आलेख- 22

विषमता पर प्रतिबंध क्यों नहीं ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आज आई आक्सफोम की एक रपट ने मुझे चौंका दिया। उसके मुताबिक भारत के एक प्रतिशत अमीरों के पास देश के 70 प्रतिशत लोगों से ज्यादा पैसा है। ज्यादा याने क्या ? इन एक प्रतिशत लोगों के पास 70 प्रतिशत लोगों के पास जितना पैसा है, उससे चार गुना ज्यादा है। सारी दुनिया के हिसाब से देखें तो हाल और भी बुरा है। दुनिया के 92 प्रतिशत की संपत्ति से दुगुना पैसा दुनिया के सिर्फ एक प्रतिशत लोगों के पास है। दूसरे शब्दों में दुनिया में जितनी अमीरी बढ़ रही है, उसके कई गुने अनुपात में गरीबी बढ़ रही है। भारत में हमारी सरकारें कमाल के आंकड़े उछालती रहती हैं। वे अपनी पीठ खुद ही ठोकती रहती हैं। वे दावे करती हैं कि इस साल में उन्होंने इतने करोड़ लोगों को गरीबी रेखा के ऊपर उठा दिया है। इतने करोड़ लोगों में साक्षरता फैला दी है लेकिन दावों की असलियत तब उजागर होती है, जब आप शहरों की गंदी बस्तियां और गांवों में जाकर आम आदमियों की परेशानियों से दो-चार होते हैं। आप पाते हैं कि भारत के शहरी, शिक्षित और ऊंची जातियों के 20-25 करोड़ों लोगों को आप छोड़ दें तो 100 करोड़ से भी ज्यादा लोगों के पास रोटी, कपड़ा, मकान, चिकित्सा और शिक्षा की न्यूनतम सुविधाएं भी नहीं है। सच्चाई तो यह है कि इन्हीं वंचित लोगों के खून-पसीने की कमाई से देश में बड़ी पूंजी पैदा होती है और उस पर मुट्ठीभर लोग कब्जा कर लेते हैं। समाजवाद इसी बीमारी का इलाज था लेकिन वह भी प्रवाह पतित हो गया। अब समाजवाद के पुरोधा देश भी पूंजीवाद और उपभोक्तावाद के चेले बन गए हैं। इस समय देश को आर्थिक प्रगति की जितनी जरुरत है, उससे ज्यादा जरुरत आर्थिक समानता की है। यदि संपन्नता बंटेगी तो लोग ज्यादा खुश रहेंगे, स्वस्थ रहेंगे। वे ज्यादा उत्पादन करेंगे। उनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा। सरकार चाहे तो पूरे देश में नागरिकों की आमदनी में, वेतन में, खर्च में एक और दस का अनुपात बांध दे। फिर देखें कि अगले 5-10 साल में ही चमत्कार होता है या नहीं ?

क्या म.प्र. पुलिस की शाख खत्म की राजेन्द्र चतुर्वेदी ने?
नईम कुरेशी
मध्य प्रदेश यूँ तो उत्तर भारत के राज्यों में शांति का टापू जैसा कहा व माना जाता था पर 95-96 के बाद ये कहना गलत हो चुका था कि ये शांति का टापू है और यहां सामाजिक न्याय का पक्ष भी कभी लिया जाता था। इन्दौर के पन्नालाल, रामलाल वर्मा से लेकर ग्वालियर में आशिफ इब्राहीम जैसे चन्द पुलिस कप्तान रहे थे जो न्याय का पक्ष लेने में सियासी बॉसों से डरते नहीं थे। जबसे राजेन्द्र चतुर्वेदी जैसे भ्रष्ट पुलिस अधीक्षक साहेबान म.प्र. में आये तब से यहां पुलिस की साख पर दाग लगने शुरू हो गये थे। राजेन्द्र चतुर्वेदी को भ्रष्टाचार के मामले में हाल ही में भोपाल की एक अदालत 5 साल की सजा सुना चुकी है, वो अब जेल में हैं। हैरत की बात है कि राजेन्द्र चतुर्वेदी शुरू से ही भ्रष्टाचार करने वाले बद्मिज़ाज अफसर रहे थे फिर भी वो ग्वालियर, भिण्ड, छतरपुर, सागर जैसे बड़े व संवेदनशील जिलों में कप्तान बनाकर रखे गये थे।
राजेन्द्र चतुर्वेदी जहां बद्मिज़ाज थे वहीं उनकी खासियत ये भी थी कि वो बहादुर भी रहे थे। उन्होंने डकैतों खासतौर से मलखान सिंह व फूलनदेवी को मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने आत्मसमर्पण कराने के लिये जोखिम भी उठाया था। इनाम के तौर पर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने उन्हें ग्वालियर का पुलिस कप्तान बना दिया था जहां वो महज 6 माह ही टिक पाये थे। उनकी कप्तानी के दौरान पुलिस प्रशासन में उनकी पत्नी दीपा का काफी हाथ रहता था। थानेदारों की पदस्थापना में वो दखल देती रहती थीं। आला अफसरों तक को अपनी सियासी पहुंच का रौब भी दीपा बताती थीं। नतीजे में उन्हें ग्वालियर से हटाकर छोटे से जिले छतरपुर, सागर आदि भेजा जाता रहा था। उनके लगातार किस्से कहानियां अखबारों में छपते फिर भी सरकार उन पर चतुर्वेदी सरनेम के कारण महरबान बनी रही। 12 विभागीय जांचों के बाद भी उन्हें लगातार पदोन्नतियां दे दी गइऔ जहां मात्र एक दो विभागीय जांचों के चलते दलित आय.पी.एस. बनी सिंह, एस.आर. चौधरी को सरकार ने एक भी पदोन्नतियां नहीं दी थीं।
राजेन्द्र चतुर्वेदी पर प्रदेश सरकार की लगातार कृपा इतने खराब रिकॉर्ड के बाद भी बनी रही। कुछ आला अफसरान भी उन पर कृपा बनाये हुये थे। आखिर क्यों ये अब जांच का विषय होना चाहिये। इन्ही जैसे अफसरों ने मध्य प्रदेश पुलिस की साख आम जनता में नीलाम कर डाली थी वरना मध्य प्रदेश में पुलिस भी, आम प्रशासन भी उत्तर प्रदेश, बिहार की तुलना में काफी बेहतर माना जाता रहा था। प्रदेश में कलेक्टर के तौर पर ग्वालियर के कलेक्टर शिवराज सिंह, पी.नरहरि, राकेश श्रीवास्तव की लोकप्रियता किसी सियासतदां से भी ऊपर रही थी। इन्दौर में डॉ. भागीरथ प्रसाद भी लोकप्रिय कलेक्टर रहे थे। भिण्ड में होशियार सिंह को भी लोकप्रिय व आम आदमी का खास आदमी बताया गया था।
नेहरू भी ले जा चुके हैं म.प्र. से अफसर
मध्य प्रदेश में जहां प्रकाशचन्द्र सेठी, अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह लोकप्रिय कलेक्टर रहे थे वहीं सखलेचा व सुन्दर लाल पटवा भी जनता के लिये अच्छे काम वाले नेता कहे गये थे। मध्य प्रदेश से ही जवाहरलाल नेहरू दिल्ली के विकास हेतु भोपाल के कमिश्नर सहाय को तत्कालीन मुख्यमंत्री डी.पी. मिश्रा की सलाह पर ले जा चुके थे। मध्य प्रदेश में एम.एन. बुच, जी.एन.बुच से लेकर सुषमानाथ, सुधीरनाथ व अजयनाथ साहब गज़ब के ईमानदार अफसरान रह चुके हैं। अजयनाथ ने कमाल का काम आम लोगों के लिये ग्वालियर, रायपुर कलेक्टर के तौर पर किया था। उन्हें उच्चशिक्षा के आयुक्त के तौर पर भी काफी सराहा जा चुका था।
मध्य प्रदेश में आमतौर से 40 फीसदी गरीब आदिवासी दलित व कमजोर तब्कों के मुसलमान व पिछड़ी जातियों के दबे कुचले लोग रहते आ रहे हैं। यहां का संवेदनशील प्रशासन ही यहां के गरीबों की लाठी रही थी पर बीच में 20 सालों में संवेदनशील प्रशासन कुछ कम रहा था कहीं कहीं गायब भी था पर अब कुछ संवेदनशीलता प्रशासन में बढ़ी लगती है जबसे माफियाओं के खिलाफ प्रदेश सरकार ने मुहिम चलाई है। मिलावटखोरों पर कुछ अंकुश लगता दिखाई दे रहा है। अस्पतालों के कहीं-कहीं हालात भी सुधरे हैं व अभी भी स्कूलों पर कुछ खास असर नहीं दिखाई दे रहा है। सिफारसी शिक्षक सियासतदां के संरक्षण में 50 फीसदी तक स्कूलों से गायब देखे जाते रहे हैं। कुछ अच्छे लोगों को अभी भी वल्लभ भवन में बिठाकर रखा गया है जो काबिल आय.ए.एस. हैं उन्हें फील्ड में तैनात नहीं किया जा रहा है। ऐसे लोग दलित व पिछड़े ज्यादा हैं। कमलनाथ व राजा दिग्विजय सिंह को इस तरफ देखना होगा वरना पहले की सरकार में और आज की सरकार में फर्क ही क्या होगा। अभी पिछली सरकारों के दौर में मलाई काट रहे संघ परिवार से जुड़े लोग मौजूद देखे जा रहे हैं, उन्हें हटाया नहीं जा रहा है।

मस्जिद में हिंदू विवाह
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
केरल के कायमकुलम कस्बे के मुसलमानों ने सांप्रदायिक सदभाव की ऐसी मिसाल कायम की है, जो शायद पूरी दुनिया में अद्वितीय है। उन्होंने अपनी मस्जिद में एक हिंदू जोड़े का विवाह करवाया। निकाह नहीं, विवाह ! विवाह याने हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार मंत्र-पाठ, पूजा, हवन, द्वीप-प्रज्जवलन, मंगल-सूत्र आदि यह सब होते हुए आप यू-टयूब पर भी देख सकते हैं। शरत शशि और अंजु अशोक कुमार के इस विवाह में आये 4000 मेहमानों को शाकाहारी प्रीति-भोज भी करवाया गया। विवाह के बाद वर-वधु ने मस्जिद के इमाम रियासुद्दीन फैजी का आशीर्वाद भी लिया। चेरावल्ली मुस्लिम जमात कमेटी ने वर-वधु को 10 सोने के सिक्के, 2 लाख रु. नकद, टीवी, फ्रिज और फर्नीचर वगैरह भी भेंट में दिए। इस जमात के सचिव नजमुद्दीन ने बताया कि वधु अंजू के पिता अशोक कुमार उनके मित्र थे और 49 वर्ष की आयु में अचानक उनका निधन हो गया था। खुद नजमुद्दीन गहनों के व्यापारी हैं और अशोक सुनार थे। अशोक की पत्नी ने अपनी 24 साल की बेटी अंजू की शादी करवाने के लिए नजमुद्दीन से प्रार्थना की। उनकी अपनी आर्थिक स्थिति काफी नाजुक थी। नजमुद्दीन को मस्जिद कमेटी ने अपना पूरा समर्थन दे दिया। और फिर यह कमाल हो गया। इस काम ने यह सिद्ध कर दिया है कि हमारे देश का मलयाली समाज कितना महान है, कितना दरियादिल है और उसमें कितनी इंसानियत है ! ऐसे ही विवाह या अन्य संस्कार हमारे मंदिरों, गिरजों और गुरुद्वारों में क्यों नहीं हो सकते ? यदि ये भगवान के घर हैं तो फिर ये सबके लिए क्यों नहीं खुले हुए हैं ? यदि ईश्वर सबका पिता है तो पूरा मानव-समाज एक-दूसरे के रीति-रिवाजों का सम्मान क्यों नहीं कर सकता ? लेकिन दुर्भाग्य यह है कि मजहब के नाम पर सदियों से निम्नतम कोटि की राजनीति होती रही है। धर्म-ध्वजियों या मजहबियों ने अपने बर्ताव से यह सिद्ध कर दिया है कि ईश्वर मनुष्यों का पिता नहीं है, मनुष्य ही ईश्वर के पिता हैं। मनुष्यों ने अपने-अपने मनपसंद भगवान घड़ लिये हैं और उन्हें वे अपने हिसाब से आपस में लड़ाते रहते हैं। उन्हें एक-दूसरे से ऊंचा-नीचा दिखाते रहते हैं। मस्जिद में हिंदू विवाह करवाकर मलयाली मुसलमानों ने सिद्ध कर दिया है कि वे पक्के मुसलमान तो है ही, पक्के भारतीय भी है। वे ऊंचे इंसान हैं, इसमें तो कोई शक है ही नहीं।

छपाक, छपास और विवाद
अनिल बिहारी श्रीवास्तव
दो शब्द हैं, छपाक और छपास। इनका उपयोग बहुत आम है। इन दिनों दोनों ही मीडिया में खासा स्पेस बटोर रहे हैं। ऐसे त्रिभुज की कल्पना करें जिसके तीन कोण छपाक, छपास और दीपिका हैं। दीपिका पादुकोण की ताजा फिल्म छपाक है। दीपिका हिंदी फिल्मों की लोकप्रिय अभिनेत्रियों में हैं, स्वाभाविक है कि छपाक की चर्चा होगी। बाक्स आफिस पर इसके रुतबे का फैसला अवश्य समय करेगा। अब सवाल यह है कि दीपिका और छपास के बीच क्या संबंध है? हाल ही में मीडियाई बहसों में छपास शब्द की धूम देखी गई। छपाक के रिलीज से पहले प्रमोशन कैम्पेन पर निकलीं दीपिका पादुकोण जेएनयू में हिंसक घटना के विरोध में छात्रों के एक वर्ग की सभा में जा पहुंचीं। इसके बाद बहसों में छपास शब्द गूंजने लगा। कुछ लोगों को सभा में दीपिका के जाने पर कोई बुराई नहीं दिखी। वो उनके साहस पर दाद दे रहे हैं। एक अन्य वर्ग मानता है कि दीपिका ने जाने-अनजाने में टुकड़े-टुकड़े गैंग का हौसला बढ़ाया है। इधर, बहिष्कार और समर्थन के आह्वानों के बीच छपाक रिलीज हो गई। भारतीय राजनीति और फिल्मों के इतिहास में पहली बार नई बात सामने आई। फिल्म के बहिष्कार के आह्वान पहले भी होते रहे हैं लेकिन पहली बार राजनेताओं का एक वर्ग किसी फिल्म की कामयाबी के लिए ऐड़ी-चोटी एक किए दिखा। रिपोर्टों के अनुसार लखनऊ में समाजवादी पार्टी ने सिनेमाघर बुक कर लोगों को मुफ्त में छपाक दिखाई। एनएसयूआई के सदस्य द्वारा छपाक की टिकट मुफ्त बाटे जाने की खबर भी सुनी गई।
जेएनयू के छात्रों की सभा में दीपिका पादुकोण कुछ बोलीं नहीं। उनकी मौन-मौजूदगी के अपने अर्थ हैं। छात्र कह रहे हैं दीपिका ने छात्रों पर हुए हमले का विरोध किया है और वह उनका साथ देने आईं थीं। इस दावे को खारिज नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, आलोचकों के अनुसार दीपिका चतुर प्रचारक हैं। मौका भुनाना उन्हें आता है। मुद्दा यह है कि दीपिका ने सभा में जाने का फैसला खुद लिया था या यह आइडिया किसी और का था? उन्हें छपाक या छपास में से किसके लिए जमावड़ा अनुकूल दिखा? नि:संदेह यह एक सधी पीआर कवायद थी। यानि, आम के आम और गुठलियों के दाम। असर दिखने लगा है। दीपिका अचानक कांग्रेस, वामदल और मोदी सरकार विरोधी लॉबी और पाकिस्तानियों की चहेती बन गईं। ऐसी पब्लिसिटी लाखों फूंक कर भी संंभव थी? दीपिका को हौसला बढ़ाने के लिए मोदी विरोधी टूट पड़े हैं। ट्वीटर पर उनके फालोअर्स की संख्या में 40 हजार का उछाल है। यहां एक तीसरा वर्ग भी है। उसे छपाक फिल्म से कोई शिकायत नहीं थी। उसे भारत तेरे टुकड़े होंंगे जैसे देश विरोधी नारे लगाने वालों के साथ दीपिका का मंच साक्षा करना नागवार गुजरा है। छपाक के बहिष्कार के बात यहीं से शुरू हुई। बहिष्कार आह्वान के पीछे पुख्ता तर्क हैं। सभा की तस्वीरें देखें। दीपिका के साथ कन्हैया कुमार दिखाई देता है। वह नारे लगा रहा है। सिर झुकाये मुग्ध दीपिका छपास के कल्पना-लोक में गोते से लगाते महसूस की जा सकतीं हैं। क्या कन्हैया पर आरोपों से दीपिका अनभिज्ञ थीं? उनकी इस मौन-मौजूदगी से ईमानदारी से पढऩे और पढ़ाने वालों को निराशा हुई है।
फिल्मी पंडित मानते हैं कि छपाक के हिट होने के आसार हंै। ऐसी भविष्यवाणियों गलत भी साबित होती रहीं हैं। औसत कारोबार की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। चार कांग्रेस शासित राज्यों ने बेहद कमजोर तर्कों के साथ छपाक को टैक्स फ्री कर दिया। क्या यह एक तरह से दीपिका को पुरस्कार जैसी बात नहीं हैै? कांग्रेस छपाक को फ्लाप नहीं होने देना चाहती। कांग्रेस के साथ वामपंथी और सपाई खड़े हैं। दीपिका के लिए दोनों हाथों में लड्डू वाली बात हो गई। बहरहाल, यहां छपाक और छपास की संक्षिप्त व्याख्या उचित होगी। छपाक क्या है? छपाक वह ध्वनि है जो किसी तरल पदार्थ पर चोट करने से उठती है। शायद ही कोई छपाक से अपरिचित होगा। किसी पर तरल पदार्थ तेजी से फेंकने से भी यह ध्वनि उठती है। बाल्टी में भरे पानी या सरोवर में भी इसे सुना जा सकता है। यह एक अलग अनुभव होता है। दूसरा शब्द छपास है। प्रेमरोग सरीखी अनुभूति देने वाले छपास की महिमा अपार है। आये दिन अपना नाम छपवाने के लिए अखबारों के दफ्तरों में मंडराने वालों के संदर्भ में कटाक्ष के रूप मं इसका उपयोग किया जाता रहा है। वैसे छपास का प्रभाव अब समूचे मीडिया में दिखाई देता है। समाज के सभी वर्गों में छपास के प्रति मोह व्याप्त दिखता है। अत: सिल्वर स्क्रीन से दर्शकों को चुधिंया देने वाले स्टारों तक यह प्रेमरोग फैला दिख रहा है तो आश्चर्य क्यों?
पूरे विवाद पर दीपिका पादुकोण की ओर से रहस्यमयी चुप्पी बनी रही। इसे अवश्य चौंकाने वाली बात कह सकते हंै। चुप्पी और दीपिका, कोई मेल नहीं हो सकता। विवाद पर पलटवार की मुद्रा वह अपनाती रहीं हैं। बात निहार पंडया, युवराज, रनवीर, सिद्धार्थ माल्या के संदर्भ में कतई नहीं की जा रही है। बात रणबीर सिंह की भी नहीं है। याद करें क्लीवेज कंट्रोवर्सी पर उनके ट्वीट को, क्या उसे भुलाया जा सकता है। एक टीवी शो के दौरान किसी के लिए कंडोम ब्रांड एंडोर्स करने का सुझाव, उनकी बेबाकी साबित करता है। 2015 में शार्ट फिल्म माय बॉडी, माय माइंड, माय च्वाइस भी एक मजबूत उदाहरण रहा है। इनसे दीपिका के मिजाज को समझ सकते हैं। कहना सिर्फ इतना है कि आपके मिजाज से किसी को लेना-देना नहीं लेकिन आप एक सेलीब्रेटी हैं, कुछ कदम फंूक कर उठाने की अपेक्षा आपसे की जा सकती है।

कब रुकेगा हादसों का सिलसिला
सिद्धार्थ शंकर
किसी भी हादसे का सबक यह होना चाहिए कि वह भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचाव का आधार बने। लेकिन रेल महकमे को शायद इस बात से बहुत सरोकार नहीं है कि ट्रेन हादसों पर काबू पाने के पर्याप्त इंतजामों को प्राथमिकता में शुमार किया जाए। माना कि पिछले कुछ वर्षों में रेल हादसों में कमी आई है और अब रेलवे हादसों को रोकने न सिर्फ गंभीर है बल्कि नई तकनीक का प्रयोग भी कर रहा है। लेकिन इन सबके बाद भी अगर कोई हादसा हो जाता है तो यह पूरी तैयारी को सवालों के घेरे में खड़ा कर देता है। अभी कुछ दिनों पहले ही रेल मंत्री पीयूष गोयल ने सुरक्षा और संरक्षा को लेकर तमाम दावे किए थे, मगर गुरुवार को कटक में हुए रेल हादसों ने दावों पर सवाल उठा दिए।
बता दें कि ओडिशा के कटक में गुरुवार सुबह भारी कोहरे की वजह से हुए ट्रेन हादसे में बड़ी संख्या में लोग घायल हो गए। इनमें से 6 की हालत नाजुक है। घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। कोहरे की वजह से घटनास्थल पर रेस्क्यू ऑपरेशन में भी देरी आई। ट्रेन मुंबई से भुवनेश्वर जा रही थी। खबर मिली है कि एक्सप्रेस ट्रेन के मालगाड़ी से टकराने की वजह से ट्रेन पटरी से उतर गई। कहा जा रहा है कि ये ट्रेन धुंध की वजह से मालगाड़ी से टकरा गई थी। अब इस हादसे को मौसम की मार मानें या मानव जनित, जांच के बाद पता चलेगा, मगर अभी तो हादसा हुआ है और यही माना जाना चाहिए।
यह बेवजह नहीं है कि एक ही प्रकृति की दुर्घटनाएं बार-बार होती हैं और उनमें लोगों की जान जाती है, रेलवे का भी भारी नुकसान होता है। वह लगातार हादसों में सिर्फ एक कड़ी है। अब एक आम हो चुकी रिवायत के मुताबिक मृतकों और घायलों के लिए मुआवजे और इलाज की घोषणा के साथ-साथ भविष्य में ऐसे हादसों पर लगाम लगाने के आश्वासन दिए जाएंगे। लेकिन इन आश्वासनों की जमीनी सच्चाई यह है कि एक दुर्घटना के बारे में लोग भूल भी नहीं पाते कि फिर कोई नया हादसा सामने आ जाता है। हो सकता है कि ताजा दुर्घटना में मरने वालों और हताहतों की तादाद बड़ी नहीं मानी जाएगी, लेकिन किसी भी हादसे में जान गंवाने वालों की संख्या कितनी भी क्यों न हो हो, उसका महत्व समान माना जाना चाहिए। सवाल है कि यात्री जब सुरक्षित सफर के मकसद से ट्रेन का सहारा लेते हैं और इसकी पूरी कीमत चुकाते हैं, तो गंतव्य तक पहुंचने के बीच वे जान जाने के जोखिम से क्यों गुजरें? विडंबना यह है कि पिछले कुछ समय से जितनी भी रेल दुर्घटनाएं हो रही हैं, उनमें से ज्यादातर में कारण चलती ट्रेन का पटरी से उतर जाना है। अनेक अध्ययनों में यह तथ्य दर्ज किया जा चुका है कि पटरियों पर ज्यादा दबाव पडऩे की वजह से वे समय से पहले कमजोर पड़ जाती हैं। इसके बावजूद पटरियों पर ट्रेनों के दबाव को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा इंतजामों को पुख्ता करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा पाते।
सवाल है कि ट्रेनों के संचालन से जुड़े बुनियादी पहलुओं पर ध्यान देना और उसे पूरी तरह सुरक्षित बनाना किसकी जिम्मेदारी है। पटरियों की गुणवत्ता से लेकर रेलवे क्रॉसिंग पर कर्मचारी के मौजूद नहीं होने जैसी दूसरी तमाम वजहों से अक्सर रेल दुर्घटनाएं होती रही हैं। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार बड़ी खामियों को पूरी तरह दुरुस्त करने के बजाय सरकार सुरक्षा के नाम पर यात्रा को ज्यादा से ज्यादा महंगी बनाने और बुलेट ट्रेन या दूसरी शानो-शौकत वाली ट्रेनों के परिचालन के लिए बढ़-चढ़ कर दावा करने में लगी है। रेलगाडिय़ों का सफर आम लोगों के लिए किस कदर मुश्किलों से भरा हो गया है, यह किसी से छिपा नहीं है। अपने गंतव्य तक जाने के लिए टिकट मिल पाने से लेकर समय पर कहीं पहुंच पाना अपने आप में एक आश्चर्य जैसा हो गया है। इसमें अब सफर के दौरान हादसों की वजह से जान पर जोखिम एक बड़ा सवाल है।

ये हैं दिगम्बर जैन संतों की मस्ती !
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
शायर जलाउद्दीन ने दिगम्बर पद को दिव्य ज्योति से अलंकृत करते हुए बताते हुए कहा हैं की वस्त्रधारी व्यक्ति की दृष्टि तो धोबी की ओर रहती हैं ——
मस्त बोलै मुहतसिव से कामजा, होगा क्या नंगे से तू ओहदा बरा.
हैं नज़र धोबी पैजामपोश की, हैं तजल्लीज़ेबरे उरीयंतनी .
नग्न दरवेश तार्किक से कहता हैं —“अरे भाई तू जा और अपना काम करतो दिगम्बर से ऊँचा नहीं बन सकता, वस्त्र धारक कीदृष्टि सदा धोबी पर रहती हैं, दिगम्बरत्व की शोभा देवी प्रकाश रूप हैं .या तो तुम नग्न दरवेशों से कोई सम्बन्ध न रखो अथवा उनके सदृश्य दिगम्बर और स्वाधीन बन जाओ .यदि तुम पूर्णतः दिगम्बर नहीं बन सकते तो अपने वस्त्रों को अल्पतम में रक्खो
आज से ३५० वर्ष पूर्व शाहजहां बादशाह के राज्य में मुस्लिम सूफी फ़कीर सरमद देहली में नग्न रूप में विहार करता था .उसका मज़ार दिल्ही की जमा मस्जिद में बाएं भाग में हैं . उसका कथन था “परमात्मा जिसमे दोष देखता हैं उसे वस्त्र पहना देता हैं, किन्तु जो निर्दोष हैं उसे नग्न रहने देता हैं ”
मैत्रेय -उपनिषद में दिगम्बरत्व को आनंद का कारण बताया हैं .हिन्दू अवधूत साधु दिगम्बर होते हैं .
देश -काल -विमुक्तोइस्म दिगम्बरं सुखोस्म्यहं .
भर्तहरि ने वैराग्य शतक में लिखा हैं —
एकाकी निस्पृहः शान्तः पाणि -पात्रो दिगम्बरः .
कदाशम्भो भविष्यामि कर्म -निर्मूलनक्षमः.
जिनकेहाथ ही पवित्र पात्र हैं, भिक्षा के द्वारा उपलब्ध अन्न ही भोजन हैं, दिशा ही वस्त्र हैं, पृथ्वी ही शैय्या हैं, परिग्रह रहित होना जिनकी परिणति हैं, जो स्वात्म संतोषी हैं तथा जो दैन्य समुदाय से दूर हैं ऐसी धन्य आत्माएं कर्मों का नाश करती हैं .राजश्री भर्तहरि ने कहा “भगवन ! वह दिन कब आएगा जब में अकेला लालसा रहित शांत कर पात्र वाला दिगम्बर बनकर कर्मनाश करने में समर्थ होऊंगा .
मुहम्मद जायसी ने पद्मावत में लिखा हैं —
कोई ब्रह्चारज पंथ लागे, कोई दिगम्बर अच्छा लागे
एक बादशाह ने किसी महात्मा के दर्शन से संतुष्ट हो कहा “महाराज! आपको जो चाहिए वह मुझसे मांग लीजिये ” वह साधु कहता हैं —
शहंशाह अक्ल तेरी मारी गयी हैं,
फकीरों को दौलत की परवा नहीं हैं
तमन्ना फकीरी में लाज़िम नहीं हैं,
धब्बा सफेदी में लाना नहीं हैं .
सम्पूर्ण विश्व का सूक्ष्म निरिक्षण किया गया, तार्किक अकलंक कहते हैं — इस जगत में भिन्न भिन्न उपासकों के विविध आराध्य देव हैं जिनकी वेशभूषा पृथक पृथक हैं, किन्तु किसी की वेश भूषा विश्व व्याप्त हैं .एक जिनेन्द्र की दिगम्बर मुद्रा ही सम्पूर्ण जगत के कण कण में, प्राणी प्राणी में विद्यमान पायी जाती हैं .
जैन दर्शन में समता भाव का स्थान सर्वोपरि हैं .भगवन पार्श्वनाथ के ऊपर कमठ का उपसर्ग हुआ तब वे अपनी आराधना से विचलित नहीं हुए —–
कियो उपसर्ग भयानक घोर, चली बहुतीक्षण पवन झकोर,
रहो दशहू दिशि में तमछाय,लगी बहु अग्नि लखि नहिजाय
सुरुनडन के बिन मुंड दिखाय, पड़े जल मूसलधार अथाय,
तबैं पदमावति कंत धनिन्द, चले जग आय जहाँ जिन चंद .
उपरोक्त कथानानुसार यह बात सिद्ध हो गयी की जैन दर्शन में दिगबरत्व एक अनिवार्यता हैं, वर्तमान में जब हाड कपकपाने वाली ठण्ड पड़ रही हैं तब जैन दिगम्बर साधु नग्न रहकर अपनी साधना /दिन चर्या में रत रहते हैं .जब हम कपड़ों के अंदर रहकर ठण्ड से मुक्ति नहीं पा रहे हैं तब वे नग्न किसी भी परिधान का सहारा न लेकर लकड़ी के तख़्त पर सोते हैं .इतनी गर्मी पड़ने पर भी वो बिना पखे, कूलर और ए सी तप साधना करते हैं और जीव हिंसा से बचने और बचाने के लिए वे एक स्थान पर रहकर चातुर्मास करते हैं .
वर्त्तमान में इंदौर में आने वाले आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज अपने संघ के साथ विराजित होने वाले हैं तो भोपाल में मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज संघस्थ विराजे हैं.
सही साधना, तपस्या, चर्या का दर्शन करना हो तो आप मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज के साथ अन्य मुनियों के दर्शन करअपने अपने को धन्यभागीबने
जैनधर्म की महिमा अपरम्पार हैं .जै हो गुरुदेव

जानलेवा मांझे पर सख्ती
सिद्धार्थ शंकर
मकर संक्रांति पर पतंगबाजी का दौर शुरू होते ही देश में कई जगह जानलेवा मांझे से जुड़ी घटनाएं सामने आने लगी हैं। यूपी के मुरादाबाद और हापुड़ के साथ गुजरात के मुरादनगर में मांझे ने राहगीरों को बुरी तरह घायल कर दिया। उनकी जान जाते-जाते बची। हालांकि, इससे पहले देश में कई लोग मांझे के चलते जान गंवा भी चुके हैं। देखा जाए तो पतंगबाजी दुनियाभर में मशहूर है। कई देशों में अलग अलग तरह के पतंगबाजी महोत्सव मनाए जाते हैं, जो वहां के पर्यटन को बढ़ावा देते हैं। एक-दूसरे की पतंग काट कर जीत का जो मजा मिलता है वह पतंगबाजों के लिए अद्भुत होता है। पतंग काटने में हवा का रुख और पतंग की कलाबाजी के साथ पतंग उड़ाने में इस्तेमाल होने वाली डोर यानी मांझा का भी खास महत्व होता है। पतंग में आगे की ओर अलग तरह के मांझे व लोहे के तार तक का प्रयोग होता है। पतंग के साथ लगे मांझे के बाद एक अलग किस्म की डोर लगाई जाती है। पतंग के साथ लगा मांझा ही दूसरी पतंग के मांझे को रगड़ता है और उसे काट देता है। मांझा दूसरी पतंग की डोर को काट सके, इस के लिए मांझे में कांच और लोहे का बुरादा लगाया जाता है। देश में कॉटन के धागे से तैयार डोर बनाई जाती है।
हाल के कुछ सालों में चीन से नायलॉन से तैयार की गई डोर बाजार में आने लगी है। नायलॉन की डोर आसानी से टूटती नहीं है। उस के ऊपर जब लोहे और कांच का बुरादा चढ़ाया जाता है तो यह कॉटन वाले मांझे से उड़ रही पतंग की डोर को आसानी से काट देती है। चाइनीज मांझे से पतंग के साथ उड़ाने वाले के हाथ भी कटने लगे हैं। सब से खतरनाक काम तो तब होता है जब कटी हुई पतंग किसी साइकिल या मोटरसाइकिल सवार के गले, मुंह या हाथ में लिपट जाती है। इससे कई बार गले की नसें तक कट जाती हैं। इस तरह की कई घटनाएं देश में घट चुकी हैं। अभी पिछले साल दिल्ली के तिमारपुर इलाके में 18 साल का युवक बाइक से कुछ सामान लाने निकला था, लेकिन बीच में एक कटी पतंग का धागा उसके गले में उलझ गया। तीखे मांझे से लैस धागे से उसकी गर्दन काफी गहराई तक कट गई और ज्यादा खून बहने से आखिरकार उसे नहीं बचाया जा सका।
खेल खेलना या मनोरंजन किसी का भी हक हो सकता है। लेकिन अगर वह किसी दूसरे और उस खेल से अनजान व्यक्ति के लिए जानलेवा बनता है तो इसे किस आधार पर सही ठहराया जा सकता है? पिछले कुछ सालों के दौरान पतंग के मांझे की वजह से लोगों की जान जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इस मसले पर काफी चिंता भी जताई गई और इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की बात भी कही गई, लेकिन आज भी हालत यह है कि इस तरह के जानलेवा धागों की खुले बाजार में बिक्री में कोई कमी नहीं आई है। प्रशासन की ओर से बरती गई इस लापरवाही और आम लोगों की गैरजिम्मेदारी की कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ रही है। देश में चाइनीज मांझे को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने प्रतिबंधित कर रखा है। बावजूद इसके चीन से आए मांझे लोगों की जान का सबब बन रहे हैं। नायलॉन के साथ सिंथैटिक मटेरियल से तैयार दूसरे मांझे खतरनाक होते हैं।
कानून के अनुसार इस तरह के मांझे से केवल पतंग उड़ाना ही गुनाह नहीं, बल्कि इस मांझे को बेचना भी बड़ा अपराध है। ऐनवायरनमैंट प्रोटेक्शन एक्ट 1986 की धारा-5 के अंतर्गत इस के इस्तेमाल पर पांच साल की सजा और एक लाख रुपए तक का जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है। यह निजी फर्म, कंंपनी अथवा सरकारी कर्मचारियों पर भी लागू होता है। भारत में चाइनीज नायलॉन के धागे की खपत शुरू हो गई। अब चाइनीज नायलॉन के धागे पर मांझा तैयार करना सरल हो गया है। कांच और लोहे के बुरादे को जब चावल के मांड के साथ इस पर लगाया जाने लगा तो यह कॉटन के धागे की तरह टूटता नहीं है। जल्दी न टूटने के कारण यह पतंग उड़ाने वालों के लिए भी खास हो गया। इस से अब दूसरी पतंग को काटना आसान हो गया है। इस कारण से चाइनीज नायलॉन से तैयार मांझा पतंगबाजी की पहली पसंद बन गया है।
बहरहाल, पतंग कटने के बाद धागा समेटने या फिर पतंग के साथ काफी निचले स्तर से गुजरता धागा आमतौर पर दिखाई नहीं देता यह अगर एक झटके से व्यक्ति के शरीर से गुजर भर जाए तो गहरा घाव तक हो सकता है। खासतौर पर मोटरसाइकिल की सवारी करने वाले लोगों की नजर चूंकि सड़क पर होती है, इसलिए धागे को देख पाना उनके लिए आमतौर पर मुश्किल होता है और कई बार वे उस जानलेवा धागे की चपेट में आ जाते हैं। यह कहा जाता है कि ये धागे चीन से भारतीय बाजारों में आ रहे हैं। हो सकता है कि यह तथ्य हो। लेकिन इसके अलावा भी पतंग के शौकीन लोग स्थानीय स्तर पर नायलॉन के धागों पर कांच का चूरा, खतरनाक अधेसिव, एल्यूमीनियम ऑक्साइड, जिरकोनिया ऑक्साइड और मैदा जैसी चीजों से तैयार लेप चढ़ा कर उसे मारक बना देते हैं। लेकिन सच यह है कि आज ये धागे कुछ लोगों के लिए पतंग काटने या इसके जरिए मनोरंजन करने का जरिया हैं तो किसी का गला भी कट जा रहा है। अब वक्त है कि खतरनाक मांझे को लेकर संवेदनशीलता बरती जाए और इसे रोकने के लिए कानून का पालन भी सुनिश्चित किया जाए।

रामचरितमानस में पारिवारिक व सामाजिक मूल्य बोध
-प्रो.शरद नारायण खरे
“ परिवार ही हमारे सामाजिक जीवन की आधारशिला है,जिसमें हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक सारी गतिविधियाँ संचालित होती हैं। हिन्दू परिवार का जीवन-दर्शन पुरूषार्थ पर आधारित है जो विश्व के अन्य समाजों के परिवारों का जीवन दर्शन नहीं है । अतः परिवार मनुष्य के सभ्य और सुसस्ंकृत होने का स्वाभाविक तारतम्य है जिसके माध्यम से मानव जीवन का उन्नयन होता हैं। ”
तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में परिवार के आदर्श और मर्यादा को स्थापित करने का सुन्दर प्रयास किया है यह प्रयास इतना प्रभावी है कि आचार्य शुक्ल लिखते हैं कि-
“ यदि भारतीय शिष्टता और सभ्यता का चित्र देखना हो तो इस राम समाज में देखिए। कैसी परिष्कृत भाषा में कैसी प्रवचन पटुता के साथ प्रस्ताव उपस्थित होते है किस गंभीरता और शिष्टता के साथ बात का उत्तर दिया जाता है छोटे-बड़े की मर्यादा का किस सरलता के साथ पालन होता है। ”
‘ मानस ’ में राम कैकेयी संवाद में कैकेयी की कठोर आज्ञा पर श्री राम मीठी वाणी में शिष्टता से कहते है।–
” सुनु जननी सोइ सुत बड़भागी।
जो पितु मातु वचन अनुरागी।
तनय मातु पितु तोष निहारा।
दुर्लभ जननि सकल संसारा। ’’
तुलसीदास जी ने परिवार में केवल आदर्श चरित्रों को ही नही अपितु यथार्थ चरित्रों को भी प्रस्तुत किया है। कैकयी,मंथरा ऐसे ही यथार्थ पात्र हैं,जो हर कुटुम्ब में मिल जाते हैं। राम वनवास के बाद भरत सिंहासन ग्रहण नहीं करते , भरत राम मिलाप की हृदयस्पर्शिता ‘मानस’ के पाठकों को भाव विभोर कर देती है। सीता का राम के साथ वन जाना ,वहीं सीता हरण के बाद राम द्वारा व्याकुल होकर सीता को ढूंढना ये सब वृतांत आदर्श कुटुम्ब की निर्मिति दर्शाते हैं। ‘’मानस ’’ में रचित ‘आदर्श’ आज भी समाज व परिवार के विकास के लिए उतने ही आवश्यक हैं, जितने की सोलवीं शती में थे।
गुरू शिष्य सम्बंध:-
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मानस में गोस्वामी जी ने ‘ गुरू महिमा ’ की महत्ता की असंख्य स्थानों पर चर्चा की है। बालकाण्ड के प्रारम्भ में ही ईश वन्दना के बाद गुरू महाराज की वन्दना करते हुए कहते हैं कि- ‘‘ श्री गुर पद नख मनि गन जोति/सुमिरत दिव्य दृष्टि हिय होती ।”
हर एक मंगल कार्य पर गुरू को दान देने और आशीर्वाद लेने का वर्णन मानस में किया गया है। राजा दशरथ की गुरू के प्रति भक्ति को वर्णित करते हुए कवि कहते है कि- ‘‘ जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल विभव बस करहीं। ”
भारतीय समाज में गुरू शिष्य सम्बंध बहुत ही घनिष्ठ था। समाज में उसकी स्थिति सर्वोच्च थी, अतः गोस्वामी जी ने भारतीय समाज में गुरू को प्राप्त आदरभाव,गरिमा और प्रतिश्ठा को ही मानस में प्रतिबिम्बित किया है ।
नारी का स्थान:- हिन्दू समाज में नारी के लिए सम्मान व मर्यादायुक्त दृष्टि रखी जाती थी।रामचरितमानस में लगभग हर वर्ग के प्रति प्रगतिशीलता दिखाई देती है,अतः तुलसी के स्त्री सम्बन्धी दृष्टिकोण को संकीर्ण कहना ,हमारा एकांकी दृष्टिकोण होगा। वस्तुतः हर लेखक अथवा कवि अपने युग के सापेक्ष रचना लिखता है। युग और सन्दर्भ बदल जाने पर उसके साहित्य के मूल्यांकन के आधार भी दोबारा बदल जाते है। यह सत्य है कि तुलसी के काव्य में नारी ,नारी धर्म अथवा पति सेवा में ही शोभा पाती है,किन्तु नारी की परतन्त्रता की पीड़ा तक पहुँचना भी , उस युग में प्रगतिशीलता थी। जो प्रमाणित करता है कि समाज में नारी की स्थिति व दशा को लेकर भी गोस्वामी में चेतना थी।
अंतत: कह सकते है कि पर्यावरण अर्थात जो हमारे चारों ओर विद्यमान है ,मनुष्य समाज में भी सामाजिक मूल्य व आदर्श चारों ओर मनुष्य को घेरे रहते हैं। गोस्वामी जी के सामाजिक मूल्यों के आदर्श का जीवन्त प्रतीक ‘ मानस ’ है जिसमें सामाजिक पर्यावरण चेतना अद्भुत रूप में मुखर हुई है।
“मानस सच में है’शरद’,सामाजिक श्रंगार ।
तुलसी बाबा ने दिया,हम सबको उपहार ।।”

शिक्षा संस्थानों की फिक्र
सिद्धार्थ शंकर
नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देश भर में मचे बवाल के बीच ऐसी अनिश्चितता की स्थिति बनती जा रही है, जिसमें यह कह पाना कठिन है कि कौन सही है और कौन गलत। अभी कुछ दिनों पहले देश के 100 से ज्यादा पूर्व नौकरशाहों ने खुला पत्र लिखकर कहा था कि देश को सीएए और एनआरसी की जरूरत नहीं है। सरकार देश के आर्थिक हालात को सुधारने पर ध्यान लगाए। नौकरशाहों के इस पत्र को सरकार के विरोध के स्वरूप लिया गया था। अब देश के 208 अकादमिक विद्वानों ने पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा है कि लेफ्ट विंग के लोग शिक्षा के माहौल को खराब रहे हैं। स्टूडेंट पॉलिटिक्स के नाम पर अतिवादी वामपंथी अजेंडे को आगे बढ़ाया जा रहा है। हाल में ही जेएनयू से जामिया औ एएमयू से जाधवपुर यूनिवर्सिटी तक में सामने आए घटनाक्रम से पता चलता है किस तरह से अकादमिक माहौल को खराब किया जा रहा है। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हुए हिंसक प्रदर्शनों और जेएनयू में हुई हिंसा के बाद लिखे गए इस पत्र को सरकार की ओर से अकदामिक जगत में समर्थन जुटाने की कोशिश माना जा रहा है। अभी ताजा पत्र के मजमूल को देखें तो पत्र लिखने वाले लोगों में कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलर भी शामिल हैं। पत्र में लिखा गया है कि लेफ्ट विंग के ऐक्टिविस्ट्स की मंडली देश में अकादमिक माहौल को खराब करने में जुटी है। पत्र को लिखने वालों में हरि सिंह गौर यूनिवर्सिटी के कुलपति आरपी तिवारी, साउथ बिहार सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कुलपति एचसीएस राठौर और सरदार पटेल यूनिवर्सिटी के वीसी शिरीष कुलकर्णी शामिल हैं। शिक्षण संस्थानों में लेफ्ट विंग की अराजकता के खिलाफ बयान शीर्षक से लिखे गए पत्र में कुल 208 अकादमिक विद्वानों के हस्ताक्षर हैं। शिक्षाविदों के इस पत्र के बाद देश में नए किस्म की बहस शुरू हो गई है। लेफ्ट विंग पर जिस तरह का निशाना साधा गया है, वह बता रहा है कि देश की शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा करने की जरूरत है और शैक्षिक परिसरों की व्यवस्था इस तरह से करने की जरूरत है, जिससे वहां पढऩे गए छात्र-छात्राओं को बेवजह के विवाद का शिकार न होना पड़े। इस तरह का माहौल बनाने के कई रास्ते हैं। पहला तो यह कि शिक्षा संस्थानों में सरकार छात्र राजनीति पर सरकार रोक लगाए। विश्वविद्यालयों में चुनाव कराने और नेतागिरी करने का मार्ग सरकार ने ही तैयार किया है। जब वहां राजनीति खत्म होगी तो सब अपने आप ही ठीक हो जाएगा। वैसे भी राजनीति करने के लिए पूरा देश पड़ा है, सैकड़ों की संख्या में राजनीतिक दल हैं। जो जिस चाहे अपना सकता है। दूसरा रास्ता यह हो सकता है कि कॉलेज या विश्वविद्यालयों में आने वाले छात्रों से बॉंड भरवाया जाए कि वे राजनीति नहीं करेंगे और ऐसी कोई हरकत नहीं करेंगे, जिससे किसी समुदाय या धर्म को ठेंस पहुंचे। इससे कुछ अंकुश तो जरूर लगेगा। पिछले कुछ वर्षों मेंं कैंपस की राजनीति में कटुता का माहौल बना है, उसने शिक्षा के मायनों को ही बदल दिया है। कॉलेज में अब पढ़ाई नहीं होती, सामने वाले गुट या संगठन को कैसे पछाडऩा है, इसकी रणनीति बनती रहती है। जेएनयू में पिछले दिनों हुई हिंसा इसी का परिणाम है। हिंसा के दौरान उन छात्र-छात्राओं को भय के माहौल से दो-चार होना पड़ा, जिनका कोई कसूर नहीं था और वहां वे अपने बेहतर भविष्य का सपना संजोकर पहुंचे थे। किसी ने आज तक उन छात्रों की सुध लेने की कोशिश नहीं की। हिंसा के जिम्मेदार रहे हों या देश में अमन का झंडा उठाए वामदल और गैर भाजपाई। आज कॉलेज की राजनीति के नाम पर हर पार्टी अपना मतलब साधने में जुटी है। कोई समर्थन में पत्र लिखा रहा है तो कोई विरोध में। मगर इस पत्र-राजनीति के चक्कर में शिक्षा संस्थानों की तरफ किसी का ध्यान नहीं है।

बुन्देली कविता की धूम और लोकप्रियता…!
नईम कुरेशी
बुन्देलखण्ड को मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के 20 जिलों की माटी माना जा सकता है जहां आल्हा ऊदल से लेकर रानी लक्ष्मीबाई, छत्रसाल, मामा माहिल जैसे वीर व महावीर हुये थे और वेदव्यास से लेकर जगनिक जैसे कवि, ईसुरी जैसे लोक कवि, गंगाधर व्यास, शिवनन्दन मिश्र, जलज जी, जो जगदीश खरे के नाम से भी प्रसिद्ध रहे थे। सीता किशोर खरे जी के नाम बिना सब सूना व अधूरा कहा जाता है। मान्यवर सीता किशोर जी से तो दो बार मिलने का भी अवसर श्योढ़ा में डॉ. कामिनी जी के साथ हुआ था 1994-95 में करीब, आपके काव्य संग्रहों में- “पानी, पानीदार है” काफी लोकप्रिय रहा है। डॉ. सीता किशोर जी ने अनेकों छात्रों की पी.एच.डी. भी कराइऔ। उन्होंने काफी मात्रा में दोहे भी लिखे।
हमारे बुन्देलखण्ड के दतिया, झांसी, जालौन, टीकमगढ़ में, सागर में, बांदा में हुये हैं। डॉ. श्यामसुन्दर सौनकिया व अन्य साहित्यकारों ने इस पर काफी कुछ लिखा है। जगनिक तो बुन्देली के सबसे प्राचीन व आदिकवि माने जा सकते हैं। वो महोबा के राजा के मित्र कवि थे। उन्होंने आल्हा ऊदल लिखकर देश दुनिया को अमरकृति दी है। लोगों का मानना है कि इससे ज्यादा लोकप्रिय गान देश दुनिया में शायद कोई दूसरा न हो।
बुन्देलखण्ड के मऊरानीपुर में जन्मे ईसुरी भी बुन्देली भाषा के काफी लोकप्रिय कवि कहे जाते रहे हैं। उनकी फागों पर दतिया के लोकेन्द्र नागर जी ने काफी कुछ लिखा है। 1990 में “बुन्देली विरासत” पुस्तक लिखने व डी.डी.1 पर फिल्म बनाने के दौरान मुझे नागर ने ये पुस्तक भेंट की थी। ईसुरी जी का लेखन, सादगी भरा व मौलिक लेखन है जो लोकजीवन से पूरी तरह जुड़ा हुआ है। ईसुरी जी भी किसी मायने में लोकप्रियता में कम नहीं रहे हैं। उनकी रचनायें फाग विधा में उनका सृजन माना जाता रहा है।
वर्मा पुरवार
बुन्देली इलाके में जन्मे होने के बाद भी मुझे डॉ. वृन्दावन लाल वर्मा जी के परिजनों व अयोध्या प्रसाद कुमुद जी व डॉ. राजेन्द्र पुरवार डॉ. हरिमोहन पुरवार के अलावा अन्य लोगों से जो बुन्देल साहित्य के महान नायक रहे हैं मिलने का खास अवसर नहीं मिल सका। श्योंढ़ा की डॉ. कामिनी से जरूर कई यादगार मुलाकातें हैं।
बुन्देली विरासत पर दिल्ली दूरदर्शन की 1993 में फिल्म बनाने के दौरान भाई साहब हरिमोहन पुरवार से गहरा सम्पर्क हुआ। उन्होंने बुन्देली की महान सेवा की अनेकों पुस्तकें लिखकर, अपने निजी निवास में बुन्देली म्यूजियम स्थापित कर पुरवार साहब खुद भी एक बुन्देली विरासत हो गये हैं।
बुन्देलखण्ड के कवियों में, लेखकों में, जालौन के डॉ. राधेश्याम योगी, गुरसराय के डॉ. शिवाजी चौहान, टीकमगढ़ के राजीव नामदेव, जालौन की डॉ. रेनू चन्द्र, डॉ. माया सिंह, डॉ. एल.आर. श्रीवास्तव, कृपा शंकर द्विवेदी, यूसुफ अंसारी, प्रिया श्रीवास्तव, रसूल अहमद सागर, मुजीब आलम, प्रो. भगवत दुबे आदि की रचनायें देखी जाती रही हैं। डॉ. रसूल अहमद साहब सागर का रचना संचार काफी बड़ा है। बुन्देली इलाके में जन्म चन्द बड़े अफसरान जालौन के सुभाष त्रिपाठी पूर्व पुलिस महानिर्देशक म.प्र. पुलिस व रमेश त्रिपाठी सचिव भारत सरकार जे.एम. कुरेशी साहब, सागर जिले के थे। यू.पी.एस.सी. के चैयरमैन रहे थे। काफी सम्पर्क भी रहा इन सबसे कुरेशी साहब ने ही मेरी पहली फिल्म बुन्देली विरासत बनवायी। इसके बाद केन्द्रीय रेलमंत्री माधवराव सिंधिया ने बनवायी थी। बुन्देलखण्ड के साहित्यकारों में सब एक से बढ़कर एक हैं। उन्होंने बुन्देली भूमि के गौरव को लगातार बढ़ाया है।
राजमाता व त्रिपाठी
बुन्देलखण्ड में जालौन से विधानसभा अध्यक्ष यू.पी. से चतुर्भुज शर्मा से लेकर ध्यानेन्द्र मामा राजमाता विजयाराजे सिंधिया से लेकर माधवराव जी सिंधिया, विद्यावती चतुर्वेदी, प्रहलाद पटेल, सत्यवृत चतुर्वेदी आदि काफी लोकप्रिय रहे है। मुझे राजमाता सिंधिया, ध्यानेन्द्र मामा व माधवराव सिंधिया से मिलने का 30-40 साल का गहरा अनुभव रहा। ये सब लोग महान व आम जनता के लिये गहराई से सोचने वाले दिखाई दिये। झांसी के दो बड़े अफसरान डॉ. प्रमोद अग्रवाल जो बंगाल में मुख्य सचिव रहे थे खुद भी 60 पुस्तकों के लेखक रहे हैं लोकप्रिय हैं, मिलनसार हैं। ओ.पी. रावत भी मुख्य चुनाव आयोग में रहे ईमानदार, निडर अफसरों में उनका नाम आता है, शशिकला खत्री अच्छी प्रशासनिक महिला अधिकारी के तौर पर लोकप्रिय हैं। डॉ. आर.एल.एस. सेंगर, अक्षय निगम, डॉ. के. जैन अच्छे लोकप्रिय डॉक्टर्स के तौर पर ग्वालियर व बुन्देलखण्ड में माने जाते हैं।

विश्व-हिंदीः नौकरानी है, अब भी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आज विश्व हिंदी दिवस है लेकिन क्या हिंदी को हम विश्व भाषा कह सकते हैं ? हां, यदि खुद को खुश करना चाहें या अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना चाहें तो जरुर कह सकते हैं, क्योंकि यह दुनिया के लगभग पौने दो सौ विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है (इनमें भारत के भी हैं), दुनिया के लगभग आधा दर्जन प्रवासी भारतीयों के देशों में किसी न किसी रुप में यह बोली और समझी जाती है और कई देशों में विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित होता रहा है। 1975 में प्रथम बार यह नागपुर में आयोजित हुआ है। लगभग 50 साल इस विश्व हिंदी सम्मेलन को आयोजित होते हुए हो गए लेकिन हिंदी की दशा आज भी भारत में नौकरानी की है। अंग्रेजी आज भी भारत की महारानी है और हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएं उसकी नौकरानियां हैं। देश में कांग्रेस और विरोधी दलों की इतनी सरकारें पिछले 72 साल में बनी लेकिन किसी प्रधानमंत्री की हिम्मत नहीं पड़ी कि इस अंग्रेजी महारानी को उसके सिंहासन से नीचे उतारे। भाजपा और नरेंद्र मोदी को 2014 में हम इसीलिए लाए थे। उनके लिए हमने अपना सारा अस्तित्व और संबंध दांव पर लगा दिए थे लेकिन इन पिछले साढ़े पांच वर्षों में हुआ क्या ? सिर्फ संयुक्तराष्ट्र में हिंदी का भाषण मोदी और सुषमा ने पढ़ दिया बाकी हर जगह आपको हिंदी वैसी ही पायदान पर बैठी मिलेगी, जैसी वह लाॅर्ड मैकाले के जमाने में बैठी हुई थी। कानून, चिकित्सा, इंजीनियरी, अंतरराष्ट्रीय राजनीति आदि किसी विषय की उच्च शिक्षा हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा में नहीं होती न कोई शोध होता है। सरकार के फैसले, संसद के कानून, अदालतों के फैसले, मरीजों का इलाज- ये सब काम अंग्रेजी में होते हैं। देश का ठगी का यह सबसे बड़ा कारोबार है। मैं अंग्रेजी या किसी विदेशी भाषा को स्वेच्छया पढ़ने-पढ़ाने का पूर्ण समर्थक हूं लेकिन जब तक स्वभाषा में काम नहीं होगा, यह भारत एक नकलची, फिसड्डी और पिछलग्गू देश बना रहेगा। हम हिंदी को विश्व भाषा तो जरुर कहते हैं लेकिन हमें यह कहते हुए जरा भी शर्म नहीं आती कि भारत के प्रांतों के बराबर जो देश हैं उनकी भाषाएं तो संयुक्त राष्ट्र संघ में मान्य है और हिंदी को वहां घुसने की भी इजाजत नहीं है।

आध्यात्मिक गुरु भी थे स्वामी विवेकानन्द
डॉक्टर अरविन्द जैन
स्वामी विवेकानन्द (जन्म: 12 जनवरी,1863 – मृत्यु: 4 जुलाई,1902) वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत “मेरे अमरीकी भाइयो एवं बहनों” के साथ करने के लिये जाना जाता है। उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था।
कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली परिवार में जन्मे विवेकानंद आध्यात्मिकता की ओर झुके हुए थे। वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से काफी प्रभावित थे जिनसे उन्होंने सीखा कि सारे जीव स्वयं परमात्मा का ही एक अवतार हैं; इसलिए मानव जाति की सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है। रामकृष्ण की मृत्यु के बाद विवेकानंद ने बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा किया और ब्रिटिश भारत में मौजूदा स्थितियों का पहले हाथ ज्ञान हासिल किया। बाद में विश्व धर्म संसद 1893 में भारत का प्रतिनिधित्व करने, संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए कूच की। विवेकानंद के संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में हिंदू दर्शन के सिद्धांतों का प्रसार किया , सैकड़ों सार्वजनिक और निजी व्याख्यानों का आयोजन किया। भारत में, विवेकानंद को एक देशभक्त संत के रूप में माना जाता है और इनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।
भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती, अर्थात १२ जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् १९८४ ई. को ‘अन्तरराष्ट्रीय युवा वर्ष’ घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की कि सन १९८४ से 12 जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयन्ती का दिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में देशभर में सर्वत्र मनाया जाए।ऐसा अनुभव हुआ कि स्वामी जी का दर्शन एवं स्वामी जी के जीवन तथा कार्य के पश्चात निहित उनका आदर्श—यही भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हो सकता है।
वास्तव में स्वामी विवेकानन्द आधुनिक मानव के आदर्श प्रतिनिधि हैं। विशेषकर भारतीय युवकों के लिए स्वामी विवेकानन्द से बढ़कर दूसरा कोई नेता नहीं हो सकता। उन्होंने हमें कुछ ऐसी वस्तु दी है जो हममें अपनी उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त परम्परा के प्रति एक प्रकार का अभिमान जगा देती है। स्वामी जी ने जो कुछ भी लिखा है वह हमारे लिए हितकर है और होना ही चाहिए तथा वह आने वाले लम्बे समय तक हमें प्रभावित करता रहेगा। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में उन्होंने वर्तमान भारत को दृढ़ रूप से प्रभावित किया है। भारत की युवा पीढ़ी स्वामी विवेकानन्द से निःसृत होने वाले ज्ञान, प्रेरणा एवं तेज के स्रोत से लाभ उठाएगी।
भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती, अर्थात १२ जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् १९८४ ई. को ‘अन्तरराष्ट्रीय युवा वर्ष’ घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की कि सन १९८४ से 12 जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयन्ती का दिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में देशभर में सर्वत्र मनाया जाए। भारत सरकार का विचार था कि –
ऐसा अनुभव हुआ कि स्वामी जी का दर्शन एवं स्वामी जी के जीवन तथा कार्य के पश्चात निहित उनका आदर्श—यही भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हो सकता है।
अमेरिका में दिया गया भाषण —
मेरे अमरीकी भाइयो और बहनो!
आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया हैं उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा हैं। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ; धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ; और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ।
मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत- दोनों की ही शिक्षा दी हैं। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था। ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है। भाईयो मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ जिसकी आवृति मैं बचपन से कर रहा हूँ और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं:
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥
अर्थात जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।
यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है:
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥
अर्थात जो कोई मेरी ओर आता है-चाहे किसी प्रकार से हो-मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।
साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई पूरे के पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये वीभत्स दानवी शक्तियाँ न होतीं तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया हैं और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टा ध्वनि हुई है वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो।
स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं –
१. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास हो सके।
२. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक के चरित्र का निर्माण हो, मन का विकास हो, बुद्धि विकसित हो तथा बालक आत्मनिर्भन बने।
३. बालक एवं बालिकाओं दोनों को समान शिक्षा देनी चाहिए।
४. धार्मिक शिक्षा, पुस्तकों द्वारा न देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा देनी चाहिए।
५. पाठ्यक्रम में लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार के विषयों को स्थान देना चाहिए।
६. शिक्षा, गुरू गृह में प्राप्त की जा सकती है।
७. शिक्षक एवं छात्र का सम्बन्ध अधिक से अधिक निकट का होना चाहिए।
८. सर्वसाधारण में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जाना चाहिये।
९. देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाय।
१०. मानवीय एवं राष्ट्रीय शिक्षा परिवार से ही शुरू करनी चाहिए।
रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था-“उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा-‘शिव!’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।
इस देश के गौरव को शत शत नमन ।।

निर्भया को न्याय
सिद्धार्थ शंकर
पूरे देश को झकझोर देने वाले निर्भया कांड में अदालत ने मंगलवार को चारों दरिंदों को डेथ वारंट यानी फांसी देने का समय तय कर दिया। सात साल पुराने मामले में पटियाला हाउस कोर्ट ने चारों दोषियों अक्षय सिंह, विनय कुमार शर्मा, मुकेश कुमार और पवन गुप्ता को 22 जनवरी की सुबह सात बजे फांसी देने का आदेश दिया। बता दें कि 16 दिसंबर, 2012 को दक्षिणी दिल्ली इलाके में चलती बस में 23 साल की पैरामेडिकल छात्रा ‘निर्भयाÓ से गैंगरेप किया गया था। 29 दिसंबर को सिंगापुर में इलाज के दौरान पीडि़ता की मौत हो गई थी। इस मामले में पुलिस ने बस चालक सहित छह को गिरफ्तार किया था। इनमें से एक नाबालिग भी था। उसे तीन साल तक सुधार गृह में रखने के बाद रिहा कर दिया गया था। एक आरोपी राम सिंह ने जेल में खुदकुशी कर ली थी। चारों आरोपियों को फांसी की सजा देने से निर्भया को भले ही इंसाफ मिल जाए, मगर देश में अब भी ऐसी कई निर्भया हैं जो इंसाफ के लिए इंतजार कर रही हैं। लगातार बढ़ते जा रहे बलात्कार के केस हमारी व्यवस्था को कोस रहे हैं। न्याय की गति बढ़ाने के उपाय मंद पड़े हैं। ऐसे में सिर्फ एक मामले में हुए न्याय को हम पूरे देश की बेटियों की जीत नहीं बता सकते। ऐसा कर हम उन बेटियों के घाव पर मरहम तो लगा सकते हैं, मगर उन्हें यह कह पाने का माद्दा नहीं रखते कि सभी का फैसला जल्द होगा। निर्भया कांड को ही देखें तो दोषियों को सजा देने में सात साल का वक्त लग गया। पीडि़त परिवार इन वर्षों में हर रोज मरकर जिया होगा। उसके दुख और पीड़ा की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। ऐसी न जाने कितनी पीडि़त होंगी, जो आज अपने दर्द से घुट-घुटकर मर चुकी होंगी। न्याय का इंतजार जितना लंबा होता है, उसकी टीस उतनी ही गहरी। इसलिए हमें एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जो कम से कम बलात्कार के मामलों में सजा देने की दर को बढ़ाए।
अगर निर्भया के मामले को ही देखें तो डेथ वारंट जारी होने के बाद भी चारों को फांसी की सजा 22 जनवरी को दी जाएगी, इसमें संदेह है। दोषियों के वकील यह दावा कर रहे हैं कि उनके पास अभी कुछ और कानूनी विकल्प हैं। नि:संदेह जघन्य अपराध के दोषियों को भी उपलब्ध कानूनी विकल्प इस्तेमाल करने का अधिकार है, लेकिन सबको पता है कि इन विकल्पों की आड़ में किस तरह तारीख पर तारीख का खेल खेला जाता है। यह केवल हास्यास्पद ही नहीं, बल्कि शर्मनाक भी है कि 2012 के जिस मामले ने पूरे देश को थर्रा दिया था, उसके दोषियों की सजा पर अमल अब तक नहीं हो सका है और वह भी तब, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला 2017 में ही सुना दिया था। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह न्याय प्रक्रिया की कच्छप गति को ही बयान करता रहा। न्याय प्रक्रिया की सुस्त रफ्तार से न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पदों पर बैठे लोग अनजान नहीं, लेकिन दुर्भाग्य से उन परिस्थितियों का निराकरण होता नहीं दिखता, जिनके चलते समय पर न्याय पाना कठिन है।
बलात्कार-हत्या जैसे जघन्य अपराधों में जिस तेजी से मामलों का निपटारा होना चाहिए, वह मौजूदा न्यायिक व्यवस्था में बेहद मुश्किल है। न्यायिक प्रक्रिया इतनी लंबी खिंचती चली जाती है कि कई बार न्याय की उम्मीद खत्म हो जाती है। निर्भया कांड को सात साल हो चुके हैं। लेकिन अभी तक बचाव पक्ष के लोग कानूनी दांवपेंचों का सहारा लेते हुए बचाव का कोई न कोई रास्ता निकालने की जुगत में हैं। वरना एक दोषी का वकील अदालत के समक्ष ऐसा विचित्र तर्क क्यों रखता कि दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के कारण जीवन छोटा होता है, उसके मुवक्किल के साथ अन्याय हुआ है, या उसका मामला मीडिया के दबाव से प्रभावित रहा है। जबकि हकीकत यह है कि इस मामले में मीडिया और देशभर में चले आंदोलन से जो दबाव बना, उसी से अदालतों ने भी इसमें फुर्ती दिखाई। वरना देशभर में हजारों मामले ऐसे होंगे जो सालों से लटके पड़े होंगे और जिनकी सुनवाई के बारे में किसी को कोई खबर नहीं होगी। अपराधी, आरोपी और दोषी न्यायिक व्यवस्था की इसी खामी का फायदा उठाते हैं और ज्यादातर मामलों में सजा नहीं हो पाती।
निर्भया कांड के बाद महिला सुरक्षा की दिशा में केंद्र सरकार ने जो कदम उठाए, जिस तरह के सख्त कानून बनाए, राज्यों को ऐसे मामलों से निपटने के लिए जो कड़े निर्देश दिए थे, वे एक तरह से बेअसर ही साबित हुए। राज्यों ने इस दिशा में कोई उल्लेखनीय कदम नहीं उठाया। बिहार, उत्तर प्रदेश सहित देश के तमाम राज्यों महिलाओं के प्रति ऐसे अपराधों का ग्राफ काफी ऊंचा है। उत्तर प्रदेश के उन्नाव कांड तक ने सबको हिला दिया था। आरोपी सत्तारूढ़ दल का विधायक था, इसलिए लंबे समय तक बचता रहा। सात साल में उत्तर प्रदेश में ऐसी न जाने कितनी वारदात हुई हैं, लेकिन किसी भी मामले में पीडि़त पक्ष को न्याय नहीं मिला। ऐसे मामलों के निपटारे के लिए कुछ दिन पहले ही उत्तर प्रदेश सरकार ने त्वरित अदालतोंके गठन का फैसला हुआ है। पीडि़तों को न्याय दिलाने के प्रति सरकार की उदासीनता एक बड़ी समस्या है। इसी से अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं। अदालतों की अपनी मजबूरियां हैं। स्थानीय पुलिस की भी इसमें बड़ी भूमिका रहती है। अपराधियों को अक्सर मिलने वाला राजनीतिक संरक्षण किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में महिलाएं कैसे सुरक्षित रहेंगी, यह गंभीर सवाल है।

तनाव है तो होने दे, इसमें बुरा क्या है?
डॉ नीलम महेंद्र
स्ट्रेस यानी तनाव। पहले इसके बारे में यदा कदा ही सुनने को मिलता था। लेकिन आज भारत समेत सम्पूर्ण विश्व के लगभग सभी देशों में यह किस कदर तेज़ी से फैलता जा रहा है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज हर जगह स्ट्रेस मैनेजमेंट अर्थात तनाव प्रबंधन पर ना सिर्फ अनेक जानकारियाँ उपलब्ध हैं बल्कि इस विषय पर अनेक रिसर्च भी की जा रही हैं। कहा जा सकता है कि आज तनाव ने एक ऐसी महामारी का रूप ले लिया है जो सीधे तौर पर भले ही जानलेवा ना हो लेकिन कालांतर में अनेक बीमारियों का कारण बनकर हमारे जीवन को जोखिम में अवश्य डाल देती है। हमारे बुजुर्गों ने भी कहा है, “चिंता चिता समान होती है”। लेकिन दिल थाम कर रखिए तनाव कितना भी बुरा हो लेकिन इस लेख के माध्यम से आपको तनाव के विषय में कुछ ऐसी रोचक जानकारियाँ दी जाएंगी जिससे तनाव के बारे में आपकी सोच ही बदल जाएगी और आप अगर तनाव को अच्छा नहीं कहेंगे तो यह तो जरूर कहेंगे कि “यार तनाव है तो होने दे, इसमें बुरा क्या है?”
यकीन नहीं है ? तो हो जाईए तैयार क्योंकि अब पेश है, तनाव के विषय में लेटेस्ट रिसर्च जो निश्चित ही आपके तनाव को कम करने वाला है।
सबसे पहले तो हमारे लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि हमारा शरीर कुदरती रूप से तनाव झेलने के लिए बनाया गया है, जीवन में यकायक आने वाली मुश्किलों से लड़ने के लिए ईश्वर द्वारा हमारे मस्तिष्क में कुछ डिफॉल्ट फंक्शन फीड किए गए हैं। इसे यूँ समझते हैं। कल्पना कीजिए आप जंगल में रास्ता भटक गए हैं और अचानक आपके सामने एक शेर आ जाता है, या फिर आप सुबह सुबह सैर के लिए निकलते हैं अचानक एक कुत्ता आपके पीछे पड़ जाता है। आपका दिल तेज़ी से धड़कने लगता है आपका रक्तचाप बढ़ जाता है आपको पसीना आने लगता है, आदि आदि। क्योंकि इस वक्त हमारा शरीर अतिरिक्त ऊर्जा से भर जाता है जो अब हमारे लिए जीवनरक्षक सिद्ध होने वाली है। आइए अब इसके पीछे की वैज्ञानिक प्रक्रिया को समझने की कोशिश करते हैं। जैसे ही आपका मष्तिष्क किसी खतरे को भांपता है, तो मस्तिष्क में मौजूद हाइपोथैलेमस ग्रंथी द्वारा एक अलार्म बजा दिया जाता है और हमारा पूरा शरीर “हाई अलर्ट” मुद्रा में आ जाता है। हमारे ही शरीर में मौजूद एक दूसरी ग्रंथी एड्रीनल ग्लैंड से हॉर्मोन का स्राव होने लगता है। ये हॉर्मोन हैं एड्रीनलीन और कोर्टिसोल। एड्रीनलीन हमारे दिल की धड़कन को बढ़ाता है, हमारे रक्तचाप को बढ़ाता है और हमारे शरीर को ऐसे समय अतिरिक्त ऊर्जा उपलब्ध कराता है। जबकि कोर्टिसोल हमारे रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ाता है ताकि हमारे सेल्स को काम करते रहने की शक्ति मिले साथ ही रक्त में ऐसे पदार्थों की उपलब्धता भी निश्चित करता है जिससे घायल होने वाले ऊतकों की रिपेयरिंग की जा सके। इतना ही नहीं यह हमारे पाचन तंत्र की क्रियाशीलता कम कर देता है जिससे इन परिस्थितियों में हमारी भूख मर जाती है और हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देता है। परिस्थिति सामान्य होते ही हमारा मष्तिष्क स्वयं इन ग्रंथियों के स्राव को रोक देता है और हमारे दिल की धड़कन रक्तचाप भूख, सभी क्रियाएँ सामान्य होने लगती हैं। सोच कर देखिए अगर वाकई में आपका सामना एक शेर से हो जाए तो तनाव के उन क्षणों में हमारे शरीर में होने वाले ये परिवर्तन हमारे लिए वरदान हैं कि नहीं? तो अब आप क्या कहेंगे? तनाव अच्छा है या बुरा? तो आइए यह अच्छा है या बुरा इसका उत्तर देने से पहले हम इसके अच्छा होने से लेकर बुरा बन जाने तक के सफर को भी समझ लेते हैं।
दरअसल जब धरती पर मानव जीवन की शुरुआत हुई थी तो वो जंगलों में जंगली जानवरों के बीच था। उस समय के तनाव ये ही होते थे कि किसी खूँखार जानवर से सामना हो गया। ऐसे समय में हमारे शरीर की यह प्रतिक्रियाएं वरदान साबित होती थीं लेकिन आज हमारे तनाव का रूप बदल गया है। आज हमारे सामने आर्थिक दिक्कत, टूटते परिवारों के परिणाम स्वरूप भावनात्मक असुरक्षा की भावना, व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता, तरक्की अथवा स्टेटस की परवाह जैसे मानसिक तनाव के अनेक कारण उपलब्ध हैं। इस प्रकार के तनाव की स्थिति का कोई व्यक्ति कैसे सामना करता है यह उसके व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। जैसे कोई ऐसी परिस्थितियों को एक चुनौती के रूप में स्वीकार कर सकता है तो कोई इन परिस्थितियों में अवसाद में चला जाता है। तनाव होने की स्थिति में हमारी प्रतिक्रिया ही वो बारीक सी रेखा है जो तनाव के अच्छा या बुरा होने के बीच की दूरी तय करती है। यही इसके अच्छे होने से लेकर इसके बुरा बन जाने तक का सफर है।
दरअसल यू एस में आठ सालों तक 30,000 लोगों पर एक प्रयोग किया गया। इस प्रयोग में उन लोगों को शामिल किया गया जो अलग अलग कारणों से तनावग्रस्त जीवन जी रहे थे। उन्हें यह समझाया गया कि यह तनाव उनके लिए अच्छा है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जिन लोगों ने इस विश्वास के साथ स्ट्रेस का सामना किया कि यह स्थिति उनके लिए अच्छी है उन्हें तनाव से कोई नुकसान नहीं पहुंचा लेकिन जिन लोगों ने तनाव का सामना तनाव के साथ किया उन्हें ना सिर्फ अनेक बीमारियाँ हुईं बल्कि उनमें मृत्यु की संभावना 43% बढ़ गई। इस रिसर्च से यह बात सामने आई कि लोगों की मौत का कारण तनाव नहीं बल्कि तनाव के प्रति उनकी प्रतिक्रिया है। ये बिल्कुल वैसा ही था जैसे कि अधिकांश लोग साँप के द्वारा डसे जाने पर उसके जहर से नहीं बल्कि शॉक से मरते हैं। तनाव के प्रति अपनी सोच को बदलकर हम अपने शरीर के उसके प्रति रेस्पॉन्स को बदल सकते हैं। क्योंकि इस रिसर्च में यह बात सामने आई कि जो लोग तनाव में थे स्वाभाविक रूप से उनकी ग्रंथियों से होने वाले हार्मोनल स्राव से उनका दिल तेज़ी से धड़कने लगा और शरीर के बाकी सेल्स को तीव्रता से रक्त पहुंचाने के लिए उनकी धमनियां सिकुड़ने लगीं। किन्तु जिन लोगों ने तनाव का कोई तनाव नहीं लिया और यह विश्वास किया कि यह तनाव उनके लिए अच्छा है, दिल उनका भी तेजी से धड़क रहा था लेकिन उनकी धमनियाँ संकुचित नही रिलैक्स्ड थीं। यह सब बहुत कुछ वैसा था जैसा वो खुशी के माहौल में या वीरतापूर्ण कार्यों में हमारी धमनियों में रक्त का संचार तो सामान्य से अधिक गति से होता है लेकिन वे संकुचित नहीं होतीं। यह बायोलॉजिकल बदलाव कोई छोटा मोटा बदलाव नहीं था। तनाव के विषय में यह नई खोज बताती है कि हम तनाव के विषय में कैसा सोचते हैं बेहद महत्वपूर्ण है। अगर हम यह सोचते हैं कि यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसकी मदद से मेरा शरीर आने वाली चुनौती का सामना करने के लिए मुझे तैयार कर रहा है तो निश्चित ही हमें सकारात्मक परिणाम मिलते हैं। तो अब उम्मीद है की तनाव की स्थिति में हम यह कहेंगे ,डू नॉट वरी बी हैप्पी आल इस वेल

जेएनयू का गुस्सा
सिद्धार्थ शंकर
जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में रविवार शाम बड़ी हिंसा हुई। लाठी-डंडे, हॉकी स्टिक से लैस नकाबपोश हमलावरों ने यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स और टीचरों को बेरहमी से पीटा। इसमें 25 से ज्यादा छात्र-टीचर घायल हो गए। यह घटना बताती है कि हमारे देश के शिक्षक संस्थानों में सुरक्षा का क्या हाल है। आए दिन कॉलेज में मारपीट, हॉस्टलों में अवैध गतिविधियां संचालित हो रही हैं। प्रशासन तमाशा देख रहा है। आज जिस जेएनयू हिंसा को लेकर पूरे देश में बवाल मचा है, उसमें जेएनयू प्रशासन की तरफ किसी की नजर नहीं है। आखिर क्यों। कॉलेज परिसर में नकाबपोश लोग अगर घुसे तो यह पुलिस की नाकामी नहीं, जेएनयू प्रशासन की है। दिल्ली पुलिस की गलती यह है कि वह समय पर नहीं पहुुंची। अगर घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस मौके पर आती तो शायद बवाल इतना बड़ा नहीं होता और बदमाशों को पकड़ भी लिया जाता। कहा जा रहा है कि यूनिवर्सिटी में खुलेआम घूमते और तोडफ़ोड़ करते नकाबपोशों की तस्वीरें सामने आ चुकी हैं। ये लोग दिन की रोशनी में डंडे लेकर घूमते दिखे। लेकिन ये नकाबपोश कौन थे और कहां से आए थे इसका जवाब दिल्ली पुलिस और जेएनयू प्रशासन को जल्द से जल्द सामने लाना होगा। सवाल फिर वही कि जेएनयू प्रशासन क्या कर रहा था। जेएनयू के गेटों पर कड़ी सुरक्षा रहती है, कोई भी बाहरी शख्स कैंपस में आसानी से दाखिल नहीं हो सकता है। छात्रों को भी आई कार्ड देखने के बाद ही प्रवेश मिलता है। अगर ये लोग बाहरी थे तो इतनी बड़ी तादाद में लाठी-डंडों और रॉडों के साथ कैसे और कहां से यूनिवर्सिटी में घुस आए। इसका जवाब यूनिवर्सिटी प्रशासन को देना ही होगा। इतनी देर तक कैंपस के अंदर हंगामा और स्टूडेंट्स के साथ मारपीट होती रही, इस दौरान यूनिवर्सिटी प्रशासन क्या कर रहा था। खासतौर से कैंपस में बड़ी तादाद में सिक्योरिटी गार्ड्स तैनात रहते हैं, वे सब इस दौरान क्या कर रहे थे। उन्होंने हमलावरों को रोकने या पकडऩे की कोशिश क्यों नहीं की। बहरहाल, जेएनयू में हुई हिंसा में छात्रसंघ अध्यक्ष आईशी घोष समेत 25 से ज्यादा छात्र और टीचर गंभीर रूप से घायल हुए, जिन्हें एम्स और सफदरजंग में भर्ती कराया गया। घटना के 17 घंटे बाद एफआईआर दर्ज हो पाई, मगर राजनीतिक बयानबाजी लगातार तेज होती जा रही है। कांग्रेस और लेफ्ट के नेताओं ने हिंसा के लिए केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। वहीं, भाजपा ने इस मामले में राजनीति न करने की सलाह दी है।
पुलिस कह रही है कि नकाबपोश युवकों की पहचान हो चुकी है, उन्हें जल्द गिरफ्तार किया जाएगा। गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्लनी के उप-राज्यपाल अनिल बैजल और दिल्ली पुलिस कमिश्नर से बात कर हिंसा पर तत्काल रिपोर्ट मांगी है। अगर पूरे विवाद पर नजर डालें तो फीस बढ़ोतरी के बाद प्रदर्शनों के बीच जेएनयू प्रशासन ने रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी थी और 5 जनवरी को उसकी आखिरी तारीख थी। हालांकि शनिवार को प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने रजिस्ट्रेशन के लिए जरूरी इंटरनेट और सर्वर के तार काट दिए, जिससे रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया ठप हो गई। जब कुछ छात्रों ने इस काम का विरोध किया तो कथित तौर पर उनके साथ मारपीट हुई और फिर फीस बढ़ोतरी के खिलाफ हो रहा प्रदर्शन एबीवीपी बनाम लेफ्ट में बदल गया। रविवार शाम से ही यह प्रदर्शन उग्र हो गया और नकाबपोश बदमाशों के आने के बाद भीड़ हिंसक हो गई। इस दौरान छात्र, टीचर सबकी पिटाई हुई। छात्रों ने बताया कि हमलावर लड़कियों के हॉस्टल में हमलावर पहुंच गए और दरवाजे खटखटाने लगे। कई हॉस्टल में जमकर तोडफ़ोड़ की गई। छात्रों का कहना है कि हमलावरों की संख्या 200 से ज्यादा थी। आरोप है कि अलग-अलग गेट से जेएनयू में पढऩे वाले एबीवीपी के कार्यकताओं ने उन्हें एंट्री करवाई। छात्रों ने सोशल मीडिया पर वॉट्सएप ग्रुप की चैट भी शेयर की है, जिसमें कैंपस में घुसने और स्टूडेंट्स लीडर्स को पीटने का प्लान बनाया गया है। हालांकि, यह सही है या फेक, यह पता नहीं लगा है। एक छात्र का कहना है हमलावरों ने सुबह से तैयारी की थी, दिन में पेरियार हॉस्टल के पास ये लोग नजर भी आए। दिन में प्रशासन से भी शिकायत की गई, लेकिन रविवार का बहाना देते हुए कोई कार्रवाई नहीं की गई। हैरानी की बात है कि यहां पुलिस सुबह से ही मौजूद थी, लेकिन हमला होते ही यहां से चली गई।

2020:वास्तविक समस्यायों से मुंह मोड़ना घातक होगा
भूपेन्द्र गुप्ता
क्या ‘विश्वगुरू’ भारत में होगी गरीब की जगह? 2020 की शुरुआत हो रही है। अच्छे माहौल में 2020 गुजरना चाहिए। गिरती हुई जीडीपी, बिखरती हुई अर्थव्यवस्था, चरम पर पहुंची बेरोजगारी और नागरिकता के नाम पर देश में लगाई गई आग ऐसे काम हैं जो तकलीफ देते हुए 2020 में भी बने रहेंगे लेकिन कोशिश यही रहे कि सौहार्द नहीं बिगड़े।
2020 कैसे सर्वहितैषी बने यह भारत जैसे महान देश को स्वयं सोचना पड़ेगा ।क्या अपने ही हाथों तैयार परेशानियां लेकर भारत का लोकतंत्र रोशन होगा? क्या मानव निर्मित परेशानियों के समाधान निकाल कर एक सम्यक भारत का निर्माण कर पाएंगे? पिछले कुछ साल भारत की आधी आबादी को डराने कोसने और उसके दमन करने की नीतियों को न्यायसंगत ठहराने में निकल गया है। कोई सकारात्मक काम नही हुए। दुर्भाग्यपूर्ण तो यह कि संघ के एक विचारक ने यहां तक कह दिया कि भारतीय परंपराओं में बलात्कार की सजा देने का कोई नियम नहीं है। इस तरह 2019 इस दकियानूसी साल था। आधी आबादी को कुचल देने वाली सोच को 2020 में नष्ट करना होगा।
कुछ सवाल हैं जो खड़े रहेंगे। जवाब हमे खोजना होगा। क्या अपने ही नागरिकों को अपना ही इतिहास खोजने के लिए विवश किया जाएगा? अपनी नागरिकता सिद्ध करने के अज्ञात अंधेरे की टनल से क्या उन्हें गुजारा जाएगा ?क्या यह व्यावहारिक है कि लोग 70 साल पीछे जाकर अपने माता पिता की जन्मतिथि की खोज करें उसके दस्तावेज उठाएं और राहत की सांस लें या वे अपने स्वयं के दस्तावेज के आधार पर भारत के गौरवमयी नागरिक कहलाएं। यह सवाल 2020 की सुबह के सामने चुनौतियों के रूप में खड़े हैं।
नये एनपीआर में जिन 15 तरह की जानकारियां दी जानी हैं उन्हें आसानी से प्राप्त नहीं किया जा सकता। माता और पिता की जन्म तिथि स्थान और उसके प्रमाण कहां से लाये जायेंगे जबकि पिता की पीढ़ी तो जन्म दिनों को संवत् और तिथियों के अनुसार याद रखती थी ।किसी अन्य बड़े व्यक्ति के जन्मदिन अथवा उसकी शादी की तारीख से जोड़कर आगे पीछे के दिनों के हिसाब से याद रखती थी। अब यह पूर्णता अव्यावहारिक है कि कोई व्यक्ति अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए 100 साल पुराने इस रिकॉर्ड की खोजबीन करे। कई महीने यह ढूंढने में ही खप जाएंगे कि जिस गांव में पिता का जन्म हुआ था उस गांव में उनके समय का कोई व्यक्ति जीवित भी हो। कल्पना करें कि हर नागरिक अपने होने का सबूत जुटाने में लगा है। मारा मारा फिर रहा होगा।
देश की वास्तविक समस्यायों से आज मुंह मोड़ना अनुचित होगा। देश में स्टील की कीमतें लगभग 34 प्रतिशत नीचे चली गईं है। मोटर उद्योग में लगभग 32 प्रतिशत खपत कम हुई है ।एफएमसीजी में भी लगभग 30 प्रतिशत खपत में कमी आई है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो बहुत ही विकट स्थिति है लगता है उनकी क्रय शक्ति जवाब दे चुकी है यही हाल दूसरे उत्पादन क्षेत्रों का है चाहे सीमेंट हो या अन्य जिससे अधोसंरचना क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है। आज हम अर्थव्यवस्था के उस बुरे दौर में पहुंच गए हैं जहां पर सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) और प्रति व्यक्ति अनुपात में हम वहीं पहुंच गये हैं जहां चीन 2002-03 में खड़ा था ।5प्रतिशतकी वास्तविक जीडीपी हासिल करना एक चुनौती है और मंदड़ियों का सोच है कि लंबी अवधि तक यही दर बनी रह सकती है।कहीं पाकिस्तान से दो-दो हाथ करने की उतावली में हम आगे बढ़ने के बजाय पीछे तो नहीं लौट रहे हैं। जो पाकिस्तान पहले ही मरा हुआ है उससे लड़ना हमारा ध्येय तो नहीं हो सकता।
हमारे बैंकों की हालत खराब हो चुकी है। सहकारी बैंक डूब रहे हैं बैंकों से कर्जा नहीं उठ रहा है स्वाभाविक है बैंकिंग उद्योग घाटे में जायेगा आज देश के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है जिससे हमें बाहर निकलना है और 2020 में इस चुनौती से बाहर निकलने के लिए हमें सी ए ए और एनसीआर जैसी थोपी गई प्राथमिकताओं से देश को बाहर निकलना पड़ेगा। देश की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि गरीब के पेट में खाना कैसे पहुंचे उसे काम कैसे मिले उसे रोजगार से कैसे जोड़ा जाए? हमें यह भी ख्याल रखना होगा कि भारत सिर्फ हिन्दुओं, मुसलमानों, सिखों ईसाईयों, पारसियों या किसी एक कौम का देश नहीं है। यह गरीबों का देश है। सभी कौमों में गरीब हैं। क्या उनकी भी कोई बात करेगा? क्या महान भारत और, विश्वगुरु भारत मे गरीब लोगों की भी जगह होगी?

कम हो तनाव
सिध्दार्थ शंकर
ईरान के दूसरे सबसे ताकतवर नेता जनरल कासिम सुलेमानी के बगदाद में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे जाने के बाद पूरे पश्चिम एशिया में तनाव अपने चरम पर है। इस हत्याकांड के बाद विश्व की 13वीं सबसे बड़ी सैन्य शक्ति ईरान और सुपर पावर अमेरिका के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है और दुनिया के तीसरे विश्वयुद्ध की ओर बढऩे की आशंका जाने लगी हैं। इस बीच खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव को देखते हुए अमेरिका ने 3 हजार अतिरिक्त सैनिक भेजने का फैसला किया है। इतना सब होने के बाद भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कह रहे हैं कि उनका देश ईरान के साथ युद्ध शुरू नहीं करना चाहता है लेकिन अगर इस्लामिक देश ने कोई जवाबी कार्रवाई की तो अमेरिका इससे निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार है। ट्रंप ने कहा, कासिम सुलेमानी की हत्या ईरान के साथ विवाद बढ़ाने के लिए नहीं की गई है। हालांकि, ईरान ने कहा है कि वह इस हत्याकांड का बदला लेगा। इस बीच ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा काउंसिल की राजधानी तेहरान में बैठक हुई है जिसकी अध्यक्षता ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई ने स्वयं की है। ऐसा पहली बार है जब खामेनेई ने किसी बैठक की अध्यक्षता की है। जो भी हो, हालात बेहद नाजुक हैं।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को देखते हुए सोशल मीडिया से लेकर राजनयिक हलके तक में तीसरे विश्वयुद्ध के शुरुआत की अटकलें तेज हो गई हैं। आशंका यह भी जताई जा रही है कि ईरान अमेरिका के सहयोगी इजरायल के सुरक्षाकर्मियों, होरमुज की खाड़ी में तेल टैंकरों और सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमले कर सकता है। उसके इस कदम में हिज्बुल्ला, हूती विद्रोही और सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद मदद कर सकते हैं।
सुलेमानी के मारे जाने से खाड़ी में फिलहाल जबरदस्त तनाव का माहौल है। इस तनाव से भारत भी अछूता नहीं रहेगा। अमेरिका के दबाव की वजह से ईरान के साथ भारत के रिश्ते पहले ही नाजुक दौर में हैं और अब ईरानी कमांडर के मारे जाने के बाद भारत और तेहरान के रिश्ते और भी जटिल हो सकते हैं। अमेरिका की इस कार्रवाई से महज दो हफ्ते पहले ही विदेश मंत्री एस. जयशंकर तेहरान पहुंचे थे। इस दौरान दोनों ही देश चाबहार पोर्ट को विकसित करने के प्रोजेक्ट को तेजी देने पर सहमत हुए थे। ईरान के साथ संबंध रखने वाले देशों पर प्रतिबंधों लगाने वाले अमेरिका ने भारत को चाबहार पोर्ट को विकसित करने की इस शर्त पर छूट दी है कि ईरानी सेना रिवोलूशनरी गार्ड्स इस प्रॉजेक्ट में शामिल न हो। चाबहार पोर्ट के जरिए भारत की अफगानिस्तान तक पहुंच सुनिश्चित होगी। चाबहार व्यापारिक के साथ-साथ रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण है। यह चीन की मदद से विकसित किए गए पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से महज 100 किलोमीटर दूर है। कभी चाबहार भारत की सीमा से सटा था। 10वीं सदी के मशहूर विद्वान और इतिहासकार अल बरूनी ने लिखा था कि भारत के समुद्री तट की शुरुआत चाबहार से होती है।
आज ईरान और अमेरिका एक दूसरे के कट्टर विरोधी हैं लेकिन एक वक्त में दोनों देशों के रिश्ते काफी मजबूत थे। 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद वॉशिंगटन और तेहरान के रिश्तों में तल्खी आ गई। इसके बाद भारत को भी तेहरान के साथ अपने रिश्तों को लेकर संतुलन साधना पड़ा। तब से नई दिल्ली अमेरिका और इजरायल के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को बरकरार रखते हुए तेहरान को भी साधे रखने की कोशिश करता है। ईरान के साथ भारत के रिश्तों की जटिलता सिर्फ अमेरिका और इजरायल की वजह से नहीं है। सऊदी अरब और ईरान की दुश्मनी भी जगजाहिर है। इस वजह से भारत के तेहरान से रिश्ते हमेशा नाजुक रहे हैं। ईरान शिया बहुल देश है जबकि खाड़ी की ज्यादातर राजशाही सुन्नियों की है। एक वक्त था जब ईरान भारत का मुख्य तेल आपूर्तिकर्ता था, लेकिन अमेरिका के दबावों की वजह से नई दिल्ली को तेहरान से तेल आयात को तकरीबन खत्म करना पड़ा। इस बीच अमेरिका बड़े तेल आपूर्तिकर्ता देश के तौर पर उभरा है और दुनियाभर में तेल और गैस का निर्यात कर रहा है। आज स्थिति यह है कि भारत की तेल जरूरतों के करीब 10 प्रतिशत की आपूर्ति अमेरिका से होती है जबकि ईरान से आपूर्ति शून्य के करीब है।
दरअसल भारत को अब चाबहार में अपने हितों को लेकर अमेरिका को आश्वस्त करने के लिए बड़ी मशक्कत करनी होगी। चाबहार चारों तरफ से जमीन से घिरे अफगानिस्तान तक संपर्क का जरिया होगा। इससे अमेरिका को भी फायदा होगा क्योंकि अफगानिस्तान नई दिल्ली और वॉशिंगटन दोनों के लिए काफी अहम है। दोनों देशों के वहां अपने-अपने हित हैं। चाबहार पर भारत को छूट देने को लेकर अमेरिका के एक अधिकारी ने पिछले महीने कहा था कि इससे भारत अफगानिस्तान में जरूरी सामानों को निर्यात करने में सक्षम होगा जो काबुल के भी हित में है। हालांकि, अगर खाड़ी में मौजूदा तनाव बड़े युद्ध का रूप लेता है तो चाबहार प्रोजेक्ट पर ग्रहण लग सकता है। इसके अलावा खाड़ी में भारत के करीब 50 लाख लोग काम करते हैं। ये भारत के लिए विदेशी पूंजी का एक बड़ा स्रोत भी हैं। तनाव बहुत ज्यादा बढऩे पर इन लोगों के वहां फंसने की आशंका भी रहेगी।

आओ प्रार्थना करें 2020 में बदल जाएं हमारे प्रतिमान
डॉ अजय खेमरिया
बदलते अवचेतन को बयां करती न्यू इंडिया की आइकॉन रैंकिंग मप्र के झाबुआ औऱ अलीराजपुर जिलों के करीब पांच सौ से अधिक गांवों में ” हलमा ” (एक वनवासी लोकप्रथा) के जरिये जल सरंक्षण और सहकार आधारित ग्राम्य विकास की अद्धभुत कहानी लिखने वाले पद्मश्री महेश शर्मा।
चित्रकूट और सतना सहित आधे बघेलखंड में ग्राम्य विकास,नवदम्पति मिशन,और पुलिस हस्तक्षेप से मुक्त ग्राम्यसमाज व्यवस्था की नींव रखने वाले नानाजी देशमुख।
जल जंगल,जमीन और जानवर के महत्व को समझ कर स्थानीय गरीबी के समेकित प्रक्षालन के लिए काम करने वाले महाराष्ट्र के धुले जिले के चेतराम पवार ।
ऐसे पारंपरिक सेवा,और लोककल्याण के अनगिनत कामों में भारत के हजारों लोग निस्वार्थ भाव से लगे है।लेकिन इन्हें आज का भारतीय समाज आदर्श नही मान रहा है।मीडिया इन्हें जगह नही देता है। अगर देता भी है तो परिस्थिति जन्य।ऐसे प्रकल्पों में धन और कारपोरेट की ताकत नहीं है।वे अंग्रेजी के बड़े अखबारों को पहले पेज के विज्ञापन के अपीलीय चेहरे जो नही।
यही कारण है कि हाल ही में फोर्ब्स के 100 प्रतिमान (आइकॉन)भारतीय चेहरों में एक भी सामाजिक क्षेत्र का व्यक्ति नही है।धन कमाने और मीडिया में मिले कवरेज को आधार बनाकर जिन 100 भारतीय आइकॉन को फोर्ब्स जैसी पत्रिका ने इस बर्ष जारी किया है उसमें सबसे उपर है विराट कोहली।नंबर दो पर अक्षय कुमार,फिर आलिया भट्ट दीपिका पादुकोण से लेकर अनुष्का शर्मा,महेंद्र सिंह धोनी,माधुरी दीक्षित, कटरीना कैफ,प्रियंका चोपड़ा,ऋषभ पंत,के आर राहुल,सोनाक्षी सिन्हा,के नाम शामिल है।
सेलिब्रिटीज की यह सूची दुनिया भर में हर साल जारी होती है।भारत के लिए इसका महत्व वैसे तो आम आदमी के सरोकार से समझे तो कोई खास नही है ।क्योंकि कोई कितना कमाता है और कितना मीडिया में जगह हासिल करता है इससे उसबहुसंख्यक भारतीय को कोई लेना देना नही है जो पेज थ्री और मेट्रो कल्चर से परे मेहनत मजदूरी कर अपने लिये दो जून की रोटी ही बमुश्किल जुटा पाता है।लेकिन भारत में पिछले तीन दशक से जिस नए मध्यम और निम्न मध्यमवर्गीय तबके का जन्म हुआ है उसके लिये इस सेलिब्रिटीज रैंकिंग का बड़ा महत्व है।यह सेलिब्रिटी रैंकिंग भारत गणराज्य में इंडियन और हिंदुस्तान के विभाजन को स्पष्ट करते सामाजिक आर्थिक विकास की कहानी भी है।सवाल यह है कि क्या नया भारतीय समाज सिर्फ धन के आदर्शों पर संकेंद्रित हो रहा है?क्या मीडिया निर्मित छवियाँ ही हमारे अवचेतन में आदर्श के रूप में स्थापित हो रही है। जो सिर्फ धनी है सम्पन्न है। और जिनकी करणी का सेवा,या उपकार, के भारतीय मूल्यों से कोई सरोकार नही। कैसे ये चेहरे हमारे लोकजीवन के आदर्शों में ढलते जा रहे है।
कला,संगीत,खेल ,व्यवसाय,उधमता का अपना महत्व है यह सभ्य लोकजीवन के आधारों में भी एक है। लेकिन जब समेकित रूप से हम समाज के आदर्शों की चर्चा करते है तो भारतीय सन्दर्भ पश्चिम से अलग पृष्ठभूमि पर नजर आता है।हम आज भी अपनी परोपकारी, सहकार, सहअस्तित्व, सहभागी औऱ समावेशी समाज व्यवस्था के बल पर ही हजारों साल से सभ्यता, संस्कृति और लोकाचार के मामलों में एक वैशिष्ट्य के साथ अक्षुण्ण बने हुए है।यह अक्षुण्यता
हमारी समाज व्यवस्था या सामूहिक चेतना में किसी आर्थिक संपन्नता की वजह से नही है,बल्कि वसुधैव कुटुम्बकम, अद्वेत,और सर्वजन सुखाय,सर्वजन हिताय जैसे कालजयी जीवन आदर्शों के चलते ही है।
इसलिये फोर्ब्स के यह ताजा सूची हमें आमंत्रित कर रही है कि हम हमारी समाज व्यवस्था के बदलते आइकॉन्स का विश्लेषण करें।हमें यह समझने की जरूरत है कि नई आर्थिकी से गढ़ी गई नई सामाजिकी के अवचेतन में अब हमारे जीवन मूल्य किस इबारत के साथ स्थापित हो रहे है।मिश्रित व्यवस्था वाले भारतीय से ग्लोबल कन्जयूमर में तब्दील करीब 30 करोड़ भारतीय (मिडिल एवं लोअर मिडिल क्लास का एक अनुमान आधारित आंकड़ा)क्या अपनी जड़ों से कट रहे है?क्या इस नए भारत के प्रतिमान पूरी तरह बदल रहे है?क्या इस विशाल तबके के लोकाचार में पैसा ,कमाई, औऱ जीवन शैली की सम्पन्नता के आगे की मूल भारतीय सोच महज रस्मी बनकर रह गई है?सवाल कई है जो हमें सामाजिक धरातल पर चेताने की कोशिशों में लगे है।सरकार द्वारा बाध्यकारी सीएसआर की परोपकारी सरकारी आर्थिक व्यवस्था ने असल में हमारे हजारों साल के लोकजीवन को कुचलने का प्रयास ही किया है।नया मध्यमवर्गीय भारत एक नकली सामाजिक चेतना को गढ़ रहा है।वह एक रात या सोशल मीडिया की आभासी लोकप्रियता जैसी अस्थायी अवधि वाले आदर्श को अपने अक्स में देखने लगा है।उसके लोकाचार में संवेदना की व्याप्ति सिर्फ खुद की चारदीवारी तक सिमट गई है।इसीलिये समाज में परिवार और रिश्तों की दरकन ने बड़ी गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।इसे समाजशास्त्र के नजरिये से समझा जाये तो कहा जा सकता है कि भारत मे नागरिकशास्त्र और समाजशास्त्र दोनों को उपभोक्ताशास्त्र ने अपनी जमीन से बेदखल सा कर दिया है।यही कारण है कि बिग बॉस और इंडियन आइडल जैसे मंचो की पकड़ हमारे मन मस्तिष्क में नाना जी देशमुख,जलपुरुष राजेन्द्र सिंह,नर्मदा सेवी अमृतलाल बेगड़,अपना घर भरतपुर या शिवगंगा झाबुआ के आग्रहों से अधिक है। गली की एक बिटिया अभावों से जूझती है एक दिन कलेक्टर बन जाती है लेकिन वह समाज और मीडिया के लिए क्षणिक आदर्श है उस बिटिया की तुलना में जो सिनेमा या रंगमंच के किसी कमाऊ या कारपोरेट प्लेटफॉर्म पर मौजूद है।
हमारे अवचेतन के 360 डिग्री कंज्यूमर बेस्ड बदलाव को समझिए उन विज्ञापनों से जो नहाने,पहनने,खाने,सोने,रतिकर्म, से लेकर विलासिता के हर उत्पाद से जुड़े है और हर उस उत्पाद के उपयोग की अपील कामुक भाव भंगिमा के साथ महिलाएं कर रही है।
फोर्ब्स की भारतीय सेलिब्रिटी लिस्ट में इस साल पॉर्नस्टार सनी लियोन भी शामिल है। क्योंकि उन्हें हम भारतीयों ने इंटरनेट पर सबसे ज्यादा सर्च किया है।इसलिये उनकी कमाई और मिडिया स्पेस किसी सुपर 30 वाले से ज्यादा रहा है। हमारी सामूहिक चेतना में सनी लियॉन सचिन शर्मा, आशीष सिंह या राजाबाबू सिंह जैसे नवाचारी और काबिल अफसरों से भी ज्यादा आदर्श स्थिति में है। जिन्होंने अजमेर और इंदौर जैसे शहरों को वैश्विक मानकों पर ला खड़ा किया या ग्वालियर चंबल जैसे डकैत प्रभावित जोन में सोशल पुलीसिंग की नई कहानी लिख दी है। असल में यह हमारे बदल चुके अवचेतन की ही कहानी है।जहां सनी लियॉन ने हमारे मध्यमवर्गीय समाज को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। तथ्य है जब समाज के चेतना का स्तर अपनी जड़ों से कट जाता है तब उस समाज के नए स्वरूप का अवतरण होता। भारतीय समाज इसी प्रक्रिया से गुजर रहा है। राजनीति, क्रिकेट,सिनेमा,क्राइम का घनीभूत हो चुका आवरण फिलहाल मस्तिष्क के किसी भी कोने में हमारे पारंपरिक लोकाचार को जगह देने के लिए तैयार नही है।केंद्रीय मंत्री प्रताप षड़ंगी को कोई नही जानता था मोदी कैबिनेट में जगह मिलने से पहले लेकिन प्रतापगढ़ के राजा भैया के लिए रॉबिनहुड बताने वाले 120 विशेष बुलेटिन अब तक जारी हो चुके है।हमारे 24 घण्टे खबरिया चैनल्स पर।आशा कीजिये हम विवेकानंद के आग्रह पर अपनी मूल चेतना की ओर लौटेंगे और अगले वर्ष जब यह सूची जारी हो तब उसमें सामाजिक क्षेत्र के चेहरे भी हमें नजर आएं।

विदेश नीतिः नरम-गरम, दोनों
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कई लोग पूछ रहे हैं कि विदेश नीति के हिसाब से पिछला साल कैसा रहा ? मैं कहूंगा कि खट्टा-मीठा और नरम-गरम दोनों रहा। कश्मीर के पूर्ण विलय को चीन के अलावा सभी महाशक्तियों ने भारत का आतंरिक मामला मान लिया। सउदी अरब और संयुक्त अरब अमारात (यूएई) ने भी भारत का स्पष्ट समर्थन किया। कश्मीर में धारा 370 खत्म करने और उसके पूर्ण विलय ने दुनिया में यह संदेश भेजा कि भारत सरकार का रवैया पहले की तरह ढीला-ढाला नहीं रहेगा। कश्मीर के पूर्ण विलय पर तुर्की और मलेशिया-जैसे देशों ने थोड़ी बहुत आलोचना की लेकिन दुनिया के अधिकतर राष्ट्रों ने मौन धारण कर लिया था। भारत के पड़ौसी मुस्लिम राष्ट्रों- बांग्लादेश, मालदीव और अफगानिस्तान ने भी भारत का समर्थन किया। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, उसे तो कड़ा विरोध करना ही था। उसने किया भी लेकिन अंतरराष्ट्रीय जगत तब भी कश्मीर के सवाल पर तटस्थ ही रहा। उसके पहले बालाकोट पर हुए भारत के हमले को चाहे पाकिस्तान ने ‘हवाई’ करार दे दिया हो लेकिन उसने मोदी सरकार की छवि में चार चांद लगा दिए। भारत-पाक संबंधों में इतना तनाव पैदा हो गया कि मोदी ने नए साल की शुभकामनाएं सभी पड़ौसी नेताओं को दी लेकिन इमरान को नहीं दीं। उधर इमरान ने करतारपुर साहब में सिखों के अलावा किसी के भी जाने पर पाबंदी लगा दी। यह हमारे उस नए नागरिकता कानून का जवाब मालूम पड़ता है, जिसमें पड़ौसी देशों के मुसलमानों के अलावा सबको शरण देने की बात कही गई है। इस कानून का सारी दुनिया में विरोध हो रहा है। इसने भारत में सारे विरोधी दलों को एक कर दिया है और सभी नौजवानों में जोश भर दिया है। यही वह कारण है, जिसके चलते अब इस्लामी सहयोग संगठन पाकिस्तान में कश्मीर के बहाने सम्मेलन करके इस मुद्दे को उठाएगा। दुनिया की कई संस्थाएं मानव अधिकार के मामले को कश्मीर और नागरिकता के संदर्भ में उठा रही हैं। अमेरिका के साथ हमारी व्यापारिक गुत्थी अभी तक उलझी हुई है और चीन के साथ व्यापारिक असंतुलन बढ़ता ही जा रहा है। सीमा का सवाल ज्यों का त्यों है। हमारे नागरिकता पैंतरे से बांग्लादेश नाराज है। हमारे पड़ौसी देशों में चीन की घेराबंदी बढ़ रही है। अफगान-संकट के बारे में भारत की उदासीनता आश्चर्यजनक है। हमारी विदेश नीति में कोई दूरगामी और गहन व्यापक दृष्टि अभी तक दिखाई नहीं पड़ रही है।

क्या और क्यों ? नागरिकता संशोधन अधिनियम एवं राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर
रघु ठाकुर
पिछले लगभग दो सप्ताह से देश में एक भूचाल सा आया हुआ है और देश के भिन्न भिन्न इलाकों में छुटपुट हिंसा की घटनायें भी हुई। पिछले लगभग 4-5 माह से लगतार ऐसी घटनायें घट रही हैं जो राष्ट्रीय एकता के लिए या देश के लिए वांछनीय नहीं है। भारत सरकार पहले एनआरसी का कानून लाई और गृहमंत्री ने एलान किया कि देश भर के ऐसे लोगों की छटनी की जायेगी जो देश के नागरिक नहीं है या कानून और नियमों के आधार पर नागरिकता के पात्र नहीं है। दरअसल इसकी शुरूआत तो आसाम के लोगों ने ही की थी। जब अस्सी के दशक में असम गण परिषद के नाम से गैर असमियों को बाहर निकालने का आन्दोलन किया था। इस आन्दोलन की मुख्य मांग बंग्लादेशी लोगों को बाहर निकालने की थी और बंग्लादेश से घुसपैठ रोकने की थी। क्योंकि बग्लादेशी सीमा भारत की असम की सीमा से सटी हुई है। पुराने कालखण्ड में बग्लादेश से लोग रोजगार के लिए आते रहे, असम के जमीन के मालकों ने उन्हें खेती या चाय बगानों में काम पर रखना शुरू किया और वे धीरे-धीरे बसते चले गये तथा परिवार बढ़ते गये। सन्् 1971 के बग्लादेश के निर्माण के समय जिस प्रकार पाकिस्तानी फौज ने बग्लादेशियों पर जुल्म किये उससे भी काफी लोग सीमा पार कर भारत में आये। 17वीं 18वीं सदी में अंगेजों ने चाय बगानो में काम करने के लिए देश के भिन्न-भिन्न अंचलों से मजदूरों को असम लाने का काम किया था। जिसमें बिहार, यू0पी0, कुछ उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल के मजदूर थे वे भी सदियों में आकर असम में बस गये। असम गण परिषद का अभियान मुख्य तौर पर बग्लादेशी मुसलमानों को निकालने का था और उसकी पीछे भाजपा, आरएसएस, जैसे संगठनों की अहम भूमिका थी। इसी तथाकथित असमियां अस्मिता के नाम पर वहां अगले चुनाव में असमगण परिषद की सरकार बनी और प्रफुल्ल महन्त सीएम बने। कालान्तर में बीजेपी और संघ ने असमगण परिषद का सत्व निचोड़ लिया और ए0जी0पी0 जो बड़ी पार्टी बनी थी जो घटकर तीसरे नंबर पर पहुंच गयी। इस दरमियान असम सरकार और केन्द्र सरकार ने भारत बंगला सीमा पर बाढ़ लगाने का तय किया। जो काम अभी भी अधूरा है। यद्यपि संघ 70 के दशक से यह प्रचार करता रहा, छपवाकर पर्चें बंटवाता रहता था कि देश में 10 करोड़ घुसपैठिये हैं। हालांकि एजीपी, बीजेपी और सभी सरकारें बमुश्किल कुछ हजार लोगों को ही विदेशी सिद्ध कर पाईं और निकाल पाईं। इसी बीच एनआरसी का प्रस्ताव जो पहले केन्द्र सरकार की फायलों में दबा पड़ा था निकल कर बाहर आया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने श्री हजेला को एनआरसी बनाने का काम सौंपा। उन्होंने अपनी निगरानी में एनआरसी बनवायें। करोड़ों रूपया खर्च होने के बाद श्री हजेला ने जो सूची बनायी उसमें भी भारी त्रृटियां पायी गयी। श्री हजेला ने अकेले असम के 19 लाख लोगों को एनआरसी से बाहर बताया। यहां तक कि सदियों से रह रहे परिवार जिनके लोग सेना में नौकरी करके रिटायर्ड हो चुके है उनको भी नागरिकता सूची से बाहर कर दिया गया। यह उन्होंने नियमों की या कानून की खामी की वजह से अथवा उनके दस्तावेजों की कमी की वजह से की या द्वेषभाव से किया। परन्तु उनकी एनआरसी सूची बनने के बाद भारी हल्ला हुआ और उन पर पक्षपात और भ्रष्टाचार के आरोप लगे। केन्द्र की भाजपा सरकार को कहना पड़ा यह सूची अंतिम नहीं है 19 लाख लोगों को निकाला नहीं जायेगा तथा सुप्रीम कोर्ट ने भी श्री हजेला को दोषी पाया और उन्हें कार्य से मुक्त कर दिया। कुल मिलाकर ढाक के तीन पात रहे। बीजेपी सरकार के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया क्योकि 19 लाख लोगों में अधिकांश लोग यू0पी0, बिहार और बंगाल आदि के हिन्दु है जो बीजेपी के मतदाता है जिन राज्यों से वह यहां पर काम पर आये है वहां भी उनके परिजन हिन्दू होने के नाम पर बीजेपी के मतदाता है। बीजेपी के इस वोट बैंक के गड़बढ़ाते गणित से स्वत: बीजेपी को कहना पड़ा कि हम नहीं मानते और इसे मान्य नहीं किया जावेगा। परन्तु कुल मिलाकर देश में भय और आशंका का माहौल बन गया।
अब दूसरा मामला सीएबी का आया याने नागरिकता संशोधन नियम इस कानून की धारा 6 में यह जोड़ा गया है कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बंगलादेश के हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध, जैन, पारसी और क्रिश्चियन समाज के लोगों को जो पांच वर्ष से भारत में रह रहे है को नागरिकता दी जा सकेगी। दरअसल भारतीय नागरिकता का कानून संविधान के लागू होने के लगभग पांच वर्ष बाद 1955 में संसद में पारित हुआ। इस कानून का मूल आधार था कि जो लोग भारत की जमीन पर या भारत में पैदा हुए हैं उन्हें भारत का नागरिक माना जावेगा। यथार्थ में 1946-47 में आजादी के पहले तत्कालीन कांगेस ने और मुस्लिम लीग ने बंटवारे के समझौते में जो आपसी निर्णय किया था कि अगर कोई व्यक्ति जो वर्तमान पाकिस्तान से भारत जाना चाहेगा या भारत से कोई व्यक्ति पाकिस्तान जाना चाहेगा तो उसे वहां जाकर बसने की अनुमति होगी। इस निर्णय से दोनों तरफ हिंसा और धार्मिक भावना का फैलाव हुआ। कुछ लोग अपने धार्मिक कारणों से, कुछ लोग हिंसा की वजह से भारत और पाक के बीच में आये गये। इसमें बड़ी अफरातफरी मची और मामला गैर धर्मावलंबियों को याने पाकिस्तान से हिन्दुओं और हिन्दुस्तान से मुसलमानों का अफरातफरी का सिलसिला चल पड़ा जिसका बड़ा कारण सम्पत्ति का लालच था। लाखों लोग इस अफरातफरी में साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार हुए और विशेषता इन्डो पाक की पश्चिमी सीमा और पूर्वी सीमा पर साम्प्रदायिक तनाव नहीं फैल सका क्योंकि महात्मा गांधी ने कलकत्ता तथा नोआखाली को अपने अभियान का केन्द्र बनाया था। उपवास किया और हिन्दु मुस्लिम नेताओं को आपसी संघर्ष से रोक दिया। जो काम अंग्रेज वाइसराय और भारत की सरकार की सेना पश्चिम की सीमा पर नहीं कर सकी वह काम महात्मा गांधी ने अकेले अपने अहिंसक साधन से पूरा कर दिया। जिसे बाद में अंग्रेज वाइसराय माउन्टवेंटन ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया और कहा कि हमारी लाखों की फौज पश्चिम सीमा पर साम्प्रदयिक हिंसा नहीं रोक पायी परन्तु गांधी – एक व्यक्ति सेना ने उसे पूरा कर दिखाया।
विभाजन के गलत निर्णय के परिणाम गंभीर हुये। जो लोग पाक सीमा से चलकर हिन्दुस्तान आये थे और शरणार्थियों के रूप में बसे थे उन्हें 1951 में एक आदेश पारित कर भारत सरकार ने देश का नागरिक मान लिया और उसके बाद उनके बच्चों आदि को 1955 में नागरिकता कानून के तहत नागरिकता मिल गई। इसके बाद भी लगातार पाकिस्तान से अधिकांश हिन्दू आबादी और कुछ मुस्लिम आबादी भी बहुत कम का भारत आने का सिलसिला चलता रहा। पाकिस्तान से आने वाले लोगों का बड़ा कारण पाकिस्तान के इस्लामिक देश बनने के बाद तनावपूर्ण जीवन था तथा वहां क्रमश: फैले कट्टरपंथी उनके जीवन को अधिक संकटपूर्ण बना रहे थे। पाकिस्तान ने ईश निंदा कानून लागू कर वहां के अल्पसंख्यकों को और भयभीत कर दिया। अनेक लोगों को इस कानून के नाम पर मृत्युदण्ड और उम्र कैद मिली जिससे भय और अधिक हो गया। गैर मुस्लिम आबादी को इस कानून के दुरूपयोग से भगाकर उनकी संपत्ति और रोजगार को छीनने के लालच में ज्यादा अन्याय हुये। 2019 के नागरिकता कानून के पारित होने के पहले भी लगातार पाकिस्तान से आने वाली हिन्दू आबादी के लोगों को नागरिकता मिलती रही है। उस समय सरकार ने 12 वर्ष के लिये बनाया था जो व्यक्ति लगातार 12 वर्ष तक रह गया हो उसे नागरिकता दी जा सकती है। हमारे देश के चलन के अनुसार नागरिकता दिलाने वाली एजेंसीज़ और अन्य लोग सक्रिय हो गये जो वहां से आने वालों से तगड़ी रकम वसूलते थे और उन्हें भारत की नागरिकता दिलाते रहे। इन नागरिकता पाने वाले लोगों में अधिकतर हिन्दू ही रहे जो ईसाई पाकिस्तान छोड़कर गये वे अधिकांशत: यूरोप के ईसाई बाहुल्य देश में गये। चूंकि पाकिस्तान के हिन्दूओं की रिश्तेदारियां भारत में थी अत: उन्हें भारत में आकर 12 साल टिके रहना, प्रमाण पत्र पाना आदि ज्यादा आसान था। इसी बीच 1990 के दशक में वैश्वीकरण के दौर शुरू होने पर यूरोप और अमेरिका से अप्रवासी भारतियों का आना शुरू हुआ तथा भारत सरकार ने उन्हें भारतीय मूल के आधार पर तथा एफ.डी.आई. (फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट) के तर्क पर द्वितीय नागरिकता देना शुरू कर दिया। यह कांग्रेस के जमाने में ज्यादा हुआ जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। इस माईग्रेसन में ज्यादातर लोग भारत से गये हुये हिन्दू लोग ही शामिल थे। याने गुजरात, पंजाब, राजस्थान, हरियाणा और भारत के अन्य प्रदेशों से गये वे लोग जो ब्रिटिश काल में या तो रोजी रोटी कमाने के लिये गये थे या गिरमिटिया मजदूर बनाकर ले जाये गये थे।
दरअसल नागरिकता संशोधन कानून में मूलभूत स्थितियों से कुछ ज्यादा फर्क नहीं है सिवाय इसके कि इसकी भाषा एक योजना के तहत लिखी गई। अगर सरकार संशोधन की धारा 6 में भा.ज.पा. सरकार ने केवल अल्पसंख्यक शब्द लिखा होता तो यह बवाल नहीं मचता और नागरिकता पाने के लिये आने वाली जमातें लगभग वहीं होतीं जो इस कानून के बाद हैं। जो लोग यह तर्क दे रहे हैं कि उदारता की सीमा नहीं बांधना चाहिये तथा मुसलमानों को भी जो धार्मिक अल्पसंख्यक नहीं हैं वरन्् मुस्लिम आबादी की संख्या के पंथगत अल्पसंख्यक हैं तथा बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी से पीढ़ित हैं यथा अफगानिस्तान और पाकिस्तान के शिया या कराची के मुहाजिर। उनका यह तर्क नि:संदेह मानवीय और ”वसुधैव कुटुम्बकम“ की कल्पना पर आधारित है परंतु केवल तर्क है व्यवहारिक तौर पर संभव नहीं है। आज कराची के मुहाजिर भारत में आकर 12 साल या 5 साल किसके यहां रहेगें। वे गरीब लोग मुसलमान है और उनके परिजन भी भारत में आमतौर पर अमीर नहीं है इसलिये पिछले 1955 से लेकर 2019 तक जितने आवेदन भारत की नागरिकता को प्राप्त हुये हैं उनमें मुस्लिम आवेदक नगण्य हैं, और एक प्रतिशत भी नहीं हैं। चीन में उईगर मुसलमानों को भी भारत आने का वीजा नहीं मिलेगा एक तो वहां की सरकार नहीं देगी और उनके भारत आने का कोई कारण नहीं बनता। न रिश्तेदारियां हैं और न सुविधा और साधन हैं। बंग्लादेश और वर्मा रोहिंग्या मुसलमानों के साथ भी यही स्थिति है। नागरिकता कानून जो 1955 में बना और उसके अंतर्गत जो नियम बने तथा 2019 का संशोधित कानून भारत में आकर पहले 12 वर्ष और अब 5 वर्ष के लगातार रहने के आधार पर है। यह कानून कोई न पहले और न अब दुनिया की बढ़ती आबादी या आंतरिक पीढ़ा के आधार पर नागरिकता देने का नहीं। 1971 में बंग्लादेश में मुक्तिवाहिनी को सहयोग के लिये भारतीय सेना को भेजने का आधार भी तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने यही निर्धारित किया था कि भारत इन 70 लाख से एक करोड़ भागे हुये शरणार्थियों का बोझ नहीं सह सकता और इसलिये भारत का हस्तक्षेप जरूरी है। यह निर्विवाद है कि आज भी भारत उन सीमित शरणार्थियों का बोझ उठाने की स्थिति में नहीं है। हमारे प्राकृतिक स्रोत भी इसे बर्दास्त नहीं कर सकेगें।
परंतु भा.ज.पा. की नीयत सांप्रदायिक गोलबंदी को हिन्दू को बढ़ाकर जैन, सिख, बुद्ध, पारसी, ईसाई आदि को अपने मतदाता समूह बनाने की है। और इसलिये उन्होंने चुनावी रणनीति के तौर पर मुसलमानों को अलग रखा और बकाया सबके नाम शामिल किये। दरअसल यह श्री नरेन्द्र मोदी का संशोधित कानून नहीं बल्कि संशोधित जाल है जिसमें उन्होंने प्रतिपक्ष को फांस लिया है। कल दिल्ली की रैली में आक्षेप किया कि कांग्रेस और विरोधियों ने इस कानून को बगैर पढ़े ही विरोध किया है। उनका आक्षेप सही है परंतु अर्धसत्य है क्या सरकार की यह जबावदारी नहीं बनती कि वह अपने प्रस्तावित कानूनों से आमजन को अवगत कराए। होना तो यह चाहिए था कि वे इस कानून को पारित करने के पहले और बाद में आमलोगों में प्रचारित कराते अखबारों में कानून को यथावत छपवाते, नागरिक समूहों को विश्वास में लेते। क्या जनमत को शिक्षित करना सरकार का दायित्व नहीं है। परंतु वे तो हिंसा ही चाहते थे ताकि उनके पक्ष के धार्मिक समूह के मतदाता एकजुट हों तथा विरोधी मतदाता व उनका वोट लेने वाली पार्टियां देश में खलनायक सिद्ध हों।
देश का प्रतिपक्ष भी सरकार गिराने या आक्षेप करने में इतना बेचैन हो उठा कि उन्होंने न तो संशोधित कानून को ठीक से पढ़ा और न प्रस्तुत किया, और मुस्लिम भाईयों को इतना भयभीत कर दिया कि उनकी नागरिकता समाप्त होने वाली हो। उन्हें देश से निकाले जाने वाला हो तथा मुस्लिम भाईयों को सड़कों पर और हिंसा पर ला दिया। सरकार के सुनियोजित षडयंत्र, प्रतिपक्ष की जल्दबाजी और अदूरदर्शिता तथा मुस्लिम मतदाता की बेचैनी को देश ने दस दिवसीय हिंसा के भयावय दौर पर ढकेल दिया और आखिरी में इतना कहना और जरूरी है कि मोदी सरकार के मंत्री भले ही विश्वविद्यालयीन शिक्षित हों परंतु लोगों को भड़काने के लिये जाने अनजाने गलत तर्क पेश कर रहे हैं।
श्री अर्जुन मेघवाल जो केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री भी हैं का लेख ”सात दसक से अधूरा काम पूरा“ शीर्षक से 21 दिसम्बर 2019 की पत्रिका में छपा है। वे लिखते हैं कि पाकिस्तान में 1947 में अल्पसंख्यकों की संख्या 30 प्रतिशत थी जो घटकर 2011 में 3.7 प्रतिशत रह गई। इसी प्रकार बंग्लादेश में अल्पसंख्यकों की संख्या 1947 में 22 प्रतिशत थी गिरकर 2011 में 7 प्रतिशत रह गई है। एक तो उन्हें यह याद रखना चाहिये कि 1947-1971 तक 24 वर्ष पाकिस्तान और बंग्लादेश एक ही देश था। 1947 में बंग्लादेश बना ही नहीं था उसकी जनगणना के आकड़े कैसे और कहां से निकाले। दरअसल देश में ये और दो उनके विश्वविद्यालय झूठे आंकड़ों को बढ़ाने और प्रसारित करने में बहुत सिद्धहस्त हैं वे हैं संघ विष्वविद्यालय और वॉट्सऐप विश्वविद्यालय। मैं सत्तापक्ष से कहूंगा कि वे सांप्रदायिकता की आग जलाकर वोट की रोटी सेंकना बंद करें क्योंकि देश के मन के ऊपर जो घाव बन रहे हैं उन्हें दूर करना लंबे समय तक कठिन हो जायेगा। और प्रतिपक्ष से भी अपील करूंगा कि वे मुद्दों को गहराई से सोचें और मोदी के जाल में फसने से बचें। दरअसल राजनीति का काम लोगों को जाग्रत करना और चैतन्य बनाना है नाकि उन्हें गुमराह कर मस्तिष्क को सुषुप्त कर हिंसा और अज्ञानता फैलाना।

नए साल में लेने होंगे नए प्रण
सिद्वार्थ शंकर
हर बार हम जो संकल्प लेते हैं, भले ही वे धरे के धरे रह जाते हों, भले ही हर साल नववर्ष की पूर्व संध्या पर बनाई गई हमारी तमाम योजनाएं भी अधूरी ही रह जाती हों, इसके बावजूद न हम संकल्प लेना छोड़ेंगे और न ही योजनाएं बनाना भी। हम इंसानों का यही स्वभाव है। इस धरती के तमाम दूसरे जीवों से हटकर मनुष्य की यही खूबी है कि वह कुछ करना चाहता है। अपनी तमाम नाकामियों से बार-बार प्रेरित होने का माद्दा हम में नहीं होता, तो हमारा इतिहास आज भी हजारों वर्ष पहले ही ठिठककर रह गया होता। इसलिए इससे हमें निराश नहीं होना चाहिए कि हर बार हमारे संकल्प अधूरे रह जाते हैं, हर बार योजनाएं बस योजनाएं ही बनी रहती हैं। इस वर्ष हम नाकामियों को भूलकर और निराशा से बाहर निकालकर फिर से नई योजनाएं बनाएं, नए संकल्प लें, नई प्रेरणाएं ढूंढें और नए लक्ष्य तय करें। यही इंसान होने की खूबी है और यही खूबसूरती भी। इसी खूबी के कारण हम धरती पर दूसरे जीवों से बेहतर हैं। बहरहाल, 2019 कितने भी कष्टों का वर्ष रहा हो, कितनी भी उठापटक का साल रहा हो, कितनी भी बेचैनियों और कितनी ही परेशानियों से रूबरू कराता रहा हो, लेकिन गुजरा साल हमें नए साल का एक तोहफा देकर गया है।
हर गुजरा साल हमें बहुत कुछ सिखाकर जाता है। यह तोहफा 2019 ने भी दिया है। अत: हमें उसका शुक्रगुजार जरूर होना चाहिए कि चाहे कैसी भी परिस्थितियां रही हों, हम उनसे जूझकर बाहर निकलने में सफल रहे। विषम परिस्थितियां हमें तोड़ नहीं पाईं। गुजरे वर्ष के प्रति आभारी होने के लिए क्या यह कम है कि उसने हमें टूटने नहीं दिया? उसने हमें जो सबक दिए हैं, याद तो उन्हें भी रखना होगा। साल 2019 हमारे लिए एक नहीं, तमाम सबक देकर गया है। उसने सभी के लिए अलग-अलग सबक दिए होंगे। अत: उनकी चर्चा करना न तो जरूरी है, न ही व्यावहारिक। लेकिन हमें अपने उन सभी सबकों को याद रखना चाहिए। प्रयास यह भी होना चाहिए कि जो गलतियां हमने बीते वर्ष की थीं, उन्हें फिर नहीं दोहराएंगे। यदि हम पुरानी गलतियों को न दोहराने का संकल्प ले सके तो यही एक बड़ी उपलब्धि भी होगी।
हां, कुछ सबक ऐसे भी हैं, जो पूरे समाज पर समान रूप से लागू होते हैं। बलात्कार की घटनाओं को लेकर यह साल खासा याद किया जाएगा। इस साल बलात्कार की ऐसी दर्दनाक और चर्चित घटनाएं सामने आईं, जिसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ा। नए साल में हमें सबसे पहला काम अपने नजरिए को पूरी तरह दुरुस्त करने का करना होगा। सकारात्मक सोच वह ताकत होती है, जो विषम परिस्थितियों को भी अंत में हमारे पक्ष में झुका देती है। इसके विपरीत हमारी सोच अगर नकारात्मक होगी तो वह अनुकूल स्थिति को भी हमारे खिलाफ कर देती है। विफलता व सफलता कुल मिलाकर हमारे नजरिए पर निर्भर करती है। अगर उदाहरण नोटबंदी का ही दें तो विपक्षी राजनीतिक दलों का कहना यह है कि 2016 के आखिरी में जिस तरह से नोटबंदी का कहर टूटा, उससे लाखों लोग बेरोजगार हुए हैं। पर इन लोगों का ध्यान इस तरफ क्यों नहीं जाता कि नोटबंदी के बाद जो लेन-देन और भुगतान के नए तौर-तरीके सामने आए हैं, भले ही वे मजबूरी में आएं हों, उनसे लाखों नए रोजगारों की संभावना बनी है। इसमें सकारात्मकता यह होगी कि हम अपने आप में योग्यता विकसित करें और इन अवसरों के दावेदार बनें। व्यक्तिगत स्तर पर हमें अपने चिंतन की दिशा को सकारात्मक ही रखना चाहिए। एक और संकल्प यह लिया जा सकता है कि यदि हम बेरोजगार हैं तो कोई ऐसा काम सीखें, जो हमें रोजी मुहैया कराए, जबकि हमारे पास यदि रोजगार है तो उसके हिसाब से हम अपने अंदर नई-नई योग्यताएं भी विकसित करें, ताकि दौड़ में पीछे न खड़ा होना पड़े। हम अपने बच्चों को भी कुशल बनाएं और इसके लिए स्कूलों-कॉलेजों के भरोसे न रहें।
इस साल देश को खुशी के पल भी मिले, तो हिंसा की आग से भी रूबरू होना पड़ा। पाकिस्तान पर भारत की एयरस्ट्राइक ने जहां करोड़ों हिंदुस्तानियों के दिल पर सुकून की लौ जलाई, वहीं नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ भड़की हिंसा की आग ने गंगा-जमुनी तहजीब वाले देश के मुंह पर कालिख भी पोती। 2019 का साल महिलाओं को संबल देने वाला रहा, तो उनकी आबरू सुरक्षित न रख पाने वाला भी। बीता साल अब नए साल में प्रवेश कर चुका है। हर दिन हमें नया करने और सेाचने को प्रेरित करता है। सो अब जबकि साल गुजर गया है, तो हमें बीती बातों को यहीं छोडऩा होगा और एक ऐसा देश और समाज बनाने का प्रण लेना होगा, जिसमें हर एक देशवासी सुखी हो और उसका जीवन किसी भी कष्ट के बिना बीते।
महिलाओं के लिए सुरक्षित समाज की नींव डालनी तो बेहद जरूरी है। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से महिलाओं के लिए असुरक्षित वातावरण बन रहा है वह हर भारतीय के लिए शर्मनाक है। हम बेटियों की आबरू नहीं बचा पा रहे हैं तो यह ठीक नहीं है। हमें इस दिशा में प्रण लेना ही होगा।

दिल्ली के लाक्षागृहों में खाक होती मासूम जिंदगियां
योगेश कुमार गोयल
दिल्ली में आगजनी की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही। बीते 8 दिसम्बर को दिल्ली के अनाज मंडी इलाके में भयावह अग्निकांड में हुई 46 मौतों के सदमे से दिल्ली अभी तक उबरी भी नहीं थी कि 20 दिनों के भीतर पांच और ऐसे ही अग्निकांडों ने न केवल हर किसी को अंदर तक झकझोर दिया है बल्कि सभी जिम्मेदार संस्थाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। 22 दिसम्बर की रात दिल्ली के किराड़ी इलाके में इंदर एनक्लेव में एक चार मंजिला इमारत के निचले हिस्से में बने कपड़ों के गोदाम में लगी आग ने पूरी इमारत को अपनी चपेट में ले लिया और देखते ही देखते यह आग 9 मासूम लोगों का काल बन गई। उसके दो ही दिन बाद 24 दिसम्बर को दिल्ली के नरेला इलाके में तीन फैक्टरियों में आग लग गई, जिसे बुझाने में 36 दमकल वाहनों की मदद से करीब 150 दकमलकर्मियों को सात घंटों तक कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। 27 दिसम्बर को सदर बाजार इलाके में एक इमारत में, महारानी बाग क्षेत्र में एक दुकान में तथा वसंत विहार इलाके में एक आवासीय इमारत में भीषण आग लग गई, जिसे दमकलकर्मियों ने कई घंटों की जद्दोजहद के बाद बुझाया। गनीमत यह रही कि आगजनी के इन हादसों में कोई हताहत नहीं हुआ। इससे पहले 8 दिसम्बर को अनाज मंडी इलाके में एक मकान में बहुमंजिला इमारत में चल रही फैक्टरी में लगी भयानक आग में 46 लोगों की मौत हो गई थी।
कितनी बड़ी विड़म्बना है कि दिल्ली में बार-बार ऐसे अग्निकांड सामने आते रहे हैं और लोग लाक्षागृह बनी ऐसी इमारतों में जलकर राख होते रहे हैं लेकिन ऐसे हादसों से कभी कोई सबक नहीं लिया जाता। दिल्ली में ऐसे अनेक इलाके हैं, जहां संकरी गलियों में अनेक फैक्टरियां या कारखाने चल रहे हैं और यह सब प्रशासन की नाक तले होता है। ऐसी लगभग तमाम औद्योगिक इकाईयों में आग से बचने के कोई इंतजाम नहीं होते लेकिन बार-बार होते ऐसे हादसों के बावजूद अगर उन पर कभी कोई कार्रवाई नहीं होती तो भला उसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए? अक्सर यही देखा गया है कि दिल्ली में अग्निकांड की घटनाएं हों या बहुमंजिला इमारतें गिरकर उनके तले दबकर मासूम लोगों के मारे जाने की, ऐसी दर्दनाक घटनाओं में प्रायः पीडि़तों को मुआवजा देने की घोषाणाएं कर सरकारों द्वारा अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती है और भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों, इसकी ओर से सब बेपरवाह हो जाते हैं। जब भी ऐसा कोई हादसा सामने आता है, तब ऐसी अव्यवस्थाओं पर खूब हो-हल्ला मचता है लेकिन चंद दिन बीतते-बीतते सब शांत हो जाता है और सारी व्यवस्था पुराने ढ़र्रे पर पूर्ववत रेंगने लगती है। ऐसे में गंभीर सवाल यही उठता है कि दिल्ली के इन अग्निकांडों का जिम्मेदार आखिर कौन है और कब तक ऐसे अग्निकांडों में जान-माल की बलि चढ़ती रहेगी? आखिर क्यों ‘मौत की नगरी’ बनती जा रही है दिल्ली? संकरी गलियों में ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच बिजली की हाई वोल्टेज तारों का मकड़जाल भी बड़े हादसों को न्यौता देता प्रतीत होता रहा है।
कहना असंगत नहीं होगा कि अगर अनाज मंडी इलाके के अग्निकांड में हुई 46 मौतों से कोई सबक लिया जाता और दिल्ली में अवैध रूप से बनी इमारतों तथा संकरी गलियों में चल रही अवैध फैक्टरियों पर लगाम कसने की कवायद शुरू कर दी गई होती तो शायद 22 और 24 दिसम्बर के हादसों से बचा जा सकता था। दिल्ली के कई इलाकों में तमाम नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाते कुकुरमुत्ते की भांति अवैध कारखाने फैले हैं, जहां हल्की सी चिंगारी को भी दावानल बनते देर नहीं लगती लेकिन शायद गहरी नींद में सोये अधिकारियों ने सोचा हो कि 8 दिसम्बर को घटी घटना के बाद अभी इतनी जल्दी कोई और घटना तो घटने वाली है नहीं, इसलिए क्यों ऐसे कारखानों पर लगाम लगाने के लिए बेवजह की जद्दोजहद की जाए। विड़म्बना है कि 1997 के उपहार सिनेमा की भीषण आग में खाक हुई 59 मासूम जिंदगियों की त्रासदी के बाद के इन 22 वर्षों में किसी ने कोई सबक सीखा। ऐसे हादसों के बाद अक्सर यही तथ्य सामने आते रहे हैं कि हादसाग्रस्त कारखानों वाली इमारतों में आग से बचने के कोई उपकरण नहीं थे और फिर भी वे धड़ल्ले से चल रहे थे।
कोई भी बड़ा हादसा होने के बाद मुख्यमंत्री, मंत्री तथा तमाम राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े नेता घटनास्थल पर पहुंचते हैं और मीडिया से मुखातिब होकर एक-दूसरे पर अपनी भड़ास निकालने के बाद वहां से खिसक लेते हैं। ऐसे अग्निकांडों में मासूम लोगों की मौत के बाद राजनीतिक दलों द्वारा एक-दूसरे पर दोषारोपण का घृणित दौर शुरू होता है लेकिन हकीकत यही है कि अगर इन्हीं लोगों ने नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए धड़ल्ले से चल रहे कारखानों पर सख्त कदम उठाने की पहल की होती तो ऐसे हादसे होते ही नहीं। बार-बार हो रहे ऐसे दर्दनाक हादसों के बाद भी इस बात का जवाब कहीं से नहीं मिलता कि आखिर संकरी गलियों में चल रहे अवैध कारखानों पर लगाम कब और कैसे लगेगी और जिम्मेदार अधिकारियों को दंडित करने के लिए सख्त कदम कब उठाए जाएंगे? सवाल यह भी है कि ऐसी संकरी गलियों में 4-5 मंजिला इमारतें कैसे बन गई और कैसे उनमें बिजली के मीटर लग गए? कैसे उन आवासीय इमारतों के भीतर औद्योगिक कारखाने स्थापित करने की इजाजत मिल गई? फायर विभाग के अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं होने के बावजूद अगर धड़ल्ले से ऐसे कारखाने दिल्ली के अनेक इलाकों में चल रहे हैं तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है? बहुत से ऐसे कारखाने भी हैं, जिन्हें फायर विभाग के अनापत्ति प्रमाण पत्र तो मिले हुए हैं लेकिन उनके पास आग बुझाने के जरूरी उपकरण ही नहीं हैं। आखिर उन्हें फायर विभाग द्वारा अनापत्ति प्रमाण पत्र कैसे दे दिए गए? जवाब बिल्कुल सीधा और स्पष्ट है कि यह सब प्रशासन और कारोबारियों की मिलीभगत तथा भ्रष्ट मंसूबों की ही देन है। ऐसे में बेहद गंभीर सवाल यही उठता है कि हमारे देश में लोगों की जान क्या इतनी सस्ती है कि सिस्टम इस तरह उनकी जिंदगी के साथ खेलता है? इसी का ताजा उदाहरण है 8 दिसम्बर को हुए अग्निकांड में 43 लोगों की मौत के बाद 22 दिसम्बर के अग्निकांड में हुुई 9 लोगों की दर्दनाक मौतें।
इस तरह का हर बड़ा हादसा हमें सबक के साथ-साथ कड़वे अनुभव भी देकर जाता है लेकिन विड़म्बना यही है कि हमारे यहां ऐसे हादसों या गलतियों से कभी कोई सबक नहीं लिया जाता। ऐसे हादसों में एक ही पल में कितने ही परिवारों के घर के चिराग बुझ जाते हैं। लोगों के स्मृति पटल में वर्ष 1997 का ‘उपहार कांड’ अब तक तरोताजा है, जो दिल्ली का अब तक का सबसे खौफनाक अग्निकांड माना जाता है। 13 जून 1997 को उपहार सिनेमा में लगी उस आग में 59 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। हादसे के वक्त उपहार सिनेमा में सैंकड़ों लोग ‘बॉर्डर’ फिल्म देख रहे थे और सिनेमा हॉल में आग लगने के बाद उन्हीं में से 59 लोग मारे गए थे। आग लगने के बाद सिनेमा हॉल में धुआं भर गया था, जिसके बाद लोग वहां से निकल भागने की कोशिश तो कर रहे थे किन्तु उनकी बदनसीबी यह थी कि उपहार सिनेमा के सभी दरवाजे बाहर से बंद थे। आखिर सिनेमा हाल के ही भीतर 59 लोगों ने आग की चपेट में आकर और धुएं से दम घुटने के कारण दम तोड़ दिया था। उपहार कांड के बाद से लेकर अब तक दिल्ली में भीषण आगजनी की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। उस भयावह हादसे को बीते 22 वर्ष लंबा समय गुजर चुका है किन्तु आज भी विड़म्बनापूर्ण स्थिति यह है कि इस दिशा में एक-दूसरे पर दोष मढ़ने के अलावा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया जाता। इस वास्तविकता से कोई अनजान नहीं है कि दिल्ली के अनेक इलाकों में बरसों से बहुत सारी अवैध फैक्टरियां चल रही हैं, जिनमें सुरक्षा के कोई उपाय नहीं होते। तमाम जिम्मेदार सरकारी विभागों को ऐसी फैक्टरियों की पूरी जानकारी भी होती है लेकिन कोई ऐसे कदम नहीं उठाए जाते, जिससे ऐसे दर्दनाक हादसों को टाला जा सके।
इसी साल 12 फरवरी को करोलबाग के होटल अर्पित में लगी भयानक आग में 17 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी और तब यह खुलासा हुआ था कि करोलबाग के उस इलाके में चार मंजिल से ज्यादा नहीं बनाई जा सकती किन्तु उस होटल को भ्रष्ट अधिकारियों के संरक्षण के चलते छह मंजिला बनाया गया था। दिल्ली में जगह-जगह ऐसे ही न जाने कितने होटल अर्पित या अवैध फैक्टरियां चल रही हैं, जो हर कदम पर बड़े हादसों को न्यौता दे रहे हैं लेकिन न जाने प्रशासन की तंद्रा कब टूटेगी? कोई बड़ा हादसा होने के बाद जब थोड़े दिन मामला गर्म रहता है तो अक्सर सामने आता है कि जिन होटलों, रेस्टोरेंट तथा फैक्टरियों को अग्निशमन विभाग द्वारा एनओसी दी गई, उनमें से कईयों में आग बुझाने वाले उपकरण काम ही नहीं कर रहे थे। दिल्ली के विभिन्न आवासीय क्षेत्रों में ऐसी घटनाओं में अक्सर अवैध फैक्टरियां चलने तथा सिनेमाघरों, होटलों, रेस्टोरेंट इत्यादि में आग से सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम के अभाव की बातें सामने आती रही हैं लेकिन प्रशासन हमेशा किसी बड़े हादसे को न्यौता देता प्रतीत होता है। कोई बड़ा हादसा सामने आने पर सारी एजेंसियां एकाएक गहरी नींद से जाग जाती हैं लेकिन जैसे ही मामला थोड़ा ठंडा पड़ता है, सब कुछ पुराने ढ़र्रे पर रेंगने लगता है और फिर से तमाम एजेंसियां किसी दूसरी घटना के इंतजार में गहरी नींद सो जाती हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ खड़ा होता है कि मौत की नगरी बनती जा रही दिल्ली में आखिर कब तक रह-रहकर इसी प्रकार के भयानक हादसे सामने आते रहेंगे और हम अपनी बेबसी पर आंसू बहाते रहेंगे। सरकारी संस्थाओं के साथ-साथ आम लोगों और नागरिक संस्थाओं का भी दायित्व है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए वे स्वयं भी अपने कर्त्तव्यों के प्रति ईमानदार और जागरूक रहें।

भारत को इस्लामी राष्ट्रों की चुनौती
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत भी कमाल का देश है। इसकी वजह से इस्लामी देशों में फूट पड़ गई है। दुनिया के 57 इस्लामी देशों का अब तक एक ही संगठन है। इस्लामी देशों का संगठन (ओआईसी) लेकिन अब एक दूसरा इस्लामी संगठन भी उठ खड़ा हुआ है। इसका नेतृत्व मलेशिया के राष्ट्रपति महाथिर मोहम्मद और तुर्की के राष्ट्रपति तय्यब इरदोगन कर रहे हैं। इन दोनों नेताओं ने कश्मीर के पूर्ण विलय के मामले में भारत का विरोध किया था। लेकिन सउदी अरब और संयुक्त अरब अमारात ने उसे भारत का आतंरिक मामला कहकर टाल दिया था। इन दोनों देशों के नेता एक-दूसरे के देशों में जाकर गदगद हुए थे और नरेंद्र मोदी को सउदी और यूएई ने अपने सर्वोच्च सम्मान भी दिए थे। इसकी काट करने के लिए पिछले हफ्ते मलेशिया में एक वैकल्पिक इस्लामी सम्मेलन आयोजित किया गया था। इसमें तुर्की के अलावा ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी भी शामिल हुए थे। इस वैकल्पिक इस्लामी सम्मेलन के पीछे अमेरिका-विरोधी भाव भी छिपा हुआ है। इस सम्मेलन के नायक के तौर पर पाकिस्तान को उभरना था लेकिन सउदी अरब ने अड़ंगा लगा दिया। उसके इशारे पर इमरान खान ने मलेशिया जाने से मना कर दिया। तो अब कश्मीर के सवाल पर इस्लामी देशों का संगठन एक नया सम्मेलन आयोजित कर रहा है। पाकिस्तान और सउदी अरब दोनों को अपनी नाक बचानी है। लेकिन अभी-अभी पता चला है कि इस्लामाबाद में होनेवाले इस सम्मेलन में इस्लामी राष्ट्रों के विदेश मंत्री भाग नहीं लेंगे। उनकी जगह उनके सांसद आएंगे। याने इन देशों की सरकारें भारत को कह सकेंगी कि जहां तक उनका सवाल है, कश्मीर के मुद्दे पर वे तटस्थ है। दूसरे शब्दों में वे भारत और पाकिस्तान दोनों को खुश करने की तरकीब कर रहे हैं। जाहिर है कि भारतीय विदेश नीति के लिए यह बड़ा धक्का है। यहां प्रश्न यही है कि जैसे पिछले इस्लामी सम्मेलन में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को ससम्मान आमंत्रित किया गया था, क्या इस बार भी भारतीय विदेश मंत्री या भारतीय सांसदों को उसमें आमंत्रित किया जाएगा ? मुझे लगता है कि ये इस्लामी राष्ट्र कश्मीर के कारण भारत के विरुद्ध उतने नहीं हो रहे हैं, जितने ये नागरिकता कानून और नागरिकता रजिस्टर की वजह से हो रहे हैं। भारत सरकार को इस चुनौती का सामना अत्यंत दूरदृष्टि के साथ करना होगा।

नए भारत के विरुद्ध खड़े वाममार्गी बुद्धिजीवी
डॉ अजय खेमरिया
भारत में अल्पसंख्यकवाद को क्यों जिंदा रखना चाहते है वामपंथी रामचन्द्र गुहा और अन्य लेखकों को विरोध प्रदर्शन करते समय पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया इसे लेकर वामपंथी विचारक और समर्थक सरकार को गरिया रहे है।इस बीच सोशल मिडिया पर ऐसे तमाम वीडियो जारी हुए है जिनमें नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों ने हिंसक रुख अख्तियार करते हुए पुलिसकर्मियों पर खूनी हमले किये है ।सरकारी सम्पति को नुकसान पहुचाया है।लेकिन किसी वामपंथी और जनवादी लेखक ने इस तरह के हिंसक कृत्यों की कोई निंदा नही की है।सवाल उठता है कि क्या देश का वाममार्गी बौद्धिक वर्ग आज सत्ताच्युत होते ही भारत के विरुद्ध खड़ा हो गया है ।जनवाद की आड़ में आज भारत के राष्ट्रीय विचार से हद दर्जे तक खिलवाड़ किया जा रहा है। नागरिकता संशोधन कानून से भारत के 20 करोड़ से ज्यादा मुसलमान में से किसी एक को भी किसी प्रकार का कानूनी संकट नही आने वाला है यह वैधानिक रुप से तथ्य है और देश के प्रधानमंत्री ,गृह मंत्री संसद से लेकर हर लोकमंच पर स्पष्ट कर चुके है। इसके बाबजूद भारत की जनता खासकर मुस्लिम भाइयों को लगातार गुमराह किया जा रहा है।उन्हें उसी क्षद्म बौद्धिक नजरिये से भयादोहित किया जा रहा है जिसके जरिये 70 सालों से अल्पसंख्यकवाद की राजनीतिक दुकान को चलाया गया है।हिटलर और नाजिज्म के उदय की डरावनी दलीले खड़ी की जा रही है लेकिन वास्तविकता यह है कि बौद्धिक रूप से असली नाजिज्म का अबलंबन तो भारत के वाममार्गी कर रहे है एक कपोल काल्पनिक झूठ को लोकजीवन में न्यस्त राजनीतिक स्वार्थों के लिये खड़ा कर दिया गया है।जो एनआरसी अभी प्रस्तावित ही नही है उसका पूरा खाका बनाकर पेश कर दिया गया है।इतिहास की भारत विरोधी ऋचाएँ गढ़ने वाले ये बुद्धिजीवी असल में अपने असली चरित्र पर आ गए है उनकी अपनी नाजिज्म मानसकिता आज सबके सामने आ गई है जो किसी भी सूरत में दक्षिणपंथी या अन्य विचार को स्वीकार नहीं करती है।इसके लिये वह झूठ,हिंसा सबको जायज मानती है।बहुलतावाद के यह वकील सच मायनों में नाजिज्म के अलमबरदार है इन्हें भारत की संसदीय व्यवस्था तक में भरोसा नही है वे इस बात को आज भी स्वीकार नही कर पा रहे है कि भारत की जनता ने एक विहित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत नरेंद्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री चुना है।वह आज भी मानने को तैयार नही है कि उनकी भारत विरोधी और अल्पसंख्यकवादी राजनीतिक दलीलों को नया भारत खारिज कर चुका है।वरन क्या कारण है कि रामचन्द्र गुहा, मुन्नवर राणा,हर्ष मन्दर,रोमिला थापर, अरुणा राय,भाषा सिंह,जैसे लोग एक नकली नैरेटिव देश मे सेट करने की कोशिशें कर रहे है।क्यों भारत के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की बातों को सुना नही जा रहा है क्यों देश की सर्वोच्च अदालत के रुख को समझने के लिये यह वर्ग तैयार नही है?हकीकत की इबारत असल में कुछ और ही है -नए भारत का विचार इस बड़े सत्ता पोषित तबके के अस्तित्व पर चोट कर रहा है।जिस भारतीय शासन और राजनीति का केंद्रीय तत्व ही अल्पसंख्यकवाद रहा हो आज वह तत्व तिरोहित हो चुका है।इसके साथ ही हिंदुत्व की बात और इसके संपुष्टि के कार्य जब देश के शीर्ष शासन में अब नियमित हो गए है तब इस डराने और दबाने की सियासत का पिंडदान तय है।इसी डर ने देश भर के वाममार्ग को आज खुद अंदर से भयादोहित कर रखा है अपनी दुकानों को बचाने की कवायद में यह बुद्धिजीवी भारत के मुसलमानों को एक उपकरणों की तरह प्रयोग कर रहे है।भारत में 70 साल बाद भी अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की राजनीति असल में एक सुनियोजित राजनीति ही है।2014 के बाद इस राजनीति का अंत असल में नए भारत का अभ्युदय ही है जिसमें सबका साथ सबका विश्वास अगर आकार लेगा तो कुछ लोग बौद्धिक विमर्श में बेरोजगार ही हो जाएंगे है ।इस षडयंत्र को आज भारत के मुसलमानों को गहराई से समझने की जरूरत है।याद कीजिये यूपीए के कार्यकाल में एक बिल लाया गया था”साम्प्रदयिक लक्षित हिंसा निरोधक कानून”इसे हर्ष मन्दर जैसे जनवादी बुद्धिजीवियों ने सोनिया गांधी की सरपरस्ती में बनाया था।इस बिल का मसौदा हिंदुओ को घोषित रूप से साम्प्रदायिक रूप से हिंसक साबित करता था।इसके प्रावधान अंग्रेजी राज से भी कठोर होकर हिंदुओ औऱ मुसलमान को स्थाई रूप से प्रतिक्रियावादी बनाने वाले थे।तब भारत की बहुलता इसलिये खतरे में नही दिखी क्योंकि इसे बनाने वाले हर्ष मन्दर जैसे चेहरे थे।आज यही हर्ष मन्दर नागरिकता बिल पर खुद को मुसलमान घोषित करना क्यों चाहते थे इसे आसानी से समझा जा सकता है।पूरे देश में सिर्फ मुस्लिम बहुल इलाकों और शैक्षणिक संस्थानों में नफरत की राजनीति क्यों की जा रही है?सिर्फ इसलिये ताकि भारत की 20 करोड़ से ज्यादा की आबादी को सरकार के विरुद्ध हिंसक विरोध के लिये उकसाया जाए क्योंकि तीन तलाक ,राममंदिर और 370 पर इस मुल्क में जो भाईचारा और अमन चैन नए भारत ने दिखाया है उसने सत्ता पोषित विभाजनकारी ब्रिगेड को बेचैन कर रखा था।सरकार के स्तर पर भी इस मामले में संचार और सँवाद पर कुछ कमी रह गई है यह भी एक तथ्य है।गृह मंत्री के रूप में 370 और राममंदिर निर्णय पर अमित शाह ने जिस सख्ती और सतत निगरानी से देश मे अमन चैन बनाये रखा उसकी निरन्तरता इस मामले में चूक गई है।यह सुगठित और सुनियोजित विरोध असल में इन्ही सब मामलों में भारतीय लोकजीवन में दिखे अमन चैन का ही चकित कर देने वाला रुख था वामपंथ और उसके साथी राजनीतिक दलों के लिये।इसलिये सरकार को अपना सँवाद कौशल फिर से दोहराए जाने की जरूरत है।
इस पूरे मामले में गांधी और संविधान की दुहाई दी जा रही है विरोध प्रदर्शन को तार्किक साबित करने के लिये लेकिन गांधी विचार में राष्ट्रीय सम्पति को नुकसान पहुँचाने की अनुमति किसने दी है यह भी विचार करने योग्य है।आज राजनीतिक रूप से भले केंद्र सरकार के विरुद्ध एक मोर्चा हमें नजर आ रहा है लेकिन इस मोर्चाबंदी का एक अदृश्य पहलू शायद अभी भी लोग देख नही पा रहे है वह नया भारत है।इस नए भारत को कांग्रेस नेता ए के एंटोनी 2014 में हुई पार्टी की पराजय पर पकड़ कर 10 जनपथ को बता चुके थे।एंटोनी कमेटी ने कांग्रेस की हार के लिये अल्पसंख्यकवाद को सबसे बड़ा फैक्टर बताया था, 2019 में भी जेएनयू जाकर राहुल गांधी ने इसी गलती को दोहराया था और अब उनकी बहन इंडिया गेट पर धरना देकर जामिया को समर्थन नही कर रही है बल्कि नए भारत से आंखे फेर रही है।इस तथ्य को अनदेखा कर की एक समावेशी कांग्रेस भारत के संसदीय लोकतंत्र के लिये बेहद अनिवार्यता है।कांग्रेस और वामपंथी मिलकर भारत के मुसलमानों को लोकजीवन से दरकिनार करने के पाप में जुटे है।यह उनका नकली बहुलतावाद है।बेहतर होगा भारत के मुस्लिम इसे जल्द से जल्द समझ लें।

आधार के बाद सीएए- एनआरसी और एनपीआर की जरूरत क्यों
सनत जैन
संपूर्ण भारत में एनआरसी (नेशनल रजिस्टर फार सिविलियन) तथा सीएए (सिविलियन अमेंडमेंट एक्ट) को लेकर आंदोलन चल रहे हैं। पहले यह आंदोलन एक्ट के विरोध में शुरू हुए अब भाजपा ने भी समर्थन में देशभर में आंदोलन शुरू कर दिए हैं। आंदोलन को रोकने के लिए दिल्ली सहित कई राज्यों में धारा 144 लगाकर आंदोलन को रोकने का उपाय किया गया। जिसके कारण आंदोलनकारियों को आंदोलन करने की अनुमति नहीं मिली| बिना अनुमति आंदोलन करने के कारण पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच अनावश्यक झड़पें हुई| पत्थरबाजी एवं लाठीचार्ज के कारण जगह-जगह आंदोलन हिंसक भी हुए पुलिस ने आंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज, अश्रु गैस तथा कई स्थानों पर गोली चालान भी किया। आंदोलन में लगभग दो दर्जन आंदोलनकारियों की मौत भी हुई। इसमें से कई मौतें गोली लगने से हुई दिल्ली और उत्तर प्रदेश पुलिस ने गोली चालाने से पहले इनकार किया। जब घटना के वीडियो सोशल मीडिया के माध्यम से सामने आए| इसमें पुलिस जवान गोली चलाते हुए दिखे। तब पुलिस ने जांच की बात कहकर मामले को ठंडा करने का प्रयास किया। जामिया विश्वविद्यालय के अंदर जाकर पुलिस ने लाइब्रेरी में बैठे छात्र और छात्राओं के ऊपर जबरदस्त बल प्रयोग किया। लाइब्रेरी कक्ष को तोड़ दिया लड़कियों के साथ भी मारपीट के वीडियो सामने आने और अलीगढ़ विश्वविद्यालय में भी कुछ इसी तरीके की पुलिसिया कार्रवाई से, सारे देश के छात्र आंदोलित हो गए पुलिस एवं सरकार अब बचाव की मुद्रा में आकर तरह-तरह के जवाब दे रहे हैं। सरकार विपक्षियों पर अफवाह फैलाने का ठीकरा फोड़कर बचने का प्रयास कर रही है।
लोकसभा एवं राज्यसभा में जिस ताबड़तोड़ तरीके से सिविलियन अमेंडमेंट एक्ट (जीएए) पास कराया गया। इसमें मुस्लिमों को नागरिकता देने से बाहर रखा गया। गृह मंत्री शाह ने जिस तरह से पाकिस्तान बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए । अल्पसंख्यकों को मान्यता देने और मुसलमानों को मान्यता नहीं देने की बात की साथ ही यह कहा कि इस बिल के पास होने के बाद सरकार जल्द ही सारे देश में एनआरसी की प्रक्रिया शुरू करेगी। गृह मंत्री के इस बयान की बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया सबसे पहले असम से शुरू हुई। असम में 4 साल तक एनआरसी को लेकर असम के सभी नागरिकों को जिस तरह दस्तावेज जुटाने और नागरिकता को साबित करने परेशान होना पड़ा। हजारों रुपए दस्तावेज जुटाने में खर्च करने पड़े । अपना काम-धाम छोड़कर लाइनों में लगना पड़ा। असम में रहने वाले पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, झारखंड इत्यादि राज्यों के हजारों हिंदू नागरिकों को भी नागरिकता साबित करने में काफी परेशान होना पड़ा। उसके बाद भी लगभग 19लाख लोग नागरिकता रजिस्टर में स्थान नहीं पा पाए । इसमें से 14 लाख से अधिक लोग गैर मुस्लिम थे जो अन्य राज्यों से आकर आसाम में रह रहे भारतीय नागरिक थे। परिणाम स्वरूप सबसे ज्यादा उग्र प्रदर्शन सबसे पहले आसाम से शुरू हुआ।
भाजपा के रणनीतिकार केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने सीएए पास कराते समय जिस तरह से मुस्लिमों को नागरिकता से दूर रखने का प्रावधान का उल्लेख किया। पाकिस्तान अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए हुए हिंदुओं, सिखों जिसमें ईसाई, जैन, बौद्ध एवं पारसियों को नागरिकता देने की बात कही। वही नागरिकता रजिस्टर में शामिल नहीं होने वाले मुस्लिमों को मुस्लिम देशों में नागरिकता मिलने की बात कही। उससे भारत के मुसलमान काफी उद्वेलित हो गए। उनके मन में यह भय बैठ गया, कि वह जरूरी दस्तावेज पेश नहीं कर सके तो उन्हें भारत से बाहर किया जाएगा, उन्हें डिटेंशन सेंटर में भेजा जाएगा।
इस एक्ट के पास होने के बाद हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण पैदा करने की जो कोशिश की गई। निश्चित रूप से विभिन्न राज्यों जिसमें महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, दिल्ली और बिहार के चुनाव को ध्यान में रखकर केंद्र सरकार ने इस मामले में हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण को ही ध्यान में रखकर इतना बड़ा कदम उठा लिया। इससे भारत के बहुसंख्यक हिंदू भी नाराज हो गए। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संविधान की मूल भावना के विपरीत धार्मिक आधार पर नागरिकता नहीं देने की बात पर बहुसंख्यक वर्ग का समर्थन भी इस एक्ट के विरोध में सारे देश में देखने को मिल रहा है। हिंदू बहुसंख्यक और गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को एकजुट करने का जो फार्मूला भाजपा ने अपना आया। उस फार्मूले के दलदल में भाजपा बुरी तरह फंस कर रह गई है। अभी तक जो आंदोलन इस एक्ट के विरोध में हो रहे हैं। उसमें छात्रों के साथ-साथ बड़ी संख्या में हिंदू और अन्य वर्गों के लोग भी शामिल हो रहे हैं। भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता दी गई है। भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की जो कोशिश भाजपा ने अप्रत्यक्ष रूप से की है। उससे सारा देश नाराज है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान तथा तालिबान जैसे धार्मिक आधार पर बने देशों में जिस तरह से लड़ाई झगड़े कट्टरवादिता देखने को मिलती है। उससे उन राष्ट्रों का कोई भला नहीं हुआ। भारत का बहु संख्यक वर्ग भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के खिलाफ है, यह आंदोलनों से स्पष्ट हो रहा है।
आधार के बाद एनआरसी क्यों
केंद्र सरकार ने आधार इनरोलमेंट के माध्यम से पिछले 10 वर्षों में प्रत्येक व्यक्ति का पंजीयन लगभग-लगभग कर लिया है। आधार पंजीयन के समय 33 तरीके के दस्तावेज एवं जानकारी के साथ आधार में पंजीयन किया गया है। आधार में पंजीयन के पूर्व प्रत्येक व्यक्ति का फिंगरप्रिंट एवं आंखों की पुतलियों का रिकॉर्ड भी फोटो के माध्यम से डिजिटल सुरक्षित किया गया है। आधार में जिन लोगों का पंजीयन हो चुका है। सारे देश में कहीं पर भी जांच एजेंसियों और सरकार के पास यह डाटा उपलब्ध है। आधार पंजीयन के समय पूर्व और वर्तमान सरकार ने यह भरोसा दिलाया था। आधार बनने के बाद अन्य किसी दस्तावेज अथवा पंजीयन की जरूरत नहीं होगी। सभी सरकारी कामकाज एवं सरकारी सहायता के लिए आधार अनिवार्य होगा। आधार में जब शत प्रतिशत पंजीयन हो गया है। इस जानकारी के आधार पर ही नागरिक रजिस्टर बनाने में भी कोई कठिनाई नहीं है। नई तरीके से सारी प्रक्रिया शुरू करने पर हजारों करोड़ रुपए खर्च करने का कोई औचित्य भी नहीं है। केंद्र सरकार चाहे तो आधार का जो डिजिटल डाटा उसके पास है। उसके आधार पर ही नागरिक रजिस्टर तैयार किया जा सकता है। इसे आधार से लिंक भी किया जा सकता है।
विदेशियों को भारतीय नागरिकता
दुनिया भर के देशों में बाहर से आए हुए लोगों को नागरिकता देने के लिए कानून बने हुए हैं। भारत में भी पहले से ही विदेशियों के लिए नागरिक कानून प्रचलित हैं। सभी सरकारें नागरिकता देने के नियम समय-समय पर बदलती रहती हैं। किसी भी देश में धर्म के आधार पर नागरिकता देने का कोई प्रावधान नहीं है। भारत दुनिया का पहला देश है, जिसने नागरिकता कानून में मुस्लिमों को प्रतिबंधित किया है। भारत में 20 करोड़ के आसपास मुस्लिम आबादी है। ऐसी स्थिति में मुसलमानों का भयभीत होना लाजमी है। भारत सरकार बिना किसी धार्मिक भेदभाव के राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए, किसी भी विदेशी को भारत की नागरिकता देती है| इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है| किंतु जिस तरीके से इसे हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण करने के लिए सीएए एक्ट राजनैतिकक कारणों से लाया गया है। उसकी प्रतिक्रिया इसी तरीके से होनी थी।
राष्ट्रीय जनगणना में हजारों करोड़ की बर्बादी क्यों
भारत में जनगणना का काम बीसवीं सदी में शुरू हुआ था। अब हम सूचना प्रौद्योगिकी एवं डिजिटल तकनीकी के 21वीं सदी में रह रहे हैं। आधार इनरोलमेंट के माध्यम से भारत सरकार ने सभी भारतीय नागरिकों का आधार इनरोलमेंट कर लिया है स्कूल में प्रवेश लेने के लिए सभी बच्चों को आधार इनरोलमेंट प्रस्तुत करना होता है। इसके साथ ही गरीब से गरीब व्यक्ति को जिसे सरकारी सहायता मिलती है। उसे भी आधार कार्ड प्रस्तुत करना पड़ता है। इसका आशय यह है कि 6 वर्ष की उम्र में प्रत्येक बच्चे का आधार में पंजीयन अनिवार्य होगा। भारत में जन्म और मृत्यु का पंजीयन अनिवार्य कर दिया गया है। यदि इसे आधार के डाटा से लिंक कर दिया जाता है, तो हर 6 वर्ष में जनसंख्या का डाटा डिजिटल माध्यम से प्रदर्शित किया जा सकता है। इसमें प्रत्येक व्यक्ति के माता पिता स्वयं की जानकारी, जन्म स्थान, आयकर ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर कार्ड, राशन कार्ड, जन्म-मृत्यु प्रमाण, पंजीयन, धर्म, जाति एवं मूल निवास से संबंधित सभी जानकारी आसानी से उपलब्ध होगी।
अभी 10 वर्ष में जनगणना होती है। इसमें हजारों करोड़ रुपए भारत सरकार के प्रत्यक्ष रूप में खर्च होते हैं। 6 माह तक चलने वाले जनगणना की जानकारी एकत्रित करने के लिए हर राज्य के लाखों कर्मचारी और अधिकारी इस काम में लगते हैं। इसका डाटा तैयार करने में और कर्मचारियों की वेतन एवं अन्य खर्च में प्रत्येक 10 वर्ष में दो लाख करोड़ रुपए से अधिक केंद्र एवं राज्य सरकार का खर्च होता है। भारत सरकार ने सेल्फ सर्टिफिकेशन के माध्यम से राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर तैयार करने का काम 1 अप्रैल 2020 से 30 सितंबर 2020 तक कराने का निर्णय लिया है। इसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 2 लाख करोड रुपए से कम खर्च नहीं होंगे। केंद्र सरकार यदि आधार के डाटा के आधार पर राष्ट्रीय जनगणना रजिस्टर प्रत्येक 6 वर्ष में तैयार करें, तो इसमें 100 से 200 करोड़ रुपए खर्च करने में यह काम आसानी से होगा। जनगणना के दौरान 6 माह तक केंद्र एवं राज्य सरकारों का काम पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है। वह भी नहीं होगा। आधार से जोड़कर प्रक्रिया अपनाने से हजारों करोड़ रुपए की केंद्र एवं राज्य सरकारों की बचत होगी।
इस दिशा में सरकार को ध्यान देने की जरूरत है।

समाजवादी विचार की जीवंत मूर्ति थे – मामा जी
डॉ. सुनीलम
( मामा बालेश्वर की 21 वीं पुण्यतिथि पर विशेष ) मामा जी के जीवन काल में मैंने उन्हें देखा भर था। जॉर्ज साहब और मधु लिमये जी के यहां परिचय हुआ , मुलाकात हुई। परंतु मामा जी के देहांत के बाद उनके कार्य क्षेत्र में जाने के बाद मामा जी के विराट व्यक्तित्व के बारे में पता चला। मैंने समाजवादी आंदोलन के दस्तावेजों का प्रो. विनोद प्रसाद सिंह जी के साथ संकलन करने के दौरान बहुत कुछ पढ़ा। यहां तक कह सकता हूं कि आज तक मैंने समाजवादियों के बारे में जितना भी पढ़ा है और जानता हूं उसमें जितना जमीनी असरकारी कार्य मामा जी ने किया उसकी तुलना किसी दूसरे व्यक्ति के साथ नहीं की जा सकती।
मामा जी विशुद्ध राजनीतिक व्यक्ति थे। केवल समाजवादी सिद्धातों में भरोसा ही नहीं करते थे। उन्होंने आजीवन समाजवादी आचरण ही किया। समाजवाद की जीवन्त मूर्ति कहना ही न्यायसंगत होगा ।उनका यही गुण उन्हें अन्य नेताओं की तुलना में विश्ष्टि स्थान दिलाता है। हमने डॉ. राममनोहर लोहिया जी के ‘जेल, वोट, फावड़ा’ के सिद्धांत को सुना लेकिन तीनों क्षेत्रों में योगदान करते मामा जी को जाना और समझा । मामा जी अंग्रेजों के जेल में रहे और आजादी के बाद भी जेल गये। उन्होंने पूरे भीलांचल के आदिवासियों को अन्याय, अत्याचार के खिलाफ लाल टोपी पहनकर, लाल झंडा लेकर संघर्ष करना सिखाया। मामा जी ने पूरे भीलांचल की राजनीति को प्रभावित किया। आज भी चुनाव के दौरान विभिन्न पार्टियों के नेतागण मामाजी के नाम का उपयोग करते हुये दिखलाई देते हैं। आज भी मामा जी के अनुयाइयों का राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में वोट बैंक है। मामा जी ने शिक्षा के क्षेत्र में स्कूल चलाकर योगदान किया। वैसे भी वे भीलों के लिये सदा हेडमास्टर के तौर पर कार्य करते। कैसे रहना चाहिये, क्या कपड़े पहनना चाहिये, क्या खाना-पीना चाहिये सबकुछ उन्होंने सिखाया। भीलांचल के लोग आज भी ये मानते हैं कि मामा जी के प्रयासों के चलते ही आदिवासियों ने लंगोटी छोड़कर पूरे कपड़े पहनना शुरू किया। मामा जी ने दहेज दापा की प्रथा को समाप्त करने तथा मांस-मदिरा छोड़ने के लिये आदिवासियों को प्रेरित किया। मामा जी ने न केवल राजनीतिक और वैचारिक प्रशिक्षण दिया बल्कि उन्होंने धर्मग्रंथों के माध्यम से भी आदिवासियों को तमाम किस्म की सीख देने का काम किया।
मामा जी लोक भाषा, लोक भूषा, लोक भोजन और लोक संस्कृति को अपनाने वाले समाजवादी नेता रहे। उन्होंने भीली भाषा में तमाम किताबें लिखीं। हिन्दी तो मामा जी की मातृ भाषा थी ही लेकिन उन्होंने गांव-गांव में जाकर भीली भाषा में भी आदिवासियों के साथ संवाद किया। इस तरह जेल, वोट, फावड़ा के सिद्धांत को मूर्त रूप देने का काम मामा जी ने किया।
मामा जी ने कभी परिवार से कोई घनिष्ठ रिश्ता नहीं रखा। एक बार जब निवाड़ी कला यानि अपना पैतृक गांव छोड़ा, उसके बाद गांव से बहुत ज्यादा रिश्ता नहीं रखा। यही कारण रहा कि हमने जब मामा जी के जन्मस्थान निवाड़ी कला,इटावा से कर्म क्षेत्र बामनिया तक की यात्रा की तब उनके खुद के गांव में मामाजी की विद्ववता तथा उनके स्वतंत्रता आंदोलन एवं समाजवादी आंदोलन में योगदान को जानने वाले बहुत कम मिले। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि मामाजी के अनुयाइयों ने राजस्थान से जाकर उनके अपने गांव में मूर्ति लगाई, शायद इसी को कहते हैं घर की मुर्गी दाल बराबर। मैंने जब निवाड़ी कला में कार्यक्रम किया था तब तमाम नेताओं ने, तमाम घोषणायें मामाजी को लेकर की थीं जैसा निवाड़ी कला में हुआ वैसा ही बामनिया में भी हुआ। मामाजी के तमाम चेले मंत्री बनकर बामनिया गये, तमाम घोषणायें कीं, लेकिन उनको घोषणाओं पर अमल नहीं हुआ।
इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जिस व्यक्ति के 150 से ज्यादा मंदिर स्वयं आदिवासियों ने बनाए हों, जिसकी पूजा लाखों आदिवासियों द्वारा की जाती हो, जिसने आजादी के आंदोलन में ही नहीं, आजादी के बाद भी भीलांचल को मुख्य धारा से जोड़ने में अहम योगदान किया हो उस व्यक्ति की एक मूर्ति भी झाबुआ जिलाधीश कार्यालय के सामने आज तक न लगाई गई हो। मामा जी का सम्मान तो सभी पार्टियों और विचारधाराओं के लोग व्यक्तिगत तौर पर करते हैं लेकिन मामा जी की विचारधारा को खतरनाक मानते हैं तथा उस समाजवादी विचारधारा को खत्म करने का हर संभव प्रयास करते हैं। सरकारों और समाज के बलशाली लोगों को मामा जी के देवता हो जाने से कोई परेशानी नहीं है। लेकिन उन्हें समाजवादी विचार के नेता के तौर पर वे किसी भी हालत में स्थापित नहीं होने देना चाहते। यही कारण है कि मामा जी के समाधि स्थल – भीलाश्रम को किसी भी सरकार ने विकसित नहीं होने दिया है।
मामा जी को भारत रत्न देने की मांग उनके अनुयायी कई वर्षों से कर रहे हैं। अभी तक सरकारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगा है। मामा जी के नाम से बामनिया रेलवे स्टेशन का नामकरण किया जाये इस मांग को भी किसी सरकार ने भी तवज्जो नहीं दी है।
मामा जी के नाम को आगे बढ़ाने का काम मूल तौर पर भक्ति मार्ग से जुड़े मामाजी के अनुयायी( भगत ) कर रहे हैं। मामा जी के जीवन काल में ही राजस्थान के आदिवासियों ने मामा जी के जन्मदिन पर आश्रम में आना शुरू कर दिया था। देहांत के बाद आश्रम आने वाले आदिवासियों की संख्या दिन दुगनी रात चैगनी बढ़ती चली गई। लेकिन 25-26 दिसम्बर की रात को हर वर्ष पच्चीस हजार से अधिक अनुयाइयों के लिये कोई सुविधा का इंतजाम शासन और सरकार की ओर से अब तक नहीं किया जा सका है।
अक्सर यह कहा जाता है कि सभी नेता एक जैसे होते हैं लेकिन मामा जी का पूरा जीवन उन्हें अन्य नेताओं से पूरी तरह अलग करता है। जो लोग सार्वजनिक जीवन में समाज के लिये योगदान करना चाहते हैं उनके लिये मामा जी का संपूर्ण जीवन एक मॉडल पेश करता है। एक तरफ
जहां मामा जी के व्यक्तित्व में सादगी, सरलता, निर्भीकता, बहादुरी, त्याग, कथनी और करनी का तारतम्य है वहां उनके सार्वजनिक जीवन में समाजवादी विचार के प्रति अडिग प्रतिबद्धता दिखलाई पड़ती है। मामा जी जैसे नेता कई सदियों में एक बार ही होते हैं इसलिये मामा जी के अनुयायी नारा लगाते हैं ‘जब तक सूरज चांद रहेगा, मामा जी का नाम रहेगा’।
जरूरत इस बात की है कि मामा जी के समाजवादी विचारों को आगे बढ़ाने के लिये सुनियोजित तौर पर कार्य किया जाये। मामा जी के फोटो और कैलेन्डर तो हजारों की संख्या में हर साल बेचे जाते हैं। मामा जी पूरे भीलांचल के हर घर में मौजूद हैं लेकिन यही बात मामा जी के विचार के बारे में नहीं कही जा सकती। यह तो सभी मानते हैं कि यदि मामाजी ने अपना पूरा जीवन इस इलाके में नहीं लगाया होता तो यह इलाका भी नक्सलवाद और माओवाद से प्रभावित होता यह निष्कर्ष भी सरकारों के लिये एक रास्ता बताता है।
मामा जी के जीवन पर मैंने क्रांति कुमार जी, राजेश बैरागी जी तथा राजस्थान के साथियों के साथ मिलकर मालती बेन ,पुंजा भगत और मास्टर रामलाल निनामा के मार्गदर्शन में आठ से अधिक किताबें प्रकाशित की हैं लेकिन यह बहुत कम हैं। मामा जी के समाजवादी साहित्य को भीलांचल के हर घर तक पहुंचाने की जरूरत है ताकि मामा जी के जीवन से प्रेरणा अधिक से अधिक लोग ले सकें।

धर्म की कम देश की अधिक चिंता करने का समय

तनवीर जाफ़री
नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा संसद के दोनों सदनों में पारित करवाया जा चुका नागरिकता संशोधन विधेयक अब क़ानून का रूप लेने जा रहा है। इस नव संशोधित नागरिकता क़ानून के दोनों सदनों यानी लोकसभा व राज्य सभा में पेश होने के दौरान ही देश के कई राज्यों में इस विधेयक का बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हुआ था जो अब भी जारी है।असम व बंगाल में तो इस आंदोलन ने हिंसक रूप धारण कर लिया है। इससे पहले राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर लागू करने के प्रयासों के दौरान भी असमवासियों में काफ़ी बेचैनी दिखाई दी थी। मोदी सरकार द्वारा लाया जाने वाला नागरिकता संशोधन क़ानून हो या राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर इन दोनों ही प्रयासों से स्पष्ट हो गया है कि यह सरकार भारतवासियों अथवा मानवता के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि धर्म के नज़रिये से अपना सत्ता सञ्चालन कर रही है। हालांकि सरकार द्वारा समय समय पर संविधान की रक्षा की दुहाई भी दी जाती है। परन्तु उसके द्वारा बहुमत की आड़ में उठाए जाने वाले कई क़दम ऐसे प्रतीत होते हैं गोया मोदी सरकार संविधान विरोधी कार्य कर रही हो। भारतीय संविधान की उद्देशिका के रूप में संविधान के शुरूआती प्रथम पृष्ठ पर मोटे शब्दों में अंकित है-“हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न,समाजवादी, पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक न्याय,विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख़ 26 नवंबर 1949 ईस्वी(मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी संवत दो हज़ार छः विक्रमी ) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत,अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।” इस प्रस्तावना में किसी धर्म जाति या क्षेत्र अथवा भाषा का ज़िक्र करने के बजाए ‘हम भारत के लोग’ और ‘उसके समस्त नागरिकों’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है तथा धर्म,जाति व क्षेत्र आदि के भेद भाव के बिना समस्त भारतवासियों को साथ लेकर राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया गया है।
क्या मोदी सरकार संविधान की इस प्रस्तावना का अनुपालन कर पा रही है ? नागरिकता संशोधन क़ानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर तैयार करने जैसी कोशिशें क्या भारतीय संविधान की मूल आत्मा अर्थात पंथ निरपेक्षता का पालन करती हैं? आख़िर क्या वजह है कि देश के कई राज्यों में इस समय बेचैनी दिखाई दे रही है। क्या बहुमत का अर्थ यह है कि सरकार अपने पूर्वाग्रही,गुप्त व साम्प्रदायिक एजेंडे को लागू करते हुए पंथ निरपेक्ष होने के बजाए बहुसंख्यवाद की राजनीति कर अपनी सत्ता सुरक्षित रखने की कोशिश करे?आख़िर सरकार द्वारा किस आधार पर अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के केवल हिंदू, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी धर्म के लोगों को ही नए नागरिकता क़ानून के तहत भारत की नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है? इसमें मुसलमानों को शामिल क्यों नहीं किया गया ? हालाँकि इस विषय पर संसद में चली बहस के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना था कि “भारत के तीनों पड़ोसी धर्मशासित देशों में अल्पसंख्यकों का लगातार मज़हबी उत्पीड़न हुआ है, जिसकी वजह से उन्हें भारत में शरण लेनी पड़ी है. छह अल्पसंख्यक समूहों को नागरिकता का अधिकार देने का फ़ैसला सर्व धर्म समभाव की भावना के अनुरूप है.” गृह मंत्री अमित शाह ने भी चर्चा के दौरान फ़रमाया कि -‘पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में इस्लाम को मानने वाले अल्पसंख्यक हैं क्या? देश का धर्म इस्लाम हो तो मुस्लिमों पर अत्याचार की संभावना कम है’ उन्होंने कहा कि मुसलमानों के आने से ही क्या धर्मनिरपेक्षता साबित होगी?
देश व देश के स्वयंभू रखवालों से कोई पूछे कि इन तीनों ही देशों में आज तक सबसे अधिक प्रताड़ना किन लोगों को सहनी पड़ी है ? अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश तीनों ही देशों में कट्टरपंथी ताक़तें चाहे वे सत्ता द्वारा संरक्षित हों या सत्ता विरोधी परन्तु इन अतिवादी ताक़तों द्वारा सबसे अधिक प्रताड़ित उन लोगों को ही किया जाता है जो वैचारिक रूप से इनसे सहमत न हों। इनमें मुसलमानों में ही गिने जाने वाले शिया,बरेलवी,अहमदिया,सूफ़ी जैसे समुदाय के लोग सबसे बड़ी संख्या में शामिल हैं। इन समुदायों के लोग मुसलमान हैं भी और ज़ाहिर है स्वयं को मुसलमान ही कहते भी हैं। परन्तु आतंक का पर्याय बनी कट्टर मुस्लिम शक्तियां इन्हें मुसलमान नहीं मानतीं। विचारधारा के इस टकराव में निश्चित रूप से सबसे अधिक उत्पीड़न इन तीनों देशों में इन्हीं मुसलमानों का किया जाता है। शिया,बरेलवी,अहमदिया,सूफ़ीआदि समुदाय के लोगों के धर्मस्थलों,मस्जिदों,दरगाहों,इमामबारगाहों को ध्वस्त किया जाता है। मुहर्रम के जुलूसों व मजलिसों पर आत्मघाती हमले किये जाते हैं।कई दरगाहों में उर्स जैसे बड़े समागमों यहाँ तक कि शादी समारोह तक में आतंकी आत्मघाती हमले करे गए जिसमें अब तक हज़ारों मुसलमान मारे जा चुके हैं।क्या इन पीड़ितों को भारत में नागरिकता लेने का अधिकार नहीं? और यह हालात गृह मंत्री अमित शाह के इस दावे कि ‘देश का धर्म इस्लाम हो तो मुस्लिमों पर अत्याचार की संभावना कम है’की कहाँ तक पुष्टि करते हैं ?
अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेशको छोड़ कर यदि हम श्री लंका,चीन,नेपाल,तिब्बत और म्यांमार जैसे देशों की बात करें तो यहाँ भी मुसलमानों के साथ साथ अन्य धर्मावलंबी भी धर्म के आधार पर उत्पीड़न का शिकार होते रहते हैं। उदाहरण स्वरूप तिब्बत के बौद्ध, श्रीलंका के तमिल, नेपाल के मधेसी,म्यांमार में रोहंगिया मुस्लिम,चिन, काचिन व अराकान समुदाय के लोग भी ज़ुल्म का शिकार होते रहते हैं परन्तु उन्हें भारत की नागरिकता दिए जाने वाले धर्मों की सूची में शामिल नहीं किया गया है ? क्या भारतीय संविधान इसी प्रकार के धार्मिक भेदभाव करने की शिक्षा देता है? क्या देश की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वालों ने ऐसे ही स्वतंत्र भारत की कल्पना की थी जो धर्म के आधार पर क़ानून बनाया करेगा? वर्तमान भाजपा सरकार दरअसल मुस्लिम विरोध पर आधारित राजनीति में ही अपनी सफलता देखती आ रही है। 2014 से लेकर अब तक मोदी सरकार तथा कई भाजपा शासित राज्य सरकारों ने ऐसे अनेक फ़ैसले लिए हैं जो भाजपा के मुस्लिम विरोधी रुख़ को दर्शाते हैं। जिस पंथ निरपेक्षता की बात भारतीय संविधान में की गयी है भाजपा उसपर विश्वास करने के बजाए हिंदूवादी राजनीति पर अधिक विश्वास करती है। और जो भी दल या नेता मुस्लिम अल्पसंख्यकों के हितों की बात करता है उसे हिन्दू विरोधी साबित करने की चतुराई करती है। विपक्ष को मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाला बताकर स्वयं हिन्दू वोट बैंक की राजनीति करती है।
उपरोक्त परिस्थितियों में देश व संविधान की मूल आत्मा को बचाने की ज़िम्मेदारी निश्चित रूप से समूचे विपक्ष के साथ साथ पूरे देश की जनता की भी है। भाजपा के रणनीतिकारों ने बड़े ही शातिराना तरीक़े से नवनिर्मित नागरिकता संशोधन क़ानून तथा राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर जैसे अति गंभीर विषयों पर विपक्ष को भी विभाजित करने की कोशिश की है।ऐसे में जो भी विपक्षी दल व नेता भारतीय संविधान व देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के पैरोकार हैं उन्हें बिना समय गंवाए ऐसे काले क़ानूनों के विरुद्ध एकजुट हो जाना चाहिए। यह वक़्त देश की आत्मा के लिए संकट का समय है। यह समय धर्म से भी अधिक देश की चिंता करने का समय है।

भारतीय राजनीति के आकाश का ध्रुवतारा थे अटल जी
योगेश कुमार गोयल
(अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती 25 दिसम्बर) पर विशेष) तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी आज हमारे बीच नहीं हैं। उन्होंने 93 वर्ष की आयु में 16 अगस्त 2018 को दिल्ली के एम्स अस्पताल में अंतिम सांस ली थी। देहांत से पूर्व वे कई वर्षों से अस्वस्थ चल रहे थे। 27 मार्च 2015 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने स्वयं उनके आवास पर जाकर प्रोटोकॉल तोड़ते हुए उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया था। अटल जी तीन बार प्रधानमंत्री, दो बार राज्यसभा सदस्य तथा दस बार लोकसभा सदस्य रहे। अटल जी भले ही भाजपा के शीर्ष नेता रहे लेकिन वो देश के सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में से एक थे। सही मायने में अटल जी भारतीय राजनीति के आकाश का ध्रुवतारा थे। उनकी शख्सियत ऐसी थी कि हर राजनीतिक दल में उनकी स्वीकार्यता रही।
2005 में जब वाजपेयी जी ने राजनीति से सन्यास लेने की घोषणा की थी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने ही उन्हें ‘मौजूदा राजनीति का भीष्म पितामह’ की संज्ञा दी थी। अटल जी एक ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने अपने जीवन का हर पल राष्ट्र को समर्पित कर दिया था। भारतीय राजनीति की महान विभूति रहे अटल जी का विराट व स्नेहिल व्यक्तित्व, विलक्षण नेतृत्व, दूरदर्शिता तथा अद्भुत भाषण देने का सामर्थ्य उन्हें एक विशाल व्यक्तित्व प्रदान करते थे। सही मायने में अटल जी का अवसान ‘अटल युग’ का अवसान है। बतौर प्रधानमंत्री उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से था 1 मई 1998 को राजस्थान के पोरखण में किया गया परमाणु बम परीक्षण, जिससे देश समूची दुनिया में एक प्रमुख परमाणु शक्ति सम्पन्न देश के रूप में उभरा। उन्होंने अपनी कुशल भाषण कला शैली से राजनीति के शुरूआती दिनों में ही ऐसा रंग जमा दिया था कि हर कोई उनके भाषणों का कायल हो जाता था। कहा जाता है कि उनके भाषण इतने प्रभावशाली होते थे, जिन्हें सुनने विरोधी भी चुपके से उनकी सभाओं में जाते थे। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष अनंतशयनम अयंगार ने एक बार कहा था कि हिन्दी में अटल बिहारी वाजपेयी से अच्छा वक्ता कोई नहीं है। यह भी कहा जाता रहा है कि स्वयं नेहरू वाजपेयी द्वारा उठाए गए मुद्दों को बहुत ध्यान से सुना करते थे।
बात वर्ष 1957 की है, जब वाजपेयी जी पहली बार सांसद चुने गए थे। अटल जी उस समय 34 वर्ष के युवा थे और उन्हें संसद में बोलने का ज्यादा समय नहीं मिलता था लेकिन वाजपेयी जी की हिन्दी पर इतनी अच्छी पकड़ थी कि उन्होंने संसद में अपनी एक अलग पहचान बना ली थी। पं. नेहरू उस समय देश के प्रधानमंत्री थे, वे भी वाजपेयी जी की हिन्दी से बहुत प्रभावित थे और यही कारण था कि नेहरू संसद में उनके सवालों का जवाब हिन्दी में ही दिया करते थे। ऐसे ही संसद में बहस के दौरान एक बार नेहरू जी ने जनसंघ की कटु आलोचना की तो अपनी हाजिरजवाबी का परिचय देते हुए अटल जी ने तपाक से कहा कि मैं जानता हूं कि पंडित जी रोज शीर्षासन करते हैं, वे शीर्षासन करें, उस पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है लेकिन वे शीर्षासन करते हुए मेरी पार्टी की तस्वीर उल्टी न देखें। वाजपेयी जी के इस जवाब को सुनकर नेहरू भी ठहाका लगाकर हंस पड़े थे।
25 दिसम्बर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक स्कूल अध्यापक के घर जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी मूल रूप से कवि और शिक्षक थे। कॉलेज में शिक्षण के दौरान ही उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं। 1943 में वे कॉलेज यूनियन के सचिव रहे और 1944 में उपाध्यक्ष बने। वे बचपन में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे और उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शाखा प्रभारी के रूप में भी कार्य किया। देश के लिए कुछ करने के जज्बे के साथ उन्होंने पत्रकारिता का रास्ता चुना और एक पत्रकार बन गए। राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर के बाद उन्होंने पत्रकारिता में अपना कैरियर शुरू किया था। अटल जी ने राष्ट्रधर्म, पांचजन्य, वीर अर्जुन और स्वदेश का संपादन किया। 1951 में जब जनसंघ की स्थापना हुई थी, तब अटल जी ने चुनावी राजनीति में प्रवेश किया था। हालांकि लखनऊ में लोकसभा उपचुनाव में अटल जी हार गए थे किन्तु वो इस हार से निराश नहीं हुए।
अटल जी भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य थे और जनसंघ ने 1957 में अटल जी को एक साथ तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से मैदान में उतारा किन्तु मथुरा में उनकी जमानत जब्त हो गई, लखनऊ में उन्हें हार का सामना करना पड़ा लेकिन बलरामपुर से वे चुनाव जीत गए और जीतकर वो पहली बार द्वितीय लोकसभा में पहुंचे। 1968 से 1973 तक अटल जी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे और 1975-77 के आपातकाल के दौरान उन्हें भी जेल भेजा गया। 1977 में जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार में वे विदेश मंत्री बने और उस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में अटल जी ने हिन्दी में ऐसा ओजस्वी भाषण दिया, जिसकी दुनियाभर में व्यापक सराहना हुई, जिसे स्वयं अटल जी अपने जीवन का सबसे सुखद क्षण बताया करते थे। 1979 में जनता पार्टी की सरकार गिर गई, जिसके बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन किया गया, जिसके संस्थापक सदस्य अटल जी ही थे और वे भाजपा के पहले अध्यक्ष भी बने तथा 1986 तक इस पद पर आसीन रहे और संसद में भाजपा संसदीय दल के नेता भी बने रहे। 1962 से 1967 और 1986 में अटल जी राज्यसभा के सदस्य भी रहे। आपातकाल के बाद जब चुनाव की घोषणा हुई थी तो कवि हृदय वाजपेयी जी ने कहा था:-
बाद मुद्दत के मिले हैं दीवाने,
कहने सुनने को बहुत हैं अफसाने।
खुली हवा में जरा सांस तो ले लें,
कब तक रहेगी आजादी कौन जाने!
पहली बार अटल जी 16 मई 1996 को देश के प्रधानमंत्री बने किन्तु उनकी सरकार मात्र 13 दिन ही चली क्योंकि सदन में बहुमत साबित न कर पाने के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और वे 1998 तक लोकसभा में विपक्ष के नेता बने रहे। दूसरी बार वे 1998 में प्रधानमंत्री बने लेकिन सहयोगी दलों द्वारा समर्थन वापस लेने के कारण 13 माह के अंतराल बाद उनकी सरकार गिर गई, जिसके बाद 1999 में हुए राजग के साझा घोषणापत्र पर चुनाव लड़ा गया, जिसमें वाजपेयी के नेतृत्व को प्रमुख मुद्दा बनाया गया। चुनाव में राजग को बहुमत हासिल हुआ और 13 अक्तूबर 1999 को अटल जी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद संभाला तथा कार्यकाल पूरा करते हुए 2004 तक इस पद को सुशोभित किया। 2005 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी थी। 2007 में उनकी अंतिम सभा 25 अप्रैल को कपूरथला चौराहे पर भाजपा उम्मीदवारों के समर्थन में हुई थी लेकिन उसके बाद उनका स्वास्थ्य खराब होता गया। 2009 में उनकी तबीयत ज्यादा खराब होने पर उन्हें कई दिनों तक वेंटिलेटर पर रखा गया था लेकिन ठीक होने पर उन्हें अस्पताल से छुट्टी तो दे दी गई थी किन्तु उसके बाद के वर्षों में उन्हें स्वास्थ्य संबंधी गंभीर परेशानियां लगातार बनी रही और वे 16 अगस्त 2018 को समस्त देशवासियों को एक अटल शून्य में छोड़ चिरनिद्रा में लीन हो गए।

 

शिक्षा के मन्दिरों को कलंकित करते दरिन्दे
रमेश सर्राफ धमोरा
राजस्थान में झुंझुनू जिले के सैनिक स्कूल के एक शिक्षक ने स्कूल में पढ़ने वाले 12 नाबालिग बच्चों का यौन शोषण कर एक शर्मनाक काम किया है। कड़े सैनिक अनुशासन व चरित्र निर्माण की शिक्षा के लिए विख्यात सैनिक स्कूल पर इस घटना ने एक बदनुमा दाग लगा दिया है। इस घटना से देश के अंदर चल रहे सभी 28 सैनिक स्कूलों की छवि खराब हुई है। हालांकि दोषी शिक्षक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन सैनिक स्कूल में इस तरह की घटना का होना कई सवालों को खड़ा करती है। सैनिक स्कूल में लंबा चौड़ा स्टाफ व हर जगह सीसीटीवी कैमरे लगे रहते हैं। उसके उपरांत लगातार ऐसी घटना को अंजाम देना स्कूल प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। इस घटना से पुलिस भी लोगों के निशाने पर आई है। पुलिस ने इस घटना को जानबूझकर दबाने का प्रयास किया था जिसकी सर्वत्र निंदा हो रही है।
पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के सरकारी और सरकार की ओर से वित्तपोषित स्कूलों के शिक्षकों के लिए एक आचार संहिता तैयार की है जिसका सभी शिक्षकों व गैर-शिक्षण कर्मचारियों को पालन करना अनिवार्य है। इसके उल्लंघन का दोषी पाए जाने की स्थिति में नौकरी से बर्खास्त करने तक की सजा का प्रावधान है। बंगाल संभवत: ऐसी आचार संहिता बनाने वाला देश का पहला राज्य है। सरकार की ओर से जारी एक अधिसूचना में तमाम स्कूलों में इसका पालन अनिवार्य कर दिया गया है। हाल के वर्षों में पश्चिम बंगाल के स्कूलों में छात्र छात्राओं के यौन शोषण की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। कोलकाता में ही बीते दो वर्षों के दौरान ऐसी एक दर्जन से ज्यादा घटनाएं दर्ज की गई हैं। इनमें एक दर्जन से ज्यादा शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की गिरफ्तारी हुई है। ऐसे घटनाओं से संबंधित अभियुक्त के साथ ही स्कूल की भी बदनामी होती है।
झारखंड के धनबाद जिले में चौथी कक्षा की एक छात्रा से स्कूल के चिकित्सा कक्ष में उप-प्रधानाचार्य समेत दो अध्यापकों द्वारा कथित तौर पर दुष्कर्म करने का मामला सामने आया है। तोपचांची स्थित स्कूल के दो शिक्षकों और एक नर्स के खिलाफ कतरास थाने में एफआईआर दर्ज की गई है। छात्रा ने आरोपियों पर एक महीने पहले संस्थान के चिकित्सा कक्ष में उससे दुष्कर्म करने का आरोप लगाया है। पुलिस के मुताबिक पीड़ित छात्रा कक्षा में बेहोश हो गई थी। शिक्षक ने उसे चिकित्सा कक्ष में भेज दिया जहां नर्स ने उसे दवा दी जिससे वो बेसुध हो गई फिर उसके साथ दुष्कर्म हुआ।
आंध्र प्रदेश में कृष्णा जिले के एक सरकारी उच्च प्राथमिक स्कूल के प्रधानाध्यापक को अपने ही स्कूल की कक्षा 2 की बच्ची के साथ बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। स्कूल के प्रधानाध्यापक ने आठ साल की बच्ची को एक खाली कमरे में ले जाकर उसके साथ बलात्कार किया। इस घटना के बाद बच्ची रोती हुई घर गई थी। उसके कपड़ों पर चोट और खून के निशान थे। उसकी मां उसे एक निजी अस्पताल में ले गई जहां डॉक्टरों ने उसे बताया कि उसके साथ यौन उत्पीडऩ किया गया है। उत्तरी केरल के मलप्पुरम जिले में स्कूल के एक शिक्षक ने छात्रा से कथित तौर पर बलात्कार किया। सातवीं कक्षा की 12 वर्षीय छात्रा अब गर्भवती है। पुलिस के अनुसार दो महीने तक बच्ची के साथ बलात्कार किया गया।
राजस्थान के जैसलमेर के स्थानीय कोर्ट ने एक प्राइवेट स्कूल के मालिक को आठ वर्षीय बच्ची के बलात्कार के आरोप में 20 साल के कारावास की सजा सुनाई गई है। कोर्ट ने आरोपी हरि सिंह पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। आरोपी हरि सिंह जैसलमेर के मोहनगढ़ जिले में एक स्कूल का मालिक हैं। मगर लोगों का मानना था कि उसके अपराध को देखते हुये उसे मौत की सजा दी जानी चाहिये थी। राजस्थान के भीलवाड़ा के सरकारी स्कूल में टीचर ने गुरु शिष्य के संबंधों को शर्मसार कर दिया। सरकारी स्कूल में इंटर्नशिप करने आए एक युवक ने अपनी ही छात्रा के साथ बलात्कार किया। उसके बाद आरोपी ने नाबालिग छात्रा की तस्वीरें सोशल मीडिया में वायरल कर दी। बताया जा रहा है कि आरोपी सरकारी स्कूल में पढ़ाता था और नाबालिग छात्रा को ब्लैकमेल करता था। यह मामला तब सामने आया जब आरोपी ने नाबालिग छात्रा की ब्लैकमेल करने वाली तस्वीरें सोशल मीडिया में वायरल कर दीं। नाबालिग लडक़ी की तस्वीरें जब उसकी मां तक पहुंचीं तब पूरे मामले का खुलासा हुआ।
हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के उपमंडल अंब के तहत सीनियर सेकेंडरी स्कूल में एक शिक्षक ने नाबालिग छात्रा से स्कूल के वॉशरूम में दुष्कर्म कर डाला। 15 साल की छात्रा ने पुलिस को बताया कि वह रोजाना की तरह स्कूल गई हुई थी। इसी दौरान करीब 11 बजे जब वह स्कूल के वॉशरूम में गई थी तो आरोपी शिक्षक भी उसी के पीछे आ गया। जहां उसने छात्रा के साथ रेप किया। ओडिशा के कोरापुट के एक स्कूल में 7वीं क्लास में पढ़ने वाली छात्रा के साथ रेप की घटना सामने आई है। रेप का आरोप स्कूल के हेडमिस्ट्रेस के पति पर लगाया है। पुलिस का कहना है कि पीड़िता गर्भवती है। इस मामले में पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है।
बिहार में महिलाओं के साथ बढ़ती आपराधिक घटनाएं थमने का नहीं ले रही हैं। बिहार के बक्सर जिले में एक नाबालिग लड़की के साथ स्कूल में रेप की वारदात सामने आई है। वारदात जिले के कोरानसराय थाना इलाके की है। बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह रेप कांड में 34 बच्चियों के साथ बलात्कार किया गया था। उस कांड में कई बड़े लोगों को जेल की हवा खानी पड़ रही है।
देश के विभिन्न प्रांतों के स्कूलों में आए दिन छात्र छात्राओं के साथ स्कूल के शिक्षकों द्वारा यौन दुराचार की घटनाओं की खबर अखबारों की सुर्खियां बनती रहती है। जिससे ना केवल स्कूल ही बदनाम होता है बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था ही दागदार हो जाती है। केन्द्र व राज्य सरकारों को इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाने की दिशा में प्रभावी कदम उठाने चाहिये।
नाबालिग बच्ची से बलात्कार करने पर फांसी देने तक की सजा का प्रावधान किया जा चुका है। मगर आज भी ऐसे आरोपियों को निचली अदालतें आजन्म कारावास की सजा नहीं सुना रही है जिससे ऐसे वहशी दरिंदो में कानून का डर व्याप्त नहीं हो पा रहा है। हमारे देश के कानून में मिली नागरिक अधिकारों की रक्षा की छूट का फायदा भी ऐसे अपराधी आसानी से उठा कर कड़ी सजा से बच जाते हैं। शिक्षा के मन्दिरों को कलंकित करने वाले लोगों को जब तक कड़ी सजा नहीं मिलेगी तब तक शिक्षण संस्थाये ऐसे ही दागदार होती रहेगी।

वायु सेवाओं को मिली नई उड़ान
दुर्गेश रायकवार
राज्य सरकार ने अपने वचन-पत्र में प्रदेश में वायु सेवाओं का विस्तार करने का वादा किया था। वादे के मुताबिक राज्य सरकार पहले साल ही भोपाल और इंदौर विमानतल को “कस्टम नोटिफाइड एयरपोर्ट” घोषित कराने में सफल रही। वर्ष 2019 में इंदौर से विस्तारा एयरलाइंस और ट्रू-जेट एयरलाइन द्वारा हवाई उड़ानें शुरू की गईं। इन एयरलाइंस द्वारा दिल्ली-अहमदाबाद-हैदराबाद के लिये अतिरिक्त उड़ान सेवा इंदौर को मिली।
भोपाल से वर्ष 2019 में इंडिगो एयरलाइंस और स्पाइस जेट एयरलाईन ने उड़ान सेवा शुरू की। इसमें इंडिगो एयरलाइंस द्वारा भोपाल से हैदराबाद, दिल्ली, मुम्बई और बैंगलुरू की सेवाएँ दी जा रही हैं। स्पाइस जेट एयरलाईन द्वारा भोपाल से दिल्ली, मुम्बई, जयपुर और उदयपुर के लिए उड़ान सेवाएँ दी जा रही हैं। इन्दौर विमानतल कस्टम नोटिफाईड एयरपोर्ट घोषित होते ही यहाँ से दुबई के लिये अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें संचालित हो रही हैं।इस एयरपोर्ट पर कार्गो सेवा भी चालू हो गई है। भोपाल हवाई अड्डा कस्टम नोटिफाईड एयरपोर्ट घोषित होते ही कस्टम विभाग एवं गृह मंत्रालय द्वारा स्थल निरीक्षण किया गया और शीघ्र ही नोटिफिकेशन जारी किया जा रहा है।
रीवा, दतिया, रतलाम, उज्जैन, मंदसौर, छिंदवाड़ा, उमरिया एवं बालाघाट स्थित शासकीय हवाई पट्टियां पायलट प्रशिक्षण तथा अन्य उड्डयन गतिविधियाँ संचालित करने, एयरो स्पोर्टस गतिविधियां संचालित करने तथा एयरक्रॉफ्ट रिसाइक्लिंग, हेलीकॉप्टर अकादमी तथा एयरो स्पोर्टस आदि सुविधाएँ विकसित करने के लिए निर्धारित शुल्क पर आवंटित की गई हैं। इसी प्रकार अन्य हवाई पट्टियों को भी निर्धारित शुल्क पर दिये जाने की कार्य-योजना है।
वर्तमान में रीजनल कनेक्टिविटी योजना में निजी वैमानिक संस्थाओं द्वारा ग्वालियर-इन्दौर-ग्वालियर, ग्वालियर-दिल्ली, बैंगलुरू-ग्वालियर-बैंगलुरू, कोलकाता-ग्वालियर-कोलकाता, ग्वालियर-जम्मू-ग्वालियर तथा हैदराबाद-ग्वालियर- हैदराबाद रूट पर हवाई सेवाएँ संचालित हो रही हैं। भारत सरकार की रीजनल कनेक्टिविटी योजना (आर.सी.एस) के तहत रीवा-भोपाल एवं रीवा-झाँसी रूट विस्तारित किये गये हैं।
रीजनल कनेक्टिविटी योजना 4.0 में प्रदेश की बिरवा, छिंदवाड़ा, दतिया, मण्डला, नीमच, पचमढ़ी, रीवा, सतना एवं उमरिया हवाई पट्टियों को शामिल करने के लिये विमानन विभाग की ओर से भारत सरकार को पत्र लिखा गया है।
अब प्रदेश में विमान सेवाओं के विस्तार के जरिए पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। लोग कम समय में लंबी दूरी तय कर अपना समय बचा सकेंगे। इसी के साथ, बीमारी की दशा में भी लोगों को समय रहते इलाज मिल सकेगा।

नागरिकता के फर्जी मुद्दे पर फंसी भाजपा
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कोई कानून हमारी संसद स्पष्ट बहुमत से बनाए और उस पर इतना देशव्यापी हंगामा होने लगे, ऐसा मुझे कभी याद नहीं पड़ता। संसद के दोनों सदनों ने नागरिकता संशोधन विधेयक पारित किया, जिसके अनुसार पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आनेवाले शरणार्थियों को भारत की नागरिकता प्रदान की जाएगी। लेकिन यह नागरिकता सिर्फ हिंदुओं, सिखों, ईसाइयों, पारसियों और यहूदियों को दी जाएगी। इन देशों के मुसलमानों को नहीं दी जाएगी ? क्योंकि हमारी सरकार का दावा है कि इन पड़ौसी मुस्लिम देशों के उक्त अल्पसंख्यकों पर काफी अत्याचार होते हैं। उन्हें शरण देना भारत का धर्म है, कर्तव्य है, फर्ज है। इसी फर्ज को निभाने के लिए मोदी सरकार ने यह नया कानून बनाया है।
इसमें शक नहीं कि शरणार्थियों को शरण देना किसी भी सभ्य देश का कर्तव्य है। इस दृष्टि से यह कानून सराहनीय है लेकिन शरण देने के लिए जो शर्त रखी गई है, वह अधूरी है, अस्पष्ट है और भ्रामक है। भारतीय नागरिकता देने की शर्त यह है कि इन पड़ौसी इस्लामी देशों में गैर-मुस्लिमों पर अत्याचार होता है। मान लें कि यह आरोप सही है तो क्या उसका एक मात्र इलाज यही है कि धार्मिक अत्याचार के बहाने जो भी भारत पर लदना चाहे, उसे हम लाद लें ? भारत आनेवाले इन लाखों लोगों में से आप कैसे तय करेंगे कि कितने लोग धार्मिक उत्पीड़न के कारण शरण मांग रहे हैं ? हो सकता है कि वे बेहतर काम-धंधों के लालच में आए हों, भारत के जरिए अमेरिका और यूरोप जाने के लिए आए हों, अपने रिश्तेदारों के साथ रहने आए हों या उन सरकारों के लिए जासूसी करने के लिए भेजे गए हों। उनके पास तुरुप का बस एक ही पत्ता है कि वे मुसलमान नहीं है। बस, उनकी गाड़ी पार है। हम धार्मिक उत्पीड़न के बहाने भारत को दक्षिण एशिया का अनाथालय क्यों बना देना चाहते हैं ? इसी कारण पूर्वोत्तर के प्रांतों में बगावत की आग भड़की हुई है।
मूल प्रश्न यह है कि उत्पीड़न क्या सिर्फ धार्मिक होता है ? यदि यह सही होता तो 1971 में बांग्लादेश से लगभग एक करोड़ मुसलमान भागकर भारत क्यों आ गए थे ? पाकिस्तान के अहमदिया, शिया, बलूच, सिंधी और पठान लोग क्या मुसलमान नहीं हैं ? वे भागकर अफगानिस्तान, भारत और पश्चिमी देशों में क्यों जाते हैं ? क्या अफगानिस्तान के शिया, हजारा, मू-ए-सुर्ख, परचमी और खल्की लोग मुसलमान नहीं हैं ? वे वहां से क्यों भागते रहे ? इन तीनों देशों से बाहर भागनेवाले लोगों में हिंदू कम और मुसलमान बहुत ज्यादा क्यों हैं ? अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार घोषणा-पत्र और शरणार्थी अभिसमय के अनुसार कोई भी व्यक्ति सिर्फ धार्मिक उत्पीड़न ही नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और आनुवांशिक उत्पीड़न से त्रस्त होने पर शरण पाने का अधिकारी होता है। इसीलिए हमारा यह नागरिकता संशोधन कानून अधूरा है।
यह कानून सपाट भी है। यह सिर्फ पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों की ही चिंता करता है। क्यों करता है ? क्योंकि 1947 में बहुत-से गैर-मुस्लिम इन देशों में रह गए थे। वे मूलतः भारतीय ही हैं। यहां पहला सवाल है कि क्या 1947 में अफगानिस्तान भारत का हिस्सा था ? यदि नहीं तो उसे क्यों जोड़ा गया ? यदि उसे जोड़ा गया तो बर्मा, भूटान, श्रीलंका और नेपाल को क्यों छोड़ा गया ? बर्मा और श्रीलंका तो ब्रिटिश भारत के अंग ही थे। इन देशों के हजारों-लाखों गैर-मुस्लिम शरणार्थी भारत आते रहे हैं। उनमें तमिल, मुस्लिम, ईसाई और हिंदू शरणार्थी भी हैं। दुनिया के पचासों देशों में बसे दो करोड़ प्रवासी भारतीयों पर कभी संकट आया तो वे क्या करेंगे ?
यह ठीक है कि इस नए नागरिकता कानून से भारतीय मुसलमान नागरिकों को कोई नुकसान नहीं है लेकिन उन्हें क्या हुआ है ? वे क्यों भड़क उठे हैं ? क्योंकि इस कानून के पीछे छिपी सांप्रदायिकता दहाड़ मार-मारकर चिल्ला रही है। भाजपा ने अपने आप को मुसलमान-विरोधी घोषित कर दिया है। भाजपा जब विपक्ष में थी, तब वोट पाने के लिए यह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण समझ में आता था। चुनावी घोषणा-पत्र में इसे डाल दिया गया था लेकिन आप अब सत्ता में हैं। किसे नागरिकता देना, किसे नहीं, यह आपके हाथ में है। इसके लिए गुण-दोष का शुद्ध और निष्पक्ष पैमाना लगाइए और बिना किसी भेद-भाव के नागरिकता दीजिए या मत दीजिए। मेरी राय में यही सच्ची हिंदुत्व दृष्टि है।
यदि हिंदुओं के वोट-बैंक को मजबूत करने के लिए यह पैंतरा मारा गया है तो बंगाल, असम, त्रिपुरा और पूर्वोतर के अन्य प्रांतों में सारे हिंदू क्यों भड़के हुए हैं ? वहां की भाजपा सरकारें क्यों हतप्रभ हैं ? यह ठीक है कि इन प्रांतों के कुछ जिलों में शरणार्थी वर्जित हैं लेकिन अभी भी राष्ट्रीय नागरिकता सूची तैयार की गई है, उसमें से 19 लाख लोग बाहर कर दिए गए। उनमें से 11 लाख हिंदू बंगाली हैं। इन सीमांत प्रदेशों में से भाजपा का सूंपड़ा साफ होने की पूरी आशंका है। यह देश का दुर्भाग्य है कि पूर्वी सीमांत के प्रांतों में कोई भी अखिल भारतीय पार्टी जम नहीं पा रही है। भाजपा के इस कानून ने देश के परस्पर विरोधी दलों को भी एकजुट कर दिया है।
यह कानून बनाते समय सरकार और हमारे सांसदों ने यह भी ठीक से नहीं सोचा कि इससे अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की प्रतिष्ठा को कितनी ठेस पहुंचेगी। इस कानून के कारण मचे कोहराम के चलते गुवाहाटी में आयोजित भारतीय और जापानी प्रधानमंत्रियों की भेंट रद्द करनी पड़ गई। अमेरिकी सरकार और संयुक्तराष्ट्र के मानव अधिकार आयोग ने हमारे इस कदम की कड़ी आलोचना की है। पाकिस्तान के एक हिंदू सांसद और एक हिंदू विधायक ने इस कानून को वहां के हिंदुओं के लिए हानिकारक बताया है। बांग्लादेश, जो कि भारत का अभिन्न मित्र है, इस कानून से बहुत परेशान है। उसके विदेश मंत्री और गृहमंत्री ने अपनी भारत-यात्रा स्थगित कर दी है। इमरान खान इस कानून की निंदा करें, इसमें कोई अचरज नहीं है। मुझे डर यह है कि कहीं अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी और प्रधानमंत्री डाॅ. अब्दुल्ला भी भारत की आलोचना न करने लगें। भाजपा ने यह कानून लाकर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान को, जो कई मामलों में परस्पर विरोधी हैं, एकजुट कर दिया है। कहीं ये तीनों देश अपने यहां भारत-जैसा कोई जवाबी कानून ही पास न कर दें। याने वे भारत के अल्पसंख्यकों- मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों और दलितों को नागरिकता सहर्ष देने का कानून न बना दें। दुनिया में उनकी जितनी बदनामी होगी, उतनी ही हमारी भी होने लगेगी।
यदि भाजपा सरकार भारत में जनसंख्या का धार्मिक अनुपात सही करना चाहती है, जो कि उचित है तो उसे चाहिए कि वह ‘हम दो और हमारे दो’ का सख्त कानून बनाए। उसका उल्लंघन करनेवालों का जीना भारत में फिर आसान नहीं होगा। मेरा राय में सरकार में इतना साहस और आत्मविश्वास होना चाहिए कि वह इस कानून को वापस ले ले। इस फर्जी मुद्दे पर देश का समय बर्बाद करने की बजाय हमारे राजनीतिक दल देश की आर्थिक स्थिति को डावांडोल होने से बचाएं तो बेहतर होगा। यदि सर्वोच्च न्यायालय इस कानून को असंवैधानिक घोषित कर दे तो वह भारत को इस निरर्थक और फर्जी संकट से बचा सकता है।

जब गंगोत्री ही अपवित्र हैं तो गंगा कहाँ तक पवित्र होगी !
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
आजकल बलात्कार के साथ हिंसा ,चोरी, डैकेती ,वैश्यावृत्ति आदि पाप या अपराध बहुलता से हो रहे हैं ,और अपराधियों को आजकल कोई भय नहीं हैं ,जबकि सी सी टी वी ,तकनीकी की बहुलता होने से शीघ्र पकडे भी जाते हैं उसके बाद भी अपराधों की कमी न होना ,यह एक यक्ष्य प्रश्न हमारे समाज में हैं .क्या हमारे देश का कानून लचीला हैं ,उसमे युगानुसार परिवर्तन और परिवर्धन की आवश्यकता नहीं हैं ?या ऐसा तो नहीं हमारे देश की संसद और विधान सभा में निर्वाचित स्वयं इन अपराधों के बावजूद सम्मान पा रहे हैं .इसका मतलब यह हुआ की जब गंगोत्री ही अपवित्र हो रही हैं तो गंगा कहाँ तक पवित्र होंगी .
यह एक चिंतन का प्रश्न हैं की क्यों ये अपराध हो रहे हैं ?इसके मूल में बेरोजगारी ,महगाई ,नशा व्यसन ,परिवेश दूषित होना जैसे पहले फिल्मों को ,उसके बाद टी वी सेरिअल्स को और अब मोबाइल संस्कृति को आरोपित करना ,ये कितना सच हैं इसका विश्लेषण करना अलग बात हैं पर घटनाएं निरंतर बढ़ रही हैं .और ये अब कम होने वाली नहीं हैं ,उसका कारण भयमुक्त समाज और कठोर दंड का न होना या शीघ्र दंड न मिलना ,न्यायिक प्रक्रिया इतनी जटिल की अपराधी को नैसर्गिक न्याय हेतु सुसंगत अवसर देना ,उदहारण के लिए निर्भया काण्ड के अपराधियों का अपराध सिद्ध होने के बाद आज भी वे दंड से दूर हैं ,सरकार उनका पालन पोषण करती हैं और यह न्याय व्यवस्था भी हैं .क्या उनकी दया याचिका के लिए या दंड देने के लिए घटना की तुलना में कितना अधिक समय लग रहा हैं ,ऐसा क्यों ? एक बात और समझ में आ रही हैं की बेरोजगारी और महंगाई के कारण अब अपराधी अपराध कर सरकारी सम्पत्ति बनकर जेलों में सुरक्षित हो जाता हैं जहाँ सर्कार की जिम्मेदारी होती हैं उसके भरण पोषण ,रखरखाव की .और जेलों से सुरक्षित अन्य जगह नहीं हैं और कोई दुर्घटना हुई तो मानवाधिकार का डंडा चलने लगता हैं .
ऐसा सुनने में आया हैं की देश में जल्लादों की कमी होने से फांसी देने में कठनाइयां हैं ,ठीक भी हैं ,पर मौत से बड़ी सजा तो नहीं हो सकती हैं न ,जब अपराधियों को उससे डर नहीं लग रहा हैं इसका मतलब अपराधियों का कलेजा बहुत मजबूत होता हैं .
वर्त्तमान में जो अपराधों की संख्या में वृद्धि ,अनेकों प्रकार के अपराध और उनके करने ढंग बहुत चिंतनीय विषय हैं ,अकल्पनीय तरीकों को अपनाना .इसका हल मात्र यदि अपराध की पुष्टि होती हैं तो अपराधियों को भी त्वरित दंड देना चाहिए जैसे उन्होंने अपराध के लिए कोई समय नहीं लिया ,न कोई समय निश्चित किया और न कोई मुहूर्त देखा ,और उसके क्या दुष्परिणाम पीड़ित को होंगे और इसका हश्र उनके साथ कैसा होगा .तब न्याय व्यवस्था क्यों इतना विचार करती हैं .?
समाज में जागरूकता के बावजूद भी अपराधियों को कोई भय नहीं हैं ,खासतौर पर बलात्कार का मामला इतना सामान्य होने लगा की अब तो एक माह से लेकर कोई भी उम्र सुरक्षित नहीं हैं ,इसको वहशीपना कहना उचित होगा या बीमारियां .बात एक पक्षीय नहीं हैं ,किसी किसी प्रकरण में पीड़ित भी इसमें भागीदार होते हैं .आज सामाजिक मर्यादाएं तार तार हो रही हैं पर इनका उदगम फिल्म ,टी वी ,साहित्य मोबाइल के साथ दूषित मानसिकता हैं .
इन बुराइयों के लिए व्यापक चिंतन मनन की जरुरत हैं और सबसे पहले बचाव ही इलाज़ हैं ,सुरक्षा में ही जीवन हैं ,देखा देखी करने से हम को ही नुक्सान होता हैं .इसीलिए जितने भी सुरक्षा कवच हों उन्हें अपनाये .और अपराधियों के प्रति सरकार को निर्मम होना चाहिए .दंड व्यवस्था शीघ्र हो ,बिलम्व से न्याय भी अन्याय लगने लगता हैं .और सबसे पहले निर्वाचित नेताओं का बहिष्कार होना चाहिए और यदि वे अपराधी सिद्ध हो चुके हो तो उन्हें जेल में होना चाहिए.तभी कुछ संभावना दिखाई देगी .

कहां सावरकर और कहां राहुल ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हमारे आजकल के नेताओं से यह आशा करना कि वे नेहरु, लोहिया, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, विनोबा, अटलबिहारी वाजपेयी और नरसिंहराव की तरह पढ़े-लिखे होंगे, उनके साथ अन्याय करना होगा। वे सत्ता में हों या विपक्ष हों, उनका बौद्धिक स्तर लगभग एक-जैसा ही होता है। सलाहकार तो उनके भी होते हैं। लेकिन वे अपने स्तर के लोगों से ही घिरे रहते हैं। इसी का नतीजा है कि कांग्रेस के राहुल गांधी ने कह दिया कि मैं सावरकर हूं क्या, जो माफी मांगूगा। मैं सावरकर नहीं, राहुल गांधी हूं। क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा ? आप कौनसे गांधी हैं ? आपके दादाजी, फिरोज भाई तो खुद को गांधी भी नहीं लिखते थे। उनके सरनेम की स्पेलिंग होती थी ghendi याने घेंडी, घंदी या गंधी । राहुल ने यह नहीं बताया कि उसके माफी मांगने और सावरकर का क्या संबंध है। या तो उसे पता ही नहीं होगा कि उसने जो कहा, उसके पीछे कौनसी कहानी है। यह भी हो सकता है, जैसा कि होता हुआ अक्सर दिखाई पड़ता है कि किसी ने आकर कान में चाबी भरी और गुड्डा नाचने लगा। चाबी खतम तो नाच भी खतम। उसे आगा-पीछा कुछ पता नहीं। यह तो ठीक है कि रेप इन इंडिया (भारत में बलात्कार) कहने पर उसे माफी मांगने की कोई जरुरत नहीं थी, क्योंकि ऐसा कहकर वह बलात्कार का समर्थन नहीं कर रहा था बल्कि उसे धिक्कार रहा था लेकिन ‘मैं मर जाऊंगा लेकिन माफी नहीं मांगूंगा’, यह कहने की क्या मजबूरी थी ? जो सर्वोच्च न्यायालय से पहले ही माफी मांग चुका है, चौकीदार चोर है पर, उसे इतनी डींग मारने की क्या जरुरत है ? जहां तक अपने आपकी तुलना सावरकर से करने की बात है, यह तथाकथित नेता, जो पांच-सात वाक्य भी शुद्ध नहीं बोल सकता, उसकी यह हिमाकत ही है कि वह सावरकर को खुद से नीचा दिखाने की कोशिश करे। ऐसा करके अपनी भद्द पिटाने के अलावा इस घिसे-पीटे नौसिखिए ने और क्या किया ? सावरकर ने भारत की आजादी के लिए जैसी कुर्बानियां की हैं, क्या किसी कांग्रेसी नेता ने की है ? सावरकर ने जैसे मौलिक और खोजपूर्ण ग्रंथ लिखे हैं, उन्हें पढ़ने की भी क्षमता या बुद्धि आज के नेताओं में है ? सावरकर इतने बुद्धिवादी और तर्कशील थे कि उन्हें कांग्रेस तो क्या, जनसंघ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के लिए भी पचाना मुश्किल रहा है। यह ठीक है कि सावरकर और गांधी में कभी पटी नहीं लेकिन सावरकर में दम नहीं होता तो गांधी उनसे मिलने के लिए 1909 में लंदन के इंडिया हाउस और 1927 में उनके घर रत्नागिरि में क्यों गए थे ?

नेशनल स्पोर्ट्स हब बनने की ओर अग्रसर मध्यप्रदेश
बिन्दु सुनील
मध्यप्रदेश में पिछले एक साल में खेलों के लिये विश्व-स्तरीय अधोसंरचना विकास को वांछित गति मिली है। साथ ही, विभिन्न खेलों की पदक तालिका में लगातार पहले और दूसरे स्थान पर अपनी उपस्थिति कायम रखने में भी प्रदेश सफल है। प्रदेश की राज्य खेल अकादमियों के मॉडल को अंडमान-निकोबार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, नागालैंड, मेघालय, असम, गोवा और उड़ीसा आदि राज्यों ने सराहा है। ये सभी राज्य आंशिक अथवा पूर्ण रूप से मध्यप्रदेश अकादमी के मॉडल को लागू करने का प्रयास भी कर रहे हैं। अब राज्य सरकार ने प्रदेश की खेल प्रतिभाओं को बढ़ावा देने के लिए नई खेल नीति और खेलों का महत्त्व स्थापित करने के लिए स्पोर्ट्स कोर्स को कंपलसरी करने की योजना लागू करने का निर्णय लिया है।
-खिलाड़ियों के लिये चिकित्सा एवं दुर्घटना बीमा
प्रदेश के खिलाड़ियों को अब चिकित्सा एवं दुर्घटना बीमा का लाभ मिलेगा। मध्यप्रदेश अब खिलाड़ियों का बीमा कराने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। प्रथम चरण में विभिन्न खेल अकादमियों के लगभग 822 खिलाड़ियों को बीमा का लाभ दिया जा रहा है। चिकित्सा बीमा से खिलाड़ी देश के चुनिन्दा अस्पतालों में से किसी भी अस्पताल में अपना इलाज करवा सकते हैं। इसके लिये उन्हें 2 लाख रुपये तक नि:शुल्क उपचार सुविधा उपलब्ध कराई गई है। खिलाड़ियों का 5 लाख रुपये का जीवन बीमा भी कराया गया है। साथ ही, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के खिलाड़ियों के अभिभावकों को भी जीवन बीमा में शामिल किया गया है।
बीमा के माध्यम से खिलाड़ियों को पूरे देश में कैशलेस उपचार की सुविधा उपलब्ध रहेगी। प्रदेश के ऐसे खिलाड़ी, जो अधिकृत रूप से राष्ट्रीय प्रतियोगिता में प्रतिभागिता कर रहे हैं, उन्हें भी चिकित्सा एवं दुर्घटना बीमा की कैशलेस सुविधा उपलब्ध कराने की प्रक्रिया जारी है। इसके लिये संबंधित खेल संघ को राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी की प्रमाणित सूची उपलब्ध करानी होगी। परीक्षण के बाद खिलाड़ी का पंजीयन कर उसे यह सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।
-शासकीय सेवा में खिलाड़ियों को 5 प्रतिशत आरक्षण
प्रस्तावित नई खेल नीति में यह व्यवस्था की जा रही है कि शासकीय नौकरी में खिलाड़ियों को 5 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिल सके।
अंतर्राष्ट्रीय पदक विजेता और सहभागिता के लिए प्रोत्साहन राशि
प्रदेश में पहली बार ओलंपिक, विश्व कप, एशियाई गेम्स, राष्ट्र-मंडल खेल और दक्षिण एशियाई खेलों में पदक प्राप्त करने वाले खिलाड़ियों के लिये प्रोत्साहन राशि निश्चित की गयी है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक हासिल करने पर 2 करोड़, रजत पदक पर एक करोड़ तथा कांस्य पदक हासिल करने पर 50 लाख की प्रोत्साहन राशि का प्रावधान किया गया है। इसके अतिरिक्त कोई भी खिलाड़ी, जिसने अंतर्राष्ट्रीय खेलों में प्रतिभागिता की है और पदक नहीं भी लिया है, तब भी उसे प्रोत्साहन के तौर पर 10 लाख की राशि दी जायेगी। राष्ट्रीय खेल एवं राष्ट्रीय चेंपियनशिप में पदक विजेता खिलाडियों को स्वर्ण पदक जीतने पर 5 लाख, रजत पर 3 लाख 20 हज़ार और कांस्य पदक जीतने पर 2 लाख 40 हज़ार रूपये की राशि दी जाएगी। इसी प्रकार, अधिकृत राष्ट्रीय चेंपियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल करने वाले खिलाड़ी को एक लाख, रजत पदक पर 75 हजार और कांस्य पदक पर 50 हजार रूपये प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। प्रतियोगिता के दौरान खिलाडियों को उपकरण क्रय करने एवं किराये पर लेने के लिए अधिकतम 5 लाख रूपये की राशि दी जाएगी। यह भी निर्णय लिया गया है कि खिलाडि़यों को उच्च स्तरीय अंतर्राष्ट्रीय/राष्ट्रीय तकनीकी प्रशिक्षण के लिए अधिकतम 5 लाख रूपये की राशि दी जाएगी। राज्य शासन ने यह भी निर्णय लिया है कि प्रशिक्षक, जिनके देख-रेख में खिलाड़ी अपनी पहचान बनाने में सफल होता है, उन्हें भी प्रोत्साहित किया जायेगा। इस संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय/राष्ट्रीय चेंपियनशिप तथा राष्ट्रीय खेल में पदक प्राप्त करने पर खिलाड़ियों को देय राशि का दस प्रतिशत हिस्सा प्रशिक्षकों को दिया जायेगा।
-स्पोर्ट्स साइंस विशेषज्ञों की नियुक्ति
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उच्च स्तरीय प्रदर्शन करने के लिए स्पोर्ट्स साइंस की भूमिका महत्वपूर्ण है। वर्त्तमान में जितने खिलाड़ी ओलंपिक, एशियाई गेम्स एवं कॉमन वेल्थ गेम्स जैसी अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, उन सभी को स्पोर्ट्स साइंस की सपोर्ट टीम मदद करती है। प्रदेश के खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं परन्तु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उच्च स्तरीय प्रदर्शन के लिए स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट, स्पोर्ट्स न्यूट्रीशियंस, स्पोर्ट्स फिजिओलॉजिस्ट, फ़िज़ियोथेरेपिस्ट, बायो- मैकेनिकल एक्सपर्ट, वीडियो एनालिस्ट, एक्सरसाइज साइंस एक्सपर्ट, फिटनेस ट्रेनर की बहुत जरूरत होती है। इसलिये राज्य सरकार ने इन पदों पर भी भर्ती करने का निर्णय लिया है।
-गुरुनानक देवजी प्रांतीय ओलम्पिक खेल
ग्रामीण खेल प्रतिभाओं को अवसर प्रदान करने के लिये विकासखण्ड, जिला एवं संभागीय स्तर पर गुरूनानक देव प्रांतीय ओलम्पिक प्रारंभ किया गया है। इसके तहत हॉकी, बास्केटबॉल, फुटबॉल, वॉलीबॉल, कबड्डी ,खो-खो, एथेलेटिक्स, कुश्ती, बेडमिंटन और टेबल-टेनिस खेल को शामिल किया गया है। प्रांतीय ओलंपिक खेल में 16 वर्ष से अधिक आयु समूह के बालक/बालिका खिलाड़ी सम्मिलित होंगे। राज्य स्तरीय प्रांतीय ओलंपिक प्रतियोगिताओं के दलीय खेलों में प्रथम को एक लाख, द्वितीय को 75 हज़ार और तृतीय को 50 हजार रूपये दिये जाएंगे। व्यक्तिगत खेल में यह राशि क्रमशः 7 हजार, 5 हजार और 3 हजार रूपये होगी। अब स्कूली स्तर पर भी अण्डर-16 प्रांतीय ओलंम्पिक शुरू किया जाएगा। अगले वर्ष से प्रांतीय ओलम्पिक में ट्राफी के साथ प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान भी किया जाएगा।
-प्रमुख उपलब्धियाँ
मध्यप्रदेश में विश्व स्तरीय खेल विश्वविद्यालय की स्थापना करने का निर्णय लिया गया है। इस दिशा में कार्यवाही प्रारम्भ कर दी गई है। इंदौर में स्वीमिंग पूल, छिन्दवाड़ा में फुटबाल और नरसिंहपुर में वॉलीबाल अकादमी की स्थापना की कार्यवाही भी पूरी की जा रही है। राज्य सरकार ने महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा के मद्देनजर खेल प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेने के लिये महिला खिलाड़ियों के साथ महिला क्रीड़ा अधिकारी का जाना अनिवार्य कर दिया है।
-पीपीपी मोड से खेल अधोसरंचना निर्माण
प्रदेश में अब पीपीपी मोड से खेल अधोसंरचना के निर्माण कार्य कराये जायेंगे। इसके लिये पायलट प्रोजेक्ट के तहत इंदौर में स्पोर्ट्स काम्पलेक्स बनाये जाने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इसकी सफलता के बाद भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर और उज्जैन में स्पोर्ट्स इन्फ्रास्ट्रक्चर स्थापित किया जाएगा। इसी मोड में ब्यावरा, राजगढ़, खिलचीपुर, सारंगपुर, नरसिंहपुर, विदिशा, शिवपुरी, पोहरी, कोलारस, अशोकनगर, पवई में इंडोर हाल निर्माणाधीन है। छिन्दवाड़ा, आगर-मालवा, कालापीपल, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, बैतूल, खरगौन, मंदसौर, मुरैना, गुना और दमोह में इंडोर हाल प्रस्तावित है। टी.टी. नगर स्टेडियम में तीन मंजिला बहुउददे्शीय इंडोर हाल का निर्माण कार्य जारी है। टी.टी. नगर स्टेडियम में रॉक क्लाइंबिंग वॉल का निर्माण प्रस्तावित है।
-विधायक खेल प्रोत्साहन योजना
राज्य सरकार ने प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में विधायक खेल प्रोत्साहन योजना क्रियान्वित करने का निर्णय लिया है। इस योजना में खेलों की आधारभूत अधोसंरचना और खेल गतिविधियों के प्रभावी संचालन के लिये क्षेत्रीय विधायक को प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये व्यय करने का प्रावधान किया गया है। साथ ही, विधायक के लिये निर्धारित राशि को 50 हजार से बढ़ाकर एक लाख रुपये किया गया है। प्रशिक्षकों के लिये कोच डेव्हलपमेंट प्रोग्राम प्रारंभ किया गया है। राज्य खेल अकादमी के खिलाड़ियों के प्रवेश के लिए नवीन मार्गदर्शी नियम बनाकर लागू किये गये हैं। रोजगार उन्मुखी कार्यक्रम में फिटनेस के क्षेत्र में टी. टी. नगर स्टेडियम, भोपाल में फिटनेस अकादमी प्रारम्भ कर युवाओं को रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। शिवपुरी में क्रिकेट अकादमी पुनः प्रारम्भ की गई है। छिंदवाड़ा में नवीन फुटबॉल अकादमी जल्द शुरू की जा रही है। पुरुष हॉकी अकादमी के लिए ग्राम गौरा में 2 नवीन हॉकी टर्फ का अनुमोदन कर दिया गया है।
मध्यप्रदेश में खेल विकास असीम संभावनाएं हैं। प्रदेश में चर्चित खेलों के अलावा पारम्परिक और आधुनिक खेल में भी खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पदक हासिल कर रहे हैं। अकादमी के शूटर्स ऐश्वर्या प्रताप सिंह और चिंकी यादव दोनों ने ही अगले ओलंपिक का कोटा हासिल कर लिया है। ओलंपिक 2020 के भारतीय हॉकी दल में मध्यप्रदेश राज्य हॉकी अकादमी की 6 खिलाड़ी शामिल हैं। प्रदेश में निरंतर बढ़ती खेल सुविधाओं ने न सिर्फ कयाकिंग-कैनोइंग, तीरंदाजी, घुड़सवारी, एथलेटिक्स जैसे खेलों के खिलाड़ियों ने देश में अपना परचम लहराया है बल्कि प्रदेश की दो लाड़ली बेटियों ने माउंट एवरेस्ट को फतेह कर वहाँ भारत का झंडा भी लहराया है। राज्य शासन की प्राथमिकता में खेल और खिलाड़ी शामिल हैं और हर संभव कोशिश की जा रही है कि देश की खेल राजधानी बने मध्यप्रदेश।

शक्तिशाली मध्यप्रदेश के लिए रखें बड़ी सोच 

कमलनाथ
एक साल बीत गया। सरकार की स्थिरता के सम्बन्ध में तमाम अटकलों का अंत हो गया है। मैंने बार-बार दोहराया कि जब से हमारी सरकार सत्ता में आई है, यह सरकार लोगों की आकांक्षाओं और उम्मीदों का प्रतिबिंब है। लोग चाहते थे कि उनकी पसंद का एजेंडा लागू हो, न कि उन पर कोई एजेंडा थोपा जाए। लोगों के फैसले का सम्मान स्वस्थ रूप से किया जाना चाहिए। यदि हम लोकतंत्र में विश्वास करते हैं, तो हमें लोगों की पसंद और उनके विवेक का सम्मान करना चाहिए।
मैंने मध्य प्रदेश को अपार अवसरों और संभावनाओं के प्रदेश के रूप में देखा है। इस बात को ध्यान में रखते हुए, मध्य प्रदेश के लोगों ने जो पाया उससे कहीं ज्यादा बेहतर के हक़दार है। मुझे लगता है कि विकास की प्रक्रियाओं का विश्लेषण करते समय अच्छे और बुरे समय बिंदुओं की परस्पर तुलना करना उचित और तार्किक नहीं होगा क्योंकि हर समय बिंदु पर प्राथमिकताएँ बदलती रहती हैं। नए-नए परिदृश्य उभरते हैं और नए रास्ते खुलते जाते हैं। नए क्षेत्र खुलते हैं। इसलिए अंधेरे को कोसने से अच्छा रोशनी करना बेहतर है। अतीत को कोसने की अपेक्षा भविष्य की ओर आगे देखना बेहतर है। हमें नए क्षितिजों पर ध्यान लगाना होगा।
हमारे सभी फैसले लोगों की अपेक्षाओं पर आधारित हैं। हमने अब तक अनसुने लोगों को भी सुना और एक नई शुरुआत की। मध्य प्रदेश अब एक बहुप्रतीक्षित आर्थिक गतिशीलता के लिए तैयार है। लोग उत्तरदायी और जवाबदेह शासन चाहते हैं। उनकी समस्याओं को संवेदनशील तरीके से हल किया जाना चाहिए। उनके वैधानिक अधिकारों और सहूलियतों का ध्यान रखा जाना चाहिए। वे एक प्रभावी और सक्षम सेवा प्रदाय तंत्र की अपेक्षा करते हैं। हमने बहुत कम समय में जो किया है वह सबके सामने है। मैं मानता हूँ कि पारदर्शिता सुशासन की आत्मा है। लोगों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि सरकार उनके लिए क्या कर रही है।
हमें लोगों की बुद्धिमत्ता पर विश्वास है। वे भी सरकार की चुनौतियों से वाकिफ हैं। लंबे समय से चली आ रही दूरी को पाटने के लिए शासन में संरचनात्मक सुधारों की बहुत आवश्यकता है। हम संविधान से प्रेरणा लेते हैं, जिसमें स्पष्ट रूप से राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों का उल्लेख है। केंद्र में हमारी सरकार ने पहले अनिवार्य शिक्षा का अधिकार, खाद्य सुरक्षा का अधिकार लागू किया। इनका व्यापक असर आज दिख रहा है। इसी तरह से, हम स्वास्थ्य के अधिकार और पानी के अधिकार के बारे में कानून ला रहे हैं। इसके अलावा, हम रोजगार के अधिकार पर भी विचार-विमर्श कर रहे हैं। यह तभी संभव है जब राज्य में बड़े पैमाने पर आर्थिक गतिविधियाँ बढ़े और आर्थिक उद्यमिता का विकास हो। मध्य प्रदेश में वह सब कुछ है, जो इसे एक आर्थिक शक्ति बना सकता है। इस सच्चाई के बावजूद कि हमारे पास मजबूत, प्रतिबद्ध और कुशल जनशक्ति, अपार संसाधन और अच्छी भौगोलिक कनेक्टिविटी है, मध्य प्रदेश की अर्थ-व्यवस्था में सब ठीक नहीं है। कोई कारण नहीं है कि हमें धीमी गति से चलना पड़े। हमें अपनी जीडीपी का विस्तार करना होगा और इसे वास्तविक रूप में और ज्यादा सहभागी बनाना होगा। हर वर्ग और क्षेत्र का जीडीपी के विस्तार में योगदान होना चाहिए। इसके लिए हमें ऐसा माहौल बनाना होगा, जिसमें हर नागरिक अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देने के बारे में सोच सके। विशाल लेकिन यथार्थवादी आर्थिक लक्ष्य निर्धारित करने होंगे और उन्हें हासिल करने के लिए खुद को संकल्पित होना होगा।सरकार ने ऋणग्रस्त किसानों के ऋण माफ करने का अपना पहला बड़ा निर्णय लिया। ऋण माफी प्रक्रिया अभी जारी है और हम अपना वादा पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
आदिवासी समुदायों को आर्थिक विकास की प्रक्रिया में शामिल होना चाहिए। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि वर्षों से जंगलों में रहने वाले आदिवासी लोगों को उनका वाजिब हक मिले। उनकी ऋणग्रस्तता सरकार के आवश्यक हस्तक्षेप के साथ समाप्त होनी चाहिए। उनका सामाजिक अलगाव राज्य के आर्थिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
हमारे सभी निर्णय चाहे वह अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27% आरक्षण हो या आवारा मवेशियों के लिए शेड का निर्माण, बेसहारा, विकलांग लोगों के लिए पेंशन को दोगुना करना, मध्य प्रदेश को खाद्य मिलावट मुक्त राज्य बनाने के लिए संकल्प करना, बिजली दर को कम कर प्रथम 100 यूनिट 100 रूपये में देना, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10% आरक्षण, निर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कलेक्टर गाइडलाइन दर को 20% तक कम करना, आदिवासी समुदायों के तीर्थों का संरक्षण करना हो, सभी उत्तरदायी सरकार बनने के संकल्प की झलक दिखाते हैं। भविष्य में भी यह सिलसिला जारी रहेगा।
हम अपने इकानॉमिक विजन डॉक्यूमेंट का अनावरण कर रहे हैं। हर नागरिक से अपील है कि वे इसे लागू करने में सहयोग करें। मध्य प्रदेश को आर्थिक शक्ति बनाने के लिए बड़ा सोचें।
(ब्लॉगर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं)

अब अदालत से ही आशा
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
संसद ने किसी कानून को स्पष्ट बहुमत से पारित किया हो और उसके खिलाफ इतना जबर्दस्त आंदोलन चल पड़ा हो, ऐसा स्वतंत्र भारत के इतिहास में कम ही हुआ है। ये तो नरेंद्र मोदी की किस्मत है कि इस समय देश में कोई अखिल भारतीय नेता नहीं है, वरना इस सरकार को लेने के देने पड़ जाते। इस नए नागरिकता कानून को पिछले हफ्ते तक सिर्फ मुस्लिम-विरोधी बताया जा रहा था लेकिन अब मालूम पड़ रहा है कि बंगाल और पूर्वोत्तर के सभी प्रांतों के हिंदू लोग लट्ठ लेकर इसके पीछे पड़ गए हैं। देश के गैर-भाजपाई राज्यों के कई मुख्यमंत्रियों ने कह दिया है कि इस कानून को हम अपने प्रदेशों में लागू नहीं करेंगे। देश के 16 प्रांतों में गैर-भाजपाई मुख्यमंत्री हैं। तो क्या केंद्र सरकार इन मुख्यमंत्रियों को बर्खास्त करेगी ? बिहार के नीतीशकुमार की सरकार, जो भाजपा के समर्थन से चल रही है, उसने भी हाथ ऊंचे कर दिए हैं। इस समय देश जिस भयंकर आर्थिक खाई की तरफ बढ़ता जा रहा है, उसका इलाज करने की बजाय केंद्र सरकार ने यह फिजूल का शोशा छोड़ दिया है। देश का सकल उत्पाद (जीडीपी) गिरता जा रहा है, मंहगाई बढ़ती जा रही है, बेरोजगारी बेलगाम हो रही है और सभी पार्टियों के नेता इस फर्जी मुद्दे पर आपस में भिड़ रहे हैं। सरकार ने इस फर्जी मुद्दे को तूल देकर अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश को तो एक मंच पर ला ही दिया है, वह भारत के सभी विरोधी दलों को भी एकजुट होने का बहाना दे रही है। सर्वोच्च न्यायालय में इस नागरिकता कानून को रद्द करवाने के लिए दर्जनों याचिकाएं रोज़ लग रही हैं। यह तो स्पष्ट है कि इस सरकार के पास न तो इतना विवेक है और न ही आत्म-विश्वास कि वह इस कानून को वापस ले ले। इस सरकार की इज्जत बचाने का काम अब सिर्फ न्यायपालिका के जिम्मे है। उसी के हाथ में है कि दल-दल में फंसी भाजपा सरकार को वह किसी तरह से बाहर निकाले। यह कानून ऐसा है, जो भाजपा के माथे पर सांप्रदायिकता का काला टीका तो जड़ ही देता है, भारत को भी बदनाम करता है। यह कानून सिर्फ मुस्लिम-विरोधी होता तो पूर्वोत्तर भारत के हिंदू इसका विरोध क्यों कर रहे हैं ? यह वास्तव में इंसानियत-विरोधी है। कोई भी इंसान किसी भी जाति, धर्म, वंश या रंग का हो और यदि वह पीड़ित है तो उसे शरण देना किसी भी सभ्य देश का कर्तव्य है। लेकिन हर गैर-मुस्लिम को पीड़ित मान लेना कहां की बुद्धिमानी है ?

विरोध का यह तरीका अस्वीकार्य
सिद्धार्थ शंकर
सरकार के किसी फैसले के विरोध में नाराजगी जताने का अधिकार जनता को है, मगर वह विरोध मर्यादा की रेखा में हो तो उसे स्वीकार किया जा सकता है। नागरिकता संशोधन कानून को लेकर पूर्वोत्तर भारत में अभी जिस तरह के हालात हैं, उसमें विरोध के तरीके को न तो स्वीकार किया जा सकता है और न ही समर्थन दिया जा सकता है। सरकार स्पष्ट कर चुकी है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह आश्वासन दे चुके हैं कि किसी को भी देश से बाहर नहीं किया जाएगा। यह कानून सिर्फ उन लोगों के लिए है, जो भारत में शरण लेना चाहते हैं, फिर विरोध के क्या मायने बचते हैं। लेकिन राजनीतिवश जिस तरह से पूरे पूर्वाेत्तर को हिंसा की आग में झोंक दिया गया है, वह चिंता नहीं बढ़ा रहा। आज पूर्वाेत्तर के तीन राज्यों असम, मेघालय और त्रिपुरा में तनावपूर्ण हालात बने हुए हैं। असम में स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए गए हैं। सेना और पुलिस की तैनाती के बाद भी प्रदर्शनकारी लगातार कफ्र्यू का उल्लंघन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने गुरुवार को यात्रियों से भरी एक ट्रेन में आग लगाने का भी प्रयास किया। विमान सेवाएं ठप हैं, जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। आखिर क्यों…। ऐसा क्या है बिल में जो लोगों के लिए मुसीबत बन जाएगा। देश के दूसरे हिस्सों में विरोध की आग क्यों नहीं जल रही। सिर्फ पूर्वाेत्तर के लोग ही क्यों मरने-मारने पर तुले हैं। इसका जवाब वहां के लोगों को देना होगा।
विरोध की मर्यादा होती है, मगर जब वह सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने लगे और दूसरों के लिए मुसीबत का सबब बनने लगे तो इसे रोकने के लिए हर सीमा से पार जाना ही होगा। बिल के विरोध में पूर्वाेत्तर के राज्यों में जिस तरह से उत्पात मचाया जा रहा है, भला कोई तो पूछे उन्हें इसकी इजाजत दी किसने। विरोध शांतिपूर्ण भी हो सकता है और गांधीजी के सिद्धांतों के मुताबिक भी। हम गांधीजी के सिद्धांतों की दुहाई देते नहीं थकते, मगर उनके उसूलों को मसलने में देर भी नहीं लगाते।
कानून के विरोध में हो रही हिंसा की वजह से फ्लाइट्स और रेल सेवाएं ठप होने से सैकड़ों लोग नॉर्थ ईस्ट के तमाम शहरों में फंस गए हैं। कई एयरलाइंस ने अपने फ्लाइट ऑपरेशन रोक दिए हैं। तमाम हाइवे बंद होने से लोग फ्लाइट्स और ट्रेन पकडऩे एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशनों पर पहुंचे तो वहां आगे जाने के लिए कोई साधन नहीं है। उनकी समस्याओं के बारे में कौन सोचेगा। देश में पहले भी कई मौके आए हंै, जब जनता किसी फैसले के विरोध में सड़क पर उतर आई थी और उसने हिंसा का ऐसा तांडव मचाया, जो समर्थन से ज्यादा गुस्से की परिणति के रूप में सामने आया। राम-रहीम के खिलाफ फैसला हो या फिर आसाराम का मामला, उनके समर्थकों ने कानून-व्यवस्था की जिस तरह से धज्जियां उड़ाई थीं, उसे कौन भूल सकता है।

शासन-प्रशासन की मजबूती और लोकसेवकों के कल्याण की कोशिशों का साल
पंकज मित्तल
राज्य सरकार ने पिछले एक वर्ष में शासन-प्रशासन के सुदृढ़ीकरण, सभी वर्गों के कल्याण एवं शासकीय सेवकों के हित में महत्वपूर्ण फैसले लिए और उन्हें लागू भी किया हैं। मध्यप्रदेश लोकसेवा अनुसूचित जातियों/ अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण अधिनियम 1994 में संशोधन कर अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया। इसी दौरान, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को शैक्षणिक संस्थाओं और शासकीय नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। शासकीय सेवाओं में मध्यप्रदेश के युवाओं को प्राथमिकता देने के लिए अभ्यर्थियों का रोजगार कार्यालय में जीवित पंजीयन अनिवार्य किया गया।
राज्य शासन ने खुली प्रतियोगिता से भरे जाने वाले पदों के लिए अधिकतम आयु सीमा 40 वर्ष निर्धारित कर दी है। इसमें अजा/ अजजा/ अन्य पिछड़ा वर्ग/ शासकीय निगम, मंडल/ स्वशासी संस्थान/ नगर सैनिक/ नि:शक्तजन/ महिलाओं(अनारक्षित/ आरक्षित) आदि के लिए अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष निर्धारित की गई है। इसके अलावा, लोक सेवा आयोग की राज्य सेवा परीक्षा 2019 के लिए अधिकतम आयु सीमा में एक वर्ष की छूट भी दी गई है।
प्रदेश में ‘आपकी सरकार आपके द्वार’ कार्यक्रम शुरू किया गया है। सभी शासकीय विभागों को ग्रामीण अंचलों में रहने वाली आम जनता की रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गाँवों के आकस्मिक भ्रमण एवं विकासखंड मुख्यालयों में शिविर लगाए जाने के निर्देश दिए गए हैं। प्रभारी सचिवों को अपने प्रभार के जिले में प्रतिमाह कम से कम एक बार भ्रमण करने के निर्देश दिए गए हैं।
बीते एक साल में मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षाओं में 5116 पदों के लिए विज्ञापन जारी किए गए। इनमें से 3784 पदों के लिए अभ्यर्थियों का योग्यतानुसार चयन भी किया गया। इसी दौरान, जरूरतमंद बालकों तथा बाल देख-रेख संस्थाओं एवं विपत्तिग्रस्त महिलाओं को संरक्षण प्रदान करने के लिए संचालित संस्थाओं के पर्यवेक्षण एवं निगरानी के लिए जिलों में अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) को नामित किया गया। शासकीय विभागों में विभिन्न पदों पर संविदा/ नियमित नियुक्तियों की परीक्षाओं में सूचना प्रौद्योगिकी और कम्प्यूटर क्षेत्र में कम्प्यूटर दक्षता प्रमाणीकरण परीक्षा (सीपीसीटी) के प्रमाण-पत्र (स्कोर कार्ड) की वैधता अवधि को 2 वर्ष से बढ़ाकर 4 वर्ष किया गया है। शासकीय सेवक को प्रथम प्रसूति में जुड़वा संतान होने के बाद नसबंदी कराए जाने पर 2 अग्रिम वेतन वृद्धि की पात्रता प्रदान की गई, जैसी एक जीवित संतान के बाद नसबंदी पर प्राप्त होती है।
राज्य सरकार ने सभी संवेदनशील मामलों का समाधान खोजने के लिये विगत 9 फरवरी को मंत्रि-परिषद् समितियों का गठन किया। सामान्य प्रशासन विभाग ने सरकार के इस निर्णय अनुपालन में आर्थिक मामलों, राजनैतिक मामलों तथा अतिथि शिक्षकों, रोजगार सहायकों और संविदा कर्मचारी संगठनों के अभ्यावेदनों और माँगों पर विचार करने, अनुसूचित जनजातियों के वन भूमि के निरस्त दावों के निराकरण और निवेश संवर्धन सहित कुल 16 मुद्दों पर मंत्रि-परिषद् समितियों के गठन के आदेश जारी किये। यह समितियाँ नियमित बैठकें कर संबंधित मुद्दों पर विचार कर शासन को रिपोर्ट प्रस्तुत कर रही हैं।

नागरिकताः सरकार की नादानी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
नया नागरिकता विधेयक अब जो जो गुल खिला रहा है, उसकी भविष्यवाणी हमने पहले ही कर दी थी। सबसे पहले तो मोदी और जापानी प्रधानमंत्री की गुवाहाटी-भेंट स्थगित हो गई। दूसरा, बांग्लादेश और पाकिस्तान में इस विधेयक की कड़ी प्रतिक्रिया हो रही है। बांग्लादेश के गृहमंत्री और विदेश मंत्री की भारत-यात्रा स्थगित हो गई। पाकिस्तान के एक हिंदू सांसद और एक हिंदू विधायक ने इस नए कानून की भर्त्सना कर दी है। अभी तक अफगानिस्तान की प्रतिक्रिया नहीं आई है, क्योंकि उसके राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, दोनों ही भारत के पुराने मित्र हैं। यह ठीक है कि वे इस नए कानून की इमरान खान की तरह भर्त्सना नहीं करेंगे और इसे संघ का हिंदुत्ववादी एजेंडा नहीं कहेंगे लेकिन उन्हें इमरान और शेख हसीना से भी ज्यादा अफसोस होगा, क्योंकि उन पर भी यह इल्जाम लग गया है कि वे हिंदू-विरोधी हैं। इन तीनों मुस्लिम राष्ट्रों को किसी मुद्दे पर एक करने का श्रेय किसी को मिलेगा तो वह हमारी मोदी सरकार को मिलेगा। हमारी सरकार पता नहीं क्यों यह कानून ले आई है ? इस कानून के बिना भी वह पड़ौसी देशों के हर सताए हुए आदमी को भारत की नागरिकता दे सकती थी। उनमें हिंदू तो अपने आप ही आ जाते लेकिन उस सूची में से शरणार्थी मुसलमानों को निकालकर भाजपा सरकार ने अपने गले में सांप्रदायिकता का पत्थर लटका लिया है। क्यों लटका लिया है, समझ में नहीं आता ? जब वह विपक्ष में थी, तब उसका यह पैंतरा हिदू वोट पटाने के लिए सही था लेकिन अब वह सरकार में है। उसे अब पूरा अधिकार है कि वह किसी भी विदेशी को नागरिकता दे या न दे। इस अधिकार के बावजूद उसे अपने आप को नंगा करने की जरुरत क्या थी ? उसने सिर्फ अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश का नाम ही क्यों लिया ? क्या अफगानिस्तान भी 1947 के पहले भारत का हिस्सा था ? श्रीलंका और बर्मा तो भारत के हिस्से ही थे। उनके यहां से आनेवाले शरणार्थियों के लिए इस नए कानून में कोई प्रावधान नहीं है। यह कानून भी नोटबंदी-जैसी ही भयंकर भूल है। इससे फायदा कम, नुकसान ज्यादा है। बंगाल सहित सभी पूर्वोत्तर प्रांतों से भाजपा ने हाथ धो लिये हैं। बेहतर होता कि राष्ट्रपति इस विधेयक पर दस्तखत नहीं करते तो संसद इस पर पुनर्विचार करती और सरकार को अपनी नादानी से मुक्ति का रास्ता मिल जाता।

मप्र में बढ़ रहा नवीन और नवकरणीय ऊर्जा का प्रयोग
अशोक मनवानी
राज्य सरकार ने अपने पहले साल के कार्यकाल में ही प्रदेश को ‘सोलर स्टेट’ और भोपाल को ‘सोलर सिटी’ की पहचान दिलाने में सफलता पाई है। प्रदेश के औद्योगिक प्रक्षेत्रों में सौर ऊर्जा के उपयोग के लिये किये गये नवाचारों की विश्व बैंक ने भी प्रशंसा की है। सोलर रूफ टॉप परियोजनाओं के क्रियान्वयन में मध्यप्रदेश बहुत आगे निकल गया है। एक वर्ष में ही प्रदेश में ग्रिड कनेक्टेड परियोजनाओं में 670 मेगावाट क्षमता की वृद्धि हुई है। प्रदेश में 645 मेगावाट की सौर परियोजनाएँ और 25 मेगावाट की बायोमास परियोजनाएं स्थापित की गईं हैं। अगले 4 वर्ष में करीब 6 हजार मेगावाट क्षमता की नवीन और नवकरणीय ऊर्जा आधारित परियोजनाएं क्रियान्वित की जाएंगी। आगर-मालवा, शाजापुर और नीमच जिलों में 1500 मेगावाट की सोलर परियोजनाएँ भी शुरू होंगी। इसके लिये भूमि आवंटन कर दिया गया है।
प्रदेश में सौर ऊर्जा, सोलर पम्प स्थापना, पॉवर स्टोरेज, ई-व्हीकल उपयोग, पवन ऊर्जा और फ्लोटिंग पावर प्लांट स्थापना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं। रीवा परियोजना से अब पूर्ण क्षमता 750 मेगावाट विद्युत उत्पादन प्राप्त हो रहा है। इसमें से प्रतिदिन लगभग 100 मेगावाट बिजली दिल्ली मेट्रो को दी जा रही है। प्रदेश में 2.97 रूपये प्रति यूनिट की मितव्ययी दर से बिजली प्रदान की जा रही है। प्रदेश के बुन्देलखण्ड और चम्बल अंचल में बंजर भूमि पर सोलर पार्क स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। ओंकारेश्वर और इंदिरा सागर जलाशयों में एक हजार मेगावाट क्षमता के फ्लोटिंग सौर संयंत्र विकसित करने की कार्यवाही शुरू हो गई है। इस क्षमता के तैरते हुए संयंत्र स्थापित करने की यह देश में अनूठी पहल है।
प्रदेश में 8.5 मेगावाट क्षमता की सौर ऊर्जा परियोजनाएँ सफल सिद्ध हुई हैं। इसके अलावा 43 मेगावाट क्षमता की परियोजनाएं आकार ले रही हैं। अगले चार वर्ष में लगभग 500 मेगावाट की सोलर रूफ टॉप परियोजनाएं काम करना शुरू कर देंगी। उन्होंने कहा कि भोपाल नगर में बड़ी झील के पास ब्रिज और रिटेनिंग वॉल पर 500 किलोवाट क्षमता के सौर संयत्र की स्थापना की गई है। संयंत्र के नजदीक करबला पम्प हाउस का संचालन सौर ऊर्जा से हो रहा है। इससे सालाना 40 लाख रूपये की बचत और लगभग 10 हजार वृक्षों के बराबर पर्यावरण संरक्षण संभव हुआ है। उज्जैन के वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट में भी सौर संयंत्र स्थापित किया गया है। विश्वविद्यालयीन भवनों, मेडिकल कॉलेजों और स्टेडियम तथा विभिन्न संस्थानों में सौर संयंत्र संचालित हैं। मण्डीदीप में करीब 600 उद्योगों का सर्वे किया गया है और विभिन्न ईकाइयों द्वारा 28 मेगावाट क्षमता का उत्पादन रेस्को मॉडल पर हो रहा है। पीलूखेड़ी और पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्रों में भी सोलर रूफटॉप परियोजनाओं के लिये उद्यमी आकर्षित हो रहे हैं।
रिन्यूएबल एनर्जी सर्विस (रेस्को) मॉडल पर कार्य प्रारंभ
नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा विभाग ने रेस्को (रिन्यूएबल एनर्जी सर्विस कम्पनी) मॉडल में कार्य प्रारंभ किया है। परियोजना में देश में सबसे कम 1.38 रूपये यूनिट की दर की बिजली की उपलब्धता की भी सराहना हुई है। प्रदेश में 2 लाख सोलर पम्प लगाए जाएंगे। अब तक 18 हजार सोलर पम्प लगाए जा चुके हैं। इस वर्ष 25 हजार सोलर पम्प लगाने का लक्ष्य है। सोलर पम्प उपभोक्ताओं की शिकायतों को हल करने के लिये टोल फ्री कॉल सेंटर जल्द ही शुरू किये जा रहे हैं।
विनोबा भावे अंतर्राष्ट्रीय सोलर पम्प पुरस्कार
मध्यप्रदेश सरकार ने विनोबा भावे अंतर्राष्ट्रीय सोलर पम्प पुरस्कार स्थापित किया है, जो इस क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले देश को इंटरनेशनल सोलर अलाइंस के माध्यम से दिया जायेगा। प्रदेश में ई-व्हीकल के उपयोग को बढ़ाने के लिये सोलर चार्जिंग स्टेशन स्थापित होंगे। मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम के मुख्यालय में चार्जिंग स्टेशन की स्थापना की जा चुकी है। यह पुरस्कार मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ की पहल पर शुरू हुआ है।विभागीय मंत्री श्री हर्ष यादव योजनाओं की नियमित समीक्षा
का कार्य कर रहे हैं।

इस कानून से हिंदू क्यों नाराज हैं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कितने मजे की बात है कि गृहमंत्री अमित शाह ने जो नया नागरिकता विधेयक संसद से पारित करवाया है, उसका विरोध भारत के मुसलमान नहीं कर रहे हैं बल्कि हिंदू कर रहे हैं और ये हिंदू हैं, पूर्वोत्तर राज्यों के। असम, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, अरुणाचल के। इन राज्यों में रहनेवाले मूल निवासियों को डर है कि नए नागरिकता कानून का फायदा उठाकर बांग्लादेश के बंगाली हिंदू उनके शहरों और गांवों में छा जाएंगे। वे पाकिस्तान और अफगानिस्तान के हिंदू और सिखों की तरह सैकड़ों और हजारों में नहीं आएंगे बल्कि वे अब तक हजारों और लाखों में आ चुके हैं और आते जा रहे हैं। वे कई जिलों में बहुमत में हो गए हैं। कुछ वर्षों में इन प्रदेशों के मूल निवासी अल्पमत में हो जाएंगे। उनके मन पर इस बात का कोई खास प्रभाव दिखाई नहीं पड़ रहा है कि इस नए नागरिकता विधेयक में पड़ौसी देशों के मुसलमानों को शरण देने की बात नहीं कही गई है। इस विधेयक ने पूर्वोत्तर में तूफान खड़ा कर दिया है। जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, वहां भी शहरों और गांवों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। सरकारें हतप्रभ हैं। भीड़ लूटपाट और तोड़-फोड़ से भी बाज़ नहीं आ रही है। हजारों फौजी जवान तैनात किए जा रहे हैं। कई शहरों में कर्फ्यू लग गया है। हवाई अड्डे और रेल-स्टेशन ठप्प हो गए हैं। 34 साल बाद इतना बड़ा आंदोलन असम में फिर उठ खड़ा हुआ है। यह आंदोलन कहीं पूर्वोत्तर क्षेत्र से भाजपा का सफाया ही न कर दे। यदि कुछ लोग हताहत हो गए तो मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी का रविवार को जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे से गुवाहाटी में मिलने का कार्यक्रम भी रद्द करना पड़ेगा। इस विधेयक ने एक तरफ पूर्वोत्तर के हिंदुओं को नाराज कर दिया है और दूसरी तरफ तमिलों को भी ! श्रीलंका से जो तमिल मुसलमान और हिंदू भारत में शरण लेना चाहते हैं, यह विधेयक उनके बारे में भी चुप है। यह ठीक है कि इस विधेयक से भारत के मुसलमानों को कोई सीधा नुकसान नहीं है लेकिन बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के मुसलमानों पर शक की छाप लगा देने का असर क्या हमारे मुसलमानों पर नहीं पड़ेगा ? इसके अलावा इन मुस्लिम देशों से जो गैर-मुसलमान भारत में आकर जमना चाहते हैं, क्या वे सब सताए हुए ही होते हैं ? क्या हमारी सरकार को यह पता है कि इन मुस्लिम देशों से बाहर जाकर बसनेवालों की संख्या में मुसलमान ही सबसे ज्यादा हैं ? वहां से हिंदू, सिख और ईसाई भी बाहर निकले हैं लेकिन जिनके पांवों में दम था, वे अमेरिका, यूरोप और सुदूर एशिया में जा बसे हैं। हम इस विधेयक के द्वारा भारत को अनाथालय क्यों बनाना चाहते हैं ? किसी को भी भारत की नागरिकता चाहिए तो उसका पैमाना मजहब, जाति या वर्ग नहीं, बल्कि उसके गुण, कर्म और स्वभाव को होना चाहिए।

पॉप कॉर्न के अलावा भी बहुत कुछ है मक्का
अवनीश सोमकुवर
मक्के की रोटी और सरसों के साग का स्वाद तो सबको पता है लेकिन यह जानकारी कम लोगों को पता है कि मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा मक्के का उत्पादन छिंदवाड़ा जिले में होता है। छिन्दवाड़ा अब कॉर्न सिटी के रूप में पहचाना जाता है।
छिंदवाड़ा के मक्का उत्पादक किसानों की मेहनत कॉर्न फेस्टिवल 2019 में दिखाई देगी, जो 15 और 16 दिसंबर को आयोजित किया जा रहा है। किसानों को मक्का प्र-संस्करण से संबंधित नई मशीनों, मक्का से खाद्य सामग्री बनाने वाली मशीनों और मक्का बाजार की जानकारी मिलेगी। साथ ही, उन्हें मक्का उत्पादन से जुड़े वैज्ञानिकों की बात सुनने और उनसे बात करने का मौका भी मिलेगा।
आज मक्का एक व्यावसायिक फसल बन चुका है। इसके उत्पादन का लाभ लेने के लिए मक्का आधारित प्र-संस्करण (कृषि प्र-संस्करण) इकाइयों का स्थापित होना जरूरी हो गया है। मक्का पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसलिये मक्का व्यंजन और मक्के से बनी खाद्य सामग्री का उद्योग लगाने की भरपूर संभावनाएँ बनी हैं। प्रदेश में मक्का उत्पादन 46 लाख मीट्रिक टन पहुँच गया है। अकेले छिंदवाड़ा जिले में मक्का का उत्पादन 6 लाख 23 हजार मीट्रिक टन से बढ़कर 12 लाख मीट्रिक टन हो गया है। मक्का का क्षेत्रफल 1 लाख 24 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 2 लाख 95 हजार हेक्टेयर बढ़ गया है।
भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान लुधियाना के निदेशक डॉ संजय रक्षित का कहना है कि मध्यप्रदेश में मक्के का उत्पादन तो बहुत हो रहा है लेकिन मूल्य संवर्धन और प्र-संस्करण नहीं हो पा रहा है। यह अपेक्षा है कि यहाँ मक्के का प्र-संस्करण शुरू हो जाए जिससे मक्का उत्पादक किसानों को भरपूर लाभ मिल सके।
हरियाणा से आए किसान श्री कमल चौहान का कहना है कि मक्का फेस्टिवल का आयोजन एक अच्छी पहल है। ऐसे आयोजन से किसानों को नई-नई तकनीकी जानकारियाँ मिलती हैं, जिनका उपयोग वे अपने खेतों में करते हैं।
खाद्य प्र-संस्करण विशेषज्ञ डॉक्टर रामनाथ सूर्यवंशी का मानना है कि कृषि उद्योग से जुड़े बड़े उद्योगपतियों को मक्का आधारित प्र-संस्करण इकाई लगाने की पहल करना चाहिए क्योंकि इसका आर्थिक बाजार बढ़ रहा है। यह अब रोज़गार पैदा करने वाली फसल है। साथ ही किसानों की आय बढ़ाने में मददगार है। आदिवासी महिला किसानों को मक्के के व्यंजन जैसे मक्का टोस्ट, बिस्किट बनाने का प्रशिक्षण देकर उन्हें बाजार उपलब्ध कराने की पहल करने वाले मध्यप्रदेश विज्ञान सभा के निदेशक डॉक्टर एस.आर. आजाद का कहना है कि मक्के के पोषक तत्वों के प्रति आम लोगों में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। मक्का उत्पादन करने वाले छोटे किसानों को सीधे मक्का आधारित खाद्य प्र-संस्करण इकाइयों से जोड़ने की भी जरूरत है। छिंदवाड़ा इसके लिए आदर्श जिला है।
न्यूट्री बेकरी
मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ की सोच है कि किसानों को कृषि उद्यमिता से जुड़ने के मौके मिलना चाहिए, जिससे वे सिर्फ उत्पादन तक सीमित नहीं रहें बल्कि एक उद्यमी के रूप में भी सामने आएं। मुख्यमंत्री की इस सोच के अनुरूप छिंदवाड़ा जिले के तामिया विकासखंड में आदिवासी महिलाओं ने न्यूट्री बेकरी की स्थापना कर खुद को आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर बनाने में सफलता हासिल की है।
न्यूट्री बेकरी यानी पोषक तत्व से भरपूर खाद्य पदार्थ बनाने की बेकरी। इससे जहाँ एक ओर पोषण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर इससे जुड़ी आदिवासी महिलाएँ आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर भी बन रही हैं। तामिया में अब चार न्यूट्री बेकरी यूनिट चल रही है। एक-डेढ़ हजार रुपए महीना कमाने वाली महिलाएँ अब 4 से 5 हजार रुपए महीना कमा रही हैं।
न्यूट्री बेकरी यूनिट शुरू होने से पहले यहाँ की आदिवासी महिलाएँ या तो खेती-बाड़ी में लगी रहती थीं या फिर लघु वनोपज इकट्ठा कर रही थी। खरीफ के समय काम की तलाश में वे आसपास के जिलों में चली जाती थी। मुश्किल से हजार-डेढ़ हजार रुपए महीना कमा पाती थी। उन्होंने मक्का, कोदो, कुटकी, ज्वार, बाजरा के साथ-साथ महुआ, आंवला, बेल जैसी वनोपज को लेकर बेकरी का काम शुरू किया। मक्के का बना टोस्ट और बिस्किट इस क्षेत्र में लोकप्रिय हो गए हैं। स्थानीय बाजार में महिलाएँ अपने उत्पादों की मार्केटिंग खुद करती हैं।
अब ये आदिवासी महिलाएँ दूसरे जिलों की महिलाओं को भी प्रशिक्षण देने के काबिल हो गई हैं। तामिया के हर्ष दिवारी गाँव के रागिनी स्व-सहायता समूह की सदस्य समोका बाई ने सात दिन का बेकरी प्रशिक्षण लिया। वे बताती है कि कैसे उन्होंने बेकरी में काम आने वाली मशीनों के बारे में जाना और कैसे मक्का टोस्ट बनाना सीखा। गुणवत्ता, लागत और मार्केटिंग के बारे में भी समझा। ऐसे ही सुमरवती बाई मटकाढाना गाँव के दुर्गा स्व-सहायता समूह की सदस्य हैं। उन्होंने मक्का टोस्ट बनाना सीखा। उनका समूह छोटी भट्टी का उपयोग कर टोस्ट बनाकर बाजार में बेच रहा है। मार्केटिंग में रुचि रखने वाली सालढाना (बागई) गाँव के राधाकृष्णा स्व-सहायता समूह की सदस्य सरोज बाई ने अब सबके साथ मिलकर व्यवसाय शुरू कर दिया है।
न्यूट्री बेकरी की सफलता को देखकर कई सरकारी विभागों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं ने इसमें दिलचस्पी जाहिर की है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, महिला-बाल विकास विभाग की तेजस्विनी, वन विभाग और चाय इंडिया (मध्यप्रदेश चेप्टर) ने न्यूट्री बेकरी की स्थापना में मदद के लिए संपर्क किया। तेजस्विनी ने मंडला जिले में दो बेकरी स्थापित कर ली है और दो की तैयारी चल रही है।
मक्का ऐसे बनी व्यावसायिक फसल
मक्के का उपयोग चार प्रकार से होता है। इसका पशु आहार विशेषकर पोल्ट्री फीड बनता है। पोल्ट्री उद्योग बढ़ने के साथ ही पोल्ट्री फीड की मांग बढ़ी है। कॉर्न फ्लेक्स जैसी लोकप्रिय खाद्य सामग्री बनती है। कॉर्न फ्लेक्स अब सुबह के नाश्ते में शामिल हो गया है। अन्न के रूप में भी इसका सेवन किया जाता है और औद्योगिक उपयोग होता है। कम पानी और कम लागत में अच्छी फसल हो जाती है। जलवायु परिवर्तन के खतरों को सह लेती है। मक्का पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसमें 71 प्रतिशत स्टार्च, 9 से 10 प्रतिशत प्रोटीन, 4 से 45 प्रतिशत फैट, 9 से 10 प्रतिशत फाइबर, 2 से 3 प्रतिशत शुगर और 1.4 प्रतिशत मिनरल होता है।

फिर आरक्षण का अंधा कानून
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
संसद ने कल सर्वानुमति से आरक्षण विधेयक पारित कर दिया। सदन में उपस्थित 352 सदस्यों में से एक की भी हिम्मत नहीं हुई कि इस आरक्षण का विरोध करे। अब 10 साल के लिए नौकरशाही के पैर में बेड़ियां फिर से डाल दी गई है। 70 साल से चल रहे इस आरक्षण का मेरे जैसे लोगों ने 40-50 साल पहले तक डटकर समर्थन किया था। जब प्रधानमंत्री विश्वनाथप्रतापसिंह ने पिछड़ों को आरक्षण दिया, तब तक हम यह नारा लगाते रहे कि ”हम सबने बांधी गांठ। पिछड़े पावे सौ में साठ।।’’ याने सरकारी नौकरियों में अनुसूचितों और पिछड़ों को जमकर आरक्षण दिया जाए ताकि उन पर सदियों से चलते रहे अत्याचार की हम कुछ हद तक भरपाई कर सकें। कई पार्टियों द्वारा आयोजित विशाल जन-सभाओं को भी मैं उन दिनों संबोधित करता रहा लेकिन अब मैं यह अनुभव करता हूं कि सरकारी नौकरियों में से आरक्षण एक दम खत्म किया जाना चाहिए। संसद के सभी सदस्यों द्वारा चली गई यह भेड़चाल बताती है कि हमारे सांसदों को कोई भी कानून बनाते समय जितनी अक्ल लगानी चाहिए, वे नहीं लगाते। यदि कुछ सांसद इस आरक्षण का विरोध करते तो क्या उन्हें संसद से निकाल दिया जाता ? मैं तो समझता हूं कि आरक्षित सीटों से जीते हुए सांसदों को इस आरक्षण का सबसे पहले विरोध करना चाहिए, क्योंकि यह आरक्षण उनके वर्ग में ‘मलाईदार परते’ तैयार कर रहा है। अनुसूचितों और पिछड़ों का यह मलाईदार वर्ग मुश्किल से 10 प्रतिशत भी नहीं है। इस वर्ग के लोग आरक्षित पदों पर पीढ़ी दर पीढ़ी कब्जा करते चले जा रहे हैं। जो सचमुच गरीब हैं, वंचित हैं, पिछड़े हैं, असहाय हैं, निरुपाय हैं, वे अब भी वैसे ही हैं, जैसे सदियों पहले थे। उनके बच्चों को न पढ़ने की सुविधा है, न ही उनकी सेहत की ठीक देखभाल हो पाती है और न ही समाज में उनकी समुचित प्रतिष्ठा है। वे जो शारीरिक श्रम करते हैं, उसकी कीमत भी आज बहुत कम है। इसीलिए समतामूलक समाज बनाने के लिए सबसे ज्यादा जरुरी यह है कि शारीरिक श्रम और बौद्धिक श्रम की कीमतों में जो खाई है, उसको पाटा जाए। यदि ऐसा हम कर सके तो लोग सफेदपोश नौकरियों में जाकर दुम हिलाने की बजाय अपनी मेहनत-मजदूरी से आत्म-सम्मान की जिंदगी क्यों नहीं जिएंगे ? इसके अलावा जातिगत भेदभाव के बिना शिक्षा और चिकित्सा हर गरीब और वंचित परिवार को न्यूनतम कीमत पर उपलब्ध करवाई जाए तो ये ही लोग आरक्षण की भीख से मिलनेवाले पदों पर थूक देंगे। क्या उनका अपना स्वाभिमान नहीं है ? अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अनुसूचितों और पिछड़ों को खुद आगे आना चाहिए। हमारे सारे नेता मजबूर हैं। वे वोट और नोट के गुलाम हैं। वे अनंतकाल तक जातिगत आरक्षण का समर्थन करते रहेंगे।

किसानों को ऋण-मुक्त कर समृद्ध बनाने के लिए हुए क्रांतिकारी फैसले
आशीष शर्मा
प्रदेश की कृषि प्रधान अर्थ-व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिये जरूरी है कि किसान चिन्ता-मुक्त हो, उसके पास आमदनी के स्थाई इंतजाम हो और उसे समय पर आवश्यक वित्तीय सहयोग भी मिले। मध्यप्रदेश में राज्य सरकार ने इस शाश्वत सत्य को सिर्फ स्वीकार ही नहीं किया है बल्कि अपने प्रारंभिक अल्प-काल में ही इस दिशा में क्रांतिकारी फैसले लिये हैं और उन्हे जमीनी स्तर पर लागू भी किया है। सरकार ने अपने वचन-पत्र में किसान कल्याण और कृषि विकास के मुद्दों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। सरकार ने सत्ता संभालते ही किसानों को पीढ़ियों के कर्जो से मुक्ति दिलाई है। साथ ही यह क्रम तब तक जारी रखने का संकल्प भी लिया है, जब तक प्रत्येक पात्र किसान कर्ज-मुक्त नहीं हो जाता। किसान को फसल बोने से लेकर फसल बेचने तक के काम में राज्य सरकार मदद कर रही है। बिजली, पानी आदि भी किसानों को रियायती दरों पर दिया जा रहा है।
जय किसान फसल ऋण माफी योजना
प्रदेश में “जय किसान फसल ऋण माफी योजना” लागू कर किसानों को ऋण-मुक्त करने का अभियान चलाया गया है। पहले चरण में 20 लाख 22 हजार 731 पात्र किसानों के 7154 करोड़ 36 लाख रूपये के ऋण माफ किये गये हैं। शीघ्र प्रारंभ किये जा रहे दूसरे चरण में 12 लाख से अधिक ऋण खाताधारक पात्र किसानों के ऋण माफ किये जाने की कार्यवाही शुरू कर दी गई है।
जय किसान समृद्धि योजना
प्रदेश में 5 मार्च 2019 को ”जय किसान समृद्धि योजना” लागू की गई है। इस योजना में रबी सीजन 2019-20 के लिए कृषि उपज मंडी और ई-उर्पाजन केंद्र के माध्यम से किसान द्वारा विक्रय किये गये गेहूँ पर 160 रूपये प्रति क्विंटल प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। राज्य सरकार ने कुल 92 लाख 67 हजार मीट्रिक टन गेहूँ विक्रय करने वाले कुल 11 लाख 79 हजार किसानों को कुल 1463 करोड़ 42 लाख प्रोत्साहन राशि देने की पुख्ता व्यवस्था की है।
कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये ”शुद्ध के लिए युद्ध”
राज्य सरकार ने कृषि के क्षेत्र में विरासत में मिली बदहाल स्थिति को समृद्धता की ओर ले जाने का निश्चय किया है। किसानों को हर कदम पर हर तरह की मदद मुहैया कराई जा रही है। गुणवत्तापूर्ण खाद, बीज और कीटनाशक की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश में ”शुद्ध के लिए युद्ध” अभियान चलाया जा रहा है। इस दौरान न सिर्फ बीज, उर्वरक और कीटनाशक के मानक स्तर का परीक्षण किया जा रहा है बल्कि कम मात्रा में सामग्री विक्रय, अनाधिकृत विक्रय, कालाबाजारी, अधिक मूल्य पर विक्रय आदि पर भी गंभीरता से कार्यवाही की जा रही है।
मंडियों में नगद भुगतान की व्यवस्था
कृषि उपज मंडी समितियों में किसानों को उनकी उपज बेचने पर दो लाख रूपये तक के नगद भुगतान की व्यवस्था की गई है। बैंकों से एक करोड़ रूपये से अधिक नगद आहरण पर टीडीएस कटौती के आयकर प्रावधानों से मंडियों में नगद भुगतान कठिनाई आई, तो तुरंत भारत सरकार का ध्यान आकर्षित किया गया। इस तरह मंडी व्यापारियों को इस प्रावधान से मुक्त कराने की पहल की गई है।
ई-नाम योजना से जुड़ी कृषि उपज मंडियाँ
राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना के द्वितीय चरण में राज्य सरकार द्वारा 25 कृषि उपज मंडियों को ई-नाम योजना से जोड़ा गया है। मंडी बोर्ड द्वारा 16 अगस्त, 2019 से प्रदेश की सभी मंडियों में एक साथ ई-अनुज्ञा प्रणाली लागू कर 4 लाख से ज्यादा ई-अनुज्ञा जारी किये गए हैं। इससे मण्डी व्यापारियों का समय बचा है। प्रदेश में 27 मण्डी प्रांगण में सोलर एनर्जी प्लांट भी स्थापित किये गये हैं। कृषकों को मण्डी प्रांगण में संतुष्टि अनुरूप मूल्य प्राप्त नहीं होने पर चार माह की निःशुल्क सुविधा और 80 प्रतिशत राशि कृषि उपज का भुगतान करने के लिये कोलेटेरल मैनेजमेंट एजेंसीस के चयन की कार्यवाही प्रक्रियाधीन है।
किसानों को सस्ती बिजली
प्रदेश में किसानों के लिये दस हॉर्स पॉवर तक के कृषि पंप की विद्युत दरों को आधा कर दिया गया है। पूर्व मे निर्धारित 1400 रूपये प्रति हॉर्स पॉवर प्रतिवर्ष कृषि पंप की विद्युत दर को अब आधा कर 700 रूपये कर दिया गया है। इससे लगभग 20 लाख किसान लाभान्वित हो रहे हैं। इस योजना में प्रति कृषि उपभोक्ता लगभग 47 हजार रूपये प्रति वर्ष सब्सिडी भी दी जा रही है। राज्य सरकार ने अब तक 2622 करोड़ 53 लाख रूपये सब्सिडी प्रदान की है। अक्टूबर 2019 से मार्च 2020 तक 20 लाख 10 हजार कृषि पंपों के लिए करीब 6138 करोड़ रूपये की सब्सिडी का प्रावधान किया गया है। स्थायी कृषि पंप कनेक्शन के अतिरिक्त अस्थायी कृषि पंप उपभोक्ताओं की विद्युत दरें भी कम की गई हैं।
अजजा/अजा किसानों को नि:शुल्क बिजली
प्रदेश में अब एक हेक्टेयर तक की भूमि वाले अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के किसानों को 5 हार्सपॉवर तक के कृषि पंप कनेक्शनों के लिये निःशुल्क बिजली दी जा रही है। इसके एवज में राज्य सरकार बिजली कंपनियों को 3800 करोड़ रूपये वार्षिक सब्सिडी देगी।
जैविक खेती
जैविक खेती के क्षेत्र में मध्यप्रदेश देश में नंबर-वन राज्य बन गया है। एपीडा के अनुसार प्रदेश में 2 लाख 13 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में कपास, गेहूँ, धान, अरहर, चना, सोयाबीन इत्यादि फसलों की जैविक खेती की जा रही है। जैविक खेती के दृष्टिकोण से गौ-शालाएँ बेहद महत्वपूर्ण हैं। ग्राम पंचायत स्तर पर गौ-शालाओं का निर्माण कराया जा रहा है।
प्रदेश का किसान अब निश्चिंत होकर कृषि कार्य में जुट गया है। कृषि की नई-नई तकनीक अपनाने लगा है। उद्यानिकी और खाद्य प्र-संस्करण के क्षेत्र में भी सक्रिय हो गया है।

सियासत की अपनी अलग एक ज़ुबाँ है ….
तनवीर जाफ़री
इस समय पूरे विश्व में उदारवाद बनाम रूढ़िवाद के मध्य द्वन्द की स्थिति देखी जा रही है। विश्व के अधिकांश देश इस प्रकार के वैचारिक द्वन्द का शिकार हैं। ज़ाहिर है भारतवर्ष भी इससे अछूता नहीं है। परन्तु अन्य देशों के नेताओं में जहाँ काफ़ी हद तक वैचारिक प्रतिबद्धता नज़र आती है वहीं हमारे देश के नेताओं में प्रायः वैचारिक प्रतिबद्धता नाम की कोई चीज़ दिखाई नहीं देती। कौन सा नेता सुबह किस पार्टी का सदस्य है और शाम को वह किस दल में शामिल हो जाएगा,कुछ कहा नहीं जा सकता । व्यक्ति विशेष तक ही नहीं बल्कि सामूहिक रूप से दलीय स्तर पर भी इस तरह का वैचारिक ढुलमुलपन देखा जा सकता है। अर्थात कौन सा दल आज किस विचारधारा के गठबंधन का हिस्सा है और वही दल कल किस विचारधारा के गठबंधन का हिस्सा बन जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। आम तौर पर इस तरह की स्थिति उस समय उत्पन्न होती है जब विचारधारा के सामने सत्ता का सवाल आ खड़ा हो जाए।
पिछले दिनों भारतीय राजनीति में महाराष्ट्र इस तरह के प्रयोग का एक और उदाहरण नज़र आया। कल तक कट्टर हिंदूवादी विचारधारा का अनुसरण व समर्थन करने वाला क्षेत्रीय दल शिव सेना जो दो दशकों से भी लम्बे समय से समान विचारधारा रखने वाली भारतीय पार्टी का लगभग स्थाई सहयोगी दल था,उसने महज़ महाराष्ट्र की सत्ता हासिल करने के लिए अपने वैचारिक सहयोगी संगठन से नाता तोड़ लिया। और अपनी धुर वैचारिक विरोधी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से हाथ मिला कर सत्ता में आ गया। निश्चित रूप से अपने हाथों से राज्य की सत्ता फिसल जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी में काफ़ी बेचैनी व छटपटाहट दिखाई दी। भाजपा के नेताओं की तरफ़ से शिवसेना के नेताओं को अवसरवादी तथा राज्य की जनता के साथ छल करने वाला बताया गया। नैतिकता के लिहाज़ से भी देखा जाए तो यह इसलिए मुनासिब नहीं था क्योंकि भाजपा व शिवसेना एक साथ मिलकर चुनाव पूर्व गठबंधन सहयोगी के रूप में चुनाव लड़े थे। इसलिए सरकार का गठन करना इन्हीं दोनों दलों का नैतिक दायित्व था। परन्तु राज्य की सत्ता के शीर्ष पर बैठने के दोनों ही दलों के उतावलेपन ने राज्य के सभी राजनैतिक समीकरण बदल कर रख दिए।
महाराष्ट्र के इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा ने भी सत्ता पर क़ब्ज़ा करने की ख़ातिर शिवसेना से भी पहले एक बड़ा राजनैतिक पाप यह कर डाला कि एक तो उसने राजभवन का दुरूपयोग किया दूसरे यह कि उसने जल्दबाज़ी में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के उस नेता पर विश्वास जताया जिसके विरुद्ध पूरे चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा करोड़ों रूपये के घोटाले व भ्रष्टाचार का आरोप लगाती रही है। यही वजह है कि जहाँ देश की जागरूक जनता जो शिवसेना+एन सी पी+कांग्रेस गठबंधन जिसे ‘महा विकास अघाड़ी ‘का नाम दिया गया है, के इस नए नवेले अवसरवादी गठबंधन को पचा नहीं पा रही है। वहीँ वह भाजपा द्वारा किये गए ‘सत्ता हरण’ के प्रयास को भी असंवैधानिक,सत्ता का दुरूपयोग तथा अनैतिकता की पराकाष्ठा के रूप में देख रही है। रहा सवाल शिवसेना व कांग्रेस के साथ आने का तो,शिवसेना का कांग्रेस प्रेम या उसका उदारवादी दलों से समझौता करना भी कोई नई बात नहीं है। 1975 में जब इंदिरा गाँधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की थी उस समय शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने आपातकाल का समर्थन क्या था। इतना ही नहीं बल्कि आपातकाल के बाद हुए 1977 के लोकसभा तथा इसके बाद 1980 में महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनावों में भी शिवसेना ने कांग्रेस पार्टी को समर्थन दिया था। आज शिवसेना को कांग्रेस या राष्ट्रवादी कांग्रेस से मिलकर सरकार बनाने पर हैरानी जताने वाले शायद भूल गए कि 1989 में शिवसेना इंडियन मुस्लिम लीग के साथ भी समझौता कर चुकी है तथा तत्कालीन मुस्लिम लीग नेता जी एम बनातवाला के साथ सेना प्रमुख बल ठाकरे मंच भी सांझा कर चुके हैं।
इन परस्पर अंतर्विरोधों के बीच एक सवाल यह भी उठता है कि क्या भाजपा को भी यह कहने का अधिकार है कि शिवसेना ने हिंदूवादी राजनीति की राह छोड़ उदारवादी दलों से समझौता क्यों कर लिया ? हरगिज़ नहीं। वर्तमान में बिहार में चल रही भाजपा व जे डी यू की संयुक्त सरकार इस समय का सबसे बड़ा उदाहरण है। सर्वविदित है कि गत वर्ष कांग्रेस+जे डी यू+आर जे डी के महागठबंधन को बड़ी ही चतुराई से धराशाई कर भाजपा ने कथित सेक्युलर पार्टी जे डी यू से समझौता कर उसे समर्थन देकर अपनी संयुक्त सरकार बनाई। स्वयं को हिंदूवादी व धर्मनिरपेक्ष बताने वाले भाजपा व जे डी यू पहले भी बिहार से लेकर केंद्र तक गठबंधन का हिस्सा रह चुकी है। इससे भी बड़ा उदाहरण पूर्व जम्मू कश्मीर का रहा है जहाँ भाजपा ने केवल सत्ता के लिए उस पी डी पी के साथ मिलकर राज्य में सरकार का गठन किया जिसे वह हमेशा ही कश्मीर का अलगाववादी दल कहा करती थी। फ़ारूक़ अब्दुल्ला व उनके पुत्र उमर अब्दुल्ला को भी भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व वाली केंद्र की गठबंधन सरकार में मंत्री बनाया था। कल तक भाजपा की नज़रों में यही नेता व यही राजनैतिक दल जो राष्ट्रवादी नज़र आते थे आज कश्मीर के हालात बदलने पर यही दल व इनके यही नेता राष्ट्रविरोधी,पाकिस्तान परस्त व अलगाववादी दिखाई दे रहे हैं।
इन राजनैतिक व वैचारिक द्वंदपूर्ण परिस्थितियों में आख़िर देश की आम जनता व मतदाता स्वयं को कहाँ खड़ा हुआ महसूस करता है?निश्चित रूप से वैचारिक सोच या विचारधारा किसी एक नेता या दल अथवा किसी संगठन विशेष से जुड़ी विषयवस्तु नहीं है न ही इसपर किसी का एकाधिकार हो सकता है। देश का प्रत्येक व्यक्ति अपने निजी विचार व सोच रखता है। परन्तु वही व्यक्ति जब किसी अवसरवादी या ढुलमुल सोच रखने वाले नेता,पार्टी या समूह से जुड़ जाता है तो वह भी इसी वैचारिक द्वन्द में उलझ जाता है। गोया कल तक जो हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में सब भाई भाई का नारा लगाया करता था उसी केमाथे पर या तो इस्लाम ख़तरे में है जैसी अनर्गल चिंताओं की लकीरें उभरती दिखाई देती हैं या उसके मुंह से “जो हिन्दू हितों की बात करेगा:वही देश पर राज करेगा ” जैसे समाज में साम्प्रदायिकता फैलाने वाले नारे सुनाई देते हैं। यानी जनता में आने वाले इस कथित वैचारिक बदलाव की वजह वह अवसरवादी नेता या दल बनते हैं जो सत्ता की ख़ातिर अपने विचारों की ही नहीं बल्कि अपने ज़मीर तक का सौदा कर बैठते हैं।
यह हालात इस नतीजे तक पहुँचने के लिए काफ़ी हैं कि प्रायः देश के किसी भी दल में वैचारिक प्रतिबद्धता नाम की कोई चीज़ बाक़ी नहीं रह गयी है। सत्ता पर नियंत्रण हासिल करना ही इनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। लिहाज़ा आम लोगों को इनकी वैचारिक ग़ुलामी से बचने की ज़रुरत है। जनता को स्वयं यह महसूस करना चाहिए और चुनाव में वोट मांगते समय इनसे यह ज़रूर पूछना चाहिए की आख़िर ये लोग समय समय पर अपने ‘वैचारिक केचुल ‘बदल कर जनता को क्यों गुमराह करते रहते हैं ? बेशक,ऐसी सियासत तो यही सोचने पर मजबूर करती है कि-“सियासत की अपनी अलग एक जुबां है-जो लिखा हो इक़रार,इंकार पढ़ना “।

अब विदेश से आ रही है प्याज
अजित वर्मा
प्याज के बढ़ते दामों ने केन्द्र सरकार की नींद हराम कर दी है। लगातार बढ़ती प्याज की कीमतों की वजह से सरकार अब विदेश से प्याज मंगवाने की तैयारी भी कर रही है। प्याज के बढ़ते दाम पर अंकुश लगाने के लिए आपूर्ति बढ़ाने के वास्ते सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एमएमटीसी ने विदेशों से 6,090 टन प्याज आयात करने का अनुबंध किया है।
केंद्रीय मंत्रिमण्डल ने पिछले हफ्ते ही 1.2 लाख टन प्याज आयात करने को मंजूरी दी है। सरकार ने सौ रुपए प्रति किलोग्राम पर पहुंचे प्याज के खुदरा दाम पर अंकुश लगाने के लिए यह फैसला किया है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्याज का दाम 70 रुपए किलोग्राम के आसपास चल रहा है।
उपभोक्ता मामले सचिव एके श्रीवास्तव प्याज के दाम, उसकी आपूर्ति और दाम को लेकर विभिन्न राज्य सरकारों के साथ समीक्षा बैठक भी कर चुके हैं। एमएमटीसी ने 6,090 टन प्याज का अनुबंध किया है। यह अनुबंध मिस्र से किया गया है, और इसकी खेप जल्द ही मुंबई बंदरगाह पर पहुंच जाएगी। सूत्रों के अनुसार एमएमटीसी को जहां एक तरफ प्याज के आयात का काम दिया गया है वहीं सरकारी क्षेत्र की संस्था नेफेड रसोई में काम आने वाली इस महत्वपूर्ण सामग्री की घरेलू बाजार में आपूर्ति करेगी।
खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने यह कहा था कि खरीफ और खरीफ के आखिरी दौर में होने वाली प्याज की पैदावार में 26 फीसद तक कमी आने का अनुमान है। प्याज का उत्पादन 2019-20 के खरीफ मौसम में घटकर 52 लाख टन रहने का अनुमान व्यक्त किया गया। इससे प्याज की आपूर्ति और दाम पर दबाव बढ़ गया। पासवान ने लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में कहा कि प्याज की फसल मौसमी होती है। रबी मौसम में मार्च से जून के दौरान इसकी पैदावार होती है जबकि खरीफ की फसल अक्टूबर से दिसंबर और खरीफ की आखिरी दौर की फसल जनवरी-मार्च में होती है। अब यह देखना है कि विदेश से आने वाली प्याज का कीमतों में कितना असर पड़ता है।

न्याय के नाम पर ठगी क्यों ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जोधपुर के एक समारोह में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और भारत के मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबदे ने जो टिप्पणियों की हैं, उन पर मेरा प्रतिक्रिया करने का मन हो रहा है। बोबदेजी ने यह ठीक ही कहा है कि न्याय न्याय है, वह प्रतिशोध या बदला नहीं हो सकता है। इसीलिए किसी भी व्यक्ति का अपराध सिद्ध होने के पहले गुस्से में आकर उसको सजा दे देना उचित नहीं है। यही ठीक हो तो फिर देश में अदालतों की जरुरत ही क्या है ? लोग अपने आप ‘न्याय’ करने लगेंगे। ऐसा न्याय समाज में अराजकता फैला देगा। लेकिन न्याय मिलने में सालों-साल लग जाएं और हजारों-लाखों रु. खर्च हो जाएं तो क्या आप उसे न्याय कहेंगे ? जब खेती ही सूख जाए और फिर आप झमाझम बारिश ले आएं तो लोग आपको क्या कहेंगे ? ‘का बरखा, जब कृषि सुखानी ?’ हमारे देश में करोड़ों मुकदमे अधर में लटके रहते हैं। तीस-तीस चालीस-चालीस साल वे फैसलों का इंतजार करते रहते हैं। उन मुकदमों के जज सेवा-निवृत्त हो जाते हैं। उनके वादी, प्रतिवादी और वकील दिवंगत हो जाते हैं। जो फैसले निचली अदालतें करती हैं, उनमें से कई ऊंची अदालतों में जाकर उलट जाते हैं। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि अदालतों की बहसें और फैसले अंग्रेजी में होते हैं, जो वादी और प्रतिवादी के लिए जादू-टोने की तरह बने रहते हैं। न्याय के नाम पर यह ठगी आजादी के बाद भी देश में धड़ल्ले से चल रही है। भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश जैसे देशों में अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही इस ठगी को रोकने की हिम्मत आज तक किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं की है। इसके विरुद्ध राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद बराबर आवाज उठा रहे हैं। उनकी पहल पर ही सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी वेबसाइट कई भारतीय भाषाओं में कर दी है। कोविंदजी मेरे पुराने साथी हैं। मुझे उन पर गर्व है। वे राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठकर भी अपने सिद्धांतों को नहीं भूले हैं। कोविंदजी ने जोधपुर में फिर कहा है कि न्याय को जरा सस्ता करो, सुलभ करो, गरीब आदमी की हैसियत ही नहीं होती कि वह मुकदमा लड़ सके। गरीब आदमी को जैसे मैं शिक्षा और इलाज मुफ्त देने की वकालता करता हूं, वैसे ही उसे इन्साफ भी मुफ्त मिलना चाहिए। इन तीनों चीजों को जादू-टोने से बाहर निकालने का एक ही शुरुआती उपाय है। वह है, इनकी पढ़ाई के माध्यम से अंग्रेजी को निकाल बाहर किया जाए। यदि वकालत, डाक्टरी और शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं बन जाएं तो कुछ ही वर्षों में भारत महाशक्ति बन सकता है

मानवाधिकारों की चेतना
प्रो.शरद नारायण खरे
(10 दिसम्बर दिवस पर विशेष) द्वितीय महायुद्ध के आरंभ में जहाँ एक ओर नात्सी और फासिस्ट देश प्रजातांत्रिक एवं नागरिक अधिकारों का उपहास कर रहे थे उसके साथ ही दूसरी ओर प्रजातांत्रिक मित्र राष्ट्रों की ओर से समस्त देशों के नागरिकों के मौलिक, मानवीय अधिकारों को सुरक्षित करने के आश्वासन दिए जा रहे थे। अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने तो सन् 1941 में अमरीकी कांग्रेस को भेजे गए अपने संदेश में चार प्रकार के मौलिक, नागरिक अधिकारों की चर्चा की थी जिनमें, भाषण और अभिव्यक्ति, धर्मोंपासना, आर्थिक अभाव से मुक्ति तथा भय से मुक्ति शामिल हैं।
सर्वराष्ट्रीय मानव अधिकारपत्र की धारा 1 तथा 2 में कहा गया है कि सभी मनुष्य जन्म से स्वतंत्र हैं और प्रत्येक मनुष्य की प्रतिष्ठा और अधिकार समान हैं अत: प्रत्येक मनुष्य सभी प्रकार के अधिकारों और स्वतंत्रताओं को पाने का अधिकारी है। उनमें किसी प्रकार के जाति, वर्ण, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीति अथवा अभिमत, राष्ट्रीयता, सामाजिक उत्पत्ति, संपत्ति, जन्म पद, आदि का भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। आगे की धाराओं में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को जीवित रहने, स्वतंत्रता का उपभोग करने तथा अपने आपको निरापद बनाने का अधिकार है । किसी व्यक्ति को दास बनाकर नहीं रखा जा सकेगा, दासता और दासों के सभी प्रकार के क्रय विक्रय पर कानूनी प्रतिबंध रखा जाएगा । किसी व्यक्ति को शारीरिक यंत्रणा नहीं दी जाएगी और न क्रूरतापूर्ण तथा अमानवीय बर्ताव ही किया जाएगा। किसी व्यक्ति का न तो अपमान किया जाएगा और न उसे अपमानजनक दंड ही दिया जाएगा । प्रत्येक व्यक्ति को संसार के प्रत्येक भाग में कानून की दृष्टि में समान मनुष्य समझे जाने का अधिकार है । कानून की दृष्टि में सभी मनुष्य समान हैं और बिना किसी प्रकार के भेदभाव के उन्हें कानून का समान संरक्षण पाने का अधिकार है। इस घोषणापत्र का उल्लंघन होने और भेदभाव किए जाने पर प्रत्येक व्यक्ति को कानूनी संरक्षण प्रदान किया जाएगा । विधान या कानून से प्राप्त मौलिक अधिकारों का अपहरण होने की स्थिति में प्रत्येक व्यक्ति को अधिकारसंपन्न राष्ट्रीय न्यायालयों द्वारा परित्राण पाने का अधिकार है । किसी व्यक्ति को मनमाने ढंग से गिरफ्तार और नजरबंद न किया जा सकेगा और न उसको निष्कासित किया जा सकेगा । आरोप और अभियोगों की जाँच तथा अधिकार और कर्तव्यों का निर्णय स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायाधीशों द्वारा उचित और खुले रूप से कराने का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को प्राप्त होगा । खुली अदालत में मुकादमा चलाकर सजा मिले बिना, जिसमें उसे अपने बचाव की सभी आवश्यक सुविधाएँ दी गई हों, प्रत्येक व्यक्ति निर्दोष समझा जाएगा; किसी भी ऐसे कार्य या गलती के लिए किसी व्यक्ति को दोषी न ठहराया जाएगा तो उस समय अपराध न माना जाता रहा हो जब वह कार्य या गलती हुई हो और न उससे अधिक सजा दी जा सकेगी जो उस समय कानून के अनुसार मिल सकती हो जब वह कार्य या गलती हुई थी । किसी के एकांत जीवन, परिवार, घर या पत्रव्यवहार के मामले में अनुचित हस्तक्षेप न किया जाएगा और न उसके सम्मान और प्रतिष्ठा पर ही किसी प्रकार का आघात किया जाएगा और अनुचित हस्तक्षेप के विरुद्ध कानूनी संरक्षण का अधिकार रहेगा । प्रत्येक व्यक्ति अपने राज्य की सीमा के अंदर स्वेच्छापूर्वक आने जाने और मनचाहे स्थान पर बसने का अधिकारी है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश को छोड़कर दूसरे देश जाने और वहाँ से लौटने का अधिकार है । प्रत्येक व्यक्ति को उत्पीड़न से परित्राण पाने के लिए दूसरे देशों में जाने का अधिकार उनको प्राप्त नहीं होगा जो अराजनीतिक मामलों के कानूनी अपराधी होंगे। जो लोग संयुक्त राष्ट्रसंघ के उद्देश्य और सिद्धांतों के प्रतिकूल होंगे उन्हें भी यह अधिकार नहीं मिलेगा । प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी राष्ट्र का नागरिक बनने का अधिकार है। कोई व्यक्ति राष्ट्रीयता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता और राष्ट्रीयता बदलने का अधिकार ही उससे छीना जा सकता है । प्रत्येक स्त्री और पुरुष को राष्ट्र, राष्ट्रीयता और धर्म के प्रतिबंध के बिना विवाह करने और परिवार बनाने का अधिकार है। प्रत्येक पुरुष और स्त्री को विवाह करने, वैवाहिक जीवन में और विवाह संबंधविच्छेद के मामलों में समान अधिकार हैं। परिवार को समान और राज्य संरक्षण प्राप्त होगा । प्रत्येक को अकेले या दूसरे के साथ मिलकर संपत्ति पर स्वामित्व करने का अधिकार है। कोई व्यक्ति मनमाने तरीके से अपनी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा । प्रत्येक व्यक्ति को विचार, अंत:करण, धर्मोपासना को स्वतंत्रता का अधिकार है। इसमें धर्मपरिवर्तन, धर्मोपदेश, व्यवहार, पूजा और अनुष्ठान की स्वतंत्रता सम्मिलित है । प्रत्येक व्यक्ति को विचार और विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता है। सूचना प्राप्त करने और उसका प्रसार करने की स्वतंत्रता है । प्रत्येक व्यक्ति को शांतिमय सभा करने और संघटन बनाने का अधिकार है। किसी व्यक्ति को किसी संघटन में रहने को बाध्य नहीं किया जा सकता ।
मानव अधिकारपत्र की 21वीं धारा में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश के प्रशासन में प्रत्यक्ष रूप से अथवा निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से हिस्सा लेने का अधिकार है। प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी सार्वजनिक पद पर नियुक्त होने का समान अधिकार प्राप्त है। प्रशासन का संचालन जनता के इच्छानुसार होगा और जनता की इच्छा, समय समय पर स्वतंत्र, निष्पक्ष और गुप्त या प्रकट मतदान के आधार पर हुए निर्वाचनों से प्रकट होगी। समाज के सदस्य की हैसियत से प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा का अधिकार है । प्रत्येक व्यक्ति का काम करने, स्वतंत्रतापूर्वक पेशा चुनने, काम करने के लिए न्यायसंगत एवं अनुकूल परिस्थितियों तथा बेकारी से संरक्षण का अधिकार है। प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के समान कार्य के लिए समान वेतन पाने का अधिकारी है। उसे उचित पारिश्रमिक पाने और मजदूर संघ बनाने का अधिकार है । प्रत्येक व्यक्ति को अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य तथा हितवर्धन के लिए अपेक्षित जीवनस्तर प्राप्त करने का, भोजन, वस्त्र, निवास, उपचार और आवश्यक सामाजिक सहायता प्राप्त करने का अधिकार है । माता और बच्चे की देखभाल और सहायता पाने का भी यह अधिकारी है । प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। प्रारंभिक शिक्षा अनिवार्य एवं नि:शुल्क होनी चाहिए शिक्षा का लक्ष्य मानव व्यक्तित्व का पूर्ण विकास तथा आधारभूत स्वतंत्रताओं एवं मानव अधिकारों के प्रति सम्मान में वृद्धि करना होगा। इसके द्वारा सब राष्ट्रों और जातीय या धार्मिक समुदायों के बीच विचारों के सामंजस्य, सहिष्णुता और मैत्री को प्रोत्साहित किया जाएगा तथा शांतिरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ की ओर से होनेवाले कार्यों में सहायता प्रदान की जाएगी। बच्चों को किस प्रकार की शिक्षा दी जाए, इसका अधिकार उनके मातापिता को है । प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रतापूर्वक समाज के सांस्कृतिक जीवन में भाग लेने का अधिकार है। वैज्ञानक, साहित्यिक अथवा कला कृति से मिलनेवाली ख्याति तथा उसके भौतिक लाभ की रक्षा का भी उसे अधिकार है ।
मानव अधिकारपत्र की धाराओं में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को इस अधिकारपत्र के अनुरूप सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था प्राप्त करने का अधिकार है। प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों और स्वतंत्रताओं का उपभोग करते हुए समाज के प्रति उत्तरदायी है और उसका कर्तव्य है कि वह अन्य व्यक्तियों के अधिकारों का सम्मान करे। दूसरों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा, नैतिकता, सार्वजनिक शांति और जनतांत्रिक समाज के सामान्य हितों के लिए कानून द्वारा प्रतिबंध लगाए जा सकेंगे। इन अधिकारों और स्वतंत्रताओं का उपयोग किसी भी दशा में संयुक्त राष्ट्रसंघ के उद्देश्यों और सिद्धांतों के विपरीत नहीं हो सकेगा।
पर,इस घोषणा का यह भी अर्थ नहीं लगाया जा सकेगा कि किसी राज्य, व्यक्ति, समुदाय अथवा व्यक्ति को किसी ऐसे कार्य में संलग्न होने या कोई ऐसा कार्य करने का अधिकार है जिसका उद्देश्य इस घोषणा में निहित अधिकारों तथा स्वतंत्रताओं में से किसी का भी उन्मूलन करना हो।

श्रीराम जन्मभूमि के साथ न्याय या अन्याय ?
ब्रह्मचारी सुबुधानंद
9 नवम्बर 2019 को भारत की सर्वोच्च न्यायालय ने श्रीराम जन्मभूमि के वर्षों से लम्बित वाद पर बहुप्रतीक्षित निर्णय पर अपनी मुहर लगाई। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को भारत की भोली-भाली सनातन धर्मावलम्बी जनता ने हृदय से स्वीकार किया। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को सम्मान देना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य भी है परन्तु- साथ ही साथ विद्वज्जनों को अपना मत प्रकट करने का अधिकार भी संविधान के अंतर्गत सुरक्षित है। अत: न्यायालय के आदेशों की स्वस्थ समीक्षा शोध का विषय है। न्याय करना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु न्याय होते दीखना भी चाहिए। हमारी इस समीक्षा का उद्देश्य देश में भिन्न-भिन्न धर्मावलंबियों के प्रति आपस में विद्वेष बढ़ाना नहीं अपितु समन्वय स्थापित करना ही है। हमारा विश्वास है कि देश का संविधान धर्मनिरपक्ष (पंथ निरपेक्ष) है। इसलिए अपने-अपने विश्वास के अनुसार प्रत्येक धर्म के अनुयायी को दी जाने वाली सुविधा के हम समर्थक हैं। इसके द्वारा हमारे मुस्लिम बन्धु बड़ी से बड़ी मस्जिद बनाकर खुदा की इबादत करे, हमें कोई परेशानी नहीं। इस समीक्षा द्वारा हम वर्ग विद्वेष नहीं अपितु स्थाई शान्ति के लिए प्रयास कर रहे हैं।
(1) सुन्नी सेण्ट्रल वक्फ बोर्ड “डेडीकेशन वाई यूजर” (समर्पण द्वारा उपयोगकर्ता) एवं एडवर्स पजेशन (प्रतिकूल कब्जा) के आवश्यक घटकों एवं सिद्धान्तों को सिद्ध नहीं कर पाया। (पृ. 914) हमारी संस्था श्रीराम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति के द्वारा जब यह सिद्ध किया गया कि अयोध्या में बाबर के जाने एवं बाबर द्वारा मस्जिद निर्माण का कोई प्रमाण ही नहीं है, ऐसी स्थिति में यह कहकर कि कुछ हिन्दू पक्षों ने इसे मान लिया है। अत: इस पर विचार ही न करना अनुचित है।
(2) श्रीराम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति द्वारा मुस्लिम साहित्य शरिया, हदीस इत्यादि के हवाले से कहा गया कि जिस भूमि में बुत होते हैं। वहां नमाज पढ़ने पर खुदा को सूचना देने वाला, फरिश्ता जिब्राइल नहीं आता और नमाज पढ़ना गुनाह होता है। ऐसी स्थिति में यह कहकर इस बात को टाल देना कि यहां के मुसलमानों ने यहां का तौर-तरीका अपना लिया है। अत: इसे कसौटी पर नहीं कसा जा सकता, यह अनुचित है। सुन्नी सेण्ट्रल वक्फ बोर्ड कट्टरपंथी मुस्लिम हैं तो इनके द्वारा तो यह सिद्ध किया जाना था कि जो भवन तोड़ा गया, वहां बुत नहीं थे, वहां मस्जिद में आवश्यक रुप से होने वाला वजू का कुंआ था, वहॉ अजान के लिए मीनारें थीं, यह सिद्ध करने में बोर्ड असफल रहा। जबकि वास्तविकता तो यह थी कि वहां कसौटी के 14 खम्भे थे, जो निश्चित रुप से मस्जिद का हिस्सा नहीं थे। इसे मुस्लिम नेता सैयद शहाबुद्दीन ने भी अपने पत्र स्वीकार किया है। इसके उलट श्रीराम जन्मभूमि को पूर्णरुप से मस्जिद मानते हुए यह कहा जाना कि मूर्ति मस्जिद में रखी गई और मस्जिद को नापाक किया गया अनुचित है।
इसके अतिरिक्त जब आप यह भूमि धर्माचार्यों को सौंप ही रहे हैं, तो इसका ट्रस्ट बनाने की क्या आवश्यकता है? रामालय न्यास अधिग्रहण के बाद बना है। जिसका उद्देश्य ही रामालय का निर्माण करना है और जिसमें चारों शंकराचार्यों सहित वैष्णवाचार्य एवं अखाड़ों के प्रतिनिधि सम्मिलित हैं। ऐसी स्थिति में किसी अन्य ट्रस्ट की आवश्यकता तो तब होती जबकि रामालय न्यास मन्दिर निर्मण करने से मना कर देता। जब कोई पार्टी सरकार बनाना चाहती है तो राज्यपाल सभी दावेदारों को बुलाता है तो यहॉ रामालय न्याय को क्यों नहीं बुलाया गया? जबकि रामालय न्याय धारा 6 के सभी प्रावधानों को पूर्ण करता है।
सुप्रीम कोर्ट के जजों ने लिखा है- हम आस्था पर कोई निर्णय नहीं दे सकते। तो यहां समझना चाहिए, आस्था दो तरह की होती है। पहली अप्रामाणिक आस्था दूसरी प्रमाणित आस्था। इस पेड़ में प्रेत है यह अंधविश्वास है। पीपल की पूजा करनी चाहिए, यह प्रामाणिक विश्वास है। गीता में लिखा है “अश्वत्थ:सर्ववृक्षाणाम्” इसे अंधविश्वास की श्रेणी में डालना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना है। मुसलमानों की आस्था को क्या आप अंधविश्वास की श्रेणी में डालना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना है। मुसलमानों की आस्था को क्या आप अंधविश्वास कह सकते है? किसी नारी ने होली घोस्ट से संतान पैदा की उसको मानने वाले अरबों लोगों की यह आस्था क्या अंधविश्वास होगी? कोर्ट का निर्णय अन्य फैसलों पर भी प्रमाण बनता है। इसका ध्यान रखा जाना चाहिए था।
भारतीय न्याय प्रणाली की बेदाग छबि विश्व में जानी जाती है। स्वयं भगवान श्रीराम के न्याय के मापदण्ड शास्त्रों में वर्णित हैं। प्राचीनकाल से ही भारतीय संस्कृति में न्याय और न्यायाधीश को ईश्वर की बराबरी का स्थान दिया गया है। उसी न्याय व्यवस्था में जब कोई पूर्वाग्रह दीखने लगता है तो फिर भय का वातावरण बनने लगता है। इस ऐतिहासिक निर्णय के मूलतत्वों का जब आगे विश्लेषण होगा, तब उक्त खामियों को चिन्हित करके अधिवक्तागण इस निर्णय के आलोक में अनेकों मामलों पर इसका प्रभाव लाएगें। यह कभी हमारे विरुद्ध भी प्रयोग होगा। अत: मानवाधिकार के दायरे में उक्त समीक्षा की गई है। जिस पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है।
हमारी संस्था श्रीराम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति ने कोर्ट में सिद्ध किया कि अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि है, जिसे हमारे शास्त्र प्रामाणित करते हैं। वहॉ एडवर्ड के द्वारा लगाये गये खम्भे बतलाते हैं कि यह श्रीराम जन्मभूमि है। हमने हंसबकर की पुस्तक पेश की जिसमें श्रीराम जन्मभूमि का प्राचीन नक्शा दर्ज था। जो श्रीराम जन्मभूमि की लोकेशन बतलाता है। ऐसी स्थिति में कोर्ट द्वारा यह कहा जाना कि मंदिर उस स्थान पर बनाया जाएगा, जहॉ मस्जिद थी, तथ्य के विपरीत है।
(3) सुन्नी सेण्ट्रल वक्फ बोर्ड का कहना था यह मस्जिद है और जब मस्जिद बन जाती है तो हमेशा के लिए खुदा की हो जाती है। जहॉ बहुत दिनों तक नमाज नहीं पढ़ी जाती, वहां मस्जिद खारिज हो जाती है। बोर्ड कहता है अमुक तारीख तक वहां नमाज पढ़ने के सबूत नहीं है। जबकि कोर्ट कहता है कि वहां हमेशा नमाज पढ़ी जाती थी, तो यह बहुत बड़ा विरोधाभास है।
हमने मस्जिद को नापाक करने का अपराध किया है, यह कहकर आपने हमें अपराधी सिद्ध किया है। सुप्रीम कोर्ट के माननीय जजों को यह ध्यान देना चाहिए कि हिन्दू ने विश्व में कहीं भी किसी धार्मिक स्थल को नहीं तोड़ा है और इसके प्रमाण भी नहीं मिलते हैं। आपने यह भी माना है कि बाबर ने खाली जमीन पर मस्जिद नहीं बनाई। वहां खुदाई में जो मूर्ति निकली हैं क्या वह मस्जिद का हिस्सा हो सकतीं हैं? क्या वे मूर्तियां प्रमाण है कि हमने मस्जिद को नापाक करने का अपराध किया है? हिन्दुओं ने कभी भी भिन्न धर्म को दबाकर कार्य नहीं किया क्योंकि हिन्दू धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्र के ग्रंथ शुक्रनीति में लिखा है-
यस्मिन् देशे य आचार: कुलाचारश्च यादृश:। तथैव परिपाल्योसौ यदावशमुपागत:।।
राजा जिस देश को जीत लेता है तो वहॉ की संस्कृति, कुलाचार आदि को उसी रुप में पालन करावे जैसा कि वहां विद्यमान है। तो हमारे यहां तो विश्वविजय के अनेकों उल्लेख हैं किन्तु हिन्दू द्वारा परधर्म को या उनके चिन्ह को कभी नष्ट नहीं किया गया है और कभी भी विजित देश की संस्कृति को नष्ट नहीं किया गया। हम तो न्याय के लिए सुप्रीमकोर्ट गये थे, अपराधी बनकर सुप्रीम कोर्ट का अनुग्रह प्राप्त करने नहीं।
एक समझौते में सुन्नी सेण्ट्रल वक्फ बोर्ड ने हस्ताक्षर किया था। उन्होंने हस्ताक्षर पूर्व सुरक्षा मांगी थी और जिसमें उन्होंने कहा था कि हम विवादित भूमि से अपना दावा वापिस लेते हैं। यह दस्तावेज सुप्रीमकोर्ट पहुंचा दिया गया था। तो ऐसी स्थिति में जबकि उन्होंने दावा वापिस ले लिया था तो स्वाभाविक रुप से उनका दावा कि मस्जिद का स्थान परिवर्तित नहीं होता और वह हमेशा के लिए खुदा की हो जाती है, समाप्त हो जाता है। कोर्ट ने इस बात को संज्ञान में लिये बिना कैसे छोड़ दिया?
(4) कालबाधित मामले खारिज होते हैं। आपने वॉड वाई लिमिटेशन के तहत सुन्नी सेण्ट्रल वक्फ बोर्ड को खारिज नहीं किया, जबकि निर्मोही अखाड़े को लिमिटेशन के अंतर्गत मानते हुए खारिज किया तो हाईकोर्ट के निर्णय की अनदेखी करके यह दोहरा मापदण्ड क्यों अपनाया गया?

राज्यपाल धनखड़ के कृत्य से संवैधानिक पद अपमानित
सनत जैन
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ इन दिनों चर्चाओं में बने हुए हैं। राज्यपाल धनखड़ बड़े नाटकीय ढंग से पश्चिम बंगाल की विधानसभा की ऐतिहासिक इमारत और लाइब्रेरी देखने के लिए पहुंचे। राजभवन सचिवालय ने विधानसभा सचिवालय को पत्र लिखकर राज्यपाल के विधानसभा पहुंचने की सूचना दी थी। विधानसभा सचिवालय ने राजभवन के पत्र का कोई जवाब नहीं भेजा था, नाही कार्यक्रम को लेकर दोनों संवैधानिक प्रमुखों के बीच कोई चर्चा हुई। ऐसी स्थिति मैं राज्यपाल को विधानसभा भवन जाना ही नहीं चाहिए था। यदि वह जा रहे थे, तो विधान सभा सचिवालय जिस समय पर खुलता है। उस समय वहां पर सामान्य नागरिक की तरह पहुंचते, तो भी यह माना जाता कि वह विधानसभा की ऐतिहासिक इमारत और लाइब्रेरी देखने पहुंचे हैं।
राज्यपाल धनखड़ लगभग 9 बजे सुबह ही विधानसभा भवन के गेट नंबर 3 पर पहुंच गए। इस गेट से वीवीआइपी ही विधानसभा में प्रवेश करते हैं। चूंकि विधानसभा में इस बात की कोई सूचना सुरक्षा अधिकारियों को नहीं थी। न ही सचिवालय खुलने का समय हुआ था। ऐसी स्थिति में दरवाजा बंद ही मिलना था। राज्यपाल गेट के सामने खड़े हुए। उन्होंने अपना विरोध एक आम आदमी की तरह दर्ज कराया। मीडिया ने उसका कवरेज किया। उसके बाद वह विधानसभा के द्वार नंबर 2 से विधानसभा के अंदर प्रवेश कर गए।
नाराज राज्यपाल धनखड़ ने कहा कि वह अपने आप को अपमानित महसूस कर रहे हैं। में व्यवस्था सुधार के लिए हूं। मेरी भूमिका रचनात्मक जिम्मेदारी निभाने की है।मुझे हैरानी है की विधानसभा का द्वार क्यों बंद है। मुझे 3 नंबर से प्रवेश क्यों नहीं करने दिया। राज्यपाल ने यह भी कहा कि सत्र नहीं चलने के दौरान भी सचिवालय काम करता है। फिर भी गेट बंद रखकर मुझे अपमानित किया है। में ना तो रबड़ स्टांप हूं और ना ही पोस्ट ऑफिस हूं। विधानसभा का भवन और लाइब्रेरी देखना कौन सा रचनात्मक या संवैधानिक काम था। इसे आसानी से समझा जा सकता है। इसके मायने भी निकाले जा सकते हैं।
समाचार पत्रों में राज्यपाल का इस तरीके से विधानसभा पहुंचना। स्वयं प्रोटोकॉल का पालन नहीं करना। संवैधानिक पद के मुखिया विधानसभा अध्यक्ष को लेकर यह कहना कि उन्होंने प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया है, बड़ा हास्यप्रद हैं।
वह भी ऐसे समय पर जब राजभवन में विधानसभा द्वारा भेजे गए 2 विधेयक की मंजूरी राज्यपाल द्वारा नहीं दिए जाने पर, विधानसभा अध्यक्ष द्वारा 2 दिन के लिए विधानसभा के सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी थी। इस दौरान विधानसभा में पहुंचना, राज्यपाल पद की गरिमा के खिलाफ है। निश्चित रूप से महाराष्ट्र और बंगाल में राज्यपालों की जिस तरह की भूमिका हाल ही के दिनों में देखने को मिली है। उससे राज्यपाल पद की गरिमा ही कम हुई है। वहीं राज्यपाल एक पार्टी विशेष के लिए काम करते हुए नजर आ रहे हैं।इससे संघीय व्यवस्था में राजनीतिक दलों एवं आम जनता के बीच में एक अविश्वास भी पैदा हुआ है। जो केंद्र एवं राज्यों के संबंधों में दूरियां पैदा करेगा। संवैधानिक पदों पर बैठे हुए पदाधिकारी यदि अपने प्रोटोकॉल का स्वयं पालन नहीं करेंगे। आम राजनेताओं की तरह सड़कों पर आकर इस तरह अपने आप को विवादित बनाएंगे। इससे समझा जा सकता है,कि हमारा लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं किस ओर जा रही हैं। महाराष्ट्र के राज्यपाल द्वारा आधी रात को राष्ट्रपति शासन समाप्त करने की अनुशंसा करना, सुबह-सुबह बिना किसी को सूचना दिए मुख्यमंत्री की शपथ ग्रहण करा देना। ऐसी घटनाएं हैं, जो राज्यपाल के पद की महत्ता और गरिमा को नष्ट करने का काम कर रही हैं। यदि यही स्थिति रही,तो भारत की संघीय व्यवस्था को कायम रख पाना बड़ा मुश्किल होगा। वहीं संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखना बहुत मुश्किल होगा।

इंदर गुजराल का सौंवा साल
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
श्री इंदर गुजराल आज जिंदा होते तो हम उनका सौंवा जन्मदिन मनाते। वे मेरे घनिष्ट मित्र थे। वे भारत के प्रधानमंत्री रहे, सूचना मंत्री रहे और मुझे याद पड़ता है कि वे दिल्ली की नगरपालिका के भी सदस्य रहे। उनसे मेरा परिचय अब से लगभग 50 साल पहले हुआ, जब वे इंदिराजी की सरकार में मंत्री थे। सोवियत रुस का सांस्कृतिक दूतावास बाराखंभा रोड के कोने पर हुआ करता था। वहां गुजराल साहब का भाषण था। मैं उन दिनों बाराखंभा रोड स्थित सप्रू हाउस में रहता था और अंतराष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. कर रहा था। मैं भी पहुंचा वहां। देखा कि रुसी कामरेड लोग रुसी भाषा में भाषण दे रहे हैं लेकिन गुजराल साहब अंग्रेजी में बोलने लगे। मैंने खड़े होकर कहा कि वे अपनी राष्ट्रभाषा में बोल रहे हैं। आप अपनी राष्ट्रभाषा में क्यों नहीं बोलते ? उसी दिन उनसे मेरा परिचय हो गया। धीरे-धीरे यही परिचय दोस्ती में बदल गया। गुजराल साहब एक दिन अपनी फिएट कार में बिठाकर मुझे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में ले गए। मेरी अनिच्छा के बावजूद उन्होंने मुझे ‘सटेरडे लंच ग्रुप’ का सदस्य बनवा दिया। इस ग्रुप में देश और विदेश की ज्वलंत समस्याओं पर इतना गहरा विचार-विमर्श होता है कि किसी भी सरकार के मंत्रिमंडल को इससे ईर्ष्या हो सकती है। इसका कारण है। इसमें विभिन्न विषयों के उत्कृष्ट विशेषज्ञों के अलावा हमारे कई मंत्री, नेता, सेवा-निवृत्त सेनापति, राजदूत, नौकरशाह, प्रोफेसर, पत्रकार आदि होते हैं। इसमें होनेवाले विचार-विमर्श को गोपनीय रखा जाता है। इस ग्रुप की पहली सीट गुजराल साहब के लिए और उसके पासवाली मेरे लिए लगभग आरक्षित-सी ही रहती थी। उनकी पत्नी शीलाजी अच्छी लेखिका थी। वे आर्यसमाजी परिवार की थी। उनके भाई प्रेस एनक्लेव में मेरे पड़ौस में ही रहते थे। इंदरजी और शीलाजी, दोनों ही शिष्टता की प्रतिमूर्ति थे। इंदरजी मास्को में हमारे राजदूत भी रहे। नरसिंहरावजी के जमाने में मैं अपने मित्र पूर्व अफगान प्रधानमंत्री बबरक कारमल से मिलने मास्को गया। गुजराल साहब बाहर थे लेकिन उन्होंने और शीलाजी ने मेरे लिए सारी सुविधाएं जुटा दीं। जब वे देवगौड़ाजी के साथ विदेश मंत्री थे, तब देवेगौड़ाजी मुझे अपने साथ ढाका ले गए थे। गुजराल साहब ने आगे होकर सभी बांग्लादेशी नेताओं से मेरा परिचय करवाया। जब गुजराल साहब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने मुझे राजदूत पद लेने के लिए भी कहा। उस दौरान ‘दूरदर्शन’ पर सप्ताह में दो-तीन बार राजनीतिक विश्लेषण के लिए मुझे नियमित बुलाया जाता रहा। मैंने एक-दो बार उनकी विदेश नीति की आलोचना भी की लेकिन उन्होंने उसका कभी बुरा नहीं माना। उनसे हर मुद्दे पर हमेशा खुलकर विचार-विमर्श होता था। उनके और शीलाजी के व्यवहार में मैने रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं देखा। जिस दिन उन्होंने इस्तीफा दिया, उसी दिन प्रधानमंत्री निवास भी खाली कर दिया। वे मूलतः बुद्धिजीवी थे। वे हमारे नेताओं की तरह नेता नहीं थे। वे प्रधानमंत्री भी अचानक ही बने थे। यदि वे लंबे समय तक टिक जाते तो हमारे पड़ौसी देशों के साथ हमारे संबंध शायद बहुत अच्छे हो जाते। उनके सौवें जन्मदिन पर उन्हें मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि।

भारत की बौद्धिक संपदा और सुरक्षा पर इंटरनेट कंपनियों का अधिकार
सनत जैन
पिछले दो दशक से भारत में इंटरनेट का बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है। केंद्र एवं राज्य सरकारों ने ई गर्वमेंट के माध्यम से डिजिटल प्रक्रिया का मुख्य संचालन इंटरनेट के माध्यम से किया है। पिछले एक दशक में गूगल, फेसबुक, व्हाट्सएप, यूट्यूब, टि्वटर एवं संचार के विभिन्न माध्यमों से, देश की सुरक्षा व्यवस्था और गोपनीय जानकारियां इंटरनेट कंपनियों के पास पहुंच रही हैं। जिसके कारण देश की सुरक्षा व्यवस्था अब इन अमेरिकी कंपनियों के अधिकार में पहुंच गई है। इसी तरह भारत की बौद्धिक संपदा एवं विभिन्न सरकारों एवं सुरक्षा से जुड़ी जानकारियां, गूगल, व्हाट्सएप, यूट्यूब के माध्यम से अमेरिकी कंपनियों के अधिकार में जाकर कापीराइट के अधिकार के साथ एकत्रित होते जा रही हैं। हमारी जानकारी और हमारी संपदा जाने अनजाने में अमेरिकी कंपनियों के पास पहुंच गई है। कानूनन कम्पनियां कॉपीराइट के अधिकार भी ले रही हैं। इस मामले में भारत सरकार का मौन इतने संवेदनशील मामले में लापरवाही और गैर जिम्मेदारी वाला है। इसको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि भारत सरकार अमेरिका की इन इंटरनेट कंपनियों के आगे समर्पण कर चुकी है। उसे ना देश की चिंता है, ना जनता की।
भारतीय सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों ने केंद्र सरकार से डेटा सुरक्षा कानून बनाने का निर्देश 10 साल पहले दिया था। उस समय व्हाट्सएप, यूट्यूब, स्मार्टफोन इत्यादि चलन में बहुत ज्यादा नहीं थे। इसके बाद भी पिछले 10 सालों में केंद्र सरकार ने कोई नियम नहीं बनाए। आज भी अंग्रेजों के बनाए 1885 के टेलीग्राफ कानून तथा भारतीय नागरिकों की निजी जानकारी और भारत की बौद्धिक संपदा को सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने कोई उपाय नहीं किए। आज सभी इंटरनेट कंपनियां, जो भारत में सबसे ज्यादा व्यापार कर रही हैं, या नि:शुल्क सेवाएं दे रही हैं। वह सभी अमेरिकी कंपनियां हैं। जब भी हम कोई ऐप डाउनलोड करते हैं, अथवा इंटरनेट पर व्हाट्सएप, फेसबुक, यूट्यूब, ईमेल इत्यादि की नि:शुल्क सेवाएं लेने के लिए जो शर्तें जाने-अनजाने में ऑनलाईन स्वीकार कर लेते हैं। उसके कारण आज हमारी सभी जानकारियां और बौद्धिक संपदा के अधिकार पिछले एक दशक में अमेरिकी कंपनियों के पास चले गए हैं।
हाल ही में गूगल ने नि:शुल्क वेबसाइट बनाकर देने का नया धंधा शुरू किया है। 3 साल तक गूगल नि:शुल्क सेवाएं देगी। जो डाटा आप उस पर अपलोड करेंगे, उस पर गूगल का अधिकार होगा। यदि वही जानकारी आप उपयोग करना चाहेंगे, तो आपको गूगल से खरीदना होगा। इन कंपनियों का गोरख धंधा और कमाई का मकड़जाल केवल इसी बात से समझा जा सकता है। व्हाट्सएप को 5 साल पहले फेसबुक ने 19 अरब डालर में खरीदा था। व्हाट्सएप भारत में नि:शुल्क सेवा उपलब्ध कराती है। लोकसभा के आम चुनाव के 5 महीनों में 120 करोड़ रुपए की कमाई व्हाट्सएप ने विज्ञापनों के माध्यम से एक नम्बर में कर ली। परदे के पीछे की कमाई का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। सरकार के दबाव में भारत में व्हाट्सएप ने अपना कार्यालय जरूर बनाया। किंतु 1 साल में मात्र इस कंपनी ने, 57 लाख रुपए की मात्र कमाई की। फेसबुक ने भारत की आधी आबादी और सभी सरकारों के डाटा पर कब्जा कर लिया है। गूगल में इंटरनेट पर जो भी डाटा अपलोड या डाउनलोड हुआ है। वह सारा डाटा गूगल के पास पहुंच गया है। इससे भारत के आम नागरिकों की निजता, राज्य और केंद्र सरकारों की सभी गोपनीय और सार्वजनिक जानकारियों पर इन्हीं अमेरिकी कंपनियों का एकाधिकार हो गया है। भारत ने इस संबंध में ना तो अभी तक कोई कानून बनाया है। नाही इन कंपनियों के डाटा सेंटर भारत में खुले हैं। भारत सरकार का आज इन कम्पनियों पर कोई नियंत्रण भी नहीं है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के अधिकारी एडवर्ड स्नोडेन ने इंटरनेट कंपनियों और खुफिया संगठनों की सांठगांठ से चल रहे, मामलों का खुलासा करने के लिए ऑपरेशन प्रिज्म 6 साल पहले किया था। खलासे के बाद इन ताकतवर कंपनियों का कुछ भी नहीं बिगड़ा। आज स्नोडेन निर्वासित होकर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। सारी दुनिया में इंटरनेट के क्षेत्र में काम करने वाले 9 कंपनियां, जो अमेरिका की हैं। वह सारी दुनिया को अपने नियंत्रण में लेने के लिए सारी जानकारियां लेकर आज सबसे खतरनाक स्थिति में पहुंच गई हैं। अमेरिका के खुफिया संगठनों का इन्हें संरक्षण प्राप्त है।
हाल ही में इजराइल के पेगासस सॉफ्टवेयर की मदद से जासूसी का जो खेल भारत में शुरू हुआ है। उसमें अधिकृत रूप से यह कहा जा रहा है कि 121 लोगों की जासूसी की गई है। जिनकी जासूसी हुई है वह शासन, प्रशासन, राजनीति एवं पत्रकारिता में महत्वपूर्ण स्थिति में थे। सरकार इस मामले की सही जानकारी देने के स्थान पर इससे पल्ला झाड़ रही है। सूत्रों के अनुसार जांच एजेंसियों ने बिना रिकॉर्ड में लाए हुए, देश के कई हजार नेताओं, अधिकारियों, पत्रकारों एवं सुरक्षा से जुड़े हुए लोगों की जासूसी, इसी सॉफ्टवेयर के माध्यम से कराई है। फौरी तौर पर सरकार की सरपरस्ती में की गई जासूसी का लाभ, वर्तमान सत्ताधारी दल को मिल गया हो। लेकिन इससे संबंधित सभी डाटा अमेरिकी कंपनियों के पास भी पहुंच गया है। इससे समझा जा सकता है कि भारत किस विस्फोटक स्थिति में पहुंच गया है। इन अमेरिकी कंपनियों पर अमेरिका के खुफियां संगठनों का भारी दबदबा है। भारत सरकार ना तो इन कम्पनियों को नियंत्रित करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी कोई कानून नहीं बना पाई। नाही सरकार भारत के डाटा को भारत के ही डाटा सेंटर में रखने के लिए इन कंपनियों को बाध्य कर पाई।
भारतीय संविधान की 70 वी जयंती पर आम जनता को संवैधानिक कर्तव्यों का बोध कराने के लिए सरकार अभियान चला रही हैं। वहीं सरकार, इंटरनेट कंपनियों की जासूसी, भारत की बौद्धिक संपदा, निजी अधिकार और सुरक्षा तंत्र को मजबूत बनाने के स्थान पर, अमेरिकी कंपनियों को सौंप रही है। सरकार और संसद राष्ट्रीय हितों को इस तरह से अनदेखा करेगी, इसकी कल्पना कोई कैसे कर सकता है। लेकिन भारत में कुछ भी संभव है, यह इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

वक्त की जरूरत
ओमप्रकाश मेहता
भाजपा के लिए अब दम्भ नहीं, आत्मचिंतन का वक्त…? भारतीय जनता पार्टी अब देश या देश की जनता के लिए नहीं बल्कि वक्त की जरूरत बन चुकी है, जो पिछले साढ़े पांच साल से देश पर राज कर रही है, पार्टी के इस साढ़े पांच साल के शासन में देश, जनता व स्वयं पार्टी ने क्या हासिल किया? यह तो आंक्लन करने वाले करते रहेंगे और आगे भी करते रहेंगे, किंतु इसके साथ ही स्वयं भारतीय जनता पार्टी के धुरंधरों के लिए अपने स्वयं की साढ़े पांच साला भूमिका पर आत्मचिंतन करने का सही वक्त है, आखिर महज डेढ़ साल में दहाई प्रदेशों की सत्ता से सिमट कर इकाई में कैसे आ गई? इसी बिन्दु पर पार्टी को गंभीर चिंतन करना चाहिये, क्या मोदी के जादू या उनके चेहरे की चमक में कमी आ गई है, या पार्टी प्रज्ञा ठाकुर जैसे पार्टी नेताओं के कारण अथवा आम जनता की असंतुष्टी के कारण अपनी चमक खोने को मजबूर है, इन सब बिन्दुओं पर गंभीर आत्मचिंतन जरूरी है, इसके साथ ही पार्टी की ‘‘यूज एण्ड थ्रो’’ नीति का यह दुष्परिणाम है या सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दों पर ध्यान देने का असर, इस पर भी विश्लेषणात्मक चिंतन जरूरी है, आज से दो साल पहले लगभग पूरे देश पर केसरिया ध्वज लहराता नजर आता था, जो आज सीमावर्ती बनकर रह गया है, सिर्फ उत्तरप्रदेश जैसा अहम् व बड़ा राज्य उसके कब्जें में रह गया है, पिछले पन्द्रह बीस महीनों में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और अब महाराष्ट्र जैसे अहम् प्रदेश उसकी पकड़ से बाहर हो गए, आखिर यह पार्टी की किस गलती के परिणाम है? इस मसले पर फिलहाल आत्मचिंतन का यही सही वक्त है, यदि अभी भी अहम् और दम्भ से पार्टी और उसके नेता मुक्त नहीं हुए तो राज्यों में और भी दुर्गति संभावित है।
ये तो सब वे बिन्दु है, जो बिना किसी ‘दुर्बिन’ के नजर आ रहे है, किंतु कुछ बिन्दु ऐसे है जो अपने पूर्ववर्ती फैसले पर आत्मचिंतन से जुड़े है, जैसे देश की आर्थिक स्थिति, देश की बढ़ती बेरोजगारी, भारत से बाहर के देशों द्वारा भारत पर कराये गए चैकाने वाले सर्वेक्षण आदि, जैसे अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की सर्वे रिपोर्ट में दावा कि देश में कृषि और मैन्यूफेक्चरिंग क्षेत्र के रोजगार में गिरावट देखी गई और उसके कारण पिछले छः सालों में आजाद भारत के इतिहास में पहली बार करीब एक करोड़ नौकरियां घटी। जबकि 2014 के चुनावी घोषणा-पत्र में भाजपा ने प्रतिवर्ष एक करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था। इसी तरह देश में किसानों द्वारा की जा रही आत्म हत्याओं के आंकड़ों में बढ़ौतरी परिलक्षित हुई अर्थात् किसानों का कर्ज व अन्य परेशानियां यथावत है, यही स्थिति राज्य व केन्द्र सरकार के कर्मचारियों की समस्याओं को लेकर है, वे भी अपने आपकों ठगा सा महसूस कर रहे है।
यह एक कटु सत्य है कि मोदी सरकार का पहला पांच साला कार्यकाल सिर्फ चिंतनकाल ही सिद्ध हुआ किंतु उस चिंतन के राष्ट्रीय दृष्टि से कुछ सुखद परिणाम अब नजर आने लगे है, जैसे सामाजिक क्षेत्र में तीन तलाक प्रथा की समाप्ति, जम्मू-कश्मीर से धारा-370 व 35ए की मुक्ति, राम-मंदिर निर्माण क्षेत्र में एक सफल न्यायिक कदम। इन फैसलों से देश खुश है, किंतु मानव मनोविज्ञान का प्रथम सिद्धांत ही यही है कि वह पहले अपने बारे में सोचता है, उसके बाद समाज, देश व दुनिया के बारे में और वह अपने प्रथम सिद्धांत में ही खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है, इसके लिए दोषी तो मौजूदा सरकार को ही माना जाएगा न, और इसी का नतीजा आज मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान व महाराष्ट्र में सामने आ रहा है। आखिर क्यों भारत के आधे भाग का भाजपा से मोहभंग होता परिलक्षित हो रहा है? इस एक अहम् सवाल पर भाजपा के भाग्यविधाताओं को कुछ बुजुर्गो से सलाह मशवरा कर गंभीर चिंतन करना चाहिए, वरिष्ठों को घर के कौने में बैठने को मजबूर कर देना और अपने अहम् के साथ पार्टी और देश के लिए सप्तरंगी सपने देखना कहां तक सही माना जा सकता है?
आज यदि आजादी के प्रमुख स्तंभों व उनकी सोच का सूक्ष्म परीक्षण किया जाए तो न्यायपालिका सहित सभी स्तंभों की वास्तविकता सामने आती है। आज आए दिन सुप्रीम कोर्ट सरकार के फैसलों पर अपनी बेबाक टिप्पणियां जारी करता जा रहा है, और वास्तविकता यह भी है कि वहीं अब जन आकांक्षा की पूर्ति और आस्था का सबसे लोकप्रिय केन्द्र बनता जा रहा है, शेष दो स्तंभों विधायिका व कार्यपालिका पर तो सरकार का ही कब्जा है और जहां तक अघोषित चैथे स्तंभ ‘खबर पालिका’ का सवाल है, उसे तो अब ‘विक्रय प्रसाधन’ ही मान लिया गया है।
इस विकट स्थिति से देश गुजरने को आज मजबूर है, जिसका एक मात्र विकल्प सत्तारूढ़ दल व सरकार का ‘सद्बुद्धि’ हासिल होना ही है और उसके लिए पूरा देश भगवान से प्रार्थना कर रहा है।

ज्वलंत समस्या बलात्कार—- एक असाध्य बीमारी –इलाज असंभव !
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
बलात्कार कोई नया रोग या घटना नहीं हैं जबसे सृष्टि में पुरुष स्त्री का प्रादुर्भाव हुआ हैं और विपरीत लिंग में जो आकर्षण होता हैं उससे अधिकतर ये विकार पैदा हुए और और होते रहेंगे.इनको कोई रोकने वाला नहीं हैं।
हमारा पूरा इतिहास इन्ही घटनाओं से हर युग में भरा पड़ा हैं।तरीके या ढंग बदले पर घटनाये तो होती रही और रहेंगी।वर्तमान में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया की जागरूकता से इनका उजागर होना अधिकतम हो गया हैं ,वरना पहले घटनाएं हो जाती थी पर पता भी नहीं चलता था.
इस विषय पर बहुत शोध ,चिंतन ,मनन हुआ और होता रहेगा ,सरकारें ,संस्थाएं बहुत जागरूकता फैलाएं हैं पर ज्यों ज्यों इलाज हो रहा हैं रोग बढ़ता ही जा रहा हैं ,इसके लिए कोई फिल्म ,टी वी सीरियल ,साहित्य ,पहनावा आदि कोई भी कारण बताएं पर इन पर रोकथाम होना कठिन होता जा रहा हैं।
हमारे देश में संविधान और उनके पालन कर्ताओं में कोई भय नहीं हैं ,जैसे घटना होने के बाद थाना क्षेत्र पर विवाद ,हमारा इलाका नहीं या उनका इलाका हैं ,पुलिस की अपनी कार्यवाही का ढंग हैं।हमारे यहाँ घटना घटने के बाद कार्यवाही होती हैं ,वचाव का कोई स्थान नहीं हैं ,उसके बाद नियमों के कारण कोई भी लकीर से हट नहीं सकता ,फिर मेडिकल रिपोर्र्ट पर आधारित प्रकरण बनते हैं ,न्यायलय में प्रमाण प्रस्तुत करना।प्राकृतिक न्याय हेतु सुसंगत अवसर देना यह अपराधियों के लिए ब्रह्मास्त्र हैं ,उनके बचाव के लिए वकील के अपने तर्क और फिर पेशी ,फिर पेशी ,गवाह ,बचाव और निर्णय।हमारे देश में अनेक अपराधी बच जाए पर निरपराधी को सजा नहीं होना चाहिए।
न्यायिक प्रक्रिया की अपनी व्यवस्थाएं हैं ,उसमे किसी का हस्तक्षेप नहीं होता।ताऱीख पर ताऱीख ,दलील पर दलील ,फिर उसके बाद अपील ,हाई कोर्ट ,सुप्रीम कोर्ट ,राष्ट्रपति महोदय के यहाँ दया की अपील ,और फिर सजा का निर्धारण।फांसी की सजा के लिए जल्लाद भी नहीं हैं।
इस प्रक्रिया में इतना अधिक समय लगता हैं की मुद्दई ,अपराधी ,पुलिस, न्यायाधीश ,समाज की रूचि ख़तम हो जाती हैं।प्रभावित होता हैं जिसके ऊपर बीतती हैं।इसके अलावा यदि बलात्कार से पीड़ित मर जाती हैं तो उसके परिवार को न्याय की इच्छा रहती हैं ,और यदि पीड़ित जिन्दा बच गयी तो उसको समाज और कचहरी में इतना जलील होना पड़ता हैं ,कोर्ट की जिरह के दौरान उसका अनेकों बार मौखिक बलात्कार होता हैं जैसे वह अपराधी हो, न की पीड़िता।
इसके लिए हमारे देश में जो कानूनव्यवस्था हैं उसमे और भी अधिक सुधारकी जरुरत के साथ यदि अपराधी दोषयुक्त हैं तो बिना देरी के जैसा अपराध वैसा दंड त्वरित होना चाहिए।जैसे अन्य देशों में खासकर मुस्लिम देशों में मृत्युदंड या लिंग विछेदन या चौराहे पर जनता के समक्ष पत्थर से मरना इत्यादि इत्यादि।
हज़ारों की संख्याओं में मुकदमे चल रहे हैं ,दंड घोषित हो चुके पर क्रियान्वयन नहीं है ,दंड व्यवस्था शीघ्रतम हो।
वास्तव में हत्या ,चोरी ,बलात्कार आदि पाप का होना एक क्षण का गुनाह, जिंदगी भर के लिए गुनहगार बना देता हैं और पीड़ित जिंदगी भर उस दर्द को झेलता रहता हैं। जब तक समाज में नैतिक ,चारित्रिक ,धार्मिक, शिक्षा का प्रसार प्रचार नहीं होगा तब तक इसका रोकना असंभव हैं।यह असाध्य रोग होता जा रहा हैं।हम कब तक अपनी बेटी ,बहिन ,पत्नी ,माँ ,भाभियों को बंदिश में रखेंगे ,क्या उन्हें भी खुली हवा में सांस लेने का अधिकार नहीं हैं।?
हैदराबाद हो या कही अन्य जगह की घटना ,विद्रूपता तो वही होती हैं ,पीड़िता का कष्ट वही जानती समझती हैं ,इस पर प्रतिबन्ध कैसे लगे या नियंत्रित कैसे हो यह यक्ष्य प्रश्न हमारे सामने हैं।पर खान पान और सामाजिक परिवेश इस प्रकार दूषित हो चूका हैं और दिन रात बलात्कार ,चोरी ,डकैती के साथ व्यसनों का सेवन अधिकतम होने से मानसिक प्रदुषण ने बहुत गहरा स्थान बना लिया हैं जिससे मुक्त होने की किरणे दिखना असंभव हैं
सृष्टि की शुरुआत के साथ हमारे वेद पुराणों में इनका उल्लेख मिलता हैं ,यानी मानव में हिंसा ,झूठ ,चोरी ,परस्त्री सेवन ,परिग्रह के अलावा क्रोध मान माया लोभ रुपी दुर्गुण जन्मजात होते हैं इनको हम धरम या व्रत रुपी दवा से दूर कर सकेंगे यानी जब तक समाज व्यक्ति और देश में अहिंसा ,सत्य ,अचौर्य ,ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह की जानकारी पहुँचाना पड़ेगा।इसके अलावा और कोई चारा नहीं हैं।यह रोग कैंसर से भी अधिक खतरनाक और कष्टकारी हैं।
क्या हमें अब पुरानी परम्परा का पालन तो नहीं करना होगा ,जल्दी शादी ,दहेज़ बिना शादी ,और परिवार में धार्मिक वातावरण पैदा करना होगा।
अब नहीं तो कब होगा इसका इलाज़ घर घर में रावण बैठ गए
इतने राम कहाँ से लाएंगे जितना अधिक शिक्षित उतना अधिक पापी
असंभव नहीं पर संभावना क्षीण हैं रोक थाम की

अर्थशास्त्रियों का अनर्थशास्त्र
रघु ठाकुर
नोबल पुरूस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री श्री अभिजीत बनर्जी पिछले दिनों भारत के दौरे पर थे। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा की ट्रेड वॉर का फायदा उठाने के लिए भारत को कंपनियों को स्थापित करने की प्रक्रिया को आसान बनाना होगा- साथ ही कनेक्टीविटी – आसान बनाना, जमीन अधिग्रहण और आधुनिक श्रम कानूनों पर भी ध्यान देना होगा।
2. उन्होंने यह भी कहा की भारत के ज्यादातर गरीब उद्यमी नहीं बनना चाहते इसलिए भारत में गरीबी बड़ी समस्या है।
श्री बनर्जी को जो नोबल पुरूस्कार मिला है वह देने वाले कौन लोग है और उनके देने के आधार क्या है यह दुनिया को कम ज्ञात है? नोबल पुरूस्कार जिन महानुभाव के नाम से स्थापित है श्री अल्फ्रेड नोबल वे हथियारों के बड़े व्यापारी थे और हथियारों की कमाई से यह पुरूस्कार स्थापित हुआ हैं। वैसे तो दुनिया के सभी वैश्विक पुरूस्कारों के पीछे की ऐसी ही कहानियां है, मेगसाय पुरूस्कार भी जिन महानुभाव के नाम से है उन्होंने अमेरिकी कारपोरेट की पूर्ति के लिए ही अपने देश के लोगों को बली का बकरा बनाया था। ऐसे ही कारपोरेट के पिट्ठूओं की गद्दारी की सेवाओं के लिए ही अमेरिकी कारपोरेट के द्वारा पुरूस्कार स्थापित करना कारपोरेट धर्म है। आखिर अंग्रेज भी तो आजादी के आंदोलन के खिलाफ उनके सेवकों को राय बहादुर आदि उपाधियों से नवाजा करते थे।
जहां तक पहले मुद्दे का सवाल है, श्री अभिजीत बनर्जी ने ट्रेड वॉर का फायदा उठाने के लिए जो सुझाव दिए है, वे उद्योग जगत व कारपोरेट्स के ही हथियार है, जिन्हें डब्लू.टी.ओ. के माध्यम से और वैश्वीकरण के नाम से कई दशको से दुनिया के सामने परोसा जा रहा है।
कंपनी स्थापित करने की प्रक्रिया आज भी कोई कठिन नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार का एक बड़ा तरीका है। उद्यम के नाम पर लोग कम्पनियां बनाते है, फिर अनुदान लेते है, किसानों की जमीनों का अधिग्रहण कर जमीने लेते है, कारखाना लगाया तो ठीक व न भी लगाया तो अनुदान व ऋण लेकर विदेशों की सैर करते है। बाद में कोई न कोई बहाना बता कर कारखाना बंद कर देते है और अधिग्रहित ज़मीन के मालिक बनकर उसे बेचकर अरबपति बने रहते है। श्री बनर्जी को पता नहीं है, भारत में सात लाख से अधिक कारखाने जो कंपनी के रूप में पंजीकृत है वो पहले से ही बंद है। उनके कब्जे में कई करोड़ एकड़ ज़मीन किसानों की है, तथा जिनके ऊपर सरकारी बैंकों का लाखों करोड़ों का कर्ज बकाया है जो, डूबते खातों के रूप में (एन.पी.ए. बनाकर) लगभग साफ या माफ कर दिया गया है। ट्रेड वॉर इस समय मुख्यत: अमेरिका और चीन के बीच है, इसमें कभी-कभी थोड़ी भूमिका यूरोप के देश निभाते है। ये सभी दुनिया के विकसित और संपन्न देश है, जिनकी कम्पनियां महाकाय है व दशकों से स्थापित है, और भारी मुनाफे कमाती रही है। भारत की सत्ता और खजाने पर आधारित नवजात कम्पनियां क्या इन ट्रेड वॉर प्रतिभागियों का मुकाबला कर सकेगी या आने वाले कुछ वर्षें में भी इनके लायक समर्थ बन सकेगी, यह कहना भी मुश्किल होगा? यह कुछ ऐसी कल्पना है कि जैसे कोई यह कहे की दारा सिंह जैसे दुनिया के बड़े पहलवान का मुकाबला करने के लिए बच्चा पैदा किया जाए व उसे सरकारी मदद और खुराक के पोषण से पहलवान से लड़ाया जाए। अगर श्री अभिजीत बनर्जी कारपोरेट अर्थशास्त्री नहीं होते या भारत के जमीनी अर्थशास्त्री होते तो शायद वह यह कहते की भारत सरकार को कारपोरेट वॉर का हिस्सेदार बनने की बजाय कृषि को एक लाभप्रद उद्योग के रूप में विकसित करना चाहिए जिससे करोड़ों लोगों को रोजगार मिल सकता है और अर्थव्यवस्था को स्थाई मजबूती मिल सकती है। वे अगर कारपोरेट के अर्थशास्त्री नहीं होते तो शायद यह सुझाव भारत की सरकार व जनता को देते कि वह मितव्ययता और संयमित उपभोग के रास्ते का वरण कर, बापू को उनके 150वें वर्ष में कर्म श्रद्धांजलि अर्पित करें।
दूसरा बिंदू जो उन्होंने कहा है कि भारत के गरीब ज्यादातर उद्यमी नहीं बनना चाहते इसलिए गरीबी बड़ी समस्या है। श्री बनर्जी उच्च शिक्षा प्राप्त है और वे जरूर जानते होंगे कि भारत देश की स्थति यह है कि हम दुनिया में पेट भरने के क्रम में यानि भूख मिटाने में बहुत नीचे 102वें पायदान पर है। वे यह भी जानते होंगे कि योजना आयोग के द्वारा गठित सेन गुप्ता समिति ने अपनी रपट में यह कहा था कि देश के 80 करोड़ लोगों की क्रय क्षमता 20रू. से भी कम है, उनमें से भी लगभग 30 करोड़ लोग ऐसे है जिनकी दैनिक क्रय क्षमता 10रू. से भी कम है। वह यह भी जानते होंगे कि पिछले डेढ़ दशक में लगभग पाँच लाख से अधिक किसानों ने कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या की है। इन हालात में गरीबों पर यह तोहमत लगाना की वे उद्यमी नहीं बनना चाहते। यह गरीबों का अपमान है। बहुत संभव है कि वे स्व. धीरू भाई अम्बानी का उदाहरण दें कि धीरू भाई पेट्रोल पंप पर काम करते करते कारपोरेट बन गए। मैं धीरू भाई की लगन व मेहनत को न चुनौती दे रहा हू न नकार रहा हू। मैं उम्मीद करता हू कि धीरू भाई से लेकर अभी तक अम्बानी परिवार के विशाल सम्राज्य खड़ा करने के पीछे राजसत्ता, नौकरशाही, और राजनैतिक भ्रष्टाचार का त्रि-सूत्रीय गठ-जोड़ है। मैं मानता हू कि कुछ एक अपवाद होते है, परन्तु दुनिया में यह स्थापित तथ्य है कि उद्योग लगाने के लिए पूँजी चाहिए वरना वैश्वीकरण के बाद की भारत और दुनिया की सरकारें विदेशी पूँजी निवेश का रोना क्यों रोती।
श्री अभिजीत बनर्जी नहीं जानते या नहीं जानना चाहते कि भारत की गरीबी के पीछे दो बड़े कारण है, विषमता और बेरोजगारी। जब श्री मुकेश अम्बानी की कम्पनियां 3 माह में ग्यारह हज़ार दो सौ करोड़ का मुनाफा कमाती है, 18 फीसदी मुनाफा वृद्धि करती है तो वह यह उन एक करोड़ लोगों को गरीब बनाकर कमाती है, जिनकी क्रय क्षमता 20 रू. से कम होती है। उनके आधार पर ही अपनी संपन्नता और सफलता हासिल करती है। विश्व के बाजार में अम्बानी बंधु कहीं नजर नहीं आते, चीन या अमेरिका के ट्रेड वॉर में भिड़ने वाली किन कंपनीयों से इनका मुकाबला है या इन्होंने कभी मुकाबला किया है बतायें? श्री अभिजीत बनर्जी कृपया बताएँ कि हमारे देश की बड़ी कम्पनियां या कारपोरेट या तो अमेरीका या चीन की विशालकाय कम्पनियों की सहायक कंपनी है या पेटी कान्ट्रेक्टर है या फिर अफ्रीकी देशों में उनकी गरीबी या लाचारी का लाभ उठाकर बनने वाले बड़े जमींदार या उद्योगपति है। श्री बनर्जी को भूलना नहीं चाहिए कि अम्बानी बंधु को राफल विमान डील का पेटी कान्ट्रेक्ट मिला है, तो वह भी राजसत्ता के सहारे। अडानी को यदि आस्ट्रेलिया में खनन का ठेका मिला है तो वह भी राजसत्ता के सहारे और देश में भी यह कारपोरेट रूपी झाड़ हरे-भरे हो रहे या बढ़ रहे है तो इसमें भी राजसत्ता का हाथ है। माइक्रो क्रेडिट और स्वयं सहायता समूह गरीबों को फ्रिज, टी.वी., आदि खरीदने का पैसा देते है यह सही है। परंतु क्या माइको फाइनेंसिंग, अम्बानी, अडानी, या बिल गेट्स की पूँजी के मुकाबले पूँजी बनाने के मदद देने के लायक है। स्वयं सहायता समूह द्वारा अचार, पापड़ बनाने के माध्यम से जीने का सहारा तो मिल सकता है परंतु वह कंपनी खड़े करने और ऐसी कम्पनी याने ट्रेड वॉर के मुकाबले कंपनी खड़ा करने या पूँजी देने लायक नहीं हो सकते।
हमारे नोबल लारेट कितने काबिल है इसका प्रमाण तो नालंदा विश्वविद्यालय के पिछले 10 वर्ष की प्रगति और खर्च करने की तुलना कर देखा जा सकता हैं श्री अमर्त्य सेन इस विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति बने थे। उनके वेतन और यात्राओं पर कितना खर्च हुआ और विश्वविद्यलाय का कितना विकास हुआ, यह कहानी छुपी नहीं है। हालत यह हो गये थे कि सरकार को उनसे मुक्ति लेनी पड़ी।
श्री बनर्जी की लंबी मुलाकात प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से हो चुकी है, और यह समझ जाना चाहिए की कारपोरेट पोषक सत्ता और कारपोरेट पोषित अर्थशास्त्री का मिलन किस व्यवस्था और किस अर्थशास्त्र को जन्म देगा।

रेप करने वाले मानसिक रोगी या अपराधी?
सनत जैन
भारत में पिछले एक दशक में बलात्कार की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। बलात्कार की घटनाओं को रोकने के लिए और अपराधियों को दंडित करने के लिए सरकार ने पिछले एक दशक में कई सख्त कानून बनाए हैं। इसके अलावा लड़कियों और लड़कों को सेक्स संबंधी शिक्षा भी दी जा रही है। यौन अपराधों को रोकने के लिए पुलिस को भी विशेष अधिकार दिए गए हैं। न्यायालयों में बलात्कार के दोषियों पर जल्द से जल्द सुनवाई हो और सजा मिले, उसका भी प्रावधान किया गया है। कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार करने के मामले में फांसी की सजा का भी प्रावधान किया गया है। लेकिन इसके बाद भी बलात्कार की घटनाएं कम होने के स्थान पर बढ़ती ही जा रही हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि बहुत कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं बढ़ी हैं। बलात्कार के बाद बच्चियों को मारने की घटनाएं भी पहले की तुलना में बहुत ज्यादा देखने को मिली हैं। इसका एक ही अर्थ है कि बलात्कार के बाद अपराधी फांसी से बचने के लिए महिलाओं और बच्चियों की हत्या करके सबूत मिटाने की चेष्टा करते हैं। जहां बलात्कार जैसे अपराध होते हैं, वहां कोई प्रत्यक्षदर्शी तो होता नहीं है। ऐसी स्थिति में दोषी को पकड़ पाना भी पुलिस के लिए मुश्किल होता है। सीसीटीवी कैमरे की सहायता से यदि संदिग्ध व्यक्ति को पकड़ भी लिया जाता है। तो उसको सजा दिला पाना, प्रत्यक्षदर्शी नहीं होने की दशा में बहुत मुश्किल होता है। भीड़ तंत्र के दबाव में पुलिस निरपराध को भी फंसाकर मामले को शांत करती है।
इस तरह की घटनाओं के बाद समाज में व्याप्त भारी रोष और भीड़तंत्र की मांग पर, सरकार बिना सोचे समझे कानून बना देती हैं। सख्त कानून बन जाने के बाद भी घटनाएं कम होने के स्थान पर बढ़ती ही जा रही हैं। समाज, सरकार, पुलिस कोई भी इनके वास्तविक कारणों को जानने की कोशिश नहीं कर रहा है। यह चिंता का विषय है।
कारणों को खोजने की जरूरत
पिछले एक दशक में बलात्कार की घटनाएं बड़ी तेजी के साथ भारत में बढ़ी हैं। छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार होना सबसे बड़ी चिंता का कारण है। सेक्स करना एक मानसिक अवस्था है। जो अपराधी रेप जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। निश्चित रूप से वह मानसिक रोग के शिकार होते हैं। अन्यथा वह कभी भी छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार कर ही नहीं पाते। सामाजिक व्यवस्था और सोच में पिछले एक दशक में बड़ी तेजी के साथ परिवर्तन आया है। सेक्स संबंधों को लेकर भारतीय समाज में अनैतिकता बढ़ी है। लंबी उम्र तक शादी नहीं होने के कारण अनैतिक संबंध बड़ी तेजी के साथ बढ़े हैं। बलात्कार जैसी घटनाएं भी बड़ी तेजी के साथ बढ़ रही हैं। पिछले एक दशक में बच्चों से लेकर बड़ों के बीच स्मार्टफोन और इंटरनेट का प्रभाव देखने को मिल रहा है। कम उम्र के बच्चे सेक्स संबंधों को लेकर समय के पहले ही परिपक्व हो रहे हैं। दो दशक पहले जब इंटरनेट और मोबाइल फोन नहीं था। तब सेक्स संबंधों को लेकर भारतीय समाज की एक अलग सोच थी। युवाओं में भी 18 से 20 साल की उम्र तक-सेक्स संबंध बनाने की मानसिकता तथा उत्कण्ठा नहीं होती थी। वर्ष 2000 तक 18 से 25 वर्ष की उम्र में युवा युवतियों की शादी हो जाया करती थी। महिलाओं एवं लड़कियों का पहनावा एवं घूमने फिरने में शालीनता थी। परिवार के सदस्य संयुक्त एवं समूह के साथ रहने के कारण, बलात्कार जैसी घटनाएं होने का अवसर आसानी से नहीं मिलता था।
पिछले 20 वर्षों में युवा युवतियों की सोच, रहन-सहन, शिक्षा के लिए शहरों में जाकर अकेले रहना, मोबाइल और इंटरनेट के साथ लगातार बने रहते हैं। जिसके कारण पिछले दो दशक में भारतीय समाज की सोच और युवा-युवतियों की सोच में भारी परिवर्तन आया है। कैरियर बनाने के चक्कर में युवा और युवती 30 से 35 साल की उम्र तक शादी नहीं करते हैं। पढ़ाई, कोचिंग, पीएचडी एवं अन्य कोर्स करने के नाम पर वह घर से बाहर रहकर, उन्मुक्त व्यवहार, शार्ट एवं फैशन का पहनावा, देर रात तक घूमना फिरना शुरू हो जाता है। इस बीच अनैतिक संबंध भी बन जाते हैं। कुछ लोग जो इस तरह के संबंध नहीं बना पाते हैं। वह धीरे-धीरे मानसिक रोगी होने लगते हैं।
पाश्चात्य देशों की नकल सबसे ज्यादा नुकसानदेह
वर्तमान स्थिति में युवा युवतियों द्वारा पाश्चात्य देशों की नकल करने के कारण, भारतीय सामाजिक व्यवस्था और सोच में भारी परिवर्तन आया है। भारतीय समाज अपनी सामाजिक परंपराओं का पालन भी करना चाहता है। वहीं पुरानी अपनी सोच को बदलने के लिए तैयार नहीं है। युवाओं के बीच दोहरी मानसिकता के चलते बहुत सारी विसंगतियां देखने को मिल रही हैं। युवा वर्ग खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हुए नजर आ रहे हैं। पश्चिमी देशों में 14 से 18 साल के युवा युवती सेक्स संबंध बना लेते हैं। वहां के परिवार और समाज में इसकी मान्यता है। कानून भी इसकी इजाजत देता है। पश्चिमी देशों में शादी की उम्र 30 से 35 वर्ष के बाद आमतौर पर शुरू होती हैं। जब परिपक्वता दोनों में आ जाती है। उनके सेक्स संबंध उनकी शारीरिक और मानसिक आवश्यकता के अनुसार बहुत कम उम्र में ही बन जाते हैं। इसके विपरीत भारत में 30 से 35 वर्ष की उम्र तक युवा-युवती शादी नहीं कर रहे हैं। युवाओं में आपस में संबंध बनाना सामाजिक तौर पर स्वीकार नहीं किया जाता है। दुनिया भर के देशों में सेक्स वर्कर आसानी से उपलब्ध होते हैं। भारत में सेक्स वर्कर का धंधा गैरकानूनी है। जिसके कारण भारत में मोबाइल और इंटरनेट के बाद वैवाहिक बंधन में नहीं बधने के कारण यौन संबंधों सें अपराध बड़ी तेजी के साथ बढ़ रहे हैं। चिकित्सा विज्ञान की बात करें तो 14 वर्ष की उम्र से अधिक के युवा युवतियों में सेक्स संबंधी प्राकृतिक मांग उत्पन्न होती है। यदि यह प्राकृतिक मांग पूरी नहीं हो पाती है, तो यह धीरे-धीरे मानसिक रूप से बीमार होने लगते है। भारत के कई राज्यों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं का अनुपात काफी कम है। जिसके कारण शादी करने के लिए लड़कियां उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। वैकल्पिक अन्य कोई व्यवस्था ना होने से भी बलात्कार और छेड़छाड़ की घटनाएं, भारत में तेजी के साथ बढ़ रही हैं। चुकी यह मानसिक रोग है, अतः इसे कानून बनाकर भी नियंत्रित कर पाना संभव नहीं होगा।
प्रकृति के साथ खिलवाड़ ठीक नहीं
भारत में स्त्री पुरुषों के बीच सेक्स संबंधों को लेकर जो दूरियां और विसंगतियां बढ़ रही हैं। उसको दूर किए जाने की आवश्यकता है। भारत में लड़कियों के लिए शादी की उम्र 18 वर्ष तथा युवकों के लिए 21 वर्ष है। कई दशक पहले भारत में बाल विवाह बड़ी संख्या में होते थे। किंतु अब 25 से 30 वर्ष की उम्र हो जाने के बाद भी युवा युवती शादी के बंधन में नहीं बंध पा रहे हैं। जिसके कारण सामाजिक व्यवस्था तेजी के साथ बिगड़ रही है। पिछले एक दशक में युवा-युवती अपना कैरियर बनाने के लिए 30 और 35 वर्ष की उम्र तक शादी करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। इस बीच वह अपने अनैतिक संबंध भी बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। स्वेच्छा से बने योन संबंध एवं लिविंग रिलेशन में कई वर्ष रहने के बाद विवाद होने की स्थिति में बलात्कार के प्रकरण दर्ज कराना भी आज आम बात हो गई है। भारत में महिलाओं के लिए विशेष कानून लागू किए गए हैं। इसका लाभ उठाने के लिए महिलाओं द्वारा बलात्कार के प्रकरण दर्ज कराने से रिकॉर्ड बड़ी तेजी के साथ बढ़ रहा है। जिससे सामाजिक सद्भाव और महिला पुरुषों के संबंध में एक अलग तरीके का तनाव देखने को मिल रहा है।
वर्तमान स्थिति में भारतीय सामाजिक, आर्थिक एवं प्राकृतिक स्थिति को देखते हुए समाज और सरकार को इस समस्या के वास्तविक कारणों को खोजना होगा। केवल कानून और पुलिस के माध्यम से बलात्कार और यौन अपराधों को रोकना संभव नहीं है। सेक्स प्रकृति जन्य मानसिक एवं शारीरिक मांग है। जो समय पर पूरी ना हो तो यह धीरे-धीरे सामान्य व्यक्ति को भी मानसिक रोगी बना देता है। इसमें महिलाओं और पुरुषों के बीच में भेद करना संभव नहीं है। जरूरत इस बात की है, कि इस समस्या पर विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ, सामाजिक एवं धार्मिक नेतृत्व करने वाले विशिष्ट व्यक्ति, इस संबंध में खुलकर चर्चा करें। वास्तविक समस्या के कारणों को खोज कर उसके निदान के प्रयास करें दो। नावों की सवारी और भीड़तंत्र की सोच से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है।

ड्रोन उड़ाने वाले नक्सलियों को देखते ही गोली मारने का आदेश
अजित वर्मा
माओवादियों द्वारा ड्रोन कब्जाने और उसके संचालन की घटना के हाल में सामने आने के बाद वामपंथी चरमपंथी प्रभावित राज्यों में तैनात सुरक्षा बलों को इन्हें देखते ही गोली मारने के आदेश जारी किए गए हैं। यह नया निर्देश केंद्र में स्थित सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियों की केंन्द्रीय कमान द्वारा दिया गया है। हाल में छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सल हिंसा से सबसे बुरी तरह प्रभावित सुकमा जिले के केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (केरिपुब) शिविर पर ड्रोन या मानव रहित यान (यूएवी) मंडराने के मामले सामने आने के बाद यह निर्देश दिये गए है।
मौके पर तैनात बलों से साझा किए गए आधिकारिक संदेश के मुताबिक, लाल और सफेद रोशनी उत्सर्जित करने वाले ड्रोन पिछले तीन दिनों में कम से कम चार बार किस्ताराम और पालोडी में केरिपुब शिविर के पास उड़ते देखे गए। ड्रोन द्वारा होने वाली हल्की आवाज ने शिविर में तैनात जवानों का ध्यान खींचा जिसके बाद जवानों ने मोर्चा संभाला और नक्सलियों द्वारा गड़बड़ी फैलाने की आशंका को देखते हुए आसपास के शिविरों को सतर्क किया गया। हालांकि सुरक्षा बल जब तक इन ड्रोनों पर लक्ष्य साधकर उन्हें मार गिराते ये छोटे मानवरहित यान आसमान में गायब हो गए।
इस घटनाक्रम के सामने आने के बाद सुरक्षा प्रतिष्ठानों ने मामले की जांच शुरू की, जिसके बाद खुफिया एजंसियां मुुंंबई के एक दुकानदार के पास पहुंची जिसके बारे में संदेह है कि उसने अज्ञात लोगों को ड्रोन बेचे। ये लोग संभवत: नक्सली थे। इस संबंध में जांच जारी है।
खुफिया एजंसियां खास तौर पर दो शिविरों को लेकर चिंतित हैं, जहां ड्रोन देखे गए। ये दोनों शिविर नक्सल प्रभाव वाले इलाके में हैं। जहां समुचित सड़क संपर्क नहीं है और नियमित रूप से इसके आसपास सशस्त्र माओवादियों की आवाजाही देखी गई है क्योंकि इस इलाके की सीमा ओड़ीशा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के जंगल से सटे इलाकों से लगती है। इस गतिविधि से जुड़ी जानकारी रखने वाले एक शीर्ष सुरक्षा अधिकारी का मानना है कि यह घटनाक्रम गंभीर चिंता का विषय है। माओवादियों द्वारा ड्रोन रखना और उसका इस्तेमाल करना एक नई चुनौती है और सुरक्षा बलों को लंबे समय से इसकी आशंका थी। अब जाकर यह मामला सामने आया है। इसी बात को ध्यान में रखकर ही वामपंथी चरमपंथ प्रभावित सभी राज्यों में सुरक्षा बलों को नक्सलियों द्वारा संचालित ऐसे ड्रोनों या मानवरहित यान को देखते ही मार गिराने का आदेश दिया गया है।
शुरुआती विश्लेषण में सामने आया है कि जो ड्रोन देखे गए वो ऐसे थे जिनका इस्तेमाल शादी या सार्वजनिक सभाओं जैसे सामाजिक कार्यक्रमों में किया जाता है। एजंसियों को शक है कि नक्सलियों ने हाल में ये छोटे ड्रोन हासिल किए हैं जिनका उद्देश्य सुरक्षा बलों के शिविरों से जुड़ी जानकारियां हासिल करना और उनकी गतिविधियोंं पर नजर रखना आदि है।

गीता में धर्म का अर्थ
हर्षवर्धन पाठक
पिछले कुछ वर्शों से धर्म और सम्प्रदाय की बहुत चर्चा हो रही है। इस संबंध में विष्लेशण रोचक होगा कि हिन्दुओं के प्रमुख धर्म ग्रंथ गीता में धर्म का क्या अर्थ दिया गया है और क्या क्या सन्दर्भ मिलते हैं?
महाभारत ग्रंथ का यह उदाहरण इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि जब कीचड़ में फंसे रथ के पहिये को निकालने के लिए कर्ण नीचे उतरा तब श्री कृश्ण ने उस पर बाण चलाने के लिए अर्जुन से कहा। इस पर कर्ण ने कहा कि यह धर्म संगत नहीं है। इसके उत्तर में श्रीकृश्ण ने पूछा कि तुम्हारा धर्म उस कहां गया था जब निषस्त्र अभिमन्यु पर सात महारथी आक्रमण कर रहे थे और उनमें तुम भी षामिल थे। श्री कृश्ण कर्ण से पूछते हैं- क्व ते धर्मस्तदागत: (अर्थात तुम्हारा धर्म तब कहां गया?) गीता में अर्जुन को श्री कृश्ण ने जो उपदेष दिया इस उपदेष की अलग-अलग व्याख्यायें हैं। आचार्य विनाबा भावे ने अपने प्रसिद्ध ”गीता प्रवचन“ में लिखा है कि अर्जुन वास्तव में स्वजन आसक्ति से प्रभावित था। गीता में इसी पर प्रहार है। अर्जुन अहिंसा समर्थक नहीं था लेकिन वह स्वजनों पर प्रहार नहीं करना चाहता था।
यदि आप समझते हैं कि गीता में धर्म की चर्चा निम्नलिखित ष्लोक तक सीमित है, यदा यदा हि धर्मस्यग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम््, तब आप निष्चित रुप से गलत हैं। गीता में धर्म को व्यापक तथा प्रसंग अनुसार लिया गया है। उदाहरण के लिये गीता के अठारहवें अध्याय का यह ष्लोक देखें। श्रीकृश्ण अर्जुन से कहते हैं।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं षरणं ब्रज , अहं त्वां सर्व पापेभ्यो मा षुच:
इस ष्लोक का षब्दार्थ यह है कि श्रीकृश्ण अर्जुन से कहते हैं कि सभी धर्मों का परित्याग कर मेरी षरण आ जाओ। मैं तुम्हारे सभी पापों से तुम्हें मुक्त कर तुम्हें मोक्ष प्रदान करुंगा। इसमें कोई संषय नहीं है। लेकिन ष्लोक का भावार्थ कुछ और इषारा करता है। यह सभी को मालूम है कि जिस समय यह महायुद्ध हुआ उस समय ईसाई धर्म और बौद्ध धर्म नहीं था। इस्लाम धर्म का प्रष्न ही नहीं है? षायद जैन धर्म था। उस कालखंड में केवल सनातन धर्म या नारायणी धर्म था जिसे आज हिन्दू धर्म के नाम से जानते हैं। अत: सभी धर्मों के परित्याग का कोई मतलब नहीं है। जिस धर्म का अर्थ लिया जाता है यहां वह अर्थ लागू नहीं होता।
लोकमान्य तिलक ने अपने विख्यात ग्रंथ ”गीता रहस्य“ में इस ष्लोक के संदर्भ में धर्म से आषय विभिन्न व्यावहारिक धर्मों से लिया है जैसे दान धर्म, पुत्र धर्म, यज्ञ धर्म, सत्य धर्म, सन्यास धर्म आदि। यहां श्रीकृश्ण अर्जुन से कहते हैं कि उक्त धर्मों के चक्कर में नहीं फंस कर केवल मुझे भज मैं तुम्हारा उद्धार कर दूंगा। वृन्दावन के संत स्वामी अखंडानंद सरस्वती ने सभी धर्मों से आषा विधि-विधान, प्रवत्ति और निवृत्ति से लिया है। यहां इसका अर्थ इन्द्रियों मन बुद्धि आदि के धर्म से हैं। वस्तुत: कोई धर्माधर्म न मेरा है और न उसका कोई अस्तित्व है। वे कहते हैं इसी का नाम है सर्व धर्म परित्याग।
इस अन्तिम अध्याय में तीन ष्लोक के बाद यह ष्लोक आता है जब श्रीकृश्ण अर्जुन से पूछते हैं अध्येश्यते च य इमं धर्म संवादमावयो: ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिश्ट: स्यामिति में मत:।“
इस ष्लोक का अर्थ है।
जो भी इस धर्म संवाद का अध्ययन करेगा वह अपनी बुद्धि के अनुसार इसका ज्ञान प्राप्त करेगा।
इन ष्लोकों के उदाहरण का तात्पर्य यही है कि गीता में धर्म को बहुत व्यापक अर्थ में लिया गया है।
गीता के इस ष्लोक को लें इसमें धर्म की अलग व्याख्या है।
श्रेयान्स्वधर्मों विगुण: परधर्मात्वनुश्टितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मों भयावह:।।
इस ष्लोक में स्वधर्मे निधनं श्रेय: का अर्थ भिनन् है। यह पहले ही स्पश्ट किया गया है कि गीता प्रवचन के समय केवल एक ही धर्म की चर्चा है। अत: यहां पर धर्म का अर्थ बिल्कुल अलग है।
द्वितीय अध्याय के प्रारंभ में अर्जुन के द्ववारा प्रकट यह संषय भी उल्लेखनीय है कि वह धर्मसम्मूढचेता है और उसे अपने धर्म या कर्तव्य का ज्ञान नहीं है अर्थात वह उलझन में हैं। उसे धर्म या कर्तव्य का ज्ञान नहीं है अर्थात वह उलझन में है।
यहां धर्म का अर्थ कर्तव्य से है। गीता में वास्तव में अर्जुन के इसी संषय का निराकर्ण है। वह स्वजनासक्ति का षिकार हो कर युद्ध से पलायन चाहता था। गीता में अर्जुन के इसी मोह का उपचार है।
चतुर्थ अध्याय में यह बहुत चर्चित ष्लोक है। यदा यदा ही धर्मस्यग्लानिर्भवति भारत अभ्युस्थानम्धर्मस्य तदात्मानम्् सृजाम्यहम। इस ष्लोक का अर्थ बहुधा गलत समझा जाता है। अठारहवें अध्याय में अन्त में श्री कृश्ण का यह कथन भी उल्लेखनीय है कि हम दोनों के इस धर्म संवाद का जो अध्ययन करेगा उसे ज्ञान प्राप्त होगा। यह ष्लोक ऊपर उद्धत किया गया है।
इस अद्धुत ग्रंथ के कुछ उदाहरण दिये गये हैं। लेकिन यह कुछ उदाहरण मात्र हैं। गीता का पूर्ण अध्ययन ऐसे अनेक उदाहरण प्रस्तुत करेगा। गीता में धर्म षब्द के अनेक अर्थ हैं परन्तु धर्म से कही हिन्दू धर्म मात्र का आषय नहीं है। सोवियत रुश और अनेक देषों में गीता के महत्व को स्वीकार किया गया है।

मुफ़्त की ‘लोक लुभावन रेवड़ियां’ बांटने से ज़रूरी है ‘मुफ़्त शिक्षा’
तनवीर जाफ़री
देश का प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान, दिल्ली का जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, इन दिनों एक बार फिर चर्चा में है। दिल्ली की सड़कों पर आए दिन जे एन यू के छात्रों द्वारा अनेक छोटे बड़े धरने प्रदर्शन किये जा रहे हैं। इस बार छात्रों में आए उबाल का कारण है विश्वविद्यालय के छात्रावास नियमों में किया जाने वाला बदलाव तथा छात्रावास की फ़ीस में की गयी बेतहाशा वृद्धि । हालांकि इस विषय पर विश्वविद्यालय प्रशासन का यह कहना है कि चूँकि पिछले 14 वर्षों से छात्रावास शुल्क के ढांचे में कोई बदलाव नहीं किया गया था इसलिए इतने लम्बे समय के बाद इसमें संशोधन किया जाना ज़रूरी हो गया था। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा घोषित किये गए नए नियमों के अनुसार छात्रावास की फ़ीस में भारी भरकम बदलाव किया गया है। इसके अंतर्गत छात्रावास के डबल सीटर कमरे का किराया जो पहले केवल 10 रुपये था उसे बढ़ा कर 300 रुपये प्रति माह किया गया। अर्थात इसमें अचानक 30 गुणा की वृद्धि कर दी गयी है। इसी तरह छात्रावास के एकल (सिंगल) सीटर कमरे का किराया 20 रुपये से 30 गुणा बढ़ाकर 600 रुपये कर दिया गया है। इसी तरह एक बार एकमुश्त जमा की जाने वाली वन टाइम मेस सिक्यूरिटी फ़ीस 5500 रुपये से बढ़ा कर 12000 रुपये कर दी गयी थी। ख़बरों के अनुसार छात्रों के आंदोलन के दबाव में आकर इसे पुनः 12000 से घटाकर 5500 कर दिया गया है। वैसे भी यह रक़म किसी भी छात्र के छात्रावास छोड़ने के समय उसे वापस कर दी जाती है। अन्य नियम जो प्रशासन द्वारा लागू किये गए हैं उनके तहत छात्रावास में रहने वाले छात्रों को ज़्यादा से ज़्यादा रात11.30 बजे के बाद अपने हॉस्टल के भीतर रहना होगा इसके बाद वे बाहर नहीं निकल सकेंगे। कोई छात्र या छात्रा अपने छात्रावास के अलावा किसी अन्य छात्रावास या कैंपस में किसी अन्य जगह पाया जाता है तो उसे छात्रावास से निष्कासित कर दिया जाएगा। इस पर छात्रों का कहना है कि पुस्तकालय में बैठने के लिए अथवा किताबों अथवा नोट्स के आदान प्रदान के लिए या फिर परीक्षा की तैयारी हेतु उन्हें कैम्पस में किसी भी समय निकलना पड़ता है। इसके अतिरिक्त छात्रावास के नए नियमों में छात्रों को डाइनिंग हॉल में ”उचित कपड़े” पहन कर आने का निर्देश भी दिया गया है। इस विषय पर छात्रों का सवाल है कि ‘उचित कपड़े’ की आख़िर परिभाषा क्या है और कौन से लिबास उचित हैं कौन से अनुचित इसका निर्धारण कौन करेगा। इसके अतिरिक्त भी विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रावास में रह रहे छात्र-छात्राओं से छात्रावास के रखरखाव के लिए 1700 रुपये की फ़ीस प्रति माह वसूलने का फ़ैसला भी लिया है। छात्रों में इस नए नियम को लेकर सबसे अधिक नाराज़गी है। इससे पहले विश्वविद्यालय में पानी, बिजली, रख-रखाव अथवा सफ़ाई के नाम पर छात्रों से कोई पैसे वसूले नहीं जाते थे। छात्रों का कहना है कि ग़रीब परिवारों से आने वाले छात्र प्रति माह 1700 रूपये जैसी भारी भरकम रक़म हरगिज़ नहीं दे सकते।
जे एन यू छात्र संघ द्वारा छात्रावास की फ़ीस बढ़ोत्तरी के इस नए नियमों को वापस लिए जाने की मांग को लेकर आंदोलन किया जा रहा है। अनेक छात्र-छात्राओं का कहना है यह ‘काला-ड्राफ़्ट’ न केवल छात्रों के मौलिक अधिकारों का हनन है बल्कि यदि बढ़ाई गयी यह फ़ीस की नई रक़म घटाई नहीं जाती तो वे पढ़ाई छोड़ने तक के लिए मजबूर हो सकते हैं। जे एन यू में लगभग 20 दिनों से चल रहे इस आंदोलन में पुलिस भी अपनी दमनकारी नीति अपना चुकी है। कई लहूलुहान छात्रों के चित्र सोशल मीडिया पर वॉयरल होते देखे गए। जे एन यू में फ़ीस बढ़ोत्तरी के विरुद्ध छात्रों के आंदोलनरत होने का एक कारण यह भी है कि यहाँ ग़रीब परिवारों के लगभग 40 प्रतिशत छात्र-छात्राएं दाख़िला लेते हैं और वे बढ़े हुए नए शुल्क को दे पाने में स्वयं को असमर्थ महसूस कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि देश की जो सरकारें अथवा राजनैतिक दल शिक्षा हासिल करने को हर भारतीय नागरिक का मौलिक अधिकार बताने की दुहाईयाँ दिया करते थे वही आज शिक्षा को इतना मंहगा बनाने पर क्यों तुले हुए हैं? ख़ासतौर पर प्रायः जे एन यू ही सरकार के निशाने पर क्यों रहती है। जे एन यू का चरित्र हनन किये जाने का प्रयास प्रायः दक्षिणपंथी शक्तियों द्वारा किया जाता रहा है। वर्ष 2016 में जब यहाँ के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को देशद्रोह के झूठे मामले में गिरफ़्तार किया गया था उस समय भी जे एन यू के कई ‘पारम्परिक अशिक्षित विरोधियों’ द्वारा कैम्पस को बदनाम करने के उद्देश्य से उपयोग में लाए गए निरोध से लेकर बकरे व मुर्ग़े की चबाई गयी हड्डियां,बियर व शराब की बोतलें,अधिया व पौव्वे तथा सिगरेट व बीड़ी के जले हुए टोटे तक की गिनती एक विधायक द्वारा बताई गयी थी। बुरी नज़र से कैम्पस को देखने वाले इन पूर्वाग्रही लोगों ने यह सब तो गिनकर मीडिया को ज़रूर बताया था परन्तु उन्होंने यह नहीं बताया कि यह विश्वविद्यालय देश को कितने भारत रत्न,कितने नोबल पुरस्कार विजेता,कितने आई ए एस टॉपर,कितने मंत्री व उच्चाधिकारी तथा कितने न्यायाधीश आदि दे चुका है?
निश्चित रूप से देश का यह सर्वप्रतिष्ठित विश्व विद्यालय देश के कर दाताओं के पैसों से चलता है। इसकी सब्सिडी का भुगतान भी देश करता है। परन्तु देश का यह पैसा यदि ग़रीब या मध्यम परिवारों से आने वाले छात्रों की शिक्षा पर लगे तो उसमें क्या हर्ज है? क्या सरदार पटेल की मूर्ति पर 500 करोड़ रूपये से अधिक की जनता की रक़म ख़र्च करना ज़्यादा ज़रूरी है ? आज देश के सैकड़ों शहरों में अनेक निर्माण कार्य ऐसे हो रहे हैं जो बिल्कुल ग़ैर ज़रूरी हैं परन्तु लोकलुभावन ज़रूर हैं। उदाहरण के तौर पर कहीं बने बनाए घंटाघर को तोड़ कर नए डिज़ाइन का स्मारक या प्रतीक बनाया जा रहा है। कहीं पार्क या तालाबों का पुनर्निर्माण किया जा रहा है। पार्कों व तालाबों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर मंहगे पत्थर लगवाए जा रहे हैं तथा उन्हें मंहगी डिज़ाइन से आकार दिया जा रहा है। इस प्रकार के निर्माण के पीछे बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है। गुजरात के मुख्यमंत्री महोदय अपने लिए नया विमान ले रहे हैं तो प्रधानमंत्री के लिए नई अत्याधुनिक कार ली जा रही है। देश को बुलेट ट्रेन के सपने दिखाए जा रहे हैं।अयोध्या के दीपोत्सव और कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा,हरियाणा में प्रत्येक वर्ष होने वाला गीता महोत्सव जैसे अनेक आयोजनों पर जनता के हज़ारों करोड़ रूपये ख़र्च किये जा सकते हैं परन्तु उस शिक्षा के लिए पैसे क्यों नहीं ख़र्च किये जा सकते या सरकार उस शिक्षा पर सब्सिडी क्यों नहीं दे सकती जिस शिक्षा से न केवल एक पूरे का पूरा परिवार आत्मनिर्भर व शिक्षित बनता है बल्कि देश भी शिक्षित होता है और आगे बढ़ता है? अतः देश की सरकारों को सबसे अधिक धन शिक्षा व स्वास्थ पर ही ख़र्च करना चाहिए न कि लोकलुभावन रेवड़ियां बांटने अथवा धर्म या रक्षा से संबंधित ज़रूरतों पर। यदि कोई भी सरकार शिक्षा को किसी भी रूप से मंहगा या ग़रीबों की पहुँच से बाहर करने का प्रयास करती है इसका सीधा सा मतलब यही है कि यह देश के ग़रीब तबक़े के लोगों को शिक्षा से दूर रखने की बड़ी साज़िश है। और यह भी कि राजनैतिक लोग स्वयं को शिक्षित समाज से ही सबसे अधिक भयभीत महसूस करते हैं।

राजनीति में कोई किसी का नहीं होता सगा !
डॉ. भरत मिश्र प्राची
महाराश्ट्र राज्य के विधान सभा चुनाव उपरान्त जो स्थिति उभर कर सामने आई जहां भाजपा एवं शिव सेना तथा एनसीपी एवं काग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा जिसमें भाजपा एवं शिव सेना को सरकार बनाने हेतु सपश्ट बहुमत तो मिला पर सियासती समझौते के चलते भाजपा व शिव सेना दोनों अलग – थलग पड़ गये। महाराश्ट्र में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी भाजपा बहुमत के आभाव में अपने सहयोगी दल शिव सेना के साथ मुख्यमंत्री कार्यकाल के बटवारे को लेकर सियासती समझौता नहीं हो पाने के कारण सरकार नहीं बना सकी। वहां एक साथ चुनाव लड़ने वाले राजनीतिक दल भाजपा व शिवसेना एक दूसरे से अलग ही नहीं हुये बल्कि सत्ता के लिये शिव सेना ने अपनो वर्शो संबंध भी तोड़ अपने को एनडीए से अलग कर लिया। फिर भी राज्यपाल द्वारा दिये समय के अंतराल तक सरकार बनाने के लिये एनसीपी एवं कांग्रेस का समर्थन पत्र नहीं जुटा पाई। इसी बीच राज्यपाल ने एनसीपी को सरकार बनाने के लिये आमंत्रण पत्र दे डाला। कांग्रेस इस सियासती गेम को अंत समय तक खेलती रही। इस तरह के हालात किसी भी दल को स्पश्ट बहुमत नहीं मिल पाने के कारण ही उभरे जहां सियासी जंग में कौन किधर हो जाये कह पाना मुश्किल है। इस तरह के हालात में खरीद – फरोख्त की भी प्रक्रिया तेजी से उभरती है। इससे बचने के लिये कांग्रेस ने अपने विधायकों को जयपुर भेज दिया एवं शिवसेना व एनसीपी अपने विधायकों पर अुत समय तक नजर गड़ाये रही कि उनका कोई विधायक इस तरह की प्रक्रिया का शिकार न हो जाय। शिव सेना का साथ नहीं मिलने पर भाजपा ने अपनी समझदारी दिखाते हुये राज्यपाल से सरकार बनाने के न्योता को नकार दिया। इसके बाद महाराश्ट्र राज्य में राश्ट्रपति शासन भी लग गया जिसके खिलाफ शिव सेना सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी। सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या होगा, कब आयेगा यह तो आगे की बात रही फिलहाल महाराश्ट्र राज्य की राजनीति में रातों रात नई घटना घट गई। जहां शिव सेना को सरकार बनाने का साथ दे रही एनसीपी के विधायक रातों रात पाला बदलकर भाजपा के साथ खड़े हो गये। जिससे जहां कल तक शिव सेना, एनसीपी एवं कांग्रेस की मिली जुली सरकार बनती नजर आ रही थी वहीं एनसीपी के सहयोग से भाजपा की सरकार बन गई। जहां कल तक राश्ट्रपति शासन लगा था वहां रातों रात राश्ट्रपति शासन भी हट गया एवं सुबह होते – होते सरकार भी गठित हो गई। इस तरह का राजनीति में तत्काल का उलट फेर पहली बार देखा गया जिसकी भनक मीडिया तक को नहीं रही। यह राजनीतिक खेल पूर्व नियोजित रहा जिसमें एनसीपी के साथ भाजपा की सांठ गाठ पहले से ही तय रही जिसका साकार रूप नई सरकार के गठन के तहत पर्दे से बाहर उभर कर सामने आया। इस खेल का राजनीतिक खामियाजा शिव सेना को भुगतना पड़ा जिसका सरकार बनाने का सपना सदा सदा के लिये खटाई में पड़ गया। शिव सेना को सरकार बनाने की भूमिका में मदद देने की कवायद करने वाले राजनीतिक दल एनसीपी एवं कांग्रेस से एनसीपी का एक धड़ा अजीत पंवार के साथ भाजपा से जा मिला जिससे शिव सेना के साथ सरकार बनाये जाने की सारी संभवनाएं हवा में उड़ गई।
महाराश्ट्र राज्य में राश्ट्रपति शासन लागू होने एवं सरकार बनने की पृश्ठिभूमि में शिव सेना , एनसीपी एवं कांग्रेस सभी के सभी जिम्मेवार है। राज्य की जनता ने तो सरकार बनाने के लिये भाजपा एवं शिव सेना गठबंधन को जनादेश दिया पर सत्ता बनाने की ललक ने शिव सेना को आज अलग – थलग कर दिया। सहयोगी दल का साथ नहीं मिलने से भाजपा ने सरकार बनाने के मामले को पहले तो नकार दिया और मौका मिलते ही शिव सेना को सरकार बनाने के मामले में साथ दे रहे एनसीपी में तोड़ फोड़ कर सरकार बना ली। कांग्रेस को समर्थन पत्र देने के मामलें में देर करने का खामियाजा भुगतना पड़ा। इस तरह के बदलते राजनीतिक प्रकरण पर एनसीपी के मुखिया शरद पंवार ने भाजपा से नफरत होने की बात कर अपने को पाक तो कर लिया पर इस तरह के प्रकरण के शक के दायरे से वे निकल नहीं पाये। राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता। सभी मौका परस्त होते है। सत्ता पाने के लिये कोई किसी से भी हाथ मिला सकता। इस तरह के प्रकरण इस बात के साक्शी रहे है, भविश्य में भी रहेंगे।

इस सत्ता उलट-पुलट के अर्थ
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
महाराष्ट्र में रातों-रात जो सत्ता-पलट हुआ था, वह अब सत्ता-उलट हो गया है। पहले अजित पवार का इस्तीफा हुआ। फिर देवेंद्र फड़नवीस का भी इस्तीफा हो गया। क्यों नहीं होता ? अजित पवार के उपमुख्यमंत्रिपद पर ही फड़नवीस का मुख्यमंत्री पद टिका हुआ था। फड़नवीस के इस्तीफे की वजह से अब विधान-सभा में शक्ति-परीक्षण की जरुरत नहीं होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने शक्ति-परीक्षण का आदेश जारी करके अपनी निष्पक्षता जरुर सिद्ध कर दी है लेकिन क्या किसी लोकतंत्र के लिए यह शर्म की बात नहीं है कि 188 विधायकों को सिर्फ तीन जजों ने नाच नचा दिया ? अदालत ऊपर हो गई और जनता के प्रतिनिधि नीचे हो गए। महाराष्ट्र की विधानसभा में यदि शक्ति परीक्षण होता तो भाजपा की इज्जत पैंदे में बैठ जाती। इसीलिए इस्तीफा देकर फड़नवीस ने अच्छा किया लेकिन भाजपा को इस घटना ने जबर्दस्त धक्का लगा दिया है। शिव सेना, राकांपा और कांग्रेस के मुंबई में साथ आने का एक संदेश यह भी है कि दिल्ली की भाजपा सरकार के खिलाफ भारत की सभी पार्टियां एक होने में नहीं चूकेंगी। मोदी के लिए यह बड़ी चुनौती होगी। फड़नवीस और अजित पवार को जो आनन-फानन शपथ दिलाई गई थी, उससे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, महाराष्ट्र के राज्यपाल और भाजपा अध्यक्ष की छवि भी विकृत हुए बिना नहीं रहेगी। यदि फड़नवीस की सरकार बन जाती तब भी उसका परिणाम यही होता। यदि सत्ता-पलट का यह क्षणिक नाटक नहीं होता और विपक्ष के ‘अप्राकृतिक’ गठबंधन की सरकार बन जाती तो फड़नवीस के प्रति महाराष्ट्र की सहानुभूति बढ़ जाती। अब विपक्ष का यह गठबंधन पहले से ज्यादा मजबूत हो गया है, हालांकि इसके आतंरिक अन्तर्विरोध इतने गहरे हैं कि यह पांच साल तक ठीक से चल पाएगा या नहीं, यह कहना अभी मुश्किल है।

गर्भवती महिलाओं को भी मोबाइल का उपयोग कितना लाभप्रद हैं ?
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
महाभारत काल में जब अर्जुन सुभद्रा को चक्रव्यूह के बारे में बता रहे थे जितने समय तक जाएगी उतना अभिमन्यु ने सुना .इससे यह सिद्ध होता हैं की गर्भस्थ शिशु पर भी उनके भावों का प्रभाव पड़ता हैं .गर्भिणी स्त्री जैसे भाव रखती हैं वैसे भावों का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता हैं .आज कल मोबाइल ,टी वी और उपलब्ध साहित्य का प्रभाव भी माँ के साथ शिशु पर भी पड़ता हैं .इसके प्रभाव और दुष्प्रभाव दोनों उपयोगकर्ता पर पड़ते हैं .
मोबाइल फोन को लंबे समय तक देखते रहने से न सिर्फ आपकी आंखों को नुकसान होता है। बल्कि हाल ही में हुई एक अध्ययन की मानें तो अगर गर्भवती महिला लंबे समय तक मोबाइल फोन उपयोग करे तो होने वाले बच्चे में स्वाभाव से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि मोबाइल फोन जो अब स्मार्टफोन बन चुका है हमारी जिंदगी का ऐसा अहम हिस्सा बन चुका है जिसे हम अपनी जिंदगी से अब अलग नहीं कर सकते। मोबाइल के बिना अपनी जिंदगी की कल्पना करना भी शायद मुश्किल ही लगे। बच्चों से लेकर युवावस्था और बुजुर्गों तक… हर किसी के हाथ में स्मार्टफोन रहता है और बड़ी संख्या में लोगों की इसकी लत भी लग चुकी है। इस लिस्ट में गर्भवती महिलाएं भी शामिल हैं। लेकिन मोबाइल के अधिकतम उपयोग का न सिर्फ आप पर बल्कि गर्भ के अंदर पल रहे बच्चे पर भी बुरा असर पड़ता है।
बच्चे में बिहेवियर से जुड़ी दिक्कतें
मोबाइल फोन की स्क्रीन और उससे निकल रही ब्राइट ब्लू लाइट को लंबे समय तक देखते रहने से न सिर्फ आपकी आंखों को नुकसान होता है। बल्कि हाल ही में हुई एक स्टडी की मानें तो अगर प्रेग्नेंट महिला लंबे समय तक मोबाइल फोन यूज करे तो होने वाले बच्चे में बिहेवियर से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं। वैज्ञानिकों ने डेनमार्क में इसको लेकर एक स्टडी की जिसमें प्रसव पूर्व और प्रसव के बाद मोबाइल फोन यूज करने का बच्चे के व्यवहार और इससे जुड़ी समस्याओं के बीच क्या लिंक ये जानने की कोशिश की गई।
हाइपरऐक्टिविटी और बिहेवियरल इशू का शिकार
इस स्टडी में ऐसी महिलाओं को शामिल किया गया जिनके बच्चे 7 साल के थे। स्टडी के दौरान महिलाओं को एक प्रश्नोत्तरी दिया गया था जिसमें उनके बच्चे की हेल्थ और बिहेवियर के साथ-साथ वे खुद फोन का कितना इस्तेमाल करती हैं, इससे जुड़े सवालों के जवाब देने थे। स्टडी के आखिर में यह बात सामने आयी कि जिन महिलाओं के बच्चे प्रसव से पूर्व और प्रसव के बाद स्मार्टफोन के प्रति एक्सपोज थे यानी जिन मांओं ने प्रेग्नेंसी के दौरान और डिलिवरी के बाद भी मोबाइल यूज ज्यादा किया उनके बच्चे हाइपरऐक्टिविटी और बिहेवियरल इशूज का शिकार थे।
प्रेग्नेंट महिलाएं इन बातों का रखें ध्यान
– मोबाइल फोन पर बहुत ज्यादा बात करने की बजाए टेक्स्ट भेजें या लैंडलाइन का उपयोग करें
– प्रेग्नेंसी के दौरान बहुत ज्यादा सोशल मीडिया को स्क्रॉल न करें
– जहां तक संभव हो हैंड्स फ्री किट यूज करें ताकि सिर और शरीर के नजदीक रेडिएशन को कम किया जा सके।
संभव हो तो इनका उपयोग ना करना ही हितकारी हैं और जन्म के बाद आजकल मोबाइल से फोटो लेना भी हानिकारक हैं .कारण गर्भस्थ शिशु नौ माह तक अँधेरे माहौल में रहता हैं और उसे प्रकाश का संसर्ग उसके लिए हानिकारक होता हैं और वह उस प्रकाश से अभ्यस्त होने से उसका लती बनने लगता हैं जिस कारण उसे दूध पीना ,खेलने में भी मोबाइल या टी वी की जरुरत पड़ती हैं .यह घातकता की निशानी हैं।

हालात में बदलाव क्या संघ को अब अहमियत मिलने लगी…..?
ओमप्रकाश मेहता
बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान संघ प्रमुख डाॅ. मोहनराव भागवत के आरक्षण सम्बंधी एक बयान पर भारतीय जनता पार्टी द्वारा अपनी हार का ठीकरा भागवत के सिर पर फोड़ने के बाद से ही मोदी सरकार ने अपने कथित संरक्षक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से दूरी बना ली थी और संरक्षक को मजबूर होकर ‘सेवक’ की मुद्रा अख्तियार करनी पड़ी थी। इसी तिरस्कार के कारण संघ प्रवक्ता को एक बार सरकार व भाजपा को चेतावनी भी देनी पड़ी थी कि यदि संघ के स्वयं सेवक भाजपा के प्रति असहयोग आंदोलन छोड़ दें तो इस सरकार की क्या हालत होगी? लेकिन प्रधानमंत्री व भाजपाध्यक्ष पर इस चेतावनी का भी कोई असर नहीं हुआ था और संघ से दूरी बनाए रखाने का दौर जारी रखा गया, किंतु अब जब हरियाणा और महाराष्ट्र के विधान सभा चुनावों के परिणामों और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करिश्में में कभी आने का अहसास मोदी-शाह को हुआ तो अब संघ की अहमियत को स्वीकारा जाने लगा है और संघ प्रमुख ने भी पुरानी सभी गुस्ताखियां माफ कर सरकार व पार्टी को सहयोग करने का निर्णय लिया है।
हाल ही में महाराष्ट्र में चुनाव परिणामों के बाद पैदा हुए राजनीतिक बवंडर को व खत्म करने के लिए भागवत का ‘ब्रम्हास्त्र’ काम में लेने का तय किया गया और भागवत जी अमित शाह के अनुरोध को स्वीकार कर महाराष्ट्र के इस महासमर में कूद पड़े। अब यह अलग विषय है कि भागवत जी के बयान का असर ‘भाजपा या शिवसेना’ पर हुआ या नहीं? किंतु यह जरूर सिद्ध हो गया कि मोदी- अमित शाह ने भागवत व संघ की अहमियत को मंजूर किया और इसी का परिणा है कि संघ प्रमुख अब राजनीतिक महत्व के विषयों पर खुलकर बयान देने लगे, फिर वह चाहे एनआरसी का मामला हो या अगले केन्द्र के बजट में ग्रामोद्योग को विशेष महत्व का सवाल हो। संघ से जुड़े अर्थशास्त्रियों ने पिछले दिनों वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण से मिलकर भावी बजट के बारे में बहुमूल्य सुझाव सौंपे है जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े आर्थिक व औद्योगिक मसलों पर विशेष ध्यान देने का अनुरोध किया था, वित्तमंत्री ने सुझावों को सहर्ष स्वीकार कर बजट बनाते समय इन पर विशेष रूप से ध्यान देने का आश्वासन भी दिया।
वैसे देश के राजनीतिक क्षेत्र में मोदी-अमित शाह के प्रति संघ की ‘स्नेहवृष्टि’ का एक प्रमुख कारण यह भी माना जा रहा है कि भाजपा की केन्द्र सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में संघ व भाजपा के प्रमुख बिन्दुओं पर विशेष ध्यान दे रही है, जिनमें संघ के तीन प्रमुख बिन्दु तीन तलाक, धारा-370 और राम मंदिर के मुद्दें शामिल है। एनआरसी को दी जा रही प्राथामिकताा से भी संघ प्रुफल्लित है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि भाजपा व संघ के मूल उद्देश्य ‘‘हिन्दू राष्ट्र’’ की दिशा में संघ एनआरसी को सरकार का एक महत्वपूर्ण कदम मान रहा है, क्योंकि असम में सम्पन्न एनआरसी का निचैड़ यही निकाला जा रहा है कि वहां जो उन्नीस लाख घुसपैठिए घोषित किए गए उनमें नब्बें फीसदी मुस्लिम है, संघ व सरकार का तर्क है कि यदि पूरे देश में एनआरसी लागू कर दी गई तो भारत की मौजूदा जनसंख्या का एक बड़ा भाग घुसपैठियां घोषित होगा और जब ये कथित मुस्लिम घुसपैठियें देश से बाहर कर दिए जाएगें तो यह देश हिन्दू बाहुल्य होकर ‘हिन्दूराष्ट्र’ बना जाएगा। असम के बाद केन्द्र सरकार की नजर पश्चिम बंगाल पर है, जहां बताया जा रहा है कि ममता सरकार का मुख्य आधार ही बंगलादेशी घुसपैठियें है जो करोड़ों की संख्या में पिछले कई दशकों से पश्चिम बंगाल में डेरा डाले हुए है, मोदी-शाह को विश्वास है कि यदि एनआरसी में असम के बाद पश्चिम बंगाल का नम्बर लगा दिया तो प्रदेश में अगले साल आसानी से भाजपा की सरकार बन सकेगी, इसी तरह अगले एक-दो सालों में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होना है, उन राज्यों पर केन्द्र सरकार एनआरसी को लेकर विशेष ध्यान दे रही है। जिससे कि अभी नहीं तो अगले पांच सालों में पूरे देश के सभी राज्यों पर भाजपा का ‘एकछत्र राज’ कायम हो सके।
इसके साथ ही भाजपा ने अब राष्ट्रीय चुनावी मुद्दों के साथ उन मुद्दों पर भी ध्यान देने का फैसला लिया है जो देश के आम वोटर से जुड़े है। क्योंकि अभी तक केन्द्र की मोदी सरकार पर यही मुख्य आरोप लगाया जा रहा था कि सरकार सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दों पर ध्यान दे रही है, आम जनता व किसानों की समस्याऐं यथावत है, साथ ही मोदी सरकार के पहले कार्यकाल (2014-19) की भी अब खुलकर समीक्षा की जाने लगी है और उस कार्यकाल को निरर्थक माना जा रहा है, इन सब राष्ट्रीय चर्चा से जुड़े मुद्दों पर अब सरकार का ध्यान जा रहा है, जिसका श्रेय आमतौर पर संघ को दिया जा रहा है, सरकार ने संघ के ‘तिरस्कार काल’ की समीक्षा भी की और उसी के परिणाम स्वरूप अब संघ को अहमियत देना दिख रहा है, यद्यपि संघ स्वयं विवादित रहा है, क्योंकि कई विवाद उससे जुड़े है, किंतु ऐसा कहा जा रहा है कि ‘‘मोदी मेहरबान तो संघ पहलवान’’।

भाजपा ने डाले हथियार
सिद्धार्थ शंकर
अब तक सिर्फ सुना गया था कि राजनीति न जाने कब कौन सा रंग दिखा दे, मगर महाराष्ट्र के नाटक में पल-पल जिस तरह से सीन बदले और किरदार बदले, उसने सभी तरह की संभावनाओं और आशंकाओं को निर्मूल साबित कर दिया। पिछले एक माह से चल रहे महाराष्ट्र के घटनाक्रम में लगभग रोज अनिश्चय की स्थिति बनी है। कभी भाजपा हावी तो कभी विपक्ष। समाधान आज तक किसी की तरफ से नहीं आया। इन सबके बीच सवाल तब उठने लगा जब रातों रात अजित पवार के समर्थन से सरकार बनाने वाले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का दिनदहाड़े इस्तीफा हो गया। पिछले शुक्रवार-शनिवार की रात सरकार बनाने के बाद का घटनाक्रम जिस तरह से बदला, उसने भाजपा को बुरी तरह फंसा दिया। बहुमत का जुगाड़ न होते देख पहले एनसीपी में अकेले पड़े उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने इस्तीफा सौंपा, फिर फडणवीस ने भी हथियार डाल दिए। यह सब तब हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार शाम 5 बजे तक फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया था। जो भी फडणवीस को इस्तीफा देने का आदेश दिल्ली से आया, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कार्यवाहक अध्यक्ष जेपी नड्डा की उच्चस्तरीय बैठक हुई। बैठक में सरकार बचाने की सभी संभावनाओं को टटोला गया, मगर बात बनते न देख भाजपा ने पैर पीछे खींचने में भलाई समझी। हालांकि, यह सोमवार की शाम ही तय हो गया था कि भाजपा बहुमत हासिल नहीं कर पाएगी। हयात होटल में शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस के विधायकों ने जिस तरह से एकजुटता दिखाई, उससे भाजपा की सारी योजना धरी रह गई।
भाजपा समर्थन हासिल करने के लिए जिन संभावनाओं पर काम कर रही थी, वह काफी पेचीदा था। महाराष्ट्र में सुप्रीम कोर्ट की ओर से बुधवार शाम पांच बजे तक बहुमत परीक्षण की डेडलाइन फिक्स करने के बाद से यह सबसे बड़ा सवाल था कि क्या सीएम देवेंद्र फडणवीस 145 का मैजिक नंबर जुटा पाएंगे? विपक्ष अपने पास 162 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहा है। 105 विधायकों वाली भाजपा अजित पवार के दम पर बहुमत के दावे पर अडिग थी, मगर ऐसा हो नहीं पाया। कहा जा रहा था कि एनसीपी के पास कुल 54 विधायक हैं। दल-बदल कानून के प्रावधान के तहत अलग गुट को मान्यता हासिल करने के लिए दो तिहाई विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। इस लिहाज से अजित पवार को 36 विधायकों का समर्थन चाहिए। अगर अजित 36 या इससे ज्यादा विधायकों का समर्थन हासिल कर लेते हैं तो उन्हें नई पार्टी बनाने में मुश्किल नहीं होगी लेकिन अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो बागी विधायकों की सदस्यता खत्म हो सकती है। उनके अलावा करीब 13 निर्दलीय विधायकों के समर्थन का दावा भाजपा पहले ही कर रही थी। ये निर्दलीय शिवसेना और बीजेपी के बागी नेता हैं। ऐसे में भाजपा के 105+36+13= 154 यानी फडणवीस सरकार आसानी से बहुमत साबित कर लेती। दूसरी स्थिति यह हो सकती थी कि विपक्षी दलों के कुछ विधायक वोटिंग के दौरान सदन से अनुपस्थित हो जाएं। इस स्थिति में प्रोटेम स्पीकर की भूमिका भी अहम हो जाती। ऐसे में बहुमत का आंकड़ा घट जाता और भाजपा आसानी से बहुमत साबित कर लेती। फडणवीस सरकार बचने की यही एकमात्र सबसे संभव स्थिति दिख रही थी, मगर भाजपा ने इस राह पर जाने से इंकार कर दिया। तीसरी स्थिति यह हो सकती थी कि भाजपा शिवसेना के खेमे में ही सेंध लगा ले और विधायकों को तोड़ ले या फिर उनसे इस्तीफा दिलवा दे। विधानसभा में इस समय शिवसेना के पाक 56 विधायक हैं। ऐसी स्थिति में भी विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा घट जाता। बीते कुछ दिनों से भाजपा के कुछ नेता भी दबी जुबान में यह दावा कर रहे थे कि शिवसेना के कुछ विधायक उनसे संपर्क में हैं। बाकी सबके खिलाफ होने पर फडणवीस के लिए सरकार बचाने की एक अंतिम स्थिति यह हो सकती थी कि कांग्रेस के 44 विधायकों में से बड़ा खेमा टूटकर भाजपा में शामिल हो जाए या फिर उसे समर्थन कर दे। मगर ऐसा होना दिन में चंाद निकलने जैसा होता।
बहरहाल, अब जबकि सारी संभावनाएं गौण हो चुकी हैं तो उस व्यक्ति की भी तलाश शुरू हो गई है, जिस पर इस नाकामी का ठीकरा फोड़ा जाए। जाहिर है भाजपा इस कूटनीतिक हार का पूरा खामियाजा फडणवीस पर फोड़ेगी।

न्यायिक सक्रियता से ही रूकेगी सीवर में होने वाली मौत
रमेश सर्राफ धमोरा
राजस्थान में सीकर जिले के फतेहपुर में सीवरेज की खुदाई के दौरान हुई तीन मजदूरों की मौत के मामले में वहां के अपर जिला एवम सेशन न्यायाधीश शिवप्रसाद तम्बोली ने कुछ दिनो पूर्व ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। कोर्ट ने इस मामले में कंपनी के इंजीनियर सहित तीन लोगों को गैर इरादतन हत्या का दोषी मानते हुये दस-दस साल के कारावास की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने माना कि काम कर रहे मजदूरों के लिए सुरक्षा का इंतजाम करना कम्पनी और ठेकेदार की जिम्मेदारी थी। कोर्ट ने माना कि उस दिन कम्पनी की ओर से सीवरेज का काम किया जा रहा था और सुरक्षा संबंधी उपाय नहीं करने के कारण तीन मजदूरों को जान गंवानी पड़ी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ समय पहले हाथ से मैला साफ करने के दौरान सीवर में होने वाली मौतों पर चिंता जताने के साथ ही सख्त टिप्पाणी की थी। देश के सबसे बड़े कोर्ट ने कहा था कि देश को आजाद हुए 72 साल से अधिक समय हो चुका है। लेकिन देश में जाति के आधार पर भेदभाव जारी है। मनुष्य के साथ इस तरह का व्यवहार सबसे अधिक अमानवीय आचरण है। इस हालात में बदलाव होना चाहिए। जस्टिस अरुण मिश्रा, एमआर शाह और बीआर गवई की पीठ ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से सवाल किया कि आखिर हाथ से मैला साफ करने और सीवर के नाले या मैनहोल की सफाई करने वालों को मास्क व ऑक्सीजन सिलेंडर जैसे सुरक्षा उपकरण क्यों नहीं मुहैया कराई जाते हैं? दुनिया के किसी भी देश में लोगों को गैस चैंबर में मरने के लिये नहीं भेजा जाता है। इस वजह से हर महीने चार से पांच लोगों की मौत हो जाती है। कोर्ट ने कहा संविधान में प्रावधान है कि सभी मनुष्य समान हैं लेकिन प्राधिकारी उन्हें समान सुविधाएं मुहैया नहीं कराते।
पीठ ने इस स्थिति को अमानवीय करार देते हुए कहा कि बिना सुरक्षा उपकरणों के सफाई करने वाले लोग सीवर और मैनहोल में अपनी जान गंवा रहे हैं। वेणुगोपाल ने पीठ से कहा कि देश में नागरिकों को होने वाली क्षति और उनके लिए जिम्मेदार लोगों से निपटने के लिये अपकृत्य कानून बना नहीं है। ऐसी घटनाओं का स्वत: संज्ञान लेने का मजिस्ट्रेट को अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि सडक़ पर झाड़ू लगा रहे या मैनहोल की सफाई कर रहे व्यक्ति के खिलाफ कोई मामला दायर नहीं किया जा सकता, लेकिन ये काम करने का निर्देश देने वाले अधिकारी या प्राधिकारी को इसका जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
सीवर सफाई के दौरान हादसों में मजदूरों की दर्दनाक मौतों की खबरें लगातार आती रहती हैं। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में कुछ दिनो पूर्व सीवर टैंक की जहरीली गैस की चपेट में आने से 5 लोगों की मौत हो गई थी। कुछ माह पूर्व गुजरात के वड़ोदरा जिले के डभोई तहसील में एक होटल की सीवेरेज टैंक साफ करने उतरे सात मजदूरों की दम घुटने से मौत हो गई थी। घटना की रात सात मजदूर एक होटल की सीवरेज टैंक साफ करने के लिए उतरे थे। लेकिन टैंक सफाई के दौरान दम घुटने से उन सभी मजदूरों की मौत हो गई थी।
मई में उत्तर पश्चिम दिल्ली के एक मकान के सेप्टिक टैंक में उतरने के बाद दो मजदूरों की मौत हो गई थी। इस मामले में भी जांच में यह बात सामने आई थी कि मजदूर टैंक में बिना मास्क, ग्लव्स और सुरक्षा उपकरणों के उतरे थे। नोएडा स्थित सलारपुर में सीवर की खुदाई करते समय पास में बह रहे नाले का पानी भरने से दो मजदूरों की डूबने से मौत हो गई थी। गत वर्ष आन्ध्र प्रदेश राज्य के चित्तूर जिले के पालमनेरू मंडल गांव में एक गटर की सफाई करने के दौरान जहरीली गैस की चपेट में आने से सात लोगो की मौत हो गयी थी। देश के विभिन्न हिस्सो में हम आये दिन इस प्रकार की घटनाओं से सम्बन्धित खबरें समाचार पत्रों में पढ़ते रहते हैं।
देश के विभिन्न हिस्सो में पिछले एक वर्ष में सीवर की सफाई करने के दौरान 200 से अधिक व्यक्तियों की मौत हो चुकी है। इस अमानवीय त्रासदी में मरने वाले अधिकांश लोग असंगठित दैनिक मजदूर होते हैं। इस कारण इनके मरने पर कहीं विरोध दर्ज नहीं होता है। देश में 27 लाख सफाई कर्मचारी हैं जिसमें 20 लाख ठेके पर काम करते हैं। एक सफाईकर्मी की औसतन कमाई 6 से 10 हजार रुपये प्रति माह होती है। आधे से ज्यादा सफाई कर्मी अनेको बिमारियों से पीडि़त होते हैं। इस कारण 90 फीसदी गटर-सीवर साफ करने वालों की मौत 60 वर्ष की उम्र से पहले ही हो जाती है। इस कार्य को करने वालों के लिये बीमा की भी कोई सुविधा नहीं होती है।
कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सीवर की सफाई करने वाली एजेंसी के पास सीवर लाईन के नक्शे, उसकी गहराई से सम्बंधित आंकड़े होना चाहिए। सीवर सफाई के काम में लगे लोगों की नियमित स्वास्थ्य की जांच, नियमित प्रशिक्षण के नियम का पालन होता कहीं नहीं दिखता है।
सभी सरकारी दिशा-निर्देशों में दर्ज हैं कि सीवर सफाई करने वालों को गैस -टेस्टर, गंदी हवा को बाहर फेंकन के लिए ब्लोअर, टॉर्च, दस्ताने, चश्मा और कान को ढंकन का कैप, हैलमेट मुहैया करवाना आवश्यक है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इस बारे में कड़े आदेश जारी कर चुका है। इसके बावजूद ये उपकरण और सुविधाएं गायब है। दिनों दिन सीवर लाइनों की लंबाई बढ़ रही है वहीं मजदूरों की संख्या में कमी की जा रही है।
गटर की सफाई करने वालो की मौत होने के साथ ही उनपर निर्भर उनका परिवार भी बेसहारा हो जाता है। परिवार की आमदनी का स्रोत अचानक से बंद हो जाता है। देश में जाम सीवर की मरम्मत करने के दौरान प्रतिवर्ष दम घुटने से काफी लोग मारे जाते हैं। इससे पता चलता है कि हमारी गंदगी साफ करने वाले हमारे ही जैसे इंसानों की जान कितनी सस्ती है। सीवर सफाई के काम में लगे लोगों को सामाजिक उपेक्षा का भी सामना करना पड़ता है।
आमतौर पर सीवर में उतरने से पहले सफाईकर्मी शराब पीते है। शराब पीने के बाद शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। तभी सीवर में उतरते ही इनका दम घुटने लगता है। सफाई का काम करने के बाद उन्हें नहाने के लिए साबुन, नहाने को पानी तथा पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी भी कार्यकारी एजेंसी की है। इसके बावजूद ये उपकरण और सुविधाएं इनको अभी तक नहीं मिल पा रही है। भारत में इसे प्रतिबंधित किये जाने के उपरान्त भी यह गंभीर समस्या बनी हुई है। अब देश की सर्वोच्च अदालत ने गटर की सफाई करने वालों की सुध लेते हुये सरकार की खिंचाई की है। इससे लगता है कि सफाई करने वाले इन स्वच्छता सिपाहियों के भी जल्दी ही अच्छे दिन आयेगें व सरकारी अकर्मण्यता से होने वाली उनकी असामयिक मौत पर रोक लग पायेगी।

भारतीय संविधान के सत्तर वर्ष
हर्षवर्धन पाठक
इस 26 नवम्बर को भारतीय संविधान बने सत्तर वर्श हो जायेंगे। सत्तर वर्श पूर्व इसी तिथि अर्थात 26 नवम्बर 1949 को हमने अपना संविधान आत्मार्पित किया था। तीन माह बाद 26 जनवरी 1950 को हमारे देष ने पहला गणतन्त्र दिवस मनाया। इसके पूर्व ब्रिटिष संविधान लागू था। यह परंपराओं पर आधारित है। इसके विपरीत हमारा संविधान लिखित है।
भारत का संविधान विष्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान माना जाता है। इसमें 448 अनुच्छेद 12 अनुसूचियां हैं , हाल ही में अयोध्या विवाद का फैसला दिया गया। जब सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुये अयोध्या विवाद के सम्बंध में अपना निर्णय दिया तब यह अनुच्छेद फिर चर्चा में आये। डॉ. भीमराव अंबेडकर को यह वृहत संविधान बनाने का श्रेय दिया जाता है।
संविधान सभा में वैसे 284 सदस्य थे। डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में गठित इस सभा में डाक्टर भीमराव अम्बेडकर ने जिस मेहनत और मेधा के साथ संविधान बनाने में रुचि ली वह अभूतपूर्व थी। इस कारण इससे डा. अम्बेडकर की यादें जुड़ी हुई है जिसकी वजह से इस संविधान में फेर बदल की कोई भी बात उनके अनुनायियों को बहुत बुरी लगती है। हर षहर में भीम नगर है तो उनकी प्रतिमायें सर्वत्र स्थापित हैं। हमारे देष का हर राजनीतिज्ञ संविधान की षपथ खाता है।
भारतीय संविधान राश्ट्र का सर्वोच्च विधान है। संविधान की प्रस्तावना ”हम भारत के लोग“ से प्रारंभ होती है, जिसका स्पश्ट संकेत है कि संविधान निर्माण में नागरिकों को अधिक महत्व दिया गया है। यह भी डा. अम्बेडकर के लोक प्रेम का परिचायक है। संविधान में यह घोशणा की गई कि देष में संसदीय लोकतांत्रिक समाजवादी गण तंत्र स्थापित किया गया है। बाद में इसमें श्रीमती इन्दिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में धर्म निरपेक्ष शब्द भी जोड़ा गया।
संविधान की एक विषेशता यह भी है कि इसमें राज्य को नीति निर्देष भी हैं तो राश्ट्र के नागरिकों के लिये अधिकार भी दिये गये हैं। इन मूल अधिकारों का कुछ मामलों में दुरुपयोग भी होता है लेकिन ये अधिकार भारतीय संविधान के सर्वाधिक महत्वपूर्ण बिन्दु हैं। कुछ व्यक्तियों के द्वारा दुरुपयोग होने के कारण इनका महत्व कम नहीं होता। इनमें प्रमुख हैं अभिव्यक्ति का अधिकार, समानता का अधिकार, षिक्षा तथा संस्कृति का अधिकार, षोशण के विरुद्ध अधिकार।
भारतीय संविधान में भारत को राज्यों का संघ बताया गया है किन्तु हमारे संविधान निर्माताओं ने राश्ट्रीय एकता का भी ध्यान रखा है। राज्यों को असीमित अधिकार नहीं दिये गये हैं। भारत राश्ट्र में संविधान निर्माताओं ने एक राश्ट्रीय ध्वज , राश्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सर्वोच्च न्यायाधीश रखे गए हैं। भारत में संसद सम्प्रभु तथा सर्वोच्च है। नियम बनाने के अधिकारों का भी विभाजन किया गया है, संघ और राज्यों को अलग-अलग अधिकार दिये गये हैं लेकिन एक समवर्ती सूची भी बनाई है। इसमें यह स्पश्ट किया गया है कि यदि संघ और राज्य दोनों नियम बनायेंगें तो संघ के नियम लागू होंगे।
संविधान निर्माण के समय यह ध्यान भी रखा गया है कि किसी को भी असीमित अधिकार न हो। राश्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीष पर भी महाभियोग का प्रावधान रखा गया है। चैक एण्ड बैंलेंस का प्राकृतिक नियम ध्यान में रखा गया है।
भारत का संविधान प्रेम बिहारी रायजादा ने पेन से लिखा था। इसकी मूल प्रति संसद के पुस्तकालय में रखी है। इसके निर्माण का कार्य आजादी मिलने के 14 दिन बाद ही षुरु हो गया था। डाक्टर भीमराव अम्बेडकर को यह महत्वपूर्ण कार्य सौंपा गया। उन्होंने दूसरे देषों के उस समय लागू संविधानों का अध्ययन किया। उसके बाद भारतीय संविधान बनाया गया। इस संविधान की खूबी यह है कि संघात्मक होने के साथ ही एकात्मक भी है। प्रति वर्श 26 नवम्बर को मनाया जाने वाला संविधान दिवस डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की अमिट स्मृति है। यह संविधान उनके परिश्रम और प्रतिभा का परिचय देता है।

खानपान बना– बहस का बड़ा मुद्दा
डॉक्टर अरविन्द
खानपान एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनता जा रहा हैं उसका कारण अपने अपने तर्क पर सच्चाई एक ही होती हैं .आज लोग मांसाहार की वकालत बहुत करते हैं और उससे किसी को कोई परहेज़ नहीं हैं .खूब जो भी खाना हो खाओ .जैसे हम कभी मिटटी का घड़ा खरीदते हैं तो उसे थोक पीटकर देखते हैं उसी प्रकार जो हम खा रहे हैं वह हमारे लिए लाभप्रद हैं या नहीं .यदि लाभप्रद हैं तो अवश्य सेवन करो और हानिकारक हैं तो उसका विश्लेषण करो और उपयोग करो.वह खाना जो हानिकारक के अलावा स्वास्थ्य निर्माण में सहायक नहीं हैं उसका सेवन नहीं करना चाहिए.
वैसे खाना पीना पहनना पूजा पाठ व्यक्ति की अपनी अपनी मान्यता के साथ स्वतंत्रता हैं पर हमें विवेक पूर्ण निर्णय लेकर सेवन करना चाहिए .
इन दिनों दुनिया में यह बहस जोरों पर है कि बेहतर स्वास्थ्य और फिटनेस के लिए क्या खाना चाहिए क्या नहीं। बाजार में तरह-तरह के डायट प्लान और उन्हें सपोर्ट करने वाली उतनी ही तरह की रिसर्च आ रही हैं। लोगों को अपनी-अपनी जरूरत के मुताबिक डायट प्लान चाहिए। अगर डायबिटीज पर नियंत्रण चाहिए तो एक तरह की डायट, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर के लिए दूसरी तरह की। जिम में वजन उठाने के लिए यानी पावरलिफ्टिंग के लिए खास तरह की डायट। तेज दौड़ने, दिन भर तरोताजा महसूस करने, कैंसर के खतरों से बचने के लिए अलग-अलग किस्म की डायट। आप अगर चाहें तो न्यूट्रिशनिस्ट से अपने ब्लड ग्रुप के हिसाब से या अपने शरीर की पाचन शक्ति के मुताबिक भी खास अपने लिए डायट प्लान बनवा सकते हैं।
खिलाड़ियों के दावे
डायट के बाजार में कुछ साल पहले तक कीटो डायट का बहुत बोलबाला था। कीटो यानी कीटोजेनिक डायट में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा घटा दी जाती है और जरूरी ऊर्जा प्रोटीन व फैट से ली जाती है। कई एथलीटों ने अपनी कीटो डायट के बारे में पब्लिक में घोषणा की और अपने अनुभव भी साझा किए। कुछ साल पहले भारत में वजन घटाने के लिए कीटो डायट अपनाने का फैशन चल निकला था। पर सबसे तीखी बहस जिस डायट को लेकर चल रही है वह है वीगन डायट जिसमें सिर्फ पौधों से मिलने वाला भोजन शामिल है। बहस पौधों से मिलने वाले भोजन पर नहीं बल्कि इस बात को लेकर हो रही है कि वीगन डायट लेने वाले अपनी ताकत की जरूरतों के लिए जानवरों से मिलने वाले किसी भी तरह के उत्पाद के खिलाफ हैं और दावा कर रहे हैं कि ऐसा करने से उनके शारीरिक प्रदर्शन पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा बल्कि उसमें सुधार आ रहा है।
पिछले साल नेटफ्लिक्स पर आई डॉक्युमेंट्री फिल्म ‘गेम चेंजर्स’ ने इस संबंध में एक अभूतपूर्व बहस छेड़ दी है। इसमें वीगन डायट लेने वाले कई सिलेब्रिटी खिलाड़ियों से बातचीत की गई है जिन्होंने अपने-अपने तरीकों से दावा किया कि कैसे वीगन डायट लेने के कारण ही वे अपने प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ पाए और खेल की थकान, चोट आदि से रिकवर करने में भी किस तरह इसने सबसे कारगर भूमिका निभाई। दुनिया भर के शाकाहारियों की हमेशा से यह चिंता रही है कि पौधों से मिलने वाले भोजन में पर्याप्त प्रोटीन नहीं मिल पाता। मांसाहारियों ने अपनी प्रोटीन की जरूरतों को लेकर कभी कोई फिक्र नहीं की क्योंकि उनके पास जानवरों से मिलने वाले भोजन की बेशुमार चॉइस रही है।
‘गेम चेंजर्स’ मांसाहारियों को शाकाहारियों की अपेक्षा प्रोटीन के बेहतर और ज्यादा विकल्प मिलने की बात को निरस्त करते हुए इस नई खोज का दावा करती है कि जानवरों के उत्पादों से मिलने वाला प्रोटीन शरीर के लिए न सिर्फ नुकसानदायक होता है क्योंकि उससे कैंसर व कई अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है बल्कि प्लांट प्रोटीन मानव शरीर के लिए ज्यादा प्रभावी और अनुकूल है। डॉक्युमेंट्री में जर्मनी के स्ट्रांगमैन पैट्रिक बाबूमियां को दिखाया गया है जो वीगन होते हुए भी 555 किलो वजन उठाने का कीर्तिमान बनाते दिखाते हैं। फिल्म में उनका एक डायलॉग है- ‘एक आदमी ने मुझसे पूछा कि तुम बिना प्रोटीन खाए सांड जैसे ताकतवर कैसे हो गए? मेरा जवाब था – तुमने क्या कभी सांड को मीट खाते हुए देखा?’ इस डॉक्युमेंट्री में अपनी बॉडी बिल्डिंग के दम पर हॉलिवुड में धूम मचाने वाले आर्नोल्ड श्वार्जनेगर, फॉर्म्युला वन चैंपियन लिविस हेमिल्टन, ऑस्ट्रेलियाई स्प्रिंटर मोर्गन मिशेल, मिक्स्ड मार्शल आर्ट के नंबर वन फाइटर रहे जेम्स विल्क्स, अल्ट्रामैराथन दौड़ने वाले दुनिया के टॉप रनर स्कॉट ज्यूरेक जैसे दिग्गज वीगन डायट की ताकीद करते दिखते हैं। डॉक्युमेंट्री यहां तक बताती है कि वीगन डायट मर्दों में सेक्शुअल पावर भी बढ़ाता है। इसके हिमायती दावा करते हैं कि हमारे दांतों का स्ट्रक्चर शाकाहार के अनुकूल है। वे फिक्रमंद हैं कि नॉन-वेज डायट के लिए पशुपालन करने में पृथ्वी के संसाधन खर्च हो रहे हैं और पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है।
भारत के विराट कोहली समेत जिस तरह दिग्गज खिलाड़ियों ने वीगन डायट अपनाया है, उससे दुनिया भर के लोगों का ध्यान इसकी ओर गया है। पर यह बात नॉन-वेज डायट के धंधे में लगे तबके के गले नहीं उतरने वाली। डॉक्युमेंट्री ने सीधे-सीधे उनके पेट पर लात मारी है। इसलिए कोई हैरानी नहीं कि कुछ ही महीनों में फिल्म के दावों को झूठा करार करने वालों का तांता लग गया। उस पर सबसे बड़ा आरोप यह लगाया जा रहा है कि इसके निर्माता और इसमें काम करने वाले ज्यादातर लोग वीगन डायट के बिजनेस से जुड़े हुए हैं। लिहाजा उन्होंने अपने व्यावसायिक लाभ के लिए झूठे और अपुष्ट स्रोतों के आधार पर फिल्म बनाकर लोगों के साथ धोखा किया है। चूंकि मामला खरबों रुपये के डायट बिजनेस का है, इसलिए दोनों ओर से दावे और प्रतिदावे किए जा रहे हैं।
सतर्कता की जरूरत
जाहिर है, दोनों में से किसी एक को सही मानकर उसे फॉलो नहीं किया जा सकता। भोजन निजी मसला है और सबकी भोजन से अपनी अलग-अलग जरूरतें और अपेक्षाएं रहती हैं। सिर्फ भोजन को महत्व देने वालों का कहना है कि अपने लिए भोजन के चयन का सबसे अच्छा तरीका है कि हम खुद ही जांच करें कि हमारे शरीर के लिए क्या अनुकूल है और क्या प्रतिकूल। वैसे यह तो तय है कि हम क्या खा रहे हैं, इसे लेकर सतर्क होने का वक्त आ गया है क्योंकि शोध हमें कई हैरतअंगेज परिणाम दे रहे हैं। आप अगर वीगन होना चाहते हैं, तो बेहतर है कि खुद जांच लें कि आपका शरीर ऐसे भोजन के साथ कैसे निर्वाह करता है। याद रखें कि आपसे ज्यादा आपके शरीर को भोजन की जरूरत है और उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि दुनिया में कौन कैसा भोजन कर रहा है।
तन मन धन करता कौन ख़राब ,
मछली ,अंडा, मांस ,शराब

चुनौतियों से भरा होगा जस्टिस बोबड़े का कार्यकाल
योगेश कुमार गोयल
चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की सेवानिवृत्ति के पश्चात् 18 नवम्बर को जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाल लिया है और इस प्रकार वे भारत के 47वें मुख्य न्यायाधीश बन गए हैं। स्थापित परम्परा के अनुरूप न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने अपनी विदाई से कुछ दिनों पहले ही अपने उत्तराधिकारी के रूप में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जज न्यायमूर्ति बोबड़े की नियुक्ति की सिफारिश कर दी थी और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा 29 अक्तूबर को उनकी नियुक्ति को स्वीकृति दे दी गई थी। जस्टिस गोगोई 3 अक्तूबर 2018 को देश के 46वें मुख्य न्यायाधीश बने थे, जिनके 17 नवम्बर को रिटायर होने के बाद जस्टिस एस ए बोबड़े ने उनका स्थान लिया है। जस्टिस गोगोई का कार्यकाल करीब एक साल का था, जिसमें उन्होंने अयोध्या विवाद कई महत्वपूर्ण मसलों पर फैसले सुनाकर न्याय जगत में एक नया इतिहास रचा और अब जस्टिस बोबड़े के करीब डेढ़ वर्षीय कार्यकाल पर भी सबकी नजरें केन्द्रित रहेंगी क्योंकि उनके समक्ष भी कई महत्वपूर्ण मुद्दे सामने आएंगे, जिन पर उन्हें अपना निर्णय सुनाना है। गौरतलब है कि जस्टिस बोबड़े का कार्यकाल 23 अप्रैल 2021 तक का होगा। जस्टिस बोबड़े ही वह न्यायाधीश हैं, जिन्होंने करीब छह साल पूर्व सबसे पहले स्वेच्छा से ही अपनी सम्पत्ति की घोषणा करते हुए दूसरों के लिए आदर्श प्रस्तुत किया था। उन्होंने बताया था कि उनके पास बचत के 2158032 रुपये, फिक्स्ड डिपोजिट में 1230541 रुपये, मुम्बई के एक फ्लैट में हिस्सा तथा नागपुर में दो इमारतों का मालिकाना हक है।
न्यायमूूर्ति बोबड़े इस साल उस वक्त ज्यादा चर्चा में आए थे, जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट की ही एक पूर्व महिला कर्मचारी द्वारा मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए जाने के बाद उस अति संवेदनशील मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित हाउस पैनल का अध्यक्ष बनाया गया था, जिसमें न्यायमूर्ति एन वी रमन तथा इंदिरा बनर्जी शामिल थे। इस पैनल ने अपनी जांच के बाद जस्टिस गोगोई को क्लीनचिट दी थी। जनवरी 2018 में जब सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कांफ्रैंस की थी, तब जस्टिस गोगोई, जे चेलमेश्वर, मदन लोकुर तथा कुरियन जोसेफ के बीच मतभेदों को निपटाने में अहम भूमिका निभाने के चलते भी जस्टिस बोबड़े चर्चा में आए थे। उस समय उन्होंने कहा था कि कोलेजियम ठीक तरीके से काम कर रहा है और केन्द्र के साथ उसके कोई मतभेद नहीं हैं।
24 अप्रैल 1956 को महाराष्ट्र के नागपुर में जन्मे न्यायमूर्ति शरद अरविंद बोबड़े को वकालत का पेशा विरासत में ही मिला था। उनके दादा एक वकील थे और पिता अरविंद बोबड़े महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल रहे हैं जबकि बड़े भाई स्व. विनोद अरविंद बोबड़े सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील रहे थे। उनकी बेटी रूक्मणि दिल्ली में वकालत कर रही हैं और बेटा श्रीनिवास मुम्बई में वकील है। शरद अरविंद बोबड़े ने नागपुर विश्वविद्यालय से एलएलबी करने के पश्चात् वर्ष 1978 में बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र की सदस्यता लेते हुए अपने वकालत कैरियर की शुरूआत की थी, जिसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ में वकालत की और 1998 में वरिष्ठ अधिवक्ता मनोनीत किए गए। 29 मार्च 2000 को उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में बतौर अतिरिक्त न्यायाधीश पदभार ग्रहण किया और फिर 16 अक्तूबर 2012 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। पदोन्नति मिलने के बाद 12 अप्रैल 2013 को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में बतौर जज कमान संभाली। सुप्रीम कोर्ट में जज बनने के बाद वे सर्वोच्च अदालत की कई महत्वपूर्ण खण्डपीठों का हिस्सा रहे। वे अदालत की उस बेंच का भी हिस्सा थे, जिसने आदेश दिया था कि आधार कार्ड न रखने वाले किसी भी भारतीय नागरिक को सरकारी फायदों से वंचित नहीं किया जा सकता। बहुतप्रतीक्षित और राजनीतिक दृष्टि से सर्वाधिक संवेदनशील माने जाते रहे रामजन्मभूमि विवाद की सुनवाई कर रही मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली उस पांच सदस्यीय संविधान पीठ का भी वे अहम हिस्सा थे, जिसने अपने फैसले से देश की न्याय प्रणाली के प्रति हर देशवासी का भरोसा बनाए रखा है।
जस्टिस बोबड़े ने देश के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अति महत्वपूर्ण कार्यभार तो संभाल लिया है लेकिन यह भी तय है कि उनका यह पूरा कार्यकाल चुनौतियों से भरा रहेगा। सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट तथा निचली अदालतों में लंबित मामलों के निपटारे, अदालतों में न्यायाधीशों की बड़ी कमी, विचाराधीन कैदियों की सुनवाई में विलम्ब, न्यायपालिका तथा कार्यपालिका के बीच टकराव जैसी स्थितियां इत्यादि उनके समक्ष कई ऐसी बड़ी चुनौतियां होंगी, जिनसे निपटते हुए उन्हें इनके समाधान के प्रयास भी करने होंगे। अदालतों में लंबित मामलों को निपटाने और मुकद्दमों में होने वाली देरी को दूर करने के लिए वर्ष 2009 में प्रक्रियागत खामी को दूर करना, मानव संसाधन का विकास करना, निचली अदालतों में बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाना जैसे रणनीतिक नीतिगत कदम उठाए जाने की जरूरत पर विशेष जोर दिया गया था लेकिन इस दिशा में सकारात्मक प्रयास नहीं हुए। न्यायमूर्ति बोबड़े इस चुनौती से कैसे निपटेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।
अगर भारतीय अदालतों में लंबित मामलों पर नजर डालें तो फिलहाल देशभर की अदालतों में 3.53 करोड़ से भी ज्यादा मामले लंबित हैं। यदि निचली अदालतों या उच्च न्यायालयों की बात छोड़ भी दें तो सर्वोच्च न्यायालय में ही करीब 58669 मामले लंबित हैं, जिनमें से 40409 मामले ऐसे हैं, जो करीब तीस सालों से लंबित हैं। ‘नेशनल ज्यूडिशयरी डेटा ग्रिड’ के अनुसार उच्च न्यायालयों में 4363260 मामले लंबित हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि मामलों को जिस गति से निपटाया जा रहा है, उस हिसाब से लंबित मामलों को निपटाने में 400 साल लग जाएंगे और वो भी तब, जब और कोई नया मामला सामने न आए। देश में प्रतिवर्ष मुकद्दमों की संख्या जिस गति से बढ़ रही है, उससे भी तेज गति से लंबित मामलों की संख्या बढ़ रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2012 में ‘नेशनल कोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम’ आरंभ किया था, जिसका आकलन है कि भारतीय अदालतों में वर्ष 2040 तक मुकद्दमों की संख्या बढ़कर 15 करोड़ हो जाएगी और इसके लिए 75 हजार और अदालतें बनाने की जरूरत है। यह न्यायमूर्ति बोबड़े की चिंता का प्रमुख विषय रहेगा।
सर्वोच्च न्यायालय सहित देश की सभी अदालतें न्यायाधीशों की भारी कमी से जूझ रही हैं। विधि आयोग ने वर्ष 1987 में सुझाव दिया था कि प्रत्येक दस लाख भारतीयों पर 10.5 न्यायाधीशों की नियुक्ति का अनुपात बढ़ाकर 107 किया जाना चाहिए लेकिन यह विड़म्बना ही है कि इन सिफारिशों के 32 साल भी यह अनुपात मात्र 15.4 ही है। सर्वोच्च न्यायालय में फिलहाल 31 न्यायाधीश हैं, जहां आठ अतिरिक्त न्यायाधीशों की आवश्यकता है। इसी प्रकार उच्च न्यायालय और निचली अदालतों में भी 5535 न्यायाधीशों की कमी है। आर्थिक सर्वेक्षण में अनुमान लगाया गया है कि अदालतों में लंबित मामलों को पांच वर्षों के भीतर निपटाने के लिए करीब 8521 न्यायाधीशों की जरूरत है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने स्वयं इस तथ्य को रेखांकित करते हुए कहा था कि जिला और उपमंडल स्तरों पर अदालतों में ही स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या 18 हजार है लेकिन फिलहाल इन अदालतों में केवल 15 हजार के करीब ही न्यायाधीश हैं।
मुख्य न्यायाधीश बोबड़े के लिए चिंता का एक बड़ा विषय यह भी रहेगा कि अदालतों में न्यायाधीशों की कमी के चलते जेलों में बंद करीब चार लाख विचाराधीन कैदी अपनी सुनवाई का नंबर आने के लिए ही लंबा इंतजार कर रहे हैं। ये ऐसे कैदी होते हैं, जिन्हें उनका अपराध साबित नहीं होने दोषी नहीं माना जा सकता और इनमें से काफी बड़ी संख्या ऐसे कैदियों की है, जिन्हें अगर जमानत मिल भी जाए तो उनके पास इतनी राशि नहीं होती कि वे अपने लिए जमानत का इंतजाम कर सकें। न्यायमूर्ति बोबड़े के लिए इस दिशा में सक्रिय पहल करते हुए ऐसे कैदियों को शीघ्र सुनवाई का अवसर मिलने की व्यवस्था करना बहुत बड़ी चुनौती रहेगी।
समय-समय पर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव देखा जाता रहा है। सरकार द्वारा कई अवसरों पर कहा गया है कि न्यायपालिका ने जरूरत से ज्यादा सक्रियता दिखाते हुए अपनी सीमारेखा का उल्लंघन किया है और वह कार्यपालिका के क्षेत्र में दखल दे रही है। हालांकि यह अलग बात है कि ऐसा अक्सर तभी हुआ, जब कार्यपालिका अपने दायित्वों के निर्वहन में विफल हुई और न्यायपालिका को न्याय सुनिश्चित करने के लिए स्वयं आगे आना पड़ा। जस्टिस अरविंद बोबड़े की नियुक्ति पर भले ही कोई विवाद नहीं रहा हो और न्यायपालिका व कार्यपालिका के बीच भी कोई टकराव नहीं देखा गया लेकिन अक्सर देखा गया है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में भी न्यायपालिका का सरकार के साथ टकराव रहा है। पिछले दिनों भी कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि ऐसी उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि सरकार कॉलेजियम की सिफारिशों पर राजी ही होगी। हालांकि जस्टिस बोबड़े का कहना है कि सरकार के साथ उनके संबंध ठीक हैं और सरकार तथा न्यायपालिका को साथ चलना होगा। भारत की न्याय वितरण प्रणाली को अच्छा बताते हुए उनका कहना है कि इसमें आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जैसी अच्छी तकनीक शामिल करने जैसे कुछ मामूली बदलावों की जरूरत हो सकती है। उनका कहना है कि सभी मुकद्दमों में न्याय सुनिश्चित करना उनका फौरी लक्ष्य है और वे न्यायपालिका में बहुप्रतीक्षित सुधार करके उन्हें अमल में लाना चाहते हैं। बहरहाल, देखना होगा कि अपने समक्ष सामने आने वाली उपरोक्त चुनौतियों का मुकाबला करते हुए वे अपने इस डेढ़ वर्ष से भी कम समय के छोटे कार्यकाल में न्यायपालिका में सुधार के लिए कितना कार्य कर पाते हैं। न्यायमूर्ति एस ए बोबड़े का कहना है कि किसी भी न्यायिक प्रणाली की शीर्ष प्राथमिकता समय पर न्याय मुहैया कराना है, जिसमें न तो ज्यादा देरी की जा सकती है और न ही जल्दबाजी। उनका कहना है कि न्याय में देरी से अपराधों में वृद्धि हो सकती है। ऐसे में सभी की नजरें इस ओर केन्द्रित रहेंगी कि वे कैसे इन चुनौतियों से पार पाते हैं।

राजनैतिक नैतिकता के आईने में उद्धव ठाकरे व लालू यादव
निर्मल रानी
महाराष्ट्र की राजनीति में जो भूचाल की स्थिति पैदा हुई है,नैतिकता के लिहाज़ से यदि देखें तो ऐसे हालात की उम्मीद नहीं की जा सकती थी। मगर जब कुर्सी की चाह, ख़ास तौर पर मुख्यमंत्री के पद की लालसा का सवाल हो तो राजनीति में ‘नैतिकता’ शब्द की कोई गुंजाईश नज़र नहीं आती। भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का लगभग 25 वर्ष पुराना गठबंधन इन्हीं हालात की भेंट चढ़ गया। 288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में पिछले दिनों हुए आम चुनावों किसी भी दाल को बहुमत नहीं मिल सका। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को 105 सीटें मिलीं और शिवसेना को 56 सीटें हासिल हुईं। उधर एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटों पर जीत मिली। सर्कार बनाने के लिए ज़रूरी 146 सीटों का आंकड़ा चुनाव पूर्व गठबंधन वाली भाजपा व शिवसेना आसानी से पूरा करती नज़र आ रही है। परन्तु 56 सीटें जितने वाली शिव सेना ने भाजपा के सामने मुख्यमंत्री पद लिए जाने की शर्त रख दी जिसे भाजपा ने मंज़ूर नहीं किया। नतीजतन स्थिति राष्ट्रपति शासन तक जा पहुंची। इस राजनैतिक उठापटक में ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो बाद में पता चलेगा परन्तु फ़िलहाल जो बड़े राजनैतिक बदलाव हुए हैं उनमें शिव सेना न केवल घाटे में बल्कि राजनैतिक रूप से अलग थलग पड़ती भी दिखाई दे रही है। शिव सेना का भाजपा से गठबंधन भी टूट चूका है और शिव सेना के लोकसभा सांसद व सेना के एकमात्र केंद्रीय मंत्री अरविंद सावंत ने ”शिव सेना सच के साथ है. इस माहौल में दिल्ली में सरकार में बने रहने का क्या मतलब है?,यह कहते हुए नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा भी दे दिया है।वे मोदी सरकार में भारी उद्योग मंत्री थे। अब सच क्या है,राजनीति में सच की परिभाषा क्या है,राजनीति में ‘वास्तविक सच’ की कोई ज़रुरत या गुंजाईश है भी या नहीं या फिर मौक़ापरस्ती ही ‘सच’ की सबसे बड़ी परिभाषा बन चुकी है इन बातों पर चिंतन करने की सख़्त ज़रुरत है।
आज भाजपा व शिव सेना एक दूसरे को वर्तमान राजनैतिक उथल पुथल के लिए ज़िम्मेदार ही नहीं ठहरा रहे बल्कि एक दुसरे पर झूठ बोलने का इल्ज़ाम भी लगा रहे हैं। शिव सेना का कहना है कि महारष्ट्र के राजनैतिक हालात के लिए शिवसेना नहीं बल्कि भाजपा का अहंकार ज़िम्मेदार है। परन्तु एक बात तो ज़रूर स्पष्ट है कि हिंदुत्व के नाम पर साथ आए ये दोनों राजनैतिक दल मुख्यमंत्री के पद की ख़ातिर अलग हो गए इसका सीधा सा मतलब यही हुआ कि दोनों ही दलों के लिए हिंदुत्व या विचारधारा की बातें करना महज़ एक छलावा था वास्तव में तो मुख्यमंत्री का पर हिंदुत्व वाद से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण था। इस राजनैतिक उथल पुथल के दौरान शिव सेना की तरफ़ से भाजपा के और कुछ ऐसे ‘विषायुक्त ‘तीर भी छोड़े गए जो विपक्षी दाल समय समय पर छोड़ा करते थे। सत्ता की खींचतान के बीच जब शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत से जब पूछा गया था कि भाजपा के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन होने के बावजूद सरकार बनाने में देरी क्यों हो रही है तो उन्होंने कहा, ‘यहां कोई दुष्यंत नहीं है जिसके पिता जेल में हों। हम धर्म और सत्य की राजनीति करते हैं।उनका इशारा हरियाणा में सत्ता के लिए भाजपा व जननायक जनता पार्टी में सत्ता के लिए हुए समझौते की तरफ़ था। क्योंकि दोनों ही एक दुसरे के विरुद्ध चुनाव लाडे थे तथा चुनाव प्रचार के दौरान दोनों ही ने एक दुसरे पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए थे।दूसरा सवाल शिव सेना ने भाजपा के सामने यह भी रखा कि जब भाजपा महबूबा मुफ़्ती की पार्टी पी डी पी से जम्मू कश्मीर में गठबंधन कर सकती हो तो शिव सेना को कांग्रेस से आपत्ति क्यों ?
बहरहाल राजनीति में अनैतिकता का बोलबाला है,ऐसे वातावरण में आज राष्ट्रीय जनता दाल के प्रमुख लालू यादव को 2015 के बिहार विधान सभा के चुनाव परिणाम के सन्दर्भ में याद करना ज़रूरी है। भारतीय जनता पार्टी को बिहार की सत्ता से दूर रखने के लिए महागठबंधन बनाया गया था जिसमें नितीश कुमार के नेतृत्व वाली जनता दाल यूनाइटेड,लालू यादव की राष्ट्रिय जनता दाल तथा कांग्रेस पार्टी शामिल थे। जबकि भाजपा राम विलास पासवान की लोक जान शक्ति पार्टी के साथ चुनाव मैदान में थी। लालू यादव ने राज्य में नितीश कुमार की ‘विकास बाबू’ की छवि को सामने रखकर चुनाव लड़ा था लिहाज़ा सत्ता में आने पर मुख्यमंत्री नितीश ही बनेंगे यह उनका वादा था। चुनाव परिणाम आने पर राज्य जनता दाल यूनाइटेड को 71 सीटें मिलीं जबकि राष्ट्रिय जनता दाल को 80 व कांग्रेस पार्टी को 27 सीटें प्राप्त हुईं। उधर भाजपा को 53 व उसकी सहयोगी लोजपा को मात्र 2 सीटों पर संतोष करना पड़ा। इस चुनाव परिणाम बाद महाराष्ट्र की स्थिति की ही तरह सबकी नज़रें लालू यादव पर जा टिकी थीं। अनैतिकता की राजनीति के वर्तमान वातावरण में यह क़यास लगाए जाने लगे थे कि राज्य में सबसे बड़ी पार्टी में उभरी आरजेडी अपने वादे के अनुसार नितीश को मुख्यमंत्री बनने देगी या सबसे बड़े दल होने के नाते स्वयं मुख्यमंत्री पद का दवा करेगी। परन्तु अत्यंत संक्षिप्त राजनैतिक बाद लालू यादव ने अपने वेड पर क़ाएम रहते हुए कुमार मुख्यमंत्री बनाए जाने का रास्ता हमवार किया और अपने दोनों पुत्रों को नितीश मंत्रिमंडल में सम्मानपूर्ण जगह दिला दी। यानी सबसे बड़े दल के रूप उभरने के बावजूद मुख्यमंत्री पद के लिए नहीं अड़े। भले ही इस वादा वफ़ाई का बुरा नतीजा भुगतना पड़ा और आज तक वे भुगत भी रहे हैं।
उधर ठीक इसके विपरीत दूसरे नंबर पर आने वाली शिवसेना महाराष्ट्र में मुख्य मंत्री पद के लिए इस हद तक आई कि विधान सभा भंग होने तक की नौबत आ गयी। शिवसेना व भाजपा का अलग होना हिन्दुत्व के दो तथाकथित अलम्बरदारों का अलग होना है जो यह साबित करता है कि सत्ता व पद के आगे हिंदुत्व या हिंदुत्ववादी विचारधारा की कोई अहमियत नहीं जबकि साम्प्रदायिक ताक़तों को सत्ता से रोकने व धर्मर्निर्पेक्षता को मज़बूत करने की ख़ातिर लालू यादव ने 2015 में न केवल मुख्यमंत्री पद पर अपना दावा पेश नहीं किया बल्कि जनता से किये गए अपने चुनाव पूर्व वादे को भी निभाया। आगे चलकर नितीश कुमार ने कैसे राजनैतिक चरित्र का परिचय दिया वो भी पूरे देश ने देखा। इसलिए कहा जा सकता है वैचारिक व सैद्धांतिक दृष्टिकोण से महाराष्ट्र की राजनीति की तुलना में 2015 में बिहार में लिया गया लालू यादव का स्टैंड उद्धव ठाकरे की तुलना में कहीं ज़्यादा वैचारिक,सिद्धांतवादी व नैतिक प्रतीत होता है। शायद यही वजह है कि चारा घोटाला व भ्रष्टाचार के दूसरे आरोपों के बावजूद लालू यादव की धर्मनिर्पेक्ष छवि व उनकी लोकप्रियता अभी भी बरक़रार है। जबकि शिवसेना को पुत्रमोह, सत्तामोह तथा वैचारिक व सैद्धांतिक उल्लंघन का भी सामना करना पड़ रहा है।

प्रदूषण के उपाय
सिद्धार्थ शंकर
सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों और सरकारों को डांट-फटकार व चेतावनियों के बावजूद दिल्ली सहित उत्तर भारत के बड़े हिस्से में वायु प्रदूषण से निपटने को लेकर सरकारी तंत्र और जनप्रतिनिधियों में जिस तरह की उदासीनता और लापरवाही देखने को मिल रही है, वह हतप्रभ करने वाली है। शहरी विकास मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति ने दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के मुद्दे पर बैठक बुलाई थी, 29 में 25 सांसद बैठक से नदारद रहे। ज्यादातर वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इसे तवज्जो नहीं दी। दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए प्रयासों के नाम पर जो भी किया जा रहा है, उससे सर्वोच्च अदालत भी संतुष्ट नहीं है। इसीलिए उसे कहना पड़ा है कि दिल्ली सरकार की सम-विषम योजना एक तरह से आधा अधूरा प्रयास है। सम-विषम योजना के पीछे मूल भावना को लेकर किसी तरह का कोई संदेह नहीं है, लेकिन जिस तरह से इसे लागू किया जाता रहा है, उससे इस पर सवाल खड़े होते हैं। आपत्ति का बड़ा कारण तो दोपहिया, तिपहिया वाहनों को छूट दी गई है। फिर महिलाओं को इससे अलग रखा गया है। अगर वायु प्रदूषण से निपटने के लिए कोई ठोस योजना लागू करनी है तो उसे सब पर लागू किया जाना चाहिए, तभी उनके नतीजे देखने को मिलेंगे। दोपहिया और तिपहिया से होने वाले प्रदूषण की भागीदारी कारों के प्रदूषण से काफी ज्यादा है। सम-विषम योजना से छूट के प्रावधान इसकी गंभीरता को कम करते हैं। सच्चाई यह है कि हम वायु प्रदूषण को लेकर केवल विलाप कर रहे हैं, लेकिन उससे निपटने के उपाय खोजने के लिए हमारे पास वक्त है, न इच्छाशक्ति।
वायु प्रदूषण से उत्पन्न गंभीर हालात पर अगर सर्वोच्च अदालत सक्रियता और कड़ा रुख नहीं दिखाती तो सरकारें शायद इतना भी नहीं करतीं और लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया जाता। फिर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट ‘एयर पॉल्यूशन एंड चाइल्ड हेल्थ: प्रिसक्राइबिंग क्लीन एयर के हवाले से बताया गया है कि वर्ष 2016 में भारत में पांच वर्ष से कम वायु प्रदूषण के कारण मरने वाले बच्चों की संख्या एक लाख के करीब थी। यह संख्या विश्व में पांच वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों की वायु प्रदूषण से होने वाली मृत्यु का पांचवा भाग है। इन मौतों में पांच वर्ष से कम आयु की बच्चियों का प्रतिशत भारत में 55 प्रतिशत के लगभग है व पांच से 14 वर्ष की आयु के बीच यह प्रतिशत बढ़कर 57 प्रतिशत के लगभग हो जाता है। (वर्ष 2016 में 5 से 14 आयु वर्ग के बच्चों की वायु प्रदूषण से होने वाली मौतें 7000 हैं, जिसमें से बच्चियों की संख्या 4000 के लगभग हैं)। यदि हम भारत की तुलना इसके अन्य पड़ोसी देशों से करें तो बांग्लादेश में 11,487, भूटान में 37, चीन में 11,377, म्यांमार में 5,543, नेपाल में 2,086, पाकिस्तान में 38,252 एवं श्रीलंका में 2016 में 5 वर्ष से कम मरने वाले शिशुओं की संख्या 94 है। प्रति लाख बच्चों पर यह आंकड़ा 96.6 बच्चियां व 74.3 बच्चे हैं, जो 5 वर्ष से कम आयु वर्ग में आते हैं। वहीं 5 से 14 आयु वर्ग में प्रति लाख पर 3.4 बच्चियां व 2.3 बच्चे हैं। भारत में बढ़ते प्रदूषण का स्तर एक चिंता का विषय है परंतु आज इतने सारे संसाधनों होने के बावजूद भी हम प्रदूषण के स्तर को कम कर पाने में नाकाम ही साबित हुए हैं। भारत, जो कि एक विश्व शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, आज अफ्रीका के निम्न आय वर्ग के देशों के साथ, प्रदूषण नियंत्रण में नाकाम होने पर खड़ा है। हमारे देश के करीब एक दर्जन से अधिक शहर विश्व के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों की सूची में गिने जाते हैं। उत्तर-भारत का ‘कानपुरÓ शहर वर्ष 2016 में विश्व का सबसे प्रदूषित शहर घोषित हुआ है।
देश में नदियों के प्रदूषण स्तर में कोई सुधार नहीं हुए हैं। हालांकि नदियों की सफाई हेतु कार्य योजना व कार्यक्रम बनाए गए हैं परंतु काम होता नहीं दिख रहा है। जहां हम पहले थे आज भी वहीं खड़े हैं। पर्यावरण से जुड़े न्यायिक मामले देखने हेतु हमारे देश में एक राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण भी कार्य रहा है। साथ ही कई कार्यक्रम समय-समय पर सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे हैं। इसके बावजूद भी पर्यावरण के प्रति चेतना जगाने में समाज असफल रहा है।

मध्यप्रदेश के बेहतर विकास का भविष्य दृष्टा
माधवेन्द्र सिंह
मध्यप्रदेश सौभाग्यशाली है कि उसे मुख्यमंत्री के रूप में कमल नाथ जैसा वैश्विक सोच का भविष्य दृष्टा व्यक्तित्व मिला है। यह अलंकरण उन लोगों को अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है, जो कमल नाथ जी के व्यक्तित्व और कृतित्व से परिचित नहीं है। जिन्होंने केन्द्र में विभिन्न मंत्रालयों में मंत्री के रूप में और छिंदवाड़ा में बतौर सांसद उनके द्वारा करवाये गए क्षेत्र के चहुँमुखी विकास को न केवल देखा है बल्कि नजदीक से समझा है वे इस ‍विशेषण से सौ फीसदी सहमत होंगे।
कमल नाथ जी को जब भी जहाँ भी जो जिम्मेदारी मिली है उन्होंने उस क्षेत्र में बुनियादी बदलाव किए भविष्य की जरूरतों को देखकर निर्णय लिए, नीति बनाई और उसे जमीनी हकीकत में तब्दील किया। उन्होंने बहुत पहले यह समझ लिया था कि युवाओं को अगर रोजगार उपलब्ध करवाना हैं, तो शिक्षा के साथ कौशल विकास बहुत जरूरी है। जब वे रोजगार की बात करते है तो उनके मस्तिष्क में इंजीनियर, डॉक्टर या स्नातक-स्नातकोत्तर शिक्षा पाए लोगों की चिंता नहीं होती है बल्कि वे उस बेरोजगार के लिए भी सोच रखते है जो पाँचवीं, आठवीं पास है। उनका छिंदवाड़ा मॉडल का रोजगार क्षेत्र इसी सोच के अनुरूप बना है। उन्होंने शिक्षित लोगों के साथ अशिक्षित लोगों को रोजगार मिले इसके लिए ऐसी संरचना तैयार की कि लोग अपने कौशल विकास से सम्मानित रोजगार प्राप्त करने में सफल हुए। राजनीति में इस तरह की दृष्टि और उसे दिशा देने वाले नेता कमतर ही है।
बेहतर भविष्य की उनकी सोच हर क्षेत्र में इतनी गहरी है कि वह सतही परिवर्तन नहीं करती बल्कि वह मूल में जाकर जड़ों को मजबूत बनाती है। किसानों की ऋण माफी को वो कृषि क्षेत्र की हालात में सुधार लाने का समाधान नहीं मानते। वे इसे एक ऐसी राहत मानते हैं, जो किसानों को आगे बढ़ने के लिए या तनाव मुक्त होने में सहायक होती है। कृषि क्षेत्र को उन्नत बनाने के लिए उनकी स्पष्ट मान्यता है कि जब तक हम किसानों के बढ़ते हुए उत्पादन का उपयोग उनकी आय दोगुना करने में नहीं करेंगे तब तक किसानों के चेहरे पर मुस्कुराहट लाना असंभव है। जब वे मुख्यमंत्री बने और दो घण्टे के अंदर किसानों की ऋण माफी का निर्णय लिया तो वे इस बात के लिए अपनी पीठ नहीं थपथपाते कि उन्होंने 20 लाख किसानों का कर्ज माफ कर दिया और आने वाले दिनों 18 लाख किसानों का कर्ज और माफ करेंगे। कर्ज माफी के साथ ही उनकी खेती-किसानी को आय से जोड़ने की चिंता शुरू हो जाती है। वे खाद्य प्र-संस्करण इकाइयों की बात करते है। सोच है तो परिणाम मिलेंगे ही। आज प्रदेश में खाद्य प्र-संस्करण इकाईयां स्थापित हो रही हैं, कई स्थानों पर स्थापित हो गई हैं। इसके जरिए वे किसानों के उत्पादन से उनकी आय कैसे दोगुना हो, इस बारे में सोचना शुरू कर देते है। उन्होंने किसानों को कर्ज माफी, बिजली एवं अन्य सुविधाएँ देने के बुनियादी निर्णय लिए लेकिन उसके बाद उनके लिए एक समग्र योजना बनाना प्रारंभ कर दिया, जो आने वाले दिनों में किसानों की खुशहाली की दिशा में एक बड़ा क्रांतिकारी बदलाव का आधार बनेगी।
समाज के कमजोर तबके के प्रति उनकी संवेदनशील सोच का ही नतीजा था कि उन्होंने आते ही बुजुर्गों की पेंशन राशि को बढ़ाकर 300 से 600 रुपए किया जिसे वे 1000 रुपए तक बढ़ाएंगे। गरीब परिवार की कन्याओं के विवाह के लिये दिए जाने वाले अनुदान राशि को 28 हजार से बढ़ाकर 51 हजार रुपए कर दिया। यह मध्यप्रदेश के इतिहास में पहली बार है और अगर हम यह कहे कि ऐसा भी पहली बार हुआ जब बढ़ते हुए बिजली बिल को थामते हुए उन्होंने इंदिरा गृह ज्योति योजना के जरिए गरीब से लेकर मध्यम वर्ग तक को राहत पहुँचाई। एक मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने बिजली बिल के जो स्लेब निर्धारित किए, उससे लोगों की जेब को तो राहत मिली ही साथ ही ऊर्जा बचत के लिए भी उनका यह कदम आज के समय में उनकी भविष्य की बेहतर सोच का अनूठा उदाहरण है। आदिवासी समाज को साहूकारों के कर्ज से मुक्त करने का क्रांतिकारी निर्णय लिया, पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला लिया। ग्यारह माह में इतने बड़े फैसले और उन पर अमल भी शुरू हो गया। मुख्यमंत्री घोषणाएं नहीं करते हैं वे कहते हैं मैं काम करता हूँ और उन्होंने मध्यप्रदेश की बेहतर तस्वीर के लिए ऐतिहासिक बदलाव कर दिए।
विश्वास है तभी निवेश आएगा उनकी इस वन लाइनर सोच ने उनके 11 माह के शासनकाल में ‍प्रदेश में उद्योग और निवेश के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन की शुरूआत की है। कार्यभार सम्हालने के दो माह बाद ही उन्होंने मिंटो हॉल में मध्यप्रदेश में उद्योग, व्यापार, व्यवसाय से जुड़े लोगों की गोलमेज कॉन्फ्रेंस बुलवाई। कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य था प्रदेश में निवेश में आने वाली बाधाओं को जानना। यह जानना वे इसलिए जरूरी मानते हैं क्योंकि जब तक हम हमारे ही प्रदेश में उद्योग और व्यवसाय के क्षेत्र में काम कर रहे लोग अगर सरकार की उद्योग एवं निवेश नीति से असंतुष्ट है, तब हम नए निवेश की कल्पना कैंसे कर सकते हैं। वे कहते है कि यह हमारे ब्रांड एम्बेसडर हैं, अगर हमने इनकी समस्याओं का समाधान कर दिया तो ये ही लोग प्रदेश में नए निवेश की ब्रांडिंग करने में मददगार साबित होंगे। नीतियों को लेकर उनकी सोच ही अभिनव है। वे कहते है कि नीतियाँ वही सफल होती हैं, जो निवेश को या किसी अन्य को आकर्षित करती है उनकी मदद करती है। सिर्फ नीति बनाकर बैठ जाने से परिणाम हासिल नहीं होते। “मैग्नीफिसेंट मध्यप्रदेश” के आयोजन की सफलता इस बात का प्रतीक है कि उन्होंने अपने अल्प कार्यकाल में ही मध्यप्रदेश के प्रति उद्योग जगत और निवेशकों के विश्वास को प्राप्त किया। मुकेश अंबानी, आदि गोदरेज, इंडिया सीमेंट के श्रीनिवासन, रवि झुनझुनवाला से लेकर जितने उद्योगपति मैग्नीफिसेंट मध्यप्रदेश में शामिल हुए उन्होंने निवेश के क्षेत्र में मुख्यमंत्री की साहसिक सोच और दूरदृष्टि की सराहना की। आज के किसी राजनेता को यह खिताब मिलना दुर्लभता की श्रेणी में ही गिना जाएगा।
विरासत में मिले खाली खजाने और जर्जर अर्थ-व्यवस्था के बीच जो दायित्व कमल नाथ जी को मिला और उन्होंने अपने कुशल प्रबंधन के साथ जिस तरह सभी चुनौतियों का सामना किया उससे पता चलता है कि वे किस कद के नेता है। किसानों की कर्ज माफी आसान नहीं थी पर अपने इस वचन को उन्होंने जिस कौशल से पूरा किया, वह एक शोध का विषय है। वे उन नेताओं में शुमार नहीं है जो लोकप्रियता के लिए अर्नगल घोषणाएँ करते है। कांग्रेस का वचन-पत्र जब तैयार हो रहा था तो उन्होंने हर वचन को पूरा करने के लिए आने वाली चुनौतियों को समझा और उसके समाधान की भी तैयारी की। यही कारण है कि वे सरकार बनते ही मात्र 73 दिनों में 83 वचनों को पूरा करने जैसा बड़ा काम कर पाये।
त्वरित निर्णय, समय – सीमा, क्रियान्वयन, गुणवत्ता, परिणाम और समय प्रबंधन कमल नाथ जी के दैनंदिन काम का अहम हिस्सा है। इससे वे कोई भी समझौता नहीं करते है। वे जब विभागों की समीक्षा करते है तो उनकी विभागीय गतिविधियों के आकलन इन बिन्दुओं पर ही आधारित होते हैं। वे समस्या और उसके समाधान को जितनी शीघ्रता से समझते है, वह उनका दुर्लभ गुण है। वे योजनाओं की डिलेवरी सिस्टम पर जोर देते है। उन्होंने कहा कि योजनाएँ चाहे कितनी अच्छी हो लेकिन उसका क्रियान्वयन जमीन पर जरूरतमंदों को लाभान्वित नहीं कर रहा है तो वे सिर्फ हमारी सरकार की सजावट का ही हिस्सा है। वे इस सजावट को खत्म करके योजनाओं की क्रियान्वयन व्यवस्था को सुधारने के लिए निरंतर काम कर रहे हैं। वे हर काम की समय – सीमा का निर्धारण करते हैं। गुणवत्ता और परिणाम सुनिश्चित हो, इस पर उनकी पैनी निगाह रहती है। समय प्रबंधन के मामले में उनका कोई सानी नहीं है। अगर 11 बजे का समय दिया है तो कमल नाथ जी 11 बजने में पाँच मिनिट पहले पहुँच जाएँगे, लेकिन पाँच मिनिट बाद नहीं।
मुख्यमंत्री कमल नाथ की साफ नीयत और नीति, ईमानदार कोशिशों से मध्यप्रदेश में पिछले 10-11 माह में जन- उम्मीदें पूरी होने लगी हैं। ऊर्जावान सोच, बगैर शोरगुल, आत्म-प्रशंसा से दूर और सधे हुए कदमों के साथ उनकी पदचाप और उनके फैसलों की धमक, जन और तंत्र के बीच महसूस होने लगी है। पाँच साल बाद निश्चित ही मध्यप्रदेश की तस्वीर उज्जवल होगी और प्रदेशवासियों की तकदीर बेहतर होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

ब्रिक्स में भारत की धाक
सिद्धार्थ शंकर
ग्लोबल बिजनेस फोरम में अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक मंदी का जिक्र किया तो वहीं दुनिया में ब्रिक्स देशों के महत्व की भी चर्चा की। आतंकवाद का जिक्र करने के साथ ही पीएम मोदी ने आपसी संबंधों को मजबूती प्रदान करने के लिए सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया तो लंबे समय के लिए व्यावसायिक भागीदारी की तरफ इशारा भी कर दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्राजील की राजधानी ब्रासिलिया में आयोजित ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) सम्मेलन में शिरकत कर भारत की धाक जमा दी। ग्लोबल बिजनेस फोरम में अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक मंदी का जिक्र किया, तो वहीं दुनिया में ब्रिक्स देशों के महत्व की भी चर्चा की। आतंकवाद का जिक्र करने के साथ ही पीएम मोदी ने आपसी संबंधों को मजबूती प्रदान करने के लिए सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया तो व्यापार के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों को चिन्हित करने का सुझाव देकर लंबे समय के लिए व्यावसायिक भागीदारी की तरफ इशारा भी कर दिया। प्रधानमंत्री ने भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे ओपन अर्थव्यवस्था बताने के साथ बिजनेस फ्रेंडली एनवायरनमेंट का जिक्र करते हुए निवेशकों को भारत में निवेश का निमंत्रण भी दे दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह दौरा कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और सफल माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स सम्मेलन के इतर भी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मुलाकात की और संबंधों की पुरातनता के साथ ही महत्व की चर्चा कर द्विपक्षीय संबंधों को नया आयाम देने की प्रतिबद्धता दोहराई। पीएम मोदी ने अमेरिकी प्रायद्वीप के महत्वपूर्ण देश ब्राजील के राष्ट्रपति को जहां भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि आने का निमंत्रण दिया, वहीं भारत के पुराने मित्र रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी पीएम मोदी को अपने देश आने का न्योता दिया। पीएम मोदी ने रूसी राष्ट्रपति के साथ वार्ता में दोनों देशों के पुराने संबंधों का जिक्र किया। दोनों ही देशों ने स्पेशल और प्रिविलेज स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप को आगे बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की और इसे आगे बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की। इससे भारत और रूस के संबंधों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पड़ोसी देश चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बैठक में अपनी दोस्ती का जिक्र करते हुए व्यापार से जुड़े पहलुओं पर चर्चा की। दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच हुई वार्ता का लब्बोलुआब यह रहा कि सीमा पर शांति बनाए रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए दोनों देशों ने वर्षों पुराने सीमा विवाद के समाधान की दिशा में पहल करते हुए विशेष प्रतिनिधियों के बीच अगले दौर की वार्ता का ऐलान कर दिया।
बहरहाल, पीएम बनने के बाद पीएम मोदी ने छठी बार इस सम्मेलन में शिरकत की। यह भारत के लिए ब्रिक्स देशों के दूसरे चक्र की शुरुआत है। भारत के लिए यह संगठन काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह विकासशील देशों की उभरती हुई आवाज बन चुका है। ब्रिक्स देशों को विकसित देशों के आक्रामक संगठनों से तगड़ी चुनौती मिलती रहती है, इसके अलावा डब्लूटीओ से लेकर जलवायु परिवर्तन के मसले तक विकासशील देशों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में भारत का यह मानना है कि ब्रिक्स से ही विकासशील देशों के हितों की रक्षा हो सकती है। पिछले एक दशक में वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका बढ़ी है, ऐसे में भारत ब्रिक्स में भी लीडरशिप करना चाहता है। भारत ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर इस संगठन का आतंकवाद के प्रति रुख को सख्त बनाया है और इसकी वजह से आतंकवाद से निपटने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। आतंकवाद को ब्रिक्स देशों के शीर्ष एजेंडे में रखवाना वास्तव में भारत के लिए एक बड़ी सफलता है।

भारत के कालापानी-लिपुलेख पर नेपाल का दावा
अजित वर्मा
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के दो केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद जारी भारत के नए राजनीतिक नक्शे पर नेपाल ने आपत्ति जताई है। नेपाल ने दावा किया है कि उत्तराखंड के कालापानी और लिपुलेख उसके धारचूला जिले के हिस्से हैं। नेपाल ने कहा है कि संबंधित क्षेत्र को लेकर भारत से बात जारी है और ये मुद्दा अभी तक अनसुलझा है। वहीं भारत ने कहा है कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए विदेश सचिवों को जिम्मेदारी सौंपी गयी है। ऐसे में बातचीत के जरिये नेपाल से मतभेद को सुलझा लिया जाएगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता बताते हैं कि नए मानचित्र में भारत ने अपने ही हिस्से को दिखाया है। चूंकि पूर्ण राज्य जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बांट कर दो नए केंद्रशासित प्रदेश बनाए गए हैं। इसी के मद्देनजर नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया गया है। नए मानचित्र में भारत ने किसी नए भूभाग को अपने हिस्से में शामिल नहीं किया है। जहां तक नेपाल की आपत्तियों का सवाल है तो दोनों देश सीमा विवाद के मसले को सचिव स्तर की बातचीत में सुलझाने पर सहमत हैं। ऐसे में नेपाल की आपत्तियों को इसी बातचीत में सुलझा लिया जाएगा।
नेपाल के दावे को लेकर नेपाल सरकार के प्रवक्ता संचार और सूचना मंत्री गोकुल प्रसाद बास्कोटा ने कालापानी को नेपाल का अभिन्न अंग बताया है। संचार मंत्री ने कहा कि 58 वर्ष पहले नेपाल द्वारा कालापानी में जनगणना कराना ही इसका ऐतिहासिक प्रमाण है। उन्होंने संचार मंत्रालय द्वारा आयोजित किए गए नियमित पत्रकार सम्मेलन में कहा कि ’नेपाल और भारत के बीच जुड़े भू-भाग में से केवल दो प्रतिशत जगह पर ही सीमा विवाद है और इसका समाधान करना अभी बाकी है। हम राजनीतिक और कूटनीतिक पहल से प्रमाण के साथ इस विवाद का समाधान करेंगे। बास्कोटा ने नेपाल सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा भारत को सार्वजनिक राजनीतिक नक्शे पर अपनी धारणा स्पष्ट रूप से रख देने की बात भी कही है।

पाक की मति मारी गई…
सिद्धार्थ शंकर
अयोध्या मुद्दे पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पाकिस्तान ने यूनेस्को के मंच पर उठाकर अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया है। हालांकि, भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है, मगर इसकी कोई जरूरत नहीं थी। उसका तमाशा पूरी दुनिया देख रही है।
अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भारत के मुस्लिम समुदाय ने स्वीकार कर लिया। देश में भाई चारे का माहौल बना हुआ है। दोनों पक्षों ने जिस तरह की मिसाल पेश की, वह किसी भी देश के लिए नजीर है। दुनिया के कई देशों खासकर मुस्लिम देशों ने भी अयोध्या मुद्दे पर आए फैसले को भारत का अंदरूनी मानकर प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन पाकिस्तान इन सबसे अलग है। फैसला आने के दिन से पड़ोसी मुल्क में मातम पसरा है। वहां के लोगों की छोड़ो सरकार भी जाहिलों की तरह सोचने और करने लगी है। अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की चर्चा पाकिस्तान में खूब हो रही है। पाकिस्तानी मीडिया में भी इस फैसले को काफी तवज्जो मिली है। वहां की सेना से लेकर विदेश मंत्रालय तक की प्रतिक्रिया आ चुकी है। वहां के अखबार संपादकीय लिख रहे हैं कि भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में तोड़ी गई मस्जिद की जगह मंदिर बनाने की अनुमति दे दी है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस को अवैध बताया है लेकिन दूसरी तरफ मंदिर बनाने की अनुमति देकर अप्रत्यक्ष रूप से भीड़ की तोडफ़ोड़ का समर्थन भी किया है। शायद यह ज्यादा अच्छा होता कि कोर्ट किसी भी पक्ष की तरफदारी नहीं करता क्योंकि यह मुद्दा भारत में काफी संवेदनशील था और इसका संबंध सांप्रदायिक सौहार्द से भी है। कुछ ऐसी प्रतिक्रिया सरकार के स्तर पर भी आई थी। तब भारत ने पाकिस्तान की प्रतिक्रिया पर कड़ा ऐतराज जताया था और कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पाकिस्तान के बयान को हम अस्वीकार करते हैं। ये भारत का आंतरिक मामला है. यह कानून के शासन और सभी धर्मों, अवधारणाओं के लिए समान सम्मान से संबंधित है, जो उनका मामला नहीं है। विदेश मंत्रालय ने कहा था कि पाकिस्तान की समझ की कमी आश्चर्य की बात नहीं है। गौरतलब है कि अयोध्या का फैसला उस दिन आया था जब सिख श्रद्धालुओं के लिए करतारपुर कॉरिडोर खोला गया। पाकिस्तान को इस फैसले को सकारात्मक अंदाज में लेना चाहिए था, जो वह नहीं कर सका।
अब वह इससे भी एक कदम आगे निकल गया है। कश्मीर के मुद्दे पर दुनिया में अलग पडऩे के बाद भी पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया और यूनेस्को जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसने अयोध्या का मामला उठा दिया। पाकिस्तान के शिक्षा मंत्री शफाकत महमूद ने कहा था कि यह फैसला यूनेस्को धार्मिक स्वतंत्रता के मूल्यों के अनुरूप नहीं है। हालांकि, यूनेस्को के मंच पर उसकी दाल नहीं गली और भारत से खूब खरीखोटी सुनने को मिली। भारत ने कहा, पाक को हमारे अंदरूनी मामलों में टांग अड़ाने की मानसिक बीमारी है। भारत ने कहा कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से दुनिया परेशान है। अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी फैसला दिया है लेकिन पाक जिस तरह की घृणास्पद बातें फैला रहा है, वो निंदनीय है और उन्हें बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। निश्चित रूप से पाक के इस कदम के पीछे उसकी बौखलाहट है। वह कैसे भी भारत को घेरना चाह रहा है। इसीलिए कभी कश्मीर तो कभी अयोध्या जैसे मामलों को वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठा रहा है। दरअसल, पाक के साथ इस समय एक-दो को छोड़ कोई भी देश नहीं है। यही बात उसे अखर रही है। पाकिस्तान में इन दिनों ऐसे कई अंदरूनी मसले हैं, मगर वहां की सरकार उन पर ध्यान नहीं दे रही है। महंगाई आसमान छू रही है, उसे काबू में करने के प्रति इमरान सरकार के पास न कोई नीति है और न ही नीयत। संभव यह भी है कि पाकिस्तान एक दिन अपने देश की बढ़ती महंगाई के लिए भारत को ही जिम्मेदार ठहरा दे।

महाराष्ट्र; शर्मसार प्रजातंत्र
ओमप्रकाश मेहता
राष्ट्र के अंदर समाहित महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों के बाद पिछले एक पखवाड़े से ’पदलिप्सा‘ का नाटक खेला जा रहा है, और यहां राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद भी इस नाटक का पटाक्षेप नजर नहीं आ रहा है, अभी भी यहां के राजनेता अपनी गोटी फिट करने में व्यस्त है। ……और यदि सत्ता के अमृत के प्याले से चूकी भाजपा और उसके प्रधानमंत्री जी विरोधियों को प्रतिशोध का ”डोज़“ देने से बाज नहीं आए तो छ: महीनें बाद महाराष्ट्र में पुन: चुनाव के माध्यम से जनता की खून पसीने की कमाई का हजारों करोड़ रूपया फिर जाया होगा और देश की जनता को मूकदर्शक बनकर यह ’दुखांत नाटक‘ देखने को मजबूर होना पड़ेगा। आज की राजनीति का यह सबसे अहम्् दु:खद नाटक होगा, जिसने प्रजातंत्र को निर्वस्त्र होने को मजबूर कर दिया है। यदि देश के अन्य प्रान्तों में भी यही नाटक खेला जाने लगा तो देश के प्रजातंत्र की आयु अत्यंत अल्प हो जाएगी और फिर प्रजातंत्र के लिए आंसू बहाने के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं रहेगा।
देश की मोदी सरकार ने सामाजिक क्षेत्र से चाहे ’तीन तलाक‘ का कलंक मिटा दिया हो, किंतु राजनीतिक क्षेत्र में यह प्रथा जोर-शोर से जारी है और अब तो स्वयं भाजपा को ही इससे अभिशप्त होने को मजबूर होना पड़ रहा है। राष्ट्र के प्रमुख राज्य महाराष्ट्र में पिछले महीने राज्य विधानसभा के चुनावा सम्पन्न हुए, ये चुनाव भाजपा और शिवसेना ने एकजुट होकर लड़े थे और इस गठबंधन ने सत्ता के लिए जरूरी बहुमत का आंकड़ा भी हासिल कर लिया था, इसलिए परिणाम घोषित होने पर किसी की भी यह कल्पना नहीं थी कि महाराष्ट्र में किसी राजनीतिक नाटक के प्रहसन लिखे जा रहे हैं, बल्कि आशंका हरियाणा को लेकर थी जहां सत्तारूढ़ भाजपा बहुमत हासिल करने में कुछ पीछे रह गई थी किंतु वहां के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने जोड़तोड़ करके पूर्व कांग्रेस नेता के प्रपौत्र से राजनीतिक गठबंधन किया और सरकार बना ली, जबकि महाराष्ट्र में जहां सरकार आसानी से बनती नजर आ रही, वहां भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने चुनाव पूर्व वादे का रायता फैला दिया और स्थिति गठबंधन तोड़ने केन्द्र से अपने मंत्री का इस्तीफा दिलवाने और राजनीतिक गाली-गलौच तक पहुंच गई। शिवसेना की दलील थी कि भाजपाध्यक्ष अमित शाह के सामने चुनाव पूर्व सत्ता प्राप्ति पर पचास-पचास प्रतिशत भागीदारी की बात हुई थी, जिसमें मुख्यमंत्री का पद भी शामिल था, जबकि भाजपा पहले ही दैवेन्द्र फणनवीस को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा कर चुकी थी, इस दलीय विग्रह के बाद ’तीन तलाक‘ लागू हो गया और भाजपा अल्पमत में आ गई और अंतत: उन्होंने राज्यपाल को सरकार नहीं बनाने का टका सा जवाब दे दिया। इसके बाद शिवसेना ने कांगेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस की ओर रूख किया, किंतु दोनों दल एक सप्ताह तक फैसला नहीं कर पाए कि उन्हें शिवसेना के साथ सरकार बनाना है या नहीं, इधर राज्यपाल ने भाजपा के बाद शिवसेना से पूछा सरकार बना सकने के बारें में किंतु कांग्रेस व एनसीपी की ढीली नीति के कारण राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन की विधिवत घोषणा कर दी गई। किंतु इस नाटक का दु:खद अंत हो जाने के बाद शिवसेना व दोनों कांग्रेस ’मुर्दालोकतंत्र‘ में जान फूंकने के प्रयास जारी रखे हुए है और आश्वस्त है कि अगले छ: महीनें में तो वे बहुमत जुटा ही लेंगे।
यद्यपि शिवसेना का आरोप है कि राज्यपाल ने उन्हें समर्थन जुटाने का पर्याप्त समय नहीं दिया और कांग्रेस का कहना है कि राज्यपाल ने उन्हें अपना बहुमत सिद्ध कर सरकार बनाने का मौका ही नहीं दिया, लेकिन ये दल यही अपने आरोप सही भी मानते है तो यह क्यों भूलते है कि आज देश में मोदी के राज्यपाल है, और उनका नियंत्रण अघोषित रूप से केन्द्रीय गृहमंत्री के हाथों में है, जो अभी भी भाजपा के अध्यक्ष है।
इस प्रकार कुल मिलाकर इस नाटक को ’दु:खांत‘ बनाने में किसी एक दल विशेष की नहीं बल्कि महाराष्ट्र के सभी राजनीतिक दलों व कथित रूप से महामहिम राज्यपाल की भूमिकाएँ अहम्् रही। अब तो यही उम्मीद करें कि इसका मंचन किसी अन्य राज्य में न हों?
इस प्रकार कुल मिलाकर विश्व के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में कुछ ऐसे प्रयासों का शुभारंभ हो गया है, जिससे यहां के लोकतंत्र को केवल क्षति ही नहीं बल्कि खात्में तक की आशंका पैदा हो सकती है? जिस देश में ’कुर्सी‘ सबसे अहम्् मान ली जाए और देश व देशवासियों को गौण मान लिया जाए, वहां के लोकतंत्र की दुर्गति की कल्पना भी संभव नहीं है, इसलिए इस देश में तो अब प्रजातंत्र या लोकतंत्र का भगवान ही मालिक रहेगा। भगवान इस नाटक के पात्रों को सद्बुद्धि प्रदान करें।

मंत्री तोमर का नालों में उतर कर सफाई करना क्यों नींद उड़ा रहा है…!
नईम कुरेशी
उत्तर भारत में ग्वालियर शहर में कोलकत्ता के साथ् 1908 में बिजली और इससे भी काफी पहले शुद्ध पेय जल सिंधिया शासक ले आये थे। यहां कि नगर पालिका के तो स्वयं अध्यक्ष भी रहे थे। 1905 में दौलतगंज क्षेत्र लश्कर के बड़े सेठ को नगर पालिका के पार्षद भी थे। उन्होंने अपने दरवाजे पर एक बिना इजाजत चबूतरा बना लिया। तब के अध्यक्ष ने ये चबूतरा हटवाकर पार्षद पर 5 रुपये का जुर्माना भी लगा दिया था। इसके निर्माण में इसे भव्य बनाने में सिंधिया राजवंश के काम की सब तरफ तारीफें भी देखी सुनी जाती हैं।
आज ग्वालियर राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की ऊँचाई पर है। यहां का पर्यटन, स्मारक व संगीत इसे अपने आप में खास बनाये हुए है। उस्ताद अमजद अलि खाॅन साहब जैसे सरोद वादक व मीता पंडित के गायन को देश दुनिया में काफी नाम मिलता रहा है। यहां के ग्वालियर फोर्ट पर 1526 में मुगल बादशाह बाबर ने आकर 7 दिन तक ठहर कर भी यहां का विस्तार से वर्णन अपने बाबरनामे में 4 पेजों में कर इसके महत्व व यहां निर्माण कार्यों, वास्तुकला को भरपूर सराहा था। जिसे सिंधिया वंश ने 18-19 सदी में और आगे बढ़ाया पर आज पिछले 40 सालों में शहर का विकास काफी धीमा पड़ गया है। साफ सफाई भी गड़बड़ा चुकी है। यहां के नुमाइन्दों व नौकरशाहों में शहर की सफाई सड़कों के सुचारु निर्माण कर उन्हें ठीक ठाक रखने व पेयजल की समस्याओं पर पिछले 30 सालों में 3 से 4 हजार करोड़ों के घोटाले तो अमृत योजना के नाम पर किये गये न जांचें हुईं और न कोई दंडित हुआ। सियासतदां इन मामलों में कुछ ज्यादा दोषी लगते हैं। एक स्वर्ण रेखा नदी के 10 किलोमीटर तक के इलाके को बर्बाद कर उस पर सीमेंट, कांक्रीट से पक्का करा दिया गया। 400 करोड़ रुपये बर्बाद हो गये। इस नदी के किनारे के 200 से भी ज्यादा कुएँ व बाबड़ियाँ जो ज्यादातर रियासतकाल की थीं सूख गये कोई एक लाख लोगों को जल संकट में भांजे साहब ने झौंक दिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री से लेकर इस अन्याय के खिलाफ ग्वालियर में उपविधायकगण ठगे से खड़े रह गये।
आज का शहर ग्वालियर लापरवाह नगर निगम अतिक्रमणों व गन्दगी की राजधानी बनी हुई है। एक से पांच दिनों तक सफाई कर्मचारी नहीं आते। उनमें भी सफाई वालों को लेकर उनके दरोगा निरीक्षकों की कमजोर निगरानी व कुछ मिलीभगत से शहर की साफ सफाई चरमराई हुई है। निगम के ज्यादातर क्षेत्राधिकार जेड.ओ. थानेदारों की तरह सिर्फ उगाई में लगे हैं। सरकारी जमीनों पर मार्केट बनवाकर लाखों करोड़ों डकार रहे हैं। नाला सफाई के बजट के 80 फीसद तक फंड आपस में बांट लिया जाता है पर कोई सुनने को तैयार नहीं है। निगम की सड़कें अधिकतर महीनों में टूटती दिखाई दे रही हैं। इन पर कभी कार्यवाही भी कुछ भी नहीं होती। किसी को जेल भेज दें तो 50 फीसद भ्रष्टाचार रुक जायेगा। मंत्री, विधायक, कलेक्टर, निगम आयुक्त सब के सब परेशान हैं। कुछ पार्षदों का आरोप है कि पिछले 2 सालों में ही नगर निगम अफसरों ने सफाई कम्पनी से मिलकर 500 करोड़ का घोटाला तक कर लिया है। यहां के 66 पार्षदों में से आधे से भी ज्यादा खुद ठेकेदारी करते देखे जाते हैं। जो सड़क सीमेंटों की वो बनवाते हैं वो कहीं-कहीं एक महीने में ही खराब हो जाती है। पिछले 10 सालों में उपनगर ग्वालियर से दूसरी बार विधायक प्रद्यम्न सिंह तोमर पहले सियासतदां देखे गये जो आम जनता की मुश्किल परेशानी के लिये फौरन सड़कों पर आ जाते रहे थे। अस्पतालों की दुर्दशा से लेकर नगर निगम की साफ सफाई, गन्दे नालों से पनप रही महामारी डेंगू को पूरे प्रदेश में अपनी राजधानी बना चुकी है। तोमर इस मामले में पिछले एक महीने से आक्रामक होकर सफाई करने, खुद गहरे नालों में सफाई करते दिखाई दे रहे हैं। जिससे एक तरफ नगर निगम प्रशासन बेचैन हैं वहीं दूसरी तरफ उनके राजनैतिक विरोधियों की भी नींदें उड़ी हुई हैं। कांग्रेसी तो कांग्रेसी संघ वालों में भी तोमर को हीरो बताया जा रहा है।
निगम में भ्रष्टाचार
ग्वालियर में गंदगी के लिये जहां निगम अमले की कमियां यहां होने वाले भ्रष्टाचार हैं वहीं सियासी दांव पेच व खुद जनता की उदासीनता व जागरुक न होना है पर सत्ता दल वालों में महापौरों की बेवजह आलोचना करना वहां ऐसे आयुक्तों को पदस्थ करा देना जो महापौरों की न सुनकर सिर्फ उनकी सुनते थे भी रहा है। ग्वालियर के समीक्षा गुप्ता भी अच्छी संवेदनशील महापौर रहीं और विवेक शेजवलकर भी लाजवाब व मिलनसार, मृदुभाषी के तौर पर जाने जाते हैं पर उन्हें उनकी ही पार्टी वालों ने विपक्ष से ज्यादा उन्हें परेशान कराया। साफ सफाई के मामले में इन्दौर को छोड़कर कहीं भी खासतौर से ग्वालियर में ईमानदारी से कोशिशें नहीं की जा रही हैं। यहां के ज्यादातर पार्षद जब खुद ठेकेदार बन बैठे हों तथा वो साफ सफाई को शहर का मुद्दा ही न मानें तो क्या बन पडेगा। अफसर तो मीटिंगे करेंगे, निरीक्षण पर निरीक्षण करेंगे, बैठकों पर बैठकें और अंत में रिजल्ट तो शून्य का शून्य ही रहने वाला है। 1978-80 तक डाॅ. भागीरथ प्रसाद साहब ने व 83-84 में अनिल जैन साहब ने काफी बेहतर निजाम चलाया। ग्वालियर नगर निगम का नगरों में स्थानीय सरकारें बनते ही निजाम बिगड़ गया। ऊपर से लूटखसोट की सियासत इस सब पर मंत्री तोमर की गांधीगिरी से कुछ प्रभाव जरूर पड़ने वाला है। अब तक कोई आम जनता के लिये नालों में क्यों नहीं उतरा ये बड़ा सवाल है।

ये नेता नहीं, कुर्सीदास हैं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारतीय राजनीति के घोर अधःपतन का घिनौना रुप किसी को देखना हो तो वह आजकल के महाराष्ट्र को देखे। जो लोग अपने आप को नेता कहते हैं, वे क्या हैं ? वे सिर्फ कुर्सीदास हैं। कुर्सी के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। शिव सेना-जैसी पार्टी कांग्रेस से हाथ मिलाकर सरकार बनाने के लिए उतावली हो गई है। बाल ठाकरे से लेकर आदित्य ठाकरे ने कांग्रेस की कब्र खोदने में कौन-कौन-सी कुल्हाड़ियां नहीं चलाई हैं, उस पर उन्होंने कितनी बार नहीं थूका है लेकिन अब उसी कांग्रेस के तलुवे चाटने को आज शिव सेना बेताब है। बालासाहब ठाकरे स्वर्ग में बैठे-बैठें अब क्या सोच रहे होंगे, अपने उत्तराधिकारियों के बारे में ? मुझे उनकी वह पुरानी भेंट-वार्ता अभी भी याद है, जिसमें उन्होंने साफ-साफ कहा था कि भाजपा और शिव सेना में से जिसे भी ज्यादा सीटें मिलेंगी, मुख्यमंत्री उसी पार्टी का बनेगा। इसमें विवाद करने की जरुरत ही नहीं है। अभी भाजपा को 105 और शिव सेना को उससे लगभग आधी (56) सीटें मिली हैं। फिर भी वह अड़ी हुई है, मुख्यमंत्री पद लेने के लिए। अब यदि वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (54) से गठबंधन कर लेती है तो भी उसकी सीटें सिर्फ 110 होंगी याने कांग्रेस (44) की खुशामद के बिना वह सरकार नहीं बना सकती। मैंने तीन दिन पहले लिखा था कि यदि शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस मिलकर सरकार बना लें तथा भाजपा बाहर बैठी रहे तो उक्त तीन पार्टियों का भट्ठा बैठे बिना नहीं रहेगा। कोई ईश्वरीय चमत्कार ही इस उटपटांग सरकार को पांच साल तक चला सकता है। उसके बाद जो भी चुनाव होंगे, उसमें महाराष्ट्र की जनता इस बेमेल खिचड़ी को उलट देगी। महाराष्ट्र ही नहीं, सारा देश यह नज्जारा देखकर चकित है। लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि ये हमारे नेता हैं कि गिरगिटान हैं। उनके कोई आदर्श, कोई सिद्धांत, उनकी कोई नीति, कोई परंपरा, कोई मर्यादा भी होती है या नहीं ? यह बात सिर्फ शिव सेना पर ही लागू नहीं होती। भाजपा ने इस चुनाव में क्या किया है ? दर्जनों कांग्रेसियों को रातोंरात भाजपा में ले लिया है। उनमें से कुछ जीते भी हैं। वे कुर्सी के चक्कर में इधर आ फंसे। अब वे क्या करेंगे ? वे दल-बदल करने की स्थिति में भी नहीं हैं। वे मन-बदल पहले ही कर चुके। महाराष्ट्र में शिव सेना, राकांपा और कांग्रेस की सरकार चाहे बन ही जाए लेकिन उसे पता है कि केंद्र में भाजपा की सरकार है। वह क्या उसे चलने देगी ? पता नहीं, ये तीनों पार्टियां क्या सोचकर सांठ-गांठ कर रही हैं?

ए डी एच डी : बीमारी को अनदेखा तो नहीं कर रहे आप?
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
जो जीव /शिशु जन्म लेता हैं यदि वह जन्मजात रोगग्रस्त होता हैं या जन्म के बाद बाह्य संक्रमन से ग्रसित होता हैं .शिशु या मानव में रोग के स्थान दो होते हैं पहला शरीर और दूसरा मन .दोनों का एक दूसरे पर प्रभाव पड़ता हैं .कभी कभी शिशु के क्रियाकलापों से हम बहुत प्रभावित होते हैं पर कभी कभी वे रोगजन्य होते हैं .इस पर ध्यान रखना आवश्यक हैं .
हम सभी अपने बच्चे की परवरिश में अपना सर्वोत्तम देना चाहते हैं। लेकिन कई बार स्थितियां ऐसी होती हैं कि हम अपने बच्चे की बीमारी को नहीं पहचान पाते हैं, खासतौर पर अगर बीमारी उसकी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी हो। ऐसी ही एक दिक्कत या मेडिकल लैंग्वेज में कहें तो डिसऑर्डर है ADHD (Attention Deficient Hyperactive Disorder)यह डिसऑर्डर बच्चे की लर्निंग और सोशल ग्रोथ में दिक्कतें खड़ी करता है और बच्चा अपनी योग्यता के अनुसार रिजल्ट नहीं दे पाता है।
बच्चे शरारती होते ही हैं
हम सभी जानते हैं बच्चे शरारती होते ही हैं। लेकिन शरारती बच्चों और एडीएचडी डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चों में फर्क पहचानना बहुत जरूरी है। इस बीमारी के लक्षण आमतौर पर बच्चे में 3 से 4 साल की उम्र में दिखने शुरू हो जाते हैं और 12 से 13 साल की उम्र तक बने रहते हैं और बच्चे की चीजें सीखने की क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। जबकि कुछ बच्चों में ये लक्षण 20-25 की उम्र तक भी बने रह सकते हैं।
इस डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चों को अटेंशन(ध्यान ) और कंसंट्रेशन(एकाग्रता) से जुड़ी समस्याएं होती हैं। इनके लिए किसी एक चीज पर ध्यान बनाए रखना या किसी बात को ध्यान से सुनना मुश्किल होता है। यही वजह होती है कि पालक और शिक्षक की बताई गई बातों को ये ध्यान से नहीं सुनते हैं या याद नहीं रख पाते हैं, क्योंकि इनका ब्रेन लगातार ऐक्टिव रहता है और इससे इनकी याददाश्त पर बुरा असर पड़ता है।
इस डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चे बार-बार वही गलतियां दोहराते हैं, जिन्हें लेकर उन्हें पहले भी कई बार डांट पड़ चुकी होती है और समझाया जा चुका होता है। ये बच्चे किसी भी काम को बमुश्किल पूरा कर पाते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि ये बहुत देर तक किसी काम में ध्यान नहीं लगा पाते और पहले काम को बीच में ही छोड़कर तुरंत दूसरे काम में लग जाते हैं और दिनभर उछलकूद मचाते हुए इसी तरह की ऐक्टिविटीज दोहराते रहते हैं।
ए डी एच डी डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चे अक्सर अपना सामान खोते रहते हैं। जैसे, स्कूल बैग, बुक्स और लंच बॉक्स जैसी डेली यूज की चीजें संभालना भी उनके लिए मुश्किल रहता है और इन्हें याद नहीं रहता कि इन्होंने अपना सामान कहां रखा है?
ए डी एच डी से पीड़ित बच्चे हर समय बेचैन से रहते हैं, हाई एनर्जी फील करते हैं और एक साथ कई काम करने की कोशिश करते हैं।
जिन बच्चों को एडीएचडी की शिकायत होती है, वे बहुत बातें करते हैं और बहुत जल्दी गुस्सा भी हो जाते हैं। ये बहुत अधिक उछलकूद करते हैं, दूसरों के काम में दिक्कतें पैदा करते हैं या दो लोगों को आपस में बात भी नहीं करने देते हैं। ऐसे बच्चों को शांत होकर खेलने या आराम करने में दिक्कत होती है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि नॉर्मल IQ होने के बावजूद ये शिक्षण में उतना अच्छा कार्य नहीं कर पाते, जितना अच्छा करने की क्षमता इनके अंदर होती है।
अगर इस तरह के लक्षण आप बच्चे में देखते हैं तो इनके समाधान के लिए आप अपने नजदीकी पेडियाट्रिशियनशिशु रोग विशेषज्ञ या मनोरोग चिकित्सक से जरूर मिलें। इसका इलाज संभव है और बिहेवियर थेरपी के साथ-साथ कुछ एक्सपर्ट आपको कुछ जरूरी मेडिसिन्स भी बच्चे के लिए दे सकते हैं।
बच्चे से जुड़ी इस समस्या को पहचानने में पैरंट्स के साथ ही स्कूल टीचर्स का बहुत बड़ा योगदान हो सकता है। बच्चे को लेकर शिक्षकों का फीडबैक बहुत महत्वपूर्ण होता है। ताकि उसकी क्रियाकलापों को सही तरीके से समझकर, उसे बेहतर तरीके से चिकित्सा किया जा सके। यह रोग भविष्य में बहुत दुखद परिणति लाकर खड़ा देता हैं .शिशु ,परिवार और अपने भविष्य के प्रति एक प्रकार से जिम्मेदारी बन जाता हैं।

गुरु नानक देव जी ने भारत को जागृत किया
कमलनाथ
गुरु नानक देव जी मानवता में विश्वास रखने वालों और नि:स्वार्थ भाव से मानवता की सेवा में समर्पित लोगों के लिए अनन्य प्रेरणा-स्रोत रहे हैं। हम इस महान संत की 550 वीं जयंती मनाते हुए आध्यात्मिक रूप से स्वयं को धन्य समझते हैं।
नानक शाह फकीर जी की शिक्षाएं आज और भी ज्यादा प्रासंगिक हो गई हैं क्योंकि मनुष्य स्वरचित दुखों का सामना कर रहा है। सामाजिक, सांस्कृतिक एकता की भावना को खतरों का सामना करना पड़ रहा है और मानवीय मूल्यों में मनुष्य का विश्वास बुरी तरह डगमगा गया है। वर्षों पहले गुरुनानक देव जी ने इस तरह की स्थितियों की चेतावनी दी थी और सुधारवादी कदम भी सुझाए थे।
भारत के गौरवान्वित नागरिकों के रूप में हम गुरु नानक देव जी को अपने मार्गदर्शक और दार्शनिक के रूप में पाकर खुद को भाग्यशाली मानते हैं। आज, जब दुनिया में सांस्कृतिक विविधता के लिए नापाक ताकतों और कट्टरपंथी सोच ने खतरे पैदा किये है, हम अपने मार्गदर्शक के रूप में गुरु नानक देव जी की बानी पाकर धन्य हैं। वे सिर्फ सिख समुदाय के गुरु नहीं हैं। वे मानवता के महान आध्यात्मिक शिक्षक हैं क्योंकि वे मन और हृदय के विकारों से मुक्ति पर जोर देते हैं।
गुरु नानक देव जी सामाजिक-धार्मिक और सांस्कृतिक सद्भाव के प्रतीक हैं। गुरु नानक देव जी और भाई मरदाना का साथ एक अनूठा उदाहरण है। यह सांस्कृतिक एकता को रेखांकित करता है। दो महान पुण्यात्माएँ परस्पर आध्यात्मिक गहराई से एकाकार थी। भाई मरदाना गुरुजी से 10 साल बड़े थे और अपने अंतिम समय तक उनके साथ रहे। उन्होंने निरंकार की महिमा का गायन करते हुए दो दशकों तक एक साथ आध्यात्मिक यात्रा की। गुरुनानक देव जी गाते थे और भाई मरदाना उनके साथ रबाब पर संगत करते थे। वे विलक्षण रबाब वादक थे। यहाँ तक ​​कि उन्होंने इसे छह-तार वाला यंत्र बनाकर इसमें सुधार किया। उनका जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। संगीत का उनका ज्ञान श्री गुरु ग्रंथ साहिब में स्पष्ट झलकता है। उसे विभिन्न रागों में निबद्ध किया गया है। भाई मरदाना का उल्लेख श्री गुरु ग्रंथ साहिब में भी है। भाई गुरुदास जी ने लिखा है –
‘इक बाबा अकाल रूप दूजा रबाबी मरदाना।’
दुनिया को यह जानने की जरूरत है कि – ‘आदि सच, जुगादि सच, है भी सच, नानक होसी भी सच।’ इसका सीधा सा अर्थ यह है कि ईश्वर एक परम सत्य, सर्वव्यापी है। सिवाय उसके कुछ भी वास्तविक नहीं है । वह सर्वकालिक है। अनन्त था अनन्त रहेगा।
ज्ञान के ऐसे शब्दों से गुरु नानक देव जी ने भारत के लोगों को जागृत किया। उर्दू के दार्शनिक कवि अल्लामा इक़बाल ने कहा है –
‘फिर उठी आखिर सदा तौहीद की पंजाब से,
हिंद को एक मर्द-ए-कामिल ने जगाया ख्वाब से’
(एक बार फिर पंजाब से एक दिव्य आवाज उठी जिसने उद्घोष किया कि ईश्वर एक है। एक सिद्ध पुरुष गुरु नानक देव जी ने भारत को जगाया।)
गुरु नानक देव जी और भाई मरदाना ने कीर्तन की परंपरा शुरू की, जो आध्यात्मिक जागृति का माध्यम साबित हुई है। समानता के विचार को प्रदर्शित करने के लिए, उन्होंने लंगर के आयोजन की परंपरा शुरू की। वर्षों बाद हम समझ पाए हैं कि यह एक क्रांतिकारी धार्मिक सुधारवादी कदम था।
गुरु नानक देव जी ने भारत को आध्यात्मिक भव्यता दी। उन्होंने कहा कि आंतरिक जागृति ही मूल्यवान वस्तु है। उन्होंने घोषणा की कि सभी समान हैं और सभी दिव्य ऊर्जा से भरपूर है। अपनी आध्यात्मिक यात्राओं के माध्यम से गुरु नानक देव जी ने भारत को जागृत किया और इसकी महिमा को ऊँचाइयाँ दी।
गुरु नानक देव जी ने जो उपदेश दिया उसका पालन किया। उन्होंने अपने बोले प्रत्येक शब्द को आत्मसात किया और सामाजिक सुधार लाए। मानवता की भलाई के लिए हमारे पास उनके दर्शन की सबसे अच्छी सीख हैं। उन्होंने कहा- हमेशा सच्चाई के पक्ष में रहें और मानवता की सेवा के लिए तैयार रहें। हमेशा पाँच बुराइयों को दूर करें- काम, क्रोध, लोभ, मोह ,अहंकार। गुरु ज्ञान का सच्चा स्रोत होते हैं। गुरु पर विश्वास रखें।
आइए हम अपने दैनिक जीवन में गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं, वैश्विक भाईचारे व सांस्कृतिक अखंडता को मजबूत करने के लिए सदैव तैयार रहें।
(ब्लॉगर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं)

भाजपा के सामने अब चुनौती
सिद्वार्थशंकर
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण एक लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का एक मुख्य मुद्दा रहा है। आज यह पार्टी जो कुछ भी है, इसी मुद्दे की वजह से ही है। जहां एक तरफ सुप्रीम कोर्ट का फैसला भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों को कुछ समय तक प्रसन्नता देगा, वहीं पार्टी के सामने अब चुनौती होगी अपनी आगे की यात्रा के लिए नया एजेंडा तय करने की। यह मुद्दा लंबे समय तक लंबित रहा था, जिसने पार्टी को अपना आधार बनाने और समर्थकों को संगठित रखने में पार्टी की खासी मदद की, लेकिन अब यह मील का पत्थर पार होते ही सब कुछ पीछे छूट जाएगा, तब यह सोचना पड़ेगा कि इसके आगे क्या? यह भी सच है कि 2014 में भाजपा विकास के वादे के साथ सत्ता में आई थी। हमें यह नहीं पता कि 2024 के अगले आम चुनाव तक इसका कामकाज कैसा रहेगा।
पार्टी की जरूरत अब यह है कि वह अब किसी ऐसे बड़े मुद्दे को पहचाने और अपनाए, जो उसे सीधे लोगों से जोड़ता हो। जरूरी नहीं है कि पार्टी का नया एजेंडा किसी आस्था या किसी तरह धर्म से जुड़ा हुआ ही हो। मुद्दा, दरअसल ऐसा होना चाहिए जो लोगों को यह संदेश देने में कामयाब रहे कि पार्टी अपने मतदाताओं और समर्थकों का वास्तव में पूरा खयाल रखती है। यह मुद्दा विकास से जुड़ा हुआ भी हो सकता है। फिलहाल यह घोषणा कठिन है कि लोग 2024 तक किन मुद्दों को पसंद करेंगे। सुप्रीम कोर्ट के शनिवार के फैसले पर कुछ लोग अपना अति-उत्साह प्रदर्शित करने के लिए बढ़-चढ़कर आगे आ सकते हैं। ये ऐसे लोग हो सकते हैं, जो यह चाहेंगे कि भावनाएं भड़कें। अगर ऐसा हुआ, तो इस समय सरकार पर रोजगार के नए अवसर तैयार करने का जो दबाव बन रहा है, वह कुछ समय के लिए हल्का पड़ सकता है।
सर्वोच्च अदालत को जो फैसला आया है, उसमें केंद्र सरकार की अपनी कोई भूमिका नहीं है, लेकिन इस फैसले ने केंद्र सरकार को कुछ राहत तो दी ही है। खासकर आर्थिक मसलों पर सरकार के ऊपर जो दबाव बना था, वह इससे कुछ कम तो हुआ ही है, लेकिन यह एक अलग मसला है। हमें जो फैसला मिला है, वह सर्वोच्च न्यायालय का फैसला है, जिसने दशकों पुरानी एक समस्या को समाधान तक पहुंचाने की कोशिश की है। किसी भी तरह से इसके जरिये विभिन्न धर्मों के धर्मावलंबियों के बीच तनाव फैलाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। मोदी सरकार ने दूसरे कार्यकाल की छह महीने की छोटी अवधि में दशकों पुराने तीन मुद्दों (अनुच्छेद 370, राम मंदिर और समान नागरिक संहिता) में से दो मुद्दों का हल निकाल लिया। अनुच्छेद 370 निरस्त करने के बाद शुक्रवार को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की राह प्रशस्त हुई है। इससे पहले मोदी सरकार ने तीन तलाक को दंडनीय अपराध बनाया। हालांकि भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति की झोली में अब सिर्फ समान नागरिक संहिता का मुद्दा नहीं बचा है। इससे पहले सरकार धर्मांतरण विरोधी कानून, नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय जनसंख्या नीति को अमलीजामा पहनाने की तैयारी में है। दरअसल वर्तमान स्थिति भाजपा के हिंदुत्व की राजनीति के अनुकूल है।
लोकसभा में जहां पार्टी और राजग को प्रचंड बहुमत हासिल है, वहीं राज्यसभा में भी राजग धीरे धीरे बहुमत की ओर बढ़ रहा है। बीती सदी के नब्बे के दशक में हिंदुत्व की राजनीति का मुखर विरोध करने वाले कई विपक्षी दल नरम हिंदुत्व की राह पर हैं। इसी के परिणामस्वरूप उच्च सदन में बहुमत न होने के बावजूद सरकार अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और इससे पहले तीन तलाक को दंडनीय अपराध बनाने वाले बिल को पारित करा पाई। राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होने के बाद हिंदुत्व की राजनीति की गाड़ी की रफ्तार धीमी नहीं होगी। सरकार के पास इस राजनीति की गाड़ी को रफ्तार देने के लिए पर्याप्त मुद्दे मौजूद हैं। मसलन सरकार की रणनीति तीसरे हफ्ते से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में धर्मांतरण विरोधी बिल के साथ नागरिकता संशोधन बिल पारित कराने की तैयारी में है। इसके बाद सरकार के एजेंडे में नई जनसंख्या नीति तैयार करना है। अंत में सरकार देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की ओर कदम बढ़ाएगी।
खासतौर पर समान नागरिक संहिता लागू करने में केंद्र सरकार के समक्ष कोई अड़चन नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में जज रहते अपने एक फैसले में जस्टिस विक्रमजीत सिंह सहित एक अन्य जज ने समान नागरिक संहिता की वकालत की थी। हिंदूवादी संगठनों के एजेंडे में अयोध्या में राम मंदिर के साथ मथुर और काशी में भी मंदिर निर्माण की बात थी। हालांकि 1991 में संसद ने एक बिल को मंजूरी दी थी जिसमें 1947 के बाद धार्मिक स्थलों की यथास्थिति बरकरार रखने की बात कही गई है। इसमें तब अयोध्या को शामिल नहीं किया गया था। फिर सरकार ने ट्रस्ट गठन को लेकर भी एजेंडा साफ कर दिया है। सरकार इस मामले में जल्दबाजी के मूड में नहीं है। सरकार पहले कमेटी बनाएगी और कानूनी पहलुओं पर विचार करेगी। मतलब साफ है मंदिर बनने से पहले इस मुद्दे को पूरी तरह भुना लेना। वैसे सरकार के इस फैसले को कुछ लोग प्रशासनिक नजरिए से भी देख रहे हैं। शनिवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही विहिप ने ट्रस्ट में भागीदारी का दावा ठोक दिया है।
उधर, अखिल भारतीय संत समिति ने कहा है कि राम जन्मभूमि न्यास के पास करोड़ों हिंदुओं की तरफ से इकट्ठा हुई शिला व धन है। लिहाजा ट्रस्ट पहले इन संसाधनों का इस्तेमाल कर उसकी गरिमा को बरकरार रखे। निर्मोही अखाड़ा भी दावा पेश करने की तैयारी है। उससे सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में निर्मोही अखाड़ा से कहा है कि वह ट्रस्ट का हिस्सा बनने के लिए केंद्र सरकार के पास जा सकता है। इस ट्रस्ट के लिए मोदी सरकार को कई कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं पर फैसला करना होगा। साथ ही इसके कई पहलू भी हैं, जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ 2.77 एकड़ जमीन के मसले पर फैसला दिया है। बाकी बचे 64.23 एकड़ जमीन का क्या होगा इसका फैसला भी ट्रस्ट अपने हाथों में ले सकता है।
शेष जमीन को केंद्र सरकार ने 1993 में अधिगृहीत कर लिया था। इसमें 43 एकड़ जमीन विहिप के पास थी, जिसका उसने मुआवजा नहीं लिया है। इस आधार पर विहिप ट्रस्ट में शामिल होने का दावा कर सकता है। इसके अलावा करीब 20 एकड़ जमीन श्री अरविंद आश्रम समेत कई संगठनों की थी। इन्होंने केंद्र से इसका मुआवजा ले लिया था। यह मसला भी ट्रस्ट की जिम्मेदारी बनेगा। उम्मीद है कि मुआवजा लेने के बावजूद यह संगठन जमीन मंदिर के नाम दान कर देंगे। वहीं सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय के बाद अब राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। लेकिन भव्य राम मंदिर के निर्माण में अभी 5 साल का समय और लगेगा। इस फैसले का लंबे समय से इंतजार कर रहे विश्व हिंदू परिषद ने मंदिर का डिजाइन पहले से ही तैयार किया हुआ है।
राम मंदिर निर्माण की कार्यशाला से जुड़े एक पर्यवेक्षक के मुताबिक, भव्य राम मंदिर के निर्माण में अभी कम से कम 5 साल का समय और लगेगा और इस निर्माण कार्य के लिए 250 विशेषज्ञ शिल्पकारों की जरूरत होगी, जो बिना रुके व बिना थके मंदिर का निर्माण कर सकें। जो भी हो अभी तो भाजपा फायदे में है और मंदिर फैसले का पूरा श्रेय मिलने की आस भी है। लिहाजा भाजपा का हिंदुत्व मुद्दा अभी खत्म नहीं हुआ है, बल्कि यह शुरुआत है।

अपनो के निशाने पर गहलोत सरकार
रमेश सर्राफ धमोरा
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इन दिनों अपनी ही कांग्रेस पार्टी के नेताओं के निशाने पर आ रहे हैं। कुछ दिनों पहले गहलोत सरकार ने प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव में हाइब्रिड फार्मूला लागू किया था जिसको लेकर प्रदेश भर में बवाल मचा था। राजस्थान कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष व राजस्थान सरकार में उप मुख्यमंत्री सचिन पायलेट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के उस फार्मूले का डटकर विरोध किया था। परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास, खाद्य आपूर्ति मंत्री रमेश मीणा, सहकारिता मंत्री उदयलाल आंजना सहित कांग्रेस के कई विधायकों ने भी सरकार के फैसले को जन विरोधी बताते हुए पायलेट का समर्थन किया था।
सचिन पायलेट का कहना था कि कांग्रेस विधायक दल की बैठक में या केबीनेट की मिटिंग में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं लाया गया था। यहां तक कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी को भी इस बाबत कभी कोई जानकारी नहीं दी गयी थी। ऐसे में जन विरोधी फैसले को राज्य में कैसे लागू होने दिया जा सकता है। पायलेट का कहना था कि इस फार्मूले से तो कोई भी व्यक्ति बिना चुनाव लड़े ही पैसों के बल पर नगरीय निकायों का प्रमुख बन जायेगा। फिर वर्षों से पार्टी में काम करने वाले कार्यकर्ताओं का क्या होगा। उस वक्त मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल ने हाइब्रिड फार्मूले का बचाव भी किया था मगर अंतत: मामला कांग्रेस आलाकमान के पास दिल्ली तक पहुंचा और अशोक गहलोत को अपना हाइब्रिड फार्मूला वापस लेकर फिर से चुने गए पार्षदों में से ही नगरीय निकायों के अध्यक्ष बनाने का नियम लागू करना पड़ा था।
हाल ही में गहलोत सरकार ने भाजपा सरकार द्वारा प्रदेश में सडक़ों पर चलने वाले निजी वाहनों को टोल टैक्स से दी गई छूट को वापस लेने का निर्णय किया है जिसका भी कांग्रेस सहित सभी दलों में विरोध हो रहा है। नगरीय निकायों के चुनाव से पूर्व टोल टैक्स लागू करने के फैसले का खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है। टोल टैक्स को फिर से लागू करने के फैसले का भी गहलोत ने बचाव करते हुए कहा है कि टोल टैक्स की छूट निजी वाहन चलानेवालों को को दी जा रही थी जो टैक्स टोल टैक्स चुकाने में सक्षम है। भाजपा की पूर्ववर्ती सरकार द्वारा टोल टैक्स में दी गई छूट नियम विरुद्ध है। इसलिए राज्य सरकार ने इसे फिर से लागू करने का फैसला किया है।
इसी तरह अक्टूबर 2018 में वसुंधरा राजे सरकार ने प्रदेश के किसानों को उनके कृषि कुओं के बिजली बिलों में 833 रूपये प्रतिमाह का अनुदान देना का निर्णय किया था। जिस में भी अब बिजली कंपनियों के अधिकारी दिक्कत पैदा करने लगे हैं। बिजली विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कृषि उपभोक्ता पहले बिजली का पूरा बिल चुकाये फिर अनुदान की राशि उसके बैंक खाते में भेजी जायेगी। उपभोक्ता के खातों में जमा कराने के नियम से प्रदेश के आधे से अधिक किसान इस छूट का लाभ नही उठा पायेगें। प्रदेश में कई किसानों के भूमि का नामांतरण नहीं हुआ है तो कई किसानों के आपस में पारिवारिक विवाद चल रहे हैं। इसलिए एक साथ बैंक खाता नहीं खुल सकता है। इसमें किसानों को विभिन्न तरह की समस्या आ रही है। किसान संगठनों का कहना है कि पूर्व की भाजपा सरकार ने किसानों को मिलने वाले अनुदान को बिजली बिलों में ही समायोजित करने का जो फैसला किया था उसे ही बरकरार रखना चाहिए। बैंक खाते में अनुदान की राशि जाने से काफी किसानो को परेशानी उठानी पड़ेगी। अधिकतर किसानो का सामूहिक कृषि कनेक्शन है। कई कृषि कनेक्शन मृतको के नाम से ही चल रहे हैं उनका अभी तक नामान्तरण दर्ज नहीं हो पाया है। ऐसे में उनको अनुदान से वंचित रहना पड़ सकता है।
राजस्थान रोडवेज ने प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिदिन करीब 2 लाख किलोमीटर रूट पर बसों के परिचालन में कटौती कर दी है। जिससे गांव में परिवहन सेवा की पहुंच कम हो गई है। जिसका असर आम ग्रामीण पर पड़ रहा है। इससे गांवों के लोगों को आवागमन के साधनों की कमी महसूस होने लगी है। प्रदेश सरकार के इन फैसलों का सीधा असर गांव के गरीब, किसान, मजदूरों पर पड़ रहा है। प्रदेश में खनन माफिया पुलिस, प्रशासन पर भारी पड़ रहा हैं। प्रदेश भर में अवैध खनन जोरों पर हैं। खनन माफियाओं का दुस्सास इतना बढ़ गया है कि वह सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों पर भी हमला करने से नहीं चूक रहे हैं। पत्थर, रोड़ी, बजरी की ठेकेदारों द्धारा मनमानी कीमत वसूली जा रही है। प्रतिबंधित क्षेत्र में भी खनन का कार्य धड़ल्ले से जारी है।
बसपा से कांग्रेस में आए 6 विधायकों का विधायक दल में तो विलय हो गया है लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी कलह की वजह से अभी तक उन्हें प्रदेश कांग्रेस कमेटी कार्यालय में विधिवत रूप से कांग्रेस की सदस्यता नहीं प्रदान की गई है। जबकि उनको कांग्रेस में शामिल करने से पूर्व इस बात का वायदा किया गया था कि उन्हें सम्मान के साथ कांग्रेस में शामिल किया जाएगा। उनमें से कुछ विधायकों को मंत्री व कुछ विधायकों को विभिन्न निगम बोर्ड का अध्यक्ष बनाया जाएगा। लेकिन उनके साथ किया वायदा भी अभी अधर झूल में लटका हुआ है। मंत्रिमंडल के पुनर्गठन की मांग भी लंबे समय से चल रही है लेकिन अभी तक उस पर भी कोई निर्णय नहीं हो पाया है। प्रदेश में सत्ता व संगठन के गतिरोध के कारण विभिन्न निगम, बोर्ड, आयोग में गैर सरकारी सदस्यों,अध्यक्षों की नियुक्तियां नहीं हो पा रही है।
हाल ही में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव व राजस्थान के प्रभारी अविनाश पांडे ने जयपुर के एक निजी होटल में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलेट के बीच सुलह कराने के उद्देश्य से लम्बी चर्चा की लेकिन उसके अभी कोई नतीजे सामने नहीं आयें है। उस मीटिंग में बसपा से कांग्रेस में शामिल होने वाले पांच विधायकों से भी फेस टू फेस चर्चा की गई थी। उनकी शिकायत थी कि कांग्रेस ने उनसे किया वादा अभी तक पूरा नहीं किया है।
राजस्थान में विधानसभा की दो सीटो मंडावा व खींवसर के उपचुनावों में में कांग्रेस ने मंडावा सीट तो जीत ली मगर कांग्रेस के दिग्गज नेता हरेंद्र मिर्धा खींवसर सीट पर सांसद हनुमान बेनीवाल के भाई नारायण बेनीवाल के हाथों से हाथों पराजित हो गए। कांग्रेस की आपसी फूट मिर्धा की हार की प्रमुख वजह मानी जा रही है।
प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति बदतर हो रही है। आए दिन जगह-जगह बलात्कार की घटनाएं घट रही हैं। कांग्रेस सरकार के आने के बाद भी प्रदेश में कर्ज से परेशान होकर करीबन एक दर्जन किसानों ने आत्महत्या कर ली है। दिन दहाड़े सरेआम दुकानदारों को गोली मारकर लूटा जा रहा है। अपराधियों में बिल्कुल भी भय नहीं है। प्रदेश में अपराधी बेखौफ होकर अपराध को अंजाम दे रहे हैं। प्रदेश की जनता भय के साए में जीने को मजबूर हो रही है। इन सब परिस्थितियों के कारण प्रदेश की आम जनता को लगने लगा है कि उन्होंने कांग्रेस को वोट देकर कहीं गलती तो नहीं कर दी है।
यदि समय रहते कांग्रेस अपने सत्ता व संगठन के झगड़े को नहीं सुलटा पाती है तो उसका खामियाजा उसे आगे आने वाले निकाय व पंचायती राज चुनाव में उठाना पड़ेगा। आगे चलकर प्रदेश में सरकार के खिलाफ एक नकारात्मक वातावरण बनेगा जो सरकार के लिए खतरे की घंटी साबित होगा।

मंदिर विवाद का पटाक्षेप
सिद्धार्थ शंकर
2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे सुन्नी वक्फ बोर्ड, रामलला विराजमान और निर्मोही अखाड़ा के बीच अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद से जुड़े भूमि विवाद का पटाक्षेप हो गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस भूमि को 3 बराबर-बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ अलग-अलग पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी और इस साल अगस्त में मामले की नियमित सुनवाई शुरू की। 40 दिन की नियमित सुनवाई के बाद शनिवार को सुप्रीम कोर्ट ने शिया बोर्ड और निर्मोही अखाड़े के दावे को खारिज करते हुए रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच फैसला दिया। फैसले में कोर्ट ने विवादित भूमि पर मंदिर बनाने और अयोध्या में ही पांच एकड़ जमीन मस्जिद के लिए देने का आदेश दिया। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली खण्डपीठ में जस्टिस एसए बोबड़े, जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल थे। इस खण्डपीठ ने जो फैसला दिया है, वह इस लिहाज से ऐतिहासिक है, क्योंकि कोर्ट के सामने मामले का समाधान करने के साथ ही दोनों पक्षों को संतुष्ट करना भी था। इस फैसले से पहले पूरे देश का माहौल जिस तरीके से तनावपूर्ण था, उसे देखते हुए भी सुप्रीम कोर्ट के सामने फैसले में सामंजस्य बैठाना जरूरी हो गया था। हालांकि कोर्ट ने जो फैसला दिया, उस पर आपत्ति किसी को नहीं है और सभी सहमत हैं। इसी परंपरा को कायम करने की अपील काफी दिनों से की जा रही थी। देश के सौहार्द्र को कायम रखने की जो मिसाल लोगों ने दिखाई है, वह उम्दा है। अगर पूरे विवाद पर नजर डालें तो अयोध्या विवाद करीब साढ़े चार सौ साल से भी ज्यादा पुराना है। राम मंदिर और बाबरी मस्जिद को लेकर दो समुदायों के बीच यह विवाद 1528 से चला आ रहा है। 1885 में मामला पहली बार कोर्ट पहुंचा। महंत रघुवर दास ने फैजाबाद की अदालत में मुकदमा दर्ज कर विवादित ढांचे में पूजा की इजाजत मांगी। इसके बाद 1886 में फैजाबाद कोर्ट ने फैसले में कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मस्जिद हिंदुओं के पवित्र स्थल पर बनी है। बता दें कि 1853 में मंदिर-मस्जिद विवाद को लेकर पहली बार हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हिंसा हुई। हिंदुओं ने आरोप लगाया कि भगवान राम के मंदिर को तोडक़र मस्जिद का निर्माण हुआ। निर्मोही अखाड़े के महंत रघुबर दास ने फैजाबाद कोर्ट में मस्जिद परिसर में मंदिर बनवाने की अपील की पर कोर्ट ने मांग खारिज कर दी। ब्रिटिश सरकार ने दीवार और गुंबदों को फिर से बनवाया। कहा जाता है कि 1949 में मस्जिद में श्रीराम की मूर्ति मिली। इस पर विरोध व्यक्त किया गया और मस्जिद में नमाज पढऩा बंद कर दिया गया। फिर दोनों पक्षों ने लोग कोर्ट पहुंच गए। इसपर सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित कर ताला लगवाया दिया। अयोध्या विवाद एक राजनीतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक-धार्मिक विवाद है जो नब्बे के दशक में सबसे ज्यादा उभार पर था। इस विवाद का मूल मुद्दा राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद की स्थिति को लेकर है। विवाद इस बात को लेकर है कि क्या हिंदू मंदिर को ध्वस्त कर वहां मस्जिद बनाया गया या मंदिर को मस्जिद के रूप में बदल दिया गया।
मुगल शासक बाबर 1526 में भारत आया। 1528 तक वह अवध वर्तमान अयोध्या तक पहुंच गया। बाबर के सेनापति मीर बाकी ने 1528-29 में एक मस्जिद का निर्माण कराया था। यह अभी भी रहस्य है कि क्या मंदिर को तोडक़र मस्जिद बनवाई गई या मंदिर की ही मस्जिद के अनुसार बदला गया किन्तु यहां पर आकर यहां की धार्मिक भावनाओं के विपरीत कार्य किये और इस्लाम धर्म को बढ़ाने के लिए हिन्दुओं को जबरदस्ती मुस्लिम बनाया, लगभग 90 फीसदी मुस्लिम पहले हिन्दू ही थे जिनका धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम बनाया गया है, अत: मुस्लिम समाज (पूर्व मे हिन्दू समाज) को राम मंदिर बनने की संभावना है, और सबको पता है कि बाबरी मस्जिद की जगह पहले रामलला ही विराजमान थे। 1528 में राम जन्म भूमि पर मस्जिद बनाई गई थी। हिन्दुओं के पौराणिक ग्रन्थ रामायण और रामचरित मानस के अनुसार यहां भगवान राम का जन्म हुआ था।
बता दें कि 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी। 21 मार्च 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से विवाद सुलझाने को कहा। 19 अप्रैल 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित भाजपा और आरएसएस के कई नेताओं के खिलाफ आपराधिक केस चलाने का आदेश दिया।
8 मार्च 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के राम मंदिर और बाबरी मस्जिद मामले को मध्यस्थता के लिए भेज दिया। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच जजों वाली पीठ ने तीन सदस्यों को मध्यस्थता समिति का सदस्य बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस फकीर मोहम्मद इब्राहिम खलीफुल्ला इस समिति के प्रमुख थे। उनके अलावा पैनल में आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू भी शामिल किया गया। हिंदू महासभा के वकील वरुण कुमार सिन्हा ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि मध्यस्था के हमारे पुराने अनुभव बुरे ही रहे हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इसपर विचार करना चाहिए।
मध्यस्थता की कोशिशें नाकाम होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामला अपने हाथ में लिया और ४० दिन तक नियमित सुनवाई की। ९ नवंबर २०१९ को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए पूरे विवाद का पटाक्षेप कर दिया। १०४५ पन्नों वाले फैसले में शीर्ष कोर्ट ने न सिर्फ विवाद का समाधान दिया, बल्कि देश को इस तरह के मामलों में आपसी एकता बनाए रखने और धैर्य से काम लेने का संदेश भी दिया। उम्मीद है कि अब हिन्दू और मुस्लिमों के बीच उन्माद का कारण बनने वाला यह विवाद सदा-सदा के लिए खत्म हो जाएगा और देश मंदिर-मस्जिद से आगे की सोच सकेगा।

भारत-सऊदी संबंधों का नया दौर
योगेश कुमार गोयल
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सऊदी अरब यात्रा को दोनों देशों के बीच संबंधों में नई ऊर्जा भरने के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रधानमंत्री ‘फ्यूचर इन्वेस्टमेंट इनिशिएटिव’ फोरम (दावोस इन द डेजर्ट) में शामिल होने के लिए दो दिन के दौरे पर सऊदी अरब गए थे, जहां दोनों देशों के बीच तेल एवं गैस, रक्षा तथा नागर विमानन सहित विभिन्न प्रमुख क्षेत्रों में कई अहम समझौते हुए। मोदी की सऊदी यात्रा के दौरान दो महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, जिनमें से एक है ‘इंडियन स्ट्रैटिजिक पैट्रोलियम रिजर्व लिमिटेड’ तथा ‘सऊदी आरामको’ के बीच हुआ समझौता, जिसके तहत सऊदी अरब कर्नाटक में तेल रिजर्व रखने का दूसरा प्लांट बनाने में अहम रोल अदा करेगा। दूसरा समझौता है, भारत के इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन की पश्चिमी एशिया यूनिट तथा सऊदी अरब की अल-जेरी कम्पनी के बीच हुआ समझौता। इस यात्रा के दौरान ‘भारत-सऊदी अरब रणनीतिक साझेदारी परिषद’ के गठन की घोषणा भी की गई, जिसमें दोनों देशों का नेतृत्व शामिल होगा, जो भारत को अपनी उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा करने में मदद करेगा। इस परिषद की अगुवाई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान करेंगे और परिषद दो वर्ष के अंतराल पर मिला करेगी।
सऊदी अरब ही वह प्रमुख देश है, जिसकी मुस्लिम देशों में भारत की पैठ बनाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है और वह ऊर्जा क्षेत्र तथा आर्थिक मोर्चे के साथ-साथ कूटनीतिक मोर्चे पर भी भारत के प्रमुख सहयोगी के रूप में तेजी से उभरा है। हालांकि एक समय था, जब भारत और सऊदी अरब के बीच संबंध इतनेे बेहतर नहीं थे। इसका सबसे बड़ा कारण था कि सऊदी अरब को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में देखा जाता था, जिसकी नीति सदैव पाकिस्तान परस्त और पाक समर्थित ही रही और जो भारत के विरूद्ध पाक प्रायोजित आतंकवाद को धन तथा अन्य संसाधन मुहैया कराता था। तब सऊदी अरब हर कदम पर पाकिस्तान के साथ ही खड़ा नजर आता था लेकिन भारत की 2008 में शुरू हुई ‘लुक ईस्ट नीति’ के बाद से वह धीरे-धीरे भारत के करीब आ रहा है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अब तक दो बार की सऊदी अरब यात्राओं के बाद दोनों देशों के संबंधों में व्यापक सुधार देखा जा रहा है। पिछले तीन वर्षों में प्रधानमंत्री की यह दूसरी सऊदी यात्रा थी। इससे पहले वे 2016 में सऊदी अरब गए थे और तब वहां के बादशाह सलमान ने उन्हें सऊदी अरब के ‘सर्वोच्च नागरिक सम्मान’ से सम्मानित किया था। उसके बाद इसी साल पुलवामा हमले के बाद दोषियों को सजा दिलाने की भारत की वैश्विक मुहिम को अंतर्राष्ट्रीय समर्थन मिलने के दौर में सऊदी क्राउन प्रिंस भारत के दौरे पर आए थे। भारत यात्रा के दौरान उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ भारत की मुहिम का समर्थन किया था। उस दौरान दोनों देशों के बीच पांच महत्वपूर्ण समझौते भी हुए थे।
यह भारत की आर्थिक और कूटनीतिक सफलता ही है कि एक ओर वह सऊदी अरब को एक बड़े व्यापारिक साझेदार के रूप में जोड़ने में सफल रहा है, वहीं सऊदी अरब भारत के रूख को समझते हुए कश्मीर को अब भारत का आंतरिक मामला मानता है और संकेत दे चुका है कि इस मुद्दे पर वह अब पाकिस्तान के पक्ष में नहीं है। गौरतलब है कि मोदी और सऊदी अरब के युवराज के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के बाद जारी संयुक्त बयान में दोनों देशों के आंतरिक मामलों में सभी रूपों में हस्तक्षेप को खारिज कर दिया गया। प्रधानमंत्री की इस बार की सऊदी यात्रा के बाद दोनों पक्ष रक्षा तथा सुरक्षा क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमत हुए हैं और अब दोनों देश अपना पहला संयुक्त नौसैनिक अभ्यास मार्च 2020 में करेंगे। भारत तथा सऊदी अरब के घनिष्ठ होते संबंधों की अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि पाकिस्तान के लाख प्रयासों के बावजूद सऊदी अरब अब भारत को पूरा महत्व देने लगा है। सऊदी अरब के लिए भारत उन आठ बड़ी शक्तियों में से एक है, जिनके साथ वह अपने ‘विजन 2030’ के तहत रणनीतिक साझेदारी करना चाहता है। भारत के साथ संबंधों में सुधार के पीछे उसके सहयोग का यह भी एक बड़ा कारण है। आपसी संबंधों को बेहतर करने की दिशा में दोनों देश अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अब लगातार दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय दे रहे हैं।
सऊदी अरब ने बेहद बुरे समय में भी हमेशा पाकिस्तान की भरपूर मदद की है और पाकिस्तान के साथ उसके रिश्ते आज भी अच्छे ही हैं लेकिन इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने के बाद तुर्की और मलेशिया के एकदम विपरीत जिस प्रकार का सकारात्मक रूख सऊदी ने दिखाया और कश्मीर मुद्दे पर बढ़ते संकट को लेकर पाकिस्तान को चेताया भी, उससे भारत-सऊदी संबंधों की ऊष्मा को महसूस किया जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के तमाम प्रोपेगेंडा के बाद भी सऊदी साफ संकेत दे चुका है कि वह कश्मीर मसले पर भारत की चिंताओं और संवेदनशीलता को समझता है। सऊदी अरब कश्मीर मसले पर भारत के रूख का सम्मान करते हुए यह मानने लगा है कि भारत जो भी कर रहा है, अपनी आबादी की बेहतरी के लिए कर रहा है। पाकिस्तान का प्रमुख सहयोगी माना जाने वाला सऊदी अरब ही अगर अब क्षेत्र को आतंकवाद मुक्त बनाने के भारत के अभियान में उसका पक्ष ले रहा है और इस चुनौती से निपटने के लिए पूर्ण सहयोग देने की प्रतिबद्धता जता रहा है तो भारत की इससे बड़ी कूटनीतिक सफलता और कोई हो भी नहीं सकती। बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत को आतंकवाद के मुद्दे पर सऊदी अरब का समर्थन भारत के बढ़ते महत्व और सकारात्मक कूटनीति का ही परिणाम है।
भारत और सऊदी अरब के बीच प्रगाढ़ होते संबंधों का सीधा असर अब सऊदी-पाकिस्तान के संबंधों पर देखा जा रहा है, जिसकी बानगी पिछले दिनों देखने को भी मिली। संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में हिस्सा लेने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान सऊदी क्राउन प्रिंस के विमान में ही न्यूयार्क गए थे और उस समय प्रिंस ने इमरान को सख्त हिदायत भी दी थी कि वह संयुक्त राष्ट्र के मंच पर कश्मीर का मुद्दा न उछालें और इस मुद्दे को दूसरे इस्लामिक राष्ट्रों से भी न जोड़ें लेकिन जब इमरान ने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में इसी मुद्दे को पुरजोर तरीके से उछालते हुए भारतीय प्रधानमंत्री को सीधे-सीधे निशाना बनाने की कोशिश की तो उनकी इस हरकत से सऊदी प्रिंस इस कदर खफा हुए कि उन्होंने अपना विमान ही वापस बुला लिया था, जिसके बाद इमरान को कमर्शियल प्लेन से अपने वतन लौटना पड़ा था। सऊदी अरब की इस नाराजगी को भांपते हुए इमरान ने पिछले माह इसीलिए दोबारा सऊदी का दौरा किया था।
पिछले कुछ वर्षों में भारत और सऊदी अरब के बीच व्यापारिक रिश्ते काफी मजबूत हुए हैं और दोनों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा है। सही मायनों में पिछले कुछ समय में सऊदी अरब विभिन्न मोर्चों पर भारत का एक भरोसेमंद साथी ही साबित हुआ है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है, जो अपनी जरूरतों का करीब 83 फीसदी तेल आयात करता है और इराक के बाद भारत के लिए सऊदी अरब ही दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है, जो भारत का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी बन गया है। दोनों देशों के संबंधों के पुख्ता होने का स्पष्ट संकेत देती सबसे अहम बात यह है कि तेल के उत्पादन में 50-60 फीसदी कमी हो जाने के दिनों में भी सऊदी ने कभी भी भारत को तेल देने में आनाकानी नहीं की। वर्ष 2017-18 में दोनों देशों के बीच 27.48 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था और अब सऊदी अरब भारत में 100 अरब डॉलर का निवेश करने जा रहा है, जो ऊर्जा, रिफाइनरी, पैट्रोकेमिकल्स, कृषि तथा खनन क्षेत्र में होगा। दूसरी ओर भारत भी सऊदी में स्मार्ट सिटी, रेड सी टूरिज्म, एंटरटेनमेंट सिटी जैसी परियोजनाओं में हिस्सेदारी बढ़ा रहा है। भारत अपनी आवश्यकताओं का 18 फीसदी कच्चा तेल तथा 32 फीसदी एलपीजी सऊदी से ही आयात करता है और वहां से करीब 22 अरब डॉलर के पैट्रो पदार्थ खरीदता है। 2018-19 में सऊदी अरब ने भारत को 40.33 मिलियन टन क्रूड ऑयल बेचा था। सऊदी में 27 लाख से भी ज्यादा भारतीय रहते हैं, जिनमें से करीब 15 लाख वहां रोजगार कर रहे हैं और इन्हीं के जरिये प्रतिवर्ष भारत में 11 बिलियन डॉलर से भी अधिक विदेशी मुद्रा आती है।
ऐसा नहीं है कि केवल भारत को ही सऊदी अरब की जरूरत है बल्कि आजकल जिस तरह का वैश्विक माहौल है, उसके चलते सऊदी को भारत की भी उतनी ही जरूरत है। वैश्विक मंचों पर जिस प्रकार भारत की हैसियत लगातार बढ़ रही है, ऐसे में सऊदी भी विभिन्न क्षेत्रों में भारत के साथ साझेदारी करना चाहता है। पूरी दुनिया जिस तरह की आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही है, उससे सऊदी भी अछूता नहीं है। सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था तेल पर ही निर्भर रही है लेकिन कच्चे तेल के दामों में गिरावट से वह पहले से ही परेशान है। दूसरी ओर यमन के साथ लड़ाई में शामिल होने के चलते उसका खर्च काफी बढ़ गया है। यही कारण है कि उसने अब तेल और गैस के व्यापार से बाहर निकलकर दूसरे क्षेत्रों में भी निवेश कर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के प्रयास शुरू किए हैं। भारत के अलावा अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया इत्यादि देशों के साथ संबंधों में सुधार की कवायद के पीछे यह भी बहुत महत्वपूर्ण कारक है। सऊदी अरब अब अपनी कट्टर मुस्लिम राष्ट्र की छवि से बाहर निकलने की लगातार कोशिश कर रहा है, जिसके चलते उसने अपने वहां महिलाओं को कई प्रकार के अधिकार भी दिए हैं। सऊदी अरब के इस तरह के प्रयासों की पूरी दुनिया ने सराहना की है। बहरहाल, जहां भारत और सऊदी अरब के प्रगाढ़ होते संबंधों से दोनों देशों में बढ़ते आपसी कारोबार के चलते दोनों में ही आर्थिक तरक्की के नए रास्ते खुलेंगे, वहीं इन रिश्तों में नई ऊर्जा भरने से आने वाले समय में एशिया महाद्वीप के राजनीतिक समीकरण भी नए रूप में सामने आ सकते हैं।

रियल एस्टेट को डोज
सिद्धार्थ शंकर
सरकार ने अटकी परियोजनाओं में फंसे मकान खरीदारों और रीयल एस्टेट कंपनियों को बड़ी राहत देने की घोषणा करते हुए 25,000 करोड़ रुपए का फंड देने का ऐलान किया है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि देशभर में 1600 हाउसिंग प्रोजेक्ट और 4.58 लाख यूनिट्स (घर या फ्लैट्स) अटके पड़े हंै। सरकार इस वैकल्पिक निवेश कोष (एआईएफ) में 10,000 करोड़ रुपए डालेगी जबकि शेष 15,000 करोड़ रुपए का योगदान स्टेट बैंक और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की ओर से किया जायेगा। इससे कोष का समूचा आकार 25,000 करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगा। इस कोष के तहत केवल रेरा में पंजीकृत परियोजनाओं पर ही विचार किया जायेगा। वित्त मंत्री ने साफ किया कि यह राहत उन्हीं परियोजनाओं को मिलेगी, जो लटके हैं। परियोजना यदि शुरू ही नहीं हुई है तो इस कोष से कोई राहत नहीं मिलेगी। उदाहरण के लिए यदि किसी परियोजना में तीन टावर बनने हैं, उसमें एक टावर में 50 प्रतिशत काम हुआ है, दूसरे में 30 प्रतिशत और तीसरे में कोई ही काम नहीं हुआ है, तो हम सबसे पहले 50 प्रतिशत पूरी हुई परियोजना को कोष उपलब्ध कराया जाएगा। सरकार की इस पहल से न केवल अर्थव्यवस्था में रोजगार पैदा होंगे बल्कि सीमेंट, लोहा और इस्पात उद्योग की भी मांग बढ़ेगी। इस फैसले का उद्देश्य अर्थव्यवस्था के इस प्रमुख क्षेत्र पर बने दबाव से उसे राहत पहुंचाना भी है।
सरकार ने रियल एस्टेट कारोबार को मंदी से उबारने की दिशा में जो पहल शुरू की है उससे यह उम्मीद बंधती है कि सरकार आने वाले दिनों में ऐसे बड़े कदम उठाएगी, जिनसे इस क्षेत्र में पिछले चार-पांच साल से चला आ रहा संकट खत्म हो और बिल्डरों के साथ-साथ ग्राहकों का भी भला हो। अभी तक रियल एस्टेट क्षेत्र एक तरह से दम तोड़े हुए है। जायदाद खरीदने-बेचने का कारोबार करने वाले सड़क पर हैं और सिर्फ बड़े कारोबारी थोड़ी-बहुत हिम्मत से डटे हैं। रियल एस्टेट में लंबे समय से खरीदार नहीं हैं। नोटबंदी के बाद यह संकट और गहराता चला गया। ये उसी का असर है कि आज लाखों फ्लैट बन कर तैयार हैं, लेकिन खरीदार नहीं हैं।
जमीन-जायदाद का कारोबार लंबे समय से नगदी संकट की मार झेल रहा है। इसकी एक वजह यह भी है कि बैंक और गैरबैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) पहले तो इस क्षेत्र के लिए पैसे दे रही थीं, लेकिन अब इन्होंने हाथ खींच लिए हैं। एनबीएफसी तो खुद नगदी संकट में फंसी हैं और ऐसी आशंका भी बनी हुई है कि कहीं इन्हें भी एनपीए की बीमारी न लग जाए।
यह पहले से कहा जा रहा था कि रियल एस्टेट क्षेत्र में जान फूंकने के लिए सरकार को एक साथ कई मोर्चों पर जूझना होगा। इनमें सबसे जटिल काम इस क्षेत्र को पूंजी मुहैया कराने का है, ताकि बिल्डर अटकी हुई परियोजनाएं पूरी कर सकें। अब जबकि सरकार ने यह कर दिखाया है, तो उम्मीद करनी चाहिए कि हालात कुछ हद तक सुधरेंगे। दूसरी बड़ी समस्या मकान खरीदारों को लेकर है। आम्रपाली, जेपी जैसे कुछ बड़े समूहों की परियोजनाओं में 42 हजार से ज्यादा लोगों के पैसे फंसे हुए हैं और सर्वोच्च अदालत ने अब इनका काम पूरा करने और लोगों को मकान दिलाने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर डाली है। इसलिए ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि सरकार अटकी परियोजनाओं को पूरा करने और खरीदारों को संकट से निकालने के लिए अलग से कोष बना सकती है।
हाल में रिजर्व बैंक ने भी अपनी मौद्रिक नीति में चौथी बार नीतिगत दरों में कटौती है और साथ ही बैंकों पर कर्ज सस्ता करने के लिए दबाव बनाया है। बैंक कर्ज सस्ता होने से भी रियल एस्टेट क्षेत्र को पटरी पर लाने में मदद मिलेगी।
इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस वक्त फिर से मंदी जैसे हालात का सामना कर रही है। ऐसे में रियल एस्टेट उद्योग को फिर से खड़ा कर पाना कोई आसान काम नहीं हैं। उसे हर स्तर पर भारी रियायतों की जरूरत है। इसीलिए बिल्डरों और क्रेडाई (कनफेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया) और नारेडको (नेशनल रियल एस्टेट डेवलपमेंट काउंसिल) ने सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया है कि सरकार बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों पर इस क्षेत्र में पैसा डालने के लिए दबाव बनाए। लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर बैंक पहले ही एनपीए की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। ऐसे में वे कोई जोखिम नहीं ले सकते। सीमेंट और इस्पात जैसे क्षेत्र रियल एस्टेट कारोबार पर टिके होते हैं। इसमें मंदी का मतलब है सीमेंट और इस्पात जैसे उद्योगों पर खतरा मंडराना। इसलिए सरकार को अब ऐसी रणनीति बनानी होगी, जिसमें बैंकों के जोखिम का खयाल रखते हुए रियल एस्टेट उद्योग में पैसा डलवाया जाए, ताकि इससे जुड़े दूसरे प्रमुख क्षेत्रों में भी मंदी के हालात दूर हों। मंदी की वजह से बड़ी संख्या में लोगों का रोजगार जा रहा है, यह भी कम गंभीर चिंता का विषय नहीं है। ऐसे में सरकार के प्रयास कहां तक सफल हो पाते हैं, यह आने वाला वक्त ही बताएगा!

क्या कश्मीरी कभी भारतीय हो पाएगें…..?
ओमप्रकाश मेहता
आज से जम्मू-कश्मीर का दर्जा बदल गया, अब वह देश का नौवां केन्द्र शासित राज्य हो गया है, जम्मू-कश्मीर के साथ लद्दाख भी केन्द्र शासित राज्य हो गया है, इस तरह देश में केन्द्र शासित राज्यों की संख्या सात से बढ़कर नौ हो गई है। जम्मू-कश्मीर के केन्द्र शासित राज्य हो जाने के बाद आज भी वही बहात्तर साल पुराना सवाल जीवित है कि क्या कश्मीरी कभी भारतीय हो पाएगें? स्मरणीय है कि भारत की आजादी के बाद जब पाकिस्तान का जन्म हुआ था, तब कश्मीर को लेकर काफी खींचतान हुई थी, पाक के तत्कालीन जनक मोहम्मद अली जिन्ना कश्मीर को पाक के साथ जोड़ना चाहते थे जबकि प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू व शेख अब्दुल्ला कश्मीर को भारत में रखना चाहते थे, इस विवाद को बढ़ता देख जिन्ना व नेहरू के बीच कश्मीर में इसी मुद्दें पर रायशुमारी का फैसला हुआ, किंतु नेहरू जी यह जानते थे कि कश्मीर का पूरा अवाम पाकिस्तान के साथ है, इसलिए उन्होंने अपनी चार्तुथ से कश्मीर को भारत के साथ रख लिया और फिर अपने जीते जी रायशुमारी नहीं कराई, शेख अब्दुल्ला की जिद पर संविधान की धारा-370 का प्रावधान कर कश्मीर को विशेष अधिकार प्राप्त राज्य का दर्जा दे दिया गया।
अब मौजूदा मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से धारा-370 के एक झटके में खत्म तो कर दिया, किंतु क्या वे कश्मीरियों को ‘‘सच्चा भारतीय’’ बना पाएगें? जम्मू-कश्मीर से धारा-370 खत्म किए नब्बे दिन होने को आ रहे है, और पहले दिन से ही वहां स्थिति सामान्य होने का ढ़िढोरा पीटा जा रहा है, यदि वहां स्थिति सामान्य थी तो फिर बच्चों के स्कूल अब क्यों खोले गए? और जो स्कूल पहले प्रशासन के दबाव में खुल गए थे, उनमें बच्चें क्यों नहीं आए? इस दौरान जितने भी समाचार चैनलों ने जम्मू-कश्मीर की विशेष रिपोर्ट जारी की, किसी ने भी यह स्वीकार नही किया कि वहां स्थिति सामान्य है, बल्कि जिन चैनलों ने कश्मीरियों से बात की सभी ने वहां की स्थिति को लेकर चिंता प्रकट की और आज भी वही स्थिति है, और अब तो वहां घटी आतंकी घटनाओं और उनमें हुई निरीहों की हत्याओं ने भी यह सिद्ध कर दिया कि कश्मीर में स्थिति सामान्य नहीं है।
यही नहीं पिछले दिनों तो हद तब हो गई जब सरकार ने अपने देश के सांसदों को जम्मू-कश्मीर जाने से रोक कर यूरोपीय संघ के सांसदों को कश्मीर की सैर करवा दी। ऐसा क्यों किया गया? यह तो अधिकारिक तौर पर केन्द्र की किसी भी हस्ती ने नहीं बताया, किंतु युरोपीय संघ के सांसदों ने जो कश्मीर में देखा उससे वे संतुष्ट नहीं थे और यह कहने को मजबूर थे कि आज भी कश्मीर में स्थिति सामान्य नहीं है। अब ये ही सांसद अपने-अपने देशों में जाकर वहां के विधान मंडलों में कश्मीर का हाल बयां करेगें तो देश की विश्व पटल पर क्या इज्जत रह जाएगी? जब इन विदेशी सांसदों ने यही की सरकार से हमारे विपक्षी सांसदों को कश्मीर जाने देने की सिफारिश कर दी तो अब इस सरकार में विराजित महापुरूषों से क्या कहा जाए?
जहां तक लद्दाख का सवाल है, वह जम्मू-कश्मीर जैसा समस्या प्रधान देश नहीं है, यद्यपि वहां चीन की दखलंदाजी की स्थायी समस्या है, और वह रहेगी, क्योंकि केन्द्र शासित राज्य बना दिए जाने से वह समस्या खत्म नहीं होगी, उसके लिए कोई सार्थक द्विपक्षीय पहल करनी पड़ेगी, इसलिए लद्दाख को जम्मू-कश्मीर के साथ जोड़ना कतई ठीक नहीं है। यह उसका दुर्भाग्य था कि उसे अब तक जम्मू-कश्मीर के साथ जोड़ रखा था।
अब यह तो फिलहाल कहना मुश्किल ही है कि जम्मू-कश्मीर में स्थिति सामान्य कब होगी? क्योंकि वहां की स्थिति वहां के नागरिकों से जुड़ी है, जब तक कश्मीरियों के दिल नहीं बदलते, जब तक वे अपने आपकों भावनात्मक रूप से भारत के साथ नहीं जोड़ते तब तक जम्मू कश्मीर में स्थिति सामान्य नहीं हो सकती, और उसके लिए इस सरकार को कश्मीरियों की मूल समस्याएँ समझकर, उन्हें दूर कर कश्मीरियों का दिल जीतना होगा, सिर्फ सेना में वहां के युवकों की भर्ती करके उन्हें आतंकवादी बनने से रोकने का ढ़िढोरा पीटने से कुछ नहीं होगा। कश्मीरियों की कुछ अपनी स्थानीय समस्याएँ है जो उनके व्यवसाय व उद्योग के साथ उनकी रोजी-रोटी से जुड़ी है, उनका समाधान प्राथमिकता के आधार पर खोजना होगा तथा उसे कार्यरूप में परिणित करना होगा, तभी कश्मीर व कश्मीरी सही अर्थों में भारत का अंग बन पाएगा। विदेशियों को कश्मीर की सैर करवाने से कुछ नहीं होगा, उल्टा वहां की समस्याओं का विश्वव्यापीकरण हो जाएगा, इसके लिए सरकार को अपनी प्राथमिकताएँ बदलनी होगी।

आर्थिक सुस्ती के गंभीर असर
सिद्वार्थ शंकर
इस वित्त वर्ष की शुरुआत से ही आर्थिक सुस्ती देखने को मिल रही है। इसके चलते औद्योगिक उत्पादन और रोजगार से लेकर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर बुरा असर पड़ा है। कई महीने तक ऑटोमोबाइल सेक्टर भी सुस्ती का सामना करता रहा। हालांकि त्योहारों की वजह से इसमें सुधार देखा गया है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने अब जो डेटा जारी किया जिसमें साफ देखा जा सकता है कि स्लोडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा है। अक्टूबर में बेरोजगारी की दर बढ़कर 8.5 प्रतिशत हो गई जो कि अगस्त 2016 के बाद सबसे ज्यादा है। यह सितंबर के मुकाबले भी 7.2 फीसदी ज्यादा है। सीएमआईई के आंकड़ों के मुताबिक यह स्लोडाउन का असर है। इसके अलावा अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की तरफ से एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई है, जिसके मुताबिक पिछले 6 सालों में करीब 90 लाख रोजगार के अवसरों में कमी आई है। इस रिपोर्ट को संतोष मेहरोत्रा और जगति के परीदा ने मिलकर तैयार किया है और इसे अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ सस्टेनेबेल एंप्लॉयमेंट की तरफ से प्रकाशित किया गया है।
अक्टूबर में मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट पिछले दो साल में सबसे स्लो रहा। आईएचएस इंडिया के पैकेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स में भी गिरावट देखी गई। यह सितंबर में 51.4 थी जो कि अक्टूबर में घटकर 50.6 हो गई। एजेंसी 400 प्रोड्यूसर्स को शामिल करके सर्वे करवाती है जिसमें नए ऑर्डर, आउटपुट, जॉब, सप्लायर के डिलिवरी टाइम और स्टॉक परचेज के आंकड़े इक_े किए जाते हैं। यह सूचकांक अगर 50 के ऊपर होता है तो वृद्धि मानी जाती है वहीं 50 के नीचे आ जाने से बाजार में स्लोडाउन की स्थिति मानी जाती है।
टैक्स कलेक्शन में भी सरकार को झटका लगा है। अक्टूबर में जीएसटी कलेक्शन गिरकर 95,380 करोड़ पर पहुंच गया। पिछले साल इस महीने में जीएसटी संग्रह 1,00,710 था। यह लगातार तीसरा महीना है जब जीएसटी 1 लाख करोड़ से कम है। आंकड़ों के मुताबिक इस वित्त वर्ष के पहले छह महीने में टैक्स कलेक्शन में ग्रोथ केवल 1.5 फीसदी की रही है जो कि 2009-10 के बाद सबसे कम है। बता दें कि अप्रैल-जून की तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 5 प्रतिशत दर्ज की गई जो कि 6 साल में सबसे कम है। जुलाई-सितंबर का डेटा 30 नवंबर में जारी किया जाएगा। निवेशकों के मुताबिक यह स्लोडाउन साल 2006 से भी लंबा है। पिछले कुछ दिनों में जिस तरह की रिपोर्ट आई है, वह शुभ संकेत नहीं है। आर्थिक सुधार के सरकार के प्रयास असर नहीं दिखा रहे हैं और आम जनता पर भार पड़ता जा रहा है। यह वक्त सरकार के लिए चेतने वाला है। अगर अब भी मंदी को दरकिनार किया जाता रहा तो आने वाला कल और भी भयावह होगा।

चिंताजनक है ‘पुलिसिया तफ़्तीश’ पर सवाल उठना
निर्मल रानी
देश में पिछले दिनों दो ऐसी घटनाएं घटित हुईं जिन्होंने जनता का पूरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। पहली घटना गत 12 अक्टूबर शनिवार को प्रातःकाल उत्तरी दिल्ली का वीआईपी इलाक़ा समझे जाने वाले सिविल लाइंस थाना क्षेत्र में घटित हुई। इस घटना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भतीजी दमयंती मोदी के साथ झपटमारी अथवा राहज़नी की घटना पेश आई। दिल्ली पुलिस के अनुसार 12 अक्टूबर शनिवार को क़रीब सात बजे दमयंती बेन मोदी ऑटो में बैठकर जैसे ही गुजराती समाज भवन के पास अपने परिवार के साथ ऑटो से उतरने लगीं, उसी समय दो स्कूटी सवारों ने उन पर झपट्टा मारा। दमयंती बेन सपरिवार अमृतसर से दिल्ली आई थीं तथा उन्हें उत्तरी दिल्ली के सिविल लाइंस क्षेत्र स्थित गुजराती समाज भवन पहुंचना था।ज्यूँ ही उनका ऑटो गुजराती समाज भवन के मुख्य द्वार के सामने पहुंचा ठीक उसी क्षण स्कूटी पर सवार दो बदमाशों ने दमयंती बेन मोदी पर झपट्टा मारा और उनका पर्स उनके हाथों से छीन कर फ़रार हो गए। दमयंती बेन के अनुसार उनके पर्स में लगभग 56 हज़ार रुपये, दो मोबाइल फ़ोन और कई ज़रूरी काग़ज़ात थे। उन्हें घटना के दिन अर्थात शनिवार को ही अहमदाबाद की विमान यात्रा भी करनी थी। परन्तु पर्स के साथ ही उनके यात्रा संबंधी ज़रूरी काग़ज़ात भी झपटमारी में चले गए थे। सिविल लाइंस के जिस इलाक़े में प्रधानमंत्री की भतीजी के साथ दिनदहाड़े यह सनसनीख़ेज़ वारदात पेश आई उसी स्थान के बिल्कुल क़रीब ही दिल्ली के उप-राज्यपाल का आवास है और वहीँ पर पर दिल्ली के मुख्यमंत्री का निवास भी है। दिल्ली विधानसभा भी इसी घटना स्थल के समीप ही स्थित है।
बहरहाल,बधाई के पात्र है दिल्ली की चुस्त,दुरुस्त,कुशल,सक्षम व कर्तव्यनिष्ठ पुलिस जिसने राहज़नी की इस घटना के मात्र 24 घंटे के भीतर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भतीजी दमयंती मोदी के साथ राजधानी दिल्ली में हुई इस लूट के मामले में दिल्ली पुलिस ने गौरव उर्फ़ नोनू (21वर्ष) नाम के एक बदमाश को हरियाणा के सोनीपत से गिरफ़्तार कर लिया । और कुछ ही देर बाद पुलिस ने बादल नामक दूसरे आरोपी को भी गिरफ़्तार कर लिया। पुलिस के अनुसार नोनू नाम का अपराधी पहाड़गंज थाना क्षेत्र में नबी करीम का रहने वाला है। पुलिस ने अपराधी नोनू की निशानदेही पर पीएम मोदी की भतीजी दमयंती बेन के पर्स में मौजूद 56 हज़ार रूपये की नक़दी, दो मोबाइल फ़ोन और काग़ज़ात भी बरामद कर लिए। इतना ही नहीं बल्कि दिल्ली पुलिस ने राहज़नी की इस घटना में इस्तेमाल की गई स्कूटी भी बरामद कर ली। निश्चित रूप से देश को दिल्ली पुलिस की इस क़द्र चौकसी व उसकी तत्परता पर नाज़ है जिसने भीड़ भाड़ वाली घनी राजधानी में होने वाले इस अपराध का पटाक्षेप अपनी कार्यकुशलता का शानदार प्रदर्शन करते हुए कर डाला।
ऐसा ही एक हाई प्रोफ़ाइल अपराध गत 18 अक्टूबर शुक्रवार की दोपहर को पुराने लखनऊ के अति व्यस्त एवं भीड़ भरे चौक इलाक़े में उस समय घटित हुआ जबकि हिन्दू समाज पार्टी के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की हत्यारों ने उन्हीं के घर में ही गला रेत कर हत्या कर दी। उत्तर प्रदेश पुलिस ने भी इस हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने का दावा मात्र 48 घंटे के भीतर ही कर डाला। पुलिस ने संदिग्धों के स्केच भी जारी किये और उनपर ढाई लाख रुपए के इनाम की घोषणा भी कर दी। अब तक चार संदिग्ध हत्यारों की गिरफ़्तारी का दावा भी उत्तर प्रदेश पुलिस कर चुकी है। उत्तर प्रदेश,गुजरात तथा महाराष्ट्र से संदिग्धों की गिरफ़्तारी की ख़बरें हैं। माना जा सकता है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भतीजी दमयंती मोदी के साथ झपटमारी की घटना की ही तरह वैसी ही तत्परता कमलेश तिवारी की हत्या के मामले में भी दिखाई जैसी दिल्ली पुलिस ने गत दिनों दिखाई थी। निश्चित रूप से पूरा देश पुलिस से ऐसी ही चौकसी बरतने व अपराधियों को पकड़ने में इसी प्रकार की तेज़ी व तत्परता प्रदर्शित करने की उम्मीद करता है।
परन्तु उपरोक्त वारदातों के बाद दिखाई गई त्वरित पुलिसिया तफ़्तीश व इससे सम्बंधित गिरफ़्तारियों से एक सवाल यह भी उठता है कि क्या इस प्रकार की तफ़्तीश और यथाशीघ्र संभव लूटे गए माल की बरामदगी करना व हत्या के आरोपियों को गिरफ़्तार करने जैसा कर्तव्य निर्वाहन चुनिंन्दा व हाई प्रोफ़ाइल मामलों तक ही सीमित रहता है या फिर आम लोगों के साथ घटित होने वाले अपराधों में भी पुलिस इतनी ही तत्परता बरतती है? आज देश में ऐसे ही न जाने कितने ऐसे अपराधिक मामले हैं जिनमें अपराधियों का कोई सुराग़ ही नहीं मिल पा रहा है। ऐसा ही सबसे चर्चित जे एन यू के छात्र नजीब की गुमशुदगी का मामला है। यह जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की तीन वर्ष पूर्व अक्तूबर 2016 की घटना है। 14 अक्तूबर 2016 की रात जे एन यू कैंपस स्थित हॉस्टल में नजीब अहमद और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कुछ छात्रों के बीच मारपीट की घटना घटित हुई। इससे अगले ही दिन यानी 15 अक्तूबर 2016 को जे एन यू कैंपस स्थित माही-मांडवी हॉस्टल से नजीब अहमद लापता हो गया। इसके अगले दिन 17 अक्तूबर को विश्वविद्यालय प्रबंधन ने नजीब के परिजनों के साथ दिल्ली पुलिस में नजीब के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज करवाई। इसके बाद दिल्ली पुलिस की जांच चलती रही। परिजनों की मांग पर अदालत ने जांच का ज़िम्मा सीबीआई को सौंपा। इसके बावजूद आज तक किसी भी जांच एजेंसी को नजीब से जुड़ी कोई जानकारी हासिल नहीं हो पाई है। गत 15 अक्टूबर को अपने बेटे नजीब की गुमशुदगी के तीन वर्ष पूरे होने की पूर्व संध्या पर उसकी मां फ़ातिमा नफ़ीस जेएनयू पहुंची। दिल्ली में पत्रकारों माध्यम से फ़ातिमा नफ़ीस ने सरकर व पुलिस से यह सवाल पूछा कि ‘जब अपराधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भतीजी का पर्स झपट लेते हैं और देश की सबसे स्मार्ट पुलिस 24 घंटे में अपराधियों के साथ-साथ लूट का सारा सामान व पैसा भी फ़ौरन बरामद कर लेती है। काश उसी तरह मेरे बेटे नजीब के लिए भी दिल्ली पुलिस और सीबीआई ने इसी तरह से जांच की होती तो आज मैं शहर-दर-शहर नहीं भटकती’। परन्तु आज तक दिल्ली पुलिस व सीबीआई न तो नजीब की तलाश कर सकी न ही अपराधियों तक पहुँच सकी। यह तक पता नहीं चल पा रहा है कि नजीब ज़िंदा भी है या नहीं।
ऐसी ही और भी कई घटनाएं हैं जो पुलिस व जांच एजेंसियों की कार्य प्रणाली पर उंगली उठाती हैं। यह सवाल उस समय और भी प्रखर हो जाते हैं जबकि हाई प्रोफ़ाइल मामलों में पुलिस आनन फ़ानन में अपराधियों की गर्दन पर तो अपने हाथ डाल देती है परन्तु आम लोगों के मामले में ऐसी तत्परता नहीं दिखा पाती। । लिहाज़ा यदि भारतीय पुलिस व सुरक्षा एजेंसियों को अपनी प्रतिष्ठा क़ायम रखनी है तथा आम जनता में अपने प्रति विश्वास बनाए रखना है तो साधारण से साधारण घटना में भी वैसी ही चौकसी,कुशलता व तत्परता का परिचय देना चाहिए जैसा कि उसने गत एक सप्ताह में घटी उपरोक्त दोनों घटनाओं में दिया है।

न कांग्रेस मुक्त भारत न पचहत्तर पार:टूटा अहंकार
तनवीर जाफ़री
महाराष्ट्र तथा हरियाणा राज्यों में हुए विधानसभा के आम चुनावों के परिणाम आ चुके हैं। देश के एक समाचार पत्र ने इन परिणामों के संबंध में अत्यंत उपयुक्त शीर्षक लगाते हुए लिखा -‘मतदाताओं ने सभी को कहा -हैप्पी दीपावली’। वास्तव में इन परिणामों ने इन चुनावों में सक्रिय लगभग सभी राजनैतिक दलों को खुश रहने का कोई न कोई अवसर ज़रूर प्रदान किया है। हरियाणा में जैसे भी हो मगर भारतीय जनता पार्टी सत्ता में वापसी करने में सफल रही जबकि महाराष्ट्र उसकी अपनी चुनाव पूर्व सहयोगी शिवसेना के साथ मुख्यमंत्री पद को लेकर घमासान जारी है । कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी दोनों ही दलों ने अपने आप में पहले से काफ़ी अधिक सुधार किया दोनों ही दलों की राजनैतिक स्थित महाराष्ट्र तथा हरियाणा के आम चुनावों से लेकर विभिन्न राज्यों में हुए लोकसभा व विधान सभा के उप चुनावों तक में काफ़ी बेहतर हुई। उधर हरियाणा के चुनावी मैदान में उतरी सबसे नई नवेली पार्टी जननायक जनता पार्टी ने अपने चुनाव निशान ‘चाबी’ की हैसियत को अपने पहले ही चुनाव में ही उस समय पहचनवा दिया जबकि पहली बार में ही सत्ता की चाबी भी उसी के पास रही और पहले ही चुनाव में उप मुख्यमंत्री का पद हासिल कर पाने में जजपा कामयाब रही। उपरोक्त पूरे राजनैतिक घटनाक्रम में किसी प्रकार की नैतिकता आदि की बात करने की ज़रुरत इसलिए नहीं कि यह राजनैतिक जोड़ तोड़ और सत्ता समीकरण बिठाने के विषय हैं लिहाज़ा यहाँ ‘नैतिकता ‘,सिद्धांत अथवा वैचारिक प्रतिबद्धता के दृष्टिकोण से किसी भी पहलू पर नज़र डालना क़तई मुनासिब नहीं।
24 अक्टूबर की शाम तक जिस समय लगभग पूरे चुनाव परिणाम आ चुके थे और यह स्पष्ट हो चुका था कि प्रधानमंत्री मोदी व ग़ृह मंत्री अमित शाह द्वारा बार बार दिया जाने वाला ‘कांग्रेस मुक्त भारत ‘ बनाए जाने का नारा जहाँ एक बार फिर असफल हुआ वहीं हरियाणा में भी पिछले कई महीनों से भाजपा द्वारा चलाया जा रहा ‘अब की बार 75 पार’ का अभियान भी मुंह के बल गिर पड़ा। कांग्रेस पार्टी ने तमाम तरह की नकारात्मकता अर्थात संगठन में खींचतान,अनेक कांग्रेस नेताओं के ठीक चुनाव पूर्व पार्टी छोड़ने,टिकट आवंटन में मचे घमासान,कई लोगों के पार्टी टिकट न मिलने पर उनके स्वतंत्र चुनाव लड़ने,आख़री समय पर प्रत्याशी घोषित करने,सोनिया गाँधी,राहुल गाँधी व प्रियंका गाँधी जैसे सर्वप्रमुख नेताओं की चुनाव प्रचार अभियान में पूरी दिलचस्पी न लिए जाने,कई प्रमुख पार्टी नेताओं के विरुद्ध हो रही क़ानूनी जाँच पड़ताल और आर्थिक संकट आदि झेलने के बावजूद जैसा प्रदर्शन महाराष्ट्र,हरियाणा तथा कई राज्यों के उप चुनावों में किया है उसकी किसी भी राजनैतिक विश्लेषक को यहाँ तक कि शायद कांग्रेसजनों को भी उम्मीद नहीं थी। चुनाव परिणामों से यह भी स्पष्ट हो गया कि चुनाव में ‘मोदी के नाम का जादू’ जैसी कोई भी चीज़ अब मतदाताओं के बीच नहीं रह गई है।
भारतीय जनता पार्टी ने हरियाणा में 2005 में हुए चुनाव में मात्र दो सीटों पर जीत दर्ज की थी जो 2009 का चुनाव आते आते केवल चार सीटें जीतने की स्थिति में आ सकी। परन्तु 2014 में पहली बार भाजपा ने जब राज्य की 90 में से 46 सीटों पर जीत दर्ज की उस समय से ही बहुमत के नशे में चूर भाजपाइ नेताओं में पार्टी को अजेय समझने जैसा अहंकार पैदा होना शुरू हो गया था।अन्यथा लोकतान्त्रिक व्यवस्था में,जहाँ जीत हार,और यश अपयश की सारी चाभियाँ ही ‘लोक ‘ अथवा जनता के पास हों वहां स्वयं भू रूप से यह घोषणा कर देना कि ‘अब की बार-75 पार’ न केवल लोकतंत्र का अपमान है बल्कि अहंकार की पराकाष्ठा भी है। और हरियाणा चुनाव नतीजों ने यह दिखा भी दिया कि नारों व अहंकार के प्रभाव में जनता नहीं आने वाली। हरियाणा में खट्टर मंत्रिमंडल के सात मंत्रियों को भी जनता ने इस चुनाव में धूल चटा दी। इन में कई जो स्वयं को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बताते थे उनकी ज़मानत भी ज़ब्त हो गई। और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,अमित शाह तथा राजनाथ सिंह जैसे नेताओं की कई जनसभाएं करवाने के बावजूद हरियाणा में बीजेपी ने कुल 40 सीटें जीती जबकि कांग्रेस ने 31, जननायक जनता पार्टी ने 10, तथा निर्दलीयों ने सात सीटों पर जीत दर्ज कर ‘अब की बार-75 पार’ के नारे को हवा हवाई नारा साबित कर दिया। ठीक इसके विपरीत संगठनात्मक तौर पर बुरे दौर से गुज़र रही कांग्रेस पार्टी जो कि हरियाणा में विशेष रूप से ठीक चुनाव पूर्व ही एक निर्णायक संकटकालीन दौर से गुज़री। यहाँ तक कि आला कमान ने ठीक चुनाव पूर्व ही 3 वर्षों से हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पर आसीन रहे अशोक तंवर को हटाकर कुमारी शैलजा को राज्य कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने जैसा ज़ोख़िम भरा फ़ैसला लिया। उधर भाजपा के नेता पूरे देश में घूम घूम कर जनता से देश को कांग्रेस मुक्त करने की ज़ोरदार अपील करते आ रहे हैं। पंडित जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस पार्टी को जम कर एक साथ कोसा जा रहा है। कश्मीर से धरा 370 हटाने के केंद्र सरकार के फ़ैसले के बाद इसी बहाने कांग्रेस व नेहरू पर महाराष्ट्र से हरियाणा तक एक बार फिर निशाने साधे गए। परन्तु नतीजा यही रहा की भाजपा को लड़खड़ाना पड़ा और कांग्रेस सहित लगभग सभी विपक्षी दल पहले से अधिक मज़बूत हुए।
इसके बावजूद भाजपा द्वारा बहुमत के जादुई आंकड़े छूकर सत्ता हासिल करना, यह वास्तव में जनादेश का कितना सम्मान है और कितना अपमान,सत्ता के लिए भाजपा को कहाँ किस प्रकार घुटने टेकने पड़े हैं,यहाँ तक कि अपनी हर आलोचना हर तरह का विरोध करने वाले यहाँ तक कि अपने ही विरुद्ध चुनाव लड़कर 10 सीटें जीत कर आने वाले जजपा जैसे नव गठित क्षेत्रीय दल के साथ उन्हीं की शर्तों पर सरकार बनाना यह सब कुछ देश ने भली भांति देखा है। जो भाजपा 90 सीटों की हरियाणा विधान सभा में ‘अब की बार 75 पार’ का नारा दे रही थी वह कितने बुलंद हौसले व इरादे से चुनाव मैदान में रही होगी इसका अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है। वहीं राज्य में त्रिकोणीय चुनावी संघर्ष के बाद और कहीं कहीं तो चतुर्थकोणीय चुनाव होने के बावजूद यदि पार्टी बहुमत का 46 का आंकड़ा भी नहीं छू सकी तो इससे साफ़ है कि हरियाणा का जनमत भाजपा की खट्टर सरकार के विरुद्ध था। भले ही भाजपा विरोधियों में से भी किसी एक दल को जनता ने पूर्ण बहुमत नहीं दिया। परन्तु केंद्र में सत्ता व सत्ता सम्बन्धी प्रतिष्ठानों का लाभ उठाकर भाजपा ने जननायक जनता पार्टी के नेता दुष्यंत चौटाला को उप मुख्यमंत्री पद देकर अपनी सत्ता की रह आसान कर ली। इस तिकड़मबाज़ी को दोनों ही दलों भाजपा व जननायक जनता पार्टी की मौक़ा परस्ती तो कहा जा सकता है परन्तु जनादेश का सम्मान हरगिज़ नहीं। जनता जनार्दन ने तो महाराष्ट्र व हरियाणा दोनों ही जगह यह दिखा दिया कि न तो भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का नारा साकार हुआ न ही पार्टी हरियाणा में ‘पचहत्तर पार’ कर सकी,हाँ जनता ने ऐसे नारे लगाने वालों का अहंकार ज़रूर चूर चूर कर दिया।

मेहनती लोगों का मध्यप्रदेश नई उड़ान क्यों नहीं भर सकता ?
कमल नाथ
मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस पर सभी नागरिकों को हार्दिक शुभकामनाएँ । हम सबके लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर है। मैं उन सभी बंधुओं को भी हार्दिक बधाई देता हूँ जो विदेशों में बस गए हैं और अपने प्रदेश की खूबसूरत वादियों और सुनहरे पलों को याद करते हैं। मैं उन सबको भी नमन करता हूँ, जिन्होंने मध्यप्रदेश के निर्माण में अपूर्व योगदान दिया है और उत्साहपूर्वक राज्य के नवनिर्माण में जुटे हुए हैं।
मध्यप्रदेश एक लंबा सफर तय कर चुका है। यह एक शानदार राज्य है। सिर्फ इसलिए नहीं कि यहाँ शांतिपूर्ण सांस्कृतिक विविधता है, मोहक जैव-विविधता, प्राकृतिक सौंदर्य है या लुभावने स्मारक है। यह अपने शांतिप्रिय और मेहनती लोगों के कारण अद्वितीय है। सर्वधर्म समभाव मध्यप्रदेश की पहचान है।
निस्संदेह, मध्य प्रदेश का सौंदर्य सबको सम्मोहित कर देता है। नर्मदा नदी का निर्मल प्रवाह, स्वतंत्र विचरण करते टाइगर, कान्हा नेशनल पार्क की अद्भुत सुंदरता, पत्थरों पर अंकित कविता खजुराहो, अद्भुत महेश्वरी और चंदेरी साड़ी, सांस्कृतिक विविधता और भी बहुत है यहाँ।
छह दशकों की यात्रा के बाद हम बेहतर भविष्य के लिए नई रणनीतियाँ तैयार कर रहे हैं।
मैं समझता हूँ कि हमने भविष्य की रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय बातों में अपना कीमती समय और ऊर्जा खर्च की। मध्यप्रदेश आगे क्यों नहीं बढ़ सकता जब यहाँ के लोग मेहनती है? हम हर क्षेत्र में उत्कृष्ट बन सकते हैं। हमारे विश्वविद्यालय उत्कृष्टता हासिल कर सकते हैं। हमारा पर्यटन तेजी से पनप सकता है । औद्योगिक विकास में हम नया मुकाम हासिल कर सकते हैं। हमारे उत्साही और प्रतिभाशाली युवा चमत्कार कर सकते हैं। हमारे किसान अपने कौशल से कमाल कर सकते हैं। हमें उनके लिए नए रास्ते बनाने होंगे। लोग अपने आत्म-विश्वास ,अपनी ऊर्जा, प्रतिभा और ज्ञान से आश्चर्यजनक परिवर्तन ला सकते हैं।
मध्य प्रदेश को एक शांतिपूर्ण राज्य बनाने का श्रेय यहाँ नागरिकों को जाता है। मध्य प्रदेश को एक उत्कृष्ट कार्य-योजना चाहिए। मौजूदा बुनियादी ढाँचे का उपयोग करते हुए मानव और प्राकृतिक संसाधनों के उत्कृष्ट प्रबंधन की जरुरत है। प्रदेश की सबसे बड़ी पूंजी यहाँ की युवा प्रतिभाएँ हैं। उन्हें अवसरों की आवश्यकता है। यह हमारा कर्त्तव्य है कि हम उनके लिए अवसर पैदा करें। मध्य प्रदेश को आगे ले जाने में हर नागरिक की समान जिम्मेदारी है। हमने लोक विवेक का आदर किया है। अपनी नीतियों और निर्णयों में लोगों की अपेक्षाओं का ध्यान रखा है।
आज मध्य प्रदेश नए क्षितिज में उड़ान भरने को तैयार है। हमारी अर्थ-व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत हमारा कृषि क्षेत्र है। अब हमें खेती में उद्यमिता को बढ़ावा देना होगा ताकि हमारे किसान आत्म-निर्भर बनें।
अब आर्थिक गतिविधि से युवा जनशक्ति को जोड़ने और उनके लिए नौकरी के अवसर पैदा करना पहली प्राथमिकता है। औद्योगिक विकास का उद्देश्य नौकरी के अवसर बढ़ाना है।
मेरा विचार है कि वर्तमान का बेहतर प्रबंधन और भविष्य की उत्कृष्ट प्लानिंग जरुरी है। प्रदेश के लोग निपुण, प्रतिभाशाली और ज्ञान से परिपूर्ण हैं। प्रत्येक नीति में उनकी आकांक्षाओं को स्थान मिलना चाहिए। नागरिकों को बेहतर सेवाएँ देने के लिए हम वचनबद्ध है। इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का सहारा लेने का समय आ गया है।
मुझे लोगों की शक्ति पर भरोसा है। मैं युवा पीढ़ी की प्रतिभा में विश्वास करता हूँ। हमें अपने उद्यमियों पर भरोसा है। मैं सश