संजीव शर्मा की लेखनी से


इंतजार…सशक्त भारत…2022
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से देश को सम्बोधन में 2022 तक नए भारत के निर्माण की बात कही है। जिसमें धार्मिक और जातीय संकीर्णता से ऊपर उठकर सशक्त और समृद्धशाली भारत बनाने की बात है। अपने उदबोधन में कश्मीर मसले का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने गोली और गाली को गलत बता कर समस्या का समाधान प्रेम के रास्ते से खोजने की बात कही है। जिसे सबका साथ सबका विकास के वादे के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ही समझा जाना चाहिए। पीएम ने नई पीढ़ी विशेषकर अठारह साल की दहलीज पर कदम रखने वाले युवाओं का स्वागत कर उन्हें नए भारत के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया है।
देश के सामने सरकार के कामकाज का ब्यौरा रखने का यह अच्छा अवसर था,और प्रधानमंत्री ने वैसा ही किया। लाल किले से उन्होंने अपनी सरकार की सफलताओं और काम-काज का लेखा-जोखा पेश कर यह बताने की कोशिश की है कि उनकी अगुवाई वाली सरकार का काम करने का तरीका किस प्रकार से पहले की सरकारों से बदल गया है। जिस ढंग से केंद्र की योजनाओं में काम करने कि गति बढ़ी है,निसंदेह उससे बदली हुई कार्यसंस्कृति दिखने भी लगी है। प्रधानमंत्री ने भाषण की शुरुआत में ही अति वर्षा से होने वाली प्राकृतिक आपदा और गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में बच्चों की मौत का उल्लेख कर अपनी प्रतिक्रिया में इस तरह की घटनाओं को रोकने की इच्छाशक्ति जाहिर की है।
मोदी की अगुवाई में भाजपा और उसके घटक दलों को 2019 में आम चुनाव का सामना करना है। बीते तीन सालों में सरकार ने नोटबंदी, पाक के विरूद्ध सर्जिकल स्ट्राइक और जीएसटी जैसे बड़े निर्णय लिये हैं। जाहिर सी बात है,इस मौके पर प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के साथ-साथ अन्य फैसलों के फायदे भी गिनाए। अब क्योंकि आने वाले दिनों में इसके सकारात्मक नतीजों की प्रतीक्षा की जा रही है, लिहाजा हमें अपने प्रधानमंत्री को कुछ और समय देना चाहिए। ताकि अगली बार जब प्रधानमंत्री लाल किले कि प्राचीर से देश को सम्बोधित कर रहे होंगे तो वह यह बताने की स्थिति में हों कि देश की बुनियादी समस्याओं के साथ ही युवाओं के रोजगार,जातीय और धार्मिक उन्माद की समस्या को हल करने में उनकी सरकार को कितनी सफलता मिली है, जिससे 2022 के समृद्ध व गौरवशाली भारत का सपना जो वे दिखा रहे है हकीकत में साकार हो सकेगा।

स्वतंत्र विदेश नीति की ओर बढ़ते कदम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत और इजराइल के राजनयिक संबंधों के 25 साल पूरे होने पर इजराइल की यात्रा कि जो अभूतपूर्व रही। मोदी को इजराइल से आत्मीय स्वागत मिला यह यादगार रहेगा। 70 सालों से ज्यादा के वक्त में भारत के किसी प्रधानमंत्री की यह पहली इजराइल यात्रा थी। प्रधानमंत्री मोदी की सूझबूझ की दाद दी जानी चाहिए, जिन्होंने किसी कि परवाह न करते हुए इजराइल की यात्रा की इजराइल पहले 1962 में चीन और फिर 1971 में पाकिस्तान से लड़ाई के वक्त हथियारों की आपूर्ति कर भारत की मदद की थी।
अब मोदी की इजराइल यात्रा से भारत-इजरायल के बीच नए संबंधों और नए दौर की विदेश नीति की शुरुआत होगी। यह यात्रा इस संदर्भ में और भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि मोदी तीन दिवसीय यात्रा के दौरान फिलिस्तीन नहीं गए हैं। इसके बावजूद इसे फिलिस्तीन को लेकर भारत की नीति में बड़े बदलाव का संकेत नहीं मानना चाहिए क्योंकि इसी साल मई में पहले ही फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास की भारत यात्रा के समय मोदी ने फिलिस्तीन को भारत के समर्थन का वादा किया है। यह पुराने संबंधों की निरंतरता के बीच नए संबंधों को प्रगाढ़ करते हुए मजबूती के साथ आगे बढ़ने का कदम हो सकता है।
उधर, देश की सत्ता पर काबिज भाजपा पहले से ही इजराइल के साथ अच्छे संबंध और तालमेल की पक्षधर रही है। शायद इजराइल के साथ मजबूती के साथ आगे बढ़ने की मोदी की सोच के पीछे यह तर्क रहा हो कि अरब देशों से भारत को क्या मिला? उन्होंने कश्मीर मसले पर भारत का कभी साथ नहीं दिया। संभवतः मोदी अब देश के लिए एक स्वतंत्र विदेश नीति की ओर बढ़ने का प्रयत्न कर रहे हैं। जिसमें इजराइल से मजबूत संबंधों का विकास तो होगा ही फिलिस्तीन से भी अच्छे संबंध बने रहेंगे। कमोबेश रूस के साथ ही अमेरिका से नए रिश्तों को भी इसी संदर्भ में समझने की जरूरत है। दोनों देशों के बीच 40 मिलियन डॉलर का इनोवेशन फंड दोतरफा व्यापार को बढ़ाने में मददगार साबित होगा। वैसे यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच साफ्टवेयर,कंप्यूटर साइंस,खारे समुद्री जल को पीने योग्य बनाने की तकनीक, रेग्सितान में ड्रिप तकनीक से खेती, प्रतिरक्षा, ऊर्जा,नागरिक उड्डयन के क्षेत्र में समझौते किए गए। जिसका लाभ दोनों देशों को मिलेगा। अब इस एैतिहासिक यात्रा के बाद यह देखना रहेगा कि मोदी यात्रा से व्यापार बढ़ाने और पुरानी रूकावटों को दूर करने में कितना सफल रहे हैं।

भारत-अमेरिका…नए रिश्तों का सूर्योदय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे से भारत और अमेरिका के बीच नए रिश्तों का सूर्योदय हुआ है। इस रिश्ते का स्वागत है, दोनों नेता जिस गर्मजोशी के साथ एक दूसरे से मिले उससे भारत-अमेरिका संबंधों के भविष्य में और प्रगाढ़ होने का अंदाजा लगाया जा सकता है। डोनाल्ड ट्रंप और उनकी पत्नी मेलानिया द्वारा जिस प्रकार से मोदी का स्वागत किया गया उससे यह साफ हो गया है कि अमेरिका भी भारत के साथ रिश्तों को लेकर गंभीर है। मोदी-ट्रंप मुलाकात बहुत ही सहज ढंग से हुई दोनों नेताओं ने आतंक के खिलाफ मिलकर लड़ने की बात कही है। इससे भी आगे अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को कड़े शब्दों में पड़ोस के देशों में आतंक फैलाने में अपने देश की जमीन का उपयोग नहीं होने देने की नसीहत दी गई है,वहीं चीन को वन बेल्ट वन रोड यानि ओबोर प्रकल्प के चलते पड़ोसी देशों की संप्रभुता को नुकसान न पहुंचाने का ठोस संदेश दिया है। जो यह बताता है कि मोदी न सिर्फ कूटनीतिक स्तर पर बल्कि भावनात्मक स्तर पर भी अमेरिका के साथ रिश्ते बनाने में सफल रहे है। इधर,अफगानिस्तान के संदर्भ में भी भारत अमेरिका को साथ लेकर पाकिस्तान को यह बताने में सफल रहा है कि उसकी प्राथमिकता अफगानिस्तान में शांति की पुर्नस्थापना कर उसके विकास में सहयोग करना है। मोदी-ट्रंप भेंट से पहले ही अमेरिकी विदेश मंत्रालय द्वारा हिजबुल मुजाहिद्दीन के सरगना सैयद सलाहुद्दीन को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया गया यह भी भारत के लिए अनुकूल रहा। एैसा कर अमेरिका भारत के साथ सदभाव दिखाने में सफल रहा है। इससे भारत और अमेरिका के बीच जो नजदीकी दिखाई दी,वह पाकिस्तान के साथ ही चीन को भी नागवार गुजर रही है। संभवतः इस दौरे में एच1बी वीजा,अप्रवासियों के बारे में अमेरिका की नीति और नौकरियों के विषय पर अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ कोई खास बात नहीं हुई है,हो सकता है कि इस मामले में ट्रंप के अब तक के नकारात्मक रवैये को देखते हुए ही बातचीत में इन विषयों को तूल देने से बचा गया हो। उधर,रक्षा क्षेत्र में अमेरिका ने भारत की नौ सेना को गार्नियर ड्रोन विमान देने पर सहमति दी है। जबकि भारत की निजी एयरलाइंस कंपनी अमेरिका की बोइंग कंपनी से विमान खरीदेगी इससे अमेरिका को आर्थिक फायदा होगा और वहां नौकरी के अवसर मिलेंगे। मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति की बेटी इवांका को अमेरिका का वाणिज्यिक प्रतिनिधिमंडल भारत लेकर आने का आमंत्रण दिया है। जिससे यह स्पष्ट है कि भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने काफी हद तक अमेरिका के साथ पारिवारिक और भावनात्मक संबंध बनाने में सफलता पाई है। हालांकि इन रिश्तों से भारत को कितना लाभ होगा यह तो बाद में ही पता लगेगा लेकिन यह जरूर है कि अब दोनों देशों के बीच नए रिश्तों का सूर्योदय हो गया है।

चुनाव प्रक्रिया…भरोसा…?
मप्र की अटेर विधानसभा सीट के उपचुनाव में ईवीएम द्वारा गडबडी की बात सामने आने पर चुनाव आयोग ने जो पहल की है,वह प्रशंसनीय है। जिस तत्परता से निर्णय लेते हुए उसने मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी की निगरानी में मप्र के दोनों विधानसभा सीटों के उप चुनाव कराने और फिर भिंड के कलेक्टर-एसपी व अन्य सरकारी अमले को हटाने की हिदायत दी है,उससे ईमानदार और निष्पक्ष चुनाव का मार्ग प्रशस्त होगा।
अब आयोग के साथ ही केंद्र की मोदी सरकार की यह जिम्मेदारी बनना स्वभाविक ही है कि वह लोगों का चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाएं। ईवीएम में गडबडी को लेकर कें द्र की सत्ता से बाहर बैठे दलों द्वारा हाल में पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद लगातार सवाल खडे किए जा रहे हैं,वह निश्चय ही चिंता बढ़ाने वाले हैं। हालांकि अब तक वीवीपैट यानि वेरिफियेबल पेपर आडिट ट्रेल को ईवीएम मशीनों के साथ जोड़े जाने पर सौ फीसदी सही रिजल्ट की बात कही जाती रही है ,लेकिन अटेर में मीडिया के सामने ईवीएम का प्रदर्शन करते समय हर दफे अलग-अलग बटन दबाने पर भी वोट कमल को ही गया इससे इस पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन जांच जरूरी हो गई है। वैसे भी इस समय देश में नए दौर की राजनीति का सूत्रपात हुआ है। लगातार भाजपा की बढ़त के साथ हिन्दुस्तान केसरिया रंग में रंगा हुआ है। अब भाजपा की विजय और चमक खंडित करने के विपक्ष के प्रयास फलीभूत न हों इसके लिए आयोग और सरकार दोनों को बहुत जल्द विपक्षी दलों की शंकाओं का समाधान करना चाहिए। बगैर किसी चूक के अटेर मामले की पूरी तह तक पहुंचना जरूरी है। अगर वीवीपैट ईवीएम की गडबडी रोकने का प्रभावशाली तरीका है,तो उसे अपनाने के लिए सरकार को सभी दलों को विश्वास में लेकर आयोग को उसे लगाने में मदद करना चाहिए। हालांकि मप्र की मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी सलीना सिंह ने बचाव में कहा है कि जो मशीनें मीडिया के सामने प्रदर्शित की गई थी उन्हें प्रदर्शन से पहले कैलिब्रेट नहीं किया गया था। जिसकी वजह से यह गडबडी हुई। उनकी बात कितनी तर्क संगत है यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा। लेकिन राजनीतिक दलों की ओर से यह कहते हुए मामला उठाया जा रहा है कि अटेर पहुंची मशीन उप्र के कानपुर से आई थी,जहां हाल में विधानसभा के चुनाव हुए हैं। एैसे में चुनाव को हुए 45 दिन भी नहीं हुए थे और यह मशीन उप्र से मप्र कैसे पहुंची इस बारे में हकीकत क्या है, इसकी सही तस्वीर सामने आना चाहिए तभी आम लोगों का हमारी चुनाव प्रणाली पर भरोसा कायम रह सकेगा।

लोकतंत्र की विजय..परिपक्व जनादेश  

पांच राज्यों के चुनाव नतीजों ने इस बार देश के सामने कुछ अहम सवाल रखे हैं,एक तो यह कि क्या जातिगत राजनीति के दिन हिन्दी भाषी राज्यों में अब अतीत का विषय समझे जाएं,दूसरा यह कि देश में क्या परिवारवाद के ध्वजवाहक कमजोर पड़ेंगे। तीसरा और अहम सवाल यह है कि क्या देश में तुष्टिकरण की राजनीति धीरे-धीरे समापन की ओर बढ़ रही है।
लेकिन इनके बीच जो अहम बात उभर कर आई है, वह देश में भविष्य की राजनीति की ओर इशारा कर रही है। लगता है देश में क्षेत्रीय दलों के प्रभाव से बाहर निकलने की तैयारी शुरू हो गई है। आने वाले दिनों में उत्तर और पश्चिम भारत की राजनीति का पहिया क्या भाजपा और कांग्रेस के आसपास घूमेगा। इसे यूं भी हिमाचल प्रदेश और गुजरात राज्यों के चुनाव के संदर्भ में देखना और भी रोचक होगा क्योंकि वर्षान्त में इनकी विधानसभाओं के चुनाव होने वाले हैं।
पहले मुंबई और ओडि़शा के स्थानीय चुनाव अब उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में केसरिया उभार, मोदी की लहर उत्तरपूर्व के राज्य मणिपुर में भाजपा की जोरदार दस्तक पंजाब में कांग्रेस का सरकार में लौटना,गोवा में भाजपा से कड़ा मुकाबला कर उसकी मुश्किल बढ़ाना तो यही इशारा करता है,कि मोदी का प्रभाव बढऩे से क्षेत्रीय दलों की ताकत कमजोर होना शुरु हो गई है। हालांकि असम के नतीजों से इसके संकेत जरूर मिले थे,लेकिन ममता की सफलता ने इस चर्चा को आगे बढऩे से रोक लिया था। इस बारे में उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनाव नतीजे इन बातों को समझने में काफी मदद कर रहे हैं,वहीं उत्तराखंड,गोवा,और मणिपुर के नतीजे भी इन बातों को काफी हद तक समझा पा रहे हैं। पंजाब और उत्तरप्रदेश में परिवारवाद के चलते वहां की सरकारें बदनाम थी,यूपी में कांग्रेस का सपा और पंजाब में भाजपा का अकालियों के साथ गठबंधन में रहना उन्हें नुकसान पहुंचाने वाला साबित हुआ है। जैसा यह दोनों दल साल भर पहले अलग-अलग चुनाव लडऩे का सोच रहे थे,वैसा अगर अब करते तो शायद दोनों के बीच कड़ा और दिलचस्प मुकाबला देखने को मिलता। यानि यूपी में कांग्रेस सपा से और पंजाब में भाजपा अकाली दल से अलग होकर चुनाव लड़ते।
उत्तरप्रदेश के संदर्भ में जातिगत राजनीति पर बात करना भी प्रासंगिक होगा प्रदेश लम्बे अरसे बाद दो क्षेत्रीय पार्टियों की जातिगत राजनीति से बाहर निकला है। पिछड़ों और दलितों की राजनीति के नाम पर परिवारों का वर्चस्व स्थापित हो गया था। जिसका तीन दशक तक उत्तरप्रदेश की सत्ता पर दबदबा बना रहा। लेकिन उसका फायदा या तो कुनबे को मिला या फिर उनसे जुड़े कुछ खास लोगों को। जिससे गरीब जातियों के पास इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं था। उनकी इसी जरूरत को मोदी-शाह सरीखे बड़े रणनीतिकारों ने खास अंदाज में कैश कर लिया। वह वोटरों को यह समझाने में सफल रहे कि उनके छोटे स्वार्थों के बजाय देश हित पहले हैं। उधर,उत्तराखंड में मुख्यमंत्री हरीश रावत पर भ्रष्टाचार के आरोप कई बार लगे भ्रष्टाचार के खिलाफ मोदी की लड़ाई के ऐलान से यह बड़ा मुद्दा बना। मणिपुर में भाजपा ने जोरदार दस्तक दी है, विधानसभा चुनाव में उसे 35 प्रतिशत वोट मिला है। जिसका सीधा नुकसान कांग्रेस को हुआ वह पहली बार बगैर स्पष्ट बहुमत की स्थिति में है।
मोदी-शाह और ओम माथुर की तिकड़ी की जमावट की भी यहां प्रशंसा करना आवश्यक होगा जिन्होंने सबसे पहले गैर-यादवों को सपा से अलग किया फिर यादवों को साधा और इसी तरह गैर-जाटव समुदाय को बसपा से अलग कर अपने साथ जोडक़र जातिगत राजनीति से ऊपर उठकर वोट डालने को तैयार किया।
अब बात करते हैं तुष्टिकरण की जिसका सीधा मतलब धर्म आधारित राजनीति से है इसे भी उत्तरप्रदेश के संदर्भ में देखना ज्यादा उचित होगा। सपा-बसपा मुस्लिम वोटों को भाजपा के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं। इस बार भाजपा ने विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ते हुए राम मंदिर को मुद्दा नहीं बनाया,और किसी मुसलमान को टिकट भी नहीं दिया उसने एक तीर से दो निशाने साधे। कुल मिलाकर नतीजों को देश के लिए अच्छा संकेत समझा जाना चाहिए क्योंकि यह छोटे स्वार्थों और बरगलाने वाली राजनीति से ऊपर उठ कर किया गया जनादेश है।

निगाहें बजट पर,निशाना चुनाव
मध्यप्रदेश विधानसभा में बुधवार को भाजपा सरकार की ओर से वर्ष 2017-18 के लिए पेश बजट से उसकी चुनावी तैयारियों की सुगबुगाहट महसूस होने लगी है। सरकार जब 2018 के चुनाव में जाएगी तो, सबसे बड़ी चिंता एंटीइंकम्बेंसी फैक्टर होना स्वभाविक है,जाहिर सी बात है सत्ता में रहते पूरे पंद्रह साल हो रहे हैं।इससे मंत्रियों व विधायकों के कामकाज को लेकर आम लोगों में नाराजगी हो सकती है।
बजट में सबको साधने की कोशिश के बीच सामाजिक सरोकारों की वचनबद्वता तो यही साबित कर रही है कि,शिवराज आगामी चुनाव में विरोधियों का दो तरह से मुकाबला करने की तैयारी कर रहे है। वह मंत्रियों-विधायकों से चर्चा कर उनके काम का मूल्यांकन कर रिपोर्ट तैयार करवा रहे हैं,जैसा हाल में पचमढ़ी में शिवराज ने कहा है। उससे तो यही लगता है,कि खराब प्रदर्शन वाले नेताओं को टिकट नहीं दिया जाएगा। दूसरा समाज के उस वर्ग के लिए कुछ खास करना जो वोट बैंक साबित हो सकते हैं। शिवराज के शासन की यह खासियत रही है, कि वह हर रोज अगले चुनाव की तैयारी में दिखाई देते हैं। अब राज्य के कर्मचारियों को सातवां वेतनमान देने का ऐलान, विधवा पेंशन योजना और मुख्यमंत्री मेधावी छात्र योजना जिसमें छात्रों को देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाओं में आगे की शिक्षा में मदद की बात है,चुनावी तैयारियों की ओर इशारा कर रही हैं। इसके पहले राज्य की लाड़ली लक्ष्मी योजना ने देश भर में धूम मचाई थी। योजना को पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा की सरकार में वापसी का बड़ा फैक्टर ठहराया गया था। इस बजट में इसी योजना पर अधिक राशि का प्रावधान किया गया है। इधर, मुख्यमंत्री कन्यादान और मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना भी सरकार के सामाजिक क्षेत्र में कार्यों की विशेष सफलता की कहानी कहती हैं। अब लक्ष्य फिर से महिला,युवा और गरीब ही हैं,जिन्हें पांच रूपए में भरपेट भोजन देने की योजना शुरू की जा रही है। इधर,एससी एसटी और पिछड़े वर्ग के युवाओं को भी साधा जा रहा है,उन छात्रों के लिए बजट में 2327 करोड़ का प्रावधान किया गया है।

आईएसआई ने कैसे खड़ा किया नेटवर्क ?
देश भर में शांति के टापू के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुके मध्यप्रदेश में गुप्त ढंग से चल रही आईएसआई की गतिविधियां चिंताजनक हैं. लेकिन ये भी सच है कि एटीएस ने तत्परता के साथ इसका
पर्दाफाश कर शानदार सफलता अर्जित की है.
मिलिटरी इंटेलीजेंस,जम्मू-कश्मीर पुलिस,उत्तरप्रदेश की पुलिस और फिर मप्र की पुलिस इनके बीच जिस समन्वय और तालमेल के साथ ये कार्रवाई की गई है. वह देश में जांच एजेंसिंयों के बीच बढ़ रही सूचनाओं के परस्पर आदान-प्रदान की ओर भी इशारा कर रहा है. इससे यह उम्मीद अवश्य जागी है,कि अब वे लोग भी कार्रवाई के घेरे में जल्द आएंगे जो छोटे-बड़े कस्बों में रहते हुए पैसे कमाने की लालच में पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई को अपने ही देश की गोपनीय जानकारी देने का काम कर रहे थे. इस कार्रवाई के बाद मध्यप्रदेश के लोग ये जानना चाहेंगे कि आखिर वह कौन से हालात रहे जिनकी वजह से इस तरह का नेटवर्क मध्यप्रदेश में विकसित हुआ . जो आरंभिक जानकारी है,उसमें यह पता चला है कि वे लोग इंटरनेट काल को सेल्युलर काल में बदलकर दूसरे देशों में बैठे उन लोगों से बात कराते थे जो उन्हें फंडिंग कर काम बताया करते थे. सबसे चिंताजनक विषय भी यही है कि मप्र के सतना जैसे छोटे से स्थान से जम्मू-कश्मीर के आतंकियों को कैसे आर्थिक मदद पहुंची. एटीएस ने प्रदेश से कुल 15 जासूसों को हिरासत में लिया है,जिसमें से एक तो राजनीतिक दल की आईटी सेल के लिए काम करता था. इस लिए अब जांच एजेंसिंयों को दायरा बढ़ाते हुए संदिगधों पर नजर इस समझदारी से रखना जरूरी हो गया है, कि आईएसआई का वास्तविक मददगार पकड़ में भी आ जाए, और लोगों के बीच में उस कार्रवाई का कोई विरोध भी न हो. जांच एजेंसिंयां आपस में और मजबूत तालमेल कर इन्हें पकडेंगी ही लेकिन उन्हें समाज और अपने बीच के विभीषण को पकडऩे के लिए जनता के सहयोग की जरूरत होगी. ये तभी संभव है जबकि आम लोग अपनी जिम्मेदारी को भलीभांति समझें और जांच एजेंसिंयों को सहयोग करने आगे आएं.

 

…संघ की रणनीति–लाभ का गणित
उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे बड़ी विधानसभाओं के चुनाव से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आरक्षण का बम फोड कर भाजपा की नींद उडा दी है. प्रेक्षकों की नजर अब इस बात पर होगी कि बिहार की तरह इस बार आरक्षण पर बवाल चुनाव में क्या गुल खिलाएगा.
साल 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले इन्हें सेमीफाइनल भी माना जा रहा है. क्योंकि भाजपा खुद ये बात कहती रही है कि उत्तरप्रदेश का मतदाता राजनीतिक दृष्टि से बेहद सतर्क होता है,जिसके वोट से देश की नब्ज को समझा जा सकता है.एैसा पहले बिहार के चुनाव नतीजे और अब सपा-कांग्रेस का गठबंधन उसके लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला ही कहा जा सकता है.भाजपा के चेहरे पर आई शिकन क्या गुल खिलाती है ये तो समय ही बताएगा. लेकिन संघ के इस तीर के दो ही मायने निकाले जा सकते हैं. पहला ये कि वह देश में जनता की धडक़न बन चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कमजोर करना चाहता है. या फिर उत्तरप्रदेश में अगड़ी जातियों को भाजपा के पक्ष में लामबंद करना चाह रहा है. लगता है भाजपा और उसके रणनीतिकारों को ये महसूस हो गया है कि उप्र के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की छवि और उनका पिछड़ी जाति से आना व मायावती की गरीब जातियों में पैठ होने से ये चुनाव भाजपा के लिए आसान नहीं होगा. लिहाजा उसने पिछड़ी जाति से प्रदेश
अध्यक्ष देने के बावजूद अगड़ी जातियों और उसके युवा वर्ग पर आरक्षण की समीक्षा का तीर चलाया है. क्योंकि प्रेक्षक संघ और भाजपा को अलग करके नहीं देखते लिहाजा संघ और भाजपा के राडार पर अगड़ी जाति और उसका युवा ही उसके समर्थन में एकजुट हो सकते हैं.
हाल में जयपुर के साहित्य उत्सव में पहले संघ के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य के बयान जिसमें आरक्षण की पुर्नसमीक्षा की बात कही गई थी और बाद में उनके पिता और संघ के पूर्व प्रवक्ता माधव गोविंद वैद्य के पिछड़ाों के आरक्षण की समीक्षा करने के लिए समिति के गठन की बात तो इसी ओर इशारा कर रही है. भले ही भाजपा के रणनीतिककार इससे नुकसान की भरपाई और अन्य रणनीति पर मंथन कर रहे हों लेकिन लगता यही है. संघ का अगड़ों को भाजपा के पक्ष में वोटों का लामबंद होने में मदद करने के उद्देश्य से ही दिया गया है.
प्रेक्षक इस बयान का असर पंजाब और उत्तराखंड विधानसभाओं पर क्या होगा इसे पढऩे की कोशिश करेंगे ही ये तय है कि पंजाब जहां दलित आबादी और उनका वोट उप्र के मुकाबले ज्यादा है.इस तरह की रणनीति कैसे काम आएगी. पंजाब भाजपा के लिए कांग्रेस के साथ आम आदमी पार्टी तो कहीं-कहीं बसपा भी चुनौती होगी एैसे में उसे अपने पुराने व परंपरागत जातियों के समर्थन की दरकार हो. एैसे में संघ का बयान बहुत संभव है उसे रणनीति की दिशा देने वाला हो. हालांकि प्रधानामंत्री नरेन्द्र मोदी विविध मंचों से आरक्षण के पक्ष में बयान देकर उसे खत्म नहीं करने की बात कह चुके है. एैसे में बिहार के बाद भाजपा स्वभाविक ही है कि इसे गंभीरता से ले. संघ के तीर पर भाजपा के अंदरखाने में खलबली जरूर है,लेकिन ये सोची समझी रणनीति के तहत दिया बयान है जिसका असर दूर तक होगा.

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