आलेख 23

प्रवासी मजदूरों की दुविधा
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
उत्तरप्रदेश सरकार ने प्रवासी मजदूरों के लिए कुछ ऐसी घोषणाएं की हैं, जो अगर लागू हो गईं तो अपने गांव वापस लौटे मजदूरों का काफी भला हो जाएगा लेकिन उसका दूसरा पहलू यह भी है कि वे अगर शहरों की तरफ वापस नहीं लौटे तो भारत के उद्योग-धंधे ठप्प हो सकते हैं। माना जाता है कि देश में प्रवासी मजदूरों की संख्या 6-7 करोड़ के करीब है। यह संख्या उनकी है, जो कारखानों में नियमित काम करते हैं, जिनको मासिक वेतन मिलता है और जिनके आधार कार्ड बने हुए हैं लेकिन घरेलू नौकरों, पटरियों पर सामान बेचेनवालों, ठेलोंवालों और दुकानों के छोटे कर्मचारियों की कोई निश्चित गिनती किसी भी सरकार के पास नहीं है। तीन साल पहले ‘नेशनल सेंपल सर्वे’ की रपट के मुताबिक दिल्ली और मुंबई में 43 प्रतिशत जनता बाहरी है याने वे लोग प्रवासी हैं। तालाबंदी के बाद मची भगदड़ में ज्यादातर प्रवासी मजदूर अपने गांवों की तरफ वापस लौट रहे हैं। जो पंजीकृत हैं उनकी संख्या उप्र, मप्र, बिहार, छत्तीसगढ़ आदि में लाखों तक जा रही है। जो पैदल ही लौट रहे हैं, उनकी संख्या और भी ज्यादा है लेकिन इस वक्त उप्र की सरकार ऐसी अकेली सरकार है, जो वादा कर रही है कि हर लौटनेवाले मजदूर को वह काम देगी। इसके लिए वह प्रवासी आयोग स्थापित कर रही है। सारे मजदूरों का वह बीमा भी करवाएगी। उसने यह मालूम करना भी शुरु कर दिया है कि कौनसा मजदूर क्या-क्या काम कर सकता है। यही प्रक्रिया बिहार सरकार भी अपनाने जा रही है। हो सकता है कि अन्य प्रदेश भी इसी राह पर चल पड़ें। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि गांवों में छोटे-मोटे उद्योग-धंधे कौन लगाएगा ? पूंजी कहां से आएगी ? तैयार माल को बाजारों तक पहुंचाना कितना खर्चीला होगा ? यह ठीक है कि मनरेगा के तहत कुछ समय के लिए करोड़ों प्रवासियों को रोजगार दिया जा सकता है। उन्हें अपने गुजारे लायक पैसे तो मिल जाएंगे लेकिन ये पैसे कितने दिनों तक घर बैठे बांटे जा सकेंगे ? और फिर मनरेगा के भुगतान में भी तरह-तरह के भ्रष्टाचार की खबरें आती रही हैं। इसमें शक नहीं कि करोड़ों मजदूरों के भरण-पोषण को सबसे पहली प्राथमिकता मिलनी चाहिए लेकिन शहरों में चल रहे उद्योग-धंधों को भी किसी तरह चालू किया जाना चाहिए। इसका भी कुछ पता नहीं कि जिन मजदूरों को एक बार शहर की हवा लग गई है, वे गांवों में टिके रहना पसंद करेंगे या नहीं ?

पाक की फिर गीदड़भभकी
सिध्दार्थ शंकर
ईद जैसे खुशी के मौके पर भी पाकिस्तान भारत को कोसे बिना नहीं रह सका। सुबह विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने भारत के खिलाफ नफरत जाहिर करने से परहेज नहीं किया। दोपहर तक सेना प्रमुख कमर बाजवा भी भारत को हद में रहने की नसीहत देने लगे। सुबह कुरैशी ने कहा कि पाकिस्तान अपने खिलाफ किए गए भारत के किसी भी दुस्साहस का माकूल जवाब देगा। बता दें कि पिछले दिनों भारत की ओर से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पर दावा ठोंकने के बाद से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। यहां तक कि ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन की मीटिंग में उसने भारत पर इस्लामोफोबिया का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग तक कर डाली। कुरैशी ने ईद की नमाज के बाद मुल्तान में कहा कि पाकिस्तान शांति चाहता है और खुद को रोकने की उसकी नीति को कमजोरी नहीं समझना चाहिए। उन्होंने आगे कहा, अगर भारत पाकिस्तान के खिलाफ कोई दुस्साहस करता है तो उसे माकूल जवाब दिया जाएगा। दोपहर को सेना प्रमुख सामने आए और अपनी विफलता के साथ ही भारत के जुल्म का जवाब देने की बात करने लगे। बाजवा ने कहा कि पाकिस्तान धारा-370 के खात्मे को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने में नाकाम रहा जबकि भारत ने इसका पूरा फायदा उठाया। बाजवा ने गीदड़भभकी देते हुए कहा कि इसकी स्थिति को चुनौती देने के किसी भी प्रयास का पूरी सैन्य ताकत के साथ जवाब दिया जाएगा। बता दें कि पिछले साल 5 अगस्त को भारत सरकार के कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म किए जाने के बाद से ही पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की फिराक में था। उसने कश्मीर मुद्दे को दुनिया के हर मंच पर उठाया लेकिन उसका कोई लाभ नहीं हुआ। उसके सबसे खास दोस्त चीन ने भी इसे भारत पाकिस्तान के बीच का मुद ही बताया।
वैसे, यह कोई पहला मौका नहीं है जब पाकिस्तान ने भारत के आंतरिक मामलों में बेजा दखल देने की कोशिश की हो और गीदड़भभकी दी हो। विडंबना यह है कि ऐसी स्थितियों का सामना करने और वैश्विक स्तर पर बने समीकरणों के बावजूद पाकिस्तान अब भी भारत को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करता रहता है। मुश्किल यह है कि इस मामले में वैश्विक मंचों पर वह अकेले कुछ कर पाने की स्थिति में तो नहीं ही है और जिन देशों का सहारा मिलने की उसे उम्मीद होती है, उनसे भी कुछ खास हासिल नहीं हो पाता। दरअसल, इससे पहले भी पाकिस्तान और चीन ने कश्मीर के मसले पर संयुक्त राष्ट्र में भारत को घेरने की कोशिश की थी। मसलन, पिछले साल अगस्त में चीन ने सुरक्षा परिषद की बैठक बुला कर जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 को हटा कर इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटे जाने का मसला उठाया था, जो नाकाम रहा। इसके बाद फिर बीते दिसंबर में भी कश्मीर मुद्दे पर सुरक्षा परिषद में बहस कराने का प्रस्ताव चीन को इसलिए वापस लेना पड़ा था, क्योंकि रूस और ब्रिटेन ने खुले तौर पर भारत का साथ देते हुए कहा था कि इस मुद्दे पर सुरक्षा परिषद में चर्चा की जरूरत नहीं है। सवाल है कि बार-बार हाथ लगने वाली नाकामी के बावजूद पाकिस्तान और चीन को यह समझने में क्यों मुश्किल हो रही है कि कश्मीर में जो कुछ भी है, वह भारत का आंतरिक मामला है और यहां की समस्याओं से निपटना आखिरकार भारत की जिम्मेदारी है!
सुरक्षा परिषद के कई सदस्यों ने यह भी कहा है कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान का द्विपक्षीय मुद्दा है और दोनों देशों के बीच बातचीत से ही इसका हल होना चाहिए। इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि अगर कोई देश अपनी सीमा में किसी इलाके में खड़े हुए किसी मुद्दे से जूझ रहा है तो यह उसका आंतरिक मामला है और इसमें किसी तरह की गैरजरूरी दखल देने की स्थिति से दूसरे देशों को बचना चाहिए। सवाल है कि क्या पाकिस्तान और चीन इस तथ्य से अनजान हैं कि किसी संप्रभु देश के आंतरिक मामलों में बिना उसकी मांग के किसी भी तरह का दखल देना ठीक नहीं है, वरना इस तरह की प्रवृत्ति के नतीजे में होने वाली उथल-पुथल की मुश्किल किसी भी देश को झेलने की नौबत आ सकती है? गौरतलब है कि इस साल भारत में होने जा रहे शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में पाकिस्तान को भी निमंत्रण भेजने की चर्चा है। यानी पाकिस्तान की बेमानी हरकतों के बावजूद अगर संबंधों को सहज बनाने के लिहाज से भारत का रुख सकारात्मक है तो क्या पाकिस्तान और चीन को अपने रवैये पर विचार नहीं करना चाहिए?

तालिबान: भारत अपनी खिड़की खोले
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अफगानिस्तान के तालिबान संगठन ने भारत के प्रति अपने रवैए में एकदम परिवर्तन कर दिया है। पाकिस्तान के लिए तो यह एक बड़ा धक्का है लेकिन यह रवैया हमारे विदेश मंत्रालय के सामने भी बड़ी दुविधा खड़ी कर देगा। अब से पहले तालिबान जब भी जिहाद का आह्वान करते थे, वे कश्मीर का उल्लेख ऐसे करते थे, जैसे कि वह भारत का अंग ही नहीं है। वे कश्मीर को हिंसा और आतंकवाद के जरिए भारत से अलग करने की भी वकालत किया करते थे। लेकिन अब तालिबान के दोहा में स्थित केंद्रीय कार्यालय के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने बाकायदा एक बयान जारी करके कहा है कि कश्मीर भारत का आतंरिक मामला है और हमारी नीति यह है कि हम अन्य देशों के मामले में कोई दखल नहीं देते हैं।
तालिबान के उप-नेता शेर मुहम्मद अब्बास स्थानकजई ने शिकायत की थी कि अफगानिस्तान में भारत अब भी निषेधात्मक भूमिका निभा रहा है। वह तालिबान के साथ सहयोग करने की बजाय अशरफ गनी और अब्दुल्ला की कठपुतली सरकार के साथ सहयोग कर रहा है। तालिबान नेताओं को आश्चर्य है कि जब अमेरिका उनसे सीधे संपर्क में है तो भारत सरकार ने उनका बहिष्कार क्यों कर रखा है ?
यह सवाल अभी से नहीं, जब 20-25 साल पहले तालिबान सक्रिय हुए थे, तभी से उठ रहा था। अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में जब तालिबान काबुल में सत्तारुढ़ हुए तो उन्होंने मुझसे सीधा संपर्क करके उनकी सरकार को भारत से मान्यता दिलवाने का आग्रह किया था। तालिबान सरकार के प्रतिनिधि मुझसे न्यूयार्क, लंदन, काबुल और पेशावर में गुपचुप मिलते रहते भी थे। लेकिन उन दिनों तालिबान और पाकिस्तान के रिश्ते इतने अधिक घनिष्ट थे कि भारत द्वारा उनको मान्यता देना भारत के हित में नहीं होता।
लेकिन इस समय स्थिति बदली हुई है। सबसे पहले मेरी अपनी मान्यता है कि तालिबान संगठन गिलज़ई पठानों का है। ये स्वभाव से स्वतंत्र और सार्वभौम होते हैं। पाकिस्तान तो क्या, अंग्रेज भी इन पर अपना रुतबा कायम नहीं कर सके। अब ये दोहा (कतर) से अपना दफ्तर चला रहे हैं, पेशावर से नहीं। और अमेरिका इनसे काबुल सरकार की बराबरी का व्यवहार कर रहा है। आधे अफगानिस्तान पर उनका कब्जा है। यह ठीक है कि अफगानिस्तान की वर्तमान सरकार से भारत के संबंध अति उत्तम हैं (राष्ट्रपति अशरफ गनी और डाॅ. अब्दुल्ला मेरे व्यक्तिगत मित्र भी हैं), इसके बावजूद मेरी राय है कि तालिबान के लिए अपनी खिड़की खुली रखना भारत के लिए जरुरी है। अमेरिकी वापसी के बाद काबुल में जिसकी भी सत्ता कायम होगी, उसके साथ भारत के संबंध अच्छे होने चाहिए। यह कितने दुख और आश्चर्य की बात है कि अफगानिस्तान भारत का पड़ौसी है और उसके भविष्य के निर्णय करने का काम अमेरिका कर रहा है ? भारत की कोई राजनीतिक भूमिका ही नहीं है।
(डॉ. वैदिक अफगान मामलों के विशेषज्ञ हैं और सभी अफगान खेमों के नेताओं से उनका सीधा संपर्क है।)

लद्दाख में टकराव
सिद्धार्थ शंकर
लद्दाख में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुए टकराव को भले ही स्थानीय स्तर पर सुलझा लिया गया लेकिन मामला पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। चीन ने सीमा पर बड़े पैमाने पर सैनिकों की तैनाती कर दी है। बड़ी तादाद में मोटर बोट भी तैनात किए हैं। हालात पर भारत के शीर्ष नेतृत्व की करीबी नजर है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और हर एक गतिविधियों की जानकारी ले रहे हैं। चीन का यह डर्टी गेम उस वक्त चल रहा है जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है और इससे निपटने में लगी है। कोरोना वायरस चीन से पूरी दुनिया में फैला और अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि वायरस के फैलने की अंतरराष्ट्रीय जांच हो और हजारों मौतों की जिम्मेदारी तय हो। ऐसे वक्त में चीन न सिर्फ जगह-जगह टकराव के जरिए इस मुद्दे से ध्यान भटका रहा है, बल्कि नेपाल को भी भारत के खिलाफ भड़का रहा है। माना जा रहा है कि लिपुलेख मामले में नेपाल को उकसाने में में चीन का ही हाथ है।
हालांकि, लद्दाख में चीन की हरकत अनायास नहीं है। लॉकडाउन के कारण दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं को तगड़ी चोट पहुंची है। वहीं कई बड़े देशों में चीन सरकार के प्रति लोगों का गुस्सा भी बढ़ता जा रहा है। चीन के रवैये से नाराज अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस समेत कई देश अपनी कंपनियों को वहां से निकालने की सोच रहे हैं। इनमें से कई देश चीन के विकल्प के रूप में भारत को देख रहे हैं। चीन विदेशी कंपनियों के कारोबार को समेटने के फैसले से भड़क गया है और इसके लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा रहा है। चीन ने तंज कसते हुए कहा कि भारत कभी भी उसकी जगह नहीं ले सकता है। चीन ने तंज कसते हुए कहा कि अमेरिका के साथ जारी तनाव भारत के लिए औद्योगिक इकाईयों को आकर्षित करने का अवसर प्रदान नहीं कर सकता। क्योंकि, भारत अपने खराब बुनियादी ढांचे, कुशल श्रम की कमी और कठोर विदेशी निवेश प्रतिबंधों के कारण मैन्यूफैक्चरिंग हब बनने के लिए तैयार नहीं है।
बहरहाल, भारत-चीन सीमा पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच नोकझोक, टकराव आम बात है। सीमा पूरी तरह स्पष्ट नहीं है इसलिए पट्रोलिंग के दौरान जब भी दोनों देशों के सैनिकों का आमना-सामना होता है तो उनमें कभी हल्की तो कभी तीखी नोकझोक देखने को मिलती है लेकिन इस बार का टकराव गंभीर रूप लेता जा रहा है। टकराव के बाद चीन ने अपनी ओर सैनिकों का जमावड़ा बढ़ा दिया है। चीन के सैनिक इस हफ्ते उसी क्षेत्र में सैन्य अभ्यास कर रहे थे। उस सैन्य अभ्यास में इस्तेमाल हो रहे भारी हथियारों, सैन्य साजोसामानों को भी चीन ने बॉर्डर पर तैनात कर दिया है। यह भी माना जा रहा है कि चीनी सैनिकों ने पैंगोंग सो लेक के किनारे अपनी-अपनी पोजिशन भी ले ली है और मोटरबोट के जरिए आक्रामक गश्ती कर रहे हैं। इतना ही नहीं, बताया जा रहा है कि भारतीय सेना ने जो अस्थायी ढांचा बना रखे थे, उन्हें भी नुकसान पहुंचाया गया है। गलवान में जहां दोनों देशों के सैनिकों के बीच टकराव हुआ, वहां चीन के सैनिक अब भी तैनात हैं। जवाब में भारत ने भी सैनिकों के जमावड़े को बढ़ा दिया है। जो रिपोट्र्स आ रही हैं, उनके मुताबिक गलवान में टकराव वाली जगह के करीब चार किलोमीटर के दायरे में चीन ने अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती कर दी है।
जानकार यह भी कह रहे हैं कि चीन अभी भारत से सीधे टकराव लेने की हिम्मत नहीं करेगा। उसे पता है कि आज का भारत 1965 वाला नहीं रहा। आज उसके पास सामरिक क्षमता चीन से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं है। फिर उसे कई ताकतवर देशों का समर्थन है। पिछली मर्तबा डोकलाम में लंबे समय तक चीन ने तनातनी दिखाकर अपना मतलब साधने की कोशिश की थी, लेकिन हालात युद्ध जैसे थे, मगर वह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा था। बाद में खुद चीन ने समझौता करना उचित समझा और विवाद खत्म किया। इस बार जब चीन कोरोना के मामले में घिरा है तो वह भारत पर दबाव बनाने लद्दाख में तनाव का माहौल बना रहा है।

भारत में दो हिंदुस्तान हैं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कोरोना के इन 55 दिनों में मुझे दो हिंदुस्तान साफ-साफ दिख रहे हैं। एक हिंदुस्तान वह है, जो सचमुच कोरोना का दंश भुगत रहा है और दूसरा हिंदुस्तान वह है, जो कोरोना को घर में छिपकर टीवी के पर्दों पर देख रहा है। क्या आपने कभी सुना कि आपके किसी रिश्तेदार या किसी निकट मित्र का कोरोना से निधन हो गया है ? मैंने तो अभी तक नहीं सुना। क्या आपने सुना कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री की तरह हमारा कोई नेता, कोई मंत्री, कोई सांसद या कोई विधायक कोरोना का शिकार हुआ है ? हमारे सारे नेता अपने-अपने घरों में दुबके हुए हैं। देश के लगभग हर प्रांत में मेरे सैकड़ों-हजारों मित्र और परिचित हैं लेकिन सिर्फ एक संपन्न परिवार के सदस्यों ने बताया कि उनके यहां तीन लोग कोरोना से पीड़ित हो गए हैं। मैंने पूछा कि यह कैसे हुआ ? उनका अंदाज था कि यह उनके घरेलू नौकर, ड्राइवर या चौकीदार से उन तक पहुंचा होगा। यानि कोरोना का असली शिकार कौन है ? वही दूसरावाला हिंदुस्तान ! इस दूसरे हिंदुस्तान में कौन रहता है ? किसान, मजदूर, गरीब, ग्रामीण, कमजोर और नंगे-भूखे लोग ! वे चीन या ब्रिटेन या अमेरिका जाकर कोरोना कैसे ला सकते थे ? उनके पास तो दिल्ली या मुंबई से अपने गांव जाने तक के लिए पैसे नहीं होते। यह कोरोना भारत में जो लोग जाने-अनजाने लाए हैं, वे उस पहले हिंदुस्तान के वासी हैं। वह है, इंडिया ! वे हैं, देश के 10 प्रतिशत खाए-पीए-धाए हुए लोग और जो हजारों की संख्या में बीमार पड़ रहे हैं, सैकड़ों मर रहे हैं, वे लोग कौन हैं ? वे दूसरे हिंदुस्तान के वासी हैं। वे ‘इंडिया’ के नहीं, ‘भारत’ के वासी हैं। इन भारतवासियों में से 70-80 करोड़ ऐसे हैं, जो रोज कुआ खोदते हैं और रोज़ पानी पीते हैं। उनके पास महिने भर की दाल-रोटी का भी बंदोबस्त नहीं होता। इन्हीं लोगों को हम ट्रकों में ढोरों की तरह लदे हुए, भयंकर गर्मी में नंगे पांव सैकड़ों मील सफर करते हुए, थककर रेल की पटरी पर हमेशा के लिए सो जाने के लिए और सड़कों पर दम तोड़ते हुए रोज देख रहे हैं। सरकारें उनके लिए भरसक मदद की कोशिशें कर रही हैं, लेकिन उनसे भी ज्यादा भारत की महान जनता कर रही है। आज तक एक भी आदमी के भूख से मरने की खबर नहीं आई है। यदि सरकारें, जैसा कि मैंने 25 मार्च को ही लिखा था, प्रवासी मजदूरों को घर-वापसी की सुविधा दे देतीं तो हमें आज पत्थरों को पिघलाने वाले ये दृश्य नहीं देखने पड़ते। आज भी ‘भारत’ के हर वासी के लिए सरकार अपने अनाज के भंडार खोल दे और कर्जे देने की बजाय दो-तीन माह के लिए दो सौ या ढाई सौ रुपए रोज का जीवन-भत्ता दे दे तो हमारे ‘इंडिया’ की सेवा के लिए यह भारत फिर उठ खड़ा होगा।

चीन के झांसे में नेपाल
सिध्दार्थ शंकर
नेपाल ने अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी कर भारत के साथ वर्षों से जारी बेहतर संबंधों को खराब करने का काम किया है। इसकी वजह इस नक्शे में लिम्पियाधुरा कालापानी और लिपुलेख को नेपाल की सीमा का हिस्सा दिखाया जाना है। ये सरकार की तरफ से जारी किया गया है इसलिए ही इसने कई सवालों को भी जन्म दे दिया है। इसमें सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि आखिर नेपाल ने इस तरह की कार्रवाई क्यों की है। क्या इसके पीछे चीन की कोई साजिश या दिमाग काम कर रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो इस पीछे कहीं न कहीं चीन ही है, जो नेपाल से ये सब कुछ करवा रहा है। नेपाल की तरफ से यह नक्शा भारत के उस फैसले के दस दिन बाद सामने आया है जिसमें भारत लिपुलेख में सड़क का निर्माण किया था। यही रास्ता तिब्बत से होता हुआ मानसरोवर तक जाता है। इस सड़क का नेपाल ने विरोध भी किया था। इसको लेकर नेपाल के विरोध को देखते हुए दोनों देशों ने विदेश सचिव स्तर की वार्ता करने पर रजामंदी जाहिर की है।
नेपाल के इस कदम के पीछे चीन का हाथ होने की सबसे बड़ी वजह तो यही है कि चीन काफी समय से नेपाल को अपने शिकंजे में करने का प्रयास कर रहा है। वह भारत केखिलाफ भड़काकर उसको अपने साथ मिलाना चाहता है। इसकी कवायद उसने वर्ष 2016-17 में उसी वक्त शुरू कर दी थी जब नेपाल में प्रचंड सरकार बनी थी। प्रचंड सरकार चीन समर्थक थी। इसके बाद से ही नेपाल का रुझान चीन की तरफ बढ़ा था। इसके बाद नेपाल पर अपना शिकंजा कसने के लिए उसने नेपाल को आर्थिक मदद भी दी थी। चीन ने पहले से ही भारत के अक्साई चिन पर अवैध तरह से कब्जा कर रखा है। इसके अलावा हिमाचल और उत्तराखंड के कुछ हिस्से पर भी चीन अपना बताता रहा है। वहीं पूर्व में अरुणाचल प्रदेश को भी वह अपना हिस्सा बताता आया है। इतना ही नहीं यहां पर होने वाले निर्माण पर भी कई बार चीन आपत्ति जाहिर की है। कुछ दिन पहले ही चीन के सैनिकों की उत्तराखंड सीमा पर भारतीय सैनिकों से हाथापाई भी हुई थी। भारत के साथ डोकलाम को लेकर भी वह काफी मुखर हो चुका है। वहां पर भारत ने उसको जबरदस्त शिकस्त दी थी। इसके बाद वह नेपाल को अपने जाल में फंसा कर भारत को रणनीतिक तौर पर कमजोर करना चाहता है।
कुल मिलाकर कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर दुनिया भर में बदनाम चीन भारत पर कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए घटिया हरकतों पर उतर आया है। भारत की सीमाओं में घुसपैठ करना और बाद में चले जाना पुरानी आदत है। पिछले दिनों लद्दाख और सिक्किम क्षेत्र में चीनी सैनिकों की ओर से की गई उकसावे वाली हरकतें चिंता का विषय है। चीन की कोशिश यही है कि अमेरिका और अन्य देशों के दबाव में भारत भी कहीं उसके खिलाफ मोर्चा न खोल दे। हांगकांग और ताइवान को लेकर भी दुनिया भर में आवाजें बुलंद हो रही हैं। यूरोपीय देश तो कोरोना वायरस के फैलते दायरे के चलते चीन को ही जिम्मेदार ठहरा कर उसके खिलाफ लामबंद हो रहे हैं। वर्ष 2017 में डोकलाम में घुसे चीनी सैनिकों को भारत के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था। तीन महीने तक दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने डटे रहे थे। यह पहला मौका था जब चीन के सामने भारत डटकर खड़ा था। भारत एक बड़ा बाजार है इसलिए चीन की मजबूरी भी है, इसलिए वह अच्छे रिश्तों की दुहाई भी देता है और गुर्राता भी है। यह सब उसकी कूटनीति का हिस्सा है। जब भी ऐसा मसला सामने आता है तो यही कहा जाता है कि भारत-चीन की सीमाएं स्पष्ट रूप से तय नहीं हुई हैं। इसलिए चीनी सैनिक घुसपैठ कर लेते हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद चीन लद्दाख को अपना हिस्सा बताता रहा है।
सीमा विवाद तो भारत और नेपाल में है, लेकिन इसमें चीन अपना हित देख रहा है। वह चाहता है कि कोरोना वायरस को लेकर उस पर आने वाले वैश्विक दबाव में भारत शामिल न हो। भारत और नेपाल चाहें तो इस समस्या का हल निकाल सकते हैं। अगर नेपाल को चीन के एजेंट के तौर पर काम करना है तो बात अलग है। नेपाल को याद रखना होगा कि मित्र तो बदले जा सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं। नेपाल में बंदूक की संस्कृति से निकले लोकतंत्र को संभल कर चलना होगा और भारत तथा चीन में संतुलन बना कर रखना होगा।

आत्मनिर्भर’ मानवीय त्रासदी के बीच उपलब्धियों का गौरव गान !
श्रवण गर्ग
लाखों की संख्या में जो मज़दूर इस समय गर्मी की चिलचिलाती धूप में भूख-प्यास झेलते हुए अपने घरों को लौटने के लिए हज़ारों किलो मीटर पैदल चल रहे हैं उन्हें शायद बहुत पहले ही ईश्वरीय संदेश प्राप्त हो चुका होगा कि आगे चलकर समूचे देश को ही आत्म निर्भर होने के लिए कह दिया जाएगा।शायद इसीलिए उन्होंने केवल अपने अंतःकरण की आवाज़ पर भरोसा किया और निकल पड़े।वे मज़दूर जान गए थे कि सरकारें तो उनकी कोई मदद नहीं ही करने वाली है ,जो जनता उनकी सहायता के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाना चाहती है उसे भी घरों में तब तक बंद रखा जाएगा जब तक कि वे अपने ठिकानों पर नहीं पहुँच जाते।वरना तो और ज़्यादा दुख भरी कहानियाँ उजागर हो जाएँगी।
अब ‘आत्म निर्भरता’ देश का नया नारा है।’मेक इन इंडिया’ अंग्रेज़ी में था यह देसी भाषा में है।इंदिरा गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया था और देश ज़्यादा गरीब हो गया।नए नारे के अंत को लेकर भयभीत हुआ जा सकता है कि कहीं लोग अब छोटी-छोटी बात के लिए भी सरकार को ही भगवान नहीं मानने लगें।वैसे आत्म-निर्भरता की शुरुआत तो हो चुकी थी पर केवल ‘पॉज़िटिव’ लोग ही उसे भांप पाए।समझाया जाने लगा था कि अधिकतर लोगों को अपना इलाज अब घरों में ही करना पड़ेगा।मरीज़ों की तुलना में अस्पताल धीरे-धीरे और छोटे पड़ते जा सकते हैं ।गिनाने की ज़रूरत नहीं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के क्या हाल हैं ! ढाई महीनों में डॉक्टर ,पुलिस और स्वास्थ्यकर्मी कितना थक चुके हैं।बीमारी अगर साल-छह महीने और चली तो क्या हाल बनेंगे ! अगर फिर भी कहा जा रहा है कि स्थिति नियंत्रण में है और लड़ाई हम शीघ्र ही जीत लेंगे तो उस पर भी यक़ीन किया जाना चाहिए।
सवाल यह है कि वे लोग जो हमसे कहीं ज़्यादा परेशान हैं,बेरोज़गारी और भूख से मरने के डर से अपने बच्चों को सीनों से चिपटाए हुए हैं ,उन्हें कौन और कैसे समझाएगा कि बीस लाख करोड़ रुपए वास्तव में कितने होते हैं, दो के अंक के बाद कितने शून्य लगाना पड़ते हैं और कि क्या वे किसी मदद के लिए शून्य में ताकते हुए ही दम तोड़ देंगे या उनके पल्ले भी कुछ पड़ेगा ? विडम्बना यह भी है कि इस भयानक मानवीय त्रासदी पर कोई शोक गीत लिखने के बजाय उपलब्धियों की गौरव गाथाओं का सार्वजनिक पारायण किया जा रहा है और तालियाँ बजाने वाले ‘जमाती’ दिलासा दे रहे हैं कि -धैर्य रखिए, बस थोड़े दिनों की ही बात है ,सब कुछ ठीक हो जाएगा।
इस बात का विश्लेषण होना अभी बाक़ी है कि केवल पंद्रह दिनों के बीच ही ऐसा क्या हो गया कि देश के चश्मे की फ़्रेम भी बदल गयी और फ़ोकस भी बदल गया।हम वैसे तो पहले से ही स्वदेशी थे पर इस बार ‘विदेशी’ से ‘स्वदेशी’ हो गए।’आडी’ से ‘खादी’ पर उतर आए।सत्ताईस अप्रैल को मुख्यमंत्रियों के साथ हुई अपनी वीडियो बातचीत में प्रधानमंत्री ने कहा बताते हैं कि विदेशी कम्पनियाँ चीन से बाहर निकल रही हैं अतः राज्यों को अपनी विस्तृत योजनाएँ बनाकर उन्हें अपने यहाँ पूँजी निवेश के लिए प्रेरित करना चाहिए।क्या चीन से निकलने वाली कम्पनियों ने भारत को अपना ठिकाना बनाने से इनकार कर दिया और वे ताइवान, थाईलैंड ,दक्षिण कोरिया आदि देशों के लिए रवाना हो रहीं हैं ? क्या देश की आर्थिक नीतियों में कोई बड़ा शिफ़्ट किया जा रहा है जिसकी कि जानकारी चुने हुए सांसदों तक पहुँचना अभी बाक़ी है ?
मुख्यमंत्रियों के साथ सोमवार को दिन में हुई प्रधानमंत्री की बातचीत में चीन से बाहर निकलनेवाली कम्पनियों का (सम्भवतः) कोई ज़िक्र नहीं किया गया और रात को जनता के नाम सम्बोधन में देश के लिए नए नारे की घोषणा कर दी गई।प्रधानमंत्री ने बताया कि जो दूसरों के वश में होता है वह दुःख और जो अपने वश में होता है वह सुख होता है।इसका यह अर्थ भी लगाया जा सकता है कि भारत ने अपने सुख के लिए विदेशों पर निर्भरता अब ख़त्म कर दी है।अब हमें ही सब कुछ करना है जिसमें कि वैक्सीन का विकास भी शामिल है।कोलकाता से प्रकाशित होने वाले अंग्रेज़ी दैनिक ‘द टेलीग्राफ़’ ने लिखा है कि प्रधानमंत्री के सम्बोधन की समाप्ति के साथ ही यह खबर भी आई कि उस इक्कीस वर्षीय प्रवासी मज़दूर की तीन सौ किलो मीटर चलने के बाद मौत हो गई जो रविवार को हैदराबाद से अपने गृह-स्थान मल्कानगिरि (उड़ीसा) के लिए पैदल निकला था।

कर्मयोगी ऋषिराज सदगुरु दद्दाजी ॥
आशुतोष राना
कर्मयोगी, ऋषिराज गृहस्थ संत परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्री देव प्रभाकर जी शास्त्री जिन्हें सम्पूर्ण जगत आदर व प्रेम से ‘दद्दाजी’ कह के सम्बोधित करता था, सच्चे अर्थों में “संकल्प मूर्ति” थे। पूज्य दद्दाजी को “संकल्प का पर्याय” कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
परमपूज्य दद्दाजी ने जहाँ अपने पूज्य गुरुदेव धर्म सम्राट यति चक्र चूड़ा मणि स्वामी करपात्री जी महाराज के राष्ट्र कल्याण के लिए ११ बार सवा करोड़ पार्थिव शिवलिंग निर्माणमहारूद्र यज्ञ के संकल्प को पूरा किया, वहीं स्वयं के ४५ बार इस यज्ञ को सम्पन्न करने के संकल्प को चित्रकूट की पावन भूमि पर पूर्ण किया।
४५ वे यज्ञ के समापन पर परमपूज्य दद्दाजी से हम सभी शिष्यों ने निवेदन किया की परमपूज्य हम शिष्यगण चाहते हैं कि आपका यह धार्मिक अभियान कम से कम १०८ यज्ञों की संख्या तक पहुँचे, तब पूज्य दद्दाजी ने अत्यंत करुणा के साथ अपने शिष्यों के शिवसंकल्प को बड़ी सहजता से स्वीकार कर १०८ यज्ञों की घोषणा कर दी और उसे स्वयं का संकल्प बना लिया जिसे उन्होंने 2016 में महाकाल की नगरी उज्जैन में हुए महाकुंभ के अवसर पर पूर्ण किया।
जो अपने गुरु के संकल्प को पूर्ण करे, स्वयं के संकल्प को पूर्ण करे व अपने शिष्यों के संकल्प को पूर्ण करे वह स्वयं शिव ही हो सकता है।
जहाँ धर्म विभिन्न मतमतांतरों के चलते शैव व वैष्णव सम्प्रदाय में बँट चुका है वही परमपूज्य गुरुदेव दद्दाजी ने अपनी अखंड दृष्टि के चलते खंड में बटी हुई आस्थाओं को पुनः अखंड कर दिया। वे एक ही यज्ञ पंडाल में सुबह “हर” ( शिव ) का निर्माण करवाते थे और संध्याकाल वहीं स्वयं के मुख से “हरी” ( कृष्ण) की कथा सुनाते थे इस नाते पूज्य दद्दाजी “हरिहरात्मक” यज्ञ के अनूठे पुरोधा थे।
करूणा और कृपा में अंतर होता है। किसी को- गिरे हुए, व्यथित, दुखी देख कर मन में दया का भाव आना करूणा है, और उस गिरे हुए को हाथ पकड़ के उठा देना उसकी सहायता कर उसे उसके गंतव्य (लक्ष्य) तक पहुँचा देना कृपा है, हे परमपूज्य गुरुदेव आप कृपानिधान ही नहीं करुणासिंधु भी थे।
परमपूज्य गुरुदेव एक ऐसे साधक, एक ऐसे संत थे जो मात्र स्वयं के चैन की तलाश में नहीं बल्कि अपने संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को सुख चैन आनंद उत्साह और उमंग से भरने के लिए प्रयासरत रहते थे।
परम पूज्य दद्दाजी ने अपने शिष्यों को मात्र जीविका निर्वहन की ही नहीं, जीवन निर्वाहन की शिक्षा दी है। समस्त चराचर के लिए समभाव और तत्परता के कारण उनके संदर्भ में हमें ये कहने की प्रेरणा मिलती है की ..
अपने अपने घरन में सब जन को है काम।
उनको सबके घरन में धन्य धन्य घनश्याम।।”
विश्वकल्याण के लिए परम पूज्य दद्दाजी के द्वारा कराए जाने वाला सवा करोड़ पार्थिव ( मिट्टी से) शिवलिंग निर्माण यज्ञ, योग भी है और सुयोग भी है। परमपूज्य दद्दाजी ने सन १९८० से लेकर आज तक, निरंतर ४० वर्षों में हम सभी को यह सुयोग प्रदान किया है।
पूरे भारतवर्ष में दिल्ली, मुंबई, शिर्डी, वाराणसी, रामेश्वरम, कानपुर, इलाहबाद, वृंदावन, भोपाल, इंदौर, उज्जैन, जबलपुर, कटनी, सागर, छतरपुर, बुरहानपुर से लेकर छोटे-छोटे शहरों और गाँवों में पूज्य दद्दाजी ने अभी तक १३१ बार इस यज्ञ को सफलता पूर्वक सम्पन्न किया है, जिसमें उन्होंने छः सौ करोड़ शिवलिंगों ( ६ अरब ) का निर्माण करवा दिया है, जो भारत की आबादी के अनुपात में चार गुना है।
परमपूज्य दद्दाजी के द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले इस यज्ञ में विभिन्न वर्ग , वर्ण, जाति , आयु ,धर्म के श्रृद्धालु सम्मिलित रहते थे। यज्ञ में लगने वाली समस्त हवन पूजन सामग्री, भोजन भंडारा सातों दिन भक्तों को निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता था।
उपलब्ध शास्त्रों व पुराणों में संकलित सूचनाओं के आधार पर यह एक ऐतिहासिक सत्य स्पष्ट होता है कि सतयुग से लेकर कलयुग तक इस सर्व कल्याणकारी यज्ञ को १३१ बार सफलतापूर्वक सम्पन्न करने का श्रेय परमपूज्य दद्दाजी को ही जाता है।
परमपूज्य दद्दाजी अपने इस धार्मिक उद्यम के कारण ज्ञात और अज्ञात इतिहास में एक मात्र संत हैं, जिन्होंने हमारे पूज्य ऋषियों की गृहस्थ परम्परा का पालन करते हुए, स्वयं सदगृहस्थ रहते हुए इस महानतम शिवसंकल्प को पूरा किया व हर-हर महादेव के इस जयघोष को घर-घर महादेव में रूपांतरित कर दिया।
पूज्य दद्दाजी का यह शिवप्रकल्प मात्र प्रसार के लिए नहीं, जनसामान्य के परिष्कार के लिए होता था यह स्वार्थ सिद्धि का नहीं, परमार्थ सिद्धि का हेतु था। हम भोगियों को योगीश्वर महादेव व योगेश्वर श्रीकृष्ण के संम्पर्क में लाने वाले, हमारे शवयोग को शिवयोग में रूपान्तरित करने वाले, मृणमय को चिन्मय बनाने वाले शिवस्वरूप ऋषिराज गृहस्थ संत परमपूज्य दद्दाजी आज ब्रह्मलीन हो गए..
कहने को तो उनका पंच भौतिक शरीर पंच महाभूतों में विलीन हो गया किंतु मेरा अनुभव है कि परमपूज्य दद्दाजी के जैसी पुनीत चेतनाएँ संसार में आती हैं और अपने सम्पर्क में आने वाली सभी चेतनाओं के आचार, विचार, व्यवहार में सदा के लिए वर्तमान हो जाती हैं। परमपूज्य दद्दाजी भले ही आज दैहिक रूप से हम सभी शिष्यों की दृष्टि से ओझल हो गए हैं किंतु मेरा विश्वास है कि वे अपने सूक्ष्म रूप से सदैव हम सभी शिष्यों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे, अब से उनका दिव्य स्वरूप हमारी आखों का विषय नहीं, अनुभूति का विषय हो गया है।
हमारी वासना को उपासना की ओर मोड़ने वाले, हमें विकल्प से मुक्त करते हुए संकल्प से युक्त करने वाले, हमारी विकार वृत्ति को विचार वृत्ति में परिवर्तित करने वाले, हमारे चिंतन को विषय से हटा कर ब्रह्म से जोड़ने वाले,
हमें वैरागी नहीं अनुरागी होने के प्रेरणा देने वाले, जगत में रहते हुए हमारे चिंतन को जगदीश्वर की ओर मोड़ने वाले। हे दयानिधि, मैं अकिंचन आपसे प्रार्थना करता हूँ मुझ जैसे मूढ्मती शिष्य को आपकी कृपाछाया जीवनपर्यंत मिलती रहे मैं सदैव सदमार्ग पर चलते हुए आपकी अहेतुकी कृपा का सदुपयोग करता रहूँ।
आपके श्री चरणों में शत् शत् प्रणाम, शिवसंकल्पमस्तु।

‘रिस्क’ केवल नागरिक ही ले सकते हैं, सरकारें नहीं!
श्रवण गर्ग
आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि लॉक डाउन खोलने को लेकर नागरिकों के मन में जैसी चिंताएँ हैं वैसी उन लोगों के मनों में बिलकुल नहीं हैं जो दुनिया भर में सरकारों में बैठे हुए हैं।उनकी चिंताएँ एकदम अलग हैं।नागरिक आमतौर पर मान बैठता है कि सरकार इस तरह की परिस्थितियों में ‘केवल’ उसी की चिंता में लगी रहती है।ऐसा वास्तव में होता नहीं है और इसे सभी जानते भी हैं।मसलन, एक नागरिक की यह दुविधा हो सकती है कि लॉक डाउन अगर पूरी तरह से खोल दिया जाए तो उसे ‘खुली जेल’ से मुक्त होते ही सबसे पहले क्या करना चाहिए इसका उसे पता नहीं है।हो सकता है कि वह कहीं जाए ही नहीं और महामारी के डर से स्वेच्छा से ही अपने आपको घरों में बंद कर ले।पर सरकारों को पता रहता है कि नागरिक कहाँ-कहाँ जा सकता है और उससे राज्य को क्या नुक़सान हो सकता है।नागरिक अपने शरीर और परिवार के भविष्य को लेकर जितना चिंतित रहता है उससे ज़्यादा चिंता राजनेताओं को अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर रहती है।लॉक डाउन जैसे महत्वपूर्ण मसलों पर लिए जाने वाले फ़ैसलों का सम्बंध भी इन्हीं चिंताओं से रहता है।
ब्रिटेन में प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन को कोरोना के कारण जब सरकारी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा तो योरप की राजनीति में जैसे भूचाल आ गया।एक प्रधानमंत्री की जान का संकट देश का संकट बन गया।उसकी बीमारी ब्रिटेन में ही हज़ारों की संख्या में हो रही नागरिक-मौतों से अलग हो गई।तरह-तरह की अटकलें लगाई जाने लगीं।अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रम्प की प्रतिदिन कोरोना जाँच हो रही है।वहाँ एक बड़ी संख्या में लोग और कई राज्यों के प्रमुख(गवर्नर) लॉक डाउन प्रतिबंधों को जारी रखने के पक्ष में हैं पर राष्ट्रपति सब कुछ जल्दी से खोलकर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना चाहते हैं जिससे कि नवम्बर में होने वाले चुनावों के पहले उनकी लोकप्रियता शिखर पर पहुँच सके।अमेरिका में कोरोना के कारण हो रही हज़ारों मौतों के बारे में सबको पता है।
राजनेताओं और उनके ही नागरिकों के सोच के बीच किस तरह का फ़र्क़ होता है उसका सामान्य तौर पर आकलन नहीं हो पाता।जैसे कि मौजूदा संकट में भी विश्व के अधिकांश नेता जनता के बीच अपनी छवि और लोकप्रियता को लेकर भी उतने ही चिंतित माने जा सकते हैं जितने कि मरनेवालों के आँकड़ों को लेकर।’इकॉनमिस्ट’ पत्रिका का आकलन है कि इस संकट की घड़ी में विश्व के कम से कम दस राष्ट्राध्यक्षों की लोकप्रियता में नौ प्रतिशत जितना इज़ाफ़ा हुआ है।भारत सहित ऑस्ट्रेलिया ,कनाडा, जर्मनी में तो इसे व्यापक तौर पर महसूस किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने सम्बोधनों में उल्लेख करना नहीं भूलते हैं कि कोरोना से निपटने में भारत के प्रयासों की दुनिया भर में तारीफ़ हुई है।
वैश्विक आपदाओं का इसे एक दुर्भाग्यपूर्ण समापन भी माना जा सकता है कि नागरिकों की मौतें केवल एक संख्या बनकर तुलनात्मक अध्ययनों के लिए रेकार्ड में दफ़्न हो जाती हैं और महत्वपूर्ण यह बन जाता है कि कितने लोग अपनी सत्ताएँ क़ायम रखने में सफल हो गए।हम अपने यहाँ के ही संदर्भ में ही देखें तो कोरोना से निपटने के मामले में केरल के बाद सफल राज्यों में गिनती गोवा, सिक्किम, मणिपुर, अरुणाचल, मिज़ोरम आदि की हो रही है।केरल तो ताइवान के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है।अतः माना जा सकता है कि मौतों के आँकड़ों के संदर्भ में कोरोना से निपटने को लेकर जो चिंता भारत की प्रतिष्ठा को लेकर प्रधानमंत्री की हो सकती वही राज्यों के मुख्यमंत्रियों की भी राष्ट्रीय स्तर पर हो सकती है।इसीलिए जो उलझन नागरिकों के मन में ‘कहाँ जाएँ’ को लेकर है वह राज्य सरकारों के मन में नहीं है।उनकी चिंता ‘कब और कहाँ तक ‘जाने दिया जाए को लेकर है और वह उलझन लम्बे अरसे तक भी बनी रह सकती है।अतः जो नागरिक इस समय दुविधा में हैं वे निश्चिंत हो सकते हैं कि तत्काल कुछ नहीं खुल रहा है और उन्हें कहीं नहीं जाना है।जो पैदल चल पड़े हैं, केवल उन्हें ही पता है कि कहाँ पहुँचना है।और उसके बारे में किसी भी बैठक में कभी कोई बात नहीं होगी।’रिस्क’ केवल नागरिक ही ले सकते हैं, सरकारें नहीं।

आत्म निर्भर भारत और विदशी माल का बहिष्कार
हर्ष वर्धन पाठक
भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश को लेकर बहुत चर्चा है। उन्होंने राष्ट्र से यह कहा है कि लोकल के लिए वोकल बनें। नरेंद्र मोदी का विचार स्वागत योग्य है कि हमें आत्म निर्भर बनना चाहिए।उनका लोकल के लिए वोकल बनें की अपील का यही सन्दर्भ है। विशेष कर चीनी माल इन दिनों भारत ही नहीं दुनिया में बहुत चल रहा है।यह सस्ता होने के कारण अधिक चल रहा है।लोग कहते हैं चीन में मजदूरी सस्ती है। यह बात समझ में नहीं आती है। कम्युनिज्म का मूल सिद्धांत मजदूरों के शोषण के खिलाफ है। क्या चीन में मजदूरों का शोषण हो रहा है?
कोरोना के संबन्ध में दो तरह के विचार सामने आ रहे हैं। एक ओर वे आशावादी लोग हैं जो यह मान कर चलते हैं,यह बीमारी नियंत्रण में है , इसके संक्रमण मे धीरे धीरे कमी हो रही है और.कुछ माह में यह.घातक रोग समाप्त. हो जाएगा तथा. इसका रोग प्रतिबंधक टीका तैयार हो जाएगा । दूसरी ओर वे लोग हैं जो यह मानते हैं घातक बीमारी जल्दी बिदा होने वाली नहीं है और हमें इसके साथ रहने की आदत डालनी होगी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बाद भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भी यह मत अभिव्यक्त किया है । अनेक लोग इस विचार के हैं । रतन टाटा जैसे अग्रणी उद्योगपति का नाम इस संबंध में उल्लेखनीय है। उन्होंने अपने हम.पेशेवर मित्रों से कहा है कि वर्ष २०२० किसी तरह जीवित रहने का काल खंड है। जब रतन टाटा जैसे उद्योगपति का यह हाल है तो बाकी उद्योगपति और व्यापारियों की मन:स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।
वैसे यह रोग डरावना स्वरूप धारण करता जा रहा है। रोग के आंकडे प्रतिदिन चिंता के कारण बन रहे हैं। ताजे आंकड़े यह बताते हैं कि भारत का स्थान कोरोना से प्रभावित देशों में पांचवां है जबकि एक माह पूर्व तक हमारा देश इस बीमारी से प्रभावित पहले बीस देशों में भी नहीं था। अमेरिका का स्थान पहला है लेकिन रोग की वृद्धि दर में कमी हुई है। भारत की वृद्धि दर कई देशों से अधिक है। यह स्थिति चिंताजनक है। महाराष्ट्र का पहला नम्बर बना हुआ है। इस प्रदेश ने दुनिया के कई अन्य देशों को इस मामले में पीछे छोड़ दिया है। अहमदाबाद में तो स्थिति इतनी खराब है कि वहां बीएसएफ को भी बुलाना पड़ा है।वास्तव में गुजरात में हालात नियंत्रण के बाहर हो गए हैं। आश्चर्य नहीं होगा यदि गुजरात महाराष्ट्र को भी पीछे छोड़ दे। कुल मिलाकर भारत में कोरोना का संकट बढ़ता जा रहा है ।यह चिंता जनक है।
कोरोनावायरस से बड़ा संकट हमारे सामने है ।यह है रोजगार और विश्वास का संकट। भारत में रोजगार कभी संतोष जनक नहीं रहा। लेकिन देश का काम किसी तरह से चल रहा था। इस बीमारी ने विश्वास का संकट भी पैदा कर दिया है । पहले मिल मालिकों और मजदूरों में परस्पर समन्वय था जो अब समाप्त हो गया हैं । इसी प्रकार खेतिहर मजदूरोंऔर किसान का समन्वय समाप्तप्राय है। यह समन्वय या आपसी विश्वास , समझदारी मिटने के दुष्परिणाम सामने आयेंगे। यदि कुछ किसान खेती में परिवर्तन करें, परंपरागत उपज को छोड़ कर ऐसी फसल लेना चाहें जिसमें उनकी निर्भरता खेतिहर मजदूरों पर कम हो तो इसमें अचरज नहीं होना चाहिए।वास्तव में भारतीय समाज का ताना बाना कोरोना के खतरे ने बदल दिया है।
इसी प्रकार की हालात प्रिन्ट मीडिया की है । अखबारों की प्रसार संख्या में कमी नहीं है लेकिन उनकी पृष्ठ संख्या कम हो गई है।इसका प्रभाव कई लोगों की नौकरी पर पड़ा है । इनमें श्रमजीवी पत्रकार भी हैं और दूसरे श्रमिक भी हैं। भारत में रोजगार बड़ी समस्या है।यह प्रतिपक्ष का बड़ा मुद्दा है।यह समस्या सुलझाना सरकार का काम है । अखिल भारतीय मेडिकल संस्थान के डायरेक्टर डा, गुलेरिया ने यह चेतावनी दी है कि जून -जुलाई माहों में कोरोनावायरस के प्रकरण चरम की स्थिति में होंगे । अर्थात.इन माहों में इस रोग का प्रकोप सर्वाधिक होगा । इस संबंध में सरकार को अभी से तैयारी करना होगी। इस संबंंध.में समस्याओं की सूची लम्बी है। अर्थव्यवस्था को सम्हालना भी होगा । एक अनुमान के अनुसार दुनिया मेंं लगभग डेढ़ सौ करोड़ लोग बेरोजगार होंगे। भारत में रोजगार खोने वाले लोगों की संख्या का अन्दाज इससे लगाया जा सकता है। इस बीमारी का घातक असर और लगभग दो माह.चले लाकडाउन ने अवसाद तथा अज्ञात मानसिक भय की परिस्थित पैदा की हैं ।क्या देश में इतने मनोवैज्ञानिक उपलब्ध हैं जो इसका समुचित उपचार कर सकें । पहले ही.लिखा है जा चुका है कि करोना के कारण उत्पन्न समस्याओं की सूची लम्बी है।

भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के हाल बेहाल
सनत जैन
– लॉक डाउन में 21 राज्यों को 1 लाख करोड़ की आय का नुकसान
– कोरोना आपदा में अरबों रुपए अलग से खर्च करने पड़ रहे हैं राज्यों को
– केंद्रीय से मिलने वाली योजनाओं की राशि में भी कटौती से राज्य भारी संकट में
लाकडाउन के कारण देश के 21 बड़े राज्यों को लगभग एक लाख करोड़ रुपए का नुकसान पिछले 40 दिनों में उठाना पड़ा है। इंडिया रेटिंग ने जो रिपोर्ट जारी की है। उसके अनुसार विमानन, पर्यटन, पोर्टल, हॉस्पिटैलिटी उत्पादन चेन आपूर्ति कारोबार और अन्य गतिविधियां सभी राज्यों में 40 दिन से अधिक हो गए हैं, पूरी तरह ठप्प पड़ी हुई हैं। केंद्र एवं राज्य सरकारें गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार गोवा, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे राज्यों की 76 फ़ीसदी से लेकर 65 फीसदी आय, उनके ही राज्य से अन्य स्रोतों से होती थी। पिछले 40 दिनों से सारा कारोबार ठप्प होने के कारण, राज्य काफी बड़े आर्थिक संकट में आ गए हैं। उल्लेखनीय है, गुजरात राज्य के बजट में 76 फ़ीसदी आय, तेलंगाना में 75.6 फ़ीसदी, हरियाणा में 74.7,फ़ीसदी कर्नाटक की 71.4 फ़ीसदी, तमिलनाडु की 70.4 फ़ीसदी, महाराष्ट्र की 69.8 फ़ीसदी, केरल की 69.6 फ़ीसदी, गोवा की 66.9 आय राज्य के स्वयं के स्त्रोत से होती थी। लॉक डाउन के कारण सारी गतिविधियां बंद होने के कारण यह बड़े राज्य भारी आर्थिक संकट में फंस गए हैं।
केंद्र सरकार द्वारा पिछले 3 माह से राज्यों को योजनाओं का पैसा कटौती करके भेजा जा रहा था। जीएसटी के नुकसान की राशि केन्द्र द्वारा नहीं दी जा रही है। जिसके कारण देश के सभी राज्यों की आर्थिक स्थिति दय से दयनीय हो गई है। कोरोनावायरस के संक्रमण को देखते हुए सभी राज्यों को आपदा प्रबंधन के कार्यक्रम भी चलाने पड़ रहे हैं। जिसके कारण प्रत्येक राज्य को अरबों रुपए कोरोनावायरस के आपदा प्रबंधन में खर्च करना पड़ रहे हैं। केंद्र सरकार द्वारा आपदा प्रबंधन के लिए कोई भी राशि राज्यों को अभी तक नहीं दी गई है। जिसके कारण सभी राज्य सरकारें बड़े आर्थिक संकट से जूझ रही हैं।
केंद्र सरकार ने राज्यों के कर्ज लेने की सीमा को बढ़ाकर उन्हें वित्तीय सहायता देने का जरूर निर्णय लिया है। अधिकांश राज्यों के ऊपर पहले से ही भारी कर्ज है। उन्हें अपनी आय का 10 से 20 फ़ीसदी तक ब्याज के रूप में चुकाना पड़ रहा है। कर्ज लेकर पिछले डेढ़ माह में राज्य सरकारों ने किसी तरीके से अपने खर्च करके स्थिति को बनाए रखा है। राज्यों के ऊपर ठेकेदारों सप्लायरों के अरबों रुपए दिया जाना हैं। जो पिछले कई माह से लंबित पड़े हुए हैं। कई राज्यों में ठेकेदारों और सप्लायरो को भुगतान नहीं करने के कारण सभी कामकाज बंद हो गए हैं। यही हालत नगरीय निकायों की भी बनी हुई है। जिसके कारण राज्य सरकारें अब केंद्र के ऊपर आर्थिक सहायता के लिए दबाव बना रही हैं।
भाजपा शासित राज्यों की हालत सबसे ज्यादा खराब है। जबरा मारे और रोउन ना दे कि स्थति भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की है। यह राज्य खुलकर अपनी बात और पीड़ा केंद्र सरकार को बता भी नहीं पा रहे हैं। राज्य सरकारों ने केंद्र सरकार को सारी स्थिति से अवगत कराते हुए, पिछले 3 माह से वित्तीय सहायता दिए जाने की मांग की जा रही है। जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है। वह राज्य खुलकर केंद्र के ऊपर दबाव बना रहे हैं। इसमें पंजाब के अमरिंदर सिंह, पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी, छत्तीसगढ़ सरकार के भूपेश बघेल इत्यादि केंद्र से आर्थिक सहायता देने की लगातार मांग कर रहे हैं। भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री यह मांग भी केंद्र से नहीं कर पा रहे हैं। जिसके कारण भाजपा शासित राज्यों में भाजपा के खिलाफ जनता में असंतोष बढ़ रहा है।
प्रधानमंत्री फ्लैगशिप योजनाओं की राशि भी राज्यों को नहीं मिल पा रही है। इसके साथ ही सांसदों के द्वारा अपने संसदीय क्षेत्र में जो राशि खर्च की जाती थी। वह भी बंद कर दी गई है। जिसके कारण भाजपा शासित राज्यों में, जब केंद्र और राज्य में दोनों जगह भाजपा की सरकारें हैं। ऐसी स्थिति में अब ठीकरा किसी और के सिर में फोड़ने की स्थिति भी नहीं है। जिसके कारण भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री काफी हैरान-परेशान हैं। ना तो वह अपनी बात खुलकर कह पा रहे हैं। नाही अपने प्रदेश की जनता को संतुष्ट कर पा रहे हैं।
लॉक डाउन का पीरियड बहुत लंबा हो जाने के कारण आर्थिक व्यवस्था की जो चेन बनी हुई थी। वह पूरी तरह खत्म हो गई है। ऑनलाइन लेनदेन हो जाने के कारण 1 रुप्या जो एक माह में चलकर 100 से 200 रुप्ये बन जाता था। इन 50 दिनों में वह 1 रुप्या ही रह गया है। जिसके कारण अर्थव्यवस्था की चेन पूरी तरह से टूटकर बिखर गई है। अब यह चैन पुनः बनने में अर्थशास्त्रियों के अनुसार कई माह लग सकते हैं। राज्य सरकारों के खर्च जिनमें वेतन भत्ते पेंशन और विभिन्न योजनाओं और विकास कार्यों के लिए जो राशि न्यूनतम जरूरत में शामिल थी। वह राज्यों के पास नहीं है। इस कारण से अर्थशास्त्रियों का यह भी कहना है, जब तक केंद्र एवं राज्य सरकारें बड़े पैमाने पर अर्थव्यवस्था का प्रवाह आम जनता तक भेजने का प्रयास नहीं करेंगी तब तक आर्थिक संकट से निपट पाना बहुत मुश्किल होगा।
कोरोनावायरस का जो भय पिछले 50 दिनों में आम जनों के बीच में डाल दिया गया है। उससे सबसे ज्यादा आर्थिकी प्रभावित हुई है। अब लोग कम से कम खर्च करने की सोच बना रहे हैं। कोरोना वायरस का संक्रमण कब तक चलेगा इसको लेकर आम आदमी भयाक्रांत है। वह अपने जीवन भर की बचत नगदी के रूप में अपनी हैसियत के अनुसार अपने घरों में सुरक्षित के रूप में रख रहा है। खर्च करने के कारोबार में मांग घट रही है। पिछले वर्ष में हिंदू और मुसलमानों के बीच में जो दूरियां बनी थी, वह दूरियां कोरोनावायरस के संक्रमण से दूर होती नजर आ रही हैं। अब लोग यह कहने लगे हैं, भूख प्यास और कोरोना वायरस से बचेंगे, तो जिंदा रहेंगे। कोरोना की बीमारी ना हिंदू देख रही है, ना मुसलमान। ऐसी स्थिति में हिंदू मुस्लिम के बीच में जो भय पैदा किया गया था। उसका स्थान अब कोरोनावायरस में ले लिया है। इसका असर भारत की 30 करोड़ जनता जो दूसरे राज्यों में जाकर काम करती थी। वह अपने घर पैसे भेजती थी। 50 दिन के लाकडाउन में जब यह गरीब और निम्न आय वर्ग के लोग पैदल ही अपने घरों के लिए निकले। इसमें हिंदू मुस्लिम का जो भय उनके मन में था, वह खत्म हो गया। इन दोनों वर्गों ने कठिन समय में एक दूसरे की मदद करके अपने आत्मीय सौहार्द्र को काफी बढ़ा लिया है। राजनीतिक दलों द्वारा पिछले वर्षों में हिंदू मुस्लिम का जो ध्रुवीकरण तैयार किया गया था। कोरोना वायरस के भय ने उसको भी काफी कमजोर कर दिया है। जो प्रवासी मजदूर अपने घरों को लौटे, तो इनके बीच हिंदू मुस्लिम का भेद खत्म हुआ है। इनके बीच एक नई आत्मीयता अपने-अपने राज्यों में लौटते वक्त देखने को मिली है। जो भविष्य में एक बहुत बड़े परिवर्तन का संकेत भी है।

लॉकडाउन के संकेत
सिद्धार्थ शंकर
18 मई से शुरू होने वाले लॉकडाउन 4.0 के संकेत मिलने लगे हैं। इस चरण में क्या होगा, क्या नहीं इसकी झलक भर दिखी है। अगर सरकार के संकेत को ही पुख्ता मानें तो इस बार लॉकडाउन सिर्फ हॉटस्पॉट इलाकों तक ही रह सकता है। तीसरा चरण 17 मई को खत्म हो रहा है। बाद की रणनीति पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, गृहमंत्री अमित शाह, स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन सहित कई वरिष्ठ मंत्रियों के साथ चर्चा की है। बैठक के दौरान महानगरों में सैनिटाइजेशन और सोशल डिस्टेंसिंग के साथ सार्वजनिक परिवहन शुरू करने पर भी सहमति बनी। सरकार सीमित संख्या में रेल सेवा बहाल कर चुकी है और हवाई सेवा भी चालू करने की घोषणा की जा चुकी है। सूत्रों के मुताबिक, बैठक में रेल सेवा को जल्द ही सामान्य स्तर पर बहाल करने की तैयारी शुरू करने का निर्देश दिया गया। यह भी तय किया गया है कि विभिन्न महानगरों की स्थिति को देखते हुए बस और टैक्सी सेवा शुरू करने की भी इजाजत दी जाए। बहरहाल, प्रधानमंत्री ने अपने राष्ट्र के नाम संबोधन में फिर से आत्मनिर्भर बनने और नया दम भरते हुए दुनिया के सामने ताकतवर रूप में उभरने का जो संकल्प दोहराया, उसमें आर्थिक पैकेज की बहुत जरूरत थी। जब कारोबार अपनी सामान्य गति में लौटेगा, तब लौटेगा, पर उसे फिलहाल इस काबिल बनाए रखना जरूरी है कि वह अपने पांवों पर खड़ा रह सके। यह आर्थिक पैकेज उसमें मदद करेगा।
राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कर दिया था कि लॉकडाउन को अभी पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाएगा। इसका चौथा चरण भी लागू होगा। हालांकि उन्होंने अभी यह स्पष्ट नहीं किया कि इसकी अवधि कितनी लंबी होगी, पर यह संकेत जरूर दे दिया कि इसका रंग-रूप अलग होगा, यानी कुछ लचीला होगा। पिछले दिनों जिस तरह दिल्ली सरकार और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा था कि अब हमें कोरोना के साथ ही जीना सीखना होगा, लॉकडाउन को लंबे समय तक जारी नहीं रखा जा सकता, उससे स्वाभाविक ही कयास लगाए जाने लगे थे कि सरकार शायद लॉकडाउन हटा ले।
दरअसल, लॉकडाउन की वजह से कारोबार को काफी बड़ा नुकसान पहुंचा है, अर्थव्यवस्था बिल्कुल चरमरा गई है। ऐसे में तमाम औद्योगिक संगठनों का दबाव था कि कोरोना प्रभावित क्षेत्रों की निशानदेही करते हुए पाबंदियों का दायरा सिकोड़ा जाए और कारोबारी गतिविधियों को शुरू किया जाए। कई राज्य सरकारें भी इसके पक्ष में नजर आ रही थीं। मगर जिस तरह कोरोना संक्रमितों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी दर्ज हो रही है और फिर बड़ी संख्या में श्रमिकों के अपने घरों की ओर लौटने का सिलसिला चल पड़ा है, उससे संक्रमण के गांवों तक फैलने का खतरा भी बढ़ गया है। ऐसे में राज्य सरकारों के सामने चुनौती बढ़ गई है। इसलिए वे कोई भी जोखिम नहीं उठाना चाहतीं।
अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की चुनौती अपनी जगह है, पर नागरिकों की सुरक्षा का दायित्व भी आखिर सरकारों पर है, इसलिए इस मोड़ पर पहुंच कर किसी तरह का जोखिम लेना उचित नहीं होता। ऐसे में राज्य सरकारों की अपील को अनदेखा नहीं किया जा सकता था। पर किसानों, मजदूरों और लघु, मध्यम तथा मंझोले उद्योगों के लिए बीस लाख करोड़ रुपए के आर्थिक पैकेज की घोषणा कर इन क्षेत्रों को हो रहे नुकसान की भरपाई करने की कोशिश जरूर की गई है।
तमाम विशेषज्ञ इस पैकेज की सलाह दे रहे थे, क्योंकि इस दौरान अगर इन्हें संबल नहीं दिया गया, तो अर्थव्यवस्था की रीढ़ ही टूट सकती है। प्रधानमंत्री ने फिर से आत्मनिर्भर बनने और नया दम भरते हुए दुनिया के सामने ताकतवर रूप में उभरने का जो संकल्प दोहराया, उसमें इस आर्थिक पैकेज की बहुत जरूरत थी। जब कारोबार अपनी सामान्य गति में लौटेगा, तब लौटेगा, पर उसे फिलहाल इस काबिल बनाए रखना जरूरी है कि वह अपने पांवों पर खड़ा रह सके। यह आर्थिक पैकेज उसमें मदद करेगा।

अब समय है तालाबंदी उठाने का
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
प्रधानमंत्री और देश के सभी मुख्यमंत्रियों के बीच बातचीत अभी चल रही है, यदि हमारे टीवी चैनल उसका जीवंत प्रसारण करते तो उसमें कोई बुराई नहीं होती। देश की जनता को कोरोना से निपटने के सभी पैंतरों का पता चलता। वह अपनी स्वतंत्रत राय बना सकती थी। इसी तरह क्या ही अच्छा होता कि हमारे सभी टीवी चैनल यह बहस चलाते कि 17 मई को तालाबंदी खत्म की जाए या नहीं और यदि खत्म की जाए तो क्या-क्या सावधानियां रखी जाएं। ऐसी बहसों में देश के विभिन्न तबकों के विचारशील लोगों से राय ली जाती तो उससे सरकार को भी मार्गदर्शन मिलता और आम जनता भी प्रेरित होती लेकिन अभी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के संवाद से जो भी सर्वसम्मति उभरेगी या जो भी राय केंद्र सरकार प्रकट करेगी, उसकी आतुरता से प्रतीक्षा सभी को है।
लेकिन पिछले 48 दिनों की तालाबंदी ने यह सिद्ध कर दिया है कि कोरोना जितना खतरनाक है, उससे भी ज्यादा खतरनाक हमारी तालाबंदी हो सकती है। यह मैं पहले भी आंकड़ों के आधार पर सिद्ध कर चुका हूं कि अन्य देशों की तुलना में कोरोना का कोप भारत में बहुत कम है लेकिन हमने खुद को जरुरत से ज्यादा डरा लिया है। इस डर के मारे कृषि-मंडियां, कारखाने, दुकानें और दफ्तर बंद हो गए हैं। बेरोजगारी और भुखमरी बढ़ गई है। सैकड़ों लोग घर-वापसी में मर रहे हैं। देश की अर्थ-व्यवस्था लंगड़ा गई है। इसलिए जरुरी यह है कि तालाबंदी को तुरंत उठा लिया जाए लेकिन कोरोना के विरुद्ध जितनी भी सावधानियां जरुरी हैं, उन्हें लागू किया जाए। इसका नतीजा यह भी हो सकता है कि कोरोना का जबर्दस्त हमला हो जाए। उस हमले से मुकाबले की तैयारी पहले से की जाए। लाखों लोगों के इलाज का इंतजाम, गांवों और शहरों में, पहले से हो। भारत उसी तरह खुल सकता है, जैसे वियतनाम, द.कोरिया और स्वीडन खुले हुए हैं। भारत सरकार इस तर्क को समझ रही है। इसीलिए रेलें चलाने की घोषणा हो गई है। तालाबंदी को उठा लेना एक खतरनाक जुआ भी सिद्ध हो सकता है लेकिन उसका चलाए रखना तो आर्थिक प्रलय को आमंत्रण देना है। तालाबंदी उठाने के बाद यदि हताहतों की संख्या इटली या अमेरिका की तरह आसमान छूने लगे तो केंद्र सरकार फिर तालाबंदी का छाता तान सकती है। उसे कौन रोक सकता है ? लेकिन यह साहसिक कदम उठाने के पहले केंद्र को राज्यों की सहमति जरुर लेनी चाहिए और उन्हें फैसलों की पूरी छूट देनी चाहिए।

उद्योगों को राहत
सिद्धार्थ शंकर
सरकार ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों को मजबूती के लिए तीन लाख करोड़ रुपए के कोलैटरल फ्री ऑटोमैटिक लोन देने का ऐलान किया है। वित्त मंत्री निर्माल सीतारमण ने जानकारी देते हुए बताया कि एमएसएमई, कुटीर उद्योगों और गृह उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए छह नए कदम उठाए गए हैं। उन्होंने कहा कि एमएसमई सेक्टर के लिए चार हजार करोड़ रुपए की क्रेडिट गारंटी दी जाएगी जिससे दो लाख कंपनियों को फायदा होगा। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग, कुटीर उद्योग और गृह उद्योग मिलकर 12 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार देते हैं। इनके लिए तीन लाख करोड़ रुपए का कोलैटरल फ्री ऑटोमैटिक लोन का प्रवाधान किया गया है। किसी को अपनी ओर से किसी तरह की गारंटी देने की जरूरत नहीं है। इसकी समयसीमा भी चार वर्ष की होगी। पहले एक वर्ष में मूलधन वापस नहीं करना पड़ेगा। 31 अक्टूबर, 2020 से स्कीम का फायदा उठाया जा सकता है। इस योजना का लाभ लेकर 45 लाख यूनिट बिजनस ऐक्टविटी दोबारा शुरू कर सकते हैं और उनके यहां नौकरियां बचाई जा सकती हैं।
एमएसएमई क्षेत्र को संकट से उबारने के लिए राहत पहुंचाए जाने के संकेत पहले से मिलने लगे थे। अब जो ऐलान किए गए हैं, वह छोटे उद्योगों और करोड़ों कामगारों के लिए उम्मीद की किसी किरण से कम नहीं है। पिछले पचास दिन से जारी लॉकडाउन ने न सिर्फ उद्योगों, बल्कि करोड़ों कामगारों को बेहाल कर दिया है। इसी का नतीजा है कि देश में लाखों कामगारों को अपने घरों को लौटने को मजबूर होना पड़ रहा है। दरअसल, छोटे उद्योग ही अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं और देश के उत्पादन में बड़ी भूमिका निभाते हैं। रोजमर्रा की जरूरत के सामान के उत्पादन से लेकर बड़े उद्योगों तक के लिए कच्चा-पक्का माल छोटे और मझोले उद्योग ही तैयार करते हैं। ऐसे में अब इस क्षेत्र की और अनदेखी से संकट और गहरा सकता है। फिर से काम चालू करने के लिए उद्योगों के सामने नगदी और मांग जैसी कई तरह की मुश्किलें हैं। पहली जरूरत तो नगदी की है। नगदी होगी तो कच्चा माल खरीदेंगे और उत्पादन शुरू हो पाएगा। नगदी के अभाव में उद्यमी कर्मचारियों को वेतन देने, अपनी इकाई के बिजली बिल, टेलीफोन बिल, जगह का किराया, बैंक से लिए कर्ज की किस्त और उसका ब्याज चुकाने जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि लॉकडाउन खत्म भी हो गया तो एकदम से मांग, उत्पादन और बिक्री का चक्र चलने वाला नहीं। तब अगले छह-आठ महीने इस तरह के खर्च कहां से किए जाएंगे, यही बड़ा संकट है। जिन छोटे उद्योगों को काम शुरू करने की इजाजत मिल भी गई है, उनमें भी काम इसलिए नहीं शुरू नहीं हो पा रहा है क्योंकि काम करने वाले अपने घरों को लौट गए हैं। लॉकडाउन के कारण जिस तरह से उद्योगों का पहिया ठहरा और उत्पादन रुक गया, उसे फिर से ढर्रे पर लाने में वक्त लगना लाजिमी है। दूसरी ओर अब बाजार में सबसे बड़ा संकट मांग का भी बना हुआ है। आबादी का बड़ा तबका ऐसा है जिसके पास खर्च करने के लिए बिल्कुल पैसे नहीं हैं। वह जरूरत भर का सामान मुश्किल से खरीद पा रहा है। मध्यमवर्ग अपनी रोजमर्रा की जरूरतें तो पूरी कर रहा है, लेकिन जो कुछ बचा-खुचा पैसा है, उसे संकट के लिए बचा कर रखने में भलाई समझ रहा है। ऐसे में सवाल है कि मांग कैसे बने बाजार में। अगर मांग कमजोर पड़ी रही तो छोटे उद्योग कितना ही उत्पादन कर लें, माल बिकेगा नहीं और इससे नया संकट खड़ा होने लगेगा। छोटे उद्योगों के लिए हालांकि रिजर्व बैंक ने कई तरह की सहूलियतों का एलान करते हुए बैंकों को निर्देश दिया था कि वे उद्यमियों को बिना किसी दिक्कत के कर्ज दें और बकाए के लिए उन पर दबाव न बनाएं। लेकिन बैंकों के सामने अपनी मजबूरियां हैं। आंख मूंद कर कर्ज देने से बैंक बचना चाहते हैं। बैंकों को डर है कि अगर कर्ज वापसी नहीं हुई तो क्या होगा। गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां पहले से ही नगदी संकट का सामना कर रही हैं, इसलिए वे भी छोटे उद्योगों को कर्ज बांटने का जोखिम लेने से बच रही हैं। जाहिर है, संकट अनुमान से ज्यादा गहरा है। लेकिन मदद के लिए सरकार की भी अपनी व्यावहारिक सीमाएं हो सकती हैं। ऐसे में रास्ता कैसे निकले, यह बड़ा सवाल है। सरकार और उद्योग जगत को मिल-बैठ कर इस संकट का समाधान खोजना होगा।

पैरों के फफोलों तले आते आसमान से गिरते लाल गुलाब !
श्रवण गर्ग
हम जो कुछ भी इस समय अपने ईर्द-गिर्द घटता हुआ देख रहे हैं उसमें नया बहुत कम है ,शासकों के अलावा।केवल सरकारें ही बदलती जा रही हैं,बाक़ी सब कुछ लगभग वैसा ही है जो पहले किसी समय था।लोगों की तकलीफ़ें, उनके दर्द और इस सबके प्रति एक बेहद ही क्रूर उदासीनता केवल इसी जमाने की कोई नयी चीज़ नहीं है। फ़र्क़ केवल इतना है कि हरेक ऐसे संकट के बाद व्यवस्थाओं के कपड़े और ज़्यादा फटे हुए नज़र आने लगते हैं।कहीं भी बदलता बहुत कुछ नहीं है।
वर्ष 1978 में रिलीज़ हुई मुज़फ़्फ़र अली की एक क्लासिक फ़िल्म ‘गमन’है।कहानी लखनऊ के पास के एक गाँव में रहनेवाले ग़ुलाम हसन (फ़ारूख शेख़) की हैं जो रोज़ी-रोटी की तलाश में बम्बई जाकर टैक्सी तो चलाने लगता है पर मन उसका रात-दिन घर लौटने के लिए ही छटपटाता रहता है।और यही हाल गाँव में उसके लौटने का इंतज़ार कर रही पत्नी ख़ैरु (स्मिता पाटील) और उसकी माँ का रहता है।नायक कभी इतने पैसे बचा ही नहीं पाता कि घर जाकर वापस बम्बई लौट सके।फ़िल्म के अंतिम दृश्य में नायक को बम्बई रेल्वे स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर लखनऊ जाने वाली ट्रेन के सामने खड़ा हुआ बताया गया है।वह दुविधा में है कि जो पैसे बचाए हैं वह अगर आने-जाने में ही खर्च हो जाएँगे तो फिर हाथ में क्या बचेगा ?वह भारी मन से घर लौटने का फ़ैसला बदल देता है और वहीं खड़ा रह जाता है।इसी फ़िल्म में प्रवासी मज़दूरों की हालत पर लिखा गया प्रसिद्ध गीत है—सीने में जलन,आँखों में तूफ़ान सा क्यों है…..?
‘गमन’ पिछले चालीस वर्षों से ही नहीं दो सौ सालों से जारी है।पर एक बड़ा फ़र्क़ जो इस महामारी ने पैदा कर दिया है वह यह कि नायक ने इस बात की चिंता नहीं की कि कोई ट्रेन उसे उसके शहर तक ले जाएगी भी या नहीं और अगर ले भी गई तो पैसे उससे ही वसूले जाएँगे या फिर कोई और देगा।वह पैदल ही चल पड़ा है अपने घर की तरफ़।और उसे इस तरह से नंगे पैर चलते देख उसकी औक़ात को अब तक अपने क़ीमती जूतों की नोक पर रखनेवाली सरकारें हिल गईं हैं।’गमन’ फ़िल्म का नायक तो दुविधा में था कि जो कुछ भी बचाया है वह तो जाने-आने में ही खर्च हो जाएगा।पर कोरोना की भारतीय फ़िल्म के इन लाखों नायकों ने अपनी इस घोषणा से राजनीति के प्रादेशिक ज़मींदारों को मुसीबत में डाल दिया है कि वे चाहे अपने गाँवों में भूखे मर जाएँ ,उन्हें वापस शहरों को तो लौटना ही नहीं है।एक रिपोर्ट में ज़िक्र है कि ये जो अपने घरों को लौटने वाले प्रवासी नायक हैं उनमें कोई 51 की मौतें पैदल यात्रा के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में हो गई।भूख और आर्थिक संकट के कारण हुई मौतें अलग हैं।
प्रधानमंत्री जब कहते हैं कि कोरोना के बाद का भारत अलग होगा तो वे बिलकुल ठीक बोलते हैं।एक अमेरिकी रिपोर्ट का अध्ययन है कि महामारी के पूरी तरह से शांत होने में अट्ठारह से चौबीस महीने लगेंगे और तब तक दो-तिहाई आबादी उससे संक्रमित हो चुकी होगी।हमें कहने का अधिकार है कि रिपोर्ट ग़लत है।जैसे परिंदों को आने वाले तूफ़ान के संकेत पहले से मिल जाते हैं ,ये जो पैदल लौट रहे हैं और जिनके रेल भाड़े को लेकर ज़ुबानी दंगल चल रहे है उन्होंने यह भी तय कर रखा है कि अगर मरना ही है तो फिर जगह कौन सी होनी चाहिए।इन मज़दूरों को तो पहले से ज्ञान था कि उन्हें बीच रास्तों पर रुकने के लिए क्यों कहा जा रहा है ! कर्नाटक, तेलंगाना और हरियाणा के मुख्यमंत्री अगर प्रवासी मज़दूरों को रुकने के लिए कह रहे हैं तो वह उनके प्रति किसी ख़ास प्रेम के चलते नहीं बल्कि इसलिए है कि इन लोगों के बिना उनके प्रदेशों की आर्थिक सम्पन्नता का सुहाग ख़तरे में पड़ने वाला है।राज्यों में फसलें खेतों में तैयार खड़ी हैं और उन्हें काटनेवाला मज़दूर भूखे पेट सड़कें नाप रहा है।
कल्पना की जानी चाहिए कि 18 मज़दूर ऐसी किस मज़बूरी के चलते सीमेंट मिक्सर की मशीन में घुटने मोड़कर छुपते हुए नासिक से लखनऊ तक बारह सौ किलो मीटर तक की यात्रा करने को तैयार हो गए होंगे ? इंदौर के निकट उन्हें पकड़ने वाली पुलिस टीम को उच्चाधिकारियों द्वारा पुरस्कृत किया गया।एक चर्चित प्राइम टाइम शो में प्रवासी मज़दूरों के साथ (शायद कुछ दूरी तक) पैदल चल रही रिपोर्टर का एक सवाल यह भी था :’आपको लौटने की जल्दी क्यों है ?’
हमारे इस कालखंड का इतिहास भी अलग-अलग अध्यायों में भिन्न-भिन्न स्थानों पर तैयार हो रहा है।इसके एक भाग में निश्चित ही हज़ारों की संख्या में बनाए जा रहे वे मार्मिक व्यंग्य चित्र भी शामिल किए जाएँगे जिनमें चित्रण है कि हवाई जहाज़ों से बरसाए जाने वाले खूबसूरत फूल किस तरह से पैदल चल रहे मज़दूरों के पैरों तले आ रहे हैं जिनके तलवों में बड़े-बड़े फफोले पड़ गए हैं और जो घर तक पहुँचने के पहले ही फूट पड़ने को व्याकुल हो रहे हैं।

मनोविज्ञान लंबी जिंदगी जीते हैं वे लोग, जिनका जीवनसाथी सहयोगी हो
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
हमारे शरीर में रोग के दो स्थान होते हैं पहला शरीर और दूसरा मन,यदि मन दुखी होता हैं तो उसका प्रभाव शरीर पर पड़ता हैं और यदि शरीर दुखी होता हैं तो उसका प्रभाव मन पर पड़ता हैं ।दोनों एक दूसरे के पूरक हैं ।आज मानसिक रोगों का भी प्रादुर्भाव बहुत हैं,उसका कारण मन में उठाने वालों संवेगों पर नियंत्रण न होना और दूसरा हर व्यक्ति दूसरे से अपेक्षा रखता हैं ।और अपेक्षा दुःख का कारण होता हैं ।आशा पाश महा दुखदानी, परिवार में सुख शांति के मूल में यदि हम एक दूसरे के भावों को आदर देना शुरू करे,तथा एक दूसरे को सुनना और जो भी स्थिति हैं उसमे प्रसन्नता की अनुभूति रखना, वर्तमान में जीना और या विधि राखे साईंया ।
हमारा व्यवहार और सोच का तरीका इस बात को काफी हद तक निर्धारित करता है कि हम कैसा जीवन जिएंगे। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि जीवन साथी के रवैये का भी हमारे जीवन परबहुत अधिक प्रभाव पड़ता हैं । जो लोग खुद बहुत आशावादी होते हैं और उन्हें जीवन साथी भी ऐसा ही मिल जाए तो इन लोगों का मष्तिष्क इन्हें लंबी और स्वस्थ्य जीवन जीने में मदद करता है। खास बात यह है कि जितना असर हम पर हमारी अपनी सोच और रवैये का पड़ता है, लगभग उतना ही असर अपने साथी के व्यवहार का भी पड़ता है।।।
लंबा जीना है तो अपना लें यह आदत
-जो लोग लम्बी बीमारी से गुजर रहे हों लेकिन फिर भी सुखद जीवन जीने के लिए प्रयासरत हों, ऐसे लोगों की बीमारी के खिलाफ लड़ाई बहुत आसान हो जाती है।
-इसलिए अगर आप लंबा और स्वस्थ जीवन जीना चाहते हैं तो आशावादी (पॉजिटिव) सोच को अपनाएं। सबसे अच्छी बात तो यह है कि आशावाद एक दृष्टिकोण हैं, जिसे हम अपने अंदर विकसित कर सकते हैं।
बढ़ती उम्र के साथ शार्पनेस
जिन लोगों के पास प्रसन्न रहनेवाला और आशावादी विचार रखनेवाला जीवन साथी होता है, वे लोग बढ़ती उम्र के साथ अधिक खुशमिजाज और तेज़ मष्तिष्क के होने लगते हैं।
-ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन लोगों की चीजें सीखने और समझने की शक्ति बढ़ती उम्र के साथ कम नहीं होती बल्कि कई मामलों में बढ़ने लगती है।
-खास बात यह भी है कि जो लोग खुद भी खुश रहते हैं और उन्हें जीवन साथी भी ऐसा ही मिला हो तो इनमें बढ़ती उम्र के साथ उस तरह के लक्षण देखने को नहीं मिलते हैं, जिन्हें बुढ़ापे से जोड़कर देखा जाता है। जैसे, चीजें भूलना, लोगों को ना पहचान पाना।
ये प्रक्रिया भी हैं सहायक
-अगर जीवन की परेशानियों या बीमारियों के कारण आप चाहकर भी खुश नहीं रह पा रहे हैं तो अपनी आहार और जीवन शैली पर ध्यान दें।
-ध्यान /योग आपको सकारात्मक रखने में काफी मददगार साबित हो सकता है। इससे आपको मानसिक शांति और हैपी हॉर्मोन्स का सही लेवल प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।
लोग आशावादी होते हैं वे अपने हर काम को बहुत ही रचनात्मक रूप से करते हैं। इससे उन्हें खुशी मिलती है। इस खुशी के कारण ब्रेन में डोपामाइन और सेराटोनिन जैसे हैपी हॉर्मोन्स का लेवल बढ़ता है, जो इन्हें तनावमुक्त रखने में लंबे समय तक मदद करता है।
-इस प्रकार एक चेन बन जाती है। यानी आप खुश रहेंगे तो आपके ब्रेन में हैपी हॉर्मोन बढ़ेंगे। हैपी हॉर्मोन बढ़ेंगे तो आप लंबे समय तक खुश और तनाव मुक्त रह सकेंगे। इससे बॉडी में ऑक्सीडेशन की क्रिया धीमी होती है और हमारी उम्र लंबी होती है।
दोनों जीवन साथी के बीच में सकारात्मक सोच हो और प्रसन्न रहने का प्रयास करना चाहिए ।जीवन बहुत क्षणिक होता हैं,कोई भी वस्तु स्थायी नहीं हैं और न कोई अपने साथ ले जा सकता हैं या पाता हैं । पर भी मानसिक रूप से संग्रह की प्रवत्ति के कारण असंतोष पैदा होता हैं और उस असंतोष का प्रगटीकरण विवाद,तनाव और झगड़े में परिवर्तित होता हैं । एक बार पति पत्नी में मानसिक दुराव की शुरुआत होना ही विवाद को जन्म देना हैं ।जहाँ तक हो एक दूसरे के भावों को पहले आदर दे और जो भी आवश्यकताएं होती हैं वो समय पर होती हैं और वे आपसी तालमेल से संभव होता हैं ।आर्थिक तंगी के कारण विवाद होते हैं पर आपकी बचत से ही आप मनोकूलसुविधाएँ प्राप्त कर सकेंगे।
पारिवारिक जीवन में बिना कारण के विवाद का होना सामान्य बात होती हैं और यह विवाद व्यक्तिगत रूप से कई दिनों तक चलता हैं जिस कारण नकारात्मक वातावरण परिवार में बनने से जीवन दुखद बन जाता हैं जिसमे दोनों का योगदान महत्वपूर्ण होता हैं,इससे बचाना चाहिए।

तात्कालिक तालाबंदी को स्थायी नशाबंदी में क्यों नहीं बदला जाए ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
तालाबंदी को ढीला करते ही सरकार ने दो उल्लेखनीय काम किए। एक तो प्रवासी मजदूरों की घर वापसी और दूसरा शराब की दुकानों को खोलना। नंगे-भूखे मजदूर यात्रियों से रेल का किराया वसूल करने की इतनी कड़ी आलोचना हुई कि उनकी यात्राएं तुरंत निःशुल्क हो गईं लेकिन जहां तक शराब का सवाल है, देश के शराबियों ने 40 दिन तो शराब पिए बिना काट दिए लेकिन हमारी महान सरकारें शराब बेचे बिना एक दिन भी नहीं काट सकीं। तालाबंदी में ढील के पहले दिन ही देश के लगभग 600 जिलों में शराब की दुकानें खुल पड़ीं। क्यों ? क्योंकि राज्य सरकारों ने केंद्र पर दबाव डाला कि यदि उन्हें शराब से जो टैक्स मिलता है, यदि वह नहीं मिला तो उनकी बधिया बैठ जाएगी। सभी राज्यों को लगभग 2 लाख करोड़ रु. टैक्स शराब की बिक्री से मिलता है। पहले दिन ही 1000 करोड़ रु. की शराब बिक गई।
कुछ राज्यों ने आर्डर मिलने पर शराब की बोतलें घरों में पहुंचवाने का इंतजाम भी किया। लेकिन सारे देश में लाखों लोग शराब की दुकानों पर टूट पड़े। दो गज की शारीरिक दूरी की धज्जियां उड़ गईं। एक-एक दुकान पर दो-दो कि.मी. लंबी लाइनें लग गईं। हर आदमी ने कई-कई बोतलें खरीदीं। जब पुलिस ने उन्हें एक-दूसरे से दूर खड़े होने के लिए धमकाया तो भगदड़ और मार-पीट के दृश्य भी देखे गए।
ये सब विचित्र दृश्य हमारे टीवी चैनलों पर विदेशों में भी लाखों लोगों ने देखे। उन्हें भरोसा ही नहीं हुआ कि भारत में इतनी बड़ी संख्या में शराबी रहते हैं। कुछ विदेशी मित्रों ने मुझे यहां तक कह दिया कि यह भारत है या दारुकुट्टों का देश है ? उनके मन में भारत की छवि वह है, जो महर्षि दयानंद, विवेकानंद और गांधी के कारण बनी हुई है। मैंने उन्हें बताया कि भारत में लगभग 25-30 करोड़ शराबी हैं। याने पांच में से एक शराबी है लेकिन रुस, यूरोप, अमेरिका और ब्रिटेन में 80 से 90 प्रतिशत लोग शराबखोर हैं।
आज भी भारत में शराबियों को आम आदमी टेढ़ी नजर से ही देखता है। भारत में शराब पहले लुक-छिपकर पी जाती थी। उसकी कलालियां मोहल्लों के किसी कोने में होती थीं लेकिन अब भारत की बड़ी होटलों, बस्तियों और बाजारों की दुकानों में भी शराब धड़ल्ले से बिकती है। इसीलिए इन लंबी कतारों ने लोगों का ध्यान खींचा है। अब भारत में सिर्फ बिहार, गुजरात, नगालैंड, मिजोरम और लक्षद्वीप में शराब पर प्रतिबंध है, बाकी सब प्रांत शराब पर मोटा टैक्स ठोककर पैसा कमा रहे हैं। दिल्ली समेत कुछ राज्यों ने इन दिनों शराब पर टैक्स की भारी वृद्धि कर दी है।
भारत की लगभग सभी पार्टियों के नेतागण शराब की बिक्री का समर्थन करते हैं। सिर्फ नीतीशकुमार की जदयू उसका विरोध करती है। अपने आप को गांधी, जयप्रकाश, लोहिया और विनोबा का अनुयायी कहनेवाले नेताओं की जुबान पर भी ताले पड़े हुए हैं। आश्चर्य तो यह है कि देश में और कई प्रदेशों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की सरकारें हैं लेकिन वे भी पैसों पर अपना ईमान बेचने पर तुली हुई हैं। इस मुद्दे पर उनकी चुप्पी भारतीय संविधान की धारा 47 का सरासर उल्लंघन है। संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में यह स्पष्ट लिखा हुआ है कि सरकार नशीली चीजों पर प्रतिबंध लगाने की भरपूर कोशिश करे। कांग्रेस, जनता पार्टी और भाजपा के पिछले 73 साल के राज में भारत में शराबखोरी 70-80 गुना बढ़ी है।
जहां तक शराब से 2 लाख करोड़ रु. कमाने की बात है, पेट्रोल और डीजल की कीमत बढ़ाकर यह घाटा पूरा किया जा रहा है और यदि पानी जितने सस्ते हुए विदेशी तेल को खरीदकर भारत अपने भंडारों में भर ले तो वह शराब की आमदनी को आराम से ठुकरा सकता है। यदि कोरोना से लड़ने के लिए वह अपनी दवाइयां, आयुर्वेदिक काढ़े और हवन सामग्री दुनिया में बेच सके तो वह अरबों-खरबों रु. कमा सकता है। इस कोरोना-संकट से पैदा हुए मौके का फायदा उठाकर वह शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा सकता था। मौत का डर शराबियों को इस प्रतिबंध के लिए भी राजी कर लेता। 40 दिन की यह मजबूरी का संयम स्थायी भी बन सकता था। तात्कालिक तालाबंदी को स्थायी नशाबंदी में बदला जा सकता था।
शराब पीने से आदमी की प्रतिरोध-शक्ति घटती है या बढ़ती है ? कोरोना से मरनेवालों में शराबियों की संख्या सबसे बड़ी है। यों भी हर साल भारत में शराब पीने से 2.5 लाख मौतें होती हैं। शराब के चलते लाखों अपराध होते हैं। देश में 40 प्रतिशत हत्याएं शराब पीकर होती हैं। ज्यादातर लोग शराब के नशे में ही बलात्कार करते हैं। कार-दुर्घटनाओं और शराब का चोली-दामन का साथ है। रुस और अमेरिका जैसे देशों में शराब कई गुना ज्यादा जुल्म करती है। यह मौका था जबकि भारत इन देशों के लिए एक आदर्श बनता लेकिन वह भी उपभोक्तावाद की चकाचौंध में बहता चला जा रहा है। न तो देश में ऐसे नेता हैं, न ही संगठन, जो कि आज के दिन नशाबंदी के लिए आंदोलन चलाएं, सत्याग्रह करें और धरने दें। कानून बनाने से भी बड़ी चीज़ है, संस्कार बनाना।
शराब पीने से मनुष्य विवेक-शून्य हो जाता है। वह अपनी पहचान खो देता है। जब तक वह नशे में होता है, उसमें और पशु में अंतर करना कठिन हो जाता है। उसकी उत्पादन-क्षमता घटती है और फिजूलखर्ची बढ़ती है। यह उसके परिवार और भारत-जैसे विकासमान राष्ट्र के लिए गहरी चिंता का विषय है।

दो पाटन के बीच ’कोरोना‘ और ’करो ना‘ के बीच फॅसे शिवराज….।
ओमप्रकाश मेहता
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की स्थिति इन दिनों ”दो पाटन के बीच फॅसे शख्स“ जैसी हो गई है, चौथी बार मुख्यमंत्री का पद सम्भालने के तत्काल बाद जहॉ उन्हे कोरोना महामारी से प्रदेश को बचाने की चुनौति से दो-चार होना पड रहा है, वहीं वे मंत्री-परिषद विस्तार के ’करो ना‘ आग्रह से परेशान है। उनकी अपनी पार्टी में इस करो ना के मुददे पर काफी अर्न्तद्वंद चल रहा है। शिवराज जी पर जहॉ कांग्रेस से सत्ता की चाबी छीनकर उन्हे सौंपने वालो (सिंधिया समर्थकों) का दबाव परेशान कर रहा है, वहीं दूसरी और उनकी अपनी भारतीय जनता पार्टी के मत्री प्रत्याशियों के सब्र का बांध टूटने के कगार पर पहुच गया है। कांग्रेस के सिंधिया समर्थकों को जहॉ भाजपा के वरिष्ठ नेता दबी जुबान अवसरवादी, दलबदलू नेता कहने लगे है, क्योंकि कई वर्षो से चली आ रही मंत्री पद की लालसा पर इन पूर्व कांग्रेसियों ने पानी फेर दिया है, वहीं अपने नेता सिंधिया के साथ दल बदलकर भाजपा में शामिल होने वालो की सफाई यह है कि यदि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का उपचुनावों को जीतकर पुन: सत्ता हथियाने का दावा सही निकल गया तो वे कितने दिन मंत्री रह पाएगें ? इसलिए सिंधिया समर्थक पूर्व मंत्रीगण भी सत्ता का हिस्सा बनने की जल्दी में है।
अब सत्ता हाथ से फिसलने के डेढ महीने बाद पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ यह सफाई दे रहे है कि उन्हे इन सिंधिया समर्थकों का भाजपा में चले जाने का पूर्वानुमान नही था, और अचानक सत्ता हाथों से फिसल गई। साथ ही उन्होने दावा भी किया कि अगले कुछ ही महीनों मे होने वाले 24 विधानसभा उप-चुनावों में कम से कम 22 सीटें वे जीतेगे और पुन: राज्य की सत्ता पर काबिज हो जाएगे, व्यक्तिगत चर्चा में उनका यह भी दावा है कि दलबदल के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया का अपने ग्वालियर-चम्बल क्षैत्र में पहले जैसा दबदबा नही रह गया है और उन्होने सिंधिया का विकल्प भी ढूंढ लिया है, इसलिए अब मध्यप्रदेश के इस अंचल में सिंधिया के खिलाफ वोटिंग होनी है, जिसका फायदा सिर्फ कांग्रेस को मिलेगा, इसी उम्मीद के चलते इस क्षैत्र के वरिष्ठ नेता श्री गोविंद सिंह को नेता प्रतिपक्ष की कमान सौंपने की तैयारी की गई है और इसी धारणा के चलते राज्य कांग्रेस का प्रभारी महामंत्री भी बदला गया है, यद्यपि फिलहाल यह तय नही है कि ये विधानसभा के उप-चुनाव कब होगे ? क्योंकि कोरोना महामारी के चलते इन तैयारियों पर भी विराम लग गया है, किन्तु यह तय माना जा रहा है कि अगले दो-तीन महीनो (जुलाई-अगस्त) तक तो ये चुनाव हो ही जाएगे और मौजूदा भाजपा सरकार का भविष्य भी तय हो जाएगा।
यह तो हुई कांग्रेस की बात। अब यदि सत्तारूढ भाजपा की बात की जाए तो उप-चुनावों को लेकर वह बेफ्रिक है, क्योंकि इसकी चिंता का दायित्व भाजपा ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंप रखा है। चूंकि ये उप-चुनाव सिंधिया समर्थको के क्षैत्रों में ही हो रहे है, इसलिए भाजपा को दो-चार जगह छोड बाकी अधिकांश जगहों के लिए अपने (भाजपा के) प्रत्याशी चुनने की भी चिंता नही है। अब तो भाजपा की नजर सिर्फ इन दो दर्जन उप-चुनावों के परिणामों पर ही रहेगी, क्योंकि इन परिणामों पर ही मौजूदा सरकार का भविष्य निर्भर रहेगा, इसलिए उप-चुनावों की चिंता कांग्रेस और भाजपा में आए सिंधिया जी को ही है, मुख्यमंत्री को नही, वे तो फिलहाल ’कोरोना‘ और मंत्री परिषद का विस्तार ”करो ना“ से ही परेशान है।

सीता वनवास का विवाद
हर्ष वर्धन पाठक
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन के संबंध में वाल्मीकि रामायण और गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस को आधिकारिक तौर पर महत्त्व दिया जाता है। वैसे तुलसीदास के रामचरितमानस में भी वाल्मीकि रामायण को आधार बनाया गया है परन्तु महर्षि वाल्मीकि के रामायण तथा तुलसीदास के रामचरितमानस में अनेक अंतर भी हैं । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में वह विवादास्पद प्रसंग नहीं लिया है जिसे हम सीता वनवास के नाम से जानते हैं।
महर्षि वाल्मीकि को श्रीराम का समकालीन माना जाता है और इस कारण उनके वर्णन को प्रामाणिक माना जाता है लेकिन यह विषय महत्वपूर्ण है कि क्या महर्षि वाल्मीकि ने वास्तव में सीता वनवास का यह प्रसंग लिखा है। वृन्दावन के प्रसिद्ध संत अखंडानंद सरस्वती और अन्य विद्वानो ने इस विवाद की चर्चा की है। स्वामी अखंडानंद सरस्वती ने एक बार वाल्मीकि रामायण पर प्रवचन दिया था ।बाद में उनके प्रवचन “वाल्मीकि रामायणामृत” नाम से प्रकाशित हुये ।इस ग्रंथ के पृष्ठ 300 में उन्होंने इस विवाद का उल्लेख किया है ।स्वामी अखंडानंद ने यह स्वीकार किया है कि ” आज कल के अधिकांश विद्वान युद्ध कांड तक ही वाल्मीकि की रचना मानते हैं। उत्तर कांड को उनकी रचना नहीं मानते।”
इस विवाद का कारण वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड के अन्तिम सर्ग के अंतिम कुछ श्लोक हैं । इन श्लोकों में यह वर्णन मिलता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम के राज्य में समस्त प्रजा धर्म में तत्पर रहती थी ।वह झूठ नहीं बोलती थी ।सभी लोग उत्तम लक्षणों से सम्पन्न थे और सबने धर्म का आश्रय ले रखा था।
(श्लोक 105, सर्ग 128 )
इस के बाद यह विवरण मिलता है कि पूर्व काल में महर्षि वाल्मीकि ने जिसकी रचना की यह वही आदि काव्य है। इससे स्पष्ट है कि यह श्लोक भी महर्षि वाल्मीकि ने नहीं लिखा -श्रृणोति इदं काव्यं पुरा वाल्मीकिना कृतम(श्लोक 112 सर्ग 128) । इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि इस श्लोक के पूर्व कवि वाल्मीकि अपनी कलम को विराम दे चुके थे । इस श्लोक के बाद अंतिम श्लोक में इस महाकाव्य का कीर्ति वर्णन है-
आयुष्यमारोग्यं करं यशस्यं
सौभ्रातृकं बुद्धिकरं शुभं च।
श्रोतव्यमेतन्नियमेन सद्भि
राख्यानमोजस्करमृद्धिकामै: ।(श्लोक 125 सर्ग 128 )
इस अंतिम श्लोक से भी यह प्रतिध्वनित होता है कि महर्षि वाल्मीकि इसके पूर्व अपने काव्य का समापन कर चुके थे ।इस श्लोक का अर्थ यह है कि यह काव्य आयु, आरोग्य ,यश, तथा भ्रातृप्रेम को बढ़ाने वाला है।अत:
समृद्धि की इच्छा रखने वाले सत्पुरुषों को इस का पाठ नियमित रूप से करना चाहिए।
विसंगति यहां समाप्त नहीं होती । उत्तर कांड में और भी उदाहरण हैं ।उत्तर कांड में प्रथम सर्ग में यह वर्णन मिलता है कि उत्तर दिशा के नित्य निवासी वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, विश्वामित्र ,गौतम ,जमदग्नि और भारद्वाज , रामचन्द्र जी का अभिनन्दन करने के लिए राम राज्याभिषेक के बाद अयोध्या आये। इसमें विसंगति यह है कि इन ऋषियों में से महर्षि वसिष्ठ राम राज्याभिषेक के समय न केवल उपस्थित थे अपितु उन्होंने स्वयं अभिषेक कराया था।यह तथ्य सर्व विदित है कि ऋषि वसिष्ठ श्री राम के समकालीन थे।
तुलसीदास ने शंबूक वध प्रसंग का वर्णन भी नहीं किया है । जब श्री राम शबरी के जूठे बेर खा सकते थे तब उन्होंने शंबूक का वध क्यों किया होगा?
गोस्वामी तुलसीदास ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के ऐसे कई कार्यों का वर्णन नहीं किया है जिनका उल्लेख वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में किया गया है। वाल्मीकि रामायण का पाठ आज भी अनेक घरों में होता है। लेकिन की ऊपर दर्शाये गये कारणों से ये प्रसंग संदिग्ध हैं। सीता वनवास का प्रसंग तो स्पष्ट रूप से संदेहजनक है? क्या यह प्रसंग बाद में वाल्मीकि रामायण में जोड़ा गया है ? भारतीय इतिहास में ऐसी अनेक गुत्थियां हैं जिनका तथ्यान्वेषण किया जाना है!

चिंता बढ़ा रहा आंकड़ा
सिध्दार्थ शंकर
भारत में अब तक 40 से ज्यादा दिनों से जारी लॉकडाउन के बाद कोरोना वायरस की रफ्तार धीमी जरूरी हुई है, लेकिन अब भी बहुत ज्यादा है। इसे इस बात से समझ सकते हैं कि भारत में डेली ग्रोथ रेट अब अमेरिका, इटली, ब्रिटेन जैसे कोरोना से सबसे बुरी तरह प्रभावित देशों से भी ज्यादा है। आइए, आंकड़ों के जरिए समझते हैं कि दुनिया के बाकी देशों और भारत में इस समय वायरस के संक्रमण की क्या स्थिति है। अगर कोरोना सक्रमण से सबसे बुरी तरह प्रभावित प्रभावित 20 देशों में डेली ग्रोथ रेट देखें तो भारत में वायरस बहुत ही तेज रफ्तार से फैल रहा है। लॉकडाउन के बावजूद कोरोना की यह रफ्तार अब चिंता बढ़ाने वाली है। 22 मार्च को भारत में एवरेज डेली ग्रोथ रेट 19.9 प्रतिशत था। उस वक्त इटली को छोड़कर अमेरिका, रूस, ब्राजील और ब्रिटेन जैसे देशों में डेली ग्रोथ रेट भारत से काफी ज्यादा थी। हालांकि, देशव्यापी लॉकडाउन के बाद भारत में कोरोना के मामलों की डेली ग्रोथ रेट लगातार गिरने लगी। लॉकडाउन 2.0 के आखिरी दिन यानी 3 मई को डेली ग्रोथ रेट घटकर 6.1 प्रतिशत आ गई। इससे तो अच्छी तस्वीर उभर रही है लेकिन जब दूसरे देशों से तुलना करते हैं तब यही आंकड़ा डराने वाला महसूस होता है। 3 मई की बात करें तो भारत में डेली ग्रोथ रेट इटली (1.0 फीसदी) के मुकाबले 6 गुना है। अमेरिका (2.7 ) और ब्रिटेन (3.0 फीसदी) के मुकाबले 2 गुना है। डेली ग्रोथ रेट के मामले में सिर्फ रूस (7.5 फीसदी) और ब्राजील (7.4 फीसदी) ही भारत से ऊपर हैं। देश के कई राज्यों में अब हालात काबू में होने के बजाय बिगड़ते जा रहे हैं। आंकड़ों पर न जाया जाए, तो हकीकत यह है कि इन राज्यों में कोरोना संक्रमण के नए मामलों में लगातार तेजी से सरकारों के हाथ-पैर फूल रहे हैं।
केंद्र और राज्य सरकारों ने लॉकडाउन में सीमित ढील देकर आमजन को राहत पहुंचाने की पहल भले की हो, लेकिन राजधानी दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में कोरोना संक्रमितों के मामले जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, वे हैरान करने वाले हैं। देश में पिछले पांच दिनों में दस हजार से ज्यादा लोगों का कोरोना संक्रमित पाया जाना इस बात की पुष्टि करता है कि बीमारी फैलने की रफ्तार उम्मीद के मुताबिक कम नहीं पड़ रही है।
ऐसे में इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले दिनों में यह आंकड़ा और तेजी से बढ़ सकता है। हालांकि सरकार की ओर से यह दावा किया जा रहा है कि भारत में कोरोना से मृत्युदर दुनिया में अब तक सबसे कम है, संक्रमित लोगों की संख्या को लेकर भी भारत की स्थिति बहुत ज्यादा खराब नहीं है। लेकिन यह सच्चाई भी छिपी नहीं है कि भारत में कोरोना की जांच दर सबसे कम है। ऐसे में महामारी के वास्तविक आकलन के बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी कह पाना आसान नहीं है।
दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश आदि ऐसे राज्य हैं जहां हालात काबू में होने के बजाय बिगड़ते जा रहे हैं। हालात की गंभीरता को देखते हुए ही देश के कोरोना प्रभावित हिस्सों को तीन हिस्सों में बांटा गया है और उसी के अनुरूप सीमित दायरे में सशर्त छूट देने का फैसला हुआ। लेकिन सोमवार को पहले ही दिन लॉकडाउन की इस छूट में जिस तरह की लापरवाही देखने को मिली, उसने तो चिंता और बढ़ दी। पहले ही दिन देश के ज्यादातर शहरों में शराब की दुकानों के बाहर जिस तरह से भीड़ उमड़ी और सुरक्षित दूरी व मास्क पहनने जैसे अत्यावश्यक नियम की धज्जियां उड़ाई गईं, उससे पुलिस और स्थानीय प्रशासन सकते में आ गया और कई जगह लाठीचार्ज तक करना पड़ गया। ऐसे में तो संक्रमण फैलने का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा। यह ठीक है कि अब पूर्णबंदी से बाहर भी निकलना है, लेकिन लग रहा है कि इस पर अमल के तरीके क्या हों, इसे लेकर सरकारों के पास पुलिस तंत्र के अलावा कोई विकल्प नहीं है। लाल, नारंगी और हरा क्षेत्र चिह्नित करने को लेकर भी अभी एकराय नहीं दिख रही। लेकिन अगर ढील के नियमों की अनदेखी होती रही तो महामारी को फैलने से कोई नहीं रोक पाएगा।

कोरोना का तुरंत तोड़ प्लाज्मा है
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
ज्यों ही तालाबंदी घोषित हुई, गुड़गांव के कुछ मित्र डाॅक्टरों और वैद्यों ने मुझे तरह-तरह के सुझाव दिए। कुछ डाक्टरों ने कहा कि आप प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों से कहिए कि वे ‘प्लाज्मा थेरेपी’ को मौका दें। मैंने कई मुख्यमंत्रियों से बात की लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सबसे ज्यादा रुचि दिखाई और मुझसे कहा कि मैं अभी डाक्टरों की बैठक बुलाता हूं और उनसे कहता हूं कि प्लाज्मा चिकित्सा का परीक्षण शुरु करें। मुझे बहुत खुशी है कि अभी तक सारी दुनिया के डॉक्टर जिस कोरोना का तोड़ नहीं निकाल पाए हैं, उसका तोड़ हमारे डॉक्टरों ने निकाल लिया है। दिल्ली के डाॅक्टरों की इस खोज पर ‘इंडियन कौंसिल आॅफ मेडिकल कौंसिल’ ने भी अपनी मोहर लगा दी है। कोरोना के मरीजों को यह तीन-चार दिन में ठीक कर देता है। यह ठीक है कि इसकी तुलना किसी टीके (वेक्सीन) या कुनैन जैसी गोली से नहीं की जा सकती। यह ‘प्लाज्मा’ हजारों-लाखों लोगों को एक साथ नहीं दिया जा सकता, क्योंकि यह उन लोगों के खून में से निकाला जाता है, जो पहले कोरोना के मरीज़ रह चुके हैं और अब बिल्कुल ठीक हो चुके हैं। ऐसे लोगों का प्लाज्मा ज्यादा से ज्यादा तीन लोगों को दिया जा सकता है। भारत में कोरोना के मरीज़ हजारों में हैं और ठीक होनेवाले मरीजों की संख्या एक-चौथाई भी नहीं है और उनमें से अपना प्लाज्मा देने की शर्त आधे लोग भी पूरी नहीं कर सकते। इसके अलावा जो व्यक्ति एक बार कोरोना के चक्कर से बच निकला है, वह अस्पताल की सूरत भी नहीं देखना चाहता। जो ठीक हुए मरीज़ अपना प्लाज्मा देने की पेशकश कर रहे हैं, मैं उन्हें बधाई देता हूं। वे छोटे-मोटे देवदूत हैं। वे डरपोक नहीं हैं। उनमें सच्ची इंसानियत है, क्योंकि यह प्लाज्मा किसकी जान बचाएगा, इसका उन्हें कुछ पता नहीं। यह तो डाक्टर तय करेंगे कि किसका प्लाज्मा किसको दिया जाएगा। यह जरुरी नहीं कि वह अपने रिश्तेदारों या मित्रों को ही दिया जाए। यह खबर और भी बड़ी खुशखबर है कि निजामुद्दीन की तबलीगी जमात में शामिल हुए तीन सौ लोग, ठीक होने के बाद अपना प्लाज्मा दान करने के लिए तैयार हैं। उनका प्लाज्मा सभी के काम आएगा, वे चाहे हिंदू हों या मुसलमान, सिख हों या ईसाई ! जब प्लाज्मा जात, मजहब, भाषा, रंग-रुप और हैसियत का फर्क नहीं करता तो हम इंसान होकर यह फर्क क्यों करने लगते हैं ? इन प्लाज्मा देनेवालों की वजह से तबलीगी जमात को कुछ हद तक अपने पाप से उबरने का मौका भी मिलेगा। रमज़ान के दिनों में इससे बढ़िया (पुण्य कार्य) कारे-सवाब क्या होगा ? यह ज़काते-जान है।

‘लॉक डाउन’ में क़ैद हमारे बच्चों के सपनों की दुनिया !
श्रवण गर्ग
क्या हम सोच पा रहे हैं कि हमारे घरों और पास-पड़ौस में जो छोटे-छोटे बच्चे बार-बार नज़र आ रहे हैं उनके मनों में इस समय क्या उथल-पुथल चल रही होगी ? क्या ऐसा तो नहीं कि वे अपने खाने-पीने की चिंताओं से कहीं ज़्यादा अपने स्कूल, अपनी क्लास ,खेल के मैदान, लाइब्रेरी और इन सबसे भी अधिक अपनी टीचर के बारे में सोच रहे हैं और हमें पता ही न हो ? कोरोना और लॉक डाउन, बच्चों के सपनों और उनकी हक़ीक़तों से बिलकुल अलग है। उन्हें डर कोरोना से कम और अपने स्कूलों तक नहीं पहुँच पाने को लेकर ज़्यादा लग रहा है। क्या उनके बारे में,उनके सपनों के बारे में भी हमारे यहाँ कहीं कोई सोच रहा है ?स्कूल जाने को लेकर तैयार होने का उनका सुख क्या इस बात से अलग है कि जो उनसे बड़े हैं किसी भी तरह घरों से बाहर निकलने को लेकर छटपटा रहे हैं ?
योरप के देश द नीदरलैंड्स के एक शहर हार्लेम की एक बालवाड़ी (किंडर गार्टन) की एक अध्यापिका को लेकर एक छोटा सा समाचार चित्र सहित किसी ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म-ट्विटर पर प्रसारित किया है।समाचार में बताया गया है कि किस तरह से बालवाड़ी की एक अध्यापिका अपने 23 बच्चों को मिस कर रही हैं।हमारे सोच से परे हो सकता है कि अपने बच्चों को मिस करते हुए अध्यापिका ने क्या किया होगा ! अध्यापिका ने अपने सभी बच्चों को नन्ही-नन्ही 23 डाल्ज़ (Dolls) में बुन दिया। प्रत्येक डॉल को उन्होंने बालवाड़ी के हरेक बच्चे का नाम भी दे दिया जैसे जुलियन ,ल्यूक,लिली,जायरा ,बोरिस, आदि,आदि।बच्चों को इसका पता चला और उन्होंने पूछ लिया कि टीचर की डॉल कहाँ है ?तो अध्यापिका ने भाव-विभोर होकर अपने आपको भी एक गुड़िया के रूप बुन लिया और बच्चों की डाल्ज़ के साथ ही बालवाड़ी के कमरे में सजा दिया।बच्चे जब 11 मई को स्कूल पहुँचेंगे ,उनकी टीचर उन्हें अपनी बाहों में भरेंगी और हरेक बच्चे को उसके नाम की डॉल सौंप देंगी।
केवल मोटा-मोटा अनुमान है जो कम ज़्यादा भी हो सकता है कि हमारे यहाँ कुल स्कूलों की संख्या तेरह लाख से अधिक है।छह से 14 वर्ष की आयु के बीच के स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या बीस करोड़ से ज़्यादा है।यानि कि एक पूरा का पूरा उत्तर प्रदेश भरके बच्चे।क्या हमारे स्कूल, हमारी बालवाड़ियाँ, आंगनवाड़ियां, आदि अपने बच्चों की वापसी को लेकर कुछ इसी तरह का सोच रही हैं ? उनको वैसे ही मिस कर रही हैं जैसा कि उस छोटे से देश के एक शहर की अध्यापिका कर रही हैं ? हम इनमें वे बालवाड़ियाँ और आंगनवाड़ियाँ भी इनमें शामिल कर सकते हैं जिनमें एक-एक कमरे में कई-कई बच्चे एकसाथ ज़मीन पर बैठकर पढ़ाई करते हैं।
दूसरे देशों में इस समय महामारी को लेकर कम और उसके ख़त्म हो जाने के बाद मिलने वाली दुनिया के बारे में ज़्यादा बातें हो रही हैं।इन सब में भी सोच के केंद्र और चिंता में बच्चों का भविष्य प्रमुखता से है ।प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘द इकानमिस्ट’की एक रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में इस समय कोई सौ करोड़ से ज़्यादा बच्चे (भारत की आबादी के बराबर लगभग )अपने-अपने स्कूलों से बाहर हैं ।कई देशों में तो बच्चे पिछले चार महीनों से अपने स्कूल नहीं जा पाए हैं।रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि स्कूलों के बंद रहने का सबसे ज़्यादा असर ग़रीब और किशोर अवस्था के बच्चों पर पड़ रहा है।
अमेरिका में इस समय बहस यह भी चल रही है कि बदली हुई परिस्थितियों में स्कूलों का स्वरूप कैसा होगा ? क्या कक्षाएँ पहले की तरह ही लग और चल पाएँगी ?अगर नहीं तो फिर क्या बच्चे एक-दूसरे से दूर-दूर बैठेंगे ?अगर ऐसा होता है तो क्या एक ही क्लास में अभी तक साथ-साथ पढ़ने वाले बच्चे अलग-अलग समयों पर स्कूल आएँगे ?क्या कक्षाएँ एक-एक दिन छोड़कर लगेंगी ? क्या बच्चे और अध्यापक मास्क लगाकर कक्षाओं में रहेंगे ?क्या बच्चों के शरीर के तापमान की रोज़ जाँच होगी ?बच्चों को लाने-ले जाने वाली बसों का फिर क्या होगा ? क्या उनके फेरे बढ़ाने पड़ेंगे ? अगर ऐसा हुआ तो सड़कों के ट्रैफ़िक पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव से कैसे निपटेंगे ? जिन बच्चों के अभिभावक काम करने घरों से बाहर जाते हैं क्या उन्हें भी अपनी दिनचर्या को नए सिरे से एडजस्ट करना पड़ेगा ?और भी बहुत सारी चिंताएँ।
बच्चे तो सारी दुनिया के एक जैसे ही होते हैं।उनकी डाल्ज़ भी लगभग एक जैसी ही बुनी और रंगों से भरी जाती हैं।हमारे यहाँ के बच्चे भी इन्हीं सब बातों को लेकर चिंतित भी हैं। उनके अभिभावक और अध्यापक-अध्यापिकाएं भी निश्चित ही होंगी ही।पर क्या जिन लोगों को बच्चों के सपनों पर फ़ैसले लेना है वे इन सब चिंताओं के लिए वक्त निकाल पा रहे हैं ? क्या आपको पता है कि आपके सूबे के स्कूली शिक्षा मंत्री कौन हैं ?उनका नाम क्या है ?उनकी शैक्षणिक योग्यता क्या है ?और यह भी कि इस समय उनकी सबसे बड़ी चिंता किन चीज़ों को लेकर है ? उस चिंतामें आपके बच्चों के स्कूल शामिल हैं या नहीं?

घर-वापसी पर कोरोना का डर
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
केंद्र सरकार ने यह बुद्धिमानी का काम किया कि दूसरी तालाबंदी खुलने के पहले करोड़ों मजदूरों, पर्यटकों, छात्रों और यात्रियों की घरवापसी की घोषणा कर दी। यदि यह घोषणा अभी तीन-चार दिन पहले नहीं होती तो इसके परिणाम अत्यंत भयंकर हो सकते थे। चार मई की सुबह ही लाखों मजदूर और छात्र सड़कों पर उतर आते और बगावत का झंडा गाड़ देते। इस तीन-चार दिन की यात्रा की सुविधा देने की बात मैं तालाबंदी के पहले दिन से ही कह रहा हूं। अब करोड़ों लोग अपने घर वापिस जाएंगे। उनकी यात्रा और जांच आदि की अपनी समस्याएं होंगी, जिनका हल राज्य सरकारें निकाल लेंगी लेकिन उससे भी बड़ी समस्या पर मेरा ध्यान जा रहा है। वह है, इन करोड़ों लोगों को कोरोना से कैसे बचाना ? यदि घर पहुंचकर इनमें कोरोना के लक्षण दिखाई पड़े तो क्या होगा ? जाहिर है कि अभी तक सरकार के पास कोई पक्का टीका, गोली या घोल नहीं है, जो कोरोना का इलाज कर सके। तो क्या किया जाए ? शारीरिक दूरी, हाथ धोते रहना, घर में टिके रहना आदि निर्देश तो लोग पालन कर ही रहे हैं लेकिन मेरी समझ में नहीं आता कि हमारी केंद्र सरकार जीवाणु और विषाणु की रोकथाम के परखे हुए पारंपरिक नुस्खों का प्रचार करने से क्यों घबरा रही है ? इन नुस्खों को गांव के लोग भी बड़े आराम से प्रयोग कर सकते हैं। सुश्रुत संहिता में रोग (संक्रमण) फैलने के आठ तरीके बताए गए हैं। पिछले ढाई हजार साल से इन संक्रामक तरीकों को काबू करने के नुस्खे हमारे आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णित हैं। इसका पहला नुस्खा तो यह है कि भेषज-धूपन करें। हवन करें। लोबान जलाएं। हवन-सामग्री में गुग्गलु, अगर, वचा, नीम के पत्ते, विंडग, सरसों, गिलोय, दालचीनी, सौंठ, कुटकी, लौंग, काली मिर्च, चिरायता, नागरमोथा, राल आदि जोड़ लें। इनके धुंआ से जयपुर के स्वामी कृष्णानंद ने बहुत सफल प्रयोग किए हैं। इनके प्रयोगों को ‘इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च’ ने भी मान्यता दी है। औषधियों का यह हवन हिंदू, मुसलमान, ईसाई सभी कर सकते हैं। आहुति डालते समय मंत्र पढ़ना जरुरी नहीं है। आप चाहें तो कुरान की आयत और बाइबिल व जिन्दावस्ता के पद भी पढ़ सकते हैं। आयुष मंत्रालय के पूर्व सलाहकार प्रसिद्ध वैद्य डाॅ. सुरेंद्र शर्मा ने 1994 में इन्हीं औषधियों के काढ़े और हवन-सामग्री सूरत के प्लेग के वक्त बंटवाने में बड़ी पहल की थी। औषधियों का धुंआ रोगी को तो संक्रमण से मुक्त करता ही है, सारे वातावरण को भी प्रदूषण-मुक्त करता है। इसी प्रकार उक्त औषधियों का क्वाथ (काढ़ा) भी रोगी को जल्दी ही लाभ पहुंचाता है। देश भर में लगभग 5-6 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं। इनकी घर-वापसी के बाद यदि इन्हें कुछ हो गया तो इनको सरकारी डाॅक्टर और अस्पताल कैसे संभालेंगे ? यदि हमारी केंद्र और राज्य सरकारें मप्र सरकार की तरह इनके घर पहुंचने से पहले ही इन्हें भेषज-चूर्ण के पूड़े पकड़ा दें तो एक बड़े संकट की आशंका से हम मुक्त हो सकेंगे।

कोरोना संक्रमण के बाद बचेंगे भारत के समाचार पत्र ?
सनत जैन
भारत में 40 दिन के लॉक डाउन के बाद यदि सबसे ज्यादा बुरा असर किसी पर पड़ा है, तो वह प्रिंट मीडिया है। 1990 के बाद से प्रिंट मीडिया ने काफी ऊंची उड़ान भरी थी। भारत के राज्य एवं प्रादेशिक समाचार पत्रों की पृष्ठ संख्या तथा प्रसार संख्या बड़ी तेजी के साथ बढ़ी। जिले एवं संभागीय स्तर से प्रभावी लघु एवं मध्यम श्रेणी के समाचार पत्र प्रकाशित होना शुरु हुए। औद्योगिक विस्तार एवं वैश्विक व्यापार संधि को देखते हुए भारत में राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक समाचार पत्रों में विज्ञापन की संख्या बढ़ी। बड़े-बड़े समाचार पत्र संस्थानों की आय भी प्रति वर्ष तेजी के साथ बढ़ी। जिसके कारण समाचार पत्र संस्थानों ने वर्तमान दायित्व की सोच को ही बदल दिया। जो मीडिया पहले अपने पाठकों के लिए उत्तरदाई होता था। पाठकों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए समाचारों, लेख एवं अन्य पठनीय सामग्री को पाठकों तक पहुंचाता था। समाचार पत्र की पहचान उसकी अपनी विचारधारा और उसके संपादक से हुआ करती थी। 1990 के बाद समाचार पत्र संस्थानों में भी औद्योगिक सोच का विस्तार हुआ। वैश्वीकरण का प्रभाव मीडिया संस्थानों में इस कदर बढ़ा, कि संपादकों एवं रिपोर्टर के स्थान पर मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव के लोग प्रिंट मीडिया में बड़ी तेजी के साथ भारी भरकम वेतन लेकर कार्य करने लगे।
प्रिंट मीडिया संस्थानों की पूरी सोच ही बदल गई। औद्योगिक एवं राजनैतिक हितों के लिए प्रिंट मीडिया काम करने लगा। देखते ही देखते 2010 तक संपादकों का स्थान ऐसे लोगों ने ले लिया, जो व्यापारिक दृष्टि से प्रिंट मीडिया के संस्थानों के लिए मुफीद थे। इसी तरह प्रिंट मीडिया ने राजनेताओं औद्योगिक और व्यापारिक संस्थानों के हितों के लिए उनसे सौदेबाजी शुरू कर दी। इस सौदेबाजी में प्रिंट मीडिया और बाद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संस्थानों का बड़ा आर्थिक फायदा हुआ। लेकिन इसी बीच आम जनता की दूरी मीडिया संस्थानों से बढ़ती चली गई।
समाचार पत्रों की पृष्ठ संख्या बड़ी तेजी के साथ बढ़ी। राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक समाचार पत्रों में विज्ञापन की संख्या बढ़ी। तेजी के साथ बढ़ी अखबारों का बहुत बड़ा स्पेस विज्ञापनों ने ले लिया। पैसा लेकर राजनीतिक दलों और औद्योगिक संस्थानों के हित में मीडिया ने काम करना शुरू कर दिया। मीडिया में काम करने लोगों का तेजी के साथ वेतन बढ़ा। जिस तरह व्यापारिक संस्थानों में बिक्री या मुनाफे के लक्ष्य निर्धारित होते थे। वैसे ही लक्ष्य मीडिया संस्थानों ने बनाना शुरु कर दिए। मीडिया संस्थानों का 80 से 90 फ़ीसदी राजस्व, कागज, प्रिंटिंग, वितरण व्यवस्था, प्रसार संख्या बढ़ाने में खर्च होने लगी। 1990 के बाद से समाचार पत्र और मीडिया पूरी तरह विज्ञापन की आय पर आधारित हो गया। पृष्ठ संख्या बढ़ जाने से कागज का खर्च बढ़ा। प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए पाठकों के लिए उपहार योजनाएं चलाई गई। अखबारों की पृष्ठ संख्या कई गुना बढ़ जाने के बाद भी समाचार पत्र की कीमतों को और कम किया गया। जिसके कारण पाठकों की रूचि बदली। समाचार पत्रों की बढ़ी हुई पृष्ठ संख्या में जो सामग्री प्रकाशित हुई, उससे पाठकों का वैचारिक दृष्टि से कोई लेना-देना भी नहीं रहा। पाठक यह सोचकर अखबार लेता रहा, कि रद्दी में अखबार बेचने के बाद बिल से ज्यादा पैसा रद्दी से मिल जाता है। इसके साथ ही पाठकों की रुचि बाजारवाद की ओर ले जाने का काम मीडिया संस्थानों ने किया। जिसके कारण राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक समाचार पत्रों में प्रसार संख्या बढ़ाने और विज्ञापन मैं एकाधिकार करने की जो होड़ मची थी। पिछले 2 से 3 वर्षों में इसी होड़ के कारण अब मीडिया संस्थानों का अस्तित्व ही संकट में आ गया है।
2016 के बाद से आर्थिक मंदी तथा कोरोनावायरस संक्रमण के एक ही झटके में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अर्श से फर्श पर लाकर खड़ा कर दिया है। 2016 के बाद से ही प्रिंट मीडिया अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था, विज्ञापन कम होता जा रहा था खर्च हर साल बढ़ता ही जा रहा था। जीएसटी के आने के बाद प्रिंट मीडिया की कमर बड़ी तेजी के साथ टूटी। स्वतंत्रता के पश्चात से कभी भी न्यूज़ प्रिंट विज्ञापन की आय में कोई टैक्स नहीं था। जीएसटी में कागज और विज्ञापन दोनों में जीएसटी लागू कर दिया गया। इसी समय आर्थिक मंदी के कारण रियल एस्टेट, एजुकेशन सेक्टर, ऑटोमोबाइल सेक्टर, आईटी सेक्टर तथा टेलीकॉम सेक्टर में मंदी का दौर आया। विज्ञापनों में अंडर कटिंग शुरू हुई। विज्ञापन की आय कम हुई, खर्च बढ़ गए। इसी बीच कोरोनावायरस का संक्रमण आया। 40 दिन का लाकडाउन लागू किया गया। संक्रमण का भय इतना फैला कि लोगों ने समाचार पत्र लेना ही बंद कर दिया। लाकडाउन की शर्तें इतनी कठिन थी, कि पेपर पहुंचाना भी बड़ा मुश्किल था हाकरों ने भी डर के मारे अखबार बांटने बंद कर दिए। पाठकों ने अखबार लेना बंद कर दिया। समाचार पत्रों की आय लगभग खत्म हो गई। लेकिन समाचार पत्रों के खर्च तथा लायबिलिटी उतनी ही बनी रही। राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक तथा क्षेत्रीय समाचार पत्रों करोड़ों और लाखों रुपए प्रतिमाह का है। विज्ञापन के अलावा आय का और कोई विकल्प उनके पास नहीं है। केंद्र एवं राज्य सरकारों ने भी पिछले वर्षों की तुलना में विज्ञापन कम कर दिए। लाक डाउन के दौरान कुछ डिस्प्ले विज्ञापनों को छोड़कर अन्य सरकारी विज्ञापन भी बंद रहे। वही औद्योगिक एवं व्यापारिक संस्थानों से भी विज्ञापन आना बंद हो गए। ऐसी स्थिति में प्रत्येक समाचार पत्र के ऊपर उसकी हैसियत के अनुसार लाखों करोड़ों रुपए की नई देनदारी खड़ी हो गई है। पिछले वर्षों में प्रतिस्पर्धा के कारण आय और खर्च का संतुलन बिगड़ने के बाद भी प्रिंट मीडिया अपना अस्तित्व बनाए हुआ था। किंतु जैसे ही 40 दिन का लाक डाउन लागू हुआ। कोरोनावायरस के संक्रमण को लेकर विज्ञापन खत्म हो गया। विज्ञापन दाताओं ने रद्दी के भाव में भी अखबार लेना स्वीकार नहीं किया। जिसके कारण प्रिंट मीडिया समाप्त होने की स्थिति में पहुंच गया है। केंद्र एवं राज्य सरकारों तथा औद्योगिक संस्थानों ने यदि प्रिंट मीडिया की सहायता नहीं की। यही स्थिति 1 माह और चल गई, तो प्रिंट मीडिया को अपना अस्तित्व बनाए रखना मुश्किल होगा। मीडिया संस्थानों की अभी तक जो हेसियत बना रखी थी। एक बार फिर उन्हें 1990 के दशक में वापस लौटने की स्थिति में आना पड़ेगा। वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते भारतीय मीडिया जगत इन दिनों अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा विज्ञापनों का भुगतान भी समय पर नहीं किया जा रहा है। भारत का मीडिया केवल विज्ञापनों की आय पर आश्रित था। विज्ञापन कम होने की दशा में या तो समाचार पत्रों के रेट बढ़ाकर अखबार को चालू रखना एकमात्र विकल्प है। समाचार पत्र के लिए सूचनाएं एकत्रित करना, उनका संपादन करने, प्रिंटिंग, कागज, वेतन और वितरण इत्यादि में मीडिया संस्थानों के कुल राजस्व का लगभग 90 फ़ीसदी राशि खर्चों में जाती है। कोरोना वायरस संक्रमण के कारण जो स्थितियां निर्मित हुई हैं। उसमें 2 माह के अंदर ही मीडिया की देनदारियां काफी बढ़ गई हैं। मीडिया संस्थानों के ऊपर बैंकों के करोड़ों रुपए के कर्ज भी हैं। ब्याज, बिजली, भारी भरकम मशीनों और अन्य प्रशासनिक बहुत ज्यादा हैं। सरकार की सहायता इन्हें त्वरित रुप से नहीं मिली, तो सबसे पहले और सबसे बुरा असर मीडिया पर ही देखने को मिलेगा। सभी मीडिया संस्थान छोटे हो या बड़े सभी चिंतित हैं। अब देखना यह है कि सरकार लघु एवं मध्यम श्रेणी के समाचार पत्रों और बड़े समाचार पत्र समूह के लिए कौन सी नीति अपनाती है। पिछले वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने जिस तरह से कुछ बड़े-बड़े मीडिया समूह को ही प्रभावी मीडिया मान लिया था। यही मीडिया सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है। मीडिया संस्थान सरकार की तरफ टकटकी लगाकर देख रहे हैं। जिस तरीके के खर्चे मीडिया ने बना रखे हैं। उसकी स्वयं की कोई आर्थिक व्यवस्था का सिस्टम नहीं है। भारत में पाठक को सबसे कम कीमत में समाचार पत्र देने, घाटे की अर्थव्यवस्था की भरपाई विज्ञापन से करने वाले मीडिया संस्थानों के सामने केवल दो ही विकल्प रह गए हैं। वह अपनी पृष्ठ संख्या को बहुत सीमित कर दें। अपने समाचार पत्र के मूल्य को बढ़ा दें। अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए मीडिया संस्थानों को एक बार फिर अपने पाठकों के हितों का ध्यान रखना होगा। पाठक जिस समाचार पत्र को पसंद करेगा, वही अस्तित्व में बना रहेगा।

कोरोनाः रोक-थाम की पहल क्यों नहीं ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कोरोना की महामारी कब खत्म होगी, कुछ पता नहीं। अमेरिका की एक खोजी संस्था की राय है कि अभी दुनिया में एक अरब लोगों के संक्रमित होने की संभावना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मुख्य वैज्ञानिक सौम्या स्वामिनाथन का कहना है कि किसी भी महामारी का मुकाबले करने के लिए टीका (वैक्सीन) तैयार करने में प्रायः दस साल लगते हैं। इबोला का टीका पांच साल में बना था। कोरोना का टीका तैयार करने में दर्जनों वैज्ञानिक लगे हुए हैं, फिर भी उसमें साल भर लग सकता है। यदि यह तथ्य है तो कोरोना का मुकाबला तब तक कैसे किया जाए ? यह भी तथ्य है कि कोरोना के रोगी अच्छी-खासी संख्या में ठीक हो रहे हैं। वे कैसे ठीक हो रहे हैं ? उन्हें ठीक करनेवाली कोई एक सुनिश्चित दवाई नहीं है। जैसा भी मरीज हो, वैसी ही दवाइयों का संयोग बिठाने की कोशिश की जाती है। लग जाए तो तीर नहीं तो तुक्का ! अब अमेरिका के रोग-नियंत्रक विभाग ने कोरोना के नए लक्षणों का बखान कर दिया है। पहले खांसी, बुखार, छींक आदि लक्षण थे, अब इनमें हाथ-पांव कांपना, सिरदर्द, मांसपेशियों में अकड़न, गला रुंधना और स्वाद खत्म होना भी जुड़ गया है। दूसरे शब्दों में अब संक्रमित रोगियों की इतनी भरमार हो सकती है कि भारत और पाकिस्तान-जैसे देश भी संकट में फंस सकते हैं, जहां कोरोना का हमला उतना तेज नहीं हुआ है, जितना अमेरिका और यूरोप में हुआ है। हमारे यहां इसकी संख्या शायद इसलिए भी कम दिखाई पड़ती है कि इन देशों की तरह हमारे यहां खुला खाता नहीं है। कई बातें छिपाई जाती है और हमारे यहां कोरोना की जांच भी बहुत कम हुई हैं। ऐसी हालत में बड़े पैमाने पर क्या किया जा सकता है। सरकार ने शारीरिक दूरी, मुखपट्टी, घर बंदी आदि का जमकर प्रचार करके ठीक ही किया है लेकिन करोड़ों लोग कोरोना से कैसे लड़ें, अपनी रोकथाम-शक्ति कैसे बढ़ाएं, इस बारे में हमारे नेतागण नौकरशाहों के नौकर बने हुए हैं। उनकी जुबान लड़खड़ाती रहती है। वे करोड़ों लोगों को घरेलू नुस्खे (काढ़ा वगैरह) लेने के लिए क्यों नहीं कहते ? हवन-सामग्री के धुंआ से संक्रमण को नष्ट क्यों नहीं करवाते ? स्वास्थ्य मंत्रालय और आयुष मंत्रालय को पिछले एक माह में मैंने ठोस विज्ञानसम्मत प्रस्ताव भिजवाए हैं लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है जबकि अफ्रीका में मेडागास्कर के राष्ट्रपति हमारी आयुर्वेदिक औषधि का प्रचार कर रहे हैं। इस मामले में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने बाजी मार ली है। वे काढ़ा—चूर्ण के एक करोड़ पूड़े सारे प्रदेश में बंटवा रहे हैं।

देश के मजदूर कैसे मनायेगें मई दिवस ?
रमेश सर्राफ धमोरा
(01 मई मजदूर दिवस पर विशेष) दुनिया के सभी कामगारों, श्रमिकों को समर्पित एक मई को मनाए जाने वाला मजदूर दिवस इस बार भी मनाया जाएगा। लेकिन इस बार का मजदूर दिवस अन्य वर्षो की अपेक्षा अलग ढंग से तंग दिली में मनेगा। desh में आगामी तीन मई तक चल रहे देशव्यापी लाक डाउन के कारण देश के सभी कल कारखाने, हाट-बाजार व अन्य व्यवसायिक संस्थान जहां मजदूर काम करते हैं सभी बंद पड़े हैं। लाक डाउन के चलते काम बंद होने के कारण देशभर के मजदूर अपने अपने घरों में बेरोजगार बैठे हुए हैं। काफी संख्या में ऐसे मजदूर जो कमाने के लिए देश के दूसरे प्रांतों में गए हुए थे। मगर अचानक से लाकडाउन होने के चलते अपने घर नहीं लौट पाए वो सब अलग-अलग प्रदेशों में बनाए गए राहत शिविरों में फंसे हुए हैं। घर लौटने का साधन नहीं मिलने के कारण बड़ी संख्या में मजदूर पैदल ही अपने घरों की तरफ निकल पड़े़ हैं। जिनका ना कोई खाने का ठिकाना है ना रहने का ठिकाना। ऐसी स्थिति में फंसे हुए लोगों के लिए इस बार का मजदूर दिवस मजबूर दिवस बन कर रह गया है। ऐसी परिस्थिति में मजदूर दिवस मनाने की बात सोचना भी मुनासिब नहीं लगता है।
भारत सहित दुनिया के सभी देशों में मजदूर दिवस मनाया जाता है। जिसका मुख्य उद्देश्य उस दिन मजदूरों की भलाई के लिए काम करने व मजदूरों में उनके अधिकारों के प्रति जागृति लाना होता है। मगर आज तक तो कहीं ऐसा हो नहीं पाया है। हमारे देश का मजदूर वर्ग आज भी अत्यंत ही दयनीय स्थिति में रह रहा है। उनको न तो मालिकों द्वारा किए गए कार्य की पूरी मजदूरी दी जाती है और ना ही अन्य वांछित सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाती है। गांव में खेती के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा है। इस कारण बड़ी संख्या में लोग मजदूरी करने के लिए शहरों की तरफ पलायन कर जाते हैं। जहां ना उनके रहने की कोई सही व्यवस्था होती है ही उनको कोई ढ़ग का काम मिल पाता है। मगर आर्थिक विपन्नता के चलते शहरों में रहने वाले मजदूर वर्ग जैसे तैसे कर वहां अपना गुजर-बसर करते हैं।
बड़े शहरों में झोंपड़ पट्टी बस्तियों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। जिन में रहने वाला लोग किन विपरीत परिस्थितियों का सामना करता है। इसको देखने की न तो सरकार को फुर्सत है ना हीं किसी राजनीतिक दलों के नेताओं को। झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले मजदूरों को शौचालय जाने के लिए भी घंटों लाइनों में खड़ा रहना पड़ता है। झोपड़ पट्टी बस्तियों में ना रोशनी की सुविधा रहती है ना पीने को साफ पानी मिलता है और ना ही स्वच्छ वातावरण। शहर के किसी गंदे नाले के आसपास बसने वाली झोपड़ पट्टियों में रहने वाले गरीब तबके के मजदूर कैसा नारकीय जीवन गुजारते हैं उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है। मगर इसको अपनी नियति मान कर पूरी मेहनत से अपने मालिकों के यहां काम करने वाले मजदूरों के प्रति मालिकों के मन में जरा भी सहानुभूति के भाव नहीं रहते हैं। उनसे 12-12 घंटे लगातार काम करवाया जाता है। घंटो धूप में खडे़ रहकर बड़ी बड़ी कोठियां बनाने वाले मजदूरों को एक छप्पर तक नसीब नही हो पाता है।
देशव्यापी लाक डाउन के चलते आज सब से ज्यादा परेशान देश के करोड़ों मजदूर हो रहे हैं। लाकडाउन के कारण उनका काम धंधा एकदम चौपट हो गया है। उनके परिवार के समक्ष गुजर-बसर करने की समस्या पैदा हो रही है। हालांकि सरकार ने देश के गरीब लोगों को कुछ राहत देने की घोषणा की है। मगर सरकार द्वारा प्रदान की जा रही सहायता भी मजदूरों तक सही ढं़ग से नहीं पहुंच पा रही है। इस कारण बहुत से लोगों के समक्ष रोजी रोटी का संकट व्याप्त हो रहा है। उद्योगपतियों व ठेकेदारों के यहां अस्थाई रूप से काम करने वाले श्रमिको को ना तो उनका मालिक कुछ दे रहा है ना ही ठेकेदार। इस विकट परिस्थिति में श्रमिक अन्य कहीं काम भी नहीं कर सकते हैं। उनकी आय के सभी रास्ते बंद पड़े हैं।
हमारे देश में आज सबसे ज्यादा काई प्रताडि़त व उपेक्षित है तो वो मजदूर वर्ग है। मजदूरो की सुनने वाला देश में कोई नहीं हैं। कारखानो में काम करने वाले मजदूरो पर हर वक्त इस बात की तलवार लटकती रहती है कि ना जाने कब मील मालिक उनकी छटनी कर काम से हटा दे। कारखानो में कार्यरत मजदूरों से निर्धारित समय से अधिक काम लिया जाता है विरोध करने पर काम से हटाने की धमकी दी जाती है। मजबूरी में मजदूर कारखाने के मालिक की शर्तों पर काम करने को मजबूर होता है। कारखानो में श्रम विभाग के मापदण्डो के अनुसार किसी भी तरह की कोई सुविधायें नहीं दी जाती है।
कई कारखानों में तो मजदूरों से खतरनाक काम करवाया जाता है जिस कारण उनको कई प्रकार की बिमारियां लग जाती है। कारखानों में मजदूरो को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा, पीने का साफ पानी, विश्राम की सुविधा तक उपलब्ध नहीं करवायी जाती है। मालिको द्वारा निरंतर मजदूरों का शोषण किया जाता है मगर मजदूरों के हितों की रक्षा के लिये बनी मजदूर यूनियनो को मजदूरो की बजाय मालिको की ज्यादा चिंता रहती है। हालांकि कुछ मजदूर यूनियने अपना फर्ज भी निभाती है मगर उनकी संख्या कम है।
किसी भी राष्ट्र की प्रगति करने का प्रमुख भार मजदूर वर्ग के कंधों पर ही होता है। मजदूर वर्ग की कड़ी मेहनत के बल पर ही राष्ट्र तरक्की करता है। लेकिन भारत का श्रमिक वर्ग श्रम कल्याण सुविधाओं के लिए आज भी तरस रहा है। हमारे देष में मजदूरों का शोषण आज भी जारी है। समय बीतने के साथ मजदूर दिवस को लेकर श्रमिक तबके में अब कोई खास उत्साह नहीं रह गया है। बढ़ती महंगाई और पारिवारिक जिम्मेदारियों ने भी मजदूरों के उत्साह का कम कर दिया है। अब मजदूर दिवस इनके लिए सिर्फ कागजी रस्म बनकर रह गया है।
हर बार मजदूर दिवस के अवसर पर सरकारे समाचार पत्रो में मजदूरो के हित की योजनाओं के बड़े-बड़े विज्ञापन जारी करती है। जिनमें मजदूरों के हितों की बहुत सी बाते लिखी होती हैं। किन्तु उनमें से अमल किसी बात पर नहीं हो पाता है। देश में सभी राजनीतिक दलों ने अपने यहां मजदूर संगठन बना रखे हैं। सभी दल दावा करते हैं कि उनका दल मजदूरो के भले के लिये काम करता है। मगर ये सिर्फ कहने सुनने में अच्छा लगता है हकीकत इससे कहीं उलट हैं।
हमारे देश में मजदूरों की स्थिति सबसे भयावह होती जा रही है। देश का मजदूर दिन प्रतिदिन और अधिक गरीब होता जा रहा है। दिन रात रोजी-रोटी के जुगाड़ में जद्दोजहद करने वाले मजदूर को तो दो जून की रोटी मिल जाए तो मानों सब कुछ मिल गया। आजादी के इतने सालो में भले ही देश में बहुत कुछ बदल गया होगा। लेकिन मजदूरों के हालात तो आज भी नहीं बदले हैं तो फिर श्रमिक वर्ग क्यों कर मनाये मजदूर दिवस?

कोरोनाः भागवत और मोदी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पिछले एक माह से मैं निरंतर याद दिला रहा हूं, चार बातों की। एक, तबलीगी मौलाना साद की गैर-जिम्मेदाराना हरकत के लिए देश के सारे मुसलमानों पर तोहमत नहीं लगाई जानी चाहिए। दूसरी, विषाणु से लड़ने में हमारे आयुर्वेदिक (हकीमी भी) घरेलु नुस्खों का प्रचार किया जाए और घर-घर में भेषज-होम (हवन) किया जाए। तीसरी, जो लोग, खासतौर से प्रवासी मजदूर, अभी तक अधर में लटके हुए हैं, उनकी घर वापसी का इंतजाम हमारी केंद्र और राज्यों की सरकारें करें। चौथी बात, कोरोना की लड़ाई में अंग्रेजी के अटपटे शब्दों की बजाय हिंदी के सरल शब्दों का प्रयोग किया जाए।
मुझे खुशी है कि इन चारों बातों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब दो-टूक शब्दों में दोहराया है। कोई बात नहीं, देर आयद्, दुरुस्त आयद ! यदि इन बातों पर महिने भर पहले से ही अमल शुरु हो जाता तो भारत में कोरोना उतना भी नहीं फैलता, जितना कि वह अभी थोड़ा-बहुत फैला है। देश के 101 अफसर बुद्धिजीवियों ने घुमा-फिराकर मीडिया, भाजपा और सरकार पर तबलीगी जमात को लेकर सांप्रदायिकता फैलाने का आरोप लगाया है। यह आरोप निराधार था लेकिन अब भागवत के बयान के बाद उनकी गलतफहमी दूर हो जानी चाहिए। कुछ टीवी चैनलों को संयम बरतने की बात तो मैं पहले ही कह चुका हूं। मोदी ने भी अपनी ‘मन की बात’ में मुसलमानों के लिए अपनी बात बहुत अच्छे ढंग से कही है। उन्होंने कहा है कि रमजान के दिनों में इस बार घर में रहो और अल्लाह की इबादत जरा ज्यादा करो।
आयुर्वेदिक नुस्खों का सम्मानपूर्ण उल्लेख मोदी ने जरुर किया लेकिन उस पर जोर नहीं दिया। इस संबंध में स्वास्थ्य मंत्री, आयुष मंत्री और उनके अफसरों से मेरी बात बराबर हो रही है लेकिन उन्होंने बहुत देर कर दी है। उन्हें याद दिलाऊं कि 1994 में जब सूरत में प्लेग फैला तो मेरे आग्रह पर गुजरात के मुख्यमंत्री छबीलदास मेहता ने काढ़े और हवन-सामग्री के लाखों पूड़े बंटवाए थे। प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंहराव ने उन्हें प्रोत्साहित किया था। अपने आपको भारतीय संस्कृति के योद्धा कहनेवाले संघी और भाजपाई इस मौके पर आगे क्यों नहीं आते ?
प्रवासी छात्रों और मजदूरों की घर वापसी में केंद्र सरकार अंडगा नहीं लगा रही है, यह अच्छी बात है और मुझे यह भी अच्छा लगा कि कोरोना से संबंधित जिन अंग्रेजी शब्दों की मैंने हिंदी बताई थी, उसका अनुकरण मोदी और मोहनजी, दोनों करने लगे हैं, जैसे (सोश्यल डिस्टेंसिंग) सामाजिक दूरी नहीं, शारीरिक दूरी। लेकिन देश के बड़े हिंदी अखबारों के मालिकों से मेरे कहने के बावजूद हमारे पत्रकार भाई अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त नहीं हुए हैं। वे अभी भी तालाबंदी को ‘लाॅकडाउन’ लिख रहे हैं।

पालघर में संतों का संहार: एक गहरी साजिश
डॉ विजय सोनकर शास्त्री
महाराष्ट्र के पालघर में गत 16 अप्रैल की रात दो साधू महाराज कल्पवृक्षगिरि महाराज (70), सुशीलगिरि महाराज (35) अपने ड्राइवर निलेश तेलगड़े के साथ एक परिचित के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए मुंबई से सूरत जा रहे थे। गुजरात सीमा के पास पालघर जिला स्थित दहानु तालुका के एक आदिवासी बाहुल्य गडचिंचले गांव में उनकी कार को रोक लिया गया। फिर उग्र भीड़ ने उन सभी की पुलिस के सामने पीट-पीटकर हत्या कर दी। महाराष्ट्र पुलिस खड़ी होकर सामुहिक नरसंहार को देखती रही। यह पूरी घटना जिस तरह से घटी, उसमें महाराष्ट्र की शिवसेना की सरकार तथा स्थानीय पुलिसकर्मियों के ऊपर भी कई गंभीर सवाल पैदा हो गए क्योंकि घटना के समय पुलिसकर्मी मौके पर ही थे, पर उन्होंने दोनों साधुओं को बचाने की जगह, उन्हें उग्र भीड़ को सौंप दिया। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने जहां इस सामुहिक नरसंहार को ग़लतफ़हमी में हुई लिंचिंग की घटना बताया, वही राज्य के मुख्यमंत्री अनिल देखमुख ने भी घटना को लेकर भाजपा एवं अन्य दलों पर राजनीति करने का आरोप लगाकर अपना पल्ला झाड़ लिया I अनिल देशमुख ने घटना के आरोपियों को गिरफ्तार करने का दावा करते हुए कहा कि इस मामले में मुस्लिम संप्रदाय का कोई भी व्यक्ति शामिल नहीं था। प्रश्न यह है कि उन्हें सफाई में मुसलमान नहीं है, यह क्यों कहना पड़ा?
जूना अखाड़े से जुड़े दोनों साधुओं की निर्मम हत्या से कई सवाल पैदा हुए हैं, जिनमें मुख्य प्रश्न यह है कि साधुओं की बर्बर हत्या का जिम्मेदार कौन? यह प्रश्न इसलिए भी गंभीर है क्योंकि संतों की हत्या जिस क्षेत्र में हुई, वह पूरा क्षेत्र ईसाई मिशनरियों का एक बड़ा केंद्र होने के साथ ही वामपंथी दलों के प्रभाव वाला क्षेत्र है। संतों की हत्या के जो वीडियो सामने आए, उसमें स्थानीय वामपंथी नेताओं को भी मौके पर देखा गया। वर्षों से स्थानीय आदिवासियों को छद्म रूप में सेवा एवं धन के लालच को हथियार बनाकर धर्म परिवर्तन कराने की साजिशें लगातार चल रही हैंI यहां पर ईसाई मिशनरियों, वामपंथियों एवं कट्टरपंथी-जेहादी मुस्लिमों के गठजोड़ को भी बडे बारीकी से समझने की आवश्यकता है। साथ ही यह ज्ञात करना भी आवश्यक है कि ईसाई मिशनरियों, वामपंथियों एवं कट्टरपंथी-जेहादी मुस्लिमों का यह अघोषित गठबंधन किस प्रकार से हिन्दू धर्मावलम्बियों को निशाना बनाकर हिन्दू समाज को तोड़ने का खेल खेलता आ रहा है। इनकी जड़ें बहुत गहरी तो है ही, साथ ही हिन्दू समाज को तोड़ने के कुचक्र का षड़यंत्र भी लगभग दो शताब्दि से लगातार सुनियोजित रूप से चलता आ रहा है I
हिन्दू समाज निशाने पर कैसे एवं कब से
भारत में विदेशी आक्रांता मुस्लिम आक्रमणकारियों ने जब हिन्दुस्तान को बलपूर्वक अपने कब्ज़े में करके सत्ता को हथियाया तो उनके निशाने पर हिन्दू समाज ही रहा। हिन्दुओं को भय और बलपूर्वक इस तरह से दबाव बनाया गया कि वे हिन्दू धर्म को छोड़कर इस्लाम को अपनाने के लिए बाध्य हो गए। लगभग छह सौ साल तक जारी इस प्रक्रिया के दौरान जिन हिन्दुओं ने धर्म परिवर्तन नहीं किया, उन्हें अस्वच्छ कार्यों को करने के लिए बाध्य किया गया। तत्कालीन हिन्दुस्तान में मैला ढ़ोने एवं चर्म कर्म का विदेशी आक्रांताओं के आने से पहले का एक भी उदाहरण नहीं मिलता है। हिन्दुओं की एक बड़ी आबादी को बलपूर्वक दमन एवं दलन के उपरांत अस्वच्छ कार्य करने के लिए मजबूर करके उन्हें दलित बना दिया गया। इस प्रकार भारत में दलित समाज की उत्पत्ति हुई, जिसका भी चालाकी से दोष हिन्दू समाज पर ही मढ़ दिया गया। लगभग छह सदी तक हिन्दू धर्मावलम्बियों को बलपूर्वक दलित बनाने का क्रम चलता रहा। इसके उपरांत विदेशी आक्रांताओं के प्रयास और अपनों के घृणा के कारण वे बिलग होकर दलित वर्ग के रूप में चिन्हित हुए।
16वी सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी भारत आयी और व्यापार करने के साथ ही भारत की भूमि पर अपना कब्ज़ा जमाना शुरू किया। इसके उपरांत भी यह वह समय भी था, जब भारत मध्ययुगीन विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में पूरे विश्व में देखा जाता था। ईस्ट इंडिया कंपनी भी भारत की आर्थिक स्थित को देखकर यहां पहुंची थी। आर्थिक इतिहासकार अंगस मैडीसन की पुस्तक ‘द वर्ल्ड इकॉनमी: ए मिलेनियल पर्स्पेक्टिव (विश्व अर्थव्यवस्था: एक हज़ार वर्ष का परिप्रेक्ष्य)’ के अनुसार 17वीं सदी तक भारत विश्व का सबसे धनी देश और दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यस्था था। इसलिए भारत की आर्थिक स्थिति को पूरा लाभ उठाने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार के साथ ही भारत की सत्ता पर भी कब्ज़ा करना प्रारंभ किया।
तत्कालीन समय में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने हिन्दू समाज के उस विराट स्वरुप को भी भलीभांति देखा और महसूस किया, जिस विराट स्वरूप के कारण हिन्दू जनता मुस्लिक शासकों की गुलामी करने के उपरांत भी अपने धर्म, आस्था और विश्वास पर अडिग और संगठित थी। हिन्दू समाज अपनी आस्था, विश्वास, रीतिरिवाज, परंपरा, यम-नियम, धर्माधिकार, मानवाधिकार और एक विशिष्ट जीवन पद्धति के लिए जाना जाता था। किन्तु भारत की संवृद्धि पूर्वकाल में सबसे पहले विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं और बाद में अंग्रेजों के दुराग्रहों की भेंट चढ़ी।
अंग्रेजों ने शुरू किया साजिशों का खेल
लगभग एक सदी तक भारत में रहने और भारत की जनता के मनोविज्ञान को समझने के उपरांत ब्रिटिश सरकार की सत्ता स्थापित करने हेतु यहाँ के सामाजिक ताने-बाने में विदेशी आक्रांताओं के कूशासन के कारण व्याप्त कमियों का लाभ उठाते हुए ब्रिटिश अधिकारियों ने कुछ चालें चलीं। उस समय ब्रिटिश संसद ने एक निर्णय लिया कि भारत में हिन्दुओं के हित के लिए उनके धर्म ग्रंथों का प्रकाशन किया जाय। वे भारत की हिन्दू जनता को अपने चंगुल में फंसाकर उन्हें उच्च-निम्न जातियों में बांटकर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहते थे। और इसी लिए सबसे पहला निशाना मनुस्मृति को बनाया गया। 1794 में सर विलियम जोन्स नामक एक अंग्रेज ने मनुस्मृति का अंग्रेजी भाषा में अपने ढंग से अनुवाद किया था और बाद में उसी के आधार पर ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने भारत में हिन्दू जनता के लिए कानून बनाये। धर्म ग्रंथों के प्रकाशन के निर्णय के बाद सर्वप्रथम रामायण, रामचरित मानस, श्रीमद्भागवत, या भागवत गीता को न छापकर मनुस्मृति को छापने का निर्णय लिया। 1828 में अंग्रेजों ने मनुस्मृति में प्रक्षिप्तता करके उसके संपादन एवं प्रकाशन का कार्य भी किया। मनुस्मृति में विवादित तथ्यों को जोड़कर अंग्रेजों ने उसका उपयोग अपने हितों को साधने और हिन्दू धर्म को बांटने के लिए किया। उसके उपरांत अंग्रेजों ने भारत की प्रचीन शिक्षा पद्धति को निशाना बनाया, जो शिक्षा पद्धति हिन्दू धर्म की नींव थी और नगरों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों पाठशालाओं के माध्यम से सबको शिक्षित करने का कार्य कर रहे थे। अंग्रेजों का उद्देश्य था कि गुरुकुल और पाठशालाओं की शिक्षा प्रणाली को यदि नष्ट कर दिया जायेगा तो हिन्दू समाज को तोड़ने में सरलता होगी I
भारत की संस्कृत आधारित शिक्षा व्यवस्था को तहस-नहस करते हुए 1834 में लार्ड टॉमस बैबिंग्टन मैकॉले ने जिस नयी शिक्षा प्रणाली को प्रारम्भ करने की घोषणा की, वह शिक्षा प्रणाली पूरी तरह से अंग्रेजी हितों को साधने की दृष्टि से तो थी ही, साथ ही उस प्रणाली ने भारत की उस प्राचीन एवं गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रणाली को नष्ट करने का काम भी किया, जो भारत की जड़ों को मजबूत करने का काम कर रही थी। नयी शिक्षा प्रणाली के आधार पर प्रारंभ हुई शिक्षा ने देखते-देखते ही जहां नब्बे प्रतिशत भारतीयों को शिक्षा से दूर करने का काम किया, वही भारत के अंदर जानबूझकर एक ऐसे आभिजात्य वर्ग को उत्पन्न किया, जिसने भेदभाव और सामाजिक असमानता को बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाई।
भारत के जंगलों एवं दुर्गम स्थानों पर भारी विरोध के कारण जब अंग्रेज शासन नहीं कर पाये तो सेवा के बहाने ईसाई मिशनरियां वहां घुसकर धर्मांतरण का नंगा नाच प्रारंभ किये। ईसाई मिशनरियों को उन मुस्लिम शासकों का भी सहयोग मिला, जो भारत में हिन्दुओं को डरा-धमकाकर धर्मपरिवर्तन के लिए बाध्य करते आ रहे थे। इसी मध्य सुनियोजित तरीके से अंग्रेजों ने अपनी सेना एवं प्रशासन में उन हिन्दुओं को शामिल करना प्रारम्भ कर दिये थे, जिन्होंने मुस्लिम आक्रांताओं के दबाव में अस्वच्छ कार्य स्वीकार कर लिया, किन्तु धर्म परिवर्तन को ठुकरा दिया। एक तरह से तथाकथित दलितों के समक्ष घड़ियाल आशू बहाने का काम किये थे। 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने अस्वच्छ तथा निम्न कर्म करने वाली जातियों को जिन्हें अंग्रेजों ने 1931में डिप्रेस्ड क्लास और डॉ भीम राव आंबेडकर ने दलित का नाम दिया था, को हिन्दू धर्म से पूरी तरह अलग करने के लिए जिस तरह से कदम उठाया, उसका खुलासा बाद में डॉ आंबेडकर ने भी कियाI 1857 की क्रांति के बाद ईसाई मिशनरियां और तेजी से सक्रिय हुई और सुनियोजित ढंग से भारत में जाति आधारित विघटन की दिशा में एकजुट होकर काम करने लगी।
1891 में डॉ आंबेडकर के जन्म से भी लगभग बीस वर्ष पहले प्रोफ़ेसर एम ए शेरींग ने ‘हिन्दू ट्राइब्स एंड कास्ट’ के नाम से एक पुस्तक लिखी थी, उस पुस्तक में दलितों को हिन्दू धर्म के प्रति भड़काने के साथ ही ईसाई धर्म अपनाने का आह्वान किया गया था। 1872 में लिखी गयी इस पुस्तक को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि भारत में अंग्रेजों और उनकी सहयोगी ईसाई मिशनरियों ने जिस तरह से जाति प्रथा का कुप्रचार किया, उसका परिणाम हिन्दू धर्म में हुई विघटन की प्रक्रिया के रूप में सामने आया। इनके निशाने पर दलित जातियां तो थी ही, विशेषकर हिन्दू धर्म का वह बड़ा वर्ग था, जो तथाकथित चर्मकार जाति से थी।
यहाँ ध्यान देने योग्य बिंदु यह भी है कि डॉ आंबेडकर के पिता और दादा जब शिक्षित थे तो फिर डॉ आंबेडकर को शिक्षा ग्रहण करने में कठिनाइयां क्यों आयी ? डॉ आंबेडकर का जब जन्म हुआ तो उसके पहले ही अंग्रेजों द्वारा भारत में जातिभेद या जाति विभाजन की प्रक्रिया बहुत तीब्र गति के साथ समाज में पैदा की जा चुकी थी, जिसका प्रतिकार करने का काम ज्योतिबा फुले जैसे समाज सुधारकों द्वारा किया जा रहा था। लेकिन लार्ड मैकाले की नयी शिक्षा प्रणाली ने शिक्षा के सुधार के नाम पर शिक्षा के व्यवसायीकरण को जिस तरह से बढ़ावा दिया गया, उसका परिणाम यह निकला कि 1935 में जहां 90 प्रतिशत तक शिक्षित होने वाले हिन्दू समाज से शिक्षा बहुत दूर होती चली गयी। धर्मपाल जी की पुस्तक ‘ब्युटीफूल ट्री’ में प्रमाणों के साथ विस्तृत विवरण इस विषय में पढ़ा जा सकता है। नयी शिक्षा प्रणाली ने हिन्दू समाज को शिक्षा से दूर करने का काम किया और शिक्षा सिर्फ आर्थिक रूप से सशक्त लोगों के बीच ही सिमट कर रह गयी I
अंग्रेजों की नीतियां और ईसाई मिशनरियों के रणनीति के बीच 1920 में प्रोफ़ेसर डब्लू एस विग्रस ने ” दी चमार्स” नाम से एक पुस्तक लिखी और पुस्तक के माध्यम से चर्मकार जाति को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। यहां प्रश्न यह भी है कि अंग्रेजों के अनुसार उस वक्त भारत में विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं के उत्पीडन, अत्याचार, व्याभिचार, दमन और दलन के कारण मटर के दाने की तरह बनकर बिखरी हुई लगभग 6500 जातियां एवं पचास हजार से अधिक उपजातियां थी तो केवल चर्मकार जाति पर ही पुस्तक क्यों लिखी गयी थी ? इस पुस्तक का अध्ययन डॉ आंबेडकर ने भी किया था, लेकिन उनके मन में कभी भी ईसाई धर्म अपनाने की इच्छा नहीं उत्पन्न हुई I
ईसाई मिशनरियां, मुस्लिम और वामपंथी
भारत में हिन्दू धर्म को तोड़ने की साजिश में ईसाई मिशनरियां, मुस्लिम और वामपंथी तीनों ही एकजुट होकर वर्षों से काम करते आ रहे हैं I अंग्रेजी शासनकाल से लेकर स्वतन्त्र भारत में इतिहास को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने में वामपंथियों का सबसे बड़ा हाथ रहा। इतिहास के माध्यम से हिन्दू धर्म पर लगातार प्रश्न खड़े किये गए और हिन्दू धर्मावलम्बियों को मुस्लिम या ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। हिन्दू धर्म में दलित जाति नामक नए वर्ग को भी साजिश के तहत बनाकर उन्हें हिन्दू समाज से अलग-थलग करके योजनाबद्ध तरीके से उन्हें धर्म परिवर्तन करने के लिए उकसाया गया।
ईसाई मिशनरियां, कट्टरपंथी-जेहादी मुस्लिम और वामपंथी शहरी नक्सलीयों द्वारा हिन्दू धर्म को तोड़ने की साजिशों को स्वामी श्रद्धानंद ने बखूबी समझा था और फिर तब उन्होंने शुद्धि आंदोलन शुरू कर दिया था। 1920 के दशक में शुद्धि आन्दोलन का मूल लक्ष्य धर्म परिवर्तन करने वाले हिन्दुओं को वापस हिन्दू धर्म में लाना था। डॉ आंबेडकर ने 1922 में कहा था कि स्वामी श्रद्धानन्द अछूतों के “महानतम और सबसे सच्चे हितैषी” हैं। यह आंदोलन जब अपनी चरम अवस्था में था, तब एक कट्टरपंथी-जेहादी मुस्लिम युवक ने स्वामी श्रद्धानन्द की हत्या कर दी। यह हत्या कांड महात्मा गाँधी के हत्या जैसा ही था। यहां यह उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा कि स्वतंत्रता से पहले हिन्दू धर्म को तोड़ने के लिए ईसाई मिशनरियां और मुस्लिम लीग एकजुट होकर काम कर रहे थे तो स्वतंत्रता के बाद वामपंथी भी इसमें शामिल हो गए। भारत में जारी धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अन्य परिणाम उड़ीसा में हिन्दू स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और अब पालघर में कल्पवृक्षगिरि एवं सुशीलगिरि महाराज की निर्मम हत्या के रूप में देखा जा सकता है I
धर्मपरिवर्तन गिरोह की रणनीति
यह एक आश्चर्य का विषय है कि मुस्लिम राष्ट्रों में ईसाई धर्म के लोगों को हिकारत की दृष्टि से देखा जाता है और उनको वहां बहुत ही सीमित अधिकार पर ही मुस्लिम देश में रहने का आदेश मिलता है। इसके विपरीत भारत में ईसाई और मुस्लिम, दोनों मिलकर वर्षों से काम करते आ रहे हैं। कुछ ईसाई और मुस्लिम पंथ के मानने वाले भारत एवं हिन्दू विरोधी गतिविधियों में वामपंथीयों को अपना पूरा समर्थन देते आ रहे हैं। भारत की स्वतंत्रता के बाद से ईसाई और मुस्लिम धर्म के प्रचारक भारत के कोने-कोने तक जा पहुंचे है और उनके निशाने पर दलित वर्ग सबसे अधिक है।
दलितों का धर्म परिवर्तन कराने के लिए जय भीम-जय मीम जैसे छद्म नारों का सहारा लिया जा रहा हैI साथ ही इस काम में गैर सरकारी संगठन और ऐसे ईसाई भी तेजी से सक्रिय हैं, जिन्होंने अपना धर्म तो बदल लिया पर सार्वजनिक रूप से वह स्वयं को हिन्दू के रूप में प्रदर्शित करते हैं। ऐसे लोगों को क्रिप्टो (छिपे हुए) क्रिस्टियन या क्रिप्टो (छिपे हुए) मुस्लिम का नाम दिया गया है। इन सबकी सहायता हेतु वामपंथी नेता, कार्यकर्ता एवं वामपंथी संगठन भी सक्रिय होकर लगातार काम करते आ रहे हैं। दलितों से लेकर आदिवासियों के मध्य धर्मपरिवर्तन के इस खेल को कही सेवा कार्य के माध्यम से तो कहीं हिन्दू धर्म के प्रति घृणा भाव को पैदा करके और तो कहीं पर हिंदूवादी संगठनों के विरुद्ध दुष्प्रचार के रूप में किया जा रहा है I
मोदी सरकार बनते ही सभी विरोधी हुए एकजुट
2014 में मोदी सरकार बनाने के बाद भाजपा विरोधियों विशेषकर वामपंथियों के निशाने पर हिन्दू धर्म के साथ ही वह सभी हैं, जो हिन्दू धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ ही हिन्दू समाज में जागृति पैदा करने का काम वर्षों से करते आ रहे हैं। ईसाई मिशनरियां, कट्टरपंथी-जेहादी मुस्लिम और शहरी नक्सल वामपंथी अब तीनों एकजुट होकर हिन्दू धर्म, हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म के महापुरुषों, साधु, संन्तो के प्रति घृणा भाव उत्पन्न करने में तिब्रता से जुटे हुए हैं। भीमकोरे गांव में हिंसा के बाद शहरी क्षेत्र में रहने वाले ऐसे पढ़े-लिखे नक्सली सामने आए हैं, जो किसी भी तरह मोदी सरकार को गिराने से लेकर हिन्दू नेताओं की हत्या ही नहीं अपितु मोदी जी के हत्या की साजिश करने में पीछे नहीं हैं। यह सभी संघठित रूप से अपने प्रभावशाली तंत्र के माध्यम से जनता को भ्रमित करने का काम कर रहे हैं और इसके प्रमाण कई बार सामने भी आ चुके हैं। इन सभी का मकसद भारत को खंड-खंड करके अपने स्वार्थो और हितों को पूरा करना है। कश्मीर से लेकर केरल तक पूरा एक तंत्र इनकी मदद कर रहा है। इनमें राजनेता से लेकर अपराधी गिरोह तक शामिल हैं I
पाल घर में संतों की हत्या का प्रकरण यह खुलासा भी करता है कि आदिवासी क्षेत्र में रहने वाली भोली-भाली जनता के मध्य तथाकथित वामपंथी, ईसाई और मुस्लिम संस्थाए अपने-अपने ढंग से धर्म परिवर्तन करने के लिए काम कर रही हैं और उनकी गतिविधियों का विरोध करने वाले की हत्या कर देना इनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है I दलित समाज को भड़काने के लिए डॉ आंबेडकर का सहारा लिया जा रहा है और अनपढ़ लोगों के मध्य डॉ आंबेडकर की ऐसी तस्वीर प्रस्तुत की जा रही है, जिससे वह धर्म परिवर्तन करके हिन्दू धर्म को त्यागने के लिए आगे आ जाए। वामपंथी विचारधारा का शहरी नक्सली आयुष्मान आनंद तलन्तुवडे जो महाराष्ट्र के भीमा कोरेगाँव से लेकर देश-विदेश तक घुमकर लोगों को भ्रमित करने में लगा है, उसे उसी क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया। कुछ मूर्ख दलित नेता उसके बारे में कहतें हैं कि वह डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर के पोती से विवाह किया है। यदि ऐसा है तो बाबा साहेब के वंशजों को वामपंथीयों के गोद में बैठने के बजाय यह स्मरण कराना चाहिए कि डॉ अंबेडकर वामपंथीयों को घृणा करते थे। वैसे वामपंथी कम्यूनिस्टों की इतनी दयनीय हालत है कि वे अब अपनेआकावों मार्क्स और लेनिन का नहीं बल्कि डॉ अंबेडकर के पोस्टर को लेकर धरना और प्रदर्शन करते दिखाई पडते हैं।
बहरहाल यह घटना प्रेरित करती है कि भारत और हिन्दू धर्म को कट्टरपंथी-जेहादी मानसिकता के मुस्लिम तबलीगी मरकजों, सेवा के बहाने धर्म परिवर्तन कराने वाले क्रिश्चियन मिशनरीयों और गरीब अपढ़ लोगों को बहकाकर सत्ता का सपना देख रहे वामपंथीयों की देश विरोधी प्रवृत्ति को अब रोका जाए। साथ ही भारत की काली-रात्रि वाले उस इतिहास को जनता के सामने रखा जाए जो भारत का वास्तविक इतिहास है। साथ ही हिन्दू धर्म को तोड़ने अथवा धर्म परिवर्तन के जो प्रयास चल रहें हैं, उन्हें रोकने के लिए कठोर कदमों को उठाने के साथ ही सामान्य जनता को भी इसके विरुद्ध खड़ा होने के लिए जागृत किया जाए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह संकट लगातार बढ़ता रहेगा और इसका नकारात्मक परिणाम हिन्दू धर्म और भारत को भी भुगतना पड़ेगा I

कोरोनाः वियतनाम से सीखें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
क्या दुनिया में कोई ऐसा भी देश है, जहां कोरोना की वजह से अब तक एक भी आदमी मरा न हो ? जी हां, ऐसा एक देश है, जिसका नाम वियतनाम है। लगभग साढ़े नौ करोड़ की जनसंख्यावाला यह देश चीन का एकदम पड़ौसी है। यह साम्यवादी पार्टी द्वारा शासित देश है। इसके नेता हो ची मिन्ह की गिनती दुनिया के बड़े नेताओं में हुआ करती थी। यह देश सिंगापुर, ताइवान और द.कोरिया जैसा संपन्न देश नहीं है लेकिन उसने कोरोना को जैसी टक्कर दी है, वैसी कोई और देश उसे नहीं दे सका है। जनवरी से अभी तक इस देश में 270 मामले सामने आए हैं और उनमें से 220 ठीक हो चुके हैं। 50 लोगों का इलाज चल रहा है। वियतनाम से भी कम आबादीवाले और चीन से बहुत दूर बसनेवाले यूरोपीय देशों और अमेरिका में हजारों आदमी मर रहे हैं और लाखों लोग कोरोना के शिकार हो रहे हैं, ऐसी हालत में वियतनाम की जनता पर तालाबंदी नहीं थुपी हुई है और वहां सामान्य काम-काज यथावत चल रहा है।
इसका रहस्य क्या है ? वियतनाम में चीन से आए दो व्यक्तियों में 23 जनवरी को कोरोना के लक्षण पाए गए लेकिन सरकार ने 16 जनवरी को ही सारे देश को सावधान कर दिया था। वे लोग 13 जनवरी को राजधानी हो ची मिन्ह सिटी में आ गए थे। लगभग इसी समय हमारे केरल में भी कोरोना का एक मामला पकड़ा गया लेकिन हमारी सरकारें खर्राटे खींचती रहीं। केंद्र सरकार ने लगभग दो-ढाई माह बाद तालाबंदी की घोषणा की। यदि हमारी केंद्र और राज्य सरकारें जनवरी में ही सतर्क हो जातीं और विदेशों से आनेवालों पर कड़ी नज़र रखतीं तो भारत भी दुनिया के लिए एक मिसाल बन जाता। वियतनाम के पास न तो पर्याप्त जांच-यंत्र हैं, न सांस यंत्र हैं और न ही दवाइयां हैं लेकिन फिर भी उसने कोरोना पर काबू इसलिए कर लिया कि विदेश से आनेवाला कोई भी व्यक्ति या उसके संपर्क में आनेवाला व्यक्ति वहां तबलीगी जमात के लोगों की तरह छिपा नहीं रहा। कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर ऐसे लोगों को अस्पताल पहुंचा दिया। वियतनाम में एक-पार्टी शासन होने के बावजूद चीन की तरह इंटरनेट और मीडिया पर सरकारी शिकंजा नहीं है। सरकार ने गली-गली और घर-घर में पोस्टर लगाकर, रेडियो, टीवी और अखबारों में विज्ञापन देकर कोरोना को ‘राष्ट्रीय शत्रु’ घोषित कर दिया। कई शहरों, गांवों और मोहल्लों में थोड़े समय के लिए उसने जबर्दस्त तालाबंदी लागू जरुर की लेकिन पूरे वियतनाम को बंद नहीं किया। अब वह सहज जीवन की तरफ लौटता जा रहा है।

आज के भारत में कट्टरता की कोई जगह नहीं
डॉ नीलम महेंद्र
कोरोना के खिलाफ अपनी लड़ाई में भारत धीरे धीरे लेकिन मजबूती के साथ आगे बढ़ रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि देश में कोरोना मरीजों की संख्या में वृद्धि होने की गति कम हुई है। यह संख्या अब 7.5 दिनों में दुगुनी हो रही है। लेकिन इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि कोरोना से इस लड़ाई के दौरान निजामुद्दीन में तब्लीगी जमात का मारकज़ सबसे कमजोर कड़ी साबित हुआ। और शायद इसी वजह से यह संगठन जिसके नाम और गतिविधियों से अबतक देश के अधिकतर लोग अनजान थे आज उसका नाम और उसकी करतूतें देश की सुरक्षा एजेंसियों से लेकर आम आदमी की जुबां पर है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं निकाला जाए कि तब्लीगी जमात के अस्तित्व से दुनिया अनजान थी। विश्व के अनेक देशों की खुफिया एजेंसियों की नज़र काफी पहले से इन पर थीं। काफी पहले से ही इन पर विभिन्न देशों में होने वाली आतंकवादी गतिविधियों में परोक्ष रूप से शामिल होने के आरोप लगते रहे हैं। इस पर अल कायदा , हरकत उल मुजाहिदीन, तालिबान जैसे आतंकवादी संगठनों के लिए युवाओं को भर्ती करने के आरोप हैं। अमरीकी खुफिया एजेंसी स्ट्रेटफॉर ने जब 9/11 के हमले की जांच की थी तो इस जांच की आंच तब्लीगी जमात तक भी पहुंची थी। आश्चर्य की बात है कि विभिन्न आतंकवादी संगठनों को परोक्ष रूप से मदद करने के आरोपों के बावजूद इस जमात की जड़ें विश्व के लगभग 150 देशों तक फैली हैं।लेकिन उससे भी बड़ा आश्चर्य यह है कि सऊदी अरब और ईरान जैसे मुस्लिम मुल्कों में इसे प्रतिबंधित किए जाने के बावजूद भारत में इसकी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगना तो दूर की बात है बल्कि भारत की राजधानी दिल्ली के भीतर भारत सरकार की नाक के नीचे ही इसका अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय है। जब तक कानूनी रूप से यह सिध्द नहीं हो जाता कि तब्लीगी जमात के आतंकवादियों से किसी प्रकार के संबंध हैं या नहीं यह विवाद का विषय हो सकता है लेकिन कोरोना संकट के इस काल में तब्लीगी जमात के लोगों के विवादित आचरण पर तो किसी प्रकार की असहमति का प्रश्न ही नहीं उठता। चाहे वो सरकार के दिशा निर्देशों की धज्जियाँ उड़ाना हो, या स्वास्थ्य कर्मियों के साथ दुर्व्यवहार हो, पुलिस कर्मियों पर पथराव और हिंसा का तांडव हो या फिर जगह जगह थूकना अथवा ऐसे क्रिया कलाप करना जिससे यह बीमारी फैले। वैसे तब्लीगी जमात के मौलाना साद का वीडियो सामने आने के बाद तब्लीगी जमात के लोगों के इस आचरण पर ज्यादा आश्चर्य करने का औचित्य नहीं रह जाता लेकिन इंसानियत के दुश्मन ऐसे लोगों पर सरकार द्वारा कठोर कार्यवाही करने में राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी दिखाना अवश्य आश्चर्यजनक लगता है।
ऐसे संगठनों पर कार्यवाही ना कर पाने की सरकारों की अपनी अपनी मजबूरियाँ हो सकती हैं लेकिन इन्हीं मजबूरियों से समाज के भीतर से विद्रोह के स्वर भी उपजते हैं। तब्लीगी जमात के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। देश के मुस्लिम समाज के भीतर से ही जमात के विरोध में आवाजें उठने लगीं। बाबरी मस्जिद के पक्षकार रहे इकबाल अंसारी ने तब्लीगी जमात की गतिविधियों के चलते उनपर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने की मांग की है। वहीं शिया वक़्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिज़्वी का कहना है कि, “यह दुनिया की सबसे खतरनाक जमात है। यह मुसलमानों का ऐसा समूह है जो पूरी दुनिया में इस्लाम के प्रचार के नाम पर मुसलमान युवाओं को कट्टरपंथी बनाता है।”
इसी प्रकार अल्पसंख्यक कल्याण राज्यमंत्री मोहसिन रज़ा ने भी तब्लीगी जमात पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए कहा कि जमात ने देशविरोधी मानसिकता का प्रदर्शन किया है। जबकि बरेली की दरगाह आला हजरत ने सरकार से तब्लीगी जमात पर कानूनी कार्यवाही करने की मांग की। शिया धर्म गुरु भी तब्लीगी जमात पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। इतना ही नहीं फ़िल्म उद्योग से जुड़े विभिन्न मुस्लिम चेहरे जैसे अब्बास टायरवाला और सलमान खान भी जमातियों के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं और देश के हर मुसलमान को घर पर ही नमाज़ पढ़ने के साथ सोशल डिस्टनसिंग की सरकार के दिशा निर्देशों का पालन करने के लिए प्रोत्साहित भी कर रहे हैं। लेकिन अब रमजान के महीने और तब्लीगी जमात के इतिहास को देखते हुए पूर्व कांग्रेस नेता मौलाना आजाद के पौत्र फिरोज़ बख़्त जो कि मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्विद्यालय के कुलाधिपति भी हैं, उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर लॉक डाउन की तारीख 24 मई तक बढ़ाने की मांग करते हुए देश भर में मुसलमानों द्वारा स्वास्थ्य एवं पुलिस कर्मियों के साथ किए गए दुर्व्यवहार के लिए क्षमा भी मांगी।
इससे स्पष्ठ है कि तब्लीगी जमात इस देश के मुसलमान की पहचान नहीं है। क्योंकि तब्लीगीजमात का आतंकवाद कनेक्शन है या नहीं यह तो समय ही बताएगा लेकिन इतना तो साफ है कि कट्टरता को बढ़ावा देना उसका मकसद जरूर है। और जहाँ कट्टरता आती है वहाँ उदारता का आसमान छोटा हो जाता है, ज्ञान और विज्ञान के सभी दरवाजे बंद हो जाते हैं। सोच के साथ पहचान भी संकुचित हो जाती है। क्योंकि सोच ही विचार बनाती है, यह विचार ही शब्दों का रूप लेते हैं, यह शब्द हमारा व्यवहार बनते हैं हमारी आदतें बनती हैं। यही आदतें हमारा चरित्र बनाती हैं और अंत में यही चरित्र हमारी नियति। अतः यह समझना जरूरी है कि तब्लीगी जमात ने अपनी यह पहचान देशविरोधी गतिविधियों वाले चरित्र से स्वयं बनाई है और यह पहचान इस देश के हर मुसलमान की कदापि नहीं हो सकती। इस देश के मुसलमान की पहचान तो अशफाकउल्ला खान ,अब्दुल हमीद, अब्दुल कलाम आजाद बिस्मिल्लाह खान जैसे नाम हैं जिनके बिना हिदुस्तान वो नहीं होता जो वो आज है। इसलिए आज जब भारत आगे बढ़ रहा है और 21 वीं सदी की बातें कर रहा है, विश्व में एक मुकाम हासिल करने के ख्वाब देख रहा है तो वहाँ कट्टरता और संकीर्णता की कोई जगह नहीं हो सकती। आज मुस्लिम समाज ही नहीं देश को भी आवश्यकता है ऐसे पढ़े लिखे युवा मुस्लिम नेतृत्व की जो उदारवादी होने के साथ ही आधुनिक समय की परिस्थितियों से सामंजस्य बैठाते हुए सही मायनों में धर्मनिरपेक्ष रूप से इस्लाम का सही स्वरूप देश और दुनिया के सामने लाए।

कोरोनाः गरीबों की उपेक्षा
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कोरोना-संकट के कारण सबसे ज्यादा मुसीबत किसकी हुई है ? मैं समझता हूं कि सबसे ज्यादा मुसीबत हमारे गरीब लोग झेल रहे हैं। सच्चाई तो यह है कि कोरोना है ही अमीरों की बीमारी ! अमीर लोगों की ही हैसियत है कि वे विदेशों से आते हैं और विदेशों में जाते हैं। इस बीमारी का आयात उन्होंने ही किया है। वे भारत लौटकर जिन-जिन लोगों के संपर्क में आते हैं, उन्हें भी वे बीमार करते चले जाते हैं। क्या वजह है कि मुंबई, दिल्ली, जयपुर और इंदौर जैसे शहरों में कोरोना का प्रकोप सबसे ज्यादा है ? उसकी वजह यही है। लेकिन हमारी सरकार और हमारा रवैया क्या है ? गरीबों के प्रति हमारा रवैया मेहरबानी का है, कृपा का है, एहसान का है, दया का है। वरना क्या वजह है कि कोटा में फंसे हजारों प्रवासी छात्रों के लिए मप्र, उप्र, राजस्थान और हरयाणा जैसे प्रदेश विशेष बसें चला रहे हैं ताकि उन्हें उनके गांवों और शहरों तक निःशुल्क पहुंचाया जा सके। उनके खाने-पीने और सुरक्षा का भी सारा इंतजाम सरकारें कर रही हैं। केंद्र सरकार का गृह मंत्रालय भी गुपचुप देख रहा है। दूसरी तरफ देश के छोटे-बड़े शहरों की सीमाओं पर लाखों मजदूर, मजदूरनियां और उनके बच्चे हैं, जिनके घर पहुंचने का कोई इंतजाम नहीं है। लोग सैकड़ों मील पैदल या साइकिलों से अपने गांव पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। जो लोग फंसे हुए हैं, उनके खाने-पीने और रहने का इंतजाम सरकारें जमकर कर रही हैं लेकिन फिर भी उनमें गहरी छटपटाहट भड़की हुई है। वे अपने घर लौटने के लिए इस कदर बेताब हैं कि वे एक-एक ट्रक में 75-75 लोग छिप-छिपाकर सैकड़ों मील की यात्रा कर रहे हैं। एक-एक सवारी 2-2 हजार रु. दे रही है। ट्रक के ड्राइवर उनसे ऊपर का पैसा भी वसूल कर रहे हैं। ऐसे दो ट्रक कल गुड़गांव में पकड़े गए हैं। मैं तालाबंदी के पहले दिन से कह रहा हूं कि इन लाखों प्रवासी मजदूरों को अपने घर भेजने की व्यवस्था कीजिए। यदि ये लोग उसी समय चले जाते तो तालाबंदी खुलने पर ये लोग अपने आप लौट आते। वे लोग गांवों में रहते हुए ऊब जाते। अब 3 मई के बाद वे लौटेंगे या नहीं, कुछ पता नहीं। कोटा से लौटनेवाले छात्रों में अभी तक एक भी कोरोना का रोगी नहीं निकला तो ये सब मजदूर कोरोना के संभावित रोगी क्यों मान लिए गए हैं ? क्योंकि ये गरीब हैं, बेजुबान हैं, गांवदी हैं जबकि कोटा के छात्र संपन्न वर्ग के हैं, लंबी जुबानवाले हैं और शहरी हैं। यही फर्क हमें अमेरिका में भी देखने को मिल रहा हे। वहां काले-अफ्रीकी, लातीनी और एशियाई मूल के नागरिकों को काफी उपेक्षा हो रही है।
गरीबों और अमीरों के लिए भारत में दोहरे कानून?
सनत जैन
भारतीय संविधान में न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका का अलग अलग दायित्व है। मीडिया को स्वतंत्र रखा गया था। वह जनता का प्रतिनिधित्व करें। इसके लिए उसे कोई अधिकार संविधान ने नहीं दिए। केवल इतना अधिकार दिया, कि वह अपनी बात स्वतंत्रता से लिख सकता है, बोल सकता है। उसकी आवाज को जनता जनार्दन की आवाज माना जाएगा। पिछले कुछ समय से कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका की कार्यप्रणाली को देखें, तो ऐसा लगता है, कि देश में जो भी हो रहा है। वह सब कार्यपालिका कर रही है। इसमें न्यायपालिका की भूमिका सरकार द्वारा किए गए कार्यों में अपनी सहमति प्रकट करना अथवा सरकार की सुविधानुसार निर्णय को टालना है। इसी तरह विधायिका भी बड़े से बड़े मुद्दे में संसद और विधानसभाओं में कार्यपालिका के इशारे पर जितना बोलने की अनुमति दी जाती है। उतना ही सांसद और विधायक बोल पाते है। मीडिया की स्थिति भी कुछ इसी तरह की बन गई है। कार्यपालिका जो निर्देश देती है, मीडिया भी उसका अक्षरस पालन करना मजबूरी है। जिसके कारण देश में पहली बार कार्यपालिका की सर्वोच्चता देखने को मिल रही है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जब पदभार गृहण कर रहे थे। तब उन्होंने सरकार के साथ सहयोग करने की बात कही थी। लोकसभा, राज्यसभा तथा विधानसभाओं में सत्ताधारी दल के सदस्य ही अध्यक्ष निर्वाचित होते हैं। वह भी सरकार के कामकाज को सुगम बनाने का काम कर रहे हैं। संसद और विधानसभाओं में सदस्यों को 1 मिनट 2 मिनट 5 मिनट में बड़े से बड़े मुद्दों पर अपनी बात कहनी होती है। संसद और विधानसभा के सत्रों की अवधि लगातार कम होती जा रही है। विवादास्पद मामलों में सत्ता पक्ष भी विपक्ष की तरह हंगामा करने का कोई मौका नहीं छोड़ता है। जिसके कारण संसद और विधानसभाओं में भी कानूनों और नियमों को लेकर जैसा विचार विमर्श होना चाहिए, वैसा नहीं हो पाता है। जल्दबाजी एवं हंगामे के बीच में बिना किसी चर्चा के कार्यपालिका अपनी सुविधानुसार नियम कायदे कानून बनवाकर लागू कर देती है। जिसके कारण भारत जैसे देश में दूरगामी परिणामों को देखते हुए जिस तरह के निर्णय अथवा कानून विधायिका को बनाने चाहिए थे, वैसे कानून नहीं बन पा रहे है। अब तो न्यायपालिका भी सरकार की मंशा को देखते हुए मामलों की सुनवाई कर रही है। हाल ही में वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने लिखा है, इस समय अदालतों को किसी भी हाल में कार्यपालिका को कार्य करने से नहीं रोकना चाहिए। उन्होंने तो यहां तक लिखा है, कि ब्रिटेन में जिस तरह कार्यपालिका को असीमित अधिकार मिला हुआ है। वैसा ही भारत में होना चाहिए। कोरोनावायरस के संक्रमण और आर्थिक आपदा को देखते हुए साल्वे का यह कथन काफी महत्वपूर्ण है। वहीं पिछले दिनों वरिष्ठ वकील दुष्यंत दुबे ने लिखा है कि यह कैसा समय है। जब विधायिका और न्यायपालिका दोनों का काम लगता है, स्थगित हो गया है। सभी काम की जवाबदारी केवल कार्यपालिका निभा रही है।
पिछले वर्षों में जिस तरह से न्यायपालिका तथा विधायिका में कार्यपालिका का हस्तक्षेप बढ़ा है। सारी संवैधानिक संस्थाओं में कार्यपालिका का हस्तक्षेप प्रत्यक्ष देखने को मिल रहा है। हर संवैधानिक संस्थान कार्यपालिका के प्रत्येक निर्णय और कार्यों को आगे बढ़ाने में उसका सहयोग कर रहा है। उससे लगता है कि प्रधानमंत्री के रूप में जो फैसला नरेंद्र मोदी जी लेते हैं। तीनों स्तंभ उसका पुरजोर समर्थन करने में लग जाते हैं। चौथा स्तंभ मीडिया भी अब इस मामले में पीछे नहीं रहा। भारत में सबसे ज्यादा भरोसा लोगों को न्यायपालिका के ऊपर था। न्यायपालिका संविधान को दृष्टिगत रखते हुए सरकार के बनाए हुए कानूनों नियमों के अनुसार लोगों के मौलिक अधिकार की समीक्षा करके स्वतंत्र निर्णय करती थी। उसे सारे लोग स्वीकार करते थे। पिछले कई वर्षों से सुप्रीमकोर्ट, हाईकोर्ट, चुनाव आयोग, सीबीआई जैसी संस्थाएं, लोकसभा, राज्यसभा के कामकाज है। सरकार का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप एवं प्रभाव देखने को मिल रहा है। न्यायपालिका भी सरकार के किसी भी निर्णय पर उसकी संवैधानिक समीक्षा कर अवरोध बनना नहीं चाहती है। जिसके कारण पिछले वर्षों में अथवा पिछले माहों में न्यायपालिका ने जिस तरीके से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के साथ सहयोग किया है। उसको लेकर अब यह कहा जाने लगा है, कि भारत में कार्यपालिका ही सर्वोच्च है। न्यायपालिका और विधायिका कार्यपालिका के सामने बोने हैं। जिसके कारण भारत में अब जो है, वह सरकार ही है।
कोरोनावायरस संक्रमण के बाद जिस तरह की स्थितियां देश में देखने को मिल रही हैं। उसमें गरीब और अमीर की लड़ाई भी अब सामने दिखने लगी है। सरकार ने विदेशों से लोगों को भारत बुलाया उनके लिए सारे इंतजाम किए। क्योंकि यह विशिष्ट वर्ग था। गरीबों के मामले में सरकार की सोच अलग है। गरीबों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोनावायरस के संक्रमण को देखते हुए जब लॉकडाउन की घोषणा की। तो केवल 4 घंटे का समय गरीबों को दिया। जिसके कारण करोड़ों मजदूर और गरीब जो अपना घर छोड़कर विभिन्न राज्यों में रोजी रोजगार और नौकरी के लिए गए थे। वह वहीं फंसे रह गए। उनके पास रहने के लिए छत भी नहीं है। लॉकडाउन के कारण सब काम धंधे बंद हो गए है। बाहर भी नहीं निकल पा रहे हैं। ना वह पैदल जा पा रहे हैं। ना उनके लिए सरकार ने ट्रेन और बस का प्रबंध किया। जगह जगह पर उन्हें रोकने के लिए जो क्वॉरेंटाइन सेंटर बनाए गए। उनमें कोई सुविधाएं नहीं है। वहां पर फिजिकल डिस्टेंस का भी पालन नहीं हो पा रहा है। उन्हें खाना भी नहीं मिल पा रहा है। इसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट और अन्य संस्थाएं उनकी व्यथा सुनने के लिए तैयार नहीं है। स्थिति यह बन गई है कि अब लोग कहने लगे हैं की जेल भेज देते, तो वहां कम से कम दो टाइम का भोजन और रहने के लिए छत तो मिलती। लेकिन क्वॉरेंटाइन सेंटर मैं जिस तरह से लोगों को बंद करके रखा है। उससे तो अच्छे कांजी हाउस हैं। जहां पर पशुओं को रखा जाता है। 1 महीने से अधिक समय हो गया। रोज कमाने खाने वाले मजदूर और कामगार आज अपने छोटे -छोटे बच्चों के साथ यहां से वहां भटक रहे हैं। खाना नहीं मिल रहा है। सरकार उनकी बात नहीं सुन रही है। विधायिका मौन साधे हुए बैठी हैं। न्यायपालिका चुप है। वह कह रही है, ऐसे समय पर हमें सरकार का सहयोग करना है। लेकिन गरीबों को सहयोग कौन करेगा। इसको लेकर कोई सोच नहीं है। जगह-जगह पर अब यह गरीब निकलकर, अपना विरोध प्रदर्शन कर रहा है। उसे अभी भी लगता है, कि सरकार और न्यायपालिका उसकी बात सुनेगी। उसे घर भेजने की व्यवस्था करेगी। क्वॉरेंटाइन सेंटर्स की हालत सुधरेगी। अस्पतालों में इलाज मिलेगा। लेकिन अब उसका यह भरोसा भी धीरे-धीरे टूटता चला जा रहा है। कहा जाता है, भूख से बड़ी कोई आग नहीं होती है। आज देश में करोड़ों लोग लॉकडाउन लागू होने के बाद बच्चों को दो टाइम का भोजन नहीं दे पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में अब गरीबी और अमीरी के बीच में जो खाई बनकर सामने आई है। आगे चलकर इसके बड़े दुष्पिरिणाम देखने को मिल सकते हैं।

कोरोनाः कांग्रेस को हुआ क्या है ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कांग्रेस-अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 7 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर पांच सुझाव दिए थे, उनमें से ज्यादातर बहुत अच्छे थे। मैंने उनका समर्थन किया था लेकिन आज कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में उन्होंने जो कुछ बोला है, वह कांग्रेस-जैसी महान पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए शोभा नहीं देता। उनके बयान से ऐसा नहीं लगता कि वे कोरोना-युद्ध में भारत की जनता के साथ हैं, हालांकि उन्होंने आम लोगों को सरकार द्वारा साढ़े सात हजार रु. देने की मांग की है। वे कोरोना से लड़ने की बजाय सरकार से लड़ने पर उतारु हो गई हैं। पता नहीं, किसने उनके दिमाग में यह बात भर दी है कि भाजपा कोरोना के संकट को सांप्रदायिक रुप दे रही है। क्या सोनियाजी के पास अपनी बात सिद्ध करने के लिए कोई प्रमाण है ? जबसे तबलीगी जमात के निजामुद्दीन-जमावड़े का मामला तूल पकड़ा है, मैं कई बार अपने लेखों में लिख चुका हूं और टीवी चैनलों पर बोल चुका हूं कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं ने तबलीगियों की लापरवाही और मूर्खता को भुनाने की कोई कोशिश नहीं की। उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ एक शब्द तक नहीं बोला। यों भी आम मुसलमान तो बिल्कुल निर्दोष है। उसका तबलीगी जमावड़े से क्या लेना-देना ? कुछ गुमराह और नादान मुसलमान गलतफहमी और अफवाहों के शिकार होकर डाॅक्टरों, नर्सों और पुलिसवालों के साथ मार-पीट और गाली-गलौज जरुर कर रहे हैं लेकिन सरकार और भाजपा नेताओं ने बार-बार कहा है कि इस मामले को सांप्रदायिक रुप देना उचित नहीं है। ऐसी नादानी कोई भी कर सकता है जैसे कि महाराष्ट्र के पालघर में दो हिंदू साधुओं और एक ड्राइवर की भीड़ ने हत्या कर दी। क्या वह भीड़ मुसलमानों की थी ? नहीं, वह गुमराह हिंदुओं की थी। भाजपा पर सांप्रदायिकता का आरोप लगाकर सोनिया गांधी ने अपना और अपनी पार्टी का ही नुकसान किया है। देश के बहुसंख्यक लोग और समझदार मुसलमान लोग कांग्रेस के रवैए पर हैरान हैं। इस समय हमें एकजुट होकर इस कोरोना राक्षस से लड़ना है या वोट बैंक की राजनीति करना है ? भाजपा सरकार ने डाक्टरों पर हमला करनेवालों के खिलाफ जो सख्त अध्यादेश जारी किया है, क्या वह सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ है ? वह हर नागरिक पर लागू होगा, वह हिंदू हो या मुसलमान ? स्वयं नरेंद्र मोदी ने कल ट्वीट किया था कि कोरोना न जाति, न मजहब, न हैसियत का भेद करता है लेकिन कांग्रेस पार्टी क्या इतनी निराशा में डूब गई है कि वह मजहबी राजनीति पर आ टिकी है ? कोरोना के जांच-यंत्रों की कमी और आर्थिक-संकट आदि पर कांग्रेस के सुझाव उचित हैं लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष का क्या यह कर्तव्य नहीं बनता कि वे अपने लाखों कार्यकर्ताओं को गरीबों की सेवा में जुटा दें। माना कि सोनियाजी वयोवृद्ध हैं लेकिन राहुल को क्या हुआ है ? घर में बैठकर आप पत्रकार-परिषद कर रहे हैं। मैदान में निकलकर लोगों की सेवा क्यों नहीं करते ?

रिजर्व बैंक भी आर्थिक संकट में
सनत जैन
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भी भारी आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि रिजर्व बैंक धीरे-धीरे कंगाल होने की स्थिति में आ रहा है। रिजर्व बैंक पर अप्रत्यक्ष रूप से सरकार का नियंत्रण बढ जाने के कारण रिजर्व बैंक की आर्थिक स्थिति अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के हिसाब से बड़ी तेजी के साथ बिगड़ रही है। वर्तमान सरकार पिछले कई वर्षों से रिजर्व बैंक से सरप्लस एकाउंट से काफी बड़ी धनराशि निकाल चुकी है। वहीं डूबती हुई अर्थव्यवस्था और बैंकों को दिवालियापन से बचाने के लिए रिजर्व बैंक ने काफी बड़ी राशि कोष से निकालकर बैंकों और सरकारों को दी है। रिजर्व बैंक ने हाल ही में केंद्र सरकार के लिए कर्ज की लिमिट 75000 करोड़ से बढ़ाकर 1 अप्रैल 2020 को 1 लाख 20 हजार करोड़ की थी। कुछ दिन बाद ही 2 लाख करोड़ की सीमा निर्धारित कर दी है। इसका मतलब है कि सरकार रिजर्व बैंक से स्वीकृत मानदंडों से अधिक राशि लेती जा रही है। बैंकों को दिवालियापन से बचाने के लिए 6 लाख करोड़ रुपए रिजर्व बैंक से बैंकों के लिए निकाला गया है। रिजर्व बैंक में, बैंकों के डिपॉजिट कम हो रहे हैं। 10 अप्रैल 2020 को 24 लाख 86 हजार के नोट प्रचलन में थे। रिजर्व बैंक के पास डिपॉजिट 40000 करोड़ का है। बैंकर्स का 4 लाख 35745 करोड़ रिजर्व बैंक में जमा है। मौजूदा आर्थिक संकट से निपटने के लिए रिजर्व बैंक को कम से कम 10 लाख करोड़ आपात निधि का कोष बनाने की आवश्यकता है। किंतु रिजर्व बैंक के पास अब यह तरलता नहीं बची है। सरकार को आर्थिक संकट से निपटने के लिए लगभग 20 लाख करोड रुपए की अतिरिक्त जुटाना पडेंगे। अन्यथा भारत की अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर लाना मुश्किल होगा।
रिजर्व बैंक के पास फॉरेन एक्सचेंज में 36 लाख 30737 करोड रुपए, 10 अप्रैल की स्थिति में जमा थे। अंतरराष्ट्रीय मानक के अनुसार 24 लाख 86 हजार करोड़ की करेंसी प्रचलन में है। इसके अलावा बैंकर्स और अन्य डिपॉजिट को देखते हुए रिजर्व बैंक के पास करेंसी गोल्ड और एसेट के रूप में निर्धारित मानदंड के अनुरुप सुरक्षित होना चाहिए। रिजर्व बैंक की स्थिति दिनों दिन इस मामले में कमजोर होती जा रही है। पिछले 4 सालों में केंद्र सरकार ने सरप्लस फंड से काफी राशि निकाल ली है। आर्थिक विकास की दर बड़ी तेजी के साथ घट रही है। केंद्र सरकार के ऊपर सब्सिडी, महंगाई भत्ता, वेतन, पेंशन, लोकलुभावन योजनाओं की देनदारी है। केंद्र सरकार की आय निरंतर कम हो रही है। राजकोषीय घाटा बढ़ेगा, ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक को आर्थिक संतुलन बनाना और अंतर्राष्ट्रीय मानक के अनुसार रिजर्व बैंक की स्थिति को बनाए रखना, बड़ा मुश्किल हो रहा है। रिजर्व बैंक में प्रचलित नोट का 50 फ़ीसदी हिस्सा गोल्ड और करेंसी के रूप में रिजर्व बैंक के पास सुरक्षित होना चाहिए। रिजर्व बैंक के पास अभी 566 टन सोना है, इसके बाद भी सारे आर्थिक समीकरण रिजर्व बैंक के गड़बडाते जा रहे हैं। सरकार के दबाव में रिजर्व बैंक ने 2014-15 तक जो नियम बने हुए थे। उनमें लगातार परिवर्तन किए। जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिजर्व बैंक की साख भी कम हो रही है।
आर्थिक मंदी, कोरोनावायरस के संक्रमण, लॉक डाउन के कारण केंद्र सरकार के ऊपर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। मीडिया जो सरकार की इमेज बनाता है। लगभग 1800 करोड़ रुपए का भुगतान विभिन्न मंत्रालय और विभिन्न विभागों द्वारा नहीं किया गया है। यह भुगतान पिछले 4 साल से लंबित होता जा रहा है। विनिवेश के लिए जिन कंपनियों को लाया गया था। उनका विनिवेश नहीं हो पाया। सरकार ने वीआरएस लेने वाले अधिकारियों कर्मचारियों को अभी तक भुगतान नहीं किया है। राज्य सरकारों को भी योजनाओं और जीएसटी के रूप में केंद्र सरकार को काफी बड़ी राशि देना है, जो कई माह से लंबित है। लॉक डाउन के कारण पिछले एक माह से सारी आर्थिक गतिविधियां बंद है। पिछले एक माह से बैंकों से बड़ी तेजी के साथ पैसा निकल रहा है, लेकिन कहीं से पैसा जमा नहीं हो रहा है। जिसके कारण रिजर्व बैंक और भारत सरकार को आर्थिक विसंगतियों का सामना करना पड़ रहा है। कच्चे तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में घटने के कारण फॉरेन एक्सचेंज की स्थिति बेहतर है। राज्य सरकारों की आर्थिक स्थिति भी काफी खराब है। एक दर्जन से अधिक राज्य हर माह बाजार से कर्ज उठा रहे हैं। रिजर्व बैंक ने राज्यों की उधार सीमा बढा दी है। इसके बाद भी सरकार से आर्थिक पैकेज के रूप में जिस तरह से रिजर्व बैंक की ढाल बना रही है। यह आगे चलकर रिजर्व बैंक और सरकार दोनों को परेशानी में डाल सकती हैं। विभिन्न अर्थशास्त्री इस मामले में अपनी चिंता जता चुके हैं। कोरोना वायरस के संक्रमण से सारी दुनिया के देशों की आर्थिक स्थिति खराब है। जिसके कारण आयात-निर्यात में भी विपरीत स्थितियॉं बनेंगी। सरकार को समय रहते इस दिशा में गंभीरता से निर्णय लेना होगा। खर्च कम करने होंगे। वित्तीय अनुशासन केन्द्र एवं राज्यों को रखना होगा।

कोरोनाः भारत की छवि ऊंची उठी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कई लोगों ने मुझसे पूछा है कि कोरोना-संकट का भारत की विदेश नीति पर क्या असर पड़ा है, आप बताइए। असलियत तो यह है कि कोरोना का युद्ध इतना गंभीर है कि यह पूरा पिछला एक महिना हम सब लोग अंदरुनी सवालों से ही जूझते रहे। फिर भी यह तो मानना पड़ेगा कि इस कोरोना-संकट के दौरान भारत की विश्व-छवि बेहतर ही हुई है। पहली बात तो यह हुई कि इस संकट के दौरान सारा भारत एक होकर लड़ रहा है। भारत के पक्ष और विपक्ष का रवैया वैसा नहीं है, जैसा अमेरिका, ब्रिटेन, पाकिस्तान और ब्राजील जैसे देशों में देखने में आ रहा है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सभी दलों के मुख्यमंत्री पूरी तरह साथ दे रहे हैं। दूसरा, भारत की जनता तालाबंदी का पालन जिस निष्ठा के साथ कर रही है, वह दूसरे देशों के लिए एक मिसाल बन गई है। विश्व स्वास्थ्य-संगठन ने स्पष्ट शब्दों में भारत की तारीफ की है। तीसरा, भारत ने कोरोना के जांच-यंत्र और करोड़ों मुखपट्टियां तैयार कर ली हैं। भारत से कुनैन की करोड़ों गोलियां अमेरिका समेत 55 देशों ने आग्रहपूर्वक मंगवाई हैं। एक अर्थ में भारत को पहली बार विश्व-त्राता का विहंगम रुप मिला है। चौथा, भारत सरकार ने हजारों प्रवासियों को विदेशों से भारत लौटाने में जो मुस्तैदी दिखाई है, उसकी भी सराहना हो रही है। पांचवा, दुनिया को आश्चर्य है कि 140 करोड़ लोगों के इस विकासमान राष्ट्र में कोरोना का प्रकोप इतना कम क्यों हो रहा है ? सारी दुनिया में यह चर्चा का विषय है। छठा, भारतीय भोजन में पड़नेवाले मसालें घरेलू औषधियों का काम कर रहे हैं। विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय भी इसीलिए कोरोना के शिकार कम हो रहे हैं। आयुर्वेद का डंका सारे विश्व में बज रहा है। सातवां, भारत ने दक्षेस राष्ट्रों को कोरोना के खिलाफ सावधान करने की पहल की और दक्षेस-कोष में बड़ी राशि दान की। प्रधानमंत्री दक्षेस-राष्ट्रों के नेताओं से निरंतर संपर्क में है। पड़ौसी देशों पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ रहा है। आठवां, जमाते-तबलीगी के कारण कोरोना को जबरन हिंदू-मुस्लिम रुप दिया जा रहा है लेकिन सरकार ने उसे ज़रा भी प्रोत्साहित नहीं किया है। तबलीग के सरगना मौलाना साद को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है। लेकिन साधारण मुसलमान मजदूरों, दुकानदारों और साग-सब्जीवालों के साथ जो दूरियां बनाई जा रही हैं, उसकी आलोचना पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन कर रहे हैं लेकिन वे यह क्यों नहीं देख रहे हैं कि मुसलमानों को इतना गुमराह कर दिया गया है कि वे उनका इलाज करनेवाले डाॅक्टरों और नर्सों को मार रहे हैं। नौवां, दुनिया का कोई भी देश कोरोना को लेकर भारत पर वैसे आरोप नहीं लगा रहा है, जैसे चीन और अमेरिका पर लग रहे हैं। दसवां, भारत सरकार ने चीन जैसे देशों के विनियोग पर कई प्रतिबंध लगा दिए हैं ताकि वे भारतीय कंपनियों पर कब्जा न कर सके। ग्यारहवां, विश्व-व्यापार में चीन को जो धक्का लगनेवाला है, उसका फायदा भारत को जरुर मिलेगा। कुल मिलाकर कोरोना के संकट के दौरान विश्व में भारत की छवि ऊंची उठी है।

पानी के भाव तेल
सिध्दार्थ शंकर
कोरोना की मार से कच्चे तेल के दाम में ऐतिहासिक गिरावट आई है। अमेरिका में कच्चे तेल की कीमत बोतलबंद पानी से कम यानी लगभग 77 पैसे प्रति लीटर हो गई। अंतरराष्ट्रीय बजार में अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट कच्चे तेल का भाव गिरते-गिरते लगभग शून्य तक पहुंच गया। साल की शुरुआत में कच्चा तेल 67 डॉलर प्रति बैरल यानी 30.08 रुपए प्रति लीटर था वहीं 12 मार्च को जब भारत में कोरोना के मामले की शुरुआत हुई तो कच्चे तेल की कीमत 38 डॉलर प्रति बैरल यानी 17.79 रुपए प्रति लीटर हो गई। वहीं एक अप्रैल को कच्चे तेल की कीमत गिरकर 23 डॉलर प्रति बैरल यानी प्रति लीटर 11 रुपए पर आ गई। इसके बावजूद दिल्ली में एक अप्रैल को पेट्रोल का बेस प्राइस 27 रुपए 96 पैसे तय किया गया, इसमें 22 रुपए 98 पैसे की एक्साइज ड्यूटी लगाई गई। 3 रुपए 55 पैसा डीलर का कमीशन जुड़ गया और फिर 14 रुपए 79 पैसे का वैट भी जोड़ दिया गया। अब एक लीटर पेट्रोल की कीमत 69 रुपए 28 पैसे हो गई।
तेल के दाम में गिरावट की बड़ी वजह मई महीने में तेल का करार निगेटिव होना है। मतलब यह कि खरीदार तेल लेने से इंकार कर रहे हैं। खरीदार कह रहे हैं कि तेल की अभी जरूरत नहीं, बाद में लेंगे, अभी अपने पास रखो। वहीं, उत्पादन इतना हो गया है कि अब तेल रखने की जगह नहीं बची है। यह सब कुछ कोरोना की महामारी की वजह से हुआ है। गाडिय़ों का चलना लगभग बंद है। कामकाज और कारोबार बंद होने की वजह से तेल की खपत और उसकी मांग भी कमी आई है। कनाडा में तो तेल के कुछ उत्पादों की कीमत माइनस में चली गई है। 20 अप्रैल को न्यूयार्क ऑयल मार्केट में कोहराम देखने को मिला यहां तेल की कीमतें इतनी गिरी की कच्चा तेल बोतलबंद पानी से भी सस्ता हो गया। यहां पर यूएस बेंचमार्क में रिकॉर्ड गिरावट हुई और मई के लिए सप्लाई की जाने वाली तेल की कीमतें एक समय गिरकर 1.50 डॉलर प्रति बैरल हो गई। यह कच्चे तेल की कीमतों में एक दिन में 90 फीसदी की गिरावट थी।
कच्चे तेल की कीमतें माइनस में जाने का यह मतलब नहीं है कि आज या कल से ही तेल सस्ता हो गया है। दरअसल मई महीने में कच्चे तेल की सप्लाई के लिए जो ठेके दिए जाते हैं वो अब निगेटिव में चला गया है। तेल विक्रेता दुनिया के देशों से तेल खरीदने के लिए कह रहे हैं लेकिन तेल खर्च करने वाले देशों को इसकी जरूरत नहीं है, क्योंकि उनकी अरबों की आबादी घरों में बैठी है लिहाजा वे तेल नहीं खरीद रहे हैं। उनका तेल भंडार भरा हुआ है, पुराना तेल खर्च न होने से उनके पास नया तेल स्टोर करने के लिए जगह नहीं है।
भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है। खपत का 85 फीसदी हिस्सा भारत आयात के जरिए पूरा करता है। इसलिए जब भी क्रूड सस्ता होता है, तो भारत को इसका फायदा होता है। तेल सस्ता होने की स्थिति में आयात में कमी नहीं पड़ती लेकिन भारत का बैलेंस ऑफ ट्रेड कम होता है। इससे रुपए को फायदा होता है क्योंकि डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए में मजबूती आती है, जिससे महंगाई भी काबू में आ जाती है। सस्ते कच्चे तेल से घरेलू बाजार में भी इसकी कीमतें कम रहेंगी। भारत की निर्भरता ब्रेंट क्रूड की सप्लाई पर है, न कि डब्लूटीआई की। ब्रेंट का दाम अब भी 20 डॉलर के ऊपर बना हुआ है। गिरावट सिर्फ डब्लूटीआई के मई वायदा में दिखाई दी, जून वायदा अब भी 20 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर है। लिहाजा भारत पर अमेरिकी क्रूड के नेगेटिव होने का खास असर नहीं होगा।
जब भी कच्चे तेल के भाव में जब एक डॉलर की कमी आती है तो भारत के आयात बिल में करीब 29000 करोड़ डॉलर की कमी आती है। यानी 10 डॉलर की कमी आने से 2 लाख 90 हजार डॉलर की बचत। सरकार को इतनी बचत होगी तो जाहिर है पेट्रोल-डीजल और अन्य फ्यूल के दाम पर असर पड़ेगा।

दुनिया के विकसित देश दिवालिया होने की कगार पर?
सनत जैन
आईएमएफ (इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड) की जो नई रिपोर्ट आई है उसके अनुसार पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था माइनस 3 वार्षिक की रफ्तार से आगे बढ़ेगी। वैश्विक स्तर पर जीडीपी में गिरावट आएगी। वर्तमान में विश्व की विकास दर 2.9 फ़ीसदी आगे बढ़ रही थी। जो अब 3 फ़ीसदी माइनस में चली जाएगी। अमेरिका की विकास दर माइनस 5.9 जर्मनी की – 7 फ्रांस की, 7.2 इटली की – 9.1 ब्राजील – 5.3 दक्षिण अफ्रीका – 5.8 की विकास दर होगी उसकी तुलना में भारत की अर्थव्यवस्था 1.9 फ़ीसदी तथा चीन की अर्थव्यवस्था 1.2 फ़ीसदी की दर से आगे बढ़ेगी सारी दुनिया के देशों में 1930 के बाद सबसे बड़ी आर्थिक मंदी के हालात बन गए हैं विकसित देशों के ऊपर आर्थिक भार बहुत ज्यादा बढ़ गया है कर्ज और राजकोषीय घाटा ज्यादा होने से कोरोनावायरस का जो संकट सामने आया है उसके बाद वैश्विक मंदी की सबसे खराब चपेट में विकसित राष्ट्र आ रहे हैं आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका जर्मनी फ्रांस इटली ब्राजील जैसे दर्जनों देश आर्थिक रूप से दिवालियापन की कगार पर खड़े हो गए हैं कोरोनावायरस के कारण यह लॉक डाउन कुछ माह और चला तो आर्थिक दिवालियापन से विकसित राष्ट्र भी नहीं बच पाएंगे आर्थिक मंदी तथा बेरोजगारी के कारण सारी दुनिया के देश 90 साल बाद आर्थिक बदहाली का सामना करेंगे। वर्तमान में लगभग सभी देशों की सरकारों के ऊपर संस्थाओं और व्यक्तियों के ऊपर भारी कर्ज है। यह पहली बार हुआ है। जब सभी अर्थव्यवस्था कर्ज के बोझ से दबी हुई हैं। जिसके कारण दिवालिया होने जैसी स्थितियां लगभग सभी देशों में बड़ी तेजी के साथ बन रही हैं। 2008 की आर्थिक मंदी में अमेरिका के सैकड़ों बैंक और नगरीय संस्थाएं दिवालिया हो गई थी ।2020 में अब ऐसी ही स्थिति कई देशों की बन गई है। अमेरिका सहित तेल उत्पादक देशों की कमाई तेजी से कम हुई है। वहीं सभी देशों के आर्थिक मंदी के इस दौर में खर्च बढ़ें हैं। जिसके कारण सरकारों का राजकोषीय घाटा बड़ी तेजी के साथ बढ़ रहा है। सरकारें भी कर्ज का भुगतान करने की स्थिति में नहीं रहेगी।
चीन ने 1992 के बाद से विकास दर के आंकड़े देना शुरू किए थे। चीन में पिछली तिमाही में 6 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। 1992 के बाद चीन के लिए यह सबसे बड़ी गिरावट है। नवंबर माह से चीन में कोरोनावायरस का संक्रमण फैल गया था। उसके बाद लगभग 4 महीने तक चीन के विभिन्न प्रांतों में लॉकडाउन की स्थिति बनी रही। जिसके फलस्वरूप चीन की आर्थिक विकास दर बड़ी तेजी के साथ गिरी। अप्रैल माह में चीन ने फिर अपनी औद्योगिक एवं व्यापारिक गतिविधियां शुरू कर दी हैं। जिसके कारण यह माना जा रहा है कि वर्ष 2020 में चीन की आर्थिक विकास दर 1.2 फ़ीसदी होगी। भारत में भी आर्थिक संकट बड़ी तेजी के साथ बढ़ रहा है। सरकार ने अपने खर्चों में कटौती शुरू कर दी है। सीएसआर फंड, सांसद निधि, एवं अन्य फंड को सरकार सीधे अपने कोष में लाने के प्रावधान करना शुरू कर दिया हैं। अमेरिका ने भी बड़े पैमाने पर आर्थिक स्थिति से निपटने के लिए बेरोजगारों और औद्योगिक संगठनों को आर्थिक पैकेज दिया है। भारत में अभी तक जो पैकेज दिया है। वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। भारत सरकार,राज्य सरकारों तथा नगरीय निकायों के ऊपर पिछले 15 वर्षों में कर्ज़ काफी बढा है। भारत में टेक्स्ट का कलेक्शन लक्ष्य से इस साल कम हुआ है। लॉक डाउन के कारण 40 दिनों में लगभग 12 लाख का नुकसान होने की बात कही जा रही है। किसानों एवं व्यापारियों को मार्च एवं अप्रैल माह में लाख डाउन के कारण अरबों रुपए का नुकसान हुआ है। भारत की सारी गतिविधियां पहली बार सारे देश में थम गई हैं। रेल, बसें, ट्रांसपोर्ट हवाई जहाज सब बंद है। औद्योगिक प्रतिष्ठान एवं व्यापारिक प्रतिष्ठान लगभग एक माह से बंद है। जनता कर्फ्यू के कारण लोग अपने घरों में कैद हैं। ऐसी स्थिति में लगभग सभी सेक्टर सरकार से आर्थिक सहयोग की मांग कर रहे हैं। भारत में करोड़ों युवा बेरोजगार हैं। लॉकडाउन के कारण करीब दो करोड़ कामगारों का हाल ही में काम छिन गया है। भारत के लोगों की क्रय शक्ति, कर्ज के कारण बहुत कम है। ऐसी स्थिति में भारत के बारे में यदि आईएमएफ का यह अनुमान है कि भारत की विकास दर 1.9 फ़ीसदी होगी तो इसके पीछे भारत की बड़ी आबादी एक मात्र कारण है। कृषि अर्थव्यवस्था भारत की अन्य देशों के मुकाबले काफी अच्छी है। ऐसी स्थिति में चीन और भारत ही दो देश ऐसे हैं, जो इस आर्थिक मंदी के दौर में सारी दुनिया के देशों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।
कोरोनावायरस का कहर अभी कम नहीं हुआ है। अमेरिका में कोरोनावायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 771197 तथा मृतकों की संख्या 41356 ,स्पेन में संक्रमित लोगों की संख्या 2.00210 तथा मृतकों की संख्या 20852, इटली में संक्रमित लोगों की संख्या 1.81228, तथा मृतकों की संख्या 201141, फ्रांस में संक्रमित लोगों की संख्या 1.52894, तथा मृतक संख्या 19418 तथा जर्मनी में संक्रमित लोगों की संख्या 1,46293 तथा मृतक संख्या 4683 इगलैंड में संक्रमित124743 तथा मृतकों की संख्या 16509 पर पहुंच गई है।
इन देशों में संक्रमण कम होने की स्थान पर बढ़ता जा रहा है। वही सिंगापुर और चीन में कोरोनावायरस का संक्रमण दोबारा फैल रहा है। ऐसी स्थिति में सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था को लेकर नई चिंता देखने को मिल रही है।
2003 के बाद से सारी दुनिया के देश वैश्विक व्यापार संधि के अंतर्गत आर्थिक लेनदेन, आयात निर्यात एवं कर्ज तथा निवेश एक-दूसरे देशों में कर रहे थे आर्थिक मंदी और कोरोनावायरस के लाक डाउन के बाद जब सारे विकसित एवं विकासशील देशों की विकास दर माइनस की ओर जा रही है। ऐसी स्थिति में सारी दुनिया में क्रय शक्ति बड़ी तेजी के साथ घटी है। अभी तक जीडीपी का जो पैमाना था। वह विकास का था। अब जीडीपी का जो पैमाना होगा वह माइनस का होगा ऐसी। स्थिति में चीन और भारत किस तरह से दुनिया का नेतृत्व कर सकते हैं। आर्थिक संकट के इस दौर में कौन अपनी अहमियत बना सकता है। यह दोनों देशों के नेतृत्व और उनकी नीतियों पर निर्भर करेगा। अमेरिका और चीन के संबंध इन दिनों काफी खराब चल रहे हैं । कोरोनावायरस का संक्रमण चीन से सारी दुनिया में फैला है। जिसके कारण चीन की मुश्किलें भी भारत की तुलना में ज्यादा है। भारत के चीन के साथ सीमा संबंधी विवाद पिछले कई वर्षों से लंबित चल रहे हैं। हाल ही में भारत सरकार ने सीमावर्ती देशों के निवेश पर जो प्रतिबंध लगाया है। उससे चीन भड़का हुआ है। वैश्विक मंदी और आर्थिक संकट के इस दौर में दुनिया के सभी देशों के बीच आपसी विवाद बढ़ रहे हैं।
जर्मनी ने चीन से कोरोना संक्रमण के कारण जो नुकसान हुआ है। उसके भुगतान की मांग की है। अमेरिका भी चीन पर दबाव बना रहा है।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद तथा डब्ल्यूएचओ जैसी संस्थाएं कमजोर पड़ गई हैं। विश्व बैंक और एशियाड बैंक जैसे वित्तीय संस्थान भी आर्थिक मंदी के इस दौर में अपना अस्तित्व किस तरह बनाए रखेंगे। इसको लेकर अनिश्चितता का माहौल सारी दुनिया में देखने को मिल रहा है। राजनीतिक एवं आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार सारी दुनिया एक बार फिर 100 साल पुराने संकट के दौर में जाती हुई दिख रही है। भारत का नेतृत्व यदि भारत की बड़ी आबादी और भारतीय संसाधनों का बेहतर ढंग से उपयोग करने के लिए नीतियों में व्यापक बदलाव करें. ऐसी स्थिति में कोई आश्चर्य नहीं है, कि आने वाला समय भारत के लिए आर्थिक, सामरिक और सामाजिक दृष्टिकोण से विश्व गुरु बनने का समय है। कोरोनावायरस और आर्थिक मंदी ने भारत के लिए एक नया अवसर पैदा किया है। इसके लिए वर्तमान सरकार को अपने राजनीतिक एवं आर्थिक सोच में परिवर्तन लाने की जरूरत है।

हिन्दुस्तान में उपेक्षित बाल फिल्में
मुकेश तिवारी
हिन्दुस्तान में भले ही गरीबी निरक्षता और अधिक आबादी जैसी तमाम समस्याए है मगर विश्व कें सबसे ज्यादा फिल्में भी हमारे मुल्क में ही बनती है। बावजूद इसके हमारे पास बच्चों को दिखाने के लिए उम्दा बाल फिल्में नहीं है जबकि सर्वाधिक जनसंख्या वाले हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा संख्या बच्चों की ही है । एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में तकरीवन 32 करोड से भी ज्यादा बच्चे है।यह विडंबना ही है कि इनके स्वस्थ मनोरंजन की हमारे मुल्क में माकूल व्यवस्था नही है। कडवा सच तो यह है कि उन्हे जो भी फिल्म देखने को मिलती है वह उसी को देखने लगते है। इसका परिणाम यह हुआ कि बच्चे व्यस्को के लिए बनी अश्लील सेक्सी फिल्मो का वेहिचक होकर छककर मजा ले रहे हैं।यही वजह है कि व्यस्को के लिए बनी फिल्मों के डायलाक बच्चों को जबानी याद है।
बालक -बालिकाओं के मस्तिश्क को व्यापक द्धश्टिकोण की ओर मोडने में बाल साहित्य की अहम भूमिका रहती है। वैसे भी बच्चो के मस्तिश्क को पुश्ट व स्वस्थ बनाने के लिए सिनेमा का माध्यम वेहतर साधन है; जो गहरी छाप छोडता है। सच तो यह है अच्छा बाल सिनेमा बिना अच्छे बाल साहित्य के नही बनाया जा सकता । एक मायने में बाल फिल्म वह फिल्म है जो बच्चो के लिए अच्छी मजेदार मनोरंजक और शिक्षाप्रद हो और किसी भी पहलू से हानिकारक न हो ।
विश्वभर में जो बाल फिल्में बनाई जाती है वे इन दो स्तरों की द्धश्टि से ही बनाई जाती है। हमारे मुल्क में लेखक अंगेजीका अन्धानुकरण करते हैं। लेकिन वे हिन्दी सहित भारतीय भाशाओं की ओर भी ध्यान दे तो वेहतर होगा । अंग्रेजी माध्यम से पढने वाले बच्चों का मानसिक स्तर और ज्ञान कुछ उंचा होता है। इसलिए इनके अलावा हमें देश के सभी बच्चों को खासकर औसत बच्चो को ध्यान में रखना होगा । तभी बाल फिल्मा की सार्थकता है।
बच्चों को कम सम्वाद शैली वाली फिल्में नाटक कार्टून फिल्में जानकारी देने वाली फिल्में तथा प्रकृति वाली फिल्में अधिक प्रिय होती है।लेकिन हम यह जरूर कहेगे कि सुविचारित सुनियोजित और अच्छी फिल्म किसी भी विधा में हो वह कसौटी पर खरी उतरेगी दूरदर्षन पर भी बाल फिल्मो को बढावा दिया जाना चाहिए । इस द्वश्टि से किसी एक भाशा की वेहतरीन बाल फिल्मो का अन्य भाशा में डबिग न करने प्रथक -प्रथक क्षेत्रीय भाशाओ में उन्हें स्वतंत्र रूप से स्थानीय परिवेश को देखकर बनाया जाना वेहतर होगा ।
शहर कस्बे और गाव में बाल फिल्में दिखाई जाना चाहिएं और बच्चों की प्रतिक्रिया देखकर फिल्मों में उत्तरोतर सुधार व नये प्रयोग किए जाते रहने चाहिए । कडवा सच तो यह हैं कि हमारे मुल्क में बच्चों के लिए हंसने -खेलने और मनोरंजन के साधन बहुत कम है। इस बात पर अधिक गौर किया जाना चाहिए कि उन्हें क्या देखना सबसे ज्यादा पंसद है।बहुत छोटे बच्चे रंगीन फिल्में देखना सबसे ज्यादा भाता है। वे सुनने के बजाय देखने में अधिक दिलचस्पी रखते है। वे जादू ;फंतासी ;तिलिस्म, कार्टून ,कठपुतली,जानवरों की कथाओं तथा सहदयता ,प्यार और सच्चाई केप्रसंगों में अधिक रस लेते है
इग्लैड और रूस बाल फिल्मों की क्रान्ति वाले अगुआ देश रहे हैं। ब्रिट्रिस फिल्में मुगल लार्ड रैक पहला व्यकित था,जिसने बच्चों के लिए विशेष चित्रो की अहमियत को समझा और उसे मूर्तरूप दिया 1930 में वाल्ट डिस्ने ने अमेरिका में जानवरों की जीवन्त फिल्मों का निर्माण कर तहलका मचाया ।ये फिल्में दुनिया भर में लोकप्रिय और प्रंसिद्व हुई क्योंकि इसने भाशा की बाधा को तोड डाला था। इसके पश्चात रूस ,कनाडा और जर्मनी में बाल फिल्मों की बाढ सी आ गयी।,द्वश्य तकनीक कथा कहने की सशक्त शैली सिद्वध हुई ।यह लहर नीदरलैण्ड और योरोप तक चलतै गई। कुछ फिल्में ऐसी भी हैं जिन्हें बडे और बच्चे दोनो ही पंसद करते हैं। उदाहरण के लिए अमेरिका की स्टार वार्स और इटृस ए मैड,मैडवर्ल्ड नामक प्रसिद्व फिल्में बच्चो और बडों द्वारा काफी पंसद की गई।इसी तरह हिन्दी की परिचय फिल्म ने भी खूब ख्यति पाई।
वैसे तो विदेशों में बाल फिल्में काफी बडी संख्या में बनाई गई है लेकिन उन सबके नाम का यह जिक्र करना उचित नही होगा ।लेकिन उनमें से कुछ के नामो का जिक्र में यह अवश्य करना चाहूगा । फ्रांस में बच्चों के लिए वेहतरीन फिल्में का निर्माण किया जाता है। यहीं की ही एक प्रसिद्व फिल्म रही है मोनस्युर पापा ।इसी तरह जापान की बहुचर्चित जीवन्त फिल्म रही है एडवेचर्स आफ ए पोलर कब । चार्ली चैपलिन और लौरेल हार्डी की फिल्मों से बच्चों का बहुत मनोरंजन होता है। ओलीवर टिवस्ट भी एक अच्छी बाल फिल्म रही है। द लव वग और हर्बी राइडूस अगेन द चैम्प भी मनोरंजक फिल्मों में गिनी जाती है।वाल्ट दिस्ने सुक्ष्मद्वश्टि वाले प्रतिभा संपन्न् व्यकित थे और उन्होने डिस्नेलैण्ड की रचना करके और उम्दा फिल्में बना कर दुनिया के बच्चों की बहुत बडी सेवा की है। इसके लिए बच्चे उनके ऋणी रहेगे । उनकी बाल फिल्में इसी लिए प्रसिद्व हुई उन्हे फिल्म वनाते समय स्मरण रहता था कि बचपन में उन्हें कौन सी चीजे किस तरह अच्छी लगती थी। इस वजह से वे उसी मानसिक स्तर से बारीकियों को लेकर फिल्में बनाते थे और रहस्य रोमांच को लेकर बच्चो को आहलादित करते थे हमारे यहां यह पैनी और सूक्ष्म द्वश्टि वी शान्ताराम में थी।हिन्दुस्तान में सर्वप्रथम उनके ही द्वारा बाल फिल्मों का श्रीगणेश किया गया था।
1929 में पहली बाल फिल्म रानी साहिबा बी शान्ताराम द्वारा बनाई गई थी ।जो कि एक कामेडी फिल्म थी ,जिसकी कथा एक सात साल के बच्चे बजर बटूटू के इर्द गिर्द घूमती हे। 1955 में उन्होने तूफान और दिया का निर्माण किया जिसमें ग्यारह बर्शीय लडके और चौदह बर्शीय बहन को समाज से जुझते हुए दिखाया गया इसमें बहन का रोल नन्दा ने अदा किया था । शान्ताराम ने बच्चो के लिए फूल और कलिया फिल्म का भी निर्माण किया था।हालाकि तपन सिन्हा की कावुली वाला राजकपूर की अब दिल्ली दूर नही और सत्यजीत रे की गूपी गाईने बागा वाइने बगला ने भी काफी धूम मचाई थी ।
कुछ अन्य बाल फिल्में भी काफी चर्चित रही जिसमें प्रमुख है-रानी और लाल परी जाग्रति,नौनिहाल ,अनमोल तस्वीर सफेंद हाथी,जादू का शंख ,सजरे फूल प्रमुख है।इन सभी फिल्मों में हिन्दुस्तानी सिने जगत के नामचीन नायक -नायिकाओं ने अभिनय किया है।तेलुगू की गंगा भवानी बंगली की सबुज दीपेर राजा, कन्नड की हगेयडा मकालु अपने दौर की चर्चित फिल्म रही हमारे मुल्क में इस दिशा में क्रान्ति तभी लाई जा सकती है जब फिल्म निर्माता इस दिशा में ठोस पहल करे और ज्यादा से ज्यादा बाल फिल्मो ंका निर्माण करे इतना ही काफी नही छवि ग्रह और मल्टीफलेक्स के संचालको को भी बाल फिल्मों के प्रदर्षन का तरजीह देना होगा।

कोरोनाः योगी और गहलोत सही
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
राजस्थान का कोटा शहर आजकल शिक्षा का बड़ा केंद्र बन गया है। वहां उत्तर प्रदेश के लगभग 7-8 हजार छात्र फंसे हुए हैं। उन्होंने अपने-अपने गांव और शहर लौटने का अभियान चला रखा है। उन्हें खाने-पीने की समस्या तो सता ही रही है, उससे भी ज्यादा मानसिक तनाव और असुरक्षा ने उनका जीना हराम कर दिया है। उनके माता-पिता भी चाहते हैं कि इस संकट के समय वे उनके साथ रहें। अब जबकि तालाबंदी को बढ़ाने की घोषणा हुई तो उन लोगों में बेचैनी और भी बढ़ गई। इस पर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने 250 बसें भेजकर छात्रों को कोटा से उ.प्र. बुलवाना शुरु कर दिया है। योगी की इस पहल पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सहमति है। योगी भाजपाई हैं और गहलोत कांग्रेसी ! लेकिन दोनों में पूर्ण समन्वय है। इन दोनों का विरोध बिहार के मुख्यमंत्री नीतीशकुमार जोरों से कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि जब बिहार के छात्रों को वे नहीं बुला रहे हैं तो योगी क्यों बुला रहे हैं ? योगी भाजपाई होकर अपने ही प्रधानमंत्री की तालाबंदी को तोड़ रहे हैं। वे सभी छात्रों को, वे जहां हैं, वहीं जमे रहने के लिए क्यों नहीं कहते ? यदि कुछ हजार छात्र सिर्फ कोटा से आज अपने घर लौटेंगे तो अन्य शहरों में ऐसे लाखों छात्र हैं। क्या उनके लौटने पर यह कोरोना सारे देश में नहीं फैल जाएगा ? तर्क की दृष्टि से नीतीश की बात ठीक है लेकिन व्यावहारिक वही है, जो योगी और गहलोत कर रहे हैं। जिस दिन तालाबंदी की घोषणा हुई थी, उसी दिन मैंने लिखा था और कई टीवी चैनलों पर मैंने कहा था कि तीन दिन के लिए रेलें और बसों को मुफ्त चला दिया जाए ताकि करोड़ों प्रवासी मजदूर, छात्र, व्यापारी और यात्रीगण अपने-अपने घर पहुंच जाएं। इन फंसे हुए लोगों की सेवा हमारी सभी सरकारें और समाजसेवी संगठन जमकर कर रहे हैं लेकिन अब जबकि 20 अप्रैल से बहुत-सा काम-काज पूरे देश में खुलनेवाला है तो मेरा निवेदन है कि प्रवासी मजदूरों, छात्रों तथा अन्य सभी लोगों के लिए 3-4 दिन तक बसों और रेलों को निःशुल्क चला दिया जाए। कोटा से यात्रा करनेवाले छात्रों के साथ जितनी सावधानियां बरती जा रही हैं, यदि उतनी ही अन्य यात्रियों के साथ भी बरती जाएगी तो कोरोना के फैलने की आशंका कम से कम होगी। वरना, उल्टा भी हो सकता है। छात्रावासों में रहनेवाले छात्रों और भीड़भरी झुग्गी-झोपड़ियों के मजदूरों में यदि कोरोना फैल गया तो भारत का हाल अमेरिका-जैसा हो सकता है।

अभी किसी की भी अग्नि परीक्षा ’खत्म नही‘ हुई है….?
ओमप्रकाश मेहता
आज वैसे तो पूरा विश्व ही महान संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, जिसमें हमारा अपना भारत भी शामिल है, किन्तु संकट के इस दौर में भारत ने पूरे विश्व को यह महसूस अवश्य करा दिया कि संक्रमण काल में साहस, दूरदशिता और दूरद्रष्टि क्या होती है, इसीलिए तो आज एक ओर विश्व की महाशक्ति अमेरिका जहॉ प्रतिदिन अपने दो हजार देशवासियों को खो रही है, वहीं हमारे देश के नेत्तृव ने विश्व को दिखा और सिखा दिया कि संक्रमण काल बखूबी कैसें निपटा जाता है और अपने देश व देशवासियों की रक्षा-सुरक्षा कैसे होती है, आज पूरा विश्व हमारे ’लॉकडाउन‘ जैसे कदमों की तारीफ कर रहा है और उनका अनुशरण करने का प्रयास भी कर रहा है, क्योंकि हर देश इन्ही कदमों में अपने देश का हित देश रहा है, और जहॉ तक हमारे देशवासियों का सवाल है, उन्हे पिछले तीन सप्ताह से अपने घरों में बंद होकर रहने के साथ जीवनोपयोगी वस्तुओं का अभाव अवश्य झेलना पड रहा है, किन्तु इनका घरों में बंद रहना, सभी के लिए वरदान सिद्व हो रहा है और इसी कारण यह महामारी हमारे देश में विकराल रूप धारण नही कर पाई। इसके साथ ही देशका हर नागरिक यह भी जानलें कि उसकी यह अग्निपरीक्षा अभी खत्म नही हुई है, अभी तो इसका मध्यान्तर है, अभी इतनी ही लम्बी दूरी हमें और तय करना है और इस महामारी को जडो से उखाडकर हमारे देश के तीन और व्याप्त महासागर में फैंकना है, जिससे कि हमारे पड़ौसी देश इससे ग्रसित न हो, यही हमारा हर देशवासी का संकल्प है। यह सब हमारे केन्द्रीय नेत्तृव का कमाल है, उनके सशक्त नेत्तृव में अब यह देश किसी भी संक्रमण का सफलतापूर्वक सामना करने को तैयार है।
अब इस दौर में यदि हम अपनी और अपने प्रदेश की बात करें तो हमारे प्रदेश तो स्वास्थ्य के संक्रमण के साथ राजनीतिक संक्रमण के दौर से भी गुजर रहा है। हमारे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जी ने इसी स्वास्थ्य संक्रमण के दौर में सरकार का दायित्व वहन किया था और चूंकि उनकी पहली प्राथमिकता महामारी से प्रदेश को सुरक्षित रखना था, इसलिए उन्होने समस्याओं के इस ’चक्रव्यूह‘ में अकेले ही जूझना तय किया और बिना किसी राजनीतिक या भौतिक सहयोग के अकेले ही पिछले तीन सप्ताह से आधुनिक ’अभिमन्यू‘ की भूमिका अख्तियार कर इस महामारी व राजनीतिक चक्रव्यूह को सफलतापूर्वक भेदने का प्रयास किया है, और उसमे बहुत हद तक सफल भी रहें, किन्तु अब जब उन्होने प्रदेश में जानलेवा महामारी को काबू में कर लिया है तो अब उन्होने अपनी दूसरी प्राथमिकता मंत्री परिषद के गठन की तैयारी शुरू कर दी है और संभव है इसी सप्ताह की अवधि में इस ’अग्निपरीक्षा‘ में भी वे खरे उतर कर सबके सामने आ जाऍ।
अंग्रेजी में एक कहावत है ”डोन्ट ट्राय टू प्लीज एवरीवन“ अर्थात हर एक को खुश रखने का प्रयास मत करों, और जब तक इस कहावत को ईमानदारी से जीवन में नही उतारा जाता तब तक हर क्षैत्र में सफलता संदिग्ध हो जाती है, राजनीति में भी यही होना चाहिए और नेत्तृव को इसी का बखूबी पालन करना चाहिए इसके लिए गंभीर चिंतन भी जरूरी है, जैसे मध्यप्रदेश के वर्तमान संदर्भ में भाजपा को जिसके माध्यम से सरकार मिली है, शपथ के समय उस माध्यम को भूलाना राजनीतिक अपराध होगा, चाहें फिर इसके लिए ”अपनों“ को क्यों न नाराज करना पड़ें ?
यद्यपि शिवराज जी काफी अनुभवी व संस्कारवान राजनेता है, उन्हे सब पता है, इसलिए आशंका कुछ नही है, फिर भी उन्हें हर बात याद दिलाना तो एक हितैषि की दृष्टि से हर एक का कर्तव्य है ही ?

कोरोनाः हार की शुरुआत
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कोरोना पर भारत ने जैसी लगाम लगाई है, वह सारी दुनिया के लिए आश्चर्य और ईर्ष्या का विषय हो सकता है। सारी दुनिया में इस महामारी से लगभग डेढ़ लाख लोग मर चुके हैं और 22 लाख से ज्यादा संक्रमित हो चुके हैं। जिन देशों में हताहतों की संख्या भारत से कई गुना ज्यादा है, उनकी जनसंख्या भारत के मुकाबले बहुत कम है। यदि वे देश भारत के बराबर बड़े होते तो हताहतों की यह संख्या उन देशों में भारत से कई सौ गुना ज्यादा हो जाती। आज तक भारत में मृतकों की संख्या लगभग 450 है और संक्रमितों की संख्या 15 हजार से भी कम है। 80 प्रतिशत से अधिक लोग ठीक हो चुके हैं। यदि जमाते-तबलीग की मूर्खता नहीं होती तो अभी तक तो तालाबंदी कभी की उठ गई होती। अब भी पता नहीं क्यों, हमारे कुछ मुसलमान भाई अफवाहों और गलतफहमियों के शिकार हो रहे हैं। कोरोना तो उनको मार ही रहा है, वे भी खुद को मौत के कुंए में ढकेल रहे हैं। हमारे नेता लोग उनसे सीधा संवाद क्यों नहीं करते ?
लगभग साढ़े तीन सौ जिलों में तो एक भी संक्रमित रोगी नहीं मिला है। कुछ दर्जन जिले जिनमें मुंबई, दिल्ली, इंदौर जैसे जिले शामिल हैं, उनमें ठीक समय पर कार्रवाई हो जाती तो भारत सारी दुनिया के लिए आदर्श राष्ट्र बन जाता। यह तब होता जबकि भारत संपन्न राष्ट्र नहीं है। उसकी स्वास्थ्य सेवाएं इटली, फ्रांस और अमेरिका के मुकाबले बहुत कमजोर हैं। उसमें साफ-सफाई की भी कमी है। इसके बावजूद भारत में यह कोरोना वायरस क्यों मात खा रहा है ? इसका मूल श्रेय भारत की जनता और हमारी सरकारों को है। केंद्र और राज्यों की सरकारों ने जो तालाबंदी घोषित की है, उसका लोग जी-जान से पालन कर रहे हैं। कुछ जमातियों द्वारा फैलाई जा रही अफवाहों को छोड़ दें तो सभी मज़हबों, सभी जातियों, सभी वर्गों, सभी प्रांतों और सभी दलों के लोग एकजुट होकर कोरोना का मुकाबला कर रहे हैं।
अब कोरोना के जांच यंत्र लाखों की संख्या में भारत में आ चुके हैं। हमारे डाक्टर और नर्सें जिस वीरता और त्याग का परिचय दे रहे हैं, वह सारी दुनिया के लिए आदर्श है। किस देश में मरीज उन पर हमला कर रहे हैं ? भारत की कुनैन की दवाई अब दुनिया के 55 देशों में पहुंच गई है। अब शीघ्र ही भारत सरकार किसानों, मजदूरों और व्यापारियों के लिए समुचित सुविधाएं मुहय्या करनेवाली है। रिजर्व बैंक ने देश के काम-धंधों में जान फूंकने के लिए 50 हजार करोड़ रु. की राशि की घोषणा की है। जाहिर है कि कोरोना की हार की शुरुआत हो चुकी है।

कोरोनाः कोरिया से सीखें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
तालाबंदी में ढील देने के निर्देश आज सरकार ने जारी कर दिए हैं। यह ढील 20 अप्रैल से लागू होगी। कुछ लोगों ने पूछा है कि इसे तुरंत लागू क्यों नहीं किया गया ? प्रधानमंत्री ने कल ही इसकी घोषणा क्यों नहीं कर दी ? यदि वे कर देते तो यह वैसी ही गल्ती होती जैसी उन्होंने 24 मार्च को अचानक तालाबंदी की घोषणा कर दी थी। यह जो पांच दिन का समय मिला है, इसमें हमारे करोड़ों मजदूर, किसान, व्यापारी, कर्मचारी, ड्राइवर, डाक्टर, पत्रकार आदि अपने-अपने काम-धंधों को फिर से शुरु करने की पूरी तैयारी करेंगे। लाखों-करोड़ों लोग अपनी जगह से विस्थापित होकर शहरों और गांवों में अटके पड़े हैं। उन्हें लाने-ले जाने के इंतजाम के बारे में सरकार ने अभी कुछ नहीं कहा है, जबकि बसें, रेलें और जहाज अभी भी 3 मई तक बंद रहेंगे। तो क्या लोग ट्रकों और मालगाड़ियों से आवागमन करेंगे ? सरकार को इस बारे में तुरंत सोचना चाहिए, वरना मुंबई के बांद्रा और सूरत जैसी घटनाएं जगह-जगह होने लगेगी। बांद्रा में तो सारा मामला पूर्व-नियोजित लग रहा था। इसीलिए बांद्रा की मस्जिद के मौलवियों की समझाइश और पुलिस के डंडों ने हालात पर काबू पा लिया लेकिन अगर ये ही हादसे बड़े पैमाने पर हो गए तो सरकार की बड़ी भद्द पिट सकती है। वैसे सरकार ने 20 अप्रैल से जितनी छूटें देने का वादा किया है, उन्हें देखते हुए लगता है कि देश की लगभग 80 प्रतिशत अर्थ-व्यवस्था पटरी पर लौटने लगेगी और यदि इस बीच कोरोना की मार शिथिल पड़ गई तो तालाबंदी 3 मई के पहले शत प्रतिशत हटा ली जाएगी। इस दौरान मनुष्य के जिंदा रहने के लिए जितनी भी बेहद जरुरी चीजें होती हैं, वे सब उसे उपलब्ध हो जाएंगी। तालाबंदी की यह ढील तय करते समय लगता है कि प्रधानमंत्री ने जितने भी परामर्श-संवाद किए गए थे, उनका पूरा फायदा उठाया गया है। इन निर्देशों में यदि अभी कुछ जोड़ा जा सकता हो तो लोगों को खुलकर सुझाव देने चाहिए। भारत को आग्नेय एशिया के छोटे-से देश दक्षिण कोरिया से बहुत-कुछ सीखना होगा। वहां एक गिरजाघर की भीड़ से फैले कोरोना पर उन्होंने काबू किया, बिना तालाबंदी के। द. कोरिया में रेलें, बसें, जहाज, दुकानें, कारखाने, रेस्तरां आदि सब चल रहे हैं लेकिन लोग-बाग पूरी सावधानी भी रख रहे हैं। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि द. कोरिया में संसदीय चुनाव आजकल जोरों से हो रहे हैं और लाखों लोग अपने घरों से निकलकर मतदान कर रहे हैं। जिस दिन (20 जनवरी) वहां पहला मामला सामने आया, सरकार ने दो हफ्तों में ही एक लाख जांच-यंत्र तैयार कर लिये। अमेरिका और यूरोप अब भी इस मामले में फिसड्डी हैं। कोरिया में अभी तक 169 लोग मरे हैं और 5828 लोग ठीक हुए हैं। अमेरिका और यूरोप में मृतकों की संख्या हजारों में है और संक्रमित होनेवालों की लाखों में ! भारत में हताहतों की संख्या अब ज्यों ही कम होने लगे (गर्मी शुरु हो गई है), उसे द. कोरिया की तरह भारत को खोल देना होगा।

कोरोना वायरस पर अमेरिका की नाराजगी और चीन का जैविक युद्ध ?
सनत जैन
कोरोनावायरस को लेकर अमेरिका ने चीन पर काफी गंभीर आरोप लगाए हैं। अमेरिका की नाराजगी, वैश्विक स्वास्थ्य संगठन पर भी देखने को मिली है।अमेरिका का आरोप है, कोरोनावायरस की बीमारी को लेकर चीन ने सारी दुनिया को अंधेरे में रखा। नवंबर माह से चीन में कोरोनावायरस के संक्रमण से रोजाना हजारों लोगों की मौत हो रही थी। लेकिन चीन का सरकारी मीडिया कोरोनावायरस के संक्रमण तथा उससे होने वाली मौतों को कई महीनों तक छुपाता रहा। अमेरिका का आरोप है, कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने दायित्व का सही निर्वाह नहीं किया। विश्व स्वास्थ्य संगठन के चेयरमैन और उनकी टीम चीन भी गई थी। उसके बाद भी कई महीनों तक कोरोनावायरस के वास्तविक तथ्यों को विश्व स्वास्थ संगठन ने छुपाया है। इससे अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप नाराज हैं। उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन को दी जाने वाली आर्थिक सहायता बंद करने का निर्णय लिया है।
जैविक युद्ध को लेकर अमेरिका और चीन का कई दशकों पुराना गहरा संबंध है। अब धीरे-धीरे यह सारी दुनिया के सामने आ रहा है। 1990 – 91 में अमेरिका ने इराक के खिलाफ इसी तरह के आरोप लगाए थे। इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन जैविक विषाणु हमले के लिए तैयारी कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की सहायता से अमेरिका ने इराक के ऊपर जैविक युद्ध की आशंका को लेकर वैश्विक आर्थिक प्रतिबंध भी लगवाए थे। अंतरराष्ट्रीय दबाव में इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की टीम को इराक में प्रवेश करने, और संयंत्रों का निरीक्षण करने की भी छूट दी थी। अंतरराष्ट्रीय टीम संयंत्रों का निरीक्षण करके वापिस गई। अमेरिका उनके निरीक्षण से संतुष्ट नहीं हुआ। इसी बीच इराक के सैन्य बलों ने 2 अगस्त 1990 को कुवैत पर हमला कर दिया। तेल के उत्पादन और विपणन को लेकर इराक की, सऊदी अरब तथा अमेरिका के नेतृत्व में जो ओपेक तेल उत्पादक देश वह नाराज थे। अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने सऊदी अरब में अमेरिका की सुरक्षा बलों को तैनात किया। इसके बाद अमेरिका ने इराक के खिलाफ युद्ध लड़ने के लिए कई देशों की सेना तैयार कर संयुक्त गठबंधन ने ईराक से युद्ध लड़ा। सऊदी अरब, इजिप्ट और संयुक्त राष्ट्र की सेना भी इसमें शामिल हुई थी।
अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से अनुमति लेकर इराक पर 17 जनवरी 1991 को पहला हवाई हमला किया। उसके बाद 23 फरवरी को जमीनी युद्ध शुरू किया। जमीनी युद्ध में गठबंधन की सेना विजयी हुई। जैविक युद्ध की परिकल्पना को लेकर पिछले चार दशक में महाशक्तिशाली देशों के बीच समय-समय पर आरोप-प्रत्यारोप तथा आशंकाएं देखने को मिलती रही हैं। इराक के खिलाफ अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र संघ को ढाल बनाकर जैविक युद्ध की आशंका पर, इराक को तबाह कर दिया। कच्चे तेल के उत्पादन और ओपेक देशों की सलाह नहीं मानने पर अमेरिका ने एक तरह से इराक पर कृत्रिम आरोप लगाकर ईराक पर कब्जा कर लिया। अमेरिका ने इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को गिरफ्तार कर फॉसी पर चढ़ा दिया था। जैविक हमले का कृत्रिम आरोप लगा कर अमेरिका ने ईराक को तवाह किया था। अब चीन के कोरोना वाइरस ने अमेरिका में तवाही मचा रखी है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप अब कोरोनावायरस को लेकर चीन के ऊपर जो आरोप लगा रहे हैं। उसको अमेरिका के संदर्भ मे हल्के में नहीं लिया जा सकता है।
पिछले 100 वर्षों में चीन से कई वायरस निकले हैं। जिन्होंने पूरी दुनिया के देशों में मौत का तांडव मचाया था। इसमें सबसे पहले प्लेग नामक बीमारी का भयंकर प्रकोप चीन से 19 वीं शताब्दी में शुरू हुआ था। इसके बाद यह धीरे-धीरे भारतीय उपमहाद्वीप से होते हुए उत्तरी एवं दक्षिण अफ्रीका यूरोप जापान फिलीपींस ऑस्ट्रेलिया एवं उत्तर दक्षिण अमेरिका में फैला था। 19वीं शताब्दी के अंत तक प्लेग का प्रकोप पूरी तरह समाप्त मान लिया गया। इस रोग ने 1994 में एक बार फिर भारत में भीषण तबाही मचाई थी। महाराष्ट्र का बीड जिला बयूबोनिक प्लेग एवं गुजरात का सूरत शहर न्यूमोनिक प्लेग का मुख्य केंद्र बिंदु था। प्लेग के जीवाणुओं को येरसीनिया पेस्टीस(पासचुरेला) पेस्टीस के नाम से जाना जाता है।
2002 में चीन के गुआंगडोंग प्रांत से सार्स नामक बीमारी चली थी। इस बीमारी ने एक महामारी का रूप लिया। एशिया महाद्वीप में सबसे ज्यादा चिंताजनक स्थिति उत्पन्न हो गई थी। भारत में सार्स वायरस का सबसे पहला मामला गोवा में दर्ज किया गया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार सार्स की बीमारी कोरोनावायरस के लक्षण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2002 में इस बीमारी से बचने के लिए गाइडलाइन जारी की थी। जिसमें संक्रमित होने के बाद मरीज को बीमार होने में 2 से 10 दिन का समय लगता था। सिर दर्द और बदन दर्द, सार्स बीमारी के शुरुआती लक्षण थे। वायरस के संक्रमित होने वाला मरीज को 104 फ़ारनहीट से भी ज्यादा बुखार हो जाता था। बुखार के बाद सूखा बलगम भी निकलता था। कुछ दिनों बाद दम फूलने के साथ सांस की बीमारी बढ़ जाती थी। 2 से 7 दिनों के अंदर सूखी खांसी शुरू हो जाती थी। जब इस वायरस का संक्रमण हुआ, उस समय मृत्यु दर काफी ज्यादा थी। लेकिन उसके बाद समुचित चिकित्सा उपलब्ध होने से सार्स कोरोनावायरस के 4 फ़ीसदी रोगी मृत्यु के शिकार हो रहे हैं।
वर्तमान स्थिति में अमेरिका ने चीन के ऊपर कोरोनावायरस फैलाने का आरोप लगाया है। इसके पीछे निश्चित रूप से अमेरिका की कोई बड़ी रणनीति भी होगी। कोरोनावायरस का संक्रमण दुनिया भर के 200 देशों में पहुंच गया है। अमेरिका स्पेन इटली फ्रांस जर्मनी इंग्लैंड ईरान तुर्की और बेल्जियम में हजारों लोग की मौत कोरोनावायरस हो चुकी है। अमेरिका को चीन के खिलाफ कोरोनावायरस युद्ध में कई देशों का समर्थन आसानी से मिलेगा। चीन ने पिछले दो दशक में जिस तरह से सारी दुनिया के देशों को पीछे छोड़ते हुए अपना आर्थिक एवं सामरिक साम्राज्य में विस्तार किया है। उससे चीन, अमेरिका के आंखों में किरकिरी बन कर गड़ रहा है। चीन के जापान भारत सहित कई देशों से सीमा विवाद चल रहे हैं। वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंम्प को कोरोना वायरस के कारण मीडिया और जनरोस का सामना पड़ रहा है। राष्ट्रपति चुनाव में चीन के विरुद्ध माहौल बनाकर अगला चुनाव जीतने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है। ऐसी स्थिति में अमेरिका का बिफरना एक बड़े खतरे का संकेत भी माना जाना चाहिए।

मोदी के भाषण के दोनों पहलू
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कोरोना पर प्रधानमंत्री के संदेश से जो लोग यह आस लगाए बैठे थे कि वे तालाबंदी में ढील की घोषणा करेंगे, उन्हें निराशा जरुर हुई होगी लेकिन उन्हें संतोष भी हुआ होगा कि उन्होंने 20 अप्रैल से उसके शुरु होने का संकेत दिया है। कहां कितनी ढील दी जाएगी, यह उन्होंने स्थानीय प्रशासनों पर छोड़ दिया है। उन्होंने यह भी ठीक ही कहा है कि जैसे ही कहीं ढील के नतीजे उल्टे दिखे, वे सख्ती करेंगे। उम्मीद है कि 20 अप्रैल तक कोरोना का प्रकोप घटेगा तो ढील बढ़ेगी, जिसका फायदा लोगों को रोजमर्रा के जीवन में तो मिलेगा ही, अर्थ-व्यवस्था भी पटरी पर लौटने लगेगी। यह अच्छा हुआ कि उन्होंने ढील की घोषणा आज से ही नहीं कर दी। अगर वे कर देते तो भगदड़ मच जाती। पता नहीं, देश में क्या होता ! तालाबंदी की हड़बड़ी से उन्होंने यह सबक सीखकर खुद का और देश का भला किया। 3 मई भी शायद उन्होंने इसीलिए चुना है कि दो और तीन तारीख को शनिवार और रविवार है। कोई आश्चर्य नहीं कि तालाबंदी को जल्दी ही इतना ढीला कर दिया जाए कि स्थिति सामान्य-सी लगने लगे लेकिन यह तभी होगा जबकि तालाबंदी का प्रकोप जमाते-तबलीग के पहले-जैसा हो जाए। प्रधानमंत्री, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जमात की धींगामुश्ती को ज्यादा तूल नहीं दिया, यह उनकी परिपक्वता और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का प्रमाण है। कोरोना का एक जबर्दस्त फायदा यह भी हुआ है कि नरेंद्र मोदी में एक कार्यकर्ता की विनम्रता लौट आई है। उन्होंने लोगों को हुए कष्टों के लिए जिन शब्दों में खेद जताया है और उन्हें सात सत्कर्म करने के लिए प्रेरित किया है, वह उन्हें राजनेता के पद से ऊंचा उठाकर राष्ट्रनेता बनाता है। उन्होंने भाषण में विरोधी दलों की हमेशा की तरह टांग नहीं खींची, यह भी सिद्ध करता है कि वे सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं। इस बीच उन्होंने सर्वदलीय बैठक बुलाई, सभी मुख्यमंत्रियों से बात की और सब निर्णय सर्वसम्मति से ले रहे हैं, यह सराहनीय है। कोरोना-विरोधी अभियान में जो सरकारी देरी हुई, उस पर उन्होंने जो लीपा-पोती की, उससे सहमत होना कठिन है लेकिन उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार को अब कोरोना के विरुद्ध एकजुट किया है, वह अन्य पड़ौसी राष्ट्रों के लिए भी प्रेरक है। मुझे खुशी है कि मोदी ने आयुष मंत्रालय के घरेलू नुस्खों का जिक्र भी किया। इन पर उन्होंने जोर क्यों नहीं दिया ? कोरोना संबंधी अंग्रेजी शब्दों के हिंदी पर्याय मैं कई बार बता चुका हूं लेकिन फिर भी मोदी नौकरशाहों की नकल पर डटे हुए हैं।
पुनश्च: मुंबई में हजारों प्रवासी मजदूरों की भीड़ देखकर मुझे दर्जनों फोन आ रहे हैं कि आपने तालाबंदी के पहले दिन और बाद में भी दो बार इस बारे में लिखा था। सरकार ने ध्यान क्यों नहीं दिया ?

करोना समस्या: व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता
रघु ठाकुर
कोरोना के बचाव के लिए लॉकडाउन के साथ सोशल मीडिया और मीडिया पर बहुत चर्चा हो रही है । दुनिया मे कोरोना कहां से आया ? कुछ प्रबुद्ध जनों यहां तक कि कुछ मुनि, महा-राजाओं ने भी चीन को, चीन में गैस उत्सर्जन और खानपान को जिम्मेदार ठहराया है। मैं नहप जानता हूं कि इनके इस शोध का स्त्रोत क्या है? गैस उत्सर्जन से पर्यावरणीय समस्याएं आ सकती है अस्थमा हो सकती हैं परंतु वायरस का जन्म कैसे हो सकता है । बल्कि सामान्य तरीके से देखा जाय तो उत्सर्जित गैसों से कारखानों की गैसों से वायुमंडल के वायरस मर सकते हैं। हां यह माना जा सकता है कि इस बार चीन में सबसे पहले कोविड-19 का प्रभाव शुरू हुआ। यह सूचना तो मीडिया में पहले ही आ चुकी थी और स्वत: चीन ने दिसम्बर-19 में यह सूचना दी थी।
वुहान शहर चीन की कुल 1.5 अरब आबादी का एक छोटा सा हिस्सा है । परंतु जानकारी मिलने के बाद चीन ने समर्थ कदम उठाएं ।वुहान से 700- 800 किलोमीटर दूर बपजिग में संक्रमण नही फैल सका। यद्यपि भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण को लेकर कुछ लोग सोशल मीडिया और कानोकान यह भी प्रचार कर रहे हैं कि चीन के वुहान में मरने वालों की संख्या 3 लाख के आसपास रही है जो वास्तव में चीन द्वारा छिपाई जा रही। मैं चीनी व्यवस्था का पक्षधर नहप हूं ना ही मेरा वहां की विचारधारा से कोई लेना-देना है बल्कि मैं उसके व साम्यवाद के विचार से भिन्न विचार रखता हूं। परंतु यह बात समझ के परे है कि लाखों लोगों की मौत को चीन कैसे छुपा सकता है। दुनिया का जो मीडिया अमेरिका,इटली, स्पेन, ईरान, इंग्लैंड और अन्य देशों की सूचनाएं दे रहा है उसी मीडिया ने चीन की भी सूचना दी है । आज दुनिया में सूचना तंत्र की पैठ इतनी गहरी है कि अगर कोई देश तथ्यों को छुपाना भी चाहे तो भी मुश्किल है। चीन में भी बहुत सारे दुनिया के पत्रकार हैं। परंतु दुनिया में और कोई देश ऐसी अफवाहों पर शायद ही इस प्रकार विश्वास करता हो जिस प्रकार हमारे देश में होता है।
सोशल मीडिया पर तो एक खबर यह भी आई कि 25 मार्च से कर्यू लगने के बाद दिल्ली में चीनी सामान का आयात 15000 रूप्ये करोड़ का कम हो गया।
इसमें कोई दो मत नहप है कि देश में विदेशी विमानों व चीन के विमान आने पर रोक है अत: चीन व अन्य देशों से विशेष चीजों को छोड़ कर सामान्य उपभोक्ता सामान का आयात लगभग बंद है। परंतु व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर साहिबान ने 15000 करोड़ रूपया का आंकड़ा भी निकाल दिया । हाँलांकि में इस राय का हूँ कि भारत को चीन व अन्य देशों से भी केवल तकनीक या सुरक्षा उपकरण छोड़कर बकाया सब आयात पर रोक लगा देना चाहिए। एक चर्चा यह भी चलाई जा रही है कि चीन के लोग सांप, चमगादड,+ बिच्छू, कुत्ता बिल्ली खाते हैं या मांसाहार करते हैं इसलिए उनके यहां कोरोना वायरस आया है। अगर मांसाहार से कोरोना वायरस का कोई संबंध होता तो न केवल चीन में बल्कि अरब और पूरे यूरोप में इसे हजारों साल पहले आ जाना चाहिए था। भारत के आदिवासी इलाकों में भी तथा समुद्र के तटवतब इलाकों व अफ्रीका में भी जहां मांसाहार करना स्थाई परिस्थितियों की वजह से प्रचलित रहा है वहां पहले ही आ जाना चाहिए था। नागालैंड में भी और कुछ पहाड़ी इलाकों में भी वहां के आदिवासी कुत्ते इत्यादि का मांस खाते हैं, परंतु वहां कोरोना नहप है। भाजपा के एक केंद्रीय मंत्री श्री किरण रिजजू ने तो सार्वजनिक बयान दिया था कि मैं गाय का मांस खाता हूं और खाता रहूंगा। परंतु वहां कोरोना वायरस नही जन्मा। आज भी इन क्षेत्रों में सबसे कम प्रभाव संक्रमण का है। अगर कुछ हुआ है तो उसे भेजने वाले बाहरी लोग हैं।
व्यक्तिगत तौर पर और तार्किक आधार पर मै शाकाहार समर्थक हूं परंतु शाकाहार और मांसाहार को किसी के पक्ष या विपक्ष में हथियार बनाने का पक्षधर नहप हूं। निसन्देह कोरोना वायरस की शुरुआत चीन के वुहान से हुई । इसकी सूचना भी स्वत: चीन ने दिसंबर माह में ही दुनिया को दी थी। उसके बाद ही दिसंबर में डब्ल्यू.एच.ओ ने दुनिया के सभी देशों को सावधान करते हुए एडवाइजरी जारी की थी। अब अगर अमेरिका या यूरोप के राष्ट्राध्यक्षों ने या भारत जैसे देशों ने इसे उसी समय गंभीरता से नहप लिया तो दोष किसका है। एक यह भी तर्क दिया जा रहा है जिसे दुनिया में और देश के प्रधानमंत्री जी ने भी दिया है कि जो दुनिया के
संपन्न तथा स्वास्थ्य सेवाओं में अग्रणी देश हैं यथा अमेरिका आदि उन के यहाँ भारत से भी ज्यादा कोरोना वायरस फैला है। यह सही है और इसके पीछे संपन्नता या चिकित्सा सुविधाओं की विफलता का तर्क नहप काम करता। बल्कि चिकित्सा और संपन्नता की विपुलता ने इन दुनिया के ताकतवर और संपन्न देशों को समस्याओं को गहराई से समझने नहप दिया। आपके पास परमाणु बम हो सकता है, अत्यधिक प्रति व्यक्ति आय हो सकती है, तकनीक हो सकती है, साधन हो सकते हैं, कैंसर हृदय रोग आदि प्रचलित बीमारियों के इलाज के लिए बेहतर उपकरण हो सकते है परंतु इनसे कोरोना वायरस का इलाज नहप हो सकता । अगर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सत्ता और ताकत के मद में वायरस का मजाक उड़ाया तो यह उनका व्यक्ति दोष था 6 अप्रैल के भास्कर अखबार ने अमेरिका के एक अस्पताल के डायरेक्टर डॉ प्राइस का बयान छापा है कि, हमारे पास कोरोना से बचने के लिए पर्याप्त मास्क, किट, पीपीई नहप है। हम जुगाड़ से काम चला रहे हैं सादा सूट पहनकर मरीजों के पास जाते हैं और एक ही मास्क पूरा दिन पहनते हैं।
अब यह भी वे वस्तुएं हैं जो आमतौर पर अस्पतालों में पहले बहुत जरूरत की नहप समझी जाती थप और सदियों से उनकी विशेष आवश्यकता भी नहप पड़ती थी। अब एक आकस्मिक आवश्यकता पैदा हो गई है। इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च ने 5 अप्रैल को स्पष्ट कहा कि कोविड-19 हवा में नहप फैलता है। मेल-जोल से संक्रमण के फैलने का अधिक खतरा होता है। और सोशल डिस्टेंसिंग ही इसे रोकने का समूची दुनिया में एक बड़ा माध्यम माना गया है । क्योंकि दुनिया को इसके बारे में अभी भी विशेष जानकारियां मिल रही है। अभी तक इसकी पूर्ण रोकथाम के लिए कोई वैक्सीन या इलाज के लिए कोई दवा नहप बनी है। तथा दुनिया में अब इस दिशा में काम शुरू हुआ है । निसंदेह इस राष्ट्रीय महामारी के समय हम अपने घरों में खुद को बंद रखकर अपने समाज की मदद कर सकते हैं। यह सोचा और किया जाना चाहिए।तथा सारे देश को इसका स्वेच्छिक पालन भी करना चाहिए। साथ ही निम्न बातों का ध्यान भी रखा जाना चाहिए:-
1. सबसे पहले तो हमे अफवाहो को फैलने व फैलाने से बचना चाहिए। मनगढ़ंत दवाओं और उपचारों से बचना चाहिए।
2. बीमारी को छुपाने के बजाय सामने आना चाहिए। आइसोलेशन ,क्वारेंटाइन अंग्रेजी के शब्द हैं जो लोगों को नये होने की वजह से कुछ भयभीत भी करते हैं। वरना लॉकआउट /कर्यू के बाद से समूचा देश ही आइसोलेशन या क्वांरेंटाइन में है।
3. यथासंभव आसपास के लोगों की मदद करना चाहिए। कोई भी पडोसी या जानकार भूखा न सोये इसकी चिंता करना चाहिए और किसी की मदद करने के बाद उसके फोटो सोशल मीडिया पर डालने या अखबारों में छपवाकर अपना प्रचार करना व पीड़ित को अपमानित करने से बचना चाहिए । कोई दूसरा आपकी तारीफ करें यह तो समझ में आ सकता है परंतु हम खुद ही अपना प्रचार करें यह ना धार्मिक हैं और न ही मानवता।
इन दिनों कुछ लोग कोरोना की चर्चा को पवित्र गाय बना रहे हैं । आप केवल सरकार की तारीफ के कसीदे पढ़े उनके हर काम का समर्थन करें परंतु कोई सवाल उठाने की जुर्रत ना करें। सवाल उठाना ही राष्ट्र विरोधी मानने का एक नया प्रयास चल रहा है । सरकार की हां में हां मिलाना ही राष्ट्रवाद है यह नया भाष्य गढ़ा जा रहा है। यह परिस्थिति 1942 में महात्मा गांधी के सामने भी आई थी। मित्र राष्टों के समर्थक और नाजीवाद के विरोध के नाम पर गांधी जी को आंदोलन न करने की सलाह दुनिया व देश के लोग दे रहे थे। मेरी राय में हमें सरकार के प्रयासों का पूरा समर्थन करना चाहिए। उनमें भागीदार बनना चाहिए परंतु। जहां कमियां हैं वहां अंकित करने में पीछे नहप रहना चाहिए। एक तरफ प्रधानमंत्री जी बार-बार सामाजिक दूरी की अपील कर रहे हैं और वहप दूसरी तरफ उनके उत्साही समर्थक 5 अप्रैल की रात को सड़कों पर जमा होकर पटाखा फोड़ते हैं तथा प्रधानमंत्री जी की अपील को नकार देते हैं । मैं नहप कहता हूं कि यह उनसे प्रधानमंत्री ने कहा है परंतु जब सारे देश के टीवी चैनल्स मीडिया में फोटो सहित इस लॉक डाउन और सोशल डिस्टेंसिंग की अपील के समाचार आ रहे हों तो सार्वजनिक रूप से उन्हें नकार कर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का मजाक बनाना कैसे उचित है। इतनी अपेक्षा मैं उनसे जरूर करता हूं कि सूरत में जमा हजारों लोगों के और भोपाल में पैकेट वितरण के समय भीड़ के दिल्ली में कई
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इलाकों में पटाखे चलाती भीड़ के, चित्र जो उन्होंने देखे ही होंगे .पया अपने उन उत्साही समर्थकों को कानून न तोड़ने की सलाह और प्रशासन तंत्र को निष्पक्षता से कार्यवाही के निर्देश दें।
सोशल मीडिया पर कुछ मित्रों ने यह लिखा है कि प्रधानमंत्री ही देश है। मैं इस राय से सहमत नहप हूँ। मतदाताओं के बहुमत से निर्वाचित प्रधानमंत्री देश का शासक या प्रशासन का मुखिया तो होता है पर देश नहप हो सकता । उन्हें याद दिलाना चाहूंगा कि 1975 के आरंभ में स्वगबय देवकांत बरुआ ने इंदिरा इज इंडिया का नारा लगाया था और इस पर से लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने उन्हें दरबारी विदूषक कहा था ।मैं उम्मीद करता हूं कि प्रधानमंत्री जी अपने अगले संबोधन में या मन की बात में इन दोनों कमियों पर जरूर कहेंगे और अपनी असहमति भी दर्ज कराएंगे। कोरोना वायरस शुरू हुआ यह एक पक्ष है परंतु इसको फैलने न देना यह दूसरा पक्ष है जो हमारी और सरकार सब की राष्ट्रीय जवाबदारी है। हम केवल दूसरों को दोष देकर अपने दायित्वों से मुक्त नहप हो सकते । हमें अपने दायित्वों को समझना होगा । कितना अच्छा होता कि अगर 5 अप्रैल को रात्रि 9:00 बजे 9 मिनट दिया जलाकर राष्ट्रीय संकल्प की अपील जब प्रधानमंत्री जी ने की थी तभी उसके साथ ही बाजार के नियंत्रक अपने समर्थकों से भी अपील कर देते कि कम से कम दीयों का तेल निर्धारित दरों पर बेचो जो अभी दुकान बंदी की वजह से डेढ़ सो रूपये प्रतिकिलो की दर पर ब्लैक में बिक रहा है । अगर वह यह करते और अगर उनके समर्थक उनकी अपील को मानते तो हो सकता है कि जो दिए शहरों कस्बों में, बाजारों में व मध्यमवर्ग के घरों में जले उनके साथ साथ करोड़ों करोड़ आदिवासी व गरीब जो घरों में बंद हैं तथा गरीबी के कारण लाचार भी हैं इस राष्ट्रीय संकल्प के सहभागी बनते।

कोरोनाः भारत का विश्व रुप
वेदप्रताप वैदिक
कोरोना कमोबेश दुनिया के सभी देशों में फैल गया है। चीन और भारत दुनिया के सबसे बड़े देश हैं लेकिन जब हम सारी दुनिया के आंकड़ें देखते हैं तो हमें लगता है कि इस कोरोना के राक्षस से लड़ने में भारत सारी दुनिया में सबसे आगे है। इस कोरोना-विरोधी युद्ध का आरंभ यदि फरवरी या मार्च के पहले सप्ताह में ही हो जाता तो भारत की स्वस्थता पर सारी दुनिया दांतों तले अपनी उंगली दबा लेती। अब भी भारत के करोड़ों लोग जिस धैर्य और संयम का परिचय दे रहे हैं, वह विलक्षण हैं। लाखों प्रवासी मजदूर अपने गांवों की तरफ लौटते-लौटते रास्ते में ही अटक गए। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के आदेश का पालन किया और पिछले दो हफ्तों से वे तंबुओं और शिविरों में अपना वक्त गुजार रहे हैं। सारी सरकारें और स्वयंसेवी संगठन दिन-रात उनकी मदद में लगे हुए हैं। हमारे नेता लोग काफी दब्बू और घर-घुस्सू सिद्ध हो रहे हैं लेकिन उनकी तारीफ करनी पड़ेगी कि इस संकट के समय में वे घटिया राजनीति नहीं कर रहे हैं। क्या यह कम महत्वपूर्ण खबर है कि लगभग सारे गैर-भाजपाई मुख्यमंत्रियों ने तालाबंदी बढ़ाने की बात आगे होकर कही है ? देश में जहां-जहां कर्फ्यू लगा हुआ है, वहां-वहां सरकारी कर्मचारी और स्वयंसेवक लोग घरों में जाकर मुफ्त सामान बांट रहे हैं। लाखों लोगों को रेसाई की गैस-टंकी और खाद्य-सामग्री घर-बैठे मिल रही है। कोरोना-मरीजों की एकांत चिकित्सा के लिए दर्जनों शहरों और रेल के डिब्बों में हजारों जगह बना ली गई हैं। कोरोना के सस्ते जांच-यंत्र, सांस-यंत्र, सस्ती मुखपट्टियां, घरेलू नुस्खे और दवाइयां भी लोगों को मिलने लगी हैं। दुनिया के कई देश अब भारत से दवाइयां मंगा रहे हैं। भारत इन सब कोरोनाग्रस्त देशों का त्राता-सा बन गया है। दूसरी तालाबंदी के दौरान भारत जो ढील देगा और सख्तियां करेगा, दुनिया के दूसरे देश उससे प्रेरणा लेंगे। यह कोरोना-संकट तीसरे विश्व-युद्ध की तरह पृथ्वी पर अवतरित हुआ है। दुनिया की महाशक्तियों का इसने दम फुला दिया है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रुस और चीन जैसी महाशक्तियां आज त्राहि-माम, त्राहि-माम कर रही हैं। ऐसे विकट समय में भारत विश्व की आशा बनकर उभर रहा है। इस मौके पर भारत की सांस्कृतिक परंपराओं, (नमस्ते और स्पर्श-भेद), ताजा और शाकाहारी भोजन-पद्धति तथा घरेलू नुस्खों का अनुशीलन सारा संसार करना चाहेगा।

कोरोना का दंश अमेरिका और चीन की नूरा कुश्ती का दुष्परिणाम !
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
हमारे यहाँ एक कहावत हैं की दो सांडों की लड़ाई में खेत की बिरवाई का नुक्सान होता हैं। यही दोस्ती सत्कार्य में हो तो उस जैसा सुख नहीं और यदि दोस्तों की दुश्मनी से उनका खुद नुक्सान होता हैं और उनका दुष्प्रभाव अन्यों को भी भोगना होता हैं। चीन और अमेरिका प्रभुत्व की लड़ाई में एक दूसरे को नीचा दिखाने में बाज़ नहीं आते। जबकि इतने बुद्धिजीवी कहलाते है पर मानवीय गुणों से विहीन उसका कारण उनकी सोच ,उनका आहार ,उनकी संकीर्ण वृतियां.
पता नहीं इतने सम्पन्न होने केबावजूद उनमे सीमा नहीं ,संयम नहीं ,एक दूसरे प्रति आदर नहीं बस अहंकार ,तृष्णा ,अस्तित्व की लड़ाई में दिन रात बैचेन। एक पद सब क्षणिक हैं और पद पर रहते हुए सत्कर्म याद रखे जाते हैं अन्यथा इस जमीं पर अच्छे अच्छे सूरमा दफ़न हो गए और हो जायेंगे जिनको कोई पूछने वाला नहीं रहता हैं।
जो बात सामने आयी हैं की कोरोना वायरस को बनाने में अमेरिका ने चीन को रीसर्च करने २९ करोड़ रुपये यानी ३.७ मिलियन डालर की आर्थिक मदद की हैं ताकि वो इस बात पर रिसर्च कर सके की क्या कोरोना का वायरस गुफाओं में रहने वाले चमगादड़ की वजह से फैला। वैज्ञानिक मानते हैं की चमगादड़ के जरिये ही कोरोना का संक्रमण इंसानों के शरीर में आया हैं। वहां के मांस बाजार में यह संक्रमण चमगादड़ के द्वारा आया और फिर पूरे विश्व में फ़ैल गया।
इस बात की पुष्टि भी हो रही हैं की यह संक्रमण चीन की प्रयोगशाला से हुआ हैं। जिस प्रयोगशाला में जानवरों पर भारी अत्याचार होते हैं उसके लिए अमेरिका ने क्यों धन दिया।
इस बात की पुष्टि से यह सिद्ध हो चूका हैं की यह मानव कृत्य त्रासदी हैं और इससे होने वाली हिंसा का फल सबको भोगना होगा जिन्होंने इसमें भागीदारी निभाई हैं।
यदि हम ईश्वरवादी और कर्म सिद्धांत पर भरोसा रखते हैं तो जरूर कहर इन नेताओं पर जरूर पड़ेगा। यह कृत्य किसी भी तरह से क्षम्य नहीं हैं।

क्या चीन से आर्थिक और राजनैतिक बहिष्कार करना आसान हैं ?
डॉक्टर अरविन्द जैन
एक कार्यालय में बहुत चतुर होशियार और चालाक बाबू ट्रांसफर होकर आया ,वैसे वह अपने कारनामों से कुख्यात रहा हैं। सब कर्मचारी अधिकारी के पास उस बाबू की समस्या लेकर आये। अधिकारी ने सबकी बात सुनी और पूछा अब रास्ता क्या हैं ?कुछ बोले हम अपना ट्रांसफर करा लेते हैं ,कुछ बोले उसका ट्रांसफर यहाँ नहीं होना चाहिए ,पर अधिकारी ने कहा बिना पूर्व धारणा के निर्णय नहीं लेना चाहिए । अधिकारी ने कहा की हमारे पास बहुत विकल्प हो सकते हैं। हम कभी कभी दुष्टा पत्नी का संग होने पर उससे अलग रह सकते हैं या तलाक दे सकते हैं ,पर इसी स्वाभाव के यदि हमारे माँ बाप भाई बहिन हो तो क्या उनसे आप छुटकारा पाने क्या करेंगे ?क्या उनसे तलाक ले सकते हैं। नहीं इसका मतलब हमें विषम परिस्थितियों में समता भाव से सामना करना चाहिए ,एक बात हमें कर्मसिद्धांत से समझना चाहिए की जो हो रहा हैं वह होता हैं ,होगा उसे हमें साक्षात भाव से द्रष्टा भाव से स्वीकार करना चाहिए ,क्या आप होने वाली घटना को रोक सकते हैं।
आज बाबा रामदेव का कहना हैं की चीन से हमें राजनैतिक और आर्थिक बहिष्कार करना चाहिए। हम भी चाहते हैं पर करेंगे कैसे ?आज विश्व स्तर पर चीन का व्यापार फैला हुआ हैं ,उसने हमारी कमजोरी का फायदा उठाकर अपना व्यापार फैलाया। आज वह बहुत सीमा तक विश्व में केंद्रीकृत हो चूका। हर देश चीन के ऊपर आश्रित हो चूका हैं ,कोई भी क्षेत्र हो। विशेष रूप से खाद्य ,रसायन ,औषधि ,टेक्निकल ,मेकेनिकल आदि आदि। जब उसकी जेड इतनी अधिक विश्व में घर कर गयी हैं तब उससे निजात पाना सरल नहीं होगा।
यह बात वर्ष १९६२ से चल रही हैं और जितना बहिष्कार उतना अधिक उसका उससे सहयोग मिल रहा हैं। आज भारत के सम्बन्ध चीन से अलग प्रकार के हैं ,इतनी प्रतिकूल स्थितिओं निर्मित करने के बाद भी हमें उससे सम्बन्ध बनाने के लिए मजबूर हैं क्यों /वर्तमान में हमारे मोदी जी ने कई बार चीनी नेताओं का अभूतपूर्व स्वागत किया आखिर क्यों ?हमने जापान ,रूस ,अमेरिका ,ब्रिटैन ,फ्रांस ,जर्मनी के साथ अन्य मध्य एशिया के मुस्लिम देशों से दोस्ती कर विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाई पर हम चीन से अपने दुरी क्यों नहीं बना पा रहे हैं ?कारण साफ़ हैं की हम चीन के साथ इतने अधिक घुल मिल गए हैं की हम तलाक लेने की स्थिति में नहीं हैं। आज हम विचार करे की हम कितने अधिक किन किन देशों के ऊपर आश्रित हैं ,तब समझ में आएगा की हमारा व्यापारिक सम्बन्ध चीन से अधिकतम हैं और अनेको सामग्रियों में हम उस पर आश्रित हैं।
यह बात विगत ६ वर्षों से कई बार सामने आयी की चीन हमारी सीमाओं को अतिक्रमित कर रहा हैं ,घुंसपैठ कर रहा हैं उसके बाद भी हमारी क्या मज़बूरी हैं की उससे सम्बन्ध नहीं तोड़ पा रहे हैं। हमें मालूम हैं की वह पाकिस्तान का समर्थक हैं और उसे मदद देता हैं ,संयुक्त राष्ट्र में उसको बचाता हैं पर हम लाचार हैं।
जो भी इसकी खिलाफत करना चाहते हैं उन्हें सुझाव ,किस प्रकार उससे सम्बन्ध विच्छेद करे खुल कर बताएं। अंतर्राष्ट्र्रीय स्तर पर हम सब देश आपस में गुथमगुथा हैं। और सबको एक दूसरे से सहयोग अपेक्षित हैं। कोई भी राष्ट्र पूर्ण रूप से स्वाबलबी नहीं हो सकता हैं। हां हम कुछ वर्षों में परालम्बी न हो यह प्रयन्त करना होगा। हमारा देश विपुल संस्थानों से बहुसंख्यक आबादी वाला देश हैं। कुछ वस्तुए हमारे देश में हैं तो कुछ अन्य देशों में। व्यापारिक गतिविधियों से आर्थिक वृद्धि होती हैं। आज क्यों विश्व के सभी देश भारत की ओर व्यापार के लिए क्यों देखते हैं ,कारण बहुल आबादी के कारण व्यापार की बहुत संभावनाएं हैं और रही हैं। यह चलन सनातन हैं।
इस समय कोरोना संक्रमण के कारण समस्त प्रतिबन्ध लगने से हमारे पास धन होने के बाद सामग्री नहीं हैं तो उस धन की क्या उपयोगिता ?कारण एक दूसरे के सब पूरक हैं और उपादेय हैं।
परस्परोग्रहो जीवानाम.इसका आशय एक जीव दूसरे जीव का उपकारी हैं। एक दूसरे की सहायता जीव द्रव्य की प्रकृति महान।
इसीलिए यह सब भाव प्रतिकूल अवस्था में आते हैं अन्यथा अन्य देश हमारे लिए उपकारी होते हैं और हम अन्यों के लिए। क्या अभी हमने पाकिस्तान से व्यापारिक ,सांस्कृतिक खेल आदि सम्बन्ध समाप्त कर लिए हैं या पूर्ण रूप से कर सकते हैं।
हाँ हमें अब विकेन्द्रीकृत नीतियां अपनानी होगी और धीरे धीरे पराधीनता से स्वाधीनता की ओर आना होगा।

कोरोना के बाद
सिद्धार्थ शंकर
कोरोना वायरस के कहर से जैसे-तैसे हम उबर जाएंगे। मगर असल संकट इसके बाद शुरू होगा। यह सिर्फ भारत के लिए नहीं, पूरी दुनिया के लिए। लॉकडाउन ने सब कुछ थाम दिया है। देश का ऐसा कोई सेक्टर नहीं है, जो खुला है। कर्मचारी घर पर हैं, तो मजदूर मीलों का सफर पैदल तय कर घरों तक पहुंच गए हैं, जो फंसे हैं, वे भी लॉकडाउन खुलने के इंतजार में हैं। कोरोना काल के खत्म होने के बाद अर्थव्यवस्था को जहां पटरी पर लाने की चुनौती होगी, वहीं बेरोजगारी से निपटना भी आसान नहीं होगा। कोरोना का संकट देख जो लोग घरों की ओर लौट गए हैं, उनका वापस आना या कहें कि जल्द से जल्द लौटना मुमकिन नहीं है। अपना घर छोड़ काम की तलाश में दूसरे राज्य गए मजदूरों को होने वाली दिक्कतों से शायद ही कोई वाकिफ हो। वे भी अपने घर जाने को तैयार रहते थे, मगर पैसे के मोह में निर्णय ले पाने की स्थिति में नहीं थे, मगर अब कोरोना ने उन्हें उनके घर पहुंंचा दिया है, तो अब शायद ही वे दूसरे राज्यों का रुख करें। रही बात दूसरे वर्ग की तो वहां नौकरी जाने का खतरा मंडरा रहा है। कोरोना ने अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका दिया है। देश को इससे उबरने में कुछ समय तो लगेगा। तब तक हर सेक्टर की गाड़ी हिचकोले खाती रहेगी। इस स्थिति में पहले जैसी व्यवस्था और श्रम शक्ति बनाए रखना निजी सेक्टर के लिए आसान नहीं होगा।
अभी कोरोना का प्रभाव जारी है तो ही देश में बेरोजगारी दर बढ़कर 23 फीसदी पहुंच गई है। आने वाले दिनों में इस आंकड़े में और इजाफा होगा। वहीं रिटेल सेक्टर में 80 हजार लोगों की नौकरियां दांव पर लग गई हैं। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इस सेक्टर में बड़े पैमाने पर छंटनी की जा सकती है। कोरोना वायरस के कारण देश में अप्रैल के पहले हफ्ते में बेरोजगारी दर 23.4 फीसदी तक पहुंच गई, जबकि मार्च के मध्य में बेरोजगारी की दर सिर्फ 8.4 फीसदी थी। सबसे ज्यादा चोट शहरों में लगी है। शहरों में बेरोजगारी की दर 30.9 फीसदी पहुंच गई है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के मुताबिक 5 अप्रैल को खत्म हफ्ते के बाद 6 अप्रैल को जारी आंकड़े में बेरोजगारी में यह बढ़ोतरी दर्ज की गई है। लॉकडाउन हटाए जाने के बाद भी देश में बेरोजगारी अधिक रहेगी। सरकार हर साल बेरोजगारी के आंकड़े पब्लिश करती है। पिछली रिपोर्ट 2010 में जारी की गई थी। इसके मुताबिक, बोरोजगारी की दर 45 साल के हाई पर पहुंचकर 6.1 फीसदी रही थी।
एक सर्वे के अनुसार, 20 प्रतिशत कर्मचारियों की छंटनी से कुल 78,592 कर्मचारी प्रभावित होंगे। उद्योग संगठन ने कहा कि सर्वे में शामिल छोटे कारोबारियों में वे इकाइयां हैं, जहां 100 से कम लोग काम करते हैं। इनकी सर्वे में भागीदारी 65 प्रतिशत हैं। वहीं मझोले खुदरा कारोबारियों में 100 से 1,000 लोग काम करते हैं। बड़े खुदरा कारोबारियों में वे शामिल हैं, जिन्होंने 1,000 से अधिक लोगों को काम दे रखा है। अब इनका काम छिनना तय माना जा रहा है।
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन का कहना है कि कोरोना वायरस के कारण भारत के निर्यात क्षेत्र में करीब डेढ़ करोड़ लोगों की नौकरियां जा सकती हैं तथा इस क्षेत्र की नॉन-परफॉर्मिंग असेट भी बढ़ सकती हैं। फीओ के अध्यक्ष ने कहा कि आधे से अधिक ऑर्डरों के रद्द हो जाने तथा वैश्विक व्यापार के खराब परिदृश्य के कारण ये नौकरियां जाने की आशंका है। हालांकि, सब कुछ बुरा होगा ऐसा भी नहीं है। लॉकडाउन खत्म होने के बाद ऐसे क्षेत्र जो कि काफी कुछ लोगों की सोच और व्यवहार पर निर्भर हैं, उनमें सुधार आने में सबसे ज्यादा वक्त लगेगा, जबकि जिन क्षेत्रों को सरकार ने कोरोना वायरस के प्रकोप को रोकने के लिए बंद किया है, उनमें सबसे तेजी से सुधार आएगा। फार्मा, चिकित्सा और स्वास्थ्य उपकरण तथा डिजिटल कंपनियां, उन क्षेत्रों में शामिल हैं, जिनके कारोबार में कोविड-19 महामारी के बाद उछाल देखा गया। पूर्व दूरसंचार और आईटी सचिव आर चंद्रशेखर का कहना है कि डिजिटल दुनिया से जुड़ी हुईं और इससे संबंधित सेवाएं मुहैया कराने वाली कंपनियां, जैसे मनोरंजन, कार्यालय प्रणाली और रसद आपूर्ति श्रृंखला, अच्छा प्रदर्शन करेंगी। कुछ हद तक आवश्यक वस्तुओं की मांग में वृद्धि हुई है और इसमें फिर तेजी आएगी। उद्योग के एक अधिकारी ने कहा कि परिवहन, भंडारण, वेयर हाउसिंग जैसे क्षेत्र लॉकडाउन खत्म होने के बाद तेजी से वापसी करेंगे जबकि यात्रा, होटल, विदेश यात्रा और शॉपिंग मॉल जैसे क्षेत्रों में जल्द वापसी की उम्मीद नहीं है। ई-कॉमर्स और होम डिलीवरी में आगे और तेजी देखने को मिलेगी।उन्होंने कहा, उदाहरण के लिए होटल और यात्रा क्षेत्र को वापसी में समय लगेगा। लोग बिना जरूरत की यात्रा पसंद नहीं करेंगे। वे होटलों में रुकना पसंद नहीं करेंगे, क्या पता वहां पहले कौन रुका था। पर्यटन को वापसी में लंबा समय लगेगा। उनकी गतिविधियों में नाटकीय रूप से कमी आएगी।
जो भी हो, सरकार को कोरोना के साथ इस मोर्चे पर भी काम करना होगा। वरना कोरोना के संकट के बाद जिस तरह का संकट आएगा, वह युवा शक्ति को वेंटीलेटर की ओर ले जाएगा और यकीन मानिए, इस बीमारी की दवा किसी के पास नहीं होगी।

कोरोना: भारत सबसे बेहतर
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कोरोना से पीड़ित सारे देशों के आंकड़ें देखें तो भारत शायद सबसे कम पीड़ित देशों की श्रेणी में आएगा। दुनिया के पहले दस देशों में अमेरिका से लेकर बेल्जियम तक के नाम हैं लेकिन भारत का कहीं भी जिक्र तक नहीं है। यदि भारत की जनसंख्या के हिसाब से देखा जाए तो माना जाएगा कि कोरोना भारत में अभी तक घुस नहीं पाया है, उसने बस भारत को छुआ भर है, जैसे उड़ती हुई चील किसी पर झपट्टा मार देती है। भारत की आबादी अमेरिका से लगभग पांच गुना ज्यादा है। वहां 16000 से ज्यादा लोग मर गए लेकिन भारत में यह आंकड़ा दो-ढाई सौ तक ही पहुंचा है, वह भी सरकारी ढील और जमातियों की मूर्खता के कारण। अमेरिकी गणित यदि भारत पर लागू करें तो यह आंकड़ा 80 हजार तक पहुंच सकता था लेकिन भारत ने कोरोना के सांड के सींग जमकर पकड़ रखे हैं। वह उसे इधर-उधर भागने नहीं दे रहा है। इसके लिए भारत की अनुशासित और धैर्यवान जनता तो श्रेय की पात्र है ही, हमारी केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारें भी अपूर्व सतर्कता का परिचय दे रही हैं। हमारे देश के दानदाताओं ने अपनी तिजोरियों के मुंह खोल दिए हैं। किसी के भी भूखे मरने की खबर नहीं है। सबका इलाज हो रहा है। हमारे डाॅक्टर और नर्स अपनी जान खतरे में डालकर मरीजों की सेवा कर रहे हैं। हरयाणा सरकार ने उनके वेतन और दुगुने करके एक मिसाल पेश की है। सभी सरकारों को हरयाणा का अनुकरण करना चाहिए। यही सुविधा सरकारी कर्मचारियों और पुलिसकर्मियों को भी दी जानी चाहिए। ठीक हुए मरीजों के ‘प्लाज्मा’ से यदि केरल में सफलता मिलती है तो देश के सारे कोरोना-मरीजों को यह तुरंत उपलब्ध करवाया जाए। पिछले हफ्ते कई मुख्यमंत्रियों से इस बारे में मेरी बात हुई थी। जिन जिलों में कोरोना नहीं पहुंचा है, उनमें किसानों को अपनी फसलें कटवाने और उन्हें बाजारों तक पहुंचवाने के बारे में सरकारें कुछ ठोस कदम उठा सकती हैं। कोरोना की जांच के लिए हमारे वैज्ञानिक डाॅक्टरों ने कई सस्ते और प्रामाणिक उपकरण ढूंढ निकाले हैं। सरकार भीलवाड़ा पद्धति पर लाखों लोगों की जांच प्रतिदिन क्यों नहीं करवा सकती है ? शहरों में अटके हुए मजदूरों को अगर यात्रा करना है तो पहले उनकी जांच का इंतजाम भी जरुरी है। मुझे आश्चर्य है कि हिंदी के कुछ बड़े अखबारों के सिवाय कोई भी सरकारी और गैर-सरकारी टीवी और रेडियो चैनल हमारे घरेलू नुस्खों पर जोर नहीं दे रहा है। इसी तरह भारत में एक-दूसरे से दूरी बनाए रखने, ताज़ा खाना खाने, नमस्ते या सलाम करने की परंपरा का भी प्रचार ठीक से नहीं हो रहा हे। भारतीय संस्कृति के इन सहज उपायों का लाभ सारे संसार को मिले, ऐसी हमारी कोशिश क्यों नहीं है ?
आरोपित ‘लॉक डाउन’ से स्वैच्छिक ‘लॉक अप‘ की ओर ?
श्रवण गर्ग
नौ मिनट के सफलतापूर्वक किए गए देशव्यापी अंधेरे ने आगे आने वाले दिनों की सूरत पर अब काफ़ी रोशनी डाल दी है।जिस बात की इतने दिनों से हमें आशंका थी वह भी अब सच होती दिख रही है।इसमें ग़लत भी कुछ नहीं है।हम इस बात को ऐसे भी समझ सकते हैं:उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव को यह कहते हुए बताया गया है कि लॉक डाउन को पूरी तरह से समाप्त करने से पहले यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि अब एक भी कोरोना पॉज़िटिव व्यक्ति राज्य में नहीं बचा है,और इसमें वक्त लग सकता है।उत्तर प्रदेश की जनसंख्या बीस करोड़ से ऊपर है।हम खुद अब अपना हिसाब लगा सकते हैं।
ऐसे ही अब ज़रा लगभग आठ करोड़ की आबादी के मध्य प्रदेश की बात लें।कोरोना काल का कोई एक महीना सरकार गिराने-बचाने में बीत गया।अब केवल शिवराज ही सबकुछ हैं।दूसरा कोई मंत्री इतने बड़े प्रदेश में नहीं।स्वास्थ्य सेवा के ज़िम्मेदार लगभग सभी बड़े अफ़सर क्वॉरंटीन में क़ैद हैं।प्रदेश कैसे चल रहा है इसकी जानकारी केवल दिल्ली को ही हो सकती है।स्वास्थ्य सेवा में खप रहे कर्मी बिना किसी लीडर के जानें बचाने के काम में जुटे हैं।क्या ऐसी हालत में लॉक डाउन खोलने की कोई हिम्मत की जाएगी ?
मोदी के नौ मिनट के आह्वान को वास्तव में उनकी भावना के प्रथम चरण का प्रकटीकरण ही माना जाना था।दूसरे चरण की भावना सोमवार को पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ भाजपा के 40वें स्थापना दिवस पर वीडियो बातचीत में प्रकट हुई जिसके ज़रिए उन्होंने देश भर को संदेश दे दिया कि लड़ाई लम्बी चलने वाली है।रविवार के देशव्यापी जन-समर्थन से उत्साहित मोदी ने कहा कि इसने भारत को इस लम्बी लड़ाई के लिए तैयार कर दिया है।देश शायद प्रधानमंत्री के इस तरह के उद्बोधन की प्रतीक्षा नहीं कर रहा था।रविवार की रात जिन भी लोगों ने सड़कों पर पटाखे फोड़े होंगे और ऊधम मचाया होगा उनकी कल्पना से परे हो कि आरोपित ‘लॉक डाउन’, आगे किसी स्वैच्छिक ‘लॉक अप’ में भी बदल सकता है।
लॉक डाउन के खुलने की प्रतीक्षा समय बीतने के साथ-साथ हो सकता है इसलिए महत्वहीन होती जाए कि लोग भी अब धीरे-धीरे ‘स्थित प्रज्ञ’ होने की मुद्रा में पहुँचते जा रहे हैं।कोरोना का डर ऐसा बैठ गया है कि वे अब उस तरह शिकायतें नहीं कर रहे हैं जैसी कि शुरू के दिनों में करते थे।महामारी से निपटने के मामले में दुनिया भी शायद हमारी इसी खूबी की तारीफ़ कर रही है।प्रधानमंत्री ने भी घरों में बैठे-बैठे चिंतन करने के लिए हमें बहुत कुछ दे दिया है।क्या पता घरों के भीतर ही बंद बंद रहना इतना अच्छा लगने लगे कि बाहर निकलने से ही इनकार करने लगें ।इस और भी बड़ी समस्या का तब क्या इलाज होगा ?
देश के कोई दो सौ उद्योग-प्रमुखों के साथ सी आइ आइ (कन्फ़ेडरेशन आफ़ इंडियन इंडस्ट्री) द्वारा किए गए ऑनलाइन सर्वे में जो नतीजे आए हैं वे काफ़ी चौंकाने वाले हैं।सर्वे के अनुसार,कोरोना वायरस और उसके बाद लॉक डाउन के कारण बनी स्थितियों से देशभर में पंद्रह से तीस प्रतिशत लोगों का रोज़गार छिन सकता है।कम्पनियों के राजस्व और उनकी आय में होने वाली कमी के आँकड़े अलग हैं।इन लोगों में असंगठित क्षेत्र के वे लाखों लोग शामिल नहीं है जो इस समय सड़कों पर डेरा डाले हुए हैं।इस बीच तेलंगाना के मुख्यमंत्री को यह कहते हुए भी बताया गया है कि लॉक डाउन लोगों की ज़िंदगी बचाए जाने तक जारी रखा जा सकता है, अर्थव्यवस्था तो हम बाद में भी बचा लेंगे।पर आगे चलकर क्या होने वाला है उसका पता अभी तो सिर्फ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही है।

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