मुख्य सचिव बी.पी. सिंह ने उत्तराखंड में मध्यप्रदेश की भू संपत्ति को औने-पौने दामों पर बेचा

भोपाल,मध्यप्रदेश की उत्तराखंड के हरिद्वार में स्थित भू संपत्ति औने-पौने दामों पर बेचने का मामला सामने आया है। इस मामले में प्रदेश के मुख्य सचिव बसंत प्रताप सिंह पर भू माफिया से संत-गांठ कर हरिद्वार में 100 करोड़ की जमीन 50 लाख में एक को बेचने का आरोप है। सूत्रों के मुताबिक बसंत प्रताप सिंह ने इन्दौर संभागायुक्त रहते हुए इंदौर के खासगी देवी अहिल्या बाई होल्कर चेरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टी की हैसियत से एक ऐसे प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिये थे जिसकी संपत्ति मध्यप्रदेश सरकार के अधीन थी। यही नहीं इस मामले की सुनवाई जब नैनीताल कोर्ट में की गई तब भी सरकार ने ढिलाई बरती।
ज्ञात रहे कि 1948 में भारत सरकार, मध्य भारत सरकार एवं इन्दौर के तत्कालीन महाराजा श्रीमंत यशवंत राव द्वितीय के बीच किये गये करार के दौरान होल्कर राज्य की बहुत सारी सम्पत्ति मध्यप्रदेश सरकार के अधीन आ गई थी। ऐसी ही जमीन उत्तराखण्ड के हरिद्वार में होल्कर राज्य की संपत्ति के रूप में थी।
भारतीय ट्रस्ट अधिनियम का उल्लंघन करते हुए ट्रस्टी सतीशचंद्र मल्होत्रा ने ट्रस्ट को गुमराह करते हुए अपने आप को मुख्तारनामा देने हेतु अधिकार प्राप्त किए एवं उक्त अधिकार का क्रिमिनल दुरूपयोग करते हुए हरिद्वार के भू माफिया राघवेंद्र सिखौला को बुलाकर 100 करोड़ की भू संपत्ति जिसमें लोकमाता अहिल्या बाई होलकर द्वारा प्राचीन शिव मंदिर स्थापित किया गया था को मात्र 50 लाख रूपए में बेच डालने की पॉवर आॅफ अटार्नी जारी कर दी गई। भू माफिया ने आनन—फानन में शिव मंदिर के पुरातात्विक एवं धार्मिक महत्व को दरकिनार करते हुए तोड़ डाला एवं वहां होटल का निर्माण कर दिया।
उक्त सौदे के विरूद्ध की गई शिकायत की जांच करते हुए उत्तराखंड के गढ़वाल आयुक्त कुणाल शर्मा ने वर्ष 2012 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में उक्त कृत्य को गंभीर आपराधिक मामला घोषित करते हुए संपूर्ण भारत में देवी अहिल्याबाई होलकर की संपत्तियों को ठिकाने लगाने की आशंका के मद्देनजर सीबीआई जांच की संस्तुति कर डाली। उक्त रिपोर्ट की विधिवत जानकारी होने के बावजूद मध्यप्रदेश व उत्तराखंड सरकार ने इस आपराधिक मामले की रोकथाम के बजाय चुप्पी साध ली।
शिकायतकर्ता को मजबूरन न्याय के लिए उच्च न्यायालय, उत्तराखंड की शरण लेना पड़ी परंतु उच्च न्यायालय ने न्याय प्रक्रिया का खुला मखौल उड़ाते हुए रिट याचिका को इसलिए खारिज कर दिया कि तीन बार बुलाए जाने के बावजूद मध्यप्रदेश सरकार अपनी संपत्ति को बचाने के लिए एक शब्द बोलने को उपस्थित नहीं हुई। अपील किए जाने पर मध्यप्रदेश सरकार, सुप्रीम कोर्ट दिल्ली का नोटिस होने पर भी नकारती रही और अंत में जब चेतावनी देते हुए उन्हें उपस्थित होने को मजबूर होना पड़ा तो यह कह कर कि मामले को हम चुनौती देंगे, अपने मालिकाना अधिकार से ही जी चुराने की घोषणा कर दी। (आदेश 5104/2017) माननीय सुप्रीम कोर्ट के द्वारा मध्यप्रदेश को अपना पक्ष उत्तराख्ंड हाईकोर्ट में रखने के लिए 12 सप्ताह का समय मिला परंतु मध्यप्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना करते हुए चुप्पी साधकर बैठ गई। 12 सप्ताह का समय बीत जाने के बाद पुन: नैनीताल हाईकोर्ट ने 11 अप्रैल तक मध्यप्रदेश सरकार को मुख्य सचिव के नाम संबोधित दस्ती नोटिस जारी किया, जो दिनांक 02.04.2018 को सुपुर्द कर दिया गया है । मध्यप्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार में लिप्त होने का साक्षात प्रमाण इस तथ्य से भी प्रमाणित होता है कि ऐसे ही एक अन्य मामले में इसी ट्रस्ट व इसकी अध्यक्ष उषाराजे होलकर के विरुद्ध मा. सुप्रीम कोर्ट अपने आदेश दिनांक 15.7.2015 के द्वारा फैसला सुना चुका है जिसमें उक्त ट्रस्ट व इसकी अध्यक्ष को किसी प्रकार के भू स्वामित्व का अधिकार साफ तौर पर नकार दिया गया है। मध्यप्रदेश सरकार 2014 से ही एक ऐसे ही मामले में अपनी अपील, जो उन्होंने मप्र हाईकोर्ट, इंदौर में 92/2014 के अंतर्गत दाखिल की थी, में भी चुपपी साधे हुए है एवं लगातार भारत के अन्य हिस्सों जैसे पुष्कर (राजस्थान), गोकर्ण (कर्नाटक) और न जाने कितने स्थानों पर मप्र सरकार की बेशकीमती हैरिटेज संपत्तियों को कौड़ियों के दाम पर ठिकाने लगाने का काम बदस्तूर जारी है।

 

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