प्रवचन-जीवन मंत्र

आध्यात्मिक जीवन में प्रगति के लिए सदपुरुषों की संगति करें
हम किसके साथ हैं यह हमारी जिंदगी में बहुत ही महत्वपूर्ण है। कुछ जगहों पर अच्छी गुणवत्ता के गुलाब की किस्म को कमजोर गुणवत्ता वाली गुलाब की किस्म के पास लगाया जाता है। यह इसलिए किया जाता है ताकि कमजोर किस्म के गुलाब का परागण उच्च किस्म के गुलाब के साथ हो सके और उनकी गुणवत्ता में निखार आ सके। इस तरह कमजोर को बेहतर बनाने का प्रयत्न किया जाता है।
यह सिद्धांत हमारी जिंदगी में भी काम करता है। कहा भी जाता है कि हम जिस तरह के लोगों की संगत में रहते हैं उसी से हमारी पहचान बनती है।
इसी तरह अगर हम आध्यात्मिक जीवन में प्रगति चाहते हैं तो हमें उन लोगों का सान्निध्य हासिल करना चाहिए जो उस रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं। अगर हम किसी ऐसे व्यक्ति के साथ कुछ समय बिताते हैं जो खुद ध्यान और प्राणायाम करता है तो हम पर उसकी इन आदतों का असर होगा ही। अच्छे लोगों की संगति हमें अच्छे रास्तों पर आगे बढऩे की प्रेरणा देती है। तो आपको अपनी संगति का मूल्यांकन करना चाहिए कि आप कैसी संगति में हैं। यदि आप ऐसे दोस्तों के साथ जुड़े हैं जो आपकी तरक्की में सहायक हैं या जिनके साथ रहते हुए आप नई चीजें सीख पा रहे हैं तो यह आपके लिए अच्छी बात है। लेकिन अगर ऐसा नहीं हो रहा है तब आपको चिंता करनी चाहिए।
आप जिन लोगों के साथ रहते हैं उनके व्यवहार के कारण ही आपके बारे में कोई भी धारणा बनाने का काम होता है इसलिए अपनी संगति के प्रति अत्यधिक सावधानी और सतर्कता रखनी चाहिए। जिस तरह किसी भी आईने में व्यक्ति का अक्स नजर आ जाता है उसी तरह दोस्तों से आपके मिजाज का अंदाज हो जाता है। इसलिए युवा अवस्था में संगति बना भी देती है और बिगाड़ भी सकती है। यही वजह है कि अपनी संगति का चुनाव बहुत ही देखभाल के साथ करना चाहिए।

मॉं अंजना के भाव हैं हनुमान
सोने की लंका के महाप्रतापी राजा और राह से भटके रावण पर विजय प्राप्त करके जब श्रीराम पुष्पक विमान पर सवार होकर आकाश मार्ग से वापस आने लगे तो कांचनगिरि के पास हनुमान जी ने कहा कि ‘महाराज! मेरी मॉं अंजना यहीं पर्वत शिखर पर रहती हैं। आप मेरी मॉं को यदि दर्शन दे देते तो आपकी बड़ी कृपा होती।’ श्रीराम आखिर अपने भक्तराज हनुमान की बात को कैसे टाल सकते थे अत: उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए वो पुष्पक विमान से पर्वत पर उतरे और माता अंजना के समक्ष जा पहुंचे। मां अंजना को जब पता चला कि रावण से सीता को छुड़ाने के लिए हनुमान के रहते श्रीराम को परिश्रम करना पड़ा तो वह तिलमिला गई। उन्होंने कहा कि ‘अरे हनुमन्त! तुमने मेरे दूध को लज्जित कर दिया। यह कैसे संभव हुआ कि तुम्हारे रहते हुए राम को कष्ट उठाना पड़ गया।’ जब मॉं ने बार-बार अपने दूध की दुहाई दी तो वहां मॉजूद अन्य रीछ वानरों और लक्ष्मण जी को भी नागवार गुजरा कि यह कैसी मां है, जो अन्य कुछ न कह कर बार-बार अपने दूध की दुहाइयां दे रही हैं। अंतत: श्रीराम ने सभी के भावों को समझा और बोले कि ‘हनुमान में शक्ति है तो उसकी अपनी शक्ति है, इसमें आपके दूध की क्या भूमिका है?’ मां अंजना इससे क्रोधित हो गईं। उन्होंने कहा कि ‘अगर हनुमान ने मेरा दूध न पिया होता तो इसके शरीर में फौलादी ताकत नहीं होती।’ वहां मौजूद अन्य लोगों ने पूछा, ‘इसका कोई सबूत है?’ मॉं अंजना अब थोड़ा मुस्कुराई और एक पत्थर के पास जाकर उन्होंने अपनी दुग्धधारा पत्थर पर छोड़ी इससे पत्थर चटक कर टुकड़े-टुकड़े हो गया। लोग चकित रह गए। दूध में इतनी शक्ति। यह देख सभी मॉं अंजना को घेर लिए और पूछने लगे कि ‘है मां! इसका तात्पर्य क्या है? आपके दूध से हनुमान में इतना बल, इतना ओज, इतना विवेक कैसे आ गया?’ मॉं अंजना ने कहा कि ‘बच्चों की नींव मां के दूध से शुरू होती है। मां जैसे विचार और भाव से बच्चों को दुग्धपान कराती है, उसका अचूक प्रभाव बच्चे पर पड़ता है।’

नासमझ रोते हैं भाग्य का रोना
धर्म कोई भी हो, लेकिन आस्थावान को अपने भाग्य पर उतना ही भरोसा होता है जितना कि जीवन और मरण में। वैसे भी मानव समाज में भाग्य को वो स्थान प्राप्त है जो कि किसी अन्य को हो नहीं सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अथक प्रयासों के बावजूद जो चीज या पद, प्रतिष्ठा नहीं मिल पाते हैं वो उज्जवल भाग्य के चलते चुटकियों में मिल जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि सब वस्तुओं की तुलना कर लें मगर अपने भाग्य की कभी भी किसी से तुलना नहीं करें। अधिकांक्षतया लोगों द्वारा अपने भाग्य की तुलना अन्य व्यक्तियों या यूं ही मजाक में किसी जानवर से करके व्यर्थ का तनाव मोल ले लिया जाता है। इसके साथ ही इसके लिए उस परमात्मा को ही सुझाव दिया जाता है कि उसे ऐसा न करते हुए ऐसा करना चाहिए था। भाग्य के लिए परमात्मा से शिकायत मत किया करो। यह समझ लो कि मानव कभी भी इतना समझदार नहीं हो सकता कि वह परमात्मा के इरादे समझ सकें। अगर उस ईश्वर ने आपकी झोली खाली रखी है तो यह सोचकर चिंतित मत होना कि आपकी झोली क्यों खाली है, बल्कि यह सोचना कि ईश्वर जरुर कुछ बेहतर देने वाला है। खाली झोली देख चिंता मत करना क्योंकि शायद हो सकता है कि भाग्यानुसार ईश्वर पहले से कुछ बेहतर उसमे डालना चाहता हो। इसे यूं समझें कि आपको अवसर मिला है कि आप दूसरों के भाग्य को देख और उसकी सराहना करने में समय लगाने की बजाय स्वयं अच्छे कार्य करते हुए अपने भाग्य को सुधारने में लग जाएं। अंतत: यह समझ लें कि परमात्मा ने भाग्य सभी के लिखे हैं, लेकिन उन्हें अमली जामा पहनाने की जिम्मेदारी स्वयं मानव के कंधों पर उसने डाल रखी है, जो यह समझ जाता है वह कड़ा परिश्रम करता रहता है और नासमझ भाग्य का रोना लेकर जिंदगी गुजार देते हैं।

भगवान का स्मरण
जहाँ भगवान का स्मरण चिन्तन होता है वह स्थान पवित्र माना जाता है। वहाँ के कण-कण में उस परमात्म-तत्त्व के परमाणु फैले रहते हैं। जो आदमी क्रोधी होता है उसके आसपास सात फीट के दायरे में क्रोध के परमाणु फैले रहते हैं। हर इन्सान एक पावर हाउस है। उसमें से कुछ न कुछ संस्कारों की सूक्ष्म तन्मात्राएँ निकलती रहती हैं। जहाँ भगवान की भक्ति करनेवाले लोग रहते हैं वह स्थान भी अपना कुछ दिव्य महत्त्व रखता है। महाराष्ट्र में महात्मा गाँधी किसी गुफा में गये थे। गुफा में रहने वाले योगी को देव हुए कोई सात-आठ दिन ही हुए थे। खाली गुफा में गाँधी जी थोड़ी ही देर बैठे तो उन्हें ॐ की सूक्ष्म ध्वनि महसूस हुई। जिस स्थान में भगवान का चिन्तन मनन होता है वह स्थान इतना पवित्र हो जाता है तो आदमी भगवान का चिन्तन मनन करता है वह कितना पवित्र हो जाता होगा ! इसीलिये भगवान के मार्ग में चलने वाले महापुरूषों का आदर करने वाला उन्नत होता है। रूपये देकर लेक्चर सुनने वाली पाश्चात्य परंपरा से केवल सूचनाएँ मिलती हैं, अमृत नहीं मिलता। गुरू और शिष्य के बीच वह सम्बन्ध होता है जो भगवान और भक्त के बीच होता है। तुच्छ वस्तुओं के लिए गुरूपद नहीं है। गुरूपद इसलिए है कि जीव जन्म-जन्मांतरें की भटकान से बचकर अपने गुरूतत्त्व को जान ले, अपने महान् पद को जान ले ताकि बार-बार दुःख-योनियों में न जाना पड़े। सूकर, कूकर आदि दुःख-योनियों हैं। श्रद्धा में एक ऐसी शक्ति है कि आप ईश्वर के किसी भी रूप को मानकर चलें तो समय पाकर गुरूओं का गुरू अन्तर्यामी परमात्मा भीतर से आपका प्रेरक बन जाता है। फिर ऐसे महापुरूष के पास आप पहुँच जाते हैं कि जिनकी पवित्र निगाह से, पवित्र आभा से आपका चित्त ईश्वर की ओर चलने लगता है। जिनकी निगाहों से, जिनके शरीर के परमाणुओं से, जिनके चित्त से ईश्वरीय आकर्षण, ईश्वरीय प्रेम तथा ईश्वरीय यात्रा के लिए जन-समाज को सहाय मिलती रहती है वे मनुष्य जाति के परम हितैषी रहते हैं। उन्हें आचार्य कहा जाता है। आचार्यवान पुरूषो वेद।। वे अभक्त को भक्ति दे सकते हैं, योग दे सकते हैं, ज्ञान दे सकते हैं और ईश्वराभिमुख बना सकते हैं। पढ़ लिखकर पदवी पाना एक बात है लेकिन रामकृष्ण की तरह, शंकराचार्य की तरह समाज के मन को ईश्वराभिमुख करना सबसे ऊँची बात है।

आपकी सोच पर निर्भर है कर्म
दो मित्र अक्सर एक वेश्या के पास जाया करते थे। एक शाम जब वे वहां जा रहे थे, रास्ते में किसी संत का आध्यात्मिक प्रवचन चल रहा था। एक मित्र ने कहा कि वह प्रवचन सुनना पसंद करेगा। उसने उस रोज वेश्या के यहां नहीं जाने का फैसला किया। दूसरा व्यक्ति मित्र को वहीं छोड़ वेश्या के यहां चला गया। अब जो व्यक्ति प्रवचन में बैठा था, वह अपने मित्र के विचारों में डूबा हुआ था। सोच रहा था कि वह क्या आनंद ले रहा होगा और कहां मैं इस खुश्क जगह में आ बैठा। मेरा मित्र ज्यादा बुद्धिमान है, क्योंकि उसने प्रवचन सुनने की बजाए वेश्या के यहां जाने का फैसला किया। उधर, जो आदमी वेश्या के पास बैठा था, वह सोच रहा था कि उसके मित्र ने इसकी जगह प्रवचन में बैठने का फैसला करके मुक्ति का मार्ग चुना है, जबकि मैं अपनी लालसा में खुद ही आ फंसा। प्रवचन में बैठे व्यक्ति ने वेश्या के बारे में सोचकर बुरे कर्म बटोरे। अब वही इसका दुख भोगेगा। गलत काम की कीमत आप इसलिए नहीं चुकाते, क्योंकि आप वेश्या के यहां जाते हैं; आप कीमत इसलिए चुकाते हैं क्योंकि आप चालाकी करते हैं। आप जाना वहां चाहते हैं, लेकिन सोचते हैं कि प्रवचन में जाने से आप स्वर्ग के अधिकारी बन जाएंगे। यही चालाकी आपको नरक में ले जाती है। आप जैसा महसूस करते हैं, वैसे ही आप बन जाते हैं। मान लीजिए कि आप जुआ खेलने के आदी हैं। हो सकता है कि अपने घर में मां, पत्नी या बच्चों के सामने आप जुआ को खराब बताते हों। इसका नाम तक मुंह पर नहीं लाते हों। लेकिन जैसे ही अपने गैंग से मिलते हैं, पत्ते फेंटने लगते हैं। चोरों को क्या ऐसा लगता है कि किसी को लूटना बुरा है? जब आप चोरी में असफल होते हैं, तो वे सोचते हैं कि आप अच्छे चोर नहीं हैं। उनके लिए वह एक बुरा कर्म हो जाता है। हमें ये समझना होगा कि कर्म उसी तरह से बनता है, जिस तरह आप उसे महसूस करते हैं। आप जो कर रहे हैं, उससे इसका संबंध नहीं है।

मन को गुलाम बनाएं, पीड़ामुक्त होंगे
जीवन में संन्यास का महत्व समझने और समझाने वाले मन को गुलाम बनाने का उपक्रम भी बताते हैं। ऐसे सन्यासियों के अनुसार मन का बदलाव, ध्यान और सन्यास संयुक्त घटनाएं हैं और मनुष्य के मन का नियम है कि निर्णय लेते ही मन बदलना शुरू हो जाता है। आपने भीतर एक निर्णय किया कि आपके मन में परिवर्तन होना शुरू हो जाता है। एक निर्णय मन में बना कि मन उसके पीछे काम करना शुरू कर देता है। जैसे ही किसी ने निर्णय लिया कि मैं संन्यास लेता हूं कि मन संन्यास के लिए सहायता पहुंचाना शुरू कर देता है। असल में निर्णय न लेने वाला आदमी ही मन के चक्कर में पड़ता है। जो आदमी निर्णय लेने की कला सीख जाता है, मन उसका गुलाम हो जाता है। वह जो अनिर्णयात्मक स्थिति है वही मन है। निर्णय की क्षमता ही मन से मुक्ति हो जाती है। वह जो निर्णय है, संकल्प है, बीच में खड़ा हो जाता है, मन उसके पीछे चलेगा लेकिन जिसके पास कोई निर्णय नहीं है, संकल्प नहीं है, उसके पास सिर्फ मन होता है और मन से हम बहुत पीड़ित और परेशान होते हैं। अंतत: मन तो आपका गुलाम है।

विदुर नीत आज भी है प्रासंगिक
महाभारत काल में अहम स्थान रखने वाले महामंत्री विदुर की नीतियां भारतीय इतिहास में अपना विशेष स्थान रखती हैं। उनकी नीतियां ना केवल युद्ध से संबंधित थीं बल्कि जीवन व्यवहार में भी आज तक कई मायनों में प्रासंगिक बनी हुई हैं। उनकी नीतियों पर चलकर आप कई परेशानियों का हल आसानी से निकाल सकते हैं और व्यक्ति के बारे में पूर्ण जानकारी हासिल कर सकते हैं। विदुर के अनुसार किस तरह नकारात्मक इंसान को आप इन चीजों से पहचान सकते हैं।
कभी नहीं करता संतोष
विदुर की नीतियों के अनुसार, जो व्यक्ति दुसरों की खुशियों में खुश नहीं रहता, सामने वाले की तरक्की को देखकर ईर्ष्या करना तथा दूसरों का अच्छा देखकर संतोष न करने वाला व्यक्ति दुष्ट प्रवृत्ति का होता है।
कभी नहीं करता सही कार्य
नीतियों के अनुसार, दुष्ट प्रवृति का व्यक्ति कोई भी चीजे सरल तरीके से नहीं करता है। वह हर कार्य को दुसरों के भरोसे करता है ताकि कोई समस्या आए तो वह बच जाए।
कभी नहीं रहता खुश
संतोष किसी चीज का ना हो, यह मनुष्य में सबसे बड़ी कमी होती है। संतोष ही ऐसा भाव है, जिससे मनुष्य का जीवन सरलता से चलता है लेकिन जिस व्यक्ति में संतोष का भाव नहीं होता है, वह ना तो कभी खुश रहता है और ना ही कभी किसी खुश रहने देता है।
आज के दौर में वाणी का बहुत महत्व है, वाणी में अमृत भी है और विष भी। यदि वाणी में अशिष्टता है तो सुनते ही सामने वाला आग बबूला हो जाएगा। ऐसे व्यक्ति के जीवन में कभी सच्चे दोस्त नहीं बनते हैं। कटु वचन बोलने वाला व्यक्ति हमेशा अकेला पड़ जाता है।
दिल का साफ नहीं होता ऐसा व्यक्ति
जो व्यक्ति सामने वाले से अच्छे से बात करे लेकिन मन ही मन आपके बारे में गलत विचार रखता है, वह दुष्ट प्रवृति का व्यक्ति होता है। जिसका दिल साफ नहीं होता है, जो जीवन में निर्मल नहीं होता है वह नकारात्मक इंसान होता है।
गलत कार्य करता है ऐसा व्यक्ति
जिस व्यक्ति का इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं होता है, ऐसा व्यक्ति दुष्ट प्रवृति का होता है। नियंत्रण के अभाव में ऐसा व्यक्ति कई बार गलत कार्य कर बैठता है। सफल इंसान बनने के लिए इंद्रियों का नियंत्रण होना जरूरी है।
अधर्मी होता है ऐसा व्यक्ति
जो व्यक्ति कभी सत्य ना बोलता हो, हमेशा झूठ का सहारा लेता हो, वह व्यक्ति दुष्ट प्रवृति का होता है। आज के दौर में सत्य से बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं है। जो सत्य का अपमान करता है, असत्य बोलता है, वह सबसे बड़ा अधर्मी है।
गलत रास्ते पर चलता है यह व्यक्ति
जिसका मन अशांत रहता है, शांति नहीं रखता, वह व्यक्ति आगे चलकर गलत रास्ते पर चलने लगता है। शांति इंसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण है, इंसान धन तो इकट्ठा कर लेता है लेकिन शांति नहीं प्राप्त कर पाता है। अशांत व्यक्ति कोई भी काम ठीक से नहीं करता।

ध्यान करने से पहले सुनना सीखें
व्यक्ति सुनता है तो विचार करता है, लेकिन जो सुनता ही नहीं है वह विचार आखिर कैसे कर सकता है। इसी संदर्भ में बताया जाता है कि तुम्हारे मन पर सतत् चारों तरफ से तरह-तरह के विचारों का आक्रमण होता है। स्वयं का बचाव करने के लिए हर मन ने प्रतिरोध की एक सूक्ष्म दीवार बनाई हुई है ताकि ये विचार वापस लौट जाएं और मन में प्रवेश न कर सकें। वैसे तो यह अच्छा होता है लेकिन धीरे-धीरे यह प्रतिरोध इतने अधिक बड़े हो जाते हैं कि कुछ समय बाद ये किसी भी तरह की बातों और विचारों को अंदर नहीं आने देते। अगर तुम चाहोगे भी तो भी तुम्हारा उन पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता। ऐसे प्रतिरोध को रोकने का वही तरीका है जिस तरह तुम अपने स्वयं के विचारों को रोकते हो। सिर्फ अपने विचारों के साक्षी बनो और जैसे-जैसे तुम्हारे विचार विलीन होने शुरू होंगे, इन विचारों को रोकने के लिए प्रतिरोधों की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। वे झड़ने लगेंगे, पेड़ के सूखे पत्तों की तरह। ये सारे सूक्ष्म तत्व हैं, तुम उन्हें देख न पाओगे लेकिन तुम्हें उनके परिणाम जरुर समय-समय पर महसूस होंगे। जो व्यक्ति ध्यान से परिचित है वही सुनने की कला जानता है और इससे उलटा भी सच है कि जो आदमी सुनने की कला जानता है वह ध्यान करना जानता है क्योंकि दोनों एक ही बात है। सदियों से हर किसी के लिए यह एकमात्र उपाय रहा है, स्वयं की वास्तविकता और अस्तित्व के रहस्य के करीब आने का। जैसे-जैसे तुम करीब आने लगोगे, तुम्हें अधिक शीतलता महसूस होगी। तब तुम स्वंय को प्रसन्न अनुभव करोगे। एक बिंदू आता है जब तुम आनंद से इतने भर जाते हो कि उसे तुम पूरी दुनिया के साथ बांटने लगते हो और फिर भी तुम्हारा आनंद उतना ही बना रहता है। इसलिए सुनना सीखें ध्यान तो करना भी आ जाएगा।

संन्यास हेतु ध्यान जरुरी
जीवन में संन्यास का महत्व समझने और समझाने वाले मन को गुलाम बनाने का उपक्रम भी बताते हैं। संन्यास का अर्थ ही यही है कि मैं निर्णय लेता हूं कि अब से मेरे जीवन का केंद्र ध्यान होगा और कोई अर्थ ही नहीं है संन्यास का। जीवन का केंद्र धन नहीं होगा, यश नहीं होगा, संसार नहीं होगा। जीवन का केंद्र ध्यान होगा, धर्म होगा, परमात्मा होगा-ऐसे निर्णय का नाम ही संन्यास है। जीवन के केंद्र को बदलने की प्रक्रिया संन्यास है। वह जो जीवन के मंदिर में हमने प्रतिष्ठा कर रखी है-इंद्रियों की, वासनाओं की, इच्छाओं की, उनकी जगह मुक्ति की, मोक्ष की, निर्वाण की, प्रभु-मिलन की, मूर्ति की प्रतिष्ठा ध्यान है। तो जो व्यक्ति ध्यान को जीवन के और कामों में एक काम की तरह करता है, चौबीस घंटों में बहुत कुछ करता है, घंटेभर ध्यान भी कर लेता है- निश्चित ही उस व्यक्ति की बजाय जो व्यक्ति अपने चौबीस घंटे के जीवन को ध्यान को समॢपत करता है, चाहे दुकान पर बैठेगा तो ध्यानपूर्वक, चाहे भोजन करेगा तो ध्यानपूर्वक, चाहे बात करेगा किसी के साथ तो ध्यानपूर्वक, रात में सोने जाएगा तो ध्यानपूर्वक, सुबह बिस्तर से उठेगा तो ध्यानपूर्वक-ऐसे व्यक्ति का अर्थ है संन्यासी, जो ध्यान को अपने चौबीस घंटों पर फैलाने की आकांक्षा से भर गया है। निश्चित ही संन्यास ध्यान के लिए गति देगा और ध्यान संन्यास के लिए गति देता है।

ईमानदारी वाला समर्पण
प्रत्येक धर्म मनुष्य जीवन को सर्वश्रेष्ठ बताता है और कहता है कि अपने कर्म में ईमानदारी रखो इससे स्वयं का मन तो स्वच्छ और सुंदर बनता ही है साथ ही ईश्वर भी प्रसन्न रहता है। सच कहा गया है कि बड़ी मुश्किल से मानव जीवन मिलता है। इसलिए इस जीवन में जितने सद्कार्य किए जाएं, उतना अच्छा है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पुरुषार्थ किए बगैर भाग्य का निर्माण नहीं हो सकता। मौजूदा संदर्भ में एक सवाल यह उठता है कि कर्म का चयन कैसे किया जाए कि किस व्यक्ति को क्या कर्म करने हैं? विद्वान कहते हैं कि अपनी जिम्मेदारियों को निष्काम भाव से निभाना ही कर्म है और सद्कर्तव्य है। शास्त्रों के अनुसार हर व्यक्ति के कर्तव्य तय हैं। शिक्षक को अपने छात्र के प्रति, नेता को राष्ट्र के प्रति, पति को अपनी पत्नी और बच्चों के प्रति, दुकानदार को अपने ग्राहक के प्रति ईमानदार व समर्पित होना चाहिए। यही ईमानदारी वाला समर्पण भक्त को अपने भगवान से मिलवाता है।

ज्ञेय और ज्ञान का संबंध
दर्शन के क्षेत्र में ज्ञान और ज्ञेय की मीमांसा चिरकाल से होती रही है। आदर्शवादी और विज्ञानवादी दर्शन ज्ञेय की स्वतंत्र सत्ता स्वीकार नहीं करते। वे केवल ज्ञान की ही सत्ता को मान्य करते हैं। अनेकांत का मूल आधार यह है कि ज्ञान की भांति ज्ञेय की भी स्वतंत्र सत्ता है। द्रव्य ज्ञान के द्वारा जाना जाता है, इसलिए वह ज्ञेय है। ज्ञेय चैतन्य के द्वारा जाना जाता है, इसलिए वह ज्ञान है। ज्ञेय और ज्ञान अन्योन्याश्रित नहीं हैं। ज्ञेय है, इसलिए ज्ञान है और ज्ञान है इसलिए ज्ञेय है, इस प्रकार यदि एक के होने पर दूसरे का होना सिद्ध हो तो ज्ञेय और ज्ञान दोनों की स्वतंत्र सत्ता सिद्ध नहीं हो सकती। द्रव्य का होना ज्ञान पर निर्भर नहीं है और ज्ञान का होना द्रव्य पर निर्भर नहीं है। इसलिए द्रव्य और ज्ञान दोनों स्वतंत्र हैं। ज्ञान के द्वारा द्रव्य जाना जाता है, इसलिए उनमें ज्ञेय और ज्ञान का संबंध है। ज्ञेय अनंत है और ज्ञान भी अनंत है। अनंत को अनंत के द्वारा जाना जा सकता है। जानने का अगला पर्याय है कहना। अनंत को जाना जा सकता है, कहा नहीं जा सकता। कहने की शक्ति बहुत सीमित है। जिसका ज्ञान अनावृत्त होता है, वह भी उतना ही कह सकता है जितना कोई दूसरा कह सकता है। भाषा की क्षमता ही ऐसी है कि उसके द्वारा एक बार में एक साथ एक ही शब्द कहा जा सकता है। हमारे ज्ञान की क्षमता भी ऐसी है कि हम अनंतधर्मा द्रव्य को नहीं जान सकते। हम अनंत-धर्मात्मक द्रव्य के एक धर्म को जानते हैं और एक ही धर्म का प्रतिपादन करते हैं। एक धर्म को जानना और एक धर्म को कहना नय है। यह अनेकांत और स्याद्वाद का मौलिक स्वरूप है। उनका दूसरा स्वरूप है प्रमाण। अनंत-धर्मात्मक द्रव्य को जानना और उसका प्रतिपादन करना प्रमाण है। हम अनंतधर्मा द्रव्य को किसी एक धर्म के माध्यम से जानते हैं। इसमें मुख्य और गौण दो दृष्टिकोण होते हैं। द्रव्य के अनंत धर्मो में से कोई एक धर्म मुख्य हो जाता है और शेष धर्म गौण। नय हमारी वह ज्ञान-पद्धति है, जिसमें हम केवल धर्म को जानते हैं, धर्मो को नहीं जानते। प्रमाण हमारी वह ज्ञान-पद्धति है, जिससे हम एक धर्म के माध्यम से समग्र धर्मो को जानते हैं।

परिग्रह पिशाच है, परिग्रह संसार का कारण है
राष्ट्रयोगी संत बाल ब्र. आत्मानंद जी महाराज :-
श्री तारण तरण दि. जैन चैत्यालय खरी फाटक रोड पर विराजमान राष्ट्रयोगी संत दसम् प्रतिमाधारी बाल ब्र. पूज्य श्री आत्मानंद जी महाराज ने उत्तम आकिंचन्य धर्म की व्याख्या करते हुए कहा – प्रथम सत्य ही अंतिम सत्य है, मनुष्य प्रथम सत्य को भूल जाता है इसलिए परमात्मा को प्राप्त नहीं हो पाता है- प्रथम सत्य यह है कि मनुष्य संसार में नग्न आया है और अंतिम सत्य यह है कि यहां से मनुष्य नग्न ही जायेगा खाली हाथ जायेगा- परम पूज्य तारण तरण देव कहते हैं, परिग्रह को एकत्र करना ही संसार का कारण है- यह परम सत्य है परिग्रह को जोड़ता है और छोड़कर चला जाता है। ऑख खुलने पर अपना मानता है ऑख बंद होने पर सपना हो जाता है सब झूठा है, छोड़ने के लिए ही जोड़ने का परिश्रम किया था छोड़कर जाना था यह परम सत्य ही है, भगवान महावीर स्वामी जी कहते हैं इस परिग्रह पिशाच से बचो कल्याण का मार्ग बनाओ- संसार में आत्मा के अतिरिक्त मेरा कुछ भी नहीं है, इस भाव का नाम अंकिचन्य है, यही उत्तम अंकिचन्य धर्म है।

व्रत पालन से ही जीवन में मिलती है सफलता
व्रत से अभिप्राय नियम, कानून अथवा अनुशासन से है। जिस जीवन में अनुशासन का अभाव है वह जीवन निर्बल है। नीति का मतलब है जीवन अस्त-व्यस्त न हो, शांत और सबल हो। नीति के अनुसार व्रत पालन से अद्भुत बल की प्राप्ति होती है। रावण के विषय में विख्यात है कि वह दुराचारी था िंकतु वह अपने जीवन में एक प्रतिज्ञा से आबद्ध था। उसका व्रत था कि वह किसी नारी का बलात्कार नहीं करेगा, उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं भोगेगा यही कारण था वह सीता को हरण करके ले तो आया िंकतु उसका शील भंग नहीं कर पाया। इसका कारण केवल उसका व्रत था, उसकी प्रतिज्ञा थी। यद्यपि यह सही है कि सीताजी के साथ बलात्कार का प्रयास भी करता तो भस्मसात हो जाता िंकतु ऐसा करने से उसकी प्रतिज्ञा ने उसे रोक लिया। निरतिचार शब्द बडे मार्वेâ का शब्द है। व्रत के पालन में कोई गड़बड़ी न हो तो आत्मा और मन पर एक ऐसी छाप पडती है कि खुद का तो निस्तार होता ही है, अन्य भी जो इस व्रत और व्रती के सम्पर्क में आ जाते हैं, वे भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। जैसे कस्तूरी को अपनी सुगन्ध के लिये किसी तरह की प्रतिज्ञा नहीं करनी पड़ती, उसकी सुगन्ध स्वत? चारों ओर व्याप्त हो जाती है, ऐसे ही इस व्रत की महिमा है। आज हम मात्र शरीर के भरण-पोषण में लगे हैं। व्रत, नियम और अनुशासन के प्रति भी हमारी रुचि होनी चाहिये। अनुशासन विहीन व्यक्ति सबसे गया-बीता व्यक्ति है। अरे भैया! तीर्थंकर भी अपने जीवन में व्रतों का निर्दोष पालन करते हैं। हमें भी करना चाहिये। हमारे व्रत ऐसे हों जो स्वयं को सुखकर हो और दूसरों को भी सुखी करें।

कर्म व्यर्थ नहीं होता
अक्सर लोग कर्म और भाग्य के बारें में चर्चा करतें समय अपनें-अपनें जीवन में घट़ित घट़नाओं के आधार पर निष्कर्ष निकालतें हैं,कोई कर्म को श्रेष्ठ मानता हैं,कोई भाग्य को ज़रूरी मानता हैं,तो कोई दोनों के अस्तित्व को आवश्यक मानता हैं। क्या जीवन में दोनों का अस्तित्व ज़रूरी हैं ? गीता में श्री कृष्ण अर्जुन को कर्मफल का उपदेश देकर कहतें हैं।
” कर्मण्यें वाधिकारवस्तें मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात मनुष्य सिर्फ कर्म करनें का अधिकारी हैं,फल पर अर्थात परिणाम पर उसका कोई अधिकार नहीं हैं,आगे श्री कृष्ण बतातें हैं,कि यदि मनुष्य कर्म करतें करतें मर जाता हैं,और इस जन्म में उसे अपनें कर्म का फल प्राप्त नहीं होता तो हमें यह नहीं मानना चाहियें की कर्म व्यर्थ हो गया बल्कि यह कर्म अगले जन्म में भाग्य बनकर लोगों को आश्चर्य में ड़ालता हैं। यही कारण हैं,कि आज भी लोग किसी उच्च पदासीन व्यक्ति के घर जन्म लेनें वालें व्यक्ति के विषय में यही राय रखतें हैं,कि ज़रूर पूर्व जन्म के कर्म श्रेष्ठ रहें होगें तभी ऐसे घर जन्म मिला अब ये अलग बात हैं,कि अपनें पूर्वजन्मों के कर्म को कोई व्यक्ति कायम नहीं रख पाता और अपनें कदाचरण के द्धारा अपना आगें का जीवन बर्बाद कर लेता हैं,जबकि कुछ लोग पूर्वजन्मों के कर्म को आगें बढ़ाकर और श्रेष्ठ जीवन व्यतित करतें हैं,किसी कहा भी हैं,कि “भाग्यवान को वही मिलता हैं,जो कर्मवीर छोड़कर गया था ” और फिर भाग्य चमकता भी कितनें का हैं, लाखों में किसी एक का जबकि कर्मवीर का तो भाग्योदय तय होता हैं.
जो कर्म शरीर द्धारा होता हैं वह कायिक या शारीरिक कर्म होता हैं,अपनें शरीर द्धारा किसी मनुष्य जीव-जन्तु को कोई चोट़ या आघात नही हो बल्कि सदैव शरीर दूसरों की भलाई के लिये तत्पर रहे यही कायिक कर्म होता हैं।
वाणी सदैंव मीठी सुभाषित रहनी चाहियें क्योंकि ” “बाण से निकला तीर और मुहँ से निकली बोली कभी वापस नहीं आती ” दुर्योधन के प्रति द्रोपदी का यह कथन कि ” अन्धों के अन्धे होतें हैं” ने महाभारत कि रचना कर दी और भारत भूमि की सभ्यता संस्कृति को बदल दिया,दूसरी और मीठे बोलों ने कितनें ही क्रोध को शांत किया हैं कहा गयाहैं। :
कागो काको धन हरै,कोयल काको देय ?मीठे वचन सुनाइ के,जग अपनो कर लेई ||
जब श्री राम ने परशुराम के आराध्य शंकर का धनुष प्रत्यांचा चढ़ानें के लिये झुकाया तो धनुष टूट गया इस पर आगबबूला परशुराम फरसा लेकर राम के पास गये और कहा कि किसनें मेरें आराध्य का धनुष तोड़ा हैं,वो मेरा सामना करें इस पर श्री राम ने कहा प्रभु में तो सिर्फ राम ही हूँ आप तो “परशुराम” हैं,मैं आपसे कैसें युद्ध कर सकता हूँ,इतना कहतें ही परशुराम का गुस्सा सातवें आसमान से सीधें जमीन पर आ गया और उन्होनें राम को गले लगाकर कहा राम तुम वास्तव में धनुष पर प्रत्यांचा चढ़ानें के अधिकारी हो,कहनें का तात्पर्य यही कि मधुरवाणी वीरो का आभूषण हैं।
तीसरा कर्म मानसिक कर्म हैं,मन में हम जो सोचतें हैं,विचार करतें हैं वही कायिक और वाचिक कर्म का आधार हैं,कहतें हैं,कि विचारों की शक्ति दूर बैठें व्यक्ति को भी प्रभावित करती हैं,यही कारण हैं,कि लोग प्रार्थना को ईश प्राप्ति का साधन मानतें हैं। वास्तव में हम सर्वाधिक कर्म मानसिक रूप में ही करतें हैं, इसलिए भारतीय मनीषी कहतें हैं,कि आदमी जैसा सोचता हैं,वैसा बन जाता हैं।

उपाय भी ठीक से हो
एक सास ने बहू से कहा, ’बहूरानी! मैं अभी बाहर जा रही हूं। एक बात का ध्यान रहे, घर में अंधेरा न घुसने पाए। बहू बहुत भोली थी। सास चली गई, सांझ होने को आई। उसने सोचा कि अंधेरा कहीं घुस न जाए, सारे दरवाजे बंद कर दिए। सब खिड़कियां बंद कर दीं। दरवाजे के पास लाठी लेकर बैठ गई। सोचा- दरवाजा खुला नहीं है, कोई खिड़की खुली है, कहीं भी कोई छेद नहीं। आएगा तो दरवाजा खटखटाएगा, लाठी लिए बैठी हूं, देखती हूं कैसे अन्दर आएगा। पूरी व्यवस्था कर दी। अंधेरा गहराने लगा। सोचा, कहां से आ गया! कहीं भी तो कोई रास्ता नहीं है। हो न हो दरवाजे से ही आ रहा है। अन्धकार को पीटना शुरू कर दिया। काफी पीटा कि निकल जाओ मेरे घर से! मेरी सास की मनाही है कि तुम्हें भीतर घुसना नहीं है! खूब लाठियां बजाई। लाठी टूटने लगी। हाथ छिल गए। लहूलुहान हो गए। अंधेरा तो नहीं गया। परेशान हो गई। सास आई। दरवाजा खोला। कहा, यह क्या किया? मैंने कहा था कि अंधेरे को मत आने देना घर में। वह बोली, ’देखो, मेरे हाथ देख लो। लहूलुहान हो गए। लाठी टूट गई। मैंने बहुत समझाया, बहुत रोका, पर इतना जिद्दी है कि माना ही नहीं और यह तो घुस ही गया। सास ने सिर पर हाथ रखा। कहा, ’बहूरानी! अंधेरे को ऍसे मिटाया जाता है? क्या अंधेरा ऍसे मिटता है? समझी नहीं तुम बात को। सास ने दीया जलाया, अंधेरा समाप्त हो गया। उपाय के बारे में हमारी जानकारी सही नहीं होती तो हम प्रयत्न तो करते हैं, परिश्रम करते हैं, पर अंधेरा मिटता नहीं।

आत्मा का स्वरूप
यमदेव के मुताबिक शरीर के नाश होने के साथ आत्मा का नाश नहीं होता। आत्मा का भोग-विलास, नाशवान, अनित्य और जड़ शरीर से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह अनन्त, अनादि और दोष रहित है। इसका कोई कारण है, न कोई कार्य यानी इसका न जन्म होता है, न मरती है। ऐसे में मनुष्य जो भी कार्य करता है उसमें आत्मा की स्वीकृति आवश्यक हो जाती है और जो ऐसा नहीं कर पाता या आत्मा के विपरीत निर्णय करता और उसी के आधार पर कर्म करता है उसकी आत्मा शरीर के जिंदा रहते हुए भी मर जाती है। इसलिए धार्मिकजन कहते हैं कि आत्मा की सुनो और आत्मा को कर्म-वचन में स्थापित करो ताकि आत्मा जब शरीर त्यागे तो किसी तरह का कष्ट न हो। मनुष्य को जान लेना चाहिए कि आत्मा न तो जन्म लेती है और न ही मरती है, वह हमेशा विद्यमान है और उससे विलग जाकर मनुष्य अपने स्वयं का अहित ही करता है।

महापुरुष बनने के लिए त्यागें अहंकार
बहुत से लोग दिन-रात प्रयास करते हैं कि उन्हें किसी तरह उच्च पद मिल जाए। खूब सारा पैसा हो और आराम की जिन्दगी जियें। जब ये सब प्राप्त हो जाता है तो इसे ईश्वर की कृपा मानने की बजाय अपनी काबिलियत और धन पर इतराने लगते हैं। जबकि संसार में किसी चीज की कमी नहीं है। अगर आप धन का अभिमान करते हैं तो देखिए आपसे धनवान भी कोई अन्य है। विद्या का अभिमान है तो ढूंढ़कर देखिए आपसे भी विद्वान मिल जाएगा। इसलिए किसी चीज का अहंकार नहीं करना चाहिए। जो लोग अहंकार त्याग देते हैं वही महापुरूष कहलाते हैं। महाभारत में कथा है कि दुर्योधन के उत्तम भोजन के आग्रह को ठुकरा कर भगवान श्री कृष्ण ने महात्मा विदुर के घर साग खाया। भगवान श्री कृष्ण के पास भला किस चीज की कमी थी। अगर उनमें अहंकार होता तो विदुर के घर साग खाने की बजाय दुर्योधन के महल में उत्तम भोजन ग्रहण करते लेकिन श्री कृष्ण ने ऐसा नहीं किया। भगवान श्री राम ने शबरी के जूठे बेर खाये जबकि लक्ष्मण जी ने जूठे बेर फेंक दिये। यहीं पर राम भगवान की उपाधि प्राप्त कर लेते हैं क्योंकि उनमें भक्त के प्रति अगाध प्रेम है, वह भक्त की भावना को समझते हैं और उसी से तृप्त हो जाते हैं। अहंकार उन्हें नहीं छूता है, वह ऊंच-नीच, जूठा भोजन एवं छप्पन भोग में कोई भेद नहीं करते। शास्त्रों में भगवान का यही स्वभाव और गुण बताया गया है। महात्मा बुद्घ से संबंधित एक कथा है कि एक बार महात्मा बुद्घ किसी गांव में प्रवचन दे रहे थे। एक कृषक को उपदेश सुनने की बड़ी इच्छा हुई लेकिन उसी दिन उसका बैल खो गया था। इसलिए वह महात्मा बुद्घ के चरण छू कर सभा से वापस बैल ढूंढने चला गया। शाम होने पर कृषक बैल ढूंढ़कर वापस लौटा तो देखा कि बुद्घ अब भी सभा को संबोधित कर रहे हैं। भूखा प्यासा किसान फिर से बुद्घ के चरण छूकर प्रवचन सुनने बैठ गया। बुद्घ ने किसान की हालत देखी तो उसे भोजन कराया, फिर उपदेश देना शुरू किया। बुद्घ का यह व्यवहार बताता है कि महात्मा बुद्घ अहंकार पर विजय प्राप्त कर चुके थे। बुद्घ के अंदर अहंकार होता तो किसान पर नाराज होते क्योंकि बैल को ढूंढ़ने के लिए किसान ने बुद्घ के प्रवचन को छोड़ दिया था। शास्त्रों में अहंकार को नाश का कारण बताया गया है इसलिए मनुष्य को कभी भी किसी चीज का अहंकार नहीं करना चाहिए।

भगवान का सबसे प्रिय आहार अहंकार
अहंकार शब्द बना है अहं से, जिसका अर्थ है ’मैं’। जब व्यक्ति में यह भावना आ जाती है कि ’जो हूं सो मैं, मुझसे बड़ा कोई दूसरा नहीं है’ तभी व्यक्ति का पतन शुरू हो जाता है। द्वापर युग में सहस्रबाहु नाम का राजा हुआ। इसे बल का इतना अभिमान हो गया कि शिव से ही युद्घ करने पहुंच गया। भगवान शिव ने सहस्रबाहु से कह दिया कि तुम्हारा पतन नजदीक आ गया है। परिणाम यह हुआ कि भगवान श्री कृष्ण से एक युद्घ में सहस्रबाहु को पराजित होना पड़ा। रावण विद्वान होने के साथ ही महापराक्रमी था। उसे अपने बल और मायावी विद्या का अहंकार हो गया और उसने सीता का हरण कर लिया। इसका फल रावण को यह मिला कि रावण का वंश सहित सर्वनाश हो गया। अंत काल में उसका सिर भगवान राम के चरणों में पड़ा था। भगवान कहते हैं ’मेरा सबसे प्रिय आहार अहंकार है’ अर्थात अहंकारियों का सिर नीचा करना भगवान को सबसे अधिक पसंद है। अहंकारी का सिर किस प्रकार भगवान नीच करते हैं इस संदर्भ में एक कथा है कि, नदी किनारे एक सुन्दर सा फूल खिला। इसने नदी के एक पत्थर को देखकर उसकी हंसी उड़ायी कि, तुम किस प्रकार से नदी में पड़े रहते हो। नदी की धारा तुम्हें दिन रात ठोकर मारती रहती है। मुझे देखो मैं कितना सुन्दर हूं। हवाओं में झूमता रहता हूं। पत्थर फूल की बात को चुपचाप सुनता रहा। पानी में घिसकर पत्थर ने शालिग्राम का रूप ले लिया था। किसी व्यक्ति ने उसे उठाकर अपने पूजा घर में स्थापित किया और उसकी पूजा की। पूजा के समय उस व्यक्ति ने फूल को शालिग्राम के चरणों में रख दिया। फूल ने जब खुद को पत्थर के चरणों में पाया तो उसे एहसास हो गया कि उसे अपने अहंकार की सजा मिली है। पत्थर ने अब भी कुछ नहीं कहा वह फूल की मन स्थिति को देखकर मुस्कुराता रहा।

तो हम भी खुश रह सकते हैं
भगवान बुद्ध कहते हैं कि हर किसी से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। यदि दूसरे शब्दों में कहें तो हम भी खुश रह सकते हैं कार्यस्थल पर सकारात्मक सोच के साथ व्यवहार करने पर हमें ऐसी अनुभूति होती है।काम के दौरान हम कैसे बुरे दिन को अच्छा कर सकते हैं, इन छोटी-छोटी समस्याओं का दिमाग के साथ हल निकालें। वैसे बॉस या अपने सहकर्मी के साथ शांतिपूर्वक तरीके से संवाद कर हल निकाला जा सकता है।
बौद्ध धर्म शांति से रहने और हिंसा से दूर रहने की सीख देता है। यानी अपने गुस्से पर नियंत्रण रख कर हम कार्यालय में किसी की बुराई से बच सकते हैं अपना आपा खोने से किसी समस्या का हल नहीं निकलता है। शांति से काम कर ही हम सफल होकर आगे बढ़ सकते हैं।

कृष्ण-सुदामा मैत्री भाव की जरूरत पूरे विश्व को
कृष्ण राजा हैं और सुदामा प्रजा। राजा और प्रजा के बीच ऐसी ही आत्मीयता होनी चाहिए जैसी कृष्ण और सुदामा के बीच थी। यदि आज के राजा भी अपने आस-पास के सुदामाओं के साथ मित्रता का इसी तरह निर्वाह करें तो समाज से गरीबी-अमीरी और राजा-प्रजा के बीच की विषमता दूर हो सकती है। कृष्ण और सुदामा जैसी मैत्री कहीं और नहीं मिलती। दुनिया को इसी मैत्री भाव की जरूरत है।
वृंदावन-बड़गोंदा के आचार्य पं. विपुलकृष्ण महाराज ने आज अन्नपूर्णा रोड बैंक कालोनी स्थित स्टार पब्लिक स्कूल के सभागृह में ठा. शिवकुमारसिंह की स्मृति में चल रहे श्रीमद भागवत कथा ज्ञानयज्ञ में कृष्ण सुदामा मिलन प्रसंग पर उक्त बातें कहीं। पं. विपुल कृष्ण ने कहा कि आज के युग में मित्रता की सही पहचान करना मुश्किल काम है। कृष्ण एक श्रेष्ठ और उदार शासक थे, जबकि सुदामा एक चरित्रवान ब्राह्मण। यदि शासक श्रेष्ठ और प्रजा चरित्रवान रहे और इन दोनों का मिलन निष्काम भाव से हो, तो सही मायने में मित्रता जीवंत और चरितार्थ हो उठेगी। इस अवसर पर दादु महाराज का भी सम्मान किया गया। भक्तों की ओर से कतारबद्ध होकर भागवतजी का पूजन भी किया गया। यज्ञ-हवन के साथ पूर्णाहुति हुई।

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