सोनभद्र,सोनभद्र के उभ्भा गांव में पिछले दो दिनों से मातम पसरा है। यहां हुए जमीन विवाद की परिणिति इतनी भयावह थी कि हिंसा में 10 लोगों की जान चली गई। तंगहाली और रोजमर्रा की तमाम दिक्कतों के बावजूद मंगलवार तक इस गांव में जिंदगी गुलजार थी। छोटी-छोटी खुशियां ही गांव वालों के लिए जीने का सहारा थीं पर गुरुवार से यहां का मंजर बदला हुआ है। गांव में घुसते ही सिसकियां सुनाई देती हैं। कोई बेटे की मौत से गमजदा है तो किसी के सिर से पिता का साया उठ गया है।
सोनभद्र की घोरावल तहसील के उभ्भा गांव में एक साथ 10 लोगों की मौत होने के कारण कंधा देने के लिए कंधे कम पड़ गए हैं। कई घरों में ताले लटके हैं। पड़ोसियों से पूछने पर टका सा जवाब मिलता है, ‘कल तक तो थे’। 70 पार कर चुके हरिवंशराम के 40 साल के बेटे अशोक को भी जमीन के विवाद में हुए संघर्ष के दौरान गोली लगी। सोनभद्र से बीएचयू ट्रॉमा सेंटर ले जाते वक्त उसने दम तोड़ दिया। जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके हरिवंशराम ने अशोक से कहा था कि उनका अंतिम संस्कार काशी में किया जाए ताकि उन्हें मोक्ष मिल सके। हरिवंशराम का कहना है कि पिता के कंधों पर बेटे के शव का बोझ बहुत ज्यादा महसूस होता है।
गांव में ही पेड़ के नीचे बैठी शंतिया की आंखों के आंसू सूख गए हैं। बेटे महेंद्र को गोली लगी है, इलाज चल रहा है। भगवान से यही प्रार्थना कर रही हैं कि उसकी जान बच जाए। बुधवार का मंजर याद करते ही चेहरे पर मौजूद दुख के भाव खौफ में बदल जाते हैं। कहती हैं, ‘ग्राम प्रधान यज्ञदत्त अपने साथ 100 से ज्यादा लोगों को कई ट्रैक्टरों पर लादकर हम लोगों का खेत जोतने पहुंचे। उसके बाद जो कत्ल-ए-आम हुआ, वैसा मंजर कभी नहीं देखा था।’ रामबली के घर में दो मौते हुई हैं। बड़े भाई रामसुंदर (50) और छोटे भाई की पत्नी सुखवंती की जान संघर्ष में चली गई। रामबली नजरें जमीन की ओर करके खुद को संभालने की कोशिश कर रहे हैं। रुंधे गले से कहते हैं, ‘भैया, पिता जैसे थे। सिर से बड़े का साया उठ गया। हिंसा में 45 वर्षीय बासमती देवी की भी जान चली गई। पति नंदलाल बताते हैं कि जिस जमीन पर खेती-बाड़ी करके गुजर बसर करते थे, उसको ग्राम प्रधान जोत रहे हैं, खबर मिलते ही बासमती बदहवास उस ओर भागी। दो बोल कह पाती इससे पहले ही दो गोलियां लगीं और वहीं गिर गई।’
सोनभद्र के उभ्भा गांव में 10 लोगों की मौत के बाद कंधा देने के लिए कम पड़ गए कंधे