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गोरक्षकों और गोभक्षकों में अंतर ?
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
पहलू खान की तरह अब उम्मर खान की हत्या हो गई। हत्यारों और कुछ पुलिसवालों का भी कहना है कि मेवात का उम्मर खान और उसके साथी एक ट्रक में गायों की तस्करी कर रहे थे। उन्हें अलवर के एक गांव में 7-8 लोगों ने पकड़ा, मारा पीटा और उनमें से एक, उम्मर के शव को रेल की पटरी पर डाल दिया गया ताकि किसी को शक न हो कि उसे मारा गया है। लेकिन पुलिस जांच कर रही है। उसने रपट लिख ली है। हत्यारे कब पकड़े जाएंगे या पकड़े भी जाएंगे या नहीं, कुछ पता नहीं। हम मान लें कि तीन गायें और तीन बछड़ों को उम्मर खान और उसके दो साथी कत्ल करने के लिए ले जा रहे थे या ले जाकर बूचड़खानों को बेचनेवाले थे, जो कि एक गैर-कानूनी काम है और बहुत ही लोक-विरोधी काम है तो भी मैं पूछना चाहता हूं कि इसके बदले उन आदमियों की हत्या का अधिकार किसी को कैसे मिल जाता है ? इस तरह का दुस्साहस अपराध तो है ही मूर्खतापूर्ण भी है। ऐसा करने से क्या गोवध रुकेगा ? ऐसा करके यदि आप कुछ प्रांतों में गोमांस-भक्षकों को डरा भी लेंगे तो भी क्या होगा ? नागालैंड, अरुणाचल, सिक्किम, कश्मीर जैसे सीमांत प्रदेशों में तो गोवध चलता रहेगा। वहां कानून का कोई बंधन नहीं है। जो मनुष्य को मारकर गोरक्षा करने का दम भरते हैं, उनमें याने गोरक्षकों और गोभक्षकों में अंतर क्या है ? सच्चे गोरक्षक तो वे हैं, जो वास्तव में गोसेवा करते हैं और लोगों को अपने प्रेम और तर्क से गोमांस-भक्षण छुड़वाते हैं। यदि सारे देश में मांसाहार-परित्याग का अहिंसक प्रेमागृह हो तो गोमांस-भक्षण तो अपने आप बंद हो जाएगा, पशु-हिंसा भी बंद हो जाएगी। किसी मज़हब में मांसाहार अनिवार्य नहीं है। भारत अकेला देश है, जहां संसार के सबसे अधिक शाकाहारी लोग रहते हैं। ये लोग मांसाहारियों को मारकर क्या अपने आप को उनसे भी नीचे नहीं गिरा रहे हैं ? वे पशुओं के हत्यारे हैं और ये मनुष्यों के हत्यारे हैं। दोनों हत्याएं ही अनुचित हैं, अनैतिक हैं लेकिन मानव-हत्या से बढ़कर कौनसा अपराध है ?

पेस के पक्षधर थे नेहरू
(14 नवम्बर : जन्म दिवस पर विशेष)
– डॉ0 बलदेवराज गुप्त
जहां तक भारतीय दृष्टि से जवाहर लाल नेहरू के छात्र जीवन के आंकलन का प्रश्न हैं वहां उन पर तिलक (लोकमान्य) के राष्ट्रवाद का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। परन्तु उनकी समाजवादी विचार – धारा ने उनमें देखने की दृष्टि को बदला। वह अब तर्क और बौद्धिक विवेचन से ‘स्वराज’ को समझने की कोशिश करने लगे थे। वह ‘स्वराज’ की प्राप्ति हेतु उन तरीफों पर गम्भीरता से सोचना चाहते थे जिसके जरिए मुल्क को उस ‘हक’ प्राप्ति के लिए तैयार किया जा सके, लड़ाया जा सके। मार्क्सवाद से भी यह प्रभावित हुए थे। 1927 में जवाहर लाल जी यूरोप से लौटने के बाद, कांग्रेस को नये सोच में ढालने के प्रयत्न करने लगे। यही वजह है कि 1927 के मद्रास कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने ‘पूर्ण स्वराज’ (कम्पलीट इन्डीपेन्डेंस) का प्रस्ताव रखा और बिना विरोध के पास करवा लिया।
स्मरण रहे कि मद्रास कांग्रेस अधिवेशन (1927) में गांधी जी उपस्थित नही थे। जब उन्हें जवाहर लाल नेहरू के पूर्ण स्वतंत्रता प्रस्ताव के पारित हो जाने का पता चला तो उन्होंने इसे पसंद नहीं किया। गांधी जी मानते थे कि देश अभी इसके लिए तैयार नहीं है। श्री मनजीत (स्कूल अध्यापक) की सलाह पर गांधी जी ने छापाखाना बैठाया। इण्डियन ओपिनियन अखबार निकला – ‘हिन्द स्वराज’ का विचार बीज बोया। 1919 में ‘नवजीवन’ ‘यंग इण्डिया’ शुरू किए। दो पद गांधी के सम्पादन में भारत में शुरू हुए। बिना पंजीकृत कराये गांधी जी ने सत्याग्रह पत्र भी निकाला। 11 फरवरी 1933 को ‘हरिजन’ साप्ताहिक शुरू किया। जवाहर लाल के मस्तिष्क मे पश्चिम का प्रेस था। नेहरू प्रेस की आलोचना का सदा स्वागत करते थे। उन्होंने जितनी प्रेस की छूट दी और आलोचना सही, आजकल के राजनीतिज्ञ उसका कुछ भी नहीं है। जवाहरलाल जी पत्रकारिता को जल्दबाजी में तैयार किया गया इतिहास और साहित्य मात्र ही नहीं मानते थे। वी.एम. चत्रपति राव के अनुसार जवाहरलाल जी पत्रकारिता को एक एक्शन (प्रक्रिया) मानते थे अर्थात पत्रकारिता एक राजनीतिक और सामाजिक प्रक्रिया है। ऐतिहासिक सन्दर्भ में उसे साहित्यिक अन्दाज में कहने की कुशलता है। स्वयं भी जवाहर लाल जी लिखते समय इस बात का ध्यान रखते थे।
प्रायŠ जवाहरलाल जी पैड पर बिना अपने नाम के लेख लिखते थे। पर कभी-कभी वह अपने नाम से भी लेख लिखा करते थे। उनके लेख, फीचर और टिप्पणियाँ पत्रकारिता के नायाब नमूने हैं। जवाहर लाल जी की पत्रकारिता पर, पत्रकारिता सम्बन्धी उनके विचारों, प्रेस-कानून, आदर्श समाचार पत्र और प्रेस की मैनेजमेन्ट और प्रेस के मन्तव्य और अधिकारों पर काम की जरूरत है। समाचार पत्रों, रेडियो, फिल्म एवं दूरदर्शन पर जवाहरलाल जी की प्रजातत्र और समाजवाद के सन्दर्भ में एक कल्पना थी। उसे साकार रूप उनके आदर्शों पर चलने वाले समाचार पत्र और पत्रकार ही दे सकते हैं। आज नेहरू शाताब्दी के अवसर पर आवश्यकता है कि उनके प्रेस सम्बंधी दर्शन (नेहरू जी प्रेस फिलास्फी) पर राष्ट्रीय स्तर का एक पत्रकारिता और मास मीडिया प्रशिक्षण संस्थान खोला जाये। नेहरू जी की जन्मभूमि इलाहाबाद या उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ (विश्वविद्यालय) में ऐसा संस्थान जवाहलाल नेहरू के प्रेस सम्बंधी विचारों के प्रति सम्मान का तोहफा होगा। नेहरू ने अपने जीवनकाल में आदर्श रिपोर्टर का काम भी एक बार किया था। लखनऊ के पास बाराबंकी में रात देर गये एक जलसा खत्म हुआ। नेहरू जी उसके बाद अखबार के दफ्तर में आये और स्वयं उन्होंने अपनी सभा और भाषण की रिपोर्ट तैयार की जो अपने आप में एक टेढ़ा काम होता है। पर नेहरू की रिपोर्ट अच्छी पत्रकारिता का एक बेजोढ़ नमूना थी। जवाहरलाल जी का पक्का विश्वास था कि अगर पत्रकार की सोच और कलम में तालमेल है तो कड़ा लिखने के लिए भी गाली देने की जरूरत नहीं है। कढ़ी से कढ़ी बात भी सरल भाषा में लिखी जा सकती है। जवाहरलाल नेहरू ने 1938 में नेशनल हेराल्ड पत्र की स्थापना की थी। वह इस पत्र के निदेशक मंडल के अध्यक्ष थे और साथ ही पत्र के सर्वेसर्वा संपादक भी। कानूनी रूप से पत्र के सम्पादक चलपती राव थे पर पूरे पत्र पर नेहरू जी का प्रभाव था।
एक बार कांग्रेस के जरिये मिले समाचार को बिना शासन की पुष्टि के छापा गया। समाचार एक पक्षीय था और लापरवाही के चलते उसमें कुछ गलतियां रह गयी थीं। समाचार के खिलाफ अवमानना का अभियोग लगा। ब्रिटिश सरकार ने मुकदमा दायर किया। जवाहर लाल जी उस समय जेल में थे। संपादक असमंजस में था। जेल से नेहरू जी ने निर्देश भिजवाया। संपादक को पहले से ध्यान रखना था, अब मुकदमा लड़ा जाए और अगर हार जाते हैं तो सम्पादक जेल जाए पर माफी नहीं मांगी जाएगी।
भारत के संविधान में प्रेस स्वतंत्रता को लेकर धारा 19 में परिवर्तन एवं संशोधन पर 1951 में जब बहस चली तो जवाहर लाल नेहरू ने उसमें सक्रियता से हिस्सा लिया। उसमें उन्होंने वे मुद्दे उठाये प्रेस स्वतंत्रता के आधार क्या हों-किसी स्वतंत्रता? प्रेस स्वतंत्रता का व्यवहारिक रूप क्या हो? इसे किसे और कैसे दिया जाये। इसके लिए नेहरू ने बड़े यत्न करके रायल प्रेस कमीशन की रिपोर्ट को गहरा अध्ययन किया था। उनके ही प्रयासों में ही भारत वर्ष में 1952 में प्रथम प्रेस आयोग की नियुक्ति की गयी थी। जवाहरलाल नेहरू समाचार पत्रों पर शृंखलाबद्ध एकाधिकार के विरोधी थे। यह सामन्तों और पूंजीवाद के चंगुल के समाचार पत्रों को मुक्त कराने के पक्ष में थे। यह उन संपादकों को अच्छा नहीं मानते थे। पर उनके इशारों पर लिखते थे। यह सम्पादक में उच्चस्तरीय आचरण सोचने और बौद्धिक समन्वय को प्राथमिकता देते थे। नेहरू पत्रकारों में ऊंचे वेतन से उनकी ऊंचाई को नापने का पैमाना नहीं मानते थे। यह तो कहते थे कि पत्रकार वह है जो पत्रकारिता के मानक मूल्यों को ऊंचा उठाये। पत्रकार की कीमत तो उसकी कलम के स्तर उसके मालिक या सम्पादक के स्तर से नहीं होता, उसमें काम करने वाले श्रमजीवी पत्रकारों से होता है। जवाहर लाल नेहरू अगर राजनीति में न जाते तो वह एक अच्छे लेखक और उच्च कोटी के सम्मानित पत्रकार होते। आवश्यकता है नेहरू के पत्रकार प्रेरणा लेकर पत्रकारों की तदनुरूप प्रशिक्षण देने की।

प्रद्युम्न की हत्याः कुछ सवाल
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव के रेयान स्कूल में हुई एक बच्चे की हत्या की जो नई परतें अब खुली हैं, वे दिल दहला देनेवाली हैं। प्रद्युम्न नामक छात्र की हत्या के लिए स्कूल बस के कंडक्टर अशोक कुमार को जिम्मेदार ठहराकर गिरफ्तार कर लिया गया। हरियाणा पुलिस ने उसे पीट-पीटकर उससे जुर्म भी कबूल करवा लिया। लेकिन प्रद्युम्न के पिता के आग्रह पर जब केंद्रीय जॉंच ब्यूरो (सीबीआई) को यह मामला सौंपा गया तो मालूम पड़ा कि प्रद्युम्न की हत्या उसी स्कूल के एक वरिष्ठ छात्र ने कर दी थी। इस छात्र ने स्कूल के अधिकारियों को प्रद्युम्न के शव की खबर सबसे पहले दी थी। सीसीटीवी और चाकू ने सुराग दिया और कथित असली हत्यारा पकड़ा गया। यह सारा मामला इतना अजीब है कि यह देश की पुलिस व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, पत्रकारिता और शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न-चिन्ह लगा देता है। उस तथाकथित छात्र हत्यारे के पिता का कहना है कि यदि उसने चाकू से हत्या की होगी तो उसकी कमीज पर खून के दाग तो होने चाहिए थे। ये दाग न तो स्कूल में किसी ने देखे और न ही घर में ! तो क्या सीबीआई की जांच बिल्कुल निराधार है ? हत्या का कारण भी अजीब है। कहा जा रहा है कि वह लड़का पढ़ाई में कमजोर था और वह चाहता था कि उस दिन होनेवाली परीक्षा टल जाए। स्कूल की छुट्टी हो जाए। इसीलिए उसने प्रद्युम्न की हत्या कर दी। परीक्षा टल गई। प्रद्युम्न की जगह कोई भी हो सकता था। यह तथ्य भी हत्या के नए आरोपी ने उगला होगा। अब देखिए, अदालत क्या करती है? बेचारे कंडक्टर पर जेल में क्या गुजर रही होगी ? हमारी पुलिस की करतूतों के कारण सैकड़ों अशोक कुमार जैसे लोग निर्दोष होते हुए भी क्या हमारी जेलों में सड़ नहीं रहे हैं? उनके पास वकीलों के बटुए भरने की ताकत कहां होती है ? अशोक का केस कोई वकील नहीं लड़ेगा, ऐसा संकल्प गुड़गांव के वकील संघ ने ले लिया था। अब वह क्या करेगा? हमारे पत्रकार भाइयों ने भी गजब ढाया। वे अशोक के पीछे हाथ धोकर पड़ गए। किसी ने खुद खोजबीन करने का कष्ट नहीं उठाया। पुलिस की लापरवाही के कारण खट्टर सरकार भी बदनामी झेल रही है। यहां यह प्रश्न भी उठता है कि इन पब्लिक स्कूलों में कैसी संस्कृति पनप रही है? परीक्षा में पास होना क्या इतनी बड़ी बात है कि उसके लिए हत्या कर दी जाए? छात्रों के माता-पिता से अंधाधुंध फीसें बटोरना, बच्चों का बढ़ता हुआ मानसिक तनाव और ढोंगभरी जीवन-शैली भी इस तरह की जघन्य घटनाओं का कारण बन जाती है।

नोट बंदी से देह व्यापार में कमी, या खाये बौरायात हैं या व देखत बौराय
– डॉक्टर अरविन्द जैन
लंका विजय के बाद अयोध्या में सब लोग अपनी अपनी युध्य में महिमा बखान कर रहे थे तो हनुमान जी बोले की जब मैं लंका की अशोक वाटिका में गया था तो सीता माता लाल साड़ी पहनी थी और अशोक के फूल लाल लाल दिखाई दे रहे थे तब राम चंद्र जी मुस्कराये और कहा हनुमान सीता सफ़ेद साडी पहनी थी और अशोक के फूल सफ़ेद होते हैं। कारण उस समय तुम क्रोध में थे तो तुम्हे सब चीज़े लाल लाल दिखाई दे रही थी। युध्य विजय के बाद सब अपनी मस्ती में रहते हैं। और जब हार जाते हैं तब बारीक से बारीक बात बड़ी दिखाई देती हैं। जब प्यार मोटा होता हैं तब गलती पतली दिखाई देती हैं और जब प्यार पतला होता हैं तब गलती मोटी हो जाती हैं।
जब उगता सूरज फैलता हैं तब उसकी लालिमा कुछ और होती हैं और डूबता सूरज की लालिमा अलग होती हैं। जब मानव जीत हासिल करता हैं तब उसकी प्रसन्नता अजीब ख़ुशी देती हैं और उसमे उसके भाव अलग दिखते हैं और जब हार का सामना करता हैं तब उसकी चेहरे के भाव अलग दिखते हैं। जैसे सोना का दाम बढ़ा तो व्यापारी खुश और घटा तो दुखी पर सोना तो सोना होता हैं वह भी एक तोला, पर हमारे राजनेता छुद्र नदी जैसे होते हैं वे शीघ्र प्रसन्न और जल्दी दुखी। ये कुर्सियां लकड़ी की होती हैं, उन पर कितने बैठ चुके और आगे बैठेंगे।
कल भोपाल में एक केंद्रीय मंत्री जी कह रहे थे की नोट बंदी से देह व्यापार कम हुआ पर मांस व्यापार बहुत बढ़ा। देह व्यापार के आंकड़े भी दिए पर देह त्याग करने के मामले में चुप ! इसी प्रकार एक राज के मंत्री जी कह रहे थे की एक दिन होली खेलने से कितना पानी बर्बाद होता हैं उससे अधिक टॉयलेट में फ्लश में ज्यादा पानी खरच होता हैं और एक दिन दीवाली में पटाका फोड़ने से कितना प्रदुषण होगा। आज ही समाचार पत्र देखे की दिल्ली में आज स्कूल बंद कर दिए हैं कारण वहां प्रदुषण बहुत हैं। क्या पता मंत्री या तो पढ़े लिखे नहीं होते कारण उनको चारा या खाना पचा पचाया मिलता हैं या उनकी ऊपरी मंजिल कचरा घर से भरी रहती हैं।
हमें सुनकर पढ़ कर अच्छा लगा की मंत्री जी को देह व्यापार की कमी ने बहुत चिंतित किया। पता नहीं इस कमी में उनका कितना योगदान हैं, था या होगा। देह व्यापार कोई नहीं रोक सकता। या व्यापार दिन दूनी रात चौगनी बढ़ रहा हैं आपकी राजधानी में नेताओं, अफसर, धनी लोगों के बहुत योगदान हैं। पांच तारा होटल तो पूर्ण सुरक्षित जगह होती हैं, हां मरने वालों को कोई जिक्र नहीं किया कारण वे मौतें दिखती नहीं हैं।
नोट बंदी ने तो मोदी और सरकार को अपने हाथ अपनी पीठ थपथपाने का खूब मौका दिया। मीडिया, पत्रों को इतना अधिक धन से भर पूर कर दिया हैं की सब आकंठ हैं और कोई हिम्मत नहीं कर सकता मोदी के खिलाफ। और हमारा मीडिया इस समय राग दरबारी बन गया। वह हां में हां मिलाता हैं।
नोट बंदी के लाभ और हानि बहुत हैं और सम्पूर्ण कर ने तो व्यापर की गति बढ़ा दी हैं। आज व्यापारी बहुत ख़ुशी में भी हैं और इस समय देश में अमन चैन हैं। हम विकास में बहुत आगे हो गए। हमारे देश का मांस, अंडा मछली का व्यापार विश्व में प्रथम हैं। काला धन बहुत बाहर आ गया नौकरी बहुत मिल रही हैं विश्व बैंक ने बहुत अच्छी रिपोर्ट दी हैं। और हम विश्व में सर्व प्रथम हैं निवेश के मामलों में। कितने देशों ने कितनी फैक्ट्री खोल ली हैं और हम स्वर्ण युग में आ गए। अब हमारे घरों में तालें नहीं लगते हैं कारण अब जोखिम वाला सामान रहा ही नहीं।
स्वच्छता अभियान के कारण हर घर में शौचालय बन गए और अब जेब कटना कम या बंद हो गया कारण प्लास्टिक के चलन होने से किसको फायदा होगा ? अब चोरियां बहुत कम हो गयी। कारण बैंक हम जनता को कोई धन नहीं दे रहा हैं और प्रत्येक व्यक्ति क़र्ज़ में डूबा हैं। हम अम्बानी अडानी अमित शाह के शहजादे का विकास तो हो रहा हैं। उनके विकास से देश का विकास हैं।
अंत में मंत्री रविप्रसाद से जानना चाहते हैं की ये आकंडे कैसे मिले और प्रदेश के मंत्री के यहाँ पानी न मिले या प्रदुषण बहुत हो जाए तो क्या करेंगे। हम लोग जानते हैं की वर्तमान सरकार बौराएँ हैं उसे अपने अलावा कोई विकास नहीं मिल रहा हैं।
अपने आप पर इतना गुमान न करना
रावण का गुमान उसे ही ले डूबा
इन्द्र स्वयं अपने मुँह से अपनी प्रशंसा करता तो
शोभा नहीं देता,
आकंड़ों में मत उलझाव जनता को
पब्लिक सब जानती हैं,
काठ की हांडी बस एक बार आग पर चढ़ती हैं
अब कोई भी वादों पर नहीं फंसेगा
सोच समझकर रहे तो ठीक नहीं तो ……

भागवत की दो चेतावनियां
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखिया श्री मोहन भागवत ने इंदौर में दो बड़ी महत्वपूर्ण बातें कह दीं। ये दोनों बातें ऐसी हैं कि जिन्हें भारत के लोग सच्चे मन से स्वीकार कर लें तो भारत का उद्धार हो जाए। पहली बात यह है कि देश उन सबका है, जो यहां रहते हैं। इस देश में जो भी रहता है, वह हिंदू है। यह देश सिर्फ उनका नहीं है, जो खुद को हिंदू कहते हैं। जो खुद को हिंदू नहीं कहते, यह उनका भी है। दूसरी बात मोहनजी ने यह कही कि कोई पार्टी या नेता इस देश को महान नहीं बना सकता। समाज को बदलाव की जरुरत है। इसके लिए सामाजिक शक्तियों को तैयार रहना होगा।
हिंदू शब्द भी मूलतः भारतीय नहीं है। यह सिंधु से बना है। फारसी में ‘स’ का ‘ह’ हो जाता है। जैसे सप्ताह का हफ्ता। सिंधू नदी के इस पार रहनेवाले लोगों को ईरान और अफगनिस्तान में हिंदू कहा जाने लगा। इस दृष्टि से भारत का हर नागरिक हिंदू ही हुआ। यों भी आप दुनिया के किसी भी प्राचीन देश में चले जाइए। भारतवासियों को वे लोग हिंदू, हुन्दू, इंदू, हिंदी, इंडी, इंडियन आदि नामों से पुकारते हैं। आप चाहें मुसलमान हों, ईसाई हों, सिख हों, पारसी हों, यहूदी हों, बौद्ध हों, जैन हों, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। जो हिंद में रहता है, वह हिंदू है। हिंदू शब्द के आगे आपकी सभी पहचान फीकी पड़ जाती हैं। यह बात भारत के बाहर तो ठीक है लेकिन भारत में उक्त सभी संप्रदायों या धर्मों के लोग अपने आप को हिंदू नहीं कहते हैं। उनके लिए भी मोहनजी ने हिंदू शब्द के द्वार खोल दिए हैं। इससे बड़ी दरियादिली क्या हो सकती है ? सांप्रदायिक दुर्भाव की इससे बढ़िया दवा क्या हो सकती है ?
मोहनजी ने जो दूसरी बात कही है, उससे हमारे नेताओं को कुछ सबक लेना चाहिए। समाज के बदलाव में राजनीतिक नेताओं की भूमिका बहुत छोटी होती है, कुछेक अपवादों को छोड़कर। हम नेताओं को जरुरत से ज्यादा महत्व दे देते हैं। कुछ कुर्सियों में बैठ जानेवाले लोगों को हम अपने देश और समाज का सर्वेसर्वा मान लेते हैं। वे खुद को सर्वज्ञ मान बैठते हैं। ये कुर्सीदास लोग तभी तक चमकते-दमकते रहते हैं, जब तक वे कुर्सी में टिके रहते हैं। उनकी असली औकात का पता तभी चलता है, जब उनकी कुर्सी उनके नीचे से खिसक जाती है। वे रद्दी की टोकरी में ऐसे जाते हैं, जैसे सिर से कटे बाल ! दुर्भाग्य है कि ये सिर के बाल खुद को ही सिर समझने लगते हैं। मोहन भागवत की यह चेतावनी बहुत सामयिक है। इसके अर्थ बहुत गहरे हैं। समझने वाले समझ गए होंगे।

(व्यंग्य) जुमलेबाजी की दुकान
– दीपक दुबे
दो बडे और महत्वपूर्ण समझे जाने वाले राज्यों मे चुनावी बिगुल बजते ही देष अब अब धीरे धीरे चुनावी मोड पर आता जा रहा है जुमलेबाजियाँ बढ रहीं हैं। वर्तमान मे जिस तरह से देष मे जूतो मे दाल बंट रही है, माने अपने बेटो के लिए खजाना खाला जा रहा है मै भी स्टार्ट अप योजना मे सोच रहा हू एक जुमले बाजी की दुकान खोल लू वैसे तो इरादा भाशण फैर्क्टी खोलने का है । आपको मालुम नही मै भी पुराना जुमलेबाज रहा हू हिन्दी मे एमए करने के बाद तो मेरी यह प्रतिभा और भी निखर गई है। स्कूल कालेज से लेकर अभी भी यह प्रतिभा मुझमे अभी भी उसी रफतार से है। वेसे भी बता दू कि यह कोई कविता कहानियों का युग तो है नही यदि सच कहे तो यह युग चुटकुला प्रधान युग हे। जीएसटी ने भले उदयोग ंघधे बंद किये हो मगर चुटकुलों का निर्माण बदस्तूर अब भी जारी है चाहे रिटायर हो या नौकरीपेषा, स्कूली छात्र हो या फिर कालेज का, कर्मचारी अधिकारी सब इसमे लगे हुए हे।
इस जुमला निर्माण फैक्ट्री से हर पाटी को मदद दी जायेगी यह जुमले पार्टी की मांग के अनुसार तैयार किये जायेगे। जनता की जुबान मे यह जुमले जनता के बीच के ही लोगो से लिए जायेगे। पूरा भाषण भी आम जनता की जुबान मे रेडीमेड लिखा जायेगा। इसके लिए कई सलाहकार भी मेने तय कर लिए है, जैसे कल्लू धोबी, डल्लु पानवाला, नत्थन लाल मास्टर,फलुआ फूलवाला,,चपलू मोची,रफीक भाई पंचरवाला,छुटटन चाटवाला आदि आदे। जनता से जुडे लोगो के पास जनता से जुडे ऐसे ऐसे जुमले मुहावरे और लोकोक्तियां इनके पास मिलेगी ऐसी कि जनता चकरा जायेगी।
दो राज्यो मे हाल ही मे चुनाव घोशित होते ही काम बढ गया है कुछ फिल्मो के डायलाग थी तलाष भी जारी है इसके लिए अलग फिल्म विषेशज्ञ मेने रखा हैं। सबसे सुपर हिट फिल्म शोले के गब्बरसिंह वाले डायलॉग अब भी प्रचलन मे है, खूब लोकप्रिय हो रहे है ये डायलाग नेताओ और पब्लिकं को खूब रास आ रहे है। गब्बर सिंह टैक्स उर्फ जीएसटी और भी इस जैसे डायलॉग खोजकर ला रहा हू जो सत्ता और विपक्ष दोनो को ही लोटपोट करने के काम आयेगे। आजकल तो फेसबुक वाट्सअप पर चुटकुलों की बाढ सी आई हुई है जब ओपन करो पचास से अधिक चुटकुले। नये नये तेनाली राम,मुल्ला नसरूददीन जेसे नवसीखिये चुटकुले बाजों ने एन्ट्री ली है इन सबकी भी मदद से नये नये जुमले तैयार करॅगा। जो लोगो को हॅसायेगे भले वोट दिलाये या ना दिलाये। जनता को किस पर सबसे ज्यादा जोक पसंद आते है यह सर्वेक्षण भी फिलहाल चल रहा हे सबसे अघिक जुमले बाजी नेताओ पर ही पब्लिक पसंद कर रही है। समय कम है मुझे अच्छे से अच्छे जुमले तेयार करने हे कुछ घटिया से लेखकों को भी इंगेज करने का मेरा इसमे इरादा हे दरअसल घटिया जुमले ही आजकल लोकप्रिय हो रहे है। एक फैक्ट्री का और दुकान दोनो का उद्घाटन दो अलग जुमले बाजों से कराने का इरादा है। आपको भी इस के लिए बुलाउWगा आयेंगे ना आप, इस नवउदयोगपति के कार्यक्रम मे।

राजनारायणः एक संन्यासी नेता
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
2017 राजनारायणजी का जन्म शताब्दि वर्ष है। आज वे जीवित होते तो उनका सौंवा साल शुरु होता। उनको गए 31 साल होने आ रहे हैं लेकिन हमारी युवा-पीढ़ी के कितने लोग उनका जानते हैं ? उनकी स्मृति में कल विट्लभाई हाउस में जो सभा हुई, उसमें कोई भी समाजवादी कहे जानेवाला नेता दिखाई नहीं पड़ा लेकिन मुझे खुशी है कि आयोजकों में कुछ ऐसे उत्साही नौजवान भी थे, जिन्होंने राजनारायणजी को देखा तक नहीं था। राजनारायण सारे संसार में क्यों विख्यात हुए थे? इसलिए कि उन्होंने तत्कालीन संसार की सबसे शक्तिशाली और परमप्रतापी प्रधानमंत्री को पहले मुकदमे में हराया और फिर चुनाव में हराया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से चुनाव हारने पर उन्होंने उन पर मुकदमा चलाया, चुनाव में गैर-कानूनी हथकंडे अपनाने के आरोप पर। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिराजी के खिलाफ ज्यों ही 12 जून 1975 को फैसला दिया, उन्होंने 26 जून को आपात्काल थोप दिया। सारे नेताओं को जेल हो गई। सारे देश को सांप सूंघ गया लेकिन मार्च 1977 में जब उन्होंने फिर चुनाव करवाया तो वे राजनारायण से तो हार ही गईं, सारे उत्तर भारत से कांग्रेस का सफाया हो गया। उस समय माना जा रहा था कि देश में बनी पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के मूलाधार राजानारायण ही हैं, हालांकि नेतृत्व की पहली पंक्ति में जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चरणसिंह और जगजीवनराम जैसे लोग थे।
राजनारायणजी और मेरी घनिष्टता लगभग 20 साल तक बनी रही। उनके अंतिम समय तक बनी रही। लोहिया अस्पताल में राजनारायणजी से मिलनेवाला मैं आखिरी व्यक्ति था। मध्य-रात्रि को विदेश से लौटते ही सीधे हवाई अड्डे से मैं उनके पास पहुंचा। वे बोल नहीं पा रहे थे। मैंने जैसे ही उनका हाथ पकड़ा, उनकी आंखों से आंसू टपक पड़े। वहां से मैं जैसे ही अपने पीटीआई कार्यालय पहुंचा, राजनारायणजी के सचिव महेश्वरसिंह ने उनके महाप्रयाण की खबर दी। राजनारायणजी के असंख्य प्रसंगों- संस्मरणों को लिखूं तो एक ग्रंथ ही तैयार हो सकता है लेकिन यहां यही कहना काफी होगा कि डाॅ. लोहिया के शिष्यों में वे अनुपम थे। वे गृहस्थ होते हुए भी किसी भी संन्यासी से बड़े संन्यासी थे। उनके-जैसे राजनेता आज दुर्लभ हैं। पद और पैसे के प्रति उनकी अनासक्ति मुझे बहुत आकर्षित करती थी। उनके अंतिम दो-तीन वर्ष काफी कठिनाइयों से गुजरे लेकिन काशी में उनकी शव-यात्रा (1986) में जितने लोग उनके पीछे चले, उस घटना ने भी इतिहास बनाया है। राजनारायणजी की जन्म-शताब्दि मनाने का सबसे अच्छा तरीका यही हो सकता है कि लोहिया की सप्त-क्रांति को अमली जामा पहनाने के लिए सारे समाजवादी एकजुट होकर काम करें।

चीन में दूसरे माओ का जन्म
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
चीन में इस साल नए माओत्सेतुंग का जन्म हुआ है। माओ जितना ताकतवर नेता चीन में अब तक कोई और नहीं हुआ है। माओ के रहते ल्यू शाओ ची और चाऊ एन लाई प्रसिद्ध जरुर हुए लेकिन वे माओ के हाथ के खिलौने ही बने रहे। माओ के बाद चीन में एक बड़े नेता और हुए। तंग श्याओ पिंग, जिनका यह कथन बहुत प्रसिद्ध हुआ था कि मुझे इससे मतलब नहीं कि बिल्ली काली है या गोरी है, मुझे यह देखना है कि वह चूहा मारती है या नहीं। तंग श्याओ पिंग ने चीनी अर्थव्यवस्था को पूंजीवादी सड़क पर चलाने की कोशिश की थी और माओ की साम्यवादी कठोर व्यवस्था को उदार बनाया था। लेकिन अब तंग से भी बड़े नेता की पगड़ी शी चिनपिंग के सिर पर रख दी गई है। शी चीन के राष्ट्रपति हैं। वे भारत आ चुके हैं। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के 2336 प्रतिनिधियों ने अपने 19 वें सम्मेलन में उन्हें अगले पांच साल के लिए फिर अपना राष्ट्रपति चुन लिया है। वे सत्तारुढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव (सर्वेसर्वा) और सैन्य आयोग के अध्यक्ष हैं। इन तीनों शक्तिशाली पदों पर तो वे विराजमान हैं ही लेकिन पार्टी संविधान में उनके विचारों को माओ के विचार का स्थान दिया गया है। उसमें उनके चीनी महापथ (ओबोर) की योजना को भी शामिल किया गया है। दो पूर्व राष्ट्रपतियों चियांग जेमिन और हू चिंताओ पार्टी कांग्रेस में उपस्थित जरुर थे लेकिन पार्टी संविधान में उनके नाम का कहीं जिक्र तक नहीं है। शी के उत्तराधिकारी के बारे में भी कोई संकेत नहीं दिया गया है। याने शी अब दूसरे माओ हैं।
जाहिर है कि माओ की तरह शी अब न तो आक्रामक हो सकते हैं और न ही तानाशाही रवैया अपना सकते हैं। अब दुनिया काफी बदल चुकी है। इस समय चीन साम्यवादी कम, महाजनी ज्यादा हो गया है। वह पैसा पैदा करने में लगा हुआ है। वह अगले 10-15 साल में दुनिया का सबसे अधिक संपन्न राष्ट्र बनना चाहता है। इस धुन में पगलाया हुआ चीन अपने नागरिकों के साथ कितना न्याय कर पाएगा, यह देखना है। चीन में गैर-बराबरी की खाई बहुत गहरी होती जा रही है और उसी पैमाने पर भ्रष्टाचार भी बढ़ रहा है। शी को इस बात का श्रेय है कि वे भ्रष्टाचार को जड़मूल से उखाड़ने में लगे हुए हैं। चीन की असली समस्या मार्क्स का वर्गविहीन समाज बनाना नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचारविहीन समाज बनाना है। वैदेशिक मामलों में भी चीन कितना ही बड़बोला बनता रहे लेकिन अब वह युद्ध से बचता रहेगा। भारत की चिंता यही है कि चीन की बढ़ती हुई ताकत उसके लिए खतरनाक सिद्ध न हो।

नौकरशाही को सरंक्षण देने की निर्लज्जता
– प्रमोद भार्गव
राजस्थान में लोकसेवकों और न्यायाधीशों के विरुद्ध परिवाद पर जांच से पहले अनुमति की अनिवार्यता वाला विवादित विधेयक विपक्ष, मीडिया और जनता के जबरदस्त विरोध के कारण पारित नहीं हो पाया। काले कानून की यह खिलाफत लोकतंत्र की रक्षा का सुखद संदेश है। इस विधेयक के प्रावधानों से असंतुष्ट भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी और भाजपा को समर्थन दे रहे निर्दलीय विधायक माणकचंद सुराणा भी सत्ता पक्ष के विरुद्ध खड़े दिखाई दिए। लोकसेवकों के कथित हितों की रक्षा के बहाने भ्रष्ट नौकरशाही को सुरक्षा कवच देने वाले इस विधेयक पर राजस्थान उच्च न्यारयालय ने भी तल्ख टिप्पणी की। इस बाबत प्रस्तुत एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि ’यह निक्कमी सरकार है और निकम्मे लोग हैं। अब तो हद हो गई है कि सरकार इन निकम्मों को बचाने के लिए अध्यादेश तक ला रही है।’ अदालत की यह टिप्पणी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार की सामंती सोच की निर्लज्जता पर कुठाराघात है। इस अध्यादेश के प्रावधानों में प्रेस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी बाधित करने के अलोकतांत्रिक उपाय किए गए थे, यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी आम-आदमी अपनी तकलीफ बयान नहीं कर सकता था। अब चयन समिति इसके प्रारूप पर पुनर्विचार करेगी।
अब तक किसी भी भारतीय नागरिक को निजी इस्तगासा के मार्फत अपने ऊपर हुए अत्याचार या किसी लोकसेवक द्वारा बरते गए कदाचरण को संज्ञान में लाने का अधिकार है। किसी नौकरशाह द्वारा बरते गए दुष्ट आचरण की शिकायत जब थाना में नहीं सुनी जाती तो पीड़ित व्यक्ति निजी इस्तगासा दायर कर अपने हक में कानूनी लड़ाई लड़ सकता है। किंतु विधेयक के माध्यम से वसुंधरा राजे सिंधिया सरकार ऐसे लोगों के मुंह सिल देना चाहती हैं, जो भ्रष्ट नौकरशाहों के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ने को आमादा रहते हैं। इस संशोधन विधेयक के जरिए आईपीसी की धारा 228 में 228 बी जोड़कर प्रावधान किया गया है कि सीआरपीसी की धारा 156 और धारा 190 सी के विपरीत कार्य किया गया तो दो साल का कारावास और जुर्माने की सजा दी जा सकती है। न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट व लोकसेवक के खिलाफ अभियोजन की स्वकृति मिलने से पहले उनका नाम एवं अन्य जानकारी का प्रकाशन व प्रसारण भी नहीं किया जा सकेगा। हालांकि न्यायपालिका को शक के दायरे में लाने से पहले उच्च न्यायालय की मंजूरी आवश्यक है। लोकसेवकों, यानी कार्यपालिका को तो इनकी आड़ में जोड़कर उनके भ्रष्ट आचरण को सुरक्षा प्रदान की जा रही थी। यह उपाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस नारे की भावना का भी उल्लघंन है, जिसमें वे 56 इंची सीना तानकर वे कहते रहे हैं कि ’न खऊंगा और न ही खाने दूंगा।’
भ्रष्टाचार से मुक्ति देश की राष्ट्रीय आकांक्षा है। देश की तमाम लोक-कल्याणकारी योजनाएं केवल भ्रष्ट नौकरशाही के कारण नाकाम हो जाती हैं। बावजूद राजस्थान सरकार द्वारा भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारियों को सरंक्षण देने के ऐसे उपाय करना जिससे आरोपितों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति मिलने तक कोई कार्यवाही न हो तो सरकार मंशा पर भी सवाल उठना लाजिमी है। दरअसल वर्तमान राज्य सरकारों के नेतृत्वकर्ता धन उगाही, गाहे-बगाहे नौकरशाही के माध्ययम से ही कर रहे हैं। यह उगाही राजनीतिक चंदे के लिए की जा रही हो अथवा निजी वित्तपोषण के लिए, नौकरशाही एक माध्यम बनकर पेश आ रही है। इसीलिए खासतौर से देश में जिन-जिन प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं, वहां-वहां नौकरशाही निरंकुशता के चरम पर है। राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकारों में तो इसी सांठगांठ के चलते नौकरशाही बेलगाम है। महाराष्ट्र सरकार ने इस आशय का कानून दो साल पहले ही पारित किया है। इसमें अभियोजन स्वीकृति की अवधि तीन माह है, जबकि राजस्थान में इसे बढ़ाकर छह माह कर दिया गया है।
सरकार की यदि मंशा ईमानदारी होती तो उसे जरूरत तो यह थी कि वह सीआरपीसी की धारा 197 में संशोधन का प्रावधान लाती। इसकी ओट में भ्रष्ट अधिकारी मुकदमे से बचे रहते हैं। इसीलिए इसे हटाने की मांग लंबे समय से चल रही है। इस धारा के तहत यदि कोई लोक सेवक पद पर रहते हुए कोई कदाचरण करता है तो उस पर मामला चलाने के लिए केंद्र सरकार से और राज्य लोक सेवा का अधिकारी है तो राज्य सरकार से मंजूरी लेना जरूरी है। राजस्थान सरकार ने इस धारा को विलोपित करने की मांग उठाने की बजाय, इसे ताकत देने का काम कर दिया था। क्योंकि संशेधन विधेयकपारित हो जाता तो फिर मीडिया भी तत्काल भ्रष्टाचारियों से संबंधित समाचारों के प्रकाशन व प्रसारण के अधिकार से वंचित हो जाता। साफ है, यह विधेयक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध था, लिहाजा लोकतंत्र की मूल भावना को आघात पहुंचाने वाला था। यह इसलिए भी असंवैधानिक था, क्योंकि अधिकारी से संबंधित शिकायत पर जांच करने या न करने के अधिकार सत्तारूढ़ दल के पास सुरक्षित थे। अब वह सत्तारूढ़ दल उस नौकरशाह के खिलाफ जांच के आदेश कैसे दे सकता है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सत्तारुढ़ दल के हित साधने में लगा हो ? जाहिर है, सरकार भ्रष्टाचार को संस्थागत करने के प्रावधान को कानूनी रूप देने की कुटिल मंशा पाले हुए थी।
फिलहाल मीडिया को शिकायत के आधार पर अथवा गोपनीय रूप से गड़बड़ी के सरकारी दस्तावेजों के आधार पर ही खबर छापने एवं प्रसारित करने का हक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत था। इस अध्यादेश को यदि बाईदवे विधेयक के रूप में स्वीकृति मिल जाती तो शिकायत हमेशा के लिए ठंडे बस्ते के हवाले कर दी जाती। इस लिहाज से यह विधेयक राजस्थान सरकार का भ्रष्टाचार को सरंक्षण देने की बेहद निर्लज्ज व निरकुंश कोशिश थी। भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक व्यवस्था में ऐसे निरकुंश प्रावधानों पर अमल तो दूर, सोचना भी अनैतिकता के दायरे में आता है। भारतीय जनमानस की याददाशत इतनी कमजोर नहीं है कि वह देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के उस आंदोलन को भूल जाए, जिसमें लोकसभा में विपक्ष में बैठी भाजपा सरकार ने भ्रष्टाचार मुक्त शासन-प्रशासन की पैरवी की थी। राजनीति और सरकार में पारदर्शिता की वकालात की थी। दुर्भाग्य से आज यही भाजपा केंद्र में सत्तारुढ़ होने के बावजूद लोकपाल की नियुक्ति से कन्नी काट रही है और राजस्थान में भ्रष्ट नौकरशाही से संबंधित खबरों को प्रतिबंधित कर रही है।
प्रशासनिक अधिकारी केंद्रीय सेवा के हों या राज्य सेवा के, उन्हें इतने संवैधानिक सुरक्षा-कवच मिले हुए है कि उनका अदालत के कटघरे में खड़ा होना आसान नहीं है। शायद इसीलिए संविधान विशेषज्ञ मंत्री-परिषद् का कार्यालय पांच साल का मानते हैं। निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायी है। उसे प्रत्येक पांच साल में मतदाता के समक्ष परीक्षा में खरा उतरने की चुनौती पेश आती है, लेकिन प्रशासन का न कोई समयबद्ध कार्यकाल है और न ही उनकी जवाबदेही जनता के प्रति और न ही कर्तव्य के प्रति सुनिश्चित है। बावजूद मंत्री-परिषद् लोकसेवकों के भ्रष्टाचार को सुरक्षित करने को तत्पर हैं तो इस पहल को संदिग्ध निगाह से ही जाएगा। जरूरत तो राज्य सरकार को यह थी कि वह प्रशासनिक सुधार लागू करने की पहल करती और नौकरशाही को जनता व लोक-कल्याण्कारी राज्य के प्रति उत्तरदायी बनाती। दरअसल नौकरशाही को जितना अधिक कानूनी सुरक्षा-कवचों से नवाजा जाएगा, वह उतना ही अधिक भ्रष्ट और निरंकुश होती जाएगी। जबकि इस भ्रष्ट कदाचरण का दंश और निंदा, निर्वाचित प्रतिनिधियों और चुनी गई राज्य सरकारों को झेलने होते है। यह अच्छी बात रही कि विपक्ष और मीडिया के प्रभावी दबाव के चलते सरकार ने लज्जा का अनुभव किया और स्वयं विधेयक को वापस ले लेना चाहिए। लोकतंत्र में इसी तरह से सुशासन को अमल में लाने की जरूरत है।

संयुक्तराष्ट्र में सुषमा और मलीहा
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कमाल कर दिया। संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान के मर्म को झिंझोड़ दिया। यह तो सभी भारतीय नेता और कूटनीतिज्ञ कहते रहते हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद का गढ़ है। लेकिन सुषमा ने यह कहने के साथ-साथ यह भी पूछ लिया कि आखिर पाकिस्तान ने पैदा होकर किया क्या ? भारत और पाकिस्तान का जन्म एक ही समय हुआ था (पाकिस्तान का एक दिन पहले), फिर भी आज भारत कहां है और पाकिस्तान कहां है ? भारत ने डाॅक्टर और इंजीनियर बनाएं, जिन्होंने विश्व-स्तरीय शोध-संस्थान खड़े किए और पाकिस्तान ने आतंकी संगठन बनाए, जिन्होंने पड़ौसी देशों में खून की नदियां बहा दीं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जबकि पाकिस्तान फौजियों, आतंकवादियों और मजहबी उग्रवादियों द्वारा संचालित होता है। सुषमा स्वराज पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी के आरोपों का संयुक्तराष्ट्र संघ महासभा में जवाब दे रही थीं। उनके इस भाषण पर पाकिस्तान के अखबारों और चैनलों ने आज अंगारे बरसा दिए हैं। संयुक्तराष्ट्र में पाकिस्तान की प्रतिनिधि मलीहा लोदी ने भारत को दुनिया की सबसे बड़ी ‘डेमोक्रेसी’ नहीं, ‘हिपोक्रेसी’ बता दिया है और भारत को ‘आतंकवाद की अम्मा’ घोषित कर दिया है। कश्मीर एक समस्या है, इसमें ज़रा भी शक नहीं लेकिन यदि पाकिस्तान फौज और आतंक के सहारे उसे कब्जाना चाहे तो वह हजार साल में भी सफल नहीं हो सकता। मलीहा लोदी को मैं व्यक्तिगत तौर से जानता हूं। वे सुशिक्षित और समझदार नेता हैं। मैं उनसे ऐसी चालू किस्म के मुहावरे बोलने की उम्मीद नहीं करता हूं। उन्होंने भारत की मोदी सरकार को फाशीवादी कहा है। वे स्वयं भारत आएं और देखें कि भारत में कितनी आजादी है। खुद नरेंद्र मोदी की रगड़ाई करनेवाले नेताओं और पत्रकारों से मिलकर वे दंग रह जाएंगी। मुझे इस बात से दुख होता है कि विश्व-मंच पर हमारे दोनों देश एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं। जब भी मैं पाकिस्तान जाता हूं, वहां के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों, विरोधी नेताओं से अपनी बातचीत में मैं हमेशा पूछता हूं कि पाकिस्तान का जैसा नाम है, वैसा उसका काम क्यों नहीं है ? हम तो सिर्फ हिंद हैं, भारत हैं, इंडिया हैं लेकिन आप तो ‘पाक’ याने पवित्र और ‘स्तान’ याने स्थान हैं। फिर भी आपके यहां इतनी गरीबी, इतनी अशिक्षा, इतना तनाव, इतने तख्ता-पलट, इतनी अस्थिरता क्यों बनी रहती है ? क्या जिन्ना के सपनों का पाकिस्तान यही है ? ये सवाल मैंने कई बार कराची, लाहौर और पेशावर के विश्वविद्यालयों में भी उठाए। मैंने उनसे यह भी पूछा कि क्या जिन्ना ने यह पाकिस्तान पहले नाटो देशों और अब चीनियों की गुलामी करने के लिए खड़ा किया था ? हिंदुओं की तथाकथित ‘गुलामी’ से आपको जिन्ना ने मुक्त कराया लेकिन अब पाकिस्तान दस खसमों की खेती बन गया है ? पाकिस्तान यदि संपन्न, स्वस्थ और शक्तिशाली लोकतंत्र बने तो वह खुद का भला तो करेगा ही, पूरे दक्षिण एशिया का भी भला करेगा।

महिला आरक्षण पर सोनिया गांधी का सियासी दांव
प्रमोद भार्गव
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण विधेयक पारित करने के सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर सियासी चाल चल दी है। पहली बार सोनिया ने किसी मुद्दे पर खुद आगे आकर खुला समर्थन देने की बात कही है। ऐसा षायद इसलिए किया है, जिससे महिला सषक्तीकरण के मुद्दे पर सरकार को कठघरे में खड़ा किया जा सके। क्योंकि जरूरी नहीं कि सरकार राज्य सभा में 9 मार्च 2010 को पारित हो चुके इस विधेयक को लोकसभा में लाए। दरअसल भाजपा का लोकसभा में स्पश्ट बहुमत है, इसलिए यह विधेयक पारित न होने पाए इसमें कोई संषय ही नहीं है। दरअसल सोनिया ने यह दांव इसलिए खेला है, जिससे उज्जवाला योजना और तीन तलाक के मुद्दे पर महिलाओं का भाजपा के पक्ष में जो ध्रुवीकरण हुआ है, उसे चुनौती दी जा सके। क्योंकि इसी साल इस मुद्दे को जब पूर्व राश्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन द्वारा बुलाए गए महिला विधायकों के राश्ट्रीय सम्मेलन में उठाया था, तब नरेंद्र मोदी ने बड़ी चतुराई से कह दिया था कि ’महिलाओं को सशक्त बनाने वाले पुरूष कौन होते हैं ? देश के निर्माण में आधी आबादी की सशक्त भूमिका रही है और वह पुरूषों से बेहतर घर चलाती हैं।’ यानी महिलाओं को घर चलाने की बात कहकर अपनी सीमा जता दी थी। लेकिन सोनिया से भी पूछा जा सकता है कि उनकी पार्टी के कार्यकाल में यह विधेयक जब लोकसभा में आया तो उनका संकल्प क्यों जवाब दे गया था ?
राज्यसभा से पारित इस विधेयक को कानूनी रूप लेने के लिए अभी लोकसभा और पन्द्रह राज्यों की विधानसभाओं का सफर तय करना होगा। इसके कानून बनते ही ऐसे कई दोहरे चरित्र के चेहरे हाशिये पर चले जाएंगे, जो पिछड़ी और मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण देने के प्रावधान के बहाने, गाहे-बगाहे बीते 21 सालों से गतिरोध पैदा किए हुए हैं। महिला आरक्षण विधेयक का मूल प्रारूप संयुक्त मोर्चा सरकार के कार्यकाल के दौरान गीता मुखर्जी ने तैयार किया था। लेकिन अक्सर इस विधेयक को लोकसभा सत्र के दौरान अंतिम दिनों में पटल पर रखा गया। इससे यह संदेह हमेशा बना रहा कि एचडी देवगौड़ा, इन्द्रकुमार गुजराल और अटलबिहारी वाजपेयी सरकारें गठबंधन के दबाव और राजनीतिक असहमतियों के चलते इस मंशा-बल का परिचय नहीं दें पाईं थीं, जो कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार ने जताई थी। जबकि इस सरकार को अपने ही सहयोगी दलों के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा था। यहां तक की समर्थक दलों ने कांग्रेस को समर्थन वापसी की धमकी भी दी थी। हालांकि प्रजातंत्र में तार्किक असहमतियां, संवैधानिक अधिकारों व मूल्यों को मजबूत करने का काम करती हैं, लेकिन असहमतियां जब मुट्ठीभर सांसदों की अतार्किक हठधर्मिता का पर्याय बन जाएं तो ये संसद की गरिमा और सदन की शक्ति को ठेंगा दिखाने वाली साबित होती हैं।
उस समय विधेयक से असहमत दलों की प्रमुख मांग थी, ’33 फीसदी आरक्षण के कोटे में पिछड़े और मुस्लिम समुदायों की महिलाओं को विधान मंडलों में आरक्षण का प्रावधान रखा जाए।’ जबकि संविधान के वर्तमान स्वरूप में केवल अनुसूचित जाति और जनजाति के समुदायों को आरक्षण की सुविधा हासिल है। ऐसे में पिछड़े वर्ग की महिलाओं को लाभ कैसे संभव है ? हमारे लोकतांत्रिक संविधान में धार्मिक आधार पर किसी भी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। लिहाजा इस बिना पर मुस्लिम महिलओं को आरक्षण की सुविधा कैसे हासिल हो सकती है ? आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने सच्चर व रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों को आधार मानते हुए मुसलमान व ईसाईयों को नौकरियों में धर्म आधारित आरक्षण की व्यवस्था की थी, लेकिन न्यायालयों ने इन्हें संविधान-विरोधी फैसला जताकर खारिज कर दिया था।
दरअसल इस कानून के वजूद में आ जाने के बाद अस्तित्व का संकट उन काडरविहीन दलों को है, जो व्यक्ति आधारित दल हैं। इसी कारण लालू, मुलायम और शरद यादव इस बिल के विरोध में दृढ़ता से खड़े हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में जातियता के बूते क्रियाशील इन यादवों की तिकड़ी का दावा रहता है कि इस अलोकतांत्रिक विधेयक के पास होने के बाद पिछड़ी व मुस्लिम महिलाओं के लिए जम्हूरियत के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। जबकि इनकी वास्तविक चिंता यह नहीं है ? दरअसल 33 फीसदी आरक्षण के बाद बाहुबलि बने पिछड़े वर्ग के आलाकमानों का लोकसभा व विधानसभा क्षेत्रों में राजनीतिक आधार तो सिमटेगा ही, सदनों में संख्याबल की दृष्टि से भी इन दलों की ताकत घट जाएगी। अन्यथा ये सियासी दल वाकई उदार और पिछड़ी व मुस्लिम महिलाओं के ईमानदारी से हिमायती हैं, तो सभी आरक्षित सीटों पर इन्हीं वर्गों से जुड़ी महिलाओं को उम्मीदवार बना सकते हैं ? बल्कि अनारक्षित सीटों का भी इन्हें प्रतिनिधित्व सौंप सकते हैं ? दरअसल इन कुटिल राजनीतिज्ञों के दिखाने और खाने दांत अलग-अलग हैं। गोया तय है कि अल्पसंख्यकों की बेहतर नुमाइंदगी की वकालात के इनके दावे थोथे हैं।
इन दलों का दोहरा चरित्र इस बात से भी जाहिर होता है कि जब देश की पंचायती राज्य व्यवस्था में महिलाओं का 33 फीसदी से 50 फीसदी आरक्षण बढ़ाने का विधेयक लाया गया था तब ये सभी दल एक राय थे। यही नहीं जब नगरीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण का विधेयक लाया गया था, तब भी इन दलों की सहमति बनी रही। लेकिन जब लोकसभा व विधानसभा की बारी आई तो यही दल गतिरोध पैदा करने लग जाते हैं। क्योंकि यह विधेयक कानूनी स्वरूप ले लेता है तो इनके निजी राजनैतिक हित प्रभावित हो जाएंगे। इनका लोकसभा और विधानसभा में पुरूषवादी वर्चस्व का दायरा 33 फीसदी कम हो जाएगा। राजनेताओं के लिए यह विधेयक इसलिए भी वजूद का संकट है, क्योंकि जिन लोक व विधानसभा क्षेत्रों से ये लोग लगातार विजयश्री हासिल करते चले आ रहे हैं, वह क्षेत्र यदि महिला आरक्षण के दायरे में आ जाता है तो इन्हें चुनाव लड़ना मुश्किल हो जाएगा ? तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने भी मुस्लिम समुदाय को बरगलाए रखने के नजरिये से इस विधेयक का विरोध किया था। भ्रष्टाचार में लिप्त ऐसे नेता भी इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं, जिनके लिए सांसद अथवा विधायक के रूप में लोकसेवक बने रहना, सुरक्षा कवच का काम करता है। इन दुर्भावनाओं को मोदी भलीभांति समझ रहे हैं, इसीलिए वे बर्र के छत्ते में हाथ डालना नहीं चाहते हैं। मोदी समझ रहे हैं कि यदि जीएसटी और नोटबंदी के तरह इस विधेयक को लाना कहीं उल्टा न पड़ जाए ?
हमारे देश में विकास को आंकड़ों और व्यक्तिगत उपलब्धि को संख्या बल की दृष्टि से देखने-परखने की आदत बन गई है। इस नाते हम मानकर चल रहे हैं कि 543 सदस्यीय लोकसभा में 181 महिलाओं की आमद दर्ज होने और 28 राज्यों की कुल 4109 विधानसभा सीटों में से महिलाओं के खाते में 1370 सीटें चली जाने से देश की समूची आधी आबादी की शक्ल बदल जाएगी। अथवा स्त्रीजन्य विषमताएं व भेदभाव समाप्त हो जाएंगे। फिलहाल लोकसभा में 12.15 प्रतिशत महिलाओं की ही भागीदारी हैं। दुनिया के 190 देशों में भारत का स्थान 109 वां हैं। 1952 में गठित पहली लोकसभा में सिर्फ 4.4 प्रतिशत यानी 489 में से महज 22 महिलाएं सांसद थीं। जबकि मौजूदा लोकसभा में 62 महिलाएं लोकसभा सदस्य के रूप में प्रतिनिधित्वि कर रही हैं। यह अब तक की सबसे अधिक संख्या है। विधानसभाओं में महिला विधायकों की उपस्थिति केवल 9 फीसदी है। हालांकि असमानता के ये हालत पंचायती राज लागू होने और उसमें महिलाओं की 33 और फिर 50 फीसदी आरक्षण सुविधा मिलने के बावजूद कायम हैं। लेकिन लोकसभा व विधानसभाओं में एक तिहाई महिलाओं की उपस्थिति इसलिए जरूरी है, जिससे वे कारगर हस्तक्षेप कर महिला की गरिमा तो कायम करें ही देश में जो पुरूष की तुलना में स्त्री का अनुपात गड़बड़ा रहा है, उसको भी समान बनाने के उपाय तलाशें ? साथ ही महिला संबंधी नीतियों को अधिक उदार व समावेशी बनाने की दृष्टि से उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता भी दिखाई दे। इसीलिए महिला विधायकों के राश्ट्रीय सम्मेलन सुमित्रा महाजन ने कहा था कि ’बिना कोई विवाद किए इस विधेयक को सम्मानजनक तरीके से पास करा देना चाहिए। लेकिन अब यह कहने की नहीं करने की बात है, क्योकि खुद सुमित्रा जिस दल से सांसद हैं, उसी दल की सरकार का लोकसभा में स्पष्ट बहुमत है और यह विधेयक अब केवल लोकसभा से ही पारित होना है।

मोदी के लिए वरदान है राहुल
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की जो खबरें अमेरिका से आ रही है, वे ऐसी हैं, जैसे किसी रेगिस्तान में झमाझम बारिश हो। भारत में जिसे लोग नेता मानने को तैयार नहीं हों, जिसे अखबारों में कभी-कभी अंदर के कोनों में कुछ जगह मिल जाती हो और जिसे लोगों ने तरह-तरह के मज़ाकिया नाम दे रखे हों, वह युवा नेता अमेरिका के बर्कले और प्रिंसटन जैसे विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों और छात्रों को सीधे संबोधित कर रहा हो, यह असाधारण घटनाक्रम है। खास बात यह है कि राहुल की ये खबरें भारतीय अखबारों के मुखपृष्ठों पर चमक रही हैं। जाहिर है कांग्रेस के हताश-निराश कार्यकर्ताओं में इन खबरों ने उत्साह का संचार कर दिया है। राहुल के जिन सहयोगियों ने इस अमेरिका-दौरे की योजना बनाई है, वे बधाई के पात्र हैं। राहुल के भाषणों और उन पर हुई चर्चाओं की जैसी रिपोर्टें छप रही हैं, उनसे जाहिर है कि इस बार कांग्रेस का खबर-प्रबंध सफल रहा है।
लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या 2019 में कांग्रेस भाजपा को टक्कर दे पाएगी? अकेली कांग्रेस तो आज इसकी कल्पना भी नहीं कर सकती। आज कांग्रेस जैसी दुर्दशा में है, वैसी वह पिछले सवा सौ साल में कभी नहीं रही। 2014 के चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 45 सीटें मिलीं थी, जबकि आपातकाल के बावजूद 1977 में उसे 154 सीटें मिली थीं। कर्नाटक और पंजाब के अलावा सीमांत के पांच छोटे-मोटे राज्यों में ही कांग्रेस की सरकारें सिमट गई हैं। यह ठीक है कि इससे भी कम क्षमतावाली पार्टी चुनाव जीतकर सरकार बना सकती है लेकिन, उसके लिए आपातकाल-जैसा या भ्रष्टाचार-जैसा बड़ा मुद्‌दा होना जरूरी है। ऐसा कोई ज्वलंत मुद्‌दा विपक्षियों के हाथ में नहीं है। नोटबंदी, जीएसटी, ‘फर्जीकल’ स्ट्राइक और बेरोजगारी-जैसे मुद्‌दे हैं जरूर, लेकिन उन्हें उठाने वाले कहां हैं? कांग्रेस के पास न तो कोई नेता है और न कोई नीति है। कांग्रेस में एक से एक काबिल और अनुभवी लोग हैं लेकिन, उनकी हैसियत क्या है? कांग्रेसी ढर्रे में पल-बढ़कर वे नौकरशाहों से भी बढ़कर नौकरशाह बन गए हैं। उनकी दुविधा यह है कि वे अपना मुंह खोलें या अपनी खाल बचाएं?
यह भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सिर्फ 30 प्रतिशत वोट पाने वाली पार्टी राज कर रही है और 70 प्रतिशत वोट पाने वाले विरोधियों के पास एक भी आवाज़ ऐसी नहीं है, जो राज्यतंत्र पर लगाम लगा सके। इसका नुकसान विरोधी दल तो भुगतेंगे ही, सबसे ज्यादा नुकसान सत्तारूढ़ भाजपा और सरकार को होगा। ये दोनों बिना ब्रेक की मोटरकार में सवार हैं। देश की अर्थव्यवस्था और सांप्रदायिक सद्‌भाव की स्थिति विषम होती जा रही है। 2019 तक पता नहीं देश कहां तक नीचे चला जाएगा? गाड़ी गुड़कती-गुड़कती पता नहीं, कहा जाकर रुकेगी ?
क्या ऐसे में सारे विरोधी दल एक होकर देश की गाड़ी संभाल सकते हैं? नहीं। क्योंकि उनका एक होना कठिन है। पहली समस्या तो यह है कि वे मूलतः प्रांतीय दल हैं। अपने प्रांतीय प्रतिद्वंदी दलों से वे समझौता कैसे करेंगे? क्या उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और माकपा एकजुट हो सकते हैं? क्या सभी प्रांतीय दल कांग्रेस को यानी राहुल गांधी को अपना नेता मान सकते हैं?
इन तथाकथित प्रांतीय दलों के नेता राहुल के जन्म के पहले से राजनीति में सक्रिय हैं। देश के राजनीतिक दलों में आजकल विचारधारा की बाधा बिल्कुल खत्म हो गई-सी लगती है। भाजपा का हिंदुत्व और माकपा का मार्क्सवाद हवा में खो गया है। अब यह सुविधा हो गई है कि कोई भी पार्टी किसी भी पार्टी से हाथ मिला सकती है लेकिन, प्रांतीय दलों का जनाधार प्रायः जाति-आधारित है। ये जातीय-समीकरण एकता में सबसे बड़ी बाधा बन सकते हैं। इन सब बाधाओं के बावजूद देश में प्रचंड विरोध की जबर्दस्त लहर उठ सकती है। लेकिन, उस लहर को उठाने वाले न तो कोई नेता आज दिखाई पड़ रहे हैं और न ही कोई राजनीतिक दल।
यदि सारे नेता एक हो जाएं तो भी वे नरेंद्र मोदी का मुकाबला नहीं कर सकते, क्योंकि राष्ट्रव्यापी लहर उठाने के लिए देश को एक नया और बेदाग चेहरा चाहिए। तीन ऐसे चेहरे हो सकते थे। नीतीश कुमार, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल लेकिन, तीनों तात्कालिक लोभ में फंसकर दीर्घकालिक लाभ के मार्ग से अलग हट गए। हमारे दलीय नेताओं की आज हालत ऐसी हो गई है, जैसी लकवाग्रस्त पहलवानों की होती है। 2019 तक मोदी कितने ही कमजोर हो जाएं लेकिन, इन सब लकवाग्रस्त पहलवानों को वे पटकनी मारने लायक तब भी रहेंगे। ये पारम्परिक नेता वर्तमान सरकार का बाल भी बांका नहीं कर सकते, क्योंकि मोदी की व्यक्तिगत ईमानदारी पर किसी को शक नहीं है और इस बीच भाजपा ने 2019 के चुनाव के लिए हर तरह से जबर्दस्त तैयारी कर ली है। जब भी देश में किसी एक नेता की पकड़ जरूरत से ज्यादा हो जाती है, उसकी पार्टी में उसके आगे कोई मुंह खोलने लायक नहीं रहता और विरोधी दल भी लुंज-पुंज हो जाते हैं, तब कोई न कोई अराजनीतिक ताकत उभरती है। 1977 में जयप्रकाश नारायण न होते और 2014 के पहले बाबा रामदेव और अन्ना हजारे न होते तो क्या इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी को सफल चुनौती दी जा सकती थी? मोदी को सफल चुनौती देनेवाला कोई अ—राजनीतिक नेता आज कौन हो सकता है ?
राजीव गांधी की प्रचंड बहुमत वाली सरकार नेताओं ने मिलकर जरूर गिराई लेकिन, मोदी पर बोफोर्स-जैसे किसी आरोप के लगने की संभावना नहीं है और भाजपा, भाजपा है, कांग्रेस नहीं है। भाजपा में विश्वनाथप्रताप सिंह जैसे किसी बागी मंत्री की कल्पना करना भी असंभव है। यह तो अनुशासितों की पार्टी है। इसके जीवनदानी बुजुर्ग नेताओं की सहनशीलता भी बेजोड़ है। वे मुंह खोलने की बजाय आंखें खोलकर सिर्फ ‘मार्गदर्शन’ करते रहते हैं। अत: 2019 तक इस सरकार के लिए खतरे की घंटी बजना मुश्किल-सा ही लगता है। इस सरकार के लिए तो राहुल गांधी वरदान की तरह हैं। जब तक वे सबसे बड़े विरोधी दल के नेता हैं, मोदी खूब खर्राटे भर सकते हैं। लेकिन, वे खर्राटे भरने की बजाय देश और विदेश में निरंतर दहाड़ते रहते हैं। पता नहीं, उन अनवरत दहाड़ों के बीच उन्हें वह कानाफूसी भी सुनाई देती है या नहीं, जो उनकी पार्टी में उनके खिलाफ चल पड़ी हैं और वे टीवी चैनलों पर खुद को दमकता हुआ तो रोज ही देखते हैं लेकिन, उन्हें वंचितों और पीड़ितों का वह मौन मोह-भंग भी कभी दिखाई देता है या नहीं, जो किसी भी समय बगावत की लहर बन सकता है?

धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं परम्परागत रामलीलायें
-रमेश सर्राफ
रामलीला की सदियों से चली आ रही भारतीय परम्परा अब खत्म होने के कगार पर है। एक जमाने में गांव-गांव में दशहरे के दस दिन पहले से रामलीला का मंचन होता था और आखिरी दिन पाप पर पुण्य की जीत यानि दशहरा को रावण वध। रावण वध की परम्परा तो आज भी चल रही है भले ही इसके स्वरूप में काफी बदलाव आ चुका है। लेकिन रामलीला मंडलियां आज धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। अब तो गांवों में भी सूचना-प्रसार क्रांति ने इस कदर लोगों को जकड़ रखा है कि मनोरंजन और जीवन का पर्याय समझाने वाली हमारी इस विरासत को बचाने कोई नजर नहीं आता।
यद्यपि इस बात का कोई दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है लेकिन यह मान्यता है कि सबसे पहली रामलीला 17वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास के शिष्य मेघा भगत ने चित्रकूट में खेली। बहरहाल इतिहास में भले ही यह विवाद हो लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि उत्तर भारत की हिन्दी बोलियों और बाद की हिन्दुस्तानी भाषा में खेले गए सभी आधुनिक लोक नाटकों की जनक रामलीला ही है और सभी प्रकार की रामलीलाओं का आधार गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस है।
रामलीला उत्तरी भारत में परम्परागत रूप से विजयादशमी के अवसर पर खेला जाने वाला राम के चरित पर आधारित नाटक है। जहां तक दस्तावेजों का सवाल है। पहली रामलीला होने का उल्लेख वाराणसी के रामनगर में सन् 1830 में मिलता है। इसके प्रवर्तक तत्कालीन काशी नरेश महाराजा उदितनारायण सिंह थे। ‘यूनेस्को‘ के मुताबिक बनारस के रामनगर की रामलीला अभी तक चलने वाला संसार का एक मात्र लोकनाट्य हैं। दिल्ली की प्रसिद्ध रामलीला की शुरूआत अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह ‘जफर‘ के जमाने से हुई।
विरासतों के अपने इतिहास में ‘यूनेस्को‘ ने भारत की रामलीलाओं को विश्व की सबसे बड़ी बहुजातीय, बहुधर्मी और बहुनस्लीय सांस्कृतिक विरासत की ‘ईवेंट’ माना है। रामलीला में नृत्य, संगीत की प्रधानता नहीं होती क्योंकि चरितनायक गंभीर, वीर, धीर, शालीन एवं मर्यादाप्रिय पुरुषोत्तम हैं। परिणामस्वरूप वातावरण में विशेष प्रकार की गंभीरता विराजती रहती है।
आम जन तक रामकथा को पहुंचाने की परम्परागत रंगमंचीय कला रामलीला राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में भी कम होती जा रही हैं। इस क्षेत्र के देहाती इलाकों में रहने वाले रामलीला के परम्परागत दर्शक टेलीविजन वीडियो व सिनेमा जैसे माध्यमों को महत्व देने लगे हैं। धीरे-धीरे दम तोड़ रही रामलीला के कारण रामलीला मंडलियों में कार्य करने वाले कलाकार खिन्न होकर रामलीला के स्थान पर गांवो में भजन गायकी, खेत मजदूरी व विभिन्न संस्थानो में चौकीदारी, बस कन्डक्टरी जैसे कार्य करने लगे हैं।
शेखावाटी क्षेत्र के सीकर व झुंझुनू जिलों के गांवों में रामलीला मंडलियो ृद्वारा रामकथा की रामायण की चौपाईयों के साथ नाट्य प्रस्तुतियां की जाती हैं। रामलीला करने का सिलसिला क्षेत्र के गांवों में कस्बों व शहरों की तरह केवल दशहरा व दीपावली के दिनो में ही नही बल्कि साल भर चलता रहता हैं। एक दशक पूर्व तक शेखावाटी क्षेत्र में करीब 40 रामलीला मंडलियां होती थी। जिनमें हर मंडली में 15 से 20 कलाकार होते थे, मगर अब मात्र 8-10 मंडलियां ही रह गई हैं। जो धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती जा रही है।
इस क्षेत्र की रामलीला मंडलियों के कार्यक्रम वर्षात के मौसम को छोडक़र वर्ष भर चलते रहते हैं। ये मंडलियां एक गांव से दूसरे गांव अपने पूरे साजो सामान के साथ जाती रहती हैं। गांव के किसी सार्वजनिक चौक में दो-चार काठ से बने तख्ते रखकर रंगमंच तैयार करते हैं। रंगमंच के पिछे विभिन्न दृश्यों के परदे लगायें जातें हैं जो घटना क्रम के अनुसार बदलते रहतें हैं। रामलीला में इन पर्दों का बहुत महत्व रहता है। रामलीला मंचन के दौरान ही दर्शको से आरती की थाली में दक्षिणा ली जाती हैं। रामलीला मंडलियां एक गांव में दस से पन्द्रह दिनों तक ठहर कर अपनी कला का प्रदर्शन करती हैं तथा लोगों से मिलने वाला चढ़ावा ही आय का मुख्य साधन होता है।
एक दशक पहले तक रामलीला मंडलियों की प्रस्तुती का जादू लोगो के सिर चढकर बोला करता था। गांवो में लोग रामलीला मंडली का बेताबी से इंतजार किया करते थे। रामलीला स्थल पर लोग सांयकाल ही अपने बैठने के लिये पीढ़ा,मुढ़ा,दरी,बोरी आदि रखकर अपना स्थान सुरक्षित कर देते थे। गांव के छोटे बच्चे तो दिनभर रामलीला के कलाकारों के इर्द गिर्द मंडराते रहते थे। रामलीला मंडली का नकलीड़ा (जोकर) तो दर्शको को हंसाहंसा कर लोटपोट कर देता था। पहले गांवो में जब तक रामलीला का मंचन होता उस वक्त पूरे गांव का वातावरण राममय हो जाता था। लेकिन पिछले कुछ सालों के दौरान क्षेत्र के गांवों में रामलीला के प्रति उत्साह में जबरदस्त गिरावट आई हैं।
दूरदर्शन पर रामायण के प्रसारण को प्राय: सभी लोगों ने देखा हैं। इसलिए दूरदर्शन की चमक दमक के समक्ष गांवो में प्रस्तुत की जाने वाली रामलीला लोगों को अब अर्थहीन ‘ड्र्रामा ‘लगने लगी हैं। आज मनोरंजन के तरीके ही बदल गयें हैं। अपने पात्रों को सजीव दर्शानें के लिये पहले हम महिनों रिहर्सल किया करते थे आज इतना समय किसके पास है। वर्षों रामलीला में राम का अभिनय करने वाले संजय सैनी का कहना है कि दूरदर्शन पर रामलीला के प्रदर्शन के बाद से तो इन रामलीलाओं का क्रेज ही समाप्त हो गया है।
झुंझुनू जिले के मानोता गांव के 50 वर्षीय भागीरथ रामलीला वाले ग्रामीण क्षेत्र में रामलीला के पितामह माने जाते हैं। विगत 37 वर्षो से अनवरत रामलीला कर रहें हैं। उनके दो भाई मदन व रामनिवास की रामलीला मंडलियां भी क्षेत्र में सक्रियता से कार्यरत हैं। इन तीनों भाइयों के अभिनय और काबलीयत को लोग दाद देते नही थकते थे । मगर भागीरथ अब रामलीला से खिन्न हैं। क्योंकि लोगों की आस्था रामलीला के प्रति तेजी से खत्म होती जा रही हैं। अब एक-एक पैसे के लिए लोगों को कहना पड़ता हैं पहले ऐसा नही था। पहले लोगों द्वारा रामलीला मंडलियों को अपने घरों पर बुलाकर बड़े प्रेम के साथ भोजन करवाया जाता था। भागीरथ नही चाहते कि उनकी अगली पीढियां रामलीला करें । उनका कहना है कि मुझे तो अब इस धंधे से घृणा होने लगती हैं। रामलीला के बहाने कुछ राम भक्ति हो जाती हैं। इस कारण यह कार्य कर रहा हँू।
गुढागौडज़ी कस्बे के रामावतार शर्मा द्वारा रामलीला में हनुमानजी के पार्ट की सजीव प्रस्तुती की जाती थी। संजीवनी बूटी लाते वक्त जब वे सौ फीट की ऊॅंचाई से सीने के बल रस्सी पर चल कर नीचे आते वक्त दर्शक रोमांचित हो उठते थे। मगर रामलीला में काम करने वाले वरिष्ठ कलाकार धीरे-धीरे उपेक्षित हो अन्य लाईन में जा रहें हैं। रामलीला मंडलीयों से जुड़े कलाकार इसी रवैये से व्यथित हैं। उनका कहना है कि चकाचौंध के दौर में रंगमंच पिट रहा हैं। उनके पास इतने पैसे भी नही है कि वे आधुनिक थियेटर के गुणों वाले मंच गांवों में तैयार करें और वैसी आय की उम्मीद भी गांवों में नही हैं। सरकारी स्तर पर भी इन रामलीला मंडलियों को कोई सहायता या संरक्षण नही मिल पाता हैं।

वंशवाद से छुटकारा लाभकारी
– डॉ हिदायत अहमद खान
वंशवाद पर जारी बहस ने राजनीतिक समुद्र को एक तरह से मथ कर रख दिया है। अब चूंकि मंथन हुआ है तो अमृत चखने के लिए तमाम नेता लाइन पर खड़े नजर आ रहे हैं, इनमें कुछ ऐसे भी हैं जो अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए बयान पर बयान दिए चले जा रहे हैं। ऐसे बयानवाज नेता संभवत: यह भूल गए कि इससे पहले तो वंशवाद का सबसे ज्यादा राग उन्हीं के द्वारा या उनकी पार्टी द्वारा ही अलापा गया था, अब उसी बात को किसी और ने कह दिया तो मानों बहुत बड़ा अपराध हो गया हो, ऐसा प्रचारित किया जा रहा है। खास बात यह है कि वंशवाद के लिए सदा विरोधियों के निशाने में रहने वाली कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस मंथन के जिम्मेदारी अपने सिर ले ली है। दरअसल उन्होंने अमेरिका में वंशवाद के मुद्दे ऐसा कुछ कह दिया कि उसकी गूंज अब देश के राजनीतिक गलियारे में ही नहीं बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी सुनाई दे रही है। उनके विरोधी इस कदर हमले कर रहे हैं कि मानों यह मुद्दा हाथ से निकला तो समझो राजनीति ही खत्म हो जाएगी। दरअसल अमेरिका दौरे के दौरान राहुल ने राजनीतिक पार्टियों में वंशवाद से जुड़े एक सवाल पर कह दिया था कि यकीनन हिन्दुस्तान में ज्यादातर पार्टियों के अंदर वंशवाद की समस्या है। इसलिए हम पर ही केंद्रित मत हो जाइए। उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए सुबूत दिए कि अखिलेश यादव डायनेस्ट तो स्टालिन भी डायनेस्ट हैं। धूमल के बेटे डायनेस्ट तो अभिषेक बच्चन भी डायनेस्ट हैं। इस प्रकार देखा जाए तो भारत इसी तरह से चल रहा है। बात साफ है कि राहुल वंशवाद को नकारते नहीं हैं बल्कि एक पार्टी विशेष को वंशवाद रुपी चश्में से देखने वाले नजरिए को बदलने की वकालत करते हैं। चूंकि आंखों में चढ़ाए गए विशेष चश्में को बदलने की बात है, इसलिए सभी को बुरी लग रही है। फिर राजनीति ही नहीं बिजनेस और इन्फोसिस के भी उदाहरण दिए जाते हैं जहां वंशवाद प्रभावी है। इसके साथ ही राहुल की यह बात मायने रखती है कि असली सवाल यही है कि जो शख्स जिस पद की जिम्मेदारी उठा रहा है क्या वह उसके काबिल है, यह देखने वाली बात है न कि वंशवाद के नाम पर काबिल और मेहनती शख्स को भी पीछे धकेल देने की राजनीति करना। इस पर विचार करने की आवश्यकता है, लेकिन यह संभव नहीं है क्योंकि इस बात को लेकर हमले हो सकते हैं विचार नहीं। यदि यकीन नहीं आता तो विरोधियों के बयानों को ही देख लें। सबसे पहले केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली का बयान आता है जिसमें वो कहते देखे जाते हैं कि राहुल के वंशवाद वाले बयान की वजह से वह शर्मिंदा हुए हैं। इसी प्रकार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह वंशवाद पर विचार रखने की बजाय राहुल पर हमले करते देखे गए। शाह ने राहुल को निशाने पर लेते हुए कहा कि वंशवाद कांग्रेस की खासियत हैं, भारत का स्वभाव नहीं है। इसे समूचे भारत पर नहीं थोपा जाना चाहिए। इस पर सवाल यही है कि आखिर कोई दूसरा आकर तो यह कहता नहीं है कि आप अपने परिवार के सदस्य या करीबी को ही आगे बढ़ाएं फिर क्या वजह है कि भाजपा के अंदर ही ऐसे न जाने कितने परिवार हैं जिनका सिलसिला राजनीतिक परिपाटी को आगे बढ़ाने वाला रहा है। इनमें अनेक उद्योगपति हैं तो कई अन्य क्षेत्रों के धुरंधर हैं, फिर हमेशा ही गांधी परिवार और कांग्रेस की ही बात क्यों की जाती है। इसलिए यदि इस विषय को उठाना ही है तो फिर समस्त राजनीतिक पार्टियों और कारोबार को सामने रखकर उठाया जाना चाहिए। तब मालूम चल सकेगा कि वंशवाद का रेशो किस पार्टी और संगठन में कितना है। इससे पहले कि इस पर शोध शुरु हो भाजपा नेता नाराज होकर मुखर होने लगते हैं, ताकि जो ढंगा-छिपा है उसे वहीं रहने दिया जाए और वो जो कह रहे हैं और दिखाने की कोशिश कर रहे हैं वही सुना और देखा जाए। अन्यथा मौटे तौर पर ही देख लें कि देश के बड़े कद्दावर कितने नेता हैं जिनके परिजन और करीबी राजनीति से दूर बिना किसी मदद के कोई और काम-धंधा करने में लगे हुए हैं। यहां सवाल यह भी है कि आखिर वंशवाद पर भाजपा को ही क्यों बुरा लगा क्योंकि इसकी जद में तो शिवसेना से लेकर सपा, राजद जैसी अनेक पार्टियां भी आ जाती हैं। बल्कि विचारणीय यह है कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव तो वंशवाद संबंधी बयान को लेकर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। उनकी नजर में भारत की क्या बात की जाए अमेरिका तक में एक ही परिवार के लोग राजनीति में आगे बढ़ते नजर आते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति के तौर पर बुश और क्लिंटन के वंश को देखा जा सकता है। इस प्रकार अभी तक कांग्रेस के लिए जिस वंशवाद को अपराध ठहराया जाता रहा है उसे राहुल ने एक शक्ति के तौर पर पेश किया है और यही वजह है कि विरोधी इस कदर आग-बबूला हुए जा रहे हैं। अंतत: वंशवाद के नाम पर अयोग्य को आगे बढ़ाना नाकाबिलेबर्दाश्त होता है, लेकिन काबिल इंसान को वंशवाद के नाम पर पीछे धकेल देना उचित नहीं कहा जा सकता है।

खतरनाक है घाटी में रोहिंग्या मुस्लिमों के पक्ष में एकजुटता
-प्रमोद भार्गव
जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में घाटी में घुसपैठ करके आए रोहिंग्या मुस्लिमों के पक्ष में और म्यांमार में इनके विरुद्ध चल रही सैनिक दमन कार्यवाही के विरोध में अलगाववादियों का प्रदर्शन हैरानी में डालने वाला है। यह प्रदर्शन तब और आश्चर्य में डालता है, तब एसआईटी ने सात अलगाववादियों के खिलाफ कार्यवाही को अंजाम दिया है। इससे साफ होता है कि अलगाववादियों की एक बड़ी श्रृंखला घाटी में अभी भी मौजूद है, जो पाकिस्तान से आर्थिक मदद लेकर स्थानीय लोगों को प्रदर्शन के लिए उकसाने का काम कर रही है। इस प्रदर्शन में जनता और पुलिस के बीच टकराव हुआ डीएसपी मोहम्मद यूसुफ को भीड़ ने इतना पीटा कि उनका घायल अवस्था में इलाज चल रहा है। शुक्रवार 8 सितंबर को जुमे की नमाज के बाद यह उपद्रव हुआ। शरारती तत्वों ने पुलिस पर पथराव भी किया। रोहिंग्याओं के पक्ष में इस प्रदर्शन और पथराव से साबित होता है कि अलगाववादी घुसपैठिये रोहिंग्याओं के समर्थन में तो हैं, लेकिन कश्मीर मूल के विस्थापित पंडितों के वापसी के पक्ष में नहीं है। लिहाजा रोहिंग्याओं को सख्ती से खदेड़ने की जरूरत है, अन्यथा ये मुस्लिम घाटी के लिए ही नहीं, बल्कि देश जिन-जिन क्षेत्रों में भी इन घुसपैठियों ने डेरा डाला हुआ है, वहां-वहां ये भविष्य में बड़े संकट का सबब बन जाएंगे।
म्यांमार में सेना के दमनात्मक रवैये और पड़ोसी बांग्लादेश सरकार का रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ सख्त रवैये के चलते भारत में लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पिछले पांच साल में भारत में रोहिंग्या मुसलमानों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई हैं। जम्मू-कश्मीर में 15,000 और आंध्रप्रदेश में 3800 से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमानों ने अवैध रूप से घुसपैठ करके शरण ले रखी है। ये शरणार्थी भारत छोड़ने को तैयार नहीं हैं। जबकि भारत के पड़ोसी देश म्यांमार में रोहिंग्या विद्रोहियों और सेना के बीच टकराव थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस टकराव में अब तक 400 से भी ज्यादा रोहिंग्याओं की मृत्यु हो चुकी है। सेना ने इन्हें ठिकाने लगाने के लिए जबरदस्त मुहिम छेड़ रखी है। नतीजतन डेढ़ लाख से भी ज्यादा रोहिंग्या म्यांमार से पलायन कर चूके हैं। म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध धर्मावलंबी है। जबकि इस देश में एक अनुमान के मुताबिक 11 लाख रोहिंग्या मुस्लिम रहते हैं। इनके बार में धारणा है कि ये मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। इन्होंने वहां के मूल निवासियों के आवास और आजीविका के संसाधनों पर जबरन कब्जा कर लिया है। इस कारण सरकार को इन्हें देश से बाहर निकालने को मजबूर होना पड़ा है। भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने इन शरणार्थियों पर आंतकी समूहों से संपर्क होने की आशंका जताई है।
कुछ दिनों पहले गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू ने संसद में जानकारी दी थी, कि सभी राज्यों को रोहिंग्या समेत सभी अवैध शरणार्थियों को वापस भेजने का निर्देश दिया है। सुरक्षा खतरों को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। आशंका जताई गई है कि 2015 में बोधगया में हुए बम विस्फोट में पाकिस्तान स्थित आंतकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने रोहिंग्या मुस्लिमों को आर्थिक मदद व विस्फोटक सामग्री देकर इस घटना को अंजाम दिया था। जम्मू के बाद सबसे ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थी हैदराबाद में रहते हैं। केंद्र और राज्य सरकारें जम्मू-कश्मीर में रह रहे म्यांमार के करीब 15,000 रोहिंग्या मुसलमानों की पहचान करके उन्हें अपने देश वापस भेजने के तरीके तलाश रही हैं। रोहिंग्या मुसलमान ज्यादातर जम्मू और साम्बा जिलों में रह रहे हैं। ये लोग म्यांमार से भारत-बांग्लादेश सीमा, भारत-म्यांमार सीमा या फिर बंगाल की खाड़ी पार करके अवैध तरीके से भारत आए हैं। अवैध तरीके से रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों के मुददे पर केंद्रीय गृह सचिव राजीव महर्षि ने उच्चस्तरीय बैठक बुलाई थी। इस बैठक में जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव बलराज शर्मा और पुलिस महानिदेशक एसपी वैद्य ने भी हिस्सा लिया था। आंध्र प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के अलावा असम, पश्चिम बंगाल, केरल और उत्तर प्रदेश में कुल मिलाकर लगभग 40,000 रोहिंग्या भारत में रह रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर देश का ऐसा प्रांत है, जहां इन रोहिंग्या मुस्लिमों को वैध नागरिक बनाने के उपाय स्थानीय सरकार द्वारा किए जा रहे हैं। इसलिए अलगाववादी इनके समर्थन में उतर आए हैं। इस परिप्रेक्ष्य में अक्टूबर 2015 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कहा था कि जम्मू में 1219 रोहिंग्या मुस्लिम परिवारों के कुल 5107 सदस्य रह रहे हैं, जिनमें से 4912 सदस्यों को संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त ने शरणार्थी का दर्जा दिया है। जून 2016 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा में मुख्यमंत्री महबूबा मुती ने बताया था कि म्यांमार और बांग्लादेश से आए करीब 13,400 शरणार्थी राज्य के विभिन्न शिविरों में रह रहे हैं। यह गौर करने लायक है कि जम्मू-कश्मीर के मौजूदा हालात में विस्थापित पंडित कश्मीर में अपने घरों में वापस नहीं लौट पा रहे हैं, जबकि रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठिये आश्रय पाने में सफल हो रहे हैं। यह तब हो रहा है, जब जम्मू-कश्मीर में भाजपा के सहयोग से महबूबा मुती सरकार चला रही हैं। इनका यहां बसना इसलिए खतरनाक है, क्योंकि यहां इस्लाम धर्म और पाकिस्तानी शह के कारण आतंकवादी और अलगाववादी संघर्ष छेड़े हुए हैं। ऐसे में धर्म के आधार पर आतंकी इन्हें भारत के खिलाफ बरगला सकते हैं। यह आशंका इसलिए भी संभव है क्योंकि हाफिज सईद को आईएसआई का समर्थन प्राप्त है, इसलिए वह कालांतर में जम्मू-कश्मीर के शरणार्थी शिविरों में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों के युवाओं को जिहाद के लिए भड़काने का काम कर सकता है ? लिहाजा इन्हें शरणार्थी के रूप में यहां बसाना देशहित में नहीं है।
पांच साल से भी ज्यादा वर्षो से यहां रह रहे शरणार्थियों ने भारत सरकार से मानवीय आधार पर वापस भेजने की योजना को टालने का अनुरोध किया है। क्योंकि म्यांमार और बांग्लादेश इन रोहिंग्याओं को भारत सरकार के कहने पर भी किसी भी हाल में वापस लेने को तैयार नहीं हैं। ऐसी परिस्थिति में संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठन भारत पर दबाव डाल रहे हैं कि वह इन मुसलमानों को योजनाबद्ध तरीके से भारत में बसाने का काम करें। जबकि इसके उलट मानवाधिकार समूह ह्यूमन राइट्स वॉच ने हाल ही में उपग्रह द्वारा ली गई तस्वीरों के आधार पर दावा किया है कि म्यांमार की सेना ने रोहिंग्याबहुल करीब 3,000 गांवों में आग लगा दी हैं। जिनमें से 700 से भी ज्यादा घर जलकर तबाह हो गए हैं। इस सैन्य अभियान के कारण 40,000 रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश की सीमा पर डेरा डाले हुए हैं और 20,000 से भी ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थी म्यांमार व बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाकों में फंसे हैं। इस हकीकत के समाचार भी टीवी और अखबारों में आ चुके हैं। इस हकीकत से रूबरू से होने के बाबजूद संयुक्त राष्ट्र और ह्यूमन राइट्स वॉच म्यांमार पर तो कोई नकेल नहीं कस पा रहे हैं किंतु भारत पर इन घुसपैठियों पर सिलसिलेबार बसाने का दबाव बना रहे हैं। यही नहीं म्यांमार सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के इस दावे को झुठलाते हुए कहा है कि रोहिंग्या विद्रोहियों ने सेना के 13 जवानों, दो अधिकरियों और 14 नागरिकों की हत्या की है। नतीजतन जवाबी कार्रवाई में सेना को सख्त कदम उठाना पड़ा है। बौद्ध बहुल म्यांमार में रोहिंग्याओं पर कई तरह के प्रतिबंध हैं और रोहिंग्या म्यांमार सरकार पर नस्लीय हिंसा का आरोप भी लगा रहे हैं। बाबजूद सेना विद्राहियों का दमन करने में लगी है। हैरानी इस बात पर भी है कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने म्यांमार की दो दिनी यात्रा की है, लेकिन उन्होंने द्विपक्षीय वार्ता में इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी।
जबकि विश्व के तेरह नोबेल पुरस्कार विजेताओं और दस वैश्विक नेताओं ने एक संयुक्त बयान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ हो रही हिंसा पर म्यांमार को सख्त संदेश देने की मांग की है। राष्ट्र संघ के पूर्व महासचिव और रखाइन राज्य को लेकर बने म्यांमार एडवाइजरी कमीशन के अध्यक्ष कॉफी अन्नान ने कहा है कि ’पत्रकारों को नरसंहार का ठप्पा लगाने से बचना चाहिए। विश्व अब जान चुका है कि वहां अब क्या हो रहा ?’ बांग्लादेश पहुँचने वाले शरणार्थियों ने वहां के भयावह हालात बयान किए हैं। विश्व के प्रतिष्ठित लोगों की मांग, एक तरह से बांग्लादेश की सरकार की मांग का ही दोहराव है। बांग्लादेश सरकार मांग करती रही है कि म्यांमार अपने नागरिकों को वापस बुला ले क्योंकि वो बांग्लादेशी नहीं हैं, जैसा कि झूठ म्यांमार बोलता रहा है। रोहिंग्याओं पर सरकार का आरोप है कि रोहिंग्याओं के कई समूह बौद्ध महिलाओं के साथ दुराचार करने के साथ पुलिस पर भी हमला कर रहे हैं। रोहिंग्याओं की इन हरकतों से साफ है कि इनकी कश्मीर और हैदराबाद जैसे मुस्लिम क्षेत्रों में बसाहट कभी भी जिहदी प्रकृति का हिस्सा बन सकती है। (लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)

सरदार सरोवरः शुभारंभ
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सरदार सरोवर बांध का निर्माण भारत की एक एतिहासिक उपलब्धि है। नर्मदा नदी पर बांध खड़ा करने का सपना सरदार पटेल ने देखा था और जवाहरलाल नेहरु ने 1961 में इसकी नींव रखी थी। यह सौभाग्य नरेंद्र मोदी को मिला कि उन्होंने अपने जन्मदिन पर इसका उद्घाटन किया। इस बांध का लाभ सिर्फ गुजरात को ही नहीं, मप्र, राजस्थान और महाराष्ट्र को भी मिलेगा। यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बांध है। इस बांध के जलाशय का फैलाव 37,000 हैक्टेयर होगा। इसके पानी से गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के लगभग 22 लाख हेक्टेयर की सिंचाई होगी। 131 शहरों को पीने का स्वच्छ पानी मिलेगा। हजारों गांवों को बिजली भी मिलेगी। गुजरात से ज्यादा महाराष्ट्र और मप्र को मिलेगी। इस बांध की ऊंचाई पहले तो सिर्फ 90 मीटर रखी गई थी लेकिन अब यह 138.68 मीटर हो गया है। इस बांध से जुड़ी नहरें गुजरात के कच्छ-जैसे सूखे इलाकों को हरा-भरा कर देंगी। इस बांध के विरुद्ध बहन मेधा पाटकर पिछले कई वर्षों से जबर्दस्त आंदोलन चला रही हैं। उनकी यह बात सही है कि इस बांध के बंध जाने से मप्र के लगभग 4 हजार परिवार उजड़ गए हैं। गांव के गांव खत्म हो गए हैं। हजारों लोग शरणार्थी हो गए हैं। उनके रहने, खाने और रोजगार का कोई ठिकाना नहीं है। ये लोग प्रायः ग्रामीण हैं, गरीब हैं, बेजुबान हैं। इनके लिए बोलनेवाला कोई नहीं है। इन्हें फिर से बसाने का जिम्मा सरकार का है। राज्य-सरकारों का है। केंद्र सरकार का है। चारों प्रांतों और केंद्र सरकार को इन विस्थापित लोगों की मांग पर तुरंत ध्यान देना चाहिए। इन मामलों में हमारी सरकारों को चीन से कुछ सीखना चाहिए। चीन में मैंने देखा है कि बड़े-बड़े निर्माण-कार्यों के लिए शहर के शहर खाली करवा लिए जाते हैं और हजारों-लाखों लोगों का बेहतर पुनर्वास करवा दिया जाता है। जब बड़े काम होते हैं तो कुछ लोग को कुछ न कुछ कुर्बानी तो करनी पड़ती ही है लेकिन उसकी भरपाई करना हर सरकार का धर्म है। मोदी को कांग्रेसियों की इस आलोचना पर भी ध्यान देना होगा कि अब तक सिर्फ 3 लाख हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई के लिए नहरें बनी हैं जबकि वह 22 लाख हेक्टेयर पर होना है। उनका आरोप है कि गुजरात का चुनाव जीतने के खातिर मोदी इस अधपकी खिचड़ी पर ही टूट पड़े हैं। जो भी हो यह एक अच्छी शुरुआत, एक शुभारंभ है। इसी तरह के कई बांध अभी देश के पूर्व और दक्षिण में भी बनने हैं।

पेट्रोल-डीजल खरीदने वाले भूखे नहीं मरते!
-ऋतुपर्ण दवे
अब तक सभी यह मानते थे कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल की कीमतें घटती हैं तो असर भारत में भी दिखता है। लेकिन अब यह बीते दिनों की बात हो गई है। फिलाहाल ठीक उल्टा है। विश्व बाजार में दाम घट रहे हैं, हमारे यहां लगातार बढ़ रहे हैं। लोगों की चिन्ता वाज़िब है। आखिर यह खेल है क्या? शायद यह हमारी नीयति है या राजनैतिक व्यवस्था का खामियाजा? जो भी कहें सच्चाई यही है कि टैक्स बढ़ाकर घटती कीमतों से सरकारखजाना तो भर रहा है लेकिन बोझ आम आदमी के कंधों पर ही है। लोकतांत्रिक सरकार और लोकतांत्रिक भगवान (मतदाता) के बीच इतना विरोधाभास क्यों और कब तक? यह सच है कि पेट्रोल-डीजल के दाम बीते तीन वर्षों की अधिकतम ऊंचाइयों पर हैं। लेकिन उससे भी बड़ा सच यह कि विश्व बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगभग आधी हैं। जून, 2014 में जो कच्चा तेल लगभग 115 डॉलर प्रति बैरल था, वही अब बहुत नीचे गिरकर 50-55 डालर के आस-पास स्थिर है। दाम घटने के बावजूद नवंबर 2014 से लगातार 9 बार डीजल-पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई गई। उस समय पेट्रोल पर एक्‍साइज ड्यूटी 9.20 रुपए थी जो जनवरी 2017 तक बढ़कर 21.48 रुपए हो गई है। इसी तरह नवंबर 2014 में डीजल की एक्‍साइज ड्यूटी 3.46 रुपए, जनवरी 2017 तक 17.33 रुपए हो गई।26 मई 2014 को जब मोदी सरकार ने शपथ ग्रहण किया तब कच्चे तेल की कीमत 6330.65 रुपये प्रति बैरल थी जो अभी पिछले हफ्ते ही आधी घटकर लगभग 3368.39 रुपये प्रति बैरल हो गई। 16 जून से पूरे देश में डायनामिक प्राइसिंग लागू होने से हर रोज सुबह 6 बजे पेट्रोल-डीजल के दाम बदल जाते हैं। सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि मौजूदा सरकार के आने के बाद से डीजल पर लागू एक्साइज ड्यूटी में 380% और पेट्रोल पर 120% की वृध्दि हो चुकी है। कई राज्यों में पेट्रोल के दाम 80 रुपए के पार जा चुके हैं। 17 सितंबर को मुंबई में पेट्रोल 79.62 रुपए,डीजल 62.55 रुपए, दिल्ली में पेट्रोल 70.51 रुपए, डीजल 58.88 रुपए प्रति लीटर रहा। उपभोक्ता की दृष्टि से देखें तो विश्व बाजार की मौजूदा कीमतों की तुलना में यहां प्रति लीटर भुगतान की जाने वाली कीमत का लगभग आधा पैसा ऐसे टैक्सों के जरिए सरकार के खजाने में पहुंच रहा है। बढ़े दामों का 75 से 80 प्रतिशत फायदा सरकारी खजाने में जबकि उपभोक्ताओं को केवल 20-25 प्रतिशत ही मिल पाया। अर्थशास्त्रियों के अनुमान पर जाएं तो पिछले तीन साल में कम से कम 5 लाख करोड़ रुपये सरकार के पास जमा हुए हैं। बड़ी विडंबना देखिए केन्द्रीय पर्यटन मंत्री अल्फोंज कन्ननाथनम पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों पर कहते हैं- “जो लोग पेट्रोल डीजल खरीद रहे हैं वो गरीब नहीं है और ना ही वो भूखे मर रहे हैं। पेट्रोल-डीजल खरीदने वाले कार और बाइक के मालिक हैं। उन्हें ज्यादा टैक्स देना ही पड़ेगा। सरकार को गरीबों का कल्याण करना है, और इसके लिए पैसे चाहिए इसलिए अमीरों पर ज्यादा टैक्स लग रहा है। गरीबों का कल्याण कर हर गांव में बिजली देना है, लोगों के लिए घर और टॉयलेट बनाना। इन योजनाओं को अमली जामा पहनाने है जिसके लिए काफी पैसा चाहिए इसलिए उन लोगों पर टैक्स लगा रहे हैं जो चुकाने में सक्षम हैं।” इस अंकगणित को कौन झुठलाए कि आम आदमी की जेब पर केवल पेट्रोल और डीजल का खर्चा नहीं बढ़ता है, हर चीज महंगी होती है। परिवहन कर जो सामान एक-दूसरी भेजा जाता है, महंगा होता है। इससे उसकी लागत बढ़ जाती है, मुद्रा स्फीति भी बढ़ती है, और थोक मूल्य सूचकांक में वृध्दि होती है। उन्मुक्त बाजार के नाम पर पेट्रोलियम की कीमतों में दखल न देकर उपभोक्ताओं का हिस्सा मारा जा रहा है। सरकार की कमाई बची रहे इसलिए केंद्र और राज्यों ने इसे जीएसटी से भी बाहर रखा है। क्या राजस्व जुटाने के लिए मौजूदा सरकार के पास सिवाए पेट्रोलियम पर टैक्स वसूलने के दूसरा कोई रास्ता नहीं है? क्या पेट्रोलियम मंत्री के ट्वीट कि दुनिया के कई देशों में भारत से महंगा पेट्रोल-डीज़ल मिलता है, हम विकसित या विकासशील देशों के बराबर पहुंच जाएंगे? दूर नहीं पड़ोस में ही देखें पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में पेट्रोल-डीजल के दाम हमसे कम हैं। क्या हम उनसे भी पीछे हैं, क्या उनको सरकारी खजाने में ज्यादा धन की जरूरत नहीं है, क्या उन्हें विकास और गरीबों के कल्याण की चिन्ता नहीं है? मई 2008 में जब यूपीए सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दामों में चार साल बाद वृध्दि की थी तब इसी भाजपा ने सरकार पर आर्थिक आतंकवाद के आरोप मढ़े थे और आज खुद ही उससे भी आगे नक्शे कदम पर है। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान की जीएसटी काउंसिल से पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के दायरे में लाने की अपील के अमल में आने के बाद देश भर में समान कीमतों पर एक्साइज का क्या असर होगा इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। फिलाहाल केन्द्रीय मंत्री अल्फोंज कन्ननाथनम के शब्दों की अनुगूंज ही काफी है जिसमें कहते हैं वो जो लोग पेट्रोल डीजल खरीद रहे हैं वो गरीब नहीं है और ना ही वो भूखे मर रहे हैं। लोग एक-दूसरे से पूछते हैं क्या यही अच्छे दिन हैं और देश बदल रहा है?

दक्षिण एशिया में नया शीतयुद्ध
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत-जापान संयुक्त घोषणा पर आज चीनी प्रवक्ता ने जो प्रतिक्रिया दी है, उससे साफ जाहिर होता है कि दक्षिण एशिया में अब एक नया शीतयुद्ध शुरु हो गया है। इस शीतयुद्ध के एक खेमे में अमेरिका, भारत और जापान हैं और दूसरे खेमें में चीन और पाकिस्तान है। जहां तक रुस का प्रश्न है, वह अभी बीच में हैं लेकिन ऐन मौके पर वह भी दूसरे खेमे के साथ जाना पसंद करेगा। यदि पूरी तरह से नहीं तो भी कई मुद्दों पर वह चीन और पाकिस्तान का साथ देगा। इसका अर्थ यह हुआ कि दक्षिण एशिया में एक अघोषित शीतयुद्ध शुरु हो चुका है। इस शीतयुद्ध को मुखरता प्रदान की है, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे की भारत-यात्रा ने। इस यात्रा के दौरान ऐसे कई समझौते हुए, जो चीन का नाम लिये बिना, उसकी नीतियों को चुनौती देते हैं। इस यात्रा के पहले ही दोकलाम-विवाद में जापान ने भारत का समर्थन कर दिया था। जापान और भारत ने चीन का नाम नहीं लिया लेकिन उन दोनों ने चीन की दुखती रग पर उंगली रख दी। दक्षिण चीन सागर और प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों ने सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान, स्वतंत्रतापूर्वक व्यापार और यात्रा तथा अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने का आह्वान किया। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय इस मामले में चीन के एकाधिकार के विरुद्ध फैसला दे चुका है। इसी प्रकार ‘ओबोर’, उ. कोरिया, सामरिक सहकार, बुलेट ट्रेन, परमाणु-सहयोग, आतंकवाद, एशिया-अफ्रीका में वैकल्पिक जल-थल मार्ग निर्माण आदि मुद्दों पर भारत और जापान की सहमति चीन को सीधी चुनौती है। चीन को चुभनेवाली सबसे नुकीली बात यह है कि जापान अब भारत-चीन सीमांत पर स्थित अरुणाचल और लद्दाख में भी निर्माण कार्य शुरु करेगा। इसी बात पर चीन चिढ़ गया है। चीनी प्रवक्ता ने अपना एतराज जाहिर करते हुए कहा है कि भारत-चीन सीमा-विवाद में किसी तीसरे देश का टांग अड़ाना ठीक नहीं है। जापान और भारत किसी गुप्त योजना को तो लागू नहीं कर रहे हैं ? चीन के इन संदेहों को पाकिस्तान में भी काफी हवा दी जा रही है। वहां मांग यह उठ रही है कि पाकिस्तान अब डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका का बहिष्कार करे और पूरी तरह चीन का पल्ला पकड़ ले। लेकिन ऐसी मांग करनेवाले यह क्यों नहीं समझ रहे कि पाकिस्तान का समर्थन चीन उसी पैमाने पर करने की सामर्थ्य नहीं रखता, जिस पैमाने पर अमेरिका करता रहा है। जो भी हो, यह शीतयुद्ध तो शुरु हो गया है। हम आशा करें कि यह गर्म युद्ध में कभी नहीं बदलेगा।

आखिर देशभक्ति के मायने क्या हैं?
-प्रो.शरद नारायण खरे
बहुत सारे विशेषण इस समय प्रचलित दिखाई देते हैं,। वे हैं-राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय हित, वतनपरस्ती, देशभक्ति आदि। तो प्रश्न यह उठता है, कि आखिर इन सब के निहितार्थ क्या हैं, और कैसे कोई व्यक्ति देशभक्त बन सकता है,। वास्तव में , यदि देखा जाए तो राष्ट्र के हित में काम करना ही देशभक्ति है, और राष्ट्र का अहित करना ही गद्दारी है, मुल्क के साथ विश्वासघात है।
अब सवाल यह है कि क्या ठीक से राष्ट्रगान“ जन गण मन अधिनायक जय है………“ गाना, भारत माता की जय बोलना, वंदे मातरम के नारे लगाना – यह ही राष्ट्रीयता/देशभक्ति है या इससे कुछ अलग हटकर काम करना देशभक्ति है? आजकल सोशल मीडिया पर तो पाकिस्तान मुर्दाबाद, नबाज शरीफ चोर है, इंडियन आर्मी जिंदाबाद, कश्मीर हमारा है, पाकिस्तान को चीर देंगे, पाकिस्तान का नामोनिशान मिटा देंगे- जैसे नारों व गर्जनाओं का प्रयोग ही देशभक्ति के रूप में माना जा रहा है। फेसबुक, व्हाट्सएप ट्यूटर इत्यादि पर जो इन नारों व उक्तियों का समर्थन लाइक/कमेंट करता है वह देशभक्त है, अन्यथा नहीं।
हकीकत तो यह है कि इस समय देश में देशभक्ति व देशद्रोहिता को लेकर एक बहस सी छिड़ी हुई है। राजनेता तो मल्लयुद्व करने में जुटे ही हैं देश का हर नागरिक व्यापारी, उद्योगपति, वकील इंजीनियर, अधिकारी, छोटा व्यापारी, मजदूर, विद्यार्थी, पत्रकार, चाय-पान की गुमटियों-ठेलों पर खडे होने वाले लोग भी देशभक्ति व देशद्रोहिता को परिभाषित करने में लगे हुए हैं।
बॉलीबुड के आमिर खान, शाहरूख खान, सलमान खान जैसे स्टार्स व निर्माता-निर्देशक भी दो खेमों में बंटे हुए हैं। एक कहता है कि पाकिस्तानी कलाकारों को फिल्मी दुनिया से भगा देना ही देशभक्ति है, तो दूसरा कहता है कला स्वंतत्र होती है उसे संकीर्णता के दायरे में बांधना कतई उचित नहीं है। मोटी रकम लेकर मंच पर ओज के
साथ कविता पढ़ने वाला कवि चीख-चीखकर “ कश्मीर हमारा है“ “पाकिस्तान का नामोनिशान मिटा देंगे“ जैसी कविताएं पढ़कर अपने देशभक्त होने का सबूत देता है। न वह इन्कम टेक्स भरता है, पर वह अपने को कविताओं के माध्यम से देशभक्त प्रमाणित करता है। तो अन्य कोई अन्य तरह का प्रपंच करके। अब सवाल यह है कि क्या कालेधन को कोसने से, या कालेधन के स्वामियों को बददुआएं देने से हम देशभक्त हो गए ?
हाल ही में 500-1000 की नोटबंदी ने भी देशवासियों को दो खेमों में बांट दिया है। यह तो सही है कि कालाधन व जाली मुद्रा पर लगाम कसने के लिए ही यह बड़ा कदम उठाया गया है, पर इस कदम से भी देश में दो वर्ग पैदा हो गए है। इस नई नीति का समर्थन करना देशभक्ति व इसका विरोध करना देशद्रोहिता माना जा रहा है। वास्तव में, बड़े नोटों पर प्रतिबंध लगाना यह उचित भी है, क्योकि इसके पीछे सरकार की स्पष्ट मंशा है। पर केवल यही देशभक्ति नहीं है, बल्कि इसके साथ अन्य अनेक महत्वपूर्ण कार्य व आचरण किए जाना भी देशभक्ति को प्रमाणित करने के लिए अपरिहार्य है। वस्तुत: देश के हितों की रक्षा करना ही देशभक्ति है, वास्तव में, देशभक्ति के मूल निहितार्थ सच्चे नागरिक होने में है। जो अपने को धर्म ,जाति भाषा, क्षेत्र की संकीर्णता से ऊपर उठाकर भारतीयता का आचरण करता है, तथा राष्ट्र की एकता को मजबूत करने में अपना योगदान देता है, वह ही सच्चा देशभक्त प्रमाणित होता है। वह व्यक्ति जो भारत के संविधान को न केवल दिल से मानता/स्वीकारता है, बल्कि भारत की न्यायपालिका,विद्यायिका, कार्यपालिका का सम्मान करता है, और विधि के दायरे में रहकर आचरण करता है, वह इनसान ही देशभक्त माना जाता है।
रिश्वत न खाना, कमीशनखोरी न करना, कर्त्तव्यपरायण-ईमानदार, रहना, कालाबाजारी- कर चोरी व जमाखोरी न करना, सभी प्रकार के टैक्स जिनके दायरे में व्यक्ति आता है, को चुकाना, पूरा आयकर भरना, बेनामी सम्पति न रखना, सबकुछ विधिवत्् घोषित करना, फर्जी नामों से खरीददारी न करना ये सभी तत्व देशभक्ति को प्रमाणित करने वाले गुणधर्म होते हैं, जिनको आचरण में उतारने वाला ही देशभक्त माना जाता है।
प्राय: हम बाजार से जो साम्रगी क्रय करते है, हम प्राय: पक्का बिल नहीं लेते हैं। या उसकी मांग करने पर जब दुकानदार हमसे कुछ अधिक भुगतान मांगने लगता है, तो हम अपने लाभ के लिए कच्चा बिल स्वीकार कर लेते है। पर देशभक्ति का यही
तकाजा है कि हमें चाहे अधिक भुगतान ही क्यों न करना पड़े, पर कभी भी हमें कच्चा बिल स्वीकार करके विक्रेता को कर चोरी का अवसर उपलब्ध नहीं कराना चाहिए, अन्यथा हमारी देशभक्ति पर प्रश्नचिंह लग जाएगा। रिश्वत लेने व देने काम करना, दतर में काम के घंटों में गप्पबाजी करना, सरकारी नीतियों की आलोचना करना, अफवाहें फैलाना, तनाव फैलाना, मजहबी उन्माद फैलाना, हड़तालें करना, तोडफोड करना, सरकारी सम्पति को नुकसान पंहुचाना, राष्ट्रीय विकास में बाधक बनना, कानूनों व आचरण संहिता का उल्लंघन करना, जमाखोरी करना, कालाबाजारी करना, उंचनीच छुआछूत को मानना, मानवाधिकारों का हनन करना, मतदान में भाग न लेना, लोभ में आकर मतदान करना, भारतीय फौजों का मनोबल घटाने की चेष्टा करना, सरकारी धन की हेराफेरी करना, ये सारी बातें देशद्रोहिता की श्रेणी में आती हैं।
अतएव, यदि हमें देशभक्त बनना है, तो हमें इन सारी बुराईयों व विकारो से दूर रहना होगा, क्योंकि ये सारी बातें देशद्रोहिता की परिधि में आती हैं। केवल गाल बजाने या नारेबाजी करने, शगूफा छेड़ने से हम देशभक्त नही बन सकते। बल्कि इसके लिए हमें समुचित तरीके से देशभक्ति व राष्ट्रीयता वाला आचरण करना चाहिए, क्योंकि देशभक्ति के मायने यही हैं।

कर्मठ और विकास प्रिय हमारे प्रधानमंत्री श्री मोदी

डॉ. नरोत्तम मिश्र
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र जी मोदी की 17 सितंबर को जन्म वर्षगांठ पर हार्दिक बधाई। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भारत को समग्र विकास, स्वच्छता, स्वच्छ पर्यावरण, शिक्षा, संचार, स्वास्थ्य और स्वालम्बन में नई पहचान देने का कार्य किया है। इसके साथ ही उन्होंने भारत को विश्व में नई गरिमामय पहचान दिलाने वाले कर्मठ प्रधानमंत्री के रूप में भी अपनी पहचान बनायी है। यह एक महत्वपूर्ण संयोग है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी की ही तरह कर्मशील विकासप्रिय व्यक्ति के रूप में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री चौहान ने भी अलग पहचान बनाई है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान भी बतौर मुख्यमंत्री श्री मोदी की तरह राज्य के सर्वांगीण विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं। श्री मोदी ने गुजरात को विकास का उदाहरण बना दिया। यही कार्य मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री श्री चौहान कर रहे हैं। यह मध्यप्रदेश का सौभाग्य है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी की तरह मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री श्री चौहान ने पं. दीनदयाल उपाध्याय के अन्त्योदय के विचार को क्रियान्वित किया है। इस समय देश और प्रदेश दोनों जगह सक्षम और समर्थ नेतृत्व जनता के कल्याण के लिए सजग और सक्रिय है। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री श्री चौहान ने 17 सितंबरको स्वच्छता के लिए श्रमदान का आव्हान कर जनता को प्रेरित किया है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी का जन्म दिवस सेवा दिवस के रूप में मनाया जाए। जब प्रधानमंत्री श्री मोदी ने प्रधानमंत्री पद का दायित्व संभाला था तब देश की क्या स्थिति थी, यह किसी से छिपा नहीं है। एक व्यापक दृष्टि और राष्ट्र के कल्याण को एक उद्देश्य मानकर कार्य करने वाले प्रधानमंत्री श्री मोदी ने देश के समस्याओं को बहुत नजदीक से देखा है।

दरअसल उन्होंने जनता के नब्ज टटोली है और उसके अनुसार ही अपनी कार्य योजना बनाकर कदम आगे बढ़ाए है। उन्होंने आम व्यक्ति के जीवन स्तर को सुधारने के लिए जिन योजनाओं की कल्पना की उन्हें जमीन पर उतारने के लिए उतने ही ठोस प्रयास भी किए। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री उज्जवला योजना की बात की जाए। इस योजना से देश की लाखों महिलाओं को रसोई गैस की सुविधा उपलब्ध करवायी गई है। इसके पहले शहरी और ग्रामीण महिलाएं चूल्हे के धुएं से परेशान होकर स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करने को विवश होती थीं। आज उनके जीवन में कम से कम प्रदूषण रहित वातावरण में कार्य करना संभव हो सका है। इसी तरह हर व्यक्ति के लिए आवास और गाँव तक पक्की सड़कों के निर्माण की दिशा में किए गए सशक्त प्रयास भारत को समृद्धि का नया मार्ग उपलब्ध करवा रहे हैं। वस्तु एवं सेवाकर की नई व्यवस्था से देश में एक कर प्रणाली लागू करने जैसे क्रांतिकारी कदम
उठाकर अर्थ व्यवस्था को दीर्घकालिक सुधारों का लाभ दिलवाने की दूरदर्शिता प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में ही संभव थी। उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में भी समृद्धि के नए कदम उठाए। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह जी प्रधानमंत्री श्री मोदी की कार्यप्रणाली के अनुसार संगठन स्तर पर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। यह देश का सौभाग्य है कि श्री मोदी और श्री शाह के परस्पर समन्वय से प्रांतों में तरक्की की जो कोशिशें आकार ले रही हैं वे साधारण श्रेणी न होकर ऐतिहासिक श्रेणी की हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी को उनके जन्म दिवस पर बधाई देते हुए यह कामना है कि मध्यप्रदेश सहित देश के सभी प्रदेशों में जनकल्याण की उनकी कल्पनाओं को साकार करने के लिए हम सब भी सहभागी बनें और राष्ट्र कल्याण के इस यज्ञ में अपनी आहुति जरूर दें। सेवा दिवस के रूप में आज का दिन इस मायने में किसी त्यौहार से कम नहीं है। त्यौहार हमारी जिंदगी में खुशियां लाते हैं और स्वच्छता के साथ विकास के संकल्प को अमल में लाने के किए यदि सभी मिलकर हाथ बढ़ाते हैं तो यह अवसर किसी त्यौहार में मिलने वाली बड़ी खुशी से कम नहीं है। (ब्लॉग राईटर डॉ. नरोत्तम मिश्र मध्यप्रदेश के जनसंपर्क, जल संसाधन और संसदीय कार्य मंत्री और राज्य सरकार के प्रवक्ता हैं)

आतंकियों के सहयोगी रोहिंग्याइयों के हमदर्द शाही इमाम
-प्रवीण गुगनानी
बांग्लादेशी घुसपैठियों का मामला पूर्व से ही देश के समक्ष एक चुनौती बन कर खड़ा हुआ है. आसाम और अन्य कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में सामाजिक तानेबाने व स्थानीय शांति व्यवस्था के लिए घातक ख़तरा बन चुके ये घुसपैठिये तमाम प्रकार की आपराधिक व आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न रहते हैं. मालदा जो कि मुस्लिम बहुल जिला है उसे इन बांग्लादेशी घुसपैठियों ने आतंकवादियों द्वारा भेजी गई नकली करेंसी खपाने का व अन्य राष्ट्रविरोधी अपराधों का गढ़ बना दिया है. अभी बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या भारत के सिर पर खड़ी ही है कि रोहिंग्याइयों मुस्लिमों का एक नया विषय भारत के समक्ष चुनौती बनकर आ गया है. रोहिंग्या मुस्लिम 12वीं सदी के शुरुआती दशक में म्यांमार के रखाइन इलाके में आकर बस गया था किंतु स्थानीय बौद्ध बहुसंख्यक समुदाय से वह कभी सामंजस्य नहीं बैठा पाया फलस्वरूप उन्हें आज भी देश का बौद्ध समाज नहीं अपना पा रहा है. 2012 में रखाइन में कुछ सुरक्षाकर्मियों की हत्या के बाद रोहिंग्या और सुरक्षाकर्मियों के बीच व्यापक हिंसा भड़क गई थी तबसे यह विभाजनकारी रेखा और गहरी हो गई. इसके बाद से ही म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों व बर्मा के बौद्ध समुदाय में संघर्ष जारी है. हाल ही में 25 अगस्त को रोहिंग्या मुसलमानों ने बर्मा की पुलिस पर हमला कर दिया, इस लड़ाई में कई पुलिस वाले घायल हुए, इस हिंसा से म्यांमार के हालात अत्यंत खराब हो गए फलस्वरूप पूर्व से चल रहा संघर्ष और अधिक तीव्र हो गया. भारत में अवैध रूप से घुस आये चालीस हजार रोहिंग्याई मुस्लिमों के निर्वासन को लेकर भारत सरकार ने भी कार्यवाही प्रारम्भ कर दी है. इसके बाद पूरे देश में रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर जामा मस्जिद दिल्ली के शाही इमाम ने ऐसा बेसुरा राग छेड़ा है कि पुरे देश के अनेकों जिला व तहसील मुख्यालयों पर भोले भाले मुस्लिम बंधुओं ने ज्ञापन देनें व रोहिंग्याइयों को भारत से निर्वासित न करने की अपील की झड़ी लगा दी है. यहां यह ध्यान देनें योग्य बात है कि भारत में जबकि हिंदू व मुस्लिम समाज में कई तरह के वैचारिक अवरोध-गतिरोध पूर्व से ही बड़ी संख्या में विद्यमान हैं तब मुस्लिम समाज को भी चाहिए कि वह इस राष्ट्र की मुख्यधारा में सम्मिलित होने हेतु पूर्व के विभाजक विषयों को शनैः शनैः समाप्त करें व नए मतभेद न उभरने दे, किन्तु जो हो रहा है वह इसके ठीक विपरीत है. देश का सामान्य मुस्लिम समाज कुछ कट्टरपंथी व अवसरवादी मुस्लिम नेताओं की घटिया राजनीति का शिकार हो जाता है व भारत की हिंदू-मुस्लिम समरसता के नए अवसरों के उपजने में बाधक बन जाता है. आतंकियों का खिलौना बन गए रोहिंग्याइयों के भारत से निर्वासन का विरोध करना इस कड़ी का ही नया आयाम है.
रोहिंग्याई मुसलामानों की समस्या के अन्तराष्ट्रीय स्वरूप या बांग्लादेशी स्वरूप को हम छोड़ दे और प्रथमतः केवल भारत के संदर्भ में इसकी चर्चा करें तो हमें कई ऐसी भारत विरोधी तथ्य मिलते हैं जो रोहिंग्याइयों को भारत से वापिस भेज देनें के पक्ष में एक बड़ा वातावरण बनाते हैं. आज स्थिति यह है कि कश्मीर में रह रहे दस हजार रोहिंग्याइयों ने अपनी “आरसा” नामक मिलीटेंट आर्मी बना ली है जो अरब देशो से फंडिंग ले रही है और कश्मीर व अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में नित नए अपराध कर रही है. रोहिंग्याई आतंकी संगठन “आरसा” का दुरूपयोग कश्मीरी अलगाववादी संगठन बड़े पैमाने पर कर रहे हैं व मजबूर व दीन हीन रोहिंग्याइयों का उपयोग मानव बम के रूप में करने की तैयारियां कर रहें हैं. उधर नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला ने इस विषय में बर्मा की “चैम्पियन आफ डेमोक्रेसी” मानी जाने वाली आंग सान
सु चि की कड़ी आलोचना तो कर दी है किंतु अपने ही देश पकिस्तान की सरकार से वे रोहिंग्याइयों को शरण देनें की व्यवस्थित अपील तक नहीं कर पा रहीं हैं. मलाला को चाहिए कि वे पहले अपने देश पाकिस्तान में रोहिंग्याइयों को शरण देनें हेतु वातावरण निर्मित करें तब अन्तराष्ट्रीय स्तर पर इस प्रकार के परामर्श देनें का कार्य करें. शाही इमाम के बहकावे में आकर रोहिंग्याइयों को भारत से निर्वासित न करने की अपील करने वाले भारतीय मुस्लिम बंधुओं को यह भी देखना चाहिए कि वे उन लोगों की मदद की बात कर रहें हैं जिनके विषय में अलकायदा जैसे घोषित आतंकवादी संगठन ने नरेंद्र मोदी सरकार की इस विषय पर आलोचना की है. अलकायदा ने मोदी सरकार को चुनौती चुनौती देते हुए कहा है कि “मोदी सरकार रोहिंग्याइयों को देश से बाहर निकाल कर दिखाए”. यहां यह भी एक विषय है कि इमाम ने अपनी सदा की दुष्प्रवृत्ति के अनुरूप इस विषय को अनावश्यक ही हिंदू मुसलमान का विषय बना दिया है. मुस्लिम बंधुओं को आज यह विचार करना ही होगा कि उनका समाज क्यों समय समय पर देशविरोधी अभियानों व आव्हानों का हिस्सा बन जाता है. मुस्लिम स्वयं विचार करें कि शाही इमाम के आव्हान पर देश में मस्जिदों से जिला कलेक्टरों को रोहिंग्याइयों के पक्ष में जिस प्रकार के ज्ञापन दिलवाए जा रहें हैं और उन्हें भारत से निर्वासित न करने की अपीलें की जा रही हैं उनका शेष भारतीय समाज व राष्ट्रीय एकता पर क्या प्रभाव होगा. मुस्लिम समाज को अपनी बुद्धि विवेक को जांचना होगा कि आखिर किस षड्यंत्र के तहत वे आज ऐसे लोगों का समर्थन करने सड़कों पर उतर आये हैं जिनका अलकायदा के दुर्दांत संगठन “आसुह” से, “अकामुल मुजाहिदिन” से व “लश्कर” से स्पष्ट सम्बन्ध व सहयोग हो गया है. रोहिंग्याई इन आतंकी संगठनों से सीधे तौर पर जुड़ कर प्रतिदिन इस देश में आपराधिक गतिविधियां कर रहें हैं! रोहिंग्याइयों का दिन प्रतिदिन घातक व देशविरोधी उपयोग आतंकवादी कर रहें हैं. आज भारत में रोहिंग्याई और कुछ नहीं बल्कि आतंकवादियों के उपयोग की एक बेहद सस्ती विस्फोटक सामग्री मात्र बनकर रह गयें हैं, उनकी वकालत एक सभ्य व सभ्रांत समाज कैसे कर सकता है?!
भारत में रह रहे चालीस हजार रोहिंग्याई मुसलामानों के संदर्भ में भारत सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि इन्हें देश में शरण नहीं दी जायेगी और इन्हें देश से निकाला जायेगा. यह भी स्पष्ट हो चुका है कि जम्मू कश्मीर सहित देश के आठ राज्यों में फ़ैल चुके रोहिंग्याई मुसलमान देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक ख़तरा बन चुकें हैं. अलकायदा सहित विभिन्न आतंकवादी संगठनों से मदद पा रहे ये रोहिंग्याई कई देशविरोधी गतिविधियों में व्याप्त होते जा रहें हैं व स्पष्टतः देश विरोधी अपराधों में रंगे हाथों पकड़े भी जा रहें हैं. भारत ने इन रोहिंग्याइयों के भारत प्रवेश को रोकने के लिए भारत-म्यांमार सीमा पर चौकसी बढ़ा दी है. सीमा पर सरकार ने इनके विरुद्ध रेड अलर्ट भी जारी किया है. प्रश्न यह आता है कि विभिन्न दुर्दांत आतंकवादी संगठनों से मदद पा रहे रोहिंग्याइयों के लिए भारत के मुसलमान क्यों इतनी वेदना व्यक्त कर रहें हैं?! पहले दिल्ली के शाही ईमाम फिर पंजाब के उलेमा और फिर पुरे देश के मुल्ला मौलवी देश भर में रोहिंग्याइयों के पक्ष में ज्ञापन देकर अपीलें कर रहें हैं, उसकी पीछे क्या कारण है? भारतीय मुस्लिमों को शाही इमाम बुखारी ने जिस प्रकार रोहिंग्याइयों के पक्ष में अपना हथियार बनाया है और भारतीय मुस्लिम भी बड़े ही भोलेपन से इमाम के हथियार बन भी गयें हैं वस्तुतः यही वह तथ्य है जो भारत के सामाजिक तानेबाने में मतभेद के तार उत्पन्न करता है. दिल्ली में हो रही अपने बेटे की ताजपोशी में भारतीय प्रधानमंत्री को नजरअंदाज कर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को आमंत्रित कर अलगाव व विभाजन रेखा खीचने वाले शाही ईमाम की इस विषय पर आलोचना उस समय भारतीय मुस्लिम बंधुओं ने भी जी भर के की थी. शाही इमाम जैसी चिंता रोहिंग्याइ मुस्लिमों की कर रहें हैं वैसी चिंता की शतांश चिंता भी वे कश्मीरी पंडितों के लिए कभी कर पायें हैं?! यह भी घोषित तथ्य है कि सैकड़ों भारतीय सामाजिक व राष्ट्रीय समस्याओं के समय चुप्पी धरे रहने वाले शाही ईमाम एकाएक रोहिंग्याइयों के विषय में राष्ट्रीय अन्तराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हो गयें हैं. शाही इमाम व भोलेपन में उनके पीछे खड़े हो गए अन्य भारतीय मुस्लिम बंधूओं को यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि भारतीय समाज अब ऐसे लोगों को सुनने समझने के मूड में कतई नहीं है जो अन्य भारतीय राष्ट्रीय व सामाजिक समस्याओं पर तो चुप्पी धरे रहते हैं किंतु आतंकवादी संगठनों के सहयोग से भारत में घुस आये, फल फुल रहे व भारत में अपराध कर रहे रोहिंग्याइयों का समर्थन कर रहें हैं. शाही इमाम व अन्य मुस्लिम उलेमाओं ने प्रधानमंत्री से अपील की है कि वे भारत में रह रहे चालीस हजार रोहिंग्याइयों को भारत में ही रहने दे व उन्हें निर्वासित न करें क्योंकि भारत की हजारों वर्षों की परम्परा लोगों को शरण देनें की रही है. उल्लेखनीय है कि इस सम्बन्ध में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि रोहिंग्या अवैध प्रवासी हैं, भारतीय नागरिक नहीं हैं, इसलिए वे ऐसी किसी चीज के हकदार नहीं हैं, जिसका कि कोई आम भारतीय नागरिक हकदार है. उन्होंने रोहिंग्या मुस्लिमों के निर्वासन पर संसद में दिए गए अपने बयान पर स्पष्ट कहा है कि रोहिंग्या लोगों को निकालना पूरी तरह से कानूनी स्थिति पर आधारित है. उन्होंने कहा, “रोहिंग्या अवैध प्रवासी हैं और कानून के मुताबिक- उन्हें निर्वासित होना है, इसलिए हमने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे रोहिंग्या मुस्लिमों की पहचान के लिए कार्यबल गठित करें और उनके निर्वासन की प्रक्रिया शुरू करें.” भारतीय मुस्लिमों को भी चाहिए कि वे राष्ट्रहित में आतंकियों के सहयोगी बन रहे रोहिंग्याइयों को भारत में बसाने की मांग करना बंद करें व एक देशभक्त भारतीय होनें का परिचय देवें.

भारत-जापान संबंध गहराए लेकिन….
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
भारत-जापान मैत्री की नींव आज मजबूत हो गई है। जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे की इस भारत-यात्रा के दौरान यह स्पष्ट हो गया है कि दोनों देश आपसी मामलों में तो एक-दूसरे को काफी फायदा पहुंचा ही सकते हैं, इसके अलावा लगभग आधा दर्जन प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मामलों में उनकी एक-जैसी दृष्टि है। चीन, उ.कोरिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, प्रशांत महासागर, आतंकवाद, अफ्रो-एशियाई महापथ, भारत-जापान-अमेरिका का त्रिकोणात्मक सहकार–इन सब मामलों में भारत और जापान का नजरिया लगभग एक-जैसा ही है। इन सब समानताओं के होते हुए भी पिछले 70 साल में भारत और जापान के संबंध घनिष्ट क्यों नहीं हुए ? कौटिल्य का यह सूत्र भारत-जापान संबंधों पर लागू क्यों नहीं हो पाया कि पड़ौसी का पड़ौसी हमारा मित्र होगा ? एक तो भारत का असंलग्न होना और जापान का अमेरिकी गुट में होना। दूसरा, भारत का परमाणु बम संपन्न होना और जापान का उसका विरोधी होना। तीसरा, भारत द्वारा अंग्रेजी भाषा की गुलामी करना। अब ये तीनों बाधाएं नहीं रहीं। अब भारत, अमेरिका और जापान मिलकर संयुक्त सैन्य अभ्यास कर रहे हैं। जापान अब हमें परमाणु तकनीक देने के लिए तत्पर है और अब भारत और जापान दोनों अंग्रेजी की बैसाखी तजकर हिंदी और जापानी को अपने व्यापार, कूटनीति और लेन-देन का माध्यम बनाने के लिए तैयार हो गए हैं। इस समय भारत-जापान व्यापार बहुत ही दयनीय है। सिर्फ 15 बिलियन डॉलर का। जबकि चीन के साथ उसका 300 बिलियन डॉलर का व्यापार है। उसे बढ़ाना जरुरी है। भारत में जापान की 1300 कंपनियां काम कर रही हैं लेकिन उनकी सिर्फ 5-6 बिलियन डॉलर की पूंजी यहां लगी है। यह ठीक है कि भारत अब एक लाख करोड़ रु. की बुलेट ट्रेन लगाएगा लेकिन जापान से मिला यह सस्ते ब्याज का पैसा दुगुना होकर क्या वापस जापान नहीं लौट जाएगा ? और फिर यह बुलेट ट्रेन किस के काम आएगी ? यह काम आएगी, ‘इंडिया’ के, भारत के नहीं। भारत में रहनेवाला गरीब, ग्रामीण, वंचित इसमें यात्रा करने का सपना भी नहीं देख सकता। इस एक लाख करोड़ रु. से भारत की सारी रेलगाड़ियों को यूरोपीय रेलगाड़ियों की तरह सुरक्षित और स्वच्छ बनाया जा सकता था। लेकिन हमारे नौटंकीप्रिय नेता बाहरी चमक-दमक पर फिदा हैं। उन्हें कौन रोक सकता है ? यदि भारत और जापान मिलकर अपना पैसा एशिया और अफ्रीका के जल-थल-वायु मार्गों के निर्माण में लगाएं तो बेहतर होगा। यदि ये दोनों देश अफगानिस्तान में मिलकर काम करें तो आंकवाद को घटाने में भी मदद मिलेगी।

बिना चूँ-चपाट डीज़ल-पेट्रोल ख़रीदते जाइए……
जहीर अंसारी
मध्यप्रदेश वाक़ई अजब भी है और ग़ज़ब भी। यहाँ 8 रुपए किलो की प्याज़ ख़रीदकर दो रुपए किलो में बेचकर भी करोड़ों रुपए भ्रष्टाचार किया जाता है। यहाँ डीज़ल-पेट्रोल पर सबसे ज़्यादा वेट वसूला जाता है। यहाँ डीज़ल-पेट्रोल पर वेट के अलावा अलग से पैसा सरकार वसूल लेती है। बड़े अफ़सर तो छोड़े चपरासी के तबादले में भी चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है। वैसे अब इन बातों के कोई मायने नहीं है। विपक्ष की माने तो पिछले ग्यारह-बारह सालों में डेढ़ सौ से ज़्यादा बड़े-बड़े घोटाले हो चुके हैं। लेकिन सरकार की कालर मजाल है जो मैली दिख जाए। मैल ढूँढने से भी नहीं दिखाई पड़ेगी।
ख़ैर हमें क्या, कौन सा हमें राजनीति करनी है। तकलीफ़ है तो इस बात की मध्यप्रदेश में ही डीज़ल-पेट्रोल सबसे ज़्यादा महँगे क्यों? क्या यहाँ के सात करोड़ रहवासी किसी दूसरे ग्रह से पधारे हैं क्या? इसी सरकार के लोग पहले पेट्रोलियम पदार्थों में एक रुपए बढ़ जाने पर महँगाई और किसानों पर अत्याचार की दुहाई देकर सड़कों पर उतार आया करते थे। फिर आज क्यों मन लगाकर जनता को लूट रहे हैं? क्या प्रदेश के लोग समृद्ध हो गए हैं? क्या उनके घरों में पेड़ से रुपए झर रहे हैं? या उनकी आमदनी के स्त्रोत में कृपा बरस रही है? सरकार का रवैया आमजन के समझ से परे है।
दिल्ली सरकार की बात करने की बजाय भाजपा शासित राज्यों की बात करें तो कई राज्यों में डीज़ल-पेट्रोल की क़ीमत कम है। बक़ौल प्रदेश के वित्त एवं वाणिज्यकर मंत्री जयंत मलैया की बात माने तो उनका कहना है कि सरकार पेट्रोल पर 31 फ़ीसदी और डीज़ल पर 27 फ़ीसदी वेट ले रही है। इसके अलावा पेट्रोल पर 4 रुपए और डीज़ल पर डेढ़ रुपए प्रति लीटर अतिरिक्त टैक्स अर्थात सैस वसूल रही है। जबकि पेट्रोल बिना वेट के 55.42 और 50.05 प्रति लीटर पड़ता है। इस पर राज्य सरकार मन लगाकर वेट वसूल रही है। इसलिए राज्य में पेट्रोल 79 रुपए और डीज़ल 65 रुपए बिक रहा है।
माना कि सरकार की माली हालत दयनीय है। पिछले एक दशक से आय बढ़ाने की बजाय सरकार ने ख़र्च ही बढ़ाया है। जनकल्याणकारी योजनाओं के ज़रिए जनता की गाढ़ी कमाई की होली ही खेली गई। यदि इन योजनाओं के सकारात्मक परिणाम निकलते तो करदातों को थोड़ा तसल्ली हो जाती।
इस सब के बाद मंत्री जी का तुर्रा यह कि हमारी बिक्री और आय बढ़ी है तो भाई क्यों नहीं बढ़ेगी जब बेरहमी से आम जनता की जेबें ढीली करवाओगे, तो सबकुछ बढ़ेगा ही। एक तरह से सरकार शायद यह चाहती कि यदि डीज़ल-पेट्रोल की क़ीमतें भारी लगे तो साइकल पर आ जाएँ। ऐसा करने से पैसा भी बचेगा और पर्यावरण भी।
जनता को भी सलाह है कि बिना चूँ-चपाट किए डीज़ल और पेट्रोल ख़रीदती जाए और सरकार का ख़ज़ाना भरती जाए। यही हमारा कर्तव्य और दायित्व है।

कश्मीर पर राजनाथ की पहल
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
गृहमंत्री राजनाथसिंह ने चार दिन कश्मीर में बिताने की पहल करके बहुत ही सामयिक कदम उठाया है। इसी समय दो दिन के लिए कांग्रेस का एक प्रतिनिधि-मंडल भी जम्मू-कश्मीर जानेवाला है, जिसका नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहनसिंह करेंगे। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि राजनाथसिंह ने पहले ही पहुंचकर श्रेय लूटने की कोशिश की है। मैं सोचता हूं कि राजनाथजी की पहल इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि आज कश्मीर में उनकी छवि कांग्रेस और भाजपा दोनों के प्रधानमंत्रियों से बेहतर है, हालांकि नरेंद्र मोदी ने कश्मीर को 80 हजार करोड़ का अनुदान देकर, प्राकृतिक प्रकोप के वक्त जबर्दस्त मदद करके और अपनी दीवाली वहां मनाकर कश्मीरी दिलों में उतरने की भरपूर कोशिश की है। राजनाथसिंह के इस बयान ने बहुत-से बाड़े तोड़ दिए हैं कि उनके दरवाजे सबके लिए खुले हैं याने हुर्रियत के नेता और आतंकवादी भी आकर बात करना चाहें तो वे उनसे करेंगे। हुर्रियत के नेताओं ने हड़ताल का नारा दिया है लेकिन वे चाहें तो हड़ताल के दौरान भी गृहमंत्री से बात कर सकते है।। गर्मागर्म युद्ध के दौरान भी दो देशों के कूटनीतिज्ञ आपस में बात करते हैं या नहीं ? अब तो पाकिस्तान के सेनापति कमर बाजवा ने भी कश्मीर के सवाल को बातचीत से हल करने का बयान दिया है। हुर्रियत नेताओं को कम से कम पाकिस्तानी सेनापति की सलाह तो माननी ही चाहिए। हुर्रियत नेता गृहमंत्री से मिलें या न मिलें लेकिन जो दर्जनों प्रतिनिधि मंडल उनसे श्रीनगर में मिल रहे हैं, वे उन्हें कई सार्थक और सामयिक सुझाव दे रहे हैं। कश्मीर के सिखों ने अल्पसंख्यकों के लिए कुछ विशेष रियायतें भी मांगी हैं। राजनाथसिंह की इस पहल का एक सुपरिणाम तो यह भी होगा कि मुख्यमंत्री महबूबा की पीडीपी और भाजपा सरकार में अब बेहतर समन्वय हो सकेगा। दोनों के बीच आया तनाव दूर होगा। धारा 35 ए और 370 के बारे में फैली गलतफहमियां भी दूर होंगी। जम्मू-कश्मीर में नियुक्त होनेवाले नए राज्यपाल के लिए एक उत्तम कार्य-सूची भी तैयार हो जाएगी। राजनाथजी की कश्मीर-यात्रा पर नाराज होने की बजाय यह अधिक अच्छा होगा कि कांग्रेसी-नेताओं को मिलनेवाले सुझाव और आलोचनाओं को वे सरकार तक पहुंचाए, क्योंकि यह मामला पार्टीबाजी का नहीं, देश का है।

बहुत कुछ कहती है गुलाबी शहर की यह आग
– डॉ हिदायत अहमद खान
दुनियाभर में मशहूर राजस्थान के गुलाबी शहर जयपुर में एक ऐसी घटना घटित हुई जिसने संपूर्ण शासन-प्रशासन की नीतियों और सिद्धांतों पर सीधे-सीधे प्रश्नचिन्ह ही लगा दिया। दरअसल जयपुर के रामगंज थाना क्षेत्र में पुलिस के बर्ताव से नाराज भीड़ ने जो किया उससे यह तो साफ हो गया कि अब भीड़ कानून के रखवालों के दोहरे चरित्र को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है। दोहरी नीति और अप्रत्याशित व्यवहार से खासी परेशान हो चली भीड़ अब खुद अपने फैसले करने को मजबूर नजर आती है। यही वजह है कि जब कभी भीड़ द्वारा किसी निहत्थे की हत्या कर देने के समाचार आम होते हैं तो साथ ही यह संदेश भी दिया जाता है कि भीड़ ने वही किया जो देश की न्यायपालिका या पुलिस प्रशासन को कानून व्यवस्था बनाने के लिए किया जाना चाहिए था। ऐसे में इन घटनाओं को लेकर शासन-प्रशासन क्या कहता और क्या करता है कहने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उसे मीडिया के जरिए देश और दुनिया देखता चला आ रहा है। अगर ईमानदारी से खुद शासन-प्रशासन इसका विश्लेषण करे तो हकीकत का आईना बोल पड़ेगा कि जिस खामी को गुमशुदा करार देकर शहर-दर-शहर तलाशा जा रहा है वह उनके अपने ही बगल में बैठा हुआ मौज कर रहा है। हत्या पर अमादा भीड़ को पहचानने वाला चश्मा बदलना होगा क्योंकि यह समझने वाली बात है कि भीड़ यदि हत्याएं करने लगे तो वह कानून की रखवाली करने वाली कतई नहीं कही जा सकती। ऐसे में यह हत्यारी भीड़ अच्छी है और यह भीड़ बुरी है जैसे दायरे से बाहर निकलना ही होगा। यही वो अनदेखी है जिसकी वजह से अब उन लोगों की भीड़ भी नजर आने लगी है जो अच्छे-बुरे में भेद करने की बजाय किसी से भी दो-दो हाथ करने पर अमादा नजर आ रही है। जबकि उसे मालूम है कि नुक्सान उसी का होना है। कहने को तो ऐसा तभी होता है जबकि आमजन का विश्वास कानून और उसके रखवालों से उठने लगे। भीड़ को इस बात का एहसास होने लगे कि पुलिस जो कर रही है वह एकतरफा कार्रवाई है और उससे कानून का राज नहीं बल्कि मनमानी का राज स्थापित होने वाला है। ऐसे हालात में भीड़ को भी लगने लगता है कि जो वो कर रही है या करेगी वही न्याय होगा और ऐसे में वह खुद अपराधी बनकर लोकतंत्र के लिए खतरा बन जाती है। जयपुर के रामगंज पुलिस थाने के सामने आक्रोषित भीड़ ने जिस तरह से जमकर हंगामा किया उसने कम से कम इसे ही परिभाषित करने का काम किया है। हद तो तब हो गई जबकि पुलिस ने भीड़ को शांत करने के लिए जो कार्रवाई की उससे भी वह बेकाबू होते हुए आगजनी और तोड़फोड़ जैसी घटनाओं को अंजाम देती नजर आ गई। ऐसे में पुलिस भी जुल्म सहने और पीछे रहने वालों में शामिल होना नहीं चाहती अत: उसने भी भीड़ पर लाठियां भांजने से लेकर आंसू गैस के गोले दागने तक के काम को अंजाम दे दिया। दूसरी तरफ भीड़ ने भी अनेक वाहनों के साथ तोड़-फोड़ की और करीब दो दर्जन वाहनों को आग के हवाले कर दिया। हालात इस कदर बेकाबू हुए कि मोबाइल, इंटरनेट जैसी संचार सेवाओं को बंद करना पड़ गया, ठीक वैसे ही जैसे कि सच्चा डेरा सौदा के बाबा राम रहीम को सजा सुनाए जाने के समय किया गया था या फिर कश्मीर में आतंकवादियों के खिलाफ इनकाउंटर करते वक्त किया जाता है। गुलाबी शहर में जब बात इतने से भी बनती नहीं दिखी तो पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने रात ड़ेढ़ बजे चारों पुलिस थाना क्षेत्रों रामगंज, माणकचौक, सुभाष चौक और गलता गेट में कर्फ्यू के आदेश दे दिए। गौरतलब है कि यह घटना पुलिस चैंकिंग के दौरान कथिततौर पर युवक को पुलिसकर्मी द्वारा पीटे जाने के कारण हुई। इसका अर्थ तो यही हुआ कि पुलिस की कार्रवाई से लोगों की भीड़ इस कदर नाराज हुई कि उसने पुलिस प्रशासन की ही ईंट से ईंट बजाने की ठान ली। इसमें अनेक पुलिस वाले घायल हुए जबकि एक व्यक्ति की मौत होने की खबर भी आ गई। इस प्रकार पूरी घटना कहीं न कहीं पुलिस कार्रवाई पर ही सवाल खड़े करती नजर आती है, जबकि यदि गहन परीक्षण करते हुए गर्त में छुपी सच्चाई को देखा जाए तो मालूम चलता है कि देश में जिस तरह से भीड़ को किसी भी निहत्ते की हत्या करने को स्वीकृति प्रदान करने का चलन शुरु हुआ है तभी से लोगों ने इसे अपना हथियार बनाकर मनमाफिक फैसले करवाने की ठान ली है। वैसे गुलाबी शहर का मामला कुछ अलग है, क्योंकि यहां सीधे पुलिस प्रशासन से टकराव और विरोध प्रमुख कारण नजर आता है। इससे हटकर देश में अनेक जगहों पर भीड़ द्वारा जो हत्याएं की गईं उनमें कहीं न कहीं गंदी राजनीति की बू आती है। इसमें भीड़ पुलिस प्रशासन या सरकार के खिलाफ एकजुट नहीं होती बल्कि राजनीतिक तौर पर समाज में जो सांप्रदायिकता के बीज बोए गए हैं उसकी परिणिति के तौर पर सामने आती है। इसमें हत्या होती है लेकिन सवाल हत्यारी भीड़ पर नहीं उठाए जाते बल्कि उसी मृत इंसान पर उठते हैं जो अब जवाब देने के लिए कभी मौजूद भी नहीं हो सकता। इस प्रकार जहां भी देखा जाता है भीड़ बिजयी मुद्रा में नजर आती है, यही वो वजह है कि अब समाज के अलग-अलग वर्गों में बेलगाम भीड़ का चलन बढ़ने लगा है। भीड़ एकत्र कर कानून को अपने हाथ में लेने का उदाहरण गुलाबी शहर में देखने को मिला है। यह सामान्य बात नहीं है, इसके पीछे जो सोच काम कर रही है उसकी तह में जाने की आवश्यकता है। अंतत: समय रहते यदि इस सोच में परिवर्तन नहीं लाया गया तो यह आग देश के अन्य हिस्सों में वैसी ही फैलने का अंदेशा है जैसे कि किसी जंगल में लगी आग से होता है।

बोल की लब ख़ामोश हुए तेरे
-ऋतुपर्ण दवे
हिंदुत्ववादी राजनीति और दक्षिणपंथियों की आलोचना को लेकर गौरी अक्सर सुर्खियों में रहती थी। निर्भीक, निडर और समाज को दिशा देने के काम में जुटी 55 साल की महिला पत्रकार और समाजसेवी गौरी लंकेश ने शायद इन्हीं सब की कीमत चुकाई है। वो मौत की नींद सुलाई जा चुकी हैं। साप्ताहिक ‘लंकेश पत्रिके’ की संपादक गौरी ने अपने विचारों से साम्प्रदायिक सद्भावना के मंच को प्रोत्साहित किया। वो अपने पिता पी लंकेश जो कि फिल्म निर्माता भी रहे के हाथों 1980 में शुरू हुई इस पत्रिका के लिए समर्पित थीं। सोशल मीडिया और सामाजिक मंचों पर बेहद सक्रिय गौरी ने कभी परिस्थितियों से समझौता नहीं किया। बेखौफ लिखती थीं, बिन्दास लिखती थीं, दबाव में आने का तो सवाल ही नहीं, अदालत में घसीटे जाने पर भी कलम नहीं थमीं। थमीं तो बस कायरों की चंद गोलियों की नापाक बेजा हकतों से। कलम क्या सांस भी थम गईं और जिस्म भी पराया हो गया। अब कैसे बोलेंगी की लब आजाद हैं मेरे और मेरी कलम की स्याही कभी चुकती नहीं।
क्या उन्हें अपनी हत्या का आभास था? उनके आखिरी ट्वीट का इशारा किस तरफ है? वो लिखती हैं- “ऐसा क्यों लगता है मुझे कि हममें से कुछ अपने आपसे ही लड़ाई लड़ रहे हैं। अपने सबसे बड़े दुश्मन को हम जानते हैं और क्या हम सभी कृपाकर इस पर ध्यान लगा सकते हैं।” उनकी हत्या से समूचा पत्रकार जगत स्तबध है। बालीवुड और खेल जगत तक खुलकर उनके समर्थन में खड़ा है। किसी विचारधारा की आलोचना गुनाह है?
एक ही जैसे तौर तरीके अपनाकर, बीते चार वर्षों की यह चौथी घटना है जब तर्कशास्त्री, अंधविश्वास विरोधी, विवेकशील, धर्मनिरपेक्ष, विद्वान-विदुषी और हिंदुत्वविरोधी लेखन में लगी एक लेखक-पत्रकार की हत्या की गई। 2013 में महाराष्ट्र के 68 वर्षीय नरेंद्र दाभोलकर, 2015 में 81 वर्षीय गोविंद पनसारे और 2016 में कर्नाटक के 77 वर्षीय एमएम काल्बुर्गी की हत्याएं हुईं।
क्या जावेद अख्तर का सवाल कि दाभोलकर, पंसारे, और कलबुर्गी के बाद अब गौरी लंकेश की हत्या नहीं बताता कि अगर एक ही तरह के लोग मारे जा रहे हैं तो हत्यारे किस तरह के लोग हैं? इस बात पर कैसे संदेह न किया जाए कि अगला निशाना भी कोई न कोई होगा? पहले भी इस तरह की हत्याओं में कोई दोषी साबित नहीं हो पाया। क्या अंधविश्वास को पनपने से रोकना अपराध है? क्या धार्मिक उन्माद परंपरा है? क्या प्रगतिशील विचार समाज के पहरुए नहीं है? किसी को पता है कि जाने-माने विद्वान, चिंतक और तर्कशास्त्री डॉक्टर एमएम कलबुर्गी के हत्यारे कहां हैं? इनकी हत्या से दो साल पहले पुणे निवासी एक और विद्वान, चिंतक और तर्कशास्त्री डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या हुई, उनके हत्यारे अब तक क्यों नहीं पकड़े जा सके? किसी विशेष संगठन, विचारधारा से ही जुड़कर चलना विद्वानों, आलोचकों, लेखकों की नीयति हो गई है? स्वयंभू महिमामण्डितों की जय तथा व्यवस्था-व्यवस्थापकों की खामोशी और तर्कशास्त्रियों, चिन्तकों, धार्मिक उन्माद विरोधियों को मौत को तोहफा? व्यवस्था के करवट बदलने का खुद-ब-खुद बड़ा संकेत तो नहीं? हां ये सच है इस बदले दौर में बिना हिम्मत के पत्रकारिता नहीं और बिना निर्भीक पत्रकारिता के समाज को साफ आईना कौन दिखाए?
लोकतांत्रिक देशों में प्रभावशाली नेताओं के मीडिया विरोधी भाषणों तथा वहां बने नये कानूनों और प्रेस-मीडिया को प्रभावित करने की तमाम कोशिशों की वजह से पत्रकारों और मीडिया की स्थिति काफी खराब हुई है। ‘रिपोर्टर्स विदाउट बोर्डर्स’ जो दुनिया भर में पत्रकारों और मीडिया की स्वतंत्रता के मौजूदा हालातों को बयां करती है, बताती है कि भारत के हालात कमोवेश पड़ोसियों से ही है। इस रिपोर्ट को ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इण्डेक्स’ भी कह सकते हैं। बीते साल की रपट में भारत का स्थान 133वें क्रम पर रहा जबकि पड़ोसी भूटान 94, नेपाल 105, श्री लंका 141, बंगलादेश 144, पाकिस्तान 147, रूस 148, क्रम पर है। अन्य लोकतांत्रिक देशों में फिनलैण्ड की सबसे बेहतर स्थिति है वो क्रमानुसार 1 पर जबकि नीदरलैण्ड 2, नार्वे 3, डेनमार्क 4, कोस्टारिका 6, स्वीटजरलैण्ड 7, स्वीडन 8, जमैका 10, बेल्जियम 13, जर्मनी 16, आइसलैण्ड 19, ब्रिटेन 38, दक्षिण अफ्रीका 39, अमेरिका 41, ब्राजील 104, अफगानिस्तान 120, इण्डोनेशिया 130, तुर्की 151 जबकि चीन निचले क्रम 176 पर है।
परतंत्रता के दौर में भी कलम पर खतरा था और अब स्वतंत्रता के दौर में खतरनाक लोग पत्रकारिता के दमन में हैं। लेकिन यह याद रखना होगा कि ये वो मिशन है जो न कभी रूका था, न रुकेगा। बस कलम ही तो है जो सच को शब्दों का आकार देकर समाज को जगाती है, चेताती है। श्रध्दांजलि गौरी लंकेश को जरूर लेकिन तर्पण उनका भी जरूरी है जो विचारधारा के हत्यारे बन जब-तब तमंचे से खामोशी का खेल खेलते हैं।

गोरक्षकों और नेताओं पर अदालत का हमला
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
पिछले तीन-चार दिनों में देश-विदेश की कुछ घटनाएं इतनी बड़ी खबरें बन गई कि सर्वोच्च न्यायालय के दो महत्वपूर्ण फैसलों पर जनता का जितना ध्यान जाना चाहिए था, नहीं गया। इन दो फैसलों में से एक है गोरक्षकों के बारे में और दूसरा है नेताओं की अंधाधुंध बढ़ती हुई दौलत के बारे में। इन दोनों फैसलों से अदालत ने राज्य सरकारों और केंद्र सरकार की जमकर खिंचाई की है। ये दोनों फैसले यह बताते हैं कि जब राज्य नामक संस्था अपना कर्तव्य निभाने से चूकती है तो न्यायपालिका को उसे झिंझोड़कर जगाना ही पड़ता है। देश में यह किसे पता नहीं है कि आए दिन गोरक्षा के नाम पर निर्दोष लोगों की हत्या कर दी जाती है, उन्हें निर्ममतापूर्वक पीटा जाता है और उनके साथ लूट-पाट भी की जाती है लेकिन राज्य सरकारें कोई ऐसा कठोर कदम नहीं उठा रही हैं, जिससे इन तथाकथित गोरक्षकों के दिल में डर पैदा हो सके। हाल ही में भारत के कई राज्यों में ऐसी 66 घटनाएं हुई हैं, जिनके दौरान गोरक्षकों ने सर्वथा निर्दोष लोगों की हत्या भी कर दी है।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे अपने हर जिले में एक-एक ऐसा वरिष्ठ पुलिस अफसर नियुक्त करें, जिसका काम यही हो कि वह इन गोरक्षकों के विरुद्ध तुरंत और सख्त कार्रवाई करे। इस संबंध में अदालत इतनी मुस्तैद है कि उसने राज्यों को एक सप्ताह की मोहलत दी है और उनसे कहा है कि वे बताएं कि उन्होंने क्या कदम उठाया है। कानून और व्यवस्था को बनाए रखना राज्यों का काम है, अदालतों का नहीं। पुलिस अफसरों को कहीं लगाना, बदलना, हटाना- यह भी राज्य-सरकारों का काम है लेकिन अदालत को इस बारे में सख्त निर्देश देने पड़ें, यह किस बात का सूचक है ? क्या इसका नहीं कि हमारा राज्यतंत्र ठीक से काम नहीं कर रहा है ?
यदि हमारी सरकारें सतर्क होतीं तो क्या मुहम्मद अखलाक, जुनैद खान और पहलू खान की हत्याएं हो सकती थीं ? इन तीनों हत्याओं में दोष किसका है ? हत्यारों का, जिन्होंने इन तीनों व्यक्तियों को गोमांस रखने या गोहत्या के शक में मौत के घाट उतार दिया। सिर्फ शक पर ! पहली बात तो यह कि जिन राज्यों में गोवध-निषेध का कानून है, वहां निश्चित रुप से गोवध एक अपराध है। अपराधी को दंड जरुर मिलना चाहिए लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कोई भी सड़कछाप व्यक्ति या भीड़ को उस अपराधी को दंड देने का अधिकार है। देश में कानून का राज है या अराजकता है ? इसके अलावा क्या कानून में गोहत्या के लिए मानव-हत्या का प्रावधान है ? एक पशु के नाम पर एक मनुष्य की हत्या कर देना क्या अपने आप में पशुता नहीं है ? गोसेवा और गोरक्षा तो परम पवित्र कर्तव्य है लेकिन उसके नाम पर नर-हिंसा में कौनसी मनुष्यता है, कौनसा हिंदुत्व है ?
गोरक्षा के नाम पर गुंडई करनेवाले लोग कौन हैं ? इन लोगों की भर्त्सना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कर ही चुका है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर चुके हैं। इन दुष्टों के लिए संघ और भाजपा को जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं है। हां, राजनीतिक दुष्प्रचार के लिए इस पैंतरे का दुरुपयोग जरुर किया जा सकता है। ये गोरक्षक वे हैं, जिन्होंने कभी भूखी गायों को रोटी तक नहीं डाली हैं, जिन्होंने तड़फ-तड़फकर गौशालाओं में मरती गायों को बचाने के लिए पत्ता भी नहीं हिलाया है और जिनके दिलों में पशुओं के लिए तो क्या, मनुष्यों के लिए भी करुणा का कोई भाव नहीं है। ये लोग इतने कमअक्ल लोग हैं कि इन्हें यह भी पता नहीं होता कि वे जिसे गोमांस समझ रहे हैं, वह क्या है ? वह बकरी का, भेड़ का या भैंस का मांस तो नहीं है?
इसके बावजूद वे निरंतर दनदनाए जा रहे हैं। इसका कारण क्या हो सकता है ? इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि वे यह मानकर चल रहे हैं कि आजकल सरकार हिंदुत्ववादियों की है और गोरक्षा हिंदुत्व का प्रमुख स्तंभ है। इसलिए वे कुछ भी कर सकते हैं। दूसरा, वे यह देख रहे हैं कि इन अपराधी गोरक्षकों को न तो समाज दंडित कर रहा है और न ही अदालतें। इस स्थिति का फायदा वे लोग भी उठा रहे हैं, अपराध ही जिनका पेशा है।
इन लोगों के साथ अब सरकारों को इतनी कठोरता से पेश आना चाहिए कि भावी हत्यारों की हड्डियां कांप उठें। सरकार से भी ज्यादा इस मामले में हमारे समाज को सक्रिय होने की जरुरत है। यह संतोष की बात है कि पिछले दिनों जब अखलाक, पहलू, जुनैद की हत्याएं हुईं तो उनके विरुद्ध प्रदर्शन करनेवाले 99 प्रतिशत लोग हिंदू ही थे। गोरक्षा के नाम पर हिंदू दलितों की भी हत्याएं कम नहीं हुई हैं। इन हत्याओं को रोकने के लिए यह भी जरुरी है कि देश में गोसेवा का वास्तविक माहौल बनाया जाए। यदि बांझ, बूढ़ी और दुग्धहीन गायों को पालने का व्रत हमारे देशवासी ले लें तो गोवध अपने आप रुक जाएगा। अदालतों को भी सरकारों के कान नहीं उमेठने पड़ेंगे।
सर्वोच्च न्यायालय का दूसरा फैसला भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उसने केंद्र सरकार को एक हफ्ते की मोहलत दी है और कहा है कि सारे चुने हुए नेताओं की चल-अचल दौलत का हिसाब वह उजागर करे। अभी तक सभी सांसदों और मंत्रियों तथा उनके परिवारवालों की दौलत का हिसाब न तो आयकर विभाग के पास है और न ही सरकार के पास ! लोक प्रहरी संस्था ने अदालत में अपनी याचिका लगाते समय बताया कि कुछ सांसदों की दौलत पिछले पांच साल में दुगुनी हो गई, कुछ की पांच गुनी हो गई, कुछ की 12 गुनी हो गई और कुछ की 21 गुनी हो गई। यह तो वह दौलत है, जो उन्होंने बताई है। यह तो ऊंट के मुंह में जीरा है। जो नहीं बताई है, वह है, असली दौलत ! वह है, बेनामी संपत्ति, विदेश में जमा काला धन। यह करोड़ों, अरबों-खरबों की दौलत राजनीति के रास्ते बड़ी आसानी से जमा हो जाती है। यह काला धन राजनीति का बाप है और राजनीति काले धन की अम्मा है। भ्रष्टाचार और राजनीति का चोली-दामन का साथ है। इसे भंग करना अदालतों के बस का काम नहीं है। वे तो यहां-वहां थोड़ी सुइयां चुभो सकती हैं लेकिन यह काम हमारी संसद चाहे तो काफी हद तक कर सकती है।
मैं तो यह बात बहुत दिनों से कह रहा हूं कि संसद को ऐसा कानून बना देना चाहिए कि सांसदों, विधायकों, पार्षदों और पंचों को हर साल अपनी चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करना होगा। उन्हें ही नहीं, राजनीतिक दलों के समस्त पदाधिकारियों पर भी यह नियम लागू होगा। इस ब्यौरे में उनके परिवार के सदस्यों का भी ब्यौरा शामिल होगा। ऐसा कानून बनते ही 90 प्रतिशत नेता राजनीति से भाग खड़े होंगे। राजनीति में वे ही लोग आएंगे, जो कबीर के शब्दों में अपना ‘सीस उतारें, कर धरें, सो पैंठे घर माय।’ यह कानून सभी नौकरशाहों पर भी लागू किया जाए। तभी देखिए कि भारत की शासन-व्यवस्था में जमीन-आसमान का अंतर आता है या नहीं !

आखिर मुंबई के दुर्दान्तों के सिर चला कानून का हथौड़ा
-ऋतुपर्ण दवे
अब लोग इसे अधूरा न्याय कहें या न्याय राह में प्रत्यर्पण की बाधा! सच यही है कि 24 सालों के लंबे इंतजार के बाद आए इस फैसले ने पीड़ितों (जो बचे हैं) और न्याय के प्रति आस्थावानों में जरूर विश्वास पैदा कर दिया है। 1993 में मुंबई में कुछ ही मिनटों के अंतर से लगातार हुए 13 बम धमाकों ने पूरी मुंबई सहित भारत को हिला कर रख दिया था। इसमें मुंबई स्टॉक एक्सचेंज, एयर इण्डिया बिल्डिंग, जावेरी बाजार सहित कई बड़ी होटलों को निशाना बनाया गया था। सिलसिलेवार बम धमाकों के इस मामले में टाडा अदालत ने अबू सलेम और करीमुल्ला शेख को उम्र कैद की सजा सुनाई है वहीं ताहिर मर्चेंट, फिरोज अब्दुल राशिद को सजा-ए-मौत यानी फांसी की सजा दी गई है जबकि रियाज सिद्दीको 10 साल की सजा सुनाई गई है। अबू सलेम को  2 लाख रूपये का जुर्माना भी लगाया है। 12 मार्च 1993 को हुए लगातार धमाकों में 257 लोगों की जान चली गई थी और लगभग 700 से ज्यादा घायल हो गए थे वहीं 27 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति नष्ट हुई थी। इस मामले में बीते 26 जून को ही जस्टिस जीए सनप ने अबू सलेम, मुस्तफा डोसा, करीमुल्लाह खान, फिरोज अब्दुल रशीद खान, रियाज सिद्दीकी और ताहिर मर्चेंट को लगातार हुए धमाकों का षडयंत्र रचने का आरोपी माना वहीं एक आरोपी अब्दुल कयूम बरी कर दिया था जबकि एक अन्य आरोपी मुस्तफा डोसा की मौत हो चुकी है।
कानून की सीमा कहिए या प्रत्यर्ण संधि के तहत समझौता, जिसके चलते 2005 में पुर्तगाल से संधि के तहत भारत लाए गए अबू सलेम को अधिकतम 25 साल की सजा ही हो सकती है जो हुई। इसके लिए भी भारत ने तीन साल तक अंतर्राष्ट्रीय कानूनी लड़ाई लड़ी थी तब जाकर अबू सलेम और मोनिका बेदी को लिस्बन से भारत लाने में कामयाबी मिली थी। 2002 में उसे भारत के इसी दबाव के बाद पुर्तगाल में गिरफ्तार किया गया और उस समय भारत के उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने पुर्तगाली लिस्बन अदालत को भरोसा दिया कि भारत को प्रत्यर्पित किए जाने की स्थिति में उसे फांसी की सजा नहीं दी जाएगी। अबू सलेम ने मुंबई हमलों के लिए एके-56 और ग्रेनेड्स को भरूच से मुंबई पहुंचाया, करीमुल्लाह शेख ने डोसा के जरिए हथियारों को लक्ष्य तक पहुंचाया, फिरोज अब्दुल राशिद खान ने हथियारों के जखीरे को एक से दूसरी जगह पहुंचाया, रियाज सिद्दीकी ने हथियारों सलेम के साथ गुजरात से मुंबई पहुंचाए तथा इनके उपयोग में मदद की। जबकि मोहम्मद ताहिर मर्चेंट ने आरोपियों को ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान भेजने में मदद की थी। अबू सलेम पुर्तगाल में गिरफ्तार होने से पहले अमरीका से भाग निकलने में कामयाब रहा जबकि पुर्तगाल में अवैध रूप से घुस जाने की वजह से उसे और मोनिका बेदी को वहां 5 साल की सजा हुई थी। इसके बाद सीबीआई हरकत में आई और भारत के वकील पुर्तगाल गए और मजबूती से अपना पक्ष रखा। तब कहीं जाकर यूनाइटेड नेशन्स कनवेंसन ऑन सप्रेशन ऑफ टेररिज्म 2000 पुर्तगालियो से समझौते के बाद अबू सलेम और मोनिका बेदी को भारत लाया जा सका था। बस यही एक वजह थी जिसके चलते मुख्य आरोपियों में शामिल अबू सलेम फांसी पर झूलने से बच गया। लेकिन यहां भी दोषी ठहराए जाने काफी पहले ही अबू सलेम ने यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स (ईसीएचआर) में एक याचिका दाखिल कराकर वापस पुर्तगाल भेजे जाने की मांग की थी इस याचिका में उसने भारत में उसकी उपस्थिति और मुकदमें दोनों को ही गलत ठहराया था।
गौरतलब यह है कि मुंबई ब्लास्ट प्रकरण में दोषियों को सजा सुनाए जाने का यह दूसरा मामला है जबकि पहला मामला 2007 में ही पूरा हो गया था जिसमें 100 आरोपियों पर दोष सिध्द हुआ था जिसमें अभिनेता संजय दत्त भी मुजरिम थे। याकूब को पिछले साल ही फांसी दी शेष बचे आरोपियों पर अलग-अलग मुकदमें इसलिए चले कि क्योंकि ये बाद में गिरफ्तार हुए थे या प्रत्यर्पण के जरिए भारत लाए गए थे। सीबीआई ने माना था मुंबई धमाके वास्तव में 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढ़हाए जाने के बाद बदला लेने के लिए किए गए थे और इसमें सबसे खास बात यह थी कि ये एक ऐसा आतंकी हमला था जिसमें दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इतने व्यापक पैमाने पर आरडीएक्स का इस्तेमाल किया गया था। 19 वर्षों बाद 2011 में शुरू हुई इस सुनवाई में इसी 16 जून को 6 आरोपियों को दोषी करार दिए जाने की सजा के साथ अपने अंजाम पर पहुंची। लेकिन गौरतलब यह है कि इसी से जुड़े 33 आरोपी अब भी फरार ही रहे जिनमें मुख्य साजिशकर्ता दाउद इब्राहिम, उसका भाई अनीस इब्राहिम, मुस्तफा दौसा का भाई मो. दौसा और टाइगर मेमन शामिल हैं। इतना तो है कि इस फैसले ने भारतीय न्याय प्रणाली ने जांच एजेंसियों की मेहनत और कानून के इंसाफ के चलते अपराधियों को फिर मुंह की खिलाई है। शायद इससे एक अच्छा संदेश भी जाएगा कि अपराधी कितना भी बड़ा हो कानून के हाथ उससे भी बड़े हैं और इंसाफ का हथोड़ा चाहे कोई भी हो, सभी पर बराबर चलेगा।

‘‘मैं चर्खा नहीं चलाऊंगा’’
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
अहमदाबाद में गांधीजी के साबरमती आश्रम में कल एक ऐसा काम हो गया, जो देश में शायद पहले कभी नहीं हुआ। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने एक लंबी परंपरा को मानने से इंकार कर दिया। उस आश्रम में जो भी विशिष्ट व्यक्ति जाता है, वह महात्मा गांधी की मूर्ति को सूत की माला पहनाता है और हाथ जोड़कर नमन करता है। बाद में वह वहां बैठकर चर्खे पर सूत कातता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीनी राष्ट्रपति के साथ वहां चर्खा चलाया था और उसके फोटो सारे देश में देखे गए थे। राष्ट्रपति कोविंद ने गांधीजी की मूर्ति को माला पहनाई और नमन भी किया। उन्होंने गांधीजी की महानता को साबरमती आश्रम की आगंतुक पुस्तिका में बहुत प्रभावशाली शब्दों में रेखांकित किया है। लेकिन चर्खा चलाने से इंकार कर दिया। उनका तर्क था कि चर्खा चलाने का अधिकार उसे ही है, जो नियमित खादी पहने। क्या अदभुत बात है ! जो लोग दस-दस लाख के सूट पहनते हैं, वे चर्खे पर सूत कातते हुए अपने फोटो छपाने में ज़रा भी संकोच नहीं करते। उनकी कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर होता है। उनके फोटो और उनका असली जीवन एक-जैसा हो, उसे वे जरुरी नहीं समझते। स्वच्छता अभियान के तहत वे फोटो खूब खिंचवाते हैं लेकिन वे अपने चड्डी-बनियान तक नहीं धोते। जिस बिस्तर पर सोते हैं, उसे साफ तक नहीं करते। कोविंदजी ने अपने नेताओं की इस भेड़-चाल को बदलने का संदेश दिया है। गांधीजी दुनिया के सारे नेताओं में सबसे अलग क्यों थे ? क्योंकि वे जो कहते थे, पहले उसे करते थे। कोविंदजी ने चर्खा नहीं चलाया, इसे लेकर देश में विवाद भी छिड़ सकता है। लोग पूछ सकते हैं कि क्या कोविंद मोदी से बड़े राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हैं ? यदि मोदी चर्खा चला सकते हैं तो कोविंद क्यों नहीं चला सकते हैं ? उन्होंने चलाने से मना करके चर्खे का अपमान तो नहीं कर दिया है ? पहली बात तो यह कि कोविंद अब राष्ट्रपति हैं। वे किसी प्रधानमंत्री की तरह अब किसी राजनीतिक दल या संगठन के सदस्य नहीं हैं। इसके अलावा हम यह न भूलें कि जनसंघ और भाजपा के साथ जाने के बहुत पहले वे कट्टर गांधीवादी मोरारजी देसाई के साथ काम करते थे। उन्होंने चर्खा चलाने का नाटक नहीं करके चर्खे का अपमान नहीं किया है बल्कि चर्खे और खादी का सम्मान बढ़ाया है। वे अब खादी ही पहनें और चर्खा चलाएं तो लाखों खादी कार्यकर्ताओं को काफी प्रोत्साहन मिलेगा। सिर्फ खादी ही नहीं, हिंदी, शाकाहार, सदाचार और दक्षिण एशियाई महासंघ (आर्यावर्त्त) जैसे मुद्दे पर भी कोविंदजी अपना प्रेरणादायक विचार पेश करें तो वे राष्ट्रपति के साथ-साथ राष्ट्रनायक की भूमिका भी निभाएंगे।

औरत का पीर: विषय गंभीर?
-निर्मल रानी
धर्म एवं अध्यात्म की दुनिया के एक और तथाकथित ‘सौदागर’ गुरमीत सिंह के चेहरे से अब उसकी हकीकत का नकाब पूरी तरह से हट चुका है। 2002 में अपने ही डेरे की साध्वियों के बलात्कार का आरोपी अब बलात्कार का सज़ाया ता मुजरिम बन चुका है। सर्वविदित है कि अपनी ही शिष्या साध्वियों के बलात्कार के मामले में डेरा सच्चा सौदा के नाम से पुकारे जाने वाले हरियाणा के सिरसा स्थित एक डेरा मु यालय के प्रमुख स्वयंभू गॉडमैन गुरमीत सिंह को पंचकुला स्थित सीबीआई अदालत ने अनेक गवाहों व तथ्यों के आधार पर बीस वर्ष का सश्रम कारावास तथा तीस लाख रूपये जुर्माना अदा करने की सज़ा सुनाई है। देश के मीडिया जगत में इस शर्मनाक कांड की ज़बरदस्त चर्चा की जा रही है। इस बलात्कारी,ढोंगी,अध्यात्मवादी गुरमीत सिंह को जेल भेजे जाने के बाद इस आश्रम से संबंधित और भी अनेक ऐसे सनसनीखेज़ कारनामों की खबरें सुनाई दे रही हैं जिनपर कानों को विश्वास ही नहीं हो रहा।
हमारे देश में स्वयं को विश्ष्टि बताने वाले विभिन्न स मानित क्षेत्रों के अनेकानेक लोग महिलाओं के साथ बलात्कार करने,बहला-फुसला कर अपनी हवस मिटाने,लालच देकर या सब्ज़ बाग दिखाकर महिलाओं की इस्मत से खेलने का प्रयास करते रहे हैं। राह चलते लड़कियों का अपहरण कर ले जाने,उनके साथ सामूहिक बलात्कार करने तथा बलात्कार के बाद हत्या कर देने जैसे मामले तो आए दिन सामने आते ही रहते हैं। परंतु यही विषय सबसे अधिक चिंताजनक तथा शर्मसार कर देने वाला उस समय हो जाता है जबकि महिला उत्पीडऩ या उसके शरीर के साथ सेक्स या खिलावाड़ करने का काम किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाए जिसे वह स्त्री व उसका परिवार न केवल पिता या अभिभावक के रूप में देखता हो बल्कि उसमें उस भक्त परिवार को परम पिता परमात्मा या ईश्वर की छवि तक दिखाई देती हो? इससे पहले आसाराम नामक एक पाखंडी बलात्कारी बाबा के साथ भी इसी प्रकार का मामला सुनाई दिया था। आज तक आसाराम तथा उसका पुत्र नारायण साईं जोकि संयुक्त रूप से अपने आश्रमों को अपने लिए व्यभिचार,अय्याशी तथा बलात्कार का अड्डा बनाए हुए थे आज भी जेल में सड़ रहे हैं।
आसाराम हो,उसका पुत्र नारायण साईं,दक्षिण भारत का पाखंडी संत नित्यानंद,साक्षी महाराज जैसा राजनीतिज्ञ एवं स्वयंभू संत,एक और राजनीतिज्ञ चिन्मयानंद या फिर अब गुरमीत सिंह डेरा संचालक या फिर आए दिन समाचार पत्रों में अपने कुकर्मों की वजह से सुिर्खयां बटोरने वाले दूसरे अनेक दुष्कर्मी डेरा संचालक,संत-महंत,पुजारी,मौलवी,रागी या पादरी,सवाल यह है कि इस धर्म एवं अध्यात्म की दुनिया से जुड़े ऐसे लोगों के संपर्क में कोई कन्या या स्त्री इतनी आसानी से कैसे आ जाती है कि वे उसकी इस्मत व आबरू को तार-तार कर दें? दरअसल किसी महिला की इज्ज्ज़त से खेलने के दोषी केवल यही पाखंडी अध्यात्मवादी लोग ही नहीं हैं बल्कि इस पूरे प्रकरण में वह परिवार खासतौर पर उस परिवार की महिलाएं भी बराबर की ही सांझीदार हैं जो ऐसे पाखंडी दुष्चरित्र बाबाओं के जाल में खुद भी फंसते हैं तथा अपने बच्चों को भी उसी नरक में धकेल देते हैं? हमारे देश में यह कहावत बहुत मशहूर है कि औरत का पीर कभी भूखा नहीं मर सकता। यह कहावत अपने-आप में अनेक अर्थों को समेटे हुए है। अपने दैनिक कार्यों,रोज़गार,व्यवसाय,नौकरी तथा परिश्रम में व्यस्त रहने वाले किसी पुरुष के पास दरअसल इतना समय ही नहीं बचता कि वह किसी धर्म व अध्यात्म की रहस्यमयी दुनिया में जाकर अपना अधिक से अधिक समय बिता सके। परंतु प्राय: घर-गृहस्थी संभालने वाली महिलाएं ही बाबाओं,डेरों या अध्यात्म व धर्म की दुकानदारी चलाने वाले बाबाओं या ज्योतिषियों अथवा पुजारियों के चक्कर लगाती रहती हैं। इनमें अधिकांशत: महिलाएं ऐसे धर्माधिकारयिों पर पूरा भरोसा करती हैं यहां तक कि इनके संपर्क में आने के बाद तथा इनके बताए हुए रास्तों पर चलने के बाद उन्हें यह भी विश्वास रहता है कि उनके घर-परिवार में धनवर्षा होगी तथा उनके पति का काम-धंधा या व्यवसाय खूब चलेगा।
जहां तक डेरा सच्चा सौदा का सवाल है तो इस आश्रम से जुडऩे वाले अधिकांश परिवार तो इसी लालच से इससे जुड़े थे कि यह एक ऐसा स्थान है जहां का डेरा प्रमुख अपने भक्तों की शराब व नशे की लत छुड़वा देता है। यही पहचान पंजाब में राधा स्वामी नामक एक डेरे ने भी बनाई है। यहां भी अपने भक्तों को शराब व नशे के सेवन के लिए मना किया जाता है। और वास्तव में ऐसा देखा भी गया है कि इन डेरों से जुडऩे वाले अधिकांश लोगों ने नशीली चीज़ों के सेवन को त्याग दिया है। ज़ाहिर है किसी पुरुष द्वारा अपनी नशे की आदत को छोडऩे के उपरांत उसके परिवार में खुशहाली का वातावरण नज़र आता है। खासतौर पर उसकी पत्नी जो अपने पति की नशे की लत से सबसे अधिक प्रभावित व पीडि़त होती है वह ऐसे आश्रमों के प्रमुखों की बेहद शुक्रगज़ार होती है और इसी लिए वह एक तरीके से अपने पूरे परिवार के साथ श्रद्धा व स मान पूर्वक अपने ‘गुरूÓ के समक्ष अध्यात्मिक रूप से समपर्ण कर देती है।
और यहीं से गेंद अब उस बाबा या गुरु के पाले में चली जाती है। यदि सौभाग्यवश वह गुरु वास्तव में धर्म व अध्यात्म की लाज बचाना चाहता है और स्वयं भी ईश्वर से डरता है और खुद सच्च्ेा रास्ते पर चलते हुए दूसरों को भी सही राह पर चलने की शिक्षा देता है तो निश्चित रूप से वह अपने भक्तों को भी न केवल सही राह दिखाएगा बल्कि उनके मान-स मान व इज़्ज़त-आबरू की रक्षा भी करेगा और यदि कोई व्यक्ति केवल गुरु,धर्मगुरु या किसी डेरे के गद्दीनशीन का चोला मात्र धारण किए हुए है और उसके भीतर एक राक्षसी प्रवृति पल रही है तो ऐसे व्यक्ति के संपर्क में किसी परिवार के आने का अर्थ केवल अनर्थ ही समझा जाना चाहिए। ठीक उसी तरह जैसेकि आसाराम से लेकर गुरमीत सिंह तक के पाखंडी व बलात्कारी स्वयंभू धर्मगुरुओं में देखा जा रहा है। वैसे भी हमारे देश में दुर्भाग्यवश महिला उत्पीडऩ तथा सेक्स जैसे विषय को लेकर समाज में बहुत चिंताजनक स्थिति देखी जा रही है। न केवल जि़ मेदार लोगों द्वारा या गुंडों-बदमाशों,मवालयिों या आवारा िकस्म के लोगों द्वारा सैक्स या बलात्कार अथवा सामूहिक बलात्कार की घटनाएं किसी न किसी बहाने अंजाम दी जाती हैं बल्कि अनेक सर्वेक्षणों से यह भी पता चला है कि किसी भी कन्या को उसके युवावस्था में कदम रखते ही सबसे बड़ा खतरा उसके अपने परिवार के लोगों और सगे-संबंधियों से ही रहता है। आए दिन ऐसी खबरें भी अखबारों में प्रकाशित होती रहती हैं। पिता,भाई,चाचा,मामा,जीजा जैसे अनेक करीबी रिश्ते दागदार होते देखे गए हैं।
ऐसे में यदि आम लोग खासतौर पर आस्था व श्रद्धावान महिलाएं यदि यह सोचें की उनकी या उनकी बहू-बेटी की इज़्ज़त किसी स्वयंभू धर्माधिकारी की संगत में या उसके संपर्क में आकर सुरक्षित रह सकती है तो इस बात की कोई गारंटी नहीं। आज के युग में जबकि कलयुग अपने चरम पर पहुंच चुका है, भारतीय संस्कृति तथा देश के मान-स मान की रक्षा करने की जि़ मेदारी,अपने व अपने परिवार की इज़्ज़त आबरू बचाए रखने का जि़ मा सबसे अधिक भारतीय महिलाओं पर ही है। लिहाज़ा औरतों को किसी पर भी आंखें मूंदकर विश्वास करने की ज़रूरत नहीं है। इस युग में उनकी चौकसी,उनकी जागरूकता तथा सजगता ही उनके परिवार व बहू-बेटियों की इज़्ज़त सुरक्षित रख सकती है।

यह फेर-बदल अच्छा लेकिन…
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
केंद्रीय मंत्रिमंडल में चार राज्यमंत्रियों की पदोन्नति और नौ नए मंत्रियों की नियुक्ति स्वागत योग्य है। यह काम साल भर पहले हो जाता तो बेहतर रहता लेकिन अब हुआ तो और भी अच्छा रहा। इसलिए अच्छा रहा कि पिछले साल की गई फर्जीकल स्ट्राइक और नोटबंदी इन मंत्रियों के मस्तक पर भी चिपक जाती लेकिन अब इन सुयोग्य पूर्व राज्यमंत्रियों और नए मंत्रियों से देश आशा करेगा कि वे सरकार के काम-काज को अब अधिक सार्थक, सगुण और साकार बनाएंगे। पिछले तीन साल में सरकार ने कई अच्छी पहलें की हैं और राजनीतिक भ्रष्टाचार का कोई मामला सामने नहीं आया है लेकिन देश की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति में कोई खास गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ है। मुझे उम्मीद है कि जिन चार सुयोग्य राज्यमंत्रियों को पूर्ण मंत्री बनाया गया है, वे अपने-अपने विभाग में कुछ न कुछ चमत्कारी काम करके दिखाएंगे। जो नए नौ मंत्री बनाए गए हैं, उनमें चार तो पुराने नामी-गिरामी और सफल नौकरशाह रहे हैं। वे निश्चित रुप से मोदी-मंत्रिमंडल की गुणवत्ता को बढ़ाएंगे। अन्य राज्यमंत्रियों में कुछ तो नए हैं लेकिन ज्यादातर ऐसे हैं, जो राजनीति में काफी पहले से हैं। वे अच्छा काम तो करेंगे ही, अपने-अपने राज्यों में भाजपा के जनाधार को मजबूत भी करेंगे। केरल के अल्फोंस और कर्नाटक के अनंत हेगड़े इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। इन सभी मंत्रियों में से ज्यादातर को मैं व्यक्तिगत रुप से जानता हूं। वे ईमानदार, निष्ठावान और सेवाभावी हैं। ऐसा नहीं है कि भाजपा या उसके बाहर अन्य सुयोग्य लोग उपलब्ध नहीं है लेकिन मोदी और शाह के लिए यह जरुरी है कि वे अपनी हीनता-ग्रंथि से मुक्त हों। वे जरा सीखे इंदिरा गांधी से, जिन्होंने 1967 में ऐसे-ऐसे कांग्रेसी और बाहरी लोगों को अपना मंत्री बनाया, जो उनसे भी अधिक अनुभवी और योग्य थे। वे कोई भी निर्णय लेते वक्त अपने विरोधियों और वरिष्ठों से सलाह लेना भी नहीं भूलती थीं। ये अगले दो साल भाजपा के लिए बहुत निर्णायक होंगे। हालांकि विरोधियों की आज इतनी दुर्दशा है कि वे 2019 में इस सरकार के लिए कोई खतरा खड़ा नहीं कर सकते लेकिन कौन जानता है कि अगले दो साल में कहीं कोई बड़ा जन-आंदोलन उठ खड़ा न हो।

एक हजार से ज्यादा मौलवियों का फतवा मायने रखता है
(अजित वर्मा)
एक हजार से ज्यादा मुस्लिम मौलवियों और इमामों ने मिलकर 2611 के मुम्बई हमले के मास्टरमाइंड और जमात-उद-दावा के चीफ हाफिज सईद के खिलाफ फतवा जारी किया है और उसे भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए सजा देने की मांग की है। मुंबई में दारुल उलूम अहले सुन्नत मदरसा में एक प्रस्ताव पास किया गया जिसमें जमात-उद-दावा सहित पाकिस्तान के कई आतंकवादी संगठनों की भी कड़ी निंदा की गई है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के काउंटर टेररिजम कमिटी के प्रमुख अम्र अब्दुललतीफ अबुलअता को यह प्रस्ताव भेजा गया है और साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय को भी इसकी एक कॉपी भेजी गई है।
प्रस्ताव को पेश करने वाले मुंबई के एनजीओ इस्लामिक डिफेंस साइबर सेल के चीफ अब्दुर रहमान अंजारिया का कहना है कि ‘हाफिज सईद और अन्य आतंकी संगठन वैश्विक शांति के लिए खतरा हैं। हाफिज भारत को अपना नंबर 1 दुश्मन बताता है लेकिन वह खुद इस्लाम और मानवता का दुश्मन है।’ अंजारिया ने साल 2015 में आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट के खिलाफ दुनिया के सबसे बड़े फतवे की भी शुरुआत की थी। इस फतवे पर 1000 से यादा भारतीय मुस्लिम मौलवियों और इमामों ने हस्ताक्षर किए थे।
प्रस्ताव में पूरी दुनिया को बताया गया है कि पाकिस्तान में करीब 60 आतंकवादी संगठन ऐक्टिव हैं और यूएन को इसके खिलाफ ऐक्शन लेना चाहिए। पाकिस्तान में जेयूडी पर प्रतिबंध लगा हुआ है लेकिन बीते सोमवार हाफिज सईद ने अपनी ‘मिली मुस्लिम लीग’ नाम की राजनीतिक पार्टी लॉन्च की है ताकि पाकिस्तानी चुनाव में लड़ सके। मुंबई के साकी नाका मदरसे के हेड अब्दुल मंजर खान अशरफी का कहना है कि ‘पाकिस्तान परमाणु हथियार से संपन्न देश है और अगर लोग हाफिज सईद जैसे लोगों को वोट देंगे तो यह सिर्फ भारत के लिए बड़ा खतरा नहीं होगा, बल्कि पूरी दुनिया के लिए होगा। सईद मुस्लिमों को कट्टरता की तरफ ले जाने की कोशिश करेगा।
जहां तक हाफिज सईद द्वारा नया संगठन बनाने की बात है, हम याद दिलाना चाहेंगे संगठन पर प्रतिबंध लगने पर पाकिस्तानी आतंकवादी नया चोला धारण करने के लिए संगठन का या तो रातों रात नाम बदल देते हैं या फिर नया संगठन बना लेते हैं। हाफिज ने भी यही किया है। अब यह तो समय ही बतायेगा कि राजनीति में पाकिस्तान के लोग कट्टरपंथी हाफिज को अपने वोट कितने देते हैं! यह देखना होगा कि सक्रिय राजनीति में उतरने पर हाफिज सईद पाकिस्तान की राजनीति में क्या बदलाव ला सकता है। हमारा मानना है कि हाफिज सईद के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र को तत्काल कदम उठाना चाहिए। समय रहते उसकी घेराबन्दी बेहद जरूरी है।

केंद्र सरकार के दावों की पोल खोलते जीडीपी के आंकड़े
– डॉ हिदायत अहमद खान
मोदी सरकार और उससे जुड़े नेता तो यही कहते हैं कि नोटबंदी से देश को खासा लाभ हुआ है, जैसे- आतंकवाद पर रोक लगी है, नकली नोटों का चलन बंद हो गया है, सारा कालाधन बैंकों में आ गया है और वो लोग भी अब निशाने पर हैं जिन्होंने कालाधन बैंकों में जमा करवाया है। दूसरी तरफ आरबीआई ने आंकड़े पेश करते हुए बताया है कि 99 फीसद पुराने नोट जमा हो चुके हैं और यह एक बड़ी खबर है क्योंकि यदि इतनी ईमानदारी से बैंको में पैसा जमा किया जा चुका है तो इसका मतलब ही यही है कि अब कालाधन देश में है ही नहीं क्योंकि बैंकों के जरिए उसे सफेद किया जा चुका है। इस प्रकार जो नेता और मंत्री देश में बड़ी मात्रा में कालाधन छुपा होने के दावे करते हैं वो सरासर झूठे और उनके दावे मनगढ़ंत साबित हो जाते हैं। इसके साथ ही अर्थव्यवस्था पर लगातार बड़े-बड़े दावे कर रही केंद्र सरकार की कलई जीडीपी के आंकड़ों से भी खुलती नजर आती है। कहने में हर्ज नहीं कि नोटबंदी ही नहीं बल्कि अनेक खामियों से लबरेज जीएसटी लागू होने से देश की जीडीपी में बड़ी गिरावट देखी गई है। इस पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार भले कहे कि नोटबंदी का इससे कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन सब कुछ यहीं से नियंत्रित होता हुआ नजर आ रह है। इससे पहले की कोई निर्णय पर हम पहुंचें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस बयान को देखें जिसे कि उन्होंने केंद्र सरकार को चेताते हुए दिए थे। वह बयान उन्होंने नोटबंदी के ठीक पहले संसद के उच्च सदन में दिया था। तब डॉ मनमोहन सिंह द्वारा मोदी सरकार को दी गई चेतावरी स्वरुप सलाह अब शब्दश: फलीभूत होती हुई नजर आई है। गौरतलब है कि पिछले वर्ष यानी नंवबर 2016 में राज्यसभा में नोटबंदी पर हो रही चर्चा के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि नोटबंदी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है। इससे अर्थव्यवस्था कमजोर हो सकती है और जीडीपी में 2 फीसदी की गिरावट आ सकती है। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के ये वही प्रधानमंत्री थे जिन्होंने विश्वमंदी के दौर में भी अपनी सफल नीतियों के दम पर भारतीय अर्थव्यवस्था को आंच आने नहीं दिया था और मंदी के कारण न तो कोई औद्योगिक इकाई को बंद करना पड़ा था और न ही किसी फर्म को अपने कर्मचारियों को बाहर ही निकालना पड़ा था। अत: ऐसे ज्ञान-वान सदस्य की बात को नजरअंदाज करके मोदी सरकार ने देश में एक बड़े आर्थिक संकट को न्यौता देने का काम किया है। इस सरकार ने समझा था कि नोटबंदी के जरिए देश का तमाम पैसा बैंको के जरिए उन तक पहुंच जाएगा और उससे वो सब कर सकेंगे जिससे देश को लाभ की स्थिति में बता सकें। इस कारण उपभोक्ताओं को बैंक में जमा धन निकालने की इजाजत भी नहीं दी गई। इस संबंध में नित नए नियम बनाकर कुछ इस तरह लागू करवाए गए मानों देश किसी बड़े संकट से गुजर रहा हो। तभी देश और दुनिया में आर्थिक मामलों के ज्ञाता और सफल पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी से सवाल किया था कि वह किसी ऐसे देश का नाम बताएं, जहां लोगों ने बैंक में अपने पैसे जमा कराए हों लेकिन वे उसे निकाल नहीं सकते हैं। बात साफ थी कि कानूनी तौर पर जो करने को उपभोक्ता से कहा जा रहा था वह उसके विश्वास को तोड़ने जैसा था। इसलिए मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में बताया था कि करेंसी सिस्टम में लोगों का भरोसा कम हुआ है, किसानों और छोटे उद्योगपतियों को भी बड़ा नुकसान हुआ है। बावजूद इसके मोदी सरकार लगातार प्रयोग पर प्रयोग किए जा रही थी और रोजाना नए नियम बनाकर संपूर्ण देश को हैरान कर रही थी। अब जबकि चालू वित्त वर्ष की जून में खत्म हुई तिमाही के दौरान देश की जीडीपी की वृद्धि दर में गिरावट दर्ज की गई तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की एक-एक बात याद हो आई। वित्त वर्ष 2016-17 की पहली तिमाही के दौरान जिस जीडीपी की रफ्तार 7.9 फीसद थी वह नोटबंदी के बाद लगातार गिरती चली गई और अब जीडीपी का आंकड़ा जो पेश किए गया वह गिरकर 5.7 फीसद पर आ गया है। विचारणीय बात है कि महज एक वर्ष में जीडीपी 7.9 से गिरकर 5.7 फीसद पर आ गया और सरकार कहती है कि सब सामान्य बात है, उसे इसके दूरगामी परिणाम नजर ही नहीं आ रहे हैं। यह मजाक वाली बात नहीं है, बल्कि गंभीर है जिससे लोगों का कारोबार और रोजगार जुड़ा हुआ है, इसलिए इस गिरावट को नोटबंदी से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। इसी प्रकार जीएसटी से भी कोई नौकरियों में इजाफा नहीं होने वाला है, बल्कि महंगाई में ही बढ़ोत्तरी देखी जा रही है और सबसे बड़ी बात यह है कि जिस चीज में सबसे ज्यादा लगाम लगाने की आवश्यकता थी उसे जीएसटी से अलग रखकर सरकार ने अपने मंसूबों को साफ कर दिया है और वह यह कि देश के आमजन को आगे भी तैयार रहना होगा कि उसके पास जो कुछ भी है वह सरकार कभी भी कैसे भी ले सकती है, क्योंकि इसके बगैर सरकार कुछ करने की स्थिति में खुद को नहीं पा रही है। अगर यह सच है तो आमजन तो यही सोच रहा है कि पिछली सरकार ही अच्छी थी जो किसी न किसी तरह से देश चला लेती थी और किसी पर कोई बोझ भी नहीं आने दे रही थी। इस सरकार ने पैसा भी निकाल लिया और कालाधन भी वापस नहीं ला पाई और अब ऊपर से कह रही है कि अभी भी उसके प्रयोग बंद होने वाले नहीं हैं। अब इससे और बुरे दिन आखिर देशवासियों को क्या देखना पड़ेंगे कि बैंक में उनका अपना जमा धन भी वापस लेने का अधिकार छीन लिया जाता है। इस प्रकार हर मोर्चे पर असफल होती सरकार यदि इसकी भी जिम्मेदारी आमजन के सिर पर डालती नजर आ जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।

धर्म के मायालोक में अंधी आस्था के दुष्परिणाम
-प्रमोद भार्गव
धर्म के मायालोक में अंधी आस्था के दुष्परिणाम क्या होते हैं, यह हमने पिछले साल मथुरा में बाबा रामपाल के डेरे में देखा और अब डेरा सच्चे सौदा के स्वयंभु ईश्वर बने बाबा गुरमीत राम-रहीम के भक्तों की पांच राज्यों में सामने आई हिंसा के कुरूप चेहरों के रूप में देख रहे हैं। बाबा ने पहले उत्तेजक माहौल बनाकर देश की न्याय व्यवस्था को यह चेतावनी देने की कोशिश की कि यदि निर्णय खिलाफ आया तो देश अराजकता के हवाले कर दिया जाएगा। भारत का नामोनिशां मिटा देंगे। और वास्तव में बलात्कार में जब अदालत ने बाबा गुरमीत को दोषी करार दिया तो पांच मिनट के भीतर हरियाणा समेत दिल्ली, हिमाचल, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में अनेक जगहों से आगजनी व तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आने लगीं। देखते-देखते करोड़ों की संपत्ति नष्ट कर दी गई और नियंत्रण के उपाय में पुलिस व सुरक्षा बलों की गोलीबारी में 30 लोग हताहत एवं 250 लोग घायल हो गए। यह वाक्या तब हुआ जब बाबा को एक साधवी के साथ दुष्कर्म के आरोप में दोषी ठहराया गया है।
कुछ समय पूर्व ही मुख्य न्यायमूर्ति जेएस खेहर ने कहा था कि ’अब कानून तोड़ना और न्यायालय की अवमानना करना हमारी संस्कृति और खून में शामिल हो गया है।’ तब उनके कहे को गंभीरता से नहीं लिया गया। इसीलिए जब तीन तलाक से जुड़ा फैसला आया तो अनेक मौलवियों और मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवियों ने इसे धर्म में हस्तक्षेप बताया और अब डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम पर यौन शोषण का आरोप सिद्ध हुआ तो उनके सर्मथकों ने उत्तरी भारत में हिंसा का तांडव रचकर जता दिया है कि अदालती आदेश के उनके लिए कोई मायने नहीं हैं। हैरानी की बात यह है कि चंडीगढ़ प्रशासन और हरियाणा एवं पंजाब की सरकारों को पता था कि 24 अगस्त को यह फैसला आना है और उनके समर्थक तीन दिन पहले से ही पंचकूला में धारा 144 लगाए जाने के बाबजूद लाखों की संख्या में आना शुरू हो गए हैं, तब उनके नियंत्रित क्यों नहीं किया गया। जबकि बड़ी संख्या में पुलिस के अलाव अर्ध-सैनिक बलों 15 हजारे जवान तैनात थे। थल सेना गश्त कर रही थी। बाबजूद बाबा के समर्थक लाठी, हथियार और पेट्रोल व डीजल लेकर संवेदनशील क्षेत्रों में घुसे चले आए। खुफिया एजेंसियां भी इनकी मंशा भनक नहीं लगा पाईं। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि एजेंसियों के अधिकारी-कर्मचारियों ने क्षेत्र में जाकर न तो समर्थकों से बातचीत की और न ही उनकी खाना-तलाशी ली। इसलिए यह खुफिया एजेंसियों की बड़ी चूक है, इसलिए उन्हें भी इस हिंसा के लिए दोषी ठहराए जाने की जरूरता है। इन सब लापरवाहियों की वजह से ही शासन-प्रशासन असहाय नजर आया।
राम रहीम को दोषी ठहराने के लिए दो पीड़ित साध्वियों ने 15 साल कानूनी लड़ाई लड़ी। इनमें से एक नाबालिग लड़की थी। 2002 में बाबा के खिलाफ उनकी शिकायत पर दुष्कर्म व यौन उत्पीडन का प्रकरण दर्ज किया गया था। 15 साल बाद फैसला 25 अगस्त 2017 को विशेष सीबीआई जज जगदीप सिंह ने सुनाया। फैसले के वक्त अदालत में पीड़ित साध्वियां, आरोपी राम रहीम के साथ हरियाणा के मुख्य सचिव भी मौजूद थे। वहीं अदालत के बाहर तथाकथित बाबा के लाखों समर्थक भी मौजूद थे। साध्वियों के बयानों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर इल्जाम सही साबित हुआ। बाबजूद समर्थकों ने पीड़ित साध्वियों का पक्ष लेने की बजाए उस बाबा का साथ दिया, जिसने बाबा का रूप रखकर जघन्य अपराध किया था। भारत में यह बेहद दुखद एवं विरोधाभासी स्थिति है कि भक्तगण धर्म के मायालोक में इतने अंधविश्वासी हो जाते हैं कि वे अपना सही-गलत का विवेक तो खोते ही हैं, कानून भी अपने हाथ में लेकर, अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारने का काम कर देते हैं। यह अंधी आस्था हम सबके लिए गहरे आत्म निरीक्षण का विषय है कि आखिर राम रहीम जैसे वैभवशाली व विलाशी लोग भोली-भाली जनता के समक्ष दैवीय शक्ति का रूप व प्रतीक बन जाते हैं। राम रहीम जैसे बाबाओं को महिमामंडित करने का काम हमारे राजनेता और आला अधिकारी भी उनकी शरण में जाकर करते हैं। इस कारण आम जनता का मानस इन्हें चमत्कारी मानने का भ्रम पाल लेती है। नतीजतन इनके सम्मोहन में आकर लोग अंधेपन का शिकार होकर अपने जीवन को पंगु बना देने का काम कर डालते हैं।
यही काम टीवी समाचार चैनलों पर ’थर्ड आई ऑफ निर्मल बाबा‘ भक्तों पर दिव्य कृपा बरसा रहे हैं। एक समय बाबा मुश्किल में भी आ गए थे, लेकिन अब उनका कारोबार फिर टीवी चैनलों पर स्पेस खरीद कर फिर से धड़ल्ले से चले निकला है। हालांकि दैवीय शक्तियों और चार भुजाओं से भक्तों के कल्याण का प्रपंच रचने वाले अकेले राम रहीम और निर्मल बाबा ही नहीं हैं, टीवी चैनलों पर मंत्र-महामंत्र और चमत्कारिक वस्तुएं एवं टोटके बेचने वाले तथाकथित सिद्धियों बनाम कारोबारियों की पूरी एक जमात है। हैरानी इस बात पर भी है कि छल, प्रपंच और प्रहसन के इस पूरे कारोबार को प्रोत्साहित और संरक्षण भुगतान समाचार (पेड न्यूज) के बूते वे टीवी चैनल दे रहे हैं, जिनकी पैठ घर-घर में है और जिनके मालिक व उद्घोषक प्रगतिशील होने का दावा करते हैं।
धर्म और धर्म के प्रर्वतक मानवता को तात्कालिक व समकालीन संकटों से मुक्ति के लिए अस्तित्व में आए और उन्होंने समाज को संकट में डालने वाली शक्तियों से जबरदस्त लोहा भी लिया। इस क्रम में भगवान बुद्ध ने ईश्वर के नाम पर संचालित धर्म सत्ता को राज्यसत्ता से अलग किया। उस युग में धर्म आधारित नियम-कानून ही राजा के राजकाज के प्रमुख आधार थे। किंतु बुद्ध ने जातीय, वर्ण और धर्म की जड़ता को खण्डित कर समतामूलक नागरिक संहिता को मूर्त रूप दिया। कौटिल्य के अर्थ शास्त्र में भी जन्म आधारित और जातिगत श्रेष्ठता की जगह व्यक्ति की योग्यता को महत्व दिया गया। ईस्लामी परंपरा में भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को उसकी रजामंदी के अधीन माना गया। ईसा मसीह ने व्यक्ति स्वातंत्र्य और करूणा के अधीन न्याय का सूत्र दिया। गुरूनानक ने जातिवाद की ऊंच-नीच को अस्वीकार कर सत्तागत राजनीतिक धर्मांधता को मानव विरोधी जताया।
परंतु कालांतर में धर्मांध लोगों ने अपनी-अपनी प्रभुताओं की वर्चस्व स्थापनाओं के दृष्टिगत कालजयी पुरुषों के संघर्ष को दैवीय व अलौकिक शक्तियों के सुपुर्द कर धर्म को अंधविश्वास और उससे उपजाए गए भय और कृपा के सुपुर्द कर दिया। बोध प्राप्ती के इस सरल मार्ग को शक्ति के मनोविकार, प्रसिद्धि की लालसा, धन की लोलुपता और वैभव के आडंबर में बदल दिया। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तो धर्म अभिव्यक्तियों के बहाने अंधविश्वास फैलाने के रास्तों पर ही आरूढ़ होता दिखाई देता है। यही कारण है कि वैचारिक शून्यता के माहौल में हर नये विचार के आगमन और प्रयोग की कोशिशों को कल्पनातीत लीलाओं की तरह महिमामंडित कर जड़ता का मनोविज्ञान रचा जाकर मानवीय सरोकारों को हाशिये पर लाया जा रहा है। मानवीय सरोकारो के लिए जीवन अर्पित कर देने वाले व्यक्तित्व की तुलना में अलौकिक चमत्कारों को संत शिरोमणि के रुप में महिमामंडित करना किसी एक व्यक्ति को नहीं पूरे समाज को दुर्बल बनाने की कोशिशें हैं।
चमत्कार यथार्थ नहीं होते इसके प्रमाण भारतीय इतिहास में भरे पड़े हैं। जब यवन आक्रांता महमूद गजनवी ने सशस्त्र लुटेरों के साथ सोमनाथ के विश्व प्रसिद्ध शिव-मंदिर पर हमला बोला तो मंदिर के पुजारियों ने सोमनाथ के सैन्य बलों को भरोसा जताया कि भोले शंकर तीसरा नेत्र खोलेंगे और आक्रांता शिव की क्रोधाग्नि से भस्म हो जाएंगे। लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसा हुआ नहीं। आक्रमणकारियों ने पवित्र शिवलिंग तो खंडित किया ही मंदिर की अकूत व बहूमूल्य धन संपदा लूट कर भी ले गए। सिंध में यही हाल मोहम्मद बिन कासिम ने किया। तुर्क शासकों का भारत पर साढ़े तीन सौ साल का शासन तो बेहद भयावह और दमनकारी रहा। तैमूर ने मोहम्मद तुगलक से युद्ध करने से पहले एक दिन में ही एक लाख हिन्दू-बंदियों का बेरहमी से कत्ल कर दिया था। मानव-जीवन को ह्यस करने वाला इतना नृशंसतापूर्ण उदाहरण दूसरा नहीं है। ब्रिटिश काल में भी नहीं। यही, भारत में वह परवर्ती युग था जब तुर्कों द्वारा सुन्दर हिन्दू लड़कियों को जबरन पत्नियां बनाये जाने के कारण पर्दा-प्रथा व बाल विवाह का प्रचलन शुरु हुआ। यही वह समय था जब हिन्दुओं में एकेश्वरवाद में विश्वास और मूर्ति पूजा में आस्था चरम पर थी। फलित ज्योतिष, सामुद्रिक हस्तशास्त्र और जादू-टोना के मोहपाश में भी मानव समुदाय उलझे थे। यही वे प्रच्छन्न कारण थे, जिनसे हिंदू समाज इतना निष्क्रिय और नाकारा हो गया था कि वह अपनी सुरक्षा भी नहीं कर पाया। (लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं)