कल से दो दिन तक दिल्ली में जुटेंगे किसान, संसद पर करेंगे प्रदर्शन

नई दिल्ली,पदयात्रा करते हुए पूरे देश से किसानों एक बार फिर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली ओर तरफ बढ़ना शुरू कर दिया है। 29 और 30 नवंबर को दिल्ली आने वाले आठ प्रमुख मार्ग किसान, मजदूर और वंचित महिलाओं से पट जाएंगे। इस दौरान किसान संगठनों के हजारो सदस्य प्रदर्शन कर अपनी मांगों के प्रति केंद्र सरकार का ध्यान आकर्षित करेंगे। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के आह्वान पर देशभर के दो सौ से ज्यादा किसान-मजदूर संगठन दो दिनों तक देश की राजधानी दिल्ली में जुटेंगे। यह कोई पहली बार नहीं है जब किसान दिल्ली आ रहे हैं। इसी साल 2 अक्टूबर को जब किसानों का जत्था दिल्ली में प्रवेश करना चाह रहा था तो दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा का हवाला देते हुए बॉर्डर सील करके किसानों को दिल्ली के बाहर ही रोक दिया था। इस दौरान प्रदर्शनकारी किसानों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प भी हुई थी।
‘किसान मुक्ति यात्रा’ में शामिल होने प्रदर्शनकारी दिल्ली के जंतर-मंतर पर एकत्र होंगे और फिर वहां से संसद के लिए मार्च करेंगे।
‘किसान मुक्ति यात्रा’ के आयोजकों ने इसी साल 19 सितंबर को देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नाम एक खुला पत्र लिखा था जिसमें किसानों की मांगों के बारे में विस्तार से जिक्र है। इस पत्र में लिखा गया है, ‘देश भर के लगभग 200 किसान संगठनो तथा हमारे देश के लाखों किसानों, मजदूरों और खेत मजदूरों का प्रतिनिधित्व कर रही अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति जो कि उनके रोजगार को बचाने की लड़ाई लड़ रही है। किसान दिल्ली में तीन दिवसीय किसान मुक्ति मार्च आयोजित का आयोजन करेंगे। हम आपसे निवेदन करते हैं कि आप उनकी 21 दिनों का संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग को स्वीकाए करने का कष्ट करें। यह सत्र पूरी तरह से कृषि संकट तथा उससे संबंधित मुद्दों पर चर्चा करने के लिए होगा।
खेती-किसानी और गांव-देहात की समस्याओं पर लिखने-बोलने वाले वरिष्ठ पत्रकार पी. साईंनाथ ने पिछले दिनों एक सम्मेलन में बताया था कि अगर सरकार 21 दिनों का विशेष सत्र बुलाती है तो उसका प्रारूप कैसा हो सकता है। एमएस स्वामीनाथन समिति ने कृषि पर साल 2004 से 2006 के दौरान पांच रिपोर्ट दी थीं। जिनमें न्यूनतम समर्थन मूल्य के अलावा फसलों की पैदावार, मुनाफा, तकनीक बढ़ाने पर जोर दिया गया।
साथ ही मौसम की मार से किसानों को बचाने के लिए उपयुक्त सुरक्षा की जरूरत बताई। संसद के सेंट्रल हॉल में उन किसानों की पीड़ा सुनी जाए जिनकी जिंदगियां इस कृषि संकट में तबाह हो गईं। इनकी मांग है कि यह संकट महज कृषि तक सीमित नहीं है। निजीकरण के कारण शिक्षा और इलाज गांव के गरीबों को महंगा पड़ रहा है। इनका मानना है कि स्वास्थ्य पर पड़ने वाला खर्च सबसे तेजी से बढ़ा है जो ग्रामीणों के कर्ज का प्रमुख अंग है। कर्ज किसानों की आत्महत्या का प्रमुख कारण है। इससे लाखों परिवारों की जिंदगियां तबाह हो गईं।
यह संकट बाढ़ और सूखे से कहीं ज्यादा है। संगठन का आरोप है कि सरकार तर्कसंगत मूल्य निर्धारण की आड़ में पानी का निजीकरण कर रही है। इनकी मांग है कि पीने के पानी का अधिकार संविधान के मौलिक अधिकार में शामिल किया जाए और जीवन देने के संसाधनों का निजीकरण बंद हो। इन संसाधनों पर समाज का नियंत्रण होना चाहिए अविशेषकर भूमिहीनों का।

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