बहिनजी के लिए सोचने-समझने का समय, एमपी में घटा जनाधार

भोपाल, पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने जितना भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस को प्रभावित किया है, उतना ही बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को भी किया है। भाजपा की हार में सभी पार्टियां अपनी जीत भले ही देख रही हों, लेकिन सीटों की संख्या और मत प्रतिशत में उतार-चढ़ाव के हिसाब से बसपा के लिए अपनी स्थिति के बारे में सोचने का समय आ गया है। इन चुनाव परिणामों ने यह संकेत भी दे दिया कि अब कांग्रेस को गंभीरता से लेने का समय आ गया है। दरअसल, राजस्थान में बसपा की सीटों में बढ़ोतरी हुई है लेकिन पार्टी के लिए महत्वपूर्ण मध्य प्रदेश में उसकी सीटें कम हो गईं हैं। राजस्थान में मायावती के नेतृत्व वाली बसपा की पिछली बार 3 सीटें थीं, जो अब बढ़कर 6 सीटें हो गई हैं। लेकिन, मध्य प्रदेश में उसका जनाधार कम हुआ है। यहां पिछले चुनाव में बसपा ने 4 सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार उसे केवल दो सीटों पर ही जीत हासिल हुई है। यह बसपा के लिए मध्यप्रदेश में घटते जनाधार का स्पष्ट संकेत है। इसको लेकर मायावती चिंतित हो उठी हैं।
उन्हें यह डर भी सता रहा है कि उनके 10 विधायकों को कोई तोड़ न ले। इसलिए उन्होंने बुधवार को पार्टी के बड़े नेताओं के साथ विधायकों की बैठक राजधानी दिल्ली में बुलाई है। इस बैठक में भविष्य की रणनीति पर चर्चा की जाएगी।
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस मध्प्रदेश और राजस्थान में बसपा से गठबंधन करने के प्रयास में थी, लेकिन अंतिम समय में बसपा गठबंधन से पीछे हट गई थी। इसके बाद दोनो ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। हालांकि, छत्तीसगढ़ में उन्होंने कांग्रेस की जगह पूर्व कांग्रेसी अजित जोगी का दामन थाम लिया। छत्तीसगढ़ में मायावती का फैसला सही साबित नहीं हुआ वहां कांग्रेस ने जबर्दश्त जीत हासिल की। छत्तीसगढ़ में बसपा के हिस्से में केवल दो सीटें ही आ सकीं। 2013 के मुकाबले उसका वोट शेयर भी काफी गिर गया है। राज्य में बसपा का वोट शेयर पहले 4.45 फीसदी था, जो अब घटकर 3.8 फीसदी रह गया है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस को भी बसपा के साथ आने से फायदा होता और भाजपा के साथ बनी मौजूदा स्थिति में उसके पास बढ़त होती। फिलहाल दोनों पार्टियों के पास करीब 41 फीसदी मतदाता हैं। बसपा को जो 4.9 फीसदी वोट मिले हैं, वह कांग्रेस के लिए मददगार साबित हो सकते थे। हालांकि, बसपा का वोट शेयर यहां सन 2013 के 6.29 फीसदी से नीचे गिरा है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास बहुमत के आंकड़े 116 से सिर्फ तीन सीटे कम हैं और भाजपा भी ज्यादा पीछे नहीं है। उधर राजस्थान में कांग्रेस 99 के बहुमत के आंकड़े के पास है। बीएसपी के 3.8 फीसदी वोट शेयर से गठबंधन आराम से जीत जाता। इस स्थिति को देखने के बाद बसपा प्रमुख पर अपनी सियासी रणनीति में बदलाव करने का दबाव बनाया है। इसका अर्थ यह है कि भाजपा विरोधी खेमे की शक्ल में अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले बदलाव देखा जा सकता है। कांग्रेस समाजवादी पार्टी या बीएसपी से गठबंधन में बड़ा हिस्सा लेने को दबाव बना सकती है। अब तक दोनों पार्टियां उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से ज्यादा ताकतवर होने का दावा करते हुए उसे जगह न देने की कोशिश कर रही थीं।

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