लखनऊ,इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने प्रमुख सचिव मेडिकल एवं स्वास्थ्य सेवाओं को प्रदेश में डाक्टरों को अस्पतालों में क्लीनिकल काम में लगाने के बजाय उन्हें प्रशासनिक कामों में लगाने पर स्पष्टीकरण देते हुए हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। साथ ही अदालत ने यह भी कहा है कि एक ओर से तो डाक्टरों केा यह कहकर स्वैच्छिक सेवानिवृत्त नहीं दी जा रही है कि अस्पतालों में डाक्टरों की भारी कमी है तो दूसरी ओर उन्हें किस आधार पर अस्पतालों मे मरीजों का इलाज करने की बजाय उन्हें प्रशासनिक कामों में लगाया जा रहा है। अदालत ने प्रमुख सचिव को जवाब दाखिल करने के लिए एक हफते का समय देते हुए मामले की सुनवायी 14 मई को नियत की है।
यह आदेश न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार अरोड़ा एवं न्यायमूर्ति वीरेंद्र कुमार द्वितीय की बेंच ने डा. सुनील कुमार की याचिका पर पारित किया। पूर्व आदेश के अनुपालन में मुख्य स्थायी अधिवक्ता रमेश पांडे ने अदालत को बताया कि याची को प्रशासनिक काम से हटाकर बलरामपुर अस्पताल में बतौर चीफ कल्संटेंट तैनात कर दिया गया है। लिहाजा याचिका अब निष्प्रभावी हो गयी है। इस पर अदालत ने कहा कि मामला केवल एक डाक्टर का नहीं है। ऐसे में अभी याचिका सारहीन नहीं हुई है। अदालत ने यह कहते हुए सरकार से अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। दरअसल याची डाक्टर केा प्रशासनिक कामों में लगाया था परंतु वह चाहता था कि उसे मरीजों के इलाज में लगाया जाये। जब सरकार ने नहीं सुनी तो याची ने अदालत को सहारा लिया था जिस पर अदालत ने पिछली सुनवायी को सरकार के रवैये पर नाराजगी जाहिर की थी। अदालत ने आश्चर्य जताते हुए कहा था कि प्रशासनिक काम आवश्यक हो सकता है पंरतु डाक्टरों की नियुक्ति प्रमुखतः मरीजों का इलाज करने के लिए होती है जिससे उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता है। अदालत ने कहा था कि वास्तव में जब एक फिजीशियन या सर्जन को प्रशासनिक कामों में लगा दिया जाता है तेा वह धीरे धीरे डाक्टरी का अपना ज्ञान खोने लगता है।
डाक्टरों को प्रशासनिक कामों में लगाने पर हाईकोर्ट नाखुश