प्रवचन-जीवन मंत्र

विवेक ही धर्म है
युग के आदि में मनुष्य भी जंगली था। जब से मनुष्य ने विकास करना शुरू किया, उसकी आवश्यकताएं बढ़ गई। आवश्यकताओं की पूर्ति न होने से समस्या ने जन्म लिया।समस्या सामने आई तब समाधान की बात सोची गई। समाधान के स्तर दो थे- पदार्थ-जगत, मनो-जगत. प्रथम स्तर पर पदार्थ के सुनियोजित उत्पादन और उनकी व्यवस्था को आकार मिला। दूसरा स्तर मानसिक था। इस जगत की समस्याएं थी अपरिमार्जित वृत्तियां, असंतुलन और तनाव। इन समस्याओं को समाहित करने के लिए धर्म की खोज हुई।
धर्म का अर्थ है पारंपरिक मूल्य-मानकों से परे हटकर मनुष्य को सत्य की दिशा में अग्रसर करना। जब तक धर्म अपने इस परिवेश में रहता है, तब तक वह रूढ़ नहीं हो सकता। पर उद्देश्य की विस्मृति के साथ ही उसमें रूढ़ता आ जाती ह। रूढ़ धर्म को व्यक्ति अपने जीवंत संदभरे से काटकर परलोक के साथ जोड़ देता है।
बस यहीं से धर्म में विकृति का प्रवेश होने लगता है। मैं ऐसा सोचता हूं कि धर्म का संबंध हमारी हर सांस से होना चाहिए। ऐसा वे ही व्यक्ति कर सकते हैं जो अपने जीवन की सतह पर दौड़-धूप कर रहे हैं। या फिर यह उन लोगों का काम है जो जीवन की गहराइयों में उतरकर अध्यात्म के प्रति समर्पित हो जाते हैं।
जीवन की सतह पर जीने वाले व्यक्ति धर्म की गहराई में नहीं उतर सकते, किंतु अध्यात्म के प्रयोक्ता की दृष्टि से वह गहराई छिपी नहीं रह सकती। जो व्यक्ति उतनी गहराई में उतरे, उन्हें धर्म की विकृतियों का बोध हुआ। जो धर्म मन को समाधान देने वाला था, वह स्वयं समस्या बनकर उभर गया। इस दृष्टि से उसमें संशोधन व परिवर्तन की अपेक्षा अनुभव हुई। अणुव्रत उसी आवश्यकता का आविष्कार है। यदि धर्म एक समस्या बनकर सामने नहीं आता तो उसे अणुव्रत के रूप में प्रस्तुति देने का कोई अर्थ ही नहीं था। अणुव्रत धर्म के साथ विवेक की अपरिहार्यता पर बल देता है। आगम की भाषा में विवेक ही धर्म है।

मिथ्या और वास्तविक अहंकार
मिथ्या अहंकार का अर्थ है, इस शरीर को आत्मा मानना। जब कोई यह जान जाता है कि वह शरीर नहीं, अपितु आत्मा है तो वह वास्तविक अहंकार को प्राप्त होता है। अहंकार तो रहता ही है। मिथ्या अहंकार की र्भत्सना की जाती है, वास्तविक अहंकार की नहीं। वैदिक साहित्य में कहा गया है अहं ब्रह्मास्मि- मैं ब्रह्म हूं, मैं आत्मा हूं। ‘मै हं’ ही आत्म भाव है और यह आत्म साक्षात्कार की मुक्त अवस्था में भी पाया जाता है। ‘मै हं’ का भाव ही अहंकार है लेकिन जब ‘ मै हं’ भाव को मिथ्या शरीर के लिए प्रयुक्त किया जाता है, तो वह मिथ्या अहंकार होता है। जब इस आत्म भाव (स्वरूप) को वास्तविकता के लिए प्रयुक्त किया जाता है, तो वह वास्तविक अहंकार होता है। ऐसे कुछ दार्शनिक हैं जो यह कहते हैं कि हमें अपना अहंकार त्यागना चाहिए। लेकिन हम अपने अहंकार को त्यागे कैसे? क्योंकि अहंकार का अर्थ है स्वरूप। लेकिन हमें मिथ्या देहात्मबुद्धि का त्याग करना ही होगा।
जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि को स्वीकार करने के कष्ट को समझना चाहिए। वैदिक ग्रन्थों में जन्म के अनेक वृत्तान्त है। श्रीमद्भागवत में जन्म से पूर्व की स्थिति, माता के गर्भ में बालक के निवास, उसके कष्ट आदि का सजीव वर्णन है। चूंकि हम भूल जाते हैं कि माता के गर्भ में हमें कितना कष्ट मिला है, अतएवं हम जन्म तथा मृत्यु की पुनरावृत्ति का कोई हल नहीं निकाल पाते। इसी प्रकार मृत्यु के समय भी सभी प्रकार के कष्ट मिलते हैं, जिनका उल्लेख प्रामाणिक शास्त्र में हुआ है। इनकी विवेचना की जानी चाहिए। जहां तक रोग तथा वृद्धावस्था का प्रश्न है, सबको इनका व्यावहारिक अनुभव है। कोई भी रोगग्रस्त नहीं होना चाहता, कोई भी बूढ़ा नहीं होना चाहता, लेकिन इनसे बचा नहीं जा सकता। जब तक हम जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि के दुखों को देखते हुए इस भौतिक जीवन के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण नहीं बना पाते, तब तक आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं रह जाता।

मन की तेज गति
नौका नदी के उस पार जा रही थी। अनेक व्यक्ति उस पर सवार थे। भार अधिक हो गया। नौका डगमगाने लगी। नाविक ने कहा – नौका डूब जाएगी। यदि सबको बचना है तो स्वयं को सुरक्षित रखते हुए अपना सारा सामान नदी में बहा दो, अन्यथा सामान के साथ-साथ प्राण भी जाएंगे। सबने अपने जीवन की सुरक्षा को महत्व देते हुए सामान नदी में डाल दिया। एक बनिये के पास तीन खाली डिब्बे और एक रूपयों से भरा डिब्बा था। उसने खाली डिब्बे पानी में डाल दिए। नाविक ने कहा – इस वजनी डिब्बे को डाल दो। बनिये ने रूपयों को ऍसे व्यर्थ बहाना उचित नहीं समझा। वह डिब्बे को साथ ले नदी में कूद पड़ा। नौका हल्की हो गई। पर वह बनिया उस डिब्बे के भार से दबकर डूब गया। यदि वह खाली डिब्बे के साथ कूदता तो संभव है बच जाता, पर भरे हुए डिब्बे ने उसे डुबो दिया।
कहने का अर्थ यह है कि लोगों का भरे हुए पर अधिक विश्वास है, खाली पर नहीं। काम में लगे रहते हैं तो समझते हैं भरे हुए हैं, समय का उपयोग हो रहा है। जब खाली होते हैं तब समझते हैं, आज तो समय व्यर्थ खो रहे हैं। लोग खाली रहना नहीं जानते और खाली रहने के समय का उपयोग करना भी नहीं जानते। आदमी खाली कहां रह पाता है? जब उसके पास कोई काम नहीं होता, तब भी वह खाली नहीं है। उसके मन का चक्का इतनी तीव्र गति से घूमता है कि दुनिया की सारी स्मृतियां उस समय उभर आती हैं। मस्तिष्क विचारों से, संकल्प-विकल्पों से भर जाता है। कहां है खाली वह आदमी? उसका दिमाग भरा ही रहता है।

ज्ञान के रास्ते पर
गौतम बुद्ध के प्रवचन में एक व्यक्ति रोज आता था और बड़े ध्यान से उनकी बातें सुनता था। बुद्ध अपने प्रवचन में लोभ, मोह, द्वेष और अहंकार छोड़ने की बात करते थे। एक दिन वह व्यक्ति बुद्ध के पास आकर बोला- ‘मैं लगभग एक महीने से आपके प्रवचन सुन रहा हूं। पर क्षमा करें, मेरे ऊपर उनका कोई असर नहीं हो रहा है। इसका कारण क्या है? क्या मुझमें कोई कमी है?’
बुद्ध ने मुस्कराकर पूछा- ‘यह बताओ, तुम कहां के रहने वाले हो?’
उस व्यक्ति ने कहा- ‘श्रावस्ती।
बुद्ध ने पूछा- ‘श्रावस्ती यहां से कितनी दूर है?’, उसने दूरी बताई।
बुद्ध ने पूछा- ‘तुम वहां कैसे जाते हो?’
व्यक्ति ने कहा- ‘कभी घोड़े पर तो कभी बैलगाड़ी में बैठकर जाता हूं।’
बुद्ध ने फिर प्रश्न किया- ‘कितना समय लगता है?’, उसने हिसाब लगाकर समय बताया।
बुद्ध ने कहा- ‘यह बताओ क्या तुम यहां बैठे-बैठे श्रावस्ती पहुंच सकते हो
व्यक्ति ने आश्चर्य से कहा- ‘यहां बैठे-बैठे भला वहां कैसे पहुंचा जा सकता है। इसके लिए चलना तो पड़ेगा या किसी वाहन का सहारा लेना पड़ेगा।’
बुद्ध मुस्कराकर बोले- ‘तुमने बिल्कुल सही कहा। चलकर ही लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है। इसी तरह अच्छी बातों का प्रभाव भी तभी पड़ता है जब उन्हें जीवन में उतारा जाए। उसके अनुसार आचरण किया जाए। कोई भी ज्ञान तभी सार्थक है जब उसे व्यावहारिक जीवन में उतारा जाए। मात्र प्रवचन सुनने या अध्ययन करने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता।’
उस व्यक्ति ने कहा- ‘अब मुझे अपनी भूल समझ में आ रही है। मैं आपके बताए मार्ग पर आज से ही चलूंगा।’ बुद्ध ने उसे आशीर्वाद दिया।

कर्म फल से मुक्ति का आधार है प्रयाश्चित
यह ठीक है कि जिस व्यक्ति के साथ अनाचार बरता गया अब उस घटना को बिना हुई नहीं बनाया जा सकता। सम्भव है कि वह व्यक्ति अन्यत्र चला गया हो। ऐसी दशा में उसी आहत व्यक्ति की उसी रूप में क्षति पूर्ति करना सम्भव नहीं। किन्तु दूसरा मार्ग खुला है। हर व्यक्ति समाज का अंग है। व्यक्ति को पहुँचाई गई क्षति वस्तुत: प्रकारान्तर से समाज की ही क्षति है। उस व्यक्ति को हमने दुष्कर्मों से जितनी क्षति पहुँचाई है उसकी पूर्ति तभी होगी जब हम उतने ही वजन के सत्कर्म करके समाज को लाभ पहुँचाये। समाज को इस प्रकार हानि और लाभ का बैलेन्स जब बराबर हो जायेगा तभी यह कहा जायेगा कि पाप का प्रायश्चित हो गया और आत्मग्लानि एवं आत्मप्रताड़ना से छुटकारा पाने की स्थिति बन गई।
सस्ते मूल्य के कर्मकाण्ड करके पापों के फल से छुटकारा पा सकना सर्वथा असम्भव है। स्वाध्याय, सत्संग, कथा, कीर्तन, तीर्थ, व्रत आदि से चित्त में शुद्धता की वृद्धि होना और भविष्य में पाप वृत्तियों पर अंकुश लगाने की बात समझ में आती है। धर्म कृत्यों से पाप नाश के जो माहात्म्य शाŒााW में बताये गये हैं उनका तात्पर्य इतना ही है कि मनोभूमि का शोधन होने से भविष्य में बन सकने वाले पापों की सम्भावना का नाश हो जाये। ईश्वरीय कठोर न्याय व्यवस्था में ऐसा ही विधान है कि पाप परिणामों की आग में जल मरने से जिन्हें बचना हो वे समाज की उत्कृष्टता बढ़ाने की सेवा-साधना में संलग्न हों और लदे हुए भार से छुटकारा प्राप्त कर शान्ति एवं पवित्रता की स्थिति उपलब्ध कर लें।

क्या हैं आध्यात्मिक होने का अर्थ
यह प्रश्न किसी भी जिज्ञासु के मन में उठ सकता है कि हमें ठीक-ठीक ऐसा क्या करना चाहिए ताकि वह जो परम है, जो परमेश्वर है, वह मेरे जीवन में घटित हो सके? सदगुरु इसका उत्तर देते हैं कि अध्यात्म भीगी बिल्लियों के लिए नहीं है, क्या तुम समझ रहे हो? तुम अपने जीवन में और कुछ भी नहीं कर सकते हो, लेकिन सोचते हो कि मैं आध्यात्मिक हो सकता हूँ, ऐसा नहीं है। अगर तुम इस संसार के किसी भी काम को अपने हाथ में लेकर कर सकते हो, फिर तुम्हारे आध्यात्मिक होने की एक संभावना पैदा हो सकती है, अन्यथा नहीं। अगर तुम्हारे पास इस संसार के किसी भी काम को लेकर और अच्छी तरह से करने की शक्ति और साहस है, तब तुम संभवत: आध्यात्मिक हो सकते हो।
यह उन लोगों के लिए नहीं है, जो कुछ भी नहीं कर सकते। अभी, पूरे देश के मन में यही बैठा हुआ है, संभवत: पूरे संसार के मन में, कि वे निकम्मे और नालायक लोग, आध्यात्मिक लोग होते हैं, क्योंकि वे तथाकथित आध्यात्मिक लोग वैसे ही हो गए हैं। वे लोग जो किसी भी चीज को करने के लायक नहीं हैं, वे बस यही करते हैं कि एक गेरुआ वस्त्र पहन कर और किसी मंदिर के सामने बैठ जाते हैं; उनका जीवन सँवर जाता है। यह अध्यात्म नहीं है, यह वर्दी पहनकर बस भीख माँगना है। अगर तुम्हें अपनी चेतना पर विजय प्राप्त करनी है, अगर तुम्हें अपनी चेतना के शिखर पर पहुँचना है, वहाँ एक भिखारी कभी नहीं पहुँच सकता। दो तरह के भिखारी होते हैं। गौतम बुद्ध तथा उस स्तर के लोग उच्चतम श्रेणी के भिखारी हैं। दूसरे सभी निपट भिखारी हैं। मैं तो कहूँगा कि एक सड़क का भिखारी तथा राजगद्दी पर बैठा हुआ एक राजा, दोनों ही भिखारी हैं। वे निरन्तर बाहर से कुछ माँग रहे होते हैं। सड़क का भिखारी हो सकता है कि पैसा, भोजन या आय माँग रहा हो। राजा हो सकता है कि किसी दूसरे राज्य पर विजय, खुशी या कुछ इस तरह की अनर्गल चीजें माँग रहा हो।
क्या तुम देखते हो, हर व्यक्ति किसी न किसी चीज की भीख माँग रहा है: गौतम बुद्ध ने केवल अपने भोजन के लिए भिक्षा माँगी, शेष चीजों के लिए वे आत्मनिर्भर थे। दूसरे सभी लोग, बस एक ही चीज के लिए भीख नहीं माँगते, अपना भोजन भीख में नहीं माँगते, बाकी सभी चीजों के लिए भीख माँगते हैं। उनका पूरा जीवन ही भीख माँगना है। केवल भोजन अर्जित करते हैं। लेकिन एक आध्यात्मिक व्यक्ति, केवल भोजन के लिए भिक्षा माँगता है, अन्य सभी चीजें अपने भीतर से अर्जित करता है। जिस भी तरह से रहना तुम बेहतर मानते हो, उसी तरह से रहो। जिस भी तरह से रहने को तुम जीने का एक सशक्त ढंग मानते हो, उसी तरह से जिओ।

साधना और सुविधा
आसक्ति के पथ पर आगे बढ़ने वाले अपनी आकांक्षाओं को विस्तार देते हैं। उनकी इच्छाओं का इतना विस्तार हो जाता है, जहां से लौटना संभव नहीं है। उस विस्तार में व्यक्ति का अस्तित्व विलीन हो जाता है। फिर वह अपने लिए नहीं जीता। उसके जीवन का आधार पदार्थ बन जाता है। पदार्थ जब मनुष्य पर हावी हो जाए तो समस्या क्यों नहीं होगी? आसक्ति अपने आप में समस्या है। इस समस्या का समाधान पदार्थ के विस्तार में नहीं, संयम में है। संयम के पथ पर वही चल सकता है, जो पदार्थ से विरक्त होने लगता है। जिन लोगों को विरक्ति का पथ प्राप्त है, जो जीवनभर इस पथ पर चलने के लिए कृतसंकल्प हैं, उनके सामने किसी प्रकार का प्रलोभन नहीं होना चाहिए। पदार्थ जीवन की आवश्यकता की पूर्ति का साधन है, यह भाव जब तक प्रबल रहता है, उसके प्रति आसक्ति पैदा नहीं होती। किंतु जब पदार्थ साध्य बन जाता है, तब व्यक्ति का दृष्टिकोण बदल जाता है।
बदला हुआ दृष्टिकोण व्यक्ति को स्वच्छंद बनाता है, सुविधावादी बनाता है और उसे संग्रह की प्रेरणा देता है। स्वच्छंदता, सुविधावाद और संग्रहवृत्ति- ये तीन सकार साधना के विघ्न हैं। साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए इनका सीमाकरण करना ही होगा। वैचारिक स्वतंत्रता का जहां तक प्रश्न है, साधना के साध उसका कोई विरोध नहीं है। पर विचार की स्वतंत्रता की यह अर्थ नहीं है कि व्यक्ति अपनी सीमा, संविधान और परंपरा से विमुख होकर उच्छृंखल बन जाए। उच्छृंखलता या स्वच्छंदता जहां प्रवेश पा लेती है, वहां से अनुशासन, व्यवस्था आदि तत्वों का पलायन हो जाता है। यह स्थिति व्यक्ति और समूह दोनों के लिए हितकर नहीं है। सुविधा के साथ भी साधना का विरोध नहीं है। साधना के नियम जिस सीमा तक स्वीकृति देते हैं, उस सीमा में सहज रूप से कोई सुविधा प्राप्त होती हो तो उसका उपयोग सम्मत है। जैन साधना पद्धति में शरीर को साधने का विधान तो है, पर उसे कष्ट देना कभी अभीष्ट नहीं है।

प्रकाशस्रोत परमात्मा
परमात्मा या भगवान ही सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रों जैसी प्रकाशमान वस्तुओं के प्रकाशस्रोत हैं। वैदिक साहित्य बताता है कि वैकुंठ राज्य में सूर्य या चन्द्रमा की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि वहां परमेश्वर का तेज विद्यमान है। भौतिक जगत में ब्रम्हज्योति या भगवान का आध्यात्मिक तेज भौतिक तत्वों से ढका रहता है। अत: हमें सूर्य, चन्द्र, बिजली आदि के प्रकाश की आवश्यकता पड़ती है। वैदिक साहित्य में स्पष्ट है कि भगवान आध्यात्मिक जगत (वैकुंठ लोक) में स्थित हैं। श्वेतातर उपनिषद में कहा गया है- आदित्यवर्ण तमस: परस्तात अर्थात वे सूर्य की भांति अत्यन्त तेजोमय हैं, लेकिन भौतिक जगत के अन्धकार से बहुत दूर हैं। उनका ज्ञान दिव्य है।
वैदिक साहित्य पुष्टि करता है कि ब्रम्ह घनीभूत दिव्य ज्ञान है। जो वैकुंठ जाने का इच्छुक है, उसे परमेश्वर द्वारा ज्ञान प्रदान किया जाता है। एक वैदिक मंत्र है तं ह देवम आत्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुवै शरणामहं प्रपद्ये। अर्थात मुक्ति के इच्छुक मनुष्य को चाहिए कि वह भगवान की शरण में जाए। जहां तक चरम ज्ञान के लक्ष्य का सम्बन्ध है, वैदिक साहित्य से भी पुष्टि होती है-तमेव विदित्वाति मृत्युमेति यानी उन्हें जान लेने के बाद ही जन्म तथा मृत्यु की परिधि को लांघा जा सकता है।
वे प्रत्येक हृदय में परम नियन्ता के रूप में स्थित हैं। परमेश्वर के हाथ-पैर सर्वत्र फैले हैं लेकिन जीवात्मा के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता। अत: मानना ही पड़ेगा कि कार्यक्षेत्र जानने वाले दो ज्ञाता हैं- एक जीवात्मा तथा दूसरा परमात्मा। पहले के हाथ-पैर किसी एक स्थान तक सीमित हैं जबकि कृष्ण के हाथ-पैर सर्वत्र फैले हैं। इसकी पुष्टि श्वेतातर उपनिषद में इस प्रकार हुई है। सर्वस्थ प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत यानी वह परमेश्वर या परमात्मा समस्त जीवों का स्वामी या प्रभु है। वह उन सबका चरम आश्रय है। अत: इस बात से मना नहीं किया जा सकता कि परमात्मा तथा जीवात्मा भिन्न हैं।

बदला हुआ आदमी
स्कॉटलैंड के एक राजा को शत्रुओं ने पराजित कर दिया। उसे धन-जन की बड़ी हानि हुई और संगी-साथी भी छूट गए। अब बस उसका जीवन बचा था, पर शत्रु उसकी टोह में थे। प्राण बचाने के लिए वह भागा-भागा फिर रहा था। स्थिति यह थी कि राजा अब मरा कि तब मरा। राजा एक खोह में छिपा अपनी मौत की प्रतीक्षा करते हुए सोच रहा था- शत्रु की तलवार पल भर में मेरा काम तमाम कर देगी।
तभी राजा ने देखा- एक मकड़ी खोह के दरवाजे पर जाला बनाने में व्यस्त थी। वह कई बार कोशिश करती, नाकाम रहती, लेकिन फिर से उठकर जाला बनाने लगती। राजा ने सोचा- यह व्यर्थ प्रयत्न कर रही है। बिना आधार के जाला भला कैसे बना पाएगी। किंतु आश्चर्य, मकड़ी का एक झीना-सा सूत्र खोह के मुंह पर अटक ही गया। बस फिर एक के बाद एक सूत्र अटकते चले गए और देखते-देखते जाला तेजी से बुना जाने लगा। थोड़ी देर में पूरी खोह के मुंह पर जाला तैयार था।
तभी शत्रु के सिपाही वहां आ पहुंचे। लेकिन खोह के मुंह पर मकड़ी का जाला बना देख वापस लौट गए। करीब आई हुई मौत तो वापस चली गई पर राजा को एक गहरे विचार में छोड़ गई। उसने सोचा- मकड़ी बार-बार गिरकर भी निराश और परास्त नहीं हुई तो मैं इंसान होकर भी क्यों डर रहा हूं? मैं भी अवश्य अपने शत्रुओं को परास्त करूंगा। इस मकड़ी ने मेरा संकल्प मजबूत कर दिया है। यह सोचते ही वह खोह से बाहर निकल गया।

भलाई का भाव होता है यज्ञ
एक भाव होता है ‘मेरा’ दूसरा है ‘मेरे लिए’ और तीसरा है ‘सबके लिए’। ‘मेरा’ में इंसान केवल अपने बारे में ही सोचता रहता है और ये पक्का कर लेता है कि मेरे पास जो है, वो केवल मेरा है, मैंने कमाया है, मुझे मिला है और इस पर केवल मेरा ही अधिकार है। यह सोच अज्ञानी लोगों की होती है, जो हमारे अहंकार को बनाये रखती है। ‘मेरे लिए’ अर्थात इंसान सोचता है कि जो भी मेरे पास है, ये मेरा नहीं बल्कि मेरे लिए है। इसका स्वामी मैं नहीं बल्कि ये सब मुझे इस्तेमाल करने के लिए मिला है। वो इसी भाव को मन में रखता है। यह सोच मध्यम दर्जे के लोगों की होती हैं।
तीसरा भाव है ‘सबके लिए’ मतलब जो मेरे पास है, वो मेरा ही नहीं और मेरे लिए नहीं, बल्कि सबके लिए है। यह विचार उत्तम दर्जे के इंसानों का होता हैं। इसी को यज्ञ कहा जाता है। जब मन में सबकी भलाई का भाव हो वही यज्ञ है। जो सबका ध्यान रखकर बाद में अपना सोचता है वही श्रेष्ठ इंसान है। इस तरह का यज्ञ अहंकार को गला देता है। ऐसी भावना के साथ साधना करने वाला ब्रह्म को पा लेता है। जो मनुष्य केवल मेरा-मेरा में ही फंसा रहता है, वो ना तो इस जन्म में सुख पाता न ही मरने के बाद परलोक में।

कौन बने राजा
भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ को पक्षियों का राजा माना गया है लेकिन वे अपने स्वामी की सेवा में इतना व्यस्त रहते थे कि उन्हें पक्षियों का हालचाल जानने का समय ही नहीं मिल पाता था। एक दिन पक्षियों ने अपनी सभा बुलाई और इस बात पर विचार-विमर्श किया कि ऐसे राजा का क्या लाभ, जो कभी हमें देखने तक नहीं आता।
सभी ने काफी सोच-विचार कर उल्लू को राजा घोषित कर दिया। उल्लू के राजतिलक की तैयारी होने लगी, तभी एक कोने में बैठे कौवे ने चिल्लाते हुए कहा कि यह फैसला हमें मंजूर नहीं है। राजा गरुड़ को भले ही हमारे पास आने का समय न मिलता हो, लेकिन जब भी मौका मिलेगा वह अवश्य आएंगे। मगर उल्लू को राजा बनाने का क्या लाभ, जिसे दिन में दिखाई ही नहीं पड़ता।
वह हमारी परेशानियों को कैसे हल करेगा। वह दूसरों की बातें सुनकर फैसला करेगा जिसका परिणाम यह होगा कि चाटुकारों का बोलबाला हो जाएगा। किसी ने तर्प दिया कि उल्लू रात में देख सकते हैं इसलिए वह रात में हमारी समस्या सुलझा देंगे। कौवे ने कहा- ऐसा राजा मुझे मंजूर नहीं जो रात में आकर हमारी नींद हराम करे। फिर हम पक्षी रात में ठीक से देख नहीं पाते। हम पहचानेंगे कैसे कि उल्लू ही आया है।
इस बात का लाभ उठाकर कोई राक्षस उसकी जगह आ सकता है और हमें मारकर खा सकता है। पक्षियों ने मान लिया कि राजा ऐसा होना चाहिए, जिसे प्रजा के दुख-दर्द दिखाई तो पड़ें। अंत में गरुड़ को ही राजा बनाए रखने का फैसला किया गया।

पत्थर की पूजा
संत नामदेव के जीवन से जुड़ी यह चर्चित कथा है। उनके पिता दामाशेट दर्जी थे। वह चाहते थे कि नामदेव उनका कारोबार आगे बढ़ाएं पर नामदेव तो दिन भर मंदिर में कीर्तन करते रहते थे। इससे दामाशेट दुखी रहते थे। एक दिन उन्होंने नामदेव को कपड़ों का एक गट्ठर सौंप दिया और कहा कि इसे वह बाजार में बेच आएं। नामदेव बाजार पहुंचे। वहां गट्ठर सामने रख विट्ठल के ध्यान में मग्न हो गए। सभी की कमाई हुई, पर नामदेव खाली ही रहे।
वहीं पास में खेत में कुछ पत्थर पड़े थे। उन्होंने पत्थरों को कपड़ों से ढक दिया और एक बड़े पत्थर से कहा कि आठ दिन बाद फिर आऊंगा, पैसे दे देना, ताकि पिता को हिसाब दे सपूं। पिता ने पूछा तो कहा कि आठ दिन बाद पैसे मिलेंगे। आठ दिन बाद नामदेव उस बड़े पत्थर के पास गए। पैसे मांगने लगे। पर वह कहां से देता! उन्होंने गुस्से में उसे उठाया और पंढरपुर के विट्ठल मंदिर ले आए। बोले- यहीं बापू को जवाब दे देना। दामाशेट बौखला रहे थे- कपड़ों के बदले पत्थर! नजदीक आकर देखा तो वह पूरा पत्थर सोने का हो गया था। यह समाचार सब ओर फैल गया।
स किसान के खेत का पत्थर था, वह आकर सोने का पत्थर मांगने लगा। नामदेव ने अपने कपड़े के पैसे मांगे व पत्थर उसे दे दिया। घर जाकर किसान ने देखा कि वह तो फिर पत्थर बन गया। वह गुस्से में नामदेव जी के घर वह पत्थर रख गया। आज भी उस पत्थर की पूजा नामदेव के मंदिर में होती है।

भय को निकालें
जब प्रियता का संवेदन होता है तो अप्रियता का संवेदन भी होगा। हमारे सारे तनाव इस परिघि में हो रहे हैं। प्रियता का संवेदन हो, प्रिय मिले, प्रिय को वियोग न हो और अप्रियता का योग न हो। बस, सारी तनाव की यह सीमा है। इसी सीमा में सारे तनाव प्रकट हो रहे हैं। पर मूल में जो छिपा हुआ कारण कार्य कर रहा है, वह मात्र एक ही है- प्रियता का संवेदन, अप्रियता का संवेदन। अब यह संवेदन है तो भय भी पैदा होगा।
एक छोटी सी कहनी है। एक आदमी बहुत डरता था। वह समझदार आदमी के पास गया जो मंत्र को जानता था। उसके पास जाकर बोला, ‘मुझे डर बहुत लगता है। उसने ताबीज बना दिया और कहा, इसको बांध लो। तुम्हारा डर समाप्त हो जाएगा। ताबीज बांध लिया। डर लगना कम हो गया। पर मंत्र जानने वाला व्यक्ति कुछ दिन बाद ही आया और पूछा- भाई! अब डर तो नहीं लगता? उसने कहा, जो काल्पनिक था, वह तो नहीं लगता किन्तु एक डर और पैदा हो गया। निरन्तर मन में भय बना रहता है कि कहीं ताबीज गुम न हो जाए। एक भय तो समाप्त हुआ, दूसरा भय और आ गया।
जब यह दृष्टि मूल में बनी रहती है कि प्रिय का वियोग न हो जाए, अप्रिय का योग न हो जाए, तब भय अनिवार्य है। उस मूल कारण से तनाव पैदा होता है। जब प्रिय संवेदन की भावना है, उसका तनाव भी पैदा होता है। हमारे जीवन के संचालन के केन्द्र में जो तत्व है, वह है लोभ। मनोविज्ञान के अनुसार हर व्यक्ति में कुछ मौलिक मनोवृत्तियां होती हैं। जीने की इच्छा भी इसी में एक है।

संत की सीख
एक धनी सेठ ने एक संत के पास आकर उनसे प्रार्थना की, ‘महाराज, मैं आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना करता हूं पर मेरा मन एकाग्र ही नहीं हो पाता है। आप मुझे मन को एकाग्र करने का कोई मंत्र बताएं।’ सेठ की बात सुनकर संत बोले, ‘मैं कल तुम्हारे घर आऊंगा और तुम्हें एकाग्रता का मंत्र प्रदान करूंगा।’ यह सुनकर सेठ बहुत खुश हुआ। उसने इसे अपना सौभाग्य समझा कि इतने बड़े संत उसके घर पधारेंगे।
उसने अपनी हवेली की सफाई करवाई और संत के लिए स्वादिष्ट पकवान तैयार करवाए। नियत समय पर संत उसकी हवेली पर पधारे। सेठ ने उनका खूब स्वागत-सत्कार किया। सेठ की पत्नी ने मेवों व शुद्ध घी से स्वादिष्ट हलवा तैयार किया था। चांदी के बर्तन में हलवा सजाकर संत को दिया गया तो संत ने फौरन अपना कमंडल आगे कर दिया और बोले, ‘यह हलवा इस कमंडल में डाल दो।’ सेठ ने देखा कि कमंडल में पहले ही कूड़ा-करकट भरा हुआ है। वह दुविधा में पड़ गया। उसने संकोच के साथ कहा, ‘महाराज, यह हलवा मैं इसमें कैसे डाल सकता हूं।
कमंडल में तो यह सब भरा हुआ है। इसमें हलवा डालने पर भला वह खाने योग्य कहां रह जाएगा, वह भी इस कूड़े-करकट के साथ मिलकर दूषित हो जाएगा।’ यह सुनकर संत मुस्कराते हुए बोले, ‘वत्स, तुम ठीक कहते हो। जिस तरह कमंडल में कूड़ा करकट भरा है उसी तरह तुम्हारे दिमाग में भी बहुत सी ऐसी चीजें भरी हैं जो आत्मज्ञान के मार्ग में बाधक हैं। सबसे पहले पात्रता विकसित करो तभी तो आत्मज्ञान के योग्य बन पाओगे। यदि मन-मस्तिष्क में विकार तथा कुसंस्कार भरे रहेंगे तो एकाग्रता कहां से आएगी। एकाग्रता भी तभी आती है जब व्यक्ति शुद्धता से कार्य करने का संकल्प करता है।’ संत की बातें सुनकर सेठ ने उसी समय संकल्प लिया कि वह बेमतलब की बातों को मन-मस्तिष्क से निकाल बाहर करेगा।

संयम से ही जीवन की उन्नति
कार्तिय माहात्म्य प्रवचनों में पं. रामनिवास ब्रजवासी जी ने कहा शरद ऋतु में की जाने वाली उपासनाओं से जहाँ चंद्र किरणों से प्राप्त होने वाले अमृत तत्व से देह का सिंचन होता है, वहीं सूर्य की रश्मियों की प्रचुर ऊर्जा से उस अमृत तत्व की शरीर में स्थिरता होती है इसीलिए कार्तिक मास में प्रात? पवित्र नदियों में स्नान कर भगवान विष्णु शालीग्राम स्वरूप की पूजा की जाती है।इन दिनों ब्रजवासी जी कार्तिक माहात्म्य के माध्यम से श्रद्धालुओं को उपदेश दे रहे हैं। उन्होंने कहा भगवान विष्णु के सहस्रनाम का पाठ करने से मनुष्य के जीवन में संयम एवं धर्म में चलने की प्रेरणा मिलती है। जीवन को उन्नत बनाने में संयम का बहुत महत्व है। संयमी व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य को नहीं छोड़ता।शालिग्राम पूजन में पंचामृत का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा गाय का दूध, दही, घी व शहद और शक्कर से शालिग्राम भगवान का अभिषेक करना चाहिए। वस्तुत: इन पांचों का मंत्रोच्चारण के साथ मिल जाना ही पाँच प्रकार के अमृतों का मिलना है।
इसमें तुलसीदल डाल देने के बाद यह चरणामृत बन जाता है जिसका प्रसाद में ग्रहण कर लेने पर सभी प्रकार की आधियाँ-व्याधियाँ अर्थात मानसिक रोग तथा शारीरिक रोग दूर हो जाते हैं। हमारी उपासना विधियाँ जहाँ मनुष्य को धार्मिक बनाती है वही शारीरिक-मानसिक रूप से स्वस्थ भी बनाती है।

शुद्ध भक्त सर्वोत्तम
निर्विशेषवादी के लिए ब्रह्मभूत अवस्था अर्थात ब्रह्म से तदाकार होना परम लक्ष्म होता है। लेकिन साकारवादी शुद्धभक्त को इससे भी आगे शुद्ध भक्ति में प्रवृत्त होना होता है। इसका अर्थ हुआ जो भगवद्भक्ति में रत है, वह पहले ही मुक्ति की अवस्था, जिसे ब्रह्मभूत या ब्रह्म से तादात्म्य कहते हैं, प्राप्त कर चुका होता है। परमेर या परब्रह्म से तदाकार हुए बिना कोई उनकी सेवा नहीं कर सकता। परम ज्ञान होने पर सेव्य तथा सेवक में कोई अन्तर नहीं कर सकता, फिर भी उच्चतर आध्यात्मिक दृष्टि से अन्तर रहता ही है।
देहात्मबुद्धि के अन्तर्गत, जब कोई इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म करता है, तो दुख का भागी होता है, लेकिन परम जगत में शुद्ध भक्ति में रत रहने पर कोई दुख नहीं रह जाता। चूंकि ईश्वर पूर्ण है, अतएव ईश्वर से सेवारत जीव भी कृष्णभावना में रहकर अपने में पूर्ण रहता है। वह ऐसी नदी के तुल्य है, जिसके जल की सारी गंदगी साफ कर दी गई है। चूंकि शुद्ध भक्त में कृष्ण के अतिरिक्त कोई विचार ही नहीं उठते, अतएव वह प्रसन्न रहता है।
वह न किसी भौतिक क्षति पर शोक करता है, न किसी लाभ की आकांक्षा करता है, क्योंकि वह भगवद् भक्ति से पूर्ण होता है। वह भौतिक जगत में न किसी को अपने से उच्च देखता है और न निम्न। ये उच्च तथा निम्न पद क्षणभंगुर है और भक्त को क्षणभंगुर प्राकटय़ या तिरोधान से कुछ लेना-देना नहीं रहता। उसके लिए पत्थर तथा सोना बराबर होते हैं।
यह ब्रह्मभूत अवस्था है, जिसे शुद्ध भक्त सरलता से प्राप्त कर लेता है। उस अवस्था में स्वर्ग प्राप्त करने का विचार मृगतृष्णा और इन्द्रियां विषदंतविहीन सर्प की भांति प्रतीत होती हैं। जिस प्रकार विषदंतविहीन सर्प से कोई भय नहीं रह जाता उसी प्रकार स्वत: संयमित इन्द्रियों से कोई भय नहीं रह जाता। भक्त के लिए समग्र जगत वैपुंठ तुल्य होता है। ब्रह्मांड का महान से महानतम पुरुष भी भक्त के लिए क्षुद्र चींटी से अधिक महत्वपूर्ण नहीं होता।

ईश्वर का आहार है साधना
तुमने ईश्वर को सदैव पिता के रूप में देखा है, कहीं ऊपर स्वर्ग में। मन में बैठी इस धारणा के संग तुम ईश्वर से कुछ मांगना चाहते हो और उनसे कुछ लेना। परन्तु क्या तुम ईश्वर को एक शिशु के रूप में देख सकते हो? जब तुम ईश्वर को शिशु के रूप में देखते हो तो तुम्हारी कोई मांग नही होती। ईश्वर तो तुम्हारे अस्तित्व का अन्त:करण है। तुम ईश्वर को धारण किये हो। तुम्हें अपने गर्भ का ध्यान रखना है और इस शिशु को संसार में जन्म देना है। ईश्वर तुम्हारा शिशु है। वे तुमसे बच्चे की तरह चिपककर रहते हैं जब तक तुम वृद्ध होकर मर नहीं जाते। ईश्वर पोषण के लिए पुकारते रहते हैं। संसार में उनके पोषण के लिए उन्हें तुम्हारी आवश्यकता है। साधना, सत्संग और सेवा ईश्वर के पोषक आहार हैं।
तुम ऐसा क्यों सोचते हो कि ईश्वर एक ही हैं? ईश्वर भी अनेक क्यों नहीं हो सकते?