अलीगढ़, यह शहर ताला और तालीम के लिए मशहूर है। अगर इसमें हार्डवेयर को जोड़ दें तो और भी बेहतर। यहां के उत्पाद जर्मनी, श्रीलंका, पाकिस्तान, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन व सऊदी अरब तक धमक बनाए हुए हैं। कुटीर उद्योग इनकी सबसे बड़ी ताकत हैं, लेकिन मशीनीकरण, श्रम शक्ति व पर्याप्त बिजली न मिलने समेत अन्य समस्याओं से ये दम तोड़ रहे हैं। 10 साल में 1500 से अधिक कारखानों पर ताले लटक चुके हैं। इसके साथ ही से 800 से उद्योग धंधे बंद होने की कगार पर हैं।
देश के अलग-अलग शहरों में कई तरह के छोटे और लघु कारोबार चल रहे हैं। कभी इन छोटे और लघु उद्योगों से लाखों लोगों को रोजगार मिलता था। लेकिन सस्ता आयात बढ़ने और फैशन में बदलाव के साथ यह उद्योग अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। हालात यह हैं सरकारी मदद नहप मिल पाने के कारण कई शहरों में यह छोटे उद्योग या तो बंद हो चुके हैं या फिर बंद होने की कगार पर हैं। हम आपको ऐसे ही छोटे शहरों के उद्योगों के बारे में बताने जा रहे है जहां के उद्योग धंधे बंद होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। आज हम आपको अलीगढ़ के ताला कारोबार के बारे में बता रहे हैं।
चीन से मिल रही कड़ी टक्कर
पिछले 60 साल से देश के गांवों और शहरों में लोगों की संपत्ति की हिफाजत कर रहे अलीगढ़ के ताले मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। 3,500-4,000 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार करने वाले अलीगढ़ के इस उद्योग को चीन से कड़ी टक्कर मिल रही है।
अलीगढ़ में ताला बनाने वाली करीब 4000 इकाइयों पर महंगाई की मार भी पड़ रही है। कच्चे माल की लागत बढने से ताला निर्माताओं का मुनाफा घट रहा है। प्रतिस्पर्धा और महंगाई की मार से यहां के ताला निर्माता बिल्डिंग हार्डवेयर के कारोबार में कदम रख रहे हैं।
ताला लगने की नौबत
उत्तर प्रदेश का अलीगढ़ पूरे देश में ताला नगरी के रूप में मशहूर है। एक समय यहां पर पूरे देश की जरूरत के करीब 75 फीसदी ताले बनते थे। आज ताला नगरी का ताला उद्योग ताला लगने के संकट से जूझ रहा है। अलीगढ़ में ताला कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि आज यह कारोबार बुरी तरह से संकट से जूझ रहा है। पिछले कुछ सालों में 1500 से ज्यादा कारखानों पर ताला लग चुका है जबकि 1 हजार से ज्यादा कारखाने ताला लगने की कगार पर खड़े हैं। कभी लाखों लोगों को रोजगार देने वाले ताला कारोबार से इस समय मात्र 10 हजार लोग जुड़े हैं जबकि कारखानों की संख्या घटकर करीब 2 हजार रह गई है।
उधारी बनी बड़ा संकट
कारोबारियों का कहना है कि इस उद्योग से जुड़े लोगों की सबसे बड़ी समस्या उधारी है। कारोबारियों के अनुसार, बिक्री के अनुसार भुगतान नहप मिलने से पूंजी का संकट खड़ा हो जाता है। बड़े उद्योग इस संकट को झेल जाते हैं लेकिन छोटे कारखानों के मालिकों के सामने आर्थिक तंगी खड़ी हो जाती है। यही कारण है कि लगातार छोटे कारखाने बंद हो रहे हैं। जीएसटी और नोटबंदी में भी छोटे कारोबारियों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। इसके अलावा एमएसएमई में पंजीकरण न हो पाने के कारण कच्चे माल पर भी छोटे कारोबारियों को सरकारी छूट का लाभ नहप मिल पाता है।
बिल्डिंग हार्डवेयर और डाई कास्टिंग का काम भी चौपट
अलीगढ़ के कारोबारियों का कहना है कि कभी यहां पर बिल्डिंग हार्डवेयर, डाई कास्टिंग, पीतल की मूर्तियां और ऑटो पार्ट्स बनाने का काम भी खूब होता था। लेकिन सस्ते आयात और बदलते फैशन के कारण यह कारोबार पूरी तरह से चौपट हो गया है। इन उद्योगों के दम तोड़ने के पीछे सरकारी लाभ नहप मिलना भी बड़ा कारण रहा है।
कारोबारियों में बीडी गुप्ता, ताला-हार्डवेयर निर्माता दिनेश चंद्र, महासचिव, अलीगढ़ ताला हार्डवेयर निर्यातक एसोसिएशन,चंद्र शेखर शर्मा, अलीगढ़ ताला नगरी औद्योगिक एसोसिएशन,अन्नु सिंधी, सप्लायर, ताला-हार्डवेयर,राकेश अग्रवाल, निर्यातक आदि की मानें तो लघु उद्योग हमारे देश की रीढ़ हैं। इससे होने वाली आय से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। एक समय अपना शहर लघु उद्योग में काफी आगे था। यहां से बनने वाले उत्पादों की सात समंदर पार तक धमक थी। शहरी की संकरी गलियों के साथ ही बड़े बाजारों व मुहल्लों में लघु उद्योगों का जलवा था। यही कारण था कि देश में बेचे जाने वाले 70 फीसद तालों का उत्पादन अलीगढ़ में ही होता था।
उद्यमियों की मानें तो आधुनिकीकरण से कुटीर उद्योगों की नैया डूब रही है। मशीनीकरण से छोटे उद्योग चौपट हो रहे हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियां उत्पादन बढ़ाकर छोटे उद्योगों को चौपट कर रही हैं।
क्या कहते हैं ताला कारोबारी
आकांक्षा इंटरनेशनल इन्फ्राहार्डवेयर पवन खंडेलवाल का कहना है कि कुटीर उद्योग को मशीनीकरण से नुकसान हुआ है। श्रमशक्ति न होने से भी दिक्कतें हैं। हर साल तमाम कारखानों में ताला लग जाता है।
स्पाइडर मेटल प्रोडक्ट प्राइवेट लिमिटेड के संचालक राजकुमार अग्रवाल कहते हैं कि एक समय यहां के कुटीर उद्योगों का देश में जलवा था। सुविधाओं के अभाव में अब हाल खराब है। सुविधाएं न मिलने से उद्यमी दूरी बना रहे हैं।
सरकार उत्पादनों पर टैक्स बढ़ा रही है। इससे दिक्कतें हो रही हैं। बिजली आपूर्ति सही नहप हैं। दस साल तमाम लघु उद्योगों पर ताला लटक चुका है।
चाहिए राहत की चाबी
देश और विदेशों में अपनी अलग पहचान रखने वाले अलीगढ़ का ताला उद्योग अब बुरे दौर से गुजर रहा है। न आधुनिक तकनीक मिल पाई और न नई सुविधाएं। आर्थिक संकट के चलते उत्पादन भी प्रभावित है। इसे रतार के लिए केंद्र सरकार से राहत की जरूरत है। उद्योगपतियों और विशेषज्ञों का मानना है कि इस उद्योग के बढ़ावे के लिए रॉ मैटेरियल व बैंक से मिलने वाले लोन की व्याज दर पर सब्सिडी की जरूरत है। बजट में इसकी घोषणा के अलावा केंद्र सरकार को आधुनिक तकनीक और सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए।
व्यापार के क्षेत्र में यहां के ताला-हार्डवेयर उद्योग के पिछड़ने का सबसे बड़ा कारण ट्रांसपोर्ट व्यवस्था का ठीक न होना भी है। चीन एक सप्ताह के अंदर दुनिया के किसी भी कौने पर अपना माल पहुंचा देता है, जबकि यहां से डिलेवरी 28 दिन में पहुंच पाती है। देश के बंदरगाह तक माल पहुंचाने में कई जगह माल का ट्रांसफर होता है। इसके लिए उद्योगपति लंबे समय से कंटेनर डिपो की मांग कर रहे हैं। इस संबंध में केंद्र के मंत्रियों तक को ज्ञापन दिए जा चुके हैं।
जिले में ताला-हार्डवेयर, आर्ट वेयर, बिजली फिटिंग उत्पादन की करीब पांच हजार लघु-अतिसूक्ष्म व मध्यम इकाइयां हैं। इस कारोबार का 55 हजार करोड़ रुपये वार्षिक टर्न ओवर है। करीब पांच लाख लोग रोजगार से जुड़े हैं। अधिकांश फैक्ट्रियों में पारंपरिक तरीका से उत्पादन होता है। एक ही स्थान पर ताले की रिताई, फिटिंग, चाबी का कार्य न होने से उत्पादन लागत बढ़ती है। उद्योगपतियों का मानना है कि आधुनिक मशीनों के आने पर एक ही स्थान पर साभी कार्य हो सकेंगे। तब लागत में भी कमी आएगी।
ताला उद्योग को नोटबंदी व जीएसटी से तगड़ा झटका लगा है। इसके चलते यह उद्योग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार कमजोर हो रहा है। देश में नई कर व्यवस्था को लागू हुए सातवां महीना है। अबतक अदा किए गए जीएसटी का रिफंड नहप मिला है। इससे व्यापारी उद्यमी पर घनघोर आर्थिक संकट हैं।
राजस्थान के राज्यपाल पूर्व मुख्यमंत्री ने की तालानगरी स्थापति
राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल एवं पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने 1992 में रामघाट रोड पर ताला- हार्डवेयर उद्योग के विकास के लिए ताला नगरी की स्थापना की थी। 26 साल बाद भी इस नगरी का विकास नहप हो सका है। कुल 1100 प्लॉटों में से चार सौ प्लॉट आवंटित हो सके। करीब तीन सौ फैक्ट्रियां संचालित हैं। पंजाब, हरियाणा, गुजरात व दिल्ली के उद्योगपतियों ने यहां प्लाट तो लिए, लेकिन उद्योग नहप लगाए। उद्योगपतियों की मांग है कि केंद्र सरकार अन्य राज्यों के उद्योगपतियों को यहां उद्योग लगाने के लिए प्रोत्साहित करने वाली योजनाएं लागू करे, ताकि यह नगरी विकसित हो सके।
इन देशों में माल की होती है सप्लाई
अलीगढ़ की ताला फैक्ट्रियों से अमेरिका, खाड़ी देश, जर्मनी, फ्रांस, इग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, नेपाल, बांगलादेश, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में ताला-हार्डवेयर, पीतल की मूर्ति व यूरोपियन फिगर, बिजली फिटिंग के उत्पादन की सप्लाई होती है।
अनदेखी से पिछड़ा उद्योग
यहां का उद्योग सरकार की अनदेखी से पिछड़ रहा है। सरकारी सब्सिडी पर उद्यमियों को लोन दिलाया जाए। कॉमन फेसलिटी सेंटरों के नाम पर व्यापारियों के साथ मजाक न हो। इन्हें अपडेट किया जाए।
अलीगढ़ के ताला कारखानों पर लटका ताला,मंदी के दौर से गुजर रहा व्यापार