नई दिल्ली,सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर महाभियोग से जुड़े सात दलों के महाभियोग प्रस्ताव को उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने संविधान और कानूनविदों से व्यापक विचार-विमर्श के बाद खारिज कर दिया। नायडू चार दिन की छुट्टी पर आंध्र गए थे, लेकिन महाभियोग का मामला पेचीदा होने के बाद वह रविवार को दिल्ली लौट आए। सोमवार को उप-राष्ट्रपति ने इस बारे में फैसला किया। कांग्रेस के नेतृत्व में सात दलों में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव उपराष्ट्रपति को दिया था। यह एक अभूतपूर्व कदम था। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ इससे पहले कभी महाभियोग प्रस्ताव नहीं आया था। वरिष्ठ वकील फाली नरीमन ने इसे काला दिन बताया था। कांग्रेस में भी अनेक वरिष्ठ नेता इस प्रस्ताव के विरोध में थे। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और समाजवादी पार्टी (सपा) ने भी महाभियोग के लिए प्रस्ताव लाए जाने को लेकर आयोजित बैठक में हिस्सा नहीं लिया था।
देश के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव में प्रमुख भूमिका निभाने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल का कहना था कि इसका जस्टिस बी एच लोया की मृत्यु या किसी अन्य मामले से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका पर संकट के कारण विपक्ष के पास इसकी सुरक्षा की कोशिश करने के लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। सिब्बल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज के खिलाफ राज्यसभा के 50 सदस्यों या लोकसभा के 100 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला महाभियोग प्रस्ताव लाने का अधिकार संविधान के आर्टिकल 124 (5) के तहत दिया गया है और इस वजह से यह कानून-सम्मत है। इसका राज्यसभा के अध्यक्ष को सदन में एक विषय पर चर्चा के लिए दिए गए नोटिस से कोई संबंध नहीं है। ये सदन की कार्यवाही नहीं है, यह एक संवैधानिक प्रावधान के तहत शुरू की गई कार्यवाही है और संसद के एक कानून के तहत नियंत्रित है। यह पूरा विवाद गलत है।
उपराष्ट्रपति नायडू ने अस्वीकार किया मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव