सियासतनामा

भाजपा पर नीतिश का भरोसा
बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार को लेकर एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने ऐसी बात कह दी है, जिसकी चर्चा अब चारों ओर हो रही है। दरअसल बिहार में आरएसएस की जांच कराने के मामले में सांसद ओवैसी ने कहा है कि इस मामले से साफ हो गया है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अब भाजपा पर भरोसा नहीं रह गया है। उनको डर है कि ये लोग प्रदेश का माहौल खराब करना चाहते हैं। इस प्रकार एक तीर से दो निशाने साधते हुए ओवैसी ने जहां नीतिश और भाजपा के संबंधों पर सवाल खड़े कर दिए हैं वहीं उन्होंने इसके बहाने पश्चिम बंगाल में हो रही राजनीतिक हिंसा की तरफ भी सभी का ध्यान खींच लिया है। कहने वाले तो यही कह रहे हैं कि संघ का बिहार में बढ़ता हस्तक्षेप मुख्यमंत्री नीतिश को रास नहीं आ रहा है, इसलिए यदि वो आगे और सख्ती करते नजर आ जाएं तो हैरानी नहीं होगी, लेकिन इस पर भाजपा क्या कहती है और क्या करेगी यह देखने वाली बात हो गई है।

ट्रेंड के साथ प्रियंका
कहते हैं जो समय के साथ अपने आपको बदल लेता है, जमाना उसी का साथ देता है। इस मामले में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की तारीफ करनी होगी कि वो वाकई समय के साथ अपने आपको ढालने में माहिर हैं। इस समय यह बात सोशल मीडिया के ट्रेंड को लेकर हो रही है। दरअसल सोशल मीडिया की दुनिया में रोजाना एक नया ट्रेंड चलता है, जिसमें आम आदमी से लेकर व्हीव्हीआईपी हर कोई शामिल हो जाता है। ऐसे ही जब ट्विटर पर ‘साड़ी ट्वीटर’ का ट्रेंड चला तो कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी खुद को रोक नहीं पाईं और वो खुद भी इससे जुड़ गईं। असल में उन्होंने साड़ी पहने अपनी एक तस्वीर साझा की है। खास बात यह है कि प्रियंका की साड़ी वाली यह तस्वीर उनकी शादी के दिन की है। उन्होंने बतौर कैप्शन लिखा है कि ’22 साल पहले शादी की सुबह पूजा वाली तस्वीर’। खास बात यह है कि तस्वीर शेयर करते हुए उन्होंने हेजटेग साड़ी ट्वीटर का भी इस्तेमाल किया है। इस तरह प्रियंका बतला रही हैं कि वो आप सभी में से ही हैं, इसलिए उन्हें भी इन सब चीजों को करना अच्छा लगता है। सच तो यह है कि इन सब में कोई राजनीति भी नहीं है।

क्या यह भी फिक्स?
जिस नाटकीय तरीके से विश्व कप 2019 की विजेता टीम इंग्लैंड को घोषित किया गया, उसने विवादों को जन्म दे दिया है। अब कहा यह जा रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट के नियमों के लिहाज से तो इंग्लैंड नहीं बल्कि न्यूजीलैंड को विश्व विजेता घोषित किया जाना चाहिए था। गौरतलब है कि मैच टाई होने के बाद हुआ सुपर ओवर भी टाई हो गया था, जिसके बाद ज्यादा बाउंड्रीज लगाने के आधार पर मेजबान इंग्लैंड को विश्व कप का नया शहंशाह घोषित किया गया। इंग्लैंड की जीत पर सवाल उठाने वालों ने खराब अंपायरिंग और नियमों का हवाला देते हुए कह दिया है असल में वर्ल्ड कप विजेता न्यूजीलैंड ही होनी चाहिए। ओवर थ्रो पर 6 रन इंग्लैंड को दिए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं। कहने वाले तो कह रहे हैं कि मैच फिक्सिंग को लेकर वैसे ही क्रिकेट की दुनिया बदनाम हो चली है, ऐसे में विश्व कप में इस तरह से इंग्लैंड को विजेता घोषित करना एक बड़ी भूल हो गई है। इस प्रकार विश्वकप पर अच्छी खासी राजनीति शुरु हो गई है।

तलाक पर फिर बहस
वायुसेना के एक फाइटर पायलट के तलाक मामले में हाईकोर्ट जस्टिस जीएस सिस्तानी और ज्योति सिंह की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि महिला द्वारा खुदकुशी करने की धमकी देना या इसके लिए सुसाइड नोट लिखना, गंभीर प्रकृति की मानसिक प्रताड़ना है। इससे पायलट के मन में इस बात की आशंका बनी रहती है कि उसकी पत्नी खुद को चोट पहुंचाकर उन्हें झूठे मामले में फंसा सकती है। तथ्यों को देखते हुए पायलट के मन में बनी आशंका को आधारहीन नहीं ठहराया जा सकता है। इसी के साथ परिवार न्यायालय द्वारा दिए गए तलाक को मंजूरी वाले फैसले को हाईकोर्ट ने भी मंजूरी प्रदान कर दी। इस पर कहा जा रहा है कि परिवार के मामलों के कारण जब जान-जोखिम में डालने वाले बन जाते हैं तो तलाक ही एक मात्र उपाय बचता है, जिससे जिंदगी बचाई जा सकती है। जानकारों की मानें तो अदालत के इस फैसले के बाद तलाक पर एक बार फिर बहस छिड़ने की गुंजाइश नजर आने लग गई है।

जनरल रावत की चिंता
सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने भविष्य को लेकर चिंता जाहिर की है और कहा है कि भविष्य के टकराव ज्यादा घातक और कल्पना से परे होंगे। इसमें तकनीकी और साइबर डोमेन की बड़ी भूमिका काम करेगी। चूंकि जनरल रावत ये बातें कारगिल विजय की बरसी पर कह रहे थे अत: इसे दो देशों के बीच लंबे समय से जारी तनाव और टकराव की स्थिति से जोड़कर देखा जा रहा है। वैसे भी राजनीतिक तौर पर भले ही दुश्मन देशों को सबक सिखाने की बातें बढ़-चढ़कर की जाती हों, लेकिन सभी जानते हैं कि परमाणु संपन्न देशों की यदि लड़ाई अब होती है तो बहुत ज्यादा नुक्सान होगा और यह मानवता के लिए सही नहीं कहा जा सकता है। इसलिए जानकार भी यही कहते हैं कि जनरल विपिन रावत की चिंता बिल्कुल सही है और इस पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है, क्योंकि युद्ध और हिंसा कभी किसी समस्या का समाधान नहीं होते हैं।

इमरान को नगर कीर्तन का निमंत्रण
आतंकवाद मामले को लेकर एक तरफ भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है। यहां तक कि दोनों देशों के बीच बातचीत के भी रास्ते बंद कर दिए गए हैं। वहीं दूसरी तरफ खबर आ रही है कि एसजीपीसी यानी शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को विशाल ‘नगर कीर्तन’ में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया है। गौरतलब है कि यह आयोजन 25 जुलाई को होना है और नवंबर माह में बाबा गुरुनानक देवजी की 550वीं जन्‍मतिथि है। इस खास मौके पर करतारपुर कॉरिडोर का उद्घाटन भी होना है। अब जबकि इमरान को निमंत्रण दिए जाने की बात सामने आ गई है तो इससे सियासी माहौल गरमाने में देर नहीं लगेगी। दरअसल इस निमंत्रण के बहाने पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी छवि सुधारने की कोशिश करता नजर आ जाए तो हैरानी नहीं होगी। मामला अल्पसंख्यकों से जुड़ा हुआ जो है।

माननियों की जान को खतरा?
कर्नाटक का सियासी ड्रामा अब अपने चरम पर पहुंच गया है। दरअसल एक तरफ एचडी कुमारस्वामी सरकार के मंत्री डीके शिवकुमार और जेडीएस विधायक शिवलिंगे गौड़ा मुंबई उस स्थल पर पहुंचे जहां बागी विधायकों को रखा गया। मुंबई एयरपोर्ट शिवकुमार ने कहा कि वो अपने दोस्तों से मिलने आए हैं। इसके साथ ही उन्होंने कह दिया कि हम सभी दोस्त राजनीति में एक साथ आए और यदि मरना है तो एक साथ ही मरेंगे। होटल के बाहर तैनात मुंबई पुलिस ने उन्हें अपने राजनीतिक दोस्तों से मिलने नहीं दिया और बताया गया कि बागी विधायकों ने मुंबई पुलिस से अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई थी, इसलिए यह व्यवस्था उन्हें दी गई है। अब कहा जा रहा है कि पाला बदलकर अपनी ही पार्टी को धोखा देने वाले इन बागी विधायकों को अपनी जान जाने का खतरा भी है, जिस कारण लगातार जगह बदले जाने की भी बातें कही जा रही हैं। इस पर जानकार कह रहे हैं कि यदि जान का इतना ही खतरा था तो फिर बागी तेवर क्यों अख्तियार किए, जो समस्या थी मिल-बैठकर सुलझा लेते, कम से कम सरकार भी चलती रहती और उनके सिर पर भी यह खतरा नहीं मंडराता। यहां सवाल यह भी है कि आखिर माननियों को खतरा किससे है, जिन्हें धोखा दिया उनसे या फिर जिन्हें आश्वासन दिया उनसे?

रूडी व हेमा, शत्रु की भूमिका में?
लोकसभा में विपक्ष की उपस्थिति भले ही नगण्य हो लेकिन इससे क्या, क्योंकि सच बोलने वाले और जनहित के मामले उठाने वाले तो सत्ता पक्ष में ही मौजूद हैं। दरअसल हुया यूं कि सांसद राजीव प्रताप रूडी और हेमा मालिनी ने प्रश्नकाल के दौरान पर्यटन मंत्रालय के कामकाज पर सवाल उठा दिए। यही नहीं बल्कि रूडी की तो पर्यटन मंत्री प्रहलाद पटेल से देर तक नोंकझोंक होती रही वहीं हेमा ने मथुरा का हवाला देते हुए सत्य उजागर करने जैसा काम किया कि धार्मिक पर्यटन परियोजना पर बीते पांच साल में दिखाने लायक कोई काम नहीं हुआ है। अब सरकार तो विज्ञापनों के जरिए इन क्षेत्रों में हो रहे बेहतर काम को दिखलाती आ रही है, ऐसे में अपने ही सांसदों का यूं विरोधियों वाला तेवर दिखाना विचारणीय प्रश्न हो गया है। सवाल करने वाले कह रहे हैं कि मोदी के पहले कार्यकाल में शत्रुघ्न सिन्हा विरोधी पक्ष की भूमिका में रहे हैं तो क्या दूसरे कार्यकाल में रुडी और हेमा उनकी भूमिका निभाएंगी?

तेज मॉं की शरण में
राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव जब से चारा घोटाले में मामले में जेल गए हैं, तभी से परिवार में कुछ न कुछ खटापिटी की खबरें आ रही हैं। ऐसे में लालू यादव के बड़े बेटे और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव पर राजनीतिक संकट के बादल भी मंडराते दिख रहे हैं। संभवत: यही वजह है कि तेज ने अपनी मां राबड़ी देवी की शरण ली है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि तेज ने मॉं राबड़ी देवी के साथ वाली अपनी एक तस्वीर को ट्वीट करते हुए भावुक संदेश भी दिया है। तेज लिखते हैं कि बहुत दिनों के बाद आज मां के हाथों से खाना खाया। गौरतलब है कि इससे पहले तेज ने लंबे अरसे बाद अपने छोटे भाई और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के साथ पार्टी बैठक में शिरकत की थी। इससे सियासी हल्के में यही संदेश गया है कि तेज अपने राजनीतिक संकट को टालने के लिए मॉं की शरण में पहुंचे हैं, अब देखना यह होगा कि वो इसमें कितने कामयाब हो पाते हैं।

नागेश्वर राव का सीबीआई से हटना
बहुचर्चित अधिकारी एम नागेश्वर राव को देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई से हटाकर फायर सर्विसेज, सिविल डिफेंस एंड होम गार्ड का डायरेक्टर जनरल नियुक्त कर दिया गया। इस पर सवाल उठाने वाले कह रहे हैं कि 1986 बैच के ओडिशा काडर के आईपीएस अधिकारी राव जो कि दो बार सीबीआई के अंतरिम चीफ़ का पद संभाल चुके हैं फिर उनसे आखिर गलती कहां हो गई। आखिर राव वही अधिकारी हैं जिन्हें बीते वर्ष सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर आलोक वर्मा और उनके डिप्टी राकेश अस्थाना के बीच हुए विवाद के बाद ही सीबीआई का अंतरिम चीफ़ बनाया गया था। बहरहाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश से आलाक वर्मा बहाल हुए और राव को पद से हटना पड़ा था, लेकिन सरकार ने यहां वर्मा को फायर डिपार्टमेंट में बतौर डीजी ट्रांसफर कर दिया था और पहली पसंद बने राव पुन: सीबीआई के अंतरिम चीफ बना दिए गए थे। इस तरह राव का सीबीआई से हटना अपने आपमें एक बड़ा मामला बन गया है।

कांग्रेस की रिसॉर्ट पॉलिटिक्स
कांग्रेस अपने विधायकों को खरीद-फरोख्त या भटकने से बचाने के लिए पिछले कुछ समय से रिसॉर्ट पॉलिटिक्स को अपनाती चली आई है। ऐसे ही जब गुजरात में अमित शाह और स्मृति ईरानी की खाली हुईं दो राज्यसभा सीटों के लिए उपचुनाव का समय आया तो कांग्रेस ने अपने 69 विधायकों को विशेष शिविर के नाम पर बनासकांठा जिले के बालाराम पैलेस रिसॉर्ट में पहुंचा दिया। इससे पहले उन्हें माउंट आबू ले जाने की बात कही जा रही थी। बहरहाल क्रॉस-वोटिंग से बचने के लिए ही कांग्रेस ने एहतियाती कदम उठाते हुए रिसॉर्ट पॉलिटिक्स को अपनाया है, फिर विरोधी जो भी कहें उससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। गौरतलब है कि जब से केंद्र में भाजपा नीत सरकार बनी है तभी से उस पर विधायक खरीद-फरोख्त के आरोप लगते आ रहे हैं। इससे पहले 2017 में कांग्रेस ने अनुभवी नेता अहमद पटेल की राज्यसभा में वापसी सुनिश्चित करने के लिए भी 44 विधायकों को पहले आणंद और फिर बेंगलुरु के एक रिसॉर्ट में रखा गया था। अब चूंकि केंद्र और गुजरात दोनों ही जगह भाजपा की सरकारें हैं अत: कांग्रेस के पास रिसोर्ट पॉलिटिक्स अपनाने के अलावा कोई दूसरा चारा बचा नहीं था।

पश्चिम बंगाल बने बांग्ला
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखते हुए मांग की है कि पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर ‘बांग्ला’ कर देना चाहिए। इसके साथ ही ममता ने कहा है कि संसद के मॉनसून सत्र में ही पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर बांग्ला किया जाए। गौरतलब है कि ममता की नाम बदलने वाली मांग को केंद्रीय गृह मंत्रालय पहले ही ठुकरा चुका है। इस संबंध में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय पहले ही कह चुके हैं किसी राज्य के नाम बदलने के लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता होती है। दरअसल पिछले साल 26 जुलाई 2018 को ममता सरकार ने पश्चिम बंगाल की विधानसभा में राज्य के नाम को बदले जाने का प्रस्ताव पास कर केंद्र को भेजा था, जिसके जवाब में गृह मंत्रालय ने यह बात कही और अब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सीधे प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर मांग को दोहराया है। इससे राज्य की सियासत गरमा जाए तो कोई बड़ी बात नहीं होगी, वैसे भी राजनीतिक हत्याओं को लेकर ममता सरकार पर केंद्र का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है।

संसद में पक्ष-विपक्ष एक साथ
जम्मू-कश्मीर मामले में जो लोग यह समझते हैं कि सत्ता पक्ष और विपक्ष में कोई मतभेद है तो उन्हें मालूम होना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर आरक्षण (संशोधन) विधेयक को राज्यसभा में भी पास कर दिया गया है। गृहमंत्री अमित शाह ने इस बिल को पेश किया तो विपक्षी पार्टियों ने भी समर्थन किया और अंतत: इसे उच्च सदन में भी मंजूरी मिल गई। खास बात यह रही कि कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की समय सीमा बढ़ाए जाने को लेकर भी विपक्षी दलों ने अपना समर्थन दिया। इन दोनों बिलों को पिछले सप्ताह ही लोकसभा में मंजूरी दी गई थी। जम्मू-कश्मीर से संबंधित बिलों पर मिले समर्थन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विपक्षी दलों के प्रति आभार जतलाया। इस प्रकार संदेश यही गया है कि जम्मू-कश्मीर में सत्ता हासिल करने के लिए तो राजनीति की जा सकती है, लेकिन देश की सुरक्षा और अखंडता से किसी प्रकार का कोई समझौता नहीं किया जा सकता है। इस मामले में पक्ष-विपक्ष सभी साथ-साथ हैं। देश के दुश्मनों और दुनिया के लिए इसे एक अच्छा संदेश माना जा रहा है।

सीएम बघेल को रोना क्यूं आया
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वो रोते नजर आ रहे हैं। दरअसल लोकसभा में कांग्रेस की करारी हार के बाद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पद पर आदिवासी नेता मोहन मरकाम को लाया गया है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बघेल को 2013 में कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया था। इसके बाद 2018 के विधानसभा चुनाव में 90 सीटों में से 67 सीटों पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की, लेकिन इसके बाद साल 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में कुल 11 में से महज दो सीटें ही कांग्रेस को हासिल हो सकीं। यही वजह रही कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस नेतृत्व में बदलाव किया है। विदाई भाषण देते हुए मुख्यमंत्री बघेल इस कदर भावुक हो गए कि उन्होंने आंसुओं से रोना शुरु कर दिया, जिससे उनके समर्थक भी भावनाओं में बहते नजर आए और ‘भूपेश बघेल जिंदाबाद, कांग्रेस पार्टी जिंदाबाद’ के नारे लगाने लग गए।

टुकड़े-टुकड़े गैंग से आशय?
कहते हैं कि अभिव्यक्ति के लिए प्रयोग किए जाने वाले शब्द वक्ता की छवि और सोच को उजागर कर देते हैं। ऐसे में जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सदन में जम्मू-कश्मीर मामले में प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु पर निशाना साधा तो हंगामा हो गया। वहीं उन्होंने यह भी कहा कि ‘जिनके मन में भारत का विरोध है, उनके अंदर डर होना चाहिए, हम टुकड़े-टुकड़े गैंग के मेंबर नहीं हैं।’ इस पर कहा जा रहा है कि भारत विरोधी तत्वों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और पूर्व सरकारों ने भी ऐसा ही किया है, लेकिन यह जो टुकड़े-टुकड़े गैंग के मेंबर होने की बात है तो मालूम होना चाहिए कि आखिर यह किस गैंग की बात कर रहे हैं, क्योंकि लोकतंत्र में तो राजनीतिक संगठन होते हैं जो लोकतंत्र को मजबूत करने का काम करते हैं, जबकि गैंग तयशुदा बदमाशों और अपराधियों के समूह का नाम होता है, ऐसे में सदन में किसी पर यूं निशाना साधना क्या मंत्री की अपनी सोच पर सवाल खड़े करना जैसा नहीं है? अनेक बुद्धिजीवियों ने तो सवाल करते हुए कहा है कि आखिर किस मानसिकता के तहत सदन में इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है वह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे देश के अंदर गलत संदेश जाता है।

ये सियासी गुटबाजी
कांग्रेस और भाजपा भले ही गुटबाजी से इंकार करती रहें, लेकिन दूर बैठे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी यह साफ तौर पर दिखाई देती है। दरअसल ओसाका में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जीत की बधाई देते हुए ट्रंप कह गए कि ‘आपने बड़ा काम किया है। दरअसल मुझे याद है कि जब बतौर प्रधानमंत्री आपने पहली बार कार्यभार संभाला था, तब बहुत सारे गुट सक्रिय थे जो आपस में लड़ रहे थे, लेकिन अब वे सभी साथ हैं। यह आपके और आपकी क्षमताओं के लिए गर्व करने वाली बात है।’ इस तरह जो गुटबाजी भारत में रहते हुए सक्रिय नेताओं को नजर नहीं आती वह दूर बैठे ट्रंप को नजर आ जाती है और एक सटीक टिप्पणीकार की तरह वो इसके लिए मोदी को बधाई भी दे देते हैं कि उन्होंने गुटों को एकजुट करने में सफलता हासिल कर ली है। इसलिए सवाल किए जा रहे हैं कि क्या कांग्रेस भी अपनी गुटबाजी को खत्म करके सभी को एक प्लेटफार्म में ला सकेगी, क्योंकि इसके बगैर जीत सुनिश्चित हो नहीं सकती है।

जेल में हथियार…!
पिछले दिनों जेल के अंदर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें उम्रकैद की सजा काट रहे दो कैदियों को हथियार लहराते हुए दिखाया गया था। बदनामी के साथ खुलासा हुआ कि मामला उन्नाव जेल का है, जिसके बाद उन्नाव जेल अधीक्षक एके सिंह की को जिलाधिकारी ने फटकारा और उनकी रिपोर्ट पर चार जेलकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई भी कर दी गई। जिन पर कार्रवाई की गई उन पर बदमाशों से मिलीभगत का चार्ज लगा, जिन्होंने जेल के अंदर उन्हें हथियार दिए और फिर वीडियो बनाकर वायरल भी कर दिया। इस घटना के बाद कहा जा रहा है कि जिन बदमाशों की तूती जेल के बाहर बोलती है, उन्हें जेल के अंदर भी तमाम सुविधाएं मुहैया रहती हैं। यह घटना इस बात का सुबूत मात्र है, जबकि तमाम जेलों में यही होता आया है। आरोप लगते रहे हैं कि बड़ा अपराधी जब जेल पहुंचता है तो उसकी गेंग जेल के अंदर भी बन जाती है और फिर उसके नाम का सिक्का चलने लगता है। इसलिए अपराधी भी अब जेल जाने से घबराते नहीं है, बल्कि संदेश यह देते हैं कि वो कुछ दिनों के लिए आराम करने जेल जा रहे हैं। जेलों की इस छवि को बनाने में जेल के चंद अधिकारी और कर्मचारियों समेत गंदी राजनीति करने वाले प्रभावी नेता भी होते हैं, जिनका दखल जेलों में बहुतायत में देखा गया है।

राहुल की खरी-खरी
लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पद छोड़ने की बात कही थी, तब यह समझा गया था कि हार के कारण ऐसा कह रहे हैं, लेकिन समय निकलने के बाद वो अपनी जिद छोड़ देंगे। ऐसा कुछ होता हुआ दिखा नहीं है, दरअसल खबर है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता में कांग्रेस के लोकसभा सांसदों की बैठक संपन्न हुई थी। इस बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी मौजूद थे। बैठक के दौरान कांग्रेस के 51 सांसद राहुल को इस्तीफा वापस लेने के लिए मनाते देखे गए, लेकिन राहुल गांधी ने भी खरी-खरी सुना दी और उन्होंने कहा कि अब वो कांग्रेस अध्यक्ष नहीं रहेंगे। राहुल ने मीडिया के समक्ष भी यही कहा है कि अब वो अध्यक्ष नहीं बने रहना चाहते हैं। कांग्रेस सांसद लोकसभा चुनाव में हुई हार को सामूहिक बताकर नैतिक जिम्मेदारी से राहुल को बरी करते देखे गए, लेकिन राहुल ने भी बतला दिया कि उनका स्टैंड साफ है और अब वो आगे अध्यक्ष नहीं बने रहना चाहते हैं।

जनता दरबार ढहा
टीडीपी प्रमुख की गुजारिश के बावजूद जनता दरबार को ढहा दिया गया। दरअसल अमरावती में प्रजा वेदिका बिल्डिंग पर आधी रात को बुल्डोजर चलाने की खबर आई। यह वही इमारत थी जहां पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की सरकार जनता दरबार लगाया करती थी। यह कार्रवाई वर्तमान मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के आदेश के बाद की गई और बताया गया कि यह बिल्डिंग अवैध है। इस पर राजनीतिक गलियारे में चर्चा आम हो गई कि जिस इमरात में जनता दरबार लगाया जाता था वह अवैध थी, इसलिए उसमें बैठकर जो फैसले लिए गए होंगे वो कहां से वैध हो सकते हैं। इसलिए बिल्डिंग गिराने के साथ ही साथ पिछली सरकारों के फैसलों पर भी एक सरसरी नजर दौड़ाने की बातें की जा रही हैं। गौरतलब है कि तेलगू देशम पार्टी ने इस बिल्डिंग को 2017 में बनाया था, जिसकी लागत को लेकर भी विवादित बयान आए थे। बहरहाल विपक्ष के नेता के तौर पर अब नायडू को कहीं और अपना तामझाम फैलाना होगा, क्योंकि यह तो अवैध घोषित हो गई और प्रशासन ने कार्रवाई भी कर दी।

ये क्या फडणवीस डिफॉल्टर?
महाराष्ट्र से हैरान करने वाली खबर आ रही है, जिसके मुताबिक राज्य के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने पानी का बिल नहीं चुकाया, इस कारण बीएमसी ने उनके घर को डिफॉल्टर घोषित कर दिया। बीएमसी की इस डिफॉल्टर सूची में 18 मंत्रियों के नाम भी शामिल हैं। सीएम के बंगले ‘वर्षा’ पर तकरीबन 7 लाख, 44 हजार, 981 रुपए का बिल बाकी बताया जा रहा है। पानी को लेकर महाराष्ट्र में जो स्थिति बनी है उसके बाद सरकार पर सवाल उठना लाजमी हैं, इस पर बीएमसी का यह कदम आमजन की आंखें खोलने जैसा है। दरअसल जिन्हें डिफॉल्टर घोषित किया गया है वो अतिविशेष व्यक्तियों में शुमार किए जाते हैं और जब वो ही इस तरह का कारनामा करेंगे तो समाज में क्या संदेश जाएगा। इस पर चर्चा आम हो रही है और कहा जा रहा है कि कम से कम जनप्रतिनिधियों को तो इस तरह का व्यवहार नहीं करना चाहिए, जिससे लोगों में भी उसी तरह का व्यवहार करने की इच्छा जागृत होने लग जाए। एक तरफ राज्य में जल संकट है वहीं दूसरी तरफ सीएम बंगले पर पानी का बिल बकाया होने की बात हो रही है, यह वाकई चिंतनीय बात है।

चमकी का हवाई सर्वेक्षण
बिहार में लू लगने और चमकी बुखार से करीब 200 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और ऐसे में खबर आई कि मुख्यमंत्री नीतिश कुमार हालात का जायजा लेने हवाई सर्वेक्षण करेंगे। इस पर कुछ लोगों ने कह दिया कि मानों राज्य में बाढ़ आई हो कि मुख्यमंत्री जी हवाई सर्वेक्षण करेंगे। यह बात उनके कानों तक पहुंच गई होगी, इसलिए हवाई सर्वेक्षण का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया। गौरतलब है कि इससे पहले जब नीतिश चमकी बुखार से मरने वाले बच्चों और उनके परिजनों का हाल जानने अस्पताल पहुंचे थे तो वहां मौजूद लोगों ने विरोध स्वरुप ‘नीतिश गो बैक’ के नारे लगाए थे। संभवत: यही वजह रही होगि कि उन्होंने हवाई सर्वेक्षण का फैसला लिया, लेकिन दूसरे ही पल उससे भी वो पलट गए। बच्चों की मौत को लेकर नीतिश विपक्ष ही नहीं बल्कि अपने ही कुछ लोगों के निशाने पर हैं।

संभव है वन नेशन, वन पोल?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दूसरे कार्यकाल को ऐतिहासिक बनाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। इसी कड़ी में उन्होंने वन नेशन, वन पोल की बात कही है। वैसे पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में बैठने का अपना ही महत्व है, लेकिन जहां तक वन नेशन, वन पोल की बात है तो इसके लिए विपक्षी दल एक राय हो पाएंगे कहना मुश्किल है। वैसे भी जानकार तो यही कह रहे हैं कि अनेक स्तर पर होने वाले चुनावों को एक साथ करवाना सरकार के लिए नहीं बल्कि चुनाव आयोग और सुरक्षा तंत्र के लिए चुनौती की बात होती है, इसलिए इस पर कोई भी फैसला लेने से पहले चुनाव आयोग और उससे जुड़े अन्य तंत्रों को मिल-बैठकर तय करने दिया जाना चाहिए कि बेहतर क्या हो सकता है। वैसे कहने को तो यह भी कहा जा रहा है कि एक देश एक चुनाव से समय और पैसे की बर्बादी भी रोकी जा सकेगी, लेकिन यह फिलहाल संभव नजर नहीं आती है।

नीतिश कुमार अब जागे ?
बिहार के मुजफ्फरपुर में सैकड़ों बच्चे एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी चमकी बुखार की चपेट में हैं, जिससे सवा सौ के करीब बच्चों की मौत हो चुकी है। इसे लेकर स्वास्थ्य विभाग से लेकर संबंधित अस्पतालों की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। बच्चों में हो रही घातक बीमारी और मौतों को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन और बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे के खिलाफ मामले भी दर्ज कराए जा चुके हैं। इसके बाद खबर आती है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार मंगलवार को मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच अस्पताल पहुंचे और चिकित्सकों से मिलकर हालात की समीक्षा की। इस पर विरोधी कह रहे हैं कि नीतिश की तब नींद खुल रही है जबकि इतनी ज्यादा तादात में बच्चों की मौत हो चुकी है। वैसे बच्चों की मौतों पर मानवाधिकार आयोग ने केंद्र और राज्य सरकार को भी नोटिस भेजा है। दुखियारे तो यही कह रहे हैं कि इससे क्या क्योंकि मरने वाले बच्चे तो वापस नहीं आने वाले। इसलिए व्यवस्था को समय रहते सुधारा जाना चाहिए, अन्यथा तमाम जिम्मेदारों को खुद अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझते हुए इस्तीफे सौंप देने चाहिए, क्योंकि इस तरह बच्चों की मौत सभ्य और मानवीय समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता है।

आगाज से पहले ही मसाज बंद
ट्रेनों में मालिश की सुविधा वाली योजना शुरु होने से पहले ही बंद हो गई। इसका मुख्य कारण शुरु होने से पहले ही इसका विरोध हो जाना रहा है। दरअसल भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ‘ताई’ ने इस योजना पर सवाल उठाते हुए बकायदा रेल मंत्री पीयूष गोयल को पत्र भी लिखा था। उन्होंने कहा था कि क्या पश्चिम रेलवे के रतलाम रेल मंडल की प्रस्तावित मालिश योजना को रेल मंत्रालय ने मंजूरी दी है? इसके साथ ही उन्होंने गंभीर सवाल किया कि इस प्रकार की (मालिश) वाली सुविधा के लिए चलती ट्रेन में किस तरह की व्यवस्था की जाएगी क्योंकि इससे यात्रियों, विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा एवं सहजता के संबंध में कुछ प्रश्न हो सकते हैं। इससे पहले इंदौर क्षेत्र के नवनिर्वाचित भाजपा सांसद शंकर लालवानी ने भी रेलवे की मसाज योजना को लेकर रेल मंत्री को पत्र लिखा था। इस प्रकार अपनों का ही विरोध देख इस मसाज सुविधा वाली योजना को बंद कर दिया गया।

अमेरिका में ‘मोदी है तो मुमकिन है…’
पिछले आम चुनाव में जिस तरह से अबकी बार मोदी सरकार का नारा बुलंद हुआ था, उसी तर्ज पर हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में ‘मोदी है तो मुमकिन है..।’ के नारे ने धूम मचाई और पूर्ण बहुमत के साथ एक बार फिर मोदी सरकार केंद्र में बिराजमान है। इस नारे का असर सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि अमेरिका जैसे देश तक में हुआ है, जिसका उदाहरण खुद अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने पेश कर दिया है। दरअसल पोम्पिओ इसी माह भारत दौरे पर आने वाले हैं। इस दौरान वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नवनियुक्त विदेश मंत्री एस जयशंकर से भी मुलाकात करेंगे। इससे पहले पोम्पिओ ने यूएस-इंडिया बिजनेस काउंसिल के इंडिया आइडियाज समिट में भाषण देते हुए कहा कि ‘जैसा प्रधानमंत्री मोदी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान नारा दिया ‘मोदी है तो मुमकिन है’ या ‘मोदी मेक्स इट पॉसिबल’, मैं भी भारत और अमेरिका के बीच संबंध को आगे बढ़ते देख रहा हूं।’ कहने वाले तो यही कह रहे हैं कि मोदी की गूंज अमेरिका में भी सुनाई दे रही है, जिसका असर विश्व में देखने को जल्द ही मिलेगा।

कुलपति हैं शाह
भाजपा के महासचिव एवं पश्चिम बंगाल के पार्टी प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने कहा है कि ममता बनर्जी का जहाज अब डूबने को है। उन्होंने इसे बचाने के लिए भले ही चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से मुलाकात की हो, लेकिन प्रशांत जिस यूनिवर्सिटी में पढ़े, वहां के कुलपति हैं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह। बंगाल में विजय जुलूस पर प्रतिबंध के सवाल पर वह बोले कि ममता कुछ भी कर सकती हैं, उनको न संविधान पर और न ही कानून पर विश्वास है। वहां तो सिर्फ उनका ही कानून चलता है। प्रतिबंध लगाना उनका फ्रस्ट्रेशन भर है। नीति आयोग पर पहले ही वह कह चुकी हैं कि मैं पीएम को नहीं मानती, विजयवर्गीय ने यहां तक कहा कि ममता सामान्य नहीं हैं, उन्हें मनोचिकित्सक की जरूरत है। बंगाल में राष्ट्रपति शासन के सवाल पर उन्होंने कहा कि हम इसके पक्षधर नहीं। मुख्यमंत्री कमलनाथ के भानजे रतुल पुरी के उज्जैन दर्शन संबंधी सवाल पर विजयवर्गीय बोले कि उनकी टीम को मालूम है कि सरकार पांच साल नहीं चलनी है, इसलिए फावड़ा लेकर कमाई में लगे हैं। मीडिया से चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि मप्र में सभी जानते हैं कि यह सरकार ज्यादा दिन नहीं चलने वाली। इस मुद्दे पर और कुरेदने पर उन्होंने कहा कि मैं अभी मिशन बंगाल में जुटा हूं, इसलिए मप्र कांग्रेस के लोगों को अपनी धड़कन बढ़ाने की जरूरत नहीं है।

ममता का जय हिंद जय बांग्ला
पश्चिम बंगाल में कार्ड का खेल खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है भाजपा ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को जय श्री राम लिखे दस लाख पोस्टकार्ड भेजने का फैसला किया है। इसके जवाब में अब ममता बैनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने तय किया है कि वह भी भाजपा को जय हिंद जय बांग्ला लिखे 20 लाख पोस्ट कार्ड भेजेगी। गौरतलब है कि भाजपा ने पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव में हार का सामना करने वाली तृणमूल कांग्रेस के जख्मों पर नमक छिड़कते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जय श्री राम लिखे दस लाख पोस्टकार्ड भेजने का फैसला किया था। पश्चिम बंगाल से भाजपा के नवनिर्वाचित सांसद अर्जुन सिंह ने कहा था हमने मुख्यमंत्री के आवास पर 10 लाख पोस्टकार्ड भेजने का निर्णय किया है जिन पर ‘जय श्रीराम’ लिखा होगा। तृणमूल कांग्रेस के विधायक रह चुके सिंह आम चुनाव से पहले भाजपा में शामिल हुए थे। उन्होंने यह बात भाजपा कार्यकर्ताओं के समूह पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किए जाने के बाद कही थी जो उस स्थान के बाहर प्रदर्शन के दौरान ‘जय श्रीराम’ के नारे लगा रहे थे जहां तृणमूल कांग्रेस के नेता बैठक कर रहे थे।

केंद्र, गांधीवादी या गोडसेवादी?
देश में पिछले कुछ समय से गोडसेवादियों ने सिर उठाना शुरु किया हुआ है और सीधे-सीधे महात्मा गांधी पर हमले बोल रहे हैं। ऐसे में जब एक आईएएस अधिकारी ने गांधी और गोडसे पर विवादित ट्वीट किया तो कांग्रेस और एनसीपी उन्हें निलंबित करने की मांग कर दी। दरअसल बृहन मुम्बई नगरपालिका की उप नगर आयुक्त निधि चौधरी ने ट्वीट करते हुए महात्मा गांधी की प्रतिमा को हटाने का अनुरोध किया और उनके हत्यारे नाथुराम गोडसे को धन्यवाद ज्ञापित कर दिया। बहरहाल विवाद बढ़ता देख अधिकारी ने ट्वीट हटा दिया और उसे एक व्यंग्य करार दिया, जिसे तोड़-मरोड़कर पेश करने की दलील भी दी गई। इससे क्या क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री चव्हाण तो यही कह रहे हैं कि उनका ट्वीट निंदनीय है। यह उनकी गिरी हुई सोच को दर्शाता है। इसी समय इन विचारों को रोकने की जरूरत है। चाव्हाण ने कहा कि केंद्र सरकार को बताना चाहिए कि वह गांधी की विचारधारा के साथ है या गोडसे की। इसके साथ ही सियासत गरमा गई और कांग्रेस नेताओं ने लगातार मोदी सरकार पर निशाना साधने का काम किया है।

जयशंकर को चीनी बधाई
पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर को मोदी सरकार में विदेश मंत्री बनाए जाने पर चीन के विदेश मंत्री और स्टेट काउंसलर वांग यी ने भी बधाई दी है। यही नहीं बल्कि वांग यी ने तो चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों के विकास में जयशंकर के बतौर भारतीय राजदूत सकारात्मक योगदान की भी सराहना की है। यह अलग बात है कि नए विदेश मंत्री का पदभार संभालने वाले जयशंकर मौजूदा वक्त में संसद के दोनों सदनों में से किसी के भी सदस्य नहीं हैं। इससे स्पष्ट हो गया है कि जयशंकर को यह अवसर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी होने की वजह से मिला है। दावे करने वाले तो यहां तक कहते हैं कि जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब चीन दौरे के दौरान जयशंकर ने उनकी काफी मदद की थी, जिससे प्रभावित प्रधानमंत्री मोदी ने अब उनका एहसान इस तरह से उतारने का काम किया है। एक तरह से चीनी बधाई ने जयशंकर से जुड़े तमाम वृत्तांतों को याद दिलाने का भी काम कर दिया है। वैसे जयशंकर नागरिक सम्मान पद्मश्री अवॉर्ड से भी नवाजे जा चुके हैं।

खुशी के साथ मायूसी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूसरी पारी शुरु होने की खुशी तो तमाम लोगों को है, लेकिन पिछली सरकार में विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालने वाली सुषमा स्वराज ने शपथ ग्रहण के बाद ट्विटर पर जो विदाई संदेश लिखा उससे उनके प्रशंसक मायूस हो गए। इसके बाद सोशल मीडिया पर पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की तारीफों के पुल बांधना शुरु हो गए। इससे संदेश गया कि जहां एक तरफ भाजपा नीत सरकार के बनने से लोग खुश हैं तो वहीं सुषमा जैसी मंत्री के जाने से वो दु:खी और निराश भी हैं। गौरतलब है कि बतौर प्रधानमंत्री मोदी के दूसरे कार्यकाल में सुषमा स्वराज को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली है और अब जबकि शपथ ग्रहण भी संपन्न हो चुका है तो खुशी के साथ कुछ लोग अपने चहेतों को जगह नहीं मिलने से मायूस भी दिख रहे हैं।

आंधी-बारिश के सियासी मायने
वाईएसआर कांग्रेस के अध्यक्ष जगनमोहन रेड्डी गुरुवार को आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेते उससे पहले तेज आंधी के साथ हुई बारिश ने विजयवाड़ा स्टेडियम की तमाम तैयारियों को उलट-पलट कर रख दिया। इस पर राजनीतिक पंडितों ने कहना शुरु कर दिया कि जगनमोहन रेड्डी ने जिस शानदार तरीके से विधानसभा और लोकसभा चुनावों में जीत हासिल की है, उससे विरोधियों के खेमे में इसी तरह की आंधी आने और बारिश होने के आसार बने हुए हैं, जिसे प्रकृति ने अपनी तरह से दिखला दिया है। विरोधियों के लिए रेड्डी खुद किसी आंधी-तूफान से कम नहीं हैं, इसलिए इसका असर आगामी दिनों में और ज्यादा दिखाई देगा। गौरतलब है कि वाईएसआर कांग्रेस को विधानसभा में 175 में से 151 सीटों पर जीत हासिल हुई है, इसी प्रकार लोकसभा की 25 सीटों में से 22 सीटों पर पार्टी ने कब्जा जमाया है, यह किसी आंधी और बारिश से कम नहीं है।

खींचतान से बढ़ेगा संकट
लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद जहां पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने को लेकर राहुल गांधी अड़ गए हैं तो वहीं दूसरी तरफ संसद में पार्टी नेता कौन होगा इस बात को लेकर भी खींचतान शुरु हो गई है। इससे पार्टी के अंदर की खींचतान भी सामने आ गई है। चूंकि इस लोकसभा में कांग्रेस महज 52 सीटें ही जीत पाई है, इसलिए इस दफा भी पार्टी को प्रतिपक्ष के नेता का पद हासिल नहीं हो पाएगा। बावजूद इसके लोकसभा में पार्टी को नेता तो चुनना होता है। पिछली दफा मल्लिकार्जुन खड़गे यह जिम्मेदारी निभा रहे थे, लेकिन इस बार के चुनाव में वो हार गए, इसलिए अब इस बात को लेकर बहस छिड़ी हुई है कि उनकी जगह कौन नेता होगा। राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की पेशकश करते हुए सदन में नेता का पद ग्रहण की बात कही है। उनके अलावा केरल से सांसद शशि थरुर और पंजाब से सांसद मनीष तिवारी का नाम भी आगे बढ़ा दिया गया, जिससे सदन में नेता कौन होगा इस पर भी खींचतान शुरु हो गई है। जानकारों की मानें तो इस खींचतान से राज्यों की कांग्रेस सरकारों पर विपरीत असर पड़ेगा और पहले से कमजोर सरकारें और कमजोर होती चली जाएंगी। कांग्रेस शासित राज्यों में संकट बढ़ सकता है, इसलिए इसे जल्द ही खत्म किया जाना चाहिए।

लालू को हार का तनाव
रांची के आरआईएमएस अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने बीते दो दिनों से खाना छोड़ रखा है। उनका रोजाना वाला रुटीन बुरी तरह से अव्यवस्थित हो गया है। डॉक्टरों की मानें तो लालू प्रसाद यादव चिंता या फिर गहरे तनाव में हैं, जिस कारण उन्हें भूख-प्यास नहीं लग रही है। वहीं सियासी गलियारे में चर्चा आम हो गई है कि पारिवारिक खींचतान और अब पार्टी की करारी हार से लालू तनाव में आ गए हैं। फिलहाल डॉक्टर तो यही सलाह दे रहे हैं कि वो समय पर खाना खाएं और दवाइयां लें, क्योंकि ऐसा नहीं करने से उनकी तबियत और भी बिगड़ सकती है। जबकि पार्टी विधायक दावा कर रहे हैं कि लालू को कोई चिंता या तनाव नहीं है, बल्कि उन्होंने अगले विधानसभा चुनाव के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया है। इस पर विरोधी कहते हैं कि कुछ लोकसभा चुनाव में कर लिया है और अब कुछ आगामी विधानसभा में कर लेंगे, इस बात का तनाव नहीं होगा तो क्या वो खुशियां मनाएंगे?

निरहुआ जो हारकर भी जीते?
भोजपुरी स्टार दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ भाजपा की टिकट पर आजमगढ़ से चुनाव मैदान में थे, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से वो बुरी तरह हार गए। इसे लेकर लोगों ने उन्हें निशाने पर लिया, जिसे लेकर निरहुआ ने ट्वीट करते हुए लिखा कि ‘ना ये देश रुकेगा, ना ये देश झुकेगा, आए तो मोदी ही’। इस पर निरहुआ के फैंस कहते हैं कि आप हारे नहीं हैं, बल्कि आप तो विजयी हुए हैं, हार तो अहंकारी अखिलेश की हुई, जिसे आपने आईना दिखाने का काम किया है। इस पर कुछ लोगों ने याद दिलाया है कि पहले निरहुआ ने ही कहा था कि उन्हें हराने वाला कोई पैदा नहीं हुआ है, क्योंकि वो स्वतंत्र आदमी हैं और उनके विचार भी स्वतंत्र हैं। फिर आखिर क्या हुआ कि इस मोदी की आंधी में भी वो हार गए। इस पर उन्हें चिंतन जरुर करना चाहिए।

शत्रु को दिख रही है गड़बड़ी
लोकसभा चुनाव 2019 में करारी हार के बाद बिहार के पटना साहिब से कांग्रेस प्रत्याशी शत्रुघ्न सिन्हा कहते देखे जा रहे हैं कि कुछ तो बड़ा खेल हुआ है। गौरतलब है कि शत्रु को केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने जोरदार शिकस्त दी है। शत्रु कहते हैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश के नतीजों को देखकर तो यही लगता है कि कुछ तो बड़ा खेल हुआ है। बहरहाल शत्रु को कम से कम यह तो मालूम ही है कि यह समय इस तरह की बातें करने के लिए माकूल नहीं है। इसके बाद भी वो कुछ तो गड़बड़ है कहकर टीवी के मशहूर करेक्टर एसीपी प्रद्युमन क्यों बन रहे हैं यह आमजन को समझ नहीं आ रहा है। लोग तो यही कह रहे हैं कि अब हार गए सो हार गए, इस पर इतना मलाल काहे को, आगे चुनाव आएंगे तब हिसाब बराबर कर लें।

ममता का सधा हुआ बयान
लोकसभा चुनाव के नतीजों ने यह तो बतला दिया कि एक बार फिर मोदी सरकार का नारा अक्षरश: सत्य हो रहा है। इससे विरोधियों को खासी परेशानी होती देखी जा रही है, लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बहुत ही सधा हुआ बयान देकर बतला दिया है कि वो राजनीति की पक्की खिलाड़ी हैं। उन्हें जीत और हार दोनों स्वीकार है। दरअसल पश्चिम बंगाल में भाजपा को अप्रत्याशित तरीके से बढ़त मिली इस पर ममता बनर्जी ने ट्वीट करते हुए कहा कि ‘विजेताओं को बधाई। लेकिन सभी हारने वाले लूजर्स नहीं हैं। चुनाव परिणामों पर समीक्षा की जाएगी उसके बाद ही कुछ कहा जा सकेगा। ममता आगे कहती दिखीं कि पहले वोटों की गिनती और वीवीपैट से मिलान पूरा होने दिया जाए। ममता के इस सधे हुए बयान को लेकर विश्लेषकों ने कहा है कि दीदी वाकई राजनीतिज्ञ हैं, इसलिए उन्होंने हार को भी बहुत ही सहज ढंग से स्वीकार करने का उपक्रम किया है, वर्ना इस समय तो अच्छे-अच्छे नेताओं की भाषा बिगड़ जाती है।

दीदी को झटका देंगे चुनाव नतीजे
लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि दीदी (ममता) बनर्जी के 40 विधायक उनके संपर्क में हैं। चुनाव परिणाम के बाद वे सभी तृणमूल कांग्रेस छोड़ देंगे। इसी तरह की बातें अन्य भाजपा नेता भी करते देखे गए, जिसे लेकर विपक्ष ने निशाना साधते हुए कहा था कि ये चुनाव प्रचार कर रहे हैं या विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त के लिए निकले हुए हैं। इसके बाद राजनीति गरमा गई थी, लेकिन चुनाव के सातों चरण पूर्ण होने के बाद अब जबकि एक चैनल ने सूत्रों के हवाले से कुछ इसी तरह की बात कह दी है तो पुन: चर्चा आम हो गई कि कहीं कुछ जरुर पक रहा है, वर्ना यूं बातें नहीं होतीं। दरअसल सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि तृणमूल के दो सांसद भाजपा के संपर्क में हैं। दावा यहां तक किया गया है कि ये दोनों सांसद इस चुनाव में भी टीएमसी की टिकट पर चुनाव लड़े हैं, लेकिन टेलिफोन के जरिए वो भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के संपर्क में हैं। अगर यह सच है तो चुनाव परिणाम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को करारा झटका देने वाले साबित होंगे।

कर्नाटक मॉडल से रुकेंगे मोदी
लोकसभा चुनाव 2019 का अंतिम चरण और नतीजों का इंतजार किए बगैर ही जोड़-तोड़ की राजनीति शुरू हो गई है। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी विपक्ष को एकजुट करने के लिए सक्रिय नजर आ रही हैं। मौजूदा हालात को देखते हुए दावा किया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी को दोबारा सत्ता में काबिज होने से रोकने के लिए कांग्रेस कर्नाटक मॉडल की तर्ज पर भी केंद्र में सरकार गठन का ऑफर ला सकती है। फिलहाल बातें तो यूं ही हो रही हैं कि कांग्रेस कोशिश करेगी कि विपक्षी दलों के साथ खुद केंद्र में वह सरकार बनाए, लेकिन यदि ऐसा होना संभव नहीं हुआ तो कर्नाटक मॉडल तो सामने है ही, फिर चिंता की बात नहीं। ये कयास मिलीजुली सरकार वालों के हैं, यदि किसी को स्पष्ट बहुमत मिल जाता है तो फिर कोई बात नहीं।

प्रधानमंत्री के भाई भी देते हैं धरना
राजस्थान से खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाई प्रहलाद मोदी एस्कार्ट की मांग को लेकर जयपुर के बगरु थाने के बाहर धरने पर बैठ गए। माजरा कुछ यूं था कि प्रधानमंत्री के भाई गत रात जयपुर-अजमेर राष्ट्रीय राजमार्ग से यात्रा कर रहे थे, ऐसे में उन्होंने पुलिस से एस्कार्ट की मांग रख दी और धरने पर बैठ गए। इस बीच करीब एक घंटे तक जयपुर के पुलिस आयुक्त आनंद श्रीवास्तव उन्हें समझाते रहे कि वो स्कॉट के पात्र नहीं हैं और आदेशानुसार उन्हें दो पीएसओ उपलब्ध कराए जा रहे थे, लेकिन वो समझ नहीं पाए और धरने पर बैठ गए। मजेदार बात यह थी कि मोदी जी तो पीएओ को अपने वाहन में ले जाने को तैयार ही नहीं थे और लगातार कह रहे थे कि उन्हें अलग पुलिस वाहन में भेजा जाए। बहरहाल इससे विरोधियों को कहने का मौका तो मिल ही गया कि प्रधानमंत्री मोदी के भाई भी धरना देना जानते हैं, यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री मोदी की ही तरह उन्हें भी दरअसल बहुत सी असलीयतें मालूम नहीं हैं, इसलिए पात्र और अपात्र के बारे में वो नहीं जान सके।

इन बहरुपियों से कैसे पाएं पार
कांग्रेस मुख्यालय में रोजाना होने वाली मीडिया ब्रीफिंग के दौरान ऐसा कुछ हुआ कि देखने वाले भी हैरान रह गए। दरअसल कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने जैसे ही मीडिया को संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ‘अजय सिंह बिष्ट’ कह कर उन्हें निशाने पर लिया तभी एक युवक उठा और भारत माता की जय के नारे लगाना शुरू कर दिया। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले से आए उस शख्स के हाथ में तिरंगा झंडा भी था। वह कह रहा था कि योगी को अजय सिंह बिष्ट क्यों कहा गया और इसके साथ ही उसने अमेठी को लेकर भी सवाल शुरु कर दिए। इस शख्स की पहचान भाजपा के निष्क्रिय सदस्य के तौर पर हुई है, जिसे हंगामा करने पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और गार्ड ने मीडिया कक्ष से हटा दिया। इस प्रकार कांग्रेस और अन्य विपक्ष के नेताओं की रैलियों व सभाओं में घुसकर इस तरह के कृत्य करने वालों की कमी नहीं है। विरोधियों ने इन्हें बहरुपिया करार देते हुए कहा है कि इनसे पार पाना भी अब मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि ये अचानक हमला कर देते हैं और हिंसा पर भी उतारु हो जाते हैं। इस घटना पर सवाल किया जा रहा है कि कहीं यह सब भाजपा की रणनीति का हिस्सा तो नहीं है।

राहुल का भरोसा
लोकसभा चुनाव के छठवें चरण का मतदान खत्म होने के साथ ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी की जीत का दावा करते हुए कह दिया है कि नतीजे आने के साथ ही प्राधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दौर भी खत्म हो जाएगा। राहुल कहते हैं कि अंग्रेजी हुकूमत के बाद पहली बार किसी एक संगठन ने हिंदुस्तान की तमाम संस्थाओं पर कब्जा करने की कोशिश की है। एक तरह से प्रधानमंत्री मोदी और आरएसएस इन संस्थाओं पर नियंत्रण करने के लिए लगातार हमला कर रहे हैं। देश के सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को काम नहीं करने दिया जा रहा है, जिस कारण पहली बार चार जज सार्वजनिक तौर पर बयान देते दिखे हैं। यही नहीं तमाम मंत्रालयों में स्पेशल ओएसडी बैठा दिया गया है, जो कि आरएसएस द्वारा नियुक्त किया गया आदमी है। एक प्रकार से यह वही रिमोट कंट्रोल है, जो देश की सभी संस्थाओं को चला रहा है। कुल मिलाकर यह आक्रमण सीधे-सीधे संविधान पर है, क्योंकि ये तमाम संस्थाएं तो संविधान से संरक्षित हैं। इन तमाम आरोपों के साथ ही राहुल का दावा है कि चुनाव परिणाम आने के साथ ही मोदी का दौर भी खत्म हो जाएगा और सब कुछ एक बार फिर पटरी पर आने लग जाएगा।

दबंगई चलेगी पर किसकी
लोकसभा चुनाव के छठे चरण के मतदान के दौरान उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर में वोटिंग का दौर जारी था, इसी बीच भाजपा उम्मीदवार मेनका गांधी और गठबंधन से बीएसपी के प्रत्याशी चंद्रभद्र सिंह उर्फ सोनू सिंह के बीच ऐसा कुछ हो हुआ कि सुर्खियां बन गया। बताया जाता है कि मेनका ने सोनू सिंह का रास्ता रोककर कहा कि दबंगई नहीं चलेगी। अब चूंकि सोनू सिंह की छवि बाहुबली नेताओं वाली है, इसलिए उन पर और उनके समर्थकों पर मेनका के समर्थकों और मतदाताओं को डराने-धमकाने का आरोप भी लगा। यहां मेनका और सोनू सिंह की बहस भी हो गई। बहरहाल राजनीतिक जानकार तो यही कह रहे हैं कि यह लोकतंत्र है और यहां पर सिर्फ और सिर्फ जनता-जनार्दन की दबंगई चलती है और वही यह तय करेंगे कि आगे किसकी दबंगई चलने वाली है। सोनू सिंह तो यही कहते हैं कि आखिर वो दबंगई कहां कर रहे हैं। बकौल सोनू सिंह, ‘आप हमें गाली दे रही हैं और जूते खुलवा रही हैं।’ गौरतलब है कि इससे पहले मेनका गांधी के बेटे वरुण गांधी ने कहा था कि ‘मैं संजय गांधी का बेटा हूं, इन लोगों से जूते खुलवाता हूं। आप सभी लोग चिंता मत करिए।’ वैसे सभी दबंगई करने में विश्वास करते देखे जा रहे हैं, लेकिन इससे क्या, क्योंकि फैसला तो ईवीएम में कैद हो चुका है।

सत्ता के असली किंगमेकर
लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों को लेकर भविष्यवाणी कर रहे सियासी पंडितों का तो यही कहना है कि इन चुनावों में किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलने वाला नहीं है। ऐसे में सभी की नजरें उन नेताओं पर टिक गई हैं जो किंगमेकर साबित हो सकते हैं। इनमें सबसे पहला नाम पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का लिया जा रहा है, वहीं दूसरे नंबर पर सपा-बसपा गठबंधन की बसपा सुप्रीमों मायावती और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव हैं, जबकि राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ओडिशा में बीजू जनता दल, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर(कांग्रेस) और तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) जैसे क्षेत्रीय दल लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद किंगमेकर की भूमिका में होंगे। इस प्रकार नजरें अब ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव और वाईएस जगमोहन रेड्डी पार आकर टिक गई हैं। वैसे मतदाता के मन में क्या चल रहा है यह तो वही जानता है, लेकिन यह दावा बहुत हद तक सही साबित हो सकता है कि किसी एक पार्टी को इस बार पूर्ण बहुमत हासिल होने वाला नहीं है, क्योंकि 2014 के चुनाव में मोदी लहर थी जिसका प्रभाव अब पूरी खत्मप्राय: हो चुका है। इसलिए सत्ता के किंगमेकर पर विचार करना जरुरी हो गया है।

मायावती पीएम तो अखिलेश सीएम
पिछले दिनों बसपा प्रमुख मायावती ने कहा था कि यदि सब कुछ अच्छा रहा तो वह लोकसभा चुनाव लड़ेंगी और प्रधानमंत्री भी बन सकती हैं। मायावती के इस बयान पर मुहर लगाने का काम सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने यह कहते हुए लगाई कि ‘मैं भी उन्हें प्रधानमंत्री बनते हुए देखना चाहता हूं।’ अब चूंकि राजनीति में इस हाथ ले उस हाथ दे वाली कहावत ही चरितार्थ होती रही है अत: सवाल किया गया कि आखिर अखिलेश क्योंकर मायावती को प्रधानमंत्री बनाए जाने के पक्ष में हैं, तो इसका भी जवाब अब मिल गया है। दरअसल एक साक्षात्कार के दौरान अखिलेश कहते दिखे हैं कि ‘मायावती और हमारे बीच में एक जेनरेशन गैप है, उन्हें प्रधानमंत्री बनता देख मुझे खुशी होगी। इसके लिए मैं पूरी मेहनत करने को तैयार हूं। वहीं, वह भी मुझे उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री देखने के लिए तैयार हैं।’ इस लिए अब सोशल मीडिया पर चुटकी लेते हुए कहा जा रहा है कि मायावती पीएम तो अखिलेश सीएम।

भाई-बहन की सियासत
वाराणसी से सपा प्रत्याशी शालिनी यादव ने सेना से बर्खास्त तेज बहादुर को राखी बांधकर भाई बना लिया और अपनी जीत का आशीर्वाद मांगा है। सपा प्रत्याशी के तौर पर तेज बहादुर का नामांकन रद्द होने के बाद सियासी लड़ाई को रोचक बनाने के लिए यह भाई-बहन वाला प्रसंग लिख दिया गया है, जिसके चर्चे सोशल मीडिया पर कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं। वहीं इस रिश्ते को लेकर भावुक हुए तेज बहादुर का कहना है कि वह पांच भाई हैं, लेकिन कोई बहन नहीं थी. अब उन्हें शालिनी यादव के रूप में बहन मिल गई है ऐसे में नकली चौकीदार के खिलाफ असली चौकीदार की लड़ाई जारी रहेगी। इस बहन की जीत के लिए भाई ने जान पर दांव लगाने जैसी बात भी कह दी है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस में बहन भाई को जीत दिलवाने में कितनी कामयाब हो पाती हैं और यहां सपा में बहन को एक भाई जीत दिलवाने के लिए क्या कुछ कर पाते हैं।

प्रियंका के दावे में दम
कांग्रेस महासचिव एवं उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी का दावा है कि उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी ने जीतने वाले तथा मजबूत उम्मीदवारों को ही चुनाव मैदान में उतारा है। बावजूद इसके जो प्रत्याशी नहीं जीत पाएंगे वो राज्य में भाजपा को नुकसान पहुंचाएंगे ही। इस प्रकार प्रियंका की माने तो उत्तर प्रदेश में भाजपा को जबरदस्त नुक्सान होने वाला है, वहीं दूसरी तरफ इस बयान को गठबंधन के अतिरिक्त उन पार्टियों के लिए भी सकारात्मक माना जा रहा है जो गठबंधन में शामिल नहीं हैं, लेकिन आगे सरकार बनाने के समय काम आ सकते हैं। इसलिए जहां उनके दावे को विरोधी पक्ष वोट कटवा पार्टी कहकर मजाक उड़ा रहे हैं तो वहीं राजनीतिक विश्लेषकों ने कहना शुरु किया है कि उनके दावे में दम तो है।

ताई का सवाल दिग्गी का जवाब
लोकसभा चुनाव में धर्म और जाति पर वोट मांगे जा रहे है। हालाँकि आचार संहिता का हवाला देकर आयोग धार्मिक उन्माद और धर्म के नाम पर वोट मांगने से रोकता रहा है। यहां धर्म और अधर्म के बीच युद्ध जैसी बातें करने वाले मध्य प्रदेश के भोपाल लोकसभा सीट की भाजपा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर पर निशाना साधते हुए कांग्रेस प्रत्याशी और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कहना है कि वह किसी भी तरह के धार्मिक उन्माद के खिलाफ हैं। इसके साथ ही लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ‘ताई’ को इंगित करते हुए उन्होंने सोशल मीडिया पर बयान दिया कि वह इस बात पर गर्व महसूस करते हैं कि उन्होंने अपने शासनकाल में सिमी और बजरंग दल पर रोक लगाने की सिफारिश करने का कदम उठाया था। दिग्विजय का कहना है कि उनके लिए देश सबसे ऊपर है, ओछी राजनीति करना नहीं। गौरतलब है की उन्होंने ये बातें उस ट्वीट के जवाब में कही हैं, जिसमें ताई के हवाले से कहा गया था कि हेमंत करकरे और दिग्विजय सिंह के बीच करीबी संबंध थे। गौरतलब है कि करकरे की शहादत पर साध्वी प्रज्ञा विवादित बयान दे चुकी हैं, इसलिए एक बार फिर इस मामले को लेकर राजनीति गरमा गई है।

गोविंदा बनाम उर्मिला कौन श्रेष्ठ
मुंबई नार्थ सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहीं अभिनेत्री उर्मिला मतोंडकर को लेकर सवाल किए जा रहे हैं कि क्या वो अभिनेता गोविंदा से बेहतर साबित हो सकेंगे? गौरतलब है कि गोविंदा ने 2004 में कांग्रेस के टिकट पर भाजपा के वरिष्ठ नेता राम नाइक को जबरदस्त शिकस्त दी थी। अब यदि गोविंदा के रिकॉर्ड को ब्रेक करना है तो फिर उर्मिला को अपने प्रतिद्वंदी और भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी और सिटिंग सांसद गोपाल शेट्टी को शानदार हार का तोहफा देना होगा। मतदान के बाद तो यही किस्से आम हो रहे हैं और सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या मायानगरी में एक बार फिर उर्मिला कलाकारों का मान रखने में सफल हो सकेंगी, क्योंकि इससे पहले गोविंदा ने तो भरपूर मान रखा था। वैसे राजनीतिज्ञों का तो यही कहना है कि दक्षिण क्षेत्र में भाजपा ने कड़ी मेहनत की है, जिससे परिणाम पलट भी सकता है।

साध्वी का श्राप और सर्जिकल स्ट्राइक
दिग्विजय सिंह ने अपनी प्रतिद्वंद्वी प्रज्ञा ठाकुर पर निशाना साधा कि उन्होंने यदि जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर को श्राप दिया होता तो सर्जिकल स्ट्राइक करने की कोई जरूरत ही नहीं होती। गौरतलब है कि साध्वी ने एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे को श्राप देने के कारण मारे जाने जैसा विवादित बयान दिया था, इसके बाद से वो तमाम संगठनों और राजनीतिक दलों के निशाने पर आ गईं। यहां तक कि भाजपा ने भी उनके इस बयान से किनारा कर लिया। इसे देख राजनीतिक गलियारे में कहा जा रहा है कि श्राप का असर तो देखने को मिल रहा है, इसलिए घबराए हुए दिग्गी राजा भी उन्हें सलाह दे रहे हैं कि जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर को श्राप दे दो तो मामला ही निपट जाए। साध्वी समर्थक कहते हैं कि जो लोग कहते हैं कि श्राप से कुछ नहीं होता, यदि उनके सामने साध्वी पहुंच जाएं और शापित कर दें तो मुश्किल में आ जाएंगे। इस तरह ये लोकसभा चुनाव पूरी तरह से श्राप-श्राप खेलने वाले हो गए हैं।

बहिनजी का सासू अवतार
उत्तर प्रदेश में बुआ और भतीजे की जोड़ी खास तौर पर चर्चा में है। लेकिन कन्नौज की सभा के बाद से बहिनजी का सासू अवतार भी खूब छाया हुआ है। दरअसल जब मंच पर उपस्थित बसपा प्रमुख मायावती के पैर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की सांसद पत्नी डिंपल यादव ने छुए तो उन्होंने न सिर्फ उन्हें आशीर्वाद दिया बल्कि अपनी बहू के लिए वोट भी मांगे। यहां मायावती ने डिंपल के समर्थन में वोट की अपील करते हुए कहा, ‘पार्टी गठबंधन के बाद डिंपल यादव को पूरे दिल से अपने खुद के परिवार की बहू मानती हूं। अखिलेश भी मुझे बड़ी ही मानकर चलते हैं, जिससे इनकी पत्नी का हमारे परिवार के साथ खास रिश्ता बन गया है और आगे भी बना रहेगा।’ मायावती के इस बयान पर चुटकी लेते हुए कहा जा रहा है कि यह तो राजनीतिक सास बन गईं, क्योंकि सपा-बसपा गठबंधन के पहले तो वो जानी दुश्मन की ही नजर से देखती रही हैं। बहरहाल जो भी है, सास-बहु का रिश्ता पवित्र और परिणाम देने वाला तो सिद्ध होगा ही होगा।

अन्य पार्टियों के वोट भी भाजपा को?
यह जानकर आम इंसान हैरान और परेशान हो सकता है कि गोवा में हुई मॉक पोलिंग में भाजपा को अन्य पार्टियों के वोट भी मिलते दिखे हैं। दरअसल बताया जा रहा है कि प्रत्येक पार्टी को 9 वोट डाले गए थे, जबकि गिनती में भाजपा को 17 वोट मिलने की बात कही गई। इस पर आम आदमी पार्टी ने गोवा में चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि दूसरी पार्टियों के वोट भी भाजपा को जा रहे हैं। इस प्रकार एक बार फिर मतदान में गड़बड़ी का मामला सुर्खियों में आ गया। गोवा के आप संयोजक एल्विस गोम्स का आरोप है कि अन्य पार्टियों के वोट भी भाजपा को ट्रांसफर किए जा रहे हैं। यह गंभीर मामला है और इससे चुनाव आयोग के दावे भी खोखले साबित होते हैं। इस मामले के सामने आने के बाद अन्य विरोधी पार्टियों ने भी एक बार फिर मतदान में गड़बड़ी को लेकर बयान देने शुरु कर दिए हैं, जिससे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं। गोवा का मॉक पोलिंग वाला यह मामला सोशल मीडिया पर जबरदस्त तरीके से वायरल हो रहा है। यह तो सभी जान रहे हैं कि दक्षिण में भाजपा अपनी लोकसभा सीटें बढ़ाने के लिए जी-जान से जुटी हुई है, लेकिन सवाल यही है कि क्या इस तरह सीटें बढ़ाई जाएंगी?

आंख दिखाने और निकालने वाले नेता
इस लोकसभा चुनाव में कुछ ऐसे नेता अपनी किस्मत आजमा रहे हैं जो या तो दूसरों को आंख दिखाने का काम करते हैं या फिर विरोधियों की आंख निकाल लेने की धमकी दे डालते हैं। जी हॉं, केंद्रीय मंत्री एवं उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से सांसद व लोकसभा उम्मीदवार मनोज सिन्हा ने ऐसा ही काम करते हुए पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा है कि वो अपना काम पूरी दिलेरी के साथ करें, यदि किसी ने उन्हें आंख दिखाने की कोशिश की तो वो उसकी आंख निकाल लेंगे। दरअसल सिन्हां कह रहे थे कि ‘भाजपा कार्यकर्ता अपराध अर्जित धन व भ्रष्टाचार को जमी-दोज करने तैयार हैं और अगर ऐसे में किसी ने उंगली दिखाने की कोशिश की तो भरोसा रखिए कि चंद घंटों में वो उंगली ही सलामत नहीं रहेगी।’ कुल मिलाकर इस तरह की धमकी देकर कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने को ज्यादातर लोग गलत मानते हैं और कानूनी कार्रवाई किए जाने की मांग भी करते हैं, लेकिन चुनाव आयोग भी क्या करे, क्योंकि वह तो संसाधनों की कमी का रोना रोते हुए कार्रवाई करने से भी बचता नजर आता है। इसलिए राजनीति में हिंसा का बोलवाला होता चला जा रहा है।

राजा के मुकाबले साध्वी…?
इस लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल संसदीय सीट सुर्खियों में है। दरअसल इस सीट से राजनीतिक वनवास पूरा कर लौटे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को कांग्रेस ने बतौर उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारा है तो वहीं उनके सामने भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को खड़ा कर दिया है। गौरतलब है कि कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का लंबा राजनीतिक अनुभव है और वो चुनाव मैनेजमेंट के लिए जाने जाते हैं, ऐसे में मालेगांव ब्लास्ट की प्रमुख आरोपी रहीं साध्वी प्रज्ञा को भाजपा द्वारा प्रत्याशी बनाए जाने को लेकर कहा जा रहा है कि बहुसंख्यक वोट बैंक को साधने के लिए भाजपा ने यह कार्ड खेला है। इसलिए दिग्गी राजा ने जहां चुनाव मैदान में साध्वी प्रज्ञा का स्वागत किया वहीं उन्होंने क्षेत्र में शांति और सद्भाव के साथ सांप्रदायिक सौहार्दृ की भी कामना करके जतला दिया है कि आखिर भाजपा करना क्या चाहती है। सोशल मीडिया पर तो राजा और साध्वी को लेकर तरह-तरह के मीम्स वायरल होने शुरु हो गए हैं।  कदम बता रही है। दरअसल नायडू ने आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग को एक ज्ञापन सौंपा था कि राज्य में हुए मतदान के दौरान बड़ी संख्या में ईवीएम में गड़बड़ी हुई और अपर्याप्त सुरक्षा के चलते हिंसा की घटनाएं घटित हुईं। इस पर वाईएसआर कांग्रेस के महासचिव एस रामकृष्ण रेड्डी ने कहा कि नायडू का नाटक तो चुनाव प्रचार समाप्त होने से शुरु हुआ और हार के भय से लगातार हथकंडे अपना रहे हैं। इस प्रकार हकीकत क्या है यह कोई जानना नहीं चाह रहा है बल्कि सभी जीत और हार से खुश या भयभीत हैं, जैसे आरोप लगा मामले को हलका बनाने में लगे हुए हैं।

अभिनन्दन पाठक और मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हमशक्ल होने के नाते देशभर में मशहूर हो चुके अभिनंदन पाठक वाराणसी से भी पर्चा भरेंगे। इससे पहले उन्होंने गृहमंत्री राजनाथ सिंह के खिलाफ लखनऊ से भी नामांकन दाखिल कर दिया है। मोदी के हमशक्ल अभिनंदन का कहना है कि वो कोई डमी कैंडिडेट नहीं हैं और न ही किसी के विरोधी ही हैं, लेकिन जुमलों का विरोध जरुर करते हैं। अभिनंदन ने प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी का समर्थन किया है, लेकिन उनका मोदी का हमशक्ल होने का जो मामला है उसे देखते हुए यही कहा जा रहा है कि वो भले ही कुछ भी क्यों न कहें, लेकिन देखने और सुनने वाले तो मोदी की ही छवि सामने रखकर उन्हें देखेंगे। इसलिए कहीं न कहीं इससे प्रचारित असली मोदी ही होंगे और इसका लाभ भी उन्हें ही मिलता दिखेगा। गौरतलब है कि 2014 के आम चुनाव, 2015 के दिल्ली और 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की रैलियों में अभिनंदन पाठक आकर्षण का केंद्र रहे, क्योंकि वो खुद को मोदी का सबसे बड़ा प्रशंसक भी बताते थे, लेकिन अब वो उनके धुर विरोधी हो गए हैं और इस चुनाव में तो उनके खिलाफ ही खड़े दिख रहे हैं।

अहमद पटेल को चाहिए 3 दिन
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल यूं तो ज्यादातर शांत नजर आते हैं, लेकिन जब अपनों पर बात आती है तो उन्हें गुस्सा भी आ जाता है। दरअसल आयकर विभाग ने अहमद पटेल के करीबी एसएस मोईन कुरैशी के घर छापामार कार्रवाई की। इस छापेमारी के बीच ही बताया जाता है कि अहमद पटेल खुद मोईन के घर पहुंच गए, जहां मीडिया के सामने ही उन्होंने केंद्र पर जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाया और कहा कि ये एजेंसियां सिर्फ तीन दिन के लिए हमें दे दें, पता चल जाएगा असली चोर कौन है। इस प्रकार अहमद पटेल ने इस छापेमारी को लेकर सीधे केंद्र पर निशाना साधा है और उन्होंने कहा कि सही मायने में जो लोग चोरी कर रहे हैं उन्हें बचाया जा रहा है, जबकि राजनीतिक विरोधियों को बेवजह परेशान किया जा रहा है। इसलिए समझा जा रहा है कि यह छापामार कार्रवाई भी चुनावी मुद्दा बन सकती है और इसलिए अहमद पटेल ने तो महज तीन दिन मांगे हैं, जिसके जरिए वो असली चोरों को बेनकाब कर सकते हैं।

भाजपा की सभा में जल संकट ने फेरा पानी
यह तो देश जानता है कि महाराष्ट्र के औरंगाबाद में जल संकट सबसे बड़ी समस्या है, जिसके नाम पर चुनाव होते रहे हैं, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। ऐसे में मजेदार किस्सा तब हुआ जबकि भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रावसाहेब दानवे की चुनावी सभा पर ‘पानी आया’ की सूचना मात्र ने पानी फेर दिया। सभा के लिए एकत्र हुए पुरुष और महिलाओं को जब नगर निकाय से पानी आने की सूचना मिली तो वो बीच में से ही उठकर चले गए। दानवे नामनगर क्षेत्र में चुनाव प्रचार कार्यालय का उद्घाटन करने पहुंचे थे। बहरहाल इस घटना ने जहां भाजपा नेता को शर्मिंदा कर दिया वहीं जल संकट से जूझ रहे क्षेत्र की असली तस्वीर भी पेश कर दी। सामाजिक कार्यकर्ता तो यही कहते हैं कि काश ये नेता इस तरह की चुनावी सभा करने से पहले जल संकट ग्रस्त क्षेत्र की मूल समस्या का समाधान तलाशते तो यूं अपमानित न होना पड़ता। इस घटना पर भाजपा नेता चुप्पी साधे हुए हैं, क्योंकि कहें भी तो क्या, क्योंकि मुंह खोलेंगे तब भी लोग तो पानी ही मांगेंगे।

बिहार में एनडीए बनाम महागठबंधन
लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बिहार खास इसलिए भी हो गया है, क्योंकि यहां जातीय समीकरण के साथ ही साथ स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दे अपना असर जरुर छोड़ते हैं। ऐसे में मतदाता बिहार की नीतिश सरकार के खिलाफ इसलिए मुखर हो रहा है, क्योंकि उसे राज्य में शराबबंदी के बावजूद सभी जगह शराब मिलने के सबूत मिल रहे हैं। नौकरी नहीं है, इसलिए राज्य व केंद्र सरकार से वह खफा है। यही नहीं मोदी सरकार की वादा खिलाफी खासतौर पर प्रत्येक नागरिक के खाते में 15-15 लाख रुपए जमा करवाने वाले वादे को लेकर खासा नाराज है। इन मामलों को लेकर बिहार में सियासत गरमा गई है, जिसे देखकर कहा जा रहा है कि नीतिश सरकार की कार्यशैली और फैसलों के कारण भाजपा को भी राज्य में खासा नुक्सान उठाना पड़ेगा। बहरहाल बिहार में लोकसभा की कुछ सीटों को यदि छोड़ दिया जाए तो अधिकांश पर मुकाबला एनडीए बनाम महागठबंधन ही है। एक तरफ सत्तारुढ़ जेडीयू और भाजपा है तो दूसरी तरफ आरजेडी-कांग्रेस सहित अन्य पार्टियों का महागठबंधन।

लालू ने खोले नीतिश के राज
राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने अपनी पुस्तक ‘गोपालगंज द रायसीना’ में दावा किया है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार महागठबंधन में वापस आना चाहते थे, लेकिन भरोसा खत्म हो जाने के चलते खुद लालू ने उन्हें मना कर दिया था। नीतिश के हृदय परिवर्तन का यह समय महागठबंधन छोड़कर भाजपा के साथ जाने के महज छह माह के अंदर का बताया गया है। इसके लिए नीतिश ने जदयू के उपाध्यक्ष और अपने विश्वासपात्र प्रशांत किशोर को अलग-अलग मौंकों पर अपना दूत बनाकर भेजा, लेकिन बात नहीं बनी। अब इस तरह के किस्से आम होने जा रहे हैं, क्योंकि जल्द ही लालू की पुस्तक लोकार्पित होने वाली है, जिससे अनेक लोगों की मुसीबतें भी बढ़ सकती हैं और कई उपकृत होते भी देखे जा सकते हैं। फिलहाल बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश को लेकर चर्चाएं आम हो चली हैं, जिसका असर आमचुनाव में होने की भी बात कही जा रही है।

अमेठी का भ्रम
कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले अमेठी को लेकर कहा जा रहा है कि अब यहां की फिजा बदल रही है। दरअसल खबर आ रही है कि रायबरेली के रहने वाले पूर्व कांग्रेस विधायक डॉ मोहम्मद मुस्लिम भाजपा में शामिल हो गए हैं। जबकि सच्चाई यह है कि डॉ मुस्लिम 2012 में तो कांग्रेस के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुए थे और उससे पहले 1996 में सपा के टिकट से वो चुनाव जीते थे और 2017 में विधानसभा चुनाव से ऐन पहले कांग्रेस छोड़ बसपा का दामन थाम चुके थे। खास बात यह रही कि तब बसपा सुप्रीमों मायावती ने उनके बेटे को विधानसभा टिकट दिया था, लेकिन वह भाजपा प्रत्याशी से हार गया था। इस प्रकार डॉ मुस्लिम ने कांग्रेस का हाथ नहीं बल्कि बसपा के हाथी की सवारी छोड़ कमल पर विराजमान होने जैसा काम किया है, जिनका अब प्रभाव क्षेत्र में न के बतौर ही बताया जाता है। उनकी छवि दल-बदलू और अवसवादी वाली हो गई है। ऐसे में उन्हें पूर्व कांग्रेसी बताकर मीडिया के जरिए लोगों में भ्रम फैलाने जैसा काम किया जा रहा है, जिस पर कांग्रेस नेता समय-समय पर आपत्ति दर्ज कराते रहे हैं। वैसे यह सब चुनावी रणनीति का ही हिस्सा है, इसलिए इसमें हर्ज भी नहीं होना चाहिए।

संबित पात्रा की अब असली परीक्षा
भाजपा ने ओडिशा की पुरी सीट से पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा को मैदान में उतारकर सही मायने में उन्हें अपने आपको साबित करने जैसा काम किया है। इससे पहले तक कहा जा रहा था कि पुरी से खुद प्रधानमंत्री मोदी चुनाव लड़ेंगे, लेकिन संबित पात्रा को टिकट देकर उन्हें इम्तिहान में बैठा दिया गया। अब मरता क्या न करता की तर्ज पर सबसे पहले तो संबित पात्रा ने भगवान जगन्नाथ की मूर्ति हाथ ली और पहुंच गए नामांकन दाखिल करने। अब आंकड़े बता रहे हैं कि उनकी जीत आसान नहीं होगी। दरअसल हिंदू धर्म के पवित्र तीर्थस्थलों में से एक पुरी को पारंपरिक तौर पर बीजू जनता दल का गढ़ माना जाता है। इस वजह से असली परीक्षा तो वाकई संबित पात्रा की होने जा रही है, जिस पर सभी की नजरें टिक गई हैं।

निषाद की कमी खलेगी?
खबर है कि सपा-बसपा गठबंधन से अलग हुए निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने इसकी पूरी जिम्मेदारी पूर्व मुख्यमंत्री और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के खाते में डाल दी है। दरअसल निषाद का कहना था कि उन्हें उम्मीद थी कि अखिलेश हमारी पार्टी के लिए सीटों का ऐलान करेंगे, लेकिन उन्होंने अपने पोस्टरों में हमारी पार्टी का नाम और एक शब्द तक नहीं छपवाया। इसके बाद आखिर कहने को बचता क्या हे, इसलिए निषाद ने कह दिया कि अब वो स्वतंत्र हैं और हमारे सामने सभी विकल्प खुले हुए हैं। इसे गठबंधन के लिए झटका बताया जा रहा है, जबकि राजनीतिक समीक्षकों ने कहना शुरु कर दिया है कि ये सब तो चुनाव के दौरान होता ही है, इसलिए इसका खासा असर होगा ऐसा नहीं है। दरअसल एक तरफ जहां निषाद की कमी अखिलेश को खलेगी तो वहीं निषाद के विरोधी गठबंधन के साथ खड़े हो जाएंगे। मतलब खेल फिर बराबरी पर आ जाएगा।

मुरली मनोहर का दु:ख
इसमें शक नहीं कि मौजूदा लोकसभा चुनाव जीतना भाजपा की पहली प्राथमिकता है और इसलिए पार्टी का शीर्ष नेतृत्व चुन-चुनकर उम्मीदवारों को टिकट देने का काम कर रही है। चीन्ह-चीन्ह के टिकट देने वाली नई परंपरा से भाजपा के अनेक दिग्गज नाराज होते दिख रहे हैं। दरअसल उम्र दराज कहकर मौजूदा सांसद लालकृष्ण आडवाणी को पहले ही हाशिये पर पहुंचाया जा चुका है और अब मुरली मनोहर जोशी का भी टिकट काटा गया है। सूत्र कह रहे है पार्टी की ओर से संगठन महासचिव रामलाल ने उन्हें इस बात की सिर्फ सूचना ही नहीं दी बल्कि उनसे यह भी कह दिया कि वो पार्टी ऑफिस आकर चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान करें। इससे खफा जोशी कह रहे हैं कि ये पार्टी के संस्कार नहीं हैं। वाकई चुनाव नहीं लड़वाने की बात यदि हुई है तो पार्टी अध्यक्ष शाह को खुद आकर उन्हें सूचित करना चाहिए था। बहरहाल आडवाणी और शत्रु जैसे नेताओं की ही लाइन में मुरली मनोहर जोशी को भी लगा दिया गया है, जिससे वो खासे दु:खी और नाराज हैं।

सुल्तानपुर का असली सुल्तान
सुल्तानपुर संसदीय सीट से वर्तमान में भाजपा के वरुण गांधी सांसद हैं, चूंकि यह लोकसभा सीट अमेठी से लगी हुई है अत: इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। यहां पर सपा-बसपा ने चन्द्रभद्र सिंह को मैदान में उतारा है तो वहीं कांग्रेस ने राज्यसभा सदस्य डॉ संजय सिंह को आगे किया है। चूंकि भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की लोकसभा सीट अमेठी पहले सुल्तानपुर जिले में ही थी, अत: राजनीतिक गलियारे में चर्चा आम है कि यहां का सुल्तान कौन होगा यह गांधी परिवार ही तय करता है और ऐसे में यदि वरुण गांधी को भाजपा आगे करती है तो फिर मुकाबला दिलचस्प हो जाएगा। क्योंकि संजय सिंह को जीत दिलवाने के लिए राहुल और प्रियंका भी जीतोड़ मेहनत करेंगे ही करेंगे। फिलहाल कहा यह जा रहा है कि मामला त्रिकोणीय मुकाबले वाला है, जिसमें से मतदाता किसे सुल्तानपुर का सुल्तान बनाता है यह देखने वाली बात होगी।

चाचा ने याद दिलाई
मध्य प्रदेश मंत्रीमंडल के सबसे युवा मंत्री हमेशा जोश से भरे रहते हैं। उनके जोशीले अंदाज और फटाफट अंग्रेजी बोलने का असर पार्टी कार्यकर्ताओं पदाधिकारियों और मंत्रियों के बीच देखने को मिलता है। मुख्यमंत्री कमल नाथ के करीब होने से उनका रुतबा मंत्रालय की तीसरी मंजिल में देखते ही बनता है। उन्होंने अपने गुरु जो उनके सगे चाचा भी हैं को मंत्री बनने के बाद ना भोपाल बुलाया और ना ही अपना मंत्रालय दिखाया, जबकि चाचा अपने भतीजे का रुतबा देखने के लिए बेचैन थे। वह खुद ही बिना किसी सूचना के मंत्रालय पहुंच गए। चाचा को देखते ही मंत्री जी ने सम्मान में अपनी कुर्सी छोड़कर उन्हें उस पर बैठाया। चाचा ने भी मंत्री जी को गले लगाया और वहां उपस्थित लोगों के सामने कहा कि मेरा भतीजा मंत्री बन गया, लेकिन अभी तक मंत्रालय नहीं दिखाया था। आज मैं खुद देखने आ गया। चाचा के इतना कहते ही मंत्री जी कुछ समय पहले, तक जिस जोशीले अंदाज में बतिया रहे थे। उसकी जगह उन्होंने मौन धारण कर लिया। सत्ता के गलियारे में इसे ही कहा जाता है सत्ता का मद।

हारे हुए को फिर मौका
भाजपा ने कुछ सीटों पर नाम तय कर दिए हैं, इन नामों में जो सबसे विवादित नाम है वो अमेठी से स्मृति ईरानी का बताया जाता है। दरअसल वीवीआईपी सीट मानी जाने वाली अमेठी लोकसभा सीट से पिछली बार की हारी हुई प्रत्याशी स्मृति ईरानी को पार्टी नेतृत्व ने एक बार फिर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुकाबला करने का आदेश सुना दिया है। इस फैसले पर पार्टी के अंदर ही कानाफूसी शुरु हो गई है। दरअसल मोदी सरकार को शुरु से निशाने पर रखने वाले पार्टी नेताओं का कहना है कि एक तरफ पार्टी के वो वरिष्ठ नेता हैं जो लगातार जीतते चले आ रहे हैं और दूसरी तरफ पार्टी नेतृत्व उन लोगों को लगातार आगे बढ़ाने का काम कर रहा है जो हारते और विवादों में रहते चले जा रहे हैं। इससे पार्टी किस तरह से मजबूत होगी समझ से परे है। विरोधियों का कहना है कि इन फैसलों के बाद आखिर पार्टी के वरिष्ठ नेता जमीनी कार्य कैसे कर पाएंगे, यह भी एक बड़ा सवाल है। उम्रदराज कहकर वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी पार्टी के लिए भारी भी पड़ सकती है, जबकि हारे हुए उम्मीदवार को एक पर एक मौका जो दिया जा रहा है।

क्या गिरिराज घिर रहे
बिहार में भाजपा ने गठबंधन के सहयोगी दलों के साथ सीट बंटावारे का ऐलान करते हुए बतलाया कि भाजपा 17, जेडीयू 17 और लोजपा 6 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। इसी के साथ भाजपा ने अपने दो बड़े नेताओं गिरिराज सिंह और शाहनवाज की सीट सहयोगियों को दे दी। दरअसल गिरिराज सिंह की नवादा सीट लोजपा के खाते में चली गई इस कारण उनके बेगूसराय से चुनाव लड़ने की बात सामने आई है। वहीं बेगूसराय से जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार के भी चुनाव लड़ने की अटकलें तेज हो गई हैं। अब कुछ लोगों को यह मुकाबला रोचक लग रहा है तो वहीं कुछ ने कहना शुरु कर दिया है कि आखिर यह कौन से कर्मों का फल है जो कि गिरिराज जैसे नेता को कन्हैया के सामने खड़ा किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि कन्हैया के पास तो खोने को कुछ भी नहीं है, जो कुछ भी है उसे पाना ही पाना है, लेकिन कम से कम गिरिराज जैसे नेता को तो इस तरह से मत घेरो।

क्या मेघवाल कांग्रेस के एजेंट ?
राजस्थान के दिग्गज भाजपा नेता देवी सिंह भाटी ने पार्टी से इस्तीफा दिया तो दिया, लेकिन उन्होंने मौजूदा भाजपा सांसद और केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को कांग्रेस का एजेंट बताकर मानों उनकी मिट्टीपलीत ही कर दी है। भाटी ने पार्टी से मेघवाल को टिकट नहीं देने की मांग करते हुए इस्तीफा दिया है, इसका मतलब साफ है कि यदि पार्टी उन्हें टिकट देती है तो भाटी उनका जमीनी स्तर पर विरोध करेंगे और यदि उन्हें टिकट नहीं मिलती है तो आगे भी वो कुछ खास नहीं कर पाएंगे। कुल मिलाकर भाटी ने एक ऐसा दांव खेला है जिसमें वो हार कर भी जीत गए हैं, जबकि मेघवाल सब कुछ पाकर भी पराजित होते दिख रहे हैं। यही वजह है कि मेघवाल समर्थक भी दबी जुबान में कहते देखे जा रहे हैं कि भाटी ने तो जाते-जाते भी मेघवाल का कबाड़ा कर दिया है, अब इसकी खानापूर्ति कैसे होगी यह देखने वाली बात है। वैसे राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता है, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि भाटी और मेघवाल पर्दे के पीछे मिल भी सकते हैं। 7 बार के विधायक देवी सिंह भाटी, मेघवाल के मुखर विरोधी रहे हैं, इसलिए इस विरोध को मेघवाल के लिए ही नहीं बल्कि पार्टी के लिए भी सिरदर्द बताया जा रहा है।

शरद पवार की भविष्यवाणी
एनसीपी यानी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार ने आमचुनाव को लेकर जो भविष्यवाणी की है उससे सभी की नजरें उन पर जा टिकी हैं। दरअसल शरद पवार ने कहा है कि ‘मैं थोड़ी-बहुत जो राजनीति जानता हूं उस आधार पर कह सकता हूं कि लोकसभा चुनाव 2019 के बाद मोदी जी दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे।’ इसके साथ ही पवार ने यह भी कह दिया कि वो कोई ज्योतिषी नहीं हैं उनके पास जादुई आंकड़ा नहीं होगा। इस प्रकार भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने वाला है। ऐसा हो सकता है कि उसे सबसे ज्यादा सीटें मिलें। इस पर जानकार कह रहे हैं पवार तो खुद भ्रमित हैं क्योंकि एक तरफ वो कह रहे हैं कि पूर्ण बहुमत नहीं मिल रहा है फिर कह रहे हैं कि सबसे बड़ी पार्टी भाजपा ही होगी और फिर कहते हैं कि मोदी जी प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। इससे तो मुलायम अच्छे हैं जो कम से कम मोदी जी को दोबारा प्रधानमंत्री बनने का आशीर्वाद तो देते हैं।

तंज पर तंज कर भाजपा उलझी
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने डोभाल पर तंज कसते हुए आतंकी मसूद अजहर को ‘अजहर जी’ कहा तो भाजपा के नेताओं ने उनको निशाने पर लेते हुए कहना शुरु कर दिया कि दिग्विजय सिंह की ही तरह राहुल के लिए भी ये आतंकी सम्माननीय हो गए हैं। इस पर कांग्रेस नेताओं ने भाजपा को निशाने पर लेते हुए कहना शुरु कर दिया है कि कांग्रेस नेता तो आतंकियों पर तंज कसने के लिए ‘जी’ का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन जो लोग बाइज्जत उन्हें कंधार तक छोड़कर आए हैं उनके बारे में भी तो कुछ कहा जाना चाहिए। कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट करते हुए सवाल किया कि क्या एनएसए श्री डोभाल आतंकवादी मसूद अज़हर को कंधार ले जाकर रिहा कर नहीं आए थे? एक और सवाल कि क्या मोदी जी ने पाक की आईएसआई को पठानकोट आतंकवादी हमले की जाँच करने नहीं बुलाया? इस प्रकार भाजपा कटाक्ष करके अब पछता रही होगी क्योंकि इस मामले में उसकी ज्यादा किरकिरी हो रही है।

फारुख की कसम के निहितार्थ
फिलहाल जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव नहीं हो रहे हैं, लेकिन सियासी भविष्य को ध्यान में रखते हुए नेशनल कांफ्रेंस अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला कह रहे हैं कि वो मरते मर जाएंगे लेकिर भाजपा के साथ गठबंधन नहीं करेंगे और न ही उनके समर्थन से सरकार ही बनाएंगे। गौरतलब है कि कश्मीर में भाजपा अपनी जड़ें मजबूत करने में लगी हुई है और ऐसे में संभावना व्यक्त की जा रही थी कि अब भाजपा महबूबा मुफ्ती की बजाय फारुख अब्दुल्ला के साथ गठबंधन कर सकती है। इसलिए फारुख ने कश्मीर में भाजपा की जड़ें फैलाने के लिए पीडीपी को जिम्मेदार ठहराया और कह दिया कि उसने भाजपा को यहां लाकर बड़ी गलती है। बहरहाल लोकसभा चुनाव में मालूम चल जाएगा कि जम्मू-कश्मीर में भाजपा की जड़ें कितनी मजबूत हुई हैं।

सपा-बसपा पर बढ़ रहा दबाव
कांग्रेस ने लोकसभा उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करके बतला दिया कि वो अपनी चुनावी रणनीति के तहत ही आगे बढ़ रही है, फिर गठबंधन हो या न हो। इससे हटकर खबर आ रही है कि सपा-बसपा, कांग्रेस को भी गठबंधन में शामिल करने पर विचार कर रही है। यदि यह सच है तो इसके लिए पहले ही देर हो चुकी है और अभी भी यदि विचार-विमर्श में समय गंवाया गया तो फिर इन पार्टियों के नेता ही अपने लोगों को पराजित करने के लिए मैदान में उतरते नजर आएंगे। वैसे भी सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती पहले ही कह चुके हैं कि उन्हें कांग्रेस की आवश्यकता नहीं है, ऐसे में राहुल गांधी क्योंकर झोली फैलाने का काम करेंगे। सीटों पर नाम घोषित करना इसी बात का प्रमाण माना जा रहा है।

सत्ता का मतलब जूतम-पैजार तो नहीं
उत्तर प्रदेश से खबर है कि खलीलाबाद से भाजपा सांसद शरद त्रिपाठी और मेंहदावल से भाजपा विधायक राकेश सिंह बघेल के बीच जमकर जूते चले। इसके बाद विधायक राकेश सिंह अपने समर्थकों के साथ धरने पर बैठ गए। भाजपा नेताओं के इस जूता कांड का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है तो कुछ ने कहना शुरु कर दिया कि यह तो भाजपा की संस्कृति है कि जो ना माने उसकी जूतों से पिटाई कर दो, अब यदि सांसद ने अपने ही विधायक के साथ वही कर दिया तो आखिर यह चिल्लपों क्यों मची है। वहीं दूसरी तरफ विरोधियों ने भाजपा सरकारों को निशाने पर लेते हुए कहना शुरु कर दिया है कि सत्ता के नशे में चूर इन नेताओं को अब अच्छे और बुरे की भी तमीज नहीं रही है। पहले घटिया बयानबाजी करते हैं और फिर जूते-चप्पल चलाते हैं, यह तो अच्छा हुआ कि उनके निशाने पर कोई और नहीं आया वर्ना उसका क्या हाल हुआ होता यह तो सभी समझ सकते हैं। गौरतलब है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इसे नफरत फैलाने वाली पार्टी कहते हैं और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भाजपा पर हिंसा फैलाने और राज करने का आरोप लगाती रही हैं। अब उत्तर प्रदेश की जूतम-पैजार वाली घटना ने इस पर मोहर लगाने का काम कर दिया।

उम्मीद अभी भी बरकरार
कांग्रेस के बिना उत्तर प्रदेश में जिस तरह से भतीजे और बुआ में गठजोड़ देखने को मिला उससे यही संदेश गया था कि अब महागठबंधन का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। ऐसे में एक बार फिर उत्तर प्रदेश से खबर आ रही है कि समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन में कांग्रेस की एंट्री हो सकती है। दरअसल बताया जा रहा है कि कांग्रेस के लिए पहले सिर्फ दो सीटें छोड़ी गईं थीं, अब पार्टी प्रमुख उनके लिए करीब एक दर्जन सीटें छोड़ने को तैयार दिख रहे हैं। दावे तो यहां तक किए जा रहे हैं कि सपा के कहने पर बसपा भी इस बात को लेकर तैयार हो गई है कि कांग्रेस से सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत की जाए। जानकार कह रहे हैं कि पुलवामा हमले के बाद देश की जो फिजा बदली है उसे देखते हुए ही उम्मीदों की किरण पुन: फूट रही है और कहा जा रहा है कि सपा, बसपा एलायंस में कांग्रेस भी एंट्री पा सकती है। बहरहाल यह राजनीति है जहां जीत के लिए उम्मीद हमेशा बरकरार रहती है, इसमें हैरानी जैसी कोई बात नहीं है।

चुनाव ने मोदी को किया चरणागत
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के गांधी नगर में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुंचे तो मंच पर मौजूद पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल के चरण छूते और आशीर्वाद लेते नजर आए। इससे पहले प्रयागराज कुंभ में स्नान करके प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ लोगों के चरण धोकर उनसे आशीर्वाद लेने का उपक्रम किया था। इस पर भी खूब राजनीतिक बयानवाजी हुई थी। दरअसल कहा जा रहा है कि जैसे-जैसे आम चुनाव करीब आ रहे हैं वैसे-वैसे मोदी जी चरणागत होते चले जा रहे हैं। जहां तक केशुभाई के चरण छूने का सवाल है तो बतला दें कि प्रधानमंत्री मोदी वर्ष 2001 में जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने केशुभाई का ही स्थान लिया था। इस लिहाज से केशुभाई वरिष्ठ और उनके राजनीतिक गुरु समान हैं, ऐसे में उनके चरण स्पर्ष करना या आशीर्वाद लेने में कोई हर्ज भी नहीं है। बहरहाल यह क्रम यदि सदा चलता रहता तो कोई बात नहीं थी, लेकिन अब जबकि कार्यकाल पूर्ण हो रहा है और एक बार फिर चुनाव में उन्हें उतरना है, इसलिए पार्टी गाइडलाइन के विपरीत यूं चरणागत होना सवाल खड़े कर रहा है। टीकाकार कहते हैं कि इस समय मोदी खुद गाइडलाइन बने हुए हैं फिर सवाल कौन उठा रहा है?

एयर स्ट्राइक और सियासत

पीओके और बालाकोट में भारतीय वायुसेना द्वारा की गई एयर स्ट्राइक को लेकर सियासी बयानों से सभी हैरान-परेशान हैं। वैसे तो इस कार्रवाई में कितने आतंकी मारे गए, यह सवाल नेताओं समेत सामान्यजन की ओर से भी आने लगा है। इसी बीच भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दावा किया कि वायुसेना की एयर स्ट्राइक में 250 से अधिक आतंकवादी मारे गए। उनके इस बयान पर राजनीति गर्मा गई है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शाह के बयान पर सवाल खड़े किए और कहा कि क्या शाह को सेना के बयान पर भरोसा नहीं है। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी एयर स्ट्राइक से संबंधित जानकारी साझा करने का केंद्र से कहकर राजनीति गरमा दी थी। इसके बाद लगातार सियासी बयान आ रहे हैं, जिनसे सभी हैरान-परेशान हो रहे हैं।

मीडिया की बदनामी
भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव और युद्धोन्माद वाले कवरेज करने को लेकर मीडिया की खासी किरकिरी हो रही है। दरअसल मीडिया ने जिस तरह का रोल इस बीच प्ले किया है उसे लेकर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि मीडिया वही दिखा रहा है और कह रहा है जो सरकार चाहती है, जबकि ऐसा करते हुए पत्रकारिता की तमाम नियंत्रण रेखाओं का उल्लंघन किया जा चुका है। टीकाकारों ने भी कहना शुरु कर दिया है कि 14 फरवरी पुलवामा हमले के बाद से मीडिया कवरेज सही मायने में पत्रकारिता के नए गर्त को छूने वाला रहा है। कहने वाले कह रहे हैं कि भारत और पाकिस्तान तो एक दूसरे को नियंत्रण रेखा का उल्लंघन करने का आरोप लगाते ही रहे हैं, लेकिन इन दोनों ही देशों के मीडिया ने भी तमाम नियंत्रण रेखाओं का उल्लंघन कर खूब बदनामी ली है। बड़बोले और भड़काऊ एंकरों ने भी मीडिया की बदनामी करवाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। इस ओर भी ध्यान दिलवाने की आवश्यकता अब आन पड़ी है, क्योंकि यह पत्रकारिता के लिए बुरा वक्त जो बताया जा रहा है।

राफेल आखिर कब तक ?
राफेल खरीदी मामले को मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस आम चुनाव तक लेकर जाना चाहती है, इसलिए जेपीसी से जांच कराए जाने की मांग पर वह अड़ी है। इस आशय का दावा करने वालों के सामने एक सवाल यह भी है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई खुली अदालत में करने के लिए सहमत हो गई है तो फिर क्या कोई सवाल बच रहता है, जिसे लेकर आगे भी इस पर कोई मामला उठाया या उस पर बहस की जा सके। वैसे सत्ता पक्ष तो यही कह रहा है कि डील में कोई कमी नहीं हुई है, लेकिन राफेल को आम चुनाव तक बनाए रखने के लिए विरोधी लगातार इसमें कुछ न कुछ तलाशते रहेंगे। इसलिए सवाल किया जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इसके बाद राफेल के जिन को जिंदा करने के लिए नए सिरे से कोशिश करेंगे या नहीं?

अभी मरा नहीं राफेल वाला जिन्न
एक समय वह था जबकि सुप्रीम कोर्ट ने राफेल सौदे की प्रक्रिया पर संदेह करने की कोई वजह नहीं होने का निर्णय दिया और तभी लगा कि मामला शांत हो गया, लेकिन अब जबकि पुनर्विचार याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिए गया है तो कहा जा रहा है कि अभी राफेल का जिन्न मरा नहीं है, बल्कि वह कभी भी उठ खड़ा हो सकता है। दरअसल वायुसेना ने पीओके में जिस दिन जवाबी कार्रवाई की उसी दिन राफेल पर दायर पुनर्विचार याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया, जिसके बाद से वायुसेना के जवानों को राफेल उपलब्ध कराए जाने की भी मांग उठने लगी है। गौरतलब है कि चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की पीठ ने पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई खुली अदालत में करने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा व अरुण शौरी और मशहूर वकील प्रशांत भूषण की अपील पर चैंबर में विचार किया था। इसके बाद ही राजनीति भी गरमा गई। यह अलग बात है कि पुलवामा हमले के बाद कांग्रेस ने आतंकवाद के खिलाफ सरकार के साथ खड़े रहने का भरोसा जतलाया है।

बसपा किसे दे रही झटका
उत्तर प्रदेश में विपक्षी महागठबंधन से अलग हो चुकी बहुजन समाज पार्टी ने अब बिहार में भी अपनी अलग राह चुन ली है। बताया जा रहा है कि बसपा ने महागठबंधन को झटका देते हुए बिहार की सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बना लिया है। ऐसे में बसपा को जदयू, भाजपा, लोजपा वाले गठबंधन एनडीए से और कांग्रेस, राजद, रालोसपा, हम व अन्य पार्टियों वाले महागठबंधन से कड़ा मुकाबला करना होगा। इसलिए राजनीतिज्ञ तो यही कह रहे हैं कि बसपा किसी और को नहीं बल्कि अपने आपको झटके पर झटका दिए जा रही है। लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद देखना होगा कि उसे किस राज्य से करारा झटका लगा है, क्योंकि अचानक नया रास्ता अख्तियार करना उसके राजनीतिक जीवन पर ब्रेक लगाने वाला भी साबित हो सकता है।

अरुणाचल की आग
कुछ दिनों से अरुणायल प्रदेश एक खास आग से झुलस रहा है। यह आग प्रदेश के छह समुदायों को स्थायी निवासी प्रमाण-पत्र यानी पीआरसी दिए जाने के मामले को लेकर सुलगी है। राज्य सरकार ने जिन छह समुदायों को पीआरसी जारी करने का प्रस्ताव बनाया है वे गैर-अरुणाचल प्रदेश अनुसूचित जनजातियां हैं। इस संबंध में विधानसभा में रिपोर्ट प्रस्तुत की जानी थी, लेकिन लोगों के हिंसात्मक विरोध को देखते हुए इसे टाल दिया गया और विधानसभा अगले सत्र तक के लिए स्थगित हो गई। इस मामले में केंद्र के हाथ होने के जो आरोप लग रहे थे वो भी सामने आ गए, क्योंकि गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने खुद भी अरुणाचल प्रदेश के लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की और केंद्रीय मंत्री किरन रिजिजू ने सफाई देते हुए कहा कि राज्य सरकार इस पर बिल नहीं ला रही थी, बल्कि नाबाम रेबिया के नेतृत्व में बनी जेएचपीसी की रिपोर्ट को विधानसभा में पेश करने जा रही थी। कुल मिलाकर इस आग के पीछे भी कहीं न कहीं राजनीति साधने की ही कोशिश नजर आ रही है।

अपराधियों के अरमान
पुलवामा आतंकी हमले के बाद ‘बैन्डिट क्वीन’ के नाम से मशहूर रहीं फूलन देवी की हत्या के दोषी शेर सिंह राणा ने भी पाकिस्तान के प्रति नाराजगी जताते हुए केंद्र सरकार से कहा है कि वो थोड़ी सी मदद कर दें उसके बाद वो अपने साथियों के साथ पाकिस्तान जाकर मसूद अजहर को ठिकाने लगा देंगे। कुछ इसी तरह की बातें चंबल के उन डकैतों ने भी की है जो कि करीब 15 साल पहले समर्पण कर चुके हैं। ऐसे तमाम अपराधियों के दिलों में देशप्रेम जाग्रत हुआ है और वो कह रहे हैं कि उन्हें अवसर दिया जाए कि वो पाकिस्तान जाकर दुश्मनों को ठिकाने लगा सकें। अपराध जगत से जुड़े रहे लोगों के अरमानों को देख अब कुछ राजनीतिक लोगों ने भी कहना शुरु कर दिया है कि गंभीर अपराध के दोषियों के लिए सीमा पर कारागार बना देना चाहिए, ताकि जब कभी जरुरत हो तो वो देश की सुरक्षा के काम कर सकें।

केजरीवाल की बेचैनी
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के संबंध में कहा जा रहा है कि वो तो कांग्रेस से गठबंधन करने के लिए बेचैन हैं, लेकिन कांग्रेस है कि उनके साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ने को तैयार ही नहीं है। दरअसल दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि दिल्ली में भाजपा के हर उम्मीदवार के खिलाफ केवल एक उम्मीदवार होना चाहिए। वोटों का बंटवारा नहीं होना चाहिए। अगर आज कांग्रेस के साथ हमारा गठबंधन हो जाता है, तो भाजपा दिल्ली की सभी 7 सीटें हार जाएगी। इसके साथ ही उन्होंने यहां तक कह दिया कि कांग्रेस को गठबंधन के लिए मनाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन वह मानने को तैयार नहीं है। इस पर व्यंग्य करते हुए राजनीतिज्ञ कह रहे हैं कि क्या कांग्रेस इतनी कमजोर हो गई है कि उसे अब नई नवेली पार्टियों से गठबंधन कर लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

मजबूरी या वक्त का तकाजा
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शिवसेना और भाजपा गठबंधन के लोकसभा और विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ने का ऐलान किया तो सवाल उठे कि आखिर क्या हुआ जो कि शिवसेना ने सरकार के सामने हथियार डाल दिए। इस पर शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा कि ‘मैंने अनुभव किया कि लोगों के प्रति उनके व्यवहार में बदलाव आया है। इसलिए मैंने भाजपा से हाथ मिलाने का फैसला लिया।’ इस पर भी सवाल किया गया कि आखिर लोगों को महसूस होने की बजाय शिवसेना और उनके प्रमुख को ही यह अहसास क्यों हुआ कि भाजपा और उनकी सरकार का मिजाज उनके प्रति बदला है। ऐसा तो नहीं किसी अनजाने भय के कारण या किसी अन्य मजबूरी के चलते यह फैसला लेना पड़ गया हो, क्योंकि शिवसेना कुछ भी क्यों न कहती रहे, लेकिन कांग्रेस तो उन्हें आमंत्रित करने वाली नहीं है, इस लिए राजनीतिज्ञ तो यही कह रहे हैं कि मजबूरी या फिर वक्त को देखते हुए ही यह फैसला किया गया है, वर्ना ठाकरे भी जानते हैं कि घने बरगद के नीचे छोटे पौधे पनपते नहीं हैं।

कांग्रेस में क्या करेंगे कीर्ति आजाद
भारतीय जनता पार्टी द्वारा वर्ष 2015 में निलंबित किए गए नेता कीर्ति आजाद को अंतत: कांग्रेस में शामिल कर लिया गया। कीर्ति आजाद के पार्टी ज्वाइन करने के समय कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी से लोग यह अनुमान लगा रहे हैं कि उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी भी मिलेगी, क्योंकि सीधे पार्टी अध्यक्ष से संबंध होने का कुछ तो लाभ मिलेगा। बिहार राज्य के दरभंगा से सांसद कीर्ति आजाद को पार्टी विरोधी गतिविधियों के इल्जाम के तहत भाजपा से निलंबित किया गया था, लेकिन अब उन्होंने कांग्रेस में शामिल होने की घोषणा ट्विटर पर करके एक तरह से भाजपा की ही मुश्किलें बढ़ाने का काम कर दिया है। क्रिकेटर से नेता बने कीर्ति आजाद के पहले नवजोत सिंह सिद्धू भी कांग्रेस में शामिल हुए थे और कांग्रेस को मजबूत करने के लिए अच्छी मेहनत भी की थी। इसलिए कीर्ति आजाद को भी बड़ी जिम्मेदारी मिलने के कयास लगाए जा रहे हैं।

मेक इन इंडिया पर सियासत?
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा था कि मेक इन इंडिया पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है। इस पर रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि यह तो शर्म की बात है क्योंकि इस तरह से देश के इंजीनियरों, टेक्निशियन और मजदूरों की मेहनत व प्रतिभा पर सवाल उठाए जा रहे हैं। जहां तक राहुल के ट्वीट का सवाल है तो उन्होंने वंदे भारत एक्सप्रेस के वाराणसी से दिल्ली लौटते समय रास्ते में रुक जाने के बाद प्रतिक्रिया स्वरुप किए थे और उन्होंने यही बताने की कोशिश की थी कि इसमें कहीं कोई कमी रह गई है, जिसे सुधारने के लिए गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। फिर भी हर बात को सियासी चश्में से देखने वाले इसमें भी राजनीति तलाश लेंगे और इस तरह से हमलावर होंगे, किसी ने सोचा नहीं था। अब तो कहा जा रहा है कि सरकार अपनी असफलताओं को दूसरों के सिर मढ़कर अपना पल्ला झाड़ने का काम कर रही है, यह भी कम शर्म की बात नहीं है।

याद आएगा प्रियंका का रोड शो
बतौर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी का पहला रोड शो अनेक मायनों में खास हो गया है। पहली बार लखनऊ में इस कदर भीड़ रोड शो के दौरान देखी गई, जिसका लाभ चोरों ने भी उठाया और 50 से ज्यादा मोबाइल पर और पर्स पर हाथ साफ कर दिया। इस प्रकार जहां प्रियंका के मेगा रोड शो का राजनीतिक आंकलन किया जा रहा है तो वहीं दूसरी तरफ चोरों को तलाशने में पुलिस लग चुकी है। कहने वाले कह रहे हैं कि जब प्रियंका अपने भाई कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पार्टी प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ लखनऊ में निकलीं तो भीड़ ने बतला दिया कि कांग्रेस एक बार फिर राजनीतिक आकाश पर छाने को आतुर है।

आरक्षण पर आर-पार
आरक्षण की मांग को लेकर राजस्थान में एक बार फिर गुर्जर आंदोलन की शुरुआत हो गई है। गुर्जर नेता कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला गुर्जरों का नेतृत्व कर रहे हैं। इस पर सवाल यह हो रहा है क जब भाजपा केंद्र में आई थी तो जातिगत आरक्षण की जगह आर्थिक आरक्षण की बात बढ़-चढ़कर कर की गई थी, लेकिन इसके बाद जो हुआ वह देश देख चुका है। इसलिए अब जानकार कह रहे हैं कि चाहे जो हो जाए, लेकिन देश को आरक्षण वाले इस जिन्न से छुटकारा मिलने वाला नहीं है। सरकारें भले बदल जाएं लेकिन कोई भी आर-पार के मूड में नहीं है, इसलिए गुर्जर आंदोलन अपने पूर्व वाले रुप में भड़कता दिख जाए तो हैरानी नहीं होगी।

यहां भी गडकरी की तारीफ
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने अपनी ही सरकार के कामकाज को लेकर जो कहा उससे विपक्ष खासा उत्साहित नजर आ रहा है। यही वजह है कि पहले राहुल गांधी ने उनकी पीठ थपथपाई तो वहीं दूसरी तरफ लोकसभा में भारतमाला परियोजना से संबंधित प्रश्न के जवाब के दौरान गडकरी के काम की जमकर तारीफ हुई। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने भी इस दौरान मेज थपथपाकर अपना समर्थन जताया। इस घटनाक्रम से देश में यह संदेश जा रहा है कि झूठ और जुमलेबाजों से विपक्ष परेशान है, लेकिन सच कहने वाले और आईना दिखाने वाले चाहे सरकार में ही क्यों न हों उन्हें उनका समर्थन मिलता रहेगा। सभी यही कह रहे हैं कि अच्छा काम करने वाले की तो तारीफ होना ही चाहिए इससे स्वस्थ विपक्ष के होने का उदाहरण भी मिलता है। इस तरीफ के बाद गडकरी अपने आपको भाग्यवान बता रहे हैं, क्योंकि तमाम पार्टी के लोग उनके काम की तारीफ जो कर रहे हैं।

गोवा में चुनाव की सुगबुगाहट
गोवा राज्य में हालात बेकाबू हैं, जिसे लेकर भाजपा के अंदर ही नाराजगी देखी जा रही है। इस समाचार के साथ ही कयास लगाए जा रहे हैं कि लोकसभा चुनाव के साथ ही गोवा विधानसभा चुनाव भी संपन्न कराए जा सकते हैं। इसकी वजह यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत परसेकर ने जहां बगावती सुर छेड़ रखे हैं तो वहीं भाजपा की दोनों सहयोगी पार्टियां महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी और गोवा फारवर्ड पार्टी के नेताओं ने भी अपने तीखे तेवर दिखाने शुरु कर दिए हैं। मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के खराब स्वास्थ्य को लेकर दोनों ही पार्टी के नेताओं में मुख्यमंत्री बनने की लालसा जाग गई है और इसलिए कहा जा रहा है कि गोवा में चुनाव हो सकते हैं, इससे कम में तो कांग्रेस नेता भी मानने को तैयार नहीं दिख रहे हैं और कहा जा रहा है कि भाजपा ने कांग्रेस के 3 विधायकों को तोड़कर कोई मैदान नहीं मार लिया है, क्योंकि अब तो उसकी अपनी ही पार्टी के नेता विरोध करते नजर आ रहे हैं।

असली हीरो कौन?
मध्य प्रदेश में भाजपा नेता अपनी हार को पचा नहीं पा रहे हैं, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री अपनेआप को हीरो बता, सभी को आईना दिखाने का काम करते नजर आ रहे हैं। मप्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ने पार्टी कार्यकर्ताओं को निराश और उनके मनोबल टूटने की बात कही तो पू्र्व मुख्यमंत्री ने उनकी बात काटते हुए कह दिया कि कार्यकर्ता निराश नहीं बल्कि गुस्से में हैं। ऐसे में एक कार्यक्रम के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खुद को जनता का असली हीरो करार दिया, इस पर गोपाल भार्गव ने भी मौका नहीं चूका और कह दिया कि जनता को तय करने दें कि असली हीरो कौन है। गौरतलब है कि लगातार तीन बार के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह अपने आपको आज भी हीरो की ही तरह पेश करते दिख रहे हैं, जिसे पार्टी के लोग ही पचा नहीं पा रहे हैं, इसलिए विरोधियों की कौन बात करे यहां तो पार्टी के नेता ही सवाल करते दिख रहे हैं कि जब प्रदेश में हार चुके हैं तो फिर हीरोगिरी किसी दिखाई जा रही है। अब तो जनता को ही तय करने दिया जाए कि असली हीरो कौन है, क्योंकि खुद को हीरो कह देने से कोई हीरो नहीं हो जाता है।

राम मंदिर पर मंथन
आम चुनाव सिर पर हैं, ऐसे में भाजपा और उसके अनुवांशिक संगठन मंदिर मुद्दे को उछालने में लगे हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ कुंभनगरी प्रयागराज में द्वारका-शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती की अगुवाई में चली तीन दिवसीय परम धर्म संसद ने धर्मादेश जारी कर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए तारीख का ऐलान भी कर दिया। इसके मुताबिक बसंत पंचमी के स्नान के बाद संत समाज अयोध्या के लिए कूच करेगा और 21 फरवरी को राम मंदिर की आधारशिला रखी जाएगी। इस घोषणा के बाद तय है कि राजनीतिक गलियारे में मंदिर मुद्दे को लेकर खींचतान शुरु हो जाए, क्योंकि कोई नहीं चाहेगा कि पू्र्ण बहुमत दिलवाने वाला मुद्दा यूं ही हाथ से निकल जाए। इसलिए जानकारों की मानें तो अब अदालत और सरकार से इतर मंदिर मुद्दे पर राजनीति शुरु हो गई है, जो आमचुनाव की घोषणा तक देश को मथने का काम करने वाली है।

चुनाव जीतने वाले चेहरे
यहां प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस पार्टी का महासचिव क्या बनाया गया, भाजपा समेत अन्य विरोधियों के खेमे में हलचल मच गई। प्रियंका की नियुक्ति पर राजनीतिक प्रतिक्रिया देने वालों में सर्वाधिक भाजपा नेता ही हैं। मजेदार बात यह है कि भाजपा नेता एवं बिहार सरकार में मंत्री विनोद नारायण झा ने तो यहां तक कह दिया कि सुंदर चेहरे के आधार पर चुनाव नहीं जीते जाते हैं। अब ऐसे नेताओं को कौन समझाए कि प्रियंका जिस परिवार से आती हैं उनके खून में सियासत समाई होती है, उस पर चेहरा सुंदर और सीरत अच्छी होना तो मानों सोने पर सुहागा जैसे है। इसलिए कांग्रेसी कह रहे हैं कि जिन्होंने प्रियंका को मंच से बोलते हुए सुना है वो जानते हैं कि उनके सामने बड़े-बड़े विरोधी नेता पानी भरते दिखेंगे, यही वजह है कि वो बौखलाहट में कुछ भी बोले चले जा रहे हैं। जहां तक चुनाव जीतने वाले चेहरों की बात है तो वह जनता तय करेगी, कोई विरोधी नेता तय नहीं कर सकता कि कौन सा चेहरा जीतेगा और कौन हारेगा।

वही परिणाम अब कैसे लाएं
लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं राजनीतिक दल इस समीक्षा में व्यस्त हो गए हैं कि जिन राज्यों से उन्हें पहले अच्छा रिजल्ट मिला था उसे फिर से कैसे दोहराया जाए। इसी सिलसिले में बताया जा रहा है कि साल 2009 के लोकसभा चुनाव में भले ही एनडीए की करारी हार हुई थी, लेकिन बिहार में एनडीए को 40 में से 32 सीटें मिलीं थीं। तब बिहार में बाकी सभी दल नीतीश के सैलाब में बह गए थे। इस बार फिर भाजपा नीतिश के कंधे पर सवार होकर वही परिणाम चाहती है जैसा कि 2009 में मिला था। समीक्षक कह रहे हैं कि अब जबकि प्रदेश में नीतिश की भाजपा समर्थित सरकार है और केंद्र में मोदी सरकार कार्य कर रही है ऐसे में पूर्व के परिणाम लाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन जैसी बात है, क्योंकि सरकारों के कामकाज को देखते हुए ही मतदाता इस बार मतदान करेगा और तब परिणाम दोहराना मुश्किल हो जाएगा।

मोदी की तरह राहुल के लगे नारे
नए साल में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पहले विदेश दौरे पर जैसे ही दुबई एयरपोर्ट पहुंचे, वहां मौजूद लोगों ने राहुल-राहुल के नारे लगाना शुरु कर दिया। यह देख लोगों को याद आया कि इसी तरह से जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कार्यकाल के शुरुआती दिनों में विदेश दौरे पर जाते थे तो लोगों का हुजूम मोदी-मोदी के नारे लगाने लगता था। अब राहुल के नाम के इन नारों के पीछे राजनीतिक कारण तलाशे जा रहे हैं। जानकारों की मानें तो राहुल अब परिपक्व राजनीतिज्ञ हो गए हैं इसलिए लोग उन्हें पसंद कर रहे हैं और यह अगले चुनाव में साफ हो जाएगा कि उनकी ख्याति किसी बड़े नेता से कम नहीं है। दरअसल भारतीय राजनीति को प्रभावित करने वाले कारकों में एक बड़ा कारण विदेश में मौजूद भारतियों का रुझान और उनका सहयोग व समर्थन भी रहता आया है। इसलिए दुबई में राहुल-राहुल के नारे लगना भारत में उन्हें स्थापित करने जैसा ही बताया जा रहा है। वैसे इस दौरे में राहुल के साथ सैम पित्रोदा और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ओमान चांडी भी रहे।

कानून व्यवस्था की पोल खोलती हत्या
गुजरात भाजपा के पूर्व उपाध्यक्ष और कच्छ के पूर्व विधायक जयंती भानुशाली की चलती ट्रेन में गोली मारकर हत्या कर दी गई। ये वही नेता हैं जिन पर पिछले साल ही एक महिला ने दुष्कर्म का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी थी और जिसके बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफा भी देना पड़ गया था। विवादों के बाद यूं पूर्व विधायक का सरेआम हत्या करने के पीछे का कारण स्पष्ट नहीं हुआ है, लेकिन कहने वाले कह रहे हैं कि गुजरात में एक बार फिर खून-खराबा करके भय का वातावरण बनाने का खेल शुरु किया जा रहा है, जिसे रोका जाना चाहिए। इस पर राजनीति नहीं करने की भी बातें की जा रही हैं, लेकिन कहा यह भी जा रहा है कि यह घटना कानून व्यवस्था दुरुस्त होने की पोल खोलने जैसी है।

वरुण क्यों बोल रहे राहुल की भाषा
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तो किसानों के मामले को लेकर लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरते आ रहे हैं। किसान कर्ज माफी के चलते ही तीर राज्यों में भाजपा को हरा कांग्रेस सरकार बनाने में सफल रही है। ऐसे में भाजपा बैकफुट पर चली गई है संभवत: यही वजह है कि अब पार्टी के ही सांसद केंद्र सरकार के खिलाफ बोलते नजर आ रहे हैं। दरअसल भाजपा सांसद वरुण गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के सुर में सुर मिलाने का काम करते हुए कहा है कि साल 1952 से लेकर 2019 तक देश के 100 उद्योगपतियों को जितना पैसा दिया गया, उस रकम का केवल 17 फीसद धन ही केंद्र और राज्य सरकारों से किसानों को आर्थिक सहायता राशि के तौर पर मिला है। इससे ज्यादा शर्मनाक आंकड़ा कुछ नहीं हो सकता है। वरुण के इस बयान से यह भी साफ हो गया है कि किसान कर्जमाफी का मामला आमचुनाव 2019 में भी छाया रहने वाला है। इससे मोदी सरकार पर सवाल उठने लाजमी हैं।

भावी प्रधानमंत्री के दावेदारों की दौड़
जैसे-जैसे आम चुनाव का समय करीब आता जा रहा है राजनीतिक दलों के गठबंधनों और भावी प्रधानमंत्री के नाम को लेकर दावे-प्रतिदावे भी खूब होते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में फूट डालो और राज करो की नीति पर चलने वालों की भी कमी नहीं रही है। दरअसल बताया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का पिछले दिनों जन्म दिन था। ऐसे में उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए पश्चिम बंगाल भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष दिलीप घोष ने कह दिया कि उन्हें फिट रहने की आवश्यकता है, क्योंकि इस समय यदि कोई बंगाली है जिसके प्रधानमंत्री बनने का चांस है तो वो ममता बनर्जी ही हैं। भाजपा से बंगाली प्रधानमंत्री का नाम पूछे जाने पर दिलीप घोष कुछ कहने की स्थिति में नहीं दिखाई देते हैं, यही वजह है कि विरोधियों ने कहना शुरु कर दिया है कि गठबंधन की गंजाइश को खत्म करने और सभी को भावी प्रधानमंत्री का दावेदार बताकर फूट डालने का काम बहुतायत में किया जा रहा है, जिससे सभी को सचेत रहने की आवश्यकता है। वैसे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने को लेकर भी तरह-तरह की बातें हो चुकी हैं, ऐसे में कोई भी नेता नहीं चाहेगा कि उसका नाम बतौर प्रधानमंत्री चलाया जाए, क्योंकि इसके बाद विवाद होना तय होता है।

माकन के बाद कौन
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय माकन ने दिल्ली कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद से अस्वस्थता के चलते इस्तीफा दे दिया। इस बात की जानकारी उन्होंने ट्वीट के जरिए दी। दरअसल उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ट्वीट करते हुए धन्यवाद किया है कि 2015 विधानसभा चुनाव के बाद से ही उन्हें दिल्ली के सभी नेताओं का सहयोग मिला, कठिन परिस्थितियों में यह सब आसान नहीं था। आप सभी का आभार। माकन के इस ट्वीट के बाद से ही कयास लगाए जाने लगे हैं कि दिल्ली का अगला अध्यक्ष कौन होने जा रहा है। इस संबंध में पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और योगानंद शास्त्री के साथ ही साथ जेपी अग्रवाल का नाम आगे किया जा रहा है, लेकिन फिलहाल केंद्रीय नेतृत्व ने इस पर कुछ भी कहना मुनासिब नहीं समझा है।

दीनदयाल की जगह अशोक चक्र
गौरतलब है कि विभिन्न राज्यों में भाजपा की सरकार बनते ही जहां कुछ जगहों के नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर कर दिए गए वहीं सरकारी दस्तावेजों में उनकी तस्वीरें लगाई जाने लगीं। इसे देखते हुए अब राजस्थान की नवर्निवाचित गहलोत सरकार ने सभी सरकारी दस्तावेजों से दीनदायल की तस्वीर हटाने का आदेश जारी करते हुए कहा है कि सभी सरकारी लेटर पैड पर दीनदयाल अपाध्याय की तस्वीर की जगह अब राष्ट्रीय चिन्ह अशोक चक्र होगा। इस फैसले पर किसी को आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि अशोक चक्र किसी राजनीतिक पार्टी का चिंह भी नहीं है और इसका सम्मान करना प्रत्येक भारतीय की जिम्मेदारी भी बनती है। बहरहाल इससे यह तय हो गया है कि यदि सरकारें बदलती हैं तो काम-काज का ढंग भी बदल जाता है, इसलिए सियासी तौर पर कहा जा रहा है कि इस तरह राजनीतिक विचारधारा की लड़ाई तो आगे भी चलती रहेगी इसमें हैरानी जैसी कोई बात नहीं है। इस बीच सियासी विरोध भी देखने को मिले तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

ऑडियो क्लिप फर्जी फिर रार क्यों
संसद में जिस ऑडियो क्लिप की चर्चा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने की थी उसे फर्जी बताया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ गोवा के मंत्री विश्वजीत राणे ने राफेल डील मामले वाले इस आडियो क्लिप को ‘छेड़छाड़’ वाला करार देते हुए मुख्‍यमंत्री मनोहर पर्रिकर से इसकी जांच कराए जाने की मांग भी कर दी है। राणे का कहना है कि कांग्रेस राफेल मामले में ‘फर्जी ऑडियो’ के जरिए उन्हें झूठा फंसा रही है। इस पर कांग्रेस नेताओं ने कहना शुरु कर दिया है कि यदि ऑडियो फर्जी है तो फिर जांच में वह साबित हो ही जाएगा, इसे लेकर यूं हंगामा करने या फिर आक्रामक होने की आवश्यकता क्या है। यह सब तो तभी होता है जबकि सच उजागर करने वालों को दबाने की कोशिश की जाती है।

पढ़े-लिखों से तो ये ही अच्छे
छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार में नौ मंत्रियों ने मंत्री पद एवं गोपनीयता की शपथ ली तो इसी के साथ बताया जाने लगा कि कौन कितना काबिल है और किसके पास क्या डिग्री है। खबर यह है कि सभी विधायकों ने हिंदी में ही शपथ ली, लेकिन कोंटा से विधायक कवासी लखमा निरक्षर होने के नाते अपना शपथ-पत्र तक नहीं पढ़ पाए. उन्हें राज्यपाल ने ही शपथ पूरी कराई। बहरहाल इस तरह की बातें करने वालों को जवाब देते हुए उनके प्रशंसक और समर्थक यह कहते हैं कि लखमा भले औपचारिक शिक्षा तक नहीं ले पाए हों, लेकिन वो पढ़े-लिखों को पीछे छोड़ते हैं क्योंकि उन्होंने तो न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया और सिंगापुर जैसे कई देशों की यात्रा की हुई हैं और कांग्रेस के विपक्ष में रहते हुए भी जिम्मेदारी के साथ अपना दायित्व निभाया है।

यह क्या कह गए गडकरी?
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने एक ऐसा बयान दे दिया है जिससे वो विवादों में उलझ सकते हैं। दरअसल गडकरी ने व्यंग्यात्मक ढंग से कहा था कि एक ट्रांसजेंडर को भी बच्चा हो जाएगा, लेकिन महाराष्ट्र के सांगली जिले में एक सिंचाई योजना कभी पूरी नहीं हो पाएगी। यहां गडकरी तेंभू ‘लिफ्ट’ सिंचाई परियोजना के चौथे चरण के पूरा होने पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे, लेकिन उन्होंने जो उदाहरण दिया वह वर्ग विशेष को नागवार गुजर सकता है। इसलिए विरोधियों ने जहां निशाने में लेना शुरु किया वहीं उनके अपनों ने कुछ न कहकर खामोश रहकर ही तमाशा देखना बेहतर समझा है।

रथ यात्रा अब आसान नहीं

भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई का कहना है कि राज्य में प्रस्तावित रथ यात्रा कार्यक्रम के लिए अनुमति मांगने के वास्ते वह उच्चतम न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाएगी। दरअसल पश्चिम बंगाल में भाजपा के महत्वाकांक्षी रोड शो को उस वक्त झटका लग गया जबकि कोलकाता उच्च न्यायालय की खंड पीठ ने रोड शो को अनुमति देने वाले एकल पीठ के फैसले को रद्द कर दिया। इसे देखते हुए जानकार कह रहे हैं कि भले ही रथ यात्रा की इजाजत सुप्रीम कोर्ट से पार्टी ले आए लेकिन अब भाजपा के लिए इस तरह की रथ यात्राएं निकालना आसान काम नहीं होगा, क्योंकि इस पर सभी की निगाहें होंगी।

राजनीतिक षड्यंत्र से हिंसा
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की हिंसा को लेकर अब राजनीतिक बयानबाजी शुरु हो गई है। एक तरफ विपक्ष योगी सरकार को घेरने में लगा हुआ है तो वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि बुलंदशहर घटना में प्रशासन ने पूरी सख्ती से कार्रवाई की है। योगी दावा करते हैं कि कानून के दायरे में रहकर प्रदेश सरकार ने बड़ी साजिश को बेनकाब किया है। दरअसल उनका कहना है कि जो लोग गोकशी कर दंगा करवाना चाहते थे और अराजकता फैलाना चाहते थे, उनके मंसूबे ध्वस्त हो गए हैं। इस पर विरोधी कह रहे हैं कि गोरक्षा के नाम पर जो भीड़ द्वारा हिंसा की जाती रही है वह भी तो राजनीतिक साजिश का ही हिस्सा होती थी, फिर इसी मामले में सरकार को राजनीतिक साजिश क्योंकर नजर आ रही है। आरोप है कि हिंसका भीड़ को प्रश्रय देने का काम विशेष राजनीतिक दल के लोग करते चले आ रहे हैं, यही वजह है कि हिंसा करने वालों के दिल इस कदर खुल गए कि उन्होंने अब पुलिस पर ही हाथ साफ करना शुरु कर दिया है। इसे लेकर राज्य में कानून व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं।

जगाने वाले सो गए?
किसानों की कर्ज माफी मामले में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का कहना है कि गुजरात और असम के मुख्यमंत्री तो जाग गए हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी भी सो रहे हैं। दरअसल मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनते ही किसानों के कर्ज माफ कर चुनावी वादे को पूरा करने के बाद राहुल ने सीधे मोदी सरकार पर निशाना साधा है और कहा है कि कांग्रेस पार्टी ने असम और गुजरात के मुख्यमंत्रियों को गहरी नींद से जगा दिया है, लेकिन प्रधानमंत्री अब भी सो रहे हैं। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी चौकीदार की भूमिका में तो घिरते नजर आए हैं, साथ ही अब वो किसानों के हित साधने के मामले में भी बैकफुट पर जाते दिख रहे हैं। इसलिए विरोधी भी कह रहे हैं कि देश को जगाने वाले अब सो गए हैं या फिर सोने का नाटक कर रहे हैं, जबकि काम करने वाले लगातार काम कर रहे हैं।

योगी के कामकाज पर सवाल
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुई हिंसा पर राज्य के पूर्व नौकरशाहों ने योगी सरकार के कामकाज पर न सिर्फ सवाल उठाए हैं, बल्कि उन्होंने मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग भी कर दी है। तकरीबन 83 पूर्व आला अधिकारियों ने बलंदशहर हिंसा पर कहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गंभीरता से कार्य नहीं कर रहे हैं। इनका कहना है कि योगी सरकार सिर्फ गोकशी मामलों पर ध्यान दे रही है, जबकि इस तरह की हिंसा पर गंभीरता दिखाई जानी चाहिए थी जो नहीं दिखाई गई। इससे लोगों में गुस्सा कायम है और अब तो पूर्व अधिकारियों ने खुला खत लिखकर योगी सरकार से इस्तीफे की मांग करके एक तरह से राजनीतिक गलियारे में हलचल पैदा कर दी है। वैसे इस मामले की जांच एसआईटी पूरी कर चुका है और रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि हिंसा से पहले गोकशी हुई थी और इस आरोप में चार लोगों को गिरफ्तार भी किया गया।
महिला अधिकारों की सियासी लड़ाई
दिखावे के लिए कहें या फिर राजनीतिक साजिश कि तमाम नेता और पार्टियां महिलाओं के अधिकार को लेकर बढ़-चढ़कर बातें करते देखे जाते हैं, लेकिन जब अधिकार देने की बात आती है तो सभी बगलें झांकने लग जाते हैं। इसका जीता जागता उदाहरण महिलाओं को राजनीति में आरक्षण का मामला है। यही वजह है कि अब भारत में भी अमेरिका की तर्ज पर महिलाओं की राजनीतिक पार्टी गठित की गई है जिससे वो अपने हक की लड़ाई अपने स्तर पर लड़ सकेंगी। कहा तो यही जा रहा है कि नेशनल वुमेन्स पार्टी सिर्फ महिलाओं का दल है और सिर्फ महिलाओं के अधिकारों की ही बात करेगा। फिलहाल तो देखने में यही आता है कि महिला जनप्रतिनिधि का काम भी उसके अपने पति, पिता या भाई ही करते देखे जाते हैं, ऐसे में महिलाओं की यह पार्टी कितनी सफलता के साथ काम कर पाती है यह देखने वाली बात होगी।

बीमार पर्रिकर और सरकार
गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर लंबे समय से बीमार चल रहे हैं। उनकी बीमारी का बहाना बनाकर विरोधी जहां राजनीतिक रणनीति तैयार करने में लगे हुए हैं तो वहीं पार्टी नेता भी दबे सुर में उनके जाने की बात करते दिखते हैं। यही वजह है कि मुख्यमंत्री पर्रिकर ने नाक में ड्रिप लगा पुल का निरीक्षण करने पहुंच गए। इसी स्थिति में उन्होंने एनआईटी गोवा के कैंपस का शिलान्यास किया और दो पुलों का जायजा लिया। इस पर राजनीतिज्ञों ने कहा कि पर्रिकर भले बीमार चल रहे हैं, लेकिन सरकार पर कोई आंच वो आने नहीं देंगे। यही वजह है कि नाक में ड्रिप लगी होने के बावजूद वो अपने कार्यों को बखूबी अंजाम दे रहे हैं। दरअसल केंद्र ऐसा ही चाहता है कि पर्रिकर सीएम बने रहें और सरकार बदलने को कोई बात को बल न मिले अत: उन्हें समय-समय पर इस तरह के कार्य करते हुए तो देखा ही जा सकता है। कुल मिलाकर पर्रिकर जरुर बीमार हैं लेकिन उन्होंने यह संदेश भी दे दिया है कि सरकार बीमार नहीं है, वह तो विकास के कार्यों को लगातार कर रही है।

सचिन को ससुर की सलाह
राजस्थान विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन करने के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट खुशियां मनाते उससे पहले ही उनके ससुर और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने नेक सलाह दे डाली। दरअसल नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि जीत पर अभी से ड्रम न बजाओ, अभी बहुत मेहनत करनी है। इसके जवाब में सचिन ने जो कहा उसने साफ कर दिया कि उनकी नजर आम चुनाव 2019 पर है, इसलिए वो कह गए कि अभी तो आधा रास्ता ही पूरा हुआ है, असली चुनौती तो चार माह बाद है। इस प्रकार फारुख की नेक सलाह संभवत: सचिन को भा गई इसलिए उन्होंने उन्हें माकूल जवाब भी दे दिया।

राजनीति में अवसरवादी कौन नहीं
बसपा प्रमुख मायावती ने मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को समर्थन करने का कहकर एक तरह से 2019 चुनाव में गठबंधन के साथ आने का संकेत भी दे दिया है। वैसे वो कहती तो यही हैं कि कांग्रेस के राज में भी दलित, आदिवासी और मुस्लिमों की उपेक्षा हुई लेकिन क्या किया जाए भाजपा को रोकने के लिए तो यह सब करना ही होगा। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब कांग्रेस और भाजपा राज में यह सब हो रहा है तो फिर समर्थन देने और गठबंधन में शामिल होने के लिए मायावती राजी क्यों हो जाती हैं। जानकारों की मानें तो मायावती भी अवसरवादिता की मारी हैं, इसलिए वो नहीं-नहीं कहते-कहते कांग्रेस के समर्थन में भी खड़ी हो जाती हैं।

कमलनाथ की सजगता आई काम
मध्‍य प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने पिछले अनुभवों को सामने रखते हुए सरकार बनाने का दावा पेश करने में कोई देर नहीं की। यहां पार्टी पूर्ण बहुमत के करीब पहुंची वहां कमलनाथ ने राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को पत्र लिखकर बहुमत साबित करने के लिए समय की मांग कर दी। इसे देखते हुए अन्य कांग्रेस नेता भी सजग हो गए और कोई बड़ी उलटफेर भाजपा या उसके सहयोगी संगठन नहीं कर पाए। इसके बाद ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जनादेश का हवाला देते हुए पद से इस्तीफा देने की बात कह दी। कुल मिलाकर कमलनाथ की सजगता और उनके अनुभवों का ही परिणाम रहा कि कांग्रेस एक बार फिर सरकार बनाने में कामयाब होती दिखी है। राजनीतिक पंडितों ने भी इसके लिए कमलनाथ की कार्यशैली को ही प्रमुखता प्रदान की है, जबकि भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय का कहना रहा है कि कांग्रेस को कम आंकना भाजपा को भारी पड़ा है।

शरद यादव को राहत?
जनता दल यू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव की राज्यसभा सदस्यता को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखे जाने के साथ ही अगली सुनवाई 11 सितंबर 2019 को किए जाने की बात कही है। इसे शरद यादव के लिए बड़ी राहत बताया जा रहा है, जबकि कहने वाले कह रहे हैं कि इस दौरान चूंकि वो राज्यसभा नहीं जा पाएंगे और न ही राज्यसभा के सदस्य के तौर पर वेतन-भत्ते ही ले पाएंगे, फिर महज सात, तुगलक रोड का बंगला ही उनके पास रहेगा, तो क्या इसे बड़ी राहत कैसे कहा जा सकता है। सही मायने में तो अदालत ने सुनवाई की तारीख लंबी दे दी है, वर्ना अब शरद यादव तो राज्यसभा सदस्य के तौर पर कुछ भी करते नजर नहीं आने वाले हैं। ऐसे में उनके पास एक ही चारा बचता है और वह यह कि 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान वो अपनी पारंपरिक मधेपुरा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ें और जीत दर्ज कर राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर अपनी इज्जत बचा लें, वर्ना विरोधियों ने तो उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है।

कैप्टन की सलाह
पंजाब के कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू का अब मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने खुद भी बचाव किया है और पार्टी के तमाम नेताओं और मंत्रियों को सलाह दी है कि वो सिद्धू के खिलाफ किसी भी तरह की नकारात्मक टिप्पणी न करें। सूत्रों की मानें तो पंजाब कैबिनेट की बैठक के दौरान दो मंत्रियों ने सिद्धू का मामला उठाया था और वो वहां मौजूद नहीं थे। ऐसे में कैप्टन अमरिंदर ने विवादों को जन्म देने वालों को नेक सलाह दे दी, लेकिन सवाल यही है कि अब उनकी सलाह आखिर कौन मानने वाला है, क्योंकि यह मामला तो काफी आगे बढ़ चुका है और मीडिया के समक्ष आकर नेता बयान दे रहे हैं। दरअसल बैठक के बाद कैबिनेट मंत्री साधू सिंह धर्मसोत ने पत्रकारों के समक्ष कहा कि मंत्रिमंडल की बैठक में सिद्धू के मामले को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई। बैठक में तो सरकार से जुड़े मामलों पर ही चर्चा की गई। जमीनी कार्यकर्ता तो यही कह रहा है कि काश ऐसा ही बयान तमाम लोग देने लग जाएं तो कम से कम कांग्रेस की जो फजीहत हो रही है वह भी रुक सकती है।

मंदिर-गाय और भाजपा
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा और उसके अनुवांशिक संगठनों ने जिस तेजी के साथ मंदिर मुद्दा उठाया उससे यह तो सभी जान गए कि एक बार फिर भाजपा मंदिर मामले को भुनाना चाहती है,और इसी के दम पर आम चुनाव में भी उतरने वाली है। इस बात की पुष्टि तेलंगाना विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा द्वारा तैयार किए गए घोषणा पत्र से भी हो रही है। दरअसल भाजपा ने घोषणा पत्र कमेटी के अध्यक्ष एनवीएसएस प्रभाकर और केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय की मौजूदगी में घोषणा पत्र जारी करते हुए यह भी वादा कर दिया कि सत्ता में आने पर वो हर साल एक लाख गाय मुफ्त बांटेंगे। मतलब साफ है कि भाजपा मंदिर और गाय पर आज तक निर्भर है, लेकिन सत्ता में आने पर क्या करती है यह सब तो जनता देख चुकी है और विरोधी बता चुके हैं। कहा जा रहा है कि पूर्ण बहुमत वाली केंद्र की मोदी सरकार ने मंदिर निर्माण को लेकर एक इंच भी कदम आगे नहीं बढ़ाया, जिससे देश के साधु-संत भी नाराज चल रहे हैं।
गोत्र बताया सफाई नहीं दी
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को लेकर सियासी तौर पर भाजपा और उसके सहयोगी लगातार हमले करते रहते हैं, ऐसे में राजस्थान के पुष्कर में पूजा के दौरान राहुल का गोत्र बताया जाना अब राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। दरअसल भारतीय जनता पार्टी ने अब राहुल के गोत्र का ‘इटली कनेक्शन’ निकालकर चुटकी लेने का काम किया है। यूपी भाजपा अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडे ने राहुल के गोत्र को नया नाम ‘गोत्र इट्लस’ दिया है। धर्म और जाति को लेकर की जा रहीं इस तरह की राजनीतिक बातों से अनेकों लोग अब आहत होने लग गए हैं इसलिए ऐसे लोग मुखर हो रहे हैं और कह रहे हैं कि यह तो हद दर्जे का गिरना है कि किसी गोत्र पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं और उसका मजाक बनाया जा रहा है। बुद्धीजीवी तो यही कहते हैं कि इन्हीं सब कारणों से हमारा देश पिछड़ता जा रहा है, लेकिन राजनेता और उनके पिछलग्गू इससे छुटकारा न तो खुद पा रहे हैं और न दूसरों को इससे हटने दे रहे हैं। काश इन बातों की बजाय विकास योजनाओं पर बातें होती तो बेहतर होता।

हेमा का टॉर्चनुमा भाषण
अपने जमाने की मशहूर अदाकारा और भाजपा सांसद हेमा मालिनी इन दिनों मध्य प्रदेश में चुनावी सभाएं करती देखी जा रही हैं। इसी दौरान वो नरेला विधानसभा क्षेत्र में जनसभा करने पहुंचीं तो अंधेरा हो चुका था और बिजली बार-बार गुल हो रही थी, जिससे परेशान हो उन्होंने मोबाइल के टॉर्च की रोशनी से अपना भाषण पूरा किया। इस पर विपक्ष ने व्यंग्यवाण दागे और कहना शुरु कर दिया कि हेमा का भाषण वाकई टॉर्चनुमा ही है, क्योंकि जब वो कहती हैं कि ‘भाग धन्नों भाग बसंती की इज्जत का सवाल है’ तो लोगों को याद आ जाता है कि मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार में वाकई बच्चियां और महिलाएं रोजाना यौन उत्पीड़न की शिकार होती हैं, लेकिन उन्हें बचाने वाला कोई नहीं होता है। इस तरह उनका भाषण कहीं न कहीं भाजपा की प्रदेश सरकार को आईना दिखाने जैसा ही है, जिसका लाभ विपक्ष को मिलेगा ही मिलेगा।
धर्म प्रचार करना पड़ा महंगा?
अंडमान के सेंटिनल द्वीप में आदिवासियों द्वारा मारे गए अमेरिकी टूरिस्ट जॉन ऐलन चाऊ के बारे में कहा जा रहा है कि वो वहां ईसाई धर्म का प्रचार करने गए थे, जो कि वहां के लोगों को पसंद नहीं आया और उन्होंने उन्हें जान से मार दिया। गौरतलब है कि शुरु से ही मिशनरीज अपना काम आदिवासी क्षेत्रों में करती रही हैं और इसलिए इस मौत को भी धर्म प्रचार से जोड़कर देखा जा रहा है। वहीं यह भी बताया गया है कि मारे गए 27 साल के अमेरिकी नागरिक जॉन ऐलन चाऊ का मकसद इन अनजान आदिवासियों से मेल-मिलाप बढ़ाना था, जिसके लिए वो तरह-तरह की सामग्री लेकर अनेक बाद गए, लेकिन इस बार उनसे कहीं कोई चूक हो गई जिस कारण वो आदिवासियों के तीर के शिकार हो गए। इस मामले में अमेरिका कोई जवाब तलब नहीं करे इसलिए भी कहा जा रहा है कि चूंकि वो धर्म प्रचार के लिए वहां गए थे इसलिए आदिवासियों जिन पर किसी का कोई कानून प्रभावी सिद्ध नहीं होता, उनकी हत्या कर दी। जानकारों की मानें तो मामला अंतर्राष्ट्रीय है इसलिए इसमें गंभीरता दिखाने की आवश्यकता है, यू चलताऊ बयानों से बात और भी बिगड़ सकती है।

धन्यवाद सुषमा
अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान करके जहां सुषमा स्वराज ने अपने पति स्वराज कौशल को खुश किया वहीं राजनीतिक गलियारे में भी अंदर ही अंदर खुश होने वालों की कमी नहीं है। दरअसल 1977 से लगातार राजनीति में सक्रिय रहने वाली सुषमा का कद इतना ऊंचा हो चुका है कि अब उनके सामने कोई टिकता ही नहीं है। ऐसे में पार्टी के अंदर ही मौजूद वो नेता जो उनके पीछे लाइन में लगे रहे हैं अब खुश हो रहे होंगे कि कम से कम अब वो आगे तो बढ़ सकते हैं, क्योंकि उनके रहते तो वो कभी भी नंबर एक पर नहीं आ सकते थे। इसमें लोकसभा चुनाव में टिकट के दावेदार शामिल हैं। बहरहाल सुषमा स्वराज स्वास्थ्य के कारण यह फैसला लेने पर मजबूर हुईं हैं, लेकिन उनके ऐसा करने से कम से परिवार के सदस्य तो खुश हो ही सकते हैं, क्योंकि अब वो अपना पूरा समय परिवार को दे सकती हैं, लेकिन इससे इतना भी खुश होने की जरुरत नहीं है क्योंकि सुषमा सिर्फ चुनाव नहीं लड़ेंगी, राजनीति में तो वो सक्रिय रहेंगी ही रहेंगी।

राफेल की गोपनीयता भंग ?
कांग्रेस ने एक बार फिर राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर केंद्र सरकार और भाजपा पर नए सिरे से निशाना साधते हुए कहा है कि राफेल पर अब कुछ भी गोपनीय नहीं रह गया है। दरअसल इससे पहले मोदी सरकार कहती रही है कि राफेल मामले में सब कुछ सार्वजनिक नहीं किया जा सकता क्योंकि इसकी गोपनीयता बरकरार रखनी होगी जो कि देशहित में है। इस पर बड़ा हमला करते हुए कांग्रेस ने एक तरह से दावा कर दिया है कि गोपनीयता तो भंग हो चुकी है और ऐसा एक बैंक की बैठक में राफेल वीमान की कीमत पर हुई चर्चा से हुआ है। यही नहीं विमान बनाने वाली कंपनी डसाल्ट ने अपनी सालाना रिपोर्ट में भी इसकी कीमत का जिक्र करते हुए राज से पर्दा उठा दिया है। इस प्रकार जो दावे गोपनीयता के केंद्र सरकार करती रही है और किसी भी प्रकार की जांच से बचती रही है अब उसे मालूम होना चाहिए कि राफेल की गोपनीयता भंग हो चुकी है।

कुशवाहा का ठौर कहां
खबर अगर गलत नहीं है तो रालोसपा प्रमुख एवं केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने एनडीए को अलविदा कह दिया है। वहीं दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा है कि इसकी औपचारिक घोषणा वो भाजपा के अंतिम निर्णय के बाद ही करेंगे, जबकि महागठबंधन कुशवाहा के सम्मान-स्वागत के लिए बताबी से इंतजार कर रहा है। इस प्रकार जदयू प्रमुख एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार जो कि कुश्वाहा से नाराज चल रहे थे को अपनी जीत नजर आ रही है। इसका एक कारण और यह भी है कि जहां कुशवाहा ने शरद यादव से एक घंटे तक बातचीत की वहीं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह उन्हें समय नहीं दे पाए, जिससे वो खासे नाराज दिख रहे हैं। कुल मिलाकर अब देखना यह है कि कुशवाहा किस नाव की सबारी करते हैं, क्योंकि दोनों ही नाव इस समय मझधार में खड़ी नजर आ रही हैं।
कौन कर रहा है जनतमत का अपमान
देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को लेकर बयानों का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है। दरअसल पहले कांग्रेस नेता शशि थरुर ने उनके बहाने मोदी पर निशाना साधा था तो वहीं अब भाजपा प्रवक्ता सुंधाशु त्रिवेदी ने सीधे नेहरु पर ही हमला बोलते हुए कह दिया कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू अनुकंपा से प्रधानमंत्री बने थे। यही नहीं उन्होंने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया है कि अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी भर जन आकांक्षा से प्रधानमंत्री बने हैं। इस पर तमाम दलों के नेता कहते देखे जा रहे हैं कि इस तरह के बयान सही मायने में देश की जनता का अपमान करने जैसा है, क्योंकि लोकतंत्र में जिसे जनता चाहती है उसे प्रधानमंत्री चुनती है और इसलीए यह कहना कि दो प्रधानमंत्रियों को छोड़कर कोई जनआकांक्षा के तहत प्रधानमंत्री नहीं बना पूरे देश के मतदाताओं का अपमान करने जैसा कार्य है।

भाजपा की सूची में गहलोत-बेनीवाल?
राजस्थान विधानसभा चुनाव उम्मीदवारों की भाजपा ने पहली सूची जारी की, जिसमें गहलोत और बेनीवाल का नाम देख लोग चौंक गए और राजनीतिक गलियारों में इसबात को लेकर चर्चा आम हो गई कि आखिर यह संभव कैसे हो सकता है कि ये नेता भाजपा सूची में जगह पाए हुए हैं। दरअसल, भाजपा की पहली सूची में पाली ज़िले की जैतारण सीट से अविनाश गहलोत को तो वहीं हनुमानगढ़ के भादरा विधानसभा सीट से संजीव कुमार बेनीवाल को टिकिट दिया गया है। इन नामों को पूर्व मख्यमंत्री अशोक गहलोत और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के सुप्रीमों हनुमान बनेवाल से जोड़कर देखा गया, जबकि हकीकत में ये भाजपा के नेता अलग हैं। बस यही गलतफहमी लोगों के लिए कौतूहल का कारण बनी और इस पर लोगों ने खूब चटखारे भी लिए। वैसे ऐसा होता आया है कि पार्टियां विरोधी उम्मीदवारों के हमनामों को चुनाव मैदान में उतारकर उनकी ताकत को कमजोर करने और जनता को भ्रमित करने का काम करती हैं, लेकिन यहां मामला दूसरा ही निकला है। अविनाश गहलोत भाजपा युवा मोर्चा के मंडल अध्यक्ष रह चुके हैं जबकि संजीव कुमार बेनीवाल भादरा सीट से विधायक बनने की ‘हैट्रिक’ जमाने के लिए ताल ठोंकते नजर आए हैं।

बहुत कुछ कहती है यह मुलाकात
रालोसपा सुप्रीमो और केन्द्रीय राज्यमंत्री उपेन्द्र कुशवाहा जहां जदयू और मुख्यमंत्री नीतिश कुमार को लेकर हमलावर हुए हैं तो वहीं, उनकी ही पार्टी के विधायक सुधांशु शेखर मुख्यमंत्री आवास पहुंचे जहां उनकी मुलाकात जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर से हो गई। मुलाकात होना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन लगातार एक घंटे तक बातचीत होना वाकई किसी बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है। इसलिए इस मुलाकात के सियासी मायने निकालने वालों ने प्रचारित कर दिया है कि शेखर बहुत जल्द जदयू में शामिल होने वाले हैं। अगर ऐसा होता है तो फिर मंत्रिमंडल विस्तार में शेखर को मंजू वर्मा की जगह मंत्री बनाया जा सकता है। गौरतलब है कि सुधांशु शेखर भी कुशवाहा समाज से आते हैं, इसलिए भी इस मुलाकात के खास मायने निकाले जा रहे हैं और बताया जा रहा है कि बाजी पलट भी सकती है।

इसे कहते हैं आ बैल मुझे मार
अपने को साफ़ -सुथरा साबित करने के लिये एमपी का शिव कुनबा यानि शिवराज के पुत्र कार्तिकेय ऐसा दांव खेल गए हैं की न केवल शिव परिवार बल्कि पूरी भाजपा मुसीबत में पड़ सकती है। कार्तिकेय ने राहुल के खिलाफ भोपाल कोर्ट में मानहानि का केस दायर कराया है, जिसकी सुनवाई 3 नवंबर को होनी है, ऐसे में रणनीतिकार कहते सुने जा रहे हैं कि अब भाजपा और शिवराज सरकार के और भी घोटाले-घपले उजागर होंगे, क्योंकि उन्होंने तो खुद आ बैल मुझे मार वाला काम कर दिया है।
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके बेटे पर निशाना साधते हुए गंभीर आरोप लगाया। इन आरोपों से नाराज शिवराज और उनके बेटे कार्तिकेय ने मानहानि का मामला दर्ज कराने की बात कह दी। इसके बाद अगले ही दिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल ने अपने बयान से यूटर्न लिया और कहा कि भाजपा में इतना भ्रष्टाचार है कि मैं कल कन्फ्यूज हो गया था। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने पनामा नहीं किया, उन्होंने तो ई-टेंडरिंग और व्यापमं घोटाला किया है।

तय करो कौन चोर कौन कोतवाल
सीबीआई प्रकरण इस कदर तूल पकड़ा हुआ है कि एक तरफ जहां मोदी सरकार पर राहुल गांधी हमला बोल रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ भाजपा ने पलटवार करते हुए यहां तक कह दिया कि उलटा चोर कोतवाल को डांटे। मतलब यहां राहुल को ही चोर बता दिया गया है, जबकि कांग्रेस के आरोपों पर कोई कुछ बोलने की स्थिति में नहीं है। इसलिए केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर कह रहे हैं कि राहुल गांधी रोज झूठ परोस रहे हैं लेकिन देश की जनता उनसे कहीं ज्यादा परिपक्व है और उन्हें पता है कि सच क्या है और झूठ क्या। अब इन्हें कौन समझाए कि जवाब सरकार को देना है कि उनके रहते हुए सीबीआई में यह सब क्या हो रहा है, लेकिन यहां उल्टा वो दूसरों को चोर बताने में लगे हुए हैं। इस समय जनता तो देख रही है कि कहीं कुछ सही होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है, क्योंकि नोटबंदी की घोषणा यहां आरबीआई की जगह प्रधानमंत्री खुद कर देते हैं, न्यायालय के मामलों को भी वो खुद हल करते दिखाई देते हैं और हद तब हो जाती है कि सीबीआई में पदस्थापना को लेकर विवाद होते हैं, लेकिन सरकार कहती है कि वो उनके कामकाज में दखल नहीं देती है, फिर ये मामले क्योंकर देश के सामने आ रहे हैं?

‘आंग्रिया’ क्रूज पर अमृता का आदर्श?
नामचीन लोगों से सार्वजनिक तौर पर ऐसे व्यवहार की उम्मीद की जाती है, जिसे शालीनता कहा जा सके, लेकिन अब यह सब बीते जमाने की बातें हो गई हैं। दरअसल मुख्यमंत्री फडणवीस की पत्नी अमृता फडवीस ने क्रूज में ऐसा कुछ कर दिया, जिसे देख लोग नाराज हो रहे हैं। वायरल एक वीडियो में अमृता क्रूज के एकदम किनारे सुरक्षा लाइन क्रॉस करते हुए सेल्फी लेने की कोशिश करती दिखी हैं। उनके पीछे खड़े सुरक्षागार्ड उन्हें ऐसा करने से रोकते रहे, लेकिन अमृता वहीं बैठी रहीं और मोबाइल से सेल्फी लेती दिखाई दीं। इस पर लोगों ने कहना शुरु कर दिया कि जब इस तरह से हस्तियां करने लगेंगी तो फिर सामान्यजन से कैसे व्यवहार की उम्मीद की जानी चाहिए, क्योंकि उनके व्यवहार को देखकर ही तो दूसरे लोग सीखते और आचरण करते हैं। इस तरह अमृता ने जो किया वह आदर्श तो कतई नहीं है। गौरतलब है कि ‘आंग्रिया’ क्रूज देश का पहला घरेलू क्रूज है जिसका उद्घाटन केंद्रीय जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी ने मुंबई पोर्ट पर किया था।

अब शिमला की बारी
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज क्या किया मानों अन्य राज्यों की भाजपा सरकारों ने भी इसे अपनाने का मन ही बना लिया। दरअसल भाजपा की एक और राज्य सरकार ऐतिहासिक शहर शिमला का नाम बदलने पर विचार कर रही है। भाजपा नेता एवं राज्य के स्वास्थ्य मंत्री विपिन सिंह परमार ने कहा है कि देश के विभिन्न क्षेत्रों के पौराणिक आधार पर नाम थे, उन नामों को फिर रखने में कोई बुराई नहीं है। शिमला का नाम श्यामला करने को लेकर बहस भी शुरु हो चुकी है। इस बहस का हिस्सा बनते हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरभजन सिंह भज्जी ने कहा कि आखिर इसका औचित्य क्या है? उन्होंने इस तरह से शहरों के नाम बदले जाने का विरोध किया और कहा कि इस प्रकार नाम बदलने से ऐतिहासिक चीजें खत्म हो जाएंगी। यहां टिप्पणीकार कह रहे हैं कि नाम बदलने का जुनून भाजपा की राज्य सरकारों में कुछ ज्यादा देखा जा रहा है, इसलिए यदि शिमला भी श्यामला हो जाता है तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।

यूपी-बिहार के मायने
बात चाहे महाराष्ट्र की हो या फिर गुजरात की, सभी जगह निशाने पर उत्तर प्रदेश और बिहार के गरीब लोग ही होते हैं। अब जबकि अमृतसर में ट्रेन हादसा हुआ तो खबर आई कि यहां मरने वालों में ज्यादातर लोग यूपी-बिहार के ही थे। पूर्व की भांति इस घटना पर भी राजनीति हुई और पंजाब के एक विपक्षी नेता ने तो इसे जनसंहार तक की संज्ञा दे दी। बहरहाल पंजाब सरकार ने रेल दुर्घटना की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दे दिए और रेलवे ने हादसे की जिम्मेदारी से भी पल्ला झाड़ लिया। टिप्पणीकार कह रहे हैं कि कुल मिलाकर इस हादसे में भी यदि कोई मारा गया तो वह गरीब ही था, लेकिन इन लाशों पर जो राजनीति करने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें यह जानकर संभवत: आश्चर्य ही हुआ होगा कि उनके यहां भी जो श्रमिक वर्ग है वह ज्यादातर यूपी-बिहार का ही, जिन्हें अन्य राज्यों से बाहर निकालने के प्रपंच रचे जा रहे हैं।

मोदी ने डाल दी नई परंपरा
लाल किले पर साल में दूसरी बार तिरंगा फहराकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक नई परंपरा का सूत्रपात कर दिया है। इससे पहले कभी यह नहीं हुआ था कि किसी की याद में यूं लाल किले पर तिरंगा फहराया जाए। बहरहाल 75 साल पहले 21 अक्टूबर 1943 के दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद भारत की पहली अस्थाई सरकार बनाई थी, जिसकी याद में मोदी सरकार ने इस कार्यक्रम को धूमधाम से मनाने का उपक्रम करते हुए तिरंगा फहराया और इसी बहाने प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस पर भी निशाना साधा। बहरहाल कहने वाले अब कह रहे हैं कि मोदी सरकार ने एक ऐसी परंपरा का सूत्रपात कर दिया है जिसके बाद अन्य महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के अवसर पर भी लाल किले पर तिरंगा फहराया जा सकेगा। इसलिए अब लाल किले पर साल में एक बार नहीं बल्कि अनेकों बार तिरंगा यदि फहरता हुआ दिखाई दे तो हैरानी नहीं होगी।

अब गुजरात और महाराष्ट्र में क्या फर्क
सांस्कृतिक, राजनीतिक या आर्थिक कारोबार के तौर पर गुजरात ने महाराष्ट्र की बराबरी नहीं की है, बल्कि क्षेत्रीयता की वजह से वह उससे भी आगे निकलता दिख रहा है। ऐसा कहने वालों ने बताना शुरु किया है कि महाराष्ट्र में उत्तर भारतियों के खिलाफ जिस तरह से जहर उगला जाता है और उनके लिए परेशानियां खड़ी की जाती हैं उसी तरह से अब गुजरात में उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के खिलाफ नफरत भरी जा रही है और उन पर हमले हो रहे हैं। इसलिए गुजरात मे प्रवासियों का रहना दूभर होता जा रहा है, जबकि पुलिस का दावा है कि उसने 342 लोगों को गिरफ्तार किया है, ताकि इस तरह की वारदात नहीं होने पाए। खबर के मुताबिक हिम्मतनगर में एक बच्ची से बलात्कार के मामले ने इस कदर तूल पकड़ा कि गुजरात के कई इलाकों में रहने वाले यूपी और बिहार के प्रवासियों को निशाना बनाया गया, जिस कारण अब गांधीनगर, अहमदाबाद, पाटन, साबरकांठा और मेहसाणा इलाके से सैकड़ों प्रवासी अपना कामकाज छोड़कर अपने घर को वापस जा रहे हैं। इस बीच कांग्रेस विधायक अल्पेश ठाकोर का बयान आया है कि उनके समर्थकों के खिलाफ झूठे मामले दर्ज किए गए हैं और इसलिए वो 11 अक्टूबर से ‘सद्भावना’ उपवास करेंगे। इस मामले में समाजसेवियों का कहना है कि सबसे पहले नफरत फैलाने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए, क्योंकि उन्हीं की वजह से प्रदेश में कानून व्यवस्था बिगड़ती है, फिर चाहे वो किसी भी राजनीतिक पार्टी के लोग क्यों न हों। इस तरह से गुजरात को महाराष्ट्र बनता देखना अच्छी बात नहीं है।

अब अल्टीमेटम से क्या हासिल?
कहा जा रहा है कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण मुद्दे को लेकर साधु-संतों ने मोदी सरकार को अल्टीमेटम देते हुए चार माह का समय दिया है। न्यास महंत नृत्य गोपाल दास की अध्यक्षता में संतों की उच्चाधिकार समिति की बैठक दिल्ली में हुई, जिसके फलस्वरुप समिति ने मोदी सरकार को अल्टीमेटम दिया। बताया जाता है कि समित ने सरकार पर अध्यादेश लाने के लिए दबाव बनाने की भी योजना बनाई है। अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद के अध्यक्ष प्रवीण भाई तोगड़िया का कहना है कि देश के संत केंद्र सरकार को राम मंदिर निर्माण का आदेश दें। इसके बावजूद अगर केंद्र सरकार मंदिर निर्माण का कानून नहीं बनाती है तो वे उसे उखाड़ फेंकें। इस पर राजनीतिज्ञों का कहना है कि अब जबकि चुनाव करीब आ गए हैं तो इस तरह के अल्टीमेटम का कोई मायने नहीं है, अगर यह सब करना ही था तो जब मोदी सरकार बनी थी तभी से किया जाना चाहिए था, ताकि अब तक उसका रिजल्ट भी निकल आता। यह सब मतदाताओं को साधने और भाजपा के पक्ष में करने के साधनमात्र हैं इसलिए चुनाव के करीब ही ये सब सामने आते हैं और मंदिर-मस्जिद की बातें करने लगते हैं।

योगी की बत्ती गुल
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भले दावे करते हों कि उनके शासनकाल में कानून व्यवस्था से लेकर सड़क, बिजली और पानी दुरुस्त है, लेकिन देखने वाले देख रहे हैं कि सब चौपट हुआ जा रहा है। दरअसल लखनऊ में योगी जी को इस बात का एहसास तब हुआ होगा जबकि उनके अपने ही कार्यक्रम के दौरान अचानक बिजली चली गई। बिजली गुल होने के कारण मुख्यमंत्री योगी को कुछ देर तक अपना भाषण भी रोकना पड़ गया, जब बिजली आती नहीं दिखी तो खुद योगी जी ने कारण पूछा तो मालूम चला कि यह तो जनरेटर वाली बिजली थी न कि बिजली विभाग द्वारा प्रदाय की जाने वाली बिजली। अब इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाकी प्रदेश में बिजली सप्लाई का क्या हाल होगा। चुटकी लेने वाले चुटकी ले रहे हैं कि यही हाल रहा तो अगले चुनाव में सही में योगी जी की बत्ती गुल हो जाएगी।
भारत-पाक मुलाकात
पाकिस्तान के प्रति सख्त रुख में बड़ा बदलाव करते हुए भारत ने दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की मुलाकात पर सहमति जताई है। अब कहा जा रहा है कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज अगले हफ्ते न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा से इतर अपने पाकिस्तानी समकक्ष शाह महमूद कुरैशी से भी मुलाकात करेंगी। इस पर विदेश मंत्रालय का कहना है कि यह महज एक मुलाकात होगी, इसे बातचीत या वार्ता का हिस्सा नहीं माना जाएगा। गौरतलब है कि पाकिस्तान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री इमरान खान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखते हुए दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की मुलाकात का प्रस्ताव रखा था, जिसे स्वीकार करने का अर्थ यह निकाला जा रहा है कि अब बातचीत के रास्ते भी खुलेंगे और सीमा पर जारी तनाव भी कम हो सकेगा। बहरहाल कहने वाले तो यही कह रहे हैं कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद पर सही प्रहार नहीं करता है तब तक मुलाकात या बातचीत का कोई मायने नहीं हैं।

कारोबारी और व्यापारी किसी के नहीं
यह तो सभी जानते हैं कि योगगुरु बाबा रामदेव ने शुरु से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फ़ैसलों को सराहा है और उनके हर कदम को देश के लिए लाभकारी बताया, लेकिन अब जबकि आम चुनाव करीब आ गए हैं तो उन्हें देश में बढ़ती महंगाई नजर आने लग गई है। हद यह है कि बाबा रामदेव कह रहे हैं कि यदि महंगाई पर काबू नहीं पाया गया तो आम चुनाव में मोदी सरकार को खुद चुनाव महंगा साबित होगा। यही नहीं बल्कि उन्होंने इस बार भाजपा का चुनाव प्रचार नहीं करने की भी बात कह दी है। इस पर भाजपा के कुछ नेताओं ने भी दबी जुबान में कहना शुरु कर दिया कि बाबा रामदेव तो व्यापारी हैं उन्हें अपना फायदा दिखाई देता है। अब यदि चुनाव भाजपा हार जाती है तो फिर उन्हें जीतने वाली पार्टी से हाथ मिलाना होगा, यही वजह है कि वो अभी से इसकी रुपरेखा तैयार कर रहे हैं और कह रहे हैं कि भाजपा के पक्ष में चुनाव प्रचार नहीं करेंगे। वैसे आमजन की समझ में यह बात नहीं आ रही है कि जब कारोबारी और व्यापारी किसी एक पार्टी से बंधकर नहीं रह सकते हैं तो फिर भाजपा और मोदी सरकार ने इन कारोबारियों और व्यापारियों के लाभ के लिए अनेक निर्णय क्यों लिए, क्या अब उसका भुगतान इन्हें नहीं भरना पड़ेगा?
अच्छा ही हुआ राहुल
पिछले कुछ दिनों से चर्चा थी कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तीन दिवसीय परिचर्चा में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को आमंत्रित किया गया है, लेकिन अब जबकि कार्यक्रम शुरु हो चुका है तो कहा जा रहा है कि उन्हें आमंत्रित किया ही नहीं गया है। इससे पहले राहुल के जाने को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए गए थे और दो पक्ष सामने आए थे, जिसमें से पहला पक्ष कहता रहा कि राहुल को आरएसएस के कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेना चाहिए, जबकि दूसरा पक्ष कह रहा था कि उन्हें जरुर जाना चाहिए और अपनी बात रखनी चाहिए। बहरहाल अब जबकि संघ का ‘भविष्य का भारत: आरएसएस का दृष्टिकोण’ विषय पर आधारित कार्यक्रम प्रारंभ हो चुका है तो बताया गया है कि करीब 40 संगठनों को आमंत्रित किया गया था, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को आमंत्रित किया ही नहीं गया। इस पर जानकार कह रहे हैं कि यह अच्छा ही हुआ, वर्ना लंबे समय तक राहुल को जवाब देना पड़ता कि आखिर वो संघ के कार्यक्रम में क्यों गए और क्या बोलकर आए और क्या उनके नाम और तस्वीरों का फायदा संघ आगे तक नहीं लेता रहेगा।

कहाँ है बुनियादी ढांचा ?
यह तो सभी जान चुके हैं कि यूपीए ने 126 राफेल विमानों की खरीद के लिए फ्रांस से सौदा तय किया था, लेकिन एनडीए सरकार ने सिर्फ 36 राफेल ही खरीदे, वो भी बहुत ज्यादा कीमत पर आखिर क्यों? इस सवाल के जवाब में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि 36 से ज्यादा विमान रखने के लिए एयरफोर्स के पास बुनियादी ढांचा नहीं था। इस पर भी सवाल किए जा रहे हैं कि आखिर सरकार बुनियादी ढांचा तैयार करने की बजाय ऐसे महंगे सौदे विदेशों से क्यों कर कर रही है, जबकि उसकी उपयोगिता पर ही सवाल उठ रहे हैं और वह भी कोई और नहीं बल्कि खुद रक्षा मंत्री उठा रही हैं। इसके लिए तो जरुरी यह होता कि मोदी सरकार यह पैसा अपने बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और उसके प्रसार पर लगाती तो बेहतर होता, कम से कम इस राजनीतिक उठा-पटक से तो बच रहते और काम भी पुख्ता हो जाता। ये ऐसे सवाल हैं जो कि सरकार की नीयत और सौदे पर विपक्ष को बोलने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
यह कैसा निलंबन
नोएडा के गौतमबुद्ध नगर की आम्रपाली पुलिस चौकी में ऐसा कुछ घटित हुआ कि सुबह होते-होते वह सुर्खियां बन गई। दरअसल इस पुलिस चौकी पर जब डीजीपी पहुंचे तो वहां मौजूद पुलिसकर्मीयों ने उन्हें पहचाना ही नहीं और इसके चलते साहब को किसी ने सैल्यूट भी नहीं ठोका। इससे गुस्साए डीजीपी ने उन्हें खबर होने से पहले ही एक्शन लिया और देखते ही देखते चौकी प्रभारी और कांस्टेबल को निलंबित कर दिया गया। इस कार्रवाई को नाम दिया गया अनुशासनहीनता, लेकिन हकीकत यही है कि डीजीपी को किसी ने नहीं पहचाना। बहरहाल मामला जो भी हो, लेकिन आम लोग तो सवाल यही कर रहे हैं कि यदि उन्होंने नहीं पहचाना था तो खुद डीजीपी अपनी पहचान बता देते और सलामी ले लेते आखिर इतना बड़ा कदम उठाने की जरुरत आखिर क्यों आन पड़ी। जिन्हें सिपाही और हवलदार कभी कभार ही देख पाते हों उन्हें पहचानना आसान थोड़े ही होता है, क्या यह बात खुद आला अधिकारी नहीं जानते हैं?
सस्ते डाटा की नहीं सस्ते आटा की जरुरत
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में होने वाले छात्रसंघ चुनाव से पहले अध्यक्ष पद के सभी उम्मीदवारों ने प्रेजिडेंशियल डिबेट में हिस्सा लेते हुए जो कहा अब वह बहस का कारण भी बन रहा है। दरअसल एक विश्वविद्यालय की छात्र संघ चुनाव में भी अध्यक्ष पद के उम्मीदवारों ने केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधा है और बताने की कोशिश की है कि इस सरकार की नीतियां क्यों गलत हैं। ऐसे ही एक उम्मीदवार जयंत जिज्ञासु ने अपने भाषण में सीधे मोदी सरकार को निशाने पर लेते हुए कहा कि देश की सरकार को समझना होगा कि हमें सस्ते डाटा की उतनी ज़रूरत नहीं है जितनी सस्ते आटा की है। इस बात को सरकार विरोधी आगे बढ़ा रहे हैं और कह रहे हैं कि मोदी सरकार तो अमीरों के साथ है इसलिए वह डाटा सस्ता करने में लगी हुई है जबकि गरीबों को दो वक्त की रोटी तक नसीब नहीं हो रही है, उन पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। इसलिए इस समय सस्ते डाटा की नहीं बल्कि सस्ते आटा की बात होनी चाहिए।

राफेल का भारत तक का सफर
एक तरफ राफेल सौदे को लेकर देश में राजनीति गरमाई हुई है तो वहीं दूसरी तरफ खबर है कि फ्रांस के तीन राफेल लड़ाकू विमान मध्य प्रदेश के ग्वालियर एयरबेस पहुंच गए हैं। इन पर अगले तीन दिनों तक भारतीय वायुसेना के पायलट ट्रेनिंग करेंगे। इस तरह राफेल सौदे के और गर्माने का अंदेशा आम हो चला है। कांग्रेस किसी भी तरह यह मानने को तैयार ही नहीं है कि इस सौदे में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ और इस पर पारदर्शिता बरती गई है। हकीकत यही है कि जिस सौदे को कांग्रेस की यूपीए सरकार नहीं कर पाई, उसे महंगे दामों में एक निजी कंपनी के जरिए कैसे अंजाम तक पहुंचा दिया गया? अब कहा जा रहा है कि सरकार भले कुछ भी क्यों न कहे, लेकिन हकीकत यही है कि यह सौदा काफी लंबे समय तक इस सरकार का पीछा करता रहेगा, क्योंकि विरोधियों ने इसे अदालत तक ले जाने का मन जो बनाया हुआ है। कांग्रेस की प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी की मानें तो मोदी सरकार ने राफेल सौदे में देशहित को पूरी तरह से दांव पर लगा दिया है।

कुत्तों ने लालू की नींद हराम की
आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में जहां जेल की सजा से परेशान हैं तो वहीं अब उन्हें डेंगू के डंक और कुत्तों की भों-भों ने परेशान कर दिया है। लालू के करीबी बता रहे हैं कि जब कभी लालू सोने की कोशिश करते हैं कुत्ते भोंकना शुरु कर देते हैं, जिससे उनकी नींद हराम हो रखी है। अब यदि लालू नींद नहीं ले पाएंगे तो उनकी बीमारी ठीक होने की बजाय और बढ़ने लगेगी। इसलिए अब उन्होंने पेइंग वार्ड की मांग कर दी है, लेकिन इसे लेकर अटकलें लगाई जाने लगीं कि इसके जरिए कहीं वो राजनीति न शुरु कर दें, इसलिए ऐसा हो पाना फिलहाल संभव नहीं है, क्योंकि आरोप यह भी है कि लालू के खिलाफ जो भी कार्रवाई की गई है वह राजनीतिक विद्वेष के चलते की गई है और केंद्र में सत्ता परिवर्तन के साथ ही उन्हें राहत मिल सकेगी। फिलहाल उन्हें अपनी तरह से दुश्मनों का सामना करना है।

दोस्त और कारोबारी में फर्क
रुस से भारत के रिश्ते जग जाहिर हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में केंद्र सरकार ने अमेरिका का रुख करके संदेश दिया कि वो अब अमेरिका से नजदीकी बनाना चाहता है। इसे विचारकों ने घातक कदम बताया था, लेकिन सरकार और उसके सलाहकार नहीं मानें और अब खबर आ रही है कि रूसी हथियारों की खरीद पर अमेरिका ने भारत को तनाव देने का काम कर दिया है। दरअसल पेंटागन के एक शीर्ष अधिकारी ने भारत को आगाह किया है कि रूस से हथियारों की खरीद करने पर उसे अमेरिका से विशेष छूट मिलने की कोई गारंटी नहीं होगी। अब यह कौन नहीं जानता कि रूस के खिलाफ अमेरिका के मौजूदा नियमों के तहत यदि कोई देश रूस से रक्षा या खुफिया विभाग के क्षेत्रों में कोई लेन-देन या सौदेबाजी करता है तो उसे अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना भी करना पड सकता है। कहा जा रहा है कि संभवत: भारत सरकार को अब दोस्त और कारोबारी में अंतर समझ आ गया होगा।

सम्भलो-बोलो,अय्यर की वापसी
पार्टी की अनुशासन समिति की अनुशंसा पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से मणिशंकर अय्यर का निलंबन तत्काल प्रभाव से रद्द करने की मंजूरी दे दी। गौरतलब है कि गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान अय्यर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेते हुए ‘नीच किस्म का आदमी’ वाली विवादित टिप्पणी कर दी थी, जिससे राहुल सख्त नाराज हुए और अनुशासन समिति ने उन्हें निलंबित कर दिया था। अब जबकि अय्यर का निलंबन रद्द कर दिया गया है तो फिर से चर्चा आम हो चली है कि क्या अय्यर अब संभल-संभल कर बोलेंगे, ताकि विरोधियों को ही नहीं बल्कि अपनी पार्टी के भी लोगों को बुरा न लगे। अब यह तो सभी समझते हैं कि राजनीति में रहते हुए भाषण देते वक्त जुबान फिसल ही जाती है, फिर उसके लिए इतनी बड़ी सजा के क्या मायने हैं। गलती हुई तो माफी मांगें और आगे बढ़ जाएं, संभवत: आगामी चुनावों के दौरान यही होने वाला है, इसलिए अय्यर को वापस ले लिया गया है।
लेडी डॉन बनाया किसने
एक गिरोह के लोग जिसे ‘मम्मी’ के नाम से पुकारते हैं वह लेडी डॉन बसीरन आखिरकार दिल्ली पुलिस के हत्थे चढ़ ही गई। बताया जाता है कि इस लेडी डॉन के खिलाफ पु‍लिस में करीब 113 मामले दर्ज हैं। यह 62 वर्षीय लेडी डॉन एक मात्र खूंखार महिला अपराधी नहीं है बल्कि दिल्ली में ऐसी पांच महिलाओं को चिंहित किया गया है, जिनकी अपराध जगत में तूती बोलती है। इस पर सामाजिक कार्यकर्ताओं का सवाल है कि आखिर ये महिलाएं जो अपराधी बन रही हैं, उसके पीछे किसका हाथ है? एक सामान्य महिला यूं भी कमजोर समझी जाती है, फिर उसे प्रताड़ित किया जाता है और बाद में पुलिस के चक्कर लगाते हुए वह रातों-रात लेडी डॉन बन जाती है। आखिर इसमें कहीं न कहीं पुलिसिया कार्रवाई भी जिम्मेदार है, क्योंकि यदि पुलिस अपना काम ईमानदारी से करती है तो अपराध का ग्राफ वैसे भी गिर जाता। विचारकों की मानें तो महिलाओं का यूं अपराध जगत में कदम रखना सभ्यसमाज के लिए अच्छा संदेश नहीं है।

योगी के लिए चुनौती है देवरिया कांड
देवरिया के मां विन्ध्यवासिनी संरक्षण गृह मामले में जहां डीपीओ को बर्खास्त किया गया वहीं, चार लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। ऐसे में देवरिया के नवनियुक्त डीएम कौशल किशोर का कहना है कि पूर्व डीपीओ ने भारी गड़बड़ियां की थीं। यहां तक कि संरक्षण गृह का लाइसेंस पिछले साल ही रद्द हो चुका था, लेकिन उसके बाद भी यहां बच्चियों को भेजा गया। जांच रिपोर्ट आने के बाद कई और की गिरफ्तारी संभव है। इस पर कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इतना बड़ा सैक्स रैकेट और बच्चियों का यूं यौन शोषण बिना शासन-प्रशासन के लोगों की मिलीभगत से चल ही नहीं सकता है। अत: अब मांग की जा रही है कि उन तमाम लोगों के चेहरों को बेनकाब किया जाना चाहिए, जिनके सहयोग से यह घनौना काम किया गया। वहीं आशंका व्यक्त की जा रही है कि नौकरशाहों और सफेदपोश लोगों के नाम इस मामले में जुड़ने से जांच और कानूनी कार्रवाई भी प्रभावित हो सकती है। यह मामला योगी सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है।

मराठा समाज आखिर किसके साथ
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के खिलाफ मराठा समाज उठ खड़ा हुआ है। मराठा समाज की नाराजगी सरकारी नौकरियों में आरक्षण और खुद सीएम का पंढरपुर पूजा के लिए नहीं पहुंचना है। इस मामले में समाज के लोग खुद को अपमानित महसूस कर रहे हैं। इसके चलते अब मराठा समाज के अनेक संगठनों ने मुख्यमंत्री से सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने की मांग रख दी है। इस प्रकार राजनीतिक तौर पर मराठा समाज ने बतला दिया है कि अब फडणवीस के साथ वो नहीं हैं, लेकिन वहीं दूसरी तरफ अब सवाल यह उठ रहा है कि जब मराठा समाज मुख्यमंत्री फडणवीस के साथ नहीं हैं तो फिर आखिर वो कौन नेता है जिसके साथ यह समाज जाने को तैयार है, क्योंकि चुनाव करीब आ रहे हैं ऐसे में वोटबैंक की खातिर कोई भी नेता कुछ भी करने को तैयार दिख रहा है।

यह कैसा विकास पर्व
मध्य प्रदेश में विकास पर्व मनाने आए केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उस समय विरोध का सामना करना पड़ गया, जबकि कार्यक्रम स्थल पर ही आशा कार्यकर्ताओं ने अपनी मांगें रखते हुए नारेबाजी शुरु कर दी। यही नहीं बल्कि कांग्रेसी विधायक ने कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य को कार्यक्रम में नहीं बुलाए जाने का भी विरोध दर्ज कराया, जिसके बाद उक्त जनप्रतिनिधि से भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने धक्कामुक्की की और विकास पर्व विरोध पर्व में तब्दील होता दिखा। खबरें यदि सही हैं तो सरकारी कार्यक्रम में सभी सम्मानित जनप्रतिनिधियों को आमंत्रित करने की परंपरा है, लेकिन जब बात पार्टी की आती है तो उसमें यह विवाद उत्पन्न होता है कि किसे बुलाया जाए और किसे नहीं। कयास लगाने वाले तंज कस रहे हैं कि यदि मंच पर ज्योतिरादित्य को बुला लिया जाता तो और किसी को जनता क्योंकर देखती, इसलिए विकास पर्व अकेले मनाना बेहतर समझा गया।

जेल में पिटाई और मौजमस्ती
उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिला जेल में ऐसा कुछ हुआ जिससे अंग्रेजों के जमाने की याद ताजा हो गई वहीं दूसरा एक अन्य वीडियो देखा गया तो मालूम हुआ कि भारतीय जेल वाकई सुधारग्रह ही हैं, जहां मौज मस्ती भी हो सकती है। दरअसल सोशल मीडिया में वायरल हुए जिला जेल के दो वीडियो अब राज्य में हड़कंप मचा रहे हैं। पहले वीडियो में जहां नर्तकियों का ग्रुप डांस है तो दूसरे में बंदियों की जेल अधीक्षक कक्ष में बेरहमी से पिटाई। वैसे जिला जेल अधीक्षक एचबी सिंह की मानें तो यह सारी साजिश उन्हें हटाने के लिए की जा रही है। मतलब जेल में नाच-गाने और पिटाई के साथ ही साथ राजनीति भी चल रही है। लोग तो यही कह रहे हैं कि इसे कहते हैं आधुनिक भारतीय जेल जहां सब कुछ मुमकिन है।

प्रणब दा पुन: राजनीति में?
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने संघ के कार्यक्रम में हिस्सा क्या लिया राजनीतिक दावों और कयासों के दौर शुरु हो गए। शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत ने तो यहां तक कह दिया कि ‘हमें लगता है कि संघ खुद को उस स्थिति के लिए तैयार कर रहा है कि यदि भाजपा 2019 आम चुनाव में बहुमत प्राप्त करने में विफल हो तो वह प्रणब मुखर्जी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए पेश कर सके।’ बकौल राउत इस बार हर हाल में भाजपा कम से कम 110 सीटें हारेगी। वहीं प्रणब दा की बेटी और कांग्रेस नेत्री शर्मिष्ठा मुखर्जी ने राउत को दो-टूक जवाब देते हुए कहा है कि ‘भारत के राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत होने के बाद मेरे पिता दोबारा सक्रिय राजनीति में नहीं आने वाले हैं।’ बहरहाल कोई कुछ भी क्यों न कहे लेकिन यह तो सच है कि जब से प्रणब दा संघ कार्यक्रम के बाद से सुर्खियों में तो आ ही गए हैं।

केजरीवाल कैबिनेट धरने पर…!
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल और दिल्ली के उपराज्यपाल की पटरी कभी बैठी ही नहीं, इसलिए हमेशा से ही तू डाल-डाल मैं पात-पात की स्थिति बनी रही है। अब खबर है कि मांगों को लेकर उप राज्‍यपाल अनिल बैजल के दफ्तर में मुख्यमंत्री केजरीवाल अपने कैबिनेट साथियों के साध धरने पर बैठ गए। संभवत: दिल्ली के इतिहास में यह पहला अवसर है जबकि सरकार को अपनी मांगे मनवाने के लिए एलजी के सामने धरना-प्रदर्शन करना पड़ा है। व्यंग्य करने वाले तो यही कह रहे हैं कि काश ऐसा ही नजारा अन्य राज्यों और यहां तक कि केंद्र में भी देखने को मिलता तो क्या बात थी, क्योंकि दिल्ली में तो उप राज्यपाल सरकार की मांगों तक को ठुकरा कर उन्हें सड़क पर ला देते हैं, लेकिन अन्य राज्यों की और केंद्र की बहुमत वाली सरकार तो किसी को कुछ बताना तक उचित नहीं समझती है। अब तो केजरीवाल कैबिनेट के धरने पर जनता ही संज्ञान ले तो कुछ बात बने, क्योंकि मांगें तो जनहित वाली ही होंगी, जिन्हें लेकर दिल्ली सरकार धरना भी देती है।

यह क्या रावण राज
खबर है कि गुजरात बोर्ड की 12वीं कक्षा की संस्कृत की किताब के जरिए बच्चों को पढ़ाया जा रहा है कि सीता का अपहरण रावण ने नहीं, बल्कि राम ने किया था। किताब के पेज नंबर तक का हवाला देते हुए बताया जा रहा है कि किताब में साफ लिखा है कि “जब राम ने सीता का अपहरण कर लिया तो लक्ष्मण ने राम से कुछ बेहद मार्मिक बातें कहीं।” वैसे तो गुजरात के बोर्ड ऑफ़ स्कूल टेक्सबुक्स के अध्यक्ष डॉ. नितिन पेठानी इसे अनुवाद की गलती बता रहे हैं, लेकिन राजनीति करने वाले तो यही कह रहे हैं कि अब लोगों को समझ में आ ही गया होगा कि हम राम राज में नहीं बल्कि रावण राज में जी रहे हैं, जिसमें राम को अपराधी घोषित करने की साजिश की जा रही है। व्यंग्य करने वाले कह रहे हैं कि हम भारतियों को आखिर रावण राज होने के और कितने सबूत चाहिए?

मीडिया और सरकार
फर्जी खबरों को रोकने के स्मृति ईरानी के फैसले को भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बदल दिया हो, लेकिन उनके बयान से कम से कम यह तो स्पष्ट हो ही गया है कि समचारों को लेकर केंद्र सरकार की सोच क्या है। सरकार के मंसूबों को भांपते हुए अनेक पत्रकार संगठनों ने भी विचार-विमर्श करना शुरु कर दिया और इससे पहले कि बात बिगड़ती और मामला सड़कों तक लाया जाता, प्रधानमंत्री मोदी ने उसे बदल कर रख दिया। वैसे असंगठित मीडिया को अब अपने हक की बात जोर-शोर से करनी चाहिए, क्योंकि अधिकार के नाम पर मीडियाकर्मियों के पास कुछ भी नहीं होता है, जबकि सबसे जिम्मेदारी का काम वही करता है। इस पर तोहमत भी उसे ही लगती है कि वह मनगढ़त खबरें देकर पूरी दुनिया को उलझाए रखता है। अगर यह सच भी है तो इसके पीछे मीडियाकर्मी कम और राजनीतिक दल और नेता समेत विभिन्न संगठन इसके अधिक जिम्मेदार होते हैं। कुल मिलाकर अपने लाभ की खातिर मीडिया को यूज करना और अपने हिसाब से चलाने की कोशिश काफी लंबे समय से चली आ रही है। मौजूदा मोदी सरकार पर भी मीडिया को मैनेज करने के आरोप लगते रहे हैं, ऐसे में फेक न्यूज की बात यदि की जाती है तो उस पर भी अंगुली उठना लाजमी हो जाता है।

भारत बंद और केंद्र सरकार
भारत बंद को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में बयान दिया और कहा कि उनकी सरकार एससी/एसटी के अधिकारों की रक्षा के लिए तत्पर है। सवाल यह है कि यदि अधिकारों की रक्षा हो रही थी तो फिर भारत बंद का आव्हान क्योंकर हुआ और सरकार उसे रोकने में नाकाम क्योंकर हुई? राजनाथ की मानें तो सरकार लोगों की चिंताओं को समझ रही है और हमारी सरकार ने एससी/एससी ऐक्ट को कमजोर नहीं किया है। यहां तक कि आरक्षण को लेकर अफवाहें निराधार हैं। इस प्रकार सरकार दावे करते है कि दलितों के मामले में वह संवेदनशील है, लेकिन वो अपनी बात को समझाने में नाकाम साबित हुई है। इसलिए अनेक राज्यों में बंद के दौरान हिंसा हुई और करीब एक दर्जन लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ गया। इसलिए विरोधी जहां केंद्र व राज्य सरकारों को बिगड़ी कानून व्यवस्था के लिए दोषी करार दे रहे हैं तो वहीं दलितों के साथ हो रहे अत्याचारों का मामला भी बढ़-चढ़कर उठाने को अपना धर्म बता रहे हैं। कुल मिलाकर इस मामले में केंद्र सरकार पूरी तरह से बैकफुट पर आ गई है, जिसका खामियाजा अब आगामी चुनावों में देखने को मिलेगा।

वाकई दाऊद लौट रहा ?
खबर है कि सीबीआई ने अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के सहयोगी और करीबी माने जाने वाले फारूक टकला को दिल्ली हवाई अड्डे से गिरफ्तार करने में कामयाबी हासिल की है। फारुख टकला कोई और नहीं बल्कि मुंबई 1993 सिलसिलेवार बम विस्फोट मामले में कथित संलिप्तता का आरोपी है, जिस पर साजिश रचने का आरोप है। यहां सवाल उठाए जा रहे हैं कि आखिर टकला के खिलाफ इंटरपोल का रेड कॉर्नर नोटिस लंबित होने के बावजूद वह दिल्ली कैसे पहुंचा? आधिकारिक सूत्रों की मानें तो टकला को संयुक्त अरब अमीरात से प्रत्यर्पित किया गया और विमान से दिल्ली रवाना किया गया। बहरहाल मामला जो भी हो, लेकिन तंज कसने वाले तो यही कह रहे हैं कि दाऊद के करीबियों का जेलों में जाना बताता है कि डॉन देश वापस आ रहा है।

ईमानदार पकौड़ा ही बेचेंगे
भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने नरेंद्र मोदी सरकार पर नोटबंदी और पीएनबी घोटाले को लेकर प्रहार किया। उन्होंने कटाक्ष किया कि जिस दर से बड़े कारोबार बंद और बड़े कारोबारी घोटाला कर देश से फरार हो रहे हैं उससे तो यही लगता है कि देश में ईमानदार पकौड़ा बेचने वाले ही रह जाएंगे। आपको बतला दें कि मोदी सरकार और उनके नुमाइंदे लगातार पकौड़ा बेचने को लेकर बयान दे रहे हैं, मतलब जो गलती हो गई उसे सही साबित करने में लगे हैं, ऐसे में अब उनकी पार्टी के लोग ही उनके खिलाफ बयान देते नजर आ रहे हैं। वैसे यह पहला अवसर नहीं है जबकि पटना साहिब से भाजपा सांसद शत्रुघ्न ने मोदी सरकार पर हमला बोला है, बल्कि इससे पहले भी अनेक बार उन्होंने नोटबंदी और जीएसटी को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा और खूब भला-बुरा कहा है, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं होना बताता है कि कहीं न कहीं कोई घाला तो जरुर है, जिस कारण शत्रुघ्न बयान पर बयान दिए चले जाते हैं और सरकार सुनकर भी अनुसुना करती चली जाती है।

नेपाल में अब्बासी की मौजूदगी
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी के नेपाल दौरे को लेकर भारत का चिंतित होना लाजमी है। दरअसल नेपाल में वाम गठबंधन की सरकार बनने के बाद अब्बासी का यह दौरा काफी अहम है। चूंकि नेपाल के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का झुकाव चीन की तरफ है अत: वहां अब्बासी की मौजूदगी अनेक सवाल खड़े करती है। यह अलग बात है कि ओली के आमंत्रण पर अब्बासी नेपाल पहुंचे, लेकिन इसके पीछे चीन की मर्जी और उनके कहने पर दोनों ही देशों के करीब आने की कहानी सामने आ सकती है। इस दौरे में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन को दोबारा प्रभाव में लाने पर सहमति बनी है। वैसे यह भी हकीकत है कि पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता के बीच अब्बासी का नेपाल दौरा अहम है, क्योंकि नवाज शरीफ को तो अदालत ने कहीं का नहीं छोड़ा है।

जैकब से जुड़े भारतीय
यह तो सभी जान चुके हैं कि दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इसके साथ ही हम भारतियों के लिए अहम खबर यह है कि जुमा के राजनीतिक करियर पर ग्रहण लगाने में भारतीय मूल के तीन भाइयों का प्रमुख हाथ बताया जा रहा है। दरअसल भारत से दक्षिण अफ्रीका गए गुप्ता ब्रदर्स की जैकब जुमा के कार्यकाल के दौरान तमाम कथित घोटालों में केंद्रीय भूमिका बताई गई है। इसलिए जुमा के इस्तीफे से पहले ही गुप्ता ब्रदर्स के ठिकानों पर पुलिस और भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसियों ने छापामार कार्रवाई की। यहां जिन गुप्ता ब्रदर्स की बात हो रही है उनके नाम अजय, अतुल और राजेश बताए जाते हैं और ये सभी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से ताल्लुक रखने वाले हैं। इस घटना के बाद बाहर बसे भारतियों की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी होने की भी खबर है। इस प्रकार भारतीय कारोबारियों के लिए इसे अच्छी खबर नहीं माना जा रहा है। इसलिए इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

DNA टेस्ट का फार्मूला
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भारतीय मुस्लिमों को हिंदू बताने के बाद अब भारतीय उपमहाद्वीप के समस्त लोगों के डीएनए पर बयान देकर सुर्खियां ली हैं। दरअसल भागवत कह रहे हैं कि अफगानिस्तान से बर्मा और तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक के लोगों का डीएनए एक है। संघ प्रमुख का यह बयान ऐसे समय आया है जब कर्नाटक में हिंदुत्व को लेकर भाजपा और कांग्रेस में जंग छिड़ी हुई है। इस प्रकार समीक्षक जहां इसे चुनाव से जोड़कर देख सकते हैं तो वहीं मेडिकल साइंस इसे मानने से इंकार भी कर सकता है, क्योंकि डीएनए से तो अंतरंग पारिवारिक संबंधों का पता लगाया जाता है। ऐसे में यदि सभी का डीएनए समान हो गया तो मेडिकल साइंस का दावा फेल हो जाएगा। इसलिए कहने वाले कह रहे हैं कि भागवत का बयान सिर्फ राजनीतिक है, जिसका साइंस और इतिहास से कोई लेना देना नहीं है।

बेहोशी के बाद तोगड़िया का रोना
करीब 11 घंटे तक ‘लापता’ रहने वाले विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया मीडिया के समक्ष आते ही रो पड़े और उन्होंने जो कहा वह किसी बड़ी साजिश की ओर ही इशारा करता है। यह अलग बात है कि तोगड़िया स्‍वीकार करते हैं कि उन्‍होंने राजस्‍थान पुलिस की गिरफ्तारी से बचने के लिए गायब हुए थे, लेकिन सवाल यह है कि फिर अहमदाबाद के शाही बाग इलाके में वो लोगों को बेहोश कैसे मिले, क्योंकि जेड प्लस सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति के लिए वह जगह सुरक्षित तो नहीं कही जा सकती। इसमें लोगों को एक बड़ी साजिश नजर आती है, जिसका जिक्र आगे खुद ही तोगड़िया आरोप के तहत करते दिखते हैं और कहते हैं कि उनका एनकाउंटर करने की साजिश रची जा रही है। उन्‍होंने कहा कि वह डरे नहीं है, बल्कि उन्‍हें डराने की कोशिश की जा रही है। लोग पूछ रहे हैं कि डर नहीं था तो फिर तोगड़िया रो क्यों रहे थे, ऐसा तो नहीं उनके किसी अपने करीबी ने ही उनके साथ चोट कर दी हो। बहरहाल बात इशारों में हुई है, इसलिए तमाम दुश्मनों के कान तो खड़े हो ही गए होंगे।

ममता पर क्यों उठे सवाल ?
पश्चिम बंगाल में टीएमसी के ब्राह्मण सम्मेलन को लेकर भाजपा सवाल उठाते हुए इसे तुष्टीकरण का नाम दे रही है, जबकि सम्मेलनकर्ताओं का दावा है कि भाजपा ने हिंदू धर्म के नाम पर जो भ्रम फैलाए हैं, उनको यहां दूर करने की कोशिश की जा रही है। इससे पहले मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी सागर द्वीप में मकर संक्रांति की तैयारियों का जायज़ा लेने पहुंचीं थी। इस पर भी भाजपा को एतराज है इसलिए वह आरोप लगा रही है कि मुस्लिम तुष्टीकरण के बाद ममता बनर्जी अब हिंदुओं को लुभाने में लगी हैं। विश्लेषक सवाल कर रहे हैं कि आखिर क्या भाजपा और कांग्रेस ने तुष्टीकरण की नीति नहीं अपनाई है, क्योंकि इसी के दम पर वोटरों का ध्रुवीकरण किया जाता रहा है ऐसे में ममता पर सवाल खड़े करने से पहले इन्हें अपने गिरेवान में भी झांक लेना चाहिए।

हेगड़े की माफी कितनी स्वीकार्य
संविधान बदलने वाले बयान पर हो रहे तीखे विरोध के बाद गुरुवार को लोकसभा में केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े को माफी मांगनी पड़ी। हेगड़े को सफाई देनी पड़ी कि संविधान में उनकी पूरी आस्था है। उन्होंने कहा, मेरे बयान पर सदन में जो गतिरोध चल रहा है, उसके संदर्भ में मैं विश्वास दिलाना चाहता हूं कि मेरे लिए संविधान सर्वोपरि है, संसद सर्वोपरि है, मैं कभी किसी भी हालत में संसद के खिलाफ नहीं बोल सकता। लोकसभा में हेगड़े ने गुरुवार को यह कहकर सदस्यों से माफी मांगी कि अगर उनके बयान से किसी की भावना को ठेस पहुंची है तो इसके लिए वह माफी मांगते हैं। कांग्रेस के 133वें स्थापना दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में राहुल गांधी ने भी इस बयान की तीखी आलोचना की और संविधान को खतरे में बताया। उन्होंने कहा, आज के समय में बाबा साहेब अंबेडकर का दिया हुआ संविधान खतरे में है, उस पर हमला हो रहा है, जो दुखद है। हमारा कर्तव्य है कि हम संविधान की रक्षा करें। बता दें कि हेगड़े ने बीते रविवार को धर्मनिरपेक्ष लोगों पर विवादित बयान दिया था। कर्नाटक में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था, जो लोग खुद को सेकुलर कहते हैं, वे अपने कुल के बारे में नहीं जानते। जिन्हें अपने मां-बाप के खून का पता नहीं, वे खुद को धर्मनिरपेक्ष बताते हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया था कि वह भारतीय संविधान को बदलने के लिए सत्ता में आए हैं और आने वाले दिनों में संविधान बदल दिया जाएगा।

एयर इंडिया ने ED को हटाया
सार्वजनिक विमानन कंपनी एयर इंडिया ने कार्यकारी निदेशक एएस सोमान को कुछ विवाद के कारण पद से हटा ‎दिया है। कंपनी ने पिछले सप्ताह जारी एक आदेश में सोमान को तत्काल प्रभाव से मुख्यालय के कार्यकारी निदेशक का पद संभालने का निर्देश दिया। कंपनी ने अभी इसकी आधिकारिक जानकारी नहीं दी है लेकिन कंपनी से जुड़े लोगों के अनुसार यह स्थानांतरण परिचालन और उड़ान की सेवाओं वाले विभाग में विवाद के कारण हुआ है। आदेश के अनुसार परिचालन के मौजूदा कार्यकारी निदेशक एके गोविल को सोमान का पद संभालने की भी अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई है। उल्लेखनीय है कि सोमान को कंपनी में इस मार्च हुए भारी फेरबदल में प्रशिक्षण विभाग से निकाल उड़ान के भीतर की सेवाओं का कार्यकारी निदेशक बनाया गया था।

लालू अब गाय से डरे
कहते हैं जब किस्मत खराब हो और भाग्य साथ न दे रहा हो तो ऊंट पर बैठे इंसान को भी कुत्ता काट लेता है, ठीक इसी तरह राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव कह रहे हैं कि उन्हें शेर से नहीं बल्कि अब तो गाय से डर लगने लगा है। वैसे लालू यादव ने यह सब केंद्र सरकार समेत प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधने के लिए कहा है, लेकिन समझने वाले तो यही समझ रहे हैं कि अब बिहार में जबकि उनके मित्र ने उनका साथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया है तो उन्हें अपने साये से भी डर लगने लगा होगा। गौरतलब है कि लालू यादव ने कहा है कि एक समय था जब लोग शेर से डरते थे, लेकिन अब वो गाय से डरते हैं। गाय से डरने की वजह गौरक्षकों द्वारा फैलाया गया आतंक है। बकौल लालू खौफ की वजह से ही बिहार के सारण में लगने वाला मवेशियों का मेला बिना मवेशियों के मेले में तब्दील हो गया है। इससे तो ऐसा लगता है कि इन गोरक्षकों से गायों को भी भय लगने लगा है।

स्वच्छता अभियान को आईना दिखाते शिंदे
महाराष्ट्र की देवेन्द्र फडणवीस सरकार के जल संरक्षण मंत्री राम शिंदे को सड़क किनारे हल्के होते हुए वीडियो तेजी से वायरल हुआ है, इसे लेकर राजनीतिक हल्के में तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं भी देखने को मिल रही हैं। कहा जा रह है कि एक तरफ स्वच्छ भारत अभियान का भाजपा पुरजोर तरीके से प्रचार कर रही है वहीं महाराष्ट्र की सत्ताधारी भाजपा सरकार के मंत्री ऐसा कृत्य करते दिखते हैं जो कि स्वच्छता अभियान की कलई खोलने जैसा प्रतीत होता है। दरअसल पहले से ही कहा जाता रहा है कि स्वच्छता अभियान कागजों पर ज्यादा और जमीन पर कम चल रहा है, इसलिए इसका असर उन्हीं जगहों पर दिखाई देता है जहां कि मीडिया के कैमरे चलते हैं, जबकि हकीकत में देखा जाए तो ग्रामीण अंचलों में ही नहीं बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी लोग अपनी आदतों को अभी तक बदल नहीं पाए हैं। मंत्री शिंदे का यह कृत्य सही मायने में अपनी सरकार को आईना दिखाने जैसा ही है।

गुरु को शिकस्त देने चेला मैदान में
हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में इस बार हमीरपुर जिले की सुजानपुरा सीट से इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार एवं पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल चुनाव लड़ रहे हैं। उनके सामने उनका ही चेला कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहा है। राजेंद्र राणा को कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी बनाया है। राजेंद्र राणा को राजनीति में लाने का प्रेम कुमार धूमल को है। उन्होंने इसे राजनीति का क ख गा घा पढ़ाया था। किंतु अब वही चेला उन्हें पटखनी देने की तैयारी कर रहा है। कहा जा रहा है राजनीति में सब कुछ जायज है। राजेंद्र राणा इन दिनों मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बहुत नजदीक है। राणा को एक रणनीति के तहत सुजानपुरा सीट से चुनाव मैदान में उतारा गया है। गुरु-चेला के चुनाव मैदान में आमने-सामने होने से यह चुनाव बड़ा रोचक हो गया है।

फेरीवालों को किसकी शह
महाराष्ट्र में उत्तर भारतीय हमेशा से ही शिवसेना और अब मनसे के निशाने पर रहे हैं। जब कभी उन्हें गुस्सा उतारना होता था फेरीवालों पर हाथ साफ कर देते थे। ‘जय महाराष्ट्र’ के नारे लगाने वाले उत्तर भारतीय फेरीवालों को गालियां देते और उन्हें शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना के साथ ही साथ आर्थिक नुक्सान पहुंचाते चले आए हैं। ऐसे में खबर आ रही है कि मुंबई के मलाड में राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के ‘गुंडे’ पीटे गए हैं और फेरीवाले जान बचाकर भागने की बजाय उन गुंडों के सामने खड़े देखे गए। यह अलग बात है कि अब उन फेरीवालों को भड़काने और हिंसा करने का आरोप कांग्रेस नेता संजय निरूपम पर लग रहा है। बहरहाल सभी यही कह रहे हैं कि किसी को इतना भी मत डराओ कि उसके अंदर से डर ही खत्म हो जाए।

…लो उडी हंसी,फंसे
एमपी के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वाशिंगटन में एक ऐसा बयान दिया जो की हंसी और उपहास में तब्दील हो गया। दरअसल अमेरिका दौरे पर गए शिवराज ने मध्य प्रदेश की सड़कों को अमेरिका की सड़कों से बेहतर बताया है। अब यह कौन नहीं जानता कि राजधानी भोपाल तक की सड़कें तो जर्जर हालत में होती हैं फिर संपूर्ण प्रदेश की सड़कें अमेरिका से कैसे बेहतर हो सकती हैं। इस मामले में पीडब्ल्यूडी मंत्री रामपाल सिंह की बात को सच मानना ही पड़ेगा कि प्रदेश के कुछ सड़कों को महज इसलिए खराब रखा गया है ताकि लोगों को कांग्रेस सरकार की याद दिलाई जाती रहे। इस प्रकार मंत्री के बयान से यह तो सिद्ध हो गया कि सड़कें खराब हैं और मुख्यमंत्री चौहान जो विदेशों में कह रहे हैं वो सत्य से परे है। इसलिए हंसी तो उड़ना ही है।

अमेठी में सभा के मायने
गुजरात में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की सक्रियता मोदी के गढ़ में भी बढ़ गई है। इसे देखते हुए भाजपा और खासकर मोदी सरकार को कुछ सूझा नहीं इसलिए उन्होंने राहुल को अमेठी में घेरने की योजना बना डाली। यह सुनकर राजनीतिक विश्लेषकों ने पूछा है कि जब चुनाव गुजरात में हो रहे हैं तो अमेठी में जाकर भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह, सूचना प्रसारण मंत्री स्‍मृति ईरानी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ अमेठी में जनसभा को संबोधित करके क्या संदेश देना चाहते हैं। यह तो खिसियानी बिल्ली खंभा नौचे वाली कहावत को चरितार्थ करने वाली बात हो गई। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि केंद्र और राज्य में जब कांग्रेस सरकार में है ही नहीं तो फिर उसे किन मुद्दों पर घेरने की बात की जा रही है, सच तो यही है कि सरकार घिरती है विपक्ष नहीं।

संघ का महिला सर्वे चर्चाओं में
भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी। संघ और उसके अनुवांशिक संगठनों 49 फ़ीसदी महिला मतदाताओं की राय जानने के लिए और उनके हाव भाव , सोच और उनके नजरिए को जानने सर्वे कराया जा रहा है।
इस सर्वे में गांव और शहर में रहने वाली महिलाओं की सोच, विभिन्न धर्म, जिस में हिंदू, मुस्लिम, सिख, जैन और ईसाई महिलाओं के साथ-साथ पिछड़ा वर्ग और दलित महिलाओं के बारे में भी सर्वे के माध्यम से जानने का प्रयास किया जा रहा है| उनकी सोच क्या है। संघ ने महिलाओं के लिए जो प्रश्नावली तैयार की है। उसमें मुझे लगता है। मैं आकर्षक नहीं हूं| मैं अपने काम से खुश नहीं रहती हूं| मैं सामान्यतः भविष्य के प्रति आशावादी नहीं हूं। मैं दूसरों के साथ खुश नहीं रहती हूं। मैं सोचती हूं कि निर्णय लेना मेरे लिए सरल नहीं है, मैं सोचती हूं कि मेरे जीवन का कोई उद्देश्य तथा अर्थ नहीं है। मैं सोचती हूं कि मैं स्वस्थ नहीं हूं। मेरे पास खुशी के यादगार पल नहीं है। यह प्रश्नावली गांव, शहर, कामकाजी महिलाएं, विधवा, ग्रहणी, आदिवासी, वनवासी, मजदूर और बुजुर्ग महिलाओं की सोच को दर्शाने वाला होगा। इस सर्वेक्षण से मिले निष्कर्ष के आधार पर संघ और भारतीय जनता पार्टी 2019 की लोकसभा चुनाव की रणनीति तैयार करेगी। सूत्रों के अनुसार अभी तक का यह सबसे बड़ा सर्वे होगा । महिला मतदाताओं की संख्या 49 फ़ीसदी है। इसको फोकस करके 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी संघ और भाजपा द्वारा की जा रही है।

शाह की राहुल से रार या वंशवाद
अमेरिका में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने वंशवाद को लेकर जो कहा उसका असर हिन्दुस्तान में देखने को खूब मिल रहा है। दरअसल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राहुल को निशाने पर लेते हुए कहा है कि वंशवाद कांग्रेस की खासियत है, भारत का स्वभाव नहीं है। इसे समूचे भारत पर नहीं थोपा जाना चाहिए। ऐसा कहकर कहीं शाह ने खुद ही अपनी पार्टी को निशाने पर तो नहीं ला दिया है, क्योंकि भाजपा में ही ऐसे न जाने कितने वरिष्ठ नेता हैं जिन्होंने अपने परिजनों और करीबियों को राजनीति में लाने और पार्टी से टिकट दिलाकर चुनाव लड़ाने का रिकॉर्ड कायम किया हुआ है। समय-समय पर उनकी चर्चा होती है और खूब होती है, लेकिन कार्रवाई नहीं होती। ऐसे में महज कांग्रेस पर वंशवाद का ठीकरा फोड़ना अब किसी के गले नहीं उतरता है। इसलिए लोग पूछ रहे हैं कि शाह को वंशवाद से परेशानी है या फिर राहुल से यह वो और बता दें तो बेहतर होगा।

आखिर अमर सिंह जाना कहां चाहते हैं
वो अमर सिंह ही हैं जो पहले कभी खुद को मुलायमवादी बताते थकते नहीं थे। न जाने अब क्या हुआ कि वो कह रहे हैं कि अगर मुलायम सिंह भी बुलाएंगे तब भी वो सपा में नहीं जाएंगे। राज्यसभा सांसद अमर सिंह की इस साफगोई के पीछे का राज जानने वाले कहते हैं कि आमचुनाव करीब आ रहे हैं, इसलिए अमर सिंह अपनी स्थिति स्पष्ट करना चाह रहे हैं। अब कहीं किसी पार्टी से बुलावा तो आ नहीं रहा इसलिए वो खुलकर कह रहे हैं कि अब न नायक हूं और न ही खलनायक हूं। यह कहकर अमर सिंह कहीं न कहीं संजय दत्त की याद दिला रहे हैं, क्योंकि जेल से निकलकर संजू बाबा ने जिस तरह से सामान्य जीवन जीना शुरु किया वह काबिले तारीफ है। क्या सपा से मुक्त होने के बाद अमर सिंह ऐसा कर सकते हैं, यह देखने वाली बात होगी।

साजिशों से सतर्क रहने का समय
खबर है कि पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की पत्नी के मदरसे, मदरसा चाचा नेहरु की वाटर सप्लाई में किसी अज्ञात व्यक्ति ने चूहा मारने वाला ज़हर मिला दिया। यह तो अच्छा हुआ कि ऐसा करते हुए मदरसे के कुछ बच्चों ने देख लिया अन्यथा मातम का माहौल बन जाता और तरह-तरह के सवालों के साथ ही साथ माहौल बिगाड़ने की भी कथिततौर पर कोशिशें हो जातीं सो अलग। गौरतलब है कि अलीगढ़ में स्थित इस को एक सोसायटी चलाती है, जिसकी प्रमुख पूर्व उपराष्ट्रपति अंसारी की पत्नी सलमा अंसारी हैं। इस मदरसे में 4,000 छात्रों के रहने की व्यवस्था है अत: अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोई हादसा हो जाता तो उसके बाद मातमी माहौल में क्या कुछ नहीं होता। इसलिए समाजसुधारकों का कहना है कि जब-जब चुनाव करीब आते हैं तो ऐसे तमाम संस्थानों को ज्यादा सतर्कता और सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि यही वह समय रहता है जबकि साजिशें आम होती हैं और उनसे बचकर चलना ही समझदारी होती है।
असली जेडीयू सामने आए तो बात बने
जेडीयू नेता शरद यादव के गुट ने अब मुख्यमंत्री नीतिश कुमार को पार्टी अध्यक्ष पद से हटा दिया है। इससे पहले नीतिश गुट ने शरद यादव को पार्टी की ओर से राज्यसभा सदस्यता समाप्त करने की घोषणा की थी। ऐसे में आमजन भ्रमित है कि आखिर जेडीयू का नेतृत्व कौन कर रहा है, क्योंकि दो बड़े नेता एक-दूसरे के खेमें को लगातार नुक्सान पहुंचाने में लगे हुए हैं और बता रहे हैं कि असली जेडीयू उनके पास है। गौरतलब है कि जेडीयू कार्यकारिणी की बैठक आयोजित करने और फिर नीतिश कुमार को अध्यक्ष पद से हटाकर गुजरात से पार्टी विधायक छोटू भाई वसावा को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किए जाने का फैसला सामने आया है। यह फैसला शरद गुट ने लिया है। बकायदा संवाददाता सम्मेलन में जदयू नेता अरुण कुमार श्रीवास्तव ने इसकी जानकारी भी दे दी। इसलिए सभी कह रहे हैं कि असली जेडीयू सामने आए तो बात बने।

पेट्रोल पर अल्फांस बोलेंगे तो विवाद होगा ही
देश में महंगाई चरम पर है और ऐसे में यदि कोई यह कहे कि इस महंगाई के कारण कोई मर तो नहीं रहा फिर हाय-तौबा क्यों कर रहे हैं। इसका तो यही अर्थ हुआ कि लोगों को तब तक त्रस्त किया जाए जब तक कि उन्हें जिंदगी मौत से भी बदतर न लगने लगे। दरअसल केंद्रीय मंत्री बने अल्‍फॉन्‍स कन्‍नानथानम ने पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा कि ‘पेट्रोल कौन खरीदता है? कोई व्यक्ति जिसके पास कार, बाइक है। निश्चित रूप से वह भूख से मर नहीं रहा है जो भुगतान कर सकते हैं, उन्हें करना पड़ेगा।’ गौरतलब है कि अल्फांस वही हैं जिन्होंने विदेश से आने वाले लोगों को सलाह देते हुए कहा था कि जो भी विदेशी भारत घूमने आ रहे हैं वो अपने देश से बीफ खाकर आएं। इसलिए विवाद तो होना ही था सो शुरु हो गया।

फूलपुर के लिए सब कुछ लगेगा दांव पर
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट खाली हो गई है, अत: अब यहां उपचुनाव होना है। भाजपा के लिए इन सीटों को हर हाल में जीतने की चुनौती है, तो वहीं विपक्ष भी अपनी खाई हुई विरासत को वापस पाने के लिए जी-जान से जुटेगा। दरअसल इलाहाबाद जिले की फूलपुर लोकसभा सीटका प्रतिनिधित्व देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू किया करते थे। भाजपा ने पहली बार 2014 में फूलपुर सीट पर जीत का परचम लहराया अब जबकि उपचुनाव होना हैं तो दोनों ही पार्टियां इसे जीतने के लिए हर संभव कोशिश करेंगी। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस अपनी विरासत वाली सीट को दोबारा पाने में कामयाब रहती है या फिर भाजपा जीत का परचम फिर लहराती है। कुल मिलाकर दोनों ही पार्टियों की प्रतिष्ठा दांव पर लगेगी।

दुनिया की नींद हराम करने वाले परीक्षण
तमाम प्रतिबंधों और कड़ी आलोचनाओं के बावजूद उत्‍तर कोरिया ने एक और मिसाइल परीक्षण करके सभी की नींद हराम करने जैसा काम कर दिखाया है। इससे जापान समेत अमेरिका की चिंताएं जहां बढ़ गई हैं तो वहीं हाल ही में किए गए हाईड्रोजन बम परीक्षण से अन्य देशों को भी चिंता हो आई है। इसके बाद उत्‍तर कोरिया को इस दिशा में आगे बढ़ने से रोकने के लिए लगभग सभी देशों ने प्रतिबंधों की वकालत की। यहां तक कि चीन और रुस ने भी उसके परीक्षणों की नींदा कर डाली, लेकिन इससे भी उसे सबक मिलता दिखाई नहीं दे रहा है और वह लगातार भड़काने की चाल चलते हुए एक के बाद एक मिसाइल परीक्षण किए जा रहा है। फिलहाल जो उसने जो मिसाइल दागी वह जापान के ऊपर से गुजरते हुए प्रशांत महासागर में गिरी। इसलिए अब समझा जा रहा है कि जापान और अमेरिका मिलकर सैन्य कार्रवाई के लिए यदि मजबूर होते हैं तो यह उसकी अपनी करनी का ही फल माना जाएगा।

स्कूल में बच्चे की मौत और सरकार
हरियाणा सरकार के शिक्षा मंत्री राम विलाश शर्मा ने रेयान इंटरनेशनल स्कूल की मान्‍यता को रद्द नहीं करने की बात कही है। यह वही स्कूल है जहां दूसरी कक्षा के बच्चे की हत्या कर दी गई थी। ऐसे में नाराज लोगों ने स्कूल के बाहर प्रदर्शन किया और तोड़-फोड़ भी की, ऐसे में मांग उठ रही थी कि स्कूल की मान्यता रद्द की जाए। अत: शिक्षा मंत्री ने कहा कि बच्‍चों के भविष्‍य को ध्‍यान में रखते हुए सरकार ने यह फैसला लिया है। स्‍कूल में 1200 बच्‍चे पढ़ते हैं, इसलिए यह कदम ठीक नहीं होगा कि उसकी मान्यता ही खत्म कर दी जाए। बात तो सही है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि इस मामले में स्कूल प्रबंधन की लापरवाही भी उजागर हुई है वहीं हत्या के आरोपी कंडक्टर अशोक के पिता और बहन ने तो स्कूल पर ही उसे फंसाने का आरोप लगा कर अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं।

बाल नोंचने वाली भाजपा विधायक
भाजपा की महिला विधायक राजकुमारी जाटव ने भाजपा के संगठन महामंत्री रामलाल को चोरों का दलाल कहते हुए बाल नोंचने की चेतावनी तक दे डाली। गौरतलब है कि सांसद रामलाल इन दिनों राजस्थान का दौरा कर पार्टी नेताओं को अनुशासन का पाठ पढ़ा रहे हैं। ऐसे में पार्टी की महिला विधायक का यह सख्त रुख उनके काम काज पर सवालिया निशान लगाने के लिए काफी रहा है। दरअसल अनुशासन का मंत्र भूल सांसद भी महिला विधायक के साथ अपशब्दों का अदान-प्रदान करते देखे गए, जिससे जानकारों ने यह अनुमान लगाया कि कोई न कोई बात तो जरुर है जिस कारण सांसद भी पलट कर उसी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं जो कि महिला विधायक कर रही थीं। बहरहाल राजनीतिक गलियारे में महिला विधायक को अब बाल नोंचने वाली विधायक के तौर पर पहचान तो मिल ही गई है।

महिला के पास रक्षा मंत्रालय
भारतीय इतिहास में यह पहली बार हुआ जबकि इंदिरा गांधी के बाद किसी महिला को रक्षामंत्री बनाया गया हो। जी हां वाणिज्य मंत्रालय में स्वतंत्र प्रभार मंत्री निर्मला सीतारमण को देश का नया रक्षामंत्री बनाया गया है। बात साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके काम से इतना ज्यादा खुश थे कि उन्हें रक्षामंत्री की जिम्मेदारी सौंप दी। अब देखना होगा कि जो कमाल उन्होंने वाणिज्य मंत्रालय में दिखाए थे और केंद्र सरकार को काफी सहूलियत पहुंचाई थी क्या अब रक्षा मंत्री के तौर पर भी वैसा ही कर पाएंगी, क्योंकि इस ओहदे पर देश और विदेश में सिर्फ और सिर्फ श्रीमती इंदिरा गांधी को ही लोग अभी तक पहचानते रहे हैं। उनकी तरह आज तक किसी महिला पर रक्षामंत्री का दायित्व नहीं सौंपा गया था। इस प्रकार अब सफल रक्षामंत्री बनकर दिखाने की चुनौती निर्मला सीतारमण के सामने है।

US तक पहुंची निजी जानकारी
केंद्रीय गृह सचिव के रूप में सेवानिवृत्त राजीव महर्षि की बात को यदि सच मान लिया जाए तो आमतौर पर हम जो स्मार्टफोन इस्तेमाल कर रहे हैं उसके जरिए तमाम निजी जानकारी सीआईए यानी अमेरिका की खुफिया एजेंसी के पास जमा हो रही है। कहने का अर्थ यह है कि स्मार्ट फोन के जरिए 40 प्रतिशत भारतीय अपनी निजी जानकारी सीआईए समेत पूरी दुनिया तक पहुंचा चुके हैं। गौरतलब है कि राजीव महर्षि ने यह बात आधार कार्ड को विभिन्न सेवाओं से जोड़ने संबंधी सवाल के जवाब में कही है। इस प्रकार जो खतरे पहले से थे अब वो और भी बढ़ गए हैं। राजीव महर्षि ने उन एप्लिकेशन पर भी चिंता जाहिर की है जो लोगों की जानकारी चुराती हैं और दूसरों तक पहुंचा देती हैं। इस पर चिदंबरम ने भी चिंता जाहिर की है, लेकिन हल क्या होगा इस पर अभी विचार नहीं हो रहा। मतलब साफ है कि जो हो रहा है होने दें बाकी आने वाले देखेंगे।

ट्रंप की फटकार का असर
आतंकवाद को पनाह देने को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की फटकार का असर अब पाकिस्तान में दिखाई देने लगा है। दरअसल अभी तक जो खामोशी से काम किए जा रहे थे और आतंकवाद बढ़ता चला जा रहा था अब वो मुखर भी हो रहे हैं। ट्रंप पर जवाबी कार्रवाई करते हुए पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने कह दिया है कि ट्रंप की हाल ही में की गई पाकिस्तान के खिलाफ बयानबाजी के विरोध यूएस से द्विपक्षीय वार्ता और यात्रा स्थगित कर दी है। खबरों को सच माना जाए तो पाकिस्तानी सरकार ने ट्रंप की बयानबाजी को गंभीरता से लिया है और अब उसके जवाब के तौर पर कड़े कदम भी उठाए जा रहे हैं। इस पर जानकार कहते हैं कि यात्रा टाल देना समस्या का समाधान नहीं हो सकता बल्कि पाकिस्तान को बताना होगा कि आतंकी संगठनों और आतंकवादियों के खिलाफ उसने क्या किया है।

धार्मिक स्थलों की भरपाई क्यों
वर्ष 2002 के गुजरात दंगों में धार्मिक स्थलों को हुए नुकसान की भरपाई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के एक फैसले को पलटते हुए कहा है कि किसी धार्मिक स्थल के निर्माण या मरम्मत के लिए सरकार करदाता के पैसे को नहीं खर्च कर सकती है। अगर सरकार मुआवजा देना भी चाहती है तो उसे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि को उसे भवन मानकर उसकी क्षतिपूर्ति की जा सकती है। गौरतलब है कि गुजरात सरकार ने योजना बनाई थी कि क्षतिग्रस्त इमारतों को ज्यादा से ज्यादा 50 हजार रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। सरकार के मुताबिक धार्मिक स्थल या मस्जिद को धर्म के नाम पर नहीं बल्कि इमारत के तौर पर मुआवजा दिया जाएगा। इस प्रकार न तो अदालत को ही कोई आपत्ति होगी और न ही सरकार की मदद से ऐसी इमारतें ही वंचित रहेंगी। फिर भी जो लोग इन भवनों या इमारतों को धार्मिक ही मानते हैं और उसी आधार पर मदद लेना चाहते हैं तो उनके लिए दिक्कत होगी और ऐसे में उन्हें मदद क्यों दी जाए यह एक बड़ा सवाल आगे भी जारी रहने वाला है।

पुलिस कार्रवाई पर उठती शंकाएं
खबर है कि दिसंबर 2010 में सिरसा के डेरा सच्चा सौदा मुख्यालय में भक्तों को हथियारों की ट्रेनिंग देने की बात आर्मी इंटेलिजेंस द्वारा उठाई गई थी। यही नहीं बल्कि आशंका यह भी थी कि ट्रेनिंग के लिए पूर्व सैनिकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस सूचना के बाद सेना कर्मियों को ऐसी किसी भी गतिविधी में शामिल नहीं होने की हिदायत दी गई थी। खास बात यह रही कि इस मामले में पुलिस द्वारा डेरा मुख्यालय में तलाशी ली गई थी लेकिन पुलिस को हथियारों की ट्रेनिंग के संबंध में सबूत नहीं मिले थे। अब जबकि बाबा राम रहीम को दोषी करार दिया गया और पुलिस-प्रशासन ने कई इलाकों में सर्च ऑपरेशन चलाया तो फिर पुलिस को एके-47 और एक माउजर समेत एक गाड़ी से दो राइफल और 5 पिस्तौल कैसे बरामद हो गई। इस कार्रवाई ने पुलिस को खुद अपनी ही कार्रवाईयों के कारण शंकाओं के घेरे में ले लिया है।

स्वाइन फ्लू और महिला विधायक की मौत
देश में इस समय या तो बाढ़ की खबरें आम हैं या फिर बारिश नहीं होने के कारण सूखे की स्थिति और उस पर बीमारियों से होती मौतें सुर्खियां बन हुई हैं। ऐसे में राजस्थान से खबर आती है कि स्वाइन फ्लू से भाजपा विधायक कीर्ति कुमारी की मौत हो गई। इससे पहले उत्तर प्रदेश में बच्चों की मौत की खबरों ने सभी की नींद उड़ाई हुई थी। यह मामूली बात नहीं है क्योंकि उपचार के दौरान मौत हो जाना अपने आपमें अनेक तरह के सवाल खड़े करता है। जहां तक बच्चों का सवाल था तो उसे ऑक्सीजन की कमी बताया गया जबकि भाजपा की महिला विधायक को स्वाइन फ्लू की शिकायत थी और अनेक चिकित्सकों की टीम उनके इलाज में लगी हुई थी बाबजूद इसके उनकी मौत हो जाना बताता है कि बीमारी भयावह स्थिति में पहुंच चुकी थी। इस समय अनेक राज्यों में स्वाइन फ्लू फैला हुआ है और उस पर सरकार और चिकित्सा विभाग को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।

हत्यारी भीड़ का फिर टूटा कहर
पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में पशु तस्करी करने के संदेह में भीड़ ने पीट-पीट कर दो नौजवानों की निर्मम हत्या कर दी। इससे पहले भी भीड़ द्वारा शक के आधार पर लोगों को मारे जाने के मामले सामने आ चुके हैं और इससे दु:खी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां तक कह दिया था कि गोरक्षा के नाम पर इंसानों की हत्या करना उचित नहीं है और ऐसे किसी भी घटना करने से पहले उनके सीने में ही क्यों न गोली मार दी जाए। इस प्रकार यह एक पीड़ा थी, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है जबकि गोरक्षकों को सरकार की ओर से गोशाला चलाने और जानबरों को सुरक्षित रखने के बदले खासी रकम दी जाती है। जानकार कहते हैं कि इस प्रकार उन्मादी भीड़ द्वारा महज शक में किसी इंसान की हत्या जैसा कृत्य किया जाना भारत की छवि को विदेशों में खराब करना है और इसके लिए प्रधानमंत्री को विदेश यात्राओं के दौरान खासा शर्मिंदा होना पड़ता है।

फैसले पर हिंसा के मायने
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत बाबा राम रहीम को सीबीआई कोर्ट द्वारा दोषी करार दिए जाने के बाद हिंसा भड़क गई। डेरा समर्थकों ने पंजाब, हरियाणा में हिंसा की जिस कारण तीन लोगों की मौत हो गई। हिंसक भीड़ ने मीडिया के वाहनों समेत अनेक वाहनों को आग के हवाले कर दिया, जबकि कुछ पत्रकारों को भी पीटा गया। बेकाबू हिंसक भीड़ ने दो रेलवे स्टेशन बललूआणा और मलेर में भी आगजनी की। इस प्रकार शासन-प्रशासन के तमाम सुरक्षा इंतजाम धरे के धरे रह गए और बाबा राम रहीम के समर्थक हिंसा करने में कामयाब नजर आए। इस प्रकार संदेश यही गया कि न्याय व्यवस्था को भी भीड़ अपनी मर्जी से चलाना चाहती है और उसी के परिणाम स्वरुप फैसले पर यह हिंसा सामने आई है, जो कि कहीं से भी सही नहीं कही जा सकती है।
न्याय पाकर भी हार गई इशरत
तीन तलाक के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ने वालीं इशरत जहां को जहां अदालत से न्याय हासिल हो गया, लेकिन अब उन्हें समाज से न्याय की दरकार है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद खबर आ रही है कि इशरत का सामाजिक बहिष्‍कार कर दिया गया है। इस प्रकार अब कोर्ट के बाहर समाज में उनका संघर्ष शुरू हो गया है जो न तो आसान है और न ही किसी तय समय सीमा के लिए ही है अत: यह लंबा चलने वाला है। गौरतलब है कि जिन्होंने अदालत का रास्ता पहले कभी दिखाया होगा अब वो भी इशरत से दूरी बनाए रखने में अपनी भलाई समझ रहे हैं। दरअसल बताया जा रहा है कि इशरत को उनके ही रिश्तेदारों और पड़ोसियों की आलोचना और बदजुबानी का शिकार होना पड़ रहा है। इस प्रकार पीड़ित पक्ष की मानें तो इशरत जीतकर भी हार गई।

निजता तय अब आधार की बारी
सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार पर गुरुवार को बेहद अहम फैसला सुनाते हुए इसे मौलिक अधिकारों का हिस्सा घोषित कर दिया। इसी के साथ ही अब बेंच यह फैसला करेगी कि आधार कार्ड के विभिन्न योजनाओं से जोड़ा जाए या नहीं। इस संबंध में 5 जजों की आधार बेंच इस पर सुनवाई करेगी। इससे पहले नौ जजों की संविधान पीठ ने 1954 और 1962 में दिए गए फैसलों को पलटते हुए कहा कि राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकारों के अंतर्गत प्रदत्त जीवन के अधिकार का ही हिस्सा है। कुल मिलाकर इससे केंद्र को करारा झटका लगेगा और योजनाकारों के लिए मुसीबतें खड़ी हो जाएंगी। दरअसल केंद्र की मंशा का आधार ही जब नहीं होगा तो फिर वो किस पर टिकेंगी, यह देखने वाली बात होगी।

तलाक पर सरकार निभाएगी जिम्मेदारी?
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के बहुमत से दिए गए फैसले में एक बार में तीन तलाक निरस्त करने के साथ ही छह माह में केंद्र से इस पर कानून बनाने के आदेश दे दिए गए हैं। जानकार कहते हैं कि विधायिका का अब दायित्व है कि वो तीन तलाक पर जल्द से जल्द कानून बनाए और फौरी तीन तलाक वाली व्यवस्था को असंवैधानिक व गैरकानूनी घोषित करे। चूंकि ऐसी मंशा और आदेश सुप्रीम कोर्ट के भी हैं अत: इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। हालांकि कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद का कहना है कि सरकार फैसले को पढ़ने के बाद परिस्थितियों के मुताबिक जरूरत पड़ने पर उचित निर्णय लेगी। इससे यह समझा जा सकता है कि अब तलाक रुपी गेंद सरकार के पाले में आ गई है और सभी की नजरें उसी पर टिक गई हैं।

मोदी के बाद गुमशुदा सुषमा की तलाश
बनारस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुमशुदा होने वाले पोस्टर के बाद अब मध्य प्रदेश के विदिशा संसदीय क्षेत्र के लोगों ने सांसद सुषमा स्वराज के गुमशुदा होने वाले पोस्टर चस्पा किए हैं। भाजपा सांसद सुषमा चूंकि विदेश मंत्री भी हैं अत: अपने बयानों के जरिए हमेशा ही मीडिया में सुर्खियां बटोरती रहती हैं, लेकिन अपने स्वयं के संसदीय क्षेत्र में उनकी उपस्थिति को लेकर जनता खासी नाराज लग रही है। यही वजह है कि अब इस नाराजगी को कांग्रेस ने सुषमा स्वराज गुमशुदा वाले पोस्टर लगाकर उजागर करने का काम किया है। क्षेत्र में इन पोस्टरों के लगने से हड़कंप मचा हुआ है। बताया जाता है कि काफी लंबे समय से सांसद के अपने क्षेत्र में नहीं आने से अनेक काम रुके हुए हैं, जिससे जनता को खासी परेशानी भी हो रही है। इसी के मद्देनजर कांग्रेस ने शहर के प्रमुख चौराहों और प्रमुख सार्वजनिक स्थलों में गुमशुदा वाले पोस्टर लगाए हैं। अब लोग कह रहे हैं कि जब प्रधानमंत्री और उनके प्रमुख मंत्रियों का अपने-अपने संसदीय क्षेत्रों का यह हाल है तो फिर अन्य नेताओं की बात कैसे की जा सकती है।

राहुल के दौरों से घबराहट क्यों
ऑक्सीजन की कमी के चलते पिछले दिनों गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों के मौत का मामला अभी ठंडा नहीं हुआ है, ऐसे में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के गोरखपुर पहुंचने और मरने वाले बच्चों के परिजनों से मिलकर दर्द बांटने को लेकर सरकार में घबराहट देखी जा रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो यहां तक कह दिया है कि राहुल मातम की जगह को पिकनिक स्पॉट न बनाएं। इस पर कांग्रेसी पूछ रहे हैं कि जब राहुल घटना के फौरन बाद घटनास्थल पर जाते हैं तो भी सवाल उठते हैं और अब जबकि एक सप्ताह बाद वो गमगीन परिजनों का दुख बांटने पहुंच रहे हैं तो भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इतना ही नहीं राहुल अगर नहीं जाते हैं, तब भी उनके विपक्षी कहते हैं कि राहुल कहां गायब हैं। मतलब सिर्फ सवाल खड़े करना विरोधियों का काम है जबकि राहुल लगातार समाजसेवा करने और लोगों से जुड़ने का काम कर रहे हैं। जहां तक योगी के बयान का सवाल है तो इसका मतलब तो यही है कि इन घटनाओं ने योगी सरकार को बेकफुट पर ला दिया है जिससे वो घबराई हुई है और इस तरह के बयान दे रहे हैं।

दूरी किरण से या उनके पद से?
खबर है कि पुडुचेरी की उपराज्यपाल किरण बेदी की तरफ से स्वतंत्रता दिवस पर आयोजित जलपान समारोह का सत्तारूढ़ कांग्रेस और सहयोगी द्रमुक समेत विपक्षी अन्नाद्रमुक के तमाम नेताओं ने बहिष्कार कर दिया। इस समारोह में वैसे मुख्यमंत्री वी. नारायणसामी, भाजपा के नामित विधायक और स्थानीय इकाई के पार्टी अध्यक्ष वी. सामीनाथन जरुर पहुंचे, लेकिन सब फीका-फीका रहा। गौरतलब है कि किरण बेदी द्वारा हाल ही में विधानसभा में तीन नामित सदस्यों के शपथ ग्रहण करवाए जाने को लेकर सरकार से टकराव हो गया। ऐसे में उनके समारोह में अधिकांश लोगों का शामिल नहीं होना बताता है कि किरण बेदी की जगह यदि कोई और होता तो भी ऐसा ही होता, क्योंकि बात टकराव की नहीं बल्कि अधिकार की जा है। आरोप तो यही हैं कि जब संवैधानिक पद पर भी भगवा रंग चढ़ने लगेगा तो विवाद कैसे नहीं होगा।

तेजस्वी की नजर में असली और नकली जदयू
जनादेश अपमान यात्रा पर निकले बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने एक तरफ जहां मुख्यमंत्री नीतिश कुमार पर निशाना साधा वहीं यह भी घोषणा कर दी कि असली जदयू शरद यादव की पार्टी है और नीतिश की जदयू तो नकली पार्टी है। गौरतलब है कि वैशाली में वर्तमान उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी पर हमला हुआ था जिस पर तेजस्वी का कहना है कि राजद हिंसा पर विश्वास नहीं करती और जनादेश अपमान यात्रा को डिस्टर्ब करने के लिए ही हमले की साजिश रची गई। इस प्रकार ऐसा प्रतीत होता है कि सियासत में करारी ठोकर के बाद तेजस्वी का दिल और दिमाग खुल गया है और अब उन्हें सब कुछ साफ साफ नजर आने लगा है, इसलिए उन्होंने असली नकली में फर्क भी कर दिया और साजिशों को भी जान लिया।

लव जिहाद अर्थात साजिशन प्यार
केरल के कथित ‘लव जिहाद’ मामले की जांच अदालत ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंप दी। इस जांच की निगरानी शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश आरवी रवीन्द्रन करेंगे। गौरतलब है कि केरल की 24 वर्षीया युवती अखिला अशोकन उर्फ हादिया ने धर्म परिवर्तन करके 26 वर्षीय मुस्लिम युवक शेफीन जहां से शादी की थी, जिसे केरल उच्च न्यायालय ने गत 24 मई को निरस्त कर दिया था। इस मामले में आमजन चुटकी ले रहा है और कह रहा है कि अब वो जमाना नहीं रहा जबकि प्रेम दिल से होता था और जब दिमाग से काम लिया जाता था तो प्रेम कोसों दूर भाग जाया करता था। अब तो प्रेम भी दिल से नहीं दिमाग से करने और साजिश रचने का काम खूब हो रहा है। गौरतलब है कि अखिला और शेफीन जहां ने निकाह किया था, लेकिन उच्च न्यायालय ने युवती के पिता की याचिका पर सुनवाई करते हुए निकाह को निरस्त कर दिया था और अब उस फैसले के खिलाफ प्रेमी दुल्हे ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।

युद्ध् को आमंत्रित करती जुबानी जंग
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन के बीच लगातार जुबानी जंग जारी है। एक तरफ उत्तर कोरिया ने अमेरिकी द्वीप गुआम को नष्ट करने की धमकी दी तो वहीं दूसरी तरफ ट्रंप ने नई चेतावनी देते हुए कह दिया कि अगर उत्तर कोरिया ने अमेरिका या उसके किसी सहयोगी देश पर हमला करने के बारे में सोचा भी तो उसके साथ ऐसा होगा जो उसने ‘कभी सोचा भी नहीं होगा। ट्रंप अपने इस बयान को कड़ा नहीं मानते और कार्रवाई की बात भी करते हैं। इससे यह समझा जा रहा है कि अगर दोनों राष्ट्राध्यक्षों के बीच जुबानी जंग यूं ही जारी रही तो कभी भी किसी भी समय विश्व युद्ध् का आगाज हो जाएगा। इसलिए इसे रोकना और शांति के लिए आगे बढ़ना जरुरी समझा जा रहा है। सवाल यही है कि बल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन?

उच्चाधिकारी की खुदकुशी से उठते सवाल
खबर है कि बिहार के बक्सर जिले के डीएम मुकेश कुमार पांडे ने ट्रेन से कटकर खुदकुशी कर ली। जो लोग खुदकुशी को गरीबी और कर्जे से जोड़कर अभी तक देखते आए हैं उनके लिए यह खबर चौंकाने वाली हो सकती है। दरअसल किसान कर्ज के कारण आत्महत्या करता है, कुछ पढ़-लिखे युवा बेरोजगारी के कारण और कुछ विद्यार्थी रीजल्ट अच्छा नहीं लाने के कारण खुदकुशी कर लेते हैं। ऐसे में 2012 बैच का एक आईएएस अधिकारी गाजियाबाद में ट्रेन के आगे आकर खुदकुशी कर ले तो सवाल उठना ही चाहिए। प्रथम दृष्टया इस खुदकुशी का मुख्य कारण पारिवारिक तनाव बताया गया है, लेकिन सोचने वाली बात यही है कि क्या इतना पढ़ा-लिखा व्यक्ति जिंदगी जीने का कोई और रास्ता तलाशने की बजाय मौत को गले लगाना क्यों उचित मानेगा? इससे तो आईएएस चयन और उनके प्रशिक्षण पर ही सवालिया निशान लगने लगेंगे।

तलाक का आधार चाय-नाश्ता
खबर है कि एक पति को सिर्फ इसलिए तलाक की इजाजत अदालत से मिल गई कि उसकी पत्नी उसे चाय-नाश्ता नहीं देती थी। पत्नी के इस व्यवहार को दिल्ली हाईकोर्ट ने पति के प्रति क्रूरता माना और तलाक की अर्जी को मंजूरी दे दी। खास बात यह है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। मतलब साफ है कि जो क्रूरता मानसिक तौर पर दी जाती है उसके सुबूत लाना बहुत मुश्किल काम होता है, ऐसे में दो अदालतों का फैसला बाकई गौर करने लायक हो गया है। दिल्ली हाइकोर्ट की जस्टिस दीपा शर्मा और जस्टिस हीमा कोहली की डबल बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि पति-पत्नी पिछले 10 साल से एक दूसरे से अलग रह रहे हैं और उनका साथ रहना अब मुमकिन नहीं है, इसलिए उनकी तलाक की अर्जी मंजूर की जा रही है।

मेनन की नाराजगी और चौहान के अधिकार
कहने को तो भाजपा नेता अरविंद मेनन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल महज इसलिए गए थे कि उन्हें पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के दौरे की तैयारियों का जायजा लेना था, लेकिन ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार चौहान से उनका पाला पड़ गया और उन्होंने मेनन को मीडिया से बात करने से रोक दिया। यहां नंदकुमार चौहान का कहना था कि प्रदेश की राजनीतिक गतिविधियों पर संगठन की ओर से सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष ही बोलने के लिए अधिकृत होता है। अत: मीडिया के सवालों का जवाब उन्हें ही देना चाहिए था इसलिए उन्होंने मेनन को जवाब देने से रोका। बहरहाल चौहान को कहना सुनना था सो उन्होंने किया लेकिन संभवत: मेनन इस बात को दिल पर ले बैठे और तीन दिन के दौरे को बीच में ही छोड़कर भुवनेश्वर जाने का कहकर दिल्ली रवाना हो गए। अब बाल की खाल निकालने वालों को तो मौका चाहिए था सो उन्होंने कहना शुरु कर दिया कि चौहान को संयत भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए था, ताकि काम भी हो जाता और मेनन नाराज भी न होते।

बूचड़खाने बंद तो क्या खुलेंगे शराबखाने?
बिहार में नीतिश सरकार की मंशा और कार्य अब बदल गए हैं, इसलिए बताया जा रहा है कि उत्तरप्रदेश के बाद बिहार में भी अवैध बूचड़खानों पर लगाम लगाने की तैयारी हो गई है। पशु और मत्स्य पालन मंत्री पशुपति कुमार पारस ने करीब 140 बूचड़खानों को अवैध बताकर बंद करने की बात कह दी है। मौजूदा बिहार सरकार के इस रवैये पर राजद के प्रवक्ता मनोज झा का कहना था कि बूचड़खानों का बंद होना सिर्फ इस बात का उदाहरण है इस सरकार की प्राथमिकताएं किस तरह से बदल गईं हैं। नीतिश सिर्फ सरकार का चेहरा हैं, दरअसल सरकार तो मुख्य रुप से भाजपा ही चला रही है। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि यदि ऐसा ही है तो फिर बिहार में क्या शराबखाने खुल जाएंगे, क्योंकि अब सरकार की कमांड तो भाजपा के हाथ में जो आ गई है।
विदेश में साड़ी और साड़ी में लुभाती विदेशी
भारतीय साड़ी को विदेशों में खासा पसंद किया जाता है, यही वजह है कि खास मौकों पर विदेशी हस्तियां भी साड़ी पहनना पसंद करती हैं। बात जब भारत में ही रहकर साड़ी पहनने की हो तो परेशानी भी सामने आ जाती है। दरअसल यहां हम बात कर रहे हैं भारत में प्रभारी अमेरिकी राजदूत मैरीके लॉस कार्लसन की जिन्हें एक अजब परेशानी ने घेर रखा है और वह यह कि 70वें भारतीय स्वतंत्रता दिवस कौन सी साड़ी पहने जिससे वो ज्यादा सुंदर दिख सकें। इसलिए ट्विटर पर उन्होंने साड़ी पहनी अपनी तस्वीर और वीडियो पोस्ट किया है। वीडियो में वे कहती हैं, मुझे यह तय करने में बहुत मुश्किल हो रही है कि मैं कौन सी साड़ी पहनूं। मुझे उम्मीद है कि इस चुनाव में आप मेरी मदद करेंगे। उन्होंने चार साड़ियां पसंद कीं अब उनमें से किसी एक को उन्हें चुनने में मदद करनी है। यह है साड़ी का विदेशियों में क्रेज और उन पर भारतियों का दीवानापन।
वेंकैया अब हमारे सबके
वेंकैया नायडू देश के 13वें उप-राष्ट्रपति चुन लिए गए और इसी के साथ उनकी भाजपा और संघ से जुड़ी यादें भी इतिहास का पन्ना हो गईं। दरअसल उच्च संवैधानिक पद पर आसीन होने के साथ ही उनकी प्राथमिकताएं और जिम्मेदारियां बदल गईं, जिसके तहत बताया जा रहा है कि उनका आदर और सम्मान उनके पद के मुताबिक ही होना चाहिए। ऐसा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी कहते हैं। बहरहाल उप राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने गोपाल कृष्ण गांधी को दोगुने से ज्यादा वोटों से हराया है। कुल 785 सांसदों में से 771 ने वोट डाला, जिसमें से नायडू को 516 वोट मिले वहीं गांधी को 244 वोट। इससे यह तो साबित हो गया कि यहां पर भी जमकर क्रास वोटिंग हुई और वह भी भाजपा के लिए, जिसने 37 साला इतिहास में पहली बार राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति जैसे उच्च पदों पर पार्टी नेताओं को आसीन कर दिया।
चीन अब नेपाल से भारत को चिढ़ाएगा
पिछले दो माह से सिक्किम के डोकलाम में भारतीय सेना और चीनी सेना के बीच तनाव ने अब नया मोड़ ले लिया है। दरअसल बताया जा रहा है कि चीन ने अब इस मुद्दे पर नेपाल के पास जाने का फैसला ले लिया है। चीन का यह फैसला भारत की चिंताएं बढ़ाने वाला है क्योंकि भारत, नेपाल के साथ भी विवादित क्षेत्र में ट्राइ-जंक्‍शन साझा करता है। इसके अलावा नेपाल अब भारत के पड़ोस में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों में लगा हुआ है। इससे सवाल यह उठ रहा है कि कहीं हम अपनी ही कूटनीतिक चाल में उलझ तो नहीं गए हैं। क्योंकि जो मसले बातचीत से हल होने चाहिए थे उन्हें इतने लंबे समय तक लटकाकर रखना भी एक कूटनीतिक चाल का परिणाम कहा जा रहा था, ऐसे में चीन का रुख नेपाल की ओर होना बताता है कि वह सियासी शतरंज को अब दूसरे की ओर से खेलना चाह रहा है। इसलिए ऐसा लग रहा है मानों वह नेपाल की ओर जाते हुए भारत को चिड़ाने का काम कर रहा है।

अपराध पर बंदिश लगाने की राजनीति
बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी का कहना है कि बालू माफिया राजद खासतौर पर लालू परिवार के फाइनेंसर हैं। उन्होंने इन सब का खुलासा करने और आरोपियों पर सख्त कार्रवाई करने की बात कहकर सही मायने में खुद के आस-पास मौजूद अपराध जगत की ओर सभी का ध्यान दिलाने जैसा काम कर दिया है। अगर विरोधी इसे गंभीरता से लें तो नीतिश सरकार में मौजूद कथित अपराधियों की मुसीबतें बढ़ सकती हैं। दरअसल ऐसोसिएशन फॉर डेमोक्रटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार की नवगठित एनडीए सरकार के मंत्रिमंडल में 29 मंत्रियों में से 22 पर आपराधिक मुकदमें दर्ज हैं। इनमें से नौ पर तो गंभीर प्रवृत्ती वाल मामले दर्ज हैं। इसलिए अब कहने वाले कह रहे हैं कि अगर इस सरकार को वाकई अपराध रोकना है और भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करना है तो पहले अपने घर से इस मुहिम को शुरु करें ताकि दूसरों के लिए वह मिसाल कायम कर सकें। वर्ना कहावत तो यही है कि गुड़ खाएं और गुलगुलों से परहेज करें।
चीन के कर्जे तले दबता पाकिस्तान
पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा का कहना है कि पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे, परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह और शंघाई सहयोग संगठन के विस्तार को लेकर अविचल समर्थन के लिए अपने सदाबहार सहयोगी चीन का ‘कर्जदार’ है। यदि वाकई ऐसा कुछ हुआ है तो फिर पाकिस्तान को समझना होगा कि कर्ज उतारते-उतारते अच्छे-अच्छों के घर-मकान तक बिक जाते हैं। ऐसे में चीन तो उस रंगदार व्यवसायी की तरह है जो न सिर्फ कर्ज देना जानता है बल्कि उसे कर्ज उगाही करना भी आता है।
‘ब्लू व्हेल’ अर्थात खतरे की घंटी
ऑनलाइन गेम ‘ब्लू व्हेल’ के कारण मुंबई में एक नौंवीं की छात्र द्वारा आत्महत्या किए जाने को गंभीरता से लिया गया है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने कहा कि यह ऑनलाइन गेम है और इसे नियंत्रित किया जा सकता है। इस मामले में राज्य सरकार केंद्र से मिलकर कार्रवाई करेगी। दरअसल राज्य विधानसभा में यह मामला राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के विधायक और पूर्व उप मुख्यमंत्री अजित पवार ने उठाया
था और कहा था कि यह घटना हम सभी के लिए ‘खतरे की घंटी’ है। अच्छी बात यह है कि राज्य सरकार का रुख भी इस मामले में सकारात्मक है, अत: हल निकलने में समय नहीं लगेगा।
उपराष्ट्रपति चुनाव और आप का रुख
राष्ट्रपति चुनाव में भले ही आम आदमी पार्टी ने अपने पत्ते नहीं खोले थे लेकिन उपराष्ट्रपति चुनाव से पहले आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि उनकी पार्टी उप राष्ट्रपति उम्मीदवार गोपालकृष्ण गांधी का समर्थन करेगी। गौरतलब है कि गांधी ने केजरीवाल से मुलाकात की जिसके बाद मुख्यमंत्री ने ट्वीट किया कि ‘आप उप राष्ट्रपति के लिये श्री गोपाल कृष्ण गांधी का समर्थन करेगी।’ गौरतलब है कि देश के अगले उपराष्ट्रपति के लिये पांच अगस्त को चुनाव होने हैं, ऐसे में उम्मीदवार तिनका-तिनका जोड़कर अपना आशियाना बनाने में लगे हुए हैं। ऐसे में जबकि नीतिश भी गांधी को समर्थन कर रहे हैं तो उम्मीदें बंधना लाजमी है।

क्या कुलसुम होंगी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री
पनामा मामले में फंसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने आखिरकार इस्तीफा दे ही दिया और इसी के साथ शुरु हो गया राजनीतिक अस्थिरता का दौर। ऐसे में मीडिया सूत्र बताते हैं कि नवाज शरीफ की पत्नी कुलसुम नवाज के तौर पर पाकिस्तान को नया प्रधानमंत्री मिल सकता है। वैसे नवाज के भाई शहबाज शरीफ भी इस रेस में सबसे आगे चल रहे हैं, देखिए किसकी किस्मत जोर मारती है। दरअसल नवाज अपने कैबिनेट के किसी मंत्री को सत्ता सौंपने के हक में नजर नहीं आ रहे हैं। ऐसे में कुलसूम और शहबाज पर ही सबकी निगाहें टिकी हैं, हालांकि, कुछ लोगों का कहना है कि पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री और अपने भाई शहबाज को चुनना भी नवाज के लिए कानूनी समस्या ला सकता है।

शरद यादव से महागठबंधन को उम्मीद
बिहार में गठबंधन-गठबंधन का खेल खेलते मुख्यमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड बना चुके नीतिश कुमार ने मानों राजनीतिक सिद्धांतों को ही उलट-पुलट के रख दिया है। पहले भाजपा के सहारे मुख्यमंत्री बने, फिर महागठबंधन के सहारे मुख्यमंत्री बने और अब गठबंधन तोड़कर छठीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली और तो और तमाम विरोधों के बावजूद विधानसभा में बहुमत भी हासिल कर लिया। ऐसे में जनता दल यूनाईटेड के सहसंस्थापक और वरिष्ठ नेता शरद यादव का क्या रुख रहता है, इसे लेकर तमाम अटकलें लगाई जा रही हैं। बहरहाल जिससे उम्मीद रखो वही धोखा दे जाता है, कम से कम वर्तमान राजनीति में तो यही देखने में आ रहा है, इसलिए सभी सिर्फ देखने का काम कर रहे हैं।
जेटली और जेठमलानी के बीच बुरे फंसे केजरीवाल
मशहूर वकील राम जेठमलानी ने अपने पूर्व मुवक्किल और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ फिर हमला बोला है। उन्होंने दावा किया है कि खुद केजरीवाल ने ही उन्हें वित्त मंत्री अरुण जेटली के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करने को कहा था। उन्होंने दावा किया है कि दिल्ली के सीएम ने जेटली के खिलाफ और भी ज्यादा अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करने को कहा था। बता दें कि जेठमलानी ने केजरीवाल को खत लिखकर जेटली द्वारा दायर मानहानि के केस को लड़ने से खुद को अलग कर लिया है और अब केजरीवाल उस नाव में सवार नजर आ रहे हैं जिसमें पतवार भी नहीं है।

पहले अक्षरा धर्म में तो आएं
कमल हासन की बेटी अक्षरा हासन को लेकर मीडिया में धर्म परिवर्तन की खबरें खूब अा रही हैं। ऐसे में जानकारों ने अब कहना शुरु कर दिया है कि जो शख्स खुद को पहले से ही नास्तिक बताता आ रहा है उसे पहले किसी धर्म में आने तो दें, फिर उसके बाद यदि वह अन्य धर्म अपनाता है तो वह धर्म परिवर्तन होगा। यह धर्म परिवर्तन नहीं है बल्कि आस्तिक और नास्तिक का सवाल है और ऐसे शख्स पर ज्यादा विचार करने की भी आवश्यकता नहीं है। गौरतलब है कि सोशल मीडिया में अक्षरा को लेकर शुरु हुई बहस से कमल हासन भी चिंतित नजर आए थे, लेकिन उन्होंने बेटी का साथ देना बेहतर समझा और उसका हौसला बढ़ाते हुए यहां तक कह दिया कि वह जो करेगी सही ही करेगी।
गुजरात पहुंची अब अम्मा की थाली
तमिलनाडू में दिवंगत अम्मा के दौर में शुरु हुई अम्मा थाली अब देश के संपन्न समझे जाने वाले राज्य गुजरात तक पहुंच गई है। इससे पहले अम्मा थाली मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में शुरु की जा चुकी है। अब गुजरात सरकार भी नई योजना के तहत 10 रुपये की रियायती दर पर श्रमिकों को डिब्बाबंद भोजन मुहैया कराने जा रही है। राज्य के राजस्व और शिक्षा मंत्री भूपेंद्र सिंह चुडासामा ने वडोदरा में ‘श्रमिक अन्नपूर्णा योजना’ की शुरुआत कर दी है। इसे देखते हुए विरोधी पूछ रहे हैं कि जब राज्य इतना संपन्न है कि पूरे देश और दुनिया में उसे मॉडल के तौर पर ख्यात किया जा रहा तो फिर ये गरीब कहां से आएंगे जो दस रुपए में भरपेट भोजन करने के लिए मजबूर होंगे। बात तो सही है लेकिन यह अकाट्य सत्य भी है कि जहां संपन्नता होती है वहीं बहुतायत में गरीब और मजलूम भी पर्दे के पीछे दबे-कुचले पड़े नजर आते हैं। इसलिए विकास की धारा को कभी सही दिशा में बहता हुआ नहीं बताया जाता।

सिर्फ सफाई देने के लिए बची है कांग्रेस
चाहे पूर्व सरकारों के कार्यकाल में की गई कोई गलती हो या फिर आज के पार्टी नेताओं की भूल, अब कांग्रेस सिर्फ सफाई देती हुई नजर आती है। दरअसल चीनी राजदूत से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की मुलाकात को लेकर सफाई देने का दौर चल रहा है। कांग्रेस ने ऐसी किसी मुलाकात में प्रियंका गांधी और उनके पति रॉबर्ट वाड्रा की मौजूदगी से भी इंकार किया है। यही नहीं कांग्रेसी तो यहां तक कह रहे हैं कि जो तस्वीर चीनी राजदूत से मुलाकात का नाम देकर वायरल की जा रही है दरअसल वो एक फूड फेस्टिवल की है। यह देख आमजन कह रहा है कि कांग्रेस सफाई क्यों दे रही है सफाई तो प्रधानमंत्री मोदी को देनी चाहिए कि चीन और पाकिस्तान से तनाव के बावजूद विदेशों में उनके नेताओं से गलबहियां क्यों करते नजर आते हैं?

मुख्य मुद्दा दलित ही रहेगा क्या
राष्ट्रपति चुनाव से लेकर अब संसद के मानसून सत्र तक में दलित मुद्दा ही प्रभावी सिद्ध् होता दिख रहा है। विपक्ष दलित मुद्दे पर हंगामा कर रहा जबकि राज्यसभा में बहस के दौरान बसपा सुप्रीमो मायावती ने नाराज होकर अपना इस्तीफा ही सौंप दिया। गौरतलब है कि मायावती राज्यसभा में अपनी बात पूरी ना किए जाने से नाराज थी। मायावती की राज्यसभा के उपसभापति पी.जे. कुरियन से तीखी बहस भी हुई, जिसके बाद वे राज्यसभा से बाहर चली गईं और कांग्रेस ने भी उनके समर्थन में वॉकआउट किया। जबकि राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने मायावती को देश के आदिवासियों की प्रमुख नेता करार दिया। कुल मिलाकर जब तक गुजरात विधानसभा चुनाव के साथ ही साथ आम चुनाव संपन्न नहीं हो जाते तब तक यह मुद्दा यूं ही छाया रहने वाला है।

सड़क निर्माण में व्यस्त भारत और चीन ?
केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने जानकारी दी है कि भारत, चीन सीमा पर आवाजाही की दृष्टि से महत्वपूर्ण 73 सड़कों का निर्माण कर रहा है। एक प्रश्न के लिखित जवाब में किरण रिजिजू ने कहा कि इनमें से 46 का निर्माण रक्षा मंत्रालय और 27 का गृह मंत्रालय कर रहा है। अब तक 30 सड़कों का निर्माण पूरा कर लिया गया है। वहीं दूसरी तरफ देखा यह जा रहा है कि चीन पाकिस्तान की मदद से आर्थिक गलियारा तैयार कर अपने आपको इस क्षेत्र का बॉस घोषित करने में लगा हुआ है। इसलिए जानकार कह रहे हैं कि इस पर भी सदन में जानकारी दी जानी चाहिए कि आखिर चीन भारत के खिलाफ क्या क्या कर रहा है। चीन असामान्य रूप से आक्रामक दिख रहा है। इस संबंध में विदेश सचिव एस जयशंकर जरुर कहते हैं कि सिक्किम सेक्टर के डोकलाम में चीन का रुख असामान्य रूप से आक्रामक और अक्?खड़ है। बहरहाल पूरे मामले को ठंडा करने के लिए साथ ही यह भी कह दिया जाता है कि तनाव खत्म करने की कोशिश जारी है।

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