मप्र की तीनों बिजली कंपनियां घाटे में चल रही, मध्य पूर्व क्षेत्र कंपनी के 1,678 07 करोड डूबत खातें में

जबलपुर, प्रदेश की तीनों बिजली कंपनिया जबर्दस्त घाटे में चल रही हैं। तीनों कंपनियों में जबलपुर रीजन में काम करने वाले मध्य पूर्व क्षेत्र विद्युत कंपनी सर्वाधिक घाटे में है। घाटे में चल रही बिजली कंपनियों ने करोड़ो रूपये की रकम एनपीए (डूबत खाते) में डाल दी है। बिजली कंपनियों ने जितनी रकम डूबत खाते में डाली है उतनी रकम कुल राजस्व का दस प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा है। रकम को डूबत खाते में डालने का जो प्रावधान टेरिफ अधिनियम के तहत है उसके अनुसार कुल राजस्व का १ प्रतिशत हिस्सा ही डूबत खाते में डालने की अनुमति है पर तीनों कंपनियों ने इस प्रावधान के विपरीत कुल राजस्व का १० प्रतिशत से अधिक हिस्सा डूबत खाते में डाल दिया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछली विद्युत नियामक आयोग ने कुल ६ करोड़ ही डूबत खाते में डालने की अनुमति तीनों बिजली कंपनियों को प्रदान की थी। तीनों कंपनियों की इतनी बड़ी रकम डूबत खाते में चला जाना विमं की सेहत के लिये अच्छा नहीं है। बिजली कंपनियां छोटे बकायादारों और ईमानदार उपभोक्ताओं की गर्दन पर शमशीर रखकर वसूली कर रहीं और बड़े डिफाल्टरों के साथ याराना निभाकर उनकी बकाया रकम को वसूलने की जगह एनपीए यानि डूबत खाते में डाला जा रहा है। शक्ति भवन से जो खबर निकलकर सामने आई है उसके अनुसार करीब ५० हजार करोड़ के घाटे में चल रही मप्र की तीनों बिजली कंपनियों ने ३,२१२.१२ करोड़ रुपए की राशि की वसूली न कर पाने की स्थिति में बट्टे खाते (एनपीए) में डाल दी है। इनमें सर्वाधिक राशि १,६७८ करोड़ मप्र पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी की शामिल हैं। बिजली मामलों के जानकारों का दावा कि कंपनियों ने पिछले दरवाजे से बड़े डिफाल्टरों की राशि माफ कर दी है। मप्र पावर मैनेजमेंट लिमिटेड ने तीनों पूर्व, मध्य और पश्चिम विद्युत वितरण, विद्युत कंपनी की ओर से वर्ष २०१८-१९ की ट्रूअप पिटीशन में डूबत खाते में राशि डालने की अधिकृत जानकारी दी है। कंपनी ने यह पिटीशन मप्र विद्युत नियामक आयोग को सौंपी है। उसने इस राशि की भरपाई उपभोक्ताओं से बिजली दरें बढ़ाकर करने से की है। कंपनियों का दावा है कि जो ३,११२ करोड़ की राशि एनपीए में डाली है, उनमें से करीब ८०त्न राशि सरकारी योजनाओं से जुड़ी है। सरकार की घोषणाओं के आधार पर कंपनियों ने उपभोक्ताओं को राहत दीए लेकिन सरकार ने इसकी भरपाई नहीं की। इससे कंपनी का घाटा बढ़ गया, जिसके चलते यह राशि बट्टे खाते में डाली गई।

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