आलेख 23

पं.दीनदयालजी कल भी प्रासंगिक थे आज भी हैं
प्रभात झा
देश में जब भी सामाजिक आर्थिक चिंतन की बात की जाती है तो गांधी, जेपी, लोहिया और दीनदयालजी का नाम लिया जाता है । हम किसी की देशभक्ति पर प्रश्नचिह्न नहीं लगा रहे । परंतु गांधीजी ने आजादी की लड़ाई लड़ी । जेपी ने आजादी की दूसरी लड़ाई लड़ी । लोहियाजी समाजवादी चेतना के संवाहक बने और दीनदयालजी स्वदेशी आधारित सामाजिक, आर्थिक चिंतन के सर्वश्रेष्ठ चिंतक बने। जब मैं दीनदयालजी के बारे में सर्वश्रेष्ठ चिंतक की बात करता हूँ तो इसका प्रामाणिक आधार है । गांधीजी की शिक्षा लंदन में हुई । जेपी की शिक्षा अमेरिकी विश्वविद्यालय में हुई और लोहिया की शिक्षा जर्मनी में हुई थी । कमोवेश इन तीनों पर उन देशों का जरूर प्रभाव पड़ा । जहाँ वे अध्ययन करने गए थे । परंतु दीनदयालजी का अध्ययन स्वदेश में हुआ । इसलिए उनके मूल में स्वदेशी चिंतन प्राकृतिक रूप में अंतर्निहित है । इसे यों कहें कि वे प्रकृति प्रदत्त स्वदेशी चिंतक थे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । अपनी – अपनी विचारधारा के धरातल पर हमारी संस्कृति में सभी को श्रेष्ठ ही माना जाता है। इसलिए गांधीजी, लोहिया, जेपी के विचारों पर हम कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाते हैं। हम इन सभी का आदर कल भी करते थे, आज भी कर रहे हैं और कल भी करेंगे । भारत के श्रेष्ठ विचारकों में हम दीनदयालजी के एकात्म मानववाद का अध्ययन करते हैं तो हम पाते हैं कि पंडित दीनदयालजी भारत की चित्ति, भारत के जनमानस और भारत की संस्कृति को समझ समस्याओं के समाधान के लिए सदैव अग्रसर हुए। यही कारण है कि दीनदयालजी कल भी प्रासंगिक थे आज भी हैं और विश्व राजनीतिक फलक पर उनका एकात्म दर्शन भी प्रासंगिक रहेगा। अगर हम गौर से देखें तो हम पाएँगे कि हर विचारक का एक शब्द प्रिय होता है । जैसे गांधीजी का अहिंसा, नेहरूजी का आराम . हराम, लोहियाजी का चौखंभा राज्य, जयप्रकाशजी का संपूर्ण क्रांति, शात्रीजी का जय जवान, जय किसान । इसी तरह दीनदयालजी का प्रिय शब्द रहा, अंत्योदय , अंत्योदय यानी अंतिम व्यक्ति का उदय। भारतीय राजनीति में विनोबा भावे ने भी सर्वोदय शब्द दिया। पर अंत्योदय में यह बात निहित है सबका साथ, सबका विकास । जब अंतिम व्यक्ति का विकास होगा तो उसके ऊपर सभी व्यक्तियों का विकास अंतर्निहित है। अंत्योदय की अंतरात्मा स्वत: अपनी उद्घोषणा करती है कि अगर अंत्योदय होगा तो सबका साथ, सबका विकास स्वत: हो जाएगा । सामाजिक जीवन में और समाज के आर्थिक जीवन में यदि हमारी अर्थव्यवस्था अंत्योदय युक्त होगी तो समाज, जीवन की चित्ति की साधना स्वत: सफल होती जाएगी । अंत्योदय शब्द में संवेदना है, सहानुभूति है, प्रेरणा है, साधना है, प्रामाणिकता है, आत्मीयता है, कर्तव्यपरायणता है तथा साथ ही उद्देश्य की स्पष्टता है । दीनदयालजी कहा करते थे कि जब तक अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति का उदय नहीं होगा, भारत का उदय संभव नहीं है । वे अश्रुपूरित आँखों से आँसू पोंछने और उसके चेहरे पर मुसकराहट को अंत्योदय की पहली सीढ़ी मानते थे । जिस देश के आर्थिक चिंतन में अंतिम पंक्ति के व्यक्ति का उदय न हो वह राष्ट्र न केवल आर्थिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी भटक जाता है । अंत्योदय सामाजिक कर्तव्य की प्रेरणा की पहल है । यह किसी राजनीतिक दल का शब्द नहीं है । सर्वकल्याणकारी, सर्वस्वीकारी और फलकारी है । अत: सरकार किसी की भी हो उस सरकार के चित्ति में अंत्योदय की लौ सतत प्रज्वलित रहनी चाहिए । प्रबलता को प्रणाम, दुर्बलता को दुलत्ती, इस नीति सिद्धांत पर कोई भी राष्ट्र तरक्की नहीं कर सकता। प्रबलता की कर्तव्यपरायणता में निर्बलता को दूर करने का साहस होता है । अत: प्रबलता की सामर्थ्य का सार्वजनिकीकरण करते हुए निर्बल को सबल बनाने का पुनीत कार्य अंत्योदय में अंतर्निहित है। जो अंत्योदय की आत्मिक पुकार है । अंत्योदय के मूल में दीनदयालजी ने कोई चुनावी लाभ नहीं देखा। क्योंकि उनका जीवन स्वत: अंत्योदय से प्रेरित था । वे समाजोत्थान के लिए अपनी हड्डी गलाने में विश्वास रखते थे । उनके शब्द और आचरण में दूरी नहीं थी। वर्षों के चिंतन के बाद उन्होंने पाया कि भारतीय जीवन और सांस्कृतिक चिंतन को जमीन पर उतारने के लिए अगर कोई नीति अंत्योदय आधारित नहीं होगी तो हम भारतीय संस्कृति से सद्भाव से गाँव की आत्मा से और शहरी आवश्यकता से कोसों दूर चले जाएँगे । दीनदयालजी के अंत्योदय का आशय राष्ट्रश्रम से प्रेरित था । वे राष्ट्रश्रम को राष्ट्रधर्म मानते थे । उनकी मान्यता रही कि राष्ट्रश्रम प्रत्येक नागरिक का राष्ट्रधर्म है । अत: कोई श्रमिक वर्ग अलग नहीं है। हम सब श्रमिक हैं । अत: राष्ट्रश्रम राष्ट्रधर्म का दूसरा नाम है । दीनदयालजी के अंत्योदय का आशय यह भी था कि समाज की योजनाएँ सबके लिए वरण्य तो हों । परंतु वरीयता अंतिम व्यक्ति को मिले। उनके चिंतन में सरकार की हर योजना के पीछे गाँव होना चाहिए । उनकी मान्यता थी कि आजादी के बाद सरकार की योजनाएँ ग्रामोन्मुखी न होकर नगरोन्मुखी ज्यादा रहीं और यही कारण है कि आज गाँव सूने हो रहे हैं तथा नगरों में रहना दूभर हो गया है । वे ग्राम और शहर के बीच संतुलित संबंध चाहते थे । आजादी के बाद जो सरकारें आईं उनके चिंतन में यह भाव नहीं दिखा । यही कारण है कि आज अंत्योदय की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है । इसी भाव के साथ दीनदयालजी के अंत्योदय के सपने को कैसे साकार किया जाए इसी दृष्टि से कुछ चिंतकों से और दीनदयालजी के साथ रहे लोगों से आलेख माँगे गए और उन आलेखों से अंत्योदय की परिभाषा सामने आई है । हमारी यह पहल रही कि समाज के बीच दीनदयालजी की अंत्योदय की भावना क्या रही यह लोग समझें । यह सफल तब होगा जब आप पढ़ेंगे समझेंगे और इसे भारतीय जीवनशैली में उतारने की कोशिश करेंगे । यहाँ यह कहने में मुझे कोइ संकोच नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंत्योदय शब्द के अपनी गरीबोन्मुखी योजनाओं से उसे साकार करने की दिशा में एक नहीं अनेक साहसिक निर्णय लिए हैं। मसला जनधन योजना का हो, उज्जवला योजना हो, आयुष्मान योजना हो, शौचालय योजना हो, प्रधानमंत्री आवास योजना हो, मुद्रा योजना हो, स्वछता अभियान हो, 18 से 40 साल के लोगों को पेंशन लाभ के दायरे में लाना, सामाजिक सुरक्षा की गारंटी को लेकर पेंशन की अनेक योजनाएं गरीब किसानों के खाते में छह हजार रुपये वार्षिक भेजने, इसके साथ ही ठेले खोमचे लगाने वालों से लेकर गरीबों की जिंदगी में मुद्रा योजना के माध्यम से परिवर्तन लाने की अहम योजना, ऐसी अनेक योजनाएं लागू हुई। जिनसे सौ करोड़ से अधिक भारतीयों के जीवन पर सीधा असर पड़ा। सरकार वही अच्छी होती है जिसकी किरणें अंत्योदय अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति के जीवन में नया सवेरा लाये।

भारत को मिले ‘वीटो’ का अधिकार
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
संयुक्तराष्ट्र संघ के 75 वें अधिवेशन के उद्घाटन पर दुनिया के कई नेताओं के भाषण हुए लेकिन उन भाषणों में इन नेताओं ने अपने-अपने राष्ट्रीय स्वार्थों को परिपुष्ट किया, जैसा कि वे हर साल करते हैं लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ ऐसे बुनियादी सवाल उठाए, जो विश्व राजनीति के वर्तमान नक्शे को ही बदल सकते हैं। उन्होंने सुरक्षा परिषद के मूल ढांचे को ही बदलने की मांग रख दी। इस समय दुनिया में अमेरिका और चीन ही दो सबसे शक्तिशाली राष्ट्र हैं। आजकल दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध मुक्का ताने हुए हैं। उनके नेता डोनाल्ड ट्रंप और शी चिन फिंग ने एक-दूसरे को निशाना बनाया। ट्रंप ने दुनिया में कोरोना विषाणु फैलाने के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराया और चीन ने कहा कि अमेरिका सारी दुनिया मेें राजनीतिक विषाणु फैला रहा है। शी चिन फिंग ने कहा कि चीन की दिलचस्पी न तो गर्म युद्ध में है और न ही शीत युद्ध में। मोदी ने अपने आप को इस चीन-अमेरिकी अखाड़ेबाजी से बचाया और सुरक्षा परिषद का विस्तार करने की बात कही। उन्होंने कहा कि जमाना काफी आगे निकल चुका है लेकिन संयुक्तराष्ट्र संघ 75 साल पहले जहां खड़ा था, वहीं खड़ा है। सुरक्षा परिषद के सिर्फ पांच सदस्यों को वीटो (निषेध) का अधिकार है याने उन पांच सदस्यों में से यदि एक सदस्य भी किसी प्रस्ताव या सुझाव को वीटो कर दे तो वह लागू नहीं किया जा सकता। याने उनमें से कोई एक राष्ट्र भी चाहे तो सारी सुरक्षा परिषद को ठप्प कर सकता है। कौनसे हैं, ये पांच राष्ट्र ? अमेरिका, चीन, रुस, ब्रिटेन और फ्रांस ! इन पांचों को यह निषेधाधिकार क्यों मिला था? क्योंकि द्वितीय महायुद्ध (1939-45) में ये राष्ट्र हिटलर, मुसोलिनी और तोजो के खिलाफ एकजुट होकर लड़े थे। जो जीते हुए राष्ट्र थे, उन्होंने बंदरबांट कर ली। संयुक्तराष्ट्र यों तो लगभग 200 राष्ट्रों का विश्व-संगठन है लेकिन इन पांच शक्तियों के हाथ में वह कठपुतली की तरह है। उसकी सुरक्षा परिषद में न तो कोई अफ्रीकी, न लातीन-अमेरिका और न ही कोई सुदूर-पूर्व का देश है। भारत-जैसा दुनिया का दूसरा बड़ा राष्ट्र भी सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं है। 10 अस्थायी सदस्यों में इस वर्ष भारत भी चुना गया है। पांचों महाशक्तियां अपना मतलब गांठने के लिए गोलमाल शब्दों में भारत को स्थायी सदस्य बनाने की बात तो करती हैं लेकिन होता-जाता कुछ नहीं है। भारत के नेता भी दब्बू हैं। वरना आज तक उन्होंने ये मांग क्यों नहीं कि या तो वीटो (निषेधाधिकार) खत्म करो या चार-पांच अन्य राष्ट्र को भी दो। वीटो अधिकार का कोई सुनिश्चित आधार होना चाहिए। भारत चाहे संयुक्तराष्ट्र के बहिष्कार की भी धमकी दे सकता है। वह अपने साथ दर्जनों राष्ट्रों को जोड़ सकता है।

चम्बल इलाके में जन्मे थे कर्ण, कुंती, परसराम, बिसमिल व सिंधिया…!
नईम कुरेशी
मध्य प्रदेश का ग्वालियर चम्बल इलाका अमर गायक तानसेन से लेकर रानी कुंती व कर्णखार नूराबाद मुरैना में जन्मे वीर कर्ण के नाम पर देश दुनिया में चर्चित है। रानी कुंती के कारण ही भगवान श्री कृष्ण उनसे मिलने इस इलाके में आते रहे हैं। चम्बल नदी इन्दौर, उज्जैन के समीप से निकली है जो श्योपुर, मुरैना, भिण्ड होती हुई जालौन के पास पंचनदा जैसे संगम में जाकर यमुना में जा मिलती है। चम्बल नदी का और चम्बल इलाके का इतिहास वीरों, महावीरों, क्रांतिकारियों से भरा पड़ा है। रामप्रसाद बिस्मिल महान स्वतन्त्रता संग्राम सैनानियों में शुमार रहे थे वो सरदार भगत सिंह के महान साथियों में थे।
चम्बल इलाके से जहां श्योपुर की सीप नदी व वहां के कच्छपघात कछवाह राजाओं की राजधानी चंडोमनगर रही थी 10वीं सदी में, यहां के शासक विक्रमसिंह का अभिलेख इतिहास में दर्ज है। मध्यकाल के इतिहास में ये चम्बल का इलाका भारत भर में वैभव का प्रतीक रहा था। 18वीं सदी में ये सिंधिया शासकों के अधीन भी रहा था। यहां के श्योपुर का किला व महल काफी भव्य है। आज ये आदिवासी संस्कृति का संग्रहालय के तौर पर प्रसिद्ध है। किले को 16वीं सदी में गौर राजपूतों ने बनवाया था। यहां का नरसिंह महल के सामने चार बाग मुगल शैली की याद दिलाता है व दीवाने-ए-आम का दरबार महल सिंधिया शासकों का माना जाता है। यहां शेरशाह सूरी के सिपेहसालार व गूगोर के शासक मुनब्बर खॉन का मकबरा भी एक अच्छी शिल्प का नमूना है। श्योपुर और विजयपुर तहसीलों के अन्तर्गत “कूनो वन्यजीव अभयारण” भी श्योपुर के अन्तर्गत ही आता है। 1981 में श्रीमंत माधवराव सिंधिया पूर्व रेल मंत्री ने ये स्थापित कराया था। यहां चीतल, तेंदुये, काले हिरण, भालू आदि देखे जा सकते हैं। श्योपुर, चम्बल इलाके के महत्वपूर्ण जिलों में से एक रहा है। पालपुर, मानपुर, काशीपुर, विजयपुर, बड़ौदा आदि के किले दुर्ग व गढ़ियां व इनमें बने मंदिर देखने लायक हैं। ये चम्बल के गौरव की गाथायें कहते हैं। सिंधिया ने ग्वालियर चम्बल इलाके में सैकड़ों विकास विगत 30 सालों में कराये तथा रेलों का जाल बिछाया।
संसद का नक्शा चम्बल इलाके से
चम्बल इलाके में मुरैना जिले का महत्व देश दुनिया भर में काफी प्रसिद्ध है। मुरैना के मालनपुर से 30 किलोमीटर की दूरी पर मितावली ग्राम में 10वीं सदी का चौरासी खम्बों पर बने शिवमंदिर को ही भारत की संसद के नक्शे का माना जाता है। “बटेश्वर मंदिर” समूह मुरैना के एक महान शिवमंदिरों का समूह है 9-10वीं सदी में ये गुर्जर प्रतिहारों ने बनवाया था। 120 मंदिरों का एक बड़ा समूह है जिसे 15 साल पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आर्किलॉजिस्ट मोहम्मद के.के. ने इसे संवार कर यहां के 30-40 मंदिर को संवार कर पुन: निर्माण कर भव्य रूप दे दिया।
मुरैना में नूराबाद जहांगीर के शासनकाल के स्मारक के कारण चर्चित बताया जाता है। यहीं पर रानी कुंती के भी अवशेष हैं। यहीं मध् भारत के वीर कर्ण का जन्म होने के प्रमाण बताये जाते हैं। मुरैना में ग्राम सुहानिया तंवरधार के समीप “ककनमठ का शिवमंदिर” एक बड़ा शिवमंदिर है जो 8 फीट ऊँचे चबूतरे पर 18वीं सदी में कछवाह शासकों का भव्य स्मारक है जो 30 फीट लम्बे रथ मंदिर के तौर पर पुरातत्व के जानकारों का खजुराहो शैली का मंदिर है। ये खजुराहो के मंदिरों से भी ज्यादा सुंदर कहा जाता है। इसके पास ही 84 ग्राम तोमर जाति के राजपूतों के हैं। अम्बाह तहसील मुरैना में एक भव्य म्यूजियम भी विगत वर्ष़ों में नरेन्द्र सिंह तोमर ने बनवाकर चम्बल की सांस्कृतिक झांकी को सफलतापूर्वक दिखाया है।
चम्बल इलाके श्योपुर मुरैना के बाद भिण्ड जिला आता है। यहां भी तमाम महत्वपूर्ण स्मारक किले मंदिर व महल देखे जाते हैं। भिण्ड का नाम महाभारत काल के एक ऋषि विभण्डक के नाम पर कहा जाता है। भिण्ड को भदावर इलाका भी माना जाता है। ये भदौरिया राजपूतों की राजधानी माना जाता है। सम्राट अकबर के दौर में भी भदौरिया शासक काफी अक्खड़ व वीर कहे जाते थे। भदौरियों का किला भिण्ड से 30 किलोमीटर दूर अटेर में चम्बल के बीहड़ों में है जो काफी सुन्दर व भव्य स्मारक है। 17 वीं सदी में महाराजा बदन सिंह ने अटेर का ये किला बनवाया था। भदौरिया राजाओं ने पृथ्वीराज चौहान द्वारा निर्मित भिण्ड शहर के प्रसिद्ध गौरी तालाब में सुन्दर घाट व सीढ़ियां बनवायीं। यहां प्रसिद्ध वनखण्डेश्वर मंदिर भी है।
होलकर की छत्री
भिण्ड के आसपास भी काफी सुन्दर स्मारक हैं जिसमें गोहद के जाट राजाओं का किला व महल पुरातत्व महत्व के स्मारकों में शुमार है। गोहद के किले में शिल्पकारी और कांच कला चित्रकारी आज भी देखते ही बनती है जो राजपूत शैली को खासतौर से दर्शाती है। यहां दौलतराव सिंधिया के एक योरोपियन सैन्य अधिकारी मेजर पियरे लिम्बर्ट की भव्य कब्रशाह भी है जिनका निधन 1780 में होना इतिहास में दर्ज है। सिंधिया की फौज में फ्रांसीसी व अंग्रेजी सेना अधिकारी ज्यादातर थे जिन्होंने सिंधिया की फौज को ताकतवर बना दिया था। भिण्ड के आलमपुर में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1766 में मल्हाराव होलकर ककी सुन्दर छत्री का निर्माण कराया था। ये छत्री अपनी सुन्दर पत्थर की कला का अमूल्य नमूना है। इस छत्री में फूल पत्तियों की रो हैं। ये मराठा शैली की बताई जा रही है। भिण्ड में दिगम्बर जैन मंदिरों की बड़ी बड़ी बतार देखी जाती हैं। मेहगांव से 18 किलोमीटर तथा भिण्ड से मात्र 15 किलोमीटर की दूरी पर बरासोजी यहां का एक छोटा सा कस्बा है जो वैशाली नदी के किनारे बसा है। ये प्राचीन जैन मंदिरों के लिए जाना जाता है। इतिहास में दर्ज है 14वीं सदी में ये मंदिर तोमर शासकों ने बनवाये थे। इसी तरह पावई में भी भगवान नेमिनाथ का एक मंदिर भी है। जो 12वीं सदी में बनाया गया बताया जाता है। यहां 135 खम्बों वाला विशाल जिनालय है इसके पास ही श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र है जिसे भगवान महावीर से जोड़ा जाता है। जनचर्चा के अनुसार यहां भगवान महावीर स्वयं आये थे।
9वीं-10वीं सदी में इस इलाके के शासक रहे गुर्जर प्रतिहारों ने यहां सूर्य मंदिर का निर्माण कराया था जिसको पूर्वमुखी कहा जाता है। यहां गंगा व यमुना नदियां देवियों की तरह उकेरी गई हैं। गुर्जर प्रतिहारों का एक मंदिर 8वीं सदी का ग्वालियर फोर्ट पर भी है। चम्बल इलाका महाभारत के वीर राजकुमार कर्ण का इलाका माना जाता है। कर्ण ने धनुष चलाने की शिक्षा गुरु द्रोणाचार्य व भगवान परसराम से लेने का इतिहास दर्ज है। भगवान परसराम सिर्फ ब्राम्हणों को धनुष चलाने की शिक्षा देते थे पर कर्ण तो राजपूत राजकुमार थे जिससे परसराम ने उन्हें जाति छिपाने के आरोप में श्राप दे दिया था जिससे उन्हें उनकी वीरता का लाभ नहीं मिल सका था। फिर भी वो एक महान योद्ध जरूर माने गये थे। चम्बल के लहार इलाके को पांडवों की हत्या के लिए लाक्षागृह कौरवों ने बनवाया था ये भी जनचर्चा है।
पाँच नदियों का संगम
चम्बल में जहां महारानी कुंती के जन्म लेने का स्थान रहा है कुंतलपुर, नूराबाद के समीप मुरैना वहीं भिण्ड के गोहद तहसील के मऊ के निकट महर्षि परशुराम के जन्म के भी प्रमाण मिलते हैं। उन्होंने अपने पिता के निर्देश पर अपनी माता की हत्या सिरकाट कर दिये जाने का भी प्रमाण देखे जाते हैं। माता रेणुका मंदिर गोहद के पास मऊ ग्राम में है। मंदिर में रेगु की प्रतिमा स्थापित है जिसमें उनका सिर धड़ से अलग है। मध्य प्रदेश का चम्बल इलाका आगरा से 85 किलोमीटर व दिल्ली से 270 किलोमीटर ही दूर है। यहां की स्थापत्य कला, ऑर्किलॉजी सांस्कृतिक विरासतों को देखकर आप आनंदित हुए बगैर नहीं रह सकेंगे। विकास के इस दौर में ये फोरलेन सड़कों से जुड़ चुका है व भिण्ड मुरैना जिलों से पूरे देश भर में सड़क व रेल परिवहन से जुड़ा हुआ है। यहां लहार के पास पंचनदा भी देखने लायक है जो पांच नदियों यमुना, पहुज, कुंआरी, बेतवा, सिंध आदि नदियों का संगम जालौन के रामपुरा कस्बे में देखा जा सकता है। जो लहार से मात्र 30-40 किलोमीटर की मात्र दूरी पर है। भारत की संस्कृति में नदियों का संगम महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धार्मिक घटना मानी जाती रही है। आज के दौर में मुरैना से लोकसभा सांसद नरेन्द्र तोमर इस क्षेत्र में विकास के लिए जाने जाते हैं। ग्वालियर में भी उन्होंने 7 ओवरब्रिज बनवाकर शहर का नक्शा बदल दिया है।

किसानों को कृषि उत्पाद बेचने की खुली आजादी देंगे कृषि सुधार कानून
विवेक कुमार पाठक
केन्द्र की मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी में आखिरकार किसानों को उपज बेचने की आजादी दी है, संविदा खेती का अवसर दिया है। कल लोकसभा में कृषि सुधार के लिए पास हुए दोनों विधेयक किसानों को हक देते हैं कि वे अपनी उपज चाहे मंडी, बाजार जहां चाहें बेचें। इन बिलों को किसानों की समृद्धि का कारक बताते हुए केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने लोकसभा में साफ कर दिया है कि अब वक्त आ गया है कि देश के अन्नदाता किसानों को वाजिब मूल्य हर स्थिति में मिले। श्री तोमर ने लोकसभा के पटल से देश के किसानों को आश्वस्त कर दिया है कि उपज की सरकारी खरीदी व न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी था, जारी है और इस बिल के बाद पूर्व की तरह जारी रहेगा। बिल को ऐतिहासिक बताते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी ट्वीट किया है कि यह बिल किसानों को बिचौलियों से मुक्ति देने वाला है। यह देश के किसानों के लिए ऐतिहासिक क्षण है। असल में यह बिल किसानों को विक्रय के और अधिक विकल्प देकर उनको और अधिक सशक्त करेगा।
कोरोना संकट के दौरान कृषि सुधार के लिए कल लोकसभा में पास हुए कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य संवर्धन और सरलीकरण विधेयक 2020 और कृषक सशक्तिरण और संरक्षण कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 देश भर में चर्चा में हैं। इन्हें कृषि सुधार की दिशा में मोदी सरकार का क्रांतिकारी कदम बताया जा रहा है। इन्हें किसानों को आर्थिक मजबूती देने वाला बड़ा कदम बताया जा रहा है। असल में 2014 में सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार तेजी से काम कर रही है।
इन विधेयकों पर कल बहस में कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा कि 2014 से मोदीजी के नेतृत्व में गांव, गरीब एवं किसान आगे बढ़े हैं। यूपीए सरकार के समय में में 12 हजार करोड़ का कृषि बजट था जबकि मोदी सरकार ने खेती और किसानों की परवाह करते हुए इसे बढ़ाकर 1 लाख 34 हजार करोड़ का कृषि बजट कर दिया है।
हमारी सरकार ने किसानों के खाते में 75 हजार करोड़ दिए। हमने पीएम किसान योजना के जरिए आय संहिता योजना प्रारंभ की और किसानो के खाते में 92 हजार करोड़ रुपए डीवीडी के जरिए किसानों के खाते में जमा कराए हैं।
कृषि मंत्री श्री तोमर ने बताया कि किस कदर एफपीओ के जरिए किसानों की उन्नति व समृद्धि का मार्ग तैयार किया जा रहा है। हमने 10 हजार एफपीओ मंजूर किए हैं ताकि उन्हें तकनीकी सहयोग मिल सके। ये एफपीओ 6 हजार 850 करोड़ रुपए की लागत से तैयार किए जा रहे हैं।
मोदी सरकार किसानों को कर्ज देने में भी आगे है। यूपीए ने जहां 8 लाख करोड़ किसानों के कर्ज के लिए दिए थे वहीं मोदीजी ने किसानों के लिए कर्ज दुगुना करते हुए 15 लाख करोड़ मंजूर किए हैं।
श्री तोमर ने बताया कि हम जानते हैं कि कोरोना के कारण किसानों के सामने किस तरह के संकट हैं। हमारी सरकार ने आत्मनिर्भर पैकेज के तहत कृषि अधोसंरचना के लिए 1 लाख करोड़ रुपए दिए साथ ही 1128 करोड़ रुपए देश भर में सहकारी समितियों को भी दिए।
श्री तोमर ने इन उदाहरणों से साफ कर दिया कि मोदी सरकार ने यह पैसा कोरोना संकट के समय एक माह के अंदर फैसला करते हुए दिया इससे सरकार की संवेदनशीलता स्पष्ट है।
वे कहते हैं सरकार निरंतर प्रतिबद्ध है कि बुआई का रकबा, उत्पादन, जैविक खेती बढ़े।
अपनी बात रखते हुए कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने साफ किया कि मोदी सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के प्रति वचनबद्ध है और इस सरकार ने समर्थन मूल्य को डेढ़ गुना बढ़ाकर इसका प्रमाण भी दिया है।
श्री तोमर ने यूपीए सरकार को उलाहना देते हुए कहा कि कृषि विशेषज्ञ स्वामीनाथन की कृषि संबंधी रिपोर्ट मंजूर करने में दस साल के कार्यकाल के बाबजूद यूपीए सरकार पीछे रही जबकि मोदी सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को मंजूर करते हुए किसानों को राहत दी। हम मूल्य आश्वासन बिल इसलिए लेकर आए ताकि देश के 86 प्रतिशत छोटे किसानों को भी निवेश का मौका मिले। उनके सामने भी प्रोसेसर, स्टार्टअप के अवसर आएं। इसके लिए किसान और करारकर्ता छोटे छोटे रकबे जोड़कर बड़े क्षेत्र की खेती कर सकते हैं जिससे करारकर्ता और किसान एक दूसरे की आमदनी बढ़ाने में सहभागी होंगे। यह करार किसानों के हक की पहले और मजबूत बात करेगा। उसकी देनदारी कभी भी उसकी जमीन पर नहीं आएगी और न ही उस पर किसी तरह का जुर्माना लगेगा। इसके विपरीत करारकर्ता और व्यापारी अपना दायित्व पूरा न करने पर जुर्माना भरेंगे।
लोकसभा में मूल्य आश्वासन बिल की खूबियां बताते हुए कृषि मंत्री ने कांग्रेस के घोषणा पत्र का पेजवार हवाला देते हुए बिल के विरोध करने वालों पर सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने साफ किया कि इस बिल से संबंधित सुधार जब आपने अपने घोषणा पत्र में शामिल कर रखे थे तो आज सदन में आप इसका विरोध करके अपने संकल्प से क्यों पीछे हट रहे हैं। हम आज जो बिल लेकर आएं हैं वो देश में लायसेंसराज खत्म करेगा। किसान एक राज्य से दूसरे राज्य में उपने उत्पाद और उपज अधिक मुनाफे के लिए बेच सकेगा। ईप्लेटफार्म से किसानों की पहुंच बढ़ेगी। देश की 585 मंडियों में ईप्लेटफार्म के प्रति इतनी लोकप्रियता रही कि अब तक 35 हजार करोड़ रुपए का व्यापार इस पर हो चुका है।
कृषि मंत्री तोमर ने साफ कर दिया कि यह बिल किसानों के हाथ खोलेगा, उसकी पहुंच बढ़ाएगा। उसे तीन दिन में उपज का पेमेंट दिलाएगा। किसान जब मनचाही जगह उपज बेचेगा तो उपज के खरीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, इसमें अधिक व्यापारी काम करेंगे जिससे निश्चित ही रोजगार के अवसरों में इजाफा होगा।
लोकसभा में इस बहस के दौरान कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने स्वामीनाथ रिपोर्ट के साथ किसान नेता शरद जोशी की सिफारिशों का जिस तरह हवाला दिया वो उनकी बात को सदन में मजबूती देने वाला रहा। श्री तोमर ने बताया कि किन किन बातों को लेकर संघर्षशील किसान नेता जोशी जी लड़ते रहे थे और उन सारी मांगों को ये दोनों विधेयक निर्णायक ढंग से पूरा करने वाले हैं। कुल मिलाकर मोदी सरकार के इन कृषि सुधारों विधेयकों पर कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने जिस गहराई से अपनी बात रखी उससे उनकी गांव के जमीनी किसान नेता व किसानपुत्र छवि सदन में फिर एक बार स्थापित हुई। वे सदन को कृषि मंत्री और एक किसान दोनों रुपों में समझाते दिखे। आसान शब्दों में तर्कपूर्ण जवाबों के साथ विधेयक का पास होना तोमर की निर्णायक सफलता रही। अब देखना ये कि कितनी जल्दी यह विधेयक कानून बनकर देश के किसानों को उपज बेचने की आजादी के साथ उन्हें आर्थिक आत्मनिर्भरता देता है। तब तक निश्चित ही देश के किसान इस विधेयक पर हो रही हर चर्चा पर निरंतर ध्यान लगाए रहेंगे।

पाक में सरकार के ऊपर सरकार
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान में पीपल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो ने लगभग सभी प्रमुख विरोधी दलों की बैठक बुलाई, जिसमें पाकिस्तानी फौज की कड़ी आलोचना की गई। पाकिस्तानी फौज की ऐसी खुले-आम आलोचना करना तो पाकिस्तान में देशद्रोह-जैसा अपराध माना जाता है। नवाज़ शरीफ ने अब इस फौज को नया नाम दे दिया है। उसे नई उपाधि दे दी है। फौज को अब तक पाकिस्तान में और उसके बाहर भी ‘सरकार के भीतर सरकार’ कहा जाता था लेकिन मियां नवाज़ ने कहा है कि वह ‘सरकार के ऊपर सरकार’ है। यह सत्य है। पाकिस्तान में अयूब खान, याह्या खान, जिया-उल-हक और मुशर्रफ ने अपना फौजी शासन कई वर्षों तक चलाया ही लेकिन जब गैर-फौजी नेता लोग सत्तारुढ़ रहे, तब भी असली ताकत फौज के पास ही रहती चली आई है। अब तो यह माना जाता है कि इमरान खान को भी जबर्दस्ती जिताकर फौज ने ही पाकिस्तान पर लादा है। फौज ही के इशारे पर अदालतें जुल्फिकार अली भुट्टो, नवाज शरीफ और गिलानी जैसे नेताओं के पीछे पड़ती रही हैं। ये ही अदालतें क्या कभी पाकिस्तान के बड़े फौजियों पर हाथ डालने की हिम्मत करती हैं ? पाकिस्तान के सेनापति कमर जावेद बाजवा की अकूत संपत्तियों के ब्यौरे रोज़ उजागर हो रहे हैं लेकिन उन्हें कोई छू भी नहीं सकता। मियां नवाज ने कहा है कि विपक्ष की लड़ाई इमरान खान से नहीं है, बल्कि उस फौज से है, जिसने इमरान को गद्दी पर थोप रखा है।
यहां असली सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान के नेता लोग फौज से लड़ पाएंगे ? ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि फौज थोड़ी पीछे खिसक जाए। सामने दिखना बंद कर दे, जैसा कि 1971 के बाद हुआ था या जैसा कि कुछ हद तक आजकल चल रहा है लेकिन फौज का शिकंजा पाकिस्तानियों के मन और धन पर इतना मजबूत है कि उसे कमजोर करना इन नेताओं के बस में नहीं है। पाकिस्तान का चरित्र कुछ ऐसा ढल गया है कि फौजी वर्चस्व के बिना वह जिंदा भी नहीं रह सकता। यदि पंजाबी प्रभुत्ववाली फौज कमजोर हो जाए तो पख्तूनिस्तान और बलूचिस्तान टूटकर अलग हो जाएंगे। सिंध का भी कुछ भरोसा नहीं। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद पाकिस्तानी जनता के मन में भारत-भय इतना गहरा पैठ गया है कि उसका एकमात्र मरहम फौज ही है। फौज है तो कश्मीर है। फौज के बिना कश्मीर मुद्दा ही नहीं रह जाएगा। इसके अलावा फौज ने करोड़ों-अरबों रु. के आर्थिक व्यापारिक संस्थान खड़े कर रखे हैं। जब तक राष्ट्र के रुप में पाकिस्तान का मूल चरित्र नहीं बदलेगा, वहां फौज का वर्चस्व बना रहेगा।

जनाधार विहिन नेता बने कांग्रेस में पदाधिकारी
रमेश सर्राफ धमोरा
कांग्रेस पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं द्वारा पार्टी अध्यक्ष को पत्र लिखने की घटना के बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने सोनिया गांधी को अगले एक साल के लिए फिर से कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया है। उसके बाद उन्होंने कांग्रेस के संगठन में कई बदलाव किए हैं। जिनमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव कांग्रेस कार्यसमिति व कांग्रेस के महासचिव के पदों पर किया गया हैं। हालांकि असंतुष्ट गुट के 23 नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष से कांग्रेस कार्य समिति के प्रत्यक्ष चुनाव कराने की मांग की थी। लेकिन उनकी इस मांग को नजरअंदाज कर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों का नामांकन कर दिया।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कांग्रेस की सबसे शक्तिशाली कांग्रेस कार्य समिति में लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी, कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ महासचिव मोतीलाल वोरा, गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री लुईस फ्लेरियो व छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू को सदस्य से हटा दिया है। उनके स्थान पर तारीक अनवर, पी चिदंबरम, रणदीपसिंह सुरजेवाला व जितेंद्र सिंह को नए सदस्य के तौर पर कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल किया गया है। कांग्रेस अध्यक्ष को पत्र लिखने वाले 23 नेताओं में शामिल गुलाम नबी आजाद को पार्टी महासचिव पद से हटा दिया गया है। मगर उन्हें कार्यसमिति में बनाए रखा है। इसके अलावा आनंद शर्मा व मुकुल वासनिक को भी फिर से कार्यसमिति में रखा गया है। कांग्रेस संगठन के फेरबदल में गुलाम नबी आजाद, अंबिका सोनी, मोतीलाल वोरा, मलिकार्जुन खड़गे, लुईस फ्लेरियो को महासचिव पद से हटा दिया गया है। हालांकि इनमें से गुलाम नबी आजाद, अंबिका सोनी, मल्लिकार्जुन खड़गे को कांग्रेस कार्यसमिति में बनाए रखा गया है। इसी तरह अनुग्रह नारायण सिंह, श्रीमती आशा कुमारी, गौरव गोगोई व रामचंद्र खुंटिया को प्रदेश प्रभारी पद से हटाया गया है।
कांग्रेस संगठन में अभी मात्र 9 लोगों को महासचिव बनाया गया है जबकि पहले इनकी संख्या 11 थी। कांग्रेस महासचिवो में बिहार के तारिक अनवर, हरियाणा के रणदीप सिंह सुरजेवाला, राजस्थान के जितेंद्र सिंह, दिल्ली के अजय माकन, महाराष्ट्र के मुकुल वासनिक, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी, प्रियंका गांधी, केरल के केसी वेणुगोपाल के नाम शामिल है। कांग्रेस में किए गए हाल ही के फेरबदल में सबसे अधिक फायदे में तारीक अनवर, रणदीप सिंह सुरजेवाला, व जितेंद्र सिंह रहे। जिन्हें महासचिव बनाए जाने के कारण कांग्रेस कार्यसमिति की सदस्यता भी मिल गई। रणदीप सिंह सुरजेवाला तो अहमद पटेल की तरह कांग्रेस की सभी समितियों के सदस्य बनाए गए हैं। चर्चा है कि हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी भूपेंद्र सिंह हुड्डा द्वारा सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखने वाले 23 नेताओं में शामिल होने के कारण उनकी काट के रूप में हरियाणा के रणदीप सिंह सुरजेवाला को कांग्रेस संगठन में आगे बढ़ाया जा रहा है।
कांग्रेस संगठन में किए गए फेरबदल में लोकसभा चुनाव जीतने वाले 52 सांसदो में से सोनिया गांधी व राहुल गांधी के अलावा किसी को कहीं भी जगह नहीं दी गई है। सभी महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किए गए पदाधिकारियों में अधिकांश राज्यसभा के सदस्य या पूर्व में मंत्री रहे नेता हैं। कांग्रेस कार्यसमिति के अध्यक्ष सहित बाईस सदस्यों में सोनिया गांधी व राहुल गांधी ही लोकसभा सदस्य हैं। 9 लोग राज्यसभा के सदस्य हैं। जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, एके एंथोनी, अहमद पटेल, अंबिका सोनी, गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, केसी वेणुगोपाल, मलिकार्जुन खड़गे व पी चिदंबरम के नाम शामिल है। कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य एके एंथोनी, गुलाम नबी आजाद, हरीश रावत, ओमन चांडी पूर्व में मुख्यमंत्री रह चुके हैं तथा गई खंगम उप मुख्यमंत्री रह चुके हैं। कार्य समिति में सदस्य बने मलिकार्जुन खड़गे, हरीश रावत, अंबिका सोनी, अजय माकन, जितेंद्र सिंह, तारिक अनवर, रणदीप सुरजेवाला, रघुवीर मीणा पिछले चुनाव में पराजित हो चुके हैं।
कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर पर बनाए गए 9 महासचिव में एक भी लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य नहीं है। तारिक अनवर शरद पवार के साथ सोनिया गांधी का विरोध करते हुए कांग्रेसी छोड़ गए थे। लंबे समय के बाद पिछले वर्ष उनकी कांग्रेस में फिर से वापसी हुई थी। 2019 का लोकसभा चुनाव उन्होंने कांग्रेसी टिकट पर लड़ा था मगर हार गए। रणदीप सिंह सुरजेवाला हरियाणा में विधानसभा के लगातार दो बार चुनाव हार चुके हैं। एक बार तो उन्होंने विधायक रहते विधानसभा का उपचुनाव लड़ा और उसमें बुरी तरह हार गए थे। जितेंद्र सिंह राजस्थान में अलवर से लगातार दो बार लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं। अजय माकन नई दिल्ली सीट से लगातार दो बार लोकसभा चुनाव में करारी हार झेल चुके हैं।
मुकुल वासनिक 2014 में लोकसभा का चुनाव हार गए थे तथा 2019 में उन्होंने चुनाव ही नहीं लड़ा। हरीश रावत मुख्यमंत्री रहते उत्तराखंड के 2 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़कर दोनों ही जगह हार गए थे। ओमान चांडी के केरल में मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस की सरकार ही चली गई थी। प्रियंका गांधी ने अभी तक कोई चुनाव नहीं लड़ा है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस की प्रभारी महासचिव बनने के बाद उत्तर प्रदेश में लोकसभा व विधानसभा की सीटों में खासी कमी हुई है। केसी वेणुगोपाल ने इस बार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा था। केरल में उनकी सीट पर चुनाव लड़ने वाले कांग्रेसी प्रत्याशी को माकपा के हाथों हारना पड़ा था।
कांग्रेस संगठन में कुछ नए लोगों को प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। जिनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन कुमार बंसल, राजीव शुक्ला, जितिन प्रसाद, कर्नाटक के दिनेश गुंडू राव, मनीकम टैगोर, राष्ट्रीय सचिव देवेंद्र यादव, विवेक बंसल, मनीष चैहान, कुलदीप सिंह नागरा के नाम शामिल है। कांग्रेस पार्टी में संगठन चुनाव करवाने के लिए केंद्रीय चुनाव अथॉरिटी का गठन किया गया है। जिसका अध्यक्ष गांधी परिवार के वफादार मधुसूदन मिस्त्री को बनाया गया है। इसमें राजेश मिश्रा, कृष्णा बायरेगौड़ा, एस ज्योति मनी, अरविंदर सिंह लवली को सदस्य बनाया गया है। इस अभिकरण को बनाते समय कहा गया था कि भविष्य निकट भविष्य में जल्दी ही कांग्रेस संगठन के चुनाव करवाए जाएंगे।
कांग्रेस अध्यक्ष को मदद व सलाह देने के लिए 6 सदस्यों की एक विशेष कमेटी का भी गठन किया गया है। जिसमें एके एंटोनी, अहमद पटेल, अंबिका सोनी, केसी वेणुगोपाल, मुकुल वासनिक व रणदीप सिंह सुरजेवाला को शामिल किया गया है। यह कमेटी अगले अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय अधिवेशन तक काम करती रहेगी।
कहने को तो कांग्रेस के नेता कहते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष ने कांग्रेस संगठन में बड़ा बदलाव कर दिया। जिससे अब कांग्रेस संगठन आने वाले समय में अधिक सक्रिय व मजबूत होकर काम कर सकेगा। कांग्रेस अध्यक्ष ने पत्र लिखने वाले 23 से असंतुष्ट नेताओं की मांग को भी पूरा कर दिया है। मगर यहां देखने वाली बात यह है कि कांग्रेस में किया गया यह बदलाव कांग्रेस को संजीवनी देने में कितना सफल होगा।
संगठन के बदलाव में लोकसभा सदस्यों को बिल्कुल भी तरहीज नहीं दी गई है। वही प्रदेशों में बड़े जनाधार वाले नेताओं को भी संगठन से दूर रखा गया है। कांग्रेस संगठन में ऐसे लोगों को शामिल किया गया है जो लगातार चुनाव हार रहे हैं तथा जिनका जनता में जनाधार समाप्त हो गया है। संगठन में पदाधिकारी बनाए गए बहुत से नेताओं को तो चुनाव लड़े ही जमाना बीत गया है। उनमें से बहुत से लोग तो लम्बे समय से राज्यसभा के रास्ते संसद में आ रहे हैं।
कांग्रेस के लिए बेहतर होता यदि जनता पर पकड़ रखने वाले नेताओं को बड़े पदों पर आगे लाया जाता। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी को कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य से हटाकर स्थाई आमंत्रित सदस्य बनाया गया है जो उनकी पदावनति है। लोकसभा में सदन के नेता को कार्यसमिति में जगह न देना उनके पद की गरिमा को भी कम करता है। कांग्रेस पार्टी को चाहिए कि जनाधार वाले नेताओं को अग्रिम मोर्चे पर तैनात करें। ताकि वह अपनी संगठन क्षमता व जनाधार की बदौलत पार्टी को चुनावी राजनीति में जीत दिला सके।

भारत-विरोधी आतंक और जासूसी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
नौ आतंकियों और तीन जासूसों की गिरफ्तारी की खबर देश के लिए चिंताजनक है। आतंकी अल-कायदा और पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं और जासूस चीन से! जासूसी के आरोप में राजीव शर्मा नामक एक पत्रकार को भी गिरफ्तार किया गया है। जिन नौ आतंकियों को गिरफ्तार किया गया है, वे सब केरल के हैं। वे मलयाली मुसलमान हैं। इनमें से कुछ प. बंगाल से भी पकड़े गए हैं। इन दोनों राज्यों में गैर-भाजपाई सरकारें हैं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने इन लोगों को कुख्यात अल-कायदा और पाकिस्तान की जासूसी एजेंसी से संपर्क रखते हुए पकड़ा है। इन पर आरोप है कि इनके घरों से कई हथियार, विस्फोटक सामग्री, जिहादी पुस्तिकाएं और बम बनाने की विधियां और उपकरण पकड़े गए हैं। ये आतंकी दिल्ली, मुंबई और कोची में हमला बोलनेवाले थे। ये कश्मीर पहुंचकर पाकिस्तानी अल-कायदा द्वारा भेजे गए हथियार लेनेवाले थे। ये लोग केरल और बंगाल के भोले मुसलमानों को फुसलाकर उनसे पैसे भी उगा रहे थे। भारत में लोकतंत्र है और कानून का राज है, इसलिए इन लोगों पर मुकदमा चलेगा। ये लोग अपने आप को निर्दोष सिद्ध करने के लिए तथ्य और तर्क भी पेश करेंगे। उन्हें सजा तभी मिलेगी, जबकि वे दोषी पाए जाएंगे। लेकिन ये लोग यदि हिटलर के जर्मनी में या स्तालिन के सोवियत रुस में या माओ के चीन में या किम के उ. कोरिया में पकड़े जाते तो आप ही बताइए इनका हाल क्या होता ? इन्हें गोलियों से भून दिया जाता। अन्य संभावित आतंकियों की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ जाती। ये आतंकी यह क्यों नहीं समझते कि इनके इन घृणित कारनामों की वजह से इस्लाम और मुसलमानों की फिजूल बदनामी होती है।
जहां तक चीन के लिए जासूसी करने का सवाल है, यह मामला तो और भी भयंकर है। जहां तक आतंकियों का सवाल है, वे लोग या तो मज़हबी जुनून या जिहादी उन्माद में फंसे होते हैं। उनमें गहन भावुकता होती है लेकिन शीर्षासन की मुद्रा में। किन्तु जासूसी तो सिर्फ पैसे के लिए की जाती है। लालच के खातिर ये लोग देशद्रोह पर उतारु हो जाते हैं। पत्रकार राजीव शर्मा और उसके दो चीनी साथियों पर जो आरोप लगे हैं, वे यदि सत्य हैं तो उनकी सजा कठोरतम होनी चाहिए। राजीव पर पुलिस का आरोप है कि उसने एक चीनी औरत और एक नेपाली आदमी के जरिए चीन-सरकार को दोकलाम, गलवान घाटी तथा हमारी सैन्य तैयारी के बारे में कई गोपनीय और नाजुक जानकारियां भी दीं। इन तीनों के मोबाइल, लेपटाॅप और कागजात से ये तथ्य उजागर हुए। राजीव के बैंक खातों की जांच से पता चला है कि साल भर में उसे विभिन्न चीनी स्त्रोतों से लगभग 75 लाख रु. मिले हैं। भारत के विरुद्ध जहर उगलनेवाले अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ में राजीव ने लेख भी लिखे हैं। देखना यह है कि उन लेखों में उसने क्या लिखा है ? दिल्ली प्रेस क्लब के अध्यक्ष आनंद सहाय ने बयान दिया है कि राजीव शर्मा स्वतंत्र और अनुभवी पत्रकार है और उसकी गिरफ्तारी पुलिस का मनमाना कारनामा है। वैसे तो किसी पत्रकार पर उक्त तरह के आरोप यदि सत्य हैं तो यह पत्रकारिता का कलंक है और यदि यह असत्य है तो इसे सरकार और पुलिस का बेहद गैर-जिम्मेदाराना काम माना जाएगा। दिल्ली पुलिस को पहले भी पत्रकारों के दो—तीन मामलों में मुंह की खानी पड़ी है। उसे हर कदम फूंक-फूंककर रखना चाहिए।

आर्थिक दबाव में मोदी सरकार ने उठाया अभी तक का सबसे बड़ा जोखिम
सनत जैन
मोदी सरकार द्वारा खेती से जुड़े तीन बिल संसद में पेश किए गए। इन बिलों के पेश होने के बाद से ही कई राज्यों में किसान विरोध कर रहे हैं। ‎किसान सड़कों पर उतर कर सरकार को, इन बिलों के पास होने से किसानों के हितों में जो नुकसान होगा, उसको लेकर आंदोलनरत हैं। सरकार भी इस बात को अच्छी तरह से समझ रही है। जिस तरह की स्थिति अभी देश में बनी हुई है। उसमें कोरोना महामारी का संकट, बेरोजगारी, केंद्र एवं राज्य सरकारों की खराब आर्थिक ‎स्थिति इत्यादि के चलते मोदी सरकार ने जिस तरह से कृषि बिलों को पास कराया है, वह अभी तक का मोदी सरकार का सबसे बड़ा जोखिम माना जा रहा है।
अकाली दल ने कृषि बिलों का विरोध करते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल से अपना प्रतिनिधित्व हर ‎सिमरत कौर को हटा लिया। अकाली दल की मांग थी, बिल को स्टैंडिंग कमेटी के पास भेज दिया जाए। सरकार इसे पास कराने में जल्दबाजी नहीं करें। लेकिन सरकार ने अकाली दल की बात भी नहीं मानी। लोकसभा में बिल पास हो जाने के बाद राज्यसभा में जिस तरीके से ‎बिल भी पास हुए हैं, उसको लेकर भी सरकार के ऊपर दबाव बढ़ा है। भारत में किसानों की संख्या है। असंगठित क्षेत्र के करोड़ों कामगार कृषि से जुड़े हुए हैं। किसानों का विरोध सरकार पर बहुत भारी पड़ सकता है। इस बात को सरकार और संघ भी बहुत अच्छी तरीके से समझ रहा है। इसके बाद भी सरकार की आर्थिक स्थितियां और अंतरराष्ट्रीय दबाव सरकार को यह जोखिम उठाने को मजबूर ‎किया है।
सरकार हर साल समर्थन मूल्य घोषित करती है। उसके बाद भी समर्थन मूल्य पर किसानों की उपज सरकार नहीं खरीदती है। एक सीमित समय पर समर्थन मूल्य पर फसल की खरीदी होती है। कृषि उपज मंडी नए बिलों के लागू होने के बाद आवश्यक नहीं होंगी। किसानों को समर्थन मूल्य घोषित होने के बाद भी, वह समर्थन मूल्य मिलेगा या नहीं। इस बात की कोई गारंटी सरकार द्वारा जो बिल पास किए गए हैं, उनमें नहीं दी गई है। मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश इत्यादि राज्यों में समर्थन मूल्य से कम कीमत पर गेहूं मंडियों और खुले बाजार में बिक रहा है। गेहूं का समर्थन मूल्य सरकार ने 1925 रुपए प्रति क्विंटल घोषित किया हुआ है। लेकिन किसानों को 1400 से लेकर 1600 रुपए प्रति क्विंटल के दाम ही मिल पा रहे हैं। किसानों की नई फसल आने पर रेट बाजार में बहुत कम हो जाते है। समर्थन मूल्य पर एक निश्चित समय सीमा पर किसान समर्थन खरीदी केंद्रों में अपनी उपज लेकर नहीं पहुंच पाता है। अथवा सरकार ‎निश्चित सीमा के बाद नहीं खरीद पाती है। जिसके कारण किसानों को मंडियों में मजबूरन व्यापारियों द्वारा समर्थन मूल्य से कम कीमत में अपनी फसल बेचने मजबूर होना पड़ता है। किसानों की वर्तमान में यही सबसे बड़ी आशंका है
पिछले वर्षों में खाद, कीटनाशक दवाइयां, बीज, डीजल, बिजली और मजदूरी कई गुना बढ़ी है। उस अनुपात में किसानों की उपज का समर्थन मूल्य नहीं बढ़ाया गया है। खेती लगातार घाटे का सौदा बन रही है। किसान लगातार कर्जदार हो रहा है। पिछले वर्षों में हालत बद से बदतर हो गए हैं। हर साल हजारों ‎किसान कर्ज के बोझ से आत्महत्या कर रहे हैं। उनका कोई समाधान मोदी सरकार नहीं निकाल पाई। उल्टे कॉन्ट्रैक्ट खेती के माध्यम से छोटे-छोटे लघु सीमांत किसानों को बड़ी कंपनियों के हवाले करने की जो कोशिश हो रही है, उससे पूरे देश में ‎किसानों का आंदोलन बढ़ता चला जा रहा है। बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसानों को और उनकी जमीनों को अनुबंध के तहत लेकर उनकी उपज को मनमाने तरीके से खरीदेंगे। पिछले कई दशकों का अनुभव है कि कारपोरेट जगत की कंपनियां हर तरह से शोषण करने का कोई मौका नहीं छोड़ती हैं। उनकी शर्तें नियम कायदे कानून अंग्रेजी में और हिंदी में कई पन्नों में लिखे होते हैं। जिसको समझ पाना वकीलों के लिए भी संभव नहीं है। इतने छोटे-छोटे शब्दों में किंतु और परंतु के साथ किसानों के साथ जो अनुबंध होंगे, वह किसानों का भला नहीं बुरा ही करेंगे। सरकार ने बिल में किसानों को समर्थन मूल्य मिले, इसका कोई प्रावधान कानूनी रूप से नहीं किया है। किसानों की जमीन उनके पास सुरक्षित होगी, इसका भी कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। समर्थन मूल्य किस आधार पर सरकार तय करेगी, सरकार पिछले कई दशकों में नीति तैयार नहीं कर पाई। ऐसी स्थिति में किसानों की आशंका एवं विरोध करना जायज और स्वाभाविक है।
सरकार इसके बाद भी यदि कृषि बिल और रिफॉर्म बिल लाने के लिए इतना बड़ा जोखिम उठा रही है। तो इसका एक ही कारण माना जा रहा है कि देश इस समय आर्थिक संकट से फंसा हुआ है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां विश्व बैंक तथा अन्य बहुराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के दबाव में केन्द्र सरकार विदेशी कंपनियों के लिए भारतीय कृषि बाजार बहुराष्ट्रीय कंप‎नियों के ‎लिए खोलेने के लिए विवश है। रिलायंस समूह के माध्यम से बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां रिटेल के क्षेत्र में भारत में चोर दरवाजे से प्रवेश कर रही हैं। सरकार के पास इसके अलावा शायद अब कोई विकल्प बचा भी नहीं है। इसलिए सरकार इतना बड़ा जोखिम उठाने के लिए तैयार हो गई है। बेरोजगारी, महंगाई, कोरोना संक्रमण, दवाइयों की बढ़ती कीमतें, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली इत्यादि पर सरकार का वर्तमान में कोई नियंत्रण नहीं रहा। ऐसी स्थिति में सरकार ने किसानों को उद्वेलित कर एक बड़ा जोखिम उठाया है। बेरोजगारी, सं‎विदाकर्मी, सरकारी कर्मचा‎रियों का ‎विरोध और प्रदर्शन चल रहे थे। अब इसकी परिणति किस रूप में होगी, इसको सोचकर ही डर लगता है। इसके बाद भी यदि सरकार ने करोड़ों किसानों और उनसे जुड़े हुए करोड़ों असंग‎ठित कामगारों को संकट में डालने का काम किया है। तो यह सरकार की कोई बहुत बड़ी मजबूरी होगी, जो वह सार्वजनिक नहीं कर पा रही है।

भारत-चीनः सच्चाई क्या है ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
एक तरफ संसद में रक्षा मंत्री और गृहराज्य मंत्री के बयान और दूसरी तरफ चीनी विदेश मंत्रालय का बयान, इन सबको एक साथ रखकर आप पढ़ें तो आपको पल्ले ही नहीं पड़ेगा कि गलवान घाटी में हुआ क्या था ? भारत और चीन के फौजी आपस में भिड़े क्यों थे ? हमारे 20 जवानों का बलिदान क्यों हुआ है ? हमारे फौजी अफसर चीनी अफसरों से दस-दस घंटे क्या बात कर रहे हैं ? हमारे और चीन के विदेश और रक्षा मंत्री आपस में किन मुद्दों पर बात करते रहे हैं ? उनके बीच जिन पांच मुद्दों पर सहमति हुई है, वे वाकई कोई मुद्दे हैं या कोई टालू मिक्सचर है ?
गृहराज्य मंत्री नित्यानंद राय ने बुधवार को राज्यसभा में कह दिया कि पिछले छह माह में चीन ने भारतीय सीमा में कोई घुसपैठ नहीं की है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कथन पर दुबारा मुहर लगा दी कि चीन ने भारत की किसी चौकी पर कब्जा नहीं किया है और वह भारत की सीमा में बिल्कुल नहीं घुसा है। जब मैंने नरेंद्र भाई के राष्ट्रीय संबोधन में इस आशय की बात सुनी तो मुझे बहुत धक्का लगा और मैं सोचने लगा कि चीन के इस अचानक हमले ने उन्हें इतना विचलित कर दिया कि यह बात उनके मुंह से अनचाहे ही निकल गई लेकिन मुझे तब और भी आश्चर्य हुआ, जब वे लद्दाख जाकर टीवी चैनलों पर बोले और उन्होंने चीन का नाम तक नहीं लिया। अब भी संसद के दोनों सदनों में सिर्फ रक्षामंत्री बोले। प्रधानमंत्री क्यों नहीं बोले ? वे गैर-हाजिर ही रहे। उनका डर स्वाभाविक था कि चीन के नाम पर उनकी चुप्पी के कारण विपक्ष उन पर हमला बोलेगा। रक्षामंत्री राजनाथसिंह ने अपने मर्यादित लहजे में सारी कहानी कह दी। वह लहजा इतना संयत रहा कि उससे न तो चीन भड़क सकता था और न ही चीन के खिलाफ भारत की जनता! सच्चाई तो यह है कि गलवान घाटी में हमारे सैनिकों के बलिदान पर संसद का खून खौल जाना चाहिए था लेकिन हमारा विपक्ष कितना निस्तेज, निष्प्रभ और निकम्मा है कि उसकी बोलती ही बंद रही। इस संकट के वक्त वह सरकार का साथ दे, यह बहुत अच्छी बात है लेकिन वह सच्चाई का पता क्यों नहीं लगाए कि गलवान घाटी में गलती किसने की है ? हमारे जवानों के बलिदान के लिए जिम्मेदार कौन है ? उधर चीनी विदेश मंत्रालय ने भारत सरकार के सभी तेवरों और दावों पर पानी फेर दिया है। उसका कहना है कि चीन ने कहीं कोई घुसपैठ नहीं की है। गलवान घाटी में जो मुठभेड़ हुई है, वह चीन की जमीन पर हुई है। भारत ने 1993 और 1996 में हुए सीमा पर शांति संबंधी जो समझौते हुए थे, उनका उल्लंघन किया है। भारत ही घुसपैठिया है। भारत पीछे हटे, यह जरुरी है। राहुल गांधी ने पूछा है कि मोदी किसके साथ है ? भारतीय सेना के साथ है या चीन के साथ ? सरकार के इस अटपटे रवैए पर राहुल का यह सवाल थोड़ा फूहड़ है लेकिन सटीक है लेकिन राहुल का वज़न इतना हल्का हो चुका है कि ऐसी बात भी हवा में उड़ जाती है।

टीके की जगी उम्मीद
सिद्धार्थ शंकर
एस्ट्राजेनेका के ट्रायल में साइड इफेक्ट कोविड-19 दवा के कारण नहीं हुआ था। इस बात का खुलासा ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने अपनी रिपोर्ट में किया है। साइड इफेक्ट के कारण इस दवा का परीक्षण कुछ दिन के लिए रोक दिया गया था। बताया गया कि ट्रायल में एक शख्स को दवा देने के बाद उसे रीढ़ संबंधी बीमारी शुरू हो गई थी, जिसे ट्रांसवर्स माइलिटिस कहा जाता है। लेकिन अब दस्तावेजों से पता चला है कि ये बीमारी शायद ही कोविड 19 वैक्सीन देने से हुई हो। इस बारे में तथ्य नहीं मिले हैं कि ट्रायल के दौरान दवा देने से प्रतिभागी को दिक्कत हुई। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की इस दवा का परीक्षण अब ब्रिटेन, ब्राजील, भारत और दक्षिण अफ्रीका में दोबारा शुरू हो गया है, हालांकि अमेरिका में अभी शुरू नहीं हुआ है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने भरोसा दिलाया है कि अगले साल की पहली तिमाही तक टीका आ जाएगा। भारत में जिस तेजी के साथ टीकों के परीक्षण चल रहे हैं, वे इस बात का संकेत हैं कि भारत जल्द ही इस दिशा में बड़ी कामयाबी हासिल करने के करीब है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के सहयोग से भारत बायोटेक इंटरनेशनल ने जो स्वदेशी टीका-कोवैक्सीन विकसित किया है, उसके दूसरे चरण का परीक्षण शुरू हो चुका है। अच्छा संकेत यह है कि अभी तक इसका कोई दुष्प्रभाव सामने नहीं आया है। इसलिए यह टीका भी इस साल के अंत या अगले साल के शुरू में उपलब्ध हो सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि कोरोना जैसी महामारी का टीका खोजना कोई आसान काम नहीं है। अमेरिका, चीन जैसे कई बड़े देश इस काम में जुटे हैं। रूस ने टीका बना लेने और परीक्षण के हर स्तर पर खरा उतरने का दावा किया है। अगले साल तक दुनिया के कई देशों के टीके बाजार में आने की संभावना है। टीका तैयार करने की प्रक्रिया की जटिल होती है और इसे कई तरह के परीक्षणों से गुजारना होता है। इसमें वक्त और पैसा दोनों ही काफी खर्च होते हैं। ऐसे में इस काम को सीमा में नहीं बांधा जा सकता, वरना टीके की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। टीका चाहे जो भी बनाए, उसकी सफलता का मापदंड तो यही होगा कि वह अधिकतम कोरोना संक्रमितों को ठीक करे। अभी जिन टीकों पर काम चल रहा है, वे कितने सुरक्षित और कारगर होंगे, इसका अभी कोई सटीक अनुमान लगा पाना मुश्किल है। इसकी एक वजह यह भी है कि कोरोनाविषाणु को लेकर जो नई-नई जानकारियां मिल रही हैं और जिस तेजी से यह विषाणु नए-नए रूपों में परिवर्तित हो रहा है और इसके जो नए-नए लक्षण सामने आ रहे हैं, वह भी वैज्ञानिकों के लिए कम बड़ी चुनौती नहीं है। भारत जैसे एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाले देश में सभी को एक साथ टीका उपलब्ध करा पाना संभव नहीं है। जाहिर है, इसके लिए प्राथमिकता तय करनी होगी और उसी के अनुरूप कदम उठाने होंगे। आबादी का बड़ा हिस्सा तो टीका खरीद पाने में सक्षम भी नहीं है। इसलिए सरकार ने तय किया है कि टीका सबसे पहले उन्हें दिया जाएगा, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होगी, भले वे इसे खरीद पाने में सक्षम न भी हों। बड़ी संख्या में स्वास्थयकर्मियों सहित ऐसे लोग हैं जो कोरोना से लोगों को बचाने के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं। इसके अलावा बुजुर्गों और कम प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को भी बचाना है। अक्सर यह देखने में आता है कि सब कुछ होते हुए भी हम कई बार कुप्रबंधन और लापरवाही के शिकार हो जाते हैं और इससे जनहित के अभियानों को धक्का लगता है। कोरोना टीका आए और देश के हर नागरिक तक पहुंचे, इसके लिए सरकार को अभी से कारगर रणनीति पर काम शुरू कर देना चाहिए।

विश्व के सबसे अधिक जनसमर्थन वाले प्रधानमंत्री : नरेन्द्र मोदी
प्रभात झा
विश्व के सबसे अधिक जनसमर्थन वाले प्रधानमंत्री, महात्मा गांधी और सरदार पटेल की भूमि गुजरात के लाल, नरेंद्र मोदी के दर्शन और कर्तव्यपरायणता महात्मा गांधी के निकट है। गांधीजी द्वारा प्रतिपादित मानवता, समानता और समावेशी विकास के सिद्धांतों पर चलकर उन्होंने भारत के अबतक के सबसे जनप्रिय प्रधानमंत्री होने का गौरव प्राप्त किया है। जन सेवा और राष्ट्र धर्म का उन्होंने अनुपालन कर जो आदर्श स्थापित किया है, एक सुनहरे भारत का निर्माण तो करेगा ही विश्व के लिए कल्याणकारी होगा। नव भारत और आत्मनिर्भर भारत के सपनों को लेकर एक श्रेष्ठ और समर्थ भारत के निर्माण को संकल्पित व समर्पित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज 70 वर्ष के हो गए। 17 सितम्बर 1950 को दामोदरदास मोदी और हीराबा के घर जन्मे नरेंद्र मोदी का बचपन राष्ट्र सेवा की एक ऐसी विनम्र शुरुआत है, जो यात्रा अध्ययन और आध्यात्मिकता के जीवंत केंद्र गुजरात के मेहसाणा जिले के वड़नगर की गलियों से शुरू होती है। 17 वर्ष की आयु में सामान्यतः बच्चे अपने भविष्य के बारे में सोचते हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी के लिए यह अवस्था पूर्णत: अलग थी। उस आयु में उन्होंने एक असाधारण निर्णय लिया। उन्होंने घर छोड़ने और देश भर में भ्रमण करने का निर्णय कर लिया। स्वामी विवेकानंद की भांति उन्होंने भारत के विशाल भू-भाग में यात्राएं कीं और देश के विभिन्न भागों की विभिन्न संस्कृतियों को अनुभव किया। यह उनके लिए आध्यात्मिक जागृति का समय था और देश के जन-जन की समस्यायों से अवगत होने का भी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक होते हुए उन्हें संगठन कौशल और जन सेवा तथा राष्ट्र धर्म के महत्व को समझने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। 12 वर्षों में गुजरात में हुए अभूतपूर्व एवं समग्र विकास के आधार पर न केवल भारतीय जनता पार्टी, यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और नीतिगत पंगुता से त्रस्त पूरे देश ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के एकमात्र विकल्प के रूप में स्वीकार्यता दिलाई। 26 मई 2014 को उनके नेतृत्व में पहली बार किसी गैर-कांग्रेसी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत मिला और वे देश के 15वें प्रधानमंत्री बने। ‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘एक भारत श्रेष्ठ’ के मूलमंत्र से उन्होंने देश का जो अभूतपूर्व सर्वांगीण विकास किया, इससे उन्होंने जन-जन के ह्रदय में अपनी जगह बनाई। जनता-जनार्दन के आशीर्वाद से 2019 के आम चुनाव में उन्हें ऐतिहासिक समर्थन मिला और 30 मई 2019 को दूसरी बार भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री हैं जिनका जन्म आजादी के बाद हुआ है। ऊर्जावान, समर्पित एवं दृढ़ निश्चयी नरेन्द्र मोदी प्रत्येक भारतीय की आकांक्षाओं और आशाओं के द्योतक हैं। नव भारत के निर्माण की नींव रखने वाले नरेन्द्र मोदी करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों का चेहरा हैं। 26 मई 2014 से, जबसे उन्होंने प्रधानमंत्री का पद संभाला है, देश को विकास उस शिखर पर ले जाने के लिए अग्रसर हैं, जहां हर देशवासी अपनी आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा कर सके। पंडित दीन दयाल उपाध्याय के दर्शन से प्रेरणा लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के अंतिम पायदान पर खड़े एक-एक व्यक्ति के पूर्ण विकास को 24/7 समर्पित हैं। आज 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 70 वर्ष के हो गए।
एक प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की अंतर्दृष्टि, संवेदना, कर्मठता, राष्ट्रदर्शन व सामाजिक सरोकार स्वतंत्र भारत के अबतक के इतिहास में अद्वितीय है। उनकी विचारशैली और उनकी कर्तव्यपरायणता अतुलनीय है। वे केवल जनप्रिय नहीं है, वे जन-जन के प्रिय हैं। उनका चिंतन राष्ट्र चिंतन है बन गया। मई 2014 से लेकर आज सितंबर 2020 के छह साल साढ़े तीन महीने के अपने रिकॉर्ड प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में उन्होंने जन सेवा और राष्ट्र धर्म के जो आदर्श स्थापित किये हैं, भारतीय राष्ट्र के बेहतर भविष्य के लिए अनुकरणीय है। 14 अप्रैल को उन्होंने कोरोना वायरस को लेकर राष्ट्र को संबोधित करते हुए यजुर्वेद के एक श्लोक का उल्लेख किया था -‘वयं राष्ट्रे जागृत्य’, अर्थात हम सभी अपने राष्ट्र को शाश्वत और जागृत रखेंगे। आज यह पूरे राष्ट्र का,जन-जीवन का संकल्प बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिक और राष्ट्र के प्रति सेवा धर्म का जो कर्तव्यपथ तैयार किया है, सम्पूर्ण भारत का उनको साथ है। लेकिन यह राह कम चुनौतयों से भरा नहीं रहा है। व्यक्तिगत जीवन हो या राजनीतिक जीवन, पूर्व के सभी प्रधानमंत्रियों की तुलना में इनका जीवन अधिक कठिनाईयों भरा रहा है। लेकिन नरेंद्र मोदी हर परीक्षा में शत-प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण होते रहे हैं। आज कोरोना महामारी में अपेक्षाकृत कम चिकित्सा सुविधा होने के बावजूद नरेंद्र के नेतृत्व में भारत विश्व में कहीं बेहतर ढंग से इस महामारी से लड़ रहा है। कोरोना महामारी से लड़ने के लिए जब पीएम केयर्स फंड की स्थापना की गई थी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरुआती फंड के तहत 2.25 लाख रुपये का योगदान दिया। पीएम केयर्स फंड में जमा राशि से भारत आज प्रभावी रूप से विश्व में सबसे बेहतर तरीके से कोरोना से लड़ाई लड़ रहा है। पीएम केयर्स फंड का उपयोग कोरोना से और भविष्य में इस प्रकार की गंभीर चुनौतियों का शीघ्रता और तत्परता से निपटने के लिए चिकित्सीय ढांचागत सुविधाओं का निर्माण किया जा रहा है। भारत का यह सशक्त होता सामर्थ्य, नरेंद्र मोदी की जन और राष्ट्र सेवा के प्रति समर्पण तथा उनके नेतृत्व में जन आस्था का परिणाम है।
प्रधानमंत्री के रूप में विश्व में त्याग और मानवता के अनुपम उदाहरण हैं नरेंद्र मोदी। मानवता और राष्ट्र की सेवा में अबतक 103 करोड़ रुपये अपने व्यक्तिगत फंड से दान कर चुके हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान मिले सभी उपहारों की नीलामी कर मिले 89.96 करोड़ रुपये को कन्या केलवनी फंड, 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभालने से पहले अपने निजी बचत के 21 लाख रूपये गुजरात सरकार के कर्मचारियों की बेटियों की पढ़ाई के लिए, 2015 में मिले उपहारों की नीलामी से जुटाए गए 8.35 करोड़ रुपये नमामि गंगे मिशन को , 2019 में कुंभ मेले में निजी बचत से 21 लाख रुपये स्वच्छता कर्मचारियों के कल्याण के लिए बनाए गए फंड को, 2019 में ही साउथ कोरिया में सियोल पीस प्राइज़ में मिली 1.3 करोड़ की राशि को स्वच्छ गंगा मिशन को, हाल ही में अपने कार्यकाल के दौरान उनको मिली स्मृति चिन्हों की नीलामी में 3.40 करोड़ रुपये एकत्र किए गए राशि को भी नमामि गंगे मिशन को उन्होंने दिए। वहीं पीएम केयर्स फंड के लिए 2.25 लाख रुपये दिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा ‘ की भावना से समाज और सेवा कर रहे हैं।
5 अगस्त को भारतीय जन आस्था के केंद्र और राष्ट्र की सांस्कृतिक नगरी अयोध्या में भगवान् श्री राम के मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन के अवसर पर पधारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा ‘राम काज किन्हें बिनु, मोहि कहां विश्राम’। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम का संदेश, हमारी हजारों सालों की परंपरा का संदेश, कैसे पूरे विश्व तक निरंतर पहुंचे, कैसे हमारे ज्ञान, हमारी जीवन-दृष्टि से विश्व परिचित हो, ये हम सबकी, हमारी वर्तमान और भावी पीढ़ियों की जिम्मेदारी है। उन्होंने विश्वास जताया कि श्रीराम के नाम की तरह ही अयोध्या में बनने वाला ये भव्य राममंदिर भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत का द्योतक होगा, और वहां निर्मित होने वाला राममंदिर अनंतकाल तक पूरी मानवता को प्रेरणा देगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वतंत्र भारत के सबसे परिवर्तनकारी नेतृत्व हैं। उनके नेतृत्व में, भारत ने सबसे बड़ा सत्ता परिवर्तन देखा, जिसमें भारतीय जनता पार्टी का उदय सत्ताधारी दल के रूप में एक नई राजनीतिक सोच तथा शैली के रूप में हुआ, जिसने कांग्रेस की छह दशकों की श्रेष्ठता को अप्रासंगिक बना दिया। नरेंद्र मोदी के परिवर्तनकारी एवं प्रभावी नेतृत्व में आधुनिक, डिजिटल, भ्रष्टाचार-मुक्त, जवाबदेह और विश्वसनीय सरकार का आविर्भाव हुआ है तथा जनता को भी अभूतपूर्व रूप से भागीदार बना दिया है। जहां अप्रासंगिक पुरातन प्रणालियों और नियमों को समाप्त कर दिया गया है, वहीं सैकड़ों योजनाओं और अभियानों के माध्यम से एक नए भारत का निर्माण हो रहा है। ‘सबके साथ’ और ‘सबके विश्वास’ से ‘सबका विकास’ हो रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न केवल राजनीतिक कार्यकर्ता हैं, बल्कि एक कविहृदय साहित्यकार भी हैं। अपने व्यस्त दिनचर्या के बावजूद उन्होंने दर्जनभर पुस्तकें लिखी हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने गुजराती भाषा में 67 कविताएं लिखी थीं। उनकी इन कविताओं के माध्यम से उनके दर्शन,उनके विचार और उनकी दृष्टि का सहजता के साथ अंदाजा लगाया जा सकता है। उनका हिन्दी में एक कविता संग्रह है ‘साक्षी भाव’ जिसमें जगतजननी मां से संवाद रूप में व्यक्त उनके मनोभावों का संकलन है, जिसमें उनकी अंतर्दृष्टि, संवेदना, कर्मठता, राष्ट्रदर्शन व सामाजिक सरोकार के स्पष्ट दर्शन होते हैं। उनकी श्रेष्ठतम रचनाओं में शामिल है ‘पुष्पांजलि ज्योतिपुंज’ जिसमें उन्होंने लिखा है कि संसार में उन्हीं मनुष्यों का जन्म धन्य है, जो परोपकार और सेवा के लिए अपने जीवन का कुछ भाग अथवा संपूर्ण जीवन समर्पित कर पाते हैं। इस पुस्तक में उन्होंने व्यक्ति के जन्म से लेकर उसकी समाज के प्रति दायित्व का बोध कराया है, तथा राष्ट्र सर्वोपरि को जीवन का मूलमंत्र माननेवाले ऐसे ही तपस्वी मनीषियों का पुण्य-स्मरण भी किया है। ‘सोशल हॉर्मोनी’ नामक पुस्तक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समाज और सामाजिक समरसता के प्रति भावनाओं के प्रबल प्रवाह को शब्दों के माध्यम से व्यक्त किया है। इस पुस्तक में उनकी समाज के प्रति अद्वितीय दृष्टि और दृष्टिकोण की स्पष्टता है। जहां वे ‘एग्जाम वॉरियर्स’ नामक अपने पुस्तक में अपने बचपन के कई उदाहरणों के माध्यम से बच्चों को परीक्षा के तनाव से निकलने की युक्ति बताते हैं, वहीं ‘कनवीनिएंट एक्शन’ में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और समाज को सचेत करते हैं और साथ ही इससे निपटने के लिए वैश्विक अभियान में शामिल होने की प्रेरणा भी देते हैं। अद्भुत हैं हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की के नेतृत्व में राजनीति और सत्ता से परे जो मानव दृष्टि है, वैश्विक दृष्टि है, उनकी विश्व नेतृत्व की क्षमता का दर्शन कराता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक दर्शन का मूलमंत्र अंत्योदय है। प्रत्येक निर्णय के केंद्र में वंचित, गरीब, मजदूर, किसान हैं। जन-जन की चिंता है। ‘अन्नदाता सुखी भवः’ की सर्वोच्च प्राथमिकता है। भ्रष्टाचार मुक्त, पारदर्शी, नीति आधारित प्रशासन की संकल्पना है। शीघ्र निर्णय का मूल सिद्धांत है। प्रत्येक परिवार को पक्का घर मिले। चौबीस घंटे बिजली मिले। स्वच्छ पीने का पानी मिले। गांव-गांव सड़क, इंटरनेट हो। सबका पोषण, सबको उत्तम स्वास्थ्य मिले। सबको शिक्षा मिले। सबको रोजगार मिले। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के योग्य और निर्णायक नेतृत्व में कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कच्छ से किबिथू तक ‘एक राष्ट्र, एक कर’, ‘एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड’ और ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का सपना साकार हो रहा है। मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, फिट इंडिया, स्वच्छ इंडिया, टीम इंडिया के सामूहिक प्रयत्नों से न्यू इंडिया का निर्माण हो रहा है। जन सेवा के साथ-साथ ‘राष्ट्ररक्षासमं पुण्यं, राष्ट्ररक्षासमं व्रतम्, राष्ट्ररक्षासमं यज्ञो, दृष्टो नैव च नैव च’ का संकल्प है। लेकिन उनके लिए मानवता और विश्व बंधुत्व का स्थान सर्वोपरि है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व मानवता के कल्याण के लिए है, भारतीय राष्ट्र के कल्याण के लिए है, विश्व के कल्याण के लिए है। नरेंद्र मोदी आप और अधिक यशस्वी बनें, दीर्घाऊ हों, शताऊ हों !
(भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं पूर्व सांसद )

राजनाथ का चीन पर संयत रवैया
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
रक्षा मंत्री राजनाथसिंह ने लोकसभा में आज एक ऐसे विषय पर भाषण दिया, जो 1962 के बाद का सबसे गंभीर मुद्दा था। गलवान घाटी में हुई हमारे जवानों की शहादत से पूरा देश गरमाया हुआ है। करोड़ों लोग बड़ी उत्सुकता से जानना चाहते थे कि गलवान घाटी में चीन के साथ मुठभेड़ क्यों हुई ? जब प्रधानमंत्री ने यह कहा था कि चीनियों ने हमारी जमीन पर कोई कब्जा नहीं किया और वे हमारी सीमा में घुसे नहीं तो रक्षा मंत्री को यह बताना चाहिए था कि उस मुठभेड़ का असली कारण क्या था ? आश्चर्य की बात है कि जिस मुद्दे पर सारे देश का ध्यान टिका हुआ है, उसकी चर्चा के वक्त सदन में प्रधानमंत्री मौजूद नहीं थे। रक्षा मंत्री ने वे सब बातें दोहराईं, जो प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री और वे स्वयं कहते रहे हैं। उन्होंने भारतीय फौज की वीरता और बलिदान को बहुत प्रभावशाली और भावुक ढंग से रेखांकित किया। उनके भाषण का सार यही है कि दोनों देश सीमा-विवाद को शांति से निपटाना चाहते हैं। दोनों युद्ध नहीं चाहते। रक्षा मंत्री ने अपने भाषण में जरा भी आक्रामक-मुद्रा अख्तियार नहीं की। उन्होंने बहुत ही संयत शब्दों में बताया कि दोनों पक्षों ने माना कि 3500 किमी की भारत-चीन के बीच जो वास्तविक नियंत्रण रेखा है, वह कितनी अनिश्चित है, अनिर्धारित है और कितनी अस्पष्ट है। वे यह भी बता देते तो ठीक रहता कि साल में कई सौ बार उनके और हमारे सैनिक और नागरिक उस रेखा का अनजाने ही उल्लंघन करते रहते हैं। रक्षा मंत्री ने यह भी बताया कि दोनों पक्ष सीमा पर यथास्थिति बनाए रखने पर राजी हो गए हैं। साथ ही उन्होंने माना है कि जो भी आपस में बैठकर तय किया जाएगा, उसका पालन दोनों पक्ष अवश्य करेंगे। मुझे खुशी होती अगर राजनाथजी इशारे में भी यह कहते कि उस नियंत्रण-रेखा को, जो झगड़े की रेखा है, उसे वास्तविक बनाने पर भी दोनों देश विचार कर रहे हैं ताकि हमेशा के लिए इस तरह के विवादों का खात्मा हो जाए। ऐसा स्थायी इंतजाम करते वक्त बहुत-कुछ ले-दे तो करना ही पड़ती है। रक्षा मंत्री ने अपने बहादुर फौजी जवानों का जबर्दस्त उत्साहवर्द्धन किया लेकिन अपने आत्मीय मित्र राजनाथजी से पूछता हूं कि उनका ‘हिंगलिश’ भाषा में दिया गया भाषण कितने जवानों को समझ में आया होगा। किसी अधपढ़ अफसर का लिखा हुआ भाषण लोकसभा में पढ़ने की बजाय वे अपनी धाराप्रवाह, सरल और सुसंयत शैली में हिंदी-भाषण देते तो उसका प्रभाव कई गुना ज्यादा होता। हिंदी-दिवस के दूसरे दिन उनके इस ‘हिंगलिश-भाषण’ ने उनके प्रशंसकों को आश्चर्यचकित कर दिया। भारत-चीन को मिलाते-मिलाते उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी का घाल-मेल कर दिया।

हिंदी दिवस या अंग्रेजी हटाओ दिवस ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत सरकार को हिंदी दिवस मनाते-मनाते 70 साल हो गए लेकिन कोई हमें बताए कि सरकारी काम-काज या जन-जीवन में हिंदी क्या एक कदम भी आगे बढ़ी? इसका मूल कारण यह है कि हमारे नेता नौकरशाहों के नौकर हैं। वे दावा करते हैं कि वे जनता के नौकर हैं। चुनावों के दौरान जनता के आगे वे नौकरों से भी ज्यादा दुम हिलाते हैं लेकिन वे ज्यों ही चुनाव जीतकर कुर्सी में बैठते हैं, नौकरशाहों की नौकरी बजाने लगते हैं। भारत के नौकरशाह हमारे स्थायी शासक हैं। उनकी भाषा अंग्रेजी है। देश के कानून अंग्रेजी में बनते हैं, अदालतें अपने फैसले अंग्रेजी में देती हैं, ऊंची पढ़ाई और शोध अंग्रेजी में होते हैं, अंग्रेजी के बिना आपको कोई ऊंची नौकरी नहीं मिल सकती। क्या हम हमारे नेताओं और सरकार से आशा करें कि हिंदी-दिवस पर उन्हें कुछ शर्म आएगी और अंग्रेजी के सार्वजनिक प्रयोग पर वे प्रतिबंध लगाएंगे? यह सराहनीय है कि नई शिक्षा नीति में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषाओं के माध्यम को लागू किया जाएगा लेकिन उच्चतम स्तरों से जब तक अंग्रेजी को विदा नहीं किया जाएगा, हिंदी की हैसियत नौकरानी की ही बनी रहेगी।
हिंदी-दिवस को सार्थक बनाने के लिए अंग्रेजी के सार्वजनिक प्रयोग पर प्रतिबंध की जरुरत क्यों है? इसलिए नहीं कि हमें अंग्रेजी से नफरत है। कोई मूर्ख ही होगा जो किसी विदेशी भाषा या अंग्रेजी से नफरत करेगा। कोई स्वेच्छा से जितनी भी विदेशी भाषाएं पढ़ें, उतना ही अच्छा! मैंने अंग्रेजी के अलावा रुसी, जर्मन और फारसी पढ़ी लेकिन अपना अंतरराष्ट्रीय राजनीति का पीएच.डी. का शोधग्रंथ हिंदी में लिखा। 55 साल पहले देश में हंगामा हो गया। संसद ठप्प हो गई, क्योंकि दिमागी गुलामी का माहौल फैला हुआ था। आज भी वही हाल है। इस हाल को बदलें कैसे?
हिंदी-दिवस को सारा देश अंग्रेजी-हटाओ दिवस के तौर पर मनाए! अंग्रेजी मिटाओ नहीं, सिर्फ हटाओ! अंग्रेजी की अनिवार्यता हर जगह से हटाएं। उन सब स्कूलों, कालेजों और विश्वविद्यालयों की मान्यता खत्म की जाए, जो अंग्रेजी माध्यम से कोई भी विषय पढ़ाते हैं। संसद और विधानसभाओं में जो भी अंग्रेजी बोले, उसे कम से कम छह माह के लिए मुअत्तिल किया जाए। यह मैं नहीं कह रहा हूं। यह महात्मा गांधी ने कहा था।
सारे कानून हिंदी और लोकभाषाओं में बनें और अदालती बहस और फैसले भी उन्हीं भाषाओं में हों। अंग्रेजी के टीवी चैनल और दैनिक अखबारों पर प्रतिबंध हो। विदेशियों के लिए केवल एक चैनल और एक अखबार विदेशी भाषा में हो सकता है। किसी भी नौकरी के लिए अंग्रेजी अनिवार्य न हो। हर विश्वविद्यालय में दुनिया की प्रमुख विदेशी भाषाओं को सिखाने का प्रबंध हो ताकि हमारे लोग कूटनीति, विदेश व्यापार और शोध के मामले में पारंगत हों। देश का हर नागरिक प्रतिज्ञा करे कि वह अपने हस्ताक्षर स्वभाषा या हिंदी में करेगा तथा एक अन्य भारतीय भाषा जरुर सीखेगा। हम अपना रोजमर्रा का काम—काज हिंदी या स्वभाषाओं में करें। भारत में जब तक अंग्रेजी का बोलबाला रहेगा याने अंग्रेजी महारानी बनी रहेगी तब तक आपकी हिंदी नौकरानी ही बनी रहेगी।
(लेखक, भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष हैं)

कितने किस्म के हिन्दू !
के. विक्रम राव
पितृपक्ष चल रहा है। सत्रह सितम्बर (बृहस्पतिवार) को श्राद्ध का अंतिम दिन रहेगा। गंगाजमुनी हिन्दू इस प्रथा का उपहास करते हैं। छद्म आस्थावान छिपे-सहमे रीति से परिपाटी निभाएंगे। कई श्रद्धालु एक दफा जीवन में गया-तीर्थ जाने के बाद निबट जाते हैं। किन्तु बहुतायत में अन्य जन सारी रस्में मन से निभाते हैं। इसी आखिरी समूह का तरीका मुझे बहुत भाता है।
पुरखों का आदर मरणोपरांत भी करना यह दर्शाता है कि नयी पीढ़ी कृतघ्न नहीं है। ऐसे मृत्यु के पश्चात वाले आचरण हमें सूर्योपासक पारसियों, ख्रिस्तीजन, जैन तथा बौद्धों से सीखना चाहिए। वे अपने सभी निर्देशित रस्मों का विधि-विधान के अनुसार निर्वहन करते हैं।
अर्थात पुण्यकर्म से लाज, हिचक क्यों?
यहाँ चौथे मुग़ल बादशाह शाहाबुद्दीन मुहम्मद शाहजहाँ (खुर्रम) की उक्ति का जिक्र कर दूं। श्राद्ध पद्धति का उल्लेख अतीव व्यथा से शाहजहाँ ने किया था। अपने बेटे औरंगजेब आलमगीर से बादशाह ने कहा, “हिन्दुओं से सीखो। वे अपने मरे हुए वालिद (पिता) को भी तर्पण में पानी पिलाते हैं और तुम हो कि अपने जीवित पिता को टूटे घड़े में आधा भरकर ही पानी देते हो, प्यासा रखते हो !” बाप से बेटे ने गद्दी हथियाते ही आगरा के किले में बादशाह को कैद कर रखा था।
मसलन पारंपरिक रिश्ते निभाने में हिन्दू को शहंशाह ने बहुत बेहतर बताया था।
आर्यसमाजी भी हिन्दुओं में होते हैं जो मूर्ति-भंजक (इस्लामिस्टों की भांति बुतशिकन) हैं। वे श्राद्ध का बहिष्कार करते हैं। हालाँकि वे वेदोक्त रीतियों को तो मानते हैं। मगर यह नही स्वीकारते कि अथर्ववेद (18-2-49) में उल्लिखित है कि पूर्वजों का स्मरण करना चाहिए : “येनः पितु: पितरो ये पितामहा तेभ्यः पितृभ्यो नमसा विधेम।”
हिन्दू संप्रदाय के समाजशास्त्रीय प्रबंधन हेतु यह प्रथाएं रची गई थीं। किन्तु नौ सदियों तक के इस्लामी राज में नगरीय क्षेत्रों से ये परम्पराएँ लुप्तप्राय हो गयी हैं। आंचलिक क्षेत्रों में दिखती हैं।
पिण्डदान के विषय में कई भारतीयों के भ्रम को दूर करने हेतु मैं लन्दन के एक महान वैज्ञानिक का अनुभव बता दूं। चूँकि वह गोरा अंग्रेज था तो हम गेहुंए भारतीय, युगों से दासता से ग्रसित रहे, तो शायद विचार करलें और मान भी लें कि आत्माएं होती हैं और विचरण करती रहती हैं। उनसे संवाद संभव है। आत्मिक सुधार हेतु सहायता भी ।
इसी सन्दर्भ में लखनऊ विश्वविद्यालय में साइकोलॉजी विभाग के हमारे एक साथी ने कभी (1959) एक लेख का उल्लेख किया जिसे ब्रिटेन के महान भौतिक शास्त्री लार्ड जॉन विलियम्स स्ट्रट रेले ने लिखा था। जॉन विलियम्स को 1904 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला था। वे बड़े धर्मनिष्ठ थे और पराविज्ञान में निष्णात थे। प्लैंशेट पर वे बहुधा अपने दिवंगत इकलौते पुत्र से संवाद करते थे।
एक बार पुत्र ने उन्हें बताया कि वह एक अत्यंत ज्वलनशील स्थान पर है। मगर भारतीय आत्माएं यहाँ से शीघ्र मुक्ति पा लेती थीं क्योंकि उनके भूलोकवासी रिश्तेदार आटे से गेंदनुमा ग्रास बनाकर कोई रस्म अदा करते थे। अर्थात पिंडदान ही रहा होगा।
अतः अब श्राद्ध प्रथा में यकीन करना होगा।

राजनीतिक स्वार्थसिद्धि के लिए हिन्दी की हील -हुज्जत उचित नहीं
मुकेश तिवारी
अपने प्रांत की भाषा अथवा मातृभाषा का प्रचार प्रसार करना अच्छा है मगर दूसरी भाषा का विरोध करना किसी भी दृष्टि से उचित नही ।दरअसल में राजनीतिक स्वार्थसि,िद्व के लिए ही हिन्दी का खुलकर विरोध किया जाता है। हरेक भाषा का अपना प्रथक-प्रथक अस्तित्व है और प्रथक महत्व भी ,मगर जब हम राष्ट्रीय स्तर पर किसी भाषा का जिक्र करते है तो वह हिन्दी ही है।
हिन्दुस्तान बहु भाषा-भाषी मुल्क है जहॉ चार सौ से भी ज्यादा बोलियां और भाषांए बोली जाती है,इसमें शक नहीं कि सबसे ज्यादा बोली व समझी जाने वाली भाषा हिन्दी ही है।जनगणना विभाग के आंकडों के अनुसार 41 प्रतिशत लोग हिन्दी में कार्य करते हैं।हिन्दी आज भारत की राष्ट्रभाषा है,लेकिन देश की सम्पर्क और साहित्य -भाषा के रूप में इसके महत्व से दुनिया सदियों से परिचित है। यही वजह है कि सर्वप्रथम विदेशियों ने ही हिन्दी के इतिहास को सूत्रबद्ध करने और इसके व्याकरण को मानक रूप देने के प्रयास किए ।इसमें फ्रांस के गार्सा द तासी का नाम अग्रणी है । किसी भी मुल्क की एकता और अखंडता को बनाए रखने में भाषा महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।भाषा ही वह माध्यम है जिसके द्धाराकोई भी समाज अपनी संस्कृति और अस्मिता को सुरक्षित रख पाता है।दरअसल में कडवी सचाई है कि भाषा ही सबसे पहले अस्मिताओं व संस्कृतियों के टकराव का शिकार हुई ।हिन्दी भी इसका अपवाद नहीं है।
पिछले दशकों में हिन्दी को राजनीतिक अवसरवादियों ने अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करना चाहा तो कभी कुछ लोगो ने अपनी स्वार्थसिद्वि के लिए इसका दुरूपयोग करना चाहा।आज हिन्दी के प्रति जिस तरह से दक्षिण प्रांतीय और मराठी लोग होहल्ला मचा रहे हैंवह उचित नहीं है इतिहास साक्षी है कि हिन्दी भाषा को लेकर कभी इन दोनो प्रांतों में टकराव नही था।आज से सैकडों बषों पूर्व दक्षिण के आचायों ने हिन्दी को अपनाकर अपनी बात जन-जन तक पहुंचाई रामानुजाचार्य,वल्लभाचार्य,रामानंद ने हिन्दी की अहमियत को समझा और इसे व्यवहार में लाए । इतिहास के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि तंजौर के भोसलवंशीय शाहजी महाराज केरल के तिरूवनंतपुरम के राजा स्वाति तिरूनाल श्रीराम वर्मा उस दौर में हिन्दी के गीत लिखा करते थे। यहां तक कि विजयनगर रियासत ने अपने दरबार में हिन्दी को विशेष दर्ज दे रखा था। अहमदनगर ,गोलकुंडा,बीजापुर में भीदक्खिनी हिन्दी का दवदबा था।
ओडिसा के चैतन्य महाप्रभु ने हिन्दी बहुला बृजबुलि का प्रयोग किया। तमिलनाडु में हिन्दी की मुखालफत 1937 में तभी शुरू हों गई थी जब राजगोपालाचारी की सरकार ने मद्रास में हिन्दी को लाने में खास भूमिका निभाते हुए इसका समर्थन किया था, लेकिन डीएमके ने तब उसका हिसक विरोध किया था लिहाजा।इस दौरान कुछ लोगो की जान भी चली गई थी। 1964 में एक मर्तवा पुन: हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रयास किया गया तो गैर हिन्दी प्रदेशों ने खुलकर विरोधप्रर्दशन किए ।
गौरतलब यह भी हैं कि1967 के चुनाव में द्रमुक के जीतने की अहंम वजह हिन्दी का विरोध ही था। द्रमुक ने हिन्दी को राजभाषा बनाए जाने का जमकर विरोध किया और यह प्रचारित किया कि यदि हिन्दी का दवदवा हुआ तो तमिल भाषा का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा द्रमुक ने सत्ता में आते ही सबसे पहले स्कूलों में हिन्दी शिक्षण को बंद करा दिया ।सबसे ज्यादा हैरानी वाली बात यह है कि तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध कर उसे राजनीतिक मुदूदा बना दिया हालाकि यह वही तमिल राज्व्य है जहां से गाधी जी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए आंदोलन की शुरूआत की थी जबकि गाधी जी की मात्रभाषा हिन्दी नहीं गुजराती थै ज्यादा महत्वपूर्ण बात तो यह है कि इसके बावजूद भी उन्होने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने का समर्थन किया था क्योकि वे जानते थे कि हिन्दी जनज न की भाषा हे हिन्दी के प्रचार -प्रसार के लिए गांधी जी द्धारा दक्षिण का चयन महज इत्तफाक नही था 1918 में दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना की मौजूदा हालात में हिन्दी को संविधान में राष्ट्रभाषा का स्थान दिलाने में गोपाल स्वामी आयंगर का भीअहम योगदान रहा ।
यकीनन महाराष्ट्र में भाषा के प्रति कभी कटरता नहीं रही । संत तुकाराम ,संत नामदेव , संत ज्ञानेश्वर ,जैसी शख्सियतों की रचनाएं आज भी हिन्दी के पाठृयक्रम का हिस्सा हैं। शिवाजी के दरबार में हिन्दी को विशेष दर्ज प्राप्त था ।वही उनका बेटा सम्भाजी हिन्दी का चर्चित कवि था । सचाई यह भी है कि महाराष्ट्र में पेशवा ,होलकर,सिधिया, सहित मराठी राजधराने राजकार्य हिन्दी में करते थे। बाल गंगाधर तिलक ने हिन्दुस्तानियों से हिन्दी सीखने का आहवान करते हुए कहा था – देश के संगठन के लिए ऐसी भाषा की जरूरत है जिसे सुगमता से समझा जा सके। कडवा सच यह है कि किसी भी विरादरी को निकट लाने के लिए भाषा का होना महत्वपूर्ण तत्व हैं।यह सही है कि देश की अर्थव्यवस्था का आधे से ज्यादा का बाजार हिन्दी पर टिका है भारतीय हिन्दी फिल्म उधोग के गढ मुंबई में औसतन हर साल हिन्दी की 600 फिल्में बनती है जो तकरीबन 12000 करोड रूप्ये का कारोबार करती है
अपने प्रांत की भाषा का प्रचार -प्रसार करना अच्छा है मगर इसके लिए दूसरी भाषा का विरोध करना किसी भी दृष्ट्रि वाजिव नही हैं।इस सचाई से भली भाति हमस ब वाकिफ है कि राजनीतिक स्वार्थसिद्वि के लिए ही हिन्दी की मुखल्फत की जाती है। हर भाषा का अपना अलग अस्तित्व है और अलग महत्व भी मगर जब हम राष्ट्रीय स्तर पर किसी एक भाषा की बात करते है तो वह हिन्दी ही है बल्कि देशवासियों को एकता के सूत्र में भी बांधती है।
यही नही हिन्दी मात्र एक भाषा नहीं बल्कि विविध बोलियों का समुच्चय है और ये बोलियां किसी एक क्षेत्र विशेष ,स्थान विषेश राज्य विशेष से नहीं ली गई , बल्कि ये विभिन्न प्रांतो से आई है जिन्हे हिन्दी ने बिना किसी भेदभाव के अपने में समाहित कर लिया है।वर्तमान दौर में यह दिल्ली , मप्र ,राजस्थान ,बिहार ,हरियाणा उत्तर प्रदेश ,छतीसगढ, उतराखंड ,झारखंड और हिमाचल प्रदेश की राजभाषा होने के साथ ही समूचे देश में सबसे ज्यादा बोली व समझी जाने वाली भाषा हैं।

हिन्दी भाषा और संबद्ध बोलियों की विकास यात्रा
विवेक रंजन श्रीवास्तव
एक छोटा बच्चा भी जो कोई भाषा नही जानता चेहरे के हाव भाव व स्पर्श की मृदुलता से हमारी भावनायें समझ लेता है। विलोम में अपनी मुस्कान , रुदन या उं आां से ही अपनी सारी बातें मां पिता को समझा लेता है। विश्व की हर भाषा में हंसी व रुदन के स्वर समान ही होते हैं। पालतू पशु पक्षी तक अपने स्वामी से सहज संवाद अपनी विशिष्ट शैली में कर लेते हैं। अर्थात भाषा भावनाओ के परस्पर संप्रेषण का माध्यम है।
हिंदी एक पूर्ण समृद्ध भाषा है। इसके वर्तमान स्‍वरूप के विकास से पहले खड़ी बोली के कई साहित्यिक रूप विकसित थे, जैसे दकनी, उर्दू, हिंदुस्‍तानी आदि. यह जानना भी रोचक है कि हिंदी के विकास में अंग्रेजों और उनकी संस्‍थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। उन्‍नीसवीं सदी हिंदी के विकास की दृष्टि से निर्णायक सदी थी। आधुनिकता की अवधारणा और राजभाषा के सवाल से हिंदी के स्‍वरूप निर्धारण और विकास का गहरा संबंध है. उन्‍नीसवीं सदी के नवजागरण के पुरोधाओं, जैसे राजा शिवप्रसाद, भारतेंदु, बालकृष्‍ण भट्ट, अयोध्‍याप्रसाद खत्री, महावीर प्रसाद द्विवेदी, देवकीनंद खत्री आदि का हिंदी के विकास में उल्‍लेखनीय योगदान रहा है.
महात्मा गांधी ने हिंदी को स्‍वाधीनता आंदोलन की भाषा के रूप में अंगीकार कर देश को एक सूत्र में जोड़ने का काम किया था। नेहरू जी, लोहिया जी व प्रायः राष्ट्रीय नेताओ के समर्थन से हिंदी भारत की राजभाषा बनी। आज के दौर की, सूचना-तकनीक की हिंदी हमें हिंदी के भविष्‍य के बारे में संकेत करती है।
एक छोटे क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा बोली कहलाती है. बोली में साहित्य रचना का अभाव दिखता है। जब किसी बोली में साहित्य रचना होने लगती है और क्षेत्र का विकास हो जाता है तो वह बोली न रहकर उपभाषा के रूप में स्थापित हो जाती है. साहित्यकार जब किसी भाषा को साहित्य रचना द्वारा सर्वमान्य स्वरूप प्रदान कर लेते हैं तथा उसका क्षेत्र व्यापक हो जाता है तो वह भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो जाती है। भारत के बाहर हिन्दी बोलने वाले देशो में अमेरिका , मॉरीशस , दक्षिण अफ्रीका, यमन , युगांडा , सिंगापुर , नेपाल , न्यूजीलैंड , जर्मनी , पाकिस्तान , बांगलादेश आदि राष्ट्रो सहित दुनियाभर में हिन्दी का प्रयोग हो रहा है।
पहले भाषा का जन्म हुआ और उसकी सार्वभौमिकता और एकात्मकता के लिए लिपि का आविष्कार हुआ. भाषा की सही-सही अभिव्यक्ति की कसौटी ही लिपि की सार्थकता है. प्रतिलेखन और लिप्यांतरण के दृष्टिकोण से देवनागरी लिपि अन्य उपलब्ध लिपियों से बहुत ऊपर है.इसमें मात्र 52 अक्षर (14 स्वर और 38 व्यंजन) हैं , किंतु प्रत्येक फोनेटिक शब्द के लिप्यांतरण में हिन्दी पूर्नतः सक्षम है। हिन्दी की विकास यात्रा की विवेचना करें तो हम पाते हैं कि हिन्दी संस्कृत, प्राकृत, फारसी और कुछ अन्य भाषाओं के विभिन्न संयोजनों से निर्मित भाषाओं से जनित है। यह द्रविड़ियन, तुर्की, फारसी, अरबी, पुर्तगाली और अंग्रेजी द्वारा प्रभावित और समृद्ध हुई भाषा है. यह एक बहुत ही अभिव्यंजक भाषा है, जो कविता और गीतों में बहुत ही लयात्मक और सरल और सौम्य शब्दों का उपयोग कर भावनाओं को व्यक्त कर सकने में सक्षम है. हिन्दी की क्षेत्रारानुसार अनेक बोलियाँ हैं, जिनमें अवधी, ब्रजभाषा, कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, हड़ौती,भोजपुरी, हरयाणवी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया, कुमाउँनी, मगही आदि प्रमुख हैं. इनमें से कुछ में अत्यंत उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना हुई है. ब्रजभाषा और अवधी में हिन्दी का साहित्य प्रचुरता से लिखा गया है। स्वतंत्रता संग्राम, जनसंघर्ष, वर्तमान के बाजारवाद के विरुद्ध भी लोकभाषा में बहुत लिखा जा रहा है। भोजपुरी सिनेमा ने नये समय में उसका साहित्य समृद्ध किया है। इधर बुंदेली , बघेली बोलियो में भी व्यापक साहियत्यिक लेखन हो रहा है।
प्रकाशन तकनीक का विकास , कम्प्यूटर में हिन्दी व अन्य भारतीय लिपियों की सुविधाओ का विस्तार , यू ट्यूब व अन्य संसाधनो से हिन्दी व संबंधित बोलियां लगातार समृद्ध हो रही हैं। हिन्दी भाषा और संबद्ध बोलियों के विकास का मूल मंत्र यही है कि हम मूल रचना कर्म तथा अन्य भाषाओ से निरंतर अनुवाद के द्वारा अपनी भाषा की समृद्धि को बढ़ाने का कार्य करते रहें। अंग्रेजी की दासता से मुक्त होना जरूरी है। नई पीढ़ी को निज भाषा के गौरव से अवगत कराने के निरंतर यत्न करते रहने होंगे।जब हिन्दी के उपयोगकर्ता बढ़ेंगे तो स्वतः ही तकनीक का वैश्विक बाजार हिन्दी के समर्थन में खड़ा मिलेगा। हिन्दी का शब्दागार व साहित्य निरंतर समृद्ध करते रहने की आवश्यकता है।नई पीढ़ी की जबाबदारी है कि नये इलेक्ट्रानिक माध्यमो के जरिये हिन्दी व बोलियो के साहित्य की प्रस्तुति यदि बढ़ाई जावे । ई बुक्स व आडियो वीडियो संसाधनो को युवा पसंद कर रहा है हिन्दी के प्राचीन साहित्य व नई रचनाओ को इन माध्यमो में प्रस्तुत करने की आवश्यकता है , जिससे।
हिन्दी भाषा और संबद्ध बोलियों की विकास यात्रा अनवरत जारी रहे।

किसानों के लिए काला कानून बने केंद्र सरकार के तीन अध्यादेश
दिग्विजय सिंह
भारत में कृषि सुधार के नाम पर केन्द्र सरकार द्वारा लाए गए तीन अध्यादेशों का पूरे देश में विरोध हो रहा है। किसानों का कहना है कि पहले अध्यादेश में कृषि उपज मंडियों के बंद होने से किसानों का शोषण शुरू हो जाएगा। दूसरे अध्यादेश में गेहूँ, चावल, दलहन और आलू, प्याज के भंडारण की छूट देने से कालाबाज़ारी शुरू हो जाएगी। अंततः मध्यम और निम्न वर्ग जमाखोरी के कारण मूल्य वृद्धि का शिकार बनेगा। तीसरे अध्यादेश में अनुबंधित कृषि का प्रावधान है। ऐसा होने पर छोटे किसान अपने ही खेतों में मजदूर बनकर रह जाएंगे।
मोदी सरकार द्वारा सुधार के नाम पर लाए जा रहे ये तीनों अध्यादेश वास्तव में किसान, छोटे व मध्यम व्यापारी और उपभोक्ताओं के हितों के विपरीत हैं। हर राज्य के किसान संगठन, व्यापारी संघ और कर्मचारी यूनियन इन अध्यादेशों को काला कानून बता रहे हैं। किसानों का कहना है कि उचित मूल्य और बेहतर बाजार के नाम पर केन्द्र सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में किसानों की किस्मत सौंपने जा रही है। जो किसानों का पोषण नहीं बल्कि शोषण करेंगे। मैं भी इस आशंका से सहमत हूँ।
जब देश में लाॅकडाउन था और करोड़ों लोग कोरोना की दहशत में थे तब किसानों का भला करने की जगह बड़ी-बड़ी कम्पनियों का भला करने के लिये “कोरोना के संकट काल में“ केन्द्र सरकार ने हमेशा की तरह अध्यादेश का सहारा लिया और बिना किसानों से संवाद और संसद में चर्चा कराए किसानों पर काला कानून लागू कर दिया। राज्य सरकार के संवैधानिक अधिकार की भी अनदेखी की है।
इस तरह प्रधानमंत्री मोदी जी ने आम जनता की “आपदा” में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए “अवसर” ढूँढ लिया!
हमारे देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है। देश के दस करोड़ से अधिक किसानों ने अपनी मेहनत से हरित क्रांति के सहारे देश को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया है। आज़ादी के बाद से कांग्रेस के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकारों ने महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए कृषि विकास में अनेक दूरगामी निर्णय लिए थे, जो उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल करने में सहायक रहीं। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जमाखोरी और कालाबाजारी पर कड़ा प्रहार करते हुए आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 बनाया ताकि बाजार में जीवन उपयोगी वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सके।
खाद्यान्न की कमी से जूझते देश में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कृषि लागत और मूल्य आयोग गठित किया जिसकी अनुशंसाओं पर किसानों को उनकी लागत के अनुरूप न्यूनतम समर्थन मूल्य दिए जाने के प्रावधान किए गए।
पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारत की परम्परागत खेती को अनेक कृषि अनुसंधान केन्द्र, कृषि विश्वविद्यालय प्रारंभ कर हरित क्रांति में बदल दिया। इंदिरा जी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर किसानों के लिए बैंकों के दरवाजे खोल दिए। सिर्फ तीन दशक में किसानों ने शासकीय सुविधाओं के सहारे खाद्यान्न उत्पादन में देश को आत्मनिर्भर बना दिया था।
70 के दशक में किसानों को व्यापारियों के शोषण से बचाने के लिए कृषि उपज मंडी अधिनियम विभिन्न प्रदेशों में लागू किए गए। इस कानून के तहत किसानों के लिए मंडी समितियां स्थापित की गईं। मंडी कानून ने किसानों को संरक्षण देते हुए उन्हें अपनी फसल के उचित दाम दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया। मंडी अधिनियम में किसानों के प्रतिनिधि मंडी समिति के अध्यक्ष होते हैं और निर्वाचित संचालकों में किसानों के वोटों की सीधी भागीदारी होती है। व्यापारियों और हम्मालों के प्रतिनिधि भी बोर्ड में शामिल किए गए। इन सभी को मिलकर हर समस्या का समाधान निकालने के लिए कानूनी तौर पर अधिकार सम्पन्न किया गया है। मध्यप्रदेश में यह कानून 1973 से लागू हो गया था।
कृषि उपज मंडी अधिनियम को अब इस अध्यादेश के माध्यम से नगण्य किया जा रहा है, जबकि हमारे देश के संविधान में कृषि को संविधान के अनुच्छेद 246 में वर्णित 7वीं अनुसूची में राज्य के अधिकार क्षेत्र में रखा गया है।
पिछले 50 सालों में कृषि उपज मंडियां किसानों की आशाओं का केन्द्र बन गई हैं, जहाँ केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बोली लगाकर फसलों की बिक्री होती है। वाजिब दाम मिलने पर ही किसान अपनी फसल व्यापारी को बेचता है। व्यापारी उसी दिन भुगतान भी करता है। विलंब होने पर व्यापारी किसान को एक प्रतिशत की दर से 5 दिनों तक ब्याज देता था और 5 दिन से ज्यादा देरी होने पर उसके बाद 5% ब्याज की दर से भुगतान किया जाता है।
नाबार्ड की रिपोर्ट बताती है कि देश में दस करोड़ से अधिक किसान है, जिनमें से आधे से अधिक कर्ज में डूबे हैं। ऐसे में अब नए अध्यादेश से शासकीय कृषि उपज मंडियों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा और व्यापारी भी अनियंत्रित हो जाएंगे। निजी मंडियां खुल जाएंगी और किसान दर-दर भटकता फिरेगा। किसानों का आरोप है कि आटा, मैदा सहित अन्य उत्पाद बनाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियां मनमानी कीमतों पर किसानों को फसल बेचने मजबूर करेंगी। परिणामस्वरूप देशभर में कंपनियों का कॉकस तैयार हो जायेगा।
फसल खरीदी में व्यापारी द्वारा धोखा देने पर किसान की सुनवाई मंडी में नहीं होगी बल्कि एस.डी.एम. और कलेक्टर के यहां होगी। कलेक्टर के आदेश की अपील केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव के पास होगी और उनके आदेश की अपील केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी के पास होगी। यानि कि जो विवाद प्रदेश में निपट जाता था अब वह दिल्ली में निपटेगा। इतना ही नहीं इस अध्यादेश ने किसानों के अदालत में जाने का रास्ता भी बंद कर दिया गया है।
वर्तमान समय में मंडी में किसान को उचित दाम, उचित तुलवाई, समय पर भुगतान सहित अनेक सुविधाएँ दी जा रही हैं। इन सुविधाओं के बीच राज्य शासन को मंडी टैक्स के रूप में हजारों करोड़ रुपए का राजस्व भी मिल रहा था जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कें बन रही थीं और किसानों को मंडी में रहने, ठहरने की सुविधा मिल रही थीं। अब निजी मंडी बनने से यह राशि भी नगण्य हो जाएगी। कर्मचारियों का वेतन नहीं बंट पाएगा।
किसानों को आशंका सही ही प्रतीत होती है कि इन अध्यादेशों के माध्यम से केन्द्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य से छुटकारा पाना चाह रही है, ताकि किसान सरकार से उचित मूल्य की बात ना कर सकें। भाजपा की केन्द्र सरकार इसी बहाने कृषि उपज सहित किसानों की आमदनी दोगुनी करने के वचन से भी बचना चाह रही है। आगे चलकर सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदी भी बंद करेगी और बड़ी कम्पनियों से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिये सीधे खाद्यान खरीदेगी और इस तरह बड़े-बड़े व्यापारी और कम्पनियां किसानों के चारों तरफ अपना जाल बिछा लेंगी।
एक अन्य अध्यादेश में सरकार बड़े-बड़े कार्पोरेट घरानों के लिये ”कांट्रेक्ट फार्मिंग“ का कानून ला रही है। इस कानून में कम्पनियां किसानों से अनुबंध कर उनकी जमीन पर खेती कराएंगी इस तरह छोटे-छोटे किसान अनुबंध के मायाजाल में फंसकर अपने ही खेतों में मजदूर बन जायेंगे। गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इस तरह की खेती के अनुभव कड़वे रहे हैं। अनुबंध के नाम पर किसानों का शोषण किया गया है। गुजरात में तो कंपनियों ने अनुबंध के नाम पर किसानों पर केस दर्ज करवा दिए थे।
केन्द्र सरकार ने अपने तीसरे अध्यादेश में अत्यावश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन कर गेहूँ, चावल, दलहन, और आलू, प्याज के मनमाने भंडारण की छूट दे दी है। अभी तक इन आवश्यक चीजों की कालाबाज़ारी रोकने के लिये भंडारण की सीमा तय थी। अब सरकार ने राष्ट्रीय आपदा की स्थिति तथा दोगुनी कीमत न होने तक मनमर्ज़ी से स्टाॅक रखने का नियम बना दिया है। यह अध्यादेश भी किसानों और आम उपभोक्ताओं की जगह बड़े व्यापारियों का भला करेगा तथा कालाबाजारी और जमाखोरी को बढ़ावा मिलेगा।
पहले किसान भंडारण कर सकता था, अब कंपनियों को छूट दे दी गई है। इस फैसले से किसानों में आक्रोश है। भविष्य में यह अध्यादेश अत्यावश्यक वस्तु जैसे गेहूँ, चावल, दलहन, आलू, प्याज की किल्लत का कारण बनेगा। निम्न और मध्यमवर्गीय परिवार महंगी वस्तुएं खरीदने को विवश होंगे। जमाख़ोरों और कालाबजारियों को खुली छूट मिल जाएगी।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि एक दशक पहले प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यू.पी.ए. सरकार ने देश के ऋण-ग्रस्त किसानों का 72 हजार करोड़ रुपए का कर्ज माफ कर किसानों पर मंदी की मार नहीं पड़ने दी थी। मध्यप्रदेश में 2018 में आयी कांग्रेस सरकार ने भी 20 लाख से अधिक लघु और सीमांत किसानों का कर्जा माफ किया था। लेकिन बीजेपी के सत्ता हथियाते ही वह ना सिर्फ़ बंद हो गया, बल्कि उसके कुछ नेता तो इसे पाप तक कहने लगे। आज देश के करोड़ों किसान केन्द्र सरकार से उचित समर्थन मूल्य, उन्नत बीज, सिंचाई सुविधाएं, अनुदान के साथ कृषि उपकरण, खाद्य और कम दर पर बिजली और डीजल की मांग कर रहे हैं। यह सब देने की जगह केन्द्र सरकार बिना आम सहमति बनाए, इस काले कानून रूपी तीन अध्यादेशों को लाकर किसानों की कमर तोड़ने पर आमादा है। जिसमें किसान की जगह कंपनियां आत्मनिर्भर बनेंगी और किसानों की उन बड़ी कंपनियों पर निर्भरता बढ़ती जाएगी।
आज इन अध्यादेशों को लेकर पूरे देश में ग्रामीण इलाक़ों और मंडियों में किसानों और मंडी कर्मचारियों का विरोध प्रदर्शन चल रहा है। मंडियाँ बंद होने से किसानों की उपज भी नहीं बिक पा रही है। कोरोना काल में जब सभी उद्योग धंधे बंद हैं तब कृषि अर्थव्यस्था को सँभालने का काम कर सकती थी, लेकिन दुर्भाग्यवश इसे भी बर्बाद करने की कोशिश की जा रही है। इसलिए इन तीनों अध्यादेशों का विरोध होना चाहिए।
*(लेखक मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व राज्यसभा सांसद हैं)*

चुनाव सुधार की दरकार
सिद्धार्थ शंकर
चुनाव सुधार को लेकर उम्मीदें तो कई सालों से की जा रही हैं, लेकिन अभी भी इस दिशा में ठोस कदम बढ़ नहीं पाए हैं। तभी तो सांसदों-विधायकों पर दर्ज केस के आंकड़े पूरी व्यवस्था को चिढ़ाते नजर आते हैं। देशभर में राजनेताओं के खिलाफ 4,442 आपराधिक मामलों में सुनवाई चल रही है। इनमें से 2556 मामले मौजूदा सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट को सभी हाईकोर्ट द्वारा मुहैया कराए गए आंकड़ों से यह खुलासा हुआ है। संसद और विधानसभाओं में चुने जनप्रतिनिधियों के खिलाफ मामलों का तेजी से निपटारा करने के मुद्दे पर विचार करने को दायर याचिका पर शीर्ष अदालत में सुनवाई जारी है। इसी के तहत सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरलों को नेताओं के खिलाफ लंबित मामलों की जानकारी देने का निर्देश दिया था।
मामले में एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने सभी हाईकोर्ट से मिली जानकारी को इकट्ठा कर अपनी रिपोर्ट शीर्ष अदालत को सौंपी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल 4,442 मामले लंबित हैं, जिनमें से 2556 मामलों में मौजूदा सांसद और विधायक आरोपी हैं। 25 पेज के हलफनामे में कहा गया है कि इनमें जनप्रतिनिधियों की संख्या मामलों से ज्यादा है क्योंकि एक मामले में एक से ज्यादा निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल हैं। भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका पर कोर्ट के आदेश पर यह रिपोर्ट दाखिल की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी में नेताओं के खिलाफ सबसे ज्यादा 1217 मामले लंबित हैं। इनमें से 446 मामले मौजूदा सांसदों व विधायकों के खिलाफ हैं। इसके बाद बिहार में 531 मामलों में से 256 में वर्तमान विधि निर्माता आरोपी हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने 352 मामलों की सुनवाई पर रोक लगाई है। 413 मामले ऐसे अपराधों से संबंधित हैं जिनमें उम्रकैद की सजा का प्रावधान है। इनमें से 174 मामलों में पीठासीन निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल हैं। रिपोर्ट में मामलों का तेजी से निपटारा करने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं। इनमें सांसदों और विधायकों के मामलों के लिए हर जिले में विशेष अदालत बनाने का सुझाव दिया गया है। इन विशेष अदालतों को उन मामलों को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिनमें अपराध के लिए मौत की सजा या उम्र कैद का प्रावधान है। इसके बाद सात साल की कैद की सजा के अपराधों को लेना चाहिए। वहीं मौजूदा सांसदों व विधायकों के मामलों को प्राथमिकता दी जाए।
इन आंकड़ों को देखने के बाद पता चल जाएगा कि क्यों चुनाव सुधारों को लेकर सवाल उठते रहे हैं, खासकर तब जब चुनाव नजदीक होते हैं। इसलिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर चुनाव आयोग और सरकार गंभीर क्यों नहीं हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि चुनाव आयोग शक्तिहीन संस्था हो चुकी है। आज भी आयोग में संपूर्ण शक्तियां विद्यमान हैं। अगर भारत में चुनाव सुधारों को लेकर की गई पहल पर गौर करें, तो नब्बे के दशक में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन ने सबसे पहले इस दिशा में बड़े कदम उठाए थे। शेषन ने राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग की शक्तियों का अहसास कराया था। इसके बाद ज्यादातर मुख्य चुनाव आयुक्तों ने चुनाव सुधार की दिशा में कुछ न कुछ ऐसा जरूर किया, जिससे आयोग की शक्तियों के बारे में आमजन को भी पता चला। लेकिन लंबे समय से यह देखा जा रहा है कि देश की सर्वोच्च अदालत तो चुनाव सुधार को लेकर सक्रिय है और समय-समय पर इस बारे में निर्देश भी जारी होते रहे हैं, लेकिन हमारे राजनीतिक दल इसमें सहयोग करने के बजाय असहयोग का रास्ता ही अपनाते रहे हैं।
यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि राजनीतिक दलों को इस बात का भय सताता रहता होगा कि अगर चुनाव प्रक्रिया सुधरी तो इसका पहला और सबसे ज्यादा असर उन्हीं पर पड़ेगा और आपराधिक संलिप्तता व चुनावों में धन के अथाह इस्तेमाल पर रोक लग जाएगी। राजनीतिक दल चुनावों में जिस तरह से भारी मात्रा में पैसे का इस्तेमाल करते हैं, वह कड़वी सच्चाई है। कालेधन के इस्तेमाल को रोकना है तो आयोग को तर्कसंगत तरीके से सोचना होगा, क्योंकि लोकतंत्र अमीरों का तंत्र बनता जा रहा है, इसमें गरीब अथवा ज्यादा धन खर्च न कर पाने वाले उम्मीदवार इन धन कुबेरों के आगे बौने पड़ गए हैं। राजनीति का अपराधीकरण गंभीर चिंता का विषय है। आज वक्त की जरूरत है कि राजनीति में धनबल और बाहुबल के बढ़ते प्रभाव को कम करने की दिशा में मजबूत कदम उठाए जाएं।

कोरोना पेंशन शुरू हो
रघु ठाकुर
कोरोना काल ने बड़ी संख्या में लोगों को देश में संक्रमित किया है, और प्रतिदिन भारत सरकार की ओर से राज्य वार संक्रमण के आंकड़े तथा राज्यों की ओर से जिलावार आंकड़े मीडिया में प्रमुखता से छप रहे है। जिनमें बताया जाता है कि, कितने लोग संक्रमित हुए कितने ठीक हुए कितनों की मृत्यु हुई। सरकार के इन आंकड़ों को देखें तो अभी तक याने 6 माह में लगभग 30 लाख लोग संक्रमित या संभावित संक्रमित पाए गए हैं। जिनमें से लगभग 71 प्रतिशत लोग याने 21 लाख लोग स्वस्थ्य हो गए। कुछ का इलाज चल रहा है और इस बीमारी से मरने वालों की संख्या लगभग 50-55 हज़ार के आस-पास है।
परन्तु अच्छा होता कि भारत सरकार यह आंकड़ा भी जारी करती कि इन 6 माहों में कितने लोग बेरोजगार हुए याने जिनके पास रोजगार थे उनमें से कितने लोगों के रोजगार छिने? कितने लोगों ने आत्महत्याएं की? कितने लोग अवसादग्रस्त हुए? और कितने लोग अपराधी बनने को लाचार हुए? आई.एल.ओ. के अनुमान तो भारत में 40 करोड़ लोग इस कोरोना के कारण बेरोजगार बन चुके हैं।
परंतु सी.आई.एम.ई.ई. नामक संस्था जो सरकार के आर्थिक स्थितियों का अध्ययन करती है, और रपट जारी करती है कि हालिया रिपोर्ट चौकाने वाली है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इन 5 माहों में एक करोड़ नवासी लाख लोग बेरोजगार बने है क्योंकि उन्हें अपनी नौकरी गवांना पड़ी है। अकेले अप्रैल माह में 1 करोड़ 70 लाख, जुलाई में 50 लाख लोगों की नौकरियां गई है, अगस्त का आंकड़ा अभी आने वाला है। आई.एल.ओ. ने तो नौकरी व निजी धंधे दोनों की बेरोजगारी मापी है। लॉकडाऊन के आंशिक रूप से समाप्त होने पर जुलाई माह में मुश्किल से 30 लाख लोगों को काम या नौकरी वापिस मिली थी। सी.आई.एम.ई.ई. ने यह भी आशंका व्यक्त की है कि जिनकी नौकरी या काम छूट गए है, उन्हें कोरोना शुरू होने के पूर्व जैसा काम वापिस मिलना कठिन है।
यह आंकलन इसलिए भी सही लगता है कि इस कोरोना काल का इस्तेमाल भारत सरकार ने निम्न तरीकों से एक नए प्रकार के आर्थिक ढांचे के इस्तेमाल के लिए किया है, जिसमें इंसान का स्थान मशीन ले रही है :-
1.नार्मल के नाम पर लगभग सभी क्षेत्रों में जैसे शिक्षा, चिकित्सा, व्यापार इत्यादि में डिजीटीलाइजेशन बढ़ रहा है। अकेले शिक्षा के क्षेत्र में स्कूल, कॉलेज आदि सभी शिक्षण संस्थाओं को बंद कर ऑनलाईन शिक्षा के परिणाम स्वरूप अभी हाल में कई लाख शिक्षकों के रोजगार समाप्त हुए हैं। और यह प्रक्रिया अभी और आगे जाएगी। अभी तो कुछ शिक्षक मोबाईल या लेपटॉप पर छात्रों को पढ़ा रहे है। परन्तु शीघ्र ही यह स्थिति आने वाली है कि शिक्षकों के भाषणों के टेप चलेंगे और शिक्षकों की जरूरत बहुत कम हो जाएगी। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया के विद्वानों के भाषणों के टेप से शिक्षा होगी तथा शिक्षक व शिक्षण संस्थान दोनों ही लगभग गैर जरूरी हो जाएंगे। इसी प्रकार चिकित्सा के क्षेत्र में दूरभाष पर (टेलीमेडिसन के द्वारा) दवाओं के नाम बता दिए जाएंगे और चिकित्सकों की संख्या व जरूरत काफी कम हो जाएगी।
2.कोरोना काल में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्रों के निजीकरण और निजी क्षेत्र के विदेशी पूँजीकरण का योजनाबद्ध अभियान शुरू किया है। निजीकरण रोजगार या कर्मचारियों की संख्या को बहुत कम करेगा क्योंकि उसके लिये तो इंसान के नाम पर मशीन लगाकर मुनाफा बढ़ाना है। एफ.डी.आई. से भी रोजगारों पर विपरीत प्रभाव पढ़ेगा क्योंकि एफ.डी.आई. भी मशीनों या सामान के रूप में ही आती है। कुल मिलाकर निजीकरण और विदेशी पूँजीकरण से पहले चरण में लगभग 50 प्रतिशत श्रम शक्ति की संख्या घट जाएगी और उनका काम मशीने करेंगी यह क्रम क्रमश: बढ़ता ही जाएगा।
3.वर्क फ्राम होम और होम डिलेवरी के गंभीर परिणाम भी सामने आएंगे। वर्क फ्राम होम के नाम पर कर्मचारियों को पहले काम के लिये घर भेजा जा रहा है। इससे मालिकों का दतर खर्च, यात्रा भत्ता आदि सब बच जाएगा। फिर धीरे-धीरे इन्हें कम आउटपुट या अक्षमता के नाम पर क्रमश: हटाते जाएंगे। वर्क फॉर्म होम आज भले ही कर्मचारियों को अच्छा लग रहा है कि कहीं जाने की जरूरत नहीं है घर से काम करेंगे परन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि यह वर्क फॉर्म होम बहुत शीघ्र ही किक बेक टू होम या गो बेक टू होम सिद्ध होने वाला है। होम डिलेवरी वाली जिन विदेशी पूँजी निवेशकर्ता कंपनियों को सरकार ने अनुमति दी है उससे करोड़ों छोटे दुकानदारों के व्यवसाय पर असर पड़ेगा। बड़ी-बड़ी कंपनियां देशी उद्योगपतियों के कोलोब्रेशन से देश में आ चुकी है, और वे सस्ता माल बेचेगी क्योंकि थोक खरीद के आधार पर उन्हें माल सस्ता पड़ेगा। जो मोबाईल फोन आज 15-20 हज़ार में बाज़ार में मिलता है वह इन्ही विदेशी कंपनियां 8-10 हज़ार रूपये का या और इससे भी कम में बेचेंगी। क्योंकि वे निर्माता कंपनियों से एक मुश्त करोड़ों की संख्या में खरीद करेंगी। यह घटना न केवल मशीनों के क्षेत्र में बल्कि कृषि उत्पादन और अन्य उपभोक्ता सामाग्री के उत्पादनों पर भी प्रभाव डालेगी तथा विदेशी कंपनियां अपना एकाधिकार जमायेगा। करोड़ों फुटकर व्यापारियों के ऊपर इसका प्रभाव पड़ने वाला है। और भले ही सरकार इसे विकास का पैमाना बतायें, माल की शुद्धता, गुणवत्ता का प्रचार करें। उपभोक्ता भी सस्ता व अधिक गुणवत्ता का सामान इन बहुराष्ट्रीय दैत्याकार कंपनियों से खरीदना अपने हित में समझेगा।
4.बाजार की आवश्यकता सीमित होगी पहले चरण में महानगर और कॉस्मोपॉलिटन सिटी में, फिर बड़े नगरों में और फिर क्रमश: तहसील और गाँव तक यह श्रंखला फैलेगी। काम काजी महिलाओं और परिवारों के लिए होम डिलेवरी आसान होगी। क्योंकि फोन पर सीधा माल घर पहुंच जाएगा। न बाजार जाने की समस्या, न पार्किंग न, लूटपाट न, जेब कटने की समस्या तथा समय व परिश्रम की बचत।
5.हमारे देश में लगभग एक करोड़ के आसपास घरेलू काम वाली बाईयाँ व पुरूषकर्मी है जो घरों में साफ सफाई से लेकर खाना बनाने का काम करते है, उनका काफी काम पहले ही बंद हो चुका है क्योंकि कोरोना के भय से लोगों ने उन्हें काम पर बुलाना बंद कर दिया है। तथा लॉकडाऊन काल ने लाचारी में लोगों में बाईयों के काम को मशीन या हाथ से स्वत: शुरू किया तथा अब वह उनका अभ्यास बन चुका है। अब कपड़े धोना, बर्तन धोना, खाना पकाना, ये सभी छोटे-मोटे हाथ के काम, झाड़ू लगाना बाईयों के स्थान पर मशीने करने लगेंगी। और रोबोट भी दुनिया में संपन्न देशों में प्रवेश कर चुका है। अमेरिका के शहरों में रोबोट घरों से लेकर होटलों और दतरों में सुरक्षा कर्मियों के स्थान पर प्रवेश कर चुका है। तथा क्रमश: चिकित्सा के क्षेत्र में भी प्रवेश कर रहा है। यहाँ तक कि हार्ट के आपरेशन और अन्य आपरेशन रोबोट करने लगे है। दुनिया के बड़े पैसे वाले जो पहले एक नंबर के थे और अब शायद दूसरे, तीसरे नम्बर पर है, बिल गेट्स ने कुछ दिनों पहले सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि रोबोट इंसान को बेरोजगार बनायेगा और एक बड़ा खतरा साबित हो गया। अमेरिका या यूरोप के देशों के लिए मशीन खतरा है, रोबोट खतरा है उनके रोजगारों को छीनने वाला है जबकि उनकी आबादी तुलनात्मक रूप से बहुत कम है। और इसलिए उनके यहाँ यह मशीन जितना बेरोजगारी पैदा कर रही है, उससे तुलनात्मक रूप से यह रंगीन दुनिया के देशों में बहुत ज्यादा बेरोजागारी पैदा करेगी। भारत एशिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों पर तो इसका प्रभाव मारक होगा।
6.इस मशीनीकरण का प्रभाव मीडिया पर भी पड़ेगा और मीडिया कर्मी की संख्या बड़ी मात्रा में कम हो जाएगी। पत्रकारिता मानव और मानवीय संवेदनाओं से कट जाएगी। राजनीति भी इससे प्रभावित होने वाली है और वहाँ भी सभा-संवाद-संपर्क से लेकर मतदान तक सब कुछ मशीन के माध्यम से होगा। व्यक्तिगत संपर्क समाप्त होगा संवेदनाओं की धारा सूख जायेगी।
7.शिक्षा का स्वरूप ही बदल जाएगा और शिक्षा तथा उसके पाठ्यक्रम आदि केवल व्यापार केन्द्र बन जाएंगे। अभी तो जिनके रोजगार छिने है वे प्रारंभिक रूप में कारखाना बंदी, काम बंदी शिक्षण संस्थान बंदी, और चिकित्सा संस्थान बंदी से छिने है। परन्तु जब मशीन ही मानव का विकल्प बन जाएगी तब जो बेरोजगारी पैदा होगी उसकी कल्पना करना भी कठिन है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने आंकलन में कहा है कि वर्ष 2020 के अंत तक दुनिया में लगभग 12 करोड़ लोग बेरोजगार होंगे और 1 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार होंगे।
भारत में भी जो अप्रवासी मजदूर घरों को लौटे है उनकी संख्या लगभग 8 करोड़ के आस-पास। इनका छोटा सा हिस्सा भी अभी तक काम पर वापिस नहीं लौट पाया है। उनके पास जो कुछ जमा पूँजी थी वह खत्म हो चुकी है। अब वे कर्ज ले रहे है। तथा कर्ज पर जिंदा है, और अब उनके समक्ष पेट भरने और जिंदा रहने के लिए अपराध ही सहारा है। ग्रामीण क्षेत्रों में और दूरस्थ क्षेत्र में कोरोना जनित बेरोजगारी के कारण अपराध बढ़ना शुरू हो गए है। म.प्र. पुलिस के गुप्तचर विभाग ने जानकारी दी है कि पिछले दिनों 90 नए गिरोह (डकैती के गिरोह) तैयार हुए है, जिनमें 2000 से अधिक लोग शामिल हुए है। तथा ग्रामीण क्षेत्रों में लूटपाट की घटनायें बढ़ी हैं। यह केवल म.प्र. का आंकड़ा है, अगर सारे देश में यही स्थिति बनेगी तो एक मोटे अनुमान के मुताबिक सारे देश में अभी तक लगभग 2 हज़ार गिरोह तैयार हो चुके है और जिनमें लगभग पचास हज़ार लोग नए डाकू के रूप में भर्ती हो गये हैं। एक तरफ देश का यह नया दस्युकरण या अपराधीकरण शुरू हो गया है और दूसरी तरफ बेरोजगारी और अकेलेपन के अवसाद से आत्महत्यायों के प्रकरण बढ़ रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार इस वर्ष के अंत तक देश में लगभग 20 लाख लोग आत्महत्यायें कर सकते है। याने कोरोना देश को डकैतों और आत्महत्याओं के देश में बदल देगा। हम लोगों ने सरकार से माँग की थी कि ”कोरोना पेंशन“ शुरू की जाए तथा कोरोना प्रभावितों को पेंशन दी जाए, जब तक कि कोई विकल्प या रोजगार नहीं मिल जाता है। परन्तु सरकार मौन है। और आम जन भी भयभीत या फिर स्वकेन्द्रित होकर मूकदर्शक बना बैठा है। आवश्यकता यह है कि जनता संघर्षशील बने और सरकारे संवेदनशील।

कब बनेगा भिखारी मुक्त भारत
रमेश सर्राफ धमोरा
देश में बेरोजगारी की हालत ऐसी है कि बहुत पढ़े लिखे लोग भी भीख मांग रहे हैं। राजस्थान सरकार ने हाल ही में भिखारी उन्मूलन एवं पुनर्वास कानून बनाया है। जिसके तहत जयपुर में भिखारियों का सर्वे शुरू किया गया है। इस सर्वे में पता चला है कि जयपुर शहर में कुछ भिखारी एमए और एमकॉम तक पढ़े हुए हैं तो कुछ बीए और बीकॉम किए हुए हैं। इन भिखारियों का कहना है कि अगर उन्हें कोई काम मिलता है तो वह भीख मांगना छोड़ कर काम करने के लिए तैयार हैं।
राजस्थान के ही गोविंदगढ़ के रहने वाले 34 साल का पवन एमकॉम तक पढ़ने के बाद अजमेर रोड पर भीख मांग रहा हैं। यह एक फैक्ट्री में मजदूरी करता था। लेकिन काम बंद होने की वजह से खाने के लिए चैराहे पर बैठना शुरू कर दिया। शादीशुदा नहीं होने की वजह से कहीं कोई काम के लिए ले जाता है तो चले जाते हैं वरना भीख मांग कर खा लेते हैं।
झुंझुनू जिले के डूंडलोद का रहने वाला 38 साल का अविवाहित मुकेश ने एमए तक पढ़ाई की है। जयपुर शहर में भीख मांग कर जिंदगी गुजर बसर करता है और फुटपाथ पर सोता है। एमकॉम तक पढ़ाई करने वाले जगदीश गुप्ता, ग्रेजुएशन करने वाले रमेश और शैलेश भी जयपुर में भीख मांगकर गुजारा करते हैं। राजस्थान सरकार ने हाल ही में विधानसभा में भिखारी उन्मूलन एवं पुनर्वास बिल पास कर दिया है। राज्य सरकार द्धारा सामाजिक संगठनों के जरिए भिखारियों के लिए पुनर्वास केंद्र बनाए जा रहे हैं।
हमारे घरों में, सार्वजनिक स्थलों, रेल, बसों व धार्मिक स्थलों पर ईश्वर, अल्लाह के नाम पर भीख मांगते बच्चे, बूढ़े, युवा आसानी से देखे जा सकते है जो सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। भीख मांगना आज एक प्रकार का धंधा धंधा बन गया हैं। भिक्षावृत्ति किसी भी सभ्य देश के लिए कलंक है। यह एक सामाजिक बुराई हैं । अब यह लाईलाज गंभीर रोग बनता जा रहा हैं। जहां असहाय,दीन-हीन लोग तो मजबूरी वश भीख मांगने के कार्य में लगे हुये हैं। वहीं शारीरिक दृष्टि से सक्षम कई लोग भी भीख मांग कर अपना गुजारा करते हैं,क्योकि उन्होने शारीरिक श्रम करने के बजाय भीख मांग कर आसानी से गुजारा करने का रास्ता चुन लिया है।
भिखारी शब्द के स्मरण से ही मन में घृणा का भाव उत्पन्न होने लगता है। भिखारी किसी भी देश व उसके नागरिकों के माथे पर कलंक की तरह होते हैं। आज 21 वीं सदी में जा रहा हमारा देश एक तरफ कम्प्यूटर, इंटरनेट की दिशा में प्रगतिशील है व विकास के बड़े-बड़े दावे कर रहा है वहीं दूसरी तरफ देश में ही एक तबका भीख मांग कर पेट भरता हो यह हम सभी के लिये एक गंभीर चिंतन का विषय है।
भारत में कुछ जनजातीय समुदाय भी अपनी आजीविका के लिये परम्परा के तौर पर भिक्षावृत्ति को अपनाते हैं। लेकिन भीख मांगने वाले सभी लोग इसे ऐच्छिक रूप से नहीं अपनाते। दरअसल गरीबी, भुखमरी तथा आय की असमानताओं के चलते देश में एक वर्ग ऐसा भी है, जिसे भोजन, कपड़ा और आवास जैसी आधारभूत सुविधाएँ भी प्राप्त नहीं हो पातीं। यह वर्ग कई बार मजबूर होकर भीख मांगने का विकल्प अपना लेता है।
भिक्षावृत्ति भारत के माथे पर ऐसा कलंक है जो हमारे आर्थिक तरक्की के दावों को खोखला बनाता है। भीख मांगना कोई सम्मानजनक पेशा नहीं वरन अनैतिक कार्य और सामाजिक अपराध है। सरकार ने इसे कानूनन अपराध घोषित कर रखा हैं। फिर भी यह लाइलाज रोग दिन पर दिन बढ़ता जा रहा हैं। हमारे देश में भिखारियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। भारत में कोई भूखा न रहे और भूख के कारण अपराधा न करे, इसीलिए खाद्य सुरक्षा अधिनियम का प्रस्ताव लाया गया था। भीख मांगना सभ्य समाज का लक्षण नहीं है मगर आत्मसम्मान तथा स्वाभिमान जागृत किए बिना इससे किसी को विमुख नहीं किया जा सकता। सरकार को शिक्षा के प्रसार पर बल देना चाहिए। शिक्षा ही व्यक्ति को संस्कारित कर उसे स्वाभिमानी बना सकती है।
भारत के संविधान में भीख मांगने को अपराध कहा गया है। फिर भी देश की सडकों पर लाखों बच्चे आखिर कैसे भीख मांगते हैं ? बच्चों का भीख मांगना केवल अपराध ही नहीं है, बल्कि देश की सामाजिक सुरक्षा के लिए खतरा भी है। हर साल कितने ही बच्चों को भीख मांगने के धंधे में जबरन धकेला जाता है। ऐसे बच्चों के आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होने की भी आशंका होती है। पुलिस रिकार्ड के अनुसार देश में हर साल 48 हजार बच्चे गायब होते हैं। उनमें से आधे कभी नहीं मिलते हैं। उन बच्चों में से काफी बच्चे भीख मंगवाने वाले गिरोहों के हाथों में पड़ जाते हैं। हर साल हजारों गायब बच्चे भीख के धंधे में झोंक दिये जाते हैं।
भारत में ज्यादातर बाल भिखारी अपनी मर्जी से भीख नहीं मांगते। वे संगठित माफिया के हाथों की कठपुतली बन जाते हैं। इन बच्चों के हाथों में स्कूल की किताबों की जगह भीख का कटोरा आ जाता है। भारत में भीख माफिया बहुत बड़ा उद्योग है। इससे जुड़े लोगों पर कभी आंच नहीं आती। हमारे देश की सबसे बड़ी प्राथमिकता बाल भिखारियों पर रोक लगाना होनी चाहिए। इसके लिए सामाजिक भागीदारी की जरूरत है। सामाजिक भागीदारी की बदौलत ही केंद्र और राज्यों की सरकारों पर बाल भिखारियों को रोकने के लिए दबाव डाला जा सकेगा। इस दबाव के कारण सरकारें अपने-अपने स्तर पर कार्रवाई करें, तो इस समस्या पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।
आज देश में भिखारियों को काम में लगाये जाने की आवश्यकता है। और कुछ नहीं तो रोजाना दो वक्त का मुफ्त खाना देकर इन सारे भिखारियों को विभिन्न प्रकार का प्रशिक्षण देकर सरकार के रोजगार परक अभियानों से जोड़ा जाना चाहिए। सरकार द्वारा चलाये जा रहे कौशल विकास कार्यक्रम से भिखारियों को स्वरोजगार परक प्रशिक्षण दिलवाकर इनको रोजगार से जोड़े तो इससे भीख मांगने की प्रवृति पर रोक लग सकती है।
भिखारियों के पुनर्वास के लिए सरकार को प्रयत्नशील रहना चाहिए। सामाजिक चेतना को बढ़ावा देना चाहिए। समाज को जागरूक बनाना चाहिये तभी हम साफ-सुथरा भारत बना सकेगें व भिक्षावृति जैसे अमानवीय कार्य से देश व समाज को छुटकारा दिला पायेंगे। समाज को सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर काम करना होगा। तभी देश में भिखारियों का पुनर्वास कर उन्हे समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जा सकेगा।
2018 में सामाजिक कल्याण मंत्री थावरचंद गहलोत ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि देश में कुल 4 लाख 13 हजार 760 भिखारी हैं। जिनमें 2 लाख 21 हजार 673 भिखारी पुरुष और बाकी महिलाएं हैं। भिखारियों की इस सूची पश्चिम बंगाल पहले नंबर पर है। बंगाल में भिखारियों की संख्या सबसे अधिक है और उसके बाद दूसरे स्थान पर है उत्तर प्रदेश और तीसरे पर बिहार है। मगर वास्तविकता में देष में भिखारियों की संख्या इनसे कई गुणा अधिक है।
हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने भिक्षावृत्ति को अपराध घोषित करने वाले कानून बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट, 1959 की 25 धाराओं को समाप्त कर दिया है। साथ ही भिक्षावृत्ति के अपराधीकरण को असंवैधानिक करार दिया है। बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट, 1959 की कुछ धाराओं में फेरबदल कर दिल्ली हाई कोर्ट ने ऐसे गरीब लोगों के जीवन जीने के अधिकार की रक्षा का एक सार्थक प्रयास किया है।

आपदा को अवसर में परिवर्तित करता अन्नदाता अब आत्मनिर्भरता की ओर
नरेन्द्र सिंह तोमर
देश अपनी आजादी के 75 वर्ष पूर्ण करने से दो कदम दूर है। लगभग साढ़े सात दशक का यह सफर अब आत्मनिभर्रता की उस मंजिल की ओर तीव्रगति से अग्रसर है जहां देश के 130 करोड़ नागरिकों को खुद के भारतवासी होने पर गौरव अनुभव हो। हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने स्वतंत्रता की 74 वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से अपने भाषण में आगामी दो वर्षों में बड़े संकल्प धारण करने और उन्हें पूर्ण करने का मंत्र देते हुए राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़े होने का आव्हान किया है। प्रधानमंत्री जी के आत्मनिर्भर भारत के इस शंखनाद में भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र को सबसे अधिक प्रधानता मिली है। किसानों के अथक परिश्रम से परिलक्षित हो रहे परिणाम सुखद संकेत दे रहे है कि कृषि क्षेत्र और उससे जुड़े उद्यम प्रधानमंत्री जी के आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को अर्जित करने की दिशा में तेजी से कदमताल करने लगे हैं।
कोरोना संकट काल में देश की अर्थव्यवस्था को अन्नदाता के परिश्रम का संबल मिला है। चालू वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल से जून 2020) में देश के सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) की दर में कृषि क्षेत्र में 3.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह स्थिति बताती है कि कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण भले ही वैश्विक स्तर पर उद्योग-धंधे प्रभावित हुए हों लेकिन भारत के कृषि क्षेत्र ने इन विपरीत परिस्थतियों में भी अपेक्षा से बहुत बेहतर कार्य किया है । आपदा को अवसर में बदल देने की भारतीय जीवन शैली की अद्भुत क्षमता का परिचय कोरोना संकटकाल में देश के किसानों ने अपने परिश्रम से दिया है। किसान भाइयों की इसी सक्रियता के माध्यम से ही लाकडाउन की अवधि में भी गांवों की अर्थ व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रही, और इससे देश की अर्थव्यवस्था को जो सहारा मिला वह जीडीपी के ताजा आंकड़ो में स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है।
कोविड-19 के संकट काल में किसानों के परिश्रम को सार्थक परिणाम तक पहुंचाने में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के मार्गदर्शन में भारत सरकार के कृषि मंत्रालय, कृषि विज्ञानियों-अधिकारियों एवं राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कृषि मंत्रालय ने लाकडाउन की घोषणा के तत्काल बाद कृषि उत्पादों की खरीद, मंडी संचालन, खेत-खलिहान में किसानों के कार्यों, उर्वरको-कीटनाशकों और बीजों के विनिर्माण एवं पैकेजिंग यूनिट्स को छूट देने का मामला गृह मंत्रालय के सामने उठाया और इस छूट के माध्यम से ही लाकडाउन में कृषि कार्य निर्विघ्न चलते रहे। किसानों को कस्टम हायरिंग केंद्र के माध्यम से फार्म मशीनरी उपलब्ध कराना हो या फसल कटाई के लिए हारवेस्टरों को एक राज्य से दूसरे राज्यों में प्रवेश का मामला हो, किसानों के हित में सारे प्रावधान किए गए। मैंने कोविड -19 लॉकडाउन के दौरान देशभर के किसान भाइयों को पत्र लिखकर उन्हें निवेदन किया था कि वे इस संकट के दौर में भी खेती-किसानी का का काम लगातार जारी रखे, सरकार उन्हें हरसंभव मदद करेगी।
कोविड लाकडाउन के दौरान किसानों के उत्पादों की निर्बाध खरीद सुनिश्चित करने के लिए सरकार की व्यवस्थाओं का ही परिणाम है कि इस वर्ष समर्थन मूल्य पर बंपर खरीद हुई है। लाकडाउन में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के लिए जहां खरीद केंद्रों की संख्या विगत वर्ष से दो गुना कर दी गई तो वहीं किसानों का खरीद केंद्र में आगमन का समय नियत कर एक-एक करके बुलाया गया। किसानों को दलहन और तिलहन की खरीद के लिए एमएसपी भुगतान के रूप में कुल 14,127 करोड़ रुपए भुगतान किए गए हैं, जोकि विगत वर्ष की तुलना में 62 प्रतिशत अधिक है, पिछले वर्ष यह राशि 8,715 करोड़ रुपए थी। खरीद किए गए दलहन-तिलहन की मात्रा में ढाई गुना की वृद्धि हुई है। इस वर्ष रबी के मौसम के दौरान 3.9 करोड़ मीट्रिक टन गेंहू की खरीद पर 75000 करोड़ रुपए का एमएसपी भुगतान किसानों को किया गया जब कि विगत वर्ष 3.4 करोड़ मीट्रिक टन की खरीद पर इस अवधि के दौरान 63000 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया था। इसके अतिरिक्त 1.33 करोड़ मीट्रिक टन धान की खरीद पर 24000 करोड़ रुपए का भुगतान किसानों को किया गया जबकि विगत वर्ष 0.83 करोड़ मीट्रिक टन धान की खरीद पर 14800 रुपए का भुगतान किया गया था। इस तरह कुल देखा जाए तो इस वर्ष रबी मौसम के दौरान समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए किसानों को पिछले वर्ष की तुलना में 32 प्रतिशत अधिक धनराशि का भुगतान किया गया है।
खाद्यान्न में हमारी आत्मनिर्भरता सुखद भविष्य के संकेत दे रही है। खाद्यान्न उत्पादन के अंतिम आंकलन के अनुसार भारत ने 2018-19 में कुल उत्पादन 285.21 मिलियन टन उपलब्धि हासिल की है। 2019-20 के तीसरे अग्रिम अनुमानों के अनुसार खाद्यान्न उत्पादन 296.50 मिलियन टन अनुमानित है जो अब तक का सर्वाधिक है। वर्ष 2019-20 के दूसरे अग्रिम अनुमान में कुल बागवानी उत्पादन उत्पादन 320.48 होने का अनुमान है जबकि 2018-19 में यह 310.70 मिलियन टन अनुमानित था। यानि विगत वर्ष से 3.13 प्रतिशत ज्यादा बागवानी उत्पादन हुआ है और यह भी अब तक का सर्वाधिक है।
कोविड लाकडाउन के दौरान ई-नाम नेटवर्क के अंतर्गत 415 मंडियों को जोड़ा गया है। अब देश की लगभग एक हजार मंडिया ई-नाम नेटवर्क से जुड़ गई हैं। लाकडाउन में किसानों ने इस आनलाइन प्लेटफार्म का उपयोग किया है। 1.67 करोड़ किसान ई-नाम प्लेटफार्म पर पंजीकृत हैं और उन्होंने एक लाख करोड़ रुपएसे अधिक का रिकार्ड व्यापार किया है। कोरोना काल के दौरान किसानों और व्यापारियों को परिवहन वाहनों को भाड़े पर लेने के लिए शुरू किए गए किसान रथ मोबाइल एप ने भी किसानों की सुगमता को बढ़ाया है। 236230 किसान और लगभग 87लाख से अधिक व्यापारी इस मोबाइल एप पर रजिस्टर्ड हैं। 11 लाख से अधिक वाहनों से जुड़े इस एप के माध्यम से किसान को घर बैठे परिवहन वाहन की सुविधा मिल रही है।
कोविड महामारी के दौरान रबी फसल का बंपर उत्पादन, उसकी कटाई और समर्थन मूल्य पर खरीद ने किसानों की समृद्धता में तो वृद्धि की ही है, राष्ट्र के खाद्यान्न भंडार को भर दिया है। कोविड महामारी दौरान भी धान सहित खरीफ की अन्य फसलों की रिकॉर्ड बुवाई के लिए भारत के अन्नदाता किसानों का अभिनन्दन करता हूं।
वर्तमान खरीफ मौसम 2020 में, रिकॉर्ड 1095.38 लाख हेक्टेयर ( 4 सितंबर 2020 तक) क्षेत्र को कवर किया गया है जो 2019 की तुलना में इस समय तक हुई बुवाई से 65 लाख हेक्टेयर अर्थात 6.32 प्रतिशत अधिक है। खरीफ 2019 के दौरान कुल कवरेज 1069.5 लाख हेक्टेयर था, जबकि पिछला रिकॉर्ड कवरेज खरीफ 2016 के दौरान 1075.71 लाख हेक्टेयर था। विगत वर्ष की तुलना में धान में 8.27 प्रतिशत, दलहन में 4.67 प्रतिशत, मोटे अनाज में 1.77 प्रतिशत, तिलहन में 11.93 प्रतिशत, गन्ना में 1.30 प्रतिशत, कपास में 3.24 प्रतिशत और जूट एवं मेस्टा में 3.24 प्रतिशत की बुवाई में वृद्धि देश के खाद्यान्न भंडार में अभूतपूर्व वृद्धि के सुखद संकेत दे रहे हैं। धान की बुवाई कुछ राज्यों में अभी भी जारी है, जबकि दलहन, मोटे अनाज, बाजरा और तिलहन की बुवाई लगभग खत्म हो गई है। हम आश्वस्त हैं कि 2020-21 के दौरान कुल खाद्यान्न उत्पादन का आंकड़ा 298.32 मिलियन टन पार कर जाएगा। इसमें खरीफ मौसम से प्राप्त किया जाने वाला 149.92 मिलियन टन है। खरीफ सीजन में रिकार्ड बुवाई होने पर हाल ही में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने मन की बात कार्यक्रम में देश के किसानों को बधाई देते हुए उनका वंदन किया है।
ग्रीष्म कालीन जायद मौसम में भी इस वर्ष इस समय तक बुवाई का क्षेत्रफल 57.07 लाख हेक्टेयर था जबकि पिछले वर्ष इस मौसम के दौरान 41.31 लाख हेक्टेयर में बुवाई की गई थी। इस वर्ष अभी तक 389.81 लाख हेक्टेयर में धान की रोपाई की जा चुका है जो कि गत वर्ष इस समय तक के 354.41 लाख हेक्टेयर से लगभग 10 प्रतिशत अधिक है।
किसानों के परिश्रम के बाद भी यह देखा जाता रहा है कि परिणाम उनके अनुरूप नहीं मिलते रहे है। कृषि के क्षेत्र में अब तक सर्वाधिक बाधाएं रहीं है। तीन माह पूर्व भारत सरकार द्वारा दो अध्यादेशों एवं नियमों के सरलीकरण से इस दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन की राह खुली है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की दूरदर्शिता, दृढ़ संकल्पशक्ति और किसानों की आय दो गुना करने का ध्येय इन परिवर्तनों में सुस्पष्ट हो रहा है। कृषि उत्पाद व्यापार और वाणिज्य संवर्धन एवं सरलीकरण अध्यादेश 2020 से किसानों को मंडियों से आजादी मिल गई है। अब वे अपना उत्पाद देश में कहीं भी बेच सकते हैं। वहीं किसान-सशक्तिकरण और संरक्षण- मूल्य आश्वासन पर करार और फार्म सेवाएं अध्यादेश 2020 के माध्यम से किसान बुवाई से पहले ही अपनी फसल के दाम तय कर सकेगा। कांट्रेक्ट फार्मिंग से किसानों को सुनिश्चित दाम मिलेंगे जिससे उनकी आय में वृद्धि होना तय है। सरकार के इन निर्णयों से बिचैलिए खत्म हो जाएंगे और किसानों को सीधा लाभ पहुंचेगा।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत एक लाख करोड़ रुपए के कृषि अवसरंचना फंड ऐतिहासिक प्रावधान किया है। कृषि में सरकारी निवेश तो सदैव रहा है लेकिन निजी निवेश बहुत कम है, और यदि यह आया भी है तो गांवों की जगह जिला मुख्यालयों या बड़े शहरों तक सीमित है। हमारा उद्देश्य है कि गोदाम, कोल्ड स्टोरेज और अन्य अवंसरचनाएं किसानों को उनके गांव में मिल सके। इस फंड के माध्यम से यह उद्देश्य पूर्ण हो पाएगा और किसानों को भंडारण व प्रसंस्करण करने पर फसल के बेहतर दाम मिल सकेंगे। निजी निवेश गांव तक पहुंचेगा और गांव के साथ खेती-किसानी भी नए युग की ओर अग्रसर हो जाएगी।
देश में दस हजार किसान उत्पादक संघ एफपीओ के गठन से छोटे एवं मझोले किसानों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचेगा। मंडी तक अपनी फसल ले जाने में अक्षम किसानों को उनकी फसल के उचित दाम तो मिलेंगे ही उन्हें खाद, बीज और सिंचाई की सुविधाएं भी सहजता से उपलब्ध हो सकेगी। किसान एफपीओ के माध्यम से क्लस्टर में खेती करेंगे तो उनके उत्पाद की गुणवत्ता और दाम दोनों बढ़ना तय है। सरकार के इन निर्णयों ने देश के कृषि सेक्टर की दशा और दिशा ही बदल दी है। किसानों के परिश्रम का एक-एक पैसा उन्हें मिले इसके लिए सरकार कृत संकल्पित है।
कृषि के क्षेत्र में बढ़ती हमारी आत्मनिर्भरता और किसानों के चेहरों पर आती समृद्धि की मुस्कान के पीछे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की दृढ़संकल्प शक्ति, भविष्य को भांप कर निर्णय लेने की क्षमता एवं कृषकों की आय दोगुना करने का पवित्र संकल्प है। जब देश स्वतंत्रता की 75 वीं सालगिरह मना रहा होगा तो पूरी उम्मीद है कि किसानों के खेत में लहलहाती फसलों में आत्मनिर्भरता के पुष्प पल्लवित हो रहे होंगे।
(लेखक- मंत्री, कृषि एवं किसान कल्याण, पंचायती राज और ग्रामीण विकास, भारत सरकार हैं)

क्या वाकई खतरे में भारत का लोकतंत्र और संविधान ..?
डॉ अजय खेमरिया
संवैधानिक संस्थाएं औऱ लोकतंत्र 2014 से पहले कभी खतरे में क्यों नही थे ? अचानक ऐसा क्या हुआ है कि देश भर में एक वर्ग ऐसा वातावरण बनाने में जुटा है मानों भारत में कोई तानाशाही राज आ गया है। दुहाई लोकतंत्र की जा रही है लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया या संवैधानिक प्रावधानों पर खुद ही इस तबके को भरोसा नही है।असल में यह भारत के नए समावेशी लोकतंत्र को अस्वीकार करने का सामंती प्रलाप भर है।देश की संसदीय राजनीति और संवैधानिक संस्थाओं को अपनी एकपक्षीय विचारसरणी से संचालित करने वाला कतिपय उदारवादी बौद्धिक जगत नए भारत की व्यवस्थाओं से बेदखल होता जा रहा है। यह बेदखली भी पूर्णतः लोकतांत्रिक प्रक्रिया के धरातल पर हो रही है।भारत के आत्मगौरव को कुचलकर अल्पसंख्यकवाद और तुष्टीकरण पर खड़ी की गई भारतीय शासन औऱ राजनीति की व्यवस्थाओ के कमजोर होने से जिहादी बौद्धिक गिरोह अब उन्ही संस्थाओं को निशाने पर ले रहा है जो कभी इनके एजेंडे को आगे बढ़ाने में सहायक थी।
वकील प्रशांत भूषण के ताजा अवमानना प्रकरण को बड़े व्यापक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है।यह प्रकरण महज एक अवमानना भर का नही है बल्कि वामपंथ एवं कांग्रेस विचारधारा का बिषैला औऱ भारत विरोधी चेहरा भी उजागर करता है।सुप्रीम कोर्ट से सजा सुनाएं जाने के बाद “स्वराज अभियान” के योगेंद्र यादव ने “कैम्पेन फ़ॉर ज्यूडिशियल अकाउंटबिलिटी एंड रिफॉर्म” शुरू करने का एलान किया। इस अभियान में अभिव्यक्ति की आजादी को बचाने के लिए देश भर से एक एक रुपया एकत्रित करने का भी आह्वान है।योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की राजनीतिक प्रतिबद्धता किसी से छिपी नही है।सवाल यह उठाया जा सकता है कि देश में करोड़ों मुकदमें बर्षों से लंबित है लेकिन अकाउंटबिलिटी का सवाल इस अर्थ में पहले नही उठाया गया। भूषण एन्ड कम्पनी खुद देश की सर्वोच्च अदालत को अपने दबाब में लेती रही है।किसी भी मामले में जब इन्हें मनमाकिफ़ निर्णय की उम्मीद नही होती तो सुनियोजित तरीके से बाहर आकर कोर्ट और जज के विरुद्ध चिल्लाने लगते है और जब फैक्ट के आधार पर निर्णय आ जाते है तब यही भूषण खुद को गांधी बनाने में जुट जाते है।समस्या इस बार जस्टिस अरुण मिश्रा को लेकर इसलिए खड़ी की गई क्योंकि वे भूषण के दबाब में नही आये।जस्टिस मिश्र की कोर्ट में भूषण के अधिकतर मामले लिस्टेड होने पर देश का सुप्रीम कोर्ट आखिर खराब हो जाता है लेकिन तथ्य यह है कि प्रशांत भूषण जब गुजरात दंगों या अमित शाह से जुड़े मामले जस्टिस आफताब आलम के यहां लिस्टेड कराते रहे तब सुप्रीम कोर्ट निष्पक्ष औऱ स्वतंत्र होता था? । प्रशांत भूषण जिन संस्थाओं से सीधे और परोक्ष रूप से जुड़े है उनकी मानसिकता बीजेपी और आरएसएस ही नही भारत की संप्रभुता के भी विरुद्ध है।जाहिर है अभिव्यक्ति की आजादी या न्यायिक जबाबदेही के उठाये गए सवाल देश हित से जुड़े न होकर एक घोषित एजेंडे का क्रियान्वयन भर है।इसलिए सवाल यह है कि क्या वाकई देश में संवैधानिक संस्थाएं औऱ लोकतंत्र संकट में है ? क्या प्रशांत भूषण,राजीव धवन या राहुल गांधी और उनके साथ समवेत एकेडेमिक्स ही सुप्रीम कोर्ट के रखवाले है?इन सवालों को हमें इतिहास और वर्तमान के बदले हुए वातावरण में भी देखना चाहिये।तथ्य यह है कि 2014 के बाद यानी केंद्र में नरेन्द्र मोदी को जनता द्वारा सत्ता सौंपने के साथ ही बौद्धिक राजनीतिक जगत में इस जनादेश को ही खारिज करने के सतत प्रयास चल रहे है। देश में जनता पार्टी,सयुंक्त मोर्चा,औऱ यूपीए की सरकारें भी रही लेकिन सवाल केवल मोदी सरकार के वोट परसेंट पर उठाया जाता है। तब भी जब 2019 में जनता ने 2014 से बड़ा बहुमत मोदी को सौंपा है।असल में संसदीय राजनीति की पारदर्शी प्रक्रिया के जरिये भारत विरोधी तत्व जनता की अदालत से अलग थलग हो रहे है।जाति,सम्प्रदाय और क्षेत्रीयता के साथ अल्पसंख्यकवाद की चुनावी राजनीति लगातार हासिए पर आ पहुँची है, भारत के जिहादी बौद्धिक जगत (एकेडेमिक्स)को इस जमीनी स्थिति ने परेशान कर दिया है। यह वर्ग लंबे समय से भारतीय शासन और राजनीति का नियामक बना रहा है।प्रशांत भूषण घटनाक्रम इसी नियामकीय अस्तित्व के संकट की हताशा है।सुप्रीम कोर्ट भारत के लोकतंत्र का प्रधान पहरेदार है और इसे जनता की दृष्टि में विवादित करके मोदी सरकार के नीतिगत निर्णयों पर अराजकता पैदा करना ही भूषण एन्ड कम्पनी का असली मन्तव्य है ।वातावरण बनाया गया है कि मोदी सरकार ने कोर्ट,चुनाव आयोग,संसद,कार्यपालिका,विश्विद्यालय,मीडिया को दबाब में ले लिया है।दावा किया जाता है कि लोग सरकार के भय से बोल नहीं पा रहे है।
सुप्रीम कोर्ट ने लॉक डाउन के दौरान मोदी सरकार के विरुद्ध याचिकाएं लेकर आये प्रशांत भूषण को चेतावनी जारी कर कहा था कि आप पीआईएल लेकर आये है या पब्लिसिटी याचिका। कोर्ट ने यहां तक कहा कि यह नहीं चल सकता है कि हम आपके मन मुताबिक निर्णय दें तो ठीक, नही दें तो कोर्ट पक्षपाती है। सच्चाई यह है कि राममंदिर,राफेल ,सुशांत सिंह तीन तलाक,पीएम केयर फ़ंड,सीएए,अनुच्छेद 370, पर सुप्रीम अदालत के निर्णय मोदी विरोधियों के मन मुताबिक नही हुए। सामाजिक कार्यकर्ता के वेष में सक्रिय लोगों का बड़ा तबका इस स्थिति से परेशान है।एक धारणा गढ़ी जा रही है कि “जज” डरे हुए है, भयादोहित है।लोकतंत्र खतरे में है और यह देश मे पहली बार हो रहा है।
हकीकत यह है कि 2014 के बाद से देश मे अभिव्यक्ति की आजादी और संवैधानिक संस्थाओं की अक्षुण्णता प्रखरता से बढ़ी है। अतीत में भारत की न्यायिक आजादी को खंगालने की कोशिशें करें तो पता चलता है कांग्रेस औऱ प्रशांत भूषण जैसे गिरोहों ने कोर्ट्स को सदैव सत्ता की पटरानी बनाने के प्रयास किया है।जिन जजों ने अतीत में कांग्रेस सरकारों की बादशाहत को चुनौती दी उन्हें अपमानित कर ठिकाने लगा दिया गया। जबकि सुप्रीम कोर्ट में पदस्थ रहते हुए प्रेस कांफ्रेंस करने वाले जस्टिस रंजन गोगोई मोदी दौर में ही चीफ जस्टिस बने। इंदिरा गांधी ने तो खुलेआम बहुमत के बल पर प्रतिबद्ध न्यायपालिका और ब्यूरोक्रेसी को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता घोषित किया था।
केशवानंद भारती मामला भारत में लोकतंत्र की हत्या कर इंदिरागांधी द्वारा न्यायाधीश को भयादोहित ,नियंत्रित और कब्जाने की नजीर है।इसकी चर्चा एकेडेमिक्स कभी नही करना चाहते है।
24 अप्रेल 1973 की तारीख को इस केस में निर्णय हुआ।68 दिन जिरह हुई। इंदिरा सरकार ने एड़ी चोटी का जोर लगाया लेकिन वह सुप्रीम कोर्ट में शिकस्त खा गई।भारत के न्यायिक इतिहास में पहली बार 13 जजों की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। 7-6 के बहुमत से निर्णय हुआ कि संसद को संविधान संशोधन का अधिकार तो है लेकिन “आधारभूत सरंचना”बेसिक स्ट्रक्चर से छेड़छाड़ नही की जा सकती है।संवैधानिक सर्वोच्चता,विधि का शासन,कोर्ट की अक्षुण्य आजादी,संसदीय शासन,निष्पक्ष संसदीय चुनाव,गणतन्त्रीय ढांचा,सम्प्रभुता आधारभूत ढांचे में परिभाषित किये गए।इनमें किसी भी प्रकार के संशोधन निषिद्ध कर दिये गए।
13जजों की पीठ में 7 जज फैसले के पक्ष में थे इनमें मुख्य न्यायाधीश एस एम सीकरी,के एस हेगड़े,एके मुखरेजा,जे एम शेलाट, एन एन ग्रोवर, पी जगनमोहन रेड्डी,और एच आर खन्ना।6 जज सरकार के साथ थे जस्टिस ए एन राय,डीजी पालेकर,के के मैथ्यू, एच एम बेग,एस एन द्विवेदी और वाय चन्द्रचूड़।
इस निर्णय से नाराज इंदिरा गांधी के दफ्तर से 25 अप्रेल 1973 को जस्टिस एन एन राय के घर फोन की घण्टी बजती है।क्या उन्हें नए सीजेआई का पद स्वीकार है? जबाब देने के लिए मोहलत मिली सिर्फ दो घण्टे की।
26 अप्रेल 1973 को जस्टिस ए एन राय को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया जाता है तीन सीनियर जज जस्टिस शेलट, ग्रोवर और हेगड़े को दरकिनार कर दिया गया।ये तीनों जज उन 7 जजों में थे जिन्होंने सरकार को असिमित संविधान संशोधन देने से असहमति व्यक्त की थी।क्या ऐसी परिस्थितियां आज मोदी सरकार ने निर्मित की है?
1975 में इंदिरा गांधी ने 39 वा औऱ 41वा संवैधानिक संशोधन कर कानून बनाया था कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति,प्रधानमंत्री,स्पीकर के चुनाव को कोर्ट में किसी भी आधार पर न चैलेंज किया जा सकता न कभी उन पर कोई मुकदमा दर्ज होगा।क्या यह संविधान को खूंटे पर टांगने जैसा नही था।हालाकि
केशवानंद केस के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों संशोधन को खारिज कर दिया था।1975 में एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला केस आपातकाल में मौलिक अधिकारों की बहाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा था।पांच जजों की पीठ ने 4-1के बहुमत से सरकार के पक्ष में निर्णय दिया।अकेले जस्टिस एच आर खन्ना ने सरकार से असहमत होते हुए निर्णय लिखा।
जस्टिस खन्ना सबसे सीनियर थे लेकिन इस निर्णय के चलते इंदिरा गांधी के निशाने पर आ गए ।उन्हें सुपरसीड करते हुए एम एच बेग को भारत का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया।
एच एम बेग केशवानंद केस में भी सरकार के साथ खड़े थे।इसलिए उन्हें भी जस्टिस राय की तरह स्वामी भक्ति का इनाम मिला।वहीं जस्टिस खन्ना उस केस में भी सरकार के विरूद्ध थे।इसलिए उन्हें सजा दी गई। क्या इन हरकतों से तब संविधान की सर्वोच्चता खण्डित नही हुई थी?
बेग 1978 तक सीजेआई रहे फिर 1981 से 1988 तक अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष और वहां से हटने के बाद कांग्रेस के मुखपत्र दैनिक हेराल्ड के संचालक बने।
बहरूल इस्लाम के किस्से तो सबको पता ही है कि उन्हें जब चाहा सांसद जब चाहा हाईकोर्ट जज जब चाहा सुप्रीम कोर्ट जज बना दिया गया।
2010 से 2014 के मध्य जस्टिस अरुण मिश्रा वरिष्ठतम हाईकोर्ट जज होने के बाबजूद सुप्रीम कोर्ट में नामित नही किये गए तब किसी ने इस मुद्दे को नही उठाया लेकिन उत्तराखंड हाईकोर्ट में पदस्थ जूनियर जज के एम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट में एलिवेट करने पर मोदी सरकार ने आपत्ति ली तब पूरे एकेडेमिक्स भूषण जैसे लोगों के साथ न्यायपालिका की आजादी का रुदाली रुदन बजाने लगे।ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि जोसेफ अल्पसंख्यकवाद के प्रतीक थे।ऐसे ही तमाम पापों से वाकिफ होने के लिए हमें
जस्टिस जगनमोहन रेड्डी की किताब “वी हैव रिपब्लिक” का अध्ययन करना चाहिये जिसमें
बताया गया है कि इंदिरा के कानून मंत्री रहे एच आर गोखले और इस्पात मंत्री कुमार मंगलम कैसे जजों को उस दौर में धमकाते थे।
कैसे अभिषेक मनु सिंघवी के शयन कक्ष से हाईकोर्ट जज निकलते है यह जप्त स्टिंग में आज भी रहस्य ही है। पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्रा बकायदा कांग्रेस के टिकट से राज्यसभा में विराजे।जबकि रंजन गोगोई तो नामित कोटे से सदस्य बने हैं। श्री मिश्रा के भतीजे तमाम आरोपों के बाद सीजेआई तक बनने में सफल रहे।
जस्टिस आफताब आलम और गुजरात दंगों की झूठी कहानियां गढ़ने वाली तीस्ता सीतलवाड़ की युगलबंदी न्यायिक इतिहास का शर्मनाक स्कैण्डल है। हिमाचल के पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह की बेटी जस्टिस अभिलाषा सिंह ने गुजरात हाईकोर्ट और आफताब आलम द्वारा सुप्रीम कोर्ट में गुजरात दंगों पर दिए निर्णय प्रतिबद्ध न्यायपालिका का बदनुमा उदाहरण है।
आतंकी अफजल की फांसी टालने के लिए भूषण एन्ड कम्पनी के आग्रह पर आधी रात को खुलता सुप्रीम कोर्ट सेक्युलर था,गुजरात दंगों,शोहरबुद्दीन,इशरत जहां,के मामलों में भी कोर्ट अच्छे थे क्योंकि निर्णय मोदी,अमित शाह के विरुद्ध और लिबरल गैंग के एजेंडे के अनुरूप थे।लेकिन मनमाकिफ़ निर्णय न होने पर कोर्ट पक्षपाती औऱ डरे हुए हो गए यह आम भारतीय भी अब समझ गया है।बहुमत के बल पर तानाशाही का एक भी उदाहरण मोदी सरकार के साथ नही जुड़ा है जबकि इंदिरा औऱ राजीव गांधी के कार्यकाल सामाजिक न्याय से जुड़े बीसियों न्यायिक निर्णयों को पलटने के रहे है।कमोबेश यही वातावरण चुनाव आयोग और ईवीएम को लेकर बनाया जाता रहा है ।हाल ही में दिग्विजयसिंह ने फिर कहा है कि 2024 में देश मे आखिरी चुनाव होंगे और यह भी ईवीएम के जरिये जीते जायेंगे इसके बाद भारत में कभी चुनाव नही होंगे।इस तरह की दलीलें केवल संसदीय आरोप प्रत्यारोप तक सीमित नही है बल्कि यह लोकतंत्र पर भी सीधा आघात है।
मीडिया का वह दौर याद किया जाना चाहिये जब गुजरात दंगों के बाद मोदी को भारतीय मीडिया ने एक खलनायक की तरह विश्व भर में स्थापित कर दिया था।आज भी भारत में मोदी और उनकी नीतियों के आलोचक स्वतन्त्रता के साथ अपनी बात कहते है।टेलीग्राफ,हिन्दू जैसे अखबार रोजाना मोदी की खिलाफत में खड़े रहते है।वर्चुअल स्पेस पर द वायर,प्रिंट,जनचौक,सत्याग्रह,क्विंट,क्लिक,कारंवा,तहलका,जैसे तमाम पोर्टल बेधड़क अपना मोदी विरोधी एजेंडा चला रहे है। आपातकाल का दंश देने वालों को इसके बाबजूद अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में नजर आती है तो इसके निहितार्थ हमें समझने होंगे।शाहीन बाग से लेकर जेएनयू,एमएमयू,जामिया में देश को तोड़ने तक की तकरीरें खुलेआम दी जाती है फिर भी भारत मे एक वर्ग को डर लगता है।इस गिरोह में दस वर्ष उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी जैसे लोग भी शामिल है ।सच तो यह है कि संवैधानिक संस्थाओं औऱ लोकतंत्र को जेबी बनाने के उपक्रम मोदी दौर से पहले बड़ी ही ठसक के साथ होतें रहे है।1975 का आपातकाल हो या 356 के जरिये संघीय ढांचे को खत्म करना।कांग्रेस और वामपंथ ने देश की जनभावनाओं का कभी ख्याल नही रखा।आज अभिव्यक्ति की चरम आजादी के माहौल में लिबरल्स ने अपने सुगठित एवं विस्तृत सूचना एवं प्रचार तन्त्र से ऐसा माहौल बनाने की कोशिशें की है जो मिथ्या,मनगढ़ंत औऱ फर्जी है।
सुखद पक्ष यह भी है कि देश की अधिसंख्य जनता आज भूषण सरीखे उदारवादियों के वास्तविक एजेंडे को समझ चुकी है।

भविष्य की चिन्ता : चिंतनीय अर्थव्यवस्था; विश्वमंदी का बहाना कब तक…!
ओमप्रकाश मेहता
राजनैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक क्षेत्रों से सम्बंधित फैसलों से राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर परर चाहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी की जय-जयकार हो रही हो, किंतु आर्थिक मोर्चे पर मोदी जी और उनकी सरकार हमेशा निशाने पर रही है। हाल ही में इस वर्ष (2020) की प्रथम तिमाही के जो आंकड़े सामने आए है, उन्होंने हमारे देश के लोगों को ही नहीं, हमारे हित चिंतक देशों की सरकारों को भी चिंता में डाल दिया है। हाल ही में इस वर्ष की प्रथम तिमाही (जनवरी से मार्च 2020) के जो जीडीपी दर की रिपोर्ट सामने आई है, वह अत्यंत चैंका देने वाली है, पिछले चैबीस सालों में, अर्थात इस नई सदी में पहली बार हमारी विकास दर पाताली स्तर अर्थात माईनस 23.9 प्रतिशत तक पहुंच गई और साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अभी भी हम नही चैते तो अगले वर्ष यह विकास दर लगभग ग्यारह फीसदी और गिर सकती है, अगले वित्त वर्ष का यह अनुमान पिछली बार के अनुमान से 4.1 फीसदी ज्यादा है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगले साल स्थिति और बत्तर होने का अनुुमान है, आशंका व्यक्त की जा ही है मौजूदा तिमाही (अप्रैल से जून 2020) में भी जीडीपी वृद्धि दर नकारात्मक रही तो देश भीषण मंदी की चपेट में आ जाएगा।
ऐसा कतई नहीं है कि सरकार को इस स्थिति की चिंता नही है, किंतु वह यह बहानेबाजी करके इस चिंता का भार कम कर रही है कि ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मंदी का दौर है, ऐसे में भारत उससे अछूता कैसे रह सकता है’’ क्या हमें अब हमारी अर्थव्यवस्था में सुधार के प्रयास भी दूसरे देशों का अनुकरण कर शुरू करना पड़ेगें? जबकि वास्तविकता यह है कि मौजूदा नरेन्द्र भाई मोदी की सरकार ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 खत्म कने, देश के अल्पसंख्यक परिवारों से तलाक प्रथा खत्म करने और अयोध्या राम मंदिर जैसे मसलों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखा और इन समस्याओं के समाधान किए जो राजनीति (370), तलाक खात्मा (सामाजिक) व अयोध्या राम मंदिर (धार्मिक) चेतनाओं से जुड़े थे। देश की आर्थिक स्थिति सुधारने को लेकर नोटबंदी जैसे प्रयास अवश्य किए गए, किंतु उनसे देश परेशान ही हुआ, उसे आर्थिक राहत हासिल नही हो पाई। यही स्थिति देश में बेरोजगारी की है। चुनावी घोषणा पत्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने प्रतिवर्ष एक करोड़ बेरोजगार युवकों को रोजगार देने की बात कही थी, जो अन्य चुनावी मुद्दों की तररह गंभीरता से पूररा करने की कोशिशें की जाती तो पिछले छः सालों में छः करोड़ युवा बेरोजगारों को रोजगार मिल जाता, किंतु आर्थिक क्षेत्र से जुड़ी इस अहम् समस्या पर भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया जिसके कारण देश में बेरोजगार शिक्षित युवाओं की संख्या दिन दूनी, रात चैगुनी बढ़ती ही जा रही है और सरकार अभी भी आर्थिक क्षेत्र के प्रतिपूरी तरह लापरवाही बरत रही है, इस सरकार की इसी लापरवाही के कारण हमारे देश के अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री सरकार के प्रति कई बार भीषण नाारजी व्यक्त कर चुके है। हमारे इन अर्थशास्त्रियों को सबसे बड़ी चिंता उन अनुुमानों को लेकर है, जिनमें कहा जा रहा है कि अगले वर्ष हमारी विकास दर मौजूदा मायनस दर से दस अंक और मायनस तक पहुंच जाएगी।
अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या अरूण जैटली जी के स्वर्ग सिधारने के बाद भाजपा के पास कोई ऐसा अर्थशास्त्री वित्तमंत्री नहीं रहा जिससे अर्थशास्त्र के सिद्धांतों का थोड़ा भी ज्ञान हो? या सरकार या उसके मुखिया स्वयं ही नहीं चाहते कि देश आर्थिक संकट से मुक्त हो?
देश में हर मोर्चे पर विजय प्राप्त करने वाली मौजूदा मोदी सरकार देश की जनता की रोजी रोटी से जुड़ी मंहगाई जैसी समस्याओं पर अपना ध्यान केन्द्रित क्यों नहीं कररर रही है? आज पूरे देश के लिए यही चिंता का विषय है, साथ ही देश का इस दिशा में भविष्य क्या होगा? इसे लेकर भी देश चिंतित है, क्या इस अहम् समस्या का हल किए बिना राम मंदिर या 370 जैसे मुद्दों पर यह सरकार ‘दीर्घजीवी’ रह सकती है?

नेतृत्व विहिन कांग्रेस कमजोर होती जा रही है
डॉ. भरत मिश्र प्राची
आजादी के बाद देश में सर्वाधिक शासन काल कांग्रेस का ही रहा है। इस दौरान इस पार्टी ने अनेक उतार चढ़ाव के दिन देखे है। इस पार्टी पर परिवारवाद का भी आरोप लगता रहा है, जिसमें एक ही परिवार के वर्चस्व की चर्चा प्रमुख रही है। इस पार्टी के साथ यह सच्चाई जमीनी धरातल से जुड़ चली है। जब – जब इस पार्टी का परिवेश आरोपित परिवारवाद की छाया से दूर होने का प्रयास किया, सफलता नहीं मिल पाई। इस संदर्भ में सीताराम केशरी, पी.वी. नरसिंहाराव के अध्यक्षीय नेतृृत्व कार्यकाल को देखा जा सकता है। जहां कांग्रेस बिखरने के कगार पर खड़ी सबसे कमजोर दिखाई देने लगी। इतिहास इस बात का साक्षी है कि राजीव गांधी की षणयंत्र के तहत असमय हुई मृृत्यु के उपरान्त दुःखी गांधी परिवार राजनीति से अपने आप को जब अलग करना चाहा, कांग्रेस के डुबते जनाधार के हालात से कांग्रेस को उबारने के लिये गांधी परिवार की ओर आई आश भरी दृष्टि ने उसे अलग नहीं होने दिया। श्रीमती सोनियां गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस फिर से हरी भरी हो गई। कांग्रेस का सर्वाधिक अध्यक्षीय कार्यकाल बिताते हुये सोनिया गांधी कांग्रेस को कुशल नेतृत्व देने में सफल सिद्ध भी हुई। अपने नेतृृत्व काल में आम चुनाव के दौरान कांग्रेस को अपार सफलता दिलाने के बाद विपक्ष द्वारा विदेशी होने के आरोप को खारिज करते हुए प्रधानमंत्री पद पर स्वंयं के बजाय मनमोहन सिंह का नाम प्रस्तावित कर सर्वशक्तिमान बन गई एवं एक दशक शासन भी किया पर आम चुनाव में हार उपरान्त जब केन्द्र में भाजपा की नई सरकार गठित हुई कांग्रेस के अन्दर अन्तःकलह भी शुरू हो गई फिर भी अभी हाल में हुये राज्यों के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को सफलता भी मिली एवं हिन्दी प्रदेश के तीन मुख्य भाजपा शासित राज्य राजस्थान, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ पर कांग्रेस को विजय मिली । वैसे फिलहाल आपसी टूट के चलते मध्यप्रदेश से कांग्रेस शासन से दूर हो गई जिसके लिये केन्द्रीय नेतृत्व को दोषी माना जा रहा है। इस तरह के हालात में कांग्रेस में गांधी परिवार की ही भूमिका सर्वोपरि नजर आ रही है। आज भी कांग्रेस इसी परिवार के इर्द गिर्द घूमती नजर आ रही है। जिसका ताजा उदाहरण अभी हाल में ही सोनियां गांधी के नेतृृत्व में आयोजित पार्टी की केन्द्रीय बैठक, में जहां कांग्रेस को मजबूत बनाने एवं अध्यक्ष फिर से राहुल गांधी को बनाये जाने की बात प्रमुख रही जब कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद छोड़ चुके है। बैठक में फिलहाल अध्यक्ष पद पर, आगामी चयन तक श्रीमती सोनिया गांधी को ही अंतरिम अध्यक्ष पद पर बने रहने का निर्णय लिया गया।
आजादी के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू से लेकर आज तक कांग्रेस इसी परिवार के इर्दगिर्द घूमती नजर आ रही है। इतिहास साक्षी इस बात का रहा है कि जब भी कांग्रेस इस परिवेश से बाहर निकलकर आई, जम नहीं पाई। अनियंत्रित नेतृत्व के चलते बिखरती गई। इस तरहकी स्थिति भले अलोकतांत्रिक मानी जा सकती जहां राजतंत्र की तरह परिवारवाद विराजमान हो पर कांग्रेस की यहीं संस्कृति बन चुकी है जहां गांधी परिवार के आलावे दूसरा उभर नहीं पाता। आज कांग्रेस की जो स्थिति है वह सभी के सामने है जहां अध्यक्षकी जगह अंतरिम अध्यक्ष कार्य कर रहा हो एवं जिसने अध्यक्ष पद त्याद दिया हो एवं अध्यक्ष बनने के लिये तैयार नहीं हो रहा हो उसे ही बार-बार अध्यक्ष बनाने की गुहार लगाई जा रही हो। इस तरह की स्थिति निश्चित रूप से कांग्रेस के बेहतर भविष्य के लिये ठीक नहीं है।
इस तरह के परिवेश में आज कांग्रेस चारों ओर से नेतृत्व विहिन नजर आ रही है। देश की सबसे बडी रही राजनीतिक पार्टी के पास अध्यक्ष की जगह अंतरिम अध्यक्ष कार्य करें तो आंतरिक मनोबल गिरना स्वाभाविक है। ऐसी क्या बात है कि इस पार्टी के पास गांधी परिवार को छोड़ और कोई नेतृत्व देने वाला नजर नहीं आता और जब कोई दूसरा इस परिवार से अलग होकर अध्यक्ष पद संभालता तो सफल नहीं हो पाता। इस तरह की स्थितियां कई बार उभर कर सामने आई जब कि इस पुरानी पार्टी के पास एक से बढ़कर एक राजनीतिक दिग्गज रहे जो अपमानित होकर अलग थलग पड़ गये। आज भी कोई मुखर होकर सामने नहीं आ रहा, । जो भी पार्टी में निर्णय होता है उसमें गांधी परिवार की ही भूमिका नजर आ रही। इस तरह का परिवेश लोकतंात्रिक पहल को कमजोर करता है। आज के परिवेश में कांग्रेस को इस तरह के पारिवारिक परिवेश से बाहर निकलकर पार्टीहित में काम करना होगा तभी कांग्रेस मजबूत हो सकेगी। आज कांग्रेस नेतृत्व विहिन होकर कमजोर होती जा रही है। जिसे पार्टी में लोकतंत्र बहाल कर फिर से इसे मजबूत किया जा सकता वरना पार्टी का अस्तित्व खतरे में ही पड़ा रहेगा।

डॉ. कफील खानः फिजूल गिरफ्तारी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर और न्यायाधीश सौमित्रदयाल सिंह को दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने डॉ. कफील खान के मामले में दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। सात महिने से जेल में पड़े डॉ. खान को उन्होंने तत्काल रिहा करने का आदेश दे दिया। डॉ. खान को इसलिए गिरफ्तार किया गया था कि उन्होंने 12 दिसंबर 2019 को अलीगढ़ मुस्लिम वि.वि. के गेट पर एक ‘उत्तेजक’ भाषण दे दिया था। उन पर आरोप यह था कि उन्होंने शाहीन बाग, दिल्ली में चल रहे नागरिकता कानून विरोधी आंदोलन का समर्थन करते हुए नफरत और हिंसा फैलाने का अपराध किया है। उन्हें पहले 19 जनवरी को मुंबई से गिरफ्तार किया गया और जब उन्होंने जमानत पर छूटने की कोशिश की तो उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत फिर से जेल में डाल दिया गया। यदि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इन दो जजों का यह साहसिक फैसला अभी नहीं आता तो पता नहीं कितने वर्षों तक डाॅ. कफील खान जेल में सड़ते रहते, क्योंकि रासुका के तहत दो बार उनकी नजरबंदी को बढ़ा दिया गया था। दोनों जजों ने डाॅ. खान के भाषण की ‘रिकार्डिंग’ को ध्यान से सुना और उन्होंने पाया कि वे तो हिंसा के बिल्कुल खिलाफ बोल रहे थे और राष्ट्रीय एकता की अपील कर रहे थे। यह ठीक है कि भारत सरकार द्वारा पड़ौसी देशों के शरणार्थियों को शरण देने के कानून में भेदभाव का वे उग्र विरोध कर रहे थे लेकिन उनका विरोध देश की शांति और एकता के लिए किसी भी प्रकार से खतरनाक नहीं था। जिला-जज और प्रांतीय सरकार ने डाॅ. खान के भाषण को ध्यान से नहीं सुना और उसका मनमाना अर्थ लगा लिया। अपनी मनमानी के आधार पर किसी को भी नजरबंद करना और उसको जमानत नहीं देना गैर-कानूनी है। यह ठीक है कि डाॅ. खान के भाषण के कुछ वाक्यों को अलग करके आप सुनेंगे तो वे आपको एतराज के लायक लग सकते हैं लेकिन कोई भी कानूनी कदम उठाते समय आपको पूरे भाषण और उसकी भावना को ध्यान में रखना जरुरी है। इलाहाबाद न्यायालय का यह फैसला उन सब लोगों की मदद करेगा, जिन्हें देशद्रोह के फर्जी आरोप लगाकर जेलों में सड़ाया जाता है। इस फैसले से न्यायापालिका की प्रतिष्ठा भी बढ़ती है और यह आरोप भी गलत सिद्ध होता है कि सरकार ने न्यायपालिका को अपना जी-हुजूर बना लिया है। डाॅ. कफील खान ने जो सात महिने फिजूल में जेल काटी, उसका हर्जाना भी यदि अदालत वसूल करवाती तो इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना गिरफ्तारियां काफी हतोत्साहित होतीं।

कब सुधरेगी कांग्रेस पार्टी
रमेश सर्राफ धमोरा
कांग्रेस कार्यसमिति की बहुप्रतीक्षित बैठक संपन्न हो चुकी है। बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को आगे भी अध्यक्ष पद पर काम करते रहने का प्रस्ताव पारित किया जा चुका हैं। कांग्रेस कार्यसमिति पार्टी में सर्वोच्च नीति निर्धारण समिति मानी जाती है। इस समिति में लिया गया निर्णय अंतिम होता है। अब सोनिया गांधी आगे भी कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में कार्य करती रहेगी।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कांग्रेस कार्यसमिति की अध्यक्ष व उनके साथ पार्टी के 21 अन्य वरिष्ठ नेता सदस्य हैं। कांग्रेस कार्यसमिति सदस्यों में पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी व पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पार्टी के लोकसभा में नेता अधीर रंजन चैधरी, पार्टी कोषाध्यक्ष अहमद पटेल, पार्टी महासचिव व राज्यसभा में पार्टी के नेता गुलाम नबी आजाद, उप नेता आनंद शर्मा, पार्टी के महासचिव (प्रशासन) मोतीलाल वोरा, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री एके एंटोनी, पार्टी महासचिव अंबिका सोनी, आसाम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री व पार्टी महासचिव ओमान चांडी, पार्टी महासचिव मलिकार्जुन खड़गे, गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री व पार्टी महासचिव लुईजिन्हो फलेरो, पार्टी महासचिव व उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, पार्टी महासचिव मुकुल वासनिक, पार्टी के महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल, छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू, राजस्थान के पूर्व मंत्री रघुवीर मीणा एवं मणिपुर के पूर्व उपमुख्यमंत्री गईखंगम गंगमेई सदस्य के तौर पर शामिल है। इसके अलावा कार्यसमिति में 15 स्थाई आमंत्रित व 11 विशेष आमंत्रित सदस्य भी शामिल है।
कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल सोनिया गांधी, राहुल गांधी व अधीर रंजन चौधरी ही लोकसभा के सदस्य हैं। मनमोहन सिंह, अहमद पटेल, एके एंटोनी, अंबिका सोनी, आनंद शर्मा, गुलाम नबी आजाद, केसी वेणुगोपाल, मलिकार्जुन खड़गे राज्यसभा के सदस्य हैं। कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल मनमोहन सिंह, मोतीलाल वोरा, तरुण गोगोई, एके एंटोनी 80 साल से अधिक की उम्र पार कर चुके हैं। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, अहमद पटेल, अंबिका सोनी, गुलाम नबी आजाद, हरीश रावत, मलिकार्जुन खड़गे, ओमन चांडी, ताम्रध्वज साहू, गईखंगम गंगमेई 70 साल से अधिक की उम्र के हैं। आनंद शर्मा 67 वर्ष, लुईजिन्हो फलेरो 69 साल के हो चुके हैं। अधीर रंजन चैधरी 64 वर्ष, मुकुल वासनिक 61 वर्ष, रघुवीर मीणा 61 वर्ष के हैं। राहुल गांधी 50 वर्ष, अजय माकन 56 वर्ष, केसी वेणुगोपाल 57 वर्ष व प्रियंका गांधी 48 वर्ष की उम्र की कार्यसमिति सदस्य हैं।
इस तरह देखा जाए तो कांग्रेस के कार्यसमिति के ज्यादातर सदस्यो की उम्र अधिक होने के कारण वे ज्यादा भागदौड़, मेहनत नहीं कर पाते हैं। कांग्रेस कार्यसमिति में जमीनी आधार वाले नेता भी नहीं है। सोनिया गांधी राहुल गांधी व अधीर रंजन चैधरी ही लोकसभा सदस्य है। कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल कई नेताओं का तो राज्यसभा में लगातार चैथा, पांचवा, छठा कार्यकाल चल रहा है। कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, अंबिका सोनी, आनंद शर्मा तो कभी लोकसभा चुनाव जीत ही नही सकें। ये हर बार राज्यसभा के रास्ते ही संसद में आते रहे हैं। कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली कोषाध्यक्ष अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद, मोतीलाल वोरा, मुकुल वासनिक, एके एंटोनी को भी चुनाव लड़े जमाना बीत गया है।
हाल ही में कांग्रेस के महासचिव बनाए गए अजय माकन नई दिल्ली से पिछले दो लोकसभा चुनाव हार चुके हैं। अजय माकन के दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहते चुनावों में कांग्रेस जीरो पर आउट हो गयी थी। इस बार उन्हें पार्टी ने विधानसभा का चुनाव लड़ने को कहा था। मगर बीमारी का बहाना कर वह चुनाव लड़ने से कन्नी काट गए थे। यही हाल मुकुल वासनिक का भी है। 2014 में लोकसभा का चुनाव भारी मतों से हार गए थे। 2019 में तो उन्होंने हार के डर से चुनाव ही नहीं लड़ा था। महाराष्ट्र में उनकी परम्परागत रामटेक सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी किशोर उत्तमराव गजभैया शिवसेना के कृपाल तुम्हाने से चुनाव हार गये थे।
कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणु गोपाल ने भी केरल की अपनी परंपरागत अलाप्पुझा लोकसभा सीट से इस बार चुनाव नहीं लड़ा। उनके स्थान पर कांग्रेस की टिकट पर लड़ने वाले कांग्रेस प्रत्याशी सनीमोल उस्मान माकपा के एएम आरिफ से चुनाव हार गये थे। केसी वेणुगोपाल राजस्थान से राज्यसभा सदस्य बन चुके हैं। कांग्रेस कार्यसमिति सदस्य रघुवीर मीणा भी राजस्थान के उदयपुर सीट से लगातार दो बार लोकसभा चुनाव हार चुके हैं। उन्हें राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से निकटता के चलते कांग्रेस कार्यसमिति सदस्य बनाया गया था।
कांग्रेस महासचिव व कार्यसमिति सदस्य हरीश रावत उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहते खुद दो सीटो पर विधानसभा चुनाव लड़कर हार गए थे। अब प्रदेश में उनका भी जनाधार कमजोर हो गया है। इसी के चलते उनको प्रदेश की राजनीति से दूर कर दिया गया है। मोतीलाल वोरा 93 साल की उम्र में भी महासचिव बने हुए हैं। एक जमाने में बोरा मुख्यमंत्री, राज्यपाल, केंद्रीय मंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके हैं। लेकिन चुनाव लड़े उन्हें भी जमाना बीत चुका है। कांग्रेस महासचिव मलिकार्जुन खड़गे 2014 से 2019 तक लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता रह चुके हैं। मगर वो पिछला लोकसभा चुनाव हार गए थे। पिछले महीने उनको कर्नाटक से राज्यसभा में लाया गया है। गांधी परिवार से निकटता के चलते उनको गुलाम नबी आजाद के स्थान पर राज्यसभा में पार्टी का नेता बनाया जा सकता है। प्रियंका गांधी के उत्तर प्रदेश की प्रभारी महासचिव रहते लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को अपने परंपरागत अमेठी सीट से हार का मुंह देखना पड़ा था।
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक से पूर्व ही पार्टी के 23 बड़े नेताओं ने पार्टी का स्थाई अध्यक्ष बनाने की मांग को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र लिखा था। जिसको लेकर कांग्रेस पार्टी में आंतरिक गुटबाजी चरम पर है। पत्र लिखने वालों में कांग्रेस कार्यसमिति सदस्य गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, मुकुल वासनिक शामिल है। इस पत्र पर हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा, पंजाब की पूर्व मुख्यमंत्री राजेंद्र कौर भट्ठल, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एम वीरप्पा मोइली, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान, लोकसभा सदस्य मनीष तिवारी, शशि थरूर, राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल, विवेक तन्खा, पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर, अरविंदर सिंह लवली, कौल सिंह ठाकुर, मिलिंद देवड़ा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री रेणुका चौधरी, जितिन प्रसाद, पीजे कुरियन, हरियाणा विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष कुलदीप शर्मा, दिल्ली विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष योगानंद शास्त्री, पूर्व सांसद संदीप दीक्षित, अजय सिंह, अखिलेश प्रताप सिंह के भी हस्ताक्षर है।
कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की बहाली को लेकर पत्र लिखने पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी नाराजगी व्यक्त कर चुके है। कांग्रेस के बड़े नेता इन 23 नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कह रहे हैं। वही गुलाम नबी आजाद अपनी बात पर डटे हुए हैं तथा बार-बार कह रहे हैं कि हमारा उद्देश्य पार्टी को मजबूत करना है। हम चाहते हैं कि पार्टी में बड़े पदों के लिए सीधे चुनाव हो तथा चुने हुए लोग ही संगठन के पदाधिकारी बने। इससे पार्टी और अधिक मजबूत होगी।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं द्वारा लिखे गए पत्र के बहाने कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी खुलकर सामने आ गई है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को अब जनाधार वाले युवा नेताओं को संगठन में जिम्मेदारी सौंपनी चाहिये। वर्षों से संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर काबिज राज्यसभा के रास्ते सांसद बनने वाले नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियों से मुक्त करना चाहिये। ताकि आने वाले समय में कांग्रेस पार्टी मजबूत होकर उभर सके। यदि आने वाले समय में कांग्रेस पार्टी के संगठन में आमूलचूल परिवर्तन नहीं किया जाता है तो कांग्रेस पार्टी के लिए अपना मौजूदा जनाधार भी बरकरार रख पाना मुश्किल होगा।

तानाशाही और सोनिया गांधी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अब फिर देश को बासी कढ़ी परोस दी। मां ने बेटे को भी मात कर दिया। छत्तीसगढ़ विधानसभा के नए भवन के भूमिपूजन समारोह में बोलते हुए वे कह गईं कि देश में ‘गरीब-विरोधी’ और ‘देश-विरोधी’ शक्तियों का बोलबाला बढ़ गया है। ये शक्तियां देश में तानाशाही और नफरत फैला रही हैं। देश में अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है।
ये सब बातें वे और उनका सुपुत्र कई बार दोहरा चुके हैं लेकिन इन पर कोई भी ध्यान नहीं देता। यहां तक कि कांग्रेसी लोग भी इनकी मज़ाक उड़ाते हैं। वे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के उत्तम कामों तक अपना भाषण सीमित रखतीं तो बेहतर होता। जहां तक तानाशाही की बात है, वह तो आपात्काल के दौरान इंदिरा गांधी भी स्थापित नहीं कर पाई थीं। उन्हें और उनके बेटे संजय गांधी को भारतीय जनता ने 1977 के चुनाव में फूंक मारकर सूखे पत्ते की तरह उड़ा दिया था। उन्हें आज नाम लेने में डर लगता है लेकिन वह कहना यह चाहती हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तानाशाह है और भाजपा अब भारतीय तानाशाही पार्टी (भातपा) बन गई है। उनका यह आशय क्या तथ्यात्मक है ? इस पर हम जरा विचार करें। आज भी देश में अखबार और टीवी चैनल पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। जो जान-बूझकर खुशामद और चापलूसी करना चाहें, सरकार उनका स्वागत जरुर करेगी (सभी सरकारें करती हैं) लेकिन देश में मेरे-जैसे दर्जनों बुद्धिजीवी और पत्रकार हैं, जो जरुरत होने पर मोदी और सरकार की दो-टूक आलोचना करने से नहीं चूकते लेकिन किसी की हिम्मत नहीं है कि उन्हें कोई जरा टोक भी सके। जहां तक तानाशाही का सवाल है, वह देश में नहीं है, पार्टियों में है। एकाध पार्टी को छोड़कर सभी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र का अंत हो चुका है लेकिन सोनियाजी ज़रा पीछे मुड़कर देखें तो उन्हें पता चलेगा कि उसकी शुरुआत उनकी सासू मां इंदिराजी ही ने की थी। कांग्रेस का यह ‘वाइरस’ भारत की सभी पार्टियों को निगल चुका है। कांग्रेस की देखादेखी हर प्रांत में पार्टियों के नाम पर कई ‘प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां’ खड़ी हो गई हैं। यदि सोनिया गांधी कुछ हिम्मत करें और कांग्रेस-पार्टी में लोकतंत्र ले आएं तो भारत के लोकतंत्र के हाथ बहुत मजबूत हो जाएंगे और उनका नाम भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। सोनियाजी की हिंदी मुझे खुश करती है। यह अच्छा हुआ कि उनके भाषण-लेखक ने सरकार के लिए ‘गरीबद्रोही’ और ‘देशद्रोही’ शब्द का प्रयोग नहीं किया।

जातीय नहीं, शैक्षणिक आरक्षण दें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर जातीय आरक्षण के औचित्य पर प्रश्न-चिन्ह लगा दिया है। पांच जजों की इस पीठ ने अपनी ही अदालत द्वारा 2004 में दिए गए उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है, जिसमें कहा गया था कि आरक्षण के अंदर (किसी खास समूह को) आरक्षण देना अनुचित है याने आरक्षण सबको एकसार दिया जाए। उसमें किसी भी जाति को कम या किसी को ज्यादा न दिया जाए। सभी आरक्षित समान हैं, यह सिद्धांत अभी तक चला आ रहा है। ताजा फैसले में भी वह अभी तक रद्द नहीं हुआ है, क्योंकि उसका समर्थन पांच जजों की बेंच ने किया था। अब यदि सात जजों की बेंच उसे रद्द करेगी तो ही आरक्षण की नई व्यवस्था को सरकार लागू करेगी। यदि यह व्यवस्था लागू हो गई तो पिछड़ों और अनुसूचितों में जो जातियां अधिक वंचित, अधिक उपेक्षित, अधिक गरीब हैं, उन्हें आरक्षण में प्राथमिकता मिलेगी। लेकिन मेरा मानना है कि सरकारी नौकरियों में से जातीय आरक्षण पूरी तरह से खत्म किया जाना चाहिए। अब से 60-65 साल पहले और विश्वनाथप्रताप सिंह के जमाने तक मेरे-जैसे लोग आरक्षण के कट्टर समर्थक थे। डाॅ. लोहिया के साथ मिलकर हम अपने छात्र-जीवन में नारे लगाते थे कि ‘पिछड़े पाएं सौ में साठ’ लेकिन जातीय आरक्षण के फलस्वरुप मुट्टीभर लोगों ने सरकारी ओहदों पर कब्जा कर लिया। उन्होंने अपनी नई जाति खड़ी कर ली। उसे अदालत ने ‘क्रीमी लेयर’ जरुर कहा लेकिन उस पर रोक नहीं लगाई। ये आरक्षण जन्म के आधार पर दिए जा रहे हैं, जरुरत के आधार पर नहीं। इसकी वजह से सरकार में अयोग्यता और पक्षपात को प्रश्रय मिलता है और करोड़ों वंचित लोग अपने नारकीय जीवन से उबर नहीं पाते हैं। यदि हम देश के 60-70 करोड़ लोगों को समाज में बराबरी के मौके और दर्जे देना चाहते हों तो हमें शिक्षा में 60-70 प्रतिशत आरक्षण बिना जातीय भेदभाव के कर देना चाहिए। जो भी गरीब, वंचित, उपेक्षित परिवारों के बच्चे हों, उन्हें मुफ्त शिक्षा, मुफ्त भोजन, मुफ्त वस्त्र और मुफ्त निवास की सुविधाएं दी जानी चाहिए। देखिए, ये बच्चे हमारी तथाकथित ऊंची जातियों के बच्चों से भी आगे निकलते हैं या नहीं ?

कांग्रेस में नेतृत्व संकट
सिद्धार्थ शंकर
कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर जारी घमासान का निपटारा करने की ठान चुके पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कार्यसमिति की बैठक के बाद दूसरी बार गुलाम नबी आजाद से फोन पर बात की। राहुल गांधी ने आजाद को दिलासा दिया कि उनकी चिंताओं का निपटारा किया जाएगा और जल्द से जल्द पार्टी के नए अध्यक्ष का चुनाव किया जाएगा। यही नहीं राहुल ने आजाद से कहा, संगठन के अन्य चुनाव भी बहुत जल्द कराए जाएंगे। पार्टी को उन्हें लेकर कोई दुर्भावना नहीं है। वहीं आजाद ने कहा, मेरा उद्देश्य गांधी परिवार को चुनौती देना या निरादर करना नहीं है। मैं बस पार्टी को और मजबूत करना चाहता हूं। राहुल ने कार्यसमिति की बैठक में हुए विवाद के बाद भी एक बार कपिल सिब्बल और आजाद से फोन पर बात की थी। इससे साफ है कि पूर्व अध्यक्ष पार्टी के भीतर जारी घमासान को शांत करने की हर कोशिश कर रहे हैं। मगर सवाल यह भी है कि क्या अगले कुछ महीने में गांधी परिवार से इतर संगठन की कमान देने के लिए किसी नेता की तलाश हो पाएगी? कार्यसमिति की हंगामेदार बैठक के बाद सियासी गलियारे में इसी सवाल का जवाब ढूंढा जा रहा है। हालांकि पार्टी का इतिहास बताता है कि गांधी परिवार की छाया से मुक्त किसी नेता के लिए संगठन की जिम्मेदारी संभालना आसान नहीं होगा। परिवार से बाहर जब भी किसी व्यक्ति को अध्यक्ष पद मिला है तो वह कांटों का ताज ही साबित हुआ है। आजादी के बाद 72 सालों में 37 साल पार्टी की कमान नेहरू-गांधी परिवार के पास ही रही। परिवार के इतर जितने भी अध्यक्ष बने उनमें परिवार के विश्वासपात्र ही काम कर पाए। बाकी को या तो समय से पहले पद छोडऩा पड़ा या कुछ ने बगावत का रास्ता अख्तियार किया। साल 1947 में जीवटराम भगवानदास कृपलानी कांग्रेस अध्यक्ष बने। पहले पीएम जवाहरलाल नेहरू से मतभेद के कारण कृपलानी सालभर के अंदर ही उन्हें पद हटना पड़ा। उनकी जगह नेहरू के करीबी पट्टाभि सीतारमैय्या को संगठन की कमान मिली। साल 1950 में नेहरू के विरोध के बावजूद वल्लभभाई पटेल के समर्थन से पुरुषोत्तम दास टंडन अध्यक्ष बने। पटेल के निधन के बाद नेहरू से मतभेदों के कारण टंडन को कुर्सी छोडऩी पड़ी। इसके बाद तीन सालों तक नेहरू खुद संगठन के साथ सरकार की कमान संभालते रहे। फिर नेहरू के करीबी यूएन ढेबर चार साल के लिए अध्यक्ष बने और उनके बाद इंदिरा गांधी ने संगठन की कमान संभाली। इंदिरा के बाद नीलम संजीव रेड्डी और के कामराज अध्यक्ष बने। कामराज के अध्यक्ष रहते नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाया गया। इस दौरान इंदिरा का कामराज और एस निजलिंगप्पा से तीखा विवाद हुआ और पार्टी दो हिस्सों में बंट गई। कुछ वर्षों तक पार्टी की कमान खुद इंदिरा ने भी संभाली। साल 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने और अध्यक्ष पद की भी जिम्मेदारी संभाली। साल 1984 के अंत से 1991 में आतंकी हमले में निधन तक राजीव ही संगठन के मुखिया थे। राजीव की हत्या लोकसभा चुनाव के दौरान हुई थी। चुनाव के बाद पीवी नरसिंह राव पीएम बने और संगठन के भी मुखिया रहे। कुछ अरसे बाद में संगठन की कमान सीताराम केसरी को दी गई। इंदिरा के बाद पहली बार सरकार और संगठन दोनों का शीर्ष पद ऐसे व्यक्तियों के पास था जो गांधी परिवार की छाया से बाहर था। हालांकि इसी दौरान राव विरोधियों ने सोनिया गांधी की राजनीति में एंट्री कराई और केसरी की अध्यक्ष पद से नाटकीय विदाई हुई। केसरी के बाद पार्टी की कमान फिर से गांधी परिवार में आई और सोनिया अध्यक्ष बनीं। सोनिया 2017 में अध्यक्ष पद से हटीं तो संगठन की कमान राहुल गांधी को दी गई। वहीं, 2019 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद राहुल ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। तब से सोनिया अंतरिम अध्यक्ष हैं। कांग्रेस के सामने यक्ष प्रश्न यही है कि सोनिया के बाद कौन? पार्टी का एक धड़ा चाहता है कि संगठन गांधी परिवार की छाया से मुक्त हो। कार्यसमिति की बैठक के बाद जनवरी महीने तक नया अध्यक्ष चुनने की घोषणा की गई है। ऐसे में सवाल यह है कि अगला अध्यक्ष परिवार से होगा या हमेशा की तरह परिवार का करीबी होगा। मौजूदा समय में गांधी परिवार नेहरू-इंदिरा-राजीव की तरह ताकतवर नहीं है। सरकार से बाहर से छह साल से ज्यादा हो चुके हैं। संगठन में भी परिवार की पकड़ कमजोर हो गई है। ऐसे में परिवार से इतर अध्यक्ष बनने की संभावना है। हालांकि सवाल यही है कि क्या गांधी परिवार इसके लिए दिल बड़ा करेगा? और अगर अध्यक्ष गांधी परिवार का यस मैन ही हुआ तो क्या पार्टी का दूसरा धड़ा स्वीकार करेगा?

क्या कांग्रेस वर्तमान चुनौतियों का मुकाबला करने को तैयार है
डॉ. सुनीलम
जो उम्मीद थी,वही हुआ। कांग्रेस कमेटी ने अंतरिम अध्य्क्ष सोनिया गांधी में आस्था प्रकट की तथा उन्हे सभी कार्यों के लिए अधिकृत कर दिया ।
बैठक के संबंध में जो जानकारी मीडिया से प्राप्त हुई है उससे पता चलता है कि कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं जिन्होंने चिट्ठी लिखी थी, उन्हें विद्रोही माना गया ,कुछ ने भा ज पा एजेंट बताकर उन पर कार्यवाही की मांग भी की। जबकि चिट्ठी में वफादारी स्पष्ट और रेखांकित कर दी गई थी। यह सब समझ में आता है लेकिन स्वयं राहुल जी का यह कथन की चिट्ठी ऐसे समय लिखी गई जब सोनिया जी बीमार थी । क्या राहुल जी यह मानते हैं कि जब अध्यक्ष बीमार हो तब संगठन पर कोई चर्चा नहीं होनी चाहिए? मुझे लगता है कि ऐसे समय में जब अध्यक्ष बीमार हैं तब उन्हें अत्यधिक काम के दबाव से मुक्त करना पार्टी के वरिष्ठ साथियों का कार्य होना चाहिए। सोनिया गांधी जी से देश यह जरूर जानना चाहेगा है कि कांग्रेस पार्टी में अंदरूनी मामले को लेकर चिट्ठी लिखना अपराध क्यों माना जा रहा है? होना तो यह चाहिए था कि जो मुद्दे पत्र में उठाए गए थे उन मुद्दों पर चर्चा की जानी चाहिए थी परंतु चाटुकारों ने चिट्ठी लिखने वालों पर ही हमला बोल दिया। किसी भी पार्टी के संगठनात्मक बदलाव के लिए इस तरह की संस्कृति को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए । हालांकि यह सच है कि देश में इस समय अधिकतर पार्टी ऐसी है जिनमें चिट्ठी लिखने वालों का यही हश्र होता है । इसे पार्टियों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की बानगी कहा जा सकता है ,जो अत्याधिक दुखद है ।
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस में कभी लोकतंत्र नहीं रहा ।जब गांधी जी कांग्रेस के सर्वोच्च नेता थे तब उनकी बिना इच्छा के और सही कहा जाए तो उनके विरोध के बावजूद सुभाष चंद्र बोस चुनाव जीतकर कांग्रेस अध्यक्ष बने थे । जवाहरलाल जी की भी इच्छा के विपरीत भी अध्यक्ष चुने जाने का इतिहास है।
चिट्ठी को लेकर एक बात यह भी कही जा रही है कि चिट्ठी तब लिखी जाती है जब मिलना संभव ना हो। कोरोना काल में मुलाकात ना होना समझ में आता है, परंतु यदि तीनों में से किसी से भी इन वरिष्ठ नेताओं की बात हो गई होती तो स्थिति यह नहीं बनती। यह आरोप कोई नया नहीं है। विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री भी नहीं मिल पाते यह सर्वविदित है परंतु यह स्थिति अन्य पार्टियों की भी है। मुझे तेलंगाना के एक मंत्री ने बताया था कि उनके मुख्यमंत्री महीनों तक अपने मंत्रियों को मिलने का समय नहीं देते।
सत्ता में जब पार्टी रहती है तो यह चोचलेबाजी चल जाती है, लेकिन विपक्ष में रहते हुए नेता की जिम्मेदारी अपनी पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं, संपूर्ण विपक्ष के नेताओं के साथ-साथ आम नागरिकों से मिलने की भी रहती है। हालांकि सभी जानते हैं कि सुरक्षा की दृष्टि से नेहरू परिवार अत्यंत संवेदनशील है।
नेहरू परिवार से बाहर का अध्यक्ष बनाने का यह
मजबूत तर्क हो सकता है । कम से कम वह मुलाकात तथा विचार परामर्श के लिए सब को उपलब्ध हो सकता है। भले ही रबर स्टाम्प के तौर पर काम करे।
कांग्रेस कमेटी की बैठक में होना तो यह था कि देश के वर्तमान संकट की परिस्थिति में कांग्रेस पार्टी को क्या कुछ करना चाहिए ?इस पर चर्चा होनी चाहिए थी। कोरोना काल का कुप्रबंधन, देश में 32% तक पहुंची बेरोजगारी, चरमराती आर्थिक स्थिति, सरकार द्वारा 44 श्रम कानूनों का खात्मा , किसानों के खिलाफ तीन अध्यादेश, विद्युत संशोधन विधेयक, देश की सार्वजनिक संपत्ति को कारपोरेट को सौंपने के फैसले, लोकतांत्रिक संस्थाओं एवं लोकतांत्रिक अधिकारों का खात्मा, शिक्षा का कार्पोरेटिकरण आदि ऐसे मुद्दे हैं जिन पर देश अपेक्षा करता था कि कांग्रेस कमेटी चर्चा करेगी तथा देश के सामने अपनी समझ प्रस्तुत करने के साथ-साथ सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करने के कार्यक्रमों की घोषणा करेगी । लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस कमेटी की बैठक ने देश को निराश किया है।
जब राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बयान आए थे कि वे चाहते है कि उनके परिवार से बाहर का व्यक्ति अध्यक्ष बने। तब उनसे अपेक्षा की जाती थी कि वे जिन नेताओं को अध्यक्ष के तौर पर कांग्रेस की बागडोर संभालने की क्षमता रखने वाला नेता मानते हैं। उनके नाम प्रस्तावित करते ।कांग्रेस पार्टी में अनुभवी नेताओं की कोई कमी नहीं है। मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे विपक्षी दल के नेता रहे कई नेता दक्षिण भारत में हैं । परंतु भाई बहन ने नए अध्यक्ष के संबंध में कोई ठोस सुझाव नहीं दिया। अगर दोनों ने कांग्रेस कमेटी की बैठक में कुछ प्रस्ताव रख दिए होते तथा कांग्रेस कमेटी ने सोनिया गांधी जी पर यह जिम्मेदारी छोड़ दी होती कि वे इन नेताओं में कोई एक का नाम तय कर दें तो भी बैठक की सार्थकता समझी जा सकती थी। सोनिया जी को मदद करने के लिए कुछ सदस्यों की समिति भी बनाई जा सकती थी, लेकिन इतना भी नहीं हुआ। इससे क्या नतीजा निकाला जाए कि भाई-बहन की घोषणा केवल दिखावे के लिए थी ?
मैं ऐसा नहीं मानता। मुझे यह लगता है कि दोनों मन से चाहते हैं कि कांग्रेस पर से परिवारवाद का धब्बा हटे लेकिन सोनिया गांधी को घेर कर रखने वाला कॉकस उनके किसी भी प्रयास को षडयंत्र पूर्वक विफल कर देता है । इस तरह की स्थिति जब कांग्रेस के अंदर पहले बनी थी तब इंदिरा गांधी खुलकर निकल पड़ी थीं ।जबकि उनके पास उस समय सोनिया जी से कम अनुभव था । प्रियंका जी में बहुत से कांग्रेसी इंदिरा गांधी की छवि देखते हैं । लेकिन उनमें बाहर की चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत तो दिखलाई पड़ती है लेकिन लगता है दोनों के अंदर संगठन के भीतर कॉकस की चुनौतियों का सामना करने की ना तो हिम्मत है , ना ही आत्मविश्वास।
कांग्रेस के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वह 135 वर्षों के अनुभव के बाद अपनी नीतियों में बदलाव करने को तैयार है या नहीं? यह सर्वविदित है कि कांग्रेस ने ही 1992 के बाद देश पर उदारीकरण निजीकरण और वैश्वीकरण थोपने का काम किया है। जिसे बुलेट ट्रेन की स्पीड से आगे बढ़ाते हुए मोदी- अमित शाह की जोड़ी कार्पोरेटीकरण और निजीकरण के रास्ते पर चलकर सब कुछ अडानी अंबानी को सौंपते जा रही है। कांग्रेस को अपनी आर्थिक नीतियों को स्पष्ट तौर पर देश के सामने रखने की जरूरत है। वह कल्याणकारी राज्य तथा सार्वजनिक संस्थानों के साथ खड़ी है यह स्पष्ट करने की जरूरत है। सीएए, एनआरसी, एनपीआर को लेकर भी कांग्रेस का नजरिया स्पष्ट नहीं है । देश में विरोध स्वरूप जो 500 स्थानों पर शाहीन बाग चल रहे थे उनमें से 50 स्थानों पर मुझे समाजवादी विचार यात्रा के दौरान जाने का अवसर मिला। कहीं पर भी कांग्रेस खुलकर मैदान में नहीं दिखी। बाबरी मस्जिद विध्वंस तथा राम मंदिर निर्माण तक कांग्रेस की वैचारिक स्पष्टता दिखलाई नहीं दी।
कश्मीर में भले ही कांग्रेस आज नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के साथ खड़ी हो लेकिन कश्मीर में 5 अगस्त के पूर्व की स्थिति को बहाल करने के मुद्दे पर कांग्रेस की स्थिति स्पष्ट नहीं है।
कांग्रेस को यह भी स्पष्ट करने की जरूरत है कि वह विपक्षी एकता के साथ है तथा पूर्व में केंद्र में बनी गैर भाजपा की विपक्ष की सरकारों को गिराने को वह अब अपनी गलती मानती है । इसी तरह 1984 के सिख्खों के नरसंहार, पंजाब में स्वर्ण मंदिर में की गई कार्यवाही तथा मुलताई जैसे पुलिस गोली चालन पर देश से माफी मांगने के लिए तैयार है।
देश में आज स्थिति यह है कि कांग्रेस खुद को बचाने, बनाने और मजबूत करने में जितना प्रयास कर रही है। (अगर कर रही हो तो) उससे कहीं ज्यादा प्रयास कांग्रेस के बाहर उसके समर्थकों और शुभ चिंतकों के द्वारा किया जा रहा है उसके बावजूद ऐसे सभी लोगों के साथ कांग्रेस नेतृत्व ने संवाद का कोई स्थाई तंत्र विकसित नहीं किया है
। मुझे पिछले कुछ वर्षों में सोनिया जी, राहुल जी और प्रियंका जी से मिलने वाले कांग्रेसियों ने बतलाया कि वे जब भी कभी उन तीनों से मिलते हैं तो वे पार्टी में शामिल होने का प्रस्ताव रखते हैं तथा वैचारिक मुद्दों पर सहमति बतलाते हुए कहते हैं कि हम तो इन मुद्दों पर कांग्रेस की नीतियों में परिवर्तन के लिए तैयार है लेकिन कांग्रेस अभी तैयार नहीं है। जिससे यह पता चलता है कि नेहरू परिवार की कांग्रेस पर पकड़ ऐसी नहीं है कि वह नीति के मामले में अपनी इच्छा अनुसार परिवर्तन कर सके।
इस स्थिति को पार्टी के भीतर बदलना नेहरू परिवार के लिए एक बड़ी चुनौती है।
कांग्रेस को संपूर्ण विपक्ष के साथ एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम खुद तय करने की जरूरत है इसके इर्द-गिर्द मोदी सरकार के खिलाफ देश में जनमत बनाया जा सके।
कांग्रेस बदलना चाहती है इसका आभास कई बार राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बयानों से होता है। हाल ही में प्रशांत भूषण के मुद्दे पर कांग्रेस द्वारा खुलकर समर्थन करने से यह पता चलता है कि कांग्रेस बदलना चाहती है।
खैर, अब यह कहा जा रहा है कि अगले 6 महीने में कांग्रेस कमेटी का अधिवेशन होगा तथा आने वाली किसी बैठक में नया अध्यक्ष चुन लिया जाएगा । इसलिए फिलहाल इंतजार के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता।
लेकिन यह स्थिति दुखद है क्योंकि आने वाले दो-तीन महीने में देश में तमाम उपचुनाव तो होने ही है, बिहार राज्य का चुनाव भी होना है। ऐसे समय में यदि कांग्रेस पार्टी नए अध्यक्ष के साथ पूरे जोशो खरोश के साथ मैदान में उतरती तथा संपूर्ण विपक्ष का साथ लेती तो कांग्रेस की स्थिति में सुधार हो सकता था। यदि कांग्रेस पार्टी एकजुट होकर मध्य प्रदेश के उपचुनाव में नए अध्यक्ष के नेतृत्व में उतरती तो कांग्रेस सरकार की वापसी भी संभव हो सकती थी लेकिन शायद कांग्रेस अभी आत्मचिंतन ,आत्ममंथन और आत्मविश्लेषण में डूबी हुई है।

प्रशांत भूषण को सजा मिलनी ही चाहिए और वे स्वीकार भी करें !
श्रवण गर्ग
प्रशांत भूषण को अगर कोई सजा मिलती है तो उसका स्वागत किया जाए या नहीं ? उन्हें जिस अवमानना का दोषी पाया गया है उसमें अधिकतम छह माह की क़ैद या जुर्माना या दोनों की सजा दी जा सकती है। यहाँ विषय क़ैद की अवधि अथवा जुर्माने की राशि का नहीं बल्कि अवमानना के मामले में किसी भी छोटी या बड़ी सजा के इतिहास में दर्ज होने और उस पर देश और दुनिया के नागरिकों की ओर से होने वाली प्रतिक्रिया का है।प्रशांत भूषण को सर्वोच्च न्यायालय ने विचार करने के लिए जो दो-तीन दिन का समय दिया था वह रविवार रात को समाप्त हो जाएगा।प्रशांत भूषण को अपने किए के प्रति न तो किसी प्रकार का पश्चाताप है और न ही सजा को लेकर वे किसी भी तरह के दया भाव की अपेक्षा कर रहे हैं।सवाल अब यह है कि नागरिकों की इस पर किस तरह की प्रतिक्रिया है या होनी चाहिए ?
देश के स्वतंत्रता दिवस के ठीक एक दिन पहले यानि कि चौदह अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय की तीन-सदस्यीय खंडपीठ द्वारा भूषण को उनके दो ट्वीट्स के लिए अवमानना का दोषी ठहराए जाने के बाद सजा का वे तमाम नागरिक निश्चित ही स्वागत करना चाहेंगे, जो न्यायपालिका की गरिमा को हर क़ीमत पर बनाए रखने के पक्षधर हैं,और उनके साथ वे लोग भी जो अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के कारण भूषण जैसे लोगों के प्रति द्वेष का भाव रखते हैं।इनमें दोनों ही प्रमुख दलों के लोग भी शामिल माने जा सकते हैं।इन लोगों का मानना हो सकता है कि सजा के बाद न्यायपालिका जैसी संस्थाओं के प्रति अवमाननाओं के ‘दुस्साहस’ की घटनाओं में कमी आ जाएगी।
दूसरी ओर ,इस बात में कोई आश्चर्य नहीं व्यक्त किया जाना चाहिए कि वे तमाम नागरिक भी ,जो संख्या में कम होते हुए भी भूषण जैसे गिने-चुने लोगों के समय-समय पर व्यक्त होने वाले अप्रतिम ‘साहस’ और विचारों के साथ आत्मीय भाव से जुड़े हुए हैं ,अगर यही चाहते हों कि सार्वजनिक जीवन में शुचिता के लिए अहिंसक संघर्ष में लगे इस व्यक्ति को प्राप्त होने वाली सजा एक पुरस्कार मानकर सम्मानपूर्वक स्वीकार कर लेना चाहिए।पर इस दूसरी तरह की ‘अल्पसंख्यक ‘जमात के इस तरह की कामना करने के कारण पहली तरह के नागरिकों से सर्वथा भिन्न हैं।
ये दूसरी तरह के नागरिक या तो संख्या में अब बहुत ही कम बचे हैं या फिर उन लोगों के ही वैचारिक उत्तराधिकारी हैं जो 25 जून 1975 की शाम दिल्ली के ऐतिहासिक राम लीला मैदान में उपस्थित थे और तिहत्तर-वर्षीय जयप्रकाश नारायण को उसी आवाज़ में बोलता हुआ सुन रहे थे जो वर्ष 1922 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के कंठ से उपजी थी।जे पी के साथ तब मंच पर मोरारजी देसाई के अलावा नानाजी देशमुख, मदन लाल खुराना और अन्य कई राष्ट्रीय नेता उपस्थित थे।इन सब लोगों को तब कोई अनुमान नहीं था कि कुछ ही घंटों के बाद और रात के ख़त्म होने के पहले देश की तक़दीर बदलने वाली है।
जयप्रकाश नारायण तब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ए एन रे से अपील कर रहे थे कि उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ इंदिरा गांधी की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई नहीं करना चाहिए।’वे ऐसा इसलिए नहीं कह रहे हैं कि उनकी निष्पक्षता के प्रति कोई अविश्वास है बल्कि इसलिए कि सरकार द्वारा अन्य तीन जजों की वरीयता को लांघकर उनका उक्त पद के लिए चयन किया गया है।अतः लोगों के मन में शंकाएँ उत्पन्न हो सकतीं हैं।’जे पी ने अस्सी मिनट के इसी उद्बोधन में अपने उस कथन को भी दोहराया कि पुलिस ,सेना के जवानों और सरकारी सेवकों को सरकार के ‘अवैध और अनैतिक’ आदेशों का पालन नहीं करना चाहिए।राम लीला मैदान पर उपस्थित हुए इस क्षण का साक्षी बनना किसी के लिए भी गौरव की बात हो सकती थी।मेरे लिए भी थी।
अपने ‘यंग इंडिया‘अख़बार में ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ़ आलेख प्रकाशित करने के आरोप में मार्च 1922 में तब केवल तिरपन-वर्षीय महात्मा गांधी को अहमदाबाद स्थित उनके साबरमती आश्रम से गिरफ़्तार कर लिया गया था।उन पर आरोप लगाया गया कि वे क़ानून के द्वारा स्थापित सरकार के ख़िलाफ़ घृणा उत्पन्न करने अथवा अवमानना या असंतोष फैलाने का प्रयास कर रहे हैं।अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को स्वीकार करते हुए महात्मा गांधी ने कहा था कि वे अदालत से दया की प्रार्थना नहीं करना चाहते हैं ।वे किसी कम कठोर सजा की माँग भी नहीं करते हैं।वे यहाँ जो भी कठोरतम दंड हो सकता है उसे प्रसन्नतापूर्वक अपने उस कार्य के परिणामस्वरूप स्वीकार करने के लिए उपस्थित हैं जिसे क़ानून जान बूझकर किया गया अपराध मानता है और वे किसी भी नागरिक का सर्वोच्च कर्तव्य समझते हैं।(चौंसठ-वर्षीय प्रशांत भूषण ने भी अपने उत्तर में ऐसा ही कुछ उद्धृत किया है।)
अंग्रेज जज सी एन ब्रूफफ़िल्ड ने तब गांधीजी को छह वर्षों के कारावास की सजा तो दी थी पर साथ ही यह भी जोड़ा था कि भारत में कभी घटनाचक्र इस तरह से बने और सरकार के लिए ऐसा सम्भव हो कि सजा की अवधि को कम करके आपको रिहा किया जा सके तो ‘मेरे से अधिक कोई और व्यक्ति प्रसन्न नहीं होगा।’
मानहानि के कारण आहत भावनाओं को लेकर सजा के समर्थक नागरिकों से भिन्न जो तबका है वह जानता है कि प्रशांत भूषण का वास्तविक इरादा उस संविधानिक संस्था की अवमानना का क़तई हो ही नहीं सकता जिसकी वाणी के साथ करोड़ों मूक लोगों का भविष्य बंधा हुआ है।उनका क्षोभ तो उन निहित स्वार्थों के प्रति है जो समस्त प्रजातांत्रिक संस्थानों के चेहरों को एक विशेष क़िस्म की वैचारिक व्यवस्था और राष्ट्रवाद की परतों से ढाँकना चाहते हैं।प्रशांत भूषण द्वारा स्वीकार की जाने वाली सजा लोगों के मन से सविनय प्रतिकार के फलस्वरूप प्राप्त हो सकने वाले दंडात्मक पुरस्कार के प्रति भय को ही कम करेगी।जैसे महामारी पर नियंत्रण के लिए उसके संक्रमण की चैन को तोड़ना ज़रूरी हो गया है उसी प्रकार लोकतंत्र पर बढ़ते प्रहारों को रोकने के लिए नागरिकों के मौन की लगातार लम्बी होती शृंखला को तोड़ना भी आवश्यक हो गया है।अतः इस कठिन समय में प्रशांत भूषण की उपस्थिति का एक आवश्यक उपलब्धि के रूप में स्वागत किया जाना चाहिए।

पाकिस्तान का उलट-पैंतरा
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
संयुक्तराष्ट्र संघ में पाकिस्तान के दूत मुनीर अकरम ने एक ऐसा पैंतरा मारा है, जिसे देखकर उन पर तरस आता है। उन्होंने पाकिस्तान की इमरान सरकार की भद्द पीट कर रख दी है। अकरम ने दावा किया है कि उन्होंने सुरक्षा परिषद में भाषण देकर ‘भारतीय आतंकवाद’ की निंदा की है। अकरम से कोई पूछे कि सुरक्षा परिषद में आपको घुसने किसने दिया ? 15 सदस्यी सुरक्षा परिषद का पाकिस्तान सदस्य है ही नहीं। गैर-सदस्य उसकी बैठक में जा ही नहीं सकता। संयुक्तराष्ट्र के महासचिव ने एक बैठक बुलाई थी, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के बारे में। इस बैठक का एक फोटो जर्मन दूतावास ने जारी किया है, जिसमें पाकिस्तान का प्रतिनिधि कहीं नहीं है। फिर भी पाकिस्तानी दूतावास ने जो बयान जारी किया है, वह झूठों का ऐसा पुलिंदा है, जिस पर खुद पाकिस्तानी लोग विश्वास नहीं करते। पहला, अकरम ने दावा किया है कि अल-क़ायदा गिरोह का खात्मा और उसामा बिन लादेन का सफाया पाकिस्तान ने किया है। सबको पता है कि उसामा को अमेरिका ने मारा था और इमरान उसे ‘शहीद उसामा’ कहते रहे हैं। दूसरा, यह भी मनगढ़ंत गप्प है कि भारत ने कुछ आतंकवादियों को भाड़े पर ले रखा है, जो पाकिस्तान में हिंसा फैला रहे हैं। सच्चाई तो यह है पाकिस्तान अपने आतंकवादियों से भारत से भी ज्यादा तंग है। खुद इमरान ने पिछले साल संयुक्तराष्ट्र महासभा के अपने भाषण में कहा था कि उनके देश में 40 से 50 हजार दहशतगर्द सक्रिय हैं। तीसरा, पाकिस्तान ने अपनी नीति को भारत की नीति बता दिया। भारत सीमा-पार आतंकवाद क्यों फैलाएगा। चौथा, 1267 प्रस्ताव की प्रतिबंधित आतंकवादियों की सूची में भारतीयों के नाम भी हैं, यह सरासर झूठ है। उसमें एक भी भारतीय का नाम नहीं है। पांचवां, अकरम का यह कहना भी गलत है कि भारत में अल्पसंख्यकों का जीना हराम है। वास्तव में 1947 में पाकिस्तान में 23 प्रतिशत अल्पसंख्यक थे जबकि अब 3 प्रतिशत रह गए हैं। भारत में अल्पसंख्यक लोग कई बार राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, राज्यपाल और मुख्यमंत्री तक बने हैं। मुनीर अकरम ने भारत के विरुद्ध ये बेबुनियाद आरोप लगाकर इमरान सरकार की जगहंसाई करवा दी है। प्रधानमंत्री इमरान खान को चाहिए कि वे मुनीर अकरम को इस्लामाबाद बुलाकर डांट पिलाएं। इन्हीं गैर-जिम्मेदाराना बयानों के कारण इस्लामी देशों में भी पाकिस्तान की साख गिरती जा रही है।

राजस्थान में अभी पायलट का दांव बाकी है
डॉ नीलम महेंद्र
राजस्थान प्रदेश प्रभारी के पद पर अविनाश पांडे की जगह अजय माकन की ताज़ा नियुक्ति इस बात का संकेत है कि राजस्थान की राजनीति में अभी बहुत कुछ बाकी है। सचिन पायलट और अशोक गहलोत की हाथ मिलाती तस्वीरों से भले ही यह संदेश देने की कोशिश की गई हो कि सब कुछ सामान्य हो गया है लेकिन अजय माकन के प्रदेश प्रभारी के पद की नियुक्ति उन तस्वीरों को धुंधला कर रही है। अजय माकन की ताज़ा नियुक्ति इस बात की ओर इशारा कर रही है कि राजस्थान का राजनैतिक संकट खत्म नहीं हुआ है बस कुछ समय के लिए टल गया है। क्योंकि यह केवल तजुर्बे और युवा जोश की लड़ाई नहीं है,यह अहम का टकराव है अस्तित्व का संघर्ष है। दरअसल पहले कर्नाटक और फिर मध्यप्रदेश में कांग्रेस के हाथ आई हुई सत्ता फिसलने के बाद राजस्थान कांग्रेस के लिए काफी अहम बन चुका था। गहलोत और पायलट की आपसी खींचतान की कीमत इस बार कांग्रेस आलाकमान चुकाने के लिए तैयार नहीं थी। इसलिए उसने मध्यप्रदेश में अपनी गलती से सबक सीखा। जिस संवादहीनता और संवेदनशून्यता को ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने का सबसे बड़ा कारण माना गया उसे सचिन पायलट के संदर्भ में कारण नहीं बनने दिया गया। लेकिन जिस तरह के कदम पायलट द्वारा उठाए गए और उनके प्रतिउत्तर में जिस प्रकार के बयान गहलोत द्वारा दिए गए उससे राजस्थान में कांग्रेस की स्थिति वाकई में दो मुँही तलवार पर चलने जैसी हो गई थी। क्योंकि गहलोत पीछे हटने को तैयार नहीं थे और पायलट सब्र करने के लिए। नतीजन आत्मविश्वास से भरे अनुभवी गहलोत ने सरकार बचाने के लिए आक्रमक होने का फैसला लिया। उन्होंने पायलट को चारों तरफ से घेर लिया। उनके द्वारा लगातार सचिन पायलट पर पर्सनल अटैक करके उनके स्वाभिमान पर चोट की जा रही थी। ऐसी स्थिति में पायलट को कांग्रेस में रोके रखना कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती थी। क्योंकि स्थिति वहाँ तक पहुंच गई थी जहाँ राज्य के स्पेशल ऑपेरशन ग्रुप द्वारा पायलट को नोटिस भेजा जाता है। गहलोत के खेमे के विधायकों को एक होटल में ठहराया जाता है जहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता। विधायकों से कोई भी बाहरी व्यक्ति किसी भी प्रकार संपर्क न कर पाए इसके लिए उस होटल में जैमर्स तक लगाए जाते हैं। विधायकों की खरीद फरोख्त की एफआईआर दर्ज करवाई जाती है। पायलट पर भाजपा के साथ मिलकर सरकार गिराने की साजिश रचने का आरोप लगाया जाता है। इसकी शिकायत करते हुए गहलोत द्वारा प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी जाती है। इतना सब होने के बाद भी अगर आज सचिन पायलट कांग्रेस में हैं और गहलोत सरकार को अभयदान प्राप्त हो जाता है तो कांग्रेस बधाई की पात्र तो है लेकिन इसका श्रेय उसे अकेले नहीं दिया जा सकता। दरअसल कई बार कमजोर प्रतिद्वंद्वी भी जीत का कारण बन जाता है। राजस्थान में भी कुछ ऐसा ही हुआ राजस्थान में भाजपा अपनी आपसी फूट के चलते कांग्रेस की फूट का वैसा फायदा नहीं उठा पाई जैसा उसने मध्यप्रदेश में उठाया। यहाँ यह बात भी गौर करने लायक है कि भले ही सचिन पायलट की सिंधिया की ही तरह भाजपा में शामिल होने की अटकलें लगाई जा रही थीं लेकिन दोनों की परिस्थितियों में बहुत फर्क था। यह भी शायद राजस्थान के मामले में कांग्रेस के पक्ष में बाज़ी जाने का एक प्रमुख कारण कहा जा सकता है। क्योंकि जहाँ सिंधिया की पारिवारिक पृष्टभूमि में भाजपा शामिल रही है, राजमाता विजयाराजे सिंधिया जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थीं और आज भी वो भाजपा में अटलबिहारी के समकक्ष कद रखती हैं। उनकी बुआ यशोधरा और वसुंधरा भाजपा की वरिष्ठ नेत्री हैं। वहीं सचिन पायलट का भाजपा से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं रहा है। बल्कि यदि यह कहा जाए कि भाजपा विरोध की उनकी पृष्ठभूमि रही है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि उनकी पत्नी कश्मीर में भाजपा की विरोधी नेशनल कॉन्फ़्रेंस के नेता फारूख अब्दुल्ला की बेटी और उमर अब्दुल्ला की बहन हैं। ये दोनों ही जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद नज़रबंद कर दिए गए थे और जिन पर पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट भी लगाया गया था। यही वजह थी कि जहाँ एक ओर सिंधिया ने धारा 370 पर कांग्रेस में रहते हुए पार्टी लाइन के विपरीत मोदी सरकार के फैसले का स्वागत किया था, वहीं पायलट ने हालांकि धारा 370 पर कोई बयान नहीं दिया था लेकिन फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला की नजरबंदी पर सवाल उठाए थे। ऐसे में पायलट की भाजपा में एंट्री सिंधिया जितनी सहज नहीं थीं। लेकिन कहते है कि राजनीति में ना कोई मित्र होता है ना कोई शत्रु। समय और परिस्थितियां सब समीकरण बदल देते हैं। हो सकता है कि जो समीकरण आज की परिस्थितियों में नहीं बन पाए वो समय के साथ कल बन जाए क्योंकि राजनीति में असंभव कुछ भी नहीं होता। क्योंकि अब ऐसी खबरें आ रही हैं कि गहलोत सरकार को अभयदान के बाद अब पायलट अपने विधायकों के लिए एक डिप्टी सीएम समेत सरकार में पांच पदों की मांग कर रहे हैं। स्पष्ट है कि इस राजनैतिक ड्रामे का अभी अंत नहीं मध्यांतर हुआ है। राजस्थान की राजनीति में अभी बहुत कुछ शेष है। पिक्चर अभी बाकी है।

हिंदी में बोलने पर सजा ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आयुष मंत्रालय के सचिव राजेश कोटेचा ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है। द्रमुक की नेता कनिमोझी ने मांग की है कि सरकार उन्हें तुरंत मुअत्तिल करे, क्योंकि उन्होंने कहा था कि जो उनका भाषण हिंदी में नहीं सुनना चाहे, वह बाहर चला जाए। वे देश के आयुर्वेदिक वैद्यों और प्राकृतिक चिकित्सकों को संबोधित कर रहे थे। इस सरकारी कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों के 300 लोग भाग ले रहे थे। उनमें 40 तमिलनाडु से थे। जाहिर है कि तमिलनाडु में हिंदी-विरोधी आंदोलन इतने लंबे अर्से से चला आ रहा है कि तमिल लोग दूसरे प्रांतों के लोगों के मुकाबले हिंदी कम समझते हैं। यदि वे समझते हैं तो भी वे नहीं समझने का दिखावा करते हैं। ऐसे में क्या करना चाहिए ? कोटेचा को चाहिए था कि वे वहां किसी अनुवादक को अपने पास बिठा लेते। वह तमिल में अनुवाद करता चलता, जैसा कि संसद में होता है। दूसरा रास्ता यह था कि वे संक्षेप में अपनी बात अंग्रेजी में भी कह देते लेकिन उनका यह कहना कि जो उनका हिंदी भाषण नहीं सुनना चाहे, वह बाहर चला जाए, उचित नहीं है। यह सरकारी नीति के तो विरुद्ध है ही, मानवीय दृष्टि से भी यह ठीक नहीं है। महात्मा गांधी और डाॅ. राममनोहर लोहिया अंग्रेजी हटाओ आंदोलन के प्रणेता थे लेकिन गांधीजी और लोहियाजी क्रमशः ‘यंग इंडिया’ और ‘मेनकांइड’ पत्रिका अंग्रेजी में निकालते थे। उनके बाद इस आंदोलन को देश में मैंने चलाया लेकिन मैं जवाहरलाल नेहरु विवि और दिल्ली में विवि में जब व्याख्यान देता था तो मेरे कई विदेशी और तमिल छात्रों के लिए मुझे अंग्रेजी ही नहीं, रुसी और फारसी भाषा में भी बोलना पड़ता था। हमें अंग्रेजी भाषा का नहीं, उसके वर्चस्व का विरोध करना है। राजेश कोटेचा का हिंदी में बोलना इसलिए ठीक मालूम पड़ता है कि देश के ज्यादातर वैद्य हिंदी और संस्कृत भाषा समझते हैं लेकिन तमिलभाषियों के प्रति उनका रवैया थोड़ा व्यावहारिक होता तो बेहतर रहता। उनका यह कहना भी सही हो सकता है कि कुछ हुड़दंगियों ने फिजूल ही माहौल बिगाड़ने का काम किया लेकिन सरकारी अफसरों से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपनी मर्यादा का ध्यान रखें। यों भी कनिमोझी और तमिल वैद्यों को यह तो पता होगा कि कोटेचा हिंदीभाषी नहीं हैं। उन्हीं की तरह वे अहिंदीभाषी गुजराती हैं। उनको मुअत्तिल करने की मांग बिल्कुल बेतुकी है। यदि उनकी इस मांग को मान लिया जाए तो देश में पता नहीं किस-किस को मुअत्तिल होना पड़ेगा। कोटेचा ने कहा था कि मैं अंग्रेजी बढ़िया नहीं बोल पाता हूं, इसलिए मैं हिंदी में बोलूंगा। जब तक देश में अंग्रेजी की गुलामी जारी रहेगी, मुट्ठीभर भद्रलोक भारतीय भाषा-भाषियों को इसी तरह तंग करते रहेंगे। कनिमोझी जैसी महिला नेताओं को चाहिए कि वे रामास्वामी नाइकर, अन्नादुराई और करुणानिधि से थोड़ा आगे का रास्ता पकड़ें। तमिल को जरुर आगे बढ़ाएं लेकिन अंग्रेजी के मायामोह से मुक्त हो जाएं।

न्यायपालिका पर सवालिया निशान क्यों…..?
ओमप्रकाश मेहता
भारत प्रजातंत्र चार स्तंभों पर अवस्थित है- विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व अघोषित स्तंभ खबरपालिका। मूलत: प्रारंभिक तीन स्तंभों को लेकर ही स्वस्थ व चिरजीवी प्रजातंत्र की कल्पना की गई थी, किंतु पिछले सत्तर सालों में इनमें से दो स्तंभ विधायिका व कार्यपालिका अपने दायित्वों का निर्वहन निष्ठा व ईमानदारी से नहीं कर पाए, जिसके कारण भारतीय लोकतंत्र के निवासी भारतीयों की आशा विश्वास का केन्द्र न्यायपालिका ही बन गई और इस आशा विश्वास की न्यायपालिका ने ईमानदारी से रक्षा भी की, किंतु अब पिछले कुछ समय से न्यायपालिका के प्रति जो आस्था व विश्वास की मजबूत मीनार खड़ी थी, उसमें कई जगह दरार नजर आने लगी और अब वह दरार दिनों-दिन न सिर्फ चौड़ी होती जा रही है, बल्कि उसके कारण प्रजातंत्र के महल को खतरा भी नजर आने लगा है।
यद्यपि विधायिका के सदस्यों की तरह न्यायपालिका के न्यायाधीशों को भी नियुक्ति के समय ईमानदारी, निष्ठा व संविधान की शपथ दिलाई जाती है, किंतु अब धीरे-धीरे विधायिका व उसकी सहायक कार्यपालिका इतनी निरंकुश होती जा रही है कि उसने न सिर्फ स्वतंत्र न्यायपालिका को गलत तरीकों से प्रभावित करने की कोशिशें की, बल्कि कई बार इस स्तंभ पर भी अपना अधिकार जताने की कोशिशें की, जबकि हमारे संविधान में तीनों स्तंभों की पृथक-पृथक कार्यक्षेत्र सीमाएँ तय की गई है तथा प्रत्येक स्तंभ को कहा गया है कि वह दूसरे स्तंभ के क्षेत्र में हस्तक्षेप न करें, पिछले सत्तर सालों में सत्ताधीशों ने अपनी सुविधा के अनुरूप संविधान में सवा सौ से भी अधिक संशोधन कर दिए हो उन्हीं सत्ताधीशों ने हर समय न्यायपालिका की स्वंतत्रता पर कुठाराघात करने का भी प्रयास किया, यही नहीं संविधान की भावना के खिलाफ उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों को राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों पर नियुक्तियाँ देकर न्याय खरीदने की कोशिशें भी की गई और इसी कारण अब न्यायपालिका की निष्पक्षता विवादों के घेरे में आई, जिसका ताजा उदाहरण पीएम केयर्स फण्ड को लेकर ताजा फैसला और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम अधिवक्ता प्रशांत भूषण पर मानहानि का प्रकरण है। पीएम केयर्स फण्ड व प्रशांत भूषण द्वारा कथित मानहानि ये दोनों प्रकरण राजनीति के दायरें के है, जिन पर सुप्रीम कोर्ट का नजरिया साफ नजर आया है। पीएम केयर्स फण्ड वाले मामले के पीछे कांग्रेस सहित सभी प्रतिपक्षी दल है, तो प्रशांत भूषण के पीछे डेढ़ दर्जन सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश व तीन सौ के करीब देश के वरिष्ठ अधिवक्ता है, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट को एक पत्र सौंपा है।
अब जहां तक पीएम केयर्स फण्ड का सवाल है, प्रधानमंत्री जी ने 22 मार्च 2020 को इसकी स्थापना कर कोरोना पीड़ितों की सहायता के लिए इस कोष की स्थापना की, जिसे खर्च करने का पूर्ण दायित्व प्रधानमंत्री को सौंपा गया, इसका प्रतिपक्षी दलों ने विरोध किया व इसके खर्च करने का दायित्व एक विधिवत कमेटी गठित कर उसे सौंपने की मांग की। अर्थात्् प्रतिपक्षी की इस मांग के पीछे प्रधानमंत्री की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाना रहा होगा, मामला सुप्रीम कोर्ट में ले जाया गया और सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के पक्ष में फैसला सुना दिया। ऐसी ही कुछ चर्चा प्रशांत भूषण के मामले को लेकर है, क्योंकि प्रशांत भूषण जी कांग्रेस से जुड़े है।
यहाँ मेरा इरादा माननीय सुप्रीम कोर्ट व उसके माननीय न्यायाधीशों की कार्यप्रणाली पर कोई आक्षेप लगाना कतई नहीं है, किंतु यह तो एक कटु सत्य है कि देश की आवाम का विधायिका व कार्य पालिका की तरह अब न्यायपालिका से भी धीरे-धीरे विश्वास कम होता जा रहा है। इस पर समय रहते सभी पक्षों को गंभीर चिंतन कर दुरूस्त करने का व न्यायपालिका के प्रति पूर्ववत आस्था कायम करने के प्रयास करना चाहिए।

गति चाहे मंद, पर हौसले बुलन्द
ओमप्रकाश मेहता
भारत में अब तक के सबसे लम्बें गैर-कांग्रेसी राज के कीर्तिमान के बाद अब भाजपा पूरे प्रदेश का ‘चक्रवर्ती’ राजा बनने की ओर कदम बढ़ा रही है, फिलहाल उसके सामने तीन मुख्य राज्य है, जिनमें से वर्तमान में एक राज्य में समर्थित सरकार तथा एक राज्य में विरोधी दल की सरकार है, तीसरा राज्य वह है जहां कई महीनों से राष्ट्रपति शासन चल रहा है। जी हाँ, यहाँ चर्चा बिहार, पश्चिम बंगाल और जम्मू कश्मीर की चल रही है। बिहार में भाजपा की सहयोगी जदयू की सरकार है तो पश्चिम बंगाल में भाजपा की कट्टर विरोधी तृणमूल कांग्रेस (ममता) की सरकार है, जम्मू-कश्मीर में पिछले कई महीनों से राष्ट्रपति शासन चल रहा है। अब भाजपा की नजर फिलहाल इन तीनों राज्यों पर है, पश्चिम बंगाल में अगले साल के प्रारंभ में चुनाव होना है तो बिहार में इसी वर्ष के अंत तक। जबकि जम्मू-कश्मीर में केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा जब भी अपने अनुकूल परिस्थिति देखेगी, राष्ट्रपति शासन खत्म कर वहां के विधानसभा चुनाव करवा लेगी, वैसे अपने तौर पर भाजपा ने इसकी तैयारी शुरू कर दी है।
वैसे इन तीनों राज्यों में भाजपा के द्वारा जीत हासिल करना कतई सरल नहीं है, यह भाजपा अच्छी तरह जानती है, उसे यह पता है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने अनुकूल मौका देखकर कभी भी भाजपा को ‘लाल झण्डी’ दिखा सकते है, क्योंकि लालू यादव के जेल में होने के कारण अब उनके सामने कोई विशेष चुनौती शेष नही रह गई है। हाल ही में बिहार में आई प्रलयकारी बाढ़ से हुई क्षति की केन्द्र द्वारा पर्याप्त रूप से नहीं की गई पूर्ति से भी वे अन्र्तमन से नरेन्द्र मोदी से नाराज है, इसलिए जिस रोज वे अपने आपको राज्यस्तर की चुनौतियों से निपटने में सक्षम समझेगें वे भाजपा से पल्ला झाड़ लेगें।
अब जहाँ तक पश्चिम बंगाल का सवाल है, वहां तो भाजपा की कट्टर विरोधी की सरकार है, इसलिए वहां भाजपा को अपने उद्धेश्य की प्राप्ति हेतु ‘‘ऐड़ी से चैंटी’’ तक का जोर लगाना पड़ेगा, फिर चूंकि पश्चिम बंगाल गैर-हिन्दी भाषी प्रदेश है, इसलिए पार्टी के वरिष्ठ हिन्दी भाषी नेताओं को वहां प्रचार में भी काफी दिक्कत आने वाली है और पार्टी को पूरी तरह स्थानीय नेताओं पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। वहां भाजपा को कठिन अग्निपरीक्षा के दौर से गुजरना पड़ेगा, यदि पश्चिम बंगाल को भाजपा फतह कर लेती है तो फिर उसके लिए देश का कोई भी राज्य फलह करना मुश्किल नहीं होगा।
अब जहाँ तक जम्मू-कश्मीर का सवाल है, वहाँ भी भाजपा को फूंक-फूंक कर कदम रखना पड़ेगा, धारा-370 का खात्मा भाजपा के गले की हड्डी बन सकती है, क्योंकि इस धारा के हटा देने से जम्मू कश्मीरवासियों का विशेष दर्जा जो खत्म हो गया? फिर इस राज्य के स्थानीय दलों की पाक के साथ अंदरूनी सांठ-गांठ भी भाजपा को काफी कष्ट देने वाली है। यद्यपि पीडीपी नैत्री महबूबा मुफ्ती के साथ सरकार में रहकर भाजपा ने वहां की नब्ज अच्छी तरह जान ली है, किंतु जम्मू कश्मीर के स्थानीय नेताओं को जो लम्बे समय तक नजरबंद रखकर उनके सहयोगी समर्थकों से जो उन्हें दूर रखा गया, उसकी नाराजी भी वहां भाजपा को झेलनी ही पड़ेगी, सिर्फ अपनी पार्टी का वहां राज्यपाल तैनात कर देने से पार्टी का कोई भला होने वाला नहीं है, वहां स्थानीय लोकप्रिय नेताओं के साथ पाक के आतंकी भी भाजपा के लिए बहुत बड़े ‘सरदर्द’ है, जो आए दिन अपनी करतूतों से सबको आगाह कर रहे है, फिर पाक अधीकृत कश्मीर को भारत में शामिल करने के बारे में भी भाजपा व केन्द्र की कोई सार्थक पहल सामने नहीं आ पा रही है, जहाँ तक धारा-370 को हटाने का मसला है, केन्द्र के उस कदम से पूरा राष्ट्र चाहे खुश हो, किंतु जम्मू कश्मीरवासी खुश नहीं है, फिर वहां पाक के आतंकी जो भाजपा नेताओं व सरपंचों को आए दिन निशाने पर लेकर उनकी हत्याएँ कर रहे है, उससे प्रदेशवासियों में जहां भय की भावना व्याप्त हो गई है, वहीं भाजपा के स्थानीय नेता भी खुलकर काम नही कर पा रहे है। ये ही कुछ तथ्य है जो जम्मू कश्मीर की राजनीति को प्रभावित कर रहे है। इन राज्यों के अलावा भाजपा ने कुछ गैर भाजपा शासित मूलतः कांग्रसी राज्यों पर कब्जे की कोशिशें की, जिनमें से मध्यप्रदेश में तो वह सफल हो गई, किंतु राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब में वह सफल नही हो पाई। मतलब यह कि भाजपा साम-दाम-दण्ड-भेद सभी नीतियों का सहारा लेकर ‘चक्रवर्ती’ बनना चाहती है, अब देखिये उसे भविष्य में कहाँ क्या हासिल हो पाता है?

पीएम केयर्स फंड पर विवाद
सिद्धार्थ शंकर
भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए पहली बार लॉकडाउन शुरू होने के कुछ ही दिन बाद 27 मार्च को नरेंद्र मोदी ने पीएम केयर्स फंड का गठन किया। एक दिन के बाद पीएम मोदी ने सभी भारतीयों से इसमें दान देने की अपील की। मोदी ने ट्वीट पर कहा, मेरी सभी भारतीयों से अपील है कि वो पीएम केयर्स फंड में योगदान दें। उन्होंने यह भी कहा कि उनके डोनेशन से कोरोना के खिलाफ भारत की लड़ाई और मजबूत होगी और स्वस्थ्य भारत बनाने की दिशा में ये एक लंबा रास्ता तय करेगा। पीएम मोदी की अपील के बाद कई क्षेत्रों से डोनेशन आने शुरू हो गए। उद्योगपति, सेलिब्रिटीज, कंपनियां और आम आदमी ने भी इसमें अपना योगदान किया। एक सप्ताह के अंदर इस फंड में 65 अरब रुपए एकत्र हो गए। लेकिन पीएम केयर्स फंड शुरू से ही विवादों में भी रहा है। कई लोगों ने इस पर सवाल उठाया कि जब 1948 से ही पीएम नेशनल रिलीफ फंड (पीएमएनआरएफ) मौजूद है, तो नए फंड की क्या आवश्यकता थी। अब पीएम केयस फंड को लेकर उठ रहे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि इसका पैसा प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष या एनडीआरएफ में जमा करने की जरूरत नहीं है। दरअसल विवाद उस समय उठा जब जानकारी मिली कि इस फंड की जांच सीएजी नहीं कर सकता है। वहीं कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक अखबार की क्लिपिंग को शेयर करते हुए तंज कसते हुए कहा बेईमान का अधिकार। दरअसल अखबार की क्लिपिंग में दावा किया गया है कि पीएम केयर्स फंड के बारे में दी गई आरटीआई पर जानकारी देने से इंकार कर दिया गया है।
वहीं पीएम केयर्स फंड को लेकर उठे विवादों के बीच आधिकारिक वेबसाइट पर कुछ सवालों के जवाब दिए हैं जिसमें बताया गया है कि इसमें एकत्र हुए पैसे कितने हैं और इसका कहां-कहां इस्तेमाल किया गया है। साल 2019-20 के दौरान इस 3076.62 करोड़ रुपया एकत्र हुआ। विदेशी करेंसी के जरिए 39.68 लाख रुपया आया। 2000 करोड़ रुपए से भारत में बने 50 हजार वेटिंलेटर देश के सरकारी अस्पतालों में बांटे गए। एक हजार करोड़ रुपए प्रवासी मजदूरों पर खर्च किए गए और 100 करोड़ रुपए वैक्सीन बनाने के लिए दिए गए।
सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस इस मुद्दे को उठाकर सरकार को घेर नहीं पाई, सवाल यह है कि उसे इससे मिला क्या। अभी तक लोगों को यह नहीं पता था कि पीएम रिलीफ फंड की कमेटी में कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष भी एक सदस्य होता है। संविधान लागू होने से पहले ही 1948 में नेहरू जी ने मूल रूप से इस फंड की व्यवस्था पाकिस्तान से आने वाले हिंदू शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए की थी। आज की तरह उस वक्त भी टाटा परिवार ने देश की मदद में उदारता दिखाई थी इसलिए बतौर सदस्य टाटा घराने के सदस्य को भी इस कमेटी में रखा गया था। हालांकि पीएम रिलीफ फंड के दुरुपयोग का कोई प्रश्न कभी नहीं उठा है और इसके जरिए प्राकृतिक आपदा और बीमारी के वक्त नागरिकों को वाकई मदद उपलब्ध कराई गई है।
अब नए पीएम केयर फंड की बात करें तो यह स्पष्ट किया जा चुका है कि प्रधानमंत्री पदेन इस ट्रस्ट के अध्यक्ष होंगे उनके साथ रक्षा, गृह और वित्त मंत्री भी पदेन सदस्य होंगे। इनके अलावा समाजसेवा, वित्त, आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों के भी स्वतंत्र लोग इसके सदस्य नामित किए जाएंगे। कोई भी राजनीतिक व्यक्ति इस ट्रस्ट में नहीं होगा जैसा पीएम रिलीफ फंड में कांग्रेस अध्यक्ष को रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट में यह चुनौती दी गई थी कि केंद्र ने बगैर संसद की अनुमति के यह फंड शुरू कर दिया लेकिन मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने नाराजगी के साथ याचिकाकर्ता को फटकार लगाई कि यह कोई ऐसा फैसला नहीं है जिसकी अनुमति ली जाए। अब मोदी समर्थक यह प्रचार कर रहे हैं कि सोनिया गांधी की भूमिका खत्म होने से कांग्रेस पीएम केयर फंड को निशाने पर ले रही थी। जिस तरह अनावश्यक विवाद इस मुद्दे पर खड़ा किया गया उससे कांग्रेस और वामपंथी रक्षात्मक मुद्रा में हैं। बेहतर होता इस निर्णय का स्वागत किया जाता और भ्रष्टाचार पर मोदी को घेरने के स्थान पर विपक्षी नेता बीजेपी अध्यक्ष की तर्ज पर अपने सभी कार्यकर्ताओं से भी न्यूनतम 100 रुपए दान की अपील करते। इस मामले में मायावती ने जो लकीर खींची है वह उनकी परिपक्वता को साबित करती है। मायावती ने सरकार के हर निर्णय का स्वागत किया है। उन्होंने अपने सांसदों और विधायकों से भी 30 फीसदी कम वेतन लेने को और अन्य सहायता देने के निर्देश दिए हैं। वस्तुत: विपक्ष को यह अभी तक क्यों समझ नहीं आया है कि मोदी सार्वजनिक जीवन में एक बेदाग छवि रखते हैं, उनकी पारिवारिक विरक्ति की नजीर के आगे आजाद भारत का कोई भी नेता आज तक टिक नहीं पाया है। जाहिर है मोदी को निजी तौर पर जितना टारगेट किया जाएगा विपक्ष मुंह की खाता रहेगा।

सच बोलने का साहस
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
एक स्कूल में एक शिक्षक छात्रों को पढ़ा रहा था। उसने पढ़ाया कि गंगा नदी अमरकंटक से निकलती हैं। इस पर प्रधानाध्यापक ने गलत बताया तो शिक्षक ने कहा 500 रूपये में तो गंगा नदी ,अमरकंटक से निकलेगी ,पूरा वेतन मिलेगा तो हम गंगोत्री से निकालेगे।
जिस प्रकार संविधान के चार स्तम्भ होते हैं उसी प्रकार शिक्षा के भी चार स्तम्भ होते हैं। शिक्षक ,भवन ,छात्र और सुविधाएं। शिक्षक भी योग्य जगह से पढ़ा हो ,पढ़ाने कि रूचि हो ,लगातार पढ़ने वाला हो और नए नए प्रयोग करने वाला हो। इसी प्रकार भवन विस्तारित हो ,मनोकुल हो ,खुला हो और मैदान हो ,छात्र पढ़ने वाले हो ,रूचि वाले हो ,उनमे शिक्षा लेने की इच्छा हो और कुछ साधन सम्पन्न हो। सुविधाएं में उनके लिए प्रायोगिक व्यवस्था ,सुगमता से मिलने वाली,प्रचुरता में हो और समानता में हो।
वैसे शिक्षा सुविधा उपलब्ध कराना सरकार का काम होता हैं। इतिहास का अवलोकन करे तब पता चलता हैं कि राजाओं -,महाराजों ने शिक्षा ,स्वास्थ्य ,सड़क ,बिजली, पानी ,सुरक्षा, न्याय जैसे मौलिक सुविधाएँ दी हैं। भारत या इंडिया में भी यह भी सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। पर शिक्षा आदि में गुणवत्ता की कमी होने से उतना अधिक विकास नहीं हो पाया।
शिक्षा अंकुरण का कार्य करता हैं। अंकुरण का आधार बीज होता हैं। उसके बाद खेत ,उर्वरा शक्ति ,जल की उपलब्धता ,मौसम आदि के बाद जब तक फसल किसान के घर तक नहीं पहुँचती तब तक घटना /दुर्घटना की संभावना होती हैं। फसल आने के बाद किसान उसे विक्रय करता हैं। उस फसल का भाग्य कैसा होता हैं कोई नहीं जानता जैसे कोई दाना किसी सेठ के यहाँ जाता ,कोई किसी गरीब के यहाँ ,किसी से मिष्ठान बनना ,किसी से पूरी बनना ,किसी से परांठा ,किसी से रोटी और कोई रोटी जल जाती हैं और कोई सड़ जाती हैं। इसी प्रकार छात्र एक बीज के रूप में पाठशाला जाता हैं ,उसको पढ़ाने वाला कैसा हैं ,किस तरह पढ़ाता हैं ,किस विषय में रूचि पैदा करे और किस तरह छात्र का रुझान हो। जब तक नीव मजबूत नहीं होती तब तक मजबूत भवन खड़ा नहीं हो सकता।
नीव से ही विकास प्रक्रिया शुरू होती हैं। वर्तमान में शिक्षा व्यवसाय हो गया । पहले शिक्षा /विद्या दान माना जाता था। गुरुओं के प्रति सम्मान होता था। आज टीचर होने से उतना प्रभाव नहीं रहा। कोचिंग के कारण पढ़ाने वालों को एक नौकर के रूप में देखा जाता हैं। कारण छात्र पैसा देते हैं और वे पढ़ते हैं। कभी कभी कोई छात्र कक्षा में अनुपस्थित होने पर कोचिंग में पढ़ाने वाले कहते हैं की आप क्यों नहीं क्लास में उपस्थित क्यों नहीं होते ?तो छात्र कहता हैं श्रीमान आपको फीस दे दी गयी हैं बस उससे मतलब रखो। आना या न आना से कोई मतलब नहीं।
आज नीव बहुत खोखली हो चुकी हैं। स्कूलों में कोई सुधार नहीं ,संविदा वाले अपने भविष्य के प्रति चिंतित ,छात्रों का भविष्य अंधकारमय और महगी शिक्षा और गुणवत्ता विहीन। हमारे देश में जबरदस्ती का काम करना पड़ता हैं। वर्तमान में बेरोजगारी के कारण शिक्षक जो बी एस सी ,बी एड की जगह इंजीनियर ,एम् बी ए जैसे अयोग्य ,शिक्षा के लिए पढ़ा रहे हैं। आज इतिहास ,भूगोल ,नागरिक शास्त्र जो स्थानीय स्तर पर जरुरी हैं वह नहीं मालूम। आज यदि किसी पढ़े लिखे छात्र से पूछे गांव ,क़स्बा ,जिला, तहसील ,जनपद ,संभाग किसे कहते हैं ,किस जिले में कौन कौन सी नदी ,पहाड़ ,बाज़ार आदि हैं, तब वे मुँह ताकते हैं। प्रदेश और देश में कौन मुख्यमंत्री और प्रधान मंत्री होते हैं ,राज्यपाल किसे कहते हैं ,नामालूम में उत्तर।
आज ऊपरी सतह पर चमक हैं पर गुणवत्ता न होने से उसका सही उपयोग नहीं हो पा रहा हैं। वर्ष में कितने दिन पढाई होती पता नहीं, क्या पढाई होती नहीं मालूम। एक बार ग्रामीण स्तर के स्कूल में शिक्षक कक्षा में शयन कर रहे थे और सभी छात्र हल्ला- गुल्ला कर रहे थे। कुछ समय के बाद स्कूल निरीक्षक दौरे पर आये तो छात्र शांत हो गए तब शिक्षक की नींद खुली और निरीक्षक को देखा तो शिक्षक बोले”‘ बच्चो बताओं कुम्भकर्ण कैसे सोता था ?आदि आदि तब निरीक्षक ने टीप दी शिक्षक द्वारा प्रैक्टिकल बहुत अच्छा कराया जाता हैं।
इसी प्रकार एक गांव के सरपंच ने शिक्षक की शिकायत की की शिक्षक स्कूल में शराब पीता हैं। बहुत शिकायत होने पर जिला शिक्षा अधिकारी जाँच के लिए गए। सरपंच को बुलाया शिकायत के सम्बन्ध में, तब सरपंच बोले अब कोई शिकायत नहीं हैं ! पहले मास्टर साब अकेले पीते थे ,अब हम दोनों पीते हैं !इसी प्रकार कॉलेज /यूनिवर्सिटी स्तर पर प्रोफेसर, रीडर आदि अपना विषय न पढ़ा कर सब विषय पढ़ाते है। (संदर्भ — उपन्यास चार इमली )
भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं हैं ,कमी हैं इंडिया में। क्योकि इंडिया बोलने से अपनत्व भाव नहीं आते जितना गौरव भारत के बोलने में होता हैं। रहा सवाल विश्व गुरु बनने का तो हम कई क्षेत्रों में बन चुके ?जैसे राजनीती में ,भ्र्ष्टाचार में ,निक्कमेपन में ,बेरोजगारी ,आर्थिक मंदी,लाल फीताशाही ,ला (लाओ) और आदेश आदि आदि अनेक क्षेत्रों में प्रावीण्यता पा चूका हैं।
इस प्रकार संलग्न पत्र के आधार पर यह निश्चित हो चूका हैं की शिक्षा का स्तर से, हम किसी भी स्तर से कम नहीं हैं। और विश्व गुरु बनने से क्या होता हैं ?हम लोग तीन लोकों से ज्ञाता हैं ,त्रिकालज्ञ हैं। तैतीस करोड़ देवी देवता हैं जिस देश में ,उतनी तो हमारी आबादी १९४७ में थी। अब बढ़ गयी भगवन की कृपा से ,और अल्लाह के फज़ल से।
विश्व गुरु बनना कठिन और असाध्य नहीं हैं बशर्ते जब तक हमारे दिल दिमाग ,व्यवस्था में सुधार न हो। कोरे भाषणों से कुछ नहीं होगा धरातल पर हमें खरे उतरना होगा। खरा बनने के लिए हमें राख होना होगा। अग्नि में तपना होगा ,नहीं तो पतन निश्चित हैं। क्योकि साक्षर को राक्षस बनना कठिन नहीं होता।
सुधार ,जाग्रति और निष्ठां जब आएगी तब गंगोत्री पवित्र हो। जब गंगोत्री अपवित्र हो चुकी तब गंगा कब तक पवित्र होगी।
विश्व गुरु हमारी कल्पना हैं ,धरातल पर हम स्वर्ग चाहते हैं पर स्वर्गवासी नहीं होना चाहते।

धोनी की विदाई
सिद्धार्थ शंकर
भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और विकेट कीपर महेंद्र सिंह धोनी ने आज आखिरकार अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास का ऐलान कर दिया। उनके रिटायरमेंट की लंबे समय से अटकलें लगाई जा रही थीं। आज उन्होंने सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए क्रिकेट के सभी प्रारूपों से संन्यास की घोषणा कर दी है। धोनी ने टेस्ट की कप्तानी भी पूरी दुनिया को चौंकाते हुए अचानक से छोड़ दी थी और एक बार फिर से उन्होंने अपने चाहने वालों को चौंकाते हुए एक बड़ा फैसला लिया। धोनी हमेशा आत्मविश्वास से लबरेज होकर क्रिकेट मैदान में उतरते थे जो उनके पूरे करियर में उनकी पहचान बनी रही। धोनी ने अपने इंस्टाग्राम संदेश के माध्यम से इंटरनेशनल क्रिकेट से अपने संन्यास की घोषणा कर दी और सबका शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि 15 अगस्त शाम सात बजकर 29 मिनट से मुझे रिटायर समझें। कप्तान के तौर पर तो धोनी हिट थे ही एक खिलाड़ी यानी बल्लेबाज व विकेटकीपर के तौर पर भी उन्होंने पहचान बनाई। धोनी ने एक भावुक पोस्ट कर अलविदा कहा है। उन्होंने लिखा- अब तक आपके प्यार और सहयोग के लिए धन्यवाद। भारत के लिए आखिरी मैच 2019 वल्र्ड कप में न्यूजीलैंड के खिलाफ खेला था जो सेमीफाइनल मुकाबला था। इस मैच में भारत को हार मिली थी और इसके बाद से ही उनके क्रिकेट करियर को लेकर काफी कयास लगाए जा रहे थे। अब माही ने अचानक से क्रिकेट को अलविदा कह दिया है। हालांकि अभी धोनी आईपीएल 2020 खेलेंगे अभी तक ऐसा ही अनुमान लगाया जा रहा है। अब इंटरनेशनल क्रिकेट में माही का अंदाज तो हमें देखने को नहीं मिलेगा। धोनी का नाम आते ही उनका कूल अंदाज नजर के सामने आता है जो किसी भी परिस्थिति में अपना आपा नहीं खोता था। चैंपियन क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी की कामयाबी मैदान पर अनायास नहीं है। अपनी कप्तानी में भारत की झोली में वल्र्ड टी20, 50 ओवर वल्र्ड कप और चैंपियंस ट्रॉफी जैसे खिताब भरने वाले धोनी को क्रिकेट पंडितों ने कैप्टन कूल का नाम दिया। इसके लिए उनकी सोच-समझकर रणनीति बनाने और इंटरनेशनल क्रिकेट में जबर्दस्त प्रेशर के बीच भी विचलित ना होने का उनका अप्रोच जिम्मेदार था। यही कारण था एक युवा बल्लेबाज को जब 2007 में एकाएक कप्तानी थमाई गई तो उसने तुरंत आकर चमत्कार कर दिखाया। यही नहीं, उनकी बल्लेबाजी में भी यही जज्बा दिखता था जोकि उन्हें भारतीय क्रिकेट के सबसे शानदार फिनिशर का दर्जा दिला गया।
देखा जाए तो धोनी का इंटरनेशनल वनडे करियर रन आउट से शुरू हुआ और रन आउट पर जाकर खत्म हुआ। धोनी अपने पहले इंटरनेशनल मैच में शून्य पर रन आउट हो गए थे। उन्होंने इंटरनेशनल पारी की शुरुआत बांग्लादेश के खिलाफ की थी। महेंद्र सिंह धोनी ने वल्र्ड टी20 2007 कप में भारत को चैंपियन बनाया। इसके बाद साल 2011 वल्र्ड कप में भारत को 28 साल बाद 50 ओवर में भारत को जीत दिलाई। इसके बाद 2013 में उन्होंने चैंपियंस ट्रॉफी में भारत को विजय दिलाई। वह तीनों आईसीसी टूर्नामेंट जीतने वाले इकलौते कप्तान बने। महेंद्र सिंह धोनी ने कप्तान के रूप में 332 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले हैं। इसमें 200 वनडे इंटरनैशनल, 60 टेस्ट और 72 टी20 इंटरनेशनल मैच खेले। यह एक वल्र्ड रिकॉर्ड है। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया के रिकी पॉन्टिंग का नंबर आता है जिन्होंने 324 मैच खेले हैं। धोनी इकलौते कप्तान हैं जिन्होंने हर प्रारूप में 50 से ज्यादा मुकाबलों में टीम की कप्तानी की है। धोनी ने भारत के लिए 350 वनडे, 90 टेस्ट और 98 टी20 मैच खेले। करियर के आखिरी चरण में वह खराब फार्म से जूझते रहे जिससे उनके भविष्य को लेकर अटकलें लगाई जाती रही। उन्होंने वनडे क्रिकेट में पांचवें से सातवें नंबर के बीच में बल्लेबाजी के बावजूद 50 से अधिक की औसत से 10773 रन बनाये। टेस्ट क्रिकेट में उन्होंने 38 . 09 की औसत से 4876 रन बनाये और भारत को 27 से ज्यादा जीत दिलाई। आंकड़ों से हालांकि धोनी के करियर ग्राफ को नहीं आंका जा सकता। धोनी ने स्टंप के पीछे रहते हुए कठिन समय में भी अपना धैर्य नहीं खोया और इसका हमेशा उनको फायदा मिलता रहा। वे लगातार एक्सपेरिमेंट्स करते रहते थे। कई बार ऐसा हुआ है जब मैच फंसा होता था तो धोनी द्वारा लिया गया अजूबा फैसला सबको चौंका देता था। लेकिन ज्यादातर मौकों पर उन्होंने अपने फैसले को सच साबित किया। उनका यह आत्मविश्वास ही था कि जो उन्हें दूसरे खिलाड़ी और स्कीपर से अलग करता था। वे बहुत सोच-समझ का फैसला लेते थे और फैसला लेने के बाद वे रिजल्ट के बारे में सोचे बगैर केवल उस पर आगे बढ़ते थे। धोनी की जितनी तारीफ की जाए कम है। उन्होंने इंडियन क्रिकेट को जो कुछ दिया है, उसे हमेशा याद रखा जाएगा। आने वाले लंबे समय तक क्रिकेट कैप्टन की तुलना धोनी से होती रहेगी।

सर्वदलीय मान्यता के एकदलीय नेता अटलजी
प्रभात झा
(अटल जी की तीसरी पुण्यतिथि) आज देश के जन-जन के मन में अपनी ओज और तेजपूर्ण वाणी से एक अप्रतीम स्थान बनाने वाले भारत रत्न और तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि है। सारा देश उन्हे नमन कर रहा है। नीति सिद्धांत, विचार एवं व्यवहार की सर्वोच्च चोटी पर रहते हुए सदैव जमीन से जुड़े रहने वाले अटलजी से जिनका भी संबंध आया, वह राजनीति में कभी छोटे मन से काम नहीं करेगा। विपक्ष में रहते हुए देश के हर दल के राजनेताओं और कार्यकर्ताओं के मन में आपका विशिष्ट स्थान बना लेना, साथ ही उन दलों के कार्यकर्ताओं में यह भाव पैदा कर देना कि काश अटलजी हमारे दल के नेता होते! का यह सामर्थ्य अटलजी में ही था। विरोध में रहते हुए भी वे सदैव सत्ता पक्ष के नेताओं से भी देश में अधिक लोकप्रिय रहे। अपने अखंड प्रवास, वक्तव्य कला और राजनैतिक संघर्ष के साथ-साथ सड़कों से लेकर संसद में सिंह गर्जना कर तत्कालीन भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनके समकक्ष नेताओं के मन मे भी अपना विशिष्ट स्थान बनाने वाले अटलजी सर्वदलीय मान्यता के एकदलीय नेता थे।
हम सभी का सौभाग्य है कि अन्य लोगों से अधिक राजनैतिक समाजिक और पत्रकार के नाते और इससे भी अधिक ग्वालियर के नाते हमारा उनपर सर्वाधिकार था। ग्वालियर अटलजी की जन्मस्थली और प्रारंभ में कर्म स्थली रही। वे महाराज बाड़े स्थित गोरखी स्कूल और तत्कालीन विक्टोरिया कॉलेज जो आज का महारानी लक्ष्मीबाई कला एवं वाण्ज्यि महाविद्यालय आज अटलजी की यादों से जुड़ा हुआ है। महारानी लक्ष्मीबाई महाविद्यालय में पढ़ चुके और पढ़ रहे छात्र गर्व से कहते है कि हम उस कॉलेज से ’पास आऊट’ हैं जहां अटल जी पढ़ा करते थे।
एक समय पर अटल जी स्वदेश के में संपादक भी रहे। उनका स्वदेश से वैचारिक लगाव रहा। हम सभी स्वदेश मे रहे, अतः हम लोगों से उन्हे और भी स्नेह था। ग्वालियर की गलियों को अटलजी ने साईकिल से नापा हुआ था। ग्वालियर की हर गली हर चौराहे और हर मोहल्ले के नाम उनकी जुंबा पर होते थे। हम लोगों से लगाव होने का कारण एक और था कि अटलजी के भांजे अनूप मिश्रा और उनके भतीजे दीपक वाजपेयी भी साथ-साथ एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। अटलजी एक तो बहुत सहज सरल थे। साथ ही सुरक्षा के नाम पर आज जिस तरह का वातावरण है, वैसा उस समय नेताओं के साथ नहीं था। अटलजी ’शताब्दी’ में दिल्ली से बैठकर ग्वालियर आते थे। सुरक्षा के नाम पर श्री शिवकुमार पारेख उनके साथ ही रहा करते थे। शिवकुमारजी अटलजी के अनुज भांति ही थे।
अटलजी की इस पुण्यतिथि पर हम भारत के जन-जन को यह बताना आवश्यक समझते है कि उनका जन्म ग्वालियर के जिस शिन्दे की छावनी स्थित कमल सिंह के बाग की पाटौर मे हुआ था, वह पाटौर उनके प्रधानमंत्री बनने तक यथावत रही। भारत की राजनीति में ईमानदारी का ऐसा अनुपम उदाहरण कभी देखने को नहीं मिला। वे प्रतिपक्ष के नेता रहते हुए ग्वालियर के ट्रेड फेयर(मेला) में हरिद्वार वालों के गाजर का हलुआ और मंगोड़ी खाने मोटर साईकिल पर बैठकर चले जाते थे। ग्वालियर में अपने आप ही उनका मन वहां बीते बचपन की ओर लौट आता था। अटलजी मूल में इतने बड़े नेता होते हुए भी पार्टी के भीतर एक कार्यकर्ता के रूप में ही थे। सन् 1996 की बात है। मध्यप्रदेश में भाजपा सांसदों, विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों का प्रशिक्षण वर्ग लगा था। बतौर प्रतिपक्ष के नेता के रूप में वे भोपाल स्थित भाजपा के प्रांतीय कार्यालय दीनदयाल परिसर के हॉल मे आए। प्रशिक्षण वर्ग में उनका उद्बोधन हुआ। उस उद्बोधन का दो पैरा मैं यहां उद्धत कर रहा हूं।
अटलजी ने उद्बोधन के प्रारम्भ में कहा,
“कार्यकर्ता मित्रों”,
मेरे इस संबोधन पर आश्चर्य न करें। मै जानता हूं कि इस प्रशिक्षण वर्ग में पार्टी के प्रमुख नेता उपस्थित है। सांसदगण भी विराजमान है। सभी विधायक भाई तथा बहनें भी वर्ग में भाग ले रही है। मैने जानबूझकर कार्यकर्ता के नाते सबको संबोधित किया। हम यह दावा करते हैं कि हमारी पार्टी कार्यकर्ताओं की पार्टी है। जो नेता है वह भी कार्यकर्ता है। विशेष जिम्मेदारी दिए जानें के कारण वह नेता के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन उनका आधार है, उनका कार्यकर्ता होना। जो आज विधायक है, वह कल शायद विधायक नहीं रहें। सांसद भी सदैव नहीं रहेंगे। कुछ लोगों को पार्टी बदल देती है, कुछ को लोग बदल देते हैं, लेकिन कार्यकर्ता का पद ऐसा है, जो बदला नहीं जा सकता। कार्यकर्ता होने का हमारा अधिकार छीना नहीं जा सकता। कारण यह है कि हमारा यह अधिकार अर्जित किया हुआ अधिकार है, निष्ठा और परिश्रम से हम उसे प्राप्त कर सकते हैं, वह ऊपर से दिया गया सम्मान नहीं है कि उसे वापिस लिया जा सके।
उन्होने वर्ग में आगे कहा पार्टी के संगठन को सुचारू रूप से चलाने के लिये कार्य का विभाजन होता है, तदानुरूप पदों का सृजन होता है। अलग-अलग दायित्व होते हैं। पदो के अनुसार कार्यकर्ता पहचाने जाते है, लेकिन यह पहचान सीमित समय तक ही रहती है। संगठन का कोई पदाधिकारी 4 साल से अधिक अपने पद पर नहीं रहता। ऐसा किसी विशेष नियम के अन्तर्गत नहीं होता, यह एक परम्परा है, हम जिसका दृढ़ता से पालन करते हैं। देश में अनेक राजनीतिक दल हैं। उनमें न नियमित रूप से सदस्यता होती है और न चुनाव। जो एक बार पदाधिकारी बन गया, वह हटने का नाम नही लेता। अनेक दलों के अध्यक्ष स्थायी अध्यक्ष बन जाते हैं। उन्हें हटाने के लिये अभियान चलाना पड़ता है, लेकिन उनके कान पर जूं नहीं रेंगती, वे टस से मस नहीं होते। हमारे यहां ऐसा नहीं है।
अटलजी कहा करते थे कि हमारा लोकतंत्र में विश्वास है। जीवन के सभी क्षेत्रों में हम लोकतांत्रिक पद्धति का अवलंबन करने के समर्थक हैं। अपने राजनीतिक दल को भी हम लोकतंत्रात्मक तरीके से चलाते हैं। निश्चित समय पर सदस्यता होती है। पुराने सदस्यों की सदस्यता का नवीकरण होता है, नये सदस्य बनाये जाते हैं। संगठन के विस्तार के लिए नये लोगों का आना जरूरी है। समाज के सभी वर्गों से और देश के सभी क्षेत्रों सें सभी पार्टी में अधिकाधिक शामिल हों, यह हमारा प्रयास होता है। किसी व्यक्ति या इकाई द्वारा अधिक से अधिक सदस्य बनाये जाते हैं, इस प्रतियोगिता में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन प्रतियोंगिता पार्टी के अनुशासन और मर्यादा के अन्तर्गत होनी चाहिए।
उन्होने आगे कहा कि पार्टी के विस्तार के लिए नये सदस्य बनाना एक बात है और पार्टी पर कब्जा करने के लिये सदस्यता बढ़ाना दूसरी बात है। जब पार्टी का विस्तार करने के बजाय पार्टी पर अधिकार जमाने की विकृत मानसिकता पैदा होती है तब फिर जाली सदस्य भी बनाये जाते हैं। सदस्यता का शुल्क भी गलत तरीके से जमा किया जाता है। इससे पार्टी का स्वास्थ्य बिगड़ता है और दलों में प्रचलित इस बुराई को हमें अपने यहां बढ़ने से रोकना होगा। वर्षों से पार्टी में काम करने वाले लोग ऐसी बुराइयों के प्रति उदासीन नहीं हो सकते। पार्टी का जन-समर्थन, बढ़ाना होगा, किन्तु उसे पद-लोलुपता से बचाना होगा। गुटबन्दी का पार्टी में कोई स्थान नहीं हो सकता।
इस ऐतिहासिक प्रशिक्षण वर्ग में भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तत्कालीन सरसंघ चालक और भाजपा के पालक सुदर्शनजी साथ ही भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय संगठन महामंत्री कुशाभाऊ ठाकरे भी मौजूद थे। भाजपा के अब तब हो रहे विस्तार में मूल प्राण ’कार्यकर्ता’ है। यही बात संगठनात्मक बैठकों में आज भी देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहा करते हैं। उनका भी कहना है कि हम चाहे जितने बड़े नेता हों पर हमें मूल में कार्यकर्ताभाव से सदैव जुड़े रहना चाहिए। कार्यकर्ता भाव ही नए कार्यकर्ता को अपने दल से जोड़ता है।
इस प्रशिक्षण वर्ग में अटलजी ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी पिछले कुछ वर्षों में अपना प्रभाव और शक्ति बढ़ाने में सफल हुई है। इसके पीछे एक चिन्तन है, एक विचारधारा है। मै अभी-अभी परिसर में पं. दीन दयाल उपाध्याय की मूर्ति का अनावरण करके आया हूं। वह महान चिंतक और कुशल संगठनकर्ता थे। उनकी विशेषता पुराने चिन्तन को देश और काल के परिप्रेक्ष्य में उपस्थित करने मे थी। समय के साथ समस्याओं का रूप बदलता है, नयी समस्याएं खड़ी होती हैं, कुछ पुरानी समस्याएं नये स्वरूप मे आती हैं। उन समस्याओं को अलग करने के लिये मूलभूत चिन्तन के आधार पर नयी व्याख्याएं और नयी व्यवस्थाएं बनानी पड़ती हैं।
वर्ग में उन्होने आगे कहा कि हम एक आदर्श राज्य की स्थापना चाहते हैं। इसलिये प्रारंभ में धर्म राज्य की बात कही, बाद में अयोध्या आन्दोलन के प्रकाश में हमने राम राज्य की स्थापना को अपने लक्ष्य के रूप में लोगों के सामने रखा। धर्म राज्य और राम राज्य में कोई अन्तर नहीं है। दोनों में लक्षण समान हैं किन्तु कभी-कभी समय में परिवर्तन के साथ कोई शब्दावली अधिक आकृष्ट हो जाती है।
यह संयोग ही है कि 5 अगस्त के अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट के द्वारा भगवान रामलला के भव्य राममंदिर के भूमिपूजन के समय अपने उद्बोधन में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने साफ शब्दों में कहा कि हजारों वर्षों से चली आ रही हमारी संस्कृति का संदेश और रामराज्य की ओर बढ़ने का एक नया युग प्रारंभ हुआ है। अटलजी ने आगे कहा कि जब जनसंघ का निमार्ण हुआ तो विश्व साम्यवाद और पूंजीवाद में बंटा हुआ था। भारतीय चिन्तन ने दोनों को अस्वीकार किया था। हम राज्य शक्ति और आर्थिक शक्ति का एकत्रीकरण नहीं चाहते, न कुछ व्यक्तियों के हाथों में और न राज्य के ही हाथों में, हम विकेन्द्रित व्यवस्था के हामी हैं। साम्यवाद शोषण से मुक्ति और राज्य के तिरोहित होने की बात करता है किन्तु व्यवहार में वह केन्द्रीकरण का पुरस्कर्ता बनकर खड़ा हो जाता है। पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों की विफलता सुनिश्चित जानकर उपाध्याय जी ने एकात्म मानववाद का प्रतिपादन किया, जिसमें पूंजीवाद की तरह न तो समस्याओं को टुकड़ो मे देखा जाता है और न व्यक्ति की स्वतंत्रता तथा उसके पुरूषार्थ पर पानी फेर कर एक अधिनायकवादी व्यवस्था का ही प्रतिपादन किया जाता है।
अटलजी कहा करते थे कि पश्चिमी सभ्यता एक नये संकट में फस रही है। नये आर्थिक सुधारों के बाद हम भी उसी गलत दिशा में जा रहे हैं। बाजारी अर्थ-व्यवस्था के मूल में कोई गहरा जीवन-दर्शन नहीं हो सकता। प्रगति के लिये प्रतियोगिता होनी चाहिए। प्रतियोगिता से प्रगति होती है। दौड़ होने पर सबसे आगे निकलने का आकर्षण होता है। तेज दौड़ने की प्रेरणा होती है, जिसमें प्रतियोगिता किस हद तक हो, इसका विचार जरूरी है। कला घटाने वाली प्रतिस्पर्धा सब का निमार्ण नहीं कर सकती। साथ-साथ दौड़ने के बजाय यदि एक-दूसरे को टंगड़ी लगाकर गिराने का खेल शुरू हो जाये तो न दौड़ होगी और न प्रगति। केवल धन कमाना ही जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता। जीवन के लिये अर्थ जरूरी है, किन्तु अर्थ के संबंध में और भी बातें आवश्यक हैं। पं.दीनदयाल उपाध्याय जी कहा करते थे कि पेट भरने मात्र से समस्याएं समाप्त नहीं होतीं। सचमुच मे कुछ समस्याओं का जन्म पेट भरने के बाद ही होता है।
अटलजी का कहना था कि हम शरीर की रचना देखें तो उसमें पेट के ऊपर मस्तिष्क और फिर सब का संचालन करने वाली आत्मा का स्थान दिखाई देता है। मनुष्य मात्र मुनाफा कमाने का साधन नहीं बन सकता। आहार, निद्रा और भय मनुष्य और पशु मे समान है। बुद्धि और भावना मनुष्य और पशु को अलग करती है। पेट के साथ मनुष्य के मस्तिष्क को भी भोजन चाहिए। बौद्धिक दृष्टि से उसका विकसित होना जरूरी है। उसके मन में करूणा, संवेदना और संतोष होना चाहिए।
उनका मानना था कि आज प्रायः सभी देशों में जड़ो की तलाश का सिलसिला चल रहा है, यहां तक कि जातियां और उपजातियां भी अपनी जड़ों की खोज करना चाहती है। इस्लामी देशों में यह खोज फंडामेंटलिज्म का रूप लेकर सामने आ रही है। मजहब समान होते हुए भी इस्लामी देश संस्कृति की दृष्टि से अलग-अलग हैं, कुछ उदारवादी हैं। कुछ दिन पहले कुछ अमरीकियों से चर्चा करने का मौका मिला। उनका कहना था कि वे हमारे हिन्दुत्व के आंदोलन को समझते हैं अपनी जड़ो से नाता रखने का प्रयास स्वाभाविक है। किन्तु जड़ो की तलाश भी एक सीमा तक होनी चाहिए। बार-बार जड़ो को उखाड़ कर देखने से पौधा नहीं पनपता। जड़ पेड़ को आधार प्रदान करता है। किन्तु पेड़ के लिए जरूरी है, उसका तना हो, उसकी शाखायें हो, शाखाओं में पत्ते हो, पत्तों में फूल खिले और फल लगें। मूल और फल के संबंध को समझना होगा। गरीब देशों की तरह से हमें पश्चिम की चकाचौंध में आने की आवश्यकता नहीं है। हमारे साथ इन देशों की आंखे भी खुलेंगी। हम उसमें उनकी सहायता कर सकते हैं। हमारे पास एक चिन्तन है, एक विचारधारा है, प्रगति के साधन है, इतना बड़ा भूखंड है, पांच-छः हजार साल की संस्कृति है, 90 करोड़ का जनवल है, पुरूषार्थ और पराक्रम की परम्परा है। हमें दृढ़ता से खड़े रहना है। सत्ता का उपयोग हमें इस कार्य के लिए करना है।
अटलजी की मान्यता रही कि भारतीय जनता पार्टी एक राष्ट्रीय विकल्प के रूप में उभरी है। हमारी बढ़ती हुई शक्ति और प्रभाव से आतंकित होकर भिन्न-भिन्न विचारों वाले हमारे इर्द-गिर्द जमघट बना रहे हैं। पहले कांग्रेस के विरूद्ध गैर कांग्रेसी हवा चलती थी। अब भाजपा के विरूद्ध एकत्रीकरण हो रहा है। यह एकत्रीकरण टिकेगा नहीं। हमें यह समझ लेना चाहिए कि यदि हमारी प्रगति में रूकावट आयेगी, जो हमारी अपनी ही कमियों और खामियों के कारण आयेगी, हमारे विरोधियों के कारण नहीं।
भारतीय जनता पार्टी के साथ आज देश का भविष्य जुड़ गया है हमें बहुमत प्राप्त हो या न हो, हमारे विरोधी चाहें या न चाहें, भारतीय जनता पार्टी का भविष्य और देश का भविष्य एक-दूसरे से सम्बद्ध हो गये हैं। इस ऐतिहासिक अवसर पर हम पिछड़ जायें, हार मान जायें, छोटे-छोटे विवादों में फंस जायें तो आने वाली पीढ़ी हमें कभी क्षमा नही करेगी। देश की स्थिति पर और संगठन की आवश्यकता पर हम कार्यकर्ता के नाते विचार करें, कार्यकर्ता के नाते ही व्यवहार करें। हम चाहे जितनी बड़ी सत्ता हासिल कर ले या हम चाहे जितनी ऊंचाई पर चले जांए, पर हमें और हमारे संगठन को इतनी ऊंचाई पर जिन कार्यकर्ताओं और जनता जनार्दन ने पहुंचाया, उन्हे हमे अपनी आंखों से कभी ओझल नहीं करना चाहिए। हमारी सफलता सुनिश्चित है। और आवश्यकता है चिन्तन के अनुरूप सही व्यवहार करने की।
अटलजी का प्रशिक्षण वर्ग में दिया गया उद्बोधन और उनका एक-एक वाक्य हमारे लिये आज भी प्रेरणादायक है। उनकी पुण्यतिथि पर उनके दिये गए विचारों पर यदि हम सदैव चिंतन करते रहे और सदैव चलते रहे तो न हम भटकेंगे और न ही हम देश को भटकने देंगे।

स्वतंत्रता दिवस और रामराज्य
रघु ठाकुर
15 अगस्त 1947 को देश में खंडित आजादी अंग्रेजों के द्वारा हस्तांतरित की गई थी। हाँलाकि 9 अगस्त 1942 को गाँधी के आव्हान पर जिस आजादी के आंदोलन की शुरूआत हुई थी वह खंडित आजादी के लिए नहीं था। इस आंदोलन में देश के किसानों, मजदूरों, युवकों, छात्रों, व्यापारियों, पत्रकारों सभी के सपनों के रंग शामिल थे और सबको यह उम्मीद थी कि आजाद भारत बापू के सपनों का भारत होगा, जिसमें रामराज्य होगा। याने ऐसा शासन जिसमें न कोई दुखी होगा, न कोई पीड़ित होगा, न अपराध होंगे, न कोई छोटा या बड़ा होगा। रामराज्य का वर्णन करते हुए तुलसीदास ने रामायण में लिखा था ‘‘दैहिक दैविक भौतिक तापा रामराज्य काहू नहीं व्यापा’’ याने रामराज्य एक ऐसा राज्य होगा जिसमें शारीरिक, दैविक और भौतिक किसी किस्म की कोई पीड़ा नहीं होगी। परन्तु आजादी के 73 वर्ष में जब हम भारत की आजादी और देश के हालातों की ओर देखते हैं तो बापू का रामराज्य कहीं नज़र नहीं आता।
देश में प्रतिवर्ष लगभग 2-3 लाख लोग दुर्घटनाआंे में मर जाते है, लगभग 70-80 लाख बच्चे 5 वर्ष की उम्र होते-होते कुपोषित होकर मर जाते है। माताओं के पेट में न पौष्टिक भोजन है, न संतान के। वह दोनों बेहाल हैं। लाखो लोग प्रतिवर्ष टी.बी. जैसी बीमारियों से मर जाते है। प्रतिवर्ष देश में सूखा और बाढ़ की विपत्ति आती है इस वर्ष भी अभी तक बाढ़ से लगभग 40 लाख लोग बेघर और तबाह हो चुके है। बिहार, आसाम, उ.प्र., आदि क्षेत्रों के बड़े इलाके जलमग्न हैं, क्या यह सब दैविक दैहिक और भौतिक तापा नहीं है?
प्रधानमंत्री जी ने कई सौ करोड़ से बनने वाले राम मंदिर का शिलान्यास तो कर दिया परन्तु रामराज्य की कल्पना की एक ईट भी कहीं नज़र नहीं आती। हाल ही में बाढ़ के प्रश्न की चर्चा करते हुए उन्होंने मुख्यमंत्रियों से बात की। बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार बोले की नेपाल अपने समझौते का क्रियान्वयन नहीं कर रहा है। यह कोई नया तर्क नहीं है बल्कि एक अर्थ में यह एक पुराना जुमला है। मैं जानता हूॅ, कि नेपाल से आने वाला पानी बाढ़ का कारण है, परन्तु आजादी के 73 वर्षाें में इस पानी को बाँधकर सूखे खेतों की ओर ले जाने का प्रयास देश की केन्द्र या राज्य की सरकारों ने क्यों नहीं किया? क्या नेपाल ने देश के मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री के हाथ बाँध दिए है? क्या वह अपने देश की जनता के हित में काम नहीं कर सकते? प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने कहा कि तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए, परन्तु किस तकनीक से बाढ़ रूकेगी इसका खुलासा उन्होंने नहीं किया। इसका कारण नेपाल है, परन्तु भारत के शासकों के लिए बचाऊ की बकरी है। सभी दलों की सरकारें या सभी दलों के लोग इन 73 वर्षाें में कही न कहीं सरकारों के कम या ज्यादा हिस्सेदार रहे हैं, परन्तु एक मात्र डाॅ. लोहिया को छोड़कर किसी ने भी इन सवालों को गंभीरता से नहीं उठाया है, सूखा और बाढ़ राहत देश के भ्रष्ट नेताओं की विलासता और राजनीति का बड़ा माध्यम है इसलिए वे राहत चाहते है, मुक्ति नहीं। राहत प्रतिवर्ष बढ़ेगी क्योंकि प्रतिवर्ष विपŸिा आएगी परन्तु अगर मुक्ति मिल गई तो राहत के नाम से पैसा कैसे आएगा। इन 73 वर्षाें में केन्द्र और राज्यों को मिलाकर लगभग 40 लाख करोड़ रूपया राहत पर खर्च हो चुका है और विपŸिा जहाँ की तहाँ है।
कोरोना की महामारी वैश्विक महामारी है और दुनिया इसकी वैक्सीन खोजेगी। परन्तु भारत के प्रधानमंत्री जैसा वैज्ञानिक और चिकित्सक कौन हो सकता है, जिन्होंने कोरोना महामारी का वैक्सीन लाॅकडाऊन में ही खोजने और निजीकरण तथा विदेशी पूँजीनिवेश की वैक्सीन से वे देश को कोरोना मुक्त कर रहे है। देश के सभी सरकारी क्षेत्र, रेलवे, बीमा, बैंक, स्टील क्षेत्र, आई.टी., खनन, रक्षा आदि सभी सरकारी क्षेत्रों के उद्यमों को वे निजीकरण की वैक्सीन लगा रहे हैं और देशी-विदेशी उद्योगपतियों के हाथों मामूली कीमत पर इन्हें बेच रहे है। पिछले 4-5 माह में लाॅकडाऊन के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था चैपट हो चुकी है। राजस्व संग्रह चाहे वह जी.एस.टी. हो या ब्रिकीकर, आयकर हो या स्थानीय कर, सभी की वसूली नगण्य है। क्येांकि जब व्यापार ही ठप्प हो गया है तो कर कहाँ से आएगा। विगत् चार दिनों से ट्रांसपोर्टर हड़ताल पर है। क्योंकि सरकार बगैर वाहन चलाए उनसे टैक्स लेना चाहती है। राज्यों के कर्मचारियों का वेतन कर्ज लेकर बँट रहा है और वर्क फार्म होम के नाम पर सरकारी और निजी कर्मचारियों को बेरोजगारी में ढकेला जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रपट के अनुसार लगभग 1 करोड़ लोग इस लाॅकडाउन की बीमारी से नए बेरोजगार बन गये है याने वह जो बेरोजगार थे जिन्हें रोजगार मिला ही नहीं था। जबकि देश में पहले से ही 10-12 करोड़ लोग बेरोजगार बने हुए है, इसके साथ-साथ लगभग एक करोड़ नये लोग अब काम बंदी की वजह से बेरोजगार हो गए है। हाथ से काम मिलने वाले तमाम छोटे-छोटे धन्धे के लोग बेरोजगार हो चुके है। काम धन्धे बंद है और देश की आबादी का एक अच्छा खासा हिस्सा नए गैर सरकारी कर्ज में डूब गया है। इसके परिणामस्वरूप बड़ी आबादी अवसाद ग्रस्त हो रही है और आत्महत्या का मार्ग चुन रही है। अगर हालात नहीं बदले तो शायद इस वर्ष में 20 लाख लोग आत्महत्यायें करेंगे। हाल ही में दिया जा रहा कर्जा किसी काम धन्धे को नहीं बल्कि पेट भरने को है।
प्रधानमंत्री जी नारा दे रहे है आत्मनिर्भर भारत का, परन्तु रास्ता बता रहे है एफ.डी.आई. का, याने परनिर्भरता का। कोरोना के नाम पर न केवल देश में बल्कि समूची दुनिया में एक सांस्कृतिक और तकनीकी महाप्रलय आया है अमेरिका जैसे देश में 42 प्रतिशत लोग तकनीकी हमले के शिकार हो चुके है और लगभग 20 लाख कामगारों की जगह पर मशीनें या रोबोट आ गए है। यहां तक कि दुनिया के बड़े पैसे वाले बिल गेट्स ने भी रोबोट्स के खतरे को बहुत गंभीर खतरा बताया है। जो इंसान को बेदखल करेगा और दुनिया की बड़ी आबादी को भुखमरी की गोद में धकेल देगा। अमेरिका या यूरोप के देश जो तकनीक के मालिक है वे इस झटके को थोड़ा बहुत सहन कर पाए थे परन्तु एशिया अफ्रीका याने रंगीन दुनिया के देशों की बड़ी आबादी के लिए यह विश्वयुद्ध से भी खतरनाक नर संहार होगा। आज अगर बापू जिंदा होते तो इस महामारी के लिए शायद दुनिया के सम्पन्न लोगों, उनके लालच व विषमता को गुनहगार बताते। तकनीक से हमारा केाई बैर नहीं है परन्तु तकनीक के साम्राज्यवाद से हमें लड़ना होगा और इसके लिए एक नई जन क्रांति की आवश्यकता है।
आइए 15 अगस्त को हम अपनी पाई हुई आजादी को बचाने के लिए इस क्रांति के सिपाही बने। हम साहस से बोले व बोली की रक्षा करें और बोलने के जन्म सिद्ध अधिकार को किसी भी कीमत पर समाप्त न होने दें। रामराज्य और रावणराज्य का यही फर्क है कि राम के राज्य में गरीब भी राम के खिलाफ बोल सकता था और रावण राज्य में रावण का भाई व पत्नी भी राजा के खिलाफ नहीं बोल सकती थी। राम राज्य और रावण राज्य के फर्क की कसौटी अगर कोई है तो वह निर्भीक बोलने की आजादी।

बेटियां हकदार लेकिन कई मुश्किलें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले ने देश की बेटियों को अपने पिता की संपत्ति में बराबरी का हकदार बना दिया है। अदालत के पुराने फैसले रद्द हो गए हैं, जिनमें कई किंतु-परंतु लगाकर बेटियों को अपनी पैतृक संपत्ति का अधिकार दिया गया था। मिताक्षरा पद्धति या हिंदू कानून में यह माना जाता है कि बेटी का ज्यों ही विवाह हुआ, वह पराई बन जाती है। मां-बाप की संपत्ति में उसका कोई अधिकार नहीं रहता। पीहर के मामलों में उसका कोई दखल नहीं होता लेकिन अब पैतृक संपत्ति में बेटियों का अधिकार बेटों के बराबर ही होगा। यह फैसला नर-नारी समता का संदेशवाहक है। यह स्त्रियों के सम्मान और सुविधाओं की रक्षा करेगा। उनका आत्मविश्वास बढ़ाएगा। इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश तो यह है कि यदि हिंदू कानून में सुधार हो सकता है तो मुस्लिम, ईसाई, सिख आदि कानूनों में सुधार क्यों नहीं हो सकता ? सारे कानूनों पर देश में खुली बहस चले ताकि समान नागरिक संहिता का मार्ग प्रशस्त हो। यह एतिहासिक फैसला कई नए प्रश्नों को भी जन्म देगा। जैसे पिता की संपत्ति पर तो उसकी संतान का बराबर अधिकार होगा लेकिन क्या यह नियम माता की संपत्ति पर भी लागू होगा ? आजकल कई लोग कई-कई कारणों से अपनी संपत्तियां अपने नाम पर रखने की बजाय अपनी पत्नी के नाम करवा देते हैं। क्या ऐसी संपत्तियों पर भी अदालत का यह नया नियम लागू होगा? क्या सचमुच सभी बहनें अपने भाइयों से अब पैतृत-संपत्ति की बंदरबांट का आग्रह करेंगी ? क्या वे अदालतों की शरण लेंगी ? यदि हां, तो यह निश्चित जानिए कि देश की अदालतों में हर साल लाखों मामले बढ़ते चले जाएंगे। यदि बहनें अपने भाइयों से संपत्ति के बंटवारे का आग्रह नहीं भी करें तो भी उनके पति और उनके बच्चे लालच में फंस सकते हैं। दूसरे शब्दों में यह नया अदालती फैसला पारिवारिक झगड़ों की सबसे बड़ी जड़ बन सकता है। क्या हमारी न्यायपालिका में इतनी क्षमता है कि इन मुकदमों को वे साल-छह महीने में निपटा सके ? इन मुकदमों के चलते-चलते तीन-तीन पीढ़ियां निकल जाएंगी। बेटियों का पीहर से कोई औपचारिक आर्थिक संबंध नहीं रहे, शायद इसीलिए दहेज-प्रथा भी चली थी। दहेज-प्रथा तो अभी भी मजबूत है लेकिन अब राखी का क्या होगा? मुकदमेबाज़ बहन से क्या कोई भाई राखी बंधवाएगा ? भाई यह दावा कर सकता है कि पिता के संपत्ति-निर्माण में उसकी अपनी भूमिका सर्वाधिक रही है। उसमें बहन या बहनोई दखलंदाजी क्यों करें ? इस समस्या का तोड़ यह भी निकाला जाएगा कि पिता अपने संपत्तियां अपने नाम करवाने की बजाय पहले दिन से ही अपने बेटों के नाम करवाने लगेंगे। वे अदालत को कहेंगे कि तू डाल-डाल तो हम पांत-पांत।

बेबाक और बेखौफ शायर थे राहत इन्दौरी
योगेश कुमार गोयल
कोरोना संक्रमित होने के अगले ही दिन देश के प्रख्यात शायर राहत इन्दौरी 70 साल की आयु में दुनिया छोड़कर चले गए और मुशायरों में गूंजने वाली दमदार आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। तबीयत बिगड़ने पर वे 10 अगस्त को इन्दौर के एक निजी अस्पताल में भर्ती हुए थे, जहां कोविड टेस्ट में पॉजिटिव आने के बाद उन्हें इन्दौर के कोविड अस्पताल अरबिंदो हॉस्पीटल में शिफ्ट किया गया था। 11 अगस्त की सुबह उन्होंने स्वयं ट्वीट कर बताया था कि कोविड के शुरूआती लक्षण दिखने पर कल उनका कोरोना टेस्ट किया गया, जिसकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई। दुआ कीजिये कि जल्द से जल्द इस बीमारी को हरा दूं। साथ ही उन्होंने ट्वीट के जरिये अपने फैंस से यह गुहार भी लगाई थी कि उन्हें या घर के लोगों को फोन ना करें, उनकी खैरियत ट्विटर और फेसबुक पर आपको मिलती रहेगी। कौन जानता था कि यही राहत इन्दौरी साहब का आखिरी ट्वीट होगा। डॉक्टरों के मुताबिक उन्हें 60 फीसदी निमोनिया था और पहले से ही किडनी, हाइपरटेंशन, डायबिटीज, दिल तथा फेफड़ों में संक्रमण सहित कई बीमारियां थी। अस्पताल में भर्ती कराने के बाद उन्हें दो बार दिल का दौरा पड़ा और 11 अगस्त की शाम उन्होंने अंतिम सांस ली।
इन्दौर में एक कपड़ा मिल कर्मचारी रफ्तुल्लाह कुरैशी तथा मकबूल उन निशा बेगम के यहां 1 जनवरी 1950 को जन्मे राहत इन्दौरी हिन्दी फिल्मों के गीतकार के अलावा ऐसे भारतीय उर्दू शायर थे, जो बड़े बेबाक और बेखौफ अंदाज में अपनी बात कहने के लिए जाने जाते थे। शायरी के जरिये सत्ता पक्ष के लोगों पर तीखा प्रहार करने के कारण ही वे सदा सत्ता पक्ष के लोगों की आंखों में खटकते रहे। उन्होंने वर्ष 1975 में भोपाल के बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में एमए और 1985 में भोज मुक्त विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में पीएचडी की थी। वे देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इन्दौर में उर्दू साहित्य के प्राध्यापक भी रहे। 19 साल की उम्र में उन्होंने कॉलेज के दिनों में अपनी पहली शायरी सुनाई थी। कॉलेज में अध्यापन के दौरान एक अच्छे व्याख्याता के रूप में छात्रों की लगातार प्रशंसा पाने के बाद वे मुशायरों में काफी व्यस्त रहने लगे। अपने उन मुशायरों से वे जनता के बीच इतने लोकप्रिय होते गए कि उन्हें देश-विदेश से मुशायरों के निमंत्रण मिलने लगे। चार दशक से भी ज्यादा समय से वे मुशायरों और कवि सम्मेलनों में अपनी शायरी पढ़ रहे थे।
उन्होंने बॉलीवुड की फिल्मों के लिए भी कुछ गीत लिखे, जिनमें फिल्म ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ का ‘एम बोले तो मुन्ना भाई एमबीबीएस’, ‘घातक’ का ‘कोई जाए तो ले आए’, ‘इश्क’ का ‘नींद चुराई मेरी, तुमने वो सनम’, ‘खुद्दार’ का ‘तुमसा कोई प्यारा कोई मासूम नहीं है’, ‘करीब’ का ‘चोरी चोरी जब नजरें मिली’, ‘मर्डर’ का ‘दिल को हजार बार रोका’, ‘सर’ का ‘आज हमने दिल का हर किस्सा’, ‘मिशन कश्मीर’ का ‘बुमरो-बुमरो, श्याम रंग बुमरो’ जैसे गीत काफी लोकप्रिय हुए लेकिन उनकी पहचान कभी भी निदा फाजली या कैफी आजमी जैसे फिल्मी गीतकार जैसी नहीं रही बल्कि उनका नाम सुनते ही हर किसी के जेहन में एक मशहूर शायर का ही ख्याल आता था। उन्हें महफिल के हिसाब से शायरी पढ़ने में महारत हासिल थी। रोमांटिक शायरी को लेकर एक टीवी शो के दौरान उन्होंने कहा था कि आदमी दिमाग से बूढ़ा होता है, दिल से नहीं।
वैसे तो उर्दू की समकालीन दुनिया में मशहूर शायरों की कोई कमी नहीं है लेकिन राहत इन्दौरी की खासियत यह थी कि वे एक गंभीर शायर होने के साथ-साथ युवा पीढ़ी की नब्ज को भी थाम लेते थे और बड़ी सहजता से शायरी के माध्यम से ऐसी तीखी बात कह जाते थे, जो राजनीति के साथ-साथ समाज को भी चीरती प्रतीत होती थी। उनके शेरों के जरिए अपने हकों को आवाज देने का जो शोर सुनाई देता था, वो उनके समकालीन किसी शायर की आवाज में शायद ही सुनने को मिला हो। अपने शेरों के माध्यम से वे राजतंत्र की खामियों को उजागर करते हुए देश-समाज की व्यवस्थाओं पर चोट करते थे। उन्होंने समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए शायरी की और सदैव आम आदमी की आवाज बने। मुशायरों में जब वे शायरी कर रहे होते थे तो ऐसा प्रतीत होता था, जैसे वे महफिल में मौजूद हर व्यक्ति से सीधे बात कर रहे हैं। सीएए को लेकर देशभर में चले प्रदर्शनों के दौर में उन्होंने काफी तीखे अंदाज में कहा था, ‘‘लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में, यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है। जो आज साहिबे मसनद हैं, कल नहीं होंगे। किरायेदार हैं, जाती मकान थोड़ी है, सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है।’’
ऐसी ही तीखी और बेबाक शायरी के कारण राहत इन्दौरी कुछ लोगों की आंखों में लगातार खटकते रहे और उन्हें लेकर बेवजह विवाद खड़ा करने की कोशिशें भी हुई। कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर उन्हीं के नाम से एक फर्जी शेर भी खूब वायरल किया गया और जब विवाद बढ़ने लगा, तब उन्हें स्वयं सफाई देनी पड़ी थी कि वह उनका शेर नहीं है। हालांकि उन्होंने कई बार अपनी शायरी के माध्यम से अपनी देशभक्ति और हिन्दुस्तानी पहचान साबित भी की। उन्होंने कहा था कि मैं मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना, लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना। लॉकडाउन के दौर में जब इन्दौर में डॉक्टरों की टीम पर हमले हो रहे थे, तब उन्होंने हमला करने वालों को एक वीडियो जारी कर कहा था, ‘‘हमारे शहर में जो वाकया पेश आया, उससे पूरे मुल्क के लोगों के सामने शर्मिंदगी से गर्दन झुक गई, शर्मसारी हुई। ये लोग तबीयत देखने आए थे, उनके साथ जो आपने सलूक किया, उससे पूरा हिन्दुस्तान हैरत में है।’’

अब कश्मीर में बंदूक नहीं, बात चले
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जम्मू-कश्मीर में मनोज सिंहा को उप-राज्यपाल बनाया गया है, यह इस बात का संकेत है कि भारत सरकार कश्मीर में डंडे की राजनीति नहीं, संवाद की राजनीति चलाना चाहती है। भारत सरकार वहां किसी फौजी अफसर या नौकरशाह को भी नियुक्त कर सकती थी लेकिन तालाबंदी खुलने के बाद यदि कुछ उथल-पुथल होती तो कश्मीर में काफी रक्तपात हो सकता था। कश्मीर में तो साल भर से तालाबंदी है। मैं इस तालाबंदी को अच्छा नहीं समझता हूं लेकिन 5 अगस्त 2019 के बाद यदि कश्मीर में तालाबंदी नहीं होती तो पता नहीं, वहां कितना खून बहता। अब यह तालाबंदी खुलनी चाहिए। नज़रबंद नेताओं को रिहा किया जाना चाहिए। उन्हें आपस में मिलने देना चाहिए और उनसे केंद्र सरकार को सीधा संवाद स्थापित करना चाहिए। शायद इसीलिए मनोज सिंहा को श्रीनगर भेजा गया है। मनोज अनुभवी नेता हैं। वे जमीन से जुड़े हुए हैं। छात्र-नेता के तौर पर वे यशस्वी हुए हैं। तीन बार उन्होंने सांसद का चुनाव जीता है। वे अपनी विचारशीलता और शालीनता के लिए जाने जाते हैं। यदि वे फारुक अब्दुल्ला, मेहबूबा मुफ्ती और हुर्रियत के नेताओं से सीधी बात करें तो निश्चय ही कोई सर्वमान्य रास्ता निकलेगा। जहां तक जम्मू-कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा देने की बात है, वह दिया जा सकता है, ऐसा संकेत गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में पिछले साल खुद भी दिया था। धारा 370 के बने रहने से कश्मीरियों को कोई खास फायदा नहीं है। उसे इंदिरा-काल में ही दर्जनों बार खोखला कर दिया गया था। अब तो बस उसका नाम भर बचा हुआ था। उसके हटने से अब कश्मीरी और शेष भारतीयों के बीच की खाई पट चुकी है। अब तो सबसे जरुरी काम यह है कि कश्मीर का चहुंदिश विकास हो। आतंकवाद समाप्त हो। वहां भ्रष्टाचार अपरंपार है। वह भी समाप्त हो ताकि औसत कश्मीरी नागरिक आनंद का जीवन जी सकें। हमारा कश्मीर शांति और समृद्धि का स्वर्ग बने ताकि पाकिस्तानी कश्मीर के लोग यह सोचने के लिए मजबूर हो जाएं कि हाय ! हम उधर क्यों न हुए ? तब पाकिस्तान के साथ भी संवाद चले और कश्मीर-समस्या को दोनों मुल्क मिलकर इतिहास का विषय बना दें। मोदी सरकार को चाहिए कि वह कश्मीरी नेताओं से दिली बातचीत के लिए सिर्फ नौकरशाहों और सिर्फ भाजपाइयों तक सीमित न रहे। देश में ऐसे कई दलीय, निर्दलीय नेता और बुद्धिजीवी हैं, जिनका कश्मीरी नेताओं से सीधा संपर्क है। मनोज सिंहा की नियुक्ति तभी सार्थक और सफल होगी जबकि कश्मीर में बंदूक नहीं, बात चलने लगेगी।

भाषा की मर्यादा
सिध्दार्थ शंकर
राजनीतिक पार्टियों का एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप और व्यंग्य बाण चलाना नई बात नहीं है। लोकतंत्र में असहमति बड़ा गुण माना जाता है, पर कई बार जब राजनेता दुर्भावनावश या घृणाभाव से अपने प्रतिपक्षी के प्रति अशोभन भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो स्वाभाविक ही उनके आचरण पर अंगुलियां उठने लगती हैं। चुनाव के वक्त राजनेताओं की भाषा अक्सर तल्ख हो उठती है, मगर पिछले कुछ सालों से इसमें जिस तरह की तल्खी देखी जा रही है, वह लोकतंत्र के लिए कतई अच्छी नहीं कही जा सकती। सार्वजनिक जीवन में नेता का आचरण काफी मायने रखता है। बहुत सारे लोग उससे प्रेरणा लेते व फिर उसके आचरण को समाज के निचले स्तर पर प्रसारित करते हैं। मगर अफसोस कि कई राजनेता अपने विपक्षी पर वार करने की धुन में अपने पद की गरिमा और मर्यादा का भी ध्यान नहीं रख पाते। इस बार लोकसभा चुनाव के मद्देनजर यह प्रवृत्ति कुछ अधिक उभर कर आई दिखती है।
हमारे यहां ज्यादातर क्षेत्रीय दलों का जनाधार जाति, धर्म, क्षेत्रीय अस्मिता पर टिका हुआ है। वे उन्हीं की राजनीति करते हैं। इसलिए केंद्र या राज्य में अपने प्रतिद्वंद्वी दल की सरकार पर अक्सर उनका तल्खी भरा बयान ही सुनने को मिलता है। उत्तर प्रदेश व बिहार के क्षेत्रीय दल इस मामले में ज्यादा मुखर नजर आते हैं। चाहे सपा-बसपा-राजद हों या दूसरे दल, उनके नेता कड़वी भाषा का इस्तेमाल करके ही अपने मतदाताओं को रिझाने का प्रयास करते हैं। इस तरह परिपाटी-सी बनती गई है कि प्रतिपक्षी पर प्रहार करना है, तो कड़वी और अशोभन भाषा का उपयोग करना ही चाहिए। ऐसी भाषा जब छुटभैए नेता ग्रहण करते हैं, तो उसे और विकृत करते हैं। विवेकहीन तरीके से तथ्यों को पेश करते, वोटरों को बरगलाने का प्रयास करते और कई बार गाली-गलौज तक की भाषा तक बोलने लगते हैं। यह लोकतंत्र की गरिमा को चोट पहुंचाने वाली ही प्रवृत्ति है, जो घातक होती जा रही है।
हैरानी की बात यह है कि कोई भी राजनीतिक दल अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं को भाषा के मामले में संयम और शालीनता बरतने की सीख नहीं देता। कई बार ऐसे नेता अपने वरिष्ठों से पुरस्कृत होते देखे जाते हैं, जो अपने विपक्षी के खिलाफ तल्ख व अशोभन भाषा का उपयोग करते हैं। विचित्र है कि आजकल टीवी और सोशल मीडिया ने ऐसी भाषा वाले बयानों को चटखारे लेकर और बढ़ा-चढ़ा कर परोसना शुरू कर दिया है। इस तरह आम लोगों का मानस कुछ इस तरह बनाने का प्रयास हो रहा है कि पान की दुकान पर खड़े होकर बतियाने वालों की भाषा और माननीय प्रतिनिधियों या फिर जिम्मेदार नेताओं की भाषा में कोई अंतर नहीं होता। आम जनजीवन की भाषा को राजनीति की भाषा बनाना अच्छी बात है, पर उसकी मर्यादा का ध्यान न रखना असंवैधानिक है। मगर शायद नेताओं ने मान लिया है कि मतदाताओं को अब वही भाषा पसंद आती है और उसी भाषा में दिए बयान उन्हें प्रभावित करते हैं, जिसमें कुछ अशोभन और तल्ख शब्दों का समावेश हो। नहीं तो कोई और कारण नहीं हो सकता कि सत्ता के शीर्ष नेतृत्व की भाषा में संयम नहीं दिखाई देता है। भाषा में भड़काऊपन, आक्रामकता व अशालीनता कहीं न कहीं राजनीति को कमजोर करते हैं।
सभी राजनेता एक जैसे नहीं होते हैं लेकिन कहावत है कि एक मछली पूरे तालाब के पानी को गंदा कर देती है। कुछ राजनेता तो अपनी राजनीति चमकाने और मुफ्त सुर्खियों में आकर सस्ती लोकप्रियता के लिए समय समय पर राजनीतिक बदजुबानी करके बखेड़ा खड़ा किया करते हैं। राजनीति में बकवास करके लोगों की भावनाओं को भड़काने का अक्सर दौर चला करता है। इन राजनेताओं में सत्ता और विपक्ष दोनों शामिल हैं। राजनीति में राजनेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए किस बात का बतंगड़ बनाकर उसका राजनीतिक फायदा ले लेगा इसका अंदाज लगा पाना आसान नहीं होता है। राजनीति में बयानबाजी करके अपना उल्लू तो सीधा किया जा सकता है किंतु उससे उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। लोकतंत्र में स्वस्थ राजनीति की जाती है किसी की भावनाओं पर कुठाराघात नहीं किया जाता है। राजनेता असल में राजनीति में अपने प्रतिद्वंद्वी की नीतियों और रीतियों की आलोचना ही नहीं करता बल्कि असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल करके अपमानित नहीं करता है।

रामजन्मभूमि आन्दोलन के हुतात्माओं के प्रति शब्दांजलि रुपी श्रद्धांजलि
प्रभात झा
वे लोग भाग्यशाली होते हैं जो किसी घट रहे इतिहास को अपनी आँखों से देखते हैं। यह मेरा सौभाग्य था कि मैं पत्रकार के नाते 6 दिसंबर] 1992 को रामलला जन्मभूमि के उस परिसर में खड़ा था, जहां हमारी आँखों के सामने भगवा पट्टी माथे पर बांधे सैकड़ों कार सेवक देखते-देखते गुम्बद पर चढ़ गए बस घंटे-दो घंटे में विवादित ढाँचे को धूल-धुसरित कर दिया। मैं मध्यप्रदेश के स्वदेश समाचार-पत्र का विशेष संवाददाता था। सन 1986 से तत्कालीन बजरंग दल के नेता जयभान सिंह पवैया के साथ रामनवमी पर रिपोर्टिंग करने और रामलला के दर्शन करने लगभग प्रति वर्ष जाते थे। हम मिथिलावासी हैं। हम मां मिथिलेश कुमारी (सीता जी ) के वंशज हैं। भगवान राम से हमारा नाता शास्त्रों के अनुसार, साले-बहनोई का है। मिथिलावासी सीताजी के कारण अवध निवासी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को अपना बहनोई मानते हैं। बहन सीता के कारण अयोध्या से मेरा लगाव पहले से ही रहा है। अत: अयोध्या में रामनवमी पर लगाने वाले मेले का आँखों देखी हाल लिखने का दायित्व स्वदेश द्वारा मुझे ही दिया जाता था।
वर्ष 1992 का 6 दिसंबर दुनिया को पता है। तब की घटना की रिपोर्टिंग करने के लिए मैं एक दिसंबर को ही अयोध्या पहुँच गया था। हाथ में डायरी और कलम थी साथ ही बैग में कैमरा। मैंने सुन रखा था कि 6 दिसंबर को कारसेवक आयेंगे और वे कार सेवा करेंगे। हम दिनभर मे अनेक बार राम के जन्म स्थान पर और कारसेवकपुरम जाते थे। हम पूरी अयोध्या घूमते थे। चौक-चौराहों पर यह चर्चा सुनते थे – ‘ पता नहीं मंदिर कब बनेगा !” पूरी की पूरी फैजाबाद जो आज का अयोध्या जिला, वहां के साधु-संतों के मुख पर एक ही बात आती थी कि मंदिर बनना कब शुरू होगा। अन्यान्य राज्यों के कारसेवक के रूप में लोगों का आना शुरू हो चुका था। केरल से कश्मीर तक कोई ऐसा राज्य नहीं था जहां से संघ के अधिकारी लोगों का आना न हो रहा हो। उन कारसेवकों की चिंता के लिए कारसेवकपुरम में विश्व हिन्दू परिषद् के नेता स्व. अशोक सिंहल जी, स्व. गिरिराज किशोर जी, स्व. मोरोपंत पिंगले जी व्यवस्था की दृष्टि से अलग – अलग बैठकें ले रहे थे। 2 दिसंबर, 1992 को लोगों के आने का सिलसिला और बढ़ गया। मैं वर्षों से अयोध्या जाता रहा हू पर, इस बार का हुजूम कुछ और ही लग रहा था।
विवादित ढाँचे के पास ही विजली विभाग के कुछ इंजिनीयर विद्युत व्यवस्था के लिए तैनात थे। वे बिजली की निर्बाध व्यवस्था के लिए लगातार तैयारी मे रह्ते थे। मुझे इन इंजीनियरों से काफी मदद मिली। रोज-रोज रिपोर्टिंग के लिए एसटीडी टेलीफोन बूथ ही एकमात्र सहारा था। तब मोबाईल फोन या ईमेल की सुविधा नहीं थी। वहां के एसटीडी बूथ पर लोड ज्यादा होने के कारण समय से सूचनाएं भेज पाना संभव नहीं था। मेरी तत्परता और खबर भेजने का जोश देखकर विद्युत विभाग के इंजीनियर प्रभावित थे। उन्हें मुझसे लगाव सा हो गया था। उनके विशेष सहयोग से एसटीडी बूथ से खबरें भेजना मेरे लिए आसान हो गया। 3 दिसंबर की बात है – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह श्री सुदर्शन जी वहां हम सभी पत्रकारों को मिले। स्वदेश समाचार पत्र को प्रारंभ करने में बतौर मध्यभारत के प्रांत प्रचारक मा. सुदर्शन जी और जनसंघ के संगठन मंत्री कुशाभाऊ ठाकरे का बड़ा योगदान था। मुझे स्वदेश की यह बाते पता थी। मैं तत्काल माननीय सुदर्शन जी के पास गया और उनको बताया कि मैं स्वदेश समाचार पत्र से आया हूँ। मेरा नाम प्रभात झा है। उन्होंने हाल-चाल पूछा और यह भी पूछा कि विश्व संवाद केंद्र के लोगों से भेंट हुई कि नहीं ? मैंने कहा अभी तक नहीं हुई है। मा. सुदर्शन जी ने कहा कि विहिप से जारी खबरों के लिए आप सभी श्री रामशंकर अग्निहोत्री जी से जरूर संपर्क कर लें। फिर उन्होंने यह भी पूछा कि तुम कहा रुके हो? मैंने कहा कि श्री जयभान सिंह पवैया के साथ छोटी छावनी के महंथ श्री नृत्य गोपाल दास जी के आश्रम में रुके हैं। मा. सुदर्शन जी ने हम सभी पत्रकारों को कहा कि कोई भी दिक्कत हो तो रामशंकर अग्निहोत्री और वीरेश्वर द्विवेदी से मिल लेना। 3 दिसंबर के सायं अयोध्या के सभी भोजनालय में भोजन समाप्त गो गया था। प्रसाद के लिए कारसेवकपुरम में लोग टूट पड़े थे। अयोध्या क सभी महंथों के आश्रम और मंदिरों में भोजन के लिए कारसेवकों तांता लग गया था। यहाँ तक कि सैकड़ों की संख्या में पहुंचे फोटोग्राफर और पत्रकारों को 3 दिसंबर से ही भोजन की असुविधा होने लगी थी।
हम पत्रकारों ने 3 दिसंबर की रात्रि से ही यह अनुमान लगाना शुरू कर दिया था कि 6 दिसंबर तक यहाँ 3-4 लाख कारसेवकों की संख्या हो जायेगी। 4 दिसंबर को अयोध्या के राष्ट्रीय राजमार्ग पर जब हमने निगाहें दौडाई तो कारसेवकों के सिवा कुछ और नहीं दिख रहा था। एक तरफ जहाँ देशभर से कारसेवक आ रहे थे, वहीं सर्वाधिक कारसेवक उत्तरप्रदेश से आ रहे थे। राष्ट्रीय राजमार्ग थम सा गया था। हजारों वाहनों के पहिये रुक गए थे। गले में भगवा पट्टी और माथे पर भगवा साफा बांधे हजारों लोग पंक्तिबद्ध कतार में दिख रहे थे। लोग नारे लगा रहे थे – ”राम लला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे।’ वे कह रहे थे – ‘जो राम राम का नहीं, वः किसी काम का नहीं।’ हनुमानगढ़ी, कनक भवन, बाल्मिकी मंदिर, छोटी छावनी से लेकर सैकड़ों मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ पडी थी। लखनऊ, फैजाबाद और अयोध्या से प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस का वाहन अयोध्या की ओर आ रहा था। पूरी अयोध्या पुलिस छावनी का रूप धारण कर चुकी थी। अयोध्या लोगों को समेटने की सीमाएं तोड़ चुकी थी। वातावरण राममय और भगवामय हो गया था। सरयू पर बने पुल से जब कैमरे में सरयू तट पर स्नान कर रहे लाखों कारसेवकों का फोटो खींच रहे थे तो कैमरे के लेंस में लोग समा नहीं रहे थे। हिंदुत्व के ज्वार का ऐसा अद्भुत दृश्य हमने पहले कभी देखा था। जब हम लोगों के बीच पहुँच रहे थे तो कोई मलयाली बोल रहा था तो कोई तेलगू। पहनावे से पूरे भारत के अलग अलग राज्यों के लोगों को पहचाना जा सकता था। धोती, लुंगीनुमा धोती और पैन्ट-शर्ट पहने लोग भोजपुरी, बघेली, पंजाबी और हरियाणवी भाषा में रामजी के काम के लिए अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। लघु भारत का अनोखा दृश्य दिख रहा था। ‘राम सबके और सब राम के’ का भाव वहाँ हर तरफ, हर जगह देखा जा सकता था।
4 दिसंबर को हमने अयोध्या से लखनऊ मोटरसायकिल से जाने की योजना बनाई जाने से तक हमने लेकिन कारसेवकों का हुजूम और जय श्रीराम का उद्घोष – राम लला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे के गगनभेदी नारों से गुंजता वातावरण। हजारों वाहनों की कतारें हमारी हिम्मत को तोड़ रही थीं। हमें वापस लौटना ही पडा। इस दरम्यान राजमार्ग पर खड़े वाहनों के चालकों और सवार लोगों से जब हमने बात की तो पता चला कि वे कई दिनों से यहीं फंसे पड़े हैं। वे कहने लगे – अब तो हमारा भोजन भी समाप्त हो गया है। उन्होंने ने ही बताया कि गोरखपुर, मुजफ्फरपुर, पटना और देश के अन्य हिस्सों में भी यही हालत हैं। हर तरफ से रामभक्तों का हुजूम अयोध्या की ओर चल पडा है। जब हब वापस अयोध्या लौट कर आये तो हमारी मोटरसायकल को निकालने की जगह ही नहीं मिला रही थी। सड़कों पर कारसेवक सोते दिख रहे थे । जब कार सेवकों से बात की तो अधिकतर लोगों के मन में यही बात आई कि इस आर या पार होगा। कुछ लोग यह भी कह रहे थे कि कारसेवक इस बार कारसेवा करके ही जायेंगे। कार सेवकों के चेहरे पर सहसा गुस्सा भी दिख जाता था। लेकिन उनका गुस्सा संगठन के अनुशासन के कारण बंधा हुआ था। इस बीच राम लला परिसर में लोग ढोल-ढमाकों के साथ आने लगे थे। विहिप के जन्मभूमि न्यास के माध्यम से मंच भी बनने लगा था। 4 दिसंबर की रात्रि हम लोग सोये नहीं। हम कारसेवकों का उत्साह अपनी आँखों से देख रहे थे। सूर्य डूब रहा था, पर एक नए सूर्योदय का सन्देश दे रहा था। न डर का, न भय का वातावरण था। राम की भक्ति अयोध्या की धरती पर नये नये इतिहास रच रही थी। मध्यप्रदेश के राजगढ़ का युवा गीतकार व चित्रकार जिसका नाम सत्यनारायण मौर्य, जिसे प्यार से लोग बाबा मौर्य कहते हैं ने पूरी अयोध्या की दीवारों को अपनी तूलिका से राममय कर दिया था। लोग बता रहे थे बाबा मौर्य कई दिनों से अयोध्या में राम लला का उदघोष लिख रहे हैं। श्री राम जन्मभूमि न्यास से जुड़े संतों और देश के प्रसिद्ध अखाड़ों से जुड़े बाबाओं की ओर देशभर से आये मीडिया के कैमरे मुड़े हुए थे। सर्वाधिक भीड़ श्री राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंथ परमहंस रामचंद्र दास जी महाराज के पास था।
दिसंबर यानि कडाके की ठंढ। हर आश्रम में अंगीठी या लकड़ी जलाकर ठंढ को दूर करने का प्रयास किया जा रहा था। लेकिन दूसरी तरफ कारसेवकों की शारीरिक गर्मी से मौसमी ठंढ दूर हो रही थी। लोगों को लग ही नहीं रहा था कि ठंढ का महीना है। राम ज्वार से लोग अभिभूत थे। मैं अनेक बार अयोध्या गया। लेकिन अयोध्या में श्रद्धालुओं का ऐसा विहंगम दृश्य कभी नहीं देखा।
5 दिसम्बर को ढाई बजे रात से ही लोग सिर पर पोटली लिए सरयू तट की ओर निकल पड़े थे। इस भीड़ में गरीब -अमीर का भेद नहीं था। सब रामरस में सराबोर होकर समरस हो गए थे। हमें मानव सिर के अलावा कुछ और दिख ही नहीं रहा था। सरयू में डुबकी लगाने की होड़ लग गई थी। हम कुछ पत्रकार मित्र भी धक्का खाते हुए सरयू तट पर पहुँच गए थे। वहां पर स्व-अनुशासन का संगम दिख रहा था। लोग एक-दूसरे की सहायता कर रहे थे। पुलिस-प्रशासन ने सरयू नदी में बांस के खम्भों से बैरिकेट्स बना रखे थे। सरयू तट के किनारे पुण्य बटोरने में माता-बहनों के साथ बच्चे भी पीछे नहीं थे। 5 दिसंबर अरुणोदय के समय सरयू तट सूर्य की लालिमा से आच्च्छादित था। ज्यों-ज्यों सूर्य भगवान् पृथ्वी पर प्रकट हो रहे थे त्यों-त्यों लोग अपने-अपने बर्तन में सरयू का जल ले कर अर्घ्य दे रहे थे। किसी एक नदी तट पर बिना कुम्भ के इस तरह लाखो लोगो के एकत्रित होने का यह पहला नजारा था।
5 दिसंबर को दोपहर में रामलला परिसर में बने मंच पर सभा शुरू हुई। विवादित ढांचे के चारों ओर पुलिस ही पुलिस तैनात थी। हम कुछ पत्रकारों ने रात में तत्कालीन जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक से बात की। हमने उनसे पूछा कि इस अनियंत्रित भीड़ को कैसे सम्हालेंगे? अधिकारियों ने उत्तर दिया – हमने उप्र के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह जी को अयोध्या और उसके आस-पास की घटित जानकारियों से अवगत करा दिया है। इसी बीच हम सभी को सूचना मिली कि विहिप के अध्यक्ष अशोक सिंहल, विहिप के वरिष्ठ नेता गिरिराज किशोर सहित भाजपा के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी, वरिष्ठ बाजपा नेता डा. मुरली मनोहर जोशी, साध्वी उमा भारती, बजरंग दल के कुंवर जयभान सिंह पवैया, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा और आचार्य धर्मेन्द्र जैसे दिग्गजों की 6 दिसंबर को राम लला परिसर में सभा होगी।
इस बार के अयोध्या में विशेषता यह थी कि अधिकतर रामभक्त युवा थे। इन युवा रामभक्तों के चहरे पर जूनून और जज्बा देखा जा सकता था। रामभक्तों का जमावड़ा ऐसा लगा कि 5 दिसम्बर की शाम के बाद रामभक्तों के पंडाल में भोजन के लूट-पाट की ख़बरें आने लगी। केन्द्रीय पुलिस बल की टुकड़ियां भी रामघाट से लेकर पूरी अयोध्या में तैनात कर दी गई थीं। कल क्या होगा इसी उधेड़बुन में हम लोग रातभर जगते रहे। अयोध्या जन-जन की ध्वनि से गुंजायमान थी। 5 दिसंबर की रात्रि को ऐसा लग रहा था जैसे लोग सिर्फ अयोध्या की ओर ही आ रहे हैं। इसी रात विहिप, बजरंग दल] भाजपा के नेताओं ने अयोध्या पहुँच रहे सभी कारसेवकों से शान्ति की मार्मिक अपील की। अनेक लोगों ने पत्रकार वार्ता करके कहा कि इस उमड़ते जन सैलाब की रक्षा ही हमारी प्राथमिकता है। लोग ठिठुरते और कंपकंपाते लाखों लोगों ने सरयू किनारे 5 दिसंबर की सारी रात बिताई।
6 दिसंबर के भोर का अरुणोदय, लाखों युवाओं को तरुनोदय दे रहा था। अरुणोदय के दौरान फूट रही सूर्य की किरणें किसी नवोदित सन्देश को समेटे थी, जिसकी जानकारी सिर्फ सूर्य भगवान को ही थी। सुबह तीन-साढे तीन बजे से ही सरयू में डुबकियो का शोर गूंजने लगा। कंपकंपाते होंठ से सिर्फ रामधुन और जय श्रीराम के नारे लग रहे थे। अरुणोदय की किरणें जैसे जैसे सूर्योदय की ओर जा रही थीं, वैसे वैसे लोगों के पग रामलला के दर्शन की ओर बढ़ रहे थे।
6 दिसंबर सूर्योदय को देख हमें नहीं लगा था कि आज कोई इतिहास रचा जाएगा । हम सभी को लग रहा था कि सभी नेताओं के भाषण होंगे और राम शिला का पूजन होगा। लेकिन 6 दिसंबर के सूर्योदय के गर्भ में सच में इतिहास छुपा था जिसकी जानकारी दोपहर 11-12 बजे के बीच दुनिया को पता चल गया। सुबह के 10 बजते ही विहिप के अध्यक्ष और जन्मभूमि आन्दोलन के प्रणेता अशोक सिंहल मंच पर हैं, उपस्थित कारसेवकों को कहते हैं कि बैरिकेट्स को कोई भी पार न करे। हमने भगवा ब्रिगेड को कार सेवकों की सुरक्षा के लिए लगाया है। इसी बीच मंच पर श्री आडवानी जी, डा. जोशी जी, साध्वी उमा भारती जी, साध्वी ऋतंभरा जी और आचार्य धर्मेन्द्र आते हैं। हमलोग भीड़ में सुदर्शन जी के पास खड़े। बीबीसी के साउथ एशिया रिपोर्टर मार्क टुली सुदर्शन जी से अंगरेजी में कुछ चर्चा कर रहे थे। मार्क टुली जानना चाहते थे कि आगे क्या होने वाला है। सुदर्शन जी ने मार्क टुली को कहा – हिंदुत्व इस सोल आफ़ इंडिया। नाऊ यू सी दिस वेब आफ़ हिंदुत्व इन अयोध्या।” इसी बीच सुदर्शन जी हम पत्रकारों के बीच से कहीं निकल गए। जैसे ही घड़ी की सूई ने 11 बजने का इशारा किया अचानक हजारों कारसेवक विवादित ढाँचे के परकोटे की ओर कूद पड़े। श्री सिंहल जी माइक से आग्रह करते रहे , लेकिन रामभक्तों के मन में प्रज्वलित राम ज्वार विवादित ढाँचे पर फूट पडा देखते-देखते कुछ लोग ढांचे के गुम्बदों पर चढ़ कर भगवा ध्वज फहरा दिया और जय श्रीराम के नारे लगाने लगे। कंटीली तारों से लहू लुहान लोग विवादित ढांचे को ध्वस्त करने पर उतारू हो गए। यह देख कुछ लोग शान्त थे, लेकिन अधिकाश लोग रोमांचित हो रहे थे। वहां जो घट रहा था वह अविस्मरणीय, अद्भुत और अकल्पनीय था। बावजूद इसके कि मैं एक पत्रकार था, मैं भी रोमांचित हो उठा।
रोकने वाले कार सेवकों को रोकते रहे, पर कारसेवक विवादित ढांचे को तोड़ते रहे। साधु-संत, बूढ़े-जवान सब उस घट रहे इतिहास का साक्षी बनना चाह रहे थे। पुलिस भीड़ को तितर-बितर कर रही थी। इस बीच पता चला कि मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने प्रशासन को सख्त निर्देश दिए थे कि चाहे जो मजबूरी हो, लेकिन कार सेवकों पर गोली नहीं चलेगी। यहाँ तो यह भी दिख रहा था कि कई पुलिस वाले भी जय श्री राम के नारे लगा रहे थे। 11:25 बजे पहला गुम्बद टूटने लगा। वह कौन-सी अदृश्य शक्ति थी, वह कौन सा अदृश्य साहस था जो विवादित ढाँचे को तोड़ रहा था इसे कोई नहीं देख पा रहा था। डेढ़ से दो घंटे में पूरा विवादित ढांचा धूल-धूसरित हो गया। तत्काल पूरे उप्र में कर्फ्यू लगा दी गई। इसी बीच पुजारियों ने रामलला को गुलाबी चादरों में लपेटकर उन्हें उचित स्थान पर स्थापित कर दिया। ढांचा तोड़ते समय अनेक लोग घायल हुए, कई लोगो की मृत्यु भी हुई। लेकिन कारसेवक अपने काम से डिगे नहीं। थोड़ी देर बाद वहां पर श्री परमहंस रामचंद्र दास जी, महंथ नृत्य गोपाल दास जी, और अशोक सिंहल जी भी वहां आये और उन्होंने रामलला के दर्शन किये।
मैं पत्रकारिता धर्म का निर्वाह कर रहा था। ढांचे के पास से ही अपने सम्पादक श्री जय किशन शर्मा जी को टेलीफोन से आँखों देखी हाल बता रहा था। इस स्थिति में भी पत्रकारिता धर्मं का निर्वाह करने का साहस स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम दे रहे थे। एक-एक घटना क्रम की जानकारी मैं स्वदेश के सम्पादकीय विभाग को देता रहा। इसी बीच मैंने कानपुर के एक स्वतंत्र पत्रकार साथी से आग्रह किया कि आज रात्री तक ही मुझे ग्वालियर पहुंचना है। मैंने उन्हें बताया कि 6 दिसंबर की ऐतिहासिक घटना की स्वदेश के पाठको तक मैं 7 की सुबह ही पहुंचाना चाहता हूँ। तब न वाट्सेप था और न ही ईमेल हमारे पास था पत्रकार का धर्म और पत्रकारिता का जूनून। बसें बंद हो गई थीं। अयोध्या से बाहर जाना संभव नहीं था। लेकिन समाचार के लिए ऐतिहासिक घटना की फोटो जरूरी थी। फोटो भेजने का कोई और उपाय नहीं था। तब मैंने साथी ओमप्रकाश तिवारी से कहा कि मुझे मोटरसायकिल से ग्वालियर ले चलो। हम दिन के 2 बजे अयोध्या से निकल पड़े। छुपते-छुपाते फैजाबाद पहुंचे। वहां से लखनऊ। लखनऊ पहुचकर पता चला कि पूरे उप्र में कर्फ्यू लग चुका है। वहां से जैसे तैसे शाम 6-7 बजे कानपुर पहुंचे। वहां से बीहड़ों से होते हुए इटावा। रात लगभग 10:30 बजे इटावा से ग्वालियर के लिए रवाना हुए। इस बीच अपने सम्पादक जी को बता दिया कि हम रात्रि 2 बजे तक ग्वालियर पहुँच जाएंगे। इटावा से भिंण्ड के बीच रात्रि में भड़कों के बीच से निकलना खतरे से खाली नही थाl वहां दस्युओं का भी बहुत खतरा था। लेकिन हम और ओमप्रकाश तिवारी मोटर सायकल के साथ आगे बढ़ रहे थे। आखिर रामजी का काज था, कोई कैसे रोक सकता था। रात्रि 12 बजे हम मध्यप्रदेश की सीमा भिंड में प्रवेश कर चुके थे। अब हमें 70-75 किमी की यात्रा और करनी थी। थकान सिर चढ़ कर बोल रहा था, लेकिन आँखों के सामने घटित इतिहास और उसका चित्र पाठकों तक पहुँचाने का रोमांच इस थकान पर भारी था। मेरे भीतर पत्रकारिता धर्म का निर्वाह करने का कर्तव्य बोध जगा हुआ था। साहस टूटी नहीं, कलम थमी नहीं। हम रात्रि 2 बजे स्वदेश कार्यालय पहुचकर सुबह पाठकों को देने के लिए सब कुछ तैयार कर चुके थे। 7 दिसंबर की सुबह वही 6 दिसंबर की अयोध्या का आँखों देखा हाल सचित्र पाठकों की आँखों के सामने था। 5 अगस्त, 2020 को होने वाला रामलला मंदिर निर्माण भूमि पूजन 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या की आँखों देखी को फिर ताजा करने वाला होगा। यह रामजन्मभूमि आन्दोलन के हुतात्माओं के प्रति पत्रकार की शब्दांजलि रुपी श्रद्धांजलि होगी।
न कोइ योजना थी
न षडयन्त्र था
जब अयोध्या मे ढांचा टूट गया, उसके बाद वहा पर अफवाह फैलाई गयी कि ढांचा तोड़ने की योजना पूर्व मे कार सेवको द्वारा बना ली गई थी। यह सरासर गलत था। कोई योजना नही थी। कारसेवक बार-बार अयोध्या आ-आ कर थक गए थे।
सन १९९० जब मुलायम सिहजी की सरकार थी तब कारसेवको पर चली गोली आखो के सामने थी। अतः कारसेवको का धैर्य टूट गया। उन्होने न आव देखा न ताव। उन्होने कहा न रहे बाँस न बजे बाँसुरी।
( राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी, पूर्व सांसद )

कश्मीरी पंडितों की वापसी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और सुप्रसिद्ध नेता डाॅ. फारुक अब्दुल्ला ने एक वेबिनार में गजब की बात कह दी है। उन्होंने कश्मीर के पंडितोें की वापसी का स्वागत किया है। कश्मीर से तीस साल पहले लगभग 6-7 लाख पंडित लोग भागकर देश के कई प्रांतों में रहने लगे थे। अब तो कश्मीर के बाहर इनकी दूसरी और तीसरी पीढ़ी तैयार हो गई है। अब कश्मीर में जो कुछ हजार पंडित बचे हुए हैं, वे वहां मजबूरी में रह रहे हैं। केंद्र की कई सरकारों ने पंडितों की वापसी की घोषणाएं कीं, उन्हें आर्थिक सहायता देने की बात कही और उन्हें सुरक्षा का आश्वासन भी दिया लेकिन आज तक 100-200 परिवार भी वापस कश्मीर जाने के लिए तैयार नहीं हुए। कुछ प्रवासी पंडित संगठनों ने मांग की है कि यदि उन्हें सारे कश्मीर में अपनी अलग बस्तियां बसाने की सुविधा दी जाए तो वे वापस लौट सकते हैं लेकिन कश्मीरी नेताओं का मानना है कि हिंदू पंडितों के लिए यदि अलग बस्तियां बनाई गईं तो सांप्रदायिक ज़हर तेजी से फैलेगा। अब डाॅ. अबदुल्ला जैसे परिपक्व नेताओं से ही उम्मीद की जाती है कि वे कश्मीर पंडितों की वापसी का कोई व्यावहारिक तरीका पेश करें।
कश्मीरी पंडितों का पलायन तो उसी समय (1990) शुरु हुआ था, जबकि डाॅ. फारुक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे। जगमोहन नए-नए राज्यपाल बने थे। उन्हीं दिनों भाजपा नेता टीकालाल तपलू, हाइकोर्ट के जज नीलकंठ गंजू और पं. प्रेमनाथ भट्ट की हत्या हुई थीं। कई मंदिरों और गुरुद्वारों पर हमले हो रहे थे। मस्जिदों से एलान होते थे कि काफिरों कश्मीर खाली करो। पंडितों के घरों और स्त्रियों की सुरक्षा लगभग शून्य हो गई थी। ऐसे में राज्यपाल जगमोहन क्या करते ? उन्होंने जान बचाकर भागनेवाले कश्मीरी पंडितों की मदद की। उनकी सुरक्षा और यात्रा की व्यवस्था की। जगमोहन और फारुक के बीच ठन गई। यदि पंडितों के पलायन के लिए आज डाॅ. फारुक जगमोहन के विरुद्ध जांच बिठाने की मांग कर रहे हैं तो उस जांच की अग्नि-परीक्षा में सबसे पहले खुद डाॅ. फारुक को खरा उतरना होगा। बेहतर तो यह होगा कि ‘बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध लेय’! पंडितों के उस पलायन के लिए जो भी जिम्मेदार हो, आज जरुरी यह है कि कश्मीर के सारे नेता फिर से मैदान में आएं और ऐसे हालात पैदा करें कि आतंकवाद वहां से खत्म हो और पंडितों की वापसी हो।

राम मन्दिर का निर्माण शुरू होने का मुहूर्त आ गया है
हर्षवर्धन पाठक
पांच अगस्त को राम मन्दिर का बहु प्रतीक्षित निर्माण प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा भूमि पूजन से प्रारम्भ होगा। यह मंदिर तीन एकड़ में बनेगा लेकिन लगभग सत्तर एकड़ भूमि का विस्तार इसके लिए प्रस्तावित किया गया है। इस महात्वांकाक्षी परियोजना का प्रस्ताव फिलहाल तीन सौ करोड़ रुपए का है।यह विचित्र बात है कि जिस भूमि का नाप सड़सठ एकड़ शुरु में बताया गया वह भूमि जब नापी गई तब सत्तर एकड़ निकली। भूमि नाप का यह अन्तर प्रशासनिक त्रुटि का प्रतीक है ।यह तो अच्छा हुआ कि इस मामले में लाभार्थी एक ही पक्ष था। यदि विवाद में दो या अधिक पक्ष होते तो माननीय न्यायालय यदि तदनुसार कोई निर्णय देता तो उलझन की बात होती।
यह प्रस्तावित है कि जो राममंदिर बनेगा उसके क्षेत्र में प्रसादालय , यज्ञ मण्डप और जन सुविधा भी होंगी तो प्रसाद बनाने का रसोई घर भी होगा और पुजारियों के लिए आवास भी बनेंगे। इस क्षेत्र में शेषावतार का मंदिर भी निर्मित होगा तथा पंच देव का मंदिर भी बनेगा। यह उल्लेखनीय है कि लक्ष्मणजी को शेष का अवतार माना जाता है। प्रस्तावित मन्दिर में राम – सीता की प्रतिमा तो होगी तो राम अकेले नहीं होंगे तो तीनों भाइयों और हनुमान के साथ विराजमान होंगें। इस मंदिर की विशेषता यह भी होगी कि इसके
दरबार हाल से हनुमान गढ़ी के भी दर्शन किये जा सकेंगे। वैसे एक हनुमत द्वार भी बनेगा।
प्रस्तावित मन्दिर श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र के नाम से जाना जाएगा।यह क्षेत्र अयोध्या का का उपनगर कहलाएगा। इसे हाइ टेक सिटी की तरह विकसित किया जाएगा।श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र निर्माण से करोड़ों हिन्दुओं का सपना पूरा होगा।लगभग तीन सौ करोड़ रुपए की इस महत्वपूर्ण परियोजना के अन्तर्गत परिक्रमा पथ का निर्माण भी प्रस्तावित है। अन्य अनेक कार्य भी किए जाएंगे।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्म त्रेता युग में हुआ और आदि कवि वाल्मीकि ने रचना उस समय की थी लेकिन राम मंदिर का निर्माण अयोध्या में बाद में हुआ। इसका कारण अनेक विद्वान यह बताते हैं पहले पूजा के लिए मंदिर का प्रचलन नहीं था। वैदिक युग में यज्ञ होते थे। इस कारण मन्दिरों का निर्माण नहीं हुआ। मंदिर जा कर पूजा करने की प्रथा बाद में शुरू हुई। इस कारण अयोध्या में राम मंदिर बाद में ग्यारहवीं सदी में बना। इस वजह से अधिकांश मन्दिर बाद में बने यद्यपि राम बहुत पहले त्रेता युग में हुए।
महर्षि वाल्मीकि को यह श्रेय दिया जाता है कि विश्व का पहला महाकाव्य लिख कर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन चरित्र की प्रस्तुति उन्होंने की। बाद में गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस का सृजन किया। लेकिन तुलसी के पूर्व (महर्षि वाल्मीकि के बाद) अनेक भाषाओं में राम कथा का गायन हो चुका था।
इनमें कई भारतीय भाषाएं हैं और विदेशी भाषाएं भी हैं। इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय है बंगला भाषा में लिखी गई कृतिवास रामायण तथा तमिल भाषा में महाकवि कम्बन द्वारा रचित कम्ब रामायण।कम्बन ने अपने ग्रंथ का नाम रामावतारम रखा था परन्तु यह ग्रंथ कम्ब रामायण के नाम से अधिक लोकप्रिय हुआ। इस रामायण में लगभग दस हजार पद हैं। वाल्मीकि रामायण को आधार बनाकर लिखी गई इस रचना को कुछ विद्वान अधिक उत्कृष्ट मानते हैं। अनेक देशों में राम कथा अनेक रूपों में प्रचलित है।इस कारण भी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का महत्व है। जैसा पहले लिखा गया है अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण ऐतिहासिक घटना है।

भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन
विजय कुमार जैन
भारतीय संस्कृति में पर्वों का प्राचीनकाल से विशेष महत्व रहा है। प्रत्येक त्यौहार के साथ धार्मिक मान्यताओं, सामाजिक एवं ऐतिहासिक घटनाओं का संयोग प्रदर्शित होता है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी अपना संदेश आम जनता तक पहुँचाने के लिये त्यौहारों एवं मेलों का मंच के रूप में उपयोग होता था। हम चर्चा कर रहे हैं ऐसे ही पर्व रक्षाबंधन की। रक्षाबंधन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का प्रमुख त्यौहार माना जाता है जो श्रावण मास पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहन अपनी रक्षा के लिये भाई को राखी बांधती है।
यह पर्व मात्र रक्षा का संदेश नहीं देता, अपितु प्रेम,
समर्पण, निष्ठा व संकल्प के द्वारा हृदयों को भी बांधने का वचन देता है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है ” मयि सर्व मिदंप्रोक्तं सूत्रे मणिगणाइव”
अर्थात सूत्र अविच्छन्नता का प्रतीक है क्योंकि सूत्र/धागे बिखरे हुए हैं मोतियों को अपने में पिरोकर एक माला में एकाकार बनाता है। माला के सूत्र की तरह रक्षासूत्र भी लोगों को जोड़ता है। पुराणों में रक्षाबंधन का उल्लेख मिलता है। रक्षा हेतु इन्द्राणी ने इन्द्र सहित देवताओं की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा और इन्द्र ने राक्षसों से युद्ध में विजय पायी। एक कथा के अनुसार राजा बलि को दिये वचन अनुसार भगवान विष्णु बैकुंठ छोड़कर बलि के राज्य की रक्षा के लिये चले गये। तब देवी लक्ष्मी ने ब्राह्मणी का रूप धर श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि की कलाई पर पवित्र धागा बांधा, उनके कहने पर बलि ने भगवान विष्णु से बैकुंठ लौटने की विनती की। रावण की बहन शूर्पणखा लक्ष्मण के द्वारा नाक काटने के पश्चात रावण के पास पहुंची और खून से मैली साड़ी का एक छोर रावण की कलाई में बांध दिया और कहा भैया जब-जब तुम अपनी कलाई को देखोगे तुम्हारी अपनी बहन का अपमान याद आयेगा और मेरी नाक काटने बालों से तुम बदला ले सकोगे। भगवान श्री कृष्ण के हाथ में चोट लगने पर एक बार द्रौपदी ने अपनी चुनरी का किनारा फाड़ कर घाव पर बांध दिया था।
दुशासन द्वारा द्रौपदी का चीरहरण प्रयास इसी बंधन के प्रभाव से असफल हुआ। श्री कृष्ण ने द्रौपदी की रक्षा की। युधिष्ठिर ने एक बार श्रीकृष्ण से पूछा कि वह महाभारत के युद्ध में कैसे बचेंगे , जवाब में श्री कृष्ण ने कहा राखी का धागा ही तुम्हारी रक्षा करेगा। सिकन्दर व पोरस के युद्ध के पूर्व रक्षा सूत्र का आदान प्रदान हुआ था। दोनों ने रक्षा सूत्र की मर्यादा का पालन किया था। मुगल काल में मुगल सम्राट हुमायूँ चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण करने बढ़ा तो राणा सांगा की विधवा कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर अपनी रक्षा का वचन लिया। हुमायूँ ने इसे स्वीकार करके चित्तौड़ पर आक्रमण का विचार मन से निकाल दिया और आगे राखी का वायदा निभाने के लिये चित्तौड़ की रक्षा हेतु गुजरात के बादशाह से भी युद्ध किया।
स्वाधीनता आन्दोलन में भी बहनों ने अपने भाइयों को राखी बांधकर देश को आजाद कराने का वचन लिया। सन 1905 में बंग-भंग आन्दोलन का शुभारंभ एक-दूसरे को रक्षा सूत्र बांधकर हुआ। आजादी के आन्दोलन की एक घटना चन्द्रशेखर आजाद से जुड़ी हुई है। आजाद एक तूफानी रात शरण लेने एक विधवा के घर पहुंचे। पहले तो उसने उन्हें डाकू समझकर शरण देने से मना कर दिया। बाद में यह पता चलने पर कि वह क्रांतिकारी आजाद है तो ससम्मान उन्हें घर के अंदर ले गई। बातचीत के दौरान आजाद को पता चला कि उस विधवा को गरीबी के कारण जबान बेटी की शादी हेतु काफी परेशानी उठानी पड़ रही है।। यह जानकर आजाद को वहुत दुख हुआ। उन्होंने विधवा को प्रस्ताव दिया कि मेरी गिरफ्तारी पर पाँच हजार रुपये का इनाम है, तुम मुझे अंग्रेजों को पकड़वा दो और उस इनाम से बेटी की शादी कर देना, यह सुनकर विधवा रो पड़ी व कहा भैया तुम देश की आजादी हेतु अपनी जान हथेली पर रखकर चल रहे हो और न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्ज़त तुम्हारे भरोसे है, मैं हरगिज ऐसा नहीं कर सकती। यह कहते हुए उसने एक रक्षा सूत्र आजाद के हाथ पर बांधकर देश सेवा का वचन लिया। सुबह जब विधवा की आँख खुली तो आजाद जा चुके थे और तकिये के नीचे पाँच हजार रुपये रखे हुए थे, साथ ही उसके साथ एक पर्चा रखा था जिस पर लिखा था कि अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी सी भेंट -आजाद। भारत में रक्षाबंधन का त्यौहार अलग अलग तरीकों से अपनी मान्यता अनुसार मनाया जाता है। मुंबई के समुद्री क्षेत्रों में
नारियल पूर्णिमा या कोकोनट फुलमून के नाम से मनाया जाता है। उत्तराखंड के चम्पावत जिले के देवीधूरा में राखी पर्व पर बाराहीदेवी को प्रसन्न करने के लिये पाषाणकाल से ही पत्थर युद्ध का आयोजन किया जाता है। इस युद्ध में आज तक कोई भी गंभीर रूप से घायल नहीं हुआ। जैन धर्म में रक्षाबंधन पर्व का विशेष महत्व है। प्राचीन काल में मुनि अकम्पनाचार्य आदि 700 मुनियों पर असुरों द्वारा हस्तिनापुर में उपसर्ग किया। सभी मुनियों को बंदी बनाकर बलि देने का निर्णय लिया। मुनि विष्णु कुमार को इसका पता चला तो उन्होंने अपनी वैक्रिया सिद्धि के द्वारा असुर शक्तियों को निर्बल किया तथा 700 मुनियों की अकम्पनाचार्य सहित रक्षा की। मुनियों की रक्षा की स्मृति में यह रक्षाबंधन पर्व मनाया जाता है। रक्षाबंधन के दिन जैन मंदिरों में 700 मुनियों की रक्षाबंधन पूजन करते है तथा इस अवसर पर धर्म और संस्कृति की रक्षा के प्रतीक रक्षासूत्र बांधते हैं।
रक्षाबंधन पर्व की एक रोचक घटना हरियाणा के फतेहपुर गाँव की है। फतेहपुर में सन 1857 में एक युवक गिरधरलाल को रक्षाबंधन के दिन अंग्रेजों ने तोप से बांधकर उड़ा दिया। इस घटना के बाद ग्रामीणों ने गिरधरलाल को शहीद का सम्मान देकर रक्षाबंधन पर्व मनाना बंद कर दिया। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 150 वर्ष पूर्ण होने पर सन 2006 में इस गाँव के लोगों ने रक्षाबंधन पर्व पुनः मनाने का संकल्प लिया।
रक्षाबंधन पर्व का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व है। यह पर्व हमारे सामाजिक परिवेश एवं मानवीय मूल्यों का अभिन्न अंग है। आज आवश्यकता है आडंबर के बजाय इस त्यौहार के पीछे छुपे हुए संस्कारों और नैतिक मूल्यों का सम्मान किया जाना चाहिए तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र का कल्याण संभव होगा।

नई शिक्षा नीतिः कुछ नई शंकाएं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
नई शिक्षा नीति में मातृभाषाओं को जो महत्व दिया गया है, कल मैंने उसकी तारीफ की थी लेकिन उसमें भी मुझे चार व्यावहारिक कठिनाइयां दिखाई पड़ रही हैं। पहली, यदि छठी कक्षा तक बच्चे मातृभाषा में पढ़ेंगे तो सातवीं कक्षा में वे अंग्रेजी के माध्यम से कैसे निपटेंगे ? दूसरी, अखिल भारतीय नौकरियों के कर्मचारियों के बच्चे उनके माता-पिता का तबादला होने पर वे क्या करेंगे ? प्रांत बदलने पर उनकी पढ़ाई का माध्यम भी बदलना होगा। यदि उनकी मातृभाषा में पढ़नेवाले 5-10 छात्र भी नहीं होंगे तो उनकी पढ़ाई का माध्यम क्या होगा? तीसरी, क्या उनकी आगे की पढ़ाई उनकी मातृभाषा में होगी ? क्या वे बी.ए., एम.ए. और पीएच.डी. अपनी भाषा में कर सकेंगे ? क्या उसका कोई इंतजाम इस नई शिक्षा नीति में है ? चौथी बात, जो सबसे महत्वपूर्ण है। वह यह है क्या ऊंची सरकारी और गैर-सरकारी नौकरियां भारतीय भाषाओं के माध्यम से मिल सकेंगी ? क्या भर्ती के लिए अंग्रेजी अनिवार्य होगी ? यदि हां, तो माध्यम का यह अधूरा बदलाव क्या निरर्थक सिद्ध नहीं होगा ? अर्थात पढ़ाई का माध्यम मातृभाषा या राष्ट्रभाषा हो और नौकरी का, रुतबे का, वर्चस्व का माध्यम अंग्रेजी हो तो लोग अपने बच्चों को मातृभाषा, प्रादेशिक भाषा या राष्ट्रभाषा में क्यों पढ़ाएंगे ? वे अपने बच्चों को कान्वेन्ट में भेजेंगे। कई राज्य अपनीवाली चलाएंगे। वे कहेंगे कि शिक्षा तो संविधान की समवर्ती सूची में है। हम अपने बच्चों को नौकरियों, बड़े ओहदों और माल-मत्तों से वंचित क्यों करेंगे ? हमारे देश में आज भी लगभग 50 प्रतिशत बच्चों को लोग निजी स्कूलों में क्यों पढ़ाते हैं ? शिक्षा की ये मोटी-मोटी दुकानें क्यों फल-फूल रही हैं ? ये स्कूल लूट-पाट के अड्डे क्यों बने हुए हैं ? क्योंकि ऊंची जातियों, शहरियों और मालदारों के बच्चे इन स्कूलों की सीढ़ियों पर चढ़कर शासक-वर्ग में शामिल हो जाते हैं। देश के 80-90 प्रतिशत लोगों को अवसरों की समानता से ये स्कूल ही वंचित करते हैं। लोकतंत्र को इस मुट्ठीतंत्र से मुक्ति दिलाने में क्या यह नई शिक्षा नीति कुछ कारगर होगी ? मुझे शक है। इस नीति में मुझे एक खतरा और भी लग रहा है। यह विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में जमने की भी छूट दे रही है। ये विश्वविद्यालय हमारे विश्वविद्यालयों में क्या हीनता-ग्रंथि पैदा नहीं करेंगे? क्या ये अंग्रेजी के वर्चस्व को नहीं बढ़ाएंगे ? क्या ये देश में एक नए श्रेष्ठि वर्ग को जन्म नहीं देंगे ? मैं अफगानिस्तान, ब्रिटेन, सोवियत रुस और अमेरिका के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में अपनी पीएच.डी. के लिए पढ़ता और शोध करता रहा हूं और कई अन्य देशों में पढ़ाता भी रहा हूं लेकिन मैंने हमेशा महसूस किया कि यदि उन राष्ट्रों की तरह हम भी अपने उच्चतम शिक्षा, शोध और नौकरियों का माध्यम स्वभाषा ही रखें तो भारत भी शीघ्र ही महाशक्ति बन सकता है।

ऑनलाइन कंपनियों द्वारा बौद्धिक चोरी
सनत जैन
अमेरिका में फेसबुक, अमेजॉन, गूगल, एप्पल के खिलाफ व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा संबंधी कानून के उल्लंघन को लेकर पूछताछ चल रही है। यह चारों कंपनियां सारी दुनिया में एकाधिकार के बल पर भारी कमाई कर रही हैं। भारत सहित वैश्विक बाजार पर जिस तरह से यह कंपनियां अपना प्रभाव बनाती हैं। प्रतिस्पर्धी को खत्म करने के लिए वैध और अवैध तरीके अपनाकर एकाधिकार कायम करती हैं। इसको लेकर अमेरिकी सांसदों की समिति इन कंपनियों के खिलाफ जांच कर रही है। मार्क जुकरबर्ग, जैफ बेजोस, सुंदर पिचाई और टिम कुक अमेरिकी सांसदों की कमेटी के सामने उनके प्रश्नों का जवाब दे रहे हैं।
गूगल पर आरोप है कि उसने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) को किसी भी अन्य संगठन के मुकाबले ज्यादा महत्व दिया है। डब्ल्यूएचओ ने अमेरिका से सच छुपाया और गूगल ने डब्ल्यूएचओ के पक्ष में काम कर अप्रत्यक्ष रूप से चीन को फायदा पहुंचाया।
अमेरिका जब इन कंपनियों के चंगुल में फंसा, तब जाकर नियंत्रण करने की कोशिश शुरू हुई हैं। सांसदों ने इन चारों कंपनियों के प्रमुखों से जब सवाल किए, तो इन्हें जवाब देना मुश्किल हो गया।
भारत से सबसे ज्यादा ऑनलाइन कमाई
इन चारों कंपनियों ने भारत को दोनों हाथों से लूटने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। भारत सबसे बड़ा बाजार है, इस बाजार में उत्पाद बेचने, यहां का डेटा, सारे विश्व में बेचने और भारत से पैसे कमाने के लिए इन्हीं चारों कंपनियों का उपयोग विश्व भर की कंपनियों ने किया है। इन चारों कंपनियों के लिए भारत सबसे बड़ा बाजार है। भारत के बाजार में इन चारों कंपनियों ने एकाधिकार बनाकर पिछले 20 वर्षों में विशेष रुप से 2010 के बाद से बहुत मनमानी की है।भारत की जानकारियां,सूचनाएं, डाटा और आइडिया चुराकर अरबों- खरबों रुपए कमाए हैं।भारत सरकार इन कंपनियों के आगे एक तरह से नतमस्तक होकर खड़ी हुई है। जिसके कारण यह भारत से कमाई भी कर रहे हैं और भारत सरकार को टैक्स भी अदा नहीं कर रहे हैं।
सबसे ज्यादा बौद्धिक चोरी भारत से पिछले 20 वर्षों में इन कंपनियों ने फ्री के प्लेटफार्म देकर मनमानी शर्तों पर उपयोगकर्ताओं से सहमति करा कर आम आदमियों के साथ बड़ा धोखा किया है। भारत के जितने भी बौद्धिक लोग हैं, उनके आइडिया, जानकारी और उनकी समस्त व्यापारिक गतिविधियों को अपने डेटाबेस बनाकर अरबों-खरबों रुपए इन कंपनियों ने भारत से कमाए हैं। लेकिन इन कंपनियों ने भारत में कॉपीराइट एक्ट का पालन भी नहीं किया। इन चारों कंपनियों के पास खुद के कोई कंटेंट नहीं है। न ही यह कोई कंटेंट तैयार करती हैं। सारे लोग इन कंपनियों के विभिन्न प्लेटफार्म में अपनी जानकारी, कंटेंट और आइडिया पोस्ट करते हैं। जिन्हें चुराकर अथवा कॉपीराइट एक्ट का पालन नहीं करके यही कंपनियां खरबों रुपए कमा रही हैं। भारत सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई है। भारत सरकार अभी तक उपयुक्त कानून भी नहीं बना पाई है। भारत सरकार को अमेरिका से सबक लेने की जरूरत है। इन बड़ी मछलियों को काबू में लाने की आवश्यकता है, जो पूरे भारत का व्यापारिक, आर्थिक एवं बौद्धिक शोषण हर तरीके से कर रही हैं। इसके लिए उपयुक्त कानून बनाने के साथ ही बौद्धिक संपदा अधिकार की रक्षा करना भी सर्वोच्च प्राथमिकता में होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो भारत को जहां आर्थिक नुकसान तो होगा ही इसके साथ साथ हम एक बार फिर इनके गुलाम होकर रह जाएंगे।

नई शिक्षा नीतिः कुछ प्रश्न
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
नई शिक्षा नीति का सबसे पहले तो इसलिए स्वागत है कि उसमें मानव-संसाधन मंत्रालय को शिक्षा मंत्रालय नाम दे दिया गया। मनुष्य को ‘संसाधन’ कहना तो शुद्ध मूर्खता थी। जब नरसिंहरावजी इसके पहले मंत्री बने तो मैंने उनसे शपथ के बाद राष्ट्रपति भवन में कहा कि इस विचित्र नामकरण को आप क्यों स्वीकार कर रहे हैं ? उनके बाद मैंने यही प्रश्न अपने मित्र अर्जुनसिंहजी और डाॅ. मुरलीमनोहर जोशी से भी किया लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार को बधाई कि उसने इस मंत्रालय का खोया नाम लौटा दिया।
पिछले 73 वर्षों में भारत ने दो मामलों की सबसे ज्यादा उपेक्षा की। एक शिक्षा और दूसरी चिकित्सा। उसका परिणाम सामने है। भारत की गिनती अभी भी पिछड़े देशों में ही होती है, क्योंकि शिक्षा और चिकित्सा पर हमारी सरकारों ने बहुत कम ध्यान दिया और बहुत कम खर्च किया। इनमें से एक बुद्धि को दूसरी शरीर को बुलंद बनाती है। तन और मन को तेज करनेवाली दृष्टि तो मुझे इस नई शिक्षा नीति में दिखाई नहीं पड़ती। इस नई नीति में न तो शारीरिक शिक्षा पर मुझे एक भी शब्द दिखा और न ही नैतिक शिक्षा पर। यदि शिक्षा शरीर को सबल नहीं बनाती है और चित्तवृति को शुद्ध नहीं करती है तो यह कैसी शिक्षा है ? बाबू बनाने, पैसा गांठने और कुर्सियां झपटना ही यदि शिक्षा का लक्ष्य है तो ये काम तो सर्वथा अशिक्षित लोग भी बहुत सफलतापूर्वक करते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि इस नई शिक्षा नीति में नया कुछ नहीं है। काफी कुछ है। इसमें मातृभाषा को महत्व मिला है। छठी कक्षा तक सभी बच्चों को स्वभाषा के माध्यम से पढ़ाया जाएगा। यह अच्छी बात है लेकिन हमारी सरकारों में इतना दम नहीं है कि वे दो-टूक शब्दों में कह सकें कि छठी कक्षा तक अंग्रेजी या किसी विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ाने पर प्रतिबंध होगा। यदि ऐसा हो गया तो शिक्षा के नाम पर चल रही निजी दुकानों का क्या होगा ? त्रिभाषा-व्यवस्था जिस तरह से की गई है, ठीक है लेकिन अंग्रेजी की पढ़ाई को स्वैच्छिक क्यों नहीं किया गया ? यदि भाजपा की सरकार भी कांग्रेसी ढर्रे पर चलेगी तो उसे अपने आप को राष्ट्रवादी कहने का अधिकार कैसे सुरक्षित रहेगा ? क्या इस नई शिक्षा नीति के अनुसार सभी विषयों की एम.ए. और पीएच.डी. की शिक्षा भी भारतीय भाषाओं के माध्यम से होगी ? आज से 55 साल पहले मैंने जवाहरलाल नेहरु विवि में अपना अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोधग्रंथ हिंदी में लिखने की लड़ाई लड़ी थी। पूरी संसद ने मेरा समर्थन किया। मेरी विजय हुई लेकिन आज भी लगभग सारा शोध अंग्रेजी में होता है। इस अंग्रेज के बनाए ढर्रे को आप कब बदलेंगे ? ये तो मेरे कुछ प्रारंभिक और तात्कालिक प्रश्न हैं लेकिन नई शिक्षा नीति का जब मूल दस्तावेज हाथ में आएगा, तब उस पर लंबी बहस की जाएगी।

जय श्रीराम भाजपा की ‘नामनीति’ के बाद अब ‘रामनीति’….?
ओमप्रकाश मेहता
भारत पर पिछले पचहत्तर महीनों से राज कर रही भारतीय जनता पार्टी की ‘नामनीति’ अब ‘रामनीति’ में परिवर्तित होने जा रही है, चूंकि इस सत्तारूढ़ दल में सब कुछ मोदी जी के ‘नाम’ पर ही होता आ रहा है और इसी ‘नामनीति’ के नाम पर ‘कामनीति’ भी तैयार की गई थी, वह अब ‘रामनीति’ में परिवर्तित होने जा रही है, क्योंकि अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास के बाद अब मोदी जी के शेष कार्यकाल में ‘रामनीति’ पर ही राज चलने वाला है और मोदी जी के अगली 2024 में पुनः ताजपोशी भी इसी रामनीति के आधार पर होगी, अर्थात अब अयोध्या में राम मंदिर और मोदी जी की अगली सरकार का स्वर्णिम भवन दोनों एक साथ ही तैयार होगें और जैसा कि कहा जा रहा है कि भव्य मंदिर के निर्माण में तीन साल का समय लगेगा, तो यह भव्य राम मंदिर जुलाई-अगस्त 2023 तक पूरा हो पाएगा और इसके सिर्फ आठ महीने बाद अप्रैल-मई में लोकसभा के चुनाव सम्पन्न होना है, तो मोदी जी की अगली विजय का भी मुख्य आधार भी यह राम मंदिर ही होगा, अर्थात् यदि यह कहा जाए कि मंदिर के भूमिपूजन के साथ मोदी जी की सत्ता के तीसरे चरण का भी यह शिलान्यास हो रहा है, तो कतई गलत नहीं होगा। क्योंकि भाजपा अपना एक बरसों पुराना वादा इसी कार्यकाल में पूरा करने जा रही है, जो भाजपा के साथ देश के हिन्दुओं का भी सुनहरा सपना था।
देवता के शयनकाल के दौरान कराये जा रहे इस मांगलिक कार्य के बारे में जब प्रदेश के प्रकाण्ड विद्वान और ज्योतिषचार्य पण्डित आनन्द शंकर व्यास जी से पूछा गया तो उनका कहना था कि- हमारे धर्मशास्त्रों में सिर्फ आवास निर्माण ही भगवान के शयनकाल याने चतुर्मास में वर्जित नहीं है और चूंकि अयोध्या में राम मंदिर भगवान राम का आवास रहेगा, इसलिए इसके शिलान्यास को धर्म-विरूद्ध नहीं माना जा सकता, उन्होंने साथ ही यह भी जोड़ा कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने शिलान्यास की जो दो तिथियाँ तीन व पाँच अगस्त सुझाई है उनमें तीन अगस्त की तिथि इस पुनीत कार्य हेतु उचित नहीं है, क्योंकि उस दिन रक्षाबंधन याने श्रावणी पर्व है, जिसमें शिलान्यास वर्जित है, हाँ, इस कार्य हेतु पांच अगस्त की तिथि एकदम सही व उचित है। अतः प्रधानमंत्री जी को इस पुनीत व धर्म कार्य हेतु पांच अगस्त की तिथि तय करना चाहिए। ट्रस्ट का तो संकल्प है कि इस भव्य राम मंदिर का शिलान्यास और भगवान श्रीराम के मंदिर का लोकार्पण दोनों ही पुनीत कार्य श्री मोदी जी के करकमलों से ही सम्पन्न होंगे, इसलिए इसमें कोई आशंका नहीं है, मंदिर का निर्माण कार्य इसकी निर्धारित अवधि तीन साल में निश्चित रूप से पूरा हो जाएगा और संभव है 2023 में भगवान राम जन्म दिवस (रामनवमी) को इस मंदिर को आराध्य को सौंप दिया जाए?
यहाँ यह भी एक उल्लेखनीय तथ्य है कि राम जन्मभूमि विवाद सम्बंधी सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के नौ महीने बाद राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है, यहाँ भी नौ माह का विशेष महत्व है, क्योंकि विवाद के साथ ‘जन्म’ जो जुड़ा था?
जो भी हो, ‘‘होई है वही जो राम-रूचि राखा’’ अर्थात् जैसा राम चाहेगें वैसा ही होगा, फिर चाहे इसके लिए भगवान राम के ससुराल (नेपाल) वाले कितना ही शोर क्यों न मचा लें? क्योंकि रामजी का उनकी ससुराल (नेपाल) से नाता तो बाद में जुड़ा, पहले तो उनका जन्म हुआ यह सर्वज्ञात है, इसलिए जन्मभूमि प्रकरण में ससुराल का कोई हस्तक्षेप नहीं हो सकता।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि त्रेतायुग व द्वापर युग दोनों ही पुण्य कालों में युगपुरूषों के अवतरण उत्तरप्रदेश की पुण्य भूमि पर हुए, यद्यपि त्रेतायुग के भगवान राम पुरातन है, कृष्ण का अवतरण तो भगवान राम के कई हजार वर्षों बाद हुआ, किंतु कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा में उनके अनेक भव्य मंदिर बन गए और भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या में अब भव्य मंदिर बनने जा रहा है, वह भी काफी विवादों के बाद। खैर, ‘‘देर आयत, दुरूस्त आयत’’ इसी में संतोष व प्रसन्नता है, इसीलिए कहा गया है- ‘‘जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिये’’
जय श्रीराम……!

पाकिस्तान का भला इसी में है !
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
दक्षिण एशिया में आतंकी गतिविधियों पर संयुक्तराष्ट्र संघ की जो 26 वीं रपट आई है, उस पर सबसे ज्यादा ध्यान पाकिस्तान की इमरान सरकार का जाना चाहिए, क्योंकि इस रपट से पता चलता है कि दुनिया में आतंकवाद का कोई गढ़ है तो वह पाकिस्तान ही है। पाकिस्तान में अल-कायदा और ‘इस्लामिक स्टेट’ के दफ्तर हैं। पाकिस्तानी तालिबान आंदेालन भी वहीं से चलता है। पाकिस्तान में जन्मा और पनपा यह आतंकवाद अफगानिस्तान और हिंदुस्तान को तबाह करने पर उतारु है। संयुक्तराष्ट्र की रपट के मुताबिक कम से कम 200 आतंकवादी ऐसे हैं, जो भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार में हमले की तैयारी कर रहे हैं। आईएसआईएस के ज्यादातर आतंकवादियों ने केरल और कर्नाटक को अपना ठिकाना बना रखा है। ‘विलायते-हिंद’ के नाम से जो नया संगठन पिछले साल बना है, उसका खास निशाना भारत ही है। भारत में भी वह कश्मीर पर ही सबसे ज्यादा अपना जोर आजमाएगा। 2015 में खुरासान के नाम से जो गिरोह खड़ा किया गया था, उसका लक्ष्य भी कश्मीर ही था। अफगानिस्तान में इस समय लगभग 6000 आतंकवादी सक्रिय हैं। अफगानिस्तान के आधे से ज्यादा जिलों पर उनका कब्जा या असर है। वे अपने आप को तहरीके-तालिबान पाकिस्तान कहते हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने तो यहां तक कहा था कि आतंकियों से खुद पाकिस्तान बहुत त्रस्त है। उनके मुताबिक पाकिस्तान में 40 हजार से ज्यादा आतंकवादी सक्रिय हैं। पाकिस्तान की जनता द्वारा चुनी हुई सरकारें खुद इन आतंकियों का विरोध करती हैं, खास तौर से कुछ साल पहले पेशावार में एक सैनिक स्कूल पर हुए हमले के बाद, जिसमें फौजियों के करीब डेढ़ सौ बच्चे मारे गए थे। लेकिन पाकिस्तान की दिक्कत यह है कि उस राष्ट्र की अफगान-नीति और हिंदुस्तान-नीति वहां की फौज बनाती है। यदि पाकिस्तान की फौज अपना हाथ खींच ले तो दक्षिण एशिया के सारे आतंकवादी ढेर हो जाएंगे। इस फौज को कौन समझाए कि आतंकवाद से जितना नुकसान भारत और अफगानिस्तान को होता है, उससे कहीं ज्यादा पाकिस्तान को ही होता है। भारत इतना शक्तिशाली देश है कि तलवार के जोर पर पाकिस्तान उससे हजार साल तक लड़कर भी कश्मीर नहीं ले सकता। हां, बातचीत से हल जरुर निकल सकता है। जहां तक अफगानिस्तान का सवाल है, पाकिस्तान के कई प्रधानमंत्रियों को मैं यह अच्छी तरह बता चुका हूं कि अफगान तालिबान गिलजई कबीले के हैं। गिलजई पठानों की रगों में आजादी दौड़ती है। वे सत्तारुढ़ हो गए तो वे पाकिस्तान के ‘पंजाबी मुसलमानों’ को ठिकाने लगाने में देर नहीं करेंगे। पाकिस्तान का भला इसी में है कि वह आतंकवाद को बिल्कुल भी सहारा न दे और काबुल और कश्मीर की उलझनों को लोकतांत्रिक तरीकों से हल करे।
(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)

तीन-तलाक- “बड़ा रिफॉर्म-बेहतरीन रिजल्ट”
मुख्तार अब्बास नकवी
वैसे तो अगस्त, इतिहास में महत्वपूर्ण घटनाओं के पन्नों से भरपूर है, 8 अगस्त “भारत छोडो आंदोलन”, 15 अगस्त भारतीय स्वतंत्रता दिवस, 19 अगस्त “विश्व मानवीय दिवस”, 20 अगस्त “सद्भावना दिवस”, 5 अगस्त को 370 खत्म होना, जैसे इतिहास के सुनहरे लफ्जों में लिखे जाने वाले दिन हैं।
वहीं 1 अगस्त, मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की कुप्रथा, कुरीति से मुक्त करने का दिन, भारत के इतिहास में “मुस्लिम महिला अधिकार दिवस” के रूप में दर्ज हो चुका है।
“तीन तलाक” या “तिलाके बिद्दत” जो ना संवैधानिक तौर से ठीक था, ना इस्लाम के नुक्तेनजर से जायज़ था। फिर भी हमारे देश में मुस्लिम महिलाओं के उत्पीड़न से भरपूर गैर-क़ानूनी, असंवैधानिक, गैर-इस्लामी कुप्रथा “तीन तलाक”, “वोट बैंक के सौदागरों” के “सियासी संरक्षण” में फलता- फूलता रहा।
1 अगस्त 2019 भारतीय संसद के इतिहास का वह दिन है जिस दिन कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी, सपा, बसपा, तृणमूल कांग्रेस सहित तमाम तथाकथित “सेक्युलरिज़्म के सियासी सूरमाओं” के विरोध के बावजूद “तीन तलाक” कुप्रथा को ख़त्म करने के विधेयक को कानून बनाया गया। देश की आधी आबादी और मुस्लिम महिलाओं के लिए यह दिन संवैधानिक-मौलिक-लोकतांत्रिक एवं समानता के अधिकारों का दिन बन गया। यह दिन भारतीय लोकतंत्र और संसदीय इतिहास के स्वर्णिम पन्नों का हिस्सा रहेगा।
“तीन तलाक” कुप्रथा के खिलाफ कानून तो 1986 में भी बन सकता था जब शाहबानों केस में सुप्रीम कोर्ट ने “तीन तलाक” पर बड़ा फैसला लिया था; उस समय लोकसभा में अकेले कांग्रेस सदस्यों की संख्या 545 में से 400 से ज्यादा और राज्यसभा में 245 में से 159 सीटें थी, पर कांग्रेस की श्री राजीव गाँधी की सरकार ने 5 मई 1986 को इस संख्या बल का इस्तेमाल मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को कुचलने और “तीन तलाक” क्रूरता-कुप्रथा को ताकत देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी बनाने के लिए संसद में संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल किया।
कांग्रेस ने कुछ “दकियानूसी कट्टरपंथियों के कुतर्कों” और दबाव के आगे घुटने टेक कर मुस्लिम महिलाओं को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित करने का आपराधिक पाप किया था। कांग्रेस के “लम्हों की खता”, मुस्लिम महिलाओं के लिए “दशकों की सजा” बन गई। जहाँ कांग्रेस ने “सियासी वोटों के उधार” की चिंता की थी, वहीँ मोदी सरकार ने सामाजिक सुधार की चिंता की।
भारत संविधान से चलता है, किसी शरीयत या धार्मिक कानून या व्यवस्था से नहीं। इससे पहले भी देश में सती प्रथा, बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने के लिए भी कानून बनाये गए। तीन तलाक कानून का किसी मजहब, किसी धर्म से कोई लेना देना नहीं था, शुद्ध रूप से यह कानून एक कुप्रथा, क्रूरता, सामाजिक बुराई और लैंगिक असमानता को खत्म करने के लिए पारित किया गया। यह मुस्लिम महिलाओं के समानता के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा से जुड़ा विषय था। मौखिक रुप से तीन बार तलाक़ कह कर तलाक देना, पत्र, फ़ोन, यहाँ तक की मैसेज, व्हाट्सऐप के जरिये तलाक़ दिए जाने के मामले सामने आने लगे थे। जो कि किसी भी संवेदनशील देश-समावेशी सरकार के लिए अस्वीकार्य था।
दुनिया के कई प्रमुख इस्लामी देशों ने बहुत पहले ही “तीन तलाक” को गैर-क़ानूनी और गैर-इस्लामी घोषित कर ख़त्म कर दिया था। मिस्र दुनिया का पहला इस्लामी देश है जिसने 1929 में “तीन तलाक” को ख़त्म किया, गैर क़ानूनी एवं दंडनीय अपराध बनाया। 1929 में सूडान ने तीन तलाक पर प्रतिबन्ध लगाया।
1956 में पाकिस्तान ने, 1972 बांग्लादेश, 1959 में इराक, सीरिया ने 1953 में, मलेशिया ने 1969 में इस पर रोक लगाई। इसके अलावा साइप्रस, जॉर्डन, अल्जीरिया, ईरान, ब्रूनेई, मोरक्को, क़तर, यूएई जैसे इस्लामी देशों ने तीन तलाक ख़त्म किया और कड़े क़ानूनी प्रावधान बनाये। लेकिन भारत को मुस्लिम महिलाओं को इस कुप्रथा के अमानवीय जुल्म से आजादी दिलाने में लगभग 70 साल लग गए।
श्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने “तीन तलाक” पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाया। सुप्रीम कोर्ट ने 18 मई 2017 को तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया था। जहाँ कांग्रेस ने अपने संख्या बल का इस्तेमाल मुस्लिम महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखने के लिए किया था, वहीँ मोदी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक-मौलिक-लोकतान्त्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए फैसला किया।
आज एक वर्ष हो गया है, इस दौरान “तीन तलाक” या “तिलाके बिद्दत” की घटनांओं में 82 प्रतिशत से ज्यादा की कमीं आई है, जहाँ ऐसी घटना हुई भी है वहां कानून ने अपना काम किया है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की सरकार हर वर्ग के सशक्तिकरण और सामाजिक सुधार को समर्पित है। कुछ लोगों का कुतर्क होता है कि मोदी सरकार को सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के तलाक की ही चिंता क्यों है? उनके आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक सशक्तिकरण के लिए कुछ क्यों नहीं करते ? तो उनकी जानकारी के लिए बताना चाहता हूँ कि इन पिछले 6 वर्षों में मोदी सरकार के समावेशी विकास-सर्वस्पर्शी सशक्तिकरण के प्रयासों का लाभ समाज के सभी वर्गों के साथ मुस्लिम महिलाओं को भी भरपूर हुआ है।
पिछले छह वर्षो में 3 करोड़, 87 लाख अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं को स्कॉलरशिप दी गई, जिसमें 60 प्रतिशत लड़कियाँ हैं। पिछले 6 वर्षो में ‘हुनर हाट’के माध्यम से लाखों दस्तकारों-शिल्पकारों को रोजगार-रोजगार के मौके मिलें जिनमे बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं शामिल हैं। “सीखों और कमाओं” , “गरीब नवाज़ स्वरोजगार योजना”, “उस्ताद”, “नई मंजिल”, “नई रौशनी” आदि रोजगारपरक कौशल विकास योजनाओं के माध्यम से पिछले 6 वर्षों में 10 लाख से ज्यादा अल्पसंख्यकों को रोजगार और रोजगार के मौके उपलब्ध कराये गए हैं जिनमे बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं शामिल हैं। इसके अतिरिक्त मोदी सरकार के अंतरगर्त 2018 में शुरू की गई बिना मेहरम महिलाओं को हज पर जाने की प्रक्रिया के तहत अब तक बिना मेहरम के हज पर जाने वाली महिलाओं की संख्या 3040 हो चुकी है। इस वर्ष भी 2300 से अधिक मुस्लिम महिलाओं ने बिना “मेहरम” (पुरुष रिश्तेदार) के हज पर जाने के लिए आवेदन किया था, इन महिलाओं को हज 2021 में इसी आवेदन के आधार पर हज यात्रा पर भेजा जायेगा, साथ ही अगले वर्ष भी जो महिलाएं बिना मेहरम हज यात्रा हेतु नया आवेदन करेंगी उन सभी को भी हज यात्रा पर भेजा जायेगा।
यहीं नहीं मोदी सरकार की अन्य सामाजिक सशक्तिकरण योजनाओं का लाभ मुस्लिम महिलाओं को भरपूर हुआ है। यही वजह है कि आज विपक्ष भी यह नहीं कह पाता कि सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक सशक्तिकरण के लिए किये जा रहे कामों में किसी भी वर्ग के साथ भेद-भाव हुआ है, मोदी सरकार के “सम्मान के साथ सशक्तिकरण, बिना तुष्टिकरण विकास” का नतीजा है कि 2 करोड़ गरीबों को घर दिया तो उसमे 31 प्रतिशत अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिम समुदाय हैं, 22 करोड़ किसानों को किसान सम्मान निधि के तहत लाभ दिया, तो उसमे भी 33 प्रतिशत से ज्यादा अल्पसंख्यक समुदाय के गरीब किसान हैं। 8 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को “उज्ज्वला योजना” के तहत निशुल्क गैस कनेक्शन दिया तो उसमे 37 प्रतिशत अल्पसंख्यक समुदाय के गरीब परिवार लाभान्वित हुए। 24 करोड़ लोगों को “मुद्रा योजना” के तहत व्यवसाय सहित अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए आसान ऋण दिए गए हैं जिनमे 36 प्रतिशत से ज्यादा अल्पसंख्यकों को लाभ हुआ। दशकों से अँधेरे में डूबे हजारों गांवों में बिजली पहुंचाई तो इसका बड़ा लाभ अल्पसंख्यकों को हुआ। इन सभी योजनाओं का लाभ बड़े पैमाने पर मुस्लिम महिलाओं को भी हुआ है और वो भी तरक्की के सफल सफर की हमसफ़र बनी हैं।

तो यहां मिलते हैं ईमानदारी, राष्ट्रवाद तथा नैतिकता के प्रमाण पत्र ?
तनवीर जाफ़री
गोवा, मणिपुर, कर्नाटक, मध्य प्रदेश व बिहार जैसे राज्यों में साम-दाम-दंड-भेद की युक्ति आज़माकर सत्ता में आने वाली भारतीय जनता पार्टी ने पिछले दिनों राजस्थान में भी लोकताँत्रिक तरीक़े से निर्वाचित अशोक गहलोत सरकार को अस्थिर कर सत्ता हथियाने की कोशिश की जो फ़िलहाल नाकाम भी साबित हुई और कुछ ‘आडिओ टेप लीक’ हो जाने की वजह से भाजपा को भरी फ़ज़ीहत का सामना भी करना पड़ा। सत्ता के लिए इस तरह की दल बदल या वैचारिक परिवर्तन करने या इसे प्रोत्साहित करने की नेताओं की वर्तमान शैली ने एक बात तो साबित कर ही दी है कि देश के लोकतंत्र को मतदाताओं से उतना ख़तरा नहीं जितना कि लोकतंत्र के सफ़ेदपोश स्वयंभू प्रहरियों से है। मज़े की बात तो यह है कि बेशर्मी व बेहयाई के इस खेल में जो जितना बड़ा खिलाड़ी है वही अपने को राजनीति का ‘चाणक्य’ समझने लगता है। राजनैतिक दलों में तोड़ फोड़ करने कराने वाले नेताओं को मीडिया भी ‘चाणक्य’ की उपाधि देता है। इससे भी बेशर्मी की बात यह है कि कल तक कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी में रहते हुए जो नेता भाजपाईयों को भ्रष्ट व अनैतिक नज़र आता है वही व्यक्ति इनके पाले में आकर इतना ‘पवित्र’, राष्ट्रवादी, नैतिकतावादी, ईमानदार व आदर्श नेता बन जाता है कि उसे मंत्री बनाने में भी इन्हें फख़्र महसूस होता है। याद कीजिये मध्य प्रदेश में कमल नाथ सरकार के समय काँग्रेस विधायक रहे बिसाहू लाल सिंह को। यह ऐसे विवादित विधायक हैं जिनपर कमल नाथ सरकार के दौरान ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों के अधिकारों का राशन हड़पने का आरोप भारतीय जनता पार्टी के नेताओं द्वारा लगाया जा रहा था। बाक़ायदा एक आर टी आई के द्वारा भाजपाइयों ने यह जानकारी इकट्ठी की थी कि कांग्रेस विधायक बिसाहूलाल सिंह व उनका पूरा परिवार अन्नपूर्णा योजना के अंतर्गत बीपीएल परिवारों को एक रुपए प्रति किलो के हिसाब से दिया जाने वाला गेहूं व चावल ले रहा है। हालाँकि इस आरोप के जवाब में विधायक बिसाहू लाल यही कहते रहे कि वे तथा उनका परिवार आर्थिक रूप से सुदृढ़ है तथा उन्होंने कभी बी पी एल कोटे का राशन नहीं लिया। बहरहाल इन्हीं आरोपों प्रत्यारोपों के बीच विधायक जी मुख्यमंत्री कमल नाथ से इसलिए ख़िलाफ़ हो गए क्योंकि उन्हें मंत्री पद नवाज़ा नहीं गया था। इसीलिए ज्योतिरादित्य सिंधिया से वफ़ादारी का परचम उठाए हुए बिसाहूलाल सिंह भी कांग्रेस के अन्य बाग़ी विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। और पिछले दिनों शिवराज सिंह चौहान ने अपने मंत्री मंडलीय विस्तार में इन्हीं बिसाहू लाल सिंह को राज्य का खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री बना दिया। पूरा प्रदेश ठगा सा देखता रह गया कि कल तक भाजपा का बी पी एल का राशन डकार खाने का आरोपी आज इसी राज्य का भाजपा सरकार का ही खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री आख़िर कैसे हो गया ?
इसी तरह ज्योतिरादित्य सिंधिया ही नहीं बल्कि उनके स्वर्गीय पिता माधव राव सिंधिया पर भी भाजपा समर्थकों द्वारा तरह तरह के आरोप लगाए जाते थे। यह तक कहा जाता था की सिंधिया राज घराना अंग्रेज़ों का वफ़ादार घराना था। इतना ही नहीं बल्कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अप्रैल 2017 में राज्य के अटेर विधानसभा क्षेत्र में एक सार्वजनिक रैली में कहा था कि सिंधिया परिवार ने अंग्रेज़ों के साथ मिलकर भारत की जनता पर ज़ुल्म ढाए थे। महारानी लक्ष्मी बाई को लेकर भी तरह तरह की बातें की जाती थीं। यह इसलिये कहा जाता था क्योंकि दोनों ही पिता पुत्र भारतीय जनता पार्टी विशेष कर राष्ट्रीय स्वयं संघ का मुखरित होकर विरोध करते थे। यहाँ तक कि संसद में भी इन्हें खुलकर आईना दिखाते थे। परन्तु ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होते ही यह आरोप भी व इन आरोपों को लगाने वाले भी, सभी ‘ज़मींदोज़’ हो चुके हैं। इसी तरह कांग्रेस में आग भड़कानी हो तो इन्हीं भाजपाइयों को इस बात की फ़िक्र भी सताती है कि कांग्रेस ने अमुक नेता को मुख्य मंत्री क्यों बनाया, अमुक नेता को क्यों नहीं। गोया कांग्रेस पार्टी को अपना मुख्यमंत्री किसे बनाना है यह सलाह भाजपा से लेने की ज़रुरत है? गत दिनों राजस्थान में चल रही राजनैतिक उठा पटक के बीच चल रही कुछ टी वी डिबेट के दौरान एक वरिष्ठ भाजपा नेता में ऐसा ही दर्द छलकता दिखाई दिया। नेता जी फ़रमा रहे थे कि -‘कांग्रेस को राजस्थान में सत्ता दिलाने में सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण भूमिका सचिन पायलट ने निभाई परन्तु जब मुख्य मंत्री बनाने का समय आया तो अशोक गहलोत को बना दिया गया।’ ज़ाहिर है भाजपा नेता यह सचिन की हमदर्दी में नहीं बोल रहे थे बल्कि सचिन-गहलोत के बीच की खाई को और गहरी करने के मक़सद से आग में घी डालते हुए सचिन के प्रति अपनी हमदर्दी के इज़हार का प्रदर्शन कर रहे थे। परन्तु उसी समय वे यह भी भूल रहे थे की राजस्थान से पहले उत्तर प्रदेश के चुनाव भी लड़े गए थे। उस समय चुनाव के दौरान डॉक्टर दिनेश शर्मा व केशव प्रसाद मौर्य का नाम ही सबसे आगे नज़र आ रहा था। पूरे प्रदेश को नहीं पता था की योगी आदित्य नाथ प्रदेश के मुख्य मंत्री होने जा रहे हैं। परन्तु भाजपा नेताओं को राजस्थान में गहलोत तो दिखाई दिए मगर उत्तर प्रदेश में योगी की नियुक्ति नज़र नहीं आई ?
बिहार की वर्तमान नितीश सरकार के 2015 में हुए आम चुनावों को याद कीजिये। किस तरह भाजपा समर्थक पूरे राज्य में गाय के गले में हाथ डालकर रोते-फिरते दिखाई देते थे। चुनाव प्रचार में वे कहते थे कि ‘ गऊ माता की रक्षा करनी है तो नितीश को हराना है, भाजपा को लाना है’। इतना ही नहीं बल्कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने तो यहाँ तक कहा था कि यदि नितीश गठबंधन विजयी हुआ तो पाकिस्तान में पटाख़े फोड़े जाएंगे। आज जब वही व्यक्ति पलटी मार कर बिहार में भाजपा-जे डी यू की संयुक्त सरकार का मुख्यमंत्री है तो न तो राज्य में गऊ माता पर कोई ख़तरा है न ही पाकिस्तान में ख़ुशी में पटाख़े दाग़े जाने की कोई फ़िक्र। भले ही राज्य में नव निर्मित पुल ढह रहे हों या बिहार बाढ़ में डूबने के लिए तैयार हो अथवा कोरोना के संकटकालीन हालत से निपट पाने में सक्षम न हो परन्तु यदि आप भाजपा के पाले में खड़े हैं तो आप राष्ट्रवादी भी हैं राष्ट्र भक्त भी, आपसे बड़ा कोई योग्य व ईमानदार भी नहीं और आपके व आपके ख़ानदान से ज़्यादा देश पर उपकार करने वाला भी कोई नहीं।

अब कही से भी दायर कर सकते है उपभोक्ता अदालत में मुकदमा !
डॉ श्रीगोपाल नारसन
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 यथा संशोधित 2019 की अधिसूचना भारत सरकार ने गत 15 जुलाई को जारी कर दी है ।जिसके तहत 20 जुलाई सन 2020 से उक्त संशोधित कानून प्रभावी माना गया है। इस बदले कानून से उपभोक्ताओं को शोषण और अन्याय से मुक्ति आसानी से मिलने लगेगी। बदलते समय के साथ इस कानून में किये गए बदलाव से उपभोक्ताओं को न्याय दिलाने के क्षेत्र में नई पहल का सूत्रपात होगा। इस नये उपभोक्ता संरक्षण संशोधित कानून, 2019 के तहत उपभोक्ता अब कही से भी उपभोक्ता अदालत में अपनी शिकायत दर्ज करा सकेगे। नए कानून में उपभोक्ताओं के हित में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए हैं,साथ ही पुराने नियमों में सुधार की भी कोशिश की गई है।
इस बदले कानून की कुछ उपलब्धियों में सेंट्रल रेगुलेटर का गठन, भ्रामक विज्ञापनों पर भारी दंड और ई-कॉमर्स फर्मों और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बेचने वाली कंपनियों के लिए सख्‍त दिशानिर्देश इस नये कानून में शामिल किये गए हैं. अब कहीं से भी उपभोक्ता अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है।
उपभोक्ताओं की शिकायतें निपटाने के लिए जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उपभोक्ता अदालतें हैं जिन्हें आयोग के रूप मान्यता दी गई है।नए कानून के तहत उपभोक्ता अदालतों के क्षेत्राधिकार को बढ़ाया गया है। राज्य और राष्ट्रीय उपभोक्ता अदालतों के मुकाबले जिला अदालतों तक पहुंच ज्यादा होती है। इसलिए अब जिला उपभोक्ता अदालतें 1 करोड़ रुपये तक के मामलों की सुनवाई कर सकेंगी।”
इस नए संशोधित कानून की खास बात यह है कि अब उपभोक्ता अपनी शिकायत कही से भी दर्ज कर सकता है। पहले उपभोक्ता वहीं शिकायत दर्ज करा सकता था, जहां विक्रेता अपनी सेवाएं देता है या फिर उसकी कोई शाखा या कार्यालय जहां मौजूद है। ई-कॉमर्स अर्थात ऑन लाइन से बढ़ती खरीदारी को देखते हुए यह उपभोक्ताओं के हित मे एक अच्छा कदम है।क्योकि इस मामले में विक्रेता किसी भी लोकेशन से अपनी सेवाएं देते हैं। इसके अलावा कानून में उपभोक्ता को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए भी सुनवाई में शिरकत करने की इजाजत दी गई है। इससे उपभोक्ता का पैसा और समय दोनों बच सकेंगे और उसे न्याय भी जल्दी मिल सकेगा। उपभोक्ता कानून के इतिहास में जाए तो पता चलता है कि सन 1966 में जेआरडी टाटा के नेतृत्व में कुछ उद्योगपतियों द्वारा उपभोक्ता संरक्षण के तहत फेयर प्रैक्टिस एसोसिएशन की मुंबई में स्थापना की गई थी और इसकी शाखाएं कुछ प्रमुख शहरों में स्थापित की गईं। भारत मे उपभोक्ताओं के हित सुरक्षित करने के लिए उपभोक्ता आंदोलन का यह प्रथम प्रयास कहा जा सकता है।वही स्वयंसेवी संगठन के रूप में ग्राहक पंचायत की स्थापना बीएम जोशी द्वारा 1974 में पुणे में की गई।समय के साथ अनेक राज्यों में उपभोक्ता कल्याण हेतु संस्थाओं का गठन हुआ। इस प्रकार उपभोक्ता आन्दोलन देश मे आगे बढ़ता रहा और सन 24 दिसम्बर 1986 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पहल पर उपभोक्ता संरक्षण विधेयक संसद ने पारित किया और जो राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित होने के बाद देशभर में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के रूप में लागू हुआ। इस अधिनियम में बाद में सन 1993 ,सन 2002 व अब 2019 में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। इन व्यापक संशोधनों के बाद यह एक सरल व सुगम अधिनियम हो गया है। इस अधिनियम के अधीन पारित उपभोक्ता अदालतों के आदेशों का पालन न किए जाने पर धारा 27 के अधीन कारावास व दण्ड तथा धारा 25 के अधीन कुर्की का प्रावधान किया गया है।
नए कानून में उत्पाद व विक्रेता कंपनी की जवाबदेही तय की गई है ।उत्पाद में निर्माण त्रुटि या खराब सेवाओं से अगर उपभोक्ता को नुकसान होता है तो उसे बनाने वाली कंपनी को हर्जाना देना होगा. यानि निर्माण त्रुटि में खराबी के कारण प्रेशर कुकर के फटने पर उपभोक्ता को चोट पहुंचती है तो उस हादसे के लिए कंपनी को हर्जाना देना होगा। पहले उपभोक्ता को केवल कुकर की लागत मिलती थी. उपभोक्ताओं को क्षति पूर्ति के लिए भी सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता था. जिससे मामले के निपटारे में सालों साल लग जाते थे।पहले कंपनियां अनैतिक तरीके से कोर्ट से तारीख पर तारीख ले लेती थीं, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। उपभोक्ताओं को 90 दिन में न्याय मिल सकेगा और पहले जहां से उपभोक्ता ने सामान खरीदा था, वहीं के उपभोक्ता फोरम में वाद दायर करना होता था। अब उपभोक्ता कहीं से भी सामान खरीदा हो, यदि उसमें खराबी है तो उसकी शिकायत घर या काम की जगह के आसपास के उपभोक्ता अदालत में कर सकता है। इस नये कानून का सबसे ज्यादा असर ई-कॉमर्स बिजनेस के क्षेत्र में होगा।अब इसके दायरे में सेवा प्रदाता भी आ जाएंगे. “उत्पाद की जवाबदेही अब निर्माता के साथ सेवा प्रदाता और विक्रेताओं पर भी होगी. इसका अर्थ यह हुआ क‍ि ई-कॉमर्स साइट खुद को एग्रीगेटर बताकर पल्ला नहीं झाड़ सकती हैं.”ई-कॉमर्स कंपन‍ियों पर सीधे बिक्री पर लागू सभी कानून प्रभावी होंगे. अब अमेजन, फ्लिपकार्ट, स्नैपडील जैसे व्यापारिक मंच को विक्रेताओं के ब्योरे का खुलासा करना होगा. इनमें उनका पता, वेबसाइट, ई-मेल इत्यादि शामिल करना जरूरी हैं.ई-कॉमर्स फर्मों की जिम्मेदारी होगी कि वे सुनिश्चित करें क‍ि उनके स्तर पर किसी तरह के नकली उत्पादों की बिक्री न हो. अगर ऐसा होता है तो कंपनी पर दंड लग सकता है, क्योंकि ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्मों पर नकली उत्पादों की बिक्री के मामलो की शिकायतें मिलती रही हैं.
कानून में सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी (सीसीपीए) नाम का केंद्रीय रेगुलेटर बनाने का प्रस्ताव है. यह उपभोक्ता के अधिकारों, अनुचित व्यापार व्यवहार, भ्रामक विज्ञापन और नकली उत्पादों की बिक्री से जुड़े मामलो को देखेगा और जरूरत पड़ने पर उनके विरुद्ध कार्यवाही कर सकेगा।नए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के पारित हो जाने के बाद कंपनियों पर इस बात की ज़िम्मेदारी अब और ज़्यादा होगी कि उनके उत्पादों के विज्ञापन भ्रामक न हों और उनके उत्पाद दावों के अनुरुप ही हों.
अब अगर कोई सेलीब्रिटी किसी ऐसे उत्पाद का प्रचार करता है, जिसमें दावा कुछ और हो और दावे की सच्चाई कुछ और, तो उस पर भी जुर्माना लगेगा.अभी तक किसी सामान की शिकायत करनी हो तो पहले उसे खरीदना जरूरी होता था परंतु नया उपभोक्ता कानून उपभोक्ताओं को अधिकार देता है कि वह बिना सामान खरीदे भी, किसी सामान की उत्पाद गुणवत्ता को लेकर शिकायत कर सकते है। अक्सर देखा गया है कि कंपनियां अपने उत्पाद के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर विज्ञापन करती हैं। अगर आपको पता चल गया कि उसमें वैसी खूबी नहीं है तो बिना सामान खरीदे उसकी शिकायत सीसीपीए से की जा सकती है। सीसीपीए में एक इंवेस्टिगेशन विंग होगी जो शिकायत की जांच करेगी। यदि शिकायत सही पाई गई तो दोषी कंपनी पर कार्रवाई होगी। यानि उपभोक्ता सरंक्षण अधिनियम में किये गए बदलाव और संशोधित कानून के लागू हो जाने से उपभोक्ता सहज,सुलभ व सस्ता न्याय प्राप्त कर सकेंगे।

हिंदी कैसे बने राष्ट्रभाषा ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत में उत्तरप्रदेश हिंदी का सबसे बड़ा गढ़ है लेकिन देखिए कि हिंदी की वहां कैसी दुर्दशा है। इस साल दसवीं और बारहवीं कक्षा के 23 लाख विद्यार्थियों में से लगभग 8 लाख विद्यार्थी हिंदी में अनुतीर्ण हो गए। डूब गए। जो पार लगे, उनमें से भी ज्यादातर किसी तरह बच निकले। प्रथम श्रेणी में पार हुए छात्रों की संख्या भी लाखों में नहीं है। यह वह प्रदेश है, जिसने हिंदी के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों और देश के सर्वाधिक प्रधानमंत्रियों को जन्म दिया है।
हिंदी को महर्षि दयानंद ‘आर्यभाषा’ और महात्मा गांधी ‘राष्ट्रभाषा’ कहते थे। नेहरु ने उसे ‘राजभाषा’ का दर्जा दे दिया लेकिन 73 साल की आजादी के बाद हिंदी के तीनों नामों का हश्र क्या हुआ ? ‘आर्यभाषा’ तो बन गई ‘अनार्य भाषा’ याने अनाड़ियों की भाषा ! कम पढ़े-लिखे, गांवदी, पिछड़े, गरीब-गुरबों की भाषा। ‘राष्ट्रभाषा’ आप किसे कहेंगे ? यह ऐसी राष्ट्रभाषा है, जिसका प्रयोग न तो राष्ट्र के उच्च न्यायालयों में होता हैं और न ही विश्वविद्यालयों की ऊंची पढ़ाई में होता है। राष्ट्रभाषा के जरिए आप न तो कानून, न चिकित्सा, न विज्ञान पढ़ सकते हैं और न ही कोई अनुसंधान कर सकते हैं। आज से 55 साल पहले मैंने जब ‘इंडियन स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज़’ में अपना पीएच.डी. का शोधग्रंथ हिंदी में लिखने का आग्रह किया था तो संसद में जबर्दस्त हंगामा हो गया था। मुझे ‘स्कूल’ से निकाल बाहर किया गया। संसद और प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद मुझे वापिस लिया गया लेकिन आज तक कितने पीएच.डी. भारतीय भाषाओं के माध्यम से हुए ? जहां तक ‘राजभाषा’ का सवाल है, आज भी देश में राज-काज के सारे महत्वपूर्ण काम अंग्रेजी में होते हैं। संसद और विधानसभाओं के कानून क्या हिंदी में बनते हैं ? सरकारी नौकरशाह क्या अपनी रपटें, टिप्पणियां, अभिमत, आदेश वगैरह अंग्रेजी में नहीं लिखते हैं ? सच्चाई तो यह है कि अंग्रेजी आज भी भारत की राजभाषा है। अंग्रेजी की इस भूतनी की आगे हमारे सारे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दब्बू साबित हुए हैं। ये स्वतंत्र भारत के गुलाम नेता हैं। इन बेचारों को पता ही नहीं कि कोई राष्ट्र संपन्न, शक्तिशाली और सुशिक्षित कैसे बनता है।
दुनिया का कोई भी राष्ट्र विदेशी भाषा के जरिए संपन्न और महाशक्ति नहीं बना है। जिस देश में किसी विदेशी भाषा का वर्चस्व होगा, उसके छात्र नकलची ही बने रहेंगे। उनकी मौलिकता लंगड़ाती रहेगी। जो देश तीन-चार सौ साल पहले तक विश्व-व्यापार में सर्वप्रथम था, जिस देश के नालंदा और तक्षशिला- जैसे विश्वविद्यालयों में सारी दुनिया के छात्र पढ़ने आते थे और जो देश अपने आप को विश्व-गुरु कहता था, आज उस देश के लाखों छात्रों का प्रतिभा-पलायन क्यों हो जाता है ? क्योंकि उनकी रेल को बचपन से ही अंग्रेजी की पटरी पर चला दिया जाता है। मैं विदेशी भाषाएं सीखने का विरोधी बिल्कुल नहीं हूं। मैंने स्वयं अंग्रेजी के अलावा रुसी, फारसी और जर्मन भाषाएं सीखी हैं लेकिन अपने प्रत्येक काम में मैंने अपनी मातृभाषा हिंदी को प्राथमिकता दी है। सभी प्रांतों में यदि शिक्षा का अनिवार्य माध्यम मातृभाषा हो तो हिंदी आर्यभाषा, राष्ट्रभाषा और राजभाषा अपने आप बन जाएगी।
महत्वाकांक्षा और सम्मान न मिलना क्या मानसिक रोग तो नहीं हैं ? 
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
महत्वाकांक्षा यानी ईगो/डिजायर और सम्मान न मिलना यानी इंसल्ट इस समय राजनीति में बहुत अधिक प्रचलन में हैं ,ऐसा कौन से व्यक्ति होगा जिसकी सभी महत्वाकांक्षा पूरी हुई होगी और ऐसा कौन सा व्यक्ति न होगा जिसकी कभी इंसल्ट न हुई हो। व्यक्ति जन्म लेता हैं उसके बाद उसे दूसरों के पराधीन रहना पड़ता हैं ,उसे अपना पालना ही अपना पूरा संसार लगता हैं। उसके बाद यदि वह घर में बड़ा हुआ और उसके छोटे भाई बहिनों ने उसकी बात नहीं मानी तो उसकी इंसल्ट हुई ,स्कूल, कॉलेज में गया तो अनेकों बार इंसल्ट हुई होती हैं। उसके बाद शादी होती हैं तब प्रायः पत्नी या पति उसकी बात नहीं मानते तब इंसल्ट होती। बच्चों ने उनकी बात न मानी तो इंसल्ट हुई। कक्षा में या पार्टी में या मीटिंग में पीछे बैठे तो इंसल्ट हुई। पत्नी ने एक गिलास पानी नहीं दिया तो इंसल्ट हुई। यह इंसल्ट क्या वास्तव में एक मनोरोग हैं या अहम हैं ?
संसार में जितनी भी भौतिक सम्पदा हैं वह हर व्यक्ति चाहता हैं ,और सामग्री सीमित हैं और किसी को कभी भी पूर्णता नहीं प्राप्त हुई। सपना देखना जरुरी हैं और उससे हमारी महत्वाकांक्षा बढ़ती हैं। एक व्यक्ति जब जन्म के बाद स्वालम्वी बनता हैं तो वह अपने उनको को भूल जाता हैं जिनके सहारे /सहयोग से बढ़ा पला और इस योग्य हुआ। वैसे हर व्यक्ति आगे बढ़ने और विकास करने की पात्रता रखता हैं। क्या वह बड़े ,सम्पन्न होने पर अपने दादा- दादी ,नाना- नानी ,माता पिता ,बड़े भाई -बहिनों और सहयोगियों के उपकार को भूल जाता हैं या भूल जाना चाहिए। क्या समय के अंतराल के बाद वह पिता का स्थान सबल होने पर ले सकता हैं ?क्या यह उचित हैं की यदि पिता सक्षम नहीं हैं तो क्या अपनी बल्दियत बदल लेना चाहिए ?क्या जिसके सहारे बड़े हुए उससे नाता तोडना चाहिए ?
वैसे उक्त बातें सामाजिक,पारिवारिक सन्दर्भ में किंचित लागू होती हैं पर राजनीती में ये सब बातें सामान्य मानी जाती हैं।
जैसे थूक कर चाटना साहित्य में वीभस्त रस कहलाता हैं और राजनीती में उसे शृंगार कहते हैं। ऐसे व्यक्ति जिनको पहले कोई पहचानता नहीं था उनको पहचान दिलाई ,सब सत्ता सुख दिए ,बीज से पौधा बनाया उसके बाद स्वयं वृक्ष बने और फिर बरगद के झाड़ होकर किसी को न पनपने देना ,न बढ़ने देना। यदि पुत्र योग्य होते हुए भी वह अपने पिता या परिवार के प्रति समर्पित न हो तो उसे कृतघ्यं कहते हैं जो सबसे बड़ा पाप माना जाता हैं। हमेशा मनुष्य को अपने उपकारी के प्रति हमेशा विनीत भाव रखना चाहिए। हमें अपने माँ ,बाप, गुरु ,सहारे देने वालों ,सहयोगियों के प्रति सम्मान के साथ ऋणी होना चाहिए। जो इसका पालन नहीं करते उनकी निष्ठाएं हमेशा संदिग्ध रहती हैं। एक बाद और हैं जिनको पाली बदलने की आदत होती हैं संभवतः वे कहीं वंशानुगत से प्रभावित तो नहीं हैं।
राजनीती में बन्दर कूदनी हमेशा से होती रही हैं और होगी ,इसको कोई नहीं रोक सकता कारण जहाँ मनुष्य को यह अहसास होने लगता हैं की हमारा विकास नहीं पायेगा या सम्मान नहीं मिल पायेगा तब वह उज्जवल भविष्य की और दृष्टिपात करना शुरू करता हैं और वह फिर अपनी जड़ को उखाड़ कर नए बीज के रूप में अन्य खेत या भूमि में बोया जाता हैं। जो बरगद रहता हैं वह अन्य भूमि में बीज बनना स्वीकार करता हैं। उसके बाद वह वृक्ष बने या न बन पाए। जिस प्रकार संतानोतपत्ति के लिए शादी करना अनिवार्य हैं पर शादी के बाद संतान हो या न हो कोई जरुरी नहीं।
इस विचार धारा के बौद्धिक लोग जो असामाजिक यानी समाज से अलग होने से इस बात को नहीं सोचते जबकि यह भी या ही सोचना चाहिए —
समः शत्रौ च मित्रे च समो मानापमानयोः।
लाभालाभे समो नित्यं लोष्ट -कांचनयोस्तथा।।
जिसे ज्ञान या समझदारी हो जाती हैं ,वह शत्रु और मित्र पर सम -भावी हो जाता हैं ,उसके लिए मान और अपमान समान
बन जाते हैं ,वह सांसारिक वस्तुओं के लाभ या अलाभ में समान रहने लगता हैं और लोष्ट -कांचन को सम -दृष्टि से देखने लगता हैं। उनको इस बात का चिंतन करना चाहिए कि मेरे ही पाप कर्म के उदय से दूसरे लोग मेरे साथ शत्रुता का व्यवहार करते हैं और मेरे पुण्य कर्म के उदय से दूसरे लोग मेरे साथ मित्रता का व्यवहार करते हैं।
वर्तमान में जिस राजनैतिक परिदृश्य में बात कहना चाह रहा हूँ चाहे मध्य प्रदेश या राजस्थान या अन्य कही भी पूर्व में हुआ था ,वर्तमान में हो रहा हैं और भविष्य जो होगा ,वह निश्चित हैं पर मानव सुख प्राप्त करने के लिए कोई भी अधम कार्य करने से नहीं चूकता और फिर कहता हैं कि मेरी पदोन्नति नहीं हो रही हैं या सम्मान नहीं मिल रहा हैं। जो काम बातचीत से हल हो सकता था वहां अहम यानी ईगो टकराया और वृक्ष से बीज बन गए।
क्या यह अस्तित्व के लिए लड़ाई लड़ी जा रही हैं या स्वारथ लिप्सा के लिए ,जब इतने सम्पन्न लोग जो दूसरों के लिए एक उदाहरण हो सकते थे उनसे को क्या सीखेगा। इतिहास और उनकी आत्मा या आत्म-बोध धिक्कारेगा। तर्क अनेक हो सकते हैं पर वास्तविकता को कोई झुठला नहीं सकता।
होऊं नहीं कृतघ्न कभी न द्रोह न मेरे उर आवे।
गुण-ग्रहण का भाव रहें नित दृष्टि न दोषों पर जावें।।
दाम बिना निर्धन दुखी ,तृष्णावश धनवान।
कहूं न सुख संसार में ,सब जग देख्यो छान।।
धन -कन कन्चन राजसुख ,सभी सुलभकर जान।
दुर्लभ हैं संसार में ,एक जथारथ ज्ञान।।
इस धरा पर सब धरा रह जायेगा।
इतिहास कभी माफ़ नहीं करता अविज्ञाकारियों को।

कोरोना महामारी संकट के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
प्रभात झा
हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने ‘वर्तमान परिदृश्य और हमारी भूमिका’ विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि कोरोना से पूरी दुनिया जूझ रही है। जीवन तो चल रहा है। स्वयंसेवकों को लगता होगा कि शाखा बंद है , नित्य कार्यक्रम बंद है। ऐसा नहीं है। शाखा भी लग रही है और संघ का काम भी चल रही है। बस उसका स्वरुप बदल गया है।
मोहन भागवत जी के उपर्युक्त विचारों को लेकर विश्लेषकों और मेरे कुछ विपक्षी दलों के राजनीतिक मित्र हतप्रभ है कि ऐसी क्या बात है संघ में कि यह संगठन किसी भी परिस्थिति में अहर्निश सक्रिय रहता है। इस कोरोना काल में भी संघ सक्रियता के नए आयामों के माध्यम से गतिशील है। सच में संघ अद्भुत है। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा संगठन है जो अपने स्थापना काल से ही दिनो दिन आगे बढ़ रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ लोग संघ की छवि को धूमिल करने में जुटे रहते हैं। ‘संघ का सच क्या है’, इस पर मैंने प्रस्तुत लेख में विचार प्रस्तुत किये हैं। हालांकि न मैं संघ का प्रवक्ता हूं और न ही संघ का अधिकारी , लेकिन बाल्यकाल से ही संघ से जुड़ा हूं। अतः एक साधारण स्वयंसेवक के नाते इसकी विशेषता पर अपने अनुभव साझा कर रहा हूं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी अनूठी कार्यपद्धति के कारण विश्व में जाना जाता है। संघ की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह सांस्कृतिक संगठन समाज आधारित है न कि सरकार आधारित। संघ विश्व का ऐसा संगठन है जिसका निरंतर विकास हो रहा है। नेहरूजी , इंदिराजी और नरसिम्हाराव जैसे तीन-तीन प्रधानमंत्रियों ने अपने-अपने कार्यकाल में तीन-तीन बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया पर संघ न रुका , न झुका, न थका, उलटे समाज के सहयोग से निरंतर बढ़ता ही रहा है।
लोग सोचते हैं कि संघ सतत् अपनें कार्य में कैसे लगा रहता है। शायद उन्हें यह नहीं पता कि यहां सभी राष्ट्र के स्वयंसेवक के नाते स्वप्रेरणा से कार्य करते हैं। यहां कार्य करने वाले सभी स्वयंसेवक का एक ही भाव होता है ‘निःस्वार्थ भावना। जब सभी का भाव निःस्वार्थ होता है तो टकराहट जन्म ही नहीं ले पाती। ‘तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा’ की भावना से बढ़ रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक। इस भौतिकवादी समय में लाभ-हानि न सोचकर सतत काम में लगे रहते हैं। ‘देश हमें देता है सबकुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें’ की स्पष्टता रहती है।
संघ के संस्थापक और आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवारजी ने सन 1925 को जब विजयादशमी के दिन नागपुर में प्रथम शाखा शुरू की तो उपस्थित स्वयंसेवकों ने कहा कि आप संघ के गुरु बन जाईये। डॉ. हेडगेवारजी ने कहा कि हम सबका गुरु व्यक्ति नहीं परमपवित्र भगवाध्वज होगा। यहीं से संदेश चला गया कि संघ व्यक्ति आधारित नहीं बल्कि विचार आधारित मां भारती के सेवार्थ कार्य करने वाला एक सुदृढ़ सांस्कृतिक संगठन बनेगा। हिंदू संस्कृति की विजयपताका विश्व में फहराएगा।
देश भर में संघ की सात्विक और आध्यात्मिक प्रभाव बढ़ता देख तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को तबसे ज्यादा बदनाम और समाप्त करने की कोशिश की, जब से संघ की प्रेरणा से भारतीय राजनीति में जनसंघ का जन्म हुआ। उससे पूर्व गांधी हत्याकांड में झूठा आरोप लगाकर जिस तरह से स्वयंसेवकों को यातना दी गई आज भी रोंगटे खड़े कर देती है। तत्कालीन सरसंघचालक विश्व के सबसे सबलतम आध्यात्मिक पुरुष डॉ. माधव सदाशिव गोलवलकर “गुरूजी” को जेल तक भेज दिया। संघ पर यातनाओं का दौर चला प्रतिबंध लगा दिया गया। पर सत्य की जीत हुई। न्यायालय ने कहा कि गांधी ह्त्या में संघ का और संघ के स्वयंसेवकों का कोई लेना-देना नहीं है। कांग्रेस सहित तत्कालीन शासक को मुंह की खानी पड़ी।
मुझे याद है , एक साक्षात्कार में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वसंत साठे ने मुझे कहा था कि ‘मैं समझ ही नहीं पाता कि संघ का विरोध लोग क्यों करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ‘आपातकाल में मैंने इंदिराजी को कहा था, पर उन्होंने एक नहीं सुनी।
संघ का कार्य निरंतर चलता रहता है। संघ की स्पष्ट मान्यता है कि संघ शाखा लगाएगा और सवयंसेवक दसों दिशाओं में समाज के हर क्षेत्र में काम खड़ा करेंगे। सबसे अच्छी बात है कि संघ किसी को अपना प्रतिद्वंदी नहीं मानता। यहां तक कि संघ को जो अपना दुश्मन मानते हैं उसके बारे में गुरूजी कहा करते थे कि हमारा आज का विरोधी कल का समर्थक होगा। हमें इसी भाव से काम करना है। संघ संस्कृति और राष्ट्र ध्वज की भावना को लेकर काम करता है।
आज स्थिति क्या है कि देश में मनुष्य को परिवार में मिलने वाले संस्कार के अलावा राष्ट्रीय संस्कार का शिक्षण कहीं दिया जा रहा है क्या? कहीं नहीं। संघ का प्रमुख उद्देश्य है चरित्र निर्माण करना और मनुष्य को संस्कारवान बनाना। यही नहीं आज बाल्यकाल से बच्चे अपनी भारतीय संस्कृति में पलें-बढ़ें , अध्ययन करें , इसके लिए संघ की प्रेरणा से विद्या भारती के मार्गदर्शन में देशभर में लाखों विद्यार्थी सरस्वती शिशु मंदिर के माध्यम से अध्ययन करते हैं।
तरुण विद्यार्थियों के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद। देश के हिंदू सनातन धर्म के रक्षार्थ विश्व हिंदू परिषद। मजदूरों के बीच, कर्मचारियों के बीच, शिक्षकों के बीच , समाज के इन वर्गों के बीच काम करने के लिए भारतीय मजदूर संघ की स्थापना। ये सभी संगठन संघ की प्रेरणा से परंतु अपनी योजना से काम करते हैं। किसानों के बीच काम करने के लिए भारतीय किसान संघ, वनवासियों के बीच काम करने के लिए वनवासी कल्याण आश्रम, संस्कार भारती, सेवा भारती, लघु उद्योग भारती, क्रीड़ा भारती, आरोग्य भारती , संस्कृत भारती, प्रज्ञा भारती, विज्ञान भारती, भारत विकास परिषद, राष्ट्रीय संपादक परिषद, स्वदेशी जागरण मंच , हिंदू स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय शिक्षण मंडल जैसे अनेक संस्थान आज के विभिन वर्गों में काम कर रहे हैं।
भारत प्रकाशन , विश्व संवाद केंद्र , दीनदयाल शोध संस्थान, अखिल भारतीय इतिहास संकलन समिति , भरतीय विचार केंद्र , राष्ट्रीय सिख संगत, विवेकानंद केंद्र, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षणिक परिषद, अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद , सहकार भर्ती, ग्राहक पंचायत , सामाजिक समरसता मंच , हिंदू जागरण मंच, अखिल भारतीय साहित्य परिषद, पर्यावरण समिति , दधीचि देहदान समिति तक संघ की प्रेरणा से चल रहे हैं।
संघ को कोई भी दूर से नहीं समझ सकता। जैसे आंख होते हुए भी लोग कान से राजनीति करते हैं और धोखा खा जाते हैं, वैसे ही संघ को देखकर ही संघ को समझा जा सकता है। संघ के बारे में सुनकर आश्चर्य ही प्रकट कर सकते हैं। राष्ट्रपिता बापू, बिनोवा भावे, सरदार वल्ल्भ भाई पटेल, लोकनायक जय प्रकाश सहित अगर अभी की बात करें तो भारत रत्न प्राप्त डॉ. प्रणव मुख़र्जी ने भी संघ को जब करीब से देखा-समझा तो उनका मन बदला।
संघ की मान्यता है , यहां पद नहीं दायित्व होता है। कोई भी कार्यकर्ता अपरिहार्य नहीं। यही नहीं, मत अनेक हो सकते हैं पर निर्णय एक। निर्णय के पूर्व विस्तृत चर्चा, निर्णय के बाद सिर्फ उसके संपादन में लगना।
आज तो कोरोना है। आपातकाल में तो हजारों स्वयंसेवक भारत के जेलों में अकारण ठूंस दिए गए थे। अनेक यातनाएं और अत्याचार स्वयंसेवकों और उनके परिजनों पर किये गए। बावजूद इसके स्वर्गीय दीनानाथ मिश्र ने ‘गुप्त क्रांति’ नामक आपातकाल के दौरान भारत के लोकतंत्र की दूसरी लड़ाई में संघ की जो भूमिका थी उसको दर्शाता है। इससे साफ़ हो जाता है कि संघ को मात्र स्वयंसेवक ही नहीं बल्कि उसका पूरा परिवार ही कार्य में जुटा रहता है। साथ ही परिवार को पता होता है कि उनका बेटा संघ का माध्यम बनकर राष्ट्रीय कार्य में जुटा हुआ है।
संघ कार्य की नींव में आपसी विश्वसनीयता,आत्मीयता, मानवता और भारतीयता के साथ सबसे बड़ी बात है कि स्वयंसेवक जैसे देश की पीड़ा को अपनी पीड़ा मानता है वैसे ही स्वयंसेवक पर आई पीड़ा को भी अपने परिवार की पीड़ा मानता है और उसे दूर करने में तन-मन-धन से लग जाता है। संघ का कार्य अपेक्षा के बीज पर खड़ा नहीं हुआ है।
स्वयंसेवक के रूप में देखें तो अटल बिहारी वाजपेयी पहले स्वयंसेवक थे जो देश के प्रधानमंत्री बने और लालकृष्ण आडवाणी उपप्रधानमंत्री बने। आज तो देश की जनता ने स्थिति ही बदल दी है। देश में संघ के स्वयंसेवक के नाते भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति पूर्व में प्रचारक रहे। पूर्व में प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी स्वयं प्रधानमंत्री हैं। साथ ही,ओम बिरला लोकसभा अध्यक्ष हैं। इतना ही नहीं, देश के केंद्रीय मंत्रिमंडल कई सदस्य, अनेक राज्यों के मुख्यमंत्री और राज्यपाल संघ से संबंधित हैं। संघ को निश्चय ही यह सब अच्छा लगता होगा , पर वह अपने को आज भी समाज आधारित संगठन ही मानता है।
संघ जड़ नहीं है बल्कि प्रवाहमान संगठन है। संघ के जितने भी अनुषांगिक संगठन हैं उनमें सभी संगठन आज भारत में नंबर एक का संगठन है। संघ का कार्य वैश्विक स्तर पर भी है। विश्व के अनेक राष्ट्रों में शाखा लगती है। राष्ट्रीय सेविका समिति देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हुए सबसे बड़ी महिला संस्था है।
संघ का कार्य स्वयंसेवक अपने को मिटाकर करता है। यह ऐसा सांस्कृतिक संगठन है जो संघ के स्वयंसेवकों की ‘गुरुदक्षिणा’ से चलता है। संघ में प्रचारक नाम की एक अद्भुत व्यवस्था है। देशभर में संघ के हज़ारों प्रचारक अपना स्वयं का जीवन राष्ट्र को यानी मां भारती को समर्पित कर कार्य करते हैं। संघ के कार्य का सबसे मजबूत नैतिक आधार प्रचारक ही होता है। सरल, सामान्य, नैतिकता, प्रामाणिकता एवं संवेदनशीलता से जुड़कर मानवता भाव से वह सहज ही संघ का कार्य करता है। संघ कार्य के विस्तार में प्रचारको की सबसे बड़ी भूमिका रहती है। वे अपने बारे मे नहीं बल्कि रात-दिन भारतमाता को वैभवशाली बनानें मे जुटे रहते हैं।
आज भी लॉकडाउन में संघ का कार्य पूरी तरह चल रहा है। स्वयंसेवक अपने-अपने संघ कार्यालय में, परिवार में शाखा लगाते हुए राष्ट्र वंदना और संघ की प्रार्थना कर रहे हैं। संघ के स्वयंसेवकों ने लॉकडाउन में बिना प्रचार किये जो सेवा कार्य भारत के प्रत्येक प्रांत और जिलो में किया है वह सराहनीय है। केरल, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में जिस तरह संघ के स्वयंसेवकों ने भोजन, खाद्यान और वहां रह रहे अन्य प्रांतों के निवासियों की सेवा की है, उसे देखकर वहां की सरकारें भी हतप्रभ थी। *मानव सेवा* संघ के कार्य का मुख्य आधार है। इस लॉकडाउन में पूरे भारतवर्ष में यह सभी ने अपनी आखों से देखा है। लोगों को भोजन कराना, ठहराना, खाद्य सामग्री समाज से एकत्रित करके उन्हें उपलब्ध कराना। जनसेवा के ये कार्य संघ के सभी अनुषांगिक संगठन कर रहे हैं। संघ स्वयं प्रचार-प्रसिद्धि से दूर रहता है। क्योंकि वह इन सेवाकार्यो को अपना राष्ट्रधर्म मानता है। अनेक स्थानों पर संगोष्ठियां, संघ विचारकों का बौद्धिक, ऑडियो-वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग से विषयों पर चर्चाएं पूरे भारतवर्ष में चल रहा है। सभी अनुषांगिक संगठनों ने अपने-अपने क्षेत्रों में कार्य प्रारंभ किया हुआ है। संघ नूतनता को आमंत्रित भी करता है और पुरातनता को सम्मान भी देता है।
संघ कभी नहीं कहता कि हम ही भारत को वैभवशाली बनाएंगे, संघ कहता है कि हम भी भारत को वैभवशाली बनाने में प्रमुख भूमिका बनाएंगे। संघ को समझना है तो उसे अपनी आखों से देखना होगा न कि कानों से सुनकर। संघ भारत की सांस्कृतिक प्रकृति है। आज नहीं तो कल इस प्रकृति की गोद में सभी को आना ही होगा।
संघ लम्बे समय से धारा 370 , श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन , सामान नागरिक संहिता जैसे मुद्दे पर जन-जागरण कार्य करता रहा है। आज देश में राष्ट्रीय विचारों की सरकार है। संघ के ये संकल्प बिना किसी व्यवधान के साकार हो रहे हैं।
संघ की गतिविधियों का आधार है शाखा। देश के सुदूर स्थानों पर भी शाखाएं लगती हैं। लाखों स्थान पर शाखाओं के माध्यम से व्यक्ति निर्माण साकार होता है। यही कारण है कि देश में जहां कहीं भी आपदाएं आती हैं तो संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचकर राहत कार्य में जुट जाते हैं।
संघ भारत की सांस्कृतिक एवं सनातनी आत्मा है। संघ वंदे मातरम है। संघ आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठान है। इस पुनीत कार्य रूपी यज्ञ में जो अपनी आहुति देता है, वह धन्य होता है। संघ न किसी का विकल्प है और न संघ का कोई विकल्प है। संघ तो भारत माता को वैभवशाली बनाने का एक अनवरत चलने वाला लाखों स्वयंसेवकों का अटूट संकल्प है।

एकता की शक्ति से वैश्विक उम्मीदें
विवेक रंजन श्रीवास्तव
कोरोना के परिदृश्य में स्पष्ट हो चुका है कि केवल सबके बचाव में ही स्वयं का बचाव संभव है। एकता की शक्ति से वैश्विक उम्मीदें हैं। जो देश इस कठिनाई के समय में भी विस्तार की नीति अपना रहे हैं, वहां की सरकारें जनता से छल कर रही हैं। दुनियां के लिये यह समय सामंजस्य और एकता के विस्तार का है।
हमारी युवा शक्ति ही देश की सबसे बड़ी ताकत है। बुद्धि और विद्वता के स्तर पर हमारे देश के युवाओ ने सारे विश्व में मुकाम स्थापित किया है। हमारे साफ्टवेयर इंजीनियर्स के बगैर किसी अमेरिकन कंपनी का काम नही चलता। हमारी स्त्री शक्ति सशक्त हुई है। देश के युवाओ से यही कहना है कि हम किसी से कम नही है और हमारे देश को विश्व में नम्बर वन बनाने की जबाबदारी हमारी पीढ़ी की ही है। हमें नीति शिक्षा की किताबो से चारित्रिक उत्थान के पाठ पढ़ने ही नही उसे अपने जीवन में उतारने की जरूरत है। मेरा विश्वास है कि भारतीय लोकतंत्र एक परिपक्व शासन प्रणाली प्रमाणित होगी, इस समय जो कमियां भ्रष्टाचार, जातिगत आरक्षण, क्षेत्रीयता, भाषावाद, वोटो की खरीद फरोक्त को लेकर देश में दिख रही हैं उन्हें दूर करके हम विश्व नेतृत्व और वसुधैव कुटुम्बकम् के प्राचीन भारतीय मंत्र को साकार कर दिखायेंगे। आज जब मानवीय मूल्य समाप्त होते जा रहे हैं, संभवतः रोबोट और मशीनी व्यवस्थायें ही देश से भ्रष्टाचार समाप्त कर सकती है, जैसा कंप्यूटरीकरण के विस्तार से रेल्वे या अन्य विभिन्न क्षेत्रो में हो भी रहा है।
सैक्स के बाद यदि दुनिया में कुछ सबसे अधिक लोकप्रिय विषय है तो संभवतः वह राजनीति ही है। लोकतंत्र सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली मानी जाती है। और सारे विश्व में भारतीय लोकतंत्र न केवल सबसे बड़ा है वरन सबसे तटस्थ चुनावी प्रणाली के चलते विश्वसनीय भी है। चुनावी उम्मीदवार अपने नामांकन पत्र में अपनी जो आय घोषित कर चुके हैं वह हमसे छिपी नही है, एक सांसद को जो कुछ आर्थिक सुविधायें हमारा संविधान सुलभ करवाता है,वह इन उम्मीदवारो के लिये ऊँट के मुह में जीरा है। प्रश्न है कि आखिर क्या है जो लोगो को राजनीति की ओर आकर्षित करता है। क्या सचमुच जनसेवा और देशभक्ति ? क्या सत्ता सुख, अधिकार संपन्नता इसका कारण है ? मेरे तो परिवार जन तक मेरे इतने ब्लाइंड फालोअर नही है, कि कड़ी धूप में वे मेरा घंटों इंतजार करते रहें, पर ऐसा क्या चुंबकीय व्यक्तित्व है, राजनेताओ का कि हमने देखा लोग कड़ी गर्मी के बाद भी लाखो की तादात में हेलीकाप्टर से उतरने वाले नेताओ के इंतजार में घंटो खड़े रहे, देश भर में। जबकि उन्हें पता था कि नेता जी आकर क्या बोलने वाले हैं। इसका अर्थ यही है कि अवश्य कुछ ऐसा है राजनीति में कि हारने वाले या जीतने वाले या केवल नाम के लिये चुनाव लड़ने वाले सभी किसी ऐसी ताकत के लिये राजनीति में आते हैं जिसे मेरे जैसे मूढ़ बुद्धि शायद समझ नही पा रहे। तमाम राजनैतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार देश के “रामभरोसे” मतदाता की तारीफ करते नही अघाते, देश ही नही दुनिया भर में हमारे रामभरोसे की प्रशंसा होती है, उसकी शक्ति के सम्मुख लोकतंत्र नतमस्तक है। रामभरोसे वोटरे के फैसले के पूर्वानुमान की रनिंग कमेंट्री कई कई चैनल कई कई तरह से करते रहे हैं। मैं भी अपनी मूढ़ मति से नई सरकार का हृदय से स्वागत करती हूं। पिछले अनुभवों में हर बार बेचारा रामभरोसे वोटर ठगा गया है, कभी गरीबी हटाने के नाम पर तो कभी धार्मिकता के नाम पर, कभी देश की सुरक्षा के नाम पर तो कभी रोजगार के सपनो की खातिर। एक बार और सही। हर बार परिवर्तन को वोट करता है रामभरोसे, कभी यह चुना जाता है कभी वह। पर रामभरोसे का सपना टूट जाता है, वह फिर से राम के भरोसे ही रह जाता है, नेता जी कुछ और मोटे हो जाते हैं। नेता जी के निर्णयो पर प्रश्नचिन्ह लगते हैं,जाँच कमीशन व न्यायालय के फैसलो में वे प्रश्न चिन्ह गुम जाते हैं। रामभरोसे किसी नये को नई उम्मीद से चुन लेता है। चुने जाने वाला रामभरोसे पर राज करता है, वह उसके भाग्य के घोटाले भरे फैसले करता है। मेरी पीढ़ी ने तो कम से कम अब तक यही होते देखा है। प्याज के छिलको की परतो की तरह नेताजी की कई छबिया होती हैं। कभी वे जनता के लिये श्रमदान करते नजर आते हैं, शासन के प्रकाशन में छपते हैं। कभी पांच सितारा होटल में रात की रंगीनियो में रामभरोसे के भरोसे तोड़ते हुये उन्हें कोई स्पाई कैमरा कैद कर लेता है। कभी वे संसद में संसदीय मर्यादायें तोड़ डालते हैं, पर उन्हें सारा गुस्सा केवल रामभरोसे के हित चिंतन के कारण ही आता है। कभी कोई तहलका मचा देता है स्कूप स्टोरी करके कि नेता जी का स्विस एकाउंट भी है। कभी नेता जी विदेश यात्रा पर निकल जाते हैं रामभरोसे के खर्चे पर, वे जन प्रतिनिधि जो ठहरे। संभवतः सर्वहारा को सर्व शक्तिमान बना सकने की ताकत रखने वाले लोकतंत्र की सफलता के लिये उसकी ये कमियां स्वीकार करनी जरूरी हैं। जो भी हो शायद यही लोकतंत्र है, तभी तो सारी दुनिया इसकी इतनी तारीफ करती है।
भारतीय लोकतात्रिक प्रणाली की वैधानिक व्यवस्थायें अमेरिकन व इंगलैण्ड सहित दुनिया के विभिन्न संविधानो के अध्ययन के उपरांत भीमराव अम्बेडकर जैसे विद्वानो ने निर्धारित की थीं। भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार तो विजयी उम्मीदवारों में से सबसे बड़े दल के सांसद,अपना नेता चुनते हैं, जो प्रधानमंत्री पद के लिये राष्ट्रपति के सम्मुख अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करता है, अर्थात जनता अपने वोट से सीधे रूप से प्रधानमंत्री का चुनाव नही करती यद्यपि सत्ता की मूल शक्ति प्रधानमंत्री में ही सन्नहित होती है। जबकि अमेरिकन प्रणाली में राष्ट्रपति सत्ता की शक्ति का केंद्र होता है, और उसका सीधा चुनाव जनता अपने मत से करती है।
अब जन आकांक्षा केवल घोषणायें और शिलान्यास नहीं कुछ सचमुच ठोस चाहती है। सरकार से हमें देश की सीमाओ की सुरक्षा, भय मुक्त नागरिक जीवन, भारतवासी होने का गर्व, और नैसर्गिक न्याय जैसी छोटी छोटी उम्मीदें हैं। सरकार सबके हितो के लिये काम करे न कि पार्टी विशेष के, पर्दे के सामने या पीछे के नुमाइन्दो से सिफारिश पर, केवल उन लोगो के काम हो जिन के पास वह खास सिफारिश हो। जो उम्मीदें चुनावी भाषणो और रैलियो में जगाई गई हैं, वे बिना भ्रष्टाचार के मूर्त रूप लें। महिलाओ को सुरक्षा मिले, पुरुषो की बराबरी का अधिकार मिले। युवाओ को अच्छी शिक्षा तथा रोजगार मिले। आम आदमी को मंहगाई और भ्रष्टाचार से निजात मिले। अल्पसंख्यको को विश्वास मिले। देश का सर्वांगीण विकास हो सके। राष्ट्र कूटनीतिक रूप से, तकनीकी रूप से,सक्षम हो। विकास के रथ पर सवार होकर हमारा देश दुनिया के सामने एक विकसित राष्ट्र के रूप में पहचान बनाये यह हर भारतीय की आकांक्षा है, और यही सरकार की चुनौती है।
कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के चलते विकास के सारे मापदण्ड छिन्न भिन्न हैं निश्चित ही सारी जबाबदारी केवल सरकार पर नही डाली जा सकती, हर नागरिक को भी इस महायज्ञ में अपनी भूमिका निभानी ही होगी। सरकार विकास का वातावरण बना सकती है, सुविधायें जुटा सकती है, पर विकास तो तभी होगा जब प्रत्येक इकाई विकसित होगी, हर नागरिक सुशिक्षित बनेगा। जब देशप्रेम की भावना का अभ्युदय हर बच्चे में होगा तो स्वहित के साथ साथ देशहित भी हर नागरिक के मन मस्तिष्क का मंथन करेगा। भ्रष्टाचार स्वयमेव नियंत्रित होता जायेगा और देश उत्तरोत्तर विकसित हो सकेगा। अतः नागरिको में सुसंस्कार विकसित करना भी नई सरकार के सम्मुख एक चुनौती है।

भारत में सच्चा लोकतंत्र कैसे लाएं ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कल के मेरे लेख हमारे ‘ढोंगी लोकतंत्र’ पर प्रतिक्रियाओं की बरसात हो गई। लोग पूछ रहे हैं कि भारत को सच्चा लोकतंत्र कैसे बनाएं ? कुछ सुझाव दीजिए। सबसे पहले देश की सभी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र हो याने किसी भी पद पर कोई भी नेता बिना चुनाव के नियुक्त न किया जाए। पार्टी के अध्यक्ष तथा सभी पदाधिकारियों का सीधा चुनाव हो, गुप्त मतदान द्वारा। दूसरा, किसी को भी नगर निगम, विधानसभा या संसद का उम्मीदवार घोषित करने के पहले यह जरुरी हो कि वह पार्टी-सदस्य पहले अपनी पार्टी के आतंरिक चुनाव में बहुमत प्राप्त करे। नेताओं द्वारा नामजदगी एकदम बंद हो। तीसरा, यह भी किया जा सकता है कि पार्टी अध्यक्ष, महासचिव और सचिवों को दो बार से ज्यादा लगातार अपने पद पर न रहने दिया जाए। चौथा, पार्टी के आय और व्यय का पूरा हिसाब हर साल सार्वजनिक किया जाए। हमारी पार्टियों को रिश्वत और दलाली के पैसों से परहेज करना सिखाया जाए। पांचवां, अपराधियों को चुनावी उम्मीदवार बनाना तो दूर की बात है, ऐसे गंभीर आरोपियों को पार्टी सदस्यता भी न दी जाए और अगर पहले दी गई हो तो वह छीन ली जाए। छठा, ऐसा कानून बने कि कोई भी दल-बदलू अगले पांच साल तक न तो चुनाव लड़ सके और न ही किसी सरकारी पद पर रह सके। सातवां, जो भी व्यक्ति किसी दल का सदस्य बनना चाहे, उसके लिए कम से कम एक साल तक आत्म-प्रशिक्षण अनिवार्य होना चाहिए। वह दल के इतिहास, नेताओं के जीवन, दल के आदर्शों, सिद्धांतों, नीतियों और कार्यक्रमों से भली-भांति परिचित हो जाए, इसके लिए उसे बाकायदा एक परीक्षा पास करनी चाहिए। आठवां, थोक वोट या वोट बैंक की राजनीति पर प्रतिबंध होना चाहिए। किसी भी दल को जाति या संप्रदाय के आधार पर राजनीति नहीं करने दी जानी चाहिए। यदि इस नियम का कड़ाई से पालन हो तो देश के कई राजनीतिक दलों को अपना बिस्तर-बोरिया गोल करना पड़ेगा। नौवां, किसी भी दल के उच्च पदों पर एक परिवार का एक ही सदस्य रहे, उससे ज्यादा नहीं। इस प्रावधान के कारण हमारे राजनीतिक दल प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां बनने से काफी हद तक बच सकेंगे। दसवां, सत्तारुढ़ दल जागरुक रहे और विरोधी दल रचनात्मक भूमिका निभाते रहें, इसके लिए जरुरी है कि सभी राजनीति दल अपने सभी कार्यकर्ताओं के लिए तीन-दिवसीय या पांच-दिवसीय प्रशिक्षण शिविर लगाएं, जिनमें उनके साथ विचारधारा, सिद्धांतों और नीतियों पर खुला विचार-विमर्श हो। ग्यारहवां, सभी दलों के पदाधिकारी और चुने गए नेताओं के लिए यह अनिवार्य होना चाहिए कि वे अपनी और अपने परिवार की चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा हर साल सार्वजनिक करें। ताकि देश को पता चले कि:
राजनीति है सेवा का घर, खाला का घर नाय ।
जो सीस उतारे कर धरे, सो पैठे घर माय ।।

तो ऐसे ‘गुरुओं’ के हाथों है देश के युवाओं का भविष्य ?
निर्मल रानी
कभी कभी किसी टी वी चैनल द्वारा बिहार,झारखण्ड,या पूर्वी उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूल्स के कुछअध्यपकों का स्टिंग ऑपरेशन कर उनके ‘ज्ञान’ के बारे में बताया जाता है की किस तरह उन्हें अपने देश के राष्ट्रपति या राज्यपाल आदि के नाम या छोटे छोटे शब्दों की स्पेलिंग तक पता नहीं होती। ऐसी रिपोर्ट्स में चिंता व्यक्त की जाती है कि किस तरह ऐसे अज्ञानी अध्यापकों की भर्ती की गयी और अब ऐसे अध्यापकों के हाथों बच्चों का भविष्य कितना अंधकारमय है। परन्तु यक़ीन जानिये कि बच्चों का भविष्य एक अनपढ़ या अर्धज्ञानीअध्यापक के हाथों उतना अंधकारमय नहीं है जितना कि आज के कुछ कलयुगी पी एच डी धारकों और वह भी विश्वविद्यालय के उपकुलपति जैसे अति महत्वपूर्ण पद पर बैठे लोगों के हाथों अंधकारमयहै। इस तरह के कलयुगी गुरु घंटालों से तो आप ऐसे ‘उपदेशों’ की तो उम्मीद ही नहीं कर सकते जो उनके द्वारा दिए जा रहे हैं। परन्तु दुर्भाग्यवश आज यही सच्चाई है।
वैसे तो जौनपुर के वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्व विद्यालय के उपकुलपति डॉ राजा राम यादव का नाम दिसंबर 2018 को ही उसी समय चर्चा में आ गया था जबकि वे गाज़ीपुर में एक कॉलेज में छात्रों को संबोधित करते हुए फ़रमा रहे थे कि – यदि आप पूर्वांचल यूनिवर्सिटी के छात्र हैं, और आपका कहीं किसी से झगड़ा हो जाए तो रोते हुए मत आना, पीटकर आना,चाहे मर्डर कर के आना। इसके बाद हम देख लेंगे। एक वाइस चांसलर स्तर के पी एच डीगुरु द्वारा अपने कॉलेज के छात्रों को हिंसा का ऐसा पाठ पढ़ाना कि हत्या करने तक के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा हो,इस बात की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस उपकुलपति ने अपने ‘कलयुगी उपदेश ‘ से उसी समय लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। बुंदेलखंड के महोबा में जन्मा यह व्यक्ति कोई मामूली शिक्षाविद या अज्ञानी भी नहीं कहा जा सकता। इन्हें दर्जनों अवार्ड व फ़ेलो शिप हासिल हैं तथा पी एच डी भी फ़िज़िक्स में की है। गुरूजी ने अपने अकादमिक यात्राओं में अमेरिका,कनाडा,इटली,फ़्रांस,जर्मनी,स्वीडेन,बेल्जियम,ऑस्ट्रिया,स्पेन,फ़िनलैंड,जापान,सिंगापुर व नेपाल जैसे देशों का भ्रमण किया है तथा भारत के प्रतिनिधि ‘शिक्षाविद’ के रूप में अपनी ‘ज्ञान वर्षा’ की है। जिस व्यक्ति को हिंसा से इतना प्यार हो कि वह अपने छात्रों को क्षमा,प्रेम व बलिदान सिखाने के बजाए हत्या,और हिंसा का खुला पाठ पढ़ा रहा हो ऐसे ‘गुरु’ के हाथों बच्चों का भविष्य कितना अंधकारमय है इस बात का स्वयं अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
दिसंबर 2018 को ग़ाज़ीपुर में दिए गए यादव के उपरोक्त ‘प्रवचन’ के बाद यदि उनको अनुशासनहीनता व छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने के लिए पदमुक्त कर दिया गया होता तो शायद पुनःइस पद की गरिमा पर ग्रहन न लगता। परन्तु ऐसा इसलिए संभव नहीं था क्योंकि ‘गुरूजी की पहुँच ‘ ऊँचे परिवार तक है। आप न केवल स्वयं संघ प्रचारक के पद पर रहे हैं बल्कि ख़बरों के अनुसार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्व सरसंघ चालक राजेंद्र सिंह उर्फ़ रज्जू भैय्या से भी इनके परिवारिक संबंध रहे हैं। गोया आज के दौर में शायद इन्हें किसी भी पद की गरिमा की चिंता किये बग़ैर कुछ भी बोलते रहने की पूरी आज़ादी मिली हुई है। पिछले दिनों एक बार फिर डॉक्टर यादव ने अपने उपकुलपति पद की मर्यादा को तार तार करते हुए एक भाषण दिया जिसका अति विवादित अंश अक्षरशः ग़ौर फ़रमाइये- आपने बताया कि -‘जब मैं विद्यार्थी था और ट्रेन से कॉलेज में महीने दो महीने में जब जाता था -तो रेल में एक अँधा था। आँख का अँधा ,जिसके दोनों आँख नहीं थी। उसके हाथ में एक खंजली थी लेकिन उसका गला इतना सुरीला गला था की केवल एक भजन वह गाता था। मुझे भजन भी आज तक याद है-अंखियाँ हरि दर्शन को प्यासी -खंजली बजाते हुए रेल के डिब्बे में अँखियाँ हरि दर्शन को प्यासी, जब वह आँख का अँधा सूरदास उस भजन को गाता था तो उसको दो दिन के लिए पैसे एक घंटे के अंदर ही मिल जाते थे। और अगली स्टेशन में वह उतर जाता था। तो आज कल लोग कहते हैं बेरोज़गारी बेरोज़गारी बेरोज़गारी। ऐसा कुछ नहीं है,यह हवा बना दी गयी है दूसरे देशों के द्वारा। हमारे देश के अंदर ऐसे रोज़गार हैं जोकि कोई भी व्यक्ति आकर के उस रोज़गार को बहुत आसानी के साथ कर सकता है। एक खंजली ख़रीदने में कितना पैसा लगता है? अगर आपको खंजली नहीं आती है, ख़रीदने का भी पैसा नहीं है तो ये पूर्वांचल विश्वविद्यालय का कुलपति आप को ख़रीद देगा।
यानी जो ‘शिक्षाविद’ दो वर्ष पूर्व इसी पद पर बैठ कर अपने छात्रों को हत्या करने का पाठ पढ़ा रहा था वही व्यक्ति आज उसी पद पर रहते हुएट्रेन में खंजली बजाते हुए भीख मांगने की शिक्षा दे रहा है ? इस तरह का ज्ञान वर्धन अनायास ही किया जा रहा है या इसके पीछे इन ‘महान आत्माओं’ के अपने संस्कार हैं जो इन्हें बचपन से इनकी शिक्षा या इनकी संगत से हासिल हुए हैं ? देश का युवा पढ़ लिखकर वैज्ञानिक,डॉक्टर,इंजीनियर,प्रोफ़ेसर व उच्चाधिकारी बनने के सपने संजोता है तो ऐसे ‘गुरूजी’ बच्चों के जीवन को नर्क बनाने पर तुले हुए हैं? दो वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के छात्रों व बेरोज़गारों को ‘पकौड़ा रोज़गार’ का जो ज्ञान दिया था उसके बाद पूरे देश में छात्रों ने ग़ुस्से में सड़कों पर प्रतीकात्मक रूप से पकौड़ा बेचकर अपना विरोध दर्ज कराया था। परन्तु यह ‘गुरूजी’ तो अपने देश के युवाओं के लिए ग़ज़ब के भविष्य की कल्पना करते हैं। या क़त्ल करो या खंजली बजाकर ट्रेन में भीख मांगो ? मेरे विचार से यदि डॉ यादव अपने इस ज्ञान के प्रति गंभीर हैं तो निश्चित तौर पर उन्हें इस ‘नेक मिशन’ की शुरुआत अपने ही घर परिवार के सदस्यों को खंजरी दिलवाकर उन्हें ट्रेन में ‘रोज़गार’ दिलवाकर करनी चाहिए। देश के युवाओं,बच्चों व अभिभावकों को ऐसे महाज्ञानी गुरु घंटालों की संगत से दूर ही रहना चाहिए। आश्चर्य है कि आज हमारे देश के युवाओं का भविष्य ऐसे ग़ैर ज़िम्मेदार शिक्षकों के हाथों में है और सरकार है, कि इनके विरुद्ध कार्रवाई करने के बजाए इन्हें प्रोत्साहित करने में लगी हुई है।

राजस्थान का रण : आपसी झगड़े से कांग्रेस को नुकसान
रमेश सर्राफ धमोरा
कांग्रेस आलाकमान ने राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट, केबीनेट मंत्री महाराजा विश्वेन्द्र सिंह व रमेश मीणा को उनके पद से हटा दिया है। साथ ही युवक कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष मुकेश भाकर व सेवादल अध्यक्ष राकेश पारीक को भी पद मुक्त कर दिया गया है। राज्य के शिक्षा राज्य मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा को प्रदेश कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया गया है। विधायक गणेश घोधरा को युवक कांग्रेस व हेमसिंह शेखावत को सेवादल का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष अभिमन्यु पूनिया ने भी पायलेट के समर्थन में अपने पद से स्तीफा दे दिया है।
दिल्ली से आये कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, अजय माकन, प्रदेश प्रभारी महासचिव अविनाश पाण्डे, रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कांग्रेस विधायक दल की लगातार दो बार बैठक लेकर इस बात का ऐलान किया। इसके बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राजभवन जाकर राज्यपाल कलराज मिश्र से मिलकर पूरे घटनाक्रम से अवगत करवा दिया है। इसके साथ ही राजस्थान में कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की लड़ाई खुलकर सड़कों पर आ गई है। दोनों नेता अपना-अपना शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। सचिन पायलट गुट के विधायक राजस्थान से बाहर हरियाणा के गुडगांव में ठहरे हुए हैं।
कोरोना जैसी महामारी के संक्रमण के दौर में जहां सरकार को अपनी पूरी ताकत कोरोना पर काबू पाने के प्रयास करने में लगानी चाहिये। वही सरकार के मंत्री आपस में ही लड़ रहे हैं। इधर प्रदेश में कोरोना का संक्रमण हर दिन तेजी से बढ़ रहा है। राजस्थान में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या 25 हजार की संख्या को पाकर चुकी है।
राजस्थान में गहलोत और पायलट की लड़ाई कोई नई नहीं है। विधानसभा चुनाव के बाद जहां सचिन पायलट मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। वही अशोक गहलोत दिल्ली में जोड़ तोड़ कर मुख्यमंत्री बन गए थे। तब से ही दोनों नेता एक दूसरे को कमजोर करने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं। कांग्रेस आलाकमान द्धारा भी राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की लड़ाई को रोकने की दिशा में कोई सकारात्मक कार्यवाही नहीं की गयी थी। जिस कारण इनकी लड़ाई दिन प्रतिदिन बढ़ती ही गई। आज स्थिति सचिन पायलट द्वारा पार्टी से बगावत करने तक पहुंच गई है।
राजस्थान में कांग्रेस के प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव अविनाश पांडे को चाहिए था कि समय रहते गहलोत और पायलट में सुलह करवाते। मगर अविनाश पांडे सुलह कराने की बजाय खुद गहलोत के पक्ष में खड़े नजर आते रहे। इससे गहलोत विरोधी विधायकों को लगने लगा कि केंद्रीय आलाकमान स्तर पर भी उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। जब जून माह में राज्यसभा के चुनाव थे उस वक्त भी गहलोत और पायलट खेमे में खुलकर टकराव हुआ था। लेकिन पांडे ने उस वक्त भी ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे दोनों पक्ष संतुष्ट हो सके।
दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनाव में जब राजस्थान में कांग्रेस को बहुमत मिला तो प्रदेश के हर कांग्रेसी को यही लग रहा था कि युवा नेता सचिन पायलट का मुख्यमंत्री बनना तय है। क्योंकि राजस्थान में कांग्रेस को उबारने में जितनी मेहनत सचिन पायलट ने की थी। उतनी शायद ही अन्य किसी नेता ने नहीं की थी। फरवरी 2014 में जब सचिन पायलट को राजस्थान कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया उस वक्त राजस्थान में कांग्रेस के मात्र 21 विधायक थे। दिसंबर 2013 में संपन्न हुए राजस्थान विधानसभा के चुनाव में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस बुरी तरह हार चुकी थी तथा हर कांग्रेसी कार्यकर्ता का मनोबल टूट चुका था। ऐसे में सचिन पायलट ने प्रदेश अध्यक्ष बनते ही राजस्थान के हर जिले का धुआंधार दौरा किया व कार्यकर्ताओं से मिलकर उन्हें काम करने के लिए प्रेरित किया था।
विधानसभा चुनाव के दौरान भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते सचिन पायलट ने पूरे चुनाव को फ्रंट से लीड किया था। पायलेट ने भारतीय जनता पार्टी की वसुंधरा राजे सरकार की नाकामियों को आम जन जन तक पहुंचाया था। जिस कारण लोगों को लगा था कि एक युवा नेता के नेतृत्व में सरकार बनने से कांग्रेस पार्टी जनहित के मुद्दों पर काम करेगी। मगर जैसे ही चुनाव परिणाम कांग्रेस के पक्ष में आये। अशोक गहलोत ने अपने दिल्ली संपर्कों के बल पर मुख्यमंत्री बन गये। गहलोत के मुख्यमंत्री बनते ही पायलट समर्थको में जबरदस्त विरोध देखा गया था। मगर उस वक्त कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी व कांग्रेस के अन्य बड़े नेताओं ने पायलट को मना कर उप मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दी।
लेकिन धीरे-धीरे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सरकार पर अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी। सरकार में पायलट व उनके समर्थकों की उपेक्षा की जाने लगी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कई ऐसे लोगों को अपना विशेषाधिकार बनाया जिनकी कांग्रेस कार्यकर्ता के नाम पर कोई उपलब्ध नहीं थी। इसके बाद मुख्यमंत्री गहलोत ने बिना पायलट की सहमति के प्रदेश के बड़े शिक्षण संस्थाओं, विश्वविद्यालयों में अपनी मनमर्जी के कुलपति, वाइस चांसलर लगा दिए।
ऐसा नहीं है कि सचिन पायलट ने पार्टी से यकायक बगावत कर दी हो। उन्होंने अपनी उपेक्षा की शिकायत बार-बार कांग्रेसी आलाकमान से की थी। मगर आलाकमान ने प्रभारी महासचिव अविनाश पांडे की अध्यक्षता में एक समन्वय समिति का गठन कर दिया। जो महज कागजी साबित हुई। राजस्थान में सरकार बने डेढ़ साल से अधिक का वक्त हो जाने के बावजूद अभी तक कार्यकर्ताओं को राजनीतिक नियुक्तियां नहीं देने से कार्यकर्ताओं में सरकार के प्रति गहरा असंतोष है। लोकडाउन के दौरान लोगों के बिजली के बिल माफ करने के लिए सचिन पायलट व उनके समर्थक मंत्रियों ने कई बार खुलकर मुख्यमंत्री से मांग की मगर मुख्यमंत्री ने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया।
जिस तरह से कर्नाटक व मध्यप्रदेश में कांग्रेस के ही नाराज विधायको ने सरकार गिरा दी थी। वही कहानी राजस्थान में भी दोहराई जा सकती है। मौजूदा घटनाक्रम में भले ही अशोक गहलोत विजेता बन के उभरे हो। मगर कांग्रेस को इसका खामियाजा आने वाले दिनों में उठाना पड़ सकता है। आज एक एक कर युवा नेता कांग्रेस छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। इस बात को कांग्रेस आलाकमान को समझना होगा कि ऐसी परिस्थितियां क्यों उत्पन्न हो रही है। जिससे युवा नेतृत्व कांग्रेस से विमुख होता जा रहा।
सचिन पायलट के कांग्रेस छोड़ने से राजस्थान में प्रभावशाली गुर्जर जाति के मतदाता भी भविष्य में कांग्रेस से दूर होंगे। सचिन पायलट युवा है तथा उनके सामने राजनीतिक करने को बहुत समय है। इन सबके चलते भविष्य में पायलट तो फिर भी मजबूत होकर उभर सकते हैं। मगर अपने राजनीतिक जीवन की अंतिम पारी खेल रहे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का पिछला इतिहास देखे तो पार्टी के लिये ज्यादा अच्छा नहीं रहा है। गहलोत के मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस कभी दुबारा चुनाव नहीं जीत पायी है।
2018 में गहलोत के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेसी सभी 25 सीटों पर बुरी तरह हार गई थी। यहां तक कि अशोक गहलोत का खुद का बेटा भी जोधपुर से करीबन तीन लाख से अधिक वोटों से हार गया था। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व को सोचना चाहिए कि आज पार्टी को जहां अधिकाधिक संख्या में नए युवाओं को जोड़ने की आवश्यकता है। वही पुराने क्षत्रपों के चलते नए लोग पार्टी छोड़ कर जा रहे हैं। यह कांग्रेस के लिए अच्छी खबर नहीं है। कांग्रेस में सचिन पायलेट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अशोक तंवर जैसे नेताओं को पार्टी छोड़ने से नहीं रोका गया तो दिन प्रतिदिन जनाधार खोती जा रही कांग्रेस को बचा पाना मुश्किल ही नहीं असंभव होगा।

हम किस ‘सीमा’ तक चीनी नाराज़गी की परवाह करना चाहते हैं ?
श्रवण गर्ग
प्रधानमंत्री ने इस वर्ष चीन के राष्ट्रपति जिन पिंग को उनके जन्म दिवस पर शुभकामना का संदेश नहीं भेजा। भेजना भी नहीं चाहिए था। जिन पिंग ने भी कोई उम्मीद नहीं रखी होगी। देश की जनता ने भी इस सब को लेकर कोई ध्यान नहीं दिया। कूटनीतिक क्षेत्रों ने ध्यान दिया होगा तो भी इस तरह की चीज़ों की सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं की जाती। सोशल मीडिया पर ज़रूर विषय के जानकार लोगों ने कुछ ट्वीट्स अवश्य किए पर वे भी जल्द ही शब्दों की भीड़ में गुम हो गए। ऐसे ट्वीट्स पर न तो ‘लाइक्स’ मिलती हैं और न ही वे री-ट्वीट होते हैं। उल्लेख करना ज़रूरी है कि चीन के राष्ट्रपति का जन्मदिन पंद्रह जून को था। यह दिन प्रत्येक भारतवासी के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है कि इसी रात चीनी सैनिकों के साथ पूर्वी लद्दाख़ की गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प में हमारे बीस बहादुर सैनिकों ने अपनी कुर्बानी दी थी। चीनी सैनिक शायद अपने राष्ट्रपति को उनके जन्मदिन पर इसी तरह का कोई रक्त रंजित उपहार देना चाह रहे होंगे। भारतीय परम्पराओं में तो सूर्यास्त के बाद युद्ध में भी हथियार नहीं उठाए जाते। चूँकि सीमा पर चीनी सैनिकों की हरकतें पाँच मई से ही प्रारम्भ हो गईं थीं, प्रधानमंत्री की आशंका में व्याप्त रहा होगा कि हिंसक झड़प जैसी उनकी कोई हरकत किसी भी दिन हो सकती है पर इसके लिए रात भी पंद्रह जून की चुनी गई।
चीनी राष्ट्रपति को जन्मदिन की शुभकामनाएँ ना भेजे जाने पर तो संतोष व्यक्त किया जा सकता है पर आश्चर्य इस बात पर हो सकता है कि प्रधानमंत्री ने तिब्बतियों के धार्मिक गुरु दलाई लामा को भी उनके जन्म दिवस पर कोई शुभकामना संदेश प्रेषित नहीं किया। पंद्रह जून को लद्दाख़ में हुई झड़प की परिणति छह जुलाई को ही इस घोषणा के साथ हुई कि चीन अपनी वर्तमान स्थिति से पीछे हटने को राज़ी हो गया है। इसे संयोग माना जा सकता है कि इसी दिन दलाई लामा हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित अपनी निर्वासित सरकार के मुख्यालय में अपना 85वाँ जन्मदिन मना रहे थे। सर्वविदित है कि चीन दलाई लामा की किसी भी तरह की सत्ता या उसे मान्यता दिए जाने का विरोध करता है।
चीन का यह विरोध पचास के दशक में उस समय से चल रहा है जब उसके सैनिकों ने तिब्बत में वहाँ के मूल नागरिकों (तिब्बतियों ) द्वारा की गई अहिंसक बग़ावत को बलपूर्वक कुचल दिया था और 1959 में सीमा पार करके दलाई लामा ने भारत में शरण ले ली थी। दलाई लामा तब 23 वर्ष के थे। जवाहर लाल नेहरू ने न सिर्फ़ दलाई लामा और उनके सहयोगियों को भारत में शरण दी धर्मशाला में उन्हें तिब्बतियों की निर्वासित सरकार बनाने की स्वीकृति भी प्रदान कर दी। देश में इस समय कोई अस्सी हज़ार तिब्बती शरणार्थी बताए जाते हैं। तिब्बत में चीनी आधिपत्य के ख़िलाफ़ अहिंसक विद्रोह का नेतृत्व करने के सम्मान स्वरूप दलाई लामा को 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया था।
सवाल केवल इतना भर नहीं है कि प्रधानमंत्री ने दलाई लामा को उनके जन्मदिन पर शुभकामनाएँ प्रेषित नहीं कि जबकि पिछले वर्ष बौद्ध धार्मिक गुरु को उन्होंने फ़ोन करके ऐसा किया था। तो क्या पंद्रह जून को पूर्वी लद्दाख़ में हुई चीनी हरकत के बावजूद हम इतने दिन बाद छह जुलाई को भी दलाई लामा को बधाई प्रेषित करके चीन को अपनी नाराज़गी दिखाने के किसी अवसर से बचना चाहते थे ?
अगर ऐसा कुछ नहीं है तो इतने भर से भी संतोष प्राप्त किया जा सकता है कि केंद्रीय राज्य मंत्री और अरुणाचल से सांसद किरण रिजिजु द्वारा दलाई लामा को बधाई प्रेषित करके एक औपचारिकता का निर्वाह कर लिया गया। रिजिजु स्वयं भी बौद्ध हैं। पर वर्तमान परिस्थितियों में तो इतना भर निश्चित ही पर्याप्त नहीं कहा जा सकता।
सवाल किया जा सकता है कि चीन के मामले में इतना सामरिक आत्म-नियंत्रण और असीमित कूटनीतिक संकोच पाले जाने की कोई तो चिन्हित-अचिन्हित सीमाएँ होंगी ही। चीन के संदर्भ में हमारी जो कूटनीतिक स्थिति दलाई लामा और उनकी धर्मशाला स्थित निर्वासित सरकार को लेकर है, वही बीजिंग के एक और विरोधी देश ताइवान को लेकर भी है। ऐसी स्थिति पाकिस्तान या किसी अन्य पड़ौसी सीमावर्ती देश को लेकर नहीं है। दो वर्ष पूर्व जब दलाई लामा के भारत में निर्वसन के साठ साल पूरे होने पर उनके अनुयायियों ने नई दिल्ली में दो बड़े आयोजनों की घोषणा की थी तो केंद्र और राज्यों के वरिष्ठ पार्टी नेताओं को उनमें भाग न लेने की सलाह दी गई थी।तिब्बतियों की केंद्रीय इकाई ने बाद में दोनों आयोजन ही रद्द कर दिए थे।उसी साल केंद्र ने दलाई लामा और उनकी निर्वासित सरकार के साथ सभी आधिकारिक सम्बन्धों को भी स्थगित कर दिया था।
किसी जमाने में तिब्बत को हम अखंड भारत का ही एक हिस्सा मानते थे (या आज भी मानते हैं) तो वह आख़िर कौन सा तिब्बत है ? क्या वह दलाई लामा वाला तिब्बत नहीं है ? वर्तमान दलाई लामा अपनी उम्र (85 वर्ष) के ढलान पर हैं। हो सकता है कि चीन आगे चलकर अपना ही कोई बौद्ध धर्मगुरु उनके स्थान पर नियुक्त कर दे या फिर वर्तमान दलाई लामा ही अपना कोई उत्तराधिकारी नियुक्त कर दें । ऐसी परिस्थिति में हमारी नीति क्या रहेगी ? क्या गलवान घाटी की घटना के बाद दलाई लामा के जन्मदिन के रूप में हमें एक ऐसा अवसर प्राप्त नहीं हुआ था, जब हम चीन के प्रति अपनी नाराज़गी का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन कर सकते थे ?अमेरिका जिसके कि साथ हम इस समय चीन को लेकर सबसे ज़्यादा सम्पर्क में हैं उसने तो दलाई लामा को आधिकारिक तौर पर उनके जन्मदिन की बधाई दी है। हमने ही इस अवसर को चूकने का फ़ैसला क्यों किया ?

स्टार्टअप की हालत
सिद्धार्थ शंकर
अर्थव्यवस्था को गति देने और देश में बेरोजगारी दूर करने के मकसद से छह साल पहले नवोन्मेष की नई संकल्पना के साथ उद्यम (स्टार्टअप) शुरू करने की जो पहल शुरू हुई थी, उससे बड़ी उम्मीदें जगी थीं। लगा था कि पड़े-लिखे नौजवान नई सोच के साथ नया काम शुरू करेंगे और इससे विकास का नया मार्ग प्रशस्त होगा। लेकिन तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि ज्यादातर ऐसे नए कारोबारों का बीच में ही दम फूलने लगेगा। लाखों नौजवानों ने अपनी सकारात्मक ऊर्जा और पूंजी लगाते हुए छोटी-छोटी कंपनियां बनाईं और काम शुरू किया। लेकिन आज इनमें से ज्यादातर उद्यमी हताश होकर काम बंद कर चुके हैं। फिर, जब से कोरोना महामारी के कारण पैदा हुए हालात में तो इन नए उद्यमियों पर तो जैसे पहाड़ टूट गया। जिन नए उद्यमों की बदौलत अर्थव्यवस्था को एक सहारा मिलने की उम्मीद की जा रही थी, वही उद्यम अब दिन दिन गिन रहे हैं।
औद्योगिक संगठन नैस्कॉम के ताजा सर्वे के मुताबिक बीते तीन महीनों में ही 90 फीसद नई कंपनियां कमाई के सारे स्रोत सूखने के कारण या तो बंद हो गई हैं या बंदी की कगार पर हैं। इनमें से 30 से 40 फीसद ने अपना कामकाज रोक दिया है। हालांकि 70 फीसद उद्यम इस उम्मीद में हैं कि उन्हें जिंदा रखने के लिए नए सिरे से कोष मुहैया कराया जाएगा। लेकिन यहां मौजू सवाल यह है कि जिन बड़े पूंजीपतियों ने भारी कमाई के नजरिए से ऐसी नई कंपनियों में पहले से ही अच्छा निवेश कर रखा था, बेहिसाब घाटे की सूरतों में अब वे इनमें नया निवेश क्यों करेंगे। सवाल इस तरह के उद्यमों को लेकर सरकार की मंशा पर भी है। जो सरकार करोड़ों रोजगारों के लुभावने सपनों और दावों के साथ इस तरह के अभियान छेड़ती है, वह इनके डूबने की खबर मिलने पर वैसे ही आर्थिक पैकेज क्यों नहीं मुहैया कराती, जैसे कि बड़े औद्योगिक घरानों को दिए जाते हैं।
संकट की वजह से हाल में कई उद्यमों को अपने यहां कर्मचारियों की छंटनी के लिए मजबूर होना पड़ा है। इनमें कई कंपनियां तो ऐसी भी हैं जिन्होंने बीते एक साल में दस करोड़ डॉलर की पूंजी देशी-विदेशी निवेशकों से जुटाई है। फिर भी एक मोटे अनुमान के मुताबिक देश में 2004 के बाद से खुली एक हजार से ज्यादा कंपनियों में से दो सौ कंपनियों को तो अब कोई मदद नहीं मिल रही है और तीस से पचास कंपनियां कर्ज में डूब कर दिवालिया हो चुकी हैं। वर्ष 2016 से ऐसे उद्यमों (स्टार्टअप) के कामकाज का लेखाजोखा रखने वाली शोध कंपनी ट्रैक्सन टेक्नोलॉजी ने तो बंद हो रही कंपनियों के लिए ‘डेडपूलÓ जैसे शब्द का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। इस संगठन के कहना है कि बीते चार साल में देश के भीतर शुरू हुई छोटी-बड़ी करीब 14 हजार कंपनियां घाटे, बुरे प्रबंधन और मांग में कमी के कारण बंद कर दी गई हैं। इनमें से ढाई सौ कंपनियां बीते दो महीने में बंद हुई हैं और आने वाले महीनों में इससे भी बुरा वक्त इनकी किस्मत में है। कहने को कोविड-19 को नया काम शुरू करने वाली कंपनियों के लिए इतिहास का सबसे बुरा दौर कहा जा रहा है। लेकिन सच्चाई यह है कि इनके लिए शुरुआती दौर को छोड़ कर अच्छा समय तो कभी आया भी नहीं। अभी भी जो स्टार्टअप कंपनियां बची हुई हैं, उनमें से अधिकतर के संस्थापक-संचालक यह उम्मीद कर रहे हैं कि उनका अधिग्रहण कर लिया जाएगा और किसी न किसी तरह से और पूंजी जुटा कर उन्हें तब तक चलाने की कोशिश की जाएगी, जब तक कि वे लाभ की स्थिति में नहीं आ जातीं।
देश को हर मामले में आत्मनिर्भर बनाने और युवाओं से कोई कामधंधा खड़ा कर अपने जैसे दूसरे बेरोजगार युवाओं को नौकरी देने के लिए शुरू किए गए स्टार्टअप अभियान का फिलहाल हासिल यही है कि बड़े पूंजीपति भी अब उनके नाम से कन्नी काटने लगे हैं। इस बारे में उनका मत है कि इस अभियान के नाम पर नए नजरिए वाले कारोबार को अनंतकाल तक पैसा देते हुए घाटा नहीं सहा जा सकता। हालांकि कई बड़े उद्योगपति आरंभ में इस तरह की नई कारोबारी कंपनियों के मुरीद रहे हैं। उन्होंने यह मानते हुए इनमें काफी पैसा लगाया है कि आगे चल कर ये पुरानी कंपनियां का बेहतर विकल्प बन सकती हैं। लेकिन आधे दशक में ही इनका बुरा हाल देख कर नजरिया बदल गया है। पूंजीपतियों के अलावा खुद उन युवाओं का भी ऐसे उद्यमों से मोहभंग हुआ है जिन्होंने नौकर के बजाय मालिक बन कर कंपनी बनाने के सपने के साथ इन्हें शुरू किया था।
अगर आइटी स्टार्टअप कंपनियों की बात करें, तो नौकरी छोड़ कर इन्हें शुरू करने वाले आइटी इंजीनियरों ने पाया कि जब तक ये किसी सेवा या उत्पाद से जुड़े नए विचार को मूर्त रूप लेकर बाजार में उतरती हैं, तब उस उत्पाद या सेवा की मांग में तब्दीलियां आ जाती हैं। इससे साबित होता है कि कम संसाधन और छोटे स्तर पर कामकाज शुरू करने पर ये कंपनियां भविष्य में पैदा होने वाली मांग का सही-सही अनुमान नहीं लगा पाती हैं और पिछड़ जाती हैं। इसके अलावा यदि बड़ी कंपनियां उन्हीं के समान सेवा और उत्पाद बाजार में उतार देती हैं, तो प्रचार आदि सहूलियतों के अभाव में ऐसे उद्यम अपने उत्पाद या सेवा के बारे में उपभोक्ताओं को न तो असरदार ढंग से बता पाते हैं और न ही अपने उत्पाद खरीदने के लिए उन्हें राजी कर पाते हैं। कमाई और विकास करने के मामले में पिछडऩे की वजह से उनके संस्थापकों को वित्तीय मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इसलिए या तो स्टार्टअप अधिग्रहण की प्रक्रिया के तहत खुद को बड़ी कंपनियों के हवाले कर देते हैं या काम ही बंद कर देते हैं।
खुद उद्यम खड़े करने वाले युवाओं को सोचना होगा कि कोई भी कंपनी अंतत: कारोबारी फायदे के लिए बनाई जाती है। अगर वे इस एक मकसद के साथ सारा कौशल इसमें झोंक दें तो उन्हें सफल होने से रोका नहीं जा सकेगा। एक अच्छा संकेत यह है कि हमारे देश में थोड़ा-बहुत संपन्न हुए मध्यवर्ग ने अपने बच्चों के सपनों को साकार करने के लिए स्टार्टअप की बढऩे का हौसला दिखाया है। शर्त यही है कि सरकार और समाज नए संकल्पों के साथ सामने आ रहे युवाओं का उत्साहवर्धन करें और युवा यह मान कर उद्यम खड़े करें कि यह उनके जीवन-मरण का प्रश्न है, यानी यदि वे इसमें नाकाम हुए हो, तो वापसी का कोई विकल्प उनके लिए नहीं बचा है।

मजदूरों की राहत बढ़ाएं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
तालाबंदी के दौरान जो करोड़ों मजदूर अपने गांवों में लौट गए थे, उन्हें रोजगार देने के लिए सरकार ने महात्मा गांधी रोजगार योजना (मनरेगा) में जान डाल दी थी। सरकार ने लगभग साढ़े चार करोड़ परिवारों की दाल-रोटी का इंतजाम कर दिया था लेकिन इस योजना की तीन बड़ी सीमाएं हैं। एक तो यह कि इसमें दिन भर की मजदूरी लगभग 200 रु. है। दूसरा, किसी भी परिवार में सिर्फ एक व्यक्ति को ही मजदूरी मिलेगी। तीसरा, पूरे साल में 100 दिन से ज्यादा काम नहीं मिलेगा। याने 365 दिनों में से 265 दिन उस मजदूर या उस परिवार को कोई अन्य काम ढूंढना पड़ेगा। सरकार ने तालाबंदी के बाद मनरेगा की कुल राशि में मोटी वृद्धि तो की ही, उसके साथ-साथ करोड़ों लोगों को मुफ्त अनाज बांटने की घोषणा भी की। इससे भारत के करोड़ों नागरिकों को राहत तो जरुर मिली है लेकिन अब कई समस्याएं एक साथ खड़ी हो गई हैं।
पहली तो यह कि सवा लाख परिवारों के 100 दिन पूरे हो गए हैं। 7 लाख परिवारों के 80 दिन और 23 लाख परिवारों के 60 दिन भी पूरे हो गए। शेष चार करोड़ परिवारों के भी 100 दिन कुछ हफ्तों में पूरे हो जाएंगे। फिर इन्हें काम नहीं मिलेगा। ये बेरोजगार हो जाएंगे। अभी बरसात और बोवनी के मौसम में गैर-सरकारी काम भी गांवों में काफी है लेकिन कुछ समय बाद शहरों से गए ये मजदूर क्या करेंगे ? इनके पेट भरने का जरिया क्या होगा ? कोरोना और उसका डर इतना फैला हुआ है कि मजदूर लोग अभी शहरों में लौटना नहीं चाहते। ऐसी स्थिति में सरकार को तुरंत कोई रास्ता निकालना चाहिए। वह चाहे तो एक ही परिवार के दो लोगों को रोजगार देने का प्रावधान कर सकती है। 202 रु. रोज देने की बजाय 250 रु. रोज दे सकती है और 100 दिन की सीमा को 200 दिन तक बढ़ा सकती है ताकि अगले दो-तीन माह, जब तक कोरोना का खतरा है, मजदूर लोग और उनके परिवार के बुजुर्ग और बच्चे भूखे नहीं मरेंगे। जब कोरोना का खतरा खत्म हो जाएगा तो ये करोड़ों मजदूर खुशी-खुशी काम पर लौटना चाहेंगे और सरकार का सिरदर्द अपने आप ठीक हो जाएगा। गलवान घाटी का तनाव घट रहा है तो सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह अब अपना पूरा ध्यान कोरोना से लड़ने में लगाएगी।

क्या राजनीतिक नेतृत्व आत्म-निरीक्षण के लिए तैयार है
वीरेन्द्र सिंह परिहार
29 जून को समाचार पत्रों में दो समाचार पढ़ने को मिले। एक तो यह कि सीधी के एक कोल आदिवासी महिला का जिला अस्पताल सीधी में मृत्यु होने पर उसके परिजनों को न तो स्वास्थ्य विभाग का शव वाहन प्राप्त हुआ और न ही नगरपालिका सीधी का शव वाहन प्राप्त हुआ। फलत: हाथ ठेले से उक्त मृतका के परिजन शव को 6-7 कि.मी. दूर सोन नदी ले गए। पर यह तो तस्वीर का एक पहलू हैं, तस्वीर का दूसरा भयावह पहलू यह हैं कि दाह संस्कार की सामग्री उपलब्ध न होने के चलते मृतका के परिजनों ने शव को सीधे सोन नदी में प्रवाहित कर दिया।
इसी दिन उल्लेखनीय समाचार जो पढ़ने को मिला वह यह कि रीवा जिले के कराहिया का एक हितग्राही कन्या विवाह योजना की राशि के लिए दो वर्षों से जनपद पंचायत रीवा के चक्कर काट रहा था। परन्तु नौकरशाही के मकड़जाल और पूरे तंत्र में घुन की तरह लगे भ्रष्टाचार के चलते उसे वह राशि प्राप्त नही हो सकी थी। फलत: वह रीवा कलेक्टर डा0 इलैया राज टी. के पास पहुंच गया। वस्तुस्थिति जानकर कलेक्टर रीवा सीधे जनपद पंचायत पहुंचकर एक तरह से सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए वहाँ पर उनके द्वारा संबंधित लिपिक की संविदा सेवा समाप्त करने के लिए जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को निर्देशित किया और मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत को लोक सेवा गांरटी के तहत दंड देने को निर्देश दिया। जनपद पंचायत में कलेक्टर को भारी गड़बड़ी देखने को मिली। सभी कर्मचारियों को अलग-अलग प्रमार भले दिया गया हो, पर सभी फाइलें सहायक मानचित्रकार इरसाद के कब्जे में ही मिलीं। पूर्व लेखाधिकारी को गलत काम करने से मना करने के चलते प्रभार से हटा दिया गया था।
कुल मिलाकर उपरोक्त दोनों घटनाओं यह बताती हैं, कि हम विकास की दौड़ में चाहे जितना आगे जाने का दावा करे। शासन द्वारा गरीबों और कमजोरों के हित में चाहे जितनी योजनाएं चलाई गई हों। हम भले एक नए भारत की बातें कर रहे हों। पर आजादी के 73 वर्षों बाद भी अभी तक जमीनी हकीकत में बहुत बदलाव नही आया हैं। कभी स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि दिल्ली से चलने वाले 1 रूपये में मात्र 15 पैसे ही आम लोगों तक पहुंचता है। संचार क्रांति, डिजिटलीकरण और खातों में सीधे राशि के भेजे जाने के चलते वह स्थिति भले न हो। परन्तु कभी किसी के शब्दों में यह तो कहा जा सकता हैं कि अंधेरा अभी कायम हैं। उपरोक्त दोनों घटनाओं से पता चलता हैं कि नौकरशाही पूरी तरह स्वच्छंद है। उसका काम करने का तौर-तरीका ’मेरे को क्या‘ फामूले पर आधारित हैं। यानी कोई काम करने से मुझे क्या मिलने वाला हैं, तभी काम करने की दिशा में सोचा जाएगा। अगर मजदूरी कर जीवन-यापन करने वाले किसी मजदूर को उपलब्ध होते हुए शव वाहन नही मिलता। दाह संस्कार के लिए संसाधन का अभाव है- तो इसका मतलब नौकरशाही पूरी तरह संवेदनहीन है, जबकि शासन की योजना के तहत गरीबी रेखा के अन्तर्गत जीने वाले को अंतिम संस्कार के लिए दस हजार रूपए तत्काल दिए जाने का प्रावधान हैं।
सवाल सिर्फ नौकरशाही का ही नहीं, राजनीतिक नेतृत्व का भी हैं। आखिर में यह तो पूंछा ही जा सकता है कि हमारे जन-प्रतिनिधि किस मर्ज की दवा हैं। लाख टके की बात यह कि आखिर में वह ऐसे अधिकारियों की पदस्थापना कराते क्यो है जो आम आदमी के प्रति जवाबदेह नही हैं और दिन-रात काली कमाई में व्यस्त रहते हैं पर इन सबके विरूद्ध कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं होती बल्कि ऐसे तत्वों को उल्टा राजनैतिक संरक्षण मिलता है। समस्या यह हैं कि ऐसे भ्रष्ट अधिकारी भी ले-देकर मलाईदार कही जाने वाली जगहों में पदस्थापना पाते हैं। फिर तो उन्हे लूट का लायसेंस ही मिल जाता हैं। इस तरह से यदि कहा जाए कि समस्या का मूल कारण हमारे राजनीतिक नेतृत्व में हैं तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। यह भी विचारणीय तथ्य हैं कि 2001 से 2014 के मध्य गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए कैसे नरेन्द्र मोदी ने वहाँ की नौकरशाही को गुजरातियों को विनम्र सेवक बना दिया था। यदि ऐसा गुजरात में संभव था तो मध्यप्रदेश में क्यों नही ?
कुछ वर्षों पूर्व तमिलनाडु के कुन्नुर जिले के नौजवान कलेक्टर द्वारा नगर पालिका के स्कूल में लाइन में खड़े होकर अपनी बच्ची को एडमिशन दिलाने की चर्चा पूरे देश में चली थी। लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण नजरिया और कृत्य रीवा कलेक्टर का हैं। कहने का तात्पर्य यह कि ऐसी शिकायतें प्राप्त होने पर मात्र कागजी घोड़े दौड़ाने के बजाय यदि मौंके से तत्काल कार्यवाही की जाए तो समस्या का बहुत कुछ समाधान निकल सकता हैं। पर यह तभी संभव हो सकता है जब ऐसे कलेक्टरों की पदस्थापना की जाएं एंव उन्हें कार्य करने की खुली छूट दी जाए। कुल मिलाकर मामला वही राजनीतिक नेतृत्व का ही हो जाता हैं। बड़ी बात यह कि क्या हमारे राजनीतिज्ञ इस दिशा में आत्म-निरीक्षण के लिए तैयार है।

मोदी का अचानक लद्दाख-दौरा
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक लद्दाख का दौरा कर डाला। अचानक इसलिए कि यह दौरा रक्षामंत्री राजनाथसिंह को करना था। इस दौरे को रद्द करके मोदी स्वयं लद्दाख पहुंच गए। विपक्षी दल इस दौरे पर विचित्र सवाल खड़े कर रहे हैं। कांग्रेसी नेता कह रहे हैं कि 1971 में इंदिरा गांधी ने भी लद्दाख का दौरा किया था लेकिन उसके बाद उन्होंने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए। अब मोदी क्या करेंगे ? कांग्रेसी नेता आखिर चाहते क्या हैं ? क्या भारत चीन पर हमला कर दे ? तिब्बत को आजाद कर दे ? अक्साई चिन को चीन से छीन ले ? सिंक्यांग के मुसलमानों को चीन के चंगुल से बाहर निकाल ले ? सबसे दुखद बात यह है कि भारत और चीन के बीच तो समझौता-वार्ता चल रही है लेकिन भाजपा और कांग्रेस के बीच वाग्युद्ध चल रहा है। कांग्रेस के नेता यह क्यों नहीं मानते कि मोदी के इस लद्दाख-दौरे से हमारे सैनिकों का मनोबल बढ़ेगा ? मुझे नहीं लगता कि मोदी लद्दाख इसलिए गए है कि वे चीन को युद्ध का संदेश देना चाहते हैं। उनका उद्देश्य हमारी सेना और देश को यह बताना है कि हमारे सैनिकों की जो कुर्बानियां हुई हैं, उस पर उन्हें गहरा दुख है। उन्होंने अपने भाषण में चाहे चीन का नाम नहीं लिया लेकिन अपने फौजियों को इतना प्रेरणादायक और मार्मिक भाषण दिया कि वैसा भाषण आज तक शायद किसी भी अन्य प्रधानमंत्री ने नहीं दिया। मोदी पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि वे अत्यंत प्रचारप्रिय प्रधानमंत्री हैं। इस लद्दाख दौरे को वे अपनी छवि बनाने के लिए भुना रहे हैं लेकिन भारत में कौन प्रधानमंत्री ऐसा रहा है (एक-दो अपवादों को छोड़कर), जो अपने मंत्रियों और पार्टी-नेताओं को अपने से ज्यादा चमकने देता है ? यह दौरा रक्षामंत्री राजनाथसिंह और गृहमंत्री अमित शाह भी कर सकते थे लेकिन मोदी के करने से चीन को भी एक नरम-सा संदेश जा सकता है। वह यह कि रुसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को बधाई देने और अरबों रु. के रुसी हथियारों के सौदे के बाद मोदी का लद्दाख पहुंचना चीनी नेतृत्व को यह संदेश देता है कि सीमा-विवाद को तूल देना ठीक नहीं होगा। मोदी के इस लद्दाख-दौरे को भारत-चीन युद्ध का पूर्वाभ्यास कहना अनुचित होगा। अगर आज युद्ध की ज़रा-भी संभावना होती तो क्या चीन चुप बैठता ? चीन के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने मुंह पर मास्क क्यों लगा रखा है ? वे भारत के विरुद्ध एक शब्द भी क्यों नहीं बोल रहे हैं ? क्योंकि भारत और चीन, दोनों परमाणुशक्ति राष्ट्र आज इस स्थिति में नहीं हैं कि कामचलाऊ सीमा-रेखा के आर-पार की थोड़ी-सी जमीन के लिए लड़ मरें।

संघ, राष्ट्र और भगवा ध्वज
नरेन्द्र सहगल
(गुरु पूर्णिमा 5 जुलाई पर विशेष))समस्त संसार में भारतवर्ष ही एकमात्र ऐसा सनातन राष्ट्र है जिसमें गुरु शिष्य की महान एवं अतुलनीय परम्परा को जन्म दिया है। शिक्षण संस्थाओं में छात्रों को पढ़ाने वाले अध्यापक, प्राध्यापक, शिक्षक, व्यापार जगत में ट्रेनिंग देने वाले उस्ताद, मास्टर और राजनीतिक क्षेत्र में अपना प्रभाव जमाने वाले तथाकथित महान नेता विश्व के प्रत्येक कोने में पाए जाते हैं परन्तु मनुष्य को सम्पूर्ण ज्ञान देकर उसे किसी विशेष ध्येय के लिए समर्पित हो जाने की प्रेरणा देने वाले श्रीगुरु केवल भारत की धरती पर ही अवतरित होते हैं। इन्हीं श्रीगुरुओं के तपोबल को शिरोधार्य करके हमारे देश के असंख्य, संतों, महात्माओं, योद्धाओं, स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत के भूगोल, संस्कृति, धर्म और राष्ट्र जीवन के मूल्यों की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व झोंक दिया। ऐसी मान्यता है कि इस गुरु परम्परा में आद्य श्रीगुरु महर्षि व्यास थे। इसीलिए भारत में व्यास पूजा के उत्सव का श्रीगणेश हुआ। इस दिन विशाल हिन्दू समाज (जैन, सिख, सनातनी, आर्यसमाजी,शैव, वैष्णव, लिंगायत, बौद्ध इत्यादि) के अधिकांश हिन्दू लोग गुरु-पूजन की परम्परा को अस्था और श्रद्धा के साथ निभाते हैं। श्रीगुरु एवं गुरुकुल भारतवर्ष के समग्र राष्ट्र जीवन के उद्गम स्थल और रक्षक रहे हैं।
डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार द्वारा 1925 में नागपुर में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी उपरोक्त श्रीगुरु परम्परा को आगे बढ़ाते हुए भारतवर्ष के राष्ट्रजीवन के प्रत्यक्षदर्शी, प्रतीक एवं पहचान परम पवित्र भगवा ध्वज को अपना श्रीगुरु स्वीकार किया है। यह भगवा ध्वज मामूली कपड़े का एक साधारण झंडा न होकर भारतवर्ष की सनातन राष्ट्रीय पहचान है। भारत के वैभव, पतन, संघर्ष और उत्थान का साक्षी है। इसीलिए कहा गया है कि -‘‘भगवा ध्वज निश्चिय ही भारतवर्ष के आदर्शों और आकांक्षाओं का, उसके इतिहास और परम्पराओं का, उसके वीरों और संतों के शौर्य और तप का सर्वाधिक वंदनीय और जगमगाता प्रतीक है’’। यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है कि संघ ने किसी व्यक्ति विशेष अथवा किसी ग्रंथ को अपना श्रीगुरु स्वीकार क्यों नहीं किया? उत्तर बहुत सीधा और सरल है। संघ का उद्देश्य भारतवर्ष का सर्वांगीण विकास अथवा सर्वांग स्वतंत्रता है। कोई अकेला व्यक्ति या ग्रंथ कितना भी महान एवं विशाल क्यों न हो वह समस्त राष्ट्र जीवन एवं अतीत से आज तक के इतिहास का प्रतिबिंब, जानकार और प्रतीक नहीं हो सकता। कोई एक महापुरुष (व्यक्ति) अथवा महाग्रंथ (पुस्तक) भारत की अनेक जातियों,रीति-रिवाजों, भाषाओं और पूजा पद्धतियों का प्रतिनिधित्व भी नहीं कर सकता। समय की आवश्यकता अनुसार अपने भारतवर्ष में अनेक संप्रदायों,विचारधाराओं एवं मजहबी गुटों की स्थापना हुई। इन सबके अपने-अपने श्रीगुरु एवं ग्रंथ भी अस्तित्व में आए। भारत के धर्म और संस्कृति में इस तरह की स्वतंत्रता है। ये भिन्नता नहीं अपितु विविधता है। यही विविधता हमारे राष्ट्र जीवन का सशक्त आधार है। पवित्र भगवा ध्वज इसी विविधता को जोड़े रखने, संवर्धित करने और सुरक्षित रखने की क्षमता रखता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य और उद्देश्य व्यक्ति, परिवार, आश्रम और संस्था केन्द्रित न होकर समाज और राष्ट्र केन्द्रित है और वैसे भी व्यक्ति कभी भी पथभ्रष्ट, उद्देश्यभ्रमित और विकट परिस्थितियों में डांवाडोल हो सकता है। इसी तरह से कोई भी बड़े से बड़ा महाग्रंथ भी समय की आवश्यकता अनुसार अपने को ढाल लेने में असमर्थ होता है। ग्रंथ अपने सम्प्रदाय का संचालन और दिशा निर्देश करने में तो सक्षम हो सकता है परन्तु किसी विशाल राष्ट्र जीवन को अपने में नहीं समेट सकता। अतः भारतवर्ष में उत्पन्न हुए सभी महापुरुषों, संतों, योद्धाओं, ग्रंथों नेताओं की प्रेरणा और एकता का आधार सनातन काल से चला आ रहा भगवा ध्वज ही है। संघ का कार्य और उद्देश्य राष्ट्र केन्द्रित है। राष्ट्र एक सांस्कृतिक इकाई होती है। देश एक भौगोलिक इकाई का नाम होता है। राज्य एक राजनीतिक इकाई होती है और सरकार प्रशासन चलाने वाली एक एजेंसी कहलाती है। भगवा ध्वज भारत की राष्ट्रीय संस्कृति की पहचान है इसीलिए वह भारतवर्ष का सांस्कृतिक ध्वज है। इस ध्वज का सम्बन्ध जाति, मजहब और, क्षेत्र विशेष से कदाचित नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक जब अपने इस श्रीगुरु भगवा ध्वज की पूजा करते हैं तो उस पूजा का अर्थ भी जातिगत अथवा व्यक्तिगत नहीं होता। भगवा ध्वज की वंदना का अर्थ है भारत के सभी धर्मग्रंथों, महापुरुषों, अवतारों, धर्मरक्षकों, धर्मगुरुओं, देवी-देवताओं, महान योद्धाओं और चैतन्यमयी देवी भारतमाता की पूजा। आधुनिक भाषा के अनुसार 33 करोड़ देवी-देवताओं की पूजा। यहां यह भी ध्यान देना चाहिए कि भगवा रंग और भगवा ध्वज को किसी कालखंड में बांधा अथवा समेटा नहीं जा सकता। जब मानवता का विभाजन हिन्दू,मुस्लिम, ईसाई इत्यादि जातियों में नहीं हुआ था उससे भी लाखों करोड़ों वर्ष पूर्व भगवा रंग और भगवा ध्वज का अस्तित्व था। वेदों में इसी ध्वज को‘अरुण केतवाः’ सूर्य का रथ कहा गया है। अतः भारत में रहने वाली सभी जातियों मजहबों का आदि रंग एवं ध्वज यह भगवा ही है। इसी ध्वज की छत्रछाया में और प्रेरणा से भारतीयों ने निरंतर 1200 वर्षों तक विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध संघर्ष किया है। इसी तरह संघ के स्वंयसेवक इसी ध्वज को अपना श्रीगुरु मानकर इससे बलिदान, त्याग, तपस्या और सेवा की प्रेरणा लेते हैं।
उपरोक्त संदर्भ में यह स्पष्टीकरण देना भी आवश्यक और महत्वपूर्ण है कि वर्तमान में तिरंगा हमारे देश का राष्ट्र ध्वज है। संघ इसे स्वीकार करता है। इसको सम्मान देता है। संघ के स्वयंसेवक जिन्होंने तिरंगे के सम्मान की रक्षा के लिए जम्मू-कश्मीर, हैदराबाद, गोवा, नगर हवेली, हुगली इत्यादि स्थानों में सैकड़ों की संख्या में बलिदान दिए हैं, आगे भी इसके सम्मान के लिए अपनी जीवनाहुति देने से कभी पीछे नहीं हटेंगे। परन्तु इस सच्चाई को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि यदि तिरंगा देश का शरीर है तो भगवा राष्ट्र की आत्मा है। अतः भगवा भारत का सनातन काल से चला आ रहा सांस्कृतिक ध्वज है और तिरंगा वर्तमान भारत का राष्ट्र ध्वज है। राष्ट्र ध्वज तिरंगे के आगे समस्त भारतवासियों के साथ संघ के स्वयंसेवक सदैव नतमस्तक हैं। इसी तरह अपने भारतवर्ष के सांस्कृतिक ध्वज के आगे संघ के स्वयंसेवकों के साथ समस्त भारतवासियों को भी नतमस्तक होना चाहिए।

भारत-चीनः विचित्र स्थिति
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
चीन को लेकर भारत में अत्यंत विचित्र स्थिति है। आज के दिन यह पता लगाना मुश्किल है कि भारत चाहता क्या है ? क्या वह चीन के साथ फौजी संघर्ष चाहता है या बातचीत से सीमाई तनातनी खत्म करना चाहता है या कोई उसकी भावी लंबी-चौड़ी रणनीति है ? भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक चीन का नाम लेकर उसके विरुद्ध एक शब्द भी नहीं बोला है। उन्होंने जो बोला है, उसे दोहराने की हिम्मत भारत का कोई नेता नहीं कर सकता है। वे शायद भारतीय जवानों के पराक्रम और बलिदान की प्रशंसा करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने कह दिया कि भारत की सीमा में कोई नहीं घुसा और हमारी जमीन पर कोई कब्जा नहीं हुआ। सरकार, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने चीनी माल के बहिष्कार की कोई अपील भी जारी नहीं की है। इससे भी बड़ी बात यह कि भारत और चीन के कोर कमांडर गालवान घाटी में 10-10——12-12 घंटे बैठकर तीन बार बात कर चुके हैं और दोनों पक्ष कह रहे हैं कि वे पीछे हटने के तौर-तरीकों पर बात कर रहे हैं। बात सफल भी हो रही है लेकिन अभी वह लंबी चलेगी। इस प्रगति का समर्थन चीन के बड़बोले और मुंहफट अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने भी किया है। इन बातों से आप किस नतीजे पर पहुंचते हैं ? इन बातों में आप यह भी जोड़ लें कि अभी तक चीन के राष्ट्रपति और मोदी के मित्र शी चिन फिंग ने भारत के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं बोला है। याने सारा मामला धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है लेकिन इसका उल्टा भी हो रहा है। चीन ने कल ही सुरक्षा परिषद में भारत पर कूटनीतिक हमला करने की कोशिश की है। कराची में हुए बलूच हमले पर पाकिस्तान जो प्रस्ताव लाया, उसके समर्थन में भारत का नाम लिये बिना चीन ने भारत पर उंगली उठा दी है। गालवान घाटी के पास उसने हजारों सैनिक जमा कर लिये है। पाकिस्तान ने भी उसके आस-पास के क्षेत्र में 20 हजार सैनिक डटा दिए हैं। इधर भारत अपनी सभी सरकारी कंपनियों से हो रहे चीनी सौदों को रद्द करता जा रहा है। हमारी गैर-सरकारी कंपनियां भी चीनी पूंजी के बहिष्कार की बात सोच रही हैं। इससे भी बड़ी बात यह हुई कि भारत में लोकप्रिय 59 चीनी ‘एप्स’ पर भारत ने प्रतिबंध लगा दिया है। चीन इस पर बौखला गया है। अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोंपियो इस मामले में भारत की पीठ ठोक रहे हैं। फ्रांस-जैसे कुछ राष्ट्रों ने, चाहे दबी जुबान से ही सही, भारत का समर्थन किया है। भारत की जनता इन परस्पर-विरोधी धाराओं का कुछ अर्थ नहीं निकाल पा रही है। हो सकता है कि दोनों देश एक-दूसरे पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दबाव बना रहे हैं। आज दोनों इस स्थिति में नहीं हैं कि युद्ध करें। चीन तो कोरोना की बदनामी और हांगकांग की उथल-पुथल में पहले से ही फंसा हुआ है। भारत यदि चीन को सबक सिखाना चाहता है तो ये तात्कालिक टोटकेबाजी काफी नहीं है। उसके लिए सुदीर्घ, गोपनीय और सुचिंतित रणनीति की जरुरत है।

कानपुर की घटना के सबक
सिध्दार्थ शंकर
कानपुर में शातिर बदमाशों को पकडऩे गई पुलिस टीम पर हुई ताबड़तोड़ फायरिंग में सीओ समेत आठ पुलिसकर्मी शहीद हो गए। कई सिपाहियों को बेहद गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है और कई पुलिसकर्मी लापता हैं। इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। अब तक पुलिस हुए हमलों में यह सबसे बड़ी घटना बताई जा रही है। गुरुवार रात करीब साढ़े 12 बजे बिठूर और चौबेपुर पुलिस ने मिलकर हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे के गांव बिकरू में उसके घर पर दबिश दी। विकास और उसके 8-10 साथियों ने पुलिस पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। घर के अंदर और छतों से गोलियां चलाई गईं। गोलीबारी में सीओ बिल्हौर देवेंद्र मिश्रा और एसओ शिवराजपुर महेश यादव शहीद हो गए। उनके साथ करीब आठ पुलिसकर्मी भी शहीद हुए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना की रिपोर्ट तलब की है और साथ ही डीजीपी एचसी अवस्थी से अपराधियों पर कड़ी कार्रवाई का निर्देश दिया है। कानपुर की घटना पर पूरा देश हैरान है। यह घटना उत्तरप्रदेश के उस शहर में हुई है जो राजधानी से कुछ घंटों की दूरी पर है और सरकार कानून-व्यवस्था के बड़े-बड़े दावे कर रही है। सच कहें, तो यह घटना सरकार और कानून दोनों के मुंह पर तमाचा है। एक अपराधी देखते-देखते इतना बड़ा हो गया और पुलिस सोती रही, यह संभव नहीं है। ऐसा तभी होता है, जब किसी अपराधी को या तो पुलिस संरक्षण दे या फिर राजनीति। वैसे भी यूपी में किसी भी अपराधी को राजनीतिक संरक्षण देने का लंबा इतिहास रहा है। उत्तर प्रदेश में राजनीति और अपराध जगत का बेहद ही करीबी रिश्ता रहा है। यहां की सियासी जमीन पर कई नेताओं ने राज किया है, जो कभी अपराध की दुनिया के बेताज बादशाह थे। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अतीक अहमद को एक खतरनाक बाहुबली नेता के तौर पर जाना जाता है। वो देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की लोकसभा सीट फूलपुर से सांसद रह चुके हैं। उस पर हत्या की कोशिश, अपहरण, हत्या के करीब 42 मामले दर्ज हैं। मुख्तार अंसारी एक माफिया-डॉन होने के साथ प्रमुख राजनेता भी है। अंसारी को बसपा ने खूब खाद-पानी दिया। मगर जब उसने मायावती को चुनौती दी तो 2010 में पार्टी से निष्कासित भी कर दिया गया। रघुराज प्रताप सिंह उर्फ रजा भैया के पैतृक निवास प्रतापगढ़ जिले की कुंडा तहसील के बारे में कहा जाता था कि राज्य सरकार की सीमाएं यहां खत्म हो जाती हैं, क्योंकि वहां उनका अपना ही राज चलता था। जौनपुर के पूर्व सांसद और बाहुबली नेता धनंजय सिंह के बारे में कहा जाता है कि पुलिस ने उसके एनकाउंटर की घोषणा कर दी थी, लेकिन उसने राजनीति में शरण लेकर खुद को बचाया। ऐसे और न जाने कितने चेहरे हैं, जिन्होंने कानून के फंदे से बचने के लिए राजनीति का सहारा लिया और हमारी राजनीति और राजनेताओं ने सत्ता के फेर में उन्हें अपना भी लिया। आज कानपुर कांड के बाद लगभग हर पार्टी मारे गए पुलिसकर्मियों के परिवार को न्याय देने का विलाप कर रही है, मगर वह यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि आखिर यूपी का यह हाल हुआ तो कैसे। खुद भाजपा भी नहीं। विकास दुबे को ही लें, तो उसकी पैठ हर राजनीतिक दल में होती थी। इसी वजह से आज तक उसे नहीं पकड़ा गया। विकास दुबे कई राजनीतिक दलों में भी रहा है। बिठूर के शिवली थाना क्षेत्र के बिकरु गांव का रहने वाला है। उसने अपने घर को किले की तरह बना रखा है। यहां उसकी मर्जी के बिना घुस पाना बहुत ही मुश्किल है। विकास दुबे इतना दबंग रहा है कि उसे किसी कानून का डर नहीं है। 2001 में विकास ने थाने के अंदर घुसकर बीजेपी के दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री संतोष शुक्ला की हत्या कर दी थी। संतोष शुक्ला हत्याकांड ने पूरे प्रदेश में हड़कंप मचा दिया था लेकिन पुलिस से लेकर कानून तक उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया। विकास दुबे ने करोड़ रुपए की संपत्ति बनाई है। वह जमीनों के अवैध कब्जे और गैर कानूनी तरीके से जमीनों को हड़पने का माहिर है। उसके कई ईंट भट्टे और कॉलेज हैं। विकास दुबे का घर किले जैसा है। घर के चारों तरफ बड़ी-बड़ी दीवारें हैं। इन दीवारों के अंदर झांकना आसान नहीं है। ऊंची दीवारों के ऊपर कंटीले तार लगे हैं। बाहर वाला आसानी से नहीं जान सकता कि किस तरफ क्या है। विकास दुबे किसी फिल्मी खलनायक से कम नहीं है। बताया जा रहा है कि थाने में घुसकर राज्यमंत्री की हत्या का आरोप लगने के बावजूद भी उसका कुछ नहीं हुआ। बताया जाता है कि इतनी बड़ी वारदात होने के बाद भी किसी पुलिसवाले ने विकास के खिलाफ गवाही नहीं दी। विकास दुबे को 2000 में कानपुर के शिवली थानाक्षेत्र स्थित ताराचंद इंटर कॉलेज के सहायक प्रबंधक सिद्धेश्वर पांडेय की हत्या के मामले में भी विकास दुबे को नामजद किया गया था। इसी साल उसके ऊपर रामबाबू यादव की हत्या के मामले में साजिश रचने का आरोप लगा था। यह साजिश उसने जेल से बैठकर रची थी। 2004 में एक केबल व्यवसाई दिनेश दुबे की हत्या के मामले में भी विकास का नाम आया था। 2013 में भी विकास दुबे ने हत्या की एक बड़ी वारदात को अंजाम दिया था। विकास दुबे जेल में रहने के दौरान ही चुनाव लड़ा था और शिवराजपुर से नगर पंचयात का चुनाव जीता भी था। बताया जा रहा है कि बीएसपी के कार्यकाल में उसकी बीएसपी में कड़ी पैठ थी। जेल से ही वह हत्याएं समेत कई वारदातों को अंजाम दिलवा देता था।

चीनी ‘एप्स’ पर प्रतिबंध का अर्थ
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सरकार ने घोषणा की है कि उसने चीन के 59 मोबाइल एप्लीकेशंस (मंचों) पर प्रतिबंध लगा दिया है। उसका कहना है कि इन चीनी मोबाइल मंचों का इस्तेमाल चीनी सरकार और चीनी कंपनियां जासूसी के लिए करती होंगी। इनका इस्तेमाल करनेवाले लोगों की समस्त गोपनीय जानकारियां चीनी सरकार के पास चली जाती होंगी। इतना ही नहीं, इन मंचों से चीनी कंपनियां हर साल अरबों रु. भी कमाकर चीन ले जाती हैं। सरकार ने इन पर प्रतिबंध लगा दिया, यह अच्छा किया। टिक टोक जैसे मंचों से अश्लील और अभद्र सामग्री इतनी बेशर्मी से प्रसारित की जा रही थी कि सरकार को इस पर पहले ही प्रतिबंध लगा देना चाहिए था। मुझे आश्चर्य है कि भारतीय संस्कृति की पुरोधा यह भाजपा सरकार इन चीनी प्रचार-मंचों को अब तक सहन क्यों करती रही ? जो लोग इस चीनी ‘एप्स’ को देखते हैं, उन्होंने मुझे बताया कि हमारे नौजवानों को गुमराह करने में इनकी पूरी कोशिश होती है। बांग्लादेश और इंडोनेशिया- जैसे कई देशों ने इन चीनी मोबाइल मंचों पर काफी पहले से प्रतिबंध लगा रखा है। असली बात तो यह है कि चीन की तथाकथित साम्यवादी सरकारों के पास आज न तो कोई विचारधारा बची है और न ही उन्हें अपनी प्राचीन संस्कृति पर गर्व है। चीन अब अमेरिका की नकल पर शुद्ध उपभोक्तावादी राष्ट्र बन गया है। पैसा ही उसका भगवान हैं। डालरानंद ही ब्रह्मानंद है। बाकी विचारधारा, सिद्धांत, आदर्श, परंपरा और नैतिकता- जैसी चीजें चीन के लिए सब मिथ्या है। चीनी चीज़ों से भारत में भी चीन की इन्ही प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिल रहा है। जरुरी यह है कि इन पर तो रोक लगे ही, चीन की ऐसी चीज़ों पर भी एकदम या धीरे-धीरे प्रतिबंध लगना चाहिए, जो गैर-जरुरी हैं, जैसे खिलौने, कपड़े, जूते, सजावट का सामान और रोजमर्रा के इस्तेमाल की कई छोटी-मोटी चीजें। इससे भारत में आत्म-निर्भरता बढ़ेगी और विदेशी मुद्रा भी बचेगी। लेकिन जैसा कि केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी ने कहा है, आंख मींचकर सभी चीनी चीज़ों का हम बहिष्कार करेंगे तो हमारे सैकड़ों कल-कारखाने ठप्प हो जाएंगे और लाखों लोगों को बेरोजगार होना पड़ेगा। इन मोबाइल एप्लीकेशंस के बंद होने का बड़ा राजनयिक फायदा भारत सरकार को इस वक्त यह भी हो सकता है कि चीन पर जबर्दस्त दबाव पड़ जाए। चीनी सरकार को यह संदेश पहुंच सकता है कि यदि उसने गलवान घाटी के बारे में भारत के साथ विवाद बढ़ाया तो फिर यह तो अभी शुरुआत है। बाद में 5 लाख करोड़ रु. का भारत-चीनी व्यापार भी खतरे में पड़ सकता है।

वर्तमान में फ़र्ज़ी डॉक्टरों की भरमार से भी -स्वास्थ्य लाभ!
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
भारत देश में तीन बातें बहुत सामान्य हैं। पहला हर समय चाय का समय रहता हैं, दूसरा प्रत्येक भारतीय डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, सलाहकार और तीसरा हर जगह टॉयलेट करने की सुविधा। एक बात बहुत अच्छी हैं वकालत में, उसमे कोई भी वकील बिना सनद और जिला अधिवक्ता परिषद् में पंजीयन बिना न्यायालय में दलील नहीं दे सकता चाहे वकील का मुंशी, बहुत ज्ञानवान हैं, इसके बाद वह वकील अन्य जिले में रहने लगता हैं तो उस जिले की परिषद्ब में पंजीयन कराता भी हैं । इसी प्रकार भवन सड़क का प्रमाणीकरणअधिकृत अभियंता द्वारा किया जाता हैं और वह मान्य होता हैं,
हमारे देश में इंडियन मेडिकल कौंसिल, सेंट्रल कौंसिल ऑफ़ इंडियन मेडिसिन और होमियोपैथी कौंसिल ऑफ़ इंडिया, इनमे जो पंजीकृत होते हैं वे ही चिकित्सक चिकित्सा करने के लिए अधिकृत होते हैं। पर हमारे देश में चिकित्सा के मामलों में इनके अलावा नेचुरोपैथी, कलर थेरेपी, म्यूजिक थेरेपी, टच थेरेपी, स्टोन थेरेपी, जल थेरेपी, जादू टोना, ज्योतिषी आदि न जाने कितनी पद्धतियां चिकित्सा में काम कर रही हैं और ये करती रहेंगी, इनको कोई भीप्रतिबन्धित नहीं कर सकता कारण ये भावनाओं, विश्वास पर आधारित हैं।
इसका मूल कारण क्या हो सकता हैं ?आबादी के अनुपात में पंजीकृत चिकित्सकों की संख्या आटे में नमक के समान हैं। सरकारी चिकित्सकों की संख्या जितनी भी हैं उनका ९०% शहरी/महानगरों में हैं, और मात्र १० प्रतिशत रहते भी हैं तो वे मुख्यालय में नहीं रहते। मुख्यालय पर न रहने के कारण उनकी प्रतिष्ठा उतनी नहीं रहती जितनी चौबीस घंटे लगातार गांव या शहर में रहने वाले फ़र्ज़ी तथाकथित डॉक्टरों की होती हैं, उसका मुख्य कारण लगातार उनकी उपलब्धता और आकस्मिक चिकित्सा देने में तत्पर। यदि फ़र्ज़ी चिकित्सक न हो और सरकारी चिकित्सकों के भरोसे वहां की जनता रहे तो बहुत सीमा तक आबादी नियंत्रण न करना पड़ेगी सरकार को कारण चिकित्सा के आभाव में मौतें बहुत होंगी। सरकारी सुविधाओं के अलावा सरकारी चिकित्सक जो निजी चिकित्सा अधिकतम करते हैं वे ही सफल हुए अन्यथा उनको भी कोई नहीं पूछता। निजी चिकित्सक जो पंजीकृत होते हैं वे अपने लाभ के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं फ़र्ज़ी चिकित्सक बनते कैसे हैं ?सबसे पहले वे कहीं पर जाकर मामूली इलाज़ का तरीका सीखते हैं, उसके बाद अपने गांव में स्थापित होकर सेवा देते हैं, केस बिगड़ने पर उनका सरकारी या निजी चिकित्सकों से संपर्क होने से वे उनका बचाव करते हैं, वह फ़र्ज़ी डॉक्टर उनके लिए दूध देने वाली गाय का काम करती हैं, उसके बाद औषधि विक्रेता भी उनको ज्ञान देते हैं क्योकि उनकी औषधि बिक्री होती हैं और बाकी मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव उनको पारंगत कर देते हैं। फ़र्ज़ी चिकित्सक का समाज में बहुत इज़्ज़तदार स्थान होने से कोई उनके खिलाफ कुछ नहीं बोलता और यदि यहाँ तक की राजनेता भी उनका सहारा लेते हैं।
ऐसा नहीं की सभी फ़र्ज़ी चिकित्सक अयोग्य होते हैं। काबुल में घोड़े ही घोड़े होते हैं, गधे नहीं होते। बहुत होते हैं। आज मेडिकल कॉलेज से निकलने वाले चिकित्सकों को आज भी ब्लड प्रेशर, इंजेक्शन और यहाँ तक की ग्लूकोस की ड्रिप लगाते नहीं बनती। बड़े बड़े डी एम्, एम् डी इमरजेंसी में इंजेक्शन लगवाने कम्पाउण्डर पर आश्रित होते हैं। खैर यह सब बातें अलग हैं।
मैं फ़र्ज़ी चिकित्सको के बहुत खिलाफ हूँ पर उनका क्या विकल्प हैं। आज शहरों, महानगरों में डॉक्टर्स, नर्सिंग होम्स, सरकारी अस्पतालों की भीड़ और सुविधाएँ हैं पर क़स्बा, गांव और दूरस्थ अंचलों में को उन देशवासियों की सेवा करने कौन जा रहा हैं.आज चिकित्सा लाक्षणिक हो रही हैं, किस कारण से रोग हो रहे उस पर कोई मेहनत नहीं करना चाहता। आजकल आप अपनी जाँच रिपोर्ट के आधार पर चिकित्सा ले सकते हैं, मरीज़ को देखने की जरुरत नहीं हैं। जांच रिपोर्ट किसी विशेष स्थान की होना चाहिए जो विश्वनीय हो क्योकि उसमे उनकी सुविधा शुल्क जुड़ा रहता हैं।
मैं चाहता हूँ सब फ़र्ज़ी चिकित्सको पर प्रतिबन्ध लगे और इसकी जिम्मेदारी मुख्य स्वास्थ्य और चिकित्सा अधिकारी और जिला प्रशासन की हैं। क्या उन सक्षम अधिकारीयों के पास इतना समय हैं कार्यवाही करने की। यदि उनके द्वारा पच्चीस -पचास प्रकरण बनादिये तो समझलो उनकी सेवा निवृति कचहरी में बीतेंगी, इसके लिए उनके द्वारा प्रभावकारी कार्यवाही न करके लाओ और आदेश ले जाओं। अधिकांश मामले सुविधा शुल्क के आधार पर निपटाते हैं या निपटते हैं।
सरकारों को चिकित्सा क्षेत्र में गुणवत्ता चाहिए हैं तो सभी पद्धतिओं को सम्मान दे, शिक्षा व्यवस्था समुचित हो और उन छात्रों का भविष्य अन्धकारमय न हों। नौकरी की व्यवस्था सुनिश्चित हो,आज सभी पद्धतियों के स्नातक बड़े बड़े प्राइवेट हॉस्पिटल, नर्सिंग होम्स में कम्पाउंडर का कार्य निष्पादित कर रहे हैं। कुछ शिक्षा का स्तर, कुछ डोनेशन के द्वारा भर्ती होना और अपने ऊपर आत्मविश्वास की कमी।
एलॉपथी चिकित्सा पद्धति अन्य पद्धतियों से चिकित्सा करने में सरल हैं। क्योकि एंटीबायोटिक्स आदि रामबाण हैं जिसको देने से नुक्सान के साथ लाभ भी होता हैं। आज बड़े बड़े चिकित्सकों की रोगी पर्ची सिद्धांतों के विपरीत होती हैं और उनको मान्यता हैं.कारण बड़े और पंजीकृत हैं।
इस देश में क्या पूरे विश्व में फ़र्ज़ी डॉक्टर्स का इलाज़ नहीं हैं, यह बहुत बड़ा असाध्य रोग हैं, और असाध्याने प्रति नास्ति चिंता।
विषय अत्यंत विवादित हैं और हर वर्ग अपने अपने तर्क देकर अपने को स्थापित करने में सक्षम हैं, पर इसका निदान न होने से इस देश में सब चलता हैं और चलेगा। इस विषय पर खुले मन से निष्पक्ष दृष्टिकोण रखकर निदान और चिकित्सा ढूढ़नी चाहिए। सबके विचारो का स्वागत हैं क्योकि स्वास्थ्य हमारे लिए बहुत संवेदनशील मामला होता हैं।

बुखार और आपातकाल सूचना देकर नहीं आते,लक्षणों से ही समझना पड़ेगा
श्रवण गर्ग
कुछ लोगों को ऐसा क्यों महसूस हो रहा है कि देश में आपातकाल लगा हुआ है और इस बार क़ैद में कोई विपक्ष नहीं बल्कि पूरी आबादी है? घोषित तौर पर तो ऐसा कुछ भी नहीं है। न हो ही सकता है। उसका एक बड़ा कारण यह है कि पैंतालीस साल पहले जो कुछ हुआ था उसका विरोध करने वाले जो लोग तब विपक्ष में थे उनमें अधिकांश इस समय सत्ता में हैं। वे निश्चित ही ऐसा कुछ नहीं करना चाहेंगे। हालाँकि इस समय विपक्ष के नाम पर देश में केवल एक परिवार ही है। इसके बावजूद भी आपातकाल जैसा क्यों महसूस होना चाहिए ! कई बार कुछ ज़्यादा संवेदनशील शरीरों को अचानक से लगने लगता है कि उन्हें बुखार है। घरवाले समझाते हैं कि हाथ तो ठंडे हैं फिर भी यक़ीन नहीं होता। थर्मामीटर लगाकर बार-बार देखते रहते हैं। आपातकाल को लेकर इस समय कुछ वैसी ही स्थिति है।
देशअपने ही कारणों से ठंडा पड़ा हुआ हो सकता है पर कुछ लोगों को महसूस हो रहा है कि आपातकाल लगा हुआ है क्योंकि उन्हें लक्षण वैसे ही दिखाई पड़ रहे हैं। लोगों ने बोलना,आपस में बात करना, बहस करना ,नाराज़ होना सबकुछ बंद कर दिया है। किसी अज्ञात भय से डरे हुए नज़र आते हैं। मास्क पहने रहने की अनिवार्यता ने भी कुछ न बोलने का एक बड़ा बहाना पैदा कर दिया है। संसद-विधानसभा चाहे नहीं चल रही हो पर राज्यों में सरकारें गिराई जा रही हों ,पेट्रोल-डीज़ल के दाम हर रोज़ बढ़ रहे हों, अस्पतालों में इलाज नहीं हो रहा हो, किसी भी तरह की असहमति व्यक्त करने वाले बंद किए जा रहे हों और उनकी कहीं सुनवाई भी नहीं हो रही हो—जनता इस सब के प्रति तटस्थ हो गई है। वह तो इस समय अपनी ‘प्रतिरोधक’ क्षमता बढ़ाने में लगी है जो कि आगे सभी तरह के संकटों में काम आ सके।
अपवादों को छोड़ दें तो मीडिया की हालत तो असली आपातकाल से भी ज़्यादा ख़राब नज़र आ रही है। वह इस मायने में कि आपातकाल में तो सूचना और प्रसारण मंत्री विद्या चरण शुक्ल का मीडिया पर आतंक था पर वर्तमान में तो वैसी कोई स्थिति नहीं है। जैसे-जैसे कोरोना के ‘पॉज़िटिव’मरीज़ बढ़ते जा रहे हैं वैसे-वैसे मीडिया का एक बड़ा वर्ग और ज़्यादा ‘पॉज़िटिव’ होता जा रहा है। आपातकाल के बाद आडवाणी जी ने मीडिया की भूमिका को लेकर टिप्पणी की थी कि :’आपसे तो सिर्फ़ झुकने के लिए कहा गया था ,आप तो रेंगने लगे। ’ आडवाणी जी तो स्वयं ही इस समय मौन हैं,उनसे आज के मीडिया की भूमिका को लेकर कोई भी प्रतिक्रिया कैसे माँगी जा सकती है?
हम ऐसा मानकर भी अगर चलें कि देश के शरीर में बुखार जैसा कुछ नहीं है केवल उसका भ्रम है तब भी कहीं तो कुछ ऐसा हो रहा होगा जो हमारे लिए कुछ बोलने और नाराज़ होने की ज़रूरत पैदा करता होगा ! उदाहरण के लिए करोड़ों प्रवासी मज़दूरों की पीड़ाओं को ही ले लें ! उसे लेकर व्यवस्था के प्रति जनता का गुमसुम हो जाना क्या दर्शाता है? किसकी ज़िम्मेदारी थी उनकी मदद करना? कभी ज़ोर से पूछा गया क्या? सोनू सूद की जय-जयकार में ही जो कुछ व्यवस्था में चल रहा है उसके प्रति प्रसन्नता ढूँढ ली गई?
सर्वोदय आंदोलन के एक बड़े नेता से जब पूछा कि वे लोग जो जे पी के आंदोलन में सक्रिय थे और आपातकाल के दौरान जेलों में भी बंद रहे इस समय प्रतिमाओं की तरह मौन क्यों हैं? क्या इस समय वैसा ही ‘अनुशासन पर्व’ मन रहा है जैसी कि व्याख्या गांधी जी के प्रथम सत्याग्रही विनोबा भावेजी ने आपातकाल के समर्थन में 1975 में की थी? वे बोले : ‘कोई कुछ भी बोलना नहीं चाहता। या तो भय है या फिर अधिकांश संस्थाएँ सरकारी बैसाखियों के सहारे ही चल रही हैं। ’ किसी समय के ‘कार्यकर्ता’ इस समय ‘कर्मचारी’ हो गए हैं। सत्तर के दशक के अंत में जब कांग्रेस में विभाजन का घमासान मचा हुआ था ,मैंने विनोबा जी के पवनार आश्रम (वर्धा) में उनसे पूछा था देश में इतना सब चल रहा है ‘बाबा’ कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं देते? उन्होंने उत्तर में कहा था :’ क्या चल रहा है? क्या सूरज ने निकलना बंद कर दिया है या किसान ने खेतों पर जाना बंद कर दिया? जिस दिन यह सब होगा बाबा भी प्रतिक्रिया दे देंगे।’
आपातकाल के दिनों और उसके ख़िलाफ़ किए गए संघर्ष का स्मरण करते रहना और उस समय के लोगों की याद दिलाते रहना इसलिए ज़्यादा ज़रूरी हो गया है कि इस समय दौर स्थापित इतिहासों को बदलकर नए सिरे से लिखे जाने का चल रहा है। आपातकाल के जमाने की कहानियों को किसी भी पाठ्यपुस्तक में नहीं बताया जाएगा। गांधी की प्रतिमाएँ इसलिए लगाई जाती रहेंगी क्योंकि दुनिया में हमारी पहचान ही उन्हीं की छवि से है। आज की सत्ता के लिए गांधी का नाम एक राजनीतिक मजबूरी है ,कोई नैतिक ज़रूरत नहीं। गांधी के आश्रम भी इसीलिए ज़रूरी हैं कि हम पिछले सात दशकों में ऐसे और कोई तीर्थस्थल नहीं स्थापित कर पाए। डर इस बात का नहीं है कि हमें बुखार नहीं है फिर भी बुखार जैसा लग रहा है। डर इस बात का ज़्यादा है कि सही में तेज बुखार होने पर भी हम कहीं बर्फ़ की पट्टियाँ रख-रखकर ही उसे दबाने में नहीं जुट जाएँ। जब बहुत सारे लोग ऐसा करने लगेंगे तब मान लेना पड़ेगा कि आपातकाल तो पहले से ही लगा हुआ था। बुखार और आपातकाल दोनों ही सूचना देकर नहीं आते। लक्षणों से ही समझना पड़ता है। वैसे भी अब किसी आपातकाल की औपचारिक घोषणा नहीं होने वाली है। सरकार भी अच्छे से जान गई है कि दुनिया के इस सबसे लम्बे तीन महीने के लॉक डाउन के दौरान एक सौ तीस करोड़ नागरिक स्वयं ही देश की ज़रूरतों के प्रति कितने समझदार और अपने कष्टों को लेकर कितने आत्मनिर्भर हो गए हैं!

नेहरू युग में एक बार फिर लौटने की विवशता
सनत कुमार जैन
जून माह में आईएमएफ ने जो रिपोर्ट जारी की है। उसके अनुसार भारत की विकास दर दुनिया के बड़े राष्ट्रों में 10वें नंबर पर होगी। कोरोना संक्रमण के बाद जिस तरीके के हालात गरीब एवं विकासशील देशों में देखने को मिल रहे हैं। उसके बाद आईएमएफ ने अपनी रिपोर्ट में एक बार फिर सरकारों को ज्यादा से ज्यादा पैसा गरीबों तक पहुंचाने एवं उद्योगपतियों, विशेष रूप से छोटे उद्योगों एवं किसानों को सब्सिडी देने की वकालत की है। उल्लेखनीय है अप्रैल माह में आईएमएफ ने भारत के बारे में यह कहा था ‎कि कोरोना का ज्यादा असर भारत पर नहीं पड़ेगा किंतु जून माह में जो नई रिपोर्ट जारी की है। उसमें भारत में कोरोना संक्रमण के बाद जो लॉकडाउन लागू किया गया है, उसका व्यापक असर पड़ने की बात कहते हुए बड़े देशों की सूची में इसे दसवें नंबर पर रखा है।
1993 के बाद से जब से वैश्विक व्यापार संधि डब्ल्यूटीओ के समझौते पर सारी दुनिया के देशों को एक मंच में लाने का प्रयास किया जा रहा था। तब सब्सिडी खत्म करने और निजी क्षेत्र को स्वतंत्र तरीके से काम करने की वकालत की जा रही थी। डब्ल्यूटीओ के समझौते में कर्ज लेकर तेजी से विकास करने की अवधारणा पर बल दिया गया था। विश्व बैंक एवं अन्य वैश्विक संगठनों ने भी निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र में व्यापार बढ़ाने के लिए नियम कानूनों में बदलाव करते हुए एकरूपता लाने की बात कही गई थी। उसके बाद से भारत में भी कानूनों में बदलाव मिश्रित अर्थव्यवस्था के स्थान पर निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने, सब्सिडी खत्म करने, सरकारी क्षेत्र से संरक्षण दिए जाने पर रोक लगा दी गई थी।
वर्तमान स्थिति में अब आईएमएफ जैसी संस्था एक बार फिर जवाहरलाल नेहरू की मिश्रित अर्थव्यवस्था की पैरवी करते हुए विकासशील देशों को गरीबों किसानों और छोटे-छोटे व्यापारियों के संरक्षण के लिए सरकार को मदद देने के लिए सुझाव दे रही हैं। भारत जैसे देश ‎‎पिछले 20 वर्षों में भारी कर्ज में डूब गए हैं। राज्य सरकारें नगरीय संस्थानों के ऊपर पिछले 15 वर्षों में बड़ी तेजी के साथ कर्ज बढ़ा है। कोरोना संक्रमण तथा वैश्विक आर्थिक मंदी में सबसे ज्यादा असर आम जनता पर पड़ रहा है। केंद्र एवं राज्य सरकारों की आय घट रही हैं। आम आदमी के पास ना तो कर्ज चुकाने के लिए पैसे हैं, ना ही खर्च करने के लिए पैसे हैं। ऐसी स्थिति में आईएमएफ जैसी वैश्विक संस्था एक बार फिर मिश्रित अर्थव्यवस्था को लागू कर अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने का सुझाव दे रही हैं। पिछले 6 वर्षों में जवाहरलाल नेहरू के बारे में यह कहा जा रहा था कि उन्होंने देश का भट्टा बैठा दिया था। उनकी मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति खराब थी। लेकिन संकेट के अब इस दौर में वैश्विक स्तर पर एक बार फिर सरकार से कहा जा रहा है कि सरकारें गरीबों, बेरोजगारों, किसानों और छोटे व्यापारियों की आर्थिक सहायता करके विकास को एक बार फिर से गतिशील बनाने की दिशा में काम करें। आईएमएफ द्वारा जो रिपोर्ट जून माह में जारी की गई है। उसके बाद भारत सरकार किस तरह की नीति अख्तियार करती है, यह देखना होगा। भारत में स्वतंत्रता के पश्चात मिश्रित अर्थव्यवस्था जिसमें पूंजीवाद और समाजवाद के बीच समन्वय बनाते हुए बचत की आर्थिक व्यवस्था से देश के विकास को नई दिशा दी थी। उस समय भारत को कर्ज भी नहीं मिलता था। जो भी विकास कार्य हुआ वह भारत के आम आदमी की बचत के कारण हुआ। इस बीच सार्वजनिक उपक्रमों के माध्यम से सरकार ने बड़ी मात्रा में रोजगार भी उपलब्ध कराया। सार्वजनिक क्षेत्र के बहुत बड़े बड़े काम सार्वजनिक उपक्रमों के माध्यम से हुए, लेकिन पिछले 15 वर्षों में निजीकरण के इस दौर में सार्वजनिक उपक्रमों को खत्म करने का काम किया गया। वहीं किसानों, मजदूरों एवं छोटे व्यापारियों की सहायता केंद्र एवं राज्य सरकारों ने बहुत कम कर दी थी। खाद, बीज, डीजल की सब्सिडी खत्म कर दी गई। उत्पादन महंगा हो गया। टैक्स लगातार बढ़ते चले गए। आम आदमी कर्ज में फंसता चला गया। अब जो आर्थिक स्थिति हैं, उसमें विकास दर को बढ़ाने के लिए एकमात्र विकल्प जवाहरलाल नेहरू द्वारा अपनाई गई आर्थिकी को वर्तमान भारत सरकार को भी स्वीकार करते हुए आगे बढ़ना होगा अन्यथा स्थिति और भी खराब होगी।

भाजपा और कांग्रेस का आपसी दंगल
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
यह हमारे लोकतंत्र की मेहरबानी है कि इस संकट की घड़ी में चीन का मुकाबला करने की बजाय हमारे राजनीतिक दल एक-दूसरे के साथ दंगल में उलझे हुए हैं। टीवी चैनलों पर जैसी अखाड़ेबाजी हमारे राजनीतिक दलों के प्रवक्ता करते रहते हैं, वह उन टीवी चैनलों का स्तर तो गिराती ही है, हमारी जनता को भी गुमराह करती रहती है। जरा हम चीन की तरफ देखें। क्या गलवान घाटी की खूनी मुठभेड़ पर वहां नेताओं, टीवी चैनलों या अखबारों के बीच वैसा ही दंगल चलता है, जैसा हमारे यहां चल रहा है ? इसका मतलब यह नहीं कि सरकार के हर कदम का आंख मींचकर समर्थन किया जाए या उसकी भयंकर भूलों की अनदेखी कर दी जाए लेकिन आजकल कांग्रेस के नेता भाजपा के नेताओं, खासकर प्रधानमंत्री के लिए जिस तरह के शब्दों का प्रयोग करते हैं, वैसा करके वे अपना ही अपमान करवाते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहनसिंह ने मोदी को पत्र लिखकर उसमें सावधानी रखने का जो सुझाव दिया, वह ठीक ही था लेकिन सोनिया गांधी और राहुल गांधी जिस तरह से चीन को जमीन सौंपने के आरोप मोदी पर लगा रहे हैं, वे सर्वथा अनुचित हैं। कोई कमजोर से कमजोर भारतीय प्रधानमंत्री जो हिमाकत नहीं कर सकता, उसे मोदी पर थोप कर कांग्रेसी नेता किसे खुश करना चाहते हैं ? गलवान की स्थानीय और तात्कालिक फौजी मुठभेड़ को भस्मासुरी रंग में रंगना और जनता को उकसाना आखिर हमें कहां ले जाएगा ? क्या कांग्रेसी नेता यह चाहते हैं कि भारत और चीन के बीच युद्ध हो जाए ? क्या ऐसा होना भारत के हित में होगा ? यदि ऐसा न भी हो तो क्या जनता को भड़काना ठीक होगा ? देश कोरोना से लड़ेगा या चीन से ? भारत और चीन का मामला अभी बातचीत से सुलझ रहा है तो उसे क्यों नहीं सुलझने दिया जाए ? यदि कांग्रेस भाजपा पर प्रहार करेगी तो भाजपाई भी गड़े मुर्दे उखाड़ने में संकोच क्यों करेंगे ? वे नेहरु सरकार को डाॅ. लोहिया की भाषा में राष्ट्रीय शर्म की सरकार कहेंगे और इंदिरा गांधी की सारी उपलब्धियों को ताक पर रखकर उन्हें आपात्काल की ‘काली’ कहेंगे और गरीबी हटाओ वाली ‘झांसे की रानी’ कहेंगे। तात्कालिक मुद्दों पर घटिया बहस छेड़कर हम भारत की नई पीढ़ियों को गलत मार्ग पर ठेलने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा, दोनों के नेता आपस में मिलकर सार्थक संवाद क्यों नहीं करते? दोनों यदि इसी तरह सार्वजनिक दंगल करते रहे तो माना जाएगा कि वे कुल मिलाकर चीन के हाथ मजबूत कर रहे हैं।

आपातकाल लोकतंत्र के लिए काला अध्याय
सुरेन्द्र द्विवेदी
आजादी की लड़ाई में कांग्रेस के नेतृत्व में लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था और 1947 में देश आजाद हुआ और लोकतंत्र की स्थापना हुई। आजादी के 28 वर्ष में ही हमारे लोकतंत्र की जड़े कमजोर हो गई और सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की सरकार ने अपनी आंतरिक कलह के कारण देश को तानाशाही की अंधेरी गुफा में ढकेल दिया। 25 जून 1975 की मध्य रात्रि को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर नागरिक स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया था। आपातकाल लगाने का यह गैर लोकतांत्रिक कार्य उसी पार्टी कांग्रेस ने किया था जो देश को आजादी दिलाने के आंदोलन में अग्रणी भूमिका में शामिल थी।
आज भारत के नागरिकों को आपातकाल की याद बहुत धुंधली ही होगी। आपातकाल आज से 45 वर्ष पूर्व श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपना प्रधानमंत्री पद बचाने के लिए लगाया था। आपातकाल की पृष्ठभूमि को समझना जरूरी हेै। 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने श्रीमती गांधी के लोकसभा चुनाव को अवैध घोषित कर दिया था। उन पर प्रधानमंत्री रहते हुए लोकसभा चुनाव में गलत तरीके से जीतने का आरोप था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री जगमोहन लाल सिन्हा ने निर्णय दिया था कि श्रीमती गांधी ने चुनाव अनुचित तरीके से जीता था। समाजवादी नेता श्री राजनारायण ने यह चुनाव याचिका दायर की थी।
कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र समाप्त हो गया था। श्रीमती इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी इसलिए वे अपने आपको पार्टी से ऊपर समझने लगी थी। न्यायालय के निर्णय के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र नहीं दिया और तत्कालीन राष्ट्रपति पर दबाव डालकर आपातकाल की घोषणा करवा दी। आपातकाल की पृष्ठभूमि को कम शब्दों में समेटना बहुत कठिन है। सर्वोदयी नेता की जयप्रकाश नारायण के समग्र क्रंांति के आंदोलन से भी तत्कालीन सरकार भयभीत हो गई थी।
25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा के साथ ही सभी विरोधी दलांे के राष्ट्रीय स्तर से लेकर, प्रदेश, जिला और नगर तथा ग्रामीण स्तर तक के नेता और कार्यकर्ताओं को बिना किसी अपराध के जेलों में बंद कर दिया गया था। उनके नागरिक अधिकार समाप्त कर दिये गये थे। न्यायालयों से भी अधिकार छीन लिये गये थे। इससे न्यायालयों में भी गिरफ्तारी के विरूद्ध सुनवाई नहीं हो सकती थी। श्रीमती गांधी ने लोकसभा का कार्यकाल भी अनुचित तरीके से एक वर्ष के लिए बढ़ा लिया था।
आपातकाल के दौरान् जनसंध, समाजवादी दलों, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सहित सभी विरोधी दलांे के लगभग एक लाख 75 हजार नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेलों में बंद किया गया था। जनसंघ और रा. स्व. संघ के कार्यकर्ताओं के साथ पूरे देश में सबसे ज्यादा जुल्म-ज्यादतिया सत्तारूढ़ दल के इशारे पर की गई। जेलों में बंद कार्यकर्ताओं के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। आजादी के आंदोलनों में अंग्रेजों ने जितने अत्याचार किये थे आपातकाल में उससे भी ज्यादा दोहराये गये।
देश में आपातकाल लगाने के साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समाप्त कर दी गई थी। समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लागू कर दी गई थी। नेताओं और कार्यकर्ताओं पर होने वाले अत्याचार की कहीं खबर भी नहीं छपती थी। सभी समाचार पत्रो मेें केवल सरकार द्वारा दी जाने वाली आपातकाल के पक्ष की ही खबरें छपती थी। देश के अनेक समाचार पत्रों को बंद कर दिया गया था। देश के कई पत्रकारों को भी गिरफ्तार कर जेलों में बंद कर दिया गया था। मैं स्वयं युगधर्म, जबलपुर में पत्रकार था। मुझे भी मीसा में बंद किया गया था।
श्रीमती गांधी ने जनवरी 1977 में खुफिया जानकारी एकत्रित कराई की इस समय अगर लोकसभा के चुनाव करायें जायें तब सत्तारूढ़ दल कांग्रेस की जीत की स्थिति क्या रहेगी। पूरा खुफिया तंत्र भी उस समय भयभीत था। कोई भी खुफिया तंत्र श्रीमती गांधी को सही स्थिति बताना नहीं चाहता था। गुप्तचर ब्यूरों ने भयवश श्रीमती गांधी को बताया कि चुनाव में सत्तारूढ़ दल विजयी होगा। गुप्तचर सूचना को सही मानते हुए लोकसभा के चुनाव कराये गए। कुछ बड़े नेताओं को छोड़ा गया और कुछ नेताओं ने जेल में रहकर चुनाव लडा। आपातकाल की जुल्म ज्यादतियों से आम जनता के मन का गुस्सा लोकसभा चुनाव में फूट पड़ा। जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया। सभी दलों से मिलकर बनी जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला। उत्तर भारत की एक लोकसभा सीट छोड़कर सभी सीटें जनता पार्टी ने जीती। श्री मोरार जी देसाई के नेतृत्व में सरकार बनी और 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त करने की घोषणा की गई। जेलों में बंद नेता और कार्यकर्ताओं को 21 मार्च 1977 के बाद जेलों से रिहा गया।

भारत और चीन अब आगे की सुध लें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत और चीन के कोर कमांडरों की बैठक में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी सेनाओं को पीछे हटाने पर सहमति व्यक्त की है। यह बैठक 10-11 घंटे तक चली। इस बैठक में क्या-क्या बातें तय हुई हैं, यह अभी विस्तार से पता नहीं चला है। कौन कितना पीछे हटेगा, कहां-कहां से हटेगा, हटने के बाद दोनों सेनाओं के बीच कितने दूरी खाली रखी जाएगी और जब दोनों सेना के लोग आपस में बात करेंगे तो वे हथियारबंद होंगे या नहीं, इन सब प्रश्नों के जवाब धीरे-धीरे सबके सामने आ जाएंगे। एक बात तो यह हुई। दूसरी बात यह हुई कि भारत, रुस और चीन के विदेश मंत्रियों की बैठक ‘इंटरनेट’ पर हुई। इस बैठक में हमारे टीवी चैनलों ने हमारे विदेशमंत्री जयशंकर का भाषण प्रचारित किया। इस भाषण में भी जयशंकर ने चीन पर कोई सीधा हमला नहीं बोला लेकिन यह जरुर कहा कि राष्ट्रों को आपसी संबंधों में अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करना चाहिए। रुस ने पहले ही कह दिया था कि इस त्रिपक्षीय संवाद में कोई भी द्विपक्षीय मामला नहीं उठेगा। यदि जयशंकर उसे उठा देते तो उससे यह संदेश निकलता कि भारत बहुत भड़का हुआ है और वह चीन से टक्कर लेने के लिए कमर कसे हुए हैं। ऐसा नहीं हुआ। शायद कल भी ऐसा नहीं होगा। हमारे रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ऐसी कोई बात शायद ही बोलेंगे, जो चीन पर शाब्दिक हमला माना जाए। वे मास्को गए हैं, दूसरे महायुद्ध में रुस की विजय के 75 वर्षीय समारोह में। वहां चीन के विदेश मंत्री के साथ भी वे कोई कहा-सुनी नहीं करेंगे। शायद उनकी बातचीत तक न हो। इन तीनों घटनाओं से आप क्या नतीजा निकालते हैं ? क्या यह नहीं कि हमारे 20 जवानों की हत्या पर भारत सरकार अपना आपा नहीं खो रही है ? उसका रवैया काफी सधा हुआ है। यह हत्याकांड एक तात्कालिक और स्थानीय फौजी घटना थी। इसमें दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की भूमिका रही होगी, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं। 15 जून की रात वह हत्याकांड हुआ और 16 जून की सुबह दोनों देशों के फौजी अफसर बात करने बैठ गए, फिर हमारे विदेश मंत्री ने चीनी विदेश मंत्री को फोन करने की पहल की, मोदी ने अपने बहुदलीय संवाद में चीन के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं बोला और अब दोनों तरफ के कमांडर बात कर रहे हैं। लेकिन हमारे कुछ नादान एंकर इन सब सकारात्मक कदमों को इतने उत्तेजक ढंग से पेश कर रहे हैं कि एक तो हमारी सीधी-सादी जनता क्रोधित हो रही है और दूसरी तरफ हमारे राजनीतिक दल एक-दूसरे पर मुक्के चला रहे हैं। बेहतर तो यह होगा कि जो बीत गया सो बीत गया, दोनों देश अब आगे की सुध लें।

जब लोकतंत्र और संविधान की हत्या हुई
प्रभात झा
उस समय कांग्रेस की सरकार थी, इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी। आजाद भारत में 25 जून 1975 को लोकतंत्र की और संविधान की हत्या करने का जो दुस्साहस इंदिरा गांधी ने दिखाया, उसकी याद आते ही आज भी तन-मन सिहर जाता है। देश में अकारण आपातकाल लगा दी गई। अंग्रेजों ने गुलाम भारतीयों के साथ जो सलूक नहीं किया, उससे बदत्तर सलूक इंदिरा गांधी की सरकार ने आम भारतीयों और देश के विपक्षी नेताओं के साथ करना शुरू कर दिया।
भारत ने नादिरशाही और हिटलरशाही का ऐसा नंगा नाच पूर्व में कभी नहीं देखा। पूरा देश सकते में था। न बोलने की, न लिखने की, न छापने की, न कानून के शरण में जाने की, न अपनी जिंदगी जीने की, न विरोध करने की और न कार्यपालिका का, न विधायिका का और ना ही न्यायपालिका का कोई मान था। एक अंगूठे के नीचे देश को लाकर दबा दिया।
इंदिरा गांधी ने पांचवीं लोकसभा का चुनाव रायबरेली से जीता था। स्व.श्री राजनारायण ने इस चुनाव के विरुद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय मे एक याचिका दायर की थी। इस याचिका पर 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायधीश सिन्हा ने इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द घोषित कर दिया। चुनाव रद्द कर छह वर्षों के लिए उन्हें राजनीति से बेदखल कर दिया। बौखलाई इंदिरा गांधी ने इस निर्णय को षडयंत्र करार दे दिया और 25 जून, 1975 रात 12 बजे आपातकाल की घोषणा कर दी। डिफेंस ऑफ इंडिया रूल और मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट (मीसा) लागू कर देश के सभी गैर-कांग्रेसी राजनीतिक दलों, अनेकों सामाजिक संस्थाओं, राष्ट्रवादी शैक्षणिक संस्थाओं, सामाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, वहीं गैर-कांग्रेसी नेताओं तथा राष्ट्रवादी विचारकों एवं पत्रकारों को रातो-रात गिरफ्तार कर लिया गया।
जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, प्रकाश सिंह बादल, जॉर्ज फ़र्नान्डिस सहित अनेकों नेताओं व कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करके जेलों में बंद कर दिया गया। जयप्रकाश नारायण को दिल्ली में गिरफ्तार किया गया जहां वे इंदिरा सरकार के विरुद्ध एक विशाल जनसमूह का नेतृत्व कर रहे थे। उनके साथ मोरारजी देसाई, राजनारायण, नानाजी देशमुख को भी गिरफ्तार किया गया। वहीं अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी एवं मधु दंडवते को बंगलुरु से गिरफ्तार किया गया जो वहां संसदीय समिति की एक बैठक में भाग लेने गए हुए थे।
26 जून की सुबह इंदिरा गांधी ने ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) पर देशवासियों को आपातकाल लगाए जाने की जानकारी दी। आपातकाल लगाने के बाद इंदिरा गांधी ने संविधान की धज्जियां उड़ाना शुरू की। कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और खबरपालिका , लोकतंत्र के इन चारों स्तंभों को बंधक बना लिया गया। देश के आम नागरिकों के सभी मौलिक अधिकार छीन लिए गए। जब विपक्ष के सभी नेता जेल में थे, तब संसद में 41वां संशोधन विधेयक लाया गया। इस विधेयक ने तो संविधान विधि द्वारा स्थापित न्याय प्रणाली और संसदीय प्रणाली की धज्जियां उड़ा कर रख दीं। सत्ताधारी कांग्रेस ने खुद को संविधान, कानून के ऊपर कर लिया था। व्यक्तिगत और वाक् स्वतंत्रता एवं निजता के अधिकार जैसे मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित कर दिया गया। आपातकाल की घोषणा किए जाने के दो दिन बाद 28 जून को प्रेस व मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया गया। समाचार पत्रों पर खबर छापने से पहले सरकार की अनुमति लेने की बंदिश लगा दी गई। और सभी समाचार पत्रो मे सेंसर अधिकारी नियुक्त कर दिये गये।
लोकतंत्र की बहाली का अभियान स्वंय संघ ने अपने हांथों में लिया। अगर यह कहें कि ‘संघ’ गुप्तक्रान्ति का सूत्रधार बना तो यह अतिश्योक्ति नही होगी। संघ को कुचलने के लिए और स्वयंसेवकों के मनोबल को तोड़ने के लिए इंदिरा गांधी और उनके बाबर्ची और ढ़िढ़ोरची के साथ-साथ दरबारी नेताओं ने न जाने कितने जुल्म किए। हजारों स्वयंसेवक बिना वजह जेलों में ठूस दिए गए, जिससे सैकड़ो स्वयंसेवकों के घर उजड़ और बिखर गए।
इंदिरा गांधी की सरकार कहती थी जेल से बाहर जाना है तो बीस सूत्रीय कार्यक्रम का समर्थन करो और जमानत कराओ। यहां यह बताते हुए गर्व होता है कि संघ के स्वयंसेवकों और जनसंघ के नेता और कार्यकर्ताओ ने जेल के सीखचों को कबूल किया पर उन्होने बीस सूत्रीय कार्यक्रम का समर्थन नहीं किया और माफी नही मागी।
उस समय देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही एकमात्र ऐसी संगठित शक्ति थी, जो इंदिरा गांधी की निरंकुशता पर लगाम लगा सकती थी। देश भर में नीचे तक शाखा लगती थी। संभावित प्रतिकार को देखते हुए इंदिरा गांधी ने संघ पर भी प्रतिबंध लगा दिया। लोकतंत्र का पूरी तरह गला घोंट दिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भूमिगत नेतृत्व के साथ गुप्तक्रांती द्वारा देशवासियों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने का निर्णय लिया। देशभर की सभी शाखाएं भूमिगत नेतृत्व के साथ जुड़ गए। संघचालक, कार्यवाह, प्रचारक के साथ-साथ संघ के अनेक अनुषांगिक संगठनों जैसे भारतीय जनसंघ,अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विश्व हिन्दू परिषद ,भारतीय मजदूर संघ ने आपातकाल विरोधी आंदोलन को ताकत दी। संघ के भूमिगत नेतृत्व ने गैर-कांग्रेसी राजनीतिक दलों, निष्पक्ष विचारकों को भी एक मंच पर लाकर लोकतंत्र के पुनर्स्थापन का शंखनाद किया।
अपने संगठन की सर्वश्रेष्ठ परम्परा को कायम रखते हुए संघ ने राष्ट्रहित में काम करने की अपनी कार्यप्रणाली को अक्षुण्ण रखते हुए आंदोलन का नेतृत्व नानाजी देशमुख के माध्यम से जयप्रकाश नारायण के हाथों में सौप दिया, जिन्होंने आपातकाल और इंदिरा गांधी के भ्रष्ट और निरंकुश सत्ता के विरुद्ध सम्पूर्ण क्रांति का नेतृत्व किया। संगठनात्मक बैठकें, जनजागरण हेतु साहित्य का प्रकाशन और वितरण, सम्पर्क की योजना, सत्याग्रहियों की तैयारी, सत्याग्रह का स्थान, प्रत्यक्ष सत्याग्रह, जेल में गए कार्यकर्ताओं के परिवारों की चिंता और गुप्तचरी के माध्यम से संघ के भूमिगत नेतृत्व ने अदम्य साहस और संगठन कौशल का परिचय दिया। देशभर में संघ के सैकडो़ं प्रचारकों को जेल भेजा गया। एक लाख से भी अधिक स्वयंसेवकों को कारावास हुआ।
जुल्म ज्यादतियों का दौर ऐसा था कि संजय गांधी या तत्कालीन कांग्रेस के जिलाध्यक्षों द्वारा जेल भेजे जाने वालों की सूची रात को बनायी जाती थी और सुबह पुलिस उन्हे पकड़कर जेलो मे ठूस देती थी। आप विवाहित हो या अविवाहित, नसबंदी का कोटा पूरा करने की आड़ में न जाने कितने नवविवाहितों और न जाने कितने कुवारों की नसबंदी कर दी गयी। नसबंदी और हदबंदी का ऐसा बुरा दौर कभी नहीं देखा गया।
पूरे देश को बदले की आग में झोंक दिया गया था। संजय गांधी ने आतंक का ऐसा दौर चलाया था कि भारत के आम नागरिकों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था।
अखबारों में क्या छपेगा यह न पत्रकार तय करते थे और न ही संपादक। वे जो लिखते थे, उसे सरकारी मीडिया पूरी तरह जांच करती थी, और जब वह अनुमति दे देती थी, तब अखबार छपने जाया करता था। सेंसरशिप के इस दौर ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पूरी तरह समाप्त कर दिया था उस समय कोई ऐसा व्यक्ति सामने नहीं आया, जैसा आजकल असहिष्णुता के नाम पर सामने आ जाते हैं।
इंदिरागांधी के असहिष्णुता और असंवेदनशीलता के साथ-साथ पूरी तरह असंवैधानिक कृत्य का विरोध करने का साहस उन जांबाजों मे कभी नही देखा गया, जो आजकल असहिष्णुता के नाम पर तत्काल बाहर आ जाते हैं।
‘इंडियन एक्सप्रेस’ के तत्कालीन मालिक रामनाथ गोयनका को इंदिरागांधी ने पी.एम.ओ में बुलाया। इंदिरागांधी ने कहा कि आपका समाचार पत्र आपातकाल का विरोध कर रहा है। आप या तो विरोध करना बंद करें नहीं तो आपका समाचार पत्र बंद हो जाएगा। इंदिराजी के इतना कहने के बाद रामनाथ गोयनका कुर्सी से उठे और कहा कि समाचार पत्र अपना काम करता है वह सरकार का समाचार पत्र नहीं है, बल्कि हम जनता के लिए समाचार पत्र निकालते हैं। बात रही समाचार बंद करने की तो मैंने अपनी जिंदगी की शुरूआत फुटपाथों के व्यवसाय से शुरू की है। मैं वहां तक पुनः जा सकता हूं, पर समाचार पत्र अपना उद्देश्य नहीं बदल सकता। श्री रामनाथ गोयनका के इस अदम्य साहस की सर्वत्र सराहना हुई।
आपातकाल के दिनों में बंगाल भी मूक दर्शक नही रहा। 14 नवम्बर, 1975 से वहां जो सत्याग्रह शुरू हुआ, उसकी बागडोर संभाली थी मिदनापुर , राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिला कार्यवाह लहरकान्ति मजूमदार एडवोकेट, तहसील कार्यवाह लक्ष्मीकांत सेन तथा सर्वोदयी नेता क्षितीश राय चौधरी ने सभी तहसीलों में सत्याग्रही जत्थे तैयार किये। तामलुक तहसील में बंगाल प्रांत के पूरे मंत्रिमण्डल की बैठक आयोजित थी। मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय उसकी अध्यक्षता करने वाले थे। जिस दिन श्री राय तामलुक में आने वाले थे , सभी स्थानों पर “सिद्धार्थ जवाब दो’-“इंदिरा जवाब दो’, “जयप्रकाश आदि नेता जेल में क्यों? “लोकतंत्र का गला क्यों घोंटा गया?’ नारे गूंज रहे थे।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निजी सचिव रह चुके आरके धवन ने देश में आपातकाल के लिए स्वर्गीय सिद्धार्थ शंकर राय को दोषी ठहराया था। जैसाकि आरके धवन ने एक साक्षात्कार में कहा था ‘आपातकाल का पूरा ताना-बाना पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने बुना था। उन्होंने 8 जनवरी 1975 को पत्र लिखकर आपातकाल की तरह कठोर कार्रवाई करने की सलाह दी थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद सिद्धार्थ शंकर राय ने दोबारा पत्र लिखकर आपातकाल के लिए उन्हें प्रेरित किया था। वहीं इंदिरा गांधी के लिए कम्युनिस्ट कांग्रेस के संसदीय प्रतिनिधियों से भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी। कांग्रेस के साथ 1971 में कम्युनिस्टों के साथ औपचारिक गठबंधन के फलस्वरूप इंदिरा गांधी की समाजवादी सोच प्रबल हुई। कम्युनिस्टों को राज्यसत्ता द्वारा उदारतापूर्वक उपकृत व पुरस्कृत किया गया। आपातकाल का समर्थन स्वाभाविक था। कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी बैठक में आपातकाल को अनुशासनात्मक नियंत्रण के लिए न्यायोचित भी ठहराया था।
आपातकाल के कारण 19 महीने तक लोकतंत्र के सूर्य को उगने ही नहीं दिया। निरंकुश सत्ता ने भारतीय लोकतंत्र को दमन और भ्रष्टाचार के हवाले कैसे कर दिया, इस पर कई पुस्तकें लिखी गई हैं। कैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निरंकुश नौकरशाहों और नेताओं के पास बंदी बना ली गई थी। कैसे न्यायपालिका को कार्यपालिका के हाथों की कठपुतली बनाकर नचाया जा रहा था। देश में किस प्रकार से अराजक तत्व मनमानी करने लगे थे और किस प्रकार से अधिनायकवादी को खुलकर तांडव करने का अवसर मिल रहा था।
1971 से1974 तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पाञ्चजन्य के संपादक दीनानाथ मिश्र ने आपातकाल के दौरान भीषण संकट और दमन झेला। उन्होंने आपातकाल पर ‘गुप्तक्रान्ति नामक पुस्तक लिखी जो 1977 में प्रकाशित हुई। यह पुस्तक आपातकाल पर एक संपूर्ण तथ्य है। दीनानाथ मिश्र ने अपने पुस्तक में यह दर्शाया है कि ‘उस समय सत्ता के लिए जनता सिर्फ चुनाव जीतने का माध्यम थी उससे आगे कुछ नहीं।‘ वे लिखते हैं ‘जब तक लोकतंत्र द्वारा श्रीमती इंदिरा गांधी को सत्ता पर बनाये रखा गया, तब तक श्रीमती गांधी ने लोकतंत्र को बनाये रखा। जिस दिन लोकतंत्र उन्हें प्रधानमंत्री बनाये रखने में नाकामयाब होने लगा, श्रीमती गांधी ने लोकतंत्र को नाकामयाब कर दिया।’ साथ ही वे यह भी लिखते हैं कि ‘बलात नसबंदी, पुलिसिया कहर, सेंसरशिप तथा अपनों को जेल में यातनाएं सहते देखकर आक्रोशित हुई जनता ने अधिनायकवाद की ध्वजवाहक इंदिरा गांधी का तख्ता पलट दिया। जनता विजयी हुई और देश को पुनः लोकतंत्र मिल गया।‘ यह लोकतंत्र फिर से किसी अधिनायकवादी और निरंकुश सोंच की कठपुतली न बने, यह हर भारतीय का कर्तव्य है।
आज भारत दुनिया का न केवल सबसे बड़ा और सबसे सफल लोकतंत्र है। भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों की मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है। लेकिन 25 जून 1975 को जो हुआ, भारत का लोकतंत्र और भारतीय जनमानस कभी नहीं भूलेगा। कांग्रेस सरकार और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल के कारनामों से भारतीय लोकतंत्र को जो कलंकित किया वह अक्षम्य था, अक्षम्य है और अक्षम्य रहेगा। आज कांग्रेस भारतीय लोकतंत्र के साथ किये गए उस अपराध की सजा भुगत रही है। जहां लगभग सभी राज्यों में कांग्रेस की सरकार हुआ करती थी, आज दो-तीन राज्यों में सिमट कर रह गई है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों सहित दो-तीन राज्यों को छोड़कर लगभग सभी राज्यों के मुख्यमंत्री आपातकाल दमन से निकले हुए लोकतंत्र के सिपाही हैं।
आपातकाल के बाद 1977 में हुए आम चुनावों में देश की जनता ने कांग्रेस और इंदिरा गांधी को उनके किये की सजा दी। देश में पहली बार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में एक गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। संविधान के पन्नों को फिर से सहेजा गया। सबसे पहले सरकार द्वारा 43वें संविधान संशोधन लाकर सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों को उनके अधिकार वापस दिए गए। सर्वोच्च न्यायालय ने भी 42वें संशोधन के कई प्रावधानों को असंवैधानिक करार देते हुए संविधान को उसका मूल स्वरुप लौटाया। इसके बाद 44वां संशोधन लाया गया। न्यायपालिका को दोबारा मजबूती देकर और 42वें संशोधन के दोषों को दूर करने के साथ ही 44वें संशोधन द्वारा संविधान को अपेक्षा से अधिक सशक्त किया गया, ताकि आपातकाल जैसी स्थिति लाकर फिर से भारतीय लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ न किया जा सके। आपातकाल के बाद 1977 में हुए आम चुनावों
लेकिन कांग्रेस को आपातकाल की पूर्ण सजा तब मिली मानी जायेगी जब कांग्रेस मुक्त भारत होगा। कांग्रेस भारतीय लोकतंत्र में एक सोंच है, एक मानसिकता है, जो भारत और भारतीयता का विरोधी है। लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा है। भारत के विश्व महाशक्ति बनाने में बाधक है। भारतीय लोकतंत्र को ऐसी निरंकुश मानसिकता के चंगुल से बचाना हमारा नागरिक कर्तव्य है।

चीन की चुप्पी का अर्थ क्या है ? डॉ.
वेदप्रताप वैदिक
गालवान घाटी में हुई मुठभेड़ के बाद भारत में कितना कोहराम मचा हुआ है। हमारे विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री को सफाइयों पर सफाइयां देनी पड़ रही हैं, प्रधानमंत्री कार्यालय को प्रधानमंत्री की सफाई को और भी साफ-सूफ करना पड़ रहा है, विरोधी दल ऊटपटांग और भोले-भाले सवाल किए जा रहे हैं और भारत की जनता है कि उसका पारा चढ़ा जा रहा है। वह जगह-जगह प्रदर्शन कर रही है, चीनी राष्ट्रपति के पुतले जला रही है, चीनी माल के बहिष्कार की आवाज़ें लगा रही हैं। हमारे कई टीवी एंकर गुस्से में अपना आपा खो बैठते हैं। हमारे 20 जवानों की अंतिम-यात्राओं के दृश्य देखकर करोड़ों लोगों की आंखें आसुओं से भर जाती हैं। लेकिन हम जरा देखे कि चीन में क्या हो रहा है ? चीन के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री ने गालवान के हत्याकांड पर अपना मुंह तक नहीं खोला है। उसके विदेश मंत्री ने हमारे विदेश मंत्री के आरोप के जवाब में वैसा ही आरोप लगाकर छोड़ दिया है कि भारतीय सैनिकों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किया है। वे वैसा न करें। दोनों विदेश मंत्रियों ने अपनी संप्रभुता की रक्षा की बात कही और सीमा पर शांति बनाए रखने की सलाह एक-दूसरे को दे दी ? चीन में न तो भारत-विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं, न ही वहां के टीवी चैनल और अखबारों ने इसे अपनी सबसे बड़ी खबर बनाया है और न ही भारतीय माल के बहिष्कार की बात कोई चीनी संस्था कर रही है। चीनी सरकार तो बिल्कुल चुप ही है। आपने जरा भी सोचा कि ऐसा क्यों हैं ? इसका जवाब ढूंढिए, हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान में, जो उन्होंने बहुदलीय बैठक में दिया था। उन्होंने कहा था कि हमारी सीमा में कोई नहीं घुसा है और हमारी जमीन के किसी भी हिस्से पर किसी का कब्जा नहीं है। मोदी ने चीन के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला। याने चीन ने कुछ किया ही नहीं है। यह बयान नरेंद्र मोदी का नहीं, चीनी राष्ट्रपति शी चिन फिंग का-सा लगता है। उन्होंने नहीं लेकिन उनके प्रवक्ता ने यही कहा है कि चीन ने किसी रेखा का उल्लंघन नहीं किया है। याने अभी तक देश को यह ठीक-ठाक पता ही नहीं है कि गालवान घाटी में हुआ क्या है ? यह सवाल मैंने पहले दिन ही उठाया था। जब मोदी अपनी सफाई पेश कर रहे थे, तब नेता लोग क्या खर्राटे खींच रहे थे ? मोदी को चाहिए था कि प्रमुख नेताओं के साथ बैठकर वे सब बातें सच-सच बताते और जरुरी होता तो उन्हें गोपनीय रखने का प्रवाधान भी कर देते। अब भी स्थिति संभाली जा सकती है। मोदी चीनी राष्ट्रपति शी से सीधी बात करें। इस स्थानीय और अचानक झड़प पर दोनों नेता दुख और पश्चाताप व्यक्त करें। यदि वे यह नहीं करते तो माना जाएगा कि दोनों के व्यक्गित संबंध शुद्ध नौटंकी मात्र थे। यह स्थिति शी के लिए नहीं, मोदी के लिए बहुत भारी पड़ जाएगी। नेहरु पर उठी भाजपा की उंगली सदा के लिए कट जाएगी।

धारा 370 को समाप्त करने के पक्षधर थे डॉ. मुखर्जी
प्रभात झा
( डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि पर विशेष 23 जून) पुण्यतिथियां तो अनेकों महापुरूषो की मनायी जाती है और आगे भी मनायी जाती रहेगी। वे पुण्यात्मा बहुत भाग्यशाली होते हैं, जिनके समर्थक या विचारधारा पर चलने वाले उनके “बलिदान” को अपने प्रयासों से उसे सार्थक कर दुनिया के सामने इतिहास रचते हैं। 23 जून को डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि है। यह पुण्यतिथि असामान्य और असाधारण कहा जाएगा। अखण्ड भारत के लिए डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि भारत में यानि एक देश में ‘दो निशान, दो विधान एवं दो प्रधान’ नहीं चलेंगे। उन्होने भारतीय संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को कहा था कि ‘या तो मैं संविधान की रक्षा करूंगा नही तो अपने प्राण दे दूंगा’। हुआ भी यही। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी परमिट बिना जम्मू-कश्मीर गए। उन्हे शेख अब्दुल्ला की सरकार ने गिरफ्तार किया। उन्होने कहा मैं इस देश का सांसद हूँ। मुझे अपने देश में ही कहीं जाने से आप कैसे रोक सकते हैं। उन्हे गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के कुछ ही दिनों बाद उन्हें मृत घोषित किया गया। वे अखंड भारत के लिए बलिदान देने वाले पहले भारतीय थे, जो जनसंघ के अध्यक्ष के रूप में वहां गए थे।
23 जून के उसी बलिदान दिवस को भारतीय जनसंघ और अब भाजपा पुण्यतिथि के रूप में मनाती है। भारतीय जनसंघ से लेकर भाजपा के प्रत्येक घोषणा पत्र में अपने बलिदानी नेता डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के इस घोष वाक्य को, कि “हम संविधान की अस्थायी धारा 370 को समाप्त करेंगे”, सदैव लिखा जाता रहा। समय आया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो स्वयं डॉ. मुरली मनोहर जोशी के साथ भारत की यात्रा करते हुए श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराया था, और गृहमंत्री अमित शाह ने 5 अगस्त 2019 को धारा 370 को राष्ट्रहित में समाप्त करनें के निर्णय को दोनों सदनों से पारित कर डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा मां भारती के लिए जीवन देनें को सच्ची श्रद्धांजली दी। वे महापुरूष बहुत भाग्यशाली होते हैं, जिनकी आने वाली पीढ़ी अपने पूर्वर्जों के मां भारती के लिए कही गई बातों को साकार करते हैं। सच में डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी भाग्यशाली हैं कि उनके विचार के संवाहक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृहमंत्री अमित शाह सहित पूरे मंत्रीमंडल ने धारा 370 को समाप्त कर दुनिया को बता दिया ।
“जहां हुए बलिदान मुखर्जी, वो कश्मीर हमारा है,
जो कश्मीर हमारा है, वह सारा का सारा है। ”

राष्ट्रभक्ति की आंचल में राष्ट्रपुरुष का निर्माण
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक ऐसे धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय और राष्ट्रभक्त माता-पिता की संतान थे जिनकी प्रसिद्धि न केवल बंगाल बल्कि सम्पूर्ण भारत में थी। धर्म एवं संस्कृति के प्रति आदर तथा राष्ट्रीयता की प्रेरणा उन्हें अपने माता-पिता से मिली थी। अपनी मां योगमाया देवी से धार्मिक एवं ऐतिहासिक कथाएं सुन-सुनकर जहां देश और संस्कृति की जानकारी प्राप्त की, वहीं अपने पिता आशुतोष मुख़र्जी के साथ बैठकर राष्ट्रभक्ति की शिक्षा को आत्मसात किया।
आत्मबोध की दिशा में दृढ़ता के साथ आगे बढ़ते हुए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने शिक्षा, राजनीति, समाज-संस्कृति सभी क्षेत्रों में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1929 में बंगाल विधान परिषद के सदस्य बने, 1934 से 1938 तक कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे कम उम्र के उप-कुलपति रहे, अखिल भारतीय हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए, बंगाल प्रांत के वित्त मंत्री रहे, महाबोधि सोसाइटी एवं रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के अध्यक्ष रहे, संविधान सभा के सदस्य बने, स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में मंत्री बने, 1952 के पहले आम चुनाव में दक्षिण कलकत्ता संसदीय क्षेत्र से लोकसभा सांसद भी बने। लेकिन राष्ट्रपुरुष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का संकल्प था कि भारत एक मजबूत एकीकृत राष्ट्र बने और इस अभियान को सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। आप तनिक चिंतन करें, पहले भारत के नेता कैसे होते थे उसका अनुपम उदाहरण भारतीय राजनीति में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी हैं।
मां भारती के सच्चे सपूत ने विभाजन का विरोध किया
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत का विभाजन नहीं होने देना चाहते थे। इसके लिए वे महात्मा गांधी के पास भी गये थे। परंतु गांधीजी का कहना था कि कांग्रेस के लोग उनकी बात सुनते ही नहीं। जवाहर लाल नेहरू भी विभाजन के पक्ष में थे। जब देश का विभाजन अनिवार्य जैसा हो गया, डॉ. मुखर्जी ने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिंदुओं के हितों की उपेक्षा न हो। उन्होंने बंगाल के विभाजन के लिए जोरदार प्रयास किया, जिससे मुस्लिम लीग का पूरा प्रांत हड़पने का मंसूबा सफल नहीं हो सका। उनके प्रयत्नों से हिंदुओं के हितों की रक्षा तो हुई ही कलकत्ता बंदरगाह भी पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) को सौंपे जाने से बच गया। पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आ रहे हिंदुओं की दुर्दशा से वे विचलित थे। उन्होंने विस्थापितों के बीच रहकर उनको लाभान्वित करने वाली योजनाओं की पहल की।
नेहरू द्वारा विस्थापितों के प्रति उपेक्षा और राष्ट्र हितों के प्रति प्रतिबद्धता के कारण उन्होंने अंततः 8 अप्रैल 1950 को नेहरू मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया, जिसमें वे 1947 में गांधीजी के निमंत्रण पर शामिल हुए थे। डॉ. मुखर्जी ने अनुभव किया कि नेहरू पाकिस्तान सरकार के प्रति बहुत ज्यादा नरम रवैया रखे हुए हैं और उनमें पश्चिमी (वर्तमान पाकिस्तान) और पूर्वी पाकिस्तान(वर्तमान बांग्लादेश) में छूट गए हिंदुओं के हितों की रक्षा सुनिश्चित करने का कोई साहस नहीं है। उनका स्पष्ट मानना था कि नेहरू-लियाकत समझौता निर्थक था क्योकि इसमें भारत सरकार पर तो अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा की जिम्मेदारी डाली गई थी, लेकिन पाकिस्तान की ओर से ऐसे ही आचरण की कोई पहल नहीं की गई थी। त्यागपत्र देने के बाद डॉ. मुखर्जी ने संसद में प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने का निश्चय किया। इस उद्देश्य से वे प्रतिपक्ष राजनीतिक मंच के गठन की संभावनाओं को तलाशने की ओर अग्रसर हुए। 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ का गठन हुआ जिसके वे संस्थापक अध्यक्ष बने। डॉ. मुखर्जी ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा था ‘आज भारतीय जनसंघ के रूप में एक नए अखिल भारतीय राजनीतिक दल का उदय हो रहा है जो देश का प्रमुख प्रतिपक्षी दल होगा। यद्यपि भारत अद्वितीय विविधताओं का देश है, तो भी इस बात की परम् आवश्यकता है कि मातृभूमि के प्रति गहरी भक्ति भावना और निष्ठा की चेतना में से विकसित होने वाला बंधुत्व भाव और विवेक समस्त देशवासियों को एक सूत्र में बांधे।’ हम सभी को ज्ञात है कि डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी उस समय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के द्वितीय सरसंघ चालक परमपूज्य माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरूजी) से भेंट की और उनसे आग्रह कर भारतीय जनसंघ की स्थापना की। गुरूजी ने डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को उसी समय अपने आठ प्रचारकों को भारतीय जनसंघ का कार्य प्रारंभ करने के लिए मुक्त किया था। यही से जनसंघ का कार्य प्रारंभ हुआ।
आई विल क्रश दिस क्रशिंग मेंटालिटी
देश में पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 तक हुआ। भारतीय जनसंघ को तीन सीटें मिली। डॉ. मुखर्जी भी दक्षिण कलकत्ता संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीत कर लोकसभा में आए। यद्यपि उन्हें विपक्ष के नेता का दर्जा नहीं था लेकिन वे संसद में डेमोक्रेटिक एलायन्स के नेता थे। सदन में नेहरू की नीतियों पर तीखा प्रहार करते थे। सदन में बहस के दौरान नेहरू ने एक बार डॉ. मुखर्जी की तरफ इशारा करते हुए कहा था ‘जनसंघ एक कम्यूनल पार्टी है, आई विल क्रश जनसंघ।’ इस पर डॉ. मुखर्जी ने जवाब देते हुए कहा, ‘माय फ्रेंड पंडित जवाहर लाल नेहरू सेज देट ही विल क्रश जनसंघ, आई से आई विल क्रश दिस क्रशिंग मेंटालिटी।’ संसद में संख्या की दृष्टि से थोड़े होते हुए उनका इतना प्रभाव था कि चाहे कश्मीर पर चर्चा हो या कोई और विषय हो, उनके भाषण को सब पूरे ध्यान से सुनते थे। उनके इस दृढ़ता और समर्पण का ही परिणाम है कि आज देश में उन सिद्धांतों पर चलने वाली नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र की बहुमत वाली सरकार है, जो नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह सरकार तक के इतिहास की गलतियों को ठीक करते हुए राष्ट्रहित और जनहित में फैसले ले रही है।
संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर
अपना जीवन बलिदान कर दूंगा
जिस समय संविधान सभा में धारा 370 पर विचार-विमर्श हो रहा था, शेख अब्दुल्ला की बात मानकर जवाहरलाल नेहरू स्वयं विदेश चले गए। यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया। नेहरू मंत्रिमंडल में बिना विभाग के मंत्री रहे गोपालस्वामी अयंगर, जो जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह के दीवान रहे थे, को नेहरू खासतौर पर जम्मू-कश्मीर के लिए ही कैबिनेट में लाए थे। विदेश जाने से पहले यह जिम्मेदारी नेहरू ने अयंगर को देकर गए थे। धारा 370 का प्रावधान कांग्रेस संसदीय दल के समक्ष आया और वहां भी विरोध हुआ। घबराये अयंगर सरदार पटेल के पास पहुंचे। उन्होंने भी इसे अस्वीकार कर दिया। लेकिन अस्थायी व्यवस्था की गई। सरदार पटेल का कहना था नेहरू होते तो इसे ठीक कर देता लेकिन अभी तो मानना होगा। सरदार पटेल का असामयिक दुनिया से चला जाना दुर्भाग्यपूर्ण रहा। धारा 370 के कारण कश्मीर की समस्या भले ही बाद में लोगों को दिखाई दी हो, डॉ. मुखर्जी उसकी गंभीरता को आरंभ में ही समझ गए थे। लोकसभा में 1952 के उनके भाषण अगर देखे जाएं तो साफ़ हो जाएगा कि बाद में कश्मीर में जो कुछ हुआ, आतंकवाद और हिंदुओं के साथ अत्याचार एवं पलायन, उन्होंने तब देख लिया था।
जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की पृथकतावादी राजनीतिक गतिविधियों से उभरी अलगाववादी प्रवृतियां 1952 तक बल पकड़ने लगी थीं। इससे राष्ट्रीय मानस विक्षुब्ध हो उठा था। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने प्रजा परिषद के सत्याग्रह को पूर्ण समर्थन दिया जिसका उद्देश्य जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना था। समर्थन में उन्होंने जोरदार नारा बुलंद किया था -‘एक देश में दो निशान, एक देश में दो विधान, एक देश में दो प्रधान, नहीं चलेंग, नहीं चलेंगे।’ अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त करते हुए कहा ‘या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।’
26 जून 1952 को संसद में दिए अपने ऐतिहासिक भाषण में डॉ. मुखर्जी ने धारा 370 को समाप्त करने की जोरदार वकालत की थी और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरासर गलत नीतियों को निर्भयतापूर्वक बेनकाब किया था। उन्होंने कहा था ‘क्या जम्मू-कश्मीर के लोग उन मूलभूत अधिकारों के हकदार नहीं है जिन्हें हमने जम्मू-कश्मीर को छोड़ सारे भारत के लोगों को दिया है? शेख अब्दुल्ला को कश्मीर का शहंशाह किसने बनाया है? जबकि विलय भारतीय सेनाओं के कश्मीर में प्रवेश करने के कारण ही सम्भव हो सका। क्या यह इसलिए किया गया था कि एक संप्रभु गणतंत्र के अंतर्गत एक और संप्रभु गणतंत्र का निर्माण हो? विभिन्न संगठक इकाईयों के लिए न तो अलग-अलग संविधानों की जरुरत है और न ही इन इकाईयों में भेदभाव जरुरी है।”
अपने संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने नई दिल्ली में नेहरू सरकार और श्रीनगर में शेख अब्दुल्ला की सरकार को चुनौती देने का निश्चय किया। मई 1953 में जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। उनका उद्देश्य वहां जाकर स्थिति का अध्ययन करना था। उन दिनों जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के लिए परमिट लेना पड़ता था। लेकिन उन्होंने बिना परमिट जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवेश करने का निर्णय लिया। उन्होंने संप्रभु गणतंत्र भारत के अंदर दूसरे संप्रभु गणतंत्र के अस्तित्व को अस्वीकार कर दिया। बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश करने से पहले उन्होंने कहा था ‘विधान लूंगा या अपने प्राण दूंगा।’ जब उनसे परमिट मांगा गया तो उन्होंने कहा ‘मैं भारत की संसद का सदस्य हूं, मैं अपने ही देश में कश्मीर में परमिट लेकर नहीं जाऊंगा।’ उन्हें गिरफ्तार कर नजरबंद कर दिया गया। 40 दिन तक न उन्हें चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई और न अन्य बुनियादी सुविधाएं दी गई। 23 जून 1953 को उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। अपने संकल्प को साकार करने के लिए डॉ. मुखर्जी ने भारत माता के चरणों पर अपने जीवन को न्यौछावर कर दिया।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जो उनके साथ कश्मीर गए थे, ने लिखा है ‘जब उनकी मृत्यु हो गई तो मुझे लगा कि डॉ. मुखर्जी कह रहे हैं, आसमान से उनकी आत्मा कह रही है कि-लुक आई हेव कम आउट ऑफ़ द स्टेट ऑफ़ जम्मू एंड कश्मीर, दो एज ए मारटीयर, वो मुझे बंद नहीं रख सके।’ अटल जी ने यहीं प्रण किया कि वे डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सपनों को साकार करनें में अपना पूरा जीवन समर्पित करेंगे। यह बलिदान स्वतंत्र भारत का ऐसा पहला बलिदान था जिसने देश में राष्ट्रीय एकता और अखंडता के संघर्ष की नींव रखी। कलकत्ता में उनके अंतिम संस्कार में 2 लाख से अधिक लोग श्रद्धांजलि देने एकत्रित हुए। युवा, वृद्ध सभी उनकी अंतिम यात्रा का हिस्सा बनने के लिए सड़कों पर उतर आये। डॉ. मुखर्जी का संकल्प राष्ट्र का संकल्प बन गया। उनका बलिदान राष्ट्र के जन-जन के लिए धारा 370 की समाप्ति का प्रण बन गया।
राष्ट्र के इतिहास में विरले ही ऐसे क्षण होते हैं जब एक अद्भुत निर्णय से इतिहास की धारा और राष्ट्र की यात्रा एक नई ऊर्जा और आत्मविश्वास से अनुप्राणित हो उठती है। 5 अगस्त 2019 का क्षण वैसा ही था जब जम्मू-कश्मीर और भारत के बीच विभाजक-रेखा खींचने वाली संविधान की धारा 370 को संसद के दोनों सदनों के एक स्वरीय अ