जगदलपुर,बस्तर में इमली आंदोलन की सुगबुगाहट के चलते जहां ट्रायफेड अपनी रूपरेखा तय कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ अब इमली के मुक्त व्यवसाय की मांग भी उठने लगी है। माना जा रहा है कि मुक्त व्यवसाय से ही आदिवासी इमली संग्राहकों को अच्छी कीमत मिल सकती हैं। बस्तर से सालाना लगभग 500 करोड़ रुपए का इमली व्यवसाय बरकरार रखने और संग्राहकों को इसका उचित मूल्य दिलाने के लिए व्यापारी संगठन तैयारी करते नजर आ रहे हैं। दूसरी ओर इमली को जीएसटी के दायरे में लाने के बाद संग्राहकों पर इसका सीधा असर पडऩे की आशंका जताई गई है। हालांकि इमली पर जीएसटी 12 प्रतिशत से घटाकर इसे बस्तर चैम्बर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्रीज की मांग पर 5 प्रतिशत कर दिया गया है। लेकिन इससे छत्तीसगढ़ को कोई लाभ नहीं मिला है। व्यापारियों ने इमली की सरकारी खरीद का सीधे तौर पर विरोध नहीं किया है, लेकिन उन्होंने संग्राहकों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक दाम देने की बात दबी जबान से जरूर कही है। बस्तर की इमली का निर्यात देश के भीतर आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश राज्यों को होता है, वहीं वियतनाम, सऊदी अरब व पाकिस्तान में भी इसकी खेप जाती है।
बस्तर में अब इमली के मुक्त व्यापार की मांग उठने लगी