न घर, न कार, न कर्ज, ईमानदार, पारदर्शी हैं नए मुख्य जज,अगले साल नवम्बर तक होगा कार्यकाल,आएंगे कई अहम फैसले

नई दिल्ली,न्यायाधीश रंजन गोगोई ने बुधवार को देश के 46 वें मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के रूप में शपथ ले ली। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें गोपनीयता की शपथ दिलाई। वे 17 नवंबर, 2019 को रिटायर हो जाएंगे। गोगोई ने 28 फरवरी, साल 2001 में बतौर जज गुवाहटी हाईकोर्ट से अपने करियर की शुरुआत की। बेहद ईमानदार और पारदर्शी माने जाने वाले गोगोई के पास न खुद का घर है, न कार, न ही कोई कर्ज। गोगोई के पास सोने का एक टुकड़ा भी नहीं है, जबकि उनकी पत्नी ने कभी जेवर नहीं खरीदे, शादी के समय परिजनों ने जो दिया, वही जेवर हैं। असम के पूर्व मुख्यमंत्री केशब चंद्र गोगोई के बेटे जस्टिस गोगोई सीजेआई बनने वाले पूर्वोत्तर से पहले जज हैं। उनकी मां शांति गोगोई असम की मशहूर समाजसेवी थीं। गोगोई की कुल संपत्ति जोड़कर देखी जाये तो यह कई वरिष्ठ वकीलों की एक दिन की कमाई से भी कम है। गोगोई ने ही नेताओं पर आपराधिक मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष अदालत बनाने का भी निर्देश दिया था।

सिर्फ इतनी ही संपत्ति
एलआईसी पॉलिसी समेत गोगोई और उनकी पत्नी के पास कुल मिलाकर 30 लाख रुपये बैंक बैलेंस है। जुलाई में उन्होंने शपथपत्र में घोषणा की थी कि उन्होंने गुवाहाटी के बेलटोला में हाई कोर्ट का जज बनने से पहल ही 1999 में एक प्लॉट खरीदा था। उन्होंने अपने घोषणापत्र में बताया है कि उस प्लॉट को उन्होंने जून में 65 लाख रुपये में बेच दिया था। उन्होंने खरीदार के नाम का भी जिक्र किया है।
संविधान खतरे में दिखा तो प्रेस कांफ्रेंस की
जनवरी 2018 में गोगोई के साथ जस्टिस जे. चेलमेश्वर, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ़ ने ने एक प्रेस कांफ्रेंस की थी। उसमें कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है क्योंकि चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा कुछ ख़ास मामलों की सुनवाई के लिए चुने हुए लोगों को नियुक्त कर रहे थे। इन लोगों ने ये चेतावनी दी कि लोकतंत्र ख़तरे में है । उन्होंने कहा था कि हम ऐसा कुछ नहीं करना चाहते कि आने वाली पीढ़ी के सामने हम यह कहें कि हमने अपनी आत्मा मारी थी।
मोदी ने वरिष्ठता के फॉर्मूला ही अपनाया
ऐसी खबरें थी कि मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट में सबसे वरिष्ठतम जस्टिस को मुख्य न्यायाधीश न बनाकर किसी अन्य जज को सीजेआई बना सकती है। लेकिन दीपक मिश्रा ने वरिष्ठता के आधार पर ही नाम सरकार को भेजा।
नेहरू ने भी नहीं तोड़ा नियम
साल 1951 के नवंबर महीने में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू नहीं चाहते थे कि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीश पतंजलि शास्त्री मुख्य न्यायाधीश के पद पर आसीन हों। लेकिन तब सुप्रीम कोर्ट के छह न्यायाधीश अपने पदों से इस्तीफ़ा देने तैयार बैठे थे। तब नेहरू ने अपना फ़ैसला बदल दिया।
इंदिरा ने की थी मनमानी
वर्ष 1973 में आपातकाल के दौरान न्याय व्यवस्था पर नियंत्रण रखने के नाम पर उन्होंने जस्टिस एच आर खन्ना को दरकिनार करके जस्टिस एम एच बेग को मुख्य न्यायाधीश बना दिया था।
गोगोई के सामने यह फैसले
– अयोध्या में राम मंदिर विवाद, 28 अक्टूबर से सुनवाई होना है, आठ वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामला
-3.30 करोड़ मामले कोर्ट में लंबित पड़े, इन्हें समय पर निपटाने की रणनीति बनानी होगी
-कॉलेजियम विवाद में सरकार से हल निकालना, क्योंकि विवाद के कारण हाई कोर्ट के 40 फीसदी और सुप्रीम कोर्ट में 20 फीसदी पदों पर नियुक्ति नहीं हो रही
गोगोई के फैसले के बाद ही असम में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनआरसी) का नियम लागू हुआ।

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