आलेख -19

ईमानदारी से पढ़ाई परीक्षा में सफलता की कुंजी
कमल नाथ
प्यारे बच्चों… परीक्षाओं का दौर प्रारंभ हो चुका है और कुछ प्रारंभ होने वाली हैं। मैं उम्मीद करता हूँ कि आपने वर्ष भर पूरे मन से तैयारी की है, जिससे आपको निश्चित ही सफलता मिलेगी। परीक्षा में शामिल होते समय आपको मन और आत्म-विश्वास मजबूत और शांत रखना है। आप धैर्य के साथ हर सवाल का जवाब दें और को‍शिश करें कि तय समय में पूछे गए सभी सवालों का जवाब दें। यदि किसी प्रश्न का उत्तर नहीं सूझ रहा हो, तो परेशान न हों। जो बचे सवाल
है, उनका उत्तर जरूर और मुकम्मल दें। तय मानें कि आप निश्चित ही सफल होंगे। सफलता के लिए मेहनत, लगन और एकाग्रता जरूरी है। निराशा और आलस्य, सफलता के दुश्मन हैं और इन्हें पास न फटकने दें। यदि आप अपने प्रति ईमानदार हैं तो आपको हताशा का सामना करना ही नहीं पड़ेगा। आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।
बच्चों… आपको मालूम है कि परीक्षा यानि उत्तम और सर्वोत्तम के लिए संघर्ष। किसने ज्यदा मेहनत की, इसका फैसला इससे होता है। यदि हम सर्वोत्तम नहीं हो पा रहे हैं, तो ये संकेत है इस बात का कि हमें आगे और मेहनत करनी है। हममें कोई थोड़ी कमी है, जो हमें दूर करना है। आप परिवार, समाज और देश का भविष्य हैं। आपसे बहुत उम्मीदें हैं और आप पर आने वाले कल की गहन-गंभीर जिम्मेदारी है। मैं कामना करता हूँ कि आप सभी सफल रहेंगे और अपना नाम रोशन करेंगे। फिर भी यदि कोई कमी रह जाए तो निराश न हों, हौसला और धैर्य बनाए रखें इस उम्मीद से कि फिर मेहनत करेंगे और अव्वल आएंगे। यदि आप दुनिया के महान और सफलतम लोगों की जीवनी पढ़ेंगे तो पाएंगे कि वे बार-बार असफल होने पर भी हिम्मत नहीं हारे और आखिरकार सफलतम बनें। असफलता से ही सफलता के रास्ते गुजरते हैं, ये जानकर ही परीक्षा में शामिल हों और कामयाब हों।
मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं।
(ब्लॉगर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री है।)

बेग्जिट पर सरगर्मी, धनाड्य भारतीयों को लाभ
अजित वर्मा
ब्रेग्जिट यानी यूरोपियन यूनियन से मार्च में बाहर जाने या न जाने के मुद्दे पर ब्रिटेन में सियासत गरमायी हुई है, लेकिन भारतीयों के हिसाब से फर्क यह पड़ा है कि इसकी वजह से अमीर भारतीयों को ब्रिटेन में अच्छी रियल्टी डील्स मिल रही हैं। ब्रेग्जिट पर अनिश्चितता के कारण ब्रिटेन में आर्थिक अनिश्चितता का माहौल बन गया है, जिसके कारण लंदन और दूसरे शहरों में प्रॉपर्टी के दाम गिरना शुरू हो गये हैं।
ब्रिटिश प्रॉपर्टी कंसल्टेंट क्लूटॉन्स के मुताबिक, लंदन के पाश इलाकों में प्रॉपर्टी के दामों में 5-7 प्रतिशत की कमी आई है और सालभर में यह गिरावट 10 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। ब्रिटेन के कुछ रियल्टी डिवेलपर्स और रियल एस्टेट एजेंट्स के मुताबिक, दाम घटने के कारण अमीर भारतीय इंग्लैंड के शहरों में प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं और ऐसे भारतीयों की संख्या 15-20 प्रतिशत तक बढ़ी है।
स्थिति यह है कि लंदन के लिवरपूल स्ट्रीट, ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट, बॉन्ड स्ट्रीट और बेकर स्ट्रीट जैसे पॉश इलाकों में मिड-साइज्ड अपार्टमेंट्स 9 करोड़ से 14 करोड़ रुपये तक में बिक रहे हैं। जबकि दिल्ली के लुटियंस जोन या साउथ मुंबई में इस तरह की प्रॉपर्टीज के दाम इससे करीब दोगुने हैं।
ब्रिटेन की प्रमुख डेवेलपर रीगल लंदन में ज्वाइंट सीईओ साइमन डी फ्रेण्ड का कहना है कि लंदन के काफी महंगे माने जाने वाले मेफेयर और वेस्टएंड इलाकों के आसपास सुपर-प्राइम प्रॉपर्टी मार्केट में प्राइस करेक्शन की रिपोर्ट्स हैं। जेएलएल, सैविल्स, राइटमूव और सीबीआरई जैसी कंसल्टिंग फर्म्स पूरे ब्रिटेन में प्राइस फ्लैट रहने या घटने के ट्रेंड का अनुमान दे रही हैं। रियल एस्टेट से जुड़ी एक अन्य प्रोफेशनल इकाई रॉयल इंस्टीट्यूशन ऑफ चार्टर्ड सर्वेयर्स का मानना है कि ब्रेग्जिट से जुड़ी अनिश्चितता और परिवारों के खर्च पर नियंत्रण करने के लिए आने वाले महीनों में रियल एस्टेट के लिए डिमांड कमजोर रह सकती है।
दरअसल, यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन के निकलने की तैयारी से मार्केट के टॉप एंड पर असर पड़ा है। पिछले पांच सालों में लंदन डेवेलपमेंट पोर्टफोलियो में प्रॉपर्टीज खरीदने की चाहत रखने वाले भारतीयों की संख्या तेजी से बढ़ी है। रीडिंग, मेडनहेड, स्लो, टैप्लो और कैनरी ह्वार्फ सरीखे लंदन के नए इलाकों में अपार्टमेंट्स करीब 45000 रुपये प्रति वर्ग फुट के रेट पर बेचे जा रहे हैं, जो मुंबई के अपेक्षाकृत विकसित उपनगरों में अपार्टमेंट्स का रेट है। बर्मिंघम और मैनचेस्टर जैसे शहरों में अपार्टमेंट्स की कीमत पुणे या नाशिक के बराबर है।
हमारा मानना है कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी हलचलों का आर्थिक प्रभाव अध्ययन की दरकार रखता है। यह ब्रेग्जिट के ब्रिटिश समर्थकों और विरोधियों के बीच जारी बहस में एक मुद्दा भी बन सकता है। बहरहाल भारत के कालाधन रखने वालों के लिए ही नहीं, सफेद धन रखने वालों के लिए भी निवेश का एक सुनहरा अवसर तो है ही।

पुलवामा से क्या सीखे ?
डॉक्टर अरविन्द जैन
जैसा कहा गया हैं की हर क्षण हमारे लिए शिक्षक हैं और अनुभव बढ़ाता हैं। वैसे हम चौबीस घंटे चौकस रहते हैं और उसमे चूक होने का फायदा दुशमन उठाता हैं। कल की घटना अत्यंत दुखद और चिंतनीय हैं। बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता। इस घटना ने पूरे देश को दहलाकर रख दिया है। घटना घट चुकी और अब उसका कोई इलाज़ नहीं ,अब घटना का पोस्ट मार्टम अपने अपने हिसाब से होगा और होना भी चाहिए। कश्मीर समस्या एक असाध्य रोग हो चूका हैं ,और जब असाध्य रोग होता हैं तब उसकी चिकित्सा औषधि या शल्य चिकित्सा से होती हैं। वैसे शल्य चिकित्सा लाभकारी और बहुत सफल मानी जाती हैं।
घटना कैसे हुई ,क्यों हुई किसकी लापरवाही से हुई और इसमें कौन दोषी हैं यह महत्वपूर्ण नहीं हैं ,महत्वपूर्ण हैं उन्होंने हमारी कौन सी कमजोरी का फायदा उठाया. यह घटना यह सिद्ध करती हैं की हमारा ख़ुफ़िया तंत्र उनकी मुखबरी से अधिक शक्तिशाली हैं या उनको हमारी गतिविधियों की जानकारी पहले से थी ,या उनका लक्ष्य कुछ भी अनहोनी करने का हैं।
यह बात जरूर हैं की हमारे तंत्र में विभीषणों कीकमी नहीं हैं ! जी हाँ। यदि वे पाकिस्तान के आतनकवादी हैं तो उन्हें स्थानीय स्तर पर सहयोग मिल रहा हैं और वे देशी हैं तो उन्हें पाकिस्तान से प्रशिक्षण और मदद मिल रही हैं। यह बहुत सरल मार्ग हैं। कारण करोड़ों पाकिस्तानियों के नाते रिश्तेदार भारत में हैं और भारत में उनकी भी रिश्तेदारियां हैं। एक बात और हैंकि इस ककॉम में जेहादी बनने का एक अलग शौक /.प्रथा हैं। न जाने क्यों इस प्रकार की दुश्मनी का बीज दशकों से बोया हुआ हैं और उसको हम नष्ट और न मिटा पा रहे हैं।
हमारे बीच बातचीत का लगभग ७० वर्षों से अधिक समय हो गया /चूका हैं। पर हर बार बात होती हैं और वही ढांक के तीन पात हो जाता हैं। पाकिस्तान में जो असामाजिक तत्व हैं वे सुधर नहीं सकते और न उनके ऊपर कोई नियंत्रण हैं किसी का और उनकी मानसिकता मात्र परपीड़क हैं। मोदी सरकार ने पाकिस्तान को दुनिया से अलग थलग कर दिया उसके बाद भी उसको चीन आदि से सहयोग मिलने से उसकी कार्यवाही हमेशा विध्वंशकारी होती हैं।
पाकिस्तान एक चिकना घड़ा हैं वह किसी भी बात से अप्रभावित रहता हैं ,उसका कारण यह हैं की वह इस समय सब प्रकार से अपने घरु समस्या में उलझा हैं ,आर्थिक ,सामाजिक ,राजनैतिक स्थितियां बहुत नाजुक हैं और पाकिस्तान में मुल्ला मौलवियों ,मिलिट्री ,मिलिटेंट और वर्तमान में चीन की गोद में खेल रहा हैं ,वहां की स्थिति पाकिस्तान द्रोपदी जैसा पांडवों के बीच में फंसा हैं।
मोदी जी ने कह दिया हैं की सेना को अब खुली छूट दे दी गयी हैं पर इसके बावजूद मरता क्या न करता। पाकिस्तान अपने परमाणु बम्बों की घुड़की देकर डराता हैं और इस कारण हम थोड़ा संजीदगी बरतते हैं दूसरा भारत अहिंसा प्रेमी देश हैं ,पर इसका अर्थ यह नहीं हैं की हम अन्याय सहन करे। अहिंसा का अर्थ विजय प्राप्त करना। हारना एक प्रकार की हिंसा हैं। इसलिए हमें इस जघन्य अपराध के लिए हमें उसका प्रतिकार करना होगा ,कारण धीरे धीरे हमारे नित्य जवान मारे जा रहे हैं यह सब सहनीय नहीं हैं। इसके लिए कूटनीति और ताकत के प्रभाव से पाकिस्तान का सामना करके उसको मुँह तोड़ जबाव देना होगा। इसके अलावा हमें अपनी गुप्तचरी को भी और सुदृढ़ बनाना होगा।
भाई जैसा दोस्त नहीं और भाई जैसा दुशमन ,पर पाकिस्तान ने अपनी सब हदें पार कर चूका हैं उस पर से अब पूरा भरोसा उठ चूका हैं। कहावत हैं की लातों के बहुत बायतों से नहीं मानते। वहां का प्रधान मंत्री पंगु और पराधीन हैं ,वह नहीं चाहता की पडोसी सुखी रहे ,विकसित हो।
मोदी जी अब तुम ऐसा कर जाओं की देश तुम्हारा गुणगान गाये अन्यथा कितने आये और कितने आकर चले गए,उनमे आपका भी नाम रहेगा ईंट का जबाव पत्थर से देना होगा। सांप काटे नहीं तो फुसकारता रहे। यह अब कुछ करने का अवसर हैं।

अनन्त की खोज
अजित वर्मा
माना जाता है कि हमारी पृथ्वी की उत्पत्ति 13.7 लाख खरब वर्ष पूर्व ब्रह्माण्ड में हुए महाविस्फोट (बिग बैंग) से हुई। यह सिद्धान्त नवीनतम है। जबकि पृथ्वी की उत्पत्ति को लेकर अन्य कई धार्मिक और वैज्ञानिक धारणाएं पहले से प्रचलित हैं।
अब एक अवधारणा पृथ्वी के महाद्वीपों के निर्माण के विषय में सामने आयी है कि आखिर इन महाद्वीपों का निर्माण कैसे हुआ होगा। दक्षिण अफ्रीका के विटवाटर्सरैंड विश्वविद्यालय के शोधकत्ताओं ने एक बयान में कहा कि अंतरिक्ष में करीब 3.8 करोड़ वर्ष पहले क्षुद्रग्रहों द्वारा पृथ्वी पर भारी बमवर्षा करने से हमारे ग्रह पर शुरूआती परत बनी जिसने बाद में महाद्वीपों को जन्म दिया। हेडियाइयोन के नाम से पहचानी जाने वाली अवधि में क्षुद्रग्रहों ने हमारे ग्रह पृथ्वी पर लगातार बमबारी की जिससे उसकी सतह की चट्टानें बड़ी मात्रा में टूटीं।
शोध में पाया गया कि इन चट्टानों में ज्यादातर बेसॉल्ट थीं और क्षुद्रग्रहों के प्रभाव से इस तरह की सतह पर काफी असर पड़ा। बेसॉल्ट एक तरह की बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान होती है। ये चट्टानें हजारों किलोमीटर मोटी थीं और इनका व्यास हजारों किलोमीटर का था।
यह शोध पत्रिका नेचर कम्यूनिकेशंस में प्रकाशित हुआ है। विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राइस लैत्यिपोव ने कहा, अगर आप जानना चाहते हैं कि उस समय पृथ्वी की सतह कैसी दिखती थी तो आप बस चंद्रमा की सतह देखो जो बड़ी संख्या में विस्फोटों से हुए गड्ढों से पटी हुई है। ये चट्टानें सिलिका युक्त थीं जो हमारे महाद्वीपों के निर्माण के लिए अनिवार्य होती हैं।
दरअसल, सच तो यह है कि भारतीय ऋषि-मुनियों की ब्रह्माण्ड सम्बंधी स्थापनाओं को आधुनिक विचारधारा वाले लोग भले कल्पना की उड़ान बताते हों, लेकिन सच है कि ब्रह्माण्ड सम्बंधी शोधों की स्थिति आज भी गहरे अंधकार में भटकने और टटोलते रहने जैसी है। आधुनिक शोध और उनके निष्कर्ष भी अज्ञात सत्य के सामने बेहद बौने हैं। लिहाजा शोध, अध्ययन और अनुसंधान को निरन्तर बढ़ावा दिया ही जाना चाहिए। क्योंकि अनन्त की खोज भी अनन्त ही होगी।

प्रजातंत्र के स्तम्भों में दरार……?
ओमप्रकाश मेहता
हमारे देश के प्रजातंत्री महल के प्रमुख तीनों स्तंभों में सिर्फ सत्तर साल में ही दरार नजर आने लगी है, हमारे प्रजातंत्र का महल इन्हीं तीनों और एक अघोषित स्तंभ पर खड़ा है, यदि देश के मालिकों ने इस महल के जर्जरित स्तंभों की मरम्मत नहीं की तो यह महल किसी भी दिन भरभरा कर गिर जाएगा और फिर देश का प्रजातंत्री ढ़ांचा सिर्फ इतिहास की किताबों तक ही सीमित होकर रह जाएगा? इसलिए अब ऐसी कोई तकनीक खोजनी होगी जिससे हमारे देश का यह प्रजातंत्री महल महफूज रहे और इसके स्तंभ इसका भार उठाने के लायक बने रहे।
हमारे देश का प्रजातंत्री महल तीन घोषित स्तंभों विधायिका, कार्य पालिका और न्याय पालिका के साथ एक अघोषित स्तंभ खबर पालिका पर टिका है। इस देश को प्रजातंत्री महल के रूप में परिवर्तित करने वाले हमारे पूर्वजों (स्वतंत्रता संग्राम सैनानियों व संविधान निर्माताओं) ने भी कभी कल्पना नहीं की होगी कि इस देश की आने वाली पीढ़ी इतनी अक्षम-अयोग्य और नकारा निकलेगी जो इस प्रजातंत्री महल के स्तंभों की रक्षा नहीं कर पाएगी और महज सत्तर साल में ही प्रजातंत्री महल खण्डहर होने के कगार पर पहुंच जाएगा, किंतु हुआ ऐसा ही राजनीतिक स्वार्थ व कुर्सी बनाए रखने की ललक ने देश के प्रजातांत्रिक मूल्यों और उनकी हिफाजत की चिंता व कद्र नहीं की और आज इसी कारण प्रजातंत्री रथ के ये चारों अश्व अलग-अलग चारों दिशाओं की ओर रूख करने की स्थिति में और रथ के अस्तित्व की किसी को भी चिंता नहीं है।
अब यदि हम प्रजातंत्री रथ के अश्वों या प्रजातंत्री महल के जर्जर स्तंभों क ‘रोना रोय’ तो मन इतना व्यथित हो जाता है कि नेत्रों से बरबस अश्रुधारा बहने लगती है। पहला स्तंभ या रथ विधायिका है, जिसमें आम चुनाव के बाद चुनकर आने वाले आधुनिक भाग्यविधाता ईश्वर और संविधान की शपथ लेकर प्रजातंत्र के इस मंदिर में प्रवेश करते है और कुर्सी पा जाने के बाद उन्हें विस्मृत कर देते है, जिनकी दया पर वे यहां पहुंचे है, उन्हें अपने भविष्य की चिंता रहती है, देश और यहां के उन मतदाताओं की नहीं, जिनकी बदौलत वे यहां तक पहुंचे है, इनके पांच साल के कार्यकाल में चार साल अपनी और अपने परिवार की भावी मनोकामना की पूर्ति व संसाधन जुटाने में गुजर जाते है और पांचवें साल पुनः अपनी ‘राजनीतिक दादागिरी’ बरकरार रखने के प्रयासों और भोले-भाले मतदाताओं को ‘मुरारीलाल के सपने’ दिखाने में गुजार कर फिर कुर्सी अर्जित कर लेते है, न उन्हें संसद या विधानसभा की चिंता है, न देश, व न ही उसके रहवासियों की ही, ये सत्ता में या उसके निकट रहकर देश का पूरा दोहन करने में व्यस्त रहते है।
यह तो हुई विधायिका की बात। अब यदि दूसरे महत्वपूर्ण स्तंभ या अश्व कार्यपालिका की बात करें तो इसके सदस्यों (नौकरशाहों) की मुख्य भूमिका सत्तासीन लोगों की ‘जी हजूरी’ और ‘यस बाॅस’ भाषा होती है और अघोषित रूप से सत्ता के संचालक ये ही लोग होते है, जिन्हें अपने आकाओं की तरह केवल अपनी व अपने परिवार के भविष्य की चिंता है, देश व देशवासी चाहे भाड़ में जाए, इनका एकमात्र नारा ‘यस बाॅस’ और ‘यस सर’ है, जिसकी आड़ में वे अपनी स्वार्थ सिद्धी कर लेते है, सत्ता में चाहे जो रहे इनका काम करने का तौर-तरीका एक ही होता है, वे अपनी कारीगरी दिखाकर सत्तासूत्र अपने हाथों में ले लेते है और अपने तरीके से अपने ‘बाॅस’ को नियंत्रित करते रहते है।
अब यदि हम तीसरे स्तंभ या अश्व न्यायपालिका की चर्चा करें तो यही एक ऐसा स्तंभ है, जिस पर देश व उसकी जनता का विश्वास कायम है, किंतु यह स्तंभ अपनी उपेक्षा से पीड़ित है, न सरकार इसकी परवाह करती है और न नौकरशाह। इसीलिए कभी-कभी इसे अपना रौद्र रूप दिखाना पड़ता है, तीन घोषित स्तंभों में इसी कारण अभी भी इसकी मजबूती की थोड़ी साख कायम है, किंतु यह अपने आपमें काफी पीड़ित व दुःखी है।
…..और अब जहां तक चैथे अघोषित स्तंभ खबर पालिका का सवाल है, अब इस स्तंभ का न कोई आधार रहा है और न ही इसकी कोई साख, क्योंकि इसने स्वयं विधायिका व कार्यपालिका की जी-हजूरी कर अपनी साख गिराई, अब तो आज की नई पीढ़ी को यह भी नहीं पता कि देश में आजादी का महल खड़ा करने में इस अघोषित स्तंभ की काफी महत्वपूर्ण अघोषित भूमिका रही हे, अब तो इस स्तंभ पर दीमक का कब्जा है, जो इसे धीरे-धीरे खत्म कर रहा है।
बस, संक्षिप्त यही सब है हमारे प्रजातंत्र के महल के जर्जरित स्तंभों की दुःख भरी कहानी। जिसे स्मरण कर आज हर वह राष्ट्रवादी रोने को मजबूर है, जिसने हमारे प्रजातंत्र को लेकर काफी ‘सब्जबाग’ संजोये थे। लेकिन हमारा इतिहास भी गवाह है और हमारे देश को विश्वास भी है कि जब-जब हमारे धर्म की हानि हुई है, एक तारणहार अवतार ने जन्म लिया है और उस ‘धर्म’ में राष्ट्र धर्म भी शामिल है, इंतजार है तो बस उस अवतार या तारणहार का।

जातिवाद को नकारती रामकृष्ण परमहंस की शिक्षा
डॉक्टर अरविन्द जैन
(18 फरवरी श्री रामकृष्ण परमहंस जयंती पर विशेष) रामकृष्ण परमहंस भारत के एक महान संत एवं विचारक थे। इन्होंने सभी धर्मों की एकता पर जोर दिया। उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं अतः ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधना और भक्ति का जीवन बिताया। स्वामी रामकृष्ण मानवता के पुजारी थे। साधना के फलस्वरूप वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संसार के सभी धर्म सच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं। वे ईश्वर तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न साधन मात्र हैं। मानवीय मूल्यों के पोषक संत रामकृष्ण परमहंस का जन्म 18 फ़रवरी 1836 को बंगाल प्रांत स्थित कामारपुकुर ग्राम में हुआ था। इनके बचपन का नाम गदाधर था। पिताजी के नाम खुदीराम और माताजी के नाम चन्द्रा देवी था।उनके भक्तों के अनुसार रामकृष्ण के माता पिता को उनके जन्म से पहले ही अलौकिक घटनाओं और दृश्यों का अनुभव हुआ था। गया में उनके पिता खुदीराम ने एक स्वप्न देखा था जिसमें उन्होंने देखा की भगवान गदाधर ( विष्णु के अवतार ) ने उन्हें कहा की वे उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। उनकी माता चंद्रमणि देवी को भी ऐसा एक अनुभव हुआ था उन्होंने शिव मंदिर में अपने गर्भ में रोशनी प्रवेश करते हुए देखा।
इनकी बालसुलभ सरलता और मंत्रमुग्ध मुस्कान से हर कोई सम्मोहित हो जाता था सात वर्ष की अल्पायु में ही गदाधर के सिर से पिता का साया उठ गया। ऐसी विपरीत परिस्थिति में पूरे परिवार का भरण-पोषण कठिन होता चला गया। आर्थिक कठिनाइयां आईं। बालक गदाधर का साहस कम नहीं हुआ। इनके बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय कलकत्ता (कोलकाता) में एक पाठशाला के संचालक थे। वे गदाधर को अपने साथ कोलकाता ले गए। रामकृष्ण का अन्तर्मन अत्यंत निश्छल, सहज और विनयशील था। संकीर्णताओं से वह बहुत दूर थे। अपने कार्यों में लगे रहते थे।
सतत प्रयासों के बाद भी रामकृष्ण का मन अध्ययन-अध्यापन में नहीं लग पाया। 1855 में रामकृष्ण परमहंस के बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय को दक्षिणेश्वर काली मंदिर ( जो रानी रासमणि द्वारा बनवाया गया था ) के मुख्य पुजारी के रूप में नियुक्त किया गया था। रामकृष्ण और उनके भांजे ह्रदय रामकुमार की सहायता करते थे। रामकृष्ण को देवी प्रतिमा को सजाने का दायित्व दिया गया था। 1856 में रामकुमार के मृत्यु के पश्चात रामकृष्ण को काली मंदिर में पुरोहित के तौर पर नियुक्त किया गया।
रामकुमार की मृत्यु के बाद श्री रामकृष्ण ज़्यादा ध्यान मग्न रहने लगे। वे काली माता के मूर्ति को अपनी माता और ब्रम्हांड की माता के रूप में देखने लगे। कहा जाता हैं की श्री रामकृष्ण को काली माता के दर्शन ब्रम्हांड की माता के रूप में हुआ था। रामकृष्ण इसकी वर्णना करते हुए कहते हैं ” घर ,द्वार ,मंदिर और सब कुछ अदृश्य हो गया , जैसे कहीं कुछ भी नहीं था! और मैंने एक अनंत तीर विहीन आलोक का सागर देखा, यह चेतना का सागर था। जिस दिशा में भी मैंने दूर दूर तक जहाँ भी देखा बस उज्जवल लहरें दिखाई दे रही थी, जो एक के बाद एक ,मेरी तरफ आ रही थी।
अफवाह फ़ैल गयी थी की दक्षिणेश्वर में आध्यात्मिक साधना के कारण रामकृष्ण का मानसिक संतुलन ख़राब हो गया था। रामकृष्ण की माता और उनके बड़े भाई रामेश्वर रामकृष्ण का विवाह करवाने का निर्णय लिया। उनका यह मानना था कि शादी होने पर गदाधर का मानसिक संतुलन ठीक हो जायेगा, शादी के बाद आये ज़िम्मेदारियों के कारण उनका ध्यान आध्यात्मिक साधना से हट जाएगा। रामकृष्ण ने खुद उन्हें यह कहा कि वे उनके लिए कन्या जयरामबाटी(जो कामारपुकुर से ३ मिल दूर उत्तर पूर्व की दिशा में हैं) में रामचन्द्र मुख़र्जी के घर पा सकते हैं। 1859 में 5 वर्ष की शारदामणि मुखोपाध्याय और 23 वर्ष के रामकृष्ण का विवाह संपन्न हुआ। विवाह के बाद शारदा जयरामबाटी में रहती थी और १८ वर्ष के होने पर वे रामकृष्ण के पास दक्षिणेश्वर में रहने लगी।
रामकृष्ण तब संन्यासी का जीवन जीते थे।
कालान्तर में बड़े भाई भी चल बसे। इस घटना से वे व्यथित हुए। संसार की अनित्यता को देखकर उनके मन में वैराग्य का उदय हुआ। अन्दर से मन ना करते हुए भी श्रीरामकृष्ण मंदिर की पूजा एवं अर्चना करने लगे। दक्षिणेश्वर स्थित पंचवटी में वे ध्यानमग्न रहने लगे। ईश्वर दर्शन के लिए वे व्याकुल हो गये। लोग उन्हे पागल समझने लगे।
चन्द्रमणि देवी ने अपने बेटे की उन्माद की अवस्था से चिन्तत होकर गदाधर का विवाह शारदा देवी से कर दिया। इसके बाद भैरवी ब्राह्मणी का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ। उन्होंने उन्हें तंत्र की शिक्षा दी। मधुरभाव में अवस्थान करते हुए ठाकुर ने श्रीकृष्ण का दर्शन किया। उन्होंने तोतापुरी महाराज से अद्वैत वेदान्त की ज्ञान लाभ किया और जीवन्मुक्त की अवस्था को प्राप्त किया। सन्यास ग्रहण करने के वाद उनका नया नाम हुआ श्रीरामकृष्ण परमहंस। इसके बाद उन्होंने ईस्लाम और क्रिश्चियन धर्म की भी साधना की।
समय जैसे-जैसे व्यतीत होता गया, उनके कठोर आध्यात्मिक अभ्यासों और सिद्धियों के समाचार तेजी से फैलने लगे और दक्षिणेश्वर का मंदिर उद्यान शीघ्र ही भक्तों एवं भ्रमणशील संन्यासियों का प्रिय आश्रयस्थान हो गया। कुछ बड़े-बड़े विद्वान एवं प्रसिद्ध वैष्णव और तांत्रिक साधक जैसे- पं॰ नारायण शास्त्री, पं॰ पद्मलोचन तारकालकार, वैष्णवचरण और गौरीकांत तारकभूषण आदि उनसे आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त करते रहे। वह शीघ्र ही तत्कालीन सुविख्यात विचारकों के घनिष्ठ संपर्क में आए जो बंगाल में विचारों का नेतृत्व कर रहे थे। इनमें केशवचंद्र सेन, विजयकृष्ण गोस्वामी, ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम लिए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त साधारण भक्तों का एक दूसरा वर्ग था जिसके सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति रामचंद्र दत्त, गिरीशचंद्र घोष, बलराम बोस, महेंद्रनाथ गुप्त (मास्टर महाशय) और दुर्गाचरण नाग थे।[2]स्वामी विवेकानन्द उनके परम शिष्य थे।
रामकृष्ण के अंतिम संस्कार के समय उनके शिष्यों की तस्वीर।
बीमारी और अन्तिम जीवन
रामकृष्ण परमहंस जीवन के अंतिम दिनों में समाधि की स्थिति में रहने लगे। अत: तन से शिथिल होने लगे। शिष्यों द्वारा स्वास्थ्य पर ध्यान देने की प्रार्थना पर अज्ञानता जानकर हँस देते थे। इनके शिष्य इन्हें ठाकुर नाम से पुकारते थे। रामकृष्ण के परमप्रिय शिष्य विवेकानन्द कुछ समय हिमालय के किसी एकान्त स्थान पर तपस्या करना चाहते थे। यही आज्ञा लेने जब वे गुरु के पास गये तो रामकृष्ण ने कहा-वत्स हमारे आसपास के क्षेत्र के लोग भूख से तड़प रहे हैं। चारों ओर अज्ञान का अंधेरा छाया है। यहां लोग रोते-चिल्लाते रहें और तुम हिमालय की किसी गुफा में समाधि के आनन्द में निमग्न रहो। क्या तुम्हारी आत्मा स्वीकारेगी? इससे विवेकानन्द दरिद्र नारायण की सेवा में लग गये। रामकृष्ण महान योगी, उच्चकोटि के साधक व विचारक थे। सेवा पथ को ईश्वरीय, प्रशस्त मानकर अनेकता में एकता का दर्शन करते थे। सेवा से समाज की सुरक्षा चाहते थे। गले में सूजन को जब डाक्टरों ने कैंसर बताकर समाधि लेने और वार्तालाप से मना किया तब भी वे मुस्कराये। चिकित्सा कराने से रोकने पर भी विवेकानन्द इलाज कराते रहे। चिकित्सा के वाबजूद उनका स्वास्थ्य बिगड़ता ही गया।
अंत में वह दुख का दिन आ गया। 1886 ई. 16 अगस्त सवेरा होने के कुछ ही वक्त पहले आनन्दघन विग्रह श्रीरामकृष्ण इस नश्वर देह को त्याग कर महासमाधि द्वारा स्व-स्वरुप में लीन हो गये।
रामकृष्ण छोटी कहानियों के माध्यम से लोगों को शिक्षा देते थे। कलकत्ता के बुद्धिजीवियों पर उनके विचारों ने ज़बरदस्त प्रभाव छोड़ा था ; हांलाकि उनकी शिक्षायें आधुनिकता और राष्ट्र के आज़ादी के बारे में नहीं थी। उनके आध्यात्मिक आंदोलन ने परोक्ष रूप से देश में राष्ट्रवाद की भावना बढ़ने का काम किया क्योंकि उनकी शिक्षा जातिवाद एवं धार्मिक पक्षपात को नकारती हैं।
रामकृष्ण के अनुसार ही मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य हैं। रामकृष्ण कहते थे की कामिनी -कंचन ईश्वर प्राप्ति के सबसे बड़े बाधक हैं। रामकृष्ण संसार को माया के रूप में देखते थे। उनके अनुसार अविद्या माया सृजन के काले शक्तियों को दर्शाती हैं (जैसे काम, लोभ ,लालच , क्रूरता , स्वार्थी कर्म आदि ), यह मानव को चेतना के निचले स्तर पर रखती हैं। यह शक्तियां मनुष्य को जन्म और मृत्यु के चक्र में बंधने के लिए ज़िम्मेदार हैं। वही विद्या माया सृजन की अच्छी शक्तियों के लिए ज़िम्मेदार हैं ( जैसे निस्वार्थ कर्म , आध्यात्मिक गुण , उँचे आदर्श , दया , पवित्रता , प्रेम और भक्ति )। यह मनुष्य को चेतन के ऊँचे स्तर पर ले जाती हैं।

दिखाएं अब 56 इंच का सीना
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कश्मीर में हुए 44 जवानों के बलिदान ने देश का दिल दहला दिया है। लोग चाहते हैं कि इस खून का बदला खून से लिया जाए। इतना ही नहीं, आतंकवाद को जड़ से उखाड़ दिया जाए लेकिन इस दुर्घटना को घटे अब 50 घंटे से ज्यादा हो चुके हैं लेकिन हमारी सरकार के प्रवक्ता सिर्फ बातों के गोले उछाल रहे हैं, बैठकें कर रहे हैं और उनकी पूर्व-निश्चित नौटंकियां भी जारी हैं। उनमें कोई फर्क नहीं पड़ा। आत्म-सम्मोहन का यह दृश्य देखकर मुझे पं. जवाहरलाल नेहरु का वह कथन याद आ रहा है, जो उन्होंने चीनी घुसपैठ और हमले के वक्त दिया था। उन्होंने श्रीलंका जाते समय अपनी फौज को आदेश दे दिया था कि वह चीनी फौज को खदेड़ दे। 1962 में फिर क्या हुआ, यह मुझे आपको बताने की जरुरत नहीं है। लगभग वही मुद्रा कल सभी टीवी चैनलों और आज के हमारे अखबारों में हमें हमारे प्रधानमंत्रीजी की देखने को मिल रही है। जवानों, तुम्हारा बलिदान बेकार नहीं जाएगा, यह भी कोई कहने का तरीका है ? यदि सरकार यह मानती है कि य
कश्मीर में हुए 44 जवानों के बलिदान ने देश का दिल दहला दिया है। लोग चाहते हैं कि इस खून का बदला खून से लिया जाए। इतना ही नहीं, आतंकवाद को जड़ से उखाड़ दिया जाए लेकिन इस दुर्घटना को घटे अब 50 घंटे से ज्यादा हो चुके हैं लेकिन हमारी सरकार के प्रवक्ता सिर्फ बातों के गोले उछाल रहे हैं, बैठकें कर रहे हैं और उनकी पूर्व-निश्चित नौटंकियां भी जारी हैं। उनमें कोई फर्क नहीं पड़ा। आत्म-सम्मोहन का यह दृश्य देखकर मुझे पं. जवाहरलाल नेहरु का वह कथन याद आ रहा है, जो उन्होंने चीनी घुसपैठ और हमले के वक्त दिया था। उन्होंने श्रीलंका जाते समय अपनी फौज को आदेश दे दिया था कि वह चीनी फौज को खदेड़ दे। 1962 में फिर क्या हुआ, यह मुझे आपको बताने की जरुरत नहीं है। लगभग वही मुद्रा कल सभी टीवी चैनलों और आज के हमारे अखबारों में हमें हमारे प्रधानमंत्रीजी की देखने को मिल रही है। जवानों, तुम्हारा बलिदान बेकार नहीं जाएगा, यह भी कोई कहने का तरीका है ? यदि सरकार यह मानती है कि यह अपराध पाकिस्तान की जैश-ए-मुहम्मद ने किया है तो वह 40 घंटे तक जबानी जमा-खर्च क्यों करती रही ? कल सूर्योदय के पहले ही उसको सबक सिखा देना चाहिए था। अगर मैं मोदी की जगह होता तो इमरान खान को फोन करता और कहता कि आतंकवादियों के शिविरों के पते मैं आपको देता हूं। या तो आप उन्हें सूर्योदय के पहले उड़ा दीजिए। यदि नहीं तो उन्हें हम उड़ा देंगे। यदि अमेरिका उसामा बिन लादेन को खत्म कर सकता है तो भारत मसूद अजहर को क्यों नहीं कर सकता लेकिन इतना सख्त कदम उठाने के लिए खुद में दम-गुर्दा (56 इंच का सीना) होना चाहिए और पहले से उसकी पूरी तैयारी होनी चाहिए। यह काम तो अब भी हो सकता है। सामरिक दृष्टि से हमारी सरकार का चरित्र लचर-पचर रहा है। इसका प्रमाण ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का भौंडा प्रचार है। यदि वह स्ट्राइक सचमुच ‘सर्जिकल’ थी तो 2016 से अब तक हमारे 300 जवान क्यों मारे गए ? पिछले तीन साल में लगभग 1000 आतंकी घटनाएं कैसे हो गई ? लगभग 100 बार हमारी सीमा का उल्लंघन क्यों हो गया ? हमारी कूटनीति भी लंगड़ा रही है। हम ट्रंप और शी की खुशामद में गलीचों की तरह बिछे हुए है। अमेरिका और चीन से हम क्यों नहीं कहते कि पाकिस्तान पोषित आतंकवादी गिरोहों को वे आगे बढ़कर खत्म करने या करवाने का जिम्मा क्यों नहीं लेते ?

आतंकी हमलों के जिम्मेदारों को सबक सिखाने का सही समय
डॉ हिदायत अहमद खान
जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में आतंकी फिदायीन हमले में हमारे जितने जवान शहीद हो गए, उतने तो शायद किसी घोषित युद्ध में भी नहीं होते। यह सोचकर दिल गम से भर आता है कि सीमा पर हमारे जवान लगातार अघोषित युद्ध की विभीषिका का शिकार हो रहे हैं और हम हर बार आतंकी हमलों की निंदा करके और शहीद हुए जवानों को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि देकर अपनी जिम्मेदारी को पूर्ण समझ रहे हैं। बहुत ही दु:ख और अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि जम्मू-कश्मीर में ही नहीं बल्कि देश के अनेक हिस्सों में आतंकी अपनी उपस्थिति लगातार दर्ज कराते रहे हैं, लेकिन सरकारें उन्हें माकूल जवाब देने की बजाय, हम देख रहे हैं, हम देखेंगे और हम देख लेंगे जैसी भाषा का प्रयोग करती चली जा रही हैं। कहने में हर्ज नहीं कि मौजूदा सरकार की विदेश नीति के साथ ही आतंकवाद विरोधी नीति पूरी तरह फेल हुई है, जिसके नतीजे में एक दो नहीं बल्कि करीब दर्जनभर आतंकी हमले हो चुके हैं। देश की दिशा और दशा तय करने वाले जिम्मेदारों की इसी भाषा के कारण आतंकी अपने नापाक इरादों को अमली जामा पहनाने में सफल हो रहे हैं। दरअसल आतंकी समझ रहे हैं कि हमारी सरकार और जिम्मेदार तंत्र जुबानी जमाखर्च करता रहेगा, जिससे उन्हें कोई नुकसान होने वाला नहीं है। यदि यह बात नहीं होती तो पाकिस्तान में मौजूद हिंदुस्तान के अपराधी आतंकी लगातार जहर उगलने का काम करते देखे नहीं जाते। यही नहीं बल्कि आतंक का पर्याय बने जैश-ए-मोहम्मद ने तो पुलवामा हमले की जिम्मेदारी लेकर यह भी जतला दिया है कि उसे किसी भी तरह की धमकियों से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। कौन नहीं जानता कि जैश-ए-मोहम्मद आतंकी संगठन पाकिस्तान की जमीन पर ही फल-फूल रहा है, जिसे अमेरिका ने भी ब्लैकलिस्टेड कर रखा है। बावजूद इसके उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर पा रहा है और वह भारत में आतंकी हमला करके अट्टहास करता है कि जो हुआ उसका जिम्मेदार वो खुद है। ऐसे निर्लज्ज और बेशर्म आतंकियों के संगठन को आखिर पनाह देने का दोषी कौन है, इस पर भी बात होनी चाहिए और अमेरिका पर दबाव बनाया जाना चाहिए कि वो अब अच्छे आतंकी और बुरे आतंकियों जैसी दोहरी नीति को दरगुजर कर तमाम आतंकियों को एक ही सूची में रखते हुए उनके खात्में की ओर आगे बढ़े। इसके लिए जरुरी है कि सबसे पहले पाकिस्तान में मौजूद आतंकी संगठनों और सरगनाओं को खत्म करने की दिशा में रणनीति के तहत सैन्य कार्रवाई की जाए। गौरतलब है कि पुलवामा में अवन्तीपुरा के गोरीपुरा इलाके में सीआरपीएफ की 54वीं बटालियन के काफिले पर हुए आतंकी हमले में करीब 42 जवान शहीद हुए हैं और इससे ज्यादा जवान घायल हैं। आरडीएक्स विस्फोटक से भरी कार से किए गए इस हमले के कारण जवानों से भरी बस के परखच्चे उड़ गए। आतंकियों के इस कायराना करतूत की जितनी भी निंदा की जाए कम है। दुनिया में इस हमले की निंदा हो रही है और ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि आतंकवादी तो सिर्फ आतंकवादी ही होते हैं, उनका किसी धर्म, जाति या संप्रदाय से कोई लेना-देना नहीं होता है। वो किसी भी कौम के सगे नहीं होते हैं, क्योंकि उनका धर्म तो आतंक फैलाना और उसे ही पोषित करना होता है। इसलिए कहा जा रहा है कि जहां से भी इस आतंक को बल मिलता हो, जो भी इसे प्रश्रय देता हो और जिन्होंने आतंकवाद की फैक्ट्री खोल रखी हो, उन्हें अब उन्हीं के घर में मुंह तोड़ जवाब देने का वक्त आ गया है। ये आतंकी बारदात को अंजाम देकर जिस बिल में भी जाकर छुपते हों उन्हें वहीं खत्म करने और शहीद जवानों को सलामी देने का भी यह वक्त है। इसके लिए देश का प्रत्येक नागरिक सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है और हौसला दे रहा है कि यदि उनके खून का एक-एक कतरा भी देश के काम आ जाए तो वो उफ नहीं करेंगे। ऐसे तमाम लोगों के जजबे को सलाम, लेकिन यहां जजबाती होने से काम नहीं चलने वाला है, क्योंकि सवाल यह भी है कि आखिर इतना बड़ा हमला करने में आतंकवादी कामयाब कैसे हो गए, जबकि गुप्तचर एजेंसियां लगातार आतंकी घुसपैठ और हमले के प्रति सचेत कर रहीं थीं। उस भारी भूल पर भी हमारी नजर होनी चाहिए, क्योंकि सीमा पर आतंकियों को रोकने और उन्हें बेकअप देने वालों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए बेहतर विदेशनीति के साथ ही साथ आतंकवाद विरोधी रणनीति की भी आवश्यकता है। यह समय राजनीति करने का नहीं है, बल्कि एकजुटता के साथ देशहित में फैसला लेते हुए सरकार और सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने का है। आमजन भी सवाल करता दिख रहा है कि आखिर राजनीति से ऊपर उठते हुए सरकारें कब देशहित में फैसला लेंगी? आखिर हमारे जवान यूं ही कब तक आतंकियों के हाथों शहीद होते रहेंगे? ऐसे तमाम सवालकर्ताओं की भावनाओं को भी समझना होगा, लेकिन इसके साथ ही यह भी समझने वाली बात है कि भावनाओं में बहकर किसी समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता है। इस दिशा में शासन-प्रशासन नीति के तहत कार्य को अंजाम देंगे, लेकिन देश के प्रत्येक नागरिक को भी अब चाहिए कि वह भी जागरुक नागरिक होने का सबूत दे और ऐसे किसी भी संदिग्ध गतिविधि में लिप्त शख्स या संगठन की जानकारी पुलिस या सुरक्षातंत्र तक पहुंचाए जो किसी भी तरह का नुक्सान कर सकता है। इससे आतंकी देश में प्रश्रय पाने में असफल होंगे और समय रहते इन्हें रोक पाना भी हमारे सुरक्षा तंत्र के लिए मुमकिन होगा। अंतत: शहीद जवानों को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि! जय हिंद!

शराबखोरों को कौन समझाए ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
दिल्ली के कितने नौजवान शराबखोरी करते हैं, यह जानने के लिए एक शराब-विरोधी संस्था ने दिल्ली के 10 हजार युवक-युवतियों से पूछताछ की। ये नौजवान कोई मजदूर के बच्चे नहीं थे। न ही गंदे गली-कूचों या झोपड़ों में रहनेवालों के बच्चे थे। ये लोग थे, दिल्ली के शानदार और मालदार इलाकों में रहनेवाले नौजवान ! साउथ एक्सटेंशन, डिफेंस काॅलोनी, न्यू फ्रेंडस काॅलोनी और राजोरी गार्डन जैसे मोहल्लों के होटलों और शराबखानों में जानेवाले युवजनों से पूछा गया था कि आप शराब पीते हैं या नहीं और यदि पीते हैं तो कब से पीनी शुरु की है। मालूम पड़ा कि 65 प्रतिशत लड़कों ने कहा कि वे पीते हैं। इन 65 प्रतिशत में से 89 प्रतिशत ने कहा कि उन्होंने 25 साल की उम्र के पहले ही पीना शुरु कर दिया था। कुल 11 प्रतिशत लोग ऐसे थे, जिन्हें पीने की यह लत 25 साल की उम्र होने के बाद लगी याने छोटी उम्र के नौजवान जरा जल्दी फिसलते हैं। यदि संस्कार मजबूत हों तो छोटी उम्र में नशाखोरी, दुराचार और अपराधों से बचना कठिन नहीं होता। इनमें से 20 प्रतिशत जवानों ने बताया कि उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों की जानकारी और मदद से शराबखोरी शुरु की। सर्वेक्षण करनेवाली इस संस्था को यह भी जानने की कोशिश करनी चाहिए थी कि लोग शराब पीना या नशा करना शुरु क्यों करते हैं ? नशाबंदी के खिलाफ देश में जबर्दस्त आंदोलन चलना चाहिए। सर्वोदय, आर्यसमाज, स्वाध्याय जैसी संस्थाएं पता नहीं, क्यों चुप पड़ी हुई हैं। इन्होंने लाखों लोगों को नशामुक्त किया है। मैं भी काफी सक्रिय हूं। मैं जिन मुस्लिम देशों में जाता हूं, वहां अपनी सभाओं और संगोष्ठियों में लोगों से नशाबंदी की प्रतिज्ञा करवाता हूं। नीतीशकुमार ने बिहार में जब नशाबंदी की तो मैंने उन्हें बहुत सराहा और उन्हें कुछ नए सुझाव भी दिए, जो उन्होंने तुरंत लागू कर दिए। हमारे राजनीतिक दल तो इस मामले में आंख मीचे रहते हैं। गांधीजी के जमाने में कांग्रेस की कार्यसमिति में कोई शराबखोर सदस्य नहीं रह सकता था लेकिन अब सभी पार्टियों के कई बड़े-बड़े नेता भी बेझिझक शराबखोरी करते रहते हैं। उन पर सत्ता और प्रचार का नशा तो पहले से चढ़ा ही रहता है, दारुकुट्टई उन्हें इंसान भी नहीं बने रहने देती। अब हम किस मुंह से इन भटके हुए नौजवानों को बरजें ?

संविधान ने प्रधानमंत्री को ’तानाशाह‘ बनाया…..?
ओमप्रकाश मेहता
अब इसे संविधान निर्माताओं की भूल कहें या उनकी भावी कल्पनाओं का अभाव कि हमारे देश के संविधान ने लोकतंत्र की आड़ में प्रधानमंत्री के पद को ’तानाशाह‘ बना दिया, हमारे संविधान के निर्माताओं ने यह कार्य तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के आभा मंडल को देखकर किया या उन्होंने अन्य देशों के संविधानों का अध्ययन नहीं किया, यह तो वे स्वयं जाने किंतु आज यह अवश्य महसूस किया जा रहा है कि हमारे देश के संविधान ने सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री को सत्ता का शीर्ष व सर्वशक्तिमान पदाधिकारी बना दिया, यद्यपि कहने को राष्ट्रपति देश का सर्वोच्च शासक होता है किंतु चूंकि उनके चयन की बागडोर प्रधानमंत्री के हाथों में होती है। इसलिए राष्ट्रपति की मजबूरी होती है कि वह किसी भी मामले में प्रधानमंत्री की सहमति के बिना कोई काम न करें।
हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री से लेकर मौजूदा प्रधानमंत्री तक सरकार चलाने में तानाशाही रूख अपनाने के आरोप लगते रहे है। पं. जवाहरलाल नेहरू के कई कार्यों को तानाशाही की श्रेणी में लाया गया तो इंदिरा जी को तो ’तानाशाही‘ की ’अवतार‘ कहा गया, यद्यपि बंगलादेश युद्ध के समय प्रतिपक्ष के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी जी ने ’दुर्गा‘ कहा था, किंतु इंदिरा जी का लगभग पूरा सत्रह साल का प्रधानमंत्री काल ’तानाशाही‘ का पर्याय रहा, जिसमें ’आपातकाल‘ भी शामिल है, और उन सत्रह सालों में राष्ट्रपति व संसद सहित कोई भी उनकी तानाशाही पर अंकुश नहीं लगा पाया।
ऐसा कतई नहीं है कि विश्व के जितने भी लोकतंत्री या प्रजातंत्री देश है वहां तानाशाही नहीं है, अंतर सिर्फ इतना है कि हमारे देश में हमारे संविधान ने प्रधानमंत्री को सर्वाधिकार देकर उसमें तानाशाही समाहित कर दी और अन्य प्रजातंत्रीय देशों में देश का शासक व्यक्तित्व, स्वभाव तथा पद के अंहकार में तानाशाही ओढ़ लेता है।
हमारे देश में तो राष्ट्रपति से लेकर संवैधानिक संस्थाओं तक को प्रधानमंत्री की दया पर निर्भर रहना पड़ता है, यद्यपि राष्ट्रपति का पद संवैधानिक रूप से प्रधानमंत्री के पद से बड़ा होता है, किंतु अहम्् सवाल यह कि राष्ट्रपति पद हेतु व्यक्ति का चयन कौन करता है? इसीलिए वह शख्स उस सर्वोच्च पद पर रहने तक प्रधानमंत्री पद पर विराजित शख्स का आभारी रहता है और प्रधानमंत्री की हर बात मानने को मजबूर होता है। ऐसा कतई नहीं है कि हमारे देश में राष्ट्रपति ने कभी भी केबिनेट (मंत्री परिषद) या प्रधानमंत्री का प्रस्ताव ठुकरा कर वापस न भेजा हो? ऐसे अवसर आए है, किंतु ऐसे अवसर अक्सर तब आए जब प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति एक-दूसरे के राजनीतिक रूप से विरोधी रहे हो, या सरकार बदल गई, नया प्रधानमंत्री आ गया और राष्ट्रपति पुराना ही हो? पर आजादी मिलने और संविधान लागू होने के बाद से अब तक ऐसे बिरले ही अवसर आए होंगे?
……फिर हमारे लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ी विसंगति यह भी रही कि हर प्रधानमंत्री ने संविधान को प्रजातंत्र का ’धर्मग्रंथ‘ नहीं बल्कि अपने हाथों का ’चाबी वाला खिलौना‘ समझ कर उसका उपयोग किया, तभी तो अब तक हमारा संविधान एक सौ से अधिक संशोधन के तीरों से बिंधा नजर आता है, अब तक हर सरकार और प्रधानमंत्री ने संविधान को अपनी इच्छा के अनुरूप बनाने की कौशिशें की और उन्हीं कौशिशों ने इतने संविधान संशोधन के नुकीलें तीर संविधान पर दाग दिए। हर प्रधानमंत्री ने यह कार्य किसी विषद् लोकहित या देश की जनता के फायदे के लिए नहीं बल्कि अपने ’वोटबैंक‘ के विस्तार और सत्ता को बनाए रखने की गरज से किए। इसी का परिणाम है कि जिसकी शपथ लेकर सत्ता का पद अंगीकार किया जाता है, वहीं संविधान ’वक्त-बेवक्त‘ का जरूरत बनकर रह गया है।
संविधान के इस सदुपयोग या दुरूपयोग पर विचार करना छोड़ यदि इसे प्रधानमंत्री पद के आईनें में देखें तो प्रधानमंत्री की सूरत उजली और संविधान की मूरत धूंधली नजर आती है। आज इसी संविधान के चलते हमारे देश में शासन पर राजनीति हावी या सशक्त हुई है, संविधान कभी हावी नहीं हो पाया, इसीलिए आज कानूनी रूप से स्वतंत्र संवैधानिक संगठनों को प्रधानमंत्री की मर्जी पर काम करना पड़ते है, जिसका ताजा उदाहरण चुनाव आयोग है, जिसे अपने सुझावों को मूर्तरूप देने के लिए गिड़गिड़ाना पड़ रहा है और देश की राजनीति के सर्वेसर्वा प्रधानमंत्री उन सुझावों पर कोई ध्यान नहीं दे रहे, यही स्थिति अन्य संवैधानिक संगठनों की भी है, वे भी अपने आप को लाचार महसूस करने लगी है। अब यह अपेक्षा करना भी व्यर्थ है कि कोई ऐसा शख्स आएगा जो संविधान में कोई ऐसा संशोधन करेगा जो प्रधानमंत्री को तानाशाह बनने से रोक सके?

सियासी लड़ाई भ्रष्टाचार से या मोदी से ?
डॉ नीलम महेंद्र
क्या राहुल रॉफेल डील से सचमुच असंतुष्ट हैं? अगर हाँ, तो जैसा कि रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, उन्हें ठोस सबूत पेश करने चाहिए। अगर वो कहते हैं और मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अनिल अंबानी को 30 हज़ार करोड़ रुपए दिए हैं तो इसे सिद्ध करें, कहीं न कहीं किसी ना किसी खाते में पैसों का लेनदेन दिखाएं। काश कि वो और उनके सलाहकार यह समझ पाते कि इस प्रकार आधी अधूरी जानकारियों के साथ आरोप लगाकर वे मोदी की छवि से ज्यादा नुकसान खुद अपनी और कांग्रेस की छवि को ही पहुँचा रहे हैं। क्योंकि देश देख रहा है कि जिस प्रकार की संवेदनशीलता से वे रॉफेल सौदे में कथित भ्रष्टाचार को लेकर मोदी के खिलाफ दिखा रहे हैं, वो ममता के प्रति शारदा घोटाले, या अखिलेश के प्रति उत्तर प्रदेश के खनन घोटाले अथवा मायावती के प्रति मूर्ति घोटाले या फिर लालू और तेजस्वी के प्रति चारा घोटाले या चिदंबरम के प्रति आई एन एक्स के भ्रष्टाचार के मामलों में नहीं दिखा रहे। देश देख रहा है कि इन मामलों में सुबूतों के आधार पर पूछताछ करने पर भी कांग्रेस कहती है कि मोदी सरकार विपक्ष को डराने का काम कर रही है लेकिन उच्चतम न्यायालय से क्लीन चिट मिलने के बाद भी रॉफेल को मुद्दा बनाने को कांग्रेस अपना अधिकार समझती है। यह खेद का विषय है कि राहुल रॉफेल को एनडीए का बोफोर्स सिध्द करने की अपनी कोशिश में हैं, ताकि वे इसे लोकसभा चुनावों में एक अहम मुद्दा बनाकर अपना राजनैतिक स्वार्थ हासिल कर सकें। इस प्रकार वे देश को गुमराह करके देश की ऊर्जा और समय दोनों नष्ट कर रहे हैं।
राहुल गांधी ने रॉफेल को लेकर ताज़ा आरोप एक अंग्रेजी अखबार द हिन्दू में प्रकाशित रक्षा मंत्रालय की एक अधूरी चिट्ठी को आधार बनाकर लगाया। लेकिन हर बार की तरह यह आरोप भी तब ध्वस्त हो गया जब रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने पूरी चिट्ठी और उसका सच सामने रख दिया। लेकिन राहुल संतुष्ट नहीं हुए। हो भी कैसे सकते हैं ? जब रॉफेल पर वो संसद में रक्षा मंत्री के जवाब से और सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ही संतुष्ट नहीं हुए तो अब रक्षा मंत्री के बयान से संतुष्ट कैसे हो सकते हैं? ऐसा लगता है कि राहुल इस समय अविश्वास के एक अजीब दौर से गुज़र रहे हैं। उन्हें प्रधानमंत्री पर विश्वास नहीं है, उन्हें देश के रक्षा मंत्री पर भरोसा नहीं है, सरकार पर यकीन नहीं है, और तो और देश की न्याय व्यवस्था, माननीय सुप्रीम कोर्ट पर भी नहीं! वो कई बार रॉफेल के मुद्दे पर जेपीसी की भी मांग कर चुके हैं जो सर्वथा निरर्थक है। क्योंकि इससे पहले जब कैग की रिपोर्ट के आधार पर 2 जी घोटाला प्रकाश में आया था, तब जेपीसी का गठन किया गया था जिसमें सरकार को क्लीन चिट दे दी गई थी लेकिन अदालत ने आरोपियों को जेल भेज दिया था। इसके बावजूद अगर वो जेपीसी की मांग करते हैं तो इसे क्या समझा जाए?
देश जानना चाहता है कि कहीं बोफोर्स की ही तरह रॉफेल भी कांग्रेस का ही षड्यंत्र तो नहीं है?
क्योंकि रॉफेल डील 2012 के कांग्रेस के समय की वो अधूरी डील है जो उनके कार्यकाल में पूरी नहीं हो पाई थी।2015 में मोदी सरकार ने इस डील को आगे बढ़ाया और अब यह डील भारत सरकार और फ्रांस सरकार के बीच है। एयर चीफ मार्शल बीरेंद्र सिंह धनोआ रॉफेल डील को लेकर लगाए गए सभी आरोपों को यह कहकर खारिज कर चुके हैं कि वर्तमान डील पहले से बेहतर शर्तों पर हुई है।
पूर्व एयर चीफ अरूप राहा कह चुके हैं कि जो 36 रॉफेल विमानों का सौदा हुआ है वो पुराने प्रपोजल से बेहतर है क्योंकि ये बेहतर टेक्नोलॉजी और हथियारों से लैस हैं।
अब इसे क्या कहा जाए कि एक तरफ राहुल गांधी हमारे सैनिकों से कहते हैं कि आप हमारे गर्व हो और दूसरी तरफ वो हमारे सेनाध्यक्षों पर भी यकीन नहीं कर रहे?
अभी हाल ही में जिस अधूरी चिट्ठी को दिखाकर वो प्रधानमंत्री को घेरने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं उसमें वो भले ही राजनीति के चलते रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के बयान पर भरोसा नहीं कर रहे ठीक है, लेकिन कम से कम देश की सेना पर तो यकीन करें जिस पर वो अपने ही कहे अनुसार गर्व करते हैं। क्योंकि खुद रॉफेल सौदे के वार्ताकार एयर मार्शल एसबीपी सिन्हा ने ही राहुल के आरोप को यह कह कर खारिज़ कर दिया कि पीएमओ ने कभी भी रॉफेल सौदे में दखलंदाजी नहीं की। इसके अलावा जिन तत्कालीन रक्षा सचिव जी मोहन कुमार के नोट को राहुल मुद्दा बना रहे हैं वो ही यह कह रहे हैं कि मेरी टिप्पणी का रॉफेल जेट की कीमतों से कोई लेना देना नहीं था, मैंने सिर्फ सामान्य शर्तों की बात की थी।
यह हैरत की बात है कि राहुल पूरी चिट्ठी से संतुष्ट नहीं होते, सेनाध्यक्षों के बयान से संतुष्ट नहीं होते, फ्रांस के राष्ट्रपति के बयान से संतुष्ट नहीं होते लेकिन एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित अधूरी खबर से इतने संतुष्ट हो जाते हैं कि प्रेस कांफ्रेंस ही बुला लेते हैं। तो आइए अब उस अखबार के एडिटर के बारे में भी कुछ रोचक तथ्य जान लें जिनकी रिपोर्ट पर ताज़ा विवाद हुआ। इसके लिए हमें इतिहास में थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। ये समय था 1986 का जब स्वीडन के रेडियो पर बोफोर्स सौदे में दलाली की खबर पहली बार सामने आई। तब भारत में लोग इस बात से अनजान थे। उस समय इसी अंग्रेजी अखबार की एक महिला रिपोर्टर किसी अन्य स्टोरी के सिलसिले में स्वीडन में थी। इस रिपोर्टर ने बोफोर्स घोटाले के सुबूतों के तौर पर लगभग 350 से अधिक दस्तावेज हासिल किए।
तब बोफोर्स में दलाली की खबर छापने वाले यही एडिटर थे। लेकिन इस मामले में यह खबर इन एडीटर की आखरी खबर भी सिध्द हुई। उसके बाद से बोफोर्स मुद्दा इन एडिटर की कवरेज से गायब हो गया। और आज वो ही एडीटर रक्षा मंत्रालय के एक नोट का अधूरा अंश छाप कर क्या सिध्द करना चाहते है? ऐसे संवेदनशील विषय पर क्या उन्हें रक्षा मंत्रालय का पक्ष भी रखकर देश के एक जिम्मेदार नागरिक होने का कर्तव्य नहीं निभाना चाहिए था? क्योंकि बात केवल इतनी ही नहीं है कि एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार का एडीटर अधूरे तथ्यों से आधा सच सामने रखता है जिसका सहारा लेकर राहुल देश को गुमराह करके राजनैतिक लाभ लेने की कोशिश करते हैं। बात यह है कि मुख्यधारा का मीडिया अपनी विश्वसनीयता खोता जा रहा है। इसलिए अगर राहुल चाहते हैं कि देश उन्हें सीरियसली ले तो वो भ्रष्टाचार के हर मुद्दे पर अपनी चिंता व्यक्त करें, भ्रष्टाचार के हर मामले के खिलाफ खड़े हों केवल मोदी के खिलाफ नहीं।

चीन में विदेशी पत्रकारों की घेराबन्दी
अजित वर्मा
चीन अब अपने देश में मुस्लिमों और ईसाईयों के उत्पीडऩ और सरकार द्वारा उन पर लगायी जा रही आर्थिक पाबन्दियों से उपज रहे आक्रोश को दुनिया की नजरों से छिपाने के लिए अपने देश में काम कर रहे विदेशी पत्रकारों के कामकाज पर भी निगरानी रखकर उनकी निजता और आवाजाही में भी बाधा डाल रहा है। चीन में विदेशी पत्रकार हिरासत में लिए जाने, वीजा में देरी और संदेहास्पद फोन टैपिंग जैसी चुनौतियोंं का सामना कर रहे हैं। ऐसे पत्रकारों का कहना है कि यहां काम करने का माहौल बेहद खराब होता जा रहा है और कई पत्रकार खुद पर नजर रखेे जाने और प्रताडि़त कियेे जाने की शिकायत कर चुके हैं। चीन में विदेशी पत्रकारों के क्लब (एफसीसीसी) की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि 109 पत्रकारों के बीच कराया गया सर्वे हाल ही में चीन में पत्रकारिता की सबसे अंधकारमय तस्वीर को दर्शाता है।
एफसीसीसी की रिपोर्ट के मुताबिक इन पत्रकारों के लिए चिंता का सबसे बड़ा विषय उन पर निगरानी रखी जाना है। इनमें से करीब आधे पत्रकारों ने कहा कि 2018 में उनका पीछा किया गया, जबकि 91 फीसद पत्रकारों ने अपने फोन की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। 14 विदेशी पत्रकारों ने कहा कि उन्हें शिनजियांग के दूरवर्ती इलाकों में सार्वजनिक स्थलों पर जाने से रोका गया।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा उल्लिखित विशेषज्ञों के एक समूह के मुताबिक उइगर समुदाय और अन्य मुस्लिम अल्पसंख्यक समूहों के लाखों लोगों को न्यायेतर हिरासत में रखा गया है। चीन ने इस मुद्दे को लेकर विदेशी मीडिया पर सनसनी फैलाने का आरोप लगाया है, लेकिन 2018 में शिनजियांग का दौरा करने वाले 23 पत्रकारों ने कहा कि उनके कामकाज में कई तरह से दखल दिया गया, जिसमें तस्वीरें और डाटा मिटाने, साक्षात्कारों में बाधा पहुँचाने और यहां तक की हिरासत में लिए जाने की घटनाएं भी शामिल हैं। समाचार पत्र ग्लोब एंड मेल के पत्रकार नाथन वैंडरक्लिप ने कहा, करीब नौ कारों और 20 लोगों ने 1600 किलोमीटर तक मेरा पीछा किया..।
एक ऐसे समय में जब पारदर्शिता बढ़ाने और सूचनाओं के उन्मुक्त प्रवाह को दुनियाभर में वरीयता मिल रही है, अपनी साम्यवादी संरचना के अनुरूप चीन सूचनाओं के प्रवाह को रोकने की बेखौफ और बेशर्म कोशिशें कर रहा है। दुनियाभर में प्रेस की स्वतंत्रता के हामियों और पत्रकारों को चीन में विदेशी पत्रकारों के साथ हो रहे व्यवहार की निन्दा करना ही चाहिए। हम जानते हैं कि जब इन हालात के बावजूद स्वतंत्रता के बड़े झण्डाबरदारों अमेरिका और यूरोप की सरकारों ने अपने होंठ सिल रखे हैं, तो फिर भारत सरकार कैसे मुँह खोलेगी। सरकारें चुप रहे पर दुनियाभर में पत्रकार तो विरोध और आक्रोश के स्वर बुलन्द कर ही सकते हैं न!

प्रियंका गांधी : इतिहास में परिवार और परिवार का इतिहास
रामेश्वर नीखरा
इन दिनों प्रियंका गांधी को कांग्रेस का महासचिव बनाये जाने से दोनों तरफ के लोगों में भूचाल जैसी हालत देखी जा रही है। इस तरफ उत्साह और उर्जा का बलबला है, तो उधर एक और लोकप्रिय नेता का सामना करने के खतरे से उत्पन्न झुरझुरी। जवाब में सत्ता पक्ष सैद्धांतिक लड़ाईयों में अपनी नाकाबिलियत के चलते व्यक्तिगत और चरित्रगत हमलों के जाने-पहचाने ओछेपन के साथ मैदान में है। उसे कमर के नीचे वार करने में ही महारत हासिल है। सीने पर वार करने का हुनर उसने सीखा ही नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी प्रियंका गांधी के कांग्रेस महासचिव बनाये जाने पर टिप्पणी करने से अपने को रोक नहीं पाये। उनका कहना है कि ‘भाजपा पार्टी को परिवार समझती है और कांग्रेस परिवार को पार्टी।’ जुमला सुनने में कर्णप्रिय लगता है, क्योंकि जुमलों में भाषा की वक्रोक्ति हुआ करती है। पर कर्णप्रिय जुमलों की पूंजी से देश की राजनीति को नहीं चलाया जा सकता और राजनीति के इतिहास को तो कतई नहीं समझा जा सकता।
चलिये आज प्रियंका गांधी के बहाने ‘इतिहास में परिवार और परिवार का इतिहास’ विषय पर थोड़ा विमर्श कर लेते हैं, इससे हमें जुमलेबाजी और देश के प्रति बलिदान करने के तात्पर्यो में अंतर करने का अवसर मिलेगा।
सबसे पहले गंगाधर नेहरु के बारे में जानते हैं। गंगाधर जी, मोतीलाल नेहरु के पिता और जवाहर लाल नेहरु के दादा थे। उनका जन्म १८२७ में हुआ था। जब वे मात्र २८ साल के थे, तब उन्हें दिल्ली के बादशाह और १८५७ की भारतीय-गदर के नेता बहादुर शाह ज़फर ने दिल्ली का कोतवाल नियुक्त किया था। अंग्रेजों ने गदर को कुचलने के लिये बहादुर शाह ज़फर के बेटों को क़त्ल किया और बादशाह को कैद करने के बाद दिल्लीr में कत्लेआम मचाया था। कोतवाल गंगाधर नेहरु के नेतृत्व में हिंदुस्तानी पुलिस ने अंग्रेजों का मुकाबला किया, परंतु बादशाह की गिरफ्तारी के कारण पुलिस में आयी हताशा के चलते उनकी पुलिस ज्यादा वक्त तक टिक नहीं पायी। दिल्लीr अंग्रेजों के कब्जे में चली गयी। गंगाधर जी इतिहास में हिंदुस्तानी हुकूमत के आखिरी कोतवाल हुए। इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत आ गयी। अंग्रेजों ने उनकी गिरफ्तारी के लिये खूब हाथ-पैर मारे, पर सफल न हुए। गंगाधर जी पत्नी जियोरानी देवी और चार बच्चों के साथ आगरा चले गये थे। सन् १८६१ में उनका निधन हो गया। उनके तीन पुत्र थे। सबसे बड़े बंशीधर नेहरू, उनसे छोटे नन्दलाल नेहरू और तीसरे मोतीलाल नेहरू थे। नंदलाल नेहरु बड़े वकील माने जाते थे। मोतीलाल नेहरु ने उनके सहायक के रूप में वकालत शुरु की और आगे चलकर खुद भी एक बड़े वकील बने।
इस तरह नेहरु परिवार का देश प्रेम और अंग्रेजों के साथ शत्रुता का इतिहास १८५७ की क्रांति के दिनों से ही शुरु हो जाता है, जबकि दूसरी तरफ १९४२ में कांग्रेस द्वारा छेड़े गये ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का विरोध और अंग्रेजों का सहयोग करने वालों में प्रमुख रूप से शामिल थे, विनायक दामोदर सावरकर। ये वही सावरकर हैं, जिन्हें नाथूराम गोडसे अपना बौद्धिक गुरु मानता था और भाजपा जिन्हें अपने महापुरुषों में स्थान देती है। सावरकर ने हिंदु महासभा की ओर से अंग्रेजों को अपने समर्थन का पत्र लिखा था और पार्र्षदों, विधायकों तथा नौकरी पेशा वर्ग के लोगों से कहा था, कि वे भारत छोड़ो आंदालन के पक्ष में अपने पदों का त्याग न करें और किसी भी कीमत पर इस आंदोलन का साथ न दें। जबकि कांग्रेस के विधायकों, पार्षदों और जनता के हिमायतियों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था और भारत की स्वाधीनता के आंदोलन में शामिल हो गये थे।
गांधी जी के आव्हान पर कांग्रेस के निर्वाचित प्रतिनिधियों के इस्तीफा दे देने से विधान सभाओं और निगमों में उसका बहुमत समाप्त हो गया था। इसका लाभ उठाते हुए हिंदु महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सिंध, बंगाल और उत्तर-पश्चिमी प्रांत में बड़ी बेशर्मी के साथ अपनी सरकारें बना ली थीं।
अंग्रेजों के दूसरे महाभक्त थे हिंदु महासभा के ही एक और नेता, डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी। वे मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाली बंगाल सरकार में मंत्री थे। उन्होंने गांधी जी के द्वारा स्कूल-कालेज, विधान सभा और अन्य सरकारी जगहों से भारतीयों को इस्तीफा देकर बाहर आ जाने के लिये की गयी अपील के विरोध में वक्तव्य दिया था और भारत छोड़ो आंदोलन का तीव्र विरोध किया था। मुखर्जी ने २६ अगस्त १९४२ को अंग्रेज सरकार को लिखे अपने पत्र में कहा था, ‘‘अब में आपका ध्यान उस समस्या पर केंद्रित करना चाहता हूं, जो कांग्रेस के आंदोलन से निर्मित हो गयी है, जिसके कारण युद्ध के समय व्यवधान और असुरक्षा फैल रही है। ऐसी स्थिति में सरकार को सख्ती के साथ आंदोलन से निपटना चाहिये। जहां तक प्रश्न है कि इस आंदोलन का सामना बंगाल सरकार कैसे करेगी, तो मैं स्पष्ट कर दूं कि हम ऐसा करेंगे कि कांग्रेस के प्रयासों के बावजूद इस राज्य में आंदोलन अपनी जड़ें न जमा सके। अंग्रेज सरकार को कांग्रेस के ऐसे आंदोलन को कुचल डालना चाहिये।’’
आरएसएस के सरसंघचालक एम एस गोलवलकर ने अंग्रेज सरकार को लिखा था कि ‘‘आरएसएस ने अपने को नियम और कानून के तहत रखते हुए १९४२ के आंदोलन से खुद को दूर रखा है।’’ (दोनों पत्रों का स्रोत- विपिन चंद्रा की पुस्तक ‘कम्यूनलिज्म इन मॉडर्न इंडिया’, २००८)
गंगाधर जी के तीसरे पुत्र मोतीलाल नेहरु ने वकालत छोडकर भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में हिस्सेदारी की। जेल यात्राएं कीं। १९२८ में भारतीय संविधान आयोग के अध्यक्ष बनाये गये। मोतीलाल नेहरू का इलाहाबाद में एक आलीशान मकान हुआ करता था ‘आनन्द भवन’। स्वाधीनता संग्राम के समय इसी भवन से कांग्रेस की गतिविधियों का संचालन होता था, इसलिये इसका राष्ट्रीय महत्व हो गया था। इसके ऐतिहासिक महत्व के कारण बाद में इंदिरा गांधी ने अपनी इस एक मात्र संपदा को भी राष्ट्र के नाम समर्पित कर दिया। सहमति पत्र पर उत्तराधिकारियों के तौर पर राजीव गांधी और संजय गांधी ने हस्ताक्षर किये थे।
मोतीलाल नेहरु के पुत्र थे, जवाहरलाल नेहरु। उन्हें ही भारत को आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य के रूप में एक सम्प्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक गणतन्त्र बनाने का वास्तुकार माना जाता है। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो से और कॉलेज की शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज (लंदन) से पूरी की थी। उन्होंने लॉ की डिग्री कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से हासिल की। इंग्लैंड में उन्होंने सात साल व्यतीत किए तथा वहां के फैबियन समाजवाद और आयरिश राष्ट्रवाद के लिए एक तर्कसंगत दृष्टिकोण अपने मानस में विकसित किया। दिसम्बर १९२९ में, कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में आयोजित किया गया था, जिसमें जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष चुने गए। इसी सत्र में ’पूर्ण स्वराज्य’ की मांग की गई। २६ जनवरी १९३० को लाहौर में जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत का पहला झंडा फहराया था। उन्होंने अनेक विश्व विख्यात पुस्तकों का लेखन भी किया, जैसे १९२९ में जेल में रहकर ‘पिता के पत्र : पुत्री के नाम’, १९३३ में विश्व इतिहास की झलक (गिल्ंम्प्सेज ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री), १९३६ में मेरी कहानी (एन ऑटोबायोग्राफी) और १९४५ में भारत की खोज (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) आदि। उन्होंने अपने युवाकाल का अधितर हिस्सा जेलों में बिताया और उसी दौरान ज्यादातर किताबों का सृजन भी किया।
जवाहरलाल नेहरु की पुत्री इंदिरा गांधी ने भी अपने जीवन की शुुरुआत भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सेदारी के साथ की थी। उन्होंने बच्चों की वानर सेना बनायी थी, जो कांग्रेस के आंदोलनकारियों के गोपनीय पत्रों को लाने-ले जाने के काम में मदद करती थी। ऑक्सफोर्ड से शिक्षा लेने के बाद १९४१ में भारत वापस आने पर वे भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में पुनः शामिल हो गयीं। बाद में वे देश की प्रधानमंत्री बनीं और दुनिया में उनका यश फैला। पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में ९३ हजार सैनिकों को इन्ही ंके कार्यकाल में सेना ने युद्धबंदी बनाया था। उन्होंने बांग्लादेश नाम का एक नया मुल्क संसार के नक्शे में पैदा करने में मदद की और तीसरी दुनिया का नेतृत्व भी किया। भारत में खालिस्तान बनाने के पाकिस्तानी इरादों को चकनाचूर किया और बदले में ३१ अक्टूबर १९८४ को अपनी शहादत दी।
संजय गांधी की मृत्यु के बाद राजीव गांधी राजनीति में आये और प्रधान मंत्री बने। उन्होंने इक्कीसवीं सदी के लिये भारत को तैयार किया। तमिल आतंकवादियों के षडयंत्र के चलते वे २१ मई १९९१ को शहीद हुए। कांग्रेस का नेतृत्व पी वी नरसिंह राव के हाथों में पहुंचा और कांग्रेस के लिये राजनीतिक संकट का काल भी शुरु हुआ। कई प्रदेशों में कांग्रेस को पराजय मिली। कांग्रेस के टुकड़े हुए। ऐसे में कांग्रेस-जनों की दीर्घकालिक मांग को पूरा करते हुए श्रीमती सोनिया गांधी ने १९९७ में राजनीति में प्रवेश किया और १९९८ में कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष निर्वाचित हुईं। कांग्रेसनीत यूपीए को २००४ में देश की सत्ता दिलायी। उन्हें नेता चुना गया, परंतु उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया। २००९ में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत दिलाया और एक बार फिर प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया।
२०१४ के आम चुनाव में कांग्रेस पराजित हुई। राहुल गांधी ने विपक्ष की भूमिका में अपनी सार्थकता सिद्ध की। भाजपा द्वारा भारतीय राजनीति में फैलाये गये झूठ के प्रदूषण का पुरजोर विरोध किया और कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित होने के एक साल के अंदर ही कांग्रेस को हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में सत्ता दिलायी।
प्रियंका गांधी २००४ से ही सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र में उनकी प्रबंधक के तौर पर काम करती रही हैं। बाद में उन्होंने राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र में भी प्रचार कार्य किया। अब वे कांग्रेस की महासचिव हैं और पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी भी। वे राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से भागीदारी करने से असहमत रही हैं, परंतु जिस पार्टी को बनाने-संवारने में उनके पूर्वजों का अपरिमित योगदान रहा हो, यदि वह संकट में पड़ी हो, तो वे चुप रहकर देखती तो नहीं रह सकती थीं, लिहाजा वे अब सक्रिय राजनीति में आ गयी हैं।
याद दिला दें कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने उस वक्त पार्टी में अहम् भूमिका का निर्वाह करना स्वीकारा, जब पार्टी के सामने विराट चुनौतियां आ खड़ी हुईं। पर जब २००९ में संसद में पार्टी बहुमत में आयी थी, तो न सोनिया जी प्रधान मंत्री बनीं थीं और न ही राहुल गांधी। अब पार्टी और पार्टी नेतृत्वकर्ता जनता के बीच में जा रहे हैं। अपनी बातें रख रहे हैं। यही लाकतांत्रिक पद्धति है। २०१९ के चुनाव के जरिये देश की जनता ही तय करेगी कि उसे राहुल-प्रियंका के नेतृत्व वाली कांग्रेस को सत्ता सौंपनी है या छल, कपट और झूठ की राजनैतिक खेती करने वालों को।
इतिहास याद रखेगा कि मुल्क के तीन गांधियों ने कुरबानियां देकर देश बनाया और उसी मुल्क के चार मोदियों ने देश लूटकर विदेशों में घर जा बनाया। यही है इतिहास में परिवार और परिवार के इतिहास का असली अंतर।
(लेखक पूर्व पूर्व सांसद हैं )

फिल्मों से सियासी इमेज चमकाने की कवायद
डॉ हिदायत अहमद खान
कहते हैं पर्दे पर दिखाई देने वाला सिनेमा समाज का आईना होता है। इसलिए फिल्में कभी समाज की उजली छवि को प्रदर्शित करती नजर आ जाती हैं तो कभी उसके कुरूप चेहरे को सामने लाकर हमें सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि क्या यह वही मानव समाज है जहां हम रहते हुए गौरव महसूस करने की बात कहते रहे हैं। इसके साथ ही फिल्मों का समाज पर प्रभाव से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। आखिर यह कैसे भुलाया जा सकता है कि फिल्म देखते हुए दर्शक कभी अपने आपको हीरो की जगह पाता है तो कभी खलनायक की दबंगाई से प्रभावित हो बदनाम गुनहगार फरिश्ता बनने की चेष्टा तक करता दिख जाता है। इसलिए कहने में हर्ज नहीं कि वर्तमान फिल्में महज समाज का आईना नहीं होतीं बल्कि किसी की छवि बनाने या बिगाड़ने का काम भी करती दिख जाती हैं। इनमें शिक्षाप्रद कहानियों पर बनने वाली फिल्मों को शामिल नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि उनका ध्येय समाज सुधार या देश व दुनिया के सुधार व विकास से जुड़ा होता है। बहरहाल यह अत्याधुनिक तकनीक का जमाना है, जहां धुंआ हुए बगैर आग लगाई जा सकती है और जहां आग लगी हो वहां से धुंआ गायब भी किया जा सकता है। इसलिए कहा जा रहा है कि आजकल जो फिल्में सियासी पैमाने को छलकाने के लिए बनाई जा रही हैं उनका मकसद किसी न किसी तरह सियासी छवि को साफ-सुथरा दिखाना और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपने नेता या पार्टी की बात को पहुंचाना हो गया है। ऐसी फिल्में किसी नेता या पार्टी की छवि खराब करने के लिए भी हो सकती हैं, इसलिए समय-समय पर इनका विरोध भी होता हुआ दिखता है। यहां देखना होगा कि किस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को लेकर फिल्म बनती है, बाल ठाकरे के जीवन पर आधारित फिल्म ठाकरे आती है और तो और सेना के सर्जिकल स्ट्राइक को भी फिल्म का विषय बना दिया जाता है। इस तरह कहीं न कहीं फिल्में इंटरटेनमेंट से हटकर बहुत कुछ करती नजर आ रही हैं। इस संबंध में फिल्म ठाकरे को ही देख लें, जिसका आधे से ज्यादा हिस्सा ब्लैक एंड व्हाइट दिखाया गया, लेकिन जब बात बाल ठाकरे की छवि की आती है तो पूरी फिल्म में व्हाइट नजर आने लगती है। विश्लेषकों की मानें तो इस फिल्म के जरिए उन सवालों के जवाब देने की भी कोशिश की गई है, जिनसे बाल ठाकरे पूरी जिंदगी घिरे रहे और जनता को उनका जवाब हासिल नहीं हो सका था। फिल्म में उत्तर भारतियों का महाराष्ट्र में विरोध जैसे ज्वलंत सवाल का जवाब भी है तो वहीं आपातकाल का समर्थन करने की बात को भी बखूबी उठाया गया है, जबकि लोकतंत्र के सवाल पर घुमावदार जवाब मिलता है। कुल मिलाकर फिल्म ठाकरे यह बताने में सफल रहती है कि आखिर शिवसेना जैसा राजनीतिक संगठन बनाने का मकसद क्या था और उसने अपने सफर में क्या पाया और क्या खोया। यह फिल्म इसलिए भी लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि एक अखबार के कार्टूनिस्ट किस तरह से सियासी दुनिया का सशक्त हस्ताक्षर हो सकता है, इसके दिशा-निर्देश भी इस फिल्म के जरिए मिल जाते हैं। दरअसल मराठियों के साथ महाराष्ट्र में होने वाले अन्याय को केंद्र में लाकर जो राजनीति कभी शुरु की गई, अब वह उत्तर भारतियों की महाराष्ट्र में मौजूदगी के विरोध तक जा पहुंची है। इसे लेकर राजनीति होती रही है और आगे भी यह सिलसिला चलते रहना है। दर्शक इस पक्ष को भी नजरअंदाज नहीं करता है। वहीं दूसरी तरफ पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के जीवन पर आधारित फिल्म ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ को देखते हैं तो पाते हैं कि किस तरह से उनके प्रधानमंत्री होने पर सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। इसके साथ ही फिल्म कांग्रेस नीत सरकार में गांधी परिवार के दखल को कुछ इस तरह से प्रस्तुत करती है मानों जो हो रहा था वह नहीं होना चाहिए था और जो होगा वह न हो इसलिए यह फिल्म जनता के बीच में लाई गई है। फिर चाहे वो बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा लिए गए फैंसलों के फिल्मांकन की बात हो या फिर फैसला लेते हुए मुश्किल में उन्हें दिखाने की बात हो, कहीं न कहीं यह छवि खराब करने और लोगों को गलत संदेश देने का ही काम करती देखती है, जिस कारण इसका विरोध भी होता हुआ दिखा, लेकिन कुछ समय पश्चात ही इसे भुला भी दिया गया, क्योंकि सभी समझ जाते हैं कि यह तो पूरी तरह एक पॉलिटिकली ड्रामा है, जो संजय बारू नामक उस शख्स की किताब पर आधारित है, जो पहले कभी पूर्व प्रधानमंत्री के सलाहकार के तौर पर काम कर चुका है। इस प्रकार राजनीतिक छवि को चमकाने के लिए जो नेता या पार्टी फिल्मों का सहारा ले रहे हैं, वो बड़ी भूल कर रहे हैं। दरअसल उन्हें जानना चाहिए कि दक्षिण फिल्मों के हीरो और सफल राजनेता सही मायने में पर्दे के हीरो हुआ करते हैं। उन्हें जनता दिलो-जान से चाहती है, क्योंकि उनका अभिनय उन्हें पसंद है। उनकी अपनी जिंदगी पर फिल्म भले न बने, लेकिन जिस किरदार को वो फिल्म में अभिनीत करते हैं, उसके बाद वह किरदार उन्हीं के नाम से जाना जाता या वो खुद उस किरदार के समानान्तर हो जाते हैं। इसलिए साऊथ में फिल्म और राजनीति का जबरदस्त मेल देखा जाता है। जयललिता, करुणानिधि से लेकर कमल हासन तक को इस फ्रेम में रखकर बात की जा सकती है। यह प्रयोग भारत के अन्य प्रांतों में सफल होता हुआ नजर नहीं आता। इसलिए फिल्म के जरिए किसी की छवि बनाना या बिगाड़ना संभव प्रतीत नहीं होता है, फिर भी कोशिशें जारी हैं, जो दर्शकों के लिए सही नहीं कही जा सकती हैं, क्योंकि सिनेमाघरों का रुख करने वाला दर्शक तो फिल्म से इंटरटेनमेंट चाहता है, उसे राजनीति का हिस्सा नहीं बनना, जिससे किसी की छवि चमकती हो या साफ सुथरी छवि पर कालिख पोतने का काम किया जा रहा हो।

कोटा में आत्महत्या करने वाली छात्रा कृति का सुसाइड नोट
सनत जैन
मैं भारत सरकार और मानव संसाधन मंत्रालय से कहना चाहती हूं, कि अगर वो चाहते हैं, कि कोई बच्चा न मरे, तो जितनी जल्दी हो सके इन कोचिंग संस्थानों को बंद करवा दें,ये कोचिंग संस्थान छात्रों को खोखला कर देते हैं। पढ़ने का इतना दबाव होता है, कि बच्चे बोझ तले दब जाते हैं।
कृति ने लिखा है कि वो कोटा में कई छात्रों को डिप्रेशन और स्ट्रेस से बाहर निकालकर सुसाईड करने से रोकने में सफल हुई। लेकिन खुद को सुसाइड करने से नहीं रोक पाई ।बहुत लोगों को विश्वास नहीं होगा कि मेरे जैसी लड़की जिसके 90+ मार्क्स हो,वो सुसाइड भी कर सकती है,लेकिन मैं आप लोगों को समझा नहीं सकती कि मेरे दिमाग और दिल में कितनी नफरत भरी है।
अपनी मां के लिए उसने लिखा- “आपने मेरे बचपन और बच्चा होने का फायदा उठाया,और मुझे विज्ञान पसंद करने के लिए मजबूर करती रहीं। मैं भी विज्ञान पढ़ती रहीं,ताकि आपको खुश रख सकूं। मैं क्वांटम फिजिक्स और एस्ट्रोफिजिक्स जैसे विषयों को पसंद करने लगी। उसमें ही बीएससी करना चाहती थी। लेकिन मैं आपको बता दूं कि मुझे आज भी अंग्रेजी साहित्य और इतिहास बहुत अच्छा लगता है।क्योंकि ये मुझे मेरे अंधकार के वक्त में मुझे बाहर निकालते हैं।
कृति सुसाइड नोट में अपनी मां को चेतावनी देती है कि- ‘इस तरह की चालाकी और मजबूर करने वाली हरकत 11 वीं क्लास में पढ़ने वाली छोटी बहन से मत करना,वो जो बनना चाहती है,जो पढ़ना चाहती है। उसे वो करने देना। क्योंकि वो उस काम में सबसे अच्छा कर सकती है।जिससे वो प्यार करती है।
– माता-पिता के लिए सबक
इस सुसाइड नोट को पढ़कर किसी का भी मन विचलित होगा। इस होड़-में हम अपने बच्चों के सपनो को छीन रहे है। बचपन छीन कर उन्हें प्रतिस्पर्धा करने विवश कर रहे है।फलां का बेटा-बेटी डॉक्टर बन गया, तुम्हें भी डॉक्टर बनाना है। फलां की बेटी-बेटा सीकर/कोटा हॉस्टल में है। हम भी वही पढ़ाएंगे। चाहे उस बच्चे के सपने और क्षमता उस तरह की ना हो। फिर भी हम बच्चों को अपनी इच्छा के अनुसार जबरदस्ती उनसे वह काम कराना चाहते हैं जो हम चाहते हैं।
आज भारत के स्कूल(कोचिंग संस्थान) बच्चों को परिवारिक रिश्तों का महत्व और जीवन किस तरह जीना है नही सिखा पा रहे हैं।उन्हें असफलताओं या समस्याओं से लड़ना नही सीखा पा रहे हैं। उनके जहन में सिर्फ एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा और काल्पनिक कैरियर बनाने का दबाव बनाया जा रहा है जो जहर बनकर उनकी जिंदगियां खत्म कर रहा है। जो कमजोर है, वह बच्चा आत्महत्या कर रहा है,जो थोड़ा मजबूत है, वह नशे का शिकार हो जाता है। प्रतिस्पर्धा में जब बच्चे असफल होते है,तो उन्हें ये पता ही नही है कि वह इससे कैसे निपटें। उनका कोमल हदय इस नाकामी से टूट जाता है। मां बाप के दबाव से वह उनसे अपनी बात कह भी नहीं पाते हैं। कहते भी हैं, तो मां-बाप समझने के लिए तैयार नहीं होते हैं। जिसके कारण भारत में बड़ी तेजी के साथ बच्चे और युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है। अब तो 10 – 12 साल के बच्चे भी आत्म हत्या के शिकार हो रहे हैं। इस स्थिति में माता पिता और सरकार को सोचना होगा, कि वह अपने बच्चों को किस ओर ले जाना चाहते हैं।

बसंत पंचमी अर्थात सरस्वती पूजन का दिवस
डॉक्टर अरविन्द जैन
(बसंत पंचमी पर विशेष) वसंत पंचमी जिसे श्रीपंचमी के नाम से जाना जाता है। यह उत्तर तथा पूर्वी भारत में मनाया जाने वाला एक प्रमुख त्योहार है। यह त्योहार वसंत के मौसम में मनाया जाता है, क्योंकि प्राचीन भारत में मौसमों छः भागों में बाटा गया था और बसंत उसमें लोगो का सबसे प्रिय मौसम था। यहीं कारण है कि प्राचीन काल से ही लोग वसंत पंचमी के इस त्योहार को इतने धूम-धाम के साथ मनाते हैं।
इस दिन स्त्रियों द्वारा पीले वस्त्र पहने जाते है। वसंत पंचमी के इस कार्यक्रम को वसंत के मौसम के आगमन के रुप में भी मनाया जाता है। वसंत पंचमी का यह त्योहार माघ माह के पाचवें दिन आता है, इसे मौसम में होने वाले एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के रुप में देखा जाता है। धार्मिक और ऐतहासिक कारणों से इस दिन को पूरे भारत भर में काफी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
वर्ष 2019 में वसंत पंचमी का त्योहार 10 फरवरी, रविवार के दिन मनाया जायेगा।
वसंत पंचमी को वसंत ऋतु के आगमन में माघ माह के पांचवे दिन मनाया जाता है। अपने मनोहर मौसम के कारण इसे मौसमों के राजा के रुप में भी जाना जाता है। इस ऋतु को सभी ऋतुओं में सबसे श्रेष्ठ माना गया है। इस ऋतु में खेतों में फसलें लहलहा रही होती हैं, जो इस ऋतु के मनोरमता को और भी उतकृष्ट बनाता है।
इसके अलावा ऐसी मान्यता है कि इसी दिन माता सरस्वती का जन्म भी हुआ था, इसलिए इस दिन भारत के कई क्षेत्रों में सरस्वती पूजा के कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं। इस दिन लोग पीले रंग के कपड़े पहनकर पीले फूलों द्वारा माता सरस्वती की पूजा-अर्चना करते हैं, क्योंकि पीले रंग को वसंत का प्रतीक माना गया है।
भारत के विभिन्न प्रांतो में वसंत पंचमी का यह दिन विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है। इस त्योहार से जुड़े कई पौराणिक कारणों से इसे देवी-देवताओं के प्रति विशेष समर्पण के साथ मनाया जाता है। इस दिन देश के कई हिस्सों में खासतौर से उत्तर भारत में वसंत पंचमी को सरस्वती पूजा के रुप में भी मनाया जाता है। जिसमें माता सरस्वती की प्रतिमा स्थापित करते हुए काफी धूम-धाम से सरस्वती पूजन का उत्सव मनाया जाता है।
इस कार्यक्रम में नवयुवकों तथा छात्रों द्वारा काफी बड़-चढ़कर हिस्सा लिया जाता है और उनके द्वारा देवी सरस्वती से सद्बुद्धि और ज्ञान की प्रर्थना की जाती है। क्योंकि वसंत पंचमी के समय शीत ऋतु की फसले अपने पूर्ण रुप में होती हैं, इसलिए इस दिन को किसानों द्वारा समृद्धि के उत्सव के रुप में भी मनाया जाता है।
पंजाब प्रांत में इस दिन पतंगबाजी की प्रथा है, इस प्रथा को महाराजा रंजीत सिंह द्वारा शुरु किया गया था। आज के समय में भी वसंत पंचमी के दिन पजांब के कई स्थानों पर पतंग उड़ायी जाती है। वसंत पंचमी के दिन कलाकारों द्वारा भी काफी धूम-धाम से मनाया जाता है, इस दिन उनके द्वारा अपने कलाकृतियों की पूजा-अर्चना तथा प्रदर्शनी की जाती है।
यह दिन नवीन ऋतु के आगमन का दिन होता है। इस समय के दौरान पुराने पत्ते झड़ जाते है और नये पत्ते आते है, जिससे इस दिन की मनोरमता और भी बढ़ जाता है। इस दिन लोग विभिन्न स्थलों पर लगने वाले बसंत मेलो में जाते है, इसके साथ ही पौरणिक दिन होने के कारण इस दिन लोग नदियों में स्नान करने का भी एक विशेष प्रथा है।
आज के समय में हर पर्व के तरह वसंत पंचमी का का भी आधुनिकरण हो चुका है। पहले की समय में लोग इस दिन वसंत के आगमन में प्रकृति की पूजा किया करते थे तथा सरस्वती पूजा के रुप में इस दिन को शांतिपूर्वक मनाते थे। जिसमें इसकी मूर्तियां क्षेत्र के मूर्तिकारों द्वारा बनायी जाती थी। जिससे उन्हें रोजगार के अवसर प्राप्त होते थे, परन्तु आज के आधुनिक युग में मूर्तियों से लेकर सजावटी सामान तक जैसी सारी वस्तुएं बड़े बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों द्वारा तैयार की जाती हैं।
इसके साथ ही अब के त्योहार में लोगो के बीच पहले की तरह समरसता देखने को नही मिलती है, आज के समय सरस्वती पूजा के दिन विभिन्न स्थानों पर हिंसा तथा लड़ाई झगड़े की घटनाएं देखने को मिलती है। हमें इस विषय पर अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिए की हम वसंत पंचमी के असली अर्थ को समझे और इसकी प्राचीन प्रथाओं तथा परम्पराओं को बनाये रखे।
वसंत पंचमी का महत्व
भारत में छः प्रमुख ऋतुएँ होती है और इनमें से वसंत को सबसे प्रमुख माना गया। यहीं कारण है कि इसे ऋतुओं का राजा भी कहा गया है। इस ऋतु में मौसम काफी सुहाना होता है और इसकी निराली छंटा देखने को ही मिलती है। इस मौसम मं खेतों में फसले लहलहा रही होती हैं और अपनी अच्छे फसलों को देखकर किसान भी काफी प्रफुल्लित होते है। स्वास्थ्य के हिसाब से भी यह मौसम काफी बेहतर होता है।
इसके सात ही वसंत पंचमी के दिन से कई सारी ऐतहासिक तथा पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हुई है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन देवी सरस्वती का जन्म भी हुआ था, इसलिए इस दिन को कई स्थानों पर सरस्वती पूजा के रुप में भी मनाया जाता है। इस दिन के उत्सव में कई स्थानों पर बसंत मेला का भी आयोजन किया जाता है।
एक तरह से शस्त्र पूजन के लिए जो महत्व विजदशमी के दिन का है ठीक उसी प्रकार से विद्यार्थियों और कलाकारों के लिए वसंत पंचमी के दिन का महत्व है। इन्हीं प्राकृतिक परिवर्तनों और विशेषताओं के कारण वसंत पंचमी के दिन का महत्व और भी बढ़ जाता है।
वसंत पचंमी का पौराणिक महत्व
वसंत पंचमी से कई सारी पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई है। लेकिन इससे जुड़ी जो सबसे प्रमुख कथा है वह देवी सरस्वती से जुड़ी हुई है, जिसके अनुसार-
जब सृष्टि की उत्पत्ति हुई थी तो वातावरण में चारो ओर नीरसता, उदासी छायी थी और संसार में कोई खुशी नही थी। ऐसा महौल देखकर ब्रम्हा जी को काफी दुख हुआ। जिसके बाद उन्होंने भगवान विष्णु से अनुमति लेते हुए, अपने कमंडल से जल छिड़का।जिससे देवी सरस्वती उत्पन्न हुई और इसके बाद उन्होंने अपने वीणा वादन द्वारा सभी पशु-पक्षियों में वाणी और बुद्धि का संचार किया। जिससे सृष्टि में फैली हुई उदासी दूर हो गयी और चारो ओर हर्ष और उल्लास फैल गया। इसलिए देवी सरस्वती को ज्ञान और बुद्धिमता के देवी का दर्जा भी दिया जाता है और इसी वजह से वसंत पंचमी के दिन को सरस्वती पूजा के रुप में भी मनाया जाता हैं
वसंत पंचमी का इतिहास
वसंत पंचमी का दिन भारतीय इतिहास के कई प्रमुख परिवर्तनों तथा कहानियों से जुड़ा हुआ है। इतिहास के अनुसार तराइन के दूसरे युद्ध में जब पृथ्वीराज चौहान को मोहम्मद गोरी द्वारा बंदी बनाकर अफगानिस्तान ले जाया गया था। तब वसंत पंचमी के दिन ही पृथ्वीराज चौहान ने अपने शब्धभेदी बाण द्वारा मोहम्मद गोरी को मौत के घाट उतारा था।
इसके अलावा वसंत पंचमी के दिन की दूसरी घटना लाहौर निवासी वीर हकीकत से जुड़ी हुई है। जिसमें छोटे उम्र के बालक वीर हकीकत ने वसंत पंचमी के दिन ही अपने धर्म की रक्षा करते हुए, हसते-हसते अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। भारत के महान राजा और उज्जैन के शासक राजा भोज पवांर का जन्म भी वसंत पंचमी के दिन ही हुआ था। इस दिन उनके राज्य में एक बड़े भोज का आयोजन किया जाता था। जिसमें उनके पूरी प्रजा को भोजन कराया जाता था और यह कार्यक्रम वसंत पंचमी से शुरु होकर अगले 40 दिनों तक चलता रहता था। इसका अलावा प्रसिद्ध गुरु तथा कूका पंथ की स्थापना करने वाले गुरु रामसिंह कूका का जन्म भी वसंत पंचमी के दिन ही हुआ था। उनके द्वारा भारतीय समाज के बेहतरी के लिए कई सारे कार्य किये गये थे। इन्हीं सब ऐतहासिक घटनाओं के कारण वसंत पंचमी का दिन लोगो में इतना लोकप्रिय है और इसे पूरे भारतवर्ष में विभिन्न कारणों से इसे काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन हमें देवी सरस्वती जी का पूजनकर बुद्धि की अधिष्ठात्री का ध्यान करना चाहिए।

सियासतदां चींटी से कुछ सीखें…!
नईम कुरेशी
संत कबीर ने चींटी और हाथी का सुन्दर वर्णन किया- रेत में बिखरी शक्कर को सिर्फ चींटी ही चुन सकती है। अपनी नम्रता और शांत स्वभाव से परगरवीले स्वभाव वाले हाथी को शक्कर का लाभ नहीं मिल पाता जैसा आज के दौर में वर्तमान सियासतदां हैं जो हाथी की तरह का गर्व रखते हैं। हवाई जहाजों हैलीकाॅप्टरों से उड़कर धूल उड़ाकर आते हैं। आम जनता के मुंह पर धूल मारकर उसे डराते हुये कहते हैं- बहनों भाइयों कब्रस्तानों में बिजली आती है, ये शमशानों में क्यों नहीं आती और फिर वही 15-20 सालों से मंदिर बनाने का मुद्दा उठाकर असल बेरोजगारी का मुद्दा हिंसा बढ़ने का मुद्दा गायब कर देते हैं। वो गायब कर देते हैं गरीबों की शिक्षा व अस्पतालों का मुद्दा जहां के डाॅक्टर व नर्से गायब रहती हैं। सरकारी अस्पतालों में भी पैसा मांगा जाता है।
संत कबीर संत रविदास जी की वाणी हमें जो संतोष व शिक्षायें देती है वो किसी राजनेता के भाषण से नहीं मिलती है। वो तो पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी को विधवा कहने व किसी विरोधी राजनैतिक नेता को पप्पू व अन्य फूहड़नामों से पुकारने को ही अपनी शान मानते आ रहे हैं। भारत में सिर्फ मंदिर-मस्जिद के नाम पर जानवरों के नाम पर सियासत करने वाले लोगों को पश्चिमी बंगाल के 30 साल मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु, जाॅर्ज फर्नांडिस व डाॅ. राममनोहर लोहिया व महात्मा गांधी जैसे लोगों की भी याद करनी चाहिये जिन्होंने अपने आचरण में संत कबीर को जिया है, संत रविदार को याद रखा है, गुरु नानक जी को याद रखा है।
हमेशा मदमस्त हाथी की तरह से घमण्ड की बातें करना मुंह में बहनों भाइयों का उच्चारण पर मन में एकदम विपरीत विचार वोट हड़पकर झूठे मक्कारों को कुर्सियों पर बैठाना जो उनके पिछलग्गू बने हुये हैं, वोटों की तिजारत करके नफरतों का व्यापार चलाना एक उद्योग बन गया है। ऐसे लोग नफरतें फैलाकर देश को काफी कुछ पीछे धकेल चुके हैं। मात्र 10 फीसद ऊँची जाति के लोगों को 80 फीसद तक सत्ता की कुर्सियां वो बाँटते दिखाई दे रहे हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक में झूठ बांटते प्रचारित करते आ रहे हैं। दलितों, अतिपिछड़ों व कमजोर तब्कों के खिलाफ मुट्ठीभर जनेऊधारी लोग इस देश में गंदी व देश तोड़ने की सियासत करते दिखाई दे रहे हैं। उनके तो बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं व उनका इलाज भी विदेशों में सरकारी खर्चे पर किया जा रहा है। तब उन्हें स्कूलों में सुधार करने या फिर सरकारी अस्पतालों में सुधार व रोजगारों की आखिर चिंता क्यों होगी। उन्हें तो सिर्फ नारे लगाने हैं वादों की पतंगें उड़ानी हैं और प्रस्तावों की नावें भर चलानी हैं और पैसा खर्च करके चन्द महीनों में भोली भाली जनता को मूर्ख भर बनाना है।
बीमारू राज्यों बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान व उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा बदइंतजामी देखी जा रही है। जहां कानून का राज्य सिर्फ कागजों में है। सबसे ज्यादा दलित अत्याचार हैं, पुलिस अत्याचार हैं। कुपोषण से आदिवासी गरीबों के बच्चे मारे जाते हैं। सिर्फ नारे लगाये जा रहे हैं। म.प्र. में बीते 15 सालों की सरकार के कारनामे सामने आ रहे हैं। करोड़ों के किसानों पर फर्जी लोन से लेकर निर्माण कार्यां में टेंडर, घोटाले व बड़ी नगर निगमों के निगम आयुक्तों के द्वारा किये जा रहे घोटाले सामने आ रहे हैं। ग्वालियर, भोपाल, इन्दौर व जबलपुर आदि में स्मार्ट सिटियों में काम न हो पाना व सीवेज व पीने के पानी के इंतजामों में 200-300 करोड़ों तक के घोटालों की शिकायतें अकेले ग्वालियर नगर निगम में देखी व सुनी जा रही हैं। जहां इन्दौर भोपालों के शहरों में स्मार्ट सिटी योजनाओं में 600-700 करोड़ रुपये खर्च कर शहरों को खूबसूरत बनाया जा रहा है वहीं ग्वालियर में अभी तक 100 करोड़ के काम भी अभी तक पूरे नहीं कराये जा सके हैं। काम काफी मन्दा चल रहा है। सियासी इच्छा शक्ति व सरकारी नौकरशाही इसकी वजह मानी जा रही है।

डिजाइनर बच्चों पर बवाल
अजित वर्मा
जैसे बहुत पहले कभी क्लोनिंग के सवाल पर तमाम तरह की बहसें हुई थीं और जो अब भी चल ही रही हैं कि डिजाइनर बच्चों यानी जेनेटिकली मॉडीफाइड मानव बच्चों को पैदा करने की कोशिशों पर बवाल शुरू हो गया है। कोई ढाई महीने पहले नवंबर 2018 में एक चीनी वैज्ञानिक जियानकुई ने दावा किया था कि क्रिस्पर-कैस 9 नामक जीन एडिटिंग तकनीक से विकसित दो भूणों से दो लड़कियों को जन्म देने में वे सफल हुए हैं। उनका यह दावा प्रकाश में आते ही दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया को असुरक्षित और अनैतिक बताते हुए जियानकुई की निंदा करना शुरू कर दिया था और चीन के प्रशासन ने भी जियानकुई की निंदा करते हुए मामले की जांच के लिए एक टीम गठित की थी। साथ ही देश में जीन-एडिटिंग से जुड़े शोधों को भी अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया गया था।
दुनिया के पहले जेनेटिकली डिजायनर बच्चे पैदा करने का दावा करने वाले चीनी वैज्ञानिक जियानकुई को उनकी यूनिवर्सिटी ने बर्खास्त ही कर दिया है। दि सदर्न यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (ससटेक) ने कि जियानकुई के साथ किये गए सभी करार खत्म कर दिए गए हैं। उनके शोध भी निरस्त कर दिए गए हैं। यूनिवर्सिटी ने यह निर्णय हेल्थ कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर लिया। इसी कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जियानकुई ने लोकप्रियता पाने के लिए जानबूझकर नियमों से खिलवाड़ किया था।
दरअसल, हर एक प्राणी का जीवन प्रकृति की देन है। प्राकृतिक प्रवृत्तियों के कारण ही प्राणी अपनी-अपनी प्रजातियों का विकास करते हैं। इनमें मनुष्य भी शामिल हैं। इस दृष्टि से मान्यता यह है कि अप्राकृतिक पद्धतियों से प्रकृति के नियमों के विपरीत कृत्रिम उपायों से नयी प्रजातियों का विकास करने के प्रयत्न करना अनैतिक और अवैधानिक है।
हालांकि आजकल जेनेटिकली मॉडिफाइड अनाज, सब्जियां, फल आदि का उत्पादन किया जा रहा है, लेकिन अभी समाज में उन्हें पूर्ण मान्यता नहीं मिली है लेकिन हाँ, जैविक खेती को आज वैश्विक स्तर पर मान्यता मिल रही है क्योंकि उसमें कृत्रिम और अप्राकृतिक प्रणालियों का सहारा नहीं लिया जाता।
लेकिन क्लोनिंग और जीन एडिटिंग के जरिये डिजाइनर बच्चे पैदा करने की कोशिश को मानवता के लिए ही खतरनाक माना जाता है क्योंकि इससे दुनिया विनाश की ओर बढ़ सकती है और विकृतियों तथा अराजकता की ओर दुनिया को ढकेल सकती है। इसलिए इनको प्रतिबंधित रखना नितान्त आवश्यक है।

महिलाओं का मंदिर-प्रवेश
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
केरल के सबरीमाला मंदिर के देवस्वम बोर्ड ने अचानक शीर्षासन कर दिया है। जब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर 2018 में हर उम्र की औरत को मंदिर में प्रवेश की इजाजत दे दी थी, तब इस संचालन-मंडल ने तो उस निर्णय का विरोध किया ही, उसके साथ केरल की भाजपा और कांग्रेस ने भी उसकी धज्जियां उड़ा दीं। इन राजनीतिक दलों ने बड़ी बेशर्मी से अदालत के फैसले का विरोध किया, धरने दिए, प्रदर्शन किए और सभाएं की। हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन भी इस पाखंड में फंस गए। इनमें से कोई भी यह नहीं बता सका कि रजस्वला महिलाओं (10 से 50 साल) का मंदिर में प्रवेश निषिद्ध क्यों हैं ? यदि वह इसलिए है कि मंदिर के देवता आयप्पा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ हैं तो मैं पूछता हूं कि क्या उनका ब्रह्मचर्य इतना कमजोर है कि पवित्र भाव लेकर मंदिर आई पुजारिनों की उपस्थिति से वह भंग हो जाता है ? ऐसा नहीं हैं। यह शुद्ध पाखंड है। पत्थर की मूर्ति को क्या पता कि कौन औरत रजस्वला है और कौन नहीं ? इस पाखंड का केरल की मार्क्सवादी सरकार ने डटकर विरोध किया। उसने मंदिर-प्रवेश के समर्थन में लाखों महिलाओं की मानव-श्रृंखला खड़ी कर दी थी। लेकिन देश की राजनीति में इतनी गिरावट आ गई है कि किसी भी उल्लेखनीय नेता ने इस महिला अधिकार का समर्थन नहीं किया। भारत की राजनीति सिर्फ वोट और नोट कबाड़ने का धंधा बनकर रह गई है। सर्वोच्च न्यायालय में 60 से भी ज्यादा याचिकाएं इसलिए लगा दी गईं कि वह अपने फैसले पर पुनर्विचार करे। सबरीमला मंदिर के बोर्ड के इस ताजा फैसले ने इन याचिकाओं को पंचर कर दिया है। दो बहादुर महिलाओं ने पहले ही मंदिर-प्रवेश करके दिखा दिया है। अब 12 फरवरी से शुरु होनेवाली कुंभम् उत्सव के मौके पर सैकड़ों-हजारों महिलाएं मंदिर प्रवेश करेंगी। केरल सरकार को सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करना होगा और मैं आशा करता हूं कि हमारे हिंदुत्ववादी संगठन और राजनीतिक दल अपने दुराग्रह से मुक्त हो जाएंगे।

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर मोदी का जवाब और आत्मविश्वास
सनत जैन
राष्ट्रपति के अभिभाषण का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष के आरोपों पर जिस आत्मविश्वास के साथ अपनी सरकार का पक्ष रखा। कांग्रेस तथा विपक्ष के आरोपों पर मोदी ने सरकार के 55 माहों के कार्यों का उल्लेख करते हुए अपना पक्ष रखा। इस दौरान उनका जो आत्मविश्वास संसद में देखने को मिला। उससे स्पष्ट है 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा बड़े आक्रमक ढंग से विपक्ष को घेरने की तैयारी कर रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्षी महा गठबंधन को महा मिलावट बताते हुए विपक्ष पर तगड़ा प्रहार किया। वहीं मोदी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी, उनकी मां सोनिया गांधी, बहन प्रियंका और जीजा रॉबर्ट वाड्रा के भ्रष्टाचार के आरोप में जिस तरह के हमले नेहरू गांधी परिवार पर किए। उससे स्पष्ट है, कि लोकसभा चुनाव के दौरान दोनों पक्षों की तल्खी अभी और बढ़ेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्ष के हमलों से बेपरवाह होकर, जिस तरह से उनका मुकाबला कर रहे हैं। उससे भारतीय जनता पार्टी का आत्मविश्वास जरूर बढ़ेगा। संसद में पूरे आत्मविश्वास के साथ उन्होंने राष्ट्रपति के भाषण पर धन्यवाद करते हुए विपक्ष की आलोचना का कोई मौका नहीं छोड़ा। विपक्ष के आरोपों का उन्होंने स्पष्ट जवाब तो नहीं दिया। किंतु स्वतंत्रता के बाद से पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा अपनी जिम्मेदारी का, जो निर्वहन 55 सालों में नहीं किया। उन्होंने 55 माह में करने की बात कही। उन्होंने रोजगार भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर भी सदन में अपने 55 माह के कार्यों का जिस ढंग से उल्लेख किया, भले वह काल्पनिक हो। जो लोग मोदी का भाषण सुन रहे थे। वह सभी लोग मोदी की वाकपटुता से प्रभावित थे। भावात्मक रूप से भी प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पक्ष में माहौल बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ा। उल्टे विपक्ष ने जिन आरोपों में मोदी को घेरने का प्रयास किया। उन्हीं आरोपों को उन्होंने अपने अनुकूल बना लिया। 9000 करोड़ रूपया लेकर भागे माल्या की 13000 हजार करोड़ की संपत्ति जप्त करने की बात कहकर उन्होंने बेहतर ढंग से बचाव भी किया। नेहरू गांधी फैमिली को रक्षा सौदों के मामले में भ्रष्ट बताते हुए बिना दलाली के कोई भी सौदा नहीं होने की बात कहकर गांधी फैमिली पर सीधा हमला किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में राहुल गांधी के उस आरोप का भी जवाब दे दिया, कि वह डरने वाले नहीं हैं। बल्कि वह है डराने वाले राजनेता हैं। उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से रॉबर्ट वाड्रा के ऊपर इशारा करते हुए यह जताने की भी कोशिश की, भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए वह किसी से डरने वाले नहीं हैं। राफेल मामले में प्रधानमंत्री मोदी ने अभी तक कांग्रेस के आरोपों का जबाव नहीं दिया है। राफेल सौदे का उल्लेख करते हुए उन्होंने कांग्रेस को घेरने के लिए रक्षा सौदों में दलाली तथा राफेल के सौदे को कई वर्षों तक लंबित रखने पर युपीए सरकार को घेरने का काम करके अपने वाक चातुर्य का परिचय दिया है। विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लोकतंत्र खतरे में है। संवैधानिक संस्थानों को खत्म किया जा रहा है। इन आरोपों के स्पष्ट जबाव देने के स्थान पर उन्होंने कांग्रेस को ही घेरने का काम करके राजनैतिक चातुर्य का प्रदर्शन किया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान संसद में अपने लंबे भाषण के दौरान विपक्षी महागठबंधन, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, रॉबर्ट वाड्रा को जिस तरह निशाने पर लिया । जिस तरीके से उन्होंने संसद में अपना भाषण दिया है। उससे तो यही लगता है की लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान संपूर्ण विपक्ष मिलकर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुकाबला आसानी से नहीं कर पाएगा। विपक्षी महागठबंधन में फूट का लाभ किस तरह उन्हें लेना है, वह अच्छी तरीके से समझ गए हैं। भाजपा की चुनावी रणनीति की सबसे बड़ी खासियत भी यही, है कि वह अपने विपक्षियों को आपस में एक नहीं हो। इसके लिए शीर्ष नेतृत्व को अपने निशाने पर लेते हैं, उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और उनकी कमजोरियां दोनों पर ही जबर्दस्त प्रहार करते हैं। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है, कि वह बिना किसी दबाव में आए अपने ही ढंग से राजनीति करते हैं । यही उनकी सफलता का राज भी है। विपक्ष के किसी आरोपों का उन्होंने कोई भी तथ्यात्मक जवाब ना देते हुए भी, विपक्ष को पूरी तरह घेर लिया। यही उनकी सफलता का राज भी है।

लोकतंत्र का ‘चीरहरण’ देखनें को मजबूर देश…..?
ओमप्रकाश मेहता
ये माना कि भारत का लोकतंत्र बुजुर्ग हो गया है, लेकिन क्या उसकी सिर्फ बहात्तर साल की उम्र में ऐसे हालात पैदा किए जाए जिससे कि वह आत्महत्या को मजबूर हो जाए? लेकिन आज हो वही रहा है, आज न संविधान की अहमियत रह गई है और न लोकतंत्र की, आज सत्ता और पैसा संविधान व नैतिकता से काफी ऊपर हो गया है, सत्ता कायम रखने या उसे हथियाने के लिए नैतिकता व राष्ट्रीयता के सभी मापदण्ड़ों की बलि दे दी गई है, अब हमारे आधुनिक भाग्यविधाताओं (नेताओं) में न तो वाणी का नियंत्रण रहा है और न ही उनमें कर्म की शर्म शेष रही, समय के ऐसे दौर में देशवासियों के भी सामने अपने सिर घुनने के अलावा विकल्प ही क्या है? क्या देश के इस माहौल को किसी ने भी गंभीरता से पढ़ने की कौशिश की? आज पूरे देश में सत्ता हथियाने की आपाधापी मची हुई है। देश का हर राजनीतिक दल सत्ता में भागीदारी के आज सपने देख रहा है।
देश का सत्ताधारी दल जहां अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए मर्यादाओं की हर सीमा लांघ रहा है, वहीं विपक्षी दल सत्ता की जुगाड़ में एक-दूसरे के साथ होने का नाटक कर रहे है, और जहां तक सत्ता की मुख्य धुरी मतदाता का सवाल है, उसे हमेशा की तरह प्रलोभानों के जाल में फंसाकर अपना ‘उल्लू’ सीधा करने के प्रयास किये जा रहे है और इसी बीच जो मतदाता असहाय, भूखा, गरीब और जरूरतमंद है, वह वैसा ही है और आगे भी वैसा ही रहने वाला है, क्योंकि अब ‘‘जुमलों’’ का वैकल्पिक शब्द खोजने की भी पूरी मशक्कत शुरू हो गई है।
आज हर कोई अपनी दलीलें रख रहा है, बैचारे मतदाता की सुनने और उसके बारे में विचार करने की किसी को भी न तो चिंता है और न ही समय? प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े पर सवार है तो विपक्षी सूरमा उनसे निपटने में व्यस्त है, पूरे देश को राजनीतिक महाभारत का अखाड़ा बनाकर रख दिया है, राज्यों के मुख्यमंत्री जहां अपने राज्यों को अपनी बपौती समझ संविधान को ताक में रख अपनी मनमर्जी और गैर संवैधानिक कृत्य करने में व्यस्त है तो प्रधानमंत्री जी वह सब कर रहे है जो आज तक देश के किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया, उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपनी सत्ता कायम रखने की चिंता है फिर देश की मर्यादा व नैतिकता चाहे कितने ही नीचे गर्त में क्यों न चली जाऐ?
देश की इस स्थिति से यदि कोई चिंतित है तो वह सिर्फ देश का बुद्धिजीवी वर्ग जिसे देश के लोकतंत्र और संविधान की मर्यादा की चिंता है, लेकिन वह भी असमंजस में है, क्योंकि वह जानता है कि अकेला ‘बुद्धिजीवी चना’ सत्ता की लालची ‘भाड़’ को फोड़ नहीं सकता, इसलिए वह छटपटाने और अपनी मर्यादा में रहकर कलम चलाने के अलावा कुछ नहीं कर सकता। फिर वह देश की अस्मिता को बचाने के लिए मद्द मांगे भी तो किससे, फिर उसे यह भी चिंता कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी अब अहमियत नहीं रह गई, क्योंकि ‘शक्तिमान’ अब अपनी सहनशक्ति खो चुके है और बुद्धिजीवी के खिलाफ कोई भी कार्यवाही कर सकते है इसलिए आज का बुद्धिजीवी वर्ग भी अपने आपको असहाय व दुखी महसूस कर रहा है और अब उसके पास भी देश में चल रहें ‘चीरहरण’ के दुःखद दृष्यों को ‘पांडव’ की मुद्रा में देखतें रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है, वह इंतजार कर रहा है उस ‘कृष्ण’ का जो देश की ‘द्रोपदी’ को वस्त्रहीन होने से बचा सके? और द्वापर में तो फिर भी ‘कृष्ण’ आ गए थे, किंतु अब इस ‘चीरहरण’ से देश को कोई ‘कृष्ण’ बचाएगा, उसके तो आसार भी नजर नहीं आ रहें है।

बारह और रेल मार्गों पर बुलेट ट्रेन… काश यह जुमला न हो
अजित वर्मा
हमारा देश भारत इस समय सपनों के स्वर्ग का सुख भोग रहा है, जबकि हकीकतें उसे दंश दे रही हैं। सरकार ने मीडिया के जरिये यह सपना परोसकर लोगों को खुश करने की एक नयी कोशिश की है कि हमारे देश में भी अब जापान की तर्ज पर बुलेट ट्रेनों का रोमांच नए दौर में पहुंच रहा है। क्योंकि मुंबई-अहमदाबाद की तर्ज पर देश के अन्य 12 रूटों पर बुलेट ट्रेन चलाने के लिए सर्वे किया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या केवल सर्वे को सपना पूरा होने का रोमांच माना जा सकता है? रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा के अनुसार नेशनल हाई स्पीड रेल कॉरपोरेशन नईदिल्ली से गाजियाबाद वाया हापुड़, वाराणसी तक बुलेट ट्रेन की संभावनाओं को तलाश रहा है। अगर ऐसा हो सका तो 720 किमी की दूरी महज महज तीन घंटे में पूरी होगी।
इस खबर को किसी चण्डूखाने की गप्प कैसे कहें क्योंकि स्वयं भारत सरकार के केंद्रीय रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा ने यह सपना दिखाया है। उनका कहना है कि विशेषज्ञों की टीम देश में 12 रूटों की सर्वे रिपोर्ट भारत सरकार को सौपेंगी। इसमें नई दिल्ली-मुरादबाद-वाराणसी पर विशेष फोकस है। बुलेट ट्रेन का रूट, यात्रियों की संख्या, दो स्टेशनों के बीच की दूरी, क्षेत्र की आर्थिक स्थिति एवं जमीन की गुणवत्ता और उपलब्धता का आंकलन किया जा रहा है। ये ट्रेनें 320 किमी प्रति घंटा की गति से दौड़ेंगी।रेल मंत्रालय ने देश के उन 12 रूटों का चयन किया है, जो सबसे तेज एवं व्यस्त गलियारों में माने जाते हैं। इस कड़ी में जर्मनी की सर्वे टीम ने मैसूर-चेन्नई रेलखंड पर प्रथम चरण की रिपोर्ट बना ली है। नई दिल्ली-भोपाल, नई दिल्ली-मुंबई, पुणे-मुंबई, हैदराबाद-चेन्नई, प्रयागराज-पटना, बंगलुरु-चेन्नई-तिवेंद्रम सहित कई ट्रैकों पर फिजिबिलटी रिपोर्ट बनाई जा रही है।
दरअसल, रेल राज्य मंत्री का यह भी दावा है कि नई दिल्ली-कानपुर-प्रयागराज रूट का कई बार सर्वे हो चुका है। नई दिल्ली-वाराणसी के बीच दोहरीकरण करने के साथ ही ट्रैक की क्षमता को बढ़ाया गया है। इस ट्रैक पर 180 से 200 किमी प्रति घंटा की रफ्तार वाली सेमी बुलेट ट्रेन आजमाई जा चुकी है। तो बुलेट के लिए नया कॉरीडोर भी बनाया जा सकता है। ये ट्रेनें 300 किमी प्रति घंटा से ज्यादा रफ्तार से दौड़ती हैं। ट्रेन का इंजन पूरी तरह एरोडायनमिक होता है। यह अत्यंत सुरक्षित माना गया है। जापान में सबसे पहले 1964 में बुलेट ट्रेन चली थी। आज तक किसी यात्री की मौत नहीं हुई। अब चीन, फ्रांस, दक्षिण कोरिया में बुलेट ट्रेन यात्रा का बेहद अहम जरिया है। भारत में इसका किराया फर्स्ट एसी के किराए से डेढ़ गुना होगा। अचानक इस बात को उछाले जाने के मकसद को आगामी चुनाव से जोड़कर लॉलीपॉप के रूप में देखा जा रहा है।
पूरा विवरण एक सरस कथा को पढऩे का आनन्द देता है और पढऩे वाला, अगर भारतीय है तो सपने देखने लगता है। क्योंकि वह परोसे जाने वाले सपनों में जीने का आदी हो चुका है और अगर पढऩे वाला कोई विदेशी है तो वह पेट पकड़-पकड़ हँसेगा। क्योंकि वह हकीकत जानता है और हकीकत यह है कि देश में पिछले पाँच वर्षों से मुम्बई-अहमदाबाद रूट पर बुलेट ट्रेन का शोर सरकार मचा रही है और अब तक शोर ही शोर हो रहा है। सारे शोर के बीच हकीकत यह सामने आती है कि इसी रेल को लेकर अभी तक महज बतकहाव हो रहा है। और इस ट्रेन का सपना अभी कागजों में ही है और योजना का प्रस्ताव ही आलोचनाओं की बौछार झेल रहा है। जाहिर है कि अभी पहली ही बुलेट टे्रन का ठिकाना किसी को दिख नहीं रहा है और मोदी सरकार के रेल मंत्री 12 बुलेट ट्रेनों का ‘जुमलाÓ उछालने लगे हैं। जनाब याद रखिये…. ऐसे जुमले लोग कैच कर लेते हैं और जब ये पूरे नहीं होते तो उलटकर उछालने वाले पर ही पत्थर जैसे वापस बरसाते हैं।

यातायात नियम सुरक्षा के लिये,बोझ न समझें
दुर्गेश रायकवार
(सड़क सुरक्षा सप्ताह 4 से 10 फरवरी पर विशेष) नियम, कायदे, कानून आपकी सुरक्षा के लिये बनाये गये हैं। इनका पालन करना सुनिश्चित करना होगा। कब तक पुलिस या बुद्धिजीवी आपको समझाइश देते रहेंगे। आपको खुद को अपनी और अपने परिवार की चिन्ता करनी होगी। इसके लिये आपको सड़क सुरक्षा संबंधी यातायात के नियमों का पालन करना होगा। इनको बोझ समझकर अनदेखी करना घातक सिद्ध हो सकता है।
सड़क हादसे में होने वाली मौतों की संख्या लगातार बढती जा रही है। इसके लिये दूसरों को नहीं अपने आप को ही बदलकर जिम्मेदार नागरिक बनना होगा। जिससे की आपका पूरा परिवार सुख, शांति से जी सके और चालान के पैसों को बचाकर घर-गृहस्थी की जरूरत पूरी करे। सड़क पर चलने के कई नियम हैं जिनका पालन करना बहुत जरूरी है। इसी प्रकार जाने-अनजाने कई गलतियाँ भी सड़क पर होती हैं, उन्हें भी दूर करना होगा।
इसमें एक है सड़क पर रैली, धरना-प्रदर्शन, बारात और धार्मिक यात्रा निकालना आदि। इसके पीछे का कारण यह है कि आये दिन इन गतिविधियों के होने से बीमार, गंभीर घायल या किसी महत्वपूर्ण काम के लिये निकला व्यक्ति अनायास ही भीड़-भाड़ और जाम में फँसता है। यहाँ तक कि बीमार तथा गंभीर घायल व्यक्ति का समय से इलाज न होने के कारण वह अपनी जान गवां देता है। तो क्या.. आपको क्या फर्क पड़ता है। यह मत सोचिये, इसका शिकार कभी आप स्वयं, परिवार या आपके मित्र-सगे-संबंधी भी हो सकते हैं। तब जरूर फर्क पड़ेगा न! सड़क पर बहुत कुछ नहीं होना चाहिये। उनमें से एक है होर्डिंग। देखने में आता है कि चौराहे हो या मोड़, जगह-जगह होर्डिंग रखने की होड़-सी चली है। इसके कारण विजिबिलिटी नहीं होती और वाहन एक-दूसरे से टकराने का भय हमेश बना रहता है। इस पर भी बहुत गंभीरता से विचार कर ध्यान देने की जरूरत है। साथ ही चौराहे पर लगे होर्डिंग से सिग्नल नहीं दिखते, इससे भी दुर्घटना होने का खतरा बना रहता है। इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है।
और जल्दी किस बात की यह आज तक नहीं समझ में आया। गाड़ी को एक नियत और सधी गति में चलाने से आप भी सुरक्षित हैं और आपका वाहन भी। जहाँ दोपहिया वाहनों पर ओवर लोडिंग और मोबाइल पर बात करना सड़क दुर्घटना को आमंत्रित करता है। वहीं चार पहिया वाहनों में सीट बेल्ट लगाने से दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्यु से बचा जा सकता है। सड़क दुर्घटनाओं के विभिन्न कारणों में से एक शराब पीकर वाहन चलाना भी है। चालक को स्वयं सावधानी से वाहन का उपयोग करना चाहिये। जरूरी है कि लंबी दूरी की सड़क यात्रा से बचा जाये। अत्यंत आवश्यक होने पर ही यह यात्रा की जाना चाहिये। प्राय: देखने में यह आता है कि नागरिक लंबी दूरी की यात्रा के समय ड्रायवर का सहारा लेते हैं और लंबे समय लगातार बिना रुके वाहन चलवाते हैं। ऐसे समय वाहन चालक को आराम देने की जरूरत है। रात के समय तो सफर करने से बचना ही चाहिये, क्योंकि राष्ट्रीय और राजकीय राजमार्ग पर अधिकांश दुर्घटनाएँ वाहन चालक को नींद का झोंका आने के कारण हुई पायी गयीं। अधिकतम 70-80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ज्यादा वाहनों की गति नहीं रखने में ही समझदारी है। अत्यधिक बारिश, कोहरा और खराब मौसम होने की स्थिति में सड़क मार्ग यात्रा से बचा जाना चाहिये। अगर किसी कार्यक्रम में जाने के लिये आप निकले हैं, तो नियत समय से पहले यात्रा शुरू करना चाहिये, जिससे हड़बड़ी में तेज वाहन-चालन से बचा जा सके।
कभी-कभी ओवर टेक करना भी मृत्यु का कारण बनता है। इससे बचने के लिये वाहन चालक को धैर्य रखना आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों में हेलमेट के प्रति लोगों को जागरूक करना बेहद जरूरी है। इसी प्रकार ट्रेक्टर-ट्राली वालों के लिये अभियान चलाकर उनके ट्रालों के पीछे रेडियम लगाने की आवश्यकता है। इससे रात में विजिबिलिटी बनने से दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है। इसी प्रकार अधिकतर देखने में आता है कि हाई-वे पर पड़ने वाले ग्रामीण क्षेत्र के नागरिक गलत दिशा में वाहन चलाकर एक दम से बड़े वाहनों के सामने आकर मृत्यु को आमंत्रित कर लेते हैं। लोगों को यातायात के प्रति जागरूक करने और सड़क सुरक्षा के उद्देश्य से 4 से 10 फरवरी तक 30वाँ राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया जा रहा है। सप्ताह के दौरान प्रदेश में सड़क सुरक्षा संबंधी विभिन्न कार्यक्रम आयोजित कर नागरिकों को जागरूक किया जा रहा है। आसान है, सड़क सुरक्षा के नियमों का पालन कर असामयिक मृत्यु से बचा जा सकता है। सड़क सुरक्षा सप्ताह का उद्देश्य भी यही है कि हमारी, आपकी और दूसरों की भी जान बच सके।
(लेखक सहायक संचालक, जनसम्पर्क और मध्यप्रदेश राज्य सड़क सुरक्षा क्रियान्वयन समिति में नोडल अधिकारी हैं)

Share