साहित्य

पूनम की साहित्यिक यात्रा का तीसरा पडाव……
रहीम खान
(पुस्तक समीक्षा) इस बात में कोई दो मत नहीं की आज का दौर सोशल मीडिया का है। जहाँ पर हर वो व्यक्ति जो कुछ लिखना चाहता है, कहना चाहता है अगर उसको कहीं प्लेटफार्म नहीं मिलता तो सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात लोगों तक पहुँचा सकता है। देश का दिल कहे जाने वाले दिल्ली की साहित्यिक जगत में कम समय में अपने परिश्रम और विचारों के बल पर अच्छी खासी पहचान स्थापित करने वाली रचनाकर कवित्री एवं शायर पूनम माटिया ऐसा ही नाम है जिसने अपने ओजस्वी विचार, विषय के अनुकूल कम शब्दों में बातों को कहना तथा समाज के सभी विषय पर चंद अल्फाजों में दिल को छूने वाले विचारों को प्रदर्शित करके एक अलग पहचान स्थापित किया। किसी भी रचनाकार के लिए उसके काव्य संग्रह का प्रकाशन अपने आप में एक बड़ा गौरव का विषय होता है। यह संयोग की बात है कि पूनम माटिया जो एक गृहणी के साथ-साथ सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए साहित्यिक यात्रा के तीसरे पडाव में तीसरी किताब अभी तो सागर शेष है को लोगों तक पहुँचाने में सफल हो गई है। इसके पूर्व उनकी दो काव्य संग्रह स्वप्न श्रृंगार और फिर अरमान शीर्षक से प्रकाशित हो चुके है। दोनों ही संग्रह में उन्होंने जीवन की सार्थकता का अनुभव को लेकर जो भी लिखा उसको सभी ने सराहा। काव्यमंच के साथ विभिन्न टी.व्ही. चैनलों पर भी वह अपनी रचनाओं के माध्यम से काव्य जगह को महकाने में लगी हुई है।
तीसरे काव्य संग्रह पूरा सौ पेज पर आधारित है, जिसमें प्रथम पेज से अंतिम पेज तक जो कुछ लिखा और कहा गया वह बेहद रोचक और रूचिकर है। वरिष्ठ रचनाकार डाॅ. कुंवर बैचेन ने लिखा कि पूनम की चाँदनी और मिट्टी की सौंधी गंध वाली कविताओं से सुसज्जित तीसरा काव्य संग्रह में व्यक्त विचार दिल की गहराईयों को छूती है। पूनम ने नम आँखों और भीगी पलकों से कविता की माटी को भिगोया है और संवेदना की नूतन मूर्ति को गढ़ा है। ऐसी मूर्ति जिसमें भावना के नये नये रंग भरे गये है जिसको काव्य के मानकों पर ठीक से तराशकर सुंदर नाक नक्शे वाली बनाया गया है जिनमें नये-नये प्रतीकों की छबि और सुंदर बिंबों की संयोजना की गई है, जिसमंे शब्द बोलते से नजर आ रहे और हर बोल अनमोल है।
जिंदगी कि किताब के पन्ने
पलटते हुए गर आँख झपक जाए
यूँ लगता है जैसे-
पलों में सदियाँ गुजर जाएँ
हर पन्ने पे हर्फ
एक नया अंदाज लिये होते है।
तीसरे काव्य संग्रह की शुरूआत रचना ही उनकी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व होने का परिचय देती है जिसमें व्यक्त विचार सीधे दिल पर चोट करते है।
उदास रातों की कहानियाँ अकसर
सिसकियाँ कह जाती हैं
बंद खिडकियों, बद दरवाजों के बीच
गूंँजती है जोर से
पर बाहर न जाने क्यूँ
खमोशियाँ रह जाती है।
मुझे इस बात को कहने में कोई संकोच नहीं कि जितनी खूबसूरत वह है उतनी की खूबसूरत उनकी रचनायें भी। यहाँ से शुरू हुआ यह संग्रह विषय, दौर, तस्वीर या हकीकत, शबाब, सुरूर, इश्क एक दुआ, आईना, मीठी मुस्कान, चाँद से चाँद की बातें करेगें, मालूम न था, तेरा रूप, क्रांति बिगुल बजाना होगा, जिदंगी एक सफर नामा, अभी तो सागर शेष है, संरक्षण प्रकृति का, अनुभव क रंग, हमसफर, मुलाकात, विश्वास की नींव बेटियाँ, होली, दीवाली, रेशम की डोर में बंधा प्यार जैसों अनेकों अनेक नये नये विषय पर पूनम ने अपनी कलम का जादू बिखेरते हुए मूर्त रूप प्रदान किया है उसको पढ़ने के बाद मन मस्तिष्क के स्मरण पर एक खुशनूमा सुकुन महसूस होता है, साथ ही यह भी अनुभव कराता है कि रचनाकार के भीतर शब्दों का अपार भंडार समाया हुआ है जो सभी खुशी, गम को चंद अल्फाजों में बयान करके श्रोताओं के दिल पर छा जाने की क्षमता रखता है। संग्रह में देश भक्ति को भी उन्होंने बेहतरीन अंदाज में पिरोया है, वहीं दोहे, गजल, मुक्तक, संस्कृति के पतन, मासूम बचपन, नादान बचपन, हमारा देश महान, मौज को तरसती आत्मा पर जो लिखा है उसका सराहना के लिये मेरे पास शब्दों का अभाव है। पूनम के काव्य संग्रह इस बात का प्रतीक है कि प्रतिभावान एवं क्षमतावान व्यक्ति यदि अपने कार्य के प्रति गंभीर है तो उसके लिये सफलता का टेडामेढा रास्ता पार करने में कभी कोई कठिनाई नहीं आती। काव्य यात्रा में जिन लोगों ने पूनम को प्रोत्साहित करने में अपना योगदान दिया उसका उल्लेख भी उन्होंने अपनी किताब में बड़े सहज ढंग से किया। तीसरा काल संग्रह का प्रकाशन अमृत प्रकाशन दिल्ली द्वारा किया गया है। कम शब्दों में एक स्थापित रचनाकार के बहुमुखी प्रतिभा को वर्णन करना बेहद कठिन कार्य है। अंत में मैं अपनी बात को उनकी इस रचना के साथ विराम देना चाहता हॅू
हुस्न उसका खिला गुलाब
जैसे कोई अनपढ़ी किताब
दिल चाहे पन्ने दर पन्ने
पढँू उसे मैं हर्फ ब हर्फ
तसल्ली बक्श दे ऐ खुदा
बैचेन दिल को दे करार
मचलते है अरमां मेरे
समेटने को उसका नूर

पुस्तक चर्चा: कालजयी छंद दोहा का मणिदीप “दोहा दीप्त दिनेश”
(प्रो. नीना उपाध्याय)
आदर्शोन्मुखता, उदात्त दार्शनिकता और भारतीय संस्कृति की त्रिवेणी के पावन प्रवाह, सामाजिक जागरण और साहित्यिक सर्जनात्मकता से प्रकाशित मणिदीप की सनातन ज्योति है विश्ववाणी हिंदी संस्थान के तत्वावधान में ‘शांति-राज पुस्तक माला’ के अंतर्गत आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ और प्रो. साधना वर्मा के कुशल संपादन में समन्वय प्रकाशन अभियान जबलपुर द्वारा प्रकाशित दोहा शतक मञ्जूषा भाग ३ “दोहा दीप्त दिनेश।” सलिल जी से अथक प्रयासों के प्रतिफल इस संकलन के रचनाएँ प्रवाही, और संतुलित भाषा के साथ, अनुकूल भाव-भंगिमा को इंगित तथा शिल्प विधान का वैशिष्ट्य प्रगट करनेवाली हैं।
‘दोहा दीप्त दिनेश’ के प्रथम दोहाकार श्री अनिल कुमार मिश्र ने ‘मन वातायन खोलिए’ में भक्ति तथा अनुराग मिश्रित आध्यात्म तथा वैष्णव व शाक्त परंपरा का सम्यक समावेशन करते हुए आज के मानव की प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है-
देवी के मन शिव बसे, सीता के मन राम।
राधा के मन श्याम हैं, मानव के मन दाम।।
सगुण-निर्गुण भक्त और संत कवियों की भावधारा को प्रवाहित करते हुए दोहाकार कहता है-
राम-नाम तरु पर लगे, मर्यादा के फूल।
बल-पौरुष दृढ़ तना हो, चरित सघन जड़ मूल।।
दोहा लेखन के पूर्व व्यंग्य तथा ग़ज़ल-लेखन के लिए सम्मानित हो चुके इंजी. अरुण अर्णव खरे ‘अब करिए कुछ काम’ शीर्षक के अंतर्गत जान सामान्य की व्यथा, आस्था व् भक्ति का ढोंग रचनेवाले महात्माओं व् नेताओं के दोहरे आचरण पर शब्दाघात करते हुए कहते हैं-
राम नाम रखकर करें, रावण जैसे काम।
चाहे राम-रहीम हों, चाहे आसाराम।।
प्रिय-वियोग से त्रस्त प्रिया को बसंत की बहार भी पतझर की तरह प्रतीत हो रही है-
ऋतु बसंत प्रिय दूर तो, मन है बड़ा उदास।
हरसिंगार खिल योन लगे, उदा रहा उपहास।।
दोहा दीप्त दिनेश के तृतीय दोहाकार अविनाश ब्योहार व्यंग्य कविता, नवगीत व् लघुकथा में भी दखल रखते हैं। आपने “खोटे सिक्के चल रहे” शीर्षक के अंतर्गत पाश्चात्य सभ्यता और नगरीकरण के दुष्प्रभाव, पर्व-त्योहारों के आगमन, वर्तमान राजनीति, न्याय-पुलिस व सुरक्षा व्यवस्था पर सफल अभिव्यक्ति की है-
अंधियारे की दौड़ में, गया उजाला छूट।
अंधाधुंध कटाई से, वृक्ष-वृक्ष है ठूँठ।।
न्यायालयों में धर्मग्रंथ गीता की सौगंध का दुरूपयोग देखकर व्यथित अविनाश जी कहते हैं-
गीता की सौगंध का, होता है परिहास।
श्री रामचरित मानस में गो. तुलसीदास प्रभु श्री राम के माध्यम से कहते हैं-
निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
इस चौपाई के कथ्य की सार्थकता प्रमाणित करते हुए विदग्ध जी कहते हैं-
जिसका मन निर्मल उसे, सुखप्रद यह संसार।
उसे किसी का भय नहीं, सबका मिलता प्यार।।
संकलन के आठवें दोहाकार डॉ. जगन्नाथ प्रसाद बघेल ने जन सामान्य के जन-जीवन की दोहों के माध्यम से सरल सहज अभिव्यक्ति की है। आपके दोहों में कहीं-कहीं व्यंग्य का पुट भी समाहित है। प्रायः देखा जाता है कि बड़े-बड़े अपराधी बच निकलते हैं जबकि नौसिखिये पकड़े जाते हैं। लोकोक्ति है कि हाथी निकल गया, पूँछ अटक गई’। बघेल जी इस विसंगति को दोहे में ढाल कर कहते हैं-
संकलन के तेरहवें दोहाकार प्रो. विश्वम्भर शुक्ल ने “आनंदित होकर जिए” शीर्षक से भारतीय संस्कृति, वर्तमान राजनीति भक्ति-प्रधान एवं श्रृंगारपरक दोहों की सारगर्भित-सरल-सहज अभिव्यक्ति लयात्मकता और माधुर्य के साथ की है। आपके दोहों में प्रसाद युग की तरह सौंदर्य और कल्पना दोनों का सुंदर समन्वय देखा जा सकता है-
उगा भाल पर बिंदु सम, शिशु सूरज अरुणाभ।
अब निंदिया की गोद में, रहा कौन सा लाभ।।
हिंदी भाषा की वैज्ञानिकता को संपूर्ण विश्व की भाषाओँ में अद्वितीय बताते हुए आपने लिखा है-
शब्द ग्रहण साहित्य हो, धनी बढ़े लालित्य।
सकल विश्व में दीप्त हो, हिंदी का आदित्य।।
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ तथा प्रो. साधना वर्मा के संपादकत्व में विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के सारस्वत अनुष्ठान ‘दोहा शतक मंजूषा’ के भाग ३ ‘दोहा दीप्त दीनेष में १५ दोहाकारों ने विविध विषयों और प्रसंगों पर अपने चिंतन की दोहा में अभिव्यक्ति की है। भक्ति, अध्यात्म, प्रकृति चित्रण, राष्ट्र-अर्चन, बलिदानियों का वंदन, श्रृंगार, राजनीति, सामयिक समस्याएँ, पर्यावरण संरक्षण व संवर्धन आदि विषयों को समाहित करते हुए ‘दोहा दीप्त दिनेश’ के दोहे सहज प्रवाही भाषा और संतुलित भाषाभिव्यक्ति के साथ शिल्प विधान का वैशिष्ट्य प्रगट करते हैं।

समसामायिक कृति है समय के सवाल
(पुस्तक चर्चा) मैं शहर के एक नामी अस्पताल के पास से निकल रहा था। परिसर में बनी दूकानो में एक भव्य शो रूम दिखा , ” फर्स्ट क्राई ” मैने देखा कि वहां नवजात शिशु के उपयोग की हर ब्रांडेड वस्तु सुलभ थी। मैं उन दिनो पंकज चतुर्वेदी की पुस्तक ” समय के सवाल ” पढ़ रहा था , तो मेरे मन में सहज ही प्रश्न आया कि क्या सचमुच इस मंहगे ब्रांडेड शो रूम में हमारी भावी पीढ़ीयों के उपयोग के सारे सरंजाम उपलब्ध हैं ? क्या वातावरण की प्रदूषित हवा , प्रदूषित जल के जबाब हम अपनी भावी नस्लों को आक्सीजन कैन या बिसलरी की बोटलो में बंद करके ही देना चाहते हैं ? नव दम्पति और बच्चे के नाना नानी , दादा दादी जिस प्रसन्नता से नवजात के लिये मंहगे ब्रांडेड सामान खरीदते और प्रसन्न होते हैं , क्या समय रहते जन चेतना से उनमें प्रकृति संरक्षण के भाव पैदा करना जरूरी नही है। जिससे आने वाला बच्चा नैसर्गिकता का कम से कम उसी रूप में आनंद उठा सके , जिस रूप में हमें हमारे बुजुर्गो ने प्रकृति को हमें सौंपा था। इन अनुत्तरित यक्ष प्रश्नो के जबाब ढ़ूंढ़ने और प्रकृति से की जा रही हमारी छेड़ छाड़ के विरुद्ध हमें चेताने की एक कोशिश ही है पंकज चतुर्वेदी की किताब “समय के सवाल”
पंकज चतुर्वेदी , जल , जंगल , जमीन से जुड़े मुद्दो पर खोजी पत्रकारिता का सुस्थापित नाम है। वे स्वयं विज्ञान के छात्र रहे हैं , शिक्षा अभियान से जुड़े हुये हैं , बुंदेलखण्ड की मिट्टी से जुड़े हुये हैं अतः प्रकृति से जुड़े समसामयिक ज्वलंत विषयों पर उनकी गहरी समझ है। हमने जब तब उन्हें यहां वहां पढ़ा ही है. वे सतही लेखन नही करते बल्कि उनके लेख ऐसे शोध कार्य होते हैं जो आम आदमी के समझ में आ सकें , तथा जन सामान्य के लिये उपयोगी हों। वे प्रकृति से जुड़े हर उस विषय पर जहां उनकी नजर में कुछ गलत होता दिखता है समाज को , सरकार को , नीति निर्माताओ को , क्रियांन्वयन करने वालो को और हर पाठक को समय रहते चेताते दिखते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में संग्रहित कुल ५३ आलेख अलग अलग समय पर सम सामयिक मुद्दो पर लिखे गये हैं। जिन्हें पर्यावरण , धरती , शहरीकरण , खेती , जंगल , जल है तो कल है इन ६ उप शीर्षको के अंतर्गत संकलित किया गया है। सभी लेख प्रामाणिकता के साथ लिखे गये हैं । लेख पढ़कर समझा जा सकता है कि लेखन के लिये उन्होने स्वयं न केवल अध्ययन किया है वरन मौके पर जाकर देखा समझा और लोगो से बातें की हैं. पहला ही आलेख है ” कई फुकुशिमा पनप रहे हैं भारत में ” यह लेख जापान में आई सुनामी के उपरान्त फुकुशिमा परमाणु विद्युत संयंत्र से हुये नाभिकीय विकरण रिसाव के बाद भारतीय संदर्भो में लिखा गया है। लेख में आंकड़े देकर उर्जा के लिये परमाणु बिजलीघरो पर हमारी निर्भरता की समीक्षा के साथ वे चेतावनी देते हैं ” परमाणु शक्ति को बिजली में बदलना शेर पर सवारी की तरह है। “यूरेनियम कारपोरेशन आफ इंडिया ” के झारखण्ड से यूरेनियम के अयस्क खनन तथा उसके परिशोधन के बाद बचे आणविक कचरे का निस्तारण जादूगोड़ा में आदिवासी गांवो के बीच किया जाता है , लेखक की खोजी पत्रकारिता है कि वे आंकड़ो सहित उल्लेख करते हैं कि इस प्रक्रिया में लगे कितने लोग कैंसर आदि बीमारियो से मरे। उन्होने १९७४ के पोखरण विस्फोट के बाद उस क्षेत्र के गांवो में कैंसर के रोगियो की बढ़ी संख्या का उल्लेख भी किया है। लेख के अंत में वे चेतावनी देते हैं कि यदि हमारे देश के बाशिंदे बीमार , कुपोषित और कमजोर होंगे तो लाख एटमी बिजलीघर भी हमें सर्वशक्तिमान नही बना सकते।
आखिर कहां जाता है परमाणु बिजली घरो का कचरा ?, लेख में बुंदेल खण्ड में किये जा रहे आणविक कचरे के निस्तारण पर चिंता जताई गई है। पेड़ पौधे भी हैं तस्करो के निशाने पर , जरूरत है पर्यावरण के प्रति संवेदन शीलता की , गर्म होती धरती ,कहीं घर में ही तो नही घुटता है दम , पत्तियो को नही तकदीर को जलाता है समाज , खोदते खोदते खो रहे हैं पहाड़ , पालिथिन पर पाबंदी के लिये चाहिये वैकल्पिक व्यवस्था जैसे भाग एक के लेख उनके शीर्षक से ही अपने भीतर के विषय की जानकारी देते हैं और पाठक को आकर्षित करते हैं। पत्तियो को नही तकदीर को जलाता है समाज लेख में पंकज जी ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का संदर्भ देकर प्रभावी तरीके से खेत के अवशेष के प्रबंधन पर कलम चलाई है।
दूसरे भाग “धरती” के अंतर्गत कुल चार लेख हैं। दुनियां में बढ़ते मरुस्थल , ग्लेशियर प्राधिकरण की आवश्यकता , बंजर जमीन की समस्या को रेखांकित करती उनकी कलम आव्हान करते हुये कहती है कि जमीन के संरक्षण की जबाबदारी केवल सरकारो पर है जबकि समाज का हर तबका जमीन का हर संभव दोहन करने में व्यस्त है , यह चिंता का विषय है।
हमारा देश गांवो का कहा जरुर जाता है पर गांवो से शहरो की ओर अंधाधुंध पलायन हो रहा है , इसके चलते शहरो का अनियंत्रित विस्तार होता जा रहा है। शहरीकरण की अपनी अलग समस्यायें हैं। इन विषयो पर लेखक ने मौलिक चिंताये तथा अपनी समझ के अनुसार बेहतरी के सुझाव देते हुये लेख लिखे हैं। प्रधानमंत्री जी का स्वच्छता कार्यक्रम सहज ही सबका ध्यानाकर्षण कर रहा है , किन्तु विडम्बना है कि हमारी मशीनरी पाश्चात्य माडल का सदैव अंधानुकरण कर लेती है। हास्यास्पद है कि हम डालर में मंहगा डीजल खरीदते हैं, फिर हर गांव कस्बे शहर में कचरा वाहन प्रदूषण फैलाते हुये घर घर से कचरा इकट्ठा करते हैं ,और वह सारा कचरा किसी खुले मैदान पर डम्प कर दिया जाता है। इस तरह सफाई अभियान के नाम पर विदेशी मुद्रा का अपव्यय , वायु प्रदूषण को बढ़ावा , जमीन का दुरुपयोग हो रहा है। बेहतर होता कि हम साईकिल रिक्शा वाले कचरा वाहन उपयोग करते जिससे कुछ रोजगार बढ़ते , डीजल अपव्यय न होता , प्रदूषण भी रुकता। मैने अपने एक लेख में लिखा है कि जब बिजली की भट्टी पल भर में शव को चुटकी भर राख में बदल सकती है तो क्या ऐसी छोटी ओवन नही बनाई जानी चाहिये जिससे हर घर में लोग अपना कचरा स्वयं राख में तब्दील कर दें। पर हमारे मन की बात कौन सुनेगा ? हम बस लिख ही सकते हैं।
पंकज जी ने ऐसे सभी विषयो पर समय पर लेख लिखकर उनके हिस्से की जबाबदारी पूरी गंभीरता से पूरी की है। महानगरीय संस्कृति से पनपते अपराधो पर उनका लेख सामाजिक मनोविज्ञान की उनकी गहरी समझ प्रदर्शित करता है। इस लेख में उन्होने देह व्यापार से जेबकतरी तक की समस्याओ पर कलम चलाई है। जाने कितने करोड़ रुपये नदियो की साफ सफाई के नाम पर व्यय किये जाते हैं , पर एक ही बाढ़ में सारे किये कराये पर पानी फिर जाता है। मुम्बई , चेन्नई , बेंगलोर और इस साल केरल की बाढ़ प्रकृति की चेतावनी है। जिसे समझाने का तार्किक यत्न पंकज जी ने किया है। जल मार्गो पर कूड़ा भरना उन्होने समस्या की जड़ निरूपित किया है। उनकी पैनी नजर सड़को पर जाम की समस्या से लेकर फ्लाईओवर तक गई है।
खेती और किसानी पर इस देश की राजनीती की फसलें हर चुनाव में पक रही हैं। कर्ज माफी के चुनावी वादे वोटो में तब्दील किये जाना आम राजनैतिक शगल बन गया है , पंकज जी ने १२ लेख फसल बीमा , रासायनिक खादो के जहर के प्रभाव , किसानो के लिये कोल्ड स्टोरेज की जरूरत, सूखे से मुकाबले की तैयारी, बी टी बीजो की समस्या आदि पर लिखे हैं। “जब खेत नही होंगे” लेख पढ़कर पाठक चौंकता है। पंकज जी से मैं सहमत हूं कि ” किसान भारत का स्वाभिमान हैं। ” वे लेख के अंत में वाजिब सवाल खड़ा करते हैं ” हमें जमीन क्यो चाहिये अन्न उगाने को या खेत उजाड़कर कारखाने या शहर उगाने को ? ”
आये दिन अखबारो में शहरो में आ जाते जंगली जानवरो की खबरे सुर्खी से छपती हैं। बस्ती में क्यो घुस रहा है गजराज ? , शुतुरमुर्ग भी मर रहे हैं और उनके पालक भी , घुस पैठियो का शिकार हो रहे हैं गैंडे , बगैर चिड़िया का अभयारण्य जैसे लेख उनकी व्यापक दृष्टि , भारत भ्रमण , और अलग अलग विषयो पर उनकी समान पकड़ का परिचायक है। वे प्रकृति के प्रहरी कलमकार के रूप में निखर कर सामने आते हैं।
कहा जाता है अगला विश्वयुद्ध पानी के लिये होगा। जल जीवन है , जल में जीवन है और जल से ही जीवन है। जल ने जीवन सृजित किया है। वहीं जल में विनाश की असाधारण क्षमता भी है। पानी समस्त मानवता को जोडता है। विभिन्न धर्मो में पानी का प्रतीकात्मक वर्णन है। ब्रम्हाण्ड की संरचना और जीवन का आधार भूत तत्व पानी ही है। जल भविष्य की वैश्विक चुनौती है। पिछली शताब्दि में विश्व की जनसंख्या तीन गुनी हो गई है , जबकि पानी की खपत सात गुना बढ़ चुकी है। जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या वृद्धि के कारण जल स्त्रोतो पर जल दोहन का असाधारण दबाव है। विश्व की बड़ी आबादी के लिये पेय जल की कमी है। जल आपदा से बचने , जल उपयोग में हमें मितव्ययता बरतने की आवश्यकता है. “जल है तो कल है” खण्ड में लेखक ने १० आलेख प्रस्तुत किये हैं। किंबहुना सभी लेखो में पानी को लेकर वैश्विक चिंता में वे बराबरी से भागीदार ही नही , वरन वे अपनी ओर से तालाबो के महत्व प्रतिपादित करते हुये समस्या का समाधान भी बताते हैं। कूड़ा ढ़ोने का मार्ग बन गई हैं नदियां , लेख में जल संसाधन मंत्रालय के संदर्भ उढ़ृत करते हुये वे विभिन्न नदियो में विभिन्न शहरो में प्रदूषण के कारण बताते हैं। दिल्ली में यमुना का प्रदूषित काला पानी जन चिंता का मुद्दा है , हिंडन जो कभी नदी थी , लेख में पंकज जी ने हिंडन को हिडन होने से बचाने की चेतावनी दी है।
लेखक अपने समय का गवाह तो होता ही है , उसकी वैचारिक क्षमतायें उसे भविष्य का पूर्वानुमान लगाने में सक्षम बना देती हैं, हमें समय के सवाल में उठाये गये मुद्दो पर गहन चिंतन मनन और हमसे जो भी प्रकृति संरक्षण के लिये हो सके करने को प्रेरित करती हैं। लेखकीय में पंकज जी ने लिखा है ” सुख के लोभ में कहीं हम अपनी आने वाली पीढ़ीयो के लिये विकल्प शून्य समाज न बना दें “।
“समय के सवाल” एक निरापद दुनियां बनाने के विमर्श का उनका खुला आमंत्रण हैं। पुस्तक पठनीय ही नही , चिंतन मनन और क्रियांवयन का आव्हान करती सम सामयिक कृति है।
(समीक्षक : विवेक रंजन)

दोहे सरस विदग्ध के
(लेखक-आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’)
दोहा विश्व वाणी हिंदी का सर्वाधिक प्राचीन (लगभग २००० वर्ष प्राचीन) छंद है। आधुनिक हिंदी ने इसे अपभृंश से विरासत में पाया और अपनाया है। संस्कारधानी जबलपुर दोहा लेखन का केंद्र रही है। गोंदरणी दुरवती के राजगुरु स्वामी नरहरिदास के शिष्य गोस्वामी तुलसीदास ने दोहावली में दोहा लिखने के साथ-साथ अपने अधिकांश ग्रंथों में दोहा को विविध छंदों के मध्य श्रृंखला के रूप में प्रयोग किया। यह परंपरा संस्कारधानी के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार, शिक्षाविद प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ के साहित्य में विद्यमान है। दोहा विदग्ध जी का प्रिय छंद है। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता जैसे दर्शन-ग्रंथ का दोहानुवाद कर अपनी सृजन सामर्थ्य का परिचय दिया है। वैशिष्ट्य यह कि हर श्लोक का भावार्थ एक दोहे में ही समेटा गया है।
मणि-कांचन संयोग
२३ मार्च १९२७ को स्वतंत्रता सत्याग्रही छोटेलाल वर्मा जी जी की धर्मपत्नि सरस्वती देवी ने जिस बालक को जन्म दिया वह पिता से ‘प्रभुता से लघुता भली, प्रभुता से प्रभु दूर’ की विरासत लेकर पिता के नाम के अनुरूप अपनी असाधारण उपलब्धयों के बावजूद खुद को ‘छोटा’ मानते हुए ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के जीवन सूत्र को अपनाता रहा। माँ के नाम को सार्थक करते हुए उसने ‘सरस्वती-साधना’ को ही जीवन का लक्ष्य बना लिया। यही नहीं जीवन संगिनी दयावती जी के नाम को अपनी जीवन शैली का अभिन्न अंग बनाते हुए उसने आजीवन ‘दयापूर्ण’ विनम्रता को अपने आचरण का अंग बना लिया। पद, धन और संपत्ति उसे ‘लघुता, ज्ञान और दया’ से विमुख नहीं कर सके। इस तीनों का प्रतिफल यह हुआ कि खुद ‘बिवेक उसका ‘रंजन’ के लिए पुत्र रूप में उसे प्राप्त हुआ और ‘कल्पना’ उसके साहित्य सृजन की सहायिका ही नहीं हुई, पुत्रवधु के रूप में भी उसकी सृजन सामर्थ्य वृद्धि में सहायक हुई। ऐसा मणि-कांचन संयोग विरल ही होता है।
सृजन यात्रा
गोंडवाना वंश की राजधानी मंडला मेरी भी जन्म स्थली है। मेरा सौभग्य है कि साहित्य-साधना की राह पर विदग्ध जी से मुझे प्रेरणा मिलती रही। उन्होंने हिंदी तथा अर्थ शास्त्र में एम्.ए., साहित्य रत्न तथा एम्.एड. की उपाधि अर्जित कर केन्दीय विद्यालय में प्राचार्य ,शासकीय शिक्षण महाविद्यालय में प्राध्यापक व् प्राचार्य के रूप में सेवा करते हुए श्रेष्ठता के मानक स्थापित किए। शिक्षण में नवाचार के लिए चर्चित रहे विदग्ध जी ने विद्यार्थियों में समाजोपयोगी कार्य करने की प्रबल चेतना जगाई। कायस्थ कहवंश में जन्में विदग्ध जी के कुल देवता श्री चित्रगुप्त जी चराचर के कर्म देवता हैं। विदग्ध जी के आजीवन कर्मोपासना को ही जीवन का ध्येय माना। उन्होंने असि को भले हे इन्हीं अपनाया पर मसि उनके साथ सदा जुडी रही। ईशाराधन, वतन को नमन, अनुगुंजन, नैतिक कथाएँ, आदर्श भाषण कला, कर्मभूमि के लिए बलिदान, जनसेवा, अँधा और लँगड़ा, मुक्तक संग्रह, स्वयं प्रभा व् अंतर्ध्वनि गीत संग्रह, मानस के मोती लेख संग्रह आदि कृतियों की रचना के समान्तर श्रीमदभगवद्गीता, मेघदूतम, रघुवंशम आदि संस्कृत ग्रंथों का हिंदी काव्यानुवाद भी विदग्ध जी ने किया।
दोहा लेखन
दोहा विदग्ध जी का सर्वप्रिय छंद है। विश्व वाणी हिंदी संसथान के तत्वावधान में शान्तिराज ग्रंथ माला के अंतर्गत दोहा शतक मञ्जूषा के सारस्वत अनुष्ठान में आशीष स्वरूप विदग्ध जी के दोहे मिलना अपने आपमें एक उपलब्धि है। कुशल दोहाकार विदग्ध जी को कबीराना जीवन शैली रुचती है। कबीर पर उन्होंने अनेक दोहे कहे हैं। एक बानगी देखें-
जो भी कहा कबीर ने, तप कर सोच-विचार।
वह धरती पर बन गया, युग का मुक्ताहार।।
यहाँ अन्त्यानुप्रास के समान्तर ‘तप’ में श्लेष की छटा दर्शनीय है।
विदग्ध जी अधिकार पर कर्तव्य को वरीयता दिए जाने के पक्षधर हैं। वे जानते और मानते हैं की लोक की, लोक के द्वारा, लोक के लिए स्थापित लोकतंत्र की सफलता जनगण की जागरूकता पर ही निर्भर है-
आम व्यक्ति को चाहिए, रखनी प्रखर निगाह।
राजनीति करती तभी जनता की परवाह।।
लोकतंत्र बमन कर्तव्य केवल जनगण के ही नहीं शासन और प्रशासन के भी होते हैं। विदग्ध जी शासन-प्रशासन को विमर्श देने का कवि-धर्म निभानेसे भी नहीं चूकते-
शासक-मन में हो दया, नीति-न्याय का ध्यान।
तब होता दायित्व का, जान-मन को कुछ भान।।
शांति-व्यवस्था के लिए जनगण के मन में कानून के प्रति आस्था और उसका पालन करने की भावना होना अनिवार्य है-
बड़े, छोटे ही भले, जिनको प्रिय कानून।
कभी कहीं करते नहीं, नैतिकता का खून।।
नियति और प्रारब्ध को कोई नहीं जान सकता। लोकोक्ति है-
‘जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोय तू सूल।
बाको सूल तो सूल है, तेरो है तिरसूल।।
इस सनातन सत्य को विदग्ध जी वर्तमान संदर्भों में अधिक स्पष्टता से कहते हैं-
हानि-लाभ किससे-किसे, कह सकता कब-कौन?
कभी ढिंढोरा हराता, कभी जिताता मौन।।
विदग्ध जी की दृष्टि सफलता और वैभव की चकाचौंध से भ्रमित नहीं होती। वे मनुष्य का मूल्यांकन उसके वैभव से नहीं उसके आचरण के आधार पर करते हैं। उनका शिक्षक उन्हें औचित्य-अनौचित्य पर विचार के प्रति सदा सजग रखता है। वे कहते हैं-
गुणी व्यक्ति का ही सदा, गुणग्राहक संसार।
ऐसे ही चलता रहा, आग-जग घर-परिवार।।
देश के राजनेताओं का कदाचरण उन्हें सालता है। स्वतंत्रता सत्याग्रही पिता का स्वतंत्र देश के संबंध में सपना और आज की सचाई उन्हें सोचने और सच कहने के लिए प्रेरित करती है। वे राजनीति का आकलन कर कहते हैं-
सत्ता-सुख या जेल हैं, राजनीति के छोर।
पहुँचाती है व्यक्ति को, हवा बहे जिस ओर।।
एक जन-दोहा है
‘मनुज बलि नहिं होत है, समय होत बलवान।
भिल्लन लूटीं गोपिका, वहि अर्जुन वहि बान।।’
विदग्ध जी इस दोहे के मर्म से सहमत होकर वर्तमान संदर्भ में इस तरह कहते हैं-
भला-बुरा कुछ भी नहीं, घटना समायाधीन।
हैं दरिद्र गुणवान जन, कभी धनी गुणहीन।।
सामाजिक विसंगतियाँ विदग्ध जी को चिंतित करें यह स्वाभाविक है। आधुनिक जीवन में बढ़ती यांत्रिकता और व्यावसायिकता उन्हें निस्सार लगती है-
मानव-जीवन बन गया, लेन-देन व्यवहार।
भूल गए कर्तव्य सब, याद रहा अधिकार।।
जीवन बना मशीन सा, नीरस सब व्यवहार।
प्रेम भाव दिखता नहीं, ढंका है व्यापार।।
जीवन को सफल बनाने का सूत्र बताते हुए विदग्ध जी कबीरी फक्कड़पने और ‘ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया’ की विरासत अगली पीढ़ी को सौंपते हुए कहते हैं-
पवन मन से उपजता, जीवन में आनंद।
निर्मल मन को ही सदा, मिले सच्चिदानंद।।
अगर शांति से चाहता, जाना भव के पार।
बना सत्य श्रम प्रेम को, जीवन एक आधार।।
विदग्ध जी के दोहे शिल्प पर कथ्य को वरीयता देते हैं। उन्हें व्यंजना या लक्षणा से अधिक अभिधा से प्यार है। वे सौंदर्य की अपेक्षा भावना को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके दोहों में प्रयुक्त भाषा शुद्ध। सरस, सरल और सहज ग्राह्य है। सफल शिक्षक होने के नाते वे भली-भाँति जानते हैं कि स्वाभाविकता से कही गई बात अधिक प्रभावी और उसका असर अधिक स्थायी होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता दोहानुवाद एक उपलब्धि
छंदराज दोहा के प्रति विदग्ध जी का प्रेम इसी बात से झलकता है कि श्री मद्भगवद्गीता के हिंदी पद्यानुवाद के लिए करोड़ों उपलब्ध छंदों में से उनहोंने दोहा कही चयन किया। गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित गीतापाठ और अनुवाद को प्रामाणिक मानते हुए विदग्ध जी ने उसे दोहान्तरित किया है।
प्रथम श्लोक का दोहान्तरण करते हुए वे लिखते हैं-
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में, युद्ध हेतु तैयार।
मेरों का पांडवों से, संजय! क्या व्यवहार।।
समन्वय और सहकार को सृष्टि का मूल बताते अध्याय ३ के श्लोक क्र. ११ का अनुवाद पूरी तरह सटीक है-
देवों को संतोष दो, देव तुम्हें दें तृप्ति।
पारस्परिक प्रभाव से, मिले सभी संतुष्टि।।
गेता में वर्णित ईश्वर के रूप का वर्णन अध्य ९ के श्लोक क्र. १६ का दोहनूवाद शब्द-चयन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है-
मैं ही कृति हूँ यज्ञ हूँ, स्वधा मंत्र घृत अग्नि।
औषध भी मैं हवन मैं, प्रबल जान जमदाग्नि।।
त्रिगुणात्मिका प्रकृति में त्रिगुणों के प्रभाव का वर्णन अध्याय १४ के श्लोक क्र. १७ में है। उसे विदग्ध जी बहुत सरलता से बताते हैं-
सत से होता ज्ञान है, रज से लोभ निदान।
तम से मोह प्रमाद है, औ’ बढ़ता अज्ञान।।
दोहाप्रेमी विदग्ध जी के व्यक्तित्व-कृतित्व को दोहा ही सम्मानित करे तो यह सोने में सुहागा होगा। समर्पित हैं कुछ दोहे-
चित्रगुप्त परब्रम्ह का, पाया जिसने इष्ट।
सरस्वती-सुत हो दिया, है अवदान विशिष्ट।।
छोटे के थे लाल पर, किये बड़े ही काम।
नेह नर्मदा में नहा, कभी न चाहा नाम।।
दया बसी मन में रही, कभी न छोड़ा साथ।
आजीवन थामे रहे, विहँस हाथ में हाथ।।
रंजन किया विवेक ने, मिला बुद्धि-सहयोग।
सहयोगी हो कल्पना, सफल करे उद्योग।।
ईशाराधन सुहाया, अनुगुंजन कर नित्य।
किया वतन को नमन नित, तज कर मोह अनित्य।।
अंतर्ध्वनि सुन-गुन सके, मेघदूत के संग।
गीत ने जीता मनस, प्रतिभा साधन रंग।।
रघुवंशम से कर्म की, ली-दी सबको सीख।
मानस के मोती लुटा, भिन्न शेष से दीख।।
स्नेह सलिल सिंचन करे, अग-जग को संजीव।
हो विदग्ध मन शांत-थिर, भव में ज्यों राजीव।।
शत वर्षों पाते रहें, हिंदीसुत तव स्नेह।
जगवाणी हिंदी बने, सकल जगत हो गेह।।

(पुस्तक चर्चा) वतन को नमन : एक पठनीय पुस्तक
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने लिखा है-
“जिसको न निज गौरव तथा निज देश एक अभिमान है
वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।”
नर्मदांचल के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ कवि प्रो. सी.बी. एल. श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ने देश की नई पीढ़ी को नर-पशु बनने से बचाने के लिए इस कृति का प्रणयन किया है। आदर्श शिक्षक रहे विदग्ध जी ने नेताओं की तरह वक्तव्य देने या तथाकथित समाज सुधारकों की तरह छद्म चिंता विकट करने के स्थान पर बाल, किशोर, तरुण तथा युवा वर्ग के लिए ही नहीं अपितु हर नागरिक में सुप्त राष्ट्रीय राष्ट्र प्रेम की भावधारा को लुप्त होने से बचाकर न केवल व्यक्त अपितु सक्रिय और निर्णायक बनाने के लिए “वतन को नमन” की रचना तथा प्रकाशन किया है। १३० पृष्ठीय इस काव्य कृति में १०८ राष्ट्रीय भावधारापरक काव्य रचनाएँ हैं। वास्तव में ये रचनाएँ मात्र नहीं, राष्ट्रीयता भावधारा के सारस्वत कंठहार में पिरोए गए काव्य पुष्प हैं।
‘वतन को नमन’ विदग्ध जी की राष्ट्रीय चेतना से परिपूर्ण कविताओं-गीतों का संग्रह है। विदग्ध जी शिल्प पर कथ्य को वरीयता देते हुए नई पीढ़ी को जगाने के लिए राष्ट्रीय भावधारा के प्रमुख तत्वों राष्ट्र महिमा, राष्ट्र गौरव, राष्ट्रीय पर्व, राष्ट्रीय जीवन मूल्य, राष्ट्रीय संघर्ष, राष्ट्रीयता की दृष्टि से महत्वपूर्ण महापुरुष, राष्ट्रीय संकट, कर्तव्य बोध, शहीदों को श्रद्धांजलि, राष्ट्र का नवनिर्माण, नयी पीढ़ी के स्वप्न, राष्ट्र की कमजोरियाँ, राष्ट्र भाषा, राष्ट्र ध्वज, राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रीय सेना, राष्ट्र के शत्रु, रष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्र की प्रगति, राष्ट्र हेतु नागरिकों का कर्तव्य एवं दायित्व आदि को गीतों में ढालकर पाठक को प्रेरित करने में पूरी तरह सफल हुए हैं। भारत का गौरव गान करते हुए वे कहते हैं-
हिमगिरि शोभित, सागर सेवित, सुखदा, गुणमय, गरिमावाली।
शस्य-श्यामला शांतिदायिनी, परम विशाला वैभवशाली।।
ममतामयी अतुल महिमामय, सरलहृदय मृदु ग्रामवासिनी।
आध्यात्मिक सन्देशवाहिनी, अखिल विश्व मैत्री प्रसारिणी।।
प्रकृत पवन पुण्य पुरातन, सतत नीति-नय-नेह प्रकाशिनि।
सत्य बंधुता समता करुणा, स्वतन्त्रता शुचिता अभिलाषिणी।।
ज्ञानमयी, युवबोधदायिनी, बहुभाषा भाषिणि सन्मानी।
हम सबकी मी भारत माता, सुसंस्कारदायिनी कल्याणी।।
देश के युवाओं का आव्हान करते हुए वे उन्हें युग निर्माता बताते हैं-
हर नए युग के सृजन का भर युवकों ने सम्हाला
तुम्हारे ही ओज ने रच विश्व का इतिहास डाला
प्रगति-पथ का अनवरत निर्माण युवकों ने किया है-
क्रांति में भी, शांति में भी, सदा नवजीवन दिया है
देश, उसकी स्वतंत्रता और देशवासियों के रक्षक सेना के रणबांकुरों के प्रति देश की भावनाएं कवि के माध्यम से अभिव्यक्त हुई हैं-
तुम पे नाज़ देश को, तुम पे हमें गुमान
मेरे वतन के फौजियों जांबाज नौजवान
संस्कारधानी जबलपुर राष्ट्रीय भावधारा के इस सशक्त हस्ताक्षर की काव्य साधना से गौरवान्वित है। हिंदी साहित्य के लब्ध प्रतिष्ठ हस्ताक्षर आचार्य संजीव ‘सलिल’ देश की माटी के गौरवगान करने वाले विदग्ध जी के प्रति अपने मनोभाव इस तरह व्यक्त करते हैं-
हे विदग्ध! है काव्य दिव्य तव सलिल-नर्मदा सा पावन
शब्द-शब्द में अनुगुंजित है देश-प्रेम बादल-सावन
कविकुल का सम्मान तुम्हीं से, तुम हिंदी की आन हो
समय न तुमको बिसरा सकता, देश भक्ति का गान हो
चिर वन्दित तव सृजन साधना, चित्रगुप्त कुल-शान हो
करते हो संजीव युवा को, कायथ-कुल-अभिमान हो।
(प्रो. (डॉ.) साधना वर्मा )

(पुस्तक चर्चा) गांव मेरा देस
(रचनाकार भगवान सिंह )
कुल दस लेख, पृष्ठ संख्या 256 मतलब बहुत विस्तार से देशज, आत्मीय अभिव्यक्ति से अपने गांव के परिवेश पर संस्मरणात्मक लेखो का संग्रह है ” गाव मेरा देस “। शीर्षक में ही देश की जगह देस शब्द का प्रयोग ही बताता है कि अपने गांव से जुड़े ठेठ मनोभाव अंतरंगता से लेखो में हैं। लेखक श्रीभगवान सिंह गांधीवादी दृष्टि के लिये सम्मानित हो चुके हैं। वर्तमान ग्लोबल विलेज के परिदृश्य में उन्होने अपने गांव के बचपन, शिक्षा, लोकाचार, तीज त्यौहार मेले ठेले, संयुक्त परिवार के संस्कारो, गांवो की स्वचालित परम्परागत व्यवस्थाओ का प्रवाहमान शैली में पठनीय वर्णन किया है। पुस्तक आकर्षण पैदा करती है, व हमें अपने गांव की स्मृति दिलाती है। एक तरह से ये निबंध उनकी अपनी जीवनी हैं, पर शैली ऐसी है कि उससे प्रत्येक पाठक कुछ न कुछ बौद्धिक व मानसिक खुराक ले लेता है।
समीक्षक … विवेक रंजन श्रीवास्तव

(पुस्तक चर्चा) पुस्तक .. जंगलराग
(व्ही.आर.रंजन)
कवि .. अशोक शाह
मूल्य .200 रु
प्रकाशक .. शिल्पायन , शाहदरा दिल्ली
मूलतः इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त , म. प्र. में प्रशासनिक सेवा में कार्यरत अशोक शाह हृदय से संवेदनशील कवि , अध्येता , आध्यात्म व पुरातत्व के जानकार हैं। वे लघु पत्रिका यावत का संपादन प्रकाशन भी कर रहे हैं। उनकी ७ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. पर्यावरण के वर्तमान महत्व को प्रतिपादित करती उनकी छंद बद्ध काव्य अभिव्यक्ति का प्रासंगिक कला चित्रो के संग प्रस्तुतिकरण जंगलराग में है। वृक्ष , जंगल प्रकृति की मौन मुखरता है , जिसे पढ़ना , समझना , संवाद करना युग की जरूरत बन गया है। ये कवितायें उसी यज्ञ में कवि की आहुतियां हैं। परिशिष्ट में ९३ वृक्षो के स्थानीय नाम जिनका कविता में प्रयोग किया गया है उनके अंग्रेजी वानस्पतिक नाम भी दिये गये हैं। कवितायें आयुर्वेदीय ज्ञान भी समेटे हैं , जैसे ” रेशमी तन नदी तट निवास भूरी गुलाबी अर्जुन की छाल
उगता सदा जल स्त्रोत निकट वन में दिखता अलग प्रगट
विपुल औषधि का जीवित संयंत्र रोग हृदय चाप दमा मंत्र ” इसी तरह बीजा , हर्रा , तिन्सा , धामन , कातुल , ढ़ोक , मध्य भारत में पाई जाने वाली विभिन्न वृक्ष वनस्पतियो पर रचनाकार ने कलम चलाई है। तथा सामान्य पाठक का ध्यान प्रकृति के अनमोल भण्डार की ओर आकृष्ट करने का सफल यत्न किया है। 14 चैप्टर्स में संग्रहित काव्य पठनीय लगा।

सतरंगी मन काव्यसंग्रह नहीं वरन समय के साथ कल्पनाओं की उड़ान
(पुस्तक समीक्षा)
कविता एक चिंतन है,जो स्वयं की भावनाओं के चिंतन के साथ शब्दों की अभिव्यक्ति के रूप में सामने आती है। कवियत्री शिल्पा शर्मा ने अपनी रचना “सतरंगी मन” में जिस तरह से बचपन से लेकर जीवन के संपूर्ण सफर को विभिन्न सोच के साथ,काव्य के माध्यम से प्रकाशित किया है। महिला एवं पुरुषों के बीच संबंध बचपन से लेकर युवा, पोडअवस्था, केरियर, दायित्व, परंपराओं,माता पिता और बच्चों के बीच संबध,सोच, समय-समय पर बदलते विचार, जीवन के सुखद और कटु अनुभव की अभिव्यक्ति, सरल और सहज शब्दों में करके, पाठकों को उनके ही जीवन से जोड़ने का जो अभिनव प्रयास किया है। वह प्रशंसनीय है।
कवियत्री की रचना में कल्पना नहीं, बल्कि यथार्थ और सत्य का बोध होता हैं।
शिल्पा शर्मा एक्सप्रेस मीडिया सर्विस से लगभग 20 वर्ष पूर्व जुडी थी। संवेदनशील एवं अपने दायित्वों को सहज, सरल एवं गंभीरता के साथ पूर्ण करने का गुण उनमें हमेशा से था। शब्दों के रूप में उन्होंने जीवन के हर पल को जिस खूबसूरती के साथ सतरंगी काव्य संग्रह में संजोया है, उससे यह कृति अनुपम हो गई है।
(समीक्षक- सनत जैन)

मोहि ब्रज बिसरत नाही

लेखिका- डॉ सुमन चौरे
ग्रामीण परिवेश के छोटे-छोटे लगभग साठ संस्मरणों का संकलन है मोहि ब्रज बिसरत नाही । लेखिका अपनी प्रस्तावना में लिखती है कि गांव में जब विकास प्रारंभ हुआ और पहली बस चली तो गांव की चौपाल पर जो चर्चा हुई उसका विचार यह था कि गांव में इस विकास से धन की वर्षा तो होगी किंतु प्रेम स्नेह और सम्वेदनाओं के स्रोत सूख जाएंगे। आज किंचित वह भय सत्य होता दिख भी रहा है । निमाड़ के आंचलिक परिदृश्य, सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास को छूते हुए यह छोटे-छोटे संस्मरण प्रभावी हैं । मूल्य की दृष्टि से किताब बहुत महंगी है शायद सरकारी खरीद के लिए ही प्रकाशित की गई है ।
लेखिका की भाषा में प्रवाह है उन्होंने निमाड़ की मालवी भाषा के उद्धरण भी जगह जगह दिए हैं। खूंटी पर टंगा बैग ,मुगी चाचा, मधुमालती के मंडवे तले ,अकरम मामा ,दगड़ू भाई ,बाबू काका ,अरदे पर्दे की बैलगाड़ी, गुम होते बाजे वाले , देहरी तो पर्वत भई,, कनस्तर का समीकरण,, जैसे संस्मरण सरल भाषा में एक रेखाचित्र पाठक के मन पर अंकित करने में सफल हुए हैं। ऐसे विषय हैं जो जन लोक से लिये गए हैं , दरअसल लेखिका स्वयं इन सारे वर्णनित विषयों की साक्षी रही हैं , इसलिए वे सहजता से लिख सकी ।
पुस्तक :- मोहि ब्रज बिसरत नाही
मूल्य 700
प्रकाशक :- अयन प्रकाशन महरौली नई दिल्ली
पृष्ठ संख्या 355
प्रस्तुति : विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

गुरु-वंदना
प्रो. शरद नारायण
गुरु की कर लो वंदना,जिसमें अतुलित ताप !
गुरु की महिमा है विकट,कौन सकेगा माप !!
गुरु सूरज,गुरु चाँद है,गुरु धरती आकाश !!
मेरा हो कल्याण यदि,मिले दया जो काश !!
गुरुवर में तो देव हैं,गुरुवर हरदम साँच !!
गुरुवर का आशीष जो,आ सकती ना आँच !!
गुरु तो बहता नीर है,गुरु है खिली बहार !
सचमुच वह नर धन्य है,जो पाता गुरु-प्यार !!
गुरु के कारण शिष्य को,मिलता है सम्मान !
गुरु से ही तो शिष्य की,बनती है पहचान !!
गुरु बतलाता सत्य को,दिखलाता है राह !
गुरु से ही तो हर कदम,मिले शिष्य को वाह !!
गुरु बिन ना तो ज्ञान है,ना ही है आलोक !
गुरु बिन तो ये ज़िन्दगी,है बस केवल शोक !!
गुरु विवेक औ’ त्याग का,है सचमुच में सार !
गुरु है तो हर हाल में ,हो रोशन संसार !!
गुरु में तुलसी हैं बसे,रहते सदा कबीर !
गुरु के कारण शिष्य की,बदले झट तक़दीर !!
गुरु का वंदन नित्य हो,हो अभिनंदन ख़ूब !
गुरु ब्रम्हा,गुरु विष्णु हैं,हैं पूजा की दूब !!

Share