सियासतनामा

उद्योगों पर मेहरबान सरकार
केंंद्र सरकार ने दिल्ली के लिए बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने कहा है कि दिल्ली में घरेलू उद्योगों को लेबर, प्रदूषण और उद्योग विभाग से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने की जरूरत नहीं होगी। बता दें कि दिल्ली में अगले साल की शुरुआत में ही विधानसभा चुनाव भी होने हैं। सरकार के इस कदम से लगभग 3 लाख उद्योगों को फायदा होगा। देखना यह है कि उद्योगों के इस फायदे को भाजपा अपने लिए कितना भुना पाती है।

सहयोगियों और बीजेपी में अनबन
भाजपा की सहयोगी पार्टियों ने परेशानी बढ़ा रखी है। पहले महाराष्ट्र और हरियाणा में पार्टी को दबाव का सामना करना पड़ा। अब झारखंड में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। पहले भाजपा की बीस साल पुरानी सहयोगी आजसू ने तेवर दिखाए, अब लोजपा भी आंखे दिखा रही है। हालांकि भाजपा की स्थिति झारखंड में आजसू और लोजपा से बेहतर है फिर भी देखना होगा कि दोनों पार्टियां चुनाव में भाजपा को कितना नुकसान पहुंचा पाती है।

संतों में फूट
केंद्र सरकार जहां अदालत के आदेश पर ट्रस्ट को लेकर मंथन कर रही है, वहीं अयोध्या में संतों के बीच नया बखेड़ा खड़ा हो गया है। इस बखेड़े का आधार रामजन्मभूमि न्यास अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास की ओर से दिया गया बयान बना है। न्यास अध्यक्ष महंत दास ने अपने बयान में कहा कि नए ट्रस्ट की जरूरत नहीं है। इस बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ही ट्रस्ट का अध्यक्ष बनाने की मांग भी जोर पकडऩे लगी है। इसी के चलते स्वयंभू अध्यक्ष का ख्वाब संजोने वाले संतों की बेचैनी बढ़ गई है।

कांग्रेस के आंदोलन पर सवाल
आखिरकार अर्थव्यवस्था की मंदी को लेकर होने वाला कांग्रेस का आंदोलन नहीं हुआ। अयोध्या पर फैसले के बहाने पार्टी ने इसे टाल दिया या खुद ब खुद टल जाने दिया। असल में इस आंदोलन को लेकर कभी भी कांग्रेस बहुत गंभीर नहीं थी और उसने कोई जमीनी तैयारी भी नहीं की थी। बस ऐसे ही एक तारीख का ऐलान कर दिया गया था। अक्टूबर में जब कांग्रेस ने ऐलान किया कि वह पांच नवंबर से आर्थिक मंदी को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू करेगी तो सोशल मीडिया में उसका बड़ा मजाक बना था। सबने यहीं कहा था कि अभी भी क्या जरूरत है, कांग्रेस थोड़ा और इंतजार कर लें।

नोटबंदी पर बहस
नोटबंदी की घोषणा को तीन साल पूरे हो गए हैं। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल का यह सबसे विवादास्पद कदम माना जाता है, जिस पर आज भी बहस जारी है। कहा जा रहा है कि अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत काफी हद तक विमुद्रीकरण की ही देन है। नोटबंदी से छोटे कारोबारियों का धंधा चौपट हो गया और वे बेरोजगार हो गए। इस तरह एक बड़े तबके की क्रयशक्ति घटने से अर्थव्यवस्था में मांग गिरने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज तक जारी है। अच्छी बात यह है कि सरकार अपने तरीके से आर्थिक सुस्ती भगाने के कुछ गंभीर उपाय भी कर रही है। मगर वे असरकारी नहीं हैं।

झारखंड पर अयोध्या का असर ?
झारखंड में विधानसभा चुनाव शुरुआत हो गई है। 30 नवंबर को पहले चरण का मतदान होना है। इस चुनाव के ऐन बीच में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद का फैसला आ गया है। यह पहला मौका नहीं है जब अयोध्या मसले पर चुनाव होगा। भाजपा अब निश्चित रूप से इस मुद्दे पर वोट मांगेगी। पहले भाजपा का नारा होता था सौगंध राम की खाते है, हम मंदिर वहीं बनाएंगे, अब ज्यादा संभावना सौगंध को पूरा करने की है।

देवगौड़ा का साथ किसे
पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा और उनकी पार्टी कब किसके साथ होते है यह पता लगाना बहुत ही मुश्किल काम है। उनकी पार्टी ने कांग्रेस से तालमेल करके राज्य में सरकार बनाई। फिर सरकार गिर गई तो दोनों पार्टियां अलग हो गई। उसके बाद भी कई बाद खुद देवगौड़ा ने संकेत दिया कि वे फिर से कांग्रेस से तालमेल के लिए तैयार है। पर अब वे बयान दे रहे हैं कि भाजपा या मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा उनके दुश्मन नहीं हैं। असल में पिछले दिनों देवेगौड़ा ने एक पुलिस अधिकारी के तबादले के लिए मुख्यमंत्री से कहा। मुख्यमंत्री ने उनके कहने से अधिकारी का तबादला कर दिया। उसके बाद देवगौड़ा का बयान आया कि मुख्यमंत्री येदियुरप्पा उनके दुश्मन नहीं है। उन्होंने यह कहावत भी दोहराई कि राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता है।

गुजरात-एमपी में कांग्रेस की गांधीगिरी
भाजपा के राज में हिंदुत्व की प्रयोगशाला बने गुजरात और मध्यप्रदेश में कांग्रेस अब गांधीगिरी करने जा रही है। युवा पीढ़ी को गांधीजी से जोडऩे के लिए सभी कॉलेजों में कार्यक्रम कराए जाएंगे। इसके लिए बाकी के बड़े नेताओं की एक कमेटी बनाई गई है, जो पूरे कार्यक्रम पर नजर रखेगी और उसे आयोजित करेगी। गांधीजी के नाम पर भाजपा इन दिनों जिस तरह से तेवर अपनाए है, उससे कांग्रेस को ही नुकसान हो रहा है। इसीलिए कांग्रेस ने गांधीगिरी करने का फैसला किया है।

निशाने पर लवासा
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ राय देने वाले चुनाव आयुक्त अशोक लवासा पर कार्रवाई की तैयारी हो गई है। केंद्र ने सरकारी नियंत्रण वाली पीएसयू को लिखा है कि वे अपने दस्तावेजों को खंगाले और पता लगाए कि कहीं लवासा ने विद्युत मंत्रालय में अपने 2009 से 2013 के कार्यकाल के दौरान प्रभाव का गलत इस्तेमाल तो नहीं किया। जो भी हो लवासा को अपने बोलने की सजा तो मिलनी ही है।

झारखंड की विपक्षी एकता में फूट
झारखंड में इसी माह होने जा रहे विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी एकता में सेंध लग गई है। झारखंड विकास मोर्चा ने कहा है कि वह विपक्षी महागठबंधन में शामिल नहीं होगा। पिछले चुनाव में झाविमो ने कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ा था और दो सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस बार भी माना जा रहा था कि भाजपा के खिलाफ सभी पार्टियां एकजुट होकर चुनाव लड़ेंगी और उसे चुनौती देंगे, मगर फिलहाल ऐसा होता दिख नहीं रहा है।

घाटी में चुनौती
केंद्र के सामने घाटी के सियासी शून्य को भरने की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। अब तक कश्मीर आधारित सियासी दलों को अलगाववादियों की काट के तौर पर भी देखा जाता था। नेशनल कांफ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के अलावा अन्य छोटे दलों के जरिए घाटी से चुनावों में हिस्सेदारी होती रही है। घाटी के यह दल एक तरह से देश की मुख्यधारा में शामिल होकर चुनावों में हिस्सा लेते रहे हैं। लेकिन जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की प्रक्रिया के शुरुआत से बने हालात के बीच कम से कम कश्मीर घाटी में सियासी शून्य बन गया है।

अधिकारों की चिंता जरूरी
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के साथ ही प्रशासनिक और अन्य विभागीय स्तर पर व्यवस्थाओं में बदलाव आने जा रहा है। अब केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में 106 केंद्रीय कानून सीधे तौर पर लागू हो गए हैं। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में पुलिस महकमे में सीआरपीसी के तहत मामले दर्ज होंगे। इससे पहले आरपीसी के तहत यह व्यवस्था थी। मगर इससे ज्यादा सरकार को वहां के लोगों के अधिकारों की चिंता करनी होगा, जो आतंकी और दहशतगर्द रौंदा करते हैं।

हुड्डा के लिए चुनौती
हरियाणा में एक बार फिर सत्ता से दूर कांग्रेस के सामने अपार चुनौतियां हैं। एक तो पार्टी को गुटबाजी खत्म कर आगे बढऩा होगा, दूसरा अपने कैडर को बिखरने से बचाना पड़ेगा। चूंकि, सत्ताधारी भाजपा और जजपा कांग्रेस को कमजोर करने के लिए हर दांव चलेंगी। भाजपा उसके एससी और मुस्लिम वोट में सेंध लगाना चाहेगी तो जजपा जाट वोट बैंक को अपने साथ लाना चाहेंगे। ऐसे में पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के सामने दोनों से पार पाने की बड़ी चुनौती होगी।

चौटाला परिवार में एका ?
शिक्षक भर्ती घोटाले में पिता ओमप्रकाश चौटाला के साथ तिहाड़ में बंद अजय चौटाला ने बाहर आने के बाद सिरसा के तेजा खेड़ा में परिवार के रिजॉर्ट में भाई अभय से मुलाकात की। इस दौरान वहां चाचा रंजीत सिंह चौटाला भी मौजूद रहे। सूत्रों के अनुसार दोनों भाई काफी गर्मजोशी से एक-दूसरे से मिले और बातें भी कीं। दुष्यंत चौटाला की जेजेपी की सफलता के बाद चौटाला फैमिली में कलह समाप्ति की उम्मीद लगाई जा रही है। दुष्यंत चौटाला को ना सिर्फ उनके परदादा ताऊ देवीलाल के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा है, बल्कि इस सफलता से राज्य के सबसे मजबूत घरानों में शुमार चौटाला परिवार के एक होने की उम्मीदों को भी बल मिलने लगा है।

मोदी का अहम् सऊदी दौरा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब की दो दिवसीय यात्रा के लिए रवाना हो गए। इस दौरान प्रधानमंत्री सऊदी अरब के पब्लिक इनवेस्टमेंट फंड की ओर से होने वाले तीन दिवसीय कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। कश्मीर को वैश्विक मुद्दा बनाने की पाकिस्तान की कोशिशों और देश में आर्थिक मंदी की आहट के बीच पीएम की सऊदी अरब की इस दूसरी यात्रा को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 2016 में सऊदी अरब ने पीएम को देश का सर्वोच्च सम्मान दिया था, इससे दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में नजदीकी आने का संकेत मिला था। इसकी पुष्टि तब हुई थी जब सऊदी अरब ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने के मामले में पाकिस्तान की मुस्लिम देशों को एकजुट करने की मुहिम से खुद को अलग कर लिया था।

ईवीएम पर चुप्पी
महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने आ गए हैं। कोई भी राजनीतिक दल चुनाव परिणाम आने के बाद ईवीएम मशीनो पर अब निशाना नहीं साध रहा है। मतदान के पहले और वोटों की गिनती तक ईवीएम मशीनों को लेकर जो आरोप-प्रत्यारोप लग रहे थे। अब सभी ने उस पर चुप्पी साध ली है।
हरियाणा में असंध सीट के भाजपा विधायक बक्शीश सिंह ने ईवीएम मशीन का माखौल उड़ाते हुए कहा था कि भाजपा ने ईवीएम में ऐसा पुर्जा लगाया है, जो किसी को भी वोट डालने पर वोट भाजपा के ही खाते में ही जाता है । इसको लेकर राजनीतिक दलों और राजनेताओं ने भारतीय जनता पार्टी को ईवीएम मशीन के मामले में घेरने की कोशिश भी की थी। परिणाम आने के बाद राजनीतिक हलकों में ईवीएम को लेकर कुछ चर्चा ना होना आश्चर्यचकित करने वाला है।

सोनिया की थिंक टैंक बैठक
कांग्रेस पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 25 अक्टूबर को थिंक टैंक की बैठक बुलाई है। यह बैठक महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव परिणाम के तुरंत बाद हो रही है। माना जा रहा है कि इस बैठक में पार्टी के प्रदर्शन पर तो चर्चा होगी, साथ ही पार्टी को विपरीत परिस्थितियों से कैसे उबारा जाए, इस पर भी मंथन होगा। सोनिया गांधी ने बैठक से पहले ही जिस तरह के संकेत दिए हैं, उससे साफ हो चुका है कि वे इस बैठक में पार्टी की सर्जरी करने की भी योजना तैयार करेंगी।

केजरीवाल और मंत्रियों का इलाज
दिल्ली में मोहल्ला क्लीनिक का ढोल पीटने वाली केजरीवाल सरकार के बारे में जो जानकारी सामने आई है, वह चुनाव में दिक्कतें बढ़ा सकती है। भाजपा ने एक आरटीआई के जरिए मिली जानकारी के हवाले से यह खुलासा किया है कि पिछले 4 सालों के दौरान दिल्ली के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और अन्य कैबिनेट मंत्रियों के इलाज पर सरकारी खजाने से 35 लाख रुपए से ज्यादा की रकम खर्च हुई है। अकेले केजरीवाल के इलाज पर 12 लाख रुपए, सिसोदिया के परिवार के इलाज पर 13 लाख से ज्यादा खर्च किए गए हैं। भाजपा ने पूछा है कि जब सीएम अरविंद केजरीवाल दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में तमाम सुविधाएं देने का दावा करते हैं और मोहल्ला क्लिनिकों की तारीफ करते नहीं थकते, तो फिर उन्होंने और उनके मंत्रियों ने अपना या अपने परिजनों का इलाज महंगे प्राइवेट अस्पतालों में क्यों कराया।

चीन-नेपाल की जुगलबंदी
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मामल्लपुरम में हुई अनौपचारिक मुलाकात दुनिया भर में सुर्खियों में रही लेकिन इसके बाद जिनपिंग का नेपाल दौरा भारत-चीन रिश्ते में एक बार फिर से अविश्वास के लिए जगह छोड़ गया। वर्तमान में नेपाल में चीन ने पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव्स की तुलना में बहुत कम निवेश है लेकिन जल्दी ही यह स्थिति बदलने वाली है। बेल्ट ऐंड रोड की दुनिया भर में हो रही आलोचना के बावजूद नेपाल की सरकार इसमें शामिल होने के लिए बेसब्र है। नेपाल की भारत के साथ दक्षिणी सीमा के उलट नेपाल-चीन की सीमा पहाड़ों से घिरी है जिससे दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क सीमित है। भारत के प्रभाव क्षेत्र में रहे नेपाल में अब चीन ने अपनी पकड़ मजबूत करने का दांव खेल दिया है।

कांग्रेस का फींका रहा चुनाव प्रचार
प्रियंका को हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों राज्यों में प्रचार करना था। सोनिया गांधी को एक रैली को संबोधित करना था लेकिन अंतिम समय में तबीयत खराब हो जाने के कारण वह नहीं पहुंच पाईं और उनकी जगह राहुल गांधी ने रैली को संबोधित किया। राहुल ने कुल 7 रैलियों को संबोधित किया, जिसमें तीन हरियाणा और चार महाराष्ट्र की रैलियां शामिल हैं। प्रचार के मामले में कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी के सामने कहीं नहीं ठहरती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 रैलियों को संबोधित किया है। वहीं गृहमंत्री अमित शाह और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी कई रैलियों को संबोधित किया।

यूपी में कानून व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी की कानून-व्यवस्था को लेकर गुरुवार को बेहद तल्ख टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि राज्य में लगता है कि जंगलराज चल रहा है। इस टिप्पणी के एक दिन बाद ही हिंदू नेता कमलेश तिवारी की हत्या कर दी। ताबड़तोड़ गिरफ्तारी कर पुलिस भले ही अपनी लापरवाही छिपा ले, मगर योगी सरकार की कानून-व्यवस्था पर लाचारी दिख ही गई। बदमाशों का एनकाउंटर कर चर्चा में रही योगी सरकार के राज में अगर बदमाश अब भी खौफजदा हैं, तो सवाल तो उठेंगे ही।

क्या गांगुली पर है भाजपा की नजर ?
पूर्व क्रिकेटर सौरभ गांगुली इस समय बीसीसीआई प्रमुख को लेकर चर्चा में हैं। मगर सियासी गलियारों में वे एक और वजह से भी चर्चा में हैं। कहा जा रहार है कि गांगुली पर भाजपा की नजर है। गांगुली 10 माह के लिए बीसीसीआई प्रमुख के पद पर रहेंगे। जब वे पद से हटेंगे, तब का समय बंगाल में विधानसभा चुनाव का होगा और भाजपा उन्हें राज्य में चेहरे के तौर पर पेश करेगी। गांगुली की बीसीसीआई बनने की संभावनाओं पर बात तब ही चली जब दुर्गा पूजा के समय कोलकाता गए गृहमंत्री अमित शाह के साथ उनकी बैठक हुई थी। खबर यह भी है कि भाजपा के इशारे पर ही गांगुली को बीसीसीआई प्रमुख बनाया जा रहा है।

प्रफुल्ल पटेल पर शिकंजा
पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल पर शिकंजा कसता नजर आ रहा है। उनके कारोबारी रिश्ते डॉन दाऊद से होने के सबूत मिले हैं। ईडी पूरे मामले की जांच कर रहा है। अगर जांच में कुछ भी पटेल के खिलाफ गया तो चिदंबरम के बाद जेल जाने वाले वे दूसरे बड़े नेता होंगे। खैर, अभी तो पटेल यही कामना कर रहे होंगे कि जांच में ऐसा कुछ न आए जिससे उन पर आंच आए। क्योंकि यह मामला न सिर्फ उनकी छवि को ठेंस पहुंचाएगा, बल्कि उनकी महाराष्ट्र में जो साख है, उसे भी खाक कर देगा।

तुर्की पर भारत का वार
जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने पर तुर्की और मलेशिया के विरोध पर भारत करारा जवाब देने की तैयारी कर रहा है। भारत अब उनसे कारोबारी संबंध कमजोर कर सकता है। इसके तहत मलयेशिया से पाम ऑयल समेत कई चीजों के आयात पर रोक लगाई जा सकती है। तुर्की का पाकिस्तान के प्रति झुकाव सभी को पता है। हाल में ही तुर्की के राष्ट्रपति ने अपने सदाबहार दोस्त पाकिस्तान की मदद करने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर में कथित तौर पर हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन मसला उठाया। एर्डोगन ने हद पार करते हुए कश्मीर की तुलना फिलिस्तीन से कर डाली।

हरियाणा में डेरों पर नजर
हरियाणा में अभी तक डेरों और धार्मिक गुरुओं के संगठनों ने किसी खास पार्टी के पक्ष में अपनी संबद्धता नहीं जताई है। इनमें से कई संगठन मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए जाने जाते हैं और लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों के नेता इनका समर्थन मांगते रहे हैं। लेकिन इस चुनाव में अब तक डेरों और धार्मिक गुरुओं की भूमिका काफी सीमित दिखी है। कई और छोटे डेरे भी राज्य में हैं, जिनका हरियाणा के कुछ खास इलाकों में प्रभाव हैं। देखना है कि भाजपा या कांग्रेस में से कौन डेरों की कृपा पाने में सफल रहता है।

राहुल की विदेश यात्रा
राहुल गांधी के पिछले सप्ताह विदेश जाने की चर्चाओं के बीच अब यह बात सामने आ रही है कि पार्टी में अपने करीबियों की उपेक्षा से राहुल नाराज हैं। पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी में हाल के घटनाक्रम से काफी नाखुश हैं। महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और ऐसे में उनका विदेश चले जाना इस तरह की अटकलों को बल दे रहा है। उनके विरोधी दलों का दावा है कि राहुल गांधी बैंकॉक गए हैं, हालांकि कांग्रेस मान रही है कि वह देश में नहीं हैं, लेकिन बैंकॉक जाने के दावे को खारिज कर रही है।

बागियों से कैसे निपटे भाजपा
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा भले ही शिवसेना के साथ सीटों के बंटवारे में सफल हो गई हो, मगर अभी उसकी चुनौती कम नहीं हुई है। भाजपा के सामने अब बागियों ने निपटने की चुनौती है। शिवसेना-भाजपा गठबंधन में 288 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं। इसमें शिवसेना के 124, भाजपा के 150 और अन्य छोटी पार्टियों के 14 उम्मीदवार होंगे। लेकिन कई जगहों पर सीट बंटवारे से नाराज भाजपा नेताओं ने शिवसेना उम्मीदवारों के खिलाफ निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पर्चे भरे हैं। बागियों को समझाया जा रहा है कि उन्हें नई सरकार बनने पर जिम्मेदारी दी जाएगी। लेकिन वे नहीं माने तो भविष्य में पार्टी में उनका कोई स्थान नहीं होगा। अब देखना है कि भाजपा की मुसीबत कम होती है या नहीं।

तंवर की बातों को समझो
हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। अशोक तंवर ने शनिवार को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस कुछ लोगों की वजह से अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। मौजूदा समय में कांग्रेस राजनीतिक विरोधियों की वजह से नहीं, बल्कि आपसी अंतर्विरोध के चलते अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। जमीन से उठे और किसी बड़े परिवार से ताल्लुक न रखने वाले मेहनती कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है। पार्टी में पैसे, ब्लैकमेलिंग और दबाव बनाने की रणनीति काम कर रही है।

शिवपाल फिर सपा के साथ
प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह लगता है कि फिर से सपा खेमे की तरफ झुक रहे हैं। भाजपा की तरफ से ज्यादा भाव न मिलने पर वे फिर से नेताजी की दुहाई देने लगे हैं। शिवपाल ने कहा है कि सपा के साथ गठबंधन का विकल्प खुला रहेगा। सांप्रदायिक शक्तियों को धाराशायी करने के लिए सपा और प्रसपा के मध्य मुद्दों के आधार पर चुनावी गठबंधन हो सकता है। बता दें कि यह वही शिवपाल हैं जो एक समय सपा को खत्म करने की कसम खाते फिरते थे।

फिर असहिष्णुता की बारी
भीड़ हिंसा के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला पत्र लिखकर चिंता जताने वाली 50 से ज्यादा हस्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया। पत्र लिखने वालों में इतिहासकार रामचंद्र गुहा, फिल्म निर्देशक मणिरत्नम, फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप, फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल, अभिनेता सौमित्र चटर्जी, अभिनेत्री अपर्णा सेन और गायिका सुधा मुद्गल आदि शामिल हैं। अब तक इनकी ओर से प्रतिक्रिया नहीं आई है, मगर जल्द ही असहिष्णुता का दौर शुरू होने वाला है। बी टाउन या साहित्य जगत की ओर से कोई अवॉर्ड लौटा दे तो कहा नहीं जा सकता।

ललित मोदी और मीनल
लंबे समय से स्विट्जरलैंड टैक्स हैवन के रूप में जाना जाता है। अंतरराष्ट्रीय दबाव में स्विट्जरलैंड ने कुछ देशों के साथ जानकारी साझा करने का समझौता किया है। इसी समझौते के तहत सरकार ने आईपीएल के कमिश्नर ललित मोदी और उनकी पत्नी मीनल पर शिकंजा कसा है। सरकार ने स्विट्जरलैंड को गैरकानूनी तरीक से पैसे के हेरफेर का पता लगाने के लिए हुए द्विपक्षीय समझौते के तहत ललित मोदी और और मीनल मोदी का नाम दिया है। 2010 से लंदन में रह रहे ललित मोदी पर पहले से ही मनी लॉन्ड्रिंग की जांच चल रही है हालांकि वह इससे इनकार करते रहे हैं। 1 अक्टूबर को जारी नोटिस में ज्यादा डीटेल नहीं दी गई है। इसमें ललित और मीनल मोदी को जवाब देने वाले आधिकारिक व्यक्तियों की जानकारी देने के लिए 10 दिन का समय दिया गया है। इतना तो तय है कि अब अगला नंबर ललित मोदी का है। देखते हैं कि वे कितने समय तक बच पाते हैं।

माया-अखिलेश और उपचुनाव
उत्तरप्रदेश में इसी माह होने वाले उपचुनाव को लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती हलाकान हैं। दरअसल, दोनों ही दलों ने लोकसभा चुनाव में साथ-साथ किस्मत आजमाई थी। बसपा जीरो से आगे बढ़ गई, मगर सपा नुकसान में रही। रही-सही कसर मायावती ने गठबंधन तोड़कर पूरी कर दी। अब उपचुनाव दोनों ही दलों के लिए कड़ी चुनौती के समान हैं। भाजपा धारा-370 और तीन तलाक खत्म कर पहले से ही आत्ममुग्ध है। दोनों ही मुद्दों पर मायावती ने राज्यसभा मेें सरकार को समर्थन देकर जनता को अपने पाले में लाने की सोच पाल ली है। मगर यूपी की जनता में मोदी के प्रति रुझान कम होता न देख दोनों ही पार्टियां परेशान हैं।

खटाई में विदेश यात्रा
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की विदेश यात्रा खटाई में पड़ती दिख रही है। केजरीवाल डेनमार्क के कोपनहेगेन में होने वाले सी-40 शिखर सम्मेलन में शामिल होने की अनुमति केन्द्र सरकार से चाहते है। मगर अब तक सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया है। इसे लेकर केजरीवाल की बेचैनी बढ़ती जा रही है। यह सम्मेलन 9 से 12 अक्टूबर के बीच होगा। मालूम हो कि राजनेता, मंत्री या मुख्यमंत्री को विदेशी मंच पर देश की रूपरेखा या सरकार के कार्यों के बारे में अपनी बात रखने के लिए विदेश मंत्रालय से इजाजत लेनी पड़ती है। अब देखना है कि केजरीवाल का विदेश यात्रा का ख्वाब पूरा हो पाता है या नहीं।

योगी बनाम प्रियंका
क्या 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी वाड्रा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच मुकाबला होगा? कांग्रेस पार्टी के पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका को मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार के तौर पर तैयार किया जा रहा है। बावजूद इसके कि 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को करारी हार झेलनी पड़ी थी। कांग्रेस ने अलबत्ता उम्मीद नहीं खोई है। नवंबर में उन्होंने युवा सम्मेलन करने का मंसूबा बनाया है, जिसकी अध्यक्षता प्रियंका करेंगी। वे इन दिनों ट्विटर पर भी खासी सक्रिय हैं और राज्य सरकार को निशाना बनाती रही हैं। अब चर्चा यह भी है कि भाई राहुल जो हासिल नहीं कर सके, क्या प्रियंका कर पाएंगी?

हरियाणा में कांग्रेस के ये सात नेता
हरियाणा में भाजपा के मुकाबले चुनाव लडऩे से पहले कांग्रेस आपसी लड़ाई में उलझी दिख रही है। भले ही सीएम कोई एक व्यक्ति ही होगा, लेकिन 7 दावेदारों ने कांग्रेस की लड़ाई को मुश्किल बना दिया है। यही वजह है कि विपक्षी दल कांग्रेस को 7 मुख्यमंत्रियों की पार्टी बता रहे हैं। बीते 20 सालों में से 10 साल तक हरियाणा में शासन चला चुकी कांग्रेस के लिए भाजपा से मुश्किल फिलहाल गुटबाजी से निपटना है। पार्टी में हर इलाके या यूं कहें कि हर तबके के नेताओं में एक सीएम का चेहरा दिख रहा है। पूर्व सीएम हुड्डा के अलावा कुमारी शैलजा, किरण चौधरी भी दावेदार हैं। इसके अलावा अहीरवाल बेल्ट के नेता कैप्टन अजय यादव भी सीएम फेस के तौर पर खुद को प्रॉजेक्ट कर रहे हैं। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर और राहुल गांधी के करीबी कहे जाने वाले रणदीप सुरजेवाला भी सीएम पद के दावेदार हैं। यही नहीं इसी साल जुलाई में गुलाम नबी आजाद के आगे भी नेताओं में जूतमपैजार हो गई थी।

फडणवीस-उद्धव में खटपट
महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा और शिवसेना के बीच सीट बंटवारे की गुत्थी सुलझने का नाम नहीं ले रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गरम है लेकिन दोनों पार्टियों के प्रमुखों ने चुप्पी साध रखी है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे बुधवार को एक मंच पर भी आए लेकिन सीट बंटवारे को लेेकर चुप्पी साधे रहे। फडणवीस और उद्धव ने कहा कि उनकी पार्टियां मिलकर चुनाव लड़ेंगी और गठबंधन की जीत का दावा भी किया लेकिन सीटों को लेकर बात कहां अटकी है इस पर कुछ नहीं बोला। दोनों की चुप्पी को देखते हुए ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा-शिवेसना कोई रास्ता निकाल लेंगे और एक साथ चुनाव लड़ेंगे।

भाजपा-शिवसेना के पांच फार्मूले
भाजपा-शिवसेना के बीच महाराष्ट्र चुनाव में मिलकर लडऩे के अंतिम दौर में पांच फार्मूले सामने हैं, मगर एक पर भी सहमति नहीं बन पा रही है। भाजपा को देश और राज्य में अपनी बढ़ी हुई शक्ति का अहसास है, वहीं शिवसेना का कहना है कि उसे लोकसभा के वक्त विधानसभा चुनाव के लिए किए गए 50-50 बंटवारे के वादे को निभाना चाहिए। फार्मूले के साथ 10 ऐसी सीटें भी हैं जिन पर दोनों ही अपना दावा छोडऩा नहीं चाहते। भाजपा बिग ब्रदर की भूमिका में है और वह 170-118 फार्मूले पर ही राजी है। मगर शिवसेना को यह मंजूर नहीं। वह 50-50 पर अड़ी है। उसका कहना है कि भाजपा को अपना लोकसभा चुनाव के समय किया वादा पूरा करना चाहिए। अगर वह ऐसा नहीं करती तो उसे आत्म निरीक्षण करने की जरूरत है।

सपा और बसपा अलग-अलग
उत्तर प्रदेश विधानसभा की 11 सीटों पर उपचुनाव के लिए सभी प्रमुख दल मैदान में डट गए हैं। लोकसभा चुनाव में मिल कर लड़े सपा और बसपा का गठबंधन टूट चुका है और इन उपचुनाव में ये दोनों दल अलग-अलग चुनाव लडऩे के लिए अपनी-अपनी तैयारियों में जुटे हुए हैं। जबकि सत्ताधारी भाजपा इस स्थिति से और भी आत्मविश्वास में है, फिर भी वह कोई खतरा न उठाते हुए सभी सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है। कांग्रेस इस बार भी अकेले चुनाव लडऩे की तैयारी में है। सपा ने उपचुनाव वाली सीटों पर दमदार प्रत्याशी तय करने की कवायद तेज कर दी है। कई सालों से उप चुनाव न लडऩे वाली बसपा इस बार पूरी दमदारी से इस जंग में उतर रही है। देखना है कि माया-अखिलेश अलग-अलग भाजपा को कितनी टक्कर दे पाते हैं।

अलगाववादियों की हेकड़ी गायब
राज्य के विशेष दर्जे की समाप्ति के बाद हिरासत में लिए गए अलगाववादियों और नेताओं की हेकड़ी निकल गई है। ये सारे नेता बाहर आने के लिए सारी शर्तें मानने को तैयार हैं और भारत के खिलाफ भड़काऊ बयानबाजी न करने की दुहाई भी दे रहे हैं। अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फारूक समेत सात नेताओं ने रिहाई के लिए बांड पर हस्ताक्षर किए हैं। पिछले 47 दिनों से अलगाववादियों तथा विभिन्न पार्टियों के नेताओं को हिरासत में रखा गया है। हिरासत में रखे गए नेताओं को प्रशासन ने बांड पर हस्ताक्षर करने की शर्त पर रिहाई की पेशकश की है। हालांकि, पीपुल्स कांफ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद गनी लोन, पीडीपी युवा विंग के नेता वाहिद पारा और नौकरशाह से नेता बने शाह फैसल ने बांड पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया है।

कांग्रेस की चिंता
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी विधायकों और वरिष्ठ नेताओं के दूसरे दलों में शामिल होने की होड़ से कांग्रेस चिंतित है। उसे आशंका है कि उम्मीदवारों के ऐलान के बाद कुछ और नेता कांग्रेस छोड़ सकते हैं। ऐसे में, पार्टी अपनों का पलायन रोकने को उन्हें इनाम दे सकती है। ये इनाम सभी विधायकों को चुनाव में उतारना हो सकता है। कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका महाराष्ट्र में लगा है। महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता राधाकृष्णन विखे पाटिल सहित चार विधायक पार्टी छोड़ चुके हैं। कई पूर्व विधायक भी भाजपा में शामिल हो गए। लोग मानते हैं कि चुनाव में भाजपा-शिवसेना की स्थिति मजबूत है इसलिए, उसमें कांग्रेस-एनसीपी के नेता शामिल हो रहे हैं। हरियाणा में भी कई नेता कांग्रेस का हाथ छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं। पार्टी के एक नेता ने कहा कि कुछ और नेता पार्टी छोड़ सकते हैं। ऐसे में पार्टी सभी विधायकों को वफादारी का इनाम दे सकती है।

भाजपा – बसपा
हरियाणा विधानसभा चुनाव में अनुसूचित जाति के मतदाताओं को अपने पाले में लाने का बीजेपी को बढिय़ा मौका दिख रहा है। दरअसल, मायावती का राज्य में किसी भी राजनीतिक पार्टी से गठबंधन नहीं हो सका है और ऐसे में बीजेपी अपना एससी वोटर बेस बढ़ाने की तैयारी में जुट गई है। आने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने मिशन-75 रखा है और यह लक्ष्य 17 एससी सीटों पर पार्टी के प्रदर्शन पर निर्भर करता है। बता दें कि 2014 में बीजेपी ने 17 एससी रिजर्व सीटों में से 8 सीटें जीतीं थीं। अब पार्टी ने इस पर फोकस किया है। हरियाणा के कुल मतदाताओं में 19 फीसदी दलित हैं और 2009 तक बीएसपी की दलित वोटरों पर अच्छी पकड़ थी। 2009 के विधानसभा चुनाव तक बीएसपी का वोट शेयर 6-7 फीसदी के बीच रहता था। इसलिए भाजपा चाहती है कि बसपा उसके साथ आ जाए।

बिहार में अगला सीएम कौन?
बिहार में मिशन 2020 के लिए एनडीए का चेहरा कौन होगा, इस सवाल पर सियासी घमासान मचा हुआ है। भाजपा और जदयू के बीच बनते-बिगड़ते माहौल को संजय जायसवाल के जवाब ने एक बार फिर हवा दे दी है। भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष ने इस सवाल पर चुप्पी साध ली है कि विधानसभा चुनाव में बिहार का कप्तान कौन होगा। जायसवाल ने कहा है कि इस संबंध में प्रदेश नेतृत्व को नहीं, बल्कि केंद्रीय नेतृत्व को निर्णय लेना है। हमें जो निर्देश मिलेगा हम उसका पालन करेंगे। उन्होंने कहा कि बिहार विधानसभा का चुनाव का कप्तान वह तय नहीं कर सकते। जायसवाल ने इस यक्ष प्रश्न को केंद्रीय नेतृत्व की ओर फेंक दिया है, जबकि उनसे पहले प्रदेश के डिप्टी सीएम सुशील मोदी, नीतीश कुमार को ही बिहार का सफल कप्तान बता चुके हैं। उन्होंने कहा था कि नीतीश कुमार बिहार में एनडीए के कप्तान हैं और 2020 में भी रहेंगे।

पिता के कानून में फंसे फारूक
जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला को रविवार रात पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसएस) के तहत हिरासत में ले लिया गया। पीएसए के तहत किसी भी शख्स को बिना किसी मुकदमे के दो साल तक हिरासत में रखा जा सकता है। दिलचस्प बात यह है कि पब्लिक सेफ्टी एक्ट को 1978 में फारूक अब्दुल्ला के पिता शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने लागू किया था। शेख अब्दुल्ला यह एक्ट लकड़ी के तस्करों पर रोकथाम लगाने के लिए लाए थे। इसके तहत सरकार को पहली बार में किसी व्यक्ति को छह महीने हिरासत में रखने और फिर बिना मुकदमा चलाए इस हिरासत को दो साल तक बढ़ाने का अधिकार है। वह मुख्यमंत्री पद पर रहे ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिन्हें पीएसए के तहत हिरासत में लिया गया है।

हाउडी मोदी में ट्रंप
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 22 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम में शामिल होंगे। ह्यूस्टन में प्रधानमंत्री भारतीय समुदाय को संबोधित करने वाले हैं। यह काफी बड़ा कार्यक्रम है, जिसमें 50 हजार से ज्यादा दर्शक शामिल होंगे। इस कार्यक्रम में ट्रंप के जाने की अटकलें काफी दिनों से थी, मगर अब पुष्टि हो गई है। ट्रंप कार्यक्रम में क्यों जा रहे हैं, इसके जवाब में अमेरिका ने कहा है कि हमारा मकसद दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत करना है। मगर अंदर की बात कुछ और है। अमेरिका में इसी साल चुनाव होने हैं और चुनाव में भारतीय काफी प्रभावशाली होते हैं। इसी वजह से ह्यूस्टन में जब मोदी के साथ ट्रम्प होंगे, तो वे जाने-अनजाने अपना प्रचार भी कर लेंगे। मंच पर जब मोदी होंगे तो उनका मकसद काफी हद तक पूरा भी हो जाएगा।

अटपटे बयानों से नहीं उभरेगी अर्थव्यवस्था
पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि आर्थिक संकट से घिरी घरेलू अर्थव्यवस्था मंत्रियों के अटपटे बयानों से उभरने वाली नहीं है। सिन्हा ने केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण और पीयूष गोयल के हाल ही में दिए गए बयानों का हवाला देते हुए यह बात कही। सिन्हा ने कहा कि सरकार में बैठे लोग अटपटे बयान दे रहे हैं। इन बयानों से अर्थव्यवस्था का कल्याण नहीं होगा। बल्कि सरकार की छवि पर असर पड़ेगा। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि यदि ओला-उबर के चलते यात्री गाडिय़ों की बिक्री में गिरावट आई, तो फिर दोपहिया वाहनों और ट्रकों की बिक्री में गिरावट क्यों आई? बीते सालों में समय रहते सुधार के कदम नहीं उठाने से देश मौजूदा आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। सरकार अब भी हालात से निपटने के बजाय कमियों पर पर्दा डालने में जुटी है।

उदयनराजे का पवार को झटका
महाराष्ट्र के सातारा से एनसीपी सांसद उदयनराजे भोसले ने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। दिल्ली में लगभग आधी रात को उन्होंने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात की और उन्हें अपना इस्तीफा सौंपा। उदयनराजे को खुद सीएम देवेंद्र फड़णवीस पुणे से दिल्ली लेकर आए और शनिवार को भाजपा में शामिल करा दिया। उदयनराजे एनसीपी के चार सांसदों में से एक थे। उदयनराजे के इस फैसले से महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से पहले शरद पवार को बड़ा झटका लगा है। इधर उदयनराजे भोसले के इस्तीफे के फैसले पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने कहा है कि एनसीपी एक बार फिर से सतारा लोक सभा सीट जीतेगी। एनसीपी प्रवक्ता नवाब मलिक ने उदयनराजे पर तंज कसते हुए कहा कि ये तो वही बता सकते हैं कि वे बीजेपी में क्यों जा रहे हैं, लेकिन एनसीपी एक बार फिर से सतारा लोकसभा सीट जीतेगी।

सोनिया गांधी की सक्रियता
कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष बनने के बाद सोनिया गांधी पार्टी को दोबारा से खड़ा करने के लिए लगातार सक्रिय हैं। कांग्रेस नेताओं के साथ सोनिया एक के बाद एक बैठकें कर रही हैं। आगामी तीन राज्यों के चुनाव की रणनीति के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ गुरुवार को बैठक में पार्टी में नई ऊर्जा का संचार करने का संकल्प लिया गया। सोनिया ने ऐसे वक्त में मुख्यमंत्रियों की यह बैठक बुलाई है जब मध्य प्रदेश, राजस्थान और पंजाब में कांग्रेस नेताओं के बीच आपसी टकराव के चर्चे आम हो चुके हैं। मध्य प्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के धड़ों के बीच प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर खींचतान चल रही है तो राजस्थान में मुख्यमंत्री गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच सबकुछ ठीक नहीं होने की बात लंबे समय से कही जा रही हैं। ऐसे ही पंजाब में अमरिंदर और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच भी टकराव रहा है. इसी के चलते सिद्धू ने कैप्टन सरकार में मंत्री पद से इस्तीफा तक दे दिया था।

संघ को होना पड़ा असहज
पिछले माह संघ प्रमुख मोहन भागवत और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना सैयद अरशद मदनी सांप्रदायिक सौहार्द के लिए मिलकर काम करने के लिए एकमत हुए लेकिन दिल्ली स्थित संघ कार्यालय, केशवकुंज के बंद कमरे में उनके बीच दोस्ताना अंदाज में जो बातचीत हुई वह ज्यादा देर तक टिक नहीं पाई। दरअसल, संघ अपनी परंपरागत कार्यशैली के तहत सांप्रदायिक सौहार्द के मुद्दे पर बढऩा चाह रहा था जबकि मौलाना मदनी ने इस गोपनीय बैठक की चर्चा को प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए सरेआम कर दिया। इससे संघ असहज है। प्रचार प्रमुख राजीव तुली कहते हैं, यह बैठक व्यक्तिगत और गोपनीय थी। संघ की यह नीति रही है कि व्यक्तिगत चर्चा को व्यक्तिगत ही रहने दिया जाता है। वैसे भी यह कोई पहली बैठक नहीं है, इससे पहले भी इस तरह की कई मुलाकातें हो चुकी हैं। इसकी नींव संघ के पूर्व प्रमुख के.एस. सुदर्शन ने रखी थी।

केरल और भाजपा
भगवान का अपना देश कहे जाने वाला केरल लंबे समय से भगवा ताकतों का प्रतिरोध करता रहा है। भाजपा ने जब अधिकांश उत्तरी हिस्सों में विजय प्राप्त कर ली और पूर्वी हिस्सों में भी जगह बना ली तब भी कर्नाटक को छोड़ कर दक्षिण के अन्य राज्यों में जमीन तलाश पाना उसके लिए कठिन बना रहा। वामपंथियों के हिंदू-बहुल गढ़ केरल ने कांग्रेस को तो जगह दी, लेकिन उस पार्टी को कभी नहीं घुसने दिया जो हिंदुओं की पैरोकार होने का दावा करती है। यहां तक कि जब भाजपा ने सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे को भुनाने की कोशिश की तो इसका लाभ कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को मिला जिसने राज्य की 20 लोकसभा सीटों में से 19 जीतीं और माकपा को अलप्पुझा की एक सीट से संतोष करना पड़ा. 2016 के विधानसभा चुनाव में नेमोम क्षेत्र से ओ. राजगोपाल की जीत से राज्य में चुनावी खाता खोलने वाली पार्टी की जीत की उम्मीदें धरी रह गईं। लेकिन विरोध का यह ज्वार अब पलट सकता है। राज्य में वामपंथियों की दुर्दशा के बाद अब भारतीय जनता पार्टी के आक्रामक सदस्यता अभियान के दौरान मलयाली लोग पार्टी में शामिल हो रहे हैं।

प्रियंका की रणनीति
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को खड़ा करने के लिए पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी एक ओर मैराथन बैठकों के जरिए मजबूत संगठन का ताना बाना बुन रही हैं? वहीं दूसरी ओर लगातार कार्यकर्ताओं को कार्यक्रम देकर आगे की लड़ाई के लिए तैयार कर रही हैं। लोकसभा चुनाव में प्रदेश की मात्र एक सीट रायबरेली पर कांग्रेस को जीत मिल सकी थी। करारी हार के बाद से प्रियंका गांधी वर्ष 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी में नए सिरे से जान फूंकने में लगी है। वह पार्टी के बड़े-छोटे नेताओं से लेकर प्रमुख कार्यकर्ताओं तक से संगठन बनाने को लेकर राय ले रही हैं। प्रियंका की यह रणनीति कांग्रेस पर कितना असर डालेगी, यह हाल ही में होने वाले उपचुनाव में दिख जाएगा।

अफगानिस्तान और भारत की चिंता
अफगानिस्तान में अमेरिका और तालिबान के बीच चल रहे समझौते की आड़ में खतरनाक सामरिक-कूटनीतिक शतरंज की बिसात बिछी है। सरकार के सामरिक कूटनीतिकारों को 2020 तक अफगानिस्तान से अपनी सेना पूरी तरह हटाने वाली अमेरिका की मंशा पर गंभीर शक है। सरकारी तंत्र बेहद सतर्क है कि वैश्विक आतंकवाद का हब कहे जाने वाले अफगानिस्तान में अमेरिका और पाकिस्तान के साथ पक रही नई खिचड़ी भारत के लिए कई चुनौतियां पैदा करेगा। अफगानिस्तान की अहम भौगोलिक स्थिति के मद्देनजर वहां अमेरिकी सेना की मौजूदगी ईरान, चीन और रूस को एक साथ लंबे समय तक साधे रहने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। खासतौर पर ईरान से लगातार बढ़ रहे तनावपूर्ण समीकरण को देखते हुए अमेरिका इस इलाके में अपनी सैन्य मौजूदगी पर जोखिम नहीं उठाना चाहेगा।

हरियाणा के बाद दिल्ली में कौन ?
हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष के फैसले के बाद अब दिल्ली की उम्मीदें बढ़ गई हैं। जल्द ही कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर मुहर लगा सकती हैं। अब तक कांग्रेस आलाकमान का पूरा फोकस हरियाणा पर था, वहां पर फैसले के बाद अब दिल्ली की बारी है। इस बीच दिल्ली के नेता लगातार सोनिया गांधी से मुलाकात कर रहे हैं और सभी नेता सुझाव भी दे रहे हैं। लेकिन अब भी यह फैसला नहीं हो पाया है कि प्रदेश की जिम्मेदारी अनुभवी नेता के हाथ में दें या फिर दिल्ली को इस बार कोई नया व युवा चेहरा मिलेगा। रोज नए-नए समीकरण बन रहे हैं। औसतन हर रोज दिल्ली का कोई न कोई नेता सोनिया गांधी से मुलाकात कर रहा है, हर मुलाकात के बाद कयासों का दौर भी बदल जा रहा है। कयास यह भी लगाया जा रहा है कि दिल्ली में अब किसी दलित चेहरे को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की संभावना कम होती दिख रही है।

शिवसेना की बैचेनी
अगले महीने संभावित महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा सहयोगी शिवसेना के साथ सीट बंटवारे के फॉर्मूले पर सस्पेंस बनाए रखेगी। पार्टी की योजना चुनाव के बेहद करीब इस मसले पर बात करने की है और वह सहयोगी को सौ से ज्यादा सीटें नहीं देना चाहती। यही कारण है कि इस संबंध में शिवसेना के बैठक बुलाए जाने के प्रस्तावों को भाजपा लगातार टाल रही है। लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा विधानसभा की आधी-आधी सीटों पर लडऩे के प्रस्ताव से सैद्धांतिक तौर पर सहमत थी। हालांकि, अब बीते एक महीने में शिवसेना ने सीट बंटवारे पर बैठक के लिए तीन बार अनौपचारिक प्रस्ताव दिया, जिसका भाजपा ने कोई जवाब नहीं दिया। इसे लेकर शिवसेना बेचैन हो रही है।

यूपी में सच का मतलब
लगता है कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के राज में सच बोलना भी गुनाह हो गया है। मिर्जापुर जिले के अहरौरा थाना क्षेत्र के सिऊर गांव स्थित प्राथमिक विद्यालय में कुछ दिनों पूर्व मिड डे मील में बच्चों को रोटी-नमक खिलाने केमामले में बीईओ ने दो नामजद समेत तीन के खिलाफ शनिवार रात मुकदमा दर्ज कराया। इन पर साजिश पूर्वक वीडियो बनाने का आरोप है। कुछ दिन पहले विद्यालय में बच्चों को नमक-रोटी खिलाने का वीडियो वायरल हुआ था। शनिवार रात खंड शिक्षा अधिकारी की तहरीर पर पुलिस ने दो नामजद सहित तीन लोगों के खिलाफ कूट रचित तरीकेसे वीडियो बनाकर वायरल करने एवं सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाने का मुकदमा दर्ज कराया। जबकि होना यह चाहिए था कि सरकार स्कूलों की दशा सुधारती और बच्चों को बेहतर गुणवत्ता वाला भोजन कराती।

ट्रैफिक नियम या फिर मुसीबत
देशभर में रविवार से प्रभावी नए ट्रैफिक नियमों पर विवाद हो गया है। पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे गैर-भाजपा शासित राज्यों ने यातायात नियम टूटने पर 10 गुना तक बढ़े जुर्माने पर सवाल उठाए हैं। बंगाल और मध्य प्रदेश ने बढ़े जुर्माने को लागू करने से इनकार किया है। वहीं, राजस्थान सरकार ने कहा है कि हमने कानून तो लागू कर दिया है, लेकिन जुर्माना राशि की समीक्षा करेंगे। संशोधित मोटर वाहन ऐक्ट में सिग्नल जंप करने पर 1000 रुपए और नशे में गाड़ी चलाने पर 10 हजार रुपए तक जुर्माने का प्रावधान है। आम लोगों की बात करें तो नए नियम के लागू होने के बाद लोगों को पुलिस के सामने हाथ-पैर जोड़ते देखा जा रहा है।

ममता और भाजपा
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी एनआरसी लिस्ट का विरोध किया है। सीएम ममता ने कहा है कि एनआरसी ने उन सभी को बेनकाब कर दिया है, जिन्होंने राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की।
उनके पास राष्ट्र को जवाब देने के लिए बहुत कुछ है। ऐसा तब होता है जब समाज की भलाई और राष्ट्र के बड़े हित के बजाय किसी काम को एक उल्टे मकसद से किया जाता है। कांग्रेस भी लिस्ट आने के बाद से नाराज है। पार्टी का कहना है कि देश के वास्तविक नागरिकों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। एनआरसी की लिस्ट न सिर्फ विपक्ष बल्कि भाजपा के लिए भी सिरदर्द बन गई है। राज्य में अगले कुछ वर्षों में चुनाव होने हैं। विपक्ष इस मुद्दे को जरूर भुनाएगा। मगर भाजपा शायद ही इस डैमेज को कंट्रोल कर सके।

क्या तंवर हटाए जायेंगे ?
कांग्रेस हाईकमान हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी में किसी किस्म के बिखराव से बचने के लिए हरियाणा पीसीसी अध्यक्ष अशोक तंवर को हटाकर सामूहिक नेतृत्व की व्यवस्था बना सकता है। बागी नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को हटाने की मांग कर रहे हैं, जिन्हें राहुल गांधी ने करीब 5 साल पहले हरियाणा की कमान सौंपी थी। इस बीच हुड्डा ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी मुलाकात की। गुलाम नबी आजाद ने दो दिनों तक पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और हुड्डा, सीडब्ल्यूसी सदस्य कुमारी शैलजा, सीएलपी नेता किरण चौधरी, वरिष्ठ नेता रणदीप सुरजेवाला और अजय यादव जैसे हरियाणा के दिग्गज नेताओं के साथ चर्चा की। इसमें हरियाणा में नेतृत्व मसले का ऐसा हल निकालने की कोशिश की गई, जो सभी को स्वीकार हो। इस बारे में आखिरी फैसला आने वाले दिनों में लिया जाएगा, लेकिन शैलजा का पार्टी नेतृत्व की अगुवाई करने का दावा सबसे मजबूत है। वरिष्ठ एआईसीसी नेताओं के साथ हरियाणा कांग्रेस में भरोसा करने वालों का मानना है कि दिग्गज दलित महिला नेता का राजनीतिक कद काफी ऊंचा है। हरियाणा में उनकी स्वीकार्यता भी है। वह इस मुश्किल समय में गुटबाजी से जूझ रही कांग्रेस को एकता के धागे में पिरो सकती हैं। अजय और सुरजेवाला भी पीसीसी पोस्ट के दावेदार हैं।

भाजपा के राजस्थान में नए चेहरे
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के बाद राजस्थान में भाजपा नेतृत्व ने नई राह पकड़ी है। पुराने चेहरों की जगह अब नए चेहरों को तरजीह देने की योजना बनी है। विधानसभा चुनाव की हार के बाद से वसुंधरा राजे तो किनारे लगाई जा चुकी हैं। हकीकत और अपने संकट को वसुंधरा भी भांप चुुकी हैं। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाने के बाद वसुंधरा को समझ आ चुकी है कि अब वे पार्टी की मजबूरी नहीं रह गई हैं। अलबत्ता आलाकमान यही धारणा बना चुका है कि वसुंधरा को दूर रखने का फायदा मिला। छह महीने से चल रहे पार्टी के सदस्यता अभियान में भी वसुंधरा कहीं नहीं दिखीं। उलटे एक महीने तो वे विदेश में ही थीं। अभियान के संयोजक शिवराज चौहान जयपुर आए तो शहर में होते हुए भी वसुंधरा ने उनकी समीक्षा बैठक से किनारा किया। गजेंद्र सिंह शेखावत को कैबिनेट में मंत्री बनाने के बाद कोटा के ओम बिरला को लोकसभा अध्यक्ष बनाकर जता दिया गया कि पार्टी में चेहरों की कमी नहीं। बिरला केंद्र की नई पसंद बन कर उभरे हैं। लोकसभा अध्यक्ष के नाते उनका प्रदर्शन चौतरफा सराहा गया है। इसी तरह सदस्यता अभियान में युवा विधायक सतीश पूनिया ने भी कमाल का कौशल दिखाया है। उम्मीद तो उनके समर्थक यही लगा रहे हैं कि आलाकमान उन्हें सूबे में पार्टी का नेतृत्व सौंप सकते हैं। सूबे में सक्रियता की सलाह राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को भी मिली है। इसीलिए उन्हें इस बार केंद्र में मंत्री पद नहीं दिया गया।

हरियाणा में कांग्रेस की मुश्किलें
कांग्रेस नेतृत्व के लिए हरियाणा की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही हैं। राज्य में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुलदीप बिश्नोई पर शिकंजा कसने से पार्टी की चिंता बढ़ गई है। दरअसल, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने एसोसिएट जर्नल लिमिटेड (एजेएल) को पंचकूला में भूमि आवंटन करने के मामले में पहला आरोपपत्र दायर किया है, जिसमें हुड्डा और मोती लाल वोरा का नाम भी शामिल है। वहीं, आयकर विभाग ने कुलदीप बिश्नोई पर बेनामी संपत्ति रोधी कानून के तहत कार्रवाई की है। पार्टी का मानना है कि विधानसभा चुनाव नजदीक आने पर इन दोनों नेताओं पर हमले और तेज होंगे। लिहाजा पार्टी को उसी के मुताबिक रणनीति बनानी होगी ताकि इसका चुनाव में ज्यादा नुकसान न हो। इस बीच, पार्टी की तमाम कोशिशों के बावजूद हरियाणा में गुटबाजी खत्म नहीं हो सकी। माना जा रहा है कि सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद जल्द ही इस पर फैसला हो सकता है। हरियाणा में भी अध्यक्ष के साथ दो से तीन कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जा सकते हैं।

आरोपियों का स्वागत
बुलंदशहर हिंसा के आरोपी जीतू फौजी, शिखर अग्रवाल, हेमू, उपेंद्र सिंह राघव, सौरव और रोहित राघव शनिवार को कोर्ट से जमानत लेकर जैसे ही जेल से बाहर आए, हिन्दूवादी संगठन से जुड़े लोगों ने फूल माला पहनाकर उनका स्वागत किया। इस दौरान भारत माता की जय, वंदे मातरम और जय श्री राम के नारे लगाए गए। इस केस के 6 आरोपियों के साथ लोगों ने एक-एक कर सेल्फी ली। पिछले साल तीन दिसंबर को स्याना के चिंगरावटी गांव में गौकशी की अफवाह के बाद हिंसा भड़क गई थी। इस हिंसा में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। यूपी पुलिस ने मामला दर्ज कर 38 लोगों को जेल भेजा था. 38 में से 6 आरोपी साढ़े सात महीने के बाद जेल से जमानत पर रिहा होकर शनिवार को बाहर निकले थे। ताजा घटनाक्रम पर विपक्ष उबल गया है। बहरहाल, बुलंदशहर केस में सभी जानते हैं कि कैसे बीजेपी ने आरोपियों को बचाने की कोशिश की थी और अब सत्ताधारी पार्टी के समर्थक आरोपियों का स्वागत कर रहे हैं। योगी सरकार को साफ करना चाहिए कि उनकी पार्टी हमेशा उनका साथ क्यों देती है जो कानून हाथ में लेते हैं?

यह कैसा सुशासन
बिहार से एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है जहां एक शख्स 30 सालों से तीन सरकारी विभागों में काम करता था। यहीं नहीं वो शख्स तीनों ही विभागों से वेतन भी उठा रहा था। बिहार सरकार के तीन अलग-अलग विभागों में कार्यरत एक (इंजीनियर) पिछले 30 सालों से तीनों विभागों से वेतन भी उठा रहा था। यह बात सामने आने के बाद किशनगंज के एक थाने में इस अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है और पुलिस जांच में जुटी हुई है। आरोपी सुरेश तीन-तीन पदों पर एक साथ कार्य कर रहा था और उसे संबंधित विभाग से समय-समय पर पदोन्नति भी मिलती रही। इस फर्जीवाड़े का खुलासा तब हुआ, जब वित्त विभाग ने नई वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (सीएफएमएस) के तहत सरकारी कर्मचारी का वेतन और अन्य कार्यो की जानकारी के लिए आधार कार्ड, पैन कार्ड और जन्मतिथि डाली गई। इस खुलासे ने नीतीश कुमार के सुशासन की भी पोल खोल दी है।

रामदेव को खुद पर भरोसा नहीं
पतंजलि आयुर्वेद के सीईओ व बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण का शुक्रवार दोपहर अचानक स्वास्थ्य खराब हो गया। तबीयत अधिक खराब होने पर उन्हें एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया गया। आचार्य बालकृष्ण के साथ बाबा रामदेव भी मौजूद रहे। बाबा रामदेव कई बीमारियों को ठीक करने का दावा करते हैं और तमाम तरह की औषधियों को बेचने के लिए दुनियाभर में मार्केटिंग करते हैं। बीमारियों के इलाज के लिए तरह-तरह के योगासन की कलाएं भी सिखाते हैं। मगर बात जब खुद पर आती है तो यह सब धरा रह जाता है। अगर रामदेव के योगासन और औषधियों में वाकई ताकत है तो फिर उन्होंने बालकृष्ण को क्यों नहीं ठीक कर दिया। क्यों उन्हें लेकर एम्स भागे।

भुजबल की घर वापसी
कांग्रेस और एनसीपी के दिग्गज नेता एक-एक कर पार्टी छोड़ते जा रहे हैं। पार्टी छोडऩे वाले ज्यादातर दिग्गजों ने भाजपा में प्रवेश किया है। शिवसेना भी ऐसे दिग्गजों को अपनी पार्टी में शामिल करना चाहती है जिससे कि भविष्य में भाजपा की किसी भी चुनौती का सामना कर सके। ऐसे में शिवसेना में एनसीपी नेता छगन भुजबल की घर वापसी की संभावनाएं बनती जा रही है। भुजबल के साथ कई और नेता भी शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। माना जा रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भुजबल की घर वापसी हो सकती है। हालांकि, भुजबल के भतीजे समीर भुजबल का कहना है कि यह सब वे मीडिया से सुन रहे हैं। खुद उनके चाचा भुजबल ने इससे इनकार किया है। दूसरी ओर, भुजबल और सुनील तटकरे के शिवसेना में शामिल होने पर पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा कि उचित समय पर उचित निर्णय लिया जाएगा, थोड़ा सब्र रखें।

असमंजस में हैं उद्धव
भाजपा-शिवसेना के संबंधों में सुधार दिखने के बाद भी सेना छोड़ कर भाजपा में शामिल होने वालों की संख्या से अनुमान लगाए जा रहे हैं कि आगामी विधानसभा चुनावों के लिए दोनों के बीच कोई चुनाव-पूर्व गठबंधन नहीं होगा। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विधायक शिवेंद्र सिंह राजे भोसले और सागर नाइक जैसे कद्दावर नेताओं समेत दूसरी पार्टियों के कम से कम 60 नेताओं ने पिछले एक महीने में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की है। इससे एक मजाक चल पड़ा है कि भाजपा का नाम अब भर्ती जनता पार्टी है। हालांकि, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस ने साफ किया है कि शिवसेना के साथ गठबंधन जारी रहेगा और जल्द ही सीटों के बंटवारे के फॉर्मूले को अंतिम रूप दिया जाएगा। 31 जुलाई को उन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा कि हमने गठबंधन बनाए रखने का फैसला किया है, मीडिया को जो चाहे अनुमान लगाने दीजिए। सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भी ऐसी ही भावनाएं व्यक्त की हैं, लेकिन उनका दावा है कि भाजपा ने उन्हें सत्ता में बराबर की भागीदारी का वादा किया है। लेकिन उद्धव अब भी पूरी तरह से भ्रमित हैं।

शिकंजे में जाकिर
विवादास्पद भारतीय इस्लामिक उपदेशक जाकिर नाइक पर शिकंजा कस गया है। अब उसने नस्ली टिप्पणी को लेकर माफी मांगी है। उसकी टिप्पणी के कारण उसे मलेशिया से निष्कासित करने की मांग तेज होने लगी थी। एक दिन पहले ही पुलिस ने उससे पूछताछ की थी। कट्टर उपदेशक जाकिर नाइक ने 9/11 के हमलों को ‘अंदरूनी काम बताया था। वह 2016 में भारत छोड़कर मुस्लिम बहुल देश मलयेशिया चला गया था जहां उसे स्थायी निवास हासिल हो गया था। भारत में वह कट्टरपंथ को भड़काने और धनशोधन के मामले में वंछित है और नई दिल्ली ने पिछले वर्ष मलेशिया से उसे प्रत्यर्पित करने के लिए कहा था लेकिन भारत के आग्रह को खारिज कर दिया गया था। भारत से भागने के बाद जाकिर कई मौकों पर आंखें दिखा चुका है, मगर भारत की कोशिशें रंग लाईं। मलेशिया ने उसके उपदेश देने पर रोक क्या लगाई, वह रोने पर आ गया और माफी मांगने लगा। वह दिन दूर नहीं जब जाकिर भारत में अपने किए की सजा पाएगा।

भागवत और आरक्षण
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार फिर आरक्षण का मुद्दा उठाया है। भागवत ने कहा कि जो आरक्षण के पक्ष में हैं और जो इसके खिलाफ हैं उन लोगों के बीच इस पर सद्भावपूर्ण माहौल में बातचीत होनी चाहिए। आरक्षण पर चर्चा हर बार तीखी हो जाती है जबकि इस दृष्टिकोण पर समाज के विभिन्न वर्गों में सामंजस्य जरूरी है। इससे पहले, आरएसएस प्रमुख ने आरक्षण नीति की समीक्षा करने की वकालत की थी, जिस पर कई दलों और जाति समूहों की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई थी। अब एक बार फिर इस बयान को लेकर आरएसएस को विपक्ष ने निशाने पर लिया है। उधर, इस बयान को लेकर विपक्ष ने आरएसएस के साथ बीजेपी पर भी तीखा हमला बोला है। एक तरफ जहां कांग्रेस ने इसे दलितों और पिछड़ों का आरक्षण खत्म करने का अजेंडा बताया, वहीं बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने कहा कि आरक्षण मानवतावादी संवैधानिक व्यवस्था है जिससे छेड़छाड़ अनुचित और अन्याय है। मायावती ने दो टूक कहा कि आरएसएस को अपनी आरक्षण विरोधी मानसिकता त्याग देनी चाहिए। भागवत ने बिहार चुनाव से ठीक पहले आरक्षण का मुद्दा उठाया था और परिणाम क्या आया, सभी को पता है। अब 5 राज्यों में चुनाव करीब हैं। ऐसे में भागवत का बयान कहीं फिर भाजपा को दिक्कत में न डाल दे क्योंकि भाजपा लगातार आरक्षण के मुद्दे से बचना चाह रही है।

काश, पहले सोच लेता पाक
धारा-370 खत्म करने के फैसले के बाद पाकिस्तान ने जिस तरह का रुख अपनाया, वह अब उसे ही भारी पडऩे लगा है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था धराशायी हो चुकी है और वहां के लोग आसमान छूती महंगाई से त्रस्त हैं। लेकिन इमरान सरकार इन दिनों भारत को युद्ध की गीदड़भभकी देने में व्यस्त हैं। पाकिस्तान में हालात इतने खराब हो चुके हैं कि वहां की आम आवाम के लिए रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना भी अब मुश्किल होता जा रहा है। दाल, चीनी, गैस, दूध, फल समेत तमाम चीजों के दामों में आग लगी हुई है। भारत से कारोबार बंद करने के बाद ऐसा लग रहा है कि पाकिस्तान ने अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार ली है। वहां दाल की कीमतें आसमान छू रही हैं। पाकिस्तान में चना दाल 160 रु, मूंग दाल 170 रु, मसूर दाल 130 रु और अरहर की दाल 180 रु किलो तक बिक रहा है। पाकिस्तान में डॉलर की कीमत भारत के मुकाबले दोगुनी है। भारत में एक डॉलर की कीमत जहां 71 रुपये 14 पैसे है वहीं पाकिस्तान में एक डॉलर की कीमत दोगुने से भी ज्यादा 159 रुपये 76 पैसे हैं। आप पाकिस्तान की कंगाली का अंदाजा इसी आंकड़े से लगा सकते हैं।

टूट जाएगी लालू की पार्टी ?
लोकसभा चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद ऐसी अटकलें हैं कि कई नेता मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू से जुडऩे की योजना बना रहे हैं। लालू यादव की पार्टी आरजेडी में चल रही अंदरूनी उठापटक फिर एक बार सामने आ गई है। पार्टी की एक अहम बैठक में एक बार फिर लालू यादव के बेटे तेजस्वी और तेज प्रताप नदारद रहे।
राज्यसभा सांसद और लालू यादव की बेटी मीसा भी बैठक से नदारद रहीं। अब पूरा दारोमदार राबड़ी देवी के कंधे पर आ गया है। लिहाजा उन्होंने फिर कमान संभाली और संदेश देने की कोशिश की कि कहीं कुछ गड़बड़ नहीं है। मगर राबड़ी के आगे आने के बाद भी यह आश्वासन या दावा पार्टी के नेता नहीं कर पा रहे हैं कि टूट नहीं होगी। दरअसल, लोकसभा चुनाव के पहले से ही लालू यादव के परिवार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। दोनों भाई कई मौकों पर एक-दूसरे से तल्खी जाहिर कर चुके हैं। इधर, सदस्यता अभियान में दोनों के शामिल नहीं होने से एक बार फिर अटकलें शुरू हो गई हैं। ऐसे में अगर भाजपा और नीतीयश की पार्टी राजद में सेंधमारी कर सकती है। लालू जेल में हैं और इलाज करा रहे हैं। राबड़ी हमेशा से लालू की रबड़ स्टैंप रही हैं और बेटों में लालू जैसा चमत्कारिक व्यक्तित्व भी नहीं है। एसे में एक ही चारा बचता है, इंतजार का। राजद का भविष्य भी इसी इंतजार के गर्भ में है।

पंचर पड़ा ऑटो सेक्टर
भारतीय अर्थव्यवस्था की नाक समझा जाने वाला ऑटोमोबाइल सेक्टर अभी तक के सबसे मुश्किल दौर में पहुंच गया है। हर तरह की गाडिय़ों की बिक्री में गिरावट जारी है। लगातार आठवें महीने आंकड़े ऐसे ही आए हैं। पैसेंजर गाडिय़ों में इस साल जुलाई तक 19 साल में सबसे बड़ी गिरावट दिखी है। पिछली जुलाई की तुलना में इस साल जुलाई में कारों की बिक्री 35.95 फीसदी गिरी है, जबकि कमर्शियल गाडिय़ों की बिक्री 37.48 फीसदी नीचे आई है। सभी तरह के यात्री वाहनों की बिक्री 30.98 फीसदी घटी है जिसमें दोपहिया वाहनों की बिक्री में 16.82 फीसदी की कमी शामिल है। गाडिय़ां कम बिकने की मार इस क्षेत्र में काम कर रहे लोगों पर पड़ रही है। करीब साढ़े तीन लाख अस्थायी और कैजुअल नौकरियां जा चुकी हैं और दस लाख लोगों की नौकरी पर खतरा मंडरा रहा है। अभी आलम यह है कि कंपनियों की तरफ से डीलरों पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे नई गाडिय़ां रखना शुरू करें। लेकिन डीलरों के पास तीन से चार महीने तक बिकने भर को गाडिय़ों का स्टॉक पहले से मौजूद है। ऐसे में वे नई गाडिय़ां उठाने का जोखिम नहीं लेना चाहते। भारतीय अर्थव्यवस्था ने कुछ साल पहले तक ठीक ठाक गति दिखाई तो इसका काफी श्रेय ऑटो सेक्टर को जाता है। लेकिन इस क्षेत्र की पतली हालत यह बता रही है कि हमारी अर्थव्यवस्था में सब कुछ ठीक नहीं है।

मंदी की आहट
दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं मंदी का संकेत दे रही हैं और इसका अगला चरण वैश्विक मंदी होगा। अगर मॉर्गन स्टेनली की मानें तो यह मंदी अगले 9 महीनों में ही आ जाएगी। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं-अमेरिका और चीन के बीच बढ़ता व्यापारिक तनाव दुनिया को मंदी की ओर धकेलने वाला मुख्य कारक है। मंदी के अन्य विश्वसनीय संकेतक भी सामने आ रहे हैं, जिसमें बांड यील्ड का उल्टा होना है। मंदी से पहले भी बांड यील्ड के ग्राफ का कर्व उलटा हुआ था और यह अब लगभग वैसा ही हो रहा है जैसा कि 2008 के वित्तीय संकटों से पहले देखने को मिला था। सोने में निवेश बढऩे से चालू खाते का घाटा बढ़ गया है। इसका संकेत यह है कि निवेश के शेयर बाजार और रियल इस्टेट जैसे सेक्टरों में निवेशकों को मुनाफे की उम्मीद नहीं रही। ऑटो सेक्टर में नौ लाख के आसपास नौकरियां जा चुकी है। इस सेक्टर ने मंदी की वजह तेल की कीमतों में इजाफा और सरकार की नई वाहन क्रय नीतियां है। शेयर बाजार में संस्थागत विदेशी निवेश में गिरावट, क्योंकि अमेरिका सरकार की संरक्षणवादी नीतियों के कारण वहां के शेयर बाजार निवेशकों को लुभाने लगे हैं। यह संकेत अच्छे नहीं हैं।

चिदंबरम की यह कैसी सोच
पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के ज्यादातर प्रावधानों को समाप्त करने पर हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेला है। उन्होंने भाजपा की आलोचना की और कहा कि यदि जम्मू-कश्मीर हिंदू बहुल राज्य होता तो भगवा पार्टी इस राज्य का विशेष दर्जा कभी ‘नहीं छीनती। चिदंबरम के बयान को दो अर्थों में लिया जा सकता है, एक वे विपक्ष के नेता हैं, इसलिए उन्हें सरकार के फैसले का विरोध करना है और दूसरा पार्टी को एक वर्ग विशेष का जनाधार हासिल करना है। मगर कुछ हासिल करने की सूरत में वे यह भूल गए कि वे देश के गृह मंत्री रह चुके हैं। धारा-370 हटाने के फैसले को हिंदू-मुस्लिमों से जोड़कर चिदंबरम आखिर साबित क्या करना चाहते हैं? अगर चिदंबरम की बात को सही मानकर उनकी दलीलों को जायज ठहरा भी दिया जाए तो क्या वे यह साबित कर पाने की स्थिति में हैं कि देश के जो राज्य हिंदू आबादी वाले हैं, उन्हें विशेष राज्य का दर्जा क्यों नहीं मिल पा रहा। इस समय विशेष राज्य का दर्जा पाने की मांग करने वाले राज्यों में आंध्र प्रदेश, ओडिशा और बिहार हैं। आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न मिल पाने की सूरत में पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने केंद्र की मोदी सरकार का साथ छोड़ दिया था। अगर सरकार चाहती तो आंध्र को विशेष राज्य का दर्जा देेकर नायडू को अपने साथ रख सकती थी।

सपा की दुश्वारी
समाजवादी कुनबे में एक अनार सौ बीमार वाली कहावत चरितार्थ हो रही है क्योंकि 2020 में पार्टी के कद्दावर नेता रामगोपाल यादव तंजीम फातिमा समेत कई नेताओं को कार्यकाल समाप्त हो रहा है। पार्टी की विधानसभा में 47 सीट हैं। ऐसे में पार्टी केवल एक राज्यसभा सीट ही हासिल करने की स्थिति में है। लेकिन यादव परिवार समेत पार्टी के आधा दर्जन से ज्यादा बड़े नेता इस सीट के लिए लाइन में हैं। ऐसे में सपा के कुनबे में खासतौर पर राज्यसभा में समाजवादी सांसदों में पार्टी को छोडऩे की होड़ मच गई है। इस फेहरिस्त में जल्द ही दो और नाम जुडऩे की अटकले तेज हो गई हैं। इसमें सुखराम सिंह यादव और विशंभर प्रसाद निषाद के नाम की चर्चा सबसे ज्यादा है। कानपुर और बांदा के इन खांटी समाजवादी नेताओं को सपा अग्रज मुलायम सिंह का भी सबसे खास समझा जाता है लेकिन यह लोग अखिलेश के नेतृत्व से नाखुश बताए जा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी समाजवादी पार्टी के नेताओं को अपने सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के तहत चुन-चुन कर ला रही है। भाजपा की निगाह इस बहाने आने वाले 12 सीटों पर होने वाले विधानसभा उपचुनाव और 2022 चुनाव है, इसके लिए ही पार्टी जातीय समीकरणों के हिसाब चुनावी बिसात को सेट कर रही है। यही वजह है कि हाल ही में सपा छोड़कर गए सुरेंद्र नागर गुर्जरों के बड़े नेताओं में शुमार रखते हैं। सपा के कोषाध्यक्ष संजय सेठ भी कारपोरेट जगत केसाथ पंजाबी और खत्री लॉबी में अच्छी पैठ रखते हैं। इन दोनों नेताओं का कार्यकाल अभी 2022 तक था। इसी क्रम में निषाद और यादव भी बिरादरी के दिग्गजों में शुमार रखते हैं। समझा जा रहा है कि पहले यादव और निषाद भी नागर और सेठ की तरह ही इस्तीफा देंगे इसके बाद भाजपा में शामिल होंगे। इन दोनों नेताओं की दिल्ली में भगवा बिग्रेड के आला नेताओं से कई दौर की बैठक भी हो चुकी है।

बुरे फंसे खट्टर
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर कश्मीरी लड़कियों के संबंध में दिए अपने बयान पर बुरे फंस गए हैं और सफाई देते घूम रहे हैं। खट्टर ने सोनीपत में एक कार्यक्रम के दौरान अपने बयान पर सफाई देते हुए कहा, ‘बेटियां सभी की एक समान होती हैं। मेरे बयान का गलत मतलब निकाला गया है। दरअसल,खट्टर ने शुक्रवार को फतेहाबाद में एक कार्यक्रम में कहा था कि अगर लड़कियों की तादाद लड़कों से कम हो तो दिक्कतें हो सकती हैं। हमारे (ओपी) धनखडज़ी ने कहा था कि उन्हें (दुल्हनों को) बिहार से लाना होगा। लेकिन कुछ लोगों ने कहा, कश्मीर खुला है, लिहाजा उन्हें (दुल्हनों को) वहां से लाया जाएगा। लेकिन मजाक से हटकर, सवाल यह है कि अगर अनुपात (लिंग अनुपात) सही रहे तो समाज में संतुलन ठीक रहेगा। दरअसल, खट्टर ने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया था कि अब हरियाणा के लोग कश्मीर से दुल्हन ला सकेंगे। उनका इशारा संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को खत्म कर जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा वापस लिए जाने की ओर था। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने खट्टर के बयान को लेकर आरएसएस पर निशाना साधा है। गांधी ने शनिवार को कहा कि यह (खट्टर का बयान) इस बात का प्रमाण है कि आरएसएस का प्रशिक्षण एक व्यक्ति की सोच को कैसा बना देता है। दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी मनोहर लाल खट्टर के बयान की आलोचना की। उन्होंने कहा कि शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को जम्मू-कश्मीर के लोगों के बारे में असंवेदनशील टिप्पणी करने से बचना चाहिए। कुछ भी हो चुनाव से ठीक पहले खट्टर बयान देकर घिर चुके हैं और विपक्ष उन्हें आसानी से बचने के रास्ते नहीं देगा।

येचुरी और राजा के मन में क्या
सीपीआई (एम) के महासचिव सीताराम येचुरी और भाकपा महासचिव डी. राजा को श्रीनगर हवाई अड्डे पर रोक दिया गया है। वह अपनी पार्टी की इकाई के सदस्यों से मिलने के लिए शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर पहुंचे थे। इससे पहले कांग्रेस सांसद गुलाम नबी आजाद को जम्मू-कश्मीर एयरपोर्ट पर रोक लिया गया था। येचुरी ने कहा कि हमें एक कानूनी आदेश दिखाया जिसमें श्रीनगर में किसी को प्रवेश की अनुमति नहीं देने की बात कही गई थी। इसमें कहा गया था कि सुरक्षा कारणों से पुलिस संरक्षण में भी शहर में जाने की अनुमति नहीं है। हम अब भी उनसे बातचीत की कोशिश कर रहे हैं। बात चाहे जो हो, दोनों नेताओं को आखिर कश्मीर जाने की क्या सूझी। कश्मीर अभी हाईअलर्ट पर है। राजनीति चमकाने का समय अभी नहीं है। एक दिन पहले जब गुलाम नबी आजाद को वापस भेजा जा चुका है तो दोनों नेताओं को मामले की गंभीरता समझनी चाहिए थी। दोनों नेता वरिष्ठ हैं और उनके लिए देश हित पहले न हो, ऐसा सोचना भी गलत है। फिर येचुरी और राजा वहां जाकर क्या संदेश देना चाह रहे थे। सिर्फ येचुरी और राजा ही नहीं हर नेता की जिम्मेदारी बनती है कि वह कश्मीर को लेकर ऐसी हरकत न करे जो घाटी का माहौल खराब करने के लिए जिम्मेदार हो। माकपा महासचिव येचुरी ने कहा कि हम दोनों ने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि हमारी यात्रा में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। इसके बावजूद हमें हिरासत में ले लिया गया। मैं अपने बीमार सहकर्मी और यहां मौजूद हमारे सहयोगियों से मिलना चाहता था। लेकिन सवाल यह है कि यह मुलाकात कुछ दिन बाद नहीं हो सकती थी।

नौ रत्नों ने तैयार किया खाका
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जब 26 जून को कश्मीर का दौरा किया था, उस वक्त खबरें आई थीं कि वे अमरनाथ यात्रा की तैयारियों का जायजा लेने के साथ जम्मू-कश्मीर पुलिस के शहीद अधिकारी निरीक्षक अरशद अहमद खान के परिजनों से मिलेंगे। लेकिन उनका यह दौरा धारा- 370 को खत्म करने की दिशा में पहला कदम था। जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने खास नौ लोगों को धारा- 370 की विदाई का खाका तैयार करने की जिम्मेदारी दी। इन लोगों में अमित शाह के अलावा विदेश मंत्री एस.जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, रॉ प्रमुख सामंत गोयल और जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव एवं पीएमओ में पूर्व संयुक्त सचिव के तौर पर काम कर चुके मोदी के भरोसेमंद बी.वी.आर सुब्रमणयम आदि शामिल हैं। वैसे, अंदर की खबर यह है कि धारा-370 हटाने की रूपरेखा मोदी सरकार के शपथ ग्रहण के बाद से ही तैयार होने लगी थी। इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में जारी भाजपा के घोषणा पत्र में छह बार धारा-370 का उल्लेख किया गया था। सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ वापसी होने के साथ ही प्रधानमंत्री ने गृहमंत्री अमित शाह समेत अपने नौ रत्नों को इस काम पर लगा दिया था और मिशन को कामयाब होने में करीब एक माह का वक्त लगा।

मोदी-नीतीश में खटपट ?
तीन तलाक बिल पर राज्यसभा में मोदी सरकार की राह आसान करने वाले नीतीश कुमार का झारखंड चुनाव को लेकर आया बयान। साबित कर रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके बीच सबकुछ ठीक नहीं है। मोदी और नीतीश के बीच वर्चस्व की जंग तबसे दिख रही है जब दोनों मुख्यमंत्री थे। बिहार चुनाव के दौरान एक बार तो नीतीश ने मोदी के साथ मंच साझा करने से मना भी कर दिया था। मगर बाद में राजनीतिक मजबूरियों के चलते न सिर्फ दोनों साथ दिखे बल्कि मतभेद न होने की बात भी कही। लेकिन बीच-बीच में दोनों के बीच तनातनी दिखती रही। दरअसल नीतीश बिहार के बहाने अपनी ताकत भाजपा को दिखाये रखना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने झारखंड में एकला चलो की नीति अपनाई है। पार्टी ने ऐलान कर दिया कि वह आगामी झारखंड विधानसभा चुनाव में सभी 81 सीटों पर अपने प्रत्याशी मैदान में उतारेगी। झारखंड में इसी साल नवंबर- दिसंबर में विधानभा चुनाव होना है। इस फैसले के बाद एक बार फिर बीजेपी और जेडीयू में दूरियां बढऩे की अटकलें तेज हो गई हैं। बता दें कि केंद्र में मोदी कैबिनेट में जेडीयू से कोई भी मंत्री शामिल नहीं है। उधर, नीतीश ने भी मंत्रिमंडल विस्तार में बीजेपी कोटे से किसी को नहीं रखा। इसके बाद से दोनों पार्टियों में मतभेद की अटकलें हैं।

थरूर की हसरत
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी शशि थरूर की एक्टिंग करने की हसरत अधूरी रह गई। यह और बात है कि राजनीति के पर्दे पर उनकी डायलॉगबाजी कभी-कभार सुनने को मिलती रहती है। थरूर की गिनती उन नेताओं में होती है, जो राजनीति से फुर्सत पाते ही ग्लैमर की दुनिया में शरीक हो जाते हैं। बहरहाल, थरूर को फिल्म में काम करने का मौका भले ही न मिल पाया हो, मगर वे अपनी यह हसरत दूसरे तरीकों से पूरी करते रहे हैं। बात हो रही है सलमान खान की फिल्म एक था टाइगर की। इस फिल्म में थरूर को विदेश मंत्री का रोल ऑफर किया गया था। जब उन्होंने अपने दोस्तों से चर्चा की, तो उन्होंने उनकी हसरतों को और बढ़ा दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें असल का विदेश मंत्री बनना है तो वे फिल्मोंं में क्यों जा रहे हैं। तब देश का माहौल मोदी सरकार के खिलाफ बन रहा था और लग रहा था कि सरकार चली जाएगी। मगर ऐसा नहीं हुआ। मगर थरूर के लिए यह दोहरा झटका साबित हुआ। एक तो वे असल के विदेश मंत्री नहीं बन पाए और फिल्म में काम करने का मौका भी गंवा बैठे।

RSS का कुटुंब प्रबोधन
भारतीय संस्कृति को बचाने के नाम पर संघ के तरह-तरह के कार्यक्रम सामने आ चुके हैं, मगर अब उसकी योजना परिवारों में दखल देने तक की बन रही है। आरएसएस नवविवाहित जोड़ों को पारंपरिक मूल्यों के साथ परिवार चलाने की ट्रेनिंग देगा। इसके लिए संघ ने कुटुंब प्रबोधन नाम से कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई है। इसमें नवविवाहित जोड़ों को भारतीय परंपरा के अनुसार परिवार चलाने के बारे में बताया जाएगा। इस दौरान पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों को बचाए रखने की सलाह जोड़ों को दी जाएगी। साथ ही उन्हें विवाह के बाद शीघ्र संतान पैदा करने के लिए भी प्रेरित किया जाएगा। संघ का यह कार्यक्रम कई लोगों को अखर रहा है। माना कि आज की पीढ़ी में भारतीय संस्कृति के प्रति दूरियां बढ़ रही हों, मगर इसका मतलब कतई नहीं कि कोई परिवार में दखल दे। संघ के इस कार्यक्रम के पीछे का असल मकसद सरकार के एजेंडे को घर-घर तक पहुंचाना है। लोकसभा चुनाव के दौरान संघ इस रणनीति में सफल हो चुका है। इसीलिए वह कुटुंब प्रबोधन कार्यक्रम शुरू कर रहा है। वरना किसे क्या मतलब कि वह पति-पत्नी के मामलों में दखल दे। संघ जो कर रहा है, उसे इसी अंदाज में कहना होगा कि पति-पत्नी राजी क्या करेगा काजी।

मुर्दा गवाह जिंदा होकर आया
केंद्रीय प्रवर्तन निदेशालय ईडी ने अगस्तावेस्टलैंड हेलीकॉप्टर खरीद मामले में अदालत मैं जिस गवाह है को मृत बताया था वह जिंदा वापस आ गया है। ईडी के वकील ने अदालत में कहा था की केके खोसला नामक गवाह मर चुका है। इस केस से जुड़े कुछ अहम दस्तावेज इसी गवाह के पास थे। बचाव पक्ष के वकीलों ने जब आपत्ति की और कहा गवाह जिंदा है। तब जाकर ईडी ने भी लीपापोती करना शुरू कर दी। सरकार और ईश्वर जो चाहे करा सकते हैं उनके सेवकों को तो वही करना पड़ता है जो उन्हें कहा जाता है।

सत्ता में रहो कुछ भी करो
अमेठी मैं मजबूत पकड़ रखने वाले सांसद संजय सिंह ने राज्यसभा की सदस्यता से त्यागपत्र देकर कांग्रेस छोड़ दी है। अब उन्होंने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है। संजय सिंह, गांधी परिवार के काफी करीब थे। सुल्तानपुर से मेनका गांधी से हार जाने के बाद कांग्रेस ने उन्हें असम से राज्यसभा के लिए निर्वाचित कराया था। किंतु जैसे ही कांग्रेस कमजोर हुई। सत्ता में गांधी परिवार और कांग्रेस की पकड़ कमजोर हुई। वह कांग्रेस को टाटा बाय बाय कर के भाजपा में चले गये। एक बार पहले भी संजय सिंह इस्तीफा दे चुके हैं। उनकी पत्नी गरिमा सिंह भाजपा की विधायक हैं। इसे कहते हैं, सत्ता में बने रहने के लिए रिश्ते और निष्ठा कोई मायने नहीं रखती है। संजय सिंह ने पार्टी बदलकर यह बता दिया। उनकी निष्ठा लोकसभा चुनाव के दौरान ही बदल गई थी। उन्होंने कहा भी है, कि कांग्रेस और रिश्ते भूतकाल के हैं। अब तो भविष्य से रिश्ता जोड़ रहे हैं।

दलबदल का खेल
महाराष्ट्र सहित कुछ राज्यों में अगले कुछ माह में चुनाव होने जा रहे हैं। चुनाव के पूर्व दल बदल करके नई पोजीशन लेने और जोड़-तोड़ करके नेताओं को अपने पाले में लाने का उत्सव बड़ी तेजी के साथ शुरू हो गया है। महाराष्ट्र में एनसीपी और कांग्रेस के नेताओं के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने द्वार खोल दिए हैं। वहीं राज्यसभा में पूर्ण बहुमत लाने के लिए सांसदों का भी दलबदल कराकर उन्हें भाजपा में प्रवेश दिया जा रहा है। हाल ही में राज्यसभा के सांसद संजय सिंह ने कांग्रेस और राज्यसभा से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता लेली है। अब फिर राज्यसभा की रिक्त सीट के लिए चुनाव होगा। संजय सिंह अब भाजपा की टिकट पाकर फिर राज्यसभा में होंगे। उत्तर प्रदेश विधानसभा में भाजपा का बहुमत है नेताओं ने एक बार फिर अपनी कीमत वसूलना शुरू कर दी। वहीं राजनीतिक दलों ने उनकी कीमत लगाना शुरू कर दी यही भारत का लोकतंत्र है।

समय बड़ा बलवान
भारत में स्वतत्रंता के बाद कम्युनिस्ट विचारधारा बड़ी तेजी के साथ फली-फूली। सारे देश में गरीब जनता और मजदूर कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जुड़े। एक समय था जब सारे देश में कम्युनिस्ट पार्टी का बड़ा जनाधार होता था। कम्युनिस्ट पार्टी राष्ट्रीय पार्टी के रूप में दर्ज थी।
समय की बलिहारी देखें कम्युनिस्ट पार्टी अब केवल केरल तक सीमित होकर रह गई है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा से सीपीआई का शासन खत्म हो गया है। सारे देश में पिछले एक दशक में कम्युनिस्ट आंदोलन और राजनीतिक पार्टी के रुप में पार्टी नेपथ्य में चली गई है। अब तो राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी कम्युनिस्ट पार्टी से छिनने जा रहा है। कैडर बेस पार्टी की इतनी दुर्गति होगी, यह किसी ने सोचा भी नहीं था।

बैंक के करोड़ों गवाएं
मध्य प्रदेश के भोपाल सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक ने पिछले वर्षों में 1800 करोड़ रुपए निजी कंपनियों में निवेश करके करोड़ों रुपए कमाई कमीशन के रूप में की। इस गोरखधंधे में बैंक के 331 करोड़ रुपए बुरी तरह फंस गए। जिनके वापस आने की संभावना है बहुत कम हैं। बैंक के प्रबंध निदेशक ने राजनेताओं से मिलकर निजी कंपनी आइएलएफएस, अडानी, उत्कृष्ट, एयू स्मॉल फाइनेंस और अन्य निजी कंपनियों को कमीशन लेकर करोड़ों रुपए की राशि निवेश कर दी। बैंक के प्रबंध निदेशक ने करोड़ों रुपए कमीशन में कमाए। किंतु इसमें बैंक के करोड़ों रुपए डूब गए। सरकार के मंत्री राजनेता और अधिकारी किस तरह करोड़ों रुपए कमाते हैं। यह भी स्पष्ट हो गया रिजर्व बैंक और सरकार ने निजी कंपनियों में निवेश करने पर रोक लगा रखी थी। इसके बाद भी निजी कंपनियों में निवेश कर करोड़ों कमाने का गोरखधंधा उजागर हो गया।

कानून बनाने में जल्दबाजी क्यों
लोकसभा, राज्य सभा और विधानसभाओं में आम जनता के लिए सरकार कानून बनाती हैं। पिछले तीन दशकों से विधायिका और सदन कानून बनाने में बहुत जल्दबाजी में रहते हैं। सरकार जिस रूप में कानून प्रस्तावित कर देती है। हो हल्ले और बिना बहस के वह कानून पास हो जाते हैं। कानून बनते हैं, और कुछ समय बाद ही उनके संशोधन आना शुरू हो जाते हैं। लोक सभा राज्य सभा और विधानसभाओं में सांसदों और विधायकों को बोलने का मौका ही नहीं मिलता है। 2 मिनट 3 मिनट 1 मिनट का उन्हें समय दिया जाता है, कि वह प्रस्तावित बिल के बारे में अपनी राय रखें। जिस काम के लिए सांसद और विधायक चुनकर जाते हैं उसके लिए ना तो उन्हें बोलने का समय दिया जाता है। नाही चर्चा के पूर्व उन्हें बिल का प्रारूप दिया जाता है।जो कानून बन रहे हैं उसके बारे में या तो सरकार अपनी ताकत बढाने कानूनों को पास करा रही हैं। अथवा भीड़तंत्र के दबाव में कानून बन रहे हैं। जिसके कारण अब कानूनों का पालन भी नहीं हो पा रहा है। हर जगह अराजकता की स्थिति बन रही हैं।
130 करोड़ लोगों के हितों के लिए जो कानून सरकार बनाने की बात करती है उसमें जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधि ही अपना पक्ष नहीं रख पाते हैं तब ऐसे कानूनों का इसी तरह का हश्र होता है। बहुमत के बल पर जनता के साथ खिलवाड भारत में ही संभव है।

अंग्रेजों के जमाने का कानून बदलो
लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला ने एक बिल की चर्चा के दौरान कहा, कि सरकार ब्रिटिश काल के कानूनों को बदलने का प्रयास करे। सरकार में रहते हुए, कोई भी राजनीतिक दल ब्रिटिश शासन काल में बनाए गए, कानूनों को बदलने की स्थान पर अंग्रेजो की सीख लेकर उसी तर्ज पर गुलामी थोपने वाले कानून बनाता है। किंतु जब राजनीतिक दल सत्ता से बाहर हो जाता है, तो उसे अंग्रेजों के जमाने के बनाए, कानूनों को बदलने की याद आती है। लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला ने अपने ही दल की सरकार से कहा है कि वह ब्रिटिश काल के कानूनों को बदलने का प्रयास करे। इसका दर्द उन्हें भी है, यह स्पष्ट रूप से दिख रहा है। किंतु जिस तरह से भाजपा को ब्रिटिश शासन काल में बनाए गए। कानून सत्ता को बनाए रखने में मदद कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में अंग्रेजों के जमाने की कानून बदलेंगे, यह सोचना भी व्यर्थ है। हाल ही में जो कानून बन रहे हैं, या संशोधन हो रहे हैं। उसमें सरकार के पास ही असीमित अधिकार होते चले जा रहे हैं। कथनी और करनी में यही एक फर्क होता है।

वेश्यागिरी से बीती राजनीति
वर्तमान भारतीय राजनीति को लेकर जिस तरह की स्थिति देखने को मिल रही है। उसको लेकर कहा जा रहा कि राजनीति वेश्याव़ति से गई बीती हो गई है, हजारों साल पहले भर्तहरि ने राजनीति को वेश्या की तरह बताया था। वेश्या पैसे लेकर अपना तन और सेवाएं किसी को भी सौंप देती थी। वर्तमान राजनीति इससे भी गई-बीती हो गई है। राजनीति में अब पैसे के साथ साथ भय और राजनीतिक स्वार्थ धोखाधडी के कारण राजनेता अपना आचरण जिस तरह से कर रहे हैं। उससे अब आम धारणा बनने लगी है की वेश्या पैसा लेकर बदले में अपना तन ईमानदारी से सौंप देती है। लेकिन वर्तमान राजनीति में अब राजनेताओं का विश्वास करना या उनमें नैतिकता ढूंढना मुश्किल हो गया है।

ईडी और कर्नाटक की सरकार?
कर्नाटक की जद एस और कांग्रेस गठबंधन की सरकार विश्वास मत हासिल नहीं कर सकी। कांग्रेस और जनता दल एस के जिन विधायकों ने इस्तीफा दिया है, और पाला बदला है। उसमें एक दर्जन विधायक अरबपति विधायक हैं। कर्नाटक के राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि आयकर प्रवर्तन निदेशालय के इशारे पर इन अरबपति विधायकों ने कांग्रेस और जद से पाला बदलकर भाजपा में शामिल होने के लिए मजबूर हुए हैं। केंद्रीय प्रवर्तन निदेशालय की दहशत का आना अब राजनीतिक क्षेत्रों में दिखने लगा है। सांसद विधायक और बड़े-बड़े संवैधानिक प्रमुख, ईडी के खौफ से कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। कर्नाटक में भी पाला बदलने के लिए केंद्रीय प्रवर्तन निदेशालय को क्रेडिट दी जा रही है। यहॉं पैसे और पद का खेल कम ईडी की दहशत से ही सरकार गिरी है।

तीन तलाक की तलवार
तीन तलाक का बिल सरकार लोकसभा से पास करा चुकी है। किंतु सरकार ने अभी तक राज्यसभा में नहीं भेजा है। तीन तलाक बिल को लेकर एक वर्ग विशेष के ऊपर तलवार लटकाए रखने और उसके बहाने राजनीति करने के इस तरीके से विपक्ष भी हैरान है। यह कहा जा रहा है, कि सरकार संसद के बजट सत्र को 1 सप्ताह के लिए बढ़ाएगी। इसे अंतिम दिनों में राज्यसभा में पेश करेगी। ताकि यह बिल पास भी ना हो सके और अगले सत्र तक इसको लेकर अनिर्णय की स्थिति बनी रहे। कई राज्यों में अगले कुछ महीने में चुनाव होने जा रहे हैं। तीन तलाक का यह मुद्दा सरकार को विधानसभा चुनाव में भाजपा को मदद पहुंचाने वाला होगा। अटकलें लगाई जा रही हैं कि अब सरकार की शीतकालीन सत्र बुलाएगी।

आजम का यूं भूमाफिया हो जाना
समाजवादी पार्टी के सांसद आजम खान को रामपुर जिला प्रशासन ने भू माफिया घोषित कर दिया है। इस फैसले से राजनीति का गर्माना स्वभाविक है, वहीं बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक और उत्तर प्रदेश के पूर्व अपर महाधिवक्ता जफरयाब जीलानी का कहना है कि रामपुर जिला प्रशासन का सपा सांसद आजम खान को भू माफिया घोषित किया जाना असल में पूरी तरह से गैरकानूनी है। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की ओछी नियत और मुसलमानों को बदनाम करने का षडयंत्र सामने आ गया है। जानकारों की मानें तो जिस बेनामें को रद्ध करके आजम को भूमाफिया बतलाया जा रहा है वह विश्वविद्यालय के लिए ली गई भूमि है और उस बेनामें को रद्ध करने का अधिकार सिर्फ दीवानी अदालत को होता है।

इस लिए डराना -धमकाना
भाजपा के पूर्व विधायक सुरेंद्रनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री कमलनाथ को धमकाते हुए खून बहाने जैसी बात कह दी। इस पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया फिर वह जमानत पर रिहा हो गए। कांग्रेस नेताओं ने इसे गोडसेवादी विचारधारा निरुपित किया है जबकि भाजपा इस बयान से किनारा कर रही है। मप्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने अपने एक बयान में कहा कि यह पार्टी का बयान नहीं है, यह उनका व्यक्तिगत बयान है। पूर्व भाजपा विधायक के भड़काऊ बयान पर कांग्रेस का कहना है कि मुख्यमंत्री को यूं खुलेआम धमकाना भाजपा का षडयंत्र है। वैसे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने सुरेंद्रनाथ को नोटिस जारी कर 15 दिनों में जवाब तलब किया है। इस पर कहने वाले तो यही कह रहे हैं कि लगातार 15 साल तक सत्ता में रहने के कारण भाजपा नेता यह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं कि उनके हाथ से सत्ता की लगाम जा चुकी है। इसलिए उन्होंने बड़े स्तर पर धमकाने और डराने का काम शुरु कर दिया है।

भाई के बहाने
आयकर विभाग ने मायावती के भाई और भाई के नोएडा स्थित 400 करोड़ रुपये के प्लॉट को लेकर कार्रवाई की, इससे बसपा सुप्रीमो अपने आपको बोलने से रोक नहीं पाईं। भाई पर की गई कार्रवाई के बहाने मायावती ने जहां भाजपा पर हमला बोलते हुए कहा कि चुनाव के दौरान दो हजार करोड़ रुपये की संपत्ति भाजपा वालों के खातों में गई है। इस राशि से उन्होंने गरीबों के वोट खरीदकर सत्ता में बैठे हैं। मायावती ने भाजपा पर ईवीएम में धांधली करने का आरोप भी लगाया। कहने वाले तो यही कह रहे हैं कि जहां भाजपा सरकार ने भाई के बहाने मायावती पर निशाना साधा है तो वहीं भाई पर कार्रवाई को लेकर मायावती ने भी भाजपा पर निशाना साधने का काम किया है।

भाजपा पर नीतिश का भरोसा
बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार को लेकर एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने ऐसी बात कह दी है, जिसकी चर्चा अब चारों ओर हो रही है। दरअसल बिहार में आरएसएस की जांच कराने के मामले में सांसद ओवैसी ने कहा है कि इस मामले से साफ हो गया है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अब भाजपा पर भरोसा नहीं रह गया है। उनको डर है कि ये लोग प्रदेश का माहौल खराब करना चाहते हैं। इस प्रकार एक तीर से दो निशाने साधते हुए ओवैसी ने जहां नीतिश और भाजपा के संबंधों पर सवाल खड़े कर दिए हैं वहीं उन्होंने इसके बहाने पश्चिम बंगाल में हो रही राजनीतिक हिंसा की तरफ भी सभी का ध्यान खींच लिया है। कहने वाले तो यही कह रहे हैं कि संघ का बिहार में बढ़ता हस्तक्षेप मुख्यमंत्री नीतिश को रास नहीं आ रहा है, इसलिए यदि वो आगे और सख्ती करते नजर आ जाएं तो हैरानी नहीं होगी, लेकिन इस पर भाजपा क्या कहती है और क्या करेगी यह देखने वाली बात हो गई है।

ट्रेंड के साथ प्रियंका
कहते हैं जो समय के साथ अपने आपको बदल लेता है, जमाना उसी का साथ देता है। इस मामले में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की तारीफ करनी होगी कि वो वाकई समय के साथ अपने आपको ढालने में माहिर हैं। इस समय यह बात सोशल मीडिया के ट्रेंड को लेकर हो रही है। दरअसल सोशल मीडिया की दुनिया में रोजाना एक नया ट्रेंड चलता है, जिसमें आम आदमी से लेकर व्हीव्हीआईपी हर कोई शामिल हो जाता है। ऐसे ही जब ट्विटर पर ‘साड़ी ट्वीटर’ का ट्रेंड चला तो कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी खुद को रोक नहीं पाईं और वो खुद भी इससे जुड़ गईं। असल में उन्होंने साड़ी पहने अपनी एक तस्वीर साझा की है। खास बात यह है कि प्रियंका की साड़ी वाली यह तस्वीर उनकी शादी के दिन की है। उन्होंने बतौर कैप्शन लिखा है कि ’22 साल पहले शादी की सुबह पूजा वाली तस्वीर’। खास बात यह है कि तस्वीर शेयर करते हुए उन्होंने हेजटेग साड़ी ट्वीटर का भी इस्तेमाल किया है। इस तरह प्रियंका बतला रही हैं कि वो आप सभी में से ही हैं, इसलिए उन्हें भी इन सब चीजों को करना अच्छा लगता है। सच तो यह है कि इन सब में कोई राजनीति भी नहीं है।

क्या यह भी फिक्स?
जिस नाटकीय तरीके से विश्व कप 2019 की विजेता टीम इंग्लैंड को घोषित किया गया, उसने विवादों को जन्म दे दिया है। अब कहा यह जा रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट के नियमों के लिहाज से तो इंग्लैंड नहीं बल्कि न्यूजीलैंड को विश्व विजेता घोषित किया जाना चाहिए था। गौरतलब है कि मैच टाई होने के बाद हुआ सुपर ओवर भी टाई हो गया था, जिसके बाद ज्यादा बाउंड्रीज लगाने के आधार पर मेजबान इंग्लैंड को विश्व कप का नया शहंशाह घोषित किया गया। इंग्लैंड की जीत पर सवाल उठाने वालों ने खराब अंपायरिंग और नियमों का हवाला देते हुए कह दिया है असल में वर्ल्ड कप विजेता न्यूजीलैंड ही होनी चाहिए। ओवर थ्रो पर 6 रन इंग्लैंड को दिए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं। कहने वाले तो कह रहे हैं कि मैच फिक्सिंग को लेकर वैसे ही क्रिकेट की दुनिया बदनाम हो चली है, ऐसे में विश्व कप में इस तरह से इंग्लैंड को विजेता घोषित करना एक बड़ी भूल हो गई है। इस प्रकार विश्वकप पर अच्छी खासी राजनीति शुरु हो गई है।

तलाक पर फिर बहस
वायुसेना के एक फाइटर पायलट के तलाक मामले में हाईकोर्ट जस्टिस जीएस सिस्तानी और ज्योति सिंह की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि महिला द्वारा खुदकुशी करने की धमकी देना या इसके लिए सुसाइड नोट लिखना, गंभीर प्रकृति की मानसिक प्रताड़ना है। इससे पायलट के मन में इस बात की आशंका बनी रहती है कि उसकी पत्नी खुद को चोट पहुंचाकर उन्हें झूठे मामले में फंसा सकती है। तथ्यों को देखते हुए पायलट के मन में बनी आशंका को आधारहीन नहीं ठहराया जा सकता है। इसी के साथ परिवार न्यायालय द्वारा दिए गए तलाक को मंजूरी वाले फैसले को हाईकोर्ट ने भी मंजूरी प्रदान कर दी। इस पर कहा जा रहा है कि परिवार के मामलों के कारण जब जान-जोखिम में डालने वाले बन जाते हैं तो तलाक ही एक मात्र उपाय बचता है, जिससे जिंदगी बचाई जा सकती है। जानकारों की मानें तो अदालत के इस फैसले के बाद तलाक पर एक बार फिर बहस छिड़ने की गुंजाइश नजर आने लग गई है।

जनरल रावत की चिंता
सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने भविष्य को लेकर चिंता जाहिर की है और कहा है कि भविष्य के टकराव ज्यादा घातक और कल्पना से परे होंगे। इसमें तकनीकी और साइबर डोमेन की बड़ी भूमिका काम करेगी। चूंकि जनरल रावत ये बातें कारगिल विजय की बरसी पर कह रहे थे अत: इसे दो देशों के बीच लंबे समय से जारी तनाव और टकराव की स्थिति से जोड़कर देखा जा रहा है। वैसे भी राजनीतिक तौर पर भले ही दुश्मन देशों को सबक सिखाने की बातें बढ़-चढ़कर की जाती हों, लेकिन सभी जानते हैं कि परमाणु संपन्न देशों की यदि लड़ाई अब होती है तो बहुत ज्यादा नुक्सान होगा और यह मानवता के लिए सही नहीं कहा जा सकता है। इसलिए जानकार भी यही कहते हैं कि जनरल विपिन रावत की चिंता बिल्कुल सही है और इस पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है, क्योंकि युद्ध और हिंसा कभी किसी समस्या का समाधान नहीं होते हैं।

इमरान को नगर कीर्तन का निमंत्रण
आतंकवाद मामले को लेकर एक तरफ भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है। यहां तक कि दोनों देशों के बीच बातचीत के भी रास्ते बंद कर दिए गए हैं। वहीं दूसरी तरफ खबर आ रही है कि एसजीपीसी यानी शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को विशाल ‘नगर कीर्तन’ में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया है। गौरतलब है कि यह आयोजन 25 जुलाई को होना है और नवंबर माह में बाबा गुरुनानक देवजी की 550वीं जन्‍मतिथि है। इस खास मौके पर करतारपुर कॉरिडोर का उद्घाटन भी होना है। अब जबकि इमरान को निमंत्रण दिए जाने की बात सामने आ गई है तो इससे सियासी माहौल गरमाने में देर नहीं लगेगी। दरअसल इस निमंत्रण के बहाने पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी छवि सुधारने की कोशिश करता नजर आ जाए तो हैरानी नहीं होगी। मामला अल्पसंख्यकों से जुड़ा हुआ जो है।

माननियों की जान को खतरा?
कर्नाटक का सियासी ड्रामा अब अपने चरम पर पहुंच गया है। दरअसल एक तरफ एचडी कुमारस्वामी सरकार के मंत्री डीके शिवकुमार और जेडीएस विधायक शिवलिंगे गौड़ा मुंबई उस स्थल पर पहुंचे जहां बागी विधायकों को रखा गया। मुंबई एयरपोर्ट शिवकुमार ने कहा कि वो अपने दोस्तों से मिलने आए हैं। इसके साथ ही उन्होंने कह दिया कि हम सभी दोस्त राजनीति में एक साथ आए और यदि मरना है तो एक साथ ही मरेंगे। होटल के बाहर तैनात मुंबई पुलिस ने उन्हें अपने राजनीतिक दोस्तों से मिलने नहीं दिया और बताया गया कि बागी विधायकों ने मुंबई पुलिस से अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई थी, इसलिए यह व्यवस्था उन्हें दी गई है। अब कहा जा रहा है कि पाला बदलकर अपनी ही पार्टी को धोखा देने वाले इन बागी विधायकों को अपनी जान जाने का खतरा भी है, जिस कारण लगातार जगह बदले जाने की भी बातें कही जा रही हैं। इस पर जानकार कह रहे हैं कि यदि जान का इतना ही खतरा था तो फिर बागी तेवर क्यों अख्तियार किए, जो समस्या थी मिल-बैठकर सुलझा लेते, कम से कम सरकार भी चलती रहती और उनके सिर पर भी यह खतरा नहीं मंडराता। यहां सवाल यह भी है कि आखिर माननियों को खतरा किससे है, जिन्हें धोखा दिया उनसे या फिर जिन्हें आश्वासन दिया उनसे?

रूडी व हेमा, शत्रु की भूमिका में?
लोकसभा में विपक्ष की उपस्थिति भले ही नगण्य हो लेकिन इससे क्या, क्योंकि सच बोलने वाले और जनहित के मामले उठाने वाले तो सत्ता पक्ष में ही मौजूद हैं। दरअसल हुया यूं कि सांसद राजीव प्रताप रूडी और हेमा मालिनी ने प्रश्नकाल के दौरान पर्यटन मंत्रालय के कामकाज पर सवाल उठा दिए। यही नहीं बल्कि रूडी की तो पर्यटन मंत्री प्रहलाद पटेल से देर तक नोंकझोंक होती रही वहीं हेमा ने मथुरा का हवाला देते हुए सत्य उजागर करने जैसा काम किया कि धार्मिक पर्यटन परियोजना पर बीते पांच साल में दिखाने लायक कोई काम नहीं हुआ है। अब सरकार तो विज्ञापनों के जरिए इन क्षेत्रों में हो रहे बेहतर काम को दिखलाती आ रही है, ऐसे में अपने ही सांसदों का यूं विरोधियों वाला तेवर दिखाना विचारणीय प्रश्न हो गया है। सवाल करने वाले कह रहे हैं कि मोदी के पहले कार्यकाल में शत्रुघ्न सिन्हा विरोधी पक्ष की भूमिका में रहे हैं तो क्या दूसरे कार्यकाल में रुडी और हेमा उनकी भूमिका निभाएंगी?

तेज मॉं की शरण में
राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव जब से चारा घोटाले में मामले में जेल गए हैं, तभी से परिवार में कुछ न कुछ खटापिटी की खबरें आ रही हैं। ऐसे में लालू यादव के बड़े बेटे और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव पर राजनीतिक संकट के बादल भी मंडराते दिख रहे हैं। संभवत: यही वजह है कि तेज ने अपनी मां राबड़ी देवी की शरण ली है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि तेज ने मॉं राबड़ी देवी के साथ वाली अपनी एक तस्वीर को ट्वीट करते हुए भावुक संदेश भी दिया है। तेज लिखते हैं कि बहुत दिनों के बाद आज मां के हाथों से खाना खाया। गौरतलब है कि इससे पहले तेज ने लंबे अरसे बाद अपने छोटे भाई और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के साथ पार्टी बैठक में शिरकत की थी। इससे सियासी हल्के में यही संदेश गया है कि तेज अपने राजनीतिक संकट को टालने के लिए मॉं की शरण में पहुंचे हैं, अब देखना यह होगा कि वो इसमें कितने कामयाब हो पाते हैं।

नागेश्वर राव का सीबीआई से हटना
बहुचर्चित अधिकारी एम नागेश्वर राव को देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई से हटाकर फायर सर्विसेज, सिविल डिफेंस एंड होम गार्ड का डायरेक्टर जनरल नियुक्त कर दिया गया। इस पर सवाल उठाने वाले कह रहे हैं कि 1986 बैच के ओडिशा काडर के आईपीएस अधिकारी राव जो कि दो बार सीबीआई के अंतरिम चीफ़ का पद संभाल चुके हैं फिर उनसे आखिर गलती कहां हो गई। आखिर राव वही अधिकारी हैं जिन्हें बीते वर्ष सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर आलोक वर्मा और उनके डिप्टी राकेश अस्थाना के बीच हुए विवाद के बाद ही सीबीआई का अंतरिम चीफ़ बनाया गया था। बहरहाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश से आलाक वर्मा बहाल हुए और राव को पद से हटना पड़ा था, लेकिन सरकार ने यहां वर्मा को फायर डिपार्टमेंट में बतौर डीजी ट्रांसफर कर दिया था और पहली पसंद बने राव पुन: सीबीआई के अंतरिम चीफ बना दिए गए थे। इस तरह राव का सीबीआई से हटना अपने आपमें एक बड़ा मामला बन गया है।

कांग्रेस की रिसॉर्ट पॉलिटिक्स
कांग्रेस अपने विधायकों को खरीद-फरोख्त या भटकने से बचाने के लिए पिछले कुछ समय से रिसॉर्ट पॉलिटिक्स को अपनाती चली आई है। ऐसे ही जब गुजरात में अमित शाह और स्मृति ईरानी की खाली हुईं दो राज्यसभा सीटों के लिए उपचुनाव का समय आया तो कांग्रेस ने अपने 69 विधायकों को विशेष शिविर के नाम पर बनासकांठा जिले के बालाराम पैलेस रिसॉर्ट में पहुंचा दिया। इससे पहले उन्हें माउंट आबू ले जाने की बात कही जा रही थी। बहरहाल क्रॉस-वोटिंग से बचने के लिए ही कांग्रेस ने एहतियाती कदम उठाते हुए रिसॉर्ट पॉलिटिक्स को अपनाया है, फिर विरोधी जो भी कहें उससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। गौरतलब है कि जब से केंद्र में भाजपा नीत सरकार बनी है तभी से उस पर विधायक खरीद-फरोख्त के आरोप लगते आ रहे हैं। इससे पहले 2017 में कांग्रेस ने अनुभवी नेता अहमद पटेल की राज्यसभा में वापसी सुनिश्चित करने के लिए भी 44 विधायकों को पहले आणंद और फिर बेंगलुरु के एक रिसॉर्ट में रखा गया था। अब चूंकि केंद्र और गुजरात दोनों ही जगह भाजपा की सरकारें हैं अत: कांग्रेस के पास रिसोर्ट पॉलिटिक्स अपनाने के अलावा कोई दूसरा चारा बचा नहीं था।

पश्चिम बंगाल बने बांग्ला
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखते हुए मांग की है कि पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर ‘बांग्ला’ कर देना चाहिए। इसके साथ ही ममता ने कहा है कि संसद के मॉनसून सत्र में ही पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर बांग्ला किया जाए। गौरतलब है कि ममता की नाम बदलने वाली मांग को केंद्रीय गृह मंत्रालय पहले ही ठुकरा चुका है। इस संबंध में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय पहले ही कह चुके हैं किसी राज्य के नाम बदलने के लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता होती है। दरअसल पिछले साल 26 जुलाई 2018 को ममता सरकार ने पश्चिम बंगाल की विधानसभा में राज्य के नाम को बदले जाने का प्रस्ताव पास कर केंद्र को भेजा था, जिसके जवाब में गृह मंत्रालय ने यह बात कही और अब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सीधे प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर मांग को दोहराया है। इससे राज्य की सियासत गरमा जाए तो कोई बड़ी बात नहीं होगी, वैसे भी राजनीतिक हत्याओं को लेकर ममता सरकार पर केंद्र का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है।

संसद में पक्ष-विपक्ष एक साथ
जम्मू-कश्मीर मामले में जो लोग यह समझते हैं कि सत्ता पक्ष और विपक्ष में कोई मतभेद है तो उन्हें मालूम होना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर आरक्षण (संशोधन) विधेयक को राज्यसभा में भी पास कर दिया गया है। गृहमंत्री अमित शाह ने इस बिल को पेश किया तो विपक्षी पार्टियों ने भी समर्थन किया और अंतत: इसे उच्च सदन में भी मंजूरी मिल गई। खास बात यह रही कि कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की समय सीमा बढ़ाए जाने को लेकर भी विपक्षी दलों ने अपना समर्थन दिया। इन दोनों बिलों को पिछले सप्ताह ही लोकसभा में मंजूरी दी गई थी। जम्मू-कश्मीर से संबंधित बिलों पर मिले समर्थन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विपक्षी दलों के प्रति आभार जतलाया। इस प्रकार संदेश यही गया है कि जम्मू-कश्मीर में सत्ता हासिल करने के लिए तो राजनीति की जा सकती है, लेकिन देश की सुरक्षा और अखंडता से किसी प्रकार का कोई समझौता नहीं किया जा सकता है। इस मामले में पक्ष-विपक्ष सभी साथ-साथ हैं। देश के दुश्मनों और दुनिया के लिए इसे एक अच्छा संदेश माना जा रहा है।

सीएम बघेल को रोना क्यूं आया
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वो रोते नजर आ रहे हैं। दरअसल लोकसभा में कांग्रेस की करारी हार के बाद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पद पर आदिवासी नेता मोहन मरकाम को लाया गया है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बघेल को 2013 में कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया था। इसके बाद 2018 के विधानसभा चुनाव में 90 सीटों में से 67 सीटों पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की, लेकिन इसके बाद साल 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में कुल 11 में से महज दो सीटें ही कांग्रेस को हासिल हो सकीं। यही वजह रही कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस नेतृत्व में बदलाव किया है। विदाई भाषण देते हुए मुख्यमंत्री बघेल इस कदर भावुक हो गए कि उन्होंने आंसुओं से रोना शुरु कर दिया, जिससे उनके समर्थक भी भावनाओं में बहते नजर आए और ‘भूपेश बघेल जिंदाबाद, कांग्रेस पार्टी जिंदाबाद’ के नारे लगाने लग गए।

टुकड़े-टुकड़े गैंग से आशय?
कहते हैं कि अभिव्यक्ति के लिए प्रयोग किए जाने वाले शब्द वक्ता की छवि और सोच को उजागर कर देते हैं। ऐसे में जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सदन में जम्मू-कश्मीर मामले में प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु पर निशाना साधा तो हंगामा हो गया। वहीं उन्होंने यह भी कहा कि ‘जिनके मन में भारत का विरोध है, उनके अंदर डर होना चाहिए, हम टुकड़े-टुकड़े गैंग के मेंबर नहीं हैं।’ इस पर कहा जा रहा है कि भारत विरोधी तत्वों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और पूर्व सरकारों ने भी ऐसा ही किया है, लेकिन यह जो टुकड़े-टुकड़े गैंग के मेंबर होने की बात है तो मालूम होना चाहिए कि आखिर यह किस गैंग की बात कर रहे हैं, क्योंकि लोकतंत्र में तो राजनीतिक संगठन होते हैं जो लोकतंत्र को मजबूत करने का काम करते हैं, जबकि गैंग तयशुदा बदमाशों और अपराधियों के समूह का नाम होता है, ऐसे में सदन में किसी पर यूं निशाना साधना क्या मंत्री की अपनी सोच पर सवाल खड़े करना जैसा नहीं है? अनेक बुद्धिजीवियों ने तो सवाल करते हुए कहा है कि आखिर किस मानसिकता के तहत सदन में इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है वह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे देश के अंदर गलत संदेश जाता है।

ये सियासी गुटबाजी
कांग्रेस और भाजपा भले ही गुटबाजी से इंकार करती रहें, लेकिन दूर बैठे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी यह साफ तौर पर दिखाई देती है। दरअसल ओसाका में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जीत की बधाई देते हुए ट्रंप कह गए कि ‘आपने बड़ा काम किया है। दरअसल मुझे याद है कि जब बतौर प्रधानमंत्री आपने पहली बार कार्यभार संभाला था, तब बहुत सारे गुट सक्रिय थे जो आपस में लड़ रहे थे, लेकिन अब वे सभी साथ हैं। यह आपके और आपकी क्षमताओं के लिए गर्व करने वाली बात है।’ इस तरह जो गुटबाजी भारत में रहते हुए सक्रिय नेताओं को नजर नहीं आती वह दूर बैठे ट्रंप को नजर आ जाती है और एक सटीक टिप्पणीकार की तरह वो इसके लिए मोदी को बधाई भी दे देते हैं कि उन्होंने गुटों को एकजुट करने में सफलता हासिल कर ली है। इसलिए सवाल किए जा रहे हैं कि क्या कांग्रेस भी अपनी गुटबाजी को खत्म करके सभी को एक प्लेटफार्म में ला सकेगी, क्योंकि इसके बगैर जीत सुनिश्चित हो नहीं सकती है।

जेल में हथियार…!
पिछले दिनों जेल के अंदर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें उम्रकैद की सजा काट रहे दो कैदियों को हथियार लहराते हुए दिखाया गया था। बदनामी के साथ खुलासा हुआ कि मामला उन्नाव जेल का है, जिसके बाद उन्नाव जेल अधीक्षक एके सिंह की को जिलाधिकारी ने फटकारा और उनकी रिपोर्ट पर चार जेलकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई भी कर दी गई। जिन पर कार्रवाई की गई उन पर बदमाशों से मिलीभगत का चार्ज लगा, जिन्होंने जेल के अंदर उन्हें हथियार दिए और फिर वीडियो बनाकर वायरल भी कर दिया। इस घटना के बाद कहा जा रहा है कि जिन बदमाशों की तूती जेल के बाहर बोलती है, उन्हें जेल के अंदर भी तमाम सुविधाएं मुहैया रहती हैं। यह घटना इस बात का सुबूत मात्र है, जबकि तमाम जेलों में यही होता आया है। आरोप लगते रहे हैं कि बड़ा अपराधी जब जेल पहुंचता है तो उसकी गेंग जेल के अंदर भी बन जाती है और फिर उसके नाम का सिक्का चलने लगता है। इसलिए अपराधी भी अब जेल जाने से घबराते नहीं है, बल्कि संदेश यह देते हैं कि वो कुछ दिनों के लिए आराम करने जेल जा रहे हैं। जेलों की इस छवि को बनाने में जेल के चंद अधिकारी और कर्मचारियों समेत गंदी राजनीति करने वाले प्रभावी नेता भी होते हैं, जिनका दखल जेलों में बहुतायत में देखा गया है।

राहुल की खरी-खरी
लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पद छोड़ने की बात कही थी, तब यह समझा गया था कि हार के कारण ऐसा कह रहे हैं, लेकिन समय निकलने के बाद वो अपनी जिद छोड़ देंगे। ऐसा कुछ होता हुआ दिखा नहीं है, दरअसल खबर है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता में कांग्रेस के लोकसभा सांसदों की बैठक संपन्न हुई थी। इस बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी मौजूद थे। बैठक के दौरान कांग्रेस के 51 सांसद राहुल को इस्तीफा वापस लेने के लिए मनाते देखे गए, लेकिन राहुल गांधी ने भी खरी-खरी सुना दी और उन्होंने कहा कि अब वो कांग्रेस अध्यक्ष नहीं रहेंगे। राहुल ने मीडिया के समक्ष भी यही कहा है कि अब वो अध्यक्ष नहीं बने रहना चाहते हैं। कांग्रेस सांसद लोकसभा चुनाव में हुई हार को सामूहिक बताकर नैतिक जिम्मेदारी से राहुल को बरी करते देखे गए, लेकिन राहुल ने भी बतला दिया कि उनका स्टैंड साफ है और अब वो आगे अध्यक्ष नहीं बने रहना चाहते हैं।

जनता दरबार ढहा
टीडीपी प्रमुख की गुजारिश के बावजूद जनता दरबार को ढहा दिया गया। दरअसल अमरावती में प्रजा वेदिका बिल्डिंग पर आधी रात को बुल्डोजर चलाने की खबर आई। यह वही इमारत थी जहां पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की सरकार जनता दरबार लगाया करती थी। यह कार्रवाई वर्तमान मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के आदेश के बाद की गई और बताया गया कि यह बिल्डिंग अवैध है। इस पर राजनीतिक गलियारे में चर्चा आम हो गई कि जिस इमरात में जनता दरबार लगाया जाता था वह अवैध थी, इसलिए उसमें बैठकर जो फैसले लिए गए होंगे वो कहां से वैध हो सकते हैं। इसलिए बिल्डिंग गिराने के साथ ही साथ पिछली सरकारों के फैसलों पर भी एक सरसरी नजर दौड़ाने की बातें की जा रही हैं। गौरतलब है कि तेलगू देशम पार्टी ने इस बिल्डिंग को 2017 में बनाया था, जिसकी लागत को लेकर भी विवादित बयान आए थे। बहरहाल विपक्ष के नेता के तौर पर अब नायडू को कहीं और अपना तामझाम फैलाना होगा, क्योंकि यह तो अवैध घोषित हो गई और प्रशासन ने कार्रवाई भी कर दी।

ये क्या फडणवीस डिफॉल्टर?
महाराष्ट्र से हैरान करने वाली खबर आ रही है, जिसके मुताबिक राज्य के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने पानी का बिल नहीं चुकाया, इस कारण बीएमसी ने उनके घर को डिफॉल्टर घोषित कर दिया। बीएमसी की इस डिफॉल्टर सूची में 18 मंत्रियों के नाम भी शामिल हैं। सीएम के बंगले ‘वर्षा’ पर तकरीबन 7 लाख, 44 हजार, 981 रुपए का बिल बाकी बताया जा रहा है। पानी को लेकर महाराष्ट्र में जो स्थिति बनी है उसके बाद सरकार पर सवाल उठना लाजमी हैं, इस पर बीएमसी का यह कदम आमजन की आंखें खोलने जैसा है। दरअसल जिन्हें डिफॉल्टर घोषित किया गया है वो अतिविशेष व्यक्तियों में शुमार किए जाते हैं और जब वो ही इस तरह का कारनामा करेंगे तो समाज में क्या संदेश जाएगा। इस पर चर्चा आम हो रही है और कहा जा रहा है कि कम से कम जनप्रतिनिधियों को तो इस तरह का व्यवहार नहीं करना चाहिए, जिससे लोगों में भी उसी तरह का व्यवहार करने की इच्छा जागृत होने लग जाए। एक तरफ राज्य में जल संकट है वहीं दूसरी तरफ सीएम बंगले पर पानी का बिल बकाया होने की बात हो रही है, यह वाकई चिंतनीय बात है।

चमकी का हवाई सर्वेक्षण
बिहार में लू लगने और चमकी बुखार से करीब 200 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और ऐसे में खबर आई कि मुख्यमंत्री नीतिश कुमार हालात का जायजा लेने हवाई सर्वेक्षण करेंगे। इस पर कुछ लोगों ने कह दिया कि मानों राज्य में बाढ़ आई हो कि मुख्यमंत्री जी हवाई सर्वेक्षण करेंगे। यह बात उनके कानों तक पहुंच गई होगी, इसलिए हवाई सर्वेक्षण का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया। गौरतलब है कि इससे पहले जब नीतिश चमकी बुखार से मरने वाले बच्चों और उनके परिजनों का हाल जानने अस्पताल पहुंचे थे तो वहां मौजूद लोगों ने विरोध स्वरुप ‘नीतिश गो बैक’ के नारे लगाए थे। संभवत: यही वजह रही होगि कि उन्होंने हवाई सर्वेक्षण का फैसला लिया, लेकिन दूसरे ही पल उससे भी वो पलट गए। बच्चों की मौत को लेकर नीतिश विपक्ष ही नहीं बल्कि अपने ही कुछ लोगों के निशाने पर हैं।

संभव है वन नेशन, वन पोल?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दूसरे कार्यकाल को ऐतिहासिक बनाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। इसी कड़ी में उन्होंने वन नेशन, वन पोल की बात कही है। वैसे पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में बैठने का अपना ही महत्व है, लेकिन जहां तक वन नेशन, वन पोल की बात है तो इसके लिए विपक्षी दल एक राय हो पाएंगे कहना मुश्किल है। वैसे भी जानकार तो यही कह रहे हैं कि अनेक स्तर पर होने वाले चुनावों को एक साथ करवाना सरकार के लिए नहीं बल्कि चुनाव आयोग और सुरक्षा तंत्र के लिए चुनौती की बात होती है, इसलिए इस पर कोई भी फैसला लेने से पहले चुनाव आयोग और उससे जुड़े अन्य तंत्रों को मिल-बैठकर तय करने दिया जाना चाहिए कि बेहतर क्या हो सकता है। वैसे कहने को तो यह भी कहा जा रहा है कि एक देश एक चुनाव से समय और पैसे की बर्बादी भी रोकी जा सकेगी, लेकिन यह फिलहाल संभव नजर नहीं आती है।

नीतिश कुमार अब जागे ?
बिहार के मुजफ्फरपुर में सैकड़ों बच्चे एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी चमकी बुखार की चपेट में हैं, जिससे सवा सौ के करीब बच्चों की मौत हो चुकी है। इसे लेकर स्वास्थ्य विभाग से लेकर संबंधित अस्पतालों की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। बच्चों में हो रही घातक बीमारी और मौतों को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन और बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे के खिलाफ मामले भी दर्ज कराए जा चुके हैं। इसके बाद खबर आती है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार मंगलवार को मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच अस्पताल पहुंचे और चिकित्सकों से मिलकर हालात की समीक्षा की। इस पर विरोधी कह रहे हैं कि नीतिश की तब नींद खुल रही है जबकि इतनी ज्यादा तादात में बच्चों की मौत हो चुकी है। वैसे बच्चों की मौतों पर मानवाधिकार आयोग ने केंद्र और राज्य सरकार को भी नोटिस भेजा है। दुखियारे तो यही कह रहे हैं कि इससे क्या क्योंकि मरने वाले बच्चे तो वापस नहीं आने वाले। इसलिए व्यवस्था को समय रहते सुधारा जाना चाहिए, अन्यथा तमाम जिम्मेदारों को खुद अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझते हुए इस्तीफे सौंप देने चाहिए, क्योंकि इस तरह बच्चों की मौत सभ्य और मानवीय समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता है।

आगाज से पहले ही मसाज बंद
ट्रेनों में मालिश की सुविधा वाली योजना शुरु होने से पहले ही बंद हो गई। इसका मुख्य कारण शुरु होने से पहले ही इसका विरोध हो जाना रहा है। दरअसल भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ‘ताई’ ने इस योजना पर सवाल उठाते हुए बकायदा रेल मंत्री पीयूष गोयल को पत्र भी लिखा था। उन्होंने कहा था कि क्या पश्चिम रेलवे के रतलाम रेल मंडल की प्रस्तावित मालिश योजना को रेल मंत्रालय ने मंजूरी दी है? इसके साथ ही उन्होंने गंभीर सवाल किया कि इस प्रकार की (मालिश) वाली सुविधा के लिए चलती ट्रेन में किस तरह की व्यवस्था की जाएगी क्योंकि इससे यात्रियों, विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा एवं सहजता के संबंध में कुछ प्रश्न हो सकते हैं। इससे पहले इंदौर क्षेत्र के नवनिर्वाचित भाजपा सांसद शंकर लालवानी ने भी रेलवे की मसाज योजना को लेकर रेल मंत्री को पत्र लिखा था। इस प्रकार अपनों का ही विरोध देख इस मसाज सुविधा वाली योजना को बंद कर दिया गया।

अमेरिका में ‘मोदी है तो मुमकिन है…’
पिछले आम चुनाव में जिस तरह से अबकी बार मोदी सरकार का नारा बुलंद हुआ था, उसी तर्ज पर हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में ‘मोदी है तो मुमकिन है..।’ के नारे ने धूम मचाई और पूर्ण बहुमत के साथ एक बार फिर मोदी सरकार केंद्र में बिराजमान है। इस नारे का असर सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि अमेरिका जैसे देश तक में हुआ है, जिसका उदाहरण खुद अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने पेश कर दिया है। दरअसल पोम्पिओ इसी माह भारत दौरे पर आने वाले हैं। इस दौरान वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नवनियुक्त विदेश मंत्री एस जयशंकर से भी मुलाकात करेंगे। इससे पहले पोम्पिओ ने यूएस-इंडिया बिजनेस काउंसिल के इंडिया आइडियाज समिट में भाषण देते हुए कहा कि ‘जैसा प्रधानमंत्री मोदी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान नारा दिया ‘मोदी है तो मुमकिन है’ या ‘मोदी मेक्स इट पॉसिबल’, मैं भी भारत और अमेरिका के बीच संबंध को आगे बढ़ते देख रहा हूं।’ कहने वाले तो यही कह रहे हैं कि मोदी की गूंज अमेरिका में भी सुनाई दे रही है, जिसका असर विश्व में देखने को जल्द ही मिलेगा।

कुलपति हैं शाह
भाजपा के महासचिव एवं पश्चिम बंगाल के पार्टी प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने कहा है कि ममता बनर्जी का जहाज अब डूबने को है। उन्होंने इसे बचाने के लिए भले ही चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से मुलाकात की हो, लेकिन प्रशांत जिस यूनिवर्सिटी में पढ़े, वहां के कुलपति हैं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह। बंगाल में विजय जुलूस पर प्रतिबंध के सवाल पर वह बोले कि ममता कुछ भी कर सकती हैं, उनको न संविधान पर और न ही कानून पर विश्वास है। वहां तो सिर्फ उनका ही कानून चलता है। प्रतिबंध लगाना उनका फ्रस्ट्रेशन भर है। नीति आयोग पर पहले ही वह कह चुकी हैं कि मैं पीएम को नहीं मानती, विजयवर्गीय ने यहां तक कहा कि ममता सामान्य नहीं हैं, उन्हें मनोचिकित्सक की जरूरत है। बंगाल में राष्ट्रपति शासन के सवाल पर उन्होंने कहा कि हम इसके पक्षधर नहीं। मुख्यमंत्री कमलनाथ के भानजे रतुल पुरी के उज्जैन दर्शन संबंधी सवाल पर विजयवर्गीय बोले कि उनकी टीम को मालूम है कि सरकार पांच साल नहीं चलनी है, इसलिए फावड़ा लेकर कमाई में लगे हैं। मीडिया से चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि मप्र में सभी जानते हैं कि यह सरकार ज्यादा दिन नहीं चलने वाली। इस मुद्दे पर और कुरेदने पर उन्होंने कहा कि मैं अभी मिशन बंगाल में जुटा हूं, इसलिए मप्र कांग्रेस के लोगों को अपनी धड़कन बढ़ाने की जरूरत नहीं है।

ममता का जय हिंद जय बांग्ला
पश्चिम बंगाल में कार्ड का खेल खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है भाजपा ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को जय श्री राम लिखे दस लाख पोस्टकार्ड भेजने का फैसला किया है। इसके जवाब में अब ममता बैनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने तय किया है कि वह भी भाजपा को जय हिंद जय बांग्ला लिखे 20 लाख पोस्ट कार्ड भेजेगी। गौरतलब है कि भाजपा ने पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव में हार का सामना करने वाली तृणमूल कांग्रेस के जख्मों पर नमक छिड़कते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जय श्री राम लिखे दस लाख पोस्टकार्ड भेजने का फैसला किया था। पश्चिम बंगाल से भाजपा के नवनिर्वाचित सांसद अर्जुन सिंह ने कहा था हमने मुख्यमंत्री के आवास पर 10 लाख पोस्टकार्ड भेजने का निर्णय किया है जिन पर ‘जय श्रीराम’ लिखा होगा। तृणमूल कांग्रेस के विधायक रह चुके सिंह आम चुनाव से पहले भाजपा में शामिल हुए थे। उन्होंने यह बात भाजपा कार्यकर्ताओं के समूह पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किए जाने के बाद कही थी जो उस स्थान के बाहर प्रदर्शन के दौरान ‘जय श्रीराम’ के नारे लगा रहे थे जहां तृणमूल कांग्रेस के नेता बैठक कर रहे थे।

केंद्र, गांधीवादी या गोडसेवादी?
देश में पिछले कुछ समय से गोडसेवादियों ने सिर उठाना शुरु किया हुआ है और सीधे-सीधे महात्मा गांधी पर हमले बोल रहे हैं। ऐसे में जब एक आईएएस अधिकारी ने गांधी और गोडसे पर विवादित ट्वीट किया तो कांग्रेस और एनसीपी उन्हें निलंबित करने की मांग कर दी। दरअसल बृहन मुम्बई नगरपालिका की उप नगर आयुक्त निधि चौधरी ने ट्वीट करते हुए महात्मा गांधी की प्रतिमा को हटाने का अनुरोध किया और उनके हत्यारे नाथुराम गोडसे को धन्यवाद ज्ञापित कर दिया। बहरहाल विवाद बढ़ता देख अधिकारी ने ट्वीट हटा दिया और उसे एक व्यंग्य करार दिया, जिसे तोड़-मरोड़कर पेश करने की दलील भी दी गई। इससे क्या क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री चव्हाण तो यही कह रहे हैं कि उनका ट्वीट निंदनीय है। यह उनकी गिरी हुई सोच को दर्शाता है। इसी समय इन विचारों को रोकने की जरूरत है। चाव्हाण ने कहा कि केंद्र सरकार को बताना चाहिए कि वह गांधी की विचारधारा के साथ है या गोडसे की। इसके साथ ही सियासत गरमा गई और कांग्रेस नेताओं ने लगातार मोदी सरकार पर निशाना साधने का काम किया है।

जयशंकर को चीनी बधाई
पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर को मोदी सरकार में विदेश मंत्री बनाए जाने पर चीन के विदेश मंत्री और स्टेट काउंसलर वांग यी ने भी बधाई दी है। यही नहीं बल्कि वांग यी ने तो चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों के विकास में जयशंकर के बतौर भारतीय राजदूत सकारात्मक योगदान की भी सराहना की है। यह अलग बात है कि नए विदेश मंत्री का पदभार संभालने वाले जयशंकर मौजूदा वक्त में संसद के दोनों सदनों में से किसी के भी सदस्य नहीं हैं। इससे स्पष्ट हो गया है कि जयशंकर को यह अवसर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी होने की वजह से मिला है। दावे करने वाले तो यहां तक कहते हैं कि जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब चीन दौरे के दौरान जयशंकर ने उनकी काफी मदद की थी, जिससे प्रभावित प्रधानमंत्री मोदी ने अब उनका एहसान इस तरह से उतारने का काम किया है। एक तरह से चीनी बधाई ने जयशंकर से जुड़े तमाम वृत्तांतों को याद दिलाने का भी काम कर दिया है। वैसे जयशंकर नागरिक सम्मान पद्मश्री अवॉर्ड से भी नवाजे जा चुके हैं।

खुशी के साथ मायूसी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूसरी पारी शुरु होने की खुशी तो तमाम लोगों को है, लेकिन पिछली सरकार में विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालने वाली सुषमा स्वराज ने शपथ ग्रहण के बाद ट्विटर पर जो विदाई संदेश लिखा उससे उनके प्रशंसक मायूस हो गए। इसके बाद सोशल मीडिया पर पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की तारीफों के पुल बांधना शुरु हो गए। इससे संदेश गया कि जहां एक तरफ भाजपा नीत सरकार के बनने से लोग खुश हैं तो वहीं सुषमा जैसी मंत्री के जाने से वो दु:खी और निराश भी हैं। गौरतलब है कि बतौर प्रधानमंत्री मोदी के दूसरे कार्यकाल में सुषमा स्वराज को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली है और अब जबकि शपथ ग्रहण भी संपन्न हो चुका है तो खुशी के साथ कुछ लोग अपने चहेतों को जगह नहीं मिलने से मायूस भी दिख रहे हैं।

आंधी-बारिश के सियासी मायने
वाईएसआर कांग्रेस के अध्यक्ष जगनमोहन रेड्डी गुरुवार को आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेते उससे पहले तेज आंधी के साथ हुई बारिश ने विजयवाड़ा स्टेडियम की तमाम तैयारियों को उलट-पलट कर रख दिया। इस पर राजनीतिक पंडितों ने कहना शुरु कर दिया कि जगनमोहन रेड्डी ने जिस शानदार तरीके से विधानसभा और लोकसभा चुनावों में जीत हासिल की है, उससे विरोधियों के खेमे में इसी तरह की आंधी आने और बारिश होने के आसार बने हुए हैं, जिसे प्रकृति ने अपनी तरह से दिखला दिया है। विरोधियों के लिए रेड्डी खुद किसी आंधी-तूफान से कम नहीं हैं, इसलिए इसका असर आगामी दिनों में और ज्यादा दिखाई देगा। गौरतलब है कि वाईएसआर कांग्रेस को विधानसभा में 175 में से 151 सीटों पर जीत हासिल हुई है, इसी प्रकार लोकसभा की 25 सीटों में से 22 सीटों पर पार्टी ने कब्जा जमाया है, यह किसी आंधी और बारिश से कम नहीं है।

खींचतान से बढ़ेगा संकट
लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद जहां पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने को लेकर राहुल गांधी अड़ गए हैं तो वहीं दूसरी तरफ संसद में पार्टी नेता कौन होगा इस बात को लेकर भी खींचतान शुरु हो गई है। इससे पार्टी के अंदर की खींचतान भी सामने आ गई है। चूंकि इस लोकसभा में कांग्रेस महज 52 सीटें ही जीत पाई है, इसलिए इस दफा भी पार्टी को प्रतिपक्ष के नेता का पद हासिल नहीं हो पाएगा। बावजूद इसके लोकसभा में पार्टी को नेता तो चुनना होता है। पिछली दफा मल्लिकार्जुन खड़गे यह जिम्मेदारी निभा रहे थे, लेकिन इस बार के चुनाव में वो हार गए, इसलिए अब इस बात को लेकर बहस छिड़ी हुई है कि उनकी जगह कौन नेता होगा। राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की पेशकश करते हुए सदन में नेता का पद ग्रहण की बात कही है। उनके अलावा केरल से सांसद शशि थरुर और पंजाब से सांसद मनीष तिवारी का नाम भी आगे बढ़ा दिया गया, जिससे सदन में नेता कौन होगा इस पर भी खींचतान शुरु हो गई है। जानकारों की मानें तो इस खींचतान से राज्यों की कांग्रेस सरकारों पर विपरीत असर पड़ेगा और पहले से कमजोर सरकारें और कमजोर होती चली जाएंगी। कांग्रेस शासित राज्यों में संकट बढ़ सकता है, इसलिए इसे जल्द ही खत्म किया जाना चाहिए।

लालू को हार का तनाव
रांची के आरआईएमएस अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने बीते दो दिनों से खाना छोड़ रखा है। उनका रोजाना वाला रुटीन बुरी तरह से अव्यवस्थित हो गया है। डॉक्टरों की मानें तो लालू प्रसाद यादव चिंता या फिर गहरे तनाव में हैं, जिस कारण उन्हें भूख-प्यास नहीं लग रही है। वहीं सियासी गलियारे में चर्चा आम हो गई है कि पारिवारिक खींचतान और अब पार्टी की करारी हार से लालू तनाव में आ गए हैं। फिलहाल डॉक्टर तो यही सलाह दे रहे हैं कि वो समय पर खाना खाएं और दवाइयां लें, क्योंकि ऐसा नहीं करने से उनकी तबियत और भी बिगड़ सकती है। जबकि पार्टी विधायक दावा कर रहे हैं कि लालू को कोई चिंता या तनाव नहीं है, बल्कि उन्होंने अगले विधानसभा चुनाव के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया है। इस पर विरोधी कहते हैं कि कुछ लोकसभा चुनाव में कर लिया है और अब कुछ आगामी विधानसभा में कर लेंगे, इस बात का तनाव नहीं होगा तो क्या वो खुशियां मनाएंगे?

निरहुआ जो हारकर भी जीते?
भोजपुरी स्टार दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ भाजपा की टिकट पर आजमगढ़ से चुनाव मैदान में थे, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से वो बुरी तरह हार गए। इसे लेकर लोगों ने उन्हें निशाने पर लिया, जिसे लेकर निरहुआ ने ट्वीट करते हुए लिखा कि ‘ना ये देश रुकेगा, ना ये देश झुकेगा, आए तो मोदी ही’। इस पर निरहुआ के फैंस कहते हैं कि आप हारे नहीं हैं, बल्कि आप तो विजयी हुए हैं, हार तो अहंकारी अखिलेश की हुई, जिसे आपने आईना दिखाने का काम किया है। इस पर कुछ लोगों ने याद दिलाया है कि पहले निरहुआ ने ही कहा था कि उन्हें हराने वाला कोई पैदा नहीं हुआ है, क्योंकि वो स्वतंत्र आदमी हैं और उनके विचार भी स्वतंत्र हैं। फिर आखिर क्या हुआ कि इस मोदी की आंधी में भी वो हार गए। इस पर उन्हें चिंतन जरुर करना चाहिए।

शत्रु को दिख रही है गड़बड़ी
लोकसभा चुनाव 2019 में करारी हार के बाद बिहार के पटना साहिब से कांग्रेस प्रत्याशी शत्रुघ्न सिन्हा कहते देखे जा रहे हैं कि कुछ तो बड़ा खेल हुआ है। गौरतलब है कि शत्रु को केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने जोरदार शिकस्त दी है। शत्रु कहते हैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश के नतीजों को देखकर तो यही लगता है कि कुछ तो बड़ा खेल हुआ है। बहरहाल शत्रु को कम से कम यह तो मालूम ही है कि यह समय इस तरह की बातें करने के लिए माकूल नहीं है। इसके बाद भी वो कुछ तो गड़बड़ है कहकर टीवी के मशहूर करेक्टर एसीपी प्रद्युमन क्यों बन रहे हैं यह आमजन को समझ नहीं आ रहा है। लोग तो यही कह रहे हैं कि अब हार गए सो हार गए, इस पर इतना मलाल काहे को, आगे चुनाव आएंगे तब हिसाब बराबर कर लें।

ममता का सधा हुआ बयान
लोकसभा चुनाव के नतीजों ने यह तो बतला दिया कि एक बार फिर मोदी सरकार का नारा अक्षरश: सत्य हो रहा है। इससे विरोधियों को खासी परेशानी होती देखी जा रही है, लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बहुत ही सधा हुआ बयान देकर बतला दिया है कि वो राजनीति की पक्की खिलाड़ी हैं। उन्हें जीत और हार दोनों स्वीकार है। दरअसल पश्चिम बंगाल में भाजपा को अप्रत्याशित तरीके से बढ़त मिली इस पर ममता बनर्जी ने ट्वीट करते हुए कहा कि ‘विजेताओं को बधाई। लेकिन सभी हारने वाले लूजर्स नहीं हैं। चुनाव परिणामों पर समीक्षा की जाएगी उसके बाद ही कुछ कहा जा सकेगा। ममता आगे कहती दिखीं कि पहले वोटों की गिनती और वीवीपैट से मिलान पूरा होने दिया जाए। ममता के इस सधे हुए बयान को लेकर विश्लेषकों ने कहा है कि दीदी वाकई राजनीतिज्ञ हैं, इसलिए उन्होंने हार को भी बहुत ही सहज ढंग से स्वीकार करने का उपक्रम किया है, वर्ना इस समय तो अच्छे-अच्छे नेताओं की भाषा बिगड़ जाती है।

दीदी को झटका देंगे चुनाव नतीजे
लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि दीदी (ममता) बनर्जी के 40 विधायक उनके संपर्क में हैं। चुनाव परिणाम के बाद वे सभी तृणमूल कांग्रेस छोड़ देंगे। इसी तरह की बातें अन्य भाजपा नेता भी करते देखे गए, जिसे लेकर विपक्ष ने निशाना साधते हुए कहा था कि ये चुनाव प्रचार कर रहे हैं या विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त के लिए निकले हुए हैं। इसके बाद राजनीति गरमा गई थी, लेकिन चुनाव के सातों चरण पूर्ण होने के बाद अब जबकि एक चैनल ने सूत्रों के हवाले से कुछ इसी तरह की बात कह दी है तो पुन: चर्चा आम हो गई कि कहीं कुछ जरुर पक रहा है, वर्ना यूं बातें नहीं होतीं। दरअसल सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि तृणमूल के दो सांसद भाजपा के संपर्क में हैं। दावा यहां तक किया गया है कि ये दोनों सांसद इस चुनाव में भी टीएमसी की टिकट पर चुनाव लड़े हैं, लेकिन टेलिफोन के जरिए वो भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के संपर्क में हैं। अगर यह सच है तो चुनाव परिणाम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को करारा झटका देने वाले साबित होंगे।

कर्नाटक मॉडल से रुकेंगे मोदी
लोकसभा चुनाव 2019 का अंतिम चरण और नतीजों का इंतजार किए बगैर ही जोड़-तोड़ की राजनीति शुरू हो गई है। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी विपक्ष को एकजुट करने के लिए सक्रिय नजर आ रही हैं। मौजूदा हालात को देखते हुए दावा किया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी को दोबारा सत्ता में काबिज होने से रोकने के लिए कांग्रेस कर्नाटक मॉडल की तर्ज पर भी केंद्र में सरकार गठन का ऑफर ला सकती है। फिलहाल बातें तो यूं ही हो रही हैं कि कांग्रेस कोशिश करेगी कि विपक्षी दलों के साथ खुद केंद्र में वह सरकार बनाए, लेकिन यदि ऐसा होना संभव नहीं हुआ तो कर्नाटक मॉडल तो सामने है ही, फिर चिंता की बात नहीं। ये कयास मिलीजुली सरकार वालों के हैं, यदि किसी को स्पष्ट बहुमत मिल जाता है तो फिर कोई बात नहीं।

प्रधानमंत्री के भाई भी देते हैं धरना
राजस्थान से खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाई प्रहलाद मोदी एस्कार्ट की मांग को लेकर जयपुर के बगरु थाने के बाहर धरने पर बैठ गए। माजरा कुछ यूं था कि प्रधानमंत्री के भाई गत रात जयपुर-अजमेर राष्ट्रीय राजमार्ग से यात्रा कर रहे थे, ऐसे में उन्होंने पुलिस से एस्कार्ट की मांग रख दी और धरने पर बैठ गए। इस बीच करीब एक घंटे तक जयपुर के पुलिस आयुक्त आनंद श्रीवास्तव उन्हें समझाते रहे कि वो स्कॉट के पात्र नहीं हैं और आदेशानुसार उन्हें दो पीएसओ उपलब्ध कराए जा रहे थे, लेकिन वो समझ नहीं पाए और धरने पर बैठ गए। मजेदार बात यह थी कि मोदी जी तो पीएओ को अपने वाहन में ले जाने को तैयार ही नहीं थे और लगातार कह रहे थे कि उन्हें अलग पुलिस वाहन में भेजा जाए। बहरहाल इससे विरोधियों को कहने का मौका तो मिल ही गया कि प्रधानमंत्री मोदी के भाई भी धरना देना जानते हैं, यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री मोदी की ही तरह उन्हें भी दरअसल बहुत सी असलीयतें मालूम नहीं हैं, इसलिए पात्र और अपात्र के बारे में वो नहीं जान सके।

इन बहरुपियों से कैसे पाएं पार
कांग्रेस मुख्यालय में रोजाना होने वाली मीडिया ब्रीफिंग के दौरान ऐसा कुछ हुआ कि देखने वाले भी हैरान रह गए। दरअसल कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने जैसे ही मीडिया को संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ‘अजय सिंह बिष्ट’ कह कर उन्हें निशाने पर लिया तभी एक युवक उठा और भारत माता की जय के नारे लगाना शुरू कर दिया। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले से आए उस शख्स के हाथ में तिरंगा झंडा भी था। वह कह रहा था कि योगी को अजय सिंह बिष्ट क्यों कहा गया और इसके साथ ही उसने अमेठी को लेकर भी सवाल शुरु कर दिए। इस शख्स की पहचान भाजपा के निष्क्रिय सदस्य के तौर पर हुई है, जिसे हंगामा करने पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और गार्ड ने मीडिया कक्ष से हटा दिया। इस प्रकार कांग्रेस और अन्य विपक्ष के नेताओं की रैलियों व सभाओं में घुसकर इस तरह के कृत्य करने वालों की कमी नहीं है। विरोधियों ने इन्हें बहरुपिया करार देते हुए कहा है कि इनसे पार पाना भी अब मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि ये अचानक हमला कर देते हैं और हिंसा पर भी उतारु हो जाते हैं। इस घटना पर सवाल किया जा रहा है कि कहीं यह सब भाजपा की रणनीति का हिस्सा तो नहीं है।

राहुल का भरोसा
लोकसभा चुनाव के छठवें चरण का मतदान खत्म होने के साथ ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी की जीत का दावा करते हुए कह दिया है कि नतीजे आने के साथ ही प्राधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दौर भी खत्म हो जाएगा। राहुल कहते हैं कि अंग्रेजी हुकूमत के बाद पहली बार किसी एक संगठन ने हिंदुस्तान की तमाम संस्थाओं पर कब्जा करने की कोशिश की है। एक तरह से प्रधानमंत्री मोदी और आरएसएस इन संस्थाओं पर नियंत्रण करने के लिए लगातार हमला कर रहे हैं। देश के सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को काम नहीं करने दिया जा रहा है, जिस कारण पहली बार चार जज सार्वजनिक तौर पर बयान देते दिखे हैं। यही नहीं तमाम मंत्रालयों में स्पेशल ओएसडी बैठा दिया गया है, जो कि आरएसएस द्वारा नियुक्त किया गया आदमी है। एक प्रकार से यह वही रिमोट कंट्रोल है, जो देश की सभी संस्थाओं को चला रहा है। कुल मिलाकर यह आक्रमण सीधे-सीधे संविधान पर है, क्योंकि ये तमाम संस्थाएं तो संविधान से संरक्षित हैं। इन तमाम आरोपों के साथ ही राहुल का दावा है कि चुनाव परिणाम आने के साथ ही मोदी का दौर भी खत्म हो जाएगा और सब कुछ एक बार फिर पटरी पर आने लग जाएगा।

दबंगई चलेगी पर किसकी
लोकसभा चुनाव के छठे चरण के मतदान के दौरान उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर में वोटिंग का दौर जारी था, इसी बीच भाजपा उम्मीदवार मेनका गांधी और गठबंधन से बीएसपी के प्रत्याशी चंद्रभद्र सिंह उर्फ सोनू सिंह के बीच ऐसा कुछ हो हुआ कि सुर्खियां बन गया। बताया जाता है कि मेनका ने सोनू सिंह का रास्ता रोककर कहा कि दबंगई नहीं चलेगी। अब चूंकि सोनू सिंह की छवि बाहुबली नेताओं वाली है, इसलिए उन पर और उनके समर्थकों पर मेनका के समर्थकों और मतदाताओं को डराने-धमकाने का आरोप भी लगा। यहां मेनका और सोनू सिंह की बहस भी हो गई। बहरहाल राजनीतिक जानकार तो यही कह रहे हैं कि यह लोकतंत्र है और यहां पर सिर्फ और सिर्फ जनता-जनार्दन की दबंगई चलती है और वही यह तय करेंगे कि आगे किसकी दबंगई चलने वाली है। सोनू सिंह तो यही कहते हैं कि आखिर वो दबंगई कहां कर रहे हैं। बकौल सोनू सिंह, ‘आप हमें गाली दे रही हैं और जूते खुलवा रही हैं।’ गौरतलब है कि इससे पहले मेनका गांधी के बेटे वरुण गांधी ने कहा था कि ‘मैं संजय गांधी का बेटा हूं, इन लोगों से जूते खुलवाता हूं। आप सभी लोग चिंता मत करिए।’ वैसे सभी दबंगई करने में विश्वास करते देखे जा रहे हैं, लेकिन इससे क्या, क्योंकि फैसला तो ईवीएम में कैद हो चुका है।

सत्ता के असली किंगमेकर
लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों को लेकर भविष्यवाणी कर रहे सियासी पंडितों का तो यही कहना है कि इन चुनावों में किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलने वाला नहीं है। ऐसे में सभी की नजरें उन नेताओं पर टिक गई हैं जो किंगमेकर साबित हो सकते हैं। इनमें सबसे पहला नाम पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का लिया जा रहा है, वहीं दूसरे नंबर पर सपा-बसपा गठबंधन की बसपा सुप्रीमों मायावती और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव हैं, जबकि राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ओडिशा में बीजू जनता दल, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर(कांग्रेस) और तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) जैसे क्षेत्रीय दल लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद किंगमेकर की भूमिका में होंगे। इस प्रकार नजरें अब ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव और वाईएस जगमोहन रेड्डी पार आकर टिक गई हैं। वैसे मतदाता के मन में क्या चल रहा है यह तो वही जानता है, लेकिन यह दावा बहुत हद तक सही साबित हो सकता है कि किसी एक पार्टी को इस बार पूर्ण बहुमत हासिल होने वाला नहीं है, क्योंकि 2014 के चुनाव में मोदी लहर थी जिसका प्रभाव अब पूरी खत्मप्राय: हो चुका है। इसलिए सत्ता के किंगमेकर पर विचार करना जरुरी हो गया है।

मायावती पीएम तो अखिलेश सीएम
पिछले दिनों बसपा प्रमुख मायावती ने कहा था कि यदि सब कुछ अच्छा रहा तो वह लोकसभा चुनाव लड़ेंगी और प्रधानमंत्री भी बन सकती हैं। मायावती के इस बयान पर मुहर लगाने का काम सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने यह कहते हुए लगाई कि ‘मैं भी उन्हें प्रधानमंत्री बनते हुए देखना चाहता हूं।’ अब चूंकि राजनीति में इस हाथ ले उस हाथ दे वाली कहावत ही चरितार्थ होती रही है अत: सवाल किया गया कि आखिर अखिलेश क्योंकर मायावती को प्रधानमंत्री बनाए जाने के पक्ष में हैं, तो इसका भी जवाब अब मिल गया है। दरअसल एक साक्षात्कार के दौरान अखिलेश कहते दिखे हैं कि ‘मायावती और हमारे बीच में एक जेनरेशन गैप है, उन्हें प्रधानमंत्री बनता देख मुझे खुशी होगी। इसके लिए मैं पूरी मेहनत करने को तैयार हूं। वहीं, वह भी मुझे उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री देखने के लिए तैयार हैं।’ इस लिए अब सोशल मीडिया पर चुटकी लेते हुए कहा जा रहा है कि मायावती पीएम तो अखिलेश सीएम।

भाई-बहन की सियासत
वाराणसी से सपा प्रत्याशी शालिनी यादव ने सेना से बर्खास्त तेज बहादुर को राखी बांधकर भाई बना लिया और अपनी जीत का आशीर्वाद मांगा है। सपा प्रत्याशी के तौर पर तेज बहादुर का नामांकन रद्द होने के बाद सियासी लड़ाई को रोचक बनाने के लिए यह भाई-बहन वाला प्रसंग लिख दिया गया है, जिसके चर्चे सोशल मीडिया पर कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं। वहीं इस रिश्ते को लेकर भावुक हुए तेज बहादुर का कहना है कि वह पांच भाई हैं, लेकिन कोई बहन नहीं थी. अब उन्हें शालिनी यादव के रूप में बहन मिल गई है ऐसे में नकली चौकीदार के खिलाफ असली चौकीदार की लड़ाई जारी रहेगी। इस बहन की जीत के लिए भाई ने जान पर दांव लगाने जैसी बात भी कह दी है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस में बहन भाई को जीत दिलवाने में कितनी कामयाब हो पाती हैं और यहां सपा में बहन को एक भाई जीत दिलवाने के लिए क्या कुछ कर पाते हैं।

प्रियंका के दावे में दम
कांग्रेस महासचिव एवं उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी का दावा है कि उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी ने जीतने वाले तथा मजबूत उम्मीदवारों को ही चुनाव मैदान में उतारा है। बावजूद इसके जो प्रत्याशी नहीं जीत पाएंगे वो राज्य में भाजपा को नुकसान पहुंचाएंगे ही। इस प्रकार प्रियंका की माने तो उत्तर प्रदेश में भाजपा को जबरदस्त नुक्सान होने वाला है, वहीं दूसरी तरफ इस बयान को गठबंधन के अतिरिक्त उन पार्टियों के लिए भी सकारात्मक माना जा रहा है जो गठबंधन में शामिल नहीं हैं, लेकिन आगे सरकार बनाने के समय काम आ सकते हैं। इसलिए जहां उनके दावे को विरोधी पक्ष वोट कटवा पार्टी कहकर मजाक उड़ा रहे हैं तो वहीं राजनीतिक विश्लेषकों ने कहना शुरु किया है कि उनके दावे में दम तो है।

ताई का सवाल दिग्गी का जवाब
लोकसभा चुनाव में धर्म और जाति पर वोट मांगे जा रहे है। हालाँकि आचार संहिता का हवाला देकर आयोग धार्मिक उन्माद और धर्म के नाम पर वोट मांगने से रोकता रहा है। यहां धर्म और अधर्म के बीच युद्ध जैसी बातें करने वाले मध्य प्रदेश के भोपाल लोकसभा सीट की भाजपा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर पर निशाना साधते हुए कांग्रेस प्रत्याशी और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कहना है कि वह किसी भी तरह के धार्मिक उन्माद के खिलाफ हैं। इसके साथ ही लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ‘ताई’ को इंगित करते हुए उन्होंने सोशल मीडिया पर बयान दिया कि वह इस बात पर गर्व महसूस करते हैं कि उन्होंने अपने शासनकाल में सिमी और बजरंग दल पर रोक लगाने की सिफारिश करने का कदम उठाया था। दिग्विजय का कहना है कि उनके लिए देश सबसे ऊपर है, ओछी राजनीति करना नहीं। गौरतलब है की उन्होंने ये बातें उस ट्वीट के जवाब में कही हैं, जिसमें ताई के हवाले से कहा गया था कि हेमंत करकरे और दिग्विजय सिंह के बीच करीबी संबंध थे। गौरतलब है कि करकरे की शहादत पर साध्वी प्रज्ञा विवादित बयान दे चुकी हैं, इसलिए एक बार फिर इस मामले को लेकर राजनीति गरमा गई है।

गोविंदा बनाम उर्मिला कौन श्रेष्ठ
मुंबई नार्थ सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहीं अभिनेत्री उर्मिला मतोंडकर को लेकर सवाल किए जा रहे हैं कि क्या वो अभिनेता गोविंदा से बेहतर साबित हो सकेंगे? गौरतलब है कि गोविंदा ने 2004 में कांग्रेस के टिकट पर भाजपा के वरिष्ठ नेता राम नाइक को जबरदस्त शिकस्त दी थी। अब यदि गोविंदा के रिकॉर्ड को ब्रेक करना है तो फिर उर्मिला को अपने प्रतिद्वंदी और भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी और सिटिंग सांसद गोपाल शेट्टी को शानदार हार का तोहफा देना होगा। मतदान के बाद तो यही किस्से आम हो रहे हैं और सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या मायानगरी में एक बार फिर उर्मिला कलाकारों का मान रखने में सफल हो सकेंगी, क्योंकि इससे पहले गोविंदा ने तो भरपूर मान रखा था। वैसे राजनीतिज्ञों का तो यही कहना है कि दक्षिण क्षेत्र में भाजपा ने कड़ी मेहनत की है, जिससे परिणाम पलट भी सकता है।

साध्वी का श्राप और सर्जिकल स्ट्राइक
दिग्विजय सिंह ने अपनी प्रतिद्वंद्वी प्रज्ञा ठाकुर पर निशाना साधा कि उन्होंने यदि जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर को श्राप दिया होता तो सर्जिकल स्ट्राइक करने की कोई जरूरत ही नहीं होती। गौरतलब है कि साध्वी ने एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे को श्राप देने के कारण मारे जाने जैसा विवादित बयान दिया था, इसके बाद से वो तमाम संगठनों और राजनीतिक दलों के निशाने पर आ गईं। यहां तक कि भाजपा ने भी उनके इस बयान से किनारा कर लिया। इसे देख राजनीतिक गलियारे में कहा जा रहा है कि श्राप का असर तो देखने को मिल रहा है, इसलिए घबराए हुए दिग्गी राजा भी उन्हें सलाह दे रहे हैं कि जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर को श्राप दे दो तो मामला ही निपट जाए। साध्वी समर्थक कहते हैं कि जो लोग कहते हैं कि श्राप से कुछ नहीं होता, यदि उनके सामने साध्वी पहुंच जाएं और शापित कर दें तो मुश्किल में आ जाएंगे। इस तरह ये लोकसभा चुनाव पूरी तरह से श्राप-श्राप खेलने वाले हो गए हैं।

बहिनजी का सासू अवतार
उत्तर प्रदेश में बुआ और भतीजे की जोड़ी खास तौर पर चर्चा में है। लेकिन कन्नौज की सभा के बाद से बहिनजी का सासू अवतार भी खूब छाया हुआ है। दरअसल जब मंच पर उपस्थित बसपा प्रमुख मायावती के पैर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की सांसद पत्नी डिंपल यादव ने छुए तो उन्होंने न सिर्फ उन्हें आशीर्वाद दिया बल्कि अपनी बहू के लिए वोट भी मांगे। यहां मायावती ने डिंपल के समर्थन में वोट की अपील करते हुए कहा, ‘पार्टी गठबंधन के बाद डिंपल यादव को पूरे दिल से अपने खुद के परिवार की बहू मानती हूं। अखिलेश भी मुझे बड़ी ही मानकर चलते हैं, जिससे इनकी पत्नी का हमारे परिवार के साथ खास रिश्ता बन गया है और आगे भी बना रहेगा।’ मायावती के इस बयान पर चुटकी लेते हुए कहा जा रहा है कि यह तो राजनीतिक सास बन गईं, क्योंकि सपा-बसपा गठबंधन के पहले तो वो जानी दुश्मन की ही नजर से देखती रही हैं। बहरहाल जो भी है, सास-बहु का रिश्ता पवित्र और परिणाम देने वाला तो सिद्ध होगा ही होगा।

अन्य पार्टियों के वोट भी भाजपा को?
यह जानकर आम इंसान हैरान और परेशान हो सकता है कि गोवा में हुई मॉक पोलिंग में भाजपा को अन्य पार्टियों के वोट भी मिलते दिखे हैं। दरअसल बताया जा रहा है कि प्रत्येक पार्टी को 9 वोट डाले गए थे, जबकि गिनती में भाजपा को 17 वोट मिलने की बात कही गई। इस पर आम आदमी पार्टी ने गोवा में चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि दूसरी पार्टियों के वोट भी भाजपा को जा रहे हैं। इस प्रकार एक बार फिर मतदान में गड़बड़ी का मामला सुर्खियों में आ गया। गोवा के आप संयोजक एल्विस गोम्स का आरोप है कि अन्य पार्टियों के वोट भी भाजपा को ट्रांसफर किए जा रहे हैं। यह गंभीर मामला है और इससे चुनाव आयोग के दावे भी खोखले साबित होते हैं। इस मामले के सामने आने के बाद अन्य विरोधी पार्टियों ने भी एक बार फिर मतदान में गड़बड़ी को लेकर बयान देने शुरु कर दिए हैं, जिससे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं। गोवा का मॉक पोलिंग वाला यह मामला सोशल मीडिया पर जबरदस्त तरीके से वायरल हो रहा है। यह तो सभी जान रहे हैं कि दक्षिण में भाजपा अपनी लोकसभा सीटें बढ़ाने के लिए जी-जान से जुटी हुई है, लेकिन सवाल यही है कि क्या इस तरह सीटें बढ़ाई जाएंगी?

आंख दिखाने और निकालने वाले नेता
इस लोकसभा चुनाव में कुछ ऐसे नेता अपनी किस्मत आजमा रहे हैं जो या तो दूसरों को आंख दिखाने का काम करते हैं या फिर विरोधियों की आंख निकाल लेने की धमकी दे डालते हैं। जी हॉं, केंद्रीय मंत्री एवं उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से सांसद व लोकसभा उम्मीदवार मनोज सिन्हा ने ऐसा ही काम करते हुए पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा है कि वो अपना काम पूरी दिलेरी के साथ करें, यदि किसी ने उन्हें आंख दिखाने की कोशिश की तो वो उसकी आंख निकाल लेंगे। दरअसल सिन्हां कह रहे थे कि ‘भाजपा कार्यकर्ता अपराध अर्जित धन व भ्रष्टाचार को जमी-दोज करने तैयार हैं और अगर ऐसे में किसी ने उंगली दिखाने की कोशिश की तो भरोसा रखिए कि चंद घंटों में वो उंगली ही सलामत नहीं रहेगी।’ कुल मिलाकर इस तरह की धमकी देकर कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने को ज्यादातर लोग गलत मानते हैं और कानूनी कार्रवाई किए जाने की मांग भी करते हैं, लेकिन चुनाव आयोग भी क्या करे, क्योंकि वह तो संसाधनों की कमी का रोना रोते हुए कार्रवाई करने से भी बचता नजर आता है। इसलिए राजनीति में हिंसा का बोलवाला होता चला जा रहा है।

राजा के मुकाबले साध्वी…?
इस लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल संसदीय सीट सुर्खियों में है। दरअसल इस सीट से राजनीतिक वनवास पूरा कर लौटे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को कांग्रेस ने बतौर उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारा है तो वहीं उनके सामने भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को खड़ा कर दिया है। गौरतलब है कि कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का लंबा राजनीतिक अनुभव है और वो चुनाव मैनेजमेंट के लिए जाने जाते हैं, ऐसे में मालेगांव ब्लास्ट की प्रमुख आरोपी रहीं साध्वी प्रज्ञा को भाजपा द्वारा प्रत्याशी बनाए जाने को लेकर कहा जा रहा है कि बहुसंख्यक वोट बैंक को साधने के लिए भाजपा ने यह कार्ड खेला है। इसलिए दिग्गी राजा ने जहां चुनाव मैदान में साध्वी प्रज्ञा का स्वागत किया वहीं उन्होंने क्षेत्र में शांति और सद्भाव के साथ सांप्रदायिक सौहार्दृ की भी कामना करके जतला दिया है कि आखिर भाजपा करना क्या चाहती है। सोशल मीडिया पर तो राजा और साध्वी को लेकर तरह-तरह के मीम्स वायरल होने शुरु हो गए हैं।  कदम बता रही है। दरअसल नायडू ने आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग को एक ज्ञापन सौंपा था कि राज्य में हुए मतदान के दौरान बड़ी संख्या में ईवीएम में गड़बड़ी हुई और अपर्याप्त सुरक्षा के चलते हिंसा की घटनाएं घटित हुईं। इस पर वाईएसआर कांग्रेस के महासचिव एस रामकृष्ण रेड्डी ने कहा कि नायडू का नाटक तो चुनाव प्रचार समाप्त होने से शुरु हुआ और हार के भय से लगातार हथकंडे अपना रहे हैं। इस प्रकार हकीकत क्या है यह कोई जानना नहीं चाह रहा है बल्कि सभी जीत और हार से खुश या भयभीत हैं, जैसे आरोप लगा मामले को हलका बनाने में लगे हुए हैं।

अभिनन्दन पाठक और मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हमशक्ल होने के नाते देशभर में मशहूर हो चुके अभिनंदन पाठक वाराणसी से भी पर्चा भरेंगे। इससे पहले उन्होंने गृहमंत्री राजनाथ सिंह के खिलाफ लखनऊ से भी नामांकन दाखिल कर दिया है। मोदी के हमशक्ल अभिनंदन का कहना है कि वो कोई डमी कैंडिडेट नहीं हैं और न ही किसी के विरोधी ही हैं, लेकिन जुमलों का विरोध जरुर करते हैं। अभिनंदन ने प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी का समर्थन किया है, लेकिन उनका मोदी का हमशक्ल होने का जो मामला है उसे देखते हुए यही कहा जा रहा है कि वो भले ही कुछ भी क्यों न कहें, लेकिन देखने और सुनने वाले तो मोदी की ही छवि सामने रखकर उन्हें देखेंगे। इसलिए कहीं न कहीं इससे प्रचारित असली मोदी ही होंगे और इसका लाभ भी उन्हें ही मिलता दिखेगा। गौरतलब है कि 2014 के आम चुनाव, 2015 के दिल्ली और 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की रैलियों में अभिनंदन पाठक आकर्षण का केंद्र रहे, क्योंकि वो खुद को मोदी का सबसे बड़ा प्रशंसक भी बताते थे, लेकिन अब वो उनके धुर विरोधी हो गए हैं और इस चुनाव में तो उनके खिलाफ ही खड़े दिख रहे हैं।

अहमद पटेल को चाहिए 3 दिन
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल यूं तो ज्यादातर शांत नजर आते हैं, लेकिन जब अपनों पर बात आती है तो उन्हें गुस्सा भी आ जाता है। दरअसल आयकर विभाग ने अहमद पटेल के करीबी एसएस मोईन कुरैशी के घर छापामार कार्रवाई की। इस छापेमारी के बीच ही बताया जाता है कि अहमद पटेल खुद मोईन के घर पहुंच गए, जहां मीडिया के सामने ही उन्होंने केंद्र पर जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाया और कहा कि ये एजेंसियां सिर्फ तीन दिन के लिए हमें दे दें, पता चल जाएगा असली चोर कौन है। इस प्रकार अहमद पटेल ने इस छापेमारी को लेकर सीधे केंद्र पर निशाना साधा है और उन्होंने कहा कि सही मायने में जो लोग चोरी कर रहे हैं उन्हें बचाया जा रहा है, जबकि राजनीतिक विरोधियों को बेवजह परेशान किया जा रहा है। इसलिए समझा जा रहा है कि यह छापामार कार्रवाई भी चुनावी मुद्दा बन सकती है और इसलिए अहमद पटेल ने तो महज तीन दिन मांगे हैं, जिसके जरिए वो असली चोरों को बेनकाब कर सकते हैं।

भाजपा की सभा में जल संकट ने फेरा पानी
यह तो देश जानता है कि महाराष्ट्र के औरंगाबाद में जल संकट सबसे बड़ी समस्या है, जिसके नाम पर चुनाव होते रहे हैं, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। ऐसे में मजेदार किस्सा तब हुआ जबकि भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रावसाहेब दानवे की चुनावी सभा पर ‘पानी आया’ की सूचना मात्र ने पानी फेर दिया। सभा के लिए एकत्र हुए पुरुष और महिलाओं को जब नगर निकाय से पानी आने की सूचना मिली तो वो बीच में से ही उठकर चले गए। दानवे नामनगर क्षेत्र में चुनाव प्रचार कार्यालय का उद्घाटन करने पहुंचे थे। बहरहाल इस घटना ने जहां भाजपा नेता को शर्मिंदा कर दिया वहीं जल संकट से जूझ रहे क्षेत्र की असली तस्वीर भी पेश कर दी। सामाजिक कार्यकर्ता तो यही कहते हैं कि काश ये नेता इस तरह की चुनावी सभा करने से पहले जल संकट ग्रस्त क्षेत्र की मूल समस्या का समाधान तलाशते तो यूं अपमानित न होना पड़ता। इस घटना पर भाजपा नेता चुप्पी साधे हुए हैं, क्योंकि कहें भी तो क्या, क्योंकि मुंह खोलेंगे तब भी लोग तो पानी ही मांगेंगे।

बिहार में एनडीए बनाम महागठबंधन
लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बिहार खास इसलिए भी हो गया है, क्योंकि यहां जातीय समीकरण के साथ ही साथ स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दे अपना असर जरुर छोड़ते हैं। ऐसे में मतदाता बिहार की नीतिश सरकार के खिलाफ इसलिए मुखर हो रहा है, क्योंकि उसे राज्य में शराबबंदी के बावजूद सभी जगह शराब मिलने के सबूत मिल रहे हैं। नौकरी नहीं है, इसलिए राज्य व केंद्र सरकार से वह खफा है। यही नहीं मोदी सरकार की वादा खिलाफी खासतौर पर प्रत्येक नागरिक के खाते में 15-15 लाख रुपए जमा करवाने वाले वादे को लेकर खासा नाराज है। इन मामलों को लेकर बिहार में सियासत गरमा गई है, जिसे देखकर कहा जा रहा है कि नीतिश सरकार की कार्यशैली और फैसलों के कारण भाजपा को भी राज्य में खासा नुक्सान उठाना पड़ेगा। बहरहाल बिहार में लोकसभा की कुछ सीटों को यदि छोड़ दिया जाए तो अधिकांश पर मुकाबला एनडीए बनाम महागठबंधन ही है। एक तरफ सत्तारुढ़ जेडीयू और भाजपा है तो दूसरी तरफ आरजेडी-कांग्रेस सहित अन्य पार्टियों का महागठबंधन।

लालू ने खोले नीतिश के राज
राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने अपनी पुस्तक ‘गोपालगंज द रायसीना’ में दावा किया है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार महागठबंधन में वापस आना चाहते थे, लेकिन भरोसा खत्म हो जाने के चलते खुद लालू ने उन्हें मना कर दिया था। नीतिश के हृदय परिवर्तन का यह समय महागठबंधन छोड़कर भाजपा के साथ जाने के महज छह माह के अंदर का बताया गया है। इसके लिए नीतिश ने जदयू के उपाध्यक्ष और अपने विश्वासपात्र प्रशांत किशोर को अलग-अलग मौंकों पर अपना दूत बनाकर भेजा, लेकिन बात नहीं बनी। अब इस तरह के किस्से आम होने जा रहे हैं, क्योंकि जल्द ही लालू की पुस्तक लोकार्पित होने वाली है, जिससे अनेक लोगों की मुसीबतें भी बढ़ सकती हैं और कई उपकृत होते भी देखे जा सकते हैं। फिलहाल बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश को लेकर चर्चाएं आम हो चली हैं, जिसका असर आमचुनाव में होने की भी बात कही जा रही है।

अमेठी का भ्रम
कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले अमेठी को लेकर कहा जा रहा है कि अब यहां की फिजा बदल रही है। दरअसल खबर आ रही है कि रायबरेली के रहने वाले पूर्व कांग्रेस विधायक डॉ मोहम्मद मुस्लिम भाजपा में शामिल हो गए हैं। जबकि सच्चाई यह है कि डॉ मुस्लिम 2012 में तो कांग्रेस के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुए थे और उससे पहले 1996 में सपा के टिकट से वो चुनाव जीते थे और 2017 में विधानसभा चुनाव से ऐन पहले कांग्रेस छोड़ बसपा का दामन थाम चुके थे। खास बात यह रही कि तब बसपा सुप्रीमों मायावती ने उनके बेटे को विधानसभा टिकट दिया था, लेकिन वह भाजपा प्रत्याशी से हार गया था। इस प्रकार डॉ मुस्लिम ने कांग्रेस का हाथ नहीं बल्कि बसपा के हाथी की सवारी छोड़ कमल पर विराजमान होने जैसा काम किया है, जिनका अब प्रभाव क्षेत्र में न के बतौर ही बताया जाता है। उनकी छवि दल-बदलू और अवसवादी वाली हो गई है। ऐसे में उन्हें पूर्व कांग्रेसी बताकर मीडिया के जरिए लोगों में भ्रम फैलाने जैसा काम किया जा रहा है, जिस पर कांग्रेस नेता समय-समय पर आपत्ति दर्ज कराते रहे हैं। वैसे यह सब चुनावी रणनीति का ही हिस्सा है, इसलिए इसमें हर्ज भी नहीं होना चाहिए।

संबित पात्रा की अब असली परीक्षा
भाजपा ने ओडिशा की पुरी सीट से पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा को मैदान में उतारकर सही मायने में उन्हें अपने आपको साबित करने जैसा काम किया है। इससे पहले तक कहा जा रहा था कि पुरी से खुद प्रधानमंत्री मोदी चुनाव लड़ेंगे, लेकिन संबित पात्रा को टिकट देकर उन्हें इम्तिहान में बैठा दिया गया। अब मरता क्या न करता की तर्ज पर सबसे पहले तो संबित पात्रा ने भगवान जगन्नाथ की मूर्ति हाथ ली और पहुंच गए नामांकन दाखिल करने। अब आंकड़े बता रहे हैं कि उनकी जीत आसान नहीं होगी। दरअसल हिंदू धर्म के पवित्र तीर्थस्थलों में से एक पुरी को पारंपरिक तौर पर बीजू जनता दल का गढ़ माना जाता है। इस वजह से असली परीक्षा तो वाकई संबित पात्रा की होने जा रही है, जिस पर सभी की नजरें टिक गई हैं।

निषाद की कमी खलेगी?
खबर है कि सपा-बसपा गठबंधन से अलग हुए निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने इसकी पूरी जिम्मेदारी पूर्व मुख्यमंत्री और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के खाते में डाल दी है। दरअसल निषाद का कहना था कि उन्हें उम्मीद थी कि अखिलेश हमारी पार्टी के लिए सीटों का ऐलान करेंगे, लेकिन उन्होंने अपने पोस्टरों में हमारी पार्टी का नाम और एक शब्द तक नहीं छपवाया। इसके बाद आखिर कहने को बचता क्या हे, इसलिए निषाद ने कह दिया कि अब वो स्वतंत्र हैं और हमारे सामने सभी विकल्प खुले हुए हैं। इसे गठबंधन के लिए झटका बताया जा रहा है, जबकि राजनीतिक समीक्षकों ने कहना शुरु कर दिया है कि ये सब तो चुनाव के दौरान होता ही है, इसलिए इसका खासा असर होगा ऐसा नहीं है। दरअसल एक तरफ जहां निषाद की कमी अखिलेश को खलेगी तो वहीं निषाद के विरोधी गठबंधन के साथ खड़े हो जाएंगे। मतलब खेल फिर बराबरी पर आ जाएगा।

मुरली मनोहर का दु:ख
इसमें शक नहीं कि मौजूदा लोकसभा चुनाव जीतना भाजपा की पहली प्राथमिकता है और इसलिए पार्टी का शीर्ष नेतृत्व चुन-चुनकर उम्मीदवारों को टिकट देने का काम कर रही है। चीन्ह-चीन्ह के टिकट देने वाली नई परंपरा से भाजपा के अनेक दिग्गज नाराज होते दिख रहे हैं। दरअसल उम्र दराज कहकर मौजूदा सांसद लालकृष्ण आडवाणी को पहले ही हाशिये पर पहुंचाया जा चुका है और अब मुरली मनोहर जोशी का भी टिकट काटा गया है। सूत्र कह रहे है पार्टी की ओर से संगठन महासचिव रामलाल ने उन्हें इस बात की सिर्फ सूचना ही नहीं दी बल्कि उनसे यह भी कह दिया कि वो पार्टी ऑफिस आकर चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान करें। इससे खफा जोशी कह रहे हैं कि ये पार्टी के संस्कार नहीं हैं। वाकई चुनाव नहीं लड़वाने की बात यदि हुई है तो पार्टी अध्यक्ष शाह को खुद आकर उन्हें सूचित करना चाहिए था। बहरहाल आडवाणी और शत्रु जैसे नेताओं की ही लाइन में मुरली मनोहर जोशी को भी लगा दिया गया है, जिससे वो खासे दु:खी और नाराज हैं।

सुल्तानपुर का असली सुल्तान
सुल्तानपुर संसदीय सीट से वर्तमान में भाजपा के वरुण गांधी सांसद हैं, चूंकि यह लोकसभा सीट अमेठी से लगी हुई है अत: इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। यहां पर सपा-बसपा ने चन्द्रभद्र सिंह को मैदान में उतारा है तो वहीं कांग्रेस ने राज्यसभा सदस्य डॉ संजय सिंह को आगे किया है। चूंकि भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की लोकसभा सीट अमेठी पहले सुल्तानपुर जिले में ही थी, अत: राजनीतिक गलियारे में चर्चा आम है कि यहां का सुल्तान कौन होगा यह गांधी परिवार ही तय करता है और ऐसे में यदि वरुण गांधी को भाजपा आगे करती है तो फिर मुकाबला दिलचस्प हो जाएगा। क्योंकि संजय सिंह को जीत दिलवाने के लिए राहुल और प्रियंका भी जीतोड़ मेहनत करेंगे ही करेंगे। फिलहाल कहा यह जा रहा है कि मामला त्रिकोणीय मुकाबले वाला है, जिसमें से मतदाता किसे सुल्तानपुर का सुल्तान बनाता है यह देखने वाली बात होगी।

चाचा ने याद दिलाई
मध्य प्रदेश मंत्रीमंडल के सबसे युवा मंत्री हमेशा जोश से भरे रहते हैं। उनके जोशीले अंदाज और फटाफट अंग्रेजी बोलने का असर पार्टी कार्यकर्ताओं पदाधिकारियों और मंत्रियों के बीच देखने को मिलता है। मुख्यमंत्री कमल नाथ के करीब होने से उनका रुतबा मंत्रालय की तीसरी मंजिल में देखते ही बनता है। उन्होंने अपने गुरु जो उनके सगे चाचा भी हैं को मंत्री बनने के बाद ना भोपाल बुलाया और ना ही अपना मंत्रालय दिखाया, जबकि चाचा अपने भतीजे का रुतबा देखने के लिए बेचैन थे। वह खुद ही बिना किसी सूचना के मंत्रालय पहुंच गए। चाचा को देखते ही मंत्री जी ने सम्मान में अपनी कुर्सी छोड़कर उन्हें उस पर बैठाया। चाचा ने भी मंत्री जी को गले लगाया और वहां उपस्थित लोगों के सामने कहा कि मेरा भतीजा मंत्री बन गया, लेकिन अभी तक मंत्रालय नहीं दिखाया था। आज मैं खुद देखने आ गया। चाचा के इतना कहते ही मंत्री जी कुछ समय पहले, तक जिस जोशीले अंदाज में बतिया रहे थे। उसकी जगह उन्होंने मौन धारण कर लिया। सत्ता के गलियारे में इसे ही कहा जाता है सत्ता का मद।

हारे हुए को फिर मौका
भाजपा ने कुछ सीटों पर नाम तय कर दिए हैं, इन नामों में जो सबसे विवादित नाम है वो अमेठी से स्मृति ईरानी का बताया जाता है। दरअसल वीवीआईपी सीट मानी जाने वाली अमेठी लोकसभा सीट से पिछली बार की हारी हुई प्रत्याशी स्मृति ईरानी को पार्टी नेतृत्व ने एक बार फिर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुकाबला करने का आदेश सुना दिया है। इस फैसले पर पार्टी के अंदर ही कानाफूसी शुरु हो गई है। दरअसल मोदी सरकार को शुरु से निशाने पर रखने वाले पार्टी नेताओं का कहना है कि एक तरफ पार्टी के वो वरिष्ठ नेता हैं जो लगातार जीतते चले आ रहे हैं और दूसरी तरफ पार्टी नेतृत्व उन लोगों को लगातार आगे बढ़ाने का काम कर रहा है जो हारते और विवादों में रहते चले जा रहे हैं। इससे पार्टी किस तरह से मजबूत होगी समझ से परे है। विरोधियों का कहना है कि इन फैसलों के बाद आखिर पार्टी के वरिष्ठ नेता जमीनी कार्य कैसे कर पाएंगे, यह भी एक बड़ा सवाल है। उम्रदराज कहकर वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी पार्टी के लिए भारी भी पड़ सकती है, जबकि हारे हुए उम्मीदवार को एक पर एक मौका जो दिया जा रहा है।

क्या गिरिराज घिर रहे
बिहार में भाजपा ने गठबंधन के सहयोगी दलों के साथ सीट बंटावारे का ऐलान करते हुए बतलाया कि भाजपा 17, जेडीयू 17 और लोजपा 6 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। इसी के साथ भाजपा ने अपने दो बड़े नेताओं गिरिराज सिंह और शाहनवाज की सीट सहयोगियों को दे दी। दरअसल गिरिराज सिंह की नवादा सीट लोजपा के खाते में चली गई इस कारण उनके बेगूसराय से चुनाव लड़ने की बात सामने आई है। वहीं बेगूसराय से जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार के भी चुनाव लड़ने की अटकलें तेज हो गई हैं। अब कुछ लोगों को यह मुकाबला रोचक लग रहा है तो वहीं कुछ ने कहना शुरु कर दिया है कि आखिर यह कौन से कर्मों का फल है जो कि गिरिराज जैसे नेता को कन्हैया के सामने खड़ा किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि कन्हैया के पास तो खोने को कुछ भी नहीं है, जो कुछ भी है उसे पाना ही पाना है, लेकिन कम से कम गिरिराज जैसे नेता को तो इस तरह से मत घेरो।

क्या मेघवाल कांग्रेस के एजेंट ?
राजस्थान के दिग्गज भाजपा नेता देवी सिंह भाटी ने पार्टी से इस्तीफा दिया तो दिया, लेकिन उन्होंने मौजूदा भाजपा सांसद और केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को कांग्रेस का एजेंट बताकर मानों उनकी मिट्टीपलीत ही कर दी है। भाटी ने पार्टी से मेघवाल को टिकट नहीं देने की मांग करते हुए इस्तीफा दिया है, इसका मतलब साफ है कि यदि पार्टी उन्हें टिकट देती है तो भाटी उनका जमीनी स्तर पर विरोध करेंगे और यदि उन्हें टिकट नहीं मिलती है तो आगे भी वो कुछ खास नहीं कर पाएंगे। कुल मिलाकर भाटी ने एक ऐसा दांव खेला है जिसमें वो हार कर भी जीत गए हैं, जबकि मेघवाल सब कुछ पाकर भी पराजित होते दिख रहे हैं। यही वजह है कि मेघवाल समर्थक भी दबी जुबान में कहते देखे जा रहे हैं कि भाटी ने तो जाते-जाते भी मेघवाल का कबाड़ा कर दिया है, अब इसकी खानापूर्ति कैसे होगी यह देखने वाली बात है। वैसे राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता है, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि भाटी और मेघवाल पर्दे के पीछे मिल भी सकते हैं। 7 बार के विधायक देवी सिंह भाटी, मेघवाल के मुखर विरोधी रहे हैं, इसलिए इस विरोध को मेघवाल के लिए ही नहीं बल्कि पार्टी के लिए भी सिरदर्द बताया जा रहा है।

शरद पवार की भविष्यवाणी
एनसीपी यानी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार ने आमचुनाव को लेकर जो भविष्यवाणी की है उससे सभी की नजरें उन पर जा टिकी हैं। दरअसल शरद पवार ने कहा है कि ‘मैं थोड़ी-बहुत जो राजनीति जानता हूं उस आधार पर कह सकता हूं कि लोकसभा चुनाव 2019 के बाद मोदी जी दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे।’ इसके साथ ही पवार ने यह भी कह दिया कि वो कोई ज्योतिषी नहीं हैं उनके पास जादुई आंकड़ा नहीं होगा। इस प्रकार भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने वाला है। ऐसा हो सकता है कि उसे सबसे ज्यादा सीटें मिलें। इस पर जानकार कह रहे हैं पवार तो खुद भ्रमित हैं क्योंकि एक तरफ वो कह रहे हैं कि पूर्ण बहुमत नहीं मिल रहा है फिर कह रहे हैं कि सबसे बड़ी पार्टी भाजपा ही होगी और फिर कहते हैं कि मोदी जी प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। इससे तो मुलायम अच्छे हैं जो कम से कम मोदी जी को दोबारा प्रधानमंत्री बनने का आशीर्वाद तो देते हैं।

तंज पर तंज कर भाजपा उलझी
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने डोभाल पर तंज कसते हुए आतंकी मसूद अजहर को ‘अजहर जी’ कहा तो भाजपा के नेताओं ने उनको निशाने पर लेते हुए कहना शुरु कर दिया कि दिग्विजय सिंह की ही तरह राहुल के लिए भी ये आतंकी सम्माननीय हो गए हैं। इस पर कांग्रेस नेताओं ने भाजपा को निशाने पर लेते हुए कहना शुरु कर दिया है कि कांग्रेस नेता तो आतंकियों पर तंज कसने के लिए ‘जी’ का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन जो लोग बाइज्जत उन्हें कंधार तक छोड़कर आए हैं उनके बारे में भी तो कुछ कहा जाना चाहिए। कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट करते हुए सवाल किया कि क्या एनएसए श्री डोभाल आतंकवादी मसूद अज़हर को कंधार ले जाकर रिहा कर नहीं आए थे? एक और सवाल कि क्या मोदी जी ने पाक की आईएसआई को पठानकोट आतंकवादी हमले की जाँच करने नहीं बुलाया? इस प्रकार भाजपा कटाक्ष करके अब पछता रही होगी क्योंकि इस मामले में उसकी ज्यादा किरकिरी हो रही है।

फारुख की कसम के निहितार्थ
फिलहाल जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव नहीं हो रहे हैं, लेकिन सियासी भविष्य को ध्यान में रखते हुए नेशनल कांफ्रेंस अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला कह रहे हैं कि वो मरते मर जाएंगे लेकिर भाजपा के साथ गठबंधन नहीं करेंगे और न ही उनके समर्थन से सरकार ही बनाएंगे। गौरतलब है कि कश्मीर में भाजपा अ

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