J & K में पाबंदियों की समीक्षा के लिए SC ने कमेटी बनाने का फैसला किया

नई दिल्ली,जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद लगाई गई पाबंदियों के खिलाफ दायर याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जम्‍मू कश्‍मीर में पाबंदियों के आदेश की समीक्षा के लिए कमेटी बनाई जाएगी। यह कमेटी समय-समय पर पाबंदी की समीक्षा करेगी। सरकार पाबंदियों पर आदेश जारी कर इनकी जानकारी दे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट लोगों का मौलिक अधिकार है। जम्मू कश्मीर में इंटरनेट अनिश्चितकाल के लिए बंद नहीं किया जा सकता। जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट पर लगी पाबंदी को हटाने के लिए सरकार तत्काल स्थिति की समीक्षा करे। इंटरनेट का अस्थाई निलंबन, नागरिकों की बुनियादी स्वतंत्रता में मनमानी नहीं होनी चाहिए, न्यायिक समीक्षा के लिए खुलापन होना चाहिए। जम्‍मू कश्‍मीर में इंटरनेट निलंबन की तत्‍काल समीक्षा की जानी चाहिए।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा कि जम्मू-कश्मीर में सरकारी वेबसाइटों और ई-बैंकिंग सुविधाओं तक पहुंच की अनुमति देने पर विचार करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि रिव्‍यू कमेटी द्वारा हर 7 दिन में क्षेत्र में इंटरनेट प्रतिबंधों की आवधिक समीक्षा की जानी चाहिए।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोगों के अधिकारों को सुरक्षित करना होगा। आजादी और सुरक्षा में संतुलन जरूरी है। राजनीति में दखल देना हमारा काम नहीं है। जम्‍मू कश्‍मीर ने बहुत हिंसा देखी है। दरअसल, पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा लिया था। कांग्रेस नेता और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद और कश्मीर टाइम्स की संपादक अनुराधा भसीन सहित कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर लगाई गई पाबंदियों को चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान गुलाम नबी आजाद की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने नियंत्रण का विरोध करते हुए कहा था कि वह ये समझते हैं कि वहां राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला है, लेकिन 70 लाख लोगों को इस तरह बंद करके नहीं रखा जा सकता। यह जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। राष्ट्रीय सुरक्षा और जीवन के अधिकार के बीच संतुलन होना चाहिए।
कश्मीर टाइम्स की संपादक अनुराधा भसीन की ओर से पेश वकील वृन्दा ग्रोवर ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर में जारी पाबंदियां असंवैधानिक हैं। ऐसे मामलों में संतुलन का ध्यान रखा जाना चाहिए। जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने गत मंगलवार को अनुच्छेद 370 हटने के बाद से राज्य में इंटरनेट सेवा पर लगी रोक को जायज ठहराते हुए कहा था कि ऐसा न होने से अलगाववादी, आतंकी और पाकिस्तानी सेना सोशल मीडिया के जरिए लोगों को जिहाद के नाम पर भड़का सकती है।

Share

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *