बोडोलैंड को अलग राज्‍य का 50 साल पुराना व‍िवाद खत्म, मोदी सरकार की बड़ी कामयाबी

गुवाहाटी, देश में पूर्वोत्‍तर के राज्‍यों से उग्रवाद के खात्‍मे का वादा कर सत्‍ता में आई केंद्र की मोदी सरकार को इस दिशा में सोमवार को बड़ी सफलता हाथ लगी। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी में केंद्र सरकार, असम सरकार और बोडो उग्रवादियों के प्रतिनिधियों ने असम समझौता 2020 पर हस्‍ताक्षर किया। समझौते के साथ ही करीब 50 साल से चला रहा बोडोलैंड विवाद समाप्‍त हो गया। इस विवाद में अब तक 2823 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। पिछले 27 साल में यह तीसरा ‘असम समझौता’ है। सूत्रों के मुताबिक इस विवाद के जल्‍द समाधान के लिए मोदी सरकार लंबे समय से प्रयासरत थी और शाह के गृहमंत्री बनने के बाद इसमें कफी तेजी आई।
इस मौके पर गृहमंत्री ने कहा कि उग्रवादी गुट नैशनल डेमोक्रैटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के 1550 कैडर 30 जनवरी को अपने 130 हथियार सौंपकर आत्‍मसमर्पण कर देने वाले है। शाह ने कहा कि समझौते के बाद अब असम और बोडो के लोगों का स्‍वर्णिम भविष्‍य सुनिश्चित होगा। उन्‍होंने आश्‍वासन दिया कि केंद्र सरकार बोडो लोगों से किए गए अपने सभी वादों को समयबद्ध तरीके से पूरा करेगी। उन्‍होंने कहा कि इस समझौते के बाद अब कोई अलग राज्‍य नहीं बनाया जाएगा।
क्‍या है बोडो विवाद
करीब 50 साल पहले असम के बोडो बहुल इलाकों में अलग राज्‍य बनाने को लेकर हिंसात्‍मक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्‍व एनडीएफबी ने किया। यह विरोध इतना बढ़ा कि केंद्र सरकार ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) कानून, 1967 के तहत एनडीएफबी को गैर कानूनी घोषित कर दिया। बोडो उग्रवादियों पर हिंसा, जबरन उगाही और हत्‍या का आरोप है। पिछले 50 सालों में 2823 लोग इस हिंसा की भेंट चढ़ चुके हैं। बोडो असम का सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय है जो राज्‍य की कुल जनसंख्‍या का 5 से 6 प्रतिशत है। यही नहीं लंबे समय तक असम के बड़े हिस्‍से पर बोडो आदिवासियों का न‍ियंत्रण रहा है। असम के चार जिलों कोकराझार, बाक्‍सा, उदालगुरी और चिरांग को मिलाकर बोडो टेरिटोरिअल एरिया डिस्ट्रिक का गठन किया गया है। इन जिलों में कई अन्‍य जातीय समूह भी रहते हैं। बोडो लोगों ने वर्ष 1966-67 में राजनीतिक समूह प्‍लेन्‍स ट्राइबल काउंसिल ऑफ असम के बैनर तले अलग राज्‍य बोडोलैंड बनाने की मांग की।
साल 1987 में ऑल बोडो स्‍टूडेंट यूनियन ने एक बार फिर से बोडोलैंड बनाए जाने की मांग की। यूनियन के नेता उपेंद्र नाथ ब्रह्मा ने उस समय मांग की कि असम को 50-50 में बांटने की मांग की। दरअसल, यह विवाद असम आंदोलन (1979-85) का परिणाम था जो असम समझौते के बाद शुरू हुआ। असम समझौते में असम के लोगों के हितों के संरक्षण की बात कही गई थी। इसके फलस्‍वरूप बोडो लोगों ने अपनी पहचान बचाने के लिए एक आंदोलन शुरू कर दिया। दिसंबर 2014 में अलगवादियों ने कोकराझार और सोनितपुर में 30 लोगों की हत्‍या कर दी। इससे पहले वर्ष 2012 में बोडो-मुस्लिम दंगों में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी और 5 लाख लोग विस्‍थापित हो गए थे।

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