आलेख- 22

कोरोनाः अपना फर्ज निभाएं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हमारे देश के डाक्टर, नर्स, पुलिसकर्मी और सरकारी कर्मचारी कितनी लगन से कोरोना-मरीजों की सेवा कर रहे हैं और समाजसेवियों के तो कहने ही क्या ? उनकी निस्वार्थ समाजसेवा ही आज भारत को दुनिया की पुण्यभूमि बना रही है। लेकिन जिस बात को लेकर आज मुझे भयंकर धक्का लगा और हर इंसान को लगना चाहिए, वह यह कि पंजाब के दो-तीन परिवारों ने गज़ब की पत्थरदिली दिखाई है। उन्होंने बेटे, पति, भाई, पिता या पड़ौसी का फर्ज निभाने में भी कोताही की है। पंजाब के एक अधिकारी के मुताबिक कोरोना से मरनेवालों के घरवाले उनके शवों को दफनाने या जलाने भी नहीं आते। उनकी अंत्येष्टि सरकारी अफसरों को करनी पड़ती है। लगभग 50 प्रतिशत शवों की यही गति हुई है। प्रसिद्ध ग्रंथी हुजूरी रागी भाई निर्मलसिंह खालसा के गांव के लोगों ने उनकी अंत्येष्टि में अड़ंगा लगा दिया। पटवारी अगर सख्ती से पेश नहीं आता तो वहां उनकी अंत्येष्टि ही नहीं होती। कोरोना-मरीजों के शवों को डाक्टर लोग काफी अच्छी तरह से लपेटकर सम्हलाते हैं। फिर भी लोग इतने डरे हुए क्यों रहते हैं, समझ में नहीं आता। पता नहीं, इसे डर कहें या कायरता ? डर के मारे हमारे सारे नेता अपने घरों में छिपे पड़े हुए हैं तो इन बेचारे सामान्यजन को क्या कहा जाए ?
भारत की केंद्र और राज्य सरकारें तो कोरोना से लड़ने की भरपूर कोशिश कर रही हैं और उन्होंने तालाबंदी को खोलने पर विचार करना भी शुरु कर दिया है लेकिन भारत के लिए यह बड़ी खुश खबर है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से कोरोना की दवाई हाइड्रोक्सीक्लोरीन की मांग की है। मलेरिया की इस सफल दवाई की करोड़ों गोलियां भारत में उपलब्ध हैं। कुछ दिन पहले भारत ने इसके निर्यात पर रोक लगाई थी लेकिन अब उसे हटा लिया है। बड़बोले ट्रंप ने भारत के इन्कार की संभावना पर बदला लेने की बात कहकर अपनी ही किरकिरी करवाई है। अच्छा है कि मोदी उसकी अनदेखी करें। न्यूयार्क और अन्य अमेरिकी शहरों में सैकड़ों भारतीय मूल के लोग भी कोरोनाग्रस्त हो गए हैं। हमारी मदद उनके भी काम आएगी। भारत ने श्रीलंका को 10 टन दवाई विशेष जहाज से भिजवाई है। भारत ने जैसे एक करोड़ डाॅलर ‘दक्षेस कोरोना आपात्कोश’ में दिए हैं, वैसे ही वह सभी पड़ौसी देशों को दवाइयां भिजवाने की भी पहल करे। उन देशों की भाषाओं में कोरोना से बचने की तरकीबें भी वहां के करोड़ों लोगों को इंटरनेट, रेडियो, टीवी और उनके खबरों के जरिए बताई जा सकती हैं। बड़े भाई का फर्ज निभाने का यह सही वक्त है।

जो गलती इंदिरा ने की उससे बड़ी गलती ये सरकार कर रही
सनत जैन
1975 में इंदिरा गांधी ने भारत में आपातकाल लागू किया था। इस आपातकाल में न्यायालय की शक्तियों को कम किया गया था। सरकार किसी भी व्यक्ति को बिना किसी अपराध के जेलों में बंद कर सकती थी। मीडिया में सेंसरशिप लागू हो गई थी। समाचार पत्रों में वही छपता था जो सरकार चाहती थी। दूरदर्शन और आकाशवाणी सरकार के नियंत्रण में थे। वह सरकार का गुणगान करते थे। सेंसरशिप के कारण तब की सरकार को, आपातकाल के दौरान क्या हुआ। इसका पता नहीं चला। चुनाव हुए, इंदिरा गांधी को सत्ता से अपदस्थ होना पड़ा था। यह उस समय की बात है, जब देश में आर्थिक आधार पर कोई बहुत ज्यादा सोच नहीं थी। 2004 के बाद से जिस तरह के सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन देश में हुए हैं। उसके बाद भारत के नागरिक सरकार के ऊपर हर मामले में आश्रित हुए हैं। ऐसे समय में सरकार को यदि वास्तविक जानकारी नहीं मिलेगी। मीडिया और न्यायपालिका सरकार के साथ कदमताल करेंगे। ऐसी स्थिति में जनता को उन पर भरोसा होगा? चारों स्तंभ में से कौन सा स्तंभ होगा, जो संकट के समय जनता को भरोसा दिला पाएगा।
अभी तक विधायिका और कार्यपालिका के निर्णय से यदि कोई व्यक्ति, समुदाय असहमत होता था। तो वह न्यायपालिका में जाकर न्याय प्राप्त करता था। आम आदमी को यह विश्वास था, न्यायपालिका उसकी बात सुनेगी। संविधान के अनुरूप उसके साथ न्याय करेंगी। पिछले कुछ वर्षों में न्यायपालिका एक तरह से सरकार के सहयोगी के रूप में काम कर रही है। जिसके कारण जनता का भरोसा न्यायपालिका पर बहुत कम हो गया है। हाल ही में देश में बड़ी बड़ी घटनाएं हुई। लोग हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट गए। उन्हें न्याय पाने में इतना समय लगा कि उस न्याय का कोई मतलब ही नहीं रह गया। न्यायपालिका ने कई महत्वपूर्ण मामलों की याचिकायें ही सुनने से ही मना कर दिया। अब तो यह भी होने लगा है, कि न्यायपालिका याचिकाओं को खारिज करने के साथ उस पर जुर्माना भी लगा देती हैं। सुप्रीम कोर्ट में पिछले 6 माह में कई ऐसे मामले लंबित हैं। जिन की त्वरित सुनवाई होनी थी। जो आज तक नहीं हुई। हाईकोर्ट में जो याचिकाएं लगी थी। वह भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने पास बुला ली, और उस पर आज तक सुनवाई नहीं की।
पिछले वर्षों में मीडिया भी चौथे स्तंभ के रूप में जनता का प्रतिनिधित्व ना करके सरकार का प्रतिनिधि बनकर काम कर रहा है। आज जितने भी न्यूज़ चैनल और समाचार पत्र हैं। वह सरकार द्वारा कही हुई बातों और सोच को ही आगे बढ़ा रहे हैं। जनता के बीच से रिपोर्टिंग करने, उनकी बात जानने या उनका पक्ष रखने का कोई भी प्रयास मीडिया में नहीं हो रहा है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी, कि दूरदर्शन और आकाशवाणी की तरह अब लगभग सभी न्यूज़ चैनल और समाचार पत्र भी सरकार के लिए अप्रत्यक्ष रूप से काम कर रहे हैं। यदा-कदा यह भी कहा जाता है, कि अघोषित रूप से सेंसरशिप लगी हुई है। ऐसी स्थिति में जनता के बीच न्यूज़ चैनल की विश्वसनीयता लगभग खत्म हो गई है। आम जनता के बीच में पिछले वर्षों में इसे गोदी मीडिया का नाम दिया गया है। न्यूज चैनलां की टीआरपी बहुत कम हो गई है। समाचार पत्रों से भी आम जनता और उनकी समस्यायें गायब है। जिससे मीडिया विश्वसनीयता संदेह के घेर में है।
कोरोनावायरस के संक्रमण से सारी दुनिया में हड़कंप मचा हुआ है। हजारों लोग रोज सारी दुनिया में मर रहे हैं। दुनिया भर में फैले कामगार बेरोजगार हो रहे हैं। सैकड़ों देशों में लाकडाउन के कारण उद्योग, व्यापार और सेवा के क्षेत्र में रोजगार के साधन लगभग लगभग खत्म हो गए हैं। विश्व बैंक का कहना है कि भारत सहित सारी दुनिया के देशों में भयंकर मंदी आने वाली है। 2008 की मंदी के सामने यह मंदी बहुत भयानक होगी। जो 100 वर्ष पुरानी मंदी की याद दिलाएगी।
भारत के 1 करोड़ 75 लाख प्रवासी भारतीय सारी दुनिया के देशों में काम करते हैं। इसमें एक करोड़ 25 लाख लोग मजदूर के रूप में अमेरिका सऊदी अरब इत्यादि देशों में कार्यरत हैं। यह प्रवासी भारतीय भारत में 78.6 बिलियन डालर की कमाई करके भेजते थे। लेकिन यह सब बेरोजगार होकर, उन देशों में फंसे हुए हैं। कुछ हजार ही अभी देश वापस आए हैं। जैसे ही अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा शुरू होगी। बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय वापस लौटेंगे। भारत में 21 दिन का लॉकडाउन लागू किया गया है। लाकडाउन की घोषणा के 4 घंटे की अवधि में ट्रेन बस और सारे परिवहन के साधन बंद कर दिए गए। भारत में ही विभिन्न राज्यों के लगभग 5 करोड़ कामगार दूसरे राज्यों में जाकर महानगरों बड़े नगरों तथा अपने घर से सैकड़ों मील दूर छोटे शहरों में कार्य कर रहे थे। जनता कर्फ्यू लागू होने के बाद जो जहां है, वही रहे। इस आदेश का पालन इसलिए नहीं हो पाया कि जो भारतीय कामगार अपनी रोजी रोटी के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर गया था। उसे दूसरे दिन काम नहीं मिला। जहां काम कर रहे थे, वहां से उन्हें भगा दिया गया। वह सड़क पर रहते थे, रेहड़ी लगाते थे, वहीं सो जाते थे। दूसरे दिन उन्हें ना तो खाना मिला, ना रहने की जगह मिली। ऊपर से पुलिस के डंडे मिलने से लाखों की संख्या में लोग अपने घरों की ओर पैदल ही भागे। पिछले 16 दिन से भारत में सभी औद्योगिक प्रतिष्ठान और कारोबार बंद हैं। स्माल एवं मध्यम उद्योग बंद है। छोटे बड़े सभी कारोबार बंद है। विभिन्न प्रदेशों में लाखों की संख्या में दूसरे प्रदेशों से आए हुए कामगारों में से 25 फीसदी अपने-अपने राज्यों में पैदल ही वापस हो गए हैं। लाकडाउन खुलने के बाद जैसे ही रेल और बसें शुरू होंगी। कामगार और मजदूर कब वापस आएंगे, इसका भी कोई भरोसा नहीं है। आर्थिक मंदी के इस दौर में सरकार कैसे उद्योग धंधों को पुनः शुरू करा पाएगी। इसको लेकर आर्थिक जगत में बड़ी चिंता व्यक्त की जा रही है। केंद्र सरकार किसानों तथा मनरेगा के मजदूरों तथा केंद्रीय योजनाओं में विभिन्न मदों में दी जाने वाली सहायता राशि भी नहीं दे पा रही है। राज्यों की आर्थिक हालत इतनी खराब है, कि उन्हें वेतन बांटने के लिए अब हर माह कर्ज लेना पड़ रहा है। केंद्र सरकार तथा महाराष्ट्र राजस्थान तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की सरकारों ने अपने कर्मचारियों के वेतन में कटौती कर दी है। विधायकों और मंत्रियों के वेतन कम कर दिए हैं। केंद्र सरकार ने सांसदों की सांसद निधि 2 साल के लिए रोक दी है। ऐसे संक्रमण काल में यदि गरीबों तक उनकी जरूरतों का सामान और खाने पीने की चीजें मुहैया नहीं करा पाए। देश में किस तरीके की स्थिति बनेगी, इसका अंदाजाभर लगाया जा सकता है। मीडिया चुप है, उसकी चुप्पी सारे भारत के लिए यहां तक कि सरकार के लिए भी एक संकट है। देश की 80 फ़ीसदी जनता गरीब है। वह कहने लगी है, कि जिंदा रहेंगे तो कोरोनावायरस से निपट लेंगे। जब खाने पीने को ही नहीं मिलेगा, हम तो वैसे ही मर जाएंगे। देश में 20 फ़ीसदी मध्यमवर्ग और उच्च कुलीन परिवार हैं। इनके ऊपर भी एक नया संकट बनने लगा है। जिनके पास खाने पीने के लिए है, वह 21 दिन नहीं 21 महीने अपना जीवन यापन कर लेंगे। लेकिन निम्न वर्ग के पास कुछ नहीं है। उनके लिए तो भूखे मरने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहेगा। किसानों, मजदूरों तथा राज्य सरकारों को जो वित्तीय मदद केन्द्र सरकार को करनी थी, वह नहीं हो पा रही हैं। भारत सरकार का ध्यान अभी भी आर्थिक व्यवस्था की ओर नहीं है। मीडिया भी आने वाले संकट से आम जनता को आगाह नहीं कर पा रहा है। जिसके कारण स्थिति विस्फोटक हो रही है। 1917 की जार क्रांति जिस रूप में हुई थी। वही स्थिति भारत में वर्तमान में देखने को मिल रही है। भेड़ बकरियों की तरह मजदूरों को जगह जगह पर रोक कर रखा गया है। उनके साथ जो व्यवहार हो रहा है, उससे वह व्यथित हैं। ग्रामीण अंचलों और छोटे शहरों की स्वास्थ्य सेवाएं तथा कोरोनावायरस को लेकर जो आपदा कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। उसकी कागजी कार्यवाही और वास्तविक हकीकत में जमीन आसमान का अंतर है। ऐसी स्थिति में न्यायपालिका तथा मीडिया भी अपना दायित्व नहीं निभा रहा है। जनता का विश्वास मीडिया पर खत्म होने से बहुत विस्फोटक स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। जब आम आदमी की कहीं सुनवाई नहीं होती है। तब वह अराजक होता है। मीडिया का सरकारी हो जाना, न्यायपालिका का सरकार के साथ कदमतल करने से शासन और जनता के बीच में जो सेतु बनता था। वह अब नहीं रहा, इसके दुष्परिणाम सभी को झेलना पड़ेंगे। समय रहते संभलने की जरुरत है।

कोरोनाः मोदी को सोनिया का पत्र
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत की जनता को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि देश के सभी राजनीतिक दल कोरोना के विरुद्ध एकजुट हो गए हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखे अपने पत्र में कुछ रचनात्मक सुझाव दिए हैं। केरल, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब और दिल्ली के गैर-भाजपाई मुख्यमंत्री लोग भाजपाई मुख्यमंत्रियों की तरह डटकर काम कर रहे हैं। गैर-राजनीतिक समाजसेवी लोग तो गजब की सेवा कर रहे हैं। यह भी गौर करने लायक बात है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा अन्य संगठनों ने जमाते-तबलीगी के मामले का सांप्रदायिकीकरण करने का विरोध किया है लेकिन हमारे कुछ टीवी चैनल इसी मुद्दे को अपनी टीआरपी के खातिर पीटे चले जा रहे हैं। संतोष की बात यह भी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से कोरोना की दवाई भिजवाने का अनुरोध किया है। इस दवाई का परीक्षण करके भारत में ही इसका प्रयोग जमकर क्यों नहीं किया जाए ? हमारे पड़ौसी देशों को यह दवाई बड़े पैमाने पर भारत आगे होकर भेंट क्यों न करे ?
जहां तक सोनिया गांधी के पांच प्रस्तावों का प्रश्न है, सबसे अच्छी बात तो यह है कि उन्होंने मोदी की इस घोषणा का स्वागत किया है कि सांसदों के वेतन में 30 प्रतिशत की कटौती और सांसद-निधि स्थगित की जाएगी। मैं सोचता हूं कि हर सांसद को स्वेच्छा से कम से कम पांच-पांच लाख रु. कोरोना राहत-कोष में दे देना चाहिए। चुनावों में वे करोड़ों का इंतजाम करते हैं या नहीं ? इस कोश के साथ किसी प्रधानमंत्री या व्यक्ति या पद का नाम जोड़ना हास्यास्पद है और यह कहना तो अत्यंत विचित्र है कि ‘‘पी एम केयर्स फंड’’। क्या देश की चिंता सिर्फ एक ही व्यक्ति को है ? क्या बाकी सब लोग ‘केयरलेस’ (लापरवाह) हैं ? ये सुझाव भी ठीक है कि कुछ सरकारी खर्चों में भी 30 प्रतिशत की कटौती की जाए। सरकारी खर्चे पर विदेश यात्राएं बंद हों। 20 हजार करोड़ रु. के ‘सेंट्रल विस्टा’ के निर्माण-कार्य को बंद किया जाए। उनका एक और सार्थक सुझाव है। वह भाजपाइयों और कांग्रेसियों दोनों पर लागू होता है। सरकारें और नेतागण अपने धुआंधार विज्ञापनों को रोकें। उस पैसे को कोरोना-युद्ध में लगाएं। सोनियाजी और मोदीजी अपनी पार्टी के करोड़ों कार्यकर्ताओं को घर से निकलकर दुखी लोगों की मदद करने के लिए क्यों नहीं कहते ? तबलीगियों को गाली देने और शर्मिंदा करने की बजाय उनको जांच और इलाज के लिए उन्हें प्रेरित क्यों न किया जाए ? आखिरकार, वे भी भारतमाता की ही संतान हैं।

सवाल पूछे ही नहीं जा रहे हैं ,जवाब मिलते जा रहे हैं !
श्रवण गर्ग
हवा का रुख़ देखकर लगता है कि लोगों की बेचैनी बढ़ रही है, वे पहले के मुक़ाबले ज़्यादा नाराज़ होने लगे हैं और अकेलेपन से घबराकर बाहर कहीं टूट पड़ने के लिए छटपटा रहे हैं।मनोवैज्ञानिक आगाह भी कर चुके हैं कि ऐसी स्थितियों में ‘डिप्रेशन’ के मामलों में भी काफ़ी वृद्धि हो जाती है।इनमें घरों में बंद लोगों के साथ-साथ खुली सड़कों पर अपने को और ज़्यादा अकेला और असहाय महसूस करने वाले हज़ारों-लाखों बेरोज़गार और मज़दूर भी शामिल किए जा सकते हैं।हमारे लिए ऐसा और इतना लम्बा एकांतवास पहला अनुभव है ,कम से कम उस पीढ़ी के लिए जो पिछले बीस वर्षों में बड़ी हुई है।पिछले बीस वर्षों में भी देश को कोई ऐसा युद्ध नहीं लड़ना पड़ा है जिसमें किसी ज्ञात या अज्ञात शत्रु से युद्ध के लिए अपने को घरों में क़ैद करना पड़ा हो।चीन के साथ हुए युद्ध की हमें तो याद है पर उसे भी हुए अब साठ साल होने आए।
जैसे-जैसे बैसाखी और अम्बेडकर जयंती नज़दीक आ रही है ,सरकार की चिंता कोरोना से ज़्यादा लॉक डाउन से आज़ाद होकर सड़कों पर टूट पड़ने को बेताब भीड़ से निपटने को लेकर बढ़ सकती है।
ईमानदारी की बात तो यह है कि कोरोना के फ़्रैक्चर से चढ़ा पट्टा कब और कैसे काटा जाएगा इस पर बड़े डॉक्टर मौन हैं।महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने ज़रूर संकेत दे दिया है कि 14 अप्रैल के बाद लॉक डाउन की समाप्ति जनता द्वारा सरकार के निर्देशों का पालन करने पर निर्भर करेगी।स्मरण किया जा सकता है कि मुख्यमंत्रियों से हुई वीडियो काँफ्रेंसिंग के बाद प्रधानमंत्री की ओर से सबसे ज़्यादा तारीफ़ ठाकरे की तरफ़ से आए सुझावों की की गई थी।उद्धव के सुझावों को व्यापक संदर्भों में भी पढ़ा जा सकता है कि पट्टा काटने के बाद केवल बैसाखियों पर टहलने की ही छूट दी जा सकती है।
इस बात का पता चलना शेष है कि कम से कम उन मुख्यमंत्रियों की ही ओर से जो सोनिया गांधी का ‘ही कहा’ या ‘कहा भी’ मानते हैं केंद्र को कठघरे में खड़ा करने या विचलित करने वाला ऐसा एक भी सवाल प्रधानमंत्री या उनके साथ बैठे लोगों से पूछा गया हो जिसका कि जवाब उनके राज्य की जनता मांग रही है।पत्रकारों की तरह दबी ज़ुबान में ही सही पूछा जा सकता था कि क्या स्थिति नियंत्रण में है और सामान्य की तरफ़ लौट रही है ?ख़स्ता वित्तीय हालात किस तरह संभलने वाली है ?फसलें खड़ी है,मज़दूर ग़ायब हैं।इस बात पर केवल खेद ही व्यक्त किया जा सकता है कि जिन सवालों के जवाब माँगे जाने चाहिए उन्हें कोई पूछने की हिम्मत भी नहीं कर रहा है ,विपक्ष भी नहीं।और जो कुछ कभी पूछा ही नहीं गया उसके जवाब हर तरफ़ से प्राप्त हो रहे हैं।इस बीच भूलना नहीं है कि आज रात नौ बजे नौ मिनट के लिए बिना बेचैन हुए हम सबको क्या करना है।

यह मामला हिंदू-मुसलमान का नहीं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जमाते-तबलीगी का दोष बिल्कुल साफ-साफ है लेकिन इसे हिंदू-मुसलमान का मामला बनाना बिल्कुल अनुचित है। जिन दिनों दिल्ली में तबलीग का जमावड़ा हो रहा था, उन्हीं दिनों पटना, हरिद्वार, मथुरा तथा कई अन्य स्थानों पर हिंदुओं ने भी धार्मिक त्यौहारों के नाम पर हजारों लोगों की भीड़ जमा कर रखी थी। इन सभी के खिलाफ सरकार को मुस्तैदी दिखानी चाहिए थी लेकिन हमारी केंद्र और राज्य सरकारों ने उन दिनों खुद ही कोरोना के खतरे को इतना गंभीर नहीं समझा था। यों भी इतने कम मामले मार्च के मध्य तक सामने आए थे कि सरकार और जनता, दोनों ने लापरवाही का परिचय दिया लेकिन जमाते-तबलीगी के सरगना मौलाना साद के भाषणों पर गौर करें तो पता चलता है कि उन्होंने कोरोना के सारे मामले को मुस्लिम-विरोधी और इस्लाम-विरोधी सिद्ध करने की कोशिश की थी। उन्हें शायद पता नहीं होगा कि दक्षिण कोरिया में एक गिरजे के ईसाइयों की लापरवाही से यह सारे कोरिया में फैल गया है। यदि यह इस्लाम-विरोधी होता तो सउदी अरब के मौलाना क्या मक्का-मदीना जैसे इस्लामी विश्व-तीर्थ को बंद कर देते ? यदि यह इस्लाम-विरोधी है तो यह सबसे ज्यादा अमेरिका, इटली और स्पेन जैसे ईसाई देशों में क्यों फैल रहा है ? इसे मजहबी जामा पहनाने का नतीजा क्या हुआ ? इंदौर के मुसलमानों में यह अफवाह फैल गई कि ये डाक्टर और नर्स उन्हें कोई जहरीली सुई लगा देंगे। कई शहरों के अस्पतालों में मरीजों ने डाक्टरों और नर्सों के साथ अश्लील हरकतें भी की हैं। अभी भी सैकड़ों जमाती ऐसे हैं, जिन्होंने अपने आपको अस्पतालों के हवाले नहीं किया है। मौलाना साद ने अपनी करतूतों के लिए पश्चाताप नहीं किया और माफी नहीं मांगी है। लेकिन इस सारी घटना का दुखद पहलू यह भी है कि कुछ नेता और टीवी वक्ता इस मामले का पूर्ण सांप्रदायिकरण कर रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष जगतप्रकाश नड्डा ने इस संकीर्णता का स्पष्ट विरोध किया है। सच्चाई तो यह है कि अपने आप को ‘इस्लामी मिश्नरी’ कहनेवाले इन तबलीगियों ने सबसे ज्यादा नुकसान खुद का किया है, मुसलमानों का किया है, अपने रिश्तेदारों और दोस्तों का किया है। उन्होंने इस्लाम की छवि को ठेस पहुंचाई है। यदि किसी मजहब के प्रचारक इतनी आपराधिक हरकतें कर सकते हैं तो क्यों उन्हें अपने आप को धर्म-प्रचारक कहने का हक है ?

कोरोनावायरस संक्रमण से बदलेगी सारी दुनिया की आर्थिक एवं सामाजिक सोच
सनत जैन
कोरोनावायरस की चपेट में सारी दुनिया के 199 देश गिरफ्त में है। अभी तक के इतिहास में पहली बार सारी दुनिया के देश एक ही बीमारी से संक्रमित हैं। जिसके कारण सारी दुनिया में राजनीतिक आर्थिक एवं सामाजिक गतिविधियों में ठहराव आ गया है। अभी तक आपदा में सबसे पहले ईश्वर को याद किया जाता था। कोरोनावायरस ने सारी दुनिया में ईश्वर को ही भुला दिया है। धार्मिक गतिविधियॉं बंद हो गई हैं। आपदा के समय में मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारे और मठों में पूजा पाठ, नमाज, अरदास, प्रार्थना सब बंद हैं। यहां तक कि भगवान के कपाट भी बंद है। मक्का में मुस्लिमों के प्रवेश एवं धार्मिक गतिविधियों में रोक लग गई है। वेटिकन सिटी में भी धार्मिक गतिविधियां बंद हैं। भारत जैसे देश में सभी मंदिर भक्तों के लिए बंद है। मंदिर और चर्च में घंटियां और घंटे बजना बंद हैं। मस्जिदों से अजान बंद है। भारत के शक्ति पर्व रामनवमी मे भी भक्त, देवी मां के दर्शन करने मंदिरों में नहीं पहुंचे। भारत में 9 देवियों की पूजा सारे देश में पूरी श्रद्धा के साथ भक्ति भाव से मनाई जाती थी। कोरोनावायरस के भय से इस बार भक्त भयभीत होकर घरों में कैद हैं। सभी धर्म गुरु कोरोनावायरस संक्रमण के भय से अपने अपने स्थानों पर कैद हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी, कि कोरोनावायरस ने एक तरह से ईश्वरीय सत्ता को भी चुनौती दी है। लगभग सभी धर्मों में कर्मों के फल स्वयं भोगने का विधान है। कोरोनावायरस के भय ने कर्मफल की अवधारणा को जनसाधारण के बीच और मजबूत करने का काम किया है।
हर बड़ी आपदा के बाद राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक एवं पारिवारिक सोच और सिद्धांत में परिवर्तन होते हैं। पहली बार वैश्विक व्यापार संधि के बाद सारी दुनिया के देशों के बीच आर्थिक संपन्नता और सामाजिक सोच में एकरूपता आई थी। वैश्विक स्तर पर पर्यटन, संस्कृति, सामाजिक एवं आर्थिक विकास, कारोबार, शैक्षणिक, स्वास्थ्य संबंधी मामलों में सारी दुनिया में एकरूपता आई थी। उधार की आर्थिक व्यवस्था ने दुनिया भर के सभी देशों तथा उसमें रहने वाले नागरिकों को, न केवल अपना कर्जदार बना लिया। वरन कर्ज देकर सारी दुनिया को एक बाजार के रूप में परिवर्तित किया गया। विज्ञापनों के माध्यम से दुनिया भर के नागरिकों के बीच भौतिक सुख-सुविधाओं तथा विकास के मॉडल का ऐसा मायाजाल रचा। जिसमें सारी दुनिया फंस कर रह गई। अर्थ के मायाजाल ने राजनेताओं और धर्मगुरुओं को भी वशीभूत करके अपने वश में कर लिया। पिछले 15 वर्षों में नेताओं में अहंकार और ईश्वरीय शक्ति का भ्रम पैदा हो गया। धार्मिक गुरु भी भौतिक सुख-सुविधाओं के अधीन होकर रह गए। धर्मगुरुओं के वैभव के सामने ईश्वरीय वैभव भी कहीं खो सा गया था। जिस तरह रावण अपने आप को सबसे बड़ा शिवभक्त मानता था। रावण ने सभी ग्रहों को अपनी कैद में रखा था। रावण को अपने अंत समय में यह भ्रम पैदा हो गया था, कि उसके कारण ही शिव की पूजा होती है। कुछ ऐसा ही भ्रम वर्तमान समय में राजनेताओं, धर्मगुरुओं और आम जनता के मन में है। भला हो कोरोनावायरस का, जिसने एक ही झटके में सभी के भ्रम तोड़ दिए हैं।
आपदा के बाद बदलती है सारी दुनिया
1918 में स्पेनिश फ्लू की महामारी दुनिया के कई देशों में फैली थी। इस महामारी में लगभग 5 करोड़ लोग मारे गए थे। महामारी से निपटने के लिए 102 साल पहले भी वही प्रयास हुए थे, जो आज कोरोनावायरस के संक्रमण से हो रहे हैं। क्वॉरेंटाइन, आइसोलेशन, सैनिटाइजेशन गर्म पानी से नमक के गरारे करने की सलाह उस समय भी चिकित्सकों ने दी थी। भारत में स्पेनिश फ्लू शुरू से 15 माह के अंदर एक करोड़ 8 लाख लोगों की मौत हुई थी। अमेरिका में उस समय 6 लाख 75 हजार लोग स्पेनिश फ्लू की बीमारी से मारे गए थे। अमेरिका और ब्रिटेन के समाचार पत्रों ने उस समय साबुन से हाथ धोने और स्पेनिश फ्लू के वायरस से बचने के लिए वही उपाय 100 साल पहिले बताए थे। जो आज कोरोनावायरस से लड़ने के लिए बताए जा रहे हैं।उस समय ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज नहीं डूबता था। उन्हीं देशों में सबसे ज्यादा स्पेनिश फ्लू से मौतें हुई थी। उसके बाद सारी दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था को लेकर नई सोच बनी थी। लोकतांत्रिक व्यवस्था उसके बाद मजबूत हुई। दुनिया भर के विकासशील एवं विकसित देश, राजे रजवाड़ों के प्रभाव से मुक्त होकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाने के लिए विवश हुए। 2001 में अमेरिका के 9/11 हमले के बाद व्यक्तिगत स्वतंत्रता सारी दुनिया में कमजोर होना शुरू हुई। सरकारों और सरकारी एजेंसियों का शिकंजा मजबूत हुआ। डिजिटल तकनीकी एवं संचार माध्यमों ने ताकतवर लोगों के हाथों में सत्ता को मजबूत किया। वहीं व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवस्था तेजी के साथ कमजोर होना शुरू हुई।
वैश्विक संधि के प्रभाव
2003 से सारी दुनिया के देशों के बीच वैश्विक व्यापार संधि का क्रियान्वय होना शुरू हुआ। वैश्विक वित्तीय संस्थाओं ने बड़े पैमाने पर केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों और नागरिकों को कर्ज देकर सारे वित्तीय अधिकार अपने पास रख लिए। अमेरिका सहित दुनिया के सभी देशों की सरकारों के ऊपर भारी कर्ज है। कर्ज स्थानीय संस्थाओं और नागरिकों के ऊपर भी हैं। सारी दुनिया के संसाधनों पर 500 से अधिक धन पशुओं का कब्जा है। उनकी संपत्ति बड़ी तेजी के साथ पिछले 15 सालों में बढ़ी है। वहीं आम जनता उतनी ही तेजी के साथ गरीब और कर्जदार हुई। सारी सरकारें और राजनेता इन्हीं धन पशुओं के सहारे चल रही हैं। जिन्होंने सारे आर्थिक और सामाजिक अधिकार अपने पास गिरबी रख लिए हैं। भौतिक आवश्यकताओं का जो नया आर्थिक मायाजाल का बाजार खड़ा किया था। वह बाजार भी आर्थिक मंदी के कारण अब लड़खड़ा रहा है।
आर्थिक मंदी
2008 में अमेरिका की आर्थिक मंदी ने सारी दुनिया के देशों को मुसीबत में डाला था। विकासशील एवं विकसित देशों की अपनी स्वयं की अर्थव्यवस्था होने से उस समय कोई बड़ा संकट नहीं आया। 2020 में कोरोनावायरस के कारण जो संकट आया है। उसने सारी दुनिया के देशों में रहने वाले लोगों के जीवन यापन में बड़ी मुसीबत पैदा कर दी हैं। भारत में जो लॉक डाउन लागू किया गया है। उसके बाद सारे देश में गरीब मजदूरों के उपर रोजी-रोटी पर संकट उत्पन्न हुआ । वह हजारों मील दूर से अपने घरों की ओर भागे। केंद्र एवं राज्य सरकारें इस भीड़ को नहीं रोक पाई। इन मजदूरों के मन में एक ही बात थी, कि कोरोनावायरस से तो बाद में मरेंगे। अभी तो रहने और खाने का ठिकाना भी नहीं है। जगह-जगह पुलिस ने खाना तो दिया नहीं। उल्टे डंडे अलग लगाए। सैकडों किलोमीटर पैदल चलकर वह अपने बच्चों और स्वयं की जान बचाने को लेकर बिना प्राणों की परवाह किए भागे।जो स्थितियां वर्तमान में उत्पन्न हुई हैं। वह 1917 की जार क्रांति की यादों को ताजा कर रही हैं। भूख से बेहाल जनता ने मदहोशी से भरे हुए जार राजा के महल में घुसकर उनकी परिवार सहित हत्या कर दी। भीड़ से एक लेनिन निकला। जिसने पूंजीवादी और राजशाही व्यवस्था खत्म हो गई। लेनिन के नेतृत्व में रूस में कम्युनिस्ट व्यवस्था शुरु हुई। रूस और चीन जैसे देश 100 साल बाद अब पूंजीवादी देश के रूप में सामने हैं। जो व्यवस्थाओं में आने वाले परिवर्तन का संकेत हैं।
पिछले वर्षों में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन के राष्ट्रपति शी जिनिपंग, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे, रूस के प्रधानमंत्री ब्लादिमिर पुतिन तथा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्राध्यक्ष हैं। सभी ने अपनी अपनी सत्ता को साम दाम दंड भेद से कई वर्षों के लिए सुरक्षित कर लिया है।
पिछले 100 वर्षों में प्रकृति का जितना दोहन किया जा सकता था। सारी दुनिया के देशों ने मिलकर किया है। कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष भगवान के समकक्ष अपने आपको मान चल रहे हैं। धर्मगुरुओं ने भी राज सत्ता के साथ मिलकर वैभव पूर्ण जीवन जीना शुरु कर दिया है। रही-सही आशा न्यायपालिका से थी। न्यायपालिका भी अब सरकारों के साथ कदमताल कर रही है। जिसके कारण लोकतांत्रिक व्यवस्था और मानव अधिकार का अस्तित्व लगभग खत्म हो गया है। पिछले 15 वर्षों में सभी देशों के नागरिकों ने भौतिक सुख-सुविधाओं को लेकर, नागरिक अधिकारों के कर्तव्यों से भी पल्ला झाड़ लिया है। ऐसी स्थिति में कोरोनावायरस ने प्रकृति को संरक्षित रखने के लिए अपना एक नया रूप दिखा दिया है। कोरोनावायरस ने एक ही झटके में सारी दुनिया का आर्थिक एवं सामाजिक परिदृश्य बदल दिया है। दुनिया के 199 देशों में कोरोनावायरस का संक्रमण फैला हुआ है। इसमें दुनिया भर के कितने लोगों की मौत होगी, कहना मुश्किल है। लॉक डाउन के कारण सारी दुनिया की आर्थिक एवं सामाजिक गतिविधियां ठप्प हो गई हैं। लोग अपनी जान बचाने और अपना भरण-पोषण करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। पेट की भूख से हर दिन लड़ना, यह पहली प्राथमिकता बन गया है। कोरोनावायरस से कब मरेंगे, यह दूसरी प्राथमिकता में चला गया है। भारत में गरीब मजदूर कोरोनावायरस के डर से कम रोजी रोजगार और दो टाइम के भोजन को लेकर यहां से वहां भाग रहा है। उसके रोजगार के साधन खत्म हो गये हैं। सरकार उसकी आर्थिक मदद करने की स्थिति में नहीं है। जिसके कारण अब स्पष्ट रूप से दिखने लगा है, कि भारत सहित सारी दुनिया, एक बार फिर नए बदलाव की ओर कदमताल कर रही है। भगवान कृष्ण ने गीता में उपदेश दिया है। कर्म का फल समय आने पर ही फलित होता है। कर्म का फल अच्छा हो या बुरा, इसे व्यक्ति को स्वयं भोगना पड़ता है। इसमें भगवान भी उनकी कोई मदद नहीं कर सकते हैं। कोरोनावायरस ने इस सत्य को पुनः सिद्ध कर दिया है। कोरोनावायरस के भय से आज मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे में बैठे विभिन्न धर्मों के बड़े-बड़े धर्मगुरु तथा बड़बोले नेता जो ईश्वर के समकक्ष होने का भ्रम पाल बैठे थे। कोरोनावायरस ने सबको कैद करके रख दिया है। उन्हें वास्तविकता का अहसास करा दिया है। कोरोनावायरस की इस आपदा के बाद सारी दुनिया में किस तरह से आर्थिक सामाजिक बदलाव आएंगे। इसके लिए हमें अभी कुछ माह और इंतजार करना होगा, बदलाव निश्चित है।

धर्म के प्रचारक या मौत के प्रचारक ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
मैं पिछले 10-15 दिनों से अखबारों में लिखता रहा और टीवी चैनलों पर बोलता रहा कि कोरोना से डरो ना। कोरोना भारत में उसी तरह फैल नहीं सकता, जिस तरह वह अन्य देशों में फैला है लेकिन मुझे अब अपनी राय उलटनी पड़ रही है, क्योंकि अब सैकड़ों लोग रोज़ाना कोरोना के जाल में फंस रहे हैं। यह क्यों हो रहा है ? क्योंकि एक मौलाना ने निहायत आपराधिक लापरवाही की है, जो कई मौतों का कारण बन गई है। जमाते-तबलीगी के अधिवेशन में दिल्ली आए हजारों लोग अपने साथ कोरोना लेकर सारे देश में फैल गए हैं। इनमें लगभग 300 विदेशी लोग भी थे। ये सब लोग धर्म-प्रचार (तबलीग) के नाम पर इकट्ठे हुए थे लेकिन ये मौत के प्रचारक बन गए हैं। केरल से कश्मीर और अंडमान-निकोबार से गुजरात तक लोग थोक में कोरोना के शिकार हो रहे हैं। ये शिकार होनेवाले लोग कौन हैं ? इनमें से ज्यादातर मुसलमान हैं और वे गैर-मुसलमान भी हैं, जो इनके संपर्क में आए हैं। इन तीन हजार तबलीगियों ने मरकज से निकलने के बाद अपने-अपने गांवों और शहरों तक पहुंचने के पहले और बाद में क्या लाखों लोगों से संपर्क नहीं किया होगा ? तबलीगी जमात के मुखिया मौलाना साद ने अपनी तकरीरों में कोरोना-प्रतिबंधों की जो मजाक उड़ाई है, वह उन्हें इन सब मौतों के लिए जिम्मेदार बना देता है। उन्होंने अपने अपराध के लिए माफी भी नहीं मांगी और वे फरार भी हो गए हैं। उनका यह कायराना बर्ताव बताता है कि वे कितने धार्मिक हैं ? उनके इस बर्ताव ने यह सिद्ध किया है कि वे जिसे धर्म-प्रचार कहते हैं, वह उनका पारिवारिक धंधा है। अपने परदारा द्वारा शुरु किए गए इस धंधे को वे मुसलमानों की जान से भी ज्यादा कीमती समझते हैं। कई देशों की तरह भारत सरकार को भी इस धंधे पर प्रतिबंध लगाने का विचार करना चाहिए। इस तरह के अंधविश्वासी अभियान किसी भी धर्म, मजहब, संप्रदाय और जाति के नाम पर चल रहे हों, उन पर सरकार को बहुत सख्ती बरतनी चाहिए। उसे यह सोचकर डरना नहीं चाहिए कि वह इन पाखंडियों के खिलाफ सख्ती करेगी तो उस पर सांप्रदायिकता या हिंदूवादिता का बिल्ला चिपका दिया जाएगा। मुझे खुशी है कि केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, जो इस्लामी विद्या के पंडित हैं, वे इस जमात के खिलाफ दो-टूक शब्दों में बोल रहे हैं। मैं देश के सभी मुस्लिम नेताओं से अनुरोध करता हूं कि धर्म के नाम पर चल रहे पाखंड का वे डटकर विरोध करें।

कोरोना प्रकोप : जनजीवन विकल : अर्थव्यवस्था रसातल
ओमप्रकाश मेहता
आज पूरा विश्व एक ऐसे अंधे मोड़ पर विवश है, जहॉ एक और कुऑ तो दूसरी ओर खाई है। ये कुआ और खाई कोरोना महामारी और हमारी अर्थव्यवस्था है। चीन द्वारा पैदा किए गए कोरोना वायरस के संकट ने न सिर्फ पूरे विश्व में कोहराम मचा दिया है, बल्कि इससे मौत का आंकडा एक लाख के करीब पहुच रहा है, विश्व का कोई भी देश इसके प्रकोप से अछूता नही रहा है, यदि हम हमारे देश हिन्दुस्तान की बात करें तो पूरा देश पिछले एक सप्ताह से अपने घरो में कैद है, और इस कैद की अवधि अभी दो सप्ताह और शेष है, अर्थात पूरा देश थम सा गया है न कही कोल्हाल और न कही आरती-भजन या मंगलगीत । इस तरह एक अजीव भय के दौर से गुजर रहा है। पूरा देश प्रधानमंत्री से लेकर आम गरीब मजदूर तक सभी अपने घरो मे कैद है, अब ऐसी विभीषिका के दौर में पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था भी रसातल की ओर अभिमुख है। पिछली दो शताब्दियों में कभी भी हमारी अर्थव्यवस्था इतनी दयनीय दौर से नही गुजरी जैसी आज गुजर रही है। इसे लेकर अंतराष्टीय मुद्वा कोष सहित अर्थ से जुडी विश्व की सभी संस्थायें व संगठन चिंताग्रस्त है। अर्थात कुल मिलाकर यदि यह कहा जाए कि हमारा भारत ही नही बल्कि पूरा विश्व दो महामारियों (कोरोना व आर्थिक) के दौर से गुजरने को मजबूर है तो कतई गलत नही होगा एक महामारी (कोरोना) तो प्राण हर लेती है और दूसरी (अर्थव्यवस्था) घुट-घुट कर मरने को मजबूर कर रही है।
कोरोना ने जहॉ विश्व के सभी एक सौ उन्तीस देशों को अपनी जकड़न में ले लिया है, प्रतिदिन हजारों इस से मर रहे है, वहीं हमारी अर्थव्यवस्था पूरे विश्व के देशो से आपस में रसातल में जाने की स्पर्धा कर रही है। हर देश की विकास दर दिनों-दिन घटती जा रही है। विश्व की जानी मानी आर्थिक संस्था मुड़ीज ने भारत की विकास दर 5.3 फीसदी से घटकर 2.5 फीसदी रह जाने की आशंका व्यक्त की है, कहा गया है कि 2008 की मंदी से भी इस वर्ष की मंदी का यह दौर खतरनाक होगा। दुनिया का हर देश इस भयावह आर्थिक गिरावट का एकमात्र कारण कोरोना वायरस का प्रकोप है, जिसके लिए केवल और केवल चीन जिम्मेंदार है। उसी ने पिछले साल कोरोना वायरस का जैविक हथियार तैयार किया था।
यद्यपि विश्व के अनैक देश व उनकी आर्थिक संस्थाये व अर्थशास्त्री आर्थिक मंदी से निपटने के विकल्प खोज रहे है, इसी गरज से रिजर्व बैंक ने हाल ही में राहत की घोषणाऍ भी कि किन्तु उन राहतो का भी कोई असर नजर नही आ रहा है, जीड़ीपी ग्रोथ की चिंता में सैंसेक्स 1.30 अंक तक लुढक गया। अब कहा जा रहा है कि वित्तीय वर्ष 20-21 में जीड़ीपी सिर्फ दो फीसदी ही बढने की संभावना रह गई है। साथ ही रिजर्व बैंक द्वारा रैपो रेट मे कटौती के बावजूद बाजार में गिरावट का दौर जारी है। विश्व की जानी मानी आर्थिक संस्थाये मार्गन, स्टेनले व गोल्ड मेन सैसेंक्स के अर्थशास्त्री भी विश्वव्यापी मंदी की भयावहता स्पष्ट कर रहे है।
इन अर्थशास्त्रियों के अनुसार इस साल वैश्विक विकास दर घटकर 0.9 प्रतिशत पर आ सकती है। इनका भारत के बारे मे कहना है कि कोरोना वायरस प्रकोप के कारण भारत में ऑफलाईन व ऑनलाईन दोनो तरह की खरीददारी पूरी तरह से बंद हो गई है, लोग भीड़ मे जाने से बच रहे है, भारत में पॉच लाख से भी ज्यादा बडे ब्रांड वाले स्टोर्स कोरोना प्रकोप के भय के कारण बंद है।
इस प्रकार कुल मिलाकर इस कोरोना महामारी प्रकोप ने पूरे विश्व की आर्थिक दशा को झकझोर कर रख दिया है, और आज पूरा विश्व अपने अब तक के इतिहास की सबसे बडी मंदी झेलने को मजबूर हो गया है।

कोरोनाः मुसलमानों से दुश्मनी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हमें संतोष था कि भारत में कोरोना ने इतना वीभत्स रुप धारण नहीं किया था, जितना उसने चीन, इटली, स्पेन और अमेरिका जैसे देशों में कर लिया है लेकिन निजामुद्दीन के मरकजे़-तबलीग ने भारत में भी खतरे की घंटियां बजवा दी हैं। 13 मार्च से अब तक चल रहे इस इस्लामी अधिवेशन में देश के कोने-कोने से और 16 देशों से लोग आए हुए थे। इनकी संख्या तीन हजार से ज्यादा थी। इनमें से सैकड़ों लोग कोरोना से पीड़ित हैं और लगभग दर्जन भर लोगों का इंतकाल हो चुका है। दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के सारे प्रतिबंधों की अवहेलना इस मरकजे-तबलीग ने की है। ऐसा करके इस मरकज़ ने कानून का उल्लंघन तो किया ही, कोरोना को लाखों लोगों तक पहुंचाने का आपराधिक दरवाजा भी खोल दिया। इस मरकज़ ने किसके साथ दुश्मनी निभाई ? सबसे ज्यादा अपने ही मुसलमान भाइयों के साथ ! मरनेवाले सब लोग कौन हैं ? सब पीड़ित लोग कौन हैं ? ज्यादातर मुसलमान हैं। यह कोरोना अब किन लोगों के बीच सबसे ज्यादा फैलेगा ? उनके बीच जिनसे इन तबलीगी लोगों का संपर्क होगा। उनके परिजनों, रिश्तेदारों, दोस्तों में यह सबसे ज्यादा फैलेगा। ऐसा नहीं है कि इस खबर को अंदाज इस संगठन के मुखिया को नहीं था। उन्हें था। उन्होंने याने मौलाना मुहम्मद साद ने अपनी तकरीरों में कहा है कि मुसलमानों तुम मस्जिदों में जाना बंद मत करो। अगर वहां मर भी गए तो इससे उम्दा मौत तुम्हें कहां मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह कोरोना मुसलमानों को डराने और मस्जिदों को बंद करवाने के लिए ही फैलाया जा रहा है। वे भूल गए कि भारत के सारे मंदिरों, गुरुद्वारों, गिरजों और मस्जिदें पर लोगों ने अपने आप तालाबंदी कर रखी है। मौलाना साद की इस आपराधिक गैर-जिम्मेदारी के अनदेखी करनेवाली दिल्ली पुलिस भी दंड की पात्र है। अपने-अपने गांवों की तरफ कूच करनेवाले भूखे-प्यासे मजदूरों की बेरहमी से पिटाई करनेवाली यह दिल्ली पुलिस कितनी बेशर्मी से इस जमावड़े को बर्दाश्त करती रही। मजहब के नाम पर इंसानों की बलि चढ़वाने से मजहब तो बदनाम होता ही है, लोगों की ईश्वर-अल्लाह में से आस्था भी डगमगाने लगती है।

अनुकरणीय पाथेय है श्रीराम का जीवन
डॉ. वंदना सेन
(रामनवमी पर विशेष) भारतीय सांस्कृतिक दर्शन की धारा को प्रवाहित करने वाले भारतीय साहित्य में वसुधैव कुटुम्बकम का भाव सदैव समाहित रहा है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण और संत तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस ने सामाजिक समरसता के भाव का प्रवाहन बहुत ही गहनता से किया है। उदारता के भाव से अनुप्राणित भारतीय साहित्य निश्चित ही विश्व समुदाय को अहिंसा और सामाजिक समरसता का धरातलीय संदेश देता है। जिसकी वर्तमान में पूरे विश्व को अत्यंत आवश्यकता है।
विश्व का प्रथम महाकाव्य महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण है। जिसमें भेदभाव और छूआछूत को महत्व न देकर केवल सामाजिक समरसता की ही प्रेरणा दी गई है। वनवासी राम का सम्पूर्ण जीवन सामाजिक समरसता का अनुकरणीय पाथेय है। श्रीराम ने वनगमन के समय प्रत्येक कदम पर समाज के अंतिम व्यक्ति को गले लगाया। केवट के बारे में हम सभी ने सुना ही है, कि कैसे भगवान राम ने उनको गले लगाकर समाज को यह संदेश दिया कि प्रत्येक मनुष्य के अंदर एक ही जीव आत्मा है। बाहर भले ही अलग दिखते हों, लेकिन अंदर से सब एक हैं। यहां जाति का कोई भेद नहीं था। वर्तमान में जिस केवट समाज को वंचित समुदाय की श्रेणी में शामिल किया जाता है, भगवान राम ने उनको गले लगाकर सामाजिक समरसता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया है। सामाजिक समरसता के भाव को नष्ट करने वाली जो बुराई आज दिखाई दे रही है, वह पुरातन समय में नहीं थी। समाज में विभाजन की रेखा खींचने वाले स्वार्थी व्यक्तियों ने भेदभाव को जन्म दिया है।
वर्तमान में हम स्पष्ट तौर पर देख रहे हैं कि समाज को कमजोर करने का सुनियोजित प्रयास किया जा रहा है, जिसके कारण जहां एक ओर समाज की शक्ति तो कमजोर हो रही है, वहीं देश भी कमजोर हो रहा है। वर्तमान में राम राज्य की संकल्पना को साकार करने की बात तो कही जाती है, लेकिन उसके लिए सकारात्मक प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। सामाजिक एकता स्थापित करने के लिए रामायण हम सभी को उचित मार्ग दिखा सकती है।
यह भी सर्वविदित है कि राम वन गमन के दौरान भगवान राम ने निषाद राज को भी गले लगाया, इसका यही तात्पर्य है कि भारत में कभी भी जातिगत आधार पर समाज का विभाजन नहीं था। पूरा समाज एक शरीर की ही तरह था। जैसे शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द होता है, तब पूरा शरीर अस्वस्थ हो जाता था। इसी प्रकार समाज की भी अवधारणा है, समाज का कोई भी हिस्सा वंचित हो जाए तो सामाजिक एकता की धारणा समाप्त होने लगती है। हमारे देश में जाति आधारित राजनीति के कारण ही समाज में विभाजन के बीजों का अंकुरण किया गया। जो आज एकता की मर्यादाओं को तार-तार कर रहा है।
भगवान राम ने अपने वनवास काल में समाज को एकता के सूत्र में पिरोने का काम पूरे कौशल के साथ किया। समाज की संग्रहित शक्ति के कारण ही भगवान राम ने आसुरी प्रवृति पर प्रहार किया। समाज को निर्भयता के साथ जीने का मार्ग प्रशस्त किया। इससे यही शिक्षा मिलती है समाज जब एक धारा के साथ प्रवाहित होता है तो कितनी भी बड़ी बुराई हो, उसे नत मस्तक होना ही पड़ता है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो संगठन में ही शक्ति है। इससे यह संदेश मिलता है कि हम समाज के साथ कदम मिलाकर नहीं चलेंगे तो हम किसी न किसी रुप में कमजोर होते चले जाएंगे और हमें कोई न कोई दबाता ही चला जाएगा। सम्पूर्ण समाज हमारा अपना परिवार है। कहीं कोई भेदभाव नहीं है। जब इस प्रकार का भाव बढ़ेगा तो स्वाभाविक रुप से हमें किसी भी व्यक्ति से कोई खतरा भी नहीं होगा। आज समाज में जिस प्रकार के खतरे बढ़ते जा रहे हैं, उसका अधिकांश कारण यही है कि समाज का हिस्सा बनने से बहुत दूर हो रहे हैं। अपने जीवन को केवल भाग दौड़ तक सीमित कर दिया है। यह सच है कि व्यक्ति ही व्यक्ति के काम आता है। यही सांस्कृतिक भारत की अवधारणा है।
पूरे विश्व में भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रुप में पहचाना जाता है, जब हम भारत को राष्ट्र बोलते हैं, तब हमें इस बात का बोध होना ही चाहिए कि राष्ट्र आखिर होता क्या है? हम इसका अध्ययन करेंगे तो पता चलेगा कि राष्ट्र की एक संस्कृति होती है, एक साहित्यिक अवधारणा होती है, एक आचार विचार होता है, एक जैसी परंपराएं होती हैं। भगवान राम के जीवन में इन सभी का साक्षात दर्शन होता है, इसलिए कहा जा सकता है कि राम जी केवल वर्ग विशेष के न होकर सम्पूर्ण विश्व के हैं। उनके आदर्श हम सभी के लिए हैं। हमें राम जी के जीवन से प्रेरणा लेकर ही अपने जीवन को उत्सर्ग के मार्ग पर ले जाने का उपक्रम करना चाहिए।

कोरोनाः सरकारी दिग्भ्रम क्यों ?
डॉ0 वेदप्रताप वैदिक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के उन लोगों से माफी मांगी है, जिन्हें इस तालाबंदी (लाकडाउन) के कारण अपने गांवों की तरफ दौड़ना पड़ा है। लेकिन उन्होंने तालाबंदी की मजबूरी पर भी जोर दिया है। मोदी की इस विनम्रता और सहृदयता पर किसी को भी शक नहीं होना चाहिए। लेकिन मेरा निवेदन है सरकारें सारे कदम हड़बड़ी में क्यों उठा रही हैं ? हर कदम उठाने के पहले वे आगा-पीछा क्यों नहीं सोचतीं ? उन्होंने नोटबंदी की भयंकर भूल से भी कोई सबक नहीं सीखा।
अब जबकि उ.प्र. के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने अपने लाखों नागरिकों को उनके गांवों तक पहुंचाने के लिए सैकड़ों बसें चला दी हैं तो प्रधानमंत्री ने आदेश जारी कर दिया है कि सारे राज्यों की सीमाएं बंद कर दी जाएं और राज्यों के अंदर भी जिलाबंदी कर दी जाए। योगी की सरकार भाजपा की है, कांग्रेस की नहीं है लेकिन भाजपा की ही केंद्र सरकार ने अब उसके सारे प्रयत्नों पर पानी फेर दिया है। मैंने सभी मुख्यमंत्रियों से अनुरोध किया था कि वे कृपया तीन दिनों के लिए इस यात्रा की सुविधा दे दें। कुछ राज्यों ने यह काम शुरु भी कर दिया था लेकिन अब पुलिसवाले उन दिहाड़ी मजदूरों, छात्रों और कर्मचारियों की पिटाई कर रहे हैं और उन्हें शहरों में लौटने के लिए बाध्य कर रहे हैं। गांव की तरफ पैदल लौटनेवाले मप्र के एक नौजवान की मौत की खबर ने बड़े अपशकुन की शुरुआत कर दी है। कई शहरों में इस ‘लाॅकडाउन’ की खुले-आम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। देश के इन करोड़ों प्रवासी मजदूरों को अब दोहरे अत्याचार का शिकार होना पड़ रहा है। उनके खाने और रहने के इंतजाम में बड़े शहरों की राज्य सरकारों की कमर टूट जाएगी। यह सरकारी दिग्भ्रम क्यों है ? कोरोना से ज्यादा लोग इस दिग्भ्रम के कारण मर सकते हैं।
इसमें शक नहीं कि केंद्र और सभी राज्यों की सरकारे इस कोरोना महामारी से लड़ने के लिए जी-तोड़ कोशिश कर रही हैं लेकिन मेरे उनसे कुछ अनुरोध हैं। पहला, कोरोना का सस्ता परीक्षण-उपकरण (टेस्ट किट) एक महिला वैज्ञानिक ने खोज निकाला है। उसकी कीमत सिर्फ 12 रु. है। उसे लाखों में बंटवाएं। दूसरा, मुंह की लाखों पट्टियां तैयार करवाकर बंटवाई जाएं। तीसरा, कोरोना हमले से ठीक हुए मरीजों के ‘प्लाज्मा’ के इस्तेमाल की बात सोची जाए। चौथा, प्रधानमंत्री ने वैद्यों से जो बात की है, उसके निष्कर्षों से सारे देश को लाभ पहुंचाया जाए। पांचवां, गैर-सरकारी अस्पतालों को कोरोना-मरीजों के मुफ्त इलाज के आदेश दिए जाएं। छठा, देश के सारे पंचों, पार्षदों और विधायकों तथा हारनेवाले उम्मीदवारों को भी घर-घर जाकर लोगों को खाद्यान्न बंटवाना चाहिए। सातवां, जनता खुद जागे। अपने भाइयों की मदद करे।

मुश्किल होती लड़ाई
सिध्दार्थ शंकर
देश भर में 21 दिन का लॉकडाउन लागू कर दिया गया है। पिछले दिनों जिस तरह कई इलाकों में लोगों ने लॉकडाउन को लेकर लापरवाही दिखाई, उससे सरकार को इस बार सख्त रुख अपनाना पड़ा। नियम तोडऩे वालों पर एक महीने से दो साल तक की सजा का प्रावधान कर दिया गया है। इस सख्ती की तात्कालिक वजह यह है कि पिछले दिनों 64 हजार के करीब भारतीय और विदेशी यूरोप, अमेरिका और खाड़ी देशों से यहां आए हैं। इन इलाकों में कोविड-19 का प्रकोप बहुत ज्यादा है, लिहाजा वहां से इनके आने के बाद भारत में बीमारी फैलने का खतरा काफी बढ़ गया है। इस लंबे लॉकडाउन का मकसद यह है कि बाहर से आए किसी व्यक्ति में अगर वायरस है भी तो वह इसे फैला न पाए। जिन मरीजों में लक्षण आने होंगे उनमें ये 14 दिन में दिख जाएंगे और उनका इलाज शुरू हो जाएगा। दूसरी तरफ जो पहले से संक्रमित हैं उनका इलाज इस बीच पूरा हो जाएगा। मगर पिछले दो दिनों में दिल्ली, गुजराज और हरियाणा में मजदूरों का पलायन और हजारों की घर जाने की जो बेबसी दिखाई दी, वह चिंतित करने वाली है। सोशल डिस्टेंशिंग का संदेश तार-तार होते दिखा। इससे संदेश यह मिला है कि लंबे लॉकडाउन से कई अप्रत्याशित चुनौतियां भी सामने आने वाली हैं। उनसे निपटने के लिए सरकार को दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देना होगा।
उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान ने कहा है कि जरूरी चीजों का मिलना सुनिश्चित करने के लिए सरकार हालात की निगरानी कर रही है। लोगों को रोजमर्रा की चीजों की किल्लत नहीं होनी चाहिए और इनकी कीमतें नियंत्रित रहनी चाहिए। कंस्ट्रक्शन सेक्टर में लगे मजदूरों के लिए श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने राहत का ऐलान किया है। 52,000 करोड़ के लेबर सेस फंड से पैसा सीधे मजदूरों के अकाउंट में भेजा जाएगा। इसके अलावा विभिन्न श्रेणी के मजदूरों को एक माह का राशन मुफ्त दिया जाएगा।
फिर, भारत समेत पूरी दुनिया में सरकारों के सामने आर्थिक मोर्चे पर अभी तिहरी चुनौती है। एक तरफ काफी पहले से निजी क्षेत्र की ओर उन्मुख हो चुके स्वास्थ्य और चिकित्सा ढांचे के बल पर विशाल आबादी की कोरोना वायरस से जुड़ी जांच कराना और बड़ी तादाद में लोगों का इलाज सुनिश्चित करना, जिसके लिए सरकारी खजाने से काफी सारी रकम खर्च करनी पड़ रही है। दूसरे, बिना किसी काम-धाम के अपने घरों में कैद करोड़ों लोगों के कम से कम तीन-चार महीने जिंदा रहने की व्यवस्था करना। और तीसरे, आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी- 2008 तो क्या, 1929 की महामंदी से भी बड़ी- आर्थिक मंदी से यथाशीघ्र उबरने का एक खाका भी तैयार रखना, ताकि महामारी से बचे लोग आने वाले दिनों में बेरोजगारी और भुखमरी के शिकार न हो जाएं।
लगभग सभी देशों की सरकारों ने इन तीनों लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए विशाल राहत पैकेजों की घोषणा करनी शुरू कर दी है, हालांकि ज्यादातर के यहां विभिन्न वजहों से खजाने का बाजा बजा हुआ है। अमेरिका में 2200 अरब डॉलर के ऐतिहासिक राहत पैकेज के तुरंत बाद अपने यहां वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन ने पेंशनयाफ्ता बुजुर्गों, अकेले घर चलाने वाली महिलाओं, दिव्यांगों और अकुशल ग्रामीण मजदूरों से लेकर किसानों, कंपनी कर्मचारियों और स्व-सहायता समूहों तक के लिए 1 लाख 70 हजार करोड़ रुपये की ऐसी कई योजनाएं घोषित की हैं, जिनके जरिये तीन महीने तक या तो कुछ अतिरिक्त रकम सीधे उनके खाते में जाएगी, या अपनी ही रकम एडवांस में निकाल कर वे अपने पारिवारिक खर्चे पूरे कर सकेंगे।
संकट की घड़ी में लोगों को सरकारी मदद देने की बात कहने में आसान लगती है लेकिन व्यवहार में यह काम बहुत मुश्किल होता है। सीधे खाते में रकम भेजना तकनीकी तौर पर इस समस्या को संबोधित करने का सबसे अच्छा तरीका है, लेकिन सालोंसाल हम देखते आ रहे हैं कि बीच में बैठे घडिय़ालों ने इस अमानत में भी खयानत करने के तमाम तरीके खोज लिए हैं।

कोरोनाः नेता लोग घर-घर जाएं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कल मैंने कुछ राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों से बात की और उनसे निवेदन किया कि जो लाखों दिहाड़ी मजदूर, कर्मचारी और खेरची विक्रेता अपने गांवों की तरफ भाग रहे हैं, उन्हें वे यात्रा की सुविधा दें। उन्होंने इसकी तुरंत व्यवस्था की। उन्हें किन शब्दों में धन्यवाद दिया जाए ? उन्होंने तालाबंदी को भंग नहीं किया बल्कि उसकी बर्दाश्त को बढ़ाया है। मुझे कई मित्रों ने फोन करके बताया कि उनकी वेबसाइटों और फेसबुक पर 30-30 लाख, 15-15 लाख लोगों ने मेरे कल के लेख को पढ़ा और उसके सुझावों का समर्थन किया।
आज मैं अपने सभी मुख्यमंत्रियों से निवेदन करता हूं कि वे ये तो कहते रहें कि लोग शहर छोड़कर गांवों की तरफ कूच न करें लेकिन फिर भी वे लोगों को अपने ठिकानों पर पहुंचाने की पूरी तैयारी करें। सबको अपनी जान प्यारी है। जो भी आवश्यक सावधानी है, उसका वे ध्यान अपने आप रखेंगे। उन्हें डंडे के जोर से डराया न जाए। अब मैं देश के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों से निवेदन कर रहा हूं कि वे देश की सभी पंचायतों, नगरपालिकाओं, नगर निगमों और विधानसभाओं के सदस्यों से कहें कि वे अपने-अपने निर्वाचन-क्षेत्रों में जाएं और हर घर को मुफ्त राशन बटवाएं। वे हर घर पर जैसे वोट लेने जाते हैं, वैसे ही अब अन्न देने जाएं। दिल्ली में मुख्यमंत्री केजरीवाल हर घर को 7.50 किलो राशन बंटवा रहे हैं। जिस घर को नहीं लेना है, वह राशन न ले। लेकिन गांवों में, कस्बों में और शहरों में किसी भी नागरिक को भूखे नहीं मरने देना है। सब घरों में अगले दो हफ्ते का राशन जरुर पहुंच जाएं। मुझे पूरा विश्वास है कि हमारे हजारों वर्षों से चले आ रहे घरेलू नुस्खों के दम पर हम इस महामारी पर जल्दी ही काबू पा लेंगे। ये नुस्खे चाहे कोरोना का सीधा इलाज न करें लेकिन वे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को काफी बढ़ा देते हैं। पिछले एक सप्ताह से मैं लगभग रोज इस मुद्दे पर जोर दे रहा हूं। मुझे खुशी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्यों की आज बैठक बुलाई थी। हमारे नुस्खों का फायदा सारे विश्व को मिलना चाहिए।
यह भारत दानवीरों का देश है। यह बात इस संकट के समय सिद्ध हो रही है। देश के सेठों ने अपनी तिजोरियां खोल दी हैं। छोटे-मोटे शहरों में वे सैकड़ों-हजारों लोगों के मुफ्त भोजन की व्यवस्था कर रहे हैं। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के 11 करोड़ सदस्यों का विशेष दायित्व है कि वे कोरोना-युद्ध में भारत को विजयी बनाएं।

अब तक के सबसे खराब दौर में पहुंची भारतीय अर्थव्यवस्था
सनत जैन
वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने वर्ष 2020 के आर्थिक अनुमान की रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में रेटिंग एजेंसी ने 2020 में भारत की आर्थिक विकास दर 2.50 फ़ीसदी रहने का अनुमान जताया है। इसी रेटिंग एजेंसी ने पिछली रिपोर्ट में भारत की आर्थिक विकास दर 5.3 फ़ीसदी रहने का अनुमान जताया था। मूडीज की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2020 में भारत की आय तेजी से घटेगी। घरेलू मांग भी काफी कम होगी। रेटिंग एजेंसी ने भारतीय बैंकों और एनएफसी कंपनियों के पास पर्याप्त नगदी नहीं होने के कारण आगे कर्ज हासिल करने में सबसे बड़ी बाधा बताया है। वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज की माने तो भारतीय अर्थव्यवस्था अपने सबसे खराब दौर पर पहुंच गई है। पिछले कई दशकों में इतनी बुरी हालत कभी नहीं रही, जो 2020 में होने जा रही है।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर शशिकांत दास में लाकडाउन के बाद विशेष पैकेज के रूप में जो घोषणा की है। उसमें रिजर्व बैंक ने रेपो रेट घटाकर 4.4 फ़ीसदी कर दिया है। 3 माह के लिए ईएमआई बढ़ाने का सुझाव उन्होंने बैंकों को दिया है। रेपो रेट 0.75 फ़ीसदी घटाने से ईएमआई में कर्जदारों को थोड़ी राहत मिलेगी। रिजर्व बैंक ने बैंकों का रिजर्व रेशो घटाकर 3 फ़ीसदी कर दिया है। इससे बैंकों के पास कर्ज बांटने के लिए 1.37 लाख करोड़ रुपया अतिरिक्त उपलब्ध होगा। रिजर्व बैंक ने जो घोषणा की है, वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार सांप गुजरने के बाद लकीर को पीटने जैसा उपाय है। इससे आर्थिक स्थिति में कोई सुधार होगा, यह अपेक्षा करना, वास्तविकता से मुंह छिपाने जैसा होगा।
वैश्विक व्यापार संधि भारत में लागू होने के बाद से भारत की आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था में बड़ी तेजी के साथ बदलाव आया। विश्व बैंक ने उधार लेकर तेजी के साथ विकास करने का जो नया फार्मूला सारी दुनिया के देशों को दिया था। उसके बाद से दुनिया भर के सभी विकासशील देशों ने विकसित देश बनने के लिए भारी पैमाने पर कर्ज लेना शुरू कर दिया। 2003 तक भारत का कोई भी नागरिक कर्जदार नहीं था। जो कर्जदार थे, उन्हें अपनी चल और अचल संपत्ति को गिरवी रखने पर संपत्ति का मात्र 25 से 50 फ़ीसदी ही ऋण उपलब्ध होता था। यदि वह नहीं चुका पाते थे, तो वह जप्त हो जाता था। लेकिन कर्जदार कोई भी भारतीय नहीं था। उस समय केंद्र एवं राज्य सरकार जरूर कर्ज लेती थी। किंतु वह भी बजट का एक सीमित हिस्सा होता था। 2004 के बाद से भारत के नागरिकों को बैंकों और फाइनेंस कंपनियों द्वारा बड़े पैमाने पर ऋण देना शुरू किया। वाहन खरीदने, टीवी, फ्रीज, मकान, प्लाट, शिक्षा के लिए कार, पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड से मिलना शुरू हो गया। जिसके कारण लोगों ने बड़े पैमाने पर कर्ज लिया। कर्ज लेकर घी पीने की कहावत चरितार्थ हुई। कर्ज स्टेट्स सिंबल बन गया। कर्ज के कारण सभी सेक्टरों में 2004 के बाद बड़ी तेजी के साथ मांग बढ़ी। भारत की अर्थव्यवस्था में साल दर साल बड़ी तेज गति से बढ़त हुई। केंद्र एवं राज्य सरकारों की टैक्स से आय बड़ी तेजी के साथ बढ़ी। उधारी की अर्थव्यवस्था का नशा भारत के प्रत्येक नागरिक में चढ़ा। इस नशे से केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और नगरीय संस्थाएं भी अछूती नहीं रही। सब ने अपनी क्षमता से कई गुना कर्ज लेकर, स्वर्ग के सुख भोगने शुरू कर दिए। अर्थात जिस चीज की इच्छा होती थी, कर्ज लेकर इच्छा को पूरा करने का कोई मौका किसी ने भी नहीं छोड़ा।
भारतीय अर्थव्यवस्था में पहला तगड़ा झटका 2016 में तब लगा। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1000 एवं 500 रुपए के नोटबंदी का निर्णय लिया। इस निर्णय से लगभग 6 माह तक भारत की अर्थव्यवस्था में ठहराव आ गया। घर-घर में महिलाओं की बचत जो स्त्री धन के रूप में थी। जो उन्होंने अपने पति और बच्चों से छुपा कर रखी थी। उसे भी बैंकों में जमा करना पड़ा। भारतीय किसानों को अपनी जमा राशि का सबूत देने के लिए, आयकर की रिटर्न भरनी पड़ी। रिजर्व बैंक ने काले धन नकली नोट तथा काली अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने का जो दावा किया था। वह तो हुआ नहीं। उल्टे रिजर्व बैंक ने जो 1000 एवं 500 रुपये के नोट जारी किए थे। उससे ज्यादा नोट रिजर्व बैंक में वापस आ गए। सरकार और रिजर्व बैंक आज भी इस आंकड़े को बताने के लिए तैयार नहीं है। यह कहा जा सकता है, कि भारत का यह सबसे बड़ा घोटाला था। जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया।
रही सही कसर जीएसटी लागू करने में सरकार ने जल्दबाजी कर भारतीय अर्थव्यवस्था को रसातल में पहुंचाने का काम किया। भारत की अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा योगदान कृषि एवं असंगठित क्षेत्र का होता है। कृषि, रोजगार और व्यापार से जुड़े लगभग 30 करोड़ों लोग भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। भारत में औद्योगिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा 35 फ़ीसदी से ज्यादा कभी नहीं रहा भारत के 60 फ़ीसदी हिस्से में आज भी इंटरनेट सेवा उपलब्ध नहीं है। सिग्नल नहीं मिलते हैं। दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में भी इंटरनेट की स्पीड और उसकी उपलब्धता बहुत कम है। यहां पर भी कई स्थानों पर सिग्नल ही नहीं मिलते हैं। छोटे शहरों एवं गांव की स्थिति आज भी बहुत खराब है। व्यापार एवं व्यवसाय में लगे लोग जो मिडिल क्लास की पास नहीं थे। जो अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त और कोई भाषा नहीं जानते थे। उनके ऊपर बिना किसी प्रशिक्षण के अंग्रेजी भाषा में जीएसटी का सॉफ्टवेयर और इंटरनेट के झूले में झूला कर जिंदा ही मार दिया गया। सरकार ने यह मान लिया था, कि सामान की बिक्री और सेवा प्रदाता द्वारा सेवा दिए जाने के साथ ही बिलों का भुगतान हो जाता है। हर माह टैक्स जमा करने की अनिवार्यता की गई। 12 फ़ीसदी से 28 फ़ीसदी का भारी भरकम टैक्स लगाया गया। खुद सरकार के विभिन्न विभागों नगरीय संस्थाओं और कारोबार में बिलों का भुगतान कई माह बाद तक होता है। जीएसटी के गलत प्रावधान के कारण कारोबारियों की पूंजी टैक्स के रूप में सरकारी खजाने में जमा हो गई। टैक्स जमा करने के लिए बैंकों से कर्ज लिया गया। बैंकों से लाखों कारोबारी डिफाल्टर हो गए। जीएसटी कानून में 700 से अधिक बार नियमों में संशोधन किया गया। व्यापारियों को सीए और बाबुओं के भरोसे छोड़ दिया गया। रही सही कसर इंटरनेट और जीएसटी के सॉफ्टवेयर ने पूरी कर दी। जिसके कारण लाखों कारोबारियों के उद्योग धंधे बंद हो गए। सारे देश में करोड़ों लोग बेरोजगार हो गए। जिसने अर्थव्यवस्था को काफी बड़ा नुकसान पहुंचाया। सरकार वास्तविकता की अनदेखी करती रही वह यह मान की चल रही थी, कि अपने आप सब कुछ ठीक हो जाएगा।
पिछले एक दशक में बैंकों ने कारपोरेट जगत को अरबों रुपए का कर्ज दिया, जो वापस नहीं आया। बैंकों ने उसे एनपीए में डाल दिया। पिछले एक दशक में बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं द्वारा बड़े पैमाने पर शेयर बाजार में निवेश किया। शेयर बाजार एक तरह से सट्टा बाजार है। जहां संभावनाओं के आधार पर पैसा निवेश किया जाता है, और उससे भारी कमाई की जाती है। सारी दुनिया के देशों में भारत का शेयर बाजार ही एक मात्र ऐसा शेयर बाजार है। जो बड़ी तेज गति से आगे बढ़ा। दुनिया भर के निवेशक भारतीय शेयर बाजार में बार-बार निवेश करके मुनाफा वसूली करते थे। बाजार को गिराने और चढ़ाने का खेल खेल कर भारतीय धन को विदेश ले जाने में देशी-विदेशी कारपोरेट निवेशक सफल रहे। इस खेल में देसी और विदेशी निवेशकों ने मिलकर भारतीय बाजार से पूंजी निकाली और विदेशों में निवेश कर दी। जब-जब बाजार गिरने को हुआ। केंद्र सरकार के इशारे पर बैंकों, एलआईसी तथा पीएफ का पैसा शेयर बाजार में निवेश कराकर कृत्रिम तेजी बनाए रखने का घोर पाप करने में केंद्र सरकार की भी बड़ी भूमिका रही। पिछले 2 माह में शेयर बाजार 42000 के उच्चतम स्तर से वापस लौट कर 30000 अंकों के नीचे आ गया है। इससे बैंकों एलआईसी तथा वित्तीय संस्थानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। 2019-20 की सभी वित्तीय संस्थानों की बैलेंस शीट अब घाटे में होंगी। यही कारण है, कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों के पास नगद पूंजी उपलब्ध नहीं है। खाते-बही में जरूर उनके पास पूंजी दिख रही है। भारतीय वित्तीय संस्थानों का धन शेयर बाजार में निवेश कराकर, देसी और विदेशी धन पशुओं के खाते में पहुंचाने में हमारे राजनेताओं और नीति निर्माताओं की भी बड़ी भूमिका है।
कोरोनावायरस के कारण देश में 21 दिनों का जो लॉकडाउन (जनता कर्फ्यू) लागू किया गया है। उससे देश की सारी आर्थिक गतिविधियां ठप्प हो गई हैं। देश में पहली बार रेलें, बसें, हवाई जहाज, उद्योग-धंधे कारोबार, मजदूरी सब बंद है। लोग घरों में कैद हैं। एक माह के अंदर ही लाखों करोड़ों रुपए की अर्थव्यवस्था का नुकसान भारत को होगा। वहीं आम आदमी के जीवन यापन और उनके जीवन को सुरक्षित बनाए रखने के लिए सरकार को अरबों रुपए अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा। भारतीय अर्थव्यवस्था में वर्तमान में ऐसी कोई तरलता नहीं है। जिससे वर्तमान खर्च को जुटाया जा सके। ऐसी स्थिति में भारतीय अर्थव्यवस्था का भगवान ही मालिक है। नागरिकों, नगरीय संस्थाओं, राज्य सरकारों तथा केंद्र सरकार के ऊपर आय से अधिक खर्च का बोझ है। नागरिकों के ऊपर टैक्स उच्चतम सीमा पर वसूल किया जा रहा है। नागरिकों के पास भी नगदी नहीं है। बैंकों के पास भी नगदी नहीं है। राज्य सरकारें हर माह कर्ज लेकर वेतन बांटने और उधारी चुकाने में कर रही हैं। केंद्र सरकार ने भी पिछले वर्षों में वित्तीय संस्थाओं से भारी कर्ज लिया है। नागरिकों के उपर भी भारी कर्ज है। जब सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था के बेपटरी हो रही है। ऐसी स्थिति में भारतीय अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए हमें बुजुर्गों के दिखाए मार्ग पर चलना होगा। अर्थात जितनी चादर उतना पैर पसारने, तथा कर्ज के स्थान पर बचत को बढ़ाकर ही हम अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं। उल्लेखनीय है, 1947 से लेकर 1997 तक भारत में जो भी विकास कार्य हुए हैं। वह बचत की अर्थव्यवस्था के कारण संभव हुए हैं। टैक्स भी कम था। विकास की गति कम जरुर थी। लेकिन अर्थव्यवस्था मजबूत थी। स्वतंत्रता के बाद 50 वर्षों में भारत ने प्राकृतिक आपदाओं, युद्ध और कई आपदाओं का सामना करते हुए अपने आप को लगातार मजबूत बनाया था। इसको हमें भूलना नहीं चाहिए।

कोरोनाः रेलें और बसें तुरंत चलाएं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
लॉकडाउन (तालाबंदी) की ज्यों ही घोषणा हुई, मैंने कुछ टीवी चैनलों पर कहा था और अपने लेखों में भी पहले दिन से लिख रहा हूं कि यह ‘लाॅकडाउन’ कोरोना से भी ज्यादा खतरनाक सिद्ध हो सकता है। कोरोना से पिछले दो हफ्तों में 20 लोग भी नहीं मरे हैं और 1000 लोग भी उसके मरीज़ नहीं हुए हैं लेकिन शहरों और कस्बों में काम-धंधे बंद हो जाने के कारण अब लाखों मजदूर और छोटे-मोटे कर्मचारी अपने गांवों की तरफ कूच कर रहे हैं। क्यों कर रहे हैं ? क्योंकि उन्हें हर शाम अपनी मजदूरी मिलनी बंद हो गई है। जो लोग कारखानों और दफ्तरों में ही सो जाते थे, उनमें ताले पड़ गए हैं। देश भर के इन करोड़ों लोगों के पास खाने को दाने नहीं हैं और सोने को छत नहीं है। वे अपने गांवों की तरफ पैदल ही चल पड़े हैं। उनके बीवी-बच्चे भी हैं। उनके पेट और जेब दोनों ही खाली हैं। सरकार ने 80 करोड़ लोगों के लिए खाने में मदद की घोषणा करके अच्छा कदम उठाया है लेकिन ये जो अपने गांवों की तरफ दौड़े जा रहे मजदूर, कर्मचारी और छोटे व्यापारी हैं, ये लोग भूख के मारे क्या रास्ते में ही दम नहीं तोड़ देंगे ? मरता, क्या नहीं करता ? रास्ते में घर और दुकानें बंद हैं ? इनके पास अपनी जान बचाने का अब क्या रास्ता बचा रहेगा ? क्या लूट-पाट और मार-धाड़ नहीं होगी ? सभी गृहस्थों और दुकानदारों से मेरा निवेदन है कि वे किसी भी यात्री को भूख से मरने न दें। मैं चाहता हूं कि अगले तीन दिन के लिए सभी सरकारी बसों और रेलों को खोल दिया जाए और सभी यात्रियों को मुफ्त-यात्रा की सुविधा दे दी जाए। करोड़ों लोग अपने गांवों में अपने परिवार के साथ संतोषपूर्वक रह सकेंगे। किसी तरह से वे अपने खाने-पीने का इंतजाम कर लेंगे। केंद्र और राज्य सरकारे लोगों की मदद कर ही रही हैं। जब मैं बसें और रेलें चलाने की बात कर रहा हूं तो यहां यह बताने की जरुरत भी है कि कोरोना से ज्यादातर वे ही लोग पीड़ित है, जो विदेश-यात्राओं से लौटे हैं और उनके संपर्क में आए हैं। जो मजदूर, किसान, छोटे कर्मचारी और छोटे विक्रेता गांवों की ओर भाग रहे हैं, उनका कोरोना से क्या लेना-देना है ? यदि सरकार मेरे इस सुझाव का लागू करती है तो कोरोना-युद्ध से लड़ने में उसको आसानी तो होगी ही, देश अराजकता से भी बच जाएगा। मैंने पहले भी लिखा है कि इस तरह की सावधानियां इस सरकार को पहले से सोच कर रखनी चाहिए थीं लेकिन कोई बात नहीं। अब भी मौका है। मैं अपने सभी राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोस्तों से अनुरोध करता हूं कि वे नरेंद्र भाई और अमित भाई को यह कदम उठाने के लिए प्रेरित करें।

‘करुणा’ जाएगी तो ‘कोरोना’ ही आएगा ?
तनवीर जाफ़री
मानव इतिहास में पहली सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में पूरा विश्व इस समय कोरोना के प्रकोप का सामना कर रहा है। दुनिया के जो शहर कभी अपने राजाओं व शासकों की मृत्यु के समय भी उनके शोक पर बंद नहीं हुए दुनिया के उन कोरोना प्रभावित कई शहरों में पूरी तरह शट डाउन देखा जा रहा है। जो बड़े से बड़े आयोजन अथवा कार्यक्रम कभी रद्द नहीं हुए उन्हें कोरोना की दहशत ने अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करा दिया है। विश्व के अनेक राष्ट्राध्यक्ष अपने देश की जनता को अपनी अपनी सोच के अनुरूप संबोधित कर चुके हैं। जहाँ इस बात की उम्मीद की जा रही थी कि तापमान में बढ़ोत्तरी होने के साथ साथ कोरोना का प्रकोप भी संभवतः समाप्त हो जाएगा वहीँ पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संग्ठन ने यह कहकर दुनिया की चिंताएं और बढ़ा दी हैं कि गर्मी के मौसम में भी कोरोना पूरी तरह से प्रभावहीन नहीं होगा। हाँ तापमान अधिक बढ़ने से इसके प्रकोप में कमी ज़रूर आ सकती है। प्रायः अधिक गर्मी के मौसम में अधिकांश वायरस प्रभाव विहीन हो जाते हैं या नष्ट हो जाते हैं। परन्तु कहा जसा रहा है कि कोरोना वायरस एक ऐसा विलक्षण वायरस है जो 37 डिग्री सेल्सियस पर भी इन्सान के शरीर में जीवित रहता है। यही वजह है कि अभी तक कोरोना को निष्क्रिय करने वाले निश्चित व सटीक तापमान का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सका है। कोरोना वायरस को लेकर अब तक जो भी दावे सामने आ रहे हैं, उनमें से ज़्यादातर का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इस वायरस को लेकर अभी कोई पुख़्ता अध्ययन नहीं है। अभी तक ऐसा माना जा रहा है कि तापमान बढ़ने पर ये वायरस स्वतः ख़त्म हो जाएगा या इसका प्रकोप बहुत कम हो जाएगा। हालांकि, इसकी कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं है।। इसीलिये विश्व स्वास्थ्य संग्ठन ने पूरी दुनिया को इससे गंभीरता से लड़ने तथा इससे बचाव के हर संभव उपाय अपनाने की सलाह दी है।
कोरोना वायरस की भयावहता तथा इसके दुष्प्रभाव से लड़ने के उपायों से जूझते स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों के बीच इसी कोरोना से जुड़े कुछ ऐसे कई बेतुके वैश्विक तथ्य भी हैं जो सोशल मीडिया से लेकर अनेक समाचार व संचार माध्यमों में प्रमुखता से दिखाई दे रहे हैं। उदाहरण के तौर पर चूँकि इस वायरस की पहली शिनाख़्त चीन के वुहान शहर से हुई इसलिए सर्वप्रथम दुनिया ने चीन के लोगों के खान पान की शैली पर ही सवाल उठाना शुरू दिया। बाद में जब इसकी भयावहता और बढ़ी उस समय चीन से अनेक कारणों से असहज रहने वाले अमेरिका सहित कई देशों व नेताओं ने पूरी तरह से चीन को ही इस वायरस के उत्सर्जन का ज़िम्मेदार बता दिया। अमेरिका को चीन ने भी उसी भाषा में जवाब दिया और कहा कि चीन नहीं बल्कि अमेरिका इसके लिये ज़िम्मेदार है क्योंकि यह अमेरिकी सैनिकों द्वारा पैदा किया गया वायरस है। बीच बहस में शाकाहारी भी कूद पड़े,और मांसाहारी प्रवृति को ही कोरोना का ज़िम्मेदार बताने लगे। इसी बहस में इस्लामी ग्रुप से संबंधित लोगों का कूदना भी शायद ज़रूरी था तभी उस विचारधारा के लोगों ने यह बता डाला कि चीन में चूँकि मुसलमानों पर चीन सरकार ने बड़े ज़ुल्म ढाए थे इसलिए ‘ख़ुदा के क़हर के रूप में यह वायरस अल्लाह का भेजा हुआ अज़ाब है। यह कथित अति उत्साही इस्लामी ग्रुप के लोग यहीं पर नहीं रुके बल्कि इनकी तरफ़ से एक वीडीओ ऐसी भी वॉयरल की गयी जिसमें यह दावा किया गया कि चीन के लोग कोरोना के क़हर से पनाह मांगने के लिए क़ुरान शरीफ़ पढ़ हैं तथा इसे बाँट रहे हैं। परन्तु इस वर्ग की यह आवाज़ उस समय मद्धिम हो गयी जब ईरान में भी इसका भयंकर प्रकोप फैल गया और वहां के कई धर्मगुरु भी इसकी चपेट में आ गए। इतना ही नहीं बल्कि कुछ समय के लिए तो काबा शरीफ़ का दैनिक तवाफ़ (परिक्रमा) भी स्थगित कर दिया गया।
तर्कशीलों द्वारा भी इस अवसर को अपनी तार्किक नज़रों से देखा गया। इस वर्ग द्वारा जनमानस के बीच एक सवाल यह छोड़ा गया कि आज जबकि लगभग कोरोना प्रभावित या कोरोना के दुष्प्रभाव की संभावना रखने वाले देशों ने अपने सभी धर्मों के लोगों को उनके अपने अपने धर्मस्थलों पर उनके अपने इष्ट व देवताओं के समक्ष नतमस्तक होने के लिए रोक दिया। जबकि प्रायः किसी भी विपदा या संकट के समय सभी कथित धर्मभीरु लोग अपने अपने ईष्ट के आगे ही सिर झुकाते हैं तथा संकट से उबरने की प्रार्थना करते हैं। परन्तु वही कथित धर्मपरायण वर्ग इस महाविपदा के समय एक बार फिर विज्ञान,अस्पताल तथा स्वास्थ्य वैज्ञानिकों की शोध की तरफ़ उम्मीद भरी नज़रों से देखने के लिए मजबूर है। तर्कशील वर्ग का तर्क है कि एक बार फिर धार्मिक सोच पर वैज्ञानिक मान्यताओं को जीत हासिल हुई है। हालाँकि दुनिया के देशों द्वारा इस तरह के भीड़ नियंत्रण करने के उपाय इसलिए किये जा रहे हैं ताकि अधिक लोगों को एक साथ इकट्ठे होने से रोका जा सके।
इस महाविपदा के समय में दुनिया का प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति जहाँ इस प्रलयकारी मर्ज़ की भयावहता को सुन सुनकर चिंताओं में डूबता जा रहा है वहीं कोरोना पॉज़िटिव लोगों की दुर्दशा तथा कई देशों में उनके प्रति अपनाए जाने वाले दर्दनाक रवैये से भी आहत है। इस समय पूरे विश्व में कोई भी मानवतावादी व्यक्ति,संस्था या संगठन अथवा देश ऐसा नहीं होगा जो किसी व्यक्ति समूह अथवा पूरे देश के लिए ‘कोरोना प्रभावित’ होने जैसी दुर्भावना रखे। परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसे विचार रखने वाला अपने ही देश का एक आग लगाऊ टी वी चैनल ही नज़र आया। मानवीय संवेदनाओं को ताक़ पर रखते हुए पिछले दिनों कोरोना वायरस के सम्बन्ध में एक बेहद नकारात्मक व दहशत पैदा करने वाली रिपोर्ट प्रसारित की। इस प्रसारण में उस ‘महान एंकर’ ने क्या पेश किया होगा इसका अंदाज़ा कार्यक्रम के इस दुर्भावना पूर्ण शीर्षक से ही लग जाता है। शीर्षक था ‘अब कोरोना की मौत मरेगा पाकिस्तान’। मैं नहीं समझता कि ऐसी त्रासदी के समय में किसी भी देश के किसी ज़िम्मेदार न्यूज़ चैनल के किसी एंकर ने इस प्रकार के घटिया व अमानवीयतापूर्ण शीर्षक के साथ किसी कार्यक्रम को प्रस्तुत किया होगा। परन्तु दुर्भाग्यवश कोरोना के इस विश्वव्यापी प्रकोप के समय ‘करुणा’ का त्याग करने वाला यह चैनल भारत जैसे ‘करुणामयी’ देश का ही एक चैनल है। नित्य भयावह होते जा रहे इस वातावरण में अनेक मानवतावादी यह सोचने के लिए मजबूर हैं कि विश्व के बड़े भाग में ‘कोरोना’ वायरस का पैर पसारना कहीं मानव में ‘करुणा’ भाव व मानवीय संवेदनाओं में निरंतर आती जा रही कमी का परिणाम तो नहीं ?

सरकार की सुनें
सिद्धार्थ शंकर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार रात 21 दिन के लॉकडाउन का सख्त फैसला सुना दिया। कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए यह कितना जरूरी है, यह शायद सभी को नहीं पता। यह बीमारी बाहर से भारत आई है, ऐसे में उनका लौटना खतरे की घंटी जैसा है। इसी वजह से सरकार ने पूरे भारत में लॉकडाउन और कई जगहों पर कफ्र्यू की भी घोषणा कर दी। लॉकडाउन लगाने की मुख्य वजह लोगों की लापरवाही है। पिछले दिनों मोदी ने ट्वीट कर इस पर नाराजगी भी जताई थी और कहा था कि लोग अब भी गंभीर नहीं हैं। अब 21 दिन का लॉकडाउन लगाने के पीछे सरकार की मंशा यही है कि बाहर से आए अगर किसी को कोरोना है भी तो वह उसे फैला न पाए। इस दौरान जिसमें लक्षण आने होंगे 14 जिन में दिख जाएंगे। उनका इलाज भी शुरू हो जाएगा वहीं जो पहले से पॉजेटिव हैं उनका भी इलाज पूरा हो जाएगा। हालांकि, 21 दिनों के बाद लॉकडाउन खत्म हो जाएगा, यह गारंटी के साथ नहीं कहा जा सकता है। 21 दिन की मियाद खत्म होने के बाद देश में वायरस के प्रकोप की समीक्षा आने वाले दिनों का भविष्य तय करेगी। खैर, यह सब सरकार पर छोड़ दीजिए… हमारे-आप के लिए तो बस एक ही काम है, घर पर रहिए और खुद को सुरक्षित कीजिए।
भारत में कोरोना संक्रमण से पीडि़त नए मरीजों का सामने आना बता रहा है कि बचाव के तमाम उपायों के बावजूद देश में यह महामारी फैल रही है। भले बड़े पैमाने पर संक्रमण के मामले सामने न आए हों, लेकिन रोजाना जिस तरह से नए मरीज सामने आ रहे हैं, वह चिंता का विषय है। ज्यादातर राज्यों में स्कूल और कॉलेज, सिनेमाघर, मॉल आदि बंद कर दिए गए हैं। ऐहतियात के तौर पर लोगों को दफ्तर के बजाय घर से काम करने को कहा गया है। सरकार ने हालात की गंभीरता को देखते हुए कोरोना संकट को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया है। हालात बेकाबू न हों, इसके लिए हर स्तर पर हरसंभव कदम उठाए जा रहे हैं। अभी तक कोरोना संक्रमण के जितने मामले सामने आए हैं, उनसे यह साबित हो चुका है कि यह संक्रमण संपर्क के जरिए ही फैल रहा है। ज्यादातर कोरोना पीडि़त वही लोग हैं जो विदेश यात्रा से लौटे हैं और यहां जो उनके संपर्क में आया, उसे यह संक्रमण लगा।
डॉक्टर हाथ धोने, भीड़ वाली जगहों पर मास्क लगाने और खांसी-जुकाम वाले मरीजों से एक मीटर की दूरी बनाए रखने जैसे उपायों पर जोर दे रहे हैं जो इस संक्रमण से बचाव के बुनियादी तरीके हैं। जब ऐसी महामारी फैलती है तो लोग घबरा जाते हैं और अपने स्तर पर ऐसे उपाय करने लगते हैं जो उन्हें संकट में डाल सकते हैं। सबसे जरूरी यह है कि डॉक्टर इससे बचाव के जो तरीके बता रहे हैं, उन्हें नजरअंदाज न किया जाए। यह बात सही है कि यह वायरस मनुष्य से मनुष्य में फैल रहा है, लिहाजा संक्रमित या अनजान लोगों से शारीरिक नजदीकी इसके फैलने में मददगार होती है। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि भारत जैसे बड़े देश को पूरा का पूरा घरों में बंद करना न तो संभव है, न ही यहां यह इस वायरस से लडऩे का सबसे उपयुक्त तरीका हो सकता है। चीन में यह बीमारी सिर्फ एक शहर वुहान में केंद्रित थी, इसलिए वहां इस शहर और इसके लोगों को आइसोलेशन में डालना कारगर साबित हुआ। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह था कि वुहान के चप्पे-चप्पे पर जबर्दस्त सैनिटाइजेशन कैंपेन चलाया गया और अब यह प्रांत फिर से पटरी पर लौटने के लिए तैयार है। चीन अपने यहां लॉकडाउन खत्म करने की तैयारी कर रहा है। यह तभी संभव हो पाया, जब वहां के लोगों ने सरकार का साथ दिया और उसके निर्देशों को माना।
भारत में अभी मरीजों की संख्या उतनी ज्यादा नहीं है, लेकिन वे बहुत बड़े भूगोल में फैले हुए हैं। ऐसे में आइसोलेशन की रणनीति सोच-समझ कर ही अपनाना ठीक रहेगा। सबको घरों में बंद रहने की हिदायत देना, बाजार बंद करवाना, ट्रेनें न चलाना, सड़कें खाली करवाना बेहद जरूरी था, इसलिए सरकार ने किया। अब हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम इस आदेश का शत-प्रतिशत पालन करें और भारत से कोरोना संक्रमण को जल्द से जल्द दूर भगाएं।

कोरोना एक अद्र्श्य सेना के खिलाफ लड़ाई है
डॉ नीलम महेंद्र
कोरोना से विश्व पर क्या असर हुआ है इसकी बानगी अमरीकी राष्ट्रपति का यह बयान है कि, “विश्व कोरोना वायरस की एक अदृश्य सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है।” चीन के वुहान से शुरू होने वाली कोरोना नामक यह बीमारी जो अब महामारी का रूप ले चुकी है आज अकेले चीन ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए परेशानी का सबब बन गई है। लेकिन इसका सबसे अधिक चिंताजनक पहलू यह है कि वैश्वीकरण की वर्तमान परिस्थितियों में यह बीमारी समूची दुनिया के सामने केवल स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि आर्थिक चुनौतियाँ भी लेकर आई है। सबसे पहले 31 दिसंबर को चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को वुहान में न्यूमोनिया जैसी किसी बीमारी के पाए जाने की जानकारी दी। देखते ही देखते यह चीन से दूसरे देशों में फैलने लगी और परिस्थितियों को देखते हुए एक माह के भीतर यानी 30 जनवरी 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे विश्व के लिए एक महामारी घोषित कर दिया। स्थिति की भयावहता को इसी से समझा जा सकता है कि आज लगभग दो महीने बाद, चीन नहीं बल्कि यूरोप चीन से शुरू हुई इस बीमारी का नया एपिसेंटर यानी उपरिकेन्द्र बन चुका है। अब तक दुनिया भर में इसके 219357 मामले सामने आ चुके हैं जिनमें से 8970 लोगों की जान जा चुकी है। जिनमें से चीन में 3245, इटली में 2978, ईरान में 1135, अमेरिका में 155, फ्रांस में 264, ब्रिटेन में 104 मौतें हुई हैं। ईरान में तो हालत यह है कि वहाँ की सरकार ने महामारी फैलने के डर से अपनी जेलों में बंद लगभग 2500 कैदी रिहा कर दिए। कनाडा के प्रधानमंत्री की पत्नी इसकी चपेट में हैं।
भारत की अगर बात करें तो इसकी वजह से हमारे देश में अब तक तीन लोगों की जान जा चुकी है और धीरे धीरे इस महामारी ने यहाँ भी अपने पांव पसारना शुरू कर दिया है। दक्षिण भारत के राज्य केरल से देश में प्रवेश करने वाला यह वायरस कर्नाटक, महाराष्ट्र, दिल्ली,हरियाणा और पंजाब होता हुआ उत्तर भारत के केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख तक पहुंच गया है। पहले से ही आर्थिक मंदी झेल रहे भारत समेत अधिकतर देशों में कोरोना के बेकाबू होते संक्रमण से बचने के चलते शट डाउन जारी है। यानी सिनेमा हॉल, मॉल, बाजार, स्कूल, कॉलेज बंद कर दिए गए हैं। भारत में तो बोर्ड और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाएँ तक अगले आदेश तक स्थगित कर दी गई हैं। विभिन्न मल्टीनेशनल कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को घर से काम करने को कहा है। सरकार की ओर से भी एडवाइजरी जारी की गई है जिसमें वो लोगों से एक जगह एकत्र होने से बचने के लिए कह रहे हैं और उन्हें आइसोलेशन यानी कुछ समय के लिए एक दूसरे से मेलजोल कम करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। यह बात सही है कि भारत सरकार ने शुरू से ही कोरोना वायरस के रोकथाम के लिए गंभीर प्रयास आरम्भ कर दिए थे। विदेशों में फंसे भारतीयों को वापस लाने में भी इस सरकार ने ना सिर्फ तत्परता दिखाई बल्कि भारत आने के बाद उनकी जांच और उनके क्वारंटाइन के भी इतने बेहतरीन उपाय किए कि ना सिर्फ विदेशों से लौटे भारतीय ही भारत सरकार के इंतज़ाम को अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों से बेहतर बता रहे हैं अपितु विश्व स्वास्थ्य संगठन भी भारत सरकार के इन प्रयासों की तारीफ किए बिना नहीं रह सका। विश्व स्वास्थ्य संगठन के भारत के प्रतिनिधि हेंक बेकडम ने कहा है कि, “कोरोना के खिलाफ पी एम ओ समेत पूरी भारत सरकार के प्रयास प्रभावशाली हैं।”
लेकिन दिक्कत यह है कि हालांकि इस प्रकार की आइसोलेशन से बीमारी से तो बचा जा सकता है लेकिन इससे होने वाले आर्थिक प्रभाव से नहीं। यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस बात का अंदेशा है कि आने वाले महीनों में बढ़ते तापमान के साथ हालांकि इस बीमारी का प्रकोप धीरे धीरे कम होकर समाप्त हो जाएगा लेकिन स्वाइन फ्लू की ही तरह तापमान कम होते ही हर साल यह फिर से सिर उठाएगी। इसलिए इस बीमारी से लड़ने के लिए हमें लघु अवधि या तात्कालिक उपाय ही नहीं दूरगामी परिणाम वाले उपाय भी करने होंगे। इस दिशा में विभिन्न देश अलग अलग कोशिशें कर रहे हैं। जैसे भारत में राजस्थान के एस एम एस अस्पताल के डॉक्टरों ने मलेरिया स्वाइन फ्लू एच आई वी की दवाइयों के कॉम्बिनेशन से कोरोना के एक ऐसे मरीज़ को ठीक किया जिसे मधुमेह भी था। यह अपने आप में एक उपलब्धि है जिसने भविष्य में इसके इलाज को खोज निकालने की नींव डाली है। वहीं अमेरिका ने कोरोना की वैक्सीन बनाने का दावा किया जिसे कथित तौर पर एक महिला पर उपयोग भी किया गया है।
लेकिन इन प्रयासों से विपरीत ब्रिटेन इस बीमारी से लड़ने के लिए एक अनोखा और रोचक किन्तु जोखिम भरा प्रयोग कर रहा है। उसने कोरोना से लड़ने के लिए आइसोलेशन थेरेपी के बजाय हर्ड यानी झुंड इम्युनिटी का सिद्धांत अपनाने का फैसला लिया है। इसके अनुसार वो अपने लोगों को एक दूसरे से दूर रहने के बजाए एक दूसरे के साथ सामान्य जीवन जीने की सलाह दे रहे हैं। इस पद्धति का मानना होता है कि स्वस्थ मानव शरीर में रोगों से लड़ने की नैसर्गिक शक्ति होती है। प्राचीन काल से अबतक मानव ने अपनी इसी रोगप्रतिरोधक क्षमता के बल पर अनेक रोगों पर विजय पाई है। दरअसल वैक्सीन भी इसी सिद्धांत पर काम करती है। किसी बीमारी की वैक्सीन के जरिए उस बीमारी के कीटाणु एक सीमित मात्रा में मानव शरीर में पहुँचाए जाते हैं। वैक्सीन के जरिए इन कीटाणुओं के सीमित मात्रा में मानव शरीर में प्रवेश करते ही शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के चलते उससे लड़ने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है जिससे भविष्य में ऐसी किसी बीमारी के आक्रमण के लिए हमारा शरीर पहले से तैयार हो जाता है। इसी सिद्धान्त के आधार पर ब्रिटेन अपने स्वस्थ नागरिकों को सामान्य जीवन जीने की आज़ादी दे रहा है और क्वारंटाइन केवल बच्चों, बूढ़ों या फिर उनका कर रहा है जो कमजोर हैं या फिर पहले से मधुमेह जैसी बीमारियों की वजह से उनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता कम है। देखा जाए तो यह कदम जोख़िम भरा तो है लेकिन अगर कारगार होता है ब्रिटेन के लोगों को भविष्य में इस बीमारी से डरने की जरूरत नहीं होगी। इन प्रयोगों के नतीजे जो भी हों लेकिन इतना तो निश्चित है कि अब मानव सभ्यता को अपनी अंधे वैज्ञानिक विकास की दौड़ की कीमत कोरोना नामक एक खतरनाक संक्रामक बीमारी से चुकानी होगी। लेकिन कोरोना को लेकर अफवाहों के इस दौर में यह जान लेना अति आवश्यक है कि यह खतरनाक इसलिए नहीं है कि यह जानलेवा है बल्कि इसलिए हे कि यह संक्रामक है। आंकड़ों पर गौर करें तो कोरोना से मृत्यु प्रतिशत केवल 4% है। अर्थात कोरोना से पीड़ित 100 में से केवल चार प्रतिशत लोगों की मृत्यु होती है वो भी उनकी जो बूढ़े हैं या जिनकी किसी कारणवश रोग प्रतिरोधक क्षमता कम है। बस हमें काबू पाना है इसके संक्रमण पर। देश के एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर हम में से हरेक को सावधानी बरतनी है कि यह देश में हमसे किसी दूसरे को न फैले। क्योंकि पंजाब में एक मामला सामने आया जिसमें विदेश से लाए गए लगभग 134 लोग स्वास्थ जांच कराए बिना एयरपोर्ट से भाग गए। अब प्रशासन उन्हें ढूंढने में लगा है। सोचने वाली बात है कि अगर इनमें से कोई कोरोना जांच में पोसिटिव पाया जाता है तो वह देश के लोगों के स्वास्थ्य के लिए कितना बड़ा खतरा है। इसलिए सरकार तो अपना काम कर ही रही है, हमें भी इस कठिन घड़ी में अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।

कोरोना से डरो ना !
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जनता-कर्फ्यू तो सिर्फ इतवार को था, लेकिन आज सोमवार को भी वह सारे देश में लगा हुआ मालूम पड़ रहा है। मेरा घर गुड़गांव की सबसे व्यस्त सड़क गोल्फ कोर्स रोड पर है लेकिन इस सड़क पर आज भी हवाइयां उड़ रही हैं। घर के पास से गुजरनेवाली रेपिड मेट्रो तो बंद ही है, सड़क पर वाहन दौड़ते हुए भी नहीं दिखाई पड़ रहे हैं। यह ठीक है कि हरयाणा सरकार ने तालाबंदी (लाॅकडाउन) घोषित कर दी है लेकिन यहां न तो ताला दिखाई पड़ रहा है और न ही चाबी! सड़क के कोने पर लगनेवाले सब्जी और फलों के ठेले तक नदारद हैं। खाने-पीने की चीजों की दुकानें भी अभी (दोपहर 12 बजे) तक बंद हैं। तालाबंदी ने जिन्हें छूट दे रखी है, वे लोग भी घर बैठे हैं। कितने डर गए हैं, हम लोग ? जो लोग दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, यदि रोज शाम को उन्हें 200-250 रु. मजदूरी न मिले तो वे खाएंगे क्या ? ऐसे लगभग 60-70 करोड़ लोगों के लिए 10-15 दिन बाद क्या कोरोना से भी बड़ा संकट खड़ा नहीं हो जाएगा ? कारखाने और दुकाने बंद होने से देश में आर्थिक आपात्काल आ धमकेगा। केरल और उत्तरप्रदेश की सरकारों ने उससे निपटने के कुछ कदम उठा लिए हैं लेकिन केंद्रीय तथा अन्य प्रांतीय सरकारें देरी क्यों कर रही हैं ? कोरोना के विरुद्ध हम जो सावधानियां बरत रहे हैं, वे तो ठीक हैं लेकिन सावधानियों से जो संकट खड़े होनेवाले हैं, उनके प्रति भी हम सावधान हैं या नहीं ? खाने-पीने की चीजें एक हफ्ते बाद इतनी मंहगी और कम हो जाएंगी कि देश में कहीं लूट-पाट का माहौल न बन जाए ? जिन लोगों को पढ़ने-लिखने, टीवी पर सिनेमा देखने, संगीत सुनने और घरेलू खेल खेलने का शौक नहीं है, वे घर बैठे-बैठे कहीं उदासीनता के अवसाद में न डूब जाएं ? कोरोना का डर इतना ज्यादा फैल गया है कि लोग एक-दूसरे को फोन करने में भी कोताही दिखा रहे हैं। कल मेरे पास मुश्किल से 8-10 फोन आए, जो कि रोजमर्रा की तुलना में 10 प्रतिशत भी नहीं हैं। आजकल घर बैठकर वैसा ही एकांत अनुभव हो रहा है, जैसा 60-70 साल पहले हम किन्हीं हिल स्टेशनों के जंगलों में बनी कुटियाओं में किया करते थे। आजकल स्वाध्याय और मौन-साधना का आनंद अनायास ही प्राप्त हो रहा है। लेकिन सभी लोग तो ऐसा आनंद नहीं कर सकते। वे क्या करेंगे ? वे डरे नहीं। तालाबंदी खुलने पर वे काम पर जाएं। भीड़-भड़क्के से बचें। लोगों से दूरी बनाए रखें। सावधान रहें। सरकारें भी कोरोना के राक्षस से निपटने की पूरी तैयारी रखें। अब एक साथ खड़े होकर ताली और थाली बजाना बंद करें। कहीं यह देश को मंहगा न पड़ जाए। (आज देश के महान विचारक और क्रांतिकारी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया की 110वीं जयंति है। उन्हें हार्दिक नमन।)

नवरात्रि-शक्ति की महत्ता का पर्व
प्रो.शरद नारायण खरे
नवरात्रि हिंदुओं का एक विशेष पर्व है। नवरात्रि शब्द एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘नौ रातें’। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवाँ दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। पौष, चैत्र,आषाढ,अश्विन प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों – महालक्ष्मी, महासरस्वती या सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिनको क्रमशः नंदा देवी, रक्ततदंतिका,शाकम्भरी, दुर्गा,भीमा और भ्रामरी कहते हैं। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दुर्गा का मतलब जीवन के दुख कॊ हटानेवाली होता है। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्यौहार है जिसे पूरे भारत में महान उत्साह के साथ मनाया जाता है।
शैलपुत्री ,ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी ,सिद्धिदात्री ये दुर्गा मां के नौ रूप हैं ।
नवरात्रि भारत के विभिन्न भागों में अलग ढंग से मनायी जाती है। गुजरात में इस त्योहार को बड़े पैमाने से मनाया जाता है। गुजरात में नवरात्रि समारोह डांडिया और गरबा के रूप में जान पड़ता है। यह पूरी रात भर चलता है। डांडिया का अनुभव बड़ा ही असाधारण है। देवी के सम्मान में भक्ति प्रदर्शन के रूप में गरबा, ‘आरती’ से पहले किया जाता है और डांडिया समारोह उसके बाद। पश्चिम बंगाल के राज्य में बंगालियों के मुख्य त्यौहारो में दुर्गा पूजा बंगाली कैलेंडर में, सबसे अलंकृत रूप में उभरा है। इस अदभुत उत्सव का जश्न नीचे दक्षिण, मैसूर के राजसी क्वार्टर को पूरे महीने प्रकाशित करके मनाया जाता है।
नवरात्रि उत्सव देवी अंबा (विद्युत) का प्रतिनिधित्व है। वसंत की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है। त्योहार की तिथियाँ चंद्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। नवरात्रि पर्व, माँ-दुर्गा की अवधारणा भक्ति और परमात्मा की शक्ति (उदात्त, परम, परम रचनात्मक ऊर्जा) की पूजा का सबसे शुभ और अनोखा अवधि माना जाता है। यह पूजा वैदिक युग से पहले, प्रागैतिहासिक काल से चला आ रहा है। ऋषि के वैदिक युग के बाद से, नवरात्रि के दौरान की भक्ति प्रथाओं में से मुख्य रूप गायत्री साधना का हैं। नवरात्रि में देवी के शक्तिपीठ और सिद्धपीठों पर भारी मेले लगते हैं । माता के सभी शक्तिपीठों का महत्व अलग-अलग हैं। लेकिन माता का स्वरूप एक ही है। कहीं पर जम्मू कटरा के पास वैष्णो देवी बन जाती है। तो कहीं पर चामुंडा रूप में पूजी जाती है। बिलासपुर हिमाचल प्रदेश मे नैना देवी नाम से माता के मेले लगते हैं तो वहीं सहारनपुर में शाकुंभरी देवी के नाम से माता का भारी मेला लगता है।
नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। यह पूजा उसकी ऊर्जा और शक्ति की की जाती है। प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है।व्यक्ति जब अहंकार, क्रोध, वासना और अन्य पशु प्रवृत्ति की बुराई प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है, वह एक शून्य का अनुभव करता है। यह शून्य आध्यात्मिक धन से भर जाता है। प्रयोजन के लिए, व्यक्ति सभी भौतिकवादी, आध्यात्मिक धन और समृद्धि eप्राप्त करने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करता है। नवरात्रि के चौथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी, की पूजा करने के लिए समर्पित है। शायद व्यक्ति बुरी प्रवृत्तियों और धन पर विजय प्राप्त कर लेता है, पर वह अभी सच्चे ज्ञान से वंचित है। ज्ञान एक मानवीय जीवन जीने के लिए आवश्यक है भले हि वह सत्ता और धन के साथ समृद्ध है। इसलिए, नवरात्रि के पांचवें दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। सभी पुस्तकों और अन्य साहित्य सामग्रियों को एक स्थान पर इकट्ठा कर दिया जाता हैं और एक दीया देवी आह्वान और आशीर्वाद लेने के लिए, देवता के सामने जलाया जाता है।
सातवें दिन, कला और ज्ञान की देवी, सरस्वती, की पूजा की है। प्रार्थनायें, आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश के उद्देश्य के साथ की जाती हैं। आठवे दिन पर एक ‘यज्ञ’ किया जाता है। यह एक बलिदान है जो देवी दुर्गा को सम्मान तथा उनको विदा करता है। …
नौवा दिन नवरात्रि का अंतिम दिन है। यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन कन्या पूजन होता है। जिसमें नौ कन्याओं की पूजा होती है जो अभी तक यौवन की अवस्था तक नहीं पहुँची है। इन नौ कन्याओं को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। कन्याओं का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। पूजा के अंत में कन्याओं को उपहार के रूप में नए कपड़े प्रदान किए जाते हैं।
प्रकारांतर से नवरात्रि नारी शक्ति की आराधना का ही पर्व है।
“नौ रूपों में नार है,देवी का प्रतिरूप।
शीतल छाया बांटकर,देती सुखमय धूप।।”

भारत जीतेगा कोरोना-युद्ध
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जनता-कर्फ्यू की सफलता अभूतपूर्व और एतिहासिक रही है। पिछले 60-70 साल में मैंने कई भारत बंद देखे हैं और उनमें भाग भी लिया है लेकिन ऐसा भारतबंद पहले कभी नहीं देखा। इस पहल का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तो है ही, इस जनता-कर्फ्यू ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि मोदी से बड़ा प्रचारमंत्री पूरी दुनिया में कोई नहीं है। इटली, चीन, स्पेन और अमेरिका में कोरोना से हजारों लोग हताहत हुए लेकिन इन देशों में भी जनता का ऐसा कर्फ्यू कहीं नहीं हुआ। इसका एक कारण यह भी है कि लोगों के दिल में मौत का डर गहरे में बैठ गया है, वैसा शायद कहीं नहीं फैला है। इसके अलावा भारत की केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारें भी जबर्दस्त मुस्तैदी दिखा रही हैं। यदि अगले 15 दिन ठीक-ठाक निकल गए तो भारत की यह मुस्तैदी सारी दुनिया के लिए एक मिसाल बन जाएगी। इस जनता-कर्फ्यू ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि भारत की जनता काफी जिम्मेदार और समझदार है। भारत के 60-70 प्रतिशत मतदाताओं ने मोदी के विरुद्ध मतदान किया है लेकिन एकाध अधकचरे नेता के अलावा देश के 100 प्रतिशत लोगों ने मोदी के आह्वान का सम्मान किया है। मुझे आश्चर्य है कि अभी तक मोदी ने दक्षेस के पड़ौसी राष्ट्रों के नेताओं के साथ इसी तरह का आह्वान करने की बात क्यों नहीं की और अभी तक देश के वंचित वर्ग के लोगों के लिए सीधी आर्थिक सहायता की घोषणा क्यों नहीं की ? मुझे खुशी है कि हमारे सभी प्रमुख टीवी चैनल कोरोना-युद्ध लड़ने के लिए हमारे परमप्रिय बाबा रामदेवजी को योद्धा बनाए हुए हैं। आसन और प्राणायाम के साथ-साथ वायुशोधक औषधियों से हवन करने की प्रेरणा मोदी और रामदेव जनता को क्यों नहीं दे रहे हैं ? अ-हिंदू लोग चाहें तो हवन में वेद मंत्रपाठ करने की बजाय कुरान की आयतें, बाइबिल के पद, त्रिपिटक के सूत्र, जैन-आगम आदि का पाठ कर सकते हैं। विषाणु-निरोधक आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपेथिक दवाइयां लेने में भी कोई हानि नहीं है। इस कोरोना-युद्ध में भारत की विजय सुनिश्चित है।

अब रोकना ही होगा टीबी की बीमारी को ?- रमेश सर्राफ धमोरा
(24 मार्च विश्व क्षयरोग दिवस पर विशेष) टीबी एक संक्रामक बीमारी है। जो संक्रमित लोगों के खांसने, छींकने या थूकने से फैलती है। आमतौर पर यह फेफड़ों को प्रभावित करती है। लेकिन यह शरीर के किसी भी हिस्से में फैल सकती है। इस बीमारी का इलाज तो है बशर्ते लोग नियमित रूप से दवा लें। भारत की नई स्वास्थ्य नीति में 2025 तक टीबी उन्मूलन का लक्ष्य रखा गया है।
24 मार्च को पूरे विश्व में टीबी दिवस मनाया जाता है। इस दिन टीबी यानि तपेदिक रोग के बारे में लोगों को जागरूक किया जाता है। टी.बी माइक्रोबैक्टीरियम नामक बैक्टीरिया की वजह से होता है। यह बैक्टीरिया फेफड़ों में उत्पन्न होकर उसमें घाव कर देते हैं। यह कीटाणु फेफड़ों, त्वचा, जोड़ों, मेरूदण्ड, कण्ठ, हड्डियों, अंतड़ियों आदि पर हमला कर सकते हैं। ट्यूबरक्लोसिस जिसे टीबी या क्षय रोग के नाम से जानते हैं। यह एक ऐसी बीमारी है जिसकी पहचान आसानी से नहीं हो पाती है। इसलिए इसके लक्षणों पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। दुनिया में छह-सात करोड़ लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं और हर वर्ष 25 से 30 लाख लोगों की इससे मौत हो जाती है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में वित्त वर्ष 2020-2021 का आम बजट पेश करते वक्त कहा था कि 2025 तक भारत को टीवी मुक्त बनाया जायेगा। वित्त मंत्री ने अपने बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 69 हजार करोड़ रुपये की घोषणा की है। यह पिछले दो वित्तीय वर्षों में सबसे अधिक है। पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में इस वर्ष स्वास्थ्य क्षेत्र को 7 हजार करोड़ रूपये अधिक आवंटित किए गए हैं। मोदी सरकार रोग रहित भारत का प्रयास कर रही है। साल 2025 तक देश को टीवी मुक्त करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है। उन्होंने कहा कि देश में जिन टीबी रोगियों का इलाज चल रहा है उन्हें 500 रुपए प्रतिमाह सहायता के रूप में दिए जा रहें हैं।
दुनिया में बीमरियों से मौत के 10 शीर्ष कारणों में टीबी को प्रमुख बताया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2018 में टीबी मरीजों की संख्या में पिछले साल की तुलना में करीब 50,000 की कमी आई। साल 2017 में भारत में टीबी के 27.4 लाख मरीज थे जो साल 2018 में घटकर 26.9 लाख रह गए। भारत में 2018 में टीबी के करीब 26.9 लाख लाख मामले सामने आए। भारत में टीबी के इलाज की कारगर दवा रिफामसिन के हताश करने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इस दवा के निष्प्रभावी मामलों की संख्या 2017 में 32 फीसदी थी। यह संख्या 2018 में बढ़कर 46 फीसदी हो गयी है।
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्वास्थ्य सेवा का बड़ा ढांचा कमजोर है और कर्मचारियों की भारी कमी है। इसके अलावा बीमारी का शुरुआती दौर में पता लगने में दिक्कत और सही इलाज का मिलना चुनौती बनी हुई है। विश्व में भारत पर टीबी का बोझ सबसे अधिक है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में टीबी उन्मूलन को प्राथमिकता के तौर पर लिया गया है। इसका उद्देश्य टीबी के नए मामलों में 95 प्रतिशत की कमी करना और टीबी से मृत्यु में 95 प्रतिशत की कमी लाना है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में रोजाना करीब आठ सौ लोगों की मौत टीबी की वजह से हो जाती है। भारत में टीबी के करीब 10 प्रतिशत मामले बच्चों में हैं लेकिन इसमें से केवल छह प्रतिशत मामले ही सामने आते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक टीबी रिपोर्ट के अनुसार भारत, इंडोनेशिया, चीन, फिलीपींस, पाकिस्तान , नाजीरिया और दक्षिण अफ्रीका इससे गंभीर रूप से प्रभावित है। दुनिया में टीबी के मरीजों की संख्या का 64 प्रतिशत सिर्फ इन्हीं सात देशों में है, जिनमें भारत का स्थान सबसे ऊपर है।
विश्वभर के टीवी मरीजों में से 27 प्रतिशत यानि सबसे अधिक मरीज भारत में है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि भारत में टीबी के केवल 58 प्रतिशत मामले ही दर्ज होते हैं। एक तिहाई से ज्यादा मामले या तो दर्ज ही नहीं होते हैं या उनका इलाज नहीं हो पाता है। इसका बड़ा कारण यह है कि गैर सरकारी सेक्टर के अस्पतालों में टीबी को दर्ज किए जाने का अब तक कोई सिस्टम नहीं बना पाना है। संगठन का ऐसा अनुमान है कि ऐसे तकरीबन दस लाख और टीबी मरीज देश में है जिन्हें पहचाना ही नहीं जा सका है। इसलिए माना यह जाना चाहिए कि हम 2025 तक टीबी को जड़ से मिटा देने की बात कर रहे हैं मगर वह इतना आसान नही है।
देश में बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जी रही है। जब तक गरीबी दूर नहीं होगी तब तक टीबी पर पूर्णतया रोक नहीं लग पायेगी। टीबी का संबंध पोषण से जुड़ा रहता है। भूखे पेट रोगों से लडऩे की क्षमता कम हो जाती है। इसलिए टीबी की बीमारी के शिकार गरीब तबके के लोग ज्यादा होते हैं। पोषण से मतलब संतुलित भोजन से माना जाना चाहिए। इसलिए यहां पर केवल टीबी का इलाज मुहैया करा भर देने से टीबी का खात्मा संभव नहीं है। यह तब मुमकिन होगा जबकि देश में लोगों को रोग प्रतिरोधक ताकत बनाए रखने के लिए संतुलित आहार भी मिले।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि भारत टीबी से निपटने को लेकर गंभीर नहीं है। अपनी ग्लोबल टीबी रिपोर्ट में उसने हमारे आंकड़ों पर भी सवाल उठाया है। उसके मुताबिक भारत ने टीबी के जितने मामले बताए हैं, वास्तव में मरीज उससे कहीं ज्यादा रहे हैं। भारत के गलत आंकड़ों की वजह से इस रोग का विश्वस्तरीय आकलन सही ढंग से नहीं हो पाया है। पिछले कुछ समय से टीबी के कई नए रूप सामने आ गए हैं। कई मानसिक बीमारियां टीबी का बड़ा कारण बनकर उभरी हैं। इस बीमारी को लेकर हमे नजरिया बदलने की जरूरत है। सरकार को परम्परागत तौर-तरीके से बाहर निकलना होगा। टीबी से निपटने के लिए सरकार को निजी क्षेत्र के साथ मिलकर व्यापक योजना बनानी होगी।
विशेषज्ञों के मुताबिक सरकार को इस क्षेत्र में एक ठोस अभियान शुरू करना होगा और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस जानलेवा बीमारी पर काबू पाने की राह में पैसों की कमी आड़े नहीं आए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो इससे मरने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होगी। अपने बजट भाषण में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने टीबी को मिटाने के लिये जो प्रतिबद्धता जतायी है उस पर तुरन्त अमल करने की जरूरत है।
एक समय टीबी की बीमारी को लाईलाज रोग माना जाता था। टीबी के मरीजो को घर से अलग रखा जाता था व उससे अछूत जैसा व्यवहार किया जाता था। मगर अब टीबी की बीमारी का देश में पर्याप्त उपचार व दवा उपलब्ध है। टीबी के रोगियों द्वारा नियमित दवा के सेवन से नो माह में ही टीबी का रोगी पूर्णत: स्वस्थ हो जाता है। सरकार को टीबी रोग की प्रभावी रोकथाम के लिये बजट में स्वास्थ्य सुविधओं के विस्तार के लिये और अधिक राशि का प्रावधान करना होगा। टीबी के प्रति लोगों को सचेत करने के लिये देश भर में टीबी जागरूकता कार्यक्रम चलाने होंगे। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केन्द्रो की संख्या बढ़ाकर ही टीबी पर काबू पाया जा सकता है।

पाकिस्तान के जयप्रकाश नारायण
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कल लाहौर में डॉ. मुबशर हसन का निधन हो गया। वे 98 वर्ष के थे। उनका जन्म पानीपत में हुआ था। वे प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार में वित्तमंत्री थे लेकिन उनकी विद्वता, सादगी और कर्मठता ऐसी थी कि सारा पाकिस्तान उनको उप-प्रधानमंत्री की तरह देखता था। भुट्टो की पीपल्स पार्टी आफ पाकिस्तान की स्थापना उनके घर (गुलबर्ग, लाहौर) में ही हुई थी। वे अपनी छोटी-सी फोक्सवेगन कार में ही बिठाकर भुट्टो को हवाई अड्डे से अपने घर लाए थे। उसी कार में उसी सीट पर बैठकर मैं भी मुबशर साहब के साथ लाहौर हवाई अड्डे से कई बार उनके घर पहुंचा हूं। उनके बारे में लोगों का ख्याल यह है कि वे अपने विचारों से वामपंथी थे लेकिन उन्होंने अपने जीवन के आखिरी 30 साल भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को सहज बनाने में खपा दिए। हालांकि वे मुझसे 20-22 साल बड़े थे लेकिन उनके-मेरे बीच मित्रता ऐसी हो गई थी, जैसी हम उम्र लोगों के बीच होती है। मैं जब उनके घर ही ठहरता तो वे और उनकी पत्नी डाॅ. जीनत हसन पूर्ण शाकाहारी हो जाते थे। डाॅ. जीनतजी को मैं ताईजी बोलता और उन दोनों के पांव छूता तो वे हंसकर बोलते ‘‘आप यह हिंदुआना हरकत क्यों कर रहे हैं?’’ भारत-पाक मैत्री के वे इतने बड़े वकील थे कि वे हर साल भारत आते थे और मेरे साथ सभी भारतीय प्रधानमंत्रियों से मिलने जाते थे। मेरे साथ वे उनके शागिर्द और पाकिस्तान के राष्ट्रपति फारुख लघारी से मिलने तो जाते थे लेकिन बेनजीर भुट्टो, नवाज़ शरीफ और अन्य प्रधानमंत्रियों से मिलना उन्हें पसंद नहीं था। उन्होंने मतभेद के कारण जुल्फिकारअली भुट्टो की सरकार से इस्तीफा भी दे दिया था। बाद में फौजी सरकार ने उन्हें सात साल तक जेल में भी डाले रखा। वे बाद में बेनजीर के भाई मुर्तजा की पार्टी में सक्रिय जरुर हुए थे लेकिन वे पाकिस्तान के जयप्रकाश नारायण की तरह काम करते रहे। सभी लोकतांत्रिक जन-आंदोलनों का वे डटकर समर्थन करते थे। वे जाने-माने इंजीनियर थे। इंजीनियरी में पीएच.डी. थे। उन्होंने कई महत्वपूर्ण किताबें भी लिखीं। वे पाकिस्तान ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया के रत्न थे। उनके अवसान से सारे दक्षिण एशिया को अपना परिवार समझनेवाले महान लोकनायक अब हमारे बीच नहीं है। उन्हें मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि।

मध्यप्रदेश : सत्ता संघर्ष राज्यपाल व स्पीकर की ’अग्नि परीक्षा‘…….?
ओमप्रकाश मेहता
मध्यप्रदेश सत्ता का सियासी संघर्ष अब धीरे-धीरे चरम पर पहुच गया है, अब इस संघर्ष के सुखद या दु:खद परिणाम का दारोमदार प्रदेश की दो प्रमुख संवैधानिक हस्तियों राज्यपाल तथा विधानसभाध्यक्ष पर है, ऐसे में यदि यह कहा जाए कि राज्यपाल व विधानसभाध्यक्ष (स्पीकर) की ”अग्निपरीक्षा“ का है, तो कतई गलत नही होगा, प्रदेश के सत्ता संघर्ष के इस दौर में दोनो संवैधानिक हस्तियॉ मूलत: अलग-अलग सियासी दलों से जुड़ी रही है, इसलिए इन दोनों के लिए मानसिक रूप से यह तय करना मुश्किल होगा कि सत्ता का भविष्य क्या होगा ? जहॉ तक नियम-कानून व संवैधानिक प्रावधानों का सवाल है, वहॉ तक दोनो ही हस्तियॉ उनका पालन करने को बाध्य होगी, किन्तु जब दोनो के स्व-विवेक का प्रश्न पैदा होगा तब राज्यपाल व विधानसभाध्यक्ष दोनो ही के लिए ’अग्निपरीक्षा‘ का समय होगा।
यहॉ यही नही बल्कि दोनो ही हस्तियों के मूल राजनीतिक दल भी इन हस्तियों से अपेक्षा रख रहे है कि वे उनके पक्ष में फैसला सुनायें, फिर जहॉ तक राज्यपाल का सवाल है, उन्हे प्रदेश में सत्ता किसी भी रहे, उन्हे कोई फर्क पडने वाला नही है अर्थात प्रदेश की सत्ता से उनक पद प्रभावित नही होगा, किन्तु स्पीकर महोदय का पद प्रदेश में सत्ता परिवर्तन से खतरे मे पड सकता है, इसलिए उन्हे हर कदम ”फूक-फूककर“ रखना पडेगा फिर उनके साथ पद की गरिमा भी जुडी हुई है और मौजूदा सत्तारूढ सरकार तो स्पीकर से यह अपेक्षा रखेगी ही कि स्पीकर अपना संवैधानिक धर्म उसके अनुसार निभायें, इसलिए स्पीकर के लिए यह विशेष परीक्षा की घउ+ाh है क्योंकि उनका इस अवसर का फैसला उनके अपना भावी राजनीतिक जीवन को प्रभावित कर सकता है।
वैसे फिलहाल राज्यपाल के अवकाश काल के दौरान विधानसभाध्यक्ष ने अपने संवैधानिक दायित्व का पालन काफी सोच-समझकर किया और सभी बाईस कांग्रेसी बागी विधायकों को नोटिस जारी किया कि वे स्वंय आकर बताऍ कि उन्होने अपने इस्तीफे स्व-विवके से दिए या किसी के दबाव में दिए यद्यपि यदि अधिकारों की बात की जाए तो स्पीकर को विधानसभा व उसके सदस्यों के बारे मे काफी अधिकार है, वे यदि चाहे तो नियमों के दायरे में इस्तीफा देने वाले विधायकों का राजनीतिक भविष्य भी धूमिल कर सकते है, किन्तु फिर वही सवाल भी उनके पद के प्रति निष्पक्षता की निष्ठा भी जुड़ी हुई है इसलिए उनसे अपेक्षा तो यही की जा रही है कि वे बिना किसी राजनीतिक पूर्वान्ह के स्पीकर पद के दायित्वों का निर्भीक होकर निर्वहन करें।
वैसे नियमों के बारे मे राजनीति में यही कहा जाता है कि वे पालन करने के लिए नही तोडने के लिए होते है, हमारे प्रदेश का ही एक उदाहरण है आज तो कांग्रेस के बागी विधायकों ने लिखित में अपने इस्तीफे राज्यपाल या स्पीकर को भेजे है, किन्तु आज से सत्रह साल पहले प्रदेश की मुख्यमंत्री साध्वी उमा भारती ने तो पद व सदन की सदस्यता से राज्यपाल व स्पीकर को फैसले से अपना इस्तीफा भेज दिया था और वह मंजूर भी हो गया था, उनसे तत्कालीन स्पीकर ने कोई नोटिस देकर जबाव-तलब नही किया था, और स्व: बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी गई थी, ऐसा इसलिए हो पाया था, क्योंकि तब दोनो संवैधानिक हस्तियों ने नियम-कानूनों को अपनी दृष्टि से समझकर कदम उठाया था, यद्यपि उस समय भी दोनो हस्तियॉ मूलत: अलग-अलग दलो की थी। किन्तु इस बार तो बागी विधायकों के विडियो तक जारी कर दिए गए, फिर भी नोटिस जारी किए गए, यह विधानसभाध्यक्ष की स्वंय संतुष्ठी से जुडा मामला बन गया है।
यह तो हुई दोनो मुख्य संवैधानिक हस्तियों से जुडे तथ्य। किन्तु अब आश्चर्य यह हो रहा है कि जो सियासी दल 2003 से 2018 तक प्रदेश में सत्ता मे रह ही अब विधानसभा के नियम भूलकर राज्यपाल के अभिभाषण के पूर्व सदन मे मत-विभाजन परीक्षण की मांग कर रहा है ? हॉ अभिभाषण पर बहस या सरकार के जवाब के समय वह दल मत विभाजन परीक्षण की मांग कर सकता है, किन्तु सत्र की शुरूआत में ही मत विभाजन परीक्षण कैसे व किस नियम के तहत संभव है ? क्या भारतीय जनता पार्टी सत्ता प्राप्ति की इतनी उतावली हो गई है ? फिर चार दिन पूर्व विधायक पदों से इस्तीफा देने वाले 22 विधायक अभी भी अपने इसी इरादे पर कायम हो यह कैसे कहा जा सकता है ? क्या इस्तीफे के बाद फिर से चुनाव लडने का भय उन्हे सता नही रहा होगा ? संभव है वे अपना इरादा बदल दें या अध्यक्ष महोदय उनके तर्को से सहमत न होकर उनके इस्तीफे स्वीकार न करें ? और कांग्रेस की सत्ता बरकरार रहे ? हॉ यह संभव है कि ’व्हीप‘ जारी होने के बाबजूद ये विधायक अपने दल की मंशा के विपरीत वोटिंग करें और पार्टी इन्हें दल से निष्कासित कर दें तब इनकी विधायिका सलामत रह सकती है ? अब जो भी हो, अब तक तो कहा जाता था कि ’प्यार और युद्व में सब जायज है‘ किन्तु अब इसके साथ ’राजनीति‘ शब्द भी जुड़ गया है, देखिये अब आगे आगे होता है क्या ?

म.प्र. में सिंधिया का छक्का
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार का बचना अब असंभव-सा लग रहा है। कुछ अन्य छोटी-मोटी पार्टियों और निर्दलीय विधायकों की मदद से चल रही यह कांग्रेस सरकार यों भी तलवार की धार पर चल रही थी लेकिन मप्र की भाजपा के शीर्ष नेताओं ने उसे गिराने की साजिश नहीं की। वे उसे बर्दाश्त किए जा रहे थे लेकिन वह अब अपने ही बोझ तले दबकर धराशायी हो रही है। भोपाल में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार गिर रही है तो उसके लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है, भाजपा नहीं। यहां मुख्य प्रश्न यह है कि कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बगावत क्यों की ? यदि वे अपने गुट के विधायकों समेत भाजपा में नहीं जाते तो शायद कांग्रेस सरकार चलती रह सकती थी, क्योंकि कमलनाथ सरकार काफी लोक-लुभावन कदम उठा रही थी और अपनी गलत पहलों को वापस लेने का साहस भी दिखा रही थी लेकिन कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को जो बीमारी पोला कर रही है, उसने मप्र में भी डेरा जमा लिया था। सिंधिया की उपेक्षा प्रांतीय नेतृत्व तो कर ही रहा था, केंद्रीय नेतृत्व ने भी कोई कमी नहीं छोड़ी है। यह ठीक है कि सिंधिया लोकसभा का चुनाव हार गए थे लेकिन फिर भी वे वजनदार युवा नेता रहे हैं। उनके पिता और उनकी दादी का भी काफी प्रभाव रहा है। उनके अहंकार को चोट लगनी स्वाभाविक थी। यदि उनका उचित सम्मान किया जाता तो कांग्रेस को यह दिन नहीं देखना पड़ता। अब वे उस भाजपा में आ गए हैं, जो उनकी दादी राजमाता विजयराजे सिंधिया की पार्टी थी। जाहिर है कि यह भाजपा की अखिल भारतीय उपलब्धि मानी जाएगी। ज्योतिरादित्य भाजपा में आ तो गए हैं लेकिन उन्हें अब अपने स्वभाव को ऐसा बनाना पड़ेगा, जिससे उनका भाजपा के साथ सही ताल-मेल बैठ सके। उनकी दादीजी से मेरा बहुत ही आत्मीय संबंध रहा है। वे विलक्षण महिला थीं। ज्योति को राजमाताजी के व्यवहार और आचरण की कला को आत्मसात करना होगा। राजमाताजी इतनी सहज और विनम्र थीं कि विरोधी दलों के नेता भी उनका हृदय से सम्मान करते थे। ज्योतिरादित्य का कांग्रेस से पिंड छुड़ाना उनके लिए आगे जाकर बहुत फायदेमंद सिद्ध हो सकता है। माधवरावजी और ज्योति, दोनों अपने आपको महाराजा तो समझते रहे लेकिन मैं दोनों से कहा करता था कि आपको अपने से कम योग्य लोगों के मातहत बनकर रहना पड़ रहा है। इससे अब वे मुक्त हुए। अब उनके लिए देश के सभी पदों के द्वार खुल गए हैं।

बुजुर्ग नेताओं को विश्राम दे कांग्रेस
रमेश सर्राफ धमोरा
कभी देश पर एक छत्र राज करने वाली कांग्रेस पार्टी आज अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के हाथों सत्ता गंवाने के बाद कांग्रेस पार्टी फिर से उबर नहीं पा रही है। 2014 व 2019 के लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के साथ ही कांग्रेस पार्टी देश के अधिकांश प्रदेशों में भी अपनी सत्ता गंवा चुकी है। इससे देश भर में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर हुआ है।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में लगातार दूसरी बार करारी हार के बाद तो कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर आवाज मुखर होने लगी हैं। कई बड़े नेता संगठन में बदलाव की मांग करने लगे हैं। देखा जाए तो कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व बूढ़ा हो गया है। कांग्रेस में बड़े पदों पर बैठे सभी बुजुर्ग नेताओं के स्थान पर युवा नेताओं को आगे लाने की मांग धीरे-धीरे तेज होने लगी है। कांग्रेस में बड़े पदों पर बैठे कई नेता तो ऐसे हैं जिन्होंने आज तक कोई चुनाव नहीं लड़ा है। वहीं कई नेताओं को चुनाव लड़े जमाना बीत चुका है।
कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी खुद 73 वर्ष की हो चुकी है। वो अक्सर बीमार रहती है जिससे अधिक मेहनत भी नहीं कर पाती है। 1998 से कांग्रेस का नेतृत्व अधिकतर उन्हीं के हाथों में रहा है। कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अहमद पटेल 71 वर्ष के हो चुके हैं। पटेल 18 साल तक सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार रहे हैं। हालांकि पटेल ने 1977,1980 व 1984 में लगातार तीन बार लोकसभा का चुनाव जीता था तथा राजीव गांधी सरकार में संसदीय सचिव भी बने थे। लेकिन बीते 36 वर्षों में उन्होने कोई चुनाव नहीं जीता। राज्यसभा के रास्ते ही वो अपनी संसदीय सीट बचाये रखते हैं। 78 वर्षीय अंबिका सोनी कांग्रेस की वरिष्ठ नेता है तथा वर्षों से राज्यसभा में जमी हुई है। उन्होंने अपने जीवन में कभी कोई चुनाव नहीं जीता। संजय गांधी के जमाने में आपातकाल के दौरान अंबिका सोनी युवा कांग्रेस की अध्यक्ष होती थी। उन्हे 1976 में ही राज्यसभा में भेजा गया था। सोनी लम्बे समय से केन्द्र में मंत्री व कांग्रेस महासचिव बनती आई है।
71 साल के गुलाम नबी आजाद जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे हैं। अभी हरियाणा के प्रभारी महासचिव और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य हैं। आजाद युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे है। उन्होने 1980 व 1984 में महाराष्ट्र के वाशिम से लोकसभा चुनाव जीता था। कहने को तो आजाद कांग्रेस के बड़े मुस्लिम चेहरे हैं। मगर 1984 के बाद से वे खुद कोई चुनाव नहीं जीत पाये हैं। आजाद अभी राज्यसभा में विपक्ष के नेता हैं तथा पांचवीं बार राज्यसभा के सदस्य हैं। जब भी केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनती है तो आजाद मुस्लिम कोटे से कैबिनेट मंत्री बन जाते हैं। केंद्र में सरकार नहीं रहती है तो वह कांग्रेस संगठन में पदाधिकारी रहते हैं। आजाद जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री बने थे तब भी इन्होंने विधानसभा के बजाय विधान परिषद के रास्ते ही विधायक बनना पसंद किया था।
मोतीलाल वोरा 93 वर्ष की उम्र में भी कांग्रेस महासचिव व कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य हैं। बोरा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल व कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रह चुके हैं। 1998 में बोरा ने अपनी जिंदगी का अंतिम चुनाव जीता था। बोरा कई बार राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं। मलिकार्जुन खड़गे 78 साल में की उम्र में महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रभारी महासचिव है। जहां पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 2 से 1 सीट पर आ गई थी। खड़गे कांग्रेस के बड़े दलित नेता हैं व कई बार सांसद, विधायक,मंत्री रह चुके हैं। हालांकि वे 2019 का लोकसभा चुनाव हार चुके हैं। महाराष्ट्र कांग्रेस के कई नेता इनकी कार्यशैली का अक्सर विरोध करते रहते हैं।
60 साल के मुकुल वासनिक एनएसयूआई व युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं। वो 1984, 1991, 1998 व 2009 में 4 बार लोकसभा सदस्य चुने गए थे। वहीं पांच बार लोकसभा के चुनाव में हार भी चुके हैं। 2019 में उन्होंने चुनाव लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा था। वासनिक कांग्रेस में बड़े दलित नेता माने जाते हैं। केंद्र में जब भी कांग्रेस की सरकार बनती है तो वासनिक मंत्री रहते हैं और सरकार नहीं रहने पर पार्टी महासचिव रहते हैं। 72 वर्ष के हरीश रावत कांग्रेस महासचिव हैं। रावत चार बार लोकसभा सदस्य, एक बार राज्यसभा सदस्य, एक बार विधायक, केंद्र सरकार में मंत्री व उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। 2017 में रावत जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने अपनी पसंद के दो विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ा था तथा दोनों ही क्षेत्रों में हार गए थे।
मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी महासचिव व कार्यसमिति सदस्य दीपक बावरिया ने कभी चुनाव नहीं लड़ा। अपने गृह प्रदेश गुजरात में भी इनका कोई जनाधार नहीं है। कांग्रेस महासचिव अविनाश पांडे महाराष्ट्र से एक बार विधान परिषद व राज्यसभा सदस्य रह चुके है। इन्होंने जिंदगी में कभी कोई चुनाव नहीं जीता। अभी राजस्थान के प्रभारी महासचिव व कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य हैं। कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल केरल में तीन बार विधायक, दो बार सांसद, राज्य व केन्द्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं। 2019 में इन्होंने लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा था मगर इनके स्थान पर चुनाव लड़ने वाले कांग्रेसी उम्मीदवार हार गए थे। वेणुगोपाल राहुल गांधी के नजदीकी नेताओं में शुमार होते हैं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया आधे उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी महासचिव है। 49 वर्षीय सिंधिया चार बार लोकसभा सदस्य व केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं। सिधिंया मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री प्रबल पद के प्रबल दावेदार थे। लेकिन वहां कमलनाथ को मुख्यमंत्री बना दिया गया जिससे यह पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रहे हैं। प्रियंका गांधी के आधे उत्तर प्रदेश की प्रभारी महासचिव रहते पिछले लोकसभा चुनाव में उनके भाई राहुल गांधी अपनी परम्परागत अमेठी सीट से चुनाव हार गये थे। उप चुनावों में भी वहां कांग्रेस के सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गयी थी।
केरल के दो बार मुख्यमंत्री रहे ओमन चांडी 77 वर्ष की उम्र में भी महासचिव बने हुए हैं। चांडी 11 बार केरल विधानसभा का चुनाव जीत चुके हैं। उम्र अधिक होने के कारण वो अधिक भागदौड़ करने में समर्थ नहीं है। कुछ समय के लिए गोवा के मुख्यमंत्री रहे लुइझिनो फलेरो 69 साल की उम्र में पूर्वोत्तर के सभी राज्यों के प्रभारी महासचिव है। वह 7 वीं बार गोवा में विधायक बने हैं। गोवा विधानसभा में कांग्रेस का बहुमत होने के बाद भी वहां सरकार बनाने में असफल रहने का ठीकरा उनके सिर पर भी फूटा था।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, कोषाध्यक्ष अहमद पटेल के अलावा 13 महासचिवों की टीम के अधिकांश सदस्य उम्र पार कर चुके है। सोनिया गांधी को छोडक़र इनमे से कोई भी नेता लोकसभा सदस्य नहीं हैं। अहमद पटेल, अंबिका सोनी, गुलाम नबी आजाद, मोतीलाल वोरा राज्यसभा के सदस्य हैं। जबकि दीपक बावरिया, हरीश रावत, ज्योतिरादित्य सिंधिया, केसी वेणुगोपाल, मलिकार्जुन खडग़े, मुकुल वासनिक, प्रियंका गांधी राज्यसभा में जाने को प्रयासरत है। कांग्रेस कार्यसमिति में भी सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, गुलाम नबी आजाद, अहमद पटेल, एके एंटनी, अंबिका सोनी, आनंद शर्मा, हरीश रावत, मोतीलाल वोरा, मलिकार्जुन खडग़े, ओमन चांडी, लुइझिनो फलेरो की उम्र अधिक हो चुकी है। कार्यसमिति के 23 में से 3 सदस्य तो गांधी परिवार के है। कुछ नेताओं को छोड़कर अधिकांश ऐसे नेता कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य हैं जिनका जनाधार समाप्त हो चुका है।
कांग्रेस पार्टी में वर्षों से वरिष्ठ पदो पर जमे बुजुर्ग नेताओं को अब विश्राम देना चाहिये व उनके स्थान पर ऐसे युवा नेताओं को आगे बढ़ाना चाहिए जिनका अपने प्रदेशों में प्रभाव हो। जो पार्टी कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़कर चल सके। आगामी राज्यसभा चुनाव में भी कांग्रेस को ऐसे ही साफ छवी के नये लोगों को टिकट देनी चाहिए। जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं में सकारात्मक संदेश जाये। उनमें एक नई ऊर्जा का संचार हो ताकि कांग्रेस फिर से अपना खोया जनाधार हासिल कर सके।

सउदी अरब में तख्ता-पलट ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सउदी अरब के राज-परिवार में जबर्दस्त उथल-पुथल मची हुई है। बादशाह सलमान 84 साल के हो गए हैं। वे अस्वस्थ भी रहते हैं। राज-परिवार के कई शाहजादों में बादशाहत की होड़ लगी हुई है। इस समय जिन्हें युवराज बना रखा है, वे हैं, बादशाह सलमान के बेटे मोहम्मद ! ये मोहम्मद वही हैं जो सारी दुनिया में दो साल पहले बदनाम हो गए थे, तुर्की में प्रसिद्ध पत्रकार जमाल खाशोग्गी की हत्या करवाने के लिए। मोहम्मद काफी तेज-तर्रार युवराज हैं। उन्होंने सउदी अरब के पुराने ढर्रे की कई रुढ़ियों को उलट-पुलट दिया है। उन्होंने अनेक प्रगतिशील कदम भी उठाए हैं, जिनसे कई पोंगापंथी मुल्ला-मौलवी नाराज हैं और राजमहल के अन्य कई शहजादें उनसे पिंड छुड़ाने के लिए कमर कसे हुए हैं। अब उन्होंने राजमहल के तीन शाहजादों और उनके समर्थक कई अफसरों को गिरफ्तार और नजरबंद कर लिया है। उन्हें आजन्म कारावास या मौत की सजा, दोनों में से कुछ भी मिल सकता है। हमें यह घटना औरंगजेब और दाराशिकोह की याद दिला रही है। खुद मोहम्मद ने 2017 में अपने ताऊ के बेटे बड़े भाई और युवराज मोहम्मद बिन नाएफ को एक तख्ता-पलट में उलट दिया था और खुद युवराज बन बैठे थे। जब 2016 में बिन नएफ युवराज बने थे तो यही मोहम्मद बिन सलमान घुटने के बल बैठकर उनका हाथ चूमते हुए दिखाई पड़े थे। जब उन्होंने युवराज पद हासिल कर लिया तो राज परिवार के कई तीसमारखां शाहजादों को उन्होंने एक होटल में नजरबंद कर दिया था। इन सब बागी शहजादों पर आरोप है कि वे मुल्ला-मौलवियों और कबाइलियों से मिलकर सउदी अरब के राज सिंहासन पर कब्जा करना चाहते हैं। इस काम के लिए उन्होंने कई विदेशी शक्तियों से भी संपर्क बना रखे थे। ऐसा माना जा रहा है कि इन सबके ख़िलाफ़ यह सारी कार्रवाई बादशाह सलमान की जानकारी और सहमति से हो रहा है। इस कार्रवाई से युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने राजगद्दी पर अपना शिकंजा काफी मजबूत कर लिया है। इस समय कोरोना वायरस की वजह से तेल की कीमतें गिर रही हैं और मक्का-मदीना की तीर्थ-यात्रा (उमरा) भी स्थगित कर दी गई है। शायद हज-यात्रा भी स्थगित हो जाए। सउदी अरब के लिए इस तरह एक बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है। युवराज मोहम्मद की महत्वकांक्षा है कि 2030 तक वे ऐसा माहौल बना दें कि सउदी अरब तेल की बजाय तीन करोड़ तीर्थ-यात्रियों से होनेवाली आमदनी से अपनी अर्थ-व्यवस्था को मजबूत बनाए।

भारत के दर्जनों बैक दिवालिया होने की कगार पर
सनत कुमार जैन
वैश्विक अर्थ व्यवस्था पर कोरोना वायरस के कारण सारी दुनिया में अफरा-तफरी मची हुई है। सारी दुनिया के शेयर बाजरों में भारी गिरावट देखने को मिल रही है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। भारत के दर्जनों बैंक दिवालिया होने की कगार पर खड़े थे। कोरोना वायरस के कारण आई मंदी के कारण यह कब तक दिवालिया हो जाएंगे कहना मुश्किल है। पिछले एक वर्ष में केंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर बैंकों का विलय राष्ट्रीयकृत बैंकों में कराकर उन्हे दिवालिया होने से तो बचा लिया है। हाल ही में बैंक के 49 फीसदी हिस्सेदारी स्टेट बैंक ने खरीदकर यस बैंक को बचाने का प्रयास कर रहा है। इसको लेकर सारे देश में चिंता बढ़ गई है। पिछले एक दशक में शेयर बाजारों में भारतीय बैंकों, जीवन बीमा निगम, वित्तीय संस्थाओं तथा म्युचल फंड का अरबों रुपया निवेश किया गया है। 2008 के बाद अमेरिका की आर्थिक मंदी के बाद भारत का शेयर बाजार मुनाफा वसूली का केंद्र बन गया था। जब जब शेयर बाजार मुनाफा वसूली के कारण गिरावट में आया। शेयर बाजार की गिरावट को रोकने के लिए केंद्र सरकार के दबाव में शेयर बाजार में बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों का निवेश बढ़ता चला गया। पीएफ जैसे संस्थान का पैसा भी केंद्र सरकार ने शेयर बाजार में लगवा दिया। 2010 में मुंबई स्टाक एक्सचेंज का सेंसेक्स 2100 पर था जो 2020 में 42000 के स्तर को छू गया। पिछले 1 दशक में शेयर बाजार के माध्यम से देश के वित्तीय संस्थाओं की जो लूट हुई है। अब उसके दुष्परिणाम सामने दिखने लगे हैं।
पिछले 5 वर्षों में शेयर बाजार में सूचीबद्ध सैकड़ों कंपनियां दिवालिया होने की कगार पर थी।
भारत की कंपनियों ने कंपनी का पैसा विदेशों में निवेश कर दिया था। वड़ी संख्या में पिछले 5 वर्षों में भारतीय नागरिकों ने विदेशी नागरिकता लेकर भारतीय वाजार के माध्यम से जमकर मुनाफा वसूली की है।
बैंकों से ली गई कर्ज की राशि को कंपनियां चुका नहीं रही थी। रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन ने सरकार को गड़बड़ी रोकने जो सुझाव दिए थे। सरकार ने नहीं माने। उलटे रघुराम राजन को ही चलता कर दिया। बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ता चला गया। सैकड़ों कंपनियों का कई लाख करोड़ रुपयों का ऋण सरकार ने राइट आफ कर दिया। सरकार और बैंक उनके नाम बताने को तैयार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने नाम उजागर करने का निर्देश सरकार को दिया। इसके बाद भी नाम उजागर नहीं किए गये। एनपीए की राशि अब बड़कर 10 लाख करोड़ के स्तर को छू रही है। इसके बाद भी सरकार के कानों में जूं नहीं रेंग रही है। उलटे सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े बैंकों में, दिवालिया होने वाले बैंकों का विलय कराकर सरकार ने इन दोनो बैंकों की आर्थिक दिवालिया की कगार पर ढकेल दिया है।
बैंकों, भारतीय जीवन बीमा निगम एवं पीएफ जैसी संस्थाओं से भारी निवेश शेयर बाजार में कराया गया। शेयर बाजार में निवेश होने से बैंकों की जो बेलेन्स शीट अभी अच्छी दिख रही है। वह शेयर बाजार में आई गिराबट के बाद खराब होते देर नहीं लगेगी। शेयर बाजार का सेंसेक्स 35000 के नीचे आने पर भारतीय बैंकों की स्थिति काफी खराब होगी। इन सबकी बेलेन्स शीट घाटे में चली जायेगी। भारतीय बैंक पिछले एक दशक में शेयर बाजार के लगातार बढ़ने से कागजों में भारी मुनाफा कमा रहे थे। अब शेयर बाजार में लगातार गिरावट चल रही है। वैश्विक सपोर्ट भी मिलना अब भारत के शेयर बाजार में संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में 35000 के नीचे शेयर बाजार के आने पर जिस तरह 2008 में अमेरिका में सैकड़ों बैंक दिवालिया हुए थे। लगभग वही स्थिति देश के बैंकों और वित्तीय संस्थाओं की बन गई है।
भारत सरकार को समझना होगा, भारत के बैंकों में करोड़ों नागरिकों की बचत का पैसा जमा होता है। यही पैसा बैंक और वित्तीय संस्थान शेयर बाजार, कंपनियों एवं अन्य को लोन देने में करते हैं। कंपनियों की आ‎र्थिक स्थिति काफी खराब है। वह अपना कर्ज नहीं लौटा पा रही है। जिनके कारण बैंकों का एनपीए हर साल बढ़ता ही जा रही है। शेयर बाजार में बैंकों ने जिन कंपनियों के शेयरों में निवेश किये थे। उन कंपनियों के शेयरों के दाम बड़ी तेजी से ‎गिर रहे हैं। इसी तरह भारतीय जीवन बीमा निगम से करोड़ों नागरिकों ने पालिसी ले रखी है जो प्रीमियम की किस्ते कई वर्षों से जमा कर रहे हैं। कर्मचारियों का पैसा पीएफ में जमा होता है। पीएफ ने भी शेयर बाजार में पैसा लगा दिया है। ऐसी स्थिति में शेयर बाजार की गिरावट में बैंकों, भारतीय जीवन बीमा निगम सहित अन्य वित्तीय संस्थाओं तथा पीएफ में आम लोगों की जमा राशि को वापस कर पाना उपरोक्त संस्थाओं के लिए शायद संभव नहीं होगा।
स्वतंत्रता के पश्चात लगभग 50 वर्षों तक देश का विकास बचत की राशि से हुआ है। बैंकों में जमा राशि डाकघर, भारतीय जीवन बीमा निगम, यूटीआई इत्यादि की राशि रिजर्व बैंक के माध्यम से सरकार को कर्ज में मिलती थी। वैश्विक व्यापार संधि के बाद रिजर्व बैंक का नियंत्रण काम हुआ। 70 फीसदी राशि बैंकों और वित्तीय संस्थाओं ने पिछले डेढ़ दशक में शेयर बाजार, कंपनियों को ऋण देने तथा कंपनियों की हिस्सेदारी लेने में पूंजी का निवेश किया है। चूंकि अब कंपनियां डूब रही हैं। शेयर बाजार लगातार गिरावट की ओर बढ़ रहा है। आम आदमी को अपना जमा धन ही नहीं मिल पा रहा है। ऐसी स्थिति में आने वाले माहों में वित्तीय संकट और बढ़ेगा। करोना वायरस के माध्यम से दुनिया भर के देशों में जो आर्थिक मंदी आई है। उसका सबसे ज्यादा असर भारत में हो रहा है। केंद्र की मोदी सरकार हिन्दुओं की पार्टी मानी जाती है। मुसलमान बैंकों में अपनी राशि जमा नहीं कराते हैं। उनमें ब्याज को हराम माना जाता है। बैंकों में जिन लोगों का जमा पैसा नहीं हो रहा है। उनमें 90 फीसदी हिन्दू हैं। पिछले 5 वर्षों में जिस तरह से गोदी मीडिया में हिन्दू मुस्लिम का खेल चल रहा है। उसमें बैंकों की जमा राशि यदि बचत कर्ताओं को नहीं मिली। इस स्थिति मे सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा को हो सकता है। देश में जिस तरह आर्थिक मंदी के कारण मंहगाई और बेरोजगारी बढ़ी है| उससे आम आदमी में अभी निराशा है। आगे चलकर यह गुस्से में परिवर्तित हो सकता है।

मप्र: सत्ता ही ब्रह्म है
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
मध्यप्रदेश में सरकार बने सवा साल ही हुआ है लेकिन उसकी अस्थिरता की चर्चा जोरों से चल पड़ी है। कांग्रेस और भाजपा दो सबसे बड़ी पार्टियां हैं, मप्र में लेकिन दोनों को विधानसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। कांग्रेस को सीटें ज्यादा मिल गई लेकिन सत्तारुढ़ भाजपा को वोट ज्यादा मिले। कांग्रेस को 114 सीटें मिलीं और भाजपा को 107 ! जो छोटी-मोटी पार्टियां हैं, उनके तीन और चार निर्दलीय विधायकों को मिलाकर कांग्रेस ने भोपाल में अपनी सरकार बना ली। विधानसभा में कुल 230 सदस्य हैं। दो सीटें अभी खाली हैं याने 228 सदस्यों की विधानसभा में कांग्रेस पार्टी का शासन मजे में चल रहा था। मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार ने कुछ ऐसे कदम भी उठाए हैं, जो भाजपा की सरकार उठाती लेकिन वे सात गैर-कांग्रेसी सदस्य हिलने-डुलने लगे हैं। एक कांग्रेसी विधायक ने विधानसभा से ही इस्तीफा दे दिया है। भोपाल में इतनी भगदड़ मच गई है कि सभी पार्टियों के नेताओं ने अपने सार्वजनिक कार्यक्रम स्थगित कर दिए हैं। कुछ सरकार गिराने में व्यस्त हैं और कुछ सरकार बचाने में ! कुछ विधायकों को गुड़गांव और कुछ को बेंगलूर में घेरा गया है। कुछ लापता हैं और कुछ दावा कर रहे हैं कि उन पर फिजूल ही पाला बदलने का शक किया जा रहा है। यह शक इसलिए भी बढ़ गया है कि मप्र में राज्यसभा के लिए तीन सदस्य तुरंत चुने जाने हैं लेकिन न कांग्रेस और न ही भाजपा के पास इतने विधायक हैं कि वे दो सदस्यों को जिता सकें। एक-एक सदस्य दोनों पार्टी चुन लेगी लेकिन तीसरे सदस्य को चुनने के लिए भी यह जोड़-तोड़ हो रही है।
मध्यप्रदेश की राजनीति इतनी विचित्र हो गई है कि इसमें न तो कांग्रेस का नेतृत्व एकजुट है और न ही भाजपा का। दोनों पार्टियों में तीन-चार नेता हैं, जो अपने-अपने गुट को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। इस गुटीय राजनीति ने दोनों पार्टियों को इस भरोसे में रख रखा है कि हमारे विरोधी आपस में बंटे हुए हैं, इसलिए सरकार गिरेगी और नहीं भी गिरेगी। यहां विचारधारा, पार्टी-आस्था, व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, परंपरा आदि सब गौण हो गए हैं। जो राजनीति का ब्रह्म-सत्य है याने सत्ता और पत्ता, अब उसका नग्न प्रदर्शन हो रहा है। सत्ता प्राप्त करने के लिए या उसमें बने रहने के लिए कोई भी नेता कोई भी कदम उठा सकता है। वह कितने पत्ते कैसे चलेगा, कुछ पता नहीं। सत्ता के अलावा सब मिथ्या है। इसलिए अब मध्यप्रदेश में कुछ भी हो सकता है। यदि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरती है तो अन्य प्रदेशों में भी कांग्रेस को सतर्क रहना पड़ेगा। कांग्रेस पार्टी तो बिना चालक की गाड़ी बन गई है।

महिला दिवस का औचित्य
ज्योति मांझी
महिला का उद्देश्य सिर्फ महिलाओं के प्रति श्रद्धा और सम्मान बताना है। समाज में नारी के स्तर को उठाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरत है महिला सशक्तिकरण की। महिला सशक्तिकरण का अर्थ है महिलाओं की आध्यात्मिक, शैक्षिक, सामजिक, राजनीतिक और आर्थिक शक्ति में वृद्धि करना, बिना इसके महिला सशक्तिकरण असंभव है। महिला सशक्तिकरण के दावे खूब किए जाते हैं। सरकारी और सामाजिक दोनों स्तरों पर। मगर वाकई महिलाएं कितनी सशक्त हुईं, यह न किसी से पूछने की जरूरत है और न ही किताब के पन्नों को पलटने की। आज हर महिला समाज में धार्मिक रूढिय़ों, पुराने नियम कानून में अपने आप को बंधा पाती है। पर अब वक्त है कि हर महिला तमाम रूढिय़ों से खुद को मुक्त करे। यह काम एक महिला अकेले कर सकती है, मगर जब पुरुषों का साथ मिलेगा तो काम जल्दी हो जाएगा। देखा जाए तो प्रकृति ने औरतों को खूबसूरती ही नहीं, दृढ़ता भी दी है। प्रजनन क्षमता भी सिर्फ उसी को हासिल है। भारतीय समाज में आज भी कन्या भ्रूण हत्या जैसे कृत्य दिन-रात किए जा रहे हैं। आज जरूरत है कि देश में बच्चियों को हम वही आत्मविश्वास और हिम्मत दें जो लड़कों को देते हैं। इससे प्रकृति का संतुलन बना रहे। इसलिए जरूरी है कि इस धरती पर कन्या को भी बराबर का सम्मान मिले। साथ ही उसकी गरिमा भी बनी रहे। एक नारी के बिना किसी भी व्यक्ति का जीवन सृजित नहीं हो सकता है। जिस परिवार में महिला नहीं होती, वहां पुरुष न तो अच्छी तरह से जिम्मेदारी निभा पाते हैं और ना ही लंबे समय तक जीते हैं। वहीं जिन परिवारों में महिलाओं पर परिवार की जिम्मेदारी होती है, वहां महिलाएं हर चुनौती, हर जिम्मेदारी को बेहतर तरीके से निभाती हैं और परिवार खुशहाल रहता है। अगर मजबूती की बात की जाए तो महिलाएं पुरुषों से ज्यादा मजबूत होती हैं क्योंकि वो पुरुषों को जन्म देती हैं।
आज जरूरत है कि समाज में महिलाओं को अज्ञानता, अशिक्षा, संकुचित विचारों और रूढि़वादी भावनाओं के गर्त से निकालकर प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए उसे आधुनिक घटनाओं, ऐतहासिक गरिमामयी जानकारी और जातीय क्रियाकलापों से अवगत कराने के लिए उसमे आर्थिक, सामजिक, शैक्षिक, राजनैतिक चेतना पैदा करने की। जिससे कि नारी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर समाज को आगे बढ़ाने में सहयोग कर सके।
सही मायने में महिला दिवस तब सार्थक होगा जब असलियत में महिलाओं को वह सम्मान मिलेगा जिसकी वे हकदार हैं। इसके साथ ही समाज को संकल्प लेना चाहिए कि भारत में समरसता की बयार बहे, भारत के किसी घर में कन्या भ्रूण हत्या न हो और भारत की किसा भी बेटी को दहेज के नाम पर न जलाया जाए। विश्व के मानस पटल पर एक अखंड और प्रखर भारत की तस्वीर तभी प्रकट होगी जब हमारी मातृशक्ति अपने अधिकारों और शक्ति को पहचान कर अपनी गरिमा और गौरव का परिचय देगी और राष्ट्र निर्माण में अपनी प्रमुख भूमिका निभाएगी।
महिला दिवस का एक स्याह पहलू भी है। सवाल यह भी है कि महिला दिवस की एक दिन की औपचारिकता क्यों। ऐसा नहीं है कि हमारे देश में देवी की पूजा नहीं होती है। हमारा देश देवी को पूजता भी है और हमारे सम्माननीय नारियों और देवियों के लिए नतमस्तक भी है। लेकिन फिर भी हमें महिला दिवस नहीं मनाना चाहिए, क्योंकि जहां मां, पुत्री, बेटी, लड़की, महिला या स्त्री के शील धर्म की रक्षा नहीं की जा सकती, वहां महज एक दिन महिलाओं के प्रति वफादारी दिखाने का क्या औचित्य है? सिर्फ एक दिन के लिए महिलाओं का गुनगान करके उन्हें सम्मान देना और दूसरी और उनको छलना, उनके साथ कपट भाव रखना, रास्ते चलते छेड़छाड़ करना, स्त्री को लज्जित करना, शराब पीकर महिलाओं के साथ मारपीट करना …यह सब हमारे पुरुष वर्ग को शोभा नहीं देता। इससे अच्छा यही होगा कि हम महिला दिवस मनाना ही भूल जाएं। अगर सच में महिलाओं के प्रति हमारे मन में आदर और सम्मान है तो सबसे पहले हमें चाहिए कि हम उन मां, बहन, बेटियों, बहुओं और उन मासूम बच्चियों के प्रति पहले ते अपना नजरिया बदलें और उन्हें हीन दृष्टि से देखना बंद करें। पराए घर की किसी महिला या लड़की को हम हमारी घर की बेटी समझ कर उन्हें भी उसी नजरिए देखें, जो नजरिया हम अपनी मां और बहनों के लिए रखते करते हैं।
महिला दिवस मनाने का केवल यह मतलब नहीं है कि एक दिन तो बहुत ऊंचे स्थान पर बैठाकर मान-सम्मान दे दिया जाए और दूसरे ही दिन राह चलती लड़कियों से छेडख़ानी शुरू कर दी जाए। यहां युवा तो युवा, बुजुर्ग भी इन मामलों में पीछे नहीं है। रास्ते चलते महिलाओं-लड़कियों पर फब्तियां कसना इनकी आदत शुमार में है और सबसे ज्यादा शर्मनाक बात तो तब हो जाती है जब हैवानों का दल 3-5 साल की मासूम बच्चियों को भी अपना निशाना बनाने में नहीं चूकते और मौका देखते ही उनका शीलहरण करके उन्हें नारकीय जीवन में पहुंचा देते है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के इतिहास को देखा जाए तो करीब 100 साल पहले मजदूर महिलाएं काम के घंटे कम करवाने, बराबर वेतन पाने और वोट डालने के अधिकार को लेकर लड़ाई लड़ रही थीं पर आज जिस तरह से महिला दिवस मनाया जा रहा है वो उसके उलट है क्योंकि आज कंपनियां मुनाफा कमाने के लिए मजदूर महिलाओं (वर्किंग क्लास वीमेन) से तय समय से ज्यादा घंटे काम करवा रही हैं। घर संभालने वाली महिलाओं को आज भी उनके काम के लिए न कोई सम्मान मिलता है और न ही कोई वेतन। उनके काम को उनकी और सिर्फ उनकी जिम्मेदारी और कर्तव्य बताया जाता है और कभी भी महिलाओं को मजदूर का दर्जा नहीं मिलता है। महिलाएं आज हर क्षेत्र में काम करने के लिए आगे आ रही हैं और बहुत सी महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र भी हैं पर क्या उनकी आर्थिक आजादी उन्हें सही मायने में आजाद कर पा रही है।
यह सच्चाई है कि अगर महिलाएं आधी आबादी हैं तो उनके सरोकार भी आधा स्थान मांगते हैं। आज महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं। वे अपने कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही हैं। वे समाज में समानता चाहती है, जहां पति-पत्नी का समान दर्जा हो। वह पुरुष की हां में हां मिलाने वाली प्राचीन भारतीय नारी की छवि से अलग अपनी स्वतंत्र सोच रखने वाली आज की महिला है। वह अपनी पसंद-नापसंद रखती है और उसे अपनी बात कहना भी आता है। हाल ही में एक फिल्म आई ‘थप्पड़Ó, जिसमें पति अपनी पत्नी को एक पार्टी में सबके बीच थप्पड़ मारता है। हमें यह स्वीकारना होगा कि ऐसा व्यवहार सदियों से चला आ रहा है, जब पुरुष अपने निकटतम रिश्ते में रह रही महिला पर अपनी मर्दानगी का रौब झाड़ता रहा है। वह पत्नी, मां, बेटी आदि स्त्रियों पर हाथ उठाने से भी बाज नहीं आता। ऐसे में उसकी शिकायत करने या उसके खिलाफ आवाज उठाने के लिए पारंपरिक हिंदी सिनेमा प्रेरित नहीं करता, बल्कि वह इस माध्यम से भी स्त्री को घरेलू महिला होने का संदेश देता-सा नजर आता है। यानी थप्पड़ खाकर चुप रहना औरत की नियति है! जिन महिलाओं ने इसके विरोध में आवाज उठाई, हर बार उन्हें उपहास या बहिष्कार का केंद्र बना दिया गया। यह भी मनोविज्ञान ही है कि महिलाओं को अपने हक की आवाज उठाने से भी रोक दिया गया।
देश में कई महिलाएं ऐसी भी हैं जो आजकल बढ़ती महंगाई और अच्छे से अच्छा दिखने, रहने और दिखाई देने की चाह में अपना अस्तित्व कहीं खोती जा रही हैं। आज अधिकतर कम पढ़ी-लिखी लड़कियां समय से हारते हुए और महंगाई के बोझ तले दबते हुए अपने कदम वेश्यावृत्ति की ओर बढ़ा रही हैं या फिर कुछ सामाजिक तत्व उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर देते हैं जो कि सही नहीं है। यह एक महिला का, देश में उन देवियों का जिनकी हम पूजा करते हैं उनका बड़ा अपमान है। साल के मात्र एक दिन को महिला दिवस के रूप में मनाकर बाकी के 364 दिन हम उनकी उपेक्षा और उन पर अत्याचार ही करते हैं। सही मायने में महिला दिवस तब ही सार्थक होगा जब विश्व भर में महिलाओं को मानसिक व शारीरिक रूप से संपूर्ण आजादी मिलेगी, जहां उन्हें कोई प्रताडि़त नहीं करेगा, जहां उन्हें दहेज के लालच में जिंदा नहीं जलाया जाएगा, जहां कन्या भ्रूण हत्या नहीं की जाएगी, जहां बलात्कार नहीं किया जाएगा, जहां उसे बेचा नहीं जाएगा। समाज के हर महत्वपूर्ण फैसलों में उनके नजरिए को महत्वपूर्ण समझा जाएगा। उन्हें भी पुरूष के समान एक इंसान समझा जाएगा। जहां वह सिर उठा कर अपने महिला होने पर गर्व करे, न कि पश्चाताप कि काश मैं एक लड़का होती।

पादरी और बलात्कार
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पोप फ्रांसिस बधाई के पात्र हैं कि जिन्होंने आखिरकार केरल के पादरी राॅबिन वडक्कमचेरी को ईसाई धर्म से निकाल बाहर किया। आखिरकार शब्द मैंने क्यों लिखा ? इसलिए कि इस पादरी को केरल की एक अदालत ने बलात्कार के अपराध में 60 साल की सजा कर दी थी, इसके बावजूद पोप ने साल भर से इस पादरी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। केरल के केथोलिक चर्च ने भी इस पादरी को दंडित नहीं किया। सिर्फ उसकी पुरोहिताई को मुअत्तिल कर दिया। 2017 में एक ईसाई लड़की से इस पादरी ने कई बार बलात्कार किया और जब इस पर मुकदमा चला तो इसने कनाडा भागने की कोशिश भी की। इसने कई गवाहों को पल्टा खिला दिया। जब उस 16 साल की लड़की ने एक बच्ची को जन्म दे दिया तो इस पादरी ने उस लड़की के बाप से यह बयान दिलवा दिया कि यह बच्ची का पिता वह पादरी नहीं, मैं हूं। बाद में उस लड़की ने इस पादरी से शादी करने की गुहार भी लगाई लेकिन अदालत ने इन सारी तिकड़मों को रद्द करते हुए राॅबिन को जेल के सींखचों के पीछे भेज दिया। केरल की पुलिस ने उस बलात्कृत लड़की के पिता के विरुद्ध भी मामला दर्ज किया है। यहां असली सवाल यह है कि चर्च, मस्जिद, मंदिर और गुरुद्वारों से इस तरह की काली करतूतों की खबरें क्यों आती हैं ? ये तो भगवान के घर हैं। इनमें बैठनेवाले साधु-संन्यासी, पंडित, मुल्ला, पादरी वगैरह तो अपने आपको असाधारण पुरुष मानते हैं। इनकी असाधारणता ही इनका कवच बन जाती है। इन पर लोग शंका करते ही नहीं हैं। मेरा निवेदन है कि इस तरह के धर्म-ध्वजियों पर सबसे ज्यादा शंका की जानी चाहिए। उनके आचरण पर कड़ी निगरानी रखी जानी चाहिए। और जब ये किसी भी प्रकार का कुकर्म करते हुए पकड़े जाएं तो इन्हें असाधारण सजा दी जानी चाहिए। यूरोप और अमेरिका में पादरियों के व्यभिचार और बलात्कार के हजारों किस्से सामने आते रहते हैं लेकिन उन्हें ऐसी तगड़ी सजा कभी नहीं मिलती, जो कि भावी अपराधियों की हड्डियों में कंपकंपी मचा दे। रोमन केथोलिक चर्च में ब्रह्मचर्य पर जरुरत से ज्यादा जोर दिया जाता है, जैसे कि हमारे यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में दिया जाता है लेकिन भारत में तो यह जोर किसी तरह निभ जाता है लेकिन गोरे देशों में इसके उल्लंघन में ही इसका पालन होता है। यदि ईसाइयत के अंधकार-युग के एक हजार साल का इतिहास देखें तो खुद कई पोप ही बलात्कार और व्यभिचार करते हुए पकड़े गए हैं। वह दिन कब आएगा, जबकि भारत के पादरियों के ऊंचे और पवित्र चरित्र का सिक्का सारी दुनिया में चमकेगा ?

लोकतंत्र बनाम राजतंत्र
सनत जैन
दिल्ली हिंसा के मामले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबडे का बयान था ‘ अदालत की शक्ति सीमित है। हम यह नहीं कह रहे हैं, कि लोगों को मरना चाहिए। लेकिन जिस तरह से जनहित याचिका लगाई गई हैं। जिस तरह का दबाव सुप्रीम कोर्ट पर बन रहा है। वह दबाव कोर्ट संभाल नहीं पाएगा। ‘उन्होंने कहा’ आम आदमी को उम्मीद होती है, कि अदालत दंगा रोक सकती है। यह शक्ति हमारे पास नहीं है। ‘मुख्य न्यायाधीश ने कहा’ जिस तरह की रिपोर्टिंग हो रही है। उससे ऐसा लगता है कि इन दंगों के लिए कहीं ना कहीं अदालत भी जिम्मेदार हैं। हम इस मामले को सुनेंगे याचिकाकर्ताओं को यह समझना होगा कि घटना होने के बाद ही मामला कोर्ट में आता है। कोर्ट घटनाओं को नहीं रोक सकता है। हम शांति की अपील करते हैं। ‘ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का यह कथन भारत के नागरिकों के लिए निराशाजनक संदेश दे रहा है।
भारतीय संविधान ने न्यायालय को सर्वोच्च स्थान पर रखा है। विधायिका और कार्यपालिका द्वारा लिए गए, किसी भी निर्णय अथवा कानून की समीक्षा का अधिकार कोर्ट का है। संविधान की दृष्टि से नागरिकों के मौलिक अधिकारों को मूलभूत अधिकारों से जोड़कर, न्यायालय समीक्षा कर गलत और सही का निर्णय करता है। न्यायालय का निर्णय मानना सभी पक्षों के लिए बंधनकारी है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस.ए.बोबडे ने पदभार ग्रहण करते हुए कहा था, कि वह सरकार के सहयोग से कार्य करेंगे। पिछले कुछ वर्षों में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट सुनवाई के दौरान निर्णयों में सरकार के साथ सहानुभूति करते हुए निर्णय स्पष्ट रूप से नजर आता है। उल्लेखनीय है, भारत में जितने भी मामले न्यायालयों में लंबित हैं, उनमें 70 फ़ीसदी से ज्यादा मामलों में केंद्र सरकार, राज्य सरकार, नगरीय निकाय एवं स्थानीय संस्थाएं पक्षकार होती हैं। सरकार चलाना विधायक का और कार्यपालिका का काम है। आम जनता को यदि विधायिका और कार्यपालिका के किसी भी निर्णय से असहमति है। तो न्यायालय का निर्णय ही अंतिम रूप से मान्य होता है। संविधान ने न्यायपालिका के लिए जो शक्तियां दी हैं, वह सर्वोच्च हैं। पिछले कुछ वर्षों में न्यायपालिका भी सरकार के दबाव में सहयोग करती हुई नजर आ रही है। जिसके कारण आम आदमी का विश्वास न्यायपालिका पर कम हो रहा है। हाल में मुख्य न्यायधीश का बयान सभी के लिए निराशाजनक है।
जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने का मामला हो या नागरिकता संशोधन विधेयक, पिछले कई माह से कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। 2 माह से अधिक समय से शाहीन बाग में आंदोलन चल रहा है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान सांप्रदायिक आधार पर खुलेआम मंत्रियों एवं सांसदों द्वारा बयान दिए गए। दिल्ली में रहते हुए सरकार के किसी भी प्रतिनिधि ने आंदोलनकारियों से बात नहीं की। कड़कड़ाती ठंड में महिलाएं एवं बच्चे शांतिपूर्ण आंदोलन सड़क पर बैठकर करते रहे। सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि पहले शांति स्थापित हो, तब हम याचिकाओं की सुनवाई करेंगे, सरकार को लगातार समय देना कहीं ना कहीं स्थिति को बिगड़ने देने के लिए भी जिम्मेदार है। याचिकाकर्ता यह मान रहे हैं, तो यह गलत भी नहीं है। केंद्र सरकार के उपरोक्त कानून को लेकर कई राज्यों के हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल हुई थीं। उन सभी याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने अपने पास बुला कर रख लिया। उस पर कई महीनों से सुनवाई नहीं हुई। सरकार और उसके नुमाइंदे एनआरसी और सीएए को लेकर अलग-अलग बयानबाजी कर रहे हैं। इसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट नागरिकों के मौलिक अधिकार या समाज में फैली उत्तेजना को लेकर सुनवाई नहीं कर है, इससे आम जनता के बीच यही संदेश जा रहा है कि जिस तरह विधायिका के दबाव में कार्यपालिका काम करती है। लगभग वही स्थिति अब न्यायपालिका की भी हो चली है। ऐसे दर्जनों मामले हैं, जिसमें लोगों को स्पष्ट रूप से यह स्थिति देखने को मिली है। न्यायपालिका ने पिछले वर्षों में जिस तरह से सरकार के साथ सहानुभूति और पक्षपातपूर्ण रवैया सुनवाई के दौरान अपनाया है। उससे लोगों में एक अलग तरह की निराशा और उद्धेलन देखने को मिल रहा है। इससे याचिकाकर्ता न्यायालयीन प्रक्रिया में प्रताड़ित हो रहे हैं। यह स्थिति अब काफी नाजुक मोड़ पर पहुंच गई है। पिछले वर्षों में विधायिका और कार्यपालिका पर लोगों का विश्वास ना के बराबर है। आम आदमी को न्यायपालिका पर ही विश्वास था, कि वह संविधान के अनुरूप उसके मौलिक अधिकारों और नागरिक अधिकारों की रक्षा करेगी। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के इस बयान से लोगों में निराशा फैलना स्वाभाविक है। संविधान प्रदत्त असीमित शक्तियों का उपयोग करने में यदि न्यायाधीश भी अपने आपको असहाय मानेंगे। तो इससे यही लगता है कि भारत में लोकतंत्र के स्थान पर राजतंत्र स्थापित हो रहा है।

इस घर को आग लग गयी घर के चिराग़ से?
निर्मल रानी
देश की राजधानी दिल्ली आख़िरकार अशांत हो ही गयी। दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाक़े हिंसा की भेंट चढ़ गए। इस साम्प्रदायिक हिंसा में अब तक भारत माता के ही 13 सपूत अपने जानें गंवा चुके हैं। इनमें एक पुलिसकर्मी भी अपनी ड्यूटी निभाते हुए दंगाइयों के हाथों शहीद हो गया जबकि दो आला पुलिस अधिकारी भी घायल हुए। बड़े पैमाने पर संपत्ति को भी क्षति पहुंचाई गयी है। टी वी तथा सोशल मीडिया पर अनेक ऐसे वी डी ओ वायरल हो रहे हैं जो अत्यंत ह्रदय विदारक हैं। इन वी डी ओज़ को देखकर यह तो पता चलता ही है कि राजनीतिज्ञों के चक्रव्यूह में उलझकर एक आम इंसान किस प्रकार से अपने ही देशवासियों के ख़ून का प्यासा हो जाता है और हैवानियत की हदों को किस तरह पार कर जाता है। साथ साथ यह भी पता चलता है कि वह पुलिस जिसपर दंगाइयों को नियंत्रित करने का ज़िम्मा है वही पुलिस किस तरह दंगाइयों की भीड़ में शामिल होकर लूट पाट व हिंसा में शरीक होती है। गत दो महीने से भी अधिक समय से दिल्ली में एन आर सी व सी ए ए के विरुद्ध निरन्तर हो रहे धरने व प्रदर्शनों के बाद से ही दिल्ली के माहौल में तनावपूर्ण गर्मी पैदा होनी शुरू हो चुकी थी। पिछले दिनों हुए दिल्ली विधान सभा चुनावों के दौरान इस गर्मी की तीव्रता उस समय और अधिक बढ़ गयी जब कि चुनाव प्रचार के दौरान अशांति पसंद करने वाले कुछ फ़ायर ब्रांड नेताओं को अपने ज़हरीले भाषणों के द्वारा राजधानी को और अधिक ‘प्रदूषित’ करने का मौक़ा मिला। दिल्ली के चुनाव परिणामों को लेकर विश्लेषकों का यही मानना है कि भले ही आम आदमी पार्टी ज़ोरदार तरीक़े से सत्ता में पुनः वापिस क्यों न आ गयी हो परन्तु 2015 में 3 सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी का 3 के आंकड़े से 2020 में 8 सीटों तक पहुंचना तथा गत 2015 के चुनाव की तुलना में भाजपा के मतों में 6.3 प्रतिशत की बढ़ौतरी होना इस बात का सुबूत है कि भाजपा नेताओं के फ़ायर ब्रांड भाषणों का निश्चित तौर पर कम ही सही परन्तु कुछ न कुछ प्रभाव ज़रूर हुआ है।
ग़ौर तलब है कि गत 8 दिसम्बर को दिल्ली में विधानसभा चुनाव संपन्न हुए। भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने इसी चुनावी वातावरण में 20 दिसंबर को एन आर सी व सी ए ए के समर्थन में एक रैली निकाली। इस रैली में वे अपने समर्थकों से नारे लगवा रहे थे कि ‘देश के ग़द्दारों को-गोली मारो सालों को’ । इसी प्रकार 27 जनवरी को दिल्ली के रिठाला विधान सभा क्षेत्र में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने भी वही उत्तेजना व हिंसा फैलाने वाला आपत्ति जनक नारा उपस्थित भीड़ से पुनः लगवाया। भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने इसी चुनाव के दौरान 23 जनवरी को एक अति आपत्तिजनक ट्वीट किया कि ‘8 फ़रवरी को दिल्ली में हिंदुस्तान व पाकिस्तान का मुक़ाबला होगा’। अर्थात दिल्ली के चुनाव को यह महाशय भारत-पाकिस्तान के मुक़ाबले के रूप में देख रहे थे। इन्हें प्रत्येक भाजपा विरोधी ‘पाकिस्तानी ‘ दिखाई देता है। कपिल मिश्रा के इस आपत्तिजनक ट्ववीट पर संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग ने उसपर 48 घंटे तक चुनाव प्रचार में भाग न लेने का प्रतिबंध भी लगा दिया था। बहरहाल चुनाव समाप्त हुए,आम आदमी पार्टी ने पुनः सत्ता संभाली परन्तु हार की कसक शायद इन आग लगाऊ नेताओं से सहन न हो सकी। नतीजतन दिल्ली को उस समय दंगों की आग में सुनियोजित तरीक़े से झोक दिया गया जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप दिल्ली में मौजूद थे।
बहरहाल,जैसा कि पहले भी सांप्रदायिक इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है यहाँ भी दर्जनों ‘स्वयंभू देशभक्त दंगाई योद्धाओं’ ने कई जगहों पर एक एक व्यक्ति को घेर कर लाठी-डंडों व लोहे की रॉड आदि से इतना पीटा की उनमें से कई बुरी तरह ज़ख़्मी लोगों ने दम तोड़ दिया।सरेआम गोलियां चलाई गयीं। भीड़ में शेर बन जाने वाले ये बहादुर योद्धा भजनपुरा में एक पीर की मज़ार को भी आग लगाने से बाज़ नहीं आए। यह मज़ार हिन्दू व मुस्लिम दोनों ही समुदाय के लोगों के लिए आस्था का केंद्र थी। दंगाइयों ने अशोक नगर में एक मस्जिद में आग लगा दी।दंगाई भीड़ ने “जय श्री राम” और “हिंदू का हिंदुस्तान” के नारे लगाते हुए जलती हुई मस्जिद के चारों ओर परेड किया और मस्जिद के मीनार पर एक हनुमान ध्वज लगा दिया। इन दंगों में एक नई चीज़ यह दिखाई दी कि अनेक जगहों पर अनेक दंगाइ जहाँ हाथों में लाठी डंडे व रॉड आदि लिए थे वहीँ उन्होंने अपने सिरों पर हेलमेट भी डाला हुआ था। यह हेलमेट उन दंगाइयों को सुरक्षा तो प्रदान कर ही रहा था साथ साथ उनकी पहचान छुपाने का काम भी कर रहा था। खुले आम दंगाइयों द्वारा पेट्रोल बम का इस्तेमाल किया गया। कई पत्रकारों की पिटाई की गयी। उनके कैमरे छीने गए। दंगाई, पत्रकारों का भी धर्म पूछ रहे थे। यदि उन्हें लगता की कोई नाम ग़लत बता रहा है तो वे उसकी पैंट उतरवाकर उसका ‘धर्म चेक’ करते। एक वीडीओ में तो यह भी देखा जा रहा है कि ज़मीन पर गिरे कुछ युवाओं पर पुलिस व कुछ युवा इकट्ठे होकर लाठियों से प्रहार कर रहे हैं तथा उनसे देशभक्ति दिखाने व राष्ट्रगीत गाने के लिए भी कह रहे हैं। मेहनतकश लोगों की सारी उम्र की कमाई दंगाइयों ने आग की भेंट चढ़ा दी। सैकड़ों मकान व दुकानें राख के ढेर में बदल डालीं। दंगे भड़काकर अपने ही देशवासियों को जान व माल का नुक़सान पहुंचाकर इन ‘सूरमाओं’ को क्या हासिल हुआ यह तो यही जानते होंगे परन्तु एक बार फिर इन दंगों के बीच से ही शांति प्रेम सद्भाव व भाइचारे की वही ‘शम्मा’ रोशन होती नज़र आई जो भारतवर्ष में हमेशा से रोशनहोती नज़र आई है। दंगा प्रभावित क्षेत्र में कई स्थानों पर हिन्दुओं ने मुसलमानों की जान व माल की हिफ़ाज़त की तो कई जगह मुसलमानों ने अपने हिन्दू भाईयों की रक्षा की। मुसलमानों द्वारा मुस्लिम आबादी में एक मंदिर व उसके पुजारी की सारी सारी रात जागकर सुरक्षा की गयी। दोनों समुदाय के लोग दंगा प्रभावित क्षेत्रों में कई जगह शांति व एकता दर्शाने वाली मानव श्रृंखला बना कर खड़े हो गए और दंगाइयों को उनकी मंशा पूरी नहीं करने दिया।
दिल्ली के इन ताज़ातरीन दंगों ने 1984 की ही तरह एक बार फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दिल्ली पुलिस को दंगों को नियंत्रित करने का ऐसा ही प्रशिक्षण हासिल है जैसा की उसने दंगाइयों के साथ दंगे व आगज़नी में शामिल होकर प्रदर्शित किया है?1984 में भी यही दिल्ली पुलिस इसी भूमिका में नज़र आई थी जैसी कि पिछले दिनों पूर्वोत्तर दिल्ली के प्रभावित क्षेत्र में दिखाई दी।अब जब चारों तरफ़ से दिल्ली पुलिस की आलोचना हो रही है उस समय दिल्ली में दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए गए हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभवाल द्वारा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया गया है। इन तथाकथित ‘शासकीय चौकसी’ के बीच यह सवाल ज़रूर उठता है कि क्या दंगे भड़काने वालों पर भी कोई कार्रवाई होगी ? क्या नियंत्रित करने के बजाए दंगों व दंगाइयों को उकसाने व उसमें शरीक होने वाले पुलिसकर्मियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई होगी ? या फिर दंगाइयों को पद व मान सम्मान देकर वैसे ही पुरस्कृत किया जाएगा जैसा कि पहले भी कई बार किया जाता रहा है। जो भी हो दंगों में हिन्दू मरे या मुसलमान, मंदिर जले या मस्जिद,आख़िरकार आहत तो मानवता ही होती है। जब भी कोई भारत माता की संतान आहत होती है तो ज़ख्म भारत माता के सीने पर ही लगता है। शायद इन्हीं हालात की तरजुमानी हुए महताब रॉय ताबां फ़रमाते हैं कि –
‘दिल के फफोले जल उठे सीने के दाग़ से’- इस घर को आग लग गयी घर के चिराग़ से’।

कलेक्टर:नाम नही मन बदलने की दरकार
डा अजय खेमरिया
मप्र में सरकार कलेक्टर का नाम बदलने जा रही है। अंग्रेजी हुकूमत के लिए राजस्व वसूलने यानी कलेक्ट करने के लिए ईजाद किये गए कलेक्टर के पद में अभी भी औपनिवेशिक प्रतिध्वनि होती है। हालांकि मप्र के आईएएस अफसर इस नाम को बदलने के लिये राजी नही है। मप्र आईएएस एशोसिएशन के अध्यक्ष आईसीपी केसरी की अध्यक्षता में बनाई गई एक पांच सदस्यीय कमेटी के समक्ष राज्य के आईएएस अफसरों के अलावा राज्य प्रशासनिक सेवा और तहसीलदार संघ ने भी सरकार के इस प्रस्ताव का विरोध किया है। अब यह कमेटी राज्य के सांसद,विधायक, औऱ अन्य मैदानी जनप्रतिनिधियों से परामर्श कर मुख्यमंत्री कमलनाथ को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। उधर राज्य के सामान्य प्रशासन मंत्री डॉ गोविंद सिंह स्पष्ट कर चुके है कि कलेक्टर का नाम बदला जाएगा। मप्र सरकार मैदानी प्रशासन तंत्र में भी नीतिगत रूप से बदलाव कर रही है अब जिलों में जिला सरकार काम करेंगी। यानी जिला प्रशासन की जगह अब सरकार लेगी जो प्रशासन की तुलना में सरकार के समावेशी स्वरूप का अहसास कराता है। कलेक्टर अभी जिले का सबसे बड़ा अफसर होता है और उसकी प्रशासनिक ताकत समय के साथ असीमित रूप से बढ़ती जा रही है। आलम यह है कि कलेक्टर के आगे विधायक सांसद जैसे चुने गए प्रतिनिधि भी लाचार नजर आते है। मप्र में छतरपुर के मौजूदा कलेक्टर तो स्थानीय विद्यायकों को मिलने के लिये घन्टो इंतजार कराकर सुर्खियों में रह चुके है। सरकार के तमाम मंत्री कलेक्टरो द्वारा असुनवाई की शिकायत करते रहते है। असल में मौजूदा राजव्यवस्था का स्वरूप स्वतः ही कलेक्टर के पद को अपरिमित ताकत देता है। लोककल्याणकारी राज के चलते सरकारें लगातार जनजीवन में अपना सकारात्मक दखल बढ़ाती जा रही है। प्रशासन का ढांचा विशालकाय हो गया है। व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक आज सरकार की भागीदारी सुनिश्चित है। ऐसे मैं कलेक्टर लोककल्याणकारी योजनाओं से लेकर आधारभूत ढांचा विकास औऱ कानून व्यवस्था के अंतहीन दायित्व कलेक्टर के पास आ गए है। इन परिस्थितियों में कलेक्टर की व्यस्तता तो बढ़ी ही है समानान्तर ताकत और अधिकारों के साथ आने वाली बुराइयों ने भी इस पद को अपने कब्जे में ले लिया है। सरकार की समस्त मैदानी प्रयोगशाला आज जिला इकाई है। कलेक्टर एक ऐसे परीक्षक बन गए है जहां से हर समीकरण निर्धारित होता है। कलेक्टर के पद से जुड़ी असीम ताकत ने निर्वाचित तंत्र को आज लाचार सा बना दिया है। आज भी आम आदमी कलेक्टर को लेकर कतई सहज नही है। इसी व्यवस्थागत विवशता को समझते हुए मप्र की कमलनाथ सरकार ने बुनियादी परिवर्तन का मन बना लिया है। जिला सरकार का प्रयोग वस्तुतः मैदानी प्रशासन तंत्र में जनभागीदारी को प्रधानता देना ही है। इस जिला सरकार में प्रभारी/पालक मंत्री अध्यक्ष होंगे और कलेक्टर सचिव। 4 सदस्य जनता की ओर से मनोनीत होंगे। कलेक्टर का पदनाम बदला जाना भी इस अंग्रेजी राज व्यवस्था पर मनोवैज्ञानिक रूप से प्रधानता हासिल करने का प्रतीक है। बेहतर होगा कलेक्टर भी अपने व्यवहार में परिवर्तन लाकर भारत के आम नागरिकों के साथ, उनकी अपेक्षाओं आकांक्षाओं के साथ समेकन का प्रयास करें। नही तो पदनाम बदले जाने का कोई औचित्य नही रह जायेगा। वैसे देश में कलेक्टर हर राज्य में नही है। पंजाब में यह डीसी,यूपी में डीएम,बिहार में समाहर्ता,के नाम से जाने जाते है। जनप्रतिनिधियों को भी चाहिये कि वे भी लोकव्यवहार में पारदर्शिता का अबलंबन करें। तभी औपनिवेशिक राजव्यवस्था से जनता को मुक्ति मिल सकेगी। अफसरशाही को लेकर यह आमधारणा है कि वह एक अनावश्यक आवरण खड़ा करके रहती है। लोकसेवक के रूप में उसकी आवश्यकता के साथ आज भी भारत की नौकरशाही न्याय नही कर पाई है और त्रासदी यह है कि 70 साल बाद मानसिकता के स्तर पर भी हमारे समाज से निकली इस जमात ने खुद को आईसीएस के मनोविज्ञान को त्यागा नही है। कलेक्टर की व्यवस्था असल में आज भी देश भर में लोगों को सुशासन का अहसास कराने में नाकाम रही है। नाम बदलकर जिला अधिकारी, जिला प्रमुख,जिलाधीश करने से उस बुनियादी लक्ष्य की ओर उन्मुख होना संभव नही है जिसे लेकर कमलनाथ यह कदम उठा रहे है।

नीतीश ने दिखाया रास्ता मोदी को
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीशकुमार ने ऐसा काम कर दिखाया है, जो उन्हें नेताओं का नेता बना देता है। पिछले कुछ दिनों से उनकी छवि गठबंधन-बदलू नेता की बन रही थी लेकिन उन्होंने बिहार की विधानसभा से राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के खिलाफ प्रस्ताव पारित करवाकर एक चमत्कार-सा कर दिया है। वह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ है याने भाजपा के विधायकों ने भी नागरिकता रजिस्टर को रद्द कर दिया है। यह वही नागरिकता रजिस्टर है, जिसके कारण दिल्ली में दंगे हो रहे हैं, सारे देश में सैकड़ों शाहीन बाग उग आए हैं और सारी दुनिया में भारत की छवि गारत हो रही है। इसी रजिस्टर के प्रस्ताव ने सारे देश में गलतफहमी का अंबार खड़ा कर दिया है। मुसलमान यह मानकर चल रहे हैं कि यह हिंदुत्ववादी मोदी सरकार मुसलमानों को छांट-छांटकर देश-निकाला दे देगी। यह धारणा बिल्कुल निराधार है लेकिन राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के तहत नागरिकों से जो सवाल पूछे जाने हैं, उन्होंने इस गलतफहमी को मजबूत कर दिया है। संसद में गृहमंत्री के बयानों और संसद के बाहर दिए गए भाजपा नेताओं के उकसाऊ भाषणों ने इस गलतफहमी को अंधविश्वास में बदल दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस आश्वासन के बावजूद कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर जैसी किसी योजना पर सरकार ने विचार ही नहीं किया है, सारे देश में गड़बड़झाला मचा हुआ है। इसी के कारण पड़ौसी मुस्लिम देशों के शरणार्थियों का कानून भी घृणा का पात्र बन गया है। यह गलतफहमी दूर हो और देश का माहौल बदले, इसके लिए मैं बराबर सुझाव देता रहा हूं लेकिन प्रधानमंत्री की मजबूरी मैं समझता हूं। खुशी की बात है कि नीतीश ने मोदी को इस अंधी गली से बाहर निकाल लिया है। बिहार विधानसभा ने जो प्रस्ताव पारित किया है, उसमें 2014 में बने राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) की तर्ज पर ही बिहार में अब 2020 में जनगणना होगी। यही प्रस्ताव अब चाहें तो देश की सभी विधानसभाएं पारित कर सकती हैं। इस प्रस्ताव के द्वारा बिहार के 17 प्रतिशत मुसलमानों के वोट नीतीश ने अपनी जेब में डाल लिए हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल चाहें तो दिल्ली में बिहार दोहरा सकते हैं। उन्होंने चुनाव में जो सावधानी दिखाई, यह उसका अगला रुप है। जहां तक पड़ौसी शरणार्थियों का सवाल है, उस कानून में भी संशोधन की मांग नीतीश करते तो बेहतर होता। जैसे नीतीश ने मोदी को नया रास्ता दिखाया, मैं सोचता हूं कि सर्वोच्च न्यायालय भी मोदी सरकार को इस दलदल से जरुर बाहर निकाल लेगा।

सेठजी ट्रंप के छक्के
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस भारत-यात्रा से किसी भी विदेशी राष्ट्रध्यक्ष की यात्रा की तुलना नहीं की जा सकती। कुछ अर्थों में यह अप्रतिम रही है। अब तक आए किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति या किसी अन्य विदेशी नेता ने भारत और उसके प्रधानमंत्री की वैसी तारीफ कभी नहीं की, जैसी कि ट्रंप ने की है। अपने दो दिन के प्रवास में ट्रंप ने एक शब्द भी ऐसा नहीं बोला और कोई भी हरकत ऐसी नहीं की, जिसके लिए वे सारी दुनिया में जाने जाते हैं। दूसरे शब्दों में उनकी भारत-यात्रा ने उन्हें काफी परिपक्व बना दिया। यदि इस परिपक्वता को वे बनाए रखेंगे तो राष्ट्रपति का अगला चुनाव जीतने में उन्हें काफी मदद मिलेगी। ट्रंप ने अपने अहमदाबाद-भाषण में पाकिस्तान का जिक्र भी बड़ी तरकीब से किया। उन्होंने उसके आतंकवाद से लड़ने की तो कसम खाई लेकिन उसे कोई दोष नहीं दिया। उस लड़ाई में उन्होंने उसकी मदद की बात भी कही। यही उच्च कोटि की कूटनीति है। उन्हें अफगानिस्तान से पिंड छुड़ाने में पाकिस्तान की मदद जो चाहिए। उन्होंने न सिर्फ नागरिकता कानून आदि ज्वलंत मुद्दों को छूने से परहेज कर लिया बल्कि मोदी को धार्मिक स्वतंत्रता के दृढ़ पक्षधर का प्रमाण-पत्र भी थमा दिया। उन्होंने कश्मीर पर मध्यस्थता का अपना पुराना राग जरुर अलापा लेकिन उसे इतने मंद स्वर में गाया कि उसका सुनना या न सुनना, एक बराबर हो गया। उनके वाशिंगटन से रवाना होने के पहले सरकारी बयानों से जो आशंकाएं पैदा हो गई थीं, वे निराधार सिद्ध हो गईं। ट्रंप ने अहमदाबाद में जो छक्के मारे हैं, उन पर अमेरिका के 40 लाख प्रवासी भारतीय क्या तालियां नहीं पीट रहे हैं ? इस चुनावी मौसम में इससे बड़े फायदे का सौदा क्या हो सकता है ? ट्रंप जैसा सेठजी कहीं जाए और खाली हाथ लौट आए, यह कैसे हो सकता है ? उन्होंने चलते-चलते 21 हजार करोड़ रु. के हेलिकाप्टर भी भारत को बेच दिए और अरबों रु. के व्यापार के सब्ज-बाग भी दिखा दिए। ट्रंप ने इस भारत-यात्रा से अपने देश का हित तो साधा ही, मोदी की और खुद की छवि को भी चार चांद लगाने में कोई कसर न छोड़ी।

सरोगेसी की जरूरत
सिद्वार्थ शंकर
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राज्यसभा की चयन समिति की सिफारिशों को शामिल करने के बाद सरोगेसी (विनियमन) विधेयक को मंजूरी दे दी। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि राज्यसभा सिलेक्ट कमेटी की सिफारिशों को शामिल करने वाली सरोगेसी विनियमन विधेयक को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। एक संसदीय पैनल ने सिफारिश की थी कि न केवल करीबी रिश्तेदार, बल्कि अपनी इच्छा से सरोगेसी करने वाली किसी भी महिला को सरोगेट के रूप में कार्य करने की अनुमति दी जानी चाहिए। राज्यसभा की 23 सदस्यीय चयन समिति द्वारा सरोगेसी (विनियमन) विधेयक, 2019 में सुझाए गए 15 बड़े बदलावों में बांझपन की परिभाषा को शामिल करना भी शामिल है। सरकार का यह फैसला पूरी तरह से स्वीकार्य नहीं किया गया है। इससे पहले लोकसभा में पेश कानून में सरोगेसी को सख्त बनाने की बात कही गई थी, मगर नए फैसले में इसे लचीला बना दिया गया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जो फैसला लिया है, वह राज्यसभा की एक समिति के अध्ययन के बाद आया है। लोकसभा मेें बिल पास होने के बाद इसे राज्यसभा में लाया गया तो इसके परीक्षण की मांग उठी। सरकार ने कमेटी के पास बिल को भेजा। वहां से आई राय के बाद सरकार ने कानून में संशोधन किया है। इस विधेयक का मसला पिछले तीन साल से चर्चा में है और संसद की स्थाई समिति व कुछ संशोधनों के बाद अब सिरे चढ़ता दिख रहा है। यह एक ऐसा मामला है, जिस पर दुनिया के कई देशों में काफी पहले से कानून बन चुके हैं, भारत शायद इस पर सबसे देरी से कानून बनाने वाले बड़े देशों में होगा। सरोगेसी यानी पराई कोख का मामला थोड़ा टेढ़ा है। इसका सीधा सा अर्थ है कि बच्चे (यानी भ्रूण) की मां कोई और होगी और वह अपने नौ महीने के शुरुआती जीवन को किसी और की कोख में गुजारेगा। पहले इसके लिए कानून की जरूरत नहीं थी, क्योंकि यह संभव ही नहीं था, लेकिन अब जब विज्ञान ने इसे संभव कर दिखाया है, तो इसकी तमाम जटिलताएं और नैतिक प्रश्न भी हमारे सामने खड़े हैं। इसकी तकनीक, जिसे विज्ञान की भाषा में एटीआर यानी असिस्टेड रिप्रोडक्शन टेक्नोलॉजी कहते हैं, वह ऐसी माओं के लिए वरदान की तरह है, जिनकी कोख किसी कारण से बच्चे का पोषण करने में समर्थ नहीं है। लेकिन ऐसी माओं की संख्या बहुत कम है, इसकी जगह इस तकनीक के इस्तेमाल की चाहत रखने वाले ऐसे लोग काफी ज्यादा हैं, जो धन के बदले अपने भ्रूण को दूसरों की कोख के हवाले करके नौ महीने की तकलीफों और उसके बाद की प्रसव पीड़ा से मुक्ति चाहते हैं। ऐसे ही लोगों की वजह से यह तकनीक पिछले दिनों काफी बदनाम भी हुई। इसकी चर्चा तब बहुत ज्यादा हुई, जब बॉलीवुड की कई हस्तियों ने अपने बच्चे हासिल करने के लिए इस रास्ते को अपनाया। फिर अचानक ही इस तरह की खबरें आने लगीं कि बच्चों की चाहत रखने वाले दुनिया भर के लोग भारत का रुख कर रहे हैं। वे गरीब घरों की औरतों की कोख को किराए पर ले रहे हैं। सरोगेसी जो एक वरदान के रूप में आई थी, वह एक व्यवसाय के रूप में पैर पसारने लग गई। वह भी उस समय, जब दुनिया भर के कई विकसित देश व्यावसायिक सरोगेसी पर पाबंदी लगा चुके थे। अब जो कानून बन रहा है, उसके बाद भारत में भी इस सब पर पाबंदी लग जाएगी। अब सिर्फ जरूरतमंद ही यह राह अपना सकेंगे और किराए की कोख भी परिवार या नजदीकी रिश्तेदारों में ही किसी की होगी। इसके लिए रुपयों के लेन-देन पर भी पूरी पाबंदी रहेगी।
फिर भी एक सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए कि हम हमेशा देर क्यों कर देते हैं? बदलती दुनिया की जरूरत के हिसाब से नियम-कायदे बनाने की हमारी चाल समय के साथ कदमताल नहीं करती और अचानक पता चलता है कि हम काफी पिछड़ गए। यही साइबर कानूनों के मसले पर भी हुआ था और यही साइबर सुरक्षा के मामले में भी। विश्व शक्ति बनने के हमारे सपने और हमारा यह ढुलमुल रवैया, दोनों एक साथ नहीं चल सकते, दोनों में किसी एक को छोडऩा ही होगा।
पिछले कुछ सालों के दौरान भारत के चिकित्सा बाजार में सरोगेट मदर का धंधा जिस कदर फल-फूल रहा था, उसमें चुपचाप पल रहे कुछ अमानवीय पहलुओं की अनदेखी हो रही थी। विडंबना यह है कि एक कारोबार की शक्ल ले चुके होने के बावजूद कानूनी स्तर पर फिलहाल ऐसी व्यवस्था नहीं है कि अगर इसमें कोई पीडि़त पक्ष है तो वह अपने हक में कानून का सहारा ले सके। इसलिए सरकार ने ‘किराए की कोखÓ के नियमन का जो फैसला लिया है, उसे एक सकारात्मक पहल कहा जा सकता है। मगर यह ऐसा काम है, जिस पर सतत निगरानी की जरूरत हमेशा बनी रहेगी।

हिंदू बना रहे मस्जिद
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत के कुछ हिंदू और मुस्लिम नेता दोनों संप्रदायों की राजनीति जमकर कर रहे हैं लेकिन देश के ज्यादातर हिंदू और मुसलमानों का रवैया क्या है ? अदभुत है। उसकी मिसाल दुनिया में कहीं और मिलना मुश्किल है। कुछ दिन पहले मैंने तीन लेख लिखे थे। एक में बताया गया था कि वाराणसी में संस्कृत के मुसलमान प्रोफेसर के पिता गायक हैं और वे हिंदू मंदिरों में जाकर अपने भजनों से लोगों को विभोर कर देते हैं। दूसरे लेख में मैंने बताया था कि उप्र के एक गांव में एक मुस्लिम परिवार के बेटे ने अपने पिता के एक हिंदू दोस्त की अपने घर में रखकर खूब सेवा की और उनके निधन पर उनके पुत्र की तरह उनके अंतिम संस्कार की सारी हिंदू रस्में अदा कीं। तीसरे लेख में आपने पढ़ा होगा कि कर्नाटक के एक लिंगायत मठ में एक मुस्लिम मठाधीश को नियुक्त किया गया है लेकिन अब सुनिए नई कहानी। ग्रेटर नोएडा के रिठौड़ी गांव में एक भव्य मस्जिद बन रही है। उसकी नींव गांव के हिंदुओं ने छह माह पहले रखी थी। इस गांव में बसनेवाले हर हिंदू परिवार ने अपनी-अपनी श्रद्धा और हैसियत के हिसाब से मस्जिद के लिए दान दिया है। पांच हजार लोगों के इस गांव में लगभग डेढ़ हजार मुसलमान रहते हैं। ये लोग एक-दूसरे के त्यौहार मिल-जुलकर मनाते हैं। एक-दूसरे से मिलने पर हिंदुओं को सलाम कहने में और मुसलमानों को राम-राम कहने में कोई संकोच नहीं होता। इस गांव में कभी कोई सांप्रदायिक तनाव नहीं हुआ। सभी लोग एक बड़े परिवार की तरह रहते हैं, जबकि दोनों की पूजा, भोजन, पहनावे और तीज-त्यौहारों में काफी भिन्नता है। क्या हम 21 वीं सदी में ऐसे ही भारत का उदय होते हुए नहीं देखना चाहते हैं ? मैं तो चाहता हूं कि यही संस्कृति पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और मालदीव में भी पनपे। इस रिठौड़ी गांव में इस महाशिवरात्रि पर एक नए मंदिर की नींव भी रखी गई। गांव के मुसलमानों ने उत्साहपूर्वक इसमें हाथ बंटाया। यदि ईश्वर एक है तो फिर मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारे में एका क्यों नहीं है ? पूजा-पद्धतियों और पूजागृहों में जो यह फर्क है, यह देश और काल की विविधता के कारण है। यह फर्क मनुष्यकृत है, ईश्वरकृत नहीं। इस सत्य को यदि दुनिया के सारे ईश्वरभक्तों ने समझ लिया होता तो यह दुनिया अब तक स्वर्ग बन जाती।

राजनीति की नई इबारत लिखने की ओर बिहार
निर्मल रानी
महात्मा बुध से लेकर महात्मा गाँधी जैसे महापुरुषों की कर्मस्थली रहा देश का प्राचीन समय का सबसे समृद्ध राज्य बिहार गत 15 वर्षों में हुए अनेक मूलभूत विकास कार्यों के बावजूद अभी भी देश के पिछड़े राज्यों में ही गिना जाता है। आज भी बिहार के शिक्षित व अशिक्षित युवा अपनी रोज़ी रोटी की तलाश में देश के अन्य राज्यों में जाने के लिए मजबूर हैं। महाराष्ट्र जैसे राज्य में तो बिहार के लोगों की संख्या इतनी अधिक हो चुकी है कि क्षेत्रीय मराठा राजनीति करने वाले नेता उत्तर भारतियों के विरोध के नाम पर ही मराठा मतों के ध्रुवीकरण की राजनीति भी करते हैं। यह भी सच है कि डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद से लेकर जय प्रकाश नारायण व कर्पूरी ठाकुर जैसे नेता इसी राज्य का प्रतिनिधित्व करते थे परन्तु इसके बावजूद अन्य राज्यों की तुलना में बिहार का विकास होना तो दूर उल्टे बिहार तेज़ी से पिछड़ता ही चला गया। लगभग 3 दशकों तक बिहार भ्रष्टाचार,ग़रीबी,पिछड़ेपन,अपराध,जातिवाद व बेरोज़गारी का पर्याय बना रहा। परन्तु जब से राष्ट्रपति भारत रत्न ए पी जे अब्दुल कलाम ने बिहार से विकास की धारा बहाने की शुरुआत की और इसी राज्य से नई हरित क्रांति छेड़ने का आवाह्न किया तब से न केवल बिहार के नेतृत्व को भी पारम्परिक लचर राजनैतिक रवैय्ये को त्यागना पड़ा बल्कि केंद्र सरकार भी बिहार के विकास के लिए गंभीर नज़र आने लगी। बिहार को एक झटका उस समय भी लगा जबकि 15 नवंबर 2000 को बिहार विभाजित हो गया और झारखण्ड के नाम से राज्य का लगभग 80,000 वर्ग किलोमीटर का प्रकृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र बिहार से अलग हो गया। कहा जाता है कि झारखण्ड राज्य अपने आप में देश की 40 प्रतिशत खनिज संपदा का स्वामित्व रखता है।
बहरहाल यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं कि जहाँ राज्य के शिक्षित युवाओं ने देश-विदेश में ऊँचे से ऊँचे पदों पर बैठकर राज्य का नाम रौशन किया तथा राज्य के मेहनतकश युवाओं व श्रमिक व खेती किसानी करने वाले कामगारों ने भी अपने ख़ून पसीने से राष्ट्र निर्माण में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की वहीँ यहाँ के राजनेताओं में राज्य के विकास को लेकर गंभीरता नज़र नहीं आई। हाँ राज्य में दशकों तक भ्रष्टाचार,लूट खसोट,राजनैतिक व प्रशासनिक लापरवाही व ढुलमुलपन का माहौल ज़रूर बना रहा। धर्म व जाति के नाम पर बिहार की भोली भली जनता को ठगा जाता रहा। यही वजह थी कि राष्ट्रपति कलाम की पहल व यू पी ए सरकार के समर्थन से शुरू हुई विकास यात्रा के सारथी व उस समय के भी मुख्यमंत्री रहे नितीश कुमार को बिहार में ‘विकास बाबू’ के नाम से जाना जाने लगा था। निःसंदेह बिहार ने गत 15 वर्षों में तरक़्क़ी तो ज़रूर की है परन्तु अभी भी राज्य के विकास की गति अत्यंत धीमी है। स्कूल में जाने वाले बच्चों की संख्या ज़रूर बढ़ी है परन्तु शिक्षा के स्तर में सुधर नहीं हुआ है। विद्यालय भवन तथा अध्यापकों की कमी अभी भी राज्य में महसूस की जा रही है। इत्तेफ़ाक़ से अपनी राजनैतिक ‘सूझ बूझ’ की वजह से आज भी नितीश कुमार ही राज्य के मुख्यमंत्री हैं परन्तु उनके मुख्यमंत्री बनने के इस सत्र में यही देखा जा रहा है कि उनका बिहार के विकास से भी ज़्यादा ध्यान व समय अपनी कुर्सी को ‘येन केन प्रकरेण’ बरक़रार रखने में लगा रहा। कभी कांग्रेस व राष्ट्रीय जनता दल के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया और भाजपा के विरुद्ध चुनाव लड़कर जीत हासिल की। फिर इन्हीं सहयोगी दलों को ठेंगा दिखाकर भाजपा के समर्थन की मिली जुली सरकार बना डाली।
अब राज्य एक बार फिर संभवतः इसी वर्ष अक्टूबर में राज्य विधान सभा का सामना करने जा रहा है। राज्य के वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में सबसे बड़े जनाधार वाले राजनैतिक दल राष्ट्रीय जनता दाल की नैय्या डगमगा रही है। अपने जादुई व लोकलुभावन अंदाज़ के लिए अपनी अलग पहचान रखने वाले नेता लालू यादव इस समय जेल में सज़ा काट रहे हैं। उनकी राजनैतिक विरासत को उनके पुत्रगण ठीक ढंग से संभाल नहीं सके। कांग्रेस पार्टी भी कमोबेश उत्तर प्रदेश जैसी स्थिति में ही यहाँ भी है। और सबसे बड़ी बात यह की स्वयं मुख्य मंत्री नितीश कुमार को भी अब राज्य में विकास बाबू के नाम के बजाए ‘पलटीमार’ के नाम से जाना जाने लगा है। उधर भाजपा भी स्वभावतयः धर्मनिरपेक्ष विचारधारा रखने वाले इस राज्य में पूरी तरह से अपने पैर नहीं फैला सकी है। संभवतः इसी चतुर्कोणीय राजनैतिक द्वन्द में से ही इस बार राज्य की जनता एक नया विकल्प प्रशांत किशोर के रूप में भी देख सकती है। गत दिनों पटना में अपने संवाददाता सम्मलेन में स्वयं ‘पी के’ ने ही अपने कुछ ऐसे ही इरादों की जानकारी भी दी। उन्होंने जे डी यू से नाता तोड़ने के बाद पहली बार नितीश कुमार पर जो सबसे बड़ा हमला बोला है वह है उनकी राजनैतिक विचारधारा को लेकर। ग़ौरतलब है कि नितीश कुमार हमेशा ही स्वयं को समाजवाद,गांधीवाद तथा राम मनोहर लोहिया व जय प्रकाश से प्रेरित मानते रहे हैं। परन्तु यह भी सच है कि उन्हें सत्ता के लिए भाजपा जैसे दक्षिण पंथी संगठन से भी हाथ मिलाने में कभी भी कोई एतराज़ नहीं हुआ। इस बार उन्हीं की पार्टी में रह चुके तथा उन्हीं के चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर ने उनसे सीधे तौर पर यही सवाल पूछा है कि-‘आप कहते थे कि महात्मा गाँधी,लोहिया व जय प्रकाश की बताई हुई बातों को आप नहीं छोड़ सकते। ऐसे में जब पूरे बिहार में आप गाँधी जी के विचारों को लेकर शिलापट लगा रहे हैं और यहाँ के बच्चों को गाँधी की बातों से अवगत करा रहे हैं उसी समय गोडसे के साथ खड़े हुए लोग अथवा उसकी विचारधारा को सहमति देने वालों के साथ कैसे खड़े हो सकते हैं ? प्रशांत किशोर का पहली बार नितीश पर किया गया यह हमला निश्चित रूप से उनके उस तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्ष आवरण’ पर सवाल खड़ा करेगा जोकि नितीश कुमार की असली पूँजी है।
‘पी के’ ने नितीश कुमार के विकास के दावों पर भी यह कहते हुए सवाल उठाए हैं कि नितीश जी को बिहार के विकास की तुलना अपने ही राज्य की पिछली स्थिति या लालू राज वाले बिहार से नहीं बल्कि देश के महाराष्ट्र,पंजाब व कर्नाटक जैसे राज्यों से करनी चाहिए। ‘पी के’ ने राज्य में विकास की गति से लेकर प्रतिभाओं व कामगारों के अब तक हो रहे पलायन पर भी सवाल उठाए। पी के ने ‘बात बिहार की’ नामक एक अभियान की शुरुआत 20 फ़रवरी से करने का निर्णय लिया है। इस अभियान के माध्यम से वे आगामी सौ दिनों में राज्य के एक करोड़ युवाओं से संपर्क बनाएँगे। माना जा रहा है कि केजरीवाल की ही तरह उनकी भी पूरी राजनीति साफ़ सुथरी तथा बिहार के तेज़ी से समग्र विकास पर आधारित होगी। और यदि राज्य की धर्मनिरपेक्ष जनता को कांग्रेस,आर जे डी व जे डी यू के बाद ‘पी के’ के नेतृत्व में इस पारम्परिक परन्तु पुराने व कमज़ोर पड़ चुके नेतृत्व के रिक्त स्थान को भरने की क्षमता नज़र आई तो कहा जा सकता है कि बिहार भी दिल्ली में केजरीवाल की ही तरह सियासत की एक नई इबारत लिखने की ओर अग्रसर है।

ट्रंप की यात्रा सिर्फ नौटंकी नहीं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस भारत-यात्रा से भारत को कितना लाभ हुआ, यह तो यात्रा के बाद ही पता चलेगा लेकिन ट्रंप ऐसे नेता हैं, जो अमेरिकी फायदे के लिए किसी भी देश को कितना ही निचोड़ सकते हैं। यह तथ्य उनकी ब्रिटेन, यूरोप तथा एशियाई देशों की विभिन्न यात्राओं में से अब तक उभरकर आया है। ट्रंप की खूबी यह है कि वे सारी राजनयिक नज़ाकतों को ताक पर रखकर खरी-खरी बोल पड़ते हैं। उन्होंने नरेंद्र मोदी से अपने संबंधों की घनिष्टता पर बार-बार जोर दिया है, उन्हें ‘भारत का पिता’ भी कह दिया है लेकिन आपसी व्यापार के मामले में उन्होंने भारत के व्यवहार पर काफी कड़ुवे शब्दों में आपत्ति भी जताई है। अमेरिका ने अभी-अभी भारत का विकासमान राष्ट्र का दर्जा भी खत्म कर दिया है, जिसका अर्थ यह है कि भारत को अपने माल पर मिलनेवाले अमेरिकी तटकर में भारी कटौती हो जाएगी। भारत ने भी जवाबी कार्रवाई कर दी है। इसीलिए शायद इस यात्रा के दौरान आपसी व्यापार का मामला नहीं सुलझ पाएगा लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ट्रंप की यह यात्रा सिर्फ एक नौटंकी बनकर रह जाएगी। नौटंकी तो वह है ही। मोदी और ट्रंप इस मामले में गुरु-शिष्य हैं। ट्रंप का बार-बार यह कहना कि अहमदाबाद में उनके स्वागत में 50-70 लाख लोग आएंगे, कोरा मजाक है। शायद उन्होंने फोन पर बातचीत में हजार को लाख समझ लिया हो। जो भी हो, ट्रंप के लिए यही बहुत फायदेमंद है कि अमेरिका के 40 लाख भारतीय वोटरों को वे अपने चुनाव के लिए प्रभावित कर लेंगे। उनकी यात्रा के दौरान पांच समझौतों पर दस्तखत की तैयारी चल रही है। एक तो आतंकवाद विरोधी सहयोग, व्यापारिक सुविधाओं, बौद्धिक मालिकाना हक, भारत-प्रशांत क्षेत्र सहयोग तथा अंतरिक्ष और परमाणु सहयोग के समझौतों की घोषणा की तैयारियां चल रही हैं। चीनी वर्चस्व के विरुद्ध लड़ने में भी अमेरिका भारत को अपने साथ लेना चाहता है लेकिन अफगानिस्तान से अपना पिंड छुड़ाने में वह पाकिस्तान को गले लगाए बिना नहीं रह सकता। तालिबानी अफगानिस्तान से निपटने की कोई तैयारी भारत के पास अभी तक दिखाई नहीं पड़ रही है। ट्रंप से इस मामले में मोदी को खुलकर बात करनी चाहिए। भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता के ट्रंप के प्रस्ताव को औपचारिक तौर पर भारत नहीं मानेगा लेकिन ट्रंप चाहे तो वे अपनी इस सदिच्छा को अनौपचारिक रुप में कृतार्थ कर सकते हैं।

चीन में क्यों और कैसे महामारी बनकर उभरा कोरोना?
योगेश कुमार गोयल
पिछले दो माह से चीन में बुरी तरह कहर बरपा रहे और पूरी दुनिया में खौफ का पर्याय बने नोवेल कोरोना वायरस को लेकर कुछ दिनों पूर्व विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया गया था और अब उसने इसे आतंकवाद से भी गंभीर बताते हुए बीते 11 फरवरी को कोरोना वायरस का नया अधिकारिक नामकरण भी कर दिया है। दरअसल चीन के वुहान शहर से शुरू हुआ कोरोना का आतंक अब एक-एक कर दुनिया के 31 देशों तक पहुंच चुका है। 30 दिसम्बर को चीन में कोरोना वायरस के अस्तित्व की जानकारी मिलने के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस वायरस को ‘2019-एनसीओवी एक्यूट रेस्पाइटरी डिजीज’ नामक तात्कलिक नाम दिया था और अब डब्ल्यूएचओ द्वारा ‘नोवेल कोरोना’ को ‘कोविड-19’ (सीओवीआईडी-19) नाम दिया गया है। कोविड में को का अर्थ है कोरोना, वि का अर्थ है वायरस और डी का अर्थ है डिजीज अर्थात् कोरोना वायरस डिजीज। कोरोना के वैश्विक खौफ को इसी से समझा जा सकता है कि 1 फरवरी को हांगकांग से रवाना हुआ नीदरलैंड का एक पोत ‘एमएस वेस्टरडम’ 2257 लोगों को लिए दो सप्ताह से समुद्र में भटकने को विवश हैं क्योंकि जापान, अमेरिका, फिलीपींस, थाईलैंड इत्यादि देशों द्वारा पोत में सवार लोगों में कोरोना संक्रमण को लेकर उपजे भय के चलते इस पोत को अपने तटों से लौटाया जा चुका है। हालांकि पोत की ओर से ऐलान किया गया था कि उसमें सवार कोई भी व्यक्ति कोरोना से संक्रमित नहीं है लेकिन कोई भी देश इस दावे को मानने को तैयार नहीं है। हाल ही में 3711 लोगों के साथ जापान के समुद्र तट पर कोरोना वायरस का कहर झेल रहे पोत ‘डायमंड प्रिंसेस’ में सवार 138 भारतीयों ने भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उन्हें सुरक्षित पोत से निकालने को लेकर मार्मिक अपील की है। दरअसल इस पोत में 439 लोगों के किए गए परीक्षण में 174 लोगों के कोरोना संक्रमित पाए जाने के बाद पोत को जापान के समुद्र तट पर ही रोक दिया गया है।
कोरोना कितना खतरनाक साबित हो रहा है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि चीन सरकार के आंकड़ों के ही मुताबिक अब तक करीब दो हजार लोग कोरोना के कारण मर चुके हैं जबकि 60 हजार से अधिक लोगों में इसके संक्रमण की पुष्टि हो चुकी है। हालांकि दुनियाभर में बहुत से लोगों का मानना है कि चीन में कोरोना से अभी तक हुई वास्तविक मौतों और संक्रमण का आंकड़ा चीन सरकार के आंकड़ों से कई गुना ज्यादा है, इसीलिए चीन में कोरोना के कहर को लेकर कोहराम मचा है। अगर चीन के सरकारी आंकड़ों की ही बात करें तो उसके अनुसार भी कोरोना से हुई मौतों का आंकड़ा 2003 में कहर बनकर बरपे सार्स को भी काफी पीछे छोड़ चुका है। कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते दुनियाभर में निवेशकों की चिंता बढ़ी है और इस वायरस के खौफ के चलते चीन के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है, जिसका असर आने वाले समय में लंबे समय तक देखा जाता रहेगा।
भारत में अब तक कोरोना संक्रमण के केरल में कुल तीन मामले सामने आए हैं और 13 फरवरी को बैंकाक से कोलकाता लौटे तीन लोगों के भी कोरोना से संक्रमित होने की आशंका जताई गई है। इसके अलावा देशभर में करीब 16 हजार व्यक्ति कोरोना के खतरे के मद्देनजर निगरानी में हैं। केरल में बीते दिनों तीन व्यक्तियों के संक्रमित पाए जाने के पश्चात् दिए गए उपचार के बाद उनमें से दो के नेगेटिव साबित होने पर एक व्यक्ति को डिस्चार्ज किया जा चुका है और केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन के अनुसार अन्य दोनों लोगों को भी अगले कुछ दिनों में डिस्चार्ज किया जा सकता है। स्पष्ट है कि भारत में जहां कोरोना के खतरे को फिलहाल सफलतापूर्वक नियंत्रित कर लिया गया है, वहीं चीन से शुरू हुआ कोरोना का कहर वहां क्यों और कैसे महामारी बनकर उभर रहा, इसके पीछे चीन सरकार की फितरत को जानना और समझना बेहद जरूरी है। दरअसल चीन पर बरसों से आरोप लगते रहे हैं कि सूचनाओं को दुनिया की नजरों से दबाना उसकी फितरत है और उसकी इसी फितरत के कारण ही कोरोना का यह खौफनाक रूप दुनिया के सामने आया है। चीन में अध्ययन करने वाले कौंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन में फैलो यानझोंग हुआंग के मुताबिक वुहान के स्थानीय स्वास्थ्य विभाग द्वारा शुरूआती कुछ हफ्तों में इस खतरे के प्रति लोगों को सावधान करने के लिए किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई। अधिकारियों ने लोगों को इस बीमारी के खतरों से अनजान रखा, जिसके कारण लोग संक्रमण से अपना बचाव नहीं कर सके। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन सरकार द्वारा कोरोना संक्रमण के प्रति लोगों को आक्रामक तरीके से सावधान नहीं करने के चलते इसे महामारी में बदलने से रोकने का एक बड़ा अवसर गंवा दिया गया, जिसका खामियाजा अब हजारों लोग भुगत रहे हैं। दरअसल एक ओर जहां कोरोना वायरस तेजी से फैलता जा रहा था, वहीं अधिकारी बार-बार एक ही राग अलाप रहे थे कि इस वायरस के फैलने की संभावना कम है।
गत वर्ष दिसम्बर माह में वुहान मेडिकल कॉलेज में जब डॉक्टरों को सात मरीज रहस्यमय बीमारी से पीडि़त मिले थे, तब उनका इलाज कर रहे 34 वर्षीय डा. ली वेनलियांग ने अपने सहयोगी चिकित्सकों को सतर्क करते हुए उन मरीजों को तुरंत आपातकालीन विभाग के आइसोलेशन वार्ड में रखने की हिदायत दी थी। लोगों के सामने कोरोना का मामला सार्वजनिक रूप से तब सामने आया था, जब 30 दिसम्बर को एक व्यक्ति ने एक ऑनलाइन चैट में वायरस संक्रमण को अत्यधिक भयावह बताते हुए डा. वेनलियांग से जानना चाहा था कि क्या वुहान में 2002 की सार्स नामक खतरनाक बीमारी की वापसी हो रही है? उल्लेखनीय है कि उस दौरान सार्स के कहर से 774 लोगों की मौत हुई थी। जैसे ही वुहान के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को डा. वेनलियांग के इस चैट की भनक लगी, जिसमें उन्होंने इस संक्रमण को सार्स जैसा ही खतरनाक माना था, उन्हें तुरंत हिरासत में लेते हुए उनसे पूछा गया कि उन्होंने इस सूचना को सार्वजनिक रूप से शेयर क्यों किया? तीन जनवरी को वहां की पुलिस ने डा. वेनलियांग से जबरन यह लिखवा लिया कि उनकी चेतावनी गैरकानूनी व्यवहार के दायरे में आती है और उन्होंने सोशल मीडिया की व्यवस्था को बिगाड़ा है। अगर डा. वेनलियांग पर शिकंजा कसने और कोरोना संक्रमण के मामलों को दुनिया की नजरों से छिपाने के बजाय चीन सरकार उसी समय कोरोना से निपटने के लिए व्यापक प्रबंध करती तो संभवतः कोरोना का इतना व्यापक और घातक असर देखने को नहीं मिलता। यह सरासर चीन सरकार द्वारा शुरूआत से ही इस मामले में लापरवाही बरतने का नतीजा है कि कोरोना से अब तक डेढ़ हजार से भी ज्यादा लोग मौत के मुंह में समा चुके हैं।
चीन में कोरोना वायरस की सबसे पहले चेतावनी देने वाले डा. ली वेनलियांग की भी पिछले दिनों वुहान में कोरोना वायरस की चपेट में आने के बाद मौत हो चुकी है, जिसके बाद से वहां के नागरिक सोशल मीडिया पर वेनलियांग को नायक करार देते हुए अपनी सरकार के प्रति खुलकर नाराजगी जाहिर कर रहे हैं और अधिकारियों पर अयोग्यता का आरोप लगा रहे हैं। हालांकि कम्युनिस्ट शासन वाले चीन में सरकार के प्रति ऐसा विरोध प्रायः बहुत ही कम देखने को मिलता है और यही कारण है कि वहां की सरकार को अब डा. वेनलियांग की मौत के मामले की जांच का आदेश देने पर विवश होना पड़ा है।
माना जा रहा है कि कोरोना वायरस का पहला मामला वुहान में दिसम्बर माह के शुरू में ही सामने आ गया था लेकिन प्रशासन ने उसे नजरअंदाज किया और कोरोना संक्रमण को लेकर हालात बेकाबू होने पर हड़कंप मचने के बाद ही चीन सरकार इस बीमारी को लेकर 20 जनवरी को हरकत में आई। उन सात हफ्तों के दौरान अधिकारियों द्वारा डॉक्टरों तथा अन्य लोगों के वायरस के बारे में बात करने पर पाबंदी लगा दी गई थी। सरकारी बयानों, अधिकारियों, डॉक्टरों, स्थानीय लोगों और मीडिया रिपोर्ट से स्पष्ट है कि कोरोना वायरस के पहले मामले के सामने आने और वुहान शहर को सील करने के बीच वुहान प्रशासन द्वारा करीब सात हफ्ते का समय बर्बाद कर दिया गया और यही सबसे बड़ा कारण रहा कि कोरोना का आतंक चीन में इस कदर फैल गया, जिसके बारे में अभी दावे के साथ कोई यह बताने की स्थिति में नहीं है कि इस आतंक से चीन को कब तक मुक्ति मिलेगी?

हिंदू मंदिर का मुस्लिम पुजारी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कर्नाटक से चमत्कारी खबर आई है। एक हिंदू मंदिर में एक मुसलमान पुजारी को नियुक्त किया गया है। यह मठ लिंगायत संप्रदाय का है। कर्नाटक में दलितों के बाद लिंगायतों की संख्या सबसे ज्यादा है। कर्नाटक के कई बड़े नेता जैसे बी.डी. जत्ती, निजलिंगप्पा, बोम्मई, येदियुरप्पा आदि लिंगायत ही हैं। इस संप्रदाय की स्थापना लगभग आठ सौ साल पहले बीजापुर के बसवन्ना ने की थी। वे स्वयं जन्म से ब्राह्मण थे लेकिन उन्होंने जातिवाद पर कड़ा प्रहार किया। उनके सिद्धांत ऐसे हैं कि कोई भी जाति, कोई भी मजहब, कोई भी वंश, कोई भी देश का आदमी उन्हें मान सकता है। जैसे भगवान बस एक ही है। दो-चार नहीं। वही इस सृष्टि का जन्मदाता, रक्षक और विसर्जक है। कोई भी मनुष्य भगवान नहीं कहला सकता। ईश्वर निराकार है। जरुरतमंद मनुष्य ही ईश्वर का रुप है। उसकी सेवा ही ईश्वर की आराधना है। जाति, मजहब, वंश आदि ईश्वरकृत नहीं, मनुष्यकृत हैं। अहंकार, वासना, क्रोध को त्यागो। हिंसा मत करो। जो भी ईश्वर को मानते हैं, वे सब एक हैं। यही लिंगायत धर्म है। लिंगायतों के इन सिद्धांतों और इस्लाम की मूल मान्यताओं में कितनी समानता है। सिर्फ एक असमानता मुझे दिखाई पड़ी। लिंगायत लोग मांस नहीं खाते। मैं अपने मुसलमान दोस्तों से पूछता हूं कि कुरान शरीफ में कहीं क्या यह लिखा है कि जो मांस नहीं खाएगा, वह आदमी घटिया मुसलमान माना जाएगा ? इसीलिए जब असुति गांव के 33 वर्षीय मुसलमान युवक शरीफ रहमानसाब मुल्ला ने लिंगायत मंदिर का मुख्य पुजारी बनना स्वीकार किया तो मुझे घोर आश्चर्य हुआ लेकिन मैंने इस क्रांतिकारी घटना पर विशेष ध्यान दिया। शरीफ के पिता रहमानसाब मुल्ला ने इस मठ के निर्माण के लिए अपनी दो एकड़ जमीन भी दान दी है। शरीफ बचपन से ही बसवन्ना के वचनों का पाठ करते रहे हैं और अब उन्होंने लिंगायतों के सारे विधि-विधानों को सीख लिया है। भारत के गांवों में अभी भी दलितों और मुसलमानों का छुआ हुआ पानी भी नहीं पिया जाता लेकिन मठाधीश शरीफ मुल्ला सबके लिए आदरणीय बन गए हैं। दीक्षा लेते समय उनके फोटो में उनका मुंडा हुआ सिर, मस्तक पर तिलक और अर्धनग्न शरीर पर धोती देखकर विश्वास ही नहीं होता कि ये शरीफ मुल्ला हैं।

शहजादे की आँखें आई, गांव में धुआं मत करो !
डॉ. अरविन्द प्रेमचंद जैन
राजकुमार को आँखों का रोग हो गया तो राजा ने मुनादी कराई की राजधानी में धुआं नहीं होना चाहिए कारण राजकुमार को आखें आयी हैं, इस पर प्रधान मंत्री ने राजा को सलाह दी की एक के पीछे कितने जन परेशान होंगे, क्यों न राजकुमार को राजधानी से बाहर भेज दिया जाय, तो राजा ने कहा बहुत उपयुक्त सलाह हैं।
इसी प्रकार एक राजा को अपनी राजधानी और राज्य में पैदल घूमने की आदत थी, जब वह नंगे पाँव घूमने निकले तो उनको पाँव में घाव हुए तो उन्होंने हुकुम जारी किया की पूरे राज्य में और राजधानी में रबर की सड़कें बनवायी जावें तब हमारे देश जैसे चतुर प्रधान मंत्री बोले महाराज आप अपने पैरो में कपड़ा क्यों नहीं लपेट लेते हो, तब राजा को प्रधान मंत्री की अक्ल पर बहुत प्रसन्नता हुई। उसके बाद ही जूतों का चलन शुरू हुआ होगा।
इसी प्रकार हमारे देश में अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प साहब क्या आ रहे मानो अहमदाबाद शहर पर वज्राघात टूट पड़ा हो। यानी ट्रम्प को हमारे चतुर प्रधानमंत्री यह बताने और समझाने का प्रयास कर रहे हैं की हमारा देश अमेरिका जैसा ही विकसित हैं। जब जैसा विकसित हैं तो उसको दिखाना चाहिए या छुपाना चाहिए !।
चीन की दीवार बनाई जा रही हैं, एक सप्ताह पहले से पूरा मार्ग आवागमन के लिए बंद, पान की दुकानें बंद, शहर में कुत्ता नहीं मिलना चाहिए, ना ही नील गाय। यानी राजा के लिए राजधानी दुल्हन जैसे सज़रही हैं जैसे उससे शादी होने वाली हो। यह बहुत जायज़ बात हैं की बहुत शक्तिशाली और सम्पन्नतम शासक का आना बहुत महत्व रखता हैं, उसे भारत की जानकारी पहले से हैं, क्या वे गूगल से भारत की नंगी तस्वीर नहीं देख सकते हैं। बड़ा आदमी यदि हमारी गरीबी देखलेगा तो वह हमें कुछ उपकृत कर सकेगा, इसके लिए कितनी सुरक्षा। पता नहीं हमारे देश में भगवानों के लिए इतनी सुरक्षा की जरुरत नहीं पड़ती पर चलित भगवान जैसे राष्ट्रपति प्रधान मंत्री मुख्य मंत्री यहाँ तक की कलेक्टर आदि से मिलने हफ़्तों लग जाते हैं उसके बाद भी दर्शन नहीं होते जबकि महाकाल के दर्शन सुगम और सरल हैं।
इसके लिए एक सुझाव यह हैं की पहली बात उन्हें सड़क मार्ग से न ले जाय जाय, कारण उनकी कार कौन सी हैं किसी को नहीं पता और दूसरी बात उनकी कार की खिड़की तो खुली नहीं रहना हैं, सड़क सुनसान रहना हैं, सेकंडों में वे पार हो जायेंगे, इसके लिए जरूरत समझे तो कार के शीशों में रंगीन फिल्म लगा दे या उन्हें बच्चों वाला रंगीन चश्मा पहनावा दे जिससे सावन के —को हरा हरा दिखाई देगा। और इसके अलावा उन्हें हवाई अड्डे से सीधे स्टेडियम ले जाया जाय जैसे अमेरिका में वो सड़क से नहीं आये थे और न हमारे प्रधान सेवक भी सड़क मार्ग से स्टेडियम पहुंचे थे। अच्छा हुआ ट्रम्प साहब अपने साथ अपना खानसामा, और खाना ला रहे हैं, कारण हमारे देश का अन्न, पानी, जलवायु बहुत प्रदूषित हैं, कही बीमार न पड़ जाए, कारण अमेरिका में मलेरिया जैसी बीमारी का इलाज़ नहीं होता।
एक नन्ही सी जान के लिए कितनी व्यवस्था, पता नहीं वे या तो हाड मांस के नहीं बने हैं जैसे हम लोग या अमूल बटर के कहीं पिघल न जाएँ। विचार करे झूठी शान बघारने कितना अपव्यय क्या मिलना हैं। मेरा अनुरोध हैं ऐसा स्वागत हर राजधानी और शहरों में किया जाय जिससे शहरों की गरीबी दूर हो जाएँगी, जनता से कुछ नहीं होना हैं, उनका जन्म तो मरने की लिया होता हैं। नेता अजर अमर जो होते हैं।
राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार
मरना सबको एक दिन अपनी अपनी वार

”देश बेचू बजट“

रघु ठाकुर

केन्द्र सरकार का वर्ष 2020 का बजट ऐसे समय आया है, जबकि एक तरफ सी.ए.ए. को लेकर शाहीन बाग में हिंसा और गोलियों की धमक तो दूसरी तरफ दिल्ली विधानसभा चुनाव के शोर के बीच बजट की चर्चा लगभग दबकर रह गई। और जिससे उसकी ज्यादा चर्चा नहीं हो सकी। वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने 2 घंटे 40 मिनिट तक बजट भाषण पढ़ा और यहाँ तक की बीच में वह कुछ अस्वस्थ भी हुई, अच्छा हुआ कि गडकरी जी की भेजी गई चॉकलेट से वे संभल गई परन्तु इससे बजट नहीं संभलता। यह भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है कि इस बार के बजट के प्रति आम लोगों में कोई दिलचस्पी नज़र नहीं आई। ऐसा लगा कि, लोग आश्वस्त थे कि बजट से उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा। आमजन की आकांक्षाओं के अनुरूप बजट लगभग निराकार बजट रहा। बजट भाषण का दो तिहाई हिस्सा तो केवल शेर-शायरी और प्रस्तावना के पाठ में चला गया, शेष में भी आमजन के लिए लगभग कुछ नहीं है। इस बार बजट पर जे.एन.यू. की बौद्धिक लावी की तरफ से भी कोई तीखी या विशेष प्रतिक्रिया नहीं आई। यह जे.एन.यू. की एकजुटता की वजह से है, या हताशा की वजह से, यह कहना कठिन है। तथ्य केवल यह है कि, श्रीमती निर्मला सीतारमण भी जे.एन.यू. की प्रोडक्ट है, और शायद इसी योग्यता की वजह से प्रतिपक्ष के आरोपों को खंडित करने के लिए उन्हें वित्त मंत्री पद से नवाजा गया है। बजट में महँगाई को रोकने के लिए उपाय तो दूर की बात है महँगाई की चर्चा तक नहीं हुई, जबकि महँगाई का चक्र बराबर बढ़ता चला जा रहा है। डॉ. लोहिया कहते थे कि, हमारे देश में आमदनी बढ़ती है गधे की चाल से, और महँगाई दौड़ती है घोड़े की चाल से। डॉ. लोहिया द्वारा 60 साल पहले कहा गया यह कथन आज भी सत्य नज़र आता है। महँगाई के प्रति तो एक प्रकार से देश भी तटस्थ जैसे हो गया है। जो मानने लगा है कि सरकारें महँगाई बढ़ाने को होती है, तथा इसका इलाज संभव नहीं है।

किसानों के लिए भी कोई योजना इस बजट में नहीं है न दाम तय करने की नीति और न ही विचोलियों से उन्हें बचाने की नीति। दोनों पर ही यह बजट खामोश है। किसानों के लिए बस एक आश्वासन का कोरा लिफाफा भर है। जिसमें लिखा गया है कि, 2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुना करने का प्रयास किया जायेगा। वैसे यह बात सरकार पिछले 2 वर्षें से कहती आ रही है, और अब तो हद हो गई कि बजट एक वर्ष का और वायदा है 3 वर्ष का। शायद इसलिए कि 2022 इस सरकार का चौथा वर्ष होगा इसके बाद चुनावी वर्ष आ जाएगा, तब कोई नया पुलवामा या शाहीन बाग जैसे मुद्दे फिर पैदा किये जाएंगे, और जिससे सीधे थोक बंद वोटो की फसल काट ली जायेगी। किसान को मिलने वाले मूल्य और उपभोक्ता के द्वारा क्रय मूल्य के बीच की खाई को पाटने की कोई चर्चा इस बजट में नहीं है। जिस प्याज को पैदा कर किसान 2-3 रूपये के भाव में उसे बेच देता है वही प्याज कुछ समय पश्चात्् बाजार में 150 रूपये किलो तक बिकती है, इस पर बजट भी मौन है, सरकार भी मौन है, और प्रतिपक्ष भी मौन है। किसानों की आय दुगनी कैसे होगी इसके लिए क्या उपाय किए जायेंगे, इस पर भी सरकार मौन है।

कर्मचारी और मध्य वर्ग के लिए आयकर की छूट के नाम पर एक जाल डाला गया है। पहली बार सरकार ने आयकर की छूट पर दो समान्तर स्लैब तैयार किए है, एक में वे पुराने लगभग 100 कर छूट के मुद्दे है, जिन्हें दशकों से फिंज्र वेनीफिट के नाम से दिया जा रहा है, इसके अन्य विकल्प के प्रस्ताव के रूप में आयकर छूट की सीमा 2.5 से बढ़कर 5 लाख करने का प्रस्ताव है। अब यह कर दाता को चुनना है कि, वह पुरानी छूट चाहते है, या नई छूट। अगर पुरानी छूट चाहेंगे तो ढाई लाख रूपये आय के बाद आयकर लगेगा और पुरानी छूट नहीं चाहिए तो 5 लाख रूपये तक की राशि आयकर मुक्त होगी। याने कुल मिलाकर स्थिति जस की तस है। अगर रियायतों को छोड़ते है तो रियायतों की राशि 5 लाख तक की आय के कर के लगभग बराबर हो जाती है, और 5 लाख रूपये की आयकर छूट का विकल्प चुनते है, तो फिर रियायतों को छोड़ना होगा। सरकार ने आम मध्यवर्ग कर्मचारियों के लिए विकल्प दे दिया है कि चाहे बायीं या दायीं जेब कटाओं पर जेब कटानी होगी।

सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को बेचने के निर्णय को और अधिक स्पष्ट कर दिया है। जीवन बीमा निगम जो लगभग 5 दशकों से आम आदमी के लिए जीवन की सुरक्षा और भविष्य के लिए जमा की सेवाएं दे रहा था, अब इस संस्था को खुले बाजार में बेचने का ऐलान सरकार ने संसद में कर दिया है, इसमें न केवल देशी बल्कि विदेशी पूँजी निवेश भी हो सकेगा और जो विदेशी कम्पनियां बीमा करने आएगी वे जब आम और गरीब आदमी का पैसा लेकर भागेगी तब इन गरीबों की पूँजी भी लुट जाएगी। कृषि के क्षेत्र में पिछले वर्ष के अनुभव हमारे सामने है। छ.ग. में कृषि बीमा के लिए देशी कम्पनी आई थी जिसमें अंबानी शामिल थे, किसानों से प्रीमियम का पैसा ले लिया गया परन्तु जब किसान पर विपदा पड़ती है तो उसे नियमानुसार वापिस नहीं किया गया। यहाँ तक कि, बस्तर के आदिवासी जिनकी गरीबी व शोषण को सरकारें आए दिन बेचती है, उनका भी पैसा लेकर कम्पनियां चली गई और अब हालात यह है कि, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव व अंबानी तो दूर उनके कर्मचारी भी नहीं आते। वे जानते है कि देश की सरकारे निर्वाचित लोग नहीं चला रहे है बल्कि उनके मालिक व उनका नाम चला रहे है। वैसे भी अंबानी बन्धुओं पर सभी सरकारें मेहरबान है, चाहे वह केन्द्र की भाजपा सरकार हो या म.प्र. की कमलनाथ की कांग्रेस सरकार हो। अगर केन्द्र के इशारे पर उन्हें पब्लिक सेक्टर को छोड़कर बगैर योग्यता के राफेल का काम मिल जाता है तो म.प्र. भी पीछे नहीं है, और उनके 450 करोड़ रूपया के बकाया चुकाने के लिए किस्त बाँध देता है। अंबानी की तिजोरियों से सभी सरकारें उपकृत है, चाहे वह भाजपा हो या कांग्रेस। आश्चर्य की बात है कि, पूँजीपतियों को सैल्यूट करने पर हिन्दू या मुसलमान दोनों शांत रहते है, और दोनों को गुस्सा नहीं आता। एयर इंडिया जो सरकारी विमान कम्पनी है को बेचा जा रहा है, और देश के पुराने वित्तमंत्री एवं वर्तमान में रेल मंत्री श्री पीयुष गोयल बेशर्मी से बयान देते है कि अगर मैं मंत्री नहीं होता तो स्वत: एयर इंडिया की बोली लगाता। यह कितना विचित्र है, कि जेट एयर वेज जो निजी विमान कम्पनी जब घाटे में जाती है, तो भारत सरकार अपनी जनता के पैसे से उसे बचाने के नाम पर दस हज़ार करोड़ रूपये की राशि या सुविधाएं देती है, और उसे सरकार के अधीन लाने की पहल करती हैं, याने खेल साफ है कि निजी उद्योगपतियों के द्वारा दूध चूस कर अधमरी गाय को जनता के पैसे से सरकार पालेगी और दूधारू गाय को जनता के अधिकार से छीनकर पूँजीपतियों को सौंप देगी।

रेलवे का निजीकरण अघोषित रूप से घोषित कर दिया गया है। 150 तेजस गाड़ियां चलायी जाएगी और रेलवे के द्वारा चलायी जा रही एक्सप्रेस और सुपरफास्ट गाड़ियों का वह स्थान ले लेगी। जिनका किराया वर्तमान किराए से देढ़ से दो गुना होगा। तेजस गाड़ियों को निकालने के लिए शताब्दी जैसी महत्वाकांक्षी गाड़ियों को रोका जाएगा। बम्बई से अहमदाबाद के बीच गाड़ी को रोक कर तेजस को रास्ता दिया जाएगा और कहा जाएगा कि तेजस की रतार कितनी अच्छी है। 350 स्टेशनों को प्रबंधन के लिए निजी हाथों में देना है, और इसका परिणाम यह होगा कि आम आदमी के लिए रेलवे स्टेशन प्रधानमंत्री निवास जैसे सुरक्षित बन जाएंगे। भोपाल के हबीबगंज स्टेशन पर 4 पहिया वाहन का पार्किंग शुल्क 24 घंटे का 400 रूपये होता है, आधारभूत ढांचा वो चाहे रेलवे का हो या हवाई अड्डा का उसे सरकार बनाएगी पर उस पर निजी विमान और रेल गाड़ियां दौड़ेगी। क्या सरकार के पास इसका कोई उत्तर है? कि जब विमान और रेल आपको चलाना है, तो हवाई अड्डा के विकास, रेलवे की विद्युतीकरण ढांचे पर हज़ारों करोड़ों रूपये सरकार खर्च क्यों कर रही हैं? उनके निर्माण के टेन्डर निजी उद्योगपति क्यों नहीं लेते? क्योंकि उसमें पूँजी लगाना है, और विमानों व रेलों से पूँजी कमाना है।

शिक्षा के लिए भी सरकार के पास बस एक ही कल्पना है कि धीरे-धीरे उसे बाजार की वस्तु बनाओ और खरीददार की क्षमता पर ले जाओ। आयुष्मान योजना से गरीब को कितना लाभ पहुँचा है, और निजी अस्पतालों ने कितना पैसा कमाया है, इसका आंकड़ा चौकाने वाला होगा। सच्चाई तो यह है कि आयुष्मान योजना से बड़ी संख्या में निजी अस्पताल मालामाल हो रहे, बल्कि चिकित्सा खर्च के नाम के भ्रष्टाचार का भारी विकास हो गया है। निजी अस्पताल मनमाने बिल बनाकर लूट रहे हैं। कार्पेरेट टैक्स में बड़ी कटौती की गई है। खाद पर दी जाने वाली रियायत को सीमित किया जा रहा है, याने सुविधा को क्रमश: खत्म करने की तैयारी हैं। इससे जब पैदावार कम होगी तो जाहिर है कि विदेशों से खाधान का आयात होगा और डब्लू.टी.ओ. के समझौते का पालन होगा। ऑनलाईन शिक्षा के नाम पर सरकार की शिक्षा की जवाबदारी क्रमश: समाप्त हो जाएगी और लाखों शिक्षक बेरोजगार हो जाएंगे। नये उद्योग को टैक्स में बड़ी छूट दी गई है। परन्तु यह भुला दिया गया है कि देश के 22 करोड़ छोटे किसान मजदूर, 32 करोड़ बेरोजगार अर्ध बेरोजगार, उद्यमी नहीं बन सकते। इनके पास 5 करोड़ तो दूर 5 लाख की पूँजी नहीं है, निजी मेडीकल कॉलेज और विश्वविद्यालय पहले से थे अब पी.पी.पी. मॉडल पर मेडीकल कॉलेज और विश्वविद्यालय खुल गये। याने शिक्षा, चिकित्सा के लिए सम्पूर्णत: निजी हाथों में देने का मार्ग प्रशस्त कर दिया गया है। शिक्षा के क्षेत्र में भी विदेशी पूँजी को रास्ता दे दिया गया है।

विदेशी कम्पनियों को डेटा सेंटर बनाने की मंजूरी दी गई है, पर इसके सामाजिक प्रभाव क्या होंगे इस पर कोई विचार नहीं किया गया। कम्पनियों के अंशधारकों को जमीनों पर टैक्स लगाकर देशी पूँजी को पीछे धकेल दिया गया है। तथा अंश पूँजी से चलने वाले उद्योग की पूँजी को घटाकर बड़ी-बड़ी राक्षसी पूँजी वाले कारखानों के मुकाबले खड़ा करने की तैयारी है। जिसके परिणामस्वरूप अंश पूँजी से बने हुए कारखाने भी क्रमश: समाप्त होंगे, और शेयर को खरीद कर बचत और आमदनी को बढ़ाने वाले आम आदमी आंशिक पूँजी लगाना बंद करेंगे। सरकारी कारखानों के हिस्सों के बेचने को सरकार की आय बताया जा रहा है। संपत्ति को बेचना और उसे आय मानना इससे बद्तर कल्पना क्या हो सकती? आई.डी.बी.आई. बैंक की 46 प्रतिशत हिस्सेदारी को सरकार बेचेगी। बिजली के प्रीपेड स्पाट मीटर बदलने पर बड़ी राशि खर्च होगी, बिजली मिले न मिले परन्तु बिल सुरक्षित मिलता रहेगा। सेना का बजट बढ़ गया परन्तु इसका अधिकांश हिस्सा केवल हथियारों की खरीद पर खर्च हो रहा है, जबकि सी.ए.जी. की रिपोर्ट के अनुसार सियाचिन में तैनात सैनिकों को न उपयुक्त खाना मिल रहा, न कपड़े, न उपकरण इस कारण से सैनिकों का स्वास्थ बिगड़ रहा है।

कुल मिलाकर यह बजट देश बेचू बजट है, याने राष्ट्रीय संपत्ति को बेचकर बनने वाला बजट। मैंने तो कहा कि वित्त मंत्री जी ने इतना लम्बा भाषण पढ़ने की कसरत बैठकर की उनका पूरा बजट तो केवल कविता में समाहित हो सकता था।

कुल तो पहले बेच दिया है, बचा खुचा अब बेचेंगे।

सारे कुछ का निजीकरण कर अब चैन से घूमेंगे।

देश की संजीवनी एक दवाई, हर जगह लाओ एफ.डी.आई.।

जिनने हमें चुनाव जिताया, वहीं हमारे माई बाप।

धर्म हमारा मालिक सेवा, जिसने हमें यहाँ पहुंचाया।

मरे किसान व बेरोजगार, अपने ऊपर पूँजी की छाया।

नहीं किसी से लेना देना, अपना तो बस एक ही कहना।

चाहे जो होने दो, हमें तो बस सत्ता में रहना।

अपराध और राजनीति 

सिध्दार्थ शंकर

हमारे सभी राजनीतिक दलों ने ऐसी न जाने कितनी शख्सियतों से गलबहियां की हैं जिन पर हत्या से लेकर बलात्कार तक के गंभीर मामले दर्ज हैं। हिंदुस्तान की सियासत आज जिस ढर्रे पर चल रही है वह भ्रष्टाचार और अपराध से लबालब है। चुनाव में बढ़ता धनबल, बाहुबल और अपराधीकरण लोकतंत्र को अंदर ही अंदर खाए जा रहा है। मगर राजनीतिक पार्टियों को इससे कोई लेना-देना नहीं। जो काम पार्टियों और नेताओं का है, उसे सुप्रीम कोर्ट को करना पड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट तक राजनीति के अपराधीकरण पर कई बार चिंता व्यक्त कर चुका है और इस बारे में संसद को कानून बनाने को कह चुका है। एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में राजनीतिक पार्टियों को अपने उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड जनता के साथ साझा करने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ काफी बड़ा कदम माना जा रहा है। लेकिन इसके लागू होने में संशय है। संशय इसलिए क्योंकि आज तक राजनीतिक दलों का रवैया इस ओर उदासीन ही रहा है। हाल के दिल्ली चुनाव को ही लें, तो पता चलेगा कि कुल 672 प्रत्याशियों में से 20 प्रतिशत (133) के खिलाफ क्रिमिनल केस थे। हैरानी वाली बात यह है कि राजनीति सुधारने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी के 51 प्रतिशत उम्मीदवार दागी थे। भाजपा के 17, कांग्रेस के 13, बहुजन समाज पार्टी के 10 और एनसीपी के 2 उम्मीदवार दागी थे। मगर किसी को इस बात का पता तक नहीं चल सका। एक भी दल ने अपने उम्मीदवारों के दागी होने की बात जनता तक नहीं पहुंचाई। सब चुनाव जीतने में लगे रहे। असोसिएशन ऑफ डिमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) के अनुसार दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के 25 प्रतिशत प्रत्याशी और भाजपा के 20 प्रतिशत प्रत्याशियों ने अपने चुनावी हलफनामों में यह घोषणा की कि उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। कांग्रेस के भी 15 प्रतिशत प्रत्याशियों ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज होने की घोषणा की है। इस आलोक में सुप्रीम कोर्ट का फैसला और भी गंभीर हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आदेश में देश के राजनीतिक दलों से कहा है कि वे चुनाव मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों का क्रिमिनल रिकॉर्ड को जनता के सामने रखें। कोर्ट ने कहा कि वह प्रत्याशियों के आपराधिक रिकॉर्ड को साइट पर अपलोड करे। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने साथ ही आगाह किया है कि इस आदेश का पालन नहीं किया गया, तो अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है। राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बड़ा आदेश दिया। कोर्ट ने राजनीतिक दलों से कहा कि वे अपने प्रत्याशियों के आपराधिक रिकॉर्ड को अखबारों, बेवसाइट्स और सोशल साइट्स पर प्रकाशित करें। इसके साथ ही पार्टियों से सवाल किया कि आखिर उनकी ऐसी क्या मजबूरी है कि वह आपराधिक पृष्ठभूमि के प्रत्याशियों को टिकट देती हैं। यह सवाल चुभने वाला है, जिसका जवाब शायद ही किसी दल के पास हो। आज ऐसी परिपाटी बन चुकी है, जिसमें हर पार्टी चुनाव जिताऊ उम्मीदवार को टिकट देना पसंद करती है। वह दागी है या नहीं, इसकी फिक्र किसी को नहीं।15वीं लोकसभा में 543 सांसदों में से 162 पर गंभीर मामले दर्ज थे और 16वीं लोकसभा में इनकी संख्या और भी बढ़ गई। इसका एक बड़ा कारण जनप्रतिनिधित्व कानून का लचीला होना भी है। 2006 में चुनाव आयोग ने देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखा। उस पत्र में गया था कि यदि जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में जरूरी बदलाव नहीं किए गए तो वह दिन दूर नहीं जब देश की संसद और विधानसभाओं में दाऊद इब्राहीम और अबू सलेम जैसे लोग बैठेंगे। ‘हम्माम में सभी नंगे हैंÓ की तर्ज पर सभी राजनीतिक पार्टियों की गोद में ऐसे अनेक नेताओं की किलकारियां गूंजती हैं जो अपराध में गले तक डूबे हैं। अब तो ऐसा लगता है कि राजनीतिक दल स्वयं इस दलदल से नहीं उबरना चाहते तभी तो अधिकतर पार्टियों ने सितंबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले का विरोध किया था जिसमें कहा गया था कि यदि अदालत विधायिका के किसी सदस्य को दो साल या उससे अधिक की सजा सुनाती है, तो वह अपनी सदस्यता बरकरार नहीं रख सकता। इसी फैसले को बेअसर करने के लिए तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा संसद में विधेयक लाया गया था जो पास नहीं हो सका।नेताओं और अपराधियों की दिनोंदिन बढ़ती सांठगांठ चिंतित करने वाली है। वैसे सितंबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाताओं को नापसंदगी का हक देकर एक ठोस पहल की थी। हालांकि चुनाव सुधार के लिए तारकुंडे समिति, गोस्वामी समिति, वोहरा कमेटी जैसी अनेक समितियों ने अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपी हैं लेकिन निजी हितों के कारण किसी भी दल ने इन्हें लागू करने की जहमत नहीं उठाई। आज जरूरत व्यापक चुनाव सुधार की है जिससे राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण को रोका जा सके। इसके लिए पार्टियों को मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी।

 

अपराधी उम्मीदवारः अधूरा फैसला
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीति को अपराधियों से मुक्त करने का जो आदेश जारी किया है, उसका स्वागत है लेकिन वह अधूरा है। यह तो ठीक है कि सभी राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के अपराधों का विस्तार से ब्यौरा दें और नामजद करने के 48 घंटों में उसे प्रचारित करें या उम्मीदवारी का फार्म जमा करने के दो हफ्ते पहले बताएं। अदालत ने यह नहीं बताया कि वे उस ब्यौरे को कौनसे अखबारों और टीवी चैनलों पर प्रचारित करें। यह नियम तो पहले भी था लेकिन उम्मीदवारों ने ऐसे अखबार चुने, जिन्हें बहुत कम लोग पढ़ते हैं और ऐसे टीवी चैनल चुने, जिन्हें बहुत कम लोग देखते हैं। अखबारों में अपने अपराधों के विज्ञापन इतने छोटे और चैनलों पर ऐसे वक्त दिए जाते हैं, जबकि उनका कोई अर्थ नहीं होता। इस बार अदालत ने कहा है कि राजनीतिक दलों को यह भी विस्तार से बताना होगा कि अपराधी होने के बावजूद फलां उम्मीदवार को उसने क्यों चुना ? उसकी योग्यता क्या है और उसकी उपलब्धियां कितनी हैं ? यह शर्त निरर्थक है, क्योंकि भारत में किसी भी उम्मीदवार की एक मात्र योग्यता यह है कि वह 21 साल का हो। अदालत कहती है कि उसमें चुनाव जीतने की योग्यता है, यह तर्क नहीं माना जाएगा तो वह यह बताए कि पार्टियां और कौनसी योग्यताओं को देखे, अपने उम्मीदवार तय करते हुए ? चुनाव जीतने के लिए पैसा, जाति, संप्रदाय, झूठे वायदे, नफरत आदि अपने आप में योग्यता बन जाते हैं। यदि कोई पार्टी किसी उम्मीदवार की हवाई योग्यताओं या उपलब्धियों का फर्जी ब्यौरा दे दे तो चुनाव आयोग या अदालत क्या कर सकती है ? अदालत कहती है कि यह ब्यौरा निश्चित अवधि में कोई पार्टी न दे तो उस पर चुनाव आयोग मानहानि का मुकदमा दायर कर सकता है। अदालत ने यह नहीं बताया कि ऐसे मुकदमों का फैसला कितने दिनों, महिनों या वर्षों में आएगा ? अधर में लटके हुए चार करोड़ मुकदमों की तरह क्या यह चुनावी मुकदमा भी नहीं लटक जाएगा ? चुनाव आयोग यदि किसी उम्मीदवार या पार्टी का चुनाव चिन्ह जब्त कर ले तो कर ले, उससे वह उनका क्या बिगाड़ लेगा ? सारी पार्टियों का तर्क यह होगा कि मुकदमा तो आप किसी पर भी चला सकते हैं, अपराध का आरोप आप किसी पर भी लगा सकते हैं, लेकिन किसी मुकदमे या आरोप से यह सिद्ध थोड़े ही हो जाता है कि वह आदमी अपराधी है। उस उम्मीदवार को, जब तक उसका अपराध सिद्ध न हो जाए, कोई अदालत या कोई चुनाव आयोग चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकता। इस समय संसद के 43 प्रतिशत सदस्य ऐसे हैं, जिन पर अपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। मैं पूछता हूं कि पार्टियों ने ऐसे उम्मीदवारों का चुना ही क्यों ? यदि देश में लाखों लोगों को विचाराधीन कैदी (अंडरट्रायल प्रिजनर्स) की तरह बरसों जेलों में बंद रखा जा सकता है तो संगीन अपराधी नेताओं की उम्मीदवारों को रद्द क्यों नहीं किया जा सकता ? इसीलिए हमारे सारे राजनीतिक दलों ने सर्वोच्च न्यायालय के इस हुकुम का स्वागत किया है।

आप की जीत भाजपा के लिए चेतावनी
सुरेश हिंदुस्थानी
दिल्ली विधानसभा के लिए हुए मतदान के पश्चात हालांकि यह तय लगने लगा था कि दिल्ली में फिर से आम आदमी पार्टी की सरकार बनेगी। लेकिन चुनाव परिणामों ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को एक बार फिर से जो छप्पर फाड़ बहुमत दिया है, उसकी उम्मीद आम आदमी पार्टी के अलावा किसी को भी नहीं थी। यहां तक कि चैनलों ने जो सर्वे दिखाया, उसमें भी आम आदमी पार्टी की इतनी सफलता की आशा नहीं थी। आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल के प्रति दिल्ली की जनता का यह अपार जन समर्थन यही प्रदर्शित करता है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जड़ें बहुत गहरे तक समा चुकी हैं। केजरीवाल ने अपनी राजनीति को हर हृदय में विद्यमान कर दिया है।
भारत में प्रायः कहा जाता है कि जो जितनी जल्दी ऊपर उठता है, वह उतनी ही गति से नीचे की ओर भी जाता है, लेकिन केजरीवाल के बारे में उक्त पंक्ति एकदम फिट नहीं बैठ रही। हालांकि केजरीवाल की पार्टी को पिछले चुनाव की तुलना में पांच सीट कम मिली हैं, लेकिन इसके बाद भी उनकी पार्टी को बड़ी जीत मिली है। आम आदमी पार्टी की इस अप्रत्याशित जीत में मुफ्त की योजनाओं का बहुत बड़ा आधार है। दिल्ली में केजरीवाल की सरकार ने बिजली फ्री, शिक्षा फ्री, पानी फ्री देकर उसे वोटों में परिवर्तित करने में सफलता प्राप्त की। इससे यह भी संदेश जा रहा है भविष्य की राजनीति में इस प्रकार की फ्री की राजनीति सत्ता बना भी सकती है और बिगाड़ भी सकती है।
निश्चित रूप से यही कहा जा सकता है कि मुफ्त की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल कहीं न कहीं देश में बेरोजगारी को बढ़ाने का ही कार्य करेगी। वास्तव में होना यह चाहिए कि आम जनता के जीवन स्तर को ऊंचा उठाया जाए, उसे रोजगार प्रदान किया जाए, जिससे जनता को अपने व्यय खुद वहन करने की शक्ति मिले। मुफ्त सुविधाएं प्रदान करना एक प्रकार से समाज को निकम्मा बनाने की राह की निर्मिति करने वाला ही कहा जाएगा। सरकार कोई भी हो उसे आम जनता के जीवन स्तर उठाने का प्रयास करना चाहिए।
विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद अब इस बात में किसी भी प्रकार की आशंका नहीं होना चाहिए कि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल का जादू बरकरार है। मुद्दे चाहे कोई भी रहे हों, जनता ने आम आदमी पार्टी के मुद्दों पर अपना व्यापक समर्थन दिया है। वहीं भाजपा के लिए यह चुनाव एक चुनौती भी है और स्पष्ट रूप से एक गंभीर चेतावनी भी है। चेतावनी इस बात की है कि भाजपा राज्यों में प्रादेशिक नेतृत्व खड़ा करने में असफल साबित हुई है। भले ही वह राष्ट्रीय नेतृत्व के हिसाब से बहुत मजबूत होगी, लेकिन दिल्ली में उसका नेतृत्व कोई कमाल नहीं कर सका। अब भाजपा के लिए यह आत्ममंथन का विषय हो सकता है कि वह अपने प्रादेशिक नेतृत्व को कैसा स्वरूप प्रदान करना चाहता है।
इसी प्रकार हम कांग्रेस की बात करें तो दिल्ली में उसका आधार ही समाप्त होता जा रहा है। लोकसभा में दिल्ली की सभी सीटें हारने वाली कांग्रेस पार्टी विधानसभा में भी अपनी हार में पूरी तरह से संतुष्ट नजर आ रही है। उसे अपनी हार का गम नहीं है। वह अरविंद केजरीवाल की जीत को ऐसे देख रही है, जैसे उसने खुद विजय प्राप्त करली हो। दिल्ली के बारे में कांग्रेस की राजनीति को देखकर यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने अप्रत्यक्ष रूप से आम आदमी पार्टी को ही समर्थन दिया है। क्योंकि यह संभव ही नहीं है कि जिस कांग्रेस पार्टी ने तीन बार बहुमत की सरकार बनाई, वह पिछले दो चुनावों में शून्य में समाहित हो जाए। कांग्रेस की करारी हार के बाद हालांकि बगावती स्वर भी उठ रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चौपड़ा ने पराजय की नैतिक जिम्मेदारी लेकर अपने पद से इस्तीफा भी दे दिया है, लेकिन यह परिणाम कांग्रेस के लिए भी गहन चिंता का विषय है।एक प्रकार से कहा जाए तो अब भी दिल्ली कांग्रेस मुक्त ही है। हालांकि भाजपा ने पिछली बार से पांच सीटों की वृद्धि की है, जो व्यापक सफलता नहीं तो कुछ सुधार तो कहा जा सकता है। कांग्रेस भी दिल्ली विधानसभा चुनावों के परिणाम को भाजपा की पराजय के रूप में देखकर प्रसन्न हो रही है। उसे अपने गिरेबान में भी झांककर देखना चाहिए कि वह कितने पानी में है।
राजनीति में जय पराजय का कोई स्थायित्व नहीं होता। जो दल आज पराजय का सामना कर रहा है, कल उसकी विजय भी हो सकती है। आज केजरीवाल के नाम है तो कल किसी और के नाम भी हो सकता है। यह बात भी सही है कि पराजय एक सबक लेकर आती है। जीत कभी कभी अहंकारी बना देती है, लेकिन पराजय बहुत कुछ सिखा देती है। दिल्ली में भाजपा पराजय से कुछ सीखेगी या नहीं, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन कांग्रेस को अपनी पराजय का भान नहीं हो रहा। भाजपा को अब यह जान लेना चाहिए कि मोदी और अमित शाह के नाम के सहारे राज्यों के चुनाव नहीं जीते जा सकते, अब उसे राज्यों में नए अध्याय का प्रारंभ करना होगा।

नए प्रधानमंत्री की दस्तक
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
दिल्ली के चुनाव में भाजपा की हार देश में नयी राजनीति की शुरुआत कर सकती है। मुझे 2013 के गुजरात विधानसभा के चुनाव की याद आ रही है। जब उसके चुनाव परिणाम घोषित हो रहे थे तो मुझे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पांच-छह टीवी चैनलों ने घेर लिया। वे पूछने लगे कि मोदी की 5-10 सीटें कम हो रही हैं, फिर भी आप कह रहे हैं कि गुजरात का यह मुख्यमंत्री अब प्रधानमंत्री के द्वार पर दस्तक देगा। यही बात आज मैं अरविंद केजरीवाल के बारे में कहूं, ऐसा मेरा मन कहता है। आप पार्टी को पिछले चुनाव के मुकाबले इस चुनाव में पाच-छह सीटें कम मिलें तो भी उसका प्रचंड बहुमत है। यह प्रचंड बहुमत याने 70 में से 60 सीटों से भी ज्यादा तब है, जबकि भाजपा और कांग्रेस ने दिल्ली प्रदेश के इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, अपनी पूरी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी थी। कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने चुनाव-प्रचार के दौरान अपना स्तर जितना नीचे गिराया, उतना गिरता हुआ स्तर मैंने 65-70 साल में कभी नहीं देखा। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को मैं दाद दूंगा कि उन्होंने अपना स्तर ऊंचा ही रखा। अपनी मर्यादा गिरने नहीं दी। भाजपा ने अपने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों से लेकर सैकड़ों विधायकों और सांसदों को झोंक दिया। दिल्ली की जनता के आगे 2 रु. किलो आटे तक के लालीपॉप उसने लटकाए लेकिन दिल्ली के लोग हैं कि फिसले ही नहीं। भाजपा यहीं तक नहीं रुकी। उसने शाहीन बाग को अपना रथ बना लिया। उसने खुद को पाकिस्तान की खूंटी पर लटका लिया। उसने अरविंद केजरीवाल को हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की धुंध में फंसाने की भी कोशिश की लेकिन गुरु गुड़ रह गए और चेला शक्कर बन गया। कर्म की राजनीति ने धर्म की राजनीति को पछाड़ दिया। अरविंद इस हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के धुंआकरण से भी बच निकले। अब वे तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बन जाएंगे लेकिन अगले आम चुनाव में वे चाहे तो अपनी वाराणसी की हार का हिसाब मोदी से चुकता कर सकते हैं। इस दिल्ली के चुनाव को वैसा प्रचार चैनलों और अखबारों में मिला है, जैसा किसी भी प्रादेशिक चुनाव को नहीं मिला है। यह लगभग राष्ट्रीय चुनाव बन गया है। राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को इस चुनाव ने दरी के नीचे सरका दिया है। अरविंद केजरीवाल के वचन और कर्म में भी अब नौसिखियापन नहीं रहा। एक जिम्मेदार राष्ट्रीय नेता की गंभीरता उनमें दिखाई पड़ने लगी है। वे अपने शुरुआती साथियों को फिर से अपने साथ जोड़ें, राष्ट्रीय मुद्दों पर अधिकारी विद्वानों और विशेषज्ञों का मार्गदर्शन लें और अपनी रचनात्मक छवि बनाए रखें तो वे देश को निराशा और आर्थिक संकट के गर्त्त में गिरने से बचा सकते हैं। दिल्ली में जो होता है, उसे पूरा देश देखता है।

महापुरुषों के विरोध पर केंद्रित राजनीति ?
तनवीर जाफ़री
‘सबका साथ सबका विकास’, गुजरात से शुरू हुआ यह नारा 2013-14 के दौरान चुनाव प्रचार का सबसे प्रमुख नारा बनकर उभरा था। विदेशी मीडिया ने भी इस नारे पर कई सकारात्मक टिप्पणियां कीं। और इस बात के लिए प्रशंसा की गयी कि यदि वास्तव में भारत सरकार ‘सबका साथ सबका विकास’ के नज़रिये के तहत काम करती है तो यह समग्र भारत वासियों के हित में ही होगा। परन्तु आज यही विकास ‘शब्द ‘ एक मज़ाक़ के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है। लोग व्यंगात्मक अंदाज़ में ‘विकास ‘ को ढूंढते नज़र आ रहे हैं। कोई पूछता है कि विकास पैदा हुआ भी या नहीं तो कोई पूछ रहा है कि ‘विकास के पापा कहाँ चले गए’। वैसे भी औद्योगिक उत्पादन,अर्थ व्यवस्था,जी डी पी,विकास दर व रोज़गार संबंधी तमाम आंकड़े भी यही बता रहे हैं कि भारत में विकास नाम की चीज़ कहीं ढूंढने पर भी दिखाई नहीं दे रही है। न स्मार्ट सिटी हैं,न आदर्श गांव हैं न नौकरी न नए उद्योग। हाँ सरकारी नवरत्न कंपनियों को निजी हाथों में सौंपने के दृश्य ज़रूर दिखाई दे रहे हैं। रोज़गार के नाम पर देश के शिक्षित युवाओं को पकौड़े बेचने जैसी ‘बेशक़ीमती’ सलाह ज़रूर दी जा चुकी है। देश में साम्प्रदायिक व जातिगत आधार पर तनाव ज़रूर बढ़े हैं। सबका साथ सबका विकास करने के बजाए सब के ‘मतों का ध्रुवीकरण’ ज़रूर कराया जा रहा है। नोटबंदी से लेकर एन आर सी जैसे प्रयोगों तक में अब तक सैकड़ों देशवासी अकारण ही अपनी जानें गँवा चुके हैं। अनिश्चितता के इस वातावरण में एक सवाल यह भी पूछा जाने लगा है कि जो सरकार,दल अथवा विचारधारा देश के महापुरुषों को समान रूप से सम्मान नहीं दे सकती,सम्मान देना तो दूर की बात है जो विचारधारा अपनी ‘राजनैतिक दुकानदारी’ चलाने के मुख्य हथकंडे के रूप में महापुरुषों की आलोचना,उनकी निंन्दा व बुराई करने को ही अपना ‘शस्त्र’ समझती हो उस से देश के लोगों को साथ लेकर चलने की उम्मीद करना आख़िर कितना मुनासिब है?
सकारात्मक राजनीति का तक़ाज़ा तो यही है कि आप अपने राजनैतिक आदर्श महापुरुषों की चर्चा करें,उनके विचारों को सार्वजनिक करें और उन्हें लोकप्रिय बनाने की कोशिश करें। परन्तु धर्मनिरपेक्ष भारत सहित पूरे विश्व में चूंकि अतिवादी विचारों की स्वीकार्यता की संभावना कम है इसीलिए अपने अतिवादी विचारकों का सार्वजनिक रूप से महिमामण्डन करने के बजाए धर्मनिरपेक्षता के ध्वजावाहक महापुरुषों को नीचा दिखाने व उनपर झूठे आरोप मढ़कर उनपर हमलावर होने के लगतार प्रयास किये जाते रहे हैं। देश और दुनिया के तमाम इतिहासकारों ने यहाँ तक की आलोचकों व विरोधियों ने भी जिन महापुरुषों को सम्मान की दृष्टि से देखा,राष्ट्र का गौरव समझे जाने वाले उन्हीं महापुरुषों की आलोचना या निंदा करने में पूरी ताक़त झोंकी जा रही है। सम्राटअकबर,टीपू सुल्तान,महात्मा गांधी,पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसी अनेक शख़्सियतें जिनकी नीयत व नीतियों की दुनिया क़ाएल है,जिनकी धर्मनिरपेक्ष नीतियों की पूरी दुनिया इज़्ज़त करती है वही महापुरुष इन अतिवादी दक्षिणपंथियों के निशाने पर रहते हैं। गुजरात में नर्मदा घाटी के मध्य मोदी सरकार द्वारा जनता के टैक्स के लगभग तीन हज़ार करोड़ रूपये ख़र्च कर जिस स्टेच्यू ऑफ़ यूनिटी का निर्माण कराया गया वह भी किसी हिंदूवादी नेता या दक्षिणपंथी विचारक की नहीं बल्कि कांग्रेस पार्टी के नेता व नेहरू मंत्रिमंडल में गृह मंत्री रहे सरदार बल्लभ भाई पटेल की है। उस जगह किसी अपने आदर्श महापुरुष की स्टेच्यू भी लगाई जा सकती थी। परन्तु इन्हें मालूम था कि सरदार पटेल के क़द का भी कोई नेता इनके पास नहीं है। इनकी पूरी ताक़त इस बात के प्रचार में लगाई जाती है कि नेहरू-पटेल एक दूसरे के दुश्मन थे। नेहरू ने पटेल को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया। इन नेताओं में पटरी नहीं खाती थी। नेहरू, पटेल का कहना नहीं मानते थे। भारत पाक विभाजन से लेकर कश्मीर की समस्याओं तक के लिए अकेले नेहरू ज़िम्मेदार हैं जबकि उन सभी फ़ैसलों में गृह मंत्री के नाते सरदार पटेल की भी महत्वपूर्ण भूमिका व सहमति हुआ करती थी।
गत एक दशक से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का विरोध इस स्तर तक फैल गया है मानो देश में एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों गोडसे फिर से पैदा हो गए हों। अतिवादी शिक्षा से प्रभावित आम लोगों द्वारा ही नहीं बल्कि महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों द्वारा गाँधी जी को अपमानित करने व उन्हें बदनाम करने के अनेक तरीक़े इस्तेमाल किये जा रहे हैं। जिस बापू की सोच,हौसले व विचारों के आगे अंग्रेज़ नत मस्तक होते थे और आज तक जो गाँधी दुनिया के तमाम देशों,सरकारों व शीर्ष नेताओं के लिए प्रेरणा स्रोत बने हों उसी गांधी का कभी चरित्र हनन किया जाता है,कभी उन्हें शहीद भगत सिंह का विरोधी बताया जाता है,कभी उन्हें मुस्लिम परस्त या दलित परस्त बताया जाता है। कुछ मंद बुद्धि ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवादी’ तो गाँधी के बजाए गाँधी के हत्यारे गोडसे को ही राष्ट्रभक्त व महापुरुष मान रहे हैं।कर्नाटक के एक सांसद जिन्होंने भारतीय संविधान से ‘सेक्युलर’ शब्द हटाने की बात कही थी तथा यह भी कहा था कि भारतीय जनता पार्टी संविधान में संशोधन करने के लिए ही सत्ता में आई है, उसी सांसद अनंत हेगड़े ने एक बार फिर अपनी ज़ुबान से अपनी ‘सांस्कारिक शिक्षा’ का परिचय दिया है। इस बार तो उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में गाँधी जी की किसी तरह की भूमिका को ही चुनौती दे डाली है। सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री अनंत हेगड़े ने एक जनसभा में कहा कि -‘देश के पूरे स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष को अंग्रेज़ों की सहमति व समर्थन से अंजाम दिया गया। हेगड़े के अनुसार ‘इन कथित नेताओं में से किसी भी नेता को पुलिस के द्वारा नहीं पीटा गया। उनका स्वतंत्रता आंदोलन बड़ा ड्रामा था। अंग्रेज़ों की सहमति से यह आंदोलन किया गया। यह सही मायनों में आंदोलन नहीं था। यह मिलीभगत से किया गया आंदोलन था।’ हेगड़े ने महात्मा गाँधी की भूख हड़ताल और सत्याग्रह को भी ड्रामा बताया। उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस का समर्थन करने वाले लोग कहते हैं कि भारत को आज़ादी सत्याग्रह के कारण मिली लेकिन यह सही नहीं है। अंग्रेज़ों ने इस देश को सत्याग्रह के कारण नहीं छोड़ा था।’ उन्होंने आगे कहा कि अंग्रेज़ों ने परेशान होकर देश को आज़ादी दी थी। हेगड़े ने ने कहा, ‘जब मैं इतिहास पढ़ता हूं तो मेरा ख़ून उबल जाता है। ऐसे लोग हमारे देश में महात्मा बन जाते हैं।’
दक्षिणपंथी नेताओं द्वारा देश के धर्मनिरपेक्ष महापुरुषों को अपमानित करने की एक कोई पहली घटना नहीं है। हाँ इसमें लगातार इज़ाफ़ा ज़रूर होता जा रहा है। गाँधी के साथ साथ स्वतंत्र संग्राम के अनेक नायकों व योद्धाओं को भी अपमानित किया जा रहा है। इससे साफ़ ज़ाहिर हो रहा है कि रचनात्मक,विकास आधारित राजनीति करने के बजाए महापुरुषों के विरोध पर केंद्रित राजनीति करने में ही अपने राजनैतिक लाभ की तलाश की जा रही है। ऐसे प्रयास महाप्रुषों के साथ साथ देश की छवि को भी धूमिल कर रहे हैं।

मंदिर ट्रस्ट और मतदान

सिद्वार्थ शंकर

दिल्ली विधानसभा चुनाव में 8 फरवरी को वोट डाले जा रहे हैं । इससे ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में बुधवार को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट बनाने का ऐलान कर दिया। पीएम मोदी के इस ऐलान के साथ ही दिल्ली चुनाव में किस्मत आजमा रहीं राजनीतिक पार्टियों ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। वहीं, राजनीतिक विश्लेषक इससे बीजेपी को होने वाले नफा-नुकसान की गणना में जुट गए हैं। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर नौ नवंबर, 2019 को अपना फैसला सुनाया था। फैसले में ही मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने की समय सीमा के भीतर बोर्ड गठित करने के केंद्र सरकार को निर्देश थे।  हालांकि चुनाव आयोग की ओर से जारी बयान के बाद राजनीतिक दलों की ओर से उठाए जा रहे सवालों पर विराम लग जाना चाहिए।चुनाव आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि यह घोषणा कहीं से भी आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है। इसके लिए सरकार को चुनाव आयोग को पहले से सूचित करने की कोई जरूरत नहीं थी। बता दें कि दिल्ली में कुल 1.47 करोड़ मतदाता हैं जिनमें 81.05 लाख पुरुष, 66.80 लाख महिला मतदाता हैं। वहीं 2011 की जनगणना के धर्म आधारित आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में एक करोड़ 37 लाख हिंदू हैं। यानी दिल्ली में करीब-करीब 10 लाख मुस्लिम मतदाता हैं। इनमें से ज्यादातर मुस्लिम आबादी आठ विधानसभा क्षेत्रों में सिमटी हुई है। सीलमपुर, मुस्तफाबाद, बल्लीमारान, ओखला, चांदनी चौक, मटिया महल, बाबरपुर और किराड़ी ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां करीब 35-50 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। इन सीटों पर मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका में होते हैं। इसके अलावा सीमापुरी और त्रिलोकपुरी में भी मुस्लिम वोटरों की संख्या ठीक-ठाक है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस अंदेशा जता रही है कि भाजपा दिल्ली चुनाव को हिंदू बनाम मुस्लिम का रंग देना चाहती है, इसलिए राम मंदिर के ट्रस्ट का ऐलान करने के लिए इस वक्त को चुना गया है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा ने किसी भी मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया है। मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर भी भाजपा ने हिंदू उम्मीदवार पर ही दांव खेला है। पिछले आंकड़ों पर नजर डालें तो इन आठ मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर भाजपा हमेशा से पिछड़ती रही है। पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा दिल्ली की सभी 7 सीटें जीती थी, लेकिन इन आठ विधानसभा सीटों पर सबसे ज्यादा 4 लाख से ज्यादा वोट कांग्रेस के खाते में गई थी। वहीं भाजपा को जीत के बावजूद करीब 30 हजार वोट मिले थे।यहां साफ तौर से दिख रहा है कि इन आठ सीटों पर भाजपा को काफी कम वोट मिलते रहे हैं। ऐसे में केवल राम मंदिर ट्रस्ट जैसे फैसले से वोटों के इतने बड़े अंतर में कोई बदलाव आ जाए इसकी कम ही संभावना दिखती है। दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव के वोटिंग पैटर्न से सबक लेते हुए आम आदमी पार्टी (आप) ने इन आठ सीटों पर जोर लगाया है और मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में करने की जुगत में जुटी है। वहीं, कांग्रेस भी इन वोटरों को अपने साथ जोड़े रखकर इज्जत बचाने की जीतोड़ कोशिश कर रही है।नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में शाहीन बाग में लोग करीब डेढ़ महीने से जमा हैं। विधानसभा चुनाव प्रचार में जिस तरह से भाजपा और आम आदमी पार्टी शाहीन बाग का नाम ले रही है, उससे यह मुख्य चुनावी मुद्दा बन गया है। विस्तृत परिदृश्य में देखें तो शाहीन बाग ही दिल्ली चुनाव का मुख्य मुद्दा है। इस तात्कालिक और बड़े मुद्दे के सामने राम मंदिर ट्रस्ट की बात को दिल्ली की जनता कितना तवज्जो देगी यह समझने की जरूरत है। आम आदमी पार्टी के हालिया फैसलों पर नजर डालें तो इस पार्टी ने ऐसा कोई स्टैंड नहीं लिया है, जिससे विरोधियो को उसे हिंदू विरोधी साबित करने का मौका मिल जाए। राम मंदिर ट्रस्ट का ऐलान होते ही मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा कि अच्छे फैसलों का कोई वक्त नहीं होता है। इससे पहले जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी किए जाने पर भी केंद्र सरकार का समर्थन किया था। आप सीएए के खिलाफ भी अब तक कोई स्टैंड लेने से बचती रही है। इतना ही नहीं, केजरीवाल शाहीन बाग के मुद्दे पर भी बीजेपी की तरफ से उकसावे के बाद भी अपना रुख स्पष्ट करने से बचते रहे। इन सारे आंकड़ों के बीच देखना दिलचस्प होगा कि 11 फरवरी को जब चुनावी नतीजे आएंगे तब भाजपा को राम मंदिर ट्रस्ट का फायदा भाजपा को होता है या नहीं।

गाँधी और गोड्से का पुनर्जन्म !

प्रभुनाथ शुक्ल

हमारे मित्र ढोंगी लाल ने काफी हाउस में चुस्कियां लेते हुए चुटकी ली। “अरे भाई ! सुना है बापू यानी गाँधी जी ने पुनः सत्याग्रह करने का ऐलान किया है। उन्हें दुःख है कि कुछ लोग उनके सत्याग्रह और आजादी मार्च का पेटेंट करना चाहते हैं, जिसकी वजह से यह ऐलान करना पड़ा है। मीडिया में नया विमर्श छिड़ गया। गाँधीवादी चिंता में पड़ गए हैं कि,  ऐसे कैसे हो सकता है। यह जिम्मेदारी तो वे लोग भलीभाँति निभा रहे थे। सब कुछ अच्छा था। गाँधीवाद की दुकान अच्छी चल रहीं थी लेकिन अब उनका क्या होगा कालिया! सरकार ने बाकायदा इस तरह की अफवाह से बचने का इश्तहार जारी कर दिया है।  सोशलमीडिया पर बापू के सत्याग्रह की ऐसी हवा फैली कि उसे रोकना मुश्किल हो गया है।टीवी वाले डिबेट चलाने लगे। दूसरे मित्र चोंगी लाल ने कहा  “अरे भाई ! ख़बर तो बासंती है। इसमें सच और झूठ की कोई गुंजाइश भी नहीं है।” दूसरे मित्र ढोंगी लाल ने कहा ” भाई ! चोंगी लाल, आपौ सठियाइ गए हो का- – – ! ” देखो ! मित्र चोंगी लाल! कहते हैं कि जिसके विचार जिंदा हैं, वह मर कर भी जिंदा है। अपने बापू ऐसे ही हैं। ख़बर सौ फीसदी सच है। क्योंकि , हमारे जीन में गाँधी और गोड्से जिंदा हैं। वह कभी मर नहीं सकते। अगर वह मर गए तो गाँधी और गोड्सेवाद मर जाएगा। सत्ता और सिंहासन के साथ सियासत मर जाएगी। देखिए ! हमारे यहाँ एक कहावत है ‘महाजनों गतेन ते  संपथा’ यानी हमारे महापुरुष जिस रास्ते का अनुसरण करें, उसी मार्ग पर हमें भी चलना चाहिए। तभी तो हम  आजादी के सत्तर दशक बाद भी गाँधी और गोड्से के अनुगामी हैं। क्योंकि हम लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं। हमारा संविधान समता- समानता की वकालत करता है। आजकल संविधान की प्रस्तावना पर अधिक जोर है। इसलिए हम गाँधी और गोड्से में कोई फ़र्क नहीं रखते। मित्र ! डोंगी लाल, जरा चिंतन की चाशनी में डुबो और फ़िर बाहर आओ। देखो ! देश आज़ भी गाँधी और गोड्से का ऋणी है। हमें आजादी दिलाते- दिलाते बापू शहीद हो गए। अभी हमने उनका सहादत दिवस भी मनाया है। चौराहों पर बुतों की धूल- मिट्टी को धोया है। राजघाट पर अदब से पुष्प अर्पित कर शीश झुकाया है। गाँधी दर्शन को जनजन तक पहुँचाया है। साथ में गोड्से को भी खाद- पानी दिया है। कुछ गाँधी नामधारियों ने तो बाकायदा ‘गोड्से’ का नामकरण भी कर दिया। जामिया सत्याग्रह में एक नया गोड्से अवतरित हुआ है। किसी ने सच समाजवादी ने सच कहा था , जब विचार मर जाते हैं तो इंसान जिंदा लाश बन जाता है। शायद इसीलिए हमने गाँधी और गोड्से को मरने नहीं दिया। गीता में भगवान कृष्ण ने युद्धभूमि में अर्जुन को उपदेश देते हुए स्वयं कहा है। आत्मा अजर अमर है। इसका कभी विनाश नहीं होता। वह केवल शरीर त्यागती है। यानी गाँधी और गोड्से ने केवल शरीर का त्याग किया है। उनकी आत्मा तो हमारे बीच है। तभी तो गाँधी के बताए मार्ग पर चलते हुए हम आजादी- आजादी की रट लगाए हुए हैं। आजकल अपने मुलुक में कई बाग तैयार हो रहे हैं। हमारी पंथी मीडिया और सत्याग्रही नई आजादी को लेकर गजबै पॉपकार्न हो रहे हैं। अमीरबाग, ख़ुशरोबाग के बाद हमने’शाहीनबाग’ भी तैयार कर लिया है। अपन का यह गाँधीवाद इतना पॉपुलर हो चुका है कि इसकी तर्ज़ पर पूरे मुलुक को ‘शाहीनबाग’ का क्लोन बनाने की तैयारी चल रहीं है।गाँधी और गोड्सेेवाद में बड़ा घालमेल हो गया है। गाँधीवादी और गोड्सेवादी पूरी तरह अपने को साबित करने में नाकाम दिख रहे हैं। दोनों मध्यमार्ग अपनाते दिखते हैं। लेकिन आजकल ‘आजादी मार्च’ में दोनों का प्रतिबिंब खूब दिखा और बिका है। देखो मित्र ! ढोंगी लाल, आजकल सबकुछ पीछे छूट गया है। अपन का पूरा मुलुक जाम, जामिया, बाग के साथ गाँधी और गोड्से में उलझ गया है। हर रोज एक नया गोड्से विमर्श में मौजूद है। सुना है जामिया नगर के आजादी मार्च में एक बार फ़िर किसी गोड्से का पुनर्जन्म हुआ है। हमारी मीडिया में वह खूब सुर्ख़ियां बटोर रहा है। गाँधी और गोड्से वादियों में जंग छिड़ गई है। यह सिलसिला फिलहाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। मुझे तो इस बासंती खबर में सच दिखता है। शायद ! इस विवाद को ख़त्म करने के लिए गाँधी और गोड्से पुनः पुनर्जन्म लेंगे। उन्हें एक दूसरे से माफी मांगनी पड़ेगी कि भाई, आप लोग यह लड़ाई ख़त्म कीजिए। हम दोनों ने मिलकर यह झगड़ा निपटा लिया है। देश को और कितनी आजादी चाहिए और कितने टुकड़े चाहिए।

 

निराशा भरा बजट
सिद्धार्थ शंकर
बजट में किए गए ऐलानों का असर आने वाले दिनों में भले अर्थव्यवस्था को कुछ रफ्तार के तौर पर देख जा सकता है, लेकिन फिलहाल उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है। सबसे ज्यादा निराशा ऑटो मोबाइल इंडस्ट्री को हुई है। कहा जा रहा है कि यह वो बजट नहीं था जिसकी उन्हें उम्मीद थी। बजट से उम्मीद की जा रही थी कि सरकार कुछ सीधी फायदे इंडस्ट्री को देगी जिससे मांग बढ़ेगी और इंडस्ट्री मौजूदा मंदी के दौर से उबर पाएगी लेकिन बजट भाषण से सारी बातें नदारद रहीं। अभी सरकार ने खर्च में अगले वित्तवर्ष में 13 फीसदी इजाफे का ऐलान किया है। उनके मुताबिक ये खर्च मौजूदा अर्थिक हालात के हिसाब से अच्छा स्टिमुलस नहीं कहा जा सकता है। सरकार को आने वाले दिनों में ऐलानों पर और सफाई देने से हालात कुछ बदल सकते हैं। बहरहाल, बजट से ज्यादा उम्मीदें अब नहीं करनी चाहिए। सरकार ने पिछले कई सालों में बजट से बाद भी तमाम बड़े ऐलान किए हैं जिनका अथ्र्यवस्था पर प्रभाव देखने को मिला है। इस बार बजट से तमाम स्टिमुलस पैकेज को लेकर उम्मीदें लगी हुई थीं जिनको निश्चित तौर पर झटका लगा है। देश मे इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के खर्च से जुड़ी बड़ी घोषणा का ऐलान न होना भी चिंताजनक रहा। हालांकि, सरकार ने भारतनेट के लिए जो ऐलान किए हैं वो देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचाएगा। देश में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में सरकार की तरफ से और निवेश की जरूरत है। मेक इन इंडिया के जरिए उत्पादन करने से ही देश को असली फायदा होगा। असेंबलिंग यूनिटें लगाने से मेक इन इंडिया की तुलना में कम मुनाफा होगा।
अगर रोजगार की बात करें तो केंद्र सरकार ने युवाओं के कौशल विकास के लिए करीब 3000 करोड़ रुपए खर्च करने की घोषणा की है। लेकिन खुद युवाओं का कहना है कि सरकार ने बजट में रोजागार को लेकर प्रावधान नहीं किया गया है। भले ही सरकार शिक्षा और कौशल विकास को बढ़ावा दे रही है। पर रोजगार सृजन को लेकर भी सरकार को बजट में प्रावधान करना चाहिए था। आखिर पढ़ाई पूरी करने के बाद युवाओं को एक बेहतर नौकरी की तलाश होती है और रोजगार उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी सरकार की बनती है। आज बड़ी संख्या में ऐसे युवा हैं, जिन्होंने आईटीआई, पॉलटेक्निक और अन्य कौशल विकास केंद्रों से प्रशिक्षण लिया है। पर कुछ फीसद ही युवाओं को ही बेहतर नौकरी मिली है। केंद्र और कई राज्य सरकार भी कौशल विकास के कार्यक्रम चला रहे हैं, लेकिन बीते कुछ महीने में देश में बेरोजगारी बढ़ी है। अगर प्रशिक्षण लेने के बाद भी नौकरी नहीं मिलेगी तो देश का युवा तकनीकि शिक्षा या फिर उच्च शिक्षा लेकर क्या करेगा? केंद्र सरकार को इस बारे में सोचना ही पड़ेगा।
महिलाओं की सुरक्षा की बात हमेशा की जाती है। पर हर बार बजट में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर केवल बड़ी-बड़ी घोषणाएं की जाती हैं। इस बार भी कुछ ऐसी ही घोषणाएं की गई हैं। महानगरों में आज छात्राएं हो या फिर कामकाजी महिलाएं। कोई भी अपने आप को सुरक्षित महसूस नहीं करता। रोजगार के साधन पर उपलब्ध कराए जाने चाहिए, ताकि महिलाओं और बच्चियों का सशक्तिकरण हो सके। आज भी बड़ी संख्या में बच्चों को बाल मजदूरी करते देखा जा सकता है। रेड लाइट पर बच्चियां भीख मांगते मिल जाएंगी। छोटे-बड़े शहरों में रहने वाले युवाओं के पास नौकरी के अलावा भी कई ऐसे साधन हैं, जिससे वह अपनी जीविकोपार्जन कर लेता है। इस बजट में भी रोगजार सृजन को लेकर कोई ठोस पहल नहीं की गई है। इसके साथ ही इनकम टैक्स में छूट को लेकर दुविधा की स्थिति पैदा हो गई है। दो प्रकार की व्यवस्था इस बजट में की गई है। वैसे, सरकार कह रही है कि बजट के ऐलानों से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, मगर कैसे, यह देखने वाला होगा।

संविधान और संस्कृति की दुहाई देने वाले कहाँ है?
भूपेन्द्र गुप्ता
नागरिकता संशोधन कानून से भाजपा और उसकी आत्मा आरएसएस ने एक बार फिर साबित कर दिया है अपने राजनैतिक एजेंडे के लिए वे संविधान को भी तार तार कर सकते है। इससे यह भी साबित हो गया है कि नस्लवाद और फासीवाद ने अब अपना चेहरा बदल लिया है। अब तो केंद्रीय मंत्री भी गालियां देने लगे है। अब भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वाले भाजपा नेता कहाँ गए?
शाहीन बाग जैसे प्रदर्शन और पूरे देश में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर चल रहे विरोध एवं समर्थन की रैलियों से यह कानून अब गांव-गांव तक चर्चा का विषय बन गया है ।लोगों में जिज्ञासा है कि इस कानून की ऐसी क्या आवश्यकता थी जो देश की मौलिक समस्याओं बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था, डूबती बैंकिंग व्यवस्था आदि को दरकिनार कर पूरे देश को केवल नागरिकता भारत-पाकिस्तान और हिंदू मुसलमान पर फोकस कर दिया गया।
लोग यह समझने में असमर्थ हैं इस कानून से आखिर कितने शरणार्थियों को लाभ पहुंचेगा जिसके लिए 133 करोड़ भारत के लोग आग में जलने के लिए मजबूर हैं। सरकारी स्तर पर जो आंकड़े सामने आए आए हैं वे यह बताते हैं कि धार्मिक प्रताड़ना के आधार पर जो लोग इस कानून के लागू होते ही लाभ उठा सकते हैं उनकी संख्या 31313 है ।इन शरणार्थियों में 25 हजार 447 हिंदू 5807 सिख, 55 ईसाई दो बुद्धिस्ट तथा मात्र दो पारसी शामिल हैं । यानी केवल 31313 शरणार्थियों को लाभ पहुंचाने के लिए पूरे देश को पक्ष और विपक्ष में बांट दिया गया है और यह भावना स्थापित कर दी गई है कि मुसलमान को इस देश में अब द्वितीय स्तर पर ही रखा जा सकता है । ऐसा नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इसके पहले मुसलमानों को देश की नागरिकता नहीं दी है। अभी ताजातरीन मामले में पाकिस्तानी पायलट अरशद सामी जिन्होंने भारत पर 65 के युद्ध में बम बरसाए थे ,के पाकिस्तानी बेटे अदनान सामी को जो मुसलमान भी हैं को भारत की नागरिकता प्रदान की गई ही गई बल्कि ताबड़तोड़ आज देश के सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री से भी नवाज दिया गया है । अगर देश की भावना कानून के साथ बताई जाती है तो सवाल उठता है कि अदनान सामी को विशेष रुप से प्राथमिकता के आधार पर यह नागरिकता क्यों दी गई? और अगर सरकार के दृष्टि में हिंदू मुसलमान जैसा कोई भेद नहीं है तो कानून में एक शब्द ष्मुसलमानों को छोड़करष् क्यों लागू किया गया है यहीं से शंका और कुशंका का वातावरण बनना शुरू हुआ है । देश को यह जानना चाहिए कि समय-समय पर देश में नागरिकता प्रदान करने के अधिकारों को भी नीचे की नौकरशाही तक भेजा गया है । 2004 में 1965 एवं 1971 के युद्ध में विस्थापित हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने के मामले में गुजरात एवं राजस्थान के छह कलेक्टरों को नागरिकता प्रदान करने के अधिकार दिए गए थे ।बाद में ये अधिकार 2005 तक और फिर 2006 तक बढ़ाये गये । इसका मतलब है कि नागरिकता देने ना देने के मामले में देश में कभी भी विवाद की स्थिति नहीं रही और वर्तमान कानून में अगर मुसलमानों को छोड़कर शब्द का प्रयोग न किया गया होता तो यह कानून भी देश ने स्वीकार कर लिया होता । एक तथ्य और ध्यान आकर्षित करता है कि 2014 से मोदी जी की इसी सरकार ने 2830 पाकिस्तानियों को 912 अफगानिस्तानियों को और 172 बांग्लादेशियों को भारत की नागरिकता प्रदान की है जिनमें हजारों मुसलमान है तब अचानक 2020 में मुसलमानों से इस नये व्यवहार के पीछे सरकार की क्या मंशा है यह तो देश जानना ही चाहेगा।
सरकारी अफसरों ने अलग-अलग समय पर यह बताया है कि नागरिकता संशोधन कानून का उद्देश्य उन शरणार्थियों के लिए एक एक ऐसा मैकेनिज्म तैयार करना है जो अन्यथा अवैध आब्रजन यानी ष्इल्लीगल इमीग्रेंटष् कहलाते हैं जिनके पास ऐसे दस्तावेज नहीं होते जिससे वह भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकें । अब इस कानून के बाद उन्हें इल्लीगल इमीग्रेंट्स नहीं माना जाएगा एवं उनके दस्तावेजों की विस्तृत जांच किए बिना वह ना केवल भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकेंगे बल्कि नागरिकता प्राप्त करने के अधिकारी भी बन जाएंगे सबसे बड़ी बहस यही है कि जो आर्टिकल 14 में संविधान रेखांकित करता है वह यह कि भारत का कोई भी कानून धार्मिक जातिगत या भाषाई अथवा नस्ली आधार पर किसी भी व्यक्ति से भेदभाव नहीं करेगा ना ही विशेष धार्मिक ग्रुपों को पसंद या नापसंद करेगा । केवल मुसलमानों को इस कानून के तहत इस सूची से बाहर रखने का उद्देश्य स्वतः आर्टिकल 14 के उद्देश्यों की अवहेलना करता है।

यह ध्रुवीकरण नहीं, धुंआकरण है
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
एक पुरानी कहावत है कि प्रेम और युद्ध में किसी नियम-कायदे का पालन नहीं होता। मैं सोचता हूं कि यह कहावत सबसे ज्यादा लागू होती है हमारे चुनावों पर ! चुनाव जीतने के लिए कौन-सी मर्यादा भंग नहीं होती ? कोई भी प्रमुख उम्मीदवार यह दावा नहीं कर सकता कि उसने चुनाव-अभियान के लिए अंधाधुंध पैसा नहीं बहाया है। चुनाव आयोग द्वारा बांधी गई खर्च की सीमा का उल्लंघन कौन प्रमुख उम्मीदवार नहीं करता ? शराब, नकदी और तरह-तरह के तोहफों का अंबार लगा रहता है। दिल्ली में आजकल जो चुनाव-अभियान चल रहा है, उसमें उक्त मर्यादा-भंग तो हो ही चुका है लेकिन कुछ नेताओं ने ऐसे बोल बोले हैं, जो उनकी अपनी प्रतिष्ठा को तो धूमिल करते ही है, उनकी पार्टी को भी बदनाम करते हैं। वे बयान भारतीय राजनीति को उसके निम्नतम स्तर पर ले जाते हैं। राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर और भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा, दोनों ही युवक मुझे प्रिय हैं। इन दोनों के पिताजी मेरे मित्र रहे हैं। दोनों का व्यक्तित्व आकर्षक है लेकिन मेरी समझ में नहीं आता कि दोनों ने ऐसी बातें कैसे कह दीं, क्यों कह दीं ? ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो इन सालों’ को और ‘ये लोेग तुम्हारे घरों में घुसकर बलात्कार करेंगे’- यह सब कहने या नारे लगवाने का अर्थ क्या है ? इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बयान की तुक क्या है कि यदि युद्ध हुआ तो हम पाकिस्तान को 7 से 10 दिन में धूल चटा सकते हैं ? गृहमंत्री अमित शाह और कुछ अन्य भाजपा नेता ‘शाहीन बागों’ को पाकिस्तान कह रहे हैं। ऐसी उग्रवादी बातें, क्या इसलिए की जा रही हैं कि हिंदू-मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण हो जाए ? क्या अब भाजपा का आखिरी सहारा पाकिस्तान और मुसलमान ही बचे हैं ? क्या वे ही अब एक मात्र ब्रह्मास्त्र बचे हैं, जो केजरीवाल पर चलाए जा रहे हैं ? भाजपा के नेताओं ने दिल्ली की जनता को इतना बेवकूफ क्यों समझ रखा है ? यह हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण नहीं, धुंआकरण है। यह सांप्रदायिक धुंआकरण आखिरकार भारत के लिए दमघोंटू सिद्ध हो सकता है। भाजपा को चाहिए था कि उसकी केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों ने जो उत्तम काम किए हैं, उनका वह प्रचार करती और दिल्लीवालों को बेहतर सरकार देने का वादा करती। उसके पास दिल्ली में मुख्यमंत्री के लायक कोई नेता नहीं है तो इसका नतीजा यह भी होगा कि दिल्ली के चुनाव के बाद अरविंद केजरीवाल, राष्ट्रीय स्तर पर शायद नरेंद्र मोदी के खिलाफ उभर आए और प्रधानमंत्री पद की चुनौती बन जाए।

कैसा होगा बजट…..?
ओमप्रकाश मेहता
भारत की अर्थव्यवस्था अब अन्तर्राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन चुकी है, यद्यपि यह सही है कि विश्वव्यापी मंदी का दौर है, जिसका सहारा लेकर भारत सरकार अब तक अपनी कमजोरी छुपाती आ रही है, किंतु भारत की अर्थव्यवस्था व मौजूदा स्थिति को लेकर विश्व के कई देशों ने चिंता अवश्य व्यक्त की है इसी बीच अमेरिका की प्रमुख बैंक आॅफ अमेरिका ने भारत की अर्थव्यवस्था अच्छी बताकर यहां की सरकार के प्रति संवेदना व्यक्त की है। जिस देश के आर्थिक कुप्रबंधन से किसान व आम मजदूर तक प्रभावित हो, उस देश की आर्थिक स्थिति क्या होगी? यह किसी से भी छुपा नहीं है। इसका संभवतः एक प्रमुख कारण यह भी है कि इस सरकार में आर्थिक विषयों का विशेषज्ञ कोई नहीं है, जब तक स्व. अरूण जेटली वित्तमंत्री रहे तब तक देश का आर्थिक प्रबंधन फिर भी ठीक रहा, क्योंकि वे चाहे अर्थशास्त्री नहीं थे, किंतु उनका संसदीय आर्थिक अनुभव उनके मंत्रित्वकाल में उनके बहुत काम आया, किंतु उनके निधन के बाद वित्तमंत्री पद का उनका उत्तराधिकारी आर्थिक मामलों के ज्ञान में शून्य प्रतीत हुआ और देश के नए आर्थिक वर्ष की बजट की जिम्मेदारी भी अक्षम वित्तमंत्री के हाथों में चली गई इसीलिए स्वयं प्रधानमंत्री को सभी जरूरी काम छोड़कर बजट की जिम्मेदारी सम्हालनी पड़ी, यहाँ तक कि बजट संसद में पेश होने तक उन्होंने दिल्ली के चुनाव प्रचार में भी हिस्सा नहीं लिया। अर्थात् इस विभाग से जुड़े मंत्री व अफसर हलवा खाते रहे और प्रधानमंत्री जी बजट तैयार करते रहे।
आज जो देश में मंदी, महंगाई और बेरोजगारी का आलम है, उसे देखकर नए बजट को लेकर आमतौर पर पूरे देश में भय और उत्सुकता का वातावरण व्याप्त है, बजट राहत वाला होगा या संकट पैदा करने वाला? इसी का उत्तर जानने को हर कोई उत्सुक है, रोजगार के लिए पेरशान देश का युवा वर्ग भी इसी चिंता में है कि उसे भी बजट में कुछ रोजगार के अवसर मिल पाएगंे या नहीं? किसान, मजदूर, नौकरीपेशा, व्यापारी कुल मिलाकर सभी वर्गों के लोगों को बजट की काफी उत्सुकता से प्रतीक्षा है।
वैसे आर्थिक समीक्षकों का बजट पूर्व अनुमान है कि नए आर्थिक वर्ष (2020-21) का बजट पिछले दस सालों का सबसे मुश्किलों भरा बजट होगा क्योंकि पिछले सत्रह सालों में भारत में निवेश सबसे अधिक सुस्त है। साथ ही पिछले ग्यारह साल में सबसे कम जीडीपी ग्रोथ है, देश की खुदरा महंगाई 7.35 फीसदी तक पहुंच गई है जो पिछले साढ़े पांच साल (मोदी जी के प्रधानमंत्रित्व काल) की सबसे अधिक है, महंगी दाल के अभाव में सब्जी पर निर्भर रहने वाले लोगों के लिए सब्जी के दामों में 65 फीसदी तक इजाफा हो चुका है। खाने-पीनें की वस्तुओं की महंगाई दर 14.12 प्रतिशत बढ़ चुकी है, इस प्रकार महंगाई के कारण देश का आम नागरिक हलाकान हो चुका है। अब ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बढ़ी हुई मुद्रा स्फीति दर के चलते कमजोर मांग का मुद्दा है। ऐसे में मांग और पूर्ति के बीच संतुलन बनाकर रखना सबसे बड़ी चुनौति है। आमतौर पर मांग में इजाफें के लिए रिजर्व बैंक की ओर से दरों में कटौती की जाती है, परंतु उपभोक्ता महंगाई दर के पहले से ही 7.4 प्रतिशत के स्तर पर होने के चलते केन्द्रीय बैंक के लिए ऐसा करना मुश्किल प्रतीत हो रहा है।
फिर सराकारी आंकड़ों के मुताबिक ही पिछले सत्रह सालों में वित्त वर्ष 2020 में इन्वेस्टमेंट की ग्रोथ का अनुमान महज एक फीसदी का ही है, अब तक सरकार मुश्किल दौर में निवेश के द्वार खोलकर अर्थव्यवस्था को रफ्तार देती रही है, अब यही देखना होगा कि निवेश बढ़ाने के लिए सरकार कैसे व क्या कदम उठाती है, ऐसी आर्थिक स्थिति में सरकार के पास काॅर्पोरेट टेक्स का मुख्य सहारा रहता है, लेकिन मौजूदा स्थिति में ऐसा करने पर कारोबारी माहौल पर भी विपरित असर पड़ने की संभावना है, ऐसे में सरकार को इस रास्ते पर आगे बढ़ने से पहले काफी चिंतन की जरूरत पड़ेगी। उल्लेखनीय है कि पिछले बजट में भी काॅर्पोरेट टेक्स में इजाफे में ऐलान के बाद सरकार को अपने कदम पीछे खींचना पड़े थे। जहां वैयक्तिक आयकर का सवाल है इसमें हम आम व खास वर्ग के लोग हर साल बजट के पूर्व राहत की उम्मीद जताते है, ऐसी ही उम्मीद इस साल भी जताई जा रही है, खासकर मध्यम व निम्न आय वर्ग द्वारा और हो सकता है सत्तारूढ़ दल द्वारा अपनी ओर जनविश्वास बढ़ाने के लिए इस तरफ कुछ कदम बढ़ा भी सकती है, लेकिन ऐसा होने पर राजकोषीय घाटे में इजाफा होना निश्चित है, जिसकी पूर्ति सरकार किस माध्यम से कर पाएगी, यह चिंता का विषय होगा। सरकार को इसके साथ ही ‘स्टाॅर्टअप्स’ के लिए कारोबारी सुगमता भी और बढ़ानी होगी, क्योंकि नई तकनीकों के सहारे आगे बढ़ रहे ‘स्टाॅर्टअप्स’ को भी बजट से काफी उम्मीदें है। उनका मानना है कि सरकार ने ‘स्टाॅर्टअप्स’ को सहूलियतें देने के लिए अब तक कई कदम उठाए है, लेकिन इसे और बढ़ावा देने के लिए नियमों के ढांचे का और अधिक सहज व सरल बनाया जाना जरूरी है।
इस प्रकार कुल मिलाकर देश का हर आम व खास वर्ग नए बजट को काफी उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है, अब नया बजट सुखद होगा या दुःखद यह तो दो-एक दिन बाद ही पता चलेगा, किंतु यह सही है कि बजट को लेकर सत्तारूढ़ पार्टी को नई उम्मीद की आस है, वहीं देश के आम नागरिक को अपनी विपदाओं से मुक्ति की आस है।

 

यूरोप में भारत-विरोध
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
यूरोपीय संघ की संसद में अब भारत की डटकर भर्त्सना होनेवाली है। उसके 751 सदस्यों में से 600 से भी ज्यादा ने जो प्रस्ताव यूरोपीय संसद में रखे हैं, उनमें हमारे नए नागरिकता कानून और कश्मीर के पूर्ण विलय की कड़ी आलोचना की है। जिन सांसदों ने इस कानून को भारत का आतंरिक मामला माना है और भारत की भर्त्सना नहीं की है, उन्होंने भी अपने प्रस्ताव में कहा है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आनेवाले शरणार्थियों में धार्मिक भेद-भाव नहीं किया जाना चाहिए। मेरी खुद की राय भी यही है लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि यूरोपीय संसद को किसी देश के आंतरिक मामले में टांग अड़ाने का कोई अधिकार नहीं है। वहां ये प्रस्ताव शफ्फाक मुहम्मद नामक एक पाकिस्तानी मूल के सांसद के अभियान के कारण लाए जा रहे हैं। इसीलिए इन प्रस्तावों में भारत-विरोधी अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया गया है। हमारे लोकसभा-अध्यक्ष ओम बिड़ला ने इस संबंध में यूरोपीय संघ के अध्यक्ष को पत्र भी लिखा है। मान लें कि यूरोपीय संसद इन प्रस्तावों को पारित कर देती है तो भी क्या होगा ? कुछ नहीं। भारत की संसद भी चाहे तो यूरोपीय संसद के विरुद्ध प्रस्ताव पारित कर सकती है लेकिन हम भारतीयों को यूरोपीय लोगों की एक मजबूरी को समझना चाहिए। हिटलर के जमाने में यहूदियों पर जो अत्याचार हुए थे, उनसे आज भी कांपे हुए यूरोपीय लोग दूसरे देशों की घटनाओं को उसी चश्मे से देखते हैं। वे भारत की महान और उदार परंपरा से परिचित नहीं हैं। इस समय यूरोपीय देशों के साथ भारत का व्यापार सबसे ज्यादा है। मार्च में भारत और यूरोपीय संघ की शिखर-बैठक होनेवाली है। कहीं ऐसा नहीं हो कि दोनों के बीच ये प्रस्ताव अड़ंगा बन जाएं। इससे दोनों पक्षों को काफी हानि हो सकती है। इसीलिए फ्रांसीसी दूतावास ने सफाई देते हुए कहा है कि यूरोपीय संसद की राय को यूरोपीय संघ की आधिकारिक राय नहीं माना जा सकता है। यदि ऐसा है, तो यह अच्छा है लेकिन भारत सरकार चाहे तो अगले सप्ताह शुरु होनेवाले संसद के सत्र में इस नए नागरिकता कानून में आवश्यक संशोधन कर सकती है।

गांधीवाद–जो जीने की कला सिखाता है
प्रो.शरद नारायण खरे
शहीद दिवस (30 जनवरी पर विशेष) “गांधीवाद” महात्मा गांधी के आदर्शों, विश्वासों एवं दर्शन से उदभूत विचारों के संग्रह को कहा जाता है, जो स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेताओं में से थे। यह ऐसे उन सभी विचारों का एक समेकित रूप है जो गांधीजी ने जीवन पर्यंत जिया था।
सत्य एवं आग्रह दोंनो ही संस्कृत भाषा के शब्द हैं, जो भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान प्रचलित हुआ था, जिसका अर्थ होता है सत्य के प्रति सत्य के माध्यम से आग्रही होना।गांधीवाद के बुनियादी तत्वों में से सत्य सर्वोपरि है। वे मानते थे कि सत्य ही किसी भी राजनैतिक संस्था, सामाजिक संस्थान इत्यादि की धुरी होनी चाहिए। वे अपने किसी भी राजनैतिक निर्णय को लेने से पहले सच्चाई के सिद्धांतों का पालन अवश्य करते थे।
गांधीजी का कहना था “मेरे पास दुनियावालों को सिखाने के लिए कुछ भी नया नहीं है। सत्य एवं अहिंसा तो दुनिया में उतने ही पुराने हैं जितने हमारे पर्वत हैं।”सत्य, अहिंसा, मानवीय स्वतंत्रता, समानता एवं न्याय पर उनकी निष्ठा को उनकी निजी जिंदगी के उदाहरणों से बखूबी समझा जा सकता है।
कहा जाता है कि सत्य की व्याख्या अक्सर वस्तुनिष्ठ नहीं होती। गांधीवाद के अनुसार सत्य के पालन को अक्षरशः नहीं बल्कि आत्मिक सत्य को मानने की सलाह दी गयी है। यदि कोई ईमानदारी- पूर्वक मानता है कि अहिंसा आवश्यक है तो उसे सत्य की रक्षा के रूप में भी इसे स्वीकार करना चाहिए। जब गांधीजी प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान स्वदेश लौटे थे तो उन्होंने कहा था कि वे शायद युद्ध में ब्रिटिशों की ओर से भाग लेने में कोई बुराई नहीं मानते। गांधीजी के अनुसार ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा होते हुए भारतीयों के लिए समान अधिकार की मांग करना और साम्राज्य की सुरक्षा में अपनी भागीदारी न निभाना उचित नहीं होता। वहीं दूसरी तरफ द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जापान द्वारा भारत की सीमा के निकट पहुंच जाने पर गांधीजी ने युद्ध में भाग लेने को उचित नहीं माना बल्कि वहां अहिंसा का सहारा लेने की वकालत की है।
अहिंसा का सामान्य अर्थ है ‘हिंसा न करना’। इसका व्यापक अर्थ है – किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से कोई नुकसान न पहुँचाना। मन में भी किसी का अहित न सोचना, किसी को कटुवाणी आदि के द्वारा भी पीड़ा न देना तथा कर्म से भी किसी भी अवस्था में, किसी भी प्राणी का कोई नुकसान न करना ।
गाँधीजी के अनसार धर्म और राजनीति को अलग नही किया जा सकता है,क्योंकि धर्म मनुष्य को सदाचारी बनने के लिए प्रेरित करता है । स्वधर्म सबका अपना अपना होता है पर धर्म मनुष्य को नैतिक बनाता है । सत्य बोलना, चोरी नहीं करना, परदु:खकातरता,दूसरों की सहायता करना आदी यही सभी धर्म सिखाते हैं । इन मूल्यों को अपनाने से ही राजनीति सेवा भाव से की जा सकेगी । गाँधीजी आडम्बर को धर्म नही मानते और जोर देकर कहते हैं कि मन्दिर मे बैठे भगवान मेरे राम नही है । स्वामी विवेकानंदजी के दरिद्र नारायण की संकल्पना को अपनाते हुए मानव सेवा को ही वो सच्चा धर्म मानते हैं । वास्तव मे उनका विश्वास है कि प्रत्येक प्राणी इश्वर की सन्तान हैं और ये सत्य है; सत्य ही ईश्वर है ।
गांधीजी सामाजिक समानता के समर्थक थे,वे मानवता व सामाजिक समरसता में विश्वास करते थे। वे अंत:करण की पवित्रता को मानता थे ।साम्प्रदायिक सद्भाव व बंधुता उनके जीवन के मुख्य तत्व थे ।वास्तव में गांधीवाद का अर्थ है -वे आदर्श जो हमें जीने की कला सिखाते हैं ।यह हक़ीक़त है कि गांधीवाद कालजयी है ।
अंत में यही कहूंगा कि–
“गांधी ने फैला दिया,सचमुच में उजियार ।
आओ हम समझें ज़रा,गांधीपथ का सार ।।”

दो खास मुसलमानों को पद्मश्री
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
हर 26 जनवरी पर भारत सरकार पद्मश्री आदि पुरस्कार बांटती है। इन पुरस्कारों के लिए कई लोग दौड़-धूप करते हैं। नेताओं, अफसरों और पत्रकारों से सिफारिश करवाते हैं। उन्हें लालच भी देते हैं। लेकिन कई लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें ये पुरस्कार देने पर सरकार खुद तुली रहती है। वे इन पुरस्कारों के लिए किसी के आगे अपनी नाक नहीं रगड़ते। जब उन्हें बताया जाता है तो ज्यादातर लोग इन पुरस्कारों को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं और अपने आप को भाग्यशाली समझते हैं लेकिन देश में ऐसे लोग भी हैं, जो इस तरह के पुरस्कारों को लेने से मना कर देते हैं। उनका तर्क यह भी होता है कि मैं तो पुरस्कार के योग्य हूं लेकिन पुरस्कार देनेवाले की योग्यता क्या है ? ऐसे पुरस्कारों की प्रामाणिकता या प्रतिष्ठा क्या है ? खैर, इस बार दो खास मुसलमानों-अदनान सामी और रमजान खान को पद्मश्री पुरस्कार देने की घोषणा हुई। यों तो आजकल लोग इन सरकारी पुरस्कारों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते लेकिन इन दोनों पुरस्कारों पर मेरा ध्यान भी गया। अदनान सामी अच्छे गायक हैं लेकिन उन्होंने इस पुरस्कार के लिए अपने आप को कतार में खड़ा किया होगा, इसमें मुझे शक है। यह उन्हें जान-बूझकर दिया गया होगा ? क्यों दिया गया होगा ? शायद सरकार ऐसा प्रभाव पैदा करना चाहती हैं कि वह मुसलमान-विरोधी नहीं है। यह बात रमजान खान के बारे में भी लागू होती है। उसने नए नागरिकता कानून के बहाने घर बैठे जो मुसीबत मोल ले ली है, इससे शायद उसे राहत मिलने की उम्मीद रही होगी। सामी, जिनके पिता पाकिस्तानी हैं, उन्हें भारत की नागरिकता भी दी गई है। रमजान खान का मामला तो और भी मजेदार हैं। वे अपने भरण-पोषण के लिए राजस्थान के मंदिरों और हिंदू कार्यक्रमों में भजन गाते हैं। गोसेवा भी करते हैं। ऐसे व्यक्ति को बिना मांगे पद्मश्री देकर यह हिंदूवादी सरकार अपनी उदारवादी छवि भी बना रही है लेकिन इससे लोग पूछेंगे कि रमजान खान के बेटे फिरोज खान को अपनी नौकरी क्यों छोड़नी पड़ी ? उसे बनारस हिंदू युनिवर्सिटी में संस्कृत क्यों नहीं पढ़ाने दी गई ? तब इस सरकार ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया ? वैचारिक दिग्भ्रम बने रहने के कारण ऐसे सही और गलत काम एक साथ होते रहते हैं।

दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करना ही सहिष्णुता
ओमप्रकाश श्रीवास्तव
जीवन का रहस्य बताती गीता में ‘कुछ बात’
पृथ्वी को अस्तित्व में आए 4.6 अरब वर्ष बीत चुके हैं। प्रारंभ में आग का गोला जब ठंडा हुआ तो 2 लाख वर्ष पूर्व वर्तमान मानव अस्तित्व में आया। मानव ने 11 हजार वर्ष पूर्व कृषि करना सीखा और विभिन्न सभ्यताओं का विकास हुआ। आज से 5500 वर्ष पूर्व भारत की विकसित सभ्यता ने महाभारत का युद्ध लड़ा और गीता जैसा अद्भुत दर्शन और जीवन दृष्टि संसार को मिली। इसके समकालीन और उसके 4000 वर्ष बाद तक सुमेरिया, बेबिलोनिया, ईरान, मिस्र और यूनान जैसी सभ्यताएँ अस्तित्व में आईं। समय के साथ यह सभ्यताएँ या तो मिट गईं या ऐसी परिवर्तित हो गईं कि उनके मूल का अस्तित्व ही नहीं बचा। पर भारत में सारे धर्म, संप्रदाय, बोलियाँ, भाषाऍं एक साथ विकसित होती रहीं। संसार भर से भारत में जो भी आया उसे बगैर भेदभाव के आश्रय मिला, अपने धर्म और रिवाज के पालन की स्वतंत्रता मिली। भारत ने कुछ उनसे सीखा और कुछ उन्हें सिखाया। लचीलापन इतना कि कुछ उन्हें बदला और कुछ खुद भी बदल गये। आज भी भारत का अपने मूल तत्वों के साथ जीवित रहना रहस्य-सा लगता है। इसीलिए अल्लामा इकबाल ने कहा ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’। यही ‘कुछ बात’ है जिसका स्रोत 5200 वर्ष महाभारत युद्ध के समय कही गई गीता में मिलता है।
इस ‘कुछ बात’ का जवाब स्वामी विवेकानन्द शिकागो के धर्म सम्मेलन में दे चुके थे जब उन्होंने गीता का श्लोक पढ़ा जिसका अर्थ था कि विभिन्न व्यक्ति ईश्वर तक जाने के विभिन्न मार्ग अपनाते हैं परंतु अंत में सभी उस एक ईश्वर को प्राप्त होते हैं। इकबाल भी कुछ हद तक यही जवाब कुछ दूसरे ढंग से देते हैं ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना’। गीता कृष्ण व अर्जुन के बीच का वार्तालाप है। अर्जुन प्रश्न पर प्रश्न करता है और कृष्ण उसका उत्तर देते हैं। यह प्रश्न और उत्तर की श्रृंखला हमारी सभ्यता और संस्कृति की ‘कुछ बात’ को स्पष्ट कर देती है।
अर्जुन अपने संबंधियों और मित्रों को युद्ध के मैदान में देखकर घबरा गया । उसने अपनी समझ के अनुसार धर्म की व्याख्या की और धनुष बाण फेंककर रथ के पीछे बैठ गया। कृष्ण ने केवल दो श्लोक कहकर उसे प्रोत्साहित करना चाहा कि वह अपने हृदय की दुर्बलता को त्याग दे और युद्ध के लिए उठ खड़ा हो। परंतु अर्जुन ने अनेक तर्क देते हुए अपना निर्णय सुना दिया कि वह युद्ध नहीं करेगा। इस समय तक अर्जुन कृष्ण को अपना मित्र मानता था। परंतु कृष्ण साधारण मित्र नहीं थे। उन्होंने पांडवों की कदम-कदम पर मदद की थी। वह कंस वध कर चुके थे और अपनी शक्ति और कूटनीति का लोहा मनवा चुके थे। पूरे भारत खंड में ऐसा कौन था जो उस समय कृष्ण को न जानता हो। यदि कृष्ण चाहते तो अपने प्रभाव का उपयोग करके अर्जुन को युद्ध करने का आदेश दे सकते थे। कृष्ण के प्रभाव को देखते हुए अर्जुन इंकार कर ही नहीं सकता था। परंतु तब यह थोपा हुआ निर्णय होता। अर्जुन के तर्कों को न मानना और इकतरफा तौर पर अपनी बात थोपना असहिष्णुता होती। इसलिए कृष्ण ने लंबा संवाद किया।
अर्जुन भी निरंतर प्रश्न करता रहा। वह कृष्ण के आभामंडल से घबराया नहीं, उनके अहसानों का उसने संकोच नहीं किया बल्कि उनके वाक्यों से ही नए प्रश्न तैयार करता गया और पूछता गया। यहाँ तक कि उसने कृष्ण के कथनों पर शंका भी की। उसने पूछा कि आपका जन्म तो अभी हुआ है जबकि सूर्य अनादि काल से है तब आपने सूर्य को योग कैसे बताया। परंतु कृष्ण ने न तो अपना धैर्य खोया और न ही कुछ थोपने का प्रयास किया। ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन कृष्ण को ईश्वर के रूप में पहचान लेता है, उनके प्रति श्रद्धा से नत हो जाता है फिर भी प्रश्नों की बौछार बंद नहीं करता है। सारी गीता सुना चुकने के बाद भी कृष्ण ने निर्णय अर्जुन पर छोड़ दिया और कहा कि मेरी कही बातों पर पूर्ण रूप से चिन्तन, मनन कर और – यथेच्छसि तथा कुरु – जैसी तेरी इच्छा हो वैसा कर। इसके बाद ही अर्जुन ने कहा कि मेरा संदेह दूर हो गया है और अब मैं आपके कहे अनुसार करूँगा।
यह वह ‘कुछ बात’ है जिसने भारतीय सभ्यता और संस्कृति को बनाए रखा है। भारत ने अपनी बात किसी पर थोपी नहीं है। अपनी बात बताई है, दूसरे की सुनी है और अंतिम निर्णय लेने का अधिकार सामने वाले के विवेक पर छोड़ दिया है। यदि वह सहमत है तो भी ठीक और यदि नहीं है तो भी ठीक । उसे अपना रास्ता चुनने का अधिकार है। सारे रास्ते उसी एक ईश्वर तक जाते हैं, ऐसा कहकर गीता ने धार्मिक विवादों को समाप्त दिया। इस स्वातंत्र्य ने ही विविध धर्मों, रीति-रिवाजों, भाषाओं-बोलियों, खान-पान आदि को फलने-फूलने का अवसर दिया। प्रकृति भी विविधता में ही विकसित होती है। यदि सब पौधे या जीव एक ही तरह के हो जाएँ, यदि सदैव दिन का प्रकाश ही फैला रहे, यदि मौसम एक सा हो जाए तो जीवन नष्ट हो जाएगा। दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करना ही सहिष्णुता है। जीवन-मृत्यु, दिन-रात, सर्दी-गरमी एक दूसरे के अस्तित्व पर आधारित हैं। कोई अकेला नहीं रह सकता। गीता गूढ़ दार्शनिक तत्वों के साथ ही साथ जीवन जीने की यह कला भी सिखाती है जिसे अल्लामा इकबाल ने ‘कुछ बात’ कहा है।
(कई पुस्तकों के लेखक, वर्तमान में संचालक, जनसंपर्क मध्यप्रदेश हैं)

गणतंत्र या गर्वतंत्र ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अपने 71 वें वर्ष में भारत का गणतंत्र खुद पर गर्व करे या चिंता करे ? मैं सोचता हूं कि वह दोनों करे। गर्व इसलिए करे कि अगर हम एशिया और अफ्रीका के देशों पर नज़र डालें तो हमें मालूम पड़ेगा कि उन सब में भारत बेजोड़ देश है। इन लगभग सभी देशों के संविधान तीन-तीन चार-चार बार बदल चुके हैं, इन ज्यादातर देशों में कई बार तख्ता-पलट हो चुके हैं, इनमें कई लोकतंत्र फौजतंत्र बन चुके हैं और फौजतंत्र लोकतंत्र बनने की कोशिश कर रहे हैं, कई देश संघात्मक से एकात्मक और एकात्मक से संघात्मक बनने लगे हैं लेकिन भारत का संविधान है कि सत्तर साल गुजर जाने पर भी ज्यों का त्यों है। उसके मूल स्वरुप में कोई बदलाव नहीं हुआ है। हां 1975-77 के आपात्काल ने जरुर इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया था लेकिन भारत की जनता ने हस्तक्षेप करनेवालों को कड़ा सबक सिखाया था। हमारे संविधान में लगभग सवा सौ संशोधन हो गए हैं। लेकिन उसका मूल स्वरुप अक्षुण्ण हैं। उसके संशोधन उसके लचीले होने का प्रमाण हैं। दूसरी बात जो गर्व के लायक है, वह यह कि आजादी के बाद देश के पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में कई राज्य भारत से अलग होना चाहते थे। लेकिन आज नागालैंड, पंजाब, कश्मीर और तमिलनाडु में ऐसी कोई आवाज सुनाई नहीं पड़ती। भारत की संपन्नता, शक्ति और एकता पहले से अधिक बलवती हो गई है। यों भी भारत दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा देश है लेकिन अब चीन और भारत- एशिया के दो महाशक्ति राष्ट्र माने जा रहे हैं। भारत इस पर गर्व कर सकता है लेकिन सत्तर या बहत्तर साल गुजरने के बावजूद भारत में गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और भ्रष्टाचार का बोलबाला है। भारत में आज तक एक भी सरकार ऐसी नहीं बनी है, जिसे जनता का 51 प्रतिशत वोट मिला है। वर्तमान सरकार भी सिर्फ 37 प्रतिशत वोटों से बनी सरकार है। भारत की चुनाव पद्धति में बुनियादी सुधार की जरुरत है। पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव होता जा रहा है। देश में भय, आतंक और अंविश्वास बढ़ रहा है। करोड़ों नागरिकों की बुनियादी जरुरतें पूरी नहीं हो पातीं और मुट्ठीभर लोग सपन्नता के हिमालयों पर चढ़ते चले जा रहे हैं। इसीलिए हमारा गणतंत्र गर्वतंत्र होते हुए भी चिंतातंत्र बना हुआ है।

फैशन की चाह में जीव, जंतुओं की मुश्किल हुई जीने की राह
मुकेश तिवारी
सौंदर्य सामग्री या प्रसाधन सामग्री के विकास और उत्पादन के लिए अनेक मासूम प्राणियों की बेरहमी से जान ले ली जाती है। तमाम सारे कामोत्तेजक परफ्यूम के निर्माण में कुछ प्राणियों की यौनग्रंथियों का स्त्राव इस्तेमाल किया जाता है। बिज्जू के नाम चिरपरिचित प्राणी की यौनग्रंथि का स्त्राव प्राप्त करने के लिए पहले इस प्राणी को बड़ी बेरहमी से पीटा जाता है। जिससे वह क्रोधित होकर ज्यादा से ज्यादा स्त्राव पैदा करे। फिर इस स्त्राव को किसी तेज धार वाले चाकू से खरोंच लिया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान बिज्जू को कठोर यातना सहने के साथ-साथ कभी-कभी अपने प्राणों की कुर्बानी तक देनी पड़ती है।
काबिलेगौर है कि इस तरह हर साल काफी बड़ी संख्या में बिज्जू सिर्फ कामोत्तेजक परफ्यूम बनाने के लिए मार दिए जाते हैं। बिज्जू जैसी ही दर्दनाक कहानी बिल्ली के परिवार के सिवेट नामक प्राणी की भी है। इस प्राणी से कस्तूरी जैसी सुंगधित ग्रंथि निकाली जाती है। यह ग्रंथि इसके पेट में मौजूद होती है। इसलिए इसका पेट काटकर ग्रंथि को निकाला जाता है। गं्रथि निकालने से पहले एक पखबाड़े तक सिवेज को लकड़ी कौंच-कौंच कर उत्त्ेजित किया जाता है, ताकि उसकी ग्रंथि में अधिक से अधिक सुगंध बन सके।
प्रकृति का इंजीनियर कहलाने वाले बीवर नामक प्राणी के शरीर से प्राप्त होने वाले तेल सौंद्रर्य प्रसाधन बनाने के काम आता है। इसकी रोहेदार खाल से चमड़े के स्टाइलिश कोट बनाए जाते हैं। गौरतलब है कि एक स्टाइलिश कोट के निर्माण के लिए चार दर्जन से अधिक बीवरों की जान ले ली जाती है। बीवर के तेल से दवाओं का निर्माण किया जाता है। इसे मादक द्रव्य की तरह भी उपयोग में लिया जाता है। कस्तूरी मृग की नाभि में छिपी अत्यंत सुगंधित कस्तूरी से तो सभी चिरपरिचित हैं। इसे निकालने के लिए मृग की नाभि काट दी जाती है। इस प्रक्रिया में भी कभी-कभी मृग की मौत हो जाती है। कराकुल नस्ल की भेड़ों की खाल बेहर कोमल व महीन रोहेदार बाल होते हैं। इस वजह से यह काफी ऊंचे दामों पर बिचती है। प्रौढ़ भेंडों़ के अलावा इनके मेमनों यहां तक कि कोख में पनप रहे भ्रूण की भी खाल उतारी जाती है। भ्रूण प्राप्त करने के लिए गर्भित भेंड़ों को कठोर यातनाएं तक दी जाती हैं। जिससे उसे गर्भपात हो जाए। भ्रूणों की खाल बाजार में बेहद ऊंचे दामों पर बिकती है। इसी तरह सील मछली की खाल की भी बाजार में खासी मांग रहती है। सील के नवजात बच्चों की खाल से बना कोट काफी ऊंचे दामों पर बिकता है। सील के नवजात बच्चों की खाल प्राप्त करने के लिए उन्हें बड़ी ही बेरहमी से मार दिया जाता है। लोहे की नोंकदार सलाई तक सिर में घौंप दी जाती है। जिससे खाल खराब न हो। एक कोट बनाने के लिए तकरीबन नौ से 10 सील शिशुओं की जान ले जाती है। कछुओं के अंगों से प्राप्त चर्बी से तेल बनाया जाता है। जिसका उपयोग सौंद्रर्य प्रसाधन सामग्री के निर्माण में होता है। वहीं सॉंप की खाल निकालने के लिए अमानवीय तरीके इस्तेमाल में किये जाते हैं। सॉंप को वृक्ष के तने पर कीले से ठोक दिया जाता है और फिर तेज धार वाले चाकुओं से चीरा जाता है। इतना ही काफी नहीं सॉंप के घोर शत्रु नेवले की खाल से भी फैशनेवल बस्तुएं बनाईं जाती हैं। फर के लिए मिंक नामक एक अन्य रोहेदार प्राणी की जान भी बड़ी बेरहमी से ले ली जाती है। यूरोप और अमेरिका की धनकुबेर महिलाएं मिंक के फर के कोट बड़ी शान से पहनती हैं। दिलचस्प बात है कि यह विश्व का सबसे मंहगा कोट माना जाता है। भांति-भांति के शेंपुओं को बाजार में उतारने से पहले शेंपू को खरगोश की ऑंख में डालकर जांचा परखा जात है। ऐसा करने से पूर्व उसे बांध दिया जाता है।

 

मुसलमानों की देशभक्ति ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन शांतिपूर्ण आंदोलनों की तारीफ की है, जो नए नागरिकता कानून के विरोध में चल रहे हैं। उनका कहना है कि इससे भारत का लोकतंत्र मजबूत हो रहा है। मैं तो इस कथन से भी थोड़ा आगे जाता हूं। मेरा कहना है कि यह आंदोलन चाहे इस गलतफहमी के आधार पर चल रहा है कि इस नए कानून से देश के मुसलमानों की नागरिकता छिन जाएगी जबकि इस कानून का संबंध सिर्फ उन मुसलमान शरणार्थियों से है, जो बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आ सकते हैं। भारत में रहनेवाले मुसलमान नागरिकों से इस कानून का कुछ लेना-देना नहीं है लेकिन वे और उनके साथ हिंदू और सिख नौजवान मिलकर जिस उत्साह से देश में प्रदर्शन कर रहे हैं, वह अपने आप में अनुपम है। इसके कई कारण हैं। पहला, तो यही कि देश में लोकतंत्र मजबूत हो रहा है। विरोध को पूरी आजादी है। दूसरा, यह आंदोलन अहिंसक है।। खून-खराबा बिल्कुल नहीं है। तीसरा, मुस्लिम महिलाएं पहली बार घर से बाहर निकल कर प्रदर्शन कर रही हैं। उनमें जागृति फैल रही है। हजार-बारह सौ साल में किसी मुस्लिम देश में भी ऐसा दृश्य कभी नहीं दिखा। चौथा, हिंदू-मुस्लिम एकता का यह प्रदर्शन भी अपूर्व है। पांचवां, मुसलमान छाती ठोक-ठोक कर कह रहे हैं कि हम उतने ही पक्के भारतीय हैं, देशभक्त हैं, जितना कि कोई और हो सकता है। इसका श्रेय भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को है। छठा, हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण का सांप्रदायिक दांव नाकाम होता दिखाई पड़ रहा है। सातवां, भाजपा के आम कार्यकर्ता भी महसूस कर रहे हैं कि उनके नेताओं ने घर बैठे यह कैसी मुसीबत मोल ले ली है ? नई सरकार ने अपने गले में यह सांप क्यों लटका लिया है? कौन से मुसलमान शरणार्थी भारत में शरण मांगने आ रहे हैं ? एक काल्पनिक भूत ने देश में कोहराम मचा रखा है।

गणतंत्र के मायने
सिद्धार्थ शंकर
गणतंत्र दिवस सात दशक की यात्रा पूरा कर चुका है। सात दशकों की यात्रा में हमारे गणतंत्र की चमक दिनोंदिन बढ़ती गई है। विश्व में भारत की पहचान आज एक सक्षम और मजबूत जनतांत्रिक देश की है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका ही नहीं, यूरोप के भी कई देश जो अपने यहां लोकतंत्र की जड़ जमाने में जुटे हैं, इसके लिए जरूरी सबक विकसित देशों से ज्यादा भारत से सीखना चाहते हैं। विज्ञान और टेक्नॉलजी के क्षेत्र में भारत काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है, साथ ही विश्व स्तर पर जारी पर्यावरण रक्षा मुहिम में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा है। भारत में सोलर एनर्जी का उत्पादन तेजी से बढ़ा है और इस मामले में हम दुनिया में अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर पहुंच गए हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था को पिछले कई वर्षों से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है। लेन-देन की प्रक्रिया में डिजिटलाइजेशन बढऩा भी एक बड़ी उपलब्धि है। हालांकि, इसका ट्रिगर पॉइंट बनी नोटबंदी के साथ लोगों की बुरी स्मृतियां भी जुड़ी हैं। विकास प्रक्रिया में पीछे छूटने वाले वर्गों पर व्यवस्था का फोकस बढ़ा है। किसान की बेहतरी लिए आज सरकार ही नहीं, विपक्ष भी चिंतित है। महिलाओं की भागीदारी हर क्षेत्र में बढ़ी है। मामले का दूसरा पहलू यह है कि इधर हमारी व्यवस्था में कुछ दरारें उभरती दिखी हैं जो चिंता का विषय है। पहली बार नागरिकता की ऐसी परिभाषा सामने आई है जिसका संवैधानिक मूल्यों के साथ कोई मेल नहीं दिखता। सरकारी नीतियों के विरोध में उठती आवाजों को राजद्रोह बताने का चलन बढ़ा है और अल्पसंख्यक समुदायों में भय का एक तत्व भी दिखाई पड़ रहा है। बहरहाल, भारतीय गणतंत्र की यह खूबी है कि वह अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें दूर कर लेता रहा है और यह सिलसिला आगे भी चलेगा।
अब आधुनिक भारत को ऐसी व्यवस्था की दरकार है जो बिना भेद किए गण को तंत्र के हर निर्णय में भागीदारी का अवसर दें, जन प्रतिनिधि के रूप में यह व्यवस्था तो है किंतु तंत्र को अधिक पारदर्शी होने की आवश्यकता है। यहां यह बात भी नहीं भूली जानी चाहिए कि गण और तंत्र एक दूसरे के पूरक है । गण अपने कर्तव्य को पूरा करें और तंत्र अपनी नीतियों से गण को उसके अधिकार दें और कर्तव्य पूर्ति के सरल नियम बनाए। आधुनिक भारत का निर्माण दोनों की ही सजग भागीदारी से संभव है। अब यह नहीं हो सकता कि एक तरफ आप अमेरिका के ट्रैफिक नियमों की तारीफ करें और खुद नियमों का पालन ना करें। विदेशों की जगमगाती सड़कों को देख आहें भरें और पिच्च से अपनी सड़कों पर थूक दे। भ्रष्टाचार की आलोचना करें और खुद भ्रष्टाचारी बने रहें, सोचिए राष्ट्र कोई जीवंत इकाई नहीं है उसे जीवंत इकाई आप बनाते हैं। एक भूमि के टुकड़े का परिचय वहां निवास करने वाले मनुष्यों से होता है वैसे बने जैसा देश आप चाहते हैं, पर उपदेश कुशल बहुतेरे, की तर्ज पर दूसरों में बदलाव किसी भी तरह की उन्नति और प्रगति की गति धीमी कर देता है।
अतएव वर्तमान में आवश्यकता इस बात की है कि उक्त तीनों पीढिय़ों को कैसे एक जाजम पर बैठाया जाए, ताकि भारतीय राष्ट्रीयता के तारतम्य में उक्त पीढिय़ों के बीच पारस्परिक संवाद पैदा हो सके। भारतीय राष्ट्रीयता की अस्मिता का भान कराने वाला एक बड़ा कारक हमारी स्वतंत्रता का तो है ही इसके उपरांत सदियों पुरानी हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति, परदु:खकातरता से लिप्त हमारी संवेदनाएं, युद्धों को टालने वाली और मानव मात्र के संदर्भ में हमारी अहिंसक विचारधाराएं, अतीत में प्रकाशित हमारे संधि प्रस्तावों के अभिलेख इत्यादि भी भारतीय राष्ट्रीयता की अस्मिता को मुस्तैदी देने वाले बड़े कारक हैं।

 

देश की चाबी अदालत के हाथ
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
नागरिकता संशोधन विधेयक के बारे में सर्वोच्च न्यायालय ने जो राय अभी दी है, उससे देश के गैर-भाजपाई राज्य नाखुश होंगे और वे सब लोग भी, जो इस कानून के विरुद्ध सारे देश में प्रदर्शन आदि कर रहे हैं। कई राज्यों ने तो नागरिकता रजिस्टर और उक्त कानून को लागू करने से मना कर दिया है। कई विधानसभाएं इस कानून के खिलाफ प्रस्ताव भी पारित कर रही हैं। ऐसी स्थिति में सब सोचते थे कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले पर तुरंत फैसला देगा और देश में फैला तनाव खत्म हो जाएगा लेकिन अदालत भी क्या करती ? उसके पास इस कानून के विरुद्ध 144 याचिकाएं आ गई हैं। उसके लिए यह जरुरी था कि वह सरकार के तर्क भी सुनती। बिना सरकारी जवाब को सुने वह फैसला करती तो वह भी ठीक नहीं होता। उसने अब सरकार को एक माह का समय दे दिया है। हो सकता है कि एक माह के बाद भी इस मामले पर लंबी बहस चले। इतने वक्त में हजारों शरणार्थियों को सरकार शरण दे देगी। उन्हें शरण देने से भाजपा सरकार को यह फायदा है कि वे भाजपा के आजीवन भक्त बन जाएंगे। लेकिन अदालत ने यह भी कहा है कि जरुरत पड़ने पर सरकार द्वारा दी गई नागरिकता को अवैध भी घोषित किया जा सकता है। इसी प्रकार अदालत ने त्रिपुरा और असम के अवैध नागरिकों की सुनवाई भी अलग से करने का निर्णय किया है। नागरिकता संबंधी सभी मामालों की सुनवाई के लिए उसने 5 जजों की एक संवैधानिक पीठ बनाने की भी घोषणा की है। आशा करनी चाहिए कि एक-डेढ़ माह में अदालत इस मामले में अपना अंतिम फैसला दे देगी। यदि उसका फैसला इस कानून के विरुद्ध आ गया तो सरकार की इज्जत भी बच जाएगी और आंदोलनकारी भी चुप हो जाएंगे। यदि अदालत ने इस कानून को सही ठहरा दिया तो सरकार का पक्ष भारी जरुर हो जाएगा। लेकिन देश में कोहराम भी मच सकता है। देश की युवा-शक्ति बगावत की मुद्रा धारण कर सकती है। वह ऐसे कई नए मुद्दे इजाद कर सकती है, जो सरकार का चलना भी मुश्किल कर सकते हैं। अहिंसक आंदोलन हिंसक रुप भी धारण कर सकता है। अब अदालत के हाथ में है, यह देखना कि देश में शांति और व्यवस्था भंग न हो ताकि आसन्न आर्थिक संकट का यह सरकार मुकाबला कर सके।

घोर अस्वच्छता के मध्य स्वच्छता के दावे ?
निर्मल रानी
केंद्र ही नहीं बल्कि राज्य सरकारों द्वारा भी स्वच्छता अभियान को लेकर बड़े बड़े दावे किये जा रहे हैं। जनता के ख़ून पसीने की कमाई का टैक्स का क़ीमती पैसा विकास या स्वच्छता संबंधित कार्यों में कम परन्तु इनके विज्ञापनों में व सरकार की अपनी पीठ थपथपाने में ज़्यादा ख़र्च हो रहा है। देश का विज्ञापन संबंधी कोई भी तंत्र स्वच्छता संबंधित विज्ञापनों से ख़ाली नहीं बचा है। देश के अनेक राज्यों व नगरों ने तो स्वयं ही इस बात का प्रमाणपत्र भी ले लिया है कि उनका राज्य या शहर गंदगी मुक्त हो गया है। कई नगरों व राज्यों का ये भी दावा है कि वे ‘खुले में शौच मुक्त’ हो चुके हैं। कई राज्यों में इसी स्वच्छता अभियान के तहत कई नए प्रयोग भी किये गए हैं। पूरे देश में जगह जगह कूड़ा डालने हेतु कहीं प्लास्टिक तो कहीं स्टील के कूड़ेदान लगाए गए। यह और बात है कि इनमें से अधिकांश कूड़ेदान या तो कमज़ोर होने की वजह से टूट फूट गए या चोरी हो गए। सैकड़ों करोड़ रुपए तो इस कूड़ेदान की ख़रीद में ही सरकार ने बर्बाद कर दिए।
हरियाणा जैसे राज्य में घर घर प्लास्टिक के छोटे कूड़ेदान सरकार द्वारा वितरित किये गए। शहरों व क़स्बों में कूड़े उठाने के ठेके दिए गए। कूड़ा उठाने वाला लगभग प्रतिदिन घर घर जाकर सीटियां बजाता और घरों से कूड़े उठाकर ले जाता। फिर एक दो स्थान पर पूरे शहर का कूड़ा इकठ्ठा किया जाता। फिर इन कूड़ों में सूखा व गीला,प्लास्टिक कचरा आदि अलग कर इसका निपटारा करने हेतु भेज दिया जाता। परन्तु गत कई महीनों से सरकार द्वारा वितरित किये गए कूड़ेदान, कूड़े का संग्रह करने वाले कर्मचारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं परन्तु तीन माह से अधिक समय से कूड़ा उठाने कोई व्यक्ति नहीं आ रहा। यह व्यवस्था इसलिए की गयी थी ताकि जनता अपने घरों के आसपास के ख़ाली प्लाटों या चौक चौराहों पर कूड़ा न फेंके। अब जबकि वही कूड़ा उठाने वाला जोकि ठेका प्रणाली पर अपनी सेवाएं दे रहा था,नहीं आ रहा है,ऐसे में जनता के सामने क्या विकल्प है ? कहाँ ले जाए जनता अपने घरों का कूड़ा? यदि सरकार कूड़ा उठाने हेतु अपनाई गयी ठेका प्रणाली को सुचारु नहीं रख सकी तो इसमें जनता का क्या दोष है? आज यदि शहर की हालत देखें तो शायद पहले से भी बदतर हो रही है। जगह जगह कूड़े के ढेर पड़े रहते हैं। नालियां व नाले जाम पड़े रहते हैं। लोगों ने फिर से अपने घरों के ही आसपास कूड़ा फेंकना शुरू कर दिया है। गोया सरकार के स्वच्छता के दावों की पोल अच्छी तरह से खुल चुकी है।
केवल ठेके पर काम करने वाले ही नहीं बल्कि नियमित सफ़ाई कर्मचारी भी मोहल्लों की नालियों की सफ़ाई सुचारु रूप से नहीं कर रहे हैं। कई कई महीने तक गलियों में नाली की सफ़ाई नहीं हो पाती। अनेक लोगों ने अपने घरों के सामने की नाली की सफ़ाई स्वयं करनी शुरू कर दी है। परन्तु नाली से निकला गया गन्दा कीचड़ उठाने भी कोई नहीं आता। यदि आप इसकी शिकायत दर्ज कराईये तो शायद एक सप्ताह बाद दुबारा याद दिलाने पर कोई कर्मचारी नाली तो साफ़ कर जाएगा परन्तु वह भी निकाला गया नाली का कचरा नाली के बाहर ही ढेर करदेगा। उसे उठाने के लिए आपको पुनः शिकायत दर्ज करवानी पड़ेगी। परन्तु इस बात की कोई गारंटी नहीं कि आपकी दूसरी शिकायत पर कोई कर्मचारी आएगा भी या नहीं। हाँ शिकायत करने पर आने वाला कर्मचारी अपना काम पूरा करने से पहले ही आपसे इस बात के लिए हस्ताक्षर ज़रूर करा लेता है कि आपकी शिकायत का निवारण कर दिया गया है। अब यदि आप इसी सफ़ाई कर्मचारी से यह पूछें कि महीनों से सफ़ाई कर्मी लापता क्यों है तो जवाब मिलेगा की ‘अधिकारियों ने बड़े नालों की सफ़ाई के लिए अधिकांश कर्मचारी तैनात कर दिए हैं’। इसका सीधा सा अर्थ है कि सरकार के पास काम ज़्यादा है जबकि कर्मचारी कम। ऐसे में क्या यह ज़रूरी नहीं कि विज्ञापनों के माध्यम से अपनी पीठ पथपथपाने पर पैसे ख़र्च करने के बजाए कर्मचारियों की भर्ती पर पैसे ख़र्च हों ? क्या यह ज़रूरी नहीं कि बेतहाशा ख़रीद फ़रोख़्त करने व फ़ुज़ूल के निर्माण कार्यों पर पैसे ख़र्च करने की जगह कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जाए? ठेके पर कूड़ा उठाने की व्यवस्था जनता पर इसलिए और भी भारी पड़ रही है कि हरियाणा सरकार द्वारा अनेक नगरवासियों से 40 रूपये प्रति माह के दर से तीन वर्षों के पैसे यानी 480 रूपये प्रतिवर्ष के हिसाब से 1440 रूपये पेशगी वसूल कर लिए गए हैं। इसके लिए सरकार ने यह नियम बनाया है कि यदि आपको अपने किसी कार्य के लिए नगरपालिका से अनापत्ति प्रमाण पत्र चाहिए तो आपको नगरपालिका के सारे बक़ाया टैक्स व बक़ाया सफ़ाई शुल्क आदि देने होंगे। अब ज़रा सोचिये कि सफ़ाई वाला या कूड़ा उठाने वाला तो आ नहीं रहा है परन्तु आपको उसका शुल्क ज़रूर देना पड़ेगा। अन्यथा अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं मिल सकेगा। सरकार की इस प्रकार की नीतियों से स्पष्ट है कि सरकार का ध्यान जनहित में नहीं बल्कि विज्ञापनों के भ्रमजाल फैलाने में लगा है। सरकार के पास अपने देशवासियों को स्वच्छ वातावरण उपलब्ध करने की क्षमता तो दिखाई नहीं देती परन्तु विदेशियों को नागरिकता देकर वोट की राजनीति करने में अपना पूरा ध्यान ज़रूर लगा रही है। इस समय देश को फ़ुज़ूल की बहसों में बिकाऊ मीडिया ने इतना उलझा दिया है कि न तो कोई सफ़ाई के विषय पर बात हो रही है न ही मंहगाई जैसे जनसरोकार से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण विषय पर। पूरे देश को मंदिर,एन आर सी और सी ए ए के खेल में उलझा दिया गया है जबकि पूरे देश में आवारा पशुओं का आतंक फैला हुआ है। रोज़ाना दर्जनों दुर्घटनाएं सड़कों पर घूमते सांड़ों व गायों की वजह से हो रही हैं। गौ माताएं कूड़े के ढेरों की ‘शोभा’ बढ़ा रही हैं। लगभग हर प्लाट या मैदान गार्बेज डंपिंग ग्राउंड बना पड़ा है जहाँ सांड़ व गायों द्वारा प्लास्टिक का कचरा खाया जा रहा है। परन्तु सरकारों को न कूड़े के रूप में फैली गंदगी से मतलब न ही गौमाता की दुर्दशा से कोई वास्ता,न बीमारी फैलने का कोई भय। बस केवल विज्ञापन या झूठा गऊ प्रेम दिखाकर स्वयं को भारतीय संस्कृति का रखवाला बताना ही इनका उद्देश्य रह गया लगता है। निश्चित रूप से सरकार द्वारा घोर अस्वच्छता के मध्य स्वच्छता के दावे किये जा रहे हैं।

विषमता पर प्रतिबंध क्यों नहीं ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आज आई आक्सफोम की एक रपट ने मुझे चौंका दिया। उसके मुताबिक भारत के एक प्रतिशत अमीरों के पास देश के 70 प्रतिशत लोगों से ज्यादा पैसा है। ज्यादा याने क्या ? इन एक प्रतिशत लोगों के पास 70 प्रतिशत लोगों के पास जितना पैसा है, उससे चार गुना ज्यादा है। सारी दुनिया के हिसाब से देखें तो हाल और भी बुरा है। दुनिया के 92 प्रतिशत की संपत्ति से दुगुना पैसा दुनिया के सिर्फ एक प्रतिशत लोगों के पास है। दूसरे शब्दों में दुनिया में जितनी अमीरी बढ़ रही है, उसके कई गुने अनुपात में गरीबी बढ़ रही है। भारत में हमारी सरकारें कमाल के आंकड़े उछालती रहती हैं। वे अपनी पीठ खुद ही ठोकती रहती हैं। वे दावे करती हैं कि इस साल में उन्होंने इतने करोड़ लोगों को गरीबी रेखा के ऊपर उठा दिया है। इतने करोड़ लोगों में साक्षरता फैला दी है लेकिन दावों की असलियत तब उजागर होती है, जब आप शहरों की गंदी बस्तियां और गांवों में जाकर आम आदमियों की परेशानियों से दो-चार होते हैं। आप पाते हैं कि भारत के शहरी, शिक्षित और ऊंची जातियों के 20-25 करोड़ों लोगों को आप छोड़ दें तो 100 करोड़ से भी ज्यादा लोगों के पास रोटी, कपड़ा, मकान, चिकित्सा और शिक्षा की न्यूनतम सुविधाएं भी नहीं है। सच्चाई तो यह है कि इन्हीं वंचित लोगों के खून-पसीने की कमाई से देश में बड़ी पूंजी पैदा होती है और उस पर मुट्ठीभर लोग कब्जा कर लेते हैं। समाजवाद इसी बीमारी का इलाज था लेकिन वह भी प्रवाह पतित हो गया। अब समाजवाद के पुरोधा देश भी पूंजीवाद और उपभोक्तावाद के चेले बन गए हैं। इस समय देश को आर्थिक प्रगति की जितनी जरुरत है, उससे ज्यादा जरुरत आर्थिक समानता की है। यदि संपन्नता बंटेगी तो लोग ज्यादा खुश रहेंगे, स्वस्थ रहेंगे। वे ज्यादा उत्पादन करेंगे। उनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा। सरकार चाहे तो पूरे देश में नागरिकों की आमदनी में, वेतन में, खर्च में एक और दस का अनुपात बांध दे। फिर देखें कि अगले 5-10 साल में ही चमत्कार होता है या नहीं ?

क्या म.प्र. पुलिस की शाख खत्म की राजेन्द्र चतुर्वेदी ने?
नईम कुरेशी
मध्य प्रदेश यूँ तो उत्तर भारत के राज्यों में शांति का टापू जैसा कहा व माना जाता था पर 95-96 के बाद ये कहना गलत हो चुका था कि ये शांति का टापू है और यहां सामाजिक न्याय का पक्ष भी कभी लिया जाता था। इन्दौर के पन्नालाल, रामलाल वर्मा से लेकर ग्वालियर में आशिफ इब्राहीम जैसे चन्द पुलिस कप्तान रहे थे जो न्याय का पक्ष लेने में सियासी बॉसों से डरते नहीं थे। जबसे राजेन्द्र चतुर्वेदी जैसे भ्रष्ट पुलिस अधीक्षक साहेबान म.प्र. में आये तब से यहां पुलिस की साख पर दाग लगने शुरू हो गये थे। राजेन्द्र चतुर्वेदी को भ्रष्टाचार के मामले में हाल ही में भोपाल की एक अदालत 5 साल की सजा सुना चुकी है, वो अब जेल में हैं। हैरत की बात है कि राजेन्द्र चतुर्वेदी शुरू से ही भ्रष्टाचार करने वाले बद्मिज़ाज अफसर रहे थे फिर भी वो ग्वालियर, भिण्ड, छतरपुर, सागर जैसे बड़े व संवेदनशील जिलों में कप्तान बनाकर रखे गये थे।
राजेन्द्र चतुर्वेदी जहां बद्मिज़ाज थे वहीं उनकी खासियत ये भी थी कि वो बहादुर भी रहे थे। उन्होंने डकैतों खासतौर से मलखान सिंह व फूलनदेवी को मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने आत्मसमर्पण कराने के लिये जोखिम भी उठाया था। इनाम के तौर पर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने उन्हें ग्वालियर का पुलिस कप्तान बना दिया था जहां वो महज 6 माह ही टिक पाये थे। उनकी कप्तानी के दौरान पुलिस प्रशासन में उनकी पत्नी दीपा का काफी हाथ रहता था। थानेदारों की पदस्थापना में वो दखल देती रहती थीं। आला अफसरों तक को अपनी सियासी पहुंच का रौब भी दीपा बताती थीं। नतीजे में उन्हें ग्वालियर से हटाकर छोटे से जिले छतरपुर, सागर आदि भेजा जाता रहा था। उनके लगातार किस्से कहानियां अखबारों में छपते फिर भी सरकार उन पर चतुर्वेदी सरनेम के कारण महरबान बनी रही। 12 विभागीय जांचों के बाद भी उन्हें लगातार पदोन्नतियां दे दी गइऔ जहां मात्र एक दो विभागीय जांचों के चलते दलित आय.पी.एस. बनी सिंह, एस.आर. चौधरी को सरकार ने एक भी पदोन्नतियां नहीं दी थीं।
राजेन्द्र चतुर्वेदी पर प्रदेश सरकार की लगातार कृपा इतने खराब रिकॉर्ड के बाद भी बनी रही। कुछ आला अफसरान भी उन पर कृपा बनाये हुये थे। आखिर क्यों ये अब जांच का विषय होना चाहिये। इन्ही जैसे अफसरों ने मध्य प्रदेश पुलिस की साख आम जनता में नीलाम कर डाली थी वरना मध्य प्रदेश में पुलिस भी, आम प्रशासन भी उत्तर प्रदेश, बिहार की तुलना में काफी बेहतर माना जाता रहा था। प्रदेश में कलेक्टर के तौर पर ग्वालियर के कलेक्टर शिवराज सिंह, पी.नरहरि, राकेश श्रीवास्तव की लोकप्रियता किसी सियासतदां से भी ऊपर रही थी। इन्दौर में डॉ. भागीरथ प्रसाद भी लोकप्रिय कलेक्टर रहे थे। भिण्ड में होशियार सिंह को भी लोकप्रिय व आम आदमी का खास आदमी बताया गया था।
नेहरू भी ले जा चुके हैं म.प्र. से अफसर
मध्य प्रदेश में जहां प्रकाशचन्द्र सेठी, अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह लोकप्रिय कलेक्टर रहे थे वहीं सखलेचा व सुन्दर लाल पटवा भी जनता के लिये अच्छे काम वाले नेता कहे गये थे। मध्य प्रदेश से ही जवाहरलाल नेहरू दिल्ली के विकास हेतु भोपाल के कमिश्नर सहाय को तत्कालीन मुख्यमंत्री डी.पी. मिश्रा की सलाह पर ले जा चुके थे। मध्य प्रदेश में एम.एन. बुच, जी.एन.बुच से लेकर सुषमानाथ, सुधीरनाथ व अजयनाथ साहब गज़ब के ईमानदार अफसरान रह चुके हैं। अजयनाथ ने कमाल का काम आम लोगों के लिये ग्वालियर, रायपुर कलेक्टर के तौर पर किया था। उन्हें उच्चशिक्षा के आयुक्त के तौर पर भी काफी सराहा जा चुका था।
मध्य प्रदेश में आमतौर से 40 फीसदी गरीब आदिवासी दलित व कमजोर तब्कों के मुसलमान व पिछड़ी जातियों के दबे कुचले लोग रहते आ रहे हैं। यहां का संवेदनशील प्रशासन ही यहां के गरीबों की लाठी रही थी पर बीच में 20 सालों में संवेदनशील प्रशासन कुछ कम रहा था कहीं कहीं गायब भी था पर अब कुछ संवेदनशीलता प्रशासन में बढ़ी लगती है जबसे माफियाओं के खिलाफ प्रदेश सरकार ने मुहिम चलाई है। मिलावटखोरों पर कुछ अंकुश लगता दिखाई दे रहा है। अस्पतालों के कहीं-कहीं हालात भी सुधरे हैं व अभी भी स्कूलों पर कुछ खास असर नहीं दिखाई दे रहा है। सिफारसी शिक्षक सियासतदां के संरक्षण में 50 फीसदी तक स्कूलों से गायब देखे जाते रहे हैं। कुछ अच्छे लोगों को अभी भी वल्लभ भवन में बिठाकर रखा गया है जो काबिल आय.ए.एस. हैं उन्हें फील्ड में तैनात नहीं किया जा रहा है। ऐसे लोग दलित व पिछड़े ज्यादा हैं। कमलनाथ व राजा दिग्विजय सिंह को इस तरफ देखना होगा वरना पहले की सरकार में और आज की सरकार में फर्क ही क्या होगा। अभी पिछली सरकारों के दौर में मलाई काट रहे संघ परिवार से जुड़े लोग मौजूद देखे जा रहे हैं, उन्हें हटाया नहीं जा रहा है।

मस्जिद में हिंदू विवाह
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
केरल के कायमकुलम कस्बे के मुसलमानों ने सांप्रदायिक सदभाव की ऐसी मिसाल कायम की है, जो शायद पूरी दुनिया में अद्वितीय है। उन्होंने अपनी मस्जिद में एक हिंदू जोड़े का विवाह करवाया। निकाह नहीं, विवाह ! विवाह याने हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार मंत्र-पाठ, पूजा, हवन, द्वीप-प्रज्जवलन, मंगल-सूत्र आदि यह सब होते हुए आप यू-टयूब पर भी देख सकते हैं। शरत शशि और अंजु अशोक कुमार के इस विवाह में आये 4000 मेहमानों को शाकाहारी प्रीति-भोज भी करवाया गया। विवाह के बाद वर-वधु ने मस्जिद के इमाम रियासुद्दीन फैजी का आशीर्वाद भी लिया। चेरावल्ली मुस्लिम जमात कमेटी ने वर-वधु को 10 सोने के सिक्के, 2 लाख रु. नकद, टीवी, फ्रिज और फर्नीचर वगैरह भी भेंट में दिए। इस जमात के सचिव नजमुद्दीन ने बताया कि वधु अंजू के पिता अशोक कुमार उनके मित्र थे और 49 वर्ष की आयु में अचानक उनका निधन हो गया था। खुद नजमुद्दीन गहनों के व्यापारी हैं और अशोक सुनार थे। अशोक की पत्नी ने अपनी 24 साल की बेटी अंजू की शादी करवाने के लिए नजमुद्दीन से प्रार्थना की। उनकी अपनी आर्थिक स्थिति काफी नाजुक थी। नजमुद्दीन को मस्जिद कमेटी ने अपना पूरा समर्थन दे दिया। और फिर यह कमाल हो गया। इस काम ने यह सिद्ध कर दिया है कि हमारे देश का मलयाली समाज कितना महान है, कितना दरियादिल है और उसमें कितनी इंसानियत है ! ऐसे ही विवाह या अन्य संस्कार हमारे मंदिरों, गिरजों और गुरुद्वारों में क्यों नहीं हो सकते ? यदि ये भगवान के घर हैं तो फिर ये सबके लिए क्यों नहीं खुले हुए हैं ? यदि ईश्वर सबका पिता है तो पूरा मानव-समाज एक-दूसरे के रीति-रिवाजों का सम्मान क्यों नहीं कर सकता ? लेकिन दुर्भाग्य यह है कि मजहब के नाम पर सदियों से निम्नतम कोटि की राजनीति होती रही है। धर्म-ध्वजियों या मजहबियों ने अपने बर्ताव से यह सिद्ध कर दिया है कि ईश्वर मनुष्यों का पिता नहीं है, मनुष्य ही ईश्वर के पिता हैं। मनुष्यों ने अपने-अपने मनपसंद भगवान घड़ लिये हैं और उन्हें वे अपने हिसाब से आपस में लड़ाते रहते हैं। उन्हें एक-दूसरे से ऊंचा-नीचा दिखाते रहते हैं। मस्जिद में हिंदू विवाह करवाकर मलयाली मुसलमानों ने सिद्ध कर दिया है कि वे पक्के मुसलमान तो है ही, पक्के भारतीय भी है। वे ऊंचे इंसान हैं, इसमें तो कोई शक है ही नहीं।

छपाक, छपास और विवाद
अनिल बिहारी श्रीवास्तव
दो शब्द हैं, छपाक और छपास। इनका उपयोग बहुत आम है। इन दिनों दोनों ही मीडिया में खासा स्पेस बटोर रहे हैं। ऐसे त्रिभुज की कल्पना करें जिसके तीन कोण छपाक, छपास और दीपिका हैं। दीपिका पादुकोण की ताजा फिल्म छपाक है। दीपिका हिंदी फिल्मों की लोकप्रिय अभिनेत्रियों में हैं, स्वाभाविक है कि छपाक की चर्चा होगी। बाक्स आफिस पर इसके रुतबे का फैसला अवश्य समय करेगा। अब सवाल यह है कि दीपिका और छपास के बीच क्या संबंध है? हाल ही में मीडियाई बहसों में छपास शब्द की धूम देखी गई। छपाक के रिलीज से पहले प्रमोशन कैम्पेन पर निकलीं दीपिका पादुकोण जेएनयू में हिंसक घटना के विरोध में छात्रों के एक वर्ग की सभा में जा पहुंचीं। इसके बाद बहसों में छपास शब्द गूंजने लगा। कुछ लोगों को सभा में दीपिका के जाने पर कोई बुराई नहीं दिखी। वो उनके साहस पर दाद दे रहे हैं। एक अन्य वर्ग मानता है कि दीपिका ने जाने-अनजाने में टुकड़े-टुकड़े गैंग का हौसला बढ़ाया है। इधर, बहिष्कार और समर्थन के आह्वानों के बीच छपाक रिलीज हो गई। भारतीय राजनीति और फिल्मों के इतिहास में पहली बार नई बात सामने आई। फिल्म के बहिष्कार के आह्वान पहले भी होते रहे हैं लेकिन पहली बार राजनेताओं का एक वर्ग किसी फिल्म की कामयाबी के लिए ऐड़ी-चोटी एक किए दिखा। रिपोर्टों के अनुसार लखनऊ में समाजवादी पार्टी ने सिनेमाघर बुक कर लोगों को मुफ्त में छपाक दिखाई। एनएसयूआई के सदस्य द्वारा छपाक की टिकट मुफ्त बाटे जाने की खबर भी सुनी गई।
जेएनयू के छात्रों की सभा में दीपिका पादुकोण कुछ बोलीं नहीं। उनकी मौन-मौजूदगी के अपने अर्थ हैं। छात्र कह रहे हैं दीपिका ने छात्रों पर हुए हमले का विरोध किया है और वह उनका साथ देने आईं थीं। इस दावे को खारिज नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, आलोचकों के अनुसार दीपिका चतुर प्रचारक हैं। मौका भुनाना उन्हें आता है। मुद्दा यह है कि दीपिका ने सभा में जाने का फैसला खुद लिया था या यह आइडिया किसी और का था? उन्हें छपाक या छपास में से किसके लिए जमावड़ा अनुकूल दिखा? नि:संदेह यह एक सधी पीआर कवायद थी। यानि, आम के आम और गुठलियों के दाम। असर दिखने लगा है। दीपिका अचानक कांग्रेस, वामदल और मोदी सरकार विरोधी लॉबी और पाकिस्तानियों की चहेती बन गईं। ऐसी पब्लिसिटी लाखों फूंक कर भी संंभव थी? दीपिका को हौसला बढ़ाने के लिए मोदी विरोधी टूट पड़े हैं। ट्वीटर पर उनके फालोअर्स की संख्या में 40 हजार का उछाल है। यहां एक तीसरा वर्ग भी है। उसे छपाक फिल्म से कोई शिकायत नहीं थी। उसे भारत तेरे टुकड़े होंंगे जैसे देश विरोधी नारे लगाने वालों के साथ दीपिका का मंच साक्षा करना नागवार गुजरा है। छपाक के बहिष्कार के बात यहीं से शुरू हुई। बहिष्कार आह्वान के पीछे पुख्ता तर्क हैं। सभा की तस्वीरें देखें। दीपिका के साथ कन्हैया कुमार दिखाई देता है। वह नारे लगा रहा है। सिर झुकाये मुग्ध दीपिका छपास के कल्पना-लोक में गोते से लगाते महसूस की जा सकतीं हैं। क्या कन्हैया पर आरोपों से दीपिका अनभिज्ञ थीं? उनकी इस मौन-मौजूदगी से ईमानदारी से पढऩे और पढ़ाने वालों को निराशा हुई है।
फिल्मी पंडित मानते हैं कि छपाक के हिट होने के आसार हंै। ऐसी भविष्यवाणियों गलत भी साबित होती रहीं हैं। औसत कारोबार की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। चार कांग्रेस शासित राज्यों ने बेहद कमजोर तर्कों के साथ छपाक को टैक्स फ्री कर दिया। क्या यह एक तरह से दीपिका को पुरस्कार जैसी बात नहीं हैै? कांग्रेस छपाक को फ्लाप नहीं होने देना चाहती। कांग्रेस के साथ वामपंथी और सपाई खड़े हैं। दीपिका के लिए दोनों हाथों में लड्डू वाली बात हो गई। बहरहाल, यहां छपाक और छपास की संक्षिप्त व्याख्या उचित होगी। छपाक क्या है? छपाक वह ध्वनि है जो किसी तरल पदार्थ पर चोट करने से उठती है। शायद ही कोई छपाक से अपरिचित होगा। किसी पर तरल पदार्थ तेजी से फेंकने से भी यह ध्वनि उठती है। बाल्टी में भरे पानी या सरोवर में भी इसे सुना जा सकता है। यह एक अलग अनुभव होता है। दूसरा शब्द छपास है। प्रेमरोग सरीखी अनुभूति देने वाले छपास की महिमा अपार है। आये दिन अपना नाम छपवाने के लिए अखबारों के दफ्तरों में मंडराने वालों के संदर्भ में कटाक्ष के रूप मं इसका उपयोग किया जाता रहा है। वैसे छपास का प्रभाव अब समूचे मीडिया में दिखाई देता है। समाज के सभी वर्गों में छपास के प्रति मोह व्याप्त दिखता है। अत: सिल्वर स्क्रीन से दर्शकों को चुधिंया देने वाले स्टारों तक यह प्रेमरोग फैला दिख रहा है तो आश्चर्य क्यों?
पूरे विवाद पर दीपिका पादुकोण की ओर से रहस्यमयी चुप्पी बनी रही। इसे अवश्य चौंकाने वाली बात कह सकते हंै। चुप्पी और दीपिका, कोई मेल नहीं हो सकता। विवाद पर पलटवार की मुद्रा वह अपनाती रहीं हैं। बात निहार पंडया, युवराज, रनवीर, सिद्धार्थ माल्या के संदर्भ में कतई नहीं की जा रही है। बात रणबीर सिंह की भी नहीं है। याद करें क्लीवेज कंट्रोवर्सी पर उनके ट्वीट को, क्या उसे भुलाया जा सकता है। एक टीवी शो के दौरान किसी के लिए कंडोम ब्रांड एंडोर्स करने का सुझाव, उनकी बेबाकी साबित करता है। 2015 में शार्ट फिल्म माय बॉडी, माय माइंड, माय च्वाइस भी एक मजबूत उदाहरण रहा है। इनसे दीपिका के मिजाज को समझ सकते हैं। कहना सिर्फ इतना है कि आपके मिजाज से किसी को लेना-देना नहीं लेकिन आप एक सेलीब्रेटी हैं, कुछ कदम फंूक कर उठाने की अपेक्षा आपसे की जा सकती है।

कब रुकेगा हादसों का सिलसिला
सिद्धार्थ शंकर
किसी भी हादसे का सबक यह होना चाहिए कि वह भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचाव का आधार बने। लेकिन रेल महकमे को शायद इस बात से बहुत सरोकार नहीं है कि ट्रेन हादसों पर काबू पाने के पर्याप्त इंतजामों को प्राथमिकता में शुमार किया जाए। माना कि पिछले कुछ वर्षों में रेल हादसों में कमी आई है और अब रेलवे हादसों को रोकने न सिर्फ गंभीर है बल्कि नई तकनीक का प्रयोग भी कर रहा है। लेकिन इन सबके बाद भी अगर कोई हादसा हो जाता है तो यह पूरी तैयारी को सवालों के घेरे में खड़ा कर देता है। अभी कुछ दिनों पहले ही रेल मंत्री पीयूष गोयल ने सुरक्षा और संरक्षा को लेकर तमाम दावे किए थे, मगर गुरुवार को कटक में हुए रेल हादसों ने दावों पर सवाल उठा दिए।
बता दें कि ओडिशा के कटक में गुरुवार सुबह भारी कोहरे की वजह से हुए ट्रेन हादसे में बड़ी संख्या में लोग घायल हो गए। इनमें से 6 की हालत नाजुक है। घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। कोहरे की वजह से घटनास्थल पर रेस्क्यू ऑपरेशन में भी देरी आई। ट्रेन मुंबई से भुवनेश्वर जा रही थी। खबर मिली है कि एक्सप्रेस ट्रेन के मालगाड़ी से टकराने की वजह से ट्रेन पटरी से उतर गई। कहा जा रहा है कि ये ट्रेन धुंध की वजह से मालगाड़ी से टकरा गई थी। अब इस हादसे को मौसम की मार मानें या मानव जनित, जांच के बाद पता चलेगा, मगर अभी तो हादसा हुआ है और यही माना जाना चाहिए।
यह बेवजह नहीं है कि एक ही प्रकृति की दुर्घटनाएं बार-बार होती हैं और उनमें लोगों की जान जाती है, रेलवे का भी भारी नुकसान होता है। वह लगातार हादसों में सिर्फ एक कड़ी है। अब एक आम हो चुकी रिवायत के मुताबिक मृतकों और घायलों के लिए मुआवजे और इलाज की घोषणा के साथ-साथ भविष्य में ऐसे हादसों पर लगाम लगाने के आश्वासन दिए जाएंगे। लेकिन इन आश्वासनों की जमीनी सच्चाई यह है कि एक दुर्घटना के बारे में लोग भूल भी नहीं पाते कि फिर कोई नया हादसा सामने आ जाता है। हो सकता है कि ताजा दुर्घटना में मरने वालों और हताहतों की तादाद बड़ी नहीं मानी जाएगी, लेकिन किसी भी हादसे में जान गंवाने वालों की संख्या कितनी भी क्यों न हो हो, उसका महत्व समान माना जाना चाहिए। सवाल है कि यात्री जब सुरक्षित सफर के मकसद से ट्रेन का सहारा लेते हैं और इसकी पूरी कीमत चुकाते हैं, तो गंतव्य तक पहुंचने के बीच वे जान जाने के जोखिम से क्यों गुजरें? विडंबना यह है कि पिछले कुछ समय से जितनी भी रेल दुर्घटनाएं हो रही हैं, उनमें से ज्यादातर में कारण चलती ट्रेन का पटरी से उतर जाना है। अनेक अध्ययनों में यह तथ्य दर्ज किया जा चुका है कि पटरियों पर ज्यादा दबाव पडऩे की वजह से वे समय से पहले कमजोर पड़ जाती हैं। इसके बावजूद पटरियों पर ट्रेनों के दबाव को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा इंतजामों को पुख्ता करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा पाते।
सवाल है कि ट्रेनों के संचालन से जुड़े बुनियादी पहलुओं पर ध्यान देना और उसे पूरी तरह सुरक्षित बनाना किसकी जिम्मेदारी है। पटरियों की गुणवत्ता से लेकर रेलवे क्रॉसिंग पर कर्मचारी के मौजूद नहीं होने जैसी दूसरी तमाम वजहों से अक्सर रेल दुर्घटनाएं होती रही हैं। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार बड़ी खामियों को पूरी तरह दुरुस्त करने के बजाय सरकार सुरक्षा के नाम पर यात्रा को ज्यादा से ज्यादा महंगी बनाने और बुलेट ट्रेन या दूसरी शानो-शौकत वाली ट्रेनों के परिचालन के लिए बढ़-चढ़ कर दावा करने में लगी है। रेलगाडिय़ों का सफर आम लोगों के लिए किस कदर मुश्किलों से भरा हो गया है, यह किसी से छिपा नहीं है। अपने गंतव्य तक जाने के लिए टिकट मिल पाने से लेकर समय पर कहीं पहुंच पाना अपने आप में एक आश्चर्य जैसा हो गया है। इसमें अब सफर के दौरान हादसों की वजह से जान पर जोखिम एक बड़ा सवाल है।

ये हैं दिगम्बर जैन संतों की मस्ती !
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
शायर जलाउद्दीन ने दिगम्बर पद को दिव्य ज्योति से अलंकृत करते हुए बताते हुए कहा हैं की वस्त्रधारी व्यक्ति की दृष्टि तो धोबी की ओर रहती हैं ——
मस्त बोलै मुहतसिव से कामजा, होगा क्या नंगे से तू ओहदा बरा.
हैं नज़र धोबी पैजामपोश की, हैं तजल्लीज़ेबरे उरीयंतनी .
नग्न दरवेश तार्किक से कहता हैं —“अरे भाई तू जा और अपना काम करतो दिगम्बर से ऊँचा नहीं बन सकता, वस्त्र धारक कीदृष्टि सदा धोबी पर रहती हैं, दिगम्बरत्व की शोभा देवी प्रकाश रूप हैं .या तो तुम नग्न दरवेशों से कोई सम्बन्ध न रखो अथवा उनके सदृश्य दिगम्बर और स्वाधीन बन जाओ .यदि तुम पूर्णतः दिगम्बर नहीं बन सकते तो अपने वस्त्रों को अल्पतम में रक्खो
आज से ३५० वर्ष पूर्व शाहजहां बादशाह के राज्य में मुस्लिम सूफी फ़कीर सरमद देहली में नग्न रूप में विहार करता था .उसका मज़ार दिल्ही की जमा मस्जिद में बाएं भाग में हैं . उसका कथन था “परमात्मा जिसमे दोष देखता हैं उसे वस्त्र पहना देता हैं, किन्तु जो निर्दोष हैं उसे नग्न रहने देता हैं ”
मैत्रेय -उपनिषद में दिगम्बरत्व को आनंद का कारण बताया हैं .हिन्दू अवधूत साधु दिगम्बर होते हैं .
देश -काल -विमुक्तोइस्म दिगम्बरं सुखोस्म्यहं .
भर्तहरि ने वैराग्य शतक में लिखा हैं —
एकाकी निस्पृहः शान्तः पाणि -पात्रो दिगम्बरः .
कदाशम्भो भविष्यामि कर्म -निर्मूलनक्षमः.
जिनकेहाथ ही पवित्र पात्र हैं, भिक्षा के द्वारा उपलब्ध अन्न ही भोजन हैं, दिशा ही वस्त्र हैं, पृथ्वी ही शैय्या हैं, परिग्रह रहित होना जिनकी परिणति हैं, जो स्वात्म संतोषी हैं तथा जो दैन्य समुदाय से दूर हैं ऐसी धन्य आत्माएं कर्मों का नाश करती हैं .राजश्री भर्तहरि ने कहा “भगवन ! वह दिन कब आएगा जब में अकेला लालसा रहित शांत कर पात्र वाला दिगम्बर बनकर कर्मनाश करने में समर्थ होऊंगा .
मुहम्मद जायसी ने पद्मावत में लिखा हैं —
कोई ब्रह्चारज पंथ लागे, कोई दिगम्बर अच्छा लागे
एक बादशाह ने किसी महात्मा के दर्शन से संतुष्ट हो कहा “महाराज! आपको जो चाहिए वह मुझसे मांग लीजिये ” वह साधु कहता हैं —
शहंशाह अक्ल तेरी मारी गयी हैं,
फकीरों को दौलत की परवा नहीं हैं
तमन्ना फकीरी में लाज़िम नहीं हैं,
धब्बा सफेदी में लाना नहीं हैं .
सम्पूर्ण विश्व का सूक्ष्म निरिक्षण किया गया, तार्किक अकलंक कहते हैं — इस जगत में भिन्न भिन्न उपासकों के विविध आराध्य देव हैं जिनकी वेशभूषा पृथक पृथक हैं, किन्तु किसी की वेश भूषा विश्व व्याप्त हैं .एक जिनेन्द्र की दिगम्बर मुद्रा ही सम्पूर्ण जगत के कण कण में, प्राणी प्राणी में विद्यमान पायी जाती हैं .
जैन दर्शन में समता भाव का स्थान सर्वोपरि हैं .भगवन पार्श्वनाथ के ऊपर कमठ का उपसर्ग हुआ तब वे अपनी आराधना से विचलित नहीं हुए —–
कियो उपसर्ग भयानक घोर, चली बहुतीक्षण पवन झकोर,
रहो दशहू दिशि में तमछाय,लगी बहु अग्नि लखि नहिजाय
सुरुनडन के बिन मुंड दिखाय, पड़े जल मूसलधार अथाय,
तबैं पदमावति कंत धनिन्द, चले जग आय जहाँ जिन चंद .
उपरोक्त कथानानुसार यह बात सिद्ध हो गयी की जैन दर्शन में दिगबरत्व एक अनिवार्यता हैं, वर्तमान में जब हाड कपकपाने वाली ठण्ड पड़ रही हैं तब जैन दिगम्बर साधु नग्न रहकर अपनी साधना /दिन चर्या में रत रहते हैं .जब हम कपड़ों के अंदर रहकर ठण्ड से मुक्ति नहीं पा रहे हैं तब वे नग्न किसी भी परिधान का सहारा न लेकर लकड़ी के तख़्त पर सोते हैं .इतनी गर्मी पड़ने पर भी वो बिना पखे, कूलर और ए सी तप साधना करते हैं और जीव हिंसा से बचने और बचाने के लिए वे एक स्थान पर रहकर चातुर्मास करते हैं .
वर्त्तमान में इंदौर में आने वाले आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज अपने संघ के साथ विराजित होने वाले हैं तो भोपाल में मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज संघस्थ विराजे हैं.
सही साधना, तपस्या, चर्या का दर्शन करना हो तो आप मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज के साथ अन्य मुनियों के दर्शन करअपने अपने को धन्यभागीबने
जैनधर्म की महिमा अपरम्पार हैं .जै हो गुरुदेव

जानलेवा मांझे पर सख्ती
सिद्धार्थ शंकर
मकर संक्रांति पर पतंगबाजी का दौर शुरू होते ही देश में कई जगह जानलेवा मांझे से जुड़ी घटनाएं सामने आने लगी हैं। यूपी के मुरादाबाद और हापुड़ के साथ गुजरात के मुरादनगर में मांझे ने राहगीरों को बुरी तरह घायल कर दिया। उनकी जान जाते-जाते बची। हालांकि, इससे पहले देश में कई लोग मांझे के चलते जान गंवा भी चुके हैं। देखा जाए तो पतंगबाजी दुनियाभर में मशहूर है। कई देशों में अलग अलग तरह के पतंगबाजी महोत्सव मनाए जाते हैं, जो वहां के पर्यटन को बढ़ावा देते हैं। एक-दूसरे की पतंग काट कर जीत का जो मजा मिलता है वह पतंगबाजों के लिए अद्भुत होता है। पतंग काटने में हवा का रुख और पतंग की कलाबाजी के साथ पतंग उड़ाने में इस्तेमाल होने वाली डोर यानी मांझा का भी खास महत्व होता है। पतंग में आगे की ओर अलग तरह के मांझे व लोहे के तार तक का प्रयोग होता है। पतंग के साथ लगे मांझे के बाद एक अलग किस्म की डोर लगाई जाती है। पतंग के साथ लगा मांझा ही दूसरी पतंग के मांझे को रगड़ता है और उसे काट देता है। मांझा दूसरी पतंग की डोर को काट सके, इस के लिए मांझे में कांच और लोहे का बुरादा लगाया जाता है। देश में कॉटन के धागे से तैयार डोर बनाई जाती है।
हाल के कुछ सालों में चीन से नायलॉन से तैयार की गई डोर बाजार में आने लगी है। नायलॉन की डोर आसानी से टूटती नहीं है। उस के ऊपर जब लोहे और कांच का बुरादा चढ़ाया जाता है तो यह कॉटन वाले मांझे से उड़ रही पतंग की डोर को आसानी से काट देती है। चाइनीज मांझे से पतंग के साथ उड़ाने वाले के हाथ भी कटने लगे हैं। सब से खतरनाक काम तो तब होता है जब कटी हुई पतंग किसी साइकिल या मोटरसाइकिल सवार के गले, मुंह या हाथ में लिपट जाती है। इससे कई बार गले की नसें तक कट जाती हैं। इस तरह की कई घटनाएं देश में घट चुकी हैं। अभी पिछले साल दिल्ली के तिमारपुर इलाके में 18 साल का युवक बाइक से कुछ सामान लाने निकला था, लेकिन बीच में एक कटी पतंग का धागा उसके गले में उलझ गया। तीखे मांझे से लैस धागे से उसकी गर्दन काफी गहराई तक कट गई और ज्यादा खून बहने से आखिरकार उसे नहीं बचाया जा सका।
खेल खेलना या मनोरंजन किसी का भी हक हो सकता है। लेकिन अगर वह किसी दूसरे और उस खेल से अनजान व्यक्ति के लिए जानलेवा बनता है तो इसे किस आधार पर सही ठहराया जा सकता है? पिछले कुछ सालों के दौरान पतंग के मांझे की वजह से लोगों की जान जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इस मसले पर काफी चिंता भी जताई गई और इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की बात भी कही गई, लेकिन आज भी हालत यह है कि इस तरह के जानलेवा धागों की खुले बाजार में बिक्री में कोई कमी नहीं आई है। प्रशासन की ओर से बरती गई इस लापरवाही और आम लोगों की गैरजिम्मेदारी की कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ रही है। देश में चाइनीज मांझे को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने प्रतिबंधित कर रखा है। बावजूद इसके चीन से आए मांझे लोगों की जान का सबब बन रहे हैं। नायलॉन के साथ सिंथैटिक मटेरियल से तैयार दूसरे मांझे खतरनाक होते हैं।
कानून के अनुसार इस तरह के मांझे से केवल पतंग उड़ाना ही गुनाह नहीं, बल्कि इस मांझे को बेचना भी बड़ा अपराध है। ऐनवायरनमैंट प्रोटेक्शन एक्ट 1986 की धारा-5 के अंतर्गत इस के इस्तेमाल पर पांच साल की सजा और एक लाख रुपए तक का जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है। यह निजी फर्म, कंंपनी अथवा सरकारी कर्मचारियों पर भी लागू होता है। भारत में चाइनीज नायलॉन के धागे की खपत शुरू हो गई। अब चाइनीज नायलॉन के धागे पर मांझा तैयार करना सरल हो गया है। कांच और लोहे के बुरादे को जब चावल के मांड के साथ इस पर लगाया जाने लगा तो यह कॉटन के धागे की तरह टूटता नहीं है। जल्दी न टूटने के कारण यह पतंग उड़ाने वालों के लिए भी खास हो गया। इस से अब दूसरी पतंग को काटना आसान हो गया है। इस कारण से चाइनीज नायलॉन से तैयार मांझा पतंगबाजी की पहली पसंद बन गया है।
बहरहाल, पतंग कटने के बाद धागा समेटने या फिर पतंग के साथ काफी निचले स्तर से गुजरता धागा आमतौर पर दिखाई नहीं देता यह अगर एक झटके से व्यक्ति के शरीर से गुजर भर जाए तो गहरा घाव तक हो सकता है। खासतौर पर मोटरसाइकिल की सवारी करने वाले लोगों की नजर चूंकि सड़क पर होती है, इसलिए धागे को देख पाना उनके लिए आमतौर पर मुश्किल होता है और कई बार वे उस जानलेवा धागे की चपेट में आ जाते हैं। यह कहा जाता है कि ये धागे चीन से भारतीय बाजारों में आ रहे हैं। हो सकता है कि यह तथ्य हो। लेकिन इसके अलावा भी पतंग के शौकीन लोग स्थानीय स्तर पर नायलॉन के धागों पर कांच का चूरा, खतरनाक अधेसिव, एल्यूमीनियम ऑक्साइड, जिरकोनिया ऑक्साइड और मैदा जैसी चीजों से तैयार लेप चढ़ा कर उसे मारक बना देते हैं। लेकिन सच यह है कि आज ये धागे कुछ लोगों के लिए पतंग काटने या इसके जरिए मनोरंजन करने का जरिया हैं तो किसी का गला भी कट जा रहा है। अब वक्त है कि खतरनाक मांझे को लेकर संवेदनशीलता बरती जाए और इसे रोकने के लिए कानून का पालन भी सुनिश्चित किया जाए।

रामचरितमानस में पारिवारिक व सामाजिक मूल्य बोध
-प्रो.शरद नारायण खरे
“ परिवार ही हमारे सामाजिक जीवन की आधारशिला है,जिसमें हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक सारी गतिविधियाँ संचालित होती हैं। हिन्दू परिवार का जीवन-दर्शन पुरूषार्थ पर आधारित है जो विश्व के अन्य समाजों के परिवारों का जीवन दर्शन नहीं है । अतः परिवार मनुष्य के सभ्य और सुसस्ंकृत होने का स्वाभाविक तारतम्य है जिसके माध्यम से मानव जीवन का उन्नयन होता हैं। ”
तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में परिवार के आदर्श और मर्यादा को स्थापित करने का सुन्दर प्रयास किया है यह प्रयास इतना प्रभावी है कि आचार्य शुक्ल लिखते हैं कि-
“ यदि भारतीय शिष्टता और सभ्यता का चित्र देखना हो तो इस राम समाज में देखिए। कैसी परिष्कृत भाषा में कैसी प्रवचन पटुता के साथ प्रस्ताव उपस्थित होते है किस गंभीरता और शिष्टता के साथ बात का उत्तर दिया जाता है छोटे-बड़े की मर्यादा का किस सरलता के साथ पालन होता है। ”
‘ मानस ’ में राम कैकेयी संवाद में कैकेयी की कठोर आज्ञा पर श्री राम मीठी वाणी में शिष्टता से कहते है।–
” सुनु जननी सोइ सुत बड़भागी।
जो पितु मातु वचन अनुरागी।
तनय मातु पितु तोष निहारा।
दुर्लभ जननि सकल संसारा। ’’
तुलसीदास जी ने परिवार में केवल आदर्श चरित्रों को ही नही अपितु यथार्थ चरित्रों को भी प्रस्तुत किया है। कैकयी,मंथरा ऐसे ही यथार्थ पात्र हैं,जो हर कुटुम्ब में मिल जाते हैं। राम वनवास के बाद भरत सिंहासन ग्रहण नहीं करते , भरत राम मिलाप की हृदयस्पर्शिता ‘मानस’ के पाठकों को भाव विभोर कर देती है। सीता का राम के साथ वन जाना ,वहीं सीता हरण के बाद राम द्वारा व्याकुल होकर सीता को ढूंढना ये सब वृतांत आदर्श कुटुम्ब की निर्मिति दर्शाते हैं। ‘’मानस ’’ में रचित ‘आदर्श’ आज भी समाज व परिवार के विकास के लिए उतने ही आवश्यक हैं, जितने की सोलवीं शती में थे।
गुरू शिष्य सम्बंध:-
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मानस में गोस्वामी जी ने ‘ गुरू महिमा ’ की महत्ता की असंख्य स्थानों पर चर्चा की है। बालकाण्ड के प्रारम्भ में ही ईश वन्दना के बाद गुरू महाराज की वन्दना करते हुए कहते हैं कि- ‘‘ श्री गुर पद नख मनि गन जोति/सुमिरत दिव्य दृष्टि हिय होती ।”
हर एक मंगल कार्य पर गुरू को दान देने और आशीर्वाद लेने का वर्णन मानस में किया गया है। राजा दशरथ की गुरू के प्रति भक्ति को वर्णित करते हुए कवि कहते है कि- ‘‘ जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल विभव बस करहीं। ”
भारतीय समाज में गुरू शिष्य सम्बंध बहुत ही घनिष्ठ था। समाज में उसकी स्थिति सर्वोच्च थी, अतः गोस्वामी जी ने भारतीय समाज में गुरू को प्राप्त आदरभाव,गरिमा और प्रतिश्ठा को ही मानस में प्रतिबिम्बित किया है ।
नारी का स्थान:- हिन्दू समाज में नारी के लिए सम्मान व मर्यादायुक्त दृष्टि रखी जाती थी।रामचरितमानस में लगभग हर वर्ग के प्रति प्रगतिशीलता दिखाई देती है,अतः तुलसी के स्त्री सम्बन्धी दृष्टिकोण को संकीर्ण कहना ,हमारा एकांकी दृष्टिकोण होगा। वस्तुतः हर लेखक अथवा कवि अपने युग के सापेक्ष रचना लिखता है। युग और सन्दर्भ बदल जाने पर उसके साहित्य के मूल्यांकन के आधार भी दोबारा बदल जाते है। यह सत्य है कि तुलसी के काव्य में नारी ,नारी धर्म अथवा पति सेवा में ही शोभा पाती है,किन्तु नारी की परतन्त्रता की पीड़ा तक पहुँचना भी , उस युग में प्रगतिशीलता थी। जो प्रमाणित करता है कि समाज में नारी की स्थिति व दशा को लेकर भी गोस्वामी में चेतना थी।
अंतत: कह सकते है कि पर्यावरण अर्थात जो हमारे चारों ओर विद्यमान है ,मनुष्य समाज में भी सामाजिक मूल्य व आदर्श चारों ओर मनुष्य को घेरे रहते हैं। गोस्वामी जी के सामाजिक मूल्यों के आदर्श का जीवन्त प्रतीक ‘ मानस ’ है जिसमें सामाजिक पर्यावरण चेतना अद्भुत रूप में मुखर हुई है।
“मानस सच में है’शरद’,सामाजिक श्रंगार ।
तुलसी बाबा ने दिया,हम सबको उपहार ।।”

शिक्षा संस्थानों की फिक्र
सिद्धार्थ शंकर
नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देश भर में मचे बवाल के बीच ऐसी अनिश्चितता की स्थिति बनती जा रही है, जिसमें यह कह पाना कठिन है कि कौन सही है और कौन गलत। अभी कुछ दिनों पहले देश के 100 से ज्यादा पूर्व नौकरशाहों ने खुला पत्र लिखकर कहा था कि देश को सीएए और एनआरसी की जरूरत नहीं है। सरकार देश के आर्थिक हालात को सुधारने पर ध्यान लगाए। नौकरशाहों के इस पत्र को सरकार के विरोध के स्वरूप लिया गया था। अब देश के 208 अकादमिक विद्वानों ने पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा है कि लेफ्ट विंग के लोग शिक्षा के माहौल को खराब रहे हैं। स्टूडेंट पॉलिटिक्स के नाम पर अतिवादी वामपंथी अजेंडे को आगे बढ़ाया जा रहा है। हाल में ही जेएनयू से जामिया औ एएमयू से जाधवपुर यूनिवर्सिटी तक में सामने आए घटनाक्रम से पता चलता है किस तरह से अकादमिक माहौल को खराब किया जा रहा है। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हुए हिंसक प्रदर्शनों और जेएनयू में हुई हिंसा के बाद लिखे गए इस पत्र को सरकार की ओर से अकदामिक जगत में समर्थन जुटाने की कोशिश माना जा रहा है। अभी ताजा पत्र के मजमूल को देखें तो पत्र लिखने वाले लोगों में कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलर भी शामिल हैं। पत्र में लिखा गया है कि लेफ्ट विंग के ऐक्टिविस्ट्स की मंडली देश में अकादमिक माहौल को खराब करने में जुटी है। पत्र को लिखने वालों में हरि सिंह गौर यूनिवर्सिटी के कुलपति आरपी तिवारी, साउथ बिहार सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कुलपति एचसीएस राठौर और सरदार पटेल यूनिवर्सिटी के वीसी शिरीष कुलकर्णी शामिल हैं। शिक्षण संस्थानों में लेफ्ट विंग की अराजकता के खिलाफ बयान शीर्षक से लिखे गए पत्र में कुल 208 अकादमिक विद्वानों के हस्ताक्षर हैं। शिक्षाविदों के इस पत्र के बाद देश में नए किस्म की बहस शुरू हो गई है। लेफ्ट विंग पर जिस तरह का निशाना साधा गया है, वह बता रहा है कि देश की शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा करने की जरूरत है और शैक्षिक परिसरों की व्यवस्था इस तरह से करने की जरूरत है, जिससे वहां पढऩे गए छात्र-छात्राओं को बेवजह के विवाद का शिकार न होना पड़े। इस तरह का माहौल बनाने के कई रास्ते हैं। पहला तो यह कि शिक्षा संस्थानों में सरकार छात्र राजनीति पर सरकार रोक लगाए। विश्वविद्यालयों में चुनाव कराने और नेतागिरी करने का मार्ग सरकार ने ही तैयार किया है। जब वहां राजनीति खत्म होगी तो सब अपने आप ही ठीक हो जाएगा। वैसे भी राजनीति करने के लिए पूरा देश पड़ा है, सैकड़ों की संख्या में राजनीतिक दल हैं। जो जिस चाहे अपना सकता है। दूसरा रास्ता यह हो सकता है कि कॉलेज या विश्वविद्यालयों में आने वाले छात्रों से बॉंड भरवाया जाए कि वे राजनीति नहीं करेंगे और ऐसी कोई हरकत नहीं करेंगे, जिससे किसी समुदाय या धर्म को ठेंस पहुंचे। इससे कुछ अंकुश तो जरूर लगेगा। पिछले कुछ वर्षों मेंं कैंपस की राजनीति में कटुता का माहौल बना है, उसने शिक्षा के मायनों को ही बदल दिया है। कॉलेज में अब पढ़ाई नहीं होती, सामने वाले गुट या संगठन को कैसे पछाडऩा है, इसकी रणनीति बनती रहती है। जेएनयू में पिछले दिनों हुई हिंसा इसी का परिणाम है। हिंसा के दौरान उन छात्र-छात्राओं को भय के माहौल से दो-चार होना पड़ा, जिनका कोई कसूर नहीं था और वहां वे अपने बेहतर भविष्य का सपना संजोकर पहुंचे थे। किसी ने आज तक उन छात्रों की सुध लेने की कोशिश नहीं की। हिंसा के जिम्मेदार रहे हों या देश में अमन का झंडा उठाए वामदल और गैर भाजपाई। आज कॉलेज की राजनीति के नाम पर हर पार्टी अपना मतलब साधने में जुटी है। कोई समर्थन में पत्र लिखा रहा है तो कोई विरोध में। मगर इस पत्र-राजनीति के चक्कर में शिक्षा संस्थानों की तरफ किसी का ध्यान नहीं है।

बुन्देली कविता की धूम और लोकप्रियता…!
नईम कुरेशी
बुन्देलखण्ड को मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के 20 जिलों की माटी माना जा सकता है जहां आल्हा ऊदल से लेकर रानी लक्ष्मीबाई, छत्रसाल, मामा माहिल जैसे वीर व महावीर हुये थे और वेदव्यास से लेकर जगनिक जैसे कवि, ईसुरी जैसे लोक कवि, गंगाधर व्यास, शिवनन्दन मिश्र, जलज जी, जो जगदीश खरे के नाम से भी प्रसिद्ध रहे थे। सीता किशोर खरे जी के नाम बिना सब सूना व अधूरा कहा जाता है। मान्यवर सीता किशोर जी से तो दो बार मिलने का भी अवसर श्योढ़ा में डॉ. कामिनी जी के साथ हुआ था 1994-95 में करीब, आपके काव्य संग्रहों में- “पानी, पानीदार है” काफी लोकप्रिय रहा है। डॉ. सीता किशोर जी ने अनेकों छात्रों की पी.एच.डी. भी कराइऔ। उन्होंने काफी मात्रा में दोहे भी लिखे।
हमारे बुन्देलखण्ड के दतिया, झांसी, जालौन, टीकमगढ़ में, सागर में, बांदा में हुये हैं। डॉ. श्यामसुन्दर सौनकिया व अन्य साहित्यकारों ने इस पर काफी कुछ लिखा है। जगनिक तो बुन्देली के सबसे प्राचीन व आदिकवि माने जा सकते हैं। वो महोबा के राजा के मित्र कवि थे। उन्होंने आल्हा ऊदल लिखकर देश दुनिया को अमरकृति दी है। लोगों का मानना है कि इससे ज्यादा लोकप्रिय गान देश दुनिया में शायद कोई दूसरा न हो।
बुन्देलखण्ड के मऊरानीपुर में जन्मे ईसुरी भी बुन्देली भाषा के काफी लोकप्रिय कवि कहे जाते रहे हैं। उनकी फागों पर दतिया के लोकेन्द्र नागर जी ने काफी कुछ लिखा है। 1990 में “बुन्देली विरासत” पुस्तक लिखने व डी.डी.1 पर फिल्म बनाने के दौरान मुझे नागर ने ये पुस्तक भेंट की थी। ईसुरी जी का लेखन, सादगी भरा व मौलिक लेखन है जो लोकजीवन से पूरी तरह जुड़ा हुआ है। ईसुरी जी भी किसी मायने में लोकप्रियता में कम नहीं रहे हैं। उनकी रचनायें फाग विधा में उनका सृजन माना जाता रहा है।
वर्मा पुरवार
बुन्देली इलाके में जन्मे होने के बाद भी मुझे डॉ. वृन्दावन लाल वर्मा जी के परिजनों व अयोध्या प्रसाद कुमुद जी व डॉ. राजेन्द्र पुरवार डॉ. हरिमोहन पुरवार के अलावा अन्य लोगों से जो बुन्देल साहित्य के महान नायक रहे हैं मिलने का खास अवसर नहीं मिल सका। श्योंढ़ा की डॉ. कामिनी से जरूर कई यादगार मुलाकातें हैं।
बुन्देली विरासत पर दिल्ली दूरदर्शन की 1993 में फिल्म बनाने के दौरान भाई साहब हरिमोहन पुरवार से गहरा सम्पर्क हुआ। उन्होंने बुन्देली की महान सेवा की अनेकों पुस्तकें लिखकर, अपने निजी निवास में बुन्देली म्यूजियम स्थापित कर पुरवार साहब खुद भी एक बुन्देली विरासत हो गये हैं।
बुन्देलखण्ड के कवियों में, लेखकों में, जालौन के डॉ. राधेश्याम योगी, गुरसराय के डॉ. शिवाजी चौहान, टीकमगढ़ के राजीव नामदेव, जालौन की डॉ. रेनू चन्द्र, डॉ. माया सिंह, डॉ. एल.आर. श्रीवास्तव, कृपा शंकर द्विवेदी, यूसुफ अंसारी, प्रिया श्रीवास्तव, रसूल अहमद सागर, मुजीब आलम, प्रो. भगवत दुबे आदि की रचनायें देखी जाती रही हैं। डॉ. रसूल अहमद साहब सागर का रचना संचार काफी बड़ा है। बुन्देली इलाके में जन्म चन्द बड़े अफसरान जालौन के सुभाष त्रिपाठी पूर्व पुलिस महानिर्देशक म.प्र. पुलिस व रमेश त्रिपाठी सचिव भारत सरकार जे.एम. कुरेशी साहब, सागर जिले के थे। यू.पी.एस.सी. के चैयरमैन रहे थे। काफी सम्पर्क भी रहा इन सबसे कुरेशी साहब ने ही मेरी पहली फिल्म बुन्देली विरासत बनवायी। इसके बाद केन्द्रीय रेलमंत्री माधवराव सिंधिया ने बनवायी थी। बुन्देलखण्ड के साहित्यकारों में सब एक से बढ़कर एक हैं। उन्होंने बुन्देली भूमि के गौरव को लगातार बढ़ाया है।
राजमाता व त्रिपाठी
बुन्देलखण्ड में जालौन से विधानसभा अध्यक्ष यू.पी. से चतुर्भुज शर्मा से लेकर ध्यानेन्द्र मामा राजमाता विजयाराजे सिंधिया से लेकर माधवराव जी सिंधिया, विद्यावती चतुर्वेदी, प्रहलाद पटेल, सत्यवृत चतुर्वेदी आदि काफी लोकप्रिय रहे है। मुझे राजमाता सिंधिया, ध्यानेन्द्र मामा व माधवराव सिंधिया से मिलने का 30-40 साल का गहरा अनुभव रहा। ये सब लोग महान व आम जनता के लिये गहराई से सोचने वाले दिखाई दिये। झांसी के दो बड़े अफसरान डॉ. प्रमोद अग्रवाल जो बंगाल में मुख्य सचिव रहे थे खुद भी 60 पुस्तकों के लेखक रहे हैं लोकप्रिय हैं, मिलनसार हैं। ओ.पी. रावत भी मुख्य चुनाव आयोग में रहे ईमानदार, निडर अफसरों में उनका नाम आता है, शशिकला खत्री अच्छी प्रशासनिक महिला अधिकारी के तौर पर लोकप्रिय हैं। डॉ. आर.एल.एस. सेंगर, अक्षय निगम, डॉ. के. जैन अच्छे लोकप्रिय डॉक्टर्स के तौर पर ग्वालियर व बुन्देलखण्ड में माने जाते हैं।

विश्व-हिंदीः नौकरानी है, अब भी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आज विश्व हिंदी दिवस है लेकिन क्या हिंदी को हम विश्व भाषा कह सकते हैं ? हां, यदि खुद को खुश करना चाहें या अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना चाहें तो जरुर कह सकते हैं, क्योंकि यह दुनिया के लगभग पौने दो सौ विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है (इनमें भारत के भी हैं), दुनिया के लगभग आधा दर्जन प्रवासी भारतीयों के देशों में किसी न किसी रुप में यह बोली और समझी जाती है और कई देशों में विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित होता रहा है। 1975 में प्रथम बार यह नागपुर में आयोजित हुआ है। लगभग 50 साल इस विश्व हिंदी सम्मेलन को आयोजित होते हुए हो गए लेकिन हिंदी की दशा आज भी भारत में नौकरानी की है। अंग्रेजी आज भी भारत की महारानी है और हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएं उसकी नौकरानियां हैं। देश में कांग्रेस और विरोधी दलों की इतनी सरकारें पिछले 72 साल में बनी लेकिन किसी प्रधानमंत्री की हिम्मत नहीं पड़ी कि इस अंग्रेजी महारानी को उसके सिंहासन से नीचे उतारे। भाजपा और नरेंद्र मोदी को 2014 में हम इसीलिए लाए थे। उनके लिए हमने अपना सारा अस्तित्व और संबंध दांव पर लगा दिए थे लेकिन इन पिछले साढ़े पांच वर्षों में हुआ क्या ? सिर्फ संयुक्तराष्ट्र में हिंदी का भाषण मोदी और सुषमा ने पढ़ दिया बाकी हर जगह आपको हिंदी वैसी ही पायदान पर बैठी मिलेगी, जैसी वह लाॅर्ड मैकाले के जमाने में बैठी हुई थी। कानून, चिकित्सा, इंजीनियरी, अंतरराष्ट्रीय राजनीति आदि किसी विषय की उच्च शिक्षा हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा में नहीं होती न कोई शोध होता है। सरकार के फैसले, संसद के कानून, अदालतों के फैसले, मरीजों का इलाज- ये सब काम अंग्रेजी में होते हैं। देश का ठगी का यह सबसे बड़ा कारोबार है। मैं अंग्रेजी या किसी विदेशी भाषा को स्वेच्छया पढ़ने-पढ़ाने का पूर्ण समर्थक हूं लेकिन जब तक स्वभाषा में काम नहीं होगा, यह भारत एक नकलची, फिसड्डी और पिछलग्गू देश बना रहेगा। हम हिंदी को विश्व भाषा तो जरुर कहते हैं लेकिन हमें यह कहते हुए जरा भी शर्म नहीं आती कि भारत के प्रांतों के बराबर जो देश हैं उनकी भाषाएं तो संयुक्त राष्ट्र संघ में मान्य है और हिंदी को वहां घुसने की भी इजाजत नहीं है।

आध्यात्मिक गुरु भी थे स्वामी विवेकानन्द
डॉक्टर अरविन्द जैन
स्वामी विवेकानन्द (जन्म: 12 जनवरी,1863 – मृत्यु: 4 जुलाई,1902) वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत “मेरे अमरीकी भाइयो एवं बहनों” के साथ करने के लिये जाना जाता है। उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था।
कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली परिवार में जन्मे विवेकानंद आध्यात्मिकता की ओर झुके हुए थे। वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से काफी प्रभावित थे जिनसे उन्होंने सीखा कि सारे जीव स्वयं परमात्मा का ही एक अवतार हैं; इसलिए मानव जाति की सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है। रामकृष्ण की मृत्यु के बाद विवेकानंद ने बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा किया और ब्रिटिश भारत में मौजूदा स्थितियों का पहले हाथ ज्ञान हासिल किया। बाद में विश्व धर्म संसद 1893 में भारत का प्रतिनिधित्व करने, संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए कूच की। विवेकानंद के संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में हिंदू दर्शन के सिद्धांतों का प्रसार किया , सैकड़ों सार्वजनिक और निजी व्याख्यानों का आयोजन किया। भारत में, विवेकानंद को एक देशभक्त संत के रूप में माना जाता है और इनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।
भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती, अर्थात १२ जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् १९८४ ई. को ‘अन्तरराष्ट्रीय युवा वर्ष’ घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की कि सन १९८४ से 12 जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयन्ती का दिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में देशभर में सर्वत्र मनाया जाए।ऐसा अनुभव हुआ कि स्वामी जी का दर्शन एवं स्वामी जी के जीवन तथा कार्य के पश्चात निहित उनका आदर्श—यही भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हो सकता है।
वास्तव में स्वामी विवेकानन्द आधुनिक मानव के आदर्श प्रतिनिधि हैं। विशेषकर भारतीय युवकों के लिए स्वामी विवेकानन्द से बढ़कर दूसरा कोई नेता नहीं हो सकता। उन्होंने हमें कुछ ऐसी वस्तु दी है जो हममें अपनी उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त परम्परा के प्रति एक प्रकार का अभिमान जगा देती है। स्वामी जी ने जो कुछ भी लिखा है वह हमारे लिए हितकर है और होना ही चाहिए तथा वह आने वाले लम्बे समय तक हमें प्रभावित करता रहेगा। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में उन्होंने वर्तमान भारत को दृढ़ रूप से प्रभावित किया है। भारत की युवा पीढ़ी स्वामी विवेकानन्द से निःसृत होने वाले ज्ञान, प्रेरणा एवं तेज के स्रोत से लाभ उठाएगी।
भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती, अर्थात १२ जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् १९८४ ई. को ‘अन्तरराष्ट्रीय युवा वर्ष’ घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की कि सन १९८४ से 12 जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयन्ती का दिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में देशभर में सर्वत्र मनाया जाए। भारत सरकार का विचार था कि –
ऐसा अनुभव हुआ कि स्वामी जी का दर्शन एवं स्वामी जी के जीवन तथा कार्य के पश्चात निहित उनका आदर्श—यही भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हो सकता है।
अमेरिका में दिया गया भाषण —
मेरे अमरीकी भाइयो और बहनो!
आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया हैं उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा हैं। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ; धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ; और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ।
मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत- दोनों की ही शिक्षा दी हैं। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था। ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है। भाईयो मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ जिसकी आवृति मैं बचपन से कर रहा हूँ और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं:
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥
अर्थात जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।
यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है:
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥
अर्थात जो कोई मेरी ओर आता है-चाहे किसी प्रकार से हो-मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।
साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई पूरे के पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये वीभत्स दानवी शक्तियाँ न होतीं तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया हैं और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टा ध्वनि हुई है वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो।
स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं –
१. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास हो सके।
२. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक के चरित्र का निर्माण हो, मन का विकास हो, बुद्धि विकसित हो तथा बालक आत्मनिर्भन बने।
३. बालक एवं बालिकाओं दोनों को समान शिक्षा देनी चाहिए।
४. धार्मिक शिक्षा, पुस्तकों द्वारा न देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा देनी चाहिए।
५. पाठ्यक्रम में लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार के विषयों को स्थान देना चाहिए।
६. शिक्षा, गुरू गृह में प्राप्त की जा सकती है।
७. शिक्षक एवं छात्र का सम्बन्ध अधिक से अधिक निकट का होना चाहिए।
८. सर्वसाधारण में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जाना चाहिये।
९. देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाय।
१०. मानवीय एवं राष्ट्रीय शिक्षा परिवार से ही शुरू करनी चाहिए।
रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था-“उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा-‘शिव!’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।
इस देश के गौरव को शत शत नमन ।।

निर्भया को न्याय
सिद्धार्थ शंकर
पूरे देश को झकझोर देने वाले निर्भया कांड में अदालत ने मंगलवार को चारों दरिंदों को डेथ वारंट यानी फांसी देने का समय तय कर दिया। सात साल पुराने मामले में पटियाला हाउस कोर्ट ने चारों दोषियों अक्षय सिंह, विनय कुमार शर्मा, मुकेश कुमार और पवन गुप्ता को 22 जनवरी की सुबह सात बजे फांसी देने का आदेश दिया। बता दें कि 16 दिसंबर, 2012 को दक्षिणी दिल्ली इलाके में चलती बस में 23 साल की पैरामेडिकल छात्रा ‘निर्भयाÓ से गैंगरेप किया गया था। 29 दिसंबर को सिंगापुर में इलाज के दौरान पीडि़ता की मौत हो गई थी। इस मामले में पुलिस ने बस चालक सहित छह को गिरफ्तार किया था। इनमें से एक नाबालिग भी था। उसे तीन साल तक सुधार गृह में रखने के बाद रिहा कर दिया गया था। एक आरोपी राम सिंह ने जेल में खुदकुशी कर ली थी। चारों आरोपियों को फांसी की सजा देने से निर्भया को भले ही इंसाफ मिल जाए, मगर देश में अब भी ऐसी कई निर्भया हैं जो इंसाफ के लिए इंतजार कर रही हैं। लगातार बढ़ते जा रहे बलात्कार के केस हमारी व्यवस्था को कोस रहे हैं। न्याय की गति बढ़ाने के उपाय मंद पड़े हैं। ऐसे में सिर्फ एक मामले में हुए न्याय को हम पूरे देश की बेटियों की जीत नहीं बता सकते। ऐसा कर हम उन बेटियों के घाव पर मरहम तो लगा सकते हैं, मगर उन्हें यह कह पाने का माद्दा नहीं रखते कि सभी का फैसला जल्द होगा। निर्भया कांड को ही देखें तो दोषियों को सजा देने में सात साल का वक्त लग गया। पीडि़त परिवार इन वर्षों में हर रोज मरकर जिया होगा। उसके दुख और पीड़ा की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। ऐसी न जाने कितनी पीडि़त होंगी, जो आज अपने दर्द से घुट-घुटकर मर चुकी होंगी। न्याय का इंतजार जितना लंबा होता है, उसकी टीस उतनी ही गहरी। इसलिए हमें एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जो कम से कम बलात्कार के मामलों में सजा देने की दर को बढ़ाए।
अगर निर्भया के मामले को ही देखें तो डेथ वारंट जारी होने के बाद भी चारों को फांसी की सजा 22 जनवरी को दी जाएगी, इसमें संदेह है। दोषियों के वकील यह दावा कर रहे हैं कि उनके पास अभी कुछ और कानूनी विकल्प हैं। नि:संदेह जघन्य अपराध के दोषियों को भी उपलब्ध कानूनी विकल्प इस्तेमाल करने का अधिकार है, लेकिन सबको पता है कि इन विकल्पों की आड़ में किस तरह तारीख पर तारीख का खेल खेला जाता है। यह केवल हास्यास्पद ही नहीं, बल्कि शर्मनाक भी है कि 2012 के जिस मामले ने पूरे देश को थर्रा दिया था, उसके दोषियों की सजा पर अमल अब तक नहीं हो सका है और वह भी तब, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला 2017 में ही सुना दिया था। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह न्याय प्रक्रिया की कच्छप गति को ही बयान करता रहा। न्याय प्रक्रिया की सुस्त रफ्तार से न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पदों पर बैठे लोग अनजान नहीं, लेकिन दुर्भाग्य से उन परिस्थितियों का निराकरण होता नहीं दिखता, जिनके चलते समय पर न्याय पाना कठिन है।
बलात्कार-हत्या जैसे जघन्य अपराधों में जिस तेजी से मामलों का निपटारा होना चाहिए, वह मौजूदा न्यायिक व्यवस्था में बेहद मुश्किल है। न्यायिक प्रक्रिया इतनी लंबी खिंचती चली जाती है कि कई बार न्याय की उम्मीद खत्म हो जाती है। निर्भया कांड को सात साल हो चुके हैं। लेकिन अभी तक बचाव पक्ष के लोग कानूनी दांवपेंचों का सहारा लेते हुए बचाव का कोई न कोई रास्ता निकालने की जुगत में हैं। वरना एक दोषी का वकील अदालत के समक्ष ऐसा विचित्र तर्क क्यों रखता कि दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के कारण जीवन छोटा होता है, उसके मुवक्किल के साथ अन्याय हुआ है, या उसका मामला मीडिया के दबाव से प्रभावित रहा है। जबकि हकीकत यह है कि इस मामले में मीडिया और देशभर में चले आंदोलन से जो दबाव बना, उसी से अदालतों ने भी इसमें फुर्ती दिखाई। वरना देशभर में हजारों मामले ऐसे होंगे जो सालों से लटके पड़े होंगे और जिनकी सुनवाई के बारे में किसी को कोई खबर नहीं होगी। अपराधी, आरोपी और दोषी न्यायिक व्यवस्था की इसी खामी का फायदा उठाते हैं और ज्यादातर मामलों में सजा नहीं हो पाती।
निर्भया कांड के बाद महिला सुरक्षा की दिशा में केंद्र सरकार ने जो कदम उठाए, जिस तरह के सख्त कानून बनाए, राज्यों को ऐसे मामलों से निपटने के लिए जो कड़े निर्देश दिए थे, वे एक तरह से बेअसर ही साबित हुए। राज्यों ने इस दिशा में कोई उल्लेखनीय कदम नहीं उठाया। बिहार, उत्तर प्रदेश सहित देश के तमाम राज्यों महिलाओं के प्रति ऐसे अपराधों का ग्राफ काफी ऊंचा है। उत्तर प्रदेश के उन्नाव कांड तक ने सबको हिला दिया था। आरोपी सत्तारूढ़ दल का विधायक था, इसलिए लंबे समय तक बचता रहा। सात साल में उत्तर प्रदेश में ऐसी न जाने कितनी वारदात हुई हैं, लेकिन किसी भी मामले में पीडि़त पक्ष को न्याय नहीं मिला। ऐसे मामलों के निपटारे के लिए कुछ दिन पहले ही उत्तर प्रदेश सरकार ने त्वरित अदालतोंके गठन का फैसला हुआ है। पीडि़तों को न्याय दिलाने के प्रति सरकार की उदासीनता एक बड़ी समस्या है। इसी से अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं। अदालतों की अपनी मजबूरियां हैं। स्थानीय पुलिस की भी इसमें बड़ी भूमिका रहती है। अपराधियों को अक्सर मिलने वाला राजनीतिक संरक्षण किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में महिलाएं कैसे सुरक्षित रहेंगी, यह गंभीर सवाल है।

तनाव है तो होने दे, इसमें बुरा क्या है?
डॉ नीलम महेंद्र
स्ट्रेस यानी तनाव। पहले इसके बारे में यदा कदा ही सुनने को मिलता था। लेकिन आज भारत समेत सम्पूर्ण विश्व के लगभग सभी देशों में यह किस कदर तेज़ी से फैलता जा रहा है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज हर जगह स्ट्रेस मैनेजमेंट अर्थात तनाव प्रबंधन पर ना सिर्फ अनेक जानकारियाँ उपलब्ध हैं बल्कि इस विषय पर अनेक रिसर्च भी की जा रही हैं। कहा जा सकता है कि आज तनाव ने एक ऐसी महामारी का रूप ले लिया है जो सीधे तौर पर भले ही जानलेवा ना हो लेकिन कालांतर में अनेक बीमारियों का कारण बनकर हमारे जीवन को जोखिम में अवश्य डाल देती है। हमारे बुजुर्गों ने भी कहा है, “चिंता चिता समान होती है”। लेकिन दिल थाम कर रखिए तनाव कितना भी बुरा हो लेकिन इस लेख के माध्यम से आपको तनाव के विषय में कुछ ऐसी रोचक जानकारियाँ दी जाएंगी जिससे तनाव के बारे में आपकी सोच ही बदल जाएगी और आप अगर तनाव को अच्छा नहीं कहेंगे तो यह तो जरूर कहेंगे कि “यार तनाव है तो होने दे, इसमें बुरा क्या है?”
यकीन नहीं है ? तो हो जाईए तैयार क्योंकि अब पेश है, तनाव के विषय में लेटेस्ट रिसर्च जो निश्चित ही आपके तनाव को कम करने वाला है।
सबसे पहले तो हमारे लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि हमारा शरीर कुदरती रूप से तनाव झेलने के लिए बनाया गया है, जीवन में यकायक आने वाली मुश्किलों से लड़ने के लिए ईश्वर द्वारा हमारे मस्तिष्क में कुछ डिफॉल्ट फंक्शन फीड किए गए हैं। इसे यूँ समझते हैं। कल्पना कीजिए आप जंगल में रास्ता भटक गए हैं और अचानक आपके सामने एक शेर आ जाता है, या फिर आप सुबह सुबह सैर के लिए निकलते हैं अचानक एक कुत्ता आपके पीछे पड़ जाता है। आपका दिल तेज़ी से धड़कने लगता है आपका रक्तचाप बढ़ जाता है आपको पसीना आने लगता है, आदि आदि। क्योंकि इस वक्त हमारा शरीर अतिरिक्त ऊर्जा से भर जाता है जो अब हमारे लिए जीवनरक्षक सिद्ध होने वाली है। आइए अब इसके पीछे की वैज्ञानिक प्रक्रिया को समझने की कोशिश करते हैं। जैसे ही आपका मष्तिष्क किसी खतरे को भांपता है, तो मस्तिष्क में मौजूद हाइपोथैलेमस ग्रंथी द्वारा एक अलार्म बजा दिया जाता है और हमारा पूरा शरीर “हाई अलर्ट” मुद्रा में आ जाता है। हमारे ही शरीर में मौजूद एक दूसरी ग्रंथी एड्रीनल ग्लैंड से हॉर्मोन का स्राव होने लगता है। ये हॉर्मोन हैं एड्रीनलीन और कोर्टिसोल। एड्रीनलीन हमारे दिल की धड़कन को बढ़ाता है, हमारे रक्तचाप को बढ़ाता है और हमारे शरीर को ऐसे समय अतिरिक्त ऊर्जा उपलब्ध कराता है। जबकि कोर्टिसोल हमारे रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ाता है ताकि हमारे सेल्स को काम करते रहने की शक्ति मिले साथ ही रक्त में ऐसे पदार्थों की उपलब्धता भी निश्चित करता है जिससे घायल होने वाले ऊतकों की रिपेयरिंग की जा सके। इतना ही नहीं यह हमारे पाचन तंत्र की क्रियाशीलता कम कर देता है जिससे इन परिस्थितियों में हमारी भूख मर जाती है और हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देता है। परिस्थिति सामान्य होते ही हमारा मष्तिष्क स्वयं इन ग्रंथियों के स्राव को रोक देता है और हमारे दिल की धड़कन रक्तचाप भूख, सभी क्रियाएँ सामान्य होने लगती हैं। सोच कर देखिए अगर वाकई में आपका सामना एक शेर से हो जाए तो तनाव के उन क्षणों में हमारे शरीर में होने वाले ये परिवर्तन हमारे लिए वरदान हैं कि नहीं? तो अब आप क्या कहेंगे? तनाव अच्छा है या बुरा? तो आइए यह अच्छा है या बुरा इसका उत्तर देने से पहले हम इसके अच्छा होने से लेकर बुरा बन जाने तक के सफर को भी समझ लेते हैं।
दरअसल जब धरती पर मानव जीवन की शुरुआत हुई थी तो वो जंगलों में जंगली जानवरों के बीच था। उस समय के तनाव ये ही होते थे कि किसी खूँखार जानवर से सामना हो गया। ऐसे समय में हमारे शरीर की यह प्रतिक्रियाएं वरदान साबित होती थीं लेकिन आज हमारे तनाव का रूप बदल गया है। आज हमारे सामने आर्थिक दिक्कत, टूटते परिवारों के परिणाम स्वरूप भावनात्मक असुरक्षा की भावना, व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता, तरक्की अथवा स्टेटस की परवाह जैसे मानसिक तनाव के अनेक कारण उपलब्ध हैं। इस प्रकार के तनाव की स्थिति का कोई व्यक्ति कैसे सामना करता है यह उसके व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। जैसे कोई ऐसी परिस्थितियों को एक चुनौती के रूप में स्वीकार कर सकता है तो कोई इन परिस्थितियों में अवसाद में चला जाता है। तनाव होने की स्थिति में हमारी प्रतिक्रिया ही वो बारीक सी रेखा है जो तनाव के अच्छा या बुरा होने के बीच की दूरी तय करती है। यही इसके अच्छे होने से लेकर इसके बुरा बन जाने तक का सफर है।
दरअसल यू एस में आठ सालों तक 30,000 लोगों पर एक प्रयोग किया गया। इस प्रयोग में उन लोगों को शामिल किया गया जो अलग अलग कारणों से तनावग्रस्त जीवन जी रहे थे। उन्हें यह समझाया गया कि यह तनाव उनके लिए अच्छा है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जिन लोगों ने इस विश्वास के साथ स्ट्रेस का सामना किया कि यह स्थिति उनके लिए अच्छी है उन्हें तनाव से कोई नुकसान नहीं पहुंचा लेकिन जिन लोगों ने तनाव का सामना तनाव के साथ किया उन्हें ना सिर्फ अनेक बीमारियाँ हुईं बल्कि उनमें मृत्यु की संभावना 43% बढ़ गई। इस रिसर्च से यह बात सामने आई कि लोगों की मौत का कारण तनाव नहीं बल्कि तनाव के प्रति उनकी प्रतिक्रिया है। ये बिल्कुल वैसा ही था जैसे कि अधिकांश लोग साँप के द्वारा डसे जाने पर उसके जहर से नहीं बल्कि शॉक से मरते हैं। तनाव के प्रति अपनी सोच को बदलकर हम अपने शरीर के उसके प्रति रेस्पॉन्स को बदल सकते हैं। क्योंकि इस रिसर्च में यह बात सामने आई कि जो लोग तनाव में थे स्वाभाविक रूप से उनकी ग्रंथियों से होने वाले हार्मोनल स्राव से उनका दिल तेज़ी से धड़कने लगा और शरीर के बाकी सेल्स को तीव्रता से रक्त पहुंचाने के लिए उनकी धमनियां सिकुड़ने लगीं। किन्तु जिन लोगों ने तनाव का कोई तनाव नहीं लिया और यह विश्वास किया कि यह तनाव उनके लिए अच्छा है, दिल उनका भी तेजी से धड़क रहा था लेकिन उनकी धमनियाँ संकुचित नही रिलैक्स्ड थीं। यह सब बहुत कुछ वैसा था जैसा वो खुशी के माहौल में या वीरतापूर्ण कार्यों में हमारी धमनियों में रक्त का संचार तो सामान्य से अधिक गति से होता है लेकिन वे संकुचित नहीं होतीं। यह बायोलॉजिकल बदलाव कोई छोटा मोटा बदलाव नहीं था। तनाव के विषय में यह नई खोज बताती है कि हम तनाव के विषय में कैसा सोचते हैं बेहद महत्वपूर्ण है। अगर हम यह सोचते हैं कि यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसकी मदद से मेरा शरीर आने वाली चुनौती का सामना करने के लिए मुझे तैयार कर रहा है तो निश्चित ही हमें सकारात्मक परिणाम मिलते हैं। तो अब उम्मीद है की तनाव की स्थिति में हम यह कहेंगे ,डू नॉट वरी बी हैप्पी आल इस वेल

जेएनयू का गुस्सा
सिद्धार्थ शंकर
जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में रविवार शाम बड़ी हिंसा हुई। लाठी-डंडे, हॉकी स्टिक से लैस नकाबपोश हमलावरों ने यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स और टीचरों को बेरहमी से पीटा। इसमें 25 से ज्यादा छात्र-टीचर घायल हो गए। यह घटना बताती है कि हमारे देश के शिक्षक संस्थानों में सुरक्षा का क्या हाल है। आए दिन कॉलेज में मारपीट, हॉस्टलों में अवैध गतिविधियां संचालित हो रही हैं। प्रशासन तमाशा देख रहा है। आज जिस जेएनयू हिंसा को लेकर पूरे देश में बवाल मचा है, उसमें जेएनयू प्रशासन की तरफ किसी की नजर नहीं है। आखिर क्यों। कॉलेज परिसर में नकाबपोश लोग अगर घुसे तो यह पुलिस की नाकामी नहीं, जेएनयू प्रशासन की है। दिल्ली पुलिस की गलती यह है कि वह समय पर नहीं पहुुंची। अगर घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस मौके पर आती तो शायद बवाल इतना बड़ा नहीं होता और बदमाशों को पकड़ भी लिया जाता। कहा जा रहा है कि यूनिवर्सिटी में खुलेआम घूमते और तोडफ़ोड़ करते नकाबपोशों की तस्वीरें सामने आ चुकी हैं। ये लोग दिन की रोशनी में डंडे लेकर घूमते दिखे। लेकिन ये नकाबपोश कौन थे और कहां से आए थे इसका जवाब दिल्ली पुलिस और जेएनयू प्रशासन को जल्द से जल्द सामने लाना होगा। सवाल फिर वही कि जेएनयू प्रशासन क्या कर रहा था। जेएनयू के गेटों पर कड़ी सुरक्षा रहती है, कोई भी बाहरी शख्स कैंपस में आसानी से दाखिल नहीं हो सकता है। छात्रों को भी आई कार्ड देखने के बाद ही प्रवेश मिलता है। अगर ये लोग बाहरी थे तो इतनी बड़ी तादाद में लाठी-डंडों और रॉडों के साथ कैसे और कहां से यूनिवर्सिटी में घुस आए। इसका जवाब यूनिवर्सिटी प्रशासन को देना ही होगा। इतनी देर तक कैंपस के अंदर हंगामा और स्टूडेंट्स के साथ मारपीट होती रही, इस दौरान यूनिवर्सिटी प्रशासन क्या कर रहा था। खासतौर से कैंपस में बड़ी तादाद में सिक्योरिटी गार्ड्स तैनात रहते हैं, वे सब इस दौरान क्या कर रहे थे। उन्होंने हमलावरों को रोकने या पकडऩे की कोशिश क्यों नहीं की। बहरहाल, जेएनयू में हुई हिंसा में छात्रसंघ अध्यक्ष आईशी घोष समेत 25 से ज्यादा छात्र और टीचर गंभीर रूप से घायल हुए, जिन्हें एम्स और सफदरजंग में भर्ती कराया गया। घटना के 17 घंटे बाद एफआईआर दर्ज हो पाई, मगर राजनीतिक बयानबाजी लगातार तेज होती जा रही है। कांग्रेस और लेफ्ट के नेताओं ने हिंसा के लिए केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। वहीं, भाजपा ने इस मामले में राजनीति न करने की सलाह दी है।
पुलिस कह रही है कि नकाबपोश युवकों की पहचान हो चुकी है, उन्हें जल्द गिरफ्तार किया जाएगा। गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्लनी के उप-राज्यपाल अनिल बैजल और दिल्ली पुलिस कमिश्नर से बात कर हिंसा पर तत्काल रिपोर्ट मांगी है। अगर पूरे विवाद पर नजर डालें तो फीस बढ़ोतरी के बाद प्रदर्शनों के बीच जेएनयू प्रशासन ने रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी थी और 5 जनवरी को उसकी आखिरी तारीख थी। हालांकि शनिवार को प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने रजिस्ट्रेशन के लिए जरूरी इंटरनेट और सर्वर के तार काट दिए, जिससे रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया ठप हो गई। जब कुछ छात्रों ने इस काम का विरोध किया तो कथित तौर पर उनके साथ मारपीट हुई और फिर फीस बढ़ोतरी के खिलाफ हो रहा प्रदर्शन एबीवीपी बनाम लेफ्ट में बदल गया। रविवार शाम से ही यह प्रदर्शन उग्र हो गया और नकाबपोश बदमाशों के आने के बाद भीड़ हिंसक हो गई। इस दौरान छात्र, टीचर सबकी पिटाई हुई। छात्रों ने बताया कि हमलावर लड़कियों के हॉस्टल में हमलावर पहुंच गए और दरवाजे खटखटाने लगे। कई हॉस्टल में जमकर तोडफ़ोड़ की गई। छात्रों का कहना है कि हमलावरों की संख्या 200 से ज्यादा थी। आरोप है कि अलग-अलग गेट से जेएनयू में पढऩे वाले एबीवीपी के कार्यकताओं ने उन्हें एंट्री करवाई। छात्रों ने सोशल मीडिया पर वॉट्सएप ग्रुप की चैट भी शेयर की है, जिसमें कैंपस में घुसने और स्टूडेंट्स लीडर्स को पीटने का प्लान बनाया गया है। हालांकि, यह सही है या फेक, यह पता नहीं लगा है। एक छात्र का कहना है हमलावरों ने सुबह से तैयारी की थी, दिन में पेरियार हॉस्टल के पास ये लोग नजर भी आए। दिन में प्रशासन से भी शिकायत की गई, लेकिन रविवार का बहाना देते हुए कोई कार्रवाई नहीं की गई। हैरानी की बात है कि यहां पुलिस सुबह से ही मौजूद थी, लेकिन हमला होते ही यहां से चली गई।

2020:वास्तविक समस्यायों से मुंह मोड़ना घातक होगा
भूपेन्द्र गुप्ता
क्या ‘विश्वगुरू’ भारत में होगी गरीब की जगह? 2020 की शुरुआत हो रही है। अच्छे माहौल में 2020 गुजरना चाहिए। गिरती हुई जीडीपी, बिखरती हुई अर्थव्यवस्था, चरम पर पहुंची बेरोजगारी और नागरिकता के नाम पर देश में लगाई गई आग ऐसे काम हैं जो तकलीफ देते हुए 2020 में भी बने रहेंगे लेकिन कोशिश यही रहे कि सौहार्द नहीं बिगड़े।
2020 कैसे सर्वहितैषी बने यह भारत जैसे महान देश को स्वयं सोचना पड़ेगा ।क्या अपने ही हाथों तैयार परेशानियां लेकर भारत का लोकतंत्र रोशन होगा? क्या मानव निर्मित परेशानियों के समाधान निकाल कर एक सम्यक भारत का निर्माण कर पाएंगे? पिछले कुछ साल भारत की आधी आबादी को डराने कोसने और उसके दमन करने की नीतियों को न्यायसंगत ठहराने में निकल गया है। कोई सकारात्मक काम नही हुए। दुर्भाग्यपूर्ण तो यह कि संघ के एक विचारक ने यहां तक कह दिया कि भारतीय परंपराओं में बलात्कार की सजा देने का कोई नियम नहीं है। इस तरह 2019 इस दकियानूसी साल था। आधी आबादी को कुचल देने वाली सोच को 2020 में नष्ट करना होगा।
कुछ सवाल हैं जो खड़े रहेंगे। जवाब हमे खोजना होगा। क्या अपने ही नागरिकों को अपना ही इतिहास खोजने के लिए विवश किया जाएगा? अपनी नागरिकता सिद्ध करने के अज्ञात अंधेरे की टनल से क्या उन्हें गुजारा जाएगा ?क्या यह व्यावहारिक है कि लोग 70 साल पीछे जाकर अपने माता पिता की जन्मतिथि की खोज करें उसके दस्तावेज उठाएं और राहत की सांस लें या वे अपने स्वयं के दस्तावेज के आधार पर भारत के गौरवमयी नागरिक कहलाएं। यह सवाल 2020 की सुबह के सामने चुनौतियों के रूप में खड़े हैं।
नये एनपीआर में जिन 15 तरह की जानकारियां दी जानी हैं उन्हें आसानी से प्राप्त नहीं किया जा सकता। माता और पिता की जन्म तिथि स्थान और उसके प्रमाण कहां से लाये जायेंगे जबकि पिता की पीढ़ी तो जन्म दिनों को संवत् और तिथियों के अनुसार याद रखती थी ।किसी अन्य बड़े व्यक्ति के जन्मदिन अथवा उसकी शादी की तारीख से जोड़कर आगे पीछे के दिनों के हिसाब से याद रखती थी। अब यह पूर्णता अव्यावहारिक है कि कोई व्यक्ति अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए 100 साल पुराने इस रिकॉर्ड की खोजबीन करे। कई महीने यह ढूंढने में ही खप जाएंगे कि जिस गांव में पिता का जन्म हुआ था उस गांव में उनके समय का कोई व्यक्ति जीवित भी हो। कल्पना करें कि हर नागरिक अपने होने का सबूत जुटाने में लगा है। मारा मारा फिर रहा होगा।
देश की वास्तविक समस्यायों से आज मुंह मोड़ना अनुचित होगा। देश में स्टील की कीमतें लगभग 34 प्रतिशत नीचे चली गईं है। मोटर उद्योग में लगभग 32 प्रतिशत खपत कम हुई है ।एफएमसीजी में भी लगभग 30 प्रतिशत खपत में कमी आई है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो बहुत ही विकट स्थिति है लगता है उनकी क्रय शक्ति जवाब दे चुकी है यही हाल दूसरे उत्पादन क्षेत्रों का है चाहे सीमेंट हो या अन्य जिससे अधोसंरचना क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है। आज हम अर्थव्यवस्था के उस बुरे दौर में पहुंच गए हैं जहां पर सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) और प्रति व्यक्ति अनुपात में हम वहीं पहुंच गये हैं जहां चीन 2002-03 में खड़ा था ।5प्रतिशतकी वास्तविक जीडीपी हासिल करना एक चुनौती है और मंदड़ियों का सोच है कि लंबी अवधि तक यही दर बनी रह सकती है।कहीं पाकिस्तान से दो-दो हाथ करने की उतावली में हम आगे बढ़ने के बजाय पीछे तो नहीं लौट रहे हैं। जो पाकिस्तान पहले ही मरा हुआ है उससे लड़ना हमारा ध्येय तो नहीं हो सकता।
हमारे बैंकों की हालत खराब हो चुकी है। सहकारी बैंक डूब रहे हैं बैंकों से कर्जा नहीं उठ रहा है स्वाभाविक है बैंकिंग उद्योग घाटे में जायेगा आज देश के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है जिससे हमें बाहर निकलना है और 2020 में इस चुनौती से बाहर निकलने के लिए हमें सी ए ए और एनसीआर जैसी थोपी गई प्राथमिकताओं से देश को बाहर निकलना पड़ेगा। देश की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि गरीब के पेट में खाना कैसे पहुंचे उसे काम कैसे मिले उसे रोजगार से कैसे जोड़ा जाए? हमें यह भी ख्याल रखना होगा कि भारत सिर्फ हिन्दुओं, मुसलमानों, सिखों ईसाईयों, पारसियों या किसी एक कौम का देश नहीं है। यह गरीबों का देश है। सभी कौमों में गरीब हैं। क्या उनकी भी कोई बात करेगा? क्या महान भारत और, विश्वगुरु भारत मे गरीब लोगों की भी जगह होगी?

कम हो तनाव
सिध्दार्थ शंकर
ईरान के दूसरे सबसे ताकतवर नेता जनरल कासिम सुलेमानी के बगदाद में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे जाने के बाद पूरे पश्चिम एशिया में तनाव अपने चरम पर है। इस हत्याकांड के बाद विश्व की 13वीं सबसे बड़ी सैन्य शक्ति ईरान और सुपर पावर अमेरिका के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है और दुनिया के तीसरे विश्वयुद्ध की ओर बढऩे की आशंका जाने लगी हैं। इस बीच खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव को देखते हुए अमेरिका ने 3 हजार अतिरिक्त सैनिक भेजने का फैसला किया है। इतना सब होने के बाद भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कह रहे हैं कि उनका देश ईरान के साथ युद्ध शुरू नहीं करना चाहता है लेकिन अगर इस्लामिक देश ने कोई जवाबी कार्रवाई की तो अमेरिका इससे निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार है। ट्रंप ने कहा, कासिम सुलेमानी की हत्या ईरान के साथ विवाद बढ़ाने के लिए नहीं की गई है। हालांकि, ईरान ने कहा है कि वह इस हत्याकांड का बदला लेगा। इस बीच ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा काउंसिल की राजधानी तेहरान में बैठक हुई है जिसकी अध्यक्षता ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई ने स्वयं की है। ऐसा पहली बार है जब खामेनेई ने किसी बैठक की अध्यक्षता की है। जो भी हो, हालात बेहद नाजुक हैं।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को देखते हुए सोशल मीडिया से लेकर राजनयिक हलके तक में तीसरे विश्वयुद्ध के शुरुआत की अटकलें तेज हो गई हैं। आशंका यह भी जताई जा रही है कि ईरान अमेरिका के सहयोगी इजरायल के सुरक्षाकर्मियों, होरमुज की खाड़ी में तेल टैंकरों और सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमले कर सकता है। उसके इस कदम में हिज्बुल्ला, हूती विद्रोही और सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद मदद कर सकते हैं।
सुलेमानी के मारे जाने से खाड़ी में फिलहाल जबरदस्त तनाव का माहौल है। इस तनाव से भारत भी अछूता नहीं रहेगा। अमेरिका के दबाव की वजह से ईरान के साथ भारत के रिश्ते पहले ही नाजुक दौर में हैं और अब ईरानी कमांडर के मारे जाने के बाद भारत और तेहरान के रिश्ते और भी जटिल हो सकते हैं। अमेरिका की इस कार्रवाई से महज दो हफ्ते पहले ही विदेश मंत्री एस. जयशंकर तेहरान पहुंचे थे। इस दौरान दोनों ही देश चाबहार पोर्ट को विकसित करने के प्रोजेक्ट को तेजी देने पर सहमत हुए थे। ईरान के साथ संबंध रखने वाले देशों पर प्रतिबंधों लगाने वाले अमेरिका ने भारत को चाबहार पोर्ट को विकसित करने की इस शर्त पर छूट दी है कि ईरानी सेना रिवोलूशनरी गार्ड्स इस प्रॉजेक्ट में शामिल न हो। चाबहार पोर्ट के जरिए भारत की अफगानिस्तान तक पहुंच सुनिश्चित होगी। चाबहार व्यापारिक के साथ-साथ रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण है। यह चीन की मदद से विकसित किए गए पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से महज 100 किलोमीटर दूर है। कभी चाबहार भारत की सीमा से सटा था। 10वीं सदी के मशहूर विद्वान और इतिहासकार अल बरूनी ने लिखा था कि भारत के समुद्री तट की शुरुआत चाबहार से होती है।
आज ईरान और अमेरिका एक दूसरे के कट्टर विरोधी हैं लेकिन एक वक्त में दोनों देशों के रिश्ते काफी मजबूत थे। 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद वॉशिंगटन और तेहरान के रिश्तों में तल्खी आ गई। इसके बाद भारत को भी तेहरान के साथ अपने रिश्तों को लेकर संतुलन साधना पड़ा। तब से नई दिल्ली अमेरिका और इजरायल के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को बरकरार रखते हुए तेहरान को भी साधे रखने की कोशिश करता है। ईरान के साथ भारत के रिश्तों की जटिलता सिर्फ अमेरिका और इजरायल की वजह से नहीं है। सऊदी अरब और ईरान की दुश्मनी भी जगजाहिर है। इस वजह से भारत के तेहरान से रिश्ते हमेशा नाजुक रहे हैं। ईरान शिया बहुल देश है जबकि खाड़ी की ज्यादातर राजशाही सुन्नियों की है। एक वक्त था जब ईरान भारत का मुख्य तेल आपूर्तिकर्ता था, लेकिन अमेरिका के दबावों की वजह से नई दिल्ली को तेहरान से तेल आयात को तकरीबन खत्म करना पड़ा। इस बीच अमेरिका बड़े तेल आपूर्तिकर्ता देश के तौर पर उभरा है और दुनियाभर में तेल और गैस का निर्यात कर रहा है। आज स्थिति यह है कि भारत की तेल जरूरतों के करीब 10 प्रतिशत की आपूर्ति अमेरिका से होती है जबकि ईरान से आपूर्ति शून्य के करीब है।
दरअसल भारत को अब चाबहार में अपने हितों को लेकर अमेरिका को आश्वस्त करने के लिए बड़ी मशक्कत करनी होगी। चाबहार चारों तरफ से जमीन से घिरे अफगानिस्तान तक संपर्क का जरिया होगा। इससे अमेरिका को भी फायदा होगा क्योंकि अफगानिस्तान नई दिल्ली और वॉशिंगटन दोनों के लिए काफी अहम है। दोनों देशों के वहां अपने-अपने हित हैं। चाबहार पर भारत को छूट देने को लेकर अमेरिका के एक अधिकारी ने पिछले महीने कहा था कि इससे भारत अफगानिस्तान में जरूरी सामानों को निर्यात करने में सक्षम होगा जो काबुल के भी हित में है। हालांकि, अगर खाड़ी में मौजूदा तनाव बड़े युद्ध का रूप लेता है तो चाबहार प्रोजेक्ट पर ग्रहण लग सकता है। इसके अलावा खाड़ी में भारत के करीब 50 लाख लोग काम करते हैं। ये भारत के लिए विदेशी पूंजी का एक बड़ा स्रोत भी हैं। तनाव बहुत ज्यादा बढऩे पर इन लोगों के वहां फंसने की आशंका भी रहेगी।

आओ प्रार्थना करें 2020 में बदल जाएं हमारे प्रतिमान
डॉ अजय खेमरिया
बदलते अवचेतन को बयां करती न्यू इंडिया की आइकॉन रैंकिंग मप्र के झाबुआ औऱ अलीराजपुर जिलों के करीब पांच सौ से अधिक गांवों में ” हलमा ” (एक वनवासी लोकप्रथा) के जरिये जल सरंक्षण और सहकार आधारित ग्राम्य विकास की अद्धभुत कहानी लिखने वाले पद्मश्री महेश शर्मा।
चित्रकूट और सतना सहित आधे बघेलखंड में ग्राम्य विकास,नवदम्पति मिशन,और पुलिस हस्तक्षेप से मुक्त ग्राम्यसमाज व्यवस्था की नींव रखने वाले नानाजी देशमुख।
जल जंगल,जमीन और जानवर के महत्व को समझ कर स्थानीय गरीबी के समेकित प्रक्षालन के लिए काम करने वाले महाराष्ट्र के धुले जिले के चेतराम पवार ।
ऐसे पारंपरिक सेवा,और लोककल्याण के अनगिनत कामों में भारत के हजारों लोग निस्वार्थ भाव से लगे है।लेकिन इन्हें आज का भारतीय समाज आदर्श नही मान रहा है।मीडिया इन्हें जगह नही देता है। अगर देता भी है तो परिस्थिति जन्य।ऐसे प्रकल्पों में धन और कारपोरेट की ताकत नहीं है।वे अंग्रेजी के बड़े अखबारों को पहले पेज के विज्ञापन के अपीलीय चेहरे जो नही।
यही कारण है कि हाल ही में फोर्ब्स के 100 प्रतिमान (आइकॉन)भारतीय चेहरों में एक भी सामाजिक क्षेत्र का व्यक्ति नही है।धन कमाने और मीडिया में मिले कवरेज को आधार बनाकर जिन 100 भारतीय आइकॉन को फोर्ब्स जैसी पत्रिका ने इस बर्ष जारी किया है उसमें सबसे उपर है विराट कोहली।नंबर दो पर अक्षय कुमार,फिर आलिया भट्ट दीपिका पादुकोण से लेकर अनुष्का शर्मा,महेंद्र सिंह धोनी,माधुरी दीक्षित, कटरीना कैफ,प्रियंका चोपड़ा,ऋषभ पंत,के आर राहुल,सोनाक्षी सिन्हा,के नाम शामिल है।
सेलिब्रिटीज की यह सूची दुनिया भर में हर साल जारी होती है।भारत के लिए इसका महत्व वैसे तो आम आदमी के सरोकार से समझे तो कोई खास नही है ।क्योंकि कोई कितना कमाता है और कितना मीडिया में जगह हासिल करता है इससे उसबहुसंख्यक भारतीय को कोई लेना देना नही है जो पेज थ्री और मेट्रो कल्चर से परे मेहनत मजदूरी कर अपने लिये दो जून की रोटी ही बमुश्किल जुटा पाता है।लेकिन भारत में पिछले तीन दशक से जिस नए मध्यम और निम्न मध्यमवर्गीय तबके का जन्म हुआ है उसके लिये इस सेलिब्रिटीज रैंकिंग का बड़ा महत्व है।यह सेलिब्रिटी रैंकिंग भारत गणराज्य में इंडियन और हिंदुस्तान के विभाजन को स्पष्ट करते सामाजिक आर्थिक विकास की कहानी भी है।सवाल यह है कि क्या नया भारतीय समाज सिर्फ धन के आदर्शों पर संकेंद्रित हो रहा है?क्या मीडिया निर्मित छवियाँ ही हमारे अवचेतन में आदर्श के रूप में स्थापित हो रही है। जो सिर्फ धनी है सम्पन्न है। और जिनकी करणी का सेवा,या उपकार, के भारतीय मूल्यों से कोई सरोकार नही। कैसे ये चेहरे हमारे लोकजीवन के आदर्शों में ढलते जा रहे है।
कला,संगीत,खेल ,व्यवसाय,उधमता का अपना महत्व है यह सभ्य लोकजीवन के आधारों में भी एक है। लेकिन जब समेकित रूप से हम समाज के आदर्शों की चर्चा करते है तो भारतीय सन्दर्भ पश्चिम से अलग पृष्ठभूमि पर नजर आता है।हम आज भी अपनी परोपकारी, सहकार, सहअस्तित्व, सहभागी औऱ समावेशी समाज व्यवस्था के बल पर ही हजारों साल से सभ्यता, संस्कृति और लोकाचार के मामलों में एक वैशिष्ट्य के साथ अक्षुण्ण बने हुए है।यह अक्षुण्यता
हमारी समाज व्यवस्था या सामूहिक चेतना में किसी आर्थिक संपन्नता की वजह से नही है,बल्कि वसुधैव कुटुम्बकम, अद्वेत,और सर्वजन सुखाय,सर्वजन हिताय जैसे कालजयी जीवन आदर्शों के चलते ही है।
इसलिये फोर्ब्स के यह ताजा सूची हमें आमंत्रित कर रही है कि हम हमारी समाज व्यवस्था के बदलते आइकॉन्स का विश्लेषण करें।हमें यह समझने की जरूरत है कि नई आर्थिकी से गढ़ी गई नई सामाजिकी के अवचेतन में अब हमारे जीवन मूल्य किस इबारत के साथ स्थापित हो रहे है।मिश्रित व्यवस्था वाले भारतीय से ग्लोबल कन्जयूमर में तब्दील करीब 30 करोड़ भारतीय (मिडिल एवं लोअर मिडिल क्लास का एक अनुमान आधारित आंकड़ा)क्या अपनी जड़ों से कट रहे है?क्या इस नए भारत के प्रतिमान पूरी तरह बदल रहे है?क्या इस विशाल तबके के लोकाचार में पैसा ,कमाई, औऱ जीवन शैली की सम्पन्नता के आगे की मूल भारतीय सोच महज रस्मी बनकर रह गई है?सवाल कई है जो हमें सामाजिक धरातल पर चेताने की कोशिशों में लगे है।सरकार द्वारा बाध्यकारी सीएसआर की परोपकारी सरकारी आर्थिक व्यवस्था ने असल में हमारे हजारों साल के लोकजीवन को कुचलने का प्रयास ही किया है।नया मध्यमवर्गीय भारत एक नकली सामाजिक चेतना को गढ़ रहा है।वह एक रात या सोशल मीडिया की आभासी लोकप्रियता जैसी अस्थायी अवधि वाले आदर्श को अपने अक्स में देखने लगा है।उसके लोकाचार में संवेदना की व्याप्ति सिर्फ खुद की चारदीवारी तक सिमट गई है।इसीलिये समाज में परिवार और रिश्तों की दरकन ने बड़ी गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।इसे समाजशास्त्र के नजरिये से समझा जाये तो कहा जा सकता है कि भारत मे नागरिकशास्त्र और समाजशास्त्र दोनों को उपभोक्ताशास्त्र ने अपनी जमीन से बेदखल सा कर दिया है।यही कारण है कि बिग बॉस और इंडियन आइडल जैसे मंचो की पकड़ हमारे मन मस्तिष्क में नाना जी देशमुख,जलपुरुष राजेन्द्र सिंह,नर्मदा सेवी अमृतलाल बेगड़,अपना घर भरतपुर या शिवगंगा झाबुआ के आग्रहों से अधिक है। गली की एक बिटिया अभावों से जूझती है एक दिन कलेक्टर बन जाती है लेकिन वह समाज और मीडिया के लिए क्षणिक आदर्श है उस बिटिया की तुलना में जो सिनेमा या रंगमंच के किसी कमाऊ या कारपोरेट प्लेटफॉर्म पर मौजूद है।
हमारे अवचेतन के 360 डिग्री कंज्यूमर बेस्ड बदलाव को समझिए उन विज्ञापनों से जो नहाने,पहनने,खाने,सोने,रतिकर्म, से लेकर विलासिता के हर उत्पाद से जुड़े है और हर उस उत्पाद के उपयोग की अपील कामुक भाव भंगिमा के साथ महिलाएं कर रही है।
फोर्ब्स की भारतीय सेलिब्रिटी लिस्ट में इस साल पॉर्नस्टार सनी लियोन भी शामिल है। क्योंकि उन्हें हम भारतीयों ने इंटरनेट पर सबसे ज्यादा सर्च किया है।इसलिये उनकी कमाई और मिडिया स्पेस किसी सुपर 30 वाले से ज्यादा रहा है। हमारी सामूहिक चेतना में सनी लियॉन सचिन शर्मा, आशीष सिंह या राजाबाबू सिंह जैसे नवाचारी और काबिल अफसरों से भी ज्यादा आदर्श स्थिति में है। जिन्होंने अजमेर और इंदौर जैसे शहरों को वैश्विक मानकों पर ला खड़ा किया या ग्वालियर चंबल जैसे डकैत प्रभावित जोन में सोशल पुलीसिंग की नई कहानी लिख दी है। असल में यह हमारे बदल चुके अवचेतन की ही कहानी है।जहां सनी लियॉन ने हमारे मध्यमवर्गीय समाज को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। तथ्य है जब समाज के चेतना का स्तर अपनी जड़ों से कट जाता है तब उस समाज के नए स्वरूप का अवतरण होता। भारतीय समाज इसी प्रक्रिया से गुजर रहा है। राजनीति, क्रिकेट,सिनेमा,क्राइम का घनीभूत हो चुका आवरण फिलहाल मस्तिष्क के किसी भी कोने में हमारे पारंपरिक लोकाचार को जगह देने के लिए तैयार नही है।केंद्रीय मंत्री प्रताप षड़ंगी को कोई नही जानता था मोदी कैबिनेट में जगह मिलने से पहले लेकिन प्रतापगढ़ के राजा भैया के लिए रॉबिनहुड बताने वाले 120 विशेष बुलेटिन अब तक जारी हो चुके है।हमारे 24 घण्टे खबरिया चैनल्स पर।आशा कीजिये हम विवेकानंद के आग्रह पर अपनी मूल चेतना की ओर लौटेंगे और अगले वर्ष जब यह सूची जारी हो तब उसमें सामाजिक क्षेत्र के चेहरे भी हमें नजर आएं।

विदेश नीतिः नरम-गरम, दोनों
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कई लोग पूछ रहे हैं कि विदेश नीति के हिसाब से पिछला साल कैसा रहा ? मैं कहूंगा कि खट्टा-मीठा और नरम-गरम दोनों रहा। कश्मीर के पूर्ण विलय को चीन के अलावा सभी महाशक्तियों ने भारत का आतंरिक मामला मान लिया। सउदी अरब और संयुक्त अरब अमारात (यूएई) ने भी भारत का स्पष्ट समर्थन किया। कश्मीर में धारा 370 खत्म करने और उसके पूर्ण विलय ने दुनिया में यह संदेश भेजा कि भारत सरकार का रवैया पहले की तरह ढीला-ढाला नहीं रहेगा। कश्मीर के पूर्ण विलय पर तुर्की और मलेशिया-जैसे देशों ने थोड़ी बहुत आलोचना की लेकिन दुनिया के अधिकतर राष्ट्रों ने मौन धारण कर लिया था। भारत के पड़ौसी मुस्लिम राष्ट्रों- बांग्लादेश, मालदीव और अफगानिस्तान ने भी भारत का समर्थन किया। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, उसे तो कड़ा विरोध करना ही था। उसने किया भी लेकिन अंतरराष्ट्रीय जगत तब भी कश्मीर के सवाल पर तटस्थ ही रहा। उसके पहले बालाकोट पर हुए भारत के हमले को चाहे पाकिस्तान ने ‘हवाई’ करार दे दिया हो लेकिन उसने मोदी सरकार की छवि में चार चांद लगा दिए। भारत-पाक संबंधों में इतना तनाव पैदा हो गया कि मोदी ने नए साल की शुभकामनाएं सभी पड़ौसी नेताओं को दी लेकिन इमरान को नहीं दीं। उधर इमरान ने करतारपुर साहब में सिखों के अलावा किसी के भी जाने पर पाबंदी लगा दी। यह हमारे उस नए नागरिकता कानून का जवाब मालूम पड़ता है, जिसमें पड़ौसी देशों के मुसलमानों के अलावा सबको शरण देने की बात कही गई है। इस कानून का सारी दुनिया में विरोध हो रहा है। इसने भारत में सारे विरोधी दलों को एक कर दिया है और सभी नौजवानों में जोश भर दिया है। यही वह कारण है, जिसके चलते अब इस्लामी सहयोग संगठन पाकिस्तान में कश्मीर के बहाने सम्मेलन करके इस मुद्दे को उठाएगा। दुनिया की कई संस्थाएं मानव अधिकार के मामले को कश्मीर और नागरिकता के संदर्भ में उठा रही हैं। अमेरिका के साथ हमारी व्यापारिक गुत्थी अभी तक उलझी हुई है और चीन के साथ व्यापारिक असंतुलन बढ़ता ही जा रहा है। सीमा का सवाल ज्यों का त्यों है। हमारे नागरिकता पैंतरे से बांग्लादेश नाराज है। हमारे पड़ौसी देशों में चीन की घेराबंदी बढ़ रही है। अफगान-संकट के बारे में भारत की उदासीनता आश्चर्यजनक है। हमारी विदेश नीति में कोई दूरगामी और गहन व्यापक दृष्टि अभी तक दिखाई नहीं पड़ रही है।

क्या और क्यों ? नागरिकता संशोधन अधिनियम एवं राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर
रघु ठाकुर
पिछले लगभग दो सप्ताह से देश में एक भूचाल सा आया हुआ है और देश के भिन्न भिन्न इलाकों में छुटपुट हिंसा की घटनायें भी हुई। पिछले लगभग 4-5 माह से लगतार ऐसी घटनायें घट रही हैं जो राष्ट्रीय एकता के लिए या देश के लिए वांछनीय नहीं है। भारत सरकार पहले एनआरसी का कानून लाई और गृहमंत्री ने एलान किया कि देश भर के ऐसे लोगों की छटनी की जायेगी जो देश के नागरिक नहीं है या कानून और नियमों के आधार पर नागरिकता के पात्र नहीं है। दरअसल इसकी शुरूआत तो आसाम के लोगों ने ही की थी। जब अस्सी के दशक में असम गण परिषद के नाम से गैर असमियों को बाहर निकालने का आन्दोलन किया था। इस आन्दोलन की मुख्य मांग बंग्लादेशी लोगों को बाहर निकालने की थी और बंग्लादेश से घुसपैठ रोकने की थी। क्योंकि बग्लादेशी सीमा भारत की असम की सीमा से सटी हुई है। पुराने कालखण्ड में बग्लादेश से लोग रोजगार के लिए आते रहे, असम के जमीन के मालकों ने उन्हें खेती या चाय बगानों में काम पर रखना शुरू किया और वे धीरे-धीरे बसते चले गये तथा परिवार बढ़ते गये। सन्् 1971 के बग्लादेश के निर्माण के समय जिस प्रकार पाकिस्तानी फौज ने बग्लादेशियों पर जुल्म किये उससे भी काफी लोग सीमा पार कर भारत में आये। 17वीं 18वीं सदी में अंगेजों ने चाय बगानो में काम करने के लिए देश के भिन्न-भिन्न अंचलों से मजदूरों को असम लाने का काम किया था। जिसमें बिहार, यू0पी0, कुछ उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल के मजदूर थे वे भी सदियों में आकर असम में बस गये। असम गण परिषद का अभियान मुख्य तौर पर बग्लादेशी मुसलमानों को निकालने का था और उसकी पीछे भाजपा, आरएसएस, जैसे संगठनों की अहम भूमिका थी। इसी तथाकथित असमियां अस्मिता के नाम पर वहां अगले चुनाव में असमगण परिषद की सरकार बनी और प्रफुल्ल महन्त सीएम बने। कालान्तर में बीजेपी और संघ ने असमगण परिषद का सत्व निचोड़ लिया और ए0जी0पी0 जो बड़ी पार्टी बनी थी जो घटकर तीसरे नंबर पर पहुंच गयी। इस दरमियान असम सरकार और केन्द्र सरकार ने भारत बंगला सीमा पर बाढ़ लगाने का तय किया। जो काम अभी भी अधूरा है। यद्यपि संघ 70 के दशक से यह प्रचार करता रहा, छपवाकर पर्चें बंटवाता रहता था कि देश में 10 करोड़ घुसपैठिये हैं। हालांकि एजीपी, बीजेपी और सभी सरकारें बमुश्किल कुछ हजार लोगों को ही विदेशी सिद्ध कर पाईं और निकाल पाईं। इसी बीच एनआरसी का प्रस्ताव जो पहले केन्द्र सरकार की फायलों में दबा पड़ा था निकल कर बाहर आया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने श्री हजेला को एनआरसी बनाने का काम सौंपा। उन्होंने अपनी निगरानी में एनआरसी बनवायें। करोड़ों रूपया खर्च होने के बाद श्री हजेला ने जो सूची बनायी उसमें भी भारी त्रृटियां पायी गयी। श्री हजेला ने अकेले असम के 19 लाख लोगों को एनआरसी से बाहर बताया। यहां तक कि सदियों से रह रहे परिवार जिनके लोग सेना में नौकरी करके रिटायर्ड हो चुके है उनको भी नागरिकता सूची से बाहर कर दिया गया। यह उन्होंने नियमों की या कानून की खामी की वजह से अथवा उनके दस्तावेजों की कमी की वजह से की या द्वेषभाव से किया। परन्तु उनकी एनआरसी सूची बनने के बाद भारी हल्ला हुआ और उन पर पक्षपात और भ्रष्टाचार के आरोप लगे। केन्द्र की भाजपा सरकार को कहना पड़ा यह सूची अंतिम नहीं है 19 लाख लोगों को निकाला नहीं जायेगा तथा सुप्रीम कोर्ट ने भी श्री हजेला को दोषी पाया और उन्हें कार्य से मुक्त कर दिया। कुल मिलाकर ढाक के तीन पात रहे। बीजेपी सरकार के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया क्योकि 19 लाख लोगों में अधिकांश लोग यू0पी0, बिहार और बंगाल आदि के हिन्दु है जो बीजेपी के मतदाता है जिन राज्यों से वह यहां पर काम पर आये है वहां भी उनके परिजन हिन्दू होने के नाम पर बीजेपी के मतदाता है। बीजेपी के इस वोट बैंक के गड़बढ़ाते गणित से स्वत: बीजेपी को कहना पड़ा कि हम नहीं मानते और इसे मान्य नहीं किया जावेगा। परन्तु कुल मिलाकर देश में भय और आशंका का माहौल बन गया।
अब दूसरा मामला सीएबी का आया याने नागरिकता संशोधन नियम इस कानून की धारा 6 में यह जोड़ा गया है कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बंगलादेश के हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध, जैन, पारसी और क्रिश्चियन समाज के लोगों को जो पांच वर्ष से भारत में रह रहे है को नागरिकता दी जा सकेगी। दरअसल भारतीय नागरिकता का कानून संविधान के लागू होने के लगभग पांच वर्ष बाद 1955 में संसद में पारित हुआ। इस कानून का मूल आधार था कि जो लोग भारत की जमीन पर या भारत में पैदा हुए हैं उन्हें भारत का नागरिक माना जावेगा। यथार्थ में 1946-47 में आजादी के पहले तत्कालीन कांगेस ने और मुस्लिम लीग ने बंटवारे के समझौते में जो आपसी निर्णय किया था कि अगर कोई व्यक्ति जो वर्तमान पाकिस्तान से भारत जाना चाहेगा या भारत से कोई व्यक्ति पाकिस्तान जाना चाहेगा तो उसे वहां जाकर बसने की अनुमति होगी। इस निर्णय से दोनों तरफ हिंसा और धार्मिक भावना का फैलाव हुआ। कुछ लोग अपने धार्मिक कारणों से, कुछ लोग हिंसा की वजह से भारत और पाक के बीच में आये गये। इसमें बड़ी अफरातफरी मची और मामला गैर धर्मावलंबियों को याने पाकिस्तान से हिन्दुओं और हिन्दुस्तान से मुसलमानों का अफरातफरी का सिलसिला चल पड़ा जिसका बड़ा कारण सम्पत्ति का लालच था। लाखों लोग इस अफरातफरी में साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार हुए और विशेषता इन्डो पाक की पश्चिमी सीमा और पूर्वी सीमा पर साम्प्रदायिक तनाव नहीं फैल सका क्योंकि महात्मा गांधी ने कलकत्ता तथा नोआखाली को अपने अभियान का केन्द्र बनाया था। उपवास किया और हिन्दु मुस्लिम नेताओं को आपसी संघर्ष से रोक दिया। जो काम अंग्रेज वाइसराय और भारत की सरकार की सेना पश्चिम की सीमा पर नहीं कर सकी वह काम महात्मा गांधी ने अकेले अपने अहिंसक साधन से पूरा कर दिया। जिसे बाद में अंग्रेज वाइसराय माउन्टवेंटन ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया और कहा कि हमारी लाखों की फौज पश्चिम सीमा पर साम्प्रदयिक हिंसा नहीं रोक पायी परन्तु गांधी – एक व्यक्ति सेना ने उसे पूरा कर दिखाया।
विभाजन के गलत निर्णय के परिणाम गंभीर हुये। जो लोग पाक सीमा से चलकर हिन्दुस्तान आये थे और शरणार्थियों के रूप में बसे थे उन्हें 1951 में एक आदेश पारित कर भारत सरकार ने देश का नागरिक मान लिया और उसके बाद उनके बच्चों आदि को 1955 में नागरिकता कानून के तहत नागरिकता मिल गई। इसके बाद भी लगातार पाकिस्तान से अधिकांश हिन्दू आबादी और कुछ मुस्लिम आबादी भी बहुत कम का भारत आने का सिलसिला चलता रहा। पाकिस्तान से आने वाले लोगों का बड़ा कारण पाकिस्तान के इस्लामिक देश बनने के बाद तनावपूर्ण जीवन था तथा वहां क्रमश: फैले कट्टरपंथी उनके जीवन को अधिक संकटपूर्ण बना रहे थे। पाकिस्तान ने ईश निंदा कानून लागू कर वहां के अल्पसंख्यकों को और भयभीत कर दिया। अनेक लोगों को इस कानून के नाम पर मृत्युदण्ड और उम्र कैद मिली जिससे भय और अधिक हो गया। गैर मुस्लिम आबादी को इस कानून के दुरूपयोग से भगाकर उनकी संपत्ति और रोजगार को छीनने के लालच में ज्यादा अन्याय हुये। 2019 के नागरिकता कानून के पारित होने के पहले भी लगातार पाकिस्तान से आने वाली हिन्दू आबादी के लोगों को नागरिकता मिलती रही है। उस समय सरकार ने 12 वर्ष के लिये बनाया था जो व्यक्ति लगातार 12 वर्ष तक रह गया हो उसे नागरिकता दी जा सकती है। हमारे देश के चलन के अनुसार नागरिकता दिलाने वाली एजेंसीज़ और अन्य लोग सक्रिय हो गये जो वहां से आने वालों से तगड़ी रकम वसूलते थे और उन्हें भारत की नागरिकता दिलाते रहे। इन नागरिकता पाने वाले लोगों में अधिकतर हिन्दू ही रहे जो ईसाई पाकिस्तान छोड़कर गये वे अधिकांशत: यूरोप के ईसाई बाहुल्य देश में गये। चूंकि पाकिस्तान के हिन्दूओं की रिश्तेदारियां भारत में थी अत: उन्हें भारत में आकर 12 साल टिके रहना, प्रमाण पत्र पाना आदि ज्यादा आसान था। इसी बीच 1990 के दशक में वैश्वीकरण के दौर शुरू होने पर यूरोप और अमेरिका से अप्रवासी भारतियों का आना शुरू हुआ तथा भारत सरकार ने उन्हें भारतीय मूल के आधार पर तथा एफ.डी.आई. (फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट) के तर्क पर द्वितीय नागरिकता देना शुरू कर दिया। यह कांग्रेस के जमाने में ज्यादा हुआ जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। इस माईग्रेसन में ज्यादातर लोग भारत से गये हुये हिन्दू लोग ही शामिल थे। याने गुजरात, पंजाब, राजस्थान, हरियाणा और भारत के अन्य प्रदेशों से गये वे लोग जो ब्रिटिश काल में या तो रोजी रोटी कमाने के लिये गये थे या गिरमिटिया मजदूर बनाकर ले जाये गये थे।
दरअसल नागरिकता संशोधन कानून में मूलभूत स्थितियों से कुछ ज्यादा फर्क नहीं है सिवाय इसके कि इसकी भाषा एक योजना के तहत लिखी गई। अगर सरकार संशोधन की धारा 6 में भा.ज.पा. सरकार ने केवल अल्पसंख्यक शब्द लिखा होता तो यह बवाल नहीं मचता और नागरिकता पाने के लिये आने वाली जमातें लगभग वहीं होतीं जो इस कानून के बाद हैं। जो लोग यह तर्क दे रहे हैं कि उदारता की सीमा नहीं बांधना चाहिये तथा मुसलमानों को भी जो धार्मिक अल्पसंख्यक नहीं हैं वरन्् मुस्लिम आबादी की संख्या के पंथगत अल्पसंख्यक हैं तथा बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी से पीढ़ित हैं यथा अफगानिस्तान और पाकिस्तान के शिया या कराची के मुहाजिर। उनका यह तर्क नि:संदेह मानवीय और ”वसुधैव कुटुम्बकम“ की कल्पना पर आधारित है परंतु केवल तर्क है व्यवहारिक तौर पर संभव नहीं है। आज कराची के मुहाजिर भारत में आकर 12 साल या 5 साल किसके यहां रहेगें। वे गरीब लोग मुसलमान है और उनके परिजन भी भारत में आमतौर पर अमीर नहीं है इसलिये पिछले 1955 से लेकर 2019 तक जितने आवेदन भारत की नागरिकता को प्राप्त हुये हैं उनमें मुस्लिम आवेदक नगण्य हैं, और एक प्रतिशत भी नहीं हैं। चीन में उईगर मुसलमानों को भी भारत आने का वीजा नहीं मिलेगा एक तो वहां की सरकार नहीं देगी और उनके भारत आने का कोई कारण नहीं बनता। न रिश्तेदारियां हैं और न सुविधा और साधन हैं। बंग्लादेश और वर्मा रोहिंग्या मुसलमानों के साथ भी यही स्थिति है। नागरिकता कानून जो 1955 में बना और उसके अंतर्गत जो नियम बने तथा 2019 का संशोधित कानून भारत में आकर पहले 12 वर्ष और अब 5 वर्ष के लगातार रहने के आधार पर है। यह कानून कोई न पहले और न अब दुनिया की बढ़ती आबादी या आंतरिक पीढ़ा के आधार पर नागरिकता देने का नहीं। 1971 में बंग्लादेश में मुक्तिवाहिनी को सहयोग के लिये भारतीय सेना को भेजने का आधार भी तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने यही निर्धारित किया था कि भारत इन 70 लाख से एक करोड़ भागे हुये शरणार्थियों का बोझ नहीं सह सकता और इसलिये भारत का हस्तक्षेप जरूरी है। यह निर्विवाद है कि आज भी भारत उन सीमित शरणार्थियों का बोझ उठाने की स्थिति में नहीं है। हमारे प्राकृतिक स्रोत भी इसे बर्दास्त नहीं कर सकेगें।
परंतु भा.ज.पा. की नीयत सांप्रदायिक गोलबंदी को हिन्दू को बढ़ाकर जैन, सिख, बुद्ध, पारसी, ईसाई आदि को अपने मतदाता समूह बनाने की है। और इसलिये उन्होंने चुनावी रणनीति के तौर पर मुसलमानों को अलग रखा और बकाया सबके नाम शामिल किये। दरअसल यह श्री नरेन्द्र मोदी का संशोधित कानून नहीं बल्कि संशोधित जाल है जिसमें उन्होंने प्रतिपक्ष को फांस लिया है। कल दिल्ली की रैली में आक्षेप किया कि कांग्रेस और विरोधियों ने इस कानून को बगैर पढ़े ही विरोध किया है। उनका आक्षेप सही है परंतु अर्धसत्य है क्या सरकार की यह जबावदारी नहीं बनती कि वह अपने प्रस्तावित कानूनों से आमजन को अवगत कराए। होना तो यह चाहिए था कि वे इस कानून को पारित करने के पहले और बाद में आमलोगों में प्रचारित कराते अखबारों में कानून को यथावत छपवाते, नागरिक समूहों को विश्वास में लेते। क्या जनमत को शिक्षित करना सरकार का दायित्व नहीं है। परंतु वे तो हिंसा ही चाहते थे ताकि उनके पक्ष के धार्मिक समूह के मतदाता एकजुट हों तथा विरोधी मतदाता व उनका वोट लेने वाली पार्टियां देश में खलनायक सिद्ध हों।
देश का प्रतिपक्ष भी सरकार गिराने या आक्षेप करने में इतना बेचैन हो उठा कि उन्होंने न तो संशोधित कानून को ठीक से पढ़ा और न प्रस्तुत किया, और मुस्लिम भाईयों को इतना भयभीत कर दिया कि उनकी नागरिकता समाप्त होने वाली हो। उन्हें देश से निकाले जाने वाला हो तथा मुस्लिम भाईयों को सड़कों पर और हिंसा पर ला दिया। सरकार के सुनियोजित षडयंत्र, प्रतिपक्ष की जल्दबाजी और अदूरदर्शिता तथा मुस्लिम मतदाता की बेचैनी को देश ने दस दिवसीय हिंसा के भयावय दौर पर ढकेल दिया और आखिरी में इतना कहना और जरूरी है कि मोदी सरकार के मंत्री भले ही विश्वविद्यालयीन शिक्षित हों परंतु लोगों को भड़काने के लिये जाने अनजाने गलत तर्क पेश कर रहे हैं।
श्री अर्जुन मेघवाल जो केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री भी हैं का लेख ”सात दसक से अधूरा काम पूरा“ शीर्षक से 21 दिसम्बर 2019 की पत्रिका में छपा है। वे लिखते हैं कि पाकिस्तान में 1947 में अल्पसंख्यकों की संख्या 30 प्रतिशत थी जो घटकर 2011 में 3.7 प्रतिशत रह गई। इसी प्रकार बंग्लादेश में अल्पसंख्यकों की संख्या 1947 में 22 प्रतिशत थी गिरकर 2011 में 7 प्रतिशत रह गई है। एक तो उन्हें यह याद रखना चाहिये कि 1947-1971 तक 24 वर्ष पाकिस्तान और बंग्लादेश एक ही देश था। 1947 में बंग्लादेश बना ही नहीं था उसकी जनगणना के आकड़े कैसे और कहां से निकाले। दरअसल देश में ये और दो उनके विश्वविद्यालय झूठे आंकड़ों को बढ़ाने और प्रसारित करने में बहुत सिद्धहस्त हैं वे हैं संघ विष्वविद्यालय और वॉट्सऐप विश्वविद्यालय। मैं सत्तापक्ष से कहूंगा कि वे सांप्रदायिकता की आग जलाकर वोट की रोटी सेंकना बंद करें क्योंकि देश के मन के ऊपर जो घाव बन रहे हैं उन्हें दूर करना लंबे समय तक कठिन हो जायेगा। और प्रतिपक्ष से भी अपील करूंगा कि वे मुद्दों को गहराई से सोचें और मोदी के जाल में फसने से बचें। दरअसल राजनीति का काम लोगों को जाग्रत करना और चैतन्य बनाना है नाकि उन्हें गुमराह कर मस्तिष्क को सुषुप्त कर हिंसा और अज्ञानता फैलाना।

नए साल में लेने होंगे नए प्रण
सिद्वार्थ शंकर
हर बार हम जो संकल्प लेते हैं, भले ही वे धरे के धरे रह जाते हों, भले ही हर साल नववर्ष की पूर्व संध्या पर बनाई गई हमारी तमाम योजनाएं भी अधूरी ही रह जाती हों, इसके बावजूद न हम संकल्प लेना छोड़ेंगे और न ही योजनाएं बनाना भी। हम इंसानों का यही स्वभाव है। इस धरती के तमाम दूसरे जीवों से हटकर मनुष्य की यही खूबी है कि वह कुछ करना चाहता है। अपनी तमाम नाकामियों से बार-बार प्रेरित होने का माद्दा हम में नहीं होता, तो हमारा इतिहास आज भी हजारों वर्ष पहले ही ठिठककर रह गया होता। इसलिए इससे हमें निराश नहीं होना चाहिए कि हर बार हमारे संकल्प अधूरे रह जाते हैं, हर बार योजनाएं बस योजनाएं ही बनी रहती हैं। इस वर्ष हम नाकामियों को भूलकर और निराशा से बाहर निकालकर फिर से नई योजनाएं बनाएं, नए संकल्प लें, नई प्रेरणाएं ढूंढें और नए लक्ष्य तय करें। यही इंसान होने की खूबी है और यही खूबसूरती भी। इसी खूबी के कारण हम धरती पर दूसरे जीवों से बेहतर हैं। बहरहाल, 2019 कितने भी कष्टों का वर्ष रहा हो, कितनी भी उठापटक का साल रहा हो, कितनी भी बेचैनियों और कितनी ही परेशानियों से रूबरू कराता रहा हो, लेकिन गुजरा साल हमें नए साल का एक तोहफा देकर गया है।
हर गुजरा साल हमें बहुत कुछ सिखाकर जाता है। यह तोहफा 2019 ने भी दिया है। अत: हमें उसका शुक्रगुजार जरूर होना चाहिए कि चाहे कैसी भी परिस्थितियां रही हों, हम उनसे जूझकर बाहर निकलने में सफल रहे। विषम परिस्थितियां हमें तोड़ नहीं पाईं। गुजरे वर्ष के प्रति आभारी होने के लिए क्या यह कम है कि उसने हमें टूटने नहीं दिया? उसने हमें जो सबक दिए हैं, याद तो उन्हें भी रखना होगा। साल 2019 हमारे लिए एक नहीं, तमाम सबक देकर गया है। उसने सभी के लिए अलग-अलग सबक दिए होंगे। अत: उनकी चर्चा करना न तो जरूरी है, न ही व्यावहारिक। लेकिन हमें अपने उन सभी सबकों को याद रखना चाहिए। प्रयास यह भी होना चाहिए कि जो गलतियां हमने बीते वर्ष की थीं, उन्हें फिर नहीं दोहराएंगे। यदि हम पुरानी गलतियों को न दोहराने का संकल्प ले सके तो यही एक बड़ी उपलब्धि भी होगी।
हां, कुछ सबक ऐसे भी हैं, जो पूरे समाज पर समान रूप से लागू होते हैं। बलात्कार की घटनाओं को लेकर यह साल खासा याद किया जाएगा। इस साल बलात्कार की ऐसी दर्दनाक और चर्चित घटनाएं सामने आईं, जिसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ा। नए साल में हमें सबसे पहला काम अपने नजरिए को पूरी तरह दुरुस्त करने का करना होगा। सकारात्मक सोच वह ताकत होती है, जो विषम परिस्थितियों को भी अंत में हमारे पक्ष में झुका देती है। इसके विपरीत हमारी सोच अगर नकारात्मक होगी तो वह अनुकूल स्थिति को भी हमारे खिलाफ कर देती है। विफलता व सफलता कुल मिलाकर हमारे नजरिए पर निर्भर करती है। अगर उदाहरण नोटबंदी का ही दें तो विपक्षी राजनीतिक दलों का कहना यह है कि 2016 के आखिरी में जिस तरह से नोटबंदी का कहर टूटा, उससे लाखों लोग बेरोजगार हुए हैं। पर इन लोगों का ध्यान इस तरफ क्यों नहीं जाता कि नोटबंदी के बाद जो लेन-देन और भुगतान के नए तौर-तरीके सामने आए हैं, भले ही वे मजबूरी में आएं हों, उनसे लाखों नए रोजगारों की संभावना बनी है। इसमें सकारात्मकता यह होगी कि हम अपने आप में योग्यता विकसित करें और इन अवसरों के दावेदार बनें। व्यक्तिगत स्तर पर हमें अपने चिंतन की दिशा को सकारात्मक ही रखना चाहिए। एक और संकल्प यह लिया जा सकता है कि यदि हम बेरोजगार हैं तो कोई ऐसा काम सीखें, जो हमें रोजी मुहैया कराए, जबकि हमारे पास यदि रोजगार है तो उसके हिसाब से हम अपने अंदर नई-नई योग्यताएं भी विकसित करें, ताकि दौड़ में पीछे न खड़ा होना पड़े। हम अपने बच्चों को भी कुशल बनाएं और इसके लिए स्कूलों-कॉलेजों के भरोसे न रहें।
इस साल देश को खुशी के पल भी मिले, तो हिंसा की आग से भी रूबरू होना पड़ा। पाकिस्तान पर भारत की एयरस्ट्राइक ने जहां करोड़ों हिंदुस्तानियों के दिल पर सुकून की लौ जलाई, वहीं नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ भड़की हिंसा की आग ने गंगा-जमुनी तहजीब वाले देश के मुंह पर कालिख भी पोती। 2019 का साल महिलाओं को संबल देने वाला रहा, तो उनकी आबरू सुरक्षित न रख पाने वाला भी। बीता साल अब नए साल में प्रवेश कर चुका है। हर दिन हमें नया करने और सेाचने को प्रेरित करता है। सो अब जबकि साल गुजर गया है, तो हमें बीती बातों को यहीं छोडऩा होगा और एक ऐसा देश और समाज बनाने का प्रण लेना होगा, जिसमें हर एक देशवासी सुखी हो और उसका जीवन किसी भी कष्ट के बिना बीते।
महिलाओं के लिए सुरक्षित समाज की नींव डालनी तो बेहद जरूरी है। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से महिलाओं के लिए असुरक्षित वातावरण बन रहा है वह हर भारतीय के लिए शर्मनाक है। हम बेटियों की आबरू नहीं बचा पा रहे हैं तो यह ठीक नहीं है। हमें इस दिशा में प्रण लेना ही होगा।

दिल्ली के लाक्षागृहों में खाक होती मासूम जिंदगियां
योगेश कुमार गोयल
दिल्ली में आगजनी की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही। बीते 8 दिसम्बर को दिल्ली के अनाज मंडी इलाके में भयावह अग्निकांड में हुई 46 मौतों के सदमे से दिल्ली अभी तक उबरी भी नहीं थी कि 20 दिनों के भीतर पांच और ऐसे ही अग्निकांडों ने न केवल हर किसी को अंदर तक झकझोर दिया है बल्कि सभी जिम्मेदार संस्थाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। 22 दिसम्बर की रात दिल्ली के किराड़ी इलाके में इंदर एनक्लेव में एक चार मंजिला इमारत के निचले हिस्से में बने कपड़ों के गोदाम में लगी आग ने पूरी इमारत को अपनी चपेट में ले लिया और देखते ही देखते यह आग 9 मासूम लोगों का काल बन गई। उसके दो ही दिन बाद 24 दिसम्बर को दिल्ली के नरेला इलाके में तीन फैक्टरियों में आग लग गई, जिसे बुझाने में 36 दमकल वाहनों की मदद से करीब 150 दकमलकर्मियों को सात घंटों तक कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। 27 दिसम्बर को सदर बाजार इलाके में एक इमारत में, महारानी बाग क्षेत्र में एक दुकान में तथा वसंत विहार इलाके में एक आवासीय इमारत में भीषण आग लग गई, जिसे दमकलकर्मियों ने कई घंटों की जद्दोजहद के बाद बुझाया। गनीमत यह रही कि आगजनी के इन हादसों में कोई हताहत नहीं हुआ। इससे पहले 8 दिसम्बर को अनाज मंडी इलाके में एक मकान में बहुमंजिला इमारत में चल रही फैक्टरी में लगी भयानक आग में 46 लोगों की मौत हो गई थी।
कितनी बड़ी विड़म्बना है कि दिल्ली में बार-बार ऐसे अग्निकांड सामने आते रहे हैं और लोग लाक्षागृह बनी ऐसी इमारतों में जलकर राख होते रहे हैं लेकिन ऐसे हादसों से कभी कोई सबक नहीं लिया जाता। दिल्ली में ऐसे अनेक इलाके हैं, जहां संकरी गलियों में अनेक फैक्टरियां या कारखाने चल रहे हैं और यह सब प्रशासन की नाक तले होता है। ऐसी लगभग तमाम औद्योगिक इकाईयों में आग से बचने के कोई इंतजाम नहीं होते लेकिन बार-बार होते ऐसे हादसों के बावजूद अगर उन पर कभी कोई कार्रवाई नहीं होती तो भला उसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए? अक्सर यही देखा गया है कि दिल्ली में अग्निकांड की घटनाएं हों या बहुमंजिला इमारतें गिरकर उनके तले दबकर मासूम लोगों के मारे जाने की, ऐसी दर्दनाक घटनाओं में प्रायः पीडि़तों को मुआवजा देने की घोषाणाएं कर सरकारों द्वारा अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती है और भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों, इसकी ओर से सब बेपरवाह हो जाते हैं। जब भी ऐसा कोई हादसा सामने आता है, तब ऐसी अव्यवस्थाओं पर खूब हो-हल्ला मचता है लेकिन चंद दिन बीतते-बीतते सब शांत हो जाता है और सारी व्यवस्था पुराने ढ़र्रे पर पूर्ववत रेंगने लगती है। ऐसे में गंभीर सवाल यही उठता है कि दिल्ली के इन अग्निकांडों का जिम्मेदार आखिर कौन है और कब तक ऐसे अग्निकांडों में जान-माल की बलि चढ़ती रहेगी? आखिर क्यों ‘मौत की नगरी’ बनती जा रही है दिल्ली? संकरी गलियों में ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच बिजली की हाई वोल्टेज तारों का मकड़जाल भी बड़े हादसों को न्यौता देता प्रतीत होता रहा है।
कहना असंगत नहीं होगा कि अगर अनाज मंडी इलाके के अग्निकांड में हुई 46 मौतों से कोई सबक लिया जाता और दिल्ली में अवैध रूप से बनी इमारतों तथा संकरी गलियों में चल रही अवैध फैक्टरियों पर लगाम कसने की कवायद शुरू कर दी गई होती तो शायद 22 और 24 दिसम्बर के हादसों से बचा जा सकता था। दिल्ली के कई इलाकों में तमाम नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाते कुकुरमुत्ते की भांति अवैध कारखाने फैले हैं, जहां हल्की सी चिंगारी को भी दावानल बनते देर नहीं लगती लेकिन शायद गहरी नींद में सोये अधिकारियों ने सोचा हो कि 8 दिसम्बर को घटी घटना के बाद अभी इतनी जल्दी कोई और घटना तो घटने वाली है नहीं, इसलिए क्यों ऐसे कारखानों पर लगाम लगाने के लिए बेवजह की जद्दोजहद की जाए। विड़म्बना है कि 1997 के उपहार सिनेमा की भीषण आग में खाक हुई 59 मासूम जिंदगियों की त्रासदी के बाद के इन 22 वर्षों में किसी ने कोई सबक सीखा। ऐसे हादसों के बाद अक्सर यही तथ्य सामने आते रहे हैं कि हादसाग्रस्त कारखानों वाली इमारतों में आग से बचने के कोई उपकरण नहीं थे और फिर भी वे धड़ल्ले से चल रहे थे।
कोई भी बड़ा हादसा होने के बाद मुख्यमंत्री, मंत्री तथा तमाम राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े नेता घटनास्थल पर पहुंचते हैं और मीडिया से मुखातिब होकर एक-दूसरे पर अपनी भड़ास निकालने के बाद वहां से खिसक लेते हैं। ऐसे अग्निकांडों में मासूम लोगों की मौत के बाद राजनीतिक दलों द्वारा एक-दूसरे पर दोषारोपण का घृणित दौर शुरू होता है लेकिन हकीकत यही है कि अगर इन्हीं लोगों ने नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए धड़ल्ले से चल रहे कारखानों पर सख्त कदम उठाने की पहल की होती तो ऐसे हादसे होते ही नहीं। बार-बार हो रहे ऐसे दर्दनाक हादसों के बाद भी इस बात का जवाब कहीं से नहीं मिलता कि आखिर संकरी गलियों में चल रहे अवैध कारखानों पर लगाम कब और कैसे लगेगी और जिम्मेदार अधिकारियों को दंडित करने के लिए सख्त कदम कब उठाए जाएंगे? सवाल यह भी है कि ऐसी संकरी गलियों में 4-5 मंजिला इमारतें कैसे बन गई और कैसे उनमें बिजली के मीटर लग गए? कैसे उन आवासीय इमारतों के भीतर औद्योगिक कारखाने स्थापित करने की इजाजत मिल गई? फायर विभाग के अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं होने के बावजूद अगर धड़ल्ले से ऐसे कारखाने दिल्ली के अनेक इलाकों में चल रहे हैं तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है? बहुत से ऐसे कारखाने भी हैं, जिन्हें फायर विभाग के अनापत्ति प्रमाण पत्र तो मिले हुए हैं लेकिन उनके पास आग बुझाने के जरूरी उपकरण ही नहीं हैं। आखिर उन्हें फायर विभाग द्वारा अनापत्ति प्रमाण पत्र कैसे दे दिए गए? जवाब बिल्कुल सीधा और स्पष्ट है कि यह सब प्रशासन और कारोबारियों की मिलीभगत तथा भ्रष्ट मंसूबों की ही देन है। ऐसे में बेहद गंभीर सवाल यही उठता है कि हमारे देश में लोगों की जान क्या इतनी सस्ती है कि सिस्टम इस तरह उनकी जिंदगी के साथ खेलता है? इसी का ताजा उदाहरण है 8 दिसम्बर को हुए अग्निकांड में 43 लोगों की मौत के बाद 22 दिसम्बर के अग्निकांड में हुुई 9 लोगों की दर्दनाक मौतें।
इस तरह का हर बड़ा हादसा हमें सबक के साथ-साथ कड़वे अनुभव भी देकर जाता है लेकिन विड़म्बना यही है कि हमारे यहां ऐसे हादसों या गलतियों से कभी कोई सबक नहीं लिया जाता। ऐसे हादसों में एक ही पल में कितने ही परिवारों के घर के चिराग बुझ जाते हैं। लोगों के स्मृति पटल में वर्ष 1997 का ‘उपहार कांड’ अब तक तरोताजा है, जो दिल्ली का अब तक का सबसे खौफनाक अग्निकांड माना जाता है। 13 जून 1997 को उपहार सिनेमा में लगी उस आग में 59 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। हादसे के वक्त उपहार सिनेमा में सैंकड़ों लोग ‘बॉर्डर’ फिल्म देख रहे थे और सिनेमा हॉल में आग लगने के बाद उन्हीं में से 59 लोग मारे गए थे। आग लगने के बाद सिनेमा हॉल में धुआं भर गया था, जिसके बाद लोग वहां से निकल भागने की कोशिश तो कर रहे थे किन्तु उनकी बदनसीबी यह थी कि उपहार सिनेमा के सभी दरवाजे बाहर से बंद थे। आखिर सिनेमा हाल के ही भीतर 59 लोगों ने आग की चपेट में आकर और धुएं से दम घुटने के कारण दम तोड़ दिया था। उपहार कांड के बाद से लेकर अब तक दिल्ली में भीषण आगजनी की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। उस भयावह हादसे को बीते 22 वर्ष लंबा समय गुजर चुका है किन्तु आज भी विड़म्बनापूर्ण स्थिति यह है कि इस दिशा में एक-दूसरे पर दोष मढ़ने के अलावा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया जाता। इस वास्तविकता से कोई अनजान नहीं है कि दिल्ली के अनेक इलाकों में बरसों से बहुत सारी अवैध फैक्टरियां चल रही हैं, जिनमें सुरक्षा के कोई उपाय नहीं होते। तमाम जिम्मेदार सरकारी विभागों को ऐसी फैक्टरियों की पूरी जानकारी भी होती है लेकिन कोई ऐसे कदम नहीं उठाए जाते, जिससे ऐसे दर्दनाक हादसों को टाला जा सके।
इसी साल 12 फरवरी को करोलबाग के होटल अर्पित में लगी भयानक आग में 17 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी और तब यह खुलासा हुआ था कि करोलबाग के उस इलाके में चार मंजिल से ज्यादा नहीं बनाई जा सकती किन्तु उस होटल को भ्रष्ट अधिकारियों के संरक्षण के चलते छह मंजिला बनाया गया था। दिल्ली में जगह-जगह ऐसे ही न जाने कितने होटल अर्पित या अवैध फैक्टरियां चल रही हैं, जो हर कदम पर बड़े हादसों को न्यौता दे रहे हैं लेकिन न जाने प्रशासन की तंद्रा कब टूटेगी? कोई बड़ा हादसा होने के बाद जब थोड़े दिन मामला गर्म रहता है तो अक्सर सामने आता है कि जिन होटलों, रेस्टोरेंट तथा फैक्टरियों को अग्निशमन विभाग द्वारा एनओसी दी गई, उनमें से कईयों में आग बुझाने वाले उपकरण काम ही नहीं कर रहे थे। दिल्ली के विभिन्न आवासीय क्षेत्रों में ऐसी घटनाओं में अक्सर अवैध फैक्टरियां चलने तथा सिनेमाघरों, होटलों, रेस्टोरेंट इत्यादि में आग से सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम के अभाव की बातें सामने आती रही हैं लेकिन प्रशासन हमेशा किसी बड़े हादसे को न्यौता देता प्रतीत होता है। कोई बड़ा हादसा सामने आने पर सारी एजेंसियां एकाएक गहरी नींद से जाग जाती हैं लेकिन जैसे ही मामला थोड़ा ठंडा पड़ता है, सब कुछ पुराने ढ़र्रे पर रेंगने लगता है और फिर से तमाम एजेंसियां किसी दूसरी घटना के इंतजार में गहरी नींद सो जाती हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ खड़ा होता है कि मौत की नगरी बनती जा रही दिल्ली में आखिर कब तक रह-रहकर इसी प्रकार के भयानक हादसे सामने आते रहेंगे और हम अपनी बेबसी पर आंसू बहाते रहेंगे। सरकारी संस्थाओं के साथ-साथ आम लोगों और नागरिक संस्थाओं का भी दायित्व है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए वे स्वयं भी अपने कर्त्तव्यों के प्रति ईमानदार और जागरूक रहें।

भारत को इस्लामी राष्ट्रों की चुनौती
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत भी कमाल का देश है। इसकी वजह से इस्लामी देशों में फूट पड़ गई है। दुनिया के 57 इस्लामी देशों का अब तक एक ही संगठन है। इस्लामी देशों का संगठन (ओआईसी) लेकिन अब एक दूसरा इस्लामी संगठन भी उठ खड़ा हुआ है। इसका नेतृत्व मलेशिया के राष्ट्रपति महाथिर मोहम्मद और तुर्की के राष्ट्रपति तय्यब इरदोगन कर रहे हैं। इन दोनों नेताओं ने कश्मीर के पूर्ण विलय के मामले में भारत का विरोध किया था। लेकिन सउदी अरब और संयुक्त अरब अमारात ने उसे भारत का आतंरिक मामला कहकर टाल दिया था। इन दोनों देशों के नेता एक-दूसरे के देशों में जाकर गदगद हुए थे और नरेंद्र मोदी को सउदी और यूएई ने अपने सर्वोच्च सम्मान भी दिए थे। इसकी काट करने के लिए पिछले हफ्ते मलेशिया में एक वैकल्पिक इस्लामी सम्मेलन आयोजित किया गया था। इसमें तुर्की के अलावा ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी भी शामिल हुए थे। इस वैकल्पिक इस्लामी सम्मेलन के पीछे अमेरिका-विरोधी भाव भी छिपा हुआ है। इस सम्मेलन के नायक के तौर पर पाकिस्तान को उभरना था लेकिन सउदी अरब ने अड़ंगा लगा दिया। उसके इशारे पर इमरान खान ने मलेशिया जाने से मना कर दिया। तो अब कश्मीर के सवाल पर इस्लामी देशों का संगठन एक नया सम्मेलन आयोजित कर रहा है। पाकिस्तान और सउदी अरब दोनों को अपनी नाक बचानी है। लेकिन अभी-अभी पता चला है कि इस्लामाबाद में होनेवाले इस सम्मेलन में इस्लामी राष्ट्रों के विदेश मंत्री भाग नहीं लेंगे। उनकी जगह उनके सांसद आएंगे। याने इन देशों की सरकारें भारत को कह सकेंगी कि जहां तक उनका सवाल है, कश्मीर के मुद्दे पर वे तटस्थ है। दूसरे शब्दों में वे भारत और पाकिस्तान दोनों को खुश करने की तरकीब कर रहे हैं। जाहिर है कि भारतीय विदेश नीति के लिए यह बड़ा धक्का है। यहां प्रश्न यही है कि जैसे पिछले इस्लामी सम्मेलन में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को ससम्मान आमंत्रित किया गया था, क्या इस बार भी भारतीय विदेश मंत्री या भारतीय सांसदों को उसमें आमंत्रित किया जाएगा ? मुझे लगता है कि ये इस्लामी राष्ट्र कश्मीर के कारण भारत के विरुद्ध उतने नहीं हो रहे हैं, जितने ये नागरिकता कानून और नागरिकता रजिस्टर की वजह से हो रहे हैं। भारत सरकार को इस चुनौती का सामना अत्यंत दूरदृष्टि के साथ करना होगा।

नए भारत के विरुद्ध खड़े वाममार्गी बुद्धिजीवी
डॉ अजय खेमरिया
भारत में अल्पसंख्यकवाद को क्यों जिंदा रखना चाहते है वामपंथी रामचन्द्र गुहा और अन्य लेखकों को विरोध प्रदर्शन करते समय पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया इसे लेकर वामपंथी विचारक और समर्थक सरकार को गरिया रहे है।इस बीच सोशल मिडिया पर ऐसे तमाम वीडियो जारी हुए है जिनमें नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों ने हिंसक रुख अख्तियार करते हुए पुलिसकर्मियों पर खूनी हमले किये है ।सरकारी सम्पति को नुकसान पहुचाया है।लेकिन किसी वामपंथी और जनवादी लेखक ने इस तरह के हिंसक कृत्यों की कोई निंदा नही की है।सवाल उठता है कि क्या देश का वाममार्गी बौद्धिक वर्ग आज सत्ताच्युत होते ही भारत के विरुद्ध खड़ा हो गया है ।जनवाद की आड़ में आज भारत के राष्ट्रीय विचार से हद दर्जे तक खिलवाड़ किया जा रहा है। नागरिकता संशोधन कानून से भारत के 20 करोड़ से ज्यादा मुसलमान में से किसी एक को भी किसी प्रकार का कानूनी संकट नही आने वाला है यह वैधानिक रुप से तथ्य है और देश के प्रधानमंत्री ,गृह मंत्री संसद से लेकर हर लोकमंच पर स्पष्ट कर चुके है। इसके बाबजूद भारत की जनता खासकर मुस्लिम भाइयों को लगातार गुमराह किया जा रहा है।उन्हें उसी क्षद्म बौद्धिक नजरिये से भयादोहित किया जा रहा है जिसके जरिये 70 सालों से अल्पसंख्यकवाद की राजनीतिक दुकान को चलाया गया है।हिटलर और नाजिज्म के उदय की डरावनी दलीले खड़ी की जा रही है लेकिन वास्तविकता यह है कि बौद्धिक रूप से असली नाजिज्म का अबलंबन तो भारत के वाममार्गी कर रहे है एक कपोल काल्पनिक झूठ को लोकजीवन में न्यस्त राजनीतिक स्वार्थों के लिये खड़ा कर दिया गया है।जो एनआरसी अभी प्रस्तावित ही नही है उसका पूरा खाका बनाकर पेश कर दिया गया है।इतिहास की भारत विरोधी ऋचाएँ गढ़ने वाले ये बुद्धिजीवी असल में अपने असली चरित्र पर आ गए है उनकी अपनी नाजिज्म मानसकिता आज सबके सामने आ गई है जो किसी भी सूरत में दक्षिणपंथी या अन्य विचार को स्वीकार नहीं करती है।इसके लिये वह झूठ,हिंसा सबको जायज मानती है।बहुलतावाद के यह वकील सच मायनों में नाजिज्म के अलमबरदार है इन्हें भारत की संसदीय व्यवस्था तक में भरोसा नही है वे इस बात को आज भी स्वीकार नही कर पा रहे है कि भारत की जनता ने एक विहित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत नरेंद्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री चुना है।वह आज भी मानने को तैयार नही है कि उनकी भारत विरोधी और अल्पसंख्यकवादी राजनीतिक दलीलों को नया भारत खारिज कर चुका है।वरन क्या कारण है कि रामचन्द्र गुहा, मुन्नवर राणा,हर्ष मन्दर,रोमिला थापर, अरुणा राय,भाषा सिंह,जैसे लोग एक नकली नैरेटिव देश मे सेट करने की कोशिशें कर रहे है।क्यों भारत के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की बातों को सुना नही जा रहा है क्यों देश की सर्वोच्च अदालत के रुख को समझने के लिये यह वर्ग तैयार नही है?हकीकत की इबारत असल में कुछ और ही है -नए भारत का विचार इस बड़े सत्ता पोषित तबके के अस्तित्व पर चोट कर रहा है।जिस भारतीय शासन और राजनीति का केंद्रीय तत्व ही अल्पसंख्यकवाद रहा हो आज वह तत्व तिरोहित हो चुका है।इसके साथ ही हिंदुत्व की बात और इसके संपुष्टि के कार्य जब देश के शीर्ष शासन में अब नियमित हो गए है तब इस डराने और दबाने की सियासत का पिंडदान तय है।इसी डर ने देश भर के वाममार्ग को आज खुद अंदर से भयादोहित कर रखा है अपनी दुकानों को बचाने की कवायद में यह बुद्धिजीवी भारत के मुसलमानों को एक उपकरणों की तरह प्रयोग कर रहे है।भारत में 70 साल बाद भी अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की राजनीति असल में एक सुनियोजित राजनीति ही है।2014 के बाद इस राजनीति का अंत असल में नए भारत का अभ्युदय ही है जिसमें सबका साथ सबका विश्वास अगर आकार लेगा तो कुछ लोग बौद्धिक विमर्श में बेरोजगार ही हो जाएंगे है ।इस षडयंत्र को आज भारत के मुसलमानों को गहराई से समझने की जरूरत है।याद कीजिये यूपीए के कार्यकाल में एक बिल लाया गया था”साम्प्रदयिक लक्षित हिंसा निरोधक कानून”इसे हर्ष मन्दर जैसे जनवादी बुद्धिजीवियों ने सोनिया गांधी की सरपरस्ती में बनाया था।इस बिल का मसौदा हिंदुओ को घोषित रूप से साम्प्रदायिक रूप से हिंसक साबित करता था।इसके प्रावधान अंग्रेजी राज से भी कठोर होकर हिंदुओ औऱ मुसलमान को स्थाई रूप से प्रतिक्रियावादी बनाने वाले थे।तब भारत की बहुलता इसलिये खतरे में नही दिखी क्योंकि इसे बनाने वाले हर्ष मन्दर जैसे चेहरे थे।आज यही हर्ष मन्दर नागरिकता बिल पर खुद को मुसलमान घोषित करना क्यों चाहते थे इसे आसानी से समझा जा सकता है।पूरे देश में सिर्फ मुस्लिम बहुल इलाकों और शैक्षणिक संस्थानों में नफरत की राजनीति क्यों की जा रही है?सिर्फ इसलिये ताकि भारत की 20 करोड़ से ज्यादा की आबादी को सरकार के विरुद्ध हिंसक विरोध के लिये उकसाया जाए क्योंकि तीन तलाक ,राममंदिर और 370 पर इस मुल्क में जो भाईचारा और अमन चैन नए भारत ने दिखाया है उसने सत्ता पोषित विभाजनकारी ब्रिगेड को बेचैन कर रखा था।सरकार के स्तर पर भी इस मामले में संचार और सँवाद पर कुछ कमी रह गई है यह भी एक तथ्य है।गृह मंत्री के रूप में 370 और राममंदिर निर्णय पर अमित शाह ने जिस सख्ती और सतत निगरानी से देश मे अमन चैन बनाये रखा उसकी निरन्तरता इस मामले में चूक गई है।यह सुगठित और सुनियोजित विरोध असल में इन्ही सब मामलों में भारतीय लोकजीवन में दिखे अमन चैन का ही चकित कर देने वाला रुख था वामपंथ और उसके साथी राजनीतिक दलों के लिये।इसलिये सरकार को अपना सँवाद कौशल फिर से दोहराए जाने की जरूरत है।
इस पूरे मामले में गांधी और संविधान की दुहाई दी जा रही है विरोध प्रदर्शन को तार्किक साबित करने के लिये लेकिन गांधी विचार में राष्ट्रीय सम्पति को नुकसान पहुँचाने की अनुमति किसने दी है यह भी विचार करने योग्य है।आज राजनीतिक रूप से भले केंद्र सरकार के विरुद्ध एक मोर्चा हमें नजर आ रहा है लेकिन इस मोर्चाबंदी का एक अदृश्य पहलू शायद अभी भी लोग देख नही पा रहे है वह नया भारत है।इस नए भारत को कांग्रेस नेता ए के एंटोनी 2014 में हुई पार्टी की पराजय पर पकड़ कर 10 जनपथ को बता चुके थे।एंटोनी कमेटी ने कांग्रेस की हार के लिये अल्पसंख्यकवाद को सबसे बड़ा फैक्टर बताया था, 2019 में भी जेएनयू जाकर राहुल गांधी ने इसी गलती को दोहराया था और अब उनकी बहन इंडिया गेट पर धरना देकर जामिया को समर्थन नही कर रही है बल्कि नए भारत से आंखे फेर रही है।इस तथ्य को अनदेखा कर की एक समावेशी कांग्रेस भारत के संसदीय लोकतंत्र के लिये बेहद अनिवार्यता है।कांग्रेस और वामपंथी मिलकर भारत के मुसलमानों को लोकजीवन से दरकिनार करने के पाप में जुटे है।यह उनका नकली बहुलतावाद है।बेहतर होगा भारत के मुस्लिम इसे जल्द से जल्द समझ लें।

आधार के बाद सीएए- एनआरसी और एनपीआर की जरूरत क्यों
सनत जैन
संपूर्ण भारत में एनआरसी (नेशनल रजिस्टर फार सिविलियन) तथा सीएए (सिविलियन अमेंडमेंट एक्ट) को लेकर आंदोलन चल रहे हैं। पहले यह आंदोलन एक्ट के विरोध में शुरू हुए अब भाजपा ने भी समर्थन में देशभर में आंदोलन शुरू कर दिए हैं। आंदोलन को रोकने के लिए दिल्ली सहित कई राज्यों में धारा 144 लगाकर आंदोलन को रोकने का उपाय किया गया। जिसके कारण आंदोलनकारियों को आंदोलन करने की अनुमति नहीं मिली| बिना अनुमति आंदोलन करने के कारण पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच अनावश्यक झड़पें हुई| पत्थरबाजी एवं लाठीचार्ज के कारण जगह-जगह आंदोलन हिंसक भी हुए पुलिस ने आंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज, अश्रु गैस तथा कई स्थानों पर गोली चालान भी किया। आंदोलन में लगभग दो दर्जन आंदोलनकारियों की मौत भी हुई। इसमें से कई मौतें गोली लगने से हुई दिल्ली और उत्तर प्रदेश पुलिस ने गोली चालाने से पहले इनकार किया। जब घटना के वीडियो सोशल मीडिया के माध्यम से सामने आए| इसमें पुलिस जवान गोली चलाते हुए दिखे। तब पुलिस ने जांच की बात कहकर मामले को ठंडा करने का प्रयास किया। जामिया विश्वविद्यालय के अंदर जाकर पुलिस ने लाइब्रेरी में बैठे छात्र और छात्राओं के ऊपर जबरदस्त बल प्रयोग किया। लाइब्रेरी कक्ष को तोड़ दिया लड़कियों के साथ भी मारपीट के वीडियो सामने आने और अलीगढ़ विश्वविद्यालय में भी कुछ इसी तरीके की पुलिसिया कार्रवाई से, सारे देश के छात्र आंदोलित हो गए पुलिस एवं सरकार अब बचाव की मुद्रा में आकर तरह-तरह के जवाब दे रहे हैं। सरकार विपक्षियों पर अफवाह फैलाने का ठीकरा फोड़कर बचने का प्रयास कर रही है।
लोकसभा एवं राज्यसभा में जिस ताबड़तोड़ तरीके से सिविलियन अमेंडमेंट एक्ट (जीएए) पास कराया गया। इसमें मुस्लिमों को नागरिकता देने से बाहर रखा गया। गृह मंत्री शाह ने जिस तरह से पाकिस्तान बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए । अल्पसंख्यकों को मान्यता देने और मुसलमानों को मान्यता नहीं देने की बात की साथ ही यह कहा कि इस बिल के पास होने के बाद सरकार जल्द ही सारे देश में एनआरसी की प्रक्रिया शुरू करेगी। गृह मंत्री के इस बयान की बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया सबसे पहले असम से शुरू हुई। असम में 4 साल तक एनआरसी को लेकर असम के सभी नागरिकों को जिस तरह दस्तावेज जुटाने और नागरिकता को साबित करने परेशान होना पड़ा। हजारों रुपए दस्तावेज जुटाने में खर्च करने पड़े । अपना काम-धाम छोड़कर लाइनों में लगना पड़ा। असम में रहने वाले पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, झारखंड इत्यादि राज्यों के हजारों हिंदू नागरिकों को भी नागरिकता साबित करने में काफी परेशान होना पड़ा। उसके बाद भी लगभग 19लाख लोग नागरिकता रजिस्टर में स्थान नहीं पा पाए । इसमें से 14 लाख से अधिक लोग गैर मुस्लिम थे जो अन्य राज्यों से आकर आसाम में रह रहे भारतीय नागरिक थे। परिणाम स्वरूप सबसे ज्यादा उग्र प्रदर्शन सबसे पहले आसाम से शुरू हुआ।
भाजपा के रणनीतिकार केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने सीएए पास कराते समय जिस तरह से मुस्लिमों को नागरिकता से दूर रखने का प्रावधान का उल्लेख किया। पाकिस्तान अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए हुए हिंदुओं, सिखों जिसमें ईसाई, जैन, बौद्ध एवं पारसियों को नागरिकता देने की बात कही। वही नागरिकता रजिस्टर में शामिल नहीं होने वाले मुस्लिमों को मुस्लिम देशों में नागरिकता मिलने की बात कही। उससे भारत के मुसलमान काफी उद्वेलित हो गए। उनके मन में यह भय बैठ गया, कि वह जरूरी दस्तावेज पेश नहीं कर सके तो उन्हें भारत से बाहर किया जाएगा, उन्हें डिटेंशन सेंटर में भेजा जाएगा।
इस एक्ट के पास होने के बाद हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण पैदा करने की जो कोशिश की गई। निश्चित रूप से विभिन्न राज्यों जिसमें महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, दिल्ली और बिहार के चुनाव को ध्यान में रखकर केंद्र सरकार ने इस मामले में हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण को ही ध्यान में रखकर इतना बड़ा कदम उठा लिया। इससे भारत के बहुसंख्यक हिंदू भी नाराज हो गए। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संविधान की मूल भावना के विपरीत धार्मिक आधार पर नागरिकता नहीं देने की बात पर बहुसंख्यक वर्ग का समर्थन भी इस एक्ट के विरोध में सारे देश में देखने को मिल रहा है। हिंदू बहुसंख्यक और गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को एकजुट करने का जो फार्मूला भाजपा ने अपना आया। उस फार्मूले के दलदल में भाजपा बुरी तरह फंस कर रह गई है। अभी तक जो आंदोलन इस एक्ट के विरोध में हो रहे हैं। उसमें छात्रों के साथ-साथ बड़ी संख्या में हिंदू और अन्य वर्गों के लोग भी शामिल हो रहे हैं। भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता दी गई है। भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की जो कोशिश भाजपा ने अप्रत्यक्ष रूप से की है। उससे सारा देश नाराज है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान तथा तालिबान जैसे धार्मिक आधार पर बने देशों में जिस तरह से लड़ाई झगड़े कट्टरवादिता देखने को मिलती है। उससे उन राष्ट्रों का कोई भला नहीं हुआ। भारत का बहु संख्यक वर्ग भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के खिलाफ है, यह आंदोलनों से स्पष्ट हो रहा है।
आधार के बाद एनआरसी क्यों
केंद्र सरकार ने आधार इनरोलमेंट के माध्यम से पिछले 10 वर्षों में प्रत्येक व्यक्ति का पंजीयन लगभग-लगभग कर लिया है। आधार पंजीयन के समय 33 तरीके के दस्तावेज एवं जानकारी के साथ आधार में पंजीयन किया गया है। आधार में पंजीयन के पूर्व प्रत्येक व्यक्ति का फिंगरप्रिंट एवं आंखों की पुतलियों का रिकॉर्ड भी फोटो के माध्यम से डिजिटल सुरक्षित किया गया है। आधार में जिन लोगों का पंजीयन हो चुका है। सारे देश में कहीं पर भी जांच एजेंसियों और सरकार के पास यह डाटा उपलब्ध है। आधार पंजीयन के समय पूर्व और वर्तमान सरकार ने यह भरोसा दिलाया था। आधार बनने के बाद अन्य किसी दस्तावेज अथवा पंजीयन की जरूरत नहीं होगी। सभी सरकारी कामकाज एवं सरकारी सहायता के लिए आधार अनिवार्य होगा। आधार में जब शत प्रतिशत पंजीयन हो गया है। इस जानकारी के आधार पर ही नागरिक रजिस्टर बनाने में भी कोई कठिनाई नहीं है। नई तरीके से सारी प्रक्रिया शुरू करने पर हजारों करोड़ रुपए खर्च करने का कोई औचित्य भी नहीं है। केंद्र सरकार चाहे तो आधार का जो डिजिटल डाटा उसके पास है। उसके आधार पर ही नागरिक रजिस्टर तैयार किया जा सकता है। इसे आधार से लिंक भी किया जा सकता है।
विदेशियों को भारतीय नागरिकता
दुनिया भर के देशों में बाहर से आए हुए लोगों को नागरिकता देने के लिए कानून बने हुए हैं। भारत में भी पहले से ही विदेशियों के लिए नागरिक कानून प्रचलित हैं। सभी सरकारें नागरिकता देने के नियम समय-समय पर बदलती रहती हैं। किसी भी देश में धर्म के आधार पर नागरिकता देने का कोई प्रावधान नहीं है। भारत दुनिया का पहला देश है, जिसने नागरिकता कानून में मुस्लिमों को प्रतिबंधित किया है। भारत में 20 करोड़ के आसपास मुस्लिम आबादी है। ऐसी स्थिति में मुसलमानों का भयभीत होना लाजमी है। भारत सरकार बिना किसी धार्मिक भेदभाव के राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए, किसी भी विदेशी को भारत की नागरिकता देती है| इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है| किंतु जिस तरीके से इसे हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण करने के लिए सीएए एक्ट राजनैतिकक कारणों से लाया गया है। उसकी प्रतिक्रिया इसी तरीके से होनी थी।
राष्ट्रीय जनगणना में हजारों करोड़ की बर्बादी क्यों
भारत में जनगणना का काम बीसवीं सदी में शुरू हुआ था। अब हम सूचना प्रौद्योगिकी एवं डिजिटल तकनीकी के 21वीं सदी में रह रहे हैं। आधार इनरोलमेंट के माध्यम से भारत सरकार ने सभी भारतीय नागरिकों का आधार इनरोलमेंट कर लिया है स्कूल में प्रवेश लेने के लिए सभी बच्चों को आधार इनरोलमेंट प्रस्तुत करना होता है। इसके साथ ही गरीब से गरीब व्यक्ति को जिसे सरकारी सहायता मिलती है। उसे भी आधार कार्ड प्रस्तुत करना पड़ता है। इसका आशय यह है कि 6 वर्ष की उम्र में प्रत्येक बच्चे का आधार में पंजीयन अनिवार्य होगा। भारत में जन्म और मृत्यु का पंजीयन अनिवार्य कर दिया गया है। यदि इसे आधार के डाटा से लिंक कर दिया जाता है, तो हर 6 वर्ष में जनसंख्या का डाटा डिजिटल माध्यम से प्रदर्शित किया जा सकता है। इसमें प्रत्येक व्यक्ति के माता पिता स्वयं की जानकारी, जन्म स्थान, आयकर ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर कार्ड, राशन कार्ड, जन्म-मृत्यु प्रमाण, पंजीयन, धर्म, जाति एवं मूल निवास से संबंधित सभी जानकारी आसानी से उपलब्ध होगी।
अभी 10 वर्ष में जनगणना होती है। इसमें हजारों करोड़ रुपए भारत सरकार के प्रत्यक्ष रूप में खर्च होते हैं। 6 माह तक चलने वाले जनगणना की जानकारी एकत्रित करने के लिए हर राज्य के लाखों कर्मचारी और अधिकारी इस काम में लगते हैं। इसका डाटा तैयार करने में और कर्मचारियों की वेतन एवं अन्य खर्च में प्रत्येक 10 वर्ष में दो लाख करोड़ रुपए से अधिक केंद्र एवं राज्य सरकार का खर्च होता है। भारत सरकार ने सेल्फ सर्टिफिकेशन के माध्यम से राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर तैयार करने का काम 1 अप्रैल 2020 से 30 सितंबर 2020 तक कराने का निर्णय लिया है। इसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 2 लाख करोड रुपए से कम खर्च नहीं होंगे। केंद्र सरकार यदि आधार के डाटा के आधार पर राष्ट्रीय जनगणना रजिस्टर प्रत्येक 6 वर्ष में तैयार करें, तो इसमें 100 से 200 करोड़ रुपए खर्च करने में यह काम आसानी से होगा। जनगणना के दौरान 6 माह तक केंद्र एवं राज्य सरकारों का काम पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है। वह भी नहीं होगा। आधार से जोड़कर प्रक्रिया अपनाने से हजारों करोड़ रुपए की केंद्र एवं राज्य सरकारों की बचत होगी।
इस दिशा में सरकार को ध्यान देने की जरूरत है।

समाजवादी विचार की जीवंत मूर्ति थे – मामा जी
डॉ. सुनीलम
( मामा बालेश्वर की 21 वीं पुण्यतिथि पर विशेष ) मामा जी के जीवन काल में मैंने उन्हें देखा भर था। जॉर्ज साहब और मधु लिमये जी के यहां परिचय हुआ , मुलाकात हुई। परंतु मामा जी के देहांत के बाद उनके कार्य क्षेत्र में जाने के बाद मामा जी के विराट व्यक्तित्व के बारे में पता चला। मैंने समाजवादी आंदोलन के दस्तावेजों का प्रो. विनोद प्रसाद सिंह जी के साथ संकलन करने के दौरान बहुत कुछ पढ़ा। यहां तक कह सकता हूं कि आज तक मैंने समाजवादियों के बारे में जितना भी पढ़ा है और जानता हूं उसमें जितना जमीनी असरकारी कार्य मामा जी ने किया उसकी तुलना किसी दूसरे व्यक्ति के साथ नहीं की जा सकती।
मामा जी विशुद्ध राजनीतिक व्यक्ति थे। केवल समाजवादी सिद्धातों में भरोसा ही नहीं करते थे। उन्होंने आजीवन समाजवादी आचरण ही किया। समाजवाद की जीवन्त मूर्ति कहना ही न्यायसंगत होगा ।उनका यही गुण उन्हें अन्य नेताओं की तुलना में विश्ष्टि स्थान दिलाता है। हमने डॉ. राममनोहर लोहिया जी के ‘जेल, वोट, फावड़ा’ के सिद्धांत को सुना लेकिन तीनों क्षेत्रों में योगदान करते मामा जी को जाना और समझा । मामा जी अंग्रेजों के जेल में रहे और आजादी के बाद भी जेल गये। उन्होंने पूरे भीलांचल के आदिवासियों को अन्याय, अत्याचार के खिलाफ लाल टोपी पहनकर, लाल झंडा लेकर संघर्ष करना सिखाया। मामा जी ने पूरे भीलांचल की राजनीति को प्रभावित किया। आज भी चुनाव के दौरान विभिन्न पार्टियों के नेतागण मामाजी के नाम का उपयोग करते हुये दिखलाई देते हैं। आज भी मामा जी के अनुयाइयों का राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में वोट बैंक है। मामा जी ने शिक्षा के क्षेत्र में स्कूल चलाकर योगदान किया। वैसे भी वे भीलों के लिये सदा हेडमास्टर के तौर पर कार्य करते। कैसे रहना चाहिये, क्या कपड़े पहनना चाहिये, क्या खाना-पीना चाहिये सबकुछ उन्होंने सिखाया। भीलांचल के लोग आज भी ये मानते हैं कि मामा जी के प्रयासों के चलते ही आदिवासियों ने लंगोटी छोड़कर पूरे कपड़े पहनना शुरू किया। मामा जी ने दहेज दापा की प्रथा को समाप्त करने तथा मांस-मदिरा छोड़ने के लिये आदिवासियों को प्रेरित किया। मामा जी ने न केवल राजनीतिक और वैचारिक प्रशिक्षण दिया बल्कि उन्होंने धर्मग्रंथों के माध्यम से भी आदिवासियों को तमाम किस्म की सीख देने का काम किया।
मामा जी लोक भाषा, लोक भूषा, लोक भोजन और लोक संस्कृति को अपनाने वाले समाजवादी नेता रहे। उन्होंने भीली भाषा में तमाम किताबें लिखीं। हिन्दी तो मामा जी की मातृ भाषा थी ही लेकिन उन्होंने गांव-गांव में जाकर भीली भाषा में भी आदिवासियों के साथ संवाद किया। इस तरह जेल, वोट, फावड़ा के सिद्धांत को मूर्त रूप देने का काम मामा जी ने किया।
मामा जी ने कभी परिवार से कोई घनिष्ठ रिश्ता नहीं रखा। एक बार जब निवाड़ी कला यानि अपना पैतृक गांव छोड़ा, उसके बाद गांव से बहुत ज्यादा रिश्ता नहीं रखा। यही कारण रहा कि हमने जब मामा जी के जन्मस्थान निवाड़ी कला,इटावा से कर्म क्षेत्र बामनिया तक की यात्रा की तब उनके खुद के गांव में मामाजी की विद्ववता तथा उनके स्वतंत्रता आंदोलन एवं समाजवादी आंदोलन में योगदान को जानने वाले बहुत कम मिले। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि मामाजी के अनुयाइयों ने राजस्थान से जाकर उनके अपने गांव में मूर्ति लगाई, शायद इसी को कहते हैं घर की मुर्गी दाल बराबर। मैंने जब निवाड़ी कला में कार्यक्रम किया था तब तमाम नेताओं ने, तमाम घोषणायें मामाजी को लेकर की थीं जैसा निवाड़ी कला में हुआ वैसा ही बामनिया में भी हुआ। मामाजी के तमाम चेले मंत्री बनकर बामनिया गये, तमाम घोषणायें कीं, लेकिन उनको घोषणाओं पर अमल नहीं हुआ।
इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जिस व्यक्ति के 150 से ज्यादा मंदिर स्वयं आदिवासियों ने बनाए हों, जिसकी पूजा लाखों आदिवासियों द्वारा की जाती हो, जिसने आजादी के आंदोलन में ही नहीं, आजादी के बाद भी भीलांचल को मुख्य धारा से जोड़ने में अहम योगदान किया हो उस व्यक्ति की एक मूर्ति भी झाबुआ जिलाधीश कार्यालय के सामने आज तक न लगाई गई हो। मामा जी का सम्मान तो सभी पार्टियों और विचारधाराओं के लोग व्यक्तिगत तौर पर करते हैं लेकिन मामा जी की विचारधारा को खतरनाक मानते हैं तथा उस समाजवादी विचारधारा को खत्म करने का हर संभव प्रयास करते हैं। सरकारों और समाज के बलशाली लोगों को मामा जी के देवता हो जाने से कोई परेशानी नहीं है। लेकिन उन्हें समाजवादी विचार के नेता के तौर पर वे किसी भी हालत में स्थापित नहीं होने देना चाहते। यही कारण है कि मामा जी के समाधि स्थल – भीलाश्रम को किसी भी सरकार ने विकसित नहीं होने दिया है।
मामा जी को भारत रत्न देने की मांग उनके अनुयायी कई वर्षों से कर रहे हैं। अभी तक सरकारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगा है। मामा जी के नाम से बामनिया रेलवे स्टेशन का नामकरण किया जाये इस मांग को भी किसी सरकार ने भी तवज्जो नहीं दी है।
मामा जी के नाम को आगे बढ़ाने का काम मूल तौर पर भक्ति मार्ग से जुड़े मामाजी के अनुयायी( भगत ) कर रहे हैं। मामा जी के जीवन काल में ही राजस्थान के आदिवासियों ने मामा जी के जन्मदिन पर आश्रम में आना शुरू कर दिया था। देहांत के बाद आश्रम आने वाले आदिवासियों की संख्या दिन दुगनी रात चैगनी बढ़ती चली गई। लेकिन 25-26 दिसम्बर की रात को हर वर्ष पच्चीस हजार से अधिक अनुयाइयों के लिये कोई सुविधा का इंतजाम शासन और सरकार की ओर से अब तक नहीं किया जा सका है।
अक्सर यह कहा जाता है कि सभी नेता एक जैसे होते हैं लेकिन मामा जी का पूरा जीवन उन्हें अन्य नेताओं से पूरी तरह अलग करता है। जो लोग सार्वजनिक जीवन में समाज के लिये योगदान करना चाहते हैं उनके लिये मामा जी का संपूर्ण जीवन एक मॉडल पेश करता है। एक तरफ
जहां मामा जी के व्यक्तित्व में सादगी, सरलता, निर्भीकता, बहादुरी, त्याग, कथनी और करनी का तारतम्य है वहां उनके सार्वजनिक जीवन में समाजवादी विचार के प्रति अडिग प्रतिबद्धता दिखलाई पड़ती है। मामा जी जैसे नेता कई सदियों में एक बार ही होते हैं इसलिये मामा जी के अनुयायी नारा लगाते हैं ‘जब तक सूरज चांद रहेगा, मामा जी का नाम रहेगा’।
जरूरत इस बात की है कि मामा जी के समाजवादी विचारों को आगे बढ़ाने के लिये सुनियोजित तौर पर कार्य किया जाये। मामा जी के फोटो और कैलेन्डर तो हजारों की संख्या में हर साल बेचे जाते हैं। मामा जी पूरे भीलांचल के हर घर में मौजूद हैं लेकिन यही बात मामा जी के विचार के बारे में नहीं कही जा सकती। यह तो सभी मानते हैं कि यदि मामाजी ने अपना पूरा जीवन इस इलाके में नहीं लगाया होता तो यह इलाका भी नक्सलवाद और माओवाद से प्रभावित होता यह निष्कर्ष भी सरकारों के लिये एक रास्ता बताता है।
मामा जी के जीवन पर मैंने क्रांति कुमार जी, राजेश बैरागी जी तथा राजस्थान के साथियों के साथ मिलकर मालती बेन ,पुंजा भगत और मास्टर रामलाल निनामा के मार्गदर्शन में आठ से अधिक किताबें प्रकाशित की हैं लेकिन यह बहुत कम हैं। मामा जी के समाजवादी साहित्य को भीलांचल के हर घर तक पहुंचाने की जरूरत है ताकि मामा जी के जीवन से प्रेरणा अधिक से अधिक लोग ले सकें।

धर्म की कम देश की अधिक चिंता करने का समय

तनवीर जाफ़री
नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा संसद के दोनों सदनों में पारित करवाया जा चुका नागरिकता संशोधन विधेयक अब क़ानून का रूप लेने जा रहा है। इस नव संशोधित नागरिकता क़ानून के दोनों सदनों यानी लोकसभा व राज्य सभा में पेश होने के दौरान ही देश के कई राज्यों में इस विधेयक का बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हुआ था जो अब भी जारी है।असम व बंगाल में तो इस आंदोलन ने हिंसक रूप धारण कर लिया है। इससे पहले राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर लागू करने के प्रयासों के दौरान भी असमवासियों में काफ़ी बेचैनी दिखाई दी थी। मोदी सरकार द्वारा लाया जाने वाला नागरिकता संशोधन क़ानून हो या राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर इन दोनों ही प्रयासों से स्पष्ट हो गया है कि यह सरकार भारतवासियों अथवा मानवता के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि धर्म के नज़रिये से अपना सत्ता सञ्चालन कर रही है। हालांकि सरकार द्वारा समय समय पर संविधान की रक्षा की दुहाई भी दी जाती है। परन्तु उसके द्वारा बहुमत की आड़ में उठाए जाने वाले कई क़दम ऐसे प्रतीत होते हैं गोया मोदी सरकार संविधान विरोधी कार्य कर रही हो। भारतीय संविधान की उद्देशिका के रूप में संविधान के शुरूआती प्रथम पृष्ठ पर मोटे शब्दों में अंकित है-“हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न,समाजवादी, पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक न्याय,विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख़ 26 नवंबर 1949 ईस्वी(मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी संवत दो हज़ार छः विक्रमी ) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत,अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।” इस प्रस्तावना में किसी धर्म जाति या क्षेत्र अथवा भाषा का ज़िक्र करने के बजाए ‘हम भारत के लोग’ और ‘उसके समस्त नागरिकों’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है तथा धर्म,जाति व क्षेत्र आदि के भेद भाव के बिना समस्त भारतवासियों को साथ लेकर राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया गया है।
क्या मोदी सरकार संविधान की इस प्रस्तावना का अनुपालन कर पा रही है ? नागरिकता संशोधन क़ानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर तैयार करने जैसी कोशिशें क्या भारतीय संविधान की मूल आत्मा अर्थात पंथ निरपेक्षता का पालन करती हैं? आख़िर क्या वजह है कि देश के कई राज्यों में इस समय बेचैनी दिखाई दे रही है। क्या बहुमत का अर्थ यह है कि सरकार अपने पूर्वाग्रही,गुप्त व साम्प्रदायिक एजेंडे को लागू करते हुए पंथ निरपेक्ष होने के बजाए बहुसंख्यवाद की राजनीति कर अपनी सत्ता सुरक्षित रखने की कोशिश करे?आख़िर सरकार द्वारा किस आधार पर अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के केवल हिंदू, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी धर्म के लोगों को ही नए नागरिकता क़ानून के तहत भारत की नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है? इसमें मुसलमानों को शामिल क्यों नहीं किया गया ? हालाँकि इस विषय पर संसद में चली बहस के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना था कि “भारत के तीनों पड़ोसी धर्मशासित देशों में अल्पसंख्यकों का लगातार मज़हबी उत्पीड़न हुआ है, जिसकी वजह से उन्हें भारत में शरण लेनी पड़ी है. छह अल्पसंख्यक समूहों को नागरिकता का अधिकार देने का फ़ैसला सर्व धर्म समभाव की भावना के अनुरूप है.” गृह मंत्री अमित शाह ने भी चर्चा के दौरान फ़रमाया कि -‘पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में इस्लाम को मानने वाले अल्पसंख्यक हैं क्या? देश का धर्म इस्लाम हो तो मुस्लिमों पर अत्याचार की संभावना कम है’ उन्होंने कहा कि मुसलमानों के आने से ही क्या धर्मनिरपेक्षता साबित होगी?
देश व देश के स्वयंभू रखवालों से कोई पूछे कि इन तीनों ही देशों में आज तक सबसे अधिक प्रताड़ना किन लोगों को सहनी पड़ी है ? अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश तीनों ही देशों में कट्टरपंथी ताक़तें चाहे वे सत्ता द्वारा संरक्षित हों या सत्ता विरोधी परन्तु इन अतिवादी ताक़तों द्वारा सबसे अधिक प्रताड़ित उन लोगों को ही किया जाता है जो वैचारिक रूप से इनसे सहमत न हों। इनमें मुसलमानों में ही गिने जाने वाले शिया,बरेलवी,अहमदिया,सूफ़ी जैसे समुदाय के लोग सबसे बड़ी संख्या में शामिल हैं। इन समुदायों के लोग मुसलमान हैं भी और ज़ाहिर है स्वयं को मुसलमान ही कहते भी हैं। परन्तु आतंक का पर्याय बनी कट्टर मुस्लिम शक्तियां इन्हें मुसलमान नहीं मानतीं। विचारधारा के इस टकराव में निश्चित रूप से सबसे अधिक उत्पीड़न इन तीनों देशों में इन्हीं मुसलमानों का किया जाता है। शिया,बरेलवी,अहमदिया,सूफ़ीआदि समुदाय के लोगों के धर्मस्थलों,मस्जिदों,दरगाहों,इमामबारगाहों को ध्वस्त किया जाता है। मुहर्रम के जुलूसों व मजलिसों पर आत्मघाती हमले किये जाते हैं।कई दरगाहों में उर्स जैसे बड़े समागमों यहाँ तक कि शादी समारोह तक में आतंकी आत्मघाती हमले करे गए जिसमें अब तक हज़ारों मुसलमान मारे जा चुके हैं।क्या इन पीड़ितों को भारत में नागरिकता लेने का अधिकार नहीं? और यह हालात गृह मंत्री अमित शाह के इस दावे कि ‘देश का धर्म इस्लाम हो तो मुस्लिमों पर अत्याचार की संभावना कम है’की कहाँ तक पुष्टि करते हैं ?
अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेशको छोड़ कर यदि हम श्री लंका,चीन,नेपाल,तिब्बत और म्यांमार जैसे देशों की बात करें तो यहाँ भी मुसलमानों के साथ साथ अन्य धर्मावलंबी भी धर्म के आधार पर उत्पीड़न का शिकार होते रहते हैं। उदाहरण स्वरूप तिब्बत के बौद्ध, श्रीलंका के तमिल, नेपाल के मधेसी,म्यांमार में रोहंगिया मुस्लिम,चिन, काचिन व अराकान समुदाय के लोग भी ज़ुल्म का शिकार होते रहते हैं परन्तु उन्हें भारत की नागरिकता दिए जाने वाले धर्मों की सूची में शामिल नहीं किया गया है ? क्या भारतीय संविधान इसी प्रकार के धार्मिक भेदभाव करने की शिक्षा देता है? क्या देश की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वालों ने ऐसे ही स्वतंत्र भारत की कल्पना की थी जो धर्म के आधार पर क़ानून बनाया करेगा? वर्तमान भाजपा सरकार दरअसल मुस्लिम विरोध पर आधारित राजनीति में ही अपनी सफलता देखती आ रही है। 2014 से लेकर अब तक मोदी सरकार तथा कई भाजपा शासित राज्य सरकारों ने ऐसे अनेक फ़ैसले लिए हैं जो भाजपा के मुस्लिम विरोधी रुख़ को दर्शाते हैं। जिस पंथ निरपेक्षता की बात भारतीय संविधान में की गयी है भाजपा उसपर विश्वास करने के बजाए हिंदूवादी राजनीति पर अधिक विश्वास करती है। और जो भी दल या नेता मुस्लिम अल्पसंख्यकों के हितों की बात करता है उसे हिन्दू विरोधी साबित करने की चतुराई करती है। विपक्ष को मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाला बताकर स्वयं हिन्दू वोट बैंक की राजनीति करती है।
उपरोक्त परिस्थितियों में देश व संविधान की मूल आत्मा को बचाने की ज़िम्मेदारी निश्चित रूप से समूचे विपक्ष के साथ साथ पूरे देश की जनता की भी है। भाजपा के रणनीतिकारों ने बड़े ही शातिराना तरीक़े से नवनिर्मित नागरिकता संशोधन क़ानून तथा राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर जैसे अति गंभीर विषयों पर विपक्ष को भी विभाजित करने की कोशिश की है।ऐसे में जो भी विपक्षी दल व नेता भारतीय संविधान व देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के पैरोकार हैं उन्हें बिना समय गंवाए ऐसे काले क़ानूनों के विरुद्ध एकजुट हो जाना चाहिए। यह वक़्त देश की आत्मा के लिए संकट का समय है। यह समय धर्म से भी अधिक देश की चिंता करने का समय है।

भारतीय राजनीति के आकाश का ध्रुवतारा थे अटल जी
योगेश कुमार गोयल
(अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती 25 दिसम्बर) पर विशेष) तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी आज हमारे बीच नहीं हैं। उन्होंने 93 वर्ष की आयु में 16 अगस्त 2018 को दिल्ली के एम्स अस्पताल में अंतिम सांस ली थी। देहांत से पूर्व वे कई वर्षों से अस्वस्थ चल रहे थे। 27 मार्च 2015 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने स्वयं उनके आवास पर जाकर प्रोटोकॉल तोड़ते हुए उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया था। अटल जी तीन बार प्रधानमंत्री, दो बार राज्यसभा सदस्य तथा दस बार लोकसभा सदस्य रहे। अटल जी भले ही भाजपा के शीर्ष नेता रहे लेकिन वो देश के सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में से एक थे। सही मायने में अटल जी भारतीय राजनीति के आकाश का ध्रुवतारा थे। उनकी शख्सियत ऐसी थी कि हर राजनीतिक दल में उनकी स्वीकार्यता रही।
2005 में जब वाजपेयी जी ने राजनीति से सन्यास लेने की घोषणा की थी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने ही उन्हें ‘मौजूदा राजनीति का भीष्म पितामह’ की संज्ञा दी थी। अटल जी एक ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने अपने जीवन का हर पल राष्ट्र को समर्पित कर दिया था। भारतीय राजनीति की महान विभूति रहे अटल जी का विराट व स्नेहिल व्यक्तित्व, विलक्षण नेतृत्व, दूरदर्शिता तथा अद्भुत भाषण देने का सामर्थ्य उन्हें एक विशाल व्यक्तित्व प्रदान करते थे। सही मायने में अटल जी का अवसान ‘अटल युग’ का अवसान है। बतौर प्रधानमंत्री उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से था 1 मई 1998 को राजस्थान के पोरखण में किया गया परमाणु बम परीक्षण, जिससे देश समूची दुनिया में एक प्रमुख परमाणु शक्ति सम्पन्न देश के रूप में उभरा। उन्होंने अपनी कुशल भाषण कला शैली से राजनीति के शुरूआती दिनों में ही ऐसा रंग जमा दिया था कि हर कोई उनके भाषणों का कायल हो जाता था। कहा जाता है कि उनके भाषण इतने प्रभावशाली होते थे, जिन्हें सुनने विरोधी भी चुपके से उनकी सभाओं में जाते थे। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष अनंतशयनम अयंगार ने एक बार कहा था कि हिन्दी में अटल बिहारी वाजपेयी से अच्छा वक्ता कोई नहीं है। यह भी कहा जाता रहा है कि स्वयं नेहरू वाजपेयी द्वारा उठाए गए मुद्दों को बहुत ध्यान से सुना करते थे।
बात वर्ष 1957 की है, जब वाजपेयी जी पहली बार सांसद चुने गए थे। अटल जी उस समय 34 वर्ष के युवा थे और उन्हें संसद में बोलने का ज्यादा समय नहीं मिलता था लेकिन वाजपेयी जी की हिन्दी पर इतनी अच्छी पकड़ थी कि उन्होंने संसद में अपनी एक अलग पहचान बना ली थी। पं. नेहरू उस समय देश के प्रधानमंत्री थे, वे भी वाजपेयी जी की हिन्दी से बहुत प्रभावित थे और यही कारण था कि नेहरू संसद में उनके सवालों का जवाब हिन्दी में ही दिया करते थे। ऐसे ही संसद में बहस के दौरान एक बार नेहरू जी ने जनसंघ की कटु आलोचना की तो अपनी हाजिरजवाबी का परिचय देते हुए अटल जी ने तपाक से कहा कि मैं जानता हूं कि पंडित जी रोज शीर्षासन करते हैं, वे शीर्षासन करें, उस पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है लेकिन वे शीर्षासन करते हुए मेरी पार्टी की तस्वीर उल्टी न देखें। वाजपेयी जी के इस जवाब को सुनकर नेहरू भी ठहाका लगाकर हंस पड़े थे।
25 दिसम्बर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक स्कूल अध्यापक के घर जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी मूल रूप से कवि और शिक्षक थे। कॉलेज में शिक्षण के दौरान ही उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं। 1943 में वे कॉलेज यूनियन के सचिव रहे और 1944 में उपाध्यक्ष बने। वे बचपन में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे और उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शाखा प्रभारी के रूप में भी कार्य किया। देश के लिए कुछ करने के जज्बे के साथ उन्होंने पत्रकारिता का रास्ता चुना और एक पत्रकार बन गए। राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर के बाद उन्होंने पत्रकारिता में अपना कैरियर शुरू किया था। अटल जी ने राष्ट्रधर्म, पांचजन्य, वीर अर्जुन और स्वदेश का संपादन किया। 1951 में जब जनसंघ की स्थापना हुई थी, तब अटल जी ने चुनावी राजनीति में प्रवेश किया था। हालांकि लखनऊ में लोकसभा उपचुनाव में अटल जी हार गए थे किन्तु वो इस हार से निराश नहीं हुए।
अटल जी भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य थे और जनसंघ ने 1957 में अटल जी को एक साथ तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से मैदान में उतारा किन्तु मथुरा में उनकी जमानत जब्त हो गई, लखनऊ में उन्हें हार का सामना करना पड़ा लेकिन बलरामपुर से वे चुनाव जीत गए और जीतकर वो पहली बार द्वितीय लोकसभा में पहुंचे। 1968 से 1973 तक अटल जी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे और 1975-77 के आपातकाल के दौरान उन्हें भी जेल भेजा गया। 1977 में जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार में वे विदेश मंत्री बने और उस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में अटल जी ने हिन्दी में ऐसा ओजस्वी भाषण दिया, जिसकी दुनियाभर में व्यापक सराहना हुई, जिसे स्वयं अटल जी अपने जीवन का सबसे सुखद क्षण बताया करते थे। 1979 में जनता पार्टी की सरकार गिर गई, जिसके बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन किया गया, जिसके संस्थापक सदस्य अटल जी ही थे और वे भाजपा के पहले अध्यक्ष भी बने तथा 1986 तक इस पद पर आसीन रहे और संसद में भाजपा संसदीय दल के नेता भी बने रहे। 1962 से 1967 और 1986 में अटल जी राज्यसभा के सदस्य भी रहे। आपातकाल के बाद जब चुनाव की घोषणा हुई थी तो कवि हृदय वाजपेयी जी ने कहा था:-
बाद मुद्दत के मिले हैं दीवाने,
कहने सुनने को बहुत हैं अफसाने।
खुली हवा में जरा सांस तो ले लें,
कब तक रहेगी आजादी कौन जाने!
पहली बार अटल जी 16 मई 1996 को देश के प्रधानमंत्री बने किन्तु उनकी सरकार मात्र 13 दिन ही चली क्योंकि सदन में बहुमत साबित न कर पाने के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और वे 1998 तक लोकसभा में विपक्ष के नेता बने रहे। दूसरी बार वे 1998 में प्रधानमंत्री बने लेकिन सहयोगी दलों द्वारा समर्थन वापस लेने के कारण 13 माह के अंतराल बाद उनकी सरकार गिर गई, जिसके बाद 1999 में हुए राजग के साझा घोषणापत्र पर चुनाव लड़ा गया, जिसमें वाजपेयी के नेतृत्व को प्रमुख मुद्दा बनाया गया। चुनाव में राजग को बहुमत हासिल हुआ और 13 अक्तूबर 1999 को अटल जी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद संभाला तथा कार्यकाल पूरा करते हुए 2004 तक इस पद को सुशोभित किया। 2005 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी थी। 2007 में उनकी अंतिम सभा 25 अप्रैल को कपूरथला चौराहे पर भाजपा उम्मीदवारों के समर्थन में हुई थी लेकिन उसके बाद उनका स्वास्थ्य खराब होता गया। 2009 में उनकी तबीयत ज्यादा खराब होने पर उन्हें कई दिनों तक वेंटिलेटर पर रखा गया था लेकिन ठीक होने पर उन्हें अस्पताल से छुट्टी तो दे दी गई थी किन्तु उसके बाद के वर्षों में उन्हें स्वास्थ्य संबंधी गंभीर परेशानियां लगातार बनी रही और वे 16 अगस्त 2018 को समस्त देशवासियों को एक अटल शून्य में छोड़ चिरनिद्रा में लीन हो गए।

 

शिक्षा के मन्दिरों को कलंकित करते दरिन्दे
रमेश सर्राफ धमोरा
राजस्थान में झुंझुनू जिले के सैनिक स्कूल के एक शिक्षक ने स्कूल में पढ़ने वाले 12 नाबालिग बच्चों का यौन शोषण कर एक शर्मनाक काम किया है। कड़े सैनिक अनुशासन व चरित्र निर्माण की शिक्षा के लिए विख्यात सैनिक स्कूल पर इस घटना ने एक बदनुमा दाग लगा दिया है। इस घटना से देश के अंदर चल रहे सभी 28 सैनिक स्कूलों की छवि खराब हुई है। हालांकि दोषी शिक्षक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन सैनिक स्कूल में इस तरह की घटना का होना कई सवालों को खड़ा करती है। सैनिक स्कूल में लंबा चौड़ा स्टाफ व हर जगह सीसीटीवी कैमरे लगे रहते हैं। उसके उपरांत लगातार ऐसी घटना को अंजाम देना स्कूल प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। इस घटना से पुलिस भी लोगों के निशाने पर आई है। पुलिस ने इस घटना को जानबूझकर दबाने का प्रयास किया था जिसकी सर्वत्र निंदा हो रही है।
पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के सरकारी और सरकार की ओर से वित्तपोषित स्कूलों के शिक्षकों के लिए एक आचार संहिता तैयार की है जिसका सभी शिक्षकों व गैर-शिक्षण कर्मचारियों को पालन करना अनिवार्य है। इसके उल्लंघन का दोषी पाए जाने की स्थिति में नौकरी से बर्खास्त करने तक की सजा का प्रावधान है। बंगाल संभवत: ऐसी आचार संहिता बनाने वाला देश का पहला राज्य है। सरकार की ओर से जारी एक अधिसूचना में तमाम स्कूलों में इसका पालन अनिवार्य कर दिया गया है। हाल के वर्षों में पश्चिम बंगाल के स्कूलों में छात्र छात्राओं के यौन शोषण की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। कोलकाता में ही बीते दो वर्षों के दौरान ऐसी एक दर्जन से ज्यादा घटनाएं दर्ज की गई हैं। इनमें एक दर्जन से ज्यादा शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की गिरफ्तारी हुई है। ऐसे घटनाओं से संबंधित अभियुक्त के साथ ही स्कूल की भी बदनामी होती है।
झारखंड के धनबाद जिले में चौथी कक्षा की एक छात्रा से स्कूल के चिकित्सा कक्ष में उप-प्रधानाचार्य समेत दो अध्यापकों द्वारा कथित तौर पर दुष्कर्म करने का मामला सामने आया है। तोपचांची स्थित स्कूल के दो शिक्षकों और एक नर्स के खिलाफ कतरास थाने में एफआईआर दर्ज की गई है। छात्रा ने आरोपियों पर एक महीने पहले संस्थान के चिकित्सा कक्ष में उससे दुष्कर्म करने का आरोप लगाया है। पुलिस के मुताबिक पीड़ित छात्रा कक्षा में बेहोश हो गई थी। शिक्षक ने उसे चिकित्सा कक्ष में भेज दिया जहां नर्स ने उसे दवा दी जिससे वो बेसुध हो गई फिर उसके साथ दुष्कर्म हुआ।
आंध्र प्रदेश में कृष्णा जिले के एक सरकारी उच्च प्राथमिक स्कूल के प्रधानाध्यापक को अपने ही स्कूल की कक्षा 2 की बच्ची के साथ बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। स्कूल के प्रधानाध्यापक ने आठ साल की बच्ची को एक खाली कमरे में ले जाकर उसके साथ बलात्कार किया। इस घटना के बाद बच्ची रोती हुई घर गई थी। उसके कपड़ों पर चोट और खून के निशान थे। उसकी मां उसे एक निजी अस्पताल में ले गई जहां डॉक्टरों ने उसे बताया कि उसके साथ यौन उत्पीडऩ किया गया है। उत्तरी केरल के मलप्पुरम जिले में स्कूल के एक शिक्षक ने छात्रा से कथित तौर पर बलात्कार किया। सातवीं कक्षा की 12 वर्षीय छात्रा अब गर्भवती है। पुलिस के अनुसार दो महीने तक बच्ची के साथ बलात्कार किया गया।
राजस्थान के जैसलमेर के स्थानीय कोर्ट ने एक प्राइवेट स्कूल के मालिक को आठ वर्षीय बच्ची के बलात्कार के आरोप में 20 साल के कारावास की सजा सुनाई गई है। कोर्ट ने आरोपी हरि सिंह पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। आरोपी हरि सिंह जैसलमेर के मोहनगढ़ जिले में एक स्कूल का मालिक हैं। मगर लोगों का मानना था कि उसके अपराध को देखते हुये उसे मौत की सजा दी जानी चाहिये थी। राजस्थान के भीलवाड़ा के सरकारी स्कूल में टीचर ने गुरु शिष्य के संबंधों को शर्मसार कर दिया। सरकारी स्कूल में इंटर्नशिप करने आए एक युवक ने अपनी ही छात्रा के साथ बलात्कार किया। उसके बाद आरोपी ने नाबालिग छात्रा की तस्वीरें सोशल मीडिया में वायरल कर दी। बताया जा रहा है कि आरोपी सरकारी स्कूल में पढ़ाता था और नाबालिग छात्रा को ब्लैकमेल करता था। यह मामला तब सामने आया जब आरोपी ने नाबालिग छात्रा की ब्लैकमेल करने वाली तस्वीरें सोशल मीडिया में वायरल कर दीं। नाबालिग लडक़ी की तस्वीरें जब उसकी मां तक पहुंचीं तब पूरे मामले का खुलासा हुआ।
हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के उपमंडल अंब के तहत सीनियर सेकेंडरी स्कूल में एक शिक्षक ने नाबालिग छात्रा से स्कूल के वॉशरूम में दुष्कर्म कर डाला। 15 साल की छात्रा ने पुलिस को बताया कि वह रोजाना की तरह स्कूल गई हुई थी। इसी दौरान करीब 11 बजे जब वह स्कूल के वॉशरूम में गई थी तो आरोपी शिक्षक भी उसी के पीछे आ गया। जहां उसने छात्रा के साथ रेप किया। ओडिशा के कोरापुट के एक स्कूल में 7वीं क्लास में पढ़ने वाली छात्रा के साथ रेप की घटना सामने आई है। रेप का आरोप स्कूल के हेडमिस्ट्रेस के पति पर लगाया है। पुलिस का कहना है कि पीड़िता गर्भवती है। इस मामले में पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है।
बिहार में महिलाओं के साथ बढ़ती आपराधिक घटनाएं थमने का नहीं ले रही हैं। बिहार के बक्सर जिले में एक नाबालिग लड़की के साथ स्कूल में रेप की वारदात सामने आई है। वारदात जिले के कोरानसराय थाना इलाके की है। बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह रेप कांड में 34 बच्चियों के साथ बलात्कार किया गया था। उस कांड में कई बड़े लोगों को जेल की हवा खानी पड़ रही है।
देश के विभिन्न प्रांतों के स्कूलों में आए दिन छात्र छात्राओं के साथ स्कूल के शिक्षकों द्वारा यौन दुराचार की घटनाओं की खबर अखबारों की सुर्खियां बनती रहती है। जिससे ना केवल स्कूल ही बदनाम होता है बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था ही दागदार हो जाती है। केन्द्र व राज्य सरकारों को इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाने की दिशा में प्रभावी कदम उठाने चाहिये।
नाबालिग बच्ची से बलात्कार करने पर फांसी देने तक की सजा का प्रावधान किया जा चुका है। मगर आज भी ऐसे आरोपियों को निचली अदालतें आजन्म कारावास की सजा नहीं सुना रही है जिससे ऐसे वहशी दरिंदो में कानून का डर व्याप्त नहीं हो पा रहा है। हमारे देश के कानून में मिली नागरिक अधिकारों की रक्षा की छूट का फायदा भी ऐसे अपराधी आसानी से उठा कर कड़ी सजा से बच जाते हैं। शिक्षा के मन्दिरों को कलंकित करने वाले लोगों को जब तक कड़ी सजा नहीं मिलेगी तब तक शिक्षण संस्थाये ऐसे ही दागदार होती रहेगी।

वायु सेवाओं को मिली नई उड़ान
दुर्गेश रायकवार
राज्य सरकार ने अपने वचन-पत्र में प्रदेश में वायु सेवाओं का विस्तार करने का वादा किया था। वादे के मुताबिक राज्य सरकार पहले साल ही भोपाल और इंदौर विमानतल को “कस्टम नोटिफाइड एयरपोर्ट” घोषित कराने में सफल रही। वर्ष 2019 में इंदौर से विस्तारा एयरलाइंस और ट्रू-जेट एयरलाइन द्वारा हवाई उड़ानें शुरू की गईं। इन एयरलाइंस द्वारा दिल्ली-अहमदाबाद-हैदराबाद के लिये अतिरिक्त उड़ान सेवा इंदौर को मिली।
भोपाल से वर्ष 2019 में इंडिगो एयरलाइंस और स्पाइस जेट एयरलाईन ने उड़ान सेवा शुरू की। इसमें इंडिगो एयरलाइंस द्वारा भोपाल से हैदराबाद, दिल्ली, मुम्बई और बैंगलुरू की सेवाएँ दी जा रही हैं। स्पाइस जेट एयरलाईन द्वारा भोपाल से दिल्ली, मुम्बई, जयपुर और उदयपुर के लिए उड़ान सेवाएँ दी जा रही हैं। इन्दौर विमानतल कस्टम नोटिफाईड एयरपोर्ट घोषित होते ही यहाँ से दुबई के लिये अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें संचालित हो रही हैं।इस एयरपोर्ट पर कार्गो सेवा भी चालू हो गई है। भोपाल हवाई अड्डा कस्टम नोटिफाईड एयरपोर्ट घोषित होते ही कस्टम विभाग एवं गृह मंत्रालय द्वारा स्थल निरीक्षण किया गया और शीघ्र ही नोटिफिकेशन जारी किया जा रहा है।
रीवा, दतिया, रतलाम, उज्जैन, मंदसौर, छिंदवाड़ा, उमरिया एवं बालाघाट स्थित शासकीय हवाई पट्टियां पायलट प्रशिक्षण तथा अन्य उड्डयन गतिविधियाँ संचालित करने, एयरो स्पोर्टस गतिविधियां संचालित करने तथा एयरक्रॉफ्ट रिसाइक्लिंग, हेलीकॉप्टर अकादमी तथा एयरो स्पोर्टस आदि सुविधाएँ विकसित करने के लिए निर्धारित शुल्क पर आवंटित की गई हैं। इसी प्रकार अन्य हवाई पट्टियों को भी निर्धारित शुल्क पर दिये जाने की कार्य-योजना है।
वर्तमान में रीजनल कनेक्टिविटी योजना में निजी वैमानिक संस्थाओं द्वारा ग्वालियर-इन्दौर-ग्वालियर, ग्वालियर-दिल्ली, बैंगलुरू-ग्वालियर-बैंगलुरू, कोलकाता-ग्वालियर-कोलकाता, ग्वालियर-जम्मू-ग्वालियर तथा हैदराबाद-ग्वालियर- हैदराबाद रूट पर हवाई सेवाएँ संचालित हो रही हैं। भारत सरकार की रीजनल कनेक्टिविटी योजना (आर.सी.एस) के तहत रीवा-भोपाल एवं रीवा-झाँसी रूट विस्तारित किये गये हैं।
रीजनल कनेक्टिविटी योजना 4.0 में प्रदेश की बिरवा, छिंदवाड़ा, दतिया, मण्डला, नीमच, पचमढ़ी, रीवा, सतना एवं उमरिया हवाई पट्टियों को शामिल करने के लिये विमानन विभाग की ओर से भारत सरकार को पत्र लिखा गया है।
अब प्रदेश में विमान सेवाओं के विस्तार के जरिए पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। लोग कम समय में लंबी दूरी तय कर अपना समय बचा सकेंगे। इसी के साथ, बीमारी की दशा में भी लोगों को समय रहते इलाज मिल सकेगा।

नागरिकता के फर्जी मुद्दे पर फंसी भाजपा
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कोई कानून हमारी संसद स्पष्ट बहुमत से बनाए और उस पर इतना देशव्यापी हंगामा होने लगे, ऐसा मुझे कभी याद नहीं पड़ता। संसद के दोनों सदनों ने नागरिकता संशोधन विधेयक पारित किया, जिसके अनुसार पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आनेवाले शरणार्थियों को भारत की नागरिकता प्रदान की जाएगी। लेकिन यह नागरिकता सिर्फ हिंदुओं, सिखों, ईसाइयों, पारसियों और यहूदियों को दी जाएगी। इन देशों के मुसलमानों को नहीं दी जाएगी ? क्योंकि हमारी सरकार का दावा है कि इन पड़ौसी मुस्लिम देशों के उक्त अल्पसंख्यकों पर काफी अत्याचार होते हैं। उन्हें शरण देना भारत का धर्म है, कर्तव्य है, फर्ज है। इसी फर्ज को निभाने के लिए मोदी सरकार ने यह नया कानून बनाया है।
इसमें शक नहीं कि शरणार्थियों को शरण देना किसी भी सभ्य देश का कर्तव्य है। इस दृष्टि से यह कानून सराहनीय है लेकिन शरण देने के लिए जो शर्त रखी गई है, वह अधूरी है, अस्पष्ट है और भ्रामक है। भारतीय नागरिकता देने की शर्त यह है कि इन पड़ौसी इस्लामी देशों में गैर-मुस्लिमों पर अत्याचार होता है। मान लें कि यह आरोप सही है तो क्या उसका एक मात्र इलाज यही है कि धार्मिक अत्याचार के बहाने जो भी भारत पर लदना चाहे, उसे हम लाद लें ? भारत आनेवाले इन लाखों लोगों में से आप कैसे तय करेंगे कि कितने लोग धार्मिक उत्पीड़न के कारण शरण मांग रहे हैं ? हो सकता है कि वे बेहतर काम-धंधों के लालच में आए हों, भारत के जरिए अमेरिका और यूरोप जाने के लिए आए हों, अपने रिश्तेदारों के साथ रहने आए हों या उन सरकारों के लिए जासूसी करने के लिए भेजे गए हों। उनके पास तुरुप का बस एक ही पत्ता है कि वे मुसलमान नहीं है। बस, उनकी गाड़ी पार है। हम धार्मिक उत्पीड़न के बहाने भारत को दक्षिण एशिया का अनाथालय क्यों बना देना चाहते हैं ? इसी कारण पूर्वोत्तर के प्रांतों में बगावत की आग भड़की हुई है।
मूल प्रश्न यह है कि उत्पीड़न क्या सिर्फ धार्मिक होता है ? यदि यह सही होता तो 1971 में बांग्लादेश से लगभग एक करोड़ मुसलमान भागकर भारत क्यों आ गए थे ? पाकिस्तान के अहमदिया, शिया, बलूच, सिंधी और पठान लोग क्या मुसलमान नहीं हैं ? वे भागकर अफगानिस्तान, भारत और पश्चिमी देशों में क्यों जाते हैं ? क्या अफगानिस्तान के शिया, हजारा, मू-ए-सुर्ख, परचमी और खल्की लोग मुसलमान नहीं हैं ? वे वहां से क्यों भागते रहे ? इन तीनों देशों से बाहर भागनेवाले लोगों में हिंदू कम और मुसलमान बहुत ज्यादा क्यों हैं ? अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार घोषणा-पत्र और शरणार्थी अभिसमय के अनुसार कोई भी व्यक्ति सिर्फ धार्मिक उत्पीड़न ही नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और आनुवांशिक उत्पीड़न से त्रस्त होने पर शरण पाने का अधिकारी होता है। इसीलिए हमारा यह नागरिकता संशोधन कानून अधूरा है।
यह कानून सपाट भी है। यह सिर्फ पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों की ही चिंता करता है। क्यों करता है ? क्योंकि 1947 में बहुत-से गैर-मुस्लिम इन देशों में रह गए थे। वे मूलतः भारतीय ही हैं। यहां पहला सवाल है कि क्या 1947 में अफगानिस्तान भारत का हिस्सा था ? यदि नहीं तो उसे क्यों जोड़ा गया ? यदि उसे जोड़ा गया तो बर्मा, भूटान, श्रीलंका और नेपाल को क्यों छोड़ा गया ? बर्मा और श्रीलंका तो ब्रिटिश भारत के अंग ही थे। इन देशों के हजारों-लाखों गैर-मुस्लिम शरणार्थी भारत आते रहे हैं। उनमें तमिल, मुस्लिम, ईसाई और हिंदू शरणार्थी भी हैं। दुनिया के पचासों देशों में बसे दो करोड़ प्रवासी भारतीयों पर कभी संकट आया तो वे क्या करेंगे ?
यह ठीक है कि इस नए नागरिकता कानून से भारतीय मुसलमान नागरिकों को कोई नुकसान नहीं है लेकिन उन्हें क्या हुआ है ? वे क्यों भड़क उठे हैं ? क्योंकि इस कानून के पीछे छिपी सांप्रदायिकता दहाड़ मार-मारकर चिल्ला रही है। भाजपा ने अपने आप को मुसलमान-विरोधी घोषित कर दिया है। भाजपा जब विपक्ष में थी, तब वोट पाने के लिए यह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण समझ में आता था। चुनावी घोषणा-पत्र में इसे डाल दिया गया था लेकिन आप अब सत्ता में हैं। किसे नागरिकता देना, किसे नहीं, यह आपके हाथ में है। इसके लिए गुण-दोष का शुद्ध और निष्पक्ष पैमाना लगाइए और बिना किसी भेद-भाव के नागरिकता दीजिए या मत दीजिए। मेरी राय में यही सच्ची हिंदुत्व दृष्टि है।
यदि हिंदुओं के वोट-बैंक को मजबूत करने के लिए यह पैंतरा मारा गया है तो बंगाल, असम, त्रिपुरा और पूर्वोतर के अन्य प्रांतों में सारे हिंदू क्यों भड़के हुए हैं ? वहां की भाजपा सरकारें क्यों हतप्रभ हैं ? यह ठीक है कि इन प्रांतों के कुछ जिलों में शरणार्थी वर्जित हैं लेकिन अभी भी राष्ट्रीय नागरिकता सूची तैयार की गई है, उसमें से 19 लाख लोग बाहर कर दिए गए। उनमें से 11 लाख हिंदू बंगाली हैं। इन सीमांत प्रदेशों में से भाजपा का सूंपड़ा साफ होने की पूरी आशंका है। यह देश का दुर्भाग्य है कि पूर्वी सीमांत के प्रांतों में कोई भी अखिल भारतीय पार्टी जम नहीं पा रही है। भाजपा के इस कानून ने देश के परस्पर विरोधी दलों को भी एकजुट कर दिया है।
यह कानून बनाते समय सरकार और हमारे सांसदों ने यह भी ठीक से नहीं सोचा कि इससे अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की प्रतिष्ठा को कितनी ठेस पहुंचेगी। इस कानून के कारण मचे कोहराम के चलते गुवाहाटी में आयोजित भारतीय और जापानी प्रधानमंत्रियों की भेंट रद्द करनी पड़ गई। अमेरिकी सरकार और संयुक्तराष्ट्र के मानव अधिकार आयोग ने हमारे इस कदम की कड़ी आलोचना की है। पाकिस्तान के एक हिंदू सांसद और एक हिंदू विधायक ने इस कानून को वहां के हिंदुओं के लिए हानिकारक बताया है। बांग्लादेश, जो कि भारत का अभिन्न मित्र है, इस कानून से बहुत परेशान है। उसके विदेश मंत्री और गृहमंत्री ने अपनी भारत-यात्रा स्थगित कर दी है। इमरान खान इस कानून की निंदा करें, इसमें कोई अचरज नहीं है। मुझे डर यह है कि कहीं अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी और प्रधानमंत्री डाॅ. अब्दुल्ला भी भारत की आलोचना न करने लगें। भाजपा ने यह कानून लाकर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान को, जो कई मामलों में परस्पर विरोधी हैं, एकजुट कर दिया है। कहीं ये तीनों देश अपने यहां भारत-जैसा कोई जवाबी कानून ही पास न कर दें। याने वे भारत के अल्पसंख्यकों- मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों और दलितों को नागरिकता सहर्ष देने का कानून न बना दें। दुनिया में उनकी जितनी बदनामी होगी, उतनी ही हमारी भी होने लगेगी।
यदि भाजपा सरकार भारत में जनसंख्या का धार्मिक अनुपात सही करना चाहती है, जो कि उचित है तो उसे चाहिए कि वह ‘हम दो और हमारे दो’ का सख्त कानून बनाए। उसका उल्लंघन करनेवालों का जीना भारत में फिर आसान नहीं होगा। मेरा राय में सरकार में इतना साहस और आत्मविश्वास होना चाहिए कि वह इस कानून को वापस ले ले। इस फर्जी मुद्दे पर देश का समय बर्बाद करने की बजाय हमारे राजनीतिक दल देश की आर्थिक स्थिति को डावांडोल होने से बचाएं तो बेहतर होगा। यदि सर्वोच्च न्यायालय इस कानून को असंवैधानिक घोषित कर दे तो वह भारत को इस निरर्थक और फर्जी संकट से बचा सकता है।

जब गंगोत्री ही अपवित्र हैं तो गंगा कहाँ तक पवित्र होगी !
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
आजकल बलात्कार के साथ हिंसा ,चोरी, डैकेती ,वैश्यावृत्ति आदि पाप या अपराध बहुलता से हो रहे हैं ,और अपराधियों को आजकल कोई भय नहीं हैं ,जबकि सी सी टी वी ,तकनीकी की बहुलता होने से शीघ्र पकडे भी जाते हैं उसके बाद भी अपराधों की कमी न होना ,यह एक यक्ष्य प्रश्न हमारे समाज में हैं .क्या हमारे देश का कानून लचीला हैं ,उसमे युगानुसार परिवर्तन और परिवर्धन की आवश्यकता नहीं हैं ?या ऐसा तो नहीं हमारे देश की संसद और विधान सभा में निर्वाचित स्वयं इन अपराधों के बावजूद सम्मान पा रहे हैं .इसका मतलब यह हुआ की जब गंगोत्री ही अपवित्र हो रही हैं तो गंगा कहाँ तक पवित्र होंगी .
यह एक चिंतन का प्रश्न हैं की क्यों ये अपराध हो रहे हैं ?इसके मूल में बेरोजगारी ,महगाई ,नशा व्यसन ,परिवेश दूषित होना जैसे पहले फिल्मों को ,उसके बाद टी वी सेरिअल्स को और अब मोबाइल संस्कृति को आरोपित करना ,ये कितना सच हैं इसका विश्लेषण करना अलग बात हैं पर घटनाएं निरंतर बढ़ रही हैं .और ये अब कम होने वाली नहीं हैं ,उसका कारण भयमुक्त समाज और कठोर दंड का न होना या शीघ्र दंड न मिलना ,न्यायिक प्रक्रिया इतनी जटिल की अपराधी को नैसर्गिक न्याय हेतु सुसंगत अवसर देना ,उदहारण के लिए निर्भया काण्ड के अपराधियों का अपराध सिद्ध होने के बाद आज भी वे दंड से दूर हैं ,सरकार उनका पालन पोषण करती हैं और यह न्याय व्यवस्था भी हैं .क्या उनकी दया याचिका के लिए या दंड देने के लिए घटना की तुलना में कितना अधिक समय लग रहा हैं ,ऐसा क्यों ? एक बात और समझ में आ रही हैं की बेरोजगारी और महंगाई के कारण अब अपराधी अपराध कर सरकारी सम्पत्ति बनकर जेलों में सुरक्षित हो जाता हैं जहाँ सर्कार की जिम्मेदारी होती हैं उसके भरण पोषण ,रखरखाव की .और जेलों से सुरक्षित अन्य जगह नहीं हैं और कोई दुर्घटना हुई तो मानवाधिकार का डंडा चलने लगता हैं .
ऐसा सुनने में आया हैं की देश में जल्लादों की कमी होने से फांसी देने में कठनाइयां हैं ,ठीक भी हैं ,पर मौत से बड़ी सजा तो नहीं हो सकती हैं न ,जब अपराधियों को उससे डर नहीं लग रहा हैं इसका मतलब अपराधियों का कलेजा बहुत मजबूत होता हैं .
वर्त्तमान में जो अपराधों की संख्या में वृद्धि ,अनेकों प्रकार के अपराध और उनके करने ढंग बहुत चिंतनीय विषय हैं ,अकल्पनीय तरीकों को अपनाना .इसका हल मात्र यदि अपराध की पुष्टि होती हैं तो अपराधियों को भी त्वरित दंड देना चाहिए जैसे उन्होंने अपराध के लिए कोई समय नहीं लिया ,न कोई समय निश्चित किया और न कोई मुहूर्त देखा ,और उसके क्या दुष्परिणाम पीड़ित को होंगे और इसका हश्र उनके साथ कैसा होगा .तब न्याय व्यवस्था क्यों इतना विचार करती हैं .?
समाज में जागरूकता के बावजूद भी अपराधियों को कोई भय नहीं हैं ,खासतौर पर बलात्कार का मामला इतना सामान्य होने लगा की अब तो एक माह से लेकर कोई भी उम्र सुरक्षित नहीं हैं ,इसको वहशीपना कहना उचित होगा या बीमारियां .बात एक पक्षीय नहीं हैं ,किसी किसी प्रकरण में पीड़ित भी इसमें भागीदार होते हैं .आज सामाजिक मर्यादाएं तार तार हो रही हैं पर इनका उदगम फिल्म ,टी वी ,साहित्य मोबाइल के साथ दूषित मानसिकता हैं .
इन बुराइयों के लिए व्यापक चिंतन मनन की जरुरत हैं और सबसे पहले बचाव ही इलाज़ हैं ,सुरक्षा में ही जीवन हैं ,देखा देखी करने से हम को ही नुक्सान होता हैं .इसीलिए जितने भी सुरक्षा कवच हों उन्हें अपनाये .और अपराधियों के प्रति सरकार को निर्मम होना चाहिए .दंड व्यवस्था शीघ्र हो ,बिलम्व से न्याय भी अन्याय लगने लगता हैं .और सबसे पहले निर्वाचित नेताओं का बहिष्कार होना चाहिए और यदि वे अपराधी सिद्ध हो चुके हो तो उन्हें जेल में होना चाहिए.तभी कुछ संभावना दिखाई देगी .

कहां सावरकर और कहां राहुल ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हमारे आजकल के नेताओं से यह आशा करना कि वे नेहरु, लोहिया, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, विनोबा, अटलबिहारी वाजपेयी और नरसिंहराव की तरह पढ़े-लिखे होंगे, उनके साथ अन्याय करना होगा। वे सत्ता में हों या विपक्ष हों, उनका बौद्धिक स्तर लगभग एक-जैसा ही होता है। सलाहकार तो उनके भी होते हैं। लेकिन वे अपने स्तर के लोगों से ही घिरे रहते हैं। इसी का नतीजा है कि कांग्रेस के राहुल गांधी ने कह दिया कि मैं सावरकर हूं क्या, जो माफी मांगूगा। मैं सावरकर नहीं, राहुल गांधी हूं। क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा ? आप कौनसे गांधी हैं ? आपके दादाजी, फिरोज भाई तो खुद को गांधी भी नहीं लिखते थे। उनके सरनेम की स्पेलिंग होती थी ghendi याने घेंडी, घंदी या गंधी । राहुल ने यह नहीं बताया कि उसके माफी मांगने और सावरकर का क्या संबंध है। या तो उसे पता ही नहीं होगा कि उसने जो कहा, उसके पीछे कौनसी कहानी है। यह भी हो सकता है, जैसा कि होता हुआ अक्सर दिखाई पड़ता है कि किसी ने आकर कान में चाबी भरी और गुड्डा नाचने लगा। चाबी खतम तो नाच भी खतम। उसे आगा-पीछा कुछ पता नहीं। यह तो ठीक है कि रेप इन इंडिया (भारत में बलात्कार) कहने पर उसे माफी मांगने की कोई जरुरत नहीं थी, क्योंकि ऐसा कहकर वह बलात्कार का समर्थन नहीं कर रहा था बल्कि उसे धिक्कार रहा था लेकिन ‘मैं मर जाऊंगा लेकिन माफी नहीं मांगूंगा’, यह कहने की क्या मजबूरी थी ? जो सर्वोच्च न्यायालय से पहले ही माफी मांग चुका है, चौकीदार चोर है पर, उसे इतनी डींग मारने की क्या जरुरत है ? जहां तक अपने आपकी तुलना सावरकर से करने की बात है, यह तथाकथित नेता, जो पांच-सात वाक्य भी शुद्ध नहीं बोल सकता, उसकी यह हिमाकत ही है कि वह सावरकर को खुद से नीचा दिखाने की कोशिश करे। ऐसा करके अपनी भद्द पिटाने के अलावा इस घिसे-पीटे नौसिखिए ने और क्या किया ? सावरकर ने भारत की आजादी के लिए जैसी कुर्बानियां की हैं, क्या किसी कांग्रेसी नेता ने की है ? सावरकर ने जैसे मौलिक और खोजपूर्ण ग्रंथ लिखे हैं, उन्हें पढ़ने की भी क्षमता या बुद्धि आज के नेताओं में है ? सावरकर इतने बुद्धिवादी और तर्कशील थे कि उन्हें कांग्रेस तो क्या, जनसंघ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के लिए भी पचाना मुश्किल रहा है। यह ठीक है कि सावरकर और गांधी में कभी पटी नहीं लेकिन सावरकर में दम नहीं होता तो गांधी उनसे मिलने के लिए 1909 में लंदन के इंडिया हाउस और 1927 में उनके घर रत्नागिरि में क्यों गए थे ?

नेशनल स्पोर्ट्स हब बनने की ओर अग्रसर मध्यप्रदेश
बिन्दु सुनील
मध्यप्रदेश में पिछले एक साल में खेलों के लिये विश्व-स्तरीय अधोसंरचना विकास को वांछित गति मिली है। साथ ही, विभिन्न खेलों की पदक तालिका में लगातार पहले और दूसरे स्थान पर अपनी उपस्थिति कायम रखने में भी प्रदेश सफल है। प्रदेश की राज्य खेल अकादमियों के मॉडल को अंडमान-निकोबार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, नागालैंड, मेघालय, असम, गोवा और उड़ीसा आदि राज्यों ने सराहा है। ये सभी राज्य आंशिक अथवा पूर्ण रूप से मध्यप्रदेश अकादमी के मॉडल को लागू करने का प्रयास भी कर रहे हैं। अब राज्य सरकार ने प्रदेश की खेल प्रतिभाओं को बढ़ावा देने के लिए नई खेल नीति और खेलों का महत्त्व स्थापित करने के लिए स्पोर्ट्स कोर्स को कंपलसरी करने की योजना लागू करने का निर्णय लिया है।
-खिलाड़ियों के लिये चिकित्सा एवं दुर्घटना बीमा
प्रदेश के खिलाड़ियों को अब चिकित्सा एवं दुर्घटना बीमा का लाभ मिलेगा। मध्यप्रदेश अब खिलाड़ियों का बीमा कराने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। प्रथम चरण में विभिन्न खेल अकादमियों के लगभग 822 खिलाड़ियों को बीमा का लाभ दिया जा रहा है। चिकित्सा बीमा से खिलाड़ी देश के चुनिन्दा अस्पतालों में से किसी भी अस्पताल में अपना इलाज करवा सकते हैं। इसके लिये उन्हें 2 लाख रुपये तक नि:शुल्क उपचार सुविधा उपलब्ध कराई गई है। खिलाड़ियों का 5 लाख रुपये का जीवन बीमा भी कराया गया है। साथ ही, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के खिलाड़ियों के अभिभावकों को भी जीवन बीमा में शामिल किया गया है।
बीमा के माध्यम से खिलाड़ियों को पूरे देश में कैशलेस उपचार की सुविधा उपलब्ध रहेगी। प्रदेश के ऐसे खिलाड़ी, जो अधिकृत रूप से राष्ट्रीय प्रतियोगिता में प्रतिभागिता कर रहे हैं, उन्हें भी चिकित्सा एवं दुर्घटना बीमा की कैशलेस सुविधा उपलब्ध कराने की प्रक्रिया जारी है। इसके लिये संबंधित खेल संघ को राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी की प्रमाणित सूची उपलब्ध करानी होगी। परीक्षण के बाद खिलाड़ी का पंजीयन कर उसे यह सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।
-शासकीय सेवा में खिलाड़ियों को 5 प्रतिशत आरक्षण
प्रस्तावित नई खेल नीति में यह व्यवस्था की जा रही है कि शासकीय नौकरी में खिलाड़ियों को 5 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिल सके।
अंतर्राष्ट्रीय पदक विजेता और सहभागिता के लिए प्रोत्साहन राशि
प्रदेश में पहली बार ओलंपिक, विश्व कप, एशियाई गेम्स, राष्ट्र-मंडल खेल और दक्षिण एशियाई खेलों में पदक प्राप्त करने वाले खिलाड़ियों के लिये प्रोत्साहन राशि निश्चित की गयी है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक हासिल करने पर 2 करोड़, रजत पदक पर एक करोड़ तथा कांस्य पदक हासिल करने पर 50 लाख की प्रोत्साहन राशि का प्रावधान किया गया है। इसके अतिरिक्त कोई भी खिलाड़ी, जिसने अंतर्राष्ट्रीय खेलों में प्रतिभागिता की है और पदक नहीं भी लिया है, तब भी उसे प्रोत्साहन के तौर पर 10 लाख की राशि दी जायेगी। राष्ट्रीय खेल एवं राष्ट्रीय चेंपियनशिप में पदक विजेता खिलाडियों को स्वर्