आलेख 23

किसानों को यदि भ्रम है तो उसे सरकार दूर क्यों नहीं करती ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
किसान नेताओं और केंद्र सरकार के नेताओं की बीच आज बात शुरु हो गई है। यह अच्छी बात है लेकिन यह बात कब शुरु हुई ? जब पंजाब और हरयाणा के हजारों किसानों ने सीधे दिल्ली पर धावा बोल दिया? मैं पूछता हूं कि संसद में कानून बनाने के पहले किसान नेताओं से विचार-विमर्श क्यों नहीं किया गया ? विपक्षी नेताओं का अभिमत क्यों नहीं जाना गया? इस कानून को इतनी झटपट क्यों थोप दिया गया? इसे संसदीय समिति को पहले क्यों नहीं सौंपा गया ? भाजपा के सहयोगी अकाली दल की मंत्री हरसिमरत कौर के इस्तीफे के बावजूद सरकार ने अपने कानून पर पुनर्विचार करने की बात नहीं सोची। संसद के अल्पकालीन सत्र में इन कृषि-विधेयकों पर सांगोपांग बहस भी ठीक से नहीं हो सकी।
अब जबकि दिल्ली पर किसानों की भीड़ जमा होने लगी तो सरकार के होश फाख्ता हो गए। वे दिल्ली में न घुस आएं, इसलिए उन पर क्या-क्या जुल्म नहीं किए गए। पंजाब और हरयाणा के किसान इस बार अपना राशन-पानी लेकर दिल्ली पहुंचे हैं। वे चौधरी चरणसिंह और महेंद्रसिंह टिकैत के किसानों की तरह दो-चार दिन के लिए नहीं आए हैं। क्या ही अच्छा होता कि प्रधानमंत्री खुद उनसे मिलने की पहल करते लेकिन अब भी सरकार सत्ता के अहंकार से मुक्त होकर किसानों से बात करेगी तो इस समस्या का सर्वहितकारी समाधान हो सकता है।
यदि शासन-विरोधी कोई भी आंदोलन खड़ा होता है तो विपक्षी दल चुप क्यों बैठेंगे ? वे बोल रहे हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि यह आंदोलन खालिस्तिानियों और कांग्रेसियों ने खड़ा किया है। कुछ किसानों ने भाजपा और नरेंद्र मोदी के बारे में जो जहरीले बयान दिए हैं, वे निंदनीय हैं लेकिन यह आंदोलन अपने ही पांवों पर चलकर दिल्ली पहुंचा है। भाजपा की केंद्र सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि जो पंजाब कल तक आतंकवाद का गढ़ था, वहां बगावत के बीज फिर से न फूटने लगें।
इस किसान आंदोलन में पंजाब और हरयाणा के अलावा अन्य प्रांतों के किसान भी जुड़ने लगे हैं। खेती के संबंध में जो तीन कानून बने हैं, कुछ किसान नेता उन सभी को रद्द करने की मांग कर रहे हैं लेकिन आंदोलनकारी किसानों का ध्यान मुख्य रुप से एक ही मुद्दे पर टिका हुआ है। उन्हें शक है कि उनकी उपज पर उन्हें जो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिलता है और मंडियों में उनका माल जिस आसानी से बिक जाता है, उनकी यह सुविधा अब चुप-चाप खत्म हो जाएगी और वे बड़े-बड़े पूंजीपतियों की कंपनियों के हाथ के खिलौने बन जाएंगे। उनका अनाज और फसलें फिर मिट्टी के मोल बिकेंगी।
सरकार ने जो नए कानून बनाए हैं, उनके अनुसार अब किसान अपना माल मंडियों के अलावा बाहरी बाजारों में भी बेच सकेंगे। किसानों को सरकार की इस घोषणा पर भरोसा नहीं है कि उन्हें अपने माल के ज्यादा पैसे मिलेंगे या कंपनियों से सौदा हो जाने पर उन्हें बीज, खाद, सिंचाई, बिक्री आदि की बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। उन्हें डर है कि मंडी-व्यवस्था धीरे-धीरे अपने आप खत्म हो जाएगी। यह डर दो कारणों से मजबूत हुआ है। पहला तो केंद्रीय वित्त मंत्री का नवंबर 2019 का वह बयान है, जिसमें उन्होंने मंडी-व्यवस्था को ‘गई-बीती’बताया था और यह भी कह दिया था कि अब उसके विदा होने के दिन आ गए हैं। दूसरा कारण है, यह प्रचार कि मोदी सरकार कुछ पूंजीपतियों को विशेष लाभ पहुंचाने के लिए कमर कसे हुए है।
सरकार का कहना है कि यह दुष्प्रचार भर है। यह गलतफहमी है। इसे विपक्ष फैला रहा है। मान लिया जाए कि यह ठीक है तो सरकार इस गलतफहमी को पिछले दो-ढाई माह में दूर क्यों नहीं कर सकी ? भाजपा में प्रचार-पंडितों की कमी नहीं है। उन्हें किसानों को सिर्फ एक बात ही समझानी है। वह यह कि समर्थन मूल्य खत्म नहीं होगा। तो वे न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा को कानूनी रुप क्यों नहीं दे देते ? यह ठीक है, अभी भी उसके पीछे कानून नहीं है लेकिन अब गलतफहमी इतनी फैल गई है कि उसे कानूनी रुप दे देने में सरकार को क्या संकोच है ? कुछ अन्य छोटे-मोटे मुद्दे भी हैं, जिन पर सहमति होना कठिन नहीं है।
सरकार समय-समय पर फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती रहती है। अभी तक सिर्फ 23 फसलों पर यह होता है जबकि भारत में कम से कम 200 तरह की फसलें होती हैं। पंजाब और हरयाणा में गेहूं और धान की फसलें सबसे ज्यादा मंडियों में बिकती हैं। सरकार इनकी सबसे बड़ी खरीद करती है। देश की कुल उपज का सिर्फ 6 प्रतिशत माल ही मंडियों में बिकता है। बाकी 96 प्रतिशत फसलों के लिए भी सरकार को कोई कमोबेश ‘दाम बांधो’ नीति बनानी चाहिए या नहीं ? इन फसलों को बेचनेवाले किसान ही गरीबी, बेकारी और लूट के शिकार होते हैं। उन्हें अपनी लागत से सवाई या डेढ़ी कीमत मिले, इसका प्रबंध भी सरकार क्यों नहीं करती ? केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने 16 सब्जियों के न्यूनतम मूल्य घोषित किए हैं। इनसे किसानों को अपनी लागत से 20 प्रतिशत मूल्य ज्यादा मिलेगा और उन्हें नुकसान होने पर 32 करोड़ रु. तक की सहायता सरकार देगी। भारतीय खेती को अमेरिका की तरह खुला बाजार दे देना तो ठीक है लेकिन सरकार उन्हें क्या अमेरिकी किसानों की तरह प्रतिवर्ष 62 हजार डालर की सहायता दे सकती है ? वहां खेती में 2 प्रतिशत से भी कम लोग हैं जबकि भारत में लगभग 50 प्रतिशत लोग खेती से जुड़े हुए हैं। यदि खेती खुलती है तो उत्पादन बढ़ेगा, उसकी गुणवत्ता बढ़ेगी और भारत बड़ा निर्यातक देश भी बन सकता है लेकिन खेती के मूलाधार किसान का विश्वास जीते बिना इस लक्ष्य की प्राप्ति असंभव है।

भ्रष्टाचार का रोग
सिद्धार्थ शंकर
भ्रष्टाचार के मामले में भारत का स्थान एक बार फिर एशिया में सबसे ऊपर दर्ज किया गया है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक यहां 39 फीसद लोगों को रिश्वत देकर अपना काम कराना पड़ता है। 46 प्रतिशत लोगों को प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचने के लिए निजी संपर्कों का सहारा लेना पड़ता है। इस साल यह आंकड़ा पिछले सालों की तुलना में कुछ बढ़ा हुआ ही है। यह तब है जब पिछले छह सालों में भ्रष्टाचार दूर करने का नारा बहुत जोर-शोर से लगता आ रहा है और अनियमितताएं दूर करने, प्रशासनिक कामकाज में पारदर्शिता लाने के लिए सरकार ने अनेक कड़े उपाय किए हैं। दफ्तरों में समय पर अधिकारियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए बायोमीट्रिक हाजिरी प्रणाली लगाई गईं। तमाम दफ्तरों को इंटरनेट के माध्यम से जोड़ा गया और आम लोगों को अपनी शिकायतें दर्ज कराने, छोटे-मोटे दस्तावेज प्राप्त करने संबंधी अर्जियां देने आदि की आनलाइन व्यवस्था की गई। कई सेवाओं के लिए सरकारी कार्यालयों की खिड़कियों पर कतार लगाने की जरूरत समाप्त कर दी गई। माना गया कि इससे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता आएगी और आम लोगों को अनावश्यक बाबुओं की बेईमानियों का शिकार नहीं होना पड़ेगा। मगर इन सब कुछ के बावजूद अगर रिश्वतखोरी की दर पहले से बढ़ी दर्ज हुई है तो हैरानी स्वाभाविक है।
बाबुओं में रिश्वतखोरी की प्रवृत्ति बनी रहने से अनेक परियोजनाएं बेवजह लटकाई जाती रहती हैं। फिर उनमें रिश्वत का चलन होने से लागत भी बढ़ती रहती है। मगर आर्थिक विकास पर जोर देने और आम लोगों और प्रशासन के बीच की दूरी खत्म करने के दावों के बावजूद अगर रिश्वतखोरी की प्रवृत्ति पर काबू नहीं पाया जा सका है और प्रशासनिक अधिकारियों की जनता से दूरी बढ़ती गई है, तो यह सरकार की विफलता ही कही जाएगी। भारत में रिश्वतखोरी की प्रवृत्ति इस कदर जड़ें जमा चुकी है कि आम लोगों में यह धारणा दृढ़ हो गई है कि बिना रिश्वत के कोई काम हो ही नहीं सकता। अपनी जमीन-जायदाद के दस्तावेजों की नकल लेने जैसे छोटे-मोटे काम भी बिना रिश्वत के नहीं होते। कचहरियों और जिला कार्यालयों में तो अलग-अलग कामों के लिए रिश्वत की दरें तक तय हैं।
इस तरह बहुत सारे लोग अधिकारियों को रिश्वत देकर गैरकानूनी तरीके से अपना काम कराते रहते हैं और वास्तविक हकदारों को उनका हक नहीं मिल पाता। रिश्वतखोरी और जनता से अधिकारियों की दूरी, दोनों आपस में जुड़े हुए हैं। अधिकारियों से लोगों की नजदीकी बढ़ेगी, वे उनकी समस्याएं सीधे सुनने लगेंगे, तो रिश्वत का चक्र टूट जाएगा। एक लोकतांत्रिक देश में इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि वहां के नागरिक अपने लोकसेवकों से सीधे न मिल पाएं, उसके लिए उन्हें किसी संपर्क सूत्र की जरूरत पड़े। अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसे में लोग अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से कहां तक मिल पाते होंगे। सरकार अगर सचमुच सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाने, भ्रष्टाचार पर काबू पाने को लेकर प्रतिबद्ध है, तो उसे नौकरशाही और नागरिकों के बीच की दूरी को खत्म करने का प्रयास करना चाहिए।
कहने को ज्यादातर सेवाएं ऑनलाइन कर दी गई हैं और इसका मकसद भी यह है कि लोगों को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल सके। लेकिन व्यावहारिक रूप से यह संभव नहीं हो पा रहा है। बड़ी समस्या यह है कि घूसखोरी और भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतों के लिए हमारे पास पुख्ता तंत्र का अभाव है। ज्यादातर लोगों को यह पता नहीं होता कि ऐसे मामलों की शिकायतें कहां की जाएं। जहां जांच होती भी है, वहां इसकी प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल है कि शिकायतकर्ता को इस तरह का कदम उठाना महंगा पड़ा जाता है। सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें और काम न रुके, इस डर के मारे लोग भी छोटे-मोटे कामों के लिए घूस देकर पिंड छुड़ाना बेहतर समझते हैं। पुलिस थाने और अदालतों में भ्रष्टाचार के किस्से कौन नहीं जानता? भ्रष्टाचार से लडऩे के लिए सरकार को तो अपने स्तर पर कड़े कदम उठाने ही होंगे, साथ ही समाज को भी जागरूक बनने की जरूरत है।

केरल का उल्टा अध्यादेश
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
केरल की वामपंथी सरकार को हुआ क्या है ? उसने ऐसा अध्यादेश जारी करवा दिया है, जिसे अदालतें तो असंवैधानिक घोषित कर ही देंगी, उस पर अब उसके विपक्षी दलों ने भी हमला बोल दिया है। इस अध्यादेश का उद्देश्य यह बताया गया है कि इससे महिलाओं और बच्चों पर होनेवाले शाब्दिक हमलों से उन्हें बचाया जा सकेगा। केरल पुलिस एक्ट की इस धारा 118 (ए) के अनुसार उस व्यक्ति को तीन साल की जेल या 10 हजार रु. जुर्माना या दोनों होंगे, ”जो किसी व्यक्ति या समूह को धमकाएगा, गालियां देगा, शर्मिंदा या बदनाम करेगा।” इस तरह के, बल्कि इससे भी कमजोर कानून को 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था। वह 2000 में बने सूचना तकनीक कानून की धारा 66 ए थी। अदालत ने उसे संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध माना था। केरल के इस अध्यादेश में तो किसी खबर या लेख या बहस के जरिए यदि किसी के प्रति कोई गलतफहमी फैलती है या उसे मानसिक कष्ट होता है तो उसी आरोप में पुलिस उसे सीधे गिरफ्तार कर सकती है। पुलिस को इतने अधिकार दे दिए गए हैं कि वह किसी शिकायत या रपट के बिना भी किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है। क्या केरल में अब रुस का स्तालिन-राज या चीन का माओ-राज कायम होगा ?
जाहिर है कि यह अध्यादेश बिना सोचे-समझे जारी किया गया है। बिल्कुल इसी तरह का गैर-जिम्मेदाराना काम केरल की वामपंथी सरकार ने ‘नागरिकता संशोधन कानून’ के विरुद्ध विधानसभा में प्रस्ताव पारित करके किया था। वह संघीय कानून के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में भी चली गई थी। देश की दक्षिणपंथी सरकारों पर जिस संकीर्णता का आरोप हमारे वामपंथी लगाते हैं, वैसे ही और उससे कहीं ज्यादा संकीर्णता अब वे खुद भी दिखा रहे हैं। केरल की कम्युनिस्ट सरकार इस कानून के सहारे अनेक पत्रकारों, लेखकों और विपक्षी नेताओं को डराने और कठघरों में खड़ा करने का काम करेगी। आश्चर्य तो इस बात का है कि आरिफ मोहम्मद खान जैसे राज्यपाल ने, जो अनुभवी राजनीतिज्ञ और कानून के पंडित हैं, ऐसे अध्यादेश पर दस्तखत कैसे कर दिए ? उन्होंने पहले भी राज्य सरकार को कुछ गलत पहल करने से रोका था और इस अध्यादेश को भी वे लगभग डेढ़ माह तक रोके रहे लेकिन केरल या केंद्र के सभी वामपंथी और विपक्षी नेताओं ने भी मुंह पर पट्टी बांधे रखी तो उन्होंने भी सोचा होगा कि वे अपने सिर बल क्यों मोल लें ? उनके दस्तखत करते ही कांग्रेसी और भाजपा नेताओं तथा देश के बड़े अखबारों ने इस अध्यादेश की धज्जियां उड़ाना शुरु कर दीं। इसके पहले कि सर्वोच्च न्यायालय इसे रद्द कर दे, केरल सरकार इसे अपनी मौत मर जाने दे तो बिल्कुल सही होगा।

भुखमरी की समस्या
सिद्धार्थ शंकर
पिछले कई दशक से दुनिया के सामने भुखमरी की बढ़ती समस्या एक बड़ी चुनौती बन कर उभरी है। अमूमन हर अगली वैश्विक भुखमरी सूचकांक की रिपोर्ट यह बताती है कि अब तक इस संकट से उबरने के उपाय संतोषजनक नहीं रहे हैं। यह समस्या सामान्य स्थितियों में पहले ही गहरा रही थी, लेकिन इस साल मार्च में कोरोना महामारी की वजह से लागू की गई पूर्णबंदी के बाद हालात और ज्यादा जटिल हो गए हैं। अब यूनिसेफ की ओर से जो आशंका जताई गई है, अगर उस पर समय रहते गौर नहीं किया गया और विश्व के समर्थ देशों ने सक्रियता नहीं दिखाई तो आने वाले समय में खासतौर पर गरीब देशों के कमजोर नागरिक समुदायों को भयावह स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
यूनिसेफ ने कहा है कि अगला वर्ष इस साल की तुलना में ज्यादा खराब होगा और अगर अरबों डॉलर की सहायता नहीं मिली तो 2021 में भुखमरी के मामले बेतहाशा बढ़ जाएंगे। वैश्विक महामारी से पैदा हुए संकट के बावजूद दुनिया के ज्यादातर समर्थ देशों और उनके नेताओं ने इस साल धन दिया, अलग-अलग मदों में राहत पैकेज दिए। लेकिन यह सरोकार जैसा 2020 में दिखा, अगले साल इसके आसार नहीं दिख रहे।
यही वजह है कि यूनिसेफ और उसके प्रमुख लगातार वैश्विक नेताओं से इस बारे में बात कर रहे हैं और धन के अभाव में आने वाले वक्त में खराब होते हालात के बारे में दुनिया को आगाह कर रहे हैं। यह एजेंसी विश्व के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे संघर्षों या फिर आपदा के दौरान संकट से घिरे या शरणार्थी शिविरों में रह रहे लोगों की मदद करती है। लाखों भूखे लोगों को खाने-पीने के सामान मुहैया करवाने के लिए इसके कर्मचारी कई तरह के जोखिम के बीच काम करते हैं।
भुखमरी का सामना करने में इस संस्था के प्रयासों को देखते हुए ही इसे शांति के नोबेल पुरस्कार से भी नवाजा गया है। करीब छह महीने पहले संयुक्त राष्ट्र भी कोरोना महामारी के चलते भुखमरी का संकट गहराने की चेतावनी दे चुका है। मगर गरीबी और दूसरे कारणों से इस समस्या की गंभीर स्थिति में कुछ देशों में एक ओर जरूरतमंद आबादी भूख से दो-चार थी, तो दूसरी ओर वहां गोदामों में पड़ा अनाज सड़ कर बर्बाद हो रहा था। जाहिर है, व्यवस्थागत लापरवाही और सरकारों की इच्छाशक्ति के अभाव ने भुखमरी की समस्या गहराने में ही अपनी भूमिका निभाई है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि कई देश अपने स्तर पर वैश्विक भुखमरी से लडऩे के लिए संबंधित संस्थाओं को सहायता राशि उपलब्ध कराते रहे हैं। लेकिन यह भी सच है कि पिछले आठ-नौ महीनों से दुनिया भर में जैसे हालात बने हुए हैं, महामारी का सामना करने के क्रम में लगभग सभी देशों की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है, उसमें उनसे पहले की तरह मदद की उम्मीद शायद नहीं की जा सकती है।
ज्यादातर देश अपनी बर्बाद हो चुकी अर्थव्यवस्था को संभालने में ही खुद को लाचार महसूस कर रहे हैं। लेकिन अगर इन हालात में मदद के अभाव का असर बढ़ती भुखमरी से लड़ाई पर पडऩा शुरू हुआ तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैसा संकट खड़ा हो सकता है। पहले ही विश्व के बहुत सारे विकासशील और गरीब देशों में खाद्यान्न के अभाव के चलते एक बड़ी आबादी के सामने जीने तक की स्थितियां मुश्किल हो चली हैं। अब अगर धन की कमी के चलते भुखमरी पर काबू पाने के अभियान बाधित होते हैं, तो इससे एक समस्या से बचाव के क्रम में दूसरे संकट के गहराने के हालात बनेंगे।

काबुल में टिकी रहें फौजें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने घोषणा की है कि वह अपनी सेना के 2500 जवानों को अफगानिस्तान से वापस बुलवाएगा। यह काम क्रिसमिस के पहले ही संपन्न हो जाएगा। जिस अफगानिस्तान में अमेरिका के एक लाख जवान थे, वहां सिर्फ 2 हजार ही रह जाएं तो उस देश का क्या होगा ? ट्रंप ने अमेरिकी जनता को वादा किया था कि वे अमेरिकी फौजों को वहां से वापस बुलवाकर रहेंगे क्योंकि अमेरिका को हर साल उन पर 4 बिलियन डाॅलर खर्च करना पड़ता है, सैकड़ों अमेरिकी फौजी मर चुके हैं और वहां टिके रहने से अमेरिका को कोई फायदा नहीं है। 2002 से अभी तक अमेरिका उस देश में 19 बिलियन डाॅलर से ज्यादा पैसा बहा चुका है। ट्रंप का तर्क है कि अमेरिकी फौजों को काबुल में अब टिकाए रखने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि अब तो सोवियत संघ का कोई खतरा नहीं है, पाकिस्तान से पहले-जैसी घनिष्टता नहीं है और ट्रंप के अमेरिका को दूसरों की बजाय खुद पर ध्यान देना जरुरी है। ट्रंप की तरह ओबामा ने भी अपने चुनाव-अभियान के दौरान फौजी वापसी का नारा दिया था लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने इस मामले में काफी ढील दे दी थी लेकिन ट्रंप ने फौजों की वापसी तेज करने के लिए कूटनीतिक तैयारी भी पूरी की थी। उन्होंने जलमई खलीलजाद के जरिए तालिबान और काबुल की गनी सरकार के बीच संवाद कायम करवाया और इस संवाद में भारत और पाकिस्तान को भी जोड़ा गया। माना गया कि काबुल सरकार और तालिबान के बीच समझौता हो गया है लेकिन वह कागज पर ही अटका हुआ है। अमल में वह कहीं दिखाई नहीं पड़ता। आए दिन हिंसक घटनाएं होती रहती हैं। इस समय नाटो देशों के 12 हजार सैनिक अफगानिस्तान में हैं। अफगान फौजियों की संख्या अभी लगभग पौने दो लाख है जबकि उसके-जैसे लड़ाकू देश को काबू में रखने के लिए करीब 5 लाख फौजी चाहिए। मैं तो चाहता हूं कि बाइडन-प्रशासन वहां अपने, नाटो और अन्य देशों के 5 लाख फौजी कम से कम दो साल के लिए संयुक्तराष्ट्र की निगरानी में भिजवा दे तो अफगानिस्तान में पूर्ण शांति कायम हो सकती है। ट्रंप को अभी अपना वादा पूरा करने दें (25 दिसंबर तक)। 20 जनवरी 2021 को बाइडन जैसे ही शपथ लें, काबुल में वे अपनी फौजें डटा दें। हालांकि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान पहली बार काबुल पहुंचे हैं लेकिन तालिबान को काबू करने की उनकी हैसियत ‘ना’ के बराबर है। बाइडन खुद अमेरिकी फौजों की वापसी के पक्ष में बयान दे चुके हैं लेकिन उनकी वापसी ऐसी होनी चाहिए कि अफगानिस्तान में उनकी दुबारा वापसी न करना पड़े। यदि अफगानिस्तान आतंक का गढ़ बना रहेगा तो अमेरिका सहित भारत-जैसे देश भी हिंसा के शिकार होते रहेंगे।

सीबीआई की हद
सिद्धार्थ शंकर
सीबीआई बिना राज्य सरकार की इजाजत के किसी प्रदेश में जांच शुरू नहीं कर सकती। केंद्र सरकार भी बिना राज्य सरकार की अनुमति के जांच एजेंसी को इसके लिए मंजूरी नहीं दे सकती। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में आरोपी अधिकारियों की याचिका पर यह फैसला सुनाया है। हाल में राजस्थान, पश्चिम बंगाल, झारखंड, केरल, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, पंजाब और मिजोरम अपने यहां सीबीआई को जांच की अनुमति देने से इनकार कर चुके हैं। इन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं। इस स्थिति में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अहम हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट के जज ए.एम. खानविल्कर और बी.आर. गवई ने फैसला सुनाते वक्त दिल्ली स्पेशल पुलिस स्टेब्लिशमेंट (डीएसपीई) एक्ट का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि धारा-5 केंद्र सरकार को केंद्र शासित प्रदेशों से परे सीबीआई के सदस्यों की शक्तियों और अधिकार बढ़ाने की ताकत देती है। यह तब तक मंजूर नहीं है, जब तक कि कोई राज्य इस तरह के विस्तार के लिए अपनी सहमति नहीं देता है। राज्य डीएसपीईएक्ट की धारा-6 के तहत अपने क्षेत्र के भीतर इसके लिए सहमति देता है। जाहिर है यह प्रावधान संविधान के संघीय चरित्र के मुताबिक हैं। इसे संविधान के बुनियादी ढांचे में से एक माना गया है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि सीबीआई देश की सबसे प्रमुख जांच एजेंसी है। बड़े घोटालों की जांच कर उन्हें निष्कर्ष तक पहुंचाती रही है। आज भी नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, विजय माल्या के आर्थिक घोटालों और राज्यों के विवादों की जांच सीबीआई ही कर रही है। शीर्ष अदालत भी प्रमुख घपलों की जांच उसी को सौंपती रही है। एक किस्म से सीबीआई न्याय की सूत्रधार है, लेकिन आज वह खुद भी कटघरे में खड़ी है। जब एजेंसी के निदेशक और विशेष निदेशक को ही सर्वोच्च न्यायालय ने क्लीन चिट नहीं दी, तो वह दूसरों को न्याय क्या दिलाएगी, सवाल बुनियादी यही है? इस सवाल पर सबसे पहले आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की टिप्पणी आई थी कि सीबीआई अब भरोसे के लायक नहीं रही। नतीजतन तब आंध्र ने सबसे पहले सीबीआई पर अपनी सहमति वापस ली थी। उसी तर्ज पर पश्चिम बंगाल ने कार्रवाई की। हाल में राजस्थान, झारखंड, केरल, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, पंजाब और मिजोरम अपने यहां सीबीआई को जांच की अनुमति देने से इनकार कर चुके हैं।
बेशक कुछ बड़े नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में सीबीआई जांच की घुड़कियां दी जाती रही हैं, ताकि वे नेता केंद्र सरकार की राजनीति के मुताबिक चलें, लेकिन आज भ्रष्टाचार के दाग खुद सीबीआई पर ही हैं।
दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के सेक्शन 2 के तहत सीबीआई सिर्फ केंद्र शासित प्रदेशों में सेक्शन 3 के तहत अपराधों पर खुद से जांच शुरू कर सकती है। राज्यों में जांच शुरू करने से पहले सीबीआई को सेक्शन 6 के तहत राज्य सरकार से इजाजत लेना जरूरी है।
सीबीआई को चार तरह से केस दिया जा सकता है- केंद्र सरकार खुद सीबीआई जांच का आदेश दे। हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट सीबीआई को जांच के आदेश दे तो। राज्य सरकार केंद्र सरकार से सीबीआई जांच की सिफारिश करे। या फिर
किसी केस को लेकर पब्लिक की डिमांड हो। इस केस को भी सरकार ही तय करती है। केंद्र सरकार के 2017 के आंकड़े के मुताबिक, लगभग 1200 केस अभी सीबीआई में पेंडिंग हैं। जून 2014 से जून 2017 के बीच सीबीआई को 791 केस मिले। यानी औसतन 263 केस हर साल मिले। इसमें 2014 में 207, 2015 में 326, 2016 में 151 और जनवरी से जून 2017 के बीच 107 केस सीबीआई को दिए गए।

ईश्वर बड़ा कि मनुष्य ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
राष्ट्रीय मुस्लिम मंच ने इस बार दीवाली काफी उत्साहपूर्वक मनाई। जिस उत्साह से यह मंच ईद मनाता है, वही उत्साह दीवाली पर भी दिखाई दिया। इस मंच के संयोजक और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेशकुमार के मुंह से इस अवसर पर एक अदभुत वाक्य निकला। उन्होंने कहा ‘सभी त्यौहार, सभी भारतीयों के’, यही सच्ची भारतीयता है। मेरी राय है कि यही सच्चा हिंदुत्व है। हिंदुत्व और भारतीयता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दो तो वे नाम के हैं। वास्तव में तो वे दोनों एक ही हैं। यदि हम अपने सभी देशवासियों को अपना भाई समझते हैं या संसार के सारे मनुष्यों को एक ही पिता की संतान समझते हैं तो क्या हमें एक-दूसरे का सम्मान नहीं करना चाहिए? एक मनुष्य दूसरे का सम्मान करे, इसका अर्थ यह नहीं कि उसने दूसरे के खुदा को अपना ईश्वर मान लिया है। कोई आदमी ऐसा है, दुनिया में, जिसने ईश्वर या यहोवा या गाॅड या खुदा को देखा है ? धर्मग्रंथ कहते हैं कि उस ऊपरवाले ने मनुष्य और प्रकृति को बनाया है। बाइबिल का ओल्ड टेस्टामेंट कहता है कि ‘‘ईश्वर मनुष्य का पिता है।’’ लेकिन मैं मानता हूं कि मनुष्य ही ईश्वर का पिता है। दुनिया के मनुष्यों ने अपनी पसंद के मुताबिक तरह-तरह के ईश्वर गढ़ लिये हैं। इसीलिए मैं कहता हूं कि एक-दूसरे के ईश्वर का सम्मान करने से भी बड़ा है, एक-दूसरे का सम्मान करना। सभी अपने-अपने ईश्वर में सुदृढ़ श्रद्धा रखें लेकिन एक-दूसरे का सम्मान करें तो उनके ईश्वरों का सम्मान अपने आप हो जाएगा। इसीलिए सबके त्यौहारों को सब मनाएं तो इसमें कोई बुराई नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि सब लोग अपना छोड़ दें और एक-दूसरे का पूजा-पाठ करने लगें। मैं स्वयं मूर्ति पूजा नहीं करता हूं लेकिन अफगानिस्तान के एक उप-प्रधानमंत्री को मैं जब बिरला मंदिर दिखाने ले गया तो उन्होंने कहा मैं पूजा कर लूं तो मैंने कहा जरुर कर लीजिए। 1969 में जब मैं पहली बार वेटिकन गया तो पोप की प्रार्थना सभा में शामिल होने में मुझे कोई एतराज नहीं हुआ। पेशावर की नमाजे-तरावी और लंदन के यहूदी मंदिर (साइनेगाॅग) में बैठने में भी मुझे कुछ अटपटा नहीं लगा। इसी तरह सरस्वती की मूर्ति पर लगभग हर सभा में मुझे माला चढ़ानी पड़ती है, क्योंकि मैं उस पत्थर की मूर्ति से नहीं, उस मूर्ति को वहां रखनेवालों से प्रेम करता हूं। यदि आपके दिल में सभी मनुष्यों के लिए प्रेम नहीं है तो ईश्वर के लिए प्रेम कहां से आएगा।

एग्जिट पोल की साख का सवाल
योगेश कुमार गोयल
बिहार विधानसभा चुनाव के फैसले के बाद चुनाव परिणाम के पूर्वानुमानों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अधिकतर सर्वेक्षणों में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की अगुवाई मंा बिहार की अगली सरकार बनने का एकतरफा अनुमान लगाया गया था। 15 साल के नीतीश-भाजपा गठबंधन सरकार के खिलाफ मतदाताओं ने भारी नाराजगी से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के बहुत ही खराब प्रदर्शन का अंदेशा था। लेकिन चुनाव परिणाम लगभग उलट आए। परिणामों के पूर्वानुमानों के बार-बार के विफल होने के बाद इसकी साख पर सवाल उठाया जा रहा है।
चुनावी सर्वे कराए जाने की शुरूआत दुनिया में सर्वप्रथम अमेरिका में हुई थी। अमेरिकी सरकार के कामकाज पर लोगों की राय जानने के लिए जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन ने इस विधा को अपनाया, जिन्हें ओपिनियन पोल सर्वे का जनक माना जाता है। चुनाव उपरांत उन्होंने पाया कि उनके द्वारा एकत्रित सैंपल तथा चुनाव परिणामों में ज्यादा अंतर नहीं था। उनका यह तरीका काफी विख्यात हुआ। इससे प्रभावित होकर ब्रिटेन तथा फ्रांस ने भी इसे अपनाया और बहुत बड़े स्तर पर ब्रिटेन में 1937 जबकि फ्रांस में 1938 में ओपिनियन पोल सर्वे कराए गए। उन देशों में भी ओपिनियन पोल के नतीजे बिल्कुल सटीक साबित हुए थे। जर्मनी, डेनमार्क, बेल्जियम तथा आयरलैंड में जहां चुनाव पूर्व सर्वे करने की पूरी छूट दी गई है, वहीं चीन, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको इत्यादि कुछ देशों में इसकी छूट तो है किन्तु शर्तों के साथ।
भारत में वैसे तो वर्ष 1960 में ही एग्जिट पोल अर्थात् चुनाव पूर्व सर्वे का खाका खींच दिया गया था। तब ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज’ (सीएसडीएस) द्वारा इसे तैयार किया गया था। हालांकि माना यही जाता है कि एग्जिट पोल की शुरूआत नीदरलैंड के समाजशास्त्री तथा पूर्व राजनेता मार्सेल वॉन डैम द्वारा की गई थी, जिन्होंने पहली बार 15 फरवरी 1967 को इसका इस्तेमाल किया। उस समय नीदरलैंड में हुए चुनाव में उनका आकलन बिल्कुल सटीक रहा था।
भारत में एग्जिट पोल की शुरूआत का श्रेय इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन के प्रमुख एरिक डी कोस्टा को दिया जाता है, जिन्हें चुनाव के दौरान इस विधा द्वारा जनता के मिजाज को परखने वाला पहला व्यक्ति माना जाता है। चुनाव के दौरान इस प्रकार के सर्वे के माध्यम से जनता के रूख को जानने का काम सबसे पहले एरिक डी कोस्टा ने ही किया था। शुरूआत में देश में सबसे पहले इन्हें पत्रिकाओं के माध्यम से प्रकाशित किया गया जबकि बड़े पर्दे पर चुनावी सर्वेक्षणों ने 1996 में उस समय दस्तक दी, जब दूरदर्शन ने सीएसडीएस को देशभर में एग्जिट पोल कराने के लिए अनुमति प्रदान की।
1998 में चुनाव पूर्व सर्वे अधिकांश टीवी चौनलों पर प्रसारित किए गए और तब ये बहुत लोकप्रिय हुए थे लेकिन कुछ राजनीतिक दलों द्वारा इन पर प्रतिबंध लगाए जाने की मांग पर 1999 में चुनाव आयोग द्वारा ओपिनियन पोल तथा एग्जिट पोल पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। तत्पश्चात् एक अखबार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के फैसले को निरस्त कर दिया। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले एकबार फिर एग्जिट पोल पर प्रतिबंध लगाए जाने की मांग उठी और मांग के जोर पकड़ने पर चुनाव आयोग ने प्रतिबंध के संदर्भ में कानून में संशोधन के लिए तुरंत एक अध्यादेश लाए जाने के लिए कानून मंत्रालय को पत्र लिखा। उसके बाद जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में संशोधन करते हुए यह सुनिश्चित किया गया कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान जबतक अंतिम वोट नहीं पड़ जाता, तब तक किसी भी रूप में एग्जिट पोल का प्रकाशन या प्रसारण नहीं किया जा सकता।
यही कारण है कि एग्जिट पोल मतदान प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही दिखाए जाते हैं। मतदान खत्म होने के कम से कम आधे घंटे बाद तक एग्जिट पोल का प्रसारण नहीं किया जा सकता। इनका प्रसारण तभी हो सकता है, जब चुनावों की अंतिम दौर की वोटिंग खत्म हो चुकी हो। ऐसे में यह जान लेना जरूरी है कि आखिर एग्जिट पोल के प्रसारण-प्रकाशन की अनुमति मतदान प्रक्रिया के समापन के पश्चात् ही क्यों दी जाती है? जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 126ए के तहत मतदान के दौरान ऐसा कोई कार्य नहीं होना चाहिए, जो मतदाताओं के मनोविज्ञान पर किसी भी प्रकार का प्रभाव डाले अथवा मत देने के उनके फैसले को प्रभावित करे। यही कारण है कि मतदान से पहले या मतदान प्रक्रिया के दौरान एग्जिट पोल सार्वजनिक नहीं किए जा सकते बल्कि मतदान प्रक्रिया पूरी होने के आधे घंटे बाद ही इनका प्रकाशन या प्रसारण किया जा सकता है। यह नियम तोड़ने पर दो वर्ष की सजा या जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं।
यदि कोई चुनाव कई चरणों में भी सम्पन्न होता है तो एग्जिट पोल का प्रसारण अंतिम चरण के मतदान के बाद ही किया जा सकता है लेकिन उससे पहले प्रत्येक चरण के मतदान के दिन डाटा एकत्रित किया जाता है। एग्जिट पोल से पहले चुनावी सर्वे किए जाते हैं और सर्वे में बहुत से मतदान क्षेत्रों में मतदान करके निकले मतदाताओं से बातचीत कर विभिन्न राजनीतिक दलों तथा प्रत्याशियों की हार-जीत का आकलन किया जाता है।
अधिकांश मीडिया संस्थान कुछ प्रोफेशनल एजेंसियों के साथ मिलकर एग्जिट पोल करते हैं। ये एजेंसियां मतदान के तुरंत बाद मतदाताओं से यह जानने का प्रयास करती हैं कि उन्होंने अपने मत का प्रयोग किसके लिए किया है। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर यह जानने का प्रयास किया जाता है कि कहां से कौन हार रहा है और कौन जीत रहा है। इस आधार पर किए गए सर्वेक्षण से जो व्यापक नतीजे निकाले जाते हैं, उसे ही ‘एग्जिट पोल’ कहा जाता है। चूंकि इस प्रकार के सर्वे मतदाताओं की एक निश्चित संख्या तक ही सीमित रहते हैं, इसलिए एग्जिट पोल के अनुमान हमेशा सही साबित नहीं होते।

भारत-चीनः खुश-खबर
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत-चीन तनाव खत्म होने के संकेत मिलने लगे हैं। अभी दोनों तरफ की सेनाओं ने पीछे हटना शुरु नहीं किया है लेकिन दोनों इस बात पर सहमत हो गई हैं कि मार्च-अप्रैल में वे जहां थीं, वहीं वापस चली जाएंगी। उनका वापस जाना भी आज-कल में ही शुरु होनेवाला है। तीन दिन में 30-30 प्रतिशत सैनिक हटेंगे। जितने उनके हटेंगे, उतने ही हमारे भी हटेंगे। उन्होंने पिछले चार-छह माह में लद्दाख सीमांत पर हजारों नए सैनिक डटा दिए हैं। चीन ने तोपों, टैंकों और जहाजों का भी इंतजाम कर लिया है लेकिन चीनी फौजियों को लद्दाख की ठंड ने परेशान करके रख दिया है। 15000 फुट की ऊंचाई पर महिनों तक टिके रहना खतरे से खाली नहीं है। भारतीय फौजी तो पहले से ही अभ्यस्त हैं। आठ बार के लंबे संवाद के बाद दोनों तरफ के जनरलों के बीच यह जो सहमति हुई है, उसके पीछे दो बड़े कारण और भी हैं। एक तो चीनी कंपनियों पर लगे भारतीय प्रतिबंधों और व्यापारिक बहिष्कार ने चीनी सरकार पर पीछे हटने के लिए दबाव बनाया है। दूसरा, ट्रंप प्रशासन ने चीन से चल रहे अपने झगड़े के कारण उसे भारत पर हमलावर कहकर सारी दुनिया में बदनाम कर दिया है। अब अमेरिका के नए बाइडन-प्रशासन से तनाव कम करने में यह तथ्य चीन की मदद करेगा कि भारत से उसका समझौता हो गया है। लद्दाख की एक मुठभेड़ में हमारे 20 जवान और चीन के भी कुछ सैनिक जरुर मारे गए लेकिन यह घटना स्थानीय और तात्कालिक बनकर रह गई। दोनों सेनाओं में युद्ध-जैसी स्थिति नहीं बनी, हालांकि हमारे अनाड़ी टीवी चैनल और चीन का फूहड़ अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ इसकी बहुत कोशिश करता रहा लेकिन मैं भारत और चीन के नेताओं की इस मामले में सराहना करना चाहता हूं। उन्होंने एक-दूसरे के खिलाफ नाम लेकर कोई आपत्तिजनक या भड़काऊ बयान नहीं दिए। हमारे प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने चीनी अतिक्रमण पर अपना क्रोध जरुर व्यक्त किया लेकिन कभी चीन का नाम तक नहीं लिया। चीन के नेताओं ने भी भारत के गुस्से पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की। दोनों देशों की जनता चाहे ऊपरी प्रचार की फिसलपट्टी पर फिसलती रही हो, लेकिन दोनों देशों के नेताओं के संयम को ही इस समझौते का श्रेय मिलना चाहिए। सच्चाई तो यह है कि भारत और चीन मिलकर काम करें तो इक्कीसवीं सदी निश्चित रुप से एशियाई सदी बन सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत चीन से बेखबर हो जाए। दोनों देशों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा जरुर चलती रहेगी लेकिन वह प्रतिशोध और प्रतिहिंसा का रुप न ले ले, यह देखना जरुरी है।
दीपावली की पृष्ठभूमि में कई कहानियां हैं
हर्षवधर्न पाठक
भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है कि हर त्यौहार के पीछे कोई न कोई कहानी छिपी है। युगों से मनाते जा रहे त्यौहारों की पृष्ठभूमि में अनेक कहानियां भी हो सकती हैं। अब दीपावली का त्यौहार लें। इस त्यौहार के पीछे भी कई कहानियां हैं। आम तौर पर इसका सम्बन्ध भगवान राम के चौदह वर्ष वनवास और रावण वध के बाद अयोध्या लौटने से जोड़ा जाता है लेकिन इसे सतयुग में भगवान विष्णु को ऋषि भृगु के द्वारा लात मारे जाने की घटना और विष्णु के एक अन्य अवतार श्री कृष्ण के समय की द्वापर कालीन कहानी से भी जोड़ा जाता है। यह कथा सतयुग की है। ऋषियों की सभा ने ऋषि भृगु को भगवान विष्णु की सहनशीलता की परीक्षा लेने का दायित्व सौंपा। महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु के वक्ष पर लात मारी।इस पर विष्णु क्रुद्ध नहीं हुए।
उन्होंने हंसते हुए महर्षि से पूछा कि आपको चोट तो नहीं लगी? कविवर रहीम ने इसे दूसरे अर्थ में लिया और एक दोहा लिखा -” क्षमा बड़न को चाहिए ,छोटन को उत्पात।
का रहीम हरि को घटयो , जो भृगु मारी लात। ”
हरि अर्थात विष्णु इस घटना पर क्रोधित नहीं हुए लेकिन उनकी पत्नी देवी लक्ष्मी को यह देखकर अच्छा नहीं लगा। उन्होंने श्राप दिया कि वे ब्राह्मणों के यहां कभी नहीं जाएंगी। ऋषि भृगु भी ब्राह्मण थे। तब महालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए श्री सूक्त की रचना की गई।तब से दीपावली पर लक्ष्मी पूजन की शुरूआत हुई ‌। एक अन्य कथा कृष्णावतार से इस पावन पर्व को मनाने की भी है। कथा इस प्रकार है – श्रीकृष्ण के समय नरकासुर नामक राक्षस था। उसे भौमासुर भी कहा जाता था। वह प्रागज्योतिषपुर का राजा था। उसने सोलह हजार राज कन्याओं को कैद कर रखा था।वह किसी अनुष्ठान की तैयारी में था। श्रीकृष्ण ने इन राज कन्याओं को न केवल मुक्त कराया अपितु उनसे विवाह भी किया।इन राज कन्याओं के माता पिता अपनी पुत्री के नरकासुर की कैद से प्रसन्न थे लेकिन लोकापवाद के डर से उन्हें वापस लेने के लिए तैयार नहीं थे। फलत: श्रीकृष्ण आगे आये। वे लोकापवाद से नहीं डरे। उन्होंने एक ही मुहूर्त में उनके साथ एक साथ विवाह किया। यद्यपि बाद में उनके ऊपर बहुत से लांछन लगे । लेकिन श्रीकृष्ण ने किसी लांछन की परवाह नहीं की। उन्होंने इन सभी राज कन्याओं के द्वारका में रहने की व्यवस्था की और सभी रानियों के साथ समान व्यवहार किया। यह कहा जाता है कि जिस दिन नरकासुर राक्षस का वध हुआ वह दिन कार्तिक अमावस्याके एक दिन पूर्व था। वह दिन नरक चौदस या भौम चौदस के रूप में मनाया गया। अगले दिन नरकासुर के वध तथा राज कन्याओं की मुक्ति की खुशी में दिये जलाए गए।

हिंसाग्रस्त दुनिया को गाँधी ही वैक्सीन है
रघु ठाकुर
2020 के वर्ष की शुरूआत कोरोना की महामारी से शुरू हुई और अंत शब्द और कर्म की हिंसा से हो रहा है। कोरोना की महामारी से मरने वालों की संख्या देर सवेर कुछ लाख हो जाएगी। परन्तु अगर हिंसा और उसके परिणाम स्वरूप युद्ध हुये तो उसके परिणाम महामारी से भी घातक होंगे। हो सकता है कि दुनिया के वैज्ञानिक कोरोना से बचाव के लिए कोई वैक्सीन बनाने में सफल हो जाए परन्तु घृणा ओर हिंसा, कट्टरता और फिरकापरस्ती का उपचार कोई वैक्सीन नहीं है। जिस प्रकार दुनिया ने वैक्सीन के अभाव में कोरोना की महामारी से बचाव के लिए कुछ मास्क या दूरी आदि के उपाय किए है और अपने खानपान से अपने शरीर में ही प्रतिरोध-शक्ति पैदा करने की प्राकृतिक पहल की है, उसी प्रकार दुनिया और विश्व समाज को हिंसा और घृणा की महामारी से बचाने के लिए जहाँ एक तरफ कुछ सामाजिक निषेध के उपाय व प्रयोग खोजना होंगे वहीं धैर्य और संयम की अपनी प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाना होगा।
पिछले दिनों फ्रांस में किसी ने पैगम्बर मोहम्मद साहब का कार्टून बनाया। मैं इस कार्टून बनाने का समर्थक नहीं हूॅ। परन्तु फ्रांस का समाज एक अलग प्रकार के लोकतांत्रिक स्वभाव का समाज है, जहाँ सभी प्रकार की आलोचनाएं सही जाती है। विचारक नीत्से ने तो यहाँ तक कहा था कि ‘‘भगवान कभी का मर चुका है’’, और यह भगवान शब्द मैंने अनुवाद कर लिखा है वर्ना उन्होंने ‘‘गाॅड’’ शब्द का इस्तेमाल किया था। और गाॅड का तात्पर्य आम तौर पर ईसाईयों के भगवान से माना जाता है। परंतु फ्रांस के समाज या सरकार ने कभी उनके विरूद्ध कोई प्रतिक्रिया नहीं की। विचारों की आजादी की इस सीमा तक वहाँ है। मुझे याद है कि जब जीन पोल साथ ने फ्रांस की व्यवस्था के खिलाफ और वहाँ की सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ तीखे व दार्शनिक सवाल पूँछना शुरू किए थे तो फ्रांस के एक तबके ने उनकी गिरफ्तारी की माँग की थी। परन्तु फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति डिगाल ने सार्वजनिक रूप से उŸार दिया था कि साथ फ्रांस की आत्मा है, उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
अभी फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने बयान देकर कहा कि ‘‘मैं कार्टून का समर्थन नहीं करता परन्तु व्यक्ति आजादी का समर्थन करता हूॅ’’ यह परम्परा दुनिया में पहले भी रही है। जब चार्वाक ने जो की भारतीय था ईश्वर को मानने से इंकार किया तब तत्कालीन समाज ने उनकी हत्या नहीं की बल्कि उसे उनके विचार के रूप में स्थान दिया। असहमति दोनों पक्षों का अधिकार होता है और असहमति का सम्मान करना ही लोकतंत्र की आत्मा है। परन्तु पिछले कुछ दिनों से दुनिया में असहमति को अपराध माना जाने लगा है। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में और भारत के बिहार विधानसभा के चुनाव व उप चुनावों में जिस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल हुआ है, वह किसी हिंसा से कम नहीं है। और भावी पीढ़ी के लिए एक बुरा संदेश है। अमेरिका के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी श्री ट्रम्प ने तो भाषा की सारी मर्यादा ही लाँघ दी और उन्होंने चुनाव जीतने और परिणामों को प्रभावित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज की नियुक्ति से लेकर अपने अन्य अधिकारियों को बर्खास्त करना सार्वजनिक रूप से लोगों का धमकाना कोई भी अनैतिक और अलोकतांत्रिक कार्य नहीं छोड़ा। यहाँ तक कि उन्हांेने यह भी धमकी दी कि वे चुनाव के बाद शाँतिपूर्ण ढंग से सŸाा हस्तांतरण नहीं करेंगे अमेरिका जो दुनिया में एक खुले विचारों का देश माना जाता था उसकी यह छवि लगभग नष्ट हो चुकी है। अमेरिका का कौन राष्ट्रपति बने, कौन न बने यह मेरा विषय नहीं है। बल्कि यह अमेरिकी मतदाताओं का अपना अधिकार है कि वे अपने प्रतिनिधि को चुनंे परन्तु बयानों आदि में जो गिरावट आई है, वह अमेरिकी लोकतंत्र के लिए और लोकतांत्रिक दुनिया के लिए चिंता का विषय है। अभी तक यह होता था कि अमूमन लोकतांत्रिक सŸाा की शब्दावली शालीन होती थी भले ही प्रतिपक्ष कई बार कटु या कठोर होता था। यह इसलिए भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार व अपरिहार्य है कि प्रतिपक्ष अल्पमत का नुमांयदा होता है, और सŸाा समूचे देश की प्रतिनिधि होती है। परन्तु पिछले कुछ समय से केन्द्र से लेकर राज्यों तक सŸाा और प्रतिपक्ष के बीच भाषा का अंतर समाप्त जैसा हो गया है। म.प्र. के उप चुनावों में भी नालायक-गधा-कुŸाा-कौवा जैसे शब्दांे का भरपूर इस्तेमाल हुआ। यद्यपि सŸाापक्ष अभी तक भगवान राम की चर्चा (भले ही राजनैतिक औजार के रूप में करता रहा है)। और प्रतिपक्ष के नेता भी अपने आप को हनुमान पूजक शब्द का इस्तेमाल करते है। मैं यह दावा नहीं करता कि मैंने दुनिया की सभी रामायणें पढ़ी हंै, परन्तु 2-3 रामायणें तो पढ़ी ही है। मुझे याद नहीं आता कि श्री राम ने अपने अधिकतम आक्रोश या पीड़ा के क्षण में भी रावण या किसी के विरूद्ध किसी अपशब्द तो दूर कटुशब्द का भी इस्तेमाल किया हो। हनुमान ने रावण की सोने की लंका जलाई-परन्तु कहीं ऐसा उल्लेख नहीं है कि उन्होंने किसी अपशब्द या गाली का इस्तेमाल किया हो। युद्ध में भी एक शालीनता और मर्यादा होती है, परन्तु अब तो दुनिया में और लोकतंत्र व्यवस्थाओं में भी शालीनता की सारी मर्यादाएं टूट गई हैं।
फ्रांस के कार्टूनिस्ट के द्वारा कार्टून बनाने के बाद चर्च में तीन हत्याएं की गई । इनमें वह कार्टूनिस्ट नहीं था बल्कि ईसाई समाज के पुरूष और महिला थे, जो निर्दाेष थे । दुनिया का कौन सा मजहब निर्दाेष की हत्या को जायज ठहरा सकता है। यहाँ जम्मू कश्मीर में भारत के आतंकवादियों ने 3 अपने ही मुस्लिम भाईयों की हत्या कर दी। क्या फ्रांस का या कश्मीर का आतंकवाद एक जैसा नहीं है? जहाँ निर्दाेष की हत्याएं की जा रही है। अब एक नया घटनाक्रम शुरू हुआ है, जिसमें कुछ मुस्लिम मित्रों ने मथुरा के मंदिर में जाकर नमाज़ पढ़ी। उनके पक्ष के कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें नमाज़ पढ़ने की पुजारी ने अनुमति दी थी, परन्तु पुजारी ने अनुमति देने से इंकार किया है, और उनके विरूद्ध रपट दर्ज कराई है। उन दोनों लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है, और एक व्यक्ति की गिरफ्तारी भी हुई है। परन्तु अब उसके प्रतिवाद स्वरूप 4 हिन्दू भाईयों ने जाकर मस्जिद में पूजा की। उनमें से भी एक की गिरफ्तारी हुई है। और अब सार्वजनिक रूप से हमले-बचाव और घात-प्रतिघात का सिलसिला शुरू हो गया है। फ्रांस के कार्टून के विरूद्ध में भारत में भी अनेक स्थानों पर मुस्लिम समाज ने बड़े-बड़े जुलूस निकाले और फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के पुतले जलाए। परन्तु कितना अच्छा होता कि अगर उन्होंने इसके साथ ही फ्रांस में की गई निर्दाेषों की हत्यायों और जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के द्वारा की गई हत्यायों की निंदा भी की होती। इससे संदेश तो यही गया है कि वे मैक्रों के तो खिलाफ है, परन्तु निर्दाेष हत्याओं के समर्थक है।
मंदिर और मस्जिद में भगवान या अल्लाह नाम जो भी कहो जो एक ही हैं का स्थान होता है। हालांकि यह एक परम्परागत कल्पना है, क्योंकि अगर भगवान या अल्लाह ने सारी दुनिया को बनाया है, तो फिर सारी दुनिया उनकी है, और मंदिर-मस्जिद के छोटे से इलाके में उन्हें सीमित करना उनसे उनकी बकाया दुनिया को छुड़ाना है। ऐसा लगता है कि हम लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था के मर्म को समझते नहीं है। उदारता या तार्किकता के बजाय ज्यादा कट्टर हो रहे है। गुरू नानक देव ने तो प्रश्न किया था कि किस तरफ पैर करे जहाँ खुदा नही हैं। परन्तु मुस्लिम भाईयों ने उनकी गर्दन नहीं काटी। स्वामी दयानंद ने मूर्ति पूजा को खुली चुनौती दी परन्तु हिन्दू भाईयों ने न उनकी हत्या की ना निंदा की बल्कि एक अच्छे खास हिस्से ने उन्हें स्वीकार किया। मिर्जा गालिब ने तो शेर ही लिख दिया ’’साकी शराब पीने दे मस्जिद मैं बैठकर – या वो जगह बता दे जहाँ खुदा न हों’’। परन्तु किसी मुस्लिम भाई ने उन्हें गैर इस्लामी नहीं माना और न उन पर हमले किए। स्वतः पैगम्बर साहब इस्लाम का प्रचार कर रहे थे तो उन्हें अपने ही समाज में आलोचना और अपमान का शिकार होना पड़ा था। परन्तु उन्होंने उनके मन को बदलने का प्रयास किया न की हिंसा का। ईसामसीह को फाँसी राज शाही का दण्ड था। परन्तु दुनिया के एक बड़े हिस्से ने उन्हें स्वीकारा। याद रखना होगा कि, दुनिया में उदारता ही आदर्श के रूप में याद की जाती है, कट्टरता नहीं।
जिन मुस्लिम भाईयों ने मंदिर में नमाज पढ़ी और उसके प्रतिवाद में जिन भाईयों ने मस्जिद में पूजा की मेरी राय में इन दोनों को कानूनी कार्यवाहियों से मुक्त कर देना चाहिए और समझाइश देना चाहिए कि अपनी-अपनी मर्यादाओं का पालन करें। और ऐसा कदम तभी उठाये, जब मंदिर के पुजारी तथा मस्जिद के इमाम साहब की सहमति हो। तभी कोई ऐसा प्रयास करेगा ताकि सामाजिक तनाव, हिंसा, फसाद और दंगे की चिंगारी न बने।
कोरोना की महामारी की वैक्सीन बनना अभी शेष है, परन्तु सामाजिक सदभाव प्रेम, अहिंसा और मर्यादा के लिए दुनिया में एक वैक्सीन पहले से मौजूद है, और वह है, महात्मा गाँधी। आज भी अगर दुनिया गाँधी की वैक्सीन का प्रयोग करेगी तो हिंसा और युद्ध की महामारी से बच सकेगी वरना इतिहास गवाह है कि साम्राज्य और समाज आपसी प्रतिशोध में कैसे नष्ट हो गये?

मुख्यमंत्री हेल्पलाईन में गुहार करने पर सितम बरपा दिया…!
नईम कुरेशी
मध्य प्रदेश में पुलिस काफी हद तक उत्तर प्रदेश के रास्तों पर जाती देखी जा सकती है। ये अलग बात है कि पुलिस की छवि को लगातार बिगाड़ने में पुलिस अफसरों से ज्यादा सियासतदां का हाथ देखा जाता है। चाहे इन्दौर हो, भोपाल हो या जबलपुर, ग्वालियर हर तरफ पुलिस के थानेदार की लगातार छवि डॉन जैसी बनी देखी जा रही है। सोमवार 26 अक्टूबर को सायं 7 बजे ग्वालियर से लश्कर क्षेत्र के माधौगंज थाने में जाने का मौका मिला। वहां के थाना प्रभारी यादव को क्षेत्र के नगर पुलिस अधीक्षक आत्माराम शर्मा साहब ने फोन पर मुझे कुछ जानकारियां दिलाने के लिए थाना प्रभारी से प्यार भरे शब्दों में गुहार भी की थी फिर भी थाना प्रभारी की अकड़ घमंड का मुझे शिकार होना पड़ा। बात सिर्फ ये थी कि सूरज गोयल नाम के एक अदना से व्यापारी को उसके पड़ोसी रास्ते के विवाद के चलते कुछ परेशान कर रहे थे। 3-4 माह से थानों के चक्कर काटने पर भी उसने मुख्यमंत्री हेल्पलाईन का बटन दबा कर आफत मोल ले ली थी। थाना प्रभारी माधौगंज के मुंह लगे हवलदार ने सूरज गोयल से कुछ सेवा शुल्क मांगा न देने पर उसके परिवारजनों के 3 लागों के ऊपर 107/116 नामक मामला दर्ज कर एस.डी.एम. लश्कर के यहां मामला भेज दिया जबकि उसके विरोधी के सिर्फ 2 लोगों को मामले में रखा गया था जिससे साफ है कि पुलिस माधौगंज ने सूरज गोयल के साथ न्याय नहीं किया था। मुख्यमंत्री हेल्पलाईन के मामले में जब थाना प्रभारी माधौगंज से हवलदार को सेवा शुल्क के मामले में कहा गया तो वो भउ+क गये थे यहां तक कि दुर्व्यवहार तक उतर आये थे। जिससे लगने लगा है कि अब तो मध्य प्रदेश पुलिस भी अपने आचरण व्यवहार से यू.पी. पुलिस की राह पर चल पड़ी है। इस विषय पर पुलिस को काम करना चाहिये।
जबकि देखा जा रहा है कि मध्य प्रदेश में पुलिस के आला अफसर डी.आय.जी. पुलिस अधीक्षक स्तर के अफसरों का व्यवहार कुछ बेहतर है यू.पी., बिहार, दिल्ली आदि से पर थाना प्रभारी स्तर पर काम के दबाव सियासतदां के दबावों व बेगारों अफसरों के दबावों के चलते इतने उद्दंड हो जायेंगे इसकी कल्पना भर करने से रोंगटे खड़े हो जायेंगे आप के। यहां ग्वालियर में कम्पू थाने के आशिक मिजाज एक और थाना प्रभारी त्रिपाठी आजकल चर्चा में हैं वो महिला को 10 दिन पहले छेड़छाड़ करते हुए अपने ही थाने में पकड़े जा चुके हैं, फरार हैं। पुलिस अधीक्षक सांघी ने उन्हें तत्काल प्रभाव से निलम्बत भी कर दिया था।
ग्वालियर चम्बल इलाके में पुलिस के थाना प्रभारियों की पदस्थापनायें अफसर राजनेता तय करने की परम्परा पिछले 10-15 सालों से डाल चुके हैं जिससे अब यहां बुरी छवि के अनुशासनहीन पुलिस वालों की बाड़ सी आ गई है। हरियाणा, उत्तर प्रदेश आदि की तुलना में मध्य प्रदेश पुलिस के ज्यादातर अफसरान बलात्कारों के मामलों में आरोपी नहीं रहे हैं। राजेन्द्र चतुर्वेदी, पुरुषोत्तम शर्मा आदि मध्य प्रदेश में रहे थे। गुजरात में तो सरकार ने ही कुछ आय.पी.एस. से नाराज होकर उन्हें जेलों में डाल रखा है। यू.पी. में 3 सालों में 12 आय.पी.एस. पुलिस अधीक्षक डी.आय.जी. को मुख्यमंत्री योगी को निलम्बत करना पड़ा है। मध्य प्रदेश में दिलिप कामदेव, ए.एन. सिंह, संजय राणा, राजीव टंडन जैसे अफसरानों ने मध्य प्रदेश पुलिस की छवि बनाये रखी। संजय राणा ने तो भिण्ड में दलितों को वोट डालने से रोकने वाले राजपूतों को कानून का पाठ सिखाया था। जे.एम.कुरेशी, अश्वनी कुमार जैसे आय.पी.एस. वालों ने भारत सरकार में मध्य प्रदेश की खूब इज्जत बढ़ाई थी। 4 साल पहले आई.बी.चीफ भी मध्य प्रदेश से रहे थेरॉव सी.बी.आई. में भी यहां से लोग ऊँचे पदों पर रखे गये हैं।

मजहब चलें मध्यम मार्ग पर
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
इधर भारतीय विदेश मंत्रालय ने विशेष कूटनीतिक साहस और स्पष्टवादिता का परिचय दिया है। उसने एक बयान जारी करके तुर्की के राष्ट्रपति तय्यब एरदोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को आड़े हाथों लिया है। भारत सरकार ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमेनुअल मेक्रो का खुलकर समर्थन किया है। मेक्रो ने इधर इस्लामी अतिवाद के खिलाफ अपने देश में जो अभियान चलाया है, उसका समर्थन सभी यूरोपीय देश कर रहे हैं। फ्रांस के एक अध्यापक की हत्या एक मुस्लिम युवक ने इसलिए कर दी थी कि उसने अपनी कक्षा में पैगंबर मोहम्मद के कुछ कार्टून दिखा दिए थे। यहां असली सवाल यह है कि फ्रांस या यूरोप की घटनाओं से भारत का क्या लेना-देना ? वहां के अंदरुनी मामलों में भारत टांग क्यों अड़ा रहा है ? इसके कई कारण है। पहला यह कि भारत के विदेश सचिव हर्षवर्द्धन श्रृंगला आज ही फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन की यात्रा पर जा रहे हैं। इन तीनों देशों से भारत के घनिष्ट संबंध हैं और ये तीनों देश इस्लामी आतंकवाद की मार भुगत चुके हैं। इन देशों में पूछा जाएगा कि आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार भारत है और वह इस मामले पर चुप क्यों है ? दूसरा, तुर्की और पाकिस्तान दोनों ही मिलकर कश्मीर के सवाल पर भारत पर कीचड़ उछालने से बाज़ नहीं आते तो भारत भी उनकी टांग खींचने का मौका क्यों चूके ? तीसरा, यह यूरोप का आंतरिक मामला भर नहीं है। इस्लामी उग्रवाद ने दुनिया के किसी महाद्वीप को अछूता नहीं छोड़ा है। यदि भारत में आतंकवाद की कोई घटना होती है तो यूरोपीय राष्ट्र हमारे पक्ष में बयान जारी करते हैं तो अब मौका आने पर भारत भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है। 2015 में फ्रांसीसी पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ के 12 पत्रकारों की हत्या की गई थी, तब भी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस्लामी आतंकवाद की खुली भर्त्सना की थी। ‘इस्लामी’ शब्द का प्रयोग न तब किया गया था और न ही अब किया गया है। भारत सरकार का यह रवैया राष्ट्रहित और तर्क की दृष्टि से ठीक मालूम पड़ता है लेकिन मुझे यह अधूरा भी लगता है। भारत जैसे महान सांस्कृतिक राष्ट्र से यह आशा की जाती है कि वह यह सीख उन्हें दे कि वे दूसरों की भावना का भी सम्मान करें। यदि पैगंबर मोहम्मद के चित्र या कार्टून से मुसलमानों को पीड़ा होती है तो ऐसे काम को टालने में कौनसी बुराई है या हानि है ? कौनसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इससे खत्म होगी ? दूसरों का दिल दुखाना ही क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है ? किसी भी संप्रदाय या मजहब के गुण-दोषों पर आलोचनात्मक बहस जरुर होनी चाहिए लेकिन उसका लक्ष्य उनका अपमान करना नहीं होना चाहिए। तुलसीदास का यह कथन ध्यातव्य है— ‘परहित सरिस धरम नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई।।’ यह सही समय है जबकि यूरोपीय राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र अतिवाद को छोड़ें और मध्यम मार्ग अपनाएं। ईसा मसीह और पैगंबर मोहम्मद के प्रति सच्ची भक्ति इसी मार्ग में है।

नये भारत के निर्माता थे सरदार पटेल
रमेश सर्राफ धमोरा
(31 अक्टूबर जयन्ती पर विशेष) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुछ वर्ष पूर्व गुजरात के नर्मदा जिले में सरदार पटेल के स्मारक का उद्घाटन किया था। इसका नाम एकता की मूर्ति (स्टैच्यू ऑफ यूनिटी) रखा गया है। यह मूर्ति स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से दुगनी ऊंचाई 182 मीटर ऊंची बनाई गयी है। इस प्रतिमा को केवडिया के निकट साधुबेट नामक एक छोटे चट्टानी द्वीप में सरदार सरोवर बांध के सामने नर्मदा नदी के मध्य में स्थापित किया गया है। सरदार वल्लभ भाई पटेल की यह प्रतिमा दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है।
सरदार पटेल की इस प्रतिमा को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनका व्यक्तित्व कितना विशाल था। सरदार यानि नेतृत्व करने का गुण तो उनमें जन्मजात था ही। संघर्षो में तपकर उनका मनोबल लौहे की तरह दृढ़ हो गया था। अपनी इसी इच्छा शक्ति व दृढ़ मनोबल के दम पर उन्होने देश की आजादी के बाद एक भारत बनाने का ऐसा मुश्किल काम कर दिखाया जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। भारत के राजनीतिक इतिहास में सरदार पटेल के योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता।
देश की आजादी के संघर्ष में उन्होने जितना योगदान दिया उससे ज्यादा योगदान उन्होने स्वतंत्र भारत को एक करने में दिया। पटेल राष्ट्रीय एकता के बेजोड़ शिल्पी व नये भारत के निर्माता थे। देश के विकास में सरदार वल्लभभाई पटेल के महत्व को सैदव याद रखा जायेगा।
सरदार पटेल को भारत का लौह पुरुष कहा जाता है। गृहमंत्री बनने के बाद भारतीय रियासतों के विलय की जिम्मेदारी उनको ही सौंपी गई थी। उन्होंने अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए छः सौ छोटी- बड़ी रियासतों का भारत में विलय कराया। देशी रियासतों का विलय स्वतंत्र भारत की पहली उपलब्धि थी और निर्विवाद रूप से पटेल का इसमें विशेष योगदान था। नीतिगत दृढ़ता के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उन्हें सरदार और लौह पुरुष की उपाधि दी थी। वल्लभ भाई पटेल ने आजाद भारत को एक विशाल राष्ट्र बनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया।
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को वैचारिक एवं क्रियात्मक रूप में एक नई दिशा देने के कारण सरदार पटेल ने राजनीतिक इतिहास में एक गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया। उनके कठोर व्यक्तित्व में संगठन कुशलता, राजनीति सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अटूट निष्ठा थी। जिस अदम्य उत्साह, असीम शक्ति से उन्होंने एकीकृत देश की प्रारम्भिक कठिनाइयों का समाधान किया। भारत की स्वतंत्रता संग्राम मे उनका महत्वपूर्ण योगदान था।
स्वतंत्र भारत के पहले तीन वर्ष सरदार पटेल देश के प्रथम उप-प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, सूचना प्रसारण मंत्री रहे। पटेल ने भारतीय संघ में उन रियासतों का विलय किया जो स्वयं में सम्प्रभुता प्राप्त थीं। उनका अलग झंडा और अलग शासक था। सरदार पटेल ने आजादी के पूर्व ही देशी राज्यों को भारत में मिलाने के लिये कार्य आरम्भ कर दिया था। सरदार पटेल के प्रयास से 15 अगस्त 1947 तक हैदराबाद, कश्मीर और जूनागढ़ को छोडकर शेष भारतीय रियासतें भारत संघ में सम्मिलित हो चुकी थी।
जूनागढ़ के नवाब के विरुद्ध जब वहां की प्रजा ने विरोध कर दिया तो वह भागकर पाकिस्तान चला गया और इस प्रकार जूनागढ भी भारत में मिला लिया गया। जब हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो सरदार पटेल ने वहां सेना भेजकर निजाम का आत्मसमर्पण करा लिया। निःसंदेह सरदार पटेल द्वारा 562 रियासतों का एकीकरण विश्व इतिहास का एक आश्चर्य था। भारत की यह रक्तहीन क्रांति थी।
लक्षद्वीप समूह को भारत में मिलाने में भी पटेल की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। इस क्षेत्र के लोग देश की मुख्यधारा से कटे हुए थे और उन्हें भारत की आजादी की जानकारी 15 अगस्त 1947 के कई दिनों बाद मिली। हालांकि यह क्षेत्र पाकिस्तान के नजदीक नहीं था लेकिन पटेल को लगता था कि इस पर पाकिस्तान दावा कर सकता है। इसलिए ऐसी किसी भी स्थिति को टालने के लिए पटेल ने लक्षद्वीप में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए भारतीय नौसेना का एक जहाज भेजा। इसके कुछ घंटे बाद ही पाकिस्तानी नौसेना के जहाज लक्षद्वीप के पास मंडराते देखे गए। लेकिन वहां भारत का झंडा लहराते देख उन्हें वापस लौटना पड़ा।
जब चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ने जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखा कि वे तिब्बत को चीन का अंग मान लें तो पटेल ने नेहरू से आग्रह किया कि वे तिब्बत पर चीन का प्रभुत्व कतई न स्वीकारें अन्यथा चीन भारत के लिए खतरनाक सिद्ध होगा। जवाहरलाल नेहरू नहीं माने बस इसी भूल के कारण हमें चीन से पिटना पड़ा और चीन ने हमारी सीमा की भूमि पर कब्जा कर लिया। सरदार पटेल के ऐतिहासिक कार्यों में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निमाण, गांधी स्मारक निधि की स्थापना, कमला नेहरू अस्पताल की रूपरेखा आदि कार्य शामिल हैं।
सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 में गुजरात के नाडियाड में लेवा पट्टीदार जाति के एक जमींदार परिवार में हुआ था। वे अपने पिता झवेरभाई पटेल एवं माता लाड़बाई की चैथी संतान थे। सरदार पटेल ने करमसद में प्राथमिक विद्यालय और पेटलाद स्थित उच्च विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की थी। लेकिन उन्होंने अधिकांश ज्ञान स्वाध्याय से ही अर्जित किया। 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह हो गया। 22 साल की उम्र में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की और जिला अधिवक्ता की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। जिससे उन्हें वकालत करने की अनुमति मिली।
सरदार पटेल के पांच भाई व एक बहन थी। 1908 में पटेल की पत्नी की मृत्यु हो गई। उस समय उनके एक पुत्र और एक पुत्री थी। इसके बाद उन्होंने विधुर जीवन व्यतीत किया। वकालत के पेशे में तरक्की करने के लिए कृतसंकल्प पटेल ने अध्ययन के लिए अगस्त 1910 में लंदन की यात्रा की।
गृहमंत्री के रूप में वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारतीय नागरिक सेवाओं (आई.सी.एस.) का भारतीयकरण कर इन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवाएं (आई.ए.एस.) बनाया। अंग्रेजों की सेवा करने वालों में विश्वास भरकर उन्हें राजभक्ति से देशभक्ति की ओर मोड़ा। यदि सरदार पटेल कुछ वर्ष और जीवित रहते तो संभवतरू नौकरशाही का पूर्ण कायाकल्प हो जाता।
सरदार पटेल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अघ्यक्ष पद के तीन बार उम्मीदवार बने मगर तीनो ही बार महात्मा गांधी ने हस्तक्षेप कर पण्डित जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनवा दिया था। 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान पटेल को तीन महीने की जेल हुई। मार्च 1931 में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के करांची अधिवेशन की अध्यक्षता की। जनवरी 1932 में उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया। जुलाई 1934 में वह रिहा हुए और 1937 के चुनावों में उन्होंने कांग्रेस पार्टी के संगठन को व्यवस्थित किया।
अक्टूबर 1940 में कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ पटेल भी गिरफ्तार हुए और अगस्त 1941 में रिहा हुए। 1945-1946 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए सरदार पटेल प्रमुख उम्मीदवार थे। लेकिन महात्मा गांधी ने हस्तक्षेप करके जवाहरलाल नेहरू को अध्यक्ष बनवा दिया। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नेहरू को ब्रिटिश वाइसरॉय ने अंतरिम सरकार के गठन के लिए आमंत्रित किया। इस प्रकार यदि घटनाक्रम सामान्य रहता तो सरदार पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री होते।
सरदार पटेल का निधन 15 दिसम्बर 1950 को मुम्बई में हुआ था। सरदार पटेल को उनकी मृत्यु के 41 साल बाद 1991 में मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया गया जो उन्हे बहुत पहले मिलना चाहिये था। वर्ष 2014 में केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयन्ती (31 अक्टूबर) को देश भर में राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाना शुरू कर उनको सम्मनित किया है।

हवा में प्रदूषण
सिद्धार्थ शंकर
अमूमन हर साल ठंड की आहट के साथ ही दिल्ली और आसपास के शहरों में प्रदूषण की हवा मुसीबत बनने लगती है। सरकार की ओर से या तो इससे निटपने के सीमित उपाय किए जाते हैं या फिर लोग इससे जूझते हुए कुछ महीने गुजार लेते हैं। इस बीच प्रदूषित हवा से जो नुकसान होना होता है, वह हो जाता है। लेकिन इस साल यही प्रदूषण दोहरी चिंता पैदा कर रहा है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की दिल्ली के लिए वायु गुणवत्ता पूर्व चेतावनी प्रणाली यानी ‘सफर’ ने शहर के प्रदूषण में पराली के धुएं की हिस्सेदारी के बढऩे का अनुमान जताया है, जिससे अगले दो-तीन दिन दिल्ली में हवा बेहद खराब रहेगी। दूसरी ओर, पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण ने भी वायु की गुणवत्ता और ज्यादा खराब होने की आशंका जताते हुए उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सरकारों से ऐसे थर्मल पावर संयंत्रों को बंद करने के लिए तैयार रहने को कहा है जो 2015 में तय किए गए मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं। दरअसल, पराली का धुआं पहले से प्रदूषण की समस्या से जूझती दिल्ली और दूसरे शहरों के लिए गंभीर समस्या बनता रहा है!
मौसम बदलने और हल्की ठंडक आने के साथ ही सतह के ऊपर हवा घनीभूत होनी शुरू हो जाती है और पराली या वाहनों से निकला धुआं आसानी से ऊपर नहीं उठ पाता है। नतीजतन, वायु की गुणवत्ता लगातार खराब होने लगती है और प्रदूषण गहराने लगता है। खासतौर पर वायु में सूक्ष्म प्रदूषक कणों के घुलने के साथ ही लोगों को सांस से संबंधित दिक्कतें होने लगती हैं।
ऐसा नहीं है कि पराली जलाने की घटना इस साल नई शुरू हुई है। पिछले कई सालों से इसकी वजह से पहले ही प्रदूषण से जूझते शहरों की समस्या और ज्यादा गहरा जाती है। इसे लेकर अलग-अलग संबंधित राज्यों के बीच जिम्मेदारियों को लेकर तर्क-वितर्क भी होते रहते हैं। लेकिन आखिरकार पराली जलाने वाले किसानों पर ही जिम्मेदारी थोप कर समस्या के टल जाने का इंतजार किया जाता है। पराली जलाने से रोकने के लिए मुआवजा या दूसरे विकल्पों पर विचार अब तक राहत के अस्थायी उपाय ही साबित हुए हैं। जबकि फसलों के चक्र के मुताबिक यह हर साल की आम समस्या है। सवाल है कि इस साल जब कोरोना संक्रमण की गंभीर समस्या से देश गुजर रहा है, तब भी इस समस्या से जूझते राज्यों के बीच इसके समाधान पर बात करने की जरूरत क्यों महसूस नहीं हो रही है! पिछले छह महीने में लगभग सभी लोग यह समझ चुके हैं कि कोरोना का संक्रमण मुख्य रूप से श्वांस नली और फेफड़े को संक्रमित करता है।
पराली जलाने या फिर वाहनों से निकले धुएं से पैदा हुआ प्रदूषण भी सांस और फेफड़े से संबंधित दिक्कतें ही पैदा करता है। हवा में जहर घुलने के इस मौसम में आमतौर पर वाहनों की संख्या नियंत्रित करके प्रदूषण को कम करने की जुगत की जाती है। इसके अलावा, औद्योगिक संयंत्रों के संचालन को नियंत्रित किया जाता है। लेकिन लॉकडाउन में राहत के बावजूद इस साल औद्योगिक इकाइयों का संचालन अब भी पूरी तरह सहज नहीं हुआ है। यानी फिलहाल वाहन और पराली जलाने से निकला धुआं मुख्य समस्या है। इसलिए सरकार को आने वाले दिनों के जोखिम को ध्यान में रखते हुए धुएं और हवा में घुलते जहर को कम करने के उपायों पर गंभीरता से अमल करना चाहिए। अगर इस मसले पर टालमटोल का रवैया अख्तियार किया जाता है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि महामारी से जूझते शहरों की हालत क्या हो सकती है!

टूटती मर्यादाएँ
ओमप्रकाश मेहता
हमारे भारतीय संविधान में राज्यों में नियुक्त किए जाने वाले राज्यपालों को राष्ट्रपति या केन्द्र सरकार ‘दूत’ या राज्य का संवैधानिक मुखिया माना गया है और राज्यपाल के पद पर नियुक्त होने वाले शख्स को शपथ ग्रहण के पूर्व अपने राजनीतिक दलीय सम्बंधों के लिखित रूप से तिलांजली देनी होती है और पद की शपथ के दौरान ‘‘बिना किसी भेदभाव या पूर्वाग्रह के अपने संवैधानिक दायित्व के निर्वहन’’ की शपथ लेनी होती है, किंतु आज क्या राज्यों के राज्यपालों द्वारा इस शपथ का ईमानदारी से अनुपालन किया जा रहा है? अब तो मौजूदा राज्यपालों पर उनकी निष्पक्षता तथा पूर्वाग्रही सोच को लेकर अनेक सवाल उठाए जा रहे है, विशेष कर उन राज्यों के राज्यपालों पर जिन राज्यों में गैर भाजपाई दल सत्ता में है, इसी कारण स्वतंत्र भारत के इस संवैधानिक पद के सामने प्रश्नचिन्ह लगने लगा है, जिसके ताजा उदाहरण महाराष्ट्र तथा पश्चिम-बंगाल के महामहिम राज्यपाल महोदय है।
आज देश के सामने आए दिन ऐसे उदाहरण सामने आ रहे है जब कहीं न कहीं संवैधानिक मर्यादाएँ टूटती स्पष्ट नजर आती है, फिर वह चाहे राज्यों के राजभवन हो, या कि संवैधानिक संगठन और अब तो धीरे-धीरे हमारी स्वतंत्रत न्यायपालिका भी इसके दायरे में लाई जाने लगी है। अब लोकतंत्र केे महल में दिनोंदिन तेजी से चैड़ी होती जा रही इस दरार के लिए लोकतंत्र के महत्व के किस स्तंभ को दोषी ठहराया जाए? यह तो प्रश्नाधीन है किंतु चूंकि केन्द्र सरकार व महामहिम राष्ट्रपति जी लोकतंत्र व संविधान के घोषित रूप से संवैधानिक संरक्षक है, इसलिए केन्द्र व महामहिम पर ही अंगुली उठना स्वाभाविक है।
महाराष्ट्र के राज्यपाल श्री भगत सिंह कोश्यारी ने पिछले दिनों वहां की शिवसेना सरकार को मंदिरों के खोले जाने का आदेश जारी कर विवाद को जन्म दिया कानून व्यवस्था चूंकि निर्वाचित सरकार के दायरें का विषय है, इसलिए इसमें हस्तक्षेप सरकार को नागवार गुजरा और मुख्यमंत्री ने राज्यपाल को उनकी ‘‘सलाह की जरूरत नहीं’’ का टका सा जवाब देकर राज्यपाल का आदेश मानने से इंकार कर दिया। इस प्रकरण पर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी राज्यपाल के प्रति नाराजगी जाहिर की। अब जिस प्रदेश में माननीय कोश्यारी जी मुख्यमंत्री रहे, उसी उत्तराखण्ड के उच्च न्यायालय ने कोश्यारी जी के राजभवन एक नोटिस भेजा है, जिसमें उनके देहरादून स्थित सरकारी आवास का बाजार दर पर निर्धारित शेष किराए की राशि तत्काल जमा करने और माननीय न्यायालय का पूर्व आदेश नहीं मानने पर न्यायालय की अवमानना का नोटिस जारी किया है। क्या कोश्यारी ने संवैधानिक पद की शपथ के पूर्व न्यायालय की इस औपचारिकता की पूर्ति करने की चिंता नहीं की? क्या केन्द्र के अंग राज्य के राज्यपाल को न्यायालय द्वारा दिए गए इस नोटिस से केन्द्र सरकार का अपमान नहीं हुआ? अब केन्द्र इस पर अपनी क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करता है? उसकी तो प्रतीक्षा है, किंतु क्या राज्यपाल के इस कृत्य से केन्द्र को आरोपों के कटघरें में खड़े होने को मजबूर नहीं होना पड़ा? करीब-करीब यही हाल पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ी जी के है, वे भी अपने ही प्रदेश की ममता की सरकार को कोसने और प्रताड़ित करने का कोई मौका नहीं चूकते, चूंकि वहां अगले साल विधानसभा चुनाव होना है, इसलिए महामहिम के राजनीतिक तीर और अधिक तीखे होते जा रहे है।
इसी बीच अब गैर-भाजपाशासित राज्यों में केन्द्र सरकार द्वारा किसानों के कथित हित में पारित तीन अध्यादेश विरोध का मुद्दा बनते जा रहे है, कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने केन्द्र द्वारा जारी इन अध्यादेशों को अमान्य कर अपने-अपने राज्यों में किसानों के कथित हित में नए अध्यादेश जारी करने का फैसला लिया है, जिसकी पंजाब के मुख्यमंत्री ने शुरूआत भी कर दी है, केन्द्र की मौजूदा सरकार व गठबंधन से हाल ही में अलग हुए अकाली दल ने भी कांग्रेस सरकार का इस मामले में समर्थन किया है, आम आदमी पार्टी का भी समर्थन मिल गया है। अब इस बारे में कांग्रेसी राज्यों के राज्यपाल सचेत हो गए है और किसान सम्बंधी कांग्रेसी अध्यादेशों को पारित करवाने के लिए राज्य विधानसभाओं के आहूत करने हेतु विशेष सत्र की अनुमति देने में आनाकानी कर रहे है, छत्तीसगढ़ इसका ताजा उदाहरण है जहां की राज्यपाल ने विशेष सत्र बुलाने के राज्य सरकार के प्रस्ताव पर अनेक सवाल खड़े किए है।
ये तो चंद उदाहण है, गैर-भाजपाशासित राज्यों में जाकर यदि तफतीश की जाए तो राज्यपालों की भूमिका को लेकर अनेक मामले मिलेंगे। जो भी हो, किंतु क्या दुनियाँ के सबसे बड़े इस लोकतंत्र देश में संवैधानिक मर्यादाओं की ऐसी हत्याएँ किसी भी दृष्टि से उचित कही जा सकती है? क्या यह हमारे पवित्र संविधान व उसकी मर्यादाओं का हनन नहीं है?

अपराध मुक्त समाज के लिए कानून या नैतिकता का कितना महत्व ?
डॉ. अरविन्द प्रेमचंद जैन
जब से मानव का उदय सृष्टि में हुआ तबसे अपराध होना शुरू हैं। मानव में मन होने से वह अन्य जानवरों से श्रेष्ठ जानवर बन गया या माना जाने लगा। मनयुक्त होने से उसमे विचारणा शक्ति आने से वह विवेक पूर्ण कृत्य करता हैं, यह जरुरी नहीं हैंकि उसके हर कृत्य सही हों। मन बहुत चंचल होता हैं। मन के बारे में कहा जाता हैं की मन बन्दर के सामान चंचल होता हैं, उसके बाद वह शराब पी ले और उसे बिच्छू काट ले तब उसका उपद्रव देखो। मम चंचल के साथ कल्पनालोक में कहाँ से कहाँ ले जाए पता नहीं चलता।
सबसे पहले संसार सञ्चालन के लिए नियम बनाये गए, उन नियमों में जब जब किसी को नुक्सान होना शुरू हुआ तब उनमे संशोधन या सुधार किये गए। या ऐसा भी कह सकते सुधार के लिए संशोधन किये गए। संसार में जितने भी नियम बने हैं वे पंच पापो के लिए बनाये गए हैं। आज पूरे विश्व की कानूनों की किताबों को जोड़ा जाय तो उनकी श्रखंला कश्मीर से कन्याकुमारी तक हो सकती हैं। ये पाप हैं हिंसा, झूठ, चोरी,कुशील और परिग्रह।आज हर जगह /मीडिया /पेपर आदि हिंसा आदि पापों से भरे पड़े रहते हैं। जितने भी पाप हैं या अपराध या नियम या कानून इन्ही पंच पापों के लिए बनाये गए हैं। हमारे धार्मिक और न्यायिक ग्रंथों में इन पंच पापों के निराकरण के लिए अपराध सम्बन्ध कानून और व्रत बताये गाये हैं।
पापों का निराकरण पंच व्रतों के पालन से होता हैं –हिंसा का विरोधी अहिंसा, झूठ का विरोधी सत्य, चोरी का विरोधी अचौर्य, कुशील का विरोधी ब्रह्मचर्य और परिग्रह का विरोधी अपरिग्रह। इन पांच पापों का यदि मनुष्य अध्ययन कर ले तो उसके जीवन में सदाचार आना शुरू हो जायेगा, नैतिकता जीवन में आएगी और सद्वृत्ति होने से वह सात्विक जीवन को उतारेगा।
अपराधों की रोकथाम जितना हिस्सा कानूनों का हैं उससे अधिक धार्मिकता जीवन में आ जाये तो बहुत सीमा तक अपराधों की रोकथाम हो सकती हैं। इसके लिए जरूरी हैं जो हमारे समाज के नेता, संत, महंत, मुखिया को अपना चारित्र नैतिकता
युक्त होना चाहिए। आज पर उपदेश कुशल बहुतेरे। यानी जनता, समाज से यह अपेक्षा की जातीं हैं वे नैतिक हो खुद अनैतिकता से लिप्त हैं । जब तक समाज में दुहरापन होगा तब तक अपराधों में कमी होना असंभव होगा। हर मनुष्य हर प्रकार की सुविधा चाहता हैं। धरम की मान्यता हैं की हम जो कुछ सुख दुःख पाते हैं वे हमारे द्वारा किये गए पुण्य पाप के फल हैं, कुछ पूर्व जन्म के और अभी के किये गए कर्म। जैसे कोई चोरी करता हैं तो वह पकड़ा नहीं जाता और कोई तुरंत पकड़ा जाता हैं और दण्डित होता हैं।
यदि बच्चों को शुरू से अच्छे संस्कार देना चाहिए, गुरुओं के सानिध्धय में कुछ नियम लेना चाहिए, शालाओं कॉलेजों, और कार्यस्थल में अच्छा वातावरण रहे तथा सकारात्मक सोच पैदा करना चाहिए। साथ ही इस बात की जानकारी देना चाहिए यदि हम नैतिकता और धार्मिक मान्यताओं को नहीं माना उससे उसके जीवन में विपरीत प्रभाव पड़ेगा और संभव हो आगामी जीवन भी दुःख होगा। हमारे कर्मों की रिकॉर्डिंग हमेशा होती रहती हैं। उनमे कोई बदलाव नहीं कर सकता।
न्याय हमेशा साक्ष्य पर आधारित होता हैं, कभी कभी साक्ष्य के अभाव में वह अपराध मुक्त हो जाता हैं और कभी कभी साक्ष्य के कारण अपराधी मान लिया जाता हैं। या न्यायलय में लोभ लालच से बच में जाते हैं और कभी कभी दण्डित होकर सजा भुगतना पड़ता हैं। दंड दंड होता हैं जैसे हथकड़ी सोने की हों या लोहे की वह हथकड़ी ही कहलाती हैं। ऐसे कोई कहे में जेल में बड़ा
सुखी रहता हूँ मेरी वहां प्रतिष्ठा हैं। अपराधियों को कभी भी सामाजिक और राजकीय प्रतिष्ठा नहीं मिलती। राजा के द्वारा अपमानित व्यक्ति हर जगह अपमानित होते हैं। अपराधियों को कोई भी सामाजिक, पारिवारिक सम्मान नहीं मिलता। जबकि धर्म और नैतिकता को पालन करने वालों की हर जगह इज़्ज़त मिलती हैं।
आज जरुरत हैं की व्यक्ति को धर्म और नैतिकता का पालन करना और जो हिंसा, झूठ, चोरी, बलात्कार और अधिक जमाखोरी करने वालों को परामर्श के साथ नैतिकता की शिक्षा देनी होगी। जिस प्रकार तराज़ू के दो पलड़े होते हैं उसी प्रकार पाप और धर्म या व्रतों को समता रूपी ज्ञान से समझना होगा। जो पलड़ा भारी होता हैं वह नीचे जाता हैं और जो हल्का होता हैं वह शिखर पर जाता हैं। यह हमारे ऊपर हैं हम किसको अंगीकार करें। आज क्या हमेशा अपराधियों की हिकारत की नज़रों से देखा जाता हैं। और नहीं से वे अपनी आत्मवंचना से पीड़ित रहते हैं।
अपराधों के नियंत्रण के लिए क़ानून कड़े बनाये जाए साथ ही धार्मिक वातावरण बनाकर उनमे से बुरी आदतों से मुक्त करे और आदर्श नागरिक बने इसको प्रेरित करना होगा। इसके लिए जरुरी हैं की स्कूली शिक्षा से नैतिकता का पौधरोपण करना होगा। “भय बिन प्रीत न होत गुसाईं ” सामाजिक और न्यायिक दंड से सुधार की संभावना हो सकती हैं।
मतदान से पहले दो मंत्रियों को देना होगा इस्तीफा
भोपाल,मध्यप्रदेश की 28 सीटों पर हो रहे उपचुनाव के लिए 3 नवंबर को वोटिंग होगी। प्रदेश में आचार संहिता भी लगी हुई है। लेकिन मध्यप्रदेश सरकार के दो मंत्रियों को उपचुनाव में वोटिंग से पहले अपने पद से इस्तीफा देना होगा। ये दोनों मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक हैं। ये दोनों ही मंत्री अभी विधायक नहीं हैं। ऐसे में वोटिंग से पहले उन्हें इस्तीफा देना होगा। मंत्री तुलसी सिलावट और गोविंद सिंह राजपूत के विधानसभा उपचुनाव तक मंत्री पद में बने रहने में संवैधानिक पेंच आड़े आ रहा है। सिवालट और गोविंद सिंह राजपूत, ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक नेता हैं।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 21 अप्रैल को अपनी टीम में पांच मंत्रियों को शामिल किया था। इसमें गोविंद सिंह राजपूत और तुलसी सिलावट भी शामिल थे। 21 अक्टबर को इनके 6 महीने पूरे हो रहे हैं। असल में उन्हें मंत्री रखना है, लेकिन संवैधानिकबाध्यता के चलते वे विधायक बने बिना छह माह से अधिक समय तक मंत्री नहीं रह सकते हैं। अब दोनों ही नेता को भाजपा ने अपना-अपना उम्मीदवार घोषित किया है। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का कहना है कि छह माह तक मंत्री बनाया जा सकता है। इसके बाद वह व्यक्ति तभी मंत्री बन सकता है जब चुनाव जीतकर आए। बता दें कि प्रदेश में आचार संहिता भी लगी है जिस कारण से ये दोनों नेता चुनाव परिणाम आने तक मंत्री पद की शपथ दोबारा नहीं ले सकते हैं।

मध्य प्रदेश में तो थानेदारों ने डी.जी.पी. को हटवा दिया था…!
नईम कुरेशी
मध्य प्रदेश के 28 सीटों के उपचुनावों के चलते पूरे सूबे में प्रशासन इसकी तैयारियों में जुटा है। खासतौर से पुलिस प्रशासन ग्वालियर में इसका फायदा गुण्डे मवाली महिलाओं को बेटियों को छेड़ने व आम लोगों को सरेआम मारपीट करने में जुटे हुए हैं। कोरोना काल में जहां आम आदमी अपनी जान बचाने में लगा है अस्पतालों के चक्कर काट रहा है वहीं प्रशासन के लोग मूकदर्शक बने हुए हैं। ग्वालियर के थाटीपुर, हजीरा, इन्दरगंज व बहोड़ापुर थानों की पुलिस अपने ही बोझ से दबी हुई देखी जा रही है।
आमतौर से ग्वालियर के ज्यादातर थानों में सियासत के चलते 1-2 महीनों में भी थानों के प्रभारी बदल दिये जा रहे हैं। कहीं कोई विधायक अपनी मर्जी व जाति बिरादरी के थानेदार रखने पर बदल दिये जा रहे हैं कहीं पैसा कमाने की अंधी होड़ में थानेदार लोग आम लोगों को झूठा फंसाकर उन पर इनाम घोषित कर आम जनता में खौफ फैलाने के चलते हटाये जा रहे हैं। जनकगंज क्षेत्र के थाने में विधायक दक्षिण लश्कर के संरक्षण में उनकी जाति के पदस्थ थानेदारों का आम जनता के पिछड़ी जाति दलितों आदि में भय का वातावरण देखा जा रहा है। कुछ दर्जन वोटों से जीते लश्कर के विधायक अपने क्षेत्र के जनकगंज, कम्पू कोतवाली आदि क्षेत्र में अपनी जाति के थानेदारों को नियुक्त कराने पर अड़े थे जिससे थानेदार बेलगाम होकर खूब पैसा बनाने में लगे देखे जा रहे हैं। ऊपर से आम चुनावों के चलते पुलिस वाले अपनी नौकरियां बचाने के चलते महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों, गुण्डों, असामाजिक तत्वों पर ध्यान नहीं दे पा रही है। जब तक अखबार में बड़ी से बड़ी खबर न छप जाये पुलिस वाले किसी गुण्डे को शिकायतें आने पर भी बोलते नहीं हैं।
उधर सरकार भी लाचार बनी हुई है। उसके प्रबन्धक जिलों में संभागों में तैनाती करने में विधायकों, सांसदों व थैली शाहों की सिफारिशों पर ही अफसरों की तैनाती करने को मजबूर हैं। पिछली कमलनाथ सरकार में तो एक महिला पुलिस अधिकारी सेटिंग कराके ही पदस्थापना कराने पर चर्चा में रही थीं। एक साल से 69 बैच के आय.पी.एस. भिण्ड, ग्वालियर, छतरपुर, सागर में पुलिस कप्तान रहे राजेन्द्र चतुर्वेदी भ्रष्टाचारों के चलते भोपाल जेल में बंद हैं। 12 विभागीय जांचों के चलते चतुर्वेदी को ए.डी.जी. तक पदोन्नत कर दिया गया था। हैरत है इसके बाद 86 बैच के शर्मा जी को अपनी पत्नी से मारपीट करने पर निलम्बित करना पड़ा है। इसी तरह शैलेन्द्र श्रीवास्तव जो 5 सालों तक परिवहन आयुक्त रहे थे उनकी 120 से ज्यादा सम्पत्तियों पर आयकर विभाग ने जांचें शुरू कर दी हैं। शैलेन्द्र श्रीवास्तव के पास 2 हजार करोड़ की सम्पत्तियां होने की खबरें प्रशासनिक सूत्र बता रहे हैं। मध्य प्रदेश भर में 20 साल पहले तक बड़े नामी व अफसरान रहे थे। एम.एन. बुच, जी.एन. बुच से लेकर सुधीरनाथ, अजयनाथ, दिलीप कामदेव व भागीरथ प्रसाद का नाम काफी इज्जत से लिया जाता रहा है। पन्नालाल से लेकर रामलाल वर्मा भी पुलिस अधीक्षक के तौर पर लोकप्रिय रहे थे। इन्दौर, ग्वालियर आदि में अब ऐसे अफसर देखने को भी नहीं हैं। प्रदेश में अच्छे अफसरानों को सियासतदां पसन्द नहीं करते हैं। ये आम तौर से देखा जा रहा है। प्रकाशचन्द्र सेठी, अर्जुन सिंह के दौर में ईमानदार अफसरों को काफी तरजीह दी जाती रही है।
दतिया में कलेक्टर रहे अशोक शिवहरे जो महज मिट्टी का तेल आम जनता को न मिल पाने पर हटा दिये गये थे। जबकि मिट्टी के तेल की लगभग सभी एजेन्सी सत्ता दल के नेताओं और दलालों के पास रहती आ रही हैं फिर भी व्ही.के. पवार, आर.के. गुप्ता आदि आय.पी.एस. वालों पर उंगलियां उठती रही हैं। इन्दौर के 10 थाना प्रभारियों ने सुन्दरलाल पटवा मुख्यमंत्री के शासन 90 के दौरान अपने पुलिस महानिदेशक मालवी साहब तक को हटवा दिया था। जबकि मालवी ईमानदार व न्यायप्रिय अफसरों में शुमार रहे थे। ग्वालियर चम्बल में एच.एम. जोशी, जे.एम. कुरेशी, एम.डी. शर्मा, ए. साइऔ मनोहर, ए.एन. पाठक व ओ.पी. राठौर साहब जैसे लोकप्रिय आई.जी., डी.आय.जी. व पुलिस अधीक्षक साहेबान भी रहे हैं जिन्होंने सामाजिक न्याय के पक्ष को मजबूत किया था। अपनी कुर्सी चले जाने की परवाह नहीं की कभी। आय.ए.एस. में शिवराज सिंह, राकेश श्रीवास्तव, पी.नरहरि ने भी अपनी कुर्सी के लिए समझौता नहीं किया। नरहरि साहब ने कला संस्कृति, पुरातत्व को बढ़ावा भी दिया। राजीव टंडन, संजय राणा भी लोकप्रिय पुलिस अफसर के तौर पर लोकप्रिय हैं। राणा ने भिण्ड एस.पी. के तौर पर निष्पक्ष चुनाव कराने का सफलतापूर्वक अभियान चलाया था। अर्जुन सिंह के दौर में उन्हें भिण्ड में पदस्थ किया गया था। यहां के ठाकुर लोग दलितों को वोट डालने से रोकते आ रहे थे।

 

श्रीलंका की दाल में कुछ काला
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
श्रीलंका और भारत के संबंधों में पिछले कुछ वर्षों में काफी उतार-चढ़ाव आए लेकिन अब जबकि श्रीलंका में भाई-भाई राज है याने गोटबाया और महिंद राजपक्ष क्रमशः राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हैं, आपसी संबंध बेहतर बनने की संभावनाएं दिखाई पड़ रही हैं लेकिन अभी- अभी दाल में कुछ काला दिखाई पड़ने लगा है| महिंद राजपक्ष कुछ समय पहले तक श्रीलंका के शक्तिशाली राष्ट्रपति के रुप में शासन कर चुके हैं। उन्हें तमिल उग्रवादियों और आतंकियों का सफाया करने का श्रेय दिया गया था। वे सिंहल जनता के महानायक बन चुके थे लेकिन भारत के साथ उनके दो मतभेद थे। पहता तो यह कि उन्हें तमिल-विरोधी माना जाता था। श्रीलंका में तमिलों ने अलग देश बनाने का आंदोलन चला रखा था। उस पर जयवर्द्धन और श्रीमावो बंदारनायक की सरकारें काबू नहीं कर पाई थी। लेकिन महिंद राजपक्ष ने उग्र तमिल-विरोधी युद्ध के कारण भारत से भी दूरी बना ली थी। भारत की सभी सरकारें श्रीलंका के तमिल अल्पसंख्यकों के लिए न्याय की मांग करती रही हैं और उन्हें स्वायत्तता देने का समर्थन करती रहती थी। इसी कारण भारत का पड़ौसी होने के बावजूद श्रीलंका चीन से नत्थी होता गया लेकिन महिंद राजपक्ष की सरकार ने अब भारत-प्रथम का नारा दिया है। 26 सितंबर को महिंद राजपक्ष और नरेंद्र मोदी के बीच वार्तालाप हुआ, वह भारत की नजर से काफी अच्छा रहा लेकिन ताज़ा खबर यह है कि उस बातचीत का जो संयुक्त वक्तव्य निकला है, उसकी बात श्रीलंका सरकार की विज्ञप्ति में से नदारद है। प्रधानमंत्री मोदी ने राजपक्ष से अनुरोध किया था कि वे श्रीलंकाई संविधान के 13 वें संशोधन को ठीक से लागू करवाएं याने तमिलों को संघात्मक अधिकार दें। शक्तियों का विकेंद्रीकरण करे। महिंद राजपक्ष ने इस पर सहमति जताई, ऐसा दावा हमारे विदेश मंत्रालय ने किया था लेकिन श्रीलंका सरकार के बयान से यह सहमति गायब है। महिंद राजपक्ष के बड़े भाई और राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्ष पहले से ही कह चुके हैं कि हमारी सरकार ‘‘विकेंद्रीकरण की बजाय विकास’’ पर ध्यान देगी। सत्तारुढ़ सिंहल-पार्टी की यह मजबूरी है, क्योंकि श्रीलंका के सवा दो करोड़ लोगों में 75 प्रतिशत सिंहली हैं और तमिल सिर्फ 11-12 प्रतिशत हैं। श्रीलंका के तमिल अपने अधिकारों की रक्षा के लिए भारत और खास तौर से तमिलनाडु की तरफ देखते हैं। भारत की पहल पर ही 1987 में जयवर्द्धन-सरकार 13 वां संशोधन लाई थी। अब राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्ष का कहना है कि नया संविधान बनेगा, जिसमें से 13 वें संशोधन को हटा दिया जाएगा। 13 वें संशोधन के कई प्रावधानों को आज 33 साल बाद भी लागू नहीं किया गया है। यह मामला श्रीलंका के सिंहलों और तमिलों के बीच तो तूल पकड़ेगा ही, यह भारत और श्रीलंका के बीच भी तनाव पैदा करेगा। मोदी और राजपक्ष ने आपसी सहयोग के कई अन्य मुद्दों पर भी बात की थी लेकिन यह तमिल मुद्दा ही दोनों देशों के संबंधों को तय करेगा।

मोदी की चिंता; आपदाओं के समय कहाँ था- राष्ट्रसंघ…..?
ओमप्रकाश मेहता
अपनी उम्र से करीब छः साल बड़े संयुक्त राष्ट्रसंघ से भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी ने सवाल किया है कि पिछले पचहत्तर सालों में राष्ट्रसंघ में बदलाव क्यों नही आया, क्यों आज भी वह उसी समय के ढकोसलों और विचार धाराओं पर चल रहा है, मोदी जी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के पचहत्तरवें साधारण अधिवेशन में इस वैश्विक संगठन की अब तक की भूमिका पर अनेक सवाल उठाए तथा पूछा कि इस लम्बी अवधि में आए वैश्विक संकटों के समय संयुक्त राष्ट्रसंघ की क्या भूमिका रही? इन संकटों से निपटने की दिशा में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने क्या किया, विशेषकर विश्वव्यापी आतंकवाद और कोरोना महामारी के समय? इन्हें रोकने और इनके जन्मदाताओं या संरक्षकों को दण्डित करने की दिशा में राष्ट्रसंघ ने क्या कार्यवाही की? मोदी ने भारत को लेकर भी सवाल उठाया कि राष्ट्रसंघ ने विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत की अब तक उपेक्षा क्यों की? उसे उसके यथोचित सहयोग से वंचित क्यों किया गया?
वैसे मोदी के भारत की उपेक्षा और राष्ट्रसंघ की अब तक की भूमिका को लेकर उठाए गए सवाल एकदम सही थे, उनकी वाणी से भारत की उपेक्षा का दर्द मुखरित भी हुआ, किंतु क्या इस तल्ख टिप्प्पणी भरे सवालों के पीछे मोदी की भावना महाशक्तियों को विशेष तवज्जोह देने की शिकायत भी छिपी थी क्या? और उनका यह कहना था कि पूरे विश्व में भारत आतंकवाद और मौजूदा कोरोना संकट से सबसे अधिक त्रस्त है और राष्ट्रसंघ तो ठीक महाशक्तियां भी इन दोनों संकटों के समय भारत के प्रति उदासीनता का रूख अपनाए हुए है।
अपने तर्कों के पक्ष में मोदी जी ने भारत में देशहित में मौजूदा सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों व जनहितकारी योजना-परियोजनाओं का भी जिक्र किया और कहा कि इस वैश्विक संगठन (राष्ट्रसंघ) को समय व उसकी आवश्यक्ता के अनुरूप चलना जरूरी है, क्योंकि विश्व के सभी सदस्य देश बड़ी आशाभरी निगाहों से राष्ट्रसंघ की ओर देख रहे हैं, इसके लिए राष्ट्रसंघ को अपनी पुरानी परम्पराओं व ढकोसलों को त्याग कर सभी सदस्य देशों की क्षमताओं को साथ लेकर चलना होगा, जिससे की वह सही अर्थों में सभी सदस्य देशों के संरक्षक की भूमिका का निर्वहन कर सके और सभी देश आश्वस्त हो सकें।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि तीन सप्ताह बाद (24 अक्टूबर को) राष्ट्रसंघ का पचहत्तरवां जन्मदिन आ रहा है और अगले साल भारत संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने वाला है, इसलिए यदि यह कहा जाए अपरोक्ष रूप से भारतीय प्रधानमंत्री ने अपनी नई भूमिका का एजेण्डा प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, तो कतई गलत नहीं होगा? और यह तो विश्व के सभी देश जानते है कि विश्वव्यापी आतंकवाद को संरक्षक देने वाले पाकिस्तान और विश्व व्याप्त महामारी कोरोना के जन्मदाता चीन के खिलाफ संयुक्त राष्ट्रसंघ ने अब तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं की, ये दोनों देश भारत के कट्टर पारम्परिक विरोधी देश रहे है और आज भी है, ऐसे में इन दोनों विश्वव्यापी संकटों के हल की दिशा में संयुक्त राष्ट्रसंघ की निष्क्रीयता भारत के लिए चिंता व रोष का विषय तो है ही। इसलिए यदि मौके का फायदा उठाकर मोदी जी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ को उसका ही आईना दिखा दिया तो क्या गलत किया?
विश्व में अपनी प्रासंगिकता को स्पष्ट करते हुए मोदी जी ने पूरे विश्व के सदस्य देशों को याद दिलाया कि विश्वव्यापी संकटों के समय भारत ने अपनी उपयोगिता किस तरह सिद्ध की, उनका कहना था कि भारत हमेशा से विश्वव्यापी आपदाओं के हल करने में अग्रणी रहा है, उन्होंने उदाहण दिया कि हाल ही में महामारी कोरोना के संकट काल में भारत ने करीब डेढ़ सौ देशों को अपने देश से औषधियां व अन्य रोग निरोधक वस्तुएं पहुंचाई, जबकि इस महामारी को पैदा करने वाला देश चीन मौन दर्शक बना रहा।
इस प्रकार हमारे प्रधानमंत्री जी ने अपने संक्षिप्त सम्बोधन में जहां राष्ट्रसंघ को उसके दायित्वों के साथ समय के साथ चलने की सीख भी दे दी, वहीं सदस्य देशों को भी पुरानी पटरी छोड़ नई पटरियों पर आने का परामर्श दे दिया।

चम्बल क्षेत्र में एक दौर था गांधीवादी समाजवादियों का भी…!
नईम कुरेशी
मध्य प्रदेश में होने जा रहे 27 34 चुनावों की हलचल गहमा गेहमी काफी तेज हो गई है। विगत दिनों पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने 14 किलोमीटर लम्बे रोड शो को करके इस चुनावी समर को और भी गहरा दिया है। कांग्रेस का ऐसा रोड शो पिछले 15-20 सालों में नहीं हो पाया था जबसे सिंधिया कांग्रेस से भारतीय जनता पार्टी में चले गये हैं लगता है कांग्रेस फिर से जवान हो गई है। वैसे ग्वालियर चम्बल इलाके के 8 जिलों श्योपुर, मुरैना, भिण्ड, दतिया, शिवपुरी, गुना, अशोक नगर व महानगर ग्वालियर में एक दौर में सिंधिया उनका परिवार खासा लोकप्रिय रहा है व विकास का पर्यायवाची के तौर पर भी माना जा चुका है।
लोकप्रिय डॉ. नरोत्तम भी हैं
फिर भी दतिया के लोकप्रिय नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा को भी माधवराव सिंधिया (184-99) के बाद इलाके में विकास का जननायक के तौर पर देखा जा रहा है। उन्होंने पिछले 10 सालों में एक छोटे से दतिया शहर का स्वरूप काफी कुछ बदल दिया जो इससे पहले कोई नहीं कर सका था। दतिया का आभामण्डल महज धार्मिक शहर के तौर पर बुन्देलखण्ड के छोटे वृन्दावन के तौर पर माना जाता था पर यहां लम्बे चौड़े ओवरब्रिज बनाकर व मेडीकल कॉलेज बनवाकर डॉ. मिश्रा ने इसे बड़े नगर बनाने की आधारशिला रखकर भा.ज.पा. के यहां गहरे पांव जमा दिए हैं। मुस्लिम भी उनके साथ देखे गये हैं।
यशवंत कुशवाह
ग्वालियर चम्बल इलाके की तमाम विशेषतायें हैं। भारतीय फौज में कोई एक लाख जवान भिण्ड मुरैना से ही जाते हैं। भिण्ड से यशवंत सिंह कुशवाह लोकसभा सदस्य व मंत्री रहे थे। उन्हें हम लोग ग्वालियर चम्बल का कबीर व कुछ लोग गांधी भी कहते आ रहे हैं। कुशवाह जी एक दौर में पत्रकार भी थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका भी निभाई थी। वो ग्वालियर की राजमाता के राजनैतिक सलाहकार भी रहे थे। सिंधिया परिवार उन्हें काफी मानता था। इसी तरह भिण्ड में समाजवादी पृष्ठभूमि से आये डॉ. राममनोहर लोहिया के साथ बाबू रघुवीर सिंह भी काफी लोकप्रिय नेता माने जाते हैं। उनकी पत्नी भी 1972 में यहाँ से विधायक रही। मुरैना से समाजवादी आंदोलन से आये बाबू जबर सिंह तोमर भी 70-80 के दशक में बड़े नेता रहे थे।
आज के दौर के नेता कलेक्टर व पुलिस अधीक्षक की बैसाखी वाले नेता ग्वालियर चम्बल में बनते दिखाई दे रहे हैं। डबरा से 3 बार विधायक का चुनाव जीतीं इमरती देवी का कहना है कि हमारी सत्ता है। हम कलेक्टरों से कहकर या कहलाकर कहीं से भी चुनाव जीत सकते हैं। इमरती देवी डबरा में 20 साल पहले खेतिहर मजूर के तौर पर आई थीं और यहाँ जिला पंचायत सदस्य के तौर पर सक्रिय रहकर आगे बढ़ी हैं, अच्छी नेता हैं। सिंधिया समर्थक शुरू से ही हैं। उन्हें कांग्रेस में खूब संघर्ष करना पड़ा है। वो डबरा इलाके में लोकप्रिय रही हैं। 40 हजार से भी ज्यादा वोटों से वो जीती रही हैं।
प्रद्युम्न तोमर की लोकप्रियता
चम्बल ग्वालियर इलाके में एक ही घर से दोनों पार्टियाँ चलती हैं कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी। इस बार भारतीय जनता पार्टी सत्ता के सहारे शायद ज्यादा कमाल न कर पाये। उसे भिण्ड, मुरैना, श्योपुर व ग्वालियर, गुना में खूब पसीना बहाना पड़ सकता है क्योंकि कांग्रेस का पुराना वोट बैंक शायद उसका साथ नहीं देता दिखाई दे रहा है जिस मुस्लिम समाज व दलितों को संघ परिवार बात-बात पर कोसता रहा हो उसकी राह में कांटे बिछाता रहा हो वो कमल के फूल पर वोट दे दे ये संभव नहीं लगता। सत्ता की मलाई तो इस इलाके के 10 फीसद ठाकुर व ब्राम्हण ही खाते दिखाई दे रहे हैं। वो ही एडमिनिस्ट्रेशन में हैं। सियासत में एस.डी.एम., डी.एस.पी., तहसीलदार, थानेदार बनकर वो ही मंत्री हैं फिर भी उपनगर ग्वालियर में प्रद्युम्न तोमर की लोकप्रियता मुस्लिम व दलितों में काफी गहराई से देखी जा रही है। वो पवैया की तरह अहंकारी व बदजुबान नहीं दिखाई देते। संघ परिवार व भा.ज.पा. वाले भी उन्हें कुछ ज्यादा हानि नहीं पहुंचाने वाले क्योंकि वो गरीबों में खासे लोकप्रिय हैं। सिंधिया का जादू कुछ कम है।

अकाली की अलग राह
सिद्धार्थ शंकर
किसान क्रांति पर विपक्ष के घमासान के बीच अब एनडीए में भी फूट पड़ गई है। करीब 22 सालों से एनडीए के साथ रही शिरोमणि अकाली दल के कोटे से मंत्री हरसिमरत कौर ने पहले सरकार का साथ छोड़ा और अब पार्टी ने एनडीए से नाता तोड़ लिया जिस कृषि बिल को मोदी सरकार किसान क्रांति बता रही है। उस बिल पर एनडीए में टूट हो गई है। शिरोमणि अकाली दल ने पहले सरकार का साथ छोड़ा और अब 9 दिन बाद अकाली दल एनडीए के कुनबे से बाहर हो गया। बड़ा सवाल यह है कि क्या शिरोमणि अकाली दल कांग्रेस के जाल में फंस गया। किसान बिल को लेकर पंजाब और हरियाणा में ही विरोध है। खास तौर पर पंजाब में किसान आंदोलित हैं और शिरोमणि अकाली दल के लिए यह बड़ी मुसीबत है।
किसान अकाली दल का बड़ा जनाधार रहे हैं। किसान बिल पर मोदी सरकार के साथ दिखने से किसानों की नाराजगी का डर था। 2022 के विधान सभा चुनाव में किसान कांग्रेस के पक्ष में जा सकते थे और इसीलिए राजनीति तेज है। कांग्रेस इसे सोची-समझी रणनीति बता रही है। हालांकि अकाली दल के अलग होने से मोदी सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पडऩे वाला है। लोकसभा में भाजपा के पास खुद का बहुमत है और अकाली दल के लोकसभा में दो और राज्यसभा में तीन सांसद हैं। इसलिए मोदी सरकार के लिए फिलहाल कोई चुनौती नहीं लेकिन अपने पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल के नाता तोड़ लेने से भाजपा के लिए एक खटका जरूर है। मगर भारतीय जनता पार्टी के जन्म से ही उसका सबसे बेहद भरोसेमंद सहयोगी शिरोमणि अकाली दल के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग होने के एलान के साथ ही यह सवाल सियासी गलियारों में उठने लगा है कि क्या अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने जिस गठबंधन की नींव डालकर भाजपा को केंद्र की सत्ता तक पहुंचाया था, पहले शिवसेना और अब अकाली दल के अलग होने से उसकी बुनियाद दरकने लगी है, या अभी ऐसा कहना बहुत जल्दबाजी होगी क्योंकि लोकसभा चुनावों में अभी साढ़े तीन साल से ज्यादा का वक्त है।क्योंकि शिवसेना और अकाली दल, दोनों भाजपा के सबसे पुराने और भरोसेमंद सहयोगी दल थे। उधर बिहार में जनता दल(यू) और लोक जनशक्ति पार्टी की तकरार अगर नहीं थमी तो चिराग पासवान किस रास्ते पर जाएंगे कहना मुश्किल है।
वाजपेयी युग में तमाम गैर कांग्रेसी दलों को एकजुट करके जो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बना था,उसमें करीब 24 छोटे बड़े दल शामिल थे, जिनमें प्रमुख रूप से भाजपा, शिरोमणि अकाली दल, शिवसेना,जनता दल(एकीकृत), लोक जनशक्ति पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, तेलुगू देशम, बीजू जनता दल, नेशनल कांफ्रेंस आदि थे। इनमें से वाजपेयी सरकार के कार्यकाल के आखिरी दौर में द्रमुक एनडीए से बाहर हुआ और उसकी जगह अन्नाद्रमुक ने ले ली। 2004 में भाजपा के चुनाव हारने के बाद तृणमूल कांग्रेस और बीजद अलग हो गए। देश की राजनीति और एनडीए के भीतर भी खासा उतार चढ़ाव आया, लेकिन अकाली दल और शिवसेना का भाजपा से नाता बना रहा। यहां तक कि 2013 में नीतीश कुमार के जनता दल(यू) ने भी भाजपा और एनडीए से अपना रिश्ता खत्म कर लिया था और 2015 के विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव के राजद और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा, जीता, सरकार बनाई और डेढ़ साल बाद जद(यू) ने फिर पलटी मारी और भाजपा से नाता जोड़कर सरकार बनाई। 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे के मुद्दे पर भाजपा और शिवसेना अलग अलग चुनाव लड़े लेकिन चुनाव के बाद दोनों ने मिलकर सरकार बनाई। 2019 के लोकसभा चुनावों तक हालाकि भाजपा और शिवसेना के बीच खासी दरार आ गई थी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने शिवसेना के साथ गठबंधन टूटने नहीं दिया और पहले लोकसभा फिर विधानसभा चुनावों में दोनों दल मिलजुल कर मैदान में उतरे और जीते। लेकिन विधानसभा चुनावों के बाद शिवसेना ने मुख्यमंत्री पद पर अड़कर भाजपा से नाता तोड़ लिया और कांग्रेस एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई। वैसे 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले तेलुगू देशम, उपेंद्र कुशवाहा (रालोसपा) और जीतनराम मांझी की पार्टी हम ने भी एनडीए से नाता तोड़ लिया था, लेकिन उनकी चुनाव में जो दुर्गति हुई, उसे सबने देखा। हालाकि मांझी अब फिर एनडीए में लौट आए हैं जबकि कुशवाहा अभी उहापोह में हैं। जो भी हो बात अगर अकाली की करें तो पंजाब में विरोध का जो आलम है, उसमें उसके सामने अपने किसान जनाधार को बचाने के लिए इसके अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था। उधर, भाजपा का एक बड़ा तबका खुश है कि पार्टी अकाली दल से खुद अलग होने के आरोप से बच गई और अब उसे पंजाब में खुल कर राजनीति करने का मौका मिलेगा।

क्या कठमुल्लाओं की साज़िश का शिकार है इस्लामी जगत?
तनवीर जाफ़री
पाकिस्तान के महानगर कराची में गत 11-12 सितंबर को सुन्नी (अहल-ए-सुन्नत) मुसलमानों के विभिन्न संगठन जिस समय सामूहिक रूप से एक विशाल प्रदर्शन पाकिस्तान के शिया समुदाय को लक्ष्य बनाते हुए आयोजित कर रहे थे और कई वक्ता जिनमें अधिकांशतः मौलवी,मुफ़्ती,हाफ़िज़ व क़ारी आदि ही थे,लाखों की भीड़ को देखकर उत्साहित होते हुए पूरी दुनिया को मुसलमानों की ताक़त दिखाते हुए ‘ललकार’ रहे थे ठीक उसी दिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक ट्वीट से दुनिया को यह सूचित कर रहे थे कि – ‘आज एक और ऐतिहासिक सफलता! हमारे दो महान दोस्त इज़रायल और बहरीन साम्राज्य एक शांति समझौते के लिए सहमत हैं – 30 दिनों में इज़रायल के साथ शांति बनाने वाला दूसरा अरब देश!’ राष्ट्रपति ट्रंप बताना चाह रहे थे कि जिस तरह गत माह संयुक्त अमीरात अर्थात यूएई, इज़राइल के साथ अपने संबंध सामान्य करने पर राज़ी हो गया था उसी तरह अब बहरीन साम्राज्य ने भी शांति समझौता कर इज़राईल से अपने मधुर रिश्ते बना लिए हैं। ग़ौर तलब हैं कि यू ए ई व बहरीन जैसे सुन्नी बाहुल्य व सुन्नी शासकों द्वारा शासित साम्राज्य उन्हीं अरब देशों में शामिल हैं जो दशकों से यह कहते रहे हैं कि जब तक फ़िलिस्तीनियों को उनके अधिकार नहीं मिल जाते तब तक इस्राईल का बहिष्कार भी जारी रहेगा तथा उसके साथ किसी भी तरह के संबंध बहाल करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। आश्चर्य है कि पाकिस्तान के जो कठमुल्ला अपनी ताक़त का प्रदर्शन कर पूरे विश्व को सुन्नी मुस्लिम एकता का सन्देश दे रहे थे साथ साथ पाकिस्तान के शियाओं को भी धमका व ललकार रहे थे उनकी इस ‘महा शक्ति ‘ का एहसास यू ए ई व बहरीन के सुन्नी शासकों को क्यों नहीं हुआ? जो कठमुल्ले वक्ता उसी मंच से अमेरिका पर भी निशाना साध रहे थे उसी अमेरिकी साज़िश का शिकार आख़िर मध्य पूर्व के दो प्रमुख सुन्नी साम्राज्य कैसे हो गए ? इस्लाम के इन सुन्नी झंडा बरदारों ने आख़िर उसी इस्राईल के सामने घुटने क्यों टेक दिए जो दशकों से अरब की सर ज़मीन पर क़ब्ज़ा करते हुए फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों का हनन करता आ रहा है?
कराची में 11 सितंबर को इकट्ठी हुई बेरोज़गारों की भीड़ तथा इन्हें गुमराह कर पाकिस्तान में भी अस्थिरता की साज़िश रचने वाले मुट्ठी भर कठमुल्लाओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे जिस शिया समुदाय को अल्पसंख्यक होने के कारण पाकिस्तान में आँखें दिखा रहे हैं वही शिया बाहुल्य देश ईरान इस समय दुनिया का अकेला ऐसा देश है जो अमेरिका और इस्राईल की आँखों की किरकिरी बना हुआ है। वजह साफ़ है कि फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर ईरान का जो नज़रिया कल था वही आज है जबकि मुस्लिम जगत का ठेकेदार बनने वाले मौक़ा परस्त अरब देशों का फ़िलिस्तीन के प्रति नज़रिया अमेरिका व इज़राईल के प्रति घुटने टेकने वाला है जिसके चलते फ़िलिस्तीनी अवाम आज पहले से ज़्यादा फ़िक्रमंद नज़र आने लगी है।
बहरहाल, अमेरिका-इस्राईल साज़िश के तहत बुलाई गयी इस रैली में जिसे ‘नामूस-ए-सहाबा’ रैली का नाम दिया गया था,मुस्लिम वहाबी वर्ग के लोगों की बहुसंख्या थी परन्तु सुन्नी एकजुटता दिखाने के लिए कुछ बरेलवी व अहले हदीस समुदाय के वक्ता ज़रूर बुलाए गए थे। इस रैली में जो नारे बार बार लगाए जा रहे थे उनमें अहले बैत (हज़रत मोहम्मद के परिजन), ख़ास तौर पर हज़रत इमाम हुसैन,हज़रत अब्बास सभी के ज़िंदा बाद के नारे लगाए जा रहे थे साथ साथ इमाम हुसैन के क़ातिल यज़ीद के मुर्दाबाद व उसपर लानत भेजने वाले गगनभेदी नारे भी लग रहे थे। इन नारों पर शिया व सुन्नी दोनों समुदायों को कोई भी आपत्ति नहीं है। सुन्नी समुदाय को सबसे बड़ी आपत्ति इस बात को लेकर है कि शिया समुदाय के लोग पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद के देहांत के बाद एक के बाद एक कर बनाए गए चार ख़लीफ़ाओं में से पहले तीन यानी हज़रत अबू बक्र,हज़रत उमर व हज़रत उस्मान को अपना ख़लीफ़ा मानने से इनकार करते हैं ,इतना ही नहीं बल्कि चौथे ख़लीफ़ा हज़रत अली को भी मानते तो हैं परन्तु सुन्नी समुदाय द्वारा स्वीकृत चौथे ख़लीफ़ा के रूप में नहीं बल्कि इमामत के सिलसिले के पहले इमाम के रूप में। इसी तरह यज़ीद के वालिद हज़रत मुआविया को भी शिया समाज स्वीकार नहीं करता जबकि सुन्नी समुदाय हज़रत मुआविया को भी सहाबी-ए-रसूल और अमीर-मुआविया के रूप में पूरे सम्मान व श्रद्धा की नज़रों से देखता है।
शिया समाज का मानना है कि हज़रत मोहम्मद चूंकि अपने जीवन में स्वयं अपना उत्तराधिकारी हज़रत अली को हज के दौरान ग़दीर के मैदान में सार्वजनिक रूप से नियुक्त कर गए थे इसलिए पैग़ंबर के देहांत के बाद उनके निर्देशों की अवहेलना करना व उनके देहांत के बाद स्वयंभू रूप से चुनाव कर ख़िलाफ़त का सिलसिला शुरू करना क़तई तौर पर पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद के निर्देशों व उनकी इच्छाओं की अवहेलना है।और करबला की घटना के बाद यही वैचारिक जंग इतनी आगे बढ़ गयी जिसने पूरे विश्व में मुस्लिम जगत में विभाजन की दो गहरी लाइनें खींच दीं। पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद,उनकी बेटी हज़रत फ़ातिमा उनके पति हज़रत अली व उनके दोनों बेटों हज़रत इमाम हसन व हुसैन (अहल-ए-बैत) को मानने वाले तथा इसी सिलसिले को आगे बढ़ने वाली इमामत परंपरा का अनुसरण करने वाले शिया कहे गए जबकि ख़िलाफ़त परंपरा को मानने वाले तथा यज़ीद के वालिद मुआविया को अमीर-ए-मुआविया स्वीकार करने वाले सुन्नी जमाअत के लोग हैं। इन दोनों समुदायों को एक दूसरे से समस्या इस बात को लेकर है कि प्रायः अनेक शिया मौलवी व वक्ता अपने प्रवचन के दौरान विशेषकर मुहर्रम के दिनों में आयोजित होने वाली मजलिसों के दौरान तीनों ख़लीफ़ाओं व मुआविया सहित कुछ ऐसे लोगों के इतिहास खंगालने लगते हैं जिन्हें सुन्नी समुदाय के लोग मान सम्मान की नज़रों से देखते हैं। प्रचलित भाषा में इसे तबर्रेबाज़ी कहा जाता है। जबकि शिया उलेमा कहते हैं कि वे जो कुछ भी बयान करते हैं वह एक सच्चाई है।
शिया सुन्नी मतभेदों को बढ़ने में जहाँ पश्चिमी ताक़तें सक्रिय रहती हैं वहीँ समय समय पर अरब हुकूमत या अरब द्वारा प्रसारित वहाबी विचारधारा ने भी कई बार जलती आग में घी डालने का काम भी किया है। मिसाल के तौर पर मदीना स्थित सबसे पहले व सबसे प्राचीन क़ब्रिस्तान जिसे जन्नतुल बक़ी कहा जाता है,में स्थित पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद के परिजनों के मक़बरों व मज़ारों को वहाबी विचारधारा के लोगों द्वारा 1804 ईस्वी में ध्वस्त कर दिया गया। इसके बाद इसी वहाबी गिरोह ने मक्का में भी जन्नतुल मुल्ला नामक क़ब्रिस्तान में हज़रत मोहम्मद व हज़रत अली के कई रिश्तेदारों के मक़बरों व क़ब्रों को तहस नहस किया। फिर 21 अप्रैल 1925 को इसी ज़हरीली विचारधारा ने पैग़ंबर मोहम्मद की बेटी व हज़रत अली की पत्नी हज़रत फ़ातिमा,उनके बेटे हज़रत इमाम हसन व इमाम हुसैन तथा शियों के चौथे इमाम व हज़रत हुसैन के पुत्र हज़रत ज़ैनुल आबिदीन व हज़रत इमाम बाक़र के मक़बरों,उनके घरों व उनके स्मारकों को भी तबाह व बर्बाद कर दिया गया। करबला से लेकर अरब की सर ज़मीन तक समय समय पर वहाबियों द्वारा अंजाम दी जाने वाली इस तरह की घटनाओं ने ही इन दोनों शिया व सुन्नी समुदायों के बीच की दरार और गहरी करने का काम किया है।
परन्तु इन सभी हक़ीक़तों के बावजूद ईरान में इस्लामी क्रांति के सूत्र धार आयतुल्ला इमाम ख़ुमैनी से लेकर भारत में शिया विद्वान मौलाना कल्बे सादिक़ तक ने और जामा मस्जिद के पूर्व इमाम स्व अब्दुल्ला बुख़ारी व भारत व पाक में सक्रिय बरेलवी विचारधारा के अनेक आलिमों का यह मंतव्य रहा है कि वर्तमान वैश्विक राजनीति के मद्देनज़र मुसलमानों के इन दोनों प्रमुख वर्गों को अपने मतभेदों को पीछे छोड़ केवल इस्लाम व मुसलमान की बात करनी चाहिए। भारत सहित कुछ अरब देशों में भी सुन्नी शिया की नमाज़ एक साथ व एक दूसरे वर्ग के इमामों के पीछे पढ़ने की शुरुआत भी की गयी। परन्तु जैसा की पूरे विश्व में देखा जा सकता है कि उदारवाद की मुहिम धीमी रफ़्तार पकड़ती है जबकि फ़ितना,फ़साद या फ़ासला पैदा करने की मुहिम तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ती है। इसी वातावरण ने पाकिस्तान के 20 प्रतिशत शिया समाज के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। अब पाकिस्तानी वहाबी उलेमाओं की कोशिश है कि उनके ख़लीफ़ाओं की शान में गुस्ताख़ी करने वाले शिया आलिमों के ख़िलाफ़ ईश निंदा करने के मामले में मुक़द्द्मा चलाया जाए। पाकिस्तान में निंदा करने वालों को फांसी की सज़ा तक सुनाई जा सकती है। फ़िलहाल जिन शिया मौलाना पर तबर्रा पढ़ने का आरोप है ख़बरों के मुताबिक़ वे पाकिस्तान से लंदन तशरीफ़ ले जा चुके हैं और उनकी तक़रीर पर नारे लगाने वाला शिया समुदाय दहशत में जीने के लिए मजबूर है। मुझे यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि आज संपूर्ण मुस्लिम जगत कठमुल्लाओं की ही साज़िश का शिकार है।

अब भारत के दबाव में आया चीन
रमेश सर्राफ धमोरा
भारत चीन सीमा पर पिछले 5 महीनों से लगातार तनाव बना हुआ हैं। भारत में लद्दाख के पास भारत चीन के मध्य वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर दोनों देशों की सेना तैनात है। जो हर स्थिति का सामना करने के लिए तत्पर है। भारत चीन सीमा पर जारी तनाव के मद्देनजर पिछले 15 जून की रात्रि में हुए खूनी संघर्ष में भारतीय सेना के एक कर्नल सहित 20 जवान शहीद हो गए थे। हालांकि चीन की सेना की और से भी हताहत होने वाले जवानों की संख्या भारतीय जवानों से कई गुना अधिक थी। मगर चीन ने उस दिन मरने वाले जवानों का अधिकृत आंकड़ा अभी तक सार्वजनिक तौर पर जारी नहीं किया है।
बरसों बाद सीमा रेखा पर भारत व चीन की सेना के जवानों में हुई मुठभेड़ में चीनी सेना को इस बात का एहसास हो गया कि भारतीय सेना के जवान उनसे कहीं अधिक मजबूत हैं। उस दिन अचानक हुए संघर्ष में चीनी सैनिकों ने लोहे की राड से बने पुरातन समय के हथियारों जैसे हथियारों का प्रयोग किया था। जबकि भारतीय सैनिक वैसा कोई हथियार लेकर नहीं गए थे। उस झड़प के बाद दोनों पक्षों के सैन्य कमांडरों में कई दौर की बातचीत होने के बाद दोनों पक्षों ने अपनी मौजूदा स्थिति से पीछे हटने का फैसला किया था।
मगर चीन की सेना ने उस फैसले का पूरी तरह पालन नहीं किया। जिस कारण दोनों तरफ तनाव बरकरार रहा। 28-29 अगस्त की रात्रि को चीनी सैनिकों ने लद्दाख के समीप एलएसी पर स्थित पैंगोंग झील के पास भारतीय सीमा में स्थित पहाड़ियों की ऊंची चोटियों पर कब्जा करने का प्रयास किया था। मगर वहां पहले से ही मौजूद भारतीय सेना के जवानों ने चीनी सेना के मंसूबों को नाकामयाब कर दिया।
भारतीय सेना के जवानों को पहले ही सूचना मिल गई थी कि चीन के सैनिक रात्रि में भारतीय सीमा में स्थित कई महत्वपूर्ण पहाड़ियों की ऊंची चोटियों पर कब्जा करने का प्रयास करेंगे। इसलिए चीनी सैनिकों के पहुंचने से पहले ही भारतीय सैनिकों ने उन चोटियों पर पहुंच कर अपना कब्जा जमा लिया था। उसके बाद चीन द्वारा निरंतर प्रयास किया जा रहा है कि सीमा रेखा के नजदीक स्थित भारतीय क्षेत्र की ऊंची चोटियों पर अपना कब्जा जमा कर सामरिक दृष्टि से बढ़त हासिल कर लें। मगर भारतीय सेना के जवानों के सामने चीनी सैनिकों की सभी चाल असफल होती जा रही है। इससे चीन बुरी तरह बौखलाया हुआ है। वह चाहता है कि किसी भी तरह भारतीय सेना से उन महत्वपूर्ण चोटियों को खाली करवाया जाये।
चीन द्वारा लद्दाख से लगती भारतीय सीमा क्षेत्र के पास वास्तविक नियंत्रण रेखा के उस पार बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती की जा रही है। भारी मात्रा में लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, टैंक, तोपे, गोला बारूद व लड़ाई का अन्य साजो सामान एकत्रित किया जा रहा है। इधर भारतीय सेना द्वारा भी चीनी सेना की तैयारियों को देखते हुए लद्दाख क्षेत्र में भारी सैन्य बल तैनात किया गया है। साथ ही बड़ी संख्या में युद्धक विमान, हेलीकॉप्टर, टैंक, तोप, मिसाइलें लगाई गई है। भारतीय सैनिकों ने जर्मनी से आए विशेष टेंट भी लगाने शुरू कर दिए हैं। जिनमें सर्दी के समय माइनस 50 डिग्री तापमान में भी आसानी से रह सकते हैं। भारतीय सेना द्वारा सीमा के निकट बड़ी मात्रा में सैनिकों के लिए खाद्य सामग्री, गोला बारूद व युद्ध का अन्य सामान पहुंचाया जा रहा है। इस काम में सेना सी- 17 ग्लोब मास्टर विमान, चिनूक हेलीकॉप्टर का उपयोग कर रही है।
चिनूक हेलीकॉप्टर के माध्यम से अमेरिका में बनी होवित्जर तोप को भी पहाड़ों की चोटियों पर तैनात किया जा रहा है। साथ ही कारगिल युद्ध में पराक्रम दिखा चुकी बोफोर्स तोप व स्वदेषी धनुष तोप को भी सीमावर्ती क्षेत्र में लगाया जा रहा है। भारतीय सेना चीनी सेना को हर तरह से जवाब देने में सक्षम है। भारतीय सेना के जवानों का जोश देखने काबिल है। वह चीन से अपनी 1962 की हार का बदला लेने को बेकरार नजर आ रहे हैं। छोटी-छोटी मुठभेड़ों से ही चीनी सेना को पता लग गया है कि अब भारत में 1962 से स्थिति एकदम से पलट गई है। भारतीय सेना भी युद्ध के लिए पूरी तैयारी कर रही है। चीन से मुकाबला करने के लिए भारतीय वायु सेना में हाल ही में शामिल फ्रांस में बने राफेल युद्धक विमानों को भी पहाड़ी मोर्चे पर तैनात कर दिया गया है। राफेल विमान सीमा के निकटवर्ती क्षेत्रों में लगातार उड़ान भर रहे हैं। किसी भी स्थिति का मुकाबला करने को लेकर वो पूरी तरह से तैयार नजर आ रहे हैं।
कोविड-19 के कारण चीन पहले ही पूरी दुनिया के निशाने पर आया हुआ है। उस तरफ से दुनिया का ध्यान हटाने के लिए चीन भारतीय सीमा पर छेड़खानी कर रहा है। मगर इस बार भारतीय सेना भी उनके गले की घंटी बन गई है। वर्षों से चीन की नीति रही है कि भारतीय सीमा में घुसकर वह अपना रुतबा जमात आ रहा है। फिर भारतीय पक्ष उसको पीछे हटने का निवेदन करता रहा है। मगर इस बार वैसा कुछ भी नहीं हुआ। चीन अपनी पुरानी आदत के अनुसार जैसे ही भारतीय सीमा में घुसपैठ करना शुरू किया। वैसे ही उसे भारतीय सैनिकों के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सेना को चीन को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पूरी छूट प्रदान की है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15-16 जून की घटना के बाद लद्दाख के सीमावर्ती क्षेत्रों का दौरा कर भारतीय सेना के जवानों से मिल कर उनका मनोबल बढ़ाया। चीन का मुकाबला करने के लिए भारतीय सेना द्वारा लगातार आधुनिक हथियार व गोला-बारूद की आपातकालीन खरीदारी की जा रही है। सेना को उसकी जरूरत का हर साजो सामान मुहैया कराया जा रहा है। इस वक्त अमेरिका, इजरायल, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी कोरिया जैसे देश भी खुलकर भारत के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं। अमेरिका, इजरायल, फ्रांस, रूस तो अपने आधुनिकतम हथियार तक भारत को देने के लिए तैयार हो गए हैं।
चीन की सेना यदि भारत से युद्ध करती है तो भारत की सेना उस से मुकाबला करने को पूरी तरह सजग व सतर्क नजर आ रही है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पिछले 5 सालों में भारतीय सेना का तेजी से आधुनिकी करण किया जा रहा है। सेना की हर जरूरत को सरकार प्राथमिकता के आधार पर पूरा कर रही है। इसी श्रंखला में पूर्व सैनिकों को बहु प्रतीक्षित वन रैंक वन पेंशन का लाभ दिया जा चुका है। अग्रिम मोर्चे पर लड़ने वाले सेना के जवानों के लिए बुलेट प्रूफ जैकेट, बुलेट प्रूफ हेलमेट, अत्याधुनिक राइफलें उपलब्ध करवाई गई है। सर्दी के मौसम में हिमालय क्षेत्र में तैनात जवानों के लिए विशेष ड्रेस तैयार करवाई गई है। जिनको पहनकर सैनिक आराम से सर्दी का मुकाबला कर सकता है।
चीन, पाकिस्तान सहित दुनिया के उन देशों को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि आज का भारत दुनिया में किसी देश से कम नहीं है। हालांकि भारत युद्ध में विश्वास नहीं रखता है हमेशा शांति के मार्ग पर चलने का प्रयास करता है। मगर युद्ध की स्थिति में किसी भी चुनौती का मुकाबला करने में हर हाल में सक्षम है। यदि कोई भारतीय सेना की शक्ति को कमतर करके आंकता है तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल होगी। आज भारतीय सेना विश्व की प्रथम पांच सबसे मजबूत सेना में शामिल है। ऐसे में भारत से टकराने की हिमाकत शायद ही कोई देश करेगा।

पं.दीनदयालजी कल भी प्रासंगिक थे आज भी हैं
प्रभात झा
देश में जब भी सामाजिक आर्थिक चिंतन की बात की जाती है तो गांधी, जेपी, लोहिया और दीनदयालजी का नाम लिया जाता है । हम किसी की देशभक्ति पर प्रश्नचिह्न नहीं लगा रहे । परंतु गांधीजी ने आजादी की लड़ाई लड़ी । जेपी ने आजादी की दूसरी लड़ाई लड़ी । लोहियाजी समाजवादी चेतना के संवाहक बने और दीनदयालजी स्वदेशी आधारित सामाजिक, आर्थिक चिंतन के सर्वश्रेष्ठ चिंतक बने। जब मैं दीनदयालजी के बारे में सर्वश्रेष्ठ चिंतक की बात करता हूँ तो इसका प्रामाणिक आधार है । गांधीजी की शिक्षा लंदन में हुई । जेपी की शिक्षा अमेरिकी विश्वविद्यालय में हुई और लोहिया की शिक्षा जर्मनी में हुई थी । कमोवेश इन तीनों पर उन देशों का जरूर प्रभाव पड़ा । जहाँ वे अध्ययन करने गए थे । परंतु दीनदयालजी का अध्ययन स्वदेश में हुआ । इसलिए उनके मूल में स्वदेशी चिंतन प्राकृतिक रूप में अंतर्निहित है । इसे यों कहें कि वे प्रकृति प्रदत्त स्वदेशी चिंतक थे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । अपनी – अपनी विचारधारा के धरातल पर हमारी संस्कृति में सभी को श्रेष्ठ ही माना जाता है। इसलिए गांधीजी, लोहिया, जेपी के विचारों पर हम कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाते हैं। हम इन सभी का आदर कल भी करते थे, आज भी कर रहे हैं और कल भी करेंगे । भारत के श्रेष्ठ विचारकों में हम दीनदयालजी के एकात्म मानववाद का अध्ययन करते हैं तो हम पाते हैं कि पंडित दीनदयालजी भारत की चित्ति, भारत के जनमानस और भारत की संस्कृति को समझ समस्याओं के समाधान के लिए सदैव अग्रसर हुए। यही कारण है कि दीनदयालजी कल भी प्रासंगिक थे आज भी हैं और विश्व राजनीतिक फलक पर उनका एकात्म दर्शन भी प्रासंगिक रहेगा। अगर हम गौर से देखें तो हम पाएँगे कि हर विचारक का एक शब्द प्रिय होता है । जैसे गांधीजी का अहिंसा, नेहरूजी का आराम . हराम, लोहियाजी का चौखंभा राज्य, जयप्रकाशजी का संपूर्ण क्रांति, शात्रीजी का जय जवान, जय किसान । इसी तरह दीनदयालजी का प्रिय शब्द रहा, अंत्योदय , अंत्योदय यानी अंतिम व्यक्ति का उदय। भारतीय राजनीति में विनोबा भावे ने भी सर्वोदय शब्द दिया। पर अंत्योदय में यह बात निहित है सबका साथ, सबका विकास । जब अंतिम व्यक्ति का विकास होगा तो उसके ऊपर सभी व्यक्तियों का विकास अंतर्निहित है। अंत्योदय की अंतरात्मा स्वत: अपनी उद्घोषणा करती है कि अगर अंत्योदय होगा तो सबका साथ, सबका विकास स्वत: हो जाएगा । सामाजिक जीवन में और समाज के आर्थिक जीवन में यदि हमारी अर्थव्यवस्था अंत्योदय युक्त होगी तो समाज, जीवन की चित्ति की साधना स्वत: सफल होती जाएगी । अंत्योदय शब्द में संवेदना है, सहानुभूति है, प्रेरणा है, साधना है, प्रामाणिकता है, आत्मीयता है, कर्तव्यपरायणता है तथा साथ ही उद्देश्य की स्पष्टता है । दीनदयालजी कहा करते थे कि जब तक अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति का उदय नहीं होगा, भारत का उदय संभव नहीं है । वे अश्रुपूरित आँखों से आँसू पोंछने और उसके चेहरे पर मुसकराहट को अंत्योदय की पहली सीढ़ी मानते थे । जिस देश के आर्थिक चिंतन में अंतिम पंक्ति के व्यक्ति का उदय न हो वह राष्ट्र न केवल आर्थिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी भटक जाता है । अंत्योदय सामाजिक कर्तव्य की प्रेरणा की पहल है । यह किसी राजनीतिक दल का शब्द नहीं है । सर्वकल्याणकारी, सर्वस्वीकारी और फलकारी है । अत: सरकार किसी की भी हो उस सरकार के चित्ति में अंत्योदय की लौ सतत प्रज्वलित रहनी चाहिए । प्रबलता को प्रणाम, दुर्बलता को दुलत्ती, इस नीति सिद्धांत पर कोई भी राष्ट्र तरक्की नहीं कर सकता। प्रबलता की कर्तव्यपरायणता में निर्बलता को दूर करने का साहस होता है । अत: प्रबलता की सामर्थ्य का सार्वजनिकीकरण करते हुए निर्बल को सबल बनाने का पुनीत कार्य अंत्योदय में अंतर्निहित है। जो अंत्योदय की आत्मिक पुकार है । अंत्योदय के मूल में दीनदयालजी ने कोई चुनावी लाभ नहीं देखा। क्योंकि उनका जीवन स्वत: अंत्योदय से प्रेरित था । वे समाजोत्थान के लिए अपनी हड्डी गलाने में विश्वास रखते थे । उनके शब्द और आचरण में दूरी नहीं थी। वर्षों के चिंतन के बाद उन्होंने पाया कि भारतीय जीवन और सांस्कृतिक चिंतन को जमीन पर उतारने के लिए अगर कोई नीति अंत्योदय आधारित नहीं होगी तो हम भारतीय संस्कृति से सद्भाव से गाँव की आत्मा से और शहरी आवश्यकता से कोसों दूर चले जाएँगे । दीनदयालजी के अंत्योदय का आशय राष्ट्रश्रम से प्रेरित था । वे राष्ट्रश्रम को राष्ट्रधर्म मानते थे । उनकी मान्यता रही कि राष्ट्रश्रम प्रत्येक नागरिक का राष्ट्रधर्म है । अत: कोई श्रमिक वर्ग अलग नहीं है। हम सब श्रमिक हैं । अत: राष्ट्रश्रम राष्ट्रधर्म का दूसरा नाम है । दीनदयालजी के अंत्योदय का आशय यह भी था कि समाज की योजनाएँ सबके लिए वरण्य तो हों । परंतु वरीयता अंतिम व्यक्ति को मिले। उनके चिंतन में सरकार की हर योजना के पीछे गाँव होना चाहिए । उनकी मान्यता थी कि आजादी के बाद सरकार की योजनाएँ ग्रामोन्मुखी न होकर नगरोन्मुखी ज्यादा रहीं और यही कारण है कि आज गाँव सूने हो रहे हैं तथा नगरों में रहना दूभर हो गया है । वे ग्राम और शहर के बीच संतुलित संबंध चाहते थे । आजादी के बाद जो सरकारें आईं उनके चिंतन में यह भाव नहीं दिखा । यही कारण है कि आज अंत्योदय की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है । इसी भाव के साथ दीनदयालजी के अंत्योदय के सपने को कैसे साकार किया जाए इसी दृष्टि से कुछ चिंतकों से और दीनदयालजी के साथ रहे लोगों से आलेख माँगे गए और उन आलेखों से अंत्योदय की परिभाषा सामने आई है । हमारी यह पहल रही कि समाज के बीच दीनदयालजी की अंत्योदय की भावना क्या रही यह लोग समझें । यह सफल तब होगा जब आप पढ़ेंगे समझेंगे और इसे भारतीय जीवनशैली में उतारने की कोशिश करेंगे । यहाँ यह कहने में मुझे कोइ संकोच नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंत्योदय शब्द के अपनी गरीबोन्मुखी योजनाओं से उसे साकार करने की दिशा में एक नहीं अनेक साहसिक निर्णय लिए हैं। मसला जनधन योजना का हो, उज्जवला योजना हो, आयुष्मान योजना हो, शौचालय योजना हो, प्रधानमंत्री आवास योजना हो, मुद्रा योजना हो, स्वछता अभियान हो, 18 से 40 साल के लोगों को पेंशन लाभ के दायरे में लाना, सामाजिक सुरक्षा की गारंटी को लेकर पेंशन की अनेक योजनाएं गरीब किसानों के खाते में छह हजार रुपये वार्षिक भेजने, इसके साथ ही ठेले खोमचे लगाने वालों से लेकर गरीबों की जिंदगी में मुद्रा योजना के माध्यम से परिवर्तन लाने की अहम योजना, ऐसी अनेक योजनाएं लागू हुई। जिनसे सौ करोड़ से अधिक भारतीयों के जीवन पर सीधा असर पड़ा। सरकार वही अच्छी होती है जिसकी किरणें अंत्योदय अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति के जीवन में नया सवेरा लाये।

भारत को मिले ‘वीटो’ का अधिकार
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
संयुक्तराष्ट्र संघ के 75 वें अधिवेशन के उद्घाटन पर दुनिया के कई नेताओं के भाषण हुए लेकिन उन भाषणों में इन नेताओं ने अपने-अपने राष्ट्रीय स्वार्थों को परिपुष्ट किया, जैसा कि वे हर साल करते हैं लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ ऐसे बुनियादी सवाल उठाए, जो विश्व राजनीति के वर्तमान नक्शे को ही बदल सकते हैं। उन्होंने सुरक्षा परिषद के मूल ढांचे को ही बदलने की मांग रख दी। इस समय दुनिया में अमेरिका और चीन ही दो सबसे शक्तिशाली राष्ट्र हैं। आजकल दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध मुक्का ताने हुए हैं। उनके नेता डोनाल्ड ट्रंप और शी चिन फिंग ने एक-दूसरे को निशाना बनाया। ट्रंप ने दुनिया में कोरोना विषाणु फैलाने के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराया और चीन ने कहा कि अमेरिका सारी दुनिया मेें राजनीतिक विषाणु फैला रहा है। शी चिन फिंग ने कहा कि चीन की दिलचस्पी न तो गर्म युद्ध में है और न ही शीत युद्ध में। मोदी ने अपने आप को इस चीन-अमेरिकी अखाड़ेबाजी से बचाया और सुरक्षा परिषद का विस्तार करने की बात कही। उन्होंने कहा कि जमाना काफी आगे निकल चुका है लेकिन संयुक्तराष्ट्र संघ 75 साल पहले जहां खड़ा था, वहीं खड़ा है। सुरक्षा परिषद के सिर्फ पांच सदस्यों को वीटो (निषेध) का अधिकार है याने उन पांच सदस्यों में से यदि एक सदस्य भी किसी प्रस्ताव या सुझाव को वीटो कर दे तो वह लागू नहीं किया जा सकता। याने उनमें से कोई एक राष्ट्र भी चाहे तो सारी सुरक्षा परिषद को ठप्प कर सकता है। कौनसे हैं, ये पांच राष्ट्र ? अमेरिका, चीन, रुस, ब्रिटेन और फ्रांस ! इन पांचों को यह निषेधाधिकार क्यों मिला था? क्योंकि द्वितीय महायुद्ध (1939-45) में ये राष्ट्र हिटलर, मुसोलिनी और तोजो के खिलाफ एकजुट होकर लड़े थे। जो जीते हुए राष्ट्र थे, उन्होंने बंदरबांट कर ली। संयुक्तराष्ट्र यों तो लगभग 200 राष्ट्रों का विश्व-संगठन है लेकिन इन पांच शक्तियों के हाथ में वह कठपुतली की तरह है। उसकी सुरक्षा परिषद में न तो कोई अफ्रीकी, न लातीन-अमेरिका और न ही कोई सुदूर-पूर्व का देश है। भारत-जैसा दुनिया का दूसरा बड़ा राष्ट्र भी सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं है। 10 अस्थायी सदस्यों में इस वर्ष भारत भी चुना गया है। पांचों महाशक्तियां अपना मतलब गांठने के लिए गोलमाल शब्दों में भारत को स्थायी सदस्य बनाने की बात तो करती हैं लेकिन होता-जाता कुछ नहीं है। भारत के नेता भी दब्बू हैं। वरना आज तक उन्होंने ये मांग क्यों नहीं कि या तो वीटो (निषेधाधिकार) खत्म करो या चार-पांच अन्य राष्ट्र को भी दो। वीटो अधिकार का कोई सुनिश्चित आधार होना चाहिए। भारत चाहे संयुक्तराष्ट्र के बहिष्कार की भी धमकी दे सकता है। वह अपने साथ दर्जनों राष्ट्रों को जोड़ सकता है।

चम्बल इलाके में जन्मे थे कर्ण, कुंती, परसराम, बिसमिल व सिंधिया…!
नईम कुरेशी
मध्य प्रदेश का ग्वालियर चम्बल इलाका अमर गायक तानसेन से लेकर रानी कुंती व कर्णखार नूराबाद मुरैना में जन्मे वीर कर्ण के नाम पर देश दुनिया में चर्चित है। रानी कुंती के कारण ही भगवान श्री कृष्ण उनसे मिलने इस इलाके में आते रहे हैं। चम्बल नदी इन्दौर, उज्जैन के समीप से निकली है जो श्योपुर, मुरैना, भिण्ड होती हुई जालौन के पास पंचनदा जैसे संगम में जाकर यमुना में जा मिलती है। चम्बल नदी का और चम्बल इलाके का इतिहास वीरों, महावीरों, क्रांतिकारियों से भरा पड़ा है। रामप्रसाद बिस्मिल महान स्वतन्त्रता संग्राम सैनानियों में शुमार रहे थे वो सरदार भगत सिंह के महान साथियों में थे।
चम्बल इलाके से जहां श्योपुर की सीप नदी व वहां के कच्छपघात कछवाह राजाओं की राजधानी चंडोमनगर रही थी 10वीं सदी में, यहां के शासक विक्रमसिंह का अभिलेख इतिहास में दर्ज है। मध्यकाल के इतिहास में ये चम्बल का इलाका भारत भर में वैभव का प्रतीक रहा था। 18वीं सदी में ये सिंधिया शासकों के अधीन भी रहा था। यहां के श्योपुर का किला व महल काफी भव्य है। आज ये आदिवासी संस्कृति का संग्रहालय के तौर पर प्रसिद्ध है। किले को 16वीं सदी में गौर राजपूतों ने बनवाया था। यहां का नरसिंह महल के सामने चार बाग मुगल शैली की याद दिलाता है व दीवाने-ए-आम का दरबार महल सिंधिया शासकों का माना जाता है। यहां शेरशाह सूरी के सिपेहसालार व गूगोर के शासक मुनब्बर खॉन का मकबरा भी एक अच्छी शिल्प का नमूना है। श्योपुर और विजयपुर तहसीलों के अन्तर्गत “कूनो वन्यजीव अभयारण” भी श्योपुर के अन्तर्गत ही आता है। 1981 में श्रीमंत माधवराव सिंधिया पूर्व रेल मंत्री ने ये स्थापित कराया था। यहां चीतल, तेंदुये, काले हिरण, भालू आदि देखे जा सकते हैं। श्योपुर, चम्बल इलाके के महत्वपूर्ण जिलों में से एक रहा है। पालपुर, मानपुर, काशीपुर, विजयपुर, बड़ौदा आदि के किले दुर्ग व गढ़ियां व इनमें बने मंदिर देखने लायक हैं। ये चम्बल के गौरव की गाथायें कहते हैं। सिंधिया ने ग्वालियर चम्बल इलाके में सैकड़ों विकास विगत 30 सालों में कराये तथा रेलों का जाल बिछाया।
संसद का नक्शा चम्बल इलाके से
चम्बल इलाके में मुरैना जिले का महत्व देश दुनिया भर में काफी प्रसिद्ध है। मुरैना के मालनपुर से 30 किलोमीटर की दूरी पर मितावली ग्राम में 10वीं सदी का चौरासी खम्बों पर बने शिवमंदिर को ही भारत की संसद के नक्शे का माना जाता है। “बटेश्वर मंदिर” समूह मुरैना के एक महान शिवमंदिरों का समूह है 9-10वीं सदी में ये गुर्जर प्रतिहारों ने बनवाया था। 120 मंदिरों का एक बड़ा समूह है जिसे 15 साल पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आर्किलॉजिस्ट मोहम्मद के.के. ने इसे संवार कर यहां के 30-40 मंदिर को संवार कर पुन: निर्माण कर भव्य रूप दे दिया।
मुरैना में नूराबाद जहांगीर के शासनकाल के स्मारक के कारण चर्चित बताया जाता है। यहीं पर रानी कुंती के भी अवशेष हैं। यहीं मध् भारत के वीर कर्ण का जन्म होने के प्रमाण बताये जाते हैं। मुरैना में ग्राम सुहानिया तंवरधार के समीप “ककनमठ का शिवमंदिर” एक बड़ा शिवमंदिर है जो 8 फीट ऊँचे चबूतरे पर 18वीं सदी में कछवाह शासकों का भव्य स्मारक है जो 30 फीट लम्बे रथ मंदिर के तौर पर पुरातत्व के जानकारों का खजुराहो शैली का मंदिर है। ये खजुराहो के मंदिरों से भी ज्यादा सुंदर कहा जाता है। इसके पास ही 84 ग्राम तोमर जाति के राजपूतों के हैं। अम्बाह तहसील मुरैना में एक भव्य म्यूजियम भी विगत वर्ष़ों में नरेन्द्र सिंह तोमर ने बनवाकर चम्बल की सांस्कृतिक झांकी को सफलतापूर्वक दिखाया है।
चम्बल इलाके श्योपुर मुरैना के बाद भिण्ड जिला आता है। यहां भी तमाम महत्वपूर्ण स्मारक किले मंदिर व महल देखे जाते हैं। भिण्ड का नाम महाभारत काल के एक ऋषि विभण्डक के नाम पर कहा जाता है। भिण्ड को भदावर इलाका भी माना जाता है। ये भदौरिया राजपूतों की राजधानी माना जाता है। सम्राट अकबर के दौर में भी भदौरिया शासक काफी अक्खड़ व वीर कहे जाते थे। भदौरियों का किला भिण्ड से 30 किलोमीटर दूर अटेर में चम्बल के बीहड़ों में है जो काफी सुन्दर व भव्य स्मारक है। 17 वीं सदी में महाराजा बदन सिंह ने अटेर का ये किला बनवाया था। भदौरिया राजाओं ने पृथ्वीराज चौहान द्वारा निर्मित भिण्ड शहर के प्रसिद्ध गौरी तालाब में सुन्दर घाट व सीढ़ियां बनवायीं। यहां प्रसिद्ध वनखण्डेश्वर मंदिर भी है।
होलकर की छत्री
भिण्ड के आसपास भी काफी सुन्दर स्मारक हैं जिसमें गोहद के जाट राजाओं का किला व महल पुरातत्व महत्व के स्मारकों में शुमार है। गोहद के किले में शिल्पकारी और कांच कला चित्रकारी आज भी देखते ही बनती है जो राजपूत शैली को खासतौर से दर्शाती है। यहां दौलतराव सिंधिया के एक योरोपियन सैन्य अधिकारी मेजर पियरे लिम्बर्ट की भव्य कब्रशाह भी है जिनका निधन 1780 में होना इतिहास में दर्ज है। सिंधिया की फौज में फ्रांसीसी व अंग्रेजी सेना अधिकारी ज्यादातर थे जिन्होंने सिंधिया की फौज को ताकतवर बना दिया था। भिण्ड के आलमपुर में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1766 में मल्हाराव होलकर ककी सुन्दर छत्री का निर्माण कराया था। ये छत्री अपनी सुन्दर पत्थर की कला का अमूल्य नमूना है। इस छत्री में फूल पत्तियों की रो हैं। ये मराठा शैली की बताई जा रही है। भिण्ड में दिगम्बर जैन मंदिरों की बड़ी बड़ी बतार देखी जाती हैं। मेहगांव से 18 किलोमीटर तथा भिण्ड से मात्र 15 किलोमीटर की दूरी पर बरासोजी यहां का एक छोटा सा कस्बा है जो वैशाली नदी के किनारे बसा है। ये प्राचीन जैन मंदिरों के लिए जाना जाता है। इतिहास में दर्ज है 14वीं सदी में ये मंदिर तोमर शासकों ने बनवाये थे। इसी तरह पावई में भी भगवान नेमिनाथ का एक मंदिर भी है। जो 12वीं सदी में बनाया गया बताया जाता है। यहां 135 खम्बों वाला विशाल जिनालय है इसके पास ही श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र है जिसे भगवान महावीर से जोड़ा जाता है। जनचर्चा के अनुसार यहां भगवान महावीर स्वयं आये थे।
9वीं-10वीं सदी में इस इलाके के शासक रहे गुर्जर प्रतिहारों ने यहां सूर्य मंदिर का निर्माण कराया था जिसको पूर्वमुखी कहा जाता है। यहां गंगा व यमुना नदियां देवियों की तरह उकेरी गई हैं। गुर्जर प्रतिहारों का एक मंदिर 8वीं सदी का ग्वालियर फोर्ट पर भी है। चम्बल इलाका महाभारत के वीर राजकुमार कर्ण का इलाका माना जाता है। कर्ण ने धनुष चलाने की शिक्षा गुरु द्रोणाचार्य व भगवान परसराम से लेने का इतिहास दर्ज है। भगवान परसराम सिर्फ ब्राम्हणों को धनुष चलाने की शिक्षा देते थे पर कर्ण तो राजपूत राजकुमार थे जिससे परसराम ने उन्हें जाति छिपाने के आरोप में श्राप दे दिया था जिससे उन्हें उनकी वीरता का लाभ नहीं मिल सका था। फिर भी वो एक महान योद्ध जरूर माने गये थे। चम्बल के लहार इलाके को पांडवों की हत्या के लिए लाक्षागृह कौरवों ने बनवाया था ये भी जनचर्चा है।
पाँच नदियों का संगम
चम्बल में जहां महारानी कुंती के जन्म लेने का स्थान रहा है कुंतलपुर, नूराबाद के समीप मुरैना वहीं भिण्ड के गोहद तहसील के मऊ के निकट महर्षि परशुराम के जन्म के भी प्रमाण मिलते हैं। उन्होंने अपने पिता के निर्देश पर अपनी माता की हत्या सिरकाट कर दिये जाने का भी प्रमाण देखे जाते हैं। माता रेणुका मंदिर गोहद के पास मऊ ग्राम में है। मंदिर में रेगु की प्रतिमा स्थापित है जिसमें उनका सिर धड़ से अलग है। मध्य प्रदेश का चम्बल इलाका आगरा से 85 किलोमीटर व दिल्ली से 270 किलोमीटर ही दूर है। यहां की स्थापत्य कला, ऑर्किलॉजी सांस्कृतिक विरासतों को देखकर आप आनंदित हुए बगैर नहीं रह सकेंगे। विकास के इस दौर में ये फोरलेन सड़कों से जुड़ चुका है व भिण्ड मुरैना जिलों से पूरे देश भर में सड़क व रेल परिवहन से जुड़ा हुआ है। यहां लहार के पास पंचनदा भी देखने लायक है जो पांच नदियों यमुना, पहुज, कुंआरी, बेतवा, सिंध आदि नदियों का संगम जालौन के रामपुरा कस्बे में देखा जा सकता है। जो लहार से मात्र 30-40 किलोमीटर की मात्र दूरी पर है। भारत की संस्कृति में नदियों का संगम महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धार्मिक घटना मानी जाती रही है। आज के दौर में मुरैना से लोकसभा सांसद नरेन्द्र तोमर इस क्षेत्र में विकास के लिए जाने जाते हैं। ग्वालियर में भी उन्होंने 7 ओवरब्रिज बनवाकर शहर का नक्शा बदल दिया है।

किसानों को कृषि उत्पाद बेचने की खुली आजादी देंगे कृषि सुधार कानून
विवेक कुमार पाठक
केन्द्र की मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी में आखिरकार किसानों को उपज बेचने की आजादी दी है, संविदा खेती का अवसर दिया है। कल लोकसभा में कृषि सुधार के लिए पास हुए दोनों विधेयक किसानों को हक देते हैं कि वे अपनी उपज चाहे मंडी, बाजार जहां चाहें बेचें। इन बिलों को किसानों की समृद्धि का कारक बताते हुए केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने लोकसभा में साफ कर दिया है कि अब वक्त आ गया है कि देश के अन्नदाता किसानों को वाजिब मूल्य हर स्थिति में मिले। श्री तोमर ने लोकसभा के पटल से देश के किसानों को आश्वस्त कर दिया है कि उपज की सरकारी खरीदी व न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी था, जारी है और इस बिल के बाद पूर्व की तरह जारी रहेगा। बिल को ऐतिहासिक बताते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी ट्वीट किया है कि यह बिल किसानों को बिचौलियों से मुक्ति देने वाला है। यह देश के किसानों के लिए ऐतिहासिक क्षण है। असल में यह बिल किसानों को विक्रय के और अधिक विकल्प देकर उनको और अधिक सशक्त करेगा।
कोरोना संकट के दौरान कृषि सुधार के लिए कल लोकसभा में पास हुए कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य संवर्धन और सरलीकरण विधेयक 2020 और कृषक सशक्तिरण और संरक्षण कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 देश भर में चर्चा में हैं। इन्हें कृषि सुधार की दिशा में मोदी सरकार का क्रांतिकारी कदम बताया जा रहा है। इन्हें किसानों को आर्थिक मजबूती देने वाला बड़ा कदम बताया जा रहा है। असल में 2014 में सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार तेजी से काम कर रही है।
इन विधेयकों पर कल बहस में कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा कि 2014 से मोदीजी के नेतृत्व में गांव, गरीब एवं किसान आगे बढ़े हैं। यूपीए सरकार के समय में में 12 हजार करोड़ का कृषि बजट था जबकि मोदी सरकार ने खेती और किसानों की परवाह करते हुए इसे बढ़ाकर 1 लाख 34 हजार करोड़ का कृषि बजट कर दिया है।
हमारी सरकार ने किसानों के खाते में 75 हजार करोड़ दिए। हमने पीएम किसान योजना के जरिए आय संहिता योजना प्रारंभ की और किसानो के खाते में 92 हजार करोड़ रुपए डीवीडी के जरिए किसानों के खाते में जमा कराए हैं।
कृषि मंत्री श्री तोमर ने बताया कि किस कदर एफपीओ के जरिए किसानों की उन्नति व समृद्धि का मार्ग तैयार किया जा रहा है। हमने 10 हजार एफपीओ मंजूर किए हैं ताकि उन्हें तकनीकी सहयोग मिल सके। ये एफपीओ 6 हजार 850 करोड़ रुपए की लागत से तैयार किए जा रहे हैं।
मोदी सरकार किसानों को कर्ज देने में भी आगे है। यूपीए ने जहां 8 लाख करोड़ किसानों के कर्ज के लिए दिए थे वहीं मोदीजी ने किसानों के लिए कर्ज दुगुना करते हुए 15 लाख करोड़ मंजूर किए हैं।
श्री तोमर ने बताया कि हम जानते हैं कि कोरोना के कारण किसानों के सामने किस तरह के संकट हैं। हमारी सरकार ने आत्मनिर्भर पैकेज के तहत कृषि अधोसंरचना के लिए 1 लाख करोड़ रुपए दिए साथ ही 1128 करोड़ रुपए देश भर में सहकारी समितियों को भी दिए।
श्री तोमर ने इन उदाहरणों से साफ कर दिया कि मोदी सरकार ने यह पैसा कोरोना संकट के समय एक माह के अंदर फैसला करते हुए दिया इससे सरकार की संवेदनशीलता स्पष्ट है।
वे कहते हैं सरकार निरंतर प्रतिबद्ध है कि बुआई का रकबा, उत्पादन, जैविक खेती बढ़े।
अपनी बात रखते हुए कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने साफ किया कि मोदी सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के प्रति वचनबद्ध है और इस सरकार ने समर्थन मूल्य को डेढ़ गुना बढ़ाकर इसका प्रमाण भी दिया है।
श्री तोमर ने यूपीए सरकार को उलाहना देते हुए कहा कि कृषि विशेषज्ञ स्वामीनाथन की कृषि संबंधी रिपोर्ट मंजूर करने में दस साल के कार्यकाल के बाबजूद यूपीए सरकार पीछे रही जबकि मोदी सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को मंजूर करते हुए किसानों को राहत दी। हम मूल्य आश्वासन बिल इसलिए लेकर आए ताकि देश के 86 प्रतिशत छोटे किसानों को भी निवेश का मौका मिले। उनके सामने भी प्रोसेसर, स्टार्टअप के अवसर आएं। इसके लिए किसान और करारकर्ता छोटे छोटे रकबे जोड़कर बड़े क्षेत्र की खेती कर सकते हैं जिससे करारकर्ता और किसान एक दूसरे की आमदनी बढ़ाने में सहभागी होंगे। यह करार किसानों के हक की पहले और मजबूत बात करेगा। उसकी देनदारी कभी भी उसकी जमीन पर नहीं आएगी और न ही उस पर किसी तरह का जुर्माना लगेगा। इसके विपरीत करारकर्ता और व्यापारी अपना दायित्व पूरा न करने पर जुर्माना भरेंगे।
लोकसभा में मूल्य आश्वासन बिल की खूबियां बताते हुए कृषि मंत्री ने कांग्रेस के घोषणा पत्र का पेजवार हवाला देते हुए बिल के विरोध करने वालों पर सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने साफ किया कि इस बिल से संबंधित सुधार जब आपने अपने घोषणा पत्र में शामिल कर रखे थे तो आज सदन में आप इसका विरोध करके अपने संकल्प से क्यों पीछे हट रहे हैं। हम आज जो बिल लेकर आएं हैं वो देश में लायसेंसराज खत्म करेगा। किसान एक राज्य से दूसरे राज्य में उपने उत्पाद और उपज अधिक मुनाफे के लिए बेच सकेगा। ईप्लेटफार्म से किसानों की पहुंच बढ़ेगी। देश की 585 मंडियों में ईप्लेटफार्म के प्रति इतनी लोकप्रियता रही कि अब तक 35 हजार करोड़ रुपए का व्यापार इस पर हो चुका है।
कृषि मंत्री तोमर ने साफ कर दिया कि यह बिल किसानों के हाथ खोलेगा, उसकी पहुंच बढ़ाएगा। उसे तीन दिन में उपज का पेमेंट दिलाएगा। किसान जब मनचाही जगह उपज बेचेगा तो उपज के खरीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, इसमें अधिक व्यापारी काम करेंगे जिससे निश्चित ही रोजगार के अवसरों में इजाफा होगा।
लोकसभा में इस बहस के दौरान कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने स्वामीनाथ रिपोर्ट के साथ किसान नेता शरद जोशी की सिफारिशों का जिस तरह हवाला दिया वो उनकी बात को सदन में मजबूती देने वाला रहा। श्री तोमर ने बताया कि किन किन बातों को लेकर संघर्षशील किसान नेता जोशी जी लड़ते रहे थे और उन सारी मांगों को ये दोनों विधेयक निर्णायक ढंग से पूरा करने वाले हैं। कुल मिलाकर मोदी सरकार के इन कृषि सुधारों विधेयकों पर कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने जिस गहराई से अपनी बात रखी उससे उनकी गांव के जमीनी किसान नेता व किसानपुत्र छवि सदन में फिर एक बार स्थापित हुई। वे सदन को कृषि मंत्री और एक किसान दोनों रुपों में समझाते दिखे। आसान शब्दों में तर्कपूर्ण जवाबों के साथ विधेयक का पास होना तोमर की निर्णायक सफलता रही। अब देखना ये कि कितनी जल्दी यह विधेयक कानून बनकर देश के किसानों को उपज बेचने की आजादी के साथ उन्हें आर्थिक आत्मनिर्भरता देता है। तब तक निश्चित ही देश के किसान इस विधेयक पर हो रही हर चर्चा पर निरंतर ध्यान लगाए रहेंगे।

पाक में सरकार के ऊपर सरकार
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान में पीपल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो ने लगभग सभी प्रमुख विरोधी दलों की बैठक बुलाई, जिसमें पाकिस्तानी फौज की कड़ी आलोचना की गई। पाकिस्तानी फौज की ऐसी खुले-आम आलोचना करना तो पाकिस्तान में देशद्रोह-जैसा अपराध माना जाता है। नवाज़ शरीफ ने अब इस फौज को नया नाम दे दिया है। उसे नई उपाधि दे दी है। फौज को अब तक पाकिस्तान में और उसके बाहर भी ‘सरकार के भीतर सरकार’ कहा जाता था लेकिन मियां नवाज़ ने कहा है कि वह ‘सरकार के ऊपर सरकार’ है। यह सत्य है। पाकिस्तान में अयूब खान, याह्या खान, जिया-उल-हक और मुशर्रफ ने अपना फौजी शासन कई वर्षों तक चलाया ही लेकिन जब गैर-फौजी नेता लोग सत्तारुढ़ रहे, तब भी असली ताकत फौज के पास ही रहती चली आई है। अब तो यह माना जाता है कि इमरान खान को भी जबर्दस्ती जिताकर फौज ने ही पाकिस्तान पर लादा है। फौज ही के इशारे पर अदालतें जुल्फिकार अली भुट्टो, नवाज शरीफ और गिलानी जैसे नेताओं के पीछे पड़ती रही हैं। ये ही अदालतें क्या कभी पाकिस्तान के बड़े फौजियों पर हाथ डालने की हिम्मत करती हैं ? पाकिस्तान के सेनापति कमर जावेद बाजवा की अकूत संपत्तियों के ब्यौरे रोज़ उजागर हो रहे हैं लेकिन उन्हें कोई छू भी नहीं सकता। मियां नवाज ने कहा है कि विपक्ष की लड़ाई इमरान खान से नहीं है, बल्कि उस फौज से है, जिसने इमरान को गद्दी पर थोप रखा है।
यहां असली सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान के नेता लोग फौज से लड़ पाएंगे ? ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि फौज थोड़ी पीछे खिसक जाए। सामने दिखना बंद कर दे, जैसा कि 1971 के बाद हुआ था या जैसा कि कुछ हद तक आजकल चल रहा है लेकिन फौज का शिकंजा पाकिस्तानियों के मन और धन पर इतना मजबूत है कि उसे कमजोर करना इन नेताओं के बस में नहीं है। पाकिस्तान का चरित्र कुछ ऐसा ढल गया है कि फौजी वर्चस्व के बिना वह जिंदा भी नहीं रह सकता। यदि पंजाबी प्रभुत्ववाली फौज कमजोर हो जाए तो पख्तूनिस्तान और बलूचिस्तान टूटकर अलग हो जाएंगे। सिंध का भी कुछ भरोसा नहीं। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद पाकिस्तानी जनता के मन में भारत-भय इतना गहरा पैठ गया है कि उसका एकमात्र मरहम फौज ही है। फौज है तो कश्मीर है। फौज के बिना कश्मीर मुद्दा ही नहीं रह जाएगा। इसके अलावा फौज ने करोड़ों-अरबों रु. के आर्थिक व्यापारिक संस्थान खड़े कर रखे हैं। जब तक राष्ट्र के रुप में पाकिस्तान का मूल चरित्र नहीं बदलेगा, वहां फौज का वर्चस्व बना रहेगा।

जनाधार विहिन नेता बने कांग्रेस में पदाधिकारी
रमेश सर्राफ धमोरा
कांग्रेस पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं द्वारा पार्टी अध्यक्ष को पत्र लिखने की घटना के बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने सोनिया गांधी को अगले एक साल के लिए फिर से कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया है। उसके बाद उन्होंने कांग्रेस के संगठन में कई बदलाव किए हैं। जिनमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव कांग्रेस कार्यसमिति व कांग्रेस के महासचिव के पदों पर किया गया हैं। हालांकि असंतुष्ट गुट के 23 नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष से कांग्रेस कार्य समिति के प्रत्यक्ष चुनाव कराने की मांग की थी। लेकिन उनकी इस मांग को नजरअंदाज कर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों का नामांकन कर दिया।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कांग्रेस की सबसे शक्तिशाली कांग्रेस कार्य समिति में लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी, कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ महासचिव मोतीलाल वोरा, गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री लुईस फ्लेरियो व छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू को सदस्य से हटा दिया है। उनके स्थान पर तारीक अनवर, पी चिदंबरम, रणदीपसिंह सुरजेवाला व जितेंद्र सिंह को नए सदस्य के तौर पर कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल किया गया है। कांग्रेस अध्यक्ष को पत्र लिखने वाले 23 नेताओं में शामिल गुलाम नबी आजाद को पार्टी महासचिव पद से हटा दिया गया है। मगर उन्हें कार्यसमिति में बनाए रखा है। इसके अलावा आनंद शर्मा व मुकुल वासनिक को भी फिर से कार्यसमिति में रखा गया है। कांग्रेस संगठन के फेरबदल में गुलाम नबी आजाद, अंबिका सोनी, मोतीलाल वोरा, मलिकार्जुन खड़गे, लुईस फ्लेरियो को महासचिव पद से हटा दिया गया है। हालांकि इनमें से गुलाम नबी आजाद, अंबिका सोनी, मल्लिकार्जुन खड़गे को कांग्रेस कार्यसमिति में बनाए रखा गया है। इसी तरह अनुग्रह नारायण सिंह, श्रीमती आशा कुमारी, गौरव गोगोई व रामचंद्र खुंटिया को प्रदेश प्रभारी पद से हटाया गया है।
कांग्रेस संगठन में अभी मात्र 9 लोगों को महासचिव बनाया गया है जबकि पहले इनकी संख्या 11 थी। कांग्रेस महासचिवो में बिहार के तारिक अनवर, हरियाणा के रणदीप सिंह सुरजेवाला, राजस्थान के जितेंद्र सिंह, दिल्ली के अजय माकन, महाराष्ट्र के मुकुल वासनिक, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी, प्रियंका गांधी, केरल के केसी वेणुगोपाल के नाम शामिल है। कांग्रेस में किए गए हाल ही के फेरबदल में सबसे अधिक फायदे में तारीक अनवर, रणदीप सिंह सुरजेवाला, व जितेंद्र सिंह रहे। जिन्हें महासचिव बनाए जाने के कारण कांग्रेस कार्यसमिति की सदस्यता भी मिल गई। रणदीप सिंह सुरजेवाला तो अहमद पटेल की तरह कांग्रेस की सभी समितियों के सदस्य बनाए गए हैं। चर्चा है कि हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी भूपेंद्र सिंह हुड्डा द्वारा सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखने वाले 23 नेताओं में शामिल होने के कारण उनकी काट के रूप में हरियाणा के रणदीप सिंह सुरजेवाला को कांग्रेस संगठन में आगे बढ़ाया जा रहा है।
कांग्रेस संगठन में किए गए फेरबदल में लोकसभा चुनाव जीतने वाले 52 सांसदो में से सोनिया गांधी व राहुल गांधी के अलावा किसी को कहीं भी जगह नहीं दी गई है। सभी महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किए गए पदाधिकारियों में अधिकांश राज्यसभा के सदस्य या पूर्व में मंत्री रहे नेता हैं। कांग्रेस कार्यसमिति के अध्यक्ष सहित बाईस सदस्यों में सोनिया गांधी व राहुल गांधी ही लोकसभा सदस्य हैं। 9 लोग राज्यसभा के सदस्य हैं। जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, एके एंथोनी, अहमद पटेल, अंबिका सोनी, गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, केसी वेणुगोपाल, मलिकार्जुन खड़गे व पी चिदंबरम के नाम शामिल है। कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य एके एंथोनी, गुलाम नबी आजाद, हरीश रावत, ओमन चांडी पूर्व में मुख्यमंत्री रह चुके हैं तथा गई खंगम उप मुख्यमंत्री रह चुके हैं। कार्य समिति में सदस्य बने मलिकार्जुन खड़गे, हरीश रावत, अंबिका सोनी, अजय माकन, जितेंद्र सिंह, तारिक अनवर, रणदीप सुरजेवाला, रघुवीर मीणा पिछले चुनाव में पराजित हो चुके हैं।
कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर पर बनाए गए 9 महासचिव में एक भी लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य नहीं है। तारिक अनवर शरद पवार के साथ सोनिया गांधी का विरोध करते हुए कांग्रेसी छोड़ गए थे। लंबे समय के बाद पिछले वर्ष उनकी कांग्रेस में फिर से वापसी हुई थी। 2019 का लोकसभा चुनाव उन्होंने कांग्रेसी टिकट पर लड़ा था मगर हार गए। रणदीप सिंह सुरजेवाला हरियाणा में विधानसभा के लगातार दो बार चुनाव हार चुके हैं। एक बार तो उन्होंने विधायक रहते विधानसभा का उपचुनाव लड़ा और उसमें बुरी तरह हार गए थे। जितेंद्र सिंह राजस्थान में अलवर से लगातार दो बार लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं। अजय माकन नई दिल्ली सीट से लगातार दो बार लोकसभा चुनाव में करारी हार झेल चुके हैं।
मुकुल वासनिक 2014 में लोकसभा का चुनाव हार गए थे तथा 2019 में उन्होंने चुनाव ही नहीं लड़ा। हरीश रावत मुख्यमंत्री रहते उत्तराखंड के 2 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़कर दोनों ही जगह हार गए थे। ओमान चांडी के केरल में मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस की सरकार ही चली गई थी। प्रियंका गांधी ने अभी तक कोई चुनाव नहीं लड़ा है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस की प्रभारी महासचिव बनने के बाद उत्तर प्रदेश में लोकसभा व विधानसभा की सीटों में खासी कमी हुई है। केसी वेणुगोपाल ने इस बार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा था। केरल में उनकी सीट पर चुनाव लड़ने वाले कांग्रेसी प्रत्याशी को माकपा के हाथों हारना पड़ा था।
कांग्रेस संगठन में कुछ नए लोगों को प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। जिनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन कुमार बंसल, राजीव शुक्ला, जितिन प्रसाद, कर्नाटक के दिनेश गुंडू राव, मनीकम टैगोर, राष्ट्रीय सचिव देवेंद्र यादव, विवेक बंसल, मनीष चैहान, कुलदीप सिंह नागरा के नाम शामिल है। कांग्रेस पार्टी में संगठन चुनाव करवाने के लिए केंद्रीय चुनाव अथॉरिटी का गठन किया गया है। जिसका अध्यक्ष गांधी परिवार के वफादार मधुसूदन मिस्त्री को बनाया गया है। इसमें राजेश मिश्रा, कृष्णा बायरेगौड़ा, एस ज्योति मनी, अरविंदर सिंह लवली को सदस्य बनाया गया है। इस अभिकरण को बनाते समय कहा गया था कि भविष्य निकट भविष्य में जल्दी ही कांग्रेस संगठन के चुनाव करवाए जाएंगे।
कांग्रेस अध्यक्ष को मदद व सलाह देने के लिए 6 सदस्यों की एक विशेष कमेटी का भी गठन किया गया है। जिसमें एके एंटोनी, अहमद पटेल, अंबिका सोनी, केसी वेणुगोपाल, मुकुल वासनिक व रणदीप सिंह सुरजेवाला को शामिल किया गया है। यह कमेटी अगले अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय अधिवेशन तक काम करती रहेगी।
कहने को तो कांग्रेस के नेता कहते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष ने कांग्रेस संगठन में बड़ा बदलाव कर दिया। जिससे अब कांग्रेस संगठन आने वाले समय में अधिक सक्रिय व मजबूत होकर काम कर सकेगा। कांग्रेस अध्यक्ष ने पत्र लिखने वाले 23 से असंतुष्ट नेताओं की मांग को भी पूरा कर दिया है। मगर यहां देखने वाली बात यह है कि कांग्रेस में किया गया यह बदलाव कांग्रेस को संजीवनी देने में कितना सफल होगा।
संगठन के बदलाव में लोकसभा सदस्यों को बिल्कुल भी तरहीज नहीं दी गई है। वही प्रदेशों में बड़े जनाधार वाले नेताओं को भी संगठन से दूर रखा गया है। कांग्रेस संगठन में ऐसे लोगों को शामिल किया गया है जो लगातार चुनाव हार रहे हैं तथा जिनका जनता में जनाधार समाप्त हो गया है। संगठन में पदाधिकारी बनाए गए बहुत से नेताओं को तो चुनाव लड़े ही जमाना बीत गया है। उनमें से बहुत से लोग तो लम्बे समय से राज्यसभा के रास्ते संसद में आ रहे हैं।
कांग्रेस के लिए बेहतर होता यदि जनता पर पकड़ रखने वाले नेताओं को बड़े पदों पर आगे लाया जाता। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी को कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य से हटाकर स्थाई आमंत्रित सदस्य बनाया गया है जो उनकी पदावनति है। लोकसभा में सदन के नेता को कार्यसमिति में जगह न देना उनके पद की गरिमा को भी कम करता है। कांग्रेस पार्टी को चाहिए कि जनाधार वाले नेताओं को अग्रिम मोर्चे पर तैनात करें। ताकि वह अपनी संगठन क्षमता व जनाधार की बदौलत पार्टी को चुनावी राजनीति में जीत दिला सके।

भारत-विरोधी आतंक और जासूसी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
नौ आतंकियों और तीन जासूसों की गिरफ्तारी की खबर देश के लिए चिंताजनक है। आतंकी अल-कायदा और पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं और जासूस चीन से! जासूसी के आरोप में राजीव शर्मा नामक एक पत्रकार को भी गिरफ्तार किया गया है। जिन नौ आतंकियों को गिरफ्तार किया गया है, वे सब केरल के हैं। वे मलयाली मुसलमान हैं। इनमें से कुछ प. बंगाल से भी पकड़े गए हैं। इन दोनों राज्यों में गैर-भाजपाई सरकारें हैं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने इन लोगों को कुख्यात अल-कायदा और पाकिस्तान की जासूसी एजेंसी से संपर्क रखते हुए पकड़ा है। इन पर आरोप है कि इनके घरों से कई हथियार, विस्फोटक सामग्री, जिहादी पुस्तिकाएं और बम बनाने की विधियां और उपकरण पकड़े गए हैं। ये आतंकी दिल्ली, मुंबई और कोची में हमला बोलनेवाले थे। ये कश्मीर पहुंचकर पाकिस्तानी अल-कायदा द्वारा भेजे गए हथियार लेनेवाले थे। ये लोग केरल और बंगाल के भोले मुसलमानों को फुसलाकर उनसे पैसे भी उगा रहे थे। भारत में लोकतंत्र है और कानून का राज है, इसलिए इन लोगों पर मुकदमा चलेगा। ये लोग अपने आप को निर्दोष सिद्ध करने के लिए तथ्य और तर्क भी पेश करेंगे। उन्हें सजा तभी मिलेगी, जबकि वे दोषी पाए जाएंगे। लेकिन ये लोग यदि हिटलर के जर्मनी में या स्तालिन के सोवियत रुस में या माओ के चीन में या किम के उ. कोरिया में पकड़े जाते तो आप ही बताइए इनका हाल क्या होता ? इन्हें गोलियों से भून दिया जाता। अन्य संभावित आतंकियों की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ जाती। ये आतंकी यह क्यों नहीं समझते कि इनके इन घृणित कारनामों की वजह से इस्लाम और मुसलमानों की फिजूल बदनामी होती है।
जहां तक चीन के लिए जासूसी करने का सवाल है, यह मामला तो और भी भयंकर है। जहां तक आतंकियों का सवाल है, वे लोग या तो मज़हबी जुनून या जिहादी उन्माद में फंसे होते हैं। उनमें गहन भावुकता होती है लेकिन शीर्षासन की मुद्रा में। किन्तु जासूसी तो सिर्फ पैसे के लिए की जाती है। लालच के खातिर ये लोग देशद्रोह पर उतारु हो जाते हैं। पत्रकार राजीव शर्मा और उसके दो चीनी साथियों पर जो आरोप लगे हैं, वे यदि सत्य हैं तो उनकी सजा कठोरतम होनी चाहिए। राजीव पर पुलिस का आरोप है कि उसने एक चीनी औरत और एक नेपाली आदमी के जरिए चीन-सरकार को दोकलाम, गलवान घाटी तथा हमारी सैन्य तैयारी के बारे में कई गोपनीय और नाजुक जानकारियां भी दीं। इन तीनों के मोबाइल, लेपटाॅप और कागजात से ये तथ्य उजागर हुए। राजीव के बैंक खातों की जांच से पता चला है कि साल भर में उसे विभिन्न चीनी स्त्रोतों से लगभग 75 लाख रु. मिले हैं। भारत के विरुद्ध जहर उगलनेवाले अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ में राजीव ने लेख भी लिखे हैं। देखना यह है कि उन लेखों में उसने क्या लिखा है ? दिल्ली प्रेस क्लब के अध्यक्ष आनंद सहाय ने बयान दिया है कि राजीव शर्मा स्वतंत्र और अनुभवी पत्रकार है और उसकी गिरफ्तारी पुलिस का मनमाना कारनामा है। वैसे तो किसी पत्रकार पर उक्त तरह के आरोप यदि सत्य हैं तो यह पत्रकारिता का कलंक है और यदि यह असत्य है तो इसे सरकार और पुलिस का बेहद गैर-जिम्मेदाराना काम माना जाएगा। दिल्ली पुलिस को पहले भी पत्रकारों के दो—तीन मामलों में मुंह की खानी पड़ी है। उसे हर कदम फूंक-फूंककर रखना चाहिए।

आर्थिक दबाव में मोदी सरकार ने उठाया अभी तक का सबसे बड़ा जोखिम
सनत जैन
मोदी सरकार द्वारा खेती से जुड़े तीन बिल संसद में पेश किए गए। इन बिलों के पेश होने के बाद से ही कई राज्यों में किसान विरोध कर रहे हैं। ‎किसान सड़कों पर उतर कर सरकार को, इन बिलों के पास होने से किसानों के हितों में जो नुकसान होगा, उसको लेकर आंदोलनरत हैं। सरकार भी इस बात को अच्छी तरह से समझ रही है। जिस तरह की स्थिति अभी देश में बनी हुई है। उसमें कोरोना महामारी का संकट, बेरोजगारी, केंद्र एवं राज्य सरकारों की खराब आर्थिक ‎स्थिति इत्यादि के चलते मोदी सरकार ने जिस तरह से कृषि बिलों को पास कराया है, वह अभी तक का मोदी सरकार का सबसे बड़ा जोखिम माना जा रहा है।
अकाली दल ने कृषि बिलों का विरोध करते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल से अपना प्रतिनिधित्व हर ‎सिमरत कौर को हटा लिया। अकाली दल की मांग थी, बिल को स्टैंडिंग कमेटी के पास भेज दिया जाए। सरकार इसे पास कराने में जल्दबाजी नहीं करें। लेकिन सरकार ने अकाली दल की बात भी नहीं मानी। लोकसभा में बिल पास हो जाने के बाद राज्यसभा में जिस तरीके से ‎बिल भी पास हुए हैं, उसको लेकर भी सरकार के ऊपर दबाव बढ़ा है। भारत में किसानों की संख्या है। असंगठित क्षेत्र के करोड़ों कामगार कृषि से जुड़े हुए हैं। किसानों का विरोध सरकार पर बहुत भारी पड़ सकता है। इस बात को सरकार और संघ भी बहुत अच्छी तरीके से समझ रहा है। इसके बाद भी सरकार की आर्थिक स्थितियां और अंतरराष्ट्रीय दबाव सरकार को यह जोखिम उठाने को मजबूर ‎किया है।
सरकार हर साल समर्थन मूल्य घोषित करती है। उसके बाद भी समर्थन मूल्य पर किसानों की उपज सरकार नहीं खरीदती है। एक सीमित समय पर समर्थन मूल्य पर फसल की खरीदी होती है। कृषि उपज मंडी नए बिलों के लागू होने के बाद आवश्यक नहीं होंगी। किसानों को समर्थन मूल्य घोषित होने के बाद भी, वह समर्थन मूल्य मिलेगा या नहीं। इस बात की कोई गारंटी सरकार द्वारा जो बिल पास किए गए हैं, उनमें नहीं दी गई है। मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश इत्यादि राज्यों में समर्थन मूल्य से कम कीमत पर गेहूं मंडियों और खुले बाजार में बिक रहा है। गेहूं का समर्थन मूल्य सरकार ने 1925 रुपए प्रति क्विंटल घोषित किया हुआ है। लेकिन किसानों को 1400 से लेकर 1600 रुपए प्रति क्विंटल के दाम ही मिल पा रहे हैं। किसानों की नई फसल आने पर रेट बाजार में बहुत कम हो जाते है। समर्थन मूल्य पर एक निश्चित समय सीमा पर किसान समर्थन खरीदी केंद्रों में अपनी उपज लेकर नहीं पहुंच पाता है। अथवा सरकार ‎निश्चित सीमा के बाद नहीं खरीद पाती है। जिसके कारण किसानों को मंडियों में मजबूरन व्यापारियों द्वारा समर्थन मूल्य से कम कीमत में अपनी फसल बेचने मजबूर होना पड़ता है। किसानों की वर्तमान में यही सबसे बड़ी आशंका है
पिछले वर्षों में खाद, कीटनाशक दवाइयां, बीज, डीजल, बिजली और मजदूरी कई गुना बढ़ी है। उस अनुपात में किसानों की उपज का समर्थन मूल्य नहीं बढ़ाया गया है। खेती लगातार घाटे का सौदा बन रही है। किसान लगातार कर्जदार हो रहा है। पिछले वर्षों में हालत बद से बदतर हो गए हैं। हर साल हजारों ‎किसान कर्ज के बोझ से आत्महत्या कर रहे हैं। उनका कोई समाधान मोदी सरकार नहीं निकाल पाई। उल्टे कॉन्ट्रैक्ट खेती के माध्यम से छोटे-छोटे लघु सीमांत किसानों को बड़ी कंपनियों के हवाले करने की जो कोशिश हो रही है, उससे पूरे देश में ‎किसानों का आंदोलन बढ़ता चला जा रहा है। बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसानों को और उनकी जमीनों को अनुबंध के तहत लेकर उनकी उपज को मनमाने तरीके से खरीदेंगे। पिछले कई दशकों का अनुभव है कि कारपोरेट जगत की कंपनियां हर तरह से शोषण करने का कोई मौका नहीं छोड़ती हैं। उनकी शर्तें नियम कायदे कानून अंग्रेजी में और हिंदी में कई पन्नों में लिखे होते हैं। जिसको समझ पाना वकीलों के लिए भी संभव नहीं है। इतने छोटे-छोटे शब्दों में किंतु और परंतु के साथ किसानों के साथ जो अनुबंध होंगे, वह किसानों का भला नहीं बुरा ही करेंगे। सरकार ने बिल में किसानों को समर्थन मूल्य मिले, इसका कोई प्रावधान कानूनी रूप से नहीं किया है। किसानों की जमीन उनके पास सुरक्षित होगी, इसका भी कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। समर्थन मूल्य किस आधार पर सरकार तय करेगी, सरकार पिछले कई दशकों में नीति तैयार नहीं कर पाई। ऐसी स्थिति में किसानों की आशंका एवं विरोध करना जायज और स्वाभाविक है।
सरकार इसके बाद भी यदि कृषि बिल और रिफॉर्म बिल लाने के लिए इतना बड़ा जोखिम उठा रही है। तो इसका एक ही कारण माना जा रहा है कि देश इस समय आर्थिक संकट से फंसा हुआ है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां विश्व बैंक तथा अन्य बहुराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के दबाव में केन्द्र सरकार विदेशी कंपनियों के लिए भारतीय कृषि बाजार बहुराष्ट्रीय कंप‎नियों के ‎लिए खोलेने के लिए विवश है। रिलायंस समूह के माध्यम से बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां रिटेल के क्षेत्र में भारत में चोर दरवाजे से प्रवेश कर रही हैं। सरकार के पास इसके अलावा शायद अब कोई विकल्प बचा भी नहीं है। इसलिए सरकार इतना बड़ा जोखिम उठाने के लिए तैयार हो गई है। बेरोजगारी, महंगाई, कोरोना संक्रमण, दवाइयों की बढ़ती कीमतें, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली इत्यादि पर सरकार का वर्तमान में कोई नियंत्रण नहीं रहा। ऐसी स्थिति में सरकार ने किसानों को उद्वेलित कर एक बड़ा जोखिम उठाया है। बेरोजगारी, सं‎विदाकर्मी, सरकारी कर्मचा‎रियों का ‎विरोध और प्रदर्शन चल रहे थे। अब इसकी परिणति किस रूप में होगी, इसको सोचकर ही डर लगता है। इसके बाद भी यदि सरकार ने करोड़ों किसानों और उनसे जुड़े हुए करोड़ों असंग‎ठित कामगारों को संकट में डालने का काम किया है। तो यह सरकार की कोई बहुत बड़ी मजबूरी होगी, जो वह सार्वजनिक नहीं कर पा रही है।

भारत-चीनः सच्चाई क्या है ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
एक तरफ संसद में रक्षा मंत्री और गृहराज्य मंत्री के बयान और दूसरी तरफ चीनी विदेश मंत्रालय का बयान, इन सबको एक साथ रखकर आप पढ़ें तो आपको पल्ले ही नहीं पड़ेगा कि गलवान घाटी में हुआ क्या था ? भारत और चीन के फौजी आपस में भिड़े क्यों थे ? हमारे 20 जवानों का बलिदान क्यों हुआ है ? हमारे फौजी अफसर चीनी अफसरों से दस-दस घंटे क्या बात कर रहे हैं ? हमारे और चीन के विदेश और रक्षा मंत्री आपस में किन मुद्दों पर बात करते रहे हैं ? उनके बीच जिन पांच मुद्दों पर सहमति हुई है, वे वाकई कोई मुद्दे हैं या कोई टालू मिक्सचर है ?
गृहराज्य मंत्री नित्यानंद राय ने बुधवार को राज्यसभा में कह दिया कि पिछले छह माह में चीन ने भारतीय सीमा में कोई घुसपैठ नहीं की है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कथन पर दुबारा मुहर लगा दी कि चीन ने भारत की किसी चौकी पर कब्जा नहीं किया है और वह भारत की सीमा में बिल्कुल नहीं घुसा है। जब मैंने नरेंद्र भाई के राष्ट्रीय संबोधन में इस आशय की बात सुनी तो मुझे बहुत धक्का लगा और मैं सोचने लगा कि चीन के इस अचानक हमले ने उन्हें इतना विचलित कर दिया कि यह बात उनके मुंह से अनचाहे ही निकल गई लेकिन मुझे तब और भी आश्चर्य हुआ, जब वे लद्दाख जाकर टीवी चैनलों पर बोले और उन्होंने चीन का नाम तक नहीं लिया। अब भी संसद के दोनों सदनों में सिर्फ रक्षामंत्री बोले। प्रधानमंत्री क्यों नहीं बोले ? वे गैर-हाजिर ही रहे। उनका डर स्वाभाविक था कि चीन के नाम पर उनकी चुप्पी के कारण विपक्ष उन पर हमला बोलेगा। रक्षामंत्री राजनाथसिंह ने अपने मर्यादित लहजे में सारी कहानी कह दी। वह लहजा इतना संयत रहा कि उससे न तो चीन भड़क सकता था और न ही चीन के खिलाफ भारत की जनता! सच्चाई तो यह है कि गलवान घाटी में हमारे सैनिकों के बलिदान पर संसद का खून खौल जाना चाहिए था लेकिन हमारा विपक्ष कितना निस्तेज, निष्प्रभ और निकम्मा है कि उसकी बोलती ही बंद रही। इस संकट के वक्त वह सरकार का साथ दे, यह बहुत अच्छी बात है लेकिन वह सच्चाई का पता क्यों नहीं लगाए कि गलवान घाटी में गलती किसने की है ? हमारे जवानों के बलिदान के लिए जिम्मेदार कौन है ? उधर चीनी विदेश मंत्रालय ने भारत सरकार के सभी तेवरों और दावों पर पानी फेर दिया है। उसका कहना है कि चीन ने कहीं कोई घुसपैठ नहीं की है। गलवान घाटी में जो मुठभेड़ हुई है, वह चीन की जमीन पर हुई है। भारत ने 1993 और 1996 में हुए सीमा पर शांति संबंधी जो समझौते हुए थे, उनका उल्लंघन किया है। भारत ही घुसपैठिया है। भारत पीछे हटे, यह जरुरी है। राहुल गांधी ने पूछा है कि मोदी किसके साथ है ? भारतीय सेना के साथ है या चीन के साथ ? सरकार के इस अटपटे रवैए पर राहुल का यह सवाल थोड़ा फूहड़ है लेकिन सटीक है लेकिन राहुल का वज़न इतना हल्का हो चुका है कि ऐसी बात भी हवा में उड़ जाती है।

टीके की जगी उम्मीद
सिद्धार्थ शंकर
एस्ट्राजेनेका के ट्रायल में साइड इफेक्ट कोविड-19 दवा के कारण नहीं हुआ था। इस बात का खुलासा ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने अपनी रिपोर्ट में किया है। साइड इफेक्ट के कारण इस दवा का परीक्षण कुछ दिन के लिए रोक दिया गया था। बताया गया कि ट्रायल में एक शख्स को दवा देने के बाद उसे रीढ़ संबंधी बीमारी शुरू हो गई थी, जिसे ट्रांसवर्स माइलिटिस कहा जाता है। लेकिन अब दस्तावेजों से पता चला है कि ये बीमारी शायद ही कोविड 19 वैक्सीन देने से हुई हो। इस बारे में तथ्य नहीं मिले हैं कि ट्रायल के दौरान दवा देने से प्रतिभागी को दिक्कत हुई। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की इस दवा का परीक्षण अब ब्रिटेन, ब्राजील, भारत और दक्षिण अफ्रीका में दोबारा शुरू हो गया है, हालांकि अमेरिका में अभी शुरू नहीं हुआ है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने भरोसा दिलाया है कि अगले साल की पहली तिमाही तक टीका आ जाएगा। भारत में जिस तेजी के साथ टीकों के परीक्षण चल रहे हैं, वे इस बात का संकेत हैं कि भारत जल्द ही इस दिशा में बड़ी कामयाबी हासिल करने के करीब है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के सहयोग से भारत बायोटेक इंटरनेशनल ने जो स्वदेशी टीका-कोवैक्सीन विकसित किया है, उसके दूसरे चरण का परीक्षण शुरू हो चुका है। अच्छा संकेत यह है कि अभी तक इसका कोई दुष्प्रभाव सामने नहीं आया है। इसलिए यह टीका भी इस साल के अंत या अगले साल के शुरू में उपलब्ध हो सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि कोरोना जैसी महामारी का टीका खोजना कोई आसान काम नहीं है। अमेरिका, चीन जैसे कई बड़े देश इस काम में जुटे हैं। रूस ने टीका बना लेने और परीक्षण के हर स्तर पर खरा उतरने का दावा किया है। अगले साल तक दुनिया के कई देशों के टीके बाजार में आने की संभावना है। टीका तैयार करने की प्रक्रिया की जटिल होती है और इसे कई तरह के परीक्षणों से गुजारना होता है। इसमें वक्त और पैसा दोनों ही काफी खर्च होते हैं। ऐसे में इस काम को सीमा में नहीं बांधा जा सकता, वरना टीके की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। टीका चाहे जो भी बनाए, उसकी सफलता का मापदंड तो यही होगा कि वह अधिकतम कोरोना संक्रमितों को ठीक करे। अभी जिन टीकों पर काम चल रहा है, वे कितने सुरक्षित और कारगर होंगे, इसका अभी कोई सटीक अनुमान लगा पाना मुश्किल है। इसकी एक वजह यह भी है कि कोरोनाविषाणु को लेकर जो नई-नई जानकारियां मिल रही हैं और जिस तेजी से यह विषाणु नए-नए रूपों में परिवर्तित हो रहा है और इसके जो नए-नए लक्षण सामने आ रहे हैं, वह भी वैज्ञानिकों के लिए कम बड़ी चुनौती नहीं है। भारत जैसे एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाले देश में सभी को एक साथ टीका उपलब्ध करा पाना संभव नहीं है। जाहिर है, इसके लिए प्राथमिकता तय करनी होगी और उसी के अनुरूप कदम उठाने होंगे। आबादी का बड़ा हिस्सा तो टीका खरीद पाने में सक्षम भी नहीं है। इसलिए सरकार ने तय किया है कि टीका सबसे पहले उन्हें दिया जाएगा, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होगी, भले वे इसे खरीद पाने में सक्षम न भी हों। बड़ी संख्या में स्वास्थयकर्मियों सहित ऐसे लोग हैं जो कोरोना से लोगों को बचाने के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं। इसके अलावा बुजुर्गों और कम प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को भी बचाना है। अक्सर यह देखने में आता है कि सब कुछ होते हुए भी हम कई बार कुप्रबंधन और लापरवाही के शिकार हो जाते हैं और इससे जनहित के अभियानों को धक्का लगता है। कोरोना टीका आए और देश के हर नागरिक तक पहुंचे, इसके लिए सरकार को अभी से कारगर रणनीति पर काम शुरू कर देना चाहिए।

विश्व के सबसे अधिक जनसमर्थन वाले प्रधानमंत्री : नरेन्द्र मोदी
प्रभात झा
विश्व के सबसे अधिक जनसमर्थन वाले प्रधानमंत्री, महात्मा गांधी और सरदार पटेल की भूमि गुजरात के लाल, नरेंद्र मोदी के दर्शन और कर्तव्यपरायणता महात्मा गांधी के निकट है। गांधीजी द्वारा प्रतिपादित मानवता, समानता और समावेशी विकास के सिद्धांतों पर चलकर उन्होंने भारत के अबतक के सबसे जनप्रिय प्रधानमंत्री होने का गौरव प्राप्त किया है। जन सेवा और राष्ट्र धर्म का उन्होंने अनुपालन कर जो आदर्श स्थापित किया है, एक सुनहरे भारत का निर्माण तो करेगा ही विश्व के लिए कल्याणकारी होगा। नव भारत और आत्मनिर्भर भारत के सपनों को लेकर एक श्रेष्ठ और समर्थ भारत के निर्माण को संकल्पित व समर्पित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज 70 वर्ष के हो गए। 17 सितम्बर 1950 को दामोदरदास मोदी और हीराबा के घर जन्मे नरेंद्र मोदी का बचपन राष्ट्र सेवा की एक ऐसी विनम्र शुरुआत है, जो यात्रा अध्ययन और आध्यात्मिकता के जीवंत केंद्र गुजरात के मेहसाणा जिले के वड़नगर की गलियों से शुरू होती है। 17 वर्ष की आयु में सामान्यतः बच्चे अपने भविष्य के बारे में सोचते हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी के लिए यह अवस्था पूर्णत: अलग थी। उस आयु में उन्होंने एक असाधारण निर्णय लिया। उन्होंने घर छोड़ने और देश भर में भ्रमण करने का निर्णय कर लिया। स्वामी विवेकानंद की भांति उन्होंने भारत के विशाल भू-भाग में यात्राएं कीं और देश के विभिन्न भागों की विभिन्न संस्कृतियों को अनुभव किया। यह उनके लिए आध्यात्मिक जागृति का समय था और देश के जन-जन की समस्यायों से अवगत होने का भी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक होते हुए उन्हें संगठन कौशल और जन सेवा तथा राष्ट्र धर्म के महत्व को समझने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। 12 वर्षों में गुजरात में हुए अभूतपूर्व एवं समग्र विकास के आधार पर न केवल भारतीय जनता पार्टी, यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और नीतिगत पंगुता से त्रस्त पूरे देश ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के एकमात्र विकल्प के रूप में स्वीकार्यता दिलाई। 26 मई 2014 को उनके नेतृत्व में पहली बार किसी गैर-कांग्रेसी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत मिला और वे देश के 15वें प्रधानमंत्री बने। ‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘एक भारत श्रेष्ठ’ के मूलमंत्र से उन्होंने देश का जो अभूतपूर्व सर्वांगीण विकास किया, इससे उन्होंने जन-जन के ह्रदय में अपनी जगह बनाई। जनता-जनार्दन के आशीर्वाद से 2019 के आम चुनाव में उन्हें ऐतिहासिक समर्थन मिला और 30 मई 2019 को दूसरी बार भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री हैं जिनका जन्म आजादी के बाद हुआ है। ऊर्जावान, समर्पित एवं दृढ़ निश्चयी नरेन्द्र मोदी प्रत्येक भारतीय की आकांक्षाओं और आशाओं के द्योतक हैं। नव भारत के निर्माण की नींव रखने वाले नरेन्द्र मोदी करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों का चेहरा हैं। 26 मई 2014 से, जबसे उन्होंने प्रधानमंत्री का पद संभाला है, देश को विकास उस शिखर पर ले जाने के लिए अग्रसर हैं, जहां हर देशवासी अपनी आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा कर सके। पंडित दीन दयाल उपाध्याय के दर्शन से प्रेरणा लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के अंतिम पायदान पर खड़े एक-एक व्यक्ति के पूर्ण विकास को 24/7 समर्पित हैं। आज 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 70 वर्ष के हो गए।
एक प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की अंतर्दृष्टि, संवेदना, कर्मठता, राष्ट्रदर्शन व सामाजिक सरोकार स्वतंत्र भारत के अबतक के इतिहास में अद्वितीय है। उनकी विचारशैली और उनकी कर्तव्यपरायणता अतुलनीय है। वे केवल जनप्रिय नहीं है, वे जन-जन के प्रिय हैं। उनका चिंतन राष्ट्र चिंतन है बन गया। मई 2014 से लेकर आज सितंबर 2020 के छह साल साढ़े तीन महीने के अपने रिकॉर्ड प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में उन्होंने जन सेवा और राष्ट्र धर्म के जो आदर्श स्थापित किये हैं, भारतीय राष्ट्र के बेहतर भविष्य के लिए अनुकरणीय है। 14 अप्रैल को उन्होंने कोरोना वायरस को लेकर राष्ट्र को संबोधित करते हुए यजुर्वेद के एक श्लोक का उल्लेख किया था -‘वयं राष्ट्रे जागृत्य’, अर्थात हम सभी अपने राष्ट्र को शाश्वत और जागृत रखेंगे। आज यह पूरे राष्ट्र का,जन-जीवन का संकल्प बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिक और राष्ट्र के प्रति सेवा धर्म का जो कर्तव्यपथ तैयार किया है, सम्पूर्ण भारत का उनको साथ है। लेकिन यह राह कम चुनौतयों से भरा नहीं रहा है। व्यक्तिगत जीवन हो या राजनीतिक जीवन, पूर्व के सभी प्रधानमंत्रियों की तुलना में इनका जीवन अधिक कठिनाईयों भरा रहा है। लेकिन नरेंद्र मोदी हर परीक्षा में शत-प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण होते रहे हैं। आज कोरोना महामारी में अपेक्षाकृत कम चिकित्सा सुविधा होने के बावजूद नरेंद्र के नेतृत्व में भारत विश्व में कहीं बेहतर ढंग से इस महामारी से लड़ रहा है। कोरोना महामारी से लड़ने के लिए जब पीएम केयर्स फंड की स्थापना की गई थी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरुआती फंड के तहत 2.25 लाख रुपये का योगदान दिया। पीएम केयर्स फंड में जमा राशि से भारत आज प्रभावी रूप से विश्व में सबसे बेहतर तरीके से कोरोना से लड़ाई लड़ रहा है। पीएम केयर्स फंड का उपयोग कोरोना से और भविष्य में इस प्रकार की गंभीर चुनौतियों का शीघ्रता और तत्परता से निपटने के लिए चिकित्सीय ढांचागत सुविधाओं का निर्माण किया जा रहा है। भारत का यह सशक्त होता सामर्थ्य, नरेंद्र मोदी की जन और राष्ट्र सेवा के प्रति समर्पण तथा उनके नेतृत्व में जन आस्था का परिणाम है।
प्रधानमंत्री के रूप में विश्व में त्याग और मानवता के अनुपम उदाहरण हैं नरेंद्र मोदी। मानवता और राष्ट्र की सेवा में अबतक 103 करोड़ रुपये अपने व्यक्तिगत फंड से दान कर चुके हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान मिले सभी उपहारों की नीलामी कर मिले 89.96 करोड़ रुपये को कन्या केलवनी फंड, 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभालने से पहले अपने निजी बचत के 21 लाख रूपये गुजरात सरकार के कर्मचारियों की बेटियों की पढ़ाई के लिए, 2015 में मिले उपहारों की नीलामी से जुटाए गए 8.35 करोड़ रुपये नमामि गंगे मिशन को , 2019 में कुंभ मेले में निजी बचत से 21 लाख रुपये स्वच्छता कर्मचारियों के कल्याण के लिए बनाए गए फंड को, 2019 में ही साउथ कोरिया में सियोल पीस प्राइज़ में मिली 1.3 करोड़ की राशि को स्वच्छ गंगा मिशन को, हाल ही में अपने कार्यकाल के दौरान उनको मिली स्मृति चिन्हों की नीलामी में 3.40 करोड़ रुपये एकत्र किए गए राशि को भी नमामि गंगे मिशन को उन्होंने दिए। वहीं पीएम केयर्स फंड के लिए 2.25 लाख रुपये दिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा ‘ की भावना से समाज और सेवा कर रहे हैं।
5 अगस्त को भारतीय जन आस्था के केंद्र और राष्ट्र की सांस्कृतिक नगरी अयोध्या में भगवान् श्री राम के मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन के अवसर पर पधारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा ‘राम काज किन्हें बिनु, मोहि कहां विश्राम’। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम का संदेश, हमारी हजारों सालों की परंपरा का संदेश, कैसे पूरे विश्व तक निरंतर पहुंचे, कैसे हमारे ज्ञान, हमारी जीवन-दृष्टि से विश्व परिचित हो, ये हम सबकी, हमारी वर्तमान और भावी पीढ़ियों की जिम्मेदारी है। उन्होंने विश्वास जताया कि श्रीराम के नाम की तरह ही अयोध्या में बनने वाला ये भव्य राममंदिर भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत का द्योतक होगा, और वहां निर्मित होने वाला राममंदिर अनंतकाल तक पूरी मानवता को प्रेरणा देगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वतंत्र भारत के सबसे परिवर्तनकारी नेतृत्व हैं। उनके नेतृत्व में, भारत ने सबसे बड़ा सत्ता परिवर्तन देखा, जिसमें भारतीय जनता पार्टी का उदय सत्ताधारी दल के रूप में एक नई राजनीतिक सोच तथा शैली के रूप में हुआ, जिसने कांग्रेस की छह दशकों की श्रेष्ठता को अप्रासंगिक बना दिया। नरेंद्र मोदी के परिवर्तनकारी एवं प्रभावी नेतृत्व में आधुनिक, डिजिटल, भ्रष्टाचार-मुक्त, जवाबदेह और विश्वसनीय सरकार का आविर्भाव हुआ है तथा जनता को भी अभूतपूर्व रूप से भागीदार बना दिया है। जहां अप्रासंगिक पुरातन प्रणालियों और नियमों को समाप्त कर दिया गया है, वहीं सैकड़ों योजनाओं और अभियानों के माध्यम से एक नए भारत का निर्माण हो रहा है। ‘सबके साथ’ और ‘सबके विश्वास’ से ‘सबका विकास’ हो रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न केवल राजनीतिक कार्यकर्ता हैं, बल्कि एक कविहृदय साहित्यकार भी हैं। अपने व्यस्त दिनचर्या के बावजूद उन्होंने दर्जनभर पुस्तकें लिखी हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने गुजराती भाषा में 67 कविताएं लिखी थीं। उनकी इन कविताओं के माध्यम से उनके दर्शन,उनके विचार और उनकी दृष्टि का सहजता के साथ अंदाजा लगाया जा सकता है। उनका हिन्दी में एक कविता संग्रह है ‘साक्षी भाव’ जिसमें जगतजननी मां से संवाद रूप में व्यक्त उनके मनोभावों का संकलन है, जिसमें उनकी अंतर्दृष्टि, संवेदना, कर्मठता, राष्ट्रदर्शन व सामाजिक सरोकार के स्पष्ट दर्शन होते हैं। उनकी श्रेष्ठतम रचनाओं में शामिल है ‘पुष्पांजलि ज्योतिपुंज’ जिसमें उन्होंने लिखा है कि संसार में उन्हीं मनुष्यों का जन्म धन्य है, जो परोपकार और सेवा के लिए अपने जीवन का कुछ भाग अथवा संपूर्ण जीवन समर्पित कर पाते हैं। इस पुस्तक में उन्होंने व्यक्ति के जन्म से लेकर उसकी समाज के प्रति दायित्व का बोध कराया है, तथा राष्ट्र सर्वोपरि को जीवन का मूलमंत्र माननेवाले ऐसे ही तपस्वी मनीषियों का पुण्य-स्मरण भी किया है। ‘सोशल हॉर्मोनी’ नामक पुस्तक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समाज और सामाजिक समरसता के प्रति भावनाओं के प्रबल प्रवाह को शब्दों के माध्यम से व्यक्त किया है। इस पुस्तक में उनकी समाज के प्रति अद्वितीय दृष्टि और दृष्टिकोण की स्पष्टता है। जहां वे ‘एग्जाम वॉरियर्स’ नामक अपने पुस्तक में अपने बचपन के कई उदाहरणों के माध्यम से बच्चों को परीक्षा के तनाव से निकलने की युक्ति बताते हैं, वहीं ‘कनवीनिएंट एक्शन’ में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और समाज को सचेत करते हैं और साथ ही इससे निपटने के लिए वैश्विक अभियान में शामिल होने की प्रेरणा भी देते हैं। अद्भुत हैं हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की के नेतृत्व में राजनीति और सत्ता से परे जो मानव दृष्टि है, वैश्विक दृष्टि है, उनकी विश्व नेतृत्व की क्षमता का दर्शन कराता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक दर्शन का मूलमंत्र अंत्योदय है। प्रत्येक निर्णय के केंद्र में वंचित, गरीब, मजदूर, किसान हैं। जन-जन की चिंता है। ‘अन्नदाता सुखी भवः’ की सर्वोच्च प्राथमिकता है। भ्रष्टाचार मुक्त, पारदर्शी, नीति आधारित प्रशासन की संकल्पना है। शीघ्र निर्णय का मूल सिद्धांत है। प्रत्येक परिवार को पक्का घर मिले। चौबीस घंटे बिजली मिले। स्वच्छ पीने का पानी मिले। गांव-गांव सड़क, इंटरनेट हो। सबका पोषण, सबको उत्तम स्वास्थ्य मिले। सबको शिक्षा मिले। सबको रोजगार मिले। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के योग्य और निर्णायक नेतृत्व में कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कच्छ से किबिथू तक ‘एक राष्ट्र, एक कर’, ‘एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड’ और ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का सपना साकार हो रहा है। मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, फिट इंडिया, स्वच्छ इंडिया, टीम इंडिया के सामूहिक प्रयत्नों से न्यू इंडिया का निर्माण हो रहा है। जन सेवा के साथ-साथ ‘राष्ट्ररक्षासमं पुण्यं, राष्ट्ररक्षासमं व्रतम्, राष्ट्ररक्षासमं यज्ञो, दृष्टो नैव च नैव च’ का संकल्प है। लेकिन उनके लिए मानवता और विश्व बंधुत्व का स्थान सर्वोपरि है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व मानवता के कल्याण के लिए है, भारतीय राष्ट्र के कल्याण के लिए है, विश्व के कल्याण के लिए है। नरेंद्र मोदी आप और अधिक यशस्वी बनें, दीर्घाऊ हों, शताऊ हों !
(भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं पूर्व सांसद )

राजनाथ का चीन पर संयत रवैया
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
रक्षा मंत्री राजनाथसिंह ने लोकसभा में आज एक ऐसे विषय पर भाषण दिया, जो 1962 के बाद का सबसे गंभीर मुद्दा था। गलवान घाटी में हुई हमारे जवानों की शहादत से पूरा देश गरमाया हुआ है। करोड़ों लोग बड़ी उत्सुकता से जानना चाहते थे कि गलवान घाटी में चीन के साथ मुठभेड़ क्यों हुई ? जब प्रधानमंत्री ने यह कहा था कि चीनियों ने हमारी जमीन पर कोई कब्जा नहीं किया और वे हमारी सीमा में घुसे नहीं तो रक्षा मंत्री को यह बताना चाहिए था कि उस मुठभेड़ का असली कारण क्या था ? आश्चर्य की बात है कि जिस मुद्दे पर सारे देश का ध्यान टिका हुआ है, उसकी चर्चा के वक्त सदन में प्रधानमंत्री मौजूद नहीं थे। रक्षा मंत्री ने वे सब बातें दोहराईं, जो प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री और वे स्वयं कहते रहे हैं। उन्होंने भारतीय फौज की वीरता और बलिदान को बहुत प्रभावशाली और भावुक ढंग से रेखांकित किया। उनके भाषण का सार यही है कि दोनों देश सीमा-विवाद को शांति से निपटाना चाहते हैं। दोनों युद्ध नहीं चाहते। रक्षा मंत्री ने अपने भाषण में जरा भी आक्रामक-मुद्रा अख्तियार नहीं की। उन्होंने बहुत ही संयत शब्दों में बताया कि दोनों पक्षों ने माना कि 3500 किमी की भारत-चीन के बीच जो वास्तविक नियंत्रण रेखा है, वह कितनी अनिश्चित है, अनिर्धारित है और कितनी अस्पष्ट है। वे यह भी बता देते तो ठीक रहता कि साल में कई सौ बार उनके और हमारे सैनिक और नागरिक उस रेखा का अनजाने ही उल्लंघन करते रहते हैं। रक्षा मंत्री ने यह भी बताया कि दोनों पक्ष सीमा पर यथास्थिति बनाए रखने पर राजी हो गए हैं। साथ ही उन्होंने माना है कि जो भी आपस में बैठकर तय किया जाएगा, उसका पालन दोनों पक्ष अवश्य करेंगे। मुझे खुशी होती अगर राजनाथजी इशारे में भी यह कहते कि उस नियंत्रण-रेखा को, जो झगड़े की रेखा है, उसे वास्तविक बनाने पर भी दोनों देश विचार कर रहे हैं ताकि हमेशा के लिए इस तरह के विवादों का खात्मा हो जाए। ऐसा स्थायी इंतजाम करते वक्त बहुत-कुछ ले-दे तो करना ही पड़ती है। रक्षा मंत्री ने अपने बहादुर फौजी जवानों का जबर्दस्त उत्साहवर्द्धन किया लेकिन अपने आत्मीय मित्र राजनाथजी से पूछता हूं कि उनका ‘हिंगलिश’ भाषा में दिया गया भाषण कितने जवानों को समझ में आया होगा। किसी अधपढ़ अफसर का लिखा हुआ भाषण लोकसभा में पढ़ने की बजाय वे अपनी धाराप्रवाह, सरल और सुसंयत शैली में हिंदी-भाषण देते तो उसका प्रभाव कई गुना ज्यादा होता। हिंदी-दिवस के दूसरे दिन उनके इस ‘हिंगलिश-भाषण’ ने उनके प्रशंसकों को आश्चर्यचकित कर दिया। भारत-चीन को मिलाते-मिलाते उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी का घाल-मेल कर दिया।

हिंदी दिवस या अंग्रेजी हटाओ दिवस ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत सरकार को हिंदी दिवस मनाते-मनाते 70 साल हो गए लेकिन कोई हमें बताए कि सरकारी काम-काज या जन-जीवन में हिंदी क्या एक कदम भी आगे बढ़ी? इसका मूल कारण यह है कि हमारे नेता नौकरशाहों के नौकर हैं। वे दावा करते हैं कि वे जनता के नौकर हैं। चुनावों के दौरान जनता के आगे वे नौकरों से भी ज्यादा दुम हिलाते हैं लेकिन वे ज्यों ही चुनाव जीतकर कुर्सी में बैठते हैं, नौकरशाहों की नौकरी बजाने लगते हैं। भारत के नौकरशाह हमारे स्थायी शासक हैं। उनकी भाषा अंग्रेजी है। देश के कानून अंग्रेजी में बनते हैं, अदालतें अपने फैसले अंग्रेजी में देती हैं, ऊंची पढ़ाई और शोध अंग्रेजी में होते हैं, अंग्रेजी के बिना आपको कोई ऊंची नौकरी नहीं मिल सकती। क्या हम हमारे नेताओं और सरकार से आशा करें कि हिंदी-दिवस पर उन्हें कुछ शर्म आएगी और अंग्रेजी के सार्वजनिक प्रयोग पर वे प्रतिबंध लगाएंगे? यह सराहनीय है कि नई शिक्षा नीति में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषाओं के माध्यम को लागू किया जाएगा लेकिन उच्चतम स्तरों से जब तक अंग्रेजी को विदा नहीं किया जाएगा, हिंदी की हैसियत नौकरानी की ही बनी रहेगी।
हिंदी-दिवस को सार्थक बनाने के लिए अंग्रेजी के सार्वजनिक प्रयोग पर प्रतिबंध की जरुरत क्यों है? इसलिए नहीं कि हमें अंग्रेजी से नफरत है। कोई मूर्ख ही होगा जो किसी विदेशी भाषा या अंग्रेजी से नफरत करेगा। कोई स्वेच्छा से जितनी भी विदेशी भाषाएं पढ़ें, उतना ही अच्छा! मैंने अंग्रेजी के अलावा रुसी, जर्मन और फारसी पढ़ी लेकिन अपना अंतरराष्ट्रीय राजनीति का पीएच.डी. का शोधग्रंथ हिंदी में लिखा। 55 साल पहले देश में हंगामा हो गया। संसद ठप्प हो गई, क्योंकि दिमागी गुलामी का माहौल फैला हुआ था। आज भी वही हाल है। इस हाल को बदलें कैसे?
हिंदी-दिवस को सारा देश अंग्रेजी-हटाओ दिवस के तौर पर मनाए! अंग्रेजी मिटाओ नहीं, सिर्फ हटाओ! अंग्रेजी की अनिवार्यता हर जगह से हटाएं। उन सब स्कूलों, कालेजों और विश्वविद्यालयों की मान्यता खत्म की जाए, जो अंग्रेजी माध्यम से कोई भी विषय पढ़ाते हैं। संसद और विधानसभाओं में जो भी अंग्रेजी बोले, उसे कम से कम छह माह के लिए मुअत्तिल किया जाए। यह मैं नहीं कह रहा हूं। यह महात्मा गांधी ने कहा था।
सारे कानून हिंदी और लोकभाषाओं में बनें और अदालती बहस और फैसले भी उन्हीं भाषाओं में हों। अंग्रेजी के टीवी चैनल और दैनिक अखबारों पर प्रतिबंध हो। विदेशियों के लिए केवल एक चैनल और एक अखबार विदेशी भाषा में हो सकता है। किसी भी नौकरी के लिए अंग्रेजी अनिवार्य न हो। हर विश्वविद्यालय में दुनिया की प्रमुख विदेशी भाषाओं को सिखाने का प्रबंध हो ताकि हमारे लोग कूटनीति, विदेश व्यापार और शोध के मामले में पारंगत हों। देश का हर नागरिक प्रतिज्ञा करे कि वह अपने हस्ताक्षर स्वभाषा या हिंदी में करेगा तथा एक अन्य भारतीय भाषा जरुर सीखेगा। हम अपना रोजमर्रा का काम—काज हिंदी या स्वभाषाओं में करें। भारत में जब तक अंग्रेजी का बोलबाला रहेगा याने अंग्रेजी महारानी बनी रहेगी तब तक आपकी हिंदी नौकरानी ही बनी रहेगी।
(लेखक, भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष हैं)

कितने किस्म के हिन्दू !
के. विक्रम राव
पितृपक्ष चल रहा है। सत्रह सितम्बर (बृहस्पतिवार) को श्राद्ध का अंतिम दिन रहेगा। गंगाजमुनी हिन्दू इस प्रथा का उपहास करते हैं। छद्म आस्थावान छिपे-सहमे रीति से परिपाटी निभाएंगे। कई श्रद्धालु एक दफा जीवन में गया-तीर्थ जाने के बाद निबट जाते हैं। किन्तु बहुतायत में अन्य जन सारी रस्में मन से निभाते हैं। इसी आखिरी समूह का तरीका मुझे बहुत भाता है।
पुरखों का आदर मरणोपरांत भी करना यह दर्शाता है कि नयी पीढ़ी कृतघ्न नहीं है। ऐसे मृत्यु के पश्चात वाले आचरण हमें सूर्योपासक पारसियों, ख्रिस्तीजन, जैन तथा बौद्धों से सीखना चाहिए। वे अपने सभी निर्देशित रस्मों का विधि-विधान के अनुसार निर्वहन करते हैं।
अर्थात पुण्यकर्म से लाज, हिचक क्यों?
यहाँ चौथे मुग़ल बादशाह शाहाबुद्दीन मुहम्मद शाहजहाँ (खुर्रम) की उक्ति का जिक्र कर दूं। श्राद्ध पद्धति का उल्लेख अतीव व्यथा से शाहजहाँ ने किया था। अपने बेटे औरंगजेब आलमगीर से बादशाह ने कहा, “हिन्दुओं से सीखो। वे अपने मरे हुए वालिद (पिता) को भी तर्पण में पानी पिलाते हैं और तुम हो कि अपने जीवित पिता को टूटे घड़े में आधा भरकर ही पानी देते हो, प्यासा रखते हो !” बाप से बेटे ने गद्दी हथियाते ही आगरा के किले में बादशाह को कैद कर रखा था।
मसलन पारंपरिक रिश्ते निभाने में हिन्दू को शहंशाह ने बहुत बेहतर बताया था।
आर्यसमाजी भी हिन्दुओं में होते हैं जो मूर्ति-भंजक (इस्लामिस्टों की भांति बुतशिकन) हैं। वे श्राद्ध का बहिष्कार करते हैं। हालाँकि वे वेदोक्त रीतियों को तो मानते हैं। मगर यह नही स्वीकारते कि अथर्ववेद (18-2-49) में उल्लिखित है कि पूर्वजों का स्मरण करना चाहिए : “येनः पितु: पितरो ये पितामहा तेभ्यः पितृभ्यो नमसा विधेम।”
हिन्दू संप्रदाय के समाजशास्त्रीय प्रबंधन हेतु यह प्रथाएं रची गई थीं। किन्तु नौ सदियों तक के इस्लामी राज में नगरीय क्षेत्रों से ये परम्पराएँ लुप्तप्राय हो गयी हैं। आंचलिक क्षेत्रों में दिखती हैं।
पिण्डदान के विषय में कई भारतीयों के भ्रम को दूर करने हेतु मैं लन्दन के एक महान वैज्ञानिक का अनुभव बता दूं। चूँकि वह गोरा अंग्रेज था तो हम गेहुंए भारतीय, युगों से दासता से ग्रसित रहे, तो शायद विचार करलें और मान भी लें कि आत्माएं होती हैं और विचरण करती रहती हैं। उनसे संवाद संभव है। आत्मिक सुधार हेतु सहायता भी ।
इसी सन्दर्भ में लखनऊ विश्वविद्यालय में साइकोलॉजी विभाग के हमारे एक साथी ने कभी (1959) एक लेख का उल्लेख किया जिसे ब्रिटेन के महान भौतिक शास्त्री लार्ड जॉन विलियम्स स्ट्रट रेले ने लिखा था। जॉन विलियम्स को 1904 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला था। वे बड़े धर्मनिष्ठ थे और पराविज्ञान में निष्णात थे। प्लैंशेट पर वे बहुधा अपने दिवंगत इकलौते पुत्र से संवाद करते थे।
एक बार पुत्र ने उन्हें बताया कि वह एक अत्यंत ज्वलनशील स्थान पर है। मगर भारतीय आत्माएं यहाँ से शीघ्र मुक्ति पा लेती थीं क्योंकि उनके भूलोकवासी रिश्तेदार आटे से गेंदनुमा ग्रास बनाकर कोई रस्म अदा करते थे। अर्थात पिंडदान ही रहा होगा।
अतः अब श्राद्ध प्रथा में यकीन करना होगा।

राजनीतिक स्वार्थसिद्धि के लिए हिन्दी की हील -हुज्जत उचित नहीं
मुकेश तिवारी
अपने प्रांत की भाषा अथवा मातृभाषा का प्रचार प्रसार करना अच्छा है मगर दूसरी भाषा का विरोध करना किसी भी दृष्टि से उचित नही ।दरअसल में राजनीतिक स्वार्थसि,िद्व के लिए ही हिन्दी का खुलकर विरोध किया जाता है। हरेक भाषा का अपना प्रथक-प्रथक अस्तित्व है और प्रथक महत्व भी ,मगर जब हम राष्ट्रीय स्तर पर किसी भाषा का जिक्र करते है तो वह हिन्दी ही है।
हिन्दुस्तान बहु भाषा-भाषी मुल्क है जहॉ चार सौ से भी ज्यादा बोलियां और भाषांए बोली जाती है,इसमें शक नहीं कि सबसे ज्यादा बोली व समझी जाने वाली भाषा हिन्दी ही है।जनगणना विभाग के आंकडों के अनुसार 41 प्रतिशत लोग हिन्दी में कार्य करते हैं।हिन्दी आज भारत की राष्ट्रभाषा है,लेकिन देश की सम्पर्क और साहित्य -भाषा के रूप में इसके महत्व से दुनिया सदियों से परिचित है। यही वजह है कि सर्वप्रथम विदेशियों ने ही हिन्दी के इतिहास को सूत्रबद्ध करने और इसके व्याकरण को मानक रूप देने के प्रयास किए ।इसमें फ्रांस के गार्सा द तासी का नाम अग्रणी है । किसी भी मुल्क की एकता और अखंडता को बनाए रखने में भाषा महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।भाषा ही वह माध्यम है जिसके द्धाराकोई भी समाज अपनी संस्कृति और अस्मिता को सुरक्षित रख पाता है।दरअसल में कडवी सचाई है कि भाषा ही सबसे पहले अस्मिताओं व संस्कृतियों के टकराव का शिकार हुई ।हिन्दी भी इसका अपवाद नहीं है।
पिछले दशकों में हिन्दी को राजनीतिक अवसरवादियों ने अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करना चाहा तो कभी कुछ लोगो ने अपनी स्वार्थसिद्वि के लिए इसका दुरूपयोग करना चाहा।आज हिन्दी के प्रति जिस तरह से दक्षिण प्रांतीय और मराठी लोग होहल्ला मचा रहे हैंवह उचित नहीं है इतिहास साक्षी है कि हिन्दी भाषा को लेकर कभी इन दोनो प्रांतों में टकराव नही था।आज से सैकडों बषों पूर्व दक्षिण के आचायों ने हिन्दी को अपनाकर अपनी बात जन-जन तक पहुंचाई रामानुजाचार्य,वल्लभाचार्य,रामानंद ने हिन्दी की अहमियत को समझा और इसे व्यवहार में लाए । इतिहास के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि तंजौर के भोसलवंशीय शाहजी महाराज केरल के तिरूवनंतपुरम के राजा स्वाति तिरूनाल श्रीराम वर्मा उस दौर में हिन्दी के गीत लिखा करते थे। यहां तक कि विजयनगर रियासत ने अपने दरबार में हिन्दी को विशेष दर्ज दे रखा था। अहमदनगर ,गोलकुंडा,बीजापुर में भीदक्खिनी हिन्दी का दवदबा था।
ओडिसा के चैतन्य महाप्रभु ने हिन्दी बहुला बृजबुलि का प्रयोग किया। तमिलनाडु में हिन्दी की मुखालफत 1937 में तभी शुरू हों गई थी जब राजगोपालाचारी की सरकार ने मद्रास में हिन्दी को लाने में खास भूमिका निभाते हुए इसका समर्थन किया था, लेकिन डीएमके ने तब उसका हिसक विरोध किया था लिहाजा।इस दौरान कुछ लोगो की जान भी चली गई थी। 1964 में एक मर्तवा पुन: हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रयास किया गया तो गैर हिन्दी प्रदेशों ने खुलकर विरोधप्रर्दशन किए ।
गौरतलब यह भी हैं कि1967 के चुनाव में द्रमुक के जीतने की अहंम वजह हिन्दी का विरोध ही था। द्रमुक ने हिन्दी को राजभाषा बनाए जाने का जमकर विरोध किया और यह प्रचारित किया कि यदि हिन्दी का दवदवा हुआ तो तमिल भाषा का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा द्रमुक ने सत्ता में आते ही सबसे पहले स्कूलों में हिन्दी शिक्षण को बंद करा दिया ।सबसे ज्यादा हैरानी वाली बात यह है कि तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध कर उसे राजनीतिक मुदूदा बना दिया हालाकि यह वही तमिल राज्व्य है जहां से गाधी जी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए आंदोलन की शुरूआत की थी जबकि गाधी जी की मात्रभाषा हिन्दी नहीं गुजराती थै ज्यादा महत्वपूर्ण बात तो यह है कि इसके बावजूद भी उन्होने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने का समर्थन किया था क्योकि वे जानते थे कि हिन्दी जनज न की भाषा हे हिन्दी के प्रचार -प्रसार के लिए गांधी जी द्धारा दक्षिण का चयन महज इत्तफाक नही था 1918 में दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना की मौजूदा हालात में हिन्दी को संविधान में राष्ट्रभाषा का स्थान दिलाने में गोपाल स्वामी आयंगर का भीअहम योगदान रहा ।
यकीनन महाराष्ट्र में भाषा के प्रति कभी कटरता नहीं रही । संत तुकाराम ,संत नामदेव , संत ज्ञानेश्वर ,जैसी शख्सियतों की रचनाएं आज भी हिन्दी के पाठृयक्रम का हिस्सा हैं। शिवाजी के दरबार में हिन्दी को विशेष दर्ज प्राप्त था ।वही उनका बेटा सम्भाजी हिन्दी का चर्चित कवि था । सचाई यह भी है कि महाराष्ट्र में पेशवा ,होलकर,सिधिया, सहित मराठी राजधराने राजकार्य हिन्दी में करते थे। बाल गंगाधर तिलक ने हिन्दुस्तानियों से हिन्दी सीखने का आहवान करते हुए कहा था – देश के संगठन के लिए ऐसी भाषा की जरूरत है जिसे सुगमता से समझा जा सके। कडवा सच यह है कि किसी भी विरादरी को निकट लाने के लिए भाषा का होना महत्वपूर्ण तत्व हैं।यह सही है कि देश की अर्थव्यवस्था का आधे से ज्यादा का बाजार हिन्दी पर टिका है भारतीय हिन्दी फिल्म उधोग के गढ मुंबई में औसतन हर साल हिन्दी की 600 फिल्में बनती है जो तकरीबन 12000 करोड रूप्ये का कारोबार करती है
अपने प्रांत की भाषा का प्रचार -प्रसार करना अच्छा है मगर इसके लिए दूसरी भाषा का विरोध करना किसी भी दृष्ट्रि वाजिव नही हैं।इस सचाई से भली भाति हमस ब वाकिफ है कि राजनीतिक स्वार्थसिद्वि के लिए ही हिन्दी की मुखल्फत की जाती है। हर भाषा का अपना अलग अस्तित्व है और अलग महत्व भी मगर जब हम राष्ट्रीय स्तर पर किसी एक भाषा की बात करते है तो वह हिन्दी ही है बल्कि देशवासियों को एकता के सूत्र में भी बांधती है।
यही नही हिन्दी मात्र एक भाषा नहीं बल्कि विविध बोलियों का समुच्चय है और ये बोलियां किसी एक क्षेत्र विशेष ,स्थान विषेश राज्य विशेष से नहीं ली गई , बल्कि ये विभिन्न प्रांतो से आई है जिन्हे हिन्दी ने बिना किसी भेदभाव के अपने में समाहित कर लिया है।वर्तमान दौर में यह दिल्ली , मप्र ,राजस्थान ,बिहार ,हरियाणा उत्तर प्रदेश ,छतीसगढ, उतराखंड ,झारखंड और हिमाचल प्रदेश की राजभाषा होने के साथ ही समूचे देश में सबसे ज्यादा बोली व समझी जाने वाली भाषा हैं।

हिन्दी भाषा और संबद्ध बोलियों की विकास यात्रा
विवेक रंजन श्रीवास्तव
एक छोटा बच्चा भी जो कोई भाषा नही जानता चेहरे के हाव भाव व स्पर्श की मृदुलता से हमारी भावनायें समझ लेता है। विलोम में अपनी मुस्कान , रुदन या उं आां से ही अपनी सारी बातें मां पिता को समझा लेता है। विश्व की हर भाषा में हंसी व रुदन के स्वर समान ही होते हैं। पालतू पशु पक्षी तक अपने स्वामी से सहज संवाद अपनी विशिष्ट शैली में कर लेते हैं। अर्थात भाषा भावनाओ के परस्पर संप्रेषण का माध्यम है।
हिंदी एक पूर्ण समृद्ध भाषा है। इसके वर्तमान स्‍वरूप के विकास से पहले खड़ी बोली के कई साहित्यिक रूप विकसित थे, जैसे दकनी, उर्दू, हिंदुस्‍तानी आदि. यह जानना भी रोचक है कि हिंदी के विकास में अंग्रेजों और उनकी संस्‍थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। उन्‍नीसवीं सदी हिंदी के विकास की दृष्टि से निर्णायक सदी थी। आधुनिकता की अवधारणा और राजभाषा के सवाल से हिंदी के स्‍वरूप निर्धारण और विकास का गहरा संबंध है. उन्‍नीसवीं सदी के नवजागरण के पुरोधाओं, जैसे राजा शिवप्रसाद, भारतेंदु, बालकृष्‍ण भट्ट, अयोध्‍याप्रसाद खत्री, महावीर प्रसाद द्विवेदी, देवकीनंद खत्री आदि का हिंदी के विकास में उल्‍लेखनीय योगदान रहा है.
महात्मा गांधी ने हिंदी को स्‍वाधीनता आंदोलन की भाषा के रूप में अंगीकार कर देश को एक सूत्र में जोड़ने का काम किया था। नेहरू जी, लोहिया जी व प्रायः राष्ट्रीय नेताओ के समर्थन से हिंदी भारत की राजभाषा बनी। आज के दौर की, सूचना-तकनीक की हिंदी हमें हिंदी के भविष्‍य के बारे में संकेत करती है।
एक छोटे क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा बोली कहलाती है. बोली में साहित्य रचना का अभाव दिखता है। जब किसी बोली में साहित्य रचना होने लगती है और क्षेत्र का विकास हो जाता है तो वह बोली न रहकर उपभाषा के रूप में स्थापित हो जाती है. साहित्यकार जब किसी भाषा को साहित्य रचना द्वारा सर्वमान्य स्वरूप प्रदान कर लेते हैं तथा उसका क्षेत्र व्यापक हो जाता है तो वह भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो जाती है। भारत के बाहर हिन्दी बोलने वाले देशो में अमेरिका , मॉरीशस , दक्षिण अफ्रीका, यमन , युगांडा , सिंगापुर , नेपाल , न्यूजीलैंड , जर्मनी , पाकिस्तान , बांगलादेश आदि राष्ट्रो सहित दुनियाभर में हिन्दी का प्रयोग हो रहा है।
पहले भाषा का जन्म हुआ और उसकी सार्वभौमिकता और एकात्मकता के लिए लिपि का आविष्कार हुआ. भाषा की सही-सही अभिव्यक्ति की कसौटी ही लिपि की सार्थकता है. प्रतिलेखन और लिप्यांतरण के दृष्टिकोण से देवनागरी लिपि अन्य उपलब्ध लिपियों से बहुत ऊपर है.इसमें मात्र 52 अक्षर (14 स्वर और 38 व्यंजन) हैं , किंतु प्रत्येक फोनेटिक शब्द के लिप्यांतरण में हिन्दी पूर्नतः सक्षम है। हिन्दी की विकास यात्रा की विवेचना करें तो हम पाते हैं कि हिन्दी संस्कृत, प्राकृत, फारसी और कुछ अन्य भाषाओं के विभिन्न संयोजनों से निर्मित भाषाओं से जनित है। यह द्रविड़ियन, तुर्की, फारसी, अरबी, पुर्तगाली और अंग्रेजी द्वारा प्रभावित और समृद्ध हुई भाषा है. यह एक बहुत ही अभिव्यंजक भाषा है, जो कविता और गीतों में बहुत ही लयात्मक और सरल और सौम्य शब्दों का उपयोग कर भावनाओं को व्यक्त कर सकने में सक्षम है. हिन्दी की क्षेत्रारानुसार अनेक बोलियाँ हैं, जिनमें अवधी, ब्रजभाषा, कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, हड़ौती,भोजपुरी, हरयाणवी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया, कुमाउँनी, मगही आदि प्रमुख हैं. इनमें से कुछ में अत्यंत उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना हुई है. ब्रजभाषा और अवधी में हिन्दी का साहित्य प्रचुरता से लिखा गया है। स्वतंत्रता संग्राम, जनसंघर्ष, वर्तमान के बाजारवाद के विरुद्ध भी लोकभाषा में बहुत लिखा जा रहा है। भोजपुरी सिनेमा ने नये समय में उसका साहित्य समृद्ध किया है। इधर बुंदेली , बघेली बोलियो में भी व्यापक साहियत्यिक लेखन हो रहा है।
प्रकाशन तकनीक का विकास , कम्प्यूटर में हिन्दी व अन्य भारतीय लिपियों की सुविधाओ का विस्तार , यू ट्यूब व अन्य संसाधनो से हिन्दी व संबंधित बोलियां लगातार समृद्ध हो रही हैं। हिन्दी भाषा और संबद्ध बोलियों के विकास का मूल मंत्र यही है कि हम मूल रचना कर्म तथा अन्य भाषाओ से निरंतर अनुवाद के द्वारा अपनी भाषा की समृद्धि को बढ़ाने का कार्य करते रहें। अंग्रेजी की दासता से मुक्त होना जरूरी है। नई पीढ़ी को निज भाषा के गौरव से अवगत कराने के निरंतर यत्न करते रहने होंगे।जब हिन्दी के उपयोगकर्ता बढ़ेंगे तो स्वतः ही तकनीक का वैश्विक बाजार हिन्दी के समर्थन में खड़ा मिलेगा। हिन्दी का शब्दागार व साहित्य निरंतर समृद्ध करते रहने की आवश्यकता है।नई पीढ़ी की जबाबदारी है कि नये इलेक्ट्रानिक माध्यमो के जरिये हिन्दी व बोलियो के साहित्य की प्रस्तुति यदि बढ़ाई जावे । ई बुक्स व आडियो वीडियो संसाधनो को युवा पसंद कर रहा है हिन्दी के प्राचीन साहित्य व नई रचनाओ को इन माध्यमो में प्रस्तुत करने की आवश्यकता है , जिससे।
हिन्दी भाषा और संबद्ध बोलियों की विकास यात्रा अनवरत जारी रहे।

किसानों के लिए काला कानून बने केंद्र सरकार के तीन अध्यादेश
दिग्विजय सिंह
भारत में कृषि सुधार के नाम पर केन्द्र सरकार द्वारा लाए गए तीन अध्यादेशों का पूरे देश में विरोध हो रहा है। किसानों का कहना है कि पहले अध्यादेश में कृषि उपज मंडियों के बंद होने से किसानों का शोषण शुरू हो जाएगा। दूसरे अध्यादेश में गेहूँ, चावल, दलहन और आलू, प्याज के भंडारण की छूट देने से कालाबाज़ारी शुरू हो जाएगी। अंततः मध्यम और निम्न वर्ग जमाखोरी के कारण मूल्य वृद्धि का शिकार बनेगा। तीसरे अध्यादेश में अनुबंधित कृषि का प्रावधान है। ऐसा होने पर छोटे किसान अपने ही खेतों में मजदूर बनकर रह जाएंगे।
मोदी सरकार द्वारा सुधार के नाम पर लाए जा रहे ये तीनों अध्यादेश वास्तव में किसान, छोटे व मध्यम व्यापारी और उपभोक्ताओं के हितों के विपरीत हैं। हर राज्य के किसान संगठन, व्यापारी संघ और कर्मचारी यूनियन इन अध्यादेशों को काला कानून बता रहे हैं। किसानों का कहना है कि उचित मूल्य और बेहतर बाजार के नाम पर केन्द्र सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में किसानों की किस्मत सौंपने जा रही है। जो किसानों का पोषण नहीं बल्कि शोषण करेंगे। मैं भी इस आशंका से सहमत हूँ।
जब देश में लाॅकडाउन था और करोड़ों लोग कोरोना की दहशत में थे तब किसानों का भला करने की जगह बड़ी-बड़ी कम्पनियों का भला करने के लिये “कोरोना के संकट काल में“ केन्द्र सरकार ने हमेशा की तरह अध्यादेश का सहारा लिया और बिना किसानों से संवाद और संसद में चर्चा कराए किसानों पर काला कानून लागू कर दिया। राज्य सरकार के संवैधानिक अधिकार की भी अनदेखी की है।
इस तरह प्रधानमंत्री मोदी जी ने आम जनता की “आपदा” में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए “अवसर” ढूँढ लिया!
हमारे देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है। देश के दस करोड़ से अधिक किसानों ने अपनी मेहनत से हरित क्रांति के सहारे देश को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया है। आज़ादी के बाद से कांग्रेस के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकारों ने महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए कृषि विकास में अनेक दूरगामी निर्णय लिए थे, जो उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल करने में सहायक रहीं। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जमाखोरी और कालाबाजारी पर कड़ा प्रहार करते हुए आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 बनाया ताकि बाजार में जीवन उपयोगी वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सके।
खाद्यान्न की कमी से जूझते देश में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कृषि लागत और मूल्य आयोग गठित किया जिसकी अनुशंसाओं पर किसानों को उनकी लागत के अनुरूप न्यूनतम समर्थन मूल्य दिए जाने के प्रावधान किए गए।
पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारत की परम्परागत खेती को अनेक कृषि अनुसंधान केन्द्र, कृषि विश्वविद्यालय प्रारंभ कर हरित क्रांति में बदल दिया। इंदिरा जी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर किसानों के लिए बैंकों के दरवाजे खोल दिए। सिर्फ तीन दशक में किसानों ने शासकीय सुविधाओं के सहारे खाद्यान्न उत्पादन में देश को आत्मनिर्भर बना दिया था।
70 के दशक में किसानों को व्यापारियों के शोषण से बचाने के लिए कृषि उपज मंडी अधिनियम विभिन्न प्रदेशों में लागू किए गए। इस कानून के तहत किसानों के लिए मंडी समितियां स्थापित की गईं। मंडी कानून ने किसानों को संरक्षण देते हुए उन्हें अपनी फसल के उचित दाम दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया। मंडी अधिनियम में किसानों के प्रतिनिधि मंडी समिति के अध्यक्ष होते हैं और निर्वाचित संचालकों में किसानों के वोटों की सीधी भागीदारी होती है। व्यापारियों और हम्मालों के प्रतिनिधि भी बोर्ड में शामिल किए गए। इन सभी को मिलकर हर समस्या का समाधान निकालने के लिए कानूनी तौर पर अधिकार सम्पन्न किया गया है। मध्यप्रदेश में यह कानून 1973 से लागू हो गया था।
कृषि उपज मंडी अधिनियम को अब इस अध्यादेश के माध्यम से नगण्य किया जा रहा है, जबकि हमारे देश के संविधान में कृषि को संविधान के अनुच्छेद 246 में वर्णित 7वीं अनुसूची में राज्य के अधिकार क्षेत्र में रखा गया है।
पिछले 50 सालों में कृषि उपज मंडियां किसानों की आशाओं का केन्द्र बन गई हैं, जहाँ केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बोली लगाकर फसलों की बिक्री होती है। वाजिब दाम मिलने पर ही किसान अपनी फसल व्यापारी को बेचता है। व्यापारी उसी दिन भुगतान भी करता है। विलंब होने पर व्यापारी किसान को एक प्रतिशत की दर से 5 दिनों तक ब्याज देता था और 5 दिन से ज्यादा देरी होने पर उसके बाद 5% ब्याज की दर से भुगतान किया जाता है।
नाबार्ड की रिपोर्ट बताती है कि देश में दस करोड़ से अधिक किसान है, जिनमें से आधे से अधिक कर्ज में डूबे हैं। ऐसे में अब नए अध्यादेश से शासकीय कृषि उपज मंडियों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा और व्यापारी भी अनियंत्रित हो जाएंगे। निजी मंडियां खुल जाएंगी और किसान दर-दर भटकता फिरेगा। किसानों का आरोप है कि आटा, मैदा सहित अन्य उत्पाद बनाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियां मनमानी कीमतों पर किसानों को फसल बेचने मजबूर करेंगी। परिणामस्वरूप देशभर में कंपनियों का कॉकस तैयार हो जायेगा।
फसल खरीदी में व्यापारी द्वारा धोखा देने पर किसान की सुनवाई मंडी में नहीं होगी बल्कि एस.डी.एम. और कलेक्टर के यहां होगी। कलेक्टर के आदेश की अपील केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव के पास होगी और उनके आदेश की अपील केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी के पास होगी। यानि कि जो विवाद प्रदेश में निपट जाता था अब वह दिल्ली में निपटेगा। इतना ही नहीं इस अध्यादेश ने किसानों के अदालत में जाने का रास्ता भी बंद कर दिया गया है।
वर्तमान समय में मंडी में किसान को उचित दाम, उचित तुलवाई, समय पर भुगतान सहित अनेक सुविधाएँ दी जा रही हैं। इन सुविधाओं के बीच राज्य शासन को मंडी टैक्स के रूप में हजारों करोड़ रुपए का राजस्व भी मिल रहा था जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कें बन रही थीं और किसानों को मंडी में रहने, ठहरने की सुविधा मिल रही थीं। अब निजी मंडी बनने से यह राशि भी नगण्य हो जाएगी। कर्मचारियों का वेतन नहीं बंट पाएगा।
किसानों को आशंका सही ही प्रतीत होती है कि इन अध्यादेशों के माध्यम से केन्द्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य से छुटकारा पाना चाह रही है, ताकि किसान सरकार से उचित मूल्य की बात ना कर सकें। भाजपा की केन्द्र सरकार इसी बहाने कृषि उपज सहित किसानों की आमदनी दोगुनी करने के वचन से भी बचना चाह रही है। आगे चलकर सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदी भी बंद करेगी और बड़ी कम्पनियों से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिये सीधे खाद्यान खरीदेगी और इस तरह बड़े-बड़े व्यापारी और कम्पनियां किसानों के चारों तरफ अपना जाल बिछा लेंगी।
एक अन्य अध्यादेश में सरकार बड़े-बड़े कार्पोरेट घरानों के लिये ”कांट्रेक्ट फार्मिंग“ का कानून ला रही है। इस कानून में कम्पनियां किसानों से अनुबंध कर उनकी जमीन पर खेती कराएंगी इस तरह छोटे-छोटे किसान अनुबंध के मायाजाल में फंसकर अपने ही खेतों में मजदूर बन जायेंगे। गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इस तरह की खेती के अनुभव कड़वे रहे हैं। अनुबंध के नाम पर किसानों का शोषण किया गया है। गुजरात में तो कंपनियों ने अनुबंध के नाम पर किसानों पर केस दर्ज करवा दिए थे।
केन्द्र सरकार ने अपने तीसरे अध्यादेश में अत्यावश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन कर गेहूँ, चावल, दलहन, और आलू, प्याज के मनमाने भंडारण की छूट दे दी है। अभी तक इन आवश्यक चीजों की कालाबाज़ारी रोकने के लिये भंडारण की सीमा तय थी। अब सरकार ने राष्ट्रीय आपदा की स्थिति तथा दोगुनी कीमत न होने तक मनमर्ज़ी से स्टाॅक रखने का नियम बना दिया है। यह अध्यादेश भी किसानों और आम उपभोक्ताओं की जगह बड़े व्यापारियों का भला करेगा तथा कालाबाजारी और जमाखोरी को बढ़ावा मिलेगा।
पहले किसान भंडारण कर सकता था, अब कंपनियों को छूट दे दी गई है। इस फैसले से किसानों में आक्रोश है। भविष्य में यह अध्यादेश अत्यावश्यक वस्तु जैसे गेहूँ, चावल, दलहन, आलू, प्याज की किल्लत का कारण बनेगा। निम्न और मध्यमवर्गीय परिवार महंगी वस्तुएं खरीदने को विवश होंगे। जमाख़ोरों और कालाबजारियों को खुली छूट मिल जाएगी।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि एक दशक पहले प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यू.पी.ए. सरकार ने देश के ऋण-ग्रस्त किसानों का 72 हजार करोड़ रुपए का कर्ज माफ कर किसानों पर मंदी की मार नहीं पड़ने दी थी। मध्यप्रदेश में 2018 में आयी कांग्रेस सरकार ने भी 20 लाख से अधिक लघु और सीमांत किसानों का कर्जा माफ किया था। लेकिन बीजेपी के सत्ता हथियाते ही वह ना सिर्फ़ बंद हो गया, बल्कि उसके कुछ नेता तो इसे पाप तक कहने लगे। आज देश के करोड़ों किसान केन्द्र सरकार से उचित समर्थन मूल्य, उन्नत बीज, सिंचाई सुविधाएं, अनुदान के साथ कृषि उपकरण, खाद्य और कम दर पर बिजली और डीजल की मांग कर रहे हैं। यह सब देने की जगह केन्द्र सरकार बिना आम सहमति बनाए, इस काले कानून रूपी तीन अध्यादेशों को लाकर किसानों की कमर तोड़ने पर आमादा है। जिसमें किसान की जगह कंपनियां आत्मनिर्भर बनेंगी और किसानों की उन बड़ी कंपनियों पर निर्भरता बढ़ती जाएगी।
आज इन अध्यादेशों को लेकर पूरे देश में ग्रामीण इलाक़ों और मंडियों में किसानों और मंडी कर्मचारियों का विरोध प्रदर्शन चल रहा है। मंडियाँ बंद होने से किसानों की उपज भी नहीं बिक पा रही है। कोरोना काल में जब सभी उद्योग धंधे बंद हैं तब कृषि अर्थव्यस्था को सँभालने का काम कर सकती थी, लेकिन दुर्भाग्यवश इसे भी बर्बाद करने की कोशिश की जा रही है। इसलिए इन तीनों अध्यादेशों का विरोध होना चाहिए।
*(लेखक मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व राज्यसभा सांसद हैं)*

चुनाव सुधार की दरकार
सिद्धार्थ शंकर
चुनाव सुधार को लेकर उम्मीदें तो कई सालों से की जा रही हैं, लेकिन अभी भी इस दिशा में ठोस कदम बढ़ नहीं पाए हैं। तभी तो सांसदों-विधायकों पर दर्ज केस के आंकड़े पूरी व्यवस्था को चिढ़ाते नजर आते हैं। देशभर में राजनेताओं के खिलाफ 4,442 आपराधिक मामलों में सुनवाई चल रही है। इनमें से 2556 मामले मौजूदा सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट को सभी हाईकोर्ट द्वारा मुहैया कराए गए आंकड़ों से यह खुलासा हुआ है। संसद और विधानसभाओं में चुने जनप्रतिनिधियों के खिलाफ मामलों का तेजी से निपटारा करने के मुद्दे पर विचार करने को दायर याचिका पर शीर्ष अदालत में सुनवाई जारी है। इसी के तहत सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरलों को नेताओं के खिलाफ लंबित मामलों की जानकारी देने का निर्देश दिया था।
मामले में एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने सभी हाईकोर्ट से मिली जानकारी को इकट्ठा कर अपनी रिपोर्ट शीर्ष अदालत को सौंपी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल 4,442 मामले लंबित हैं, जिनमें से 2556 मामलों में मौजूदा सांसद और विधायक आरोपी हैं। 25 पेज के हलफनामे में कहा गया है कि इनमें जनप्रतिनिधियों की संख्या मामलों से ज्यादा है क्योंकि एक मामले में एक से ज्यादा निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल हैं। भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका पर कोर्ट के आदेश पर यह रिपोर्ट दाखिल की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी में नेताओं के खिलाफ सबसे ज्यादा 1217 मामले लंबित हैं। इनमें से 446 मामले मौजूदा सांसदों व विधायकों के खिलाफ हैं। इसके बाद बिहार में 531 मामलों में से 256 में वर्तमान विधि निर्माता आरोपी हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने 352 मामलों की सुनवाई पर रोक लगाई है। 413 मामले ऐसे अपराधों से संबंधित हैं जिनमें उम्रकैद की सजा का प्रावधान है। इनमें से 174 मामलों में पीठासीन निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल हैं। रिपोर्ट में मामलों का तेजी से निपटारा करने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं। इनमें सांसदों और विधायकों के मामलों के लिए हर जिले में विशेष अदालत बनाने का सुझाव दिया गया है। इन विशेष अदालतों को उन मामलों को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिनमें अपराध के लिए मौत की सजा या उम्र कैद का प्रावधान है। इसके बाद सात साल की कैद की सजा के अपराधों को लेना चाहिए। वहीं मौजूदा सांसदों व विधायकों के मामलों को प्राथमिकता दी जाए।
इन आंकड़ों को देखने के बाद पता चल जाएगा कि क्यों चुनाव सुधारों को लेकर सवाल उठते रहे हैं, खासकर तब जब चुनाव नजदीक होते हैं। इसलिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर चुनाव आयोग और सरकार गंभीर क्यों नहीं हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि चुनाव आयोग शक्तिहीन संस्था हो चुकी है। आज भी आयोग में संपूर्ण शक्तियां विद्यमान हैं। अगर भारत में चुनाव सुधारों को लेकर की गई पहल पर गौर करें, तो नब्बे के दशक में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन ने सबसे पहले इस दिशा में बड़े कदम उठाए थे। शेषन ने राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग की शक्तियों का अहसास कराया था। इसके बाद ज्यादातर मुख्य चुनाव आयुक्तों ने चुनाव सुधार की दिशा में कुछ न कुछ ऐसा जरूर किया, जिससे आयोग की शक्तियों के बारे में आमजन को भी पता चला। लेकिन लंबे समय से यह देखा जा रहा है कि देश की सर्वोच्च अदालत तो चुनाव सुधार को लेकर सक्रिय है और समय-समय पर इस बारे में निर्देश भी जारी होते रहे हैं, लेकिन हमारे राजनीतिक दल इसमें सहयोग करने के बजाय असहयोग का रास्ता ही अपनाते रहे हैं।
यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि राजनीतिक दलों को इस बात का भय सताता रहता होगा कि अगर चुनाव प्रक्रिया सुधरी तो इसका पहला और सबसे ज्यादा असर उन्हीं पर पड़ेगा और आपराधिक संलिप्तता व चुनावों में धन के अथाह इस्तेमाल पर रोक लग जाएगी। राजनीतिक दल चुनावों में जिस तरह से भारी मात्रा में पैसे का इस्तेमाल करते हैं, वह कड़वी सच्चाई है। कालेधन के इस्तेमाल को रोकना है तो आयोग को तर्कसंगत तरीके से सोचना होगा, क्योंकि लोकतंत्र अमीरों का तंत्र बनता जा रहा है, इसमें गरीब अथवा ज्यादा धन खर्च न कर पाने वाले उम्मीदवार इन धन कुबेरों के आगे बौने पड़ गए हैं। राजनीति का अपराधीकरण गंभीर चिंता का विषय है। आज वक्त की जरूरत है कि राजनीति में धनबल और बाहुबल के बढ़ते प्रभाव को कम करने की दिशा में मजबूत कदम उठाए जाएं।

कोरोना पेंशन शुरू हो
रघु ठाकुर
कोरोना काल ने बड़ी संख्या में लोगों को देश में संक्रमित किया है, और प्रतिदिन भारत सरकार की ओर से राज्य वार संक्रमण के आंकड़े तथा राज्यों की ओर से जिलावार आंकड़े मीडिया में प्रमुखता से छप रहे है। जिनमें बताया जाता है कि, कितने लोग संक्रमित हुए कितने ठीक हुए कितनों की मृत्यु हुई। सरकार के इन आंकड़ों को देखें तो अभी तक याने 6 माह में लगभग 30 लाख लोग संक्रमित या संभावित संक्रमित पाए गए हैं। जिनमें से लगभग 71 प्रतिशत लोग याने 21 लाख लोग स्वस्थ्य हो गए। कुछ का इलाज चल रहा है और इस बीमारी से मरने वालों की संख्या लगभग 50-55 हज़ार के आस-पास है।
परन्तु अच्छा होता कि भारत सरकार यह आंकड़ा भी जारी करती कि इन 6 माहों में कितने लोग बेरोजगार हुए याने जिनके पास रोजगार थे उनमें से कितने लोगों के रोजगार छिने? कितने लोगों ने आत्महत्याएं की? कितने लोग अवसादग्रस्त हुए? और कितने लोग अपराधी बनने को लाचार हुए? आई.एल.ओ. के अनुमान तो भारत में 40 करोड़ लोग इस कोरोना के कारण बेरोजगार बन चुके हैं।
परंतु सी.आई.एम.ई.ई. नामक संस्था जो सरकार के आर्थिक स्थितियों का अध्ययन करती है, और रपट जारी करती है कि हालिया रिपोर्ट चौकाने वाली है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इन 5 माहों में एक करोड़ नवासी लाख लोग बेरोजगार बने है क्योंकि उन्हें अपनी नौकरी गवांना पड़ी है। अकेले अप्रैल माह में 1 करोड़ 70 लाख, जुलाई में 50 लाख लोगों की नौकरियां गई है, अगस्त का आंकड़ा अभी आने वाला है। आई.एल.ओ. ने तो नौकरी व निजी धंधे दोनों की बेरोजगारी मापी है। लॉकडाऊन के आंशिक रूप से समाप्त होने पर जुलाई माह में मुश्किल से 30 लाख लोगों को काम या नौकरी वापिस मिली थी। सी.आई.एम.ई.ई. ने यह भी आशंका व्यक्त की है कि जिनकी नौकरी या काम छूट गए है, उन्हें कोरोना शुरू होने के पूर्व जैसा काम वापिस मिलना कठिन है।
यह आंकलन इसलिए भी सही लगता है कि इस कोरोना काल का इस्तेमाल भारत सरकार ने निम्न तरीकों से एक नए प्रकार के आर्थिक ढांचे के इस्तेमाल के लिए किया है, जिसमें इंसान का स्थान मशीन ले रही है :-
1.नार्मल के नाम पर लगभग सभी क्षेत्रों में जैसे शिक्षा, चिकित्सा, व्यापार इत्यादि में डिजीटीलाइजेशन बढ़ रहा है। अकेले शिक्षा के क्षेत्र में स्कूल, कॉलेज आदि सभी शिक्षण संस्थाओं को बंद कर ऑनलाईन शिक्षा के परिणाम स्वरूप अभी हाल में कई लाख शिक्षकों के रोजगार समाप्त हुए हैं। और यह प्रक्रिया अभी और आगे जाएगी। अभी तो कुछ शिक्षक मोबाईल या लेपटॉप पर छात्रों को पढ़ा रहे है। परन्तु शीघ्र ही यह स्थिति आने वाली है कि शिक्षकों के भाषणों के टेप चलेंगे और शिक्षकों की जरूरत बहुत कम हो जाएगी। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया के विद्वानों के भाषणों के टेप से शिक्षा होगी तथा शिक्षक व शिक्षण संस्थान दोनों ही लगभग गैर जरूरी हो जाएंगे। इसी प्रकार चिकित्सा के क्षेत्र में दूरभाष पर (टेलीमेडिसन के द्वारा) दवाओं के नाम बता दिए जाएंगे और चिकित्सकों की संख्या व जरूरत काफी कम हो जाएगी।
2.कोरोना काल में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्रों के निजीकरण और निजी क्षेत्र के विदेशी पूँजीकरण का योजनाबद्ध अभियान शुरू किया है। निजीकरण रोजगार या कर्मचारियों की संख्या को बहुत कम करेगा क्योंकि उसके लिये तो इंसान के नाम पर मशीन लगाकर मुनाफा बढ़ाना है। एफ.डी.आई. से भी रोजगारों पर विपरीत प्रभाव पढ़ेगा क्योंकि एफ.डी.आई. भी मशीनों या सामान के रूप में ही आती है। कुल मिलाकर निजीकरण और विदेशी पूँजीकरण से पहले चरण में लगभग 50 प्रतिशत श्रम शक्ति की संख्या घट जाएगी और उनका काम मशीने करेंगी यह क्रम क्रमश: बढ़ता ही जाएगा।
3.वर्क फ्राम होम और होम डिलेवरी के गंभीर परिणाम भी सामने आएंगे। वर्क फ्राम होम के नाम पर कर्मचारियों को पहले काम के लिये घर भेजा जा रहा है। इससे मालिकों का दतर खर्च, यात्रा भत्ता आदि सब बच जाएगा। फिर धीरे-धीरे इन्हें कम आउटपुट या अक्षमता के नाम पर क्रमश: हटाते जाएंगे। वर्क फॉर्म होम आज भले ही कर्मचारियों को अच्छा लग रहा है कि कहीं जाने की जरूरत नहीं है घर से काम करेंगे परन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि यह वर्क फॉर्म होम बहुत शीघ्र ही किक बेक टू होम या गो बेक टू होम सिद्ध होने वाला है। होम डिलेवरी वाली जिन विदेशी पूँजी निवेशकर्ता कंपनियों को सरकार ने अनुमति दी है उससे करोड़ों छोटे दुकानदारों के व्यवसाय पर असर पड़ेगा। बड़ी-बड़ी कंपनियां देशी उद्योगपतियों के कोलोब्रेशन से देश में आ चुकी है, और वे सस्ता माल बेचेगी क्योंकि थोक खरीद के आधार पर उन्हें माल सस्ता पड़ेगा। जो मोबाईल फोन आज 15-20 हज़ार में बाज़ार में मिलता है वह इन्ही विदेशी कंपनियां 8-10 हज़ार रूपये का या और इससे भी कम में बेचेंगी। क्योंकि वे निर्माता कंपनियों से एक मुश्त करोड़ों की संख्या में खरीद करेंगी। यह घटना न केवल मशीनों के क्षेत्र में बल्कि कृषि उत्पादन और अन्य उपभोक्ता सामाग्री के उत्पादनों पर भी प्रभाव डालेगी तथा विदेशी कंपनियां अपना एकाधिकार जमायेगा। करोड़ों फुटकर व्यापारियों के ऊपर इसका प्रभाव पड़ने वाला है। और भले ही सरकार इसे विकास का पैमाना बतायें, माल की शुद्धता, गुणवत्ता का प्रचार करें। उपभोक्ता भी सस्ता व अधिक गुणवत्ता का सामान इन बहुराष्ट्रीय दैत्याकार कंपनियों से खरीदना अपने हित में समझेगा।
4.बाजार की आवश्यकता सीमित होगी पहले चरण में महानगर और कॉस्मोपॉलिटन सिटी में, फिर बड़े नगरों में और फिर क्रमश: तहसील और गाँव तक यह श्रंखला फैलेगी। काम काजी महिलाओं और परिवारों के लिए होम डिलेवरी आसान होगी। क्योंकि फोन पर सीधा माल घर पहुंच जाएगा। न बाजार जाने की समस्या, न पार्किंग न, लूटपाट न, जेब कटने की समस्या तथा समय व परिश्रम की बचत।
5.हमारे देश में लगभग एक करोड़ के आसपास घरेलू काम वाली बाईयाँ व पुरूषकर्मी है जो घरों में साफ सफाई से लेकर खाना बनाने का काम करते है, उनका काफी काम पहले ही बंद हो चुका है क्योंकि कोरोना के भय से लोगों ने उन्हें काम पर बुलाना बंद कर दिया है। तथा लॉकडाऊन काल ने लाचारी में लोगों में बाईयों के काम को मशीन या हाथ से स्वत: शुरू किया तथा अब वह उनका अभ्यास बन चुका है। अब कपड़े धोना, बर्तन धोना, खाना पकाना, ये सभी छोटे-मोटे हाथ के काम, झाड़ू लगाना बाईयों के स्थान पर मशीने करने लगेंगी। और रोबोट भी दुनिया में संपन्न देशों में प्रवेश कर चुका है। अमेरिका के शहरों में रोबोट घरों से लेकर होटलों और दतरों में सुरक्षा कर्मियों के स्थान पर प्रवेश कर चुका है। तथा क्रमश: चिकित्सा के क्षेत्र में भी प्रवेश कर रहा है। यहाँ तक कि हार्ट के आपरेशन और अन्य आपरेशन रोबोट करने लगे है। दुनिया के बड़े पैसे वाले जो पहले एक नंबर के थे और अब शायद दूसरे, तीसरे नम्बर पर है, बिल गेट्स ने कुछ दिनों पहले सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि रोबोट इंसान को बेरोजगार बनायेगा और एक बड़ा खतरा साबित हो गया। अमेरिका या यूरोप के देशों के लिए मशीन खतरा है, रोबोट खतरा है उनके रोजगारों को छीनने वाला है जबकि उनकी आबादी तुलनात्मक रूप से बहुत कम है। और इसलिए उनके यहाँ यह मशीन जितना बेरोजगारी पैदा कर रही है, उससे तुलनात्मक रूप से यह रंगीन दुनिया के देशों में बहुत ज्यादा बेरोजागारी पैदा करेगी। भारत एशिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों पर तो इसका प्रभाव मारक होगा।
6.इस मशीनीकरण का प्रभाव मीडिया पर भी पड़ेगा और मीडिया कर्मी की संख्या बड़ी मात्रा में कम हो जाएगी। पत्रकारिता मानव और मानवीय संवेदनाओं से कट जाएगी। राजनीति भी इससे प्रभावित होने वाली है और वहाँ भी सभा-संवाद-संपर्क से लेकर मतदान तक सब कुछ मशीन के माध्यम से होगा। व्यक्तिगत संपर्क समाप्त होगा संवेदनाओं की धारा सूख जायेगी।
7.शिक्षा का स्वरूप ही बदल जाएगा और शिक्षा तथा उसके पाठ्यक्रम आदि केवल व्यापार केन्द्र बन जाएंगे। अभी तो जिनके रोजगार छिने है वे प्रारंभिक रूप में कारखाना बंदी, काम बंदी शिक्षण संस्थान बंदी, और चिकित्सा संस्थान बंदी से छिने है। परन्तु जब मशीन ही मानव का विकल्प बन जाएगी तब जो बेरोजगारी पैदा होगी उसकी कल्पना करना भी कठिन है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने आंकलन में कहा है कि वर्ष 2020 के अंत तक दुनिया में लगभग 12 करोड़ लोग बेरोजगार होंगे और 1 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार होंगे।
भारत में भी जो अप्रवासी मजदूर घरों को लौटे है उनकी संख्या लगभग 8 करोड़ के आस-पास। इनका छोटा सा हिस्सा भी अभी तक काम पर वापिस नहीं लौट पाया है। उनके पास जो कुछ जमा पूँजी थी वह खत्म हो चुकी है। अब वे कर्ज ले रहे है। तथा कर्ज पर जिंदा है, और अब उनके समक्ष पेट भरने और जिंदा रहने के लिए अपराध ही सहारा है। ग्रामीण क्षेत्रों में और दूरस्थ क्षेत्र में कोरोना जनित बेरोजगारी के कारण अपराध बढ़ना शुरू हो गए है। म.प्र. पुलिस के गुप्तचर विभाग ने जानकारी दी है कि पिछले दिनों 90 नए गिरोह (डकैती के गिरोह) तैयार हुए है, जिनमें 2000 से अधिक लोग शामिल हुए है। तथा ग्रामीण क्षेत्रों में लूटपाट की घटनायें बढ़ी हैं। यह केवल म.प्र. का आंकड़ा है, अगर सारे देश में यही स्थिति बनेगी तो एक मोटे अनुमान के मुताबिक सारे देश में अभी तक लगभग 2 हज़ार गिरोह तैयार हो चुके है और जिनमें लगभग पचास हज़ार लोग नए डाकू के रूप में भर्ती हो गये हैं। एक तरफ देश का यह नया दस्युकरण या अपराधीकरण शुरू हो गया है और दूसरी तरफ बेरोजगारी और अकेलेपन के अवसाद से आत्महत्यायों के प्रकरण बढ़ रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार इस वर्ष के अंत तक देश में लगभग 20 लाख लोग आत्महत्यायें कर सकते है। याने कोरोना देश को डकैतों और आत्महत्याओं के देश में बदल देगा। हम लोगों ने सरकार से माँग की थी कि ”कोरोना पेंशन“ शुरू की जाए तथा कोरोना प्रभावितों को पेंशन दी जाए, जब तक कि कोई विकल्प या रोजगार नहीं मिल जाता है। परन्तु सरकार मौन है। और आम जन भी भयभीत या फिर स्वकेन्द्रित होकर मूकदर्शक बना बैठा है। आवश्यकता यह है कि जनता संघर्षशील बने और सरकारे संवेदनशील।

कब बनेगा भिखारी मुक्त भारत
रमेश सर्राफ धमोरा
देश में बेरोजगारी की हालत ऐसी है कि बहुत पढ़े लिखे लोग भी भीख मांग रहे हैं। राजस्थान सरकार ने हाल ही में भिखारी उन्मूलन एवं पुनर्वास कानून बनाया है। जिसके तहत जयपुर में भिखारियों का सर्वे शुरू किया गया है। इस सर्वे में पता चला है कि जयपुर शहर में कुछ भिखारी एमए और एमकॉम तक पढ़े हुए हैं तो कुछ बीए और बीकॉम किए हुए हैं। इन भिखारियों का कहना है कि अगर उन्हें कोई काम मिलता है तो वह भीख मांगना छोड़ कर काम करने के लिए तैयार हैं।
राजस्थान के ही गोविंदगढ़ के रहने वाले 34 साल का पवन एमकॉम तक पढ़ने के बाद अजमेर रोड पर भीख मांग रहा हैं। यह एक फैक्ट्री में मजदूरी करता था। लेकिन काम बंद होने की वजह से खाने के लिए चैराहे पर बैठना शुरू कर दिया। शादीशुदा नहीं होने की वजह से कहीं कोई काम के लिए ले जाता है तो चले जाते हैं वरना भीख मांग कर खा लेते हैं।
झुंझुनू जिले के डूंडलोद का रहने वाला 38 साल का अविवाहित मुकेश ने एमए तक पढ़ाई की है। जयपुर शहर में भीख मांग कर जिंदगी गुजर बसर करता है और फुटपाथ पर सोता है। एमकॉम तक पढ़ाई करने वाले जगदीश गुप्ता, ग्रेजुएशन करने वाले रमेश और शैलेश भी जयपुर में भीख मांगकर गुजारा करते हैं। राजस्थान सरकार ने हाल ही में विधानसभा में भिखारी उन्मूलन एवं पुनर्वास बिल पास कर दिया है। राज्य सरकार द्धारा सामाजिक संगठनों के जरिए भिखारियों के लिए पुनर्वास केंद्र बनाए जा रहे हैं।
हमारे घरों में, सार्वजनिक स्थलों, रेल, बसों व धार्मिक स्थलों पर ईश्वर, अल्लाह के नाम पर भीख मांगते बच्चे, बूढ़े, युवा आसानी से देखे जा सकते है जो सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। भीख मांगना आज एक प्रकार का धंधा धंधा बन गया हैं। भिक्षावृत्ति किसी भी सभ्य देश के लिए कलंक है। यह एक सामाजिक बुराई हैं । अब यह लाईलाज गंभीर रोग बनता जा रहा हैं। जहां असहाय,दीन-हीन लोग तो मजबूरी वश भीख मांगने के कार्य में लगे हुये हैं। वहीं शारीरिक दृष्टि से सक्षम कई लोग भी भीख मांग कर अपना गुजारा करते हैं,क्योकि उन्होने शारीरिक श्रम करने के बजाय भीख मांग कर आसानी से गुजारा करने का रास्ता चुन लिया है।
भिखारी शब्द के स्मरण से ही मन में घृणा का भाव उत्पन्न होने लगता है। भिखारी किसी भी देश व उसके नागरिकों के माथे पर कलंक की तरह होते हैं। आज 21 वीं सदी में जा रहा हमारा देश एक तरफ कम्प्यूटर, इंटरनेट की दिशा में प्रगतिशील है व विकास के बड़े-बड़े दावे कर रहा है वहीं दूसरी तरफ देश में ही एक तबका भीख मांग कर पेट भरता हो यह हम सभी के लिये एक गंभीर चिंतन का विषय है।
भारत में कुछ जनजातीय समुदाय भी अपनी आजीविका के लिये परम्परा के तौर पर भिक्षावृत्ति को अपनाते हैं। लेकिन भीख मांगने वाले सभी लोग इसे ऐच्छिक रूप से नहीं अपनाते। दरअसल गरीबी, भुखमरी तथा आय की असमानताओं के चलते देश में एक वर्ग ऐसा भी है, जिसे भोजन, कपड़ा और आवास जैसी आधारभूत सुविधाएँ भी प्राप्त नहीं हो पातीं। यह वर्ग कई बार मजबूर होकर भीख मांगने का विकल्प अपना लेता है।
भिक्षावृत्ति भारत के माथे पर ऐसा कलंक है जो हमारे आर्थिक तरक्की के दावों को खोखला बनाता है। भीख मांगना कोई सम्मानजनक पेशा नहीं वरन अनैतिक कार्य और सामाजिक अपराध है। सरकार ने इसे कानूनन अपराध घोषित कर रखा हैं। फिर भी यह लाइलाज रोग दिन पर दिन बढ़ता जा रहा हैं। हमारे देश में भिखारियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। भारत में कोई भूखा न रहे और भूख के कारण अपराधा न करे, इसीलिए खाद्य सुरक्षा अधिनियम का प्रस्ताव लाया गया था। भीख मांगना सभ्य समाज का लक्षण नहीं है मगर आत्मसम्मान तथा स्वाभिमान जागृत किए बिना इससे किसी को विमुख नहीं किया जा सकता। सरकार को शिक्षा के प्रसार पर बल देना चाहिए। शिक्षा ही व्यक्ति को संस्कारित कर उसे स्वाभिमानी बना सकती है।
भारत के संविधान में भीख मांगने को अपराध कहा गया है। फिर भी देश की सडकों पर लाखों बच्चे आखिर कैसे भीख मांगते हैं ? बच्चों का भीख मांगना केवल अपराध ही नहीं है, बल्कि देश की सामाजिक सुरक्षा के लिए खतरा भी है। हर साल कितने ही बच्चों को भीख मांगने के धंधे में जबरन धकेला जाता है। ऐसे बच्चों के आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होने की भी आशंका होती है। पुलिस रिकार्ड के अनुसार देश में हर साल 48 हजार बच्चे गायब होते हैं। उनमें से आधे कभी नहीं मिलते हैं। उन बच्चों में से काफी बच्चे भीख मंगवाने वाले गिरोहों के हाथों में पड़ जाते हैं। हर साल हजारों गायब बच्चे भीख के धंधे में झोंक दिये जाते हैं।
भारत में ज्यादातर बाल भिखारी अपनी मर्जी से भीख नहीं मांगते। वे संगठित माफिया के हाथों की कठपुतली बन जाते हैं। इन बच्चों के हाथों में स्कूल की किताबों की जगह भीख का कटोरा आ जाता है। भारत में भीख माफिया बहुत बड़ा उद्योग है। इससे जुड़े लोगों पर कभी आंच नहीं आती। हमारे देश की सबसे बड़ी प्राथमिकता बाल भिखारियों पर रोक लगाना होनी चाहिए। इसके लिए सामाजिक भागीदारी की जरूरत है। सामाजिक भागीदारी की बदौलत ही केंद्र और राज्यों की सरकारों पर बाल भिखारियों को रोकने के लिए दबाव डाला जा सकेगा। इस दबाव के कारण सरकारें अपने-अपने स्तर पर कार्रवाई करें, तो इस समस्या पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।
आज देश में भिखारियों को काम में लगाये जाने की आवश्यकता है। और कुछ नहीं तो रोजाना दो वक्त का मुफ्त खाना देकर इन सारे भिखारियों को विभिन्न प्रकार का प्रशिक्षण देकर सरकार के रोजगार परक अभियानों से जोड़ा जाना चाहिए। सरकार द्वारा चलाये जा रहे कौशल विकास कार्यक्रम से भिखारियों को स्वरोजगार परक प्रशिक्षण दिलवाकर इनको रोजगार से जोड़े तो इससे भीख मांगने की प्रवृति पर रोक लग सकती है।
भिखारियों के पुनर्वास के लिए सरकार को प्रयत्नशील रहना चाहिए। सामाजिक चेतना को बढ़ावा देना चाहिए। समाज को जागरूक बनाना चाहिये तभी हम साफ-सुथरा भारत बना सकेगें व भिक्षावृति जैसे अमानवीय कार्य से देश व समाज को छुटकारा दिला पायेंगे। समाज को सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर काम करना होगा। तभी देश में भिखारियों का पुनर्वास कर उन्हे समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जा सकेगा।
2018 में सामाजिक कल्याण मंत्री थावरचंद गहलोत ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि देश में कुल 4 लाख 13 हजार 760 भिखारी हैं। जिनमें 2 लाख 21 हजार 673 भिखारी पुरुष और बाकी महिलाएं हैं। भिखारियों की इस सूची पश्चिम बंगाल पहले नंबर पर है। बंगाल में भिखारियों की संख्या सबसे अधिक है और उसके बाद दूसरे स्थान पर है उत्तर प्रदेश और तीसरे पर बिहार है। मगर वास्तविकता में देष में भिखारियों की संख्या इनसे कई गुणा अधिक है।
हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने भिक्षावृत्ति को अपराध घोषित करने वाले कानून बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट, 1959 की 25 धाराओं को समाप्त कर दिया है। साथ ही भिक्षावृत्ति के अपराधीकरण को असंवैधानिक करार दिया है। बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट, 1959 की कुछ धाराओं में फेरबदल कर दिल्ली हाई कोर्ट ने ऐसे गरीब लोगों के जीवन जीने के अधिकार की रक्षा का एक सार्थक प्रयास किया है।

आपदा को अवसर में परिवर्तित करता अन्नदाता अब आत्मनिर्भरता की ओर
नरेन्द्र सिंह तोमर
देश अपनी आजादी के 75 वर्ष पूर्ण करने से दो कदम दूर है। लगभग साढ़े सात दशक का यह सफर अब आत्मनिभर्रता की उस मंजिल की ओर तीव्रगति से अग्रसर है जहां देश के 130 करोड़ नागरिकों को खुद के भारतवासी होने पर गौरव अनुभव हो। हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने स्वतंत्रता की 74 वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से अपने भाषण में आगामी दो वर्षों में बड़े संकल्प धारण करने और उन्हें पूर्ण करने का मंत्र देते हुए राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़े होने का आव्हान किया है। प्रधानमंत्री जी के आत्मनिर्भर भारत के इस शंखनाद में भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र को सबसे अधिक प्रधानता मिली है। किसानों के अथक परिश्रम से परिलक्षित हो रहे परिणाम सुखद संकेत दे रहे है कि कृषि क्षेत्र और उससे जुड़े उद्यम प्रधानमंत्री जी के आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को अर्जित करने की दिशा में तेजी से कदमताल करने लगे हैं।
कोरोना संकट काल में देश की अर्थव्यवस्था को अन्नदाता के परिश्रम का संबल मिला है। चालू वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल से जून 2020) में देश के सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) की दर में कृषि क्षेत्र में 3.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह स्थिति बताती है कि कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण भले ही वैश्विक स्तर पर उद्योग-धंधे प्रभावित हुए हों लेकिन भारत के कृषि क्षेत्र ने इन विपरीत परिस्थतियों में भी अपेक्षा से बहुत बेहतर कार्य किया है । आपदा को अवसर में बदल देने की भारतीय जीवन शैली की अद्भुत क्षमता का परिचय कोरोना संकटकाल में देश के किसानों ने अपने परिश्रम से दिया है। किसान भाइयों की इसी सक्रियता के माध्यम से ही लाकडाउन की अवधि में भी गांवों की अर्थ व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रही, और इससे देश की अर्थव्यवस्था को जो सहारा मिला वह जीडीपी के ताजा आंकड़ो में स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है।
कोविड-19 के संकट काल में किसानों के परिश्रम को सार्थक परिणाम तक पहुंचाने में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के मार्गदर्शन में भारत सरकार के कृषि मंत्रालय, कृषि विज्ञानियों-अधिकारियों एवं राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कृषि मंत्रालय ने लाकडाउन की घोषणा के तत्काल बाद कृषि उत्पादों की खरीद, मंडी संचालन, खेत-खलिहान में किसानों के कार्यों, उर्वरको-कीटनाशकों और बीजों के विनिर्माण एवं पैकेजिंग यूनिट्स को छूट देने का मामला गृह मंत्रालय के सामने उठाया और इस छूट के माध्यम से ही लाकडाउन में कृषि कार्य निर्विघ्न चलते रहे। किसानों को कस्टम हायरिंग केंद्र के माध्यम से फार्म मशीनरी उपलब्ध कराना हो या फसल कटाई के लिए हारवेस्टरों को एक राज्य से दूसरे राज्यों में प्रवेश का मामला हो, किसानों के हित में सारे प्रावधान किए गए। मैंने कोविड -19 लॉकडाउन के दौरान देशभर के किसान भाइयों को पत्र लिखकर उन्हें निवेदन किया था कि वे इस संकट के दौर में भी खेती-किसानी का का काम लगातार जारी रखे, सरकार उन्हें हरसंभव मदद करेगी।
कोविड लाकडाउन के दौरान किसानों के उत्पादों की निर्बाध खरीद सुनिश्चित करने के लिए सरकार की व्यवस्थाओं का ही परिणाम है कि इस वर्ष समर्थन मूल्य पर बंपर खरीद हुई है। लाकडाउन में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के लिए जहां खरीद केंद्रों की संख्या विगत वर्ष से दो गुना कर दी गई तो वहीं किसानों का खरीद केंद्र में आगमन का समय नियत कर एक-एक करके बुलाया गया। किसानों को दलहन और तिलहन की खरीद के लिए एमएसपी भुगतान के रूप में कुल 14,127 करोड़ रुपए भुगतान किए गए हैं, जोकि विगत वर्ष की तुलना में 62 प्रतिशत अधिक है, पिछले वर्ष यह राशि 8,715 करोड़ रुपए थी। खरीद किए गए दलहन-तिलहन की मात्रा में ढाई गुना की वृद्धि हुई है। इस वर्ष रबी के मौसम के दौरान 3.9 करोड़ मीट्रिक टन गेंहू की खरीद पर 75000 करोड़ रुपए का एमएसपी भुगतान किसानों को किया गया जब कि विगत वर्ष 3.4 करोड़ मीट्रिक टन की खरीद पर इस अवधि के दौरान 63000 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया था। इसके अतिरिक्त 1.33 करोड़ मीट्रिक टन धान की खरीद पर 24000 करोड़ रुपए का भुगतान किसानों को किया गया जबकि विगत वर्ष 0.83 करोड़ मीट्रिक टन धान की खरीद पर 14800 रुपए का भुगतान किया गया था। इस तरह कुल देखा जाए तो इस वर्ष रबी मौसम के दौरान समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए किसानों को पिछले वर्ष की तुलना में 32 प्रतिशत अधिक धनराशि का भुगतान किया गया है।
खाद्यान्न में हमारी आत्मनिर्भरता सुखद भविष्य के संकेत दे रही है। खाद्यान्न उत्पादन के अंतिम आंकलन के अनुसार भारत ने 2018-19 में कुल उत्पादन 285.21 मिलियन टन उपलब्धि हासिल की है। 2019-20 के तीसरे अग्रिम अनुमानों के अनुसार खाद्यान्न उत्पादन 296.50 मिलियन टन अनुमानित है जो अब तक का सर्वाधिक है। वर्ष 2019-20 के दूसरे अग्रिम अनुमान में कुल बागवानी उत्पादन उत्पादन 320.48 होने का अनुमान है जबकि 2018-19 में यह 310.70 मिलियन टन अनुमानित था। यानि विगत वर्ष से 3.13 प्रतिशत ज्यादा बागवानी उत्पादन हुआ है और यह भी अब तक का सर्वाधिक है।
कोविड लाकडाउन के दौरान ई-नाम नेटवर्क के अंतर्गत 415 मंडियों को जोड़ा गया है। अब देश की लगभग एक हजार मंडिया ई-नाम नेटवर्क से जुड़ गई हैं। लाकडाउन में किसानों ने इस आनलाइन प्लेटफार्म का उपयोग किया है। 1.67 करोड़ किसान ई-नाम प्लेटफार्म पर पंजीकृत हैं और उन्होंने एक लाख करोड़ रुपएसे अधिक का रिकार्ड व्यापार किया है। कोरोना काल के दौरान किसानों और व्यापारियों को परिवहन वाहनों को भाड़े पर लेने के लिए शुरू किए गए किसान रथ मोबाइल एप ने भी किसानों की सुगमता को बढ़ाया है। 236230 किसान और लगभग 87लाख से अधिक व्यापारी इस मोबाइल एप पर रजिस्टर्ड हैं। 11 लाख से अधिक वाहनों से जुड़े इस एप के माध्यम से किसान को घर बैठे परिवहन वाहन की सुविधा मिल रही है।
कोविड महामारी के दौरान रबी फसल का बंपर उत्पादन, उसकी कटाई और समर्थन मूल्य पर खरीद ने किसानों की समृद्धता में तो वृद्धि की ही है, राष्ट्र के खाद्यान्न भंडार को भर दिया है। कोविड महामारी दौरान भी धान सहित खरीफ की अन्य फसलों की रिकॉर्ड बुवाई के लिए भारत के अन्नदाता किसानों का अभिनन्दन करता हूं।
वर्तमान खरीफ मौसम 2020 में, रिकॉर्ड 1095.38 लाख हेक्टेयर ( 4 सितंबर 2020 तक) क्षेत्र को कवर किया गया है जो 2019 की तुलना में इस समय तक हुई बुवाई से 65 लाख हेक्टेयर अर्थात 6.32 प्रतिशत अधिक है। खरीफ 2019 के दौरान कुल कवरेज 1069.5 लाख हेक्टेयर था, जबकि पिछला रिकॉर्ड कवरेज खरीफ 2016 के दौरान 1075.71 लाख हेक्टेयर था। विगत वर्ष की तुलना में धान में 8.27 प्रतिशत, दलहन में 4.67 प्रतिशत, मोटे अनाज में 1.77 प्रतिशत, तिलहन में 11.93 प्रतिशत, गन्ना में 1.30 प्रतिशत, कपास में 3.24 प्रतिशत और जूट एवं मेस्टा में 3.24 प्रतिशत की बुवाई में वृद्धि देश के खाद्यान्न भंडार में अभूतपूर्व वृद्धि के सुखद संकेत दे रहे हैं। धान की बुवाई कुछ राज्यों में अभी भी जारी है, जबकि दलहन, मोटे अनाज, बाजरा और तिलहन की बुवाई लगभग खत्म हो गई है। हम आश्वस्त हैं कि 2020-21 के दौरान कुल खाद्यान्न उत्पादन का आंकड़ा 298.32 मिलियन टन पार कर जाएगा। इसमें खरीफ मौसम से प्राप्त किया जाने वाला 149.92 मिलियन टन है। खरीफ सीजन में रिकार्ड बुवाई होने पर हाल ही में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने मन की बात कार्यक्रम में देश के किसानों को बधाई देते हुए उनका वंदन किया है।
ग्रीष्म कालीन जायद मौसम में भी इस वर्ष इस समय तक बुवाई का क्षेत्रफल 57.07 लाख हेक्टेयर था जबकि पिछले वर्ष इस मौसम के दौरान 41.31 लाख हेक्टेयर में बुवाई की गई थी। इस वर्ष अभी तक 389.81 लाख हेक्टेयर में धान की रोपाई की जा चुका है जो कि गत वर्ष इस समय तक के 354.41 लाख हेक्टेयर से लगभग 10 प्रतिशत अधिक है।
किसानों के परिश्रम के बाद भी यह देखा जाता रहा है कि परिणाम उनके अनुरूप नहीं मिलते रहे है। कृषि के क्षेत्र में अब तक सर्वाधिक बाधाएं रहीं है। तीन माह पूर्व भारत सरकार द्वारा दो अध्यादेशों एवं नियमों के सरलीकरण से इस दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन की राह खुली है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की दूरदर्शिता, दृढ़ संकल्पशक्ति और किसानों की आय दो गुना करने का ध्येय इन परिवर्तनों में सुस्पष्ट हो रहा है। कृषि उत्पाद व्यापार और वाणिज्य संवर्धन एवं सरलीकरण अध्यादेश 2020 से किसानों को मंडियों से आजादी मिल गई है। अब वे अपना उत्पाद देश में कहीं भी बेच सकते हैं। वहीं किसान-सशक्तिकरण और संरक्षण- मूल्य आश्वासन पर करार और फार्म सेवाएं अध्यादेश 2020 के माध्यम से किसान बुवाई से पहले ही अपनी फसल के दाम तय कर सकेगा। कांट्रेक्ट फार्मिंग से किसानों को सुनिश्चित दाम मिलेंगे जिससे उनकी आय में वृद्धि होना तय है। सरकार के इन निर्णयों से बिचैलिए खत्म हो जाएंगे और किसानों को सीधा लाभ पहुंचेगा।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत एक लाख करोड़ रुपए के कृषि अवसरंचना फंड ऐतिहासिक प्रावधान किया है। कृषि में सरकारी निवेश तो सदैव रहा है लेकिन निजी निवेश बहुत कम है, और यदि यह आया भी है तो गांवों की जगह जिला मुख्यालयों या बड़े शहरों तक सीमित है। हमारा उद्देश्य है कि गोदाम, कोल्ड स्टोरेज और अन्य अवंसरचनाएं किसानों को उनके गांव में मिल सके। इस फंड के माध्यम से यह उद्देश्य पूर्ण हो पाएगा और किसानों को भंडारण व प्रसंस्करण करने पर फसल के बेहतर दाम मिल सकेंगे। निजी निवेश गांव तक पहुंचेगा और गांव के साथ खेती-किसानी भी नए युग की ओर अग्रसर हो जाएगी।
देश में दस हजार किसान उत्पादक संघ एफपीओ के गठन से छोटे एवं मझोले किसानों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचेगा। मंडी तक अपनी फसल ले जाने में अक्षम किसानों को उनकी फसल के उचित दाम तो मिलेंगे ही उन्हें खाद, बीज और सिंचाई की सुविधाएं भी सहजता से उपलब्ध हो सकेगी। किसान एफपीओ के माध्यम से क्लस्टर में खेती करेंगे तो उनके उत्पाद की गुणवत्ता और दाम दोनों बढ़ना तय है। सरकार के इन निर्णयों ने देश के कृषि सेक्टर की दशा और दिशा ही बदल दी है। किसानों के परिश्रम का एक-एक पैसा उन्हें मिले इसके लिए सरकार कृत संकल्पित है।
कृषि के क्षेत्र में बढ़ती हमारी आत्मनिर्भरता और किसानों के चेहरों पर आती समृद्धि की मुस्कान के पीछे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की दृढ़संकल्प शक्ति, भविष्य को भांप कर निर्णय लेने की क्षमता एवं कृषकों की आय दोगुना करने का पवित्र संकल्प है। जब देश स्वतंत्रता की 75 वीं सालगिरह मना रहा होगा तो पूरी उम्मीद है कि किसानों के खेत में लहलहाती फसलों में आत्मनिर्भरता के पुष्प पल्लवित हो रहे होंगे।
(लेखक- मंत्री, कृषि एवं किसान कल्याण, पंचायती राज और ग्रामीण विकास, भारत सरकार हैं)

क्या वाकई खतरे में भारत का लोकतंत्र और संविधान ..?
डॉ अजय खेमरिया
संवैधानिक संस्थाएं औऱ लोकतंत्र 2014 से पहले कभी खतरे में क्यों नही थे ? अचानक ऐसा क्या हुआ है कि देश भर में एक वर्ग ऐसा वातावरण बनाने में जुटा है मानों भारत में कोई तानाशाही राज आ गया है। दुहाई लोकतंत्र की जा रही है लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया या संवैधानिक प्रावधानों पर खुद ही इस तबके को भरोसा नही है।असल में यह भारत के नए समावेशी लोकतंत्र को अस्वीकार करने का सामंती प्रलाप भर है।देश की संसदीय राजनीति और संवैधानिक संस्थाओं को अपनी एकपक्षीय विचारसरणी से संचालित करने वाला कतिपय उदारवादी बौद्धिक जगत नए भारत की व्यवस्थाओं से बेदखल होता जा रहा है। यह बेदखली भी पूर्णतः लोकतांत्रिक प्रक्रिया के धरातल पर हो रही है।भारत के आत्मगौरव को कुचलकर अल्पसंख्यकवाद और तुष्टीकरण पर खड़ी की गई भारतीय शासन औऱ राजनीति की व्यवस्थाओ के कमजोर होने से जिहादी बौद्धिक गिरोह अब उन्ही संस्थाओं को निशाने पर ले रहा है जो कभी इनके एजेंडे को आगे बढ़ाने में सहायक थी।
वकील प्रशांत भूषण के ताजा अवमानना प्रकरण को बड़े व्यापक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है।यह प्रकरण महज एक अवमानना भर का नही है बल्कि वामपंथ एवं कांग्रेस विचारधारा का बिषैला औऱ भारत विरोधी चेहरा भी उजागर करता है।सुप्रीम कोर्ट से सजा सुनाएं जाने के बाद “स्वराज अभियान” के योगेंद्र यादव ने “कैम्पेन फ़ॉर ज्यूडिशियल अकाउंटबिलिटी एंड रिफॉर्म” शुरू करने का एलान किया। इस अभियान में अभिव्यक्ति की आजादी को बचाने के लिए देश भर से एक एक रुपया एकत्रित करने का भी आह्वान है।योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की राजनीतिक प्रतिबद्धता किसी से छिपी नही है।सवाल यह उठाया जा सकता है कि देश में करोड़ों मुकदमें बर्षों से लंबित है लेकिन अकाउंटबिलिटी का सवाल इस अर्थ में पहले नही उठाया गया। भूषण एन्ड कम्पनी खुद देश की सर्वोच्च अदालत को अपने दबाब में लेती रही है।किसी भी मामले में जब इन्हें मनमाकिफ़ निर्णय की उम्मीद नही होती तो सुनियोजित तरीके से बाहर आकर कोर्ट और जज के विरुद्ध चिल्लाने लगते है और जब फैक्ट के आधार पर निर्णय आ जाते है तब यही भूषण खुद को गांधी बनाने में जुट जाते है।समस्या इस बार जस्टिस अरुण मिश्रा को लेकर इसलिए खड़ी की गई क्योंकि वे भूषण के दबाब में नही आये।जस्टिस मिश्र की कोर्ट में भूषण के अधिकतर मामले लिस्टेड होने पर देश का सुप्रीम कोर्ट आखिर खराब हो जाता है लेकिन तथ्य यह है कि प्रशांत भूषण जब गुजरात दंगों या अमित शाह से जुड़े मामले जस्टिस आफताब आलम के यहां लिस्टेड कराते रहे तब सुप्रीम कोर्ट निष्पक्ष औऱ स्वतंत्र होता था? । प्रशांत भूषण जिन संस्थाओं से सीधे और परोक्ष रूप से जुड़े है उनकी मानसिकता बीजेपी और आरएसएस ही नही भारत की संप्रभुता के भी विरुद्ध है।जाहिर है अभिव्यक्ति की आजादी या न्यायिक जबाबदेही के उठाये गए सवाल देश हित से जुड़े न होकर एक घोषित एजेंडे का क्रियान्वयन भर है।इसलिए सवाल यह है कि क्या वाकई देश में संवैधानिक संस्थाएं औऱ लोकतंत्र संकट में है ? क्या प्रशांत भूषण,राजीव धवन या राहुल गांधी और उनके साथ समवेत एकेडेमिक्स ही सुप्रीम कोर्ट के रखवाले है?इन सवालों को हमें इतिहास और वर्तमान के बदले हुए वातावरण में भी देखना चाहिये।तथ्य यह है कि 2014 के बाद यानी केंद्र में नरेन्द्र मोदी को जनता द्वारा सत्ता सौंपने के साथ ही बौद्धिक राजनीतिक जगत में इस जनादेश को ही खारिज करने के सतत प्रयास चल रहे है। देश में जनता पार्टी,सयुंक्त मोर्चा,औऱ यूपीए की सरकारें भी रही लेकिन सवाल केवल मोदी सरकार के वोट परसेंट पर उठाया जाता है। तब भी जब 2019 में जनता ने 2014 से बड़ा बहुमत मोदी को सौंपा है।असल में संसदीय राजनीति की पारदर्शी प्रक्रिया के जरिये भारत विरोधी तत्व जनता की अदालत से अलग थलग हो रहे है।जाति,सम्प्रदाय और क्षेत्रीयता के साथ अल्पसंख्यकवाद की चुनावी राजनीति लगातार हासिए पर आ पहुँची है, भारत के जिहादी बौद्धिक जगत (एकेडेमिक्स)को इस जमीनी स्थिति ने परेशान कर दिया है। यह वर्ग लंबे समय से भारतीय शासन और राजनीति का नियामक बना रहा है।प्रशांत भूषण घटनाक्रम इसी नियामकीय अस्तित्व के संकट की हताशा है।सुप्रीम कोर्ट भारत के लोकतंत्र का प्रधान पहरेदार है और इसे जनता की दृष्टि में विवादित करके मोदी सरकार के नीतिगत निर्णयों पर अराजकता पैदा करना ही भूषण एन्ड कम्पनी का असली मन्तव्य है ।वातावरण बनाया गया है कि मोदी सरकार ने कोर्ट,चुनाव आयोग,संसद,कार्यपालिका,विश्विद्यालय,मीडिया को दबाब में ले लिया है।दावा किया जाता है कि लोग सरकार के भय से बोल नहीं पा रहे है।
सुप्रीम कोर्ट ने लॉक डाउन के दौरान मोदी सरकार के विरुद्ध याचिकाएं लेकर आये प्रशांत भूषण को चेतावनी जारी कर कहा था कि आप पीआईएल लेकर आये है या पब्लिसिटी याचिका। कोर्ट ने यहां तक कहा कि यह नहीं चल सकता है कि हम आपके मन मुताबिक निर्णय दें तो ठीक, नही दें तो कोर्ट पक्षपाती है। सच्चाई यह है कि राममंदिर,राफेल ,सुशांत सिंह तीन तलाक,पीएम केयर फ़ंड,सीएए,अनुच्छेद 370, पर सुप्रीम अदालत के निर्णय मोदी विरोधियों के मन मुताबिक नही हुए। सामाजिक कार्यकर्ता के वेष में सक्रिय लोगों का बड़ा तबका इस स्थिति से परेशान है।एक धारणा गढ़ी जा रही है कि “जज” डरे हुए है, भयादोहित है।लोकतंत्र खतरे में है और यह देश मे पहली बार हो रहा है।
हकीकत यह है कि 2014 के बाद से देश मे अभिव्यक्ति की आजादी और संवैधानिक संस्थाओं की अक्षुण्णता प्रखरता से बढ़ी है। अतीत में भारत की न्यायिक आजादी को खंगालने की कोशिशें करें तो पता चलता है कांग्रेस औऱ प्रशांत भूषण जैसे गिरोहों ने कोर्ट्स को सदैव सत्ता की पटरानी बनाने के प्रयास किया है।जिन जजों ने अतीत में कांग्रेस सरकारों की बादशाहत को चुनौती दी उन्हें अपमानित कर ठिकाने लगा दिया गया। जबकि सुप्रीम कोर्ट में पदस्थ रहते हुए प्रेस कांफ्रेंस करने वाले जस्टिस रंजन गोगोई मोदी दौर में ही चीफ जस्टिस बने। इंदिरा गांधी ने तो खुलेआम बहुमत के बल पर प्रतिबद्ध न्यायपालिका और ब्यूरोक्रेसी को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता घोषित किया था।
केशवानंद भारती मामला भारत में लोकतंत्र की हत्या कर इंदिरागांधी द्वारा न्यायाधीश को भयादोहित ,नियंत्रित और कब्जाने की नजीर है।इसकी चर्चा एकेडेमिक्स कभी नही करना चाहते है।
24 अप्रेल 1973 की तारीख को इस केस में निर्णय हुआ।68 दिन जिरह हुई। इंदिरा सरकार ने एड़ी चोटी का जोर लगाया लेकिन वह सुप्रीम कोर्ट में शिकस्त खा गई।भारत के न्यायिक इतिहास में पहली बार 13 जजों की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। 7-6 के बहुमत से निर्णय हुआ कि संसद को संविधान संशोधन का अधिकार तो है लेकिन “आधारभूत सरंचना”बेसिक स्ट्रक्चर से छेड़छाड़ नही की जा सकती है।संवैधानिक सर्वोच्चता,विधि का शासन,कोर्ट की अक्षुण्य आजादी,संसदीय शासन,निष्पक्ष संसदीय चुनाव,गणतन्त्रीय ढांचा,सम्प्रभुता आधारभूत ढांचे में परिभाषित किये गए।इनमें किसी भी प्रकार के संशोधन निषिद्ध कर दिये गए।
13जजों की पीठ में 7 जज फैसले के पक्ष में थे इनमें मुख्य न्यायाधीश एस एम सीकरी,के एस हेगड़े,एके मुखरेजा,जे एम शेलाट, एन एन ग्रोवर, पी जगनमोहन रेड्डी,और एच आर खन्ना।6 जज सरकार के साथ थे जस्टिस ए एन राय,डीजी पालेकर,के के मैथ्यू, एच एम बेग,एस एन द्विवेदी और वाय चन्द्रचूड़।
इस निर्णय से नाराज इंदिरा गांधी के दफ्तर से 25 अप्रेल 1973 को जस्टिस एन एन राय के घर फोन की घण्टी बजती है।क्या उन्हें नए सीजेआई का पद स्वीकार है? जबाब देने के लिए मोहलत मिली सिर्फ दो घण्टे की।
26 अप्रेल 1973 को जस्टिस ए एन राय को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया जाता है तीन सीनियर जज जस्टिस शेलट, ग्रोवर और हेगड़े को दरकिनार कर दिया गया।ये तीनों जज उन 7 जजों में थे जिन्होंने सरकार को असिमित संविधान संशोधन देने से असहमति व्यक्त की थी।क्या ऐसी परिस्थितियां आज मोदी सरकार ने निर्मित की है?
1975 में इंदिरा गांधी ने 39 वा औऱ 41वा संवैधानिक संशोधन कर कानून बनाया था कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति,प्रधानमंत्री,स्पीकर के चुनाव को कोर्ट में किसी भी आधार पर न चैलेंज किया जा सकता न कभी उन पर कोई मुकदमा दर्ज होगा।क्या यह संविधान को खूंटे पर टांगने जैसा नही था।हालाकि
केशवानंद केस के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों संशोधन को खारिज कर दिया था।1975 में एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला केस आपातकाल में मौलिक अधिकारों की बहाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा था।पांच जजों की पीठ ने 4-1के बहुमत से सरकार के पक्ष में निर्णय दिया।अकेले जस्टिस एच आर खन्ना ने सरकार से असहमत होते हुए निर्णय लिखा।
जस्टिस खन्ना सबसे सीनियर थे लेकिन इस निर्णय के चलते इंदिरा गांधी के निशाने पर आ गए ।उन्हें सुपरसीड करते हुए एम एच बेग को भारत का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया।
एच एम बेग केशवानंद केस में भी सरकार के साथ खड़े थे।इसलिए उन्हें भी जस्टिस राय की तरह स्वामी भक्ति का इनाम मिला।वहीं जस्टिस खन्ना उस केस में भी सरकार के विरूद्ध थे।इसलिए उन्हें सजा दी गई। क्या इन हरकतों से तब संविधान की सर्वोच्चता खण्डित नही हुई थी?
बेग 1978 तक सीजेआई रहे फिर 1981 से 1988 तक अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष और वहां से हटने के बाद कांग्रेस के मुखपत्र दैनिक हेराल्ड के संचालक बने।
बहरूल इस्लाम के किस्से तो सबको पता ही है कि उन्हें जब चाहा सांसद जब चाहा हाईकोर्ट जज जब चाहा सुप्रीम कोर्ट जज बना दिया गया।
2010 से 2014 के मध्य जस्टिस अरुण मिश्रा वरिष्ठतम हाईकोर्ट जज होने के बाबजूद सुप्रीम कोर्ट में नामित नही किये गए तब किसी ने इस मुद्दे को नही उठाया लेकिन उत्तराखंड हाईकोर्ट में पदस्थ जूनियर जज के एम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट में एलिवेट करने पर मोदी सरकार ने आपत्ति ली तब पूरे एकेडेमिक्स भूषण जैसे लोगों के साथ न्यायपालिका की आजादी का रुदाली रुदन बजाने लगे।ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि जोसेफ अल्पसंख्यकवाद के प्रतीक थे।ऐसे ही तमाम पापों से वाकिफ होने के लिए हमें
जस्टिस जगनमोहन रेड्डी की किताब “वी हैव रिपब्लिक” का अध्ययन करना चाहिये जिसमें
बताया गया है कि इंदिरा के कानून मंत्री रहे एच आर गोखले और इस्पात मंत्री कुमार मंगलम कैसे जजों को उस दौर में धमकाते थे।
कैसे अभिषेक मनु सिंघवी के शयन कक्ष से हाईकोर्ट जज निकलते है यह जप्त स्टिंग में आज भी रहस्य ही है। पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्रा बकायदा कांग्रेस के टिकट से राज्यसभा में विराजे।जबकि रंजन गोगोई तो नामित कोटे से सदस्य बने हैं। श्री मिश्रा के भतीजे तमाम आरोपों के बाद सीजेआई तक बनने में सफल रहे।
जस्टिस आफताब आलम और गुजरात दंगों की झूठी कहानियां गढ़ने वाली तीस्ता सीतलवाड़ की युगलबंदी न्यायिक इतिहास का शर्मनाक स्कैण्डल है। हिमाचल के पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह की बेटी जस्टिस अभिलाषा सिंह ने गुजरात हाईकोर्ट और आफताब आलम द्वारा सुप्रीम कोर्ट में गुजरात दंगों पर दिए निर्णय प्रतिबद्ध न्यायपालिका का बदनुमा उदाहरण है।
आतंकी अफजल की फांसी टालने के लिए भूषण एन्ड कम्पनी के आग्रह पर आधी रात को खुलता सुप्रीम कोर्ट सेक्युलर था,गुजरात दंगों,शोहरबुद्दीन,इशरत जहां,के मामलों में भी कोर्ट अच्छे थे क्योंकि निर्णय मोदी,अमित शाह के विरुद्ध और लिबरल गैंग के एजेंडे के अनुरूप थे।लेकिन मनमाकिफ़ निर्णय न होने पर कोर्ट पक्षपाती औऱ डरे हुए हो गए यह आम भारतीय भी अब समझ गया है।बहुमत के बल पर तानाशाही का एक भी उदाहरण मोदी सरकार के साथ नही जुड़ा है जबकि इंदिरा औऱ राजीव गांधी के कार्यकाल सामाजिक न्याय से जुड़े बीसियों न्यायिक निर्णयों को पलटने के रहे है।कमोबेश यही वातावरण चुनाव आयोग और ईवीएम को लेकर बनाया जाता रहा है ।हाल ही में दिग्विजयसिंह ने फिर कहा है कि 2024 में देश मे आखिरी चुनाव होंगे और यह भी ईवीएम के जरिये जीते जायेंगे इसके बाद भारत में कभी चुनाव नही होंगे।इस तरह की दलीलें केवल संसदीय आरोप प्रत्यारोप तक सीमित नही है बल्कि यह लोकतंत्र पर भी सीधा आघात है।
मीडिया का वह दौर याद किया जाना चाहिये जब गुजरात दंगों के बाद मोदी को भारतीय मीडिया ने एक खलनायक की तरह विश्व भर में स्थापित कर दिया था।आज भी भारत में मोदी और उनकी नीतियों के आलोचक स्वतन्त्रता के साथ अपनी बात कहते है।टेलीग्राफ,हिन्दू जैसे अखबार रोजाना मोदी की खिलाफत में खड़े रहते है।वर्चुअल स्पेस पर द वायर,प्रिंट,जनचौक,सत्याग्रह,क्विंट,क्लिक,कारंवा,तहलका,जैसे तमाम पोर्टल बेधड़क अपना मोदी विरोधी एजेंडा चला रहे है। आपातकाल का दंश देने वालों को इसके बाबजूद अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में नजर आती है तो इसके निहितार्थ हमें समझने होंगे।शाहीन बाग से लेकर जेएनयू,एमएमयू,जामिया में देश को तोड़ने तक की तकरीरें खुलेआम दी जाती है फिर भी भारत मे एक वर्ग को डर लगता है।इस गिरोह में दस वर्ष उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी जैसे लोग भी शामिल है ।सच तो यह है कि संवैधानिक संस्थाओं औऱ लोकतंत्र को जेबी बनाने के उपक्रम मोदी दौर से पहले बड़ी ही ठसक के साथ होतें रहे है।1975 का आपातकाल हो या 356 के जरिये संघीय ढांचे को खत्म करना।कांग्रेस और वामपंथ ने देश की जनभावनाओं का कभी ख्याल नही रखा।आज अभिव्यक्ति की चरम आजादी के माहौल में लिबरल्स ने अपने सुगठित एवं विस्तृत सूचना एवं प्रचार तन्त्र से ऐसा माहौल बनाने की कोशिशें की है जो मिथ्या,मनगढ़ंत औऱ फर्जी है।
सुखद पक्ष यह भी है कि देश की अधिसंख्य जनता आज भूषण सरीखे उदारवादियों के वास्तविक एजेंडे को समझ चुकी है।

भविष्य की चिन्ता : चिंतनीय अर्थव्यवस्था; विश्वमंदी का बहाना कब तक…!
ओमप्रकाश मेहता
राजनैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक क्षेत्रों से सम्बंधित फैसलों से राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर परर चाहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी की जय-जयकार हो रही हो, किंतु आर्थिक मोर्चे पर मोदी जी और उनकी सरकार हमेशा निशाने पर रही है। हाल ही में इस वर्ष (2020) की प्रथम तिमाही के जो आंकड़े सामने आए है, उन्होंने हमारे देश के लोगों को ही नहीं, हमारे हित चिंतक देशों की सरकारों को भी चिंता में डाल दिया है। हाल ही में इस वर्ष की प्रथम तिमाही (जनवरी से मार्च 2020) के जो जीडीपी दर की रिपोर्ट सामने आई है, वह अत्यंत चैंका देने वाली है, पिछले चैबीस सालों में, अर्थात इस नई सदी में पहली बार हमारी विकास दर पाताली स्तर अर्थात माईनस 23.9 प्रतिशत तक पहुंच गई और साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अभी भी हम नही चैते तो अगले वर्ष यह विकास दर लगभग ग्यारह फीसदी और गिर सकती है, अगले वित्त वर्ष का यह अनुमान पिछली बार के अनुमान से 4.1 फीसदी ज्यादा है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगले साल स्थिति और बत्तर होने का अनुुमान है, आशंका व्यक्त की जा ही है मौजूदा तिमाही (अप्रैल से जून 2020) में भी जीडीपी वृद्धि दर नकारात्मक रही तो देश भीषण मंदी की चपेट में आ जाएगा।
ऐसा कतई नहीं है कि सरकार को इस स्थिति की चिंता नही है, किंतु वह यह बहानेबाजी करके इस चिंता का भार कम कर रही है कि ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मंदी का दौर है, ऐसे में भारत उससे अछूता कैसे रह सकता है’’ क्या हमें अब हमारी अर्थव्यवस्था में सुधार के प्रयास भी दूसरे देशों का अनुकरण कर शुरू करना पड़ेगें? जबकि वास्तविकता यह है कि मौजूदा नरेन्द्र भाई मोदी की सरकार ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 खत्म कने, देश के अल्पसंख्यक परिवारों से तलाक प्रथा खत्म करने और अयोध्या राम मंदिर जैसे मसलों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखा और इन समस्याओं के समाधान किए जो राजनीति (370), तलाक खात्मा (सामाजिक) व अयोध्या राम मंदिर (धार्मिक) चेतनाओं से जुड़े थे। देश की आर्थिक स्थिति सुधारने को लेकर नोटबंदी जैसे प्रयास अवश्य किए गए, किंतु उनसे देश परेशान ही हुआ, उसे आर्थिक राहत हासिल नही हो पाई। यही स्थिति देश में बेरोजगारी की है। चुनावी घोषणा पत्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने प्रतिवर्ष एक करोड़ बेरोजगार युवकों को रोजगार देने की बात कही थी, जो अन्य चुनावी मुद्दों की तररह गंभीरता से पूररा करने की कोशिशें की जाती तो पिछले छः सालों में छः करोड़ युवा बेरोजगारों को रोजगार मिल जाता, किंतु आर्थिक क्षेत्र से जुड़ी इस अहम् समस्या पर भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया जिसके कारण देश में बेरोजगार शिक्षित युवाओं की संख्या दिन दूनी, रात चैगुनी बढ़ती ही जा रही है और सरकार अभी भी आर्थिक क्षेत्र के प्रतिपूरी तरह लापरवाही बरत रही है, इस सरकार की इसी लापरवाही के कारण हमारे देश के अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री सरकार के प्रति कई बार भीषण नाारजी व्यक्त कर चुके है। हमारे इन अर्थशास्त्रियों को सबसे बड़ी चिंता उन अनुुमानों को लेकर है, जिनमें कहा जा रहा है कि अगले वर्ष हमारी विकास दर मौजूदा मायनस दर से दस अंक और मायनस तक पहुंच जाएगी।
अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या अरूण जैटली जी के स्वर्ग सिधारने के बाद भाजपा के पास कोई ऐसा अर्थशास्त्री वित्तमंत्री नहीं रहा जिससे अर्थशास्त्र के सिद्धांतों का थोड़ा भी ज्ञान हो? या सरकार या उसके मुखिया स्वयं ही नहीं चाहते कि देश आर्थिक संकट से मुक्त हो?
देश में हर मोर्चे पर विजय प्राप्त करने वाली मौजूदा मोदी सरकार देश की जनता की रोजी रोटी से जुड़ी मंहगाई जैसी समस्याओं पर अपना ध्यान केन्द्रित क्यों नहीं कररर रही है? आज पूरे देश के लिए यही चिंता का विषय है, साथ ही देश का इस दिशा में भविष्य क्या होगा? इसे लेकर भी देश चिंतित है, क्या इस अहम् समस्या का हल किए बिना राम मंदिर या 370 जैसे मुद्दों पर यह सरकार ‘दीर्घजीवी’ रह सकती है?

नेतृत्व विहिन कांग्रेस कमजोर होती जा रही है
डॉ. भरत मिश्र प्राची
आजादी के बाद देश में सर्वाधिक शासन काल कांग्रेस का ही रहा है। इस दौरान इस पार्टी ने अनेक उतार चढ़ाव के दिन देखे है। इस पार्टी पर परिवारवाद का भी आरोप लगता रहा है, जिसमें एक ही परिवार के वर्चस्व की चर्चा प्रमुख रही है। इस पार्टी के साथ यह सच्चाई जमीनी धरातल से जुड़ चली है। जब – जब इस पार्टी का परिवेश आरोपित परिवारवाद की छाया से दूर होने का प्रयास किया, सफलता नहीं मिल पाई। इस संदर्भ में सीताराम केशरी, पी.वी. नरसिंहाराव के अध्यक्षीय नेतृृत्व कार्यकाल को देखा जा सकता है। जहां कांग्रेस बिखरने के कगार पर खड़ी सबसे कमजोर दिखाई देने लगी। इतिहास इस बात का साक्षी है कि राजीव गांधी की षणयंत्र के तहत असमय हुई मृृत्यु के उपरान्त दुःखी गांधी परिवार राजनीति से अपने आप को जब अलग करना चाहा, कांग्रेस के डुबते जनाधार के हालात से कांग्रेस को उबारने के लिये गांधी परिवार की ओर आई आश भरी दृष्टि ने उसे अलग नहीं होने दिया। श्रीमती सोनियां गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस फिर से हरी भरी हो गई। कांग्रेस का सर्वाधिक अध्यक्षीय कार्यकाल बिताते हुये सोनिया गांधी कांग्रेस को कुशल नेतृत्व देने में सफल सिद्ध भी हुई। अपने नेतृृत्व काल में आम चुनाव के दौरान कांग्रेस को अपार सफलता दिलाने के बाद विपक्ष द्वारा विदेशी होने के आरोप को खारिज करते हुए प्रधानमंत्री पद पर स्वंयं के बजाय मनमोहन सिंह का नाम प्रस्तावित कर सर्वशक्तिमान बन गई एवं एक दशक शासन भी किया पर आम चुनाव में हार उपरान्त जब केन्द्र में भाजपा की नई सरकार गठित हुई कांग्रेस के अन्दर अन्तःकलह भी शुरू हो गई फिर भी अभी हाल में हुये राज्यों के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को सफलता भी मिली एवं हिन्दी प्रदेश के तीन मुख्य भाजपा शासित राज्य राजस्थान, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ पर कांग्रेस को विजय मिली । वैसे फिलहाल आपसी टूट के चलते मध्यप्रदेश से कांग्रेस शासन से दूर हो गई जिसके लिये केन्द्रीय नेतृत्व को दोषी माना जा रहा है। इस तरह के हालात में कांग्रेस में गांधी परिवार की ही भूमिका सर्वोपरि नजर आ रही है। आज भी कांग्रेस इसी परिवार के इर्द गिर्द घूमती नजर आ रही है। जिसका ताजा उदाहरण अभी हाल में ही सोनियां गांधी के नेतृृत्व में आयोजित पार्टी की केन्द्रीय बैठक, में जहां कांग्रेस को मजबूत बनाने एवं अध्यक्ष फिर से राहुल गांधी को बनाये जाने की बात प्रमुख रही जब कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद छोड़ चुके है। बैठक में फिलहाल अध्यक्ष पद पर, आगामी चयन तक श्रीमती सोनिया गांधी को ही अंतरिम अध्यक्ष पद पर बने रहने का निर्णय लिया गया।
आजादी के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू से लेकर आज तक कांग्रेस इसी परिवार के इर्दगिर्द घूमती नजर आ रही है। इतिहास साक्षी इस बात का रहा है कि जब भी कांग्रेस इस परिवेश से बाहर निकलकर आई, जम नहीं पाई। अनियंत्रित नेतृत्व के चलते बिखरती गई। इस तरहकी स्थिति भले अलोकतांत्रिक मानी जा सकती जहां राजतंत्र की तरह परिवारवाद विराजमान हो पर कांग्रेस की यहीं संस्कृति बन चुकी है जहां गांधी परिवार के आलावे दूसरा उभर नहीं पाता। आज कांग्रेस की जो स्थिति है वह सभी के सामने है जहां अध्यक्षकी जगह अंतरिम अध्यक्ष कार्य कर रहा हो एवं जिसने अध्यक्ष पद त्याद दिया हो एवं अध्यक्ष बनने के लिये तैयार नहीं हो रहा हो उसे ही बार-बार अध्यक्ष बनाने की गुहार लगाई जा रही हो। इस तरह की स्थिति निश्चित रूप से कांग्रेस के बेहतर भविष्य के लिये ठीक नहीं है।
इस तरह के परिवेश में आज कांग्रेस चारों ओर से नेतृत्व विहिन नजर आ रही है। देश की सबसे बडी रही राजनीतिक पार्टी के पास अध्यक्ष की जगह अंतरिम अध्यक्ष कार्य करें तो आंतरिक मनोबल गिरना स्वाभाविक है। ऐसी क्या बात है कि इस पार्टी के पास गांधी परिवार को छोड़ और कोई नेतृत्व देने वाला नजर नहीं आता और जब कोई दूसरा इस परिवार से अलग होकर अध्यक्ष पद संभालता तो सफल नहीं हो पाता। इस तरह की स्थितियां कई बार उभर कर सामने आई जब कि इस पुरानी पार्टी के पास एक से बढ़कर एक राजनीतिक दिग्गज रहे जो अपमानित होकर अलग थलग पड़ गये। आज भी कोई मुखर होकर सामने नहीं आ रहा, । जो भी पार्टी में निर्णय होता है उसमें गांधी परिवार की ही भूमिका नजर आ रही। इस तरह का परिवेश लोकतंात्रिक पहल को कमजोर करता है। आज के परिवेश में कांग्रेस को इस तरह के पारिवारिक परिवेश से बाहर निकलकर पार्टीहित में काम करना होगा तभी कांग्रेस मजबूत हो सकेगी। आज कांग्रेस नेतृत्व विहिन होकर कमजोर होती जा रही है। जिसे पार्टी में लोकतंत्र बहाल कर फिर से इसे मजबूत किया जा सकता वरना पार्टी का अस्तित्व खतरे में ही पड़ा रहेगा।

डॉ. कफील खानः फिजूल गिरफ्तारी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर और न्यायाधीश सौमित्रदयाल सिंह को दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने डॉ. कफील खान के मामले में दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। सात महिने से जेल में पड़े डॉ. खान को उन्होंने तत्काल रिहा करने का आदेश दे दिया। डॉ. खान को इसलिए गिरफ्तार किया गया था कि उन्होंने 12 दिसंबर 2019 को अलीगढ़ मुस्लिम वि.वि. के गेट पर एक ‘उत्तेजक’ भाषण दे दिया था। उन पर आरोप यह था कि उन्होंने शाहीन बाग, दिल्ली में चल रहे नागरिकता कानून विरोधी आंदोलन का समर्थन करते हुए नफरत और हिंसा फैलाने का अपराध किया है। उन्हें पहले 19 जनवरी को मुंबई से गिरफ्तार किया गया और जब उन्होंने जमानत पर छूटने की कोशिश की तो उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत फिर से जेल में डाल दिया गया। यदि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इन दो जजों का यह साहसिक फैसला अभी नहीं आता तो पता नहीं कितने वर्षों तक डाॅ. कफील खान जेल में सड़ते रहते, क्योंकि रासुका के तहत दो बार उनकी नजरबंदी को बढ़ा दिया गया था। दोनों जजों ने डाॅ. खान के भाषण की ‘रिकार्डिंग’ को ध्यान से सुना और उन्होंने पाया कि वे तो हिंसा के बिल्कुल खिलाफ बोल रहे थे और राष्ट्रीय एकता की अपील कर रहे थे। यह ठीक है कि भारत सरकार द्वारा पड़ौसी देशों के शरणार्थियों को शरण देने के कानून में भेदभाव का वे उग्र विरोध कर रहे थे लेकिन उनका विरोध देश की शांति और एकता के लिए किसी भी प्रकार से खतरनाक नहीं था। जिला-जज और प्रांतीय सरकार ने डाॅ. खान के भाषण को ध्यान से नहीं सुना और उसका मनमाना अर्थ लगा लिया। अपनी मनमानी के आधार पर किसी को भी नजरबंद करना और उसको जमानत नहीं देना गैर-कानूनी है। यह ठीक है कि डाॅ. खान के भाषण के कुछ वाक्यों को अलग करके आप सुनेंगे तो वे आपको एतराज के लायक लग सकते हैं लेकिन कोई भी कानूनी कदम उठाते समय आपको पूरे भाषण और उसकी भावना को ध्यान में रखना जरुरी है। इलाहाबाद न्यायालय का यह फैसला उन सब लोगों की मदद करेगा, जिन्हें देशद्रोह के फर्जी आरोप लगाकर जेलों में सड़ाया जाता है। इस फैसले से न्यायापालिका की प्रतिष्ठा भी बढ़ती है और यह आरोप भी गलत सिद्ध होता है कि सरकार ने न्यायपालिका को अपना जी-हुजूर बना लिया है। डाॅ. कफील खान ने जो सात महिने फिजूल में जेल काटी, उसका हर्जाना भी यदि अदालत वसूल करवाती तो इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना गिरफ्तारियां काफी हतोत्साहित होतीं।

कब सुधरेगी कांग्रेस पार्टी
रमेश सर्राफ धमोरा
कांग्रेस कार्यसमिति की बहुप्रतीक्षित बैठक संपन्न हो चुकी है। बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को आगे भी अध्यक्ष पद पर काम करते रहने का प्रस्ताव पारित किया जा चुका हैं। कांग्रेस कार्यसमिति पार्टी में सर्वोच्च नीति निर्धारण समिति मानी जाती है। इस समिति में लिया गया निर्णय अंतिम होता है। अब सोनिया गांधी आगे भी कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में कार्य करती रहेगी।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कांग्रेस कार्यसमिति की अध्यक्ष व उनके साथ पार्टी के 21 अन्य वरिष्ठ नेता सदस्य हैं। कांग्रेस कार्यसमिति सदस्यों में पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी व पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पार्टी के लोकसभा में नेता अधीर रंजन चैधरी, पार्टी कोषाध्यक्ष अहमद पटेल, पार्टी महासचिव व राज्यसभा में पार्टी के नेता गुलाम नबी आजाद, उप नेता आनंद शर्मा, पार्टी के महासचिव (प्रशासन) मोतीलाल वोरा, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री एके एंटोनी, पार्टी महासचिव अंबिका सोनी, आसाम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री व पार्टी महासचिव ओमान चांडी, पार्टी महासचिव मलिकार्जुन खड़गे, गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री व पार्टी महासचिव लुईजिन्हो फलेरो, पार्टी महासचिव व उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, पार्टी महासचिव मुकुल वासनिक, पार्टी के महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल, छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू, राजस्थान के पूर्व मंत्री रघुवीर मीणा एवं मणिपुर के पूर्व उपमुख्यमंत्री गईखंगम गंगमेई सदस्य के तौर पर शामिल है। इसके अलावा कार्यसमिति में 15 स्थाई आमंत्रित व 11 विशेष आमंत्रित सदस्य भी शामिल है।
कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल सोनिया गांधी, राहुल गांधी व अधीर रंजन चौधरी ही लोकसभा के सदस्य हैं। मनमोहन सिंह, अहमद पटेल, एके एंटोनी, अंबिका सोनी, आनंद शर्मा, गुलाम नबी आजाद, केसी वेणुगोपाल, मलिकार्जुन खड़गे राज्यसभा के सदस्य हैं। कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल मनमोहन सिंह, मोतीलाल वोरा, तरुण गोगोई, एके एंटोनी 80 साल से अधिक की उम्र पार कर चुके हैं। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, अहमद पटेल, अंबिका सोनी, गुलाम नबी आजाद, हरीश रावत, मलिकार्जुन खड़गे, ओमन चांडी, ताम्रध्वज साहू, गईखंगम गंगमेई 70 साल से अधिक की उम्र के हैं। आनंद शर्मा 67 वर्ष, लुईजिन्हो फलेरो 69 साल के हो चुके हैं। अधीर रंजन चैधरी 64 वर्ष, मुकुल वासनिक 61 वर्ष, रघुवीर मीणा 61 वर्ष के हैं। राहुल गांधी 50 वर्ष, अजय माकन 56 वर्ष, केसी वेणुगोपाल 57 वर्ष व प्रियंका गांधी 48 वर्ष की उम्र की कार्यसमिति सदस्य हैं।
इस तरह देखा जाए तो कांग्रेस के कार्यसमिति के ज्यादातर सदस्यो की उम्र अधिक होने के कारण वे ज्यादा भागदौड़, मेहनत नहीं कर पाते हैं। कांग्रेस कार्यसमिति में जमीनी आधार वाले नेता भी नहीं है। सोनिया गांधी राहुल गांधी व अधीर रंजन चैधरी ही लोकसभा सदस्य है। कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल कई नेताओं का तो राज्यसभा में लगातार चैथा, पांचवा, छठा कार्यकाल चल रहा है। कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, अंबिका सोनी, आनंद शर्मा तो कभी लोकसभा चुनाव जीत ही नही सकें। ये हर बार राज्यसभा के रास्ते ही संसद में आते रहे हैं। कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली कोषाध्यक्ष अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद, मोतीलाल वोरा, मुकुल वासनिक, एके एंटोनी को भी चुनाव लड़े जमाना बीत गया है।
हाल ही में कांग्रेस के महासचिव बनाए गए अजय माकन नई दिल्ली से पिछले दो लोकसभा चुनाव हार चुके हैं। अजय माकन के दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहते चुनावों में कांग्रेस जीरो पर आउट हो गयी थी। इस बार उन्हें पार्टी ने विधानसभा का चुनाव लड़ने को कहा था। मगर बीमारी का बहाना कर वह चुनाव लड़ने से कन्नी काट गए थे। यही हाल मुकुल वासनिक का भी है। 2014 में लोकसभा का चुनाव भारी मतों से हार गए थे। 2019 में तो उन्होंने हार के डर से चुनाव ही नहीं लड़ा था। महाराष्ट्र में उनकी परम्परागत रामटेक सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी किशोर उत्तमराव गजभैया शिवसेना के कृपाल तुम्हाने से चुनाव हार गये थे।
कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणु गोपाल ने भी केरल की अपनी परंपरागत अलाप्पुझा लोकसभा सीट से इस बार चुनाव नहीं लड़ा। उनके स्थान पर कांग्रेस की टिकट पर लड़ने वाले कांग्रेस प्रत्याशी सनीमोल उस्मान माकपा के एएम आरिफ से चुनाव हार गये थे। केसी वेणुगोपाल राजस्थान से राज्यसभा सदस्य बन चुके हैं। कांग्रेस कार्यसमिति सदस्य रघुवीर मीणा भी राजस्थान के उदयपुर सीट से लगातार दो बार लोकसभा चुनाव हार चुके हैं। उन्हें राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से निकटता के चलते कांग्रेस कार्यसमिति सदस्य बनाया गया था।
कांग्रेस महासचिव व कार्यसमिति सदस्य हरीश रावत उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहते खुद दो सीटो पर विधानसभा चुनाव लड़कर हार गए थे। अब प्रदेश में उनका भी जनाधार कमजोर हो गया है। इसी के चलते उनको प्रदेश की राजनीति से दूर कर दिया गया है। मोतीलाल वोरा 93 साल की उम्र में भी महासचिव बने हुए हैं। एक जमाने में बोरा मुख्यमंत्री, राज्यपाल, केंद्रीय मंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके हैं। लेकिन चुनाव लड़े उन्हें भी जमाना बीत चुका है। कांग्रेस महासचिव मलिकार्जुन खड़गे 2014 से 2019 तक लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता रह चुके हैं। मगर वो पिछला लोकसभा चुनाव हार गए थे। पिछले महीने उनको कर्नाटक से राज्यसभा में लाया गया है। गांधी परिवार से निकटता के चलते उनको गुलाम नबी आजाद के स्थान पर राज्यसभा में पार्टी का नेता बनाया जा सकता है। प्रियंका गांधी के उत्तर प्रदेश की प्रभारी महासचिव रहते लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को अपने परंपरागत अमेठी सीट से हार का मुंह देखना पड़ा था।
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक से पूर्व ही पार्टी के 23 बड़े नेताओं ने पार्टी का स्थाई अध्यक्ष बनाने की मांग को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र लिखा था। जिसको लेकर कांग्रेस पार्टी में आंतरिक गुटबाजी चरम पर है। पत्र लिखने वालों में कांग्रेस कार्यसमिति सदस्य गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, मुकुल वासनिक शामिल है। इस पत्र पर हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा, पंजाब की पूर्व मुख्यमंत्री राजेंद्र कौर भट्ठल, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एम वीरप्पा मोइली, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान, लोकसभा सदस्य मनीष तिवारी, शशि थरूर, राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल, विवेक तन्खा, पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर, अरविंदर सिंह लवली, कौल सिंह ठाकुर, मिलिंद देवड़ा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री रेणुका चौधरी, जितिन प्रसाद, पीजे कुरियन, हरियाणा विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष कुलदीप शर्मा, दिल्ली विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष योगानंद शास्त्री, पूर्व सांसद संदीप दीक्षित, अजय सिंह, अखिलेश प्रताप सिंह के भी हस्ताक्षर है।
कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की बहाली को लेकर पत्र लिखने पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी नाराजगी व्यक्त कर चुके है। कांग्रेस के बड़े नेता इन 23 नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कह रहे हैं। वही गुलाम नबी आजाद अपनी बात पर डटे हुए हैं तथा बार-बार कह रहे हैं कि हमारा उद्देश्य पार्टी को मजबूत करना है। हम चाहते हैं कि पार्टी में बड़े पदों के लिए सीधे चुनाव हो तथा चुने हुए लोग ही संगठन के पदाधिकारी बने। इससे पार्टी और अधिक मजबूत होगी।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं द्वारा लिखे गए पत्र के बहाने कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी खुलकर सामने आ गई है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को अब जनाधार वाले युवा नेताओं को संगठन में जिम्मेदारी सौंपनी चाहिये। वर्षों से संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर काबिज राज्यसभा के रास्ते सांसद बनने वाले नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियों से मुक्त करना चाहिये। ताकि आने वाले समय में कांग्रेस पार्टी मजबूत होकर उभर सके। यदि आने वाले समय में कांग्रेस पार्टी के संगठन में आमूलचूल परिवर्तन नहीं किया जाता है तो कांग्रेस पार्टी के लिए अपना मौजूदा जनाधार भी बरकरार रख पाना मुश्किल होगा।

तानाशाही और सोनिया गांधी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अब फिर देश को बासी कढ़ी परोस दी। मां ने बेटे को भी मात कर दिया। छत्तीसगढ़ विधानसभा के नए भवन के भूमिपूजन समारोह में बोलते हुए वे कह गईं कि देश में ‘गरीब-विरोधी’ और ‘देश-विरोधी’ शक्तियों का बोलबाला बढ़ गया है। ये शक्तियां देश में तानाशाही और नफरत फैला रही हैं। देश में अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है।
ये सब बातें वे और उनका सुपुत्र कई बार दोहरा चुके हैं लेकिन इन पर कोई भी ध्यान नहीं देता। यहां तक कि कांग्रेसी लोग भी इनकी मज़ाक उड़ाते हैं। वे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के उत्तम कामों तक अपना भाषण सीमित रखतीं तो बेहतर होता। जहां तक तानाशाही की बात है, वह तो आपात्काल के दौरान इंदिरा गांधी भी स्थापित नहीं कर पाई थीं। उन्हें और उनके बेटे संजय गांधी को भारतीय जनता ने 1977 के चुनाव में फूंक मारकर सूखे पत्ते की तरह उड़ा दिया था। उन्हें आज नाम लेने में डर लगता है लेकिन वह कहना यह चाहती हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तानाशाह है और भाजपा अब भारतीय तानाशाही पार्टी (भातपा) बन गई है। उनका यह आशय क्या तथ्यात्मक है ? इस पर हम जरा विचार करें। आज भी देश में अखबार और टीवी चैनल पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। जो जान-बूझकर खुशामद और चापलूसी करना चाहें, सरकार उनका स्वागत जरुर करेगी (सभी सरकारें करती हैं) लेकिन देश में मेरे-जैसे दर्जनों बुद्धिजीवी और पत्रकार हैं, जो जरुरत होने पर मोदी और सरकार की दो-टूक आलोचना करने से नहीं चूकते लेकिन किसी की हिम्मत नहीं है कि उन्हें कोई जरा टोक भी सके। जहां तक तानाशाही का सवाल है, वह देश में नहीं है, पार्टियों में है। एकाध पार्टी को छोड़कर सभी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र का अंत हो चुका है लेकिन सोनियाजी ज़रा पीछे मुड़कर देखें तो उन्हें पता चलेगा कि उसकी शुरुआत उनकी सासू मां इंदिराजी ही ने की थी। कांग्रेस का यह ‘वाइरस’ भारत की सभी पार्टियों को निगल चुका है। कांग्रेस की देखादेखी हर प्रांत में पार्टियों के नाम पर कई ‘प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां’ खड़ी हो गई हैं। यदि सोनिया गांधी कुछ हिम्मत करें और कांग्रेस-पार्टी में लोकतंत्र ले आएं तो भारत के लोकतंत्र के हाथ बहुत मजबूत हो जाएंगे और उनका नाम भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। सोनियाजी की हिंदी मुझे खुश करती है। यह अच्छा हुआ कि उनके भाषण-लेखक ने सरकार के लिए ‘गरीबद्रोही’ और ‘देशद्रोही’ शब्द का प्रयोग नहीं किया।

जातीय नहीं, शैक्षणिक आरक्षण दें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर जातीय आरक्षण के औचित्य पर प्रश्न-चिन्ह लगा दिया है। पांच जजों की इस पीठ ने अपनी ही अदालत द्वारा 2004 में दिए गए उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है, जिसमें कहा गया था कि आरक्षण के अंदर (किसी खास समूह को) आरक्षण देना अनुचित है याने आरक्षण सबको एकसार दिया जाए। उसमें किसी भी जाति को कम या किसी को ज्यादा न दिया जाए। सभी आरक्षित समान हैं, यह सिद्धांत अभी तक चला आ रहा है। ताजा फैसले में भी वह अभी तक रद्द नहीं हुआ है, क्योंकि उसका समर्थन पांच जजों की बेंच ने किया था। अब यदि सात जजों की बेंच उसे रद्द करेगी तो ही आरक्षण की नई व्यवस्था को सरकार लागू करेगी। यदि यह व्यवस्था लागू हो गई तो पिछड़ों और अनुसूचितों में जो जातियां अधिक वंचित, अधिक उपेक्षित, अधिक गरीब हैं, उन्हें आरक्षण में प्राथमिकता मिलेगी। लेकिन मेरा मानना है कि सरकारी नौकरियों में से जातीय आरक्षण पूरी तरह से खत्म किया जाना चाहिए। अब से 60-65 साल पहले और विश्वनाथप्रताप सिंह के जमाने तक मेरे-जैसे लोग आरक्षण के कट्टर समर्थक थे। डाॅ. लोहिया के साथ मिलकर हम अपने छात्र-जीवन में नारे लगाते थे कि ‘पिछड़े पाएं सौ में साठ’ लेकिन जातीय आरक्षण के फलस्वरुप मुट्टीभर लोगों ने सरकारी ओहदों पर कब्जा कर लिया। उन्होंने अपनी नई जाति खड़ी कर ली। उसे अदालत ने ‘क्रीमी लेयर’ जरुर कहा लेकिन उस पर रोक नहीं लगाई। ये आरक्षण जन्म के आधार पर दिए जा रहे हैं, जरुरत के आधार पर नहीं। इसकी वजह से सरकार में अयोग्यता और पक्षपात को प्रश्रय मिलता है और करोड़ों वंचित लोग अपने नारकीय जीवन से उबर नहीं पाते हैं। यदि हम देश के 60-70 करोड़ लोगों को समाज में बराबरी के मौके और दर्जे देना चाहते हों तो हमें शिक्षा में 60-70 प्रतिशत आरक्षण बिना जातीय भेदभाव के कर देना चाहिए। जो भी गरीब, वंचित, उपेक्षित परिवारों के बच्चे हों, उन्हें मुफ्त शिक्षा, मुफ्त भोजन, मुफ्त वस्त्र और मुफ्त निवास की सुविधाएं दी जानी चाहिए। देखिए, ये बच्चे हमारी तथाकथित ऊंची जातियों के बच्चों से भी आगे निकलते हैं या नहीं ?

कांग्रेस में नेतृत्व संकट
सिद्धार्थ शंकर
कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर जारी घमासान का निपटारा करने की ठान चुके पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कार्यसमिति की बैठक के बाद दूसरी बार गुलाम नबी आजाद से फोन पर बात की। राहुल गांधी ने आजाद को दिलासा दिया कि उनकी चिंताओं का निपटारा किया जाएगा और जल्द से जल्द पार्टी के नए अध्यक्ष का चुनाव किया जाएगा। यही नहीं राहुल ने आजाद से कहा, संगठन के अन्य चुनाव भी बहुत जल्द कराए जाएंगे। पार्टी को उन्हें लेकर कोई दुर्भावना नहीं है। वहीं आजाद ने कहा, मेरा उद्देश्य गांधी परिवार को चुनौती देना या निरादर करना नहीं है। मैं बस पार्टी को और मजबूत करना चाहता हूं। राहुल ने कार्यसमिति की बैठक में हुए विवाद के बाद भी एक बार कपिल सिब्बल और आजाद से फोन पर बात की थी। इससे साफ है कि पूर्व अध्यक्ष पार्टी के भीतर जारी घमासान को शांत करने की हर कोशिश कर रहे हैं। मगर सवाल यह भी है कि क्या अगले कुछ महीने में गांधी परिवार से इतर संगठन की कमान देने के लिए किसी नेता की तलाश हो पाएगी? कार्यसमिति की हंगामेदार बैठक के बाद सियासी गलियारे में इसी सवाल का जवाब ढूंढा जा रहा है। हालांकि पार्टी का इतिहास बताता है कि गांधी परिवार की छाया से मुक्त किसी नेता के लिए संगठन की जिम्मेदारी संभालना आसान नहीं होगा। परिवार से बाहर जब भी किसी व्यक्ति को अध्यक्ष पद मिला है तो वह कांटों का ताज ही साबित हुआ है। आजादी के बाद 72 सालों में 37 साल पार्टी की कमान नेहरू-गांधी परिवार के पास ही रही। परिवार के इतर जितने भी अध्यक्ष बने उनमें परिवार के विश्वासपात्र ही काम कर पाए। बाकी को या तो समय से पहले पद छोडऩा पड़ा या कुछ ने बगावत का रास्ता अख्तियार किया। साल 1947 में जीवटराम भगवानदास कृपलानी कांग्रेस अध्यक्ष बने। पहले पीएम जवाहरलाल नेहरू से मतभेद के कारण कृपलानी सालभर के अंदर ही उन्हें पद हटना पड़ा। उनकी जगह नेहरू के करीबी पट्टाभि सीतारमैय्या को संगठन की कमान मिली। साल 1950 में नेहरू के विरोध के बावजूद वल्लभभाई पटेल के समर्थन से पुरुषोत्तम दास टंडन अध्यक्ष बने। पटेल के निधन के बाद नेहरू से मतभेदों के कारण टंडन को कुर्सी छोडऩी पड़ी। इसके बाद तीन सालों तक नेहरू खुद संगठन के साथ सरकार की कमान संभालते रहे। फिर नेहरू के करीबी यूएन ढेबर चार साल के लिए अध्यक्ष बने और उनके बाद इंदिरा गांधी ने संगठन की कमान संभाली। इंदिरा के बाद नीलम संजीव रेड्डी और के कामराज अध्यक्ष बने। कामराज के अध्यक्ष रहते नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाया गया। इस दौरान इंदिरा का कामराज और एस निजलिंगप्पा से तीखा विवाद हुआ और पार्टी दो हिस्सों में बंट गई। कुछ वर्षों तक पार्टी की कमान खुद इंदिरा ने भी संभाली। साल 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने और अध्यक्ष पद की भी जिम्मेदारी संभाली। साल 1984 के अंत से 1991 में आतंकी हमले में निधन तक राजीव ही संगठन के मुखिया थे। राजीव की हत्या लोकसभा चुनाव के दौरान हुई थी। चुनाव के बाद पीवी नरसिंह राव पीएम बने और संगठन के भी मुखिया रहे। कुछ अरसे बाद में संगठन की कमान सीताराम केसरी को दी गई। इंदिरा के बाद पहली बार सरकार और संगठन दोनों का शीर्ष पद ऐसे व्यक्तियों के पास था जो गांधी परिवार की छाया से बाहर था। हालांकि इसी दौरान राव विरोधियों ने सोनिया गांधी की राजनीति में एंट्री कराई और केसरी की अध्यक्ष पद से नाटकीय विदाई हुई। केसरी के बाद पार्टी की कमान फिर से गांधी परिवार में आई और सोनिया अध्यक्ष बनीं। सोनिया 2017 में अध्यक्ष पद से हटीं तो संगठन की कमान राहुल गांधी को दी गई। वहीं, 2019 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद राहुल ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। तब से सोनिया अंतरिम अध्यक्ष हैं। कांग्रेस के सामने यक्ष प्रश्न यही है कि सोनिया के बाद कौन? पार्टी का एक धड़ा चाहता है कि संगठन गांधी परिवार की छाया से मुक्त हो। कार्यसमिति की बैठक के बाद जनवरी महीने तक नया अध्यक्ष चुनने की घोषणा की गई है। ऐसे में सवाल यह है कि अगला अध्यक्ष परिवार से होगा या हमेशा की तरह परिवार का करीबी होगा। मौजूदा समय में गांधी परिवार नेहरू-इंदिरा-राजीव की तरह ताकतवर नहीं है। सरकार से बाहर से छह साल से ज्यादा हो चुके हैं। संगठन में भी परिवार की पकड़ कमजोर हो गई है। ऐसे में परिवार से इतर अध्यक्ष बनने की संभावना है। हालांकि सवाल यही है कि क्या गांधी परिवार इसके लिए दिल बड़ा करेगा? और अगर अध्यक्ष गांधी परिवार का यस मैन ही हुआ तो क्या पार्टी का दूसरा धड़ा स्वीकार करेगा?

क्या कांग्रेस वर्तमान चुनौतियों का मुकाबला करने को तैयार है
डॉ. सुनीलम
जो उम्मीद थी,वही हुआ। कांग्रेस कमेटी ने अंतरिम अध्य्क्ष सोनिया गांधी में आस्था प्रकट की तथा उन्हे सभी कार्यों के लिए अधिकृत कर दिया ।
बैठक के संबंध में जो जानकारी मीडिया से प्राप्त हुई है उससे पता चलता है कि कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं जिन्होंने चिट्ठी लिखी थी, उन्हें विद्रोही माना गया ,कुछ ने भा ज पा एजेंट बताकर उन पर कार्यवाही की मांग भी की। जबकि चिट्ठी में वफादारी स्पष्ट और रेखांकित कर दी गई थी। यह सब समझ में आता है लेकिन स्वयं राहुल जी का यह कथन की चिट्ठी ऐसे समय लिखी गई जब सोनिया जी बीमार थी । क्या राहुल जी यह मानते हैं कि जब अध्यक्ष बीमार हो तब संगठन पर कोई चर्चा नहीं होनी चाहिए? मुझे लगता है कि ऐसे समय में जब अध्यक्ष बीमार हैं तब उन्हें अत्यधिक काम के दबाव से मुक्त करना पार्टी के वरिष्ठ साथियों का कार्य होना चाहिए। सोनिया गांधी जी से देश यह जरूर जानना चाहेगा है कि कांग्रेस पार्टी में अंदरूनी मामले को लेकर चिट्ठी लिखना अपराध क्यों माना जा रहा है? होना तो यह चाहिए था कि जो मुद्दे पत्र में उठाए गए थे उन मुद्दों पर चर्चा की जानी चाहिए थी परंतु चाटुकारों ने चिट्ठी लिखने वालों पर ही हमला बोल दिया। किसी भी पार्टी के संगठनात्मक बदलाव के लिए इस तरह की संस्कृति को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए । हालांकि यह सच है कि देश में इस समय अधिकतर पार्टी ऐसी है जिनमें चिट्ठी लिखने वालों का यही हश्र होता है । इसे पार्टियों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की बानगी कहा जा सकता है ,जो अत्याधिक दुखद है ।
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस में कभी लोकतंत्र नहीं रहा ।जब गांधी जी कांग्रेस के सर्वोच्च नेता थे तब उनकी बिना इच्छा के और सही कहा जाए तो उनके विरोध के बावजूद सुभाष चंद्र बोस चुनाव जीतकर कांग्रेस अध्यक्ष बने थे । जवाहरलाल जी की भी इच्छा के विपरीत भी अध्यक्ष चुने जाने का इतिहास है।
चिट्ठी को लेकर एक बात यह भी कही जा रही है कि चिट्ठी तब लिखी जाती है जब मिलना संभव ना हो। कोरोना काल में मुलाकात ना होना समझ में आता है, परंतु यदि तीनों में से किसी से भी इन वरिष्ठ नेताओं की बात हो गई होती तो स्थिति यह नहीं बनती। यह आरोप कोई नया नहीं है। विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री भी नहीं मिल पाते यह सर्वविदित है परंतु यह स्थिति अन्य पार्टियों की भी है। मुझे तेलंगाना के एक मंत्री ने बताया था कि उनके मुख्यमंत्री महीनों तक अपने मंत्रियों को मिलने का समय नहीं देते।
सत्ता में जब पार्टी रहती है तो यह चोचलेबाजी चल जाती है, लेकिन विपक्ष में रहते हुए नेता की जिम्मेदारी अपनी पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं, संपूर्ण विपक्ष के नेताओं के साथ-साथ आम नागरिकों से मिलने की भी रहती है। हालांकि सभी जानते हैं कि सुरक्षा की दृष्टि से नेहरू परिवार अत्यंत संवेदनशील है।
नेहरू परिवार से बाहर का अध्यक्ष बनाने का यह
मजबूत तर्क हो सकता है । कम से कम वह मुलाकात तथा विचार परामर्श के लिए सब को उपलब्ध हो सकता है। भले ही रबर स्टाम्प के तौर पर काम करे।
कांग्रेस कमेटी की बैठक में होना तो यह था कि देश के वर्तमान संकट की परिस्थिति में कांग्रेस पार्टी को क्या कुछ करना चाहिए ?इस पर चर्चा होनी चाहिए थी। कोरोना काल का कुप्रबंधन, देश में 32% तक पहुंची बेरोजगारी, चरमराती आर्थिक स्थिति, सरकार द्वारा 44 श्रम कानूनों का खात्मा , किसानों के खिलाफ तीन अध्यादेश, विद्युत संशोधन विधेयक, देश की सार्वजनिक संपत्ति को कारपोरेट को सौंपने के फैसले, लोकतांत्रिक संस्थाओं एवं लोकतांत्रिक अधिकारों का खात्मा, शिक्षा का कार्पोरेटिकरण आदि ऐसे मुद्दे हैं जिन पर देश अपेक्षा करता था कि कांग्रेस कमेटी चर्चा करेगी तथा देश के सामने अपनी समझ प्रस्तुत करने के साथ-साथ सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करने के कार्यक्रमों की घोषणा करेगी । लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस कमेटी की बैठक ने देश को निराश किया है।
जब राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बयान आए थे कि वे चाहते है कि उनके परिवार से बाहर का व्यक्ति अध्यक्ष बने। तब उनसे अपेक्षा की जाती थी कि वे जिन नेताओं को अध्यक्ष के तौर पर कांग्रेस की बागडोर संभालने की क्षमता रखने वाला नेता मानते हैं। उनके नाम प्रस्तावित करते ।कांग्रेस पार्टी में अनुभवी नेताओं की कोई कमी नहीं है। मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे विपक्षी दल के नेता रहे कई नेता दक्षिण भारत में हैं । परंतु भाई बहन ने नए अध्यक्ष के संबंध में कोई ठोस सुझाव नहीं दिया। अगर दोनों ने कांग्रेस कमेटी की बैठक में कुछ प्रस्ताव रख दिए होते तथा कांग्रेस कमेटी ने सोनिया गांधी जी पर यह जिम्मेदारी छोड़ दी होती कि वे इन नेताओं में कोई एक का नाम तय कर दें तो भी बैठक की सार्थकता समझी जा सकती थी। सोनिया जी को मदद करने के लिए कुछ सदस्यों की समिति भी बनाई जा सकती थी, लेकिन इतना भी नहीं हुआ। इससे क्या नतीजा निकाला जाए कि भाई-बहन की घोषणा केवल दिखावे के लिए थी ?
मैं ऐसा नहीं मानता। मुझे यह लगता है कि दोनों मन से चाहते हैं कि कांग्रेस पर से परिवारवाद का धब्बा हटे लेकिन सोनिया गांधी को घेर कर रखने वाला कॉकस उनके किसी भी प्रयास को षडयंत्र पूर्वक विफल कर देता है । इस तरह की स्थिति जब कांग्रेस के अंदर पहले बनी थी तब इंदिरा गांधी खुलकर निकल पड़ी थीं ।जबकि उनके पास उस समय सोनिया जी से कम अनुभव था । प्रियंका जी में बहुत से कांग्रेसी इंदिरा गांधी की छवि देखते हैं । लेकिन उनमें बाहर की चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत तो दिखलाई पड़ती है लेकिन लगता है दोनों के अंदर संगठन के भीतर कॉकस की चुनौतियों का सामना करने की ना तो हिम्मत है , ना ही आत्मविश्वास।
कांग्रेस के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वह 135 वर्षों के अनुभव के बाद अपनी नीतियों में बदलाव करने को तैयार है या नहीं? यह सर्वविदित है कि कांग्रेस ने ही 1992 के बाद देश पर उदारीकरण निजीकरण और वैश्वीकरण थोपने का काम किया है। जिसे बुलेट ट्रेन की स्पीड से आगे बढ़ाते हुए मोदी- अमित शाह की जोड़ी कार्पोरेटीकरण और निजीकरण के रास्ते पर चलकर सब कुछ अडानी अंबानी को सौंपते जा रही है। कांग्रेस को अपनी आर्थिक नीतियों को स्पष्ट तौर पर देश के सामने रखने की जरूरत है। वह कल्याणकारी राज्य तथा सार्वजनिक संस्थानों के साथ खड़ी है यह स्पष्ट करने की जरूरत है। सीएए, एनआरसी, एनपीआर को लेकर भी कांग्रेस का नजरिया स्पष्ट नहीं है । देश में विरोध स्वरूप जो 500 स्थानों पर शाहीन बाग चल रहे थे उनमें से 50 स्थानों पर मुझे समाजवादी विचार यात्रा के दौरान जाने का अवसर मिला। कहीं पर भी कांग्रेस खुलकर मैदान में नहीं दिखी। बाबरी मस्जिद विध्वंस तथा राम मंदिर निर्माण तक कांग्रेस की वैचारिक स्पष्टता दिखलाई नहीं दी।
कश्मीर में भले ही कांग्रेस आज नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के साथ खड़ी हो लेकिन कश्मीर में 5 अगस्त के पूर्व की स्थिति को बहाल करने के मुद्दे पर कांग्रेस की स्थिति स्पष्ट नहीं है।
कांग्रेस को यह भी स्पष्ट करने की जरूरत है कि वह विपक्षी एकता के साथ है तथा पूर्व में केंद्र में बनी गैर भाजपा की विपक्ष की सरकारों को गिराने को वह अब अपनी गलती मानती है । इसी तरह 1984 के सिख्खों के नरसंहार, पंजाब में स्वर्ण मंदिर में की गई कार्यवाही तथा मुलताई जैसे पुलिस गोली चालन पर देश से माफी मांगने के लिए तैयार है।
देश में आज स्थिति यह है कि कांग्रेस खुद को बचाने, बनाने और मजबूत करने में जितना प्रयास कर रही है। (अगर कर रही हो तो) उससे कहीं ज्यादा प्रयास कांग्रेस के बाहर उसके समर्थकों और शुभ चिंतकों के द्वारा किया जा रहा है उसके बावजूद ऐसे सभी लोगों के साथ कांग्रेस नेतृत्व ने संवाद का कोई स्थाई तंत्र विकसित नहीं किया है
। मुझे पिछले कुछ वर्षों में सोनिया जी, राहुल जी और प्रियंका जी से मिलने वाले कांग्रेसियों ने बतलाया कि वे जब भी कभी उन तीनों से मिलते हैं तो वे पार्टी में शामिल होने का प्रस्ताव रखते हैं तथा वैचारिक मुद्दों पर सहमति बतलाते हुए कहते हैं कि हम तो इन मुद्दों पर कांग्रेस की नीतियों में परिवर्तन के लिए तैयार है लेकिन कांग्रेस अभी तैयार नहीं है। जिससे यह पता चलता है कि नेहरू परिवार की कांग्रेस पर पकड़ ऐसी नहीं है कि वह नीति के मामले में अपनी इच्छा अनुसार परिवर्तन कर सके।
इस स्थिति को पार्टी के भीतर बदलना नेहरू परिवार के लिए एक बड़ी चुनौती है।
कांग्रेस को संपूर्ण विपक्ष के साथ एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम खुद तय करने की जरूरत है इसके इर्द-गिर्द मोदी सरकार के खिलाफ देश में जनमत बनाया जा सके।
कांग्रेस बदलना चाहती है इसका आभास कई बार राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बयानों से होता है। हाल ही में प्रशांत भूषण के मुद्दे पर कांग्रेस द्वारा खुलकर समर्थन करने से यह पता चलता है कि कांग्रेस बदलना चाहती है।
खैर, अब यह कहा जा रहा है कि अगले 6 महीने में कांग्रेस कमेटी का अधिवेशन होगा तथा आने वाली किसी बैठक में नया अध्यक्ष चुन लिया जाएगा । इसलिए फिलहाल इंतजार के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता।
लेकिन यह स्थिति दुखद है क्योंकि आने वाले दो-तीन महीने में देश में तमाम उपचुनाव तो होने ही है, बिहार राज्य का चुनाव भी होना है। ऐसे समय में यदि कांग्रेस पार्टी नए अध्यक्ष के साथ पूरे जोशो खरोश के साथ मैदान में उतरती तथा संपूर्ण विपक्ष का साथ लेती तो कांग्रेस की स्थिति में सुधार हो सकता था। यदि कांग्रेस पार्टी एकजुट होकर मध्य प्रदेश के उपचुनाव में नए अध्यक्ष के नेतृत्व में उतरती तो कांग्रेस सरकार की वापसी भी संभव हो सकती थी लेकिन शायद कांग्रेस अभी आत्मचिंतन ,आत्ममंथन और आत्मविश्लेषण में डूबी हुई है।

प्रशांत भूषण को सजा मिलनी ही चाहिए और वे स्वीकार भी करें !
श्रवण गर्ग
प्रशांत भूषण को अगर कोई सजा मिलती है तो उसका स्वागत किया जाए या नहीं ? उन्हें जिस अवमानना का दोषी पाया गया है उसमें अधिकतम छह माह की क़ैद या जुर्माना या दोनों की सजा दी जा सकती है। यहाँ विषय क़ैद की अवधि अथवा जुर्माने की राशि का नहीं बल्कि अवमानना के मामले में किसी भी छोटी या बड़ी सजा के इतिहास में दर्ज होने और उस पर देश और दुनिया के नागरिकों की ओर से होने वाली प्रतिक्रिया का है।प्रशांत भूषण को सर्वोच्च न्यायालय ने विचार करने के लिए जो दो-तीन दिन का समय दिया था वह रविवार रात को समाप्त हो जाएगा।प्रशांत भूषण को अपने किए के प्रति न तो किसी प्रकार का पश्चाताप है और न ही सजा को लेकर वे किसी भी तरह के दया भाव की अपेक्षा कर रहे हैं।सवाल अब यह है कि नागरिकों की इस पर किस तरह की प्रतिक्रिया है या होनी चाहिए ?
देश के स्वतंत्रता दिवस के ठीक एक दिन पहले यानि कि चौदह अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय की तीन-सदस्यीय खंडपीठ द्वारा भूषण को उनके दो ट्वीट्स के लिए अवमानना का दोषी ठहराए जाने के बाद सजा का वे तमाम नागरिक निश्चित ही स्वागत करना चाहेंगे, जो न्यायपालिका की गरिमा को हर क़ीमत पर बनाए रखने के पक्षधर हैं,और उनके साथ वे लोग भी जो अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के कारण भूषण जैसे लोगों के प्रति द्वेष का भाव रखते हैं।इनमें दोनों ही प्रमुख दलों के लोग भी शामिल माने जा सकते हैं।इन लोगों का मानना हो सकता है कि सजा के बाद न्यायपालिका जैसी संस्थाओं के प्रति अवमाननाओं के ‘दुस्साहस’ की घटनाओं में कमी आ जाएगी।
दूसरी ओर ,इस बात में कोई आश्चर्य नहीं व्यक्त किया जाना चाहिए कि वे तमाम नागरिक भी ,जो संख्या में कम होते हुए भी भूषण जैसे गिने-चुने लोगों के समय-समय पर व्यक्त होने वाले अप्रतिम ‘साहस’ और विचारों के साथ आत्मीय भाव से जुड़े हुए हैं ,अगर यही चाहते हों कि सार्वजनिक जीवन में शुचिता के लिए अहिंसक संघर्ष में लगे इस व्यक्ति को प्राप्त होने वाली सजा एक पुरस्कार मानकर सम्मानपूर्वक स्वीकार कर लेना चाहिए।पर इस दूसरी तरह की ‘अल्पसंख्यक ‘जमात के इस तरह की कामना करने के कारण पहली तरह के नागरिकों से सर्वथा भिन्न हैं।
ये दूसरी तरह के नागरिक या तो संख्या में अब बहुत ही कम बचे हैं या फिर उन लोगों के ही वैचारिक उत्तराधिकारी हैं जो 25 जून 1975 की शाम दिल्ली के ऐतिहासिक राम लीला मैदान में उपस्थित थे और तिहत्तर-वर्षीय जयप्रकाश नारायण को उसी आवाज़ में बोलता हुआ सुन रहे थे जो वर्ष 1922 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के कंठ से उपजी थी।जे पी के साथ तब मंच पर मोरारजी देसाई के अलावा नानाजी देशमुख, मदन लाल खुराना और अन्य कई राष्ट्रीय नेता उपस्थित थे।इन सब लोगों को तब कोई अनुमान नहीं था कि कुछ ही घंटों के बाद और रात के ख़त्म होने के पहले देश की तक़दीर बदलने वाली है।
जयप्रकाश नारायण तब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ए एन रे से अपील कर रहे थे कि उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ इंदिरा गांधी की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई नहीं करना चाहिए।’वे ऐसा इसलिए नहीं कह रहे हैं कि उनकी निष्पक्षता के प्रति कोई अविश्वास है बल्कि इसलिए कि सरकार द्वारा अन्य तीन जजों की वरीयता को लांघकर उनका उक्त पद के लिए चयन किया गया है।अतः लोगों के मन में शंकाएँ उत्पन्न हो सकतीं हैं।’जे पी ने अस्सी मिनट के इसी उद्बोधन में अपने उस कथन को भी दोहराया कि पुलिस ,सेना के जवानों और सरकारी सेवकों को सरकार के ‘अवैध और अनैतिक’ आदेशों का पालन नहीं करना चाहिए।राम लीला मैदान पर उपस्थित हुए इस क्षण का साक्षी बनना किसी के लिए भी गौरव की बात हो सकती थी।मेरे लिए भी थी।
अपने ‘यंग इंडिया‘अख़बार में ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ़ आलेख प्रकाशित करने के आरोप में मार्च 1922 में तब केवल तिरपन-वर्षीय महात्मा गांधी को अहमदाबाद स्थित उनके साबरमती आश्रम से गिरफ़्तार कर लिया गया था।उन पर आरोप लगाया गया कि वे क़ानून के द्वारा स्थापित सरकार के ख़िलाफ़ घृणा उत्पन्न करने अथवा अवमानना या असंतोष फैलाने का प्रयास कर रहे हैं।अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को स्वीकार करते हुए महात्मा गांधी ने कहा था कि वे अदालत से दया की प्रार्थना नहीं करना चाहते हैं ।वे किसी कम कठोर सजा की माँग भी नहीं करते हैं।वे यहाँ जो भी कठोरतम दंड हो सकता है उसे प्रसन्नतापूर्वक अपने उस कार्य के परिणामस्वरूप स्वीकार करने के लिए उपस्थित हैं जिसे क़ानून जान बूझकर किया गया अपराध मानता है और वे किसी भी नागरिक का सर्वोच्च कर्तव्य समझते हैं।(चौंसठ-वर्षीय प्रशांत भूषण ने भी अपने उत्तर में ऐसा ही कुछ उद्धृत किया है।)
अंग्रेज जज सी एन ब्रूफफ़िल्ड ने तब गांधीजी को छह वर्षों के कारावास की सजा तो दी थी पर साथ ही यह भी जोड़ा था कि भारत में कभी घटनाचक्र इस तरह से बने और सरकार के लिए ऐसा सम्भव हो कि सजा की अवधि को कम करके आपको रिहा किया जा सके तो ‘मेरे से अधिक कोई और व्यक्ति प्रसन्न नहीं होगा।’
मानहानि के कारण आहत भावनाओं को लेकर सजा के समर्थक नागरिकों से भिन्न जो तबका है वह जानता है कि प्रशांत भूषण का वास्तविक इरादा उस संविधानिक संस्था की अवमानना का क़तई हो ही नहीं सकता जिसकी वाणी के साथ करोड़ों मूक लोगों का भविष्य बंधा हुआ है।उनका क्षोभ तो उन निहित स्वार्थों के प्रति है जो समस्त प्रजातांत्रिक संस्थानों के चेहरों को एक विशेष क़िस्म की वैचारिक व्यवस्था और राष्ट्रवाद की परतों से ढाँकना चाहते हैं।प्रशांत भूषण द्वारा स्वीकार की जाने वाली सजा लोगों के मन से सविनय प्रतिकार के फलस्वरूप प्राप्त हो सकने वाले दंडात्मक पुरस्कार के प्रति भय को ही कम करेगी।जैसे महामारी पर नियंत्रण के लिए उसके संक्रमण की चैन को तोड़ना ज़रूरी हो गया है उसी प्रकार लोकतंत्र पर बढ़ते प्रहारों को रोकने के लिए नागरिकों के मौन की लगातार लम्बी होती शृंखला को तोड़ना भी आवश्यक हो गया है।अतः इस कठिन समय में प्रशांत भूषण की उपस्थिति का एक आवश्यक उपलब्धि के रूप में स्वागत किया जाना चाहिए।

पाकिस्तान का उलट-पैंतरा
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
संयुक्तराष्ट्र संघ में पाकिस्तान के दूत मुनीर अकरम ने एक ऐसा पैंतरा मारा है, जिसे देखकर उन पर तरस आता है। उन्होंने पाकिस्तान की इमरान सरकार की भद्द पीट कर रख दी है। अकरम ने दावा किया है कि उन्होंने सुरक्षा परिषद में भाषण देकर ‘भारतीय आतंकवाद’ की निंदा की है। अकरम से कोई पूछे कि सुरक्षा परिषद में आपको घुसने किसने दिया ? 15 सदस्यी सुरक्षा परिषद का पाकिस्तान सदस्य है ही नहीं। गैर-सदस्य उसकी बैठक में जा ही नहीं सकता। संयुक्तराष्ट्र के महासचिव ने एक बैठक बुलाई थी, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के बारे में। इस बैठक का एक फोटो जर्मन दूतावास ने जारी किया है, जिसमें पाकिस्तान का प्रतिनिधि कहीं नहीं है। फिर भी पाकिस्तानी दूतावास ने जो बयान जारी किया है, वह झूठों का ऐसा पुलिंदा है, जिस पर खुद पाकिस्तानी लोग विश्वास नहीं करते। पहला, अकरम ने दावा किया है कि अल-क़ायदा गिरोह का खात्मा और उसामा बिन लादेन का सफाया पाकिस्तान ने किया है। सबको पता है कि उसामा को अमेरिका ने मारा था और इमरान उसे ‘शहीद उसामा’ कहते रहे हैं। दूसरा, यह भी मनगढ़ंत गप्प है कि भारत ने कुछ आतंकवादियों को भाड़े पर ले रखा है, जो पाकिस्तान में हिंसा फैला रहे हैं। सच्चाई तो यह है पाकिस्तान अपने आतंकवादियों से भारत से भी ज्यादा तंग है। खुद इमरान ने पिछले साल संयुक्तराष्ट्र महासभा के अपने भाषण में कहा था कि उनके देश में 40 से 50 हजार दहशतगर्द सक्रिय हैं। तीसरा, पाकिस्तान ने अपनी नीति को भारत की नीति बता दिया। भारत सीमा-पार आतंकवाद क्यों फैलाएगा। चौथा, 1267 प्रस्ताव की प्रतिबंधित आतंकवादियों की सूची में भारतीयों के नाम भी हैं, यह सरासर झूठ है। उसमें एक भी भारतीय का नाम नहीं है। पांचवां, अकरम का यह कहना भी गलत है कि भारत में अल्पसंख्यकों का जीना हराम है। वास्तव में 1947 में पाकिस्तान में 23 प्रतिशत अल्पसंख्यक थे जबकि अब 3 प्रतिशत रह गए हैं। भारत में अल्पसंख्यक लोग कई बार राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, राज्यपाल और मुख्यमंत्री तक बने हैं। मुनीर अकरम ने भारत के विरुद्ध ये बेबुनियाद आरोप लगाकर इमरान सरकार की जगहंसाई करवा दी है। प्रधानमंत्री इमरान खान को चाहिए कि वे मुनीर अकरम को इस्लामाबाद बुलाकर डांट पिलाएं। इन्हीं गैर-जिम्मेदाराना बयानों के कारण इस्लामी देशों में भी पाकिस्तान की साख गिरती जा रही है।

राजस्थान में अभी पायलट का दांव बाकी है
डॉ नीलम महेंद्र
राजस्थान प्रदेश प्रभारी के पद पर अविनाश पांडे की जगह अजय माकन की ताज़ा नियुक्ति इस बात का संकेत है कि राजस्थान की राजनीति में अभी बहुत कुछ बाकी है। सचिन पायलट और अशोक गहलोत की हाथ मिलाती तस्वीरों से भले ही यह संदेश देने की कोशिश की गई हो कि सब कुछ सामान्य हो गया है लेकिन अजय माकन के प्रदेश प्रभारी के पद की नियुक्ति उन तस्वीरों को धुंधला कर रही है। अजय माकन की ताज़ा नियुक्ति इस बात की ओर इशारा कर रही है कि राजस्थान का राजनैतिक संकट खत्म नहीं हुआ है बस कुछ समय के लिए टल गया है। क्योंकि यह केवल तजुर्बे और युवा जोश की लड़ाई नहीं है,यह अहम का टकराव है अस्तित्व का संघर्ष है। दरअसल पहले कर्नाटक और फिर मध्यप्रदेश में कांग्रेस के हाथ आई हुई सत्ता फिसलने के बाद राजस्थान कांग्रेस के लिए काफी अहम बन चुका था। गहलोत और पायलट की आपसी खींचतान की कीमत इस बार कांग्रेस आलाकमान चुकाने के लिए तैयार नहीं थी। इसलिए उसने मध्यप्रदेश में अपनी गलती से सबक सीखा। जिस संवादहीनता और संवेदनशून्यता को ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने का सबसे बड़ा कारण माना गया उसे सचिन पायलट के संदर्भ में कारण नहीं बनने दिया गया। लेकिन जिस तरह के कदम पायलट द्वारा उठाए गए और उनके प्रतिउत्तर में जिस प्रकार के बयान गहलोत द्वारा दिए गए उससे राजस्थान में कांग्रेस की स्थिति वाकई में दो मुँही तलवार पर चलने जैसी हो गई थी। क्योंकि गहलोत पीछे हटने को तैयार नहीं थे और पायलट सब्र करने के लिए। नतीजन आत्मविश्वास से भरे अनुभवी गहलोत ने सरकार बचाने के लिए आक्रमक होने का फैसला लिया। उन्होंने पायलट को चारों तरफ से घेर लिया। उनके द्वारा लगातार सचिन पायलट पर पर्सनल अटैक करके उनके स्वाभिमान पर चोट की जा रही थी। ऐसी स्थिति में पायलट को कांग्रेस में रोके रखना कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती थी। क्योंकि स्थिति वहाँ तक पहुंच गई थी जहाँ राज्य के स्पेशल ऑपेरशन ग्रुप द्वारा पायलट को नोटिस भेजा जाता है। गहलोत के खेमे के विधायकों को एक होटल में ठहराया जाता है जहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता। विधायकों से कोई भी बाहरी व्यक्ति किसी भी प्रकार संपर्क न कर पाए इसके लिए उस होटल में जैमर्स तक लगाए जाते हैं। विधायकों की खरीद फरोख्त की एफआईआर दर्ज करवाई जाती है। पायलट पर भाजपा के साथ मिलकर सरकार गिराने की साजिश रचने का आरोप लगाया जाता है। इसकी शिकायत करते हुए गहलोत द्वारा प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी जाती है। इतना सब होने के बाद भी अगर आज सचिन पायलट कांग्रेस में हैं और गहलोत सरकार को अभयदान प्राप्त हो जाता है तो कांग्रेस बधाई की पात्र तो है लेकिन इसका श्रेय उसे अकेले नहीं दिया जा सकता। दरअसल कई बार कमजोर प्रतिद्वंद्वी भी जीत का कारण बन जाता है। राजस्थान में भी कुछ ऐसा ही हुआ राजस्थान में भाजपा अपनी आपसी फूट के चलते कांग्रेस की फूट का वैसा फायदा नहीं उठा पाई जैसा उसने मध्यप्रदेश में उठाया। यहाँ यह बात भी गौर करने लायक है कि भले ही सचिन पायलट की सिंधिया की ही तरह भाजपा में शामिल होने की अटकलें लगाई जा रही थीं लेकिन दोनों की परिस्थितियों में बहुत फर्क था। यह भी शायद राजस्थान के मामले में कांग्रेस के पक्ष में बाज़ी जाने का एक प्रमुख कारण कहा जा सकता है। क्योंकि जहाँ सिंधिया की पारिवारिक पृष्टभूमि में भाजपा शामिल रही है, राजमाता विजयाराजे सिंधिया जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थीं और आज भी वो भाजपा में अटलबिहारी के समकक्ष कद रखती हैं। उनकी बुआ यशोधरा और वसुंधरा भाजपा की वरिष्ठ नेत्री हैं। वहीं सचिन पायलट का भाजपा से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं रहा है। बल्कि यदि यह कहा जाए कि भाजपा विरोध की उनकी पृष्ठभूमि रही है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि उनकी पत्नी कश्मीर में भाजपा की विरोधी नेशनल कॉन्फ़्रेंस के नेता फारूख अब्दुल्ला की बेटी और उमर अब्दुल्ला की बहन हैं। ये दोनों ही जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद नज़रबंद कर दिए गए थे और जिन पर पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट भी लगाया गया था। यही वजह थी कि जहाँ एक ओर सिंधिया ने धारा 370 पर कांग्रेस में रहते हुए पार्टी लाइन के विपरीत मोदी सरकार के फैसले का स्वागत किया था, वहीं पायलट ने हालांकि धारा 370 पर कोई बयान नहीं दिया था लेकिन फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला की नजरबंदी पर सवाल उठाए थे। ऐसे में पायलट की भाजपा में एंट्री सिंधिया जितनी सहज नहीं थीं। लेकिन कहते है कि राजनीति में ना कोई मित्र होता है ना कोई शत्रु। समय और परिस्थितियां सब समीकरण बदल देते हैं। हो सकता है कि जो समीकरण आज की परिस्थितियों में नहीं बन पाए वो समय के साथ कल बन जाए क्योंकि राजनीति में असंभव कुछ भी नहीं होता। क्योंकि अब ऐसी खबरें आ रही हैं कि गहलोत सरकार को अभयदान के बाद अब पायलट अपने विधायकों के लिए एक डिप्टी सीएम समेत सरकार में पांच पदों की मांग कर रहे हैं। स्पष्ट है कि इस राजनैतिक ड्रामे का अभी अंत नहीं मध्यांतर हुआ है। राजस्थान की राजनीति में अभी बहुत कुछ शेष है। पिक्चर अभी बाकी है।

हिंदी में बोलने पर सजा ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आयुष मंत्रालय के सचिव राजेश कोटेचा ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है। द्रमुक की नेता कनिमोझी ने मांग की है कि सरकार उन्हें तुरंत मुअत्तिल करे, क्योंकि उन्होंने कहा था कि जो उनका भाषण हिंदी में नहीं सुनना चाहे, वह बाहर चला जाए। वे देश के आयुर्वेदिक वैद्यों और प्राकृतिक चिकित्सकों को संबोधित कर रहे थे। इस सरकारी कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों के 300 लोग भाग ले रहे थे। उनमें 40 तमिलनाडु से थे। जाहिर है कि तमिलनाडु में हिंदी-विरोधी आंदोलन इतने लंबे अर्से से चला आ रहा है कि तमिल लोग दूसरे प्रांतों के लोगों के मुकाबले हिंदी कम समझते हैं। यदि वे समझते हैं तो भी वे नहीं समझने का दिखावा करते हैं। ऐसे में क्या करना चाहिए ? कोटेचा को चाहिए था कि वे वहां किसी अनुवादक को अपने पास बिठा लेते। वह तमिल में अनुवाद करता चलता, जैसा कि संसद में होता है। दूसरा रास्ता यह था कि वे संक्षेप में अपनी बात अंग्रेजी में भी कह देते लेकिन उनका यह कहना कि जो उनका हिंदी भाषण नहीं सुनना चाहे, वह बाहर चला जाए, उचित नहीं है। यह सरकारी नीति के तो विरुद्ध है ही, मानवीय दृष्टि से भी यह ठीक नहीं है। महात्मा गांधी और डाॅ. राममनोहर लोहिया अंग्रेजी हटाओ आंदोलन के प्रणेता थे लेकिन गांधीजी और लोहियाजी क्रमशः ‘यंग इंडिया’ और ‘मेनकांइड’ पत्रिका अंग्रेजी में निकालते थे। उनके बाद इस आंदोलन को देश में मैंने चलाया लेकिन मैं जवाहरलाल नेहरु विवि और दिल्ली में विवि में जब व्याख्यान देता था तो मेरे कई विदेशी और तमिल छात्रों के लिए मुझे अंग्रेजी ही नहीं, रुसी और फारसी भाषा में भी बोलना पड़ता था। हमें अंग्रेजी भाषा का नहीं, उसके वर्चस्व का विरोध करना है। राजेश कोटेचा का हिंदी में बोलना इसलिए ठीक मालूम पड़ता है कि देश के ज्यादातर वैद्य हिंदी और संस्कृत भाषा समझते हैं लेकिन तमिलभाषियों के प्रति उनका रवैया थोड़ा व्यावहारिक होता तो बेहतर रहता। उनका यह कहना भी सही हो सकता है कि कुछ हुड़दंगियों ने फिजूल ही माहौल बिगाड़ने का काम किया लेकिन सरकारी अफसरों से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपनी मर्यादा का ध्यान रखें। यों भी कनिमोझी और तमिल वैद्यों को यह तो पता होगा कि कोटेचा हिंदीभाषी नहीं हैं। उन्हीं की तरह वे अहिंदीभाषी गुजराती हैं। उनको मुअत्तिल करने की मांग बिल्कुल बेतुकी है। यदि उनकी इस मांग को मान लिया जाए तो देश में पता नहीं किस-किस को मुअत्तिल होना पड़ेगा। कोटेचा ने कहा था कि मैं अंग्रेजी बढ़िया नहीं बोल पाता हूं, इसलिए मैं हिंदी में बोलूंगा। जब तक देश में अंग्रेजी की गुलामी जारी रहेगी, मुट्ठीभर भद्रलोक भारतीय भाषा-भाषियों को इसी तरह तंग करते रहेंगे। कनिमोझी जैसी महिला नेताओं को चाहिए कि वे रामास्वामी नाइकर, अन्नादुराई और करुणानिधि से थोड़ा आगे का रास्ता पकड़ें। तमिल को जरुर आगे बढ़ाएं लेकिन अंग्रेजी के मायामोह से मुक्त हो जाएं।

न्यायपालिका पर सवालिया निशान क्यों…..?
ओमप्रकाश मेहता
भारत प्रजातंत्र चार स्तंभों पर अवस्थित है- विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व अघोषित स्तंभ खबरपालिका। मूलत: प्रारंभिक तीन स्तंभों को लेकर ही स्वस्थ व चिरजीवी प्रजातंत्र की कल्पना की गई थी, किंतु पिछले सत्तर सालों में इनमें से दो स्तंभ विधायिका व कार्यपालिका अपने दायित्वों का निर्वहन निष्ठा व ईमानदारी से नहीं कर पाए, जिसके कारण भारतीय लोकतंत्र के निवासी भारतीयों की आशा विश्वास का केन्द्र न्यायपालिका ही बन गई और इस आशा विश्वास की न्यायपालिका ने ईमानदारी से रक्षा भी की, किंतु अब पिछले कुछ समय से न्यायपालिका के प्रति जो आस्था व विश्वास की मजबूत मीनार खड़ी थी, उसमें कई जगह दरार नजर आने लगी और अब वह दरार दिनों-दिन न सिर्फ चौड़ी होती जा रही है, बल्कि उसके कारण प्रजातंत्र के महल को खतरा भी नजर आने लगा है।
यद्यपि विधायिका के सदस्यों की तरह न्यायपालिका के न्यायाधीशों को भी नियुक्ति के समय ईमानदारी, निष्ठा व संविधान की शपथ दिलाई जाती है, किंतु अब धीरे-धीरे विधायिका व उसकी सहायक कार्यपालिका इतनी निरंकुश होती जा रही है कि उसने न सिर्फ स्वतंत्र न्यायपालिका को गलत तरीकों से प्रभावित करने की कोशिशें की, बल्कि कई बार इस स्तंभ पर भी अपना अधिकार जताने की कोशिशें की, जबकि हमारे संविधान में तीनों स्तंभों की पृथक-पृथक कार्यक्षेत्र सीमाएँ तय की गई है तथा प्रत्येक स्तंभ को कहा गया है कि वह दूसरे स्तंभ के क्षेत्र में हस्तक्षेप न करें, पिछले सत्तर सालों में सत्ताधीशों ने अपनी सुविधा के अनुरूप संविधान में सवा सौ से भी अधिक संशोधन कर दिए हो उन्हीं सत्ताधीशों ने हर समय न्यायपालिका की स्वंतत्रता पर कुठाराघात करने का भी प्रयास किया, यही नहीं संविधान की भावना के खिलाफ उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों को राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों पर नियुक्तियाँ देकर न्याय खरीदने की कोशिशें भी की गई और इसी कारण अब न्यायपालिका की निष्पक्षता विवादों के घेरे में आई, जिसका ताजा उदाहरण पीएम केयर्स फण्ड को लेकर ताजा फैसला और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम अधिवक्ता प्रशांत भूषण पर मानहानि का प्रकरण है। पीएम केयर्स फण्ड व प्रशांत भूषण द्वारा कथित मानहानि ये दोनों प्रकरण राजनीति के दायरें के है, जिन पर सुप्रीम कोर्ट का नजरिया साफ नजर आया है। पीएम केयर्स फण्ड वाले मामले के पीछे कांग्रेस सहित सभी प्रतिपक्षी दल है, तो प्रशांत भूषण के पीछे डेढ़ दर्जन सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश व तीन सौ के करीब देश के वरिष्ठ अधिवक्ता है, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट को एक पत्र सौंपा है।
अब जहां तक पीएम केयर्स फण्ड का सवाल है, प्रधानमंत्री जी ने 22 मार्च 2020 को इसकी स्थापना कर कोरोना पीड़ितों की सहायता के लिए इस कोष की स्थापना की, जिसे खर्च करने का पूर्ण दायित्व प्रधानमंत्री को सौंपा गया, इसका प्रतिपक्षी दलों ने विरोध किया व इसके खर्च करने का दायित्व एक विधिवत कमेटी गठित कर उसे सौंपने की मांग की। अर्थात्् प्रतिपक्षी की इस मांग के पीछे प्रधानमंत्री की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाना रहा होगा, मामला सुप्रीम कोर्ट में ले जाया गया और सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के पक्ष में फैसला सुना दिया। ऐसी ही कुछ चर्चा प्रशांत भूषण के मामले को लेकर है, क्योंकि प्रशांत भूषण जी कांग्रेस से जुड़े है।
यहाँ मेरा इरादा माननीय सुप्रीम कोर्ट व उसके माननीय न्यायाधीशों की कार्यप्रणाली पर कोई आक्षेप लगाना कतई नहीं है, किंतु यह तो एक कटु सत्य है कि देश की आवाम का विधायिका व कार्य पालिका की तरह अब न्यायपालिका से भी धीरे-धीरे विश्वास कम होता जा रहा है। इस पर समय रहते सभी पक्षों को गंभीर चिंतन कर दुरूस्त करने का व न्यायपालिका के प्रति पूर्ववत आस्था कायम करने के प्रयास करना चाहिए।

गति चाहे मंद, पर हौसले बुलन्द
ओमप्रकाश मेहता
भारत में अब तक के सबसे लम्बें गैर-कांग्रेसी राज के कीर्तिमान के बाद अब भाजपा पूरे प्रदेश का ‘चक्रवर्ती’ राजा बनने की ओर कदम बढ़ा रही है, फिलहाल उसके सामने तीन मुख्य राज्य है, जिनमें से वर्तमान में एक राज्य में समर्थित सरकार तथा एक राज्य में विरोधी दल की सरकार है, तीसरा राज्य वह है जहां कई महीनों से राष्ट्रपति शासन चल रहा है। जी हाँ, यहाँ चर्चा बिहार, पश्चिम बंगाल और जम्मू कश्मीर की चल रही है। बिहार में भाजपा की सहयोगी जदयू की सरकार है तो पश्चिम बंगाल में भाजपा की कट्टर विरोधी तृणमूल कांग्रेस (ममता) की सरकार है, जम्मू-कश्मीर में पिछले कई महीनों से राष्ट्रपति शासन चल रहा है। अब भाजपा की नजर फिलहाल इन तीनों राज्यों पर है, पश्चिम बंगाल में अगले साल के प्रारंभ में चुनाव होना है तो बिहार में इसी वर्ष के अंत तक। जबकि जम्मू-कश्मीर में केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा जब भी अपने अनुकूल परिस्थिति देखेगी, राष्ट्रपति शासन खत्म कर वहां के विधानसभा चुनाव करवा लेगी, वैसे अपने तौर पर भाजपा ने इसकी तैयारी शुरू कर दी है।
वैसे इन तीनों राज्यों में भाजपा के द्वारा जीत हासिल करना कतई सरल नहीं है, यह भाजपा अच्छी तरह जानती है, उसे यह पता है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने अनुकूल मौका देखकर कभी भी भाजपा को ‘लाल झण्डी’ दिखा सकते है, क्योंकि लालू यादव के जेल में होने के कारण अब उनके सामने कोई विशेष चुनौती शेष नही रह गई है। हाल ही में बिहार में आई प्रलयकारी बाढ़ से हुई क्षति की केन्द्र द्वारा पर्याप्त रूप से नहीं की गई पूर्ति से भी वे अन्र्तमन से नरेन्द्र मोदी से नाराज है, इसलिए जिस रोज वे अपने आपको राज्यस्तर की चुनौतियों से निपटने में सक्षम समझेगें वे भाजपा से पल्ला झाड़ लेगें।
अब जहाँ तक पश्चिम बंगाल का सवाल है, वहां तो भाजपा की कट्टर विरोधी की सरकार है, इसलिए वहां भाजपा को अपने उद्धेश्य की प्राप्ति हेतु ‘‘ऐड़ी से चैंटी’’ तक का जोर लगाना पड़ेगा, फिर चूंकि पश्चिम बंगाल गैर-हिन्दी भाषी प्रदेश है, इसलिए पार्टी के वरिष्ठ हिन्दी भाषी नेताओं को वहां प्रचार में भी काफी दिक्कत आने वाली है और पार्टी को पूरी तरह स्थानीय नेताओं पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। वहां भाजपा को कठिन अग्निपरीक्षा के दौर से गुजरना पड़ेगा, यदि पश्चिम बंगाल को भाजपा फतह कर लेती है तो फिर उसके लिए देश का कोई भी राज्य फलह करना मुश्किल नहीं होगा।
अब जहाँ तक जम्मू-कश्मीर का सवाल है, वहाँ भी भाजपा को फूंक-फूंक कर कदम रखना पड़ेगा, धारा-370 का खात्मा भाजपा के गले की हड्डी बन सकती है, क्योंकि इस धारा के हटा देने से जम्मू कश्मीरवासियों का विशेष दर्जा जो खत्म हो गया? फिर इस राज्य के स्थानीय दलों की पाक के साथ अंदरूनी सांठ-गांठ भी भाजपा को काफी कष्ट देने वाली है। यद्यपि पीडीपी नैत्री महबूबा मुफ्ती के साथ सरकार में रहकर भाजपा ने वहां की नब्ज अच्छी तरह जान ली है, किंतु जम्मू कश्मीर के स्थानीय नेताओं को जो लम्बे समय तक नजरबंद रखकर उनके सहयोगी समर्थकों से जो उन्हें दूर रखा गया, उसकी नाराजी भी वहां भाजपा को झेलनी ही पड़ेगी, सिर्फ अपनी पार्टी का वहां राज्यपाल तैनात कर देने से पार्टी का कोई भला होने वाला नहीं है, वहां स्थानीय लोकप्रिय नेताओं के साथ पाक के आतंकी भी भाजपा के लिए बहुत बड़े ‘सरदर्द’ है, जो आए दिन अपनी करतूतों से सबको आगाह कर रहे है, फिर पाक अधीकृत कश्मीर को भारत में शामिल करने के बारे में भी भाजपा व केन्द्र की कोई सार्थक पहल सामने नहीं आ पा रही है, जहाँ तक धारा-370 को हटाने का मसला है, केन्द्र के उस कदम से पूरा राष्ट्र चाहे खुश हो, किंतु जम्मू कश्मीरवासी खुश नहीं है, फिर वहां पाक के आतंकी जो भाजपा नेताओं व सरपंचों को आए दिन निशाने पर लेकर उनकी हत्याएँ कर रहे है, उससे प्रदेशवासियों में जहां भय की भावना व्याप्त हो गई है, वहीं भाजपा के स्थानीय नेता भी खुलकर काम नही कर पा रहे है। ये ही कुछ तथ्य है जो जम्मू कश्मीर की राजनीति को प्रभावित कर रहे है। इन राज्यों के अलावा भाजपा ने कुछ गैर भाजपा शासित मूलतः कांग्रसी राज्यों पर कब्जे की कोशिशें की, जिनमें से मध्यप्रदेश में तो वह सफल हो गई, किंतु राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब में वह सफल नही हो पाई। मतलब यह कि भाजपा साम-दाम-दण्ड-भेद सभी नीतियों का सहारा लेकर ‘चक्रवर्ती’ बनना चाहती है, अब देखिये उसे भविष्य में कहाँ क्या हासिल हो पाता है?

पीएम केयर्स फंड पर विवाद
सिद्धार्थ शंकर
भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए पहली बार लॉकडाउन शुरू होने के कुछ ही दिन बाद 27 मार्च को नरेंद्र मोदी ने पीएम केयर्स फंड का गठन किया। एक दिन के बाद पीएम मोदी ने सभी भारतीयों से इसमें दान देने की अपील की। मोदी ने ट्वीट पर कहा, मेरी सभी भारतीयों से अपील है कि वो पीएम केयर्स फंड में योगदान दें। उन्होंने यह भी कहा कि उनके डोनेशन से कोरोना के खिलाफ भारत की लड़ाई और मजबूत होगी और स्वस्थ्य भारत बनाने की दिशा में ये एक लंबा रास्ता तय करेगा। पीएम मोदी की अपील के बाद कई क्षेत्रों से डोनेशन आने शुरू हो गए। उद्योगपति, सेलिब्रिटीज, कंपनियां और आम आदमी ने भी इसमें अपना योगदान किया। एक सप्ताह के अंदर इस फंड में 65 अरब रुपए एकत्र हो गए। लेकिन पीएम केयर्स फंड शुरू से ही विवादों में भी रहा है। कई लोगों ने इस पर सवाल उठाया कि जब 1948 से ही पीएम नेशनल रिलीफ फंड (पीएमएनआरएफ) मौजूद है, तो नए फंड की क्या आवश्यकता थी। अब पीएम केयस फंड को लेकर उठ रहे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि इसका पैसा प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष या एनडीआरएफ में जमा करने की जरूरत नहीं है। दरअसल विवाद उस समय उठा जब जानकारी मिली कि इस फंड की जांच सीएजी नहीं कर सकता है। वहीं कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक अखबार की क्लिपिंग को शेयर करते हुए तंज कसते हुए कहा बेईमान का अधिकार। दरअसल अखबार की क्लिपिंग में दावा किया गया है कि पीएम केयर्स फंड के बारे में दी गई आरटीआई पर जानकारी देने से इंकार कर दिया गया है।
वहीं पीएम केयर्स फंड को लेकर उठे विवादों के बीच आधिकारिक वेबसाइट पर कुछ सवालों के जवाब दिए हैं जिसमें बताया गया है कि इसमें एकत्र हुए पैसे कितने हैं और इसका कहां-कहां इस्तेमाल किया गया है। साल 2019-20 के दौरान इस 3076.62 करोड़ रुपया एकत्र हुआ। विदेशी करेंसी के जरिए 39.68 लाख रुपया आया। 2000 करोड़ रुपए से भारत में बने 50 हजार वेटिंलेटर देश के सरकारी अस्पतालों में बांटे गए। एक हजार करोड़ रुपए प्रवासी मजदूरों पर खर्च किए गए और 100 करोड़ रुपए वैक्सीन बनाने के लिए दिए गए।
सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस इस मुद्दे को उठाकर सरकार को घेर नहीं पाई, सवाल यह है कि उसे इससे मिला क्या। अभी तक लोगों को यह नहीं पता था कि पीएम रिलीफ फंड की कमेटी में कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष भी एक सदस्य होता है। संविधान लागू होने से पहले ही 1948 में नेहरू जी ने मूल रूप से इस फंड की व्यवस्था पाकिस्तान से आने वाले हिंदू शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए की थी। आज की तरह उस वक्त भी टाटा परिवार ने देश की मदद में उदारता दिखाई थी इसलिए बतौर सदस्य टाटा घराने के सदस्य को भी इस कमेटी में रखा गया था। हालांकि पीएम रिलीफ फंड के दुरुपयोग का कोई प्रश्न कभी नहीं उठा है और इसके जरिए प्राकृतिक आपदा और बीमारी के वक्त नागरिकों को वाकई मदद उपलब्ध कराई गई है।
अब नए पीएम केयर फंड की बात करें तो यह स्पष्ट किया जा चुका है कि प्रधानमंत्री पदेन इस ट्रस्ट के अध्यक्ष होंगे उनके साथ रक्षा, गृह और वित्त मंत्री भी पदेन सदस्य होंगे। इनके अलावा समाजसेवा, वित्त, आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों के भी स्वतंत्र लोग इसके सदस्य नामित किए जाएंगे। कोई भी राजनीतिक व्यक्ति इस ट्रस्ट में नहीं होगा जैसा पीएम रिलीफ फंड में कांग्रेस अध्यक्ष को रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट में यह चुनौती दी गई थी कि केंद्र ने बगैर संसद की अनुमति के यह फंड शुरू कर दिया लेकिन मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने नाराजगी के साथ याचिकाकर्ता को फटकार लगाई कि यह कोई ऐसा फैसला नहीं है जिसकी अनुमति ली जाए। अब मोदी समर्थक यह प्रचार कर रहे हैं कि सोनिया गांधी की भूमिका खत्म होने से कांग्रेस पीएम केयर फंड को निशाने पर ले रही थी। जिस तरह अनावश्यक विवाद इस मुद्दे पर खड़ा किया गया उससे कांग्रेस और वामपंथी रक्षात्मक मुद्रा में हैं। बेहतर होता इस निर्णय का स्वागत किया जाता और भ्रष्टाचार पर मोदी को घेरने के स्थान पर विपक्षी नेता बीजेपी अध्यक्ष की तर्ज पर अपने सभी कार्यकर्ताओं से भी न्यूनतम 100 रुपए दान की अपील करते। इस मामले में मायावती ने जो लकीर खींची है वह उनकी परिपक्वता को साबित करती है। मायावती ने सरकार के हर निर्णय का स्वागत किया है। उन्होंने अपने सांसदों और विधायकों से भी 30 फीसदी कम वेतन लेने को और अन्य सहायता देने के निर्देश दिए हैं। वस्तुत: विपक्ष को यह अभी तक क्यों समझ नहीं आया है कि मोदी सार्वजनिक जीवन में एक बेदाग छवि रखते हैं, उनकी पारिवारिक विरक्ति की नजीर के आगे आजाद भारत का कोई भी नेता आज तक टिक नहीं पाया है। जाहिर है मोदी को निजी तौर पर जितना टारगेट किया जाएगा विपक्ष मुंह की खाता रहेगा।

सच बोलने का साहस
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
एक स्कूल में एक शिक्षक छात्रों को पढ़ा रहा था। उसने पढ़ाया कि गंगा नदी अमरकंटक से निकलती हैं। इस पर प्रधानाध्यापक ने गलत बताया तो शिक्षक ने कहा 500 रूपये में तो गंगा नदी ,अमरकंटक से निकलेगी ,पूरा वेतन मिलेगा तो हम गंगोत्री से निकालेगे।
जिस प्रकार संविधान के चार स्तम्भ होते हैं उसी प्रकार शिक्षा के भी चार स्तम्भ होते हैं। शिक्षक ,भवन ,छात्र और सुविधाएं। शिक्षक भी योग्य जगह से पढ़ा हो ,पढ़ाने कि रूचि हो ,लगातार पढ़ने वाला हो और नए नए प्रयोग करने वाला हो। इसी प्रकार भवन विस्तारित हो ,मनोकुल हो ,खुला हो और मैदान हो ,छात्र पढ़ने वाले हो ,रूचि वाले हो ,उनमे शिक्षा लेने की इच्छा हो और कुछ साधन सम्पन्न हो। सुविधाएं में उनके लिए प्रायोगिक व्यवस्था ,सुगमता से मिलने वाली,प्रचुरता में हो और समानता में हो।
वैसे शिक्षा सुविधा उपलब्ध कराना सरकार का काम होता हैं। इतिहास का अवलोकन करे तब पता चलता हैं कि राजाओं -,महाराजों ने शिक्षा ,स्वास्थ्य ,सड़क ,बिजली, पानी ,सुरक्षा, न्याय जैसे मौलिक सुविधाएँ दी हैं। भारत या इंडिया में भी यह भी सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। पर शिक्षा आदि में गुणवत्ता की कमी होने से उतना अधिक विकास नहीं हो पाया।
शिक्षा अंकुरण का कार्य करता हैं। अंकुरण का आधार बीज होता हैं। उसके बाद खेत ,उर्वरा शक्ति ,जल की उपलब्धता ,मौसम आदि के बाद जब तक फसल किसान के घर तक नहीं पहुँचती तब तक घटना /दुर्घटना की संभावना होती हैं। फसल आने के बाद किसान उसे विक्रय करता हैं। उस फसल का भाग्य कैसा होता हैं कोई नहीं जानता जैसे कोई दाना किसी सेठ के यहाँ जाता ,कोई किसी गरीब के यहाँ ,किसी से मिष्ठान बनना ,किसी से पूरी बनना ,किसी से परांठा ,किसी से रोटी और कोई रोटी जल जाती हैं और कोई सड़ जाती हैं। इसी प्रकार छात्र एक बीज के रूप में पाठशाला जाता हैं ,उसको पढ़ाने वाला कैसा हैं ,किस तरह पढ़ाता हैं ,किस विषय में रूचि पैदा करे और किस तरह छात्र का रुझान हो। जब तक नीव मजबूत नहीं होती तब तक मजबूत भवन खड़ा नहीं हो सकता।
नीव से ही विकास प्रक्रिया शुरू होती हैं। वर्तमान में शिक्षा व्यवसाय हो गया । पहले शिक्षा /विद्या दान माना जाता था। गुरुओं के प्रति सम्मान होता था। आज टीचर होने से उतना प्रभाव नहीं रहा। कोचिंग के कारण पढ़ाने वालों को एक नौकर के रूप में देखा जाता हैं। कारण छात्र पैसा देते हैं और वे पढ़ते हैं। कभी कभी कोई छात्र कक्षा में अनुपस्थित होने पर कोचिंग में पढ़ाने वाले कहते हैं की आप क्यों नहीं क्लास में उपस्थित क्यों नहीं होते ?तो छात्र कहता हैं श्रीमान आपको फीस दे दी गयी हैं बस उससे मतलब रखो। आना या न आना से कोई मतलब नहीं।
आज नीव बहुत खोखली हो चुकी हैं। स्कूलों में कोई सुधार नहीं ,संविदा वाले अपने भविष्य के प्रति चिंतित ,छात्रों का भविष्य अंधकारमय और महगी शिक्षा और गुणवत्ता विहीन। हमारे देश में जबरदस्ती का काम करना पड़ता हैं। वर्तमान में बेरोजगारी के कारण शिक्षक जो बी एस सी ,बी एड की जगह इंजीनियर ,एम् बी ए जैसे अयोग्य ,शिक्षा के लिए पढ़ा रहे हैं। आज इतिहास ,भूगोल ,नागरिक शास्त्र जो स्थानीय स्तर पर जरुरी हैं वह नहीं मालूम। आज यदि किसी पढ़े लिखे छात्र से पूछे गांव ,क़स्बा ,जिला, तहसील ,जनपद ,संभाग किसे कहते हैं ,किस जिले में कौन कौन सी नदी ,पहाड़ ,बाज़ार आदि हैं, तब वे मुँह ताकते हैं। प्रदेश और देश में कौन मुख्यमंत्री और प्रधान मंत्री होते हैं ,राज्यपाल किसे कहते हैं ,नामालूम में उत्तर।
आज ऊपरी सतह पर चमक हैं पर गुणवत्ता न होने से उसका सही उपयोग नहीं हो पा रहा हैं। वर्ष में कितने दिन पढाई होती पता नहीं, क्या पढाई होती नहीं मालूम। एक बार ग्रामीण स्तर के स्कूल में शिक्षक कक्षा में शयन कर रहे थे और सभी छात्र हल्ला- गुल्ला कर रहे थे। कुछ समय के बाद स्कूल निरीक्षक दौरे पर आये तो छात्र शांत हो गए तब शिक्षक की नींद खुली और निरीक्षक को देखा तो शिक्षक बोले”‘ बच्चो बताओं कुम्भकर्ण कैसे सोता था ?आदि आदि तब निरीक्षक ने टीप दी शिक्षक द्वारा प्रैक्टिकल बहुत अच्छा कराया जाता हैं।
इसी प्रकार एक गांव के सरपंच ने शिक्षक की शिकायत की की शिक्षक स्कूल में शराब पीता हैं। बहुत शिकायत होने पर जिला शिक्षा अधिकारी जाँच के लिए गए। सरपंच को बुलाया शिकायत के सम्बन्ध में, तब सरपंच बोले अब कोई शिकायत नहीं हैं ! पहले मास्टर साब अकेले पीते थे ,अब हम दोनों पीते हैं !इसी प्रकार कॉलेज /यूनिवर्सिटी स्तर पर प्रोफेसर, रीडर आदि अपना विषय न पढ़ा कर सब विषय पढ़ाते है। (संदर्भ — उपन्यास चार इमली )
भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं हैं ,कमी हैं इंडिया में। क्योकि इंडिया बोलने से अपनत्व भाव नहीं आते जितना गौरव भारत के बोलने में होता हैं। रहा सवाल विश्व गुरु बनने का तो हम कई क्षेत्रों में बन चुके ?जैसे राजनीती में ,भ्र्ष्टाचार में ,निक्कमेपन में ,बेरोजगारी ,आर्थिक मंदी,लाल फीताशाही ,ला (लाओ) और आदेश आदि आदि अनेक क्षेत्रों में प्रावीण्यता पा चूका हैं।
इस प्रकार संलग्न पत्र के आधार पर यह निश्चित हो चूका हैं की शिक्षा का स्तर से, हम किसी भी स्तर से कम नहीं हैं। और विश्व गुरु बनने से क्या होता हैं ?हम लोग तीन लोकों से ज्ञाता हैं ,त्रिकालज्ञ हैं। तैतीस करोड़ देवी देवता हैं जिस देश में ,उतनी तो हमारी आबादी १९४७ में थी। अब बढ़ गयी भगवन की कृपा से ,और अल्लाह के फज़ल से।
विश्व गुरु बनना कठिन और असाध्य नहीं हैं बशर्ते जब तक हमारे दिल दिमाग ,व्यवस्था में सुधार न हो। कोरे भाषणों से कुछ नहीं होगा धरातल पर हमें खरे उतरना होगा। खरा बनने के लिए हमें राख होना होगा। अग्नि में तपना होगा ,नहीं तो पतन निश्चित हैं। क्योकि साक्षर को राक्षस बनना कठिन नहीं होता।
सुधार ,जाग्रति और निष्ठां जब आएगी तब गंगोत्री पवित्र हो। जब गंगोत्री अपवित्र हो चुकी तब गंगा कब तक पवित्र होगी।
विश्व गुरु हमारी कल्पना हैं ,धरातल पर हम स्वर्ग चाहते हैं पर स्वर्गवासी नहीं होना चाहते।

धोनी की विदाई
सिद्धार्थ शंकर
भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और विकेट कीपर महेंद्र सिंह धोनी ने आज आखिरकार अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास का ऐलान कर दिया। उनके रिटायरमेंट की लंबे समय से अटकलें लगाई जा रही थीं। आज उन्होंने सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए क्रिकेट के सभी प्रारूपों से संन्यास की घोषणा कर दी है। धोनी ने टेस्ट की कप्तानी भी पूरी दुनिया को चौंकाते हुए अचानक से छोड़ दी थी और एक बार फिर से उन्होंने अपने चाहने वालों को चौंकाते हुए एक बड़ा फैसला लिया। धोनी हमेशा आत्मविश्वास से लबरेज होकर क्रिकेट मैदान में उतरते थे जो उनके पूरे करियर में उनकी पहचान बनी रही। धोनी ने अपने इंस्टाग्राम संदेश के माध्यम से इंटरनेशनल क्रिकेट से अपने संन्यास की घोषणा कर दी और सबका शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि 15 अगस्त शाम सात बजकर 29 मिनट से मुझे रिटायर समझें। कप्तान के तौर पर तो धोनी हिट थे ही एक खिलाड़ी यानी बल्लेबाज व विकेटकीपर के तौर पर भी उन्होंने पहचान बनाई। धोनी ने एक भावुक पोस्ट कर अलविदा कहा है। उन्होंने लिखा- अब तक आपके प्यार और सहयोग के लिए धन्यवाद। भारत के लिए आखिरी मैच 2019 वल्र्ड कप में न्यूजीलैंड के खिलाफ खेला था जो सेमीफाइनल मुकाबला था। इस मैच में भारत को हार मिली थी और इसके बाद से ही उनके क्रिकेट करियर को लेकर काफी कयास लगाए जा रहे थे। अब माही ने अचानक से क्रिकेट को अलविदा कह दिया है। हालांकि अभी धोनी आईपीएल 2020 खेलेंगे अभी तक ऐसा ही अनुमान लगाया जा रहा है। अब इंटरनेशनल क्रिकेट में माही का अंदाज तो हमें देखने को नहीं मिलेगा। धोनी का नाम आते ही उनका कूल अंदाज नजर के सामने आता है जो किसी भी परिस्थिति में अपना आपा नहीं खोता था। चैंपियन क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी की कामयाबी मैदान पर अनायास नहीं है। अपनी कप्तानी में भारत की झोली में वल्र्ड टी20, 50 ओवर वल्र्ड कप और चैंपियंस ट्रॉफी जैसे खिताब भरने वाले धोनी को क्रिकेट पंडितों ने कैप्टन कूल का नाम दिया। इसके लिए उनकी सोच-समझकर रणनीति बनाने और इंटरनेशनल क्रिकेट में जबर्दस्त प्रेशर के बीच भी विचलित ना होने का उनका अप्रोच जिम्मेदार था। यही कारण था एक युवा बल्लेबाज को जब 2007 में एकाएक कप्तानी थमाई गई तो उसने तुरंत आकर चमत्कार कर दिखाया। यही नहीं, उनकी बल्लेबाजी में भी यही जज्बा दिखता था जोकि उन्हें भारतीय क्रिकेट के सबसे शानदार फिनिशर का दर्जा दिला गया।
देखा जाए तो धोनी का इंटरनेशनल वनडे करियर रन आउट से शुरू हुआ और रन आउट पर जाकर खत्म हुआ। धोनी अपने पहले इंटरनेशनल मैच में शून्य पर रन आउट हो गए थे। उन्होंने इंटरनेशनल पारी की शुरुआत बांग्लादेश के खिलाफ की थी। महेंद्र सिंह धोनी ने वल्र्ड टी20 2007 कप में भारत को चैंपियन बनाया। इसके बाद साल 2011 वल्र्ड कप में भारत को 28 साल बाद 50 ओवर में भारत को जीत दिलाई। इसके बाद 2013 में उन्होंने चैंपियंस ट्रॉफी में भारत को विजय दिलाई। वह तीनों आईसीसी टूर्नामेंट जीतने वाले इकलौते कप्तान बने। महेंद्र सिंह धोनी ने कप्तान के रूप में 332 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले हैं। इसमें 200 वनडे इंटरनैशनल, 60 टेस्ट और 72 टी20 इंटरनेशनल मैच खेले। यह एक वल्र्ड रिकॉर्ड है। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया के रिकी पॉन्टिंग का नंबर आता है जिन्होंने 324 मैच खेले हैं। धोनी इकलौते कप्तान हैं जिन्होंने हर प्रारूप में 50 से ज्यादा मुकाबलों में टीम की कप्तानी की है। धोनी ने भारत के लिए 350 वनडे, 90 टेस्ट और 98 टी20 मैच खेले। करियर के आखिरी चरण में वह खराब फार्म से जूझते रहे जिससे उनके भविष्य को लेकर अटकलें लगाई जाती रही। उन्होंने वनडे क्रिकेट में पांचवें से सातवें नंबर के बीच में बल्लेबाजी के बावजूद 50 से अधिक की औसत से 10773 रन बनाये। टेस्ट क्रिकेट में उन्होंने 38 . 09 की औसत से 4876 रन बनाये और भारत को 27 से ज्यादा जीत दिलाई। आंकड़ों से हालांकि धोनी के करियर ग्राफ को नहीं आंका जा सकता। धोनी ने स्टंप के पीछे रहते हुए कठिन समय में भी अपना धैर्य नहीं खोया और इसका हमेशा उनको फायदा मिलता रहा। वे लगातार एक्सपेरिमेंट्स करते रहते थे। कई बार ऐसा हुआ है जब मैच फंसा होता था तो धोनी द्वारा लिया गया अजूबा फैसला सबको चौंका देता था। लेकिन ज्यादातर मौकों पर उन्होंने अपने फैसले को सच साबित किया। उनका यह आत्मविश्वास ही था कि जो उन्हें दूसरे खिलाड़ी और स्कीपर से अलग करता था। वे बहुत सोच-समझ का फैसला लेते थे और फैसला लेने के बाद वे रिजल्ट के बारे में सोचे बगैर केवल उस पर आगे बढ़ते थे। धोनी की जितनी तारीफ की जाए कम है। उन्होंने इंडियन क्रिकेट को जो कुछ दिया है, उसे हमेशा याद रखा जाएगा। आने वाले लंबे समय तक क्रिकेट कैप्टन की तुलना धोनी से होती रहेगी।

सर्वदलीय मान्यता के एकदलीय नेता अटलजी
प्रभात झा
(अटल जी की तीसरी पुण्यतिथि) आज देश के जन-जन के मन में अपनी ओज और तेजपूर्ण वाणी से एक अप्रतीम स्थान बनाने वाले भारत रत्न और तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि है। सारा देश उन्हे नमन कर रहा है। नीति सिद्धांत, विचार एवं व्यवहार की सर्वोच्च चोटी पर रहते हुए सदैव जमीन से जुड़े रहने वाले अटलजी से जिनका भी संबंध आया, वह राजनीति में कभी छोटे मन से काम नहीं करेगा। विपक्ष में रहते हुए देश के हर दल के राजनेताओं और कार्यकर्ताओं के मन में आपका विशिष्ट स्थान बना लेना, साथ ही उन दलों के कार्यकर्ताओं में यह भाव पैदा कर देना कि काश अटलजी हमारे दल के नेता होते! का यह सामर्थ्य अटलजी में ही था। विरोध में रहते हुए भी वे सदैव सत्ता पक्ष के नेताओं से भी देश में अधिक लोकप्रिय रहे। अपने अखंड प्रवास, वक्तव्य कला और राजनैतिक संघर्ष के साथ-साथ सड़कों से लेकर संसद में सिंह गर्जना कर तत्कालीन भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनके समकक्ष नेताओं के मन मे भी अपना विशिष्ट स्थान बनाने वाले अटलजी सर्वदलीय मान्यता के एकदलीय नेता थे।
हम सभी का सौभाग्य है कि अन्य लोगों से अधिक राजनैतिक समाजिक और पत्रकार के नाते और इससे भी अधिक ग्वालियर के नाते हमारा उनपर सर्वाधिकार था। ग्वालियर अटलजी की जन्मस्थली और प्रारंभ में कर्म स्थली रही। वे महाराज बाड़े स्थित गोरखी स्कूल और तत्कालीन विक्टोरिया कॉलेज जो आज का महारानी लक्ष्मीबाई कला एवं वाण्ज्यि महाविद्यालय आज अटलजी की यादों से जुड़ा हुआ है। महारानी लक्ष्मीबाई महाविद्यालय में पढ़ चुके और पढ़ रहे छात्र गर्व से कहते है कि हम उस कॉलेज से ’पास आऊट’ हैं जहां अटल जी पढ़ा करते थे।
एक समय पर अटल जी स्वदेश के में संपादक भी रहे। उनका स्वदेश से वैचारिक लगाव रहा। हम सभी स्वदेश मे रहे, अतः हम लोगों से उन्हे और भी स्नेह था। ग्वालियर की गलियों को अटलजी ने साईकिल से नापा हुआ था। ग्वालियर की हर गली हर चौराहे और हर मोहल्ले के नाम उनकी जुंबा पर होते थे। हम लोगों से लगाव होने का कारण एक और था कि अटलजी के भांजे अनूप मिश्रा और उनके भतीजे दीपक वाजपेयी भी साथ-साथ एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। अटलजी एक तो बहुत सहज सरल थे। साथ ही सुरक्षा के नाम पर आज जिस तरह का वातावरण है, वैसा उस समय नेताओं के साथ नहीं था। अटलजी ’शताब्दी’ में दिल्ली से बैठकर ग्वालियर आते थे। सुरक्षा के नाम पर श्री शिवकुमार पारेख उनके साथ ही रहा करते थे। शिवकुमारजी अटलजी के अनुज भांति ही थे।
अटलजी की इस पुण्यतिथि पर हम भारत के जन-जन को यह बताना आवश्यक समझते है कि उनका जन्म ग्वालियर के जिस शिन्दे की छावनी स्थित कमल सिंह के बाग की पाटौर मे हुआ था, वह पाटौर उनके प्रधानमंत्री बनने तक यथावत रही। भारत की राजनीति में ईमानदारी का ऐसा अनुपम उदाहरण कभी देखने को नहीं मिला। वे प्रतिपक्ष के नेता रहते हुए ग्वालियर के ट्रेड फेयर(मेला) में हरिद्वार वालों के गाजर का हलुआ और मंगोड़ी खाने मोटर साईकिल पर बैठकर चले जाते थे। ग्वालियर में अपने आप ही उनका मन वहां बीते बचपन की ओर लौट आता था। अटलजी मूल में इतने बड़े नेता होते हुए भी पार्टी के भीतर एक कार्यकर्ता के रूप में ही थे। सन् 1996 की बात है। मध्यप्रदेश में भाजपा सांसदों, विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों का प्रशिक्षण वर्ग लगा था। बतौर प्रतिपक्ष के नेता के रूप में वे भोपाल स्थित भाजपा के प्रांतीय कार्यालय दीनदयाल परिसर के हॉल मे आए। प्रशिक्षण वर्ग में उनका उद्बोधन हुआ। उस उद्बोधन का दो पैरा मैं यहां उद्धत कर रहा हूं।
अटलजी ने उद्बोधन के प्रारम्भ में कहा,
“कार्यकर्ता मित्रों”,
मेरे इस संबोधन पर आश्चर्य न करें। मै जानता हूं कि इस प्रशिक्षण वर्ग में पार्टी के प्रमुख नेता उपस्थित है। सांसदगण भी विराजमान है। सभी विधायक भाई तथा बहनें भी वर्ग में भाग ले रही है। मैने जानबूझकर कार्यकर्ता के नाते सबको संबोधित किया। हम यह दावा करते हैं कि हमारी पार्टी कार्यकर्ताओं की पार्टी है। जो नेता है वह भी कार्यकर्ता है। विशेष जिम्मेदारी दिए जानें के कारण वह नेता के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन उनका आधार है, उनका कार्यकर्ता होना। जो आज विधायक है, वह कल शायद विधायक नहीं रहें। सांसद भी सदैव नहीं रहेंगे। कुछ लोगों को पार्टी बदल देती है, कुछ को लोग बदल देते हैं, लेकिन कार्यकर्ता का पद ऐसा है, जो बदला नहीं जा सकता। कार्यकर्ता होने का हमारा अधिकार छीना नहीं जा सकता। कारण यह है कि हमारा यह अधिकार अर्जित किया हुआ अधिकार है, निष्ठा और परिश्रम से हम उसे प्राप्त कर सकते हैं, वह ऊपर से दिया गया सम्मान नहीं है कि उसे वापिस लिया जा सके।
उन्होने वर्ग में आगे कहा पार्टी के संगठन को सुचारू रूप से चलाने के लिये कार्य का विभाजन होता है, तदानुरूप पदों का सृजन होता है। अलग-अलग दायित्व होते हैं। पदो के अनुसार कार्यकर्ता पहचाने जाते है, लेकिन यह पहचान सीमित समय तक ही रहती है। संगठन का कोई पदाधिकारी 4 साल से अधिक अपने पद पर नहीं रहता। ऐसा किसी विशेष नियम के अन्तर्गत नहीं होता, यह एक परम्परा है, हम जिसका दृढ़ता से पालन करते हैं। देश में अनेक राजनीतिक दल हैं। उनमें न नियमित रूप से सदस्यता होती है और न चुनाव। जो एक बार पदाधिकारी बन गया, वह हटने का नाम नही लेता। अनेक दलों के अध्यक्ष स्थायी अध्यक्ष बन जाते हैं। उन्हें हटाने के लिये अभियान चलाना पड़ता है, लेकिन उनके कान पर जूं नहीं रेंगती, वे टस से मस नहीं होते। हमारे यहां ऐसा नहीं है।
अटलजी कहा करते थे कि हमारा लोकतंत्र में विश्वास है। जीवन के सभी क्षेत्रों में हम लोकतांत्रिक पद्धति का अवलंबन करने के समर्थक हैं। अपने राजनीतिक दल को भी हम लोकतंत्रात्मक तरीके से चलाते हैं। निश्चित समय पर सदस्यता होती है। पुराने सदस्यों की सदस्यता का नवीकरण होता है, नये सदस्य बनाये जाते हैं। संगठन के विस्तार के लिए नये लोगों का आना जरूरी है। समाज के सभी वर्गों से और देश के सभी क्षेत्रों सें सभी पार्टी में अधिकाधिक शामिल हों, यह हमारा प्रयास होता है। किसी व्यक्ति या इकाई द्वारा अधिक से अधिक सदस्य बनाये जाते हैं, इस प्रतियोगिता में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन प्रतियोंगिता पार्टी के अनुशासन और मर्यादा के अन्तर्गत होनी चाहिए।
उन्होने आगे कहा कि पार्टी के विस्तार के लिए नये सदस्य बनाना एक बात है और पार्टी पर कब्जा करने के लिये सदस्यता बढ़ाना दूसरी बात है। जब पार्टी का विस्तार करने के बजाय पार्टी पर अधिकार जमाने की विकृत मानसिकता पैदा होती है तब फिर जाली सदस्य भी बनाये जाते हैं। सदस्यता का शुल्क भी गलत तरीके से जमा किया जाता है। इससे पार्टी का स्वास्थ्य बिगड़ता है और दलों में प्रचलित इस बुराई को हमें अपने यहां बढ़ने से रोकना होगा। वर्षों से पार्टी में काम करने वाले लोग ऐसी बुराइयों के प्रति उदासीन नहीं हो सकते। पार्टी का जन-समर्थन, बढ़ाना होगा, किन्तु उसे पद-लोलुपता से बचाना होगा। गुटबन्दी का पार्टी में कोई स्थान नहीं हो सकता।
इस ऐतिहासिक प्रशिक्षण वर्ग में भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तत्कालीन सरसंघ चालक और भाजपा के पालक सुदर्शनजी साथ ही भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय संगठन महामंत्री कुशाभाऊ ठाकरे भी मौजूद थे। भाजपा के अब तब हो रहे विस्तार में मूल प्राण ’कार्यकर्ता’ है। यही बात संगठनात्मक बैठकों में आज भी देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहा करते हैं। उनका भी कहना है कि हम चाहे जितने बड़े नेता हों पर हमें मूल में कार्यकर्ताभाव से सदैव जुड़े रहना चाहिए। कार्यकर्ता भाव ही नए कार्यकर्ता को अपने दल से जोड़ता है।
इस प्रशिक्षण वर्ग में अटलजी ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी पिछले कुछ वर्षों में अपना प्रभाव और शक्ति बढ़ाने में सफल हुई है। इसके पीछे एक चिन्तन है, एक विचारधारा है। मै अभी-अभी परिसर में पं. दीन दयाल उपाध्याय की मूर्ति का अनावरण करके आया हूं। वह महान चिंतक और कुशल संगठनकर्ता थे। उनकी विशेषता पुराने चिन्तन को देश और काल के परिप्रेक्ष्य में उपस्थित करने मे थी। समय के साथ समस्याओं का रूप बदलता है, नयी समस्याएं खड़ी होती हैं, कुछ पुरानी समस्याएं नये स्वरूप मे आती हैं। उन समस्याओं को अलग करने के लिये मूलभूत चिन्तन के आधार पर नयी व्याख्याएं और नयी व्यवस्थाएं बनानी पड़ती हैं।
वर्ग में उन्होने आगे कहा कि हम एक आदर्श राज्य की स्थापना चाहते हैं। इसलिये प्रारंभ में धर्म राज्य की बात कही, बाद में अयोध्या आन्दोलन के प्रकाश में हमने राम राज्य की स्थापना को अपने लक्ष्य के रूप में लोगों के सामने रखा। धर्म राज्य और राम राज्य में कोई अन्तर नहीं है। दोनों में लक्षण समान हैं किन्तु कभी-कभी समय में परिवर्तन के साथ कोई शब्दावली अधिक आकृष्ट हो जाती है।
यह संयोग ही है कि 5 अगस्त के अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट के द्वारा भगवान रामलला के भव्य राममंदिर के भूमिपूजन के समय अपने उद्बोधन में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने साफ शब्दों में कहा कि हजारों वर्षों से चली आ रही हमारी संस्कृति का संदेश और रामराज्य की ओर बढ़ने का एक नया युग प्रारंभ हुआ है। अटलजी ने आगे कहा कि जब जनसंघ का निमार्ण हुआ तो विश्व साम्यवाद और पूंजीवाद में बंटा हुआ था। भारतीय चिन्तन ने दोनों को अस्वीकार किया था। हम राज्य शक्ति और आर्थिक शक्ति का एकत्रीकरण नहीं चाहते, न कुछ व्यक्तियों के हाथों में और न राज्य के ही हाथों में, हम विकेन्द्रित व्यवस्था के हामी हैं। साम्यवाद शोषण से मुक्ति और राज्य के तिरोहित होने की बात करता है किन्तु व्यवहार में वह केन्द्रीकरण का पुरस्कर्ता बनकर खड़ा हो जाता है। पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों की विफलता सुनिश्चित जानकर उपाध्याय जी ने एकात्म मानववाद का प्रतिपादन किया, जिसमें पूंजीवाद की तरह न तो समस्याओं को टुकड़ो मे देखा जाता है और न व्यक्ति की स्वतंत्रता तथा उसके पुरूषार्थ पर पानी फेर कर एक अधिनायकवादी व्यवस्था का ही प्रतिपादन किया जाता है।
अटलजी कहा करते थे कि पश्चिमी सभ्यता एक नये संकट में फस रही है। नये आर्थिक सुधारों के बाद हम भी उसी गलत दिशा में जा रहे हैं। बाजारी अर्थ-व्यवस्था के मूल में कोई गहरा जीवन-दर्शन नहीं हो सकता। प्रगति के लिये प्रतियोगिता होनी चाहिए। प्रतियोगिता से प्रगति होती है। दौड़ होने पर सबसे आगे निकलने का आकर्षण होता है। तेज दौड़ने की प्रेरणा होती है, जिसमें प्रतियोगिता किस हद तक हो, इसका विचार जरूरी है। कला घटाने वाली प्रतिस्पर्धा सब का निमार्ण नहीं कर सकती। साथ-साथ दौड़ने के बजाय यदि एक-दूसरे को टंगड़ी लगाकर गिराने का खेल शुरू हो जाये तो न दौड़ होगी और न प्रगति। केवल धन कमाना ही जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता। जीवन के लिये अर्थ जरूरी है, किन्तु अर्थ के संबंध में और भी बातें आवश्यक हैं। पं.दीनदयाल उपाध्याय जी कहा करते थे कि पेट भरने मात्र से समस्याएं समाप्त नहीं होतीं। सचमुच मे कुछ समस्याओं का जन्म पेट भरने के बाद ही होता है।
अटलजी का कहना था कि हम शरीर की रचना देखें तो उसमें पेट के ऊपर मस्तिष्क और फिर सब का संचालन करने वाली आत्मा का स्थान दिखाई देता है। मनुष्य मात्र मुनाफा कमाने का साधन नहीं बन सकता। आहार, निद्रा और भय मनुष्य और पशु मे समान है। बुद्धि और भावना मनुष्य और पशु को अलग करती है। पेट के साथ मनुष्य के मस्तिष्क को भी भोजन चाहिए। बौद्धिक दृष्टि से उसका विकसित होना जरूरी है। उसके मन में करूणा, संवेदना और संतोष होना चाहिए।
उनका मानना था कि आज प्रायः सभी देशों में जड़ो की तलाश का सिलसिला चल रहा है, यहां तक कि जातियां और उपजातियां भी अपनी जड़ों की खोज करना चाहती है। इस्लामी देशों में यह खोज फंडामेंटलिज्म का रूप लेकर सामने आ रही है। मजहब समान होते हुए भी इस्लामी देश संस्कृति की दृष्टि से अलग-अलग हैं, कुछ उदारवादी हैं। कुछ दिन पहले कुछ अमरीकियों से चर्चा करने का मौका मिला। उनका कहना था कि वे हमारे हिन्दुत्व के आंदोलन को समझते हैं अपनी जड़ो से नाता रखने का प्रयास स्वाभाविक है। किन्तु जड़ो की तलाश भी एक सीमा तक होनी चाहिए। बार-बार जड़ो को उखाड़ कर देखने से पौधा नहीं पनपता। जड़ पेड़ को आधार प्रदान करता है। किन्तु पेड़ के लिए जरूरी है, उसका तना हो, उसकी शाखायें हो, शाखाओं में पत्ते हो, पत्तों में फूल खिले और फल लगें। मूल और फल के संबंध को समझना होगा। गरीब देशों की तरह से हमें पश्चिम की चकाचौंध में आने की आवश्यकता नहीं है। हमारे साथ इन देशों की आंखे भी खुलेंगी। हम उसमें उनकी सहायता कर सकते हैं। हमारे पास एक चिन्तन है, एक विचारधारा है, प्रगति के साधन है, इतना बड़ा भूखंड है, पांच-छः हजार साल की संस्कृति है, 90 करोड़ का जनवल है, पुरूषार्थ और पराक्रम की परम्परा है। हमें दृढ़ता से खड़े रहना है। सत्ता का उपयोग हमें इस कार्य के लिए करना है।
अटलजी की मान्यता रही कि भारतीय जनता पार्टी एक राष्ट्रीय विकल्प के रूप में उभरी है। हमारी बढ़ती हुई शक्ति और प्रभाव से आतंकित होकर भिन्न-भिन्न विचारों वाले हमारे इर्द-गिर्द जमघट बना रहे हैं। पहले कांग्रेस के विरूद्ध गैर कांग्रेसी हवा चलती थी। अब भाजपा के विरूद्ध एकत्रीकरण हो रहा है। यह एकत्रीकरण टिकेगा नहीं। हमें यह समझ लेना चाहिए कि यदि हमारी प्रगति में रूकावट आयेगी, जो हमारी अपनी ही कमियों और खामियों के कारण आयेगी, हमारे विरोधियों के कारण नहीं।
भारतीय जनता पार्टी के साथ आज देश का भविष्य जुड़ गया है हमें बहुमत प्राप्त हो या न हो, हमारे विरोधी चाहें या न चाहें, भारतीय जनता पार्टी का भविष्य और देश का भविष्य एक-दूसरे से सम्बद्ध हो गये हैं। इस ऐतिहासिक अवसर पर हम पिछड़ जायें, हार मान जायें, छोटे-छोटे विवादों में फंस जायें तो आने वाली पीढ़ी हमें कभी क्षमा नही करेगी। देश की स्थिति पर और संगठन की आवश्यकता पर हम कार्यकर्ता के नाते विचार करें, कार्यकर्ता के नाते ही व्यवहार करें। हम चाहे जितनी बड़ी सत्ता हासिल कर ले या हम चाहे जितनी ऊंचाई पर चले जांए, पर हमें और हमारे संगठन को इतनी ऊंचाई पर जिन कार्यकर्ताओं और जनता जनार्दन ने पहुंचाया, उन्हे हमे अपनी आंखों से कभी ओझल नहीं करना चाहिए। हमारी सफलता सुनिश्चित है। और आवश्यकता है चिन्तन के अनुरूप सही व्यवहार करने की।
अटलजी का प्रशिक्षण वर्ग में दिया गया उद्बोधन और उनका एक-एक वाक्य हमारे लिये आज भी प्रेरणादायक है। उनकी पुण्यतिथि पर उनके दिये गए विचारों पर यदि हम सदैव चिंतन करते रहे और सदैव चलते रहे तो न हम भटकेंगे और न ही हम देश को भटकने देंगे।

स्वतंत्रता दिवस और रामराज्य
रघु ठाकुर
15 अगस्त 1947 को देश में खंडित आजादी अंग्रेजों के द्वारा हस्तांतरित की गई थी। हाँलाकि 9 अगस्त 1942 को गाँधी के आव्हान पर जिस आजादी के आंदोलन की शुरूआत हुई थी वह खंडित आजादी के लिए नहीं था। इस आंदोलन में देश के किसानों, मजदूरों, युवकों, छात्रों, व्यापारियों, पत्रकारों सभी के सपनों के रंग शामिल थे और सबको यह उम्मीद थी कि आजाद भारत बापू के सपनों का भारत होगा, जिसमें रामराज्य होगा। याने ऐसा शासन जिसमें न कोई दुखी होगा, न कोई पीड़ित होगा, न अपराध होंगे, न कोई छोटा या बड़ा होगा। रामराज्य का वर्णन करते हुए तुलसीदास ने रामायण में लिखा था ‘‘दैहिक दैविक भौतिक तापा रामराज्य काहू नहीं व्यापा’’ याने रामराज्य एक ऐसा राज्य होगा जिसमें शारीरिक, दैविक और भौतिक किसी किस्म की कोई पीड़ा नहीं होगी। परन्तु आजादी के 73 वर्ष में जब हम भारत की आजादी और देश के हालातों की ओर देखते हैं तो बापू का रामराज्य कहीं नज़र नहीं आता।
देश में प्रतिवर्ष लगभग 2-3 लाख लोग दुर्घटनाआंे में मर जाते है, लगभग 70-80 लाख बच्चे 5 वर्ष की उम्र होते-होते कुपोषित होकर मर जाते है। माताओं के पेट में न पौष्टिक भोजन है, न संतान के। वह दोनों बेहाल हैं। लाखो लोग प्रतिवर्ष टी.बी. जैसी बीमारियों से मर जाते है। प्रतिवर्ष देश में सूखा और बाढ़ की विपत्ति आती है इस वर्ष भी अभी तक बाढ़ से लगभग 40 लाख लोग बेघर और तबाह हो चुके है। बिहार, आसाम, उ.प्र., आदि क्षेत्रों के बड़े इलाके जलमग्न हैं, क्या यह सब दैविक दैहिक और भौतिक तापा नहीं है?
प्रधानमंत्री जी ने कई सौ करोड़ से बनने वाले राम मंदिर का शिलान्यास तो कर दिया परन्तु रामराज्य की कल्पना की एक ईट भी कहीं नज़र नहीं आती। हाल ही में बाढ़ के प्रश्न की चर्चा करते हुए उन्होंने मुख्यमंत्रियों से बात की। बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार बोले की नेपाल अपने समझौते का क्रियान्वयन नहीं कर रहा है। यह कोई नया तर्क नहीं है बल्कि एक अर्थ में यह एक पुराना जुमला है। मैं जानता हूॅ, कि नेपाल से आने वाला पानी बाढ़ का कारण है, परन्तु आजादी के 73 वर्षाें में इस पानी को बाँधकर सूखे खेतों की ओर ले जाने का प्रयास देश की केन्द्र या राज्य की सरकारों ने क्यों नहीं किया? क्या नेपाल ने देश के मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री के हाथ बाँध दिए है? क्या वह अपने देश की जनता के हित में काम नहीं कर सकते? प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने कहा कि तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए, परन्तु किस तकनीक से बाढ़ रूकेगी इसका खुलासा उन्होंने नहीं किया। इसका कारण नेपाल है, परन्तु भारत के शासकों के लिए बचाऊ की बकरी है। सभी दलों की सरकारें या सभी दलों के लोग इन 73 वर्षाें में कही न कहीं सरकारों के कम या ज्यादा हिस्सेदार रहे हैं, परन्तु एक मात्र डाॅ. लोहिया को छोड़कर किसी ने भी इन सवालों को गंभीरता से नहीं उठाया है, सूखा और बाढ़ राहत देश के भ्रष्ट नेताओं की विलासता और राजनीति का बड़ा माध्यम है इसलिए वे राहत चाहते है, मुक्ति नहीं। राहत प्रतिवर्ष बढ़ेगी क्योंकि प्रतिवर्ष विपŸिा आएगी परन्तु अगर मुक्ति मिल गई तो राहत के नाम से पैसा कैसे आएगा। इन 73 वर्षाें में केन्द्र और राज्यों को मिलाकर लगभग 40 लाख करोड़ रूपया राहत पर खर्च हो चुका है और विपŸिा जहाँ की तहाँ है।
कोरोना की महामारी वैश्विक महामारी है और दुनिया इसकी वैक्सीन खोजेगी। परन्तु भारत के प्रधानमंत्री जैसा वैज्ञानिक और चिकित्सक कौन हो सकता है, जिन्होंने कोरोना महामारी का वैक्सीन लाॅकडाऊन में ही खोजने और निजीकरण तथा विदेशी पूँजीनिवेश की वैक्सीन से वे देश को कोरोना मुक्त कर रहे है। देश के सभी सरकारी क्षेत्र, रेलवे, बीमा, बैंक, स्टील क्षेत्र, आई.टी., खनन, रक्षा आदि सभी सरकारी क्षेत्रों के उद्यमों को वे निजीकरण की वैक्सीन लगा रहे हैं और देशी-विदेशी उद्योगपतियों के हाथों मामूली कीमत पर इन्हें बेच रहे है। पिछले 4-5 माह में लाॅकडाऊन के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था चैपट हो चुकी है। राजस्व संग्रह चाहे वह जी.एस.टी. हो या ब्रिकीकर, आयकर हो या स्थानीय कर, सभी की वसूली नगण्य है। क्येांकि जब व्यापार ही ठप्प हो गया है तो कर कहाँ से आएगा। विगत् चार दिनों से ट्रांसपोर्टर हड़ताल पर है। क्योंकि सरकार बगैर वाहन चलाए उनसे टैक्स लेना चाहती है। राज्यों के कर्मचारियों का वेतन कर्ज लेकर बँट रहा है और वर्क फार्म होम के नाम पर सरकारी और निजी कर्मचारियों को बेरोजगारी में ढकेला जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रपट के अनुसार लगभग 1 करोड़ लोग इस लाॅकडाउन की बीमारी से नए बेरोजगार बन गये है याने वह जो बेरोजगार थे जिन्हें रोजगार मिला ही नहीं था। जबकि देश में पहले से ही 10-12 करोड़ लोग बेरोजगार बने हुए है, इसके साथ-साथ लगभग एक करोड़ नये लोग अब काम बंदी की वजह से बेरोजगार हो गए है। हाथ से काम मिलने वाले तमाम छोटे-छोटे धन्धे के लोग बेरोजगार हो चुके है। काम धन्धे बंद है और देश की आबादी का एक अच्छा खासा हिस्सा नए गैर सरकारी कर्ज में डूब गया है। इसके परिणामस्वरूप बड़ी आबादी अवसाद ग्रस्त हो रही है और आत्महत्या का मार्ग चुन रही है। अगर हालात नहीं बदले तो शायद इस वर्ष में 20 लाख लोग आत्महत्यायें करेंगे। हाल ही में दिया जा रहा कर्जा किसी काम धन्धे को नहीं बल्कि पेट भरने को है।
प्रधानमंत्री जी नारा दे रहे है आत्मनिर्भर भारत का, परन्तु रास्ता बता रहे है एफ.डी.आई. का, याने परनिर्भरता का। कोरोना के नाम पर न केवल देश में बल्कि समूची दुनिया में एक सांस्कृतिक और तकनीकी महाप्रलय आया है अमेरिका जैसे देश में 42 प्रतिशत लोग तकनीकी हमले के शिकार हो चुके है और लगभग 20 लाख कामगारों की जगह पर मशीनें या रोबोट आ गए है। यहां तक कि दुनिया के बड़े पैसे वाले बिल गेट्स ने भी रोबोट्स के खतरे को बहुत गंभीर खतरा बताया है। जो इंसान को बेदखल करेगा और दुनिया की बड़ी आबादी को भुखमरी की गोद में धकेल देगा। अमेरिका या यूरोप के देश जो तकनीक के मालिक है वे इस झटके को थोड़ा बहुत सहन कर पाए थे परन्तु एशिया अफ्रीका याने रंगीन दुनिया के देशों की बड़ी आबादी के लिए यह विश्वयुद्ध से भी खतरनाक नर संहार होगा। आज अगर बापू जिंदा होते तो इस महामारी के लिए शायद दुनिया के सम्पन्न लोगों, उनके लालच व विषमता को गुनहगार बताते। तकनीक से हमारा केाई बैर नहीं है परन्तु तकनीक के साम्राज्यवाद से हमें लड़ना होगा और इसके लिए एक नई जन क्रांति की आवश्यकता है।
आइए 15 अगस्त को हम अपनी पाई हुई आजादी को बचाने के लिए इस क्रांति के सिपाही बने। हम साहस से बोले व बोली की रक्षा करें और बोलने के जन्म सिद्ध अधिकार को किसी भी कीमत पर समाप्त न होने दें। रामराज्य और रावणराज्य का यही फर्क है कि राम के राज्य में गरीब भी राम के खिलाफ बोल सकता था और रावण राज्य में रावण का भाई व पत्नी भी राजा के खिलाफ नहीं बोल सकती थी। राम राज्य और रावण राज्य के फर्क की कसौटी अगर कोई है तो वह निर्भीक बोलने की आजादी।

बेटियां हकदार लेकिन कई मुश्किलें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले ने देश की बेटियों को अपने पिता की संपत्ति में बराबरी का हकदार बना दिया है। अदालत के पुराने फैसले रद्द हो गए हैं, जिनमें कई किंतु-परंतु लगाकर बेटियों को अपनी पैतृक संपत्ति का अधिकार दिया गया था। मिताक्षरा पद्धति या हिंदू कानून में यह माना जाता है कि बेटी का ज्यों ही विवाह हुआ, वह पराई बन जाती है। मां-बाप की संपत्ति में उसका कोई अधिकार नहीं रहता। पीहर के मामलों में उसका कोई दखल नहीं होता लेकिन अब पैतृक संपत्ति में बेटियों का अधिकार बेटों के बराबर ही होगा। यह फैसला नर-नारी समता का संदेशवाहक है। यह स्त्रियों के सम्मान और सुविधाओं की रक्षा करेगा। उनका आत्मविश्वास बढ़ाएगा। इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश तो यह है कि यदि हिंदू कानून में सुधार हो सकता है तो मुस्लिम, ईसाई, सिख आदि कानूनों में सुधार क्यों नहीं हो सकता ? सारे कानूनों पर देश में खुली बहस चले ताकि समान नागरिक संहिता का मार्ग प्रशस्त हो। यह एतिहासिक फैसला कई नए प्रश्नों को भी जन्म देगा। जैसे पिता की संपत्ति पर तो उसकी संतान का बराबर अधिकार होगा लेकिन क्या यह नियम माता की संपत्ति पर भी लागू होगा ? आजकल कई लोग कई-कई कारणों से अपनी संपत्तियां अपने नाम पर रखने की बजाय अपनी पत्नी के नाम करवा देते हैं। क्या ऐसी संपत्तियों पर भी अदालत का यह नया नियम लागू होगा? क्या सचमुच सभी बहनें अपने भाइयों से अब पैतृत-संपत्ति की बंदरबांट का आग्रह करेंगी ? क्या वे अदालतों की शरण लेंगी ? यदि हां, तो यह निश्चित जानिए कि देश की अदालतों में हर साल लाखों मामले बढ़ते चले जाएंगे। यदि बहनें अपने भाइयों से संपत्ति के बंटवारे का आग्रह नहीं भी करें तो भी उनके पति और उनके बच्चे लालच में फंस सकते हैं। दूसरे शब्दों में यह नया अदालती फैसला पारिवारिक झगड़ों की सबसे बड़ी जड़ बन सकता है। क्या हमारी न्यायपालिका में इतनी क्षमता है कि इन मुकदमों को वे साल-छह महीने में निपटा सके ? इन मुकदमों के चलते-चलते तीन-तीन पीढ़ियां निकल जाएंगी। बेटियों का पीहर से कोई औपचारिक आर्थिक संबंध नहीं रहे, शायद इसीलिए दहेज-प्रथा भी चली थी। दहेज-प्रथा तो अभी भी मजबूत है लेकिन अब राखी का क्या होगा? मुकदमेबाज़ बहन से क्या कोई भाई राखी बंधवाएगा ? भाई यह दावा कर सकता है कि पिता के संपत्ति-निर्माण में उसकी अपनी भूमिका सर्वाधिक रही है। उसमें बहन या बहनोई दखलंदाजी क्यों करें ? इस समस्या का तोड़ यह भी निकाला जाएगा कि पिता अपने संपत्तियां अपने नाम करवाने की बजाय पहले दिन से ही अपने बेटों के नाम करवाने लगेंगे। वे अदालत को कहेंगे कि तू डाल-डाल तो हम पांत-पांत।

बेबाक और बेखौफ शायर थे राहत इन्दौरी
योगेश कुमार गोयल
कोरोना संक्रमित होने के अगले ही दिन देश के प्रख्यात शायर राहत इन्दौरी 70 साल की आयु में दुनिया छोड़कर चले गए और मुशायरों में गूंजने वाली दमदार आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। तबीयत बिगड़ने पर वे 10 अगस्त को इन्दौर के एक निजी अस्पताल में भर्ती हुए थे, जहां कोविड टेस्ट में पॉजिटिव आने के बाद उन्हें इन्दौर के कोविड अस्पताल अरबिंदो हॉस्पीटल में शिफ्ट किया गया था। 11 अगस्त की सुबह उन्होंने स्वयं ट्वीट कर बताया था कि कोविड के शुरूआती लक्षण दिखने पर कल उनका कोरोना टेस्ट किया गया, जिसकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई। दुआ कीजिये कि जल्द से जल्द इस बीमारी को हरा दूं। साथ ही उन्होंने ट्वीट के जरिये अपने फैंस से यह गुहार भी लगाई थी कि उन्हें या घर के लोगों को फोन ना करें, उनकी खैरियत ट्विटर और फेसबुक पर आपको मिलती रहेगी। कौन जानता था कि यही राहत इन्दौरी साहब का आखिरी ट्वीट होगा। डॉक्टरों के मुताबिक उन्हें 60 फीसदी निमोनिया था और पहले से ही किडनी, हाइपरटेंशन, डायबिटीज, दिल तथा फेफड़ों में संक्रमण सहित कई बीमारियां थी। अस्पताल में भर्ती कराने के बाद उन्हें दो बार दिल का दौरा पड़ा और 11 अगस्त की शाम उन्होंने अंतिम सांस ली।
इन्दौर में एक कपड़ा मिल कर्मचारी रफ्तुल्लाह कुरैशी तथा मकबूल उन निशा बेगम के यहां 1 जनवरी 1950 को जन्मे राहत इन्दौरी हिन्दी फिल्मों के गीतकार के अलावा ऐसे भारतीय उर्दू शायर थे, जो बड़े बेबाक और बेखौफ अंदाज में अपनी बात कहने के लिए जाने जाते थे। शायरी के जरिये सत्ता पक्ष के लोगों पर तीखा प्रहार करने के कारण ही वे सदा सत्ता पक्ष के लोगों की आंखों में खटकते रहे। उन्होंने वर्ष 1975 में भोपाल के बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में एमए और 1985 में भोज मुक्त विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में पीएचडी की थी। वे देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इन्दौर में उर्दू साहित्य के प्राध्यापक भी रहे। 19 साल की उम्र में उन्होंने कॉलेज के दिनों में अपनी पहली शायरी सुनाई थी। कॉलेज में अध्यापन के दौरान एक अच्छे व्याख्याता के रूप में छात्रों की लगातार प्रशंसा पाने के बाद वे मुशायरों में काफी व्यस्त रहने लगे। अपने उन मुशायरों से वे जनता के बीच इतने लोकप्रिय होते गए कि उन्हें देश-विदेश से मुशायरों के निमंत्रण मिलने लगे। चार दशक से भी ज्यादा समय से वे मुशायरों और कवि सम्मेलनों में अपनी शायरी पढ़ रहे थे।
उन्होंने बॉलीवुड की फिल्मों के लिए भी कुछ गीत लिखे, जिनमें फिल्म ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ का ‘एम बोले तो मुन्ना भाई एमबीबीएस’, ‘घातक’ का ‘कोई जाए तो ले आए’, ‘इश्क’ का ‘नींद चुराई मेरी, तुमने वो सनम’, ‘खुद्दार’ का ‘तुमसा कोई प्यारा कोई मासूम नहीं है’, ‘करीब’ का ‘चोरी चोरी जब नजरें मिली’, ‘मर्डर’ का ‘दिल को हजार बार रोका’, ‘सर’ का ‘आज हमने दिल का हर किस्सा’, ‘मिशन कश्मीर’ का ‘बुमरो-बुमरो, श्याम रंग बुमरो’ जैसे गीत काफी लोकप्रिय हुए लेकिन उनकी पहचान कभी भी निदा फाजली या कैफी आजमी जैसे फिल्मी गीतकार जैसी नहीं रही बल्कि उनका नाम सुनते ही हर किसी के जेहन में एक मशहूर शायर का ही ख्याल आता था। उन्हें महफिल के हिसाब से शायरी पढ़ने में महारत हासिल थी। रोमांटिक शायरी को लेकर एक टीवी शो के दौरान उन्होंने कहा था कि आदमी दिमाग से बूढ़ा होता है, दिल से नहीं।
वैसे तो उर्दू की समकालीन दुनिया में मशहूर शायरों की कोई कमी नहीं है लेकिन राहत इन्दौरी की खासियत यह थी कि वे एक गंभीर शायर होने के साथ-साथ युवा पीढ़ी की नब्ज को भी थाम लेते थे और बड़ी सहजता से शायरी के माध्यम से ऐसी तीखी बात कह जाते थे, जो राजनीति के साथ-साथ समाज को भी चीरती प्रतीत होती थी। उनके शेरों के जरिए अपने हकों को आवाज देने का जो शोर सुनाई देता था, वो उनके समकालीन किसी शायर की आवाज में शायद ही सुनने को मिला हो। अपने शेरों के माध्यम से वे राजतंत्र की खामियों को उजागर करते हुए देश-समाज की व्यवस्थाओं पर चोट करते थे। उन्होंने समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए शायरी की और सदैव आम आदमी की आवाज बने। मुशायरों में जब वे शायरी कर रहे होते थे तो ऐसा प्रतीत होता था, जैसे वे महफिल में मौजूद हर व्यक्ति से सीधे बात कर रहे हैं। सीएए को लेकर देशभर में चले प्रदर्शनों के दौर में उन्होंने काफी तीखे अंदाज में कहा था, ‘‘लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में, यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है। जो आज साहिबे मसनद हैं, कल नहीं होंगे। किरायेदार हैं, जाती मकान थोड़ी है, सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है।’’
ऐसी ही तीखी और बेबाक शायरी के कारण राहत इन्दौरी कुछ लोगों की आंखों में लगातार खटकते रहे और उन्हें लेकर बेवजह विवाद खड़ा करने की कोशिशें भी हुई। कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर उन्हीं के नाम से एक फर्जी शेर भी खूब वायरल किया गया और जब विवाद बढ़ने लगा, तब उन्हें स्वयं सफाई देनी पड़ी थी कि वह उनका शेर नहीं है। हालांकि उन्होंने कई बार अपनी शायरी के माध्यम से अपनी देशभक्ति और हिन्दुस्तानी पहचान साबित भी की। उन्होंने कहा था कि मैं मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना, लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना। लॉकडाउन के दौर में जब इन्दौर में डॉक्टरों की टीम पर हमले हो रहे थे, तब उन्होंने हमला करने वालों को एक वीडियो जारी कर कहा था, ‘‘हमारे शहर में जो वाकया पेश आया, उससे पूरे मुल्क के लोगों के सामने शर्मिंदगी से गर्दन झुक गई, शर्मसारी हुई। ये लोग तबीयत देखने आए थे, उनके साथ जो आपने सलूक किया, उससे पूरा हिन्दुस्तान हैरत में है।’’

अब कश्मीर में बंदूक नहीं, बात चले
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जम्मू-कश्मीर में मनोज सिंहा को उप-राज्यपाल बनाया गया है, यह इस बात का संकेत है कि भारत सरकार कश्मीर में डंडे की राजनीति नहीं, संवाद की राजनीति चलाना चाहती है। भारत सरकार वहां किसी फौजी अफसर या नौकरशाह को भी नियुक्त कर सकती थी लेकिन तालाबंदी खुलने के बाद यदि कुछ उथल-पुथल होती तो कश्मीर में काफी रक्तपात हो सकता था। कश्मीर में तो साल भर से तालाबंदी है। मैं इस तालाबंदी को अच्छा नहीं समझता हूं लेकिन 5 अगस्त 2019 के बाद यदि कश्मीर में तालाबंदी नहीं होती तो पता नहीं, वहां कितना खून बहता। अब यह तालाबंदी खुलनी चाहिए। नज़रबंद नेताओं को रिहा किया जाना चाहिए। उन्हें आपस में मिलने देना चाहिए और उनसे केंद्र सरकार को सीधा संवाद स्थापित करना चाहिए। शायद इसीलिए मनोज सिंहा को श्रीनगर भेजा गया है। मनोज अनुभवी नेता हैं। वे जमीन से जुड़े हुए हैं। छात्र-नेता के तौर पर वे यशस्वी हुए हैं। तीन बार उन्होंने सांसद का चुनाव जीता है। वे अपनी विचारशीलता और शालीनता के लिए जाने जाते हैं। यदि वे फारुक अब्दुल्ला, मेहबूबा मुफ्ती और हुर्रियत के नेताओं से सीधी बात करें तो निश्चय ही कोई सर्वमान्य रास्ता निकलेगा। जहां तक जम्मू-कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा देने की बात है, वह दिया जा सकता है, ऐसा संकेत गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में पिछले साल खुद भी दिया था। धारा 370 के बने रहने से कश्मीरियों को कोई खास फायदा नहीं है। उसे इंदिरा-काल में ही दर्जनों बार खोखला कर दिया गया था। अब तो बस उसका नाम भर बचा हुआ था। उसके हटने से अब कश्मीरी और शेष भारतीयों के बीच की खाई पट चुकी है। अब तो सबसे जरुरी काम यह है कि कश्मीर का चहुंदिश विकास हो। आतंकवाद समाप्त हो। वहां भ्रष्टाचार अपरंपार है। वह भी समाप्त हो ताकि औसत कश्मीरी नागरिक आनंद का जीवन जी सकें। हमारा कश्मीर शांति और समृद्धि का स्वर्ग बने ताकि पाकिस्तानी कश्मीर के लोग यह सोचने के लिए मजबूर हो जाएं कि हाय ! हम उधर क्यों न हुए ? तब पाकिस्तान के साथ भी संवाद चले और कश्मीर-समस्या को दोनों मुल्क मिलकर इतिहास का विषय बना दें। मोदी सरकार को चाहिए कि वह कश्मीरी नेताओं से दिली बातचीत के लिए सिर्फ नौकरशाहों और सिर्फ भाजपाइयों तक सीमित न रहे। देश में ऐसे कई दलीय, निर्दलीय नेता और बुद्धिजीवी हैं, जिनका कश्मीरी नेताओं से सीधा संपर्क है। मनोज सिंहा की नियुक्ति तभी सार्थक और सफल होगी जबकि कश्मीर में बंदूक नहीं, बात चलने लगेगी।

भाषा की मर्यादा
सिध्दार्थ शंकर
राजनीतिक पार्टियों का एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप और व्यंग्य बाण चलाना नई बात नहीं है। लोकतंत्र में असहमति बड़ा गुण माना जाता है, पर कई बार जब राजनेता दुर्भावनावश या घृणाभाव से अपने प्रतिपक्षी के प्रति अशोभन भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो स्वाभाविक ही उनके आचरण पर अंगुलियां उठने लगती हैं। चुनाव के वक्त राजनेताओं की भाषा अक्सर तल्ख हो उठती है, मगर पिछले कुछ सालों से इसमें जिस तरह की तल्खी देखी जा रही है, वह लोकतंत्र के लिए कतई अच्छी नहीं कही जा सकती। सार्वजनिक जीवन में नेता का आचरण काफी मायने रखता है। बहुत सारे लोग उससे प्रेरणा लेते व फिर उसके आचरण को समाज के निचले स्तर पर प्रसारित करते हैं। मगर अफसोस कि कई राजनेता अपने विपक्षी पर वार करने की धुन में अपने पद की गरिमा और मर्यादा का भी ध्यान नहीं रख पाते। इस बार लोकसभा चुनाव के मद्देनजर यह प्रवृत्ति कुछ अधिक उभर कर आई दिखती है।
हमारे यहां ज्यादातर क्षेत्रीय दलों का जनाधार जाति, धर्म, क्षेत्रीय अस्मिता पर टिका हुआ है। वे उन्हीं की राजनीति करते हैं। इसलिए केंद्र या राज्य में अपने प्रतिद्वंद्वी दल की सरकार पर अक्सर उनका तल्खी भरा बयान ही सुनने को मिलता है। उत्तर प्रदेश व बिहार के क्षेत्रीय दल इस मामले में ज्यादा मुखर नजर आते हैं। चाहे सपा-बसपा-राजद हों या दूसरे दल, उनके नेता कड़वी भाषा का इस्तेमाल करके ही अपने मतदाताओं को रिझाने का प्रयास करते हैं। इस तरह परिपाटी-सी बनती गई है कि प्रतिपक्षी पर प्रहार करना है, तो कड़वी और अशोभन भाषा का उपयोग करना ही चाहिए। ऐसी भाषा जब छुटभैए नेता ग्रहण करते हैं, तो उसे और विकृत करते हैं। विवेकहीन तरीके से तथ्यों को पेश करते, वोटरों को बरगलाने का प्रयास करते और कई बार गाली-गलौज तक की भाषा तक बोलने लगते हैं। यह लोकतंत्र की गरिमा को चोट पहुंचाने वाली ही प्रवृत्ति है, जो घातक होती जा रही है।
हैरानी की बात यह है कि कोई भी राजनीतिक दल अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं को भाषा के मामले में संयम और शालीनता बरतने की सीख नहीं देता। कई बार ऐसे नेता अपने वरिष्ठों से पुरस्कृत होते देखे जाते हैं, जो अपने विपक्षी के खिलाफ तल्ख व अशोभन भाषा का उपयोग करते हैं। विचित्र है कि आजकल टीवी और सोशल मीडिया ने ऐसी भाषा वाले बयानों को चटखारे लेकर और बढ़ा-चढ़ा कर परोसना शुरू कर दिया है। इस तरह आम लोगों का मानस कुछ इस तरह बनाने का प्रयास हो रहा है कि पान की दुकान पर खड़े होकर बतियाने वालों की भाषा और माननीय प्रतिनिधियों या फिर जिम्मेदार नेताओं की भाषा में कोई अंतर नहीं होता। आम जनजीवन की भाषा को राजनीति की भाषा बनाना अच्छी बात है, पर उसकी मर्यादा का ध्यान न रखना असंवैधानिक है। मगर शायद नेताओं ने मान लिया है कि मतदाताओं को अब वही भाषा पसंद आती है और उसी भाषा में दिए बयान उन्हें प्रभावित करते हैं, जिसमें कुछ अशोभन और तल्ख शब्दों का समावेश हो। नहीं तो कोई और कारण नहीं हो सकता कि सत्ता के शीर्ष नेतृत्व की भाषा में संयम नहीं दिखाई देता है। भाषा में भड़काऊपन, आक्रामकता व अशालीनता कहीं न कहीं राजनीति को कमजोर करते हैं।
सभी राजनेता एक जैसे नहीं होते हैं लेकिन कहावत है कि एक मछली पूरे तालाब के पानी को गंदा कर देती है। कुछ राजनेता तो अपनी राजनीति चमकाने और मुफ्त सुर्खियों में आकर सस्ती लोकप्रियता के लिए समय समय पर राजनीतिक बदजुबानी करके बखेड़ा खड़ा किया करते हैं। राजनीति में बकवास करके लोगों की भावनाओं को भड़काने का अक्सर दौर चला करता है। इन राजनेताओं में सत्ता और विपक्ष दोनों शामिल हैं। राजनीति में राजनेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए किस बात का बतंगड़ बनाकर उसका राजनीतिक फायदा ले लेगा इसका अंदाज लगा पाना आसान नहीं होता है। राजनीति में बयानबाजी करके अपना उल्लू तो सीधा किया जा सकता है किंतु उससे उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। लोकतंत्र में स्वस्थ राजनीति की जाती है किसी की भावनाओं पर कुठाराघात नहीं किया जाता है। राजनेता असल में राजनीति में अपने प्रतिद्वंद्वी की नीतियों और रीतियों की आलोचना ही नहीं करता बल्कि असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल करके अपमानित नहीं करता है।

रामजन्मभूमि आन्दोलन के हुतात्माओं के प्रति शब्दांजलि रुपी श्रद्धांजलि
प्रभात झा
वे लोग भाग्यशाली होते हैं जो किसी घट रहे इतिहास को अपनी आँखों से देखते हैं। यह मेरा सौभाग्य था कि मैं पत्रकार के नाते 6 दिसंबर] 1992 को रामलला जन्मभूमि के उस परिसर में खड़ा था, जहां हमारी आँखों के सामने भगवा पट्टी माथे पर बांधे सैकड़ों कार सेवक देखते-देखते गुम्बद पर चढ़ गए बस घंटे-दो घंटे में विवादित ढाँचे को धूल-धुसरित कर दिया। मैं मध्यप्रदेश के स्वदेश समाचार-पत्र का विशेष संवाददाता था। सन 1986 से तत्कालीन बजरंग दल के नेता जयभान सिंह पवैया के साथ रामनवमी पर रिपोर्टिंग करने और रामलला के दर्शन करने लगभग प्रति वर्ष जाते थे। हम मिथिलावासी हैं। हम मां मिथिलेश कुमारी (सीता जी ) के वंशज हैं। भगवान राम से हमारा नाता शास्त्रों के अनुसार, साले-बहनोई का है। मिथिलावासी सीताजी के कारण अवध निवासी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को अपना बहनोई मानते हैं। बहन सीता के कारण अयोध्या से मेरा लगाव पहले से ही रहा है। अत: अयोध्या में रामनवमी पर लगाने वाले मेले का आँखों देखी हाल लिखने का दायित्व स्वदेश द्वारा मुझे ही दिया जाता था।
वर्ष 1992 का 6 दिसंबर दुनिया को पता है। तब की घटना की रिपोर्टिंग करने के लिए मैं एक दिसंबर को ही अयोध्या पहुँच गया था। हाथ में डायरी और कलम थी साथ ही बैग में कैमरा। मैंने सुन रखा था कि 6 दिसंबर को कारसेवक आयेंगे और वे कार सेवा करेंगे। हम दिनभर मे अनेक बार राम के जन्म स्थान पर और कारसेवकपुरम जाते थे। हम पूरी अयोध्या घूमते थे। चौक-चौराहों पर यह चर्चा सुनते थे – ‘ पता नहीं मंदिर कब बनेगा !” पूरी की पूरी फैजाबाद जो आज का अयोध्या जिला, वहां के साधु-संतों के मुख पर एक ही बात आती थी कि मंदिर बनना कब शुरू होगा। अन्यान्य राज्यों के कारसेवक के रूप में लोगों का आना शुरू हो चुका था। केरल से कश्मीर तक कोई ऐसा राज्य नहीं था जहां से संघ के अधिकारी लोगों का आना न हो रहा हो। उन कारसेवकों की चिंता के लिए कारसेवकपुरम में विश्व हिन्दू परिषद् के नेता स्व. अशोक सिंहल जी, स्व. गिरिराज किशोर जी, स्व. मोरोपंत पिंगले जी व्यवस्था की दृष्टि से अलग – अलग बैठकें ले रहे थे। 2 दिसंबर, 1992 को लोगों के आने का सिलसिला और बढ़ गया। मैं वर्षों से अयोध्या जाता रहा हू पर, इस बार का हुजूम कुछ और ही लग रहा था।
विवादित ढाँचे के पास ही विजली विभाग के कुछ इंजिनीयर विद्युत व्यवस्था के लिए तैनात थे। वे बिजली की निर्बाध व्यवस्था के लिए लगातार तैयारी मे रह्ते थे। मुझे इन इंजीनियरों से काफी मदद मिली। रोज-रोज रिपोर्टिंग के लिए एसटीडी टेलीफोन बूथ ही एकमात्र सहारा था। तब मोबाईल फोन या ईमेल की सुविधा नहीं थी। वहां के एसटीडी बूथ पर लोड ज्यादा होने के कारण समय से सूचनाएं भेज पाना संभव नहीं था। मेरी तत्परता और खबर भेजने का जोश देखकर विद्युत विभाग के इंजीनियर प्रभावित थे। उन्हें मुझसे लगाव सा हो गया था। उनके विशेष सहयोग से एसटीडी बूथ से खबरें भेजना मेरे लिए आसान हो गया। 3 दिसंबर की बात है – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह श्री सुदर्शन जी वहां हम सभी पत्रकारों को मिले। स्वदेश समाचार पत्र को प्रारंभ करने में बतौर मध्यभारत के प्रांत प्रचारक मा. सुदर्शन जी और जनसंघ के संगठन मंत्री कुशाभाऊ ठाकरे का बड़ा योगदान था। मुझे स्वदेश की यह बाते पता थी। मैं तत्काल माननीय सुदर्शन जी के पास गया और उनको बताया कि मैं स्वदेश समाचार पत्र से आया हूँ। मेरा नाम प्रभात झा है। उन्होंने हाल-चाल पूछा और यह भी पूछा कि विश्व संवाद केंद्र के लोगों से भेंट हुई कि नहीं ? मैंने कहा अभी तक नहीं हुई है। मा. सुदर्शन जी ने कहा कि विहिप से जारी खबरों के लिए आप सभी श्री रामशंकर अग्निहोत्री जी से जरूर संपर्क कर लें। फिर उन्होंने यह भी पूछा कि तुम कहा रुके हो? मैंने कहा कि श्री जयभान सिंह पवैया के साथ छोटी छावनी के महंथ श्री नृत्य गोपाल दास जी के आश्रम में रुके हैं। मा. सुदर्शन जी ने हम सभी पत्रकारों को कहा कि कोई भी दिक्कत हो तो रामशंकर अग्निहोत्री और वीरेश्वर द्विवेदी से मिल लेना। 3 दिसंबर के सायं अयोध्या के सभी भोजनालय में भोजन समाप्त गो गया था। प्रसाद के लिए कारसेवकपुरम में लोग टूट पड़े थे। अयोध्या क सभी महंथों के आश्रम और मंदिरों में भोजन के लिए कारसेवकों तांता लग गया था। यहाँ तक कि सैकड़ों की संख्या में पहुंचे फोटोग्राफर और पत्रकारों को 3 दिसंबर से ही भोजन की असुविधा होने लगी थी।
हम पत्रकारों ने 3 दिसंबर की रात्रि से ही यह अनुमान लगाना शुरू कर दिया था कि 6 दिसंबर तक यहाँ 3-4 लाख कारसेवकों की संख्या हो जायेगी। 4 दिसंबर को अयोध्या के राष्ट्रीय राजमार्ग पर जब हमने निगाहें दौडाई तो कारसेवकों के सिवा कुछ और नहीं दिख रहा था। एक तरफ जहाँ देशभर से कारसेवक आ रहे थे, वहीं सर्वाधिक कारसेवक उत्तरप्रदेश से आ रहे थे। राष्ट्रीय राजमार्ग थम सा गया था। हजारों वाहनों के पहिये रुक गए थे। गले में भगवा पट्टी और माथे पर भगवा साफा बांधे हजारों लोग पंक्तिबद्ध कतार में दिख रहे थे। लोग नारे लगा रहे थे – ”राम लला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे।’ वे कह रहे थे – ‘जो राम राम का नहीं, वः किसी काम का नहीं।’ हनुमानगढ़ी, कनक भवन, बाल्मिकी मंदिर, छोटी छावनी से लेकर सैकड़ों मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ पडी थी। लखनऊ, फैजाबाद और अयोध्या से प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस का वाहन अयोध्या की ओर आ रहा था। पूरी अयोध्या पुलिस छावनी का रूप धारण कर चुकी थी। अयोध्या लोगों को समेटने की सीमाएं तोड़ चुकी थी। वातावरण राममय और भगवामय हो गया था। सरयू पर बने पुल से जब कैमरे में सरयू तट पर स्नान कर रहे लाखों कारसेवकों का फोटो खींच रहे थे तो कैमरे के लेंस में लोग समा नहीं रहे थे। हिंदुत्व के ज्वार का ऐसा अद्भुत दृश्य हमने पहले कभी देखा था। जब हम लोगों के बीच पहुँच रहे थे तो कोई मलयाली बोल रहा था तो कोई तेलगू। पहनावे से पूरे भारत के अलग अलग राज्यों के लोगों को पहचाना जा सकता था। धोती, लुंगीनुमा धोती और पैन्ट-शर्ट पहने लोग भोजपुरी, बघेली, पंजाबी और हरियाणवी भाषा में रामजी के काम के लिए अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। लघु भारत का अनोखा दृश्य दिख रहा था। ‘राम सबके और सब राम के’ का भाव वहाँ हर तरफ, हर जगह देखा जा सकता था।
4 दिसंबर को हमने अयोध्या से लखनऊ मोटरसायकिल से जाने की योजना बनाई जाने से तक हमने लेकिन कारसेवकों का हुजूम और जय श्रीराम का उद्घोष – राम लला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे के गगनभेदी नारों से गुंजता वातावरण। हजारों वाहनों की कतारें हमारी हिम्मत को तोड़ रही थीं। हमें वापस लौटना ही पडा। इस दरम्यान राजमार्ग पर खड़े वाहनों के चालकों और सवार लोगों से जब हमने बात की तो पता चला कि वे कई दिनों से यहीं फंसे पड़े हैं। वे कहने लगे – अब तो हमारा भोजन भी समाप्त हो गया है। उन्होंने ने ही बताया कि गोरखपुर, मुजफ्फरपुर, पटना और देश के अन्य हिस्सों में भी यही हालत हैं। हर तरफ से रामभक्तों का हुजूम अयोध्या की ओर चल पडा है। जब हब वापस अयोध्या लौट कर आये तो हमारी मोटरसायकल को निकालने की जगह ही नहीं मिला रही थी। सड़कों पर कारसेवक सोते दिख रहे थे । जब कार सेवकों से बात की तो अधिकतर लोगों के मन में यही बात आई कि इस आर या पार होगा। कुछ लोग यह भी कह रहे थे कि कारसेवक इस बार कारसेवा करके ही जायेंगे। कार सेवकों के चेहरे पर सहसा गुस्सा भी दिख जाता था। लेकिन उनका गुस्सा संगठन के अनुशासन के कारण बंधा हुआ था। इस बीच राम लला परिसर में लोग ढोल-ढमाकों के साथ आने लगे थे। विहिप के जन्मभूमि न्यास के माध्यम से मंच भी बनने लगा था। 4 दिसंबर की रात्रि हम लोग सोये नहीं। हम कारसेवकों का उत्साह अपनी आँखों से देख रहे थे। सूर्य डूब रहा था, पर एक नए सूर्योदय का सन्देश दे रहा था। न डर का, न भय का वातावरण था। राम की भक्ति अयोध्या की धरती पर नये नये इतिहास रच रही थी। मध्यप्रदेश के राजगढ़ का युवा गीतकार व चित्रकार जिसका नाम सत्यनारायण मौर्य, जिसे प्यार से लोग बाबा मौर्य कहते हैं ने पूरी अयोध्या की दीवारों को अपनी तूलिका से राममय कर दिया था। लोग बता रहे थे बाबा मौर्य कई दिनों से अयोध्या में राम लला का उदघोष लिख रहे हैं। श्री राम जन्मभूमि न्यास से जुड़े संतों और देश के प्रसिद्ध अखाड़ों से जुड़े बाबाओं की ओर देशभर से आये मीडिया के कैमरे मुड़े हुए थे। सर्वाधिक भीड़ श्री राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंथ परमहंस रामचंद्र दास जी महाराज के पास था।
दिसंबर यानि कडाके की ठंढ। हर आश्रम में अंगीठी या लकड़ी जलाकर ठंढ को दूर करने का प्रयास किया जा रहा था। लेकिन दूसरी तरफ कारसेवकों की शारीरिक गर्मी से मौसमी ठंढ दूर हो रही थी। लोगों को लग ही नहीं रहा था कि ठंढ का महीना है। राम ज्वार से लोग अभिभूत थे। मैं अनेक बार अयोध्या गया। लेकिन अयोध्या में श्रद्धालुओं का ऐसा विहंगम दृश्य कभी नहीं देखा।
5 दिसम्बर को ढाई बजे रात से ही लोग सिर पर पोटली लिए सरयू तट की ओर निकल पड़े थे। इस भीड़ में गरीब -अमीर का भेद नहीं था। सब रामरस में सराबोर होकर समरस हो गए थे। हमें मानव सिर के अलावा कुछ और दिख ही नहीं रहा था। सरयू में डुबकी लगाने की होड़ लग गई थी। हम कुछ पत्रकार मित्र भी धक्का खाते हुए सरयू तट पर पहुँच गए थे। वहां पर स्व-अनुशासन का संगम दिख रहा था। लोग एक-दूसरे की सहायता कर रहे थे। पुलिस-प्रशासन ने सरयू नदी में बांस के खम्भों से बैरिकेट्स बना रखे थे। सरयू तट के किनारे पुण्य बटोरने में माता-बहनों के साथ बच्चे भी पीछे नहीं थे। 5 दिसंबर अरुणोदय के समय सरयू तट सूर्य की लालिमा से आच्च्छादित था। ज्यों-ज्यों सूर्य भगवान् पृथ्वी पर प्रकट हो रहे थे त्यों-त्यों लोग अपने-अपने बर्तन में सरयू का जल ले कर अर्घ्य दे रहे थे। किसी एक नदी तट पर बिना कुम्भ के इस तरह लाखो लोगो के एकत्रित होने का यह पहला नजारा था।
5 दिसंबर को दोपहर में रामलला परिसर में बने मंच पर सभा शुरू हुई। विवादित ढांचे के चारों ओर पुलिस ही पुलिस तैनात थी। हम कुछ पत्रकारों ने रात में तत्कालीन जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक से बात की। हमने उनसे पूछा कि इस अनियंत्रित भीड़ को कैसे सम्हालेंगे? अधिकारियों ने उत्तर दिया – हमने उप्र के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह जी को अयोध्या और उसके आस-पास की घटित जानकारियों से अवगत करा दिया है। इसी बीच हम सभी को सूचना मिली कि विहिप के अध्यक्ष अशोक सिंहल, विहिप के वरिष्ठ नेता गिरिराज किशोर सहित भाजपा के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी, वरिष्ठ बाजपा नेता डा. मुरली मनोहर जोशी, साध्वी उमा भारती, बजरंग दल के कुंवर जयभान सिंह पवैया, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा और आचार्य धर्मेन्द्र जैसे दिग्गजों की 6 दिसंबर को राम लला परिसर में सभा होगी।
इस बार के अयोध्या में विशेषता यह थी कि अधिकतर रामभक्त युवा थे। इन युवा रामभक्तों के चहरे पर जूनून और जज्बा देखा जा सकता था। रामभक्तों का जमावड़ा ऐसा लगा कि 5 दिसम्बर की शाम के बाद रामभक्तों के पंडाल में भोजन के लूट-पाट की ख़बरें आने लगी। केन्द्रीय पुलिस बल की टुकड़ियां भी रामघाट से लेकर पूरी अयोध्या में तैनात कर दी गई थीं। कल क्या होगा इसी उधेड़बुन में हम लोग रातभर जगते रहे। अयोध्या जन-जन की ध्वनि से गुंजायमान थी। 5 दिसंबर की रात्रि को ऐसा लग रहा था जैसे लोग सिर्फ अयोध्या की ओर ही आ रहे हैं। इसी रात विहिप, बजरंग दल] भाजपा के नेताओं ने अयोध्या पहुँच रहे सभी कारसेवकों से शान्ति की मार्मिक अपील की। अनेक लोगों ने पत्रकार वार्ता करके कहा कि इस उमड़ते जन सैलाब की रक्षा ही हमारी प्राथमिकता है। लोग ठिठुरते और कंपकंपाते लाखों लोगों ने सरयू किनारे 5 दिसंबर की सारी रात बिताई।
6 दिसंबर के भोर का अरुणोदय, लाखों युवाओं को तरुनोदय दे रहा था। अरुणोदय के दौरान फूट रही सूर्य की किरणें किसी नवोदित सन्देश को समेटे थी, जिसकी जानकारी सिर्फ सूर्य भगवान को ही थी। सुबह तीन-साढे तीन बजे से ही सरयू में डुबकियो का शोर गूंजने लगा। कंपकंपाते होंठ से सिर्फ रामधुन और जय श्रीराम के नारे लग रहे थे। अरुणोदय की किरणें जैसे जैसे सूर्योदय की ओर जा रही थीं, वैसे वैसे लोगों के पग रामलला के दर्शन की ओर बढ़ रहे थे।
6 दिसंबर सूर्योदय को देख हमें नहीं लगा था कि आज कोई इतिहास रचा जाएगा । हम सभी को लग रहा था कि सभी नेताओं के भाषण होंगे और राम शिला का पूजन होगा। लेकिन 6 दिसंबर के सूर्योदय के गर्भ में सच में इतिहास छुपा था जिसकी जानकारी दोपहर 11-12 बजे के बीच दुनिया को पता चल गया। सुबह के 10 बजते ही विहिप के अध्यक्ष और जन्मभूमि आन्दोलन के प्रणेता अशोक सिंहल मंच पर हैं, उपस्थित कारसेवकों को कहते हैं कि बैरिकेट्स को कोई भी पार न करे। हमने भगवा ब्रिगेड को कार सेवकों की सुरक्षा के लिए लगाया है। इसी बीच मंच पर श्री आडवानी जी, डा. जोशी जी, साध्वी उमा भारती जी, साध्वी ऋतंभरा जी और आचार्य धर्मेन्द्र आते हैं। हमलोग भीड़ में सुदर्शन जी के पास खड़े। बीबीसी के साउथ एशिया रिपोर्टर मार्क टुली सुदर्शन जी से अंगरेजी में कुछ चर्चा कर रहे थे। मार्क टुली जानना चाहते थे कि आगे क्या होने वाला है। सुदर्शन जी ने मार्क टुली को कहा – हिंदुत्व इस सोल आफ़ इंडिया। नाऊ यू सी दिस वेब आफ़ हिंदुत्व इन अयोध्या।” इसी बीच सुदर्शन जी हम पत्रकारों के बीच से कहीं निकल गए। जैसे ही घड़ी की सूई ने 11 बजने का इशारा किया अचानक हजारों कारसेवक विवादित ढाँचे के परकोटे की ओर कूद पड़े। श्री सिंहल जी माइक से आग्रह करते रहे , लेकिन रामभक्तों के मन में प्रज्वलित राम ज्वार विवादित ढाँचे पर फूट पडा देखते-देखते कुछ लोग ढांचे के गुम्बदों पर चढ़ कर भगवा ध्वज फहरा दिया और जय श्रीराम के नारे लगाने लगे। कंटीली तारों से लहू लुहान लोग विवादित ढांचे को ध्वस्त करने पर उतारू हो गए। यह देख कुछ लोग शान्त थे, लेकिन अधिकाश लोग रोमांचित हो रहे थे। वहां जो घट रहा था वह अविस्मरणीय, अद्भुत और अकल्पनीय था। बावजूद इसके कि मैं एक पत्रकार था, मैं भी रोमांचित हो उठा।
रोकने वाले कार सेवकों को रोकते रहे, पर कारसेवक विवादित ढांचे को तोड़ते रहे। साधु-संत, बूढ़े-जवान सब उस घट रहे इतिहास का साक्षी बनना चाह रहे थे। पुलिस भीड़ को तितर-बितर कर रही थी। इस बीच पता चला कि मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने प्रशासन को सख्त निर्देश दिए थे कि चाहे जो मजबूरी हो, लेकिन कार सेवकों पर गोली नहीं चलेगी। यहाँ तो यह भी दिख रहा था कि कई पुलिस वाले भी जय श्री राम के नारे लगा रहे थे। 11:25 बजे पहला गुम्बद टूटने लगा। वह कौन-सी अदृश्य शक्ति थी, वह कौन सा अदृश्य साहस था जो विवादित ढाँचे को तोड़ रहा था इसे कोई नहीं देख पा रहा था। डेढ़ से दो घंटे में पूरा विवादित ढांचा धूल-धूसरित हो गया। तत्काल पूरे उप्र में कर्फ्यू लगा दी गई। इसी बीच पुजारियों ने रामलला को गुलाबी चादरों में लपेटकर उन्हें उचित स्थान पर स्थापित कर दिया। ढांचा तोड़ते समय अनेक लोग घायल हुए, कई लोगो की मृत्यु भी हुई। लेकिन कारसेवक अपने काम से डिगे नहीं। थोड़ी देर बाद वहां पर श्री परमहंस रामचंद्र दास जी, महंथ नृत्य गोपाल दास जी, और अशोक सिंहल जी भी वहां आये और उन्होंने रामलला के दर्शन किये।
मैं पत्रकारिता धर्म का निर्वाह कर रहा था। ढांचे के पास से ही अपने सम्पादक श्री जय किशन शर्मा जी को टेलीफोन से आँखों देखी हाल बता रहा था। इस स्थिति में भी पत्रकारिता धर्मं का निर्वाह करने का साहस स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम दे रहे थे। एक-एक घटना क्रम की जानकारी मैं स्वदेश के सम्पादकीय विभाग को देता रहा। इसी बीच मैंने कानपुर के एक स्वतंत्र पत्रकार साथी से आग्रह किया कि आज रात्री तक ही मुझे ग्वालियर पहुंचना है। मैंने उन्हें बताया कि 6 दिसंबर की ऐतिहासिक घटना की स्वदेश के पाठको तक मैं 7 की सुबह ही पहुंचाना चाहता हूँ। तब न वाट्सेप था और न ही ईमेल हमारे पास था पत्रकार का धर्म और पत्रकारिता का जूनून। बसें बंद हो गई थीं। अयोध्या से बाहर जाना संभव नहीं था। लेकिन समाचार के लिए ऐतिहासिक घटना की फोटो जरूरी थी। फोटो भेजने का कोई और उपाय नहीं था। तब मैंने साथी ओमप्रकाश तिवारी से कहा कि मुझे मोटरसायकिल से ग्वालियर ले चलो। हम दिन के 2 बजे अयोध्या से निकल पड़े। छुपते-छुपाते फैजाबाद पहुंचे। वहां से लखनऊ। लखनऊ पहुचकर पता चला कि पूरे उप्र में कर्फ्यू लग चुका है। वहां से जैसे तैसे शाम 6-7 बजे कानपुर पहुंचे। वहां से बीहड़ों से होते हुए इटावा। रात लगभग 10:30 बजे इटावा से ग्वालियर के लिए रवाना हुए। इस बीच अपने सम्पादक जी को बता दिया कि हम रात्रि 2 बजे तक ग्वालियर पहुँच जाएंगे। इटावा से भिंण्ड के बीच रात्रि में भड़कों के बीच से निकलना खतरे से खाली नही थाl वहां दस्युओं का भी बहुत खतरा था। लेकिन हम और ओमप्रकाश तिवारी मोटर सायकल के साथ आगे बढ़ रहे थे। आखिर रामजी का काज था, कोई कैसे रोक सकता था। रात्रि 12 बजे हम मध्यप्रदेश की सीमा भिंड में प्रवेश कर चुके थे। अब हमें 70-75 किमी की यात्रा और करनी थी। थकान सिर चढ़ कर बोल रहा था, लेकिन आँखों के सामने घटित इतिहास और उसका चित्र पाठकों तक पहुँचाने का रोमांच इस थकान पर भारी था। मेरे भीतर पत्रकारिता धर्म का निर्वाह करने का कर्तव्य बोध जगा हुआ था। साहस टूटी नहीं, कलम थमी नहीं। हम रात्रि 2 बजे स्वदेश कार्यालय पहुचकर सुबह पाठकों को देने के लिए सब कुछ तैयार कर चुके थे। 7 दिसंबर की सुबह वही 6 दिसंबर की अयोध्या का आँखों देखा हाल सचित्र पाठकों की आँखों के सामने था। 5 अगस्त, 2020 को होने वाला रामलला मंदिर निर्माण भूमि पूजन 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या की आँखों देखी को फिर ताजा करने वाला होगा। यह रामजन्मभूमि आन्दोलन के हुतात्माओं के प्रति पत्रकार की शब्दांजलि रुपी श्रद्धांजलि होगी।
न कोइ योजना थी
न षडयन्त्र था
जब अयोध्या मे ढांचा टूट गया, उसके बाद वहा पर अफवाह फैलाई गयी कि ढांचा तोड़ने की योजना पूर्व मे कार सेवको द्वारा बना ली गई थी। यह सरासर गलत था। कोई योजना नही थी। कारसेवक बार-बार अयोध्या आ-आ कर थक गए थे।
सन १९९० जब मुलायम सिहजी की सरकार थी तब कारसेवको पर चली गोली आखो के सामने थी। अतः कारसेवको का धैर्य टूट गया। उन्होने न आव देखा न ताव। उन्होने कहा न रहे बाँस न बजे बाँसुरी।
( राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी, पूर्व सांसद )

कश्मीरी पंडितों की वापसी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और सुप्रसिद्ध नेता डाॅ. फारुक अब्दुल्ला ने एक वेबिनार में गजब की बात कह दी है। उन्होंने कश्मीर के पंडितोें की वापसी का स्वागत किया है। कश्मीर से तीस साल पहले लगभग 6-7 लाख पंडित लोग भागकर देश के कई प्रांतों में रहने लगे थे। अब तो कश्मीर के बाहर इनकी दूसरी और तीसरी पीढ़ी तैयार हो गई है। अब कश्मीर में जो कुछ हजार पंडित बचे हुए हैं, वे वहां मजबूरी में रह रहे हैं। केंद्र की कई सरकारों ने पंडितों की वापसी की घोषणाएं कीं, उन्हें आर्थिक सहायता देने की बात कही और उन्हें सुरक्षा का आश्वासन भी दिया लेकिन आज तक 100-200 परिवार भी वापस कश्मीर जाने के लिए तैयार नहीं हुए। कुछ प्रवासी पंडित संगठनों ने मांग की है कि यदि उन्हें सारे कश्मीर में अपनी अलग बस्तियां बसाने की सुविधा दी जाए तो वे वापस लौट सकते हैं लेकिन कश्मीरी नेताओं का मानना है कि हिंदू पंडितों के लिए यदि अलग बस्तियां बनाई गईं तो सांप्रदायिक ज़हर तेजी से फैलेगा। अब डाॅ. अबदुल्ला जैसे परिपक्व नेताओं से ही उम्मीद की जाती है कि वे कश्मीर पंडितों की वापसी का कोई व्यावहारिक तरीका पेश करें।
कश्मीरी पंडितों का पलायन तो उसी समय (1990) शुरु हुआ था, जबकि डाॅ. फारुक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे। जगमोहन नए-नए राज्यपाल बने थे। उन्हीं दिनों भाजपा नेता टीकालाल तपलू, हाइकोर्ट के जज नीलकंठ गंजू और पं. प्रेमनाथ भट्ट की हत्या हुई थीं। कई मंदिरों और गुरुद्वारों पर हमले हो रहे थे। मस्जिदों से एलान होते थे कि काफिरों कश्मीर खाली करो। पंडितों के घरों और स्त्रियों की सुरक्षा लगभग शून्य हो गई थी। ऐसे में राज्यपाल जगमोहन क्या करते ? उन्होंने जान बचाकर भागनेवाले कश्मीरी पंडितों की मदद की। उनकी सुरक्षा और यात्रा की व्यवस्था की। जगमोहन और फारुक के बीच ठन गई। यदि पंडितों के पलायन के लिए आज डाॅ. फारुक जगमोहन के विरुद्ध जांच बिठाने की मांग कर रहे हैं तो उस जांच की अग्नि-परीक्षा में सबसे पहले खुद डाॅ. फारुक को खरा उतरना होगा। बेहतर तो यह होगा कि ‘बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध लेय’! पंडितों के उस पलायन के लिए जो भी जिम्मेदार हो, आज जरुरी यह है कि कश्मीर के सारे नेता फिर से मैदान में आएं और ऐसे हालात पैदा करें कि आतंकवाद वहां से खत्म हो और पंडितों की वापसी हो।

राम मन्दिर का निर्माण शुरू होने का मुहूर्त आ गया है
हर्षवर्धन पाठक
पांच अगस्त को राम मन्दिर का बहु प्रतीक्षित निर्माण प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा भूमि पूजन से प्रारम्भ होगा। यह मंदिर तीन एकड़ में बनेगा लेकिन लगभग सत्तर एकड़ भूमि का विस्तार इसके लिए प्रस्तावित किया गया है। इस महात्वांकाक्षी परियोजना का प्रस्ताव फिलहाल तीन सौ करोड़ रुपए का है।यह विचित्र बात है कि जिस भूमि का नाप सड़सठ एकड़ शुरु में बताया गया वह भूमि जब नापी गई तब सत्तर एकड़ निकली। भूमि नाप का यह अन्तर प्रशासनिक त्रुटि का प्रतीक है ।यह तो अच्छा हुआ कि इस मामले में लाभार्थी एक ही पक्ष था। यदि विवाद में दो या अधिक पक्ष होते तो माननीय न्यायालय यदि तदनुसार कोई निर्णय देता तो उलझन की बात होती।
यह प्रस्तावित है कि जो राममंदिर बनेगा उसके क्षेत्र में प्रसादालय , यज्ञ मण्डप और जन सुविधा भी होंगी तो प्रसाद बनाने का रसोई घर भी होगा और पुजारियों के लिए आवास भी बनेंगे। इस क्षेत्र में शेषावतार का मंदिर भी निर्मित होगा तथा पंच देव का मंदिर भी बनेगा। यह उल्लेखनीय है कि लक्ष्मणजी को शेष का अवतार माना जाता है। प्रस्तावित मन्दिर में राम – सीता की प्रतिमा तो होगी तो राम अकेले नहीं होंगे तो तीनों भाइयों और हनुमान के साथ विराजमान होंगें। इस मंदिर की विशेषता यह भी होगी कि इसके
दरबार हाल से हनुमान गढ़ी के भी दर्शन किये जा सकेंगे। वैसे एक हनुमत द्वार भी बनेगा।
प्रस्तावित मन्दिर श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र के नाम से जाना जाएगा।यह क्षेत्र अयोध्या का का उपनगर कहलाएगा। इसे हाइ टेक सिटी की तरह विकसित किया जाएगा।श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र निर्माण से करोड़ों हिन्दुओं का सपना पूरा होगा।लगभग तीन सौ करोड़ रुपए की इस महत्वपूर्ण परियोजना के अन्तर्गत परिक्रमा पथ का निर्माण भी प्रस्तावित है। अन्य अनेक कार्य भी किए जाएंगे।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्म त्रेता युग में हुआ और आदि कवि वाल्मीकि ने रचना उस समय की थी लेकिन राम मंदिर का निर्माण अयोध्या में बाद में हुआ। इसका कारण अनेक विद्वान यह बताते हैं पहले पूजा के लिए मंदिर का प्रचलन नहीं था। वैदिक युग में यज्ञ होते थे। इस कारण मन्दिरों का निर्माण नहीं हुआ। मंदिर जा कर पूजा करने की प्रथा बाद में शुरू हुई। इस कारण अयोध्या में राम मंदिर बाद में ग्यारहवीं सदी में बना। इस वजह से अधिकांश मन्दिर बाद में बने यद्यपि राम बहुत पहले त्रेता युग में हुए।
महर्षि वाल्मीकि को यह श्रेय दिया जाता है कि विश्व का पहला महाकाव्य लिख कर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन चरित्र की प्रस्तुति उन्होंने की। बाद में गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस का सृजन किया। लेकिन तुलसी के पूर्व (महर्षि वाल्मीकि के बाद) अनेक भाषाओं में राम कथा का गायन हो चुका था।
इनमें कई भारतीय भाषाएं हैं और विदेशी भाषाएं भी हैं। इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय है बंगला भाषा में लिखी गई कृतिवास रामायण तथा तमिल भाषा में महाकवि कम्बन द्वारा रचित कम्ब रामायण।कम्बन ने अपने ग्रंथ का नाम रामावतारम रखा था परन्तु यह ग्रंथ कम्ब रामायण के नाम से अधिक लोकप्रिय हुआ। इस रामायण में लगभग दस हजार पद हैं। वाल्मीकि रामायण को आधार बनाकर लिखी गई इस रचना को कुछ विद्वान अधिक उत्कृष्ट मानते हैं। अनेक देशों में राम कथा अनेक रूपों में प्रचलित है।इस कारण भी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का महत्व है। जैसा पहले लिखा गया है अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण ऐतिहासिक घटना है।

भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन
विजय कुमार जैन
भारतीय संस्कृति में पर्वों का प्राचीनकाल से विशेष महत्व रहा है। प्रत्येक त्यौहार के साथ धार्मिक मान्यताओं, सामाजिक एवं ऐतिहासिक घटनाओं का संयोग प्रदर्शित होता है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी अपना संदेश आम जनता तक पहुँचाने के लिये त्यौहारों एवं मेलों का मंच के रूप में उपयोग होता था। हम चर्चा कर रहे हैं ऐसे ही पर्व रक्षाबंधन की। रक्षाबंधन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का प्रमुख त्यौहार माना जाता है जो श्रावण मास पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहन अपनी रक्षा के लिये भाई को राखी बांधती है।
यह पर्व मात्र रक्षा का संदेश नहीं देता, अपितु प्रेम,
समर्पण, निष्ठा व संकल्प के द्वारा हृदयों को भी बांधने का वचन देता है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है ” मयि सर्व मिदंप्रोक्तं सूत्रे मणिगणाइव”
अर्थात सूत्र अविच्छन्नता का प्रतीक है क्योंकि सूत्र/धागे बिखरे हुए हैं मोतियों को अपने में पिरोकर एक माला में एकाकार बनाता है। माला के सूत्र की तरह रक्षासूत्र भी लोगों को जोड़ता है। पुराणों में रक्षाबंधन का उल्लेख मिलता है। रक्षा हेतु इन्द्राणी ने इन्द्र सहित देवताओं की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा और इन्द्र ने राक्षसों से युद्ध में विजय पायी। एक कथा के अनुसार राजा बलि को दिये वचन अनुसार भगवान विष्णु बैकुंठ छोड़कर बलि के राज्य की रक्षा के लिये चले गये। तब देवी लक्ष्मी ने ब्राह्मणी का रूप धर श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि की कलाई पर पवित्र धागा बांधा, उनके कहने पर बलि ने भगवान विष्णु से बैकुंठ लौटने की विनती की। रावण की बहन शूर्पणखा लक्ष्मण के द्वारा नाक काटने के पश्चात रावण के पास पहुंची और खून से मैली साड़ी का एक छोर रावण की कलाई में बांध दिया और कहा भैया जब-जब तुम अपनी कलाई को देखोगे तुम्हारी अपनी बहन का अपमान याद आयेगा और मेरी नाक काटने बालों से तुम बदला ले सकोगे। भगवान श्री कृष्ण के हाथ में चोट लगने पर एक बार द्रौपदी ने अपनी चुनरी का किनारा फाड़ कर घाव पर बांध दिया था।
दुशासन द्वारा द्रौपदी का चीरहरण प्रयास इसी बंधन के प्रभाव से असफल हुआ। श्री कृष्ण ने द्रौपदी की रक्षा की। युधिष्ठिर ने एक बार श्रीकृष्ण से पूछा कि वह महाभारत के युद्ध में कैसे बचेंगे , जवाब में श्री कृष्ण ने कहा राखी का धागा ही तुम्हारी रक्षा करेगा। सिकन्दर व पोरस के युद्ध के पूर्व रक्षा सूत्र का आदान प्रदान हुआ था। दोनों ने रक्षा सूत्र की मर्यादा का पालन किया था। मुगल काल में मुगल सम्राट हुमायूँ चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण करने बढ़ा तो राणा सांगा की विधवा कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर अपनी रक्षा का वचन लिया। हुमायूँ ने इसे स्वीकार करके चित्तौड़ पर आक्रमण का विचार मन से निकाल दिया और आगे राखी का वायदा निभाने के लिये चित्तौड़ की रक्षा हेतु गुजरात के बादशाह से भी युद्ध किया।
स्वाधीनता आन्दोलन में भी बहनों ने अपने भाइयों को राखी बांधकर देश को आजाद कराने का वचन लिया। सन 1905 में बंग-भंग आन्दोलन का शुभारंभ एक-दूसरे को रक्षा सूत्र बांधकर हुआ। आजादी के आन्दोलन की एक घटना चन्द्रशेखर आजाद से जुड़ी हुई है। आजाद एक तूफानी रात शरण लेने एक विधवा के घर पहुंचे। पहले तो उसने उन्हें डाकू समझकर शरण देने से मना कर दिया। बाद में यह पता चलने पर कि वह क्रांतिकारी आजाद है तो ससम्मान उन्हें घर के अंदर ले गई। बातचीत के दौरान आजाद को पता चला कि उस विधवा को गरीबी के कारण जबान बेटी की शादी हेतु काफी परेशानी उठानी पड़ रही है।। यह जानकर आजाद को वहुत दुख हुआ। उन्होंने विधवा को प्रस्ताव दिया कि मेरी गिरफ्तारी पर पाँच हजार रुपये का इनाम है, तुम मुझे अंग्रेजों को पकड़वा दो और उस इनाम से बेटी की शादी कर देना, यह सुनकर विधवा रो पड़ी व कहा भैया तुम देश की आजादी हेतु अपनी जान हथेली पर रखकर चल रहे हो और न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्ज़त तुम्हारे भरोसे है, मैं हरगिज ऐसा नहीं कर सकती। यह कहते हुए उसने एक रक्षा सूत्र आजाद के हाथ पर बांधकर देश सेवा का वचन लिया। सुबह जब विधवा की आँख खुली तो आजाद जा चुके थे और तकिये के नीचे पाँच हजार रुपये रखे हुए थे, साथ ही उसके साथ एक पर्चा रखा था जिस पर लिखा था कि अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी सी भेंट -आजाद। भारत में रक्षाबंधन का त्यौहार अलग अलग तरीकों से अपनी मान्यता अनुसार मनाया जाता है। मुंबई के समुद्री क्षेत्रों में
नारियल पूर्णिमा या कोकोनट फुलमून के नाम से मनाया जाता है। उत्तराखंड के चम्पावत जिले के देवीधूरा में राखी पर्व पर बाराहीदेवी को प्रसन्न करने के लिये पाषाणकाल से ही पत्थर युद्ध का आयोजन किया जाता है। इस युद्ध में आज तक कोई भी गंभीर रूप से घायल नहीं हुआ। जैन धर्म में रक्षाबंधन पर्व का विशेष महत्व है। प्राचीन काल में मुनि अकम्पनाचार्य आदि 700 मुनियों पर असुरों द्वारा हस्तिनापुर में उपसर्ग किया। सभी मुनियों को बंदी बनाकर बलि देने का निर्णय लिया। मुनि विष्णु कुमार को इसका पता चला तो उन्होंने अपनी वैक्रिया सिद्धि के द्वारा असुर शक्तियों को निर्बल किया तथा 700 मुनियों की अकम्पनाचार्य सहित रक्षा की। मुनियों की रक्षा की स्मृति में यह रक्षाबंधन पर्व मनाया जाता है। रक्षाबंधन के दिन जैन मंदिरों में 700 मुनियों की रक्षाबंधन पूजन करते है तथा इस अवसर पर धर्म और संस्कृति की रक्षा के प्रतीक रक्षासूत्र बांधते हैं।
रक्षाबंधन पर्व की एक रोचक घटना हरियाणा के फतेहपुर गाँव की है। फतेहपुर में सन 1857 में एक युवक गिरधरलाल को रक्षाबंधन के दिन अंग्रेजों ने तोप से बांधकर उड़ा दिया। इस घटना के बाद ग्रामीणों ने गिरधरलाल को शहीद का सम्मान देकर रक्षाबंधन पर्व मनाना बंद कर दिया। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 150 वर्ष पूर्ण होने पर सन 2006 में इस गाँव के लोगों ने रक्षाबंधन पर्व पुनः मनाने का संकल्प लिया।
रक्षाबंधन पर्व का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व है। यह पर्व हमारे सामाजिक परिवेश एवं मानवीय मूल्यों का अभिन्न अंग है। आज आवश्यकता है आडंबर के बजाय इस त्यौहार के पीछे छुपे हुए संस्कारों और नैतिक मूल्यों का सम्मान किया जाना चाहिए तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र का कल्याण संभव होगा।

नई शिक्षा नीतिः कुछ नई शंकाएं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
नई शिक्षा नीति में मातृभाषाओं को जो महत्व दिया गया है, कल मैंने उसकी तारीफ की थी लेकिन उसमें भी मुझे चार व्यावहारिक कठिनाइयां दिखाई पड़ रही हैं। पहली, यदि छठी कक्षा तक बच्चे मातृभाषा में पढ़ेंगे तो सातवीं कक्षा में वे अंग्रेजी के माध्यम से कैसे निपटेंगे ? दूसरी, अखिल भारतीय नौकरियों के कर्मचारियों के बच्चे उनके माता-पिता का तबादला होने पर वे क्या करेंगे ? प्रांत बदलने पर उनकी पढ़ाई का माध्यम भी बदलना होगा। यदि उनकी मातृभाषा में पढ़नेवाले 5-10 छात्र भी नहीं होंगे तो उनकी पढ़ाई का माध्यम क्या होगा? तीसरी, क्या उनकी आगे की पढ़ाई उनकी मातृभाषा में होगी ? क्या वे बी.ए., एम.ए. और पीएच.डी. अपनी भाषा में कर सकेंगे ? क्या उसका कोई इंतजाम इस नई शिक्षा नीति में है ? चौथी बात, जो सबसे महत्वपूर्ण है। वह यह है क्या ऊंची सरकारी और गैर-सरकारी नौकरियां भारतीय भाषाओं के माध्यम से मिल सकेंगी ? क्या भर्ती के लिए अंग्रेजी अनिवार्य होगी ? यदि हां, तो माध्यम का यह अधूरा बदलाव क्या निरर्थक सिद्ध नहीं होगा ? अर्थात पढ़ाई का माध्यम मातृभाषा या राष्ट्रभाषा हो और नौकरी का, रुतबे का, वर्चस्व का माध्यम अंग्रेजी हो तो लोग अपने बच्चों को मातृभाषा, प्रादेशिक भाषा या राष्ट्रभाषा में क्यों पढ़ाएंगे ? वे अपने बच्चों को कान्वेन्ट में भेजेंगे। कई राज्य अपनीवाली चलाएंगे। वे कहेंगे कि शिक्षा तो संविधान की समवर्ती सूची में है। हम अपने बच्चों को नौकरियों, बड़े ओहदों और माल-मत्तों से वंचित क्यों करेंगे ? हमारे देश में आज भी लगभग 50 प्रतिशत बच्चों को लोग निजी स्कूलों में क्यों पढ़ाते हैं ? शिक्षा की ये मोटी-मोटी दुकानें क्यों फल-फूल रही हैं ? ये स्कूल लूट-पाट के अड्डे क्यों बने हुए हैं ? क्योंकि ऊंची जातियों, शहरियों और मालदारों के बच्चे इन स्कूलों की सीढ़ियों पर चढ़कर शासक-वर्ग में शामिल हो जाते हैं। देश के 80-90 प्रतिशत लोगों को अवसरों की समानता से ये स्कूल ही वंचित करते हैं। लोकतंत्र को इस मुट्ठीतंत्र से मुक्ति दिलाने में क्या यह नई शिक्षा नीति कुछ कारगर होगी ? मुझे शक है। इस नीति में मुझे एक खतरा और भी लग रहा है। यह विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में जमने की भी छूट दे रही है। ये विश्वविद्यालय हमारे विश्वविद्यालयों में क्या हीनता-ग्रंथि पैदा नहीं करेंगे? क्या ये अंग्रेजी के वर्चस्व को नहीं बढ़ाएंगे ? क्या ये देश में एक नए श्रेष्ठि वर्ग को जन्म नहीं देंगे ? मैं अफगानिस्तान, ब्रिटेन, सोवियत रुस और अमेरिका के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में अपनी पीएच.डी. के लिए पढ़ता और शोध करता रहा हूं और कई अन्य देशों में पढ़ाता भी रहा हूं लेकिन मैंने हमेशा महसूस किया कि यदि उन राष्ट्रों की तरह हम भी अपने उच्चतम शिक्षा, शोध और नौकरियों का माध्यम स्वभाषा ही रखें तो भारत भी शीघ्र ही महाशक्ति बन सकता है।

ऑनलाइन कंपनियों द्वारा बौद्धिक चोरी
सनत जैन
अमेरिका में फेसबुक, अमेजॉन, गूगल, एप्पल के खिलाफ व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा संबंधी कानून के उल्लंघन को लेकर पूछताछ चल रही है। यह चारों कंपनियां सारी दुनिया में एकाधिकार के बल पर भारी कमाई कर रही हैं। भारत सहित वैश्विक बाजार पर जिस तरह से यह कंपनियां अपना प्रभाव बनाती हैं। प्रतिस्पर्धी को खत्म करने के लिए वैध और अवैध तरीके अपनाकर एकाधिकार कायम करती हैं। इसको लेकर अमेरिकी सांसदों की समिति इन कंपनियों के खिलाफ जांच कर रही है। मार्क जुकरबर्ग, जैफ बेजोस, सुंदर पिचाई और टिम कुक अमेरिकी सांसदों की कमेटी के सामने उनके प्रश्नों का जवाब दे रहे हैं।
गूगल पर आरोप है कि उसने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) को किसी भी अन्य संगठन के मुकाबले ज्यादा महत्व दिया है। डब्ल्यूएचओ ने अमेरिका से सच छुपाया और गूगल ने डब्ल्यूएचओ के पक्ष में काम कर अप्रत्यक्ष रूप से चीन को फायदा पहुंचाया।
अमेरिका जब इन कंपनियों के चंगुल में फंसा, तब जाकर नियंत्रण करने की कोशिश शुरू हुई हैं। सांसदों ने इन चारों कंपनियों के प्रमुखों से जब सवाल किए, तो इन्हें जवाब देना मुश्किल हो गया।
भारत से सबसे ज्यादा ऑनलाइन कमाई
इन चारों कंपनियों ने भारत को दोनों हाथों से लूटने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। भारत सबसे बड़ा बाजार है, इस बाजार में उत्पाद बेचने, यहां का डेटा, सारे विश्व में बेचने और भारत से पैसे कमाने के लिए इन्हीं चारों कंपनियों का उपयोग विश्व भर की कंपनियों ने किया है। इन चारों कंपनियों के लिए भारत सबसे बड़ा बाजार है। भारत के बाजार में इन चारों कंपनियों ने एकाधिकार बनाकर पिछले 20 वर्षों में विशेष रुप से 2010 के बाद से बहुत मनमानी की है।भारत की जानकारियां,सूचनाएं, डाटा और आइडिया चुराकर अरबों- खरबों रुपए कमाए हैं।भारत सरकार इन कंपनियों के आगे एक तरह से नतमस्तक होकर खड़ी हुई है। जिसके कारण यह भारत से कमाई भी कर रहे हैं और भारत सरकार को टैक्स भी अदा नहीं कर रहे हैं।
सबसे ज्यादा बौद्धिक चोरी भारत से पिछले 20 वर्षों में इन कंपनियों ने फ्री के प्लेटफार्म देकर मनमानी शर्तों पर उपयोगकर्ताओं से सहमति करा कर आम आदमियों के साथ बड़ा धोखा किया है। भारत के जितने भी बौद्धिक लोग हैं, उनके आइडिया, जानकारी और उनकी समस्त व्यापारिक गतिविधियों को अपने डेटाबेस बनाकर अरबों-खरबों रुपए इन कंपनियों ने भारत से कमाए हैं। लेकिन इन कंपनियों ने भारत में कॉपीराइट एक्ट का पालन भी नहीं किया। इन चारों कंपनियों के पास खुद के कोई कंटेंट नहीं है। न ही यह कोई कंटेंट तैयार करती हैं। सारे लोग इन कंपनियों के विभिन्न प्लेटफार्म में अपनी जानकारी, कंटेंट और आइडिया पोस्ट करते हैं। जिन्हें चुराकर अथवा कॉपीराइट एक्ट का पालन नहीं करके यही कंपनियां खरबों रुपए कमा रही हैं। भारत सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई है। भारत सरकार अभी तक उपयुक्त कानून भी नहीं बना पाई है। भारत सरकार को अमेरिका से सबक लेने की जरूरत है। इन बड़ी मछलियों को काबू में लाने की आवश्यकता है, जो पूरे भारत का व्यापारिक, आर्थिक एवं बौद्धिक शोषण हर तरीके से कर रही हैं। इसके लिए उपयुक्त कानून बनाने के साथ ही बौद्धिक संपदा अधिकार की रक्षा करना भी सर्वोच्च प्राथमिकता में होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो भारत को जहां आर्थिक नुकसान तो होगा ही इसके साथ साथ हम एक बार फिर इनके गुलाम होकर रह जाएंगे।

नई शिक्षा नीतिः कुछ प्रश्न
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
नई शिक्षा नीति का सबसे पहले तो इसलिए स्वागत है कि उसमें मानव-संसाधन मंत्रालय को शिक्षा मंत्रालय नाम दे दिया गया। मनुष्य को ‘संसाधन’ कहना तो शुद्ध मूर्खता थी। जब नरसिंहरावजी इसके पहले मंत्री बने तो मैंने उनसे शपथ के बाद राष्ट्रपति भवन में कहा कि इस विचित्र नामकरण को आप क्यों स्वीकार कर रहे हैं ? उनके बाद मैंने यही प्रश्न अपने मित्र अर्जुनसिंहजी और डाॅ. मुरलीमनोहर जोशी से भी किया लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार को बधाई कि उसने इस मंत्रालय का खोया नाम लौटा दिया।
पिछले 73 वर्षों में भारत ने दो मामलों की सबसे ज्यादा उपेक्षा की। एक शिक्षा और दूसरी चिकित्सा। उसका परिणाम सामने है। भारत की गिनती अभी भी पिछड़े देशों में ही होती है, क्योंकि शिक्षा और चिकित्सा पर हमारी सरकारों ने बहुत कम ध्यान दिया और बहुत कम खर्च किया। इनमें से एक बुद्धि को दूसरी शरीर को बुलंद बनाती है। तन और मन को तेज करनेवाली दृष्टि तो मुझे इस नई शिक्षा नीति में दिखाई नहीं पड़ती। इस नई नीति में न तो शारीरिक शिक्षा पर मुझे एक भी शब्द दिखा और न ही नैतिक शिक्षा पर। यदि शिक्षा शरीर को सबल नहीं बनाती है और चित्तवृति को शुद्ध नहीं करती है तो यह कैसी शिक्षा है ? बाबू बनाने, पैसा गांठने और कुर्सियां झपटना ही यदि शिक्षा का लक्ष्य है तो ये काम तो सर्वथा अशिक्षित लोग भी बहुत सफलतापूर्वक करते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि इस नई शिक्षा नीति में नया कुछ नहीं है। काफी कुछ है। इसमें मातृभाषा को महत्व मिला है। छठी कक्षा तक सभी बच्चों को स्वभाषा के माध्यम से पढ़ाया जाएगा। यह अच्छी बात है लेकिन हमारी सरकारों में इतना दम नहीं है कि वे दो-टूक शब्दों में कह सकें कि छठी कक्षा तक अंग्रेजी या किसी विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ाने पर प्रतिबंध होगा। यदि ऐसा हो गया तो शिक्षा के नाम पर चल रही निजी दुकानों का क्या होगा ? त्रिभाषा-व्यवस्था जिस तरह से की गई है, ठीक है लेकिन अंग्रेजी की पढ़ाई को स्वैच्छिक क्यों नहीं किया गया ? यदि भाजपा की सरकार भी कांग्रेसी ढर्रे पर चलेगी तो उसे अपने आप को राष्ट्रवादी कहने का अधिकार कैसे सुरक्षित रहेगा ? क्या इस नई शिक्षा नीति के अनुसार सभी विषयों की एम.ए. और पीएच.डी. की शिक्षा भी भारतीय भाषाओं के माध्यम से होगी ? आज से 55 साल पहले मैंने जवाहरलाल नेहरु विवि में अपना अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोधग्रंथ हिंदी में लिखने की लड़ाई लड़ी थी। पूरी संसद ने मेरा समर्थन किया। मेरी विजय हुई लेकिन आज भी लगभग सारा शोध अंग्रेजी में होता है। इस अंग्रेज के बनाए ढर्रे को आप कब बदलेंगे ? ये तो मेरे कुछ प्रारंभिक और तात्कालिक प्रश्न हैं लेकिन नई शिक्षा नीति का जब मूल दस्तावेज हाथ में आएगा, तब उस पर लंबी बहस की जाएगी।

जय श्रीराम भाजपा की ‘नामनीति’ के बाद अब ‘रामनीति’….?
ओमप्रकाश मेहता
भारत पर पिछले पचहत्तर महीनों से राज कर रही भारतीय जनता पार्टी की ‘नामनीति’ अब ‘रामनीति’ में परिवर्तित होने जा रही है, चूंकि इस सत्तारूढ़ दल में सब कुछ मोदी जी के ‘नाम’ पर ही होता आ रहा है और इसी ‘नामनीति’ के नाम पर ‘कामनीति’ भी तैयार की गई थी, वह अब ‘रामनीति’ में परिवर्तित होने जा रही है, क्योंकि अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास के बाद अब मोदी जी के शेष कार्यकाल में ‘रामनीति’ पर ही राज चलने वाला है और मोदी जी के अगली 2024 में पुनः ताजपोशी भी इसी रामनीति के आधार पर होगी, अर्थात अब अयोध्या में राम मंदिर और मोदी जी की अगली सरकार का स्वर्णिम भवन दोनों एक साथ ही तैयार होगें और जैसा कि कहा जा रहा है कि भव्य मंदिर के निर्माण में तीन साल का समय लगेगा, तो यह भव्य राम मंदिर जुलाई-अगस्त 2023 तक पूरा हो पाएगा और इसके सिर्फ आठ महीने बाद अप्रैल-मई में लोकसभा के चुनाव सम्पन्न होना है, तो मोदी जी की अगली विजय का भी मुख्य आधार भी यह राम मंदिर ही होगा, अर्थात् यदि यह कहा जाए कि मंदिर के भूमिपूजन के साथ मोदी जी की सत्ता के तीसरे चरण का भी यह शिलान्यास हो रहा है, तो कतई गलत नहीं होगा। क्योंकि भाजपा अपना एक बरसों पुराना वादा इसी कार्यकाल में पूरा करने जा रही है, जो भाजपा के साथ देश के हिन्दुओं का भी सुनहरा सपना था।
देवता के शयनकाल के दौरान कराये जा रहे इस मांगलिक कार्य के बारे में जब प्रदेश के प्रकाण्ड विद्वान और ज्योतिषचार्य पण्डित आनन्द शंकर व्यास जी से पूछा गया तो उनका कहना था कि- हमारे धर्मशास्त्रों में सिर्फ आवास निर्माण ही भगवान के शयनकाल याने चतुर्मास में वर्जित नहीं है और चूंकि अयोध्या में राम मंदिर भगवान राम का आवास रहेगा, इसलिए इसके शिलान्यास को धर्म-विरूद्ध नहीं माना जा सकता, उन्होंने साथ ही यह भी जोड़ा कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने शिलान्यास की जो दो तिथियाँ तीन व पाँच अगस्त सुझाई है उनमें तीन अगस्त की तिथि इस पुनीत कार्य हेतु उचित नहीं है, क्योंकि उस दिन रक्षाबंधन याने श्रावणी पर्व है, जिसमें शिलान्यास वर्जित है, हाँ, इस कार्य हेतु पांच अगस्त की तिथि एकदम सही व उचित है। अतः प्रधानमंत्री जी को इस पुनीत व धर्म कार्य हेतु पांच अगस्त की तिथि तय करना चाहिए। ट्रस्ट का तो संकल्प है कि इस भव्य राम मंदिर का शिलान्यास और भगवान श्रीराम के मंदिर का लोकार्पण दोनों ही पुनीत कार्य श्री मोदी जी के करकमलों से ही सम्पन्न होंगे, इसलिए इसमें कोई आशंका नहीं है, मंदिर का निर्माण कार्य इसकी निर्धारित अवधि तीन साल में निश्चित रूप से पूरा हो जाएगा और संभव है 2023 में भगवान राम जन्म दिवस (रामनवमी) को इस मंदिर को आराध्य को सौंप दिया जाए?
यहाँ यह भी एक उल्लेखनीय तथ्य है कि राम जन्मभूमि विवाद सम्बंधी सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के नौ महीने बाद राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है, यहाँ भी नौ माह का विशेष महत्व है, क्योंकि विवाद के साथ ‘जन्म’ जो जुड़ा था?
जो भी हो, ‘‘होई है वही जो राम-रूचि राखा’’ अर्थात् जैसा राम चाहेगें वैसा ही होगा, फिर चाहे इसके लिए भगवान राम के ससुराल (नेपाल) वाले कितना ही शोर क्यों न मचा लें? क्योंकि रामजी का उनकी ससुराल (नेपाल) से नाता तो बाद में जुड़ा, पहले तो उनका जन्म हुआ यह सर्वज्ञात है, इसलिए जन्मभूमि प्रकरण में ससुराल का कोई हस्तक्षेप नहीं हो सकता।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि त्रेतायुग व द्वापर युग दोनों ही पुण्य कालों में युगपुरूषों के अवतरण उत्तरप्रदेश की पुण्य भूमि पर हुए, यद्यपि त्रेतायुग के भगवान राम पुरातन है, कृष्ण का अवतरण तो भगवान राम के कई हजार वर्षों बाद हुआ, किंतु कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा में उनके अनेक भव्य मंदिर बन गए और भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या में अब भव्य मंदिर बनने जा रहा है, वह भी काफी विवादों के बाद। खैर, ‘‘देर आयत, दुरूस्त आयत’’ इसी में संतोष व प्रसन्नता है, इसीलिए कहा गया है- ‘‘जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिये’’
जय श्रीराम……!

पाकिस्तान का भला इसी में है !
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
दक्षिण एशिया में आतंकी गतिविधियों पर संयुक्तराष्ट्र संघ की जो 26 वीं रपट आई है, उस पर सबसे ज्यादा ध्यान पाकिस्तान की इमरान सरकार का जाना चाहिए, क्योंकि इस रपट से पता चलता है कि दुनिया में आतंकवाद का कोई गढ़ है तो वह पाकिस्तान ही है। पाकिस्तान में अल-कायदा और ‘इस्लामिक स्टेट’ के दफ्तर हैं। पाकिस्तानी तालिबान आंदेालन भी वहीं से चलता है। पाकिस्तान में जन्मा और पनपा यह आतंकवाद अफगानिस्तान और हिंदुस्तान को तबाह करने पर उतारु है। संयुक्तराष्ट्र की रपट के मुताबिक कम से कम 200 आतंकवादी ऐसे हैं, जो भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार में हमले की तैयारी कर रहे हैं। आईएसआईएस के ज्यादातर आतंकवादियों ने केरल और कर्नाटक को अपना ठिकाना बना रखा है। ‘विलायते-हिंद’ के नाम से जो नया संगठन पिछले साल बना है, उसका खास निशाना भारत ही है। भारत में भी वह कश्मीर पर ही सबसे ज्यादा अपना जोर आजमाएगा। 2015 में खुरासान के नाम से जो गिरोह खड़ा किया गया था, उसका लक्ष्य भी कश्मीर ही था। अफगानिस्तान में इस समय लगभग 6000 आतंकवादी सक्रिय हैं। अफगानिस्तान के आधे से ज्यादा जिलों पर उनका कब्जा या असर है। वे अपने आप को तहरीके-तालिबान पाकिस्तान कहते हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने तो यहां तक कहा था कि आतंकियों से खुद पाकिस्तान बहुत त्रस्त है। उनके मुताबिक पाकिस्तान में 40 हजार से ज्यादा आतंकवादी सक्रिय हैं। पाकिस्तान की जनता द्वारा चुनी हुई सरकारें खुद इन आतंकियों का विरोध करती हैं, खास तौर से कुछ साल पहले पेशावार में एक सैनिक स्कूल पर हुए हमले के बाद, जिसमें फौजियों के करीब डेढ़ सौ बच्चे मारे गए थे। लेकिन पाकिस्तान की दिक्कत यह है कि उस राष्ट्र की अफगान-नीति और हिंदुस्तान-नीति वहां की फौज बनाती है। यदि पाकिस्तान की फौज अपना हाथ खींच ले तो दक्षिण एशिया के सारे आतंकवादी ढेर हो जाएंगे। इस फौज को कौन समझाए कि आतंकवाद से जितना नुकसान भारत और अफगानिस्तान को होता है, उससे कहीं ज्यादा पाकिस्तान को ही होता है। भारत इतना शक्तिशाली देश है कि तलवार के जोर पर पाकिस्तान उससे हजार साल तक लड़कर भी कश्मीर नहीं ले सकता। हां, बातचीत से हल जरुर निकल सकता है। जहां तक अफगानिस्तान का सवाल है, पाकिस्तान के कई प्रधानमंत्रियों को मैं यह अच्छी तरह बता चुका हूं कि अफगान तालिबान गिलजई कबीले के हैं। गिलजई पठानों की रगों में आजादी दौड़ती है। वे सत्तारुढ़ हो गए तो वे पाकिस्तान के ‘पंजाबी मुसलमानों’ को ठिकाने लगाने में देर नहीं करेंगे। पाकिस्तान का भला इसी में है कि वह आतंकवाद को बिल्कुल भी सहारा न दे और काबुल और कश्मीर की उलझनों को लोकतांत्रिक तरीकों से हल करे।
(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)

तीन-तलाक- “बड़ा रिफॉर्म-बेहतरीन रिजल्ट”
मुख्तार अब्बास नकवी
वैसे तो अगस्त, इतिहास में महत्वपूर्ण घटनाओं के पन्नों से भरपूर है, 8 अगस्त “भारत छोडो आंदोलन”, 15 अगस्त भारतीय स्वतंत्रता दिवस, 19 अगस्त “विश्व मानवीय दिवस”, 20 अगस्त “सद्भावना दिवस”, 5 अगस्त को 370 खत्म होना, जैसे इतिहास के सुनहरे लफ्जों में लिखे जाने वाले दिन हैं।
वहीं 1 अगस्त, मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की कुप्रथा, कुरीति से मुक्त करने का दिन, भारत के इतिहास में “मुस्लिम महिला अधिकार दिवस” के रूप में दर्ज हो चुका है।
“तीन तलाक” या “तिलाके बिद्दत” जो ना संवैधानिक तौर से ठीक था, ना इस्लाम के नुक्तेनजर से जायज़ था। फिर भी हमारे देश में मुस्लिम महिलाओं के उत्पीड़न से भरपूर गैर-क़ानूनी, असंवैधानिक, गैर-इस्लामी कुप्रथा “तीन तलाक”, “वोट बैंक के सौदागरों” के “सियासी संरक्षण” में फलता- फूलता रहा।
1 अगस्त 2019 भारतीय संसद के इतिहास का वह दिन है जिस दिन कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी, सपा, बसपा, तृणमूल कांग्रेस सहित तमाम तथाकथित “सेक्युलरिज़्म के सियासी सूरमाओं” के विरोध के बावजूद “तीन तलाक” कुप्रथा को ख़त्म करने के विधेयक को कानून बनाया गया। देश की आधी आबादी और मुस्लिम महिलाओं के लिए यह दिन संवैधानिक-मौलिक-लोकतांत्रिक एवं समानता के अधिकारों का दिन बन गया। यह दिन भारतीय लोकतंत्र और संसदीय इतिहास के स्वर्णिम पन्नों का हिस्सा रहेगा।
“तीन तलाक” कुप्रथा के खिलाफ कानून तो 1986 में भी बन सकता था जब शाहबानों केस में सुप्रीम कोर्ट ने “तीन तलाक” पर बड़ा फैसला लिया था; उस समय लोकसभा में अकेले कांग्रेस सदस्यों की संख्या 545 में से 400 से ज्यादा और राज्यसभा में 245 में से 159 सीटें थी, पर कांग्रेस की श्री राजीव गाँधी की सरकार ने 5 मई 1986 को इस संख्या बल का इस्तेमाल मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को कुचलने और “तीन तलाक” क्रूरता-कुप्रथा को ताकत देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी बनाने के लिए संसद में संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल किया।
कांग्रेस ने कुछ “दकियानूसी कट्टरपंथियों के कुतर्कों” और दबाव के आगे घुटने टेक कर मुस्लिम महिलाओं को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित करने का आपराधिक पाप किया था। कांग्रेस के “लम्हों की खता”, मुस्लिम महिलाओं के लिए “दशकों की सजा” बन गई। जहाँ कांग्रेस ने “सियासी वोटों के उधार” की चिंता की थी, वहीँ मोदी सरकार ने सामाजिक सुधार की चिंता की।
भारत संविधान से चलता है, किसी शरीयत या धार्मिक कानून या व्यवस्था से नहीं। इससे पहले भी देश में सती प्रथा, बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने के लिए भी कानून बनाये गए। तीन तलाक कानून का किसी मजहब, किसी धर्म से कोई लेना देना नहीं था, शुद्ध रूप से यह कानून एक कुप्रथा, क्रूरता, सामाजिक बुराई और लैंगिक असमानता को खत्म करने के लिए पारित किया गया। यह मुस्लिम महिलाओं के समानता के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा से जुड़ा विषय था। मौखिक रुप से तीन बार तलाक़ कह कर तलाक देना, पत्र, फ़ोन, यहाँ तक की मैसेज, व्हाट्सऐप के जरिये तलाक़ दिए जाने के मामले सामने आने लगे थे। जो कि किसी भी संवेदनशील देश-समावेशी सरकार के लिए अस्वीकार्य था।
दुनिया के कई प्रमुख इस्लामी देशों ने बहुत पहले ही “तीन तलाक” को गैर-क़ानूनी और गैर-इस्लामी घोषित कर ख़त्म कर दिया था। मिस्र दुनिया का पहला इस्लामी देश है जिसने 1929 में “तीन तलाक” को ख़त्म किया, गैर क़ानूनी एवं दंडनीय अपराध बनाया। 1929 में सूडान ने तीन तलाक पर प्रतिबन्ध लगाया।
1956 में पाकिस्तान ने, 1972 बांग्लादेश, 1959 में इराक, सीरिया ने 1953 में, मलेशिया ने 1969 में इस पर रोक लगाई। इसके अलावा साइप्रस, जॉर्डन, अल्जीरिया, ईरान, ब्रूनेई, मोरक्को, क़तर, यूएई जैसे इस्लामी देशों ने तीन तलाक ख़त्म किया और कड़े क़ानूनी प्रावधान बनाये। लेकिन भारत को मुस्लिम महिलाओं को इस कुप्रथा के अमानवीय जुल्म से आजादी दिलाने में लगभग 70 साल लग गए।
श्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने “तीन तलाक” पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाया। सुप्रीम कोर्ट ने 18 मई 2017 को तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया था। जहाँ कांग्रेस ने अपने संख्या बल का इस्तेमाल मुस्लिम महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखने के लिए किया था, वहीँ मोदी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक-मौलिक-लोकतान्त्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए फैसला किया।
आज एक वर्ष हो गया है, इस दौरान “तीन तलाक” या “तिलाके बिद्दत” की घटनांओं में 82 प्रतिशत से ज्यादा की कमीं आई है, जहाँ ऐसी घटना हुई भी है वहां कानून ने अपना काम किया है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की सरकार हर वर्ग के सशक्तिकरण और सामाजिक सुधार को समर्पित है। कुछ लोगों का कुतर्क होता है कि मोदी सरकार को सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के तलाक की ही चिंता क्यों है? उनके आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक सशक्तिकरण के लिए कुछ क्यों नहीं करते ? तो उनकी जानकारी के लिए बताना चाहता हूँ कि इन पिछले 6 वर्षों में मोदी सरकार के समावेशी विकास-सर्वस्पर्शी सशक्तिकरण के प्रयासों का लाभ समाज के सभी वर्गों के साथ मुस्लिम महिलाओं को भी भरपूर हुआ है।
पिछले छह वर्षो में 3 करोड़, 87 लाख अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं को स्कॉलरशिप दी गई, जिसमें 60 प्रतिशत लड़कियाँ हैं। पिछले 6 वर्षो में ‘हुनर हाट’के माध्यम से लाखों दस्तकारों-शिल्पकारों को रोजगार-रोजगार के मौके मिलें जिनमे बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं शामिल हैं। “सीखों और कमाओं” , “गरीब नवाज़ स्वरोजगार योजना”, “उस्ताद”, “नई मंजिल”, “नई रौशनी” आदि रोजगारपरक कौशल विकास योजनाओं के माध्यम से पिछले 6 वर्षों में 10 लाख से ज्यादा अल्पसंख्यकों को रोजगार और रोजगार के मौके उपलब्ध कराये गए हैं जिनमे बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं शामिल हैं। इसके अतिरिक्त मोदी सरकार के अंतरगर्त 2018 में शुरू की गई बिना मेहरम महिलाओं को हज पर जाने की प्रक्रिया के तहत अब तक बिना मेहरम के हज पर जाने वाली महिलाओं की संख्या 3040 हो चुकी है। इस वर्ष भी 2300 से अधिक मुस्लिम महिलाओं ने बिना “मेहरम” (पुरुष रिश्तेदार) के हज पर जाने के लिए आवेदन किया था, इन महिलाओं को हज 2021 में इसी आवेदन के आधार पर हज यात्रा पर भेजा जायेगा, साथ ही अगले वर्ष भी जो महिलाएं बिना मेहरम हज यात्रा हेतु नया आवेदन करेंगी उन सभी को भी हज यात्रा पर भेजा जायेगा।
यहीं नहीं मोदी सरकार की अन्य सामाजिक सशक्तिकरण योजनाओं का लाभ मुस्लिम महिलाओं को भरपूर हुआ है। यही वजह है कि आज विपक्ष भी यह नहीं कह पाता कि सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक सशक्तिकरण के लिए किये जा रहे कामों में किसी भी वर्ग के साथ भेद-भाव हुआ है, मोदी सरकार के “सम्मान के साथ सशक्तिकरण, बिना तुष्टिकरण विकास” का नतीजा है कि 2 करोड़ गरीबों को घर दिया तो उसमे 31 प्रतिशत अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिम समुदाय हैं, 22 करोड़ किसानों को किसान सम्मान निधि के तहत लाभ दिया, तो उसमे भी 33 प्रतिशत से ज्यादा अल्पसंख्यक समुदाय के गरीब किसान हैं। 8 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को “उज्ज्वला योजना” के तहत निशुल्क गैस कनेक्शन दिया तो उसमे 37 प्रतिशत अल्पसंख्यक समुदाय के गरीब परिवार लाभान्वित हुए। 24 करोड़ लोगों को “मुद्रा योजना” के तहत व्यवसाय सहित अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए आसान ऋण दिए गए हैं जिनमे 36 प्रतिशत से ज्यादा अल्पसंख्यकों को लाभ हुआ। दशकों से अँधेरे में डूबे हजारों गांवों में बिजली पहुंचाई तो इसका बड़ा लाभ अल्पसंख्यकों को हुआ। इन सभी योजनाओं का लाभ बड़े पैमाने पर मुस्लिम महिलाओं को भी हुआ है और वो भी तरक्की के सफल सफर की हमसफ़र बनी हैं।

तो यहां मिलते हैं ईमानदारी, राष्ट्रवाद तथा नैतिकता के प्रमाण पत्र ?
तनवीर जाफ़री
गोवा, मणिपुर, कर्नाटक, मध्य प्रदेश व बिहार जैसे राज्यों में साम-दाम-दंड-भेद की युक्ति आज़माकर सत्ता में आने वाली भारतीय जनता पार्टी ने पिछले दिनों राजस्थान में भी लोकताँत्रिक तरीक़े से निर्वाचित अशोक गहलोत सरकार को अस्थिर कर सत्ता हथियाने की कोशिश की जो फ़िलहाल नाकाम भी साबित हुई और कुछ ‘आडिओ टेप लीक’ हो जाने की वजह से भाजपा को भरी फ़ज़ीहत का सामना भी करना पड़ा। सत्ता के लिए इस तरह की दल बदल या वैचारिक परिवर्तन करने या इसे प्रोत्साहित करने की नेताओं की वर्तमान शैली ने एक बात तो साबित कर ही दी है कि देश के लोकतंत्र को मतदाताओं से उतना ख़तरा नहीं जितना कि लोकतंत्र के सफ़ेदपोश स्वयंभू प्रहरियों से है। मज़े की बात तो यह है कि बेशर्मी व बेहयाई के इस खेल में जो जितना बड़ा खिलाड़ी है वही अपने को राजनीति का ‘चाणक्य’ समझने लगता है। राजनैतिक दलों में तोड़ फोड़ करने कराने वाले नेताओं को मीडिया भी ‘चाणक्य’ की उपाधि देता है। इससे भी बेशर्मी की बात यह है कि कल तक कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी में रहते हुए जो नेता भाजपाईयों को भ्रष्ट व अनैतिक नज़र आता है वही व्यक्ति इनके पाले में आकर इतना ‘पवित्र’, राष्ट्रवादी, नैतिकतावादी, ईमानदार व आदर्श नेता बन जाता है कि उसे मंत्री बनाने में भी इन्हें फख़्र महसूस होता है। याद कीजिये मध्य प्रदेश में कमल नाथ सरकार के समय काँग्रेस विधायक रहे बिसाहू लाल सिंह को। यह ऐसे विवादित विधायक हैं जिनपर कमल नाथ सरकार के दौरान ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों के अधिकारों का राशन हड़पने का आरोप भारतीय जनता पार्टी के नेताओं द्वारा लगाया जा रहा था। बाक़ायदा एक आर टी आई के द्वारा भाजपाइयों ने यह जानकारी इकट्ठी की थी कि कांग्रेस विधायक बिसाहूलाल सिंह व उनका पूरा परिवार अन्नपूर्णा योजना के अंतर्गत बीपीएल परिवारों को एक रुपए प्रति किलो के हिसाब से दिया जाने वाला गेहूं व चावल ले रहा है। हालाँकि इस आरोप के जवाब में विधायक बिसाहू लाल यही कहते रहे कि वे तथा उनका परिवार आर्थिक रूप से सुदृढ़ है तथा उन्होंने कभी बी पी एल कोटे का राशन नहीं लिया। बहरहाल इन्हीं आरोपों प्रत्यारोपों के बीच विधायक जी मुख्यमंत्री कमल नाथ से इसलिए ख़िलाफ़ हो गए क्योंकि उन्हें मंत्री पद नवाज़ा नहीं गया था। इसीलिए ज्योतिरादित्य सिंधिया से वफ़ादारी का परचम उठाए हुए बिसाहूलाल सिंह भी कांग्रेस के अन्य बाग़ी विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। और पिछले दिनों शिवराज सिंह चौहान ने अपने मंत्री मंडलीय विस्तार में इन्हीं बिसाहू लाल सिंह को राज्य का खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री बना दिया। पूरा प्रदेश ठगा सा देखता रह गया कि कल तक भाजपा का बी पी एल का राशन डकार खाने का आरोपी आज इसी राज्य का भाजपा सरकार का ही खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री आख़िर कैसे हो गया ?
इसी तरह ज्योतिरादित्य सिंधिया ही नहीं बल्कि उनके स्वर्गीय पिता माधव राव सिंधिया पर भी भाजपा समर्थकों द्वारा तरह तरह के आरोप लगाए जाते थे। यह तक कहा जाता था की सिंधिया राज घराना अंग्रेज़ों का वफ़ादार घराना था। इतना ही नहीं बल्कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अप्रैल 2017 में राज्य के अटेर विधानसभा क्षेत्र में एक सार्वजनिक रैली में कहा था कि सिंधिया परिवार ने अंग्रेज़ों के साथ मिलकर भारत की जनता पर ज़ुल्म ढाए थे। महारानी लक्ष्मी बाई को लेकर भी तरह तरह की बातें की जाती थीं। यह इसलिये कहा जाता था क्योंकि दोनों ही पिता पुत्र भारतीय जनता पार्टी विशेष कर राष्ट्रीय स्वयं संघ का मुखरित होकर विरोध करते थे। यहाँ तक कि संसद में भी इन्हें खुलकर आईना दिखाते थे। परन्तु ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होते ही यह आरोप भी व इन आरोपों को लगाने वाले भी, सभी ‘ज़मींदोज़’ हो चुके हैं। इसी तरह कांग्रेस में आग भड़कानी हो तो इन्हीं भाजपाइयों को इस बात की फ़िक्र भी सताती है कि कांग्रेस ने अमुक नेता को मुख्य मंत्री क्यों बनाया, अमुक नेता को क्यों नहीं। गोया कांग्रेस पार्टी को अपना मुख्यमंत्री किसे बनाना है यह सलाह भाजपा से लेने की ज़रुरत है? गत दिनों राजस्थान में चल रही राजनैतिक उठा पटक के बीच चल रही कुछ टी वी डिबेट के दौरान एक वरिष्ठ भाजपा नेता में ऐसा ही दर्द छलकता दिखाई दिया। नेता जी फ़रमा रहे थे कि -‘कांग्रेस को राजस्थान में सत्ता दिलाने में सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण भूमिका सचिन पायलट ने निभाई परन्तु जब मुख्य मंत्री बनाने का समय आया तो अशोक गहलोत को बना दिया गया।’ ज़ाहिर है भाजपा नेता यह सचिन की हमदर्दी में नहीं बोल रहे थे बल्कि सचिन-गहलोत के बीच की खाई को और गहरी करने के मक़सद से आग में घी डालते हुए सचिन के प्रति अपनी हमदर्दी के इज़हार का प्रदर्शन कर रहे थे। परन्तु उसी समय वे यह भी भूल रहे थे की राजस्थान से पहले उत्तर प्रदेश के चुनाव भी लड़े गए थे। उस समय चुनाव के दौरान डॉक्टर दिनेश शर्मा व केशव प्रसाद मौर्य का नाम ही सबसे आगे नज़र आ रहा था। पूरे प्रदेश को नहीं पता था की योगी आदित्य नाथ प्रदेश के मुख्य मंत्री होने जा रहे हैं। परन्तु भाजपा नेताओं को राजस्थान में गहलोत तो दिखाई दिए मगर उत्तर प्रदेश में योगी की नियुक्ति नज़र नहीं आई ?
बिहार की वर्तमान नितीश सरकार के 2015 में हुए आम चुनावों को याद कीजिये। किस तरह भाजपा समर्थक पूरे राज्य में गाय के गले में हाथ डालकर रोते-फिरते दिखाई देते थे। चुनाव प्रचार में वे कहते थे कि ‘ गऊ माता की रक्षा करनी है तो नितीश को हराना है, भाजपा को लाना है’। इतना ही नहीं बल्कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने तो यहाँ तक कहा था कि यदि नितीश गठबंधन विजयी हुआ तो पाकिस्तान में पटाख़े फोड़े जाएंगे। आज जब वही व्यक्ति पलटी मार कर बिहार में भाजपा-जे डी यू की संयुक्त सरकार का मुख्यमंत्री है तो न तो राज्य में गऊ माता पर कोई ख़तरा है न ही पाकिस्तान में ख़ुशी में पटाख़े दाग़े जाने की कोई फ़िक्र। भले ही राज्य में नव निर्मित पुल ढह रहे हों या बिहार बाढ़ में डूबने के लिए तैयार हो अथवा कोरोना के संकटकालीन हालत से निपट पाने में सक्षम न हो परन्तु यदि आप भाजपा के पाले में खड़े हैं तो आप राष्ट्रवादी भी हैं राष्ट्र भक्त भी, आपसे बड़ा कोई योग्य व ईमानदार भी नहीं और आपके व आपके ख़ानदान से ज़्यादा देश पर उपकार करने वाला भी कोई नहीं।

अब कही से भी दायर कर सकते है उपभोक्ता अदालत में मुकदमा !
डॉ श्रीगोपाल नारसन
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 यथा संशोधित 2019 की अधिसूचना भारत सरकार ने गत 15 जुलाई को जारी कर दी है ।जिसके तहत 20 जुलाई सन 2020 से उक्त संशोधित कानून प्रभावी माना गया है। इस बदले कानून से उपभोक्ताओं को शोषण और अन्याय से मुक्ति आसानी से मिलने लगेगी। बदलते समय के साथ इस कानून में किये गए बदलाव से उपभोक्ताओं को न्याय दिलाने के क्षेत्र में नई पहल का सूत्रपात होगा। इस नये उपभोक्ता संरक्षण संशोधित कानून, 2019 के तहत उपभोक्ता अब कही से भी उपभोक्ता अदालत में अपनी शिकायत दर्ज करा सकेगे। नए कानून में उपभोक्ताओं के हित में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए हैं,साथ ही पुराने नियमों में सुधार की भी कोशिश की गई है।
इस बदले कानून की कुछ उपलब्धियों में सेंट्रल रेगुलेटर का गठन, भ्रामक विज्ञापनों पर भारी दंड और ई-कॉमर्स फर्मों और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बेचने वाली कंपनियों के लिए सख्‍त दिशानिर्देश इस नये कानून में शामिल किये गए हैं. अब कहीं से भी उपभोक्ता अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है।
उपभोक्ताओं की शिकायतें निपटाने के लिए जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उपभोक्ता अदालतें हैं जिन्हें आयोग के रूप मान्यता दी गई है।नए कानून के तहत उपभोक्ता अदालतों के क्षेत्राधिकार को बढ़ाया गया है। राज्य और राष्ट्रीय उपभोक्ता अदालतों के मुकाबले जिला अदालतों तक पहुंच ज्यादा होती है। इसलिए अब जिला उपभोक्ता अदालतें 1 करोड़ रुपये तक के मामलों की सुनवाई कर सकेंगी।”
इस नए संशोधित कानून की खास बात यह है कि अब उपभोक्ता अपनी शिकायत कही से भी दर्ज कर सकता है। पहले उपभोक्ता वहीं शिकायत दर्ज करा सकता था, जहां विक्रेता अपनी सेवाएं देता है या फिर उसकी कोई शाखा या कार्यालय जहां मौजूद है। ई-कॉमर्स अर्थात ऑन लाइन से बढ़ती खरीदारी को देखते हुए यह उपभोक्ताओं के हित मे एक अच्छा कदम है।क्योकि इस मामले में विक्रेता किसी भी लोकेशन से अपनी सेवाएं देते हैं। इसके अलावा कानून में उपभोक्ता को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए भी सुनवाई में शिरकत करने की इजाजत दी गई है। इससे उपभोक्ता का पैसा और समय दोनों बच सकेंगे और उसे न्याय भी जल्दी मिल सकेगा। उपभोक्ता कानून के इतिहास में जाए तो पता चलता है कि सन 1966 में जेआरडी टाटा के नेतृत्व में कुछ उद्योगपतियों द्वारा उपभोक्ता संरक्षण के तहत फेयर प्रैक्टिस एसोसिएशन की मुंबई में स्थापना की गई थी और इसकी शाखाएं कुछ प्रमुख शहरों में स्थापित की गईं। भारत मे उपभोक्ताओं के हित सुरक्षित करने के लिए उपभोक्ता आंदोलन का यह प्रथम प्रयास कहा जा सकता है।वही स्वयंसेवी संगठन के रूप में ग्राहक पंचायत की स्थापना बीएम जोशी द्वारा 1974 में पुणे में की गई।समय के साथ अनेक राज्यों में उपभोक्ता कल्याण हेतु संस्थाओं का गठन हुआ। इस प्रकार उपभोक्ता आन्दोलन देश मे आगे बढ़ता रहा और सन 24 दिसम्बर 1986 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पहल पर उपभोक्ता संरक्षण विधेयक संसद ने पारित किया और जो राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित होने के बाद देशभर में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के रूप में लागू हुआ। इस अधिनियम में बाद में सन 1993 ,सन 2002 व अब 2019 में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। इन व्यापक संशोधनों के बाद यह एक सरल व सुगम अधिनियम हो गया है। इस अधिनियम के अधीन पारित उपभोक्ता अदालतों के आदेशों का पालन न किए जाने पर धारा 27 के अधीन कारावास व दण्ड तथा धारा 25 के अधीन कुर्की का प्रावधान किया गया है।
नए कानून में उत्पाद व विक्रेता कंपनी की जवाबदेही तय की गई है ।उत्पाद में निर्माण त्रुटि या खराब सेवाओं से अगर उपभोक्ता को नुकसान होता है तो उसे बनाने वाली कंपनी को हर्जाना देना होगा. यानि निर्माण त्रुटि में खराबी के कारण प्रेशर कुकर के फटने पर उपभोक्ता को चोट पहुंचती है तो उस हादसे के लिए कंपनी को हर्जाना देना होगा। पहले उपभोक्ता को केवल कुकर की लागत मिलती थी. उपभोक्ताओं को क्षति पूर्ति के लिए भी सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता था. जिससे मामले के निपटारे में सालों साल लग जाते थे।पहले कंपनियां अनैतिक तरीके से कोर्ट से तारीख पर तारीख ले लेती थीं, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। उपभोक्ताओं को 90 दिन में न्याय मिल सकेगा और पहले जहां से उपभोक्ता ने सामान खरीदा था, वहीं के उपभोक्ता फोरम में वाद दायर करना होता था। अब उपभोक्ता कहीं से भी सामान खरीदा हो, यदि उसमें खराबी है तो उसकी शिकायत घर या काम की जगह के आसपास के उपभोक्ता अदालत में कर सकता है। इस नये कानून का सबसे ज्यादा असर ई-कॉमर्स बिजनेस के क्षेत्र में होगा।अब इसके दायरे में सेवा प्रदाता भी आ जाएंगे. “उत्पाद की जवाबदेही अब निर्माता के साथ सेवा प्रदाता और विक्रेताओं पर भी होगी. इसका अर्थ यह हुआ क‍ि ई-कॉमर्स साइट खुद को एग्रीगेटर बताकर पल्ला नहीं झाड़ सकती हैं.”ई-कॉमर्स कंपन‍ियों पर सीधे बिक्री पर लागू सभी कानून प्रभावी होंगे. अब अमेजन, फ्लिपकार्ट, स्नैपडील जैसे व्यापारिक मंच को विक्रेताओं के ब्योरे का खुलासा करना होगा. इनमें उनका पता, वेबसाइट, ई-मेल इत्यादि शामिल करना जरूरी हैं.ई-कॉमर्स फर्मों की जिम्मेदारी होगी कि वे सुनिश्चित करें क‍ि उनके स्तर पर किसी तरह के नकली उत्पादों की बिक्री न हो. अगर ऐसा होता है तो कंपनी पर दंड लग सकता है, क्योंकि ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्मों पर नकली उत्पादों की बिक्री के मामलो की शिकायतें मिलती रही हैं.
कानून में सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी (सीसीपीए) नाम का केंद्रीय रेगुलेटर बनाने का प्रस्ताव है. यह उपभोक्ता के अधिकारों, अनुचित व्यापार व्यवहार, भ्रामक विज्ञापन और नकली उत्पादों की बिक्री से जुड़े मामलो को देखेगा और जरूरत पड़ने पर उनके विरुद्ध कार्यवाही कर सकेगा।नए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के पारित हो जाने के बाद कंपनियों पर इस बात की ज़िम्मेदारी अब और ज़्यादा होगी कि उनके उत्पादों के विज्ञापन भ्रामक न हों और उनके उत्पाद दावों के अनुरुप ही हों.
अब अगर कोई सेलीब्रिटी किसी ऐसे उत्पाद का प्रचार करता है, जिसमें दावा कुछ और हो और दावे की सच्चाई कुछ और, तो उस पर भी जुर्माना लगेगा.अभी तक किसी सामान की शिकायत करनी हो तो पहले उसे खरीदना जरूरी होता था परंतु नया उपभोक्ता कानून उपभोक्ताओं को अधिकार देता है कि वह बिना सामान खरीदे भी, किसी सामान की उत्पाद गुणवत्ता को लेकर शिकायत कर सकते है। अक्सर देखा गया है कि कंपनियां अपने उत्पाद के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर विज्ञापन करती हैं। अगर आपको पता चल गया कि उसमें वैसी खूबी नहीं है तो बिना सामान खरीदे उसकी शिकायत सीसीपीए से की जा सकती है। सीसीपीए में एक इंवेस्टिगेशन विंग होगी जो शिकायत की जांच करेगी। यदि शिकायत सही पाई गई तो दोषी कंपनी पर कार्रवाई होगी। यानि उपभोक्ता सरंक्षण अधिनियम में किये गए बदलाव और संशोधित कानून के लागू हो जाने से उपभोक्ता सहज,सुलभ व सस्ता न्याय प्राप्त कर सकेंगे।

हिंदी कैसे बने राष्ट्रभाषा ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत में उत्तरप्रदेश हिंदी का सबसे बड़ा गढ़ है लेकिन देखिए कि हिंदी की वहां कैसी दुर्दशा है। इस साल दसवीं और बारहवीं कक्षा के 23 लाख विद्यार्थियों में से लगभग 8 लाख विद्यार्थी हिंदी में अनुतीर्ण हो गए। डूब गए। जो पार लगे, उनमें से भी ज्यादातर किसी तरह बच निकले। प्रथम श्रेणी में पार हुए छात्रों की संख्या भी लाखों में नहीं है। यह वह प्रदेश है, जिसने हिंदी के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों और देश के सर्वाधिक प्रधानमंत्रियों को जन्म दिया है।
हिंदी को महर्षि दयानंद ‘आर्यभाषा’ और महात्मा गांधी ‘राष्ट्रभाषा’ कहते थे। नेहरु ने उसे ‘राजभाषा’ का दर्जा दे दिया लेकिन 73 साल की आजादी के बाद हिंदी के तीनों नामों का हश्र क्या हुआ ? ‘आर्यभाषा’ तो बन गई ‘अनार्य भाषा’ याने अनाड़ियों की भाषा ! कम पढ़े-लिखे, गांवदी, पिछड़े, गरीब-गुरबों की भाषा। ‘राष्ट्रभाषा’ आप किसे कहेंगे ? यह ऐसी राष्ट्रभाषा है, जिसका प्रयोग न तो राष्ट्र के उच्च न्यायालयों में होता हैं और न ही विश्वविद्यालयों की ऊंची पढ़ाई में होता है। राष्ट्रभाषा के जरिए आप न तो कानून, न चिकित्सा, न विज्ञान पढ़ सकते हैं और न ही कोई अनुसंधान कर सकते हैं। आज से 55 साल पहले मैंने जब ‘इंडियन स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज़’ में अपना पीएच.डी. का शोधग्रंथ हिंदी में लिखने का आग्रह किया था तो संसद में जबर्दस्त हंगामा हो गया था। मुझे ‘स्कूल’ से निकाल बाहर किया गया। संसद और प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद मुझे वापिस लिया गया लेकिन आज तक कितने पीएच.डी. भारतीय भाषाओं के माध्यम से हुए ? जहां तक ‘राजभाषा’ का सवाल है, आज भी देश में राज-काज के सारे महत्वपूर्ण काम अंग्रेजी में होते हैं। संसद और विधानसभाओं के कानून क्या हिंदी में बनते हैं ? सरकारी नौकरशाह क्या अपनी रपटें, टिप्पणियां, अभिमत, आदेश वगैरह अंग्रेजी में नहीं लिखते हैं ? सच्चाई तो यह है कि अंग्रेजी आज भी भारत की राजभाषा है। अंग्रेजी की इस भूतनी की आगे हमारे सारे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दब्बू साबित हुए हैं। ये स्वतंत्र भारत के गुलाम नेता हैं। इन बेचारों को पता ही नहीं कि कोई राष्ट्र संपन्न, शक्तिशाली और सुशिक्षित कैसे बनता है।
दुनिया का कोई भी राष्ट्र विदेशी भाषा के जरिए संपन्न और महाशक्ति नहीं बना है। जिस देश में किसी विदेशी भाषा का वर्चस्व होगा, उसके छात्र नकलची ही बने रहेंगे। उनकी मौलिकता लंगड़ाती रहेगी। जो देश तीन-चार सौ साल पहले तक विश्व-व्यापार में सर्वप्रथम था, जिस देश के नालंदा और तक्षशिला- जैसे विश्वविद्यालयों में सारी दुनिया के छात्र पढ़ने आते थे और जो देश अपने आप को विश्व-गुरु कहता था, आज उस देश के लाखों छात्रों का प्रतिभा-पलायन क्यों हो जाता है ? क्योंकि उनकी रेल को बचपन से ही अंग्रेजी की पटरी पर चला दिया जाता है। मैं विदेशी भाषाएं सीखने का विरोधी बिल्कुल नहीं हूं। मैंने स्वयं अंग्रेजी के अलावा रुसी, फारसी और जर्मन भाषाएं सीखी हैं लेकिन अपने प्रत्येक काम में मैंने अपनी मातृभाषा हिंदी को प्राथमिकता दी है। सभी प्रांतों में यदि शिक्षा का अनिवार्य माध्यम मातृभाषा हो तो हिंदी आर्यभाषा, राष्ट्रभाषा और राजभाषा अपने आप बन जाएगी।
महत्वाकांक्षा और सम्मान न मिलना क्या मानसिक रोग तो नहीं हैं ? 
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
महत्वाकांक्षा यानी ईगो/डिजायर और सम्मान न मिलना यानी इंसल्ट इस समय राजनीति में बहुत अधिक प्रचलन में हैं ,ऐसा कौन से व्यक्ति होगा जिसकी सभी महत्वाकांक्षा पूरी हुई होगी और ऐसा कौन सा व्यक्ति न होगा जिसकी कभी इंसल्ट न हुई हो। व्यक्ति जन्म लेता हैं उसके बाद उसे दूसरों के पराधीन रहना पड़ता हैं ,उसे अपना पालना ही अपना पूरा संसार लगता हैं। उसके बाद यदि वह घर में बड़ा हुआ और उसके छोटे भाई बहिनों ने उसकी बात नहीं मानी तो उसकी इंसल्ट हुई ,स्कूल, कॉलेज में गया तो अनेकों बार इंसल्ट हुई होती हैं। उसके बाद शादी होती हैं तब प्रायः पत्नी या पति उसकी बात नहीं मानते तब इंसल्ट होती। बच्चों ने उनकी बात न मानी तो इंसल्ट हुई। कक्षा में या पार्टी में या मीटिंग में पीछे बैठे तो इंसल्ट हुई। पत्नी ने एक गिलास पानी नहीं दिया तो इंसल्ट हुई। यह इंसल्ट क्या वास्तव में एक मनोरोग हैं या अहम हैं ?
संसार में जितनी भी भौतिक सम्पदा हैं वह हर व्यक्ति चाहता हैं ,और सामग्री सीमित हैं और किसी को कभी भी पूर्णता नहीं प्राप्त हुई। सपना देखना जरुरी हैं और उससे हमारी महत्वाकांक्षा बढ़ती हैं। एक व्यक्ति जब जन्म के बाद स्वालम्वी बनता हैं तो वह अपने उनको को भूल जाता हैं जिनके सहारे /सहयोग से बढ़ा पला और इस योग्य हुआ। वैसे हर व्यक्ति आगे बढ़ने और विकास करने की पात्रता रखता हैं। क्या वह बड़े ,सम्पन्न होने पर अपने दादा- दादी ,नाना- नानी ,माता पिता ,बड़े भाई -बहिनों और सहयोगियों के उपकार को भूल जाता हैं या भूल जाना चाहिए। क्या समय के अंतराल के बाद वह पिता का स्थान सबल होने पर ले सकता हैं ?क्या यह उचित हैं की यदि पिता सक्षम नहीं हैं तो क्या अपनी बल्दियत बदल लेना चाहिए ?क्या जिसके सहारे बड़े हुए उससे नाता तोडना चाहिए ?
वैसे उक्त बातें सामाजिक,पारिवारिक सन्दर्भ में किंचित लागू होती हैं पर राजनीती में ये सब बातें सामान्य मानी जाती हैं।
जैसे थूक कर चाटना साहित्य में वीभस्त रस कहलाता हैं और राजनीती में उसे शृंगार कहते हैं। ऐसे व्यक्ति जिनको पहले कोई पहचानता नहीं था उनको पहचान दिलाई ,सब सत्ता सुख दिए ,बीज से पौधा बनाया उसके बाद स्वयं वृक्ष बने और फिर बरगद के झाड़ होकर किसी को न पनपने देना ,न बढ़ने देना। यदि पुत्र योग्य होते हुए भी वह अपने पिता या परिवार के प्रति समर्पित न हो तो उसे कृतघ्यं कहते हैं जो सबसे बड़ा पाप माना जाता हैं। हमेशा मनुष्य को अपने उपकारी के प्रति हमेशा विनीत भाव रखना चाहिए। हमें अपने माँ ,बाप, गुरु ,सहारे देने वालों ,सहयोगियों के प्रति सम्मान के साथ ऋणी होना चाहिए। जो इसका पालन नहीं करते उनकी निष्ठाएं हमेशा संदिग्ध रहती हैं। एक बाद और हैं जिनको पाली बदलने की आदत होती हैं संभवतः वे कहीं वंशानुगत से प्रभावित तो नहीं हैं।
राजनीती में बन्दर कूदनी हमेशा से होती रही हैं और होगी ,इसको कोई नहीं रोक सकता कारण जहाँ मनुष्य को यह अहसास होने लगता हैं की हमारा विकास नहीं पायेगा या सम्मान नहीं मिल पायेगा तब वह उज्जवल भविष्य की और दृष्टिपात करना शुरू करता हैं और वह फिर अपनी जड़ को उखाड़ कर नए बीज के रूप में अन्य खेत या भूमि में बोया जाता हैं। जो बरगद रहता हैं वह अन्य भूमि में बीज बनना स्वीकार करता हैं। उसके बाद वह वृक्ष बने या न बन पाए। जिस प्रकार संतानोतपत्ति के लिए शादी करना अनिवार्य हैं पर शादी के बाद संतान हो या न हो कोई जरुरी नहीं।
इस विचार धारा के बौद्धिक लोग जो असामाजिक यानी समाज से अलग होने से इस बात को नहीं सोचते जबकि यह भी या ही सोचना चाहिए —
समः शत्रौ च मित्रे च समो मानापमानयोः।
लाभालाभे समो नित्यं लोष्ट -कांचनयोस्तथा।।
जिसे ज्ञान या समझदारी हो जाती हैं ,वह शत्रु और मित्र पर सम -भावी हो जाता हैं ,उसके लिए मान और अपमान समान
बन जाते हैं ,वह सांसारिक वस्तुओं के लाभ या अलाभ में समान रहने लगता हैं और लोष्ट -कांचन को सम -दृष्टि से देखने लगता हैं। उनको इस बात का चिंतन करना चाहिए कि मेरे ही पाप कर्म के उदय से दूसरे लोग मेरे साथ शत्रुता का व्यवहार करते हैं और मेरे पुण्य कर्म के उदय से दूसरे लोग मेरे साथ मित्रता का व्यवहार करते हैं।
वर्तमान में जिस राजनैतिक परिदृश्य में बात कहना चाह रहा हूँ चाहे मध्य प्रदेश या राजस्थान या अन्य कही भी पूर्व में हुआ था ,वर्तमान में हो रहा हैं और भविष्य जो होगा ,वह निश्चित हैं पर मानव सुख प्राप्त करने के लिए कोई भी अधम कार्य करने से नहीं चूकता और फिर कहता हैं कि मेरी पदोन्नति नहीं हो रही हैं या सम्मान नहीं मिल रहा हैं। जो काम बातचीत से हल हो सकता था वहां अहम यानी ईगो टकराया और वृक्ष से बीज बन गए।
क्या यह अस्तित्व के लिए लड़ाई लड़ी जा रही हैं या स्वारथ लिप्सा के लिए ,जब इतने सम्पन्न लोग जो दूसरों के लिए एक उदाहरण हो सकते थे उनसे को क्या सीखेगा। इतिहास और उनकी आत्मा या आत्म-बोध धिक्कारेगा। तर्क अनेक हो सकते हैं पर वास्तविकता को कोई झुठला नहीं सकता।
होऊं नहीं कृतघ्न कभी न द्रोह न मेरे उर आवे।
गुण-ग्रहण का भाव रहें नित दृष्टि न दोषों पर जावें।।
दाम बिना निर्धन दुखी ,तृष्णावश धनवान।
कहूं न सुख संसार में ,सब जग देख्यो छान।।
धन -कन कन्चन राजसुख ,सभी सुलभकर जान।
दुर्लभ हैं संसार में ,एक जथारथ ज्ञान।।
इस धरा पर सब धरा रह जायेगा।
इतिहास कभी माफ़ नहीं करता अविज्ञाकारियों को।

कोरोना महामारी संकट के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
प्रभात झा
हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने ‘वर्तमान परिदृश्य और हमारी भूमिका’ विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि कोरोना से पूरी दुनिया जूझ रही है। जीवन तो चल रहा है। स्वयंसेवकों को लगता होगा कि शाखा बंद है , नित्य कार्यक्रम बंद है। ऐसा नहीं है। शाखा भी लग रही है और संघ का काम भी चल रही है। बस उसका स्वरुप बदल गया है।
मोहन भागवत जी के उपर्युक्त विचारों को लेकर विश्लेषकों और मेरे कुछ विपक्षी दलों के राजनीतिक मित्र हतप्रभ है कि ऐसी क्या बात है संघ में कि यह संगठन किसी भी परिस्थिति में अहर्निश सक्रिय रहता है। इस कोरोना काल में भी संघ सक्रियता के नए आयामों के माध्यम से गतिशील है। सच में संघ अद्भुत है। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा संगठन है जो अपने स्थापना काल से ही दिनो दिन आगे बढ़ रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ लोग संघ की छवि को धूमिल करने में जुटे रहते हैं। ‘संघ का सच क्या है’, इस पर मैंने प्रस्तुत लेख में विचार प्रस्तुत किये हैं। हालांकि न मैं संघ का प्रवक्ता हूं और न ही संघ का अधिकारी , लेकिन बाल्यकाल से ही संघ से जुड़ा हूं। अतः एक साधारण स्वयंसेवक के नाते इसकी विशेषता पर अपने अनुभव साझा कर रहा हूं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी अनूठी कार्यपद्धति के कारण विश्व में जाना जाता है। संघ की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह सांस्कृतिक संगठन समाज आधारित है न कि सरकार आधारित। संघ विश्व का ऐसा संगठन है जिसका निरंतर विकास हो रहा है। नेहरूजी , इंदिराजी और नरसिम्हाराव जैसे तीन-तीन प्रधानमंत्रियों ने अपने-अपने कार्यकाल में तीन-तीन बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया पर संघ न रुका , न झुका, न थका, उलटे समाज के सहयोग से निरंतर बढ़ता ही रहा है।
लोग सोचते हैं कि संघ सतत् अपनें कार्य में कैसे लगा रहता है। शायद उन्हें यह नहीं पता कि यहां सभी राष्ट्र के स्वयंसेवक के नाते स्वप्रेरणा से कार्य करते हैं। यहां कार्य करने वाले सभी स्वयंसेवक का एक ही भाव होता है ‘निःस्वार्थ भावना। जब सभी का भाव निःस्वार्थ होता है तो टकराहट जन्म ही नहीं ले पाती। ‘तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा’ की भावना से बढ़ रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक। इस भौतिकवादी समय में लाभ-हानि न सोचकर सतत काम में लगे रहते हैं। ‘देश हमें देता है सबकुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें’ की स्पष्टता रहती है।
संघ के संस्थापक और आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवारजी ने सन 1925 को जब विजयादशमी के दिन नागपुर में प्रथम शाखा शुरू की तो उपस्थित स्वयंसेवकों ने कहा कि आप संघ के गुरु बन जाईये। डॉ. हेडगेवारजी ने कहा कि हम सबका गुरु व्यक्ति नहीं परमपवित्र भगवाध्वज होगा। यहीं से संदेश चला गया कि संघ व्यक्ति आधारित नहीं बल्कि विचार आधारित मां भारती के सेवार्थ कार्य करने वाला एक सुदृढ़ सांस्कृतिक संगठन बनेगा। हिंदू संस्कृति की विजयपताका विश्व में फहराएगा।
देश भर में संघ की सात्विक और आध्यात्मिक प्रभाव बढ़ता देख तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को तबसे ज्यादा बदनाम और समाप्त करने की कोशिश की, जब से संघ की प्रेरणा से भारतीय राजनीति में जनसंघ का जन्म हुआ। उससे पूर्व गांधी हत्याकांड में झूठा आरोप लगाकर जिस तरह से स्वयंसेवकों को यातना दी गई आज भी रोंगटे खड़े कर देती है। तत्कालीन सरसंघचालक विश्व के सबसे सबलतम आध्यात्मिक पुरुष डॉ. माधव सदाशिव गोलवलकर “गुरूजी” को जेल तक भेज दिया। संघ पर यातनाओं का दौर चला प्रतिबंध लगा दिया गया। पर सत्य की जीत हुई। न्यायालय ने कहा कि गांधी ह्त्या में संघ का और संघ के स्वयंसेवकों का कोई लेना-देना नहीं है। कांग्रेस सहित तत्कालीन शासक को मुंह की खानी पड़ी।
मुझे याद है , एक साक्षात्कार में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वसंत साठे ने मुझे कहा था कि ‘मैं समझ ही नहीं पाता कि संघ का विरोध लोग क्यों करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ‘आपातकाल में मैंने इंदिराजी को कहा था, पर उन्होंने एक नहीं सुनी।
संघ का कार्य निरंतर चलता रहता है। संघ की स्पष्ट मान्यता है कि संघ शाखा लगाएगा और सवयंसेवक दसों दिशाओं में समाज के हर क्षेत्र में काम खड़ा करेंगे। सबसे अच्छी बात है कि संघ किसी को अपना प्रतिद्वंदी नहीं मानता। यहां तक कि संघ को जो अपना दुश्मन मानते हैं उसके बारे में गुरूजी कहा करते थे कि हमारा आज का विरोधी कल का समर्थक होगा। हमें इसी भाव से काम करना है। संघ संस्कृति और राष्ट्र ध्वज की भावना को लेकर काम करता है।
आज स्थिति क्या है कि देश में मनुष्य को परिवार में मिलने वाले संस्कार के अलावा राष्ट्रीय संस्कार का शिक्षण कहीं दिया जा रहा है क्या? कहीं नहीं। संघ का प्रमुख उद्देश्य है चरित्र निर्माण करना और मनुष्य को संस्कारवान बनाना। यही नहीं आज बाल्यकाल से बच्चे अपनी भारतीय संस्कृति में पलें-बढ़ें , अध्ययन करें , इसके लिए संघ की प्रेरणा से विद्या भारती के मार्गदर्शन में देशभर में लाखों विद्यार्थी सरस्वती शिशु मंदिर के माध्यम से अध्ययन करते हैं।
तरुण विद्यार्थियों के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद। देश के हिंदू सनातन धर्म के रक्षार्थ विश्व हिंदू परिषद। मजदूरों के बीच, कर्मचारियों के बीच, शिक्षकों के बीच , समाज के इन वर्गों के बीच काम करने के लिए भारतीय मजदूर संघ की स्थापना। ये सभी संगठन संघ की प्रेरणा से परंतु अपनी योजना से काम करते हैं। किसानों के बीच काम करने के लिए भारतीय किसान संघ, वनवासियों के बीच काम करने के लिए वनवासी कल्याण आश्रम, संस्कार भारती, सेवा भारती, लघु उद्योग भारती, क्रीड़ा भारती, आरोग्य भारती , संस्कृत भारती, प्रज्ञा भारती, विज्ञान भारती, भारत विकास परिषद, राष्ट्रीय संपादक परिषद, स्वदेशी जागरण मंच , हिंदू स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय शिक्षण मंडल जैसे अनेक संस्थान आज के विभिन वर्गों में काम कर रहे हैं।
भारत प्रकाशन , विश्व संवाद केंद्र , दीनदयाल शोध संस्थान, अखिल भारतीय इतिहास संकलन समिति , भरतीय विचार केंद्र , राष्ट्रीय सिख संगत, विवेकानंद केंद्र, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षणिक परिषद, अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद , सहकार भर्ती, ग्राहक पंचायत , सामाजिक समरसता मंच , हिंदू जागरण मंच, अखिल भारतीय साहित्य परिषद, पर्यावरण समिति , दधीचि देहदान समिति तक संघ की प्रेरणा से चल रहे हैं।
संघ को कोई भी दूर से नहीं समझ सकता। जैसे आंख होते हुए भी लोग कान से राजनीति करते हैं और धोखा खा जाते हैं, वैसे ही संघ को देखकर ही संघ को समझा जा सकता है। संघ के बारे में सुनकर आश्चर्य ही प्रकट कर सकते हैं। राष्ट्रपिता बापू, बिनोवा भावे, सरदार वल्ल्भ भाई पटेल, लोकनायक जय प्रकाश सहित अगर अभी की बात करें तो भारत रत्न प्राप्त डॉ. प्रणव मुख़र्जी ने भी संघ को जब करीब से देखा-समझा तो उनका मन बदला।
संघ की मान्यता है , यहां पद नहीं दायित्व होता है। कोई भी कार्यकर्ता अपरिहार्य नहीं। यही नहीं, मत अनेक हो सकते हैं पर निर्णय एक। निर्णय के पूर्व विस्तृत चर्चा, निर्णय के बाद सिर्फ उसके संपादन में लगना।
आज तो कोरोना है। आपातकाल में तो हजारों स्वयंसेवक भारत के जेलों में अकारण ठूंस दिए गए थे। अनेक यातनाएं और अत्याचार स्वयंसेवकों और उनके परिजनों पर किये गए। बावजूद इसके स्वर्गीय दीनानाथ मिश्र ने ‘गुप्त क्रांति’ नामक आपातकाल के दौरान भारत के लोकतंत्र की दूसरी लड़ाई में संघ की जो भूमिका थी उसको दर्शाता है। इससे साफ़ हो जाता है कि संघ को मात्र स्वयंसेवक ही नहीं बल्कि उसका पूरा परिवार ही कार्य में जुटा रहता है। साथ ही परिवार को पता होता है कि उनका बेटा संघ का माध्यम बनकर राष्ट्रीय कार्य में जुटा हुआ है।
संघ कार्य की नींव में आपसी विश्वसनीयता,आत्मीयता, मानवता और भारतीयता के साथ सबसे बड़ी बात है कि स्वयंसेवक जैसे देश की पीड़ा को अपनी पीड़ा मानता है वैसे ही स्वयंसेवक पर आई पीड़ा को भी अपने परिवार की पीड़ा मानता है और उसे दूर करने में तन-मन-धन से लग जाता है। संघ का कार्य अपेक्षा के बीज पर खड़ा नहीं हुआ है।
स्वयंसेवक के रूप में देखें तो अटल बिहारी वाजपेयी पहले स्वयंसेवक थे जो देश के प्रधानमंत्री बने और लालकृष्ण आडवाणी उपप्रधानमंत्री बने। आज तो देश की जनता ने स्थिति ही बदल दी है। देश में संघ के स्वयंसेवक के नाते भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति पूर्व में प्रचारक रहे। पूर्व में प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी स्वयं प्रधानमंत्री हैं। साथ ही,ओम बिरला लोकसभा अध्यक्ष हैं। इतना ही नहीं, देश के केंद्रीय मंत्रिमंडल कई सदस्य, अनेक राज्यों के मुख्यमंत्री और राज्यपाल संघ से संबंधित हैं। संघ को निश्चय ही यह सब अच्छा लगता होगा , पर वह अपने को आज भी समाज आधारित संगठन ही मानता है।
संघ जड़ नहीं है बल्कि प्रवाहमान संगठन है। संघ के जितने भी अनुषांगिक संगठन हैं उनमें सभी संगठन आज भारत में नंबर एक का संगठन है। संघ का कार्य वैश्विक स्तर पर भी है। विश्व के अनेक राष्ट्रों में शाखा लगती है। राष्ट्रीय सेविका समिति देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हुए सबसे बड़ी महिला संस्था है।
संघ का कार्य स्वयंसेवक अपने को मिटाकर करता है। यह ऐसा सांस्कृतिक संगठन है जो संघ के स्वयंसेवकों की ‘गुरुदक्षिणा’ से चलता है। संघ में प्रचारक नाम की एक अद्भुत व्यवस्था है। देशभर में संघ के हज़ारों प्रचारक अपना स्वयं का जीवन राष्ट्र को यानी मां भारती को समर्पित कर कार्य करते हैं। संघ के कार्य का सबसे मजबूत नैतिक आधार प्रचारक ही होता है। सरल, सामान्य, नैतिकता, प्रामाणिकता एवं संवेदनशीलता से जुड़कर मानवता भाव से वह सहज ही संघ का कार्य करता है। संघ कार्य के विस्तार में प्रचारको की सबसे बड़ी भूमिका रहती है। वे अपने बारे मे नहीं बल्कि रात-दिन भारतमाता को वैभवशाली बनानें मे जुटे रहते हैं।
आज भी लॉकडाउन में संघ का कार्य पूरी तरह चल रहा है। स्वयंसेवक अपने-अपने संघ कार्यालय में, परिवार में शाखा लगाते हुए राष्ट्र वंदना और संघ की प्रार्थना कर रहे हैं। संघ के स्वयंसेवकों ने लॉकडाउन में बिना प्रचार किये जो सेवा कार्य भारत के प्रत्येक प्रांत और जिलो में किया है वह सराहनीय है। केरल, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में जिस तरह संघ के स्वयंसेवकों ने भोजन, खाद्यान और वहां रह रहे अन्य प्रांतों के निवासियों की सेवा की है, उसे देखकर वहां की सरकारें भी हतप्रभ थी। *मानव सेवा* संघ के कार्य का मुख्य आधार है। इस लॉकडाउन में पूरे भारतवर्ष में यह सभी ने अपनी आखों से देखा है। लोगों को भोजन कराना, ठहराना, खाद्य सामग्री समाज से एकत्रित करके उन्हें उपलब्ध कराना। जनसेवा के ये कार्य संघ के सभी अनुषांगिक संगठन कर रहे हैं। संघ स्वयं प्रचार-प्रसिद्धि से दूर रहता है। क्योंकि वह इन सेवाकार्यो को अपना राष्ट्रधर्म मानता है। अनेक स्थानों पर संगोष्ठियां, संघ विचारकों का बौद्धिक, ऑडियो-वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग से विषयों पर चर्चाएं पूरे भारतवर्ष में चल रहा है। सभी अनुषांगिक संगठनों ने अपने-अपने क्षेत्रों में कार्य प्रारंभ किया हुआ है। संघ नूतनता को आमंत्रित भी करता है और पुरातनता को सम्मान भी देता है।
संघ कभी नहीं कहता कि हम ही भारत को वैभवशाली बनाएंगे, संघ कहता है कि हम भी भारत को वैभवशाली बनाने में प्रमुख भूमिका बनाएंगे। संघ को समझना है तो उसे अपनी आखों से देखना होगा न कि कानों से सुनकर। संघ भारत की सांस्कृतिक प्रकृति है। आज नहीं तो कल इस प्रकृति की गोद में सभी को आना ही होगा।
संघ लम्बे समय से धारा 370 , श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन , सामान नागरिक संहिता जैसे मुद्दे पर जन-जागरण कार्य करता रहा है। आज देश में राष्ट्रीय विचारों की सरकार है। संघ के ये संकल्प बिना किसी व्यवधान के साकार हो रहे हैं।
संघ की गतिविधियों का आधार है शाखा। देश के सुदूर स्थानों पर भी शाखाएं लगती हैं। लाखों स्थान पर शाखाओं के माध्यम से व्यक्ति निर्माण साकार होता है। यही कारण है कि देश में जहां कहीं भी आपदाएं आती हैं तो संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचकर राहत कार्य में जुट जाते हैं।
संघ भारत की सांस्कृतिक एवं सनातनी आत्मा है। संघ वंदे मातरम है। संघ आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठान है। इस पुनीत कार्य रूपी यज्ञ में जो अपनी आहुति देता है, वह धन्य होता है। संघ न किसी का विकल्प है और न संघ का कोई विकल्प है। संघ तो भारत माता को वैभवशाली बनाने का एक अनवरत चलने वाला लाखों स्वयंसेवकों का अटूट संकल्प है।

एकता की शक्ति से वैश्विक उम्मीदें
विवेक रंजन श्रीवास्तव
कोरोना के परिदृश्य में स्पष्ट हो चुका है कि केवल सबके बचाव में ही स्वयं का बचाव संभव है। एकता की शक्ति से वैश्विक उम्मीदें हैं। जो देश इस कठिनाई के समय में भी विस्तार की नीति अपना रहे हैं, वहां की सरकारें जनता से छल कर रही हैं। दुनियां के लिये यह समय सामंजस्य और एकता के विस्तार का है।
हमारी युवा शक्ति ही देश की सबसे बड़ी ताकत है। बुद्धि और विद्वता के स्तर पर हमारे देश के युवाओ ने सारे विश्व में मुकाम स्थापित किया है। हमारे साफ्टवेयर इंजीनियर्स के बगैर किसी अमेरिकन कंपनी का काम नही चलता। हमारी स्त्री शक्ति सशक्त हुई है। देश के युवाओ से यही कहना है कि हम किसी से कम नही है और हमारे देश को विश्व में नम्बर वन बनाने की जबाबदारी हमारी पीढ़ी की ही है। हमें नीति शिक्षा की किताबो से चारित्रिक उत्थान के पाठ पढ़ने ही नही उसे अपने जीवन में उतारने की जरूरत है। मेरा विश्वास है कि भारतीय लोकतंत्र एक परिपक्व शासन प्रणाली प्रमाणित होगी, इस समय जो कमियां भ्रष्टाचार, जातिगत आरक्षण, क्षेत्रीयता, भाषावाद, वोटो की खरीद फरोक्त को लेकर देश में दिख रही हैं उन्हें दूर करके हम विश्व नेतृत्व और वसुधैव कुटुम्बकम् के प्राचीन भारतीय मंत्र को साकार कर दिखायेंगे। आज जब मानवीय मूल्य समाप्त होते जा रहे हैं, संभवतः रोबोट और मशीनी व्यवस्थायें ही देश से भ्रष्टाचार समाप्त कर सकती है, जैसा कंप्यूटरीकरण के विस्तार से रेल्वे या अन्य विभिन्न क्षेत्रो में हो भी रहा है।
सैक्स के बाद यदि दुनिया में कुछ सबसे अधिक लोकप्रिय विषय है तो संभवतः वह राजनीति ही है। लोकतंत्र सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली मानी जाती है। और सारे विश्व में भारतीय लोकतंत्र न केवल सबसे बड़ा है वरन सबसे तटस्थ चुनावी प्रणाली के चलते विश्वसनीय भी है। चुनावी उम्मीदवार अपने नामांकन पत्र में अपनी जो आय घोषित कर चुके हैं वह हमसे छिपी नही है, एक सांसद को जो कुछ आर्थिक सुविधायें हमारा संविधान सुलभ करवाता है,वह इन उम्मीदवारो के लिये ऊँट के मुह में जीरा है। प्रश्न है कि आखिर क्या है जो लोगो को राजनीति की ओर आकर्षित करता है। क्या सचमुच जनसेवा और देशभक्ति ? क्या सत्ता सुख, अधिकार संपन्नता इसका कारण है ? मेरे तो परिवार जन तक मेरे इतने ब्लाइंड फालोअर नही है, कि कड़ी धूप में वे मेरा घंटों इंतजार करते रहें, पर ऐसा क्या चुंबकीय व्यक्तित्व है, राजनेताओ का कि हमने देखा लोग कड़ी गर्मी के बाद भी लाखो की तादात में हेलीकाप्टर से उतरने वाले नेताओ के इंतजार में घंटो खड़े रहे, देश भर में। जबकि उन्हें पता था कि नेता जी आकर क्या बोलने वाले हैं। इसका अर्थ यही है कि अवश्य कुछ ऐसा है राजनीति में कि हारने वाले या जीतने वाले या केवल नाम के लिये चुनाव लड़ने वाले सभी किसी ऐसी ताकत के लिये राजनीति में आते हैं जिसे मेरे जैसे मूढ़ बुद्धि शायद समझ नही पा रहे। तमाम राजनैतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार देश के “रामभरोसे” मतदाता की तारीफ करते नही अघाते, देश ही नही दुनिया भर में हमारे रामभरोसे की प्रशंसा होती है, उसकी शक्ति के सम्मुख लोकतंत्र नतमस्तक है। रामभरोसे वोटरे के फैसले के पूर्वानुमान की रनिंग कमेंट्री कई कई चैनल कई कई तरह से करते रहे हैं। मैं भी अपनी मूढ़ मति से नई सरकार का हृदय से स्वागत करती हूं। पिछले अनुभवों में हर बार बेचारा रामभरोसे वोटर ठगा गया है, कभी गरीबी हटाने के नाम पर तो कभी धार्मिकता के नाम पर, कभी देश की सुरक्षा के नाम पर तो कभी रोजगार के सपनो की खातिर। एक बार और सही। हर बार परिवर्तन को वोट करता है रामभरोसे, कभी यह चुना जाता है कभी वह। पर रामभरोसे का सपना टूट जाता है, वह फिर से राम के भरोसे ही रह जाता है, नेता जी कुछ और मोटे हो जाते हैं। नेता जी के निर्णयो पर प्रश्नचिन्ह लगते हैं,जाँच कमीशन व न्यायालय के फैसलो में वे प्रश्न चिन्ह गुम जाते हैं। रामभरोसे किसी नये को नई उम्मीद से चुन लेता है। चुने जाने वाला रामभरोसे पर राज करता है, वह उसके भाग्य के घोटाले भरे फैसले करता है। मेरी पीढ़ी ने तो कम से कम अब तक यही होते देखा है। प्याज के छिलको की परतो की तरह नेताजी की कई छबिया होती हैं। कभी वे जनता के लिये श्रमदान करते नजर आते हैं, शासन के प्रकाशन में छपते हैं। कभी पांच सितारा होटल में रात की रंगीनियो में रामभरोसे के भरोसे तोड़ते हुये उन्हें कोई स्पाई कैमरा कैद कर लेता है। कभी वे संसद में संसदीय मर्यादायें तोड़ डालते हैं, पर उन्हें सारा गुस्सा केवल रामभरोसे के हित चिंतन के कारण ही आता है। कभी कोई तहलका मचा देता है स्कूप स्टोरी करके कि नेता जी का स्विस एकाउंट भी है। कभी नेता जी विदेश यात्रा पर निकल जाते हैं रामभरोसे के खर्चे पर, वे जन प्रतिनिधि जो ठहरे। संभवतः सर्वहारा को सर्व शक्तिमान बना सकने की ताकत रखने वाले लोकतंत्र की सफलता के लिये उसकी ये कमियां स्वीकार करनी जरूरी हैं। जो भी हो शायद यही लोकतंत्र है, तभी तो सारी दुनिया इसकी इतनी तारीफ करती है।
भारतीय लोकतात्रिक प्रणाली की वैधानिक व्यवस्थायें अमेरिकन व इंगलैण्ड सहित दुनिया के विभिन्न संविधानो के अध्ययन के उपरांत भीमराव अम्बेडकर जैसे विद्वानो ने निर्धारित की थीं। भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार तो विजयी उम्मीदवारों में से सबसे बड़े दल के सांसद,अपना नेता चुनते हैं, जो प्रधानमंत्री पद के लिये राष्ट्रपति के सम्मुख अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करता है, अर्थात जनता अपने वोट से सीधे रूप से प्रधानमंत्री का चुनाव नही करती यद्यपि सत्ता की मूल शक्ति प्रधानमंत्री में ही सन्नहित होती है। जबकि अमेरिकन प्रणाली में राष्ट्रपति सत्ता की शक्ति का केंद्र होता है, और उसका सीधा चुनाव जनता अपने मत से करती है।
अब जन आकांक्षा केवल घोषणायें और शिलान्यास नहीं कुछ सचमुच ठोस चाहती है। सरकार से हमें देश की सीमाओ की सुरक्षा, भय मुक्त नागरिक जीवन, भारतवासी होने का गर्व, और नैसर्गिक न्याय जैसी छोटी छोटी उम्मीदें हैं। सरकार सबके हितो के लिये काम करे न कि पार्टी विशेष के, पर्दे के सामने या पीछे के नुमाइन्दो से सिफारिश पर, केवल उन लोगो के काम हो जिन के पास वह खास सिफारिश हो। जो उम्मीदें चुनावी भाषणो और रैलियो में जगाई गई हैं, वे बिना भ्रष्टाचार के मूर्त रूप लें। महिलाओ को सुरक्षा मिले, पुरुषो की बराबरी का अधिकार मिले। युवाओ को अच्छी शिक्षा तथा रोजगार मिले। आम आदमी को मंहगाई और भ्रष्टाचार से निजात मिले। अल्पसंख्यको को विश्वास मिले। देश का सर्वांगीण विकास हो सके। राष्ट्र कूटनीतिक रूप से, तकनीकी रूप से,सक्षम हो। विकास के रथ पर सवार होकर हमारा देश दुनिया के सामने एक विकसित राष्ट्र के रूप में पहचान बनाये यह हर भारतीय की आकांक्षा है, और यही सरकार की चुनौती है।
कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के चलते विकास के सारे मापदण्ड छिन्न भिन्न हैं निश्चित ही सारी जबाबदारी केवल सरकार पर नही डाली जा सकती, हर नागरिक को भी इस महायज्ञ में अपनी भूमिका निभानी ही होगी। सरकार विकास का वातावरण बना सकती है, सुविधायें जुटा सकती है, पर विकास तो तभी होगा जब प्रत्येक इकाई विकसित होगी, हर नागरिक सुशिक्षित बनेगा। जब देशप्रेम की भावना का अभ्युदय हर बच्चे में होगा तो स्वहित के साथ साथ देशहित भी हर नागरिक के मन मस्तिष्क का मंथन करेगा। भ्रष्टाचार स्वयमेव नियंत्रित होता जायेगा और देश उत्तरोत्तर विकसित हो सकेगा। अतः नागरिको में सुसंस्कार विकसित करना भी नई सरकार के सम्मुख एक चुनौती है।

भारत में सच्चा लोकतंत्र कैसे लाएं ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कल के मेरे लेख हमारे ‘ढोंगी लोकतंत्र’ पर प्रतिक्रियाओं की बरसात हो गई। लोग पूछ रहे हैं कि भारत को सच्चा लोकतंत्र कैसे बनाएं ? कुछ सुझाव दीजिए। सबसे पहले देश की सभी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र हो याने किसी भी पद पर कोई भी नेता बिना चुनाव के नियुक्त न किया जाए। पार्टी के अध्यक्ष तथा सभी पदाधिकारियों का सीधा चुनाव हो, गुप्त मतदान द्वारा। दूसरा, किसी को भी नगर निगम, विधानसभा या संसद का उम्मीदवार घोषित करने के पहले यह जरुरी हो कि वह पार्टी-सदस्य पहले अपनी पार्टी के आतंरिक चुनाव में बहुमत प्राप्त करे। नेताओं द्वारा नामजदगी एकदम बंद हो। तीसरा, यह भी किया जा सकता है कि पार्टी अध्यक्ष, महासचिव और सचिवों को दो बार से ज्यादा लगातार अपने पद पर न रहने दिया जाए। चौथा, पार्टी के आय और व्यय का पूरा हिसाब हर साल सार्वजनिक किया जाए। हमारी पार्टियों को रिश्वत और दलाली के पैसों से परहेज करना सिखाया जाए। पांचवां, अपराधियों को चुनावी उम्मीदवार बनाना तो दूर की बात है, ऐसे गंभीर आरोपियों को पार्टी सदस्यता भी न दी जाए और अगर पहले दी गई हो तो वह छीन ली जाए। छठा, ऐसा कानून बने कि कोई भी दल-बदलू अगले पांच साल तक न तो चुनाव लड़ सके और न ही किसी सरकारी पद पर रह सके। सातवां, जो भी व्यक्ति किसी दल का