प्रवचन-जीवन मंत्र

स्थापित होना है तो करें प्रशंसनीय कर्म
यहां हम बात उस महान खिलाड़ी की कर रहे हैं जिसे आप सभी क्रिकेट का भगवान कहते हैं। आज क्रिकेट टीम से बाहर होने के बाद भी क्रिकेट की शुरुआत यदि होती है तो सचिन का नाम लेकर ही होती है और चर्चा यदि खत्म होती है तो उनके नाम से ही खत्म भी होती है। अर्थात सचिन रमेश तेंदुलकर आज उस सितारे का नाम हो गया है जो आसमान में चमक रहा है। कहा जाता है कि किशोर उम्र के सचिन उन दिनों शारदाश्रम स्कूल की जूनियर टीम से खेलते थे। उन्हीं दिनों एक घटना हुई, जिसने उनकी सोच को परिवर्तित करके रख दिया। उनके गुरु आचरेकर ने उन्हें एक दूसरे-स्कूल में अभ्यास करने के लिए कहा। तब सचिन ने गुरु की बात नहीं मानी और स्कूल की ही सीनियर टीम का मैच देखने चले गए। शाम को जब सचिन गुरु आचरेकर से मिले तो उन्होंने सचिन से उनके उस दिन के प्रदर्शन के बारे में पूछा और कहा कि आज तुम ने कितने रन बनाए? इस पर सचिन ने उन्हें बताया कि वह मैच खेलने नहीं गए थे, बल्कि वह तो सीनियर टीम का हौसला बढ़ाने के लिए मैदान के बाहर बैठकर ताली बजा रहे थे। यह सुन गुरु आचरेकर ने सचिन पर बहुत गुस्सा किया और कहा, ‘तुम्हें दूसरे के लिए तालियां बजानी है या खुद भी उस लायक बनना है? तुम खेलो और इस तरह खेलों की दुनिया तुम्हारे लिए तालियां बजाते न थके। इसके बाद तो सचिन की जिंदगी वाकई बदल गई और उनका ध्येय प्रशंसनीय बनने वाला हो गया, जिसका उदाहरण वो दे चुके हैं।

भगवान श्रीकृष्ण की ये बातें आज भी हैं प्रासंगिक
आधुनिक जीवन में सफलता का अर्थ पैसों और सुख-सुविधा की चीजों से जुड़ा हुआ है। आप जितना भी धन कमा लेंगे दुनिया आपको उतना ही कामयाबी कहेगी, अंधाधुध पैसे कमाने की होड़ में कोई व्यक्ति ये नहीं सोचता कि उससे भौतिक दुनिया की सुख-सुविधा कमाने के कारण कितने पाप हो गए हैं।
श्रीमद्भागवत गीता में भगवान कृष्ण ने कई नीतियों के उपदेश दिए हैं। इसमें बताए गए एक श्लोक के अनुसार, जो मनुष्य ये चार आसान काम करता है, उसे निश्चित ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ऐसे मनुष्य के जाने-अनजाने में किए गए पाप कर्म माफ हो जाते हैं और उसे नर्क नहीं जाना पड़ता। आइए, जानते हैं उन कामों के बारे में।
दान
दान करने का अर्थ है किसी जरूरतमंद को वो चीज निशुल्क उपलब्ध करवाना, जिसे पाने में वो अक्षम है। दान करने से पहले या बाद किसी को भी दान के बारे में नहीं बताना चाहिए। दान को हमेशा गुप्त ही रखना चाहिए।
आत्म संयम
कई बार ऐसा होता है कि हमारा मन और दिमाग दोनों विपरीत दिशा में चलते हैं और हम अधर्म कर बैठते हैं। गीता में दिए गए ज्ञान के अनुसार मन को वश में कर लेने से व्यक्ति द्वारा किसी पाप को करने की संभावना रहती है।
सत्य बोलना
कलियुग में सत्य और असत्य का पता लगाना मुश्किल हो गया है। किसी भी व्यक्ति की बात को सुनने मात्र से ये नहीं कहा जा सकता कि वो झूठ बोल रहा है या सच। अगर आपने भूतकाल में कोई गलत काम किया है, तो आप शेष बचे जीवन में हमेशा सत्य बोलकर पापों का प्रायश्चित कर सकते हैं।
ध्यान या जप
आधुनिक युग में ऐसे लोग बहुत कम बचे हैं, जो रोजाना ध्यान करते हो. पूजा-पाठ भगवान को प्रसन्न करने के लिए नहीं बल्कि स्वंय का स्वयं से मिलन करवाने के लिए की जाती है। आत्मध्यान करके हम आत्मसाक्षात्कार कर सकते हैं। नियमित रूप से स्वच्छ मन से जप या ध्यान करने से भूल से हुई गलतियों से पार पाया जा सकता है।

स्वयं में भगवान श्रीराम के दर्शन करते हैं रामनामी
कहते हैं यदि ईश्‍वर तो हृदय में बसते हैं। शायद यही वजह है कि रामनामी समाज किसी मंदिर में जाने की बजाए भगवान श्रीराम के दर्शन खुद में ही करते हैं। यहां हर किसी में बस राम ही रचे-बसे नजर आते हैं। तो आइए जानते हैं क‍ि कौन हैं ये लोग और क्‍यों इन्‍होंने क्यों मर्यादा पुरुषोत्‍तम को अपने तन-मन में बसाया है।
ऐसे बनी परंपरा
छत्‍तीसगढ़ के ‘जमगाहन गांव’ में तकरीबन सौ बरस पहले निम्‍न वर्ग के तबके को जब मंदिर जाने से मना किया गया। तो उन्‍होंने प्रभु की पूजा का एक नया ही मार्ग खोज निकाला। सभी ने अपने शरीर पर राम नाम को गुदवाना शुरू कर दिया। पहले यह उपेक्षा के चलते शुरू किया गया था लेकिन बाद में यह परंपरा बन गई। आज भी लोग सहर्ष इसका निर्वहन कर रहे हैं।
राम नाम से बन गए रामनामी
राम का नाम इस तरह से खुद पर लिखवाने के चलते जमगाहनगांव के इस निम्‍न तबके की परिभाषा ही बदल गई। अब इन्‍हें रामनामी समाज के नाम से जाना जाता है। पूरे देश में इन्‍हें इसी विशेष समाज के नाम से जाना-पहचाना जाता है।
जय श्री राम का करते हैं संबोधन
बरसों पहले मंदिर जाने से रोके गए रामनामी समाज के लोग मूर्ति पूजा करते ही नहीं। वह बस अपने शरीर पर रामनाम गुदवाते हैं। इसके अलावा राम का नाम गुदवा लेने के बाद इस समाज के लोग मदिरा को हाथ तक नहीं लगाते। साथ ही नियमित रूप से राम नाम के मंत्र का जाप करते हैं। दैनिक अभिवादन में जय श्री राम का संबोधन ही प्रयोग करते हैं।
रामनामियों की श्रेणी
रामनामियों की अपनी ही एक श्रेणी हैं। इसमें शरीर के अलग-अलग भागों और पूरे शरीर पर राम नाम लिखवाने वालों को अलग-अलग श्रेणी में रखा जाता है। इसमें जो शरीर के किसी एक भाग पर राम नाम लिखवाते हैं, उन्‍हें रामनामी कहते हैं। यदि माथे पर राम का नाम गुदवाया हो तो उसे शिरोमणि रामनामी कहते हैं। इसके अलावा अगर पूरे माथे पर ही राम का नाम गुदवाया हो तो उसे सर्वांग रामनामी कहते हैं। वहीं जो पूरे शरीर पर राम का नाम गुदवा लेता है उसे नखशिख रामनामी कहते हैं।

धर्म का सही अर्थ
धर्म शब्द की उत्पत्ति ‘धृ’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ धारण करना है। इस संसार में जो भी गुण मनुष्य के लिए धारण करने योग्य है, उसे धर्म कहा जा सकता है। इस परिभाषा से यह स्पष्ट हो जाता है कि हर पदार्थ का जो मौलिक गुण है वह उसमें निहित धर्म है। जैसे पानी का धर्म प्यास बुझाना है। अगर उसे उबाल देंगे तो वह वाष्प बन जाएगा, पर ठंडा होकर फिर प्यास बुझाएगा। वही पानी जमकर बर्फ बन जाएगा और पिघलकर फिर प्यास बुझाएगा। किसी भी स्थिति में पानी अपना मौलिक गुण, अपना धर्म नहीं छोड़ता है। प्रत्येक पदार्थ में निहित वह विशेष गुण जो उसे उपयोगी बनाता है, उसका धर्म है। अर्थात धर्म और कर्म में कोई अंतर नहीं है। प्रत्येक परिस्थिति में धर्म के अनुसार आचरण करना हमारे जीवन का कर्म है और जब हम ऐसा कर्म करते हैं हम स्वयं ही सुखों को आमंत्रित कर लेते हैं।
इस सत्य को स्वीकार करते हुए चाणक्य कहते हैं कि सभी सुखों के मूल में धर्म कार्य कर रहा है। भोजन, निद्रा, भय पशु में भी पाए जाते हैं। वहीं धर्म ही मनुष्य को पशु से अलग करता है। यहां पर विचार करने योग्य तथ्य यह है कि सिर्फ मनुष्य है जो अपने जीवन को बड़ा बनाना चाहता है। जिसके मन में कामनाएं उत्पन्न होती हैं, भविष्य को सुरक्षित करने की इच्छा होती है और जो अपने कल को बेहतर करने के लिए आज कर्मशील होने के लिए तत्पर है। पशुओं को कल की चिंता नहीं होती। यानी धर्म वह प्रयोजन है जिसके द्वारा जीवन को महानता की ओर ले जाया जा सकता है।
धर्म का आचरण करने से ही मनुष्य के जीवन में अर्थ और काम की उपलब्धि होती है। फिर धर्म को छोड़कर किसी और की शरण में आप कैसे जा सकते हैं? शास्त्र सहर्ष स्वीकार करते हैं कि जिससे जीवन में श्री, अभ्युदय अर्थात उन्नति और सिद्धि प्राप्त हो, वह धर्म है। फिर इसमें कोई दो राय किस तरह से हो सकती है कि धर्म का अर्थ ही उत्तम प्रकार के कर्म करना है, जिसके द्वारा कामनाओं को पूर्ण किया जा सके। सीधे शब्दों में कहें तो कामनाओं को पूरा करने के लिए कमाना पड़ता है और कमाई में जब कमी होती है तो जीवन दीन-हीन हो जाता है। धर्म की हानि उस समय होती है जब हम बिना कर्म किए छल से, बल से, कामनाओं को पूरा करना चाहते हैं लेकिन उससे भी अधिक धर्म की हानि तब होती है। जब हम शोषण का प्रपंच शांत भाव से देखते हैं। उस समय यह याद रखें कि आप भी भीष्म की भांति अपने कर्म से हट रहे हैं।
इस जीवन में धर्मज्ञ बनना है, धर्मभीरु नहीं। किसी भी वस्तु, व्यक्ति अथवा विषय से भय उस समय तक ही रहता है, जब तक हमें उस विषय का पूर्ण ज्ञान न हो जाए। धर्म का वास्तविक अर्थ यथोचित कर्म करना है जो जीवन को उन्नति की ओर ले जाए। इस प्रवाह में बहने का नाम ही धार्मिकता है।

संतोषी बनने से मिलता है परमसुख
आचार्य चाणक्य का जन्म आज से लगभग 2400 वर्ष पहले हुआ था। उन्होंने ‘चाणक्य नीति’, अर्थशास्त्र राजनीति, अर्थनीति, कृषि, समाज नीति आदि महान ग्रंथों की रचना की। चाणक्य जीवन दर्शन के ज्ञाता थे। उन्होंने अपने जीवन से प्राप्त अनुभवों से नियमों का निर्माण कर उन्हीं का लोगों को उपदेश दिया। उन्होंने बहुत सी ऐसी नीतियों का निर्माण किया है जिन पर अमल करने से जीवन को खुशहाल बनाया जा सकता है। व्यक्ति को सीधा और ईमानदार नहीं होना चाहिए क्योंकि जंगल में सीधे वृक्षों को काटने में कठिनाई नहीं होती उन्हें ही सबसे पहले काटा जाता है। धन ही एकमात्र ऐसी वस्तु है जिसके माध्यम से दुनिया को चलाया जाता है। जिस व्यक्ति के पास पैसा होता है, सारे सगे-संबंधी भी उनके ही होते हैं। मूर्ख लोगों के धनी होने के कारण उन्हें बुद्धिमान, विद्वान अौर योग्य माना जाता है। कुत्ते के लिए उसकी दुम गर्व का सूचक नहीं होती। कुत्ते की पूंछ मक्खी, मच्छरों को उड़ाने के काम नहीं आती। उसी प्रकार कम ज्ञान वाले व्यक्ति की बुद्धि बेकार होती है इसलिए उसे अधिक से अधिक सीखने का प्रयास करते रहना चाहिए। गुस्सा मौत को, लालच दुख को आमंत्रण देता है। ज्ञान दूध देने वाली गाय की तरह है जो प्रत्येक जगह व्यक्ति की मदद करता है। संतुष्ट व्यक्ति कहीं भी प्रत्येक स्थिति में जीवन यापन कर सकता है।

इन लोगों से नहीं लें सलाह
महात्मा विदुर महाभारत काल के महान नीतिज्ञ माने जाते हैं इन्हें धर्मराज का अवतार भी माना जाता है। इन्होंने हमेशा नीतियों और न्याय का पालन किया। इन्होंने अपनी नीतियों में बताया है कि मनुष्य को कोई भी काम शांति और समझदार लोगों की सलाह से करना चाहिए। वहीं भूलकर भी 4 लोगों से सलाह लेने से बचना चाहिए। ये 4 लोग ऐसे हैं जिनसे सलाह लेने पर नुकसान होना तय है। आइए जानें विदुर नीति के अनुसार वो 4 लोग कौन हैं जिनसे सलाह लेने से बचना चाहिए।
जिनकी बुद्धि हो ऐसी
विदुरजी के अनुसार जिन लोगों की बुद्धि कम होती है। उन लोगों से कभी सलाह नहीं लेना चाहिए। इनके अनुसार थोड़ी बुद्धि वाले कभी सही सलाह देने में सक्षम नहीं होते हैं। वो खुद में ही अल्पबुद्धि के हैं तो किसी को क्या सलाह और विमर्श दे पाएंगे। इसलिए ऐसे लोगों से गुप्त विचार विमर्श करने से अपना ही नुकसान होगा। ऐसे लोगों से दूर ही रहना चाहिए। ऐसे लोग आपकी गुप्त योजनाओं को दूसरों के सामने प्रकट कर सकते हैं।
दीर्घसूत्री व्यक्ति
दीर्घसूत्री व्यक्ति विषयों की गंभीरता समझने की बजाय उस पर इतना मंथन करने लग जाता है कि काम पूरा होने का समय ही निकल जाए। इस तरह की सोच वाले व्यक्ति की सलाह लेने पर काम में सफलता मिलना मुश्किल होता है। विदुरजी बताते हैं कि जो समझदारी से विचार करके परिस्थिति की गंभीरता के समझता हो उसी से सलाह लेने में मनुष्य की भलाई है।
जल्दबाजी में काम करने वाले
किसी काम को जल्दबाजी में निपटाने वाले व्यक्ति से भी कोई सलाह नहीं लेना चाहिए। विदुर नीति के अनुसार जो लोग काम को करने में हड़बड़ाहट मचाते हैं, ध्यान से नहीं करते हैं उनकी सलाह को भी कोई खास प्रमुखता नहीं देनी चाहिए। जल्दबाजी करने वाले मनुष्य से गुप्त सलाह लेना एक नुकसानदायी परिणाम दे सकता है।
चाटुकारिता करने वाले
विदुर के अनुसार, चापलूसी करने वाले व्यक्ति से दूर रहना चाहिए। चाटुकार सच को छुपाकर आपको प्रसन्न करने वाली बात कहेगा वह आपकी कमियों को बताने से डरेगा और आप आत्ममुग्ध होकर गलती कर बैठेंगे जिससे आपका नुकसान होना तय है। इसलिए हमें सत्य को बोलने वाले की सलाह लेनी चाहिए।

वक्त का पहिया
जब तुम्हें लगता है कि समय बहुत कम है, तुम या तो बेचैन होते हो या अत्यन्त सजगता की अवस्था में होते हो। दुखी या उत्सुक होने पर तुम्हें समय बहुत लम्बा लगता है। जब तुम प्रसन्न हो और जो कुछ कर रहे हो, उसमें आनंद आ रहा है, तब तुम्हें समय का आभास नहीं होता। इसी प्रकार, नींद में भी तुम्हें समय का आभास नहीं होता। जब तुम समय से आगे हो, समय कटता ही नहीं और नीरसता अनुभव होती है। जब समय तुम्हारे आगे है, तब तुम आश्चर्यचकित और स्तब्ध होते हो। तुम घटनाओं को आत्मसात नहीं कर पाते। गहन ध्यान में तुम ही समय हो और सब कुछ तुम्हारे ही अहदर घटित हो रहा है। घटनाएं तुममें ऐसे घट रही हैं, जैसे आसमान में बादल गुजरते हैं। जब तुम समय के साथ होते हो, तुम ज्ञानी हो, तुम्हारा मन शांत है। जब मन प्रसन्न होता है, तब यह विस्तृत होता है, तब समय भी बहुत छोटा लगता है। जब मन दुखी होता है, संकुचित होता है, तब समय बहुत लंबा प्रतीत होता है। जब मन समचित्त है, स्थिर है, तब यह काल के परे है। इन दोनों स्थितियों से बचने के लिए कई व्यक्ति शराब या निद्रा का सहारा लेते हैं, परंतु जब मन जड़ या बेसुध होता है, तब यह अपनी ही अनुभूति नहीं कर सकता। समाधि ही असल शांति है, जो मन और समय के परे है।
जैसे मन समय को अनुभव करता है, वैसे इस क्षण का भी अपना एक मन है। एक विराट मन, जिसमें व्यवस्था करने की अपरिमित और असीम योग्यता है। एक विचार और कुछ नहीं, समय के इस क्षण में एक तरंग है और समाधि के कुछ ही पल मन को ऊर्जा से भर देते हैं। निद्रावस्था के पहले और जिस पल तुम नींद से जगाते हो, सचेतनता के उन धूमिल क्षणों में, समय के परे जाने का अनुभव करो। जीवन साकार व निराकार का मिशण्रहै। भावनाओं का कोई आकार नहीं परंतु उनकी अभिव्यक्ति साकार होती है। आत्मा का कोई रूप नहीं परंतु उसका निवास साकार में है। इसी तरह, ज्ञान और कृपा का भी कोई रूप नहीं, लेकिन उनकी अभिव्यक्ति किसी रूप द्वारा ही होती है। निराकार को हटा देने से तुम जड़ बनते हो- सांसारिक और संवेदनशील। आकार को छोड़ देने से तुम एक भ्रमित तपस्वी, अत्यधिक सपने देखने वाले या भावनात्मक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति बन जाते हो।

शुद्ध मन में आते हैं सद्विचार
मानव जीवन में विचार का विशेष महत्व है। विचार ही इंसान को अच्छा या बुरे कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। ऐसे में मन से खराब और दूषित विचारों को रोकने और निकाल फेंकने के लिए यदि थोड़ी कठिनाई हो तो भी सह लेनी चाहिए। वैसे भी यदि सच्चे मन से सद्विचारों के लिए थोड़ा अभ्यास किया जाए तो यह सरलता से हो सकता है। कुछ समय तक सावधानी से अभ्यास करें तो पाएंगे कि आपका स्वभाव ही ऐसा बन गया है कि उसकी चिंतनधारा में अनावश्यक विचार प्रवेश ही नहीं कर पा रहे हैं। इस प्रकार जब मन में शुद्ध तथा सुंदर विचार दृढ़ होने लगेंगे, तो वे स्वयं भी अपने से विरोधी विचारों को मन में रुकने ही नहीं देंगे। ठीक वैसे ही जैसे कि कहा जाता है कि पैसा पैसे को खींचता है, उसी तरह विचार अच्छे हों या बुरे, वे स्वयं अपने जैसे विचारों को आकर्षित करते, आमंत्रित करते और आपके मन में डेरा जमाने की जगह उनके लिए बना देते हैं। इसलिए अधिक से अधिक अच्छे विचारों को आमंत्रित करने के लिए उन्हें मन में ज्यादा से ज्यादा समय तक स्थापित करें। सच्चाई और सद्जीवन को लक्ष्य बनाएं और देखेंगे कि आपके विचार दिन व दिन शुद्ध् होते चले जा रहे हैं और उनका समूह आपके मन में पुराने पड़े बुरे विचारों को बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं।

धोखेबाज कौन नहीं
एक समय की बात है एक शहर के बुद्धिमान व्यक्ति के पास एक शख्स आया और उसने उनसे जानना चाहा कि उनके पास लोग तो बहुत हैं जो उसके कहने पर काम करते हैं, लेकिन उसके पास कोई भी विश्वासपात्र व्यक्ति नहीं है। उसने कहा कि ‘मेरे कर्मचारी मुझसे बात बात पर झूठ बोलते हैं। यहां तक कि मेरे परिवार में मेरे बच्चे और पत्नी कि स्वार्थियों जैसा व्यवहार करते हैं। मानों यह दुनिया ही स्वार्थी है। कोई मुझे सही नहीं नजर आता है।’ यह सुनकर बुद्धिमान व्यक्ति थोड़ा मुस्कराया और उसे असंतुष्ट को एक कहानी सुनाते हुए बोला, ‘किसी जमाने में एक गॉंव था। वहां एक बड़े से कमरे में 1000 के करीब शीशे लगे थे। एक छोटी बच्ची उस हॉल में खेलने जाया करती थी। वहां उसे खेलना बहुत अच्छा लगता था। दरअसल उसे लगता था कि मानो हजारों बच्चों के साथ वह खेल रही है। वह तालियाँ बजाती, तो हजार बच्चे उसके साथ में तालियाँ बजा रहे होते। उसे ऐसा करते हुए लगता कि यह दुनिया का सबसे बेहतरीन स्थान है। एक बार उस हाल के भीतर एक गुस्सैल और उदास व्यक्ति चला गया। उसे लगा कि वह हजार गुस्सैल लोगों से घिरा हुआ है। वे सब उसे घूर रहे हैं। वह डर गया, उसने उन्हें मारने के लिए अपना हाथ ऊपर उठाया तो उसी की तरह हजार हाथ खड़े हो गए। अब उसे लगा कि यह तो दुनिया की सबसे ख़राब और बेकार जगह है, यह समझ वह तुरंत वहां से बाहर निकल गया।’ यह कहानी सुन उस शख्स को अपनी गलती समझ आ गई और तभी बुद्धिमान व्यक्ति ने उससे पूछा बताओ धोखेबाज कौन नहीं है?

मूर्खों को शोभती है चापलूसी
कभी कभी किसी का संस्मरण भी इंसान को बेहतर राह दिखाने का काम कर जाता है। ऐसा ही एक संस्मरण अमेरिका के एक बड़े राजनेता ने लिखा, जिसमें उन्होंने बताया कि ‘लुहार की दुकान के सामने से एक दिन गुजर रहा था। उसका दूसरा साथी कहीं चला गया था। अकेला ही धौंकनी धौंकता और लोहा पीटता जा रहा था। मुझे अजीब लगा, सो दुकान के सामने रुक कर देखने लगा। लुहार ने अपनी कारिस्तानी दिखायी उसने छूटते ही किसी बड़े खानदान से अपने आपको सम्बन्धित और अपनी कक्षा का मेधावी छात्र बताया, साथ ही भविष्य में कोई बड़ा आदमी बनने की संभावना भी व्यक्त कर दी। उसके इस कथन से मेरे मन में उसके प्रति सद्भावना जाग गई। उसने कहा कि ‘यदि और भी कुछ सुनना और देखना चाहते हो तो मेरे पास बैठो और इस कला की जानकारी हासिल कर लो, जिसने मुझे मालदार बना दिया है।’ लुहार की बात से बालक प्रभावित हुआ और वह दुकान पर जा बैठा। उसने धौंकनी थमा दी और कहा देखो इसे चलाना भी कितना मजेदार है। मैं उसकी बातों में आ गया और देर तक उसकी धोंकनी चलाता रहा। जब भी उठने का मन करता तभी वह फिर अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से मुझे अपने जाल में फँसा लेता। इस तरह दोपहर हो गयी। हाथ में दर्द भी होने लगा। अंतत: मैं वहां से उठा और चल पड़ा। इसके बाद स्कूल पहुँचा तो मेरी गैरहाजिरी लग गयी थी। उस दिन परीक्षा भी थी। मास्टर ने बुरी तरह पीटा और मुझे फेल भी कर दिया। धौंकनी धौंकने का दर्द तो बाँहों में था ही मास्टर की पिटाई से वह और भी अधिक बढ़ गया। बुखार आया और चारपाई पर पड़ा पछताता रहा। इसके बाद मैंने जीवन भर याद रखा कि चापलूसी बातों में कतई नहीं फँसना है, यह सबसे बड़ी मूर्खता है।

आपकी सोच पर निर्भर है कर्म
दो मित्र अक्सर एक वेश्या के पास जाया करते थे। एक शाम जब वे वहां जा रहे थे, रास्ते में किसी संत का आध्यात्मिक प्रवचन चल रहा था। एक मित्र ने कहा कि वह प्रवचन सुनना पसंद करेगा। उसने उस रोज वेश्या के यहां नहीं जाने का फैसला किया। दूसरा व्यक्ति मित्र को वहीं छोड़ वेश्या के यहां चला गया। अब जो व्यक्ति प्रवचन में बैठा था, वह अपने मित्र के विचारों में डूबा हुआ था। सोच रहा था कि वह क्या आनंद ले रहा होगा और कहां मैं इस खुश्क जगह में आ बैठा। मेरा मित्र ज्यादा बुद्धिमान है, क्योंकि उसने प्रवचन सुनने की बजाए वेश्या के यहां जाने का फैसला किया। उधर, जो आदमी वेश्या के पास बैठा था, वह सोच रहा था कि उसके मित्र ने इसकी जगह प्रवचन में बैठने का फैसला करके मुक्ति का मार्ग चुना है, जबकि मैं अपनी लालसा में खुद ही आ फंसा। प्रवचन में बैठे व्यक्ति ने वेश्या के बारे में सोचकर बुरे कर्म बटोरे। अब वही इसका दुख भोगेगा। गलत काम की कीमत आप इसलिए नहीं चुकाते, क्योंकि आप वेश्या के यहां जाते हैं; आप कीमत इसलिए चुकाते हैं क्योंकि आप चालाकी करते हैं। आप जाना वहां चाहते हैं, लेकिन सोचते हैं कि प्रवचन में जाने से आप स्वर्ग के अधिकारी बन जाएंगे। यही चालाकी आपको नरक में ले जाती है। आप जैसा महसूस करते हैं, वैसे ही आप बन जाते हैं। मान लीजिए कि आप जुआ खेलने के आदी हैं। हो सकता है कि अपने घर में मां, पत्नी या बच्चों के सामने आप जुआ को खराब बताते हों। इसका नाम तक मुंह पर नहीं लाते हों। लेकिन जैसे ही अपने गैंग से मिलते हैं, पत्ते फेंटने लगते हैं। चोरों को क्या ऐसा लगता है कि किसी को लूटना बुरा है? जब आप चोरी में असफल होते हैं, तो वे सोचते हैं कि आप अच्छे चोर नहीं हैं। उनके लिए वह एक बुरा कर्म हो जाता है। हमें ये समझना होगा कि कर्म उसी तरह से बनता है, जिस तरह आप उसे महसूस करते हैं। आप जो कर रहे हैं, उससे इसका संबंध नहीं है।

प्रार्थना वास्तविक ध्यान का परिणाम
कबीर का जोर ध्यान पर है, बुद्ध का जोर ध्यान पर है, मेरा जोर ध्यान पर है। ध्यान एक अलग दृष्टिकोण है: भगवान के साथ इसका कोई लेना-देना नहीं है, इसका संबंध तुम से है, तुम्हारे मन से है। इसके द्वारा तुम्हारे भीतर एक मौन पैदा करना है, एक गहरा मौन। उस गहरे मौन में तुम भगवान की उपस्थिति महसूस करना शुरू कर दोगे। प्रार्थना वास्तविक ध्यान का एक परिणाम है। केवल एक ध्यानी प्रार्थना कर सकता है क्योंकि वह जानता है, क्योंकि वह महसूस करता है, क्योंकि अब भगवान की उपस्थिति सिर्फ एक तर्क नहीं है, एक तार्किक बात नहीं है, परन्तु कोई अनुभूति है, कुछ जीया हुआ है। और तब प्रार्थना एक शिकायत नहीं रह जाती है। फिर प्रार्थना एक समर्पण है, तब प्रार्थना शुद्ध प्रेम है – इसके साथ कोई इच्छा नहीं जुड़ी है, कोई शर्त नहीं है। यह कोरी कृतज्ञता है। प्रार्थना को ध्यान से उठने दो। तुम ध्यान करो। ध्यान तुम्हारे हृदय को तैयार करेगा, यह तुम्हें शुद्ध करेगा। यह तुम्हें तुम्हारे विचारों से स्वच्छ करेगा, यह उन सभी कचरों को साफ करेगा जो तुम अपने सिर पर ढोए हुए हो सदियों से, जन्मों से; यह प्रार्थना के लिए खाली जगह तैयार करेगा। ध्यान: गुलाब की क्यारी के लिए जमीन तैयार करने की तरह है: प्रार्थना एक गुलाब की तरह है। सबसे पहले तुम्हें जमीन तैयार करनी है, तुम्हें घास-फूस हटा देना होगा, मिट्टी को बदलना होगा, तुम्हें सभी कंकड़ पत्थरों को फेंकना होगा। ध्यान से क्यारी तैयार की जाती है और केवल तैयार क्यारी में ही तुम गुलाब लगा सकते हो। अन्यथा घास-फूस तुम्हारे गुलाब को उखाड़ देंगे और घास-फूस पूरी मिट्टी का फायदा उठाएंगे और तुम्हारे गुलाबों को ज्यादा कुछ नहीं मिलेगा, वे खराब गुलाब होंगे। और यदि भूमि में कंकड़ पत्थरों होंगे तो गुलाब की वृद्धि अवरुद्ध हो जाएगी। पहले जमीन तैयार करो, फिर प्रार्थना अपने आप हो जाती है। प्रार्थना कुछ ऐसी है जिसे तुम कर नहीं सकते। ध्यान एक ऐसा काम है जिसे तुम कर सकते हो क्योंकि इसका संबंध मन से है।

असली योगी की पहचान
गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि ”नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन |
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन || गीता 8/27||” अर्थात हे पार्थ! इन मार्गों का ज्ञान हो जाने पर कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन, सभी काल में योग से जुड़कर रहो। इसे हम यूं समझ सकते हैं कि अज्ञानी लोग उत्तरायण और दक्षिणायन रुपी मार्गों के नाम तो जरूर जानते हैं, लेकिन इनके सत्य और असलियत से परिचित नहीं होते हैं। दूसरी ओर ज्ञानी होते हैं, जो योग-साधक हैं, वे इन मार्गों के बारे में जानलेने की प्रक्रिया से गुजरते हैं। वो लंबी साधना के बाद जान लेते हैं और फिर इनके मर्म को जानकर इन मार्गों के प्रति मोहित नहीं होते क्योंकि वे सिर्फ आत्मभाव में टिके होते हैं। गीता में भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि हे अर्जुन, ऐसा कोई भी काल या समय नहीं होना चाहिए जब तुम अपने स्वरूप से जुड़े हुए नहीं हो। भले हम कुछ भी कर रहे हों, सभी कार्य करते हुए भी प्रत्येक काल में अपने आत्मस्वरूप से जुड़े रहना चाहिए। अत: योगी वही है जो अपनी आत्मा से योग को हमेशा जोड़कर रखता है।

जीवन के सत्य का भान
प्रतिदिन की तरह भगवान बुद्ध भक्तों को उपदेश दे रहे थे । तभी एक श्रोता उठा और उनके पास आया और बोला, ‘भगवन ! लोग शांति चाहते हैं, पर चारो ओर शांति कहीं नहीं है। उन्हें शांति नहीं मिलती क्यों?’ बुद्ध मुस्कुराए और विनम्रतापूर्वक जवाब देते हुए कहने लगे, ‘ऐसा तुम्हें लगता है। यह तुम्हारा भ्रम है। लोग शांति चाहते ही नहीं।’ बुद्ध से ऐसे जवाब की उम्मीद उस व्यक्ति को कतई नहीं थी। उसने तुरंत कहा कि ‘यह आप क्या कह रहे हैं? हर व्यक्ति शांति का भूखा है और हर पल उसकी खोज में ही लगा रहता है।’ उस समय आश्रम में बहुत भीड़ थी । लोग बैठकर बुद्ध और उस व्यक्ति के बीच के वार्तालाप को सुन रहे थे। तभी बुद्ध ने एक आदमी को बुलाकर पूछा, ‘कहो भाई, तुम क्या चाहते हो?’ वह व्यक्ति बोला, ‘भगवन, मेरा परिवार काफी बड़ा है । आमदनी कम है और हर समय धन के लिए किल्लत मची रहती है । बस कुछ धन मिल जाए, तो जीवन सुखी हो जाए।’ तब बुद्ध ने पहले आदमी से कहा, ‘देखो, शांति कोई नहीं चाहता। सबकी अपनी अपनी इच्छाएं और आवश्यकताएं हैं, उन्हीं की पूर्ति कि वह हर पल कामना करता है।’ यह कहकर बुद्ध चुप हो गए। वह व्यक्ति भी चुपचाप चला गया, क्योंकि उसके सामने जीवन का सत्य जो उजागर हो गया था।

इस प्रकार होता है दैवीय गुणों का विकास
दैवीय गुणों का विकास करने के लिए आध्यात्मिक जीवन के अभ्यासी बनें क्योंकि इस जीवनशैली में स्वाभाविक रूप से जीवन की सिद्धि, सफलताएं, समाधान और कल्याण के सूत्र मौजूद हैं। इसमें क्षमाशीलताएं, विनय और परमार्थ जैसे अनेक सद‌्गुणों का स्थायी वास रहता है। जन्म, जरा और मृत्यु भौतिक शरीर को सताते हैं आध्यात्मिक शरीर को नहीं। आध्यात्मिक व्यक्ति ईश्वरीय शक्ति संपन्न बन जाता है। अध्यात्म जीवन का ऐसा सत्य है, एक ऐसी अनिवार्यता है जो देर-सबेर जीवन का सचेतन हिस्सा बनती है और लौकिक अस्तित्व को पूर्णता देती है। इस तरह यह विश्लेषण विवेचन व चर्चा से अधिक जीने का अंदाज है जिसे जी कर ही जाना व पाया जा सकता है। प्राण वायु की तरह हर पल अध्यात्म तत्व को जीवन में धारण कर हम अपने जीवन की खोई हुई जीवंतता और लय को पुन: प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार हमारे व्यक्तित्व में दैवीय गुणों का विकास होता है और एक विश्वसनीयता एवं प्रमाणिकता जन्म लेती है।
जीवन में भक्ति और दिव्य कर्मों के विषय में सब कुछ जानने का प्रयत्न ही अध्यात्म है। जिस समय हम शांति, अकारण सुख व आनंद की अवस्था में होते हैं, हम अपने वास्तविक स्व में, गहन अंतरात्मा में जी रहे होते हैं। सही मायने में अध्यात्म एक दर्शन है चिंतन धारा है, विद्या है, हमारी संस्कृति की परंपरागत विरासत है। यह आत्मा, परमात्मा, जीव, माया, जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म, सृजन, प्रलय की अबूझ पहेलियों को सुलझाने का प्रयत्न है। देखा जाए तो स्वयं को स्वयं से जोड़ने का नाम आध्यात्मिकता है।
इस संसार में मानव जीवन से अधिक श्रेष्ठ अन्य कोई उपलब्धि नहीं है। एकमात्र मानव जीवन ही वह अवसर है जिसमें मनुष्य जो भी चाहे प्राप्त कर सकता है। इसका सदुपयोग मनुष्य को कल्पवृक्ष की भांति फलीभूत होता है। जो मनुष्य इस सुरदुर्लभ मानव जीवन को पाकर उसे सुचारू रूप से संचालित करने की कला नहीं जानता यह उसका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।
मानव जीवन वह पवित्र क्षेत्र है जिसमें परमात्मा ने सारी विभूतियां बीज रूप में रख दी हैं जिनका विकास नर को नारायण बना देता है। किंतु इन विभूतियों का विकास तभी होता है जब जीवन का व्यवस्थित रूप से संचालन किया जाए। अध्यात्म हमें जीवन के द्वंद्वों के बीच सम रहने और विषमताओं को पार करने की शक्ति देता है। आध्यात्मिक दृष्टि में जीवन का लक्ष्य आत्म-जागरण, आत्म-साक्षात्कार, ईश्वर प्राप्ति है। यह प्रक्रिया स्वयं को जानने के साथ प्रारंभ होती है, अपनी अंतरात्मा से संपर्क साधने और उस सर्वव्यापी सत्ता के साथ जुड़ने के साथ आगे बढ़ती है।
अध्यात्म विवेक को जागृत करता है जो सहज स्फूर्त नैतिकता को संभव बनाता है और हम जीवन मूल्यों के स्रोत से जुड़ते चले जाते हैं। अध्यात्म अंतर्निहित दिव्य क्षमताओं एवं शक्तियों के जागरण, विकास के साथ व्यक्तित्व की चरम संभावनाओं को साकार करता है। आज हम जिन महामानवों अथवा देव मानवों को आदर्श के रूप में देखते हैं वे किसी न किसी रूप में इसी विकास का परिणाम होते हैं।

एकाग्रता से मिलता है लक्ष्य
हमें शुरुआत से ही बार-बार ध्यान लगाकर काम करने की सीख दी जाती है पर वर्तमान में इस पर गौर किया जाए, तो ध्यान की कमी नजर आती है। एकाग्रता के संबंध में धनुर्धर अर्जुन से सीख लें। अर्जुन को अपने लक्ष्य के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं देता था।
जब मन एक कार्य पर एकाग्र होता है, उस समय ध्यान की तीव्रता अत्यधिक बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप आप कार्यों को भली-भांति संपन्न करते हैं। आज के समय में जब प्रतियोगिता इतनी अधिक बढ़ गई है तो गहन कार्य या पूर्ण एकाग्रता के साथ काम करना न सिर्फ समय का सदुपयोग है, बल्कि समय नियोजन भी है। अस्त-व्यस्त दिनचर्या की अगर कोई काट है तो वह मानसिक एकाग्रता के साथ संपन्न किया गया कर्म ही है। अगर आप इसे जीवन का धर्म बना लें तो इसके बाद आपकी क्षमता पूर्ण रूप से विकसित हो पाती है।
उपनिषदों में दो शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण हैं- कर्म और धर्म। धर्म का अर्थ है हमारा स्वभाव और कर्म जो हम करते हैं। कर्म में हमारी दृष्टि बाहर की ओर होती है और धर्म हमें अपने अंदर की ओर मोड़ देता है, अपने अंतर्मन की ओर। मन को लेकर हमें ज्ञात है कि इसे नियंत्रण में करना अति कठिन है, क्योंकि मन में भांति-भांति के उद्वेग उठते रहते हैं। इसे मन का विकार कहते हैं और जब यह मन विचलन से रहित हो जाता है उस शांत निर्विकार दशा को आत्मा कहते हैं।
एकाग्रता वह बिंदु है जहां पर धर्म और कर्म आपस में मिल जाते हैं और व्यक्ति स्वयं को लक्ष्य के प्रति समर्पित कर देता है। इसके बाद आप को अर्जुन की तरह चिड़िया की आंख के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं देता है। फिर कोई भी मंजिल दूर नहीं रहती है।

इस तरह करें आध्यात्मिक सोच का विस्तार
आध्यात्मिक गुरुओं का मानना है कि अपने मस्तिष्क में बेकार की सूचना संग्रहीत न करें, अनुपयोगी को निकाल फेंकें, तभी आपका मन उच्च विचार ग्रहण करने में समर्थ होगा।’ अवांछित, अशोभनीय वस्तुओं या विचारों को सहेजे रखने से नैराश्य पनपता है और हमारा शारीरिक तथा आध्यात्मिक बल क्षीण होता है।
उन्नयन के लिए सीखते रहना जरूरी है। जन्म से मरण तक सीखने की प्रक्रिया का नाम ही जीवन है। किंतु जाने-अनजाने बहुत कुछ नकारात्मक सीख लिया जाता है। निरक्षर वे नहीं जो पढ़-लिख नहीं सकते, बल्कि वे हैं जिनमें अनुपयोगी सीख को तिलांजलि दे डालने और दोबारा सही बातें सीखने का माद्दा नहीं है।
इसी प्रकार मन में बैठा दिए गए पूर्वाग्रह और कुत्सित धारणाएं भी जीवन में अवरोध उत्पन्न करती हैं। मन अवांछित भावनाओं, भ्रांतियों, मिथ्याग्रहों, दुराग्रहों से ठुंसा होगा तो उसमें प्रगतिशील, पाक और नेक विचारों का प्रवेश कैसे होगा फिर तो नीरसता पसरेगी, जीवंतता ठप होगी, हम जड़ हो जाएंगे। व्यक्तिगत बेहतरी में सीखने से ज्यादा अहमियत गैरजरूरी तत्वों को दरकिनार करने की होती है।
कला, कौशल या विद्या सीखने की शर्त है कि अभी तक जो हम जानते, सोचते, समझते आए हैं उसे अंतिम सत्य न मानें और उसकी पुनरीक्षा में हिचकें नहीं बल्कि अच्छी चीजों को अपनाने के लिए तत्पर रहें। मौजूदा मान्यताओं और मूल्यों को श्रेष्ठ तथा असंशोधनीय मानते हुए इनमें जकड़े रहने का अर्थ है नए के प्रति संशय या दुराव भाव को सींचते रहना।
भले ही व्यक्ति अपने क्षेत्र में पारंगत हो, अगर उसके मन में यह घर कर जाए कि इससे आगे शेष कुछ नहीं तो उसकी वैचारिक प्रगति अवरुद्ध समझें। शरीर में नई कोशिकाएं इसलिए जन्म लेती हैं ताकि पुरानी को प्रतिस्थापित कर दिया जाए। बेहतरी का सही निर्णय वही लेगा जो मौजूदा धारणाओं और मान्यताओं की पुनरीक्षा में समर्थ है। इस परिवर्तनशील संसार में प्रत्येक उच्चतर स्तर में आपको अभिनव संस्करण के तौर पर स्वयं को प्रस्तुत करना होगा। ज्ञान के प्रवेशद्वार सीलबंद होंगे तो नई सोच विकसित नहीं होगी।

ध्यान में छिपा है सांसारिक समस्याओं का हल
जीवन में व्याप्त परेशानियां, दुख और कष्टों से संघर्ष करते हुए जब व्यक्ति निराश हो जाता है तो वह आध्यात्म का सहारा लेता है। अध्यात्म और दर्शन से उसे जो बल मिलता है उससे सभी परेशानियां को वह आसानी से हल कर लेता है।
ध्यान के शारीरिक और मानसिक बहुत से फायदे हैं। जब हम एक बार ध्यान लगाना सीख लेते हैं, तब हम हमारे पास अंतर में हर समस्या का समाधान तैयार होता है। ध्यान दो प्रकार से हमारी मदद करता है। पहला, यह हमें शारीरिक तौर पर शांत करता है। दूसरा, हम इसके जरिए उस अवस्था में पहुंच जाते हैं जहां हमें प्रभु के प्यार और परमानंद की प्राप्ति होती है। ध्यान के समय हमारी सांसारिक समस्याएं ज्यों की त्यों रहती हैं, पर ध्यान के जरिए हम प्रभु की याद और उसके आनंद में इतने डूबे रहते हैं कि हमें अपनी समस्याओं और दुखों-दर्दों का आभास नहीं होता है।
सांसारिक तनाव और दबाव होने के बावजूद हमारे विचार, सोचने की शक्ति और भावनाओं में संतुलन रहता है। हम अपने तनाव पर आसानी से काबू पा लेते हैं। इस प्रकार ध्यान के द्वारा हम जिंदगी जीने का वह तरीका सीख लेते हैं जिससे हम अपने सांसारिक तनावों पर काबू पा लेते हैं। इस विद्या के माध्यम से हम सुख, शांति और चैन का रास्ता खोज लेते हैं।
वहीं आज लोग चिंता, दहशत, उदासी, और आधारहीन डर के आलम से गुजर रहे हैं। लोग जिंदगी के दुखों का सामना नहीं कर पाते। यही कारण है कि मनोचिकित्सकों, मनोविज्ञानिकों और हृदय-चिकित्सकों के कक्ष आज भरे हुए नजर आते हैं। हम आर्थिक रूप से घोर विपत्ति के आलम में हैं। हम टूटे हुए वैवाहिक रिश्तों और उजड़े हुए घरों को बसाने का यत्न कर रहे हैं। कुछ लोग उस उदासी के माहौल से चिंतित हैं, जो उनके किसी प्यारे के चले जाने के डर से उत्पन्न हो सकता है।
ये हलचल और तनाव सिर्फ हमारे मन पर ही असर नहीं करते। हमारी दिमागी तौर पर अस्वस्थ हालत कई प्रकार की बीमारियों को जन्म देती है। अध्ययन ने साबित कर दिया है कि जब हम गुस्से में होते हैं, या बहुत ज्यादा भावुक होते हैं, तब हमारे शरीर में एक अजीब तरह की हरकत होती है जो हमें लड़ने या सब कुछ छोड़ कर भाग जाने के लिए विवश करती है। पर हम सामाजिक नियमों से डर से चुपचाप सब सह लेते हैं और अंदर ही अंदर घुलते रहते हैं।
इसका असर यह होता है कि हम शारीरिक रूप से प्रभावित होते हैं और कई प्रकार की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं,
पिछले कुछ वर्षों से भावनाओं के तूफान और तनाव को खत्म करने के लिए लोगों का रुझान ध्यान की ओर हुआ है।

सुख सपना दु:ख बुलबुला
काम का ढेर देखकर कभी घबराना नहीं। मनुष्य काम करने के लिए ही जन्मा है। वह नहीं चाहेगा तो भी उसे काम करना ही पड़ेगा। जो कर्तव्य-कर्म करने में उत्साही है, वही दूसरों के लिए उपयोगी होने का सुख भोग सकता है। उद्यम में लक्ष्मी का वास है और आलस्य में अलक्ष्मी का। उद्यमी को देखकर कमनसीबी डरके भाग जाती है। उद्यम करने पर भी कभी ध्येय सिद्ध न हो तो भी उदास न हों, क्योंकि पुरुषार्थ अथवा प्रयत्न स्वयं ही एक बड़ी सिद्धि है। दु:ख से कभी डरें नहीं, बल्कि उसे देखकर उसके सामने हँसें। आपको हँसते देखकर दु?ख स्वयं ही डरके भाग जाएगा। मानव को दु:ख का शिकार नहीं होना चाहिए, न ही सुख में फूलना चाहिए। सुख सपना दु:ख बुलबुला, दोनों हैं मेहमान। दोनों बीतन दीजिए, जो भेजें भगवान?

विष्णु भगवान को इसलिए कहते हैं नारायण
भगवान विष्णु के हजारों नाम हैं। इनमें एक प्रमुख नाम है नारायण। फिल्मों, टीवी सीरियल या रामलीला में आपने देखा होगा कि नारद मुनि भगवान विष्णु को नारायण नाम से पुकारते हैं। इस नाम का धार्मिक रूप से बड़ा महत्व है। इस एक नाम में सृष्टि का संपूर्ण सार छिपा हुआ है। इसलिए शास्त्रों में अधिकांश स्थानों पर विष्णु भगवान को नारायण नाम से संबोधित किया गया है। हिन्दू धर्म में अठारह पुराणों का वर्णन मिलता है। इन अठारह पुराणों में विष्णु पुराण एक है। इस पुराण में सृष्टि की रचना का वर्णन किया गया है। इसी क्रम में बताया गया है किस प्रकार विष्णु भगवान ने वाराह रूप धारण करके पृथ्वी को रसातल यानी पाताल लोक से उठाकर जल के मध्य में स्थित किया। इसके बाद ब्रह्मा जी ने सत्व, रज और तम गुणों से असुर, देव, राक्षस, यक्ष, मनुष्य, सर्प एवं अन्य जीव-जन्तुओं की रचना की। विष्णु पुराण में बताया गया है कि सृष्टि के समाप्ति के समय सब कुछ जल में समा जाता है और संपूर्ण ब्रह्माण्ड अंधकारमय हो जाता है। भगवान विष्णु चिर निद्रा में जल में शयन करते हैं। देवताओं का दिन आरंभ होने पर भगवान विष्णु फिर से सृष्टि की रचना करते हैं और ब्रह्मा एवं शिव की उत्पत्ति उन्हीं से होती है। भगवान विष्णु प्रथम नर रूप में व्यक्त होते हैं। इसलिए शास्त्रों में इन्हें आदिपुरूष कहा गया है। आदि पुरूष विष्णु का निवास यानी ‘आयन’ नार यानी ‘जल’ है इसलिए भगवान विष्णु को नारायण नाम से संबोधित किया जाता हैं।

विनम्रता में भी अहंकार उचित नहीं
अगर कृत्य है, अगर संकल्प है, तो कर्ता फिर निर्मित हो जाएगा, फिर अहंकार बन जाएगा। तुम्हारे भीतर एक नया अहंकार पैदा हो जाएगा कि देखो मैं कितना विनम्र हूं, कैसा झुक जाता हूं, जगह-जगह झुक जाता हूं, मुझसे ज्यादा विनम्र कोई भी नहीं!इसलिए मैं अपने संन्यासियों को नहीं कहता कि तुम अपने आचरण को ऐसा करो, वैसा करो; यह खाओ, वह पियो; इतने बजे उठो, इतने बजे मत उठो। मैं अपने संन्यासियों को सिर्फ एक बात कह रहा हूं, सिर्फ एक औषधि कि तुम ध्यान में उतरो। ध्यान तुम्हें सत्य के सामने खड़ा कर देगा, फिर तुम्हारे जीवन में क्रांति होनी शुरू होगी- जो तुम करोगे नहीं, होगी ही और उस बात का सौंदर्य ही और है, जब तुम्हारा आचरण अपने आप बदलता है, जब तुम्हारे आचरण में अपने आप आभा आती है! थोप-थोपकर, जबरदस्ती ऊपर से बिठाकर, किसी तरह संभालकर जो आचरण बनाया जाता है, वह पाखंड है। लेकिन सदियों से तुम्हें पाखंड सिखाया गया है धर्म के नाम पर, नीति के नाम पर, इसलिए मैं तुम्हें उस पाखंड को छोड़ देने के लिए कहता हूं।

अनुशासन का पाठ
गुरु अंबुजानंद के पास अनेक शिष्य शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। उनका आश्रम लंबे समय से चल रहा था। अब चूंकि अंबुजानंद काफी वृद्ध हो गए थे, गुरुकुल चलाना उनके लिए कठिन हो रहा था। वह अपने शिष्यों में से ही किसी एक को गुरुकुल का सारा कार्यभार सौंपना चाहते थे। एक दिन उन्होंने अपने 18 श्रेष्ठ विद्यार्थियों को अपने पास बुलाया। उन्होंने उनसे कहा, ’आप सभी प्रतिभाशाली, मेहनती और ईमानदार हैं। यदि मैं आपको शिक्षा के लिए किसी विशेष क्षेत्र में नियुक्त करना चाहूं तो आप कौन-कौन से क्षेत्र को चुनना चाहेंगे?’
यह सुनकर सभी शिष्य कुछ देर सोचते रहे और फिर 17 विद्यार्थियों ने अपने-अपने मनपसंद क्षेत्रों के नाम गुरु को बता दिए। अठारहवां शिष्य आयुष अभी तक कुछ सोच ही रहा था। उसे चुप देखकर गुरु ने पूछा, ’बेटा आयुष, तुमने अपने लिए किसी क्षेत्र का चुनाव नहीं किया?’ गुरु की बात सुनकर आयुष ने सिर झुकाकर कहा, ’गुरुजी, मैंने आपसे ही शिक्षा ग्रहण की है। मैं आपके द्वारा सीखी गई शिक्षा को जन-जन तक फैलाना चाहता हूं। इसके लिए मुझे किसी क्षेत्र विशेष का चुनाव करने की आवश्यकता नहीं है। मैं हर क्षेत्र में आपके द्वारा प्रदान की गई शिक्षाओं को दूसरों तक पहुंचाना चाहूंगा। हालांकि क्षेत्र से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है आपके दिए गए मूल्य या संस्कार का प्रसार, जो शास्त्रों से अलग है। मैं चाहता हूं कि लोग उसे जानें ताकि वे नैतिक दृष्टि से भी श्रेष्ठ हों। मात्र पुस्तकीय ज्ञान से कुछ नहीं होने वाला है। आपने जो अनुशासन का पाठ हमें पढ़ाया है, उसे तो मैं विशेष रूप से सिखाना चाहूंगा। ज्ञान पाने के लिए व्यक्तित्व को एक खास सांचे में ढालना पड़ता है। आपने जिस तरह हमें ढाला है, मैं भी दूसरों को ढालना चाहूंगा।’ आयुष की बात सुनकर गुरु अंबुजानंद का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा। उन्होंने उसे गले से लगाकर कहा, ’बेटा, आज से यह गुरुकुल तुम्हारी देखरेख में ही चलेगा।’

आध्यात्मिक जीवन में प्रगति के लिए सदपुरुषों की संगति करें
हम किसके साथ हैं यह हमारी जिंदगी में बहुत ही महत्वपूर्ण है। कुछ जगहों पर अच्छी गुणवत्ता के गुलाब की किस्म को कमजोर गुणवत्ता वाली गुलाब की किस्म के पास लगाया जाता है। यह इसलिए किया जाता है ताकि कमजोर किस्म के गुलाब का परागण उच्च किस्म के गुलाब के साथ हो सके और उनकी गुणवत्ता में निखार आ सके। इस तरह कमजोर को बेहतर बनाने का प्रयत्न किया जाता है।
यह सिद्धांत हमारी जिंदगी में भी काम करता है। कहा भी जाता है कि हम जिस तरह के लोगों की संगत में रहते हैं उसी से हमारी पहचान बनती है।
इसी तरह अगर हम आध्यात्मिक जीवन में प्रगति चाहते हैं तो हमें उन लोगों का सान्निध्य हासिल करना चाहिए जो उस रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं। अगर हम किसी ऐसे व्यक्ति के साथ कुछ समय बिताते हैं जो खुद ध्यान और प्राणायाम करता है तो हम पर उसकी इन आदतों का असर होगा ही। अच्छे लोगों की संगति हमें अच्छे रास्तों पर आगे बढऩे की प्रेरणा देती है। तो आपको अपनी संगति का मूल्यांकन करना चाहिए कि आप कैसी संगति में हैं। यदि आप ऐसे दोस्तों के साथ जुड़े हैं जो आपकी तरक्की में सहायक हैं या जिनके साथ रहते हुए आप नई चीजें सीख पा रहे हैं तो यह आपके लिए अच्छी बात है। लेकिन अगर ऐसा नहीं हो रहा है तब आपको चिंता करनी चाहिए।
आप जिन लोगों के साथ रहते हैं उनके व्यवहार के कारण ही आपके बारे में कोई भी धारणा बनाने का काम होता है इसलिए अपनी संगति के प्रति अत्यधिक सावधानी और सतर्कता रखनी चाहिए। जिस तरह किसी भी आईने में व्यक्ति का अक्स नजर आ जाता है उसी तरह दोस्तों से आपके मिजाज का अंदाज हो जाता है। इसलिए युवा अवस्था में संगति बना भी देती है और बिगाड़ भी सकती है। यही वजह है कि अपनी संगति का चुनाव बहुत ही देखभाल के साथ करना चाहिए।

मॉं अंजना के भाव हैं हनुमान
सोने की लंका के महाप्रतापी राजा और राह से भटके रावण पर विजय प्राप्त करके जब श्रीराम पुष्पक विमान पर सवार होकर आकाश मार्ग से वापस आने लगे तो कांचनगिरि के पास हनुमान जी ने कहा कि ‘महाराज! मेरी मॉं अंजना यहीं पर्वत शिखर पर रहती हैं। आप मेरी मॉं को यदि दर्शन दे देते तो आपकी बड़ी कृपा होती।’ श्रीराम आखिर अपने भक्तराज हनुमान की बात को कैसे टाल सकते थे अत: उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए वो पुष्पक विमान से पर्वत पर उतरे और माता अंजना के समक्ष जा पहुंचे। मां अंजना को जब पता चला कि रावण से सीता को छुड़ाने के लिए हनुमान के रहते श्रीराम को परिश्रम करना पड़ा तो वह तिलमिला गई। उन्होंने कहा कि ‘अरे हनुमन्त! तुमने मेरे दूध को लज्जित कर दिया। यह कैसे संभव हुआ कि तुम्हारे रहते हुए राम को कष्ट उठाना पड़ गया।’ जब मॉं ने बार-बार अपने दूध की दुहाई दी तो वहां मॉजूद अन्य रीछ वानरों और लक्ष्मण जी को भी नागवार गुजरा कि यह कैसी मां है, जो अन्य कुछ न कह कर बार-बार अपने दूध की दुहाइयां दे रही हैं। अंतत: श्रीराम ने सभी के भावों को समझा और बोले कि ‘हनुमान में शक्ति है तो उसकी अपनी शक्ति है, इसमें आपके दूध की क्या भूमिका है?’ मां अंजना इससे क्रोधित हो गईं। उन्होंने कहा कि ‘अगर हनुमान ने मेरा दूध न पिया होता तो इसके शरीर में फौलादी ताकत नहीं होती।’ वहां मौजूद अन्य लोगों ने पूछा, ‘इसका कोई सबूत है?’ मॉं अंजना अब थोड़ा मुस्कुराई और एक पत्थर के पास जाकर उन्होंने अपनी दुग्धधारा पत्थर पर छोड़ी इससे पत्थर चटक कर टुकड़े-टुकड़े हो गया। लोग चकित रह गए। दूध में इतनी शक्ति। यह देख सभी मॉं अंजना को घेर लिए और पूछने लगे कि ‘है मां! इसका तात्पर्य क्या है? आपके दूध से हनुमान में इतना बल, इतना ओज, इतना विवेक कैसे आ गया?’ मॉं अंजना ने कहा कि ‘बच्चों की नींव मां के दूध से शुरू होती है। मां जैसे विचार और भाव से बच्चों को दुग्धपान कराती है, उसका अचूक प्रभाव बच्चे पर पड़ता है।’

नासमझ रोते हैं भाग्य का रोना
धर्म कोई भी हो, लेकिन आस्थावान को अपने भाग्य पर उतना ही भरोसा होता है जितना कि जीवन और मरण में। वैसे भी मानव समाज में भाग्य को वो स्थान प्राप्त है जो कि किसी अन्य को हो नहीं सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अथक प्रयासों के बावजूद जो चीज या पद, प्रतिष्ठा नहीं मिल पाते हैं वो उज्जवल भाग्य के चलते चुटकियों में मिल जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि सब वस्तुओं की तुलना कर लें मगर अपने भाग्य की कभी भी किसी से तुलना नहीं करें। अधिकांक्षतया लोगों द्वारा अपने भाग्य की तुलना अन्य व्यक्तियों या यूं ही मजाक में किसी जानवर से करके व्यर्थ का तनाव मोल ले लिया जाता है। इसके साथ ही इसके लिए उस परमात्मा को ही सुझाव दिया जाता है कि उसे ऐसा न करते हुए ऐसा करना चाहिए था। भाग्य के लिए परमात्मा से शिकायत मत किया करो। यह समझ लो कि मानव कभी भी इतना समझदार नहीं हो सकता कि वह परमात्मा के इरादे समझ सकें। अगर उस ईश्वर ने आपकी झोली खाली रखी है तो यह सोचकर चिंतित मत होना कि आपकी झोली क्यों खाली है, बल्कि यह सोचना कि ईश्वर जरुर कुछ बेहतर देने वाला है। खाली झोली देख चिंता मत करना क्योंकि शायद हो सकता है कि भाग्यानुसार ईश्वर पहले से कुछ बेहतर उसमे डालना चाहता हो। इसे यूं समझें कि आपको अवसर मिला है कि आप दूसरों के भाग्य को देख और उसकी सराहना करने में समय लगाने की बजाय स्वयं अच्छे कार्य करते हुए अपने भाग्य को सुधारने में लग जाएं। अंतत: यह समझ लें कि परमात्मा ने भाग्य सभी के लिखे हैं, लेकिन उन्हें अमली जामा पहनाने की जिम्मेदारी स्वयं मानव के कंधों पर उसने डाल रखी है, जो यह समझ जाता है वह कड़ा परिश्रम करता रहता है और नासमझ भाग्य का रोना लेकर जिंदगी गुजार देते हैं।

भगवान का स्मरण
जहाँ भगवान का स्मरण चिन्तन होता है वह स्थान पवित्र माना जाता है। वहाँ के कण-कण में उस परमात्म-तत्त्व के परमाणु फैले रहते हैं। जो आदमी क्रोधी होता है उसके आसपास सात फीट के दायरे में क्रोध के परमाणु फैले रहते हैं। हर इन्सान एक पावर हाउस है। उसमें से कुछ न कुछ संस्कारों की सूक्ष्म तन्मात्राएँ निकलती रहती हैं। जहाँ भगवान की भक्ति करनेवाले लोग रहते हैं वह स्थान भी अपना कुछ दिव्य महत्त्व रखता है। महाराष्ट्र में महात्मा गाँधी किसी गुफा में गये थे। गुफा में रहने वाले योगी को देव हुए कोई सात-आठ दिन ही हुए थे। खाली गुफा में गाँधी जी थोड़ी ही देर बैठे तो उन्हें ॐ की सूक्ष्म ध्वनि महसूस हुई। जिस स्थान में भगवान का चिन्तन मनन होता है वह स्थान इतना पवित्र हो जाता है तो आदमी भगवान का चिन्तन मनन करता है वह कितना पवित्र हो जाता होगा ! इसीलिये भगवान के मार्ग में चलने वाले महापुरूषों का आदर करने वाला उन्नत होता है। रूपये देकर लेक्चर सुनने वाली पाश्चात्य परंपरा से केवल सूचनाएँ मिलती हैं, अमृत नहीं मिलता। गुरू और शिष्य के बीच वह सम्बन्ध होता है जो भगवान और भक्त के बीच होता है। तुच्छ वस्तुओं के लिए गुरूपद नहीं है। गुरूपद इसलिए है कि जीव जन्म-जन्मांतरें की भटकान से बचकर अपने गुरूतत्त्व को जान ले, अपने महान् पद को जान ले ताकि बार-बार दुःख-योनियों में न जाना पड़े। सूकर, कूकर आदि दुःख-योनियों हैं। श्रद्धा में एक ऐसी शक्ति है कि आप ईश्वर के किसी भी रूप को मानकर चलें तो समय पाकर गुरूओं का गुरू अन्तर्यामी परमात्मा भीतर से आपका प्रेरक बन जाता है। फिर ऐसे महापुरूष के पास आप पहुँच जाते हैं कि जिनकी पवित्र निगाह से, पवित्र आभा से आपका चित्त ईश्वर की ओर चलने लगता है। जिनकी निगाहों से, जिनके शरीर के परमाणुओं से, जिनके चित्त से ईश्वरीय आकर्षण, ईश्वरीय प्रेम तथा ईश्वरीय यात्रा के लिए जन-समाज को सहाय मिलती रहती है वे मनुष्य जाति के परम हितैषी रहते हैं। उन्हें आचार्य कहा जाता है। आचार्यवान पुरूषो वेद।। वे अभक्त को भक्ति दे सकते हैं, योग दे सकते हैं, ज्ञान दे सकते हैं और ईश्वराभिमुख बना सकते हैं। पढ़ लिखकर पदवी पाना एक बात है लेकिन रामकृष्ण की तरह, शंकराचार्य की तरह समाज के मन को ईश्वराभिमुख करना सबसे ऊँची बात है।

आपकी सोच पर निर्भर है कर्म
दो मित्र अक्सर एक वेश्या के पास जाया करते थे। एक शाम जब वे वहां जा रहे थे, रास्ते में किसी संत का आध्यात्मिक प्रवचन चल रहा था। एक मित्र ने कहा कि वह प्रवचन सुनना पसंद करेगा। उसने उस रोज वेश्या के यहां नहीं जाने का फैसला किया। दूसरा व्यक्ति मित्र को वहीं छोड़ वेश्या के यहां चला गया। अब जो व्यक्ति प्रवचन में बैठा था, वह अपने मित्र के विचारों में डूबा हुआ था। सोच रहा था कि वह क्या आनंद ले रहा होगा और कहां मैं इस खुश्क जगह में आ बैठा। मेरा मित्र ज्यादा बुद्धिमान है, क्योंकि उसने प्रवचन सुनने की बजाए वेश्या के यहां जाने का फैसला किया। उधर, जो आदमी वेश्या के पास बैठा था, वह सोच रहा था कि उसके मित्र ने इसकी जगह प्रवचन में बैठने का फैसला करके मुक्ति का मार्ग चुना है, जबकि मैं अपनी लालसा में खुद ही आ फंसा। प्रवचन में बैठे व्यक्ति ने वेश्या के बारे में सोचकर बुरे कर्म बटोरे। अब वही इसका दुख भोगेगा। गलत काम की कीमत आप इसलिए नहीं चुकाते, क्योंकि आप वेश्या के यहां जाते हैं; आप कीमत इसलिए चुकाते हैं क्योंकि आप चालाकी करते हैं। आप जाना वहां चाहते हैं, लेकिन सोचते हैं कि प्रवचन में जाने से आप स्वर्ग के अधिकारी बन जाएंगे। यही चालाकी आपको नरक में ले जाती है। आप जैसा महसूस करते हैं, वैसे ही आप बन जाते हैं। मान लीजिए कि आप जुआ खेलने के आदी हैं। हो सकता है कि अपने घर में मां, पत्नी या बच्चों के सामने आप जुआ को खराब बताते हों। इसका नाम तक मुंह पर नहीं लाते हों। लेकिन जैसे ही अपने गैंग से मिलते हैं, पत्ते फेंटने लगते हैं। चोरों को क्या ऐसा लगता है कि किसी को लूटना बुरा है? जब आप चोरी में असफल होते हैं, तो वे सोचते हैं कि आप अच्छे चोर नहीं हैं। उनके लिए वह एक बुरा कर्म हो जाता है। हमें ये समझना होगा कि कर्म उसी तरह से बनता है, जिस तरह आप उसे महसूस करते हैं। आप जो कर रहे हैं, उससे इसका संबंध नहीं है।

मन को गुलाम बनाएं, पीड़ामुक्त होंगे
जीवन में संन्यास का महत्व समझने और समझाने वाले मन को गुलाम बनाने का उपक्रम भी बताते हैं। ऐसे सन्यासियों के अनुसार मन का बदलाव, ध्यान और सन्यास संयुक्त घटनाएं हैं और मनुष्य के मन का नियम है कि निर्णय लेते ही मन बदलना शुरू हो जाता है। आपने भीतर एक निर्णय किया कि आपके मन में परिवर्तन होना शुरू हो जाता है। एक निर्णय मन में बना कि मन उसके पीछे काम करना शुरू कर देता है। जैसे ही किसी ने निर्णय लिया कि मैं संन्यास लेता हूं कि मन संन्यास के लिए सहायता पहुंचाना शुरू कर देता है। असल में निर्णय न लेने वाला आदमी ही मन के चक्कर में पड़ता है। जो आदमी निर्णय लेने की कला सीख जाता है, मन उसका गुलाम हो जाता है। वह जो अनिर्णयात्मक स्थिति है वही मन है। निर्णय की क्षमता ही मन से मुक्ति हो जाती है। वह जो निर्णय है, संकल्प है, बीच में खड़ा हो जाता है, मन उसके पीछे चलेगा लेकिन जिसके पास कोई निर्णय नहीं है, संकल्प नहीं है, उसके पास सिर्फ मन होता है और मन से हम बहुत पीड़ित और परेशान होते हैं। अंतत: मन तो आपका गुलाम है।

विदुर नीत आज भी है प्रासंगिक
महाभारत काल में अहम स्थान रखने वाले महामंत्री विदुर की नीतियां भारतीय इतिहास में अपना विशेष स्थान रखती हैं। उनकी नीतियां ना केवल युद्ध से संबंधित थीं बल्कि जीवन व्यवहार में भी आज तक कई मायनों में प्रासंगिक बनी हुई हैं। उनकी नीतियों पर चलकर आप कई परेशानियों का हल आसानी से निकाल सकते हैं और व्यक्ति के बारे में पूर्ण जानकारी हासिल कर सकते हैं। विदुर के अनुसार किस तरह नकारात्मक इंसान को आप इन चीजों से पहचान सकते हैं।
कभी नहीं करता संतोष
विदुर की नीतियों के अनुसार, जो व्यक्ति दुसरों की खुशियों में खुश नहीं रहता, सामने वाले की तरक्की को देखकर ईर्ष्या करना तथा दूसरों का अच्छा देखकर संतोष न करने वाला व्यक्ति दुष्ट प्रवृत्ति का होता है।
कभी नहीं करता सही कार्य
नीतियों के अनुसार, दुष्ट प्रवृति का व्यक्ति कोई भी चीजे सरल तरीके से नहीं करता है। वह हर कार्य को दुसरों के भरोसे करता है ताकि कोई समस्या आए तो वह बच जाए।
कभी नहीं रहता खुश
संतोष किसी चीज का ना हो, यह मनुष्य में सबसे बड़ी कमी होती है। संतोष ही ऐसा भाव है, जिससे मनुष्य का जीवन सरलता से चलता है लेकिन जिस व्यक्ति में संतोष का भाव नहीं होता है, वह ना तो कभी खुश रहता है और ना ही कभी किसी खुश रहने देता है।
आज के दौर में वाणी का बहुत महत्व है, वाणी में अमृत भी है और विष भी। यदि वाणी में अशिष्टता है तो सुनते ही सामने वाला आग बबूला हो जाएगा। ऐसे व्यक्ति के जीवन में कभी सच्चे दोस्त नहीं बनते हैं। कटु वचन बोलने वाला व्यक्ति हमेशा अकेला पड़ जाता है।
दिल का साफ नहीं होता ऐसा व्यक्ति
जो व्यक्ति सामने वाले से अच्छे से बात करे लेकिन मन ही मन आपके बारे में गलत विचार रखता है, वह दुष्ट प्रवृति का व्यक्ति होता है। जिसका दिल साफ नहीं होता है, जो जीवन में निर्मल नहीं होता है वह नकारात्मक इंसान होता है।
गलत कार्य करता है ऐसा व्यक्ति
जिस व्यक्ति का इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं होता है, ऐसा व्यक्ति दुष्ट प्रवृति का होता है। नियंत्रण के अभाव में ऐसा व्यक्ति कई बार गलत कार्य कर बैठता है। सफल इंसान बनने के लिए इंद्रियों का नियंत्रण होना जरूरी है।
अधर्मी होता है ऐसा व्यक्ति
जो व्यक्ति कभी सत्य ना बोलता हो, हमेशा झूठ का सहारा लेता हो, वह व्यक्ति दुष्ट प्रवृति का होता है। आज के दौर में सत्य से बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं है। जो सत्य का अपमान करता है, असत्य बोलता है, वह सबसे बड़ा अधर्मी है।
गलत रास्ते पर चलता है यह व्यक्ति
जिसका मन अशांत रहता है, शांति नहीं रखता, वह व्यक्ति आगे चलकर गलत रास्ते पर चलने लगता है। शांति इंसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण है, इंसान धन तो इकट्ठा कर लेता है लेकिन शांति नहीं प्राप्त कर पाता है। अशांत व्यक्ति कोई भी काम ठीक से नहीं करता।

ध्यान करने से पहले सुनना सीखें
व्यक्ति सुनता है तो विचार करता है, लेकिन जो सुनता ही नहीं है वह विचार आखिर कैसे कर सकता है। इसी संदर्भ में बताया जाता है कि तुम्हारे मन पर सतत् चारों तरफ से तरह-तरह के विचारों का आक्रमण होता है। स्वयं का बचाव करने के लिए हर मन ने प्रतिरोध की एक सूक्ष्म दीवार बनाई हुई है ताकि ये विचार वापस लौट जाएं और मन में प्रवेश न कर सकें। वैसे तो यह अच्छा होता है लेकिन धीरे-धीरे यह प्रतिरोध इतने अधिक बड़े हो जाते हैं कि कुछ समय बाद ये किसी भी तरह की बातों और विचारों को अंदर नहीं आने देते। अगर तुम चाहोगे भी तो भी तुम्हारा उन पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता। ऐसे प्रतिरोध को रोकने का वही तरीका है जिस तरह तुम अपने स्वयं के विचारों को रोकते हो। सिर्फ अपने विचारों के साक्षी बनो और जैसे-जैसे तुम्हारे विचार विलीन होने शुरू होंगे, इन विचारों को रोकने के लिए प्रतिरोधों की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। वे झड़ने लगेंगे, पेड़ के सूखे पत्तों की तरह। ये सारे सूक्ष्म तत्व हैं, तुम उन्हें देख न पाओगे लेकिन तुम्हें उनके परिणाम जरुर समय-समय पर महसूस होंगे। जो व्यक्ति ध्यान से परिचित है वही सुनने की कला जानता है और इससे उलटा भी सच है कि जो आदमी सुनने की कला जानता है वह ध्यान करना जानता है क्योंकि दोनों एक ही बात है। सदियों से हर किसी के लिए यह एकमात्र उपाय रहा है, स्वयं की वास्तविकता और अस्तित्व के रहस्य के करीब आने का। जैसे-जैसे तुम करीब आने लगोगे, तुम्हें अधिक शीतलता महसूस होगी। तब तुम स्वंय को प्रसन्न अनुभव करोगे। एक बिंदू आता है जब तुम आनंद से इतने भर जाते हो कि उसे तुम पूरी दुनिया के साथ बांटने लगते हो और फिर भी तुम्हारा आनंद उतना ही बना रहता है। इसलिए सुनना सीखें ध्यान तो करना भी आ जाएगा।

संन्यास हेतु ध्यान जरुरी
जीवन में संन्यास का महत्व समझने और समझाने वाले मन को गुलाम बनाने का उपक्रम भी बताते हैं। संन्यास का अर्थ ही यही है कि मैं निर्णय लेता हूं कि अब से मेरे जीवन का केंद्र ध्यान होगा और कोई अर्थ ही नहीं है संन्यास का। जीवन का केंद्र धन नहीं होगा, यश नहीं होगा, संसार नहीं होगा। जीवन का केंद्र ध्यान होगा, धर्म होगा, परमात्मा होगा-ऐसे निर्णय का नाम ही संन्यास है। जीवन के केंद्र को बदलने की प्रक्रिया संन्यास है। वह जो जीवन के मंदिर में हमने प्रतिष्ठा कर रखी है-इंद्रियों की, वासनाओं की, इच्छाओं की, उनकी जगह मुक्ति की, मोक्ष की, निर्वाण की, प्रभु-मिलन की, मूर्ति की प्रतिष्ठा ध्यान है। तो जो व्यक्ति ध्यान को जीवन के और कामों में एक काम की तरह करता है, चौबीस घंटों में बहुत कुछ करता है, घंटेभर ध्यान भी कर लेता है- निश्चित ही उस व्यक्ति की बजाय जो व्यक्ति अपने चौबीस घंटे के जीवन को ध्यान को समॢपत करता है, चाहे दुकान पर बैठेगा तो ध्यानपूर्वक, चाहे भोजन करेगा तो ध्यानपूर्वक, चाहे बात करेगा किसी के साथ तो ध्यानपूर्वक, रात में सोने जाएगा तो ध्यानपूर्वक, सुबह बिस्तर से उठेगा तो ध्यानपूर्वक-ऐसे व्यक्ति का अर्थ है संन्यासी, जो ध्यान को अपने चौबीस घंटों पर फैलाने की आकांक्षा से भर गया है। निश्चित ही संन्यास ध्यान के लिए गति देगा और ध्यान संन्यास के लिए गति देता है।

ईमानदारी वाला समर्पण
प्रत्येक धर्म मनुष्य जीवन को सर्वश्रेष्ठ बताता है और कहता है कि अपने कर्म में ईमानदारी रखो इससे स्वयं का मन तो स्वच्छ और सुंदर बनता ही है साथ ही ईश्वर भी प्रसन्न रहता है। सच कहा गया है कि बड़ी मुश्किल से मानव जीवन मिलता है। इसलिए इस जीवन में जितने सद्कार्य किए जाएं, उतना अच्छा है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पुरुषार्थ किए बगैर भाग्य का निर्माण नहीं हो सकता। मौजूदा संदर्भ में एक सवाल यह उठता है कि कर्म का चयन कैसे किया जाए कि किस व्यक्ति को क्या कर्म करने हैं? विद्वान कहते हैं कि अपनी जिम्मेदारियों को निष्काम भाव से निभाना ही कर्म है और सद्कर्तव्य है। शास्त्रों के अनुसार हर व्यक्ति के कर्तव्य तय हैं। शिक्षक को अपने छात्र के प्रति, नेता को राष्ट्र के प्रति, पति को अपनी पत्नी और बच्चों के प्रति, दुकानदार को अपने ग्राहक के प्रति ईमानदार व समर्पित होना चाहिए। यही ईमानदारी वाला समर्पण भक्त को अपने भगवान से मिलवाता है।

ज्ञेय और ज्ञान का संबंध
दर्शन के क्षेत्र में ज्ञान और ज्ञेय की मीमांसा चिरकाल से होती रही है। आदर्शवादी और विज्ञानवादी दर्शन ज्ञेय की स्वतंत्र सत्ता स्वीकार नहीं करते। वे केवल ज्ञान की ही सत्ता को मान्य करते हैं। अनेकांत का मूल आधार यह है कि ज्ञान की भांति ज्ञेय की भी स्वतंत्र सत्ता है। द्रव्य ज्ञान के द्वारा जाना जाता है, इसलिए वह ज्ञेय है। ज्ञेय चैतन्य के द्वारा जाना जाता है, इसलिए वह ज्ञान है। ज्ञेय और ज्ञान अन्योन्याश्रित नहीं हैं। ज्ञेय है, इसलिए ज्ञान है और ज्ञान है इसलिए ज्ञेय है, इस प्रकार यदि एक के होने पर दूसरे का होना सिद्ध हो तो ज्ञेय और ज्ञान दोनों की स्वतंत्र सत्ता सिद्ध नहीं हो सकती। द्रव्य का होना ज्ञान पर निर्भर नहीं है और ज्ञान का होना द्रव्य पर निर्भर नहीं है। इसलिए द्रव्य और ज्ञान दोनों स्वतंत्र हैं। ज्ञान के द्वारा द्रव्य जाना जाता है, इसलिए उनमें ज्ञेय और ज्ञान का संबंध है। ज्ञेय अनंत है और ज्ञान भी अनंत है। अनंत को अनंत के द्वारा जाना जा सकता है। जानने का अगला पर्याय है कहना। अनंत को जाना जा सकता है, कहा नहीं जा सकता। कहने की शक्ति बहुत सीमित है। जिसका ज्ञान अनावृत्त होता है, वह भी उतना ही कह सकता है जितना कोई दूसरा कह सकता है। भाषा की क्षमता ही ऐसी है कि उसके द्वारा एक बार में एक साथ एक ही शब्द कहा जा सकता है। हमारे ज्ञान की क्षमता भी ऐसी है कि हम अनंतधर्मा द्रव्य को नहीं जान सकते। हम अनंत-धर्मात्मक द्रव्य के एक धर्म को जानते हैं और एक ही धर्म का प्रतिपादन करते हैं। एक धर्म को जानना और एक धर्म को कहना नय है। यह अनेकांत और स्याद्वाद का मौलिक स्वरूप है। उनका दूसरा स्वरूप है प्रमाण। अनंत-धर्मात्मक द्रव्य को जानना और उसका प्रतिपादन करना प्रमाण है। हम अनंतधर्मा द्रव्य को किसी एक धर्म के माध्यम से जानते हैं। इसमें मुख्य और गौण दो दृष्टिकोण होते हैं। द्रव्य के अनंत धर्मो में से कोई एक धर्म मुख्य हो जाता है और शेष धर्म गौण। नय हमारी वह ज्ञान-पद्धति है, जिसमें हम केवल धर्म को जानते हैं, धर्मो को नहीं जानते। प्रमाण हमारी वह ज्ञान-पद्धति है, जिससे हम एक धर्म के माध्यम से समग्र धर्मो को जानते हैं।

परिग्रह पिशाच है, परिग्रह संसार का कारण है
राष्ट्रयोगी संत बाल ब्र. आत्मानंद जी महाराज :-
श्री तारण तरण दि. जैन चैत्यालय खरी फाटक रोड पर विराजमान राष्ट्रयोगी संत दसम् प्रतिमाधारी बाल ब्र. पूज्य श्री आत्मानंद जी महाराज ने उत्तम आकिंचन्य धर्म की व्याख्या करते हुए कहा – प्रथम सत्य ही अंतिम सत्य है, मनुष्य प्रथम सत्य को भूल जाता है इसलिए परमात्मा को प्राप्त नहीं हो पाता है- प्रथम सत्य यह है कि मनुष्य संसार में नग्न आया है और अंतिम सत्य यह है कि यहां से मनुष्य नग्न ही जायेगा खाली हाथ जायेगा- परम पूज्य तारण तरण देव कहते हैं, परिग्रह को एकत्र करना ही संसार का कारण है- यह परम सत्य है परिग्रह को जोड़ता है और छोड़कर चला जाता है। ऑख खुलने पर अपना मानता है ऑख बंद होने पर सपना हो जाता है सब झूठा है, छोड़ने के लिए ही जोड़ने का परिश्रम किया था छोड़कर जाना था यह परम सत्य ही है, भगवान महावीर स्वामी जी कहते हैं इस परिग्रह पिशाच से बचो कल्याण का मार्ग बनाओ- संसार में आत्मा के अतिरिक्त मेरा कुछ भी नहीं है, इस भाव का नाम अंकिचन्य है, यही उत्तम अंकिचन्य धर्म है।

व्रत पालन से ही जीवन में मिलती है सफलता
व्रत से अभिप्राय नियम, कानून अथवा अनुशासन से है। जिस जीवन में अनुशासन का अभाव है वह जीवन निर्बल है। नीति का मतलब है जीवन अस्त-व्यस्त न हो, शांत और सबल हो। नीति के अनुसार व्रत पालन से अद्भुत बल की प्राप्ति होती है। रावण के विषय में विख्यात है कि वह दुराचारी था िंकतु वह अपने जीवन में एक प्रतिज्ञा से आबद्ध था। उसका व्रत था कि वह किसी नारी का बलात्कार नहीं करेगा, उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं भोगेगा यही कारण था वह सीता को हरण करके ले तो आया िंकतु उसका शील भंग नहीं कर पाया। इसका कारण केवल उसका व्रत था, उसकी प्रतिज्ञा थी। यद्यपि यह सही है कि सीताजी के साथ बलात्कार का प्रयास भी करता तो भस्मसात हो जाता िंकतु ऐसा करने से उसकी प्रतिज्ञा ने उसे रोक लिया। निरतिचार शब्द बडे मार्वेâ का शब्द है। व्रत के पालन में कोई गड़बड़ी न हो तो आत्मा और मन पर एक ऐसी छाप पडती है कि खुद का तो निस्तार होता ही है, अन्य भी जो इस व्रत और व्रती के सम्पर्क में आ जाते हैं, वे भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। जैसे कस्तूरी को अपनी सुगन्ध के लिये किसी तरह की प्रतिज्ञा नहीं करनी पड़ती, उसकी सुगन्ध स्वत? चारों ओर व्याप्त हो जाती है, ऐसे ही इस व्रत की महिमा है। आज हम मात्र शरीर के भरण-पोषण में लगे हैं। व्रत, नियम और अनुशासन के प्रति भी हमारी रुचि होनी चाहिये। अनुशासन विहीन व्यक्ति सबसे गया-बीता व्यक्ति है। अरे भैया! तीर्थंकर भी अपने जीवन में व्रतों का निर्दोष पालन करते हैं। हमें भी करना चाहिये। हमारे व्रत ऐसे हों जो स्वयं को सुखकर हो और दूसरों को भी सुखी करें।

कर्म व्यर्थ नहीं होता
अक्सर लोग कर्म और भाग्य के बारें में चर्चा करतें समय अपनें-अपनें जीवन में घट़ित घट़नाओं के आधार पर निष्कर्ष निकालतें हैं,कोई कर्म को श्रेष्ठ मानता हैं,कोई भाग्य को ज़रूरी मानता हैं,तो कोई दोनों के अस्तित्व को आवश्यक मानता हैं। क्या जीवन में दोनों का अस्तित्व ज़रूरी हैं ? गीता में श्री कृष्ण अर्जुन को कर्मफल का उपदेश देकर कहतें हैं।
” कर्मण्यें वाधिकारवस्तें मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात मनुष्य सिर्फ कर्म करनें का अधिकारी हैं,फल पर अर्थात परिणाम पर उसका कोई अधिकार नहीं हैं,आगे श्री कृष्ण बतातें हैं,कि यदि मनुष्य कर्म करतें करतें मर जाता हैं,और इस जन्म में उसे अपनें कर्म का फल प्राप्त नहीं होता तो हमें यह नहीं मानना चाहियें की कर्म व्यर्थ हो गया बल्कि यह कर्म अगले जन्म में भाग्य बनकर लोगों को आश्चर्य में ड़ालता हैं। यही कारण हैं,कि आज भी लोग किसी उच्च पदासीन व्यक्ति के घर जन्म लेनें वालें व्यक्ति के विषय में यही राय रखतें हैं,कि ज़रूर पूर्व जन्म के कर्म श्रेष्ठ रहें होगें तभी ऐसे घर जन्म मिला अब ये अलग बात हैं,कि अपनें पूर्वजन्मों के कर्म को कोई व्यक्ति कायम नहीं रख पाता और अपनें कदाचरण के द्धारा अपना आगें का जीवन बर्बाद कर लेता हैं,जबकि कुछ लोग पूर्वजन्मों के कर्म को आगें बढ़ाकर और श्रेष्ठ जीवन व्यतित करतें हैं,किसी कहा भी हैं,कि “भाग्यवान को वही मिलता हैं,जो कर्मवीर छोड़कर गया था ” और फिर भाग्य चमकता भी कितनें का हैं, लाखों में किसी एक का जबकि कर्मवीर का तो भाग्योदय तय होता हैं.
जो कर्म शरीर द्धारा होता हैं वह कायिक या शारीरिक कर्म होता हैं,अपनें शरीर द्धारा किसी मनुष्य जीव-जन्तु को कोई चोट़ या आघात नही हो बल्कि सदैव शरीर दूसरों की भलाई के लिये तत्पर रहे यही कायिक कर्म होता हैं।
वाणी सदैंव मीठी सुभाषित रहनी चाहियें क्योंकि ” “बाण से निकला तीर और मुहँ से निकली बोली कभी वापस नहीं आती ” दुर्योधन के प्रति द्रोपदी का यह कथन कि ” अन्धों के अन्धे होतें हैं” ने महाभारत कि रचना कर दी और भारत भूमि की सभ्यता संस्कृति को बदल दिया,दूसरी और मीठे बोलों ने कितनें ही क्रोध को शांत किया हैं कहा गयाहैं। :
कागो काको धन हरै,कोयल काको देय ?मीठे वचन सुनाइ के,जग अपनो कर लेई ||
जब श्री राम ने परशुराम के आराध्य शंकर का धनुष प्रत्यांचा चढ़ानें के लिये झुकाया तो धनुष टूट गया इस पर आगबबूला परशुराम फरसा लेकर राम के पास गये और कहा कि किसनें मेरें आराध्य का धनुष तोड़ा हैं,वो मेरा सामना करें इस पर श्री राम ने कहा प्रभु में तो सिर्फ राम ही हूँ आप तो “परशुराम” हैं,मैं आपसे कैसें युद्ध कर सकता हूँ,इतना कहतें ही परशुराम का गुस्सा सातवें आसमान से सीधें जमीन पर आ गया और उन्होनें राम को गले लगाकर कहा राम तुम वास्तव में धनुष पर प्रत्यांचा चढ़ानें के अधिकारी हो,कहनें का तात्पर्य यही कि मधुरवाणी वीरो का आभूषण हैं।
तीसरा कर्म मानसिक कर्म हैं,मन में हम जो सोचतें हैं,विचार करतें हैं वही कायिक और वाचिक कर्म का आधार हैं,कहतें हैं,कि विचारों की शक्ति दूर बैठें व्यक्ति को भी प्रभावित करती हैं,यही कारण हैं,कि लोग प्रार्थना को ईश प्राप्ति का साधन मानतें हैं। वास्तव में हम सर्वाधिक कर्म मानसिक रूप में ही करतें हैं, इसलिए भारतीय मनीषी कहतें हैं,कि आदमी जैसा सोचता हैं,वैसा बन जाता हैं।

उपाय भी ठीक से हो
एक सास ने बहू से कहा, ’बहूरानी! मैं अभी बाहर जा रही हूं। एक बात का ध्यान रहे, घर में अंधेरा न घुसने पाए। बहू बहुत भोली थी। सास चली गई, सांझ होने को आई। उसने सोचा कि अंधेरा कहीं घुस न जाए, सारे दरवाजे बंद कर दिए। सब खिड़कियां बंद कर दीं। दरवाजे के पास लाठी लेकर बैठ गई। सोचा- दरवाजा खुला नहीं है, कोई खिड़की खुली है, कहीं भी कोई छेद नहीं। आएगा तो दरवाजा खटखटाएगा, लाठी लिए बैठी हूं, देखती हूं कैसे अन्दर आएगा। पूरी व्यवस्था कर दी। अंधेरा गहराने लगा। सोचा, कहां से आ गया! कहीं भी तो कोई रास्ता नहीं है। हो न हो दरवाजे से ही आ रहा है। अन्धकार को पीटना शुरू कर दिया। काफी पीटा कि निकल जाओ मेरे घर से! मेरी सास की मनाही है कि तुम्हें भीतर घुसना नहीं है! खूब लाठियां बजाई। लाठी टूटने लगी। हाथ छिल गए। लहूलुहान हो गए। अंधेरा तो नहीं गया। परेशान हो गई। सास आई। दरवाजा खोला। कहा, यह क्या किया? मैंने कहा था कि अंधेरे को मत आने देना घर में। वह बोली, ’देखो, मेरे हाथ देख लो। लहूलुहान हो गए। लाठी टूट गई। मैंने बहुत समझाया, बहुत रोका, पर इतना जिद्दी है कि माना ही नहीं और यह तो घुस ही गया। सास ने सिर पर हाथ रखा। कहा, ’बहूरानी! अंधेरे को ऍसे मिटाया जाता है? क्या अंधेरा ऍसे मिटता है? समझी नहीं तुम बात को। सास ने दीया जलाया, अंधेरा समाप्त हो गया। उपाय के बारे में हमारी जानकारी सही नहीं होती तो हम प्रयत्न तो करते हैं, परिश्रम करते हैं, पर अंधेरा मिटता नहीं।

आत्मा का स्वरूप
यमदेव के मुताबिक शरीर के नाश होने के साथ आत्मा का नाश नहीं होता। आत्मा का भोग-विलास, नाशवान, अनित्य और जड़ शरीर से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह अनन्त, अनादि और दोष रहित है। इसका कोई कारण है, न कोई कार्य यानी इसका न जन्म होता है, न मरती है। ऐसे में मनुष्य जो भी कार्य करता है उसमें आत्मा की स्वीकृति आवश्यक हो जाती है और जो ऐसा नहीं कर पाता या आत्मा के विपरीत निर्णय करता और उसी के आधार पर कर्म करता है उसकी आत्मा शरीर के जिंदा रहते हुए भी मर जाती है। इसलिए धार्मिकजन कहते हैं कि आत्मा की सुनो और आत्मा को कर्म-वचन में स्थापित करो ताकि आत्मा जब शरीर त्यागे तो किसी तरह का कष्ट न हो। मनुष्य को जान लेना चाहिए कि आत्मा न तो जन्म लेती है और न ही मरती है, वह हमेशा विद्यमान है और उससे विलग जाकर मनुष्य अपने स्वयं का अहित ही करता है।

महापुरुष बनने के लिए त्यागें अहंकार
बहुत से लोग दिन-रात प्रयास करते हैं कि उन्हें किसी तरह उच्च पद मिल जाए। खूब सारा पैसा हो और आराम की जिन्दगी जियें। जब ये सब प्राप्त हो जाता है तो इसे ईश्वर की कृपा मानने की बजाय अपनी काबिलियत और धन पर इतराने लगते हैं। जबकि संसार में किसी चीज की कमी नहीं है। अगर आप धन का अभिमान करते हैं तो देखिए आपसे धनवान भी कोई अन्य है। विद्या का अभिमान है तो ढूंढ़कर देखिए आपसे भी विद्वान मिल जाएगा। इसलिए किसी चीज का अहंकार नहीं करना चाहिए। जो लोग अहंकार त्याग देते हैं वही महापुरूष कहलाते हैं। महाभारत में कथा है कि दुर्योधन के उत्तम भोजन के आग्रह को ठुकरा कर भगवान श्री कृष्ण ने महात्मा विदुर के घर साग खाया। भगवान श्री कृष्ण के पास भला किस चीज की कमी थी। अगर उनमें अहंकार होता तो विदुर के घर साग खाने की बजाय दुर्योधन के महल में उत्तम भोजन ग्रहण करते लेकिन श्री कृष्ण ने ऐसा नहीं किया। भगवान श्री राम ने शबरी के जूठे बेर खाये जबकि लक्ष्मण जी ने जूठे बेर फेंक दिये। यहीं पर राम भगवान की उपाधि प्राप्त कर लेते हैं क्योंकि उनमें भक्त के प्रति अगाध प्रेम है, वह भक्त की भावना को समझते हैं और उसी से तृप्त हो जाते हैं। अहंकार उन्हें नहीं छूता है, वह ऊंच-नीच, जूठा भोजन एवं छप्पन भोग में कोई भेद नहीं करते। शास्त्रों में भगवान का यही स्वभाव और गुण बताया गया है। महात्मा बुद्घ से संबंधित एक कथा है कि एक बार महात्मा बुद्घ किसी गांव में प्रवचन दे रहे थे। एक कृषक को उपदेश सुनने की बड़ी इच्छा हुई लेकिन उसी दिन उसका बैल खो गया था। इसलिए वह महात्मा बुद्घ के चरण छू कर सभा से वापस बैल ढूंढने चला गया। शाम होने पर कृषक बैल ढूंढ़कर वापस लौटा तो देखा कि बुद्घ अब भी सभा को संबोधित कर रहे हैं। भूखा प्यासा किसान फिर से बुद्घ के चरण छूकर प्रवचन सुनने बैठ गया। बुद्घ ने किसान की हालत देखी तो उसे भोजन कराया, फिर उपदेश देना शुरू किया। बुद्घ का यह व्यवहार बताता है कि महात्मा बुद्घ अहंकार पर विजय प्राप्त कर चुके थे। बुद्घ के अंदर अहंकार होता तो किसान पर नाराज होते क्योंकि बैल को ढूंढ़ने के लिए किसान ने बुद्घ के प्रवचन को छोड़ दिया था। शास्त्रों में अहंकार को नाश का कारण बताया गया है इसलिए मनुष्य को कभी भी किसी चीज का अहंकार नहीं करना चाहिए।

भगवान का सबसे प्रिय आहार अहंकार
अहंकार शब्द बना है अहं से, जिसका अर्थ है ’मैं’। जब व्यक्ति में यह भावना आ जाती है कि ’जो हूं सो मैं, मुझसे बड़ा कोई दूसरा नहीं है’ तभी व्यक्ति का पतन शुरू हो जाता है। द्वापर युग में सहस्रबाहु नाम का राजा हुआ। इसे बल का इतना अभिमान हो गया कि शिव से ही युद्घ करने पहुंच गया। भगवान शिव ने सहस्रबाहु से कह दिया कि तुम्हारा पतन नजदीक आ गया है। परिणाम यह हुआ कि भगवान श्री कृष्ण से एक युद्घ में सहस्रबाहु को पराजित होना पड़ा। रावण विद्वान होने के साथ ही महापराक्रमी था। उसे अपने बल और मायावी विद्या का अहंकार हो गया और उसने सीता का हरण कर लिया। इसका फल रावण को यह मिला कि रावण का वंश सहित सर्वनाश हो गया। अंत काल में उसका सिर भगवान राम के चरणों में पड़ा था। भगवान कहते हैं ’मेरा सबसे प्रिय आहार अहंकार है’ अर्थात अहंकारियों का सिर नीचा करना भगवान को सबसे अधिक पसंद है। अहंकारी का सिर किस प्रकार भगवान नीच करते हैं इस संदर्भ में एक कथा है कि, नदी किनारे एक सुन्दर सा फूल खिला। इसने नदी के एक पत्थर को देखकर उसकी हंसी उड़ायी कि, तुम किस प्रकार से नदी में पड़े रहते हो। नदी की धारा तुम्हें दिन रात ठोकर मारती रहती है। मुझे देखो मैं कितना सुन्दर हूं। हवाओं में झूमता रहता हूं। पत्थर फूल की बात को चुपचाप सुनता रहा। पानी में घिसकर पत्थर ने शालिग्राम का रूप ले लिया था। किसी व्यक्ति ने उसे उठाकर अपने पूजा घर में स्थापित किया और उसकी पूजा की। पूजा के समय उस व्यक्ति ने फूल को शालिग्राम के चरणों में रख दिया। फूल ने जब खुद को पत्थर के चरणों में पाया तो उसे एहसास हो गया कि उसे अपने अहंकार की सजा मिली है। पत्थर ने अब भी कुछ नहीं कहा वह फूल की मन स्थिति को देखकर मुस्कुराता रहा।

तो हम भी खुश रह सकते हैं
भगवान बुद्ध कहते हैं कि हर किसी से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। यदि दूसरे शब्दों में कहें तो हम भी खुश रह सकते हैं कार्यस्थल पर सकारात्मक सोच के साथ व्यवहार करने पर हमें ऐसी अनुभूति होती है।काम के दौरान हम कैसे बुरे दिन को अच्छा कर सकते हैं, इन छोटी-छोटी समस्याओं का दिमाग के साथ हल निकालें। वैसे बॉस या अपने सहकर्मी के साथ शांतिपूर्वक तरीके से संवाद कर हल निकाला जा सकता है।
बौद्ध धर्म शांति से रहने और हिंसा से दूर रहने की सीख देता है। यानी अपने गुस्से पर नियंत्रण रख कर हम कार्यालय में किसी की बुराई से बच सकते हैं अपना आपा खोने से किसी समस्या का हल नहीं निकलता है। शांति से काम कर ही हम सफल होकर आगे बढ़ सकते हैं।

कृष्ण-सुदामा मैत्री भाव की जरूरत पूरे विश्व को
कृष्ण राजा हैं और सुदामा प्रजा। राजा और प्रजा के बीच ऐसी ही आत्मीयता होनी चाहिए जैसी कृष्ण और सुदामा के बीच थी। यदि आज के राजा भी अपने आस-पास के सुदामाओं के साथ मित्रता का इसी तरह निर्वाह करें तो समाज से गरीबी-अमीरी और राजा-प्रजा के बीच की विषमता दूर हो सकती है। कृष्ण और सुदामा जैसी मैत्री कहीं और नहीं मिलती। दुनिया को इसी मैत्री भाव की जरूरत है।
वृंदावन-बड़गोंदा के आचार्य पं. विपुलकृष्ण महाराज ने आज अन्नपूर्णा रोड बैंक कालोनी स्थित स्टार पब्लिक स्कूल के सभागृह में ठा. शिवकुमारसिंह की स्मृति में चल रहे श्रीमद भागवत कथा ज्ञानयज्ञ में कृष्ण सुदामा मिलन प्रसंग पर उक्त बातें कहीं। पं. विपुल कृष्ण ने कहा कि आज के युग में मित्रता की सही पहचान करना मुश्किल काम है। कृष्ण एक श्रेष्ठ और उदार शासक थे, जबकि सुदामा एक चरित्रवान ब्राह्मण। यदि शासक श्रेष्ठ और प्रजा चरित्रवान रहे और इन दोनों का मिलन निष्काम भाव से हो, तो सही मायने में मित्रता जीवंत और चरितार्थ हो उठेगी। इस अवसर पर दादु महाराज का भी सम्मान किया गया। भक्तों की ओर से कतारबद्ध होकर भागवतजी का पूजन भी किया गया। यज्ञ-हवन के साथ पूर्णाहुति हुई।

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