व्यंग

आओ हरियाली, हरियाली खेलें
प्रभुनाथ शुक्ल
(व्यंग) हमारे देश में हरियाली का अकाल पड़ गया है। विकास की बुलट रेल शहर बसा रही है जिसकी वजह से गांव और जंगल उजड़ रहे हैं। नतीजा पर्यावरण के साथ जल संकट भी खड़ा हो गया है। हरियाली नहीं बची तो जीवन नहीं बचेगा। पेड़ मर गए तो जीवन मर जाएगा। जिसकी वजह से सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर हरियाली बचाने के प्रयास हो रहे हैं। मानसून सत्र में पेड़ लगाओ उत्सव चल रहा है। पर्यावरण संरक्षण के नारे गढ़े जा रहे हैं। धरती को हरी-भरी बानाने का अभियान इतना तेज हो चला है कि एक-एक दिन में करोड़ों नवजात पौधे एक जगह से अपदस्थ कर दूसरी जगह वृक्ष स्थापना की उम्मीद में पदस्त किए जा रहे हैं। वैसे भी अपदस्त करने का मौसम चल रहा है। कुछ का द इंड को गया है तो दूसरे वेटिंग लिस्ट में हैं। अपदस्त का मंचन कब सतह पर आ जाए कुछ कहा नहीं जा सकता है। हरियाली स्थापना अभियान चंद्रयान मिशन से भी तगड़ा है। पेड़ों को कागजी कक्षा में बैठाने का सफल परीक्षण जारी है। मिशन को सफल करने में पूरी सरकार लगी है। एक दिन में ग्लोबल ग्रीन का रिकार्ड भी बनाया जा रहा है। गिनीज बुक वालों को खोजा रहा है।
नवजात वृक्ष शिशुओं के लिए यह परम सौभाग्य का दिन है। वह अपने भाग्य पर इठला रहे हैं। नेता, अफसर, संतरी, मंत्री सभी नवजातों को प्रतिस्थापना को लेकर व्यग्र हैं। बाद में खाद-पान के बगैर कुपोषण का शिकार हो जाएं चलेगा, लेकिन अभी तो उनका वक्त है। वह मासूमन का धन्यावाद दे रहे हैं। मानसून से चिरौरी करते फिर रहे है कि काश आप इसी तरह हमेेंशा कायम रहें। गली मोहल्ले के छुटभैइये नेता से लेकर पूरी सरकार हरियाली उत्सव में शरीक है। पौधे लगा कर सोशलमीडिया पर हजारों हजार सेल्फी हर रोज अपलोड़ हो रही है। नवजात शिशुओं का टेम्पोंहाई है। वह मुख्यमंत्री, अधिकारी, संतरी, नेता, व्यापारी, बुद्धजीवि, वैज्ञानिक, पर्यावरण विद् के हाथों में पहुंच इतरा रहे हैं। वह खुद सौभाग्यशाली समझ रहे हैं। नवजात वृक्ष शिशुओं में होड़ लगी है। नवजात वृक्ष खुद एक दूसरे को नीचे दिखा रहे हैं। कोई कह रहा है देख हम सीएम के हाथ से पदस्त हुए, दूसरा बोल रहा है कि हमें सचिव साबह ने रोपा। तीसरा बोल रहा है कि हमें अभिनेता जी ने रोपा और कुछ बगैर रोपे दुनिया से अलविदा हो गए। उन्हें अपने भाग्य पर इतराने का मौका भी नहीं मिला।
ट्वीटर, इंस्टाग्राम, फेसबुक, वाट्सप ग्रुप में हरियाली उत्सव छाया है। जमींन में एक वृक्ष पदस्त हो रहा है, लेकिन मीडिया के सैकड़ों कमैरे चमक रहे हैं। कोई पत्तियां पकड़े है तो कोई जड़ और तना। साहब के हाथ में फावड़ा है। जूते की पालिश तक फीकी नहीं पड़ रही है। हाथ में मिट्टी तक नहीं लगी है। भला यह परम सौभाग्य इन बेचारों को कब मिलता। यह तों सरकारें ही कर सकती हैं। इतना बड़ा उत्सव वहीं मना सकती हैं। यह हर साल बारिश में मनाया जाता है। अखबारों में हरियाली उत्सव के नारे और बड़े-बड़े इश्तिहार छपते हैं। पर्यावरण बचाने का ज्ञान बखरा जाता है। सख्त से सख्त निर्देश जारी होते हैं। वृक्षों की पदस्थता के लिए करोड़ों खारिज होते हैं। अगले बरस के मानसून का फिर इंतजार किया जाएगा। तब तक जमींन में वृक्षों की जड़ें जमाने और उनकी सुरक्षा के लिए दूसरा बजट खारिज होगा। अगले साल मानसून की दस्तक के साथ हरितिमा की नई योजना बनाई जाएगी। फिर हरियाली उत्सव मनाया जाएगा। फिर नई सरकार आएगी। अपने स्तर से दूसरी योजना लाएगी। अब तक की सरकारों में जो करोड़ों वृक्ष रोपे गए उसमें कितने वेंटीलेटर पर और आईसीयू में हैं उसकी चिंता किसी को नहीं है। उसमें कोई जिंदा भी है या नहीं इसकी भी फिक्र नहीं है। क्योंकि मरने वालों का हिसाब नहीं रखा रखा जाता। सरकारें सिर्फ वर्तमान का हिसाब रखती हैं। दूसरों का लेखाजोखा नहीं छेड़ना चाहती। गलत परंपरा नहीं डालना चाहती। यह उत्सव ही कागजी होता है। जब से देश में यह अभियान चल रहा है इंच पर जमींन शायद नहीं बचती अगर सारे पदस्थापित पौधे जिंदा बचे होते। अगर ऐसा हो जाएगा तो नयी सरकारों हरियाली उत्सव कैसे मनाएंगी। करोड़ों का बजट कैसे खारिज होगा। यह सरकारों की आपसी समझदारी है। इसिलए पुराने पदस्थ वृक्षांे का हिसाब नहीं रखा जाता। बस! आप भी पुरानी हरियाली का लेखा-जोखा मत मांगिए। पेड़ लगाइए। सेल्फी डालिए और हरियाली का उत्सव मनाइए।

नेतागिरी का डिग्री कॉलेज
दीपक दुबे
आखिर वह बहुप्रतीक्षित और मेरे मन का कोर्स आ ही गया । हां सच बताउं तो इस सब्जेक्ट पर सर्च करते करते थक चुका था मगर कोईऩ ऐसा इंस्टीटयूट नही मिला था जो इस पर कोर्स चला रहा हो। हां यह कार्य है नेतागिरी सीखने के लिए कालेज का। यह बीडा राप्टीय स्वयं सेवक संघ ने उठाया हे। संघ ने ऐलान किया है कि वह टेनिंग देकर 9 महीने मे नेता बनायेगा। वह नेतागिरी करने के इच्छुक लोगो को नेतागिरी के दांवपेंच सिखायेगा। नेतागिरी का डिग्री कोर्स नो माह का होगा।
मेरे लिए रोजगार का यह नया और धांसू आईडिया मिला है यह सुनते ही मैने तो डिग्री कोर्स चलाने वाले कॉलेज खोलने की तैयारी भी शुरू कर दी है। कुछ रूपरेखा बताउं? तो सबसे पहले इस डिग्री कोर्स वाले कॉलेज का नाम भारतीय संस्कृति से जुडा भारी भरकम अत्यंत क्लिप्ट नाम होगा। यहां आने वाले युवाओं की योग्यता इंटरव्यू कर जानी जायेगी।
एडमीशन के लिए पहली योग्यता जबान से पलटना होगी क्योकि राजनीति का यह आवश्यक गुण होता हे कि आप जबान से कितनी बार पलटते है और ऐसा दिन मे कितनी बार करते है? एडािrशन लेने के इच्छुक युवाओं की खाल मोटी और बार बार झुककर पैर छूने की कला आनी चाहिए। वह लंगोट और जबान का कच्चा होना चाहिए।
एक नेता का एक और गुण, आप कितना ज्यादा झूठ बोल सकते है? इसके लिए आपसे यह पूछा जायेगा कि किन किन मौको पर आपने सफलता पूर्वक झूठ बोले है। फिर आपकी बॉडी लैंगवेज पर भी ध्यान दिया जायेगा। कितनी बार आप भापण देते समय हवा मे हाथ उछालते है ? कितनी बार एक हाथ कितनी बार दोनो हाथ। कितनी बार आप माथे का पसीना, जो कि नही आया रहता हे, पोंछने के लिए रूमाल निकालते है। कितनी बार पानी का गिलास मुह से लगाते हे मगर पीते नही।
आप कितनी बार मित्रो,भाईये बहनो,माताओं का किस तरह से उच्चारण करते हैं। आपको यह भी करना होगा कि कभी आप मामा बन जाओ कभी दादा कभी चाचा बाकि भईया तो हो ही।
यह टोपी युग है विलुप्त होती यह संस्कृति फिर से फार्म मे है। पिछले कुछ सालों से यह खास आदमी के सिर से उडकर आम आदमी के सिर पर आ गई है। अब ये टोपियं एक दूसरे पर कीचड उछाल रहीं हैं। अब सवाल यह है कि टोपी किस रंग की आप पर सूट करेगी,कुर्ता किस रंग का पहनेंगे। या फिर हॉफ पेंट और सफेद शर्ट से काम चलाना होगा। यह भी पूछा जायेगा कि कभी आपने जुलूस मे लठृठ खाये है। पानी की धार आपने पर झेली है ?
एक और महत्वपूर्ण बात कि कही ऐसा तो नही कि आप उधार लेकर चुकाते रहे हो? कतई नही ऐसा हे तो कोर्स के लिए आप अनफिट है। आपको एडमीशन नही मिलेगा। यह तो नेतागिरी की पहली श्शर्त हे भईऩ कि राम राम जपना पराया माल अपना। हां एक और बात आपको अपने साथ चमचों की फौज रखना होगी। ये बिल्कुल दिमाग से पैदल होना चाहिए। दिमाग नाम की चीज ना हो इनकी जुबान पर बस -जी भैयाजी ही होना चाहिए।
अब क्वालिफिकेशन के बाद डिग्रियों की बात करें यह डिग्री कोस्र 9 माह का होगा एक माह फील्ड वक्र के लिए होगा। जिसमे जुलूस मे जाने के कायदे कानून पत्थर फेंकना,नारे लगाना,नये नये नारे गढना आदि सिखया जायेगा। किसी बडे नेता के साथ आपको पंदह दिन के लिए अटैच किया जायेगा। अब देखना अगले दस सालों मे कैसे नेता माफिया नये नये नेतागिरी के कॉलेज खोलकर फर्जी डिग्रियां देना शुरू कर देगे। आप भी तैयार रहियेगा।

गुमशुदा विकास की तलाश…
ज़हीर अंसारी
विकास गुम हो गया है। इसकी तलाश ज़ोरों पर जारी है। कहाँ गुमा, कहाँ गया, किधर गया किसी को नहीं मालूम। विकास बिना बताए ही लापता हो गया है। विकास को लेकर सब तरफ़ हाहाकार मचा हुआ है। भागदौड़ चल रही है। काफ़ी खोजबीन के बाद भी अब तक उसका कोई पता-ठिकाना नहीं मिला।
लापता विकास के बारे में विरोधाभाषी जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है। कोई कहता है उसकी सूरत उजली है। कोई कहता उसका रंग बदरंग है। विकास की उम्र को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। कोई कहता है विकास की उम्र सिर्फ़ पंद्रह साल है, कोई कहता है कि पाँच साल है और कोई इससे आगे बढ़कर 55 साल बताता है। दोनों के अपने दावे हैं। विकास की 55 साल उम्र बताने वालों का दावा है कि हमने विकास को जन्म से पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखा और जनसेवक बनाया था। वहीं विकास की उम्र 5 और 15 कहने वालों का विश्वास है कि उन्हीं की वजह से विकास जेंटलमेन बना है। इतनी कम उम्र में विकास ने प्रगति के कई सोपान तय किया है। विकास की उपलब्धियाँ बेमिसाल है। वैसे विकास की क़द-काठी को भी लेकर दुविधा है। उसकी पहचान का कोई फ़िक्स्ड पैमाना नहीं है। सब अपनी ज़ुबानी अलग-अलग हाँक रहे हैं।
विकास की उम्र और उपलब्धियों की दावेदारी करने वालों से हटकर एक वर्ग ऐसा है जो विकास को नहीं जानता है, और न ही देखा। अलबत्ता उन्होंने विकास का नाम ख़ूब सुना है। पार्टियों के मंच पर, राजनैतिक दलों के कार्यक्रमों में और नेताओं व कार्यकर्ताओं की बहस में। इस वर्ग का मानना है, भले ही हमने विकास को क़रीब से नहीं देखा मगर सुना है कि विकास ने कईयों के वारे- न्यारे कर दिए। फटियल लोग भी अब धन्ना सेठ बने घूम रहे हैं। विकास का धन हड़पकर लज्जापूर्वक विकास की दुहाई देते फिर रहे हैं। विकास के माल से ऐसे लोग चेहरे पर नियमित मसाज और फेशियल करवा रहे हैं।
ऐन चुनाव के वक़्त विकास का ग़ायब होना असामान्य घटना नहीं है। इसके पीछे ज़रूर कोई गहरी साज़िश है। काश विकास मौजूद होता सभी सियासी पार्टियाँ उसे उछाल-उछालकर गोदी में खिलाते नज़र आते। विकास की गुमशुदगी में उसके नाम पर सियासत खेली जा रही है।
चुनावी महफ़िल सज चुकी है। मुनादी पिटवाई जा रही है। विकास तुम जहाँ कहीं भी हो आकर पब्लिक को अपनी शक्ल व सूरत दिखाओ। तुम किसके हो ये बताओ। किसने तुम्हें अपने कंधे पर लादकर ढोया है, ये भी बतलाओ।
जनसामान्य से भी अपेक्षा की जाती है कि वह अपने इर्द-गिर्द विकास को खोजे। मिलने पर उससे सवाल न पूछे और न ही डाँटे-फटकारें। विकास से सिर्फ़ इतनी इल्तिजा करें कि कभी तो नेताओं की गोदी से उतरकर जनता के आसपास फ़टक लिया कर मेरे प्रिय विकास।

नाउ,नो मोर नेतागिरी
प्रो.शरद नारायण खरे
(व्यंग्य) जब हम स्कूल में पढ़ते थे,और एन.सी.सी में ट्रेनिंग करने जाते थे,तो हमें सिखाया जाता था कि नेता का मतलब होता है- वह जो कि नेतृत्व कर सके ,ग्रुप को लीड कर सके ! और बताया गया था कि ये गुण हर आदमी में होना चाहिए ! तो मुझे नेता शब्द से बहुत लगाव हो गया था,और मैं सोते- जागते नेता बनने के सपने देखने लगा था !
उस समय मुझे सिखाया गया था कि भीड़ का नेतृत्व करने के लिए आदमी में भाषण देने की कला भी होनी चाहिए ! तो मैंने कॉलेज में दाखिला लेने के बाद अपने इस सपने को साकार करने की कोशिश शुरु कर दी,और मैं मंच से बोलने वाले कॉम्पटीशन्स जैसे भाषण- वाद विवाद इत्यादि में उत्साह से शामिल होने लग गया था ,क्योंकि मुझे नेता जो बनना था ! जब छात्रसंघ के इलेक्शन हुए तो मैं भी स्टूडेंट यूनियन के जनरल सेक्रेटरी की फाइट करने मैदान में कूद पड़ा ! मैं स्टूडेंट्स को लीड करना चाहता था ,उनका नेतृत्व कपना चाहता था,इसलिए मैं यह मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहता था !पर अब लोग मुझे नेता कहकर खुल्लमखुल्ला संबोधित करने लगे थे ! शुरू मैं तो मैं खुश होता था पर बाद में लगा कि यह तो वे मेरी खिल्ली उड़ाने के लिए कह रहे हैं ! यह उनका मुझ पर टोन्ट है ,एक मजाक है !
कोई कहता ऐ भाईअब तुम पढ़ाई की जगह नेतागिरी करोगे ! तो कोई कहता लगता है पॉलिटिक्स जॉइन करने की तैयारी है,तो कोई कुछ और कमेंट पास कर देता ! पर गज़ब तो तब हो गई जब एक दिन मेरे बाबूजी ही बोल उठे– अच्छा तो अब बरखुरदार लीडरशिप करेंगे !
पर यह सुन-सुनकर मुझे कुछ अजीब सा फील होता ! मैं सोचता कि नेतृत्व करना तो बहुत अच्छी बात है,तो फिर लोग मुझ पर ऐसी कमेंटबाजी क्यों करते हैं ! मैं बहुत सोचता था पर मैं कुछ समझ नहीं पाता था ! ख़ैर वक्त गुजरता गया,और मैं बैंक में नौकरी करने लगा ! पर वहां भी जब भी मैं कर्मचारियों की ऑफिस सम्बंधी किसी परेशानी या असुविधा की बात मैनेजर या बड़े अफसरों से करता तो वे कहते -तुम नेतागिरी क्यों कर रहे हो ? मुहल्ले-पड़ोस, कॉलोनी,नगर की किसी भी समस्या या दिक्कत को मैं जब सम्बंधित विभाग के पास ले जाता ,तो वहां के कर्मचारी मुझे देखते ही कहते – लो नेता आ गया ! शुरू में मुझे ये अपनी तारीफ लगती थी,पर धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि वे लोग मेरी हँसी उड़ाते हैं ! फिर तो लोगों ने मुझे नेता कहना ही शुरू कर दिया ! मानो मेरा असली नाम ही नेता हो !
मुहल्ला-पड़ोस ,दफ्तर तो छोड़ दीजिए मेरे रिश्तेदार तक मुझे नेता कहने लगे थे ! एक बार मेरे दो रिश्तेदार आपस में मेरे बारे में जब बात कर कर रहे थे,तो उनमें से एक दूसरे से बोला कि– दरअसल वो नेता नामक बंदा हर जगह उंगली करता है,हर जगह फटे में टांग अड़ाता है,इसलिए सब उसे नेता कहते हैं ! हर जगह होशियारी दिखाना और अपनी चलाना उसकी आदत है इसीलिए उस नेता को कोई पसंद नहीं करता है !
यह सुनकर मैं ‘ काटो तो खून नहीं ‘ की हालत में पहुंच गया ! मैं समझ गया कि डेमोक्रेसी और पॉलिटिक्स के नेता तो अलग होते हैं ,और उन्हें तो सब घोषित रूप में लांछित करते ही हैं ,पर बाहर भी नेता को कदापि भी इज्जत की नजर से नहीं देखा जाता ! मैं समझ गया कि यह नेता वाला रूप तो हर जगह अपमानित है ! वैसे नेता वाला रूप तो समाज में हर जगह दिखता है,अच्छे नेता भी मिलते हैं,पर लोगों को किंचित भीस्वीकार नहीं ! यह बात भी सत्य है कि सामाजिक क्षेत्र में भी,भले ही अच्छे मुद्दे को भी उठाया जाए,तो भी नेता शब्द लोगों की दृष्टि में अभिसप्त,प्रदूषित / अपमानजनक व तिरस्कृत ही होता है ! उसमें परिहास,उपेक्षा व व्यंग्य ही छिपा रहता है ! उसकी वजह यही है कि कुर्सी और वोटों की राजनीति करने वाले नेताओं ने उल्टे- सीधे काम /धंधे करके इस अच्छे व पवित्र शब्द एवं पोजीशन को इतना बदनाम व प्रदूषित कर दिया है,इतना गंदा कर दिया है कि यह शब्द जैसे केवल और केवलगाली बनकर रह गया है !
तो भैया,अब तो मैंने कान पकड़ लिए हैं,तौबा कर ली है कि चाहे कुछ हो जाए,कैसा भी हो जाए,नेतागिरी करने का नहीं ! कौन गाली सुनें !तो दोस्तो,हमने तो नेतागिरी करना पूरी तरह से छोड़ दिया है ,आपकी आप जानें !

कहीं पनैया चोरी न हो जाए…..
जहीर अंसारी
(व्यंग्य) कई महीनों बाद कल्लू स्वामी अपने घर की पट्टी पर बैठे दिखे। परछी की लाईट बंद थी सो उनका ख़ूबसूरत मुखड़ा कारिया-कारिया सा दिख रहा था, ठीक से उन्हें पहचान नहीं पा रहा था मगर उनकी क़द-काठी और घर की पट्टी पर पसरने की स्टाइल से समझ गया कि स्वामी जी ही होंगे सो घर से निकलकर उनके पास पहुँच गया। सोचा पड़ोसी धर्म निभाऊँ, हालचाल पूछ लूँ। पूरी शरद ऋतु वो कम्बल में ही घुसे रहे। घर पर ही महुआ रानी को बुलवाकर प्रेमपूर्वक सेवन करते रहे।
जब मैं उनके पास पहुँचा तो देखा कि उनके इर्द-गिर्द भारी संख्या में मच्छर भनभना रहे थे। शायद उनके पास ‘हिट’ नहीं रहा होगा वरना ‘हिट’ डालकर पट्टी पर ही पट्ट हो जाते और मच्छर गिनने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती। ‘हिट’ के अभाव में मच्छरों से घिरे, अधलेटे स्वामी के बाज़ू में बैठ गया। बैठते ही पहले तो बड़ी ज़ोर से महुआ रानी की महक आई। एक पल तो लगा कि कहीं इस महक से कहीं मैं यहीं लोट न जाऊँ। फ़ौरन जेब से रुमाल निकाला, नाक के द्वार बंद किए और झट खड़ा हो गया।
मेरे खड़े होते ही स्वामी अचरज में पड़ गए। पसरे-पसरे बोले अरे-अरे क्या हुआ जो खड़े हो गए। बैठो-बैठो। कुछ दूषित ख़ुश्बू आई क्या..? (आप इसे बदबू समझ सकते हैं)। स्वामी जी मेरा हाथ पकड़कर बग़ल में बिठा लिया। फिर बोले कि वो क्या है कि बहुत दिनों बाद महुआरानी के बंगले गया था, वहाँ काफ़ी ख़ातिर-तवाजो हुई। इसलिए हो सकता है कि मेरे शरीर से चम्पा-चमेली की महक ज़्यादा आ रही है।
मैंने मुँह सिकोड़ते हुए कहा, चम्पा-चमेली।
स्वामी जी बोले ऐसा ही समझो। तुम क्या जानो, अंगूर की बेटी की महक। तुम तो नगर की बजबजाती नालियों और जगह-जगह पड़े कूड़े-करकट की गंध के आदी हो। बातें चाहे जितनी कर लो, पब्लिक का रुपया चाहे जितना फूँक दो पर स्वच्छता में पिछड़े ही रहोगे। अब देखो न, स्वच्छता में अपने शहर ने करोड़ों रुपए उड़ा दिए और नम्बर लगा 25वाँ। अब जब शासन तंत्र ऐसा होगा तो हर जगह से बदबू ही आएगी।
स्वामी जी आगे कुछ और बकरबाज़ी कर पाते, मैंने पूछा कि ये गमछे में क्या लपेटे बग़ल में दबाए हो।
स्वामी जी ने बड़े गर्व से कहा, पनैया
मैंने आश्चर्य से पूछा पनैया मतलब चप्पलें, क्यों..?
बोले, बेटा बड़ा मुश्किल दौर आन पड़ा है। अब पनैया संभालने के दिन आ गए हैं। सीमा पर भले हमारे जवान अपनी शहादत दे-देकर देश की रक्षा कर रहें हैं, दुश्मन देश के घर में घुसकर वार कर रहे हैं परंतु देश के भीतर असुरक्षा का माहौल है। अब देखो न देश की सुरक्षा संभालने वाला भारी-भरकम विभाग ही असुरक्षित है। सुना हैं वहाँ से राफ़ेल लड़ाकू विमान की बेशक़ीमती फ़ाईल चोरी हो गई। यह फ़ाइल इतनी, इतनी गोपनीय थी कि विपक्ष तो छोड़ो, सुप्रीम कोर्ट को दिखाने से भी देश के लिए ख़तरा पैदा होने की सम्भावनाएँ जताई जा रही है। अब समझने वाली बात यह है कि जब इतनी महत्वपूर्ण फ़ाईल रक्षा मंत्रालय के लाकर्स से चोरी जा सकती है तो मेरी सौ रूपैया की पनैया कोई भी चोर आसानी से ठिकाने लगा देगा। इसलिए आजकल मैं अपनी पनैया हमेशा अपने से चिपकाए रखता हूँ। अगर मेरी पनैया चोरी हो गई तो मैं नंगा हो जाऊँगा, जैसे…………?
स्वामी जी आगे बोले, पनैया साथ रखने का दूसरा मक़सद भी समझ लो। जब भी अपनी पाठशाला का कोई साथी तीन-पाँच करो तो दे दनादन..दे दनादन। स्वामी जी अपनी बकवास पूरी कर पाते उसके पहले ही पट्टी पर औंध गए।

चलो, चलें प्रधानमंत्री बने
हेमेन्द्र क्षीरसागर
(व्यंग) देश में लोकसभा चुनाव आते देख सियासतदारों के मुंह में लड्डू फूटने लगे कि मैं भी अब प्रधानमंत्री बन सकता हूँ। बेला में चलो, चले प्रधानमंत्री बने की होड़ लगी हुई है। ताबड़तोड़ मेरा वोट-तेरा वोट मिलाकर करेंगे चोट की सोच से चुनाव फतह करने की तैयारी दम मार रही है। फुसफुसाहट बेमर्जी गठबंधन, मतलबी दिखावा और दुश्मन का दुश्मन दोस्त बनाने का चलन जोरों पर है। मतलब आइने की तरह बिल्कुल साफ है प्रधानमंत्री की कुर्सी जिसे पाने की जुगत में महागठबंधन नामक समूह का हर छोटा-बड़ा दल काफी मशकत कर रहा है। बस इस फिराक में की कब नरेन्द्र मोदी हटे और हम वहां डटे।
खुशफहमी बिना नेता, नीति और नियत के राजनीतिक लिप्सा शांत होने के बजाए बढ़ते क्रम में है। मुगालते में कि बिन दुल्हे की बारात ज्यादा देर नहीं चलती। बावजूद शोर-शराबा मचाने कोई आनाकानी नहीं हो रही है। जिधर देखो उधर अपनी जमीन बचाने वाला दल या नेता बाहें तानकर मोदी को निपटाने की बात कह रहा है। जैसे मोदी-मोदी चिलाने मात्र से देश का भला और सरकार बन जाएगी। पर सावन के अंधों को समझाऐ कौन इन्हें तो हर जगह हरा ही हरा दिखाई दे रहा है। कदमताल विचारधारा के परे भानुमति का कुनबा फिर तैयार हो रहा है। इस उम्मीदी में कि परिवार बचाओं, गढ़जोड़ बनाओं, वोट कबाड़ों, मोदी हराओं, सत्ता पाओं आंख दिखाओं, और मजे उड़ाओं मामला खत्म।
ये हरगिज भी नागवारा नहीं लगता क्योंकि कभी कांग्रेस के खिलाफ लड़ने वाले दल आज भाजपा के खिलाफ लामबंद होकर साथ खड़े है। किसलिए सिर्फ औऱ सिर्फ मोदी व भाजपा विरोध के रास्ते सत्तासुख के वास्ते। इनका सिद्धांत तो रहा नहीं बताऐ किसे बचा-कुचा वजूद ही बचाले मुक्मल होगा। इसके बिना राजनैतिक दुकानदारी बंद समझो इस डर से टुकुर-टुकुर नजरे मिलाई जाने लगी है। चाहत में आनन-फानन मोदी फोबियां का इलाज ढूंडा जा रहा है ताकि आगे का राजनीति सफर अमन चैन से बिते है। उधेड़बून एकाएक सियासती चालबाजी शुरू हो गई, वोटों की गोलबंदी और मुफीद शार्गिद हुंकार भरने लगे। नतीजतन कूटरचित सत्ता विरोध अभियान के पुरोधा प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न दिन में ही देख रहे है।
चलो अच्छा है, कमशकम कोई ना सही नरेन्द्र मोदी ने तो इन टूटे हुए दिलों को मिलाकर तसली दिला दी। बानगी में पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, दिल्ली और झारखंड़ समेत अन्य राज्यों में दिलजलों की दिल्लगी हो चली है। छिनाझपटी प्रधानम़ंत्री बनने वालों की नुराकुश्ति के क्यां कहने नुक्ताचिनी के बावजूद मिलन समारोह जोरों पर है। हमजोली आत्ममंथन के रसवादन से क्या निकलता है ये तो आने वाला वक्त बताएगा लेकिन पदलोलुपत्ता के चक्कर में रसपानी ललायित जोर अजमाईस करने में मशगूल है। कसर के असर में सामाजिक, क्षेत्रिय और सम सामयिक के नाम पर वोटबंदी का प्रभुत्व चलो, चले प्रधानमंत्री बने चलित अभियान का वाहक बनकर उभरा है। यह फिलवक्त ऊफान पर है जो थमने के बजाए बढ़ता ही जा रहा है और चुनाव तक सारी हदें पार कर देगी।
बतौर बेहतर परिणामों की उम्मीद बेईमानी के अलावे और कुछ नहीं क्योंकि ऐसी मौकापरस्ती के सब आदी है। अभी झंड़ा बुलंद होगा बाद में नफा-नुकसान के कायदे में चरण वंदन होगा। फिर नौटकी की क्या जरूरत है। देश को गुमराह और मतदाताओं को दिग्भ्रमित करने या अपने ईशारे पर नाचने वाली सरकार बनाने के लिए, तासिर तो येही लगती है। तभी अच्छे-बुरे की चिंता किये बिना देशहित को दरकिनार कर मतलब की राजनीति और सियासती दांवपेंच धडल्ले से खेला जा रहा है। अतएव दुर्भाग्य कहें या विड़ंबना इक्सवीं सदी में भी मूल्क की राजनीति तुतु-मैंमैं, बनने-बनाने-बिगड़ाने तथा काज नहीं अपितु राज करने के इर्दगिर्द घूम रही है जो जग हंसाई का कारक है। इतर मुठ्ठी भर कुकरमुते दलों के राजपाठी रवैया पर अंकुश लगाकर चौपट होते लोकतंत्र और प्रधानमंत्री जैसे गौरवामयी पद को बचाया जा सकता है।

नेता पुत्र-पुत्रियों की व्यथा
हेमेन्द्र क्षीरसागर
(व्यंग्य) राजनीति की डगर बहुत कठिन मानी जाती है लेकिन इस पर चलने वालों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। भागदौड़ में राजनेताओं के पुत्र पुत्रियां भी पीछे नहीं है, अच्छी खासी तादात में इनका दखल राजनीति में बढ़ता ही जा रहा है । बावजूद यहां मामला कुछ उल्टा ही पड़ा दिखता है। जहां अन्य क्षेत्रों में वारिसों को अपने परवरिश के आधार पर खानदानी पेशा अपनाने पर कोई नानूकर नहीं होती। जिस पर हर कोई फक्र की बात कहकर हौसला अफजाई करते है। करना भी जरूरी है क्योंकि पंरपंरागत पेशे को बचाए रखना आज की जरूरत है। गौरतलब रहे व्यवसाय व राजनैतिक सेवाओं में अंतर तो है परन्तु मंशा एक ही देश की उन्नति, विकास और जनकल्याण। बतौर व्यापार में योग्यता और कार्य के मायने अनुभव के सामने बदल जाते है। वहां राजनीतिक क्षेत्र में नेता पुत्र पुत्रियों की दखल अंदाजी पर परिवारवाद का रोना रोकर तथाकथितों के सीने में सांप क्यों लोटने लगते है। ये कहते हुए कि अब राजनीति का अनर्थ हो जाएगा । यह राजनीतिक बरसाती वंश राजनीति को तहस-नहश कर देगा। उनकी यह बात तब अच्छी लगती है जब आसमान से खानदानी बरसात हो या सियासत, विरासत बनने लगे तब। हां! ऐसा हो तो राजनीतिक तिलक पर जरूर हांहांकार मचाना चाहिए क्योंकि राजनीति किसी की बपौती नहीं है जो वसीयत में लिख दी की मेरे बाद मेरी संतान राजपाट का सुल्तान बनेगी । यह तो लोकतंत्र है यहां जो लोगों की सच्चे मन से सेवा करेगा और पार्टी के हर काम में कंधे से कंधा मिलाकर कार्यकर्ताओं के साथ खड़ा रहेंगा । ऐसे नेता पुत्र पुत्र राजनीतिक उत्तराधिकारी कहलाने के सच्चे हकदार होगें। इसलिए राजनीति में जो अर्पण समर्पण और तर्पण की भावना से काम करेगा वही जनता का असली नुमाइंदा कहलाएंगा। लिहाजा जुड़े हुए राजनेताओं के पुत्र पुत्रियों की चिंता और व्यथा जायज है कि हम आज राजनीतिक के मैदान में एक निष्ठावान और कर्म योगी कार्यकर्ता की भांति अपनी भूमिका निभाते आ रहे हैं। फिर क्यों परिवारवाद की बेदी पर हमें चढाकर कहां जाता है कि तुम नेता पुत्र पुत्री ने हमारा हक छीना है। मालूम है राजनीति में परोसी हुई थाली नहीं मिलती, कमानी पड़ती है चाहे वह कोई भी हो सबका तरीका जुदा होता है। आखिर ! हमसे ऐसे अनगिनत जवाब-तलब किए जाते रहते।
अलबत्ता, अपनी प्रतिभा से कलेक्टर का बेटा कलेक्टर, डॉक्टर की बेटी डॉक्टर, उद्योगपति का बेटा उद्योगपति और हीरो की बेटी हीरोइन बन सकती है तो ऐसी ही योग्यतावानों से लोकशाही क्यों अछूती रहे। बहरहाल, खुशखबर है कि अब होनहार और ऊर्जावान लोग राजनीति में कदम रख रहे हैं । उनमें अगर नेता पुत्र पुत्रियों की अगवानी बढ़ती है तो किस बात का गुरेज। इस पर हमें गर्व होना चाहिए कि दूसरे क्षेत्र में भविष्य संवारने की बजाय राजनीति को अपना रहे है। सरोकार हमें बड़े मन से इनका सत्कार करना चाहिए। यदि ये दूसरे क्षेत्र में काम करते तो वह कहीं ना कहीं ऊंचे मुकाम को हासिल किए होते। ऐसे मौके बार-बार नहीं दिखाई पड़ते जहां संतान अपने माता पिता के पद चिन्हों पर भोग विलासता से विभूषित शानो-शौकत की जिंदगी को त्याग कर राजनीति की कांटो भरी राहों में चलते है खासकर पुत्रियां । वह भी तब, जब देश का नौजवान राजनीति से तौबा करने की बात करता है।
यथेष्ठ, आम कार्यकर्ताओं के तौर पर काम करने वाले नेता पुत्र पुत्रियों की उस व्यथा से पार पाना होगा कि राजनीति में इनका आगमन केवल वंशजों की वजह से होता है नाकि अपनी मेहनत और योग्यता के बल पर। इस मिथक को तोड़ना ही राजनीति के लिए लाभदायक होगा। याने वंशवाद नहीं अपितु काबिलियत नेतृत्व का मूलाधार बनें। बेहतर, हमारे देश में अनेकों ऐसे उदाहरण है जहां इन युवाओं ने लोकतंत्र और देश का सिर गर्व से ऊंचा किया है । इसलिए योग्यों को दुलार और अयोग्यों को धुत्कार ही वक्त की नजाकत है। स्तुत्य स्वच्छंदता, जन कल्याण और विकास की नई इबारत राजनीति के माध्यम से देश का अधिष्ठान करेगी।

जैसे घूरे के दिन फिरे, सबके फिरें
कहते हैं न कि सौ दिन सुनार के तो एक दिन लोहार का। स्वच्छ भारत अभियान का धन्यवाद कि घूरे के दिन भी फिर ही गये। बड़े बड़े नेता, मंत्री और खूब खूब बड़े अधिकारी सब झाड़ू लिये नजर आ रहे हैं। सरकारी दफ्तरो में झाड़ू, फावड़े, तसले, कचरे उठाने की टोकनी, हार्पिक, फिनाइल, फ्लोर क्लीनर, वगैरह की खरीदी हो रही है। स्वच्छता सैल्फी ली जा रही हैं, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर लोड हो रही हैं। नेता जी को चौराहे पर स्वच्छता अभियान के आयोजन में हिस्सेदारी करनी होती है तो भीड़ के साथ साथ नई झाड़ू, कैमरामैन, अखबार नबीस, वगैरह के संग ही कचरा भी जुटाना पड़ता है अब, जिसे साफ करते हुये धवल कपड़ो में नेता जी की फोटो ली जा सके। हर शहर में नगर पालिका जो केवल टैक्स वसूलने का काम कर रही थीं, उन्हें एक मिशन मिल गया है। साफ सफाई के पोस्टर लग रहे हैं। कचरा उठाने वाली गाड़ियो की धड़ल्ले से खरीद हो रही है। बच्चो से स्वच्छता पर निबंध लिखवाये जा रहे हैं। सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओ को चित्र बनाओ प्रतियोगिता से लेकर फिल्म बनाओ कम्पटीशन तक आयोजित करने के अवसर मिल गये हैं। प्रतियोगिताओ के पुरस्कार बंटते हैं, नेता जी की प्राईज बांटती तस्वीरे छपती हैं। अखबारो को, टीवी चैनलो को गंदी सड़को, किसी सार्वजनिक आयोजन के बाद फैली गंदगी को उजागर करने के मौके मिल गये हैं। अफसर, बाबू बिजी हो गये हैं कचरे का पूरा रिकार्ड रखा जा रहा है।
गांधी जी पर जो अपना एकाधिकार मानते थे उन्हें चेलेंज मिला है। लोग गांधी जी को तो मानते थे पर उनके मुद्दो को उनके बंदरो की तरह आंखे बंद कर, मुंह बंद कर, और कान पर हाथ रखकर अनसुना कर रही थे। स्वच्छता की झाड़ू गांधी जी से लेकर उन्हें रिटायर कर दिया है। कचरे को लेकर अनुसंधान हो रहे हैं। कोई कचरे से खाद बना रहा है, कोई कचरे को छांटकर पोलीथिन से सड़क बनाने के प्रयोग कर रहा है। रिसाइकलिंग हो रही है। समुद्र तट से लेकर नदियां तक साफ हो रही हैं। गनीमत है किसी सिरफिरे ने जंगल साफ करने के अभियान नही चला दिये। कचरे से बिजली बन रही है। कोई राष्ट्र प्रेमी कंपनी पहले शहर का कचरा इकट्ठा करती है, नगर निगम से बड़ी सफाई से इस राष्ट्रीय कार्य का भुगतान लेती है। नगर निगम आखिर इस कचरे का क्या करे ? वह उसी कंपनी को एकत्रित कचरा फिर से बेच देता है। अब वह कंपनी उस कचरे को जलाकर गर्मी पैदा करती है, और शहर से बाहर किसी कोने में मुफ्त में मिली जमीन पर लगे अपने विदेशो से आयातित प्लांट से, बिजली बनाती है, स्वच्छता अभियान में योगदान देने के लिये कंपनी को पुरस्कृत किया जाता है। नेता जी किसी बड़े से आयोजन में कंपनी के सी ई ओ को सम्मानित करते हैं, तस्वीरें सुर्खियां बनती हैं। सरकारी बिजली कंपनी बनी हुई बिजली खरीद लेती है, और उसे झुग्गी झोपड़ियो में बांट देती है। झोपड़ियां रोशन हो जातीं हैं, ये और बात है कि सरकारी बिजली कंपनी को सब्सिडी वाला बिल भी कोई नही चुकाता। कचरा जलने के बाद बची खुची राख मेक इन इंडिया के नारे के साथ ईंटें बनाने के लिये ऊंची दर पर बेच कर राष्ट्र प्रेमी कंपनी प्राफिट मेकिंग कंपनी बन जाती है। सरकारी निर्माण में राख से बनी ईंटे लगाने की बाध्यता से बनी बिल्डिंग का उद्घाटन करने नेता जी आते हैं और दूसरे ही दिन उनकी मुस्कराती हुई एक और तस्वीर फ्रंट पेज पर छपती है।
पता नही क्यो मुझ जैसे मूर्खो को ही कचरे की यह साइक्लिंग नेता जी की निरंतर छपती हुई फोटो, कचरे के नोट और वोट में तब्दील होते हुये नजर आती है, वरना तो आम जनता की तरह ही दिखना तो वही चाहिये जो टी वी दिखाता है या अखबार पढ़वाता है। खैर जो भी हो, न तो कचरा निकलना बंद होगा और न ही उसकी रिसाक्लिंग। यह अनवरत उद्योग यूं ही चलता रहे यही कामना है। हम तो वसुधैव कुटुम्बकम, मानने समझने वाले लोग हैं हम यही मनाते हैं कि जैसे कचरे के दिन फिरे, वैसे सबके फिरें ! विदेशो से डालर में डीजल का आयात होता है, और उसे घर घर से कचरा इकट्ठा करने वाली गाड़ियो के ईधन के रूप में बेधड़क फूंका जा रहा है। अब मेरे जैसे नासमझो की बात भला कौन सुने कि बेहतर होता यदि हम घर घर कचरा साईकिल रिक्शे वाली गाड़ियो से एकत्रित करते, कम से कम कुछ अधिक लोगो को रोजगार मिलता, कुछ डीजल ही बचता। कुछ प्रदूषण ही कम होता। या और भी बेहतर होता जो ऐसा ओवन बना लिया जाता कि हर घर पर लोग अपना कचरा स्वयं राख कर देते। न तो कचरा इकट्ठा करने की जरूरत होती और न ही कीमती जमीन कचरा घर बनकर खराब होती।
मुझे तो बिना क्रिकेट जाने समझे क्रिकेट खेलता फिल्म लगान का वह पात्र याद आ रहा है जिसका नाम ही कचरा था और उसकी टूटी हुई कलाई के करतब से कोई अंग्रेज बैट्स मैन, उसकी बालिंग के सामने नही टिक पा रहा था। आज देश के कचरे की भी कुछ ऐसी ही रोमांचक कथा है। इस सबके बीच मुझे स्वच्छता अभियान की वास्तविक खुशी तब मिली जब मैने देखा कि मेरी बेटी ने चाकलेट खाकर उसका रैपर अपने पर्स में रख लिया, अब वह उसे किसी सूखे कचरे वाली डस्टबिन को ढ़ूंढ़कर उसमें डालेगी जिससे वह रिसाईकल किया जा सके। कचरे के प्रति यही संस्कार तो देश की जरूरत हैं।
(लेखक- विवेक रंजन श्रीवास्तव)

हिन्दी चीनी आबादी की ताकत
हिन्दी-चीनी आबादी, ही इन देशो की ताकत है, आबादी के मामले में हम भाई भाई हैं। पिछली सदी में खूब अमेरिकन माल खपाया, अमेरिका ने इन देशो में। मछलियों को खिलाने वाला लाल गेहूं देकर हमारी सरकारो को उपकृत किया,और खुद का नाम कमाया और दुनिया का मुखिया बन बैठा। अब जब हमने खुद के उत्पादन में आत्मनिर्भरता पैदा कर ली है तो कुछ चीजो पर भारत से आयात पर टैक्स बढ़ा कर अमेरिका हमें नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है। हमें रूस या ईरान से क्या खरीदना है यह हम ही तय करेंगे मिस्टर प्रेसीडेंट। आपके प्रतिबंधो से हमारे लोगो की आबादी कम न होने वाली है। न ही हमारे लोगो का टेलेंट कम होगा उन्हें अमरीकन वीसा पर प्रतिबंध लगाने से।
आबादी से, आबादी के टेलेंट से और आत्मनिर्भरता से ताकत है हममें और इस मामले में हिन्दी चीनी भाई भाई हैं। चीन ने अपनी आबादी को मजदूरी पर लगा रखा है, इसलिये कुछ भी बनाना हो चीन से सस्ता कोई बना ही नही पाता। सारी दुनिया के बाजार चीनी सामानो से भरे पड़े हैं। हमारी सवा अरब की आबादी अपनी खपत से दुनिया भर की कीमते नियंत्रित कर सकती है। हम अपनी बेशुमार जनता को खिला पिला कर, जन्म से मृत्यु तक तरह तरह की सुविधायें देकर पाल रहे हैं। विश्व बाजार में खपत और आपूर्ति का सरल सिद्धांत ही कीमतो को नियंत्रित करता है, सो अपनी खपत को हमने ताकत बना लिया है, चीन आपूर्ति के कारण ताकतवर है।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन सारा जहां हमारा। सचमुच कुछ बात तो है हम में। सोने की खदाने होंगी जहां होंगी, हमारे तो घरो में गहनो की शक्ल में ही दुनियां में सबसे ज्यादा सोना इकट्ठा है। सारा देश दो टाइम भरपेट खाना खाकर, डकार ले ले, तो दुनियां में मॅहगाई बढ़ जाये। और बना लो ग्लोबल मार्केट। हमारे गांधी जी ग्राम इकाई की बातें करते थे, जो भला, बुरा, घट, बढ होती थी गांव घर की बात, वहीं की समस्या, वहीं निदान। अब उस माडल को तो माना नहीं, ग्लोबल विलेज का ढांचा खड़ा कर दिया, तो अब भुगतो।
डालर में डीजल पेट्रोल की खरीददारी के बल पर और दुनिया भर को इससे उससे लड़वाकर हथियारो के सौदो से अमेरिका दुनिया में प्रभुत्व स्थापित किये हुये है, अगरचे प्रत्येक दो देश डालर के बदले अपनी खुद की करंसी में एक्सचेंज के जरिये परस्पर व्यापार करने लगें तो डालर धड़ाम से गिर पड़े, इसलिये इसको उसको सहायता के कर्ज के नाम पर, समझौते करके या प्रतिबंध लगाकर और धमकी देकर अमरीका दादागिरी करता रहता है। वह कभी मानव अधिकारो को अपना अस्त्र बना लेता है तो कभी पर्यावरण को। कभी जीवन मूल्यो पर अमेरिका सारी दुनिया में अपना वर्चस्व बनाये हुये है।
हमारे युवाओ का दिमाग अमेरिकन सिलिकान वैली से हटा दिया जाये और चीन के सारे प्राडक्ट अमेरिकन बाजारो से गायब कर दिये जायें तो क्या होगा अमेरिका का सोचा है ? हम भारतीय तो सीधे सीधे अपने खेतो के बल पर और सोने के गहने इकट्ठा करने वाली अपनी जनता के बल पर ताल ठोककर दम दे रहे है, तुम रखे रहो अपने परमाणु बम, यदि ज्यादा नाटक किया तो, और हम सबने पैदल चलना शुरूकर दिया तो हमें पेट्रो डालर की गरज ही न रह जायेगी। चीन की आबादी और हम लोग दिन में तीन बार भोजन करना शुरू कर दें, तो इस वैश्विक दुनियां में अनाज के लाले पड़ जायेंगें। हमारी जनता को दस्त लगेंगे तो हम निपट लेंगे, पर देश भक्ति के नाम पर, दो चार चपाती और खाकर ही रहेंगे। दुनिया समझ ले कि माइक्रोसाफ्ट, फेसबुक की वर्चुएल रोटियो से पेट नही भरता, जमीनी काम खेतो पर इंसानी ताकत ही करती है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव

व्यंग्य- कीड़ा मार दवाई में कीड़े
कल सुबह से एक ही व्हाट्स अप ज्ञान कई ग्रुप्स में मिल रहा है ” कीड़ा मार दवाई में कीड़े लगे ” . चूंकि मैं रात का भरपूर उपयोग निद्रा देवी के आगोश में करता हूं , सो मुझे रातो रात सीबीआई की सीबीआई के द्वारा सीबीआई के लिये की गई रात्री कालीन कार्यवाहियो का इल्म नही था . अतः मैं इस त्वरित कीड़ा मार व्हाट्सअप ज्ञान को समझने में असमर्थ रहा . फिर जब बार बार लगातार पांच पांच फारवर्ड आये तो मेरी मोटी बुद्धि में भी समझ आया कि रातों रात जरूर कुछ घटा है . मैने “ओके गूगल” कहा और मोबाईल को आदेश दिया बताओ क्या हो गया ? मुझे पता नही कम्प्यूटर बाबा कैसी भाषा बोलते हैं , पर मेरे सवाल के जबाब में मेरे मोबाईल में छिपी “एलेक्सा” ने अपनी अटपटी कम्प्यूटराइज्ड ध्वनि में मुझे फटाफट बताया कि रातो रात किस तरह “तोते” ने उल्लू की शक्ल अख्तियार की और ब्रेकिंग न्यूज की चटपटी शैली में कहें तो , जो ७० सालो में नही हुआ वह हो गया . किसी का ट्रांस्फर हो गया , कोई छुट्टी पर भेज दिया गया , किसी का दफ्तर सील हो गया . किसी को रिमांड पर लेने की नौबत आ गई .बड़ी ही तेज गति से किसी को आभास हुआ कि उसके साथ अन्याय हो रहा है तो वह आनन फानन में सुप्रिम कोर्ट भागा . पक्ष विपक्ष हरकत में आ गये . स्वनाम धन्य बड़े बड़े वकीलो को मसला भी मिल गया मुवक्किल भी . न्यूज एंकर्स रात की खुमारी भी नही उतार पाये थे कि फिर गुलाबी फाउंडेशन लीप पोत कर फोकस लाइट्स के कैमरो के समक्ष , न्यूज वैन से कवर किये जाते समाचार सबसे पहले मेरे चैनल पर एक्सक्लूजिव रपट का राग अलापने आ पहुंचे . पार्टी प्रवक्ता गण शाम को चैनल्स पर होने वाले हाट नुक्ता चीनी डिस्कशन्स की तैयारियो के लिये गड़े मुर्दो को खोज कर सर्च रिसर्च करने लगे . बड़े नेता , बड़े बड़े सपने देखते हैं , तो कुछ ने दूर की कौड़ी फेंकी और सारी कार्यवाही को राफेल से जोड़ लिया . किसी ने सीबीआई को बी बी आई बताने के लिये नये एब्रीविएशन्स और नये फुलफार्म गढ़ लिये . किसी ने इस कार्यवाही को करने के लिये ५६ इंची सीना होने की ताकत होना जरूरी बता कर अपना पक्ष मजबूत करने का यत्न किया तो किसी ने सीबीआई पर जासूसी करवाने का आरोप लगाकर अपना गाल बजाया .
चाय और पान के ठेलो पर चर्चा में लोग इस पर चर्चा करते मिले कि वैभव लक्ष्मी जैसे सीबीआई पर प्रसन्न हुई वैसी सब पर हों रिश्वत ली दी जाये ऐसी जैसी मोईन कुरैशी ने दी और सीबीआई के आला अफसरान ने ली . इस सारे प्रकरण से जुड़े लोगो को रिटायरमेंट के बाद अपनी आत्मकथा में उद्घाटित करने के लिये और शायद अपनी बुक ” ए नाइट इन डार्क ” जैसे टाइटिल से लिखी जाने वाली किताबो के लिये और फिल्म वालो को दो पांच सालो बाद ही सही एक सनसनीखेज फिल्म का प्लाट तो मिला.
(विवेक रंजन श्रीवास्तव)

मतदातागण कृपया ध्यान दें……. ज़हीर अंसारी
मध्यप्रदेश में चुनावी ट्रेन आने की घोषणा हो चुकी है। यह ट्रेन 28 नवम्बर को अपने निर्धारित समय सुबह 7 बजे से चलना शुरू करेगी और शाम तक चलेगी। इस दिन मतदाताओं को ट्रेन चालक के चयन का सुनहरा अवसर मिलेगा। जो अगले पाँच सालों तक आपकी ट्रेन का संचालन करेगा। चालक चयन का मौक़ा आपको हर पाँच साल
में दिया जाता है, बशर्ते बीच में कोई बड़ी दुर्घटना न हो। दुर्घटना होने की दशा में दिल्ली हेडक्वार्टर से चालकों के मुखिया समेत सभी चालकों को बर्खास्त करने का फ़रमान निकाल दिया जाता है।
हाँ तो मतदातगण चालक चयन का मौक़ा सिर्फ़ एक चरण में होगा लेकिन आपके श्रीचरणों में अभ्यार्थी कई बार नतमस्तक होंगे लिहाज़ा आप तमाम लोग अभी से अपने चरणों को किसी महँगे वाशिंग सोप से धोना प्रारंभ कर दें और सुबह-शाम स्वदेशी निर्माता की अच्छी वाली क्रीम से अपने तलुओं को चिकना बनाना शुरू कर दें, क्योंकि इस वक़्त आपके तलुओं की डिमांड काफ़ी होगी।
हाँ तो मतदातागण कृपया ध्यान दीजिए पूर्वानुसार इस बार भी कई तरह के सफ़ेद कुर्ताधारी आपके सम्मुख चालक चयन के लिए पेश होंगे। ख़ुद को उत्कृष्ट और अन्य को निष्कृठ साबित करेंगे। आकाई आस्था की दुहाई देंगे और दलीय अच्छाइयों का बखान करेंगे। हो सकता है परम्परानुसार आप लोगों को पायल, बिछिया, रुपया-पैसा, कम्बल-घड़ी, शराब-कबाब आदि से उपकृत किया जाए, यानी ज़हरखुरानी हो सकती है। वैसे आप लोगों के साथ अब तक ज़हरखुरानी होती आई है। कभी जातीय, कभी धार्मिक तो कभी आर्थिक लाभ रूपी ज़हर आपको लच्छेदार बातों में मिलाकर पिलाया जाता रहा है। आप को होश तब आता है जब चालक पाँच साल के लिए ट्रेन लेकर छू हो जाता है।
मतदातागण कृपया विशेष ध्यान रखें, चालक अभ्यार्थी के संग कंडक्टर और अटैंडर भी रहेंगे, वो आपको एसी फ़र्स्ट, टू और थर्ड क्लास में यात्रा कराने का प्रलोभन दे सकते हैं। यह क़तई मुमकिन नहीं है। ये क्लास उच्च कोटी के नेता, अफ़सर और कारोबारी के लिए ही होती है। आप ठहरे स्लीपर और जनरल क्लास के यात्री। आप अपनी क्लास की ही बात रखना। बस इसी वक़्त आप जैसे निरीह वोटर की सुनी जाएगी, बाक़ी के पाँच साल आपको उनकी सुनना पड़ेगी। अभी वो आप की चौखट पर ‘बेचारे’ बनकर आएँगे फिर आप की बेचारगी पर सिर्फ़ आश्वासन पिलाएँगे।
मतदातागण आपको यह समझना चाहिए कि यह ट्रेन आपकी गाढ़ी कमाई से तैयार की जाती है इसलिए इसके चालक चयन में सूझबूझ का परिचय आवश्यक है। हो सके तो भावी चालक को वायदा करने से पहले ‘कमिटमेंट’ लिखवा लें कि वे सिर्फ़ अपनी ट्रेन और ट्रेन में बैठे समस्त श्रेणी के यात्रियों के हित-पक्ष में ही काम करेगा। ऐसा न हो ट्रेन के इंजिन में बैठते ही अपना विकास करने लगे (जैसा कि अब तक होता आया है) और जब यात्रियों की बात आए तो पार्टी और सरकार की मजबूरी बताने लगे।
मतदातागण कृपया इस बार ध्यान रखें कि चालक चयन मशीन (ईवीएम) में चुनाव चिन्ह के साथ अभ्यार्थी की फ़ोटो भी चस्पा रहेगी। अभ्यार्थी की शक्ल देखकर आप न प्रभावित हो न डराएँ। आप तो सिर्फ़ उनके व्यक्तित्व और योग्यता को ध्यान में रखें और चयन बटन को दबाएँ।
मतदातागण आपसे अंतिम अनुरोध है 28 नवंबर से पाँच साल के लिए चलने वाली ट्रेन में मुफ़्तख़ोरी न करें। पूरी ईमानदारी से चालक चयन प्रक्रिया में भाग लें। छोटे-छोटे लालच में आकर अपना ज़मीर, अपने बच्चों का भविष्य और देश-प्रदेश की तरक़्क़ी को चूना न लगाएँ। प्लीज़…..।

मीटू मीटू
विवेक रंजन श्रीवास्तव
मी टू की सबसे पुरानी विक्टिम कौन ? यह शोध का विषय है। राधा, अहिल्या, या कोई और। पर तय है कि मीटू मीटू का इतिहास है बड़ा पुराना। नारी की नैसर्गिक लज्जा, और उसे प्रकृति प्रदत्त सौंदर्य के विपरीत पुरुष को मिली भौतिक बलिष्ठता तथा समाज में उसकी स्वस्थापित ताकत मीटू का मूल कारण है। पुरुष सदा से स्त्री को कहता तो बराबरी का रहा पर स्त्री की समर्पण की वृत्ति के चलते मीटू कारोबार चलता रहा।
आधुनिक सिनेमा काल में सबसे पहले मीना कुमारी ने बड़े सुरीले अंदाज में मीटू की शिकायत की थी ” इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा ” इस हरकत के तीन गवाह भी थे, उन्होने बाकायदा कहा था “हमरी न मानो बजजवा से पूछो”, “हमरी न मानो रंगरेजवा से पूछो”, “हमरी न मानो सिपहिया से पूछो” पर तब इसे सोसायटी ने इग्नोर कर दिया गया। सिपाही की गवाही भी कोई काम न आई। उलटे इस गीत की भूरि भूरि प्रशंसा की जाती रही। यदि तभी कठोर कार्यवाही कर दी जाती, कम से कम कड़ी निंदा ही की जाती तो आज यह नौबत न होती कि हर दूसरी सेलीब्रिटी मीटू मीटू रट रहीं हैं। और मेरे जैसे जिन्होने कभी अपनी पत्नी तक को जबरदस्ती मीटू नही किया भी भयग्रस्त हैं कि कहीं कल के अखबार की सुर्खियो में अपना नाम भी फोटू सहित मीटू मीट में न आ जाये।
जिन्होने स्त्री की किसी विवशता का लाभ उठाकर मीटू कैंपेन में शिकायत लायक कुत्सित हरकतें की हैं उन्हें तो डरना ही चाहिये। मैं उनकी घनघोर भर्तसना करता हूं। पर संजय दत्त जैसे कथित खलनायक जिनकी बायोपिक बनाकर उन्हें महिमा मण्डित करने में किसी मीटू लेडी ने आपत्ति तक नही की, सरे आम पूरी बेशर्मी से सार्वजनिक रूप से अपनी मीटू हरकतो की गिनती बता रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट परस्पर सहमति से यौन व्यवहार को जायज बता रहा है।
मेरे एक मित्र बड़े प्रशासनिक अधिकारी हैं, पब्लिक डीलिंग का दायित्व है, वे स्वभाव से सहज हैं, उनकी एक सुंदर सी स्टेनो है, जनता उनके पास अपनी शिकायतें लेकर आती रहती है। इस सारे माहौल से वे इतना विचलित हुये कि उन्होने उस स्टेनो का स्थानांतरण कर दिया और एक पुरुष स्टेनो रख लिया। अपने कक्ष के पर्दे उन्होने हटवा दिये, टेबल इस तरह ारेंज करवा दी कि वे बाहर से दिखते रहें, अब वे अपने चैंबर के दरवाजे खुले रखते हैं। चपरासी को दरवाजे के पास ही गवाही के लिये बैठा कर रखते हैं। एक दूसरे मित्र ने अपने पूरे आफिस में वीडियो कैमरे ही लगवा दिये हैं।
सवाल यह है कि क्या हमारे बैड रूम तक अब सब कुछ वीडीयो सर्विलेंस में ही होगा। क्या हमें अपने आप पर भरोसा नही बचा। मीटू जैसे आंदोलनो से स्त्रियो का और समाज का भला होगा या समाज के स्थापित मूल्य व आदर्श ध्वस्त हो जायेंगे ? समाज को स्त्री स्वतंत्रता व समानता को मान्यता देनी ही चाहिये, पर वर्तमान परिदृश्य में मेरे जैसे कन्फ्युजिया गये हैं। जीवन के किसी क्षण में बड़े से बड़े आदर्शवादी पुरुष व स्त्रियां भी अपने व्यवहार में स्खलित हुये हैं, हरिवंशराय बच्चन जैसे कुछ ने साहस करके अपनी आत्मकथाओ में अपने कमजोर पलों को स्वीकार भी किया है। किन्तु आज के व्यवसायिक युग में जब प्रोपेगेंडा भी पब्लिसिटी टूल के रूप में स्वीकार किया जा चुका है। ऐसे कैंपेन का चरित्र हनन में दुरुपयोग भी संभव है।

आचार संहिता लग गई, अब सब आदर्श ही होगा
विवेक रंजन श्रीवास्तव
लो फिर लग गई आचार संहिता। अब महीने दो महीने सारे सरकारी काम काज नियम कायदे से ही होंगें। पूरी छान बीन के बाद। नेताओ की सिफारिश नही चलेगी। वही होगा जो कानून बोलता है, जो होना चाहिये। अब प्रशासन की तूती बोलेगी। जब तक आचार संहिता लगी रहेगी सरकारी तंत्र, लोकतंत्र पर भारी पड़ेगा। बाबू साहबों के पास लोगो के जरूरी काम काज टालने के लिये आचार संहिता लगे होने का आदर्श बहाना होगा। सरकार की उपलब्धियो के गुणगान करते विज्ञापन और विज्ञप्तियां समाचारों में नही दिखेंगी। अखबारो से सरकारी निविदाओ के विज्ञापन गायब हो जायेंगे। सरकारी कार्यालय सामान्य कामकाज छोड़कर चुनाव की व्यवस्था में लग जायेंगे।
मंत्री जी का निरंकुश मंत्रित्व और राजनीतिज्ञो के छर्रो का बेलगाम प्रभुत्व आचार संहिता के नियमो उपनियमो और उपनियमो की कंडिकाओ की भाषा में उलझा रहेगा। प्रशासन के प्रोटोकाल अधिकारी और पोलिस की सायरन बजाती मंत्री जी की एस्कार्टिंग करती और फालोअप में लगी गाड़ियो को थोड़ा आराम मिलेगा। मन मसोसते रह जायेंगे लोकशाही के मसीहे, लाल बत्तियो की गाड़ियां खड़ी रह जायेंगी। शिलान्यास और उद्घाटनों पर विराम लग जायेगा। सरकारी डाक बंगले में रुकने, खाना खाने पर मंत्री जी तक बिल भरेंगे। मंत्री जी अपने भाषणो में विपक्ष को कितना भी कोस लें पर लोक लुभावन घोषणायें नही कर सकेंगे।
सरकारी कर्मचारी लोकशाही के पंचवर्षीय चुनावी त्यौहार की तैयारियो में व्यस्त हो जायेंगे। कर्मचारियो की छुट्टियां रद्द हो जायेंगी। वोट कैंपेन चलाये जायेंगे। चुनाव प्रशिक्षण की क्लासेज लगेंगी। चुनावी कार्यो से बचने के लिये प्रभावशाली कर्मचारी जुगाड़ लगाते नजर आयेंगे। देश के अंतिम नागरिक को भी मतदान करने की सुविधा जुटाने की पूरी व्यवस्था प्रशासन करेगा। रामभरोसे जो इस देश का अंतिम नागरिक है, उसके वोट को कोई अनैतिक तरीको से प्रभावित न कर सके, इसके पूरे इंतजाम किये जायेंगे। इसके लिये तकनीक का भी भरपूर उपयोग किया जायेगा, वीडियो कैमरे लिये निरीक्षण दल चुनावी रैलियो की रिकार्डिग करते नजर आयेंगे। अखबारो से चुनावी विज्ञापनो और खबरो की कतरनें काट कर पेड न्यूज के एंगिल से उनकी समीक्षा की जायेगी राजनैतिक पार्टियो और चुनावी उम्मीदवारो के खर्च का हिसाब किताब रखा जायेगा। पोलिस दल शहर में आती जाती गाड़ियो की चैकिंग करेगा कि कहीं हथियार, शराब, काला धन तो चुनावो को प्रभावित करने के लिये नही लाया ले जाया रहा है। मतलब सब कुछ चुस्त दुरुस्त नजर आयेगा। ढ़ील बरतने वाले कर्मचारी पर प्रशासन की गाज गिरेगी। उच्चाधिकारी पर्यवेक्षक बन कर दौरे करेंगे। सर्वेक्षण रिपोर्ट देंगे। चुनाव आयोग तटस्थ चुनाव संपन्न करवा सकने के हर संभव यत्न में निरत रहेगा। आचार संहिता के प्रभावो की यह छोटी सी झलक है।
देश में सदा आचार संहिता ही लगी रहे, तो अपने आप सब कुछ वैसा ही चलेगा जैसा आदर्श जनता चाहती है। प्रशासन मुस्तैद रहेगा और मंत्री महत्वहीन रहेंगें। भ्रष्टाचार नही होगा। बेवजह के निर्माण कार्य नही होंगे तो अधिकारी कर्मचारियो को रिश्वत का प्रश्न ही नही रहेगा। आम लोगो का क्या है उनके काम तो किसी तरह चलते ही रहते हैं धीरे धीरे, नेता जी पड़ में थे तब भी और जब नही हैं तब भी, लोग जी ही रहे हैं। मुफ्त पानी मिले ना मिले, बिजली का पूरा बिल देना पड़े या माफ हो, आम आदमी किसी तरह एडजस्ट करके जी ही लेता है, यही उसकी विशेषता है।
कोई आम आदमी को विकास के सपने दिखाता है, कोई यह बताता है कि पिछले दस सालो में कितने एयरपोर्ट बनाये गये और कितने एटीएम लगाये गये हैं। कोई यह गिनाता है कि उन्ही दस सालो में कितने बड़े बड़े भ्रष्टाचार हुये, या मंहगाई कितनी बढ़ी है। पर आम आदमी जानता है कि यह सब कुछ, उससे उसका वोट पाने के लिये अलापा जा रहा राग है। आम आदमी ही लगान देता रहा है, राजाओ के समय से। अब वही आम व्यक्ति ही तरह तरह के टैक्स दे रहा है, इनकम टैक्स, सर्विस टैक्स, प्रोफेशनल टैक्स, और जाने क्या क्या, प्रत्यक्ष कर, अप्रत्यक्ष कर। जो ये टैक्स चुराने का दुस्साहस कर पा रहा है वही अमीर बन पा रहा है।
जो आम आदमी को सपने दिखा पाने में सफल होता है वही शासक बन पाता है। परिवर्तन का सपना, विकास का सपना, घर का सपना, नौकरी का सपना, भांति भांति के सपनो के पैकेज राजनैतिक दलो के घोषणा पत्रो में आदर्श आचार संहिता के बावजूद भी चिकने कागज पर रंगीन अक्षरो में सचित्र छप ही रहे हैं और बंट भी रहे हैं। हर कोई खुद को आम आदमी के ज्यादा से ज्यादा पास दिखाने के प्रयत्न में है। कोई खुद को चाय वाला बता रहा है तो कोई किसी गरीब की झोपड़ी में जाकर रात बिता रहा है, कोई स्वयं को पार्टी के रूप में ही आम आदमी रजिस्टर्ड करवा रहा है। पिछले चुनावो के रिकार्डो आधार पर कहा जा सकता है कि आदर्श आचार संहिता का परिपालन होते हुये, भारी मात्रा में पोलिस बल व अर्ध सैनिक बलो की तैनाती के साथ इन समवेत प्रयासो से दो चरणो में चुनाव तथाकथित रूप से शांति पूर्ण ढ़ंग से सुसंम्पन्न हो ही जायेंगे। विश्व में भारतीय लोकतंत्र एक बार फिर से सबसे बड़ी डेमोक्रेसी के रूप में स्थापित हो जायेगा। कोई भी सरकार बने अपनी तो बस एक ही मांग है कि शासन प्रशासन की चुस्ती केवल आदर्श आचार संहिता के समय भर न हो बल्कि हमेशा ही आदर्श स्थापित किये जावे, मंत्री जी केवल आदर्श आचार संहिता के समय डाक बंगले के बिल न देवें हमेशा ही देते रहें। राजनैतिक प्रश्रय से ३ के १३ बनाने की प्रवृत्ति पर विराम लगे, वोट के लिये धर्म और जाति के कंधे न लिये जावें, और आम जनता और लोकतंत्र इतना सशक्त हो की इसकी रक्षा के लिये पोलिस बल की और आचार संहिता की आवश्यकता ही न हो।

टिकिटिया अफ़ीम का उतरा नशा
ज़हीर अंसारी
देश में अनेक तरह की राजनैतिक पार्टियाँ हैं। कोई गरम तो कोई नरम, कोई ढुलमुल तो कोई मौक़ापरस्त। लेकिन इन सब की प्रवृति एक समान है। नीचे वाले नेता और कार्यकर्ता को उल्लू बनाओ और स्वार्थसिद्धी करो। निचले क्रम के नेताओं को टिकिटिया अफ़ीम इतनी पिलाते रहो कि सबरे मदक्की बन जाए। जब तक इन्हें टिकिटिया अफ़ीम चखाते रहो, इनकी सक्रियता बनी रहती है। जैसे ही यह अफ़ीम मिलना बंद हो जाती है, बेचारे निचले क्रम के नेता पल्ली ओढ़ कर सो जाते हैं। पार्टी के कार्यक्रमों में यदाकदा नज़र तो आते हैं मगर वहाँ भी भीतर की टीस उगल देते हैं। टीस उगलने के बाद फिर घिघिया कर कहते हैं कि जो उगला वो ‘ऑफ़ दी रिकार्ड’ है। अब ऐसे लोगों को कौन समझाए कि सियासत में जो होता है वो सब ‘ऑन रिकार्ड’ ही होता है।
ऐसे ही टिकिटिया अफ़ीमची हमारे कल्लू स्वामी थे। टिकिट माँगते-माँगते थक गए। अंत में जब उनके पिछवाड़े घनघनाती दोलत्ती पड़ी तो किलबिलाकर कोना दाब लिया। अब कोने में बैठे-बैठे कायँ-कायँ करते रहते हैं। कुरेदने पर अपनी व्यथा सुनाते-सुनाते पिछवाड़े पड़ी लात से कराह उठते हैं। कहते हैं जब मैं युवा था, ऊर्जावान था, दरी-फट्टा बिछाने में माहिर था तो पार्टी के सभी नेता मेरी क़द्र किया करते थे। दरी-फट्टे बिछाने में मुश्किल से विशेषज्ञता हासिल की। इसी विशेषज्ञता के बल पर मैं शीर्ष नेताओं की जी-हुजुरी सूची में शामिल हो गया। चमचों की ‘टॉप टेन’ सूची में मेरा नाम आने लगा। सोचने लगा कि मेरा क़द जिराफ़ की गर्दन टाइप हो गया, सो बीवी बच्चों और कारोबार को ठेंगे पर रख आकाओं की चाकरी इस उम्मीद से करने लगा कि अगली बार टिकिट पक्की। जब-जब टिकिटों का मार्केट ओपन होता तो मैं भी क़तार में लग जाता। आका को अर्ज़ी थमा देता। हर बार आका नीचे से ऊपर तक मुझे अजगरी दृष्टि से देखते, मानों सेंघा निगल जाएँगे। फिर मुझे पुचकार कर अगली बार का भरोसा देते हुए बम्बईया गोली चूसने के लिए पकड़ा देते थे।
पहली बार जब मैंने टिकिट का कटोरा फैलाया था। तब तक मैं ज़रा मुँहफट हो चुका था। दशकों से चमचागिरी करते रहने की वजह से मेरे मुँह का गवर्नर डैमेज हो गया था। सो बिना किसी हिचक के सौ की स्पीड में आँकड़ो सहित जीत का प्रमाण पत्र पेश कर दिया और टिकिट चाहिए ही बोल दिया।
आका ने फ़िल्म अदाकारा ललिता पवार की तरह आँखें मटकाई और मुस्कुराहट शशिकला की तरह लाते हुए शाब्दिक भाषा में बोले। बेटा अभी तुम जवान हो, तुम्हारी उम्र ही क्या है। पार्टी में बहुतेरे सीनियर हैं, इन्हें इस बार चुनाव लड़ने दो, अगली बार तुम्हारा नम्बर पक्का। आका की ज़ुबान से चासनी मिली अफ़ीम पाकर मैं गदगद हो गया। चुनाव दर चुनाव आते रहे, मुझे आश्वासन की चासनी में डुबा-डुबा कर निकाला जाता रहा। चासनी की मिठास में कब पचास साल निकल गए पता ही नहीं चला। पता उस वक़्त चला जब महरारू की कमर 75 अंश का कोण बनाने लगी। मैं दौड़ा-भागा अपने आका की चौपाल में पहुँच गया। उनसे बोला कि इस बार के चुनाव में टिकिट चाहिए। अब मैं सीनियर मोस्ट हो गया हूँ। अब तो मेरे पास भी हज़ारों दरी-फट्टा बिछाने और बैनर-कटआउट लगाने वाले चिलुआ हैं। सीट वैसे ही निकालकर दूँगा जैसे सिजेरियन आपरेशन से बच्चा निकाला जाता है।
आका ने यह सब सुनकर अपनी लम्बी सी नाक ऐसे सिकोड़ी जैसे नाक में मच्छर घुस गया हो। सड़ेला सा मुँह बनाते हुए बोले कल्लू अब तुम उम्रदराज़ हो चले हो। हाईकमान की पॉलिसी है कि युवाओं को प्रमोट करना है। अब तुम्हारा वक़्त निकल गया। अब तो तुम्हारा सेवानिवृत हुए नौकरशाहों की तरह पुनर्वास भी नहीं हो सकता।
कल्लू स्वामी अपनी दुःखभरी कथा सुनाते-सुनाते रुआंसे से हो गए। मूर्च्छित अवस्था को प्राप्त होने लगे। किसी तरह शीतल जल के छिड़काव से मूर्च्छित होने से उन्हें बचा लिया। उन्हें जब तनिक चैतन्यता आई तो कहने लगे। युवा अवस्था वाले आका ने कहा था कि थोड़ा सीनियर हो जाओ फिर टिकिट ले लेना, अब का आका कहता है बुढ़ा गए हो युवाओं को मौक़ा मिलेगा। साला सारी उम्र घासियारागिरी में निकाल दी और हाथ की आई शून्य। ये टिकिटिया अफ़ीम भी अजीब है। मैंने अपनी सात पुस्तों को वासियत कर दी है कि कटोरा लेकर चाय-पकोड़े की दुकान पर भीख माँग लेना मगर टिकिटिया अफ़ीम कभी मत खाना।

लेटर टू बापू, सेल्फी विद झाड़ू   

ऋतुपर्ण दवे

प्रिय बापू, ‘इंडिया दैट इज भारत’ से मेरा राम-राम। आज 2 अक्टूबर है। हर बरस आता है। आगे भी आएगा। तुझे याद करने का मौका हर बरस एक बार ही आता है। ऐसे में माला पहनाते तेरी तस्वीर संग एक क्लिक हो जाए। हाँ बापू अब तो सेल्फी का जमाना है। लोग तो तेरी नकल उतारने की होड़ में लग गए हैं। कोई फूल देता है तो तो कोई हाथ जोड़ता है पर अपुन को मंदसौर के प्रो.गुप्ता बहुत पसंद आए। पता है बापू उन्होंने वही किया..नहीं समझे… वो क्लास के पास नारेबाजी से परेशान थे। नारेबाजों को रोका क्या नारेबाज उन्हें ही देशद्रोही कहने लगे फिर क्या था गुप्ताजी उनके पैर पकड़ने लगे…। खैर बापू तू बता ऊपर के क्या हालचाल हैं? मेरे पास टाइम ही टाइम है। छुट्टी का असल मजा तो आज ही होगा। सुबह दो-चार जगह झाड़ू फेर प्रोग्राम में हो आया। फोटू खिचवा ली इधर का कचरा उधर, उधर का इधर। बस छुट्टी पक गई। दिन भर घूमुंगा, फिरूंगा फोटू भिजवाउंगा और क्या। अरे अभी याद आया है। आज तो चैनल वाले भी फोटू दिखाएंगे। वो क्या कहते हैं…..‘सेल्फी’ भेजो। एक आइडिया आया बापू। झाड़ू के संग सेल्फी खींचूंगा। तुम कहोगे कैसा मूर्ख है। भला झाड़ू संग सेल्फी ? तुमको पता नहीं बापू तुम्हारे भारत यानी ‘दैट इज इण्डिया’ में कुछ भी इंपॉसिबल नहीं।   सुन बापू मेरे गांव की नदी है। वो सूख गई। सच! सारे शहर की गंदगी से इतना शर्माई, थक, हार गई, कोई देखने सुनने वाला नहीं था। 5-10 बरस पहले ही पता नहीं क्या हुआ पहले धार कम हुई और अब पूरा खल्लास हो गई। बापू मेरा गांव भी सीमेण्ट जंगल बन गया है। तुम सिखाते थे मिट्टी में चला करो, बरसात की सोंधी खुशबू लिया करो, हरे घास में नंगे पैर टहला करो और सुबह-शाम “वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाणे रे” गाया करो। पर क्या करूं बापू मिट्टी तो छोड़ रेत तक सोन के भाव बिक रही है। कहां चलूं सीमेण्टेड रोड में? घास गाय-भैंस को खिलाने को नहीं बची तो घूमने कहां जाऊं? बेशरम की झुरमुट में या हर जगह इकट्ठा कचरे के पहाड़ में। बापू तुम मानते क्यों नहीं पीने के पानी के लिए इतनी मार-काट होती है कि घूमने कि फिकर कैसी? पता है दूसरे मोहल्ले से पानी लाते खासी मेहनत हो जाती है यही तो घूमना हुआ। तेरा भजन मोबाइल वाले बोलते है आउट डेटेड है, तू ही बता नया वर्जन कहां मिलेगा? बापू शहर तो छोड़ मेरा छोटा सा गांव भी गंदा हो गया। सुन जो पैसा सरकार ने नाली के लिए भेजा था वो सरपंच की गैरॉज में लग गया। अरे एक बात तो बताना भूल गया। तेरी बहू को शौच के लिए बाहर न जाना पड़े सो सरकार ने घर पर ही पक्का संडास बनवा दिया। पर क्या बताऊं उसमें लगा टीन का दरवाजा महीने भर में ही चोरी हो गया। ‘सत्य मेव जयते’ वाली पुलिस में रपट लिखाने गया तो उल्टा मुझसे पूछने लगे कि शक किस पर है। बता बापू मैं कैसे बता दूं? मरना है क्या बताकर कि वो चौधरी का बेटा…खैर छोड़ बापू।बता के मार थोड़ी खाना है। तुझे पता है मेरा गाल तेरे गाल जैसे मजबूत नहीं क्योंकि तुझे पता है मिलावटी दाना, पानी खाता हूं। इसलिए तेरे जैसे गाल थोड़ी आगे करूंगा। चल छोड़ बापू तू बता कैसा है। जल्दी-जल्दी बता दे। शाम हो रही है। रात की चिन्ता सता रही है। खैर छोड़ एक दिन नींद नहीं भी आई तो क्या। अरे बापू सुन तो,  सुबह मुझे सरकारी अस्पताल भी जाना है पता है क्यों। तेरे जनम दिन पर, सरकारी स्कूल में मध्यान्ह भोजन का खास खाना बना था नेताइन के समूह को ठेका मिला है। पता नहीं कैसे नकली दूध की असली खीर में जिन्दा छिपकली गिर गई जिससे बच्चे बीमार हो गए। अभी भी 15-20 अस्पताल में हैं। डॉक्टर तो तेरी फोटू के लिए फूल-माला का इंतजाम करने सीएमओ के पास शहर चला गया था। गनीमत थी कि अपना मन्तू सफाईवाला था न उसका बेटा अस्पताल में बाप की जगह भर्ती हो गया था। भला इंसान है खुद ही बच्चों को बॉटल चढ़ा दिया अब सब ठीक हैं। अच्छा बापू अपुन का टेम हो गया, तुझे पता है न तलब लग रही है। पर बापू एक बात तेरे लिए बहुत अच्छी है। सच्ची बताना तू वहां खुश है कि नहीं? सुन अगर कोई तकलीफ हो तो संकोच नहीं करना। मुझे पता है वहां भी तेरे बहुत से पॉलीटिकल कांपीटीटर पहुंच गए होंगे। तुझे वहां भी चैन  नहीं होगी। खैर चिन्ता मत करियो। उससे भी आगे का जुगाड़ हो गया है। वहां तकलीफ हो तो मुझे चुपचाप एसएमएस कर दइओ। अगले 2 अक्टूबर तक तेरे लिए मंगल पर जगह रिजर्व करा दूंगा वहां अभी भीड़ भाड़ कम है और किसी के दिमाग में नहीं है ये आईडिया। बात अपने तक रखियो। चलूं बापू राम-राम।

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