आलेख 7

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पाकिस्तान की महान बेटी असमा जहांगीर
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
असमा जहांगीर के आकस्मिक निधन की खबर सुनकर पाकिस्तान ही नहीं, सारे दक्षिण एशिया के देशों में समझदार लोगों को बहुत धक्का लगा है। असमाजी 66 साल की थीं और बहुत सक्रिय थीं। उनसे मेरी मुलाकात 1983 में (बुजुर्ग नेता) डाॅ. मुबशर हुसैन और प्रसिद्ध पत्रकार श्री आई.ए. रहमान ने करवाई थी। उसके बाद भारत और पाकिस्तान में हम दर्जनों बार मिलते रहे। वे भारत-पाक दोस्ती की अलमबरदार थीं। लेकिन उससे भी बड़ा इंसानियत का काम उन्होंने अपने हाथों में ले रखा था। चाहे पाकिस्तान हो या हिंदुस्तान या कोई अन्य पड़ौसी देश, यदि वहां किसी मनुष्य के अधिकारों का हनन हो रहा हो तो असमा जहांगीर शेरनी की तरह दहाड़ती थीं। वे गरीब से गरीब आदमी के लिए लड़ने को तैयार हो जाती थीं। उन्होंने पाकिस्तान के बलूचों, पख्तूनों, ईसाइयों और हिंदुओं के लिए अपनी अदालतों में कई तूफान उठा दिए थे। अकेली असमा बहन काफी थीं, जनरल जिया-उल-हक और जनरल मुशर्रफ का दम फुलाने के लिए। उन्होंने कानून की पढ़ाई की थी, झूठे मुकदमे लड़ने और पैसे कमाने के लिए नहीं, बल्कि सताए हुए बेजुबान दलितों, पीड़ितों, वंचितों को न्याय दिलाने के लिए ! उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और नजरबंद रहना पड़ा। वे अदम्य साहस की धनी थीं। मुशर्रफ के खिलाफ चले वकीलों के आंदोलन में उन्होंने जबर्दस्त भूमिका निभाई और मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी का खुला समर्थन किया लेकिन जब (मेरे मित्र) लाहौर के राज्यपाल सलमान तासीर की हत्या हुई और वकीलों ने उसकी तारीफ की तो असमाजी ने इन्हीं वकीलों के खिलाफ ईमान की तलवार खींच ली। उन्होंने फिर से मुख्य न्यायाधीश बने इफ्तिखार चौधरी के लोकतंत्र-विरोधी फैसलों की कटु आलोचना करने में भी संकोच नहीं किया। पाकिस्तान में फौज के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत बड़े-बड़े नेताओं में नहीं होती लेकिन असमा जहांगीर उसके धुर्रे उड़ाने में भी नहीं चूकती थीं। वे सच्ची सत्याग्रही थीं। वे देखने में सुंदर और शालीन थीं। लेकिन उनके हृदय में दुर्गा और भवानी बैठी थी। पाकिस्तान को अपनी इस महान बेटी पर गर्व होना चाहिए। असमा जहांगीर में इतना साहस था, जितना दर्जनों प्रधानमंत्रियों और सेनापतियों में मिलकर नहीं होता। वे पाकिस्तान के ताज में जड़े हुए चमकदार हीरे की तरह थीं। उन्हें मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि !

इस आतंकी हमले का अर्थ क्या है ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जम्मू के सुंजवां सैनिक अड्डे पर आतंकवादियों ने फिर हमला कर दिया। 5 भारतीय जवान शहीद हो गए और अन्य पांच-छह लोग घायल हो गए। यह हमला पाकिस्तान के आतंकवादियों ने ही किया है, ऐसा जम्मू-कश्मीर पुलिस के महानिदेशक का दावा है। यह हमला अफजल गुरु और मकबूल बट को हुई फांसी के दिन किया गया है। इसी अड्डे पर 2003 में भी हमला हो चुका है। तब 12 जवान मारे गए थे। इसी तरह के हमले पठानकोट, उड़ी और नगरोटा के सैनिक अड्डों पर 2016 में हुए थे। सुंजवां के हमले की आशंका हमारे गुप्तचर विभाग ने फौज को पहले से बता रखी थी और पश्चिमी कमांड के ले.ज. सुरेंद्र सिंह 8-9 फरवरी को इस इलाके का मुआइना करने भी गए थे। इस तरह के हमलों का बार-बार होना क्या इस बात का प्रमाण नहीं है कि हमारा बंदोबस्त बिल्कुल लचर-पचर है। हमलावरों ने सुंजवां में भी वही तौर-तरीके अपनाए, जो उन्होंने पिछले हमलों में अपनाए थे। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे लोग पिछली घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखते। इसके अलावा हमारी सरकार के मुंह पर ये हमले करारे तमाचे हैं। हमारे प्रधानमंत्री देश को यह कहकर भरमाते रहे कि हमने पाकिस्तान की सीमा में जाकर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की है लेकिन यदि वह की होती तो पिछले एक साल में क्या 406 बार हमारी सीमा का उल्लंघन होता ? वह सर्जिकल नहीं फर्जीकल स्ट्राइक थी, यह सिद्ध होता है, हमारे सैनिक अड्डों पर होनेवाले हमलों से ! सरकार का यह दावा भी हास्यास्पद सिद्ध हो रहा है कि आतंकवाद और बातचीत, साथ-साथ नहीं चल सकते। दोनों चल रहे हैं और आराम से चल रहे हैं। हमारे सैनिक अड्डों पर होनेवाले हमले कश्मीर में भारत-विरोधियों की हौसला-आफजाई करते हैं। वे विधानसभा में बैठकर भारत-विरोधी नारे लगाते हैं। हमारे सरकारी नेता सिर्फ बयानबाजी करके खुश हो लेते हैं।

मालदीव में यामीन पर सख्त कार्रवाई करे भारत
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन किसी की नहीं सुन रहे हैं। उनसे संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा और श्रीलंका ने अनुरोध किया है कि वे अपने संविधान और सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान करें। मालदीव के सबसे बड़े पड़ोसी और शुभेच्छु राष्ट्र भारत के अनुरोध को वे ठुकरा चुके हैं। मालदीव के सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वसम्मति से यह फैसला दिया था कि जिन 12 सांसदों को संसद से निकाल दिया गया था, उन्हें वापस लिया जाए और विरोधी दलों के नौ नेताओं को रिहा किया जाए। इनमें मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद और यामीन के अपने एक उपराष्ट्रपति भी हैं।
यह फैसला मानने की बजाय यामीन ने मालदीव में आपातकाल लगा दिया। अब उनका बर्ताव किसी निरंकुश तानाशाह जैसा हो गया है। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश अब्दुल्ला सईद और एक न्यायाधीश अली हमीद को गिरफ्तार कर लिया है। सईद के वकील ने आरोप लगाया है कि सईद से यह कहा गया है कि यदि वे फैसला वापस नहीं लेंगे तो उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएंगे। डर के मारे शेष तीन जजों ने वह फैसला रद्‌द कर दिया है। यदि सांसदों और नेताओं की वापसी हो जाती तो यामीन की गद्‌दी हिल जाती। चुनाव तो साल भर बाद है लेकिन, यामीन को अभी ही गद्‌दी छोड़नी पड़ती, क्योंकि 85 सदस्यीय संसद में इन 12 सांसदों के विरोध के कारण उनकी पार्टी अल्पमत में आ जाती और यदि उन पर महाभियोग चलता तो उनके हारने की नौबत आ जाती। पूर्व राष्ट्रपति नशीद को 2015 में 13 साल के लिए जेल में डाल दिया गया था। लेकिन, इलाज के बहाने नशीद लंदन चले गए और अब यामीन के खिलाफ जबर्दस्त अभियान छेड़े हुए हैं।
यदि नशीद और शेष आठ नेता मुक्त होकर आज मालदीव में राजनीति करें तो यामीन का जीना मुश्किल हो सकता है। नशीद ने यामीन-सरकार के भ्रष्टाचार के ऐसे आंकड़े पेश किए हैं, जिनका तथ्यपूर्ण खंडन अभी तक नहीं किया जा सका है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि नशीद का साथ दे रहे हैं 80 वर्षीय मौमून गय्यूम, जो कि यामीन के सौतेले भाई हैं और जिन्होंने 30 साल तक राष्ट्रपति के रुप में मालदीव पर राज किया है। पूर्व राष्ट्रपति नशीद और गय्यूम, दोनों के साथ दिल्ली में मेरी व्यक्तिगत भेंट और लंबी वार्ता हुई है। दोनों ही भारत के अभिन्न मित्र हैं। यामीन ने इतनी क्रूरता दिखाई है कि 80 वर्षीय गय्यूम को भी जेल में डाल दिया है।
मालदीव की संसद के अध्यक्ष और यामीन के एक मंत्री ने तंग आकर इस्तीफा दे दिया है। खुद यामीन इतने बौखलाए हुए हैं कि उन्होंने पहले दो दिन में अपने दो पुलिस मुखियाओं को बर्खास्त कर दिया। अब उन्होंने अपने तीन परम मित्र राष्ट्रों- चीन, पाकिस्तान और सऊदी अरब को अपने विशेष दूत भिजवाए हैं। भारत ने उनके विशेष दूत को दिल्ली आने की अनुमति नहीं दी है। इस समय चीन खुलकर यामीन का समर्थन कर रहा है। उसने घुमा-फिराकर भारत को धमकी भी दी है कि मालदीव में बाहरी हस्तक्षेप अनुचित होगा। मालदीव भारत का पड़ोसी है और दक्षेस का सदस्य है लेकिन, ऐसा लग रहा है कि वह चीन का प्रदेश-सा बनता जा रहा है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग तो 2014 में ही मालदीव जा चुके हैं। हमारे प्रधानमंत्री बाकी सारे पड़ोसी देशों में हो आए, पाकिस्तान भी, लेकिन अभी तक मालदीव नहीं जा सके।
मालदीव ने अभी-अभी चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौता कर लिया है। 777 पृष्ठ के इस समझौते को संसद ने सिर्फ 10 मिनिट में बिना बहस हरी झंडी दे दी। 85 सदस्यीय संसद में सिर्फ 30 वोटों से उसे पास कर दिया गया। बिल्कुल इसी तरह जुलाई 2015 में संसद ने एक ऐसा कानून आनन-फानन बना दिया, जिसके तहत कोई भी विदेशी सरकार या व्यक्ति मालदीव के द्वीपों को खरीद सकता था। ये दोनों सुविधाएं चीन के लिए की गई हैं ताकि वह वहां अपना सैनिक अड्‌डा बना सके। राष्ट्रपति शी की मालदीव-यात्रा के दौरान दोनों पक्षों ने 8 समझौते किए थे। सबसे बड़ा समझौता इब्राहिम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्‌डा बनाने का था। इस हवाई अड्‌डे को पहले एक भारतीय कंपनी बना रही थी। उसे रद्‌द करके यह चीन को दे दिया गया। माले और उससे 10 किमी दूर समुद्र में स्थित द्वीप हुलहुले के बीच चीन अब एक पुल बनाएगा। मालदीव चीन के रेशम महापथ की योजना में सक्रिय हिस्सा लेगा। इसके अलावा चीन ने वहां सड़कें और मकान बनाने की योजनाएं भी शुरू कर दी हैं। गत वर्ष मालदीव पहुंचने वाले पर्यटकों में 90 प्रतिशत चीनी थे। मालदीव आजकल इस्लामी कट्‌टरवाद का अड्‌डा भी बनता जा रहा है। उसके सैकड़ों युवक आजकल सीरिया में छापामारी कर रहे हैं। पिछले तीन-चार महीनों में मैं कई बार लिख चुका हूं कि मालदीव में भारत-विरोधी लहर उठने वाली है। पिछले माह जब हमारे विदेश मंत्रालय की नींद खुली तो उसने मालदीव के विदेश मंत्री मोहम्मद असीम को भारत बुलवाया। उन्होंने सरकार परस्त एक मालदीवी अखबार के इस कथन का खंडन किया कि ‘मालदीव का सबसे बड़ा दुश्मन भारत है और सबसे बड़ा दोस्त चीन है।’ उसने भारत के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते की बात कही। मैंने लिखा था कि यह सिर्फ जबानी जमा-खर्च है।
अब भारत क्या करे? यदि अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण विरोधी नेताओं को यामीन रिहा कर दें, उनमें सर्वसम्मति करवाएं और चुनावों की घोषणा कर दें तो भारत को कुछ करने की जरूरत नहीं है लेकिन, यदि वे तानाशाही रवैया जारी रखेंगे तो मालदीव में अराजकता फैल सकती है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा। भारत ने यदि 1988 में सैन्य-हस्तक्षेप नहीं किया होता तो सिंगापुर और श्रीलंका से आए हुए हुड़दंगी मालदीव में राष्ट्रपति गय्यूम का तख्ता पलट देते। 1971 में श्रीलंका की प्रधानमंत्री सिरिमाओ भंडारनायक के अनुरोध पर भारत ने सेना भेजकर उन्हें बचाया था। नेपाल के राजा त्रिभुवन की भी 1950 में भारत ने रक्षा की थी। 1971 में शेख मुजीब के निमंत्रण पर भारत ने सेना भेजकर बांग्लादेश का निर्माण करवाया था। मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति नशीद तथा अन्य महत्वपूर्ण नेताओं ने इस संकट की घड़ी में भारत से मदद मांगी है। भारत को अपने लिए कुछ नहीं चाहिए लेकिन, इस चार लाख लोगों के देश में खून की नदियों को बहने से रोकना उसका कर्तव्य है।

दीनदयाल उपाध्याय होने का मतलब
संजय द्विवेदी
राजनीति में विचारों के लिए सिकुड़ती जगह के बीच पं. दीनदयाल उपाध्याय का नाम एक ज्योतिपुंज की तरह सामने आता है। अब जबकि उनकी विचारों की सरकार पूर्ण बहुमत से दिल्ली की सत्ता में स्थान पा चुकी है, तब यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर दीनदयाल उपाध्याय की विचारयात्रा में ऐसा क्या है जो उन्हें उनके विरोधियों के बीच भी आदर का पात्र बनाता है।
दीनदयाल जी सिर्फ एक राजनेता नहीं थे, वे एक पत्रकार, लेखक, संगठनकर्ता, वैचारिक चेतना से लैस एक सजग इतिहासकार, अर्थशास्त्री और भाषाविद् भी थे। उनके चिंतन, मनन और अनुशीलन ने देश को ‘एकात्म मानवदर्शन’ जैसा एक नवीन भारतीय विचार दिया। सही मायने में एकात्म मानवदर्शन का प्रतिपादन कर दीनदयाल जी ने भारत से भारत का परिचय कराने की कोशिश की। विदेशी विचारों से आक्रांत भारतीय राजनीति को उसकी माटी से महक से जुड़ा हुआ विचार देकर उन्होंने एक नया विमर्श खड़ा कर दिया। अपनी प्रखर बौद्धिक चेतना, समर्पण और स्वाध्याय से वे भारतीय जनसंघ को एक वैचारिक और नैतिक आधार देने में सफल रहे। सही मायने में वे गांधी और लोहिया के बाद एक ऐसे राजनीतिक विचारक हैं, जिन्होंने भारत को समझा और उसकी समस्याओं के हल तलाशने के लिए सचेतन प्रयास किए। वे अनन्य देशभक्त और भारतीय जनों को दुखों से मुक्त कराने की चेतना से लैस थे, इसीलिए वे कहते हैं-“प्रत्येक भारतवासी हमारे रक्त और मांस का हिस्सा है। हम तब तक चैन से नहीं बैठेंगें जब तक हम हर एक को यह आभास न करा दें कि वह भारत माता की संतान है। हम इस धरती मां को सुजला, सुफला, अर्थात फल-फूल, धन-धान्य से परिपूर्ण बनाकर ही रहेंगें।” उनका यह वाक्य बताता है कि वे किस तरह का राजनीतिक आदर्श देश के सामने रख रहे थे। उनकी चिंता के केंद्र में अंतिम व्यक्ति है, शायद इसीलिए वे अंत्योदय के विचार को कार्यरूप देने की चेष्ठा करते नजर आते हैं।
वे भारतीय समाज जीवन के सभी पक्षों का विचार करते हुए देश की कृषि और अर्थव्यवस्था पर सजग दृष्टि रखने वाले राजनेता की तरह सामने आते हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था पर उनकी बारीक नजर थी और वे स्वावलंबन के पक्ष में थे। राजनीतिक दलों के लिए दर्शन और वैचारिक प्रशिक्षण पर उनका जोर था। वे मानते थे कि राजनीतिक दल किसी कंपनी की तरह नहीं बल्कि एक वैचारिक प्रकल्प की तरह चलने चाहिए। उनकी पुस्तक ‘पोलिटिकल डायरी’में वे लिखते हैं-“ भिन्न-भिन् राजनीतिक पार्टियों के अपने लिए एक दर्शन (सिद्दांत या आदर्श) का क्रमिक विकास करने का प्रयत्न करना चाहिए। उन्हें कुछ स्वार्थों की पूर्ति के लिए एकत्र होने वाले लोगों का समुच्च मात्र नहीं बनना चाहिए। उनका रूप किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान या ज्वाइंट स्टाक कंपनी से अलग होना चाहिए। यह भी आवश्यक है कि पार्टी का दर्शन केवल पार्टी घोषणापत्र के पृष्ठों तक ही सीमित न रह जाए। सदस्यों को उन्हें समझना चाहिए और उन्हें कार्यरूप में परिणत करने के लिए निष्ठापूर्वक जुट जाना चाहिए।” उनका यह कथन बताता है कि वे राजनीति को विचारों के साथ जोड़ना चाहते थे। उनके प्रयासों का ही प्रतिफल है कि भारतीय जनसंघ (अब भाजपा) को उन्होंने वैचारिक प्रशिक्षणों से जोड़कर एक विशाल संगठन बना दिया। यह विचार यात्रा दरअसल दीनदयाल जी द्वारा प्रारंभ की गयी थी, जो आज वटवृक्ष के रूप में लहलहा रही है। अपने प्रबोधनों और संकल्पों से उन्होंने तमाम राजनीतिक कार्यकर्ताओं तथा जीवनदानी उत्साही नेताओं की एक बड़ी श्रृंखला पूरे देश में खड़ी की।
कार्यकर्ताओं और आम जन के वैचारिक प्रबोधन के लिए उन्होंने पांचजन्य, स्वदेश और राष्ट्रधर्म जैसे प्रकाशनों का प्रारंभ किया। भारतीय विचारों के आधार पर एक ऐसा दल खड़ा किया जो उनके सपनों में रंग भरने के लिए तेजी से आगे बढ़ा। वे अपने राजनीतिक विरोधियों के प्रति भी बहुत उदार थे। उनके लिए राष्ट्र प्रथम था। गैरकांग्रेस की अवधारणा को उन्होंने डा.राममनोहर लोहिया के साथ मिलकर साकार किया और देश में कई राज्यों में संविद सरकारें बनीं। भारत-पाक महासंघ बने इस अवधारणा को भी उन्होंने डा. लोहिया के साथ मिलकर एक नया आकाश दिया। विमर्श के लिए बिंदु छोड़े। यह राष्ट्र और समाज सबसे बड़ा है और कोई भी राजनीति इनके हितों से उपर नहीं है। दीनदयाल जी की यह ध्रुव मान्यता थी कि राजनीतिक पूर्वाग्रहों के चलते देश के हित नजरंदाज नहीं किए जा सकते। वे जनांदोलनों के पीछे दर्द को समझते थे और समस्याओं के समाधान के लिए सत्ता की संवेदनशीलता के पक्षधर थे। जनसंघ के प्रति कम्युनिस्टों का दुराग्रह बहुत उजागर रहा है। किंतु दीनदयाल जी कम्युनिस्टों के बारे में बहुत अलग राय रखते हैं। वे जनसंघ के कालीकट अधिवेशन में 28 दिसंबर,1967 को कहते हैं-“ हमें उन लोगों से भी सावधान रहना चाहिए जो प्रत्येक जनांदोलन के पीछे कम्युनिस्टों का हाथ देखते हैं और उसे दबाने की सलाह देते हैं। जनांदोलन एक बदलती हुयी व्यवस्था के युग में स्वाभाविक और आवश्यक है। वास्तव में वे समाज के जागृति के साधन और उसके द्योतक हैं। हां, यह आवश्यक है कि ये आंदोलन दुस्साहसपूर्ण और हिंसात्मक न हों। प्रत्युत वे हमारी कर्मचेतना को संगठित कर एक भावनात्मक क्रांति का माध्यम बनें। एतदर्थ हमें उनके साथ चलना होगा, उनका नेतृत्व करना होगा। जो राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं वे इस जागरण से घबराकर निराशा और आतंक का वातावरण बना रहे हैं। ”
इस प्रकार हम देखते हैं कि दीनदयाल जी का पूरा लेखन और जीवन एक राजनेता की बेहतर समझ, उसके भारत बोध को प्रकट करता है। वे सही मायने में एक राजनेता से ज्यादा संवेदनशील मनुष्य हैं। उनमें अपनी माटी और उसके लोगों के प्रति संवेदना कूट-कूट कर भरी हुयी है। ‘सादा जीवन और उच्च विचार’ का मंत्र उनके जीवन में साकार होता नजर आता है। वे अपनी उच्च बौद्धिक चेतना के नाते भारत के सामान्य जनों से लेकर बौद्धिक वर्गों में भी आदर से देखे जाते हैं। एक लेखक के नाते आप दीनदयाल जी को पढ़ें तो अपने विरोधियों के प्रति उनमें कटुता नहीं दिखती। उनकी आलोचना में भी एक संस्कार है, सुझाव है और देशहित का भाव प्रबल है। पुण्यतिथि पर उनके जैसे लोकनायक की याद सत्ता में बैठे लोग करेंगें, शेष समाज भी करेगा। उसके साथ ही यह भी जरूरी है कि उनके विचारों का अवगाहन किया जाए, उस पर मंथन किया जाए। वे कैसा भारत बनाना चाहते थे? वे किस तरह समाज को दुखों से मुक्त करना चाहते थे? वे कैसी अर्थनीति चाहते थे?
दीनदयाल जी को आयु बहुत कम मिली। जब वे देश के पटल पर अपने विचारों और कार्यों को लेकर सर्वश्रेष्ठ देने की ओर थे, तभी हुयी उनकी हत्या ने इस विचारयात्रा का प्रवाह रोक दिया। वे थोड़ा समय और पाते थे तो शायद एकात्म मानवदर्शन के प्रायोगिक संदर्भों की ओर बढ़ते। वे भारत को जानने वाले नायक थे, इसलिए शायद इस देश की समस्याओं का उसके देशी अंदाज में हल खोजते। आज वे नहीं हैं, किंतु उनके अनुयायी पूर्ण बहुमत से केंद्र की सत्ता में हैं। भाजपा और उसकी सरकार को चाहिए कि वह दीनदयाल जी के विचारों का एक बार फिर से पुर्नपाठ करे। उनकी युगानूकूल व्याख्या करे और अपने विशाल कार्यकर्ता आधार को उनके विचारों की मूलभावना से परिचित कराए। किसी भी राजनीतिक दल का सत्ता में आना बहुत महत्वपूर्ण होता है, किंतु उससे कठिन होता है अपने विचारों को अमल में लाना। भाजपा और उसकी सरकार को यह अवसर मिला है वह देश के भाग्य में कुछ सकारात्मक जोड़ सके। ऐसे में पं.दीनदयाल उपाध्याय के अनुयायियों की समझ भी कसौटी पर है। सवाल यह भी है कि क्या दीनदयाल उपाध्याय,कांग्रेस के महात्मा गांधी और समाजवादियों के डा. लोहिया तो नहीं बना दिए जाएंगें?उम्मीद की जानी चाहिए कि सत्ता के नए सवार दीनदयाल उपाध्याय को सही संदर्भ में समझकर आचरण करेंगें।

महिला अस्मिता: दर्पण झूठ न बोले
निर्मल रानी
अब तो हमारे ही देश के अनेक ईमानदार व स्पष्टवादी लेखकों, चिंतकों तथा बुद्धिजीवियों द्वारा स्वयं यह स्वीकार किया जाने लगा है कि हम भारतवासी दोहरे मापदंड अपनाते हैं तथा अपने जीवन में दोहरे चरित्र का आचरण करते हैं। भ्रष्टाचार में संलिप्त कोई भी दूसरे व्यक्ति को भ्रष्टाचार से दूर रहने का भाषण पिलाता है, दुष्कर्मी व दुराचारी स्वयंभू संत संसार को सद्चरित्रता का उपदेश देता है। रिश्वतखोर व्यक्ति दूसरों से ईमानदारी बरतने की उम्मीद रखता है। धन-संपत्ति का भूखा साधू दूसरों को माया मोह से विरक्त रहने की सीख देता है। महिलाओं का अपमान, ‎तिरस्कार व निरादर करने वाले लोग महिलाओं के मान-सम्मान की दुहाई देते हैं। दिन-रात अनैतिकता के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति नैतिकता का पाठ पढ़ाता है। इस प्रकार के सैकड़ों ऐसे उदाहरण हैं जो यह साबित करते हैं कि हमारा समाज किस प्रकार अपने जीवन में दोहरा आचरण अपनाता है। ऐसा ही एक सर्वप्रमुख विषय जिसपर हमारे देश में हमेशा चर्चा छिड़ी रहती है वह है स्त्री के मान-सम्मान, उसके आदर व अस्मिता का विषय। ज़ाहिर है इस विषय पर भी हमारे देश का पुरुष समाज वैसा ही या उससे भी बढ़कर दोहरा चरित्र रखता है जैसाकि दैनिक जीवन के अन्य विषयों में रखता आ रहा है।
हमारी प्राचीन संस्कृति तथा हमारे धर्म-शात्र महिलाओं के प्रति कैसा नज़रिया रखते थे यह बात भारतीय संस्कृति में खासतौर पर हिंदू धर्म में स्वीकार्य अनेक पूज्य देवियों से साफ पता चलती है। इन देवियों के अतिरिक्त धर्म व इतिहास से जुड़ी अनेक गाथाएं भी ऐसी हैं जो महिलाओं की अस्मिता, उनके शौर्य, साहस तथा उनके सद्चरित्र का बखान करते हैं। यहां तक कि दुर्गा पूजा के दिनों में होने वाले कन्या पूजन के दिन तो केवल कुंआरी बालिकाओं को ही पूजने की परंपरा हिंदू समाज में चली आ रही है। राजनैतिक स्तर पर भी यदि हम देखें तो प्राय: दोहरा चरित्र अपनाने वाले राजनीतिज्ञ भी दिखावे के लिए ही क्यों न सही परंतु कभी-कभी महिलाओं को ‘आधी आबादी’ कहकर संबोधित करते नज़र आते हैं तथा उन्हें समाज के प्रत्येक क्षेत्र में बराबर का आरक्षण दिए जाने की पैरवी भी करते रहते हैं। यह और बात है कि अभी हमारे देश में महिलाओं को 33 प्रतिशत वह आरक्षण भी पूरी तरह से नहीं दिया जा सका जिसके लिए न केवल महिलाएं बल्कि पुरुष भी काफी लंबे समय से संघर्षरत हैं। परंतु यदि हम विभिन्न पार्टियों में शीर्ष पदों पर या दूसरी पंक्ति में नज़र डाल कर देखें तो लगभग सभी दलों में ऐसी महिलाएं देखी जा सकती हैं जो हमें राजनैतिक रूप से शक्तिशाली दिखाई देती हैं। और उन्हें देखकर हमें यह तसल्ली भी हो सकती है कि महिलाएं भारतीय राजनीति में अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं। परंतु क्या महिलाओं को लेकर हमें जो कुछ दिखाई दे रहा है वास्तविकता भी ऐसी ही है? या फिर हमारे देश में महिलाओं की स्थिति शायद उतनी बद्तर है जितनी किसी दूसरे देश में नहीं?
महिला सम्मान के संदर्भ में राजस्थान की धरती का ही एक प्रसंग भी जान लीजिए। पिछले दिनों एक वीडियो वायरल हुआ जिसे देखकर किसी भी आम इंसान के रोंगटे खड़े हो जाएं और इस वीडियो को देखने के बाद निश्चित रूप से कोईभी मनुष्य यह सोचने के लिए मजबूर हो जाए कि आ‎खिर वह किस देश में और किस युग में और किस समाज में जी रहा है। वायरल वीडियो के अनुसार राजस्थान के एक सुनसान रेगिस्तानी क्षेत्र में एक गरीब परिवार की झोंपड़ी के पास एक मोटरसाईकल व एक ट्रैक्टर आकर रुकता है। उसके बाद दो पुरुष एक अधेड़ महिला को डंडों से पीटने राजस्थानी भाषा में बोलते हुए उसे गालियां देते हैं। दरअसल, यह युवक अधेड़ महिला के सामने से उसकी जवान बेटी को उठाकर ले जाना चाहते हैं जिसका उसकी मां और वहां खड़े उसी परिवार के एक-दो बच्चे भी रो-पीट कर, चीख-चिल्ला कर विरोध करते हैं। और आखिरकार वह दबंग गुंडे तड़पती, चीखती-चिल्लाती मां के सामने ही ट्रैक्टर पर बिठाकर उस जवान लड़की को लेकर चले जाते हैं। वीडियो के साथ कैप्शन लिखने वाले ने लिखा है कि राजस्थान के कई क्षेत्रों में इसी प्रकार से दबंग लोग गरीब घरों की युवतियों को उठा ले जाते हैं तथा उनके साथ बलात्कार करते हैं। यह भी लिखा गया है कि यह सब काम पुलिस प्रशासन की जानकारी में होता है तथा यह लोग इतने निडर हैं कि दिन के उजाले में ही यह सब काम करते हैं।
केवल राजस्थान ही नहीं बल्कि देश के अधिकांश भागों में महिलाओं की लगभग यही स्थिति है। बलात्कार करना, बलात्कार के बाद हत्या कर देना, सामूहिक बलात्कार, शारीरिक उत्पीड़न, महिला के शरीर के साथ हैवानियत की हदें पार कर जाना, किसी भी व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को गालियों के रूप में भी उसकी मां-बहन, बेटी को ‘याद’ करना, प्रत्येक महिला पर बुरी नज़र डालना, महिला को संभोग मात्र की वस्तु समझना यही सब हमारे देश में महिलाओं की वास्तविक स्थिति है। और हमारे देश के पुरुष प्रधान समाज की इसी सोच ने भारतवर्ष का नाम पूरी दुनिया में बदनाम भी कर दिया है। दुनिया के कई देश समय-समय पर अपने भारत भ्रमण करने वाले पर्यट्कों को इसी संदर्भ में दिशा निर्देश भी जारी करते रहते हैं तथा उन्हें चौकस व सचेत रहने की हिदायत देते हैं। हमारे देश में महिला की दुर्गति तो वास्तव में उसके जन्म के समय से ही शुरु हो जाती है। नारी अपमान की ज़िम्मेदारी से महिलाएं भी स्वयं को अलग नहीं रख सकतीं। क्योंकि एक महिला स्वयं महिला होने के बावजूद सर्वप्रथम पुत्र पैदा होने की मनोकामना करती है पुत्री की हरगिज़ नहीं। प्राय: ऐसी खबरें आती रहती हैं कि किसी महिला ने अपनी नवजात कन्या शिशु को इधर-उधर जाकर फेंक दिया। यह काम अकेला पुरुष कभी भी नहीं कर सकता। बिना महिला की सहमति के न तो कन्या भ्रूण हत्या हो सकती है न ही पैदा की हुई कन्या कूड़ेदान में या इधर-उधर फेंकी जा सकती है। ज़ाहिर है जब कन्या को जन्म देने वाली मां द्वारा प्रोत्साहन मिलता है तभी कोई पुरुष उस नवजात कन्या को कूड़े के ढेर के हवाले करके आता है। किसी पुरुष द्वारा कन्या के साथ मान-सम्मान जुड़े होने या उसके पालन-पोषण या विवाह पर आने वाले खर्च की बात सोचना तो बाद का विषय है।
लिहाज़ा हमारे देश में नारी अस्मिता की बातें करना भी हमारे समाज के लोगों द्वारा अपनाए जाने वाले दोहरे चरित्र व दोहरे मापदंड का ही सबसे मज़बूत उदाहरण है। हम लाख देवियों की पूजा कर लें, महिला मान-सम्मान के लिए भाषण देते फिरें, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान चलाकर लोक लुभावनी बातें करते फिरें परंतु हकीकत यही है कि भारतवर्ष में नारी की अस्मिता व सम्मान की जो वास्तविक स्थिति है वह दर्पण में साफ दिखाई दे रही है और ज़ाहिर है दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता।

चर्चाओं और अटकलों के बीच दिग्विजय की नर्मदा परिक्रमा
ज़हीर अंसारी
जटिलो मुण्डी लुञ्छितकेशः, काषायाम्बरबहुकृतवेषः।
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः,
उदरनिमित्तं बहुकृतवेषः ॥१४॥
बड़ी जटाएं, केश रहित सिर, बिखरे बाल , काषाय (भगवा) वस्त्र और भांति भांति के वेश ये सब अपना पेट भरने के लिए ही धारण किये जाते हैं, अरे मोहित मनुष्य तुम इसको देख कर भी क्यों नहीं देख पाते हो ॥१४॥
आदि शंकराचार्य रचित ‘भज गोविंदम’ का यह स्त्रोत भले ही सामान्य व्यक्ति की समझ में न आए पर विवेकशील व्यक्ति इसे आत्मसात कर लेता है। उदाहरण के तौर पर मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इसे अपने जीवन का आधार मार्ग बना लिया है। आडंबररहित हिंदुत्व के पैरोकार दिग्विजय सिंह कई बार यह वक्तव्य दे चुके हैं कि वे सच्चे सनातनी हैं, कट्टर नहीं। धर्म-अध्यात्म में पूर्ण विश्वास रखने वाले दिग्विजय सिंह सपत्निक इन दिनों नर्मदा परिक्रमा पर हैं।
राघोगढ रियासत के राजा दिग्विजय सिंह दस सालों तक मप्र के मुख्यमंत्री रहे। भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित नेताओं में श्री सिंह को शुमार किया जाता है। हर विषय और मुद्दे पर बेबाक़ राय देना और ट्वीट करना उनकी ख़ासियत है। इसके एवज़ में उन्हें बेशुमार आलोचनाएँ भी झेलनी पड़ी। पत्नी आशा रानी सिंह के निधन के बाद जब उन्होंने पत्रकार अमृता राय से विवाह किया तो भी उन पर ख़ूब छींटा-कशी की गई। विचलित होना शायद उनकी फ़ितरत नहीं है इसलिए आलोचनाओं और राजनीति की ऊँच-नीच दरकिनार रखते हुए माँ नर्मदा की शरण में आ गए। यूँ तो दिग्विजय सिंह शुद्ध आध्यात्मिक मानसिकता के व्यक्ति हैं और जगतगुरु द्विपीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज के विशेष कृपापात्र शिष्य हैं। सनातन धर्म में घोर आस्था के बावजूद सर्वधर्म समभाव में उनका विश्वास है।
दिग्विजय सिंह की सनातनी आस्था का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि 70 वर्ष की आयु में नर्मदा परिक्रमा का संकल्प किया और पत्नी सुश्री अमृता राय के साथ पैदल परिक्रमा पर निकल पड़े। 30 सितंबर से प्रारंभ उनकी परिक्रमा यात्रा क़रीब 24 सौ किलोमीटर की दूरी तय कर चुकी है। सिंह दम्पत्ति पूरी आस्था और हृदयी भाव से अपने संकल्प को पूरा करने की दिशा में अग्रसर हैं।
नर्मदा परिक्रमा करने वाले दिग्विजय दम्पत्ति कोई अनोखे नहीं हैं। हज़ारों-लाखों सालों से नर्मदा परिक्रमा का सिलसिला अनवरत चला आ रहा है। धर्म शास्त्र कहते हैं कि सर्वप्रथम भगवान श्रीराम ने त्रेता युग में नर्मदा की परिक्रमा की थी। वनवास के दौरान जब भगवान राम श्रीलंका जाते वक़्त नर्मदा तट पहुँचे तो उन्होंने नर्मदा नदी का लंघन करना अपनी मर्यादा के विपरीत समझा। चूँकि नर्मदा चिर कुँआरी और पतित पावनी थी, लिहाज़ा पर्याप्त सम्मान देते हुए उन्होंने लंघन करने की बजाय एक तट से दूसरे तट तक घूमकर पहुँचे। कहते हैं तभी से नर्मदा परिक्रमा का सिलसिला शुरू हुआ।
हर साल हज़ारों श्रद्धालु इस पवित्र नदी की परिक्रमा करते हैं। जिसमें हर उम्र के लोग शामिल होते हैं। धनवान-अधनवान सभी अपने-अपने भाव और संसाधन से परिक्रमा करते हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. अनिल माधव दवे ने हेलीकाप्टर से परिक्रमा की थी तो पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री एवं सांसद प्रह्लाद पटैल दो बार पैदल नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं। अब दिग्विजय सिंह कर रहे हैं तो इसमें कोई नयापन नहीं है, अधिकांश लोग यही सोच रहे हैं और कई लोग इस यात्रा को राजनीतिक नेत्र से देख रहे हैं। ख़ैर, सबका अपना व्यक्तिगत नज़रिया होता है, इस पर ज़्यादा चिंतन की आवश्यकता नहीं है।
चिंतन तो इस बात पर किया जाना चाहिए धन-दौलत, मान-प्रतिष्ठा और संसाधनों से युक्त कोई राजनेता जब परिक्रमा करे तो ज़रूर उसकी धार्मिक आस्था कितनी प्रगाढ़ होगी, इसका सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है। आश्चर्य इस बात पर भी किया जाना चाहिए कि दिल्ली की पाँच सितारा संस्कृति में रची-बसी उनकी पत्रकार पत्नी अमृता राय भी क़दम-क़दम से मिलकर साथ दे रही हैं। वे भी पूरी श्रद्धा और भारतीय संस्कारों को सहेजे परिक्रमा में लीन हैं। साथ-साथ नर्मदा नदी के सौंदर्य और ग्रामीण इलाक़ों का अध्ययन करती जा रही हैं।
दिग्विजय सिंह की परिक्रमा पर तरह-तरह के क़यास लगाए जा रहे हैं। वे किस संकल्प से यह परिक्रमा कर रहे हैं, यह तो वो ही जाने, पर नर्मदा जी को सिद्धीदात्री भी माना जाता है। बड़े-बड़े संत-महात्माओं ने यहाँ से ज्ञान और रिद्धियाँ-सिद्धियाँ प्राप्त की है। शायद राघोगढ रियासत के राजा दिग्विजय को भी कोई तत्वज्ञान की तलाश हों।
दिग्विजय दंपति को नर्मदा किनारे चलते-चलते साढ़े चार महीने हो गए। ऊँचे-नीचे पहाड़, छोटी-छोटी पगडंडियों और दुर्गम मार्गों से गुज़रते हुए भी दिग्विजय दंपति की आस्था डिगी नहीं बल्कि और मज़बूत होती चली गई। पैरों में छाले पड़े, दर्द-तकलीफ़ सही फिर भी नर्मदा मैया का आँचल थामे अनवरत चलते जा रहे हैं। उनके चेहरे की बेफ़िक़्र मुस्कान और सौम्यता बताती है कि वे अभी भी ऊर्जा से भरे हुए हैं।
चूँकि शुरुआत आदि शंकराचार्य के स्त्रोत से हुई थी तो अंत भी वैसा ही होना चाहिए। शायद राजा साहब की इस धर्म यात्रा का मक़सद तत्वज्ञान अथवा मोक्ष प्राप्ति के लिए भी हो सकता है।
सत्संगत्वे निस्संगत्वं,
निस्संगत्वे निर्मोहत्वं।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं
निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥९॥
सत्संग से वैराग्य, वैराग्य से विवेक, विवेक से स्थिर तत्त्वज्ञान और तत्त्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥९॥

डाॅक्टरेट का अपमान बंद करें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आज एक अंग्रेजी अखबार ने देश में चल रही पीएच.डी. (डाॅक्टरेट) की उपाधियों की हेरा-फेरी पर एक खोजपूर्ण खबर छापी है। देश के लगभग सभी विश्वविद्यालय ऐसे लोगों को भी मानद पीएच.डी. की डिग्री दे देते हैं, जिनके मैट्रिक पास होने का भी पता नहीं हैं। पिछले 20 साल में 160 विश्वविद्यालयों ने 2000 से ज्यादा लोगों को मानद डॉक्टरेट की उपाधियां बाटी हैं। ऐसी मानद डिग्री पानेवालों में देश के राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और कई मंत्री तो हैं ही, सरकारी अफसर, कई अनपढ़ पूंजीपति और कई तथाकथित समाजसेवी भी हैं। इस मामले में मेरा कहना यह है कि ये सब लोग किसी न किसी कारण सम्मान पाने के हकदार हो सकते हैं लेकिन इन्हें डाॅक्टरेट (पीएच.डी.) की डिग्री ही क्यों दी जाए
यह डाॅक्टरेट या डी लिट की डिग्री का दुरुपयोग है। उस डिग्री का अपमान है। किसी भी विषय में डाॅक्टरेट करने के लिए पांच-सात साल शोध करना पड़ता है। मैंने स्वयं जब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में डाॅक्टरेट की उपाधि के लिए शोध किया तो लगातार पांच साल सुबह 8 बजे से रात आठ बजे तक बैठकर पुस्तकालयों में काम किया। अंग्रेजी के अलावा तीन विदेशी भाषाएं सीखीं। सैकड़ों विदेशी नेताओं और विद्वानों से वार्तालाप किया। चार देशों में रहकर गहरा अनुसंधान किया। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विख्यात विशेषज्ञों ने उसे स्वीकार किया। तब जाकर (जेएनयू) ने मुझे डाॅक्टरेट की उपाधि दी। आप जिस विषय पर डाॅक्टरेट करते हैं, उस विषय के पंडित ही नहीं, महापंडित माने जाते हैं जबकि मानद डाॅक्टरेट पानेवाले कुछ लोग तो विद्वानों के बीच बैठने लायक भी नहीं होते। कुछ ऐसे भी लोगों को डाॅक्टरेट दे दी जाती है, जिनसे उन विश्वविद्यालयों को आर्थिक लाभ हुआ हो या होने की संभावना हो। उन पर हुई तरह-तरह की कृपाओं को लौटाने का यह प्रमुख साधन बन गया है। इसके पीछे वे विश्वविद्यालय अपनी कमियों, धांधलियों और भ्रष्टाचार पर पर्दा डाल देते हैं। कुछ लोग पैसे के जोर पर ये मानद उपाधियां या फर्जी डिग्रियां भी हथिया लेते हैं। वे अपने नाम के पहले ‘डाॅक्टर’ लगाना कभी नहीं भूलते। उनके सारे नौकर-चाकर उन्हें ‘डाॅक्टर साहब’ कहकर ही बुलाते हैं। मैं तो सर्वोच्च न्यायालय से कहता हूं कि ऐसी मानद और फर्जी उपाधियों पर वह कड़ा प्रतिबंध लगा दे ताकि हमारे विश्वविद्यालय बदनाम होने से बच सकें। इस तरह की उपाधियां और पद्मश्री और पद्मभूषण- जैसे सम्मान पानेवाले अपने निजी मित्रों को मैं प्रायः सहानुभूति का पत्र लिख देता हूं, क्योंकि इन कागजी उपाधियों के लिए उन्हें पता नहीं, किस-किस के आगे नाक रगड़नी पड़ती है।

हाँ…..मैं पकौड़ा हूँ, डोंट इन्सल्ट……
ज़हीर अंसारी
हाँ मैं पकौड़ा हूँ। मेरा जन्म यहीं हुआ है। यहीं लोगों का चहेता बना। हर आम और ख़ास मुझे पसंद करते हैं। गर्मागर्म अगर मैं किसी के सामने आ जाऊँ तो गप्प मुझे भीतर कर लिया जाता है। हर मौसम का मैं माक़ूल भोज्य हूँ। फ़ाईव स्टार से लेकर गली-कूचे तक मुझे तला और बेचा जाता है। बच्चा हो या बूढ़ा सब मुझे पसंद करते हैं। सेहत का ख़्याल रखने वाले मुझे उम्दा तेल में घर के साफ़-सुथरे किचिन में बनाते हैं और लापरवाह लोग कहीं भी मुझे ख़रीद कर खा लेते हैं। ग़रीब और शौक़ीन मेरे आशिक़ हैं। शौक़ीन रेस्टोरेंट में मुझे खाते हैं और ग़रीब सड़क पर। ग़रीब यह भी भूल जाता है कि मैं गर्द से लपटा हुआ हूँ। सड़क पर मैं सस्ते में बिकता हूँ। बेचारे मेहनतकश मुझसे ही अपने पेट की आग बुझा लेते हैं। अमीर मुझे शाही तरीक़े से पकाते हैं। सुबह-शाम तो मुझे हल्की भूख मिटाने या चेंज के लिया खाया जाता है। शौक़ और चटकारे से रात वाले खाते हैं। एक घूँट एक पकौड़ी का कोमबिनेशन स्वर्ग सा एहसास कराता है।
सुनों, मेरा नाम लेकर मज़ाक़ उड़ाने वाले मैं तुम सबसे बेहतर हूँ। राजनेताओं और बुद्धिजीवियों की तरह न मैं साम्प्रदायिक हूँ और न ही असहिष्णु। मेरा सेवन हर वर्ग, तबके और धर्म के लोग चाव से करते हैं। सब के पेट में ख़ुशी-ख़ुशी फुदकता हूँ। यह अलग बात है कि तीखी चटनी के साथ लेने पर कभी-कभी किसी को अलसेट भी दे देता हूँ।
हाँ तो बात पकौड़ा रोज़गार से शुरू हुई थी। मैं दशकों से लाखों को रोज़गार पर लगाए हुए हूँ। मेरे कई भाईबंद हैं। हम सबने मिलकर कईयों का परिवार पाल दिया, बिल्डिंग्स बनवा दी। बावजूद इसके मेरा नाम ले लेकर खिल्ली उड़ाई जा रही है। अबे खिल्ली उड़ाने वालों सही सलाह को मज़ाक़ मत बनाओ। मैं ही कम पूँजी का धंधा बचा हूँ। एक भट्टी, एक कढ़ाई, एक झारा, आधा किलो तेल, पाव भर बेसन, पाव भर प्याज़ और चुटकी भर नमक से कोई भी कहीं भी कारोबार शुरू कर सकता है। इस काम में डिग्री, लायसेंस, जगह की ज़रूरत नहीं पड़ती। बस शुरुआत में थोड़ी इज़्ज़त कम रहती है परंतु पकौड़े की क्वालिटी अच्छी बनाई तो इज़्ज़तदार लाईन लगाए खड़े रहेंगे। इज़्ज़त से नाम लेंगे और दाम भी देंगे। आजकल युवा नाइंटी प्लस मार्क्स लेकर बेरोज़गारी का रोना रो रहे हैं। पकौड़ी तलने से सस्ता और सुलभ कोई रोज़गार नहीं है। सारी सड़कें और गलियाँ इस व्यवसाय के लिए उपयुक्त स्थान होते हैं।
सुनों, पकौड़ी बिरादरी का मज़ाक़ उड़ाने वालों मेरी वजह से ही सेंसेक्स धड़ाम से नीचा गिरा। जानते हो क्यों ? पिज़्ज़ा-बर्गर खाने वालों को पकौड़ी से सरकार की मोहब्बत रास नहीं आई। विदेशियों ने शेयर बाज़ार में रुपया इसलिए लगाया था कि गली-गली फ़्रेंच फ़राइज तलेंगे और रुपया कमायेंगे। यहाँ तो उलटा हो रहा है। सरकार पकौड़ी तलवाने पर तुली है। लिहाज़ा विदेशियों ने शेयर मार्केट से धड़ाधड़ अपना पैसा निकाल लिया।
बस अब बहुत हो गया। पकौड़ी/पकौड़ा के नाम पर राजनीति बंद होनी चाहिए। मूल मुद्दे और समस्याओं पर जिरह होना चाहिए और इस पर सरकार और राजनेताओं से जवाब लेना चाहिए। मुख्य मुद्दों से भटके तो यूँ तले जाते रहोगे।

मोदी और राहुलः दोनों सही
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में कांग्रेस के जैसे धुर्रे बिखेरे, वैसे संसद के इतिहास में किसी भी गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री ने नहीं बिखेरे। उसका एक कारण तो यह भी था कि अटलजी के अलावा सभी पूर्व कांग्रेसी थे- मोरारजी, चरणसिंह, विश्वनाथप्रताप सिंह, चंद्रशेखर, देवेगौड़ा, गुजराल आदि और अटलजी गैर-कांग्रेसी होते हुए भी नेहरु और इंदिरा गांधी के प्रशंसक थे और फिर अटलजी पर कांग्रेसी उतने कटु हमले नहीं करते थे, जैसे कि आजकल वे मोदी पर कर रहे हैं। इसीलिए मोदी ने कांग्रेस को भारत-विभाजन, परिवारवाद, लोकतंत्र की हत्या, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, आर्थिक विषमता, कश्मीर समस्या, आपात्काल, सिखों की हत्या, सरदार पटेल की उपेक्षा आदि के लिए जिम्मेदार ठहराया और महात्मा गांधी का हवाला देते हुए कहा कि वे स्वयं कांग्रेस-मुक्त भारत चाहते थे। भारत में लोकतंत्र की स्थापना का श्रेय कांग्रेस को देने का विरोध करते हुए मोदी ने कहा कि आप भारत के लोकतंत्र की हजारों वर्ष पुरानी परंपरा पर पानी क्यों फेर रहे हैं ? भारत में लिच्छवी गणराज्य और बौद्ध संघों की परंपरा के बारे में कांग्रेसियों को कुछ ज्ञान है या नहीं ? नेहरु की जगह यदि सरदार पटेल प्रधानमंत्री बनते तो कश्मीर की समस्या पैदा होती क्या, मेादी ने पूछा ! मोदी को शायद पता न हो, तिब्बत के बारे में भी पटेल ने नेहरु को सचेत किया था। मोदी का भाषण, जिसने भी तैयार करवाया, उस टीम को मेरी हार्दिक बधाई लेकिन राहुल और अहमद पटेल ने भी सरकार के कान खींचने में कोई कमी नहीं रखी। मोदी ने गड़े मुर्दे उखाड़े तो राहुल ने सरकार के कपड़े फाड़े। उसने पूछा कि पुरानी घिसी-पिटी पुरानी बातें करने की बजाय मोदी यह बताएं कि कांग्रेस-राज में बैंकों का कर्ज 52 लाख करोड़ रु. था। अब वह सिर्फ तीन साल में 73 लाख करोड़ कैसे हो गया ? फ्रांस से जो राफेल विमान कांग्रेस सरकार 526 करोड़ रु. में खरीद रही थी, उनकी कीमत अब 1570 करोड़ रु. क्यों चुकाई जा रही है? इतनी बड़ी दलाली कौन डकार रहा है ? क्या यह सरकार कुछ चुनींदा पूंजीपतियों के इशारों पर नाच रही है ? वह राफेल सौदे के तथ्यों पर पर्दा क्यों डाले हुए है ? हर माह लगभग 10 लाख नौजवान बेरोजगार हो रहे हैं। नोटबंदी और जीएसटी को जिस भौंडे ढंग से लागू किया गया, उसने सैकड़ों लोगों की जान ले ली, काला धन पकड़ा नहीं गया और व्यापारी और उपभोक्ता परेशान हैं। पाकिस्तानी घुसपैठ जारी है और मोदी सर्जिकल स्ट्राइक की बांसुरी बजाए जा रहे हैं। उन्होंने कांग्रेस पर हमले को अपना धर्म बना लिया है और वे अपने राजधर्म की उपेक्षा कर रहे हैं। वे प्रधानमंत्री पद की मर्यादा का निर्वाह नहीं कर रहे हैं। वे रेडियो पर मन की बातें करते रहें लेकिन संसद में कुछ काम की बातें तो करें।

2018 : चुनावी वर्ष…….? क्या इसी साल ’एकसाथ‘ चुनाव हो पाएगें.?
ओमप्रकाश मेहता
बजट सत्र के शुभारंभ के अवसर पर महामहिम राष्ट्रपति जी से देश में सभी चुनाव एक साथ कराने की अपील करवाना, अपना अंतिम पूर्णकालिक बजट में चुनावी तड़का लगाना, देश में चुनावी माहौल का निर्माण करना क्या यह महसूस नहीं कराता कि मोदी जी की सरकार ने इसी वर्ष के अंत में आठ राज्यों की विधानसभाओं के साथ लोकसभा के भी चुनाव कराने का फैसला ले लिया है? यद्यपि राजस्थान उपचुनावों के परिणामों से मोदी सरकार व सत्तारूढ़ दल चौंक जरूर गए है, किंतु इसके बावजूद सरकार यह भरसक प्रयास कर रही है कि इसी साल के अंत तक लोकसभा के भी चुनाव निपट जाएं तथा अगले वर्ष के प्रारंभ से ही नई सरकार अपना काम शुरू कर दें।
यद्यपि सरकार के इस मंसूबे को पूरा करने के लिए काफी मशक्कत भी करनी पड़ेगी, जिसमें सभी राज्यों की सरकारों से सहमति प्राप्त करना और उसके बाद सभी दलों के सहयोग से आवश्यक संविधान संशोधन कराना शामिल है। यद्यपि कांग्रेस सहित सभी प्रतिपक्षी दल सरकार के इस विचार से सहमत नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जिद को ध्यान में रखकर कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों ने अंदरूनी रूप से राज्यों के साथ लोकसभा चुनावों की भी तैयारी अवश्य शुरू कर दी है।
यद्यपि एक साल चुनाव कराने की ’खिचड़ी‘ तो पिछले कई महीनों से ’पक‘ रही थी, प्रधानमंत्री जी इसका उल्लेख भी कई बार कर चुके, किंतु इस आकांक्षा की पूर्ति की शुरूआत के लिए प्रधानमंत्री ने महामहिम राष्ट्रपति जी के अभिभाषण को श्रेष्ठ माना और उनसे सभी दलों के लिए संयुक्त अपील जारी करवा दी, जिससे सरकार की महत्वाकांक्षा का आगाज़ भी हो गया और प्रतिपक्षी दल सचेत भी हो गए, फिलहाल यह कहना तो मुश्किल है कि सभी राज्यों की सरकारें केन्द्र के इस प्रस्ताव से सहमत होकर संसद के दोनों सदनों से तत्संबंधी संविधान संशोधन को मंजूरी मिल ही जाएगी? लेकिन यह सही है कि सरकार ने इस दिशा में गंभीर प्रयास अवश्य शुरू कर दिए है। साथ ही केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने भी अपने स्तर पर तैयारी शुरू कर दी है, क्योंकि इस वर्ष के अंत में जिन एक दर्जन राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव करवाए जाने है, या सदनों निर्धारित अवधि कम-ज्यादा कर चुनाव करवाए जाएगें, उनमें से आठ राज्यों में तो भाजपा की ही सरकारें है, कर्नाटक, जैसे दो-तीन राज्य है, जिनमें प्रतिपक्षी दलों की सरकारें है, इसलिए भाजपा यह उम्मीद कर रही है कि उसे सभी राज्य सरकारों से सहमति प्राप्त करने में कोई ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी, और जहां तक कांग्रेस व अन्य दलों का सवाल है, वे भी राजस्थान उपचुनाव परिणामों जैसे परिणामों की आशा में ’एक साथ‘ चुनाव कराने की जिद के सामने नतमस्तक हो सकते है, किंतु फिलहाल इस मसले पर सभी विपक्षी दल एकमत नहीं है, उल्टा इस विवाद का असर यह हो रहा है कि सभी विपक्षी दलों ने एकजूट होने की तैयारी शुरू कर दी है।
अब जहां तक मोदी की मंशा को पूरी करने का दायित्व सम्हालने वाले चुनाव आयोग का सवाल है, वह मोदी के इस प्रस्ताव के पक्ष में तो है, किंतु उसने भी इस दिशा में आत्मनिरूपण व आत्मचिंतन शुरू कर दिया है, तथा अपनी समस्याओं से भी सुझावात्मक रूप से सरकार को अवगत करा दिया है, चुनाव आयोग ने अपने सुझावों में कहा है कि इसके लिए सर्वप्रथम राजनीतिक दलों की सर्वसम्मति जरूरी है, दूसरे एक साथ चुनाव कराने के लिए करीब दो हजार करोड़ खर्च कर भारी मात्रा में इवीएम और वीवीपीटी मशीनें खरीदनी पड़ेगी, साथ ही यदि इन एक साथ चुनावों पूर्व विधानसभाऐं व लोकसभा भंग करनी पड़ी तो उसका विकल्प तैयार रखना होगा। सरकार ने चुनाव आयोग के इन सुझावों पर भी गंभीर चिंतन शुरू कर दिया है। सरकार चाहती है इस दिशा में इसी चालू बजट सत्र के दौरान अंतिम फैसला हो जाए, जिससे कि उस दिशा में व्यापक स्तर पर तैयारी शुरू कर दी जाए, इसलिए सरकार इन दिनों इस मुद्दें पर प्रतिपक्षी दलों को पटाने के प्रयास में जुटी है। यद्यपि जहां तक प्रतिपक्षी दलों का सवाल है, वे फिलहाल इस प्रस्ताव पर सहमत नहीं है, किंतु यदि मोदी सरकार येन-केन-प्रकारेण चुनाव एक साथ करवाना ही चाहती है, तो इस दिशा में उन्होंने तैयारी शुरू कर भी दी है और चुनाव वालें राज्यों की अपनी इकाईयों को सचेत भी कर दिया है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि देश की आजादी के बाद 1952 में हुए पहले आम चुनाव से लेकर 1967 तक पूरे देश के राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव एक साथ ही हुए है, किंतु 1967 के बाद से यह परम्परा खत्म हो गई और फिर प्रतिवर्ष किसी न किसी राज्य में चुनावों की परम्परा शुरू हो गई। जिस पर देश का काफी धन, समय व ऊर्जा नष्ट होती रही है, अब मोदी जी पुन: उसी परम्परा को पुर्नजीवित करना चाहते है और इसी दिशा में प्रयासरत् है।

वह करें तो ‘लीला’ हम करें तो ‘पाप’?
निर्मल रानी
देश के हिंदूवादी संगठनों द्वारा खासतौर पर वर्तमान सत्तारूढ़ भाजपा जनता पार्टी एवं उसके संरक्षकों द्वारा महात्मा गांधी से लेकर पूरी कांग्रेस पार्टी तथा नेहरू-गांधी परिवार पर निशाना साधने के लिए सबसे बड़ा आरोप यही लगाया जाता रहा है कि यह भारतवर्ष में मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाला वर्ग है। यही कहकर गत् 70 वर्षों में इन्होंने देश के बहुसंख्य हिंदू समाज को धर्म के आधार पर अपने पक्ष में लामबंद करने की कोशिश की है। इसमें इन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली है। परंतु सत्ता में आने के बाद मुस्लिम तुष्टिकरण का ढोल पीटने वाली यही भाजपा भले ही कांग्रेस पार्टी को मुस्लिम तुष्टिकरण का दोषी ठहराती रही हो परंतु लगता है कि अब इस तथाकथित हिंदुत्ववादी विचारधारा रखने वाले संगठन को भी हिंदू हितों की रक्षा करने के बजाए मुस्लिम हितों की कुछ ज़्यादा ही चिंता सताने लगी है। अगस्त 2015 में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने ‘सशक्तीकरण समागम’ के नाम से दिल्ली में बुलाए गए मुस्लिम समाज के एक सम्मेलन में यह घोषणा की थी कि आगामी 6 से 7 वर्षों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले देश के सभी मुस्लिम परिवारों को बीपीएल श्रेणी से ऊपर उठा दिया जाएगा। इस सम्मेलन में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी शिरकत की थी। भाजपा सरकार ने मुस्लिम समाज के लिए शिक्षण संस्थान खोलने तथा उनके आर्थिक, सामाजिक व शैक्षणिक विकास के लिए और भी कई योजनाएं शुरु करने की घोषणा की थी।
मुस्लिम समाज के प्रति हमदर्दी दिखाने का ही एक जीता-जागता उदाहरण पिछले दिनों संसद में उस समय देखने को मिला जब लोकसभा में तीन तलाक संबंधी विधेयक पारित कर दिया गया। नि:संदेह मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग में प्रचलित तीन बार तलाक बोलकर तलाक दे देने की यह प्रथा अत्यंत अमानवीय तथा भौंडी प्रथा है। हालांकि तलाक की इस प्रथा को दुनिया के अनेक मुस्लिम देशों में भी स्वीकार नहीं किया जाता। भारत में भी मुसलमानों का एक सीमित वर्ग ही इस व्यवस्था को मानता तो ज़रूर है परंतु तीन तलाक देने के उचित तरीकों पर अमल करने के बजाए इसका इस्तेमाल भौंडे, अनुचित तथा गलत तरीकों से करता है। जिससे तीन तलाक देने का यह तरीक़ा आलोचना का शिकार भी रहा है और हास्यास्पद भी बन चुका है। भारत में मुस्लिम समाज के विद्वानों और बुद्धिजीवियों में भी तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कहकर तलाक दिए जाने के मुस्लिम मर्दों के एकाधिकार को लेकर दशकों से चिंतन होता आ रहा है। अधिकांश मुस्लिम समाज के उलेमा व बुद्धिजीवी भी इस व्यवस्था को पसंद नहीं करते और वे भी समय-समय पर इस विषय पर चिंतन करते रहे हैं तथा मुस्लिम समाज के लोगों को इस प्रथा से दूर रहने की हिदायत देते रहे हैं। परंतु लगता है कि दूसरों पर मुस्लिम तुष्टिकरण का इल्ज़ाम लगाने वाली भारतीय जनता पार्टी को बहुसंख्य हिंदू समाज की महिलाओं की दुर्दशा से अधिक चिंता उन मुट्ठीभर मुस्लिम महिलाओं की हो गई जिन्हें मुसलमानों का एक वर्ग तलाक-तलाक-तलाक कहकर छोड़ दिया करता है।
इन दिनों लोकसभा से लेकर मीडिया तक तथा सार्वजनिक मंचों पर तीन तलाक से संबंधित चर्चा होती देखी जा रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इस समय देश का सबसे ज्वलंत मुद्दा केवल यही रह गया है। और मोदी सरकार के इन प्रयासों से ऐसा भी मालूम हो रहा है गोया भारतवर्ष में केवल तीन तलाक की शिकार तलाकशुदा महिलाएं ही सबसे अधिक ज़ुल्म, अत्याचार व बेबसी का शिकार हैं। शेष भारतीय समाज की महिलाएं पूरी तरह से प्रसन्नचित्त व सुखी हैं। हालांकि तीन तलाक विषय को लेकर कानून व शरिया संबंधी तरह-तरह की बातें की जा रही हैं। भाजपा समर्थक इस विषय को मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की जीत के रूप में प्रचारित कर रहे हैं तथा मोदी सरकार को ऐसी महिलाओं का हमदर्द बता रहे हैं तो दूसरी ओर इस व्यवस्था का विरोध करने वाले व लोकसभा में इस बिल से दूरी बनाकर रखने वाले इसे मुस्लिम शरीया कानून में भाजपा का अनुचित हस्तक्षेप बता रहे हैं। राज्यसभा में इस बिल का क्या हश्र होगा यह तो भविष्य में पता चलेगा परंतु लोकसभा में अपने बहुमत के आधार पर इस विधेयक को पारित कराकर मोदी सरकार ने यह संदेश तो दे ही दिया है कि उसे हिंदू तलाकशुदा, ‎विधवा, असहाय तथा अपने पतियों द्वारा अकारण छोड़ी गई महिलाओं से अधिक चिंता मुस्लिम महिलाओं की है। सवाल यह है कि क्या यह मुस्लिम महिलाओं का तुष्टिकरण नहीं है? तुष्टिकरण की वह परिभाषा जिसे भाजपा हमेशा कांग्रेस के लिए इस्तेमाल किया करती थी क्या भाजपा के लिए वह परिभाषा अब बदल चुकी है?
हैदराबाद के लोकसभा सदस्य असद्दुद्दीन ओवैसी ने संसद में इस विषय पर हो रही बहस के दौरान अपने भाषण में यह बताने की कोशिश की कि देश की कितनी हिंदू महिलाएं किन-किन दयनीय परिस्थितियों का सामना कर रही हैं। आज भारतवर्ष में सबसे अधिक विधवा, तलाकशुदा तथा अपने पतियों द्वारा बिना तलाक के छोड़ी गई महिलाएं हिंदू समाज से ही हैं। उन्होंने ‘गुजरात में मेरी भाभी’ कहकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की धर्मपत्नी की ओर भी इशारा करते हुए याद दिलाया कि ऐसी महिलाओं के अधिकारों की बात भी होनी चाहिए जिन्हें उनके पतियों ने बिना तलाक दिए त्याग दिया है। सोशल मीडिया पर तो लोग स्मृति ईरानी से भी सवाल कर रहे हैं कि उनके पति ज़ुबिन ईरानी की उस पहली पत्नी मोना ईरानी के अधिकारों के बारे में स्मृति ईरानी का क्या विचार है जोकि आजकल तीन तलाक व्यवस्था के विरुद्ध पीड़ित मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में भाषण देती फिर रही हैं। आज वृंदावन में जाकर देखिए तो ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान कृष्ण की यह पावन नगरी हिंदू विधवा, वृद्ध तथा त्यागी गई महिलाओं का ‘महाकुंभ’ बन चुका है। मथुरा की सांसद हेमा मालिनी भी वृंदावन में हिंदू वृद्ध महिलाओं के इस भारी जमघटे पर अपनी चिंता ज़ाहिर कर चुकी हैं। इसी प्रकार वृंदावन, हरिद्वार अथवा बनारस जैसे किसी भी तीर्थस्थल पर जाकर देखें तो वहां आपको बड़ी संख्सा में हिंदू महिलाएं अपने भाग्य पर रोती तथा शारीरिक, मानसिक व आर्थिक यातनाएं सहती हुई दिखाई दे जाएंगी।
यदि वास्तव में मोदी सरकार सबका साथ-सबका विकास की बात करती है और मुस्लिम तुष्टिकरण का विरोध करती है तो इन दोनों ही नज़रियों से तीन तलाक जैसे विषय को लोकसभा में लाना तथा इस व्यवस्था से प्रभावित मुस्लिम वर्ग की मुट्ठीभर महिलाओं के पक्ष में स्वयं को खड़े दिखाना पूरी तरह से गैर मुनासिब था। इससे पहले उन्हें या तो उस बहुसंख्य समाज की महिलाओं के हितों की िफक्र करनी चाहिए जिसकी वजह से उन्हें हिंदू हृदय सम्राट माना गया है। इसी प्रकार पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने सऊदी अरब सरकार द्वारा चार वर्ष पूर्व 45 वर्ष से ऊपर की महिलाओं को हज हेतु अकेले आ सकने की घोषणा का श्रेय लेने का प्रयास किया। दूसरी ओर इस विषय पर भी मुस्लिम विद्वानों के अनुसार किसी मेहरम पुरुष के साथ के बिना किसी महिला पर हज पर जाना जायज़ ही नहीं है। इन सब विवादित विषयों के उछालने से तो साफतौर पर यही प्रतीत होता है कि भाजपा सरकार का मकसद मुस्लिम समाज में स्वीकार्य संहिता अर्थात् शरिया में दखलअंदाज़ी करना तथा इससे छेड़छाड़ कर मुस्लिम समाज को उकसाना है। और यदि सरकार महिलाओं के प्रति वास्तव में हमदर्दी दिखा रही है तो उसे सभी महिलाओं को शिक्षित व सुरक्षित करने की चिंता करनी चाहिए। केवल मुस्लिम महिलाओं के लिए ‎फिक्रमंद होने का दिखावा करना और अपने विरोधियों पर मुस्लिम तुष्टिकरण का स्टिकर चिपकाने का तो यही अर्थ है कि -‘वह करें तो लीला हम करें तो पाप’?

भारत में बीते साल नौ पत्रकारों की हत्या
(अजित वर्मा)
भारत के समाचार पत्र जगत के लिए यह चिंता का विषय है कि बीते साल 2017 में मीडियाकर्मियों पर हमलों की विभिन्न घटनाओं में नौ पत्रकारों को अपनी जान गँवाना पड़ी। यों, केन्द्रीय गृहमंत्रालय ने सभी राज्यों को परामर्श जारी किया और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के निर्देश दिए हैं पर अभी यह देखा जाना शेष है कि राज्य सरकारें और स्वयं केन्द्र सरकार जोखिम भरे पेशे में जुटे पत्रकारों की रक्षा करने के लिए क्या करती है? इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (आईएफजे) ने भी भारत में पत्रकारों की हत्याओं पर चिंता जताई है और ऐसी घटनाओं की निंदा की है। लेकिन भारतीय समाज में बढ़ रही हिंसा के कारण पत्रकारों की सुरक्षा के लिए उपस्थित खतरों में कभी आने गुंजाइश कम ही है।
बीते बरस पत्रकार की हत्या की पहली घटना 15 मई को तब हुई जब इंदौर में इस साल 45 वर्षीय पत्रकार श्याम शर्मा की हत्या कर दी गई। मोटरसाईकिल सवार दो हमलावरों ने उनकी कार को रुकवाकर उनका गला रेत दिया। इसके 15 दिन बाद ही 31 मई को पत्रकार कमलेश जैन की मध्यप्रदेश के पिपलिया मंडी क्षेत्र में गोली मारकर हत्या कर दी गई। पांच सितम्बर को बंगलुरु में 55 वर्षीय पत्रकार गौरी लंकेश की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हमलावरों ने उनके घर के पास ही उन्हें कई गोलियां मार कर ढेर कर दिया। 15 दिन बाद ही एक और पत्रकार की हत्या हो गई 20 सितम्बर को त्रिपुरा में स्थानीय टेलीविजन पत्रकार शांतनु भौमिक की तब हत्या कर दी गई जब वह दो समूहों के बीच संघर्ष की कवरेज कर रहे थे।
महज तीन दिन बाद 23 सितम्बर को पंजाब के मोहाली में 64 वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार केजे सिंह और उनकी 94 वर्षीय माँ की हत्या कर दी गई। 21 अक्टूबर को उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले में पत्रकार राजेश मिश्र की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस हमले में उनके भाई बुरी तरह घायल हुए थे। हमलावरों ने उन पर कई गोलियां चलाईं थीं। 20 नवम्बर को एक बंगाली अखबार के पत्रकार सुदीप दत्ता भौमिक की अगरतला से 20 किलोमीटर दूर आरके नगर में 2 -त्रिपुरा राइफल्स के एक कांस्टेबल ने गोली मारकर हत्या कर दी। इसके 10 दिन बाद 30 नवम्बर को उत्तरप्रदेश में कानपुर के बिल्हौर क्षेत्र में पत्रकार नवीन गुप्ता की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हरियाणा में भी एक पत्रकार की हत्या का मामला सामने आया। जब पत्रकार राजेश शयोराण का क्षत-विक्षत शव 21 दिसम्बर की सुबह चरखी दादरी जिले में कलियाणा रोड के किनारे पड़ा मिला।
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में पत्रकारों की हत्या चिंता का विषय है। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए केन्द्र को अलग से पत्रकार सुरक्षा कानून बनाना चाहिए। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्य सरकारों को पत्रकारों की सुरक्षा के लिए परामर्श जारी किया था, लेकिन फिर भी ऐसी घटनाओं का न रुक पाना चिंताजनक है। हमारा मानना है कि सरकार को जर्नलिस्ट प्रोटेक्शन एक्ट जल्द से जल्द बनाकर लागू करना चाहिए।

राष्ट्रगानः डंडे से नहीं, प्रेम से
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
सिनेमा घरों में राष्ट्रगान के सवाल पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले को उलटकर साहस का काम किया है। अब भारत के सिनेमा घरों में फिल्म शुरु होने के पहले राष्ट्रगान जरुरी नहीं होगा। जब राष्ट्रगान ही अनिवार्य नहीं होगा तो सारी समस्या ही सुलझ जाएगी। लेकिन फिर भी यदि कोई सिनेमा मालिक राष्ट्रगान बजाए तो क्या होगा, यह एक सरकारी समिति तय करेगी। क्या अपंग, बीमार और अत्यंत वृद्ध व्यक्ति को भी अटेंशन की मुद्रा में खड़े होना होगा ? वैसे तो सिनेमा में राष्ट्रगान गाया जाए तो फिर खेल-कूद, विवाह संस्कारों और अंतिम संस्कारों के समय भी वह क्यों नहीं गाया जाए? जो टोपी सिर पर पहनते हैं, उसे पांव पर भी क्यों नहीं पहना जाए ? अदालत ने राष्ट्रगान को सिनेमाघरों में अनिवार्य करके अपना मजाक बना लिया था। ऐसा लग रहा था कि वह पोप से भी अधिक पवित्र बनने की कोशिश कर रही थी। वह राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रवाद का दिखावा करके हमारी सरकार से भी ज्यादा उस्ताद दिखाई पड़ना चाहती थी लेकिन उसके इस फैसले का मजाक उड़ने लगा तो सरकार ने भी सबक लिया। उसने इस तरह के सभी मामलों पर एक कमेटी बिठा दी। इसके पहले कि संसद, न्यायालय के फैसले को उलट देती, उसने इसे खुद उलट लिया। इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपने राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, राष्ट्रभाषा और राष्ट्रध्वज की उपेक्षा करें या उनका अपमान होने दें। उनके सम्मान और गरिमा की रक्षा नितांत आवश्यक है। राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत यदि पाठशालाओं में नित्य गवाए जाएं तो बच्चों पर अच्छे संस्कार पड़ेंगे लेकिन वहां भी वह अनिवार्य क्यों हो ? उसका न गाना दंडनीय क्यों हो ? माता-पिता और बुजुर्गों का चरण-स्पर्श भारतीय संस्कृति की अदभुत देन है लेकिन उसे न करना जुर्म कैसे करार दिया जा सकता है ? श्रेष्ठ संस्कारों का निर्माण जितना स्वेच्छा से हो, वह इतना ही प्रामाणिक और टिकाऊ होगा।

मैंने फिर रामलला को देखा
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
आज लगभग 40 साल बाद मैं फिर से अयोध्या की राम जन्मभूमि पर गया जहां रामलला विराजमान हैं, उस जगह तक पहुंचने में लगभग आधा घंटा पैदल चलना पड़ा। जब पहली बार यहां आया था तो शायद पांच मिनिट भी नहीं चलना पड़ा था। पैदल चलना मेरे लिए आनंद की बात है लेकिन रामलला तक पहुंचने पर जो दृश्य मैंने देखा, वह हृदय-विदारक था। लोहे के पाइपों से घिरा रास्ता ऐसा लग रहा था, जैसे हम हिटलर के किसी यातना-शिविर में से गुजर रहे हैं। ऐसे कई शिविर मैंने यूरोपीय देशों में देखे हैं लेकिन यह दृश्य तो उससे भी भयंकर था। सुरक्षाकर्मियों ने कलम, घड़ी, बटुआ वगैरह भी नाके पर रखवा लिया। ऐसी सुरक्षा तो मैंने कभी रुस के क्रेमलिन, अमेरिका के व्हाइट हाउस और भारत के राष्ट्रपति भवन में भी नहीं देखी। अनेक सम्राटों और बादशाहों से मिलते हुए भी मुझे अपनी घड़ी और पेन निकालकर जमा नहीं कराने पड़े। बड़ी बेइज्जती महसूस हो रही थी लेकिन क्या करते ? वैसे मैं मूर्तिपूजक भी नहीं हूं लेकिन मेरे साथ देश के जाने-माने 30 लोग थे, जिनमें नालंदा वि.वि. के कुलपति और विख्यात वैज्ञानिक डाॅ. विजय भाटकर, एमआईटी पुणे के डाॅ. वि.ना. कराड़, स्वनामधन्य पूर्व मंत्री आरिफ खान, डाॅ. शहाबुदीन पठान आदि भी थे। लोहे के पाइपों से घिरे इस रास्ते के चारों तरफ गंदगी फैली हुई थी और भूखे बंदर प्रसाद की बाट जोह रहे थे। उसके बाद हम लोग उस स्थाान पर गए जहां राम मंदिर के लिए शिलाएं तराशी जा रही थीं और राम मंदिर के लिए देश भर से ईंटे इकट्ठी की गई थी। बड़ी-बड़ी शिलाओं पर कारीगरी तो मनोहारी थी लेकिन लाल शिलाएं अजीब-सी लग रही थीं। उस मंदिर में तो दुनिया की सर्वश्रेष्ठ शिलाएं लगानी चाहिए। फिर हम सब गए सरयू के किनारे। बहती हुई मनोरम सरिता को देखकर याद आया कि राम ने यही प्राण त्यागे थे। यह यात्रा अविस्मरणीय रही, क्योंकि यहां की 70 एकड़ भूमि में हम विश्व-तीर्थ बना हुआ देखना चाहते हैं, चाहे राम जन्म-स्थल पर तो मंदिर ही बने लेकिन शेष 60-65 एकड़ में दुनिया के कम से कम दस मजहबों के पवित्र-स्थल बनें। अयोध्या विश्व की आध्यात्मिक राजधानी बन जाए। यहां करोड़ों लोग हर साल धार्मिक पर्यटन के लिए आएं। उसके साथ-साथ यहां एक ऐसा विश्वविद्यालय भी कायम हो, जिसकी पढ़ाई में अध्यात्म और विज्ञान का संगम हो। अयोध्या अपने नाम को सार्थक करे। युद्ध की वृत्ति का निषेध करे। सारा विवाद खत्म हो। मामला अदालत के बाहर सुलझे। जब जीतें, कोई न हारे।

बैंकों और उद्योगपतियों को आम नागरिकों को लूटने की छूट
-सनत जैन
केंद्र सरकार ने सरकारी बैंकों को दिवालिया होने से बचाने के लिए 2.1 लाख करोड़ रुपए की सहायता देने की योजना को स्वीकृति प्रदान की है केंद्र सरकार ने लोकसभा से 80 हजार करोड़ रुपए सरकारी बैंकों को देने के लिए खर्च की मंजूरी ले ली है। धन विधेयक के रूप में यह मांग लोकसभा में की गई थी। राज्यसभा में इस बिल पर स्वीकृति लेने की जरूरत नहीं रही। यह धन बिल के रूप में पेश किया गया था। सरकार के खजाने में यह धन नागरिकों से विभिन्न करों के रूप में जमा हुआ था इस धन का उपयोग विकास कार्यों और आम नागरिकों की सुख सुविधाओं पर खर्च किया जाना था किंतु अब यह पैसा सरकार बैंकों में निवेश करके बैंकों को दिवालिया होने से बचाने का काम सरकार करेगी। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ इंडिया यूनाइटेड बैंक यूको बैंक देना बैंक इत्यादि को इस केंद्रीय सहायता का लाभ मिलेगा। बैंकों का अरबों रुपया एनपीए के रूप में फंसा हुआ है जो बैंक वसूल नहीं कर पा रहे हैं।सरकारी सहायता से बैंक अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार करने की कोशिश करेंगे। 2008 की अमेरिका में आई मंदी के बाद सैकड़ों अमेरिका के बैंक रातों-रात दिवालिया हो गए थे।भारत के सरकारी बैंकों को दिवालिया होने से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने पहले से प्रस्ताव तैयार किया है। बैंकों को सरकार ने सहायता राशि देना शुरू भी कर दिया है।
वहीं स्टेट बैंक ने 1 अप्रैल से 30 नवंबर तक लाखों खातेदारों के खातों से न्यूनतम बेलेन्स के रूप में 1772 करोड़ रुपया वसूले हैं। जो बैंक की दूसरी तिमाही की सकल आय से ज्यादा है। भारत के सरकारी बैंकों का लगभग 12 लाख करोड़ रुपया एनपीए में फंसा हुआ है इसमें 65 फीसदी से ज्यादा राशि बड़ी-बड़ी कारपोरेट कंपनियों को, जो ऋण बैंको ने दिया था। उनके द्वारा ऋण नहीं चुकाया गया। बड़ी-बड़ी कारपोरेट कंपनियों द्वारा ऋण नहीं चुकाने के कारण बैंकों की स्थिति दिवालिया होने की हो गई है।बड़े-बड़े कारपोरेट, सरकार से आर्थिक स्थिति खराब हो जाने के बाद आर्थिक सहायता भी प्राप्त करते हैं। बैंकों का ऋण भी नहीं चुकाते हैं।जिसके कारण जनता से करों के रूप में वसूली गई राशि बैंक को और बड़े-बड़े कारपोरेट को देकर जनता के साथ यह एक धोखाधड़ी है।केंद्र सरकार और बैंक अरबों रुपए के डिफाल्टर करदाताओं के नाम भी सार्वजनिक नहीं करते। सुप्रीम कोर्ट ने भी कर्ज नहीं चुकाने वाली बड़ी कंपनियों के नाम सार्वजनिक करने के निर्देश बैंकों को दिए थे। इसके बाद भी बैंकों द्वारा उनके नाम उजागर नहीं किए। छोटे-छोटे व्यापारियों ,किसानों और आम नागरिकों के खाते एनपीए होने पर बैंक सरफेसी एक्ट में उनकी बंधक रखी संपत्ति को नीलाम करती है। अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित कराती हैं। वहीं अरबों रुपए के बड़े बड़े कर्जदारों के नाम घोषित करने से बचती है।जिसके कारण अब आम नागरिकों में यह धारणा बनने लगी है की सरकार अमीरों और समर्थ व्यक्तियों के लिए अलग नियम कानून बनाती हैं।गरीब-गुरबों और मध्यम वर्गीय लोगों के लिए इस देश के नियम कानून अलग होते हैं।इससे आम जनता में नाराजगी बढ़ रही है।
बैंकों को दिवालिया होने से बचाने के लिए नोटबंदी के तुरंत बाद सारा लेन-देन बैंकों के माध्यम से अनिवार्य किया गया है। प्रत्येक लेनदेन पर बैंक भारी भरकम शुल्क खातेदारों से वसूल कर रहे हैं। बचत बैंक, एवं करंट अकाउंट में मिनिमम बैलेंस के नाम पर प्रतिमाह करोड़ों रुपए बैंक खातेदारों से वसूल कर रहे हैं। बैंक बिना खातेदार को बताएं राशि निकालकर खुलेआम खातेदारों को लूट रहे है। इसके बाद भी बैंकों की आर्थिक स्थिति सुधरने की बजाए बिगड़ रही है,तो इसकी वजह को समझना होगा।
केंद्र सरकार बैंकों को दिवालिया होने से बचाने के लिए फाइनेंसियल रेजोल्यूशन एंड डिपाजिट इंश्योरेंस बिल लेकर आई है। इस बिल में जो प्रावधान किए गए हैं। उसके अनुसार सरकार एक बोर्ड बनाएगी। बैंक की आर्थिक स्थिति खराब होने पर वह बैंक बोर्ड के पास जाएंगे।बोर्ड बैंक की आर्थिक स्थिति को देखते हुए, जमाकर्ता को सीमित धनराशि का भुगतान करने,और शेष रकम के बांड जारी करने या कुछ समय के बाद समय-समय पर पैसे निकालने के आदेश कर सकती है। बोर्ड के आदेश को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दिए जाने का बिल में प्रावधान किया गया है।इस बिल का बड़े पैमाने पर सारे देश में विरोध हो रहा है।इस बिल के पास हो जाने से, नागरिकों की बैंक में जमा बचत उन्हें जरूरत के समय पर उपलब्ध नहीं होगी। जिस तरह नोटबंदी के दौरान लोग अपनी जमा राशि बैंकों से नहीं निकाल पाए। इस बिल के पास हो जाने के बाद, यह सीमा कई वर्षों तक की हो सकती है।जिसके कारण जमा रकम का उपयोग अब बचतकर्ता अपनी जरुरत के अनुसार नहीं कर पाएगा। सरकार आम जमाकर्ताओं के जमा धन से दिवालिया होने वाले बैंकों को बचाने का काम करेगी। सरकार इस बिल को नागरिकों की जमा राशि सुरक्षित रखने की बात कह रही है। लेकिन यह नहीं बता रही है,कि जमा राशि का भुगतान बैंक कितने समय के अंदर करेंगे।
केंद्र सरकार, बैंकों को प्रस्तावित बिल के माध्यम से दिवालिया होने से बचाने का सुरक्षा कवच देने की तैयारी कर रही है। इससे आम नागरिकों के मौलिक अधिकार खत्म होंगे। वहीं बैंकिंग व्यवस्था पर भी आम नागरिकों का विश्वास उठ जायगा। पिछले एक दशक में केंद्र, राज्य सरकारों, स्थानीय संस्थाओं ने आम जनता पर कई गुना टैक्स का बोझ लाद दिया है। स्थानीय संस्थाएं और राज्य सरकारों पर कर्ज का बोझ हर साल बढ़ता ही जा रहा है। हर सुविधा के लिए नागरिकों को अब शुल्क अदा करना पड़ रहा है। इस सब के बाद फायदा केवल कारपोरेट जगत को ही हो रहा है।आम नागरिक और मध्यम वर्गीय परिवार लगातार आर्थिक रूप से कमजोर हो रहा है।वहीं कारपोरेट दिन दूनी रात चौगुनी की गति से आर्थिक प्रगति कर रहे हैं। इस असमानता से आम नागरिकों का गुस्सा बैंकों और उद्योगपतियों पर बढ़ने लगा है।यह स्थिति कहीं से भी बेहतर नहीं कही जा सकती है। सरकार को मध्यम वर्ग एवं आम जनता के हितों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। ऐसा नहीं हुआ तो आगे चलकर देश मे अराजकता फैल सकती है।

मासूम बेटियाँ छोड़ गईं सिसकियों का सैलाब….
– जहीर अंसारी
इंदौर में कल जब चार मासूम बेटियों का अंतिम संस्कार हो रहा था तो पत्थर दिल भी पसीज गए थे। उफ़, ये क्या हुआ। जिसने भी इस दर्दनाक हादसे को सुना, टीस से भर गया। बच्चों की कोई धर्म-जाति नहीं होती है। होती है तो सिर्फ़ उनमें मासूमियत जो हर किसी को मोहित कर जाती है।
चार मासूम बच्चियों का सड़क हादसे में चला जाना, सिस्टम और शासन-प्रशासन के मुँह पर तमाचा है। काहे का शासन, काहे का प्रशासन, आख़िर इनकी आँखों में सड़कों पर लगातार मरने वालों का बहता गर्म ख़ून नज़र क्यों नहीं आता है। देश की छोड़े सिर्फ़ मध्यप्रदेश की बात करें तो आए दिन सड़कों पर ख़ून बह रहा है। धड़ाधड़ लोग मर रहे हैं, हज़ारों ज़ख़्मी हो रहे हैं। फिर भी शासन-प्रशासन के मुखमंडल पर शिकन का नामोनिशान नहीं दिखता। बड़े हादसे के बाद ज़रूर बड़े-बड़े वायदे और घोषणाएँ कर दी जाती हैं परंतु नतीजा वही ढाक के तीन पात।
पिछले कुछ सालों के हादसों पर दृष्टिपात करें तो पाएँगे प्रदेश का कोई ऐसा कोई कोना नहीं हैं जहाँ पर सड़क हादसों में मौतें न हुई हों। क्या आम, क्या ख़ास, क्या विधायक, क्या अफ़सर सब सड़क दुर्घटनाओं का शिकार बन रहे हैं।
किसी भी मौत पर शोक जताना चलन सा बन गया है। नेता तो नेता अफ़सरान भी एक-दो दिवसीय अभिनय करके अपने वास्तविक कर्तव्यों से इतिश्री कर लेते हैं। इस तरह की घटनाओं में कमी आए इसके लिए अब तक कोई ठोस प्लान नहीं बनाया गया। इतना ज़रूर होता है कि घटना के ज़िम्मेदार पर आनन-फ़ानन कार्रवाई कर मामले को शांत कर दिया जाता है। यही इंदौर घटना पर किया जा रहा है।
ईश्वर, अध्यात्म और मानवता के पैरोकर कब तक सड़कों पर होने वाली मौतें पर गाल बजाते रहेंगे। ज़िम्मेदार अमला कब तक मलाई की लालच में मौतों का गवाह बनेगा।
कोई उस दिल को फटता देखे जिसके अपने कालकलवित होते हैं। शासन-प्रशासन कभी भुक्तभोगियों की आँखों में आँखे डाल कर आँसुओं की धार का अंदाज़ा लगाए। हो सकता है इसके बाद संवेदनाओं के द्वार खुल जाएँ।
इंदौर की कृति, श्रुति, हरमीत और स्वस्तिक ऐसी मंज़िल को कूच कर गई जहाँ से अब तक कोई लौट न सका। चारों बेटियां अपने परिजनों के लिए सिसकियों का सैलाब छोड़ गईं। परमात्मा न करे अब के बाद किसी माँ पर ऐसा व्रजपात हो। वेंटिलेटर के सहारे ज़िंदगी से लड़ रही ख़ुशी, शिवांग, अरीवा सहित गंभीर बच्चे शीघ्र स्वस्थ्य हों, ऐसी प्रार्थना है।

केजरीवाल भूल सुधार करे
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
यह तो कोई मान ही नहीं सकता कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पैसे खाकर दो गुप्ताओं को राज्यसभा के टिकिट दे दिए होंगे लेकिन ये टिकिट उन्हें क्यों दिए गए, यह बताने में आम आदमी पार्टी असमर्थ है। उन दोनों में एक चार्टर्ड एकाउंटेट है और दूसरा शिक्षा और चिकित्सा के धंधे में है, जो आज देश में लूट-पाट के सबसे बड़े धंधे हैं। जो चार्टर्ड एकाउंटेंट है, वह अभी कुछ दिन पहले तक कांग्रेस में था और केजरीवाल का घनघोर विरोधी था। उसने ऐसा क्या चमत्कार कर दिया कि अरविंद ने सम्मोहित होकर उसे राज्यसभा में भेजने का निर्णय कर लिया ? इन दोनों के चयन ने केजरीवाल और ‘आप’ की छवि को चौपट कर दिया है। ऐसा नहीं है कि अयोग्य धनपशुओं को अन्य दलों ने पहले राज्यसभा में नहीं भेजा है लेकिन उन दलों और नेताओं की छवि क्या अरविंद केजरीवाल-जैसी थी ? भ्रष्टाचार-विरोध ही अरविंद और ‘आप’ की पहचान है और उसकी पहचान पर अब सवाल उठने लगे हैं। इस नामजदगी से ‘आप’ पार्टी में कितनी नाराजगी है, यह कार्यकर्ताओं ने बता दिया है। तीसरा उम्मीदवार संजय सिंह अपना पर्चा भरने शेर की तरह गया और दो गुप्ता- लोग बिल्कुल गुप्त- से ही हो गए। यदि ‘आप’ पार्टी तुरंत नहीं संभली तो दिल्ली में उसका लौटना भी मुश्किल हो सकता है। उसने इधर इतने अच्छे काम किए हैं कि 2019 में उसकी राष्ट्रीय भूमिका भी बन सकती है बशर्ते कि वह तुरंत भूल सुधार करे। कैसे करे ? इन दोनों गुप्ताओं को पहले जीतने दे और फिर दोनों ही इस्तीफा दे दें। उसके बाद ‘आप’ पार्टी में ही कई तेजस्वी और मुखर नेता हैं, उन्हें नामजद किया जाए और अपनी इज्जत बचाई जाए। राज्यसभा की नामजदगी में सभी दलों के नेता इतनी धांधली करते हैं कि मेरी राय में यह अधिकार नेताओं से छीनकर उनके संसदीय दलों या कार्यसमितियों को दे दिया जाना चाहिए। राष्ट्रपति द्वारा की जानेवाली 10 नामजदगियों का अधिकार भी राज्यसभा के सभी सदस्यों के पास चला जाना चाहिए ताकि राज्यसभा में सचमुच योग्य लोग जा सकें।

भोपाल की बेगमों ने किया यहाँ विकास और तहजीब…!
नईम कुरेशी
एक दौर में भोपाल नवाबशाही व बेगमों के शहर होने का फक्र हासिल था पर आज वो उससे भी आगे बढ़कर बगीचों और तालाबों का शहर के नाम पर उत्तर भारत में चर्चित है। भोपाल वो शहर है जहाँ से देश दुनिया में मशहूर हॉकी खेल का विकास हुआ। यह वही शहर है जहाँ की रानी कमला होती थीं और ये ताज-उल-मसाजिद का शहर भी माना जाता है। इसी शहर में जहाँ 100 साल पहले जनरल उबेदुल्लाह खॉन जैसे हॉकी प्रेमी थे वहीं आम लोगों के खास राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा भी हुए थे। यहीं अफसरशाहों के बादशाह एम.एन. बुच साहब, निर्मला बुच, अजयनाथ, सुधीरनाथ आदि भी भोपाल के ही रहे हैं।
भोपाल जहां आज म.प्र. की सियासत का केन्द्र व सूबाई राजधानी भी है। यहां मार्शल टीटो, जयप्रकाश नारायण, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू जैसे लोगों ने आकर यहां की मेहमान नवाजी का लुत्फ उठाया था। डॉ. सर मोहम्मद इकबाल और नवाब भोपाल की गहरी दोस्ती को भी यहां के साहित्यकारों व इतिहासकारों ने अपने अफसानों में दर्ज किया है। सर मोहम्मद इकबाल जहां शायरी और साहित्य के रत्न थे वहीं वो हिन्दू-मुस्लिम एकता के भी एक पैगम्बर समान थे। उनके पूर्वज हिन्दू ब्राम्हण थे। उन्होंने अपनी शायरी के चन्द बोलों में कहा- मैं असल का खास सोमनाती। आबा मेरे लातियों मनाती तू सैयद हाशमी की औलाद, मेरी कफे खाक बरहमनजाद। डॉ. सर मोहम्मद इकबाल इलाहाबाद हाईकोर्ट के मशहूर वकील सर तेजबहादुर सपरू के घराने से थे।
मार्शल टीटो भी आये
भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खॉन अपनी योग्यता की वजह से ही “चेम्बर ऑफ प्रिन्सेस” के चान्सलर रहे थे। हिन्दुस्तान के सभी राजा नवाबों में वो काफी लोकप्रिय रहे थे। साथ-साथ अंग्रेजी शासन के अफसरान भी उनके खास दोस्तों में रहे थे जिससे भोपाल में सबसे पहली रेल लाईनों को बिछा दिया था और नवाबों की तरफ से इसमें 35 लाख की भारी धनराशि खर्च की गई थी। चिकलोद भोपाल से 60 किलोमीटर की दूरी पर एक बड़ा घना जंगल था जहां शेर, तेंदुए, हिरण, चीतल आदि बड़ी तादातों में थे। यहां नवाबों ने बड़े-बड़े बगीचे लगा रखे थे। यहां शिकार के लिये तमाम बड़े लोग आते रहते थे, जिसमें मार्शल टीटो जो योगोस लाविया के पहले राष्ट्रपति थे व रोमन के थोलिक थे। वे कम्यूनिष्ट विचारों के भी थे। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव भी डाली थी। वो भी भोपाल आकर चिकलोद में नवाब भोपाल के मेहमान बनाये गये थे। इससे भोपाल शहर व यहां की भूमि का मान बढ़ा था। मिर्जा गालिब जैसे देश दुनिया के मशहूर शायर थे। मिर्जा गालिब का ग्वालियर के एक जमीरदार हज़रत जी से भी काफी दोस्ताना था और वो उन्हें काफी लम्बे-लम्बे खत भी लिखा करते थे। “बीते दिन भोपाल” किताब के लेखक खालिद मोहम्मद खॉन के अनुसार गालिब का भोपाल से भी गहरा संबंध रहा था। जब नवाब जीनत महल के बेटे मिर्जा जवाँबखत की शादी हुई तो मिर्जा गालिब ने उनकी शान में एक सैहरा लिखा गया था, जिसमें चन्द लाइनें ये थीं- खुश हो अम बख्त के है आज तेरे सर सैहरा। बांध शहजादे जवांबख़त के सर पर सैहरा क्या ही इस चांद से मुखड़े पे भला लगता है। है तेरे हुस्न दिल अफ़रोज का जेवर सैहरा।
डॉ. भोपाली आजादी के मतवाले
मिर्जा गालिब की भोपाल से नजदीकी के बारे में उर्दू अदब की काबिसतरीन सख्सियत अब्दुल कवी दसनवी साहब द्वारा उनकी किताब “भोपाल और गालिब” में विस्तार से लिखा है। भोपाल में देशभर में अदीबों, शायरों के आने का सिलसिला शुरू से ही बना रहा था। 17वीं सदी में ही जब देशभर के राजा नवाब अपनी दौलत खजाने में जमा करते थे तब भोपाल के नवाब और बेगम भोपाल में डाक तार मेहकमों व रेलों से यहां की आवाम को राहतें दे रही थीं। यहां का व्यापार बढ़ाया जा रहा था। अंग्रेजों के दौर में अलीगढ़ के “मरसान” कस्बे के राजा महेन्द्र प्रताप सिंह भी भोपाल रियासत के मेहमान रहे थे। उन्हें मुगल बादशाहों ने राजा की पदवी प्रदान की थी। राजा साहब ने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई थी जिससे उन्हें अपनी काफी जमीनों से हाथ धोना पड़ा था पर वो भोपाल के नवाबों के दोस्त रहे थे जिससे वो अक्सर भोपाल आते रहे थे और बरकत उल्ला भोपाली के साथ अंग्रेजी जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने लगे थे। डॉ. बरकत उल्ला भोपाली इंग्लैण्ड, बर्लिन, मास्को, टोकियो आदि में रहकर भारत की आजादी का बिगुल बजाते रहे थे।
आज भोपाल में लॉ इंस्टीट्यूट, आदिवासियों के नाम पर बड़ा म्यूजियम, पुलिस अमलों के लिये बड़े ऑफियों से लेकर ओपन विश्वविद्यालय, पत्रकारिता विश्वविद्यालय, एकांत जंगलों का बड़ा बाग, मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट, उर्दू अकादमी, हिन्दी भवन, रीजनल साइऔस भवन, श्याम हिल्स व चार ईमली पर बने भव्य बंगलों की लम्बी फेहरिश्तों से जंगलात मेहकमे के भी संस्थान भोपाल की शान बन चुके हैं। चार्ल्स कोरिया नामक विश्वप्रसिद्ध ऑर्किटेक्ट ने भी यहां भव्य विधानसभा भवन बनाकर यहां की शान बढ़ाई है।

जब उपराष्ट्रपति विज्ञापनों से हो गये भ्रमित तो आम इंसान की स्थिति क्या होगी
– डॉक्टर अरविन्द जैन
आज के समाचार पत्र में जब यह समाचार पढ़ने में आया की माननीय उपराष्ट्रपति महोदय भ्रामक विज्ञापन के कारण ठगें गए तक याद आया की लेखक द्वारा इस विषय पर अपने कार्यकाल में दस वर्ष पूर्व सैंकड़ों व्यापारियों और सबसे बड़े अखबार के साथ अन्यों को नोटिस दिया पर उनपर अधिकृत अधिकारीयों द्वारा कोई भी कार्यवाही नहीं की गई कारण यह विषय अधिकृत अधिकारीयों के लिए नीरस या समय की कमी या उनकी रूचि का न होना हैं, जिसके प्रमाण लेखक के पास हैं। चूँकि लेखक शासकीय अधिकारी होने के नाते अधिकार क्षेत्र में कार्य कर सकता था उसके बाद मध्य प्रदेश शासन के चिकित्सा शिक्षा विभाग मंत्रालय भोपाल के आदेश क्रमांक ऍफ़ १२/२/२००३ /२/५५ भोपाल दिनांक १४/५/२००५ द्वारा जिला कलेक्टर, डुप्टी कॉलेक्टर पुलिस अधीक्षक और उपाधीक्षक को मध्य शासन द्वारा कार्यवाही बाबत अधिकृत किया गया हैं और आज दिनांक तक सम्बंधित अधिकृत अधिकारीयों द्वारा कितनो पर कार्यवाही की गई से अनभिज्ञ हूँ ?शासन को इस विषय पर जानकारी प्राप्त करलेखक को भी अवगत कराना चाहिए।
आजकल चिकित्सा, खाने पीने आदि के भ्रामक प्रचार टी वी, समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में भरमार से प्रकाशित हो रहे हैं। इस विज्ञापनों के माध्यम से पढ़ी लिखी जनता क साथ निरीह जनता अनावश्यक रूप से चंगुल में फंसकर धोखाधड़ी की शिकार हो रही हैं, वही मानसिक संत्रास को भी भोग रही हैं। ये विज्ञापन ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट 1954 के अंतर्गत एक आपराधिक कृत्य हैं, उक्त एक्ट में 56 बिमारियों का विज्ञापन न प्रकाशित कर सकते हैं तथा उल्लंघन करने पर सजा और जुर्माने का प्रावधान हैं जिसके लिए मध्य प्रदेश शासन ने कलेक्टर, उप कलेक्टर अधीक्षक और उप अधीक्षक को कार्यवाही करने अधिकृत किया गया हैं जो मुख्य न्यायाधीश प्रथम श्रेणी के समक्ष कार्यवाही हेतु सक्षम हैं। परन्तु कार्याधिकता, रूचि का अभाव और नीरस विषय होने से कोई कार्यवही नहीं की गयी विगत दस वर्षों में। इस हेतु शासन को जानकारी लेना चाहिए
इसी प्रकार कोई भी चिकित्सक अपने नाम से शर्तिया इलाज़ से ठीक करने का विज्ञापन प्रकाशित नहीं कर सकता। यह भारतीय चिकित्सा व्यवसायी (वृतिक आचरण और शिष्टाचार सार और आचार संहिता) विनियम १९८२ के अंतर्गत धारा 24 का खुला उल्लंघन हैं। इस सम्बन्ध में माननीय उच्च न्यायालय मध्य प्रदेश ग्वालियर बेंच ने भी आदेश पारित किया हैं। परन्तु इस सम्बन्ध में सक्षम अधिकारीयों द्वारा समुचित कार्यवाही न किये जाने से जनता गुमराह होकर इन चिकित्सकों द्वारा लूटी जा रही हैं। जहाँ एक ओर धोखाधड़ी हो रही हैं वहीँ नियमों का उल्लंघन कर आपराधिक कृत्य कर रहे हैं।
आज महंगाई इतनीअधिक हैं वा समुचित इलाज़ न मिलने के कारण विशेष चिकित्सा पद्धतियों से विश्वास उठता जा रहा हैं, वहीँ झूठे विज्ञापनों से जनता ठगी का शिकार हो रही हैं। इस प्रकार कानूनों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही कर समाज में व्याप्त अनियमितताओं पर अंकुश लगाना आवश्यक व हितकारी होगा। भारतीय चिकित्सा के व्यवसाय (वृतिक आचरण शिष्टाचार स्तर तथा आचार संहिता )विनिमय 1982 की आधार संहिता इस प्रकार हैं|
विज्ञापन भारतीय चिकित्सा के किसी चिकित्सक द्वारा या तो वैयक्तिक्त रूप से समाचार -पत्र में विज्ञापन द्वारा, प्लेकार्ड द्वारा या परिपत्रों द्वारा या हैंड बिल के वितरण द्वारा प्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष्य रूप से अनुनय करना अनैतिक हैं। चिकित्सा व्यवसायी विज्ञापन या प्रचार के किसी भी रूप में या रीति से अपना नाम और या फोटो का उपयोग नहीं करेगा या उपयोग करने में सहायता नहीं देगा या दूसरों को उपयोग नहीं करने देगा।
बीमारियों के नाम और स्थिति जिनके चमत्कारी औषधियों का प्रचार नहीं किया जा सकता हैं —-
एपिन्डिटिस, आर्ट्रीआयोस क्लोरोरोसिस, अंधापन, बल्लोद पोइज़निंग, ब्राइटस रोग, कैंसर, मोतियाबिंद, बहरापन, डाइबिटीस, मष्तिष्क की बीमारियां या खराबी, मासिक धरम की खराबी, नर्वस सिस्टम की खराबी, प्रोस्टेटिक ग्रंथि की खराबी, ड्रॉप्सी, एप्लेप्सी। स्त्रीरोग (सामान्य) बुखार (सामान्य) फिट्स,, फॉर्म एंड स्ट्रुक्टर ऑफ़ फीमेल बस्ट, गाल ब्लैडर स्टोन। किडनी स्टोन गैंग्रीन, ग्लूकोमा, गोयटर,हृदय रोग, हाई या लो ब्लड प्रेसर, हइड्रोसील, हिस्टीरिया, इन्फेन्टाइल पैरालिसिस, इनसैनिटी, लेप्रोसी, लुकोडेर्मा, लाक जा, लोकोमेटेर एटाक्सिया,लुपस, नर्वस डेबिलिटी,मोटापा, पैरालिसिस, प्लेग, प्लूरिसी, निमोनिया, रूमेटिस्म, रुप्चर्स,सेक्सुअल इम्पोटेंसी, स्माल पॉक्स स्ट्रेचर ऑफ़ पर्सन्स, ट्राकोमा, स्टेरिलिटी ऑफ़ वीमेन, टी.बी. टाइफाइड बुखार,, अलसर, वेनेरल डिसीज़ (सिफलिस, गोनोरेहिया) एड्स और अस्थमा।
अब शर्तिया इलाज़ नहीं कर पाएंगे डॉक्टर
नए विधेयक में किया गया प्रावधान, साइन बोर्ड में नाम और डिग्री के अलावा कुछ भी लिखने पर हो सकती हैं कार्यवाही।
स्वास्थय एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा तैयार किये गए नेशनल कौंसिल फॉर ह्यूमन रिसोर्स इन हेल्थ (एनसीएचआरएच)विधेयक में प्रावधान किये गए हैं।
मंत्रालय ने इसविधेयक के जरिये देश में खुद को डॉक्टरों को खुद की मार्केटिंग करने से रोकने की तैयारी कर ली हैं। मत्रालय ने विधेयक का अंतिम प्रारूप तैयार कर स्वास्थय मंत्री को सौप दिया हैं। इसमें कोईडॉक्टर या अस्पताल किसी बीमारी विशेष के इलाज़ का दावा करने वाला विज्ञापन नहीं कर सकता हैं।
इन सब नियमों के बाबजूद भी समाचार पत्रों, टी वी. पत्रिकाओं और होर्डिंग्स द्वारा भ्रामक प्रचार किया जा रहा हैं, नियमों के अंतरगत कठोरतम कार्यवाही अपेक्षित हैं और क्रियान्वयन जरुरी हैं। इस सम्बन्ध में केंद्र और राज्य सरकार समुचित कार्यवाही कर जनता को गुमराह होने से बचाये। जब शासक के साथ धोखा तो सामान्य जन का क्या हाल होता होगा!

अमेरिका ने तरेरीं पाकिस्तान पर आंखें

(प्रमोद भार्गव)

तू डाल-डाल, हम पात-पात, कहावत एक बार फिर अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों के संदर्भ में सामने आई है। इसलिए यह आशंका बरकरार है कि पाक को दी जाने वाली आर्थिक मदद पर प्रतिबंध का निर्णय बनाम चेतावनी कब तक स्थिर रह पाएंगे ? क्योंकि अन्य अमेरिकी राष्ट्रपतियों की बात तो छोड़िए, स्वयं डोनाल्ड ट्रंप इस तरह की भवकियां पहले भी कई मर्तबा दे चुके हैं। लेकिन ट्रंप ने यह जो सख्ती दिखाई है, वह थोड़ी विचित्र है और उसके कूटनीतिक मायने हैं। पाक द्वारा आतंकियों को शरण देने और उन्हें भारत समेत अन्य दुश्मन देशों के परिप्रेक्ष्य में उकसाए रखने के बाबत ट्रंप ने ट्वीट के जरिए कहा है कि ’इस दक्षिण एशियाई देश ने आतंकियों को मजबूती से सरंक्षण दिया और लंबे समय तक इस झूठ और छल के जरिए सैन्य मदद भी लेता रहा। ऐसे कपटी देश को और आर्थिक मदद देना मूर्खता होगी।’ पाक की धूर्त जताने की भर्त्सना इससे पहले अमेरिका ने कभी नहीं की। इसलिए यह फटकार कहीं ज्यादा कठोर और लज्जाजनक है। लेकिन जिस देश की आंखों में शर्म न हो, उसे लज्जा कैसी ? चीन ने यह कहकर इस लज्जा पर पर्दा डालने की कोशिश की है कि ’अमेरिका समेत विश्व समुदायों को आतंकियों के खिलाफ उसके सर्वोत्तम योगदान को स्वीकार करना चाहिए।’ भारत सरकार अमेरिका की इस पहल पर इतराती दिख रही है। लेकिन उसे आतंक के परिप्रेक्ष्य में अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। उसकी समस्याओं का समाधान पाक को दी जाने वाली आर्थिक सहायताओं पर प्रतिबंध से रुकने वाला नहीं है।  इस ट्वीट के बाद ट्रंप प्रशासन ने कथनी और करनी में भेद न बरतते हुए 1624 करोड़ रुपए की मदद रोक दी। नए साल के पहले दिन हुई यह कार्यवाही पाकिस्तान की खुशहाली के लिए बड़ा झटका है। अमेरिका 15 साल के भीतर पाक को 33 अरब डॉलर की मदद दे चुका है। इस प्रतिबंध के चलते ही पाक के हाथ-पैर फूल गए। कुछ ही घंटों में उसने प्रशासनिक सक्रियता बरतते हुए लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक व मुंबई हमलों के सरगना हाफिज सईद और उसके संगठनों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। जानकारी तो यहां तक है कि पाक की वित्तीय नियामक संस्था प्रतिभूति एवं विनियम आयोग ने जमात-उद-दावा और फलह-ए-इंसानियत फाउंडेशन समेत हाफिज के सभी संगठनों को चंदा लेने से वंचित कर दिया है। हालांकि यह अलग बात है कि यह फैसला कितने समय तक टिकाऊ रह पाता है ?  पाक के लिए एक बुरी खबर यह भी है कि इसी माह के अंत में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का एक समूह आतंकी दलों के खिलाफ पाकिस्तान द्वारा वास्तव में कितनी कार्यवाहियां अमल में लाई गई हैं, इसका जमीनी-मुआयना करने पाक पहुंच रहा है। संभव है, इस दल को दिखाने की दृष्टि से ही पाक ने उपरोक्त फौरी कार्यवाहियां की हों ? लेकिन संयुक्त राष्ट्र के इस दल का दायित्व बनता है कि वह तात्कालिक कार्यवाहियों की बजाय, कम से कम तीन साल की गतिविधियों की पड़ताल करे ? दरअसल पाकिस्तान खुद को आतंक से पीड़ित देश जताकर इस तरह की पड़तालों के प्रति सहानुभूति बटोरने की कोशिश में रहता है। लेकिन इन दलीलों के परिप्रेक्ष्sय दो जुदा पहलू हैं। यह अपनी जगह सच है कि आतंकियों की प्रताड़ना पाक को भी झेलनी पड़ रही है, लेकिन इससे यह हकीकत नहीं छिप जाती कि वह आतंकियों को खुला सरंक्षण और सर्मथन दे ? मुबंई आतंकी हमलों का सरगना हाफिज सईद इसका पुख्ता सबूत है। अब तो वह पाकिस्तान की सरजमीं पर राजनीतिक दल बनाकर चुनाव आयोग से मान्यता लेने की फिराक में लगा है। पूरी दुनिया जानती है कि लादेन को इसी पाक ने पनाह दी हुई थी। अमेरिकी हवाई फौज ने सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए ऐबटाबाद स्थित लादेन के घर में घुसकर उसे मार गिराने का साहसिक काम किया था। ये दो ऐसे सबूत हैं, जो पाक के झूठ को बेपर्दा करते हैं। शायद इसलिए ट्रंप ने पाक को झूठा और छलिया कहा है।  आर्थिक मदद पर रोक के बाद पाक का जो बर्ताव पेश आया है, उससे साफ होता है कि रस्सी तो जल गई, लेकिन उसकी ऐंठन नहीं गई। इसीलिए प्रतिबंध के बाद जो प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, वे कमोवेश अमेरिका को चिढ़ाने वाली हैं। पाक विदेश मंत्री एवाज आसिफ ने कहा है कि ’अमेरिका अफगानिस्तान में लड़ाई के लिए पाकिस्तान के संसधानों का इस्तेमाल करता रहा है। नतीजतन वह पाक को खैरात में नहीं, इसी सहयोग की कीमत चुकाता रहा है। लिहाजा अमेरिका द्वारा दी जाने वाली मदद के संदर्भ में यह कहना व्यर्थ है कि अब और मदद नहीं दी जाएगी।’ विदेश मंत्री के इस दो टूक बयान में यह अंहकार अंतर्निहित है की अब पाक अमेरिकी मदद का मोहताज नहीं रह गया है। क्योंकि चीन उसका अंतरंग मित्र और आर्थिक मददगार के रूप में अमेरिका से कहीं ज्यादा बढ़-चढ़कर पेश आ रहा है। चीन जो पाकिस्तान से होकर आर्थिक गलियारा बना रहा है, उसे अफगानिस्तान की भूमि पर ले जाना चाहता है। इस लिहाज से चीन जहां पाक की जायज-नाजायज हरकतों का खुला सर्मथन कर रहा है, वहीं बेहिसाब पूंजी निवेश भी करने में लगा है। इस लिहाज से अमेरिका नहीं चाहेगा कि पाक को नाराज करके एकाएक उससे पल्ला झाड़ लिया जाए।  अमेरिका जब पाक के विरुद्ध निशाना साध रहा था, तभी उसने ईरान को भी आड़े हाथ लिया हुआ था। ईरान में इन दिनों सरकार विरोधी प्रदर्शनों के पीछे अमेरिकी मंशा जताई जा रही है। हकीकत जो भी हो, लेकिन यह तय है कि अमेरिका दक्षिण एशिया के दो देशों को एक साथ नाराज करने की मूर्खता नहीं कर सकता ? गोया, देर-सबेर अमेरिका लगाई रोक हटा सकता है। वैसे भी एक तो अफगानिस्तान की शांति और स्थिरता के लिए अमेरिका को पाक की जरूरत है, दूसरे पाक जिस तरह के बोल प्रतिबंध के बाद बोल रहा है, उससे तय है कि अमेरिका ने पाक पर ज्यादा दबाव बनाया तो वह चीन पर अपनी अघिकतम निर्भरता बढ़ाने में कोई संकोच नहीं करेगा ? पाकिस्तान को लाइन पर बनाए रखने के लिए अमेरिका चीन से टकराने की हिम्मत जुटा ले, यह मौजूदा परिस्थितियों में संभव हीं नहीं है। अमेरिका चीनी हितों में हस्तक्षेप न करे, शायद इसीलिए चीन उत्तर कोरिया को अमेरिका के विरुद्ध उकसाए रखने में मदद कर रहा है। इसका ताजा उदाहरण तेल के वे टेंकर हैं, जो अमेरिकी रोक के बावजूद चीन ने उत्तर कोरिया पहुंचने के लिए रवाना किए थे। वैसे भी चीन और अमेरिका एक दूसरे के प्रतियोगी है, प्रतिद्वंद्वी नहीं।  इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व फलक पर आतंकवाद और उसके पालन-पोषण में पाकिस्तान की भूमिका को प्रखरता से उजागार किया है। अमेरिका से भारत के रिश्ते घनिष्ट हुए हैं। लेकिन इसका खमियाजा भी भारत को भविष्य में भुगतना पड़ सकता है, क्योंकि भारत के इसी बर्ताव के चलते रूस जैसा विश्वसनीय सहयोगी भी पाकिस्तान में पूंजी निवेश कर उससे पुराने खराब संबंधों को सुधारने में लगा है। इस सबके बावजूद पाकिस्तान को लेकर हमारी नीति स्पष्ट नहीं है। मौखिक रूप से तो हम पाक को आतंकी देश कहते हैं, लेकिन भारत ने स्वयं अभी तक अपने किसी भी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज में पाक को आतंकी देश संबोधित करने का जोखिम नहीं उठाया है। यही नहीं वह भारत ही है, जिसने पाकिस्तान को ’मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा दिया हुआ है। पाक के साथ मजबूत व्यापारिक रिश्तों में अब तक कोई अवरोध नहीं है। पाक के लाइलाज रोगियों को भारत हाथों-हाथ लेता है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जहां भारत और पाक के बीच यातायात सुविधाओं में बढ़ोत्तरी हुई हैं, वहीं यात्री नियमों में भी शिथिलता बढ़ी है। ये ऐसी बानगियां हैं, जो पाकिस्तान के संदर्भ में हमारी विदेश नीति का अस्पष्ट स्वरूप दर्शाती हैं। गोया, कूटनीति के स्तर पर भारत को कालांतर में बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। यदि भविष्य में भारत से रूस की दूरी इसी तरह बढती रही तो कालांतर में जिस बीजिंग, इस्लामाबाद और मास्को का त्रिकोण बनने की संभावना जताई जा रही है, उसका निर्माण हुआ तो वह भारत के लिए घातक साबित हो सकता है। लिहाजा भारत को अमेरिका द्वारा पाक पर लगाए प्रतिबंध को लेकर इठलाने की नहीं, बल्कि अपनी लड़ाई खुद लड़ने का संकल्प लेकर निष्कंटक रास्ते तलाशने की जरूरत है।

ईरान में हड़कंप और भारत
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
आजकल ईरान में जबर्दस्त प्रदर्शन हो रहे हैं। हजारों लोग सड़क पर उतर आए हैं। वे तोड़-फोड़ भी कर रहे हैं। वे लोग न तो उच्च वर्ग के हैं और न ही मध्यम वर्ग के। इनमें से ज्यादातर लोग मजदूर वर्ग के हैं, ग्रामीण हैं और छोटे-छोटे शहरों में उनका जोर ज्यादा है। अभी तक दो दर्जन लोग मारे गए हैं और सैकड़ों गिरफ्तार हो चुके हैं। मुझे नहीं लगता कि ये प्रदर्शन शंहशाह के खिलाफ 1976-77 में हुए देशव्यापी भयंकर प्रदर्शनों की तरह हैं। इनकी तुलना 2009 में अहमदनिजाद सरकार के विरुद्ध हुए प्रदर्शनों से भी नहीं की जा सकती। यह असंतोष इसलिए भड़का है कि ईरान की अर्थव्यवस्था संभल नहीं पा रही है। ईरान की परमाणु-नीति के कारण लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने काफी दुर्दशा कर दी थी लेकिन अब जबकि ज्यादातर राष्ट्रों ने उन्हें हटा लिया है, अभी भी आशा की कोई किरण दिखाई नहीं पड़ रही है। रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों के भाव दुगुने हो गए हैं। ईरान के लोगों में 60 प्रतिशत युवा हैं। वे बेरोजगारी के शिकार हो रहे हैं। भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं है। इस आंदोलन का कोई निश्चित नेता नहीं है, जैसे कि 1975-77 में आयतुल्लाह खुमैनी थे। यह असंभव नहीं कि सरकारी दमन के सामने यह टिक ही नहीं पाए। लेकिन इस आंदोलन में पहली बार ईरान के सर्वोच्च इस्लामी नेता ‘अली खामेनई मुर्दाबाद’ के नारे लगे हैं। राष्ट्रपति हसन रुहानी, जो कि मूलतः उदारवादी हैं, उन पर भी नारों की मार पड़ रही है। लोग यह भी पूछ रहे हैं कि जब ईरान की आर्थिक स्थिति इतनी खराब है तो वह सीरिया, एराक, लेबनान और यमन के बागियों पर इतना पैसा और हथियार क्यों लुटा रहा है? 40 साल में यह पहली बार हो रहा है कि बादशाहत की वापसी के नारे भी लगे हैं। इन प्रदर्शनों से डोनाल्ड ट्रंप और इस्राइल के नेतन्याहू खुश दिखाई पड़ रहे हैं लेकिन ईरानी सरकार उनका नाम लिए बिना उन्हें आग में घी डालनेवाला कह रही है। इस मौके पर भारत का तटस्थ रहना ही हितकर है। हम ट्रंप और नेतन्याहू की आवाज़ में आवाज़ मिला कर न अपना भला करेंगे और न ही ईरान का। यदि ईरान स्थिर और खुशहाल रहता है तो इससे आखिरकार भारत को ही मदद मिलेगी। भारत चाबहार बंदरगाह का इस्तेमाल तो करेगा ही, ईरान से तेल-उत्पादन के सौदे पर भी फिर से बात की जा सकती है।

बांग्लादेशियों को वापस खदेडऩा नहीं होगा आसान
(अनिल बिहारी श्रीवास्तव)
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर तैयार हो रहे नागरिकता के रजिस्टर(एनआरसी)के पहले प्रारूप को भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त द्वारा जारी किए जाने के साथ एक उम्मीद जागी है। कम से कम इस बात की अब पहचान हो सकेगी कि असम में रहने वालों में कितने लोग भारतीय नागरिक हैं और भारतीय होने का मुखौटा लगा कर हमारे संसाधनों को चूस रहे विदेशी विशेषकर बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या कितनी है। असम में तीन करोड़ 29 लाख लोगों ने इस राज्य का बाशिन्दा होने का दावा किया था। प्रारूप के अनुसार इनमें से सिर्फ एक करोड़ 90 लाख लोगों के पास अपने दावे के पक्ष में वैध दस्तावेज हैं। लेकिन फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि बाकी के एक करोड़ 39 लाख लोगों में से कितने लोग असम में अवैध रूप से रह रहे हैं। अभी शेष दावों की जांच बाकी है। यह माना जा रहा है कि पूरी कड़ाई से दस्तावेजों की जांच की गई तो असम में रह रहे घुसपैठियों की संख्या लाखों में निकलेगी। इस बीच आल असम स्टूडेंट यूनियन ने प्रारूप प्रकाशन की शुरूआत का स्वागत किया है। संगठन ने कहा है कि इस कदम से असम को बांग्लादेशियों से मुक्त करने के लिए सही दिशा में बढ़ा गया है। आल असम स्टूडेंट यूनियन(आसू) ने असम में बांग्लादेशियों की घुसपैठ के विरूद्ध लंबी लड़ाई लड़ी है। 1980 के दशक में आसू की अगुआई में असम में जन आंदोलन चला था। संघर्ष 1985 में राजीव गांधी सरकार और आसू के बीच समझोैता होने पर ही थम सका। समझौता इस बात पर हुआ था कि 25 मार्च 1971 तक जो लोग असम में थे, उन्हें ही भारतीय नागरिक माना जाए। इस डेड लाइन को तय करने का कारण 26 मार्च 1971 में बांग्लादेश का बन जाना था। सियासी मक्कारों ने समझौता होने के बाद भी न तो असम में अवैध रूप से रहने वालों की पहचान करने लिए कोई ईमानदार प्रयास किए और न ही बांग्लादेश से घुसपैठ रोकने के बहुत पुख्ता कदम उठाए गए। नतीजा यह हुआ कि असम के अलावा पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा सहित दिल्ली और मुम्बई तक बांग्लादेशी घुसपैठिये फैलते चले गए।
आज भारत में लगभग चार करोड़ बांग्लादेशी नागरिक अवैध रूप से रह रहे हैें। स्थानीय नेताओं और दलालों की मदद से इनमें से अधिकांश ने राशनकार्ड, मतदाता पहचान पत्र आदि बनवा लिए। घुसपैठियों के कारण कानून एवं व्यवस्था से जुड़ी समस्याएं आए दिन सामने आतीं है। वहीं, देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा बढ़ रहा है। एक अन्य बड़ी समस्या देश के संसाधनों का इन विदेशियों के द्वारा दोहन किए जाने की है। ऐसे घुसपैठियों के कारण देश के मूल निवासी संसाधनों पर अपने वाजिब हक से वंचित हो रहे हैं। आम लोगों के लिए यह उत्सुकता का विषय हो सकता है कि लाखों बांग्लादेशी घुसपैठिये भारत आ गए और कैसे हमारी सरकार चलाने वाले लोग खर्राटों में मग्र रहे? यह आरोप निराधार नहीं है कि कुछ राजनीतिक दल और नेताओं ने वोट बैंक क्षुद्र की राजनीति के लिए राष्ट्रहित की अनदेखी की। उन्होंने इन विदेशियों को यहां अवैध रूप से आने और बसने में भरपूर मदद की है। परिणाम स्वरूप आज असम के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के अनेक इलाकों की आबादी में असंतुलन साफ दिखाई देने लगा। असम के अनेक सीमावर्ती गांवों में हालात अच्छे नहीं बताए जा रहे। वहां अस्सी प्रतिशत आबादी मुस्लिमों की हो गई है। ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि बांग्लादेश से आए घुसपैठियों ने राजनीतिक संरक्षण के बूते कई गांवों में न केवल वहां मूल नागरिकों की जमीनों पर कब्जा कर लिया बल्कि बड़े पैमाने पर वन भूमि हथिया ली। वहां उनका आतंक है। ऐसे गांवों के मूल असमी नागरिकों को पलायन पर मजबूर होना पड़ा। असम के पड़ौसी राज्य पश्चिम बंगाल में भी बांग्लादेशी घुसपैठियों को भरपूर राजनीतिक संरक्षण मिला। पश्चिम बंगाल में माकपा की अगुआई वाले वाममोर्चा सरकार के कार्यकाल के दौरान राज्य के अनेक नगरों और गांवों में बांग्लादेशी नागरिकों की संख्या तेजी से बढ़ी। इसको लेकर सैंकड़ों बार चिन्ता व्यक्त की गई लेकिन तत्कालीन वाममोर्चा सरकार तथा केन्द्र सरकार ने बढ़ते खतरे को कभी गम्भीरता से नहीं लिया। हैरानी की बात तो यह रही कि पश्चिम बंगाल में अन्य राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने भी इस मामले में चुप्पी साधे रखी। देश में लाखों बांग्लादेशी नागरिकों के घुस आने के लिए सिर्फ केन्द्र की पिछली सरकारों में बैठे लोगों की अकर्मण्यता और असम एवं पश्चिम बंगाल की राजनीतिक बिरादरियों के छल-कपट को ही जिम्मेदार कहा जा सकता है। इनके पाप को बोझ देश उठा रहा है। असम की तरह पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठियों के प्रति वोट बैंक के सौदागरों के प्रेम का एक उदाहरण कुछ बरस पूर्व सामने आया था। महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा गठबंधन की एक सरकार के कार्यकाल के दौरान राज्य में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों के विरूद्ध अभियान छेड़ा गया था। महाराष्ट्र की इस कार्रवाई का पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने जम कर विरोध किया। ममता बैनर्जी भी महाराष्ट्र सरकार की कार्रवाई का विरोध कर रहीं थीं। तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार की कार्रवाई को बांग्लाभाषी मुसलमानों के विरूद्ध साजिश करार दिया गया। पश्चिम बंगाल के सांसदों ने यह मुद्दा संसद उठाया। हद तो तब हो गई जब महाराष्ट्र में गिरफ्तार बांग्लादेशियों को छोडऩे महाराष्ट्र पुलिस ट्रेन से पश्चिम बंगाल पहुंची तो वामपंथी दलों के कार्यकर्ताओं ने धावा बोल कर उन्हें मुक्त करा लिया। पश्चिम बंगाल में वोट बैंक की निकृष्ट राजनीति वाममोर्चा सरकार के समय खूब देखने को मिली थी। अब वहां सत्ता सुख भोग रहीं ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने वही शैली अपना रखी है। ममता बैनर्जी की राजनीति में तुष्टिकरण की सड़ांध नथुनों को बेदम कर देती है। कहा जाता है कि ममता का बस नहीं चल रहा अन्यथा वह म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों को भारत आ कर बस जाने का न्यौता देने में देर नहीं करतीं। कल्पना कीजिए कि ऐसे राजनेताओं और ऐसी राज्य सरकारों के रहते भारत में अवैध रूप से रहने वालों की पहचान और उन्हें निकाल बाहर करना कितना मुश्किल काम होगा।
लगभग दस वर्ष पूर्व सीमा सुरक्षा बल के तत्कालीन प्रमुख ने बताया था कि हर साल 24 हजार से अधिक बांग्लादेशी नागरिक भारत में घुस आते हैं। दुनिया के किसी भी देश में नियमित रूप से होने वाली घुसपैठ का यह सबसे बड़ा उदाहरण कहा जाएगा। ये घुसपैठिये हमारे मूल नागरिकों का हक तो मारते ही हैं साथ ही अपराध और भारत विराधी गतिविधियों में भी इनकी लिप्तता के प्रमाण मिले हैं। अनेक पुलिस अधिकारी मानते हैं कि बांग्लादेशी नागरिक गम्भीर किस्म के अपराधों तक में लिप्त पाए गए हैं। उदाहरण मिले हैं जिनमें कुछ बांग्लादेशी नागरिक हत्या, लूट और डकैती जैसे अपराध करके वापस बांग्लादेश भाग गए। आज चुनौती यह है कि इन घुसपैठियों से कैसे मुक्त हुआ जा सकता है? बात चाहे मानवता की हो या मजबूरी की करें, यहां विचार इस बात पर अवश्य किया जाना चाहिए कि बढ़ती आबादी के कारण संसाधनों पर पड़ रहे दबाव से भारत स्वयं परेशान है। सवा अरब से अधिक हो चुकी आबादी के लिए जमीन और जल दोनों की कमी के कारण हम खुद ही तनाव में हैं। इस हकीकत के बाद भी परमार्थ का राग गा कर भारत की भावी पीढ़ी के लिए मुसीबत बढ़ाना विशुद्ध मूर्खता होगी? जनगणना विशेषज्ञ मानते हैं कि अगले एक दशक में भारत आबादी के मामले में चीन को पीछे छोड़ देगा। सन 2050 तक भारत की आबादी एक अरब 61 करोड़ हो जाने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। जाहिए है कि हम स्वयं ही कठिन समय की ओर बढ़ रहे हैं। शरणार्थी या घुसपैठिये के रूप में आने वाले लोगों का बोझ कैसे यह राष्ट्र ढो पाएगा। अहम मुद्दा यह है कि असम और देश के अन्य भागों में जो बांग्लादेशी नागरिक अपनी नागरिकता साबित नहीं कर सकेंगे उनका क्या होगा? यहां दो बातों पर विचार करना
जरूरी लग रहा है। पहली बात यह कि क्या ऐसे लाखों विदेशियों को उनके देश वापस भेजना संभव होगा। तय मानिए कि वोट बैंक के खेल में माहिर लोग इस काम में अवश्य अड़ंगा डालेंगे। वे घुसपैठियों को भारत का नागरिक साबित करने के लिए ऐड़ी-चोटी एक कर देंगे। साम्प्रदायिक कार्ड खेलने से नहीं हिचकेंगे। मानवता और भारतीय संस्कृति का हवाला देकर भावनात्मक ब्लेैकमेल किया जाएगा। दूसरी बात यह कि क्या घुसपैठियों को बांग्लादेश वापस लेने पर राजी होगा। आबादी के एक बड़े भाग से पिण्ड छुड़ा चुके बांग्लादेश से ऐसी उदारता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। इस धारणा की वजह है। याद करें बांग्लादेश में पूर्व की खालिदा जिया सरकार के समय वहां के एक मंत्री भारत यात्रा पर आए थे। दिल्ली में मीडिया द्वारा बांग्लादेशी नागरिकों की भारत में अवैध मौजूदगी का मुद्दा उठाए जाने पर उस बांग्लादेशी मंत्री ने साफ शब्दों में कह दिया कि उनके देश का एक भी नागरिक भारत में अवैध रूप से नहीं रह रहा है। इस जवाब से साफ हो गया था कि अपनी आबादी का बोझ भारत पर डालने की साजिश भारत के इस पड़ौसी देश की पिछली सरकारें बरसों से कर रहीं थीं। हमारे यहां घुुसपैठ कराने वाले दलालों, वोट बैंक भूखें नेताओं, राजनीतिक दलों तथा भारत की पूर्ववर्ती केन्द्र सरकारों की लचर नीतियों ने उनका काम आसान कर दिया। देश में 1951 के बाद पहली बार नागरिकों का रजिस्टर बन रहा है। यह काम सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते ही संभव हो सका है। असम में नागरिकता रजिस्टर बनाने की कवायद समूचे देश के लिए एक अच्छा उदाहरण बन सकती है। यह उम्मीद जागी है कि भविष्य में देश के अन्य राज्यों में भी नागरिकों का रजिस्टर बनाने का काम किया जा सकता है। वैसे समूचे देश में एनसीआर बनाने के विषय में केन्द्र की पिछली संप्रग सरकार के समय विचार उठा था किन्तु वह ठोस रूप नहीं ले सका। केन्द्र सरकार ने जिस तरह आधार कार्ड को लेकर दृढ़ता प्रदर्शित की है उसी तरह देश का एनसीआर बनाने के बारे में विचार किया जाना चाहिए। आखिर, पता तो चले कि कौन यहां का मूल नागरिक है और कौन शरणार्थी या घुसपैठिया?

भाजपा के भविष्य को लेकर संघ चिंतित……! 

ओमप्रकाश मेहता 

अभी तक तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ मोदी राज में अपने स्वयं के सपने पूरे नहीं होने को लेकर चिंतित और परेशान था, किंतु गुजरात विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद वह भारतीय जनता पार्टी के भविष्य को लेकर चिंतित है, उसे चिंता है कि जब प्रधानमंत्री और भाजपाध्यक्ष के अपने प्रदेश गुजरात में भाजपा की यह स्थिति है तो फिर इसी साल देश के आठ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की स्थिति क्या होगी? इसी चिंता को लेकर आजकल भूत भावन महाकाल की शरण में आ गया है और अगले तीन दिन महाकाल के सानिध्य में बैठकर अपनी चिंता पर मनन-चिंतन करेगा, और अपनी अगली रणनीति भी तय करेगा। आज से करीब चार साल पहले याने मोदी सरकार के पदारूढ़ होने के पूर्व संघ ने सपने सजा रखे थे कि केन्द्र में भाजपा की सरकार बनते ही न सिर्फ अयोध्या में भगवान राम के मंदिर के निर्माण का कार्य शुरू हो जाएगा, बल्कि कश्मीर से धारा-370 भी हटा दी जाएगी साथ ही कश्मीर से निष्कासित कश्मीरी पण्डितों का भी पुनर्वास हो जाएगा, संघ ने यह भी कल्पना की थी कि देश में हिन्दुत्व का दबदबा भी बढ़ जाएगा, फिर हिन्दू राष्ट्र कायम करने का मार्ग भी प्रशस्त हो जाएगा, किंतु मोदी सरकार के साढ़े तीन साल से भी अधिक समय गुजर जाने के बाद भी संघ के सपने न सिर्फ अपनी जगह कायम है, बल्कि वे धीरे-धीरे ”मुंगेरीलाल के सपनों“ में तब्दील होते जा रहे है, इसी कारण संघ इन दिनों काफी खिन्न, उदास और अंदर से नाराज भी है। किंतु उसकी मजबूरी यह भी है कि उसे मोदी सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना भी पड़ रहा है, इसी एक वजह यह भी है कि स्वयं नरेन्द्र भाई मोदी और अमित शाह ने संघ की बातें सुनना तो दूर उनके पदाधिकारियों यथेष्ट तवज्जोह ही नहीं दी, जबकि संघ ने अपनी पूरी लगन व ईमानदारी से भाजपा का कदम-कदम पर पूरा साथ दिया, फिर वह चाहे विधानसभा चुनाव में प्रचार का कार्य हो या कि नैतिक भरोसा। इसलिए अब धीरे-धीरे संघ का पूरा भ्रम टूटने की कगार पर है, संघ के सरकार्यवाह भैय्या जी पिछले सप्ताह दिल्ली में अपनी चिंताओं को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी और भाजपाध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात भी की थी, संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत चाहते थे कि उज्जैन में आयोजित संघ की शीर्ष महत्वपूर्ण बैठक के पहले प्रधानमंत्री व भाजपाध्यक्ष का रूख जान ले, जिससे कि उज्जैन बैठक में भावी रणनीति तय करने में सुविधा हो सके। संघ की इस बैठक के प्रथम दिन कोर गुप के आठ शीर्ष संघ नेताओं के साथ संघ प्रमुख ने बंद कमरे में लम्बी चर्चा की। जिस में विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष पद पर पुन: प्रवीण तोगड़िया की वापसी पर भी गंभीर विचार-विमर्श किया गया, संघ इन दिनों प्रवीण तोगड़िया जी से नाराज है तथा इसी कारण संघ प्रवीण जी की जगह जस्टिस कोगजे को कार्यकारी अध्यक्ष पद सौंपना चाह रहा था, किंतु प्रवीण तोगड़िया ने फिर बाजी मार ली। इसी कारण से संघ प्रवीण जी से नाराज है। वैसे संघ ने दिखावे के लिए अपने उज्जैन बैठक में विचार हेतु सात सूत्रीय एजेण्डे की घोषणा की है, जिसके तहत सामाजिक समरसता, गौ-संवर्धन, जैविक खेती, व्यसन मुक्ति, संस्कार, स्वच्छता व स्वावलंबन जैसे विषयों पर भी चर्चा होगी, किंतु संघ की इस बैठक का मुख्य उद्देश्य देश की राजनीतिक, आर्थिक और वर्चस्व की स्थिति पर गहन चिंतन-मनन कर उसकी भावी रणनीति तय करना है, जिससे कि संघ अपने नए दिशा निर्देशक सिद्धांत तय कर अपने स्वयं सेवकों की फौज की अभी से तैनाती कर सके। इसके साथ ही संघ की सबसे बड़ी चिंता भाजपा के भविष्य को लेकर है, जिसके बारे में वह अंतिम फैसला लेकर अपनी स्थिति साफ कर देना चाहता है।  वास्तविकता तो यह है कि संघ अब यह महसूस करने लगा है कि उसकी भाजपा के संरक्षक की भूमिका दिखावे मात्र के लिए रह गई है, क्योंकि अब न तो भाजपा या केन्द्र में सत्तासीन कोई पदाधिकारी उससे कोई सलाह मशवरा या मार्गदर्शन प्राप्त करने आता है और न ही उसके स्वयं द्वारा दिए गए सुझावों को कोई गंभीरता से लेता है, इसलिए कुल मिलाकर संघ को अब अपने अस्तित्व की ही चिंता सताने लगी है, उसकी मजबूरी यह है कि वह अपनी पीड़ा किसी के सामने उजागर भी नहीं कर सकता, क्योंकि उसे पता है कि ”सुनी अठिलैहे लोग सब, बांटी न लैहे कोय“। इसलिए उसकी मजबूरी यही है कि वह आपस में ही विचार- विमर्श कर सकते है और अब इसीलिए अंतिम रूप से अपनी रणनीति तय करने के लिए संघ ने बाबा महाकाल की नगरी का चयन किया है, क्योंकि अब संघ बाबा महाकाल की तरह अब ज्यादा विषपान नहीं कर सकता।

क्या मुल्क का मीडिया हाईजैक हो गया?
(ज़हीर अंसारी)
देश की पत्रकारिता को ग्रहण लग चुका है। मीडिया के सभी माध्यम अपनी-अपनी ढपली में अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। कोई इनका तो कोई उनका स्तुतिगान कर रहा है। गान भी ऐसा जो देश की एकता-अखंडता के लिए लाभकारी नहीं कही जा सकती। मीडिया हाउज़ेज़ और मीडिया पर्सन किसी विशेष खूँटे से बंध चुके हैं। पत्रकार की जगह मीडिया पर्सन का शब्द इसलिए इस्तेमाल किया जा रहा है कि पत्रकार समग्रता पर चिंतन करता है और समाज को अपने चिंतन तथा व्यवस्था की हक़ीक़त से अवगत कराता है।जबकि मीडिया पर्सन बंधुआ मज़दूर की तरह काम करता है। ये वही सामग्री परोसते हैं जो उनके खूँटे को मज़बूत करता है। ऐसा करते समय मीडिया पर्सन देशहित, नागरिक हित, और आपसी सौहाद्र पर पड़ने वाले दूरगामी परिणामों को भूल जाते हैं। तात्कालिक लाभ के लिए कुछ भी करने वाले मीडिया पेर्सोंस ने पत्रकारिता के अविस्मरणीय हस्ताक्षर स्व. श्री गणेशशंकर विद्यार्थी के बलिदान को भी याद नहीं रखते। भले ही पत्रकारिता का पाखंड करते हुए उनका नाम बार-बार लें लेकिन उनके किरदार को अमल में बिलकुल नहीं लाते। गणेशशंकर जी ने साम्प्रदायिक सौहाद्र के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी।जान क़ुर्बान होने तक वे देश की एकता-अखंडता के लिए लिखते-पढ़ते रहे। यही नहीं हर स्तर पर प्रयास करते रहे कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सब एकजुट होकर अंग्रेज़ी हुकूमत से मुक़ाबला करें।
आज की पत्रकारिता ने उनके सिद्धांतों को उलट कर रख दिया। पत्रकारिता की परिभाषा भी बदल दी। ठीक है उस दौर के पत्रकार आज़ादी के धुनी थे, अब के व्यवसायिक लाभ-हानि के धुनी। व्यवसाय में लाभ कमाना या अधिक लाभ की प्रत्याशा रखना कोई ग़लत नहीं है। हर कोई लाभ की कोशिश करता है। लेकिन नैतिकता और कम बेईमानी का लिहाज़ रखना चाहिए। रही बात विचारधारा की तो हर पत्रकार किसी न किसी पार्टी की विचारधारा से प्रभावित होता है। दलों को अपनी पसंद-नापसंद के अनुसार वोट करता है। इसमें किसी को कोई एतराज़ नहीं करना चाहिए।
पत्रकार हों या मीडिया पर्सन इन्हें अपने नैतिक कर्तव्यों पर ग़ौर करना चाहिए। विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में संतुलन का परिचय देना चाहिए। वैमनस्यता फैलाने वाली एक ख़बर मात्र से देश का सारा वातावरण भयग्रस्त हो जाता है। आपसी सम्बन्ध और समन्वय को आघात लगता है।
मीडिया घराने को यह तय करना होगा कि क्या पत्रकारिता बाज़ार है हिस्सा है या बाज़ार को नियंत्रित रखने वाला तंत्र है। जिस दिन यह तय हो जाएगा उस दिन से पत्रकारिता पर विश्वास जम जाएगा।
मीडिया के एकतरफ़ा रवैये की वजह से साधारण नागरिक भी कहने लगा कि लगता है मुल्क का मीडिया हाईजैक हो गया है। यही नहीं मीडिया और पत्रकारों पर जोक भी बनाए जाने लगे है। ऐसा ही एक जोक पेशे-ख़िदमत है।
लड़कीवाले – लड़का क्या करता है?
लड़केवाले – पत्रकार है।
लड़कीवाले – कौन सी पार्टी का?

स्वभाषा: मोदी कुछ तो करें!
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अचानक हिंदी और भारतीय भाषाओं की याद आई, यह जानकर मेरा हृदय प्रसन्नता से भर गया। हमारे महान वैज्ञानिक प्रो. सत्येंद्रनाथ बोस की 125 वीं जन्म-गांठ पर बोलते हुए मोदी ने विज्ञान और स्वभाषा के संबंधों पर अपने विचार व्यक्त किए। ऐसे विचार मेरी याद में आज तक किसी प्रधानमंत्री ने व्यक्त नहीं किए। प्रधानमंत्री के मुख से ये विचार निकले हैं, इसलिए अब इन्हें उनके ही माना जाएगा, चाहे फिर ये मेरे या आपके या किसी भाषण लिखनेवाले अफसर के ही क्यों न हों ?
मोदी ने कहा कि विज्ञान की पढ़ाई और अनुसंधान यदि भारतीय भाषाओं में हो तो विज्ञान जनता से जुड़ेगा। नौजवानों में लोकप्रिय होगा। उसका फायदा आम जनता को ज्यादा मिलेगा। वैज्ञानिक लोग यदि अपने मूल ज्ञान का प्रयोग आम आदमी की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए करें तो उनकी पूछ बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि सत्येन बोस विज्ञान को भारतीय भाषाओं के माध्यम से पढ़ाने के पक्षधर थे। उन्होंने बांग्ला भाषा में एक विज्ञान पत्रिका भी प्रकाशित की थी।
ऐसे उत्तम विचार व्यक्त करने के लिए मैं मोदी की तारीफ पहले ही कर चुका हूं लेकिन मैं पूछता हूं कि क्या मोदी को हमने इसीलिए प्रधानमंत्री बनाया है ? ऐसे और इससे भी अच्छे विचार तो कोई भी व्यक्त कर सकता है लेकिन किसी प्रधानमंत्री या सरकार के मुखिया से क्या सिर्फ यही उम्मीद की जाती है ? वह भाषण जरुर झाड़े या उपदेश जरुर करे, लेकिन इसके साथ-साथ हम उससे कुछ कर दिखाने की आशा भी करते हैं। मोदी यह बताए कि पिछले साढ़े तीन साल में मोदी ने देश में एक भी ऐसा कालेज स्थापित किया, जो मेडिकल, इंजीनियरी, विज्ञान और कानून आदि की उच्च शिक्षा भारतीय भाषाओं के माध्यम से देता हो ? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना होगा कि उसका श्रेष्ठ स्वयंसेवक प्रधानमंत्री की कुर्सी में बैठकर भी इतना लाचार क्यों है ? वह इस दिशा में शून्य क्यों है ? अंग्रेजी की गुलामी करनेवाले अन्य प्रधानमंत्रियों से वह अलग और बेहतर साबित क्यों नहीं हो रहा है ?

नये साल का “ उपहार” मुंबई का पब हादसा
आर.के.सिन्हा
मुंबई के पॉश परेल इलाके के कमला मिल कंपाउंड के एक बिल्डिंग के छत के ऊपर चलाई जा रही “पब” या “रात्रि दारूखाना और नाचघर” में लगी आग से मची तबाही ने 23 दिसम्बर,1995 को मंडी डबवाली (हरियाणा) और 13 जून,1997 को राजधानी दिल्ली के उपहार सिनेमाघर में लगी दिल-दलहाने वाले अग्निकांडों की डरावनी यादें ताजा कर दीं हैं। एक के बाद एक इस तरह के अग्निकांड हमारे यहां तो हर साल ही होते रहते हैं। पर हमें होश कहॉं आती है।हादसों के बाद रस्मी तौर पर जांच बिठा दी जाती है और मृतकों के परिजनों तथा घायलों को कुछ सरकारी मदद दिलाने के बाद तो सबकुछ भुला ही दिया जाता है। इसी से मिलते-जुलते हादसे बाकी के देशों में भी होते रहते हैं। कुछ समय पहले अमेरिका के शहर केलिफर्निया में भी एक इमारत में “रेव पार्टी” में आग लगने से कम से कम नौ लोगों की मौत हो गई थी। मेक्सिको और ब्राजील से भी इसी तरह के दुखद हादसों के समाचार आते रहे हैं।कुछ वर्ष पहले चीन के शॉंघाई शहर में भी एक बड़े पंडालनुमा जगह में चलाये जा रहे एक नाइट क्लब में आग लगने से सैकडों यवयुवकों- नवयुवतियाँ की दर्दनाक मौत हो गई थी। हमारे देश में तो हादसे थमने का नाम ही नहीं लेते।
नहीं बना नजीर
दिल्ली के दर्दनाक उपहार सिनेमा अग्निकांड से देश भर की सरकारों और नगर पालिकाओं/ निगमों को सबक़ लेना चाहिए था। लेकिन, इतना भयावह हादसा देश की राजधानी में जमी संवेदनहीन सियासी जमात और भ्रष्ट अफ़सरशाही का रवैया भी न सुधार सका,दूसरे शहरों की बात ही क्यों करें? मुंबई में हुई हालिया चौदह मौतों की कहानी का अंजाम भी वही हो जाये तो आश्चर्य ही क्या होगा? यह हमारे देश में न पहली बार हुआ है न आख़िरी बार ही होगा।घोर निराशाजनक स्थिति है! कोई दूसरा देश होता तो इतनी मौतों के लिए सम्बंधित सरकारों और स्थानीय निकायो पर ही आपराधिक मुक़दमा हो गया होता,करोड़ों का हर्ज़ाना-जुर्माना अलग से। तख़्ता पलट हो जाना भी कोई ख़ास बात नही होती! लेकिन, हमारे देश में सब बयान देकर ही बरी हो जाते हैं।उपहार कांड के बाद हर साल अख़बारों में, न्यूज़ चैनलों पर दिल्ली की बहुमंज़िला इमारतों में आग से निपटने के उपायों में लापरवाही पर लंबी लंबी रिपोर्टें छपीं, दिन- दिन भर के प्रोग्राम भी टी. वी. चैनलों पर हुए, लेकिन किसी सरकारी विभाग के चाल, चरित्र में और काम- काज के ढर्रे में तो कोई फ़र्क़ नहीं नज़र आया। उपहार सिनेमा के मालिक अंसल बंधु सुप्रीम कोर्ट तक जाकर आखिरकार राहत ले ही आए और हादसे में अपने दोनों बच्चे खो चुकीं नीलम कृष्णमूर्ति के हिस्से में लंबी लड़ाई हार जाने का दर्द भर ही तो बचा रहा।है। किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता सिवाय उन लोगों के, जिनकी दुनिया हमेशा के लिए वीरान हो जाती है। सरकारें नागरिकों से तगड़ा टैक्स लेती हैं, एमसीडी, बीएमसी की अरबों की आमदनी है । लेकिन, आम शहरी की जान बचाने की ज़िम्मेदारी लेने के लिए कौन तैयार है?
मुंबई के हादसे के बहाने कम से कम 20 नवम्बर,2011 को दिल्ली के दिलशाद गार्डन में हुए अग्निकांड की ही याद कर लेते हैं। उस मनहूस दिनराजधानी में किन्नरों के एक आयोजन के दौरान सामुदायिक भवन में लगी आग में भी 14 लोगों की जानें चली गई थीं। मंडी डबवाली में डीएवी स्कूल में चल रहे सालाना आयोजन में 360 अभागे लोग,जिनमें देश के नौनिहाल स्कूली बच्चे ही अधिक थे, स्वाहा हो गए थे। हालांकि, कुछ लोगों का तो यहां तक दावा है कि मृतकों की तादाद साढ़े पांच सौ से भी अधिक थी।
कैसे गई जानें
मंडी डबवाली से लेकर मुंबई के ताजा अग्निकांडों में कुछ बातें पहली नजर में एक जैसी सामने आईं। इन तीनों स्थानों में आग लगने के बाद मची भगदड़ से बहुत सी जानें गईं। चूंकि तीनों मनहूस जगहों में लोगों के लिए निकलने का रास्ता मात्र एक था जिसके कारण अफरा-तफरी मच गई। उसके बाद जो कुछ हुआ, वो अब बताने की जरूरत नहीं है। मंडी डबवाली में यही हुआ था। स्कूली कार्यक्रम चल रहा था। शामियाने के नीचे बहुत बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे,उनके अभिभावक और तमाम दूसरे लोग बैठे थे। उनके वहां से निकलने का सिर्फ एक ही रास्ता था। शामियाने में शार्ट सर्किट के बाद आग लगी और उसने अपनी चपेट में सैकड़ों लोगों को ले लिया। स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी अग्निकांड में कभी इतने अधिक लोग नहीं मारे गए जितने मंडी डबवाली मारे गए थे। कमोबेश इसी तरह के हालातों से दो-चार हुए. उपहार सिनेमाघर में ‘बार्डर’ फिल्म देख रहे तमाम लोग। उपहार में आग लगने के बाद उसके भीतर धुआं उठने लगा। जब वे अभागे लोग निकलने की चेष्टा कर रहे थे तब उन्होंने पाया कि सिनेमा घर के सभी दरवाजे बंद थे। वे लाख कोशिश करने के बाद भी खुल नही पा रहे थे। उसके बाद जो कुछ हुआ,उसने पत्थर दिल इंसानों की आंखों से भी आंसू निकलवा दिए। सांस घुटने से 59 अभागे लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

(लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)

प्रतिस्पर्धा बदज़ुबानी की?
– निर्मल रानी
पिछले दिनों गुजरात चुनाव के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शान में गुस्ताखी करते हुए उन्हें ‘नीच आदमी’ जैसे शब्द से संबोधित किया था। किसी भी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के बारे में ऐसी भाषा का प्रयोग कतई नहीं करना चाहिए। खासतौर पर देश के प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति के लिए तो ऐसे शब्द हरगिज़ शोभा नहीं देते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ‘राजनैतिक कौशल’ का परिचय देते हुए ‘नीच आदमी’ शब्द को ‘नीच जाति’ के शब्द के रूप में परिवर्तित करते हुए गुजरात चुनाव में अपनी डूबती हुई नैया को पार लगा लिया। अय्यर की यह भाषा कांग्रेस आलाकमान को पसंद नहीं आई और आनन-फानन में उन्हें पार्टी से निष्कासित कर उन्हें उनकी बदज़़ुबानी की सज़ा दी गई। निश्चित रूप से सभी राजनैतिक दलों के आलाकमान को देश के राजनैतिक चरित्र तथा इसकी प्रतिष्ठा को बचाने के लिए इस प्रकार के अपशब्दों या असंसदीय भाषा बोलने वाले,सरेआम गालियां बकने वाले अथवा किसी व्यक्ति या समुदाय हेतु जान-बूझ कर बदज़ुबानी करने वाले नेताओं के विरुद्ध न केवल संगठनात्मक स्तर पर इसी प्रकार की सख्त कार्रवाई करनी चाहिए बल्कि समाज में नफरत फैलाने वाले नेताओं के विरुद्ध तो कानूनी कार्रवाई भी की जानी चाहिए।
परंतु ऐसा देखा जा रहा है कि देश में सक्रिय हिंदूवादी संगठनों से जुड़े अनेक नेतागण इस समय पूरे देश में घूम-घूम कर सार्वजनिक रूप से ऐसे बयान दे रहे हैं जोकि न केवल दूसरे समुदाय के लोगों को सामूहिक रूप से आहत करने वाले हैं बल्कि ऐसे वक्तव्यों से भारतीय संविधान का भी मज़ाक उड़ाया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर धर्मनिरपेक्ष अथवा सेक्यूलर शब्द हमारे देश के संविधान की आत्मा के रूप में दर्ज है। हमारे देश का पूरा का पूरा स्वरूप,इसकी सामाजिक संरचना,यहां के धार्मिक विश्वास तथा विभिन्नता में एकता का आधार ही भारतीय धर्मनिरपेक्षता है। परंतु भारत सरकार के केंद्रीय रोज़गार एवं कौशल विकास राज्य मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने धर्मनिरपेक्ष शब्द की एक ऐसी नई परिभाषा गढ़ी है जिससे न केवल उनकी बल्कि उनके संस्कारों की सोच का भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है। हेगड़े ने अपने राज्य कर्नाट्क में एक जनसभा को संबोधित करते हुए पहले तो जनता से पूछा कि क्या आपको पता है कि धर्मनिरपेक्ष लोग कौन होते हैं? और यह पूछने के बाद उन्होंने स्वयं ही अपने सवाल का जवाब देते हुए कहा कि-‘धर्मनिरपेक्ष वे होते हैं जिन्हें अपने मां-बाप के खून का पता नहीं होता। इसलिए मेरा प्रस्ताव है कि संविधान में धर्मनिरपेक्षता की प्रस्तावना को बदल दिया जाना चाहिए’। अपने गुप्त एजेंडे को भी उजागर करते हुए हेगड़े ने स्पष्ट किया कि मेरा प्रस्ताव है कि संविधान में धर्मनिरपेक्षता की प्रस्तावना को बदल दिया जाना चाहिए’। ब्राह्मण समुदाय से जुड़े एक संगठन की सभा में उन्होंने साफतौर पर यह कहा कि-‘ हम लोग सत्ता में इसीलिए आए हैं ताकि संविधान को बदल सकें’।
ज़रा मंत्री महोदय के इस महाज्ञान की व्याख्या करिए और सोचिए कि आिखर उन लोगों के लिए किन शब्दों का प्रयोग किया जाता है जिनके माता-पिता के बारे में पता ही नहीं होता। क्या धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्द का अर्थ उतने निचले स्तर तक ले जाना भारत सरकार के मंत्री को शोभा देता है? क्या 31 प्रतिशत मत लेकर देश में अपनी सरकार चलाने वाले किसी संगठन अथवा विचारधारा को यह अधिकार है कि वह देश के 69 प्रतिशत लोगों की विचारधारा को यहां तक कि भारतीय संविधान की आत्मा के रूप में प्रयुक्त शब्द को किसी अपशब्द अथवा गाली के साथ जोड़े? यह तो उसी तरह की बात हुई जैसी कि भारतीय जनता पार्टी की एक संासद व केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने दिल्ली में एक चुनावी सभा के दौरान अत्यंत आपत्तिजनक बयान देते हुए यह कहा था कि-‘ जो भारतीय जनता पार्टी को वोट देगा वो रामज़ादा है और जो भाजपा के विरुद्ध वोट देगा वह हरामज़ादा है’। भाजपा अथवा सरकार द्वारा तो इस महिला नेत्री के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गई परंतु ज़्यादा हंगामा होते देख स्वयं साध्वी ने ही क्षमायाचना मांग मामले को रफा-दफा करने में ही अपनी भलाई समझी। हां साध्वी निरंजन ज्योति की इस बदकलामी का प्रभाव दिल्ली की जनता पर इतना ज़रूर पड़ा कि दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों पर हुए चुनाव में दिल्लीवासियों ने केवल 3 सीटों पर ही भाजपा को विजय दिलाई जबकि 67 सीटें आप पार्टी को प्राप्त हुईं। इन नतीजों से रामज़ादों व हरामज़ादों जैसे कटु वचन के परिणामों का अंदाज़ा स्वयं लगाया जा सकता है। यही स्थिति मणिशंकर अय्यर के बयान के चलते गुजरात में भी पैदा हुई है।
ज्ञानचंद आहूजा राजस्थान के अलवर जि़ले के एक ऐसे विधायक का नाम है जिसने देश के सर्वप्रतिष्ठित विश्विद्यालय जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के चरित्र से संबंधित अपना ‘शोध प्रस्तुत करते हुए मीडिया के समक्ष कहा था कि-‘जेएनयू में प्रतिदिन शराब की देसी तथा विदेशी दो हज़ार बोतलें,हड्डियों के पचास हज़ार टुकड़े,तीन हज़ार कंडोम,गर्भपात हेतु प्रयुक्त होने वाले पांच सौ इंजेक्शन बीड़ी के चार हज़ार व सिगरेट के दस हज़ार टुकड़े,चिप्स व नमकीन आदि की दो हज़ार थैलियां तथा ड्रग्स पीने हेतु प्रयुक्त होने वाले सौ सिल्वर पेपर बरामद किए जाते हैं। यही नहीं बल्कि उसने यह भी आरोप लगाया कि यहां आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में युवक- युवतियां नग्र अवस्था में नृत्य करते हैं। इस प्रकार की बदज़ुबानी करने वाले तथा देश के अत्यंत महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान को बदनाम करने वाले एक अशिक्षित भाजपाई विधायक ने एक बार फिर राजस्थान के अलवर में गौतस्करी के आरोप में पकड़े गए तथा जनता द्वारा बुरी तरह से पीटे गए एक व्यक्ति के संबंध में पुन: एक विवादित बयान देते हुए यह कहा है कि-‘ गौकशी तथा गौतस्करी करने वाले लोग मारे जाएंगे’। गोया देश में गौरक्षा के नाम पर फैली अराजकता को हवा देने तथा ऐसी घटनाओं को प्रोत्साहित करने जैसा काम भाजपाई विधायक द्वारा किया जा रहा है। परंतु पार्टी इसपर खा़मोश है।
इसी प्रकार तेलांगाना के हैदराबाद स्थित गोशामहल क्षेत्र से भाजपा विधायक टी राजा सिंह लोध नामक एक विधायक तो अपने भाषण में सिवाय हिंसा व घृणा फैलाने के किसी दूसरी भाषा का प्रयोग ही नहीं करता। राजा का पूरा का पूरा भाषण हिंदूवादी विचारधारा रखने वाले अपने समर्थकों को अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध भड़काने तथा नफरत फैलाने मात्र पर ही आधारित होता है। वे अक्सर अपने समर्थकों के साथ सड़कों पर हथियारबंद लोगों की भीड़ को भी साथ लेकर चलते हैं। हालांकि गत् दिनों राजा के विरुद्ध हैदराबाद पुलिस द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 153 ए तथा 295 ए के तहत एक मुकद्दमा रजिस्टर्ड भी किया गया है। यह मुकद्दमें दो समुदायों के मध्य नफरत फैलाने,धर्म-जाति क्षेत्र आदि के नाम पर लोगों को भड़काने तथा दूसरे धर्म व धार्मिक विश्वासों को ठेस पहुंचाने के आरोप में दर्ज किए गए हैं। परंतु भाजपा आलाकमान की ओर से इस विधायक के विरुद्ध अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। ऐसे बदज़ुबान तथा सांप्रदायिकता व नफरत का ज़हर फैलाने वाले नेताओं के विरुद्ध पार्टी आलाकमान द्वारा कार्रवाई न किए जाने के परिणामस्वरूप ही आज ऐसे कई नेताओं में बदज़ुबानी की प्रतिस्पर्धा होती देखी जा रही है। देश की एकता व अखंडता के लिए यह एक बड़ा खतरा है।

2018 में ये 11 काम करें
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
पिछला साल बीत गया। सच पूछा जाए तो साढ़े तीन साल बीत गए। अब बस डेढ़ साल बचा है। जो बीत गया, सो बीत गया। अब उस पर छाती पीटने और माथा कूटने से क्या फायदा है। देश को क्या पता था कि हम खोदेंगे पहाड़ और उसमें से चुहिया भी नहीं निकलेगी लेकिन अब इस 2018 के साल में कुछ चमत्कारी काम हो गए तो 2019 में यही सरकार लौट सकती है और उससे भी बड़ी बात यह कि देश की नय्या डूबने से बच सकती है।
तो क्या-क्या किया जाए 2018 में ? सबसे पहले तो देश की अर्थ-व्यवस्था को सुधारा जाए। नोटबंदी और जीएसटी ने जो धक्का लगाया है, उससे रोजगार, व्यापार और खेती को उबारा जाए। दूसरा, गरीबी की रेखा को 28 और 32 रु. से उठाकर कम से कम 100 रु. रोज किया जाए। तीसरा, देश में शिक्षा और चिकित्सा को लगभग हवा और पानी की तरह सर्वसुलभ बनाया जाए ताकि इनके नाम पर चल रही लूट-पाट बंद हो जाए। चौथा, हमारी संसद, सरकार और अदालतों से अंग्रेजी को हटाया जाए ताकि देश के मुट्ठीभर लोगों को मिलनेवाले खास फायदे आम आदमी को भी मिलने लगें। पांचवां, शैक्षणिक संस्थाओं से अंग्रेजी की अनिवार्यता और अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई पर सख्त प्रतिबंध लगे लेकिन अंग्रेजी समेत कई विदेशी भाषाओं को स्वेच्छया पढ़ने-पढ़ाने का इंतजाम किया जाए। छठा, देश में शराबबंदी याने पूर्ण नशाबंदी का वातावरण बनाया जाए। लोगों से धूम्रपान छुड़वाया जाए। सातवां, मांसाहार के नुकसानों से लोगों को सावधान किया जाए। गोवध अपने आप रुकेगा। आठवां, देश में वृक्षारोपण और प्रदूषणमुक्तता का प्रबल अभियान चलाया जाए। नौवां, दहेज, पर्दा-प्रथा, मृत्युभोज, वैवाहिक फिजूलखर्ची आदि सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध अभियान चलाया जाए। दसवां, मजहबी कानूनों और प्रथाओं को ताक पर रखकर स्त्री-पुरुष समानता के लिए पूरे देश में एक-जैसा कानून लागू हो। तीन तलाक के साथ बहुपत्नी प्रथा भी खत्म हो।ग्यारहवां, जातीय उपनाम लगाने पर प्रतिबंध हो। जातीय संगठन गैर-कानूनी घोषित हों। जातीय आरक्षण समाप्त हो और भारत को समतामूलक समाज बनाया जाए।

क्या आश्रम, मठ, मदरसा, चर्च, मंदिर वैश्यालय बनते जा रहे हैं ?
-डॉ.अरविन्द जैन
जैसा सुना जाता है कि राम, आदि भाई लोग शुरुआत में ही गुरु के आश्रम गए थे और उन्होंने वहां गुरु के आदेश से सब काम किये और शिक्षा दीक्षा पाई और योग्यतम बने। कृष्ण भी सांदीपनि आश्रम गए और वहां गुरु से शिक्षा ली। कौरव पांडव ने भी गुरुआश्रम जाकर ज्ञान प्राप्त किया। भारत में गुरुकुल प्रथा बहुत प्राचीनतम हैं जिसके उदाहरण नालंदा, तक्षशिला रहे । ऐसा सुना जाता हैं एक समय भारत वर्ष में लाखों गुरुकुल संचालित थे तथा सीता द्रोपदी आदि राजकुमारियों के अलावा अन्य लड़कियों के लिए भी गुरुकुल व्यवस्था थी जहाँ से निकलकर योग्यता, घर गृहस्थी, लोकाचार , नैतिकता की शिक्षा दीक्षा दी जाती थी ली । कोमल हृदय बालक बालिकाएं शीघ्रता से अच्छी संस्कारित होकर निकलती थी। वे आश्रम आदर्श शिक्षा के केंद्र रहे। वहां से निकले छात्र-छात्राएं गुरु दक्षिणा में कुछ विशेष नियम लेकर निकलते थे और गुरु उन्हें बहुत प्यार और सम्मान से दीक्षित
करते थे और दोनों एक दूसरे के पूरक थे।
लार्ड मेकाले ने भारतीय शिक्षा को तहस-नहस करने के वास्ते प्रथम गुरुकुल व्यवस्था को ख़तम किया और स्कूलों का निर्माण या शुरुआत की। वहां उसने अंग्रेजी माध्यम के द्वारा शिक्षा दीक्षा दी। इस तरह भारतीय संस्कृति को नष्ट का प्रयास किया और वह सफल भी हुआ। हमारे देश में लगभग दो सौ सालों में बहुत खुद क्या पूरा सांस्कृतिक आचरण अंग्रेजी संस्कृति का पोषक हुआ और हमने बहुत कुछ सीखा और अधिक खोया। इसके बाद देश स्वतंत्र हुआ और देश के कर्णधारों ने भी उसी परंपरा को आगे
बढ़ाया और उसको पुष्प पल्लवित किया।
भारत स्वतंत्र हुआ और स्वच्छंदता को बढ़ावा और सब जातियों, धर्मों ने अपने अपने ढंग से आश्रम ,मठ, मदरसा, चर्च पद्धत्ति के माध्यम से फिर से गुरुकुल प्रणाली की शुरुआत की और हमारा देश धरम भीरु भी हैं और ही हैं । धरम के नाम पर हमारा विभाजन हुआ और हममे इतनी दूरियां
हो गयी की अपनी प्रतिष्ठा, अस्तित्व, कायम करने फिर से इतिहास की पुनर्वृत्ति करके इन संस्थाओं को स्थापित किया और शुरुआत में कुछ अच्छे परिणाम मिले। पर धरम की आड़ में बहुत कुछ सीखने गए और अधिकांशतया गरीबों को सुविधाओं के नाम पर आकर्षित किया । धरम एक ऐसा औजार हैं और अन्धविश्वास की ओट में कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं ।इसी प्रकार कोई ज्योतिष के नाम में ,कोई सीधे भगवान के दर्शन कराने के बहाने और कोई शिक्षा दीक्षा के बहाने इन संस्थाओं में भर्ती कराते हैं ।इनका आश्रम ,मठ ,मदरसा चर्च
स्वयं के प्रभाव से प्रतिष्ठित होते हैं फिर उसमे धनी व्यक्ति ,प्रतिष्ठित /गणमान्य /सरकारी /असरकारी /नेता /अभिनेता धर्मगुरुओं के चेला /शिष्य /पिछलग्गू बन जाते हैं और वहां के प्रमुख इतने बड़े बड़े कोठियां ,आश्रम ,मदरसा,चर्च आदि बना लेते हैं जो प्राचीन राजाओं के महल को मात देते हैं ।सुरक्षा और व्यवस्था की दृष्टि से ।
किलेनुमा आश्रम में प्रवेश अपनी मर्ज़ी से मिलता और निकलना मठाधीश की नजरेंकर्म से ।इस प्रकार महंत ,संत गुरु घंटालों के द्वारा अपने ऐसे एजेंट तैयार किये जाते हैं जिनके माध्यम से लड़के लड़कियों ,गरीब महिलाओं पुरुषों को आश्रय देकर पहले धरम के नाम पर विश्वास अर्जित कर सुविधाएँ देते हैं और एक प्रकार का धीमा जहर या आश्रय देने के बदले काम लेते और धरम के नाम पर भीरु बनाते ।इसके बाद इनकी प्रभाव चिकित्सा शुरू होती हैं ,धीरे धीरे धन ,जन, बलशाली होकर अपने आभामंडल से समाज
,राजनेताओं को प्रभाव में लेते हैं उनके संरक्षण में दोनों एक दूसरे के पूरक और उपकारी हो जाते हैं ।और जहाँ औरतें ,लड़कियां होगी वहां व्यभिचार बढ़ने या होने की संभावनाएं सौ प्रतिशत होती हैं ।इसमें कोई शक नहीं हैं ।अभी अभी कितने संतों ,गुरुओं के नामलिये जाये ।कितने मुल्ला मौलवियों ,पादरियों के द्वारा शोषण किया जाता हैं या किया जा रहा हैं ।जो सामने आ गए वे भ्रष्ट और बाकी अभी सब ईमानदार ।जब तक पकडे नहीं गए। इस प्रकार मठ ,मंदिर मदरसा ,चर्च आदि जो भी नाम दो या लो इनके प्रमुख प्रथम हिंसक, ,बलात्कारी होते हैं और बाद में ये दलाल का काम करते हैं ।दूसरे शब्दों में ये व्यभिचार के बड़े अड्डे बने हैं ,ये आधुनिक वैश्यालय का रूप हैं । और आश्चर्य की बात हैं इतने बड़े बड़े राजशाही महल
नुमा आश्रम बनते हैं और वहां की स्थानीय प्रशासन ,पुलिस और अन्य अधिकारीयों की भी हिस्सेदारी /भागीदारी /उपयोगकर्ता होने से कोई न शिकायत मिलती हैं और वहां का मनमानापन लोह कवच से बाहर नहीं आता ।जो आ जाता हैं वह उजागर हो जाता हैं। इन स्थानों में नारकीय जीवन भोगना पड़ता हैं ।धन ,जन बल और धरम के नाम पर उनकी गरीबी ,मजबूरी का फायदा उठाया जाता हैं /इन संस्थाओं पर प्रथम स्थानीय प्रशासन /पुलिस /जागरूक नागरिकों की पहली जिम्मेदारी होती हैं की उन संस्थाओं की आतंरिक गतिविधियों की जानकारी खुफ़िआ तंत्र के माध्यम से प्राप्त करे और शिकायत करे ।मालूम हैं शिकायतों का कोई अर्थ नहीं होता कारण वे मंत्री संत्री नेताओं अभिनेताओं धन्नासेठियों का संरक्षण प्राप्त होते हैं या ये सब उनके भक्त होते हैं ।पर वर्तमान में पत्रकारिता ,मीडिया ,सोशल मीडिया का बहुत कुछ योगदान होने से अब ऐसे कुकर्म को रोकना सरल हो गया हैं बशर्ते सब जगह थोड़ी ईमानदारी हो। या फिर पीड़ित खुलकर सामने आएं कितना किस किस पर भरोसा रखो धर्म गुरु मुल्ला मौलवी पादरी संत महंत सब धरम की आड़ में भोगलिप्सा में रह रहे
क्योकि ये सब अतृप्त कामना वासना से पीड़ित होते हैं ये साधु के नाम पर रंगे भेड़िया होते हैं ये सब धरम के भय से शोषण करते हैं अबलाएं शीघ्र भ्रमित और शिकारी हो जाती
गरीबी मज़बूरी और अज्ञात भय को दिखाकर बनाते हैं अपना चेला शिकारी और करते निरंतर शोषण कर रहे हैं अपने अपने धर्मों को कलंकित ,कुरूप ,लांछित कांठ की पतीली अधिक नहीं टिकती आग की आंच पर एक दिन जब होगा भंडाफोड़ तब क्या करेंगे अपने मुख माँथ पर|

बीजेपी का गढ़ बनने का खामियाजा भुगतता बुंदेलखंड
– राजा पटेरिया
हाल हीं में एक खबर पढ़ी कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जी ने मालवा के लिए नर्मदा – पार्वती लिंक परियोजना को मंजूरी दे दी है। इस योजना पर 7 हजार 546 करोड़ रूपये की लागत आयेगी । मालवाचंल के लिए यह चौथी महत्वाकांक्षी परियोजना है जो भविष्य में मालवा की कृषि , पेयजल और औद्योगिक आवश्यक्ताओं की पूर्ति करेगी । दूसरी ओर बुंदेलखंड भी इसी प्रदेश का एक अंचल है जो पिछले एक दशक से गंभीर सूखे की चपेट में है, लेकिन भयावह गरीबी और भुखमरी से जूझने के बावजूद यह सरकारी उपेक्षा की मार झेल रहा है।
मालवा के लिए बीते 7 साल मे यह चौथी बड़ी जल आपूर्ति परियोजना है। सरकार अब तक नर्मदा-क्षिप्रा लिंक परियोजना, नर्मदा-गंभीर लिंक परियोजना और नर्मदा-कालीसिंध परियोजना को मंजूरी दे चुकी है। इससे इंदौर देवास उज्जैन धार झाबुआ शाजापुर समेत मालवा के बाकी क्षेत्रों में ना सिर्फ 2 लाख हेक्टेयर से ज़्यादा कि सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी बल्कि इन क्षेत्रों की पेयजल समस्या का भी स्थाई निराकरण होगा। हम मालवा में शुरू हो रही परियोजनाओं के विरोधी नहीं हैं लेकिन फिर भी यह तो सोचने में आता ही है कि मुख्यमंत्री बुंदेलखंड जैसे आपदाग्रस्त क्षेत्र को भगवान भरोसे छोड़कर मालवा पर ध्यान केंद्रित क्यों किये हुए हैं । बुंदेलखंड तो डेढ़ दशक बाद भी इकलौती केन बेतवा लिंक परियोजना के शुरू होने का इंतजार कर रहा है।
असल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह आकंट राजनीति में डूबे एक व्यक्ति हैं , उनके हरेक कार्य और विचार के पीछे कोई ना कोई राजनैतिक उद्देश्य निहित होता है। मुख्यमंत्री का मालवा प्रेम और बुंदेलखंड की उपेक्षा भी इसी का उदाहरण है। मालवा बीजेपी का गढ़ हुआ करता था लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मालवा में कांग्रेस मज़बूत हुई है। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने धार, झाबुआ , मंदसौर , उज्जैन, देवास और राघौगढ़ सीटों पर जीत दर्ज की थी इसके अलावा कांग्रेस इंदौर सीट मामूली अंतर से हारी थी । इस उलटफेर ने बीजेपी को चिंतित करते हुए अंचल में अपनी प्रतिष्ठा बचने के लिए जीतोड़ मेहनत करने पर मजबूर कर दिया। पिछले चुनाव में पार्टी “अच्छे दिन” का ख्वाब दिखाकर सत्ता में आ गई थी लेकिन जनता का अब भ्रमनिरसन हो रहा है, मालवा मे किसान आंदोलन सक्रिय है,जो परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। शिवराज जी को डर है कि जनता फिर 2009 के नतीजे ना दोहरा दे। दरसल मालवांचल की मुख्य समस्या पानी की कमी और जगह जगह फैलता सूखे का संकट है । यहां वन नष्ट हो चुकें हैं और प्राकृतिक जलस्त्रोत वर्षा के दो तीन महिने बाद ही सूख जाते हैं । भूजल स्तर में भी तेज़ी से गिरावट आ रही है। ऐसे में शिवराज सिंह चौहान पानी का इंतज़ाम कर पार्टी की साख बचाने के प्रयास में जुटे हैं।
बुंदेलखंड की बात की जाए तो यह क्षेत्र भी मालवा की तरह ही बीजेपी का गढ़ है और हमेशा यहां से बीजेपी की एक तरफा जीत होती रही है। लेकिन यहां की जनता ने मालवावासियों की तरह बीजेपी को कभी झटका देकर अपने वोट का महत्व नहीं समझाया। इस कारण मुख्यमंत्री बुंदेलखंड को लेकर निश्चिंत और आश्वस्त है और सरकार इस तरफ
गंभीरता से ध्यान नही दे रही।ऐसा नही कि सरकार समस्या से अवगत नही, वर्तमान सरकार में बुंदेलखंड से जयंत मलैया , गोपाल भार्गव , कुसुम मेहदेले , भूपेंद्र सिंह , ललिता यादव मंत्री हैं। लेकिन इन्होंने कभी क्षेत्र और क्षेत्रवासियों के हित की आवाज़ नहीं उठाई। इसे अलावा पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती और टीकमगढ़ सांसद वीरेंद्र कुमार केंद्र में मंत्री हैं , दमोह सांसद प्रहलाद पटेल पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री हैं, जिनकी बात पार्टी फोरम पर गंभीरता से ली जाती है।खजुराहो सांसद नागेंद्र सिंह भी म.प्र सरकार के मंत्री थे। वर्तमान मे अंचल की सभी लोकसभा सीट बीजेपी के पास है इसके अलावा कुछेक सीटें छोड़कर सारे विधायक भी बीजेपी के हैं। कहने का अर्थ सिर्फ इतना है कि राज्य और केंद्र दोनों में ही बीजेपी की सरकार है और दोनों में बुंदेलखंड से प्रभावशाली प्रतिनिधित्व मौजूद होने के बावजूद अंचल उपेक्षा और पिछड़ेपन का शिकार है।
बुंदेलखंड की जनता बार बार बीजेपी द्वारा ठगी गई लेकिन फिर भी चुनाव में बीजेपी को ही जितवाया है। शायद इसीलिए बीजेपी ने बुंदेलखंड को गंभीरता से लेना छोड़ दिया । बुंदेलखंड मे डेढ़ दशक में असामान्य बारिश के कारण खेती और अर्थव्यवस्था दोनों बर्बाद हो गई हैं, लोग रोज़गार के लिए पलायन कर रहें हैं, लेकिन बीजेपी सरकार और बुंदेलखंड के मंत्रियों ने हालात सुधारने कि दिशा में कोई सार्थक कदम नहीं उठाए। कांग्रेस की यूपीए सरकार ने राहत के लिए जो बुंदेलखंड पैकेज दिया था राज्य सरकार ने उसमें भी गजब का भ्रष्टाचार किया और जनता को उसका कोई लाभ नहीं मिला। इतने विरोधाभास के बावजूद बीजेपी चुुुनाव मेे जीती जिससे भाजपा बुंदेलखंड को अपनी जागीर मानने लगी है। मानो की वह जनता की मजबूरी है और लाख उपेक्षाओं के बावजूद जनता बीजेपी को ही चुनाव जितवायेगी। बीजेपी की इसी सोच के कारण बुंदेलखंड पिछड़ रहा है और सरकार पिछड़ेपन पर जानबूझकर मौन है।
बीजेपी सरकार ने 2009 में लोकसभा चुुनाव हारने के बाद ही मालवा की जल समस्या पर पहले पहल ध्यान दिया था। उससे पहले मालवावासियों भी महाकाल के भरोसे ही थे। बुंदेलखंड ने भी यदि 2008-09 या 2013-14 मे परिवर्तन किया होता तो आज हालात बेहतर होते।दरअसल जिस समय वोटर अपने वोट के विनिमय मूल्य या आसान भाषा में कहें तो वोट की कीमत भूल जाता है तो उस समय नेताओं की नज़र में जनता का डर खत्म हो जाता है और वह इसी प्रकार राजनेताओं के हाथ की कठपुतली बनकर रह जाता है। मालवा की जनता कि इस मामले में तारीफ करनी होगी कि उसने उसने अपने वोट के विनिमय मूल्य को कायम रखा है। उसने बीजेपी को वोट दिया तो बदले में अपने लिए अपेक्षाएं भी रखी और अपेक्षाएं पूरी ना होने पर बीजेपी को सिरे से नकार भी दिया। लेकिन बुंदेलखंड नाकारे नेताओं को दशकों से ढो रहा है। बीजेपी मालवा की जनता के नकारने की क्षमता से परिचित है, इसी डर से वह मालवा की समस्याओं को गंभीरतापूर्वक हल करने का प्रयास करती है। लेकिन बुंदेलखंड की जनता ने अब तक नकारने की इस क्षमता का परिचय नहीं दिया इसलिए वह गरीबी , पिछड़ेपन , शोषण भ्रष्टाचार और अत्याचार के कुचक्र में फंसी है। इस दुष्चक्र से मुक्ति और विकास के लिए बुंदेलखंड को भी मालवा से सीख लेेेकर नेतृत्व परिवर्तन की राह पकड़नी होगी।

ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर भाजपा के दोनों हाथ में लड्डू
-सनत जैन
भारतीय जनता पार्टी ने ट्रिपल तलाक के मुद्दे को जिस तरह से अंजाम दिया है। उसे देश में एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। गैर भाजपा दल हमेशा मुस्लिम नेताओं के प्रभाव में रहे हैं। वहीं भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा से मुस्लिमों का विरोध करने वाले के रुप में पहचाना जाता रहा है। स्वतंत्रता के 70 वर्षों के इतिहास में मुसलमानों ने कभी भी भाजपा और संघ के प्रति अपना भरोसा नहीं जताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की जुगल जोड़ी किसी भी जोखिम से घबराती नहीं है। वह अपने आप को जोखिम में डालकर सभी को आश्चर्यचकित करते हुए जीतकर बाहर निकलने में माहिर है। ट्रिपल तलाक के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। कांग्रेस सहित देश के अन्य राजनीतिक दलों को मुस्लिमों के इस मामले में भाजपा के पीछे चलने के लिए विवश होना पड़ा है। भाजपा ने मुस्लिम महिलाओं के वोट बैंक में सेंध लगाने का जो मंसूबा बनाया था, उसमें भाजपा पूर्ण रुप से सफल होती दिख रही है।
28 दिसंबर 2017 को लोकसभा में तीन तलाक का बिल ध्वनिमत से पारित हो गया। इस बिल का विरोध असदुद्दीन ओवैसी ने किया। उन्होंने अपने 3 संशोधन प्रस्ताव भी लोकसभा में पेश किए । कांग्रेस ने भी इस बिल के कुछ प्रावधानों का विरोध करते हुए इसके लिए समिति बनाने की बात कही। ओवैसी ने अपने संशोधन प्रस्ताव पर मतदान की मांग की थी। जिस पर उन्हें कोई खास समर्थन नहीं मिला, यह बिल ध्वनिमत से लोकसभा में पास हो गया। राज्यसभा में भी इस बिल के पास होने की पूर्ण संभावना जताई जा रही है। क्योंकि कांग्रेस भी इस बिल का खुलकर विरोध करने के लिए अपने आप को सहज नहीं मान रही है। नरेंद्र मोदी की यह सबसे बड़ी जीत है। इस बिल के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम समाज को दो फाड़ करने में सफलता हासिल कर ली है। मुस्लिम आबादी में लगभग आठ करोड़ मुस्लिम महिलाएं हैं। सरकार के इस कदम से आठ करोड़ महिलाएं भारतीय जनता पार्टी को कहीं ना कहीं अपनी हितेषी मानने के लिए विवश होंगी। विशेष रुप से नई उम्र की मुस्लिम महिलाओं की सोच पर भाजपा ने एक लोहार की तरह तगड़ी चोट की है। जिससे इसका असर बड़े पैमाने पर होना ही है। भाजपा के राज्यसभा सदस्य और विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर की तकरीर भी मुस्लिम नेता के रुप में कराते हुए कि इस्लाम खतरे में है या मुल्ला-मौलवी खतरे में हैं। कहलवाकर सरकार ने मुस्लिम कट्टरपंथियों और मुल्ला मौलवियों की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। निश्चित रुप से मुस्लिम महिलाओं में इसका असर होगा, और इसके दीर्घकालीन परिणाम भाजपा के पक्ष में सामने आएंगे।
भाजपा ने प्रथम चरण एक सुनियोजित रणनीति के तहत सभी विपक्षी दलों को हांका लगाकर अपने पीछे चलाने विवश करके एक अप्रत्याशित सफलता हासिल कर ली है। भाजपा, मुस्लिम आबादी को पुरुषों और महिलाओं के बीच बांटने में पूर्णता सफल होती दिख रही है। आगे चलकर भाजपा के लिए इसमें एक बड़ा जोखिम भी हो सकता है। ट्रिपल तलाक अथवा तलाक के बाद सरकार यदि मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण का पुख्ता इंतजाम नहीं कर पाई तो भाजपा को इसका दुहरा नुकसान उठाने के लिए भी तैयार रहना होगा। भाजपा ट्रिपल तलाक के मामले में आरोपी पुरुष को 3 साल के लिए जेल भेज देगी। उसके बाद यदि उसकी पत्नी को आर्थिक एवं सामाजिक स्वीकार्यता सरकार नहीं दे पाई, तो इसके बहुत गंभीर परिणाम सामने आएंगे। पाकिस्तान में आज जो हालत भारत से गये मुसलमानों की है। वही हालात मुस्लिम समाज की महिलाओं की अपने परिवारों में हो सकती है। इतिहास से भी भाजपा को भी सबक लेने की जरूरत है । भारत में आज मुस्लिमों की इतनी बड़ी आबादी केवल इस कारण है , कि जब मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा हिंदू महिलाओं को लूटकर ले जाया गया, और जब उन्हें छोड़ा, तो भारत में जाति वादी व्यवस्था ने उनको अछूत मानकर अपने पास रखने से मना कर दिया। जिसके कारण लूटी गई महिलाएं फिर उनकी शरण में जाने के लिए विवश हुई। जिसके कारण आज इतने बड़े पैमाने पर भारत में मुस्लिम आबादी है। और सैकड़ों हिन्दुओं को गुलामी में रहना पड़ा।
भारत की 95 फ़ीसदी मुस्लिम आबादी आर्थिक रुप से काफी कमजोर है। सरकार की ओर से पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को यदि सरकार ने पर्याप्त आर्थिक सहायता और संरक्षण नहीं दिया। ऐसी स्थिति में भाजपा सरकार की विश्वसनीयता पर असर होगा। यदि केंद्र सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को आर्थिक सहायता और संरक्षण दिया, और वह आर्थिक सहायता और संरक्षण यदि हिंदू समाज की महिलाओं को नहीं मिलेगा, तो इसमें एक बड़ा खतरा भारतीय जनता पार्टी को उठाना पड़ सकता है। अभी तक हिंदूवादी संगठन भाजपा के पक्ष में इसलिए खड़े हो रहे थे कि वह मुस्लिम विरोधी हैं
अब भाजपा की एक नई छवि सामने आ रही है। जिस तरह ट्रिपल तलाक को लेकर मुस्लिम महिलाएं शोषित हो रही थी। कुछ इसी तरह की स्थिति हिंदू महिलाओं की भी हैं। भारत में पिछले कुछ वर्षों में हिंदुओं के बीच में भी बड़े पैमाने पर तलाक शुरू हो गए हैं। तलाक के बाद यहां एक बड़ी हिन्दू आबादी महिलाओं को आर्थिक सहायता और गुजारा भत्ता उपलब्ध नहीं करा पाती है। बहुत लोगों की ऐसी स्थिति नहीं है, कि वह आर्थिक सहायता दे सकें। ऐसी स्थिति में हिंदू महिलाओं का दबाव भी सरकार पर पड़ेगा। ट्रिपल तलाक को लेकर जिस तेजी के साथ सरकार ने मुस्लिम महिलाओं का साथ दिया है। उससे हिंदू महिलाएं भी प्रभावित होंगी और वह भी सरकार से अपेक्षा करेंगी कि सरकार उनकी आर्थिक और सामाजिक जरूरतों को पूरा करे। इसके दीर्घकालीन परिणाम क्या होंगे। अभी कहना मुश्किल है प्रथम चरण में भाजपा के दोनों हाथ में लड्डू है। भारत में स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र में वोटों के बंटवारे के लिए हिंदू, मुस्लिम, एसटी-एससी, पिछड़ा वर्ग के नाम पर जो ध्रर्वीकरण समय-समय पर भारतीय सामाजिक व्यवस्था में हुए। अब उसका नया रूप, महिला और पुरुषों के बंटवारे के रूप में देखने को मिल रहा है। भविष्य में महिला और पुरुषों, आधारित राजनीति महत्वपूर्ण साबित होगी। सरकार को यह भी ध्यान में रखना होगा। महिलाएं केवल आर्थिक रूप से नहीं, वरन सत्ता में भागीदारी के लिए भी खुलकर मैदान में है। ट्रिपल तलाक के मामले में महिलाओं की बड़ी जीत सत्ता में भागीदारी के लिए भी उग्र होंगीं।

नमामि गंगे अभियान की असफलता
-प्रमोद भार्गव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सर्वोच्च प्राथमिकता वाली ’नमामि गंगे’ परियोजना नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट के अनुसार जिस दुर्दशा को शिकार हुई है, वह आश्चर्य में डालने वाली स्थिति की बानगी है। कैग ने ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा किया है कि केंद्र सरकार स्वच्छ गंगा मिशन के लिए आवंटित धनराशि के एक बड़े हिस्से का उपयोग ही नहीं कर पाई है। कैग का यही निष्कर्ष निकलना था, क्योंकि सफाई अभियान चलाने के बावजूद गंगा की वही हालत है, जो पहले थी। मोदी कार्यकाल के साढ़े तीन साल बीत जाने के बाद भी गंगा सफाई मुहिम लक्ष्य की ओर बढ़ती नहीं दिखी तो साफ है आने वाले डेढ़ साल में भी कोई सार्थक परिणाम दिखने वाले नहीं हैं। इस अभियान के परिप्रेक्ष्य में अब तक किसी ठोस नीति का सामने नहीं आना इस बात को दर्शाता है कि केंद्र सरकार और नरेंद्र मोदी सफाई के प्रति मंचों से जितनी प्रतिबद्धता जता रहे हैं, उतने गंभीर नहीं हैं। कमोबेश यही मानसिकता राज्य सरकारों और स्वायत्त निकायों की है। यही कारण है कि अब तक गंगा सफाई के जितने भी अभियान चले हैं, जमीनी धरातल पर नाकाम रहे हैं।
लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी का वादा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का महत्वाकांक्षी स्वप्न गंगा को स्वच्छ कर उसकी जलधार को अविरल बनाना था। इस नाते 2016 में एक व्यापक अभियान को उत्सवधर्मिता के साथ क्रियान्वित करने का श्रीगणेश भी हुआ था। तब उम्मीद बंधी थी कि ’नमामि गंगे’ परियोजना के भविष्य में सार्थक परिणाम निकलेंगे ? केंद्र के वित्त पोषण से शुरू हुई यह योजना भारतीय सभ्यता, संस्कृति और आजीविका की जीवन रेखा कहलाने वाली गंगा का कायाकल्प कर इसका सनातन स्वरूप बहाल करेगी ? लेकिन कैग की रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि ये बातें और वादे महज जनता को मुगालते में रखने का बड़बोलापन था। हालांकि इस योजना को निरापद और निर्बाध रूप से अमल में लाने के परिप्रेक्ष्य में कुछ आशंकाएं पहले भी थीं, जिन पर कैग ने तस्दीक की मोहर लगा दी है। दरअसल गंगोत्री से गंगासागर का सफर तय करने के बीच में गंगा जल को औद्योगिक हितों के लिए निचोड़कर प्रदूषित करने में चमड़ा, चीनी, रसायन, शराब और जल विद्युत परियोजनाएं सहभागी बन रही हैं। उन पर गंगा सफाई की इस सबसे बड़ी मुहिम में न तो नियंत्रण के व्यापक उपाय दिख रहे थे और न ही बेदखली के ?
गंगा सफाई की पहली बड़ी पहल राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में हुई थी। तब शुरू हुए गंगा स्वच्छता कार्यक्रम पर हजारों करोड़ रुपए पानी में बहा दिए गए, लेकिन गंगा नाममात्र भी शुद्ध नहीं हुई। इसके बाद गंगा को प्रदूषण के अभिशाप से मुक्ति के लिए संप्रग सरकार ने इसे राष्ट्रीय नदी घोषित करते हुए, गंगा बेसिन प्राधिकरण का गठन किया, लेकिन हालत जस के तस रहे। भ्रष्टाचार, अनियमितता, अमल में शिथिलता और जबावदेही की कमी ने इन योजनाओं को दीमक की तरह चट कर दिया। भजपा ने गंगा को 2014 के आम चुनाव में चुनावी मुद्दा तो बनाया ही, वाराणसी घोषणा-पत्र में भी इसकी अहमियत को रेखांकित किया। सरकार बनने पर कद्दावर, तेजतर्रार और संकल्प की धनी उमा भारती को एक नया मंत्रालय बनाकर गंगा के जीर्णोद्वार का भगीरथी दायित्व सौंपा गया। जापान के नदी सरंक्षण से जुड़े विशेषज्ञों का भी सहयोग लिया गया। उन्होंने भारतीय अधिकारियों और विशेषज्ञों से कहीं ज्यादा उत्साह भी दिखाया। किंतु इसका निराशाजनक परिणाम यह निकला कि भारतीय नौकरशाही की सुस्त और निरंकुश कार्य-संस्कृति के चलते उन्होंने परियोजना से पल्ला झाड़ लिया। इन स्थितियों से अवगत होने के बाद सर्वोच्च न्यायालय को भी सरकार की मंशा संदिग्ध लगी। नतीजतन न्यायालय ने कड़ी फटकार लगाते हुए पूछा कि वह अपने कार्यकाल में गंगा की सफाई कर भी पाएगी या नहीं ? न्यायालय के संदेह की पुष्टि कैग ने कर दी है।
’नमामि गंगे’ की शुरूआत गंगा किनारे वाले पांच राज्यों में 231 परियोजनाओं की आधारशिला, सरकार ने 1500 करोड़ के बजट प्रावधान के साथ 104 स्थानों पर 2016 में रखी थी। इतनी बड़ी परियोजना इससे पहले देश या दुनिया में कहीं शुरू हुई हो, इसकी जानकारी मिलना असंभव है। इनमें उत्तराखंड में 47, उत्तर-प्रदेश में 112, बिहार में 26, झारखंड में 19 और पशिचम बंगाल में 20 परियोजनाएं क्रियान्वित होनी थीं। हरियाणा व दिल्ली में भी 7 योजनाएं गंगा की सहायक नदियों पर लागू होनी थीं। अभियान में शामिल परियोजनाओं को सरसरी निगाह से दो भागों में बांट सकते हैं। पहली, गंगा को प्रदूषण मुक्त करने व बचाने की। दूसरी गंगा से जुड़े विकास कार्यों की। गंगा को प्रदूषित करने के कारणों में मुख्य रूप से जल-मल और औद्योगिक ठोस व तरल अपशिष्टों को गिराया जाना है। जल-मल से छुटकारे के लिए अधिकतम क्षमता वाले जगह-जगह सीवेज संयंत्र लगाए जाने थे। गंगा के किनारे आबाद 400 ग्रामों में ’गंगा-ग्राम’ नाम से उत्तम प्रबंधन योजनाएं शुरू होनी थीं। इन सभी गांवों में गड्ढे युक्त शौचालय बनाए जाने थे। सभी ग्रामों के शमशान घाटों पर ऐसी व्यवस्था होनी थी, जिससे जले या अधजले शवों को गंगा में बहाने से छुटकारा मिले। शमशान घाटों की मरम्मत के साथ उनका अधुनीकिकरण भी होना था। विद्युत शवदाह गृह बनने थे। साफ है, ये उपाय संभव हो गए होते तो कैग की रिपोर्ट नकारात्मक न आई होती।
विकास कार्यों की दृष्टि से इन ग्रामों में 30,000 हेक्टेयर भूमि पर पेड़-पौधे लगाए जाने थे। जिससे उद्योगों से उत्सर्जित होने वाले कॉर्बन का शेषण कर वायु शुद्ध होती। ये पेड़ गंगा किनारे की भूमि की नमी बनाए रखने का काम भी करते। गंगा-ग्राम की महत्वपूर्ण परियोजना को अमल में लाने की दृष्टि से 13 आईआईटी को 5-5 ग्राम गोद लेने थे। किंतु इन ग्रामों का हश्र वही हुआ, जो सांसदों द्वारा गोद लिए गए आदर्श ग्रामों का हुआ है। गंगा किनारे आठ जैव विविधता सरंक्षण केंद्र भी विकसित किए जाने थे। वाराणसी से हल्दिया के बीच 1620 किमी के गंगा जल मार्ग में बड़े-छोटे सवारी व मालवाहक जहाज चलाए जाना भी योजना में शामिल था। इस हेतु गंगा के तटों पर बंदरगाह बनाए जाने थे। इस नजर से देखें तो नमामि गंगे परियोजना केवल प्रदूषण मुक्ति का अभियान मात्र न होकर विकास व रोजगार का भी एक बड़ा पर्याय था। लेकिन जब इन विकास कार्यों पर धनराशि ही खर्च नहीं हुई तो रोजागार कैसे मिलता ?
नमामि गंगे परियोजना में उन तमाम मुद्दों को छुआ गया था, जिन पर यदि अमल होने की वास्तव में शुरूआत हो गई होती तो गंगा एक हद तक शुद्व दिखने लगी होती। हकीकत तो यह है कि जब तक गंगा के तटों पर स्थापित कल-कारखानों को गंगा से कहीं बहुत दूर विस्थापित नहीं किया जाता, गंगा गंदगी से मुक्त होनी वाली नहीं है ? जबकि इस योजना में कानपुर की चमड़ा टेनरियों और गंगा किनारे लगे सैकड़ों चीनी व शराब कारखानों को अन्यत्र विस्थापित करने के कोई प्रावधान ही नहीं थे। इनका समूचा विषाक्त कचरा गंगा को जहरीला तो बना ही रहा है, उसकी धारा को अवरुद्ध भी कर रहा है। कुछ कारखानों में प्रदूषण रोधी संयंत्र लगे तो हैं, लेकिन वे कितने चालू रहते हैं, इसकी जवाबदेही सुनिश्चित नहीं है। इन्हें चलाने की बाध्यकारी शर्त की परियोजना में अनदेखी की गई है। हालांकि नमामि गंगे में प्रावधान है कि जगह-जगह 113 ’वास्तविक समय जल गुणवत्ता मापक मूल्यांकन केंद्र’ बनाए जाएंगे, जो जल की शुद्धता को मापने का काम करेंगे। लेकिन जब गंदगी व प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को ही नहीं हटाया जाएगा तो भला केंद्र क्या कर लेंगे ?
उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर एक लाख तीस हजार करोड़ की जलविद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इन परियोजनाओं की स्थापना के लिए पहाड़ों को जिस तरह से छलनी किया जा रहा है, उसी का परिणाम देव-भूमि में मची तबाही थी। गंगा की धारा को उद्गम स्थलों पर ही ये परियोजनाएं अवरुद्ध कर रही हैं। यदि प्रस्तावित सभी परियोजनाएं वजूद में आ जाती हैं तो गंगा और हिमालय से निकलने वाली गंगा की सहायक नदियों का जल पहाड़ से नीचे उतरने से पहले ही निचोड़ लिया जाएगा। तब गंगा अविरल कैसे बहेगी ?
पर्यावरणविद् भी मानते हैं कि गंगा की प्रदूषण मुक्ति को गंगा की अविरलता के तकाजे से अलग करके नहीं देखा जा सकता है ? लिहाजा टिहरी जैसे सैंकड़ों छोटे-बड़े बांधों से धारा का प्रवाह जिस तरह से बाधित हुआ है, उस पर मोदी सरकार खामोश है। जबकि मोदी के वादे के अनुसार नमामि गंगे योजना, महज गंगा की सफाई की ही नहीं सरंक्षण की भी योजना है। शायद इसीलिए उमा भारती ने ’गंगा सरंक्षण कानून’ बनाने की घोषणा की थी, लेकिन अब तक इस कानून का प्रारूप भी तैयार नहीं किया गया है। साफ है, सरकार की मंशा और मोदी के वादे में खोट है।
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं)

ट्रंप का भूकंप: भारत चौकन्ना रहे
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिका ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति की घोषणा से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भूकंप ला दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने भाषण में इस रणनीति का प्रतिपादन करते हुए भारत को एक उदीयमान विश्व-शक्ति कहा है और भारत-प्रशांत क्षेत्र में उसकी विशिष्ट भूमिका को सराहा है। एशियाई देशों की संप्रभुता का उसे संरक्षक भी कहा है। 65 पृष्ठ के इस एतिहासिक दस्तावेज में भारत का नाम आठ बार लिया गया है। भारत और अमेरिका की सामरिक भागीदारी पर भी काफी जोर दिया गया है तथा भारत, जापान और आस्ट्रेलिया के साथ मिलकर अमेरिका ऐसा गठबंधन भी तैयार करना चाहता है, जो रुस और चीन की दादागीरी का मुकाबला कर सके। भारत के महत्व को यों तो 1971 में रिचर्ड निक्सन, फिर जार्ज बुश, क्लिंटन और ओबामा ने बराबर स्वीकार किया था लेकिन ट्रंप ने तो भारत पर अपने शब्दों का खजाना ही लुटा दिया है। ट्रंप की इस अदा पर कौन भारतीय फिदा नहीं हो जाएगा ? भारतीयों को यह भी अच्छा लगेगा कि ट्रंप ने इस रणनीति-दस्तावेज़ में पाकिस्तान की जमकर खिंचाई की है। उन्होंने कहा है कि अमेरिका पाकिस्तान को आतंकवाद से लड़ने के लिए 33 अरब डाॅलर अब तक दे चुका है लेकिन अब वह इसके खिलाफ ठोस कार्रवाई चाहता है। वह कोई बहानेबाजी नहीं सुनना चाहता है। उन्होंने पाकिस्तान की परमाणु-नीति पर भी उंगली उठाई है।
इस तरह की खरी-खरी बातों से भारत बहुत खुश है और पाकिस्तान नाराज़ लेकिन ट्रंप का क्या भरोसा ? वे पल में तोला हैं और पल में माशा हो जाते हैं। मुझे शंका यह है कि उन्होंने यह पैंतरा कहीं इसलिए तो नहीं अपनाया है कि वे रुस और चीन के खिलाफ अपने सामरिक मोर्चे में भारत को भर्ती करना चाहते हैं। इसी दस्तावेज़ पर बोलते हुए उन्होंने नए शीतयुद्ध की घोषणा कर दी है। उन्होंने दो-ढाई दशक पहले खत्म हुए शीतयुद्ध का दुबारा शंखनाद कर दिया है। वे चीन और रुस के द्वारा अमेरिका की शक्ति, संपन्नता और संस्कृति को दी जा रही चुनौती का डटकर मुकाबला करना चाहते हैं। उनकी इस रणनीति की कटु भर्त्सना रुस और चीन ने तो की है, पाकिस्तान भी चुप नहीं रहा है। भारत सरकार उसकी तारीफ करे, यह स्वाभाविक है लेकिन मुझे विश्वास है कि इतिहास के इस नाजुक मुकाम पर भारत सरकार पर्याप्त परिपक्वता का परिचय देगी। वह अपने आप को इस या उस गुट का मोहरा बनाने की बजाय मध्यम मार्ग का अनुसरण करेगी। वह किसी एक गुट का पिछलग्गू बनने की बजाय दोनों गुटों से उत्तम संबंध बनाए रखेगी। ट्रंप के भूकंप में वह भारत को चौकन्ना रखेगी।

लाल-हरी लाईट
-आलोक मिश्रा
हम तो ठहरे छोटे से कस्बे में रहने वाले छोटे से आदमी । जब हमारे कस्बे में कोई कालेज खुल जाये , कोई अस्पताल दस से बीस बिस्तर का हो जाए या किसी चौक पर किसी महापुरूष की मुर्ति स्थापित हो जाए ; तब हमें अपने कस्बे के विकसित होने का पता लगता हैं। भला हो मंत्रियों का जो अक्सर भूमिपूजन और उद्घाटन करके हमारे कस्बे के विकास से हमें परचित कराते रहतें हैं। हमारे कस्बे में पुरानी टाकीज थी ,जिस दिन माल खुला हमारा और आपका सीना छप्पन इंच का हो गया । कस्बे ऐसे ही कछुए की गति से विकास करते हैं हमारे कस्बे को यह गति पसन्द नहीं हैं । बस हमारे कस्बे ने एक दम से छलांग लगा कर शहरों में शामिल होने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया । इस प्रयास के चलते पहले तो कस्बे में पिज्जा औा बर्गर मिलने लगे फिर कुछ आई.सी. यू. और बड़े होटल खुल गए ।
हमारे कस्बे को इतने से ही संतोष कहाँ था ? हम अक्सर बड़े शहरों में जाते तो चौक -चौबारों पर लाल- हरी लाईट देखते । हमें लगता ये लाईट जिस दिन हमारे कस्बे मे लगेगी उस दिन ही हमारा कस्बा भी शहर हो जाएगा । हुआ भी ऐसा ही एक दिन हमारे कस्बे में भी ट्रेफिक सिग्नल लग गए । अरे वाह …… अब तो हम भी शहर में रहने वाले हो गए । अब ये लाल- हरी बत्तीयॉ दिन-रात अपनी गति से जलती रहती है और लोग अपनी गति से आते जाते रहते है । ऐसा लगता है कि हमारा कस्बा पूरे वर्ष दीपावली मनाने के मूड में हो । एक दिन एक बाहर की कार वाला चौक पर लाल लाईट देख कर रूक गया । आस-पास से जाते हुए हमारे कस्बाईयों ने उसे ऐसे देखा जैसे उससे बड़ा मुर्ख आज तक देखा ही न हो । वो बेचारा शर्मा गया और लाईट के हरे होने के पूर्व ही उसने अपना कृष्णमुख कर लिया ।
इन जलती- बुझती बत्तियों ने हमारे शहर को जो खूबसूरती प्रदान की है उसका वर्णन करना आसान नहीं है । हमें लगा था कि इन ट्राफिक लाईट रूपी फलदार पेड़ों की छाया में कुछ ट्राफिक वाले अपने फल का जुगाड़ तो कर ही लेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं । वे तो अब भी बिना लाईट वाले चौकों पर बड़ी तादाद में जमा हो कर जेबभरो आंदोलन चलाते रहते है । मुझे ऐसा लगता है कि इस पुनीत आंदोलन के लिए कुछ लोग अपना अतिरिक्त समय भी देते होंगे । अन्यथा स्टाफ की कमी से जुझ रहे विभाग के पास इतना बड़ अमला आता कहॉ से है । लोगों को मालूम है कि इस आंदालन से बचना कैसे है । लोग भी उनसे रास्ता बदल कर निकलने के लिए इन्हीं ट्राफिक सिग्नल वाले चौकों का प्रयोग करते है ।
एक दिन किसी बड़े अफसर को लगा कि कस्बे के लोग कितने मूर्ख है जो इन लाल- हरी लाईट तक को समझ नहीं पाते , बस उसने बिना किसी ठोस व्यवस्था के लोगों को सिग्नल पर स्वत: कैसे रूके यह सीखने का पुनीत अभियान प्रारम्भ कर दिया । हमारे कस्बे के सीधे -सादे लोग अब सुबह पॉच बजे भैसों को भी ”सिग्नल पर कैसे रूकना“ का अभ्यास कराने में लगे है ।
कस्बा बड़ा हुआ तो रोडें भी बढ़ी ,वाहन बढ़े और पैदल चलने वाले भी बढ़े । वाहनों की धमाचौकड़ी के बीच जेब्रा क्रॉसिंग हो तो कोई गधा भी उस पर चल कर जेब्रा हो जाए । यहॉ तो जेब्रों के लिए कोई क्रासिंग ही नहीं है । फुटपाथ पर तो गुमटी वाले और दुकानदारों का कब्जा है । बेचारा पैदल आदमी जाए तो जाए कहॉ ? एक पैदल आदमी को मैने लाल लाईट पर स्वत: ही रूकते देखा तो मै आपा ही खो बैठा । मेरी इच्छा उसके चरणस्पर्ष करने की हुई । भावनाओं पर नियंत्रण करते हुए मैनें उसे पूछा ” भाई साहब आप क्यों रूक गए ?“ वो बोला ” वैसे मुझे रोकने वाला यहॉ कोई है तो नहीं परन्तु मुझे लगा शायद मेरे रूकने से किसी को यहॉ की व्यवस्था का ख्याल आ ही जाए ।“
मुझे लगने लगा है कि जैसे इन चौकों को ट्राफिक सिग्नलों के भरोसे छोड़ कर सब सो गए है ; कहीं ऐसा तो नहीं कि हम जनता को भी उन्होनें हमारे हाल पर छोड़ दिया हो । हो सकता है कि ये ट्राफिक सिग्नल ”सोनम गुप्ता बेवफा है “ जैसा ही कोई गुप्त संदेष हो जो हमें यह बताने का प्रयास कर रहा हो कि अपनी – अपनी व्यवस्था स्वयम् देखो ; हमसे कोई अपेक्षा मत रखना । अब हमें सावधान तो उस बोर्ड़ को पढ कर ही हो जाना चाहिए जो हमारे कस्बे में प्रवेष करते समय बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा दिखाई देता है । जिस पर लिखा होता है ” मुस्कुराईए कि आप ………. में है ।“

मोहन भागवत की चेतावनी
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत का इस वर्ष का विजयादशमी संदेश काफी अर्थगर्भित रहा। कुछ लोग कह सकते हैं कि उन्होंने मोदी सरकार को खदेड़ने में कोताही कर दी। लेकिन इन लोगों से पूछा जाए कि क्या मोहनजी अपनी सरकार की खुली भर्त्सना करते ? जो सरकार संघ की तपस्या और परिश्रम के फलस्वरुप अस्तित्व में आई है, उसकी निंदा वे क्यों करें ? उनका काम प्रोत्साहित करना, परामर्श देना और सचेत करना है। ये तीनों काम उन्होंने अपने वार्षिक उदबोधन में ठीक से किए हैं। उन्होंने सरकार द्वारा हल किए गए दोकलाम-विवाद, कश्मीरी आतंकवाद पर लगाए गए अंकुश और विदेशों में चमकाई गई भारत की छवि पर प्रसन्नता व्यक्त की लेकिन नोटबंदी और जीएसटी जैसे मुद्दों पर उन्होंने साफ-साफ कहा कि सरकार को जनता की कठिनाइयों पर ध्यान देना चाहिए। किसानों, मजदूरों और छोटे व्यापारियों की तकलीफों को उन्होंने विशेष रुप से रेखांकित किया। उन्होंने सरकार के इरादों को ठीक बताया लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि जो भी नई नीतियां लागू की गईं, उनका आगा-पीछा अच्छी तरह सोचा जाना चाहिए था। लोगों की उन नीतियों पर क्या प्रतिक्रिया है, यह सरकार को ठीक-ठीक पता होना चाहिए याने यह सरकर केवल एकायामी है। संवाद नहीं करती, सिर्फ एकतरफा भाषण झाड़ती है, यह बात मोहनजी ने घुमा-फिराकर कह दी है। मोहनजी ने नीति आयोग और सरकार की आंकड़ेबाजी पर भी तीखा आक्षेप किया है। उन्होंने कहा है कि भारत की आर्थिक स्थिति को नापने-परखने के लिए सरकार ने जो विदेशी मापदंड बना रखे हैं, उनसे आप अपना पिंड छुड़ाएं और भारत की जमीनी सच्चाई को ध्यान में रखकर देश की आर्थिक स्थिति सुधारें। दूसरे शब्दों में उन्होंने सर्वज्ञजी को सलाह दी है कि आप नौकरशाहों की नौकरी करना बंद कीजिए, अपनी आंखों से उनका चश्मा उतारिए और एक स्वयंसेवक की आंखों से इस भारत देश को देखिए। उन्होंने कश्मीरी पंडितों, रोहिंग्या शरणार्थियों और गाोरक्षकों के बारे में भी अपनी दो-टूक राय रखी है। अच्छा होता कि वे अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व, नशाबंदी, शिक्षा और चिकित्सा की दुर्दशा पर भी कुछ कहते ताकि सरकार तो सरकार जनता को भी कुछ करने की प्रेरणा मिलती। अगली विजयादशमी तक तो ऐसे कई मुद्दों का ढेर लग जाएगा।

शहरी बुनियादी संरचना के लिए धन की जरूरत
(अजित वर्मा)
आवास और शहरी मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी का कहना है कि उनका मंत्रालय पिछले 2 वर्षों के दौरान शुरू किए गए नये शहरी मिशनों के तहत शहरी बुनियादी संरचना परियोजनाओं को तीव्र गति से लागू करने के लिए बाजार से उधार लेने पर विचार कर रहा है। त्वरित शहरीकरण की चुनौतियां और अवसरों पर ‘पब्लिक अफेयर्स फोरम ऑफ इंडिया’ ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम आयोजित किया था। इस अवसर पर श्री पुरी ने बुनियादी संरचना की कमी को दूर करने के लिए बड़े निवेश की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि नये शहरी मिशनों के तहत लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जरूरी राशि की उपलब्धता सुनिश्चित करने और विभिन्न आकस्मिक व्यय की पूर्ति के लिए सरकार बाजार से संसाधन जुटाने की योजना बना रही है। सरकार ने वर्ष 2022 तक आवश्यक राशि का आकलन कर लिया है और अब आवश्यक राशि की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बाजार से धनराशि उठाने के लिए एक विशेष उद्देश्य व्यवस्था (एसपीवी) का गठन विचाराधीन है।
श्री पुरी आश्वस्त कर रहे हैं कि न्यू अर्बन इंडिया का लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की सरकार कोई कोताही नहीं बरतेगी और टीम इंडिया की भावना से राज्य सरकारों और जिला प्रशासन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करेगी।
सरकार मानती है कि देश में अभी बदलाव का दौर चल रहा है और यह शहरीकरण इस उत्साही और चुनौतीपूर्ण यात्रा का एक हिस्सा है। सरकार जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन के क्रियान्वयन और नतीजों का समग्र मूल्यांकन करा रही है, जिससे कई उद्देश्य पूरे होंगे और यह शहरी क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए पहला ठोस कदम होगा।
यह सच है कि मूल्यांकन की शर्तों से जेएनएनयूआरएम के निश्चित लक्ष्यों, सुधारों के क्रियान्यन पर शहरी प्रबंधन में सुधार का आकलन, खामियों की पहचान और भौतिक एवं वित्तीय प्रगति में कमी की वजहों का पता चल सकेगा।
हम मानते हैं कि शहरी पुनरुद्धार के मौजूदा संदर्भ में यह मूल्यांकन शहरी प्रशासन और राज्य सरकारों के लिए एक उपयोगी मार्गदर्शन उपलब्ध कराएगा। सरकार के इस दावे का प्रमाणीकरण भी होना चाहिए कि वर्ष 2005-14 के दौरान लागू हुई जेएनएनयूआरएम योजना के अंतर्गत लागू की गई कुछ अधूरी परियोजनाओं को एक निश्चित मानक के आधार पर धनराशि मुहैया कराना मोदी सरकार ने जारी रखा है।
दरअसल, स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में पीपीपी पद्धति पर ज्यादा जोर दिया गया है और सरकार की कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा परियोजनाएं निजी क्षेत्र को सौंपी जायें। लेकिन बुनियादी संरचना परियोजनाओं के लिए सरकार को बड़ी हद तक स्वयं राशि जुटाना होगी। इसके लिए एक रास्ता बाजार से धन राशि उगाहने का है। यह स्वाभाविक है और सरकार के पास फिलहाल यही विकल्प उपलब्ध है। लेकिन यह जरूरी है कि सरकार अपनी योजना द्रुत गति से समयबद्ध आधार पर ही क्रियान्वित करे।

जेटली की केटली से गर्मागर्म चाय
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
श्री यशवंत सिन्हा और अरुण जेटली के बीच चली तकरार से क्या भाजपा को कोई फायदा हो रहा है ? सिन्हा अटलजी की भाजपा सरकार में वित्त मंत्री रह चुके हैं और जेटली आजकल मोदी सरकार में वित्तमंत्री हैं। सिन्हा ने एक अंग्रेजी अखबार में लेख लिखकर नोटबंदी और जीएसटी के लिए पूरी तरह जेटली को जिम्मेदार ठहराया है। इस पर जेटली को गुस्सा आ जाना स्वाभाविक है, क्योंकि नोटबंदी से बेचारे जेटली का क्या लेना देना ? जेटली ने तो कभी ये दावा भी नहीं किया कि वे इस महान क्रांतिकारी कदम के जनक हैं। वे वित्तमंत्री जरुर हैं लेकिन उन्हें शायद इसकी भनक भी नहीं थी कि मोदीजी नोटबंदी लानेवाले हैं। जब वे ले ही आए तो बेचारे जेटली क्या करते ? क्या वे मंत्रिमंडल में उनका विरोध करते ? वे विरोध कैसे करते ? वे तो संसद की अपनी सदस्यता के लिए भी मोदीजी के मोहताज़ हैं। क्या मुफ्त में मिली नौकरी (अपना वित्तमंत्री पद) छोड़ने की हिम्मत उनमें है ? नहीं है। इसीलिए सिन्हा ने जब उनका नाम घसीटा तो उन्होंने भी कह दिया कि सिन्हा 80 बरस से ऊपर हैं लेकिन नौकरी की तलाश में हैं। जब नरेंद्र मोदी-जैसा अति कृतज्ञ स्वयंसेवक या प्रधानसेवक आडवाणी और जोशी जैसे ‘बंद दिमागों’ को नौकरी देने के लिए तैयार नहीं है तो सिन्हा उससे किसी नौकरी की आशा कैसे कर सकते हैं ? सिन्हा ने स्वयं कश्मीर जाकर जो नई पहल की थी, उसे जानने के लिए हमारे ‘सर्वज्ञजी’ ने उन्हें दस मिनिट तक का समय नहीं दिया लेकिन उनके बेटे जयंत सिन्हा से उनके खिलाफ लेख लिखवा दिया। जयंत को राज्य वित्तमंत्री पद से हटाकर विमानन राज्यमंत्री बनाया गया है। जयंत अपने पिता ही नहीं, पिता के मित्रों का भी खूब सम्मान करता है लेकिन वह क्या करे ? वह भी जेटली की केटली से चाय पीने को मजबूर है। लेकिन वह जेटली से बेहतर निकला। उसने यशवंतजी के तथ्यों के जवाब में तथ्य और तर्क के जवाब में तर्क रखे लेकिन जेटली ने क्या किया ? जेटली ने अपनी केटली की गर्मागर्म चाय सिन्हा के सिर पर उंडेल दी। इसका लाभ कौन उठा रहा है ? इसका लाभ कांग्रेस को मिल रहा है। जेटली ने वित्तमंत्री मनमोहनसिंह और प्रणब मुखर्जी की तारीफ की और इन दोनों ने मोदी के महान फैसलों के बारे में जो कहा था, अब उसी का विस्तार सिन्हा ने अपने लेख में किया है।

भारतीय फौजें काबुल नहीं जाएंगी
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
अमेरिका के रक्षा मंत्री जेम्स मेटिस भारत क्यों आए ? इसीलिए कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजें हटा ली जाएं और उनकी जगह भारतीय सेनाएं अड़ा दी जाएं। 1981 के जनवरी माह में मैं अपने पुराने मित्र बबरक कारमल से काबुल में मिला तो उन्होंने ढाई-तीन घंटे की पहली मुलाकात में जो बात मुझसे सबसे पहले कही, वह यही थी कि रुसी फौजों के बदले अगर आपकी फौजें अफगानिस्तान आ जाएं तो बड़ी कृपा होगी। बबरक कारमल लगभग साल भर पहले ही अफगानिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे। हफीजुल्लाह अमीन की हत्या के बाद रुसी फौजें अफगानिस्तान में घुस गई थीं और उन्होंने कारमल के हाथों सत्ता सौंप दी थी। बबरक कारमल भारत के पुराने मित्र थे। वे थे तो कम्युनिस्ट (परचम पार्टी) लेकिन जवाहरलाल नेहरु और इंदिरा गांधी के बड़े प्रशंसक थे। उन्होंने ज्यों ही भारतीय फौजें काबुल भेजने की बात उठाई, मैंने उनको कई कारण बताए, जिनकी वजह से हम वहां फौज नहीं भेज सकते थे। बाद में हमारी प्रधानमंत्री इंदिराजी को जब यह मालूम पड़ा तो उन्होंने राहत की सास ली। अब अफगानों ने अमेरिका और नाटो की फौजों को पिछले 15 साल में इतनी मार लगा दी है कि वे भी रुसियों की तरह अपनी बला भारत के माथे टालना चाहते हैं लेकिन मुझे खुशी है कि हमारी नई रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन ने अमेरिकी रक्षा मंत्री को दो-टूक शब्दों में कह दिया कि भारतीय फौजें काबुल नहीं जाएंगी लेकिन हम सैनिकों को प्रशिक्षण, हथियार और उपकरण देंगे। भारत अभी तक 5000 अफगान सैनिकों को प्रशिक्षण दे चुका है। उसने चार एम-आई-25 हेलिकाॅप्टर भी दिए हैं। भारत की लगभग 3 बिलियन डाॅलर की सहायता से पिछले 50 साल में कई अस्पताल, स्कूल, बांध, बिजलीघर, सड़कें और पुल बन चुके हैं। भारत ने अफगान संसद भवन और जरंज-दिलाराम सड़क बनाकर एतिहासिक काम किए हैं। आज अफगानिस्तान के सीईओ (प्रधानमंत्री) डाॅ. अब्दुल्ला अब्दुल्ला एक व्यापार-प्रदर्शनी (भारत-अफगान) का उद्घाटन करेंगे। वे भारतप्रेमी नेता हैं। लगभग 250 अफगान व्यापारी दिल्ली आ गए हैं। भारत-अफगान व्यापार आजकल जितना है, उससे दस गुना बढ़ सकता है, बशर्ते कि पाकिस्तान भारतीय माल को अपनी सीमा में से जाने दे लेकिन ईरान के जरिए जरंज-दिलाराम सड़क का इस्तेमाल व्यापार-वृद्धि के लिए अब जोरों से होगा। पाकिस्तान खुश होगा कि भारतीय फौजें अफगानिस्तान नहीं जा रही हैं।

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