अंधेरे में चमकने वाले लेंस से डायबिटीज के मरीजों को मिल सकती है रोशनी

वॉशिंगटन, डायबिटीज के शिकार लोगों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसके कारण कई बार उनकी आंखों की रोशनी भी चली जाती है। अब विशेषज्ञों ने अंधेरे में चमकने वाले ऐसे कॉन्टैक्ट लेंस विकसित किए हैं, जो डायबिटीज के मरीजों को नेत्रहीनता से राहत दिलांएगे। अमेरिका के कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा इलाज विकसित किया है, जिसमें दर्द की गुंजाइश न के बराबर है। यह इलाज ग्लो इन द डार्क कॉन्टैक्ट लेंस है। दुनिया भर में लाखों लोग मधुमेह से पीड़ित हैं और उन्हें नेत्रहीनता, डायबिटिक रेटिनोथैरेपी का खतरा है। इस समस्या के लिए अभी जो इलाज उपलब्ध है, वह थोड़ा तकलीफदेह है। इसमें आईबॉल में लेजर और इंजेक्शन का उपयोग किया जाता है।
मधुमेह की वजह से पूरे शरीर में खून पहुंचाने वाली नसों को नुकसान होता है। आंखों की नसों को नुकसान से रोशनी जाने की समस्या होती है, क्योंकि रेटीना की नर्व सेल्स में खून का प्रवाह कम हो जाता है और वे खत्म होने लगती हैं। आमतौर पर रेटीना में नए नर्व सेल्स भी बनते हैं। लेकिन डायबिटीज के मरीजों के रेटीना में ऑक्सीजन की आपूर्ति नहीं होने से ये कोशिकाएं सही से विकसित नहीं हो पातीं और आंखों के अंदर प्लाज्मा का स्राव होने लगता है। इसकी वजह से उनकी आंखों की रोशनी चली जाती है। नया लेंस इस तरह डिजाइन किया गया है जिससे रात को रेटीना की ऑक्सीजन की मांग कम हो जाती है।
इसके लिए आंखों की रॉड कोशिकाओं को नया लेंस स्वयं मामूली रोशनी देता है। यह प्रक्रिया पूरी रात चलती है। इसके लिए लेंस में कलाई में पहनी जाने वाली घड़ी की तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। ट्रीटियम से भरी नन्हीं शीशियों से रोशनी मिलती है। ट्रीटियम हाइड्रोजन गैस का रेडियोएक्टिव रूप है, जिसके क्षरण के दौरान इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होता है। अंधेरे में जब रेटीना का प्यूपिल फैलता है, तब नन्हीं शीशियों से आने वाली रोशनी की वजह से रेटीना को भी रोशनी मिलती है, जो नेत्रहीनता की समस्या दूर करती है।

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