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ट्रंप राष्ट्रपति हैं या मसखरे ?
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
पिछले साल जब डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति की शपथ लेने वाले थे तो उनके एक बड़े समर्थक मुंबई आए और उन्होंने मुझे उनके शपथ-विधि समारोह में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया। मैंने नम्रतापूर्वक मना कर दिया क्योंकि उनके राष्ट्रपति निर्वाचित होने के पहले ही मुझे यह लगने लगा था कि ट्रंप इस पद के लिए सर्वथा अयोग्य हैं। पिछले साल भर में उनकी कथनी और करनी ने मेरे इस संदेह को संपुष्ट किया है। अमेरिका के सवा दो सौ साल के इतिहास में दो-तीन राष्ट्रपति ऐसे जरुर हुए हैं, जिन्होंने यदा-कदा अपना आपा खोया है लेकिन ट्रंप-जैसा मूढ़-मति राष्ट्रपति अमेरिका के इतिहास में पहला ही हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपतियों के दुराचार के कुछ किस्से तो जग-जाहिर होते रहे हैं लेकिन वे लुक-छिपकर ही होते थे। ट्रंप का तो खुला खेल फरक्कावादी है। दर्जनों महिलाओं ने ट्रंप पर व्यभिचार और बलात्कार के आरोप लगाए हैं। अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ के अनुसार एक अश्लील फिल्म अभिनेत्री के साथ अपने शारीरिक संबंधों पर पर्दा डालने के लिए ट्रंप ने उसे लगभग सवा करोड़ रु. एक वकील के जरिए पहुंचवाए। ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद भी अपने पद की गरिमा का उल्लंघन किया है। शायद उन्हें पता ही नहीं चलता है कि वे क्या कर रहे हैं। उन्होंने मेक्सिको से आनेवाले शरणार्थियों को क्या-क्या भद्दी गालियां नहीं दी हैं। अभी अफ्रीकी देशों के लिए उन्होंने इतने गंदे शब्द का प्रयोग किया है कि उसे हम यहां लिख भी नहीं सकते। उनके कई मंत्रियों और अफसरों ने उनके फूहड़ व्यवहार से तंग आकर इस्तीफा दे दिया है। अभी पहले साल में ही इतने अपशकुन हो गए तो शेष तीन साल में क्या होगा ? पता नहीं, तब तक वे टिक पाएंगे भी या नहीं? उन्होंने अपने दोस्तों और दुश्मनों, दोनों को अधर में लटका रखा है। वे किसी एक नीति पर नहीं टिकते। वे पल में माशा और पल में तोला होते रहते हैं। वे कभी उत्तर कोरिया को धमकी देते है। कभी पाकिस्तान को और कभी ईरान को और देखते ही देखते पल्टी खा जाते हैं। कभी अमेरिका स्थित प्रवासी भारतीयों को निकाल बाहर करने की धमकी देते हैं और कभी उनकी तारीफों के पुल बांध देते हैं। चीन को दुश्मन बताते हैं और जब वहां जाते हैं तो चारों खाने चित हो जाते हैं, क्योंकि उसे अरबों-खरबों डाॅलरों का अमेरिकी माल टिकाना है। मुस्लिम देशों और आतंकवाद के खिलाफ जहर उगलने में ट्रंप सबसे ज्यादा बड़बोले हैं लेकिन सउदी अरब पहुंचते ही ट्रंप इस तरह पसर जाते है कि वे पहचान में ही नहीं आते। वे राष्ट्रपति कम, मसखरे और मदारी ज्यादा नज़र आते हैं। उनके हाथ में परमाणु-बमों का खटका है, यह दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

हमारे नौसिखियों की विदेश नीति
– डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने साफ शब्दों में स्वीकार किया है कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित दोभाल थाईलैंड में बैठकर पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जनरल नसीर जेंजुआ के साथ बातचीत कर रहे थे। यह बातचीत 26 दिसंबर को हुई याने उसके दूसरे दिन हुई, जिस दिन कुलभूषण जाधव की मां और पत्नी को इस्लामाबाद में बेइज्जत किया गया था। हमारी सरकार इधर उस मामले पर हायतौबा मचा रही थी, कपड़े फाड़ रही थी और बैंकाक में हमारा अफसर पाकिस्तानी अफसर के साथ लुक-छिपकर बातचीत कर रहा था। मैं पूछता हूं, यह लुका-छिपी क्यों हो रही है, किसके डर के मारे हो रही है ? वे बैंकाक में क्यों मिल रहे हैं ? वे दिल्ली और इस्लामाबाद में क्यों नहीं मिल सकते ? यह जरुरी नहीं है कि वे दिल्ली या इस्लामाबाद में जो बातें करेंगे, उन्हें जनता को बताना जरुरी है। कूटनीति में गोपनीयता और चुप्पी का महत्व कौन नहीं जानता ? लेकिन हमारे नेता जब ये बोलते हैं कि आतंक और बात साथ-साथ नहीं चल सकते तो वे क्या मसखरे-से नहीं लगते हैं ? जब दोभाल चुप है तो सुषमा और मोदी को जुबान चलाने की जरुरत क्यों है ? लात और बात का साथ-साथ चलना तो महाभारत के जमाने से चला आ रहा है। सूर्यास्त के पहले तक युद्ध और उसके बाद वार्तालाप खुद कृष्ण चलाते थे। राम ने हनुमान को लंका क्यों भेजा था ? अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर, निक्सन और केनेडी के जमाने में अमेरिका और चीन के राजदूत पोलैंड में बैठकर लगातार कई वर्षों तक बात करते रहे या नहीं ? यह बात उस समय भी जारी थी जबकि माओत्से तुंग ने अमेरिकी हमले के खतरे के कारण सारे चीन में खंदकें खुदवा रखी थीं। कारगिल-युद्ध के दौरान अटलजी ने एक व्यक्ति को प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बात करने के लिए भेजा था। मियां नवाज़ ने मुझे फोन करके यह युद्ध के दौरान ही बताया। अटलजी, नवाज शरीफ और मेरे बीच त्रिकोणात्मक संवाद चलता रहा और युद्ध भी चलता रहा। भाजपा की मुसीबत यह है कि उसके नेता विदेश नीति के मामले में बिल्कुल नौसिखिए हैं। और उनकी मुसीबत यह भी है कि उनमें इतनी योग्यता भी नहीं है कि वे विदेशनीति के विशेषज्ञों से खुलकर बात कर सकें। वर्तमान भाजपा के पास योग्य बुद्धिजीवियों का यों भी टोटा ही रहता है। इसीलिए उसके नेता नौकरशाहों के नौकर बने रहते हैं। जब तक इस मजबूरी से पार नहीं पाया जाएगा, हमारी सरकार की विदेश नीति अधर में ही लटकी रहेगी।

शीर्ष न्यायालय में ठिठका लोकतंत्र शीर्ष न्यायालय में ठिठका लोकतंत्र –

प्रमोद भार्गव 

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि सर्वोच्च न्यायालय ने चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने पत्रकार वार्ता आयोजित कर अपना असंतोष सार्वजनिक किया। आमतौर से ऐसा देखने में नहीं आया है कि न्यायालय के भीतर हुए किसी पक्षपातपूर्ण व्यवहार के परिप्रेक्ष्य में कुछ न्यायाधीशों को लोकतंत्र की रक्षा की गुहार लगाते हुए मीडिया को हथियार बनाने की जरूरत आन पड़ी हो ? न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन बी लोकुर और कुरियन जोसेफ ने सीधे-सीधे शीर्ष न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर ऊंगली उठाई है। उनका आरोप है कि उनके सुझाव नहीं माने गए, लिहाजा उन्हें मजबूर होकर मीडिया के सामने आना पड़ा। इस मौके पर मुख्य न्यायाधीश के बाद दूसरे वरिष्ठ जज चेलमेश्वर ने कहा कि हम चारों इस बात पर सहमत हैं कि इस संस्थान को बचाया नहीं गया तो देश का लोकतंत्र जिंदा नहीं रह पाएगा। जबकि स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायापालिका भारतीय संवैघानिक व्यवस्था की रीढ़ है। सुप्रीम कोर्ट में प्रधान न्यायाधीश समेत 31 न्यायाधीशों के पद हैं। इनमें से 6 पद रिक्त हैं। यानी अन्य 21 न्यायमूर्तियों ने सीजेई की कार्यप्रणाली के संदर्भ में अपनी असहमति नहीं जताई है, तब क्या यह मान लिया ताए कि सीजेई वाकई में मनमानी पर उतारू हैं ? हकीकत तो यह है कि इससे लोकतंत्र को तो कोई खतरा नहीं है, लेकिन उसकी साख और गरिमा को जरूर पलीता लगा है। लिहाजा बेहतर होता यदि शीर्ष न्यायालय के भीतर कहीं ठहराव या गतिरोध आ भी रहा था, तो उसे संवाद के जरिए सुलझा लिया जाता ?  देश की जनता यह मानकर चलती है कि उसकी आवाज यदि कहीं नहीं सुनी गई तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा जरूर सुनी जाएगी। लेकिन अब चार न्यायाधीशों द्वारा उठाई आवाज इस तथ्य की और इंग्ति करती है कि जब वरिष्ठतम जजों की आवाज की अदालत ही अनदेखी कर रही है तो आम-आदमी की आवाज कैसे सुनी जाएगी ? वैसे भी अब वकीलों की शुल्क इतनी अधिक हो गई है कि दूरदाज क्षेत्रों में बैठे गरीब का सुप्रीम कोर्ट की देहरी तक पहुंचना ही नामुमकिन हो गया है। फिर भी आम-आदमी का यह मुगालता अच्छा ही था कि उसे सुप्रीम कोर्ट से न्याय की उम्मीद बंधी होने के कारण लोकतंत्र के इस तीसरे स्तंभ पर आस्था थी। इसी सूझ-बूझ से काम लेते हुए हमारे संविधान निर्माताओं ने हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के सभी अंगों के स्वरूप और कामकाज की बुनियाद में जनतांत्रिकता अनिवार्य रूप से स्थापित की थी। लेकिन देखने में आ रहा है कि हमारी संवैधानिक संस्थाओं में आंतरिक लोकतेत्र का संकट बढ़ रहा है। राज्यसभा, लोकसभा, विधानसभा से लेकर राजनीतिक दलों में आतंरिक लोकतंत्र लगभग गायब है। विद्यायिका में तो हम लोकतंत्र का चीरहरण होते रोजाना देखते हैं, इसलिए अब अचंभित या परेशान नहीं होते। किंतु सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश भी राजनेताओं के आचरण का अनुकरण करने लग जाएंगे, यह चिंतनीय पहलू है। क्योंकि न्यायालय और सीबीआई दो ही ऐसी संस्थाएं हैं, जिन पर देश का आम आदमी सबसे ज्यादा भरोसा करता है। गोया, इस ऐतिहासिक घटनाक्रंम से हड़कप मचना स्वाभाविक है।  हालांकि सुप्रीम और हाईकोर्ट के जज अपना असंतोष या न्यायालयों के भीतर जारी कदाचरण या अनैतिक गड़बड़ियों का खुलासा मर्यादित रूप में करते रहे हैं। कोलकाता उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश सीएस कर्णन ने बंद लिफाफे में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मामला उठाते हुए 20 जजों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। हाईकोर्ट के कुछ जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर जब उन्होंने नैतिकता के आधार पर इस्तीफे नहीं दिए तो महावियोग चलाकर उन्हें हटाया गया। बीते कुछ सालों में हाईकोर्ट जजों पर प्रशिक्षु छात्राओं से अश्लील अभ्रदता के आरोप भी लगे हैं। ऐसे जजों को सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति देकर न केवल शीर्ष न्यायालय, अपितु लोक में न्याय की रक्षा की है, जिससे न्यायालय की पवित्रता में पलीता न लगे। बहरहाल, मीडिया को जो सात पृष्ठीय पत्र दिया हैं, उसमें खासतौर से प्रशासनिक व्यवस्था में स्थापित परिपाटी की अनदेखी करने की बात कही गई है। उच्चतम और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश दो प्रकार के कार्य करते हैं, एक न्यायिक मामलों का निराकरण, दूसरा प्रशासनिक व्यवस्था देखना। इस दूसरे प्रकार के काम के अंतर्गत विचाराधीन प्रकरणों की कार्य-तालिका (रोस्टर) तैयार होती है। जिसमें प्रधान न्यायाधीश विभिन्न सदस्यों और पीठों को मामले आबंटित करते हैं। मामलों को आबंटित करने की परिपाटी में प्रकरण की प्रकृति के हिसाब से वर्गीकरण करके रोस्टर में डाला जाता है। हैरानी इस बात पर है कि आपत्ति जताने वाले चारों जजों ने माना है कि रोस्टर तैयार करना प्रधान न्यायाधीश का विशेषाधिकार है। जब प्रधान न्यायाधीश को विशेषधिकार प्राप्त है तो सार्वजनिक आपत्ति की जरूरत क्यों ? दरअसल यह पत्रकार वार्ता उस प्रक्रिया के ठीक एक दिन बाद संपन्न हुई, जिसके तहत कॉलेजियम व्यवस्था का पालन करते हुए पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों ने दो न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए नाम तय किए थे, इसी के अगले दिन चार वरिष्ठ न्यायाधीश प्रधान न्यायाधीश की कार्य प्रणाली को लेकर सवाल उठा देते हैं। गौरतलब है कि जो पत्र मीडिया को दिया गया, उसमें भी उस फैसले का हवाला दिया गया, ’जिसमें 4 जुलाई 2017 को इसी अदालत की सात न्यायाधीशों की पीठ ने माननीय न्यायाधीश सीएस कर्णन से जुड़ा एक एससीसी (1) में फैसला सुनाया था। इस फैसले में (आरपी लूथरा मामले में दर्ज) हम में से दो ने कहा था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर दोबारा विचार करने और महाभियोग के अलावा सुधारात्मक उपायों के लिए एक तंत्र स्थापित करने की जरूरत है।’ इस प्रसंग और पत्रकार सम्मेलन के समय से जाहिर होता है कि दो जजों की जो नियुक्तियां हुई हैं, उनको लेकर कहीं पेंच है, जो लोकतंत्र की दुहाई देने के बहाने कहीं न्यायालय की चौहद्दी में ठिठका हुआ है। लिहाजा अदालत के भीतर यह व्यवस्थाजन्य आंतरिक समस्या है, ऐसी प्रशासनिक समस्याओं से देश का लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा, यह कहना व्यावाहरिक नहीं है।  वैसे भी लोकतंत्र की सीमा पर सैनिक और अंदर राजस्व व पुलिस के कर्मी रक्षा करते हैं न कि न्यायालय या न्यायाधीश ? क्योंकि इस प्रेस वार्ता के बाद इसके औचित्य के पक्ष व विपक्ष में सुप्रीम कोर्ट के ही विद्वान अधिवक्ता जिस तरह के सवाल खड़े कर रहे हैं, उससे यह एक राय कतई नहीं बन रही कि चार न्यायाधीशों ने जो पहल की, उससे इतर समस्या के समाधान का कोई रास्ता था ही नहीं ? शीर्ष न्यायालय की प्रतिष्ठा दांव पर लगे, इससे अच्छा है, असंतुष्ठ न्यायाधीश प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा से संवाद कायम कर पारदर्शी समाधान निकालकर न्यायालय और न्यायाधीशों का सम्मान बहाल करें। क्योंकि अंदरूनी विवाद को सार्वजनिक विवाद बनाने का जो कदम उठ गया है, वह अप्रत्याशित है। नतीजतन सर्वोच्च न्यायालय जैसी निर्विवाद माने जाने वाली संस्था ही विवाद के कठघरे में आकर खड़ी हो गई है।

गुजरात ने दम क्यों फुलाया ?
(वेदप्रताप वैदिक)
गुजरात का चुनाव-अभियान आज देश में जितना तहलका मचा रहा है, मेरी याद में इतना और ऐसा तहलका किसी प्रांतीय चुनाव में नहीं मचाया। ऐसा लग रहा है कि यह गुजरात की विधानसभा का नहीं, भारत की संसद का चुनाव है। इस चुनाव में यदि भाजपा हार गई तो 2019 में नरेंद्र मोदी का भविष्य अनिश्चित हो जाएगा और यदि विपक्ष जीत गया तो कांग्रेस की छवि चमकेगी और राहुल गांधी को लोग पप्पू कहना बंद कर देंगे। इसका अर्थ यह नहीं कि 2019 में राहुल को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार आसानी से मान लिया जाएगा। पहली बात तो यह कि विपक्ष की एकता अपने आप में एक पहेली बनी रहेगी और यह पहेली हल हो गई, तब भी विपक्ष में इतने खुर्राट और बुजुर्ग नेता हैं कि वे राहुल को अपना नेता कैसे मान लेंगे ? यह तो हुई भविष्य की बात लेकिन अभी हाल क्या है ? सत्य तो यह है कि गुजरात ने मोदी-गिरोह का दम फुला दिया है। स्वयं प्रधानमंत्री और पार्टी-अध्यक्ष को अपने ही प्रांत में इतनी दंड-बैठक क्यों लगानी पड़ रही है? पहली बात तो यह कि नोटबंदी और जीएसटी ने गुजरात के व्यापारियों को जबर्दस्त धक्का पहुंचाया है। यह व्यापारी वर्ग गुजरात ही नहीं, सारे भारत में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रीढ़ रहा है। दूसरी बात, दलित, ठाकोर और पटेल मोदी-शाह के विरुद्ध गोलबंद हो गए हैं। भारत की राजनीति में यदि कोई विशेष तूफान न आया हो तो वह प्रायः जातिवाद से ही संचालित होती है। तीसरी बात, गुजरात के नौजवानों पर अब 2002 के गोधरा का भूत सवार नहीं है। वे रोजगार की तलाश में हैं। विकास के नाम पर गुजरात में मोटी पूंजी का घूमर नृत्य जरुर हुआ है लेकिन उसमें से रोजगार बहुत कम निकला है। एक कंपनी के 30 हजार करोड़ रु. की पूंजी से लगे उद्योग ने सिर्फ 2200 नौकरियां दी हैं याने सवा करोड़ रु. का विनियोग होने पर सिर्फ एक आदमी को रोजगार मिला है। चौथी बात, गुजराती किसानों को उनकी मूंगफली, प्याज और कपास की कीमत इतनी कम मिली है कि वे भी मुक्का ताने बैठे हुए हैं। पांचवीं बात, मुस्लिम मतदाता अभी भी 2002 को भूला नहीं है। ये सब कारण तो हैं, भाजपा के वोट घटाने के लेकिन गुजरात के लोग यह कैसे भूल सकते हैं कि उनका बेटा दिल्ली के तख्त पर बैठा है और वे उस तख्त को ही उलटाने में लग जाएं ? यह तो ठीक है कि गुजरात के विपक्ष के पास आज एक भी भरोसेमंद नेता नहीं है, जिसे वह मुख्यमंत्री के रुप में देख सके लेकिन जब जनता गुस्साती है तो एक कहावत है कि ‘जब काम पड़े बांका तो गधे को कहे काका (चाचा)’ ! पता नहीं, वह क्या कर बैठे ? क्या पता, वह गुजरात में उत्तरप्रदेश की कहानी को दोहरा दे ?

(व्यंग्य) बनते बनते रह गई फिल्म
– दीपक दुबे
देश मे इस समय फिल्म बनाना और बन गई और तो उसे रिलीज करना मुश्किल होता जा रहा है कई तरह के बैरियर कई तरह के लोकल सेंसर आडे आते रहते है। जो प्रदर्शन कर माहौल खराब करते है । मैने भी फिल्म बनाने की ठानी थी बडी मेहनत से स्क्रिप्ट तैयार की फिर कलेक्टर से लेकर पटवारी तक सब से परमीशन बटोरता जैसे तैसे फिल्म बना ही डाला। फिल्म का नाम रखा धोबी के गधे तुम कुत्ते क्यों ना हुए? फिल्म का प्रोमो तैयार हुआ गधे की आत्मकथात्मक शैली को चित्रित कर जब इसका प्रोमो जारी किया गया तो देश मे हडकम्प मच गया एक प्रदेश मे जहां जहां यह वर्ग ज्यादा हे वहां पुतले जलने लगे जगह जगह आगजनी होने लगी। माजरा कुछ समझ नही आ रहा था आखिर लोग चाहते क्या है।
सबसे पहले प्रतिनिधिमण्डल को बुलाकर जानकारी ली तो सामने आया कि नाम को गलत ढंग से प्रदर्शित किया जा रहा है गधे की तुलना कुत्ते से करना लोगो का नागवार गुजर रहा था।
कुछ बुद्धिजीवी टाईप के धोबियों को इस बात पर आपत्ति थी कि गधो की पीठ पर तीन तीन गठठृर लादे गये हे जो कि उनकी परंपरा के विरूद्व हे इतने गठठृर तो रामायण काल मे भी नही लादे गये थे यह गघो पर अत्याचार हे भले वे हमारे भाई और नही पर भाई और जैसे हे उन पर यह अत्याचार सहन नही होगा।
मगर इसका क्या हल होगा ? समझौते के मूड मे आते हुए मैेने प्रतिनिघि मण्डल के एक नेता से पूछा।
अपको कम से कम इतना बोझा तो नही लादना चाहिए तुरंत दो गठठृर कम कीजिए जी जब तक दो गटठृर कम नही होगे फिल्म रिलीज नही करने दी जायेगी । और वे जोर जोर से नारे लगाने लगे।
मेने कहा कि सेंसर बोर्ड ने तो पास कर दिया हे और गघो को कोई भी आपत्ति नही है तो आप क्यो बीच मे टांग अडा रहे है? वे भडक गये यह हमरे गौरव का सवाल है आप इस तरह से हमारे गधे को चित्रित नही कर सकते कहकर वे उठे और अपना पुतला लेकर बाहर चले गये। मीडिया भी जो हमेशा इसं तरह की कंट्रोवर्सी के लिए तके बैठा रहता था एक्टिव्ह हो गया शहर शहर गांव गांव मे प्रदर्शन होने लगे कुछ लाण्ड्री वाले भी शामिल हो गये। बिना जाने कि बात आखिर है क्या?
प््रादेश के आका जो हमेशा इसी ताक मे रहते हे कि कब आगे होकर बाजी मारी जाये को जब यह पता चली तो उन्होने तुरंत अपने बंगले पर पूर्व से तेयार स्थायी पण्डाल मे धेाबी पंचायत बुला ली उन्होने भाषण मे कह भी दिया कि गधो पर ज्यादा बोझ लादना संविधान के खिलाफ है वे इसकीे निन्दा करते है ओर दो गठठृर तो कम से कम कम करने ही पडेगे। उन्होने समाज को खुश करने के लिए अपने निवास के सामने झील के किनारे एक गघे का स्मारक बनाने की घोषणा भी कर दी । धोबियों मे खुशी की लहर दौड गई। मगर मै क्या करू? मै तो दो क्या एक गटटर भी कम नही कर सकता हू क्योकि शूटिंग कैसे करूंगा इस हो हल्ले से मेरा हीरो गघा कही भाग गया है

शिक्षा जगत के बेमिसाल दानवीर डॉ. हरीसिंह गौर
(26 नवम्बर : जन्म दिवस पर विशेष)
– डॉ. अलीम अहमद खान
आधुनिक भारत में शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. हरीसिंह गौर जैसा दानी कोई दूसरा नहीं हैं। डॉ. गौर ने जो किया उसकी दूसरी मिसाल आज तक देखने-सुनने-पढ़ने में नहीं आती। 26 नवम्बर 1870 को सागर शहर की शनीचरी टौरी वार्ड में डॉ. गौर का जन्म हुआ। इनके दादा का नाम मानसींग था। इनके दादा गढ़पहरा सागर से शनीचरी में आकर बसे वे पेशे से कारपेंटर (बढ़ई) थे उनके एक पुत्र तख्त सिंह थे वे अपने पैतृक पेशे में जाने के इच्छुक नहीं थे। वे थोड़े शिक्षित थे और पुलिस विभाग में भर्ती हो गए। तख्त सिंह के चार पुत्र थे। ओंकार सिंह, गनपत सिंह, आधार सिंह और डॉ. हरीसिंह, पुत्रों के अलावा इनकी दो पुत्रियाँ भी थीं। जिनके नाम लीलावती और मोहनबाई था।
ओंकार सिंह और गनपत सिंह का काफी कम आयु में निधन हो गया। आधार सिंह और हरीसिंह ने अपने परिवार को सम्हाला। बचपन के दिनों में वे दो वर्षों तक एक निजी पाठशाला में पढ़े। इसके बाद सागर में ही उन्होंने हाई स्कूल तक शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा के प्रारंभिक दौर से ही उनकी विलक्षणता दिखाई देने लगी। सरकार से उन्हें छात्रवृत्ता मिलने लगी।
वे अपनी माँ को छात्रवृत्ता में से पैसे देते थे। छात्रवृत्ता की राशि ने उनकी पढ़ने की रूचि को और बलबति बनाया। डॉ. गौर आगे के अध्ययन के लिए जबलपुर गए। जबलपुर के उपरांत वे अपने भाई के पास नागपुर गए उनके भाई नागपुर न्यायालय में कार्यरत थे। इन्हेंने नागपुर में आगे की पढ़ाई जारी रखी। यहाँ से डॉ. गौर ने पूरे क्षेत्र में सबसे अधिक अंक लेकर मेरिट में स्थान प्राप्त किया। गणित और दर्शन डॉ. गौर के प्रिय विषय थे। इन्हें शिक्षा में अच्छे प्रदर्शन के लिये पुरूस्कृत किया गया। इसके बाद इन्होंने (हिस्लाप महाविद्यालय, नागपुर) में प्रवेश लिया।
छात्र जीवन में डॉ. गौर को अंग्रेजी और इतिहास में विशेष दक्षता के अंक मिले नागपुर की पढ़ाई के उपरांत इनके भाई ने डॉ. गौर को उच्च अध्ययन हेतु क्रेम्बिज भेजा इनके भाई एक निश्चित राशि डॉ. गौर को भेजा करते थे। इस राशि के अतिरिक्त डॉ. गौर उनके प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेने लगे। इनमें वे विजेता रहते और पुरूस्कृत होते। पुरूस्कार को राशि से इंग्लैड के खर्चे वहन करने में इन्हें मदद मिलती। कालांतर में इन्हें एलएल.डी. की डिग्री मिली। डॉ. गौर ने इंग्लैड प्रवास में नस्लीय भेद को काफी नजदीक से देखा।
विधि के छात्र के साथ वे अच्छी कविताएं भी लिखते थे, उनकी लिखी कविताएँ ‘रायल सोसायटी आफ लिटरेचर’ द्वारा प्रकाशित की जाती थी। 1892 में वे विदेश से अध्ययन पूरा करके स्वदेश लौंटे। डॉ. गौर की शैक्षणिक विद्वता की धूम पूरे यूरोप में थी, इंग्लैंड के साथ-साथ उनकी विद्वता का लोहा समकालीन भारतीय समाज मानता था। 1921 में जब दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तो डॉ. गौर को इस विश्वविद्यालय का पहला कुलपति नियुक्त किया गया। इसी तरह 1928 में जब नागपुर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तो इसके पहले कुलपति भी डॉ. गौर नियुक्त हुए। डॉ. गौर को सागर शहर से काफी लगाव था। नागपुर विश्वविद्यालय के कुलपति पद के दायित्व के कुशल निर्वाहन के बाद सागर नगर में विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए जी जान से जुट गए।
1936 से वे इस दिशा में अधिक सक्रिय रहे। तत्कालीन म.प्र. सरकार ने जबलपुर में विश्वविद्यालय स्थापित करने का प्रस्ताव उन्हें दिया जो इन्होंने ठुकरा दिया, वे सागर में ही विश्वविद्यालय स्थापित करना चाहते थे। आखिर उन्होंने सागर में निजी पूंजी से विश्वविद्यालय स्थापित किया। 1946 में लगभग 2 करोड़ रूपयों की बड़ी राशि से सागर नगर के पूर्व में पथरिया की पहाड़ियों पर एक बहुत खूबसूरत विश्वविद्यालय स्थापित किया। जो केवल सागर के लिए ही नहीं बल्कि भारत के शैक्षणिक संस्थानों में एक ऊँचा स्थान रखता है। भारत में अलीगढ़ एवं बनारस विश्वविद्यालय भी बने परन्तु वे लोगों के दान से बने। सागर विश्वविद्यालय डॉ. गौर की निजी सम्पत्ता से बना यह बेमिसाल हैं। डॉ. गौर का यह दान बुन्देलखण्ड और देश के लिए वरदान साबित हुआ।

व्यापमं घोटाले के जिन्न का चिराग से बाहर आ जाना
– डॉ हिदायत अहमद खान
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आते दिख रहे हैं वैसे-वैसे घपले और घोटालों की फाइलों से धूल झाड़ने का काम तेजी से शुरु हो गया है। इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष को किसी भी तरह से पीछे रहना स्वीकार नहीं है, इसलिए सरकार जहां इनसे बचने के उपाय तलाश रही है तो वहीं विपक्ष इन्हें हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए आक्रामक मुद्रा अख्तियार करने की दिशा में आगे बढ़ता नजर आ रहा है। इसी बीच खबर है कि मध्य प्रदेश परीक्षा मंडल यानी व्यापमं के बहुचर्चित घोटाले में सीबीआई ने विशेष अदालत में एक और चार्जशीट दायर कर गहरी नींद में सो रहे तमाम लोगों को जगाने का काम कर दिया है। यह बात हंगामाआराई इसलिए भी है क्योंकि इस चार्जशीट में पीएमटी 2012 के 592 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए हैं। इस तरह से एक बार फिर व्यापमं के जिन्न को चिराग से बाहर निकालने का काम कर दिया गया है। गौरतलब है कि व्यापमं घोटाले को सीबीआई ने जुलाई 2015 में पंजीबद्ध किया था, तब ये कयास लगाए जा रहे थे कि इस मामले में अब बहुत जल्द अनेक सफेदपोश नेता और आला अधिकारी जेल की हवा खाते नजर आएंगे, लेकिन सीबीआई की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी वैसे-वैसे ऐसा कुछ संभव होता हुआ नहीं दिखा। इसके साथ ही मामला इतना उलझा और पेंचीदा होता चला गया कि दो साल बाद सीबीआई चार्जशीट दायर करने की स्थिति में खुद को ला पाई है। बहरहाल देर आयद दुरुस्त आयद की तर्ज पर इससे यह तो खुलासा हो ही गया कि इस घोटाले में पूरा गिरोह सक्रिय था, जिसने अयोग्य लोगों को निजी चिकित्सा महाविद्यालय संचालकों और चिकित्सा शिक्षा विभाग से सांठगांठ कर चिकित्सा महाविद्यालयों में प्रवेश दिलवाया। इसमें व्यापमं के पूर्व अधिकारियों ने भी इनका खुलकर साथ दिया, जिनके बगैर यह काम निश्चित ही संभव नहीं था। यहां विपक्ष का आरोप है कि व्यापमं के आरोपियों को सरकार ने बचाने का खूब काम किया है, इसी वजह से असली भ्रष्टाचारी और घपलेबाज तो जांच की आड़ में खुद को बचाते चले गए और हद तब हो गई जबकि असली आरोपी सलाखों से साफ बाहर आ गए, जबकि विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को इसकी सजा भुगतनी पड़ रही है। इस मामले में होना यह था कि सबसे पहले व्यापमं के आरोपी अधिकारियों पर शिकंजा कसा जाता और उसके बाद उन्हें मोहरे की तरह इस्तेमाल करने वाले सफेदपोश नेता और मंत्रियों को निशाने में लिया जाता और जब घोटाले के सूत्र मिल जाते तो इसके लिए मैदान मुहैया कराने वाले निजी चिकित्सा महाविद्यालय और उनके संचालकों को शिकंजे में लिया जाता तो स्थिति स्पष्ट हो जाती कि सबसे ज्यादा दोषी कौन है। इसके विपरीत जो कार्रवाहियां हुई हैं उनमें प्रताड़ितों को और प्रताड़ित करने जैसा काम किया गया है। आखिर लालचवश जिन विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों ने मनमुताबिक राशि मुहैया कराकर सीटें खरीदने का असफल प्रयास किया उन्हें ही तो सबसे पहले शिकंजे में लिया गया, जिससे उनका पूरा करीयर ही चौपट हो गया। समाज में बदनामी हुई सो अलग। बहरहाल व्यापमं घोटाला एक ऐसा देशव्यापी मामला हो गया है जिसके तार अनेक प्रदेशों से जुड़ते हैं, इसलिए इसे इतनी आसानी से सुलझाया नहीं जा सकता था, अत: सीबीआई को भी समय लग रहा है। यहां सीबीआई सूत्रों की मानें तो जांच में यह बात भी उजागर हो चुकी है कि पीएमटी परीक्षा में सक्रिय गिरोह ने सॉल्वर की व्यवस्था कराई जिसका फायदा कुछ छात्रों ने उठाया। इसमें सॉल्वर और परीक्षार्थियों का भी गठजोड़ साबित होता है, लेकिन इस गठजोड़ में व्यापमं के अधिकारियों की भूमिका भी रही। इन अधिकारियों का काम सिर्फ इतना होता था कि वो सॉल्वर और परीक्षार्थियों की बैठक व्यवस्था आसपास ही करा देते थे, जिससे परीक्षार्थियों को सॉल्वर से नकल करने में आसानी हो जाती थी। अब सवाल यह उठता है कि साल्वर कोई अनजान या अयोग्य व्यक्ति तो हो नहीं सकता था, अत: इस काम में चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधिकारी और चिकित्सक भी शामिल रहे हैं, जिन्होंने इस घोटाले को आसान बनाने में अपनी भूमिका तय की। दस्तावेजों के आधार पर बताया गया है कि 10 जून 2012 को पीएमटी की जो परीक्षा संपन्न करवाई गई, उसमें काउंसलिंग के दौरान बिचौलियों ने सॉल्वर्स को चार निजी चिकित्सा महाविद्यालयों में ही प्रवेश लेने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके अलावा पूर्ण प्रवेश प्रक्रिया को अपनाए बिना ही सॉल्वर्स को एडमिशन दे दिया गया। ऐसी बहुत सी खामियां जांच के बाद सामने आईं हैं, जिससे आरोप सिद्ध हो सकेंगे। बहरहाल इसका दूसरा पक्ष जो बहुत मजबूती से विपक्ष उठा सकता है वो यही है कि इस घोटाले में शिवराज सरकार के तत्कालीन मंत्री और उनसे जुड़े अनेक लोगों के तार को काटा क्यों गया है, जबकि सर्वप्रथम उन्हीं पर शिकंजा कसा गया था? इस घोटाले के बाद व्यापमं द्वारा कराई गईं अन्य परीक्षाओं पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं और लगातार विवादों को जन्म दिया जा रहा है। इन विवादों से दागदार होते व्यापमं से खुद को बाहर निकालने के लिए ही सरकार को इसका नाम बदलने की सूझी थी, लेकिन अब जबकि सीबीआई ने चार अधिकारियों समेंत 592 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी है तो यही कहा जाएगा कि व्यापमं के जिन्न को पुन: चिराग से बाहर निकाल दिया गया है और इसका असर अब लगातार देखने को मिलता रहेगा। कुल मिलाकर सरकार बचाव की मुद्रा में और विपक्ष हमलावर नजर आए तो हैरानी नहीं होगी। बहरहाल कोशिश तो यही होनी चाहिए कि असली दोषियों को जेल के सीखचों के पीछे भिजवाया जाए ताकि प्रताड़ित पक्ष न्याय पा सके।

अब तीन तलाक़ को तलाक़
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
मुसलमानों में चली आ रही तीन तलाक की प्रथा को हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने तीन माह पहले अवैध घोषित कर दिया था। फिर भी सरकार इस प्रथा के विरुद्ध शीघ्र ही कानून बनाने जा रही है। कुछ लोगों का कहना है कि मुस्लिम महिलाओं के वोट खींचने और कट्टर हिंदूवादी तत्वों को खुश करने के लिए मोदी सरकार यह दांव चल रही है लेकिन यह तथ्य है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बावजूद तीन तलाक की कई घटनाएं सामने आई हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विवि के एक प्रोफेसर ने हाल ही में अपनी पत्नी को ई-मेल और व्हाट्साप पर तलाक दे दिया। गांवों और छोटे शहरों में होनेवाली ऐसी घटनाओंकी चर्चा तक नहीं होती। ऐसी स्थिति में सरकार ऐसा कानून बनाना चाहती है, जिससे तीन तलाक देनेवालों को सजा मिल सके। सजा के डर से वे तीन तलाक देने से बाज़ आएंगे। यहां हम कहेंगे कि सरकार की मंशा तो ठीक है लेकिन घरेलू वाद-विवाद को क्या फौजदारी कानून के तहत रखना ठीक है ? यदि तीन बार तलाक-तलाक बोलनेवाले शौहर को पांच या दस साल की सजा का प्रावधान कर दिया जाए तो उसका नतीजा क्या निकलेगा ? बीवी तो घर में रहेगी और मियां जेल में ! यह तो 5-10 साल का मियादी तलाक नहीं हो गया क्या ? और फिर बीवी घर में तो रहेगी लेकिन खाएगी क्या ? इसीलिए बेहतर होगा कि इस कानून को फौजदारी नहीं, दीवानी क्षेत्र में रखा जाए। आर्थिक जुर्माना कर देना काफी है। ऐसे मामलों को बातचीत और ठंडे दिमाग से हल करने पर भी जोर दिया जाना चाहिए। इससे भी ज्यादा जरुरी है कि सभी मुस्लिम संगठन इस कानून का जमकर प्रचार करें ताकि कोई भी शौहर अपनी बीवी को तीन तलाक देने की हिम्मत ही न करे। इसके अलावा भारतीय मुस्लिम समाज के नेताओ को आगे आकर अनेक अन्य मुस्लिम कानूनों में सुधार के आंदोलन चलाने चाहिए। उन्हें चाहिए कि दुनिया भर के मुसलमानों का वे नेतृत्व करें। भारतीय मुसलमानों की इसे मैं खास जिम्मेदारी समझता हूं, क्योंकि उन्हें भारत की उदार, लचीली और सदा आधुनिक रहनेवाली संस्कृति विरासत में मिली है। वे मुसलमान हैं तो वे इस्लाम में पूरी श्रद्धा रखें लेकिन अरबों के दकियानूसी रीति-रिवाजों को आंख मींचकर वे क्यों मानते रहें ?

आस्था के केंद्र पर पर्यावरण की सुध 

(प्रमोद भार्गव) 

प्रदूषण और पर्यावरण बदलाव की समस्या जैसे-जैसे धार्मिक आस्था के केंद्र एवं पयर्टन स्थलों पर गहरा रही है, वैसे-वैसे सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण के फैसले पर्यावरण सुधार और जन-सुरक्षा की दृष्टि से प्रासंगिक लग रहे हैं। कई निर्णयों की प्रशंसा हुई है, तो कई निंदा के दायरे में भी आए हैं। अधिकरण ने जम्मू स्थित वैष्णो देवी मंदिर में दर्शन के लिए प्रतिदिन 50000 श्रद्धालुओं की संख्या निर्धारित कर दी है। यदि इससे ज्यादा संख्या में दर्शार्थी आते है तो उन्हें कटरा और अर्द्धकुमारी में रोक दिया जाएगा। वैष्णो देवी मंदिर भवन की क्षमता वैसे भी 50000 से अधिक की नहीं है। मंदिर मार्ग में ठहरने के स्थलों पर कूड़े के निस्तारण और मल-विसर्जन की क्षमताएं भी इतने ही लोगों के लायक हैं। इस लिहाज से पर्यावरण को स्थिर बनाए रखने में यह निर्देश बेहद महत्वपूर्ण है। किंतु अधिकरण ने अमरनाथ मंदिर की गुफा पर ध्वनि प्रदूषण पर अंकुश लगाने की दृष्टि से नारियल फोड़ने और शंख बजाने पर जो अंकुश लगाया गया है, उसकी तीखी आलोचना हो रही है। बहरहाल दर्शनार्थियों की संख्या सीमित कर देने से भगदड़ के कारण जो हादसे होते हैं, वे भी नियंत्रित होंगे।   यह निर्देश उस याचिका पर सुनवाई के क्रम में आया है, जिसमें याचिकार्ता ने जम्मू स्थित वैष्णो देवी मंदिर परिसर में घोड़ों, गधों, टट्टुओं और खच्चरों के आवागमन पर रोक लगाने का निर्देश देने की मांग की थी। दरअसल इन पारंपरिक पशुओं पर लादकर रोजमर्रा के उपयोग वाला सामान तो जाता ही है, कई बुजुर्ग, दिव्यांग एवं बच्चे भी इन पर सवार होकर माता के दर्शन के लिए जाते हैं। इनके अंधाधुंध इस्तेमाल से मंदिर परिसर और मार्ग में प्रदूषण बढ़ रहा है। यह प्रदूषण जन-स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक बताया गया है। लेकिन इनकी आवाजाही से हजारों परिवारों की रोजी-रोटी चल रही है। इस नाते इनकी आवाजाही भी जरूरी है। बावजूद अधिकरण ने धीरे-धीरे इनको हटाने का निर्देश दिया है। वैष्णो देवी मंदिर त्रिकुट पहाड़ियों पर समुद्र तल से 5200 फुट की ऊंचाई पर एक गुफा में स्थित है। फिर भी तीर्थयात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। नवरात्रियों के समय यह संख्या औसत से ज्यादा बढ़ जाती है। दिसंबर में बड़े दिन की छुट्टियों के अवसर पर भी श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। ऐसे अवसरों पर मंदिर का प्रबंधन देख रहे श्राईन बोर्ड पर भी दबाब बढ़ जाता है। नतीजतन व्यवस्थाएं लड़खड़ाने का संकट गहरा जाता है। इसीलिए अधिकरण ने श्राईन बोर्ड के प्रबंधन द्वारा उपलब्ध कराए गए तीर्थयात्रियों के आंकड़े और बुनियादी सुविधाओं का आकलन करने के बाद ही यह फैसला लिया है।  किंतु अधिकरण ने पशुओं के उपयोग को धीरे-धीरे खत्म करने का श्राईन बोर्ड को जो निर्देश दिया है वह इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की आजीविका की दृष्टि से अप्रासंगिक लगता है। यह बात अपनी जगह सही है कि जिस स्थल पर भी मनुष्य और पशु होंगे वहां पर्यावरण दूषित होगा ही। लेकिन एक सीमा में इनकी उपस्थिति रहे तो इनके द्वारा उत्सर्जित होने वाला प्रदूषण प्राकृतिक रूप से जैविक क्रिया का हिस्सा बन पंच-तत्वों में विलय हो जाता है। हालांकि इसी साल 24 नबंवर से मंदिर जाने के लिए नया रास्ता खुल जाएगा। 13 किमी से ज्यादा लंबे इस रास्ते पर या तो बैटरी से चलने वाली टैक्सियां चलेंगी या लोगों को पैदल जाने की अनुमति होगी। इस रास्ते पर खच्चरों और गधों का इस्तेमाल प्रतिबंधित होगा।  एनजीटी ने जिन मानकों को आधार बनाकर यह फैसला दिया है, वह बेहद अहम्् है। यदि कचरे के निस्तारण और मल-मूत्र के विर्सजन को पैमाना मानकर चले तो देश के ज्यादातर महानगर और शहर इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते है। देश की राजधानी होते हुए भी दिल्ली इस समस्या से दो-चार हो रही है। आबादी और शहर के भूगोल के अनुपात में ज्यादातर शहरों में ये दोनों ही व्यवस्थाएं छोटी पड़ रही है। परेशानी यह भी है कि शहरों की ओर लोगों को आकर्षित करने के उपाय तो बहुत हो रहे है, लेकिन उस अनुपात में न तो शहरों का व्यवस्थित ढंग से विस्तार हुआ है और न ही सुविधाएं उपलब्ध हो पाई है। हमारे जितने भी प्राचीन धर्म-स्थल हैं, वहां के धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उपाय तो बहुत किए गए लेकिन जमीनी स्तर पर आने वाले श्रद्धालुओं को सुविधाएं नहीं जुटाई गईं। यहां तक कि न तो मार्गों का चौड़ीकरण हुआ और न ही ठहरने के प्रबंध के साथ बिजली-पानी की सुविधाएं समुचित हो पाईं। यही वजह है कि हर साल तीर्थ स्थलों पर जानलेवा दुर्घटनाएं हो रही हैं।             भारत में पिछले डेढ़ दशक के दौरान मंदिरों और अन्य धार्मिक आयोजनों में प्रचार-प्रसार के कारण उम्मीद से कई गुना ज्यादा भीड़ उमड़ रही है। जिसके चलते दर्शनलाभ की जल्दबाजी व कुप्रबंधन से उपजने वाले भगदड़ों का सिलसिला जारी है। धर्म स्थल हमें इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि हम कम से कम शालीनता और आत्मानुशासन का परिचय दें, किंतु इस बात की परवाह आयोजकों और प्रशासनिक अधिकारियों को नहीं होती। इसलिए उनकी जो सजगता घटना के पूर्व सामने आनी चाहिए, वह अकसर देखने में नहीं आती ? आजादी के बाद से ही राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र उस अनियंत्रित स्थिति को काबू करने की कोशिश में लगा रहता है, जिसे वह समय पर नियंत्रित करने की कोशिश करता तो हालात कमोबेश बेकाबू ही नहीं हुए होते ? इसलिए अब ऐसी जरूरत महसूस होने लगी है कि भीड़-भाड़ वाली जगहों पर व्यवस्था की जिम्मेदारी जिन आयोजकों, संबंधित विभागों और अधिकारियों पर होती है, उन्हें भी ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेबार ठहराया जाए।   हमारे धार्मिक-आध्यात्मिक आयोजन विराट रुप लेते जा रहे हैं।  कुंभ मेलों में तो विशेष पर्वों के अवसर पर एक साथ तीन-तीन करोड़ तक लोग एक निश्चित समय के बीच स्नान करते हैं। किंतु इस अनुपात में यातायात और सुरक्षा के इंतजाम देखने में नहीं आते। जबकि शासन-प्रशासन के पास पिछले पर्वों के आंकड़े हाते है। बावजूद लपरवाही बरतना हैरान करने वाली बात है। दरअसल, कुंभ या अन्य मेलों में जितनी भीड़ पहुंचती है और उसके प्रबंधन के लिए जिस प्रबंध कौशल की जरुरत होती है, उसकी दूसरे देशों के लोग कल्पना भी नहीं कर सकते ? इसलिए हमारे यहां लगने वाले मेलों के प्रबंधन की सीख हम विदेशी साहित्य और प्रशिक्षण से नहीं ले सकते ? क्योंकि दुनिया के किसी अन्य देश में किसी एक दिन और विषेश मुहूर्त के समय लाखों-करोड़ों की भीड़ जुटने की उम्मीद ही नहीं की जा सकती है ? यह भीड़ रेलों और बसों से ही यात्रा करती है। बावजूद हमारे नौकरशाह भीड़ प्रबंधन का प्रशिक्षण लेने खासतौर से योरुपीय देशों में जाते हैं। प्रबंधन के ऐसे प्रशिक्षण विदेशी सैर-सपाटे के बहाने हैं, इनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। ऐसे प्रबंधनों के पाठ हमें खुद अपने देशज ज्ञान और अनुभव से लिखने एवं सीखने होंगे।   इस दृष्टि से इस वैष्णो देवी मंदिर पर यात्रियों की संख्या की जो सीमा तय की गई है, वह एनजीटी की सजगता दर्शाती है। एनजीटी अब उन स्थलों पर पर्यावरण एवं जनसुरक्षा की सुध ले रही है, जिन्हें आस्था का केंद्र मानकर अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। हमारे ज्यादातर प्राचीन तीर्थ पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं। धार्मिक आस्था का सम्मान हर हाल में होना चाहिए, किंतु इन स्थलों पर पर्यावरण की जो महिमा है, उसका भी ख्याल रखने की जरूरत है ? आस्था और पर्यावरण के तालमेल से ही इन स्थलों की आध्यात्मिकता बनी हुई है। इन स्थलों पर अंधाधुंध निर्माण और लोगों की बढ़ती संख्या इनका आध्यात्मिक अनुभव को तो ठेस लगा ही रहे है, भगदड़ से अनायास उपजने वाली त्रासदियों का सबब भी बन रहे हैं। केदारनाथ त्रासदी इसी बेतरतीब निर्माण और तीर्थयात्रियों की बड़ी संख्या का परिणाम थी। इसलिए एनजीटी ने वैष्णो देवी मंदिर पर श्रद्धालुओं की संख्या तय करके उचित पहल की है।

गाँधी जी पद दलित और हत्यारा पूज्नीय
(डॉ. अरविन्द जैन)
ऐसा सुना और देखा जाता हैं की अधिकांश व्यक्ति जिनकी जिन्दा में इज़्ज़त नहीं होती पर मरने के बाद उसके गुणगान गाये जाते हैं और उसकी भूले भुला दी जाती हैं। और उसकी बुराइयां अच्छाइयों में तब्दील हो जाती हैं, भले उसने नर्क जैसी जिंदगी जी हो पर उसको स्वर्गीय कहते हैं। जिंदगी भर एक एक दाने को तरसता रहा पर उसके मृत्यु भोज में बहुत उत्तम
भोज कराया जाता हैं। और उसके नाम पर वर्तन, दान पुण्य किया जाता हैं। और उसकी स्मृति को अजर अमर बनाया जाता हैं। उसके मरने के बाद उसके वारिस उसके गुणगान की व्याख्या बड़ी चढ़ बढ़ करते हैं। वैसे मृत्यु यह बता देती हैं की उस व्यक्ति का जीवन कैसा रहा होगा, जैसे जन्म के समय हम कहते हैं होनहार विरवान के होत चीकने पात। कई लोग कपूर जैसे इस संसार से उड़ जाते हैं और अधिकांश म्रत्यु की याचना करते करते दारुण दुखों को सहते हुए मरते हैं ! जैसे एक्सीडेंट, हार्ट अटैक या हार्ट अरेस्ट आदि से होने वाली म्रत्यु अच्छी मानी जाती हैं कारण उसमे अधिक दुःख भोगना नहीं पड़ता। वैसे मृत्यु अत्यंत दुखदायी होती हैं पर ऐसी म्रत्यु सबको मिले।
क्षमा के एक गुण में यह बताया गया हैं की यदि किसी ने तुमको गाली दी हैं तो सिर्फ गाली दी हैं, किसी ने मारा हैं सिर्फ मारा हैं, किसी ने हाथ पाँव तोड़ दिए तो हाथ पाँव ही तोड़े और किसी ने मार डाला तो उसने मार डाला, कम से कम उसने जीवन के कष्टों से मुक्ति दिलाई। मरने वाला उस के प्रति कृतग्यता ज्ञापित करे की भाई तुमने मेरे ऊपर बहुत उपकार
किया कम से कम मुझे इस जीवन से छुटकारा दिला दिया। ये सब बातें सामान्य नागरिक या मनुष्य के लिए बहुत हद तक ठीक रहती हैं पर जो व्यक्ति असामाजिक या प्रतिष्ठित या गणमान्य हो जाता हैं या वह पुरुष न होकर महापुरुष हो जाता हैं उसका जीवन जिन्दा में कष्टकारी और मरने पर महा कष्टकारी हो जाता हैं।
गाँधी जी वर्ष 1915 -16 में भारत या इंडिया या हिंदुस्तान आये तो उन्होंने पूरे देश का भ्रमण किया और समस्यायें बहुत बारीकी से समझी और शुरुआत चम्पारण के आंदोलन से शुरू हुई और फिर उनका भृमण और आंदोलन एक दूसरे के पूरक हो गए। उनकी ख्याति बढ़ी और उनके दुश्मन भी बढे और समूह में होने लगे। वैसे जिस व्यक्ति की ख्याति बढ़ती हैं तो
उसके दुश्मन बढ़ने का कारण उसके गुणों में वृद्धि होने लगती हैं। हर व्यक्ति की अपनी अपनी सोच होती हैं और उसके विचार अन्य से मिले या न मिले कोई आवश्यक नहीं पर उसके नेतृत्व में जब देश चलने लगता हैं तो इसका मतलब उसके पास कोई आकर्षण होगा और उसके विरोधी छिद्रान्वेषण शुरू कर हर अच्छाई में बुराई देखने लगते हैं। वैसे भी जब प्रेम मोटा होता हैं तब गलती पतली लगती हैं और जब प्रेम पतला होता हैं तब गलती मोटी लगने लगती हैं।
जब किसी देश के प्रधान मंत्री को चुन लिया जाता हैं तब हमें उसके ऊपर भरोसा /विश्वास करना होता हैं। चुने हुए नेता को बारबार रायशुमारी नहीं लेना होती हैं। उसी प्रकार तत्समय जो पार्टी के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा था उस नेता ने उस परिस्थिति के अनुरूप निरयण लिया वह किसी के लिए प्रिय और किसी के लिए अप्रिय होगा। उसका काम वैश्या जैसा नहीं होता की वह सबको खुश करे। उससे भी सबकी संतुष्टि नहीं होती। आज सत्तर वर्ष बाद इस बात पर चर्चा करना की उन्होंने या कांग्रेस पार्टी ने देश का बटवारा क्यों किया ?इसका पोस्टमार्टम वर्ष 2017 में करना कितना उपयुक्त या उपादेय होगा ?जैसे कल्पना करे वर्ष 2025 में हम सोचेंगे की वर्ष 2016 में नोट बंदी क्यों की गयी या जी एस टी क्यों लगाया गया पर विचार करेंगे। अरे भाई आज जैसी स्थिति हुई उस हिसाब से तत्कालीन प्रधान मंत्री ने निर्णय लिया। और आज भी विरोध हो रहा पर निरयण लिया। वैसे ही तत्समय के प्रधान मंत्री और उनके मंत्री मंडल ने निरयण लिया की राज्यों का विलीनीकरण करना हैं और तत्समय जो भी गृह मंत्री होता वह कार्यवाही करता तो उसने किया। गृह मंत्री का कार्य या उपलब्धि तत्समय के प्रधान मंत्री की होती हैं। उसका फल या निष्फल का परिणाम प्रधान मंत्री का होता हैं। जैसे नोट बंदी, जी एस टी की कार्यवाही वित्त मंत्री के द्वारा की गई और उसका श्रेय या अपयश प्रधानमंत्री का होगा। अच्छा हुआ तो प्रधान मंत्री और गलत हुआ तो वित्त मंत्री।
सत्तर साल पहले जिस परिस्थिति में बटवारा का निरयण या मतभेद होने के कारण हिन्दू महासभा के नाथूराम गोडसे ने गाँधी की हत्या की, यह सिद्ध हैं। हत्या हत्या होती हैं चाहे सद्भावना या दुर्भावना से की हो हत्या कहलाएंगी। अब इसको आप कोई भी नाम दो, जैसे कृष्ण के साथ कंस, राम के साथ रावण का नाम लिया जाता हैं वैसे ही गाँधी के साथ गोडसे का नामलिया जाता हैं। ठीक है तत्समय गाँधी जी को राष्ट्रपिता का दर्ज़ा दिया गया और उनके नाम से नोट चले पर उनका अर्थ व्यर्थ होता हैं जब तक की उसमे रिज़र्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर न हो, बिना हस्ताक्षर के मुद्रा का कोई अर्थ नहीं वैसे ही गोडसे के बिना गाँधी का कोई अस्तित्व नहीं।
वर्तमान में गाँधी जी पददलित हो रहे हैं ! जी हाँ उनके नाम और उनके कथन को सीढ़ियों में लिखकर रोज हज़ारों लोग रौंद रहे हैं, यह हाल एक देश के सम्मानीय /गणमान्य /प्रतिष्ठित /महापुरुष के हैं जी हाँ इसका प्रमाण भोपाल रेलवे स्टेशन के पुल की सीढ़ियों का हैं और उनके हत्यारे की मूर्ति बनाकर उसे पूज्यनीय बना रहे हैं ! वैसे जो महापुरुष होते हैं उनको जीवित में कोई भी प्रशंसा करे या नफरत उनको कोई फर्क नहीं पड़ता क्योकि वे इस स्तर से उच्च हो जाते हैं पर जो निंदनीय कार्य करता हैं या किया वह कभी भी पूज्यनीय नहीं हो सकता। चाहे मूर्ति बनालो स्मारक बना लो या राष्ट्रपुरुष घोषित कर दो। जो छाप लगी हैं /दाग लगे हैं उनसे कोई बच नहीं सकता।
अरि,मित्र महल मशान कंचन कांच थुति निंदाकरण,
असि प्रहारण अर्घावतारन में सदा समता धरण।
गाली सुन मन खेद न आनो,गन को अवगुण कहे अयानों
गोडसे को कोई कितना बनाये भगवान कुछ नहीं होगा
गाँधी को कोई कितना कितनी भी बार मारे रहेगा जिन्दा
धीमानों आज उसका पोस्ट मार्टम करो की क्यों किया बंटवारा
कल क्या तुम्हरी भी बारी नहीं आएँगी की तुमने क्यों किया नोट बंदी
हर पल की घटना का निरयण लेना नेता का काम हैं
यह सब करना छुद्र वृत्ति का परिचायक हैं
गाँधी की शानी गोडसे क्या पाएगा,वह तो धूल नहीं हैं उनके चरणों की
उनका सामना कौन कर पाएगा ?!!

पहले पद्मावती को देखें, फिर बोलें
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
फिल्म पद्मावती का प्रदर्शन अब एक दिसंबर से शुरु नहीं होगा, यह अच्छी खबर है। अब फिल्म-निर्माता और फिल्म-विरोधियों को इस फिल्म पर ठंडे दिमाग से सोचने का समय मिल जाएगा। मुझे पूरा विश्वास है कि फिल्म को देखकर उन्हें काफी संतोष होगा। यदि उसमें सुधार के कुछ सुझाव वे देंगे तो फिल्म प्रमाणीकरण पर्षद (सेंसर बोर्ड) उन पर विचार करेगा और वे सुझाव उसे ठीक लगेंगे तो वह फिल्म-निर्माता को वैसे निर्देश देगा, जिसे यदि वह नहीं मानेगा तो फिल्म सार्वजनिक तौर पर दिखाई नहीं जा सकेगी। इसी आशय की बात राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कही है। यदि सेंसर बोर्ड की सहमति के बावजूद कुछ लोगों को फिल्म आपत्तिजनक लगे तो उन्हें अधिकार है कि वे उसका विरोध करें लेकिन वह विरोध अमर्यादित न हो और हिंसक न हो। वह राजपूत समाज की अप्रतिष्ठा और मजाक का कारण न बने, यह जरुरी है। मैंने यह फिल्म काफी गौर से देखी है। मुझे इसमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं लगा। हां, एकाध जगह उसे बेहतर बनाने का सुझाव मैंने दिया है। इसमें अलाउद्दीन खिलजी का खलनायकत्व जमकर उभरा है और महाराजा रतनसिंह की सज्जनता और वीरता भी काफी प्रभावशाली ढंग से चित्रित हुई है। और पद्मावती के क्या कहने ? उसे अप्रतिम सौंदर्य की प्रतिमूर्ति तो बनाया ही गया है, साथ-साथ उसके शौर्य और रणनीति-कौशल को इतना तेजस्वी और अनुकरणीय रुप दिया गया है कि देश की प्रत्येक महिला उस पर गर्व कर सकती है। झूठी अफवाहों के आधार पर जो आरोप लगाए जा रहे हैं, जैसे अलाउद्दीन और पद्मावती के प्रेम-प्रसंग, दोनों का एक-दूसरे के सपनों में आना, घूमर नृत्य की अश्लीलता आदि का लेश-मात्र संकेत भी इस फिल्म में नहीं है। सेंसर बोर्ड और नेताओं को भी घबराने की जरुरत नहीं है। उन्हें बहानेबाजी और चुप्पी का सहारा लेने की बजाय अपनी राय इस फिल्म पर खुलकर दे देनी चाहिए। जब मेरे-जैसा मामूली हैसियत का आदमी इस फिल्म के बारे में खुलकर बोल रहा है तो वे खुद इस फिल्म को देखने का आग्रह क्यों नहीं करते ? मैंने जैसे यह फिल्म देखी, वैसे ही कुछ चुने हुए लोग इस फिल्म को देखें, तो वह न तो किसी कानून का उल्लंघन है और न ही किसी मर्यादा का। इस तरह फिल्म दिखाने और सिनेमा घरों में उसे दिखाने में बहुत फर्क है। यह दिखाना पैसा कमाने के लिए नहीं, सत्य और शुभ की स्थापना के लिए है।

जागरुकता में चम्बल के सांसद आगे हैं आज…!
(नईम कुरेशी)
मध्य प्रदेश में साफ सफाई की तारीफ यहां के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह खूब कर रहे हैं। अमेरिका से फौरन लौटने पर उन्होंने इन्दौर की व भोपाल की साफ सफाई को अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन से भी बेहतर बता डाला है जो शायद ठीक भी हो पर प्रदेश सरकार प्रदेश भर में साफ सफाई पर नगर निगमों व नगर पालिकाओं के साथ मिलकर अच्छा अभियान चला रही हैं जिसमें महापौर, क्षेत्रीय सांसद व विधायकगण बढ़ चढ़कर इस अभियान से जुड़े हैं पर ये साफ देखा जा रहा है कि अभी भी ये सब लोग दिखावा ज्यादा कर रहे हैं, फोटो खिंचवाने में आगे रहते हैं।
नगर निगम साफ सफाई के बाद पेयजल का भी इंतजाम के लिये जिम्मेवार होती हैं। प्रदेश भर के बड़े महानगरों में 20 फीसद से भी ज्यादा पानी बर्बाद होता देखा जाता है, जो नलों में टोंटियों का न होना है। भैंसों को व कारों को धोने में बर्बाद होता देखा जाता है पर नगर निगमें इस कोई पर कोई भी जागरुकता अभियान नहीं चलातीं। नुक्कड़ नाटकों, प्रचार-प्रसार के अन्य साधनों, वृत्तचित्रों से उन्हें दिखाकर भी जनता को जागरुक बनाया जाना जरूरी है। इस तरफ गौर किया जाना जरूरी है। 5-6 करोड़ का पानी बड़े शहरों ग्वालियर, इन्दौर, भोपाल, जबलपुर आदि में हर माह बर्बाद हो जाता है, जो इसके 10 फीसद खर्चे से ही रोका जा सकता है।
साफ सफाई का अभियान आम घरों से व स्कूली बच्चों के माध्यम से शुरू किया जाना चाहिये जिसका अच्छा असर देखा जा सकता है। नैतिक शिक्षा, व्यायाम के साथ हर रोज साफ-सफाई पर हते में दो बार 5-10 मिनट का संक्षिप्त ज्ञान परक भाषण दिया जाना बच्चों को समाज में इस विषय पर बेहतर परिणाम हो सकता है। पर हमारे यहां खासतौर से बीमारू राज्यों बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश व राजस्थान आदि में भाषण ज्यादा दिये जाते हैं। ये भाषण चाहे मुख्यमंत्री अमेरिका के मुकाबले में दें या कोई सूबे के मंत्री, सांसद या फिर विधायकगण या कलेक्टर निगम आयुक्त।
चम्बल के सांसद
ग्वालियर चम्बल इलाका एक दौर में 20-30 साल पहले तक डकैतों से प्रभावित इलाके के तौर पर चर्चित था जो आज नहीं है। चम्बल के भिण्ड-दतिया क्षेत्र से लोकसभा के सांसद डॉ. भागीरथ प्रसाद इस मामले में सबसे आगे हैं। उन्होंने चम्बल विकास यात्रा 100 किलोमीटर निकाल कर रानी लक्ष्मीबाई के आजादी के आंदोलन के शहीदों की खोज में अभियान चलाकर चम्बल-भिण्ड के लहार, रौन, गोहद आदि के अन्दरूनी इलाकों के ऐसे वीरों को खोजा जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया था। जो लोग छोटे-छोटे किसान व पिछड़े तथा दलित वर्ग़ों के रहे थे। चम्बल शौर्य यात्रा के दौरान सांसद डॉ. प्रसाद का कहना है कि ये इलाका ऐसा है जहां के लोगों ने जहांगीर बादशाह तक को टैक्स देने से मना कर दिया था। यहां के लोग निडर व बहादुर हैं। फौज में एक लाख लोग हैं भिण्ड अकेले के। डॉ. प्रसाद ने भिण्ड को न सिर्फ रेल्वे का उपहार दिया बल्कि भिण्ड, दतिया को पर्यटन मैप पर भी भारत सरकार के पर्यटन व सांस्कृति मंत्रालय के माध्यम से जोड़ने का काम करा दिया। बड़ी-बड़ी सिंचाई योजनायें भी उन्होंने यहां शुरू कराई हैं। गुना, शिवपुरी, मुरैना आदि के सांसदों की सक्रियता काफी कम इस अंचल में देखी जा रही है। दतिया में अशोक के शिलालेख की जानकारी खुद डॉ. प्रसाद देते हैं।
पर्यटन पुरातत्व इतिहास इस इलाके में खूब हैं ग्वालियर का फोर्ट जहां 8वीं सदी के गुर्जर प्रतिहार मंदिर में गणित के शून्य का अभिलेख है। ग्वालियर फोर्ट जैसा महान किला है, अमर गायक तानसेन का मकबरा है। 200 से भी ज्यादा सुन्दर स्मारक हैं इस अंचल में पर उनका प्रचार-प्रसार कुछ कम है। पर्यटन मंत्रालय सैलफोन पर संदेश भर देता है। 5-25 अक्टूबर तक पर्यटन पर्व मनाइये पर कैसे, जानकारियों का अभाव रहता है। नौकरशाह लोग पर्यटन कमेटियों के सदर बने बैठे हैं जो फोन पर किसी पर्यटन प्रेमी से बात करने में परहेज करते हैं व खुद पर्यटन या पुरातत्व पर ए.बी.सी.डी. भी नहीं जानते हैं। कैसे बढ़े पर्यटन कैसे हो स्मारकों की संरक्षण नीति? कैसे वो अतिक्रमणों से बचें?

खतरनाक है संवाद के बजाए हिंसा की बढ़ती प्रवृति

(निर्मल रानी) 

हमारे देश की राजनीति में गत् कुछ वर्षों से ऐसा देखा जा रहा है कि दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं के मध्य संवाद के रास्ते तो धीरे-धीरे बंद होते जा रहे हैं और संवाद व तर्क-वितर्क की जगह हिंसा, झूठ तथा साज़िश का सहारा लिया जाने लगा है। ज़ाहिर है किसी स्वस्थ व ईमानदार लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहचान ही स्वस्थ तर्क-वितर्क तथा संवाद से ही होती है और जब इस स्वस्थ परंपरा से मुंह मोड़कर या इसके दरवाज़े बंद कर केवल साज़िश, झूठ-फरेब, सत्ता शक्ति का दुरुपयोग, धन-बल का खुला इस्तेमाल व हिंसा को ही अपनी जीत या अपनी बात को ऊपर रखने का माध्यम बनाया जाने लगे तो निश्चित रूप से यह रास्ता लोकतंत्र के मार्ग से भटक कर तानाशाही, तबाही व कट्टरवाद की ओर ही जाता है। और कम से कम भारत जैसे विभिन्नता में एकता रखने के लिए विश्व विख्यात देश के भविष्य के लिए यह स्थिति कतई अच्छी नहीं।
पिछले कुछ दिनों से लगातार प्राप्त हो रहे समाचारों के अनुसार पंजाब तथा केरल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कई कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई। केरल में तो आरएसएस व वामपंथी संगठनों के मध्य घटित होने वाली हिंसक व जानलेवा वारदातों का सिलसिला काफी लंबा खिंचता जा रहा है। इन हत्याओं में अब तक दोनों ही विचारधाराओं व संगठनों से संबंध रखने वाले सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। देश में दर्जनों ऐसी घटनाएं भी हो चुकी हैं जिसमें विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े कार्यकर्ता अपने ही द्वारा तैयार किए जा रहे बमों व बारूदों में हुए ब्लास्ट के परिणामस्वस्प या तो स्वयं ही मारे गए या बुरी तरह घायल हुए। अब तो यह स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि कार्यकर्ताओं या स्वयं सेवकों से आगे बढ़ते हुए सीधे तौर पर नेताओं को ही निशाना बनाया जाने लगा है। कहीं किसी नेता पर स्याही फेंकी जा रही है तो किसी के मुंह में कालिख पोती जा रही है किसी पर जूता फेंका जा रहा है तो किसी के गाल पर थप्पड़ मारा जा रहा है या लात-घूंसों से उसकी पिटाई की जा रही है। हालांकि इस प्रकार की घटनाएं चुनिंदा लोगों द्वारा बाकायदा पूर्व नियोजित साज़िश के तहत अंजाम दी जाती हैं। परंतु यदि इस सिलसिले को सभी राजनैतिक दलों के नेताओं द्वारा बड़ी गंभीरता के साथ नियंत्रित नहीं किया गया तो भविष्य में इस प्रकार का नेता विरोधी उबाल जनता में भी देखा जा सकता है। और यदि भविष्य में ऐसी स्थिति पैदा होती है तो इसके लिए जनता तो कम वे साज़िश कर्ता नेतागण या उस विचारधारा के लोग ज़्यादा ज़िम्मेदार होंगे जो संवाद की जगह लेती जा रही हिंसा की प्रवृति को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार को ही यदि अकेले देखा जाए तो उस पर कथित देशद्रोह का मामला चलने के बाद अब तक दर्जनों हमले किए जा चुके हैं। भारत की धरती पर एक गरीब किसान परिवार में जन्मे इस युवा नेता को कुछ विशेष विचारधारा से जुड़े लाग राष्ट्रद्रोही, देशविरोधी और पाकिस्तान व आतंकवाद का समर्थक साबित करने में अपनी पूरी ताकत झोंके हुए हैं। कभी उससे हवाई जहाज़ में यात्रा करने के दौरान हाथापाई की जाती है तो कभी अदालत में वकील का वेश धारण किए असमाजिक तत्व उसे बुरी तरह मारने-पीटने लगते हैं। कभी उसकी कार पर पत्थर फेंके जाते हैं तो कभी उसकी सभाओं में व्यवधान डालने की कोशिश की जाती है। पिछले दिनों हद तो उस समय हो गई जबकि लखनऊ में एक आयोजन के दौरान कन्हैया कुमार पर दक्षिणपंथी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् तथा संघ से संबद्ध युवाओं ने मिलकर हमला बोल दिया। जबकि कन्हैया कुमार की सुरक्षा एसिड सर्वाईवर्स महिलाओं द्वारा बनाई गई मानव श्रंखला ने की। हालांकि इस घटना के बाद कन्हैया कुमार ने अपने भाषण को और भी तेज़ धार दे डाली। सवाल यह है कि जब अदालत ने कन्हैया कुमार के विरुद्ध राष्ट्रद्रोह जैसा कोई मामला न पाते हुए उसे क्लीन चिट दे दी है फिर आ‎खिर किसी संघ या विद्यार्थी परिषद् के लोगों को उसे देश का ग़द्दार या देशद्रोही ठहराने का क्या अधिकार है?
दरअसल संवाद व तर्क-विर्तक में कमी और उसकी जगह हिंसा व साज़िश रचने या झूठ, मक्कारी व फरेब की बढ़ती प्रवृति का कारण केवल यही है कि हिंसा का सहारा लेने वाली किसी भी प्रकार की विचारधारा के पास तर्क-विर्तक व संवाद के लिए जब कुछ शेष नहीं रह जाता तो ऐसे ही लोग इस प्रकार का नकारात्मक रास्ता अ‎ख्तियार करते हैं। और ऐसी हिंसा के बाद घटना की निंदा व भर्त्सना का भी जो दौर शुरु होता है उसमें भी पक्षपात के निशान साफतौर पर नज़र आते हैं। अर्थात् यदि किसी संघ कार्यकर्ता की हत्या पंजाब, केरल अथवा बंगाल में होती है तो भाजपा अध्यक्ष अमितशाह से लेकर संघ कार्यालय तक से ऐसी घटना की निंदा संबंधी टव्टी या बयान जारी किए जाने लगते हैं और अपने उन विरोधियों पर निशाना साधा जाने लगता है जो उनके निकटतम राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी हैं। यही स्थिति दूसरी विचारधारा के लोगों के साथ भी है। सवाल यह है क्या राजनीति में बढ़ती जा रही इस प्रकार की हिंसापूर्ण प्रवृति को रोके जाने का प्रयास समस्त विचारधारा व राजनैतिक लोगों को मिल कर नहीं करना चाहिए? क्या किसी की जान ले लेने या उसे घूंसा, मुक्का तथा जूता आदि मार कर उसका अपमान करने से किसी विचारधारा का गला दबाया जा सकता है? कन्हैया कुमार को ही यदि ले लीजिए तो यही देखा जा रहा है कि कन्हैया पर जितने अधिक हमले होते जा रहे हैं उसके भाषण की धार और भी तेज़ होती जा रही है। यही नहीं बल्कि समय के साथ-साथ तथा इन बढ़ते हुए हमलों के साथ कन्हैया कुमार को सुनने व देखने वाले लोगों की भीड़ में भी तेज़ी से इज़ाफा होता जा रहा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक युवा वर्ग कन्हैया कुमार के प्रति आकर्षित होता जा रहा है।
परंतु दक्षिणपंथी विचारधारा रखने वाली केंद्र सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमितशाह जैसे संगठन प्रमुख जब स्वयं प्रेस वार्ता करने से गुरेज़ करते हों फिर आ‎खिर इनके संगठन के कार्यकर्ताओं के पास इतना साहस, ज्ञान व क्षमता कहां कि वे कन्हैया कुमार द्वारा सरकार को याद दिलाए जा रहे उनके वादों का सामना कर सकें? टीवी पर प्रसारित होने वाली अनेक डिबेट में भी यह देखा जा चुका है कि कन्हैया कुमार ने अपनी वाकपटुता तथा हाज़िरजवाबी की बदौलत सरकार को आईना दिखाते हुए सत्ताधारी दल के प्रवक्ताओं की ज़ुबानें बंद कर दीं। यही वजह है कि छात्रों व युवाओं में लोकप्रिय होता जा रहा कन्हैया कुमार अपने विरोधियों की आंखों की किरकिरी बना हुआ है। राजनीति, देश और समाज की सेवा तथा विकास का एक पवित्र माध्यम है। इसे स्वार्थ, सत्ता मोह, सत्ता का दुरुपयोग, सांप्रदायिकता तथा धनार्जन का माध्यम बनाने का जो खतरनाक प्रयास हो रहा है वह देश की एकता और अखंडता के लिए बेहद खतरनाक है।अपनी विचारधारा से मेल न खाने वाले लोगों को बदनाम करने के लिए उनपर देशद्रोही होने या पाकिस्तानी अथवा आतंकी समर्थक होने का लेबल चिपका देने के कोशिश करना और खुद राष्ट्रभक्ति व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रमाण पत्र बांटने की दुकान खोलकर बैठ जाना स्वस्थ लोकतंत्र की परंपरा न कभी रही है न रह सकती है। ऐसी प्रवृति से उबरने का सामूहिक प्रयास सभी राजनैतिक विचारधाराओं द्वारा किया जाना चाहिए?

एक और मंदिर विवाद ..और अब नाथूराम गोड़से का मंदिर……।

ओमप्रकाश मेहता 

अभी अयोध्या में भगवान राम के भव्य मंदिर का विवाद जारी ही है, इसी बीच हिन्दू महासभा ने महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोड़से की भगवान राम से तुलना करते हुए ग्वालियर में न सिफ गोड़से की प्रतिमा स्थापित कर दी बल्कि हर मंगलवार को उक्त प्रतिमा की विशेष आरती व पूजा की भी घोषणा की है। बापू की हत्या के दोषी नाथूराम गोड़से की भगवान राम से तुलना करते हुए दलील दी गई कि जिस तरह भगवान राम ने अन्याय व अत्याचार को खत्म करने के लिए मानव रूप में अवतार लिया था, उसी तरह गोड़से ने भी मुस्लिम परस्त महात्मा गांधी से देश को मुक्त कराया, इसलिए हिन्दू महासभा की नजरों में गोड़से भी भगवान स्वरूपप ही है और भगवान राम के अयोध्या में निर्माणधीन मंदिर से पहले अगले छ: माह में गोड़से मंदिर बनकर तैयार हो जाएगा। यद्यपि पिछले दिनों जब महात्मागांधी की हत्या का मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने पुन: सुनवाई हेतु लाने की कौशिश की गई थी तक सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि- ”हम किसी संगठन को गांधी जी की हत्या का दोषी नहीं ठहरा सकते“ इस पर भारतीय जनता पार्टी और संघ पर भड़की हिन्दू महासभा ने ऊंचे स्वरों में कहा था कि- ”हमसे न छीनों गांधी की हत्या का श्रेय“। हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अशोक शर्मा ने कहा था कि देश को गुमराह करने के लिए गांधी जी को लगी चौथी गोली का जिक्र किया जा रहा है, जब कि महासभा के सदस्य नाथूराम गोड़से ने ही तीन गोली मारकर बापू का काम तमाम किया था, गांधी की हत्या का श्रेय हमसे छीनने के लिए भाजपा-संघ ने यह चौथी गोली का विवाद पैदा किया है। उल्लेखनीय है कि अभिनव भारत के संस्थापक पंकज फणनीस ने दावा किया कि राष्ट्रपिता की हत्या एक संदिग्ध व्यक्ति ने की थी, जिसने उन पर चौथी गोली दागी थी। अभी इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में मामला चल ही रहा है, इसी बीच हिन्दू महासभा ने अपने ग्वालियर स्थित कार्यालय के परिसर में ढ़ाई फीट ऊँची नाथूराम गोड़से की मूर्ति स्थापित कर दी और अगले छ: माह में भव्य मंदिर बनाकर उसमें बाकायदा यह मूर्ति स्थापित करने की घोषणा भी कर दी। जबकि जिला प्रशासन ने उक्त मंदिर हेतु जमीन आवंटित करने से स्पष्ट इंकार कर दिया है।  अब इसमें कोई आशंका नहीं रह गई कि यह गोड़से मंदिर का मामला सियासी विवाद बनकर रहेगा, कांग्रेस ने जहां अभी से मूर्ति स्थापकों को देशद्रोही करार कर उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने की मांग कर डाली है, वहीं देश-प्रदेश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने फिलहाल इस मामले में मौन साध लिया है, ग्वालियर के मंत्रियों वे प्रदेश के गृहमंत्री ने भी इस मामले में कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया है।  यद्यपि आज हर सियासी गलियारे से यह आवाज उठाइz जा रही है कि धर्म और राजनीति को पृथक रखा जाना चाहिये, किंतु ठीक इसके विपपरीत जहां आज उत्तरप्रदेश को हिन्दूत्व की पहचान का सबसे बड़ा केन्द्र बनाए जाने का सरकारी प्रयास जारी है, वहीं केन्द्र सरकार ने भी धर्म-कर्म की आग पर सियासी रोटी सेंकने के प्रयास शुरू कर दिए है, जिसका ताजा उदाहरण भाजपाशासित राज्यों के लिए विभिन्न धार्मिक परियोजनाऐं तैयार करवाना है, वहीं महाराष्ट्र सरकार द्वारा बाब रामदेव के पतंजली संस्थान को गाय प्रोजेक्ट के लिए आठ सौ एकड़ जमीन देने की अनुशंसा है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तरप्रदेश सरकार की अयोध्या में दीपावली मनाने के बाद मथुरा में होली का भव्य आयोजन की तैयारी है। यही नहीं केन्द्रीय मंत्री नितिन गड़करी ने तो पूरे देश में तहसील स्तर पर यूरिन बैंक बनाने का भी सुझाव दे डाला है, जिससे कि यूरिन से यूरिया तैयार कर किसानों को उर्वरक के रूप में उसे उपलब्ध कराया जा सके।  अब यहां सबसे अहम् सवाल यह है कि ”अपनों“ द्वारा पैदा किए जा रहे ये साम्प्रदायिक विवाद मोदी सरकार के लिए कितने कारगर या दु:खदायी सिद्ध होंगे? क्योंकि मोदी जी ने देश से प्रतिपक्ष का नाम-ओ-  निशान मिटाने का प्रयास अवश्य किया, उसमें कुछ सीमा तक वे सफल भी सिद्ध हुए किंतु जब ”घर का भेदी ही लंका (अपनी सरकार) को ढहाने“ का प्रयास करे तो आखिर किसे दोष दिया जाए? प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी को ऐसी परिस्थितियों में देश व राष्ट्र के लिए हितकारी योजनाओं के बारे में सोचने-समझने का समय ही कहां देती? और अब तो जबसे गुजरात चुनाव की पूरी जिम्मेदारी भाजपा ने विनीत भाव से मोदी जी के कंधे पर डाली है, तब से तो मोदी जी और अधिक व्यस्त हो गए है। गुजरात चुनाव के खत्म होने के पहले ही संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो जाएगा और उसके बाद बजट सत्र की तैयारी। अब ऐसे में अकेले बैचारे मोदी जी क्या-क्या करेंगे? क्या उनके अपनों ने भी कभी यह सोचा है?

गोरक्षकों और गोभक्षकों में अंतर ?
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
पहलू खान की तरह अब उम्मर खान की हत्या हो गई। हत्यारों और कुछ पुलिसवालों का भी कहना है कि मेवात का उम्मर खान और उसके साथी एक ट्रक में गायों की तस्करी कर रहे थे। उन्हें अलवर के एक गांव में 7-8 लोगों ने पकड़ा, मारा पीटा और उनमें से एक, उम्मर के शव को रेल की पटरी पर डाल दिया गया ताकि किसी को शक न हो कि उसे मारा गया है। लेकिन पुलिस जांच कर रही है। उसने रपट लिख ली है। हत्यारे कब पकड़े जाएंगे या पकड़े भी जाएंगे या नहीं, कुछ पता नहीं। हम मान लें कि तीन गायें और तीन बछड़ों को उम्मर खान और उसके दो साथी कत्ल करने के लिए ले जा रहे थे या ले जाकर बूचड़खानों को बेचनेवाले थे, जो कि एक गैर-कानूनी काम है और बहुत ही लोक-विरोधी काम है तो भी मैं पूछना चाहता हूं कि इसके बदले उन आदमियों की हत्या का अधिकार किसी को कैसे मिल जाता है ? इस तरह का दुस्साहस अपराध तो है ही मूर्खतापूर्ण भी है। ऐसा करने से क्या गोवध रुकेगा ? ऐसा करके यदि आप कुछ प्रांतों में गोमांस-भक्षकों को डरा भी लेंगे तो भी क्या होगा ? नागालैंड, अरुणाचल, सिक्किम, कश्मीर जैसे सीमांत प्रदेशों में तो गोवध चलता रहेगा। वहां कानून का कोई बंधन नहीं है। जो मनुष्य को मारकर गोरक्षा करने का दम भरते हैं, उनमें याने गोरक्षकों और गोभक्षकों में अंतर क्या है ? सच्चे गोरक्षक तो वे हैं, जो वास्तव में गोसेवा करते हैं और लोगों को अपने प्रेम और तर्क से गोमांस-भक्षण छुड़वाते हैं। यदि सारे देश में मांसाहार-परित्याग का अहिंसक प्रेमागृह हो तो गोमांस-भक्षण तो अपने आप बंद हो जाएगा, पशु-हिंसा भी बंद हो जाएगी। किसी मज़हब में मांसाहार अनिवार्य नहीं है। भारत अकेला देश है, जहां संसार के सबसे अधिक शाकाहारी लोग रहते हैं। ये लोग मांसाहारियों को मारकर क्या अपने आप को उनसे भी नीचे नहीं गिरा रहे हैं ? वे पशुओं के हत्यारे हैं और ये मनुष्यों के हत्यारे हैं। दोनों हत्याएं ही अनुचित हैं, अनैतिक हैं लेकिन मानव-हत्या से बढ़कर कौनसा अपराध है ?

पेस के पक्षधर थे नेहरू
(14 नवम्बर : जन्म दिवस पर विशेष)
– डॉ0 बलदेवराज गुप्त
जहां तक भारतीय दृष्टि से जवाहर लाल नेहरू के छात्र जीवन के आंकलन का प्रश्न हैं वहां उन पर तिलक (लोकमान्य) के राष्ट्रवाद का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। परन्तु उनकी समाजवादी विचार – धारा ने उनमें देखने की दृष्टि को बदला। वह अब तर्क और बौद्धिक विवेचन से ‘स्वराज’ को समझने की कोशिश करने लगे थे। वह ‘स्वराज’ की प्राप्ति हेतु उन तरीफों पर गम्भीरता से सोचना चाहते थे जिसके जरिए मुल्क को उस ‘हक’ प्राप्ति के लिए तैयार किया जा सके, लड़ाया जा सके। मार्क्सवाद से भी यह प्रभावित हुए थे। 1927 में जवाहर लाल जी यूरोप से लौटने के बाद, कांग्रेस को नये सोच में ढालने के प्रयत्न करने लगे। यही वजह है कि 1927 के मद्रास कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने ‘पूर्ण स्वराज’ (कम्पलीट इन्डीपेन्डेंस) का प्रस्ताव रखा और बिना विरोध के पास करवा लिया।
स्मरण रहे कि मद्रास कांग्रेस अधिवेशन (1927) में गांधी जी उपस्थित नही थे। जब उन्हें जवाहर लाल नेहरू के पूर्ण स्वतंत्रता प्रस्ताव के पारित हो जाने का पता चला तो उन्होंने इसे पसंद नहीं किया। गांधी जी मानते थे कि देश अभी इसके लिए तैयार नहीं है। श्री मनजीत (स्कूल अध्यापक) की सलाह पर गांधी जी ने छापाखाना बैठाया। इण्डियन ओपिनियन अखबार निकला – ‘हिन्द स्वराज’ का विचार बीज बोया। 1919 में ‘नवजीवन’ ‘यंग इण्डिया’ शुरू किए। दो पद गांधी के सम्पादन में भारत में शुरू हुए। बिना पंजीकृत कराये गांधी जी ने सत्याग्रह पत्र भी निकाला। 11 फरवरी 1933 को ‘हरिजन’ साप्ताहिक शुरू किया। जवाहर लाल के मस्तिष्क मे पश्चिम का प्रेस था। नेहरू प्रेस की आलोचना का सदा स्वागत करते थे। उन्होंने जितनी प्रेस की छूट दी और आलोचना सही, आजकल के राजनीतिज्ञ उसका कुछ भी नहीं है। जवाहरलाल जी पत्रकारिता को जल्दबाजी में तैयार किया गया इतिहास और साहित्य मात्र ही नहीं मानते थे। वी.एम. चत्रपति राव के अनुसार जवाहरलाल जी पत्रकारिता को एक एक्शन (प्रक्रिया) मानते थे अर्थात पत्रकारिता एक राजनीतिक और सामाजिक प्रक्रिया है। ऐतिहासिक सन्दर्भ में उसे साहित्यिक अन्दाज में कहने की कुशलता है। स्वयं भी जवाहर लाल जी लिखते समय इस बात का ध्यान रखते थे।
प्रायŠ जवाहरलाल जी पैड पर बिना अपने नाम के लेख लिखते थे। पर कभी-कभी वह अपने नाम से भी लेख लिखा करते थे। उनके लेख, फीचर और टिप्पणियाँ पत्रकारिता के नायाब नमूने हैं। जवाहर लाल जी की पत्रकारिता पर, पत्रकारिता सम्बन्धी उनके विचारों, प्रेस-कानून, आदर्श समाचार पत्र और प्रेस की मैनेजमेन्ट और प्रेस के मन्तव्य और अधिकारों पर काम की जरूरत है। समाचार पत्रों, रेडियो, फिल्म एवं दूरदर्शन पर जवाहरलाल जी की प्रजातत्र और समाजवाद के सन्दर्भ में एक कल्पना थी। उसे साकार रूप उनके आदर्शों पर चलने वाले समाचार पत्र और पत्रकार ही दे सकते हैं। आज नेहरू शाताब्दी के अवसर पर आवश्यकता है कि उनके प्रेस सम्बंधी दर्शन (नेहरू जी प्रेस फिलास्फी) पर राष्ट्रीय स्तर का एक पत्रकारिता और मास मीडिया प्रशिक्षण संस्थान खोला जाये। नेहरू जी की जन्मभूमि इलाहाबाद या उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ (विश्वविद्यालय) में ऐसा संस्थान जवाहलाल नेहरू के प्रेस सम्बंधी विचारों के प्रति सम्मान का तोहफा होगा। नेहरू ने अपने जीवनकाल में आदर्श रिपोर्टर का काम भी एक बार किया था। लखनऊ के पास बाराबंकी में रात देर गये एक जलसा खत्म हुआ। नेहरू जी उसके बाद अखबार के दफ्तर में आये और स्वयं उन्होंने अपनी सभा और भाषण की रिपोर्ट तैयार की जो अपने आप में एक टेढ़ा काम होता है। पर नेहरू की रिपोर्ट अच्छी पत्रकारिता का एक बेजोढ़ नमूना थी। जवाहरलाल जी का पक्का विश्वास था कि अगर पत्रकार की सोच और कलम में तालमेल है तो कड़ा लिखने के लिए भी गाली देने की जरूरत नहीं है। कढ़ी से कढ़ी बात भी सरल भाषा में लिखी जा सकती है। जवाहरलाल नेहरू ने 1938 में नेशनल हेराल्ड पत्र की स्थापना की थी। वह इस पत्र के निदेशक मंडल के अध्यक्ष थे और साथ ही पत्र के सर्वेसर्वा संपादक भी। कानूनी रूप से पत्र के सम्पादक चलपती राव थे पर पूरे पत्र पर नेहरू जी का प्रभाव था।
एक बार कांग्रेस के जरिये मिले समाचार को बिना शासन की पुष्टि के छापा गया। समाचार एक पक्षीय था और लापरवाही के चलते उसमें कुछ गलतियां रह गयी थीं। समाचार के खिलाफ अवमानना का अभियोग लगा। ब्रिटिश सरकार ने मुकदमा दायर किया। जवाहर लाल जी उस समय जेल में थे। संपादक असमंजस में था। जेल से नेहरू जी ने निर्देश भिजवाया। संपादक को पहले से ध्यान रखना था, अब मुकदमा लड़ा जाए और अगर हार जाते हैं तो सम्पादक जेल जाए पर माफी नहीं मांगी जाएगी।
भारत के संविधान में प्रेस स्वतंत्रता को लेकर धारा 19 में परिवर्तन एवं संशोधन पर 1951 में जब बहस चली तो जवाहर लाल नेहरू ने उसमें सक्रियता से हिस्सा लिया। उसमें उन्होंने वे मुद्दे उठाये प्रेस स्वतंत्रता के आधार क्या हों-किसी स्वतंत्रता? प्रेस स्वतंत्रता का व्यवहारिक रूप क्या हो? इसे किसे और कैसे दिया जाये। इसके लिए नेहरू ने बड़े यत्न करके रायल प्रेस कमीशन की रिपोर्ट को गहरा अध्ययन किया था। उनके ही प्रयासों में ही भारत वर्ष में 1952 में प्रथम प्रेस आयोग की नियुक्ति की गयी थी। जवाहरलाल नेहरू समाचार पत्रों पर शृंखलाबद्ध एकाधिकार के विरोधी थे। यह सामन्तों और पूंजीवाद के चंगुल के समाचार पत्रों को मुक्त कराने के पक्ष में थे। यह उन संपादकों को अच्छा नहीं मानते थे। पर उनके इशारों पर लिखते थे। यह सम्पादक में उच्चस्तरीय आचरण सोचने और बौद्धिक समन्वय को प्राथमिकता देते थे। नेहरू पत्रकारों में ऊंचे वेतन से उनकी ऊंचाई को नापने का पैमाना नहीं मानते थे। यह तो कहते थे कि पत्रकार वह है जो पत्रकारिता के मानक मूल्यों को ऊंचा उठाये। पत्रकार की कीमत तो उसकी कलम के स्तर उसके मालिक या सम्पादक के स्तर से नहीं होता, उसमें काम करने वाले श्रमजीवी पत्रकारों से होता है। जवाहर लाल नेहरू अगर राजनीति में न जाते तो वह एक अच्छे लेखक और उच्च कोटी के सम्मानित पत्रकार होते। आवश्यकता है नेहरू के पत्रकार प्रेरणा लेकर पत्रकारों की तदनुरूप प्रशिक्षण देने की।

प्रद्युम्न की हत्याः कुछ सवाल
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव के रेयान स्कूल में हुई एक बच्चे की हत्या की जो नई परतें अब खुली हैं, वे दिल दहला देनेवाली हैं। प्रद्युम्न नामक छात्र की हत्या के लिए स्कूल बस के कंडक्टर अशोक कुमार को जिम्मेदार ठहराकर गिरफ्तार कर लिया गया। हरियाणा पुलिस ने उसे पीट-पीटकर उससे जुर्म भी कबूल करवा लिया। लेकिन प्रद्युम्न के पिता के आग्रह पर जब केंद्रीय जॉंच ब्यूरो (सीबीआई) को यह मामला सौंपा गया तो मालूम पड़ा कि प्रद्युम्न की हत्या उसी स्कूल के एक वरिष्ठ छात्र ने कर दी थी। इस छात्र ने स्कूल के अधिकारियों को प्रद्युम्न के शव की खबर सबसे पहले दी थी। सीसीटीवी और चाकू ने सुराग दिया और कथित असली हत्यारा पकड़ा गया। यह सारा मामला इतना अजीब है कि यह देश की पुलिस व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, पत्रकारिता और शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न-चिन्ह लगा देता है। उस तथाकथित छात्र हत्यारे के पिता का कहना है कि यदि उसने चाकू से हत्या की होगी तो उसकी कमीज पर खून के दाग तो होने चाहिए थे। ये दाग न तो स्कूल में किसी ने देखे और न ही घर में ! तो क्या सीबीआई की जांच बिल्कुल निराधार है ? हत्या का कारण भी अजीब है। कहा जा रहा है कि वह लड़का पढ़ाई में कमजोर था और वह चाहता था कि उस दिन होनेवाली परीक्षा टल जाए। स्कूल की छुट्टी हो जाए। इसीलिए उसने प्रद्युम्न की हत्या कर दी। परीक्षा टल गई। प्रद्युम्न की जगह कोई भी हो सकता था। यह तथ्य भी हत्या के नए आरोपी ने उगला होगा। अब देखिए, अदालत क्या करती है? बेचारे कंडक्टर पर जेल में क्या गुजर रही होगी ? हमारी पुलिस की करतूतों के कारण सैकड़ों अशोक कुमार जैसे लोग निर्दोष होते हुए भी क्या हमारी जेलों में सड़ नहीं रहे हैं? उनके पास वकीलों के बटुए भरने की ताकत कहां होती है ? अशोक का केस कोई वकील नहीं लड़ेगा, ऐसा संकल्प गुड़गांव के वकील संघ ने ले लिया था। अब वह क्या करेगा? हमारे पत्रकार भाइयों ने भी गजब ढाया। वे अशोक के पीछे हाथ धोकर पड़ गए। किसी ने खुद खोजबीन करने का कष्ट नहीं उठाया। पुलिस की लापरवाही के कारण खट्टर सरकार भी बदनामी झेल रही है। यहां यह प्रश्न भी उठता है कि इन पब्लिक स्कूलों में कैसी संस्कृति पनप रही है? परीक्षा में पास होना क्या इतनी बड़ी बात है कि उसके लिए हत्या कर दी जाए? छात्रों के माता-पिता से अंधाधुंध फीसें बटोरना, बच्चों का बढ़ता हुआ मानसिक तनाव और ढोंगभरी जीवन-शैली भी इस तरह की जघन्य घटनाओं का कारण बन जाती है।

नोट बंदी से देह व्यापार में कमी, या खाये बौरायात हैं या व देखत बौराय
– डॉक्टर अरविन्द जैन
लंका विजय के बाद अयोध्या में सब लोग अपनी अपनी युध्य में महिमा बखान कर रहे थे तो हनुमान जी बोले की जब मैं लंका की अशोक वाटिका में गया था तो सीता माता लाल साड़ी पहनी थी और अशोक के फूल लाल लाल दिखाई दे रहे थे तब राम चंद्र जी मुस्कराये और कहा हनुमान सीता सफ़ेद साडी पहनी थी और अशोक के फूल सफ़ेद होते हैं। कारण उस समय तुम क्रोध में थे तो तुम्हे सब चीज़े लाल लाल दिखाई दे रही थी। युध्य विजय के बाद सब अपनी मस्ती में रहते हैं। और जब हार जाते हैं तब बारीक से बारीक बात बड़ी दिखाई देती हैं। जब प्यार मोटा होता हैं तब गलती पतली दिखाई देती हैं और जब प्यार पतला होता हैं तब गलती मोटी हो जाती हैं।
जब उगता सूरज फैलता हैं तब उसकी लालिमा कुछ और होती हैं और डूबता सूरज की लालिमा अलग होती हैं। जब मानव जीत हासिल करता हैं तब उसकी प्रसन्नता अजीब ख़ुशी देती हैं और उसमे उसके भाव अलग दिखते हैं और जब हार का सामना करता हैं तब उसकी चेहरे के भाव अलग दिखते हैं। जैसे सोना का दाम बढ़ा तो व्यापारी खुश और घटा तो दुखी पर सोना तो सोना होता हैं वह भी एक तोला, पर हमारे राजनेता छुद्र नदी जैसे होते हैं वे शीघ्र प्रसन्न और जल्दी दुखी। ये कुर्सियां लकड़ी की होती हैं, उन पर कितने बैठ चुके और आगे बैठेंगे।
कल भोपाल में एक केंद्रीय मंत्री जी कह रहे थे की नोट बंदी से देह व्यापार कम हुआ पर मांस व्यापार बहुत बढ़ा। देह व्यापार के आंकड़े भी दिए पर देह त्याग करने के मामले में चुप ! इसी प्रकार एक राज के मंत्री जी कह रहे थे की एक दिन होली खेलने से कितना पानी बर्बाद होता हैं उससे अधिक टॉयलेट में फ्लश में ज्यादा पानी खरच होता हैं और एक दिन दीवाली में पटाका फोड़ने से कितना प्रदुषण होगा। आज ही समाचार पत्र देखे की दिल्ली में आज स्कूल बंद कर दिए हैं कारण वहां प्रदुषण बहुत हैं। क्या पता मंत्री या तो पढ़े लिखे नहीं होते कारण उनको चारा या खाना पचा पचाया मिलता हैं या उनकी ऊपरी मंजिल कचरा घर से भरी रहती हैं।
हमें सुनकर पढ़ कर अच्छा लगा की मंत्री जी को देह व्यापार की कमी ने बहुत चिंतित किया। पता नहीं इस कमी में उनका कितना योगदान हैं, था या होगा। देह व्यापार कोई नहीं रोक सकता। या व्यापार दिन दूनी रात चौगनी बढ़ रहा हैं आपकी राजधानी में नेताओं, अफसर, धनी लोगों के बहुत योगदान हैं। पांच तारा होटल तो पूर्ण सुरक्षित जगह होती हैं, हां मरने वालों को कोई जिक्र नहीं किया कारण वे मौतें दिखती नहीं हैं।
नोट बंदी ने तो मोदी और सरकार को अपने हाथ अपनी पीठ थपथपाने का खूब मौका दिया। मीडिया, पत्रों को इतना अधिक धन से भर पूर कर दिया हैं की सब आकंठ हैं और कोई हिम्मत नहीं कर सकता मोदी के खिलाफ। और हमारा मीडिया इस समय राग दरबारी बन गया। वह हां में हां मिलाता हैं।
नोट बंदी के लाभ और हानि बहुत हैं और सम्पूर्ण कर ने तो व्यापर की गति बढ़ा दी हैं। आज व्यापारी बहुत ख़ुशी में भी हैं और इस समय देश में अमन चैन हैं। हम विकास में बहुत आगे हो गए। हमारे देश का मांस, अंडा मछली का व्यापार विश्व में प्रथम हैं। काला धन बहुत बाहर आ गया नौकरी बहुत मिल रही हैं विश्व बैंक ने बहुत अच्छी रिपोर्ट दी हैं। और हम विश्व में सर्व प्रथम हैं निवेश के मामलों में। कितने देशों ने कितनी फैक्ट्री खोल ली हैं और हम स्वर्ण युग में आ गए। अब हमारे घरों में तालें नहीं लगते हैं कारण अब जोखिम वाला सामान रहा ही नहीं।
स्वच्छता अभियान के कारण हर घर में शौचालय बन गए और अब जेब कटना कम या बंद हो गया कारण प्लास्टिक के चलन होने से किसको फायदा होगा ? अब चोरियां बहुत कम हो गयी। कारण बैंक हम जनता को कोई धन नहीं दे रहा हैं और प्रत्येक व्यक्ति क़र्ज़ में डूबा हैं। हम अम्बानी अडानी अमित शाह के शहजादे का विकास तो हो रहा हैं। उनके विकास से देश का विकास हैं।
अंत में मंत्री रविप्रसाद से जानना चाहते हैं की ये आकंडे कैसे मिले और प्रदेश के मंत्री के यहाँ पानी न मिले या प्रदुषण बहुत हो जाए तो क्या करेंगे। हम लोग जानते हैं की वर्तमान सरकार बौराएँ हैं उसे अपने अलावा कोई विकास नहीं मिल रहा हैं।
अपने आप पर इतना गुमान न करना
रावण का गुमान उसे ही ले डूबा
इन्द्र स्वयं अपने मुँह से अपनी प्रशंसा करता तो
शोभा नहीं देता,
आकंड़ों में मत उलझाव जनता को
पब्लिक सब जानती हैं,
काठ की हांडी बस एक बार आग पर चढ़ती हैं
अब कोई भी वादों पर नहीं फंसेगा
सोच समझकर रहे तो ठीक नहीं तो ……

भागवत की दो चेतावनियां
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखिया श्री मोहन भागवत ने इंदौर में दो बड़ी महत्वपूर्ण बातें कह दीं। ये दोनों बातें ऐसी हैं कि जिन्हें भारत के लोग सच्चे मन से स्वीकार कर लें तो भारत का उद्धार हो जाए। पहली बात यह है कि देश उन सबका है, जो यहां रहते हैं। इस देश में जो भी रहता है, वह हिंदू है। यह देश सिर्फ उनका नहीं है, जो खुद को हिंदू कहते हैं। जो खुद को हिंदू नहीं कहते, यह उनका भी है। दूसरी बात मोहनजी ने यह कही कि कोई पार्टी या नेता इस देश को महान नहीं बना सकता। समाज को बदलाव की जरुरत है। इसके लिए सामाजिक शक्तियों को तैयार रहना होगा।
हिंदू शब्द भी मूलतः भारतीय नहीं है। यह सिंधु से बना है। फारसी में ‘स’ का ‘ह’ हो जाता है। जैसे सप्ताह का हफ्ता। सिंधू नदी के इस पार रहनेवाले लोगों को ईरान और अफगनिस्तान में हिंदू कहा जाने लगा। इस दृष्टि से भारत का हर नागरिक हिंदू ही हुआ। यों भी आप दुनिया के किसी भी प्राचीन देश में चले जाइए। भारतवासियों को वे लोग हिंदू, हुन्दू, इंदू, हिंदी, इंडी, इंडियन आदि नामों से पुकारते हैं। आप चाहें मुसलमान हों, ईसाई हों, सिख हों, पारसी हों, यहूदी हों, बौद्ध हों, जैन हों, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। जो हिंद में रहता है, वह हिंदू है। हिंदू शब्द के आगे आपकी सभी पहचान फीकी पड़ जाती हैं। यह बात भारत के बाहर तो ठीक है लेकिन भारत में उक्त सभी संप्रदायों या धर्मों के लोग अपने आप को हिंदू नहीं कहते हैं। उनके लिए भी मोहनजी ने हिंदू शब्द के द्वार खोल दिए हैं। इससे बड़ी दरियादिली क्या हो सकती है ? सांप्रदायिक दुर्भाव की इससे बढ़िया दवा क्या हो सकती है ?
मोहनजी ने जो दूसरी बात कही है, उससे हमारे नेताओं को कुछ सबक लेना चाहिए। समाज के बदलाव में राजनीतिक नेताओं की भूमिका बहुत छोटी होती है, कुछेक अपवादों को छोड़कर। हम नेताओं को जरुरत से ज्यादा महत्व दे देते हैं। कुछ कुर्सियों में बैठ जानेवाले लोगों को हम अपने देश और समाज का सर्वेसर्वा मान लेते हैं। वे खुद को सर्वज्ञ मान बैठते हैं। ये कुर्सीदास लोग तभी तक चमकते-दमकते रहते हैं, जब तक वे कुर्सी में टिके रहते हैं। उनकी असली औकात का पता तभी चलता है, जब उनकी कुर्सी उनके नीचे से खिसक जाती है। वे रद्दी की टोकरी में ऐसे जाते हैं, जैसे सिर से कटे बाल ! दुर्भाग्य है कि ये सिर के बाल खुद को ही सिर समझने लगते हैं। मोहन भागवत की यह चेतावनी बहुत सामयिक है। इसके अर्थ बहुत गहरे हैं। समझने वाले समझ गए होंगे।

(व्यंग्य) जुमलेबाजी की दुकान
– दीपक दुबे
दो बडे और महत्वपूर्ण समझे जाने वाले राज्यों मे चुनावी बिगुल बजते ही देष अब अब धीरे धीरे चुनावी मोड पर आता जा रहा है जुमलेबाजियाँ बढ रहीं हैं। वर्तमान मे जिस तरह से देष मे जूतो मे दाल बंट रही है, माने अपने बेटो के लिए खजाना खाला जा रहा है मै भी स्टार्ट अप योजना मे सोच रहा हू एक जुमले बाजी की दुकान खोल लू वैसे तो इरादा भाशण फैर्क्टी खोलने का है । आपको मालुम नही मै भी पुराना जुमलेबाज रहा हू हिन्दी मे एमए करने के बाद तो मेरी यह प्रतिभा और भी निखर गई है। स्कूल कालेज से लेकर अभी भी यह प्रतिभा मुझमे अभी भी उसी रफतार से है। वेसे भी बता दू कि यह कोई कविता कहानियों का युग तो है नही यदि सच कहे तो यह युग चुटकुला प्रधान युग हे। जीएसटी ने भले उदयोग ंघधे बंद किये हो मगर चुटकुलों का निर्माण बदस्तूर अब भी जारी है चाहे रिटायर हो या नौकरीपेषा, स्कूली छात्र हो या फिर कालेज का, कर्मचारी अधिकारी सब इसमे लगे हुए हे।
इस जुमला निर्माण फैक्ट्री से हर पाटी को मदद दी जायेगी यह जुमले पार्टी की मांग के अनुसार तैयार किये जायेगे। जनता की जुबान मे यह जुमले जनता के बीच के ही लोगो से लिए जायेगे। पूरा भाषण भी आम जनता की जुबान मे रेडीमेड लिखा जायेगा। इसके लिए कई सलाहकार भी मेने तय कर लिए है, जैसे कल्लू धोबी, डल्लु पानवाला, नत्थन लाल मास्टर,फलुआ फूलवाला,,चपलू मोची,रफीक भाई पंचरवाला,छुटटन चाटवाला आदि आदे। जनता से जुडे लोगो के पास जनता से जुडे ऐसे ऐसे जुमले मुहावरे और लोकोक्तियां इनके पास मिलेगी ऐसी कि जनता चकरा जायेगी।
दो राज्यो मे हाल ही मे चुनाव घोशित होते ही काम बढ गया है कुछ फिल्मो के डायलाग थी तलाष भी जारी है इसके लिए अलग फिल्म विषेशज्ञ मेने रखा हैं। सबसे सुपर हिट फिल्म शोले के गब्बरसिंह वाले डायलॉग अब भी प्रचलन मे है, खूब लोकप्रिय हो रहे है ये डायलाग नेताओ और पब्लिकं को खूब रास आ रहे है। गब्बर सिंह टैक्स उर्फ जीएसटी और भी इस जैसे डायलॉग खोजकर ला रहा हू जो सत्ता और विपक्ष दोनो को ही लोटपोट करने के काम आयेगे। आजकल तो फेसबुक वाट्सअप पर चुटकुलों की बाढ सी आई हुई है जब ओपन करो पचास से अधिक चुटकुले। नये नये तेनाली राम,मुल्ला नसरूददीन जेसे नवसीखिये चुटकुले बाजों ने एन्ट्री ली है इन सबकी भी मदद से नये नये जुमले तैयार करॅगा। जो लोगो को हॅसायेगे भले वोट दिलाये या ना दिलाये। जनता को किस पर सबसे ज्यादा जोक पसंद आते है यह सर्वेक्षण भी फिलहाल चल रहा हे सबसे अघिक जुमले बाजी नेताओ पर ही पब्लिक पसंद कर रही है। समय कम है मुझे अच्छे से अच्छे जुमले तेयार करने हे कुछ घटिया से लेखकों को भी इंगेज करने का मेरा इसमे इरादा हे दरअसल घटिया जुमले ही आजकल लोकप्रिय हो रहे है। एक फैक्ट्री का और दुकान दोनो का उद्घाटन दो अलग जुमले बाजों से कराने का इरादा है। आपको भी इस के लिए बुलाउWगा आयेंगे ना आप, इस नवउदयोगपति के कार्यक्रम मे।

राजनारायणः एक संन्यासी नेता
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
2017 राजनारायणजी का जन्म शताब्दि वर्ष है। आज वे जीवित होते तो उनका सौंवा साल शुरु होता। उनको गए 31 साल होने आ रहे हैं लेकिन हमारी युवा-पीढ़ी के कितने लोग उनका जानते हैं ? उनकी स्मृति में कल विट्लभाई हाउस में जो सभा हुई, उसमें कोई भी समाजवादी कहे जानेवाला नेता दिखाई नहीं पड़ा लेकिन मुझे खुशी है कि आयोजकों में कुछ ऐसे उत्साही नौजवान भी थे, जिन्होंने राजनारायणजी को देखा तक नहीं था। राजनारायण सारे संसार में क्यों विख्यात हुए थे? इसलिए कि उन्होंने तत्कालीन संसार की सबसे शक्तिशाली और परमप्रतापी प्रधानमंत्री को पहले मुकदमे में हराया और फिर चुनाव में हराया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से चुनाव हारने पर उन्होंने उन पर मुकदमा चलाया, चुनाव में गैर-कानूनी हथकंडे अपनाने के आरोप पर। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिराजी के खिलाफ ज्यों ही 12 जून 1975 को फैसला दिया, उन्होंने 26 जून को आपात्काल थोप दिया। सारे नेताओं को जेल हो गई। सारे देश को सांप सूंघ गया लेकिन मार्च 1977 में जब उन्होंने फिर चुनाव करवाया तो वे राजनारायण से तो हार ही गईं, सारे उत्तर भारत से कांग्रेस का सफाया हो गया। उस समय माना जा रहा था कि देश में बनी पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के मूलाधार राजानारायण ही हैं, हालांकि नेतृत्व की पहली पंक्ति में जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चरणसिंह और जगजीवनराम जैसे लोग थे।
राजनारायणजी और मेरी घनिष्टता लगभग 20 साल तक बनी रही। उनके अंतिम समय तक बनी रही। लोहिया अस्पताल में राजनारायणजी से मिलनेवाला मैं आखिरी व्यक्ति था। मध्य-रात्रि को विदेश से लौटते ही सीधे हवाई अड्डे से मैं उनके पास पहुंचा। वे बोल नहीं पा रहे थे। मैंने जैसे ही उनका हाथ पकड़ा, उनकी आंखों से आंसू टपक पड़े। वहां से मैं जैसे ही अपने पीटीआई कार्यालय पहुंचा, राजनारायणजी के सचिव महेश्वरसिंह ने उनके महाप्रयाण की खबर दी। राजनारायणजी के असंख्य प्रसंगों- संस्मरणों को लिखूं तो एक ग्रंथ ही तैयार हो सकता है लेकिन यहां यही कहना काफी होगा कि डाॅ. लोहिया के शिष्यों में वे अनुपम थे। वे गृहस्थ होते हुए भी किसी भी संन्यासी से बड़े संन्यासी थे। उनके-जैसे राजनेता आज दुर्लभ हैं। पद और पैसे के प्रति उनकी अनासक्ति मुझे बहुत आकर्षित करती थी। उनके अंतिम दो-तीन वर्ष काफी कठिनाइयों से गुजरे लेकिन काशी में उनकी शव-यात्रा (1986) में जितने लोग उनके पीछे चले, उस घटना ने भी इतिहास बनाया है। राजनारायणजी की जन्म-शताब्दि मनाने का सबसे अच्छा तरीका यही हो सकता है कि लोहिया की सप्त-क्रांति को अमली जामा पहनाने के लिए सारे समाजवादी एकजुट होकर काम करें।

चीन में दूसरे माओ का जन्म
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
चीन में इस साल नए माओत्सेतुंग का जन्म हुआ है। माओ जितना ताकतवर नेता चीन में अब तक कोई और नहीं हुआ है। माओ के रहते ल्यू शाओ ची और चाऊ एन लाई प्रसिद्ध जरुर हुए लेकिन वे माओ के हाथ के खिलौने ही बने रहे। माओ के बाद चीन में एक बड़े नेता और हुए। तंग श्याओ पिंग, जिनका यह कथन बहुत प्रसिद्ध हुआ था कि मुझे इससे मतलब नहीं कि बिल्ली काली है या गोरी है, मुझे यह देखना है कि वह चूहा मारती है या नहीं। तंग श्याओ पिंग ने चीनी अर्थव्यवस्था को पूंजीवादी सड़क पर चलाने की कोशिश की थी और माओ की साम्यवादी कठोर व्यवस्था को उदार बनाया था। लेकिन अब तंग से भी बड़े नेता की पगड़ी शी चिनपिंग के सिर पर रख दी गई है। शी चीन के राष्ट्रपति हैं। वे भारत आ चुके हैं। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के 2336 प्रतिनिधियों ने अपने 19 वें सम्मेलन में उन्हें अगले पांच साल के लिए फिर अपना राष्ट्रपति चुन लिया है। वे सत्तारुढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव (सर्वेसर्वा) और सैन्य आयोग के अध्यक्ष हैं। इन तीनों शक्तिशाली पदों पर तो वे विराजमान हैं ही लेकिन पार्टी संविधान में उनके विचारों को माओ के विचार का स्थान दिया गया है। उसमें उनके चीनी महापथ (ओबोर) की योजना को भी शामिल किया गया है। दो पूर्व राष्ट्रपतियों चियांग जेमिन और हू चिंताओ पार्टी कांग्रेस में उपस्थित जरुर थे लेकिन पार्टी संविधान में उनके नाम का कहीं जिक्र तक नहीं है। शी के उत्तराधिकारी के बारे में भी कोई संकेत नहीं दिया गया है। याने शी अब दूसरे माओ हैं।
जाहिर है कि माओ की तरह शी अब न तो आक्रामक हो सकते हैं और न ही तानाशाही रवैया अपना सकते हैं। अब दुनिया काफी बदल चुकी है। इस समय चीन साम्यवादी कम, महाजनी ज्यादा हो गया है। वह पैसा पैदा करने में लगा हुआ है। वह अगले 10-15 साल में दुनिया का सबसे अधिक संपन्न राष्ट्र बनना चाहता है। इस धुन में पगलाया हुआ चीन अपने नागरिकों के साथ कितना न्याय कर पाएगा, यह देखना है। चीन में गैर-बराबरी की खाई बहुत गहरी होती जा रही है और उसी पैमाने पर भ्रष्टाचार भी बढ़ रहा है। शी को इस बात का श्रेय है कि वे भ्रष्टाचार को जड़मूल से उखाड़ने में लगे हुए हैं। चीन की असली समस्या मार्क्स का वर्गविहीन समाज बनाना नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचारविहीन समाज बनाना है। वैदेशिक मामलों में भी चीन कितना ही बड़बोला बनता रहे लेकिन अब वह युद्ध से बचता रहेगा। भारत की चिंता यही है कि चीन की बढ़ती हुई ताकत उसके लिए खतरनाक सिद्ध न हो।

नौकरशाही को सरंक्षण देने की निर्लज्जता
– प्रमोद भार्गव
राजस्थान में लोकसेवकों और न्यायाधीशों के विरुद्ध परिवाद पर जांच से पहले अनुमति की अनिवार्यता वाला विवादित विधेयक विपक्ष, मीडिया और जनता के जबरदस्त विरोध के कारण पारित नहीं हो पाया। काले कानून की यह खिलाफत लोकतंत्र की रक्षा का सुखद संदेश है। इस विधेयक के प्रावधानों से असंतुष्ट भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी और भाजपा को समर्थन दे रहे निर्दलीय विधायक माणकचंद सुराणा भी सत्ता पक्ष के विरुद्ध खड़े दिखाई दिए। लोकसेवकों के कथित हितों की रक्षा के बहाने भ्रष्ट नौकरशाही को सुरक्षा कवच देने वाले इस विधेयक पर राजस्थान उच्च न्यारयालय ने भी तल्ख टिप्पणी की। इस बाबत प्रस्तुत एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि ’यह निक्कमी सरकार है और निकम्मे लोग हैं। अब तो हद हो गई है कि सरकार इन निकम्मों को बचाने के लिए अध्यादेश तक ला रही है।’ अदालत की यह टिप्पणी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार की सामंती सोच की निर्लज्जता पर कुठाराघात है। इस अध्यादेश के प्रावधानों में प्रेस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी बाधित करने के अलोकतांत्रिक उपाय किए गए थे, यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी आम-आदमी अपनी तकलीफ बयान नहीं कर सकता था। अब चयन समिति इसके प्रारूप पर पुनर्विचार करेगी।
अब तक किसी भी भारतीय नागरिक को निजी इस्तगासा के मार्फत अपने ऊपर हुए अत्याचार या किसी लोकसेवक द्वारा बरते गए कदाचरण को संज्ञान में लाने का अधिकार है। किसी नौकरशाह द्वारा बरते गए दुष्ट आचरण की शिकायत जब थाना में नहीं सुनी जाती तो पीड़ित व्यक्ति निजी इस्तगासा दायर कर अपने हक में कानूनी लड़ाई लड़ सकता है। किंतु विधेयक के माध्यम से वसुंधरा राजे सिंधिया सरकार ऐसे लोगों के मुंह सिल देना चाहती हैं, जो भ्रष्ट नौकरशाहों के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ने को आमादा रहते हैं। इस संशोधन विधेयक के जरिए आईपीसी की धारा 228 में 228 बी जोड़कर प्रावधान किया गया है कि सीआरपीसी की धारा 156 और धारा 190 सी के विपरीत कार्य किया गया तो दो साल का कारावास और जुर्माने की सजा दी जा सकती है। न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट व लोकसेवक के खिलाफ अभियोजन की स्वकृति मिलने से पहले उनका नाम एवं अन्य जानकारी का प्रकाशन व प्रसारण भी नहीं किया जा सकेगा। हालांकि न्यायपालिका को शक के दायरे में लाने से पहले उच्च न्यायालय की मंजूरी आवश्यक है। लोकसेवकों, यानी कार्यपालिका को तो इनकी आड़ में जोड़कर उनके भ्रष्ट आचरण को सुरक्षा प्रदान की जा रही थी। यह उपाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस नारे की भावना का भी उल्लघंन है, जिसमें वे 56 इंची सीना तानकर वे कहते रहे हैं कि ’न खऊंगा और न ही खाने दूंगा।’
भ्रष्टाचार से मुक्ति देश की राष्ट्रीय आकांक्षा है। देश की तमाम लोक-कल्याणकारी योजनाएं केवल भ्रष्ट नौकरशाही के कारण नाकाम हो जाती हैं। बावजूद राजस्थान सरकार द्वारा भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारियों को सरंक्षण देने के ऐसे उपाय करना जिससे आरोपितों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति मिलने तक कोई कार्यवाही न हो तो सरकार मंशा पर भी सवाल उठना लाजिमी है। दरअसल वर्तमान राज्य सरकारों के नेतृत्वकर्ता धन उगाही, गाहे-बगाहे नौकरशाही के माध्ययम से ही कर रहे हैं। यह उगाही राजनीतिक चंदे के लिए की जा रही हो अथवा निजी वित्तपोषण के लिए, नौकरशाही एक माध्यम बनकर पेश आ रही है। इसीलिए खासतौर से देश में जिन-जिन प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं, वहां-वहां नौकरशाही निरंकुशता के चरम पर है। राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकारों में तो इसी सांठगांठ के चलते नौकरशाही बेलगाम है। महाराष्ट्र सरकार ने इस आशय का कानून दो साल पहले ही पारित किया है। इसमें अभियोजन स्वीकृति की अवधि तीन माह है, जबकि राजस्थान में इसे बढ़ाकर छह माह कर दिया गया है।
सरकार की यदि मंशा ईमानदारी होती तो उसे जरूरत तो यह थी कि वह सीआरपीसी की धारा 197 में संशोधन का प्रावधान लाती। इसकी ओट में भ्रष्ट अधिकारी मुकदमे से बचे रहते हैं। इसीलिए इसे हटाने की मांग लंबे समय से चल रही है। इस धारा के तहत यदि कोई लोक सेवक पद पर रहते हुए कोई कदाचरण करता है तो उस पर मामला चलाने के लिए केंद्र सरकार से और राज्य लोक सेवा का अधिकारी है तो राज्य सरकार से मंजूरी लेना जरूरी है। राजस्थान सरकार ने इस धारा को विलोपित करने की मांग उठाने की बजाय, इसे ताकत देने का काम कर दिया था। क्योंकि संशेधन विधेयकपारित हो जाता तो फिर मीडिया भी तत्काल भ्रष्टाचारियों से संबंधित समाचारों के प्रकाशन व प्रसारण के अधिकार से वंचित हो जाता। साफ है, यह विधेयक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध था, लिहाजा लोकतंत्र की मूल भावना को आघात पहुंचाने वाला था। यह इसलिए भी असंवैधानिक था, क्योंकि अधिकारी से संबंधित शिकायत पर जांच करने या न करने के अधिकार सत्तारूढ़ दल के पास सुरक्षित थे। अब वह सत्तारूढ़ दल उस नौकरशाह के खिलाफ जांच के आदेश कैसे दे सकता है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सत्तारुढ़ दल के हित साधने में लगा हो ? जाहिर है, सरकार भ्रष्टाचार को संस्थागत करने के प्रावधान को कानूनी रूप देने की कुटिल मंशा पाले हुए थी।
फिलहाल मीडिया को शिकायत के आधार पर अथवा गोपनीय रूप से गड़बड़ी के सरकारी दस्तावेजों के आधार पर ही खबर छापने एवं प्रसारित करने का हक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत था। इस अध्यादेश को यदि बाईदवे विधेयक के रूप में स्वीकृति मिल जाती तो शिकायत हमेशा के लिए ठंडे बस्ते के हवाले कर दी जाती। इस लिहाज से यह विधेयक राजस्थान सरकार का भ्रष्टाचार को सरंक्षण देने की बेहद निर्लज्ज व निरकुंश कोशिश थी। भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक व्यवस्था में ऐसे निरकुंश प्रावधानों पर अमल तो दूर, सोचना भी अनैतिकता के दायरे में आता है। भारतीय जनमानस की याददाशत इतनी कमजोर नहीं है कि वह देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के उस आंदोलन को भूल जाए, जिसमें लोकसभा में विपक्ष में बैठी भाजपा सरकार ने भ्रष्टाचार मुक्त शासन-प्रशासन की पैरवी की थी। राजनीति और सरकार में पारदर्शिता की वकालात की थी। दुर्भाग्य से आज यही भाजपा केंद्र में सत्तारुढ़ होने के बावजूद लोकपाल की नियुक्ति से कन्नी काट रही है और राजस्थान में भ्रष्ट नौकरशाही से संबंधित खबरों को प्रतिबंधित कर रही है।
प्रशासनिक अधिकारी केंद्रीय सेवा के हों या राज्य सेवा के, उन्हें इतने संवैधानिक सुरक्षा-कवच मिले हुए है कि उनका अदालत के कटघरे में खड़ा होना आसान नहीं है। शायद इसीलिए संविधान विशेषज्ञ मंत्री-परिषद् का कार्यालय पांच साल का मानते हैं। निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायी है। उसे प्रत्येक पांच साल में मतदाता के समक्ष परीक्षा में खरा उतरने की चुनौती पेश आती है, लेकिन प्रशासन का न कोई समयबद्ध कार्यकाल है और न ही उनकी जवाबदेही जनता के प्रति और न ही कर्तव्य के प्रति सुनिश्चित है। बावजूद मंत्री-परिषद् लोकसेवकों के भ्रष्टाचार को सुरक्षित करने को तत्पर हैं तो इस पहल को संदिग्ध निगाह से ही जाएगा। जरूरत तो राज्य सरकार को यह थी कि वह प्रशासनिक सुधार लागू करने की पहल करती और नौकरशाही को जनता व लोक-कल्याण्कारी राज्य के प्रति उत्तरदायी बनाती। दरअसल नौकरशाही को जितना अधिक कानूनी सुरक्षा-कवचों से नवाजा जाएगा, वह उतना ही अधिक भ्रष्ट और निरंकुश होती जाएगी। जबकि इस भ्रष्ट कदाचरण का दंश और निंदा, निर्वाचित प्रतिनिधियों और चुनी गई राज्य सरकारों को झेलने होते है। यह अच्छी बात रही कि विपक्ष और मीडिया के प्रभावी दबाव के चलते सरकार ने लज्जा का अनुभव किया और स्वयं विधेयक को वापस ले लेना चाहिए। लोकतंत्र में इसी तरह से सुशासन को अमल में लाने की जरूरत है।

संयुक्तराष्ट्र में सुषमा और मलीहा
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कमाल कर दिया। संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान के मर्म को झिंझोड़ दिया। यह तो सभी भारतीय नेता और कूटनीतिज्ञ कहते रहते हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद का गढ़ है। लेकिन सुषमा ने यह कहने के साथ-साथ यह भी पूछ लिया कि आखिर पाकिस्तान ने पैदा होकर किया क्या ? भारत और पाकिस्तान का जन्म एक ही समय हुआ था (पाकिस्तान का एक दिन पहले), फिर भी आज भारत कहां है और पाकिस्तान कहां है ? भारत ने डाॅक्टर और इंजीनियर बनाएं, जिन्होंने विश्व-स्तरीय शोध-संस्थान खड़े किए और पाकिस्तान ने आतंकी संगठन बनाए, जिन्होंने पड़ौसी देशों में खून की नदियां बहा दीं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जबकि पाकिस्तान फौजियों, आतंकवादियों और मजहबी उग्रवादियों द्वारा संचालित होता है। सुषमा स्वराज पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी के आरोपों का संयुक्तराष्ट्र संघ महासभा में जवाब दे रही थीं। उनके इस भाषण पर पाकिस्तान के अखबारों और चैनलों ने आज अंगारे बरसा दिए हैं। संयुक्तराष्ट्र में पाकिस्तान की प्रतिनिधि मलीहा लोदी ने भारत को दुनिया की सबसे बड़ी ‘डेमोक्रेसी’ नहीं, ‘हिपोक्रेसी’ बता दिया है और भारत को ‘आतंकवाद की अम्मा’ घोषित कर दिया है। कश्मीर एक समस्या है, इसमें ज़रा भी शक नहीं लेकिन यदि पाकिस्तान फौज और आतंक के सहारे उसे कब्जाना चाहे तो वह हजार साल में भी सफल नहीं हो सकता। मलीहा लोदी को मैं व्यक्तिगत तौर से जानता हूं। वे सुशिक्षित और समझदार नेता हैं। मैं उनसे ऐसी चालू किस्म के मुहावरे बोलने की उम्मीद नहीं करता हूं। उन्होंने भारत की मोदी सरकार को फाशीवादी कहा है। वे स्वयं भारत आएं और देखें कि भारत में कितनी आजादी है। खुद नरेंद्र मोदी की रगड़ाई करनेवाले नेताओं और पत्रकारों से मिलकर वे दंग रह जाएंगी। मुझे इस बात से दुख होता है कि विश्व-मंच पर हमारे दोनों देश एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं। जब भी मैं पाकिस्तान जाता हूं, वहां के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों, विरोधी नेताओं से अपनी बातचीत में मैं हमेशा पूछता हूं कि पाकिस्तान का जैसा नाम है, वैसा उसका काम क्यों नहीं है ? हम तो सिर्फ हिंद हैं, भारत हैं, इंडिया हैं लेकिन आप तो ‘पाक’ याने पवित्र और ‘स्तान’ याने स्थान हैं। फिर भी आपके यहां इतनी गरीबी, इतनी अशिक्षा, इतना तनाव, इतने तख्ता-पलट, इतनी अस्थिरता क्यों बनी रहती है ? क्या जिन्ना के सपनों का पाकिस्तान यही है ? ये सवाल मैंने कई बार कराची, लाहौर और पेशावर के विश्वविद्यालयों में भी उठाए। मैंने उनसे यह भी पूछा कि क्या जिन्ना ने यह पाकिस्तान पहले नाटो देशों और अब चीनियों की गुलामी करने के लिए खड़ा किया था ? हिंदुओं की तथाकथित ‘गुलामी’ से आपको जिन्ना ने मुक्त कराया लेकिन अब पाकिस्तान दस खसमों की खेती बन गया है ? पाकिस्तान यदि संपन्न, स्वस्थ और शक्तिशाली लोकतंत्र बने तो वह खुद का भला तो करेगा ही, पूरे दक्षिण एशिया का भी भला करेगा।

महिला आरक्षण पर सोनिया गांधी का सियासी दांव
प्रमोद भार्गव
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण विधेयक पारित करने के सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर सियासी चाल चल दी है। पहली बार सोनिया ने किसी मुद्दे पर खुद आगे आकर खुला समर्थन देने की बात कही है। ऐसा षायद इसलिए किया है, जिससे महिला सषक्तीकरण के मुद्दे पर सरकार को कठघरे में खड़ा किया जा सके। क्योंकि जरूरी नहीं कि सरकार राज्य सभा में 9 मार्च 2010 को पारित हो चुके इस विधेयक को लोकसभा में लाए। दरअसल भाजपा का लोकसभा में स्पश्ट बहुमत है, इसलिए यह विधेयक पारित न होने पाए इसमें कोई संषय ही नहीं है। दरअसल सोनिया ने यह दांव इसलिए खेला है, जिससे उज्जवाला योजना और तीन तलाक के मुद्दे पर महिलाओं का भाजपा के पक्ष में जो ध्रुवीकरण हुआ है, उसे चुनौती दी जा सके। क्योंकि इसी साल इस मुद्दे को जब पूर्व राश्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन द्वारा बुलाए गए महिला विधायकों के राश्ट्रीय सम्मेलन में उठाया था, तब नरेंद्र मोदी ने बड़ी चतुराई से कह दिया था कि ’महिलाओं को सशक्त बनाने वाले पुरूष कौन होते हैं ? देश के निर्माण में आधी आबादी की सशक्त भूमिका रही है और वह पुरूषों से बेहतर घर चलाती हैं।’ यानी महिलाओं को घर चलाने की बात कहकर अपनी सीमा जता दी थी। लेकिन सोनिया से भी पूछा जा सकता है कि उनकी पार्टी के कार्यकाल में यह विधेयक जब लोकसभा में आया तो उनका संकल्प क्यों जवाब दे गया था ?
राज्यसभा से पारित इस विधेयक को कानूनी रूप लेने के लिए अभी लोकसभा और पन्द्रह राज्यों की विधानसभाओं का सफर तय करना होगा। इसके कानून बनते ही ऐसे कई दोहरे चरित्र के चेहरे हाशिये पर चले जाएंगे, जो पिछड़ी और मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण देने के प्रावधान के बहाने, गाहे-बगाहे बीते 21 सालों से गतिरोध पैदा किए हुए हैं। महिला आरक्षण विधेयक का मूल प्रारूप संयुक्त मोर्चा सरकार के कार्यकाल के दौरान गीता मुखर्जी ने तैयार किया था। लेकिन अक्सर इस विधेयक को लोकसभा सत्र के दौरान अंतिम दिनों में पटल पर रखा गया। इससे यह संदेह हमेशा बना रहा कि एचडी देवगौड़ा, इन्द्रकुमार गुजराल और अटलबिहारी वाजपेयी सरकारें गठबंधन के दबाव और राजनीतिक असहमतियों के चलते इस मंशा-बल का परिचय नहीं दें पाईं थीं, जो कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार ने जताई थी। जबकि इस सरकार को अपने ही सहयोगी दलों के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा था। यहां तक की समर्थक दलों ने कांग्रेस को समर्थन वापसी की धमकी भी दी थी। हालांकि प्रजातंत्र में तार्किक असहमतियां, संवैधानिक अधिकारों व मूल्यों को मजबूत करने का काम करती हैं, लेकिन असहमतियां जब मुट्ठीभर सांसदों की अतार्किक हठधर्मिता का पर्याय बन जाएं तो ये संसद की गरिमा और सदन की शक्ति को ठेंगा दिखाने वाली साबित होती हैं।
उस समय विधेयक से असहमत दलों की प्रमुख मांग थी, ’33 फीसदी आरक्षण के कोटे में पिछड़े और मुस्लिम समुदायों की महिलाओं को विधान मंडलों में आरक्षण का प्रावधान रखा जाए।’ जबकि संविधान के वर्तमान स्वरूप में केवल अनुसूचित जाति और जनजाति के समुदायों को आरक्षण की सुविधा हासिल है। ऐसे में पिछड़े वर्ग की महिलाओं को लाभ कैसे संभव है ? हमारे लोकतांत्रिक संविधान में धार्मिक आधार पर किसी भी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। लिहाजा इस बिना पर मुस्लिम महिलओं को आरक्षण की सुविधा कैसे हासिल हो सकती है ? आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने सच्चर व रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों को आधार मानते हुए मुसलमान व ईसाईयों को नौकरियों में धर्म आधारित आरक्षण की व्यवस्था की थी, लेकिन न्यायालयों ने इन्हें संविधान-विरोधी फैसला जताकर खारिज कर दिया था।
दरअसल इस कानून के वजूद में आ जाने के बाद अस्तित्व का संकट उन काडरविहीन दलों को है, जो व्यक्ति आधारित दल हैं। इसी कारण लालू, मुलायम और शरद यादव इस बिल के विरोध में दृढ़ता से खड़े हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में जातियता के बूते क्रियाशील इन यादवों की तिकड़ी का दावा रहता है कि इस अलोकतांत्रिक विधेयक के पास होने के बाद पिछड़ी व मुस्लिम महिलाओं के लिए जम्हूरियत के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। जबकि इनकी वास्तविक चिंता यह नहीं है ? दरअसल 33 फीसदी आरक्षण के बाद बाहुबलि बने पिछड़े वर्ग के आलाकमानों का लोकसभा व विधानसभा क्षेत्रों में राजनीतिक आधार तो सिमटेगा ही, सदनों में संख्याबल की दृष्टि से भी इन दलों की ताकत घट जाएगी। अन्यथा ये सियासी दल वाकई उदार और पिछड़ी व मुस्लिम महिलाओं के ईमानदारी से हिमायती हैं, तो सभी आरक्षित सीटों पर इन्हीं वर्गों से जुड़ी महिलाओं को उम्मीदवार बना सकते हैं ? बल्कि अनारक्षित सीटों का भी इन्हें प्रतिनिधित्व सौंप सकते हैं ? दरअसल इन कुटिल राजनीतिज्ञों के दिखाने और खाने दांत अलग-अलग हैं। गोया तय है कि अल्पसंख्यकों की बेहतर नुमाइंदगी की वकालात के इनके दावे थोथे हैं।
इन दलों का दोहरा चरित्र इस बात से भी जाहिर होता है कि जब देश की पंचायती राज्य व्यवस्था में महिलाओं का 33 फीसदी से 50 फीसदी आरक्षण बढ़ाने का विधेयक लाया गया था तब ये सभी दल एक राय थे। यही नहीं जब नगरीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण का विधेयक लाया गया था, तब भी इन दलों की सहमति बनी रही। लेकिन जब लोकसभा व विधानसभा की बारी आई तो यही दल गतिरोध पैदा करने लग जाते हैं। क्योंकि यह विधेयक कानूनी स्वरूप ले लेता है तो इनके निजी राजनैतिक हित प्रभावित हो जाएंगे। इनका लोकसभा और विधानसभा में पुरूषवादी वर्चस्व का दायरा 33 फीसदी कम हो जाएगा। राजनेताओं के लिए यह विधेयक इसलिए भी वजूद का संकट है, क्योंकि जिन लोक व विधानसभा क्षेत्रों से ये लोग लगातार विजयश्री हासिल करते चले आ रहे हैं, वह क्षेत्र यदि महिला आरक्षण के दायरे में आ जाता है तो इन्हें चुनाव लड़ना मुश्किल हो जाएगा ? तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने भी मुस्लिम समुदाय को बरगलाए रखने के नजरिये से इस विधेयक का विरोध किया था। भ्रष्टाचार में लिप्त ऐसे नेता भी इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं, जिनके लिए सांसद अथवा विधायक के रूप में लोकसेवक बने रहना, सुरक्षा कवच का काम करता है। इन दुर्भावनाओं को मोदी भलीभांति समझ रहे हैं, इसीलिए वे बर्र के छत्ते में हाथ डालना नहीं चाहते हैं। मोदी समझ रहे हैं कि यदि जीएसटी और नोटबंदी के तरह इस विधेयक को लाना कहीं उल्टा न पड़ जाए ?
हमारे देश में विकास को आंकड़ों और व्यक्तिगत उपलब्धि को संख्या बल की दृष्टि से देखने-परखने की आदत बन गई है। इस नाते हम मानकर चल रहे हैं कि 543 सदस्यीय लोकसभा में 181 महिलाओं की आमद दर्ज होने और 28 राज्यों की कुल 4109 विधानसभा सीटों में से महिलाओं के खाते में 1370 सीटें चली जाने से देश की समूची आधी आबादी की शक्ल बदल जाएगी। अथवा स्त्रीजन्य विषमताएं व भेदभाव समाप्त हो जाएंगे। फिलहाल लोकसभा में 12.15 प्रतिशत महिलाओं की ही भागीदारी हैं। दुनिया के 190 देशों में भारत का स्थान 109 वां हैं। 1952 में गठित पहली लोकसभा में सिर्फ 4.4 प्रतिशत यानी 489 में से महज 22 महिलाएं सांसद थीं। जबकि मौजूदा लोकसभा में 62 महिलाएं लोकसभा सदस्य के रूप में प्रतिनिधित्वि कर रही हैं। यह अब तक की सबसे अधिक संख्या है। विधानसभाओं में महिला विधायकों की उपस्थिति केवल 9 फीसदी है। हालांकि असमानता के ये हालत पंचायती राज लागू होने और उसमें महिलाओं की 33 और फिर 50 फीसदी आरक्षण सुविधा मिलने के बावजूद कायम हैं। लेकिन लोकसभा व विधानसभाओं में एक तिहाई महिलाओं की उपस्थिति इसलिए जरूरी है, जिससे वे कारगर हस्तक्षेप कर महिला की गरिमा तो कायम करें ही देश में जो पुरूष की तुलना में स्त्री का अनुपात गड़बड़ा रहा है, उसको भी समान बनाने के उपाय तलाशें ? साथ ही महिला संबंधी नीतियों को अधिक उदार व समावेशी बनाने की दृष्टि से उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता भी दिखाई दे। इसीलिए महिला विधायकों के राश्ट्रीय सम्मेलन सुमित्रा महाजन ने कहा था कि ’बिना कोई विवाद किए इस विधेयक को सम्मानजनक तरीके से पास करा देना चाहिए। लेकिन अब यह कहने की नहीं करने की बात है, क्योकि खुद सुमित्रा जिस दल से सांसद हैं, उसी दल की सरकार का लोकसभा में स्पष्ट बहुमत है और यह विधेयक अब केवल लोकसभा से ही पारित होना है।

मोदी के लिए वरदान है राहुल
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की जो खबरें अमेरिका से आ रही है, वे ऐसी हैं, जैसे किसी रेगिस्तान में झमाझम बारिश हो। भारत में जिसे लोग नेता मानने को तैयार नहीं हों, जिसे अखबारों में कभी-कभी अंदर के कोनों में कुछ जगह मिल जाती हो और जिसे लोगों ने तरह-तरह के मज़ाकिया नाम दे रखे हों, वह युवा नेता अमेरिका के बर्कले और प्रिंसटन जैसे विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों और छात्रों को सीधे संबोधित कर रहा हो, यह असाधारण घटनाक्रम है। खास बात यह है कि राहुल की ये खबरें भारतीय अखबारों के मुखपृष्ठों पर चमक रही हैं। जाहिर है कांग्रेस के हताश-निराश कार्यकर्ताओं में इन खबरों ने उत्साह का संचार कर दिया है। राहुल के जिन सहयोगियों ने इस अमेरिका-दौरे की योजना बनाई है, वे बधाई के पात्र हैं। राहुल के भाषणों और उन पर हुई चर्चाओं की जैसी रिपोर्टें छप रही हैं, उनसे जाहिर है कि इस बार कांग्रेस का खबर-प्रबंध सफल रहा है।
लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या 2019 में कांग्रेस भाजपा को टक्कर दे पाएगी? अकेली कांग्रेस तो आज इसकी कल्पना भी नहीं कर सकती। आज कांग्रेस जैसी दुर्दशा में है, वैसी वह पिछले सवा सौ साल में कभी नहीं रही। 2014 के चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 45 सीटें मिलीं थी, जबकि आपातकाल के बावजूद 1977 में उसे 154 सीटें मिली थीं। कर्नाटक और पंजाब के अलावा सीमांत के पांच छोटे-मोटे राज्यों में ही कांग्रेस की सरकारें सिमट गई हैं। यह ठीक है कि इससे भी कम क्षमतावाली पार्टी चुनाव जीतकर सरकार बना सकती है लेकिन, उसके लिए आपातकाल-जैसा या भ्रष्टाचार-जैसा बड़ा मुद्‌दा होना जरूरी है। ऐसा कोई ज्वलंत मुद्‌दा विपक्षियों के हाथ में नहीं है। नोटबंदी, जीएसटी, ‘फर्जीकल’ स्ट्राइक और बेरोजगारी-जैसे मुद्‌दे हैं जरूर, लेकिन उन्हें उठाने वाले कहां हैं? कांग्रेस के पास न तो कोई नेता है और न कोई नीति है। कांग्रेस में एक से एक काबिल और अनुभवी लोग हैं लेकिन, उनकी हैसियत क्या है? कांग्रेसी ढर्रे में पल-बढ़कर वे नौकरशाहों से भी बढ़कर नौकरशाह बन गए हैं। उनकी दुविधा यह है कि वे अपना मुंह खोलें या अपनी खाल बचाएं?
यह भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सिर्फ 30 प्रतिशत वोट पाने वाली पार्टी राज कर रही है और 70 प्रतिशत वोट पाने वाले विरोधियों के पास एक भी आवाज़ ऐसी नहीं है, जो राज्यतंत्र पर लगाम लगा सके। इसका नुकसान विरोधी दल तो भुगतेंगे ही, सबसे ज्यादा नुकसान सत्तारूढ़ भाजपा और सरकार को होगा। ये दोनों बिना ब्रेक की मोटरकार में सवार हैं। देश की अर्थव्यवस्था और सांप्रदायिक सद्‌भाव की स्थिति विषम होती जा रही है। 2019 तक पता नहीं देश कहां तक नीचे चला जाएगा? गाड़ी गुड़कती-गुड़कती पता नहीं, कहा जाकर रुकेगी ?
क्या ऐसे में सारे विरोधी दल एक होकर देश की गाड़ी संभाल सकते हैं? नहीं। क्योंकि उनका एक होना कठिन है। पहली समस्या तो यह है कि वे मूलतः प्रांतीय दल हैं। अपने प्रांतीय प्रतिद्वंदी दलों से वे समझौता कैसे करेंगे? क्या उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और माकपा एकजुट हो सकते हैं? क्या सभी प्रांतीय दल कांग्रेस को यानी राहुल गांधी को अपना नेता मान सकते हैं?
इन तथाकथित प्रांतीय दलों के नेता राहुल के जन्म के पहले से राजनीति में सक्रिय हैं। देश के राजनीतिक दलों में आजकल विचारधारा की बाधा बिल्कुल खत्म हो गई-सी लगती है। भाजपा का हिंदुत्व और माकपा का मार्क्सवाद हवा में खो गया है। अब यह सुविधा हो गई है कि कोई भी पार्टी किसी भी पार्टी से हाथ मिला सकती है लेकिन, प्रांतीय दलों का जनाधार प्रायः जाति-आधारित है। ये जातीय-समीकरण एकता में सबसे बड़ी बाधा बन सकते हैं। इन सब बाधाओं के बावजूद देश में प्रचंड विरोध की जबर्दस्त लहर उठ सकती है। लेकिन, उस लहर को उठाने वाले न तो कोई नेता आज दिखाई पड़ रहे हैं और न ही कोई राजनीतिक दल।
यदि सारे नेता एक हो जाएं तो भी वे नरेंद्र मोदी का मुकाबला नहीं कर सकते, क्योंकि राष्ट्रव्यापी लहर उठाने के लिए देश को एक नया और बेदाग चेहरा चाहिए। तीन ऐसे चेहरे हो सकते थे। नीतीश कुमार, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल लेकिन, तीनों तात्कालिक लोभ में फंसकर दीर्घकालिक लाभ के मार्ग से अलग हट गए। हमारे दलीय नेताओं की आज हालत ऐसी हो गई है, जैसी लकवाग्रस्त पहलवानों की होती है। 2019 तक मोदी कितने ही कमजोर हो जाएं लेकिन, इन सब लकवाग्रस्त पहलवानों को वे पटकनी मारने लायक तब भी रहेंगे। ये पारम्परिक नेता वर्तमान सरकार का बाल भी बांका नहीं कर सकते, क्योंकि मोदी की व्यक्तिगत ईमानदारी पर किसी को शक नहीं है और इस बीच भाजपा ने 2019 के चुनाव के लिए हर तरह से जबर्दस्त तैयारी कर ली है। जब भी देश में किसी एक नेता की पकड़ जरूरत से ज्यादा हो जाती है, उसकी पार्टी में उसके आगे कोई मुंह खोलने लायक नहीं रहता और विरोधी दल भी लुंज-पुंज हो जाते हैं, तब कोई न कोई अराजनीतिक ताकत उभरती है। 1977 में जयप्रकाश नारायण न होते और 2014 के पहले बाबा रामदेव और अन्ना हजारे न होते तो क्या इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी को सफल चुनौती दी जा सकती थी? मोदी को सफल चुनौती देनेवाला कोई अ—राजनीतिक नेता आज कौन हो सकता है ?
राजीव गांधी की प्रचंड बहुमत वाली सरकार नेताओं ने मिलकर जरूर गिराई लेकिन, मोदी पर बोफोर्स-जैसे किसी आरोप के लगने की संभावना नहीं है और भाजपा, भाजपा है, कांग्रेस नहीं है। भाजपा में विश्वनाथप्रताप सिंह जैसे किसी बागी मंत्री की कल्पना करना भी असंभव है। यह तो अनुशासितों की पार्टी है। इसके जीवनदानी बुजुर्ग नेताओं की सहनशीलता भी बेजोड़ है। वे मुंह खोलने की बजाय आंखें खोलकर सिर्फ ‘मार्गदर्शन’ करते रहते हैं। अत: 2019 तक इस सरकार के लिए खतरे की घंटी बजना मुश्किल-सा ही लगता है। इस सरकार के लिए तो राहुल गांधी वरदान की तरह हैं। जब तक वे सबसे बड़े विरोधी दल के नेता हैं, मोदी खूब खर्राटे भर सकते हैं। लेकिन, वे खर्राटे भरने की बजाय देश और विदेश में निरंतर दहाड़ते रहते हैं। पता नहीं, उन अनवरत दहाड़ों के बीच उन्हें वह कानाफूसी भी सुनाई देती है या नहीं, जो उनकी पार्टी में उनके खिलाफ चल पड़ी हैं और वे टीवी चैनलों पर खुद को दमकता हुआ तो रोज ही देखते हैं लेकिन, उन्हें वंचितों और पीड़ितों का वह मौन मोह-भंग भी कभी दिखाई देता है या नहीं, जो किसी भी समय बगावत की लहर बन सकता है?

धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं परम्परागत रामलीलायें
-रमेश सर्राफ
रामलीला की सदियों से चली आ रही भारतीय परम्परा अब खत्म होने के कगार पर है। एक जमाने में गांव-गांव में दशहरे के दस दिन पहले से रामलीला का मंचन होता था और आखिरी दिन पाप पर पुण्य की जीत यानि दशहरा को रावण वध। रावण वध की परम्परा तो आज भी चल रही है भले ही इसके स्वरूप में काफी बदलाव आ चुका है। लेकिन रामलीला मंडलियां आज धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। अब तो गांवों में भी सूचना-प्रसार क्रांति ने इस कदर लोगों को जकड़ रखा है कि मनोरंजन और जीवन का पर्याय समझाने वाली हमारी इस विरासत को बचाने कोई नजर नहीं आता।
यद्यपि इस बात का कोई दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है लेकिन यह मान्यता है कि सबसे पहली रामलीला 17वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास के शिष्य मेघा भगत ने चित्रकूट में खेली। बहरहाल इतिहास में भले ही यह विवाद हो लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि उत्तर भारत की हिन्दी बोलियों और बाद की हिन्दुस्तानी भाषा में खेले गए सभी आधुनिक लोक नाटकों की जनक रामलीला ही है और सभी प्रकार की रामलीलाओं का आधार गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस है।
रामलीला उत्तरी भारत में परम्परागत रूप से विजयादशमी के अवसर पर खेला जाने वाला राम के चरित पर आधारित नाटक है। जहां तक दस्तावेजों का सवाल है। पहली रामलीला होने का उल्लेख वाराणसी के रामनगर में सन् 1830 में मिलता है। इसके प्रवर्तक तत्कालीन काशी नरेश महाराजा उदितनारायण सिंह थे। ‘यूनेस्को‘ के मुताबिक बनारस के रामनगर की रामलीला अभी तक चलने वाला संसार का एक मात्र लोकनाट्य हैं। दिल्ली की प्रसिद्ध रामलीला की शुरूआत अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह ‘जफर‘ के जमाने से हुई।
विरासतों के अपने इतिहास में ‘यूनेस्को‘ ने भारत की रामलीलाओं को विश्व की सबसे बड़ी बहुजातीय, बहुधर्मी और बहुनस्लीय सांस्कृतिक विरासत की ‘ईवेंट’ माना है। रामलीला में नृत्य, संगीत की प्रधानता नहीं होती क्योंकि चरितनायक गंभीर, वीर, धीर, शालीन एवं मर्यादाप्रिय पुरुषोत्तम हैं। परिणामस्वरूप वातावरण में विशेष प्रकार की गंभीरता विराजती रहती है।
आम जन तक रामकथा को पहुंचाने की परम्परागत रंगमंचीय कला रामलीला राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में भी कम होती जा रही हैं। इस क्षेत्र के देहाती इलाकों में रहने वाले रामलीला के परम्परागत दर्शक टेलीविजन वीडियो व सिनेमा जैसे माध्यमों को महत्व देने लगे हैं। धीरे-धीरे दम तोड़ रही रामलीला के कारण रामलीला मंडलियों में कार्य करने वाले कलाकार खिन्न होकर रामलीला के स्थान पर गांवो में भजन गायकी, खेत मजदूरी व विभिन्न संस्थानो में चौकीदारी, बस कन्डक्टरी जैसे कार्य करने लगे हैं।
शेखावाटी क्षेत्र के सीकर व झुंझुनू जिलों के गांवों में रामलीला मंडलियो ृद्वारा रामकथा की रामायण की चौपाईयों के साथ नाट्य प्रस्तुतियां की जाती हैं। रामलीला करने का सिलसिला क्षेत्र के गांवों में कस्बों व शहरों की तरह केवल दशहरा व दीपावली के दिनो में ही नही बल्कि साल भर चलता रहता हैं। एक दशक पूर्व तक शेखावाटी क्षेत्र में करीब 40 रामलीला मंडलियां होती थी। जिनमें हर मंडली में 15 से 20 कलाकार होते थे, मगर अब मात्र 8-10 मंडलियां ही रह गई हैं। जो धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती जा रही है।
इस क्षेत्र की रामलीला मंडलियों के कार्यक्रम वर्षात के मौसम को छोडक़र वर्ष भर चलते रहते हैं। ये मंडलियां एक गांव से दूसरे गांव अपने पूरे साजो सामान के साथ जाती रहती हैं। गांव के किसी सार्वजनिक चौक में दो-चार काठ से बने तख्ते रखकर रंगमंच तैयार करते हैं। रंगमंच के पिछे विभिन्न दृश्यों के परदे लगायें जातें हैं जो घटना क्रम के अनुसार बदलते रहतें हैं। रामलीला में इन पर्दों का बहुत महत्व रहता है। रामलीला मंचन के दौरान ही दर्शको से आरती की थाली में दक्षिणा ली जाती हैं। रामलीला मंडलियां एक गांव में दस से पन्द्रह दिनों तक ठहर कर अपनी कला का प्रदर्शन करती हैं तथा लोगों से मिलने वाला चढ़ावा ही आय का मुख्य साधन होता है।
एक दशक पहले तक रामलीला मंडलियों की प्रस्तुती का जादू लोगो के सिर चढकर बोला करता था। गांवो में लोग रामलीला मंडली का बेताबी से इंतजार किया करते थे। रामलीला स्थल पर लोग सांयकाल ही अपने बैठने के लिये पीढ़ा,मुढ़ा,दरी,बोरी आदि रखकर अपना स्थान सुरक्षित कर देते थे। गांव के छोटे बच्चे तो दिनभर रामलीला के कलाकारों के इर्द गिर्द मंडराते रहते थे। रामलीला मंडली का नकलीड़ा (जोकर) तो दर्शको को हंसाहंसा कर लोटपोट कर देता था। पहले गांवो में जब तक रामलीला का मंचन होता उस वक्त पूरे गांव का वातावरण राममय हो जाता था। लेकिन पिछले कुछ सालों के दौरान क्षेत्र के गांवों में रामलीला के प्रति उत्साह में जबरदस्त गिरावट आई हैं।
दूरदर्शन पर रामायण के प्रसारण को प्राय: सभी लोगों ने देखा हैं। इसलिए दूरदर्शन की चमक दमक के समक्ष गांवो में प्रस्तुत की जाने वाली रामलीला लोगों को अब अर्थहीन ‘ड्र्रामा ‘लगने लगी हैं। आज मनोरंजन के तरीके ही बदल गयें हैं। अपने पात्रों को सजीव दर्शानें के लिये पहले हम महिनों रिहर्सल किया करते थे आज इतना समय किसके पास है। वर्षों रामलीला में राम का अभिनय करने वाले संजय सैनी का कहना है कि दूरदर्शन पर रामलीला के प्रदर्शन के बाद से तो इन रामलीलाओं का क्रेज ही समाप्त हो गया है।
झुंझुनू जिले के मानोता गांव के 50 वर्षीय भागीरथ रामलीला वाले ग्रामीण क्षेत्र में रामलीला के पितामह माने जाते हैं। विगत 37 वर्षो से अनवरत रामलीला कर रहें हैं। उनके दो भाई मदन व रामनिवास की रामलीला मंडलियां भी क्षेत्र में सक्रियता से कार्यरत हैं। इन तीनों भाइयों के अभिनय और काबलीयत को लोग दाद देते नही थकते थे । मगर भागीरथ अब रामलीला से खिन्न हैं। क्योंकि लोगों की आस्था रामलीला के प्रति तेजी से खत्म होती जा रही हैं। अब एक-एक पैसे के लिए लोगों को कहना पड़ता हैं पहले ऐसा नही था। पहले लोगों द्वारा रामलीला मंडलियों को अपने घरों पर बुलाकर बड़े प्रेम के साथ भोजन करवाया जाता था। भागीरथ नही चाहते कि उनकी अगली पीढियां रामलीला करें । उनका कहना है कि मुझे तो अब इस धंधे से घृणा होने लगती हैं। रामलीला के बहाने कुछ राम भक्ति हो जाती हैं। इस कारण यह कार्य कर रहा हँू।
गुढागौडज़ी कस्बे के रामावतार शर्मा द्वारा रामलीला में हनुमानजी के पार्ट की सजीव प्रस्तुती की जाती थी। संजीवनी बूटी लाते वक्त जब वे सौ फीट की ऊॅंचाई से सीने के बल रस्सी पर चल कर नीचे आते वक्त दर्शक रोमांचित हो उठते थे। मगर रामलीला में काम करने वाले वरिष्ठ कलाकार धीरे-धीरे उपेक्षित हो अन्य लाईन में जा रहें हैं। रामलीला मंडलीयों से जुड़े कलाकार इसी रवैये से व्यथित हैं। उनका कहना है कि चकाचौंध के दौर में रंगमंच पिट रहा हैं। उनके पास इतने पैसे भी नही है कि वे आधुनिक थियेटर के गुणों वाले मंच गांवों में तैयार करें और वैसी आय की उम्मीद भी गांवों में नही हैं। सरकारी स्तर पर भी इन रामलीला मंडलियों को कोई सहायता या संरक्षण नही मिल पाता हैं।

वंशवाद से छुटकारा लाभकारी
– डॉ हिदायत अहमद खान
वंशवाद पर जारी बहस ने राजनीतिक समुद्र को एक तरह से मथ कर रख दिया है। अब चूंकि मंथन हुआ है तो अमृत चखने के लिए तमाम नेता लाइन पर खड़े नजर आ रहे हैं, इनमें कुछ ऐसे भी हैं जो अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए बयान पर बयान दिए चले जा रहे हैं। ऐसे बयानवाज नेता संभवत: यह भूल गए कि इससे पहले तो वंशवाद का सबसे ज्यादा राग उन्हीं के द्वारा या उनकी पार्टी द्वारा ही अलापा गया था, अब उसी बात को किसी और ने कह दिया तो मानों बहुत बड़ा अपराध हो गया हो, ऐसा प्रचारित किया जा रहा है। खास बात यह है कि वंशवाद के लिए सदा विरोधियों के निशाने में रहने वाली कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस मंथन के जिम्मेदारी अपने सिर ले ली है। दरअसल उन्होंने अमेरिका में वंशवाद के मुद्दे ऐसा कुछ कह दिया कि उसकी गूंज अब देश के राजनीतिक गलियारे में ही नहीं बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी सुनाई दे रही है। उनके विरोधी इस कदर हमले कर रहे हैं कि मानों यह मुद्दा हाथ से निकला तो समझो राजनीति ही खत्म हो जाएगी। दरअसल अमेरिका दौरे के दौरान राहुल ने राजनीतिक पार्टियों में वंशवाद से जुड़े एक सवाल पर कह दिया था कि यकीनन हिन्दुस्तान में ज्यादातर पार्टियों के अंदर वंशवाद की समस्या है। इसलिए हम पर ही केंद्रित मत हो जाइए। उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए सुबूत दिए कि अखिलेश यादव डायनेस्ट तो स्टालिन भी डायनेस्ट हैं। धूमल के बेटे डायनेस्ट तो अभिषेक बच्चन भी डायनेस्ट हैं। इस प्रकार देखा जाए तो भारत इसी तरह से चल रहा है। बात साफ है कि राहुल वंशवाद को नकारते नहीं हैं बल्कि एक पार्टी विशेष को वंशवाद रुपी चश्में से देखने वाले नजरिए को बदलने की वकालत करते हैं। चूंकि आंखों में चढ़ाए गए विशेष चश्में को बदलने की बात है, इसलिए सभी को बुरी लग रही है। फिर राजनीति ही नहीं बिजनेस और इन्फोसिस के भी उदाहरण दिए जाते हैं जहां वंशवाद प्रभावी है। इसके साथ ही राहुल की यह बात मायने रखती है कि असली सवाल यही है कि जो शख्स जिस पद की जिम्मेदारी उठा रहा है क्या वह उसके काबिल है, यह देखने वाली बात है न कि वंशवाद के नाम पर काबिल और मेहनती शख्स को भी पीछे धकेल देने की राजनीति करना। इस पर विचार करने की आवश्यकता है, लेकिन यह संभव नहीं है क्योंकि इस बात को लेकर हमले हो सकते हैं विचार नहीं। यदि यकीन नहीं आता तो विरोधियों के बयानों को ही देख लें। सबसे पहले केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली का बयान आता है जिसमें वो कहते देखे जाते हैं कि राहुल के वंशवाद वाले बयान की वजह से वह शर्मिंदा हुए हैं। इसी प्रकार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह वंशवाद पर विचार रखने की बजाय राहुल पर हमले करते देखे गए। शाह ने राहुल को निशाने पर लेते हुए कहा कि वंशवाद कांग्रेस की खासियत हैं, भारत का स्वभाव नहीं है। इसे समूचे भारत पर नहीं थोपा जाना चाहिए। इस पर सवाल यही है कि आखिर कोई दूसरा आकर तो यह कहता नहीं है कि आप अपने परिवार के सदस्य या करीबी को ही आगे बढ़ाएं फिर क्या वजह है कि भाजपा के अंदर ही ऐसे न जाने कितने परिवार हैं जिनका सिलसिला राजनीतिक परिपाटी को आगे बढ़ाने वाला रहा है। इनमें अनेक उद्योगपति हैं तो कई अन्य क्षेत्रों के धुरंधर हैं, फिर हमेशा ही गांधी परिवार और कांग्रेस की ही बात क्यों की जाती है। इसलिए यदि इस विषय को उठाना ही है तो फिर समस्त राजनीतिक पार्टियों और कारोबार को सामने रखकर उठाया जाना चाहिए। तब मालूम चल सकेगा कि वंशवाद का रेशो किस पार्टी और संगठन में कितना है। इससे पहले कि इस पर शोध शुरु हो भाजपा नेता नाराज होकर मुखर होने लगते हैं, ताकि जो ढंगा-छिपा है उसे वहीं रहने दिया जाए और वो जो कह रहे हैं और दिखाने की कोशिश कर रहे हैं वही सुना और देखा जाए। अन्यथा मौटे तौर पर ही देख लें कि देश के बड़े कद्दावर कितने नेता हैं जिनके परिजन और करीबी राजनीति से दूर बिना किसी मदद के कोई और काम-धंधा करने में लगे हुए हैं। यहां सवाल यह भी है कि आखिर वंशवाद पर भाजपा को ही क्यों बुरा लगा क्योंकि इसकी जद में तो शिवसेना से लेकर सपा, राजद जैसी अनेक पार्टियां भी आ जाती हैं। बल्कि विचारणीय यह है कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव तो वंशवाद संबंधी बयान को लेकर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। उनकी नजर में भारत की क्या बात की जाए अमेरिका तक में एक ही परिवार के लोग राजनीति में आगे बढ़ते नजर आते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति के तौर पर बुश और क्लिंटन के वंश को देखा जा सकता है। इस प्रकार अभी तक कांग्रेस के लिए जिस वंशवाद को अपराध ठहराया जाता रहा है उसे राहुल ने एक शक्ति के तौर पर पेश किया है और यही वजह है कि विरोधी इस कदर आग-बबूला हुए जा रहे हैं। अंतत: वंशवाद के नाम पर अयोग्य को आगे बढ़ाना नाकाबिलेबर्दाश्त होता है, लेकिन काबिल इंसान को वंशवाद के नाम पर पीछे धकेल देना उचित नहीं कहा जा सकता है।

खतरनाक है घाटी में रोहिंग्या मुस्लिमों के पक्ष में एकजुटता
-प्रमोद भार्गव
जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में घाटी में घुसपैठ करके आए रोहिंग्या मुस्लिमों के पक्ष में और म्यांमार में इनके विरुद्ध चल रही सैनिक दमन कार्यवाही के विरोध में अलगाववादियों का प्रदर्शन हैरानी में डालने वाला है। यह प्रदर्शन तब और आश्चर्य में डालता है, तब एसआईटी ने सात अलगाववादियों के खिलाफ कार्यवाही को अंजाम दिया है। इससे साफ होता है कि अलगाववादियों की एक बड़ी श्रृंखला घाटी में अभी भी मौजूद है, जो पाकिस्तान से आर्थिक मदद लेकर स्थानीय लोगों को प्रदर्शन के लिए उकसाने का काम कर रही है। इस प्रदर्शन में जनता और पुलिस के बीच टकराव हुआ डीएसपी मोहम्मद यूसुफ को भीड़ ने इतना पीटा कि उनका घायल अवस्था में इलाज चल रहा है। शुक्रवार 8 सितंबर को जुमे की नमाज के बाद यह उपद्रव हुआ। शरारती तत्वों ने पुलिस पर पथराव भी किया। रोहिंग्याओं के पक्ष में इस प्रदर्शन और पथराव से साबित होता है कि अलगाववादी घुसपैठिये रोहिंग्याओं के समर्थन में तो हैं, लेकिन कश्मीर मूल के विस्थापित पंडितों के वापसी के पक्ष में नहीं है। लिहाजा रोहिंग्याओं को सख्ती से खदेड़ने की जरूरत है, अन्यथा ये मुस्लिम घाटी के लिए ही नहीं, बल्कि देश जिन-जिन क्षेत्रों में भी इन घुसपैठियों ने डेरा डाला हुआ है, वहां-वहां ये भविष्य में बड़े संकट का सबब बन जाएंगे।
म्यांमार में सेना के दमनात्मक रवैये और पड़ोसी बांग्लादेश सरकार का रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ सख्त रवैये के चलते भारत में लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पिछले पांच साल में भारत में रोहिंग्या मुसलमानों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई हैं। जम्मू-कश्मीर में 15,000 और आंध्रप्रदेश में 3800 से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमानों ने अवैध रूप से घुसपैठ करके शरण ले रखी है। ये शरणार्थी भारत छोड़ने को तैयार नहीं हैं। जबकि भारत के पड़ोसी देश म्यांमार में रोहिंग्या विद्रोहियों और सेना के बीच टकराव थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस टकराव में अब तक 400 से भी ज्यादा रोहिंग्याओं की मृत्यु हो चुकी है। सेना ने इन्हें ठिकाने लगाने के लिए जबरदस्त मुहिम छेड़ रखी है। नतीजतन डेढ़ लाख से भी ज्यादा रोहिंग्या म्यांमार से पलायन कर चूके हैं। म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध धर्मावलंबी है। जबकि इस देश में एक अनुमान के मुताबिक 11 लाख रोहिंग्या मुस्लिम रहते हैं। इनके बार में धारणा है कि ये मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। इन्होंने वहां के मूल निवासियों के आवास और आजीविका के संसाधनों पर जबरन कब्जा कर लिया है। इस कारण सरकार को इन्हें देश से बाहर निकालने को मजबूर होना पड़ा है। भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने इन शरणार्थियों पर आंतकी समूहों से संपर्क होने की आशंका जताई है।
कुछ दिनों पहले गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू ने संसद में जानकारी दी थी, कि सभी राज्यों को रोहिंग्या समेत सभी अवैध शरणार्थियों को वापस भेजने का निर्देश दिया है। सुरक्षा खतरों को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। आशंका जताई गई है कि 2015 में बोधगया में हुए बम विस्फोट में पाकिस्तान स्थित आंतकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने रोहिंग्या मुस्लिमों को आर्थिक मदद व विस्फोटक सामग्री देकर इस घटना को अंजाम दिया था। जम्मू के बाद सबसे ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थी हैदराबाद में रहते हैं। केंद्र और राज्य सरकारें जम्मू-कश्मीर में रह रहे म्यांमार के करीब 15,000 रोहिंग्या मुसलमानों की पहचान करके उन्हें अपने देश वापस भेजने के तरीके तलाश रही हैं। रोहिंग्या मुसलमान ज्यादातर जम्मू और साम्बा जिलों में रह रहे हैं। ये लोग म्यांमार से भारत-बांग्लादेश सीमा, भारत-म्यांमार सीमा या फिर बंगाल की खाड़ी पार करके अवैध तरीके से भारत आए हैं। अवैध तरीके से रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों के मुददे पर केंद्रीय गृह सचिव राजीव महर्षि ने उच्चस्तरीय बैठक बुलाई थी। इस बैठक में जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव बलराज शर्मा और पुलिस महानिदेशक एसपी वैद्य ने भी हिस्सा लिया था। आंध्र प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के अलावा असम, पश्चिम बंगाल, केरल और उत्तर प्रदेश में कुल मिलाकर लगभग 40,000 रोहिंग्या भारत में रह रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर देश का ऐसा प्रांत है, जहां इन रोहिंग्या मुस्लिमों को वैध नागरिक बनाने के उपाय स्थानीय सरकार द्वारा किए जा रहे हैं। इसलिए अलगाववादी इनके समर्थन में उतर आए हैं। इस परिप्रेक्ष्य में अक्टूबर 2015 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कहा था कि जम्मू में 1219 रोहिंग्या मुस्लिम परिवारों के कुल 5107 सदस्य रह रहे हैं, जिनमें से 4912 सदस्यों को संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त ने शरणार्थी का दर्जा दिया है। जून 2016 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा में मुख्यमंत्री महबूबा मुती ने बताया था कि म्यांमार और बांग्लादेश से आए करीब 13,400 शरणार्थी राज्य के विभिन्न शिविरों में रह रहे हैं। यह गौर करने लायक है कि जम्मू-कश्मीर के मौजूदा हालात में विस्थापित पंडित कश्मीर में अपने घरों में वापस नहीं लौट पा रहे हैं, जबकि रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठिये आश्रय पाने में सफल हो रहे हैं। यह तब हो रहा है, जब जम्मू-कश्मीर में भाजपा के सहयोग से महबूबा मुती सरकार चला रही हैं। इनका यहां बसना इसलिए खतरनाक है, क्योंकि यहां इस्लाम धर्म और पाकिस्तानी शह के कारण आतंकवादी और अलगाववादी संघर्ष छेड़े हुए हैं। ऐसे में धर्म के आधार पर आतंकी इन्हें भारत के खिलाफ बरगला सकते हैं। यह आशंका इसलिए भी संभव है क्योंकि हाफिज सईद को आईएसआई का समर्थन प्राप्त है, इसलिए वह कालांतर में जम्मू-कश्मीर के शरणार्थी शिविरों में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों के युवाओं को जिहाद के लिए भड़काने का काम कर सकता है ? लिहाजा इन्हें शरणार्थी के रूप में यहां बसाना देशहित में नहीं है।
पांच साल से भी ज्यादा वर्षो से यहां रह रहे शरणार्थियों ने भारत सरकार से मानवीय आधार पर वापस भेजने की योजना को टालने का अनुरोध किया है। क्योंकि म्यांमार और बांग्लादेश इन रोहिंग्याओं को भारत सरकार के कहने पर भी किसी भी हाल में वापस लेने को तैयार नहीं हैं। ऐसी परिस्थिति में संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठन भारत पर दबाव डाल रहे हैं कि वह इन मुसलमानों को योजनाबद्ध तरीके से भारत में बसाने का काम करें। जबकि इसके उलट मानवाधिकार समूह ह्यूमन राइट्स वॉच ने हाल ही में उपग्रह द्वारा ली गई तस्वीरों के आधार पर दावा किया है कि म्यांमार की सेना ने रोहिंग्याबहुल करीब 3,000 गांवों में आग लगा दी हैं। जिनमें से 700 से भी ज्यादा घर जलकर तबाह हो गए हैं। इस सैन्य अभियान के कारण 40,000 रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश की सीमा पर डेरा डाले हुए हैं और 20,000 से भी ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थी म्यांमार व बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाकों में फंसे हैं। इस हकीकत के समाचार भी टीवी और अखबारों में आ चुके हैं। इस हकीकत से रूबरू से होने के बाबजूद संयुक्त राष्ट्र और ह्यूमन राइट्स वॉच म्यांमार पर तो कोई नकेल नहीं कस पा रहे हैं किंतु भारत पर इन घुसपैठियों पर सिलसिलेबार बसाने का दबाव बना रहे हैं। यही नहीं म्यांमार सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के इस दावे को झुठलाते हुए कहा है कि रोहिंग्या विद्रोहियों ने सेना के 13 जवानों, दो अधिकरियों और 14 नागरिकों की हत्या की है। नतीजतन जवाबी कार्रवाई में सेना को सख्त कदम उठाना पड़ा है। बौद्ध बहुल म्यांमार में रोहिंग्याओं पर कई तरह के प्रतिबंध हैं और रोहिंग्या म्यांमार सरकार पर नस्लीय हिंसा का आरोप भी लगा रहे हैं। बाबजूद सेना विद्राहियों का दमन करने में लगी है। हैरानी इस बात पर भी है कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने म्यांमार की दो दिनी यात्रा की है, लेकिन उन्होंने द्विपक्षीय वार्ता में इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी।
जबकि विश्व के तेरह नोबेल पुरस्कार विजेताओं और दस वैश्विक नेताओं ने एक संयुक्त बयान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ हो रही हिंसा पर म्यांमार को सख्त संदेश देने की मांग की है। राष्ट्र संघ के पूर्व महासचिव और रखाइन राज्य को लेकर बने म्यांमार एडवाइजरी कमीशन के अध्यक्ष कॉफी अन्नान ने कहा है कि ’पत्रकारों को नरसंहार का ठप्पा लगाने से बचना चाहिए। विश्व अब जान चुका है कि वहां अब क्या हो रहा ?’ बांग्लादेश पहुँचने वाले शरणार्थियों ने वहां के भयावह हालात बयान किए हैं। विश्व के प्रतिष्ठित लोगों की मांग, एक तरह से बांग्लादेश की सरकार की मांग का ही दोहराव है। बांग्लादेश सरकार मांग करती रही है कि म्यांमार अपने नागरिकों को वापस बुला ले क्योंकि वो बांग्लादेशी नहीं हैं, जैसा कि झूठ म्यांमार बोलता रहा है। रोहिंग्याओं पर सरकार का आरोप है कि रोहिंग्याओं के कई समूह बौद्ध महिलाओं के साथ दुराचार करने के साथ पुलिस पर भी हमला कर रहे हैं। रोहिंग्याओं की इन हरकतों से साफ है कि इनकी कश्मीर और हैदराबाद जैसे मुस्लिम क्षेत्रों में बसाहट कभी भी जिहदी प्रकृति का हिस्सा बन सकती है। (लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)

सरदार सरोवरः शुभारंभ
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सरदार सरोवर बांध का निर्माण भारत की एक एतिहासिक उपलब्धि है। नर्मदा नदी पर बांध खड़ा करने का सपना सरदार पटेल ने देखा था और जवाहरलाल नेहरु ने 1961 में इसकी नींव रखी थी। यह सौभाग्य नरेंद्र मोदी को मिला कि उन्होंने अपने जन्मदिन पर इसका उद्घाटन किया। इस बांध का लाभ सिर्फ गुजरात को ही नहीं, मप्र, राजस्थान और महाराष्ट्र को भी मिलेगा। यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बांध है। इस बांध के जलाशय का फैलाव 37,000 हैक्टेयर होगा। इसके पानी से गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के लगभग 22 लाख हेक्टेयर की सिंचाई होगी। 131 शहरों को पीने का स्वच्छ पानी मिलेगा। हजारों गांवों को बिजली भी मिलेगी। गुजरात से ज्यादा महाराष्ट्र और मप्र को मिलेगी। इस बांध की ऊंचाई पहले तो सिर्फ 90 मीटर रखी गई थी लेकिन अब यह 138.68 मीटर हो गया है। इस बांध से जुड़ी नहरें गुजरात के कच्छ-जैसे सूखे इलाकों को हरा-भरा कर देंगी। इस बांध के विरुद्ध बहन मेधा पाटकर पिछले कई वर्षों से जबर्दस्त आंदोलन चला रही हैं। उनकी यह बात सही है कि इस बांध के बंध जाने से मप्र के लगभग 4 हजार परिवार उजड़ गए हैं। गांव के गांव खत्म हो गए हैं। हजारों लोग शरणार्थी हो गए हैं। उनके रहने, खाने और रोजगार का कोई ठिकाना नहीं है। ये लोग प्रायः ग्रामीण हैं, गरीब हैं, बेजुबान हैं। इनके लिए बोलनेवाला कोई नहीं है। इन्हें फिर से बसाने का जिम्मा सरकार का है। राज्य-सरकारों का है। केंद्र सरकार का है। चारों प्रांतों और केंद्र सरकार को इन विस्थापित लोगों की मांग पर तुरंत ध्यान देना चाहिए। इन मामलों में हमारी सरकारों को चीन से कुछ सीखना चाहिए। चीन में मैंने देखा है कि बड़े-बड़े निर्माण-कार्यों के लिए शहर के शहर खाली करवा लिए जाते हैं और हजारों-लाखों लोगों का बेहतर पुनर्वास करवा दिया जाता है। जब बड़े काम होते हैं तो कुछ लोग को कुछ न कुछ कुर्बानी तो करनी पड़ती ही है लेकिन उसकी भरपाई करना हर सरकार का धर्म है। मोदी को कांग्रेसियों की इस आलोचना पर भी ध्यान देना होगा कि अब तक सिर्फ 3 लाख हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई के लिए नहरें बनी हैं जबकि वह 22 लाख हेक्टेयर पर होना है। उनका आरोप है कि गुजरात का चुनाव जीतने के खातिर मोदी इस अधपकी खिचड़ी पर ही टूट पड़े हैं। जो भी हो यह एक अच्छी शुरुआत, एक शुभारंभ है। इसी तरह के कई बांध अभी देश के पूर्व और दक्षिण में भी बनने हैं।

पेट्रोल-डीजल खरीदने वाले भूखे नहीं मरते!
-ऋतुपर्ण दवे
अब तक सभी यह मानते थे कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल की कीमतें घटती हैं तो असर भारत में भी दिखता है। लेकिन अब यह बीते दिनों की बात हो गई है। फिलाहाल ठीक उल्टा है। विश्व बाजार में दाम घट रहे हैं, हमारे यहां लगातार बढ़ रहे हैं। लोगों की चिन्ता वाज़िब है। आखिर यह खेल है क्या? शायद यह हमारी नीयति है या राजनैतिक व्यवस्था का खामियाजा? जो भी कहें सच्चाई यही है कि टैक्स बढ़ाकर घटती कीमतों से सरकारखजाना तो भर रहा है लेकिन बोझ आम आदमी के कंधों पर ही है। लोकतांत्रिक सरकार और लोकतांत्रिक भगवान (मतदाता) के बीच इतना विरोधाभास क्यों और कब तक? यह सच है कि पेट्रोल-डीजल के दाम बीते तीन वर्षों की अधिकतम ऊंचाइयों पर हैं। लेकिन उससे भी बड़ा सच यह कि विश्व बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगभग आधी हैं। जून, 2014 में जो कच्चा तेल लगभग 115 डॉलर प्रति बैरल था, वही अब बहुत नीचे गिरकर 50-55 डालर के आस-पास स्थिर है। दाम घटने के बावजूद नवंबर 2014 से लगातार 9 बार डीजल-पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई गई। उस समय पेट्रोल पर एक्‍साइज ड्यूटी 9.20 रुपए थी जो जनवरी 2017 तक बढ़कर 21.48 रुपए हो गई है। इसी तरह नवंबर 2014 में डीजल की एक्‍साइज ड्यूटी 3.46 रुपए, जनवरी 2017 तक 17.33 रुपए हो गई।26 मई 2014 को जब मोदी सरकार ने शपथ ग्रहण किया तब कच्चे तेल की कीमत 6330.65 रुपये प्रति बैरल थी जो अभी पिछले हफ्ते ही आधी घटकर लगभग 3368.39 रुपये प्रति बैरल हो गई। 16 जून से पूरे देश में डायनामिक प्राइसिंग लागू होने से हर रोज सुबह 6 बजे पेट्रोल-डीजल के दाम बदल जाते हैं। सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि मौजूदा सरकार के आने के बाद से डीजल पर लागू एक्साइज ड्यूटी में 380% और पेट्रोल पर 120% की वृध्दि हो चुकी है। कई राज्यों में पेट्रोल के दाम 80 रुपए के पार जा चुके हैं। 17 सितंबर को मुंबई में पेट्रोल 79.62 रुपए,डीजल 62.55 रुपए, दिल्ली में पेट्रोल 70.51 रुपए, डीजल 58.88 रुपए प्रति लीटर रहा। उपभोक्ता की दृष्टि से देखें तो विश्व बाजार की मौजूदा कीमतों की तुलना में यहां प्रति लीटर भुगतान की जाने वाली कीमत का लगभग आधा पैसा ऐसे टैक्सों के जरिए सरकार के खजाने में पहुंच रहा है। बढ़े दामों का 75 से 80 प्रतिशत फायदा सरकारी खजाने में जबकि उपभोक्ताओं को केवल 20-25 प्रतिशत ही मिल पाया। अर्थशास्त्रियों के अनुमान पर जाएं तो पिछले तीन साल में कम से कम 5 लाख करोड़ रुपये सरकार के पास जमा हुए हैं। बड़ी विडंबना देखिए केन्द्रीय पर्यटन मंत्री अल्फोंज कन्ननाथनम पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों पर कहते हैं- “जो लोग पेट्रोल डीजल खरीद रहे हैं वो गरीब नहीं है और ना ही वो भूखे मर रहे हैं। पेट्रोल-डीजल खरीदने वाले कार और बाइक के मालिक हैं। उन्हें ज्यादा टैक्स देना ही पड़ेगा। सरकार को गरीबों का कल्याण करना है, और इसके लिए पैसे चाहिए इसलिए अमीरों पर ज्यादा टैक्स लग रहा है। गरीबों का कल्याण कर हर गांव में बिजली देना है, लोगों के लिए घर और टॉयलेट बनाना। इन योजनाओं को अमली जामा पहनाने है जिसके लिए काफी पैसा चाहिए इसलिए उन लोगों पर टैक्स लगा रहे हैं जो चुकाने में सक्षम हैं।” इस अंकगणित को कौन झुठलाए कि आम आदमी की जेब पर केवल पेट्रोल और डीजल का खर्चा नहीं बढ़ता है, हर चीज महंगी होती है। परिवहन कर जो सामान एक-दूसरी भेजा जाता है, महंगा होता है। इससे उसकी लागत बढ़ जाती है, मुद्रा स्फीति भी बढ़ती है, और थोक मूल्य सूचकांक में वृध्दि होती है। उन्मुक्त बाजार के नाम पर पेट्रोलियम की कीमतों में दखल न देकर उपभोक्ताओं का हिस्सा मारा जा रहा है। सरकार की कमाई बची रहे इसलिए केंद्र और राज्यों ने इसे जीएसटी से भी बाहर रखा है। क्या राजस्व जुटाने के लिए मौजूदा सरकार के पास सिवाए पेट्रोलियम पर टैक्स वसूलने के दूसरा कोई रास्ता नहीं है? क्या पेट्रोलियम मंत्री के ट्वीट कि दुनिया के कई देशों में भारत से महंगा पेट्रोल-डीज़ल मिलता है, हम विकसित या विकासशील देशों के बराबर पहुंच जाएंगे? दूर नहीं पड़ोस में ही देखें पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में पेट्रोल-डीजल के दाम हमसे कम हैं। क्या हम उनसे भी पीछे हैं, क्या उनको सरकारी खजाने में ज्यादा धन की जरूरत नहीं है, क्या उन्हें विकास और गरीबों के कल्याण की चिन्ता नहीं है? मई 2008 में जब यूपीए सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दामों में चार साल बाद वृध्दि की थी तब इसी भाजपा ने सरकार पर आर्थिक आतंकवाद के आरोप मढ़े थे और आज खुद ही उससे भी आगे नक्शे कदम पर है। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान की जीएसटी काउंसिल से पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के दायरे में लाने की अपील के अमल में आने के बाद देश भर में समान कीमतों पर एक्साइज का क्या असर होगा इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। फिलाहाल केन्द्रीय मंत्री अल्फोंज कन्ननाथनम के शब्दों की अनुगूंज ही काफी है जिसमें कहते हैं वो जो लोग पेट्रोल डीजल खरीद रहे हैं वो गरीब नहीं है और ना ही वो भूखे मर रहे हैं। लोग एक-दूसरे से पूछते हैं क्या यही अच्छे दिन हैं और देश बदल रहा है?

दक्षिण एशिया में नया शीतयुद्ध
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत-जापान संयुक्त घोषणा पर आज चीनी प्रवक्ता ने जो प्रतिक्रिया दी है, उससे साफ जाहिर होता है कि दक्षिण एशिया में अब एक नया शीतयुद्ध शुरु हो गया है। इस शीतयुद्ध के एक खेमे में अमेरिका, भारत और जापान हैं और दूसरे खेमें में चीन और पाकिस्तान है। जहां तक रुस का प्रश्न है, वह अभी बीच में हैं लेकिन ऐन मौके पर वह भी दूसरे खेमे के साथ जाना पसंद करेगा। यदि पूरी तरह से नहीं तो भी कई मुद्दों पर वह चीन और पाकिस्तान का साथ देगा। इसका अर्थ यह हुआ कि दक्षिण एशिया में एक अघोषित शीतयुद्ध शुरु हो चुका है। इस शीतयुद्ध को मुखरता प्रदान की है, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे की भारत-यात्रा ने। इस यात्रा के दौरान ऐसे कई समझौते हुए, जो चीन का नाम लिये बिना, उसकी नीतियों को चुनौती देते हैं। इस यात्रा के पहले ही दोकलाम-विवाद में जापान ने भारत का समर्थन कर दिया था। जापान और भारत ने चीन का नाम नहीं लिया लेकिन उन दोनों ने चीन की दुखती रग पर उंगली रख दी। दक्षिण चीन सागर और प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों ने सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान, स्वतंत्रतापूर्वक व्यापार और यात्रा तथा अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने का आह्वान किया। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय इस मामले में चीन के एकाधिकार के विरुद्ध फैसला दे चुका है। इसी प्रकार ‘ओबोर’, उ. कोरिया, सामरिक सहकार, बुलेट ट्रेन, परमाणु-सहयोग, आतंकवाद, एशिया-अफ्रीका में वैकल्पिक जल-थल मार्ग निर्माण आदि मुद्दों पर भारत और जापान की सहमति चीन को सीधी चुनौती है। चीन को चुभनेवाली सबसे नुकीली बात यह है कि जापान अब भारत-चीन सीमांत पर स्थित अरुणाचल और लद्दाख में भी निर्माण कार्य शुरु करेगा। इसी बात पर चीन चिढ़ गया है। चीनी प्रवक्ता ने अपना एतराज जाहिर करते हुए कहा है कि भारत-चीन सीमा-विवाद में किसी तीसरे देश का टांग अड़ाना ठीक नहीं है। जापान और भारत किसी गुप्त योजना को तो लागू नहीं कर रहे हैं ? चीन के इन संदेहों को पाकिस्तान में भी काफी हवा दी जा रही है। वहां मांग यह उठ रही है कि पाकिस्तान अब डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका का बहिष्कार करे और पूरी तरह चीन का पल्ला पकड़ ले। लेकिन ऐसी मांग करनेवाले यह क्यों नहीं समझ रहे कि पाकिस्तान का समर्थन चीन उसी पैमाने पर करने की सामर्थ्य नहीं रखता, जिस पैमाने पर अमेरिका करता रहा है। जो भी हो, यह शीतयुद्ध तो शुरु हो गया है। हम आशा करें कि यह गर्म युद्ध में कभी नहीं बदलेगा।

आखिर देशभक्ति के मायने क्या हैं?
-प्रो.शरद नारायण खरे
बहुत सारे विशेषण इस समय प्रचलित दिखाई देते हैं,। वे हैं-राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय हित, वतनपरस्ती, देशभक्ति आदि। तो प्रश्न यह उठता है, कि आखिर इन सब के निहितार्थ क्या हैं, और कैसे कोई व्यक्ति देशभक्त बन सकता है,। वास्तव में , यदि देखा जाए तो राष्ट्र के हित में काम करना ही देशभक्ति है, और राष्ट्र का अहित करना ही गद्दारी है, मुल्क के साथ विश्वासघात है।
अब सवाल यह है कि क्या ठीक से राष्ट्रगान“ जन गण मन अधिनायक जय है………“ गाना, भारत माता की जय बोलना, वंदे मातरम के नारे लगाना – यह ही राष्ट्रीयता/देशभक्ति है या इससे कुछ अलग हटकर काम करना देशभक्ति है? आजकल सोशल मीडिया पर तो पाकिस्तान मुर्दाबाद, नबाज शरीफ चोर है, इंडियन आर्मी जिंदाबाद, कश्मीर हमारा है, पाकिस्तान को चीर देंगे, पाकिस्तान का नामोनिशान मिटा देंगे- जैसे नारों व गर्जनाओं का प्रयोग ही देशभक्ति के रूप में माना जा रहा है। फेसबुक, व्हाट्सएप ट्यूटर इत्यादि पर जो इन नारों व उक्तियों का समर्थन लाइक/कमेंट करता है वह देशभक्त है, अन्यथा नहीं।
हकीकत तो यह है कि इस समय देश में देशभक्ति व देशद्रोहिता को लेकर एक बहस सी छिड़ी हुई है। राजनेता तो मल्लयुद्व करने में जुटे ही हैं देश का हर नागरिक व्यापारी, उद्योगपति, वकील इंजीनियर, अधिकारी, छोटा व्यापारी, मजदूर, विद्यार्थी, पत्रकार, चाय-पान की गुमटियों-ठेलों पर खडे होने वाले लोग भी देशभक्ति व देशद्रोहिता को परिभाषित करने में लगे हुए हैं।
बॉलीबुड के आमिर खान, शाहरूख खान, सलमान खान जैसे स्टार्स व निर्माता-निर्देशक भी दो खेमों में बंटे हुए हैं। एक कहता है कि पाकिस्तानी कलाकारों को फिल्मी दुनिया से भगा देना ही देशभक्ति है, तो दूसरा कहता है कला स्वंतत्र होती है उसे संकीर्णता के दायरे में बांधना कतई उचित नहीं है। मोटी रकम लेकर मंच पर ओज के
साथ कविता पढ़ने वाला कवि चीख-चीखकर “ कश्मीर हमारा है“ “पाकिस्तान का नामोनिशान मिटा देंगे“ जैसी कविताएं पढ़कर अपने देशभक्त होने का सबूत देता है। न वह इन्कम टेक्स भरता है, पर वह अपने को कविताओं के माध्यम से देशभक्त प्रमाणित करता है। तो अन्य कोई अन्य तरह का प्रपंच करके। अब सवाल यह है कि क्या कालेधन को कोसने से, या कालेधन के स्वामियों को बददुआएं देने से हम देशभक्त हो गए ?
हाल ही में 500-1000 की नोटबंदी ने भी देशवासियों को दो खेमों में बांट दिया है। यह तो सही है कि कालाधन व जाली मुद्रा पर लगाम कसने के लिए ही यह बड़ा कदम उठाया गया है, पर इस कदम से भी देश में दो वर्ग पैदा हो गए है। इस नई नीति का समर्थन करना देशभक्ति व इसका विरोध करना देशद्रोहिता माना जा रहा है। वास्तव में, बड़े नोटों पर प्रतिबंध लगाना यह उचित भी है, क्योकि इसके पीछे सरकार की स्पष्ट मंशा है। पर केवल यही देशभक्ति नहीं है, बल्कि इसके साथ अन्य अनेक महत्वपूर्ण कार्य व आचरण किए जाना भी देशभक्ति को प्रमाणित करने के लिए अपरिहार्य है। वस्तुत: देश के हितों की रक्षा करना ही देशभक्ति है, वास्तव में, देशभक्ति के मूल निहितार्थ सच्चे नागरिक होने में है। जो अपने को धर्म ,जाति भाषा, क्षेत्र की संकीर्णता से ऊपर उठाकर भारतीयता का आचरण करता है, तथा राष्ट्र की एकता को मजबूत करने में अपना योगदान देता है, वह ही सच्चा देशभक्त प्रमाणित होता है। वह व्यक्ति जो भारत के संविधान को न केवल दिल से मानता/स्वीकारता है, बल्कि भारत की न्यायपालिका,विद्यायिका, कार्यपालिका का सम्मान करता है, और विधि के दायरे में रहकर आचरण करता है, वह इनसान ही देशभक्त माना जाता है।
रिश्वत न खाना, कमीशनखोरी न करना, कर्त्तव्यपरायण-ईमानदार, रहना, कालाबाजारी- कर चोरी व जमाखोरी न करना, सभी प्रकार के टैक्स जिनके दायरे में व्यक्ति आता है, को चुकाना, पूरा आयकर भरना, बेनामी सम्पति न रखना, सबकुछ विधिवत्् घोषित करना, फर्जी नामों से खरीददारी न करना ये सभी तत्व देशभक्ति को प्रमाणित करने वाले गुणधर्म होते हैं, जिनको आचरण में उतारने वाला ही देशभक्त माना जाता है।
प्राय: हम बाजार से जो साम्रगी क्रय करते है, हम प्राय: पक्का बिल नहीं लेते हैं। या उसकी मांग करने पर जब दुकानदार हमसे कुछ अधिक भुगतान मांगने लगता है, तो हम अपने लाभ के लिए कच्चा बिल स्वीकार कर लेते है। पर देशभक्ति का यही
तकाजा है कि हमें चाहे अधिक भुगतान ही क्यों न करना पड़े, पर कभी भी हमें कच्चा बिल स्वीकार करके विक्रेता को कर चोरी का अवसर उपलब्ध नहीं कराना चाहिए, अन्यथा हमारी देशभक्ति पर प्रश्नचिंह लग जाएगा। रिश्वत लेने व देने काम करना, दतर में काम के घंटों में गप्पबाजी करना, सरकारी नीतियों की आलोचना करना, अफवाहें फैलाना, तनाव फैलाना, मजहबी उन्माद फैलाना, हड़तालें करना, तोडफोड करना, सरकारी सम्पति को नुकसान पंहुचाना, राष्ट्रीय विकास में बाधक बनना, कानूनों व आचरण संहिता का उल्लंघन करना, जमाखोरी करना, कालाबाजारी करना, उंचनीच छुआछूत को मानना, मानवाधिकारों का हनन करना, मतदान में भाग न लेना, लोभ में आकर मतदान करना, भारतीय फौजों का मनोबल घटाने की चेष्टा करना, सरकारी धन की हेराफेरी करना, ये सारी बातें देशद्रोहिता की श्रेणी में आती हैं।
अतएव, यदि हमें देशभक्त बनना है, तो हमें इन सारी बुराईयों व विकारो से दूर रहना होगा, क्योंकि ये सारी बातें देशद्रोहिता की परिधि में आती हैं। केवल गाल बजाने या नारेबाजी करने, शगूफा छेड़ने से हम देशभक्त नही बन सकते। बल्कि इसके लिए हमें समुचित तरीके से देशभक्ति व राष्ट्रीयता वाला आचरण करना चाहिए, क्योंकि देशभक्ति के मायने यही हैं।

कर्मठ और विकास प्रिय हमारे प्रधानमंत्री श्री मोदी

डॉ. नरोत्तम मिश्र
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र जी मोदी की 17 सितंबर को जन्म वर्षगांठ पर हार्दिक बधाई। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भारत को समग्र विकास, स्वच्छता, स्वच्छ पर्यावरण, शिक्षा, संचार, स्वास्थ्य और स्वालम्बन में नई पहचान देने का कार्य किया है। इसके साथ ही उन्होंने भारत को विश्व में नई गरिमामय पहचान दिलाने वाले कर्मठ प्रधानमंत्री के रूप में भी अपनी पहचान बनायी है। यह एक महत्वपूर्ण संयोग है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी की ही तरह कर्मशील विकासप्रिय व्यक्ति के रूप में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री चौहान ने भी अलग पहचान बनाई है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान भी बतौर मुख्यमंत्री श्री मोदी की तरह राज्य के सर्वांगीण विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं। श्री मोदी ने गुजरात को विकास का उदाहरण बना दिया। यही कार्य मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री श्री चौहान कर रहे हैं। यह मध्यप्रदेश का सौभाग्य है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी की तरह मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री श्री चौहान ने पं. दीनदयाल उपाध्याय के अन्त्योदय के विचार को क्रियान्वित किया है। इस समय देश और प्रदेश दोनों जगह सक्षम और समर्थ नेतृत्व जनता के कल्याण के लिए सजग और सक्रिय है। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री श्री चौहान ने 17 सितंबरको स्वच्छता के लिए श्रमदान का आव्हान कर जनता को प्रेरित किया है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी का जन्म दिवस सेवा दिवस के रूप में मनाया जाए। जब प्रधानमंत्री श्री मोदी ने प्रधानमंत्री पद का दायित्व संभाला था तब देश की क्या स्थिति थी, यह किसी से छिपा नहीं है। एक व्यापक दृष्टि और राष्ट्र के कल्याण को एक उद्देश्य मानकर कार्य करने वाले प्रधानमंत्री श्री मोदी ने देश के समस्याओं को बहुत नजदीक से देखा है।

दरअसल उन्होंने जनता के नब्ज टटोली है और उसके अनुसार ही अपनी कार्य योजना बनाकर कदम आगे बढ़ाए है। उन्होंने आम व्यक्ति के जीवन स्तर को सुधारने के लिए जिन योजनाओं की कल्पना की उन्हें जमीन पर उतारने के लिए उतने ही ठोस प्रयास भी किए। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री उज्जवला योजना की बात की जाए। इस योजना से देश की लाखों महिलाओं को रसोई गैस की सुविधा उपलब्ध करवायी गई है। इसके पहले शहरी और ग्रामीण महिलाएं चूल्हे के धुएं से परेशान होकर स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करने को विवश होती थीं। आज उनके जीवन में कम से कम प्रदूषण रहित वातावरण में कार्य करना संभव हो सका है। इसी तरह हर व्यक्ति के लिए आवास और गाँव तक पक्की सड़कों के निर्माण की दिशा में किए गए सशक्त प्रयास भारत को समृद्धि का नया मार्ग उपलब्ध करवा रहे हैं। वस्तु एवं सेवाकर की नई व्यवस्था से देश में एक कर प्रणाली लागू करने जैसे क्रांतिकारी कदम
उठाकर अर्थ व्यवस्था को दीर्घकालिक सुधारों का लाभ दिलवाने की दूरदर्शिता प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में ही संभव थी। उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में भी समृद्धि के नए कदम उठाए। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह जी प्रधानमंत्री श्री मोदी की कार्यप्रणाली के अनुसार संगठन स्तर पर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। यह देश का सौभाग्य है कि श्री मोदी और श्री शाह के परस्पर समन्वय से प्रांतों में तरक्की की जो कोशिशें आकार ले रही हैं वे साधारण श्रेणी न होकर ऐतिहासिक श्रेणी की हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी को उनके जन्म दिवस पर बधाई देते हुए यह कामना है कि मध्यप्रदेश सहित देश के सभी प्रदेशों में जनकल्याण की उनकी कल्पनाओं को साकार करने के लिए हम सब भी सहभागी बनें और राष्ट्र कल्याण के इस यज्ञ में अपनी आहुति जरूर दें। सेवा दिवस के रूप में आज का दिन इस मायने में किसी त्यौहार से कम नहीं है। त्यौहार हमारी जिंदगी में खुशियां लाते हैं और स्वच्छता के साथ विकास के संकल्प को अमल में लाने के किए यदि सभी मिलकर हाथ बढ़ाते हैं तो यह अवसर किसी त्यौहार में मिलने वाली बड़ी खुशी से कम नहीं है। (ब्लॉग राईटर डॉ. नरोत्तम मिश्र मध्यप्रदेश के जनसंपर्क, जल संसाधन और संसदीय कार्य मंत्री और राज्य सरकार के प्रवक्ता हैं)

आतंकियों के सहयोगी रोहिंग्याइयों के हमदर्द शाही इमाम
-प्रवीण गुगनानी
बांग्लादेशी घुसपैठियों का मामला पूर्व से ही देश के समक्ष एक चुनौती बन कर खड़ा हुआ है. आसाम और अन्य कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में सामाजिक तानेबाने व स्थानीय शांति व्यवस्था के लिए घातक ख़तरा बन चुके ये घुसपैठिये तमाम प्रकार की आपराधिक व आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न रहते हैं. मालदा जो कि मुस्लिम बहुल जिला है उसे इन बांग्लादेशी घुसपैठियों ने आतंकवादियों द्वारा भेजी गई नकली करेंसी खपाने का व अन्य राष्ट्रविरोधी अपराधों का गढ़ बना दिया है. अभी बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या भारत के सिर पर खड़ी ही है कि रोहिंग्याइयों मुस्लिमों का एक नया विषय भारत के समक्ष चुनौती बनकर आ गया है. रोहिंग्या मुस्लिम 12वीं सदी के शुरुआती दशक में म्यांमार के रखाइन इलाके में आकर बस गया था किंतु स्थानीय बौद्ध बहुसंख्यक समुदाय से वह कभी सामंजस्य नहीं बैठा पाया फलस्वरूप उन्हें आज भी देश का बौद्ध समाज नहीं अपना पा रहा है. 2012 में रखाइन में कुछ सुरक्षाकर्मियों की हत्या के बाद रोहिंग्या और सुरक्षाकर्मियों के बीच व्यापक हिंसा भड़क गई थी तबसे यह विभाजनकारी रेखा और गहरी हो गई. इसके बाद से ही म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों व बर्मा के बौद्ध समुदाय में संघर्ष जारी है. हाल ही में 25 अगस्त को रोहिंग्या मुसलमानों ने बर्मा की पुलिस पर हमला कर दिया, इस लड़ाई में कई पुलिस वाले घायल हुए, इस हिंसा से म्यांमार के हालात अत्यंत खराब हो गए फलस्वरूप पूर्व से चल रहा संघर्ष और अधिक तीव्र हो गया. भारत में अवैध रूप से घुस आये चालीस हजार रोहिंग्याई मुस्लिमों के निर्वासन को लेकर भारत सरकार ने भी कार्यवाही प्रारम्भ कर दी है. इसके बाद पूरे देश में रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर जामा मस्जिद दिल्ली के शाही इमाम ने ऐसा बेसुरा राग छेड़ा है कि पुरे देश के अनेकों जिला व तहसील मुख्यालयों पर भोले भाले मुस्लिम बंधुओं ने ज्ञापन देनें व रोहिंग्याइयों को भारत से निर्वासित न करने की अपील की झड़ी लगा दी है. यहां यह ध्यान देनें योग्य बात है कि भारत में जबकि हिंदू व मुस्लिम समाज में कई तरह के वैचारिक अवरोध-गतिरोध पूर्व से ही बड़ी संख्या में विद्यमान हैं तब मुस्लिम समाज को भी चाहिए कि वह इस राष्ट्र की मुख्यधारा में सम्मिलित होने हेतु पूर्व के विभाजक विषयों को शनैः शनैः समाप्त करें व नए मतभेद न उभरने दे, किन्तु जो हो रहा है वह इसके ठीक विपरीत है. देश का सामान्य मुस्लिम समाज कुछ कट्टरपंथी व अवसरवादी मुस्लिम नेताओं की घटिया राजनीति का शिकार हो जाता है व भारत की हिंदू-मुस्लिम समरसता के नए अवसरों के उपजने में बाधक बन जाता है. आतंकियों का खिलौना बन गए रोहिंग्याइयों के भारत से निर्वासन का विरोध करना इस कड़ी का ही नया आयाम है.
रोहिंग्याई मुसलामानों की समस्या के अन्तराष्ट्रीय स्वरूप या बांग्लादेशी स्वरूप को हम छोड़ दे और प्रथमतः केवल भारत के संदर्भ में इसकी चर्चा करें तो हमें कई ऐसी भारत विरोधी तथ्य मिलते हैं जो रोहिंग्याइयों को भारत से वापिस भेज देनें के पक्ष में एक बड़ा वातावरण बनाते हैं. आज स्थिति यह है कि कश्मीर में रह रहे दस हजार रोहिंग्याइयों ने अपनी “आरसा” नामक मिलीटेंट आर्मी बना ली है जो अरब देशो से फंडिंग ले रही है और कश्मीर व अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में नित नए अपराध कर रही है. रोहिंग्याई आतंकी संगठन “आरसा” का दुरूपयोग कश्मीरी अलगाववादी संगठन बड़े पैमाने पर कर रहे हैं व मजबूर व दीन हीन रोहिंग्याइयों का उपयोग मानव बम के रूप में करने की तैयारियां कर रहें हैं. उधर नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला ने इस विषय में बर्मा की “चैम्पियन आफ डेमोक्रेसी” मानी जाने वाली आंग सान
सु चि की कड़ी आलोचना तो कर दी है किंतु अपने ही देश पकिस्तान की सरकार से वे रोहिंग्याइयों को शरण देनें की व्यवस्थित अपील तक नहीं कर पा रहीं हैं. मलाला को चाहिए कि वे पहले अपने देश पाकिस्तान में रोहिंग्याइयों को शरण देनें हेतु वातावरण निर्मित करें तब अन्तराष्ट्रीय स्तर पर इस प्रकार के परामर्श देनें का कार्य करें. शाही इमाम के बहकावे में आकर रोहिंग्याइयों को भारत से निर्वासित न करने की अपील करने वाले भारतीय मुस्लिम बंधुओं को यह भी देखना चाहिए कि वे उन लोगों की मदद की बात कर रहें हैं जिनके विषय में अलकायदा जैसे घोषित आतंकवादी संगठन ने नरेंद्र मोदी सरकार की इस विषय पर आलोचना की है. अलकायदा ने मोदी सरकार को चुनौती चुनौती देते हुए कहा है कि “मोदी सरकार रोहिंग्याइयों को देश से बाहर निकाल कर दिखाए”. यहां यह भी एक विषय है कि इमाम ने अपनी सदा की दुष्प्रवृत्ति के अनुरूप इस विषय को अनावश्यक ही हिंदू मुसलमान का विषय बना दिया है. मुस्लिम बंधुओं को आज यह विचार करना ही होगा कि उनका समाज क्यों समय समय पर देशविरोधी अभियानों व आव्हानों का हिस्सा बन जाता है. मुस्लिम स्वयं विचार करें कि शाही इमाम के आव्हान पर देश में मस्जिदों से जिला कलेक्टरों को रोहिंग्याइयों के पक्ष में जिस प्रकार के ज्ञापन दिलवाए जा रहें हैं और उन्हें भारत से निर्वासित न करने की अपीलें की जा रही हैं उनका शेष भारतीय समाज व राष्ट्रीय एकता पर क्या प्रभाव होगा. मुस्लिम समाज को अपनी बुद्धि विवेक को जांचना होगा कि आखिर किस षड्यंत्र के तहत वे आज ऐसे लोगों का समर्थन करने सड़कों पर उतर आये हैं जिनका अलकायदा के दुर्दांत संगठन “आसुह” से, “अकामुल मुजाहिदिन” से व “लश्कर” से स्पष्ट सम्बन्ध व सहयोग हो गया है. रोहिंग्याई इन आतंकी संगठनों से सीधे तौर पर जुड़ कर प्रतिदिन इस देश में आपराधिक गतिविधियां कर रहें हैं! रोहिंग्याइयों का दिन प्रतिदिन घातक व देशविरोधी उपयोग आतंकवादी कर रहें हैं. आज भारत में रोहिंग्याई और कुछ नहीं बल्कि आतंकवादियों के उपयोग की एक बेहद सस्ती विस्फोटक सामग्री मात्र बनकर रह गयें हैं, उनकी वकालत एक सभ्य व सभ्रांत समाज कैसे कर सकता है?!
भारत में रह रहे चालीस हजार रोहिंग्याई मुसलामानों के संदर्भ में भारत सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि इन्हें देश में शरण नहीं दी जायेगी और इन्हें देश से निकाला जायेगा. यह भी स्पष्ट हो चुका है कि जम्मू कश्मीर सहित देश के आठ राज्यों में फ़ैल चुके रोहिंग्याई मुसलमान देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक ख़तरा बन चुकें हैं. अलकायदा सहित विभिन्न आतंकवादी संगठनों से मदद पा रहे ये रोहिंग्याई कई देशविरोधी गतिविधियों में व्याप्त होते जा रहें हैं व स्पष्टतः देश विरोधी अपराधों में रंगे हाथों पकड़े भी जा रहें हैं. भारत ने इन रोहिंग्याइयों के भारत प्रवेश को रोकने के लिए भारत-म्यांमार सीमा पर चौकसी बढ़ा दी है. सीमा पर सरकार ने इनके विरुद्ध रेड अलर्ट भी जारी किया है. प्रश्न यह आता है कि विभिन्न दुर्दांत आतंकवादी संगठनों से मदद पा रहे रोहिंग्याइयों के लिए भारत के मुसलमान क्यों इतनी वेदना व्यक्त कर रहें हैं?! पहले दिल्ली के शाही ईमाम फिर पंजाब के उलेमा और फिर पुरे देश के मुल्ला मौलवी देश भर में रोहिंग्याइयों के पक्ष में ज्ञापन देकर अपीलें कर रहें हैं, उसकी पीछे क्या कारण है? भारतीय मुस्लिमों को शाही इमाम बुखारी ने जिस प्रकार रोहिंग्याइयों के पक्ष में अपना हथियार बनाया है और भारतीय मुस्लिम भी बड़े ही भोलेपन से इमाम के हथियार बन भी गयें हैं वस्तुतः यही वह तथ्य है जो भारत के सामाजिक तानेबाने में मतभेद के तार उत्पन्न करता है. दिल्ली में हो रही अपने बेटे की ताजपोशी में भारतीय प्रधानमंत्री को नजरअंदाज कर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को आमंत्रित कर अलगाव व विभाजन रेखा खीचने वाले शाही ईमाम की इस विषय पर आलोचना उस समय भारतीय मुस्लिम बंधुओं ने भी जी भर के की थी. शाही इमाम जैसी चिंता रोहिंग्याइ मुस्लिमों की कर रहें हैं वैसी चिंता की शतांश चिंता भी वे कश्मीरी पंडितों के लिए कभी कर पायें हैं?! यह भी घोषित तथ्य है कि सैकड़ों भारतीय सामाजिक व राष्ट्रीय समस्याओं के समय चुप्पी धरे रहने वाले शाही ईमाम एकाएक रोहिंग्याइयों के विषय में राष्ट्रीय अन्तराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हो गयें हैं. शाही इमाम व भोलेपन में उनके पीछे खड़े हो गए अन्य भारतीय मुस्लिम बंधूओं को यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि भारतीय समाज अब ऐसे लोगों को सुनने समझने के मूड में कतई नहीं है जो अन्य भारतीय राष्ट्रीय व सामाजिक समस्याओं पर तो चुप्पी धरे रहते हैं किंतु आतंकवादी संगठनों के सहयोग से भारत में घुस आये, फल फुल रहे व भारत में अपराध कर रहे रोहिंग्याइयों का समर्थन कर रहें हैं. शाही इमाम व अन्य मुस्लिम उलेमाओं ने प्रधानमंत्री से अपील की है कि वे भारत में रह रहे चालीस हजार रोहिंग्याइयों को भारत में ही रहने दे व उन्हें निर्वासित न करें क्योंकि भारत की हजारों वर्षों की परम्परा लोगों को शरण देनें की रही है. उल्लेखनीय है कि इस सम्बन्ध में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि रोहिंग्या अवैध प्रवासी हैं, भारतीय नागरिक नहीं हैं, इसलिए वे ऐसी किसी चीज के हकदार नहीं हैं, जिसका कि कोई आम भारतीय नागरिक हकदार है. उन्होंने रोहिंग्या मुस्लिमों के निर्वासन पर संसद में दिए गए अपने बयान पर स्पष्ट कहा है कि रोहिंग्या लोगों को निकालना पूरी तरह से कानूनी स्थिति पर आधारित है. उन्होंने कहा, “रोहिंग्या अवैध प्रवासी हैं और कानून के मुताबिक- उन्हें निर्वासित होना है, इसलिए हमने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे रोहिंग्या मुस्लिमों की पहचान के लिए कार्यबल गठित करें और उनके निर्वासन की प्रक्रिया शुरू करें.” भारतीय मुस्लिमों को भी चाहिए कि वे राष्ट्रहित में आतंकियों के सहयोगी बन रहे रोहिंग्याइयों को भारत में बसाने की मांग करना बंद करें व एक देशभक्त भारतीय होनें का परिचय देवें.

भारत-जापान संबंध गहराए लेकिन….
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
भारत-जापान मैत्री की नींव आज मजबूत हो गई है। जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे की इस भारत-यात्रा के दौरान यह स्पष्ट हो गया है कि दोनों देश आपसी मामलों में तो एक-दूसरे को काफी फायदा पहुंचा ही सकते हैं, इसके अलावा लगभग आधा दर्जन प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मामलों में उनकी एक-जैसी दृष्टि है। चीन, उ.कोरिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, प्रशांत महासागर, आतंकवाद, अफ्रो-एशियाई महापथ, भारत-जापान-अमेरिका का त्रिकोणात्मक सहकार–इन सब मामलों में भारत और जापान का नजरिया लगभग एक-जैसा ही है। इन सब समानताओं के होते हुए भी पिछले 70 साल में भारत और जापान के संबंध घनिष्ट क्यों नहीं हुए ? कौटिल्य का यह सूत्र भारत-जापान संबंधों पर लागू क्यों नहीं हो पाया कि पड़ौसी का पड़ौसी हमारा मित्र होगा ? एक तो भारत का असंलग्न होना और जापान का अमेरिकी गुट में होना। दूसरा, भारत का परमाणु बम संपन्न होना और जापान का उसका विरोधी होना। तीसरा, भारत द्वारा अंग्रेजी भाषा की गुलामी करना। अब ये तीनों बाधाएं नहीं रहीं। अब भारत, अमेरिका और जापान मिलकर संयुक्त सैन्य अभ्यास कर रहे हैं। जापान अब हमें परमाणु तकनीक देने के लिए तत्पर है और अब भारत और जापान दोनों अंग्रेजी की बैसाखी तजकर हिंदी और जापानी को अपने व्यापार, कूटनीति और लेन-देन का माध्यम बनाने के लिए तैयार हो गए हैं। इस समय भारत-जापान व्यापार बहुत ही दयनीय है। सिर्फ 15 बिलियन डॉलर का। जबकि चीन के साथ उसका 300 बिलियन डॉलर का व्यापार है। उसे बढ़ाना जरुरी है। भारत में जापान की 1300 कंपनियां काम कर रही हैं लेकिन उनकी सिर्फ 5-6 बिलियन डॉलर की पूंजी यहां लगी है। यह ठीक है कि भारत अब एक लाख करोड़ रु. की बुलेट ट्रेन लगाएगा लेकिन जापान से मिला यह सस्ते ब्याज का पैसा दुगुना होकर क्या वापस जापान नहीं लौट जाएगा ? और फिर यह बुलेट ट्रेन किस के काम आएगी ? यह काम आएगी, ‘इंडिया’ के, भारत के नहीं। भारत में रहनेवाला गरीब, ग्रामीण, वंचित इसमें यात्रा करने का सपना भी नहीं देख सकता। इस एक लाख करोड़ रु. से भारत की सारी रेलगाड़ियों को यूरोपीय रेलगाड़ियों की तरह सुरक्षित और स्वच्छ बनाया जा सकता था। लेकिन हमारे नौटंकीप्रिय नेता बाहरी चमक-दमक पर फिदा हैं। उन्हें कौन रोक सकता है ? यदि भारत और जापान मिलकर अपना पैसा एशिया और अफ्रीका के जल-थल-वायु मार्गों के निर्माण में लगाएं तो बेहतर होगा। यदि ये दोनों देश अफगानिस्तान में मिलकर काम करें तो आंकवाद को घटाने में भी मदद मिलेगी।

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