छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा, माता-पिता का पालन-पोषण करना पुत्र का कर्त्तव्य नहीं बल्कि धर्म

रायपुर,छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेटे की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि माता-पिता का पालन-पोषण करना पुत्र का कर्त्तव्य नहीं बल्कि धर्म है। बेटे की याचिका को खारिज कर दिया है। पुत्र ने पिता द्वारा अन्य भाइयों को पक्षकार नहीं बनाने पर परिवार न्यायालय के आदेश के खिलाफ याचिका दाखिल की थी। दरअसल,रायगढ़ निवासी गणेश कुमार जगतराम और उनकी पत्नी प्रतिभा देवी ने अपने पुत्र अखिलेश कुमार से भरण-पोषण प्राप्त करने के लिए धारा 125 के तहत परिवार न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत किया था। परिवार न्यायालय से आदेश पारित होने पर पुत्र अखिलेश कुमार ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
याचिका में कहा गया कि पिता ने दुर्भावनापूर्वक सिर्फ उस ही पक्षकार बनाया है जबकि परिवार में उनके दो और भी पुत्र हैं। उन्हें भी पिता की संपत्ति और उपहार मिले हुए हैं। याचिका में सुप्रीम कोर्ट, गुवाहाटी हाईकोर्ट समेत अन्य हाईकोर्ट का न्यायदृष्टांत पेश कर कहा गया कि पिता द्वारा सभी संतानों को पक्षकार बनाया जाना था यह उनका भी दायित्व बनता है। मामले में सुनवाई के बाद हाईकोर्ट जस्टिस संजय के अग्रवाल के कोर्ट ने पाया कि न्यायदृष्टांत में माता-पिता को भरण-पोषण के लिए अनेक संतान में सक्षम किसी एक पुत्र से भरण-पोषण प्राप्त करने का विकल्प चुनने का अधिकार है। लिहाजा, कोर्ट ने पुत्र की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अपने माता-पिता के पालन-पोषण का दायित्व पुत्र का सिर्फ एक कर्तव्य ही नहीं बल्कि उनका धर्म भी होता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *