( छत्तीसगढ़ चुनाव 2018 विशेष ) बिलासपुर,राज्य के गठन के साथ ही बिलासपुर को हाईकोर्ट और रेलवे जीएम का ऑफिस मिला तभी से इसकी पहचान न्यायधानी के रूप में की जाने लगी। यहां के निर्माण में अजित जोगी की भूमिका एक शिल्पकार की रही है यह पहला चुनाव है जब जोगी अपनी पार्टी बनाकर उसके चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ेंगे और दूसरों को लड़ाएंगे। ऐसे मैं उनके दल के लोगों को उनसे किसी करिश्मे की उम्मीद है। बिलासपुर में विधानसभा की कुल सात सीटें हैं। जिनमें इस बार त्रिकोणीय मुकाबले के कयास लगाए जा रहे हैं। क्योंकि भाजपा और कांग्रेस की उपस्थिति में जोगी की पार्टी को आमद दर्ज करना है तो उसे वोट कटवा के बजाय मुकाबले को त्रिकोणीय बनाना होगा। यहाँ की पांच सीटें सामान्य है, जबकि दो अनुसूचित जाति व एक अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। जिले में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर होती है। यहाँ अब तक पलड़ा कभी कांग्रेस का भारी होता है तो कभी भाजपा का। हालांकि कुछ सीटों पर बहुजन समाज पार्टी की भी स्थिति अच्छी है। इससे मुकाबला त्रिकोणीय हो जाता है, लेकिन राज्य बनने के बाद से पार्टी जिले में एक भी सीट नहीं जीत पाई है। वोट शेयर के गणित में कांग्रेस की स्थिति भाजपा के मुकाबले बेहतर नजर आती है।जिले में भाजपा और कांग्रेस के दो-दो सुरक्षित गढ़ है। राज्य बनने के बाद मरवाही और कोटा सीट पर कांग्रेस का कब्जा है। कोटा सीट तो लंबे अर्से से कांग्रेस के पास है। इसी तरह बिलासपुर सीट पर भाजपा का कब्जा है। वहीं, पहले सिपत और फिर परिसीमन के बाद बने बेलतरा सीट पर भी भाजपा का बीते तीन चुनाव से कब्जा है। भाजपा के अमर व बद्रीधर लगातार जीत रहे हैं।राज्य गठन के पहले चुनाव में जिले में आठ सीटें थीं। भाजपा की लहर के बावजूद पार्टी आठ में से केवल तीन ही सीट जीत पाई। पार्टी को करीब 35 फीसद वोट मिले। 2008 के चुनाव में भाजपा का वोट शेयर महज दो फीसद बढ़ा, लेकिन पार्टी पांच सीट जीत गई। 2013 में वोट शेयर में मामूली बढ़ोतरी हुई, लेकिन सीट फिर सिमट कर तीन ही रह गई।2013 में कांग्रेस को जिले में करीब 44 फीसद वोट और चार सीटें मिलीं। 2008 में 39 फीसद वोट शेयर के बावजूद कांग्रेस केवल अपने दोनों गढ़ मरवाही और कोटा ही बचा पाई थी। 2003 में पार्टी लगभग 44 फीसद वोट शेयर के साथ पांच सीटो पर काबिज थी। अब अजीत जोगी की नयी पार्टी बन जाने से यहाँ मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है।
बिलासपुर विधानसभा
छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े शहरों में से एक और राज्य की हाईप्रोफाइल सीट माने जाने वाली बिलासपुर विधानसभा सीट हमेशा से ही भारतीय जनता पार्टी का गढ़ रही है। यहां से बीजेपी विधायक अमर अग्रवाल राज्य सरकार में मंत्री हैं और करीब चार बार यहां से चुनाव जीत चुके हैं। छत्तीसगढ़ का गठन होने के बाद से ही ये सीट पूरी तरह से भारतीय जनता पार्टी का गढ़ साबित हुई। रमन सरकार में मंत्री अमर अग्रवाल पिछले करीब 15 सालों से यहां से विधायक चुने जा रहे हैं। 2013 विधानसभा चुनाव में अमर अग्रवाल को कुल वोट मिले 72255 थे जबकि उनके करीबी वानी राव, कांग्रेस को 56656 कुल वोट मिले थे। 2008 विधानसभा चुनाव में अमर अग्रवाल, बीजेपी, कुल 60784 वोट मिले और अनिल ताह, कांग्रेस, कुल 51408 वोट मिले थे 2003 विधानसभा चुनाव में अमर अग्रवाल, बीजेपी, कुल 61154 वोट मिले और अनिल ताह, कांग्रेस, कुल 55311 वोट मिले थे
मरवाही विधानसभा
मरवाही विधानसभा जो मध्यप्रदेश के समय से काफी चर्चित सीट रही है, जिसे छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का चुनावी क्षेत्र होने का गौरव हासिल है। आदिवासी के लिए आरक्षित इस विधानसभा क्षेत्र की एक और खासियत है कि ये दलबदलू नेताओं के लिए भी जाना जाता है। दरअसल यहां का हर विधायक ने एक न एक बार अपनी पार्टी जरूर बदली है या पार्टी छोड़कर चुनाव लड़ा है।बिलासपुर जिले में आने वाला मरवाही विधानसभा क्षेत्र मध्यप्रदेश की सीमा से लगा हुआ है। घने जंगलों से घिरा ये इलाका करीब डेढ़ लाख हेक्टयेर में फैला हुआ है। इसमें पेंड्रा, गौरेला और मरवाही तहसील का इलाका शामिल है। भालुओँ के लिए भी ये इलाका काफी मशहूर है।मरवाही दलबदलू विधायकों का क्षेत्र रहा है। इसकी शुरूआत बड़े आदिवासी नेता भंवर सिंह पोर्ते से ही हो जाती है, जिन्होंने 1972 ,1977 और 1980 के चुनाव जीत कर हैट्रिक लगाई। लेकिन 1985 में पार्टी ने उनका टिकट काट दिया और कांग्रेस के दीनदयाल ने ये चुनाव जीता। अपनी टिकट कटने से नाराज भंवर सिंह ने 1990 में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीते भी। लेकिन 1993 में एक बार फिर उनका टिकट कटा हालांकि ये चुनाव कांग्रेस के पहलवान सिंह मरावी ने जीता। भंवर सिंह पोर्ते टिकट कटने की वजह से बीजेपी से भी रूठ गए और 1998 का चुनाव उन्होंने निर्दलीय लड़ा लेकिन वो बुरी तरह से हारे ये चुनाव बीजेपी के रामदयाल उइके ने जीता। लेकिन राज्य बनने के बाद 2001 में एक हेरतअंगेज सियासी घटना के तहत रामदयाल उइके न केवल कांग्रेस में शामिल हो गए बल्कि इस्तीफा देकर ये सीट अजीत जोगी के लिए छोड़ दी।2001 के बाद से ये विधानसभा जोगी की होकर रह गई। 2003, 2008 में अजीत जोगी लगातार यहां से विधायक रहे। 2013 में उन्होंने अपनी टिकट अपने बेटे अमित जोगी को दे दी, जिन्होंने 45 हजार के रिकार्ड मतों से जीत हासिल की,2013 के विधानसभा चुनाव में मरवाही सीट पर 11 उम्मीदवार मैदान में थे। कांग्रेस से अमित जोगी ने पिता की विरासत को बचाने में ही नहीं बल्कि रिकॉर्ड मतों से जीतने में कामयाब रहे थे। अमित जोगी को 82 हजार 909 वोट मिले थे। जबकि बीजेपी उम्मीदवार समीरा पैकरा को 36 हजार 659 वोट मिले थे। बाकी उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा सके थे। 2008 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के अजीत जोगी को 67523 वोट मिले थे।बीजेपी के ध्यान सिंह परोटे को 25431 वोट मिले थे।2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के अजीत जोगी को 76269 को वोट मिले थे।बीजेपी के नंद कुमार साई को 22119 को वोट मिले थे।
कोटा विधानसभा
बिलासपुर जिले की कोटा विधानसभा क्षेत्र कांग्रेस का सबसे मजबूत दुर्ग माना जाता है। ये ऐसी सीट है 66 साल से कांग्रेस का कब्जा है। पिछले 14 विधानसभा चुनाव हुए कांग्रेस के सिवा किसी दूसरी पार्टी का खाता नहीं खुला है। हालांकि इस बार बदले राजनीतिक समीकरण में बीजेपी कमल खिलाने की उम्मीद में नजर आ रही है।दरअसल इस सीट पर पिछले तीन चुनाव से अजीत जोगी की पत्नी रेणु जोगी चुनाव जीतती आ रही हैं। 1952 से लेकर अब कोटा विधानसभा सीट पर 14 बार चुनाव हुए हैं। काशीराम तिवारी पहले विधायक बने थे। जबकि मथुरा प्रसाद दुबे 4 बार, राजेंद्र शुक्ल 5 बार चुने गए। इसके अलावा 2006 में डॉ. रेणु जोगी बनीं पहली महिला विधायक वे पिछले 3 बार से विधायक हैं।2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र प्रसाद शुक्ला को 39546 वोट मिले बीजेपी के भूपेंद्र सिंह को 37866 वोट मिले थे। 2006 में उपचुनाव में कांग्रेस की रेणु जोगी 59465 वोट मिले बीजेपी के भूपेंद्र सिंह को 35995 वोट मिले। 2008 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की रेणु जोगी 55317 वोट मिले और बीजेपी के मूलचंद्र खंडेलवाल को 45506 वोट मिले थे। 2013 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की रेणु जोगी 58390 वोट मिले बीजेपी के काशीराम शाहू 53301 वोट मिले थे। काफी कोशिशों के बाद भी बीजेपी को अभी तक सफलता नहीं मिल सकी है।
तखतपुर विधानसभा
बिलासपुर जिले में आने वाली इस विधानसभा सीट पर फिलहाल बीजेपी के राजू सिंह विधायक हैं। बिलासपुर से 30 किलोमीटर दूर तखतपुर विधानसभा का इलाका शहर के उस्लापुर से लेकर कोटा-लोरमी के जंगलों तक फैला हुआ है।तखतपुर के सियासी समीकरण की बात की जाए तो ये सीट बीजेपी के कद्दावर नेता और मध्यप्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके मनहरण लाल पांडेय का चुनाव क्षेत्र रहा है। ग्रामीण और शहरी परिवेश को समेटे तखतपुर विधानसभा में कुछ मौकों को छोड़ दिया जाए तो बीजेपी कांग्रेस पर हमेशा बीस साबित हुई है। पिछली दो बार से ये सीट बीजेपी के कब्जे में है। सामान्य निर्वाचन क्षेत्र होने के बावजूद यहां अनुसूचित जाति के वोट निर्णायक साबित होते हैं।बेलपान गांव जो तखतपुर विधानसभा क्षेत्र को खास बनाती है। कहा जाता है कि यहां मौजूद एक कुंड से जो नदी निकली है उसे छोटी नर्मदा कहते हैं। इससे लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है। लेकिन तखतपुर के राजनीतिक आस्था की बात करें तो यहां की जनता का झुकाव बीजेपी की तरफ ज्यादा रहा है। बीजेपी के कद्दावर नेता और मध्यप्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके मनहरण लाल पांडेय के कारण भी जाना जाता है। मनहरण लाल पांडेय ने ही इलाके में भैंसाझार परियोजना सहित कई सिंचाई योजनाओं की नींव रखी थी। मनहरण लाल पांडेय यहां से पांच बार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। लेकिन 1996 में उनके लोकसभा जाने के बाद पहली बार कांग्रेस के बलराम सिंह यहां से विधायक चुने गए। इसके बाद 1998 में बीजेपी ने वापस सीट पर कब्जा किया। लेकिन 2003 में बलराम सिंह ठाकुर दूसरी बार चुनाव जीतकर सीट को कांग्रेस के पाले में डाल दिया। 2008 में बीजेपी के टिकट पर राजू सिंह क्षत्रीय यहां से चुनाव जीते। इसके बाद 2013 के विधानसभा चुनाव में भी राजू सिंह क्षत्रीय पर पार्टी ने भरोसा किया। भरोसे पर खरा उतरते हुए राजू सिंह ने आशीष सिंह को मात देकर विधायक चुने गए। इस चुनाव में बीजेपी को जहां 44735 वोट मिले, वहीं कांग्रेस को 44127 वोट मिले। इस तरह जीत का अंतर महज 608 वोटों का रहा। एक दो चुनाव को छोड़ दिया जाए तो सीट पर बीजेपी का पलड़ा भारी रहा है । 2003 के चुनाव नतीजे में कांग्रेस के बलराम सिंह को 39362 वोट मिले थे।बीजेपी के जगजीत सिंह मक्कड़ को 32671 वोट मिले थे।2008 के चुनाव में बीजेपी के राजू सिंह को 43431 वोट मिले थे।कांग्रेस के बलराम सिंह को 37838 वोट मिले थे।2013 के चुनाव नतीजे में बीजेपी के राजू सिंह को 44735 वोट मिले थे।कांग्रेस के अशीष सिंह को 44127 वोट मिले थे।तखतपुर विधानसभा सामान्य सीट है, लेकिन यहां जातीय समीकरण चुनावी नतीजों को काफी प्रभावित करते हैं। इस सीट अनुसूचित जाति के वोटर निर्णायक भूमिका में है। 2 लाख 14 हजार 699 मतदाता वाले इस विधानसभा क्षेत्र में ठाकुर, कुर्मी और ब्राह्मण भी बड़ी संख्या में हैं।
बिल्हा विधानसभा
छत्तीसगढ़ के बिल्हा विधानसभा ऐसी इकलौती सीट है, जो दो जिलों के नक्शे में शामिल है। इस सीट का क्षेत्र का आधे से ज्यादा हिस्सा मुंगेली जिले और एक हिस्सा बिलासपुर जिले में आता है। बिल्हा सीट बीते तीन चुनाव से बीजेपी के धरमलाल कौशिक और कांग्रेस के सियराम कौशिक की रणभूमि बनी हुई है।2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सियाराम कौशिक ने बीजेपी के धरमपाल के करारी मात दी थी। कांग्रेस के सियाराम कौशिश को 83598 वोट मिले थे। वहीं, बीजेपी के धरमपाल कौशिश को 72630 वोट मिले थे।2003 कांग्रेस ने धरमलाल के मुकाबले सियाराम को उतारा। सियाराम करीब साढ़े छह हजार मतों से जीतकर विधानसभा पहुंचे। कांग्रेस के सियाराम को 48028 वोट मिले थे। वहीं, बीजेपी के धरमलाल कौशिश को 41477 मिले था।2008 के चुनाव में फिर दोनों कौशिक आमने- सामने थे। इस बार धरमलाल ने करीब छह हजार मतों के अंतर से सियाराम को पटखनी दी थी। बीजेपी के धरमलाल कौशिश को 62517 मत मिले थे। जबकि कांग्रेस के सियाराम कौशिश को 56447 मत मिले थे।सन 1952 के बाद से यह सीट पिछड़ा वर्ग के नेताओं के खाते में रही है और दिवंगत चित्रकांत जायसवाल यहां से जीतकर अविभाजित मध्य प्रदेश में जलसंसाधन मंत्री बने थे।इसी तरह अशोक राव एक बार जनता दल से अपना जीत का खाता यहां से खोले और दूबारा कांग्रेस की टिकट से जीतकर दिग्विजय मंत्रीमंडल में स्वास्थ्य मंत्री बने। 1993 के चुनाव में कांग्रेस के अशोक राव से हारने के बाद धरमलाल 1998 में राव को हराकर विधानसभा पहुंचे।बिल्हा विधानसभा सामान्य सीट होने के बाद भी अनुसूचित बाहुल्य सीट मानी जाती है। वहीं पिछड़ा वर्ग में कुर्मी, लोधी, साहू की अच्छी उपस्थिति है। इसके अलावा सामान्य वर्ग एवं अन्य जाति के लोग भी यहां निवास करते हैं। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही कुछ चुनावों से यहां कुर्मी नेताओं पर दांव लगाती आ रही है।
बेलतरा विधानसभा
बिलासपुर जिले की बेलतरा विधानसभा सीट बीजेपी का मजबूत किला माना जाता है। 2008 में परिसीमन के बाद ये सीट वजूद में आई है। पिछले 15 वर्षों से बीजेपी के बद्रीधर दीवान ही जीतते आ रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस सहित बाकी दल अपनी जगह बनाने के लिए बेताब हैं।बेलतरा से पहले सीपत विधानसभा हुआ करता था। 2008 में परिसीमन के बाद सीपत की जगह बेलतरा विधानसभा सीट का गठन हुआ। बता दें कि सीपत विधानसभा पर बसपा का कब्जा था। यहां से बसपा के रामेश्वर खरे विधायक थे।बसपा से पहले यह कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। यहां से राधेश्याम शुक्ला, चन्द्रप्रकाश बाजपेयी, अरुण तिवारी विधायक बने थे, लेकिन साल 2003 के बाद से बेलतरा विधानसभा बीजेपी के कब्जे में है। यहां से बद्रीधर दीवान चुनाव जीतते आए हैं।2013 चुनाव में बीजेपी के बद्रीधर दीवान को 50890 वोट मिले थे।कांग्रेस के भुनेश्वर प्रसाद यादव को 45162 वोट मिले थे।दिलचस्प बात ये है कि 2013 में 45 उम्मीदवार मैदान में थे।2008 के विधानसभा नतीजे में बीजेपी के बद्रीधर दीवान को 38867 वोट मिले थे।कांग्रेस के भुनेश्वर प्रसाद यादव को 33891 वोट मिले थे।शहरी क्षेत्र से जुड़े होने की वजह से बेलतरा विधानसभा क्षेत्र के नतीजे बीजेपी के पक्ष में जाता रहा है। छत्तीसगढ़ के गठन से पहले मध्य प्रदेश के समय 1990 के चुनाव में सीपत से दीवान एक बार पहले भी जीत चुके थे।
मस्तुरी विधानसभा
बिलासपुर जिले की मस्तुरी विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा है। जबकि इससे पहले बीजेपी को दो बार लगातार जीत मिली थी।120 किलोमीटर के इलाके में फैले इस चुनाव क्षेत्र के सियासी समीकरण बदलते रहे हैं।2008 में परिसीमन के बाद सीपत विधानसभा का एक बड़ा हिस्सा इसमें शामिल कर लिया गया है। इसके चलते यहां के राजनीतिक समीकरण काफी बदल गए हैं।कांग्रेस के कब्जे वाली इस सीट से गणेश राम अनंत, बंसीलाल घृतलहरे जैसे बड़े लीडर चुनाव जीतकर मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके हैं। 1998 में पहली बार ये सीट भाजपा के कब्जे में आई, मदन सिंह डहरिया यहां से चुनाव जीते, लेकिन 2000 में छत्तीसगढ़ बनने के बाद वे कांग्रेस में शामिल हो गए।2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के मदन सिंह डहरिया को बीजेपी के डॉक्टर कृष्णमूर्ति बांधी ने हराया और प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री बने थे। 2008 में भी डॉ बांधी फिर चुनाव जीते, लेकिन 2013 में उन्हें दिलीप सिंह लहरिया के हाथों हार का मुंह देखना पड़ा था।2013 के चुनाव नतीजे में कांग्रेस के दिलीप दिलीप सिंह लहरिया को 86509 वोट मिले थे।बीजेपी के कृष्णमूर्ति बांधी को 62363 वोट मिले थे।2008 के विधानसा चुनाव में बीजेपी के कृष्णमूर्ति बांधी को54002 वोट मिले थे।कांग्रेस के मदन सिंह दहारिया को 44794 वोट मिले थे। 2003 के चुनाव में बीजेपी के कृष्णमूर्ति बांधी को 40485 वोट मिले थे।कांग्रेस के मदन सिंह दहारिया को 38217 वोट मिले थे।जातीय समीकरण की बात की जाए तो यहां एससी और एसटी वोटर का बड़ा वर्ग मौजूद है। इसके अलावानिषाद, रजक, कुर्मी, साहू, यादव, ब्राह्मण, ठाकुर समाज के वोटर भी अच्छे खासे हैं। यही वजह है कि सीट पर बीएसपी का भी प्रभाव रहा है। बीएसपी को पिछले तीन चुनाव से यहां करीब 20 हजार वोट मिलते रहे हैं।
बिलासपुर में जनता कांग्रेस को जोगी के करिश्मे की दरकार तो भाजपा को अमर की आस