समाज के दर्द को बयां कर गया राख से उड़ा पंछी

भोपाल,आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय, भोपाल में साप्ताहिक प्रदर्शन की श्रृंखला अभिनयन के अंतर्गत इस शुक्रवार नाटक ‘राख से उड़ा पंछी’ का मंचन त्रिकर्षि नाट्य संस्था, भोपाल के कलाकारों द्वारा सिद्धार्थ दाभाडे के निर्देशन मेें किया गया.
नाटक के मर्मस्पर्शी संवाद एवं कलाकारों के भावपूर्ण अभिनय ने नाटक के विचार को पूरी तरह दर्शकों के समक्ष संप्रेषित किया. डॉ. सतीश सालुके द्वारा लिखित नाटक राख से उड़ा पंक्षी समाज के दर्द को बयां करता है और दूसरी और कई तरह की मजाकिया स्थितियाँ उत्पन्न करता है. इस भाव को सभी कलाकारों ने मंच पर बखूबी मंचित किया.
नाटक में ये बताया गया कि मृत्यु एक शाश्वत् सत्य हैं जिसका जन्म हुआ हैं उसे उस लोक में एक न एक दिन तो जाना ही है. लोक से परलोक तक पहुंचाने में हम मनुष्यों की जो सहायता करते हैं. श्मशानकर्मी जिनके जीवन की डोर या आजीविका का साधन मृत्यु से ही जुड़ा है. जिस समय हमें मृत्यु व्यथित कर रही होती है उस दिन श्मशानकर्मी के घर में खुशी का माहौल होता है क्योंकि उस दिन उसके घर में चूल्हा जलता है. श्मशान घाट में मुर्दा फूंकता डोम दलित परिवार की वेदना को हवा देता प्रतीत होता है पर सच यह है कि उसके भीतर जो आग जल रही है, अंगारे भडक़ रहे हैं उसका ताप कौन समझें ? उसकी चिंगारी भीतर ही भीतर राख बन रही होती है.
मंच पर :
शिवकांत वर्मा, शिवम् गुप्ता, अभिषेक विश्वकर्मा, पूजा मालवीया, शिवानी कहार, सुष्मिता मालवीय, प्रखर सक्सेना, देवेश झा, आकांक्षा ओझा, प्रज्ञा चतुर्वेदी, सोनम उपाध्याय, मयंक शर्मा, मधुसुदन, शरद वाजपेयी, संजय, प्रिंस, कमल शर्मा तथा अन्य कलाकार
मंच से परे
देवेश झा, देवेन्द्र शर्मा, दीपक सहारे, राहुल सिंह, प्रथमेश त्रिवेदी, रश्मि आचार्य, मृदुला भारद्वाज, आदर्श शर्मा, प्रियेश पाल, कमलेश एवं अन्य कलाकार.

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