आलेख- 22

कमलनाथ ने जगाया उद्योगपतियों का विश्वास
सनत जैन
मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार जो कहती है, वह करती है। इंदौर में 18 अक्टूबर को होने जा रहे, मैग्नीफिसेंट एमपी में आने वाले औद्योगिक घरानों और उद्योगपतियों के लिए सरकार ने जो तैयारियां की हैं। कारोबारियों को निवेश के बाद म.प्र. में किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। म.प्र. में बदलाव के वादे के साथ सत्ता में आई कमलनाथ सरकार देश की पहली सरकार है, जिसने उद्योगों की समस्याओं के हिसाब से उद्योग नीति को मूर्तरूप दिया है। सरकार विभिन्न सेक्टर के उद्योग के अनुसार सुविधाएं दे रही है। औद्योगिक सूझबूझ वाले मुख्यमंत्री कमलनाथ का विजन मध्यप्रदेश को विकसित राज्यों की कतार में लाना है। इसके लिए उन्होंने पहले उद्योगों को श्रेणियों में बांटा, फिर उनकी समस्याएं को पहचाना फिर उनके निराकरण की उम्दा कोशिश की। उद्योगों के प्रति कमलनाथ सरकार का यह एजेंडा देश में शायद ही कहीं देखने को मिले। कहा जाता है कि कारोबारी सुगमता वह चाबी है, जो प्रदेश में निवेश और उद्यमिता के ताले को खोलकर औद्योगिक गतिविधियों में इजाफा कर सकती है। इससे एक ओर जहां कारोबारियों की राह आसान हुई है। वहीं बढ़ती गतिविधियों से पनपे नए रोजगार के साधन युवाओं को बेहतर भविष्य देंगे।
कारोबारी सुगमता में म.प्र. अव्वल
किसी प्रदेश में होने वाला निवेश काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है, कि कारोबारियों के लिए मध्यप्रदेश में कारोबार अन्य राज्यों की तुलना में आसान है। कारोबारी सुगमता में उस प्रदेश की स्थिति इसका सटीक पहचान कराती है। मध्यप्रदेश इस मामले में देश के अन्य प्रांतों से बहुत आगे आ रहा है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में प्रदेश सरकार लगातार प्रयास कर रही है, कि कारोबारी सुगमता में निरंतर सुधार हो। प्रदेश में नया निवेश सतत् आता रहे। कमलनाथ का मानना है कि नागरिक सेवाओं की तरह कारोबारियों की समस्याओं की सुनवाई भी जल्द से जल्द हो।
दूसरे प्रदेशों पर भारी म.प्र.
मुख्यमंत्री कमलनाथ के 9 माह के कार्यकाल में ही मध्यप्रदेश तमाम मानकों पर देश के दूसरे प्रदेशों पर भारी पड़ रहा है। हाल ही में विश्व बैंक और उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवद्र्धन विभाग (डीपीआईआईटी) की ओर से तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि कारोबारी सुगमता के मामले में मध्यप्रदेश चुनिंदा राज्यों में शामिल है। कारोबारी प्रस्तावों के क्रियान्वयन के लिए जारी मानकों के अनुसार प्रदेश का अनुपालन 95 प्रतिशत है।
नवाचार से निकल रहा हल
कमलनाथ सरकार ने मध्यप्रदेश में औद्योगिक गतिविधयों को बढ़ाने और रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए नए तरीके अपनाए हैं। जिनके सकारात्मक परिणाम भी हमें देखने को मिल रहे हैं। प्रदेश सरकार अपने इन्वेस्ट पोर्टल के माध्यम से संभावित निवेशकों को एकल खिड़की निस्तारण प्रदान कर रही है। कमलनाथ के राज में मध्यप्रदेश में निवेश के इच्छुक कारोबारियों को विभिन्न विभागों के चक्कर काटने की आवश्यकता नहीं रही है। अब वे एक ही स्थान पर संपर्क करके तमाम मंजूरियां, भूमि आवंटन, जरूरी रियायतें त्वरित हासिल कर सकते हैं। इतना ही नहीं आगे चलकर परियोजना के विस्तार या नवीनीकरण का काम भी यहीं से हो सकता है। वर्तमान में 8 विभागों की 32 सेवाओं का लाभ इन्वेस्ट पोर्टल के माध्यम से लिया जा सकता है।
इन वजहों से म.प्र. पहली पसंद
मध्यप्रदेश में ऐसे अनेक कारक हैं जिनकी बदौलत वह निवेशकों की पहली पसंद बना हुआ है।
भूमि आवंटन
मध्यप्रदेश में औद्योगिक भूमि प्रचुर मात्रा में मौजूद है। इंदौर के निकट पीथमपुर, भोपाल के निकट मंडीदीप, ग्वालियर के निकट मालनपुर इंडिस्ट्रयल एरिया के अलावा भी प्रदेश के विभिन्न जिलों में लैंड बैंक बनाये गये हैं जिन्हें जरूरत पडऩे पर कारोबारियों को आवंटित किया जा सकता है। मप्र औद्योगिक विकास निगम के पास कुल मिलाकर 1.20 लाख एकड़ जमीन उपलब्ध है। बीते कुछ समय में विभाग ने 650 से अधिक लैंड पार्सल कारोबारियों को आवंटित किये हैं।
जरुरत के अनुसार रियायतें
मध्यप्रदेश सरकार उद्यमियों को पूंजीगत रियायतें भी प्रदान कर रही है। प्रदेश में फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाने वाले कारोबारी हों या स्टार्ट अप और एसएमई कारोबारी, सरकार उन्हें विभिन्न बुनियादी सुविधाओं के लिए पूंजीगत रियायत देने की नई नीति बनाई है। विभिन्न उपक्रम लगाने वालों को स्टैंप शुल्क में मुक्ति और निशुल्क बिजली उपलब्ध कराने का प्रावधान भी प्रदेश सरकार ने किया है। उद्योगों को मूल निवेश राशि के 10 प्रतिशत से लेकर 40 प्रतिशत तक की छूट प्रदान की जा रही है। वृहद श्रेणी के उद्योगों के लिए यह राशि 10 प्रतिशत और छोटे उद्योगों के लिए 40 प्रतिशत है। प्रत्येक उद्योग में निवेश रोजगार क्षमता तथा ग्रामीण अंचलों के संसाधनों पर आधारित उद्योग लगाने पर रियायतें भी अलग -अलग हैं।
किसानों और बेरोजगार के हित में
सरसरी तौर पर देखने पर लगता है, कि सरकार ये सारी रियायतें तो कारोबारियों को दे रही है, भला इससे आम जनता का क्या भला हो सकता है? कारोबारी सुगमता का सीधा संबंध प्रदेश की आम जनता से है। प्रदेश में निवेश समर्थक और कारोबार की अहमियत समझने वाली सरकार हो, तो रोजगार की स्थिति में सुधार होता है। प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बीते कुछ दिनों में देश के शीर्षस्थ कारोबारियों के साथ मुलाकात कर उन्हें मध्यप्रदेश में निवेश करने के लिए आमंत्रित किया। इन कारोबारियों में रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी, शापूरजी पालोनजी समूह के साइरस मिस्त्री समेत देश के तमाम बड़े उद्यमी शामिल थे। इन उद्यमियों ने प्रदेश में बड़े पैमाने पर निवेश की इच्छा भी जताई है। यह निवेश जब जमीन पर उतरेगा तो प्रदेश के आर्थिक विकास को तो गति मिलेगी ही, स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलेंगे। प्रदेश सरकार ने निजी उद्यमों में मिलने वाले रोजगार में स्थानीय लोगों को 70 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा भी की है। वहीं किसानों को भी लाभ हो उसके उत्पाद का बेहतर मूल्य एवं बड़ा बाजार मिले इसका भी ध्यान रखा गया है।
श्रम शक्ति को कुशल बनाना प्राथमिकता
मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने वक्तव्यों में बार-बार यह दोहराते रहे हैं कि उद्योगों को बढ़ावा देना, प्रदेश में रोजगार के अवसर तैयार करना तथा प्रदेश की श्रम शक्ति को कुशल बनाना उनकी प्राथमिकता में है। ऐसे में अगर कारोबारी सुगमता के माध्यम से कारोबार के अनुकूल माहौल तैयार होता है, तो इसमें सभी का हित है। भूमि आवंटन से लेकर श्रम सुधारों तक और राजस्व सुधार से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में दी जा रही सब्सिडी तक प्रदेश कारोबारी सुगमता के साथ लगातार आगे बढ़ रहा है।
नाथ का विजन मप्र को देगा नई ऊर्जा
देश की हृदयस्थली होने के नाते मध्यप्रदेश एक विशिष्ट हैसियत रखता है। यहां होने वाला निवेश राज्य के सकल घरेलू उत्पाद को तो मजबूत करेगा साथ ही, रोजगार के अवसरों के साथ ग्रामीण और अद्र्धशहरी इलाकों में रहने वाले लोगों की आय और क्रयशक्ति बढ़ायेगा। मौजूदा वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में यह बात बहुत मायने रखती।

*भोपाल नगर निगम का विभाजन: इसमें गलत क्या है?*
राजेन्द्र चतुर्वेदी
मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार ने भोपाल नगर निगम को दो भागों में बांटने का फैसला कर लिया है। यह ऐसा फैसला है, जिसका जनता स्वागत कर रही है, जबकि भाजपा राजनीतिक कारणों से विरोध।
ये लोग एक बहुत ही ‘रोचक’ सवाल पूछ रहे हैं कि सरकार बताए कि आखिर वह भोपाल नगर निगम को दो हिस्सों में क्यों बांटना चाहती है? यह सवाल इतना सरल है कि इसका जवाब कोई भी दे सकता है। क्या यह सवाल भाजपा से नहीं पूछा जाना चाहिए कि उसके नेता यह बताने का कष्ट करेंगे कि वे इसका विरोध क्यों कर रहे हैं?
आखिर,भोपाल नगर निगम के दो हिस्सों में बंटने के बाद उन्हें किस दुकानदारी के बंद होने का डर है? एक पूर्व मंत्री जी ने तो यहां तक कहा है कि अगर भोपाल को दो नगर निगमों में बांटा जाएगा, तो प्रदेश के टुकड़े हो जाएंगे। मंत्री जी नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं। जो लोग देश को बांटने की राजनीति कर रहे हैं, वे प्रदेश के विभाजन की चिंता में दुबले होने लगें, तो इसे उनकी हताशा ही कहा जाएगा? विरोध के लिए विरोध की राजनीति करने वालों को अपनी हताशा को छिपाकर रखना चाहिए। लेकिन हताशा का स्तर इतना ऊंचा है कि एक ‘नेताजी’ तो यह तक कह बैठे कि कांग्रेस हिंदू-मुसलमान के आधार पर भोपाल नगर निगम को बांट रही है। हिंदू-मुसलमान के आधार पर समाज को बांटने की राजनीति करने वाली भाजपा के नेताओं से यह उम्मीद कोई नहीं कर सकता कि वे सांप्रदायिक विद्वेश नहीं फैलाएंगे। खैर, लोकतंत्र का एक सर्वस्वीकृत सिद्धांत है कि प्रशासनिक इकाइयां जितनी छोटी होंगी, जनता को उतनी ही सुविधा मिलेगी। छोटी प्रशासनिक इकाइयों के पक्ष में भाजपा नेता और पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की आवाज काफी बुलंद हुआ करती थी। वे देश को छोटे-छोटे राज्यों में बांटने के पक्षधर थे। मध्यप्रदेश को बांटकर छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश को बांटकर उत्तराखंड और बिहार को बांटकर झारखंड राज्य का गठन उन्हीं शासनकाल में हुआ था। यदि आज अटल जी हमारे बीच होते, तो वे कमलनाथ सरकार के फैसले का स्वागत ही करते। दरअसल, प्रशासनिक इकाइयों का आकार छोटा करने के लिए ही नए राज्यों, नए जिलों, तहसीलों, नगर निकायों का सृजन किया जाता है। जब प्रशासनिक इकाई छोटी होती है, तो जनता और शासन- प्रशासन के बीच की दूरी कम हो जाती है। जैसे- भोपाल के लोग अपनी किसी समस्या को लेकर जितनी आसानी से मुख्यमंत्री, मंत्रियों, पुलिस-प्रशासन के आला अफसरों से मिल सकते हैं, उतनी आसानी से प्रदेश के सुदूर अंचलों के लोग नहीं मिल सकते। राजधानी एक प्रशासनिक इकाई ही तो है और इस इकाई से जो अंचल जितना दूर है, वहां के लोगों का राजधानी तक आना उतना ही दुष्कर। राजधानी का तो उदाहरण मात्र दिया गया है। आम जनता के ज्यादातर काम ग्रामीण-शहरी निकायों, जिला, तहसील, थानों में पड़ते हैं। इन सभी प्रशासनिक इकाइयों की आम जनता से कम दूरी होनी चाहिए। अंतत: ये इकाइयां जनता की सुविधा, उसकी समस्याओं के निराकरण के लिए ही स्थापित की गई हैं।
एक बहुत बड़ा मसला आबादी का होता है। जब आबादी बढ़ती है, तो प्रशासनिक इकाइयों पर काम का बोझ भी बढ़ता है। इस सूरते-हाल में उस प्रशासनिक इकाई को बांटकर दो मुख्यालय बना दिए जाते हैं। इससे काम का बोझ बंट जाता है और मुख्यालय जनता के करीब पहुंच जाता है। क्या भाजपा नेता यह नहीं जानते कि भोपाल की आबादी लगातार बढ़ रही है? अभी 10-12 साल पहले जो गांव भोपाल से बाहर हुआ करते थे, वे अब भोपाल में शामिल हो गए हैं। शहर का आकर इतना फैलता गया कि उसने गांवों को अपने में समाहित कर लिया। आज भोपाल के दो नहीं, तीन चेहरे हैं। एक चेहरा तो वह है, जहां नागरिकों को ठीक-ठाक सुविधाएं दी जा सकती हैं। वे अभी मिल नहीं पा रही हैं, तो नगर निगम की अकर्मण्यता की वजह से। दूसरा चेहरा वह है, जहां सुविधाएं तो हैं, लेकिन नाम मात्र के लिए। भोपाल के ही कुछ इलाके केवल कहने भर को शहर हैं। वहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अकाल है। यह भोपाल का तीसरा चेहरा है। क्या अरेरा कॉलोनी और कोलार के नागरिकों को एक जैसी सुविधाएं देने का दावा कर सकता है, भोपाल का भाजपा शासित नगर निगम? क्या आनंद नगर और महाराणा प्रताप नगर की तुलना की जा सकती है? क्या अयोध्या नगर, करोद या भानपुर की तुलना होशंगाबाद रोड पर स्थित किसी कॉलोनी से हो सकती है? नहीं, क्योंकि जहां नगर निगम की जितनी पहुंच या जहां के लोगों की नगर निगम तक जितनी पहुंच, वहां उतना विकास हुआ है, उतनी ही जनसुविधाओं में इजाफा हुआ है। जो इलाका दूर है, उसके साथ न्याय नहीं हो पाया है।
भोपाल का एक जैसा विकास, शहरवासियों को एक जैसी बुनियादी सुविधाएं तभी मिलेंगी, जब नगर निगम तो दो भागों में बांटा जाएगा। इस तरह के विभाजनों का कहीं विरोध नहीं किया जाता। 2002 में बेंगलुरु नगर निगम तीन हिस्सों में बंटा, तो वहां के सभी लोगों ने इसका स्वागत ही किया। चेन्नई नगर निगम भी अपनी स्थापना से लेकर अब तक चार बार विभाजित हो चुका है। पुणे, मुंबई, कोलकाता आदि नगरीय निकायों का विभाजन हुआ, लेकिन विरोध किसी ने नहीं किया। हां, जब 2011-12 में दिल्ली नगर निगम को चार हिस्सों में बांटा गया था, तब भाजपा के लोगों ने ही हंगामा किया था। यह बात अलग है कि जब उन्हें दिल्ली की जनता का समर्थन नहीं मिला, तो वे चुप हो गए थे। आज भाजपा नेता स्वयं स्वीकार करते हैं कि यदि दिल्ली नगर निगम को चार भागों में नहीं बांटा गया होता, तो उसका वैसा विकास नहीं हुआ होता, जैसा अब हुआ है। दिवंगत वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्वयं स्वीकार किया था कि नगर निगम का विभाजन दिल्ली के हित में रहा, लेकिन जब विभाजन हो रहा था, तब ये जनता की भावनाओं की कद्र नहीं कर रहे थे।
जबकि जनता यह बात खूब समझती है कि सरकार का कौन सा निर्णय उसके हित में है, कौन सा नहीं। उसे पता होता है कि जब प्रशासनिक इकाई के मुख्यालय की दूरी उससे कम होती है, तो उसके पास अपने काम के लिए भाग-दौड़ करने का समय निकल आता है। तब राशन कार्ड सुधरवाने के लिए दो दिन तक दुकान बंद नहीं रखनी पड़ती, नौकरी से छुट्टी नहीं लेनी पड़ती। जब मुख्यालय पास होता है, तो अपने रोज के कार्य करते हुए भी वक्त निकाला जा सकता है। पास में मुख्यालय होने का एक और फायदा यह होता है कि कर्मचारी सतर्क रहते हैं। वे लोगों के काम को टाल नहीं पाते। जैसे- थाने से पांच-10 किलोमीटर दूर अगर एसपी का कार्यालय हो, तो ऐसे थानों में अलग तरह की सतर्कता देश के किसी भी हिस्से में देखी जा सकती है। इसका कारण यही डर होता है कि सामने वाला आदमी शिकायत लेकर कहीं ‘बड़े साहब’ के पास न चला जाए। ज्यादातर कर्मचारियों की मनोदशा यह होती है कि जहां उनकी शिकायत हो सकती है, वह स्थान दूर है, तो वे अपने ही अंदाज में काम करते हैं। उनका रवैया टालने वाला ज्यादा होता है, काम को करने की जगह।
नगर निगम वह प्रशासनिक इकाई है, जहां सभी को काम पड़ता है। इसलिए भोपाल नगर निगम के विभाजन का विरोध कुल मिलाकर जनता का विरोध है। भाजपा कमलनाथ सरकार का विरोध करने के चक्कर में यह तक भूल गई है कि वह जनता का विरोध कर रही है। वह नहीं चाहती कि जनता की समस्याओं का समाधान आसानी से हो। भाजपा को जनविरोधी राजनीति करने से बचना चाहिए।
*लेखक राजेन्द्र चतुर्वेदी, मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं।*

’लोहिया का कथन सच निकला जे.पी. ने देश को हिलाया’’
रघु ठाकुर
(11 अक्टूबर जन्मदिवस पर विशेष ) जयप्रकाश जी को लोकनायक का संबोधन देश की जनता ने 1974 में दिया था, जब उन्होंने बिहार आंदोलन और उसके बाद समूचे देश में सम्पूर्ण क्रांति के नाम से आंदोलन का नेतृत्व किया था। निसंदेह 1974 का आंदोलन आजादी के बाद के देश में हुये आंदोलनों में सबसे व्यापक था। 1974 की रेल हड़ताल जो शायद दुनिया की सबसे बड़ी हड़ताल थी, इसके हिस्सेदार देश के 20 लाख कर्मचारी थे। परन्तु जे.पी. के आंदोलन मंे शारीरिक और मानसिक भागीदारी करोड़ों लोगों की थी।
1952 के संसदीय आम चुनाव के बाद जिसमें तत्कालीन सोशलिस्ट पार्टी पराजित हुई थी। इसके बाद जे.पी.जो समाजवादी नेता थे, पार्टी व राजनीति छोड़कर सर्वोदय में चले गये थे। डाॅ.लोहिया जो 1940 के दशक से जे.पी. के समतुल्य समाजवादी नेता थे और जयप्रकाश और लोहिया का नाम समाजवादी कार्यकर्ताओं के लिये आदर्श समाजवादी नाम थे। यहाॅ तक कि समाजवादी आंदोलन के नारों में भी लोहिया और जयप्रकाश के नारे साथ-साथ ही लगते थे।
डाॅ.लोहिया, जयप्रकाश की व्यापक छवि और प्रभाव को समझते थे और इसीलिये अपनी मृत्यु के कुछ दिनो पूर्व डाॅ.लोहिया ने पटना मंे भाषण देते हुये जयप्रकाश जी से पुनः समाजवादी आंदोलन का नेतृत्व करने का आवाहन किया था। लोहिया ने कहा था कि ’’जयप्रकाश, तुम देश को हिला सकते हो बशर्ते खुद न हिलो’’ और इस दूसरी पंक्ति का तात्पर्य जे.पी. की भावुकता से था।
1974 में गुजरात के नौजवानों ने छात्रावासों के भोजनालयों में भोजन की थाली के बढ़े दाम के विरुद्व आंदोलन शुरू किया था और जो धीरे-धीरे यह आंदोलन समूचे प्रदेश के छात्रों का आंदोलन बन गया था । रविशंकर महाराज जो गुजरात के सर्वमान्य गांधीवादी नेता थे, ने आंदोलन की अगुवाई की थी और स्व.मोरारजी भाई देसाई ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार जिसके मुख्यमंत्री चिमनभाई थे, को बर्खास्त करने की मांग की थी और अनिश्चित कालीन उपवास शुरू किया था। श्रीमति इंदिरा गांधी जो प्रधानमंत्री थी को जनता के दबाव में अपनी ही पार्टी की सरकार को बर्खास्त करना पड़ा। इस आंदोलन में शामिल होने के लिये जब जे.पी. पहुंचे तो उन्हें स्वतः ही एक प्रकार का आत्मविश्वास प्राप्त हुआ और उन्होंने सार्वजनिक रुप से स्वीकार किया था कि गुजरात के नौजवानों ने मुझे नई रोशनी दिखाई है। गुजरात से लौटने के बाद ही जे.पी.ने बिहार के छात्रों के आंदोलन की अगुवाई की और बिहार आंदोलन के नाम से शुरु हुआ आंदोलन लगभग समूचे देश में फैला। हालांकि इसकी सघनता उत्तर भारत, पश्चिमी भारत और पूर्वी भारत में जितनी ज्यादा थी उतनी दक्शिण भारत में नही थी।
जे.पी.ने सम्पूर्ण क्रांति का अर्थ व्यवस्था में सम्पूर्ण बदलाव कहा था और स्व.डाॅ.लोहिया के द्वारा दुनिया में बदलाव के लिये तय की गई ’’सप्त क्रांति’’ का सगुण कार्यक्रम माना था।
जे.पी. ने सम्पूर्ण क्रांति के आंदोलन की अगुवाई करते समय जिन कार्यक्रमों पर तत्कालीन रुप से ज्यादा जोर दिया था उनमें चुनाव सुधार, भ्रष्टाचार की समाप्ति, विकेन्द्रीकरण, मंहगाई को रोकना, बेरोजगारी और राजकीय दमन और काले कानून की समाप्ति प्रमुख रुप से थी। जे.पी. के इस आंदोलन में समाजवादी तो अपनी सम्पूर्ण भावना के साथ थे क्योंकि उनका जे.पी. के साथ लगभग 35 वर्षो का कार्यात्मक और रागात्मक लगाव था। समाजवादी साथियों ने कभी भी जे.पी. को अलग नही माना और सर्वोदय में जाने के बाद भी वे समाजवादियों के लिये पूर्ववत मान्य नेता थे। सर्वोदय के वैचारिक रुप से दो हिस्से हो गये थे और जो लोग विनोवा जी को अपना अंतिम वाक्य मानते थे उन्हें छोड़कर एक बड़ा हिस्सा जे.पी के साथ संघर्ष में आया। बावजूद इसके कि विनोवा जी अन्यानिक कारणों से आंदोलन के हक में नही थे। वामपंथियों में भी बॅटवारा हुआ था और सी.पी.आई. कांग्रेस के साथ थी परन्तु सी.पी.एम और अन्य माक्र्सवादी धड़े इस आंदोलन के सहभागी थे। भारतीय क्रांतिदल जिसका नेतृत्व स्व.चरण सिंह, बीजू पटनायक, राजनारायण और कर्पूरी ठाकुर अपने अपने राज्यों में करते थे, सम्पूर्ण तौर पर सम्पूर्ण क्रांति के आंदोलन का हिस्सेदार थे क्योंकि भारतीय क्रांतिदल में भी राजनायण और कर्पूरी जैसे समाजवादी नेताओं की बड़ी ताकत थी। जनसंघ और राष्ट्रीय स्ंवय सेवक संघ भी अपने निर्णय के माध्यम से इस आंदोलन में सहभागी बने। जब जनसंघ और संघ इसका हिस्सेदार बना तो तत्कालीन सरकार के इशारे पर प्रचार तंत्र ने यह कहकर आंदोलन को विभाजित करने का प्रयास किया था कि जे.पी. के आंदोलन में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ जैसी संस्थायें जो फासिस्ट है, श्षामिल है। तत्कालीन सरकारी पार्टी की ओर से कुछ लोगो ने जे.पी. को राष्ट्रद्रोही की संज्ञा भी दी थी और जे.पी. ने उत्तर देते हुये कहा कि अगर मैं राष्ट्रद्रोही हो जाऊॅगा तो इस देश में कोई राष्ट्रभक्त नही बचेगा। यह उनका अपनी राष्ट्रभक्ति के प्रति गहरा विश्वास था। जे.पी. ने यह भी कहा कि अगर संघ फासिस्ट है और मेरे साथ है फिर मैं भी फासिस्ट हूं। जे.पी. यह जानते थे और उनका विश्वास इतना गहरा था कि देश कभी भी उनके राष्ट्र प्रेम, लोकतांत्रिक और धर्म निरपेक्ष चरित्र पर शक नही करेगा। जे.पी. को यह भी विश्वास था कि इस आंदोलन में शामिल होने से नई युवा शक्ति का उदय होगा और जो राजनैतिक दल शामिल हुये थे उनके स्वभाव और चरित्र पर शक नही करेगा। जे.पी. ने 1977 के आम चुनाव के पूर्व सबको मिलाकर एक जनता पार्टी का गठन कराया। केवल सी.पी.एम. ने अपना पृथक अस्तित्व बचाये रखा। हांलाकि जनता पार्टी जिसकी सरकार चुनाव के बाद केन्द्र में बनी और अनेक राज्यों में भी बनी से जे.पी.को धोखा हुआ, उनका विश्वास खंडित हुआ। जनता पार्टी सरकारों ने जे.पी. के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन के मुद्दे को लेकर लगभग कुछ भी नही किया और केवल सत्ता और संगठन के कब्जे के अंतर खेल में ही पार्टी फंसी रही। जनसंघ के जो लोग सरकारों में आये थे
उन्होंने सरकारों को चलाना ही अपना लक्श्य समझ लिया और जिस बदलाव की उम्मीद जे.पी. ने की थी उसे निराशा में बदल दिया। दो घटनाओं का मैं विशेष उल्लेख करूंगा:-
1. बिहार सरकार के जनसंघ और संघ पृष्ठभूमि के मंत्री श्री दीनानाथ पांडे, नाथूराम गोडसे के भाई श्री गोपाल गोडसे को लेकर बिहार में दौरा करने लगे और गांधी जी की हत्या को उचित ठहराने लगे।
2. 26 जून 1979 को पटना में जे.पी. का अभिनंदन कार्यक्रम था और एक सम्पूर्ण क्रांति सम्मेलन रखा गया था। इस सम्मेलन में मैं स्वतः भी शामिल था तथा तत्कालीन सर संघ संचालक स्व. बालासाहब देवरस इस सम्मेलन में जे.पी. का अभिनंदन करने आये थे। उनका भाषण जो टेप भी है और 27 जून 1979 के पटना के समाचार पत्रों में छपा भी था वह तथ्य को समझने के लिये महत्वपूर्ण है। स्व.देवरस ने अपने भाषण में कहा कि मैं अक्सर संघ कार्यो के लिये यात्रा में रहता हॅू अतः मैं नही पढ़ सका या जान सका कि सम्पूर्ण क्रांति क्या है? परन्तु जे.पी. जैसे महान व्यक्ति जब उसकी चर्चा कर रहे है तो मुझे लगता है कि वह कुछ अच्छी ही बात होगी। क्या बाला साहब का यह कथन मुद्दों से बच निकलने का कथन नही है? 1977 के चुनाव के पूर्व आपातकाल में वे स्वतः जेल में थे और क्या उन्हें इतनी लम्बी अवधि में सम्पूर्ण क्रांति के बारे में पढ़ने या जानने का अवसर नही मिला होगा?
जो मुद्दे सम्पूर्ण क्रांति के मुद्दे थे वे अभी भी लगभग अनिर्णीत है- बेरोजगारी चरम पर है, भ्रष्टाचार और मंहगाई चरम पर है, चुनाव सुधार, यद्यपि टी.एन.शेषन ने अपने कार्याकाल में कुछ शुरुआत की थी परन्तु बड़े सुधार अभी भी लंबित है। आज केन्द्र में श्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री है और उनकी पार्टी ही अकेले बहुमत की सरकार है। श्री नरेन्द्र मोदी जी, जे.पी.आंदोलन के हिस्सेदार भी रहे है तथा समय-समय पर जे.पी. की याद भी करते है और उसका उत्तर वे कैसे देते है वही इतिहास में उनका स्थान तय करेगा। जो लोग आपातकाल में जेलो में रहे है या बाहर रहकर भी आपातकाल के खिलाफ संघर्ष में सहयोगी रहे है और जो विभिन्न प्रदेशों में दलीय सत्ताओं के आधार पर विभिन्न संगठनों में कार्यरत है, आज उनके सामने भी यह चुनौती है।
प्रधानमंत्री से मेरी अपेक्षा है कि वे 11 अक्टूकर को जयप्रकाश जी के जन्मदिन के अवसर पर निम्न कार्यक्रमों की घोषणा करें:-
1. चुनाव सुधार लागू हों जिनमें समूचे देश के पंचायत से लेकर संसद तक याने जनपद, जिला पंचायत, सहकारी समितियाॅ, सहकारी बैंक, विधानसभा और संसद
तक एक साथ हो। हर पाॅच वर्ष में एक माह चुनाव के लिये निर्धारित हो जिसमें सारे चुनाव एक साथ हों जिससे चुनाव खर्च भी सीमित होगा और देश का अमूल्य समय, धन और साधन भी बचेगा।
2. बाजार की मंहगाई को रोकने के लिये ’’दाम बाॅधो’’ नीति का एलान करें ताकि लागत खर्च और बाजार मूल्य में आखिरी छोर तक 50 पैसे से ज्यादा फर्क न हो।
3. कृषि उपजों के दो फसलों के बीच का उतार चढ़ाव 6 प्रतिशत से अधिक न हो, का कानून बने तथा खाद्यान्न की सुरक्षा और संधारण के लिये कृषक भंडारगृह जो किसान के ही घर में हो ऐसी योजना शुरु हो तथा क्षेत्रीय उत्पाद के आधार पर खाद्य प्रस्ंास्करण के क्षेत्रीय उद्योग लगाये जाने की घोषणा करें जिससे कुछ माह के अंदर ही देश में 30-40 लाख लोगों को रोजगार मिल सकता है।
4. लोकतंत्र को नियंत्रित या समाप्त करने वाले काले कानूनों को समाप्त किया जाये।

5. सभी बेरोजगारों को बेकारी भत्ता न्यूनतम 5 हजार रुपया और चयन परीक्षाओं के शुल्क को समाप्त करने की घोषणा करें।
अगर प्रधानमंत्री जी ये घोषणायें करेगे तो वह लोक नायक जयप्रकाश के प्रति सच्ची श्रद्वांजलि होगी। आपातकाल के मीसाबंदियों या आपातकाल के विरुद्व आंदोलन के सहयोगी मित्रों से मैं अपील करुॅगा कि आज भी हमारा दायित्व इन बुनियादी सवालों के प्रति है और इसीलिये हमें दलीय खाकों के ऊपर उठकर अपने और पराये का भेद छोड़कर गीता को सम्मुख रखकर उपरोक्त कार्यक्रमों को पूरा कराने के लिये लड़ने की तैयारी करना होगी। सरकारों में बैठे लोग हमारे अपने है शत्रु नही है परन्तु नीति और कत्र्तव्य की पुकार है कि हम उन्हें प्रेरित करने और बाध्य करने के लिये पुनः सिविल नाफरमानी के मार्ग पर उतरें।

राष्ट्रपिता तुम्हें प्रणाम
रघु ठाकुर
अमेरिका के राष्ट्रपति श्री ट्रंप न केवल दुनिया में बल्कि अमेरिका में भी एक अविश्वसनीय- गैर जिम्मेदार और कमोवेश मूर्ख व्यक्ति माने जाते है। यद्यपि वह अपने राजनैतिक स्वार्थें के प्रति सदैव सजग रहते है। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अमेरिकी यात्रा में ”हाउडी मोदी“ के नाम से ह्यूस्टन में जलसा प्रायोजित किया गया था। इसका उद्देश्य एक तरफ भारत में श्री मोदी को वैश्विक नेता बताने और इस प्रकार की छवि निर्माण करने का उद्देश्य था दूसरी तरफ आगामी चुनाव में भारतीय मतदाताओं को ट्रंप के पक्ष, में करना था, चूंकि श्रीमति तुलसी गेवार्ड उनके विरूद्ध प्रत्याशी है, और वे भारतीय मूल की हिन्दू महिला है। इसलिए ट्रंप के लिए भारतीय मतदाताओं का समर्थन कठिन हो सकता था ”हाउडी मोदी“ के माध्यम से इस चुनावी संकट से पार पाने का कुछ प्रयास श्री ट्रंप ने किया है।
मोदी के माध्यम से भारतीय मतदाताओं का समर्थन पाने के लिये श्री ट्रंप इतने उत्साहित हो गए कि उन्होंने श्री मोदी को ”फादर ऑफ इंडिया“ घोषित कर दिया। किसी व्यक्ति को देश याने भौगोलिक इकाई का पिता मानने या न मानने का और घोषित करने या न करने का अधिकार उस देश के निवासी नागरिकों का होता है। महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता का पहला संबोधन, नेता जी श्री सुभाष चंद्र बोस ने किया था जिसे पहले देश ने फिर दुनिया ने स्वीकार किया। अगर ट्रंप ने श्री मोदी को फादर ऑफ अमेरिका या फादर ऑफ ट्रंप घोषित किया होता तो वह उनका व्यक्तिगत अधिकार था, परन्तु किसी दूसरे देश के बारे में, अपने स्वार्थ के लिए ऐसी टिप्पणी करना तो उस पद के लिए घोषित व्यक्ति को भी छोटा या हल्का बनाना है। राष्ट्रपिता जैसी उपाधि कोई संवैधानिक उपाधि नहीं है, बल्कि यह जन स्वीकारिता पर निर्भर करती है। अगर उस दिन श्री नरेन्द्र मोदी स्वत: इसका खंडन करते और विनम्रता पूर्वक कहते की ”भारत में एक ही राष्ट्र पिता है और वह है महात्मा गाँधी“ तो श्री नरेन्द्र मोदी का कद भारतीयों के मन में और ऊँचा हाता। पर उनकी चुप्पी और प्रसन्नता ने न केवल उन्हें देश में लोलुप सिद्ध किया है, बल्कि हास्य का पात्र बना दिया है। आचार्य धर्मेंद्र जैसे कट्टर मानसिकता और गाँधी विरोधी लोग यदा कदा महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता कहने पर इस आधार पर आपत्ति करते रहे है एक व्यक्ति सवा सौ करोड़ लोगों का पिता कैसे हो सकता है? शायद ही अब वे इस मोदी के मामले पर जबान खोले और कहें एक व्यक्ति एक सौ तीस करोड़ लोगों का पिता कैसे हो सकता है। वे और उनके जैसे लोग इतने तो समझदार है, जानते है कि श्री नरेन्द्र मोदी के विरूद्ध बोलने या उनकी नाराजगी का क्या अर्थ होता है? श्री आसाराम, राम रहीम, रामपाल जैसा शायद वे नहीं बनना चाहेंगे। अभी तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में सर्वेच्च पद सर संघ संचालक का होता रहा है। इस पद को संघ के लोग सम्मान पूर्वक या योजना पूर्वक परम पूज्यनीय कहते रहे है। श्री ट्रंप ने श्री मोदी और संघ के बीच एक संकट खड़ा कर दिया है। और भाजपा सरकार तथा संघ के रिश्तो पर तनाव का संकट खड़ा कर दिया है। अब या तो श्री मोहन भागवत और संघ के लोगों को श्री मोदी को फादर ऑफ इंडिया कहने या मानने से इंकार करना होगा या फिर अपने पिता के पैर छूना होगा। इस ट्रंप जनित नैतिक व व्यवहारिक संकट का हल संघ कैसे निकालेगा यह उन पर ही निर्भर है हालांकि संघ का योजना कौशल निर्विवाद हैं। वैसे ट्रंप ने जाने अनजाने इतना तो अच्छा किया की मोदी को ”फादर ऑफ इंडिया“ कहा। दरअसल इंडिया और राष्ट्र के बीच में मौलिक फर्क है। इंडिया केवल देश के आबादी के 15-20 प्रतिशत लोगों का पर्याय है जो अंग्रेजी दा व पाश्चात्य सभ्यता के पोषक है। पूँजीपति है, कारपोरेट है, और शोषण के पर्याय है। भारत देश की उस 85 प्रतिशत आबादी का पर्याय है जो भारतीय भाषाओं को जानती बोलती है-जो किसान है-मजदूर है- अनुसूचित जाति-जन जाति-पिछड़े व गरीब है, और जो मेहनत कश है। पर दूसरे के श्रम की लूटने वाले नहीं है। महात्मा गाँधी इस भारत के राष्टपिता हैं, और ट्रंप के मोदी उस कारपोरेट जगत के पिता है जो सत्ता की ताकत के माध्यम से कारपोरेट्स को, पूंजीपतियों को और मीडिया के मालिकों को बनाते मिटाते है। श्री ट्रंप ने उन्हें ”फादर ऑफ इंडिया“ कहकर उन 10-15 प्रतिशत लोगों का पर्याय और पिता बता दिया है जो भारतीय सभ्यता पर विश्वास नहीं करते। जो अमेरिका और पश्चिम की पूंजीवादी सभ्यता को अपना आदर्श मानते है। दरअसल इंडिया, भारत रूपी विशाल राष्ट्र का एक बदनुमा दाग जैसा है। जिस प्रकार सुंदर शरीर पर एक छोटा सा निशान बदनुमा बन जाता है। वह तो महात्मा गाँधी ही थे, कि ”अगर उन्हें कोई फादर ऑफ इंडिया कहता तो वे उसे तत्काल हिम्मत के साथ नकार देते और कहते की इस गुलामी के इंडिया को मिटाओ और आजादी का भारत बनाओ। ”परन्तु वे महात्मा गाँधी थे, इसलिए ऐसा कर सकते थे, परन्तु ये मोदी है, जिनसे यह उम्मीद करना बेकार है।
वैसे भी श्री मोदी देश के मामूली से अल्पमत के नुमाइंदे है, चूंकि चुनाव प्रणाली में, जीत-हार कई प्रकार के कारणों पर निर्भर करती है जिसमें कई बार मामूली मतों के अंदर से भी संसदीय संख्या बड़ी हो जाती है। उन्हें 2019 के चुनाव में मतदान करने वाले मतदाताओं का 40 प्रतिशत से कुछ अधिक मत मिला है। अगर इसे देश के कुल मतदाताओं की कसौटी पर रखा जाए तो देश के कुल मतदाताओं का यह लगभग 31 प्रतिशत होता है। फिर जो एन.डी.ए. के घटक दल है जैसे जद यू, लोक जनशक्ति अपना दल आदि के भाजपा को स्थानान्तिरित वोटों की गणना की जाए तो वह भी 4-5 प्रतिशत होंगे। तथा भारतीय जनता पार्टी में, जो मोदी विरोधी तबका है अगर उसकी निजी मत शक्ति की गणना की जाए तो वह लगभग 2 प्रतिशत होगी, यानि श्री मोदी वास्तव में देश के 24 प्रतिशत लोगों के ऐच्छिक नुमाइंदे है, 76 प्रतिशत लोग इसमें उनकी पार्टी के लोग भी शामिल है। जो न उन्हें अपना नेता मानते है, न पिता। देश एक भौगोलिक इकाई होती है और राष्ट्र एक व्यापक, भौगोलिक, एवं सांस्कृतिक इकाई होती है। ”इंडिया“ अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा खींची रेखाएं हैं, और भारत एक विशाल और व्यापक स्वाभाविक इकाई है, जो ”अंग्रेजी इंडिया से“ बहुत बड़ी व व्यापक है। अच्छा हुआ कि ट्रंप की जबान नहीं फिसली और उन्होंने श्री मोदी को ”फादर ऑफ इंडिया“ शब्द का ही इस्तेमाल किया।

पाँच सौ गुना तक महंगी बिक रहीं दवाएं
अजित वर्मा
आम आदमी के लिये सबसे जरूरी दवाओं की कीमतों को लेकर हमेशा से विवाद की स्थिति बनी रही है। अब यह बात सामने आयी है कि अस्पताल मालिक डॉक्टरों और केमिस्ट के दबाव में आकर दवा निर्माता दवा के पैकेट पर 500 फीसदी तक बढ़ा मनमाना दाम प्रिंट कर रहे हैं सभी दवा की कीमत पर 30 फीसदी का मार्जिन कैप लगने से दवा और मेडिकल उपकरणों की कीमतें 90 फीसदी तक कम हो जाएंगी, जिससे निर्माताओं के दवाओं की बिक्री के दाम पर कोई असर नहीं पड़ेगा। गैर अधिसूचित दवाओं पर रिटेलर की खरीद की कीमत से 500 फीसदी तक से ज्यादा दाम ग्राहकों से वसूला जा रहा है। अभी हाल ही में प्रमुख कंपनियों के 1107 दवाइयों की स्टडी की गयी है, जिसका औसत एमआरपी रिटेलर की दवाओं की खरीद की कीमत से 500 फीसदी ज्यादा है। वहीं दूसरी ओर यह स्थिति भी है कि ब्रांडेड और जैनेरिक दवा के क्वालिटी में कोई अंतर नहीं है।
डॉक्टरों पर बड़े-बड़े या कैपिटल अक्षरों में जेनेरिक दवाएं लिखने की कोई बाध्यता नहीं है। वहीं अब तो अधिकांश डॉक्टरों ने खुद की दवाईयें की दूकानें भी खोल ली हैं। इसलिए अधिकांश डॉक्टर न पढ़े जाने वाली भाषा में ब्रांडेड दवाइयां लिख रहे हैं मरीजों को डॉक्टरों के पास बनी केमिस्ट की दुकानों से वह दवाएं मनमाने दामों पर खरीदनी पड़ती है।
दवा में ‘ब्रांड’ के नाम पर लूट का काला कारोबार- बीमारी से ज्यादा आम आदमी ‘महंगी दवाओं’ के बोझ से दब रहा है सरकार, निजी दवा कंपनियों के मनमर्जी के दाम वसूलने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने में पूर्णत: असफल साबित हुई है वहीं जन औषधालय, आम मरीज की पहुंच से दूर हैं और प्राइवेट दवा कपंनियों की तादाद बढ़ती जा रही है।
ब्रांडिंग के खेल में जेनरिक दवाओं के महत्व को दबाया जा रहा है। जीवनदाता सफेदपोश डॉक्टरों का ‘कमिशन’ कई गुना बढ़ गया है प्राइवेट दवा कंपनियों के मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव की घुसपैठ सरकारी अस्पतालों के अंदर खाने तक हो गई है और लूट का कारोबार चरम पर है। अब तो दवा कंपनियां डॉक्टरों को तरह-तरह के प्रलोभन भी देती हैं। कई कंपनियां तो ज्यादा दवाईयां खपाने वाले डॉक्टरों को अब विदेशों की सैर भी करवाती हैं। यह विडम्बना ही है कि डॉक्टरों और दवा के कारोबार को लेकर कोई गंभीर प्रयास होते नजर नहीं आ रहे हैं।

एनसीपी-कांग्रेस ही नहीं, भाजपा-शिवसेना की भी परीक्षा
अजित वर्मा
महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होने के बाद एक ओर भाजपा खेमे में उत्साह का माहौल है, वहीं कांग्रेस-एनसीपी खेमे में निराशा छाई हुई है। विरोधी दलों के ज्यादातर दिग्गज नेता या तो कमल के साथ हो लिए हैं, या शिवसेना के बंधन में बंध गए हैं। एनसीपी प्रमुख शरद पवार राज्य में घूम रहे हैं, लेकिन खेमों में बंटी कांग्रेस अभी भी भ्रम की स्थित में है। इस बार का चुनाव कांग्रेस और एनसीपी राज्य में अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई है।
तीन तलाक और जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद देश में यह पहला बड़ा चुनाव होने जा रहा हैं। इन चुनाव के माध्यम से जनता का सही मूड भांपने का अवसर मिलेगा, क्योंकि अब तक भाजपा सरकार दावा करती रही है कि दोनों निर्णयों से जनता में खुशी का माहौल है। अगर महाराष्ट्र में भाजपा की सीटें बढ़ती हैं, तो निश्चित ही भाजपा का दावा सही साबित होगा, वर्ना उनके दावों की पोल खुल जाएगी।
लोकसभा चुनावों में मिली हार से कांग्रेस और राकांपा उबरी ही नहीं थी कि उनकी पार्टी में ही विरोध इस कदर शुरू हुआ कि मजबूत से मजबूत नेता भी पार्टी छोड़ गए। दोनों पार्टियों में पूरी तरह से अविश्वास का माहौल है। हालात इस कदर बिगड़ गए हैं कि कब कौन पार्टी छोड़ दे, इसका भरोसा नहीं है। ऐसे में दोनों दलों को अब अपने अस्तित्व को बचाए रखने की चुनौती होगी। महाराष्ट्र की राजनीतिक में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बेहद मजबूत होकर उभरे हैं। पिछले पांच साल में उन्होंने अपनी पार्टी के दिग्गजों को जहां चित कर दिया, वहीं विरोधी दल कांग्रेस-राकांपा को भी धूल चटा दी। विधानसभा में विरोधी पक्ष नेता राधाकृष्ण विखे पाटील जैसे दिग्गज नेता को फड़नवीस ने सरकार में शामिल कर लिया। शिवसेना के लिए भी एक लक्ष्मण रेखा खींच दी गयी है। आलम यह है कि मुख्यमंत्री जिसे भाजपा में शामिल नहीं कर सके, उसे शिवसेना में एडजस्ट करा दिया। मुख्यमंत्री ने औरंगाबाद से कांग्रेस के दिग्गज विधायक अब्दुल सत्तार के साथ बैठक की, लेकिन उन्हें शिवसेना में भर्ती करा दिया। अब मुख्यमंत्री के लिए चुनौती है कि वे भाजपा के लिए पिछले विधानसभा चुनाव से ज्यादा सीटें जीतकर लाएं। पिछले चुनाव में भाजपा ने 122 सीटों जीती थी।
वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-राकांपा का गठबंधन टूट गया था। सभी दलों ने अपने-अपने दम पर चुनाव लड़ा था। लेकिन इस बार भाजपा और शिवसेना तथा कांग्रेस और राकांपा के बीच चुनावी गठबंधन हो रहा है इसलिये अब दोनों गठबंधनों के बीच मुकाबला होने जा रहा है।

रावण ने जानबूझकर राम के हाथों मृत्यु के लिये सीता का अपहरण किया था
हर्षवर्धन पाठक
दशहरा के समय जब राम की विजय का घोष होता है तो रावण की पराजय और मृत्यु की चर्चा भी होती है। वास्तव में दशहरा के मौके पर राम तथा रावण दोनों का स्मरण होता है।
रामानुज लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा का अंग भंग किये जाने का कारण सब को मालूम हैं। लेकिन इस सिलसिले में दो तथ्य ध्यान दिये योग्य हैं। श्रीराम और लक्ष्मण दोनों प्रारंभ में शूर्पणखा का प्रस्ताव टालते हैं। जब शूर्पणखा डरावना रूप धारण करती है तब सीता को भयभीत देखकर लक्ष्मण शूर्पणखा के नाक-कान काटते है। तब भी शूर्पणखा राम की बुराई नहीं करती है, सीता का रूप वर्णन करते हुए वह रावण से कहती है:-
सोभा धाम राम अस नामा।
तिन्ह के संग नारि एक स्यामा।
रूप रासि विधि नारी संवारी।
रति सत कोटि तासु बलहारी।
सीता के रूप की प्रशंसा करते हुए वह रावण को उकसाती है कि सीता का अपहरण कर लो लेकिन राम के विरूद्ध कुछ नही कहती है।
रावण का कथित अहंकार और जिद को तुलसीदास ने बार-बार दिखाया है लेकिन वे अरण्यकांड में रावण के मन की बात कह गये।
कथा प्रसंग यह है कि दरबार में बहिन शूर्पणखा को महाबली रावण अपने बल और शौर्य की कहानियां सुनाकर सांत्वना देता हैं लेकिन वह इसके बाद रात भर सो नहीं पाया। तुलसीदास अरण्यकांड के दोहा क्रमांक 22 में रावण के रात्रि जागरण तथा उसके मनोमंथन की बात कहते है।
शूर्पणखा समुझाई करि, बल बोलेसि बहु भांति।
गयऊ भवन अति सोच बस, नींद परई न राति।
रावण रात भर सो नही पाया। यद्यपि उसने अपनी बहिन को दरबार में अपने बल तथा शौर्य के बहुत किस्से सुनाये परन्तु रात्रि जागते हुए वह यह सोचता रहा कि खर दूषण जैसे मेरे समान बलशाली राक्षसों को राम ने मार दिया तो वे निश्चय ही भगवान के अवतार हैं। भगवान का भजन इस जन्म में इस तन से नहीं हो सकता तो एक ही विकल्प बचता है कि भगवान के हाथ से मृत्यु के द्वारा मुझे मोक्ष मिले।
रावण की इस मनोदशा का वर्णन करते हुए महाकवि यह भी लिखते है कि रावण ने यह निश्चय कर लिया है कि मैं हठ पूर्वक श्रीराम का दुश्मन बनूंगा। यदि वे दोनों (राम और लक्ष्मण) ईश्वर के अवतार नहीं है तो मैं उन दोनों से युद्ध जीत लूंगा और यदि वे ईश्वर के अवतार हुए तो और यदि वे ईश्वर के अवतार हुए तो उनके हाथों मरकर स्वर्ग जाऊंगा। यह उल्लेखनीय प्रसंग है।
रावण के इस मनोमन्थन का उल्लेख संत कवि ने इन शब्दों में किया है:-
तो मैं जाई बैरी हठ करऊ
प्रभु सर प्रान तजे भव तरऊ।
इसके बाद अगले दोहा में तुलसीदास ने एक और रहस्योद्घाटन किया। श्रीराम सीता से कहते हैं कि तुम कुछ समय के लिए अग्नि में निवास करो। तब तक मैं राक्षसों का संहार करूंगा। श्रीराम के मुंह से यह बात सुनकर सीता ने अग्नि में प्रवेश कर लिया। अग्नि से उनका प्रतिबिम्ब सामने आया जो वैसा ही रूप था। लक्ष्मण को यह ज्ञात नहीं था क्योकि उस समय वे वन गये हुये थे।
रावण-वध के बाद सीता की अग्नि परीक्षा का कारण भी यही था कि श्रीराम मूल सीता को अग्नि से वापिस प्राप्त करना चाहते थे, जो पूर्व में अग्नि में समा गई थी। तुलसीदास ने इस प्रसंग का वर्णन इस प्रकार किया है।
सुनहू प्रिया व्रत रूचिर सुसीला
मैं कछू करब ललित नर लीला।
तुम्ह पावक मंह करऊं निवासा।
जो लगि करौं निसाचर नासा।
निज प्रति बिम्ब राखि तंह सीता।
तैसई सील रूप सुविनीत।।
इसके बाद इस सीता का हरण हुआ। रावण इस सीता का अपहरण कर ले गया तथा राम-रावण युद्ध की भूमिका बनी। अरण्यकांड में ही शबरी द्वारा दिये गये कंद मूल फल राम के द्वारा खाये जाने का वर्णन है। श्रीराम ने शबरी को भक्ति के नौ प्रकारों (नवधा भक्ति) का उपदेश दिया।
श्रीराम ने इसके पूर्व लक्ष्मण को भी नवधा भक्ति से अवगत कराया था। यह प्रसंग भी अरण्यकाण्ड मे आया है। लेकिन लक्ष्मण और शबरी को दिये गये नवधा भक्ति के उपदेशों में अन्तर है। यह है कि जहां श्रीराम ने लक्ष्मण को ईश्वर से प्रेम करना सिखाया वहां शबरी की वह भक्ति बताई जिसमे मनुष्य ईश्वर का प्रिय होता है।
शबरी ने ही पंपासुर का मार्ग बताया जहां श्रीराम लक्ष्मण की भेट पहले हनुमान से और फिर सुग्रीव से होती है।
वृन्दावन के विख्यात संत दिवंगत स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती ने अरण्यकाण्ड की तुलना माया नगरी हरिद्वार से की है। उनका कथन यह है कि जिस प्रकार तालाब में उतरने के लिये सीढ़िया उतरनी पड़ती है वैसे ही रामचरित मानस के सात सोपान अर्थात सात सीढ़ियां है। राम चरित मानस के सात सोपानों का नामकरण वे सात मोक्षदायिनी पुरियों के नाम पर करते हैं। वे अरण्यकाण्ड को वे माया प्रथान बताते हुये इसे हरिद्वार बताते है। ये सात पुरियां है अयोध्यां, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवन्तिका तथा द्वारावती (द्वारका)। अरण्यकाण्ड की वे माया प्रधान बनाते है। इसमें सभी माया करते है। राम-सीता-लक्ष्मण ने अरण्य की शरण ली। वहां राम ने सीता के अग्नि प्रवेश की माया रची तो रावण ने विप्रवेश धारण कर सीता हरण की माया की। मारीच ने कंचन मृग बनकर सीता को लुभाने की माया की, तो अंत में लक्ष्मण के स्वर में सीता का उच्चारण कर एक और माया की। खर-दूषण ने राम से माया युद्ध किया तो राम ने भी माया युद्ध कर उसका उत्तर दिया। शूर्पणखा ने भी राम को प्रलोभित करने की माया की।

विकास की पटरी पर रेल
सिद्धार्थ शंकर
देश की कॉर्पोरेट सेक्टर की पहली ट्रेन तेजस के लिए अब इंतजार खत्म हो गया है। देश की पहली प्राइवेट ट्रेन को सीएम योगी आदित्यनाथ लखनऊ जंक्शन से इसे हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। रेलवे ने तेजस एक्सप्रेस के किराए का भी ऐलान कर दिया है। यह ट्रेन सप्ताह में 6 दिन चलेगी। दिल्ली-लखनऊ तेजस एक्सप्रेस के यात्रियों को ट्रेन के विलंब होने पर मुआवजा दिया जाएगा। रेलवे की सहायक कंपनी ने मंगलवार को यह जानकारी दी। इसमें कहा गया कि एक घंटे से अधिक का विलंब होने पर 100 रुपए की राशि अदा की जाएगी, जबकि दो घंटे से अधिक की देरी होने पर 250 रुपए का मुआवजा दिया जाएगा। तेजस मंगलवार को छोड़कर हफ्ते में छह दिन चलेगी। छह अक्टूबर से ट्रेन सुबह 6 बजकर 10 मिनट पर लखनऊ जंक्शन से छूटकर 7 बजकर 20 मिनट पर कानपुर और वहां से 7 बजकर 25 मिनट पर चलकर 11 बजकर 43 मिनट पर गाजियाबाद पहुंचेगी। यहां से 11 बजकर 45 मिनट पर छूटकर 12.25 मिनट पर नई दिल्ली पहुंचेगी। नई दिल्ली से ट्रेन शाम 4 बजकर 30 मिनट पर रवाना होकर शाम 5 बजकर 10 मिनट पर गाजियाबाद, रात 9.30 मिनट पर कानपुर और रात 10 बजकर 45 मिनट पर लखनऊ आएगी।
देश की पहली प्राइवेट ट्रेन को पटरियों पर दौड़ते देखना वाकई सुखद है और रेलवे के कायाकल्प के लिए जरूरी भी। यह ट्रेन रेलवे की विस्तार नीति को बढ़ावा देगी और विभाग पर लगातार आ रहे बोझ से छुटकारा भी दिलाएगी। हालांकि, इस टे्रन के बहाने रेलवे के निजीकरण को लेकर उठ रही शंकाओं का रेल मंत्री पीयूष गोयल समाधान कर चुके हैं, फिर भी यह ऐसा पहलू है, जिसकी तरफ एकबारगी नजर डालनी ही चाहिए। बहरहाल, देश की पहली प्राइवेट ट्रेन की परिकल्पना सुरेश प्रभु की है। रेल मंत्री रहते प्रभु ने कहा था कि वो रेल के विकास के लिए निजी कंपनियों के साथ ज्वाइंट वेंचर करेंगे, साथ ही राज्यों का भी सहयोग लेंगे। अगर मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में रेलवे के विकास पर नजर डालें तो पता चलेगा कि विकास पटरी पर काफी आगे निकल गया है। रेलवे ने एक नई सेवा का ऐलान किया है। इस सेवा के जरिए टिकट बुक करवाते समय भले ही उन्हें कंफर्म टिकट न मिले, मगर उन्हें यह जरूर पता चल जाएगा कि उनके वेट लिस्ट टिकटों के कन्फर्म होने संभावना कितनी है। लोगों को ट्रेनों में खाने की क्वालिटी को लेकर शिकायत रहती है। अभी राजधानी और शताब्दी में खाने की अधिक मात्रा दी जाती है। भारतीय रेलवे अब ऐसी ट्रेनों में खाने की मात्रा कम करेगी, ताकि इसकी गुणवत्ता में सुधार लाया जा सके। हाल ही में रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा रेलवे के जोनल प्रमुखों को कहा था कि ट्रेनों में होने वाली देरी का असर उनके अप्रेजल में नजर आएगा। इसमें सुधार के लिए उन्होंने अधिकारियों को एक महीने का वक्त दिया है। संभव है कि प्रमोशन दांव पर लगने के बाद ट्रेनों की समयबाध्यता बढ़ेगी।
अगले साल से भारतीय रेलवे को एयरपोर्ट जैसे स्टेशन मिलेंगे, जो आकर्षण के लिहाज से बड़ा बदलाव होगा। मध्यप्रदेश में हबीबगंज और गुजरात में गांधी नगर के रेलवे स्टेशन किसी सामान्य हवाई अड्डे को टक्कर देंगे। कुल 68 रेलवे स्टेशनों के सुधार के लिए 5,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।
मोदी सरकार ने गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकारों को 1,504 किलोमीटर लंबे वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडर के लिए जमीन अधिग्रहण में होने वाली देरी के लिए आड़े हाथों लिया है। भारतीय रेलवे का नेटवर्क विशालकाय है। इस वजहे से इसमें बदलाव की संभावनाएं और गति काफी सुस्त रहती है. हर जगह एक साथ बदलाव पहुंच पाना संभव भी नहीं है, मगर यदि समय पर सही प्रयास किया जाए, तो परिवर्तन लाया जा सकता है।
किलोमीटर लंबी पटरियों पर दौड़ती भारतीय रेल हमारी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। माल ढुलाई और यात्रियों के आवागमन का प्राथमिक साधन होने के साथ रोजगार उपलब्ध करानेवाली सबसे बड़ी संस्था रेल ही है। सत्ता में आते ही पीएम नरेंद्र मोदी ने इसके कायाकल्प का भरोसा दिलाया था. हालांकि ऐसे वादे पहले भी किये गये थे। रेल के विस्तार एवं विकास की दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धियां भी हासिल हुई थीं, लेकिन यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा बेहतर करने तथा रेल नेटवर्क की व्यावसायिक संभावनाओं को वास्तविकता में बदलने की आकांक्षाएं संतोषजनक रूप से पूरी नहीं हो सकी थीं। मोदी सरकार के पहले बजट में ही तत्कालीन रेलमंत्री सदानंद गौड़ा ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी पर जोर देकर सुधार की पहलकदमी की थी। रेल बजट की एक परंपरा बन गई थी कि व्यापक विकास की आवश्यकताओं को किनारे रख राजनीतिक नफे-नुकसान को देखते हुए नयी यात्री रेलगाडिय़ों की घोषणा की जाती थी। प्रभु ने इस परिपाटी को न सिर्फ तोड़ा, बल्कि पूरे रेल प्रणाली के आधुनिकीकरण, विद्युतीकरण और मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर के रख-रखाव पर जोर दिया। खस्ताहाल पटरियों के कारण हमारे देश में ट्रेनों की गति कम है, इससे माल ढुलाई और यात्री गाडिय़ां देरी से भी चलती हैं।
यह समस्या अब भी है, क्योंकि इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने में समय लगता है, लेकिन मौजूदा सरकार की कोशिशों से इसमें सुधार हुआ है और अनेक तेज गति की ट्रेनें चल रही हैं। एक महत्वपूर्ण निर्णय यह हुआ कि 92 साल से चली आ रही अलग रेल बजट की परंपरा को विराम देते हुए 2017 में रेल बजट को आम बजट में समाहित कर दिया गया. उस वर्ष 2016-17 के बजट से आठ फीसदी की वृद्धि की गई थी। तब वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पांच सालों में रेल सुरक्षा के लिए एक लाख करोड़ रुपए का कोष बनाने की घोषणा की थी। रेल सुरक्षा पर बातें पहले भी होती थीं, पर आवंटन की कमी से अच्छे परिणाम नहीं आते थे, पर बीते चार सालों में इस दिशा में बहुत काम हुआ है और दुर्घटनाओं में कमी आई है।

असंगठित जनता को लूटते संगठित व्यवसायी ?
निर्मल रानी
लगभग दस बारह वर्ष पूर्व आपने मोबाईल नेटवर्क उपलब्ध करने वाली एयरटेल जैसी कई कम्पनीज़ के ऑफ़र्स में लाइफ़ टाइम ऑफ़र दिए जाने के बारे में ज़रूर सुना होगा। मेरे जैसे करोड़ों देशवासियों ने हर महीने मोबाईल टाक टाईम चार्ज करवाने की झंझट से बचने के लिए कंपनी के लाइफ़ टाइम ऑफ़र को स्वीकार करते हुए उसके द्वारा मांगे गए एक हज़ार रूपये भी दे दिए थे। इसके कुछ समय पश्चात् इस प्रकार का लाइफ़ टाइम ऑफ़र स्वीकार करने वालों के मोबाईल फ़ोन पर उन कम्पनीज़ द्वारा इस आशय के सन्देश भेजे गए कि आप का लाइफ़ टाइम कनेक्शन 2030 या किसी पर 2032 या 2033 या 34 आदि तक वैध रहेगा। इस प्रकार की जानकारी भी दी गयी। इस ऑफ़र की घोषणा व इसकी बिक्री को लगभग 10 वर्ष बीत चुके हैं। इसलिए हमें यह जानना ज़रूरी है कि क्या लाइफ़ टाइम ऑफ़र देने वाली सभी कम्पनीज़आज भी सही सलामत भारतीय बाज़ारों में क़ायम रहकर लाइफ़ टाइम ऑफ़र उपलब्ध कराने के अपने वचन पर क़ाएम हैं?वह सभी कम्पनीज़आज भी भारतीय बाज़ारों में जीवित नज़र आ रही हैं? इसी प्रकार अपना मोबाईल पोर्ट करने अर्थात उसी पुराने नंबर को बरक़रार रखते हुए किसी अन्य मोबाईल नेटवर्क कंपनी में अपना कनेक्शन स्थानांतरित करने की व्यवस्था थी। वह नई मोबाईल नेटवर्क कंपनी अपनी शर्तों के अनुसार तथा अपने निर्धारित रेट पर नेटवर्क की सेवाएं उपलब्ध कराती थीं। परन्तु भारतीय बाज़ार का उतार चढ़ाव तथा अपने घाटे मुनाफ़े का अपने तरीक़े से आंकलन करने के बाद गत दो दशकों में नेटवर्क सेवाएं उपलब्धकरने वाली अनेक कम्पनीज़ विशाल भारतीय बाज़ार के क्षितिज पर पहले तो सितारों की तरह चमकीं और कुछ ही समय के बाद सितारों की ही तरह आँखों से ओझल भी हो गयीं।
ऐसे में सवाल यह कि कोई भी नेटवर्क सेवाएं उपलब्ध कराने वाली कम्पनी भारतीय बाज़ार में टिकी रहे या भारतीय बाज़ार को छोड़ जाए। अथवा नेटवर्क सेवाएं उपलब्ध कराने वाली किसी दूसरी कम्पनी में उसका विलय हो जाए। परन्तु एक ग्राहक से कंपनी द्वारा किये गए उस वादे की वैधानिक स्थिति क्या होगी जिसके तहत उसने ग्राहक को लुभाया और तरह तरह की लालच देकर कनेक्शन लेने हेतु वातावरण तैयार किया ? गत दो दशकों के दौरान भारत में मोबाईल नेटवर्क मुहैय्या कराने वाली अनेक कम्पनीज़ आईं और चली गयीं। उनकी शर्तें व ग्राहकों के साथ किये गए उनके सभी क़रार भी धराशायी हो गए। अब न तो कोई लाइफ़ टाइम कनेक्शन रह गया है न ही पिछली कंपनी की शर्तों व रेट पर कोई नई कम्पनी सुविधाएं दे रही है। सब की अपनी अपनी शर्तें हैं आपको उसे मानना ही पड़ेगा। मोबाईल नेटवर्क मुहैय्या कराने वाली अनेक कम्पनीज़ के अपने अपने नियम हैं वे पोर्ट करने वाली किसी अन्य कंपनी के नियमों को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। अब लाइफ़ टाईम ऑफ़र के नाम पर जनता से लूटे गए सैकड़ों करोड़ रुपयों की भी कोई जवाबदेही किसी भी कंपनी की नहीं है। अब यदि आप नियमित रूप से अपना मोबाईल कंपनी के पैकेज के अनुरूप प्रत्येक माह चार्ज करा रहे हैं फिर तो ग़नीमत है अन्यथा आपकी पैकेज की तिथि समाप्त होते ही आने व जाने वाली सभी कॉल्स कंपनी बंद कर देती है। और यदि इनकमिंग कॉल्स की व्यवस्था को जीवित रखना चाहते हैं तो प्रत्येक माह किसी कंपनी का 35 रु तो किसी का 23 रु प्रति माह के हिसाब से ज़रूर चार्ज करना पड़ेगा अन्यथा आपके हाथों का मोबाईल संचार सुविधाएं मुहैय्या करा पाने में पूरी तरह असमर्थ है। भले ही आप ने लाइफ़ टाइम सदस्य के रूप में किसी कम्पनी को एक हज़ार रूपये क्यों न दे रक्खे हों।
यहाँ महीने के नाम पर 30 या 31 दिन गिनने की भी ग़लती मत करें। इन संगठित व्यवसायियों ने लूट खसोट की अपनी सुविधा के मद्देनज़र महीने का निर्धारण भी मात्र 28 दिनों का कर रखा है। गोया हर महीने दो या तीन दिन के फ़ालतू पैसे महीने भर के पैकेज के नाम पर प्रत्येक ग्राहक से ठगे जा रहे हैं। हमें एक वर्ष में बारह महीने की यदि आय होती है तो इन कम्पनीज़ ने साल के 12 नहीं बल्कि 13 महीने या इससे भी कुछ अधिक निर्धारित कर दिए हैं। और असंगठित ग्राहक लूटा भी जा रहा है और तमाशबीन भी बना हुआ है। आपकी कॉल ड्राप होती है या सही सिग्नल नहीं मिलते अथवा बातचीत के दरम्यान काल काट जाती है अथवा रेकार्डेड यंत्र आपको कॉल कनेक्ट करने के बजाए और कुछ बोलता रहता है तो इसकी ज़िम्मेदारी भी कोई कम्पनी नहीं लेती सिवाए इसके की आप सम्बंधित कंपनी के ग्राहक सेवा केंद्र पर फ़ोन करें और यहाँ बैठा कोई युवक या युवती आपको बातों बातों में ही अपनी मीठी व सुरीली भाषा से ही संतुष्ट कर दे और अंत में भी आप से यही पूछे कि और कोई सेवा बताएं या काल करने हेतु धन्यवाद कर आपकी शिकायत का ‘सुखद अंत’ कर दे। वैसे भी जबसे देश के सबसे बड़ा सरकारी संचार संस्थान बी एस एन एल की तरफ़ से सरकार ने जान बूझ कर आँखें फेरनी शुरू की हैं तभी से निजी कम्पनीज़ के हौसले बुलंद हो चुके हैं। अनेक निजी कम्पनीज़ के इस क्षेत्र से ग़ाएब हो जाने के बावजूद जिओ,एयरटेल,आइडिया,व वोडाफ़ोन जैसी कई कम्पनीज़ अपने कारोबार में निरंतर विस्तार भी कर रही हैं। यहाँ यह बताने की ज़रुरत नहीं कि इन कम्पनीज़ के स्वामी सरकार के मुखियाओं से अपने ‘मधुर सम्बन्ध’ रखते हैं लिहाज़ा इन्हें सरकार का पूरा संरक्षण भी हासिल होता है। इतना अधिक कि सरकार अपने संचार संस्थान बी एस एन एल के आधुनिकीकरण पर या इसके कर्मचारियों की मांगों पर गंभीरता पूर्वक ध्यान देने के बजाए संचार क्षेत्र की निजी कम्पनीज़ के समक्ष आने वाली परेशानियों से शीघ्रता से निपटती है। जिओ के बाज़ार में उतरने के समय पूरे देश ने देखा कि किस प्रकार जिओ के विज्ञापन में बड़े पैमाने पर देश के प्रधानमंत्री के चित्र का इस्तेमाल किया गया। जैसे कि जिओ निजी संचार संस्थान न होकर कोई सरकारी संचार संस्थान हो। इस बात को लेकर उस समय थोड़ा बहुत हो हल्ला भी हुआ था परन्तु जो कुछ करना या होना था वह हो चुका था। देश को जिओ पर सरकरी संरक्षण होने का सन्देश सफलतापूर्वक दिया जा चुका था। आज पूरे देश में व्यापक स्तर पर इसका फैला नेटवर्क जिओ पर सरकारी संरक्षण का सुबूत है।
इसी प्रकार के और भी कई ऐसे निजी यहाँ तक कि कई सरकारी क्षेत्र भी ऐसे हैं जहाँ जनता के पैसों की मनमानी तरीक़े से लूट खसोट सिर्फ़ इसलिए की जाती है क्योंकि आम लोग असंगठित हैं,विभिन्न वर्गों में बंटे हुए हैं। जनता को अपने हितों से अधिक चिंता अपने धर्म व जाति,संस्कृति व भाषा आदि की सताने लगी है। और निःसंदेह जनता की इन्हीं कमज़ोरियों का फ़ायदा संगठित संस्थानों या संस्थाओं के लोग बड़ी ही आसानी से उठा रहे हैं।
05अक्टूबर/ईएमएस

अंधविश्वास की काट कब
सिद्धार्थ शंकर
ओडिशा के गंजम से इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला एक मामला सामने आया है। कुछ लोगों ने जादूटोना करने के शक में छह बुजुर्गों के दांत तोड़ दिए और उन्हें मानव मलमूत्र खाने के लिए मजबूर किया। हैरानी की बात यह है कि पीडि़त मदद के लिए गुहार लगाते रहे, लेकिन कोई उनकी सहायता के लिए आगे नहीं आया। गोपुरपुर गांव के कुछ लोगों को शक था कि छह बुजुर्ग व्यक्ति जादूटोना कर रहे हैं, जिसके चलते उनके इलाके में कम से कम छह महिलाओं की मौत हो गई और सात अन्य बीमार हो गईं। पुलिस के मुताबिक उन्होंने मंगलवार को छह लोगों को जबरदस्ती घर से बाहर निकाला और उन्हें मानव मलमूत्र खाने के लिए मजबूर किया, बाद में उनके दांत उखाड़ दिए। इन छह ने मदद की गुहार भी लगाई लेकिन कोई भी उनके लिए आगे नहीं आया। जादू टोना के नाम पर किसी के साथ ज्यादती की यह पहली घटना नहीं है। देश में कई मौकों पर इंसानियत को शर्मसार करने वाली तस्वीर सामने आ चुकी है। मगर आज तक कोई समाधान नहीं हो सका।
यह घटना अपने आप में बताने के लिए काफी है कि विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच हमारे समाज में बहुत सारे लोग वैज्ञानिक चेतना के अभाव में किस कदर किसी बीमारी के कारण पर विचार करने की स्थिति में नहीं पहुंच सके हैं। यह एक जगजाहिर तथ्य है कि ऐसे अंधविश्वासों की वजह से देश भर में कितने लोगों और खासकर महिलाओं को त्रासद उत्पीडऩ का सामना करना पड़ता है। तांत्रिक या ओझा के बहकावे में आकार किसी महिला को डायन या काला जादू करने वाली बताने, उसे मैला पिलाने, निर्वस्त्र करके घुमाने और हत्या तक कर देने की खबरें अक्सर आती रहती हैं। विडंबना है कि ऐसे अंधविश्वासों में पड़े लोगों को यह भी अहसास नहीं होता कि भ्रम में पड़ कर वे अपराध कर रहे हैं। कई बार धार्मिक परंपरा का नाम देकर ऐसी धारणाओं का बचाव किया जाता है। देश के कुछ राज्यों में जब अंधविश्वास के खिलाफ कानून बनाने की कोशिशें की जा रही थीं, तो उसके विरोध के लिए धार्मिक पक्ष और मान्यताओं का ही हवाला दिया गया था।
साफ है कि अंधविश्वासों के बने रहने में कुछ लोग अपना हित समझते हैं और इसीलिए वैज्ञानिक सोच के बजाय भ्रम पर आधारित परंपराओं को बढ़ावा देने में लगे रहते हैं। महाराष्ट्र में अंधविश्वास विरोधी आंदोलन और जागरूकता अभियानों की कमी नहीं रही है। इसके बावजूद आज भी अगर देश में कहीं भी जादू-टोना या अंधविश्वास पर आधारित मान्यताओं की वजह से किसी की हत्या कर दी जाती है तो यह सोचने की जरूरत है कि व्यवस्थागत रूप से सामाजिक विकास के किन पहलुओं की अनदेखी की गई है। भारतीय संविधान की धारा 51-ए (एच) के तहत वैज्ञानिक दृष्टि के विकास और जरूरत को नागरिकों को बुनियादी कर्तव्य के रूप में रेखांकित किया गया है। पर आजादी से बाद से अब तक सरकारों की ओर से शायद ही कभी इस मकसद से कोई ठोस पहलकदमी की गई या वैज्ञानिक चेतना के विकास, उसके प्रचार-प्रसार को मुख्य कार्यक्रमों में शामिल किया गया। नतीजतन, परंपरागत तौर पर जिस रूप में अंधविश्वास समाज में चलता आया है, लोग उससे अलग कुछ सोचने की कोशिश नहीं करते। जरूरत इस बात की है कि न केवल सामाजिक संगठनों, बल्कि खुद सरकार की ओर से भी शिक्षा-पद्धति में अंधविश्वासों के खिलाफ पाठ शामिल करने के साथ-साथ व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जाएं। अन्यथा अंधविश्वास की वजह से होने वाली घटनाएं हमारे तमाम विकास पर सवाल उठाती रहेंगी।
आज की तारीख में अनेक बाबाओं और तांत्रिकों का धंधा अंधविश्वास के कारण ही चल रहा है। सच कहा जाए तो अंधविश्वास फैलाने वाले काफी संगठित और मजबूत हैं, तभी तो उनका विरोध करने पर नरेंद्र दाभोलकर जैसे लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। संविधान में वैज्ञानिक सोच को आगे बढ़ाने के संकल्प के बावजूद कार्यपालिका और विधायिका के स्तर पर अंधविश्वास से लडऩे की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई देती।
कुछ राज्यों में भले इस मामले में कानून बन गया हो, लेकिन ज्यादातर राज्य इसे लेकर उदासीन हैं। अक्सर जाने-अनजाने प्रशासन ही इसे बढ़ावा देता रहता है। अंधविश्वास विकास और तरक्की के रास्ते में बड़ी बाधा है। सरकार को चाहिए कि वह अफवाह फैलाने वालों से सख्ती से निपटे और लोगों को जागरूक करे। आज अंधविश्वास और अवैज्ञानिक सोच के खिलाफ सामाजिक आंदोलन की जरूरत है। इसके लिए सरकार, सामाजिक-धार्मिक संगठनों और प्रबुद्ध वर्ग को एकजुट होना होगा।

सीवर में होने वाली मौतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
रमेश सर्राफ धमोरा
कुछ दिनो पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने देश में हाथ से मैला साफ करने के दौरान सीवर में होने वाली मौतों पर चिंता जताने के साथ ही सख्त टिप्पाणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि देश को आजाद हुए 70 साल से अधिक समय हो चुका है। लेकिन देश में जाति के आधार पर भेदभाव जारी है। मनुष्य के साथ इस तरह का व्यवहार सबसे अधिक अमानवीय आचरण है। इस हालात में बदलाव होना चाहिए।
जस्टिस अरुण मिश्रा, एमआर शाह और बीआर गवई की पीठ ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से सवाल किया कि आखिर हाथ से मैला साफ करने और सीवर के नाले या मैनहोल की सफाई करने वालों को मास्क व ऑक्सीजन सिलेंडर जैसे सुरक्षा उपकरण क्यों नहीं मुहैया कराई जाते हैं? दुनिया के किसी भी देश में लोगों को गैस चैंबर में मरने के लिये नहीं भेजा जाता है। इस वजह से हर महीने चार से पांच लोगों की मौत हो जाती है। कोर्ट ने कहा संविधान में प्रावधान है कि सभी मनुष्य समान हैं लेकिन प्राधिकारी उन्हें समान सुविधाएं मुहैया नहीं कराते।
पीठ ने इस स्थिति को अमानवीय करार देते हुए कहा कि बिना सुरक्षा उपकरणों के सफाई करने वाले लोग सीवर और मैनहोल में अपनी जान गंवा रहे हैं। वेणुगोपाल ने पीठ से कहा कि देश में नागरिकों को होने वाली क्षति और उनके लिए जिम्मेदार लोगों से निपटने के लिये अपकृत्य कानून बना नहीं है। ऐसी घटनाओं का स्वत: संज्ञान लेने का मजिस्ट्रेट को अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि सडक़ पर झाडू लगा रहे या मैनहोल की सफाई कर रहे व्यक्ति के खिलाफ कोई मामला दायर नहीं किया जा सकता, लेकिन ये काम करने का निर्देश देने वाले अधिकारी या प्राधिकारी को इसका जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
सीवर सफाई के दौरान हादसों में मजदूरों की दर्दनाक मौतों की खबरें लगातार आती रहती हैं। कुछ माह पूर्व गुजरात के वड़ोदरा जिले के डभोई तहसील में एक होटल की सीवेरेज टैंक साफ करने उतरे सात मजदूरों की दम घुटने से मौत हो गई है। घटना बीती रात की है जब सात मजदूर एक होटल की सीवेज टैंक साफ करने के लिए उतरे थे। लेकिन टैंक सफाई के दौरान दम घुटने से उन सभी मजदूरों की मौत हो गई।
मई में उत्तर पश्चिम दिल्ली के एक मकान के सेप्टिक टैंक में उतरने के बाद दो मजदूरों की मौत हो गई थी। इस मामले में भी जांच में यह बात सामने आई थी कि मजदूर टैंक में बिना मास्क, ग्लव्स और सुरक्षा उपकरणों के उतरे थे। नोएडा सेक्टर 107 में स्थित सलारपुर में सीवर की खुदाई करते समय पास में बह रहे नाले का पानी भरने से दो मजदूरों की डूबने से मौत हो गई थी। गत वर्ष आन्ध्र प्रदेश राज्य के चित्तूर जिले के पालमनेरू मंडल गांव में एक गटर की सफाई करने के दौरान जहरीली गैस की चपेट में आने से सात लोगो की मौत हो गयी थी। देश के विभिन्न हिस्सो में हम आये दिन इस प्रकार की घटनाओं से सम्बन्धित खबरें समाचार पत्रों में पढ़ते रहते हैं।
देश के विभिन्न हिस्सो में पिछले एक वर्ष में सीवर की सफाई करने के दौरान 200 से अधिक व्यक्तियों की मौत हो चुकी है। अधिकतर टैंक की सफाई के दौरान मरने वालों की उम्र 20 से 55 वर्ष के लोगों की होती है। इस अमानवीय त्रासदी में मरने वाले अधिकांश लोग असंगठित दैनिक मजदूर होते हैं। इस कारण इनके मरने पर ना तो कहीं विरोध दर्ज होता है और न ही भविष्य में ऐसी दुर्घटनाएं रोकने के उपाय।
देश भर में 27 लाख सफाई कर्मचारी। जिसमें 7 लाख स्थायी व 20 लाख ठेके पर काम करते हैं। एक सफाईकर्मी की औसतन कमाई 7 से 9 हजार रुपये प्रति माह होती है। आधे से ज्यादा सफाईकर्मी कॉलरा, अस्थमा, मलेरिया और कैंसर जैसी बिमारियों से पीडि़त होते हैं। इस कारण 90 फीसदी गटर-सीवर साफ करने वालों की मौत 60 बरस से पहले हो जाती है। इस कार्य को करने वालों के लिये बीमा की भी कोई सुविधा नहीं होती है।
कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सीवर की सफाई करने वाली एजेंसी के पास सीवर लाईन के नक्शे, उसकी गहराई से सम्बंधित आंकड़े होना चाहिए। सीवर सफाई का दैनिक रिकॉर्ड, काम में लगे लोगों की नियमित स्वास्थ्य की जांच, आवश्यक सुरक्षा उपकरण मुहैया करवाना, काम में लग कर्मचारियों का नियमित प्रशिक्षण, सीवर में गिरने वाल कचरे की नियमित जांच कि कहीं इसमें कोई रसायन तो नहीं गिर रहे हैं जैसे निर्देशों का पालन होता कहीं नहीं दिखता है। भूमिगत सीवरों ने भले ही शहरी जीवन में कुछ सहूलियतें दी हों, लेकिन इसकी सफाई करने वालों के जीवन में इन अंधेरे नालो ने और भी अंधेरा कर दिया है। देश में दो लाख से अधिक लोग जाम हो गए सीवरों को खोलने, मेनहोल में घुस कर वहां जमा कचरे को हटान के काम में लगे हैं।
सभी सरकारी दिशा-निर्देशों में दर्ज हैं कि सीवर सफाई करने वालों को गैस -टेस्टर, गंदी हवा को बाहर फेंकन के लिए ब्लोअर, टॉर्च, दस्ताने, चश्मा और कान को ढंकन का कैप, हैलमेट मुहैया करवाना आवश्यक है। मुंबई हाईकोर्ट का निर्देश था कि सीवर सफाई का काम ठेकेदारों के माध्यम से कतई नहीं करवाना चाहिए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इस बारे में कड़े आदेश जारी कर चुका है। इसके बावजूद ये उपकरण और सुविधाएं गायब है। एक तरफ दिनों दिन सीवर की लंबाई में वृद्वि हो रही है वहीं दूसरी मजदूरों की संख्या में कमी आई।
सीवर सफाई में लगे श्रमिकों में से आधे लोग सांस की बीमारियों, खांसी व सीने में दर्द के रोगी हैं। 11 प्रतिशत को डरमैटाइसिस, एग्जिमा और ऐसे ही चर्मरोग हैं। लगातार गंदे पानी में डुबकी लगाने के कारण कान बहने व कान में संक्रमण, आंखों में जलन व कम दिखने की शिकायत करने वालों का संख्या 32 फीसदी थी।
गटर की सफाई करने वालो की मौत होने के साथ ही इनका पूरा परिवार भी अनाथ हो जाता है। परिवार की आमदनी का स्रोत समाप्त हो जाता है। मासूम बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ दो वक्त के खाने की भी परेशानी हो जाती है। मरने वालों का पूरा परिवार बेसहारा हो जाता है। देश में जाम सीवर की मरम्मत करने के दौरान प्रतिवर्ष दम घुटने से काफी लोग मारे जाते हैं। इससे पता चलता है कि हमारी गंदगी साफ करने वाले हमारे ही जैसे इंसानों की जान कितनी सस्ती है। ऐसी बदबू, गंदगी और रोजगार की अनिश्चितता में जीने वाले इन लोगों का शराब व अन्य नशों की गिरफ्त में आना लाजिमी ही है। नशे की यह लत उन्हें कई गंभीर बीमारियों का शिकार बना देती है। सीवर सफाई के काम में लगे लोगों को सामाजिक उपेक्षा का भी सामना करना पड़ता है। इन लोगों के यहां रोटी-बेटी का रिश्ता करने में उनके ही समाज वाले परहेज करते हैं।
आमतौर पर ये लोग सीवर में उतरने से पहले शराब पीते हैं, क्योंकि नशे के सरूर में वे भूल पाते हैं कि काम करते समय उन्हें कितनी गंदगी से गुजरना है। शराब पीने के बाद शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, फिर गहरे सीवरों में तो वैसे ही आक्सीजन की कमी रहती है। तभी सीवर में उतरते ही इनका दम घुटने लगता है। सफाई का काम करने के बाद उन्हें नहाने के लिए साबुन व पानी तथा पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी भी कार्यकारी एजेंसी की है। इसके बावजूद ये उपकरण और सुविधाएं इनको अभी तक नहीं मिल पा रही है।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 1993 से अब तक इस प्रथा के कारण देश में कुल 620 लोगों की मौत हो चुकी है। तमिलनाडु में ही ऐसे 144 मामले दर्ज किए गए हैं। भारत में हाथ से मैला ढोने की प्रथा को प्रतिबंधित किये जाने के उपरान्त भी यह देश में यह गंभीर समस्या बनी हुई है। अब देश की सर्वोच्च अदालत ने गटर की सफाई करने वालों की सुध ली है व सरकार की खिंचाई की है। इससे लगता है कि सफाई करने वाले इन सिपाहियों के भी जल्दी ही अच्छे दिन आयेगें व सरकारी अकर्मण्यता से होने वाली उनकी मौत पर रोक लग पायेगी।

एससी/एसटी को राहत
सिद्धार्थ शंकर
एससी/एसटी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाया। सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में दिए गए आदेश को रद्द कर दिया है और अब इसके बाद इससे जुड़े मामलों में तुरंत गिरफ्तारी होगी। इससे पहले मार्च 2018 में दिए गए कोर्ट के ही एक आदेश में इन मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। कोर्ट के आदेश में कहा गया था कि शिकायत दर्ज होने पर पुलिस पहले मामले की जांच करेगी और दोषी पाए जाने पर ही गिरफ्तारी हो। हालांकि, इस आदेश का देशभर में विरोध हुआ था और सरकार ने भी सर्वोच्च न्यायालय से अपील की थी कि वो इस आदेश को वापस ले ले। 20 सितंबर को प्रावधानों को हल्का करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा था। केंद्र सरकार द्वारा 20 मार्च 2018 को सुनाए गए फैसले को लेकर पुनर्विचार याचिका दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के आदेश को वापस लेते हुए कहा कि इस तरह का आदेश जारी ही नहीं किया जाना चाहिए था। कोर्ट ने इस दौरान कहा कि अनुच्छेद 15 के तहत एससी और एसटी के लोगों को संरक्षण मिला हुआ है लेकिन फिर भी उनके साथ भेदभाव होता है। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की बेंच ने ये भी माना कि एससी-एसटी समुदाय के लोगों को अभी भी उत्पीडऩ और भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में इस कानून को डायल्यूट करने का कोई औचित्य नहीं है। पीठ ने कहा था कि कई मौकों पर, निर्दोष नागरिकों को आरोपी और लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों को निभाने से रोका जा रहा है जबकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को लागू करते समय विधायिका का ऐसा इरादा कभी भी नहीं था। अदालत ने यह कहा था कि अत्याचार अधिनियम के तहत मामलों में अग्रिम जमानत देने के खिलाफ कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, अगर कोई भी प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता या जहां शिकायतकर्ता को प्रथम दृष्टया दोषी पाया जाता है। पीठ ने कहा था कि अत्याचार अधिनियम के तहत मामलों में गिरफ्तारी के कानून के दुरुपयोग के मद्देनजर किसी लोक सेवक की गिरफ्तारी केवल नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा अनुमोदन के बाद और एक गैर-लोक सेवक की गिरफ्तारी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के अनुमोदन के बाद ही हो सकती है।
गौरतलब है कि जब फैसला आया था तब नरेंद्र मोदी सरकार को काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था कि वह एससी-एसटी समुदाय के लोगों के हितों की रक्षा नहीं कर रही है।
अगर कोर्ट के पहले फैसले के आलोक में देखें तो पता चलेगा कि वह फैसला समाज के उपेक्षित तबके को न्याय दिलाने के मकसद से था। एक अर्से से यह महसूस किया जा रहा था कि अनुसूचित जाति-जनजाति प्रताडऩा निवारण अधिनियम अर्थात एससी-एससी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है, लेकिन इस बारे में सरकार के स्तर पर कोई पहल इसलिए नहीं हो पा रही थी कि कहीं उसकी मनमानी व्याख्या करके उसे राजनीतिक तूल न दे दिया जाए। इन स्थितियों में इसके अलावा और कोई उपाय नहीं रह गया था कि सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप करके कुछ ऐसे उपाय करता ताकि यह अधिनियम बदला लेने का जरिया बनने से बचे। हालांकि, अब जबकि कोर्ट ने अपना फैसला बदल दिया है तो सरकार और समाज दोनों की भूमिका बढ़ गई है। सरकार के स्तर पर यह देखना होगा कि किसी का अहित न होने पाए। ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिससे कोई भी किसी को आधार बनाकर कार्रवाई की तलवार न लटका दे।
दरअसल सरकार और समाज के वंचित तबकों के बीच कुछ समय से एक अविश्वास की स्थिति कायम होती जा रही है। यही अविश्वास किसी को भी जेल भेजने व मुकदमा दर्ज कराने तक पहुंच जाता है। अत: यह समाज की भी जिम्मेदारी है कि वह देखे कि लोगों का अंत: मन इतना शुद्ध हो कि सिर्फ निजी स्वार्थ के लिए वह किसी को न फंसा सके। कोर्ट ने अपना जो फैसला पलटा है, वह एक वंचित समुदाय के हितों को देखते हुए ही। अगर पहले की तरह फर्जी मुकदमे होते गए, तो फिर फैसले को पलटने का कोई आधार नहीं बचेगा और समाज में अविश्वास की खाई और गहरी होती जाएगी।

बूचड़खाना और शाकाहार अंडा
डॉ. अरविन्द प्रेमचंद जैन
इसको कहते हैं एक तीर से दो निशान !जी हाँ दिग्विजय सिंह ने अपने पुत्र मंत्री को पात्र लिखा की जान भावनाओं और धरम को देखते हुए आदमपुर में नगर निगम भोपाल द्वारा निर्मित किया जा रहा बूचड़ खाना का निर्माण नहीं होगा, उसके लिए अन्य जगह देखी जाएँगी। अब भविष्य में कोई स्थान की जरुरत नहीं पड़ेंगी कारण केंद्र सरकार द्वारा की गई शोध के अनुसार भविष्य में प्रयोगशाला द्वारा अहिंसा मीट तैयार किया जा रहा हैं और अब पॉलट्री फॉर्म की भी जरुरत नहीं पड़ेगी कारण अब शाकाहारी अण्डों का भी निर्माण
विज्ञान ने बहुत विकास कर लिया और करता ही जा रहा हैं। नित्य नयी खोज होती जा रही हैं, कहीं जी.एम. बीज, क्लोनिंग बच्चे, बकरी, उसके बाद टेस्ट टियूब बेबी। इसके बाद हमारे आहार पर भी बहुत अधिक आक्रमण हो रहे हैं। हरित क्रांति के कारण उत्पादन बढ़ा और रसायनों के उपयोग से गंभीर बीमारियां ने घेरना शुरू किया। उसके बाद श्वेत क्रांति आयी तो दूध की नदियां बहने लगी और नकली मिलावटी दूध इतना मिलने लगा की इतिहास में जैसे दूध की नदियां भारत में बहती थी। इस क्रांति ने भी बहुत अधिक बीमारियों को बढ़ाया। दोनों क्रांतियों ने मनुष्य को जहरीला बना दिया। आज सांप मनुष्य को काटे तो सांप मर जाता हैं।
कहते हैं की आवश्यकता ही आविष्कार की जननी हैं। भारत के भाग्य विधाताओं यानी नेताओं को लगने लगा की हमारा देश आर्थिक रूप से विपन्न हैं और गरीबी नहीं जा रही या हट नहीं पा रही तो उन्होंने पिंक क्रांति यानी मांस का उत्पादन और निर्यात शुरू की इससे हमारा देश विश्व में मांस,चमड़ा, अंडा मछली के निर्यात में नंबर एक पर हैं, मजेदार बात इससे अरबों, खरबों रुपयों की आमद होती हैं और बिना किसी जानवर को मारे ! क्या यह संभव हैं ?जी हां हैं और अब तो सरकार अन्न की बचत के लिए घरो घर मांस, अंडा भेजने की व्यवस्था कर रही हैं, और मध्यान्ह भोजन में तो कुछ राज्य अंडा दे रहे हैं। यानी अब भविष्य में अहिंसा मीट और शाकाहार अंडा आने वाला हैं। यह सब इसलिए की हमारे देश में कुपोषण हैं उसको दूर करना हैं।
यानि मांस अंडा शाकाहारी होगा इससे सरकार के साथ शाकाहारी लोगों को कोई हिचक नहीं होगी। पहले बिरयानी माँसाहारी समझा जाता था पर अब शाकाहारी बिरयानी मिलने लगा। जैसे हॉट डॉग इसको कभी कभी गरम कुत्ता कह देते तो झगड़ा हो जाता। जैसे पिज़्ज़ा बर्गर आदि के ऍफ़ सी, डॉमिनोज,मैक्डोनाल्ड आदि बेचती हैं जिसमे शुद्ध नॉनवेज होता हैं पर वह शुद्ध सफाई से बनता हैं और कोई कोई कहते हैं की उनका किचिन भी अलग अलग होता हैं और बनाने वाला एक होता हैं उससे दोनों प्रकार के आहारियों को सुविधा होती हैं। यानि शाकाहार और मांसाहार का। अहिंसा के घाट पर गाय और शेर एक साथ खाना का रहे हैं।
चलो अच्छा हो रहा हैं की अहिंसा मीट और शाकाहार अंडा मिलने से कम से कम मंदिरों में नकली मावा की मिठाई तो प्रसाद के रूप में नहीं देना होगी या पड़ेगी। सरकार द्वारा प्रामाणिक
अहिंसा मीट यानि मांस और अंडा शाकाहारी मिलेगा तो कोई भी परेशानी नहीं होगी और उसकी आड़ में शुद्ध मांस और अंडा भी खपने लगेगा। कारण सब एक से दिखेंगे तब किसी को क्या आपत्ति। और इस बहाने नकली और असली बिकेगा।
अब तो खुले आम नकली और असली मांस और अंडे की दुकान खुलेंगी जो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त रहेंगी। और उसमे जो सस्ता और महंगा होगा उसमे आराम से मिलावट होगी और जन भावनाओं से खिलवाड़ होगा।
ये सब अहिंसा प्रेमियों, और जो पक्के धर्म को पालने वाले हैं उनके साथ धोखा किया जा रहा हैं। भविष्य में इनके क्या क्या दुष्परिणाम होंगे यह कोई नहीं जानता पर हमारे देश में चरित्र और नैतिकता का ह्रास होने से कुछ भी संभवहैं। विज्ञानं की अपनी सीमा हैं और व्यापारियों की असीमित। उनमे धन के पीछे क्या क्या खिला रहे हैं भगवान जाने।
पहली बात मांस अहिंसात्मक नहीं होता और न अंडा शाकाहार होता हैं इसीलिए अहिंसा मांस और शाकाहार अंडा का नामकरण बदला जावें जिससे शाकाहारियों और धर्मभीरु लोग भ्रमित न हो। यह सब नाटक सरकार कुपोषण दूर करने के नाम पर कर रही हैं।
यह देश में अहिंसा की शुरुआत हो गयी हैं,

आज भारत को महात्मा की ज्यादा जरूरत
कमलनाथ
वे लोग महान है जिन्होंने इस धरती पर महात्मा गांधी को देखा और सुना था। महात्मा गांधी जैसा व्यक्तित्व सदियों में जन्म लेता है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने सच कहा था कि – आने वाली पीढ़ियाँ शायद ही वह विश्वास करें कि इस धरती पर गांधीजी जैसा हाड़-मांस का पुतला कभी चलता था।
आज पूरा देश गांधी जी की 150वीं जयंती मना रहा है। यह हम सब के लिए अभूतपूर्व अवसर है। सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि भारत जैसे कई देशों के लिए यह विशेष अवसर है क्योंकि महात्मा गांधी एक विश्व नागरिक थे। पूरी दुनिया यह जानकर आश्चर्यचकित थी कि सत्य और अहिंसा के दो दिव्य अस्त्रों के साथ भारत ने अपने नागरिक अधिकारों की लड़ाई कैसे लड़ी और जीती। पहले दक्षिण अफ्रीकामें सत्याग्रह और फिर स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करते हुए महात्मा गांधी विश्व के शीर्ष नेताओं की श्रेणी में गिने जाने लगे थे। इसलिए स्वाभाविक रूप से महात्मा की 150वीं जयंती का वैश्विक महत्व है।
आज हमें महात्मा गांधी को याद करने और उनके दर्शन को समझने की सबसे ज्यादा जरूरत है। वह इसलिए कि भारत सहित विश्व के कई देशों की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थितियों में जो तनाव चल रहा है उसका समाधान गांधी जी के दर्शन में है। नैतिक मूल्यों और मानवीय गरिमा पर जो संकट है उसे दूर करने में गांधीजी मदद कर सकते हैं। धर्म और जाति को लेकर उन्माद की जो स्थिति बन रही हैं उससे बचने का उपाय गांधी जी के विचारों में है। गांधी जी अपने समय से बहुत आगे थे। उनका जीवन शिक्षा देता है कि अच्छे विचारों को अपना लो, बुरे विचार अपने आप दूर हो जायेंगे। विचार कोई शोभा की वस्तु नहीं है, विचार आत्मा की शुद्धि के काम आते हैं। उनसे मानव-कल्याण का काम किया जाता है। आज हमें गांधी जी से बहुत सीखने की जरूरत है, उनका जीवन स्वयं एक पाठशाला है। सत्य की पाठशाला, जहाँ जीवन मूल्यों को समझने, समझाने और व्यावहारिक रूप में अपनाने के तौर-तरीके सिखाये जाते हैं। गांधी दर्शन की पाठशाला अब विश्वविद्यालय का स्वरूप ले चुकी है और सबके लिए हमेशा खुली है। यहाँ सभी धर्मों, जाति और विचारधाराओं के लोग शिक्षा लेने आ सकते हैं। महात्मा गांधी भारत की पहचान है । पूरे विश्व में भारत को गांधी का देश कहते हैं। गांधीजी के बिना भारत की कल्पना अधूरी है। गांधीजी भारत के कण-कण में दर्शनीय है। गांधीजी सर्वोदय आधारित समाज की स्थापना करना चाहते थे । सर्वोदय का सीधा अर्थ है सबका कल्याण । सबकी समृद्धि । वे पर्यावरण को भी जीवंत मानते थे । इसलिए पर्यावरण की रक्षा और विवेकपूर्ण उपयोग की बात करते थे। गांधी जी एक महान शिक्षक भी थे। जिन सर्वश्रेष्ठ और मानव हितैषी विचारों को उन्होंने अपनाया, उनका ईमानदारी से पालन किया। सच्चाई के रास्ते पर चलने के तरीके सिखाए, जो आज पूरी दुनिया के लिए मिसाल है। वे कर्मयोगी, ज्ञानयोगी और भक्तियोगी थे। आज हर समाज चाहता है कि वह कर्म, ज्ञान और भक्ति का समन्वय बने और अपने नागरिकों से इसे अपनाने की अपेक्षा करें। इसलिए गांधी जी के दर्शन में हर धर्म का स्थान और मान-सम्मान है। आज भारत सहित पूरे विश्व में सर्वधर्म समभाव की जरूरत है। सत्य और शांति की स्थापना की जरूरत है। साथ ही व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुँचाए बिना तरक्की करने की जरूरत है। मैं युवाओं से आग्रह करूंगा कि गांधी जी की 150वीं जयंती पर उनके जीवन और उनके लेखन को पढ़ें। महात्मा गांधी का जीवन पढ़ने पर खुद इस सवाल का जवाब भी मिल जाएगा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनके नहीं रहने पर क्यों कहा था कि ‘हमारे जीवन से प्रकाश चला गया।’ गांधीजी को जितना पढ़ेंगे, उतना हमारा रास्ता आसान होगा। वे कहते थे कि शिक्षा का अर्थ है चारित्रिक दुर्गुणों के प्रति सचेत रहना और उन्हें दूर करना।
गांधी जी को अपनाना आसान है। गांधी के रास्ते पर चलना आसान है, हर नागरिक अपने आप में गांधी हैं। यदि आप सच बोलना और सुनना चाहते हैं, यदि आप आत्म-निर्भर बनने के लिए प्रयत्नशील हैं, यदि हर धर्म का सम्मान करते हैं और शांति चाहते हैं, यदि अपने साथी नागरिकों की गरिमा का सम्मान करते हैं, पर्यावरण की रक्षा और आदर करते हैं, यदि अपने कारीगरों की कला पर गर्व करते हैं और कमजोर का साथ देते हैं, तो समझिए कि आप गांधीजी के दर्शन पर अमल कर रहे हैं। आइए हम सब मिलकर सर्वोदय आधारित भारत बनाने में अपनी भूमिका तय करें और पूरी ईमानदारी से अपने कर्त्तव्य का पालन करें।
ब्लागर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री है

गांधीवाद :जीवन की पाठशाला है
प्रो.शरद नारायण खरे
गांधीवाद महात्मा गांधी के आदर्शों, विश्वासों एवं दर्शन से उदभूत विचारों के संग्रह को कहा जाता है, जो स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेताओं में से थे। यह ऐसे उन सभी विचारों का एक समेकित रूप है जो गांधीजी ने जीवन पर्यंत जिया था।सत्याग्रह उनकी राजनीतिक जीवन शैली का अनिवार्य अंग था ।सत्य एवं आग्रह दोनो ही संस्कृत भाषा के शब्द हैं, जो भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान प्रचलित हुआ था, जिसका अर्थ होता है सत्य के प्रति सत्य के माध्यम से आग्रही होना।गांधीवाद के बुनियादी तत्वों में से सत्य सर्वोपरि है। वे मानते थे कि सत्य ही किसी भी राजनैतिक संस्था, सामाजिक संस्थान इत्यादि की धुरी होनी चाहिए। वे अपने किसी भी राजनैतिक निर्णय को लेने से पहले सच्चाई के सिद्धांतो का पालन अवश्य करते थे।गांधीजी का कहना था “मेरे पास दुनियावालों को सिखाने के लिए कुछ भी नया नहीं है। सत्य एवं अहिंसा तो दुनिया में उतने ही पुराने हैं जितने हमारे पर्वत हैं।”सत्य, अहिंसा, मानवीय स्वतंत्रता, समानता एवं न्याय पर उनकी निष्ठा को उनकी निजी जिंदगी के उदाहरणों से बखूबी समझा जा सकता है।
कहा जाता है कि सत्य की व्याख्या अक्सर वस्तुनिष्ठ नहीं होती। गांधीवाद के अनुसार सत्य के पालन को अक्षरशः नहीं बल्कि आत्मिक सत्य को मानने की सलाह दी गयी है। यदि कोई ईमानदारीपूर्वक मानता है कि अहिंसा आवश्यक है तो उसे सत्य की रक्षा के रूप में भी इसे स्वीकार करना चाहिए। जब गांधीजी प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान स्वदेश लौटे थे तो उन्होंने कहा था कि वे शायद युद्ध में ब्रिटिशों की ओर से भाग लेने में कोई बुराई नहीं मानते। गांधीजी के अनुसार ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा होते हुए भारतीयों के लिए समान अधिकार की मांग करना और साम्राज्य की सुरक्षा में अपनी भागीदारी न निभाना उचित नहीं होता। वहीं दूसरी तरफ द्वतीय विश्वयुद्ध के समय जापान द्वारा भारत की सीमा के निकट पहुंच जाने पर गांधीजी ने युद्ध में भाग लेने को उचित नहीं माना बल्कि वहां अहिंसा का सहारा लेने की वकालत की है।
अहिंसा का सामान्य अर्थ है ‘हिंसा न करना’। इसका व्यापक अर्थ है – किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से कोई नुकसान न पहुँचाना। मन में भी किसी का अहित न सोचना, किसी को कटुवाणी आदि के द्वारा भी पीड़ा न देना तथा कर्म से भी किसी भी अवस्था में, किसी भी प्राणी का कोई नुकसान न करना।
गांधीजी का मानना था कि उपवास व्यक्ति के मन पर सकाराकमक असर डालता है |उपवास व्यक्ति केनशारीरिक अंगों में भी तन्दुरस्ती लाता है|यह अनुकुल परिस्थितियों की रचना भी करता है ।वह अंतर्रात्मा को पवित्र व बलशाली भी बनाता है ।
गाँधी जी के अनसार धर्म और राजनीति को अलग नही किया जा सकता है क्योंकि धर्म मनुष्य को सदाचारी बनने के लिए प्रेरित करता है । स्व धर्म सबका अपना अपना होता है,पर धर्म मनुष्य को नैतिक बनाता है । सत्य बोलना, चोरी नहीं करना, परदु:खकातरता, दूसरों की सहायता करना आदि बातें यही सभी धर्म सिखाते हैं । इन मूल्यों को अपनाने से ही राजनीति सेवा भाव से की जा सकेगी । गाँधी जी आडम्बर और कर्मकांड को धर्म नही मानते और जोर देकर कहते हैं कि मन्दिर मे बैठे भगवान मेरे राम नही है । स्वामी विवेकानंद जी के दरिद्र नारायण की संकल्पना को अपनाते हुए मानव सेवा को ही वो सच्चा धर्म मानते हैं । वास्तव मे उनका विश्वास है कि प्रत्येक प्राणी इश्वर की सन्तान हैं और ये सत्य है; सत्य ही ईश्वर है ।
गांधीवाद स्वदेशी को मानते हुए आम आदमी की खुशहाली तथा सद्भाव की बात करते हुए मानवता व देशप्रेम की बात करता है ।सच में गांधीवाद ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘जियो और जीने दो’ तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:———-‘के आदर्श की बात करता है ।यही कहूंगा कि-
“जीवन को सद् राह नित,देता गांधीवाद ।
रहे गूंजता नित्य ही,सत्य-अहिंसा नाद ।।

अब कश्मीर का हाल क्या है ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
संयुक्तराष्ट्र में मोदी और इमरान के बाद कश्मीर का हाल क्या है ? इमरान खान के भाषण का असर चाहे चीन और तुर्की के अलावा किसी भी राष्ट्र पर न पड़ा हो लेकिन 55 दिन से सोये कश्मीर में अब कुछ न कुछ हलचल मची है। जगह-जगह लोगों ने प्रदर्शन भी किए हैं, हथगोले भी फेंके हैं और आतंकियों ने भी अपने तेवर दिखाए हैं। कुछ लोग मारे भी गए हैं। कई इलाकों में कर्फ्यू दुबारा लगाना पड़ा है। फौजियों की संख्या भी बढ़ाने पर विचार हो रहा है। स्कूल-कालेज खुले हैं लेकिन उनमें कोई दिखाई नहीं पड़ता। दुकानें भी मुश्किल से एक-दो घंटे के लिए खुल पा रही हैं। सड़कों पर भी यातायात लगभग बंद-सा हो गया है। यह सब मुझे देश के प्रमुख अखबारों की खबरों से पता चला है, क्योंकि मोबाइल फोन और इंटरनेट तो बंद पड़े हैं। अखबारों ने कश्मीर की इन खबरों को अपने मुखपृष्ठों पर छापा है। इससे पता चलता है कि भारत में अभी भी अभिव्यक्ति की आजादी कायम है और उसका पूरा-पूरा इस्तेमाल पत्रकार व विरोधी नेता लोग खुले-आम कर रहे हैं। मुझे विश्वास था कि संयुक्तराष्ट्र संघ के दंगल के बाद कश्मीर की घुटन कुछ घटेगी लेकिन अब ऐसा लगता है कि प्रतिबंधों का यह दौर शायद लंबा खिंचेगा। हो सकता है कि यह दिसंबर तक खिंच जाए। जहां तक मुझे खबर है, भारत सरकार के इरादे बिल्कुल नेक हैं। वह कश्मीर में खून की एक बूंद भी बहते हुए नहीं देखना चाहती और कश्मीरियों से खुला संवाद करना चाहती है लेकिन यदि वहां हिंसा होती है और आतंकी सक्रिय होते हैं तो सरकार को मजबूरन सख्ती करनी होगी। यहां संतोष का विषय है कि जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने खुले तौर पर घोषणा की है कि उनकी सरकार अगले कुछ दिनों में ही लगभग 70 हजार नौजवानों को नौकरियां देनेवाली है। यह काम अगले तीन महिने में पूरा हो जाएगा। हर गांव से कम से कम पांच लोगों को नौकरी मिलेगी। सरकारी कंपनी ‘नाफेड’ ने पहली बार 8000 करोड़ रु. के सेब खरीदे हैं और 1100 ट्रक रोज सेब कश्मीर से बाहर ले जाए जा रहे हैं। सेबवालों को उनके सेब के डेढ़े दाम भी दिए जा रहे हैं। अस्पतालों में 55 दिन में 70 हजार आपरेशन और एक लाख लोगों का इलाज किया गया है। बच्चे यदि स्कूलों में नहीं आ रहे हैं तो उन्हें पेन ड्राइव के जरिए पढ़ाने का इंतजाम किया जा रहा है। कश्मीर में उद्योग-धंधे लगाने और पर्यटन को बढ़ाने के लिए कुछ नई पहल भी की जा रही हैं। ये सब काम तो ठीक हैं लेकिन मैं सोचता हूं कि कश्मीरी नेताओं और जनता से भी खुले संवाद की खिड़कियां खोलनी अब जरुरी है। यदि इस पहल को सफलता मिलेगी तो भारत-पाक संवाद के हालत अपने आप तैयार हो जाएंगे।

शाकाहार की ओर बढ़ने लगे लोग
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
(1 अक्टूम्बर विश्व शाकाहार दिवस पर विशेष) दुनियाभर में आज शाकाहार दिवस मनाया जा रहा है। खुशी की बात ये है कि दुनिया अब शाकाहार की ओर बढ़ने लगी है पिछले कुछ साल के आंकड़ों पर भरोसा करें तो दुनिया में शाकाहारियों की तादाद बढ़ रही है। हालांकि मांसाहारियों की तुलना में अब भी खासी कम है। इस दिवस पर सभी मानव जाति को शुभकामनाएं ,
बढ़ रहे हैं शाकाहारी
दुनिया में तेजी से प्लांट बेस यानि वनस्पति आधारित खानपान के तौर तरीके बढ़ रहे हैं। लोग इसे तेजी से अपना रहे हैं। ये आंदोलन का रूप ले रहा है, जिसे काफी पसंद भी किया जा रहा है।
दुनिया की सबसे बड़ी फूड फैक्ट्री नेस्ले का अनुमान है, “वनस्पति आधारित खानों का क्रेज अब बढेगा।” एक और कंपनी जस्टइट के सर्वे का कहना है, “दुनिया में 94 फीसदी हेल्दी फूड आर्डर बढा है।” एक अन्य अमेरिकी कंपनी ग्रबहब का डेटा कहता है, “अमेरिका में दुकानों और मॉल्स से हरी सब्जियां ले जाने की संख्या बढ रही है।”
गूगल ट्रेंड्स का सर्च डाटा कहता है, ” वर्ष 2014 से 2018 के बीच दुनियाभर में असरदार तरीके से शाकाहार की ओर लोगों का रुझान बढा है। इजराइल, आस्ट्रेलिया, आस्ट्रिया, कनाडा और न्यूजीलैंड में शाकाहारी बढ़ रहे हैं।”
ग्लोबडाटा की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, “अमेरिका में शाकाहारी लोगों में 600 फीसदी की बढोतरी हुई है।” रिपोर्ट कहती है, “वर्ष 2014 में अमेरिका में केवल एक फीसदी लोग शाकाहारी होने का दावा करते थे लेकिन वर्ष 2017 में ये संख्या छह फीसदी हो चुकी है। ब्रिटेन में एक दशक पहले की तुलना में वेजन 350 फीसदी बढे हैं।”
कनाडा में वर्ष 2017 में शाकाहार पर सबसे ज्यादा सर्च हुई। पहली बार कनाडा की नई फूड गाइड का मसौदा तैयार हुआ, इसे कनाडा की सरकार ने 2017 में रिलीज किया, जिसमें हरी सब्जियों और वनस्पति आधारित खानों की पैरवी की गई
हर जगह बढ़ रहा है शाकाहार का बाजार
नीलसन की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, पुर्तगाल में पिछले एक दशक में शाकाहारियों की संख्या 400 फीसदी तक बढ़ी है। चीन की सरकार अपने लोगों को मांसाहार के लिए हतोत्साहित कर रही है। उसका कहना है कि मांसाहार की खपत को 50 फीसदी तक कम किया जाना चाहिए।
रिसर्च कहता है कि चीन में शाकाहार का बाजार 17 फीसदी की दर से 2015 से 2020 के बीच बढने की उम्मीद जाहिर की जा रही है। हांगकांग में 22 फीसदी लोग शाकाहारी खाने और हरी सब्जियों की आदत डाल रहे हैं।
आस्ट्रेलिया में वर्ष 2014 से 2016 के बीच 02 फीसदी शाकाहार उत्पाद लांच किए गए। आस्ट्रेलिया दुनिया का तीसरा तेजी से बढ़ता शाकाहार का बाजार है। अमेरिका में फास्ट कैजुअल रेस्टोरेंट एक लाख दस हजार मील हर महीने परोसता है और वो इसे दुनियाभर में फैलाने की योजना बना रहा है। मैकडोनाल्ड्स् ने स्वीडन, फिनलैंड सहित कई देशों में मैकवेजन बर्गर लांच किये हैं। पिज्जा हट ने ब्रिटेन में वेजन चीज पिज्जा पेश किया
फ्रेंड्स ऑफ़ अर्थ नामक संस्था के मुताबिक दुनियाभर में 50 करोड़ लोग ऐसे हैं जो पूरी तरह से शाकाहारी हैं लेकिन तादाद बढ़ रही है। दुनिया के सबसे ज्यादा शाकाहारी भारत में हैं, हालांकि ये आंकड़े पुराने हैं। माना जा रहा है कि वर्ष 2018 में शाकाहार के प्रति सबसे ज्यादा ट्रेंड देखा गया है लिहाजा शाकाहारियों की तादाद भी और बढ़ चुकी होगी।
भारत – 30 से 40 फीसदी शाकाहारी
ताइवान – 14 फीसदी
आस्ट्रेलिया – 11 फीसदी
मैक्सिको – 19 फीसदी
इजराइल – 13 फीसदी
ब्राजील – 14 फीसदी
स्वीडन – 10 फीसदी
न्यूजीलैंड- 10.3 फीसदी
जर्मनी – 10 फीसदी
कितनी तरह के भोजन करने वाले
दुनिया में तीन तरह का भोजन करने वाले लोग हैं। पहले जो मांसाहार करते हैं, यानी नॉन -वेजिटेरिअन . दूसरे जो शाकाहारी हैं- यानी वेजेटेरियंस और तीसरे वो लोग हैं जो शाकाहारी हैं और जानवरों से प्राप्त किए जाने वाले पदार्थ जैसे दूध का सेवन भी नहीं करते। ऐसे लोगों को (वीगन) कहा जाता है।
मांसाहार कम होने पर फायदे
– भोजन में मांसाहार की मात्रा कम करने से दुनिया भर में हर साल करीब 66 लाख 73 हज़ार करोड़ रुपये बचाए जा सकते हैं जबकि ग्रीन गैस उत्सर्जन में कमी आने से 34 लाख करोड़ रुपये बचाए जा सकेंगे।
– कम कैलोरी वाला भोजन करने से मोटापे की समस्या कम होगी। स्वास्थ्य पर लगने वाले खर्च में कमी आएगी।
– फल और सब्ज़ियों का उत्पादन बढ़ने से भारत सहित दक्षिण एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था को जबरदस्त फायदा होगा
– अमेरिका की नेशनल अकादमी ऑफ़ साइंसेज के एक नए रिसर्च के मुताबिक, अगर पूरी दुनिया में शाकाहार को बढ़ावा मिले तो धरती को ज्यादा स्वस्थ, ज्यादा ठंडा और ज्यादा दौलतमंद बनाया जा सकता है।
मांसाहार उत्पादन में ज्यादा पानी
– एक अनुमान के मुताबिक जानवरों को पालने के लिए उन्हें जो भोजन दिया जाता है, वो अगर इंसानों को मिलने लगे तो दोगुने लोगों का पेट भर सकता है। इसी तरह मीट प्रोडक्ट्स को खाने की टेबल तक पहुंचाने में सब्जियों के मुकाबले 100 गुना ज़्यादा पानी का इस्तेमाल किया जाता है।
– आधा किलो आलू उगाने में 127 लीटर पानी लगता है जबकि आधा किलो मांस का उत्पादन करने के लिए 9 हज़ार लीटर से ज्यादा पानी बर्बाद होता है जबकि आधा किलो गेंहूं का आटा बनाने में 681 लीटर पानी का इस्तेमाल होता है।
– फ्रेंड्स ऑफ़ अर्थ नामक संस्था के मुताबिक मीट प्रोडक्ट्स पैदा करने के लिए हर साल करीब 6 लाख हेक्टेयर जंगल काट दिए जाते हैं ताकि उस ज़मीन पर जानवरों को पाला जा सके।
– कुल मिलाकर अगर वैज्ञानिक रिपोर्ट्स को आधार बनाया जाए तो ये कहना गलत नहीं होगा हफ्ते में सिर्फ एक दिन के लिए शाकाहार को अपनाकर भी, धरती को बचाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा सकता है, क्योंकि मांसाहार कम होने से ग्लोबल वार्मिंग में कमी आएगी, और धरती के वातावरण को ठंडा बनाने में मदद मिलेगी।
शाकाहार से भी बनती है मसल्स
शाकाहारी भोजन में मसल्स बनाने के लिए सभी जरूरी पोषक तत्व होते हैं। सब्जियों से मिलने वाली कार्बोहाईड्रेट और वसा बीमारियों से बचाव करती है, साथ ही प्रोटीन से आपकी मसल्स का निर्माण होता है। सब्जियों में शरीर के लिए फायदेमंद विटामिन्‍स, एंटीऑक्सीडेंट और अमीनो एसिड भी पाया जाता है।
कुछ शाकाहारी खाद्य पदार्थों की जिनके सेवन और वर्क आउट से आप आकर्षक और मजबूत मसल्स पा सकते हैं। प्रोटीन के लिए चना, दाल, बादाम, काजू, अनाज और मटर का सेवन फायदेमंद रहता है। बटरमिल्‍क भी मसल्स बनाने में मददगार है। छाछ में नाम मात्र की वसा होती है, यह भी मसल्स निर्माण में सहायक है
इतिहास क्या कहता है
शाकाहार के शुरुआती रिकॉर्ड ईसा पूर्व छठी शताब्दी में प्राचीन भारत और प्राचीन ग्रीस में पाए जाते हैं। लेकिन प्राचीनकाल में रोमन साम्राज्य के ईसाईकरण के बाद शाकाहार व्यावहारिक रूप से यूरोप से गायब हो गया।
कौन सा धर्म खानपान पर क्या कहता है
हिंदू धर्म – हिंदू धर्म में शाकाहार को श्रेष्ठ माना गया है। ये विश्वास है कि मांसाहारी भोजन मस्तिष्क और आध्यात्मिक विकास के लिए हानिकारक है। हिंदू धर्म पशु-प्राणियों के अंहिसा के सिद्धांत को भी मानता है। हिंदू शाकाहारी आमतौर पर अंडे से परहेज़ करते हैं लेकिन दूध और डेयरी उत्पादों का उपभोग करते हैं, इसलिए वे लैक्टो-शाकाहारी हैं। हालांकि अपने संप्रदाय और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार हिंदुओं के खानपान की आदतें अलग होती हैं।
जैन धर्म- ये दृढ तरीके से शाकाहार पर जोर देते हैं। यहां तक शाकाहार में कुछ ऐसी सब्जियां नहीं खाते, जो जड़ की होती हैं, क्योंकि वो इसे पौधों की हत्या के रूप में देखते हैं। वे फलियां और फल खाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
बौद्ध धर्म- बौद्ध धर्म शाकाहार पर विश्वास करता है। लेकिन थैरवादी या स्थविरवादी आमतौर पर मांस खाया करते हैं। महायान बौद्ध धर्म में, ऐसे अनेक संस्कृत ग्रंथ हैं जिनमे बुद्ध अपने अनुयायियों को मांस से परहेज करने का निर्देश देते हैं। तिब्बत और जापानी बौद्धों के बहुमत सहित महायान की कुछ शाखाएं मांस खाया करती हैं जबकि चीनी बौद्ध मांस नहीं खाते।
सिख धर्म- सिख धर्म के सिद्धांत शाकाहार या मांसाहार पर अलग से कोई वकालत नहीं करते। भोजन का निर्णय व्यक्ति पर छोड़ दिया गया है। कुछ सिख संप्रदाय से संबंधित “अमृतधारी” मांस और अंडे के उपभोग का जोरदार विरोध करते हैं।
यहूदी धर्म- मांस त्याग की पैरवी करता है और इसे नैतिक तौर पर गलत बताता है। हालाँकि यहूदियों के लिए मांस खाना न आवश्यक है और न ही निषिद्ध।
ईसाई धर्म- मौजूदा ईसाई संस्कृति सामान्य रूप से शाकाहार नहीं है। हालाँकि, सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट और पारंपरिक मोनैस्टिक शाकाहार पर जोर डालते हैं।
इस्लाम- व्यक्तिगत तौर पर मांस का स्वाद पसंद न करने वालों को शाकाहार चुनने की आजादी प्रदान करता है।
उपरोक्त आधार के अलावा मानव शरीर की संरचना मांसाहार के लिए नहीं हैं ।शाकाहार यानि शांति कारक और हानि रहित .इसको अपनाने में लाभ हैं ।
आये इस दिन हम संकल्प ले की हम स्वयं शाकाहारी बने और और कम से एक व्यक्ति को शाकाहार बनाने प्रेरित करे। कोई भी शाकाहार परिषद् का सदस्य बन सकता हैं जो पूर्णतया शाकाहारी ,अहिंसा प्रेमी और जीवदया के प्रति दया का भाव रखता हो।

भाजपा अपनी इज्जत बचाए
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भाजपा के पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानंद और उनके कालेज की एक छात्रा के मामले ने भाजपा की छवि को धूल में मिलाकर रख दिया है। जो पार्टी अपनी चाल, चेहरे और चरित्र पर गर्व करती थी, क्या अब वह कहीं अपना मुंह दिखाने लायक रह गई है ? वह छात्रा साल भर से चिन्मय पर आरोप लगा रही है कि उसके साथ वह बलात्कार और मारपीट करता रहा है लेकिन जब तक उसने इन बातों को इंटरनेट पर जग-जाहिर नहीं किया, न तो उप्र की पुलिस ने कोई सुनवाई की और न ही उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कोई ध्यान दिया। जब सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप किया तो चिन्मय के खिलाफ कार्रवाई शुरु तो हुई लेकिन उसे बीमारी के बहाने अस्पताल में आराम फरमाने भेज दिया गया है और दूसरी तरफ पीड़िता के साथ क्या हुआ, वह आप जानें तो आप चकित रह जाएंगे। बलात्कारी अस्पताल में है और बलात्कार—पीड़िता जेल में है। पीड़िता पर जो आरोप है, उसके कुछ प्रमाण पुलिस जरुर पेश करेगी लेकिन वे आरोप क्या हैं ? वे मजाक हैं। पीड़िता और उसके तीन साथियों को जेल में इसलिए डाला गया है कि वे चिन्मय से पैसे मूंडने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने पैसे मूंड लिये हैं, यह आरोप उन पर नहीं है। उधर चिन्मय पर जो आरोप लगाया गया है, जरा आप उसकी चतुराई देखिए। चिन्मय पर उप्र की पुलिस ने जो आरोप लगाया है, वह बलात्कार का नहीं है बल्कि ‘शारीरिक संबंधों के लिए सत्ता के दुरुपयोग’ का है। याने चिन्मय ने बलात्कार किया है या नहीं, यह पता नहीं लेकिन उन्होंने सिर्फ सत्ता का दुरुपयोग किया है। क्या यह मजाक नहीं है ? मुख्यमंत्री आदित्यनाथ एक तरफ ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान चला रहे हैं और दूसरी तरफ उनकी सरकार बलात्कारी बचाओ अभियान चला रही है। यह कितने शर्म की बात है कि एक संन्यासी मुख्यमंत्री है और उसकी नाक के नीचे हिंदू धर्म का संन्यास-जैसा पवित्र आश्रम सारी दुनिया में बदनाम हो रहा है। हिंदुत्व पर गर्व करनेवाली मोदी सरकार का हिंदुत्व क्या यही है ? प्रधानमंत्री को अपनी छवि, भाजपा की छवि, भारत की छवि और संन्यास की छवि की रक्षा करनी हो तो उन्हें इस मामले में तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। यदि चिन्मय से यह पाप हुआ है तो उसे उसको स्वीकार करना चाहिए और अदालत सजा दे, उसके पहले खुद को खुद कठोरतम सजा दे डालनी चाहिए और यदि वे निर्दोष हैं तो अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए उन्हें आमरण अनशन करके अपनी जान की बाजी लगा देनी चाहिए।

हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषा का क्या समाधान?
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
आज विषय बहुत गंभीर हैं की राष्ट्रभाषा /राजभाषा कौन सी होना चाहिए ? यह भाषा की लड़ाई नहीं हैं यह सबके अस्तित्व की लड़ाई हैं। वैसे सबसे पहले हमें राष्ट्रभाषा हिंदी को प्रथम रखना चाहिए और उसके बाद अंग्रेजी को प्राथमिकता दे। स्थानीय भाषाओँको भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
एक मजेदार बात यह हैं की अन्य प्रदेश के वासी जैसे कन्नड़ ,तमिल ,तेलगु ओड़िया, असमी आदि अनेक स्थानीय और प्रांतीय भाषाई लोग हिंदी के माध्यम से अपनी रोजी रोटी खा रहे और कमा रहे। उदाहरण के लिए हिंदी भाषी फिल्मों में इन प्रांतों द्वारा फिल्मों में काम किया जाता हैं ,और सब लोग हिंदी गानों को मस्ती से सुनते हैं। कभी कभी टेलीविजन में साक्षत्कार आते हैं तब वे हिंदी में बात करते हैं तब वे अंग्रेजी या अपनी भाषा में जबाव देते हैं ,इसका आशय वे हिंदी जानते हैं। आज हिंदी वासी लोग उनके प्रान्त घूमने जाते हैं वे उनकी बात समझते हैं।
एक देश, एक भाषा: गृह मंत्री अमित शाह बोले- कभी किसी क्षेत्रीय भाषा पर हिंदी थोपने की बात नहीं क केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि उन्होंने कभी किसी क्षेत्रीय भाषाओं पर हिंदी थोपने की बात नहीं कही थी। उन्होंने कहा कि इसपर राजनीति की जा रही है। उन्होंने विपक्षी दलों को भी आड़े हाथों लिया।
मैंने कभी किसी क्षेत्रीय भाषा पर हिंदी थोपने की बात नहीं की थी। मैंने एक मातृभाषा सीखने के बाद दूसरी भाषा के तौर पर हिंदी सीखने का आग्रह किया था। मैं खुद एक गैर हिंदी भाषी राज्य गुजरात से आता हूं। अगर कोई व्यक्ति इसपर राजनीति करना चाहता है तो वह उसकी इच्छा है।’
शाह ने अपने हिंदी दिवस के भाषण में कहा था कि अनेक भाषाएं, अनेक बोलियां कई लोगों को देश के लिए बोझ लगती हैं। उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है यह हमारी देश की सबसे बड़ी ताकत हैं। परंतु जरूरत है देश की एक भाषा हो, जिसके कारण विदेशी भाषाओं को जगह न मिले। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमारे पुरखों और स्वतंत्रता सेनानियों ने राजभाषा की कल्पना की थी और राजभाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार किया था।’
गृह मंत्री द्वारा ऐसा कोई कथन नहीं किया गया जहाँ विरोध हो पर हमने जो अंग्रेजी को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रखी उस पर चिंतन जरूरी हैं। इसके लिए जरूरी यह होगा की हमें अपने सरकारी तंत्र जैसे संसद ,न्यायलय और अन्य क्षेत्रों में हिंदी को प्राथमिकता दे.हिंदी को राष्ट्रभाषा होना चाहिए जिससे हम अपने आप गौरवान्वित हो सके उसके बाद अन्य भाषाओं को भी अन्य भाषी सीखे और उनके साहित्य से अवगत हों.
इस विषय पर अन्य भाषायी यदि विवाद करते हैं तो यह उचित नहीं हैं ,यदि बहुलता को देखे और उसके बाद उसकी उपयोगिता को समझे तो कुछ निर्णय निकल सकता हैं। भाषा से कोई परेशानी नहीं पर किसी को इसका दर्ज़ा देना जरूरी हैं। अंग्रेजी से भी कोई विरोध नहीं हैं ,वह संपर्क का सशक्त माध्यम हैं उससे इंकार नहीं किया जा सकता हैं।
भाषा एक ऐसा रोग बन गया हैं
जिसे असाध्य कहा जा सकता हैं
या हो गया
असाध्यनि प्रति नास्ति चिंता
हर साल ऐसी ही रस्म अदायगी
और हम इंडिया से भारत नहीं हो पाएंगे।

लोकतंत्र को मजबूत करने वाला फैसला
विवेक तन्खा
ब्रिटेन के इतिहास में पहली बार तब संवैधानिक संकट की स्थिति बन गई तब वहां के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने संसद को पांच हफ्ते के लिए निलंबित करने का सुझाव दिया। ब्रिटेन की महारानी को दिये गये इस सुझाव के पीछे उनका मंतव्य यूरोपियन युनियन से बाहर होने के लिए होने वाली डील पर बहस से बचना था। उन्होंने यह भी कहा कि इस दौरान उनकी सरकार की नीतियां महारानी के भाषण के जरिये सामने रखी जाएंगी। जॉनसन के इस फैसले की तत्काल चौरफा आलोचनाएं शुरू हो गईं। ब्रिटेन के राजनेताओं ने इस फैसले को लोकतंत्र पर आघात बताया। उनका कहना था कि जॉनसन गैर कानूनी तरीके से संसद को ब्रेगि्जट यूरोपियन यूनियन से अलग होने का फैसला) की तारीख से बिल्कुल पहले रद्द करवा दिया है। ताकि संसद के बिना डील के ब्रेगि्जट की उनकी योजना पर बहस करके बावजूद ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने अपना फैसला वापस लेने से इंकार कर दिया।
उल्लेखनीय है कि ब्रिटेन आने वाले 31 अक्टूबर को 28 देशों के समूह यूरोपियन यूनियन को छोड़ने वाला है। संसद को सस्पेंड करने के फैसले के बाद विपक्षी दलों ने जॉनसन पर महारानी को गुमराह करने का आरोप लगाया था, जिनकी अनुमति संसद को निलंबित करने के लिए अनिवार्य होती है। इस तरह ब्रिटेन में एक संवैधानिक संकट खड़ा हो गया। फैसले को इंग्लैड के हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। लेकिन इस अदालत ने मामले की सुनवाई करने से यह कहकर मना कर दिया कि यह मामला न्यायालय में सुनवाई के दायरे से बाहर है।
आखिरकर मामला ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट पहुंचा गया। वहां एक सप्ताह के भीतर मामला सूचीबद्ध हो गया। इस मामले की सुनवाई के लिए शीघ्र ही 11 जजों की एक पीठ बना दी गई। मामले की सुनवाई दो दिन चल चली। और फिर जल्द ही सुनवाई दो दिन तक चली और फिर जल्द ही फैसला सुना दिया गया।
अदालत ने प्रधानमंत्री जानसन के फैसले को गलत करार दिया। अदालत ने कहा कि प्रधानमंत्री ने संसद को अपने कर्तव्य का फैसला बहुत ही संक्षिप्त था लेकिन दमदार था, अब सवाल यह है कि ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या लोकतंत्र की रक्षा के संदर्भ में भारतीय सुप्रीम कोर्ट के लिए मिसाल हो सकता है?
अब तक का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि भारत की सर्वोच्च अदालत निश्चित दायरे में काम करती रही है। बात यदि दल बदल कानून से संबंधित हो तो भी अदालत ऐसे में सदन के अध्यक्ष के फैसले को तरजीह देती है। देश में ऐसे ही अनेक मामले उठते रहते है, लेकिन अदालत आमतौर पर संसद के फैसलों को गलत नहीं ठहराती।
मुझे आपातकाल के दौर की याद आती है। तब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन जीने और निजता के अधिकार को अस्वीकार कर दिया था। 1976 में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की एक पीठ ने आपातकाल के दौरान यह फैसला दिया था कि आपातकाल के समय व्यक्ति के मिले जीवन और निजता के अधिकार को वापस लिया जा सकता है। यह फैसला कांग्रेस के उस कदम के समर्थन में था जिसे सरकार अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के विरुद्ध इस्तेमाल कर सकती है।
तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जसि्टस ए. एन. रे की अध्यक्षता वाली पांच जजों की इस पीठ में जस्टिस एच आर खन्ना. जस्टिस एच आर बेग, जस्टिस एम एच बेग, जस्टिस वाई वी चंद्रचूढ़ और जस्टिस पीएन भगवती शामिल थे। इस फैसले से केवल जस्टिस एच आर खन्ना असहमत थे। उन्हें अपनी इस असहमति की कीमत भी चुकानी पड़ी थी। इस फैसले के बाद सीजेआई के पद पर नियुक्ती के दौरान जस्टिस खन्ना की वरिष्ठता को दरकिनार कर दिया गया। उनकी जगह जस्टिस एमएच बेग को सीजेआई जस्टिस जे एस खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस डीवाई चंद्रचूढ़ भी शामिल थे। जो सुप्रीम कोर्ट के 1976 के में शामिल रहे जस्टिस वाई वी. चंद्रचूढ़ के पुत्र हैं।
देश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले अपने आप में यह बताते हैं कि उसकी स्थिति क्या है। भारत में फैसले प्रधानमंत्री कैबिनेट के साथ राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से करते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के लिए उसके फैसलों को उस तरह से पलटना संभव नहीं होता। जैसे कि ब्रिटेन में सरलता से हो जाता है। बहुत से मामले हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि उनमें सुप्रीम कोर्ट को सीधे तौर पर हस्तक्षेप करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट कहता है कि कानून बनाने का काम सरकार का है, वह तो केवल समीक्षा कर सकता है। हां, .यह कह सकते हैं कि ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट ने जिस सफलता से सरकार के विरोध में फैसला करने की हिम्मत दिखाई, वैसी भारत की सुप्रीम कोर्ट को करनी चाहिए लेकिन जरूर तो नहीं सुप्रीम कोर्ट सरकार के हर फैसले से असहमत ही हो। यह उसकी सोच पर निर्भर करता है।
– 31 अक्टूबर को 28 देशों के समूह यूरोपियन यूनियन को छोड़ने वाला है। संसद को सस्पेंड करने के फैसले के बाद विपक्षी दलों ने जॉनसन पर महारानी को गुमराह करने का आरोप लगाया था, जिनकी अनुमति संसद को निलंबित करने के लिए अनिवार्य होती है।
(राज्यसभा सदस्य, प्रदेश के एडिशनल सॉलिस्टर जनरल रहे)

ट्रंप की नोबेल की चाह
सिद्धार्थ शंकर
अभी कुछ दिन पहले जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र में खुद को नोबेल पुरस्कार न मिलने को लेकर नाखुशी जाहिर की थी, तब बहुत से लोगों ने इसे ट्रंप की फितरत से जोड़कर देखा था और कहा था कि ट्रंप इसी तरह की बातें करने के लिए विख्यात हैं। मगर जानकारों का कहना है कि ट्रंप की यह पीड़ा न तो चर्चा में बने रहने के लिए थी और न ही माहौल को हल्का करने के लिए। ट्रंप वाकई चाहते हैं कि उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया जाए। ट्रंप के अब तक के कार्यकाल को देखें तो पता चलेगा कि उन्होंने न सिर्फ काम करने का एजेंडा सेट किया, बल्कि उसी के मुताबिक चले भी। जहां जरूरत थी वहां भी और जहां जरूरत नहीं थी, वहां भी उन्होंने अपनी टांग फंसाई। नतीजा यह निकला कि कहीं उनकी कोशिशों को सराहा गया तो कहीं खारिज किया गया। अपनी इसी नीतियों के चलते वे विवादित भी कहलाए। नोबेल पुरस्कार पाने की ख्वाहिश पाले ट्रंप को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक सबसे मुफीद समय लग रहा है। कश्मीर को लेकर पिछले कुछ माह से आ रहे ट्रंप के बयानों ने पटकथा लिखने का काम किया। ट्रंप जानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र की बैठक में दुनियाभर के राष्ट्र प्रमुख आएंगे और उनकी कोशिशों को सराहेंगे।
ट्रंप लगातार कश्मीर को लेकर स्टैंड बदल रहे हैं। कभी वे पाकिस्तान के साथ खड़े होते हैं, तो कभी भारत के साथ। तो कभी दोनों को ही नसीहत देने की भूमिका में आ जाते हैं। ट्रंप के अब तक के बयानों को देखें तो जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री उनसे मिलने अमेरिका गए तो उन्होंने यहां तक कह दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे कश्मीर पर मध्यस्थता करने की बात की थी, इसलिए वे यह करने को तैयार हैं। विवाद बढ़ा तो अमेरिका में हर स्तर पर ट्रंप का बयान खारिज किया गया। विदेश मंत्रालय को बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर कहना पड़ा कि मोदी ने ट्रंप से इस आशय की कोई बात नहीं की। अब जबकि मोदी संयुक्त राष्ट्र की बैठक में पहुंचे तो ट्रंप कहने लगे कि जब तक भारत तैयार नहीं होगा तब तक वे मध्यस्थता की कोशिश नहीं करेंगे। भारत अकेले ही इस समस्या को सुलझा सकता है। इस बयान को 48 घंटे भी नहीं हुए थे कि अब ट्रंप फिर से भारत और पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दा हल करने की नसीहत देने लगे हैं। नोबेल पाने की ट्रंप की चाह उन्हें सिर्फ कश्मीर लेकर नहीं जा रही। इससे पहले वे उत्तर कोरिया तक भी पहुंच बना चुके हैं। खतरनाक हथियारों की होड़ में जुटे उत्तर कोरिया के शासन किम जोंग के साथ ट्रंप तीन बार बात कर चुके हैं, मगर अब तक किम की सोच बदल नहीं पाए हैं। इसीलिए वे फिर से भारत और पाकिस्तान को टारगेट करने पर लगे हैं। हालांकि, भारत कह चुका है कि कश्मीर उसका अंदरूनी मामला है और इसमें किसी तीसरे पक्ष की भूमिका मंजूर नहीं है। ऐसा नहीं है कि भारत का यह पक्ष पहली बार आया है। समस्या के पहले दिन ेसे भारत मध्यस्थता को खारिज करता रहा है। अब ट्रंप इसे मानें या नहीं, मगर इतना तो तय है कि भारत उनकी बातों को तवज्जो नहीं देगा। बेहतर है कि वे पाकिस्तान पर जोर दिखाएं और उसे पीछे हटने को कहें। शायद ऐसा कर ट्रंप नोबेल पाने के हकदार हो जाएं। जहां तक बात भारत की है, वह ट्रंप की मंशा कामयाब नहीं होने देगा।

क्या-क्या अदाएं हैं हमारे ट्रंपजी की
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
ह्यूस्टन में नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप की संयुक्त सभा ने जो जलवा पैदा किया है, उससे इन दोनों नेताओं के अंदरुनी और बाहरी विरोधी-सभी हतप्रभ हैं। दोनों नेता प्रचार-कला के महापंडित हैं। दोनों एक-दूसरे के गुरु-शिष्य और शिष्य-गुरु हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति का विद्यार्थी होने के नाते मैं कल जिस अदृश्य तथ्य को समझ रहा था और जिसके बारे में पहले भी लिख चुका हूं, अब वही होने जा रहा है। दो देशों के नेता परस्पर कैसा भी व्यवहार करें लेकिन उन दोनों देशों के संबंधों का निर्धारण उनके राष्ट्रहित ही करते हैं। ट्रंप ने ह्यूस्टन में मोदी और भारत के लिए तारीफों के पुल बांध दिए लेकिन क्या यही उन्होंने इमरान खान के साथ नहीं किया ? कल जब इमरान उनसे न्यूयार्क में मिले तो उनकी हर अदा ऐसी थी, जैसे कि वे भारत और पाकिस्तान में कोई फर्क ही नहीं करते। जो लोग ह्यूस्टन की नौटंकी देखकर फूले नहीं समा रहे थे, वे ट्रंप की इस अदा से पंचर हो गए। ट्रंप ने मोदी और इमरान दोनों को महान बताकर भारत-पाक के बीच मध्यस्थता करने का राग दुबारा अलाप दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने ह्यूस्टन में मोदी के भाषण को काफी ‘आक्रामक’ बता दिया। यह तो उन्होंने पत्रकारों को बताया लेकिन पत्रकारों को जो पता नहीं है याने इमरान को, पता नहीं, उन्होंने क्या-क्या उल्टा-सीधा घुमाया होगा जबकि ह्यूस्टन में मोदी ने पाकिस्तान के खिलाफ किसी आक्रमक शब्द का इस्तेमाल तो किया ही नहीं, घुमा-फिराकर उसका नाम लिये बिना उसकी कुछ आक्रमक प्रवृत्तियों का और उसकी मुश्किलों का जिक्र किया। जबकि खुद ट्रंप महाशय ने ‘इस्लामिक टेररिज्म’ शब्द का इस्तेमाल किया। याने तालियां बजवाने के खातिर ट्रंप कुछ भी बोल सकते हैं। ट्रंप के इस तेवर का साफ-साफ विरोध इमरान खान ने ‘कौंसिल आॅफ फारेन रिलेशंस’ (न्यूयार्क) के अपने भाषण में कर दिया। इमरान को ट्रंप का रवैया इतना अजीब लगा है कि उन्होंने यहां तक कह डाला कि (ट्रंप को क्या पता नहीं है कि) ‘इस्लाम सिर्फ एक प्रकार का है। वह नरम या गरम नहीं है।’ जब ट्रंप और इमरान संयुक्तराष्ट्र संघ भवन में पत्रकारों के साथ खड़े थे तो ट्रंप अपनी ही हांकते चले जा रहे थे। बेचारे इमरान खान चुपचाप खड़े रहे। ट्रंप ने कश्मीर के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा। जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि आतंकवाद के हिसाब से क्या पाकिस्तान सबसे खतरनाक देश नहीं है तो उन्होंने झट से ईरान का नाम ले दिया। वे भारत और पाकिस्तान दोनों को खुश करने में लगे हुए हैं। देखना यह है कि वे भारत-अमेरिका व्यापार के उलझे हुए सवालों पर क्या रवैया अपनाते हैं। ट्रंप अमेरिका को बार-बार दुनिया का सबसे बड़ा महाशक्ति राष्ट्र घोषित करते रहते हैं तो फिर क्या वजह है कि वह सारे दक्षिण एशिया को महासंघ के एक सूत्र में बांधने का व्रत क्यों नहीं लेते ? सिर्फ अमेरिका के संकीर्ण और क्षुद्र स्वार्थों को सिद्ध करने में ही वे लीन क्यों हैं ?

पूरे देश के लिये एक दर्जन सरकारी बैंक काफी हैं
अजित वर्मा
अभी हाल ही में 10 बैंकों का विलय करके चार बैंक बना दिये जाने के फैसले को लेकर बैंकिंग जगत में नयी हलचल मची है। वित्त सचिव राजीव कुमार ने कहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के 10 बैंकों का विलय कर चार बैंक बनाने से बैंकों के एकीकरण की प्रक्रिया लगभग पूरी हो गई है। आकांक्षी और नए भारत की जरूरतों को पूरा करने के लिए 12 सार्वजनिक बैंकों की संख्या बिल्कुल उचित है।
इस एकीकरण के पूरा होने के बाद देश में राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या घटकर 12 रह जाएगी। 2017 से यह 27 थी। वित्त सचिव दोहरा रहे हैं कि बैंकों की यह संख्या देश की जरूरत के हिसाब से पूरी तरह उचित है। सरकार ने 30 अगस्त को सार्वजनिक क्षेत्र के 10 बैंकों का एकीकरण कर चार बैंक बनाने की घोषणा की थी। सरकार के इस फैसले से 5,000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को पान में मदद मिलेगी। अगले चरण की वृद्धि को समर्थन के लिए देश को बड़े बैंक की जरूरत है। बैंकों के विलय की जो बड़ी घोषणा हुई है उससे इसमें मदद मिलेगी। अब हमारे पास छह विशाल आकार के बैंक होंगे। इन बैंकों का पूंजी आधार, आकार पैमाना और दक्षता उच्चस्तर की होगी।
वित्त सचिव कुमार ने बैंकिंग क्षेत्र के बहीखातों को साफ-सुथरा बनाने के अभियान की अगुआई की है। उनके कार्यकाल में कई चीजें पहली बार हुई हैं। बैंकिंग इतिहास में उनमें सबसे अधिक पूंजी डाली गई है। इसी तरह पहली बार बैंक ऑफ बड़ौदा की अगुआई में तीन बैंकों का विलय हुआ है। बैंकों की बहीखातों को साफ-सुथरा करने की प्रक्रिया के अब नतीजे सामने आने लगे हैं।
चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 18 में से 14 सार्वजनिक बैंकों ने लाभ दर्ज किया है। इससे पहले इसी साल विजया बैंक और देना बैंक का बैंक आफ बड़ौदा में विलय हुआ। इससे देश का दूसरा सबसे बड़ा सरकारी बैंक अस्तित्व में आया। अप्रैल 2017 में भारतीय स्टेट बैंक में पांच सहायक बैंकों – स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर,स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर और स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद व भारतीय महिला बैंक का विलय हुआ। यह तय हो गया है कि अब आगे बैंकों का विलय नहीं होगा और मौजूदा 12 सरकारी बैंक ही देश की संपूर्ण बैंकिंग व्यवस्था को सम्हालेंगे।

मोदी और ट्रंप बम-बम
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह अमेरिका-यात्रा उनकी पिछली सभी अमेरिका-यात्राओं से अधिक महत्वपूर्ण और एतिहासिक मानी जाएगी। इसलिए कि संयुक्तराष्ट्र संघ की महासभा के अधिवेशन में भाग लेने के लिए सौ-सवा-सौ राष्ट्राध्यक्ष हर साल न्यूयार्क पहुंचते हैं लेकिन उनमें से ज्यादातर अमेरिकी राष्ट्रपति से हाथ तक नहीं मिला पाते हैं जबकि मोदी इस यात्रा के दौरान उनसे कई बार बात करेंगे और मिलेंगे। ह्यूस्टन में प्रवासी भारतीयों की जो विशाल जन-सभा हुई है, वह एतिहासिक है, क्योंकि पहली बात तो यह कि अमेरिका का कोई भी नेता इतनी बड़ी सभा अपने दम पर नहीं कर सकता। दूसरी बात, यह कि यह शायद पहला मौका है, जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति किसी अन्य देश के प्रधानमंत्री के साथ इस तरह की जनसभा में साझेदारी कर रहा हो। तीसरी बात यह कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने भाषण में ‘इस्लामी आतंकवाद’ और सीमा-सुरक्षा के सवाल उठाकर सभा में उपस्थित 50-60 हजार लोगों का ही नहीं, भारत और दुनिया के करोड़ों टीवी दर्शकों का दिल जीत लिया। अमेरिका के जो प्रवासी भारतीय कट्टर डमोक्रेट हैं और ट्रंप की मजाक उड़ाते रहते हैं, वे भी मंत्र-मुग्ध थे। दोनों नेताओं के भाषण सुनकर ऐसा लगा कि वे अपनी-अपनी चुनावी-सभा में बोल रहे हैं। मोदी ने ट्रंप के दुबारा राष्ट्रपति बनने का भी समर्थन कर दिया। मोदी ने लगे हाथ समस्त गैर-हिंदीभाषियों को भी गदगद कर दिया। उन्होंने कई भारतीय भाषाओं में बोलकर बताया कि ‘भारत में सब कुशल-क्षेम है।’ वह है या नहीं है, यह अलग बात है लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हिंदीवाले बयान को लेकर गलतफहमी फैलानेवाले कई भारतीय नेताओं के गाल पर मोदी ने प्यारी-सी चपत भी लगा दी। पाकिस्तान का नाम लिये बिना मोदी और ट्रंप ने यह स्पष्ट कर दिया कि इमरान की इस अमेरिका-यात्रा का हश्र क्या होनेवाला है। क्या कोई पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इस तरह की संयुक्त जन-सभा अमेरिका में आयोजित करने की कल्पना कर सकता है ? हां, खबरें कहती हैं कि ह्यूस्टन की सभा के बाहर एक पाकिस्तानी मंत्री के सानिध्य में पाकिस्तान के कुछ प्रवासियों और सिखिस्तान समर्थकों ने नारेबाजी भी की लेकिन इस एतिहासिक जनसभा के अलावा मोदी ने वहां कश्मीरी पंडितों, सिखों और दाउदी बोहरा प्रतिनिधि मंडलों से भी भेंट की। इसके अलावा मोदी के ह्यूस्टन-प्रवास की एक महत्वपूर्ण घटना यह भी है कि भारत की गैस और तेल की आपूर्ति के लिए अमेरिका की 17 बड़ी कंपनियों के कर्णधारों से भी बात की। एक और भी काम हुआ है, जिससे हर भारतीय का सीना गर्व से फूल सकता है। भारतीय कंपनी पेट्रोनेट अब ह्यूस्टन में 2.5 बिलियन डालर का निवेश करेगी ताकि उसे अगले 40 साल तक 50 लाख मीट्रिक टन गैस हर साल अमेरिका से मिलती रहे।

बड़ी तेजी के साथ बढ़ रहा है राज्यों का राजकोषीय घाटा
सनत जैन
आर्थिक मंदी और केंद्र सरकार द्वारा बजट में टैक्स के रूप में उपकर लगाकर, जो वसूली की जा रही है। उससे राज्यों की स्थिति, दिनों दिन काफी खस्ता हालत होती जा रही है। केंद्र सरकार ने पिछले दो केंद्रीय बजट में पेट्रोल और डीजल में उपकर के रूप में उत्पाद शुल्क बढ़ाया है। उसका कोई भी लाभ राज्यों को नहीं मिल पा रहा है। उपकर के रूप में जो राशि सरकारी खजाने में आती है, वह पूरी की पूरी केंद्र सरकार के पास पहुंचती है।
42 फ़ीसदी का झुनझुना
केंद्र सरकार ने 14वें वित्त आयोग के फार्मूले के अनुसार राज्यों को केंद्र को मिलने वाली राशि का 42 फ़ीसदी हिस्सा राज्यों को देने का फार्मूला बनाया था। पिछले वर्षों के केंद्रीय बजट में केंद्रीय कर सीधे नहीं उपकर के रूप में वसूल करने का नया फार्मूला केंद्र सरकार ने निकाला है । पिछले 2 वर्षों में पेट्रोल और डीजल आयकर अथवा अन्य मामलों में उपकर के रूप में शुल्क बढ़ाया गया है। जिसका लाभ राज्यों को नहीं मिल पा रहा है। जिसके कारण राज्यों का आर्थिक संकट बढ़ रहा है।
नोटबंदी और आर्थिक मंदी के कारण जो संकट उत्पन्न हुआ है। उसमें जीएसटी से जो आए बढ़नी चाहिए थी वह राज्यों की नहीं बढ़ पा रही है। जिसके कारण कई राज्यों की स्थिति बहुत खराब हो गई है। हाल ही में केंद्र सरकार ने कारपोरेट कर में जो कमी की है। उसका नुकसान भी राज्यों को उठाना पड़ेगा है क्योंकि राज्यों की 42 फ़ीसदी हिस्सेदारी होने से उन्हें आर्थिक नुकसान होगा।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपयों का जो लाभांश प्राप्त हुआ है । इसका लाभ भी राज्यों को नहीं मिलना है। अतिरिक्त राजस्व के रूप में यह केंद्र सरकार के खजाने में ही जाएगा।
15वें वित्त आयोग के चेयरमैन एनके सिंह ने सभी राज्यों से वस्तु एवं सेवा कर जीएसटी के राजस्व को बढ़ाने का अनुरोध किया है। जबकि स्थिति ठीक इसके विपरीत है। आर्थिक मंदी के कारण जीएसटी की आय में कोई वृद्धि नहीं हो पा रही है। उल्टे कई राज्यों में पिछले वर्ष की तुलना में कम राजस्व इकट्ठा हुआ है। 2022 तक केंद्र सरकार को जीएसटी में होने वाले नुकसान की भरपाई राज्यों को करनी है। केंद्र सरकार को वर्ष 2022 तक जीएसटी में यदि कोई कमी होती है, तो 14 फ़ीसदी प्रतिवर्ष की वृद्धि के साथ राज्यों को भरपाई करनी है। केंद्र एवं राज्य सरकारें लगातार प्रयास कर रहे हैं कि जीएसटी से प्राप्त होने वाला राजस्व बढ़े, किंतु आर्थिक मंदी के कारण कर राजस्व बढ़ने की स्थान पर और कम हो रहा है, जिससे राज्यों की आर्थिक स्थिति बड़ी तेजी के साथ खराब हो रही है।
अप्रैल से जुलाई माह के पहले 4 माह में जिन राज्यों का राजस्व घाटा बढ़ा है। उनमें आंध्र प्रदेश 59.3 राजस्थान 35.5, पंजाब 12.5 कर्नाटक 12.3 गुजरात 8, केरल 7.6 तथा हरियाणा को 6.1 का नुकसान उठाना पड़ा है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी कर राजस्व में कमी आई है। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ उड़ीसा तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश तेलंगाना, उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल भी कर राजस्व की कमी से जूझ रहे हैं।
आर्थिक मंदी को देखते हुए औद्योगिक एवं व्यापारिक जगत के लोग केंद्र एवं राज्य सरकारों से राहत की मांग कर रहे हैं। किंतु केंद्र एवं राज्य सरकार की ऐसी स्थिति नहीं है, कि वह राहत प्रदान कर सकें। जीएसटी के राजस्व में वृद्धि नहीं होने के कारण केंद्र एवं राज्य सरकारों के समक्ष गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। राजकोषीय घाटे से निपटने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों को जहां अपनी आय बढ़ानी होगी वही अपने खर्चों को संतुलित कर बजट घाटे को नियंत्रित करना पड़ेगा।
केंद्र एवं राज्यों के संबंध में तल्खी
केंद्र सरकार ने पिछले दो बजटों में पीछे के रास्ते (सेस- उपकर के माध्यम ) से टैक्स बढ़ाने का काम किया है जिसके कारण राज्यों को दोहरा नुकसान हो रहा है. केंद्र सरकार ने पेट्रोल डीजल और अन्य चीजों पर उपकर बढ़ाकर, केंद्र के खजाने को भरने का काम किया है। उपकर से एकत्रित की गई राशि पर राज्यों का कोई अधिकार नहीं होने से, राज्यों को आर्थिक दृष्टि से नुकसान उठाना पड़ रहा है। राज्यों का केंद्र पर दबाव पड़ना शुरू हो गया है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कैसे निपटती हैं। यह देखना होगा। जिस तरह की आर्थिक ती स्थिति पिछले 4 महीनों में सामने आई है। उससे गैर भाजपा शासित प्रदेशों के साथ-साथ भाजपा शासित राज्य भी आर्थिक संकट का शिकार हो रहे हैं। कर्नाटक और गुजरात राज्य भी उसमें शामिल हैं। केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को दी जाने वाली 42 फ़ीसदी हिस्सेदारी की भरपाई करने की के लिए उपकार के रूप में जो राजस्व केंद्र सरकार द्वारा वसूला जा रहा है। उसमें राज्यों को हिस्सा नहीं मिलने से अब राज्यों की आर्थिक स्थिति खस्ता हाल में पहुंच गई हैं। केंद्र सरकार द्वारा पिछले वर्षों में केद्रीय योजनाएं कम करने तथा केंद्रीय योजना की राशि में कटौती करने से भाजपा शासित राज्य भी त्राहिमान त्राहिमान कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के भय से वह मौन अवश्य हैं। इससे राज्यों में भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ गिरने लगा है। विरोध बढ़ने लगा है। यह चिंता का विषय है।

गरीबों के लिए सार्वजनिक सेवाओं में बदलाव
नरेन्द्र सिंह तोमर
सार्वजनिक सेवाओं की सुविधाजनक, आसान और विश्वसनीय प्रणाली तैयार करने का कार्य अक्सर इस आधार पर छोड़ दिया जाता है कि यह सब निजी क्षेत्र कर लेगा क्योंकि सार्वजनिक व्यवस्थाओं से गुणवत्तापूर्ण सेवाओं की प्रदायगी कराना कठिन ही नहीं, लगभग असंभव है। भारत जैसे विशाल देश में सर्वाधिक वंचित परिवारों तक जरूरी सेवाओं की समता और न्याय आधारित प्रदायगी अनिवार्य रूप से लाभार्थियों के साक्ष्य-आधारित चयन, भलीभांति किए गए अनुसंधान के आधार पर नीतिगत उपायों, (जिनमें समय पर सुधारात्मक कार्यों का प्रावधान हो), सूचना – प्रौद्योगिकी से जुडे संसाधनों की उपलब्धता और उनके पूर्ण उपयोग के जरिए मानवीय हस्तक्षेप को कम से कम करने, और अन्य के साथ-साथ संघीय संरचना में काम करने वाली विभिन्न एजेंसियों के साथ ठोस तालमेल पर निर्भर करती है। बुनियादी ढांचागत कमियों, विस्तृत भौगोलिक क्षेत्रों और देश के कई दुर्गम भूभागों में दूर-दूर बसी विरल आबादी को ध्यान में रखते हुए यह कार्य और भी जरूरी हो जाता है। वास्तव में इतने बड़े पैमाने पर अपेक्षित सेवाओं की संकल्पना, योजना तैयार करना और सेवाएं प्रदान करना गैर-सरकारी एजेंसियों के लिए असंभव है। हालाँकि निजी क्षेत्र और स्थानीय/राज्य स्तरों पर कुछ उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त हुई हैं। तथापि, “सबका साथ सबका विकास” के व्यापक फ्रेमवर्क में “सभी के लिए आवास”, “सभी के लिए स्वास्थ्य”, “सभी के लिए शिक्षा”, “सभी के लिए रोजगार” जैसे महत्त्वाकांक्षी राष्ट्रीय लक्ष्यों की पूर्ति और “नए भारत” का स्वप्न साकार करने के लिए सार्वजनिक सेवाओं की पर्याप्त व्यवस्था बहुत जरूरी है, ताकि अखिल भारतीय आधार पर कार्यक्रमों की आयोजना, वित्तपोषण, कार्यान्वयन और निगरानी के साथ उनमें समय-समय पर अपेक्षित बदलाव किए जा सकें। इस संबंध में निम्नलिखित गतिविधियां आवश्यक और महत्वपूर्ण हैं:-
– परिवारों में अभाव की स्थिति के निर्धारण के लिए अखिल भारतीय स्तर पर अचूक सर्वेक्षण की आयोजना और संचालन तथा स्थानीय सरकारों से उस सर्वेक्षण की पुनरीक्षा कराना;
– पिछले अनुभवों और सर्वोत्तम राष्ट्रीय एवं वैश्विक पद्धतियों से सीख लेते हुए कार्यक्रमों की रूप रेखा तैयार करना, ताकि आवश्यकतानुसार कार्यक्रम सुनिश्चित किए जा सकें;
– भली-भांति तैयार किए गए कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त वित्त-पोषण की व्यवस्था करना;
– अनुभवों से सीख लेते हुए प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर तालमेल बनाना तथा कार्यान्वयन के दौरान तत्काल सुधारात्मक उपाय करना।
गरीबी उन्मूलन का अंतिम लक्ष्य हासिल करने के वास्ते भारत के एक बड़े अभावग्रस्त जनसमुदाय के लिए सेवाएं सुनिश्चित करने हेतु उपर्युक्त व्यवस्थाएं अपरिहार्य हैं। हाल ही के सफल अनुभव से साबित होता है कि हम इन्हें किसी भी कीमत पर नजर अंदाज नहीं कर सकते।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान ग्रामीण विकास के क्षेत्र में चलाए गए ग्राम स्वराज अभियान जैसे कार्यक्रम पूरी तरह पारदर्शी रहे हैं। वास्तव में ये कार्यक्रम समुदाय के प्रति पूरी जवाबदेही के साथ अपेक्षित परिणाम हासिल करने के लिए भरोसेमंद सार्वजनिक सेवा प्रणाली तैयार करने के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
गौरतलब है कि हमारी यह यात्रा जुलाई, 2015 में सामाजिक – आर्थिक और जाति आधारित जनगणना (एसईसीसी) 2011 के आंकड़ों को अंतिम रूप दिए जाने के साथ शुरू हुई। गरीबों के लिए चलाए जाने वाले लोक कल्याण कार्यक्रमों में अभावग्रस्त परिवारों का सटीक और उद्देश्य-परक निर्धारण किया जाना आवश्यक था। गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वालों की वर्ष 2002 में तैयार की गई बी.पी.एल. सूची ग्राम प्रधान का विशेषाधिकार बन चुकी थी और इससे गरीब अक्सर छूट जाते थे। एसईसीसी के तहत अभाव के पैरामीटरों की पहचान करना आसान है। आंकड़े एकत्रित किए जाने के समय लोगों को यह जानकारी नहीं थी कि एसईसीसी का इस्तेमाल क्या और किस तरह होगा। इसके आधार पर तैयार की गई रिपोर्टें वास्तविकता के बहुत नजदीक हैं।
परिवारों की गरीबी के पैरामीटरों को तैयार किए जाने के बाद ग्राम सभा के माध्यम से पुष्टि की प्रक्रिया ने इस डाटाबेस में समुदाय आधारित सुधार का अवसर दिया । एलपीजी कनेक्शन के लिए उज्ज्वला, बिजली के नि:शुल्क कनेक्शन के लिए सौभाग्य, मकान की व्यवस्था के लिए प्रधान मंत्री आवास योजना-ग्रामीण (पीएमएवाई-जी), अस्पताल में चिकित्सीय सहायता के लिए आयुष्मान भारत जैसे कार्यक्रमों के अंतर्गत लाभार्थियों का चयन एसईसीसी के अभाव संबंधी मानदंडों के आधार पर किया गया। यह डाटाबेस धर्म, जाति और वर्ग निरपेक्ष है। यह गरीबी के विभिन्न आयामों को दर्शाने वाले अभाव संबंधी पैरामीटरों पर आधारित है जिनका सत्यापन आसानी से किया जा सकता है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत राज्यों के श्रम बजटों के निर्धारण तथा दीन दयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) के अंतर्गत महिला स्व-सहायता समूहों (एसएचजी) के गठन में सभी अभावग्रस्त परिवारों के समावेशन के लिए एसईसीसी के आंकड़ों का उपयोग किया गया।
गरीबी के सटीक निर्धारण, आँकड़ों में सुधार और उन्हें अद्यतन बनाने में ग्राम सभाओं की भागीदारी से आधार, आईटी/डीबीटी, परिसंपत्तियों की जियो-टैगिंग, कार्यक्रमों के लिए राज्यों में एक नोडल खाते, पंचायतों को धनराशि खर्च करने का अधिकार दिए जाने किंतु नकद राशि न देने, सार्वजनिक वित्त प्रबंधन प्रणाली (पीएफएमएस) जैसे प्रशासनिक और वित्तीय प्रबंधन सुधारों को अपनाया जा सका। इसके परिणामस्वरूप लीकेज की स्थिति में बड़ा बदलाव आया। गरीबों के जन-धन खाते और अन्य खाते भी बिना बिचौलियों के प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के माध्यम बन गए। इससे व्यवस्था में काफी सुधार हुआ। पंचायत के खाते में नकद राशि अंतरण किए जाने की बजाय केवल पंचायत के निर्वाचित नेता के प्राधिकार से मजदूरी और सामग्री के लिए भुगतान इस प्रणाली के माध्यम से किए जा सकते हैं।
मनरेगा जैसे कार्यक्रमों से गरीबों के खातों में धनराशि के अंतरण, टिकाऊ परिसंपत्तियों के सृजन और आजीविका सुरक्षा सहित प्रमुख सुधारों को बढ़ावा मिला। मांग के अनुसार दिहाड़ी मजदूरी के लिए रोजगार उपलब्ध कराना जरूरी है, साथ ही यह भी आवश्यक है कि मजदूरी आधारित इस रोजगार के परिणामस्वरूप गरीबों की आय और दशा में सुधार लाने वाली टिकाऊ परिसंपत्तियों का सृजन भी हो। ग्राम पंचायत स्तर पर मजदूरी और सामग्री के 60:40 के अनुपात जैसे नियमों में बदलाव कर इसे जिला स्तर पर भी लागू किया गया। गरीबों के लिए स्वयं अपने मकान के निर्माण कार्य में 90/95 दिन के कार्य के लिए सहायता के रूप में व्यक्तिगत लाभार्थी योजनाएं शुरू की गईं। इन योजनाओं में गरीबों के साथ सीमांत एवं छोटे किसानों को भी शामिल कर, मनरेगा के अंतर्गत पशुओं के बाड़े बनाए गए, कुएं और खेत तालाब खोदे गए और पौधरोपण कार्य किए गए। प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (एनआरएम) तथा कृषि और इससे जुड़े कार्यकलापों पर अधिक जोर देते हुए सामुदायिक परिसंपत्तियों का निर्माण भी जारी रखा गया। हमने मनरेगा के अंतर्गत लीकेज पर पूरी तरह अंकुश लगाने और गुणवत्तापूर्ण परिसंपत्तियों के सृजन के लिए साक्ष्यों का सहारा लिया। वर्ष 2018 में आर्थिक विकास संस्थान के अध्ययन में पाया गया कि बनाई गई 76 प्रतिशत परिसंपत्तियां अच्छी या बहुत अच्छी थीं । केवल 0.5% परिसंपत्तियां असंतोषजनक पाई गईं। मनरेगा और इसके सुचारू कार्यान्वयन के लिए विश्वसनीय सार्वजनिक व्यवस्था तैयार करना एक महत्वपूर्ण कदम है। यह वही कार्यक्रम है जिसमें संदीप सुखतांकर, क्लीमेंट इम्बर्ट इत्यादि द्वारा वर्ष 2007 से 2013 के दौरान कराए गए अध्ययनों में बड़े पैमाने पर लीकेज का पता चला था। निधियों को उचित और पारदर्शी तरीके तथा सही तकनीकी सहायता के साथ खर्च करने की योग्यता से पहले ही मनरेगा को निधियां मिल चुकी थीं। हमने प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के लिए एक तकनीकी दल गठित कर साक्ष्य आधारित कार्यक्रम लागू करने के लिए इस प्रौद्योगिकी का उपयोग किया। अब इसके परिणाम दिखाई दे रहे हैं। 15 दिनों के भीतर ही भुगतान आदेशों की संख्या 2013-14 के मात्र 26 प्रतिशत से बढ़ कर 2018-19 में 90 प्रतिशत से अधिक हो गई। इस वर्ष हम यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि भुगतान आदेश न केवल समय पर जारी हों, बल्कि धनराशि पंद्रह दिन के भीतर ही खाते में जमा हो जाए।
ग्रामीण आवास कार्यक्रम में पिछले 5 वर्षों के दौरान 15 मिलियन से अधिक मकान बनाए गए हैं और चरण-वार जियो-टैग किए गए चित्र भी pmayg.nic.in वेबसाइट पर पब्लिक डोमेन में डाल दिये गये हैं । सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञों ने देश भर में विविधता को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में पारंपरिक मकान के डिजाइनों का अध्ययन किया। स्थानीय सामग्री के उपयोग को बढ़ावा देने के साथ राजमिस्त्रियों को कारगर तरीके से प्रशिक्षित किया गया। मौजूदा समय में सभी प्रकार की राशि इलेक्ट्रॉनिक तरीके से सत्यापित बैंक खातों में अंतरित की जाती है। सम्पूर्ण प्रक्रिया की निगरानी उचित समय पर वेबसाइट पर उपलब्ध डैशबोर्ड के जरिए की जाती है। प्रौद्योगिकी के प्रभावी उपयोग से मकानों का निर्माण कार्य पूरा होने की वार्षिक दर में 5 गुना वृद्धि हुई है। इससे हमारा यह विश्वास मजबूत हुआ है कि सभी के लिए 2022 तक मकान का लक्ष्य प्राप्त करना पूरी तरह संभव है। इन मकानों को तालमेल के जरिये स्वच्छ भारत शौचालय, सौभाग्य बिजली कनेक्शन, उज्ज्वला एलपीजी कनेक्शन और मनरेगा योजना के अंतर्गत 90 दिन का काम भी मिला है। कई व्यक्ति आयुष्मान भारत के भी लाभार्थी हैं और महिलाएं डीएवाई-एनआरएलएम के अंतर्गत बैंक लिंकेज वाले स्व-सहायता समूह की सदस्य हैं। बहुआयामी प्रयासों के जरिए गरीबों की जीवन दशा निश्चित रूप से बदली है। बीमारू कहे जाने वाले राज्यों में ज्यादातर लोग जर्जर कच्ची झोपडि़यों में रहते हैं। ऐसे राज्यों ने प्रधानमंत्री आवास योजना – ग्रामीण के अंतर्गत उत्कृष्ट काम कर अन्य राज्यों के लिए मिसाल पेश की है। यह भारत का एकमात्र ऐसा कार्यक्रम है, जहां बीमारू राज्यों ने आगे कदम बढ़ाकर परिवर्तन की अगुवाई की है।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत एसएचजी के माध्यम से महिलाओं की सामुदायिक एकजुटता उल्लेखनीय रहने के बावजूद आजीविका में विविधता लाने और बैंक लिंकेज प्रदान करने के लिए अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। बैंक लिंकेज पर जोर दिए जाने से पिछले 5 वर्षों में एनआरएलएम के अंतर्गत लगभग तीन करोड़ महिलाओं के लिए दो लाख करोड़ रू. से अधिक के ऋण की मंजूरी मिल चुकी है। इससे आजीविका में बड़े पैमाने पर विविधता आई है। महिलाओं को सार्वजनिक परिवहन, बैंकिंग करेस्पॉन्डेंट और कस्टम सेंटर के स्वामित्व जैसे विभिन्न नए कार्यकलाप शुरू करने के अवसर मिले हैं। आजीविका मिशन से जुड़ी 6 करोड़ से अधिक महिलाएं बगैर किसी पूंजीगत सब्सिडी के, गरीबों का भाग्य बदल रही हैं। उनकी नॉन-परफॉर्मिंग परिसंपत्तियां (एनपीए) वर्ष 2013 की 7 प्रतिशत से घटकर आज 2 प्रतिशत से कुछ ही ज्यादा रह गई हैं। नि:संदेह ये महिलाएं हमारी सर्वश्रेष्ठ कर्जदार हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में रचनात्मक बदलाव के लिए इस बात की जरूरत है कि उनके नैनो उद्यमों को मदद दी जाए ताकि वे आने वाले वर्षों में सूक्ष्म और लघु उद्यम का रूप ले सकें। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने उद्यमों के विकास के लिए डीडीयू-जीकेवाई के अंतर्गत 67 प्रतिशत से अधिक रोजगार और आरएसईटीआई कार्यक्रम के अंतर्गत दो तिहाई से अधिक नियोजन सुनिश्चित किया है। इस योजना में नियोजन आधारित रोजगार और ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थानों (आरएसईटीआई) के तहत स्वरोजगार पर जोर देने के लिए कौशल विकास कार्यक्रमों में सुधार किए गए है।
14वें वित्त आयोग के अंतर्गत बड़ी धनराशि का अंतरण किए जाने से ग्राम पंचायतें अब ग्रामीण सड़कों और नालियों के साथ जरूरत के मुताबिक अन्य ढांचागत सुधार कर सकती हैं। पिछले एक वर्ष से मनरेगा और पीएमएवाई-जी के अंतर्गत जियो-टैगिंग, आईटी/डीबीटी अंतरण और पीएफएमएस के जरिये पूरी प्रणाली को जवाबदेह एवं पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई है। हमें पूरा विश्वास है कि पीआरआईएसॉफ्ट के अंतर्गत खातों की इलेक्ट्रॉनिक निगरानी, परिसंपत्तियों की जियो-टैगिंग, लेन-देन आधारित एमआईएस के जरिए निधियों के अंतरण और एकल नोडल खाते के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ेगी। स्थानीय खातों में निधियों के नकद अंतरण से भ्रष्टाचार की गुंजाइश बढ़ती है। अगर प्राधिकरण ग्राम पंचायत में निधियां खर्च करें, लेकिन भुगतान इलेक्ट्रॉनिक तरीके से मजदूरों और विक्रेताओं के खाते में किया जाए, तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। वृद्धों, विधवाओं और दिव्यांगों को पेंशन देने के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम – एनएसएपी के अंतर्गत इसी प्रकार के प्रयास किए गए थे। उनके अभिलेखों को डिजिटल बनाया गया । आज अधिकांश राज्यों में प्रौद्योगिकी की मदद से गरीबों को उनके बैंक खातों और आईटी/डीबीटी प्लेटफॉर्म के जरिए प्रति माह पेंशन राशि अंतरित करने में मदद मिली है। नि:संदेह, महिला स्व-सहायता समूहों की मदद से दूरदराज के क्षेत्रों में बैंकिंग करेस्पॉन्डेंटों का विस्तार करने से वृद्ध और बीमार विधवाओं को उनके घर पर ही पेंशन उपलब्ध कराने का रास्ता खुलेगा। प्रौद्योगिकी, प्रभावी विश्वसनीय सार्वजनिक व्यवस्था तैयार करने में बहुत सहायक है। पिछले 4 वर्षों का अनुभव हमें विश्वास दिलाता है कि ऐसा कर पाना संभव है ।
ग्राम स्वराज अभियान सरकार के 7 प्रमुख जनकल्याण कार्यक्रमों के अंतर्गत देश के 63974 गांवों में सभी पात्र व्यक्तियों के सर्वव्यापी कवरेज का एक अनोखा प्रयास था। इस कार्यक्रम के तहत एलपीजी कनेक्शन के लिए उज्ज्वला, मुफ्त बिजली कनेक्शन के लिए सौभाग्य, मुफ्त एलईडी बल्ब के लिए उजाला, टीकाकरण के लिए मिशन इंद्रधनुष, बैंक खातों के लिए जन-धन तथा दुर्घटना बीमा एवं जीवन बीमा कार्यक्रमों को एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर प्रभावी निगरानी प्रणाली के जरिये गरीबों के घर-घर पहुंचाया गया । इस काम में बड़ी संख्या में केंद्रीय कर्मचारियों की भी मदद ली गई। यह छह करोड़ महिला स्व-सहायता समूहों और पंचायती राज संस्थाओं के 31 लाख निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के मिलकर काम करने का अनूठा सहयोगात्मक संघीय प्रयास था। इससे साबित हो गया कि अगर इच्छा-शक्ति हो, तो बड़े से बड़े लक्ष्य को भी प्राप्त कर पाना कठिन नहीं है ।
प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के अंतर्गत ग्रामीण सड़कों के लिए भी इसी प्रकार के प्रयास किए गए। इससे पिछले 1000 दिनों में प्रतिदिन 130-135 किमी. लंबाई की सड़कों का निर्माण हुआ जो प्रभावी निगरानी और राज्यों के साथ लगातार बातचीत के जरिए संभव हो पाया । बीमारू राज्यों के मैदानी क्षेत्रों में 500 से अधिक और पर्वतीय क्षेत्रों में 250 से अधिक आबादी वाली पात्र बसावटों को सड़कों से जोड़ने की एक बड़ी चुनौती सामने थी। उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया गया कि लगभग 97 प्रतिशत पात्र और व्यवहार्य बसावटों को मार्च, 2019 तक सड़कों से जोड़ दिया जाए। हालांकि मूल लक्ष्य मार्च, 2022 तक का था। ग्रामीण सड़क कार्यक्रम से इस बात की भी पुष्टि हुई है कि पीएमजीएसवाई जैसा लोक कार्यक्रम किस प्रकार निर्धारित समयसीमा के भीतर और उचित लागत पर सार्वजनिक सेवाएं प्रदान कर सकता है। इसमें कार्बन फुटप्रिंट कम करने और विकास को स्थायी आधार देने के लिए रद्दी प्लास्टिक जैसी हरित प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए 30,000 किमी. से अधिक सड़क मार्गों का निर्माण किया गया।
ग्रामीण कृषि बाजार (ग्राम), उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों, अस्पतालों को बस्तियों से जोड़ते हुए 1,25,000 किलीमीटर थ्रु और प्रमुख ग्रामीण सड़कों का 80,250 करोड़ रुपये की लागत से समेकन कार्य की मंजूरी सरकार ने दे दी है । सभी राज्यों को दिशानिर्देश भेज दिए गए हैं और परियोजनाओं की मंजूरी के लिए प्रारम्भिक कार्य भी शुरू हो चुके हैं ।
यह सच है कि हम सार्वजनिक सेवा प्रणलियों की सफलता का जिक्र करने में भी कोई रूचि नहीं लेते क्योंकि हम में से ज्यादातर लोगों की धारणा सरकारों को निष्क्रिय तथा निजी क्षेत्र को कारगर स्वरूप में देखने की बन चुकी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि निजी क्षेत्र ने कई शानदार उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन हमें इसके साथ-साथ इसे भी समझना जरूरी है कि सामाजिक क्षेत्र में गरीबों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रम जैसी अनेक सार्वजनिक सेवाओं में अब भी समुदाय के नेतृत्व और स्वामित्व वाली एक ऐसी सार्वजनिक सेवा प्रदायगी व्यवस्था की जरूरत है जो परिणामों पर केंद्रित हो और गरीबों की जीवन दशा में सुधार तथा कल्याण ही उसका अंतिम लक्ष्य हो। विश्वसनीय सार्वजनिक सेवा प्रणाली तैयार करने से अब पीछे नहीं हटा जा सकता, क्योंकि यह गरीबों की जीवन दशा में परिवर्तन और सुधार लाने के लिए अत्यंत आवश्यक है । प्रसन्नता की बात यह है कि केन्द्र में लोकप्रिय और यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में वर्तमान राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार शुरू से ही इसके लिए प्रयत्नशील रही है । इसके अनेक सुखद परिणाम सामने आए हैं और यह सिलसिला रूकने वाला नहीं है।

लाईफ जैकेट’ विहीन सोनिया; डूबती काँग्रेस…..?
ओमप्रकाश मेहता
आज भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चिंता प्रतिपक्ष विहीन राजनीति है, इतिहास गवाह है कि मजबूत प्रतिपक्ष के अभाव की स्थिति में ही तानाशाही का जन्म होता है और अब भारतीय लोकतंत्र को यही एक डर सता रहा है, वह इसलिए क्योंकि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के सामने किसी भी प्रतिपक्षी राष्ट्रीय दल की अहमियत शेष नहीं रही देश का सबसे पुराना राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस धीरे-धीरे अपनी अहमियत और महत्व खोता जा रहा है तथा एक सौ तीस साल की उम्र का यह अतिबुजुर्ग दल कई तरह की व्याधियों से पीड़ित हो राजनीति के महासागर में डूब जाने की स्थिति में है, यद्यपि इसे अच्छे दिन दिखाने वाले परिवार की बहू सोनिया गांधी इसे बचाने के लिए तूफानी समंदर में कूद तो पड़ी है, पर चूंकि उन्होंने किसी तरह की कोई भी ‘लाईफ जैकेट’ नहीं पहन रखी है, इसलिए स्वयं डूबने वाले ही अपने जीवन के प्रति निराश दिखाई दे रहे हैं।
मौजूदा भारतीय लोकतंत्र में कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी राजनीतिक संगठन है, जिसने न सिर्फ 130 साल में भारत को हर स्थिति में करीबब से देखा है, बल्कि उसे निखारने और इसे महिमामंडित करने में सक्रिय भूमिका भी निभाई है। इसलिए यही एकमात्र ऐसा दल है जो भारत को हर तरीके से अच्छे से सोचता-समझता है और आज समय के थपैड़ों ने इस दल का मरणासन्न स्थिति में पहुंचा दिया है और इस स्थिति का फायदा सत्तारूढ़ दल उठाकर उसकी सरकार तानाशाही की राह न पकड़ ले यह आशंका मजबूत होती जा रही है।
वैसे यदि कांग्रेस की मौजूदा स्थिति के कारणों का ईमानदारी से विश्लेषण किया जाए तो कांग्रेस की इस दुरावस्था के लिए स्वयं कांग्रेस व उसके ‘‘बिगड़े सपूतों’’ के अलावा कोई दोषी नही हैं। राजनीति का यह तो एक कटू सत्य है कि जब किसी एक दल को सत्ता की लम्बी पारी मिल जाती है तो वह निरंकुश हो बिना अपना भविष्य सोचे कुछ ऐसे फैसले ले लेता है, जो स्वयं उसी के लिए आत्मघाती सिद्ध होते है, आजादी के बाद से यही कांग्रेस के साथ हुआ, आजादी के बाद के अब तक के बहत्तर सालों में से पैसठ से अधिक सालों तक कांग्रेस सत्ता में रही आजादी के बाद सत्रह साल पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनके बाद लगभग सत्रह साल ही इंदिरा जी प्रधानमंत्री रही, बीच में कुछ महीनों (ढाई साल) के लिए जनता पार्टी सत्ता में रही, और इन चैतीस सालों में भारत के विभाजन से लेकर आपातकाल जैसे फैसले भी लिए गए, इनके बाद देश की कमान राजीव गांधी तथा नरसिंहराव के हाथों में रही, इनके बाद डाॅ. मनमोहन सिंह एक दशक तक प्रधानमंत्री रहें। इसलिए इतनी लम्बी अवधि में जरूरी नहीं कि सत्तारूढ़ कांग्रेस ने ‘जन हिताय’ फैसले ही लिये हो, और इसीलिए मनमोहन सिंह के पहले अटल जी और मनमोहन सिंह के बाद नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने। चूंकि आजादी के बाद कई सालों तक राष्ट्रीय दल के रूप में कांग्रेस ही थी, इसलिए देश के आम मतदाता के सामने कांग्रेस को चुनने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, इसलिए नेहरू-इंदिरा इतनी लम्बी अवधि तक सत्ता में रहें, इंदिरा के आपातकाल के दौरान चूंकि प्रमुख प्रतिपक्षी दलों ने एकजूट होकर जनता पार्टी नामक संगठन बना लिया था, तो आपातकाल पीड़ित देश की जनता ने उसे चुन लिया, किंतु ये सभी अनुभवहीन थे, इसलिए ढाई साल से ज्यादा नहीं टिक पाए और 1980 में फिर इंदिरा जी को विकल्प के रूप में देश ने सत्ता सौंप दी। किंतु इंदिरा जी की हत्या के बाद कांग्रेस परिवारवाद से बाहर नहीं आ पाई, जिसकी परिणति यह हुई की राजीव की हत्या के बाद नरसिंहराव के कार्यकाल में बाबरी मस्जिद काण्ड हुआ और उसी के साथ कांग्रेस के विकल्प के रूप में भारतीय जनता पार्टी मैदान में आई और अटल जी प्रधानमंत्री बन गए, उसके बाद 2004 में एक बार फिर कांग्रेस को देश की बागडोर सोनिया पर विश्वास कर सौंपी गई और सोनिया ने डाॅ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनवा दिया, डाॅ. मनमोहन सिंह चूंकि राजनीति के ‘घिसे-पिटे’ मोहरे थे, इसलिए उन्होंने एक दशक तक सरकार चलाई, किंतु 2014 में भाजपा ने मोदी नाम के ‘धूमकेतू’ को राजनीति के आकाश में उतार दिया, जिसकी चमक से आज तक जनता ‘चमत्कृत’ है।
…..और इसी ‘धूमकेतु’ की चमक ने कांग्रेस को इस दुरावस्था में ढकेल दिया है, अब कांग्रेस के पास लागू करने को कोई प्रयोग भी शेष नहीं बचे है, बेटा पार्टी को सम्हाल नहीं पाया, इसलिए मजबूर होकर नेहरू खानदान की इस बहू को ही इसे जीवनदान देने को मजबूर होना पड़ा, अब वे अपने प्रयासों में कहां तक सफल हो पाती है, यह तो भविष्य के गर्भ में है, किंतु कांग्रेस के पास इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं था, इसलिए सोनिया जी के सामने कांग्रेस को नया जीवनदान देने की सबसे बड़ी चुनौती है, अब उनके अपने ही पार्टीजन उन्हें इस पुनीत कार्य में कितना योगदान करते है या पार्टी को धक्का देते है यह सब देखने वाली बात होगी।

खुशहाल मध्यप्रदेश की ओर बढ़ते कदम
पी-सी-शर्मा
यह खुशहाल और हरा-भरा नया मध्य प्रदेश है,जो लोक-कल्याण का संकल्प लिए नई ऊँचाइयाँ छू रहा है। यहाँ किसान खुशहाल होकर आगे बढ़ रहे है। ग्रामीण इलाकों का सर्वांगीण विकास हो रहा है। बहनें और बेटियाँ सुरक्षित होकर उन्नति के नए आयाम स्थापित कर रही है। नौनिहालों की आँखों में स्वर्णिम सपने हैं। समाज में सुख-शांति और सद्भावना है। युवाओं के लिए रोजगार की असंख्य संभावनाएँ जगी हैं। कौशल विकास के पुख्ता और सहज इंतजाम होने से समाज का हर तबका लाभान्वित हो रहा है। जल, जंगल और जमीन के असल रक्षक आदिवासी समाज में प्रसन्नता और विश्वास बढ़ा है और उनकी उम्मीदें आसमान पर है। दलित और वंचित वर्ग आत्म-विश्वास से भरा हुआ है। पिछड़ा वर्ग का आरक्षण बढ़कर 27 प्रतिशत होने से समाज के एक बड़े तबके में विकास के साथ कदम-ताल का विश्वास बढ़ा है। अल्पसंख्यक समुदाय भयमुक्त होकर विकास का हमराह बना हुआ है।
पिछले 15 सालों के कुशासन ने युवाओं को हतोत्साहित किया था लेकिन कमलनाथ सरकार ने युवाओं के कल्याण की बेहतरीन परिकल्पना से नई संभावनाएँ जगाई हैं। युवाओं के लिए रोजगार के नए और बेहतर अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने उद्योग नीति मेँ संशोधन कर राज्य मेँ लगने वाले उद्योगों मेँ स्थानीय युवाओं को 70 प्रतिशत रोजगार देना अनिवार्य कर दिया है। खिलाड़ियों को उच्च स्तर की सुविधाएँ देने को सरकार प्रतिबद्ध है। राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता मेँ भाग लेने वाले और जीतने वाले खिलाड़ियों के लिए पुरस्कार राशि कई गुना बढ़ा दी गई है। शिक्षा संस्थानों का कायाकल्प करके आधुनिक संसाधन बढ़ाएँ जा रहे हैं जिससे हमारे नौनिहाल बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अर्जित कर सके।
स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त किया गया है। ग्रामीण इलाकों तक आसानी से बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ जन-मानस को मिल सके, इसके लिए लोक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के क्षेत्र मेँ तत्परता से कार्य किए जा रहे हैं। पंचायतों को मजबूत किया गया है और शासन की योजनाओं का लाभ गाँव-गाँव तक पहुँचे यह सुनिश्चित किया गया है। वहीं नगरीय विकास को बेहतर और नियोजित स्वरूप दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री शहरी अधोसंरचना योजना से नगरीय विकास को गति मिली है। बिजली की दरों को सस्ता करने से आम आदमी को बहुत राहत मिली है। पर्यटन की दृष्टि से देश-विदेश मेँ राज्य की नई पहचान बनी है। परिवहन की व्यवस्थाएँ बेहतर हुई हैं। कर्मचारी कल्याण हो या सामाजिक न्याय, लोगों का विश्वास बढ़ा है।
हमारी आस्था, धर्म, जन-जागरण और प्रेरणा के प्रतीक साधु-संतों की भी इस प्रदेश में वैसी ही चिंता की जा रही है, जैसी अन्य जन-समुदाय की। आध्यात्म विभाग ने संत समागम के माध्यम से साधु-संतों का सम्मान करके और उनकी समस्याओं पर व्यापक विमर्श कर यह साफ संदेश दिया गया है कि प्रदेश की कमलनाथ सरकार की लोक कल्याणकारी नीति से कोई भी वर्ग अछूता नहीं रहे। राज्य में धर्मस्व, धार्मिक न्यास और आनंद विभाग को मिलाकर अध्यात्म विभाग का गठन इसीलिए किया गया जिससे आस्था और विश्वास के साथ हमारा धर्म निरपेक्ष ढाँचा और मजबूत बने। धार्मिक स्थानों का समुचित और चहुँमुखी विकास कर धर्मावलम्बियों को सुलभ और बेहतर सुविधाएँ मिल सके, इस दिशा मेँ तेजी से कार्य किए जा रहे हैं। प्रदेश में शासन संधारित मंदिरों के पुजारियों के मानदेय में तीन गुना वृद्धि की गई है। इसके साथ ही कई धार्मिक स्थलों को पर्यटन केन्द्रों के रूप में विकसित करके वहाँ आधुनिक और उच्च स्तर की सुविधाओं का भी विकास किया जा रहा है। इससे स्थानीय स्तर पर व्यापक रोजगार बढ़ने की संभावनाएँ बढ़ी है। विमानन के क्षेत्र में शासकीय हवाई पट्टियों को पायलट प्रशिक्षण, उड्डयन गतिविधियों एयर स्पोर्ट्स, हेलीकॉप्टर अकादमी के लिए सुलभ बनाया गया है।
मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना का लाभ प्रदेश की जनता को खूब मिल रहा है और प्रदेश के कोने-कोने से धर्मावलम्बी विभिन्न तीर्थ-स्थानों पर जाकर दर्शन लाभ ले रहे है। धार्मिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण राम वनगमन पथ की प्रस्तावित योजना रचनात्मक होकर राज्य के कई इलाकों में विकास के द्वार खोल रही है। राम वनगमन पथ के प्रस्तावित मार्ग में सतना, पन्ना, कटनी, उमरिया, शहडोल और अनूपपुर जिले आते हैं। इन स्थानों के प्रमुख धर्म-स्थलों का जीर्णोद्धार, संरक्षण और विकास किया जाएगा। नदियो, झरनों और वनों का संरक्षण कर उन्हें प्रदूषण मुक्त रखने के साथ ही समुचित जन सुविधाएँ सुलभ करवाकर पर्यटन के लिए भी विकसित किया जाएगा।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया को माना जाता है। हमारे पत्रकार कृत-संकल्पित होकर लोकतंत्र को मजबूत करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं और कमलनाथ सरकार पत्रकारों की सुरक्षा और उनकी बेहतरी के लिए निरंतर कार्य कर रही है। पत्रकार प्रोटेक्शन एक्ट लागू करने की तैयारी है। महिला पत्रकारों को प्रोत्साहन और सुरक्षा देने के लिए राज्य स्तरीय समिति का गठन,पत्रकारिता सम्मान, दुर्घटना और स्वास्थ्य बीमा योजना,पत्रकार आवास ऋण योजना जैसे कई अन्य प्रभावकारी कदम उठाये गए है। विधि और विधायी के कार्य समय पर सम्पन्न हो इसके लिये भी व्यवस्था को बेहतर करने के कदम उठाये गए हैं। एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट को लागू किए जाने को लेकर सरकार तैयार है। अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश के 4 अतिरिक्त न्यायालयों की स्थापना,वाणिज्यिक न्यायालयों का गठन और व्यवहार न्यायाधीश वर्ग-2 की भर्ती सुनिश्चित करने जैसे कार्यों का फायदा निश्चित ही जन-समुदाय को मिलेगा।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी से देश और समाज का तेजी से विकास हो, इसके प्रयास पूर्व प्रधानमन्त्री स्व. राजीव गांधी ने लगभग 35 साल पहले ही प्रारम्भ कर दिए थे। कमलनाथ सरकार इस दिशा में तेजी से कार्य कर रही है। भोपाल में साईंस सिटी का विकास, उज्जैन और जबलपुर में उप क्षेत्रीय विज्ञान केंद्र की स्थापना,समस्त सेवाओं को ऑन लाईन करने जैसे कई प्रभावशाली कदम उसी दिशा में सकारात्मक प्रयास है। विकास से दूर मध्यप्रदेश के विकास के लिए व्यापक और सकारात्मक सोच की आवश्यकता को देखते हुए कमलनाथ सरकार ने संकल्पित होकर प्रतिबद्धता से उसे पूरा करने का प्रयास किया है। पिछली सरकार ने किसानों के खिलाफ जो अन्याय पूर्ण और हिंसात्मक व्यवहार किया था, उससे अन्नदाता भयभीत और बदहाल थे। कमलनाथ सरकार ने जय किसान फसल ऋण माफी योजना से किसानों को व्यापक राहत दी। इसे साथ ही कृषि और किसान कल्याण के लिए व्यापक योजनाओं की शुरुआत की। मुख्यमंत्री कृषक जीवन कल्याण योजना से आकस्मिक और अप्रत्याशित दुर्घटनाओं से निबट पाने के प्रति किसानों में विश्वास जागा है। जाहिर है कमलनाथ सरकार जब से आई है,मध्य प्रदेश मेँ खुशहाली आई है। बेहतर और खुशहाल मध्यप्रदेश बने, इसलिए हम संकल्पित होकर कार्य कर रहे हैं। लोक कल्याण ही हमारा ध्येय है।
( लेखक मध्यप्रदेश के जनसम्पर्क, विधि-विधायी मंत्री है)

हमारे प्रेरक ग़ज़नवी नहीं बल्कि मोहम्मद के घराने वाले हैं
तनवीर जाफ़री
‘पाकिस्तान ने अपनी रक्षा प्रणाली में जिन मिसाइलों को “सुसज्जित” कर रखा है उनमें से कुछ मिसाइलों के नाम हैं- बाबर, गौरी और ग़ज़नी” । पाकिस्तान द्वारा अपनी मिज़ाइलों का इस प्रकार का नामकरण किया जाना ज़ाहिर है उसके इरादों,नीयत व उसकी आक्रामकता को दर्शाता है।पाकिस्तान द्वारा यह नाम अनायास ही नहीं रखे गए बल्कि सही मायने में पाकिस्तान इसी प्रकार के आक्रांताओं व लुटेरे शासकों से ही प्रेरित व प्रभावित रहा है। जबकि भारत में इन शासकों की गिनती लुटेरे आक्रांताओं में की जाती है। ख़ास तौर पर महमूद ग़ज़नवी को तो भारत में आक्रमण के दौरान लूटपाट मचाने व सोमनाथ के प्राचीन मंदिर तोड़ने वाले एक आक्रामक शासक के रूप में जाना जाता है। ग़ौर तलब है कि ग़ज़नवी ने सबसे बड़ा आक्रमण 1026 ई. में काठियावाड़ के सोमनाथ मंदिर पर था। विध्वंसकारी महमूद ने सोमनाथ मंदिर का शिवलिंग तोड़ दिया था और मंदिर को ध्वस्त कर दिया था।इस हमले में हज़ारों लोग मरे गए थे जबकि ग़ज़नवी के लुटेरे सैनिक मंदिर का सोना और भारी ख़ज़ाना लूटकर ले गए थे। अकेले सोमनाथ से उसे अब तक की सभी लूटों से अधिक धन मिला था। ग़ज़नवी जैसे लुटेरे आक्रांताओं ने भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में अपने ऐसे ही लूट पाट के कारनामों से इस्लाम व मुसलमानों की छवि को धूल धूसरित करने का काम किया था। यही वह दौर था जबकि सन 61 हिजरी में करबला में यज़ीद के लश्कर की तर्ज़ पर धर्म के नाम पर अपने इस्लामी साम्राज्य को बढ़ाने की चेष्टा करते हुए लूटपाट,क़त्लो ग़ारत तथा धर्मस्थलों को तोड़ने जैसी अनेक इबारतें लिखी गयीं। कहना ग़लत नहीं होगा कि ऐसे ही शासकों ने अन्य धर्मों के लोगों के दिलों में मुसलमानों के प्रति नफ़रत पैदा की तथा इस्लाम धर्म की छवि धूमिल की।
जिस प्रकार यज़ीद के समर्थक उसके प्रशंसक व उसे अपना प्रेरणा स्रोत मानने वाले लोग 61 हिजरी के दौर में करबला की घटना के समय मौजूद थे उसी तरह यज़ीद व यज़ीदियत के रस्ते पर चलने वाले आतंकी सरग़नाओं के समर्थक व उनके प्रशंसक आज भी मौजूद हैं। यज़ीद भी तलवार के बल पर इस्लामी हुकूमत को फैलाने का दावा तो करता था मगर हक़ीक़त में वह इस्लाम का इतना बड़ा दुश्मन था जिसने रसूल-ए-पाक हज़रत मुहम्मद के परिवार के लोगों को ही करबला (इराक़) में शहीद कर पूरे इस्लामी जगत के चेहरे पर कला धब्बा लगाने की कोशिश की। इसी साम्रज्य्वादी सोच का प्रतिनिधित्व अलक़ायदा, दाइश,आई एस व तालिबान जैसे इनके अनेक सहयोगी संगठन भी कर रहे हैं। देखने में रंग रूप व पहनावे में चूँकि यह भी कट्टर मुसलमान ही प्रतीत होते हैं लिहाज़ा इस्लाम विरोधी शक्तियों को इनकी हर “कारगुज़ारियों” को मुसलमानों व इस्लाम से जोड़ने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगता। निश्चित रूप से पाकिस्तान की तबाही व वहां अल्पसंख्यकों के साथ वहां होने वाले ज़ुल्मो जब्र का मुख्य कारण ही यही है कि पाकिस्तान इस्लाम के वास्तविक नायकों अर्थात नबी,पैग़म्बर,ख़लीफ़ा,इमाम से ज़्यादा ग़ज़नवी,अब्दाली,लाडेन,जवाहरी,मसूद अज़हर व हाफ़िज़ सईद जैसे उन लोगों से प्रेरित होता है जो इस्लाम व मुसलमानों को हमेशा हीकलंकित करते रहे हैं।
अभी पिछले दिनों एक बार फिर कश्मीर के ताज़ा तरीन सुरते-ए-हाल के सन्दर्भ में बात करते हुए पाकिस्तान के धार्मिक संगठन जमात-ए-इस्लामी प्रमुख सिराज उल हक़ ने अपनी गिनती “ग़ज़नवी की औलादों” में की है। ख़बरों के मुताबिक़ जमात प्रमुख सिराज उल हक़ ने ये भी कहा कि “कश्मीर पाकिस्तान के लिए ज़िंदगी और मौत का सवाल है। उन्होंने बड़े ही गौरवान्वित लहजे में अपने लिए यह भी कहा कि वो “महमूद ग़ज़नवी की औलाद” हैं। वे स्वयं को किस रिश्ते से ग़ज़नवी की औलाद बता रहे हैं मुझे नहीं मालूम। क्योंकि शाब्दिक अर्थ के लिहाज़ से तो विलादत देने वाले को वालिद और उससे पैदा होने वाली संतान को औलाद कहा जाता है। हो सकता है उनका शजरा ग़ज़नवी से मिलता भी हो परन्तु यदि वे महज़ एक मुसलमान होने के नाते उस आक्रांता से अपना रिश्ता जोड़ रहे हैं तो उन्हें यह बताना ज़रूरी है कि यह लुटेरे और आक्रांता कभी भी भारतीय मुसलमानों के नायक अथवा प्रेरणा स्रोत नहीं रहे। यह क्या कोई भी मुस्लिम सुल्तान या शासक,बादशाह अथवा नवाब कभी भी इस्लाम धर्म का नायक कभी भी न हुआ है न हो सकता है न ही उसे इस्लामी नायक व मुसलमानों का प्रेरणास्रोत माना जा सकता है। भले ही उसने नमाज़,रोज़ा,हज आदि का पालन भी क्यों न किया हो। इस्लाम पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद व उनके परिजनों हज़रत अली ,बीबी फ़ातिमा ,हज़रत इमाम हसन व हज़रात इमम हुसैन जैसे हज़रत मुहम्मद के घराने वालों से प्रेरणा हासिल करने वाला धर्म है। इस्लाम, पैग़म्बरों,इमामों व मुहम्मद के घराने वालों को अपना आदर्श मानने वाला धर्म है।इस्लाम उस त्याग,तपस्या और क़ुर्बानी का धर्म है जो करबला में हज़रत इमाम हुसैन की शहादत की शक्ल में सिर चढ़ कर बोला। इस्लाम हुसैनियत के बल पर ज़िंदा है यज़ीदियत के बल पर नहीं। यज़ीदियत के लक्षण तो यही हैं जो ग़ज़नवी,अब्दाली,लाडेन,जवाहरी,मसूद अज़हर व हाफ़िज़ सईद जैसे लोगों में और इनके चहेतों में दिखाई दे रहे हैं।
यहाँ पाकिस्तान के जमात प्रमुख सिराज उल हक़ के कश्मीर के सन्दर्भ में दिए गए बयान के विषय में यह बताना भी ज़रूरी है कि कश्मीर में कश्मीरियों के साथ उनकी “ग़ज़नवीयत” से भरी हमदर्दी कश्मीर और कश्मीरियत को नुक़्सान तो ज़रूर पहुंचा सकती है फ़ायदा हरगिज़ नहीं। कश्मीर के विषय पर भारत में ही सरकार की कश्मीर नीति से असहमति रखने वालों द्वारा सरकार की हर संभव आलोचना हो रही है। कश्मीरियों और कश्मीरियत का साथ देने वाले लोग भारतीय समाज में बड़ी संख्या में हैं। परन्तु पाकिस्तान के लोगों की हमदर्दी ख़ास तौर पर उनकी हमदर्दी का “ग़ज़वियाना” अंदाज़ कश्मीरी लोगों के लिए नुक़्सानदे होगा।जहाँ तक कश्मीर के विषय पर भारतीय मुसलमानों के पक्ष का प्रश्न है तो पिछले दिनों जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव महमूद मदनी गत 12 सितंबर को जमीयत उलेमा-ए-हिंद के इस प्रस्ताव के पारित होने की घोषणा कर चुके हैं कि “कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, जम्मू-कश्मीर के लोग भी भारतीय ही हैं। वे हमसे किसी प्रकार अलग नहीं हैं।” महमूद मदनी यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि बावजूद इसके कि “पाकिस्तान वैश्विक स्तर पर ये बात उछालने की कोशिश कर रहा है कि भारतीय मुसलमान भारत के ख़िलाफ़ हैं। हम पाकिस्तान की इस कोशिश का विरोध करते हैं। भारत के मुसलमान अपने देश के साथ हैं। हम अपने देश की सुरक्षा और एकता के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे। भारत हमारा देश है और हम इसके साथ खड़े रहेंगे।” मदनी ने ये भी कहा कि देश में रहते हुए बहुत से मुद्दों पर हमारी असहमति हो सकती हैं, लेकिन जब देश की बात आती है तो हम सब एक हैं।”
अतः पाकिस्तानी नेताओं और “ग़ज़नवी की औलादों” को कश्मीरी मुसलमानों के हक़ में घड़ियाली आंसू बहाने के प्रदर्शन से बाज़ आना चाहिए और अपने देश के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर अपनी ऊर्जा ख़र्च करनी चाहिए। यदि वे अपनी ग़ज़नवीयत भरी सोच का इस्तेमाल पाकिस्तान तक ही सीमित रखें तो ज़्यादा बेहतर है। उनकी ख़ामोशी में ही कश्मीरियों का हित निहित है।

कश्मीर में नई पहल का मौका
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आज कश्मीर में प्रतिबंध लगे पूरा डेढ़ महीना हो गया है। सरकार कहती है कि कश्मीर के हालात ठीक-ठाक हैं। कोई पत्थरबाजी नहीं है। कोई लाठी या गोलीबार नहीं है। न लोग मर रहे हैं और न घायल हो रहे हैं। मरीज़ों के इलाज के लिए अस्पताल खुले हुए हैं। हजारों आपरेशन हुए हैं। लोगों को राशन वगैरह ठीक से मिलता रहे, उसके लिए दुकानें खुली रहती हैं लेकिन मैंने अपने कश्मीरी दोस्तों और नेताओं से लेंडलाइन टेलिफोन पर बात की है। कुछ जेल से छूटे हुए कार्यकर्ता भी दिल्ली और गुड़गांव आकर मुझसे मिले हैं। वे जो कह रहे हैं, वह बिल्कुल उल्टा है। उनका कहना है कि लोग बेहद तकलीफ में हैं। सड़कों पर कर्फ्यू लगा हुआ है। स्कूल-कालेज बंद हैं। सैलानियों ने कश्मीर आना लगभग बंद कर दिया है। गरीब लोगों के पास रोजमर्रा की चीजें खरीदने के लिए पैसा नहीं है। कोई किसी से बात नहीं कर पा रहा है। इंटरनेट और मोबाइल फोन बंद हैं। ज्यादातर घरों में लेंडलाइन अब है ही नहीं। अखबार और टीवी चैनल भी पाबंदियों के शिकार हैं। शुक्रवार को कई मस्जिदों में नमाज़ भी नहीं पढ़ने दी जाती है, क्योंकि सरकार को डर है कि कहीं भीड़ भड़ककर हिंसा पर उतारु न हो जाए। दिल्ली से जानेवाले कई नेताओं को श्रीनगर हवाई अड्डे से ही वापस कर दिया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई याचिकाओं के जवाब में कहा है कि सरकार वहां जल्दी से जल्दी हालात ठीक करने के लिए कदम उठाए। लगभग सभी अखबारों और टीवी चैनलों पर मांग की जा रही है कि कश्मीरियों को अभिव्यक्ति की आजादी शीघ्रातिशीघ्र दी जाए। मुझे लगता है कि इस मांग पर अमल होना शायद अगले हफ्ते से शुरु हो जाएगा। संयुक्तराष्ट्र महासभा में एक बार भारत-पाक वाग्युद्ध हो ले, उसके बाद भारत सरकार जरुर कुछ नरम पड़ेगी। पाकिस्तान की फौज और सरकार को इस बात पर खुश होना चाहिए कि कश्मीरियों पर से प्रतिबंध उठाने की मांग वे जितने जोरों से कर रहे हैं, उससे ज्यादा जोरों से भारत में हो रही है। फिर भी यह प्रश्न उठता है कि मोदी सरकार ने इतने कड़े प्रतिबंध क्यों लगाए हैं ? क्योंकि वह कश्मीर में खून की नदियां बहते हुए नहीं देखना चाहती। कश्मीरी लोगों को सोचना चाहिए कि उनकी जुबान ज्यादा कीमती है या उनकी जान ? यही सवाल सबसे बड़ा है। मैं तो समझता हूं कि कश्मीरी लोगों को अपना क्रोध या गुस्सा प्रकट करने की इजाजत वैसे ही मिलनी चाहिए, जैसी कि चीन ने हांगकांग के लोगों को दे रखी है। अहिंसक प्रदर्शन करने का पवित्र अधिकार सबको है। अब सही मौका है, जबकि जेल में बंद कश्मीरी नेताओं से सरकार मध्यस्थों के जरिए बात करना शुरु करे।
पीओके पर घिरा पाक
सिद्धार्थ शंकर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बाद अब विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर स्थिति साफ कर दी है। विदेश मंत्री जयशंकर पीओके पर सवाल हुआ तो उन्होंने साफ तौर पर कहा कि पीओके भारत का हिस्सा है और एक दिन भौगोलिक रूप से भी यह भारत में शामिल होगा। विदेश मंत्री का यह बयान दुनियाभर के सामने जम्मू-कश्मीर का मसला उठाने की कोशिश कर रहे पाक के लिए बड़ा झटका है। सिर्फ भारत ही नहीं अब पाक में इस तरह की आवाजें उठने लगी हैं जो पाक के लिए ही खतरा हैं। पाकिस्तान लगातार बलूचिस्तान, पीओके में किए जा रहे अत्याचारों को लेकर घिर रहा है। पाकिस्तानी ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट आरिफ अजाकिया का कहना है कि गिलगित-बालटिस्तान, पीओके जम्मू-कश्मीर का हिस्सा है और जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है। ऐसे में नरेंद्र मोदी को उस गलती को सुधारना चाहिए जो बरसों पहले हो गई थी।
पीओके को लेकर पाकिस्तान चाहे जितने तर्क गढ़े और दुनियाभर को चाहे जो दलीलें दे, मगर सच यह है कि पीओके भारत का हिस्सा है और जल्द ही वह भूभाग भी होगा। अगर अभी पीओके की हालत देखें तो पता चलेगा कि इस जगह को पाक ने नर्क से बदतर बना रखा है। अब भारत का अपने अखंड भूभाग जम्मू कश्मीर पर दावा और पुख्ता होता जा रहा है। जब हम अखंड जम्मू कश्मीर की बात करते हैं तो स्वाभाविक रूप से उसमें पीओके शामिल होता है। पीओके को गुलाम कश्मीर कहा जाता है। वहां के सामाजिक, आर्थिक और मानवाधिकारों की स्थिति पर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस ने साल 2011 में शोध रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में किए गए खुलासे वैश्विक जगत को अवाक करने के लिए काफी हैं। पाक ने इस भूभाग पर अवैध कब्जा कर रखा है। अपनी भेदभाव पूर्ण नीतियों से पूरे क्षेत्र को बदहाल और आतंकवाद की नर्सरी बना रखा है। पाकिस्तान यहां की स्थिति को दुनिया के सामने न आने के लिए कोशिशें करता रहा है। वहां पर बड़ी संख्या में अंदरूनी आंदोलन चल रहे हैं। राष्ट्रवादी लोग वहां पर पाकिस्तानियों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का खुलासा कर रहे हैं।
1990 के बाद से पीओके बढ़ती आतंकी गतिविधियों का गढ़ बन गया है। लश्करए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन वहां के लोगों को जिहाद के लिए उकसा कर अपने संगठन में शामिल कर रहे हैं। यह सिलसिला वर्ष 2005 में इलाके में भूकंप से मची तबाही के बाद अधिक हो गया है। जमात-उद-दावा आतंकी संगठन भी लोगों को अपने संगठन में भर्ती कर रहा है। आतंकी संगठनों के लिए वहां काम करना ज्यादा आसान है क्योंकि वहां के आर्थिक व राजनीतिक हालात खराब हैं। तहरीक-ए-तालिबान द्वारा भी कई आतंकी संगठनों को मदद मुहैया होती है। दर्जनों आतंकी संगठन हैं जो इस क्षेत्र में अपनी पैठ बनाए हुए हैं और यहीं से भारत के लिए दिक्कतें खड़ी करते रहते हैं। पाकिस्तान और चीन के बीच काराकोरम हाईवे का 1978 में निर्माण हुआ। यह करीब 1280 किमी लंबा है। यह हाईवे पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वां प्रांत को जेजियांग क्षेत्र के कश्गर से जोड़ता है। करीब 800 किमी का हाईवे क्षेत्र पाकिस्तान में है जो पीओके के गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र से होकर गुजरता है। इस हाईवे का रखरखाव चीन ही करता है इसके जरिये चीन से पाकिस्तान में परमाणु हथियार भी पहुंचाए जाते हैं। चीन पीओके में कई तरह की परियोजनाओं पर भी काम कर रहा है। चीनी कंपनियां वहां पर मौजूद नदियों पर ऊर्जा परियोजनाएं बना रही हैं। इसके अलावा भी गुलाम कश्मीर में पानी से जुड़ी कई योजनाओं पर चीन काम कर रहा है।

4 साल 4 माह में 43 लाख 68 हजार करोड़ भारत से विदेशों में
सनत जैन
भारतीय अर्थव्यवस्था अभी तक के सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है। पिछले 5 वर्षों में भारत से लगभग 45 लाख करोड़ रुपया विदेशों में चला गया है। रिजर्व बैंक द्वारा जो हालिया जानकारी प्रकाशित की गई है। उसके अनुसार वर्ष 2014 15 में जब मनमोहन सरकार थी उस साल 1 लाख 32 हजार करोड़ रुपया भारत से विदेश ले जाया गया था। 2014 के बाद से केंद्र में मोदी सरकार है 2015-16 के वित्तीय वर्ष में 4.60 लाख करोड़ 2016 17 में 8.17 लाख करोड़ 2017- 18 में 11.33 लाख करोड़, 2018 -19 में 13.77 लाख करोड, तथा वित्तीय वर्ष के पिछले 4 माह में 5 .80 लाख करोड़ रुपया रिजर्व बैंक की अनुमति से भारत से बाहर जाकर विदेशों में निवेश किया, गया है। पिछले 5 वर्षों में भारत के रईसों ने बड़ी मात्रा में विदेशों में जाकर पैसा निवेश किया, वहीं की नागरिकता भी ले ली।
रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार द्वारा पिछले 5 वर्षों में भारतीय रईसों द्वारा बड़े पैमाने पर देश का पैसा विदेशों में ले जाकर निवेश किया है। सरकार और रिजर्व बैंक ने इस मामले में चुप्पी साध रखी थी यह बड़ा आश्चर्य का विषय है। भारत सरकार विदेशों में जाकर वहां के उद्योगपतियों को भारत में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी। वही भारत के रईस भारत से पैसा निकाल कर विदेशों में निवेश कर रहे थे परिणाम स्वरूप पिछले 5 वर्षों में सबसे कम विदेशी निवेश भारत में हुआ है। इसके बाद भी भारत सरकार द्वारा कोई कार्यवाही क्यों नहीं की गई।
भारतीय शेयर बाजार में पिछले 5 वर्षों में कृत्रिम तेजी के माध्यम से निवेशकों ने भारी मुनाफा वसूली की है। भारतीय उद्योग धंधे जब आर्थिक संकट से जूझ रहे थे। बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ रहा था। बड़ी संख्या में कंपनियां दिवालिया हो रही थी। उसके बाद भी शेयर बाजार में तेजी बनी रही । मुनाफावसूली का यह पैसा बड़े पैमाने पर भारतीय उद्योगपतियों ने भारत से निकाल कर विदेशों में निवेश किया है। इस गड़बड़ झाले में भारतीय जीवन बीमा निगम राष्ट्रीय कृत बैंकों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों तथा पीएफ का भी अरबों रुपया खुलेआम शेयर बाजार के माध्यम से लूट लिया गया
अब बाजार में पैसा नहीं है। बैंकों के पास भी नगदी नहीं है। बैंकों और भारतीय जीवन बीमा निगम की बहुत बड़ी राशि शीर्ष जो कंपनियों में निवेश की गई थी। शेयर बाजार की गिरावट के साथ इन कंपनियों और बैंकों का घाटा लगातार बढ़ रहा है। देश में नगदी संकट के कारण सभी सेक्टर आर्थिक मंदी का शिकार हैं। इसके बाद भी सरकार वास्तविकता को यदि अनदेखा कर रही है, तो यह भारत के लिए बहुत बड़ा संकट माना जा सकता है। करोड़ों की संख्या में पहले ही बेरोजगार देश में घूम रहे थे। वर्तमान आर्थिक मंदी के कारण बड़ी तेजी के साथ उद्योग और व्यापार बंद हो रहे हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियां दिवालिया हो रही हैं। यदि यही स्थिति कुछ माह है। और रह गई तो देश भारी आर्थिक संकट में फंस जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अच्छे दिनों का वादा करके केंद्र की सत्ता में आए थे। पिछले 5 वर्षों में आर्थिक स्थिति शनै:शनै: खराब होती रही । जिसका असर मोदी की विश्वसनीयता और लोकप्रियता पर पड़ना तय है। इससे देश में अराजकता की भी स्थिति भी उत्पन्न हो सकती हैं।

देश की चिकित्सा शिक्षा को अफसरशाही से बचाने की गंभीर चुनौती….
डॉ अजय खेमरिया
अनुभव बता रहे है कि किस तरह मोदी सरकार की मंशा को पलीता लगा रहा है सरकारी तंत्र देश भर के सरकारी अस्पतालों को कॉलेजों के दर्जे से हासिल हो सकते है सबको अरोग्य का मिशन यह सही है मोदी सरकार ने पिछले 5बर्षो में चिकित्सा शिक्षा के विस्तार को नई दिशा और आयाम दिया है। अगले दो वर्षों में 75 नए मेडिकल कॉलेज खोलने का निर्णय भी हाल ही में लिया गया है।निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिये लेकिन इससे पहले कुछ तथ्यों और उन पहलुओं पर भी ईमानदारी से विचार किये जाने की आवश्यकता है जो इस क्षेत्र के साथ व्यावहारिक धरातल पर जुड़े है। मसलन एक नया मेडिकल कॉलेज जब खोला जाता है तब उसकी जमीनी कठिनाइयों की ओर सरकार के स्तर पर भूमिका क्या वैसी ही मजबूत है जैसी इन्हें खोलने के निर्णय लेते समय होती है। पिछले दो बर्षो में मप्र में सात नए मेडिकल कॉलेज मप्र सरकार द्वारा खोले गए है इनमे से कुछ कॉलेजों को एललोपी यानी कक्षाओं के संचालन की अनुमति एमसीआई द्वारा जारी कर दी गई है।इस बीच मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की जगह आयुर्विज्ञान आयोग अस्तित्व में आ गया है जो नए प्रावधानों को चिकित्सा शिक्षा से जोड़ता है इस आयोग के माध्यम से मोदी सरकार ने एमसीआई की मनमानी और प्रक्रियागत भृष्टाचार को बंद करने का प्रयास किया है।
मप्र में खोले गए सभी नए मेडिकल कॉलेज इस समय विवादों में है इससे पहले खोले गए कॉलेजों की मान्यता और आधारभूत शैक्षणिक एवं आधारिक सरंचनाओं की उपलब्धता को लेकर विवाद होते रहे है।कमोबेश नए मेडिकल कॉलेजों में भी कक्षाओं को आरम्भ करने की जल्दबाजी में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं और फर्जीवाड़े को आधार बनाया जा रहा है।
राज्यों में चिकित्सा शिक्षा का पूरा तंत्र अफसरशाही के हवाले है जो चिकित्सा शिक्षा को वैसे ही चलाना चाहते है जैसे अन्य सरकारी योजनाएं जबकि यह क्षेत्र बहुत ही संवेदनशील और समाज के भविष्य के साथ जुड़ा है।समाज मे अयोग्य और अक्षम चिकित्सक का पैदा होना बहुत ही खतरनाक पक्ष है, क्योंकि भारत जैसे देश मे चिकित्सा सुविधाओं की पहुंच आज भी 50 फीसदी तबके तक है ही नही।इसलिये मोदी सरकार के इस निर्णय को सिर्फ राजनीतिक लिहाज से देखने की जगह इसकी गंभीरता और दीर्धकालिक महत्व को भी समझने की जरूरत है यह सभी राज्य सरकारों का नैतिक दायित्व भी है कि मेडिकल कॉलेजों के लिये परम्परागत सरकारी तौर तरीकों से परिचालित न किया जाए ।मसलन देश भर में आज जब डॉक्टरों की बेहद कमी है तब हमें यह समझना होगा कि नए खुल रहे कॉलेजो के लिये फैकल्टी आएंगे कहां से ?जब इनकी मानक उपलब्धता ही मुल्क में नही है तब इन्हें लाया कहां से जाएगा?मेडिकल एजुकेशन के लिये जो पैरामीटर टीचिंग फेकल्टी के एमसीआई द्वारा निर्धारित है उन्हें देश के 90 फीसदी नए कॉलेज पूरा नहीं कर रहे है यानी स्पष्ट है की नए कॉलेजों में पढ़ाने वाले सक्षम शिक्षक होंगे ही नही।जब शिक्षक ही मानक योग्यताओं को पूरा नही करते है तो काबिल डॉक्टर्स कहां से आएंगे?
वर्तमान में एमसीआई के पास कुल 10 लाख 41 हजार के लगभग डॉक्टरों के जीवित पंजीयन है जिनमें से सिर्फ 1लाख 2 हजार डॉक्टर ही विभिन्न सरकारी संस्थानों में कार्यरत है जाहिर है कोई भी विशेषज्ञ चिकित्सक देश की सरकारी सेवाओं में नही आना चाहता है ऐसे में यह जरुरी हो गया है कि जो विशेषज्ञ पीजी डॉक्टर मेडिकल कॉलेजों से बाहर सरकारी सेवाओं में है उन्हें फैकल्टी के रूप में भी जोड़ा जाए क्योंकि कॉलेज के प्रोफेसर और सरकारी विशेषज्ञ डॉक्टरों के काम मे सिर्फ थ्योरी क्लास लेने का बुनियादी अंतर है ,सरकार के स्तर पर ऐसे अध्ययनशील विशेषज्ञ डॉक्टरों को चिन्हित किया जा सकता है जो ओपीडी,ओटी के अलावा थ्योरी को भी बता सके।इसके लिये इन डॉक्टर्स को विशेष प्रोत्साहन भत्ते दिए जा सकते है।इस प्रयोग से देश भर में सरकारी फैकल्टी की कमी को दूर किया जा सकता है। फिलहाल जो व्यवस्था है उसमें भी कार्यरत पीजी डॉक्टरों को ही डेजीगनेट प्रोफेसर और एशोसिएट प्रोफेसर के रूप में एमसीआई के निरीक्षण में काउंट करा दिया जाता है।अच्छा होगा इस फर्जीवाड़े को स्थाई कर दिया जाए। 2014 के बाद करीब 80 नए मेडिकल कॉलेज मोदी सरकार खोल चुकी है और 75 अतिरिक्त खोलने की मंजूरी अभी पखवाड़े भर पहले ही दी गई है।सभी कॉलेजों में मानक फैकल्टीज का अभाव है। मप्र के सात नए कॉलेजों के अनुभव बता रहे है कि मेडिकल कॉलेज राज्यों में जबरदस्त अनियमितता और भृष्टाचार का केंद्र बन रहे है।अफसरशाही ने पूरे तंत्र को अपनी गिरफ्त में ले रखा है सरकार में बैठे मंत्री, मुख्यमंत्री अफसरों के इस तर्क से खुश है कि उनके राज्य में नए मेडिकल कॉलेज खुल रहे जिन्हें वह अपनी उपलब्धियों के रूप में जनता के बीच प्रचारित कर सकते है लेकिन इस प्रक्रिया में जो खतरनाक खेल अफसरशाही खेल रही है उसकी तरफ न सरकार का ध्यान है न समाज का।इस खेल को आप मप्र के उदाहरण से समझिए।सात नए मेडिकल कॉलेजों के लिये सरकार ने प्रति कॉलेज 250 करोड़ बिल्डिंग के लिये फंड दिया,300 करोड़ उस कॉलेज के चिकिसकीय उपकरण,100 करोड़ अन्य परिचालन व्यय,और करीब एक हजार विभिन्न नियमित सरकारी पदों की स्वीकृति। आरंभिक चरण के लिये दी हैं।सभी कॉलेज जिला मुख्यालयों पर खोले गए जहां पहले से ही परिवार कल्याण विभाग के 300 बिस्तर अस्पताल मौजूद है।इन्ही अस्पताल को नए कॉलेजों से अटैच कर दिया गया है।एमसीआई के निरीक्षण के समय इन्ही अस्पतालों के विशेषज्ञ औऱ अन्य डॉक्टरों को डिजिग्नेट करके नए कॉलेज स्टाफ में दिखाया गया है।दूसरी तरफ
फैकल्टी से लेकर सभी छोटे पदों की भर्तियां मनमाने तरीके से हो रही है मप्र के शिवपुरी, दतिया कॉलेजों की भर्तियों को लेकर तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनो के विधायक विधानसभा में तीन सत्रो से हंगामा मचा रहे है क्योंकि इन भर्तियों में बड़े पैमाने पर भृष्टाचार हुआ है।अयोग्य और
अपात्र लोगों को मोटी रकम लेकर भर्ती कर लिया गया है।भर्ती का यह खेल करोड़ो तक पहुँचा है क्योंकि सभी पद रेगुलर है।
मप्र में उपकरणों की खरीदी भी अफसरों के लिये कुबेर खजाना साबित हुई है।
खास बात यह है कि मप्र का चिकित्सा शिक्षा विभाग पूरी तरह से अफसरशाही की शिकंजे में मंत्री के नीचे प्रमुख सचिव,आयुक्त,उपसचिव,आईएएस संवर्ग के है वही हर मेडिकल कॉलेज का स्थानीय सुपर बॉस उस संभाग का कमिश्नर है।यानी उपर से नीचे तक आईएएस अफसरों का शिकंजा है।यही अफसर सभी नीतिगत निर्णय लेते है भर्ती से लेकर सभी खरीदी भी इन्ही के हवाले है।रोचक और अफसरशाही की शाश्वत सर्वोच्चता का साबित करता एक तथ्य यह भी है कि इन अफसरों में से एक भी मेडिकल एजुकेशन से नही आता है कोई इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से है या फिर मानविकी से लेकिन वे चिकित्सा शास्त्र जैसे विशुद्ध तकनीकी विषय की नीतियां निर्धारित और लागू कर रहे है।वस्तुतः मेडिकल कॉलेजों के साथ जुड़ा सरकारी धन का आंकड़ा अफ़सरशाही और उच्च नेतृत्व को गठबंधन बनाने के लिये मजबूर कर रहा है।मप्र में नए मेडिकल कॉलेजों का बजट प्रावधान हजारो करोड़ में पहुँच रहा है।7 हजार से ज्यादा सरकारी भर्तियों का मौका यहां व्यापमं का पितामह साबित हो रहा है क्योंकि यहां बगैर किसी लिखित या मौखिक परीक्षाओं के सीधे स्वशासी कॉलेज व्यवस्था के नाम से नियुक्तियों को किया गया है।
अब सवाल यह उठता है कि जब नए मेडिकल कॉलेजों में इस स्तर पर भ्रष्टाचार हो रहा है तो इनसे निकलने वाले डॉक्टरों की चिकिसकीय गुणवत्ता कैसी होगी?क्या वे भारतीय समाज के आरोग्य के लिए प्रतिबद्ध होंगे?
मप्र के अनुभवों के आधार पर सरकारों को चाहिये कि सबसे पहले नए मेडिकल कॉलेजों के लिये बजट प्रावधानों पर पुनर्विचार करे।सैंकड़ो करोड़ की बिल्डिंगस के स्थान पर बेहतर होगा कि देश के सभी जिला अस्पतालों को मेडिकल कॉलेजों की अधिमान्यता प्रदान कर दी जाए क्योंकि जो काम मेडिकल कॉलेजों के अस्पतालों में हो रहा है वही इन सरकारी जिला अस्पतालों में होता है जो नए कोलेज खोले गए हैं वे सभी इन्ही अस्पतालों से अटैच किये गए है चूंकि मान्यता के लिये इन्ही अस्पतालों का निरीक्षण होता है यहां कार्यरत चिकिसकीय एवं पैरा मेडिकल स्टाफ को ही आवश्यक मानव संसाधन के कोटे में गिना जाता है इसलिये अच्छा होगा कि देश के सभी 600 से ज्यादा जिला अस्पताल मेडिकल कॉलेजों में तब्दील कर दिए जाएं।यहाँ पूरक सुविधाएं उपलब्ध कराकर मेडिकल कॉलेजों के मानकों को पूरा किया जाए।
सभी राज्य मेडिकल एजुकेशन औऱ पब्लिक हैल्थ के विभागों का आपस मे मर्जर कर दें ताकि लोक स्वास्थ्य में समरूपता दिखाई दे अभी स्वास्थ्य विभाग के आसपास अलग है और मेडिकल एजुकेशन के अलग।इनके अलग अलग संचालन नियम है अलग सेटअप है जबकि दोनो के काम एक ही है।
सरकारी स्तर पर यह नीतिगत निर्णय भी होना चाहिये कि मेडिकल एजुकेशन में सिर्फ प्रमुख सचिव स्तर पर एक ही आइएएस अफसर का पद होगा जो सरकार और विभाग के बीच समन्वय का काम करेगा।इसमें भी मेडिकल एकेडमिक बैकग्राउंड वाले अफसर को तरजीह दी जाए।शेष सभी पदों पर डॉक्टरों की नियुक्ति प्रशासन के लिहाज से हो।जिला अस्पतालों को आधुनिक सुविधाओं और थ्योरी क्लासेस के अनुरूप बनाने से सभी जिलों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हो सकेगी फैकल्टी की समस्याओं का भी समाधान होगा।ग्रामीण क्षेत्रो के स्वास्थ्य केंद्र जिलों में अध्ययन करने वाले मेडिकल स्टूडेंट्स के लिये समयबद्व ढंग से ओपीडी का काम कर सकते है।
मोदी सरकार ने निसंदेह चिकित्सा शिक्षा के लिये 5 साल में क्रांतिकारी कदम उठाए है इस मोर्चे पर सरकार की सराहना करनी चाहिये लेकिन हमें पिछले दिनों लोकसभा में प्रस्तुत किये है तथ्यों पर भी गौर करना होगा :
भारत मे फिलहाल 479 मेडिकल कॉलेज है जिनमें फिलहाल 85218 एमबीबीएस और 29870 पीजी की सीट्स है।वर्ष 2016 से 2018 के बीच मोदी सरकार ने करीब 80 नए मेडिकल कॉलेज को मंजूरी दी है। 2014 में मोदी सरकार के आने से पहले देश मे एमबीबीएस की 52 हजार औऱ पीजी की 13 हजार सीट्स ही थी।
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत मे 67 फीसदी नागरिक अपनी बीमारियों का इलाज खुद अपनी जेब के धन से कराते है और देश की कुल आबादी के पचास फीसदी तक स्वास्थ्य सेवाओं की मानक उपलब्धता नही है।
विश्व स्वास्थ्य सांख्यिकीय संस्थान के हवाले से सरकार ने बताया है कि वर्ष 2018 में भारत मे 23 करोड़ नागरिकों ने अपनी आमदनी का 10 फीसदी हिस्सा अपनी बीमारियों के इलाज पर खर्च किया है। यह 23 करोड़ का आंकड़ा यूरोप के एक दर्जन से ज्यादा मुल्कों की आबादी को मिला दिया जाए तब भी अधिक बैठता है। यानि यूरोप के कई मुल्कों की कुल जनसंख्या से ज्यादा लोग भारत मे ऐसे है जो अपनी कमाई का दस प्रतिशत अपने इलाज पर खर्च कर देते है। भारत स्वास्थ्य सेवा सुलभ कराने के मामले में 195 देशों में 154 वे नम्बर पर है।
भारत मे औसत 11082 व्यक्तियों पर एक डॉक्टर है जबकि वैश्विक मानक कहते है 1100 की आबादी पर एक होना चाहिये।
भारत मे पिछले दो बर्षो में ब्लड प्रेशर और शुगर के मरीजों की संख्या दोगुनी हो चुकी है वही कैंसर के 36 फीसदी मरीज बढ़े है।
इन तथ्यों के बीच नए मेडिकल कॉलेजों की गुणवत्ता बनाया जाना कितना अनिवार्य है यह आसानी से समझा जा सकता है।
बगैर अफसरशाही से मुक्ति के यह आसान नही लगता है।

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