प्रवचन-जीवन मंत्र

ईश्वर का दोस्त
एक संत ने एक रात स्वप्न देखा कि उनके पास एक देवदूत आया है। देवदूत के हाथ में एक सूची थी। उसने कहा, ‘यह उन लोगों की सूची है, जो प्रभु से प्रेम करते हैं।’ संत ने कहा, ‘मैं भी प्रभु से प्रेम करता हूं। मेरा नाम तो इसमें अवश्य होगा।’ देवदूत बोला, ‘नहीं, इसमें आप का नाम नहीं है।’ संत उदास हो गए। फिर उन्होंने पूछा, ‘इसमें मेरा नाम क्यों नहीं है? मैं ईश्वर से ही प्रेम नहीं करता बल्कि गरीबों से भी प्रेम करता हूं। मैं अपना अधिकतर समय निर्धनों की सेवा में लगाता हूं। उसके बाद जो समय बचता है उसमें प्रभु का स्मरण करता हूं।’ तभी संत की आंख खुल गई। दिन में वह स्वप्न को याद कर उदास थे। एक शिष्य ने उदासी का कारण पूछा तो संत ने स्वप्न की बात बताई और कहा, ‘लगता है सेवा करने में कहीं कोई कमी रह गई है।’ दूसरे दिन संत ने फिर वही स्वप्न देखा। वही देवदूत फिर उनके सामने खड़ा था। इस बार भी उसके हाथ में कागज था। संत ने बेरुखी से कहा, ‘अब क्यों आए हो मेरे पास? मुझे प्रभु से कुछ नहीं चाहिए।’
देवदूत ने कहा, ‘आपको प्रभु से कुछ नहीं चाहिए, लेकिन प्रभु का तो आप पर भरोसा है। इस बार मेरे हाथ में दूसरी सूची है।’ संत ने कहा, ‘तुम उनके पास जाओ जिनके नाम इस सूची में हैं। मेरे पास क्यों आए हो?’ देवदूत बोला, ‘इस सूची में आप का नाम सबसे ऊपर है।’ यह सुन कर संत को आश्चर्य हुआ। बोले, ‘क्या यह भी ईश्वर से प्रेम करने वालों की सूची है।’ देवदूत ने कहा, ‘नहीं, यह वह सूची है जिन्हें प्रभु प्रेम करते हैं। ईश्वर से प्रेम करने वाले तो बहुत हैं, लेकिन प्रभु उसको प्रेम करते हैं जो गरीबों से प्रेम करते हैं। प्रभु उसको प्रेम नहीं करते जो दिन रात कुछ पाने के लिए प्रभु का गुणगान करते रहते हैं।’

अनुभव का लाभ
एक विदेशी राजा ने भारत पर आक्रमण करना चाहा। उसने सोचा कि आक्रमण से पूर्व यह जान लेना चाहिए कि उस राजा के पास कोई बुद्धिमान व्यक्ति है या नहीं? उस राजा ने सुरमे की एक डिबिया देकर एक दूत भेजा। उस डिबिया में दो आंखों में ही लगाने लायक सुरमा था। वह सुरमा अंधे को आंख देने में समर्थ था। दूत आया। दूत ने कहा, ‘दो आंखों में ही आ जाए, इस डिबिया में इतना-सा सुरमा है। हमें इसकी अधिक आवश्यकता है। आपके पास हो तो हमें दें। या इस सुरमे के आधार पर कोई व्यक्ति ऍसा ही सुरमा बना सके तो हम उस आदमी को अपने साथ ले जाना चाहेंगे।’
राजा ने मंत्रियों से सलाह ली। किन्तु ऍसा सुरमा कौन बना सके? किसी को समाधान नहीं आया। राजा ने सोचा, एक बूढ़ा मंत्री था, जो अभी सेवानिवृत्त हुआ है, उससे पूछा जाए। राजा ने उसे बुला भेजा। वह अंधा हो गया था। वह आया। मंत्री ने डिबिया ली। एक आंख में सुरमा लगाया। कुछ ही क्षणों बाद उसे दिखने लगा। जो शेष सुरमा बचा था, उसे अपनी जीभ पर रख लिया। स्वाद से उसने सुरमे के सारे द्रव्यों का विश्लेषण कर लिया। घर जाकर वैसा ही सुरमा बनाया। परीक्षण के लिए अपनी दूसरी आंख में उसे लगाया। आंख खुल गई। उसने शेष सुरमा डिबिया में भरकर दूत से कहा, ‘जाओ, अपने सम्राट से कहना कि ऍसा सुरमा जितना चाहे यहां से मंगा लें।’ दूत गया। सम्राट को वृत्तान्त सुनाया। सम्राट ने सोचा, जिस देश में ऍसे अनुभवी और वृद्ध रहते हैं, इतने बुद्धिमान मंत्री हैं, उस देश पर आप्रमण करना भयंकर भूल होगी।

गुरु का पाठ
गंगा के किनारे बने एक आश्रम में महर्षि मुद्गल अपने अनेक शिष्यों को शिक्षा प्रदान किया करते थे। उन दिनों वहां मात्र दो शिष्य अध्ययन कर रहे थे। दोनों काफी परिश्रमी थे। वे गुरु का बहुत आदर करते थे। महर्षि उनके प्रति समान रूप से स्नेह रखते थे। आखिर वह समय भी आया, जब दोनों अपने-अपने विषय के पारंगत विद्वान बन गए। मगर इस कारण दोनों में अहंकार आ गया। वे स्वयं को एक-दूसरे से श्रेष्ठ समझने लगे। एक दिन महर्षि स्नान कर पहुंचे तो देखा कि अभी आश्रम की सफाई भी नहीं हुई है और दोनों शिष्य सोकर भी नहीं उठे हैं। उन्हें आश्चर्य हुआ क्योंकि ऐसा पहले कभी नहीं होता था। महर्षि ने जब दोनों को जगाकर सफाई करने को कहा तो दोनों एक-दूसरे को सफाई का आदेश देने लगे। एक बोला-मैं पूर्ण विद्वान हूं। सफाई करना मेरा काम नहीं है। इस पर दूसरे ने जवाब दिया-मैं अपने विषय का विशेषज्ञ हूं। मुझे भी यह सब शोभा नहीं देता। महर्षि दोनों की बातें सुन रहे थे। उन्होंने कहा- ठीक कह रहे हो तुम लोग। तुम दोनों बहुत बड़े विद्वान हो और श्रेष्ठ भी। यह कार्य तुम दोनों के लिए उचित नहीं है। यह कार्य मेरे लिए ही ठीक है। उन्होंने झाड़ू उठाया और सफाई करने लगे। यह देखते ही दोनों शिष्य मारे शर्म के पानी-पानी हो गए। गुरु की विनम्रता के आगे उनका अहंकार पिघल गया। उनमें से एक ने आकर गुरु से झाड़ू ले लिया और दूसरा भी उसके साथ सफाई के काम में जुट गया। उस दिन से उनका व्यवहार पूरी तरह बदल गया।

प्रतिभा की पहचान
यूनान के किसी गांव का एक लड़का लकड़ियां काटकर गुजारा करता था। वह दिन भर जंगल में लकड़ियां काटता और शाम को पास के शहर के बाजार में उन्हें बेच देता था। एक दिन एक विद्वान व्यक्ति बाजार से जा रहा था। उसकी नजर बालक के गट्ठर पर पड़ी जो बेहद कलात्मक ढंग से बंधा था। उसने उस लड़के से पूछा- क्या यह गट्ठर तुमने खुद बांधा है? लड़के ने जवाब दिया- जी हां, मैं दिन भर लकड़ी काटता हूं, स्वयं गट्ठर बांधता हूं और रोज शाम को बाजार में बेच देता हूं। उस व्यक्ति ने कहा- क्या तुम इसे खोलकर इसी प्रकार दोबारा बांध सकते हो? लड़के ने गट्ठर खोला तथा बड़े ही सुंदर तरीके से उसे फिर बांध दिया। यह कार्य वह बड़े ध्यान, लगन और फुर्ती के साथ कर रहा था।
लड़के की एकाग्रता, लगन तथा कलात्मक रीति से काम करने के तरीके ने उस व्यक्ति को काफी प्रभावित किया। उसे बच्चे में काफी संभावना नजर आई। उसने पूछा- क्या तुम मेरे साथ चलोगे? मैं तुम्हें अपने साथ रखूंगा, शिक्षा दिलाऊंगा। तुम्हारा सारा खर्चा मैं उठाऊंगा। बालक ने सोच-विचार कर अपनी स्वीकृति दे दी और उसके साथ चला गया। उस व्यक्ति ने बालक के रहने और उसकी शिक्षा का प्रबंध किया। वह स्वयं भी उसे पढ़ाता था और नई-नई बातें सिखाता था। थोड़े ही समय में उस बालक ने उच्च शिक्षा हासिल की और काफी कुछ ज्ञान अर्जित कर लिया। बड़ा होने पर यह बालक यूनान के महान दार्शनिक पाइथागोरस के नाम से प्रसिद्ध हुआ। और जिस व्यक्ति ने उसे अपने यहां रखा था वह था यूनान का विख्यात तत्व ज्ञानी डेमोप्रीट्स।

संत की सीख
एक धनी सेठ ने एक संत के पास आकर उनसे प्रार्थना की, ‘महाराज, मैं आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना करता हूं पर मेरा मन एकाग्र ही नहीं हो पाता है। आप मुझे मन को एकाग्र करने का कोई मंत्र बताएं।’ सेठ की बात सुनकर संत बोले, ‘मैं कल तुम्हारे घर आऊंगा और तुम्हें एकाग्रता का मंत्र प्रदान करूंगा।’ यह सुनकर सेठ बहुत खुश हुआ। उसने इसे अपना सौभाग्य समझा कि इतने बड़े संत उसके घर पधारेंगे।
उसने अपनी हवेली की सफाई करवाई और संत के लिए स्वादिष्ट पकवान तैयार करवाए। नियत समय पर संत उसकी हवेली पर पधारे। सेठ ने उनका खूब स्वागत-सत्कार किया। सेठ की पत्नी ने मेवों व शुद्ध घी से स्वादिष्ट हलवा तैयार किया था। चांदी के बर्तन में हलवा सजाकर संत को दिया गया तो संत ने फौरन अपना कमंडल आगे कर दिया और बोले, ‘यह हलवा इस कमंडल में डाल दो।’ सेठ ने देखा कि कमंडल में पहले ही कूड़ा-करकट भरा हुआ है। वह दुविधा में पड़ गया। उसने संकोच के साथ कहा, ‘महाराज, यह हलवा मैं इसमें कैसे डाल सकता हूं।
कमंडल में तो यह सब भरा हुआ है। इसमें हलवा डालने पर भला वह खाने योग्य कहां रह जाएगा, वह भी इस कूड़े-करकट के साथ मिलकर दूषित हो जाएगा।’ यह सुनकर संत मुस्कराते हुए बोले, ‘वत्स, तुम ठीक कहते हो। जिस तरह कमंडल में कूड़ा करकट भरा है उसी तरह तुम्हारे दिमाग में भी बहुत सी ऐसी चीजें भरी हैं जो आत्मज्ञान के मार्ग में बाधक हैं। सबसे पहले पात्रता विकसित करो तभी तो आत्मज्ञान के योग्य बन पाओगे। यदि मन-मस्तिष्क में विकार तथा कुसंस्कार भरे रहेंगे तो एकाग्रता कहां से आएगी। एकाग्रता भी तभी आती है जब व्यक्ति शुद्धता से कार्य करने का संकल्प करता है।’ संत की बातें सुनकर सेठ ने उसी समय संकल्प लिया कि वह बेमतलब की बातों को मन-मस्तिष्क से निकाल बाहर करेगा।

निष्ठावान बने रहें
एक किसान शहर में आया। गहनों की दुकान पर गया। गहने खरीदे, सोने के गहने, चमकदार। दुकानदार ने मूल्य मांगा। किसान ने कहा, मेरे पास मूल्य नहीं है, रूपए नहीं हैं। घी का भरा हुआ घड़ा है। आप इसे ले लें और गहने मुझे दें। सौदा तय हो गया। दुकानदार भी प्रसन्न और किसान भी प्रसन्न। किसान घर गया। अपने गांव के सुनार को गहने दिखाए। उसने परीक्षण कर कहा, तुम ठगे गए। नीचे पीतल है और ऊपर स्वर्ण का झोल। किसान ने सोचा, मैंने सेठ को ठगा, तो सेठ ने मुझे ठग लिया। सेठ घर गया। घी को दूसरे बर्तन में डालना चाहा। ऊपर घी था, नीचे कंकड़-पत्थर। माथे पर हाथ रख सोचा, ठगा गया। मैंने किसान को ठगा और किसान ने मुझे ठग लिया।
किसान सोचता है, मैंने सेठ को ठग लिया। सेठ सोचता है, मैंने किसान को ठग लिया। कोई नहीं ठगा गया। सौदा बराबर हो गया। जब पूरा समाज अनैतिक होता है, तो कौन किसको ठगेगा? कौन ठगा जाएगा? सभी सोचते हैं, मैंने उसको ठग लिया, पर ठगे सभी जाते हैं। बेईमानी जब व्यापक होती है, तब सब ठगे जाते हैं। अकेला कोई नहीं ठगा जाता। समाज में ईमानदार लोग भी हैं। इस ईमानदारी के कंधे पर चढ़कर बेईमानी चल रही है। सत्य के आधार पर असत्य और अहिंसा के आधार पर हिंसा चल रही है। सारे हिंसक बन जाएं, तो हिंसा अघिक नहीं चल सकती।
हम गहराई से चिन्तन करें कि सामाजिक स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त आवश्यक है निष्ठा, पराविद्या की निष्ठा। भौतिकता और आध्यात्मिकता का सन्तुलन बना रहे। हम परम को भी देखें, अपरम को भी देखें। सत्यनिष्ठा रचनात्मक दृष्टिकोण की उपलब्घि ही तो है।

प्रार्थना की शक्ति
मनुष्य का जीवन उसकी शारीरिक एवं प्राणिक सत्ता में नहीं, अपितु उसकी मानसिक एवं आध्यात्मिक सत्ता में भी आकांक्षाओं तथा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए और कामनाओं का है। जब उसे ज्ञान होता है कि एक महत्तर शक्ति संसार को संचालित कर रही है, तब वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, अपनी विषम यात्रा में सहायता के लिए, अपने संघर्ष में रक्षा के लिए आय प्राप्त करने के लिए प्रार्थना द्वारा उसकी शरण लेता है।
प्रार्थना द्वारा भगवान की ओर साधारण धार्मिक पहुंच, अपने को ईश्वर की ओर मोड़ देने के लिए यह हमारी प्रार्थनारूपी विधि हमारी धार्मिक सत्ता का मौलिक प्रयत्न है, और एक सार्वभौम सत्य पर स्थित है- भले ही इसमें कितनी भी अपूर्णताएं हों और सचमुच अपूर्णताएं हैं भी।
प्रार्थना के प्रभाव को प्राय? संदेह की दृष्टि से देखा जाता है और स्वयं प्रार्थना निरर्थक तथा निष्फल समझी जाती है। वैश्व संकल्प सदैव अपने लक्ष्य को ही कार्यान्वित करता है। वह सर्वज्ञ होने के कारण अपने वृहत्तर ज्ञान से कर्तव्य पहले ही जान लेता है, परंतु यह व्यवस्था यांत्रिक नियम से नहीं, बल्कि कुछ शक्तियों एवं बलों के द्वारा कार्यान्वित होती है।
यह मानव संकल्प, अभीप्सा और श्रद्धा का एक विशेष रूप मात्र है। प्रारंभ में प्रार्थना निम्न स्तर भी हमारे सबंध को तैयार करने में सहायता पहुंचाती है। मुख्य वस्तु इस प्रकार का साक्षात संबंध, मनुष्य का ईश्वर से संपर्प, सचेतक आदान-प्रदान न कि पार्थिव वस्तु की प्राप्ति।
अपनी मानसिक रचना के निर्माण के बाद यदि व्यक्ति अपने को ‘ईश कृपा’ पर समर्पित कर देता है, और इसमें भरोसा रखता है, तो उसको अवश्य ही सफलता मिलेगी। यदि कोई ईश्वर की कृपा का मात्र आह्वान करता है, तो अपने को उसके हाथों में सौंप देता है, तो वह विशेष अपेक्षा नहीं करता।
प्रार्थना को सूत्रबद्ध करके किसी वस्तु के लिए निवेदन करना होगा। व्यक्ति को यह सवाल नहीं करना चाहिए। यदि सचाई के साथ सच्ची आंतरिक भावना के साथ याचना की जाए तो संभव है- वह स्वीकृत हो जाए।

व्यक्ति-निर्माण समाज पर निर्भर
व्यक्ति का निर्माण केवल उसी पर नहीं, बहुत कुछ अंशों में समाज पर निर्भर है।इसलिए उसे अपने निर्माण को समाज के निर्माण में देखना है। सफलता का पहला सूत्र है- मूल्यों का परिवर्तन। समाज का निर्माण मूल्यों के परिवर्तन से ही होता है। स्वार्थ और संग्रह, ये दोनों मूल्य जब विकसित होते हैं तब व्यक्ति पुष्ट होता है और समाज क्षीण। क्षीण समाज में समर्थ व्यक्तित्व विकसित नहीं हो पाते। आज का समाज सही अर्थ में क्षीण है। उसे पुष्ट करने के लिए स्वार्थ और विसर्जन के मूल्यों को विकसित करना जरूरी है। इनसे समाज पुष्ट होगा। पुष्ट समाज में समर्थ व्यक्तित्व पैदा होंगे। क्षीण कोई नहीं होगा। मैंने देखा है स्वार्थ और संग्रह परायण समाज ने अनेक प्रकार की क्रूर्ताओं और अनैतिकताओं को जन्म दिया है। इसे बदलना क्या आज के सामाजिक व्यक्ति का कर्तव्य नहीं है? सफलता का दूसरा सूत्र है- शक्ति का विकास। शक्ति के दो स्रोत हैं- मानसिक विकास और संगठन। मानसिक विकास के लिए धर्म का अभ्यास और प्रयोग करना जरूरी है। संगठन की शक्ति का विस्फोट इतना हुआ है कि अब इसमें कोई विवाद ही नहीं है।
हमारे पूज्य भिक्षु स्वामी ने संगठन का मूल्य दो शताब्दी पूर्व ही समझ लिया था। उनके अनुयायियों को क्या उसे अब भी समझना है। वात्सलता और सहानुभूति को विकसित किए बिना संगठन सुदृढ़ नहीं हो सकता। आज सबकुछ शक्ति-संचय के आधार पर हो रहा है। इसलिए संगठन अब अनिवार्य हो गया है। छोटे-छोटे प्रश्न इस महान कार्य में अवरोध नहीं बनने चाहिए। सफलता का तीसरा सूत्र है- शातौर परिवर्तन का यथार्थ-बोध। कुछ स्थितियां देशकालातीत होती है। उन्हें बदलने की जरूरत नहीं है, किंतु देशकाल सापेक्ष स्थितियों का देशकाल के बदलने के साथ न बदलना असफलता का मुख्य हेतु है। परिवर्तन के विषय में युवकों का दृष्टिकोण बहुत स्पष्ट होना चाहिए। बदलना अपने आप में कोई उद्देश्य नहीं है और नहीं बदलना कोई सार्थकता नहीं है। बदलने की स्थिति होने पर बदलना विकास की अनिवार्य प्रप्रिया है।

मरने के बाद कहां जाता है इंसान
सभी धर्मों में पुनर्जन्म की बात कही गयी है, यानी एक शरीर को छोड़ने के बाद इंसान दूसरे शरीर में प्रवेश करता है। लेकिन मृत्यु के बाद से पुनर्जन्म लेने तक जीव कहां रहती है यह एक बड़ा सवाल है। भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता में कहा है कि आत्मा न तो जन्म लेती है और न मरती है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर जीव के मरने के बाद आत्मा कहां जाती है। इसका उत्तर आप जरूर जानना चाहते होंगे। 18 पुराणों में से गरूड़ पुराण ही एक ऐसा पुराण है जिसमें इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है। इस पुराण में कहा गया है कि मृत्यु के बाद जीवात्मा को शरीर से निकाल कर ले जाने के लिए दो यमदूत आते हैं। जो व्यक्ति अपने जीवन काल में अच्छे कर्म करते हैं उनकी आत्मा शरीर से आसानी से निकल जाती है। जिनका अपने शरीर से मोह नहीं जाता है और जीवन काल में अच्छे कर्म नहीं करते हैं उन्हें यमदूत जबरदस्ती खींच कर अपने साथ ले जाते हैं। शरीर से निकलने के बाद आत्मा अंगूठे के आकार का बन जाता है।
यह दिखने में उसी प्रकार का होता है जैसा मृत व्यक्ति दिखने में होता है। इस आत्मा को लेकर यमदूत यमराज के पास जाते हैं। यहां उसे 24 घंटे रखा जाता है और जीवन काल में उसके द्वारा किये गये अच्छे बुरे कर्मों को दिखाया जाता है। इसके बाद आत्मा को पुन: उसी स्थान पर लाकर रख दिया जाता है जहां से यमदूत उसे लेकर जाते हैं। 13 दिनों तक इस स्थान पर रहकर आत्मा अपने शरीर का अंतिम संस्कार देखता है। इसके बाद यमदूत उसे अपने साथ लेकर पुन: यमलोक की ओर चलते हैं। इस रास्ते में आत्मा को यम की भयानक नगरी के दर्शन कराये जाते हैं। इस रास्ते में आत्मा को कई प्रकार की भयानक यतानाएं सहनी पड़ती है। एक साल तक इस रास्ते में चलते हुए जीवात्मा यमलोक पहुंचती है। यहां यमराज व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार नर्क, स्वर्ग अथवा दूसरी योनियों में भेजते हैं। यहीं पर तय होता है कि व्यक्ति को दूसरा जन्म कब मिलेगा। जो लोग धर्मात्मा होते हैं उन्हें यमलोक की यात्रा नहीं करनी पड़ती है। ऐसे लोगों के लिए विमान आता है जिसमें बैठकर आत्मा विष्णु लोक चली जाती है। जिन्हें विष्णु लोक में स्थान मिल जाता है उन्हें पुन: जन्म नहीं लेना पड़ता है।

श्रद्धा के साथ पूजा
हरेक व्यक्ति में चाहे वह जैसा भी हो, एक विशेष प्रकार की श्रद्धा पाई जाती है। लेकिन उसके द्वारा अर्जित स्वभाव के अनुसार उनकी श्रद्धा उत्तम (सतोगुणी), राजस (रजोगुणी) अथवा तामसी कहलाती है। अपनी श्रद्धा के अनुसार ही वह कतिपय लोगों से संगति करता है। अब वास्तविक तथ्य तो यह है कि जैसा कि गीता के 15 वें अध्याय में कहा गया है कि प्रत्येक जीव परमेर का अंश है। अतएव वह मूलत: इन समस्त गुणों से परे होता है।
लेकिन जब वह भगवान के साथ अपने सम्बन्ध को भूल जाता है और बद्ध जीवन में भौतिक प्रकृति के संसर्ग में आता है तो वह विभिन्न प्रकार की प्रकृति के साथ संगति करके अपना स्थान बनाता है। इस प्रकार से प्राप्त कृत्रिम श्रद्धा तथा अस्तित्व मात्र भौतिक होते हैं। भले ही कोई किसी धारणा या देहात्मबोध द्वारा प्रेरित हो लेकिन मूलत: वह निगरुण या दिव्य होता है। अतएव भगवान के साथ अपना सम्बन्ध फिर से प्राप्त करने के लिए उसे भौतिक कल्मष से शुद्ध होना पड़ता है। यही एकमात्र मार्ग है, निर्भय होकर कृष्णभावनामृत में लौटने का।
श्रद्धा मूलत: सतोगुण से उत्पन्न होती है। मनुष्य की श्रद्धा किसी देवता, किसी कृत्रिम ईश्वर या मनोधर्म में हो सकती है लेकिन प्रबल श्रद्धा सात्त्विक कार्यो से उत्पन्न होती है। किंतु भौतिक बद्धजीवन में कोई भी कार्य शुद्ध नहीं होता। वे मिश्रित होते हैं। वे शुद्ध सात्त्विक नहीं होते। शुद्ध सत्त्व दिव्य होता है। इसमें रहकर मनुष्य भगवान के स्वभाव को समझ सकता है। जब तक श्रद्धा पूर्णतया सात्त्विक नहीं होती, वह प्रकृति के किसी भी गुण से दूषित हो सकती है। ये दूषित गुण हृदय तक फैल जाते हैं।
अत: किसी विशेष गुण के सम्पर्प में रहकर हृदय जिस स्थिति में होता है, उसी के अनुसार श्रद्धा होती है। यदि किसी का हृदय सतोगुण में स्थित है तो उसकी श्रद्धा भी सतोगुणी है। यदि हृदय रजोगुण में स्थित है तो उसकी श्रद्धा रजोगुणी और तमोगुण में स्थित है तो उसकी श्रद्धा तमोगुणी होती है। पूजा इसीके आधार पर होती है।

रोगों का उपचार ध्वनि तंरगों से करें
यह बात जान कर आप सभी को आश्चर्य होगा की ध्वनि तंरगें से भी रोगों के उपाच होते है। यह विश्व जीवों से भरा है। ध्वनि तंरगों की टकराहट से सुक्ष्म जीव मर जाते है, रात्री में सूर्य की पराबैगनी किरणां के अभाव में सूक्ष्म जीव उत्पन्न होते है जो ध्वनि तरगों की टकराहट से मर जाते है। ध्वनि तरगों से जीवों के मरने की खोज सर्वप्रथम बर्लिन विश्वविधालय में 1928 में हुई थी। शिकागों के डॉ.ब्राइन ने ध्वनि तरगों से जीवों के नष्ट होने की बात सिद्ध की है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया कि शंख और घण्टा की ध्वनि लहरों से 27 घन फुट प्रति सेकिंड वायु शक्ति वेग से 1200फुट दूरी के बैक्टीरिया नष्ट हो जाते है।
पूर्व में मंदिरों का निमार्ण गुम्वजाकार होता था दरवाजे छोटे होते थे अन्दर की ध्वनि बाहर नही निकलती थी, बाहर की ध्वनि अन्दर प्रवेश नही करती थी। मन्दिर में एक ईष्ट देव की प्रतिमा, एक दीपक, एक घण्टा, शंख होता था। यहां कोई भी रोगी श्रद्धा से जाता घण्टा या शंख ध्वनि कर दीप जलता बैठ कर श्रद्धा से प्रार्थना भक्ति करता, मौन ध्यान करता। रोंगों के ठीक होने की कामना करता वह ठीक हो जाता था। इसका बैज्ञानिक कारण घण्टा -शंख ध्वनि भक्ति प्रार्थना की ध्वनि तंरगें बाहर न जाकर गुम्वजाकार शिखर से टकराकर शरीर से टकराती जिससे शरीर के रोगाणु नष्ट हो जाते रोग ठीक हो जाते। आज भी पुराने मंदिरों में यह होता है। इसलिये सीमित मात्रा में बोलना ठीक है। ध्वनि ज्यादा मात्रा में प्रदूषण का रूप ले लेती है, जो शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से हानिकारक होती है। मौन रहने में ही सुख एवं सुख मय जीवन है।

आत्मा का दिव्य भाव
जो व्यक्ति दिव्य पद पर स्थित है, वह न किसी से ईष्या करता है और न किसी वस्तु के लिए लालायित रहता है। जब कोई जीव इस संसार में भौतिक शरीर से युक्त होकर रहता है, तो समझना चाहिए कि वह प्रकृति के तीन गुणों में से छूट जाता है। लेकिन जब तक वह शरीर से बाहर नहीं आ जाता, तब तक उसे उदासीन रहना चाहिए। उसे भगवान की भक्ति में लग जाना चाहिए जिससे भौतिक देह से उसका ममत्व स्वत: विस्मृत हो जाए। जब मनुष्य भौतिक शरीर के प्रति सचेत रहता है तो वह केवल इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म करता है, लेकिन जब चेतना कृष्ण में स्थानान्तरित कर देता है, तो इन्द्रियतृप्ति स्वत: रुक जाती है। मनुष्य को इस भौतिक शरीर की आवश्यकता नहीं रह जाती है और न उसे भौतिक शरीर के आदेशों के पालन की आवश्यकता रह जाती है। शरीर के भौतिक गुण कार्य करेंगे, लेकिन आत्मा ऐसे कार्य से पृथक रहेगी। वह न तो शरीर का भोग करना चाहती है, न उससे बाहर जाना चाहती है। इस प्रकार दिव्य पद पर स्थित भक्त स्वयमेव मुक्त हो जाता है। उसे प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मुक्त होने के लिए किसी प्रयास की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। भौतिक पद पर स्थित व्यक्ति शरीर को मिलने वाले तथाकथित मान-अपमान से प्रभावित होता है, लेकिन दिव्य पद पर आसीन व्यक्ति ऐसे मिथ्या मान-अपमान से प्रभावित नहीं होता। वह इसकी चिन्ता नहीं करता कि कोई व्यक्ति उसका सम्मान करता है या अपमान। वह उन बातों को स्वीकार कर लेता है, जो कृष्णभावनामृत में उसके कर्त्तव्य के अनुकूल हैं, अन्यथा उसे किसी भौतिक वस्तु की आवश्यकता नहीं रहती। वह प्रत्येक व्यक्ति को जो कृष्णभावनामृत के सम्पादन में उसकी सहायता करता है, मित्र मानता है और तथाकथित शत्रु से भी घृणा नहीं करता। वह समभाव वाला होता है और सारी वस्तुओं को समान धरातल पर देखता है, क्योंकि वह इसे भलीभांति जानता है कि उसे इस संसार से कुछ लेना-देना नहीं है।

जहाँ शांति है वही सुख
यदि हमारे पास दुनिया का पूरा वैभव और सुख-साधन उपलब्ध है परंतु शांति नहीं है तो हम भी आम आदमी की तरह ही हैं। संसार में मनुष्यों द्वारा जितने भी कार्य अथवा उद्यम किए जा रहे हैं सबका एक ही उद्देश्य है ‘शांति’। सबसे पहले तो हमें ये जान लेना चाहिए कि शांति क्या है? शांति का केवल अर्थ यह नहीं कि केवल मुख से चुप रहें अपितु मन का चुप रहना ही सच्ची सुख-शांति का आधार है। कहते हैं कि जहाँ शांति है वहाँ सुख है। अर्थात सुख का शांति से गहरा नाता है। लड़ाई, दुख और लालच को भंग करने के लिए शांति सशक्त औजार है। कई लोग कहते हैं कि बिना इसके शांति नहीं हो सकती। इसके साथ ही भौतिक सुख-साधनों तथा अन्य संसाधनों से शांति होगी यह कहना भी गलत है। यदि इससे ही शांति हो जाती तो हम मंदिर आदि के चक्कर नहीं लगाते। धन-दौलत और संपदा से संसाधन खरीदे जा सकते हैं परंतु शांति नहीं। हम यही सोचते रह जाते हैं कि यह कर लूँगा तो शांति मिल जाएगी। आवश्यकताओं को पूरा करते-करते पूरा समय निकल जाता है और न तो शांति मिलती है और न ही खुशी। खुशहाल पारिवारिक जीवन के लिए जरूरी है कि पहले शांति रहे। जहाँ शांति है वहाँ विकास है। जहाँ विकास है वहाँ सुख है। इसलिए अमूल्य शांति के लिए सबसे पहले हमें अपने आप को देखना होगा। अपने बारे में जानना होगा। मैं कौन हूं, कहाँ से आया हूं और हमारे अंदर कौन-कौन सी शक्तियाँ हैं जो हम अपने अंदर ही प्राप्त कर सकते हैं। शांति का सागर परमात्मा है। हम आत्माएँ परमात्मा की संतान हैं। जब हमारे अंदर शांति आएगी तो हमारा विकास होगा। जब विकास होगा तो वहाँ सुख का साम्राज्य होगा। यह प्रक्रिया बिल्कुल सरल और सहज है जिसके जरिए हम यह जान और पहचान सकते हैं। वर्तमान समय अशांति और दुख के भयानक दौर से गुजर रहा है। ऐसे में जरूरत है कि हम अपने धर्म और शाश्वत सत्य को स्वीकारते हुए शांति के सागर परमात्मा से अपने तार जोड़ें। ताकि हमारे भीतर शांति का खजाना मिले। इससे हमारे अंदर शांति तो आएगी ही साथ ही हम दूसरों को भी शांति प्रदान कर सकेंगे।

एकता में भाषा का अवरोध क्यों ?
भाषा, जो दूसरों तक अपने विचारों को पहुंचाने का माध्यम है, उसे भी राष्ट्रीय एकता के सामने समस्या बनाकर खड़ा कर दिया जाता है. अपनी भाषा के प्रति आकषर्ण होना अस्वाभाविक नहीं है और मातृभाषा व्यक्ति के बौद्धिक विकास का सशक्त माध्यम बन सकती है, इसमें कोई संदेह नहीं. पर हमें इस तथ्य को नहीं भुला देना चाहिए कि मातृभाषा के प्रति जितना हमारा आकषर्ण होता है, उतना ही आकषर्ण दूसरों को अपनी मातृभाषा के प्रति होता है। इसलिए भाषाई अभिनिवेश में फंसना कैसे तर्पसंगत हो सकता है? हमारे पूर्वाचर्यों ने एकता की सर्वोत्तम कसौटी प्रस्तुत की थी। वह है- जो तुम्हारे लिए प्रतिकूल है, वह तुम दूसरों के लिए मत करो। हमारा भाषाई प्रेम उस सीमा तक ही होना चाहिए जहां दूसरों के भाषाई प्रेम से उसकी टक्कर न हो। हर प्रांत का अपना भाषाई प्रेम है। उनके पारस्परिक संपर्प के लिए एक जैसी भाषा भी अपेक्षित होती है, जो उनके प्रेम को अक्षुण्ण रखते हुए एक-दूसरे को मिला सके। वह राष्ट्रीय भाषा होती है। प्रांतीय भाषा के प्रेम को इतना उभार देना कैसे उचित हो सकता है, जिससे प्रांतीय और राष्ट्रीय भाषाओं में परस्पर टकराहट पैदा हो जाए। राष्ट्रीय एकता के लिए इस विषय पर गंभीर चिंतन आवश्यक है।
भाषा की समस्या को मैं सामयिक समस्या मानता हूं। इस समस्या को कभी-कभी उभार दिया जाता है और यह राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती बन जाती है। फिर भी इसमें स्थायित्व नहीं है। इसके आकषर्ण की एक सीमा है। यह लंबे समय तक जनता को आकृष्ट किए नहीं रख सकती। आर्थिक-सामाजिक वैषम्य तथा जातीय और सांप्रदायिक वैमनस्य राष्ट्रीय एकता की स्थाई समस्याएं हैं। इनका समाधान हुए बिना राष्ट्रीय एकता का आधार मजबूत नहीं हो सकता। क्या हित-सिद्धि के भेद की भित्ति पर अभेद का प्रासाद खड़ा किया जा सकता है? क्या हीनता और उच्चता की उबड़-खाबड़ भूमि पर एकता के रथ को ले जाया जा सकता है? ऐसे कभी नहीं हो सकता।

सुख की उपेक्षा क्यों?
मेरे पास लोग आते हैं। जब वे अपने दुख की कथा रोने लगते हैं, तो बड़े प्रसन्न मालूम होते हैं। उनकी आंखों में चमक मालूम होती है। जैसे कोई बड़ा गीत गा रहे हों! अपने घाव खोलते हैं, लेकिन लगता है जैसे कमल के फूल ले आए हैं। सुख की तो कोई बात ही नहीं करता। और ऐसा नहीं है कि सुख नहीं है; हम सुख पर पर ध्यान नहीं देते हैं। हम दु:ख-दुख चुन लेते हैं; हम सुख की उपेक्षा कर देते हैं। फिर जिसकी उपेक्षा कर देते हैं, स्वभावत: धीरे-धीरे वह दूर चला जाता है और जिसमें हम रस लेते हैं वह पास होता चला जाता है। संतों की बात तुम्हें तभी जमेगी, रुचेगी, भली लगेगी, प्रीतिकर मालूम होगी-जब तुम दुख को पकड़ना छोड़ दोगे; जब तुम जागोगे और सुख की सचेष्ट खोज शुरू करोगे। तुम्हारे भीतर अगर अभी भी दुख को पकड़ने का आयोजन चल रहा है, तो संतों के वचन तुम्हारे कानों में गूजेंगे और खो जाएंगे। तुम्हारे हृदय तक नहीं पहुंचेंगे। क्योंकि संतों के वचनों में बड़ा सुख भरा है। तुम सुखोन्मुख हो जाओ, तुम आनंद की खोज में लग जाओ; तो ये एक-एक शब्द ऐसे जाएंगे तुम्हारे भीतर जैसे तीर चले जाएं। और ये एक-एक शब्द तुम्हारे भीतर ऐसे-ऐसे हजार-हजार फूल खिला देंगे, जैसे कभी न खिले थे। तुम्हारे भीतर बड़ी रोशनी होगी।
ये छोटे-छोटे शब्द हैं। मगर ये बड़े सार्थक शब्द हैं। सुनो- ‘बोलू हरिनाम तू छोड़ि दे काम सब, सहज में मुक्ति होई जाय तेरी।काम यानी कामना। काम यानी वासना। काम यानी इच्छा, तृष्णा। यह मिले वह मिले-कुछ मिले! जब तक हम मिलने की दौड़ में होते हैं, हम भिखमंगे होते हैं। और जब तक हम भिखमंगे होते हैं, तब तक परमात्मा नहीं मिलता। परमात्मा भिखमंगों को मिलता ही नहीं। परमात्मा सम्राटों को मिलता है। परमात्मा उनको मिलता है जो अपने मालिक है। परमात्मा उनको मिलता है जो कुछ मांगते ही नहीं। असल में वे ही परमात्मा को मांगने में कुछ सफल हो पाते हैं, जो और कुछ नहीं मांगते। जिन्होंने कुछ और मांगा, वे परमात्मा को कैसे मांगेंगे। वह जबान फिर परमात्मा को मांगने के योग्य न रह गई। वह जबान अपवित्र हो गई। जिस जबान से बेटा मांगा, बेटी मांगी, धन मांगा, पद मांगा, प्रतिष्ठा मांगी-उसी जबान से परमात्मा को मांगोगे? इस जहर भरे पात्र में अमृत रखोगे? यह जबान जब तक मांगती है तब तक संसार है। जिस दिन यह जबान मांगती नहीं, उस दिन परमात्मा की यात्रा शुरू हुई। उस दिन बिन मांगे मिलता है। ऐसे तो मांगे-मांगे भी नहीं मिलता।

प्रसन्नता से होता है शरीर पुष्ट एवं क्रोध से होती है हानि
मानव शरीर में अनेक ग्रंथियां होती हैं,पियूष ग्रंथि मस्तिष्क में होती है, उससे 12 प्रकार के रस निकलते है, जो भावनाओं से विशेष प्रभावित होती हैं। जब व्यक्ति प्रसन्नचित होता है, तो इन ग्रनथियों से विशेष प्रकार के रस बहने लगते है, जिससे शरीर पुष्ट होने लगता है, बुद्धि विकसित होती है, रक्त गति सामान्य रहती है। जब मनुष्य अधिक बोलता है, तो रक्त की गति अनावश्यक प्रभावित होती है। जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है,खून के थक्के बनने लगते है। इसी प्रकार प्रोध अधिक करने से खून का बहाव कम हो जाता है, खून जमने की शक्ति बढ़ जाने से मृत्यू भी संभव है। अपने जीवन में ज्यादा बोलना अभिशाप हो सकता है। अधिक बोलने से पाचन क्रिया पर गलत प्रभाव पड़ता है, शरीर की अधिक शक्ति खर्च होती है, पेट की माँसपेशियां खिचने लगती है, पाचन रस ग्रंथियों से नही निकलता, शरीर में विटामिन, खनिज तत्व एवं हार्मोन्स की कमी हो जाती हैं। शरीर रोगी हो जाता है, मानसिक दुर्बलता आ जाती है, स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है, याददाश्त कमजोर हो जाती है, अतŠवाणी का प्रभाव शरीर पर पड़ता है। हर प्राणी को अपना जीवन झूठा, बनावटी, जोर जोर से बोलने बाला ना बना कर शांत चित बनाना चाहिए।

प्राणी शरीर पर पड़ता है ध्वनि का प्रभाव
यह जानकर खुश होगें की ध्वनि का प्रभाव प्रत्येक जीव के शरीर पर पड़ता है। वर्तमान औधोगिकी करण और तकनीकि से ध्वनि प्रदूषण अधिक मात्रा में बढ़ रहा है। इस ध्वनि प्रदूषण के परिणाम देखते हुये नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. राबर्ट कॉक ने सन् 1925-26 में एक बात कही थी एक दिन ऐसा आयेगा, जब पूरे विश्व में स्वस्थ्य का सबसे बड़ा शत्रु ध्वनि प्रदूषण होगा। यह ध्वनि प्रदुषण दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। मानव का मन, मस्तिष्क और शरीर बहुत संवेदन शील हैं। यह ध्वनि तरगों के प्रति भी बेहद संवेदन शील है। जैसे जब कोई संगीत सहित, गीत गाता है,या वाद्य बजाता है तो मन अपने आप उस पर केन्द्रित हो जाता है उसे सुनते ही अंग-अंग थिरकने लगता है, मन प्रसन्रता से भर जाता है, शरीर में आनंद की लहर छा जाती है। इसके विपरीत कानो को अप्रिय लगने वाली तेज ध्वनि सुनाई देती है तब मानव को शारीरिक और मानसिक दोनो तरह की परेशानी होती है। जिससे व्यक्ति का मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है एवं स्वस्थ्य खराब हो जाता है। वह बहरा और पागल भी हो सकता है।
डेसी बल ध्वनि की तीब्रता नापने की इकाई है। इसका अविष्कार ‘ग्राहमबेल’ बैज्ञानिक ने किया था। आधुनिक वैज्ञानिकों का कहना है कि 150 डेसीबल की ध्वनि बहरा भी बना सकती है। 160 डेसीबल की ध्वनि त्वचा जला देती है। 180 डेसीबल की ध्वनि मौत की नींद सुला सकती है। 120 डेसीबल की ध्वनि ह्रदयगति बढ़ना प्रारंभ हो जाती है। जिससे ह्रदय रोग एवं उच्च रक्त चाप की बीमारी जन्म लेती है। हर मानव को 60 डेसीबल तक की ध्वनि वाले वातावरण में रहना चाहिए प्रदूषण की श्रेणी में 75 डेसीबल से अधिक की ध्वनि शोर आता है। ध्वनि प्रदुषण से आंखों की पुतली का मध्य छिद्र फैल जाता है, आमाशय और ऑतों पर घातक प्रभाव से पाचन क्रिया बिगड़ जाती है। इससे शरीर की प्रति रोधी क्षमता घट जाती है, ग्रनथियों से हार्मोन्स का श्राव अनियमित हो जाता है, स्नायु खिच जाते है, शरीर में थकान, मानसि तनाव, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती अत: हमें तेज ध्वनि से बचना चाहिए।

सुख की उपेक्षा क्यों ?
मेरे पास लोग आते हैं। जब वे अपने दुख की कथा रोने लगते हैं, तो बड़े प्रसन्न मालूम होते हैं। उनकी आंखों में चमक मालूम होती है। जैसे कोई बड़ा गीत गा रहे हों! अपने घाव खोलते हैं, लेकिन लगता है जैसे कमल के फूल ले आए हैं। सुख की तो कोई बात ही नहीं करता। और ऐसा नहीं है कि सुख नहीं है; हम सुख पर पर ध्यान नहीं देते हैं। हम दु:ख-दुख चुन लेते हैं; हम सुख की उपेक्षा कर देते हैं। फिर जिसकी उपेक्षा कर देते हैं, स्वभावत: धीरे-धीरे वह दूर चला जाता है और जिसमें हम रस लेते हैं वह पास होता चला जाता है।
संतों की बात तुम्हें तभी जमेगी, रुचेगी, भली लगेगी, प्रीतिकर मालूम होगी-जब तुम दुख को पकड़ना छोड़ दोगे; जब तुम जागोगे और सुख की सचेष्ट खोज शुरू करोगे। तुम्हारे भीतर अगर अभी भी दुख को पकड़ने का आयोजन चल रहा है, तो संतों के वचन तुम्हारे कानों में गूजेंगे और खो जाएंगे। तुम्हारे हृदय तक नहीं पहुंचेंगे। क्योंकि संतों के वचनों में बड़ा सुख भरा है। तुम सुखोन्मुख हो जाओ, तुम आनंद की खोज में लग जाओ; तो ये एक-एक शब्द ऐसे जाएंगे तुम्हारे भीतर जैसे तीर चले जाएं। और ये एक-एक शब्द तुम्हारे भीतर ऐसे-ऐसे हजार-हजार फूल खिला देंगे, जैसे कभी न खिले थे। तुम्हारे भीतर बड़ी रोशनी होगी।
ये छोटे-छोटे शब्द हैं। मगर ये बड़े सार्थक शब्द हैं। सुनो- ‘बोलू हरिनाम तू छोड़ि दे काम सब, सहज में मुक्ति होई जाय तेरी। काम यानी कामना। काम यानी वासना। काम यानी इच्छा, तृष्णा। यह मिले वह मिले-कुछ मिले! जब तक हम मिलने की दौड़ में होते हैं, हम भिखमंगे होते हैं। और जब तक हम भिखमंगे होते हैं, तब तक परमात्मा नहीं मिलता। परमात्मा भिखमंगों को मिलता ही नहीं। परमात्मा सम्राटों को मिलता है। परमात्मा उनको मिलता है जो अपने मालिक है। परमात्मा उनको मिलता है जो कुछ मांगते ही नहीं।
असल में वे ही परमात्मा को मांगने में कुछ सफल हो पाते हैं, जो और कुछ नहीं मांगते। जिन्होंने कुछ और मांगा, वे परमात्मा को कैसे मांगेंगे। वह जबान फिर परमात्मा को मांगने के योग्य न रह गई। वह जबान अपवित्र हो गई। जिस जबान से बेटा मांगा, बेटी मांगी, धन मांगा, पद मांगा, प्रति…ा मांगी-उसी जबान से परमात्मा को मांगोगे? इस जहर भरे पात्र में अमृत रखोगे? यह जबान जब तक मांगती है तब तक संसार है। जिस दिन यह जबान मांगती नहीं, उस दिन परमात्मा की यात्रा शुरू हुई। उस दिन बिन मांगे मिलता है। ऐसे तो मांगे-मांगे भी नहीं मिलता।

सम्यक दृष्टिकोण की जरूरत
आज मानवता को बचाने से अधिक कोई करणीय काम प्रतीत नहीं होता। मनुष्य औद्योगिक और यांत्रिक विकास कर पाए या नहीं, इनसे मानवता की कोई क्षति नहीं होने वाली है, िंकतु उसमें मानवीय गुणों का विकास नहीं होता है तो कुछ भी नहीं होता है। एक मानवता बचेगी तो सब कुछ बचेगा। जब इसकी सुरक्षा नहीं हो पाई तो क्या बचेगा? और उस बचने का अर्थ भी क्या होगा? मनुष्य एक सर्वाधिक शक्तिशाली प्राणी है, इस तथ्य को सभी धर्मो ने स्वीकार किया है।पर मानव जाति का दुर्भाग्य यह रहा कि उसकी शक्ति मानवता के विकास में खपने के स्थान पर उसके हृास में खप रही है। मानवता की सुरक्षा के लिए जिस ऊर्जा को संग्रहीत किया गया था, वह हथियार का रूप लेकर उसका संहार कर रही है।मनुष्य के मन की धरती पर उगी हुई करुणा की फसल क्रूरता से भावित होकर धीरे-धीरे समाप्त हो रही है।यह एक ऐसा भोगा हुआ यथार्थ है, जिसे कोई भी संवेदनशील व्यक्ति नकार नहीं सकता।
पानी को जीवनदाता माना जाता है, सर्वोत्तम तत्व माना जाता है; फिर भी उसके स्वभाव की विचित्रता यह है कि वह ढलान का स्थान प्राप्त होते ही नीचे की ओर बहने लगता है।दूसरों को जीवन देने वाला जल भी जब नीचे की ओर जाने लगे तो उसके कौन रोक सकता है? यही स्थिति आज के मनुष्य की है।सर्वाधिक शक्तिशाली होकर भी यदि वह स्वयं का दुश्मन हो जाए, करुणा को भूलकर क्रूर बन जाए तो उसे कौन समझा सकता है। इस बात को सब मानते हैं कि विज्ञान ने बहुत तरक्की की है।यह बहुत अच्छी बात है।िंकतु हमें इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि विज्ञान में तारक और मारक दोनों शक्तियां होती हैं। कोई आदमी उसकी तारक शक्ति को भूलकर मारक शक्ति को ही काम में लेने लगे, इसमें विज्ञान का क्या दोष।उसके पास मानवता या मानव जाति को बचाने की जो विलक्षण शक्ति है, उसे भुला दिया गया और संहार की भयानक शक्ति को उजागर किया गया।इस स्थिति को बदलने के लिए सम्यक दृष्टिकोण के निर्माण की आवश्यकता है।

मनुष्य के हृदय में हैं भगवान
ईश्वर ने तो चींटी से लेकर हाथी तक की रचना कर डाली, लेकिन तब सृष्टि में न तो कोई उत्पात मचा न झंझट ही खड़ा हुआ। न ईश्वर से किसी कुछ माँगा न कोई शिकायतें ही करता दिखा, किन्तु जब वह मनुष्य की रचना कर चुका तो परमात्मा उस दिन से बड़ा हैरान परेशान रहने लगा। नित नये उपद्रव, दंगे फसाद, शिकायतें और फरियादों का ताँता लग गया। सब काम रोककर शिकायतें निपटाते ही उसका दिन बीतता। एक दिन परमात्मा ने देवताओं की बैठक बुला कहा कि हमसे जीवन में पहली बार इतनी बड़ी भूल हुई है जितनी कभी नहीं हुई थी। अनेकों जीवों की रचना की तब तक हम बड़े चैन से थे। किन्तु जब से मनुष्य की रचना की है पूरी मुसीबत खड़ी हो गई। नित्य ही दरवाजे पर माँगने वालों और फरियाद करने वालों की भीड़ जमा रहने लगी है। अब कोई उपाय भी नहीं सूझता कि क्या किया जाय? कोई ऐसी जगह बताओ जहाँ मैं छिप कर बैठ जाऊँ। एक देवता ने सुझाव दिया भगवान क्षीर सागर में छिपना ठीक रहेगा। भगवान बोले वहाँ तो मनुष्य मुझे आसानी से ढूँढ़ लेगा दूसरे ने कहा हिमालय पर्वत ठीक रहेगा। तीसरे ने कहा चन्द्रमा में छिप जाये प्रभु। भगवान ने कहा इसकी अकल इतनी पैनी है कि आकाश पाताल में कहीं भी पहुँच सकता है। तब देवर्षि नारद आगे आये और बोले भगवन्! बहुत गोपनीय स्थान समझ में आया है। किन्तु कानोंकान किसी को खबर न होने दें और उनने भगवान के कान में कहा ‘प्रभु! मनुष्य के दिल में छिपकर बैठ जाइये इसकी आँखें बाहर देखती हैं। यह चारों ओर खोजता फिरेगा और अन्दर यह आपको कभी खोजेगा ही नहीं।’ कहते है जब से भगवान मनुष्य के हृदय में छिपकर बैठे हैं जो इस रहस्य को जानता है वहीं उन्हें खोज पाता है। इसलिए संत कबीर ने कहा मोहे कहां खोजे रे बंदे मैं तो तेरे उर में।

स्थापित होना है तो करें प्रशंसनीय कर्म
यहां हम बात उस महान खिलाड़ी की कर रहे हैं जिसे आप सभी क्रिकेट का भगवान कहते हैं। आज क्रिकेट टीम से बाहर होने के बाद भी क्रिकेट की शुरुआत यदि होती है तो सचिन का नाम लेकर ही होती है और चर्चा यदि खत्म होती है तो उनके नाम से ही खत्म भी होती है। अर्थात सचिन रमेश तेंदुलकर आज उस सितारे का नाम हो गया है जो आसमान में चमक रहा है। कहा जाता है कि किशोर उम्र के सचिन उन दिनों शारदाश्रम स्कूल की जूनियर टीम से खेलते थे। उन्हीं दिनों एक घटना हुई, जिसने उनकी सोच को परिवर्तित करके रख दिया। उनके गुरु आचरेकर ने उन्हें एक दूसरे-स्कूल में अभ्यास करने के लिए कहा। तब सचिन ने गुरु की बात नहीं मानी और स्कूल की ही सीनियर टीम का मैच देखने चले गए। शाम को जब सचिन गुरु आचरेकर से मिले तो उन्होंने सचिन से उनके उस दिन के प्रदर्शन के बारे में पूछा और कहा कि आज तुम ने कितने रन बनाए? इस पर सचिन ने उन्हें बताया कि वह मैच खेलने नहीं गए थे, बल्कि वह तो सीनियर टीम का हौसला बढ़ाने के लिए मैदान के बाहर बैठकर ताली बजा रहे थे। यह सुन गुरु आचरेकर ने सचिन पर बहुत गुस्सा किया और कहा, ‘तुम्हें दूसरे के लिए तालियां बजानी है या खुद भी उस लायक बनना है? तुम खेलो और इस तरह खेलों की दुनिया तुम्हारे लिए तालियां बजाते न थके। इसके बाद तो सचिन की जिंदगी वाकई बदल गई और उनका ध्येय प्रशंसनीय बनने वाला हो गया, जिसका उदाहरण वो दे चुके हैं।

भगवान श्रीकृष्ण की ये बातें आज भी हैं प्रासंगिक
आधुनिक जीवन में सफलता का अर्थ पैसों और सुख-सुविधा की चीजों से जुड़ा हुआ है। आप जितना भी धन कमा लेंगे दुनिया आपको उतना ही कामयाबी कहेगी, अंधाधुध पैसे कमाने की होड़ में कोई व्यक्ति ये नहीं सोचता कि उससे भौतिक दुनिया की सुख-सुविधा कमाने के कारण कितने पाप हो गए हैं।
श्रीमद्भागवत गीता में भगवान कृष्ण ने कई नीतियों के उपदेश दिए हैं। इसमें बताए गए एक श्लोक के अनुसार, जो मनुष्य ये चार आसान काम करता है, उसे निश्चित ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ऐसे मनुष्य के जाने-अनजाने में किए गए पाप कर्म माफ हो जाते हैं और उसे नर्क नहीं जाना पड़ता। आइए, जानते हैं उन कामों के बारे में।
दान
दान करने का अर्थ है किसी जरूरतमंद को वो चीज निशुल्क उपलब्ध करवाना, जिसे पाने में वो अक्षम है। दान करने से पहले या बाद किसी को भी दान के बारे में नहीं बताना चाहिए। दान को हमेशा गुप्त ही रखना चाहिए।
आत्म संयम
कई बार ऐसा होता है कि हमारा मन और दिमाग दोनों विपरीत दिशा में चलते हैं और हम अधर्म कर बैठते हैं। गीता में दिए गए ज्ञान के अनुसार मन को वश में कर लेने से व्यक्ति द्वारा किसी पाप को करने की संभावना रहती है।
सत्य बोलना
कलियुग में सत्य और असत्य का पता लगाना मुश्किल हो गया है। किसी भी व्यक्ति की बात को सुनने मात्र से ये नहीं कहा जा सकता कि वो झूठ बोल रहा है या सच। अगर आपने भूतकाल में कोई गलत काम किया है, तो आप शेष बचे जीवन में हमेशा सत्य बोलकर पापों का प्रायश्चित कर सकते हैं।
ध्यान या जप
आधुनिक युग में ऐसे लोग बहुत कम बचे हैं, जो रोजाना ध्यान करते हो. पूजा-पाठ भगवान को प्रसन्न करने के लिए नहीं बल्कि स्वंय का स्वयं से मिलन करवाने के लिए की जाती है। आत्मध्यान करके हम आत्मसाक्षात्कार कर सकते हैं। नियमित रूप से स्वच्छ मन से जप या ध्यान करने से भूल से हुई गलतियों से पार पाया जा सकता है।

स्वयं में भगवान श्रीराम के दर्शन करते हैं रामनामी
कहते हैं यदि ईश्‍वर तो हृदय में बसते हैं। शायद यही वजह है कि रामनामी समाज किसी मंदिर में जाने की बजाए भगवान श्रीराम के दर्शन खुद में ही करते हैं। यहां हर किसी में बस राम ही रचे-बसे नजर आते हैं। तो आइए जानते हैं क‍ि कौन हैं ये लोग और क्‍यों इन्‍होंने क्यों मर्यादा पुरुषोत्‍तम को अपने तन-मन में बसाया है।
ऐसे बनी परंपरा
छत्‍तीसगढ़ के ‘जमगाहन गांव’ में तकरीबन सौ बरस पहले निम्‍न वर्ग के तबके को जब मंदिर जाने से मना किया गया। तो उन्‍होंने प्रभु की पूजा का एक नया ही मार्ग खोज निकाला। सभी ने अपने शरीर पर राम नाम को गुदवाना शुरू कर दिया। पहले यह उपेक्षा के चलते शुरू किया गया था लेकिन बाद में यह परंपरा बन गई। आज भी लोग सहर्ष इसका निर्वहन कर रहे हैं।
राम नाम से बन गए रामनामी
राम का नाम इस तरह से खुद पर लिखवाने के चलते जमगाहनगांव के इस निम्‍न तबके की परिभाषा ही बदल गई। अब इन्‍हें रामनामी समाज के नाम से जाना जाता है। पूरे देश में इन्‍हें इसी विशेष समाज के नाम से जाना-पहचाना जाता है।
जय श्री राम का करते हैं संबोधन
बरसों पहले मंदिर जाने से रोके गए रामनामी समाज के लोग मूर्ति पूजा करते ही नहीं। वह बस अपने शरीर पर रामनाम गुदवाते हैं। इसके अलावा राम का नाम गुदवा लेने के बाद इस समाज के लोग मदिरा को हाथ तक नहीं लगाते। साथ ही नियमित रूप से राम नाम के मंत्र का जाप करते हैं। दैनिक अभिवादन में जय श्री राम का संबोधन ही प्रयोग करते हैं।
रामनामियों की श्रेणी
रामनामियों की अपनी ही एक श्रेणी हैं। इसमें शरीर के अलग-अलग भागों और पूरे शरीर पर राम नाम लिखवाने वालों को अलग-अलग श्रेणी में रखा जाता है। इसमें जो शरीर के किसी एक भाग पर राम नाम लिखवाते हैं, उन्‍हें रामनामी कहते हैं। यदि माथे पर राम का नाम गुदवाया हो तो उसे शिरोमणि रामनामी कहते हैं। इसके अलावा अगर पूरे माथे पर ही राम का नाम गुदवाया हो तो उसे सर्वांग रामनामी कहते हैं। वहीं जो पूरे शरीर पर राम का नाम गुदवा लेता है उसे नखशिख रामनामी कहते हैं।

धर्म का सही अर्थ
धर्म शब्द की उत्पत्ति ‘धृ’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ धारण करना है। इस संसार में जो भी गुण मनुष्य के लिए धारण करने योग्य है, उसे धर्म कहा जा सकता है। इस परिभाषा से यह स्पष्ट हो जाता है कि हर पदार्थ का जो मौलिक गुण है वह उसमें निहित धर्म है। जैसे पानी का धर्म प्यास बुझाना है। अगर उसे उबाल देंगे तो वह वाष्प बन जाएगा, पर ठंडा होकर फिर प्यास बुझाएगा। वही पानी जमकर बर्फ बन जाएगा और पिघलकर फिर प्यास बुझाएगा। किसी भी स्थिति में पानी अपना मौलिक गुण, अपना धर्म नहीं छोड़ता है। प्रत्येक पदार्थ में निहित वह विशेष गुण जो उसे उपयोगी बनाता है, उसका धर्म है। अर्थात धर्म और कर्म में कोई अंतर नहीं है। प्रत्येक परिस्थिति में धर्म के अनुसार आचरण करना हमारे जीवन का कर्म है और जब हम ऐसा कर्म करते हैं हम स्वयं ही सुखों को आमंत्रित कर लेते हैं।
इस सत्य को स्वीकार करते हुए चाणक्य कहते हैं कि सभी सुखों के मूल में धर्म कार्य कर रहा है। भोजन, निद्रा, भय पशु में भी पाए जाते हैं। वहीं धर्म ही मनुष्य को पशु से अलग करता है। यहां पर विचार करने योग्य तथ्य यह है कि सिर्फ मनुष्य है जो अपने जीवन को बड़ा बनाना चाहता है। जिसके मन में कामनाएं उत्पन्न होती हैं, भविष्य को सुरक्षित करने की इच्छा होती है और जो अपने कल को बेहतर करने के लिए आज कर्मशील होने के लिए तत्पर है। पशुओं को कल की चिंता नहीं होती। यानी धर्म वह प्रयोजन है जिसके द्वारा जीवन को महानता की ओर ले जाया जा सकता है।
धर्म का आचरण करने से ही मनुष्य के जीवन में अर्थ और काम की उपलब्धि होती है। फिर धर्म को छोड़कर किसी और की शरण में आप कैसे जा सकते हैं? शास्त्र सहर्ष स्वीकार करते हैं कि जिससे जीवन में श्री, अभ्युदय अर्थात उन्नति और सिद्धि प्राप्त हो, वह धर्म है। फिर इसमें कोई दो राय किस तरह से हो सकती है कि धर्म का अर्थ ही उत्तम प्रकार के कर्म करना है, जिसके द्वारा कामनाओं को पूर्ण किया जा सके। सीधे शब्दों में कहें तो कामनाओं को पूरा करने के लिए कमाना पड़ता है और कमाई में जब कमी होती है तो जीवन दीन-हीन हो जाता है। धर्म की हानि उस समय होती है जब हम बिना कर्म किए छल से, बल से, कामनाओं को पूरा करना चाहते हैं लेकिन उससे भी अधिक धर्म की हानि तब होती है। जब हम शोषण का प्रपंच शांत भाव से देखते हैं। उस समय यह याद रखें कि आप भी भीष्म की भांति अपने कर्म से हट रहे हैं।
इस जीवन में धर्मज्ञ बनना है, धर्मभीरु नहीं। किसी भी वस्तु, व्यक्ति अथवा विषय से भय उस समय तक ही रहता है, जब तक हमें उस विषय का पूर्ण ज्ञान न हो जाए। धर्म का वास्तविक अर्थ यथोचित कर्म करना है जो जीवन को उन्नति की ओर ले जाए। इस प्रवाह में बहने का नाम ही धार्मिकता है।

संतोषी बनने से मिलता है परमसुख
आचार्य चाणक्य का जन्म आज से लगभग 2400 वर्ष पहले हुआ था। उन्होंने ‘चाणक्य नीति’, अर्थशास्त्र राजनीति, अर्थनीति, कृषि, समाज नीति आदि महान ग्रंथों की रचना की। चाणक्य जीवन दर्शन के ज्ञाता थे। उन्होंने अपने जीवन से प्राप्त अनुभवों से नियमों का निर्माण कर उन्हीं का लोगों को उपदेश दिया। उन्होंने बहुत सी ऐसी नीतियों का निर्माण किया है जिन पर अमल करने से जीवन को खुशहाल बनाया जा सकता है। व्यक्ति को सीधा और ईमानदार नहीं होना चाहिए क्योंकि जंगल में सीधे वृक्षों को काटने में कठिनाई नहीं होती उन्हें ही सबसे पहले काटा जाता है। धन ही एकमात्र ऐसी वस्तु है जिसके माध्यम से दुनिया को चलाया जाता है। जिस व्यक्ति के पास पैसा होता है, सारे सगे-संबंधी भी उनके ही होते हैं। मूर्ख लोगों के धनी होने के कारण उन्हें बुद्धिमान, विद्वान अौर योग्य माना जाता है। कुत्ते के लिए उसकी दुम गर्व का सूचक नहीं होती। कुत्ते की पूंछ मक्खी, मच्छरों को उड़ाने के काम नहीं आती। उसी प्रकार कम ज्ञान वाले व्यक्ति की बुद्धि बेकार होती है इसलिए उसे अधिक से अधिक सीखने का प्रयास करते रहना चाहिए। गुस्सा मौत को, लालच दुख को आमंत्रण देता है। ज्ञान दूध देने वाली गाय की तरह है जो प्रत्येक जगह व्यक्ति की मदद करता है। संतुष्ट व्यक्ति कहीं भी प्रत्येक स्थिति में जीवन यापन कर सकता है।

इन लोगों से नहीं लें सलाह
महात्मा विदुर महाभारत काल के महान नीतिज्ञ माने जाते हैं इन्हें धर्मराज का अवतार भी माना जाता है। इन्होंने हमेशा नीतियों और न्याय का पालन किया। इन्होंने अपनी नीतियों में बताया है कि मनुष्य को कोई भी काम शांति और समझदार लोगों की सलाह से करना चाहिए। वहीं भूलकर भी 4 लोगों से सलाह लेने से बचना चाहिए। ये 4 लोग ऐसे हैं जिनसे सलाह लेने पर नुकसान होना तय है। आइए जानें विदुर नीति के अनुसार वो 4 लोग कौन हैं जिनसे सलाह लेने से बचना चाहिए।
जिनकी बुद्धि हो ऐसी
विदुरजी के अनुसार जिन लोगों की बुद्धि कम होती है। उन लोगों से कभी सलाह नहीं लेना चाहिए। इनके अनुसार थोड़ी बुद्धि वाले कभी सही सलाह देने में सक्षम नहीं होते हैं। वो खुद में ही अल्पबुद्धि के हैं तो किसी को क्या सलाह और विमर्श दे पाएंगे। इसलिए ऐसे लोगों से गुप्त विचार विमर्श करने से अपना ही नुकसान होगा। ऐसे लोगों से दूर ही रहना चाहिए। ऐसे लोग आपकी गुप्त योजनाओं को दूसरों के सामने प्रकट कर सकते हैं।
दीर्घसूत्री व्यक्ति
दीर्घसूत्री व्यक्ति विषयों की गंभीरता समझने की बजाय उस पर इतना मंथन करने लग जाता है कि काम पूरा होने का समय ही निकल जाए। इस तरह की सोच वाले व्यक्ति की सलाह लेने पर काम में सफलता मिलना मुश्किल होता है। विदुरजी बताते हैं कि जो समझदारी से विचार करके परिस्थिति की गंभीरता के समझता हो उसी से सलाह लेने में मनुष्य की भलाई है।
जल्दबाजी में काम करने वाले
किसी काम को जल्दबाजी में निपटाने वाले व्यक्ति से भी कोई सलाह नहीं लेना चाहिए। विदुर नीति के अनुसार जो लोग काम को करने में हड़बड़ाहट मचाते हैं, ध्यान से नहीं करते हैं उनकी सलाह को भी कोई खास प्रमुखता नहीं देनी चाहिए। जल्दबाजी करने वाले मनुष्य से गुप्त सलाह लेना एक नुकसानदायी परिणाम दे सकता है।
चाटुकारिता करने वाले
विदुर के अनुसार, चापलूसी करने वाले व्यक्ति से दूर रहना चाहिए। चाटुकार सच को छुपाकर आपको प्रसन्न करने वाली बात कहेगा वह आपकी कमियों को बताने से डरेगा और आप आत्ममुग्ध होकर गलती कर बैठेंगे जिससे आपका नुकसान होना तय है। इसलिए हमें सत्य को बोलने वाले की सलाह लेनी चाहिए।

वक्त का पहिया
जब तुम्हें लगता है कि समय बहुत कम है, तुम या तो बेचैन होते हो या अत्यन्त सजगता की अवस्था में होते हो। दुखी या उत्सुक होने पर तुम्हें समय बहुत लम्बा लगता है। जब तुम प्रसन्न हो और जो कुछ कर रहे हो, उसमें आनंद आ रहा है, तब तुम्हें समय का आभास नहीं होता। इसी प्रकार, नींद में भी तुम्हें समय का आभास नहीं होता। जब तुम समय से आगे हो, समय कटता ही नहीं और नीरसता अनुभव होती है। जब समय तुम्हारे आगे है, तब तुम आश्चर्यचकित और स्तब्ध होते हो। तुम घटनाओं को आत्मसात नहीं कर पाते। गहन ध्यान में तुम ही समय हो और सब कुछ तुम्हारे ही अहदर घटित हो रहा है। घटनाएं तुममें ऐसे घट रही हैं, जैसे आसमान में बादल गुजरते हैं। जब तुम समय के साथ होते हो, तुम ज्ञानी हो, तुम्हारा मन शांत है। जब मन प्रसन्न होता है, तब यह विस्तृत होता है, तब समय भी बहुत छोटा लगता है। जब मन दुखी होता है, संकुचित होता है, तब समय बहुत लंबा प्रतीत होता है। जब मन समचित्त है, स्थिर है, तब यह काल के परे है। इन दोनों स्थितियों से बचने के लिए कई व्यक्ति शराब या निद्रा का सहारा लेते हैं, परंतु जब मन जड़ या बेसुध होता है, तब यह अपनी ही अनुभूति नहीं कर सकता। समाधि ही असल शांति है, जो मन और समय के परे है।
जैसे मन समय को अनुभव करता है, वैसे इस क्षण का भी अपना एक मन है। एक विराट मन, जिसमें व्यवस्था करने की अपरिमित और असीम योग्यता है। एक विचार और कुछ नहीं, समय के इस क्षण में एक तरंग है और समाधि के कुछ ही पल मन को ऊर्जा से भर देते हैं। निद्रावस्था के पहले और जिस पल तुम नींद से जगाते हो, सचेतनता के उन धूमिल क्षणों में, समय के परे जाने का अनुभव करो। जीवन साकार व निराकार का मिशण्रहै। भावनाओं का कोई आकार नहीं परंतु उनकी अभिव्यक्ति साकार होती है। आत्मा का कोई रूप नहीं परंतु उसका निवास साकार में है। इसी तरह, ज्ञान और कृपा का भी कोई रूप नहीं, लेकिन उनकी अभिव्यक्ति किसी रूप द्वारा ही होती है। निराकार को हटा देने से तुम जड़ बनते हो- सांसारिक और संवेदनशील। आकार को छोड़ देने से तुम एक भ्रमित तपस्वी, अत्यधिक सपने देखने वाले या भावनात्मक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति बन जाते हो।

शुद्ध मन में आते हैं सद्विचार
मानव जीवन में विचार का विशेष महत्व है। विचार ही इंसान को अच्छा या बुरे कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। ऐसे में मन से खराब और दूषित विचारों को रोकने और निकाल फेंकने के लिए यदि थोड़ी कठिनाई हो तो भी सह लेनी चाहिए। वैसे भी यदि सच्चे मन से सद्विचारों के लिए थोड़ा अभ्यास किया जाए तो यह सरलता से हो सकता है। कुछ समय तक सावधानी से अभ्यास करें तो पाएंगे कि आपका स्वभाव ही ऐसा बन गया है कि उसकी चिंतनधारा में अनावश्यक विचार प्रवेश ही नहीं कर पा रहे हैं। इस प्रकार जब मन में शुद्ध तथा सुंदर विचार दृढ़ होने लगेंगे, तो वे स्वयं भी अपने से विरोधी विचारों को मन में रुकने ही नहीं देंगे। ठीक वैसे ही जैसे कि कहा जाता है कि पैसा पैसे को खींचता है, उसी तरह विचार अच्छे हों या बुरे, वे स्वयं अपने जैसे विचारों को आकर्षित करते, आमंत्रित करते और आपके मन में डेरा जमाने की जगह उनके लिए बना देते हैं। इसलिए अधिक से अधिक अच्छे विचारों को आमंत्रित करने के लिए उन्हें मन में ज्यादा से ज्यादा समय तक स्थापित करें। सच्चाई और सद्जीवन को लक्ष्य बनाएं और देखेंगे कि आपके विचार दिन व दिन शुद्ध् होते चले जा रहे हैं और उनका समूह आपके मन में पुराने पड़े बुरे विचारों को बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं।

धोखेबाज कौन नहीं
एक समय की बात है एक शहर के बुद्धिमान व्यक्ति के पास एक शख्स आया और उसने उनसे जानना चाहा कि उनके पास लोग तो बहुत हैं जो उसके कहने पर काम करते हैं, लेकिन उसके पास कोई भी विश्वासपात्र व्यक्ति नहीं है। उसने कहा कि ‘मेरे कर्मचारी मुझसे बात बात पर झूठ बोलते हैं। यहां तक कि मेरे परिवार में मेरे बच्चे और पत्नी कि स्वार्थियों जैसा व्यवहार करते हैं। मानों यह दुनिया ही स्वार्थी है। कोई मुझे सही नहीं नजर आता है।’ यह सुनकर बुद्धिमान व्यक्ति थोड़ा मुस्कराया और उसे असंतुष्ट को एक कहानी सुनाते हुए बोला, ‘किसी जमाने में एक गॉंव था। वहां एक बड़े से कमरे में 1000 के करीब शीशे लगे थे। एक छोटी बच्ची उस हॉल में खेलने जाया करती थी। वहां उसे खेलना बहुत अच्छा लगता था। दरअसल उसे लगता था कि मानो हजारों बच्चों के साथ वह खेल रही है। वह तालियाँ बजाती, तो हजार बच्चे उसके साथ में तालियाँ बजा रहे होते। उसे ऐसा करते हुए लगता कि यह दुनिया का सबसे बेहतरीन स्थान है। एक बार उस हाल के भीतर एक गुस्सैल और उदास व्यक्ति चला गया। उसे लगा कि वह हजार गुस्सैल लोगों से घिरा हुआ है। वे सब उसे घूर रहे हैं। वह डर गया, उसने उन्हें मारने के लिए अपना हाथ ऊपर उठाया तो उसी की तरह हजार हाथ खड़े हो गए। अब उसे लगा कि यह तो दुनिया की सबसे ख़राब और बेकार जगह है, यह समझ वह तुरंत वहां से बाहर निकल गया।’ यह कहानी सुन उस शख्स को अपनी गलती समझ आ गई और तभी बुद्धिमान व्यक्ति ने उससे पूछा बताओ धोखेबाज कौन नहीं है?

मूर्खों को शोभती है चापलूसी
कभी कभी किसी का संस्मरण भी इंसान को बेहतर राह दिखाने का काम कर जाता है। ऐसा ही एक संस्मरण अमेरिका के एक बड़े राजनेता ने लिखा, जिसमें उन्होंने बताया कि ‘लुहार की दुकान के सामने से एक दिन गुजर रहा था। उसका दूसरा साथी कहीं चला गया था। अकेला ही धौंकनी धौंकता और लोहा पीटता जा रहा था। मुझे अजीब लगा, सो दुकान के सामने रुक कर देखने लगा। लुहार ने अपनी कारिस्तानी दिखायी उसने छूटते ही किसी बड़े खानदान से अपने आपको सम्बन्धित और अपनी कक्षा का मेधावी छात्र बताया, साथ ही भविष्य में कोई बड़ा आदमी बनने की संभावना भी व्यक्त कर दी। उसके इस कथन से मेरे मन में उसके प्रति सद्भावना जाग गई। उसने कहा कि ‘यदि और भी कुछ सुनना और देखना चाहते हो तो मेरे पास बैठो और इस कला की जानकारी हासिल कर लो, जिसने मुझे मालदार बना दिया है।’ लुहार की बात से बालक प्रभावित हुआ और वह दुकान पर जा बैठा। उसने धौंकनी थमा दी और कहा देखो इसे चलाना भी कितना मजेदार है। मैं उसकी बातों में आ गया और देर तक उसकी धोंकनी चलाता रहा। जब भी उठने का मन करता तभी वह फिर अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से मुझे अपने जाल में फँसा लेता। इस तरह दोपहर हो गयी। हाथ में दर्द भी होने लगा। अंतत: मैं वहां से उठा और चल पड़ा। इसके बाद स्कूल पहुँचा तो मेरी गैरहाजिरी लग गयी थी। उस दिन परीक्षा भी थी। मास्टर ने बुरी तरह पीटा और मुझे फेल भी कर दिया। धौंकनी धौंकने का दर्द तो बाँहों में था ही मास्टर की पिटाई से वह और भी अधिक बढ़ गया। बुखार आया और चारपाई पर पड़ा पछताता रहा। इसके बाद मैंने जीवन भर याद रखा कि चापलूसी बातों में कतई नहीं फँसना है, यह सबसे बड़ी मूर्खता है।

आपकी सोच पर निर्भर है कर्म
दो मित्र अक्सर एक वेश्या के पास जाया करते थे। एक शाम जब वे वहां जा रहे थे, रास्ते में किसी संत का आध्यात्मिक प्रवचन चल रहा था। एक मित्र ने कहा कि वह प्रवचन सुनना पसंद करेगा। उसने उस रोज वेश्या के यहां नहीं जाने का फैसला किया। दूसरा व्यक्ति मित्र को वहीं छोड़ वेश्या के यहां चला गया। अब जो व्यक्ति प्रवचन में बैठा था, वह अपने मित्र के विचारों में डूबा हुआ था। सोच रहा था कि वह क्या आनंद ले रहा होगा और कहां मैं इस खुश्क जगह में आ बैठा। मेरा मित्र ज्यादा बुद्धिमान है, क्योंकि उसने प्रवचन सुनने की बजाए वेश्या के यहां जाने का फैसला किया। उधर, जो आदमी वेश्या के पास बैठा था, वह सोच रहा था कि उसके मित्र ने इसकी जगह प्रवचन में बैठने का फैसला करके मुक्ति का मार्ग चुना है, जबकि मैं अपनी लालसा में खुद ही आ फंसा। प्रवचन में बैठे व्यक्ति ने वेश्या के बारे में सोचकर बुरे कर्म बटोरे। अब वही इसका दुख भोगेगा। गलत काम की कीमत आप इसलिए नहीं चुकाते, क्योंकि आप वेश्या के यहां जाते हैं; आप कीमत इसलिए चुकाते हैं क्योंकि आप चालाकी करते हैं। आप जाना वहां चाहते हैं, लेकिन सोचते हैं कि प्रवचन में जाने से आप स्वर्ग के अधिकारी बन जाएंगे। यही चालाकी आपको नरक में ले जाती है। आप जैसा महसूस करते हैं, वैसे ही आप बन जाते हैं। मान लीजिए कि आप जुआ खेलने के आदी हैं। हो सकता है कि अपने घर में मां, पत्नी या बच्चों के सामने आप जुआ को खराब बताते हों। इसका नाम तक मुंह पर नहीं लाते हों। लेकिन जैसे ही अपने गैंग से मिलते हैं, पत्ते फेंटने लगते हैं। चोरों को क्या ऐसा लगता है कि किसी को लूटना बुरा है? जब आप चोरी में असफल होते हैं, तो वे सोचते हैं कि आप अच्छे चोर नहीं हैं। उनके लिए वह एक बुरा कर्म हो जाता है। हमें ये समझना होगा कि कर्म उसी तरह से बनता है, जिस तरह आप उसे महसूस करते हैं। आप जो कर रहे हैं, उससे इसका संबंध नहीं है।

प्रार्थना वास्तविक ध्यान का परिणाम
कबीर का जोर ध्यान पर है, बुद्ध का जोर ध्यान पर है, मेरा जोर ध्यान पर है। ध्यान एक अलग दृष्टिकोण है: भगवान के साथ इसका कोई लेना-देना नहीं है, इसका संबंध तुम से है, तुम्हारे मन से है। इसके द्वारा तुम्हारे भीतर एक मौन पैदा करना है, एक गहरा मौन। उस गहरे मौन में तुम भगवान की उपस्थिति महसूस करना शुरू कर दोगे। प्रार्थना वास्तविक ध्यान का एक परिणाम है। केवल एक ध्यानी प्रार्थना कर सकता है क्योंकि वह जानता है, क्योंकि वह महसूस करता है, क्योंकि अब भगवान की उपस्थिति सिर्फ एक तर्क नहीं है, एक तार्किक बात नहीं है, परन्तु कोई अनुभूति है, कुछ जीया हुआ है। और तब प्रार्थना एक शिकायत नहीं रह जाती है। फिर प्रार्थना एक समर्पण है, तब प्रार्थना शुद्ध प्रेम है – इसके साथ कोई इच्छा नहीं जुड़ी है, कोई शर्त नहीं है। यह कोरी कृतज्ञता है। प्रार्थना को ध्यान से उठने दो। तुम ध्यान करो। ध्यान तुम्हारे हृदय को तैयार करेगा, यह तुम्हें शुद्ध करेगा। यह तुम्हें तुम्हारे विचारों से स्वच्छ करेगा, यह उन सभी कचरों को साफ करेगा जो तुम अपने सिर पर ढोए हुए हो सदियों से, जन्मों से; यह प्रार्थना के लिए खाली जगह तैयार करेगा। ध्यान: गुलाब की क्यारी के लिए जमीन तैयार करने की तरह है: प्रार्थना एक गुलाब की तरह है। सबसे पहले तुम्हें जमीन तैयार करनी है, तुम्हें घास-फूस हटा देना होगा, मिट्टी को बदलना होगा, तुम्हें सभी कंकड़ पत्थरों को फेंकना होगा। ध्यान से क्यारी तैयार की जाती है और केवल तैयार क्यारी में ही तुम गुलाब लगा सकते हो। अन्यथा घास-फूस तुम्हारे गुलाब को उखाड़ देंगे और घास-फूस पूरी मिट्टी का फायदा उठाएंगे और तुम्हारे गुलाबों को ज्यादा कुछ नहीं मिलेगा, वे खराब गुलाब होंगे। और यदि भूमि में कंकड़ पत्थरों होंगे तो गुलाब की वृद्धि अवरुद्ध हो जाएगी। पहले जमीन तैयार करो, फिर प्रार्थना अपने आप हो जाती है। प्रार्थना कुछ ऐसी है जिसे तुम कर नहीं सकते। ध्यान एक ऐसा काम है जिसे तुम कर सकते हो क्योंकि इसका संबंध मन से है।

असली योग

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