नई दिल्ली,किसी विधानसभा या लोकसभा सीट पर नोटा को विजयी प्रत्याशी से ज्यादा वोट पड़ते हैं, तो ऐसी स्थिति में क्या होगा। इसे लेकर चुनाव आयोग में गहन मंथन शुरू हो चुका है। ऐसे हालात से निबटने के लिए आयोग ने राजनीतिक दलों से सुझाव भी मांगे हैं। वहीं पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त नियमों का हवाला दे, दोबारा वोटिंग नहीं कराने की सलाह दे रहे हैं। २०१३ में नोटा लागू होने के बाद से अभी तक सभी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में १.३३ करोड़ से ज्यादा नोटा वोट पड़ चुके हैं। वहीं इस बार हो रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में १३ लाख ५६ हजार वोट नोटा को गए हैं। हाल ही में हरियाणा राज्य चुनाव आयोग ने पांच जिलों में होने वाले नगर निगम चुनाव में नोटा को ज्यादा वोट मिलने की स्थिति में दोबारा चुनाव कराने का फैसला किया है। राज्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने नोटा को एक प्रत्याशी की तरह गिनने का फैसला किया है, साथ ही कहा है कि ऐसे हालात में पहले वाले सभी प्रत्याशी अयोग्य घोषित हो जाएंगे। इससे पहले देश में पहली बार महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग ने भी ऐसा ही फैसला दिया था, जिसमें नोटा को ज्यादा वोट मिलने की स्थिति में स्थानीय निकाय चुनावों को फिर से कराया जाए और चुनाव में कोई भी विजयी घोषित नहीं किया जाएगा।
क्या कहता है नोटा कानून?
नोटा कानून में इस स्थिति को लेकर कुछ स्पष्ट नहीं है। आयोग के पास सभी विकल्प खुले हैं। आयोग भी चुनाव संचालन नियम, १९६१ के नियम संख्या ६४ में संशोधन का पक्षधर है और जल्द ही संशोधनों को प्रस्तावित करेगा। वहीं पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी महाराष्ट्र और हरियाणा राज्य चुनाव आयोग के फैसलों को गलत ठहराते हैं। उनका कहना है कि ऐसे हालात में दोबारा वोटिंग करना अवैध है। कुरैशी के मुताबिक नोटा को ज्यादा वोट मिलने की स्थिति में दोबारा चुनाव कराने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि अगर किसी चुनाव में १०० में से नोटा को ९९ वोट मिलते हैं और प्रत्याशी को एक वोट मिलता है, तो ऐसे में प्रत्याशी को विजयी माना जाएगा। जून २०१० से जुलाई २०१२ तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे कुरैशी के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि नोटा, नकारात्मक विचार रजिस्टर रखने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि नोटा को ज्यादा वोट मिलने से सभी प्रत्याशियों की हार नहीं मानी जा सकती या चुनाव रद्द नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि नोटा का मतलब होता है कि वोटर खुद को उस चुनाव से अलग रखना चाहता है और अपनी गोपनीयता सुनिश्चित रखना चाहता है, ताकि कोई उसकी जगह फर्जी वोट न डाल सके।
– नोटा कैसे बनेगा असरदार
आयोग सूत्रों की माने तो आयोग के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है कि वह फिर से चुनाव करवा सके। नोटा की पवित्रता को बनाए रखने और यहां तक कि नए चुनावों का आदेश देने के लिए नियम ६४ में बदलाव करने होंगे और इसके लिए संसद की मुहर लगनी जरूरी नहीं है, बल्कि कानून मंत्रालय ही इसे मंजूरी दे सकता है। चुनाव के परिणाम और चुनाव की वापसी की घोषणा पर नियम ६४ कहता है कि रिटर्निंग अफसर के पास उसी प्रत्याशी को विजयी घोषित कर सकता है जिसे सबसे ज्यादा वैध वोट मिले हों। साथ ही नियम ६४ में इस बात कोई उल्लेख नहीं है कि नोटा को ज्यादा वोट मिलने की स्थिति में क्या किया जाए।
कहां, कितना दबा नोटा?
वहीं इस बार ५ राज्यों के विधानसभा चुनावों में मध्यप्रदेश को सबसे ज्यादा ५१८०८१ (१.५ प्रतिशत), राजस्थान ४५५८८७ (१.३ प्रतिशत), तेलंगाना में २११८६ (१.१ प्रतिशत), छत्तीसगढ़ में २१९४५ (२.१ प्रतिशत) और मिजोरम में २९१७ (०.५ प्रतिशत) वोट नोटा को पड़े हैं। इससे पहले कर्नाटक चुनाव में ०.९ फीसदी (३,२२,८२९) वोटरों ने नोटा पर बटन दबाया था। वहीं एडीआर आंकड़ों के मुताबिक २०१३ में लॉन्च होने के बाद से नोटा में को अभी तक लोकसभा और विधानसभा चुनावों में १.३३ करोड़ वोट मिले हैं। जिनमें सबसे ज्यादा वोट २०१५ के बिहार विधानसभा चुनावों में पड़े थे। वहीं २०१३ में छत्तीसगढ़ में ३.६ प्रतिशत वोट नोटा के पक्ष में पड़े थे। २०१३ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद नोटा का विकल्प दिया था और २०१५ में नोटा का सिंबल जारी किया गया। नोटा का प्रयोग सबसे पहले २०१३ में छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान, मध्यप्रदेश और दिल्ली विधानसभा चुनाव में हुआ। इसके बाद २०१४ में हुए लोकसभा चुनाव में भी नोटा का इस्तेमाल हुआ। २०१५ तक देशभर के सभी लोकसभा और विधानसभा चुनावों पूरी तरह नोटा लागू हो गया।
अगर नोटा को मिले विजयी प्रत्याशी से ज्यादा वोट? चुनाव आयोग में मंथन शुरू