…और अब जोगी परिवार मुक्त कांग्रेस की कवायद

रायपुर,एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ अभियान पर फोकस किये हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस के फील्ड कप्तान राहुल गांधी गुजरात चुनाव के जरिये कांग्रेस को मोदी के गृह राज्य से ऑक्सीजन दिलाने दिन-रात एक कर रहे हैं। और यहां छत्तीसगढ़ में प्रदेश कांग्रेस संगठन जोगी परिवार मुक्त कांग्रेस की रेस में उतर गया है। पहले अजीत जोगी फिर उनके विधायक पुत्र अमित जोगी। अब जोगी की पत्नी श्रीमती रेणु जोगी से मुक्ति की तैयारी नहीं तो इसे और क्या कहा जाये कि कांग्रेस विधायक दल की उपनेता श्रीमती जोगी को प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने इस बात पर नोटिस थमा दिया कि वे अपने पारिवारिक कार्यक्रम में अपने पति के साथ क्यों बैठीं! अजीब सा लगता है कि जब सब को साथ जोड़ने का दावा करने वाली कांग्रेस अपने ही विधायक दल की उपनेता को उनके पति से तोड़ने की कसरत करती नज़र आये। छत्तीसगढ़ कांग्रेस में जोगी और संगठन के बीच चली लम्बी रस्साकसी का परिणाम यह निकला कि अजीत जोगी ने खुद कांगेस से नाता तोड़कर अपनी पार्टी बना ली। उनके पास इसके अलावा कोई विकल्प शेष नहीं रह गया था। अगर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने उस समय छत्तीसगढ़ कांग्रेस की महाभारत में प्रभावी दखल दिया होता तो यह नौबत नहीं आती। जोगी लगातार उपेक्षित किये जा रहे थे। एक दौर था जब कांग्रेस के दिल्ली दरबार में जोगी के खिलाफ एक शब्द नहीं सुना जाता था। वक्त बदला तो उसी दरबार में जोगी बेगाने हो गए। जोगी के मातहत मंत्री रहे भूपेश बघेल की सूबेदारी में ऐसा माहौल बना दिया गया कि आखिरकार जोगी कांग्रेस से रूखसत हो गए। दिल्ली को यह भरोसा दिला दिया गया कि जोगी से छुटकारा मिलने पर राज्य में कांग्रेस मजबूत हो जायेगी। कांग्रेस आलाकमान को यह पता है कि जोगी व्यापक जनाधार वाले नेता हैं। निकालने पर उन्हें अधिक सहानुभूति मिलेगी इसलिए यह रास्ता देखा गया कि वे खुद निकल जायें। हुआ भी ऐसा ही। जोगी ने अपनी पार्टी बनाई और कांग्रेस से विलग हो गए। जोगी पुत्र अमित तो पहले ही कांग्रेस संगठन गुट की आंख में कंकड़ की तरह गड़ते रहे हैं। वे भी पूरी ताकत से कांगेस संगठन को चुनौती देकर विधायक दल से निलम्बित हो गए। इस तरह कांग्रेस ने दो जोगियों से मुक्ति पा ली। जोगी के दो समर्थक विधायक आर के राय और सियाराम कौशिक भी कांग्रेस से निलम्बित किये गए। मगर विधायक दल की उपनेता रेणु जोगी से छुटकारा पाना आसान नज़र नहीं आया क्योंकि उन्होंने पारिवारिक धर्म के साथ-साथ राजनीतिक धर्म भी पूरी निष्ठा के साथ निभाया। राष्ट्रपति चुनाव के वक्त उनकी निष्ठा पर संदेह किया गया तब नेता प्रतिपक्ष टी एस सिंहदेव ने उनका साथ देते हुए कहा था कि श्रीमती रेणु जोगी की निष्ठा पर प्रश्नचिंह नहीं लगाया जा सकता। मगर उस दौरान भी यह संकेत तो मिल ही गया था कि पीसीसी अब ‘जोगी परिवार मुक्त कांग्रेस’ की राह पर कदम रख चुकी है। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर उभरे विवाद ने ज्यादा जोर नहीं पकड़ा क्योंकि श्रीमती जोगी ने कांग्रेस संगठन के लोगों को कोई अवसर नहीं दिया। वे पारिवारिक तौर पर पति और पुत्र के साथ पूरी जिम्मेदारी से खड़ी होती हैं तो राजनीतिक जिम्मेदारी के तहत कांग्रेस का भरपूर साथ निभाती हैं। ठीक भी है। राजनीति अपनी जगह और परिवार अपनी जगह। कोई एक फर्ज दूसरे से न टकराये, इसका बखूबी ख्याल श्रीमती जोगी रखती रही हैं। लेकिन अब स्पष्ट नज़र आ रहा है कि कांग्रेस संगठन पूरे जोगी परिवार से मुक्ति पा लेने छटपटा रहा है। अगर ऐसा है तो इसमें जोगी का कोई नुकसान नहीं होगा और कांग्रेस को कोई फायदा मिलेगा, इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता। यदि कांग्रेस संगठन के नेता चाहते हैं कि श्रीमती जोगी हालात के मद्देनजर कांग्रेस से अलग हो जायें तो उन्हें यह सियासी सावधानी बरतना होगी कि वे खुद विदा न लें। अगर कांग्रेस उनकी विदाई करती है तो सारी राजनीतिक संवेदना उनके साथ होंगी क्योंकि उन्होंने कांग्रेस के साथ हर-पल हर हाल में वफादारी की है। यहां कांग्रेस के उन रणनीतिकारों को भी यह समझ में आना चाहिए कि श्रीमती जोगी को साथ लेकर चलने के कितने राजनीतिक फायदे हैं। यदि पूरी ईमानदारी से कांग्रेस से जुड़ी महिला नेता को सिर्फ पारिवारिक दायित्व की आड़ में तिरस्कृत किया जायेगा अथवा छुटकारे का माहौल बनाया जायेगा तो यह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा हो सकता है। मामला कुछ ऐसा है कि श्रीमती जोगी अपने परिवार के साथ पैतृक गांव में हुए निजी कार्यक्रम में सम्मिलित हो गईं। इस पर उन्हें नोटिस दे दिया गया। श्रीमती जोगी ने जो जवाब पेश किया है, वह पीसीसी को आइना दिखाने का प्रयास है। उन्होंने इसे दुखद और आश्चर्य जनक बताते हुए कहा है कि देश का संविधान और कांग्रेस का लोकतंत्र किसी महिला को अपने पत्नी धर्म और पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने से न तो रोकता है और न ही बंदिशें लगाता है। रेणु जी ठीक कहती हैं। यहां कांग्रेसियों को एक वाकया याद दिला दें कि जब कांग्रेस के नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के विवाह समारोह में शामिल होने उनकी दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया राजी नहीं थीं तो ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया ने अटलबिहारी वाजपेयी से आग्रह करके उन्हें रजामंद किया था। आशय यह कि पारिवारिक मामलों में राजनीति का चश्मा आंखों पर नहीं चढ़ाना चाहिए।

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