जोधपुर,जोधपुर की जिला अदालत ने आसाराम को नाबालिग के साथ रेप का दोषी पाए जाने के बाद उम्रकैद की सजा दे दी है। आसाराम के साथ उसके गुनाहों में भागीदार शिल्पी और शरतचंद्र को 20-20 साल की कठोर सजा सुनाई गई है। लेकिन शिल्पी और शरतचंद्र, आसाराम के गुनाहों में कड़ी मात्र थे। पीड़िता को फंसाने की पूरी साजिश दरअसल खुद आसाराम ने रची थी। अपने शिष्य की बेटी और पोती के समान लड़की के साथ आसाराम की साजिश किसी बॉलीवुड के खलनायक जैसी ही थी। पुलिस जांच रिपोर्ट में यह हैरान करने वाला खुलासा हुआ है। यह रिपोर्ट बताती है कि आसाराम कोई संत नहीं बल्कि साजिशों का झांसाराम है। आज हम आपको बताएंगे साधु के भेष में बलात्कारी आसाराम की घिनौनी करतूत का पूरा प्लान। मई-जून 2012 में आसाराम ने पहली बार हरिद्वार में पीड़ित नाबालिग लड़की को देखा था। उस समय वह आसाराम के छिंदवाड़ा आश्रम की ओर से चलाए जा रहे स्कूल में पढ़ती थी और आसाराम के हरिद्वार में आयोजित पूजा कार्यक्रम में हिस्सा लेने स्कूल की ओर से ही हरिद्वार गई हुई थी। तब पीड़िता की उम्र 15 साल थी। हरिद्वार में पूजा कार्यक्रम में ही पहली बार आसाराम की बुरी नजर पीड़िता पर गई थी। उस वक्त हरिद्वार के आश्रम की इंचार्ज आसाराम की पक्की राजदार शिल्पी उर्फ संचिता गुप्ता थी। पीड़िता ने कोर्ट में दिए बयान में कहा है कि 2012 में आसाराम ने आशीर्वाद देने के नाम पर उसे गलत जगह छुआ था, लेकिन तब उसने सोचा कि एक दादा की उम्र के उसके ‘भगवान’ की कोई गलत भावना नहीं रही होगी। आसाराम की गंदी नजर पीड़िता पर पड़ चुकी थी और मानसिक रूप से बीमार आसाराम जनवरी 2013 में छिंदवाड़ा जा पहुंचा। गुरुकुल के छात्रों को शिक्षित और संस्कारी करने के कार्यक्रम के दौरान उसने एकबार फिर उस लड़की को देखा। तब उसने अपने गुनाहों के राजदार छिदवाड़ा आश्रम के निदेशक शरतचंद्र को कहा कि शिल्पी को छिंदवाड़ा लेकर आते हैं। बिना किसी वजह के संचिता गुप्ता उर्फ शिल्पी का ट्रांसफर छिंदवाड़ा के आश्रम में कर दिया गया। शिल्पी का वह ट्रांसफर लेटर है, जिसे सबूत के तौर पर पुलिस ने कोर्ट में रखा है। इस लेटर में लिखा है कि संचिता गुप्ता, पुत्री महेंद्र गुप्ता का ट्रांसफर छिंदवाड़ा के गुरुकुल के संचालिका के पद पर किया जाता है। एक अप्रैल 2013 को शरदचंद्र छिंदवाड़ा गुरुकुल का निदेशक बन गया और संचिता गुप्ता उर्फ शिल्पी संचालिका बनाई जाती है। दरअसल, शिल्पी को छिंदवाड़ा भेजने का मकसद नाबालिग लड़की को आसाराम के जाल में फंसाना था। छिंदवाड़ा आश्रम पहुंचकर शिल्पी ज्यादा से ज्यादा समय पीड़िता के साथ बिताने लगी। एक दिन पीड़िता के पेट में दर्द उठा तो शिल्पी ने दवा दिलवाने के बजाय कह दिया कि उस पर भूत-प्रेत का साया है। इसे शिल्पी और शरतचंद्र ने आसाराम के शिकार के लिए मौके के रूप में लिया। शरतचंद्र पर जिम्मेदारी थी कि वह पीड़िता के मां-बाप को समझाए कि वह पीड़िता को आसाराम के पास ले जाएं, जबकि शिल्पी पर जिम्मेदारी थी कि वह पीड़िता को आसाराम के पास जाने के लिए समझाए।
आसाराम ने खुद रची थी पीड़िता को फंसाने की साजिश