स्वास्थ्य जगत

ब्रेन स्ट्रोक से कैसे बचें
ब्रेन स्ट्रोक जो बन जाता है स्थाई विकलांगता का कारण उससे बचने के लिए जरुरी है कि आप नियमित ब्यायाम करें और चिकित्सकों की सलाह पर इलाज करवाएं। गौरतलब है कि दुनिया भर में कोरोनरी धमनी रोग के बाद मृत्यु का दूसरा सबसे आम कारण है ब्रेन स्ट्रोक। ब्रेन स्ट्रोक स्थाई विकलांगता का भी सबसे प्रचलित कारण बन चुका है। हर साल स्ट्रोक के सभी मामलों में 20 से 25 फीसदी मामले भारत के बताए जाते हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन यानी आईएमए के मुताबिक ब्रेन स्ट्रोक इस आधुनिक युग में महज वृद्धों तक सीमित नहीं है, बल्कि लाइफस्टाइल बदलने की वजह से अब 40 साल की उम्र से पहले ही लोग इस बीमारी के शिकार हो जाते हैं। जानकारों की मानें तो ब्रेन स्ट्रोक तब होता है, जब आपके मस्तिष्क के किसी हिस्से में खून की सप्लाई ठीक से नहीं हो पाती है। इस कारण मस्तिष्क के ऊतकों को ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं मिलते और इस कारण मस्तिष्क की कोशिकाएं मृतप्राय: होने लगती हैं। इसके बाद ही हम ब्रेन स्ट्रोक जैसी बीमारी के शिकार हो जाते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार यदि समय रहते इलाज शुरू नहीं किया गया तो हर सेकेंड में लगभग 32,000 मस्तिष्क कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने का अंदेशा रहता है। लगभग 85 प्रतिशत स्ट्रोक इस्केमिक प्रकृति के होते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार देश में ब्रेन स्ट्रोक के लिए जिम्मेदार कुछ सामान्य कारकों में उच्च रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान और डिसलिपिडेमिया आदि हैं। हैरानी की बात तो यह है कि आज भी हमारे देश में स्ट्रोक के इलाज के लिए कोई उचित व्यवस्था मौजूद नहीं है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ब्रेन स्ट्रोक एक आपातकालीन स्थिति है, जिसका समय पर इलाज करना बेहद जरूरी होता। इसलिए ब्रेन स्ट्रोक से बचने के उपायों पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके तहत प्रत्येक दिन लगभग 30 मिनट तक व्यायाम किया करना चाहिए। यदि वजन बढ़ रहा है तो उसे कम करने की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। सिगरेट, पान और तंबाकू का सेवन पूरी तरह बंद करना। अपनी ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रण रखें और अंत में सबसे जरुरी है कि आप जितना हो सके तनाव से दूर रहें। इन उपायों के जरिए सामान्यतौर पर ब्रेन स्ट्रोक होने से बचा जा सकता है, फिर भी किसी प्रकार की कोई शिकायत होने पर तुरंत चिकित्सक को दिखाया जाना उचित होगा और पूर्ण इलाज किया जाना चाहिए।

खांसी और डाइजेशन को ठीक करेगा अदरक
सर्दियों में अदरक की चाय पीने का अपना ही मजा है, लेकिन आपको बतला दें कि अदरक गले से जुड़ी किसी भी समस्या में बहुत फायेदमंद होता है। चूंकि अदरक हर रसोई में आसानी से मिलने वाली चीज है तो इसके इस्तेमाल से जुड़ी जानकारी भी आपको होनी ही चाहिए। दरअसल अदरक डाइजेशन को ठीक रखता है और पेट की बीमारियों में भी फायदेमंद होता है। बावजूद इसके क्‍या आप जानते हैं कि अदरक के टुकड़े के साथ जरा सा नमक खाने से इसका फायदा दोगुना हो जाता है और कफ या बलगम की समस्या से तुरंत राहत देता है। दरअसल अदरक, श्वास नली के संकुचन में हो परेशानी को दूर करता है, जिससे मरीज को फोरन राहत मिलती है। इससे सूखी खांसी को दूर करने में भी मदद मिलती है। अदरक में मौजूद एंटीऑक्‍सीडेंट गले और सांस लेने वाली नली में जमा टॉक्‍सिन को साफ करता है और कफ को बाहर निकालता है। यही नहीं अदरक में ऐसे गुण होते हैं, जो अस्‍थमा और ब्रोंकाइटिस से भी निजाद दिलवा सकते हैं। यदि अदरक में नमक मिला दिया जाए तो इसकी ताकत दोगुनी हो जाती है क्‍योंकि नमक गले में फसे म्‍यूकस को निकालने में तेजी से मदद भी करता है और बैक्‍टीरियल ग्रोथ को रोकने में सहायक होता है। अदरक और नमक का सेवन करने के लिए पहले अदरक को छील कर धो लें और छोटे पीस में उसे काट लें, फिर उस पर थोड़ा सा नमक छिड़के। अब इसे चबाएं और इसका रस निगल लें। उसके बाद शहद चाट लें ऐसा करने से अदरक का कसैला स्वाद चला जाएगा।

ठंड में इन्हें खालीपेट नहीं खाएं क्योंकि होता है नुक्सान
अब जबकी ठंड ने दस्तक दे दी है तो खान-पान पर विशेष ध्यान रखना होगा। इस मौसम में कुछ भी खाली पेट खाकर काम चलाने वाली आदत आपको परेशानी में डाल सकती है। सेहत पर भारी पड़ने वाले इस खान-पान से बचा जाना चाहिए। इस मौसम में विशेषज्ञ जिन चीजों को खाली पेट खाने से मना करते हैं, उनमें प्रमुखत: सॉफ्ट ड्रिंक, मसालेदार खाना, खट्टे फल मुख्य हैं। इस संबंध में किए गए शोध ने भी इस बात को साबित किया है। इसके मुताबिक सुबह-सुबह खाली पेट ब्रेकफास्ट में कभी भी स्पाईसी या बहुत मिर्च-मसाला वाला खाना नहीं खाना चाहिए। इससे दिनभर पेट में एसिडिटी की शिकायत रहती है और अल्सर के भी होने का अंदेशा हो जाता है। इसी तरह सॉफ्ट ड्रिंक्स खास तौर से कोल्ड ड्रिंक्स खाली पेट कभी भी नहीं पीना चाहिए। इनमें उच्च मात्रा में कार्बोनेट एसिड होता है। यह पेट के एसिड से मिलकर गंभीर परेशानियां पैदा कर देता है। इसकी वजह से आपको गैस और मतली या उल्टी आने की समस्या भी हो सकती है। इसके साथ ही खाली पेट ठंडी चीजें जिन्हें कोल्ड बेवरेज कहते हैं, नहीं पीने चाहिए। जैसे कि कोल्ड कॉफी या कोल्ड ड्रिंक्स आदि। यह आपके पेट के मुकस मेम्ब्रेन यानी कि पेट की उस झिल्ली को क्षति पहुंचाता है। यह पाचन क्रिया में मददगार होती है और इसमें नुक्सान होने से डायजेशन धीमा हो जाता है। इसकी जगह आप गर्म ग्रीन टी या हल्का गर्म पानी पी कर अपने दिन की शुरुआत कर सकते हैं। इस मौसम में खाली पेट खट्टे फल भी नहीं खाने चाहिए। जैसे कि संतरा, नींबू, अमरूद आदि खाली पेट नहीं खायें क्योंकि ये पेट में एसिड बनाते है। यह बात सही है कि इससे आपको फाइबर और फ्रुक्टोज भी मिलेगा, लेकिन इससे आपका पाचन तंत्र भी धीमा हो जाएगा। इसलिए सलाह दी जाती है कि इन्हें खाली पेट न लिया जाए।

 

चर्मरोगों को इस प्रकार रखें दूर
शरीर की अगर सही प्रकार से सफाई न हो तो कई प्रकार के चर्मरोग हो जाते हैं। इससे पीड़ित को शारीरिक कष्ट के साथ ही मानसिक पीड़ा का भी सामना करना पड़ता है। यह रोग पूरे शरीर की चमड़ी पर कहीं भी हो सकता है। अनियमित खान-पान, दूषित आहार, शरीर की सफाई न होने एवं पेट में कृमि के पड़ जाने और लम्बे समय तक पेट में रहने के कारण उनका मल नसों द्वारा अवशोषित कर खून में मिलने से तरह तरह के चर्मरोग सहित शारीरिक अन्य बीमारियां पनपने लगती हैं जो इंसान के लिए अति हानिकारक होती है। इससे पीड़ित को समाज में भी अलग-थलग कर दिया जाता है।
चर्मरोग कई प्रकार के होते हैं।
दाद में खुजली बहुत ज्यादा होती है की आप उसे खुजाते ही रहते हैं। खुजाने के बाद इसमे जलन होती है व छोटे-छोटे दाने होते हैं। वहीं
खुजली
इसमें पूरे शरीर में सफेद रंग के छोटे-छोटे दाने हो जाते हैं। इन्हें फोड़ने पर पानी जैसा तरल निकलता है जो पकने पर गाढ़ा हो जाता है। इसमें खुजली बहुत होती है, यह बहुधा हांथो की उंगलियों के बीच में तथा पूरे शरीर में कहीं भी हो सकती है। इसको खुजाने को बार-बार इच्छा होती है और जब खुजा देते है तो बाद में असह्य जलन होती है। यह संक्रामक रोग है। रोगी का तौलिया व चादर उपयोग करने पर यह रोग आगे चला जाता है, अगर रोगी के हाथ में रोग हो और उससे हांथ मिलायें तो भी यह रोग सामने वाले को हो जाता है।
इन बीमारियों को घ्ररेलू इलाज के जरिये भी ठीक किया जा सकता है। दाद, खाज, खुजली, एग्जिमा होने पर अकौता, अपरस का मरहम गन्धक 10 ग्राम, पारा 3 ग्राम, मस्टर 3 ग्राम, तूतिया 3 ग्राम, कबीला 15 ग्राम, रालकामा 15 ग्राम। इन सब को अच्छे से मिला कर एक शीशी में रख लें। दाद रोग में मिट्टी के तेल (केरोसीन) में लेप बनाकर लगाएँ, खाज में सरसों के तेल के साथ मिलाकर सुबह-शाम लगायें। अकौता एग्जिमा में नीम के तेल में मिलाकर लगायें। यह दवा 10 दिन में ही सभी चर्मरोगो में पूरा आराम देती है।
चर्म रोग नाशक अर्क
शुद्ध आंवलासार गंधक, ब्रह्मदण्डी, स्वर्णछीरी की जड़, भृंगराज का पंचांग, नीम के पत्ते, बाबची, पीपल की छाल, इन सभी को 100 -100 ग्राम की मात्रा में लेकर व 10 ग्राम छोटी इलायची जौ के साथ 3 लीटर पानी में भिगो दें। सुबह इन सभी का अर्क निकाल लें। यह अर्क 10 ग्राम की मात्रा में सुबह खाली पेट मिश्री के साथ पीने से समस्त चर्म रोगों में लाभ करता है। इसके प्रयोग से खून शुद्ध होता है। इसके सेवन से चेहरे की झाइयाँ, आँखों के नीचे का कालापन, मुहासे, फुन्सियां, दाद, खाज, खुजली, अपरस, अकौता, कुष्ठ आदि समस्त चर्मरोगों में पूर्णतः लाभ होता है।

सुपारी से मुंह के कैंसर का खतरा
सुपारी सभी जगह नही उगती लेकिन इससे सभी परिचित है| जिस जगह पानी अधिक होता है सुपारी वही उगती है| यह मन को प्रसन्न रखती है साथ ही कफ,पित आदि को दूर करने वाली होती है| दुनिया भर में लाखों लोग सुपारी का सेवन करते है| सुपारी जो दुनिया के कई क्षेत्रों खायी जाती है वो दो अलग-अलग वनस्पति का एक मिश्रण है|
एक कच्ची सुपारी दूध में घिस कर पीने से पेट सभी कृमि (कीड़े) मर जाते है|
आमतौर पर सुपारी चबाने से ज्यादा लार आती है। कुछ लोग ज्यादा लार को या तो थूक देते है या निगल लेते है। परंपरागत रूप से सुपारी मौखिक स्वच्छता, भूख और लार के उत्पादन के लिए फायदेमंद होती थी। अब वैज्ञानिकों को पता चला है कि सुपारी चबाने से मुंह के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है और यह प्रतिकूल गर्भ में बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
वहीं सुपारी के कई रूप उपयोगी भी है हालांकि ज्यादातर रूप जोखिम भरे और अस्वस्थ करते है। सुपारी एशियाई महाद्वीप के दक्षिण प्रशांत द्वीप समूह, दक्षिण पूर्व एशिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश में एक साइकोएक्टिव ड्रग के रूप में लोकप्रिय है।

 

जब जल जायें तो करें ये घरेलू उपाय
अगर आप कहीं भी काम करते समय अचानक जल जायें तो कुछ घरेलू उपाय आपको तत्काल राहत दे सकते हैं। जब भी किसी कारण से त्वचा जल जाए, तो तुरंत उस पर ठंडा पानी डालें, ताकि फफोले ना पड़ सकें। इसके बाद भी आप जले हुए स्थान पर ठंडे पानी में कपड़ा भिगोकर लपेट दें, ताकि यह खतरा और भी कम हो जाए।
जलने पर एलोवेरा काफी फायदा पहुंचाता है। प्राथमिक उपचार के तौर पर इसका प्रयोग जले हुए स्थान पर किया जा सकता है। इसेक बेहतर परिणाम प्राप्त होंगे। पानी या दूध से घाव को धोने के बाद एलोवेरा को जले हुए स्थान पर लगाएं। जले हुए स्थान पर आलू या आलू का छिलका लगाकर रखने से भी जलन से राहत मिलेगी और ठंडक मिलेगी। इसके लिए आलू को दो भागों में काटकर उसे जख्म पर रखें। जलने के तुरंत बाद यह करना काफी फायदेमंद होगा। जले हुए स्थान पर तुरंत हल्दी का पानी लगाने से दर्द कम होता है और आराम मिलता है। इसलिए इसे प्राथमिक उपाचार के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है।
शहद का प्रयोग भी जले हुए स्थान पर करने से लाभ होता है, क्योंकि यह एक अच्छा एंटीबायोटिक होता है। यह घाव के कीटाणुओं को खत्म करने में सहायक होता है। इसके लिए शहद को पट्टी पर लेकर पट्टी को घाव पर रख दें और इस पट्टी को दिन में दो से तीन बार जरूर बदलें।
जले हुए स्थान पर टी-बैग रखने से भी आपको काफी राहत मिलेगी। इसके लिए टी-बैग को फ्रि‍ज या ठंडे पानी में कुछ देर रखने के बाद घाव पर लगाएं। इसमें टैनिक अम्ल होता है, जो घाव की गर्मी को कम की उसे ठीक करने में मदद करता है।
जले हुए हिस्से पर तुलसी के पत्तों का रस लगाना भी बेहद असरकारक होता है। इससे हुए वाले भाग पर दाग बनने की संभावना कम होती है।
तिल का उपायोग भी जलने पर राहत पहुंचाने में सहायक है। तिल को पीसकर जले हुए स्थान पर लगाने से जलन और दर्द नहीं होगा। तिल लगाने से जलने वाले हिस्से पर से दाग-धब्बे भी समाप्त होते हैं।
जल जाने पर टूथपेस्ट भी एक कारगर उपचार है जिससे जलन तो कम होती ही है, साथ ही त्वचा पर फफोले भी नहीं पड़ते। इसलिए जलने पर कुछ उपलब्ध न हो तो तुरंत टूथपेस्ट लगा लिजिए।
जलने पर तुरंत पानी में नमक डालकर गाढ़ा घोल बनाएं, और प्रभावित स्थान पर लगाएं, इससे ठंडक भी मिलेगी और त्वचा फफोले भी नहीं पड़ेंगे। जले हुए स्थान पर तुरंत मीठा सोडा डालकर रगड़ने से भी फफोले नहीं पड़ते और बिल्कुल जलन नहीं होती।

मधुमेह को लेकर जागरुकता की कमी
भारत में डा‍यबिटीज (मधुमेह) को लेकर जागरुकता की कमी देखी गई है। मधुमेह एक ऐसा रोग है जो अंदर ही अंदर आपको खोखला कर देता है। इससे शरीर में कई गंभीर रोगों का भी खतरा रहता है। इसमें शरीर में बने घाव नहीं भरते और जान का भी खतरा बना रहता है। इसमें शरीर में शुगर का स्तर बढ़ जाता है और एक स्तर से आगे होने पर इंसुलिन के इंजेक्शन लेने पड़ते हैं।
इसके बाद भी शुगर नियं‍त्रण और इससे जुड़ी बीमारियों को लेकर लोगों की जानकारी बेहद कम है। इस मामले में कराये गए एक अध्‍ययन से पता चला है कि 40 फीसदी लोगों को शुगर के सामान्‍य स्‍तर का पता नहीं है। यही नहीं डायबिटीज के लिए हर तीन महीने में करवायी जाने वाली औचक जांच (एचबीएवनसी) के बारे में केवल दस फीसदी लोग ही जानते हैं। बीमारी की कम जानकारी की वजह से डायबिटीज के करीब 50 फीसदी मरीज दिल की बीमारी के करीब हैं।
डायबिटीज प्रबंधन के क्षेत्र में काम कर रहे एक अध्‍ययन के अनुसार 30 से 40 साल की उम्र के 45 फसदी लोग डा‍यबिटीज से पहले की अवस्‍था यानी प्री डायबिटीज को गंभीरता से नहीं लेते हैं। यह वह स्थिति होती है जब साधारण जांच में शुगर का स्‍तर सामान्‍य से अधिक पाया जाता है।
शुगर नियंत्रण को लेकर लोग गंभीर नहीं रहते हैं। डायबिटीज प्रबंधन की जानकारी दस प्रतिशत मरीजों को भी नहीं है। यही कारण है कि डायबिटीज की पहचान होने के पांच से आठ साल के अंदर मरीजों को दिल की धमनियों की बीमारी हो जाती है।
अध्‍ययन में पाया गया कि वर्ष 2008 में डायबिटीज के लिए पंजीकृत 50 प्रतिशत मरीज दिल की बीमारी के करीब हैं। इनके खून में साधारण कोलेस्‍ट्रॉल का स्‍तर अधिक देखा गया, जबकि 67 प्रतिशत को इस बात की जानकारी नहीं है कि डायबिटीज उनके शादीशुदा जीवन को भी प्रभावित करती है।

क्या होता है डायलिसिस
डायलिसिस को हिन्दी में अपोहन कहते हैं। डायलिसिस खून साफ करने की एक कृत्रिम विधि है इस प्रक्रिया को तब अपनाया जाता है जब किसी रोगी का किडनी। वृक्क, गुर्दे सही से काम नहीं करता है। जब हमारी किडनी सही ढंग से काम नहीं करता है ऐसे में विषैले पदार्थों (क्रिएटिनिन और यूरिया) का शरीर से बाहर नहीं निकलना कठिन हो जाता है। विषैले पदार्थों की जब मनुष्य के शरीर बढ़ जाता है, तो डायलसिस की आवश्यकता पड़ती है।
किडनी फेल होने के लक्षण
जब गुर्दे की कार्य क्षमता 80-90 % तक घट जाती है इसमें पेशाब का बनना बहुत कम हो जाता है जिससे विषाक्त पदार्थों का शरीर में जमा होने से थकान सूजन, मतली उल्टी और सांस फूलने जैसे लक्षण दिखाई दे सकता है। ऐसे समय में सामान्य चिकित्सा प्रबंधन यानि दवाई अपर्याप्त हो जाता है और मरीज़ को डायलिसिस शुरू करने की जरूरत होती है।

 

नियमित रुप से करायें दांतों की जांच
भारत में दांतों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता है। हाल ही में किए गए एक अध्ययन से संकेत मिलता है कि लगभग 95 प्रतिशत भारतीयों में मसूड़ों की बीमारी है, 50 प्रतिशत लोग टूथब्रश का उपयोग नहीं करते और 15 वर्ष से कम उम्र के 70 प्रतिशत बच्चों के दांत खराब हो चुके हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के अनुसार, भारतीय लोग नियमित रूप से दंत चिकित्सक के पास जाने की बजाय, कुछ खाद्य और पेय पदार्थो का परहेज करके स्वयं-उपचार को प्राथमिकता देते हैं। दांतों की सेंस्टिविटी एक और बड़ी समस्या है, क्योंकि इस समस्या वाले मुश्किल से चार प्रतिशत लोग ही दंत चिकित्सक के पास परामर्श के लिए जाते हैं।
तनाव का दांतों की सेहत पर बुरा प्रभाव
आईएमए के विशेषज्ञों के अनुसार, “तनाव का दांतों की सेहत पर बुरा असर होता है1 तनाव के चलते कई लोग मदिरापान और धूम्रपान शुरू कर देते हैं, जिसका आगे चलकर दांतों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। जागरुकता की कमी के चलते ग्रामीण इलाकों में दांतों की समस्या अधिक मिलती है। शहरों में जंक फूड और जीवनशैली की अन्य कुछ गलत आदतों के कारण दांतों में समस्याएं पैदा हो जाती हैं। प्रसंस्कृत भोजन में चीनी अधिक होने से भी नई पीढ़ी में विशेष रूप से दांत प्रभावित हो रहे हैं।”
रक्तस्राव को न करें नजरअंदाज
दांतों में थोड़ी सी भी परेशानी को अनदेखी नहीं करनी चाहिए और जितनी जल्दी हो सके, दंत चिकित्सक से मिलना चाहिये। दांत दर्द, मसूड़ों से रक्तस्राव और दांतों में सेंस्टिविटी को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। वयस्कों के अलावा, दांतों की समस्याएं बच्चों में भी आम होती है। दूध की बोतल का प्रयोग करने वाले शिशुओं के आगे के चार दूध के दांत अक्सर खराब हो जाते हैं।”
दूध की बोतल भी है नुकसानदेह
दूध की बोतल से भी बच्चों के दांत खराब हो सकते हैं। इसलिए माताओं को हर फीड के बाद एक साफ कपड़े से शिशुओं के मसूड़े और दांत पोंछने चाहिए। अगर अनदेखा छोड़ दिया जाए तो दंत संक्रमण से हृदय संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं।”
दांतों की देखभाल के उपाय
दो बार ब्रश करें।
फ्लॉसिंग उन दरारों को साफ करने में मदद करता है जहां ब्रश नहीं पहुंच पाता है।
बहुत अधिक चीनी खाने से बचें। स्टार्चयुक्त खाद्य पदार्थ भी दांतों के क्षय का कारण बन सकते हैं, क्योंकि चीनी लार में जीवाणुओं के साथ प्रतिक्रिया करके एसिड बनाती है जो दांतों के इनेमल को नष्ट कर देता है।
जीभ को भी रखें साफ
किसी भी असामान्य संकेत की उपेक्षा न करें। यदि मसूड़ों में सूजन हो या खून आ जाए तो दंत चिकित्सक से परामर्श करें।
दांतों की जांच हर छह महीने में कराएं। दांतों की सफाई और एक वर्ष में दो बार जांच-पड़ताल आवश्यक है।

अब एचआईवी का इलाज होगा आसान
अब शोधकर्ताओं ने एचआईवी का आसान इलाज खोज लिया है। यह 99% तक एचआईवी वायरस को खत्म कर सकता है। यू.एस. नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ और फार्मास्युटिकल फर्म सनोफी के शोधकर्ताओं ने ये दावा किया कि उन्होंने एक ऐसा एंटीबॉडी तैयार किया है जो ना सिर्फ 99% एचआईवी वायरस पर वार करता है बल्कि ये प्राइमेट्स में इंफेक्शन को रोकने का काम भी करता है।ये एंटीडोट घातक वायरस के तीन हिस्सों पर वार करता है जिससे इस वायरस का प्रभाव अधिक से अधिक कम हो सके।
इंटरनेशनल एड्स सोसाइटी (आईएएस) ने इस एंटीडोट, जिसे ‘इंजीनियर एंटीडोट’ के नाम से जाना जाता है, को एचआईवी का प्रभावी इलाज माना जा रहा है। सनोफी के चीफ डॉ. गैरी नेबेल का कहना है कि किसी भी अन्य एंटीडोट चाहे वे खोजे गए हैं या नैचुरल हैं उनके मुकाबले ये बहुत ही शक्तिशाली और उपयोगी है। हमने रिसर्च के दौरान देखा है कि ये 99% तक सही रूप से काम कर रहा है। वैज्ञानिकों ने एंटीबॉडीज को खत्म करने के लिए पहली बार इसका इलाज इस तरह से करने का प्रयास किया है। इंसान पर इसके प्रयोग की संभावना अगले साल तक शुरू होगी ताकि यह पता लगाया जा सके कि इंसान के शरीर में एचआईवी संक्रमण को रोकने या उसके इलाज में इसका क्या योगदान हो सकता है।

माइग्रेन से जबड़े की बीमारी होने का खतरा तीन गुना ज्यादा
माइग्रेन से पीड़ित लोगों में जबड़े की गंभीर बीमारी होने की आशंका तीन गुना तक बढ़ जाती है। एक शोध में यह बात सामने आई। शोधकर्ताओं ने कहा कि शोध के निष्कर्षो से पता चला है कि टेम्पोरोमैंडिबुलर डिसऑर्डर (टीएमडी) सीधे तौर पर माइग्रेन पैदा न कर जबड़े के जोड़ों को प्रभावित करता है हालांकि टीएमडी, माइग्रेन के एक हमले की तीव्रता को बढ़ा सकता है। ब्राजील के साओ पाउलो विश्वविद्यालय में शोधकर्ता और प्रमुख शोध लेखक लीडियान फ्लोरेंसियो ने कहा कि माइग्रेन बहुत से कारणों के साथ एक न्यूरोलॉजिकल डिजीज़ है, जबकि टीएमडी, गर्दन का दर्द और ब्रेन सेल संबंधी अन्य विकार माइग्रेन से ग्रस्त मरीजों की सेंसेविटी और रोग को बढ़ाता है। टेम्पोरोमैंडिबुलर जोड़ जबड़े को स्कल की हड्डी से जोड़ते हुए कब्जे के समान कार्य करता है, इसलिए चबाने और जोड़ों के तनाव में कठिनाई विकार के लक्षण में शामिल हैं।उन्होंने कहा कि माइग्रेन के हमले बार-बार होने से दर्द बढ़ सकता है।
अध्ययन के लिए टीम ने 30 साल के आसपास उम्र की महिलाओं पर गौर किया, जिनका किसी तरह का कोई पुराना माइग्रेन या एपिसोडिक माइग्रेन या माइग्रेन का इतिहास नहीं था जिन्हें माइग्रेन की शिकायत नहीं थी, उनमें 54 प्रतिशत टीएमडी के लक्षण पाए गए, जबकि हाल ही में माइग्रेन की शिकार हुई महिलाओं के साथ 80 प्रतिशत और पुराने माइग्रेन वाली महिलाओं में इसके 100 प्रतिशत लक्षण पाए गए। शोधकर्ताओं ने कहा है कि माइग्रेन से पीड़ित लोगों में टीएमडी होने की प्रबल संभावना रहती है, जबकि टीएमडी ग्रस्त लोगों में जरूरी नहीं कि उन्हें माइग्रेन हो।

ज्यादा नमक से बीपी ही नहीं डायबीटीज का भी खतरा
नमक के बिना खाने का स्वाद नहीं है। यह शरीर के लिए जरुरी है पर इसकी अधिकता हमें जानलेवा रोगों का शिकार बना देती है। सभी जानते हैं कि ज्यादा नमक खाने से ब्लड प्रेशर की समस्या होती है पर हाल ही में हुए एक ताजा अध्ययन में हैरान करने वाला खुलास हुआ है। इसमें कहा गया है कि ज्यादा नमक खाने से डायबीटीज होने का खतरा भी बढ़ जाता है। प्रत्येक 2.5 ग्राम अतिरिक्त नमक के सेवन से टाइप 2 डायबीटीज का खतरा 43 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। रिसर्च में बताया गया है कि जो लोग हर दिन तकरीबन 7.3 ग्राम नमक का सेवन करते हैं, इनमें उन लोगों के मुकाबले डायबीटीज का खतरा ज्यादा होता है जो लोग हर दिन 6 ग्राम तक नमक का सेवन करते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि नमक में मौजूद सोडियम इंसुलिन प्रतिरोध पर सीधा असर डालता है। इस वजह से हाई ब्लड प्रेशर और वजन बढ़ने जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। ज्यादा मात्रा में नमक का सेवन वयस्कों में लेटेंट ऑटोइम्यून डायबीटीज का खतरा बढ़ा देता है। रिसर्च के मुताबिक सोडियम के प्रभाव से लेटेंट ऑटोइम्यून डायबीटीज का खतरा हर दिन प्रति ग्राम सोडियम पर 73 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। नमक में मौजूद सोडियम इसका प्रमुख कारण है। इसलिए अपने खाने में नमक कम डालें। नमक का ज्यादा मात्रा में सेवन आपके रक्त संचरण और ब्लड प्रेशर को बिगाड़ सकता है। इसके अलावा नमक के ज्यादा सेवन से दिल की बीमारी का खतरा भी बढ़ जाता है।
ऑस्टियोपोरोसिस से बचाता है सीबीएफ-बीटा प्रोटीन
शोधकर्ताओं ने एक ऐसी प्रणाली की पहचान की है जो बताता है कि बुजुर्गो की हड्डियों में कमजोरी क्यों आ जाती है। साथ ही शोधकर्ताओं ने ऐसा तरीका खोज निकाला है, जिसके जरिए बढ़ती उम्र के साथ हड्डियां कमजोर होने के इलाज में काम आ सकता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि ऑस्टियोपोरोसिस यानी हड्डी के पतलेपन और डेंसिटी में कमी के कारण हड्डी टूटने का खतरा बढ़ जाता है। यह बुजुर्गो की एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या है। अक्सर ये हालात बोन मैरो में फैट सेल्सर की वृद्धि के साथ पैदा होते हैं। बर्मिघम के अलबामा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर यू-पिंग ली के एक अध्ययन में सामने आया है कि सीबीएफ-बीटा नामक एक प्रोटीन हड्डियों के बनने में मददगार कोशिकाओं को शरीर में बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
एक परीक्षण में पाया गया कि युवाओं की तुलना में वृद्ध लोगों की बोन मैरो सेल्स में सीबीएफ-बीटा का स्तर कम पाया गया। इस निष्कर्ष से पता चलता है कि इस प्रणाली में खराबी आने पर, कोशिकाएं हड्डियों को बनाने में मदद करना बंद कर देती हैं और फैट सेल्स को बनाने में मदद करती हैं। ली ने कहा कि सीबीएफ-बीटा नाम के प्रोटीन को बनाए रखना ह्यूमन लाइफ रिलेटिड ऑस्टियोपोरोसिस को रोकने में मदद कर सकता है।शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रणाली की जानकारी होने से कम से कम साइड इफेक्ट के साथ ह्यूमन बोन मेरो का इलाज किया जा सकता है।

सीने में दर्द को न करें नजरअंदाज
आम तौर पर हम शरीर के संकेतों पर ध्यान नहीं देते। इससे आगे चलकर हमें परेशानी उठानी पड़ती है।
छाती का दर्द होने पर गैस सोचकर इसे नजरअंदाज न करें। हर्ट अटैक के अलावा कभी-कभी कई अन्य कारणों से भी छाती में दर्द की होता है। हर बार ऐसा नहीं होता कि आपकी छाती का दर्द हर्ट अटैक का ही लक्षण हो। कभी-कभी कई अन्य कारणों से भी छाती में दर्द की समस्या जन्म लेती है। छाती में किसी भी तरह का दर्द हो, उसे नजरअंदाज करना कतई सही नहीं है। हो सकता है कि यह कोई बड़ी बीमारी की वजह से न हो लेकिन अगर आप उसे यूं ही हल्के में लेते रहे तो एक दिन आपके लिए यह गंभीर समस्या भी बन सकती है। इसलिए तत्काल डॉक्टर से मिलें।
पेट में किसी भी तरह की समस्या छाती दर्द का कारण हो सकती है। पित्त की थैली में बना गैस जब छाती की तरफ आता है तो सीने में दर्द की शिकायत उठती है। सोने के टाइम पर होने वाला यह दर्द पेट में खराबी का संकेत है।
अगर आपकी छाती के बगल किसी भी तरह का दर्द हो या फिर सांस लेने और खांसने में छाती में दर्द होना शुरू हो जाए तो यह समझ लीजिए कि आपको फेफड़े से संबंधित कोई बीमारी है।
सीने की अंदुरूनी दीवारों पर कभी-कभी सूजन का हो जाना भी दर्द का कारण हो सकता है। सीने की अंदरूनी सूजन की वजह से सांस लेने पर सीने में असहनीय दर्द होता है। इसका कारण टीबी या फिर निमोनिया हो सकता है ।
टीबी की वजह से फेफड़ों की झिल्ली में सूजन आ जाती है। ऐसे में जब भी हम सांस लेते हैं तो सूजन के हवा से रगड़ खाने पर तेज दर्द उठता है। यह चिकित्सा शास्त्र में प्ल्यूराइटिस कहा जाता है।
अगर आपके सीने की बाईं ओर दर्द हो रहा है तो यह हर्ट अटैक की वजह से भी हो सकता है। एंजाइना पिक्टोरिस की वजह से भी सीने में दर्द उठ सकता है। इसमें दिल तक रक्त की बेहद कम मात्रा ही पहुंच पाती है। इस वजह से दिल को ऑक्सीजन कम मिलता है और सांस लेने में भी दिक्कत आने लगती है।

विटामिन बी 3 से आंखों में ग्लॉकोम का खतरा होता है कम
पानी में विटामिन बी3 डालने से आंख की रोशनी कम होने की बीमारी ( ग्लॉकोम) के खतरे को कम किया जा सकता है। इससे आंखें स्वस्थ रहती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इलाज के लिए आंखों में बार-बार ड्रॉप्स डालना महंगा पड़ता है। वहीं, पानी में विटामिन बी3 डालकर पीना सुरक्षित और सस्ता तरीका है। बुज़ुर्गों के लिए हर रोज़ आंखों में दवाई डालना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में यह उपचार उनके लिए आसान है। पूरी दुनिया में करीब 80 मिलियन लोग ग्लॉकोम से पीड़ित हैं और आईड्राप्स पर निर्भर रहते हैं। यह बीमारी आंखों में एक्सट्रा प्रेशर के कारण होती है, क्योंकि इसमें नर्व्स डैमेज हो जाती हैं। फैमिली हिस्ट्री या डायबिटीज़ के कारण, ग्लॉकोम होने का रिस्क बढ़ जाता है। इसका ट्रीटमेंट आईड्रॉप्स हैं, जो सभी को सूट नहीं करते, और आंखों में जलन भी पैदा करते हैं। गंभीर मामलों में मरीज़ की सर्जरी या लेज़र थेरेपी करनी पड़ती है।
ग्लॉकोम के लक्षण
आंख में दर्द, उल्टी, आंख का लाल होना आदि। अचानक से आंख की रोशनी कम होना भी इस बीमारी का संकेत है।
वैसे तो इस बीमारी को ठीक करना मुश्किल है, लेकिन कुछ तरीके अपनाने से ऐसा ज़रूर हो सकता है कि आंखों की रोशनी ज़्यादा कम न हो। इसके लिए पहले तो इस बीमारी को पहले स्टेज में ही पकड़ लेना ज़रूरी है, क्योंकि इसमें रोशनी कम होने की प्रक्रिया बेहद धीमी रहती है। आंखों में दबाव को कम करने के प्राकृतिक तरीके।
अपनी जीवनशैली में कुछ ऐसे बदलाव करके जिनसे की आपका ब्लड प्रेशर कम हो, आंखों के दबाव को भी कम करता है। इस उपचार का कोई साइड इफेक्ट नहीं है।
अपने इंसुलिन लेवल को कम करें।
जैसे आपका इंसुलिन का स्तर बढ़ता है, यह आपके रक्तचाप का कारण बनता है, और इससे आपकी आंखों पर दबाव भी बढ़ता है। समय के साथ आपका शरीर इंसुलिन प्रतिरोधी बन जाता है। यह उन लोगों को ज़्यादा होता है, जो डायबिटीज़, मोटापा और हाई ब्लड प्रेशर के मरीज़ हैं।
इसका समाधान यह है कि आपको अपनी डाइट में चीनी और अनाज कम करना होगा। अगर आपको ग्लॉकोम है या इसके बारे में चिंतित हैं, तो आप ये सब खाने से बचें
ब्रेड, पास्ता, चावल, अनाज और आलू।
नियमित रूप से व्यायाम करें: इंसुलिन के स्तर को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है व्यायाम, जैसे- एरोबिक्स और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग। इससे इंसुलिन लेवल कंट्रोल में रहता है और आंखों की रोशनी भी बचाई जा सकती है।
ओमेगा -3 फैट सप्लीमेंट: इसे लेने से भी इस बीमारी को दूर रखा जा सकता है। डीएचए नामक ओमेगा -3 फैट आंखों के स्वास्थ्य के लिए काफी अच्छा है। यह आंखों की रोशनी नहीं जाने देता। डीएएच सहित ओमेगा -3 फैट, मछली में पाए जाते हैं, लेकिन विशेषज्ञ मछली न खाने की राय देते हैं। उनके मुताबिक इस फैटी एसिड का सबसे अच्छा स्रोत है क्रिल ऑयल।
हरी सब्जियां खाएं: ल्यूटिन और ज़ेकैक्थिन से आंखों की रोशनी बढ़ती है। ल्यूटिन हरी, पत्तेदार सब्जियों में विशेष रूप से बड़ी मात्रा में पाया जाता है। यह एंटी-ऑक्सीडेंट है और आंखों के सेल्स को खराब होने से बचाता है।
साग, पालक, ब्रोकोली, स्प्राउट्स और अंडे के पीले भाग में भी ल्यूटिन होता है लेकिन ध्यान रहे कि ल्यूटिन ऑयल में घुलता है। इसलिए इन हरी सब्ज़ियों के साथ थोड़ा ऑयल या बटर खाना भी ज़रूरी है।
अंडे का पीला भाग न्यूट्रिएंट्स से भरपूर होता है, लेकिन इसे पकाते ही इसके सारे पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं। इसलिए एक्सपर्ट्स सनी साइड अप खाने की सलाह देते हैं। ट्रांस फैट से बचें ट्रांस फैट को भी अपनी डाइट में कम करें। इससे भी आंखों की रोशनी जाने का खतरा बढ़ सकता है। ट्रांस फैट पैकेज्ड फूड्स, बेक्ड फूड्स और फ्राइड फूड्स में पाया जाता है।

इस प्रकार शुरुआत में कैंसर का पता चलेगा
कैंसर एक ऐसी जानलेवा बीमारी है जिसका इलाज बेहद ही मुश्किल और दर्दनाक है। कई तरह के कैंसर ऐसे भी होते हैं, जिनका कोई इलाज ही नहीं है। इसीलिए शुरुआत में ही लक्ष्णों को पहचानकर अगर हम डॉक्टर के पास जायें तो कैंसर की रोकथाम की जा सकती है। इसके लिए आपको थोड़ा सतर्क और जागरुक रहना पड़ेगा। अगर आपको कोई भी दिक्कत बार-बार होती है, तो इसे हल्के से नहीं लेते हुए अपने डॉक्टर से ज़रूर संपर्क करें। ये हैं कैंसर की शुरुआत भी हो सकती है।
अगर आपको अक्सर सांस लेने में दिक्कत होती है और सांस लेते वक्त आवाज़ भी सुनाई देती है, तो यह फेफडे के कैंसर की शुरुआत के संकेत हो सकते हैं।
सीने में दर्द और लंबी खांसी
कैंसर के कई मरीज़ बाजू और सीने में दर्द की शिकायत करते हैं। ये ट्यूमर और रक्त कैंसर (ल्यूकेमिया) का संकेत हो सकता है।
बार-बार संक्रमण और बुखार
ल्यूकेमिया के शुरुआती दिनों में मरीज़ को बार-बार इंफेक्शन और बुखार होता है। ऐसा इसीलिए, क्योंकि शरीर में सफेद रक्त कणों की गिनती सामान्य नहीं रहती। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति भी प्रभावित होती है ऐसे में बुखार और संक्रमण बार -बार होने लगता है।
गले का कैंसर होने पर मरीज़ को खाना निगलने में दिक्कत होती है।
बांहों के नीचे या गर्दन पर सूजन
लिम्फ नोड्स बीन्स की शेप में ग्लैंड्स होते हैं। कैंसर के शुरू होने पर यह सूज सकते हैं और अंडरआर्म के नीचे या गर्दन पर देखे जा सकते हैं।
चोट लगना और खून निकलना
ल्यूकेमिया के कारण लाल रक्त कण और प्लेटलेट्स में बदलाव हो सकता है, जिससे रक्त स्राव (ब्लीडिंग) का भी खतरा बढ़ जाता है।
हमेशा थकान रहना
जब शरीर ज़रूरत से ज़्यादा काम करता है, तब तो थकान होती ही है, पर थकान का हमेशा रहना भी कैंसर का संकेत हो सकता है।
पेट के निचले हिस्से में दर्द
कैंसर की शुरुआत में पेट के निचले हिस्से में दर्द रहता है और पेट फूला-फूला भी रहता है। यह ओवेरियन कैंसर का संकेत हो सकता है।
पेट का फूलना और वज़न बढ़ना
अगर आपका पेट अक्सर फूला रहता है और आप बिना किसी वजह के फूलते जा रहे हो, तो यह भी ओवेरियन कैंसर के लक्षण हो सकते हैं।
पीठ के निचले हिस्से में दर्द
कैंसर की शुरुआत में पीठ के निचले हिस्से में अक्सर दर्द रहता है। यह ब्रेस्ट ट्यूमर का भी लक्षण हो सकता है या लिवर कैंसर का भी। इसीलिए, अगर आपको अक्सर इस जगह दर्द रहती है, तो तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें।

डेंगू को लेकर फैली है गलत धारणाएं
देश भर में डेंगू के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. जिस तरह से डेंगू से हो रही मौतों ने दहशत फैलाई है इसको देखते हुए इससे जुड़ी भ्रांतियों और तथ्यों के बारे में भी जागरूकता फैलाना बेहद जरुरी है। आईएमए के एक विशेषज्ञ ने कहा कि डेंगू के मामले अगले एक महीने तक आते रहेंगे और इसको लेकर दहशत और अव्यवस्था फैलाने की बजाए हमें इसकी रोकथाम के बारे में जागरूकता फैलाने और इसके रोकने के तरीकों के लिए सही समय पर कदम उठाने चाहिए।
साथ ही कहा कि केवल एक प्रतिशत मामलों में डेंगू जानलेवा साबित हो सकता है। डेंगू के ज्यादातर मामलों का इलाज ओपीडी में किया जा सकता है। अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं पड़ती।
महामारी नहीं
डेंगू के कई मामले सामने आए हैं लेकिन यह महामारी के स्तर तक नहीं पहुंचा है.
यह आम धारणा है कि डेंगू के सभी मामले एक जैसे होते हैं और सभी का इलाज भी एक समान होता है जो सही नहीं है।
डेंगू को दो श्रेणियों डेंगू बुखार और गंभीर डेंगू में बांटा जा सकता है। अगर मरीज में कैपलरी लीकेज हो तो उसे गंभीर डेंगू से पीड़ित माना जाता है, जबकि अगर ऐसा नहीं है तो उसे डेंगू बुखार होता है। टाइप 2 और टाइप 4 डेंगू से लीकेज होने की ज्यादा संभावना होती है।
डेंगू से पीड़ित सभी मरीजों का अस्पताल में भर्ती होना जरूरी नहीं है। डेंगू बुखार का इलाज ओपीडी में हो सकता है और जिन मरीजों में तीव्र पेट दर्द, टैंडरनेस्स, लगातार उल्टी, असंतुलित मानसिक हालात और बेहद कमजोरी है उन्हें ही केवल भर्ती होना पड़ सकता है।
हमेशा याद रखें कि 70 प्रतिशत मामलों में डेंगू बुखार का इलाज तरल आहार लेने से हो जाता है। मरीज को साफ सुथरा 100 से 150 मिलीलीटर पानी हर घंटे देते रहना चाहिए। एक बार डेंगू होने पर दोबारा कभी डेंगू नहीं हो सकता। यह धारणा सही नहीं है।
तथ्य यह है कि डेंगू की चार किस्में हैं। एक किस्म का डेंगू दोबारा नहीं हो सकता लेकिन दूसरी किस्म का डेंगू हो सकता है। दूसरी बार हुआ डेंगू पहली बार से ज्यादा गंभीर होता है। पहली बार में केवल एजीएम या एएस1 ही पाजिटिव होगा और दूसरी बार में एजीजी भी पॉजिटिव होगा।
यह माना जाता है कि डेंगू बुखार का प्रमुख इलाज प्लेटलेट्स टरांसफ्यूजन है जो सही नहीं है। प्लेटलेट्स ट्रांसफ्यूजन की जरूरत तब होती है, जब प्लेटलेट्स की संख्या 10000 से कम होती है और ब्लीडिंग हो रही हो। ज्यादातर मामलों में प्लेटलेट्स ट्रांसफ्यूजन की जरूरत नहीं होती और यह फायदे की बजाय नुकसान कर सकता है। तरल आहार देते रहना इसके इलाज का सबसे बेहतर तरीका है। जो लोग मुंह से तरल आहार नहीं ले सकते उन्हें नाड़ी से तरल आहार दिया जा सकता है।
धारण है कि मशीन से प्राप्त प्लेट्लेट्स संख्या सटीक होती है। वास्तविकता यह है कि मशीन की रीडिंग असली प्लेटलेट्स की संख्या से कम हो सकती है।प्लेटलेट्स की संख्या का यह अंतर 30000 से ज्यादा तक का हो सकता है। केवल प्लेट्लेट्स संख्या से ही डेंगू का सम्पूर्ण और कारगर इलाज हो सकता है जबकि प्रोगनोसिस और इनक्रीज्ड कैपिलरी परमियबिल्टी की जांच करने के लिए संपूर्ण ब्लड काउंट खास कर हीमोक्रिटिक की जरूरत पड़ती है, जो सभी समस्याओं का शुरुआती केंद्रबिंदु होता है।

माइक्रोचिप से होगा क्षत-विक्षत अंगों का उपचार
ओहियो,वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसकी मदद से चोटिल और क्षतिग्रस्त अंगों को आसानी से ठीक किया जा सकेगा। इस तकनीक के कारण क्षत-विक्षत अंग भी ठीक हो सकेंगे। साथ ही, घाव भी भर सकेंगे। नसों और धमनियों को भी इस तकनीक की सहायता से ठीक किया जा सकेगा। इस तकनीक का नाम टिशू नैनोट्रांसफेक्शन (टीएनटी) है। इसमें नैनो तकनीक की मदद से त्वचा की कोशिकाओं को कई अन्य तरह की कोशिकाओं में तब्दील किया जा सकता है। फिर इन कोशिकाओं के द्वारा क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को ठीक किया जाता है। एक छोटे माइक्रोचिप के द्वारा कोशिकाओं के परिवर्तन की यह प्रक्रिया पूरी की जाती है। यह माइक्रोचिप एक सिक्के जितना बड़ा है। यह चिप जेनेटिक कोड को त्वचा की कोशिकाओं के अंदर डालता है। फिर ये कोशिकाएं अन्य तरह की कोशिकाओं में तब्दील हो जाती हैं। एक वैज्ञानिक ने बताया कि इस चिप का इस्तेमाल भी बेहद आसान है। इसे सिर्फ त्वचा पर रखना होता है और फिर एक सेकंड से भी कम समय में यह नई विशेष तरह की कोशिकाओं का निर्माण कर देता है।
ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने चूहों और सूअरों पर इस चिप का परीक्षण किया। चिप की मदद से चूहों और सुअरों की त्वचा कोशिकाओं को धमनी कोशिकाओं और नस कोशिकाओं में बदलने में कामयाबी मिली। एक हफ्ते के बाद इन नई कोशिकाओं ने धमनियों और नसों के नए उत्तकों का निर्माण किया। एक चूहे के बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके पैर को भी इस चिप की मदद से ठीक किया गया। एक अन्य प्रयोग में वैज्ञानिकों ने चूहे के दिमाग की कोशिकाओं को भी ठीक करने में कामयाबी हासिल की। इस चूहे को ब्रेन स्ट्रोक आया था। इस चिप के कारण चूहा पूरी तरह से ठीक हो गया।
इस शोध में शामिल एक वैज्ञानिक डॉक्टर चंदन सेन ने बताया, ‘इसकी कल्पना कर पाना मुश्किल है, लेकिन इसके नतीजे बिल्कुल सटीक हैं। उन्होंने दावा किया कि 98 फीसद मामलों में यह तकनीक सफलतापूर्वक काम कर रही है। इस तकनीक की मदद से हम त्वचा की कोशिकाओं को पलक झपकते ही किसी भी अंग की कोशिकाओं में बदल सकते हैं। इस प्रक्रिया के लिए एक सेकंड से भी कम का समय चाहिए होता है। यह चिप आपके शरीर में लगा नहीं रहता, अपना काम करने के बाद इसे हटा लिया जाता है। इसे हटाने के बाद कोशिकाओं की पुनर्रचना शुरू हो जाती है।’

जीन थेरेपी से होगा डायबिटीज का स्थायी इलाज
डायबिटीज,के रोगियों के लिए अब एक स्थायी इलाज मिलने की संभावना नजर आ रही है। अभी तक मधुमेह को परहेज और दवा के जरिये ही नियंत्रित किया जा रहा है। अब एक नये अध्ययन से उम्मीद की नई किरण नजर आ रही है। वैज्ञानिकों ने उम्मीद जताई है कि जीन थेरेपी से डयबिटीज का स्थायी इलाज होगा। अब तक जीन थेरेपी को चूहों में टाइप-2 डायबिटीज और मोटापे के इलाज के लिए स्किन ट्रांसप्लांट के तौर पर इस्तेमाल किया किया है।
शोधकर्ताओं ने मौजूदा इम्यून सिस्टम के साथ चूहों से चूहों का स्किन ट्रांसप्लांट का मॉडल तैयार किया है। यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शाओयांग वू का मानना है कि चूहों में जीन थेरेपी सुरक्षित और स्थिर होने की संभावना है और उन्हें उम्मीद है कि इंसानों पर भी ये थेरेपी सफल होगी।
शोधकर्ताओं ने सीआरआईएसपीआर आधारित टेक्नॉलोजी से जन्मे एक चूहे के स्किन स्टेम सेल्स में बदलाव किया ताकि सेल्स पेप्टाइड को छुपा सके जो ब्लड शुगर को कंट्रोल करता है। चूहे में सेल्स ट्रांसप्लांट करने से इंसुलिन स्राव बढ़ता दिखा और हाई-फैट डाइट से बढ़ता वजन कम दिखाई दिया और साथ ही इंसुलिन का लेवल नियंत्रि‍त होते दिखा।
ताज़ा शोध
मधुमेह के रोगियों का इम्‍यून सिस्‍टम कमजोर हो जाता है, जिसके कारण शरीर की बीमारियों से लड़ने की क्षमता प्रभावित होती है। मधुमेह उन कोशिकाओं को नष्ट कर देता है यह ब्लड शुगर की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए ज़रूरी हार्मोन इंसुलिन का निर्माण करती हैं।
ताज़ा शोध से पता चला है कि ऐसी वैक्सीन विकसित की जा सकती है जो मरीज़ों के प्रतिरोधक तंत्र को मजबूत कर सके। इसके लिए 80 मरीज़ों पर शोध किया गया।
स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर में शोधकर्ताओं ने ठीक इसके वैक्सीन का इस्तेमाल प्रतिरोधक तंत्र को हमले से बचाने के लिए किया। शोध के दौरान वैक्सीन को मरीज़ के शरीर की बीटा कोशिकाओं पर हमला करने वाली सफ़ेद रक्त कोशिकाओं पर इस्तेमाल किया गया। मरीजों को तीन महीनों तक हर हफ्ते इंजेक्शन दिए जाने के बाद शरीर में सफ़ेद रक्त कोशिकाओं की मात्रा कम हो गई।
मरीज़ों की रक्त जांच से पता चला कि वैक्सीन लेने वाले मरीज़ों के शरीर में बीटा कोशिकाएं सिर्फ़ इंसुलिन के इंजेक्शन लेने वाले मरीज़ों की तुलना में बेहतर काम कर रही थी। हालांकि प्रतिरोधक तंत्र के अन्य हिस्से पहले की तरह ही थे।
प्रोफेसर लॉरेंस स्टीनमैन ने कहा, ‘इसके नतीजों से हम बहुत उत्साहित हैं। इससे पता चलता है कि पूरे प्रतिरोधक तंत्र को नष्ट किए बिना सिर्फ़ बेकार प्रतिरोधक कोशिकाओं को नष्ट करना संभव हो सकेगा।’यह शोध अभी शुरूआती दौर में है। अभी वैक्सीन के दूरगामी परिणामों को परखने के लिए बड़ी संख्या में मरीज़ों पर इसके परीक्षण की ज़रूरत है।

टमाटर के रस से कम होती है रजोनिवृत्ति की परेशानियां
रजोनिवृत्ति और उसके बाद का समय महिलाओं के लिए काफी कठिन रहता है क्योंकि इस दौरान हार्मोन का स्राव बंद होने लगता है। इससे महिलाओं को कई शारीरिक और मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में खानपान और रहन सहन में कुछ बदलाव कर वे कई समस्याओं से राहत पा सकती हैं।
टमाटर का रस रजोनिवृत्ति के लक्षणों को कम करने में मददगार तो है ही साथ ही कोलेस्ट्रॉल और तनाव को भी नियंत्रित करता है। शोधकर्ताओं ने शोध में पाया कि आठ हफ्तों तक दिन में दो बार 200 मिलिलीटर टमाटर का रस लाभप्रद है। इस शोध में 93 महिलाओं को टमाटर का रस पीने दिया गया और उनके हृदय की गति और कई अन्य जांच की गई। इसके बाद देखा गया आया कि रजोनिवृत्ति की परेशानियां जैसे तनाव, हॉट फ्लैश आदि आधी हो गईं। यही नहीं, आराम करने के दौरान महिलाओं की ज्यादा कैलोरी भी बर्न होती है।
स्तन कैंसर का खतरा भी होता है कम
हाल ही में हुए एक अन्‍य शोध में माना गया है क‌ि रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं के लिए टमाटर का अधिक सेवन ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को भी कम करता है। टमाटर में विटामिन सी, लाइकोपीन, विटामिन, पोटैशियम भरपूर मात्रा में पाया जाता है। टमाटर में कोलेस्ट्रॉल को कम करने की क्षमता होती है। टमाटर खाकर वजन को आसानी से कम किया जा सकता है।
आखिर क्यों दी जाती है रात में हल्का खाना खाने की सलाह?
टमाटर की खूबी है कि गर्म करने के बाद भी इसके विटामिन समाप्त नहीं होते हैं। न्यूजर्सी की रटगर यूनिवर्सिटी के शोध में माना गया है कि डाइट में अधिक टमाटर के सेवन से महिलाओं के हार्मोन्स पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और यह फैट्स और शुगर को न‌ियंत्रित करने में मदद करता है।

ब्लैडर कैंसर से रहें सावधान
ब्लैडर कैंसर जानलेवा होता है इसलिए इसका इलाज समय रहते करा लें। शरीर में ब्लैडर की दीवारों के टिश्यूज के इंफैक्टेड (संक्रमित) होने से ये कैंसर आरंभ होता है। इसकी शुरुआत में ब्‍लैडर में खून के थक्के जमने आरंभ होते हैं।
इस प्रकार होते हैं शुरुआती संकेत
इसके आरंभिक लक्षणों में यूरीन के साथ खून आता है। जब ब्‍लैडर इन्‍फेक्टिड होता है तो ऐसा होता है।
ब्‍लैडर में इन्‍फेक्‍शन के कारण यूरीन करते समय जलन और तेज दर्द होता है. अगर ये लंबे समय तक बना रहे या बार-बार हो तो सचेत हो जाना चाहिए।ये एक सामान्‍य लक्षण है जो कई बड़ी बीमारियों में होता है। ये है बिना किसी वजह के तेजी से वजन कम हो जाना। अगर आपके साथ ऐसा हुआ है या हो रहा है जो इसे हल्‍के में ना लें। इसके साथ ही थोड़ा सा काम करके थक जाना और कमजोरी रहना भी इसके लक्षणों में शामिल है। यूरीन के साथ सफेद टिश्‍यूज डिस्‍चार्ज होना और पेट के निचले हिस्‍से यानी पेल्विक रीजन में दर्द बने रहना भी एक संकेत भर है।
इससे पीडि़त लोग अक्‍सर हड्डियों में लगातार दर्द रहने की शिकायत भी करते हैं।
अगर बार-बार यूरीन इन्‍फेक्‍शन हो रहा हो तो भी ये इसका एक लक्षण हो सकता है। डॉक्‍टर्स और तमाम स्‍टडीज कहती हैं कि इस बीमारी की जद में 60 साल से ज्‍यादा के लोग सबसे अधिक है।. साथ ही, ऐसे लोग जिनका वजन ज्‍यादा होता है वे भी इसके खतरे में होते हैं। शराब का सिगरेट का अत्‍यधिक सेवन करने वालों को ये कैंसर होने का खतरा अधिक होता है।

गर्भावस्था में रखें खानपान का खास ध्यान
गर्भवती महिलाओं को अपने खानपान का खास ख्याल रखना पड़ता है। इस दौरान उनके शरीर को सभी पोषक तत्वों की जरूरत होती है जिससे डिलीवरी के बाद कमजोरी नहीं आती। ऐसे में गर्भावस्था में गुड़ खाना महिलाओं के लिए बहुत फायदेमंद होता है। इसमें आयरन, कैल्शियम और फॉस्फोरस जैसे कई गुण होते हैं जो शरीर की सभी जरूरतों को पूरा करते हैं। गर्भावस्था के सांतवे महीने से सभी महिलाओं को गुड़ खाना शुरू कर देना चाहिए। आइए जानिए गर्भावस्था के दौरान गुड़ खाने से क्या-क्या फायदे मिलते हैं।
खून की कमी नहीं होती
गुड़ में मौजूद आयरन शरीर में ब्लड सेल्स बनाने में मदद करता है जिससे डिलीवरी के समय महिलाओं के शरीर में खून की कमी नहीं होती और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत होती है। भ्रूण का सही विकास होती है और रक्त भी शुद्ध रहता है। रोजाना खाने के बाद गुड़ का सेवन करने से होने वाले बच्चे की सेहत और वजन एक दम सही रहता है। गर्भावस्था में कई महिलाओं को जोड़ों में दर्द होने लगता है। ऐसे में गुड़ का सेवन करना चाहिए। इसमें मौजूद कैल्शियम हड्डियों को मजबूत करता हैं और शरीर को भी ताकत मिलती है जिससे जोड़ों में होने वाली दर्द से राहत मिलती है।
बी पी रहता है ठीक
कुछ महिलाओं को इस दौरान ब्लड प्रैशर की समस्या हो जाती है। ऐसा सिर्फ अधिक सोचने की वजह से होता है। ऐसे में गुड़ का सेवन करने से बी पी कंट्रोल में रहता है और दिल संबंधी समस्याएं भी कम होती हैं।
गर्भावस्था के दौरान अगर शरीर में पानी की कमी हो जाए तो काफी परेशानी हो जाती है। ऐसे में गुड़ में मौजूद मिनरल्स और पोटेशियम शरीर में पानी की कमी नहीं होने देते। इसके अलावा यह हाथों-पैरों में होने वाली सूजन को भी कम करता है।

लो ब्लड प्रेशर को नजरअंदाज न करें
मन और शरीर में चलने वाली उथल-पुथल का असर स्वास्थ्य पर पड़ना बहुत स्वाभाविक है। लो ब्लड प्रेशर के पीछे भी इसी तरह के कारण हो सकते हैं। ऐसे में लाइफस्टाइल और खानपान में सुधार तथा अन्य तरह से सतर्कता रखकर बहुत हद तक इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है। ब्लड प्रेशर का लो होना या हाइपोटेंशन की तकलीफ का मतलब है रक्त के दबाव का 90/60 से भी कम होना। यूं सामान्य तौर पर थोड़ा-बहुत या बिना लक्षणों के ब्लड प्रेशर का लो हो जाना कोई समस्या पैदा नहीं करता लेकिन यदि इसके लक्षण स्पष्ट नजर आने लगें और बार-बार यह तकलीफ उभरने लगे, तो यह किसी अंदरूनी समस्या की ओर इशारा हो सकता है। जैसे- मस्तिष्क, हृदय तथा अन्य प्रमुख अंगों तक रक्त के प्रवाह का अपर्याप्त होना। खासकर उम्र के बढ़ने पर इस तरह की समस्याओं के उपजने का खतरा और बढ़ सकता है।
कई बार बहुत देर तक बैठे या लेटे रहकर उठने पर या लंबे समय तक खड़े रहने पर भी ब्लड प्रेशर लो हो सकता है। इसे पोस्चरल हाइपोटेंशन कहा जाता है। कई सारी अन्य ऐसी स्थितियां हैं, जो लो ब्लड प्रेशर का कारण बन सकती हैं। इनमें गर्भावस्था, हार्मोनल समस्याएं जैसे थाइरॉइड या डायबिटीज आदि, कुछ विशेष औषधियां, अल्कोहल का अधिक सेवन, हृदय संबंधी अनियमितताएं, रक्त वाहिकाओं का चौड़ा होना या फैलना और लिवर डिसीज आदि शामिल हैं। वहीं दुर्घटना, बीमारी या किसी अन्य कारण से ब्लड प्रेशर का एकदम से बहुत लो हो जाना खतरे का संकेत भी हो सकता है।
डॉक्टर से करें सपर्क
लो ब्लड प्रेशर के शुरूआती मामले सामान्य तौर पर कोई नुकसान नहीं पहुंचाते पर इसके लक्षणों का उभरना सतर्क हो जाने का इशारा हो सकता है। ऐसे में तत्काल डॉक्टर से संपर्क करना चाहिये।
चक्कर आना या सिर घूमना। चक्कर खाकर गिर जाना। एकाग्रता में कमी होना। धुंधला दिखाई देना, उल्टी आने का अहसास होना, त्वचा का ठंडा पड़ जाना, त्वचा का चिपचिपा या पीला पड़ जाना, सांस का असामान्य होना, अधिक थकान का अनुभव होना। भोजन और जीवनशैली में परिवर्तन, इस समस्या के संदर्भ में बड़ी राहत दे सकता है।
इस प्रकार के उपाय करें
पानी भरपूर मात्रा में पीएं। इससे रक्त की मात्रा में वृद्धि होती है तथा डिहाइड्रेशन से लड़ने में मदद मिलती है
लंबे समय तक खड़े रहने या बैठने के बाद उठने पर यदि आपको समस्या होती है, तो उठने की गति को नियंत्रित करें। सुबह सोकर उठते समय तेजी से उठने की जगह पहले लेटे-लेटे कुछ गहरी सांसें लीजिए, फिर धीरे से बैठिए और फिर खड़े होइए। सोते समय सिर को थोडा ऊंचा रखना भी काफी मदद करेगा
अपने डॉक्टर के मार्गदर्शन से व्यायाम को नियमित रूप से अपनाइए
भोजन को छोटे-छोटे कई टुकड़ों में बांटकर खाइए
आलू, चावल, पास्ता, नूडल्स और ब्रैड जैसे हाई कार्बोहाइड्रेट फूड का सेवन कम से कम करें
शराब का सेवन न करें।
चाय या कॉफी का सेवन लाभ दे सकता है लेकिन इसकी मात्रा को लेकर डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें
व्हाइट फली, सादा दही, कीवी फ्रूट, आड़ू, केला, लाल शिमला मिर्च, ब्रोकली, शकरकंद, क्विनोआ, एवोकाडो आदि इस समस्या में फायदेमंद होगें।
मल पर रखें नियंत्रण
मन और शरीर में चलने वाली उथल-पुथल का असर स्वास्थ्य पर पड़ना बहुत स्वाभाविक है। लो ब्लड प्रेशर के पीछे भी इसी तरह के कारण हो सकते हैं। ऐसे में जीवनशैली और खानपान में सुधार तथा अन्य तरह से सतर्कता रखकर बहुत हद तक इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है। ब्लड प्रेशर का लो होना या हाइपोटेंशन की तकलीफ का मतलब है रक्त के दबाव का 90/60 से भी कम होना। यूं सामान्य तौर पर थोड़ा-बहुत या बिना लक्षणों के ब्लड प्रेशर का लो हो जाना कोई समस्या पैदा नहीं करता लेकिन यदि इसके लक्षण स्पष्ट नजर आने लगें और बार-बार यह तकलीफ उभरने लगे, तो यह किसी अंदरूनी समस्या की ओर इशारा हो सकता है।

बारिश के मौसम में स्वास्थ्य का रखें ध्यान
भीषण गर्मी के बाद मानसून का मौसम राहत की बारिश लाने के साथ ही ठंडक लाता है। इसमें चारों ओर हरियाली होने के साथ ही एक अलग ही अहसास होता है। इस मौसम में हमें स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि पानी खराब होने के साथ ही वातावरण में नमी से कई रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
मानसून में पाचन क्रिया धीमी गति से काम करती है, इस मौसम में तला भुना खाने का मन करता है पर ध्यान रहे इस प्रकार का खाना आपको नुकसान पहुंचा सकता है। इस मौसम में हल्का व कम मसालेदार खाना खाएं, विटामिन युक्त चीजें खाएं। बाजार के कटे हुए फल न खाएं, बासी जूस पीने से बचें। ताजा बना खाना खाएं और फस्ट फूड का सेवन जहां तक हो सके न करें।
बारिश के कारण भाप युक्त हवा चलने से हमारी पाचन प्रणाली पर प्रभाव पड़ता है। कफ जमने की शिकायत बढ़ती है। वायु, पित्त और कफ इन तीनों प्रकार के दोषों के कारण कई तरह के रोग होने की आशंका रहती है। इसलिए मौसम के दौरान ज्यादा लवणयुक्त, अम्लीय पदार्थ का सेवन करने से बचें। तिल-तेल, बैंगन, सरसों, राई का भी सेवन नहीं करना चाहिए।
खाने के साथ पीने के पानी से भी सबसे ज्यादा संक्रमण फैलता है। जी हां बरसात में डायरिया, हैजा, पीलिया और बुखार जैसी अधिकतर बीमारियां पानी के ही कारण होती हैं। इसलिए बेहतर होगा कि फिल्टर का पानी पीएं, नहीं तो पानी उबाल कर पीएं और दिन भर में ज्यादा से ज्यादा पानी पीने की कोशिश करें।
मानसून में जगह-जगह पानी जमा होने के कारण मच्छर ज्यादा पनपने लगते है। और मच्छरों की वजह से डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का सामना करना पड सकता है। इसलिए इनसे बचने के सभी उपाय अपनाएW। पूरी बांह के कपड़ें पहनें।
बरसात के मौसम में दूध और बटर मिल्क काफी हितकारी होते हैं। बटरमिल्क जहां हमारी पाचन क्रिया को दुरस्त करता है, वहीं बरसात के मौसम में रोजाना एक गिलास गर्म दूध हमें संक्रमण से बचाता है।
मानसून में नाश्ता भारी, लेकिन रात का खाना हल्का होना चाहिए। ऐसा करने से आपका पाचनतंत्र ठीक रहता है। रात को सोने से कम से कम एक घंटा पहले खाना खाएं और खाना खाने के बाद टहलना न भूलें।
डेंगू स्थिर पानी से पैदा होता है। इसलिए घर के आस-पास पानी जमा न होने दें, पानी के कंटेनरों को कवर कर दें, या खाली कर दें जिससे मच्छर पैदा न हो और आप मच्छरों के काटे जाने के जोखिम से बच सकें।
बरसात में भीग जाने पर कई रोग होने की आशंका बनी रहती है, लेकिन अगर अदरक और तुलसी के पत्तों की चाय पी ली जाएं तो किसी भी तरह का इंफेक्शन होने का खतरा टाला जा सकता है। इसके अलावा नियमित रूप से प्याज और अदरक भी हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता और पाचन क्रिया को मजबूत करते हैं।

दांत निकलते समय बच्चे को दें चबाने वाला भोजन
जब छोटे बच्चों के दांत निकलते हैं तो मसूड़ों में दर्द या खुजलाहट होती है। जिसकी वजह से वे चिड़चिड़े हो जाते हैं और बात-बात पर रोने लगते हैं। बच्चों की इस समस्या को देखते हुए माता पिता उन्हें बाजार में मौजूद प्लास्टिक और रबड़ के टीथर दे देते हैं। लेकिन यह आपके बच्चों के लिए नुकसानदायक होते हैं क्योंकि इसमें बहुत से रासायनिक पदार्थ होते हैं। पुराने समय से ही बच्चों के दांत निकलने के समय पर उन्हें नेचुरल टीथर यानी चबाने वाले खाद्य पदार्थ दिए जाते थे, ताकि बच्चे उससे चबाएं और उनका चिड़चिड़ापन कम हो जाए। आइए जानें नेचुरल टीथर के बारे में ताकि बच्चे की सेहत को न पहुंचे नुकसान।आप अपने छोटे बच्चों को नेचुरल टीथर में गाजर, मूली, चुकंदर का एक पीस चबाने के लिए दें सकते हैं। प्लास्टिक या रबड़ के टीथर की तुलना में नेचुरल टीथर सुरक्षित होते हैं। नेचुरल टीथर में गाजर, मूली, चुकंदर कड़क होते हैं जो बच्चों के मसूड़ों में अच्छी तरह से दबाव बनते हैं। फ्रोजेन गाजर का स्टिक दें अपने छोटे बच्चों के मसूड़ों को मजबूत बनाने के लिए एक गाजर लेकर उसे अच्छे से साफ करें, फिर छील कर काट लें। काटने के बाद इसे थोड़े समय के लिए फ्रिज में ठंडा होने के लिए रख दें। पर ध्यान में रखें कि गाजर की स्टिक मोटी हो। अगर गाजर की स्टिक मोटी होगी तो बच्चा इसे तोड़ नहीं पाएगा और इसे ज्यादा समय तक चबाता रहेगा। इससे उसे पौष्टिक तत्व भी मिलेंगे।

दिल टूटना बन रहा जानलेवा
दिल का टूटना भी हार्ट अटैक का एक बड़ा कारण है। इस कारण हो रही बीमारी का ब्रोकन हार्ट सिंड्रोम है। एक अध्ययन के अनुसार लंबे समय तक दिल का टूटा रहना दिल को बेहद बीमार कर सकता है। एक साल के दौरान ब्रिटेन में करीब 3 हजार मरीज ब्रोकन हार्ट सिंड्रोम से पीड़ित बताए गए जिसे आमतौर पर टाकोटसूबो सिंड्रोम भी कहा जाता है।
इस बीमारी के कारण दिल में एक लोटेनुमा आकृति बन जाती है। यह बीमारी सबसे ज्यादा महिलाओं को अपना शिकार बनाती है। जापान में एक ऑक्टोपॉस के नाम पर इस बीमारी का नाम पड़ा है क्योंकि यह उसी के आकार का होता है। भावनात्मक तनाव इस बीमारी के मुख्य कारण में से एक है। तलाक, प्यार में धोखा, किसी करीबी की मौत या फिर जीवनसाथी के साथ विवाद… ऐसी घटनाएं हैं जिनकी वजह से लोगों का खासतौर पर महिलाओं का दिल टूट जाता है।
रिसर्च के मुताबिक, अगर ज्यादा समय तक लोग दिल टूटने के दर्द के साथ जीते हैं तो उनमें इस बीमारी के लक्ष्य बढ़ जाते हैं जिसका इलाज भी आसान नहीं है। रिसर्च के मुताबिक इस बीमारी के कारण लोगों की मौत होने की बड़ी वजह मसल्स का कमजोर हो जाना है। इस रिसर्च में 52 ब्रोकन हार्ड सिंड्रोम से पीड़ित मरीजों को 4 महीने तक निगरानी में रखा गया।
इस टीम ने पाया कि एक बार बीमारी डायग्नोज़ हो जाती है तो हार्ट की स्थिति पता चल जाती है। इस बीमारी में इंसान का दिल कैसे काम करता है इस बारे में रिसर्च में बहुत कुछ सामने आया है। डॉ डॉसन बताते हैं, ’जो मरीज इस बीमारी से पीड़ित हैं उनमें बगैर किसी ईलाज कैसे परिवर्तन आता है इसके बारे में ही रिसर्च की गई है। इसमें हमने पाया है कि यह बीमारी हार्ट को काफी हद तक डैमेज कर देती है। आंकड़ें भी कहते हैं कि डायग्नोज़ होने के 5 साल के भीतर इस बीमारी से मरने वालों की संख्या 17 फीसदी तक है।’ जबकि ब्रिटेन में इस बीमारी से 90 फीसदी महिलाएं पीड़ित हैं। फाउंडेशन के प्रफेसर मैटीन बताते हैं कि इस रिसर्च के परिणामों के बाद यह सच्चाई सामने आ चुकी है कि इस बीमारी के इलाज को लेकर दुनिया भर में रिसर्च की जरूरत है। साथ ही लोगों को भी ऐसी बीमारी से बचने के लिए जागरूक होने की जरूरत है।

ज्यादा चाय बच्चों के लिए हानिकारक
हमारे यहां करीब-करीब सभी घरों में दिन की शुरूआत चाय से पीने से होती है। ऐसा माना जाता है कि चाय पीने से पाचन क्रिया अच्छी रहती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता दुरुस्त रहती है और कमजोरी दूर होती है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि चाय पीने के बहुत से फायदे हैं लेकिन एक बच्चे और वयस्क पर चाय के प्रभाव अलग-अलग प्रभाव होते हैं। कई घरों में लोग चाय में दूध की मात्रा ये सोचकर बढ़ा देते हैं कि इसी बहाने से बच्चा दूध पी लेगा। लेकिन ऐसा सोचना गलत है। हम सभी के घरों में चाय पीना बहुत सामान्य बात है। लेकिन ये बात जान लेना बहुत जरूरी है कि एक बच्चे और एक वयस्क पर चाय का असर अलग-अलग होता है। अगर आपका बच्चा बहुत अधिक चाय पीता है तो इसका असर उसके मस्तिष्क, मांसपेशियों और नर्वस सिस्टम पर भी पड़ सकता है। इसके साथ ही बहुत अधिक चाय पीने का असर शारीरिक विकास पर भी पड़ता है। बहुत अधिक चाय पीने वाले बच्चों को हो ये परेशानियां सकती हैं। इससे उनकी हड्डियां कमजोर हो सकती हैं। इसके अलावा हड्डियों खासतौर पर पैरों में दर्द की शिकायत हो सकती हैं। उनके व्यवहार में बदलाव आ सकता है। इसके अलावा चाय के सेवन से मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं।

 

 

आई-पिल को न बनायें आदत
आजकल अनचाहे गर्भधारण को रोकने के लिए युवाओं के बीच आई-पिल इमर्जेंसी कॉन्ट्रसेप्टिव (आई-पिल) का चलन आम हो गया है पर इस्तेमाल में इस प्रकार की अति इन्हें आने वाले समय में भारी पड़ सकती है। यह सही है कि पुरुष और महिलाएं अनचाहे गर्भधारण को रोकने के लिए तरह-तरह के उपाय अपनाते हैं। ऐसे में जरूरी है कि हम दोनों की जरूरतों और सहूलियतों के हिसाब से गर्भनिरोध के सही तरीकों को जान और समझ सकें हालांकि गर्भनिरोध की ज्यादातर जिम्मेदारी महिलाओं पर ही डाल दी जाती है, आई-पिल भी ऐसा ही एक उपाय है।
क्यों बढ़ रहा उपयोग
इमर्जेंसी कॉन्ट्रसेप्टिव का उपयोग करने वाले युवा इसे सेक्शुअल लिबर्टी का सिंबल मानते हैं। उन्हें लगता है कि इसकी वजह से अनचाहे गर्भ से आसानी से पीछा छुड़ाया जा सकता है। यह एक सच्चाई है कि इमरजेंसी पिल की वजह से गर्भ ठहरने के डर से मुक्ति मिल जाती है लेकिन इमर्जेंसी पिल सेफ सेक्स का विकल्प नहीं है। अगर कभी अनसेफ सेक्स हो गया है, तो इसे लिया जा सकता है, मगर इसे रुटीन का हिस्सा नहीं बनाना चाहिए। इमरजेंसी पिल का यूज करें, मिसयूज नहीं। यह सही है कि असुरक्षित सेक्स की वजह से गर्भ ठहरने और फिर अबॉर्शन के तकलीफदेह प्रॉसेस से भी इमरजेंसी पिल बचाती है। इसके अलावा, टीवी पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों में दावा किया जाता है कि यह ७२ घंटे तक कारगर रहती हैं, मगर संबंध बनाने के जितनी देर बाद इन पिल्स को खाया जाता है, इनका असर उतना ही कम हो जाता है। बेहतर होगा कि किसी भी तरह की गोली को लेने से पहले किसी डॉक्टर से सलाह लें। इसके साइड इफेक्ट्स के बारे में भी पूरी जानकारी रखें।
आई-पिल से कई गंभीर बीमारियां का खतरा
आई-पिल अनचाहे गर्भ से बचाती है पर यह भी सही है कि इसकी वजह से कैजुअल सेक्स की प्रवृत्ति के साथ ही कई तरह की बीमारियां भी बढ़ रही है। युवतियों को यह बात समझनी चाहिए कि लंबे समय तक इसका इस्तेमाल उन्हें भविष्य में गर्भधारण में पूरी तरह अक्षम बना सकता है। इसके अलावा इस पिल से उल्टी महसूस होना और वॉमेटिंग हो सकती है। पिल्स से होने वाला ये सबसे आम साइड इफेक्ट्स हैं। अगर इमर्जेंसी पिल खाने के दो घंटों के भीतर वोमेटिंग होती है, तो पिल दोबारा खानी चाहिए, वरना सुरक्षा चक्र टूट सकता है और गर्भ ठहरने की संभावना रहती है। पिल की वजह से पेट दर्द या सिरदर्द की शिकायत भी हो सकती है। ज्यादातर मामलों में ये शिकायतें पिल के लगातार इस्तेमाल से सामने आती हैं। ब्रेस्ट हेवी या फिर बहुत ज्यादा सॉफ्ट होने लगती हैं। दोनों ही वजहों से महिलाओं को आम जिंदगी में दिक्कत होती है। इमरजेंसी पिल के ज्यादा यूज से अक्सर पीरियड साइकल गड़बड़ा जाती है। हालांकि कई बार पीरियड साइकल गड़बड़ाने की दूसरी वजहें भी होती हैं, जैसे कि ओवरी में प्रॉब्लम होना, हॉर्मोंस में गड़बड़ी होना आदि। इमरजेंसी पिल यूज करने पर पीरियड कुछ ज्यादा दिन खिंच सकते हैं, मगर इन्हें लेकर परेशान होने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेन बेहतर होगा। एसटीडी का खतरा
इमर्जेंसी या दूसरी कॉन्ट्रसेप्टिव पिल एसटीडी (दूसरे पार्टनर से होने वाले यौन रोगों) के खतरे से बचाव नहीं करती। जो लोग एक ही पार्टनर के साथ सेक्स करते हैं, उन्हें तो कम रिस्क है, मगर एक से ज्यादा पार्टनर होने पर एसटीडी का खतरा ज्यादा रहता है। इमरजेंसी पिल के ज्यादा यूज की वजह से यौन संबंधी बीमारियों का रिस्क ज्यादा रहता है। इसमें भी सबसे ज्यादा खतरनाक एचपीवी ह्यूमन पैसिलोमा वायरस होता है, जो आगे जाकर सर्वाइकल कैंसर का कारण बन सकता है।

वैज्ञानिकों ने खोजी नई तकनीक, अंधे-बहरे देखेंगे टीवी 

लंदन,शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो ब्रेल को वास्तविक समय में टाइप करती है और नेत्रहीन व बहरे लोगों को बिना किसी की सहायता के टीवी देखने में मदद करती है। यूनिवर्सिडाड कालोर्स थर्ड डे मैड्रिड के शोधकर्ताओं ने एक प्रसारित हो सकने वाले ‘परवैसिव सब प्रोजेक्ट’ चलाया है, जो टेलीविजन चैनलों के उपशीर्षकों को संकलित करता है और उन्हें मुख्य सर्वर को भेजता है, जो आगे उसे फिर स्मार्टफोन और टैबलेट को भेजता है। वहां उन्हें एक एप्लिकेशन के माध्यम से अंधे-बहरे शख्स के ब्रेल लाइन को भेजा जाता है, जिससे अच्छे सिंप्रोनाइजेशन के साथ टीवी ब्रॉडकास्ट से सीधे कैप्चर हुए उपशीर्षकों की गति को नियंत्रित किया जा सकता है।
स्पेनिश ब्रॉडबैंड और दूरसंचार प्रदाता टेलीफोनिका द्वारा परवैसिवसब वित्त पोषित है। टेलीफोनिका (सस्टेनेबल इनोवेशन) के निदेशक अरांका डियाज-लाडो ने एक बयान में कहा, ‘टेलीफोनिका में हम और अधिक सुलभ कंपनी बनने का प्रयास करते हैं और इस तरह हम सभी के लिए समान अवसर पैदा कर रहे हैं और हालांकि हमें अभी लंबा सफर तय करना है…नई तकनीक और डिजिटल प्रांति हमें वहां पहुंचने में मदद करने वाला सबसे अच्छा माध्यम है।’ परीक्षण सफल रहा है और मैड्रिड के सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय डिजिटल टेरेस्ट्रियल टेलीविजन (डीटीटी) चैनलों के साथ इस सुविधा को जोड़ दिया गया है। शोधकतार्ओं का दल जरूरतमंदों को यह सुविधा मुफ्त में प्रदान कर रहा है।

हाइड्रोजन परॉक्साइड है कई रोगों की दवा
हाइड्रोजन परॉक्साइड का इस्तेमाल वैसे तो अस्पतालों और क्लिनिक्स में घावों और चोट की सफाई के लिए किया जाता है पर यह घर में भी कई काम आ सकता है। नहाते समय बाल्टी के पानी में दो या तीन चम्मच हाइड्रोजन परॉक्साइड डालने से त्वचा में मौजूद टॉक्सिन और केमिकल निकल जाते हैं। इससे त्वचा भी चिकनी और नरम रहती है। इसके दो-तीन बूंद कान में डालने से यह मैल को फुलाकर बाहर निकाल देता है। रात को सोते समय इसे पानी में मिलाकर पैरों को डुबाकर रखने से आराम मिलता है। यही नहीं बल्कि यह मुंह की बदबू दूर करने और दांतों को चमकाने में भी सहायक होता है। बस इसे इस्तेमाल करने की विधि आनी चाहिए। ये किसी भी केमिस्ट की दुकान में आसानी से मिल जाता है। हाइड्रोजन परॉक्साइड के इतने फायदेमंद हैं कि इसे हर घर में जरूर रखना चाहिए।
हाइड्रोजन परॉक्साइड एक प्रकार का रसायनिका मिश्रण हैं। जहां पानी में हाड्रोजन के 2 और ऑक्सीजन का एक एटम होता है, वहीं हाइड्रोजन परॉक्साइड में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों के ही 2-2 एटम्स होते हैं। इसके कारण इसमें मजबूत ऑक्सीडेटिव गुण आ जाते हैं जो संक्रमण दूर करने के साथ ही एंटीबैक्टीरियल के रूप में भी उपयोगी होते हैं।
यह एंटीसेप्टिक होता है और संक्रमण से बचाता है। रूई में हाइड्रोजन परॉक्साइड भिगोकर चोट और घावों में लगाते हुए सफाई कर सकते हैं। यह लाभकारी होगा और आराम भी पहुंचाता है।

जाने स्वस्थ्य रहने के छोटे उपाय

आप अपने शरीर को कुछ छोटे और आसान से उपायों से स्वस्थ रख सकते है जैसे हमेशा खाना खाने से पहले और बाद में साबुन से हाथ धोए और बाहर से आने के बाद अपना मुंह धोए इससे आपकी बाहरी त्वचा पर आ जाने वाले कीटाणु मर जाते है रोज़ाना नहाना अपने आस -पास की जगह को स्वछ रखना बारिश के मौसम में कुछ विशेष चीज़ों का ध्यान रखना जैसे मच्छर व कीड़े-मकोड़ो से अपना बचाव करना आवश्यक है. इसी तरह जिन विशेष बीमारियों का टीकाकरण होता है तो जरूर टीकाकरण करवाएं डॉक्टरों का कहना है की जल्दी सोने से भी आपकी कई बीमारिया दूर होती हे व् आप दिन भर जोशीले भी रहते है। आप कुछ-कुछ महीनो के अंतराल में अपना पूर्ण स्वास्थय परिक्षण भी करवाते रहे इससे भी आपको स्वस्थ्य रहने में मदद मिल सकती है. आप जैसे कहा गया है स्वस्थ खाने से भी स्वस्थ रह सकते है तो आप फल सब्ज़ी स्वस्थ रहने के लिए यह सब ज़रूर खाए अब आप स्वास्थ्य रहने के लिए यह टिप्स ज़रूर फॉलो करे:
1 हमेशा आपकी थाली में सब्ज़ी की मात्रा ज़्यादा हो
2. छोटे-छोटे वाक कर ते रहे जैसे -ऑफिस में सिद्दी लेना व् दर्वासा खोलने खुद जाना।
3. रोज़ाना आधे घंटे काम से काम कसरत करना।

स्वस्थ खाए और स्वस्थ रहें
आज -कल हममें से प्रत्येक खासकर युवा व् बच्चे junk food खाने के शौकीन हे वे पिज़्ज़ा ,बर्गर ,नूडल्स खाने के बहुत शौकीन है. मगर यह स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक है.वे इस बात को नज़रअंदाज़ करते हे मगर उनको भी यह सब मालूम है की इससे ब्लड कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ता है तथा अमेरिका व कई यूरोपियन देशों में इसका असर दिख चूका हे. बच्चों में छोटी उम्र से ही फैट लेवल बढ़ जाता हे व् विशेषयज्ञों का यह कहना हे की एक हफ्ते में या महीने में सिर्फ एक ही बार जंक फ़ूड ख़ाना चाहिए तो उस से ज़्यादा नुकसान नहीं होगा ज़्यादा जंक फ़ूड का सेवन करने से मोटापा बढ़ जाता हे तथा कई सारे अन्य रोग भी हो जाते है.वही दूसरी ओर जो लोग हरी सब्ज़ीया खाते हे दूध पीते हे तथा पोष्टिक आहार लेते हे वे हमेशा स्वस्थ्य रहते है. उनको दिल की बीमारी ,ब्लड कोलेस्ट्रॉल ,अत्यधिक फैट तथा अन्य रोग नहीं होते हे पोष्टिक आहार खाने वाले का रोग -प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती हे कई बार जंक फ़ूड खाना हार्ट अटैक का तक कारण बन सकता हे स्वस्थ रहने के कई और तरीके हे :
यह करना अच्छा रहे गा :
1 . रोज़ाना पैदल चलना व् कसरत करना
2. सिमित मात्रा में या जितनी भूख हो उससे कम खाना
3. रोज़ना योग करना

हार्ट अटैक पुरूषों की ही नहीं महिलाओं की भी समस्या

आमतौर पर ये माना जाता था कि हार्ट अटैक सिर्फ पुरूषों की समस्या है. लेकिन अब ये बात जाहिर हो चुकी है कि इससे महिलाएं भी नहीं बच सकी हैं.एैसे में जब अब हम ये मान रहे हैं कि हार्ट अटैक किसी को भी आ सकता है. तब जानना जरूरी है कि दिल का दौरा पडऩे पर क्या करना चाहिए.ं
ये देखा गया है कि अधिकाँश औरतों को छाती में कोई दर्द नहीं होता उन्हें हाथों और छाती में दर्द, जी मचलाना और चिपचिपी त्वचा जैसी परेशानियां लक्षण के तौर पर दिखी हैं. ये भी साफ हो गया है कि महिलाओं में मृत्यु का सबसे पहला कारण दिल की बीमारी ही है.
क्या हैं इसके लक्षण
अधिकांश महिलाएं जिन्हें हार्ट अटैक आया वे सांस लेने में परेशानी का अनुभव कर रही थी.हालाँकि पुरुषों में भी यह लक्षण होता है परंतु महिलाओं में सीने में दर्द हुए बिना सांस लेने में परेशानी जैसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है. उनके शरीर के ऊपरी भाग में दर्द रहा. मसलन गर्दन, पीठ, दांत, जबड़ा, भुजाएं तथा कंधे की हड्डी में दर्द होना हार्ट अटैक के लक्षण हैं. इसके अलावा महिलाओं में पुरूषों से हटकर जी मिचलाना, उलटी या अपचन जैसे लक्षण अधिक दिखाई देते हैं. यह अकसर इसलिए होता है क्योंकि दिल को रक्त पहुंचाने वाली दायीं धमनी जो दिल में गहराई तक जाती है, अवरुद्ध हो जाती है.
आधी महिलाएं शिकायत करती हैं कि जब उन्हें हार्ट अटैक आया तब उन्हें अचानक थकान महसूस होने लगी जिसका कोई कारण भी नहीं था. आधी महिलाओं को नींद की समस्या का सामना भी करना पड़ा. उन्हें फ़्लू जैसे लक्षण भी दिखे हैं. इधर, रजोनिवृत्ति के दौर से गुजर रही महिलाओं में अचानक पसीना आना भी प्रमुख लक्षण था. सीने में दर्द और दबाव के साथ ही चक्कर आना सिर घूमना, जबड़े में दर्द, सीने या पीठ में जलन की शिकायत भी अचानक महसूस हुई है तो फिर आपको तुरंत डॉक्टर को जाकर दिखाना चाहिए.