व्यंग

हिन्दी चीनी आबादी की ताकत
हिन्दी-चीनी आबादी, ही इन देशो की ताकत है, आबादी के मामले में हम भाई भाई हैं। पिछली सदी में खूब अमेरिकन माल खपाया, अमेरिका ने इन देशो में। मछलियों को खिलाने वाला लाल गेहूं देकर हमारी सरकारो को उपकृत किया,और खुद का नाम कमाया और दुनिया का मुखिया बन बैठा। अब जब हमने खुद के उत्पादन में आत्मनिर्भरता पैदा कर ली है तो कुछ चीजो पर भारत से आयात पर टैक्स बढ़ा कर अमेरिका हमें नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है। हमें रूस या ईरान से क्या खरीदना है यह हम ही तय करेंगे मिस्टर प्रेसीडेंट। आपके प्रतिबंधो से हमारे लोगो की आबादी कम न होने वाली है। न ही हमारे लोगो का टेलेंट कम होगा उन्हें अमरीकन वीसा पर प्रतिबंध लगाने से।
आबादी से, आबादी के टेलेंट से और आत्मनिर्भरता से ताकत है हममें और इस मामले में हिन्दी चीनी भाई भाई हैं। चीन ने अपनी आबादी को मजदूरी पर लगा रखा है, इसलिये कुछ भी बनाना हो चीन से सस्ता कोई बना ही नही पाता। सारी दुनिया के बाजार चीनी सामानो से भरे पड़े हैं। हमारी सवा अरब की आबादी अपनी खपत से दुनिया भर की कीमते नियंत्रित कर सकती है। हम अपनी बेशुमार जनता को खिला पिला कर, जन्म से मृत्यु तक तरह तरह की सुविधायें देकर पाल रहे हैं। विश्व बाजार में खपत और आपूर्ति का सरल सिद्धांत ही कीमतो को नियंत्रित करता है, सो अपनी खपत को हमने ताकत बना लिया है, चीन आपूर्ति के कारण ताकतवर है।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन सारा जहां हमारा। सचमुच कुछ बात तो है हम में। सोने की खदाने होंगी जहां होंगी, हमारे तो घरो में गहनो की शक्ल में ही दुनियां में सबसे ज्यादा सोना इकट्ठा है। सारा देश दो टाइम भरपेट खाना खाकर, डकार ले ले, तो दुनियां में मॅहगाई बढ़ जाये। और बना लो ग्लोबल मार्केट। हमारे गांधी जी ग्राम इकाई की बातें करते थे, जो भला, बुरा, घट, बढ होती थी गांव घर की बात, वहीं की समस्या, वहीं निदान। अब उस माडल को तो माना नहीं, ग्लोबल विलेज का ढांचा खड़ा कर दिया, तो अब भुगतो।
डालर में डीजल पेट्रोल की खरीददारी के बल पर और दुनिया भर को इससे उससे लड़वाकर हथियारो के सौदो से अमेरिका दुनिया में प्रभुत्व स्थापित किये हुये है, अगरचे प्रत्येक दो देश डालर के बदले अपनी खुद की करंसी में एक्सचेंज के जरिये परस्पर व्यापार करने लगें तो डालर धड़ाम से गिर पड़े, इसलिये इसको उसको सहायता के कर्ज के नाम पर, समझौते करके या प्रतिबंध लगाकर और धमकी देकर अमरीका दादागिरी करता रहता है। वह कभी मानव अधिकारो को अपना अस्त्र बना लेता है तो कभी पर्यावरण को। कभी जीवन मूल्यो पर अमेरिका सारी दुनिया में अपना वर्चस्व बनाये हुये है।
हमारे युवाओ का दिमाग अमेरिकन सिलिकान वैली से हटा दिया जाये और चीन के सारे प्राडक्ट अमेरिकन बाजारो से गायब कर दिये जायें तो क्या होगा अमेरिका का सोचा है ? हम भारतीय तो सीधे सीधे अपने खेतो के बल पर और सोने के गहने इकट्ठा करने वाली अपनी जनता के बल पर ताल ठोककर दम दे रहे है, तुम रखे रहो अपने परमाणु बम, यदि ज्यादा नाटक किया तो, और हम सबने पैदल चलना शुरूकर दिया तो हमें पेट्रो डालर की गरज ही न रह जायेगी। चीन की आबादी और हम लोग दिन में तीन बार भोजन करना शुरू कर दें, तो इस वैश्विक दुनियां में अनाज के लाले पड़ जायेंगें। हमारी जनता को दस्त लगेंगे तो हम निपट लेंगे, पर देश भक्ति के नाम पर, दो चार चपाती और खाकर ही रहेंगे। दुनिया समझ ले कि माइक्रोसाफ्ट, फेसबुक की वर्चुएल रोटियो से पेट नही भरता, जमीनी काम खेतो पर इंसानी ताकत ही करती है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव

व्यंग्य- कीड़ा मार दवाई में कीड़े
कल सुबह से एक ही व्हाट्स अप ज्ञान कई ग्रुप्स में मिल रहा है ” कीड़ा मार दवाई में कीड़े लगे ” . चूंकि मैं रात का भरपूर उपयोग निद्रा देवी के आगोश में करता हूं , सो मुझे रातो रात सीबीआई की सीबीआई के द्वारा सीबीआई के लिये की गई रात्री कालीन कार्यवाहियो का इल्म नही था . अतः मैं इस त्वरित कीड़ा मार व्हाट्सअप ज्ञान को समझने में असमर्थ रहा . फिर जब बार बार लगातार पांच पांच फारवर्ड आये तो मेरी मोटी बुद्धि में भी समझ आया कि रातों रात जरूर कुछ घटा है . मैने “ओके गूगल” कहा और मोबाईल को आदेश दिया बताओ क्या हो गया ? मुझे पता नही कम्प्यूटर बाबा कैसी भाषा बोलते हैं , पर मेरे सवाल के जबाब में मेरे मोबाईल में छिपी “एलेक्सा” ने अपनी अटपटी कम्प्यूटराइज्ड ध्वनि में मुझे फटाफट बताया कि रातो रात किस तरह “तोते” ने उल्लू की शक्ल अख्तियार की और ब्रेकिंग न्यूज की चटपटी शैली में कहें तो , जो ७० सालो में नही हुआ वह हो गया . किसी का ट्रांस्फर हो गया , कोई छुट्टी पर भेज दिया गया , किसी का दफ्तर सील हो गया . किसी को रिमांड पर लेने की नौबत आ गई .बड़ी ही तेज गति से किसी को आभास हुआ कि उसके साथ अन्याय हो रहा है तो वह आनन फानन में सुप्रिम कोर्ट भागा . पक्ष विपक्ष हरकत में आ गये . स्वनाम धन्य बड़े बड़े वकीलो को मसला भी मिल गया मुवक्किल भी . न्यूज एंकर्स रात की खुमारी भी नही उतार पाये थे कि फिर गुलाबी फाउंडेशन लीप पोत कर फोकस लाइट्स के कैमरो के समक्ष , न्यूज वैन से कवर किये जाते समाचार सबसे पहले मेरे चैनल पर एक्सक्लूजिव रपट का राग अलापने आ पहुंचे . पार्टी प्रवक्ता गण शाम को चैनल्स पर होने वाले हाट नुक्ता चीनी डिस्कशन्स की तैयारियो के लिये गड़े मुर्दो को खोज कर सर्च रिसर्च करने लगे . बड़े नेता , बड़े बड़े सपने देखते हैं , तो कुछ ने दूर की कौड़ी फेंकी और सारी कार्यवाही को राफेल से जोड़ लिया . किसी ने सीबीआई को बी बी आई बताने के लिये नये एब्रीविएशन्स और नये फुलफार्म गढ़ लिये . किसी ने इस कार्यवाही को करने के लिये ५६ इंची सीना होने की ताकत होना जरूरी बता कर अपना पक्ष मजबूत करने का यत्न किया तो किसी ने सीबीआई पर जासूसी करवाने का आरोप लगाकर अपना गाल बजाया .
चाय और पान के ठेलो पर चर्चा में लोग इस पर चर्चा करते मिले कि वैभव लक्ष्मी जैसे सीबीआई पर प्रसन्न हुई वैसी सब पर हों रिश्वत ली दी जाये ऐसी जैसी मोईन कुरैशी ने दी और सीबीआई के आला अफसरान ने ली . इस सारे प्रकरण से जुड़े लोगो को रिटायरमेंट के बाद अपनी आत्मकथा में उद्घाटित करने के लिये और शायद अपनी बुक ” ए नाइट इन डार्क ” जैसे टाइटिल से लिखी जाने वाली किताबो के लिये और फिल्म वालो को दो पांच सालो बाद ही सही एक सनसनीखेज फिल्म का प्लाट तो मिला.
(विवेक रंजन श्रीवास्तव)

मतदातागण कृपया ध्यान दें……. ज़हीर अंसारी
मध्यप्रदेश में चुनावी ट्रेन आने की घोषणा हो चुकी है। यह ट्रेन 28 नवम्बर को अपने निर्धारित समय सुबह 7 बजे से चलना शुरू करेगी और शाम तक चलेगी। इस दिन मतदाताओं को ट्रेन चालक के चयन का सुनहरा अवसर मिलेगा। जो अगले पाँच सालों तक आपकी ट्रेन का संचालन करेगा। चालक चयन का मौक़ा आपको हर पाँच साल
में दिया जाता है, बशर्ते बीच में कोई बड़ी दुर्घटना न हो। दुर्घटना होने की दशा में दिल्ली हेडक्वार्टर से चालकों के मुखिया समेत सभी चालकों को बर्खास्त करने का फ़रमान निकाल दिया जाता है।
हाँ तो मतदातगण चालक चयन का मौक़ा सिर्फ़ एक चरण में होगा लेकिन आपके श्रीचरणों में अभ्यार्थी कई बार नतमस्तक होंगे लिहाज़ा आप तमाम लोग अभी से अपने चरणों को किसी महँगे वाशिंग सोप से धोना प्रारंभ कर दें और सुबह-शाम स्वदेशी निर्माता की अच्छी वाली क्रीम से अपने तलुओं को चिकना बनाना शुरू कर दें, क्योंकि इस वक़्त आपके तलुओं की डिमांड काफ़ी होगी।
हाँ तो मतदातागण कृपया ध्यान दीजिए पूर्वानुसार इस बार भी कई तरह के सफ़ेद कुर्ताधारी आपके सम्मुख चालक चयन के लिए पेश होंगे। ख़ुद को उत्कृष्ट और अन्य को निष्कृठ साबित करेंगे। आकाई आस्था की दुहाई देंगे और दलीय अच्छाइयों का बखान करेंगे। हो सकता है परम्परानुसार आप लोगों को पायल, बिछिया, रुपया-पैसा, कम्बल-घड़ी, शराब-कबाब आदि से उपकृत किया जाए, यानी ज़हरखुरानी हो सकती है। वैसे आप लोगों के साथ अब तक ज़हरखुरानी होती आई है। कभी जातीय, कभी धार्मिक तो कभी आर्थिक लाभ रूपी ज़हर आपको लच्छेदार बातों में मिलाकर पिलाया जाता रहा है। आप को होश तब आता है जब चालक पाँच साल के लिए ट्रेन लेकर छू हो जाता है।
मतदातागण कृपया विशेष ध्यान रखें, चालक अभ्यार्थी के संग कंडक्टर और अटैंडर भी रहेंगे, वो आपको एसी फ़र्स्ट, टू और थर्ड क्लास में यात्रा कराने का प्रलोभन दे सकते हैं। यह क़तई मुमकिन नहीं है। ये क्लास उच्च कोटी के नेता, अफ़सर और कारोबारी के लिए ही होती है। आप ठहरे स्लीपर और जनरल क्लास के यात्री। आप अपनी क्लास की ही बात रखना। बस इसी वक़्त आप जैसे निरीह वोटर की सुनी जाएगी, बाक़ी के पाँच साल आपको उनकी सुनना पड़ेगी। अभी वो आप की चौखट पर ‘बेचारे’ बनकर आएँगे फिर आप की बेचारगी पर सिर्फ़ आश्वासन पिलाएँगे।
मतदातागण आपको यह समझना चाहिए कि यह ट्रेन आपकी गाढ़ी कमाई से तैयार की जाती है इसलिए इसके चालक चयन में सूझबूझ का परिचय आवश्यक है। हो सके तो भावी चालक को वायदा करने से पहले ‘कमिटमेंट’ लिखवा लें कि वे सिर्फ़ अपनी ट्रेन और ट्रेन में बैठे समस्त श्रेणी के यात्रियों के हित-पक्ष में ही काम करेगा। ऐसा न हो ट्रेन के इंजिन में बैठते ही अपना विकास करने लगे (जैसा कि अब तक होता आया है) और जब यात्रियों की बात आए तो पार्टी और सरकार की मजबूरी बताने लगे।
मतदातागण कृपया इस बार ध्यान रखें कि चालक चयन मशीन (ईवीएम) में चुनाव चिन्ह के साथ अभ्यार्थी की फ़ोटो भी चस्पा रहेगी। अभ्यार्थी की शक्ल देखकर आप न प्रभावित हो न डराएँ। आप तो सिर्फ़ उनके व्यक्तित्व और योग्यता को ध्यान में रखें और चयन बटन को दबाएँ।
मतदातागण आपसे अंतिम अनुरोध है 28 नवंबर से पाँच साल के लिए चलने वाली ट्रेन में मुफ़्तख़ोरी न करें। पूरी ईमानदारी से चालक चयन प्रक्रिया में भाग लें। छोटे-छोटे लालच में आकर अपना ज़मीर, अपने बच्चों का भविष्य और देश-प्रदेश की तरक़्क़ी को चूना न लगाएँ। प्लीज़…..।

मीटू मीटू
विवेक रंजन श्रीवास्तव
मी टू की सबसे पुरानी विक्टिम कौन ? यह शोध का विषय है। राधा, अहिल्या, या कोई और। पर तय है कि मीटू मीटू का इतिहास है बड़ा पुराना। नारी की नैसर्गिक लज्जा, और उसे प्रकृति प्रदत्त सौंदर्य के विपरीत पुरुष को मिली भौतिक बलिष्ठता तथा समाज में उसकी स्वस्थापित ताकत मीटू का मूल कारण है। पुरुष सदा से स्त्री को कहता तो बराबरी का रहा पर स्त्री की समर्पण की वृत्ति के चलते मीटू कारोबार चलता रहा।
आधुनिक सिनेमा काल में सबसे पहले मीना कुमारी ने बड़े सुरीले अंदाज में मीटू की शिकायत की थी ” इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा ” इस हरकत के तीन गवाह भी थे, उन्होने बाकायदा कहा था “हमरी न मानो बजजवा से पूछो”, “हमरी न मानो रंगरेजवा से पूछो”, “हमरी न मानो सिपहिया से पूछो” पर तब इसे सोसायटी ने इग्नोर कर दिया गया। सिपाही की गवाही भी कोई काम न आई। उलटे इस गीत की भूरि भूरि प्रशंसा की जाती रही। यदि तभी कठोर कार्यवाही कर दी जाती, कम से कम कड़ी निंदा ही की जाती तो आज यह नौबत न होती कि हर दूसरी सेलीब्रिटी मीटू मीटू रट रहीं हैं। और मेरे जैसे जिन्होने कभी अपनी पत्नी तक को जबरदस्ती मीटू नही किया भी भयग्रस्त हैं कि कहीं कल के अखबार की सुर्खियो में अपना नाम भी फोटू सहित मीटू मीट में न आ जाये।
जिन्होने स्त्री की किसी विवशता का लाभ उठाकर मीटू कैंपेन में शिकायत लायक कुत्सित हरकतें की हैं उन्हें तो डरना ही चाहिये। मैं उनकी घनघोर भर्तसना करता हूं। पर संजय दत्त जैसे कथित खलनायक जिनकी बायोपिक बनाकर उन्हें महिमा मण्डित करने में किसी मीटू लेडी ने आपत्ति तक नही की, सरे आम पूरी बेशर्मी से सार्वजनिक रूप से अपनी मीटू हरकतो की गिनती बता रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट परस्पर सहमति से यौन व्यवहार को जायज बता रहा है।
मेरे एक मित्र बड़े प्रशासनिक अधिकारी हैं, पब्लिक डीलिंग का दायित्व है, वे स्वभाव से सहज हैं, उनकी एक सुंदर सी स्टेनो है, जनता उनके पास अपनी शिकायतें लेकर आती रहती है। इस सारे माहौल से वे इतना विचलित हुये कि उन्होने उस स्टेनो का स्थानांतरण कर दिया और एक पुरुष स्टेनो रख लिया। अपने कक्ष के पर्दे उन्होने हटवा दिये, टेबल इस तरह ारेंज करवा दी कि वे बाहर से दिखते रहें, अब वे अपने चैंबर के दरवाजे खुले रखते हैं। चपरासी को दरवाजे के पास ही गवाही के लिये बैठा कर रखते हैं। एक दूसरे मित्र ने अपने पूरे आफिस में वीडियो कैमरे ही लगवा दिये हैं।
सवाल यह है कि क्या हमारे बैड रूम तक अब सब कुछ वीडीयो सर्विलेंस में ही होगा। क्या हमें अपने आप पर भरोसा नही बचा। मीटू जैसे आंदोलनो से स्त्रियो का और समाज का भला होगा या समाज के स्थापित मूल्य व आदर्श ध्वस्त हो जायेंगे ? समाज को स्त्री स्वतंत्रता व समानता को मान्यता देनी ही चाहिये, पर वर्तमान परिदृश्य में मेरे जैसे कन्फ्युजिया गये हैं। जीवन के किसी क्षण में बड़े से बड़े आदर्शवादी पुरुष व स्त्रियां भी अपने व्यवहार में स्खलित हुये हैं, हरिवंशराय बच्चन जैसे कुछ ने साहस करके अपनी आत्मकथाओ में अपने कमजोर पलों को स्वीकार भी किया है। किन्तु आज के व्यवसायिक युग में जब प्रोपेगेंडा भी पब्लिसिटी टूल के रूप में स्वीकार किया जा चुका है। ऐसे कैंपेन का चरित्र हनन में दुरुपयोग भी संभव है।

आचार संहिता लग गई, अब सब आदर्श ही होगा
विवेक रंजन श्रीवास्तव
लो फिर लग गई आचार संहिता। अब महीने दो महीने सारे सरकारी काम काज नियम कायदे से ही होंगें। पूरी छान बीन के बाद। नेताओ की सिफारिश नही चलेगी। वही होगा जो कानून बोलता है, जो होना चाहिये। अब प्रशासन की तूती बोलेगी। जब तक आचार संहिता लगी रहेगी सरकारी तंत्र, लोकतंत्र पर भारी पड़ेगा। बाबू साहबों के पास लोगो के जरूरी काम काज टालने के लिये आचार संहिता लगे होने का आदर्श बहाना होगा। सरकार की उपलब्धियो के गुणगान करते विज्ञापन और विज्ञप्तियां समाचारों में नही दिखेंगी। अखबारो से सरकारी निविदाओ के विज्ञापन गायब हो जायेंगे। सरकारी कार्यालय सामान्य कामकाज छोड़कर चुनाव की व्यवस्था में लग जायेंगे।
मंत्री जी का निरंकुश मंत्रित्व और राजनीतिज्ञो के छर्रो का बेलगाम प्रभुत्व आचार संहिता के नियमो उपनियमो और उपनियमो की कंडिकाओ की भाषा में उलझा रहेगा। प्रशासन के प्रोटोकाल अधिकारी और पोलिस की सायरन बजाती मंत्री जी की एस्कार्टिंग करती और फालोअप में लगी गाड़ियो को थोड़ा आराम मिलेगा। मन मसोसते रह जायेंगे लोकशाही के मसीहे, लाल बत्तियो की गाड़ियां खड़ी रह जायेंगी। शिलान्यास और उद्घाटनों पर विराम लग जायेगा। सरकारी डाक बंगले में रुकने, खाना खाने पर मंत्री जी तक बिल भरेंगे। मंत्री जी अपने भाषणो में विपक्ष को कितना भी कोस लें पर लोक लुभावन घोषणायें नही कर सकेंगे।
सरकारी कर्मचारी लोकशाही के पंचवर्षीय चुनावी त्यौहार की तैयारियो में व्यस्त हो जायेंगे। कर्मचारियो की छुट्टियां रद्द हो जायेंगी। वोट कैंपेन चलाये जायेंगे। चुनाव प्रशिक्षण की क्लासेज लगेंगी। चुनावी कार्यो से बचने के लिये प्रभावशाली कर्मचारी जुगाड़ लगाते नजर आयेंगे। देश के अंतिम नागरिक को भी मतदान करने की सुविधा जुटाने की पूरी व्यवस्था प्रशासन करेगा। रामभरोसे जो इस देश का अंतिम नागरिक है, उसके वोट को कोई अनैतिक तरीको से प्रभावित न कर सके, इसके पूरे इंतजाम किये जायेंगे। इसके लिये तकनीक का भी भरपूर उपयोग किया जायेगा, वीडियो कैमरे लिये निरीक्षण दल चुनावी रैलियो की रिकार्डिग करते नजर आयेंगे। अखबारो से चुनावी विज्ञापनो और खबरो की कतरनें काट कर पेड न्यूज के एंगिल से उनकी समीक्षा की जायेगी राजनैतिक पार्टियो और चुनावी उम्मीदवारो के खर्च का हिसाब किताब रखा जायेगा। पोलिस दल शहर में आती जाती गाड़ियो की चैकिंग करेगा कि कहीं हथियार, शराब, काला धन तो चुनावो को प्रभावित करने के लिये नही लाया ले जाया रहा है। मतलब सब कुछ चुस्त दुरुस्त नजर आयेगा। ढ़ील बरतने वाले कर्मचारी पर प्रशासन की गाज गिरेगी। उच्चाधिकारी पर्यवेक्षक बन कर दौरे करेंगे। सर्वेक्षण रिपोर्ट देंगे। चुनाव आयोग तटस्थ चुनाव संपन्न करवा सकने के हर संभव यत्न में निरत रहेगा। आचार संहिता के प्रभावो की यह छोटी सी झलक है।
देश में सदा आचार संहिता ही लगी रहे, तो अपने आप सब कुछ वैसा ही चलेगा जैसा आदर्श जनता चाहती है। प्रशासन मुस्तैद रहेगा और मंत्री महत्वहीन रहेंगें। भ्रष्टाचार नही होगा। बेवजह के निर्माण कार्य नही होंगे तो अधिकारी कर्मचारियो को रिश्वत का प्रश्न ही नही रहेगा। आम लोगो का क्या है उनके काम तो किसी तरह चलते ही रहते हैं धीरे धीरे, नेता जी पड़ में थे तब भी और जब नही हैं तब भी, लोग जी ही रहे हैं। मुफ्त पानी मिले ना मिले, बिजली का पूरा बिल देना पड़े या माफ हो, आम आदमी किसी तरह एडजस्ट करके जी ही लेता है, यही उसकी विशेषता है।
कोई आम आदमी को विकास के सपने दिखाता है, कोई यह बताता है कि पिछले दस सालो में कितने एयरपोर्ट बनाये गये और कितने एटीएम लगाये गये हैं। कोई यह गिनाता है कि उन्ही दस सालो में कितने बड़े बड़े भ्रष्टाचार हुये, या मंहगाई कितनी बढ़ी है। पर आम आदमी जानता है कि यह सब कुछ, उससे उसका वोट पाने के लिये अलापा जा रहा राग है। आम आदमी ही लगान देता रहा है, राजाओ के समय से। अब वही आम व्यक्ति ही तरह तरह के टैक्स दे रहा है, इनकम टैक्स, सर्विस टैक्स, प्रोफेशनल टैक्स, और जाने क्या क्या, प्रत्यक्ष कर, अप्रत्यक्ष कर। जो ये टैक्स चुराने का दुस्साहस कर पा रहा है वही अमीर बन पा रहा है।
जो आम आदमी को सपने दिखा पाने में सफल होता है वही शासक बन पाता है। परिवर्तन का सपना, विकास का सपना, घर का सपना, नौकरी का सपना, भांति भांति के सपनो के पैकेज राजनैतिक दलो के घोषणा पत्रो में आदर्श आचार संहिता के बावजूद भी चिकने कागज पर रंगीन अक्षरो में सचित्र छप ही रहे हैं और बंट भी रहे हैं। हर कोई खुद को आम आदमी के ज्यादा से ज्यादा पास दिखाने के प्रयत्न में है। कोई खुद को चाय वाला बता रहा है तो कोई किसी गरीब की झोपड़ी में जाकर रात बिता रहा है, कोई स्वयं को पार्टी के रूप में ही आम आदमी रजिस्टर्ड करवा रहा है। पिछले चुनावो के रिकार्डो आधार पर कहा जा सकता है कि आदर्श आचार संहिता का परिपालन होते हुये, भारी मात्रा में पोलिस बल व अर्ध सैनिक बलो की तैनाती के साथ इन समवेत प्रयासो से दो चरणो में चुनाव तथाकथित रूप से शांति पूर्ण ढ़ंग से सुसंम्पन्न हो ही जायेंगे। विश्व में भारतीय लोकतंत्र एक बार फिर से सबसे बड़ी डेमोक्रेसी के रूप में स्थापित हो जायेगा। कोई भी सरकार बने अपनी तो बस एक ही मांग है कि शासन प्रशासन की चुस्ती केवल आदर्श आचार संहिता के समय भर न हो बल्कि हमेशा ही आदर्श स्थापित किये जावे, मंत्री जी केवल आदर्श आचार संहिता के समय डाक बंगले के बिल न देवें हमेशा ही देते रहें। राजनैतिक प्रश्रय से ३ के १३ बनाने की प्रवृत्ति पर विराम लगे, वोट के लिये धर्म और जाति के कंधे न लिये जावें, और आम जनता और लोकतंत्र इतना सशक्त हो की इसकी रक्षा के लिये पोलिस बल की और आचार संहिता की आवश्यकता ही न हो।

टिकिटिया अफ़ीम का उतरा नशा
ज़हीर अंसारी
देश में अनेक तरह की राजनैतिक पार्टियाँ हैं। कोई गरम तो कोई नरम, कोई ढुलमुल तो कोई मौक़ापरस्त। लेकिन इन सब की प्रवृति एक समान है। नीचे वाले नेता और कार्यकर्ता को उल्लू बनाओ और स्वार्थसिद्धी करो। निचले क्रम के नेताओं को टिकिटिया अफ़ीम इतनी पिलाते रहो कि सबरे मदक्की बन जाए। जब तक इन्हें टिकिटिया अफ़ीम चखाते रहो, इनकी सक्रियता बनी रहती है। जैसे ही यह अफ़ीम मिलना बंद हो जाती है, बेचारे निचले क्रम के नेता पल्ली ओढ़ कर सो जाते हैं। पार्टी के कार्यक्रमों में यदाकदा नज़र तो आते हैं मगर वहाँ भी भीतर की टीस उगल देते हैं। टीस उगलने के बाद फिर घिघिया कर कहते हैं कि जो उगला वो ‘ऑफ़ दी रिकार्ड’ है। अब ऐसे लोगों को कौन समझाए कि सियासत में जो होता है वो सब ‘ऑन रिकार्ड’ ही होता है।
ऐसे ही टिकिटिया अफ़ीमची हमारे कल्लू स्वामी थे। टिकिट माँगते-माँगते थक गए। अंत में जब उनके पिछवाड़े घनघनाती दोलत्ती पड़ी तो किलबिलाकर कोना दाब लिया। अब कोने में बैठे-बैठे कायँ-कायँ करते रहते हैं। कुरेदने पर अपनी व्यथा सुनाते-सुनाते पिछवाड़े पड़ी लात से कराह उठते हैं। कहते हैं जब मैं युवा था, ऊर्जावान था, दरी-फट्टा बिछाने में माहिर था तो पार्टी के सभी नेता मेरी क़द्र किया करते थे। दरी-फट्टे बिछाने में मुश्किल से विशेषज्ञता हासिल की। इसी विशेषज्ञता के बल पर मैं शीर्ष नेताओं की जी-हुजुरी सूची में शामिल हो गया। चमचों की ‘टॉप टेन’ सूची में मेरा नाम आने लगा। सोचने लगा कि मेरा क़द जिराफ़ की गर्दन टाइप हो गया, सो बीवी बच्चों और कारोबार को ठेंगे पर रख आकाओं की चाकरी इस उम्मीद से करने लगा कि अगली बार टिकिट पक्की। जब-जब टिकिटों का मार्केट ओपन होता तो मैं भी क़तार में लग जाता। आका को अर्ज़ी थमा देता। हर बार आका नीचे से ऊपर तक मुझे अजगरी दृष्टि से देखते, मानों सेंघा निगल जाएँगे। फिर मुझे पुचकार कर अगली बार का भरोसा देते हुए बम्बईया गोली चूसने के लिए पकड़ा देते थे।
पहली बार जब मैंने टिकिट का कटोरा फैलाया था। तब तक मैं ज़रा मुँहफट हो चुका था। दशकों से चमचागिरी करते रहने की वजह से मेरे मुँह का गवर्नर डैमेज हो गया था। सो बिना किसी हिचक के सौ की स्पीड में आँकड़ो सहित जीत का प्रमाण पत्र पेश कर दिया और टिकिट चाहिए ही बोल दिया।
आका ने फ़िल्म अदाकारा ललिता पवार की तरह आँखें मटकाई और मुस्कुराहट शशिकला की तरह लाते हुए शाब्दिक भाषा में बोले। बेटा अभी तुम जवान हो, तुम्हारी उम्र ही क्या है। पार्टी में बहुतेरे सीनियर हैं, इन्हें इस बार चुनाव लड़ने दो, अगली बार तुम्हारा नम्बर पक्का। आका की ज़ुबान से चासनी मिली अफ़ीम पाकर मैं गदगद हो गया। चुनाव दर चुनाव आते रहे, मुझे आश्वासन की चासनी में डुबा-डुबा कर निकाला जाता रहा। चासनी की मिठास में कब पचास साल निकल गए पता ही नहीं चला। पता उस वक़्त चला जब महरारू की कमर 75 अंश का कोण बनाने लगी। मैं दौड़ा-भागा अपने आका की चौपाल में पहुँच गया। उनसे बोला कि इस बार के चुनाव में टिकिट चाहिए। अब मैं सीनियर मोस्ट हो गया हूँ। अब तो मेरे पास भी हज़ारों दरी-फट्टा बिछाने और बैनर-कटआउट लगाने वाले चिलुआ हैं। सीट वैसे ही निकालकर दूँगा जैसे सिजेरियन आपरेशन से बच्चा निकाला जाता है।
आका ने यह सब सुनकर अपनी लम्बी सी नाक ऐसे सिकोड़ी जैसे नाक में मच्छर घुस गया हो। सड़ेला सा मुँह बनाते हुए बोले कल्लू अब तुम उम्रदराज़ हो चले हो। हाईकमान की पॉलिसी है कि युवाओं को प्रमोट करना है। अब तुम्हारा वक़्त निकल गया। अब तो तुम्हारा सेवानिवृत हुए नौकरशाहों की तरह पुनर्वास भी नहीं हो सकता।
कल्लू स्वामी अपनी दुःखभरी कथा सुनाते-सुनाते रुआंसे से हो गए। मूर्च्छित अवस्था को प्राप्त होने लगे। किसी तरह शीतल जल के छिड़काव से मूर्च्छित होने से उन्हें बचा लिया। उन्हें जब तनिक चैतन्यता आई तो कहने लगे। युवा अवस्था वाले आका ने कहा था कि थोड़ा सीनियर हो जाओ फिर टिकिट ले लेना, अब का आका कहता है बुढ़ा गए हो युवाओं को मौक़ा मिलेगा। साला सारी उम्र घासियारागिरी में निकाल दी और हाथ की आई शून्य। ये टिकिटिया अफ़ीम भी अजीब है। मैंने अपनी सात पुस्तों को वासियत कर दी है कि कटोरा लेकर चाय-पकोड़े की दुकान पर भीख माँग लेना मगर टिकिटिया अफ़ीम कभी मत खाना।

लेटर टू बापू, सेल्फी विद झाड़ू   

ऋतुपर्ण दवे

प्रिय बापू, ‘इंडिया दैट इज भारत’ से मेरा राम-राम। आज 2 अक्टूबर है। हर बरस आता है। आगे भी आएगा। तुझे याद करने का मौका हर बरस एक बार ही आता है। ऐसे में माला पहनाते तेरी तस्वीर संग एक क्लिक हो जाए। हाँ बापू अब तो सेल्फी का जमाना है। लोग तो तेरी नकल उतारने की होड़ में लग गए हैं। कोई फूल देता है तो तो कोई हाथ जोड़ता है पर अपुन को मंदसौर के प्रो.गुप्ता बहुत पसंद आए। पता है बापू उन्होंने वही किया..नहीं समझे… वो क्लास के पास नारेबाजी से परेशान थे। नारेबाजों को रोका क्या नारेबाज उन्हें ही देशद्रोही कहने लगे फिर क्या था गुप्ताजी उनके पैर पकड़ने लगे…। खैर बापू तू बता ऊपर के क्या हालचाल हैं? मेरे पास टाइम ही टाइम है। छुट्टी का असल मजा तो आज ही होगा। सुबह दो-चार जगह झाड़ू फेर प्रोग्राम में हो आया। फोटू खिचवा ली इधर का कचरा उधर, उधर का इधर। बस छुट्टी पक गई। दिन भर घूमुंगा, फिरूंगा फोटू भिजवाउंगा और क्या। अरे अभी याद आया है। आज तो चैनल वाले भी फोटू दिखाएंगे। वो क्या कहते हैं…..‘सेल्फी’ भेजो। एक आइडिया आया बापू। झाड़ू के संग सेल्फी खींचूंगा। तुम कहोगे कैसा मूर्ख है। भला झाड़ू संग सेल्फी ? तुमको पता नहीं बापू तुम्हारे भारत यानी ‘दैट इज इण्डिया’ में कुछ भी इंपॉसिबल नहीं।   सुन बापू मेरे गांव की नदी है। वो सूख गई। सच! सारे शहर की गंदगी से इतना शर्माई, थक, हार गई, कोई देखने सुनने वाला नहीं था। 5-10 बरस पहले ही पता नहीं क्या हुआ पहले धार कम हुई और अब पूरा खल्लास हो गई। बापू मेरा गांव भी सीमेण्ट जंगल बन गया है। तुम सिखाते थे मिट्टी में चला करो, बरसात की सोंधी खुशबू लिया करो, हरे घास में नंगे पैर टहला करो और सुबह-शाम “वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाणे रे” गाया करो। पर क्या करूं बापू मिट्टी तो छोड़ रेत तक सोन के भाव बिक रही है। कहां चलूं सीमेण्टेड रोड में? घास गाय-भैंस को खिलाने को नहीं बची तो घूमने कहां जाऊं? बेशरम की झुरमुट में या हर जगह इकट्ठा कचरे के पहाड़ में। बापू तुम मानते क्यों नहीं पीने के पानी के लिए इतनी मार-काट होती है कि घूमने कि फिकर कैसी? पता है दूसरे मोहल्ले से पानी लाते खासी मेहनत हो जाती है यही तो घूमना हुआ। तेरा भजन मोबाइल वाले बोलते है आउट डेटेड है, तू ही बता नया वर्जन कहां मिलेगा? बापू शहर तो छोड़ मेरा छोटा सा गांव भी गंदा हो गया। सुन जो पैसा सरकार ने नाली के लिए भेजा था वो सरपंच की गैरॉज में लग गया। अरे एक बात तो बताना भूल गया। तेरी बहू को शौच के लिए बाहर न जाना पड़े सो सरकार ने घर पर ही पक्का संडास बनवा दिया। पर क्या बताऊं उसमें लगा टीन का दरवाजा महीने भर में ही चोरी हो गया। ‘सत्य मेव जयते’ वाली पुलिस में रपट लिखाने गया तो उल्टा मुझसे पूछने लगे कि शक किस पर है। बता बापू मैं कैसे बता दूं? मरना है क्या बताकर कि वो चौधरी का बेटा…खैर छोड़ बापू।बता के मार थोड़ी खाना है। तुझे पता है मेरा गाल तेरे गाल जैसे मजबूत नहीं क्योंकि तुझे पता है मिलावटी दाना, पानी खाता हूं। इसलिए तेरे जैसे गाल थोड़ी आगे करूंगा। चल छोड़ बापू तू बता कैसा है। जल्दी-जल्दी बता दे। शाम हो रही है। रात की चिन्ता सता रही है। खैर छोड़ एक दिन नींद नहीं भी आई तो क्या। अरे बापू सुन तो,  सुबह मुझे सरकारी अस्पताल भी जाना है पता है क्यों। तेरे जनम दिन पर, सरकारी स्कूल में मध्यान्ह भोजन का खास खाना बना था नेताइन के समूह को ठेका मिला है। पता नहीं कैसे नकली दूध की असली खीर में जिन्दा छिपकली गिर गई जिससे बच्चे बीमार हो गए। अभी भी 15-20 अस्पताल में हैं। डॉक्टर तो तेरी फोटू के लिए फूल-माला का इंतजाम करने सीएमओ के पास शहर चला गया था। गनीमत थी कि अपना मन्तू सफाईवाला था न उसका बेटा अस्पताल में बाप की जगह भर्ती हो गया था। भला इंसान है खुद ही बच्चों को बॉटल चढ़ा दिया अब सब ठीक हैं। अच्छा बापू अपुन का टेम हो गया, तुझे पता है न तलब लग रही है। पर बापू एक बात तेरे लिए बहुत अच्छी है। सच्ची बताना तू वहां खुश है कि नहीं? सुन अगर कोई तकलीफ हो तो संकोच नहीं करना। मुझे पता है वहां भी तेरे बहुत से पॉलीटिकल कांपीटीटर पहुंच गए होंगे। तुझे वहां भी चैन  नहीं होगी। खैर चिन्ता मत करियो। उससे भी आगे का जुगाड़ हो गया है। वहां तकलीफ हो तो मुझे चुपचाप एसएमएस कर दइओ। अगले 2 अक्टूबर तक तेरे लिए मंगल पर जगह रिजर्व करा दूंगा वहां अभी भीड़ भाड़ कम है और किसी के दिमाग में नहीं है ये आईडिया। बात अपने तक रखियो। चलूं बापू राम-राम।

Share