मप्र में अब निजी क्षेत्र को सौंपे जा सकेंगे जंगल, एक हजार एकड़ तक का ले सकेंगे कक्ष

भोपाल,मप्र में “निजी” निवेशक एक साथ 1000 एकड़ तक का एक कक्ष ले सकेंगे। एक कंपनी कितने कक्ष ले सकेगी इस बारे में कोई सीमा तय नहीं की गई है । यह लीज 30 वर्षों के लिए दी जायेगी। हाल में शिवराज सरकार के इस निर्णय के आधार पर मध्यप्रदेश के प्रधान वन संरक्षक ने 20 अक्टूबर को यह आदेश भी जारी कर दिया। इस आदेश के मुताबिक़ इन 30 वर्षों में ये निजी कंपनियां क्या क्या कर सकेंगी। इस बात का भी कहीं जिक्र नहीं किया गया है कि वे क्या क्या नहीं कर सकेंगी।
बिगड़े वनो में सुधार के नाम पर शुरू की जाने वाली इस योजना में साफ़ प्रावधान है कि जो वन क्षेत्र उन्हें सौंपा जाएगा जरूरी नहीं कि वह पूरी तरह बिगड़ा वन क्षेत्र हो – प्रावधान के मुताबिक़ 60 प्रतिशत बिगड़े (कम छाया वाले जंगल) के साथ 40 फीसद घने जंगल वाला वन क्षेत्र भी सौंपा जाएगा। इसके साथ उससे सटी राजस्व भूमि भी दिए जाने का प्रावधान इस प्रक्रिया में किया गया है।
इसका उद्देश्य वानिकी क्षेत्र में नई पूँजी, तकनीक और प्रबंधकीय कौशल बताया गया है। निजी निवेशक से प्राप्त राशि का आधा हिस्सा वन ग्राम समिति/ ग्राम सभा (पंचायत नहीं) को दिए जाने और वन सुधार की योजना में वन क्षेत्र पर आधारित समुदाय की सहमति की बात भी काफी अस्पष्ट है – इसमें पंचायत या ग्राम सभा का उल्लेख नहीं किया गया है।
आदेश निजी निवेशकों के लाभ की पूरी गारंटी करता दिखता है। इसमें कहा गया है कि “क्षेत्र का चयन सिंचाई के पानी की उपलब्धता की प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा।” इसी के साथ “पूरी तरह से अतिक्रमण मुक्त क्षेत्र” देने की बात की गयी है। इससे स्पष्ट है कि इसे सौंपने के पहले उन कुछ लाख परिवारों की जबरिया बेदखली किया जाना तय है जिन्हे शिवराज सरकार ने वनाधिकार के पट्टे के जायज अधिकार से वंचित रखा हुआ है।
हालांकि आदेश केंद्र सरकार से अनुमति पाने के बाद प्रक्रिया शुरू करने की बात कहता है किन्तु आदेश के साथ ही उस प्रारूप को भी जारी कर दिया गया है जिसमे इच्छुक निजी कंपनियां आवेदन कर सकती हैं।
पिछली 15 वर्षों में ऐन घने तथा संरक्षित जंगल की जमीन और नदियाँ निजी कंपनियों को देने की कारगुजारियां दिखा चुकी भाजपा सरकार अब पूरी तरह देसी विदेशी कंपनियों के कब्जे वनो पर कराने की आतुरता दिखा रही है।
इस आदेश को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के “वनो में भी उद्योग लगाने की छूट” वाले बयान के साथ पढ़ने से खतरा और अधिक साफ़ हो जाता है। जाहिर है प्रदेश के पर्यावरण और आदिवासी तथा परंपरागत वन वासियों के अधिकारों के लिए संघर्षरत संगठनो ने इस आदेश को काफी चिंता के साथ लिया है। अखिल भारतीय किसान सभा तथा आदिवासी एकता महासभा आने वाले दिनों में इस आत्मघाती, पर्यावरण विनाशी तथा आदिवासी एवं परम्परागत वनवासी विरोधी आदेश को वापस कराये जाने हेतु साझे अभियान तथा आंदोलन संगठित करेगी ।

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