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बेलगाम घोड़ा और भयभीत सवार –
-राजा पटेरिया
मध्यप्रदेश में पिछले दिनों हुए किसान आंदोलन और उसके बाद से किसानों में शासन के प्रति लगातार बढ़ते आक्रोश से मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान इतने क्षुब्ध और हताश हो गये हैं कि अब वे राज्य की नौकरशाही पर पकड़ बनाने के लिये अफसरों को सार्वजनिक रूप से अपमानजनक तरीके से डरा-धमका रहे हैं । मुख्यमंत्री के इस बदले हुए रवैये से नौकरशाही भी परेशान है और इससे राज्य के प्रशासन में अराजकता का माहौल बनता जा रहा है । वास्तविकता यह है कि मुख्यमंत्री उस घुड़सवार की तरह हैं, जिसका घोड़ा सवार की नादानी के कारण बेलगाम हो गया है और अब सवार भयभीत है ।
वर्ष 2003 में सत्ता में आने के बाद भाजपा ने राज्य की नौकरशाही का अपने तरीके से इस्तेमाल करने की जो रणनीति बनाई, उसके कारण चंद चापलूस, नौकरशाहों ने अनुभवहीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अपने जाल में इस कदर फांस लिया कि उन्होंने सबकुछ अपने चहेते नौकरशाहों के भरोसे छोड़ दिया और उनके चश्मे से ही प्रशासन की गतिविधियों का मूल्यांकन करने लगे । नतीजा यह हुआ कि मुख्यमंत्री को उजाड़, वीरान इलाके में भी हरियाली दिखाई देती रही । अनेक बार भाजपा संगठन के जिम्मेदार और गंभीर नेताओं ने मुख्यमंत्री को प्रशासन पर नियंत्रण रखने और शासन, प्रशासन को जनता से सतत जुड़े रहने की सलाह दी, लेकिन चापलूस अफसरों ने इस सलाह की आड़ में मुख्यमंत्री को जनता के बीच अपनी निजी इमेज बनाने और सचिवालय में काम छोड़कर प्रदेशभर का दौरा करते रहने की आदत डाल दी । कुछ समय तक मुख्यमंत्री को यह सब अच्छा लगा, और उन्होंने जनता की समस्याओं, दुख तकलीफों को सुनने के बाद ”मैं हूँ न“ कहने की आदत डाल ली ।
मुख्यमंत्री चौहान स्वयं को शासन प्रशासन का एकमात्र कर्णधार और राज्य में भाजपा का एकमात्र नेता के रूप में प्रति…त करने लगे और इस काम में उनकी चापलूस अफसर मण्डली ने उन्हें पूरा सहयोग दिया । वर्ष 2008 और उसके बाद 2013 के चुनाव जीतने के बाद तो शिवराज सिंह स्वयं को पूरी भाजपा के पर्याय और स्वयं को सभी नेताओं से लम्बे कद का अजेय नेता मानने लगे हैं । लेकिन मुख्यमंत्री की इमेज बनाने और उनके राजनैतिक तथा निजी स्वार्थ सिद्ध करने के लिये नौकरशाही ने प्रशासन का जो कबाड़ा किया, उसके नतीजे अब सामने आ रहे हैं और अब 12 साल शासन करने के बाद शिवराज सिंह चौहान को पता चल रहा है कि उनकी सरकार के राज्य के विकास और जनकल्याण से जुड़े विभागों ने कोई काम नहीं किया नतीजा यह हुआ है कि प्रदेश में न तो विकास हुआ और न ही जनता का कल्याण हुआ है, केवल मुख्यमंत्री की छवि बनाने के नाम पर भारी भरकम सरकारी खर्च से जो प्रचार हुआ है उससे कुछ समय के लिये जनता भ्रमित हुई है, लेकिन अब जनता का भ्रम टूट रहा है ।
वर्ष 2014 तक केन्द्र में यूपीए की सरकार शिवराज सिंह के लिये वरदान रही क्योंकि तब राज्य की अधिकांश समस्याओं के लिये मुख्यमंत्री केन्द्र सरकार को असहयोगी बताकर अपनी जिम्मेदारी टालते रहे हैं । आर्थिक संकट का रोना रोकर जब तक वे केन्द्र सरकार से भरपूर सहायता लेते रहे और उसका दुरुपयोग भी करते रहे, लेकिन अब केन्द्र में भाजपा की अपनी सरकार है और नरेन्द्र मोदी जैसा धाकड़ नेता प्रधानमंत्री है । अब शिवराज सिंह की चालाकी और बहानेबाजी केन्द्र में नहीं सुनी जाती है । इसी कारण विभिन्न मदों में केन्द्र सरकार से मिलने वाले अनुदान और अन्य सहायता राशि में कमी आ रही है ।
सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि मध्यप्रदेश सरकार ने बच्चों की शिक्षा, पोषण आहार वितरण, कुपोषण नियंत्रण, आदिवासी दलित छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति, वृद्धों, विधवाओं और विकलांगों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता जैसे मदों में भी केन्द्र से प्राप्त धनराशि का पूरा उपयोग नहीं किया और इन सभी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में घपले, घोटाले किये । हाल ही सीएजी ने बताया है कि वर्ष 2010-11 से 2015-16 तक मध्यप्रदेश सरकार ने स्कूलों में बुनियादी सुविधायें उपलब्ध कराने और छात्रों को शिक्षा सामग्री वितरण करने जैसे कार्यक्रमों के लिये दी जाने वाली केन्द्राrय धनराशि का पूरा उपयोग नहीं किया और करोड़ों रुपया बचा लिया या लेप्स कर दिया । इन वर्षों में 947 करोड़ रुपये से लेकर 1363 करोड़ रुपये साल तक की केन्द्राrय धनराशि या तो खर्च नहीं हो पाई या बचा ली गई । वास्तव में यह धनराशि मुख्यमंत्री की इमेज बनाने वाली योजनाओं में खर्च की गई और बाद में समायोजित करने के लिये वित्तीय नियमों और अनुशासन मर्यादा का घोर उल्लंघन किया गया ।
श्री शिवराज सिंह चौहान के शासनकाल में राज्य की वित्त व्यवस्था दीवालियेपन की स्थिति में आ चुकी है । वित्त मंत्री जयंत मलैया पिछले वित्त मंत्री राघवजी की तरह न तो कड़क हैं और न ही वित्तीय मामलों में ज्यादा समझदार हैं । वे मुख्यमंत्री के वफादार मुनीम की तरह नियम कायदों की परवाह किये बिना सरकारी खजाने का दुरुपयोग करने का खेल खेल रहे हैं, इसी का नतीजा है कि आज राज्य सरकार पर डेढ़ लाख करोड़ से ज्यादा का कर्ज है और अब तो चाहे सरकारी वित्तीय संस्थायें हों या निजी क्षेत्र की वित्तीय संस्थायें हों, कोई भी मध्यप्रदेश सरकार को कर्ज देने का जोखिम मोल नहीं लेना चाहती हैं । रिजर्व बैंक ने तो कर्ज की गारंटी लेने से ही इंकार कर दिया । वित्तीय संकट बने रहने के कारण सरकार न तो विकास कार्य कर पा रही है और न ही जनता के कल्याण के कार्यक्रमों पर पूरा ध्यान दे रही है । बीच-बीच में मुख्यमंत्री की सनक के कारण कभी नर्मदा तट पर वृक्षारोपण, कभी किसानों से प्याज खरीदी, कभी उज्जैन सिंहस्थ कुंभ पर बेतहाशा खर्च, नर्मदा यात्रा जैसे दिखावे वाले कार्यक्रमों और केन्द्राrय नेताओं तथा मुख्यमंत्री की प्रायोजित सभाओं, कार्यक्रमों और प्रचार कार्य पर इतना खर्च कर दिया जाता है कि विकास और कल्याण के जरूरी मदों का पैसा मुख्यमंत्री के शौक और सनक को पूरा करने के लिये खर्च कर दिया जाता है । सर्वोच्च न्यायालय और राज्य के उच्च न्यायालय के सैंकड़ों मामलों से सरकार पर जो देनदारी है और राज्य के कर्मचारियों की देनदारी है, उसका चुकारा बेशर्मी से नहीं किया जा रहा है और नियम कानूनों का उल्लंघन कर सरकार अपने कर्मचारियों का ही शोषण कर रही है ।
प्रशासन में ईमानदार, नियम कानून के तहत काम करने वाले कर्मठ अधिकारियों को हतोत्साहित किया जा रहा है और चापलूस अफसरों को बढ़ावा दिया जा रहा है । ग्राम स्तर तक भाजपा पार्टी के कार्यकर्ता सरकारी तंत्र पर हावी हैं और मुख्यमंत्री भी पार्टी कार्यकर्ताओं को संतुष्ट रखने के लिये इस दुष्प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं । कुछ ऐसे मामले हुए कि पुलिस और प्रशासन के आला अफसरों को आरएसएस और भाजपा के बड़े नेताओं के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करनी पड़ी, तो संगठन को खुश करने के लिये मुख्यमंत्री ने उन्हें हटा दिया ।
राज्य में जिस प्रकार से रेत माफिया, खनिज माफिया, सरकारी अफसरों से मारपीट करते हैं, और उनपर कार्यवाही नहीं होती है, इससे साफ है कि इन अपराधी तत्वों को सरकारी संरक्षण प्राप्त है । प्रशासन में भ्रष्टाचार का बोलबाला है और इसका लेखाजोखा ट्रांसपेरेन्स इंटरनेशनल जैसी संस्था से भी मिल सकता है ।
कानून व्यवस्था की दुर्गति के लिये राज्य बदनाम हो चुका है । राज्य में क्या वृद्ध, क्या महिलाएं और क्या बच्चे, सभी असुरक्षित हैं और अपराधियों के शिकार बन रहे हैं । राजनीति और समाज के जानकारों का तो कहना है कि भाजपा के शासन में प्रशासन के भ्रष्ट और चापलूस अफसरों, कर्मचारियों ने भाजपा के भ्रष्ट और महत्वाकांक्षी कार्यकर्ताओं, नेताओं और हर क्षेत्र के संगठित अपराधी गिरोहों से गठजोड़ कर रख है और वे इस गठजोड़ का खुद लाभ उठाते हैं और चुनाव के समय मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी को भी लाभ पहुंचाते हैं । इसीलिये इस गठजोड़ को मुख्यमंत्री तोड़ना नहीं चाहते हैं और यही कारण है कि आज प्रशासन उन पर सवार है और वे एक निरीह दुखी कमजोर व्यक्ति की तरह भ्रष्ट और बेलगाम नौकरशाही को गीदड़ भभकियां दे रहे हैं । लेकिन इससे प्रशासन के ईमानदार और अब तक प्रताड़ित हो रहे आला अफसरों और कर्मठ कर्मचारियों में जो प्रतिक्रिया है, उससे मुख्यमंत्री वाकिफ नहीं हैं । इसके नतीजे उन्हें चुनाव में भुगतने होंगे ।

कानपुर में हिंदी का ताजमहल
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
आज मैं कानपुर के तुलसी उपवन में हूं। अब से 36 साल पहले इस उपवन की स्थापना पं. ब्रदीनारायण तिवारी ने की थी। महाकवि तुलसीदास के प्रति तिवारीजी इतने समर्पित हैं, श्रद्धा से इतने भरे हुए हैं, उनके प्रेम में इतने पगे हुए हैं कि अगर वे शाहजहां होते तो तुलसी की याद में ताजमहल खड़ा कर देते लेकिन यह तुलसी उपवन एक अर्थ में हिंदीवालों का ताजमहल ही है। जहां तक मेरा ध्यान जाता है, हिंदी के लिए ऐसा विलक्षण तीर्थ सारी दुनिया में कहीं नहीं है। कानपुर के इस तुलसी उपवन में एक बड़े प्रस्तर कमल पर तुलसीदासजी की प्रतिमा स्थपित की गई है। राम कथा के अनेक मार्मिक प्रसंगों को कई शिलालेखों में अंकित किया गया है। इस विशाल और आकर्षक उपवन में तुलसी की मूर्ति के साथ-साथ हिंदी के प्रसिद्ध इतालवी विद्वान पियो तेस्सीतोरी, रुसी विद्वान वारान्निकोव और बेल्जियम के फादर कामिल बुल्के की मूर्तियां भी लगी हुई हैं। इन तीनों विदेशी विद्वानों ने रामायण पर अद्भुत काम किया है। अपनी-अपनी भाषाओं में उन्होंने रामकथा का अनुवाद तो किया ही है, गणेषणात्मक रचनाएं भी की है। हिंदी के इन महान सेवियों को आज कौन याद कर रहा है ? इनके नाम पर सम्मान और पुरस्कार क्यों नहीं रखे जा रहे हैं ? मेरा सौभाग्य है कि प्रो. अलेक्सेई वारान्निकोव और फादर कामिल बुल्के से मिलने के कई अवसर मुझे मिले। प्रो.वारान्निकोव से मेरी पहली भेंट लेनिनग्राद में उनके घर ही हुई। जब मैं अपने शोध-कार्य के लिए रुस जाता रहा तो वहां लेनिनग्राद विश्वविद्यालय में उनसे और बाद में उनके बेटे से भी भेंट हुई। उनसे मिलते वक्त महापंडित राहुल सांकृत्यायन के बेटे ईगोर सांकृत्यापन भी मेरे साथ थे। डाॅ. बुल्के के साथ कई बार सभाओं में बोलने का मुझे मौका भी मिला। वे कृपापूर्वक हमारे घर भोजन करने भी पधारे। उनका निधन दिल्ली में ही हुआ था। उनकी अंत्येष्टि हमने खान मार्केट वाले कब्रिस्तान में ही की थी। तुलसी जयंति के अवसर पर तिवारीजी ने कई वर्ष पहले मुझे यहां बुलाया था। वे हर साल यह विशाल आयोजन करते हैं। प्रातः 6 बजे से ही हिंदी प्रेमियों का यहां जमघट लग जाता है। इस बार मंच पर मेरे साथ हेमवतीनंद बहुगुणाजी की बेटी रीता बहुगुणा (उ.प्र. में मंत्री), स्वामी मार्तंड पुरी (पूर्व माधवकांत मिश्र), प्रदीपकुमार (हिंदी निधि, इटावा) आदि प्रमुख हिंदी प्रेमी विराजमान थे। यहां तमिलनाडू के हिंदी विद्वान गोविंदराजन का सम्मान भी किया गया। उन्होंने तुलसी-साहित्य का तमिल रुपांतर किया है। अपने अध्यक्षीय भाषण में मैंने यही कहा कि यदि हिंदी डूब गई तो देश डूब जाएगा। हम समस्त भारतीय भाषाओं का सम्मान करें तो हिंदी अपने आप आएगी। अंग्रेजी भाषा से हमें कोई विरोध नहीं लेकिन उसके एकाधिकार और वर्चस्व के मिटाने के लिए सारे देश को कमर कसनी होगी। सभी राष्ट्र जो महाशक्ति बने हैं, अपना काम अपनी भाषा में करते हैं। आज देश में अंग्रेजी मिटाओ नहीं, अंग्रेजी हटाओ आंदोलन की जबर्दस्त जरुरत है। सभा में उपस्थित सैकड़ों लोगों ने अपने हस्ताक्षर सदा हिंदी में करने का संकल्प लिया।

बड़े लोगों की बड़ी सोच गँगा मैली,स्नान से या गंदगी मिलने से..?
– ओमप्रकाश मेहता
आज से पचास साल पहले उस सदी के सबसे बड़े शो-मेन अभिनेता स्व.राजकपूर ने जिस बड़े गर्व और श्रृद्धा के साथ जिस देश में गँगा बहती है फिल्म बनाई थी और उसके माध्यम से दुनिया भर को यह बताया था कि हम उसे देश के वासी है, जिस देश में गंगा बहती है, आखिर उन्हीं राजकपुर जी को महज पच्चीस साल बाद ’राम तेरी गंगा मैली‘ फिल्म का निर्माण क्यों करना पड़ा, क्या उन्हें उसी समय अहसास हो गया था कि दो दशक बाद पवित्र गंगा भी राजनीति के निशाने पर आने वाली है, और गंगा जी की सफाई का संकल्प लेने वाली साध्वी मंत्री भी कानपुर तथा अन्य जगहों पर गंगा जी में मिलने वाली फैक्टि्रयों की गंदगी को भूलकर लाखों लोगों के स्नान करने के कारण गंगा जी मैली होने का राग अलापेंगी? और साथ ही यह भी घोषणा कर देगी कि किस कारण गंगा नदी हमेशा साफ नहीं रह सकती। हमारे चतुर प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी ने अपनी एक श्रृद्धालु और साध्वी मंत्री को गंगा की सफाई का दायित्व इसीलिए सौंपा था कि यह एक महत्वपूर्ण कार्य जिम्मेदारी और बिना किसी भ्रष्टाचार के एक साध्वी के प्रयास से सम्पन्न हो जाएगा, किंतु तीन साल गुजर जाने के बाद साध्वी जी का जो ताजा बयान संसद में आया, उसे सुनकर संसद का सदन तो क्या पूरे भारतवासी दंग रह गए। यही नहीं मंत्री जी ने तो भारत में माँ मानी जाने वाली पवित्र गंगा नदी की तुलना उस टेम्स व राइन नदियों से कर दी जो पूरे विश्व के प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए आकर्षण का केन्द्र है। …..और सबसे आश्चर्य की बात तो यही है कि कथा-वार्ता और प्रवचन करने वाली शास्त्रों की ज्ञानी उमाजी ने यह कैसे कह दिया कि प्रतिदिन बीस लाख या प्रतिवर्ष साठ करोड़ लोगों के स्नान करने से गंगा नदी ……….. होती है। क्या उसे गंदी करने में कानपुर की चमड़ा फैक्टि्रयों या अन्य गंगा के तट पर स्थित कल-कारखाने से निकलने वाली गंदबी का कोई योगदान नहीं है। फिर उमाजी यह क्यों सोचती है कि हर समस्या का हल कानून बनाने से ही हो सकता है और बकौल उमाजी गंगा को स्वच्छ रखने का भी कानून बनाया जा रहा है, इस समस्या का हल तो अकेले उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ही कर सकते है गंगा किनारे के कल-कारखानों पर सख्ती लगाकर। …..और उन्होंने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजी जी की आदर्श व अनुकरणीय नमामि गंगे परियोजना शुरू करने की घोषणा भी की है, जिस दिन आदित्यनाथ जी कानपुर की गंदगी गंगा में मिलने से रोकने का संकल्प ले लेंगे, उसी दिन से गंगा जी स्वच्छ और निर्मल हो जाएगी, जबकि आज तो स्थिति यह है कि ऋषिकेश के आगे गंगा जी स्नान तो ठीक आचमन के लायक भी नहीं रही है। अरे…. जब उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने गंगा-यमुना नदियों को जीवित मानव का दर्जा प्रदान किया था, यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने इसे नकार दिया किंतु चूंकि गंगा को सिर्फ भारत ने ही ’माता‘ का दर्जा नहीं दिया, बल्कि पूरा विश्व इस पूरी श्रृद्धा के साथ सबसे पवित्र और पौराणिक नदी मानता है, तो फिर हमारी सरकार गंगा के प्रति ऐसा नजरिया क्यों? यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि पिछले बत्तीस सालों में गंगा की सफाई के नाम पर बाईस हजार करोड़ रूपए खर्च किए जा चुके है, अब गंगा जी तो वैसी ही है, जैसी थी, इस बाईस हजार करोड़ की राशि से किसी गरीबी या दरिद्रता साफ हुई यह एक खोज का विषय है।
हाल ही में गंगा की सफाई को लेकर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) का एक फैसला भी आया है, जिसमें गंगा नदी के तट से एक सौ मीटर तक के क्षेत्र को नो डेवल्पमेंट जोन घोषित किया गया है। इसके अलावा नदी के पांच सौ मीटर के दायरे में कचरा या गंदबी फैकने या नदी में डालने पर पचास हजार रूपए के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह कि यदि हमारे संविधान के प्रावधानों और सरकारी कानूनों का भारत में ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से यदि पालन किया गया होता तो आज पूरे देश में स्वच्छता जैसे अन्य राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने की जरूरत ही क्या पड़ती? अब सबसे बड़ा सवाल यह कि एनजीटी ने गंगा को गंदगी से बचाने का फैसला तो सुना दिया, पर उसके परिपालन की किसी ने कोई चिंता नहीं की, इसीलिए गंगा आज अपनी भी पवित्रता को लेकर बदनामी झेल रही है। यद्यपि 2525 किलोमीटर क्षेत्र में फैली हमारी पवित्र गंगा नदी उत्तराखण्ड से लेकर पश्चिम बंगाल तक की यात्रा करती है, अर्थात उत्तराखण्ड के गोमुख से पश्चिम बंगाल के गंगा सागर तक की यात्रा करती है, इसलिए इतने लम्बे क्षेत्र के लिए एनजीटी के आदेश का पालन कराना कठिन ही नहीं असंभव भी है, किंतु यदि इस पवित्र नदी को अपने प्रदेश से गुजरने का गर्व करने वाली सम्बंधित राज्यों की सरकारें एनजीटी के आदेश के परिपालन का ईमानदारीपूर्ण संकल्प ले लें तो यह कार्य कठिन भी नहीं है, उन्हें सिर्फ बर्नाड शौ की वह पंक्ति याद रखना पड़ेगी, जिसमें उन्होंने अंग्रेजी में कहा था कि असंभव शब्द मूर्खों के शब्दकोष में ही होता है।

बेरोजगारी समस्या कभी भी विस्फोटक रूप ले सकती है
– राजा पटेरिया
”अच्छे दिन आयेंगे“, की दिलासा दिलाते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार ने देश की आर्थिक नीतियों और विकास के बुनियादी ढांचे में जिस प्रकार बदलाव किये हैं, उनसे आज देश की जनता त्रस्त है। देशभर में किसान, छोटे-बड़े व्यापारी, उद्योगपति, संगठित, असंगठित क्षेत्र के कामगार सभी अपनी-अपनी समस्याओं से परेशान होकर जब तब सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन अपनी धुन में मस्त सरकार और सरकारी विशेषज्ञों को ”रोजगार विहीन विकास“, के बारे में जो भ्रम बना हुआ है, उसके कारण देश में उच्च शिक्षित, शिक्षित और अशिक्षित करोड़ों बेरोजगारों में घोर निराशा और हताशा फैल रही है।
भारत सरकार के क्राइम रिकार्ड ब्यूरो द्वारा संकलित आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले तीन वर्षों में बेरोजगारी से तंग आकर आत्महत्या करने वाले युवक-युवतियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। बेरोजगारों की यह हताशा-निराशा फिलहाल तो आत्महत्या के दुखद मामलों के रूप में सामने आ रही है, जिस पर सरकार गंभीरता से ध्यान नहीं दे रही है, लेकिन हर सचेतन नागरिक को चिंता है कि बेरोजगारों की यह हताशा-निराशा निकट भविष्य में कभी भी विस्फोटक आंदोलन का रूप ले सकती है और युवा शक्ति के इस आंदोलन से समूची समाज व्यवस्था में अराजकता फैलने का खतरा है।
संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की रोजगार संबंधी 2017 की रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2017 और 2018 में भारत में नये रोजगार अवसर बढ़ने की कोई संभावना नहीं है और इससे बेरोजगारी और भी बढ़ेगी। भारत में 2016 में बेरोजगारों की संख्या 1.77 करोड़ थी जो 2017 में बढ़कर 1.78 करोड़ हो गई और अब 2018 में 1.80 करोड़ होने की पूरी संभावना है। इस प्रकार पिछले तीन वर्षों में बेरोजगारी दर 3.4 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है और यह तब और भी चिंता का विषय है जब भारत अपनी विकास दर 7 प्रतिशत से अधिक होने का दावा करते हुए भविष्य में 2 अंकों में विकास दर पाने की उम्मीद लगाये बैठा है। भारत जैसे जनसंख्या बहुल और विकासशील देश के लिये श्रम शक्ति नियोजन की कोई पुख्ता नीति न होना गंभीर चिंता का विषय है और यह चिंता तब और भी बढ़ जाती है जब दुनिया के विकसित और सम्पन्न देशों में भी बेरोजगारी 5.5 प्रतिशत वार्षिक की दर से बढ़ रही है क्योंकि श्रम शक्ति बहुल वाले देशों से सस्ते श्रम के रूप में विकसित देश जनशक्ति का आयात करते रहे हैं। लेकिन अब जब अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में ट्रम्प के ”अमेरिकी फर्स्ट“ के नारे ने भावनात्मक जोर पकड़ा और ट्रम्प चुनाव जीत गये, तब अमेरिका ने अपने नागरिकों को रोजगार देने के उपाय शुरू कर दिये हैं और इससे भारत जैसे देशों के बेरोजगारों को विदेशों में नौकरी मिलने या काम मिलने की संभावना दिनों दिन कम हो रही है। फ्रांस, जर्मनी और इंग्लैण्ड भी दूसरे देशों के बेरोजगारों के लिये दरवाजे बंद कर रहे हैं। कुवैत, दुबई आदि खाड़ी देशों में यह आवाज उठने लगी है कि भारत आदि देशों के लोगों को एक निश्चित समय के लिये ही रोजगार पर रखा जाये और समय पूरा होने पर उनके देश वापस भेज दिया जाये। एक तरह से पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी का दौर चल रहा है और इसका असर रोजगार अवसरों पर भी बुरा पड़ रहा है। ऐसे में श्री नरेन्द्र मोदी की ”मेक इन इंडिया पॉलिसी“ और कौशल विकास की नीति और उपायों से भी बेरोजगारों का कोई लाभ होगा, उम्मीद करना व्यर्थ है।
भारत में गैर कृषि क्षेत्र में तेजी से विकास करके विकास दर बढ़ाने के लोभ में मोदी सरकार ने ग्रामीण और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के मूल ढांचे पर ही प्रहार किया है। इसी कारण गांव में रोजगार अवसर कम हो रहे हैं और छोटी जोत के किसान और खेतिहर मजदूर रोजी-रोटी के लिये शहरों की ओर पलायन करने पर मजबूर हो रहे हैं इससे शहरी क्षेत्र में अकुशल श्रमिकों की संख्या तेजी से बड़ रही है और रोजगार न मिलने की स्थिति में मजबूरी में ये अकुशल श्रमिक पेट भरने के लिये अनैतिक और आपराधिक गतिविधियों में भी लिप्त हो जाते हैं।
अच्छे भविष्य के सपने देखते हुए जो युवक इंजीनियरिंग, मेडिकल, प्रबंधन और दूसरे व्यवसायिक क्षेत्रों में महंगी शिक्षा प्राप्त करके रोजगार के लिये भटक रहे हैं, उनमें घोर निराशा और हताशा फैल रही है। छात्रों में भी भविष्य को लेकर चिंता व्याप्त है। फिनलैण्ड जैसे छोटे किन्तु सम्पन्न देश ने अपने बेरोजगारों को मासिक बेरोजगारी भत्ता देकर शांत करा लिया है, लेकिन भारत जैसे गरीब देश के लिये यह संभव नहीं है। ऐसे में हमारी सरकार को अपनी विकास और आर्थिक नीतियों के बारे में गंभीरता से पुर्नविचार करना होगा और विकास को रोजगारमूलक आधार देना होगा। अन्यथा देश की युवा बेरोजगार शक्ति कभी भी बेरोजगारी की समस्या को लेकर कोई देश व्यापी बड़ा विस्फोटक आंदोलन कर सकती है और यह आंदोलन किसी के संभाले संभलने वाला नहीं है, इससे देश की समुची शासन और समाज व्यवस्था में अराजकता फैलने का खतरा है।

चिकित्सा व्यवसाय या सेवा !
डॉक्टर – अरविन्द जैन
वर्तमान में प्रतिस्पर्धा गला काट हैं। वैसे पहले भी थी पर इतनी नहीं । कुछ व्यवसाय ऐसे होते हैं7 उनमे प्रतिस्पर्धा होने का कारण उसका स्वरुप बदल गया । जो पहले सेवा होती थी वे अब व्यवसाय हो गया । व्यवसाय में भी कुछ नियम-धरम होते हैं। पर सेवा वाले, व्यवसाय जब बन जाते हैं। तब उनमे तनाव, असुरक्षित, असंस्तुष्ट, भय ग्रस्त होने लगते । बिना कारण के कोई कार्य उत्पन्न नहीं होता। जहाँ धुआं है, वहां आग जरूर होगी। डॉक्टरों का इन विकारों से ग्रस्त होना न उनके लिए परिवार समाज और मरीज़ों के लिए शुभ लक्षण नहीं हैं ।
चिकित्सा अपने चार स्तम्भ पर आधारित है । 1-चिकित्सक, 2- औषधि 3-उपचारक और रोगी। इनमे चार चार गुण होते हैं। चार स्तम्भ के जिस प्रकार चन्द्रमा में कलाएं होती हैं। तभी वह परिपूर्ण माना जाता। उसी प्रकार चिकित्सा भी कलाओं से पूर्ण है7 जितनी-जितनी कमी होने से उतनी-उतनी चिकित्सा में कमी होती जाती है।
चिकित्सा में चरक आदि के समय में अर्थ या धन का कोई स्थान नहीं था । रोगी की सेवा कर रोग मुक्त करना मुख्य उद्देश्य रहा। युग के साथ आज से 50 वर्ष पहले भी चिकित्सा क्षेत्र में अर्थ इतना अधिक प्रभावकारी नहीं था। जितना आज भौतिक्तता की चाहत बढ़ी, उतनी उतनी इस क्षेत्र में गिरावट आयी और मोर इंटेंशन मोर टेंशन लेस इंटेंशन लेस टेंशन पर गगनचुम्बी इमारते हॉस्पिटल के लिए बनी, बैंक से या उधार या खुद का पैसा लगाया जिससे उसके लिए ब्याज की किस्त निकालना और उसमे स्थापना खर्च और अन्य कमीशन बाज़ी के कारण अर्थ का लूटना शुरू किया। उसके बाद अनचाहे
टेस्ट कराना मात्र कमिशनों के बाबद उससे भी तनाव का होना ।
वैसे हर व्यवसाय का अपना एक नियम धरम होता हैं ।कपडा व्यापारी का लाभ निश्चित होता हैं अधिकांश पर डॉक्टर के यहाँ या हॉस्पिटल की दलहीज चढ़ने के बाद मरीज़ को यह पता नहीं रहता कि कितना खर्च या पैसा लगेगा । पता चला वह मात्र परामर्श के लिया गया था और पता चला ऑपरेशन की स्थिति बन गयी7 जांच पर जाँच, एक दूसरे डॉक्टर की जांच अमान्य दूसरे का पर्चा बिना देखे, बेइज़्ज़त करना, निर्धारित केंद्र की जांच को मान्यता देना । आजकल तो इलाज़ के नाम पर हड्डी से मज्जा तक निकाल लेते हैं । एक बार हॉस्पिटल के चक्रव्यूह में फंसना यानी जिन्दा निकलना या मौत के साथ। कारण के बिना इलाज । ऐसे घटनाएं सुनने-पढ़ने मिलती हैं। और होना स्वाभाविक है7 कारण जैसा बोयेंगे वैसा पाएंगे । मरीज़ को शुकुन देंगे तो तुम्हे भी सुकून मिलेगा7
दूसरे के जेब से पैसा निकालना सरल, सुगम नहीं होता । जब तक उसे भयग्रस्त न कर दो इतना न डरा दो कि वह बुद्धम शरणम गच्छामि न हो जाये । उसके बाद उसका कैसे-कैसे शोषण किया जा सकता है7 यह उस हॉस्पिटल में कार्यरत डॉक्टरों का लक्ष्य निर्धारित होता हैं । जितने डॉक्टर उतनी विजिट उतना चार्ज । उसी हॉस्पिटल में भर्ती मरीज़ को देखने उस हॉस्पिटल का कोई भी डॉक्टर परीक्षण करने आएंगे7 उसका मीटर चालू हो जाता हैं7 और मरीज़ असहाय ।
व्यवहारी धरातल में डॉक्टर हिंसा के कारण तनाव ग्रस्त मुकदमे के डर से भयभीत और डॉक्टरों को आपराधिक मामला चलाये जाने का डर, ऐसा क्यों? इसका साथ कारण आप अनियमित, अनैतिक ढंग से पैसा कमाना चाहते हो तो आपको असाध्य रोगों का इलाज़ करना पड़ेंगे, जो चिकित्सक असाध्य रोग का इलाज करता है7 उसे चार प्रकार की हानि उठानी पड़ती है7 पहला ज्ञान यश धन और आक्रोश।
आज मरीज़ डॉक्टर का एक मुर्गा या बकरा माना जाता हैं आया हैं तो हलाल करो । यह नहीं देखना की वह सक्षम हैं या नहीं ।इसके कारण जब कोई घटना जैसे बिल अधिक का बनना,अनावश्यक जांचे अनावशयक दवाएं और अंत में मरीज़ की मृत्यु आक्रोश का कारण बनती हैं जिससे डॉक्टर तनाव में अधिक काम का बोझ होने पर नींद का न होना पैसों की अंधी दौड़ में असामाजिक रहना परिवार को समुचित समय न देना अपने आपको न देखना जिसकी खूब प्रैक्टिस चलती हैं उसे भोजन नसीब नहीं होता और जिसकी नहीं चलती उसको भोजन नहीं मिलता ।
जीवन में प्रबधन का अभाव,अधिकतम तृषणाग्रस्त होना और मरीज़ के प्रति मात्र अर्थ का ध्यान रखना ।यदि आप ईमानदारी से रोगी के प्रति व्यवहार करे अनावश्यक लूटें न और जितना उसके प्रति मित्रवत विश्वासी बनेंगे उतना आपको कम तनाव होगा आप भय विहीन रहेंगे आपको अपराध बोध नहीं होगा और स्वयं मधुमेह हृदय रोग और मानसिक रोगों से ग्रस्त नहीं होंगे ।
आर्थिक युग में प्रतिस्पर्धा का कारण हैं इन बिमारियों को दावत देना ।ऐसे आज भी कई डॉक्टर हैं जैसे डॉ मालती यादव इंदौर की ?? वर्ष की होने के बाद भी कार्यरत हैं स्वस्थ्य हैं मानसिक आर्थिक सामाजिक आध्यात्मिक रूप से ।क्या हम ऐसे उदाहरणों से कुछ शिक्षा नहीं ले सकते ।
दौलत कौन कितना कब ले गया इस जहाँ से
हमने तो देखा हैं कइयों को टूटते हुए दौलत को
दौलत यदि खुदा होता हो आने पर लत क्यों पड़ती छाती पर
और जब जाती हैं तब क्यों तुम झुक जाते लाते पीछे खाने पर ।
सीमाएं हमें सिखाती हैं हम कैसे रहे मर्यादित ।
अमर्यादित को तो हमने बीमार देखा हैं
क्यों रुग्णता को दूर करने वाले हताश हैं।
उनका इलाज़ उनके पास हैं पर अनजान हैं।
चरक शुश्रुत की शिक्षाए आज भी उपयोगी हैं।
धरम अर्थ काम मोक्ष के पुरुषार्थ हैं
धरम मय धन, काम ही सुख का सार हैं ।

सांसत में मियां नवाज़ शरीफ
– डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान की राजनीति आजकल डावांडोल है। उसके सबसे ज्यादा लोकप्रिय रहे और सबसे ज्यादा बार प्रधानमंत्री बने, ऐसे नेता मियां नवाज शरीफ काफी मुश्किल के दौर से गुजर रहे हैं। इतनी मुसीबत तो राजीव गांधी ने भी नहीं झेली। बोफोर्स में राजीव बदनाम जरुर हुए लेकिन उनके विरुद्ध आज तक कुछ भी सिद्ध नहीं हो पाया लेकिन इस मामले में पाकिस्तान भारत से कहीं आगे निकल गया। पाकिस्तान की न्यायपालिका ने उसके शक्तिशाली प्रधानमंत्री को सांसत में डाल दिया है। उसके सर्वोच्च न्यायालय ने ‘पनामा पेपर्स’ के मामले में इतनी उधेड़-बुन कर डाली, जितनी किसी कुर्सी पर बैठे प्रधानमंत्री के खिलाफ करने की हिम्मत किसी अदालत की नहीं होती। जैसे जनरल मुशर्रफ के खिलाफ पाक न्यायपालिका भिड़ गई थी, अब उससे भी ज्यादा नवाज शरीफ और उनकी संतान के विरुद्ध उसने माहौल गरमा दिया है। नवाज शरीफ परिवार के पास बेहिसाबी संपत्ति कहां से आई, इसका जवाब कोई नहीं दे पा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने नवाज को कठघरे में खड़ा कर दिया और उनके खिलाफ जांच बिठा दी। इस जांच रपट में उन्हें दोषी करार दिया गया। नवाज ने इस रपट को रद्दी की टोकरी के लायक कह दिया है और अब अदालत में उस पर बहस चल रही है। जांच कमेटी ने नवाज़ के खिलाफ 15 अन्य पुराने मामलों में जांच की मांग की है। तहरीके-इंसाफ के नेता इमरान खान ने नवाज के खिलाफ अपनी तोपों के मुंह खोल दिए हैं। माना जाता है कि यह फौज के इशारे पर ही हो रहा है। जांच कमेटी के सदस्यों में फौज और गुप्तचर विभाग के दो अफसर भी थे। पाकिस्तान में फौज इतनी ताकतवर है कि वह चाहे तो नवाज़ का तख्ता-पलट कर सकती है लेकिन उस हालत में डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिका पाकिस्तान का टेंटुआ कस सकता है। हो सकता है कि अदालत कोई बीच का रास्ता निकाल दे और मियां नवाज अगले साल तक टिके रहें। कोई आश्चर्य नहीं कि पाकिस्तान की जनता उन्हें फिर चुन ले, क्योंकि अपने दक्षिण एशियाई राष्ट्रों में जनता को पता है कि अंधाधुंध पैसा जमा किए बिना राजनीति करना असंभव है लेकिन मियां नवाज का अगले साल के चुनाव तक लंगड़ाते हुए प्रधानमंत्री बने रहना, भारत के लिए मंहगा पड़ेगा, क्योंकि पाकिस्तानी सरकार का सारा ध्यान अपनी अंदरुनी गुत्थी सुलझाने पर केंद्रित हो जाएगा।

नयी शिक्षा नीति के लिए कस्तूरीरंगन समिति
(अजित वर्मा)
पिछले दिनों मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में नयी शिक्षा नीति पर काम करने के लिए एक नौ सदस्यीय समिति का गठन किया है। समिति में अलग-अलग विशेषज्ञता वाले लोगों को स्थान दिया गया है, ताकि उनके अनुभवों का लाभ उठा कर संतुलित शिक्षा नीति तय की जा सके। विभिन्न विशेषज्ञता और शैक्षणिक योग्यता वाली पृष्ठभूमि के लोगों को इस समिति में शामिल किया गया है। यह समिति भारतीय शिक्षा नीति को नया रूप देने का काम करेगी।
भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो की कमान संभाल चुके कस्तूरीरंगन के अलावा इस समिति में पूर्व आईएएस अधिकारी केजे अल्फोंसे कनामथानम भी शामिल हैं। कनामनाथन ने केरल के कोट्टायम और एर्नाकुलम जिलों के पूर्ण साक्षरता दर हासिल करने में अहम भूमिका निभाई है।
मध्य प्रदेश के महू स्थित बाबा साहेब अंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति राम शंकर कुरील भी समिति का हिस्सा होंगे। उन्हें कृषि विज्ञान और प्रबंधन के क्षेत्र का व्यापक अनुभव है। कर्नाटक राज्य नवोन्मेष परिषद के पूर्व सदस्य सचिव डॉ. एमके श्रीधर, भाषा संचार के विशेषज्ञ डॉ. टीवी कट्टीमनी, गुवाहाटी विश्वविद्यालय में फारसी के प्रोफेसर डॉ. मजहर आसिफ और उत्तर प्रदेश के पूर्व शिक्षा निदेशक कृष्ण मोहन त्रिपाठी को भी इस समिति में शामिल किया गया है। प्रिंसटन विश्विवद्यालय के गणितज्ञ मंजुल भार्गव और मुंबई की एनएनडीटी विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति वसुधा कामत भी इस समिति का हिस्सा होंगी।
जाहिर है कि समिति में अलग-अलग विशेषज्ञता वाले लोगों को रखा गया है, ताकि विविध क्षेत्रों से जुड़ी उनकी विशेषज्ञता का नयी शिक्षा नीति के निर्धारण में इस्तेमाल किया जा सके। कुछ साल पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यन की अध्यक्षता में भी शिक्षा नीति पर एक समिति बनाई थी।
भले ही सरकार ने नई शिक्षा नीति बनाने के लिए जिस समिति का गठन किया है उसमें उच्च योग्यता और विविधतापूर्ण अनुभव रखने वाली हस्तियां शामिल हैं और उम्मीद की जा सकती है कि समिति के विचार-विमर्श से कुछ अच्छे निष्कर्ष ही सामने आयेंगे। लेकिन पिछले 70 वर्षों में शिक्षा क्षेत्रों में कितनी समितियां बनीं इसकी गिनती शायद ही किसी को पता हो। इसी तरह कितनी समितियां अपनी सिफारिशें सरकार को सौंप सकी हैं और जिनने सिफारिशें सौंपी भी हैं, उन सिफारिशों पर अमल कितना किया गया, यह भी शायद ही किसी को पता हो शिक्षा मंत्रालय से मानव संसाधन विकास मंत्रालय में तब्दील होने के बाद भी इस मंत्रालय ने शिक्षा को लेकर बहुत कसरतें की हैं। लेकिन आज भी सरकारी और निजी शिक्षण संस्थाओं, कोचिंग क्लासेज और उच्च शिक्षा के नाम पर देश की शिक्षा भर्राशाही की शिकार है। शिक्षा के नाम पर कहीं बच्चों और युवाओं से छल हो रहा है तो कहीं लूट मची है। उम्मीद की जाना चाहिए कि समिति समग्र चिन्तन करके राष्ट्र के भविष्य के हित में श्रेष्ठ सिफारिशें देगी और सरकार भी उन पर गम्भीरता से काम करेगी।

मां-बेटा पार्टी और ये उम्मीदवार
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पदों के उम्मीदवारों की घोषणा करते हुए कहा है कि चुनावी-गणित के मुताबिक उन्हें हारना ही है लेकिन उनके दोनों उम्मीदवारों को देश के 18 राजनीतिक दल समर्थन दे रहे हैं याने विरोधी दलों की एकता मजबूत हो रही है और दूसरा, यह चुनाव वैचारिक संघर्ष को मैदान में ला रहा है। यह संकीर्णता, सांप्रदायिकता और विभाजनकारी प्रवृत्तियों के खिलाफ शंखनाद है। क्या खूब ? बातों के लिहाज से इस अदा का कोई जवाब नहीं है। कौनसी विरोधियों की एकता ? राष्ट्रपति के मामले में बिहार की उम्मीदवार मीरा कुमार का विरोध बिहार के मुख्यमंत्री नीतीशकुमार ही कर रहे हैं। उप्र में मुलायमसिंह भी उनको वोट नहीं देंगे। कुछ अन्य विरोधी दलों के बड़े नेताओं से मेरी बात हुई है। वे भी अपने सांसदों और विधायकों को अंतःकरण की छूट दे रहे हैं, जैसा कि सोनियाजी ने अपील की है। विरोधी दलों की एकता तो मृग-मरीचिका भर है। इस समय कोई भी विरोधी नेता ऐसा नहीं है, जो नरेंद्र मोदी के मुकाबले खड़ा हो सके। खुद कांग्रेस पार्टी एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनकर रह गई है। यदि मीरा कुमार और गोपाल गांधी जैसे श्रेष्ठ उम्मीदवार उक्त पदों के लिए खोजे जा सकते हैं तो कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के लिए क्यों नहीं खोजे जा सकते हैं ? मुझे पूरा विश्वास है कि मीराजी और गोपालजी कांग्रेस पार्टी को मां-बेटे की तुलना में काफी अच्छी चला सकते हैं। जहां तक वैचारिक संघर्ष का सवाल है, कौनसा वैचारिक संघर्ष ? विचार नाम की वस्तु भारतीय राजनीति से कभी की अंर्तध्यान हो गई है। गांधी की कांग्रेस तो कभी की चल बसी है। अब तो मां-बेटा कांग्रेस है और सत्ता ही एक मात्र विचार है। दोनों पदों के लिए सोनियाजी ने मांग की है कि सांसद और विधायक अपने अंतःकरण के अनुसार वोट दें। क्या नेताओं का अंतःकरण भी होता है ? दोनों श्रेष्ठ उम्मीदवारों को अपनी डूबती नाव पर सवार करवाकर अब आपने उनको बचाने का यह नया पैंतरा मार दिया है। धन्य है, देवी !!

भाजपा में वेंकैया ही क्यों ? डॉ. मयंक चतुर्वेदी
यह प्रश्न सहज और सरलतम रूप से संव्याप्त है कि भारतीय जनता पार्टी ने उपराष्ट्रपति चुनाव में अपने इतने वरिष्ठ एवं अनुभवी नेता जिनको कि देश के शहरों की कायाकल्प करने की जिम्मेवारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रीमण्डल में शामिल कर बतौर शहरी विकास मंत्री सौंपी, उन्हें आखिर क्यों इस महत्वपूर्ण पद के लिए चुना गया है ? क्या भाजपा के पास देश का उपराष्ट्रपति चुना जाने वाला आवश्यक अन्य सदस्य नहीं था या उसे ऐन मौके पर कोई पद के लिए तैयार होता नहीं दिखा। इस प्रकार के अनेक प्रश्न कई लोगों के मनो-मतिष्क में इस समय चल रहे हैं। जिसमें कि सबसे अधिक भाजपा के कार्यकर्ताओं के दिमाग में हैं। किंतु जिस तरह का यह निर्णय पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने लिया है, उसके लिए वह अवश्य ही सराहना का पात्र है।
यदि विपक्ष चाहता तो हो सकता है कि यह निर्णय नहीं होता, आपसी सहमति बनती तो कांग्रेस समेत 18 विपक्षी दलों के गठबंधन से चुनाव में इस पद के लिए खड़े किए गए गोपालकृष्ण गांधी के नाम पर सर्वसम्मति से मुहर लग जाती। सभी जानते हैं कि गोपाल गांधी महात्मा गांधी के पौत्र हैं। वह पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और राजनयिक रहे हैं और सिविल सोसायटी की नामी शख्सियत हैं। परन्तु इसे विपक्ष का अहंकार ही कहिए कि उसने सत्तापक्ष से इस विषय पर विमर्श करना भी उचित नहीं समझा और एक तरफा अपना उम्मीदवार तय कर दिया।
इसका नकारात्मक परिणाम यही माना जाए कि विपक्ष ने गोपालकृष्ण गांधी जैसे एक श्रेष्ठतनाम को आगे करने के बाद भी उन्हें हारने के लिए चुनाव के मैदान में छोड़ दिया है, क्योंकि वोट का गणित तो एनडीए नीत भाजपा के साथ है, जो यह साफ बता रहा है कि वेंकैया ही देश के अगले उपराष्ट्रपति होंगे।
वस्तुत: संसद में राजग का संख्या बल देखते हुए चुनाव को महज औपचारिकता माना जा सकता है। पांच अगस्त को होने वाले इस चुनाव में वेंकैया की ही जीत होगी, बशर्ते कि कोई अप्रत्याशित घटना न घटे । आंकड़े स्वत: स्पष्ट कर रहे हैं कि उपराष्ट्रपति चुनाव में लोकसभा के 545 और राज्यसभा के 245 सांसद वोट डालते हैं। अभी लोकसभा और राज्यसभा में दो-दो सीटें खाली हैं यानी स्पीकर को मिला कर कुल निर्वाचन मंडल 786 सांसदों का मौजूद है। यह संख्या बल एनडीएनीत भाजपा के पक्ष में जा रहा है। एनडीए के पास 425 सांसद सदस्यों की संख्या है, जबकि उसे एआईएडीएमके के 50, बीजेडी के 27, टीआरएस के 14, वाईएसआर कांग्रेस के 8, पीएमके और एआईएनआर कांग्रेस के एक-एक सांसद का समर्थन मिला हुआ है। क्योंकि इन्होंने पहले ही भाजपा का साथ देने का भरोसा जताया था । इस तरह यदि कुल एनडीए की वोट संख्या का आंकड़ा देखें तो यह 526 तक पहुंच जाता है, जो जीत के लिए जरूरी वोटों से बहुत आगे है। अत: इन आंकड़े को देख और समझ कर कोई भी पहली नजर में कह देगा कि वेंकैया नायडू की जीत पक्की है और वे देश के अगले उपराष्ट्रपति होने जा रहे हैं।
नायडू का राजनीतिक जीवन देखने पर भी लगता है कि उपराष्ट्रपति की उम्मीदवारी के हिसाब से भाजपा ने बहुत उत्तम नाम पर विचार किया है। मुप्पवरपु वेंकैया नायडू आंध्र प्रदेश से भारतीय राजनीति में आने वाले एक ऐसे राजनीतिज्ञ हैं, जिन्होंने सन् 1974 से आंध्र विश्वविद्यालय में छात्र संघ के अध्यक्ष के रूप में अपनी राजनीतिक लोकसेवक की यात्रा आरंभ की है। वे सबसे पहले 1972 में जय आंध्र आंदोलन के दौरान पहली बार सुर्खियों में आए थे। छात्र जीवन में उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण की विचारधारा से प्रभावित होकर आपातकालीन संघर्ष में हिस्सा लिया। वे आपातकाल के बाद सन् 1977 से 1980 तक जनता पार्टी के युवा शाखा के अध्यक्ष रहे। वर्ष 2002 से 2004 तक उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का उतरदायित्व निभाया। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रहे और वर्तमान में वे भारत सरकार के अंतर्गत शहरी विकास, आवास तथा शहरी गरीबी उन्मूलन तथा संसदीय कार्य मंत्री के पद पर रहते हुए लोकसेवा के कार्य में जुटे हुए हैं।

मोदी और शी फिर झूला झूलें, बात करें
-डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पिछले लगभग एक माह से भारत और चीन की फौजें आमने-सामने हैं। उन्होंने एक-दूसरे की सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया है बल्कि भूटान के दोकलाम नामक एक पठार को लेकर दोनों देशों के फौजियों के बीच धक्का-मुक्की और कहा-सुनी हुई है। गनीमत है कि तोपें और बंदूकें नहीं चली हैं। भारत और चीन की सीमाएं हजारों किलोमीटर में फैली हुई हैं और सैकड़ों बार दोनों देशों की फौजें जाने-अनजाने उनका उल्लंघन करती रहती हैं लेकिन उनमें मुठभेड़ की नौबत प्रायः नहीं आती। 1987 में अरुणाचल के सोमदोरोंग चू इलाके में मुठभेड़ की स्थिति बन गई थी लेकिन दोनों देशों की सरकारों ने उसे बातचीत के जरिए हल कर लिया था। भारत-चीन सीमा-विवाद पर शांतिपूर्ण मर्यादित व्यवहार कैसे किया जाता है, यह उदाहरण मैं पाकिस्तानी नेताओं, फौजियों और कूटनीतिज्ञों को अक्सर देता हूं लेकिन इस बार दोकलाम-विवाद ने दूसरा ही चित्र उपस्थित कर दिया है।
यह दोकलाम-विवाद है, क्या ? दोकलाम लगभग 250 कि.मी. का वह पठारी इलाका है, जो भूटान की सीमा में है। यह तिब्बत, भूटान और सिक्किम के त्रिभुज के कंधे पर स्थित है। यह अत्यंत सामरिक महत्व का स्थान है। इस पर चीन अपना अधिकार जता रहा है। वह वहां ऐसी सड़कें बना रहा है, जिस पर 40-40 टन के टैंक भी चल सकें। यदि इस पठार पर चीन का कब्जा हो गया तो भारतीय सीमाओं में घुस जाना उसके लिए बाएं हाथ का खेल होगा। वह चुम्बी घाटी पार करके मिनिटों में सारे उत्तर-पूर्व के प्रांतों को भारत से काट सकता है। भूटान का कहना है कि दोकलाम में सड़क बनाकर चीन 1988 और 1998 में हुए समझौतों का उल्लंघन कर रहा है। उन समझौतों में यह तय हुआ था कि जब तक यह सीमा-विवाद हल नहीं हो जाता, चीन यथास्थिति बनाए रखेगा। इस क्षेत्र के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा लेकिन चीन कहता है कि 1890 में जो ब्रिटिश-चीन समझौता हुआ था, उसमें यह क्षेत्र चीन का है, ऐसा ब्रिटेन ने स्वीकार किया था। इसीलिए चीन अब इस भारतीय हस्तक्षेप को चीन की संप्रभुता का उल्लंघन मानता है। यह भी कहा जाता है कि दोकलाम का पठार चीन के लिए इतने अधिक सामरिक महत्व का बन गया है कि इसके बदले वह उत्तरी भूटान के पास इससे दुगुनी जमीन पर अपना दावा छोड़ने को तैयार है।
दोकलाम पठार पर अपने कब्जे को चीन ने अपनी इज्जत का सवाल बना लिया है। वह भारत से कोई भी बात करने के लिए तब तक तैयार नहीं है, जब तक कि भारत वहां से अपनी फौजें न हटा ले। वह खुद जमा रहे और भारत हट जाए। इतना ही नहीं, उसने कैलाश-मानसरोवर की तीर्थ-यात्रा स्थगित कर दी। वर्षों से तीर्थ-यात्रा की तैयारी कर रहे भारतीयों ने यह अजीब-सा धक्का महसूस किया। चीनी सरकार के प्रवक्ताओं ने ऐसे तेजाबी बयान जारी किए हैं कि मानो दोकलाम को लेकर चीन युद्ध के लिए तैयार है। रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने सिर्फ इतना कहा था कि यह 1962 नहीं, 2017 है। इस पर चीनी प्रवक्ता ने 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध का हवाला देते हुए अत्यंत उत्तेजक और आपत्तिजनक बयान दे डाले। बयान तो भारत की तरफ से भी जारी हो रहे हैं लेकिन उनमें पूरा संयम बरता जा रहा है।
आश्चर्य है कि अभी तक दोनों देशों के बीच कोई कूटनीतिक वार्ता तक नहीं चली है। दिल्ली और पेइचिंग, दोनों जगह दूतावास हैं और उनका उन देशों की सरकारों से इस मुद्दे पर कोई संवाद नहीं है।

सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल: सुविधा केंद्र या लूट के अड्डे?
-निर्मल रानी
हमारे देश में इन दिनों मध्यम व उच्च श्रेणी के निजी नर्सिंग होम व निजी अस्पतालों से लेकर बहुआयामी विशेषता रखने वाले मल्टी स्पेशिलिटी हॉस्पिटल्स की बाढ़ सी आई हुई है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र व गुजरात जैसे आर्थिक रूप से संपन्न राज्यों से लेकर उड़ीसा, िबहार व बंगाल जैसे राज्यों तक में भी ऐसे बहुसुविधा उपलब्ध करवाने वाले अस्पतालों को संचालित होते देखा जा सकता है। यहां यह बताने की ज़रूरत नहीं कि हज़ारों करोड़ रुपये की लागत से शुरु होने वाले इन अस्पतालों को संचालित करने वाला व्यक्ति या इससे संबंधित ग्रुप कोई साधारण व्यक्ति या ग्रुप नहीं हो सकता। निश्चित रूप से ऐसे अस्पताल न केवल धनाढ्य लोगें द्वारा खोले जाते हैं बल्कि इनके रसूख भी काफी ऊपर तक होते हैं। इतना ही नहीं बल्कि बड़े से बड़े राजनेताओं व अफसरशाही से जुड़े लोगों का इलाज करते-करते साधारण अथवा मध्यम या उच्च मध्यम श्रेणी के मरीज़ों की परवाह करना या न करना ऐसे अस्पतालों के लिए कोई मायने नहीं रखता। इस संदर्भ में हम यह कह सकते हैं कि देश के इन नामी-गिरामी बड़े अस्पतालों में जिनमें फोर्टिस, मैक्स, अपोलो, कोलंबिया एशिया रेफरल हॉस्पिटल, नोवा स्पेशिलिटी हॉस्पिटल, ग्लोबल हेल्थ सिटी, बी जी एस ग्लोबल हॉस्पिटल, सर गंगाराम हॉस्पिटल व इनके अतिरिक्त और भी कई अस्पताल ऐसे हैं जहां एक ही छत के नीचे किसी भी मरीज़ की प्रत्येक ‎किस्म की बीमारी की जांच-पड़ताल, उससे संबंधित प्रत्येक क़िस्म के मेडिकल टेस्ट व हर प्रकार के ऑप्रेशन की सुविधा उपलब्ध रहती है।
यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि लगभग पांच सितारा होटल्स जैसी सुविधाएं उपलब्ध करवाने वाले इन अस्पतालों का खर्च उठा पाना किसी साधारण व्यक्ति के वश की बात नहीं है। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि ऐसे अस्पताल केवल उन मरीज़ों के लिए ही अपनी सेवाएं देते हैं जो इन अस्पतालों द्वारा मरीज़ की बीमारी से संबंधित भारी-भरकम बिल का बोझ उठा सके। ऐसे अस्पतालों में आमतौर पर कोई छोटा ऑप्रेशन अथवा मध्यम श्रेणी की बीमारी का इलाज भी लाखों रुपये में हो पाता है। इसमें कोई शक नहीं कि देश में लाखें संपन्न मरीज़ ऐसे हैं जो इन या इन जैसे दूसरे बड़े अस्पतालों से अपना इलाज करवा कर स्वास्थय लाभ ले रहे हैं। ऐसी खबरें नि:संदेह संतोषजनक हैं तथा देश के सभी अस्पतालों से ऐसे ही संतोषजनक समाचारों की उम्मीद की जानी चाहिए। परंतु यदि हमें यह पता चले कि इतने विशाल भवन, वृहद् आकार व प्रकार वाले इन्हीं पांच सितारा सरीखे अस्पतालों में मरीज़ों के साथ खुलेआम लूट नहीं बल्कि डकैती की जा रही है तो ऐसी खबरें ऐसे अस्पतालों के लिए किसी कलंक से कम नहीं है। आज यदि आप ऐसे कई बड़े अस्पताल की वेबसाईट खोलकर देखें अथवा इन अस्पतालों के भुक्तभोगी मरीज़ों द्वारा सांझे किए गए उनके अनुभवों पर नज़र डालें तो आपको ऐसे अस्पतालों की वास्तविकता तथा इन विशाल गगनचुंबी इमारतों के पीछे का भयानक सच पढ़ने को मिल जाएगा।
बेशक कुछ ऐसे रिव्यू लिखने वालों ने इन अस्पतालों की कारगुज़ारियों व उनके स्टाफ के बर्ताव की तारीफ भी लिखी है। परंतु प्रश्न यह है कि लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद यदि एक भी मरीज़ या उसके तीमारदार अस्पताल के प्रति कोई नकारात्मक विचार लेकर जाते हैं तो आ‎खिर ऐसा भी क्यों? पिछले दिनों मनीश गोयल नामक एक नवयुवक ने दिल्ली के शालीमार बाग स्थित मैक्स हॉस्पिटल के अपने अनुभव को सोशल मीडिया पर एक वीडियो के द्वारा सांझा किया। उसने बताया कि गत् 19 जून को उसके मरीज़ को एक बाईपास सर्जरी के बाद डिस्चार्ज किया जाना था।

चुनाव आयोग की हकलाहट
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
अपना चुनाव आयोग बड़ी दुविधा में फंस गया है। वह सर्वोच्च न्यायालय को यह नहीं बता पा रहा है कि जिन नेताओं को आपराधिक मामलों में दो साल से ज्यादा की सजा हो जाती है, उन्हें सिर्फ छह साल तक चुनाव नहीं लड़ने दिया जाए या पूरे जीवन भर का प्रतिबंध उन पर लगा दिया जाए। ऐसे अपराधी नेताओं को जीवन भर चुनावों से वंचित करने के लिए एक याचिका भाजपा के प्रवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने अदालत में लगा रखी है। चुनाव आयोग ने अदालत के सामने लिखित कागज पेश किया है, उसमें तो आजीवन प्रतिबंध की बात से वह सहमत है लेकिन उसके वकील ने जजों से कहा कि यह तय करना तो संसद के हाथ में है। इस पर जजों ने आयोग से कहा कि आप हकला क्यों रहे हैं ? आप अपनी दो-टूक राय क्यों नहीं देते ? उपाध्याय ने अपनी याचिका में यह मांग भी की है कि ऐसे अपराधियों को न तो किसी पार्टी का पदाधिकारी बनने का अधिकार होगा और न ही वे कोई नई पार्टी बना सकेंगे। यह बिल्कुल सही मांग है, क्योंकि अपराधी नेताओं को हमने देखा है कि वे मुख्यमंत्री का पद अपनी बीवी या किसी चमचे को सौंपकर खुद पार्टी के मुखिया की गद्दी सम्हाल लेते हैं। कुछ कैदी नेता जेल में पड़े-पड़े अपनी पार्टियां चलाते रहते हैं। इस मामले में चुनाव आयोग भी हकला रहा है क्योंकि सरकारी वकील ने साफ-साफ कह दिया है कि यह मामला संसद ही तय करेगी। संसद क्या करेगी, यह हम अपने आप समझ सकते हैं। यों भी आजीवन प्रतिबंध में ज़रा ज्यादती मालूम पड़ती है, क्योंकि अदालतें भी कभी-कभी गलत निर्णय कर देती हैं। इसके अलावा नेता भी साधारण मनुष्य ही होते हैं। कभी-कभी अनजाने ही वे भयंकर भूल भी कर सकते हैं। उन्हें सुधरने का मौका दिया जा सकता है। इसीलिए उनकी प्रवंचना की अवधि को 6 वर्ष से बढ़ाकर 10 वर्ष कर दिया जाना चाहिए और चुनाव के साथ-साथ उन्हें 10 वर्ष तक पार्टी और सरकारी पदों से भी वंचित रखने का प्रावधान होना चाहिए। यदि संसद ऐसा कानून बना दे तो हमारी राजनीति पहले से थोड़ी बेहतर हो सकेगी।
युद्ध समाधान नही: पर चीन के साथ वार्ता फिलहाल बेमानी है
(अजित वर्मा)
सिक्किम के निकट भूटान की भूमि पर भारत के साथ विवाद के बीच चीनी सेना तिब्बत के उंचाई वाले इलाके में युद्ध के वास्तविक हालात के मुताबिक अभ्यास कर रही है। सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने रिपोर्ट छापी है कि यह सैन्य अभ्यास 5100 मीटर की उंचाई पर किया जा रहा है। इस अभ्यास में चीन अपने सबसे आधुनिक टैंक (टाइप 96बी) का भी परीक्षण कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक नए उपकरणों का परीक्षण करने के साथ गोलीबारी कराई जा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अभ्यास में युद्ध अभियान कमान, युद्ध में सहयोग, गोलीबारी का प्रशिक्षण और शस्त्रों की समग्र निगरानी को शामिल किया गया है। पिछले सप्ताह चीनी रक्षा विभाग के प्रवक्ता कर्नल वू किन ने मीडिया से कहा था कि सैन्य अभ्यास के दौरान करीब 35 टन वजन वाले टैंक का परीक्षण किया जा रहा है। शिन्हुआ ने अपनी वेबसाइट पर इस अभ्यास की तस्वीरें भी जारी की हैं। यह अभ्यास सिक्किम सेक्टर के डोकालाम इलाके में भारत और चीन के बीच तनाव की पृष्ठभूमि में हो रहा है।
हाल में ही सैन्य विशेषज्ञों ने कहा था कि युद्ध की स्थिति में चीनी सेना को बेहतर कोऑर्डिनेशन के लिए जूझना पड़ रहा है। इसके बाद चीन की सरकार ने नियमित तौर पर मिलिटरी एक्सरसाइज शुरू कर दी थी। शिन्हुआ के मुताबिक ऐसा पहली बार है जब इतनी यादा ऊंचाई पर तिब्बत के पठार में युद्ध की परिस्थितियों के मुताबिक चीन की सेना अभ्यास कर रही है।
मौजूदा संदर्भों में भले इसे प्रासंगिक माना जाए लेकिन पहले से तय कार्यक्रम के तहत भारत, अमेरिका और जापान भी इन्हीं दिनों मिलकर सैन्य अभ्यास के जरिए अपनी ताकत दिखा रहे हैं। भारत और चीन के बीच मौजूदा तनाव के बीच तीनों देशों का मालाबार सैन्य अभ्यास शुरू हो गया है। चीन की इस अभ्यास पर गहरी नजर है। चीन स्वयं दुनिया के कारोबार के लिहाज से अहम साउथ चाइना-सी में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है, जबकि हिंद महासागर क्षेत्र में भी चीनी पनडुब्बियों की गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। जाहिर है कि भारत साफ संदेश दे रहा है कि वह चीन की बेजा हरकतों से डरने वाला नहीं है।
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर तकरार के बीच चीनी मीडिया लगातार भारत को पीछे हटने के लिए दबाव बना रहा है। लेकिन भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि यह हमारी सुरक्षा का मुद्दा है, इसलिए पीछे हटने का सवाल ही नहीं उठता है। भारत -चीन सीमा पर चल रहे तनाव पर पूरे देश का ध्यान केन्द्रित है। चीन जहां धमकियां दे रहा है, वहीं उसने अपनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की तैनाती में भी वृद्धि की है। जवाब में भारत ने भी क्षेत्र में सैन्य बल बढ़ाया है। क्षेत्र के बुनियादी ढांचे में भी भारत सुधार कर रहा है।
इस बीच सवाल उठ रहा है कि आखिर विवाद का हल कैसे निकलेगा? कहा जा रहा है कि भारत और चीन को सीमा विवाद कूटनीति के जरिए बैठकर सुलझाने चाहिए। चीन के साथ वर्तमान सीमा विवाद पर भारत का रुख यह है कि चीन को अपनी हद पार नहीं करनी चाहिए। उसको भूटान के क्षेत्र में नहीं घुसना चाहिए । इस मुद्दे का समाधान कूटनीतिक माध्यम से किया जाना चाहिए। चीन को अपने पहले की जगह (सीमा पर) पर बने रहना चाहिए। भारत याद दिला रहा है कि भूटान के राजा ने एक बयान जारी किया है कि चीन हमारे क्षेत्र में घुस रहा है। भूटान जो कह रहा है उसे समझा जाना चाहिए।
यह सच है कि पिछले कुछ महीनों में भारत और चीन के रिश्ते तल्ख हुए हैं। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमी कॉरिडोर का भारत के विरोध को लेकर वह खार खाया हुआ है। वहीं भारत-अमेरिका की बढ़ती नजदीकी को भी वह पचा नही पा रहा है। ताजा विवाद के तहत चीन ने भारतीय जवानों पर सिक्किम में सीमा पार करने का आरोप लगाया है और उन्हें वापस बुलाए जाने की मांग वह भारत से कर रहा है।

राहुल बात को छिपाए क्यों ?
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने चीनी राजदूत से भेंट की, यह कोई असाधारण घटना नहीं थी लेकिन यह इतनी खबरीली इसलिए बन गई कि इसे छिपाने की कोशिश पहले राहुल ने की और फिर चीनी दूतावास ने की। जब टीवी चैनलों पर हंगामा होने लगा तो कांग्रेस के प्रवक्ता और राहुल भी चारों खाने चित्त हो गए। उन्होंने स्वीकार किया कि राहुल और चीनी राजदूत की बात हुई है लेकिन उन्हें यह बताते अभी भी डर लग रहा है कि बात क्या हुई ?
इसमें डरने की बात क्या है ? छिपाने की बात क्या है ? तीन साल पहले जब हाफिज सईद से पाकिस्तान में मेरी बात हुई थी तो कितना बड़ा हंगामा हो गया था, संसद बंद हो गई थी, कुछ टीवी एंकर पगला गए थे लेकिन सबका मैंने मुंहतोड़ जवाब दिया था। मैंने कुछ छिपाया नहीं। हाफिज से हुई तीखी बातचीत को शब्दशः छपा दिया था। साॅंच को आॅंच क्या ? हां, राहुल का यह इरादा रहा हो सकता है कि चीनी राजदूत की बात में से कुछ बिंदु ऐसे निकाल लिये जाएं, जिनसे मोदी पर हमला हो सके। वैसे राहुल ने भूटान के राजदूत और अपने पूर्व राजनयिक शिवशंकर मेनन से भी बात की है। यह अच्छा लक्षण है। विपक्ष का नेता यदि कुछ सीखने की कोशिश कर रहा है तो यह प्रशंसनीय है। यों भी अक्सर राहुल की मजाक उड़ती रही है। देश के बौद्धिकों के बीच वे ‘भौंदू बाबा’ के नाम से विख्यात हो चुके हैं। लेकिन राहुल हमारे प्रधानमंत्रीजी की तरह सर्वज्ञ नहीं है। दोकलाम में चल रही तनातनी के बारे में ‘सर्वज्ञजी’ अभी तक चुप हैं। सबसे शर्मनाक बात तो यह हुई कि हमारे विदेश मंत्रालय ने सर्वज्ञजी और चीनी नेता की हेम्बर्ग में बातचीत हुई, ऐसा जमकर प्रचार कर दिया और चीनी प्रवक्ता कह रहा है कि दोनों की कोई बैठक ही नहीं हुई। खड़े-खड़े सलाम-दुआ हुई और फोटो खिंच गए। पता नहीं, हमारी सरकार डर क्यों रही है ? बात क्यों नहीं कर रही है ? विरोध-पत्र क्यों नहीं भेज रही है ? चीनी राजदूत को बुलाकर उससे पूछताछ क्यों नहीं कर रही है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि दोकलाम में तनातनी का फैसला स्थानीय स्तर पर ले लिया गया हो और केंद्रीय नेताओं का उसका पता ही न हो। सारे मामले को केंद्र सरकार बहुत तूल नहीं दे रही है, यह ठीक कर रही है। लेकिन आश्चर्य है कि इतने लंबे-चौड़े सलाह-मश्विरे के बावजूद राहुल गांधी अभी तक कुछ बोले क्यों नहीं ? बंधी मुट्ठी लाख की ! खुल गई तो खाक की !

चीन का ’सुपर-गेम‘
चीन एक चूहा है, जो फूँक-फूँक कर काटता है……!
(ओमप्रकाश मेहता)
चीन एक ऐसा चूहा है, जिसकी फितरत ही फूंक-फूंक कर काटने की है और जिसे उसने काटा उसे चीनी चूहे के काटने का पता तब चलता है, जब उसे अपने अंग में खून के दर्शन होते है और तब तक चूहा अपने करतब दिखाकर गायब हो जाता है, चीनी चूहे की यह तरकीब नई नहीं है, 1962 में इस चूहे ने ”हिन्दी-चीनी भाई-भाई“ का नारा लगाकर हमारे देश को लहूलुहान किया था और अब जर्मनी के हैम्बर्ग में मोदी के सामने मुस्कान बिखैर कर और उनकी तारीफ कर ’चूहानीति‘ अपनाने का प्रयास किया। अब यह बात अलग है कि भारत द्वारा हैम्बर्ग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिन से नरेन्द्र मोदी की संभावित भेंट से इंकार करने के बाद यह मुलाकात क्यों हुई और यह मुलाकात मोदी की कूटनीति का हिस्सा थी या चीनी राष्ट्रपति का ’सुपरगेम‘? किंतु यह सबके सामने है कि भारतीय प्रधानमंत्री व चीनी राष्ट्रपति की भेंट हुई। अब इस भेंट के दौरान क्या चर्चा हुई दोनों के बीच, यह तो अभी स्पष्ट नहीं हुआ है, किंतु यह तय है कि यह भेंट ’चीनी चूहा नीति‘ का ही एक हिस्सा थी? वैसे इस भेंट को लेकर देश में चर्चाओं का बाजार गर्म है, जितने मूंह उतनी बातें हो रही है, कोई मोदी पर आरोप लगा रहा है तो कोई शी पर। किंतु देश की राजनीति का मर्मज्ञों का यह कहना जरूर है कि हमारे प्रधानमंत्री जी का आततायी देश के राष्ट्रपति से मिलना तो दूर उन्हें तवज्जोह ही नहीं देनी थी, क्योंकि यदि ऐसी बातचीत से ही विवाद सुलझना होता तो ’नेहरूयुग‘ में ही सुलझ गया होता और आज हमें अपनी ही सरहदों पर सुबह-सुबह ’नकटों‘ (कटी हुई नाकों वालों) के दर्शन नहीं करना पड़ते, किंतु ’ड्रेगन‘ तो मार-खाने का आदी हो गया है, और वह इसके बावजूद अपनी ’विस्तारवादी नीति‘ नहीं छोड़ सकता।
आज चीन की हैकड़ी का शिकार अकेला भारत नहीं बल्कि सत्रह देश है। मध्य एशिया, दक्षिण पूर्वी एशिया और पूर्वी एशिया के डेढ दर्जन देश चीन की चालबाजी में फंसे हुए है और तनावग्रस्त है। उल्लेखनीय है कि चीन का जिन देशों के साथ जमीन को लेकर विवाद है उनमें ताजिकिस्तान, वर्गिस्तान, वियतनाम, लाझोस, कम्बोडिया, ताईवान और जापान देश है, जिनकी जमीन पर चीन ने कब्जा कर रखा है, यदि नहीं इन देशों के अलावा जो देश चीन के कर्जदार है, और किसी कारण से कर्ज चुका नहीं पा रहें है, उन देशों की जमीन पर वह कर्ज के बदले कब्जा कर रहा है। चीन की बाईस हजार कि.मी. की जमीनी सीमा है, जो कोरिया, रूस, मंगोलिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, म्यांमार, लाझोस और वियतनाम देशों की सीमा से गुजरती है, जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, वह चीन का सीधा पड़ौसी नहीं है लेकिन पीओके के माध्यम से वह पाकिस्तान को भी अपना पड़ौसी देश मानता है।
नाम आदर्श, काम पतित
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
मुंबई की आदर्श हाउसिंग सोसायटी के घोटाले में चार मुख्य मंत्रियों, कुछ मंत्रियों, कुछ नौकरशाह और कुछ सेनापतियों के नाम उछले, यही बताता है कि इस सोसायटी का नाम जितना खरा है, काम इसका उतना ही खोटा है। नाम आदर्श, काम पतित ! कोलाबा में बने इस 31 मंजिले भवन के फ्लैट करगिल युद्ध के शहीदों को मिलने थे लेकिन उन्हें हड़प लिया नेताओं ने, नौकरशाहों ने, सैन्य अफसरों ने। यह पता नहीं चला कि करगिल के शहीदों की कितनी विधवाओं को ये फ्लैट दिए गए। यह भी पता नहीं कि शहीद होनेवाले जवान और कनिष्ठ अफसरों के परिजनों के पास इन फ्लैटों को खरीदने के लिए पैसे भी थे या नहीं ? 75-75 लाख रु. वे कहां से लाते ? दूसरे शब्दों में इस सरकारी जमीन का दुरुपयोग करने का षड़यंत्र पहले से ही बना हो सकता है। करगिल युद्ध के नाम पर कुछ भी किया जा सकता है। इसीलिए 31 मंजिल ऊंचा भवन बनाने की बाकायदा इजाजत भी ले ली गई। संबंधित विभाग ने उन्हें रोका भी नहीं। इस क्षेत्र में सात मंजिल से ऊंचे भवन नहीं बनते हैं, क्योंकि पास में ही रक्षा-मंत्रालय के भवन हैं। पर्यावरण की दृष्टि से भी वे आपत्तिजनक हैं। इस रहवासी भवन की 31 मंजिला ऊंचाई पर किसी ने उंगली तक नहीं उठाई, क्योंकि नेता, नौकरशाह और सेनापतियों की मिलीभगत थी। जब भांडाफोड़ हुआ तो मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को इस्तीफा देना पड़ा और सेनापतियों ने शर्म के मारे अपने फ्लैट लौटा दिए। अब रक्षा मंत्रालय की जांच में सेना के कई उच्च अधिकारियों के नाम भी धूमिल हुए हैं लेकिन अभी तक यह तय नहीं हुआ है कि जिन लोगों ने बेईमानी से उन फ्लैटों पर कब्जा किया है और छोड़ नहीं रहे हैं, उनका क्या किया जाए ? मुंबई के उच्च न्यायालय का फैसला यह था कि पूरा भवन ही गिरा दिया जाए। यदि सचमुच यह भवन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है तो इसे गिराना ही ठीक है लेकिन यदि नहीं है तो क्या इतना काफी नहीं हेागा कि गैर-कानूनी कब्जाधारियों को तुरंत निकाल बाहर किया जाए और उन्हें एक-पैसा भी नहीं लौटाया जाए। उन पर हल्का-सा जुर्माना भी जरुर किया जाए। कुछ नौकरशाहों और बड़े फौजी अफसरों की गिरफ्तारी पहले ही हो चुकी है। उनकी इज्जत धूल में मिल चुकी है। लेकिन हमारे नेता पूरी तरह से सुरक्षित हैं, क्योंकि उनका आचरण ‘आदर्श’ है।

बढ़ते कचरे की चुनौती से निपटना
सुधीरेन्‍दर शर्मा
देश के अधिकतर बड़े और मध्यम शहरों तथा कस्बों में आमतौर पर छोटे पहाड़नुमा अशोधित शहरी कचरे के ढ़ेर नजर आते हैं। किसी भी शहर में आगंतुकों का स्‍वागत कचरे के ढ़ेर से होता हैं और घूरे पर पड़ा कचरा तेजी से बढ़ती समृद्धि को दर्शाता है। इसका परिणाम यह है कि लगभग सभी शहरों में कूड़े के ढ़ेर स्वास्थ्य के लिये गंभीर खतरा बन गए हैं, इनमें वे शहर भी शामिल हैं जो कचरे के निपटान के प्रभावी तरीके विकसित नहीं कर पाये हैं।इस समस्या पर नियंत्रण के लिये भारत सरकार ने क्षेत्र-आधारित विकास और शहरी स्तर के स्मार्ट समाधान के माध्यम से जीवन में सुधार के लिए स्वच्छ भारत अभियान (एसबीए) और स्मार्ट सिटी मिशन (एससीएम) शुरू किये हैं। तीन साल की कार्य एजेंडा (2017-18 से 2019-20) तैयार करने में नीति आयोग ने नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट (एमएसडब्ल्यू) प्रबंधन की समस्‍या से निपटने के लिये व्यापक ढांचा तैयार किया है।
वास्तविकता में बदलाव के साथ विकास की रणनीति से ताल मेल के लिये नीति आयोग को तीन वर्ष की अवधि के भीतर नीतिगत परिवर्तनों को प्रभावित
करने के साधन और दृष्टिकोण विकसित करने का कार्य सौंपा गया है। यह अपने तीन वर्ष के एजेंडे के तार्किक निष्कर्ष के लिये सात साल की रणनीति और पंद्रह वर्ष की दूरदर्शिता के साथ कार्य करेगा। स्थिति की विशालता को देखते हुये इस एजेंडे में नगरपालिका के ठोस कचरे के प्रबंधन के लिये तेजी से कार्रवाई करने की आवश्यकता को स्वीकार किया है।
7,935 शहरी क्षेत्रों में रहने वाले 377 मिलियन निवासियों के कारण (जनगणना 2011) प्रति दिन 170,000 टन ठोस अपशिष्ट पैदा होता है। इस तथ्य को देखते हुए समयसीमा में कार्य पूरा करने के लिए नीति आयोग ने यह एजेंडा सही समय पर विकसित किया गया है क्योंकि 2030 तक जब शहरों में 590 मिलियन निवासी हो जाने के कारण शहरों की सीमायें समाप्त होने से प्रकृति और शहरी अपशिष्ट का प्रबंधन करना मुश्किल होगा। सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं के चलते इस समस्‍या का शीघ्र तकनीकी समाधान आवश्‍यक है और नीति आयोग का एजेंडा इस समस्‍या को हल करने का प्रयास है।
इस एजेंडा में सुझाए गए समाधान दो तरह के हैं: बड़ी नगर पालिकाओं के लिए अपशिष्ट पदार्थ से ऊर्जा तैयार करना और छोटे कस्बों तथा अर्ध-शहरी क्षेत्रों के
लिए अपशिष्ट का निपटान कर खाद तैयार करने की विधि। इसमें नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट साफ करने की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिये संयंत्र लगाने के
वास्‍ते सार्वजनिक निजी भागीदारी हेतू भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के समान ही नया वेस्ट टू एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया
(डब्ल्यूईसीआई) स्थापित करने का सुझाव दिया गया है।

ममता करे खुद का नुकसान
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कल से मैं कोलकाता में हूं। यहां के अखबार और टीवी चैनल बस एक ही खबर से भरे दिखाई पड़ रहे हैं। वह है- राज्यपाल और मुख्यमंत्री की मुठभेड़। राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच खुले-आम जो दंगल चल पड़ा है, वह कई राज्यों में पहले चले दंगलों की याद दिला रहा है। ममता ने एक भाषण में आरोप लगाया है कि त्रिपाठी ने फोन करके उन्हें डांटा और उन्हें धमकी दी। उन्होंने इतने बुरे ढंग से बात की कि ममता का मन इस्तीफा देने का होने लगा। त्रिपाठी का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैंने तो उनसे सिर्फ यह कहा था कि 24 परगने के बदूरिया गांव में वे सांप्रदायिक तनाव को काबू करें। वहां से बहुत शिकायतें आ रही हैं। वे जाति, धर्म, संप्रदाय का ख्याल किए बिना दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करें। राज्यपाल की प्रतिक्रिया से नाराज होकर तृणमूल कांग्रेस के नेता उन पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने राजभवन को भाजपा और संघ का दफ्तर बना दिया है। किसी नामजद राज्यपाल को किसी जनता के द्वारा चुने हुए मुख्यमंत्री को हड़काने का क्या अधिकार है ? कांग्रेस का कहना है कि इस राज्यपाल को बर्खास्त करो। वह पुडुचेरी की उप-राज्यपाल किरण बेदी को भी बर्खास्त करने की मांग कर रही है, क्योंकि उन्होंने मुख्यमंत्री को बताए बिना ही भाजपा के तीन लोगों को नामजद करके विधायक की शपथ दिला दी। मार्क्सवादी पार्टी प. बंगाल के राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों को बर्खास्त करने और राष्ट्रपति शासन की मांग कर रही है। ये सब मांगें हमारे लोकतंत्र को कमजोर करनेवाली हैं। यहां इस मामले में सबसे अच्छी भूमिका गृहमंत्री राजनाथसिंह निभा रहे हैं। उन्होंने राज्यपाल और मुख्यमंत्री, दोनों को संयम बरतने की सलाह दी है। बिहार में रामनाथ कोविंद और नीतिश के जैसे मधुर संबंध रहे हैं, वैसे सभी प्रदेशों में क्यों नहीं रह सकते ? यदि त्रिपाठीजी ने कुछ कठोर शब्दों का प्रयोग कर दिया हो तो भी ममताजी को उन्हें सार्वजनिक करने की क्या जरुरत थी ? ऐसा करके उन्होंने अपना नुकसान खुद किया है। वोटों का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण अब तेजी से होगा। पूरे प्रांत में हिंदू ज्यादा हैं या मुसलमान ? अकेले 24 परगना में हिंदू एक करोड़ हैं और मुसलमान सिर्फ 25 लाख ! इसमें शक नहीं कि स्थिति को काबू करने में ममताजी पूरी मुस्तैदी दिखा रही हैं लेकिन इस विवाद का फायदा अनचाहे ही वे भाजपा को दे रही हैं।

समान नागरिक संहिता से पहले…
-तनवीर जाफरी
भारत वर्ष की पहचान दुनिया के उन सबसे बड़े देशों में एक के रूप में बनी हुई है जहां विभिन्न धर्मों के लोग शताब्दियों पूर्व से एक साथ रहते आ रहे हैं तथा अपनी सभी प्रकार की धार्मिक मान्यताओं, विश्वासों तथा रीति-रिवाजों का पूरी स्वतंत्रता के साथ पालन करते आ रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में लगभग 80 प्रतिशत बहुसंख्य हिंदू धर्म की जनसंख्या है तो इस्लाम धर्म के मानने वाले लगभग 14.5 प्रतिशत लोग हैं। ईसाई धर्म के अनुयाईयों की संख्या अनुमानत: 2.3 प्रतिशत है जबकि सिख धर्म के मानने वाले लोगों की तादाद करीब 1.8 प्रतिशत है। जैन समाज के लोग त़करीबन 0.4 प्रतिशत हैं तथा इसके अतिरिक्त अन्य धर्मों के मानने वालों की तादाद लगभग 0.7 प्रतिशत है। उपरोक्त आंकड़े यही दर्शाते हैं कि हिंदू धर्म के लोगों की बहुसंख्य आबादी होने के बाद भी दूसरे सभी धर्मों के लोगों का पूरी स्वतंत्रता के साथ अपनी-अपनी धार्मिक पूजा पद्धति पर अमल करना निश्चित रूप से पूरे विश्व के लिए धर्मनिरपेक्षता का एक ज़बरदस्त उदाहरण पेश करता है। हमारे देश में समान संविधान तथा भारतीय पैनल कोड में उल्लिखित कायदे-कानून समस्त देशवासियों के लिए एक समान हैं। इसके बावजूद क्षेत्र, भूगोल, क्षेत्रीय सभ्यता व संस्कृति के संरक्षण के नाम पर देश के कई राज्यों खासतौर पर कई पहाड़ी राज्यों में कुछ विशेष अधिकार भी दिए गए हैं। ऐसे अधिकारों का संरक्षण भारतीय संविधान के एक विशेष अनुच्छेद धारा 370 के तहत किया गया है।
हालांकि धारा 370 से संबंधित कई प्रावधान देश के अन्य राज्यों में भी लागू हैं। परंतु जम्मू-कश्मीर राज्य में धारा 370 के अंतर्गत् कुछ विशेष रियायतें इस राज्य के लोगों को दी गई हैं। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी व इसके सहयोगी दूसरे राजनैतिक संगठन जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को समाप्त करने की पुरज़ोर मांग करते रहे हैं। यह सही भी है कि जम्मू-कश्मीर में लागू धारा 370 की कई धाराएं ऐसी भी हैं जो देश के अन्य राज्यों व जम्मू-कश्मीर के मध्य भेद पैदा करती हैं। उदाहरण के तौर पर देश के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है तो जम्मू-कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्ष का क्यों? देश के उच्चतम न्यायालय के आदेश जम्मू-कश्मीर में मान्य क्यों नहीं हैं? यह ऐसा कानून है कि यदि इस राज्य की कोई महिला भारत के किसी दूसरे राज्य के व्यक्ति से शादी करे तो उस महिला की राज्य की नागरिकता समाप्त परंतु यदि वही महिला पाकिस्तान के किसी व्यक्ति से विवाह करे तो उस पाकिस्तानी नागरिक को जम्मू-कश्मीर की नागरिकता मिलने का प्रावधान? जम्मू-कश्मीर में आरटीआई व सीएजी जैसे कानून लागू क्यों नहीं? राज्य में पंचायत के अधिकार नहीं हैं? इस राज्य में धारा 370 के कारण देश के अन्य भागों के लोग कश्मीर में ज़मीन नहीं खरीद सकते। हालांकि देश के और भी पहाड़ी राज्यों में दूसरे राज्यों के लोगों के ज़मीन खरीदने पर प्रतिबंध है। ऐसे और भी कई कानून हैं जो धारा 370 के अंतर्गत् कश्मीर के लोगों को अतिरिक्त अधिकार व संरक्षण प्रदान करते हैं। मुखरित रूप में जम्मू-कश्मीर से धारा 370 समाप्त करने की आवाज़ बुलंद करती रही है। यह बात और है कि सत्ता में आने के बाद पार्टी ने इस मुद्दे को न केवल खूंटी पर लटका दिया है बल्कि धारा 370 की प्रबल पक्षधर क्षेत्रीय पार्टी पीडीपी के साथ राज्य में सत्ता की भागीदार भी बनी बैठी है। और धारा 370 के मुद्दे को कुछ इस तरह भूल चुकी है गोया यह विषय कभी पार्टी का मुद्दा ही न रहा हो।

प्रणब दा को मोदी का तोहफा
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के आपसी संबंध इतने अच्छे रहे हों, जितने प्रणब मुखर्जी और नरेंद्र मोदी के रहे हैं, ऐसा न तो मैंने कभी पढ़ा, न सुना और न ही जाना। प्रणब दा पर छपी एक चित्रकथा का विमोचन करते हुए मोदी ने कहा कि उनके और प्रणब दा के संबंध बाप-बेटे की तरह रहे हैं। पिछले तीन वर्षों में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच कोई ऐसा विवाद नहीं हुआ, जैसे डॉ. राजेंद्रप्रसाद और नेहरु तथा डॉ. राधाकृष्णन और नेहरु के बीच हुआ करते थे। ज्ञानी जैलसिंह और राजीव गांधी के बीच तो लंबी तनातनी चलती रही। कार्यकारी राष्ट्रपति ब.दा. जती और मोरारजी तथा के.आर. नारायणन और अब्दुल कलाम के ज़माने में भी दोनों सर्वोच्च पदाधिकारियों में खींचतान बनी रही। प्रणब मुखर्जी और मोदी के बारे में भी यही समझा जा रहा था कि दोनों की कैसे पटेगी ? जीवन भर एक कांग्रेस के नेता रहे हैं और दूसरे भाजपा के ! एक उत्तरी ध्रुव है और दूसरा दक्षिणी ध्रुव ! दोनों ही जिद्दी स्वभाव के हैं और दोनों के बारे में उनके साथी कहते हैं कि दोनों अहंकारी हैं और अकड़बाज हैं लेकिन इस पुस्तक-विमोचन समारोह में दोनों के भाषणों से यह गलतफहमी एकदम दूर हो गई है। प्रणब दा ने कहा कि मोदी सरकार से मेरे मतभेद कुछ मुद्दों पर हुए लेकिन गाड़ी कभी अटकी नहीं। मैंने अपनी राय साफ-साफ जाहिर की तो प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों ने मुझे भी पूर्ण रुप से संतुष्ट करने की कोशिश की। जैसे नोटबंदी और बार-बार अध्यादेश जारी करने पर मैंने चेतावनी दी। मोदी ने कहा कि उनका सौभाग्य है कि प्रणब दा की उंगली पकड़कर वे दिल्ली की जिंदगी में जमे। मोदी-जैसे व्यक्ति का यह कथन उनके व्यक्तित्व के बेहद अनजान और सुंदर पहलू को उजागर करता है। यदि ऐसे ही संबंध वे अपने पार्टी-बुजुर्गों और साथी मंत्रियों से रखें तो वे एक सफल प्रधानमंत्री बन सकते हैं और लंबे समय तक अपने पद पर टिके रह सकते हैं। प्रणब दा और मोदी ने एक-दूसरे के बारे में जो कहा है, वह राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री संबंधों का उच्च आदर्श उपस्थित करता है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच यदि इसी तरह के संबंध बने रहें तो भारतीय संविधान और गणतंत्र को कोई बड़ा खतरा होने की संभावना बहुत कम हो जाती है। किसी राष्ट्रपति की बिदाईं पर किसी प्रधानमंत्री की तरफ से इससे बढ़िया तोहफा क्या दिया जा सकता है?

जम्मू कश्मीर को भारतीय संविधान के
तहत लाने के लिए डाॅ. मुखर्जी ने प्राणों की आहुति दी…..– भरतचन्द्र नायक
लम्हों ने खता की है सदियों ने सजा पायी। आजादी के बाद देश में गठित पहली राष्ट्रीय सरकार के अंतद्र्वंद का ही दुष्परिणाम है कि आज कश्मीर की मनोरमवादियां रक्तरंजित हो रही है। काश राष्ट्रीय सरकार में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आव्हान पर शामिल होने वाले उस दूरदर्शी, दार्शनिक राजनेता डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की चेतावनी पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने ध्यान दिया होता किंतु सेकुलरवाद के पुरोधा बनने की चाहत में जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा और धारा 370 ईजाद करके न केवल भारत को लहुलुहान करने का साजो सामान दीर्घजीवी बना दिया अपितु भारत के अभिन्न अंग जम्मू कश्मीर में अलगाववाद के बीज बो दिए गए। पं. नेहरू से मतभेद उभरने और मंत्रिपद से इस्तीफा देने का वाजिब कारण यही था कि डाॅ. मुखर्जी ने कहा था कि पाकिस्तान से विस्थापित शरणार्थी जितनी भूमि छोड़कर आए है उतनी भूमि पाकिस्तान से ली जाए। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल सहमत थे लेकिन पं. नेहरू ने बात अनसुनी कर दी। डाॅ. मुखर्जी की पहल पर आधा पंजाब ओर आधा बंगाल बच गया। डाॅ. मुखर्जी ने विभाजित भारत के पाकिस्तान से इतना भूभाग बचा कर सच्चे राष्ट्रवाद का सबूत दिया। उनके इस्तीफा का आगाज उन्होंने संसद में देकर किया और जनसंघ गठित कर धर्म, जाति, नस्ल का विचार किए बिना सभी के लिए जनसंघ के द्वार खोलकर राष्ट्रवादियों पर साम्प्रदायिकता का आरोप लगाने वालों के लिए माकूल जवाब दिया।
डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को भारत की मुख्यधारा में जोड़ने के लिये अनुच्छेद 370 का प्रखर विरोध किया। जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के लिये परमिट प्रणाली को डाॅ मुखर्जी ने देश की अखंडता में बाधक बताया और इसके विरोध में जब बिना प्रवेश परमिट के जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने का आन्दोलन किया तत्कालीन प्रधानमंत्री पं.नेहरू तब के जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला के तुष्टीकरण पर आत्म मुग्ध थे। इस साजिश में शेख अब्दुल्ला को किसकी शह थी यह बताना अब व्यर्थ है। लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं कि उन्हें जानबूझकर ऐसी जगह हिरासत में लिया गया जहाॅं भारतीय संविधान, सर्वोच्च न्यायालय, देश का संवैधानिक हस्तक्षेप बेअसर था। देश की अखंडता के लिए प्रतिबद्धता के लिए रात में डाॅ- मुखर्जी के प्राण चले गये। तब न तो डाॅ.मुखर्जी को उपचार की सुविधा हासिल हुई और न न्यायिक समीक्षा का अवसर मिला। डाॅ.मुखर्जी की मौत ने भारतीय उपमहाद्वीप को झकझोर दिया। पं नेहरू ने अपने संवदेना संदेश में डाॅ मुखर्जी की माताजी योग माया देवी से उनकी इच्छा के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने डाॅ मुखर्जी की मेडीकल हत्या पर दुख व्यक्त करते हुए न्यायिक जांच की मांग की थी। जो कभी पूरी नहीं हुई। कुछ ही हफ्तों में डाॅ.मुखर्जी के बलिदान के बाद जम्मू-कश्मीर में प्रवेश परमिट की प्रणाली को समाप्त कर दिया गया। वहाॅं अलग संविधान, अलग निशान और अलग प्रधान की व्यवस्था को बदल दिया गया। फिर भी डाॅ.मुखर्जी की धारा 370 को समाप्त किये जाने की माग को तुष्टीकरण की बलिबेदी पर चढ़ा दिया गया।
जम्मू-कश्मीर को लहूलुहान करने में धर्म निरपेक्षता के छदम् ने कम नुकसान नहीं पहुंचाया है। कांग्रेस जिस रास्ते पर चली वह वास्तव में डाॅ.मुखर्जी के बलिदान का अपमान है। पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ.मनमोहन सिंह जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता देने की बात कह कर भारत की सवा अरब जनता के हितों के साथ खिलवाड़ किया। सरहदों के बाहर बुने ये जाल में फंसना हमारी नियति बनी है। आजादी के बाद पाकिस्तान के फौजियों ने कबालियों के वेश में जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण किया उसके पहले जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरी सिंह अपनी रियासत का भारत में विलय कर चुके थे। इसी तरह की अन्य रियासतों को पाकिस्तान में विलय की आजादी मिली थी। फिर पाकिस्तान किस आधार पर जम्मू-कश्मीर के विलय पर प्रश्न उठाता है। इस मर्म की हमने अनदेखी की। उसका खामियाजा आज तक भुगतने के लिये भारत अभिषप्त है। कवालियों के हमले का भारतीय फौज ने माकूल जबाव दिया। पाकिस्तान के फौजियों को खदेड़ा और छटी का दूध याद दिलाया। लेकिन हम तुष्टीकरण के अलंवरदार जम्मू कश्मीर को शेख अब्दुल्ला के मन के माफिक जीती हुई जमीन छोड़ते चले गये। जो कसर बाकी थी वह उनके कुल दीपक डाॅ फारूख अब्दुल्ला ने स्वायत्तता दिये जाने का बिल लाकरपूरी कर दी। कांग्रेस इस बिल पर अपनी पुष्टि की मोहर लगाकर विश्व को अपनी धर्म निरपेक्षता का सबूत देने की खातिर देश का मुकुट भारत विरोधी देश को तश्तरी में भेंट करने के लिये आतुर रही थी। जो जनविरोध के कारण नहीं हो सका।

एकात्म टैक्स: मोदी= नेहरु+पटेल
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
‘एक देश, एक टैक्स’ के एतिहासिक कदम का विरोध प्रमुख विरोधी दल तो कर ही रहे हैं, देश का व्यापारी वर्ग भी कर रहा है। देश के कई प्रमुख नगरों में दुकानों की हड़ताल हो गई है, कई कंपनियों ने अगले 3-4 दिनों के लिए अपने पट बंद कर दिए हैं और कई छोटे-बड़े व्यापारी नई कर-व्यवस्था पर अमल करने के तरीके ढूंढ रहे हैं। उधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गदगद हैं। उन्होंने इस नए एकात्म कराधान का स्वागत ऐसी नाटकीय धूमधाम से किया है, जैसे कि 14 अगस्त 1947 की मध्य-रात्रि को जवाहरलाल नेहरु ने किया था। उन्होंने ‘500 तरह के करों’ को मिलाकर एक करने के दावा भी वैसे ही किया है, जैसी कि सरदार पटेल ने 500 देसी रियासतों का विलय करवाया था। याने अब मोदी बराबर नेहरु और पटेल ! मोदी= नेहरु+पटेल ! यह प्रचारमंत्री का कोरा प्रचार पैंतरा भर नहीं रहेगा, यदि इस एकात्म कराधान को वे वास्तव में लागू कर पाए तो ! मेरे ख्याल से चुनाव के 20 महिने पहले मोदी ने यह सबसे बड़ा खतरा मोल ले लिया है। मोदी की ‘फर्जीकल स्ट्राइक’ और ‘नोटबंदी’ के धक्के तो राष्ट्र ने बर्दाश्त कर लिये लेकिन यदि यह एकात्म कराधान पिट गया तो 2019 में भाजपा का वही हाल होगा, जो दिल्ली प्रदेश के चुनाव में उसका हुआ था। भाजपा और संघ की रीढ़ मूलतः व्यापारी वर्ग ही रहा है। यदि वही उखड़ गया तो भाजपा का खड़े रहना भी मुश्किल हो जाएगा। मोदीजी कहीं भाजपा का वही हाल न कर दें, जो राहुलजी ने कांग्रेस का कर दिया है। इस समय देश के नागरिकों का कर्तव्य है कि वे ‘एक देश, एक टैक्स’ की इस महान योजना को सफल बनाने की भरपूर कोशिश करें, हालांकि सरकार की तैयारी काफी कम है। विरोधी दलों द्वारा इसका विरोध बिल्कुल अनैतिक है, क्योंकि उनकी राज्य सरकारों ने इस पर सहमति दी है। वे स्वयं तीन साल पहले यह कानून बनाने के लिए कमर कसे हुए थे। इस एतिहासिक कदम को वे पार्टीबाजी के पचड़े में नहीं फंसाते तो बेहतर होता। इस नए एकात्म कराधान की कमियां जैसे-जैसे मालूम पड़ती जाएंगी, उन्हें बताना विरोधियों का काम है और उन्हें दूर करना सरकार का !

आओ मिलकर वृक्ष लगायें
शिवराज सिंह चौहान
समाज की सक्रिय सहभागिता से नर्मदा सेवा यात्रा अभियान बहुत सफल रहा। इस अभियान में 148 दिनों में 3350 किलोमीटर की यात्रा तय की गई और 15 लाख से अधिक लोगों ने माँ नर्मदा को स्वच्छ, निर्मल और पवित्र बनाये रखने का संकल्प लिया। प्रदेशवासियों ने जिस उत्साह, उमंग और आत्मीयता के साथ इस अभियान में हिस्सा लिया,उससे पता ही नहीं चला कि मध्यप्रदेश सरकार का यह अभियान कैसे, धीरे-धीरे जन-जन के अभियान में परिवर्तित होता चला गया। इस अभियान में 500 से अधिक सभी धर्मों के गुरुओं, पर्यावरणविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, राजनैतिक दलों के प्रमुख व्यक्तियों, संयुक्त राष्ट्र संगठनों के पदाधिकारियों, फिल्म एवं खेल जगत की प्रमुख हस्तियों सहित कई मुख्यमंत्रियों और केन्द्रीय मंत्रियों की उपस्थिति ने इस अभियान को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। यह अभियान पूरी दुनिया में लोगों को नदियों के प्रति जागरूक करने और उनके संरक्षण के लिए प्रेरित करने का माध्यम बन गया। यह अभियान सामाजिक-समरसता और सौहार्द का भी बड़ा प्रतीक बन गया।
नमामि देवि नर्मदे-नर्मदा सेवा यात्रा अभियान के दौरान लाखों प्रदेशवासियों ने यह प्रण लिया था कि 2 जुलाई को माँ नर्मदा के दोनों तटों सहित पूरे नर्मदा कछार में लाखों लोग मिलकर एक साथ 6 करोड़ पौधों का रोपण करके इतिहास बनायेंगे और माँ नर्मदा में जल की धार बढ़ाएंगे। नर्मदा सेवा यात्रा की पूर्णता के अवसर पर हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी लाखों लोगों की उपस्थिति में माँ नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक में हम सभी को आने वाली पीढ़ी के प्रति अपनी जिम्मेदारी के लिए आगाह किया था। इस मौके पर उन्होंने सभी प्रदेशवासियों से नर्मदा कछार में 2 जुलाई 2017 को बढ़-चढ़कर पौध-
रोपण करने का आव्हान किया था। हम सभी ने अपने-अपने हाथ उठाकर पौध-रोपण के इस संकल्प को पूरा करने के लिए उत्साह के साथ सहमति व्यक्त की थी।मुझे आज इस बात की खुशी है कि जिस 2 जुलाई का हम सभी बड़ी ही बेसब्री से इंतजार कर रहे थे, वह दिन अब आ चुका है। यह दिन देश और प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में पर्यावरण और नदी संरक्षण के क्षेत्र में एक इतिहास बनने जा रहा है। आपको और हम सबको इस बात पर गर्व होगा कि हम सभी इस ऐतिहासिक दिन के साक्षी बनेंगे। पूरी दुनिया में इससे पहले कभी भी पर्यावरण और नदी को समृद्ध करने के लिए इतने बड़े स्तर पर कोई सामूहिक प्रयास और सामाजिक सहभागिता देखने को नहीं मिलती है। इस दो जुलाई के दिन, प्रदेशवासियों, माँ नर्मदा, मध्यप्रदेश और हमारे भारत देश का नाम पूरी
दुनिया में इस पुनीत कार्य के लिए इतिहास में दर्ज हो जायेगा। मध्यप्रदेश में इस पौध-रोपण कार्यक्रम के लिए नर्मदा तट और नर्मदा कछार के सभी
24 जिलों में पौध-रोपण के लिए जागरूकता और कार्यक्रम की सफलता के लिए तैयारियाँ काफी बड़े पैमाने पर की गई हैं। वन विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, कृषि विकास तथा किसान-कल्याण विभाग, उद्यानिकी विभाग और जन अभियान परिषद के सभी लोगों ने कार्यक्रम की तैयारियों में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। जन-जागरूकता के लिए प्रदेश के सभी 51 जिलों में 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के दिन से ;पेड़ लगाओ यात्राओं का आयोजन किया गया। इस यात्रा में;धरती पर कम न हों वन, ध्यान रखें हम मानव जन;जैसे नारे, लोगों के बीच में गाँव-गाँव तक बहुत लोकप्रिय हुए। गाँवों और कस्बों में छोटे-छोटे बच्चे तक बड़े प्यार और सुन्दर भावनाओं के साथ इन नारों को गा-गा कर लोगों को सुना रहे थे। यह सभी की जुबान पर चढ़ गये थे। सभी लोग माँ नर्मदा को हरियाली चुनरी ओढ़ाने के लिए बहुत ही भावुक थे। इस पौध-रोपण कार्यक्रम में हिस्सेदारी के लिए लोगों के उत्साह का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दो जुलाई के कार्यक्रम में भाग लेने के लिए
इस अभियान की वेबसाइट पर लगभग 6 लाख व्यक्तियों और सामाजिक या स्वयंसेवी संगठनों ने पंजीयन करवाया है। मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि इस अभियान से जुड़ने के लिए 5 लाख व्यक्तियों ने ऑफ लाइन; पंजीयन भी कराया है। वन विभाग तथा उद्यानिकी विभाग द्वारा पौधे तैयार करा लिये गये हैं। पौध-रोपण के लिए गढ्ढों की खुदाई हो चुकी है। पौधों को लाने-ले जाने के लिए परिवहन की समुचित व्यवस्था की गई है। पौधों को चुनते समय हमने इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि पौध-रोपण में फलदार और छायादार पौधों का रोपण अधिक किया जाये, जिससे कि आने वाले समय में यह पौधे आमजन के लिए अधिक से अधिक उपयोगी हो सकें। हमने इन पौधों में आम, आँवला, नीम, पीपल, बरगद, जामुन, बाँस, इमली, संतरा, नींबू, अमरूद,मुनगा और अनार जैसे फलों को प्राथमिकता दी है।
(ब्लॉगर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं)

मध्यप्रदेश में सदी का महावृक्षारोपण
– सुरेश गुप्ता
बदलाव की संवाहक साफ नीयत और दृढ़ इच्छा-शक्ति होती है। खासतौर से तब जब प्रकृति में पैदा असंतुलन को दूर कर उसका नैसर्गिक रूप देना हो या नदियों को सदानीरा बनाना हो। मध्यप्रदेश ठनमामि देवि नर्मदे- सेवा यात्राठ के माध्यम से पिछले छह माह में इस बात का गवाह रहा है कि कैसे प्रकृति को बचाने , नदियों को बचाने की कोशिश जन-आंदोलन में बदलती है। न केवल मध्यप्रदेश बल्कि सारे देश और विश्व ने इसे देखा और सराहा।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में संचालित ठनमामि देवि नर्मदेठ सेवा यात्रा ने विश्व मानवता को यह संदेश दिया कि नदियाँ बढ़ती आबादी, औद्योगीकरण और जलवायु परिवर्तन के नित नये खतरों के बावजूद बचायी जा सकती है। इस यात्रा के दौरान न केवल जनमानस नदी के संरक्षण के खातिर जागरूक हुआ बल्कि उसमें नदी को प्रदूषित करने वाले, उसके अविरल प्रवाह को रोकने वाले स्वयं के व्यवहार में भी बदलाव आया। जनमानस समझ गया कि नदी है तो वह है, उसकी संतति है और है भावी पीढ़ियों का संरक्षित जीवन।
2 जुलाई को 6 करोड़ से ज्यादा पौधों का रोपण
नदी संरक्षण खासतौर से नर्मदा नदी के संरक्षण की मुहिम को पुख्ता आधार देने के लिये नर्मदा यात्रा के बाद अब 2 जुलाई को मध्यप्रदेश में नर्मदा के दोनों तट के किनारों और नदी के जलग्रहण क्षेत्र वाले कुल 24 जिलों में 6 करोड़ पौधे लगाने का सदी का सबसे बड़ा महावृक्षारोपण कार्य किया जायेगा। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने अब तक सरकार द्वारा किये जाते रहे पौधा रोपण कार्य को भी नर्मदा यात्रा की तर्ज पर जन-अभियान के रूप में ही संचालित करने का फैसला लिया है। इस फैसले के अनुरूप ही 2 जुलाई के महावृक्षारोपण की तैयारियाँ की गई। यह तैयारियाँ 2 जुलाई को वृक्षारोपण के विश्व रिकार्ड के रूप में परिणत होगी, जब एक साथ एक दिन 6 करोड़ पौधे लगेंगे। माँ नर्मदा इन पौधों के साल-दर साल वृक्ष बनने के साथ न केवल हरियाली चूनर से आच्छादित होगी बल्कि उसका अविरल प्रवाह भी भावी पीढ़ियों के लिये वरदान बनेगा।
नर्मदा बेसिन क्षेत्र
नर्मदा नदी की कुल लम्बाई 1312 किलोमीटर की है। मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी की कुल लम्बाई 1079 किलोमीटर है, जो कुल लम्बाई का 82.24 प्रतिशत है। इस सांख्यिकी से साफ जाहिर है कि नर्मदा के संरक्षण का महती कार्य मध्यप्रदेश में ही होना है और मध्यप्रदेश को ही करना है। नर्मदा नदी का बेसिन 98 हजार 796 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इसमें भी मध्यप्रदेश का हिस्सा 86.19 प्रतिशत अर्थात कुल 85 हजार 149 वर्ग किलोमीटर का है।
मध्यप्रदेश नर्मदा बेसिन के 24 जिले में होगा वृक्षारोपण
नर्मदा बेसिन में मध्यप्रदेश के 24 जिले आते हैं। इनमें डिंडौरी, मण्डला, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, रायसेन, सीहोर, हरदा, देवास, खण्डवा, खरगोन, धार, बड़वानी,अलीराजपुर, अनूपपुर, बालाघाट, कटनी, दमोह, सागर, सिवनी, छिन्दवाड़ा, बैतूल, इन्दौर और बुरहानपुर जिला शामिल है।
नर्मदा नदी के कैचमेन्ट एरिया के इन्हीं जिलों में 2 जुलाई, 2017 को एक दिवसीय वृक्षारोपण में 6 करोड़ पौधों का रोपण किया जाना है। वृक्षारोपण का यह महती कार्य वन क्षेत्रों में, स्कूल, कॉलेज, शासकीय कार्यालयों के प्रांगण, अन्य सामुदायिक भूमियों और निजी भूमियों पर किया जायेगा।
सरकार और समाज की भागीदारी से होगा वृक्षारोपण
वृक्षारोपण में वन, ग्रामीण विकास, कृषि उद्यानिकी, नगरीय प्रशासन, स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा विभाग, जन-अभियान परिषद और अन्य शासकीय विभाग की भूमिका रहेगी। एक दिवसीय इस वृक्षारोपण में शासन के सभी विभागों के समस्त अधिकारियों/कर्मचारियों को भाग लेने के लिये प्रेरित किया गया है। भोपाल मुख्यालय, जिला मुख्यालय स्तर, विकास खण्ड एवं ग्राम स्तर पर पदस्थ अधिकारी-कर्मचारी का वृक्षारोण में भाग लेना सुनिश्चित किया गया है। वृक्षारोपण में भाग लेने हेतु दहत्ग्हा रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था की गई। इसके अनुसार पर निजी व्यक्ति, शासकीय संस्थाएँ, सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाएँ, महिला मंडल, क्लब्स ने आदि ने वृक्षारोण में शामिल होने के लिये रजिस्ट्रशन करवाया। दिनांक 28 जून 2017 की स्थिति में 5 लाख 89 हजार लोगों द्वारा ऑनलाइन पंजीकरण करवाया जा चुका था।
रोपण के लिये आवश्यक पौधों की व्यवस्था वन विभाग, उद्यानिकी विभाग एवं निजी रोपणियों से की जा रही है। आवश्यक फलदार पौधे अन्य राज्यों से भी प्राप्त किये जा रहे हैं। पौधा लगाने के लिये गढ्ढा खुदाई कार्य सभी विभागों ने अपने-अपने लक्ष्यों के अनुसार लगभग पूर्ण कर लिया है। रोपित पौधों के सत्यापन के लिये प्रत्येक रोपण स्थल पर अधिकारी/कर्मचारी तैनात किये गये हैं।

जुनैद की हत्या और सच्चा हिंदुत्व
– डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कल दिल्ली समेत देश के कई शहरों में अकस्मात ही कई प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों में न लोगों को ढोकर लाया गया, न उन्हें किसी नेता या संगठन ने बुलाया और न ही उन्होंने कोई जोशीले नारे लगाए। ये स्वतः स्फूर्त प्रदर्शन कुछ उसी तरह के थे, जैसे कि निर्भया के बलात्कार के बाद हुए थे। इन प्रदर्शनों की उपेक्षा कैसे की जा सकती है? ये हुए हैं, 15 वर्षीय नौजवान जुनैद खान की हत्या के विरोध में ! जुनैद और उसके भाई पर प्राणलेवा हमला किया, उन लोगों ने जो चलती रेलगाड़ी में सीटों के लिए कहा-सुनी कर रहे थे। ऐसी कहा-सुनी और छोटे-मोटे झगड़े हम में से किसने नहीं देखे हैं लेकिन जिस बात ने लोगों को मर्मांतक पीड़ा पहुंचाई है, वह यह है कि जुनैद और उसके भाई को पहले गोमांसभक्षी कहा गया और फिर बेखौफ होकर उन पर जानलेवा हमला कर दिया गया। वे दोनों भाई ईद के लिए नए कपड़े वगैरह खरीदकर अपने घर वल्लभगढ़ लौट रहे थे। उन्होंने नमाजी टोपी पहन रखी थी। ज़रा सोचें कि उनके मां-बाप पर क्या गुजर रही होगी? उस पूरे गांव ने कैसी ईद मनाई है? यह मामला तो है, इस्लाम और मुसलमान-विरोधी लेकिन यह इतना घृणित है कि देश में जो प्रदर्शन हुए हैं, उनमें आनेवाले 99 प्रतिशत लोग हिंदू हैं। यही सच्चा हिंदुत्व है। एक हत्यारे को तो पकड़ लिया गया है, शेष तीन भी शीघ्र ही पकड़े जाएंगे। याने सरकार इस मामले में कोई ढील नहीं देगी। मुहम्मद अखलाक और पहलू खान के हत्यारे भी पकड़े गए हैं लेकिन असली सवाल यह है कि इन हत्यारों को कब लटकाया जाएगा और कैसे लटकाया जाएगा। यदि इनकी फांसी का जमकर प्रचार हो तो इस तरह के सांप्रदायिक हत्याकांड जरुर हतोत्साहित होंगे। सरकार तो अपना काम करेगी लेकिन हमारे समाज में सांप्रदायिकता का जो यह ज़हर बढ़ता चला जा रहा है, इसका इलाज़ तो हमारे शिक्षकों, माता-पिता, धर्म-ध्वजियों और समाजसेवकों को करना होगा। एक पशु के नाम पर एक मनुष्य की हत्या कर देना कौनसा हिंदुत्व है और कौनसी मनुष्यता है? सिर्फ नाम पर? गोरक्षा तो परम पवित्र कार्य है लेकिन मानव-रक्षा उससे कम नहीं है।

 

नेताओं के अहं की मालिश
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
हवाई जहाजों में यात्रा करते वक्त हमारे नेताओं को क्या ‘प्रोटोकाल’ (विशेष व्यवहार) मिलना चाहिए, इसे लेकर नागर विमानन मंत्रालय ने सभी गैर-सरकारी हवाई कंपनियों की एक बैठक बुलाई है। अब एयर इंडिया भी बिकनेवाली है, इसीलिए नेताओं को अपने प्रोटोकाॅल की चिंता सता रही है। यदि देश में कोई सरकारी हवाई कंपनी ही नहीं रहेगी तो नेताओं के नखरे कौन उठाएगा ? अब गैर-सरकारी हवाई कंपनियों को भी मजबूर किया जाएगा कि वे नेताओं की अगवानी दूल्हों की तरह किया करें। जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधि जहाज या रेल से यात्रा करते हैं तो लगता है कि वे हमारे लोकतंत्र पर तमाचा जड़ रहे हैं। एक तो उनकी यात्रा मुफ्त होती है। उनका किराया हम भरते हैं। वह हमारे टैक्स के पैसों में से जाता है। फिर उन्हें बिजनेस क्लास और फर्स्ट क्लास में सीटें दी जाती हैं। सबसे अगली सीट पर कब्जा करने के लिए वे बेताब रहते हैं। उनका खाना-पीना भी अति-विशेष होता है। उन्हें कहीं भी लाइन में नहीं लगना पड़ता है। उनका हैंडबेग भी कोई न कोई अर्दली ढोता है। वे विशेष लाउंज से निकलकर सीधे जहाज में जाते हैं। ये सब ठाठ-बाट वे क्यों मांगते हैं ? इसलिए कि वे जन-प्रतिनिधि हैं या जनता के सेवक हैं या नौकर हैं। मैं तो अपने घर के नौकरों से भी भाई-बहन की तरह बर्ताव करने का हिमायती हूं लेकिन आप जब अपने नौकरों को अपने सिर पर बिठाने लगते हैं तो वे अपने आप को बादशाह समझने लगते हैं। यह बादशाहत लोकतंत्र के लिए कलंक है। यदि ये वीआईपी लोग वास्तव में जनता के सेवक हैं तो उन्हें सबसे पीछे बैठने, सबसे बाद में खाने और लाइन में लगने के लिए तैयार रहना चाहिए। यदि मोदी सरकार में दम हो तो वह रेलों और जहाजों में से सारी ‘क्लासें’ खत्म करे और सब यात्रियों को समान माने। मोदी सरकार ने कारों पर से लाल बत्ती हटवाने का अत्यंत प्रशंसनीय कार्य किया है। अब वह नेताओं के दिमागों में से यह वीआईपी बत्ती भी हटवाने का काम करे। नेताओं को यह पता होना चाहिए कि समाज में उनसे भी कई गुना महत्वपूर्ण लोग रहते हैं। यदि वे अपने लिए कोई विशेष व्यवहार नहीं चाहते तो सिर्फ नेता ही अपने अहं की मालिश करवाने पर क्यों तुले रहते हैं।

 

अब तक भोग किया, अब योग करें
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
योग दिवस पर कुछ कांग्रेसी मित्रों ने योग और मोदी का मजाक बनाया है। मोदी की जो भी आलोचना उन्हें करना है, वह जरुर करें। वरना वे विपक्षी कैसे कहलाएंगे ? लेकिन योग और योग-दिवस के बारे में तो मैं उनसे उत्तम प्रतिक्रिया की उम्मीद करता था। मैं तो सोचता था कि कांग्रेसी मित्र लोग भी बढ़-चढ़कर योग-दिवस मनाएंगे और इस विश्व-व्यापी कल्याण-कार्य पर अकेले मोदी की छाप नहीं लगने देंगे लेकिन राजनीति तो ऐसी ईर्ष्यालु प्रेमिका है कि वह विश्व-कल्याण को भी बर्दाश्त नहीं कर सकती। इस समय योग की सबसे ज्यादा जरुरत किसी को है तो वह कांग्रेसी नेताओं को है। राहुल को है, हमारे मित्र दिग्गी राजा को है, शशि थरुर को है, गुलाम नबी को है। किसको नहीं है ? ये लोग योग को क्या समझे बैठे हैं ? ये लोग उठक-बैठक, अनुलोम-विलोम, शीर्षासन-पद्मासन को ही योग समझे बैठे हैं। ये योग जरुर हैं लेकिन यह योग का सिर्फ एक-चौथाई हिस्सा है। अष्टांग योग के आठ चरणों में से ये सिर्फ दो चरण हैं। शेष छह चरण इनसे भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। योग का मर्म योग-दर्शन के इस सूत्र में है। योगश्चचित्तवृत्तिनिरोधः ! चित्तवृत्ति का निरोध ही योग है। कांग्रेसी भाई खुद समझ लें कि इस समय उन्हें इस मंत्र की कितनी जरुरत है। पिछले 70 साल भोग में बीत गए। अब तो वे योग कर लें।
मैं सोचता हूं कि योग के असली अर्थ को उन लोगों को भी समझना होगा, जो सारी दुनिया में योग का प्रचार करने का बीड़ा उठाए हैं। योग विश्व को भारत की अदभुत देन है। बाबा रामदेव ने इसे लोकप्रिय बनाया और नरेंद्र मोदी ने इसे संयुक्तराष्ट्र संघ से मनवाया। 21 जून को दुनिया के लगभग 200 देशों के लाखों नागरिकों ने योगाभ्यास किया। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने विदेशी राजदूतों को योग करवाया। यदि दुनिया के दो-तीन अरब लोग भी नियमित योगाभ्यास करने लगें तो अस्पतालों और दवाइयों का खर्च एक-चौथाई भी नहीं रह जाएगा। अपराध, व्यभिचार, बलात्कार, मांसाहार तथा अपराध भी काफी घट जाएंगे। हिंसा और आतंकवाद भी घटेंगे। भोगवाद घटेगा और योगवाद फैलेगा तो सारा मानव समाज अहिंसात्मक और समतामूलक बनता चला जाएगा। हमारे ‘चतुर बनिया’ नरेंद्र मोदी ने तो योग में रोजगार के अपूर्व अवसर भी ढूंढ निकाले।

आम आदिवासी में रानी के स्वाभिमानी संघर्ष-चेतना की जरुरत
(रानीदुर्गावती का बलिदान दिवस 24 जून पर विशेष)
-रामेश्वर नीखरा
24 जून गोंड वंश की वीरांगना रानी दुर्गावती का बलिदान दिवस है। उन्होंने अपने स्वाभिमान और आत्माधिकार की रक्षा के लिये पलायन या समर्पण की अपेक्षा संघर्ष को चुना उनका यह चुनाव ही उनके व्यक्तिव की विशेष पहचान बनकर सदियों से इतिहास में दर्ज है। तुलनात्मक रुप से देखें तो मुगल शासन अकबर की तुलना में गढ़ा मंडला राज्य बहुत साधारण सा राज्य था, परंतु उसकी असाधारणता तो उसका नेतृत्व करने वाली रानीदुर्गावती के संकल्प और संघर्षकामी चेतना में मौजूद है।
गेंड राज्य गढ़ा मंडला की तुलना में आकार तथा शक्ति संपन्नता में बढ़े-चढ़े अनेक राज्यों और उनके अधिपतियों में जब फतहपुर सीकरी की सत्ता के आगे अपने घुटने टेक दिये थे, तब एक स्त्री होते हुए भी रानीदुर्गावती ने आत्माभिमान की रक्षा के लिये संघर्ष और अवश्यंभावी बलिदान का रास्ता अख्तियार किया था।
उनके बलिदान दिवस पर मुझे लगता है कि जरूरत इस बात की है कि इस विषय पर विचार किया जाये कि जिन आदिवासियों के बीच में दुर्गावती, शंकरशाह, बिरसा मुंडा और टंटय़ा भील जैसे लड़ाकू और आत्मगौरव से परिपूर्ण रणबांकुरों की विरासत मौजूद है, वहीं आदिवासी समाज आज अपनी अजीविका की तलाश में और अपने जल जंगल जमीन को बचाये रखने की जद्दों जहद में इतना हलाकान परेशान क्यों दिखाई पड़ रहा है। निसंदेह, उसका शोषण हुआ है, उसे अधिकार वंचित किये जाने का लंबा लिससिला भी नजर आता है और अपनी सीमितजरूरतों को अर्जित करने में ही उसका पूरा जीवन खपा जा रहा है।
स्वतंत्रता के पश्चात् भारत सरकार ने आदिवासियों की समस्याओं के प्रति विशेष संवेदनशीलता दिखायी और उन्हें वाजिब अनुपात में आरक्षण उपलब्ध कराया, विकास की खास योजनाएं बनायी और उन्हें लाभांवित करने के भरपूर प्रयास भी किये। गुजारे हुए 60-70 सालों के दौरान सराकरी कार्यक्रमों में लगातार इजाफा ही हुआ है। केंद्र और राज्यों में अलग से मंत्रालयों तक का गठन हुआ ताकि आदिवासी समस्याओं के निराकरण को खास तवज्जों मिल सके, मगर दुख के साथ इस शर्मनाक यथार्थ को स्वीकार करने के लिये मैं खुले मन से तैयार हूं कि नौकरशाही और बिचोलियों के कारण सरकार के कार्यक्रमों का वास्तवित और शत प्रतिशत लाभ उन्हें नहीं मिल सका।
आदिवासियों के लिये छात्रावासों, शिक्षा के लिये आदिवासी विद्यालयों प्राथमिक स्तर से उच्चस्तर तक की शिक्षा के लिये छात्रवृत्तियों, नौकरियों में आरक्षण, वन भूमि के पट्टों, तेंदुपत्ता संग्रहण में बोनस जैसी विविधतापूर्ण योजनाएं संचालित हो रही है और आदिवासी समुदाय उनका लाभ भी उठा रहा है, पर वह आधा अधूरा सा है। शोषण की सामाजिक व्यवस्था का अदृश्य राक्षस उन्हें ग्रसे हुए है। मुझे पिछले दिनों डिंडौरी जिले के गाड़ासराई& जाने का मौका मिला था, मुझे बताया गया कि व्यापारियों के एक समुदाय की आर्थिक स्थिति पूरे प्रदेश में यदि कहीं सर्वोच्च स्तर पर है तो वह गाड़ासरई में ही है, परंतु जिन आदिवासियों से वनोपज खरीदकर और उन्हें नमक, तेल, शक्कर, कपड़ों का विक्रय करके वे संपन्नता की सबसे ऊंची पायदान पर पहुंच गये, वहीं उनका लंगोटीधारी ग्राहक समुदाय लंगोटी से आगे की आर्थिक स्थिति में न पहंच सका। तो यह अब शोध का विषय बन चुका है कि बिना उत्पीड़न के ही एक व्यवसायगत विधा अरण्यवासियों से बहुत कुछ छीन लेती है और उसे कोई देख तक नहीं पाता।
इनका विकल्प रानीदुर्गावती के व्यक्तिव के उसी पहलु में छिपा हुआ है, जिसने उन्हें स्वाभिमान की रक्षा के साथ संघर्ष और आत्मबलिदान की परिणिति के लिये प्रेरित किया। आदिवासी समाज को प्रेरित होकर अपने हकों के लिये आगे जाना चाहिये, किंतु नक्सलवादी- गतिविधियां जैसी हिंसक प्रवृत्तियों के चंगुल में फंसने से भी अपने को बचाये रखना चाहिये। नक्सलवाद, आदिवासी-असंतोष को भुनाकर राजनीति करने वाला ऐसा आंदोलन बन चुका है, जो अब निजी अहम और नेतृत्व के रोमानी-झुकाव का शिकार बन कर रह गया है। जैसा कि मैं अपने कुछ पुराने लेखों में कहा चुका हूं कि केंद्र सरकार को सिर्फ अच्छी योजनाएं बनाकर और धन मुहैया कराकर ही खामोश नहीं बैठ जाना चाहिये, बल्कि योजनाओं के क्रियान्वयन के प्रति कड़ा रूख अपनाते हुए एक सशक्त मानीटरिंग-प्रणाली भी ईजाद करनी चाहिये ताकि फायदा उस अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सके। आदिवासियों के हितों के लिये तो इस प्रणाली की खास जरूरत है।

मध्यप्रदेश.. .. .. .. .यह कैसा सत्याग्रह?
प्रभात झा
आंदोलन, सत्याग्रह, उपवास, चक्काजाम, काले-हथयंडे, काली पट्टी, रेल रोको, धरना प्रदर्शन सहित अनेक पैंतरे हो सकते हैं जिनसे सरकार के विरुद्ध अविश्वसनीयता व विरोध जताया जा सके। आखिर यह किसके लिए क्यों किया जाता है? हम जनता के लिए, जनता की भलाई के लिए, जनता की सहुलियत के लिए करते हैं। जनता को परेशान करने के लिए नहीं। किसी भी दल को जनता के बीच अपनी बात रखने के लिए जनता के बीच इस तरह के प्रदर्शन करना आवश्यक हो तो वह भी संविधान के दायरे में रहकर ही किया जाना चाहिए। यहां सवाल यह उठता है कि मध्यप्रदेश में दो जून से जो कुछ भी आंदोलन के नाम पर किया गया वह किसके लिए किया गया? किसानों को आगे करके कांग्रेस द्वारा आंदोलन चलाया गया क्या यह लोकतांत्रिक कदम है। कोई भी अलोकतांत्रिक कार्य कभी भी लोकतंत्र में सफ लता नही दिलवाता है। हम आजादी की लड़ाई और उस समय के आंदोलन और सत्याग्रह इस बात की गवाही देते हैं। उन आंदोलनों का उद्देश्य था भारत को आजादी दिलाना था। स्वतंत्रता के बाद भी देश में अनेक
आंदोलन एवं सत्याग्रह हुए हैं लेकिन किसी भी आंदोलन या सत्याग्रह की आड़ में ऐसा कुछ नहीं किया गया जैसा इस आंदोलन के दौरान मध्यप्रदेश में किया गया। मध्यप्रदेश शांति का टापू है यहां का अन्नदाता सात्विक है। भाईचारे का अनुपम उदाहरण मध्यप्रदेश के ग्रामीण परिवेश में देखने को मिलता है, यहां आज भी गांव के गरीब की बेटी की शादी पूरा गांव मिल जुलकर करता है। आज भी गांव में कोई भूखा नहीं सोता! क्योंकि गांव में रहने वाला अन्नदाता किसान है। 2 जून से लेकर 7 जून तक जो कुछ भी हुआ उसका जिम्मेदार कांग्रेस पार्टी को कहा जाए, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। हम जानना चाहते हैं कि इन्दौर के राउ से विधायक कौन है? जो किसानों को उग्र कर रहे थे और अनुविभागीय अधिकारी (एस.डी. एम) से गाली गलौच करते हुए बात करते है। किसानों को भड़काकर आग लगाने के लिए पे्ररित करते हुए विधायक शकुंतला देवी खटीक को थाने को आग के हवाले करने और थानेदार को पीटने का अधिकार संविधान ने कब दे दिया। सतना जिले को कांग्रेस जिलाध्यक्ष श्री दिलिप मिश्रा उन्होंने कहा कि हम सरकार पर गोली चलवाएंगे। हम रेल की पटरी उखाड़ देगें। धाकड़ जी और कांग्रेस नेता श्री घनययाम गुर्जर सांची दूध बरबाद करने की बात कर रहे हैं, सैकड़ो वाहन (ट्रक, बस, शासकीय वाहन) जला दिए गए। कौन सा रुप है यह आंदोलन का? हमारे प्रदेश का किसान कभी ऐसा रहा ही नहीं, वह निर्विकार है और निर्लिप्त भाव से, अपनी क्षमता से, अपनी ताकत से मध्यप्रदेश में बंपर पैदावार करता है।
वाज़िब दाम की लड़ाई लड़ना चाहिए किन्तु किसानों की आड़ में कांग्रेस को नहीं, कांग्रेस आगे आती तो बात समझ में आती। मध्यप्रदेश के किसानों को देश भर में बदनाम करने की गहरी साजिश की गई किसान आंदोलन के नाम पर कांग्रेस के सभी चेहरे उजागर हो चुके हैं। वह तो भला मध्यप्रदेश के मुखिया श्री शिवराज सिंह जी का जो इस भयावह स्थिति को भांप गए कि यह सत्ता प्राप्ति के लिए कांग्रेस की सोची समझी चाल है किसानों को बरगलाकर प्रदेश की शांति भंग करने की। हमारे लाड़ले मुख्यमंत्री जी ने कहा कि मध्यप्रदेश बचेगा तो हम बचेंगे और दो टूक कह दिया कि मैं गंाधी वादी तरीके से प्रदेश में शांति बहाली के उपवास करुंगा और बैठ गए उपवास पर। भेल दशहरा मैदान में उपवास के दौरान किसान आने लगे
और चमत्कार तो तब हुआ जब आंदोलन के दौरान दिवंगत किसान परिवार के वंशजों के परिजन मुख्यमंत्री जी से मिलने आ पहुंचे और उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री जी हमारे लाल तो चले गए अब आप क्यों उपवास कर रहे हैं आपकी आवश्यकता इस मध्यप्रदेश को है और उन्होंने श्री शिवराज जी का व्रत समाप्त करवाया। मुख्यमंत्री जी इस घटना से दुःखी थे, आह्त थे, बेचैन थे उन्हे एक ही बात की पीड़ा थी कि मैने मध्यप्रदेश में सदैव किसान पुत्र होने का धर्म निभाया है बिना मांगे किसानों वह सब सुविधा उपलब्ध कराई है जो खेती को लाभ का धंधा बनाने सकने में सक्षम है। भारत में किसी भी प्रदेश में शून्य प्रतिशत ब्याज पर किसान को कर्ज नहीं दिया जाता किन्तु मध्यप्रदेश में किसानों के लिए शून्य प्रतिशत ब्याज पर सहकारी ऋण उपलब्ध कराया जाता है। इतना ही नहीं बोनस देने की प्रथा जारी है। और तो और किसानों को एक लाख रु. तक का ऋ ण बिना ब्याज के सरकार उपलब्ध कराती है और दस हजार की सब्सिडी देकर मात्र नब्बे हजार की ऋण वापस लेती है। पिछले वर्ष की बात करें तो सोयाबीन की फसलें खराब होने पर माननीय मुख्यमंत्री जी द्वारा 4,800 करोड़ रु. की सहायता राशि जारी की गई थी, इसके पश्चात ही 4,800 करोड़ रु. की बीमा राशि का भुगतान किया गया। सरकार ने गेंहू, धान को समर्थन मूल्य पर खरीदा गया, प्याज आठ रु. प्रति किलो की दर से खरीदी गई। तुबर दाल के न्यूनतम समर्थन मूल्य रु. 5050 प्रति मि्. की दर से,मूंग का उपार्जन रु. 5225 प्रति मि्. की दर से, उड़द दाल को 5000 रु.प्रति मि्. की दर से 30 जून 2017 तक खरीदा जाएगा। भाजपानीत मध्यप्रदेश सरकार श्री शिवराज सिंह जी के नेतृत्व में किसानों के हित के लिए वचनबद्ध है और इसी हेतु से सरकार ने घोषणाऐं की है जो मुख्यतःयह हैं बिचौलियों की भूमिका समाप्त करने के लिए प्रदेश के चिन्हित नगरों में किसान बाजार बनाए जाने की योजना है। स्वामीनाथन आयोग की अनुशंसा के अनुरुप व्लेज नालेज सेंटर बनाए जाएंगे। 1000 करोड़ की लागत से मूल्य स्थिरीकरण कोष बनाया जाएगा। जिन लोगों की निजि सम्पत्ति का नुकसान हुआ है
उन्हे सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। अमूल डेयरी माडल के आधार पर दूध के मूल्य के निर्धारण की व्यवस्था की जाएगी। किसानो की जमीन की खसरा खतौनी की नकल को उनके घर पर वर्ष में एक बार उपलब्ध कराई जाएगी। कृषि उपज मंडी में भुगतान अब आर.टी. जी.एस. किया जाएगा 50 प्रतिशत राशि नगदी प्रदान की जाएगी। किसानो को मोबाईल सूचना तंत्र के साथ जोड़कर सूचित किया जाऐगा कि एक ही फसल अधिक रकबे में न लगाए ताकि एक ही प्रकार की फ सल का उत्पादन ज्यादा न हो। चौबीस में से अट्ठारह घंटे मध्यप्रदेश की जनता की भलाई के लिए काम करने वाले माननीय मुख्यमंत्री जी द्वारा किसानों के हित मे लिए निर्णय है। प्रदेश की जनता के हितार्थ उपवास किया और 48 घंटे के भीतर ही प्रदेश में फैल रही अराजकता को चिन्हित कर उस पर नियंत्रण कर लिया गया।

(लेखक कमल संदेश के संपादक, राज्यसभा के माननीय सांसद,एवं भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)

शांघाई के अखाड़े में भारत-पाक
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
इस साल भारत और पाकिस्तान शांघाई सहयोग संगठन के बाकायदा सदस्य बन गए हैं। इस संगठन में दोनों की सदस्यता एक साथ हुई, यह अपने आप में विशेष बात है। अब सवाल है कि ये दोनों राष्ट्र क्या उस संगठन में भी एक-दूसरे के साथ वैसा ही बर्ताव करेंगे, जैसा कि वे दक्षेस (सार्क) में करते रहे हैं ? यदि हां तो उस संगठन का कोई खास नुकसान तो होगा नहीं, क्योंकि जैसे दक्षेस के राष्ट्रों में ये दोनों सबसे बड़े हैं, वैसे शांघाई-राष्ट्रों में ये दोनों चीन और रुस से छोटे हैं। यों भी यह संगठन चीन और रुस ने मिलकर बनाया है। चीन और रुस ने वास्तव में भारत और पाक को इस संगठन का सदस्य बनाकर एक खतरा मोल लिया है। शायद एक सिरदर्द पाल लिया है। यह कैसे संभव है कि भारत और पाकिस्तान किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक साथ बैठें और एक दूसरे के खिलाफ न बोलें ? संयुक्तराष्ट्र संघ में तो हम यह करते ही रहे हैं अभी सिंगापुर में चलनेवाले परिसंवाद में दोनों देशों की खटपट हो गई थी।अगर ऐसा शांघाई सहयोग संगठन में भी होता रहा तो भारत का नुकसान होने की संभावना ज्यादा है, क्योंकि चीन से भारत की पुरानी उलझने हैं और पाकिस्तान के साथ तो रिश्ते दुश्मनी की हद तक पहुंचे हुए हैं। भारत को ये दोनों देश घेरेंगे। उसे हिलने-डुलने की भी दिक्कत हो सकती है। जहां तक रुस का सवाल है, वह भी आजकल पाकिस्तान की तरफ मुखातिब है। अभी रुस-पाक सेनाओं ने संयुक्त अभ्यास भी किया था। इधर रुस तलिबान के प्रति थोड़ा नरम पड़ा है और उसका मुख्य निशाना दाएश (आईएसआईएस) है। इसीलिए भारत रुस से पहली-सी मुहब्बत नहीं मांग सकता। और फिर भारत क्या पाकिस्तान सेना के साथ संयुक्त सैन्य-अभ्यास करेगा, जैसी कि शांघाई-राष्ट्रों की परंपरा है ? यदि दोनों देश ऐसा कर सकें तो क्या कहने ? नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में पाकिस्तान का नाम लिए बिना आतंकवाद और चीन का नाम लिए बिना ‘ओबोर’ के द्वारा भारतीय संप्रभुता के उल्लंघन की बात कही। बहुत अच्छा किया। यह विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को पेइचिंग में हुए ‘ओबोर’ सम्मेलन में जाकर कहना था। अब भूल-सुधार हो गया लेकिन शांघाई सहयोग संगठन से बहुत ज्यादा उम्मीद करना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इसके छह सदस्यों में चीन और रुस के अलावा मध्य एशिया के वे चार मुस्लिम राष्ट्र हैं, जो 20 साल पहले तक रुस के प्रांत रहे हैं। इस संगठन की अधिकारिक भाषाएं भी रुसी और चीनी हैं, जो कि मोदी और नवाज के लिए जादू-टोने की तरह हैं। हमारे दोनों प्रधानमंत्रियों की अंग्रेजी भी माशाअल्लाह है। देखें, अनुवादकों के जरिए हम राष्ट्रहितों के मूल का कितना अनुवाद कर पाते हैं ? बेहतर तो यह होता, जैसा कि मैं पिछले कई दशकों से कहता आ रहा हूं कि हम दक्षेस के आठ राष्ट्रों की बजाय आर्यावर्त्त के 16 राष्ट्रों का संगठन बनाएं, जिसमें मध्य एशिया के पाचों गणतंत्रों के अलावा बर्मा, ईरान और मोरिशस को भी शामिल करें।

 

पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका का यूं अलग हो जाना
– डॉ. हिदायत अहमद खान
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपने निर्णय से दुनिया को चौंका दिया है। ट्रंप का यह ऐसा फैसला है जिससे अमेरिकी विश्वसनीयता पर सवालिया निशान भी लग सकते हैं। दरअसल राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका को पेरिस जलवायु समझौते से अलग करने की घोषणा की है। इस प्रकार निकारागुआ और सीरिया के बाद अमेरिका इस समझौते से बाहर होने वाला तीसरा देश बन गया है। गौरतलब है कि पेरिस जलवायु समझौता करीब दो सैकड़ा देशों के बीच में हुआ था। इन देशों ने अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने का निश्चय किया था। पूरे विश्व में बढ़ते तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस तक रोकने के मकसद से यह समझौता हुआ था। यह समझौता 4 नवंबर 2016 से लागू भी कर दिया गया। इसके तहत ग्रीन हाउस गैसेस के उत्सर्जन में 28फीसद की कमी लाने का निश्चय किया गया था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सितंबर 2016 में इस समझौते पर हस्ताक्षर कर दुनिया को बतलाया था कि इसके जरिए भविष्य में वैश्विक जलवायु को जीव-जंतुओं के रहने लायक बनाया जा सकेगा। कुल मिलाकर समझौता इसलिए हुआ कि 2100 तक ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे सीमित रखना है। चूंकि अमेरिका पिछले कई दशकों से दुनिया का सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जक देश बना हुआ है, यानी कुल उत्सर्जन का करीब 15 फीसद हिस्सा अमेरिका से ही उत्सर्जित होता है। इस प्रकार उसने अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने का फैसला लिया। यही वजह थी कि अमेरिका एक ऐसे सजग विकसित देश की तरह आगे आया जो कि उन विकासशील देशों के लिए आर्थिक और तकनीकी मदद का बड़ा स्रोत बना जो जलवायु परिवर्तन से लड़ने को तैयार नजर आए। तब राष्ट्रपति ओबामा ने पेरिस समझौते पर अपने विचार रखते हुए कहा था कि इसमें सबकी जीत है। अमेरिका के लिए ये नई टेक्नोलॉजी और नए शोध में पैसा लगाकर लाखों नौकरियां पैदा करने का मौका है। वहीं उन्होंने इसे विकासशील देशों के लिए इन नए आविष्कारों का फायदा उठाने का मौका बताया था। इस प्रकार अमेरिका के साथ ही संपूर्ण विश्व के भले की चिंता करने वाले कदम को ट्रंप ने जैसे ही पीछे खींचा सभी ने उसका विरोध शुरू कर दिया। अब सीधे तौर पर सवाल किया जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ी जाने वाली इस लड़ाई में क्या अमेरिका से सहयोग मिलेगा? यदि अमेरिका इससे अलग हो रहा है तो क्या इस स्थिति में इसकी कमान चीन के हाथ में नहीं चली जाएगी? बहरहाल यह पहली बार नहीं है जबकि समझौते पर सवाल खड़े किए गए हों, बल्कि इससे पहले ही इसे जहां ऐतिहासिक उपलब्धि बताने वालों की जुबान नहीं थक रही थी तो वहीं दूसरी तरफ ऐसे भी देश और थिंकर रहे जिन्होंने इसे साफतौर पर धोखा और झूठ व कमजोर करार दिया था। खासतौर पर गरीब और विकासशील देशों के हिमायती विश्लेषकों ने समझौते को आर्थिक और तकनीकी तौर पर कमजोर ठहराया था। दरअसल इस सोच को आगे बढ़ाने वालों का मानना था कि जो जिम्मेदारियां, विकसित देशों के लिए बाध्यकारी होनी चाहिए थीं, वे उससे साफ बच निकले हैं। तब के अंदेशे और भविष्यवाणियाँ अब जमीनी हकीकत बनकर सामने आ रही हैं। पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका को पीछे हटाने के ट्रंप के फैसले के विरोध में कई देश सामने आ गए हैं। फ्रांस, जर्मनी और इटली ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि पेरिस जलवायु समझौते पर फिर से बातचीत नहीं की जा सकती।

मोदी सरकार ने तीन वर्ष में किया देश का कायापलट

नरेन्द्र सिंह तोमर
केन्द्र में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार अपने तीन वर्ष पूरे करने जा रही है। यह उचित होगा कि हम इस अवसर पर केन्द्र सरकार द्वारा जनहित और देशहित में उठाये गये विभिन्न कदमों, महत्वाकांक्षी योजनाओं और कार्यक्रमों के परिणामों की समीक्षा करें और किन उपायों पर तेजी से अमल किये जाने की जरूरत है, उनके बारे में रोडमैप तैयार करें। वास्तव में विकास पुरुष और देश को ऊर्जापूर्ण व कुशल नेतृत्व देने वाले प्रेरक प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी, जनता की उन आकांक्षाओं और अपेक्षाओं पर खरे उतरे हैं जिनकी कल्पना देश की जनता ने उन्हें सत्ता सौंपते हुए की थी। श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में नये आयाम स्थापित किये हैं, जिन्हें युगान्तरकारी कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा।
विश्व में वर्तमान आर्थिक कठिनाइयों के दौर में भी भारत प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच चट्टान की तरह मजबूती से खड़े रहते हुए विदेशी निवेशकों के लिये सुनहरा स्थल बना रहा है। यह हर्ष का विषय है कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपने जनवरी, २०१७ के आकलन में वर्ष २०१७ के दौरान भारत की विकास दर ६.६ प्रतिशत से बढ़कर ७.२ प्रतिशत और २०१८ में ७.७ प्रतिशत हो जाने का अनुमान लगाया है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था चर्चित हुई है और इसके प्रति विदेशी निवेशकों का विश्वास और उत्साह बढ़ा है। देश में ऐतिहासिक मौद्रिक उपायों सहित अनेक सुधारात्मक कदम उठाये गये हैं और देश की अर्थव्यवस्था को सीमित नकदी वाले मार्ग पर ले जाने का नया अभियान शुरू हुआ है। सरकार ने बजट में राजस्व घाटे में कमी की है और राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखा है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार ३६१ अरब डॉलर तक पहुंच गया है, महंगाई दर ६ प्रतिशत से नीचे रख पाने में कामयाबी मिली है और भारत विश्व के छठे सबसे बड़े निवेश स्थल के रूप में उभरा है। प्रत्यक्ष और परोक्ष कर-वसूली में करीब १८ प्रतिशत की वृद्धि के साथ राजस्व विभाग ने २०१६-१७ के लिए संशोधित कर-वसूली लक्ष्य पार कर लिया। इससे स्पष्ट है कि केन्द्र में वर्तमान सरकार की योजनाओं और कार्यों के अपेक्षित और ठोस परिणाम प्राप्त हो रहे हैं।
वर्तमान सरकार महिलाओं, किसानों, गरीबों, युवा और वंचित वर्ग पर सर्वाधिक ध्यान दे रही है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत वर्ष २०१४ से २०१६ के दौरान १२.७४ लाख हेक्टेयर जमीन को सूक्ष्म सिंचाई परियोजनाओं के दायरे में लाया गया है, जो २०० प्रतिशत वृद्धि है। दिसम्बर, २०१९ तक चरणबद्ध तरीके से ७६.०३ लाख हेक्टेयर की क्षमता के साथ ९९ बड़ी और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने के उद्देश्य से इस योजना को मिशन मोड में कार्यान्वित किया जा रहा है। प्राथमिकता वाली ९९ सिंचाई परियोजनाओं में से २१ परियोजनाएं जून, २०१७ तक पूरी होने की उम्मीद है, जिनकी कुल सिंचाई क्षमता ५.२२ लाख हेक्टेयर होगी। राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना के तहत राज्यों की मंडियों को ई-एनएएम पोर्टल से जोड़ने का काम तेजी से चल रहा है। ई-एनएएम पोर्टल के तहत किसानों की उपज की बिक्री से प्राप्त होने वाली राशि के ऑनलाइन भुगतान की व्यवस्था की गई है। राज्यों से यह धनराशि किसानों के बैंक खातों में सीधे हस्तांतरित करने का अनुरोध किया गया है। पहले चरण के अंतर्गत मार्च, २०१८ तक कुल ५८५ मंडियों को इस पोर्टल से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें से ४०० मंडियों को मार्च, २०१७ तक जोड़ दिया गया है।
सरकार शहरों की तर्ज पर गांवों का विकास करना चाहती है ताकि ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन पर रोक लगे और ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को स्थानीय स्तर पर स्थायी रोजगार या आजीविका प्राप्त हो सके। इस उद्देश्य से केन्द्र सरकार की विभिन्न ग्रामीण विकास योजनाओं के लिये अतिरिक्त आवंटन और कुशल प्रबंधन पर ध्यान दिया गया है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) में वित्त वर्ष २०१६-१७ के दौरान अब तक का सबसे अधिक खर्च कर इस योजना की कायापलट की गई है। ४८२२० करोड़ रुपए के बजट प्रावधान के मुकाबले वित्त वर्ष २०१६-१७ में ५७५१२ करोड़ रुपए खर्च किए जाने की जानकारी मिली है, जिसमें राज्यांश भी शामिल है। वित्त वर्ष २०१७-१८ के लिये ४८००० करोड़ रू. का बजट प्रावधान रखा गया है।

(केंद्रीय मंत्री- नरेन्द्र सिंह तोमर )

सर्जिकल स्ट्राइक या फर्जीकल स्ट्राइक ?
-डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हमारे टीवी चैनलों और अखबारों में एक खबर सबसे ज्यादा छाई रही। वह थी, हमारी फौज द्वारा दुबारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक  की ! यह सर्जिकल स्ट्राइक  इसीलिए की गई कि १ मई को हमारे दो जवानों के सिर काट दिए गए थे और उनके शवों को क्षत-विक्षत कर दिया गया था। नियंत्रण रेखा पर हुई इस घटना का बदला लेने के लिए भारतीय फौज ने ९ मई को पाकिस्तान की कुछ चैकियां उड़ा दी। और अब १४ दिन बाद हमारी फौज के प्रवक्ता दुनिया को बता रहे हैं कि हमारी फौज ने कैसा कमाल कर दिखाया। समझ में नहीं आता कि नियंत्रण-रेखा पर क्या चल रहा है। १ मई को हमारे फौजियों के साथ वहशियाना बर्ताव हुआ और हमारी सरकार आठ दिन तक सोती रही। उसने ९ मई को बदला लिया। उसी दिन या दूसरे दिन ही क्यों नहीं ? उस समय सारा देश भन्नाया हुआ था लेकिन सरकार का थर्मामीटर फ्रीजर में रखा हुआ था। दूसरा सवाल यह कि ९ मई को सर्जिकल स्ट्राइक का प्रोपेगंडा अब २३-२४ मई को किसलिए किया जा रहा है ? अगर यह सर्जिकल स्ट्राइक होती तो सरकार १४-१५ दिन तक सोती नहीं रहती। भारत को गाल बजाने की भी जरुरत नहीं होती। वह खुद बोलती। चिल्ला-चिल्लाकर बोलती। भारत बोलता, उसके पहले ही पाकिस्तान चिल्ला-चिल्लाकर सारी दुनिया को जगा देता। लेकिन अभी क्या हुआ है ? वह कहीं फर्जीकल स्ट्राइक तो नहीं है ? आपने सर्जिकल स्ट्राइक का दावा किया और पाकिस्तान ने उसे रद्द कर दिया। आपने २४ सेकेंड का वीडियो दिखाया तो उन्होंने आपसे चार गुना बड़ा वीडियो दिखा दिया। सितंबर में हुए च्सर्जिकल स्ट्राइकज् का तो इससे भी बड़ा मजाक बन गया था। यदि भारत ने इस्राइल (१९६७) की तरह कोई च्सर्जिकल स्ट्राइकज् किया होता तो उसके बाद क्या पाकिस्तान की इतनी हिम्मत पड़ती कि वह दर्जनों बार नियंत्रण-रेखा का उल्लंघन करता और हमारे जवानों के शवों की बेइज्जती करता ? इस समय सीमा पार में ५५ आतंकी शिविर सक्रिय हैं, उमनें से २० तो अभी-अभी बने हैं। जनवरी से अब तक घुसपैठ की कम से कम ६५ घटनाएं हो चुकी हैं। हमारे तदर्थ रक्षा मंत्री दावा करते हैं कि हमारी सैनिक कार्रवाइयां इसीलिए बढ़ा दी गई है कि कश्मीर में शांति रहे। वाह क्या बात है ? कश्मीर-समस्या पर उनकी समझ को सलाम है। क्या कश्मीर के हजारों पत्थरफेंकू लड़के, सारे बमबाज आतंकवादी और लाखों हड़ताल करनेवाले लोग नियंत्रण-रेखा पार करके भारत में घुस आए हैं? पाकिस्तान को पाकिस्तान बने रहने के लिए सीमा पर अलाव जलाए रखना जरुरी है। अब हमारी सरकार ने पाकिस्तान को ही गुरु धारण कर लिया है। वह भी सीमांत पर लगातार फुलझड़ियां छोड़ती रहती है। इससे यह पता चलता है कि मोदी सरकार सिर्फ बंडल नहीं मार रही है। वह पक्की राष्ट्रवादी है। वह नहले पर दहला मारती है। गुरु गुड़ रह गया है और चेला शक्कर बन गया है। पाकिस्तान तो एक फर्जी राष्ट्र है। उसके खिलाफ सर्जीकल स्ट्राइक  ही काफी है।

अनिल जी फिर लौटें…

विरोधाभास के कुहांसे के बीच ‘मोदी-युग’ का शुभ प्रभात
– भरतचन्द्र नायक…

भारत में लोकतंत्र ने अंगड़ाई ली है। लोकतंत्र परिपक्वता की ओर बढ़ता नजर आया और परंपराएं ध्वस्त हुई क्योंकि जनता ने सियासी खोखलापन नापसंद कर दिया। पात्रता के अवसरवाद से मुक्ति के बाद सबका साथ-सबका सशक्तिकरण लोकबोध बनता देखा गया। अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की इस बात को लेकर आलोचना हुई कि उत्तर प्रदेश में एक भी अल्पसंख्यक को प्रत्याशी नहीं बनाया। लेकिन मतदान करने में अल्पसंख्यक आगे रहे और कमल की नुमाइंदगी पसंद की। यहां तक कि मुस्लिम महिलाओं ने कमल के समर्थन में तमाम फतबों और दबावों को दरकिनार करके गतिशील भारत की दिशा निर्धारित कर दी। देश-विदेश के राजनैतिक विश्लेषक इस बात पर हैरान-परेशान है कि विमुद्रीकरण ने 86 प्रतिशत बड़ी मुद्रा को चलन से बाहर कर बैंकों के सामने लंबी लाईनों में जनता को खड़ा कर दिया। फिर भी जनता ने नोटबंदी के कारण क्लेशित होने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समर्थन में मतदान केन्द्रों पर भी कतारों को लंबा कर दिया। कारण स्पष्ट समझ में आया कि सात दशकों तक राजनीति के दिखाऊ मधुर तेवरों में हकीकत कम फसाना अधिक रहा है। नरेन्द्र मोदी ने देश की काली अर्थव्यवस्था में नस्तर लगाया और इसके पहले ताकीद कर दी कि नस्तर से तकलीफ होगी। लेकिन बनने वाले नासूर से आप और अगली पीढ़ी सुरक्षित हो जायेगी। नतीजा सामने आया उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े सूबे में कमल खिला और ऐसा विशाल जनमत लगभग पौने चार दशक बाद जनता ने परोसा। सत्ता नस्तर लगाने वालों के हाथों में सौंपकर निश्चिन्त हो गयी। पग-पग पर विरोधाभास ने नरेन्द्र मोदी का प्रेतछाया के समान पीछा किया है और नहीं कहा जा सकता है कि यह सिलसिला कहां से कब तक चलेगा? लेकिन जैसा कि वरिष्ठ नेता वैंकेया नायडू ने कहा कि मोदी देश को दैवीय वरदान (गॉड गिफ्ट) है। विरोधाभास वास्तव में उनके लिए पारस स्पर्श देता आ रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मोदी को मौत के सौदागर के रूप में संबोधित क्या किया, गुजरात की जनता मोदी पर कुर्बान हो गयी और गुजरात में कांग्रेस का अवसान हो गया। सर्जिकल स्ट्राईक को राहुल बाबा ने सैनिकों के खून की दलाली कहकर जनता का मूड बिगाड़ दिया। पांच में से 4 राज्यों में जीत का सेहरा जनता ने मोदी के सिर बांध दिया।
बाबरी मजिस्द विवाद के पक्षकार मोहम्मद अंसारी की गणना अल्पसंख्यकों के कट्टर पेरोकार के रूप में हुई है। लेकिन अंसारी मोदी पर ऐसे लटटू हो गये कि उन्होनें अल्पसंख्यकों का आव्हान किया और कहा कि आजादी के बाद पहला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हुआ जो न तो राग द्वेष रखता और न ही लोक लुभावन नारे परोसकर जनता को छलता है। उसके लिए समूची कौम एक परिवार और नजर एक है। अल्पसंख्यकों के साथ वेमुरोब्बत बात वहीं कर सकता है जो निष्कपट है। हाल का एक वाकया भी गंभीर विमर्श की अपेक्षा करता है। आतंकवाद के विस्तार में सिमी के सपोलों ने सिर उठाया। मध्यप्रदेश में 6 सपोले पुलिस के हत्थे चढ़ गये। उत्तर प्रदेश में हरकत कर पाते इसके पहले ही हुई मुठभेड़ में सैफुल्ला हला हो गया। सेकुलर ब्रिगेड चुप कैसे रहता? उसे वोटों की सियासत का मनचाहा मौका मिल गया। मुठभेड़ पर सवाल दाग दिये गये। लेकिन आतंकवादी सरगना सैफुल्ला के वालिद जनाब सरताज ने सैफुल्ला की लाश लेने और दफन करने से इंकार करते हुए कहा कि जो वतन का नहीं हुआ वह मेरा लडक़ा कैसे हो सकता है। सेकुलर ब्रिगेड की सियासत की सरताज ने न केवल पोल खोल दी, बल्कि नरेन्द्र मोदी द्वारा की गयी सर्जिकल स्ट्राईक के औचित्य में चार चांद लगा दिये। कांग्रेस के वे सभी नेता चुप हतप्रभ रह गये जो ऐसे मौकों को सियासत के लिए भुनाने की ताक में रहते है। उन्होनें मुंबई आतंकी घटना, बटाला हाउस एनकाउंटर पर सवाल खड़े ही नहीं किये, बल्कि मुठभेड़ में शहीद हुए रक्षाकर्मियों की शहादत का अपमान भी किया। लगातार अल्पसंख्यकों को भ्रमित करके अल्पसंख्यकों के विश्वास को सेकुलर ब्रिगेड ने डिगा दिया। अब तक सेकुलरवादियों की अल्पसंख्यकों के भावनात्मक शोषण करने की फितरतों ने सेकुलरवाद के छद्म से अल्पसंख्यक ने तौबा कर ली। इसी का दुष्परिणाम कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश के चुनाव में भोगना पड़ा। अल्पसंख्यकों के साथ दलितों, पिछड़ों, अति पिछड़ों ने भी नरेन्द्र मोदी की आर्थिक, सामाजिक नीतियों के समर्थन में एकमुश्त मतदान करने की ठान लिया। लोकसभा चुनाव 2014 में नरेन्द्र मोदी के समर्थन में भारतीय जनता पार्टी को जो समर्थन मिला था, ढ़ाई वर्ष बाद भी उसका बरकरार रहना भारतीय लोकतंत्र में विश्वसनीयता का एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। एंटी इन्कमबेंसी की प्रत्याशा में जो ताल ठोक रहे थे वे धराशायी हो गये। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में तीन चौथाई से अधिक बहुमत ने देश और दुनिया को चमत्कृत किया है। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसा तीन चौथाई बहुमत विधानसभा, लोकसभा चुनाव में पीढ़ी को एक बार ही मयस्सर होता है। 1952 के चुनावों में पं. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में यह जीत नसीब हुई। बाद में गरीबी हटाओं देश को बचाओं जैसे आकर्षक नारे देकर इंदिरा जी को भी जनता ने मौका दिया। उनके अवसान के बाद 1984 में इंदिरा जी की दु:खद मौत के बाद जनता ने सहानुभूति वोट के रूप में राजीव गांधी को भी इस स्तर पर पहुंचाया। लेकिन 37 वर्ष बाद नरेन्द्र मोदी ने जैसा कहा कि देश की जनता की खिदमत में उनका 56 इंच का सीना चट्टान की तरह आगे रहेगा। उन्होनें 16वीं लोकसभा के चुनाव और उत्तर प्रदेश की 16वीं विधानसभा के चुनाव में अप्रत्याशित जीत हासिल कर साबित कर दिया कि वे सेवादारों की सैना में यदि सेनापति है तो बेरेक में रहकर हुक्म चलाना नहीं जानते, सीना मोर्चा पर हमेशा आगे रहता है। ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’, न चैन से बैठूंगा और न दूसरों को बैठने दूंगा। छाती ठोककर प्रमाणित कर दिखाया है। नरेन्द्र मोदी का कद पं. नेहरू, इंदिरा गांधी से आगे नहीं तो, पीछे भी नहीं है। यह अतिश्योक्ति नहीं। सात समन्दर पार विश्व संचार माध्यम जो अब तक नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विष वमन करने में अग्रणी थे, वे ही फरमा रहे है कि नरेन्द्र मोदी की भारत की जनता ऐसी मुरीद है कि 2019 में 17वीं लोकसभा चुनाव में कमल खिलाने को आतुर है। आहट सोलहवीं विधानसभा (उ.प्र.) चुनावों से कर्णगोचर हो चुकी है। समाजशास्त्रियों, राजनैतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ सियासतदारों का मानना है कि नरेन्द्र मोदी ने समाज के बिखराव के जो कारक अभी तक राजनेताओं ने ईजाद किये थे, उन्हें झुठला दिया है। उनकी नीतियों से पात्रता क्रम मिट चुका है। उन्होनें सबका साथ-सबका सशक्तिकरण मूलमंत्र साबित किया है। चाहे जन-धन योजना हो, मुद्रा बैंक योजना हो, उज्जवला योजना और 79 प्रकार की जो भी जन हितकारी योजनाएं है, उनमें एक ही सांचा है। भारत का नागरिक, शोषित, पीडि़त, वंचित, गरीब, अबाल, वृद्ध नर-नारी, किसान, मजदूर, युवा, महिला सब एक समान न्याय और समानता के अधिकार के हकदार है। पूर्ववर्ती कांग्रेस की यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने योजना भवन दिल्ली में बैठकर यह कहकर कि देश की संपदा पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है, अलगाव के बीज बो दिये थे।

अंतत: योगी अंतत: हिंदुत्व
उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ के मनोनयन के पश्चात यह स्पष्ट हो गया कि नरेंद्र मोदी व अमित शाह की टोली ने यह नियुक्ति कई संदेशों के स्पष्टत: प्राकट्य, प्रस्तुतीकरण व प्रसारण के लिए बड़ी ही दृढ़ता के साथ की है. बहुत से ऐसे तथ्य, मान्यताएं व राजनैतिक मिथक हैं जो नरेंद्र मोदी के इस कदम से आलोकित व स्पष्ट होंगे. बड़ी ही सामान्य सी व सर्वमान्य सी धारणा थी कि नरेंद्र मोदी जैसे तैसे बन रही अपनी विकास पुरुष की छवि को शनै: शनै: विकसित करेंगे और योगी आदित्यनाथ को उप्र का मुख्यमंत्री क्या अपने केन्द्रीय मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री का स्थान भी नहीं देंगे. योगी आदित्यनाथ को उप्र जैसे भारत के सबसे बड़े, सर्वाधिक जनसंख्या वाले व सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाकर नरेंद्र मोदी ने स्वयं के हिंदुत्व के कठोर आग्रह वाली छवि को पुनर्जागृत कर दिया है. एक सामान्य सा प्रश्न सभी के मष्तिष्क में आ रहा है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि विकास पुरुष की व कठोर निर्णय लेनें में सक्षम प्रधानमंत्री की छवि के ऊपर प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने हिंदुत्व वाली छवि को वरीयता दी?! उत्तरप्रदेश के चुनाव में एक भी मुस्लिम को भाजपा प्रत्याशी न बनाना अपने आप में एक चौकाने वाली व राजनीति में एक नई लकीर को खींचनें के संकल्प वाली घटना थी और योगी के मुख्यमंत्री बनने की बिसात वहीं बिछ गई थी. वर्तमान राजनीति के दौर में जबकि मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति चरम पर है तब 20त्न मुस्लिम जनसँख्या वाले प्रदेश में एक भी मुस्लिम को टिकिट न देना एक प्रकार से आत्मघाती निर्णय माना गया था. वस्तुत: ऐसा करके अमित शाह ने “मुस्लिम वोट बैंक” की अवधारणा को ही समाप्त कर दिया था और इसी के साथ जन्म हुआ “हिन्दू वोट बैंक” की अवधारणा को. स्वतंत्र भारत में पहली बार ऐसा हुआ है जब “हिन्दू वोट बैंक” जैसा कोई शब्द धरातल पर अपने अस्तित्व सहित दिख पा रहा है. चुनाव प्रचार के दौर में जब स्वयं प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने श्मशान और कब्रिस्तान की बात करके चुनाव को इस विषय पर केन्द्रित कर दिया था कि तुष्टिकरण की राजनीति की समाप्ति हो या वह चलती रहे तब भी यह स्पष्ट हो गया था कि भाजपा ने इस चुनाव को भगवा एजेंडे पर लडऩे के अपनें निर्णय को कठोरता के साथ धरातल पर उतार दिया है. पूरे चुनाव के दौरान समूची भाजपा का चुनाव अभियान तो हिंदुत्व को अभियान के एक भाग के रूप में चलाता रहा किन्तु योगी आदित्यनाथ का चुनाव अभियान पूरी तरह से भगवा रंग में रंगा ही नहीं होता था बल्कि वे मुस्लिम कट्टरता के विरुद्ध बड़ी ही संकल्पशीलता के साथ मारक अंदाज में भाषण बाजी करते थे व चुनाव को तेजी से ध्रुवीकरण की तरफ ले जानें में सफल भी हो गए थे.
योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनानें के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य मिशन 2019 ही है. माना जा रहा है कि समूचे उत्तरप्रदेश में योगी एक बड़े स्टार प्रचारक के रूप में छा गए हैं और वे अपने दम पर चुनावी मैदान की दिशा मोडऩे का माद्दा रखते हैं. वैसे भी पूर्व से ही योगी पूर्वांचल के प्रभावी, निर्णायक व लोकप्रिय नेता माने जाते रहें हैं. उप्र के पूर्वांचल में 60 विधानसभा क्षेत्र आते हैं व सबसे बड़ी बात प्रधानमन्त्री का निर्वाचन क्षेत्र बनारस भी पूर्वांचल में ही आता है.
सतत 5 लोस चुनाव जीतनें वाले योगी 2009 का चुनाव दो लाख वोटों से व 2014 का लोकसभा चुनाव तीन लाख मतों के अंतर से जीत चुकें हैं. लगातार पांच बार सांसद रहना, फायर ब्रांड हिन्दू नेता होना, अपनें तर्कों के माध्यम से सदा हावी रहना आदि ऐसे तर्क थे जिन्होंने भाजपा आलाकमान को योगी के पक्ष में मुख्यमंत्री की आसंदी देनें का निर्णय करवाया. योगी सदा आक्रामक रहते हुए भी एक विशिष्ट प्रकार की विनम्रता को कठोरता से अपनाए रहते हैं यही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशिष्टता है.

उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ ही क्यों ? डॉ. मयंक चतुर्वेदी
संत परंपरा का निर्वहन करते हुए राजनीति में आए योगी आदित्यनाथ पर यह आरोप सदैव से लगते रहे हैं कि वे हिन्दुत्व की राजनीति करते हैं, चुनावों में एक वर्ग विशेष, धर्म-संप्रदाय से जुड़े वोटों का ध्रुवीकरण करते हैं और जरूरत पड़े तो वे तीन तलाक, लव जिहाद, मदरसा, कब्रिस्तान जैसे धर्म आधारित विवादित बयान देने से पीछे नहीं रहते । उनके तमाम पुराने बयानों को एक बार में देखने पर यही लगता है कि वे अल्पसंख्यक समाज खासकर मुसलमानों के धुरविरोधी हैं। सीधेतौर पर इसका प्रभाव भी समुचे यूपी में योगी के विरोध में देखने को मिलता है तो वहीं प्रशंसकों की कोई कमी भी इसी कारण नहीं है कि वे सीधे-सीधे बोलते हैं। फिर उनके कितने भी विरोधी लोकतंत्र, सेक्युलरिज्म और कट्टरता की आड़ लेकर खड़े हों जाए लेकिन योगी अपनी कही बात से पीछे नहीं हटते हैं। अभी हाल ही में यूपी चुनावों के दौरान जब उन्होंने कुछ मीडिया संस्थानों को अपने साक्षात्कार दिए तो उनकी सही में मंशा क्या है और वे राष्ट्र, राजनीति एवं समाज को लेकर किस प्रकार से सोचते हैं, यह बात व्यापक स्तर पर उजागर हुई। जिसका निष्कर्ष यही है कि यूपी के वर्तमान मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी राजनीति को सेवा का मध्यम मानते हैं और उत्तरप्रदेश को खुशहाल विकसित बनाने का वे स्वप्न देखते हैं ।
भाजपा ने उन्हें जैसे ही यूपी का मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा की तो उत्तरप्रदेश या देश की राजधानी दिल्ली से ही नहीं तमाम राज्यों से यह आवाज भी उठी कि यह उत्तरप्रदेश के लिए ठीक निर्णय नहीं है। सभी खबरिया चेनलों पर यह बहस शुरू हो गई कि उनके सीएम बनने के कारण यूपी को कितना नुकसान होगा, किंतु क्या यह मानलेना पूरी तरह सही होगा कि उत्तप्रदेश को योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से सिर्फ नुकसान ही होगा । निश्चित ही कुछ बातें हैं जिन पर सभी को गौर अवश्य करना चाहिए। योगी के इस वक्तव्य को गंभीरता से देखें, हमारे पास नेता हैं, हमारे पास कार्यकर्ता हैं, हमारे पास कैडर है, हम अपनी इस विचारधारा को पुष्ट करते हुए उत्तर प्रदेश में राज भी बदलेंगे, समाज भी बदलेंगे, वहां की विकृत व्यवस्था भी बदलेंगे। हमारी नजऱ कुर्सी पर नहीं, भारत माता के चरणों पर है, हम भारत माता के विकास के लिए उत्तर प्रदेश के समग्र विकास के लिए कार्य करेंगे । वस्तुत: यह बातें योगी आदित्यनाथ ने एक खबरिया चेनल इण्डिया 24 सेवन के साक्षात्कार में कहीं थीं। देखाजाए तो इससे पता चल जाता है कि वे उत्तरप्रदेश की समुची राजनीति एवं वहां की व्यवस्था को लेकर क्या सोचते हैं।
इसमें कोई दोराय नहीं कि वह बीजेपी के फायर ब्रांड नेता हैं। पूर्वांचल में उन्हें हिंदुत्व के पुरोधा के रूप में जाना जाता है। लेकिन क्या इससे यह तय किया जा सकता है अथवा यह धारणा पुष्ट की जाना चाहिए कि वे हिन्दुओं के अलावा अन्य पंथ-संप्रदाय के विरोधी हैं ? योगी के अब तक दिए जिन बयानों एवं भाषणों को लेकर मीडिया तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतें और राजनीतिक पार्टियां उन्हें कटघरे में खड़ा करती आई हैं, वास्तव अब उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद ही सही यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि योगी जब किसी बात को कह रहे होते हैं तो उसके पीछे का संदर्भ क्या था ? जिस पर उनका यह बयान या भाषण सार्वजनिक हुआ। क्या हिन्दूहित की बात कहना साम्प्रदायिक हो जाना है ? भारत ने तो पाकिस्तान का रास्ता नहीं चुना, न ही डायरेक्ट एक्शन के नाम पर देश के दो टुकड़े करने के लिए हिन्दुओं ने कोई प्रयास किए, बल्कि जिन स्वातंत्र्यवीर सावरकर से लेकर अन्य देशभक्तों पर हिन्दू अतिवादी होने का आरोप लगता रहा है, धर्म के आधार पर भारत के टुकड़े हो, यह तो उन्होंने भी कभी नहीं चाहा था। फिर जब टुकड़े हो ही गए तो मुसलमानों को जिन्हें भारत से प्यार था और जो शेष हिन्दुस्थान में बहुसंख्यक समाज के साथ ही रहना चाहते थे, उन्हें देश में रहने देने से लेकर, उन्हें अल्पसंख्यक मानकर विशेष रियायतें देने तक और उसके बाद भी भारत को पंथ निरपेक्ष गणराज्य घोषित करने तक यदि आप देखें तो कहीं से भी हिन्दूहित की बात करने वाले कटघरे में खड़े किए जाएं ऐसे नजर नहीं आते हैं, फिर उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही क्यों न हो ।

हर हमले से मजबूत होते हैं हम
जब पांच राज्यों के चुनाव परिणाम यह दर्शा रहे थे कि राजनीति में न हार अटल है और ना जीत, ठीक उसी वक्त बस्तर के सुकमा में आतंक के दहशतगर्द नक्सलियों ने आईईडी ब्लॉस्ट कर 12 जवानों को शहीद कर दिया और कुछ को घायल। नक्सलरोधी-नीति पर सवालिया निशान खड़े करती इस घटना के तत्काल बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जो तत्परता-सह्दयता-उदारता दिखाई, उसने शहीद परिवारों के जख्मों पर मलहम तो जरूर लगाया है लेकिन मुंहतोड़ जवाबी कार्रवाई की दरकार बनी हुई है।
लोकतंत्र के कायम हकों को छीनने की जो कोशिश दहशतगर्द नक्सली कर रहे हैं, वह कभी कामयाब नहीं होगी। आतंक के हब्शी लोग यदि यह सोच रहे हैं कि वे हमें डराने में कामयाब हो रहे हैं तो ऐसा हरगिज नहंी है। दस साल पहले 76 जवानों को इन्ही नक्सलियों ने आग में भून दिया था तो क्या हमारे निडर जवानों और सरकार ने घुटने टेक दिए? याद रखें कि ऐसे हर हमले से हम और ज्यादा मजबूत होकर उभरते हैं।
पहले एक आईना दिखाने वाली बात। भारतीय मीडिया का एक तबका चिल्लाता आया है कि बस्तर में मानवाधिकार का उल्लंघन हो रहा है। अब कहां दुबक गए ऐसे लोग? कल जब सारे भारत पर पांच राज्यों के चुनावी परिणाम की खुमारी चढ़ी हुई थी और टीआरपी का भूखा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, चौबीसों घण्टे उस पर चिल्ल-पौं कर रहा था तब किसी भी नेशनल चैनल ने इन जवानों की शहादत को गंभीरता और उदारता के साथ याद नहीं किया. बस रस्म के तौर पर एक लाइन की बे्रकिंग न्यूज दिखा दी गई।
जनाब, आपके लिए जवानों की शहादत का दु:ख किसी भी राजनीतिक फिलसफे से बढकऱ होना चाहिए। यहां तारीफ करना चाहूंगा हमारे सभी क्षेत्रीय न्यूज चैनलों की, जिज्होंने अपनी सुघड़ जिम्मेदारी निभाई और नक्सलियों के कायराना हमले की दिल खोलकर निंदा की। बयानबाजों के बेमतलब के सुर सप्तम यही दर्शा रहे हैं कि हर बार शांति वार्ता का आश्वासनरूपी झुनझुना थमा दिया जाता है। शख्सी फायदे या हौसले से इतर नुमांया तौर पर आम आदमी ने आतंकवादियों के हुकूमत की बजाय लोकतंत्र के रास्ते को अपने लिए अधिक भला माना है लेकिन यह मान लेना भूल होगी कि बस्तर के लोग अपने दम पर अकेले इस चक्रव्यूह से निकल आएंगे। इसके लिए सरकार की नेकनीयती और मजबूत इच्छाशति बेहद जरूरी है.
आज जब नक्सलवाद के अलाव की आंच उनके अपने ही दुष्कर्मों से धीमी पड़ रही है तब हमारे हुक्मरानों की एक भी गलती इस ठंडी पड़ती आग में घी का काम कर सकती है। राज्य के मुखिया, मुख्यमंत्री रमन सिंह ने ठीक ही दोहराया कि जवानों की शहादत व्यर्थ नहंी जाने दी जाएगी। डॉक्टर साहब ने बस्तर में जिस तरह पुलिस को बंधनमुक्त कर रखा है, उसी का परिणाम है कि पहले सरगुजा और अब बस्तर से माओवादियों के पैर उखडऩे लगे हैं। लेकिन सिर्फ इतना मान लेना आईने से मुंह मोडऩे जैसा होगा कि शांति-राग अलापने मात्र से नक्सली आत्मसमर्पण कर देंगे बल्कि उन्हें चौतरफा घेरने की जरूरत है।
पहला हथियार शांति-वार्ता का है लेकिन वे इसे मानने को तैयार नहीं है। याद कीजिए कि अभी नेपाल के प्रधानमंत्री और माओवादी नेता रह चुके प्रचंड ने कभी स्वीकारा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है इसलिए साफ है कि जनताणा सरकार का राज लाने को संकल्पित नक्सली, शांति-वार्ता की टेबल पर कभी नहीं आ सकते अन्यथा कलेक्टर मेनन अपहरण काण्ड के बाद तो उनके लिए अच्छा मौका था।
दूसरा पाथेय शांति और विकास का है जिसने नक्सलियों के संगठन की जड़ों में म_ा डालने का काम किया है। नक्सली-दलम अब अधेड़ों की शरणस्थली बने हुए हैं। उनका रास्ता हर रोज मुश्किल होता जा रहा है। उन्हें उन नौजवानों ने ठेंगा दिखाना शुरू कर दिया है जो अब इंजीनियर-डॉक्टर बनकर बेहतर सामाजिक और सम्मानभरा जीवन जीना चाहते हैं। पुलिस के आंकड़ें बताते हैं कि अब तक 400 से ज्यादा युवा नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है जबकि इसके मुकाबले नक्सली मात्र 10 प्रतिशत युवाओं को ही दलम में भर्ती कर पाते हैं।
तीसरा हथियार बस्तर में सेना बिठाने का है। मालूम नहीं कि तीन साल पहले सेना की तीन टुकडिय़ां जो बस्तर में बिठाई गई थीं, उनके कितने उत्साहजनक परिणाम मिले या वे फिलहाल बस्तर में हैं भी या नहीं लेकिन इतना डर तो नक्सलियों के मन में घर कर ही गया कि यदि गलती से भी उन्होंने हमला किया तो जवाबी कार्रवाई उनकी कब्र्रगाह साबित हो सकती थी। फतहयाबी के साथ सेना का डर नक्सलियों में बना रहे, इसके लिए उसकी प्रभावी मौजूदगी दर्ज होना चाहिए।
फिर भी लफजों की फेर-फार के बगैर यह कहना ठीक होगा कि नक्सलवाद के अलाव की आंच उनके अपने ही दुष्कर्मों से धीमी पड़ रही है तब हमारे हुक्मरानों की एक भी गलती इस ठंडी पड़ती आग में घी का काम कर सकती है। आइपीएस एसआरपी कल्लूरी साहब बस्तर आईजी के तौर पर नक्सलियों के लिए मेन्स किलर साबित हो रहे थे लेकिन कुछ समय के लिए विपक्ष ने घडिय़ाली आंसू और मानवाधिकार के ठेकेदारों ने मिमियाना क्या शुरू किया, नौवातानुकूलित चेम्बरों में बैठे लोगों ने तिकड़मबाजी कर कल्लूरी साहब की घर-वापसी करवा दी। अब ये मानव अधिकार के अलंबरदार कहां हैं?
कल्लूरी साहब की तरह ही बहादुर पुलिस अफसर अजीत ओगरे भी हैं। उनके पिता भी सेवानिवृत्त पुलिस अफसर रहे हैं। अजीत ने अब तक 72 से ज्यादा नक्सलियों के एनकाउंटर किए हैं जिसकी वजह से उसके सीने पर तीन राष्ट्रपति पदक लगे हुए हैं। लेकिन पुलिस विभाग में बैठे कुछ कायरों की जमात ने उसे भी प्रताडि़त कर किनारे लगा दिया। ताहम रूझां इस तरफ है कि कि आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में आतंक के सरगनाओं को खत्म करने में ऐसे ही जांबाजों का हाथ रहा है। यह भी याद रखें कि आतंक के सौदागरों से वर्दीपोश ही लड़ेंगे, ना कि सफेदपोश।
कुंवर जावेद का शेर सुन लीजिए :
दया के नाम नदी जब हिलोरें लेती हैं, तू उस नदी की रवानी उतार लेता है.
लहू को पानी की तरह से यूं बहाना तेरा, हमारे चेहरे का पानी उतार लेता है.
अनिल द्विवेदी
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

नदी संरक्षण से ही बचेगी संस्कृति
शिवराज सिंह चौहान
नर्मदा जयंती के अवसर पर सभी प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई. आज हनुवंतिया में माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना एवं आरती करने के बाद केबिनेट की बैठक में मध्यप्रदेश के विकास की योजनाओं के संबंध में निर्णय लेकर आध्यात्मिक शांति की अनुभूति हुई है.
विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताएँ नदियों के तट पर ही विकसित हुई हैं. नर्मदा घाटी भी इसका अपवाद नहीं है. नर्मदा घाटी का सांस्कृतिक इतिहास गौरवशाली रहा है. माँ नर्मदा का आसपास की धरती को समृद्ध बनाने में बहुत योगदान रहा है. नर्मदा नदी को मध्यप्रदेश की जीवन-रेखा कहा जाता है. माँ नर्मदा को भारतीय संस्कृति में मोक्षदायिनी, पाप मोचिनी, मुक्तिदात्री, पितृतारिणी और भक्तों की कामनाओं की पूर्ति करने वाले महातीर्थ का भी गौरव प्राप्त है.
नर्मदा नदी भारत की सात प्रमुख नदियों में से एक है. प्राचीन काल से ही नर्मदा की धारा में सामाजिक चेतना देखने को मिलती है. नर्मदांचल में अनेक पंथों के संतों का समय-समय पर आगमन हुआ. इनमें कबीर पंथ, सिख पंथ, तारण पंथ, राधावल्लभ पंथ और प्रणामी पंथ प्रमुख हैं. नर्मदा किनारे पर मैकल, व्यास, भृगु, अत्री और कपिल जैसे ऋषियों के तप करने का भी उल्लेख पुराणों में मिलता है. आदि शंकराचार्य ने भी इस भूमि पर तप किया. इन संतों ने अपनी वाणी और संदेश से नर्मदा क्षेत्र के धार्मिक वातावरण को उदार बनाया. इन्होंने इस क्षेत्र को धार्मिक विविधता प्रदान करते हुए यहाँ सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया, जो कि आज तक इस अंचल में विद्यमान है.
होशंगाबाद के सेठानी घाट का ऐतिहासिक महत्व है. ब्रह्म विद्या सोसायटी के संस्थापक हेनरी स्टल अलकाट ने यहाँ अपने अंतर्राष्ट्रीय सहयोगियों के साथ स्नान करके आध्यात्मिक आनंद प्राप्त किया था. इस घाट पर नर्मदा का जन्मोत्सव नर्मदा जयंती के रूप में वर्ष 1976 से मनाया जा रहा है. उस समय यह आयोजन नर्मदा में प्रदूषण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिये ही प्रारम्भ किया गया था, जो आगे चलकर सामूहिक पूजा में बदल गया.
नमामि देवि नर्मदे- नर्मदा सेवा यात्रा अभियान इतिहास की उसी परम्परा का पुनर्जीवन है, जो कि प्रदेश के नागरिकों को माँ नर्मदा के ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक पहलुओं से परिचित करायेगी. इस यात्रा का उद्देश्य नर्मदा और विश्व की सभी नदियों को प्रदूषण मुक्त रखने के संदेश और नर्मदा तपोभूमि के सामाजिक समरसता के विचार को पूरे प्रदेश, देश और समूची दुनिया में पहुँचाना है.
नर्मदा नदी के तट पर स्थित अमरकंटक, भेड़ाघाट, ओंकारेश्वर, महेश्वर और मंडलेश्वर जैसे धार्मिक पर्यटन स्थलों पर श्रद्धालुओं की गतिविधियों से भी लोगों को रोजग़ार मिलता है. नर्मदा नदी के किनारे होने वाले अनेक मेले और सांस्कृतिक आयोजन भी लाखों लोगों को रोजग़ार देते हैं. मैं तो कहता हूँ कि माँ नर्मदा अपने तट पर बसे प्रदेशवासियों को केवल रोजग़ार ही नहीं देती है, बल्कि जो भी उसकी वंदना करता है, उस पर मुक्त हस्त से कृपा बरसाती हैं. आज हनुवंतिया जैसा अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल भी यहाँ विकसित हो पाया है। यह भी प्रदेश को एक नई पहचान देगा. माँ नर्मदा की कृपा से ही प्रदेश विकास की ओर अग्रसर है. मैया की कृपा से ही सूखे कंठों और खेतों को पानी मिल रहा है. माँ नर्मदा 4 करोड़ से अधिक लोगों को पीने के लिये पानी और 17 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की व्यवस्था करती है. माँ की कृपा से ही हमारे अन्न के भण्डार भरे हैं और बिजली मिलने से घरों का अंधेरा दूर हुआ है. माँ नर्मदा की कृपा से 2400 मेगावाट बिजली उत्पन्न होती है. माँ की कृपा से ही प्रदेश को चार बार कृषि कर्मण अवार्ड प्राप्त हुआ है.
मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि आज नमामि देवि नर्मदे-नर्मदा सेवा यात्रा अभियान एक जन आंदोलन बन गया है. सभी लोग बड़े उत्साह और उमंग के साथ दुनिया के सबसे बड़े नदी संरक्षण अभियान में बढ़-चढक़र हिस्सा ले रहे हैं. आध्यात्मिक गुरु और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता दलाई लामा जी, हमारे देश के महान अभिनेता अमिताभ बच्चन जी, जिन्हें हम स्वर कोकिला के नाम से जानते है, ऐसी सुश्री लता मंगेशकर जी और नोबल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी जी के अलावा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ईस्ट तिमोर के नोबल शांति पुरस्कार विजेता जोस रामोस होर्ता और टयूनीथिया की नोबल शांति पुरस्कार विजेता श्रीमती बाहडेड बाउन्चेमोई जैसी हस्तियों का हमें समर्थन प्राप्त हुआ है. इससे हमारा मनोबल बढ़ा है.
माँ नर्मदा भविष्य में प्रदूषित न हों इसलिये हमने फैसला लिया है कि 15 शहरों के दूषित जल को नर्मदा में नहीं मिलने देंगे. इसके लिये हम 1500 करोड़ रुपये की राशि से सीवरेज ट्रीटमेंट प्लान्ट लगा रहे हैं. नर्मदा नदी के तट के सभी गाँवों और शहरों को खुले में शौच से मुक्त किया जायेगा. नर्मदा नदी के दोनों ओर बहने वाले 766 नालों के पानी को नर्मदा में जाने से रोकने के सुनियोजित प्रयास किये जायेंगे. नदी के दोनों ओर हम सघन व़क्षारोपण करेंगे ताकि नर्मदा में जल की मात्रा बढ़ सके. नर्मदा के तट पर स्थित गाँवों और शहरों में 5 कि.मी. की दूरी तक शराब की दुकानें नहीं होगी. सभी घाटों पर शवदाह गृह, स्नानागार और पूजा सामग्री विसर्जन कुण्ड बनाये जायेंगे ताकि माँ नर्मदा को पूर्णत: प्रदूषण रहित रखा जा सके.
मेरे विचार से हमें नदियों के महत्व को समझते हुए पूरी दुनिया में नदियों को बचाने के लिये लोगों को जागरूक करना चाहिये. जिन नदियों के किनारे हमारी प्राचीन सभ्यताएँ विकसित हुई हैं, यदि वह नदियॉ ही स्वच्छ नहीं रहेगी तो हमारी सभ्यता और संस्कृति के स्वस्थ रहने की कल्पना हम कैसे कर सकते हैं. लंदन की टेम्स नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिये वहाँ के नागरिक आगे आये, उन्होंने उसे दुनिया की सबसे स्वच्छ नदी बना दिया. नर्मदा नदी भारत देश की सबसे कम प्रदूषित नदी है, इसे हम अब और प्रदूषित नहीं होने देंगे. हम निर्मल बनाकर ही दम लेंगे. इसी तरह से पूरी दुनिया में सभी लोगों को नदियों को बचाने के लिये आगे आना चाहिये.
मैं संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस जी को पत्र लिखकर यह अनुरोध करूँगा कि वह पूरी दुनिया में संयुक्त राष्ट्र की अगुवाई में नदियों को संरक्षित और प्रदूषणमुक्त रखने के लिये लोगों को जागरूक करने अभियान चलायें, हम इसमें उनके साथ हैं.
आइये संकल्प लें कि हम पूरे विश्व में नदियों को स्वच्छ बनाने के लिये लोगों का आव्हान कर एक सुखी, समृद्ध और सुन्दर विश्व का निर्माण करेंगे.
( ब्लागर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं )

मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के जन्मदिवस पर विशेष

जुनूनी हैं मुख्यमंत्री चौहान

मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश में विकास की नई इबारत लिखी है। इस इबारत को लिखने के लिए उन्होंने किसी इबादत की तरह कार्य किया है। सीहोर जिले के एवं छोटे से गाँव की गलियों से निकलकर सार्वजनिक क्षेत्र में आने और फिर संगठन से लेकर सरकार के मुखिया की जिम्मेदारी निभाने में श्री चौहान की सक्रिय भूमिका सामने आई है। उन्होंने हर तबके के तरक्की के लिए कदम उठाये हैं। यही वजह है कि देश के मुख्यमंत्रियों में उनकी अलग पहचान भी बनी है। राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज जी ने दायित्व संभालने से लेकर अब तक निरंतर गतिशील रहकर जन-जन का कल्याण सुनिश्चित किया है। ऐसे अनेक अवसर आए जब प्रदेश के किसान अतिवर्षा, बाढ़,दुर्घटनाओं का अनायास शिकार हुए। प्रदेश के नागरिकों की सहायता के लिए जिस ततपरता से मुख्यमंत्री श्री चौहान आगे आते हैं, वो बेमिसाल है। बीते वर्ष सिंहस्थ के दौरान आंधी-तूफान आने पर उज्जैन में आश्रमों के क्षतिग्रस्त हो जाने और आम लोगों के रहवास के स्थानों के उखड़ जाने की वेदना शिवराज जी ने महसूस की। वे प्रदेश के दूसरे कोने में प्रवास पर रहने पर भी सडक़ मार्ग से पंद्रह-बीस घंटों की यात्रा कर उज्जैन पहुँच गए
थे। तुरंत ही सभी इंतजाम ठीक करवाए गए और लोगों को राहत मिली। मध्यप्रदेश के अनुसूचित जाति,जनजाति, पिछड़ा वर्ग और यहां तक कि सामान्य निर्धन वर्ग के विद्यार्थी भी छात्रवृत्ति और अन्य सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं।
अब तक मध्यप्रदेश को चार बार कृषि कर्मण अवार्ड मिला है। इसके पीछे एक खास वजह मध्यप्रदेश में विकसित सिंचाई सुविधाएं भी हैं। प्रदेश सरकार लगातार किसानों, गरीबों तथा समाज के हर वर्ग के चहुँमुखी विकास के लिये तेजी से कार्य कर रही है। जहाँ पहले प्रदेश में केवल साढ़े सात लाख हेक्टेयर में सिंचाई सुविधा थी, वहीं अब यह बढक़र सरकारी स्त्रोतों से लगभग चालीस लाख हेक्टेयर हो गयी है। मध्यप्रदेश में अगले कुछ वर्ष में यह क्षमता 60 लाख हेक्टेयर हो जाएगी। आने वाले तीन साल में सिंचाई परियोजनाओं में पच्चीस हजार करोड़ रुपये का निवेश करने की तैयारी है। मध्यप्रदेश के किसान सरकार को दुआ दे रहे हैं। इस साल उपलब्ध
करवाई गई सिंचाई सुविधा की बात करें तो रबी और खरीफ सीजन में लगभग तीस लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई करवाई गई। आंध्र प्रदेश के बाद मध्यप्रदेश देश का दूसरा प्रांत है, जहां सिंचाई प्रबंधन में किसानों की भागीदारी को कानूनीजामा पहनाया गया है। इस समय मध्यप्रदेश में जल संसाधन विभाग की छोटी बड़ी मिलाकर लगभग पांच हजार निर्मित सिंचाई योजनाएं हैं। मध्यप्रदेश किसानों को अतिवर्षा, ओलावृष्टि से हुई फसल क्षति पर राहत राशि और फसल बीमा योजना के अंतर्गत राशि दिलवाने वाला अग्रणी राज्य भी मध्यप्रदेश ही है। बीते चार वर्ष में प्रदेश की कृषि विकास दर 18 प्रतिशत प्रतिवर्ष हुई है। यह दर प्राप्त करने वाला मध्यप्रदेश देश का एकमात्र राज्य है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के आव्हान पर प्रारंभ स्वच्छ भारत अभियान का भी प्रदेश में अच्छा
क्रियान्वयन हुआ है। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) का उद्देश्य दिसंबर 2018 तक पूरे प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र को खुले में शौच की प्रथा से पूरी तरह मुक्त करवाना है। सार्वजनिक स्वच्छता से सार्वजनिक स्वास्थ्य भी सुनिश्चित होता है और बेहतर परिवेश से अच्छे मन से कार्य होते हैं। जहाँ तक लोगों की व्यक्तिगत सेहत की रक्षा और बड़ी बीमारियों से बचाने का सवाल है, मुख्यमंत्री श्री चौहान ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर दिखाया। राज्य बीमारी सहायता योजना के बजट में साल-दर- साल वृद्धि होती गई है। योजना का विकेन्द्रीकरण किया गया। अब जिला स्तर पर कलेक्टर विभिन्न रोगों के इलाज के लिए सहायता मंजूर करते हैं। जिलो में स्वास्थ्य शिविर लगाकर रोगों की पहचान और उनके इलाज का पुण्य कार्य भी किया गया है। छोटे नगरों में
बड़े चिकित्सा संस्थानों के विशेषज्ञ पहुँचकर सेवा कार्य करते हैं। उद्योगों निवेश बढ़ाना हो, शासकीय सेवकों को सातवां वेतनमान देने की बात हो अथवा स्वरोजगार के प्रयास बढ़ाना, शिवराज जी ने मनोयोग से यह कार्य करवाए हैं। मुख्यमंत्री के रूप में श्री चौहान ने अपनी सहज, सरल व्यक्ति की छवि को बनाए रखा है। उनका मानना है कि राज्य का हर नागरिक खुश हो, खुशहाल हो। उनका यह भी मानना है कि प्रसन्नता का संबंध पद या पैसे से नहीं होता। इसी अवधारणा के आधार पर नए आनंद विभाग के गठन का फैसला लिया गया। मध्यप्रदेश के पर्यटन को नया आयाम देने, सांस्कृतिक क्षेत्र में आंचलिक कलाकारों को प्रोत्साहन और नौजवानों
को रोजगार मुहैया करने के लिए हाल ही में रोजगार कार्यालयों को प्लेसमेंट सेन्टर के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया गया है। मध्यप्रदेश इस तरह का निर्णय लेने वाला देश का प्रथम राज्य है। कल्पना यह है कि वह युवक जिसे रोजगार दिया जाएगा, कम से कम दो लाख रुपये वार्षिक आमदनी प्राप्त करे। करीब एक लाख युवाओं को प्रतिवर्ष रोजगार मिलेगा। यह सरकार का जिम्मा होगा कि हर महीने समीक्षा करते हुए रोजी-रोटी उपलब्ध कराने की इस महत्वपूर्ण योजना का क्रियान्वयन स्तर बेहतर रखा जाए। मध्यप्रदेश में जनता को पर्यावरण संरक्षण से जोडऩे की दिशा में नर्मदा सेवा यात्रा प्रारंभ की गई है। यह एक अनूठी पहल है। इसी तरह पं. दीनदयाल उपाध्याय जी के जन्मशताब्दी वर्ष में गरीबों के लिए भोजन की सुविधा एक महत्वपूर्ण कदम है। शिवराज जी मानवीय दृष्टिकोण के लिए भी जाने जाते हैं। उदारण के लिए पिछले नवम्बर महीने में कानुपर के पास रेल दुर्घटना की बात जैसे ही श्री चौहान को ज्ञात हुई उन्होंने न सिर्फ
तत्काल वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक बुलाकर मध्यप्रदेश से राहत एवं बचाव कार्य प्रारंभ करने के निर्देश दिये, बल्कि स्वयं भी कानपुर पहुँचे। मैं अपने अनुभव से कह
डॉ. नरोत्तम मिश्र
मंत्री, जनसंपर्क, जल संसाधन और संसदीय कार्य
आर्थिक क्रांति की संवाहक – प्रदेश की जनता
शिवराज सिंह चौहान

पूरे देश में ८ नवम्‍बर, २०१६ को एक ऐतिहासिक फैसला हुआ। इस दिन ने सरकारों के कामकाज की शैली पर जन-मानस द्वारा जो प्रश्‍न उठाए जाते हैं उसे एक सार्थक उत्‍तर दिया है। अक्‍सर सरकारों पर ये आरोप लगते हैं कि वे कठोर निर्णय नहीं ले सकती और शक्तिशाली लोगों को नुकसान पहुँचाने वाले निर्णय लेने से डरती हैं। हमारे प्रधानमंत्री जी ने ८ दिसम्‍बर, २०१६ से ५०० और १००० रूपये के नोटों को बन्‍द करने के साहसिक निर्णय से इस मिथक को तोड़ा है कि सरकारें दबाव में आकर कठोर निर्णय नहीं लेती हैं।नोटबंदी का निर्णय इस मामले में ऐतिहासिक है कि इस निर्णय ने लगभग सभी को चौंकाया और यही इसकी खासियत है।

पिछले १०० साल के इतिहास में देश में दो बार पहले भी नोटबंदी के निर्णय लिए गए हैं परंतु इन निर्णयों ने लोगों को काफी समय दिया जिसके कारण जो कालाधन नोटों की शक्‍ल में रखने वाले लोग थे, उन्‍हें इसका पर्याप्‍त अवसर मिला कि वे इसे बदल पाएं और ऐसे निर्णयों के पीछे का एक मुख्‍य उद्देश्‍य कम सफल रहा। इस बार का निर्णय ऐसा था जिसने अधिकांश लोगों को ऐसी किसी प्‍लानिंग करने का मौका नहीं दिया। आलोचकों ने इस बात की आलोचना की है कि यह निर्णय बेहतर प्‍लानिंग के व्‍दारा किया जाना चाहिए था और लोगों को पर्याप्‍त अवसर दिया जाना चाहिए था। जब आलोचक यह कहते हैं कि लोगों को पर्याप्‍त अवसर दिया जाना चाहिए था तो वे किन लोगों की बात करते हैं, यह समझ से परे है। क्‍या वे गरीब जनता की बात करते हैं जिनकी मासिक आय पाँच या दस हजार रूपये है और जिनके पास एक समय में ५ या १० बड़े नोटों से अधिक नहीं होते? नि:संदेह वे ऐसे लोगों की बात नहीं करते, क्‍योंकि ऐसे गरीब लोग जिनके पास ५ या १० बड़े नोट थे वे तो एक बार में ही उसे बदलवाकर निश्चिंत हो गए। तो फिर ये कौन लोग हैं जिन्‍हें इसके लिए समय दिया जाना चाहिए था? स्‍वाभाविक है कि आलोचकों का एक वर्ग उन लोगों की हिमायत कर रहा है जिन्‍होंने कालाधन को नोटों के रूप में जमा कर रखा था। प्रधानमंत्रीजी का यह निर्णय कि कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा दिया जाये एक तरह से एक विकासशील देश को विकसित देश की तरफ बढ़ाने की दिशा में लिया गया निर्णय है।ऐसे निर्णय की आलोचना करने के पहले आलोचकों को उसके सभी पहलुओं को देखना चाहिए। हमारे कांग्रेस व अन्‍य राजनीतिक दलों के मित्र यह कहते हैं कि नोटबंदी के निर्णय से किसानों को नुकसान हुआ और वे समय पर बोनी भी नहीं कर सके। मध्‍यप्रदेश में स्थिति यह है कि गत वर्ष के कुल १०८ लाख हेक्‍टेयर में बोनी की तुलना में इस वर्ष अब तक १०५ लाख हेक्‍टेयर में बोनी हो चुकी है और कुल बोनी ११५ लाख हेक्‍टेयर तक होगी। स्‍पष्‍ट है कि नोटबंदी से बोनी बिलकुल प्रभावित नहीं हुई है।नोटबंदी के तथाकथित आलोचक यह कहते हैं कि हमारे देश में कैशलेस लेन-देन संभव नहीं है। मध्‍यप्रदेश की मण्डियों में जहाँ इन आलोचकों के ही मत में अनपढ़ और अज्ञान किसान अपनी उपज बेचते हैं, नोटबंदी के बाद से ९५ प्रतिशत लेन-देन कैशलेस हो रहा है। क्‍या यह सबों की आँख खोलने के लिए पर्याप्‍त नहीं है कि एक ऐसा वर्ग जिससे सबसे कम अपेक्षाएँ थी, वह ९५ प्रतिशत कैशलेस लेन-देन कर रहा है? कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देने का इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता है।यह सही है कि जो भी विकसित देश हैं सभी अधिक से अधिक कैशलेस लेन-देन की तरफ बढ़ रहे हैं। अर्थ-व्‍यवस्‍था को यदि पंख लगाने हैं तो हमें विकसित अर्थ- व्‍यवस्‍थाओं से ऐसी चीजें लेनी पड़ेगी जो उन्‍हें विकास के उस मुकाम तक पहुँचानें में सफल रहे हैं। यह सभी मानते हैं कि कैशलेस लेन-देन से अर्थ-व्‍यवस्‍था में व्‍यापक सुधार आता है। एक भी अर्थशास्‍त्री ने पिछले डेढ़ महिने में ऐसा तर्क नहीं दिया है कि कैशलेसलेन-देन अर्थ-व्‍यवस्‍था के लिए खराब है। यदि कोई चीज अच्‍छी है तो हमें प्रयास करना चाहिए कि आगे आकर उसे सफल बनायें और आलोचनाओं के द्वारा उसे विफल न करें। जो लोग यह कहते हैं कि कैशलेस लेन-देन की व्‍यवस्‍था इस देश में संभव नहीं वे इस देश के १२० करोड़ लोगों की क्षमताओं को बिना परखे चुनौती देते हैं, जो इस देश के जन-मानस के साथ अन्‍याय है। पिछले दो माह में मध्‍यप्रदेश में अकेले सेन्‍ट्रल बैंक ऑफ इंडिया में इंटरनेट बैंकिंग के जरिये होने वाले लेन-देन में ७७ प्रतिशत की वृद्धि हुई है, क्कह्रस् मशीनों के जरिये होने वाली बिक्री में ५४ प्रतिशत की वृद्धि हुई है। क्‍या यह परिणाम ये इशारा नहीं

करते हैं कि हमारे देश की जनता उससे ज्‍यादा जागरूक और सक्षम है जितना हमारे कतिपय आलोचक समझते हैं ?कैशलेस व्‍यवस्‍था का एक और लाभ स्‍पष्‍ट रूप से दिखाई दे रहा है। दिसम्‍बर माह में जहाँ राज्‍य के दूसरे करों में कमी दिखने को मिली है वहीं वैट में १४त्न की वृद्धि हुई है। इससे यह स्‍पष्‍ट होता है कि जो लेन-देन पहले नकद रूप में होता था और जिसमें टैक्‍स की चोरी होती थी वह कैशलेस होने से कम हो रही है। इससे कर संग्रहण में वृद्धि होगी जिससे कल्‍याणकारी योजनाओं पर राज्‍य सरकारें अधिक खर्च कर पाएंगी। अब समय की मांग यह है कि हम जनता को कैशलेस लेन-देन के तरीकों के बारे में प्रशिक्षित करें। मध्‍यप्रदेश में बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण की व्‍यवस्‍थाएँ की जा रहीं हैं।पंचायत स्‍तर तक प्रशिक्षण कार्यक्रम आने वाले दिनों में आयोजित किए जाएंगे, जहाँ जन-मानस को कैशलेस लेन-देन के विभिन्‍न तरीकों के बारे में विस्‍तृत जानकारी मिल जाएगी। हमारा यह भी प्रयास है कि प्रधानमंत्री जन-धन योजना के दायरे से जो गरीब परिवार छूट गए हैं उनके भी बैंक खाते खुलवाकर उनका वित्‍तीय समावेषण किया जाए। दस नवम्‍बर के बाद से लगभग सात लाख नवीन खाते बैंकों में खोले गए हैं और लगभग पाँच लाख नए रूपे कार्ड जारी किए गए हैं। मध्‍यप्रदेश सरकार ने पी.ओ.एस. मशीनों पर लगने वाले वैट टैक्‍स और बैंकों के साथ किए जाने वाले अनुबंध पर लगने वाले स्‍टाम्‍प शुल्‍क से छूट प्रदान की है। इससे छोटे एवं मध्‍यम व्‍यापारियों व्‍दारा पी.ओ.एस. मशीन लगाना आसान होगा। प्रदेश के समस्‍त शासकीय संव्‍यवहार कैशलेस करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। टैक्‍स शुल्‍क आदि जमा करने की ऑनलाईन व्‍यवस्‍था विभिन्‍न विभाग द्वारा विकसित की गई है। राज्‍य सरकार द्वारा नागरिकों को किए जाने वाले विभिन्‍न तरह के भुगतान ऑनलाईन किए जा रहे हैं। राज्‍य सरकार कैशलेस की अर्थ-व्‍यवस्‍था को प्रोत्‍साहित करने के लिए कृत-संकल्पित है।मेरा हमेशा यह विश्‍वास रहा है कि प्रदेश की जनता अपना हित बहुत अच्‍छे ढंग से समझती है और उन्‍हें पता है कि हमारे प्रधानमंत्री जी का नोटबंदी का कदम कालाधन जमा करने वाले, राष्‍ट्र विरोधी गतिविधियों में संलिप्‍त रहने वाले और जाली नोटों के रूप में देश की अर्थ-व्‍यवस्‍था को चोट पहुँचाने वाले पड़ोसी देश की आकांक्षाओं पर कुठाराघात है। हमारा जन-मानस ऐसे हर कदम को जो देश हित में उठाया गया है अच्‍छे से समझता है और इस कारण कैशलेस की अर्थ-व्‍यवस्‍था को आगे बढ़ाने में हमें जन-मानस से मदद मिल रही है। आने वाला समय विश्‍व में भारत का है और कैशलेस अर्थ-व्‍यवस्‍था हमें विकसित राष्‍ट्रों की श्रेणी में खड़ा करने में निश्चित रूप से मददगार होगी।

ब्लॉगर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री है
धर्मनिरपेक्ष देश में तस्लीमा प्रकरण

डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारत में जिस तरह से दिनोंदिन कट्टरपंथ बढ़ता जा रहा है और जिस कट्टरपंथ की आंधी के कारण कभी देश का विभाजन हुआ था, उससे सबक न लेते हुए यहां राजनीतिक पार्टियां खुद को ज्यादा धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए लगातार प्रतिस्पर्धा करती नजर आ रही हैं. यह देखकर मन में यह सवाल उठने लगा है कि क्या हम भविष्य में देश का और अधिक विभाजन देखना चाहते हैं ? यह प्रश्न आज इसलिए उठ खड़ा हुआ है, क्योंकि बांग्लादेशी मूल की लेखिका तस्लीमा नसरीन ने देश में यूनिफार्म सिविल कोड लागू करने की मांग क्या की, उनके विरोध में एक विशेष समुदाय के लोग सडक़ों पर उतर आए . बात यहां तक भी ठीक है कि लोकतंत्र में किसी मुद्दे पर सहमत हुआ जाए, यह जरूरी नहीं, किंतु जब इन लोगों के कारण आयोजकों को माफी मांगनी पड़े और कहना पड़े की भविष्य में वे कभी लेखिका तस्लीमा को अपने आयोजन में नहीं बुलाएंगे, तब जरूर यह पीड़ा होती है कि इस पूरे प्रकरण में सरकार मूकदर्शक क्यों बनी रही ? कहने को राष्ट्रवाद की संवाहिका राजनीतिक पार्टी की सरकार केंद्र और जहां यह प्रकरण हुआ, उस राजस्थान प्रदेश दोनों में ही मौजूद है.
तस्लीमा ने इसमें क्या गलत कहा था कि जब मैं हिन्दू, बौद्ध और ईसाई धर्म के खिलाफ लिखती व बोलती हूँ, तो मेरे खिलाफ कुछ नहीं होता, लेकिन जैसे ही मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ लिखती हूँ तो मेरे खिलाफ फतवा जारी होने के साथ ही जान को खतरा बन जाता है. उनके खिलाफ फतवे जारी करने वालों को तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों का संरक्षण रहा है. कोलकाता में सरेआम मेरे खिलाफ फतवा जारी करने वाले और मेरे सिर पर इनाम रखने वालों को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का संरक्षण है। ऐसे लोगों को प. बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का भी संरक्षण हासिल रहा है. फतवे जारी करने वालों को बढ़ावा देना क्या धर्म निरपेक्षता है.
तस्लीमा यहां यह कहना भी नहीं भूलती हैं कि हिन्दू समाज की महिलाओं के अधिकारों की बात करें, तो कोई विरोध में नहीं उतरता और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात करें तो जानलेवा हमला हो जाता है. इस्लाम में महिलाओं को अधिकार क्यों नहीं मिलते? उनके अधिकारों के लिए आवाज क्यों नहीं उठती ? ये सब नहीं है, तो कोई राष्ट्र खुद को धर्मनिरपेक्ष कैसे कह सकता है ? हिंदुस्तान में मुस्लिम महिलाओं को बराबर का हक नहीं दिया जा रहा, फिर लोकतंत्र की बातें क्यों होती हैं ? इस्लाम को मानने वाले जब तक खुद के लिए आलोचना नहीं सुनेंगे, तब तक वे धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकते.
वस्तुत: तस्लीमा जब ये सवाल उठाती हैं कि देश में आखिर किस तरह की धर्म निरपेक्षता है, तब इसमें उनका यह प्रश्न जरूर छिपा नजर आता है कि जहां ममता की सरकार, कांग्रेस की सरकार या साम्यवादियों की सरकारें होती हैं, वहां तो यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिमों के गलत होने पर भी उन्हें सार्वजनिक तौर पर गलत करार दें और उनकी गलतियों को स्वीकार करते हुए उन्हें दंडित करें . जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं, उनसे तो यह उम्मीद की ही जा सकती है कि राममंदिर और बहुसंख्यक हिन्दू समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले सत्ताधीश सत्य को सत्य और असत्य को असत्य कहने का साहस दिखाएंगे.
वस्तुत: जिन प्रमुख मुद्दों पर देशव्यापी वातावरण बनाने का कार्य भाजपा पिछले कई सालों से कर रही है, समान नागरिक संहिता उन्हीं मुद्दों में से ही एक है. आज देश की अधिकांश जनता यही चाहती है कि जब भारत में कानून सभी के लिए समान हैं, जब भारतीय संविधान इस बात की इजाजत किसी को नहीं देता कि राज्य अपने नागरिकों से किसी भी स्तर पर भेद रखें. सभी को समान नजर से देखने का निर्देश जब हमारा संविधान देता हो, वहां धर्मनिरपेक्ष होने के बाद भी यदि धर्म के आधार पर ही बंटवारा किया जाए, तो इसे कहां तक उचित माना जा सकता है ? सभी धर्मों की संस्कृति, परम्पराएं अलग हो सकती हैं लेकिन सभी का देश तो एक ही भारतवर्ष है. विविध पंथ, मत, दर्शन अपने भेद नहीं वैशिष्ट्य हमारा, यही तो भारत की मूल पहचान है. फिर क्यों भारत में समान नागरिक संहिता लागू करने का विरोध होना चाहिए ? किंतु उसी समान नागरिक संहिता की बात जब लेखिका तस्लीमा करती हैं तो वे इस्लामिक कट्टरपंथ के निशाने पर आ जाती हैं.
नर्मदा और सहायक नदियाँ प्रदेश में स्थाई परिवर्तन की संवाहक बनी
दुर्गेश रायकवार
नर्मदा और उसकी सहायक नदियों में उपलब्ध जल राशि का विकास में उपयोग करने के लिये
पिछले 11 वर्षों में जो योजनाबद्ध प्रयास हुए उनसे नर्मदा और उसकी सहायक नदियाँ मध्यप्रदेश के एक बडे भू-भाग में स्थाई परिवर्तन की संवाहक बनी है.उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश की जीवन-रेखा नर्मदा प्रदेश के अनुपपूर जिले में अमरकण्टक पर्वत माला से निकलकर मध्यप्रदेश की सीमा तक 1077 किलोमीटर प्रवाहित होती है.प्रदेश के 16 जिले इसके प्रवाह क्षेत्र में आते हैं.मध्यप्रदेश में अपनी यात्रा में 39 प्रमुख सहायक नदियाँ नर्मदा से मिलती हैं.अमरकण्टक से निकलने के बाद नर्मदा के मुख्य प्रवाह पर रानी अवंतीबाई सागर परियोजना बांध निर्मित है.बांध की बाँयी मुख्य नहर से जबलपुर तथा नरसिंहपुर जिले में 1 लाख 57 हजार हेक्टेयर रकबा सिंचित होगा। वर्तमान में 1 लाख 20 हजार हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित हो रहा है.बांध की दाँयी मुख्य नहर से जबलपुर, कटनी, रीवा और सतना जिलों में 2 लाख 45 हजार हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित होगा.सिंचाई का यह विस्तार इन जिलों में कृषि क्षेत्र में क्रकारी परिवर्तन लाने की ओर अग्रसर है.परियोजना जलाशय मछली उत्पादन के स्थाई लाभ के साथ ही 100 मेगावाट बिजली उत्पादन का लाभ भी दे रहा है.जलाशय से 175 मीट्रिक टन औसत मछली उत्पादन हो रहा है.
मुख्य नदी पर इसके आगे चिंकी सिंचाई योजना का निर्माण होगा.चिंकी उद्वहन प्रणाली रायसेन
और नरसिंहपुर जिलों में 1 लाख 4 हजार हेक्टेयर कृषि रकबा सिंचित करेगी. चिंकी उद्वहन प्रणाली के आगे नर्मदा का प्रमुख इंदिरा सागर बांध जलाशय निर्मित है.इस विशाल जलाशय की जलसंग्रह क्षमता 12.2 अरब घनमीटर है.इंदिरा सागर परियोजना से खरगोन, खण्डवा और बड़वानी जिलों का करीब सवा लाख हेक्टेयर रकबा सिंचित होगा. वर्तमान में मुख्य नहर से एक लाख हेक्टेयर से अधिक रकबा सिंचित हो रहा है.जलाशय से प्रति वर्ष औसतन 2 हजार 300 मीट्रिक टन मछली उत्पादन के साथ ही 1000 मेगावाट बिजली उत्पादन किया जा रहा है.
इंदिरा सागर जलाशय के बाद नर्मदा पर ओंकारेश्वर परियोजना बांध जलाशय निर्मित है.
परियोजना से 1 लाख 48 हजार हेक्टेयर सिंचाई क्षमता खरगोन, धार तथा खण्डवा जिलों में निर्मित
होगी. वर्तमान में एक लाख हेक्टेयर रकबा सिंचित हो रहा है. जलाशय से 520 मेगावाट बिजली उत्पादन के साथ ही प्रति वर्ष औसतन 12 मीट्रिक टन मछली उत्पादन हो रहा है। ओंकारेश्वर के बाद 400 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता की महेश्वर जल विद्युत उत्पादन योजना बनकर तैयार है।
12 सहायक नदियों पर भी योजनाएँ निर्माणाधीन
अमरकण्टक से उदगम के बाद नर्मदा से मिलने वाली मुख्य सहायक नदी हालोन पर मण्डला
जिले में हालोन सिंचाई बांध परियोजना निर्माणाधीन है. इससे मण्डला जिले में 13 हजार हेक्टेयर कृषि रकबा सिंचित होगा. इसके आगे मण्डला जिले में ही नर्मदा की सहायक मटियारी नदी पर मटियारी योजना 10 हजार 120 हेक्टेयर सिंचाई का लाभ दे रही है. इसके आगे नर्मदा की सहायक शक्कर नदी पर प्रस्तावित योजना नरसिंहपुर छिन्दवाड़ा जिलों को 64 हजार 700 हेक्टेयर सिंचाई का लाभ देगी. इसके आगे नर्मदा से मिलने वाली बारना नदी पर निर्मित बांध जलाशय रायसेन तथा सीहोर जिलों में 60 हजार हेक्टेयर रकबा सिंचित कर रहा है. अगले पड़ाव पर होशंगाबाद जिले में नर्मदा की सहायक दूधी नदी पर 50 हजार हेक्टेयर क्षमता की सिंचाई योजना प्रस्तावित है. इसके आगे सीहोर जिले में 33 हजार हेक्टेयर सिंचाई क्षमता की सहायक नदी कोलार पर होशंगाबाद, हरदा जिलों में 2 लाख 42 हजार हेक्टेयर सिंचाई क्षमता की तवा परियोजना लाभ दे रही है. होशंगाबाद जिले में ही नर्मदा की सहायक मोरण्ड और गंजाल नदियों पर 52 हजार हेक्टेयर कमाण्ड क्षेत्र निर्मित करने वाली सिंचाई योजनाओं का निर्माण होगा.
सहायक नदियों के जल उपयोग के क्रम में सुक्ता नदी पर निर्मित सिंचाई योजना खण्डवा जिले
में 16 हजार हेक्टेयर रकबा सिंचित कर रही है. वहीं खरगोन जिले में नर्मदा की सहायक बेदा नदी पर निर्मित परियोजना से 10 हजार हेक्टेयर सिंचाई का लाभ मिल रहा है. मध्यप्रदेश में नर्मदा प्रवाह के अंतिम भाग पर मिलने वाली सहायक नदी मान पर 15 हजार हेक्टेयर तथा जोबट पर 10 हजार हेक्टेयर क्षमता की योजनाएँ आदिवासी बहुल धार जिले को लाभ दे रही हैं. मध्यप्रदेश की सीमा के अंदर सहायक नदी गोई पर सिंचाई परियोजना पूर्णता की ओर है. इससे बड़वानी जिले में 13 हजार हेक्टेयर रकबा सिंचित होगा.
नर्मदा जल उपयोग के नवाचारी प्रयास
नर्मदा जल के उपयोग की नवाचारी प्रयासों के अंतर्गत ओंकारेश्वर जलाशय की नहर प्रणाली से
जल उद्वहन कर नर्मदा-क्षिप्रा-सिंहस्थ लिंक योजना पूर्ण करने के बाद इन्दौर और उज्जैन जिलों में 50 हजार हेक्टेयर सिंचाई क्षमता की नर्मदा-मालवा-गम्भीर लिंक योजना का कार्य जारी है.इसी क्रम में नर्मदा-कालीसिंध और नर्मदा-पार्वती लिंक योजनाएँ भी प्रस्तावित हैं. इंदिरासागर मुख्य नहर से जल उद्वहन कर 15 उद्वहन माईक्रो सिंचाई योजनाओं का क्रमबद्ध निर्माण आरम्भ किया गया है. इनसे आने वाले समय में खरगोन, खण्डवा, अलीराजपुर, नरसिंहपुर, रायसेन, सीहोर, देवास, इन्दौर और कटनी जिलों में 3 लाख 61 हजार सिंचाई क्षमता निर्मित होगी.

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