सोहराबुद्दीन मामले से कैसे छूटे वरिष्ठ अधिकारी, जस्टिस ठिपसे ने किया सवाल

मुंबई,बहुचर्चित सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले में सभी हाई प्रोफाईल आरोपियों को जमानत कैसे मिली? यह सवाल पूर्व न्यायमूर्ति अभय ठिपसे ने अपने एक साक्षात्कार में उठाया है। पूर्व न्यायमूर्ति अभय ठिपसे ने अपने इस साक्षात्कार में राजनीतिक दबाव, न्याय व्यवस्था की मुश्किलों और सोहराबुद्दीन मामले की गंभीर स्थिति पर विस्तार से प्रकाश डाला है। पूर्व न्यायाधीश अभय ठिपसे ने सवाल किया सोहराबुद्दीन शेख के कथित एनकाऊंटर मामले के सभी हाई प्रोफाइल कैदियों को जमानत कैसे मिल गई? इस मामले में केवल जूनियर अधिकारी ही कैसे फंसे रह गए? प्रथम दृष्टया गुजरात के पूर्व पुलिस उप-महानिरीक्षक डीजी वंजारा, आईपीएस राजकुमार पांडियन और राजस्थान के कैडर के दिनेश एनएम इस मामले में स्पष्ट रूप से शामिल होने का पता चलते हुए उनकी जमानत कैसे हुई? यह सवाल भी पूर्व न्यायाधीश अभय ठिपसे ने उठाया।
पूर्व न्यायाधीश अभय ठिपसे ने मुंबई उच्च न्यायालय को सलाह देते हुए कहा मुकदमे से संबंधित इन सभी बातों पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। ठिपसे ने हाईप्रोफाईल दोषियों की जमानत, आन-फानन हुए तबादलों, जमानत को लेकर उठे सवाल और गवाहों पर साक्ष्य बदलने के लिए दबाव-इन सब बातों पर प्रकाश डाला है। मार्च 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के रूप में निवृत्त होने के बाद उन्होंने पहली बार इस मामले में विचार व्यक्त किए हैं। पूर्व न्यायाधीश ठिपसे ने कहा कि डीजी वंजारा को जमानत देने की उनकी बिल्कुल भी इच्छा नहीं थी, मात्र सुप्रीम कोर्ट से दूसरे दो अधिकारियों की जमानत मंजूर होने से ऊपरी अदालत का मान रखने के लिए जमानत मंजूर करने का दावा भी उन्होंने किया। उन्होंने कहा कि मुंबई हाईकोर्ट की सुनवाई में स्पेशल सीबीआई द्वारा दिए गए आदेश में विचित्र विसंगति होने की बात भी न्यायाधीश ठिपसे ने कही।
उन्होंने कहा ऐसे में मुंबई हाईकोर्ट को पुनर्निर्णय के अधिकार का इस्तेमाल करना चाहिए, जरूरत पड़ने पर स्यू मोटो दाखिल कर इस प्रकरण पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि कोर्ट को भी ऐसा लगता है कि मुठभेड़ में मारे गए लोगों को पकड़कर मुठभेड़ दिखाया गया। फिर भी कुछ पुलिस अफसरों को छोड़ दिया गया। इस प्रकरण में कुछ पहलू संदिग्ध हैं।

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