आलेख- 22

इंदर गुजराल का सौंवा साल
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
श्री इंदर गुजराल आज जिंदा होते तो हम उनका सौंवा जन्मदिन मनाते। वे मेरे घनिष्ट मित्र थे। वे भारत के प्रधानमंत्री रहे, सूचना मंत्री रहे और मुझे याद पड़ता है कि वे दिल्ली की नगरपालिका के भी सदस्य रहे। उनसे मेरा परिचय अब से लगभग 50 साल पहले हुआ, जब वे इंदिराजी की सरकार में मंत्री थे। सोवियत रुस का सांस्कृतिक दूतावास बाराखंभा रोड के कोने पर हुआ करता था। वहां गुजराल साहब का भाषण था। मैं उन दिनों बाराखंभा रोड स्थित सप्रू हाउस में रहता था और अंतराष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. कर रहा था। मैं भी पहुंचा वहां। देखा कि रुसी कामरेड लोग रुसी भाषा में भाषण दे रहे हैं लेकिन गुजराल साहब अंग्रेजी में बोलने लगे। मैंने खड़े होकर कहा कि वे अपनी राष्ट्रभाषा में बोल रहे हैं। आप अपनी राष्ट्रभाषा में क्यों नहीं बोलते ? उसी दिन उनसे मेरा परिचय हो गया। धीरे-धीरे यही परिचय दोस्ती में बदल गया। गुजराल साहब एक दिन अपनी फिएट कार में बिठाकर मुझे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में ले गए। मेरी अनिच्छा के बावजूद उन्होंने मुझे ‘सटेरडे लंच ग्रुप’ का सदस्य बनवा दिया। इस ग्रुप में देश और विदेश की ज्वलंत समस्याओं पर इतना गहरा विचार-विमर्श होता है कि किसी भी सरकार के मंत्रिमंडल को इससे ईर्ष्या हो सकती है। इसका कारण है। इसमें विभिन्न विषयों के उत्कृष्ट विशेषज्ञों के अलावा हमारे कई मंत्री, नेता, सेवा-निवृत्त सेनापति, राजदूत, नौकरशाह, प्रोफेसर, पत्रकार आदि होते हैं। इसमें होनेवाले विचार-विमर्श को गोपनीय रखा जाता है। इस ग्रुप की पहली सीट गुजराल साहब के लिए और उसके पासवाली मेरे लिए लगभग आरक्षित-सी ही रहती थी। उनकी पत्नी शीलाजी अच्छी लेखिका थी। वे आर्यसमाजी परिवार की थी। उनके भाई प्रेस एनक्लेव में मेरे पड़ौस में ही रहते थे। इंदरजी और शीलाजी, दोनों ही शिष्टता की प्रतिमूर्ति थे। इंदरजी मास्को में हमारे राजदूत भी रहे। नरसिंहरावजी के जमाने में मैं अपने मित्र पूर्व अफगान प्रधानमंत्री बबरक कारमल से मिलने मास्को गया। गुजराल साहब बाहर थे लेकिन उन्होंने और शीलाजी ने मेरे लिए सारी सुविधाएं जुटा दीं। जब वे देवगौड़ाजी के साथ विदेश मंत्री थे, तब देवेगौड़ाजी मुझे अपने साथ ढाका ले गए थे। गुजराल साहब ने आगे होकर सभी बांग्लादेशी नेताओं से मेरा परिचय करवाया। जब गुजराल साहब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने मुझे राजदूत पद लेने के लिए भी कहा। उस दौरान ‘दूरदर्शन’ पर सप्ताह में दो-तीन बार राजनीतिक विश्लेषण के लिए मुझे नियमित बुलाया जाता रहा। मैंने एक-दो बार उनकी विदेश नीति की आलोचना भी की लेकिन उन्होंने उसका कभी बुरा नहीं माना। उनसे हर मुद्दे पर हमेशा खुलकर विचार-विमर्श होता था। उनके और शीलाजी के व्यवहार में मैने रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं देखा। जिस दिन उन्होंने इस्तीफा दिया, उसी दिन प्रधानमंत्री निवास भी खाली कर दिया। वे मूलतः बुद्धिजीवी थे। वे हमारे नेताओं की तरह नेता नहीं थे। वे प्रधानमंत्री भी अचानक ही बने थे। यदि वे लंबे समय तक टिक जाते तो हमारे पड़ौसी देशों के साथ हमारे संबंध शायद बहुत अच्छे हो जाते। उनके सौवें जन्मदिन पर उन्हें मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि।

भारत की बौद्धिक संपदा और सुरक्षा पर इंटरनेट कंपनियों का अधिकार
सनत जैन
पिछले दो दशक से भारत में इंटरनेट का बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है। केंद्र एवं राज्य सरकारों ने ई गर्वमेंट के माध्यम से डिजिटल प्रक्रिया का मुख्य संचालन इंटरनेट के माध्यम से किया है। पिछले एक दशक में गूगल, फेसबुक, व्हाट्सएप, यूट्यूब, टि्वटर एवं संचार के विभिन्न माध्यमों से, देश की सुरक्षा व्यवस्था और गोपनीय जानकारियां इंटरनेट कंपनियों के पास पहुंच रही हैं। जिसके कारण देश की सुरक्षा व्यवस्था अब इन अमेरिकी कंपनियों के अधिकार में पहुंच गई है। इसी तरह भारत की बौद्धिक संपदा एवं विभिन्न सरकारों एवं सुरक्षा से जुड़ी जानकारियां, गूगल, व्हाट्सएप, यूट्यूब के माध्यम से अमेरिकी कंपनियों के अधिकार में जाकर कापीराइट के अधिकार के साथ एकत्रित होते जा रही हैं। हमारी जानकारी और हमारी संपदा जाने अनजाने में अमेरिकी कंपनियों के पास पहुंच गई है। कानूनन कम्पनियां कॉपीराइट के अधिकार भी ले रही हैं। इस मामले में भारत सरकार का मौन इतने संवेदनशील मामले में लापरवाही और गैर जिम्मेदारी वाला है। इसको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि भारत सरकार अमेरिका की इन इंटरनेट कंपनियों के आगे समर्पण कर चुकी है। उसे ना देश की चिंता है, ना जनता की।
भारतीय सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों ने केंद्र सरकार से डेटा सुरक्षा कानून बनाने का निर्देश 10 साल पहले दिया था। उस समय व्हाट्सएप, यूट्यूब, स्मार्टफोन इत्यादि चलन में बहुत ज्यादा नहीं थे। इसके बाद भी पिछले 10 सालों में केंद्र सरकार ने कोई नियम नहीं बनाए। आज भी अंग्रेजों के बनाए 1885 के टेलीग्राफ कानून तथा भारतीय नागरिकों की निजी जानकारी और भारत की बौद्धिक संपदा को सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने कोई उपाय नहीं किए। आज सभी इंटरनेट कंपनियां, जो भारत में सबसे ज्यादा व्यापार कर रही हैं, या नि:शुल्क सेवाएं दे रही हैं। वह सभी अमेरिकी कंपनियां हैं। जब भी हम कोई ऐप डाउनलोड करते हैं, अथवा इंटरनेट पर व्हाट्सएप, फेसबुक, यूट्यूब, ईमेल इत्यादि की नि:शुल्क सेवाएं लेने के लिए जो शर्तें जाने-अनजाने में ऑनलाईन स्वीकार कर लेते हैं। उसके कारण आज हमारी सभी जानकारियां और बौद्धिक संपदा के अधिकार पिछले एक दशक में अमेरिकी कंपनियों के पास चले गए हैं।
हाल ही में गूगल ने नि:शुल्क वेबसाइट बनाकर देने का नया धंधा शुरू किया है। 3 साल तक गूगल नि:शुल्क सेवाएं देगी। जो डाटा आप उस पर अपलोड करेंगे, उस पर गूगल का अधिकार होगा। यदि वही जानकारी आप उपयोग करना चाहेंगे, तो आपको गूगल से खरीदना होगा। इन कंपनियों का गोरख धंधा और कमाई का मकड़जाल केवल इसी बात से समझा जा सकता है। व्हाट्सएप को 5 साल पहले फेसबुक ने 19 अरब डालर में खरीदा था। व्हाट्सएप भारत में नि:शुल्क सेवा उपलब्ध कराती है। लोकसभा के आम चुनाव के 5 महीनों में 120 करोड़ रुपए की कमाई व्हाट्सएप ने विज्ञापनों के माध्यम से एक नम्बर में कर ली। परदे के पीछे की कमाई का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। सरकार के दबाव में भारत में व्हाट्सएप ने अपना कार्यालय जरूर बनाया। किंतु 1 साल में मात्र इस कंपनी ने, 57 लाख रुपए की मात्र कमाई की। फेसबुक ने भारत की आधी आबादी और सभी सरकारों के डाटा पर कब्जा कर लिया है। गूगल में इंटरनेट पर जो भी डाटा अपलोड या डाउनलोड हुआ है। वह सारा डाटा गूगल के पास पहुंच गया है। इससे भारत के आम नागरिकों की निजता, राज्य और केंद्र सरकारों की सभी गोपनीय और सार्वजनिक जानकारियों पर इन्हीं अमेरिकी कंपनियों का एकाधिकार हो गया है। भारत ने इस संबंध में ना तो अभी तक कोई कानून बनाया है। नाही इन कंपनियों के डाटा सेंटर भारत में खुले हैं। भारत सरकार का आज इन कम्पनियों पर कोई नियंत्रण भी नहीं है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के अधिकारी एडवर्ड स्नोडेन ने इंटरनेट कंपनियों और खुफिया संगठनों की सांठगांठ से चल रहे, मामलों का खुलासा करने के लिए ऑपरेशन प्रिज्म 6 साल पहले किया था। खलासे के बाद इन ताकतवर कंपनियों का कुछ भी नहीं बिगड़ा। आज स्नोडेन निर्वासित होकर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। सारी दुनिया में इंटरनेट के क्षेत्र में काम करने वाले 9 कंपनियां, जो अमेरिका की हैं। वह सारी दुनिया को अपने नियंत्रण में लेने के लिए सारी जानकारियां लेकर आज सबसे खतरनाक स्थिति में पहुंच गई हैं। अमेरिका के खुफिया संगठनों का इन्हें संरक्षण प्राप्त है।
हाल ही में इजराइल के पेगासस सॉफ्टवेयर की मदद से जासूसी का जो खेल भारत में शुरू हुआ है। उसमें अधिकृत रूप से यह कहा जा रहा है कि 121 लोगों की जासूसी की गई है। जिनकी जासूसी हुई है वह शासन, प्रशासन, राजनीति एवं पत्रकारिता में महत्वपूर्ण स्थिति में थे। सरकार इस मामले की सही जानकारी देने के स्थान पर इससे पल्ला झाड़ रही है। सूत्रों के अनुसार जांच एजेंसियों ने बिना रिकॉर्ड में लाए हुए, देश के कई हजार नेताओं, अधिकारियों, पत्रकारों एवं सुरक्षा से जुड़े हुए लोगों की जासूसी, इसी सॉफ्टवेयर के माध्यम से कराई है। फौरी तौर पर सरकार की सरपरस्ती में की गई जासूसी का लाभ, वर्तमान सत्ताधारी दल को मिल गया हो। लेकिन इससे संबंधित सभी डाटा अमेरिकी कंपनियों के पास भी पहुंच गया है। इससे समझा जा सकता है कि भारत किस विस्फोटक स्थिति में पहुंच गया है। इन अमेरिकी कंपनियों पर अमेरिका के खुफियां संगठनों का भारी दबदबा है। भारत सरकार ना तो इन कम्पनियों को नियंत्रित करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी कोई कानून नहीं बना पाई। नाही सरकार भारत के डाटा को भारत के ही डाटा सेंटर में रखने के लिए इन कंपनियों को बाध्य कर पाई।
भारतीय संविधान की 70 वी जयंती पर आम जनता को संवैधानिक कर्तव्यों का बोध कराने के लिए सरकार अभियान चला रही हैं। वहीं सरकार, इंटरनेट कंपनियों की जासूसी, भारत की बौद्धिक संपदा, निजी अधिकार और सुरक्षा तंत्र को मजबूत बनाने के स्थान पर, अमेरिकी कंपनियों को सौंप रही है। सरकार और संसद राष्ट्रीय हितों को इस तरह से अनदेखा करेगी, इसकी कल्पना कोई कैसे कर सकता है। लेकिन भारत में कुछ भी संभव है, यह इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

वक्त की जरूरत
ओमप्रकाश मेहता
भाजपा के लिए अब दम्भ नहीं, आत्मचिंतन का वक्त…? भारतीय जनता पार्टी अब देश या देश की जनता के लिए नहीं बल्कि वक्त की जरूरत बन चुकी है, जो पिछले साढ़े पांच साल से देश पर राज कर रही है, पार्टी के इस साढ़े पांच साल के शासन में देश, जनता व स्वयं पार्टी ने क्या हासिल किया? यह तो आंक्लन करने वाले करते रहेंगे और आगे भी करते रहेंगे, किंतु इसके साथ ही स्वयं भारतीय जनता पार्टी के धुरंधरों के लिए अपने स्वयं की साढ़े पांच साला भूमिका पर आत्मचिंतन करने का सही वक्त है, आखिर महज डेढ़ साल में दहाई प्रदेशों की सत्ता से सिमट कर इकाई में कैसे आ गई? इसी बिन्दु पर पार्टी को गंभीर चिंतन करना चाहिये, क्या मोदी के जादू या उनके चेहरे की चमक में कमी आ गई है, या पार्टी प्रज्ञा ठाकुर जैसे पार्टी नेताओं के कारण अथवा आम जनता की असंतुष्टी के कारण अपनी चमक खोने को मजबूर है, इन सब बिन्दुओं पर गंभीर आत्मचिंतन जरूरी है, इसके साथ ही पार्टी की ‘‘यूज एण्ड थ्रो’’ नीति का यह दुष्परिणाम है या सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दों पर ध्यान देने का असर, इस पर भी विश्लेषणात्मक चिंतन जरूरी है, आज से दो साल पहले लगभग पूरे देश पर केसरिया ध्वज लहराता नजर आता था, जो आज सीमावर्ती बनकर रह गया है, सिर्फ उत्तरप्रदेश जैसा अहम् व बड़ा राज्य उसके कब्जें में रह गया है, पिछले पन्द्रह बीस महीनों में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और अब महाराष्ट्र जैसे अहम् प्रदेश उसकी पकड़ से बाहर हो गए, आखिर यह पार्टी की किस गलती के परिणाम है? इस मसले पर फिलहाल आत्मचिंतन का यही सही वक्त है, यदि अभी भी अहम् और दम्भ से पार्टी और उसके नेता मुक्त नहीं हुए तो राज्यों में और भी दुर्गति संभावित है।
ये तो सब वे बिन्दु है, जो बिना किसी ‘दुर्बिन’ के नजर आ रहे है, किंतु कुछ बिन्दु ऐसे है जो अपने पूर्ववर्ती फैसले पर आत्मचिंतन से जुड़े है, जैसे देश की आर्थिक स्थिति, देश की बढ़ती बेरोजगारी, भारत से बाहर के देशों द्वारा भारत पर कराये गए चैकाने वाले सर्वेक्षण आदि, जैसे अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की सर्वे रिपोर्ट में दावा कि देश में कृषि और मैन्यूफेक्चरिंग क्षेत्र के रोजगार में गिरावट देखी गई और उसके कारण पिछले छः सालों में आजाद भारत के इतिहास में पहली बार करीब एक करोड़ नौकरियां घटी। जबकि 2014 के चुनावी घोषणा-पत्र में भाजपा ने प्रतिवर्ष एक करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था। इसी तरह देश में किसानों द्वारा की जा रही आत्म हत्याओं के आंकड़ों में बढ़ौतरी परिलक्षित हुई अर्थात् किसानों का कर्ज व अन्य परेशानियां यथावत है, यही स्थिति राज्य व केन्द्र सरकार के कर्मचारियों की समस्याओं को लेकर है, वे भी अपने आपकों ठगा सा महसूस कर रहे है।
यह एक कटु सत्य है कि मोदी सरकार का पहला पांच साला कार्यकाल सिर्फ चिंतनकाल ही सिद्ध हुआ किंतु उस चिंतन के राष्ट्रीय दृष्टि से कुछ सुखद परिणाम अब नजर आने लगे है, जैसे सामाजिक क्षेत्र में तीन तलाक प्रथा की समाप्ति, जम्मू-कश्मीर से धारा-370 व 35ए की मुक्ति, राम-मंदिर निर्माण क्षेत्र में एक सफल न्यायिक कदम। इन फैसलों से देश खुश है, किंतु मानव मनोविज्ञान का प्रथम सिद्धांत ही यही है कि वह पहले अपने बारे में सोचता है, उसके बाद समाज, देश व दुनिया के बारे में और वह अपने प्रथम सिद्धांत में ही खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है, इसके लिए दोषी तो मौजूदा सरकार को ही माना जाएगा न, और इसी का नतीजा आज मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान व महाराष्ट्र में सामने आ रहा है। आखिर क्यों भारत के आधे भाग का भाजपा से मोहभंग होता परिलक्षित हो रहा है? इस एक अहम् सवाल पर भाजपा के भाग्यविधाताओं को कुछ बुजुर्गो से सलाह मशवरा कर गंभीर चिंतन करना चाहिए, वरिष्ठों को घर के कौने में बैठने को मजबूर कर देना और अपने अहम् के साथ पार्टी और देश के लिए सप्तरंगी सपने देखना कहां तक सही माना जा सकता है?
आज यदि आजादी के प्रमुख स्तंभों व उनकी सोच का सूक्ष्म परीक्षण किया जाए तो न्यायपालिका सहित सभी स्तंभों की वास्तविकता सामने आती है। आज आए दिन सुप्रीम कोर्ट सरकार के फैसलों पर अपनी बेबाक टिप्पणियां जारी करता जा रहा है, और वास्तविकता यह भी है कि वहीं अब जन आकांक्षा की पूर्ति और आस्था का सबसे लोकप्रिय केन्द्र बनता जा रहा है, शेष दो स्तंभों विधायिका व कार्यपालिका पर तो सरकार का ही कब्जा है और जहां तक अघोषित चैथे स्तंभ ‘खबर पालिका’ का सवाल है, उसे तो अब ‘विक्रय प्रसाधन’ ही मान लिया गया है।
इस विकट स्थिति से देश गुजरने को आज मजबूर है, जिसका एक मात्र विकल्प सत्तारूढ़ दल व सरकार का ‘सद्बुद्धि’ हासिल होना ही है और उसके लिए पूरा देश भगवान से प्रार्थना कर रहा है।

ज्वलंत समस्या बलात्कार—- एक असाध्य बीमारी –इलाज असंभव !
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
बलात्कार कोई नया रोग या घटना नहीं हैं जबसे सृष्टि में पुरुष स्त्री का प्रादुर्भाव हुआ हैं और विपरीत लिंग में जो आकर्षण होता हैं उससे अधिकतर ये विकार पैदा हुए और और होते रहेंगे.इनको कोई रोकने वाला नहीं हैं।
हमारा पूरा इतिहास इन्ही घटनाओं से हर युग में भरा पड़ा हैं।तरीके या ढंग बदले पर घटनाये तो होती रही और रहेंगी।वर्तमान में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया की जागरूकता से इनका उजागर होना अधिकतम हो गया हैं ,वरना पहले घटनाएं हो जाती थी पर पता भी नहीं चलता था.
इस विषय पर बहुत शोध ,चिंतन ,मनन हुआ और होता रहेगा ,सरकारें ,संस्थाएं बहुत जागरूकता फैलाएं हैं पर ज्यों ज्यों इलाज हो रहा हैं रोग बढ़ता ही जा रहा हैं ,इसके लिए कोई फिल्म ,टी वी सीरियल ,साहित्य ,पहनावा आदि कोई भी कारण बताएं पर इन पर रोकथाम होना कठिन होता जा रहा हैं।
हमारे देश में संविधान और उनके पालन कर्ताओं में कोई भय नहीं हैं ,जैसे घटना होने के बाद थाना क्षेत्र पर विवाद ,हमारा इलाका नहीं या उनका इलाका हैं ,पुलिस की अपनी कार्यवाही का ढंग हैं।हमारे यहाँ घटना घटने के बाद कार्यवाही होती हैं ,वचाव का कोई स्थान नहीं हैं ,उसके बाद नियमों के कारण कोई भी लकीर से हट नहीं सकता ,फिर मेडिकल रिपोर्र्ट पर आधारित प्रकरण बनते हैं ,न्यायलय में प्रमाण प्रस्तुत करना।प्राकृतिक न्याय हेतु सुसंगत अवसर देना यह अपराधियों के लिए ब्रह्मास्त्र हैं ,उनके बचाव के लिए वकील के अपने तर्क और फिर पेशी ,फिर पेशी ,गवाह ,बचाव और निर्णय।हमारे देश में अनेक अपराधी बच जाए पर निरपराधी को सजा नहीं होना चाहिए।
न्यायिक प्रक्रिया की अपनी व्यवस्थाएं हैं ,उसमे किसी का हस्तक्षेप नहीं होता।ताऱीख पर ताऱीख ,दलील पर दलील ,फिर उसके बाद अपील ,हाई कोर्ट ,सुप्रीम कोर्ट ,राष्ट्रपति महोदय के यहाँ दया की अपील ,और फिर सजा का निर्धारण।फांसी की सजा के लिए जल्लाद भी नहीं हैं।
इस प्रक्रिया में इतना अधिक समय लगता हैं की मुद्दई ,अपराधी ,पुलिस, न्यायाधीश ,समाज की रूचि ख़तम हो जाती हैं।प्रभावित होता हैं जिसके ऊपर बीतती हैं।इसके अलावा यदि बलात्कार से पीड़ित मर जाती हैं तो उसके परिवार को न्याय की इच्छा रहती हैं ,और यदि पीड़ित जिन्दा बच गयी तो उसको समाज और कचहरी में इतना जलील होना पड़ता हैं ,कोर्ट की जिरह के दौरान उसका अनेकों बार मौखिक बलात्कार होता हैं जैसे वह अपराधी हो, न की पीड़िता।
इसके लिए हमारे देश में जो कानूनव्यवस्था हैं उसमे और भी अधिक सुधारकी जरुरत के साथ यदि अपराधी दोषयुक्त हैं तो बिना देरी के जैसा अपराध वैसा दंड त्वरित होना चाहिए।जैसे अन्य देशों में खासकर मुस्लिम देशों में मृत्युदंड या लिंग विछेदन या चौराहे पर जनता के समक्ष पत्थर से मरना इत्यादि इत्यादि।
हज़ारों की संख्याओं में मुकदमे चल रहे हैं ,दंड घोषित हो चुके पर क्रियान्वयन नहीं है ,दंड व्यवस्था शीघ्रतम हो।
वास्तव में हत्या ,चोरी ,बलात्कार आदि पाप का होना एक क्षण का गुनाह, जिंदगी भर के लिए गुनहगार बना देता हैं और पीड़ित जिंदगी भर उस दर्द को झेलता रहता हैं। जब तक समाज में नैतिक ,चारित्रिक ,धार्मिक, शिक्षा का प्रसार प्रचार नहीं होगा तब तक इसका रोकना असंभव हैं।यह असाध्य रोग होता जा रहा हैं।हम कब तक अपनी बेटी ,बहिन ,पत्नी ,माँ ,भाभियों को बंदिश में रखेंगे ,क्या उन्हें भी खुली हवा में सांस लेने का अधिकार नहीं हैं।?
हैदराबाद हो या कही अन्य जगह की घटना ,विद्रूपता तो वही होती हैं ,पीड़िता का कष्ट वही जानती समझती हैं ,इस पर प्रतिबन्ध कैसे लगे या नियंत्रित कैसे हो यह यक्ष्य प्रश्न हमारे सामने हैं।पर खान पान और सामाजिक परिवेश इस प्रकार दूषित हो चूका हैं और दिन रात बलात्कार ,चोरी ,डकैती के साथ व्यसनों का सेवन अधिकतम होने से मानसिक प्रदुषण ने बहुत गहरा स्थान बना लिया हैं जिससे मुक्त होने की किरणे दिखना असंभव हैं
सृष्टि की शुरुआत के साथ हमारे वेद पुराणों में इनका उल्लेख मिलता हैं ,यानी मानव में हिंसा ,झूठ ,चोरी ,परस्त्री सेवन ,परिग्रह के अलावा क्रोध मान माया लोभ रुपी दुर्गुण जन्मजात होते हैं इनको हम धरम या व्रत रुपी दवा से दूर कर सकेंगे यानी जब तक समाज व्यक्ति और देश में अहिंसा ,सत्य ,अचौर्य ,ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह की जानकारी पहुँचाना पड़ेगा।इसके अलावा और कोई चारा नहीं हैं।यह रोग कैंसर से भी अधिक खतरनाक और कष्टकारी हैं।
क्या हमें अब पुरानी परम्परा का पालन तो नहीं करना होगा ,जल्दी शादी ,दहेज़ बिना शादी ,और परिवार में धार्मिक वातावरण पैदा करना होगा।
अब नहीं तो कब होगा इसका इलाज़ घर घर में रावण बैठ गए
इतने राम कहाँ से लाएंगे जितना अधिक शिक्षित उतना अधिक पापी
असंभव नहीं पर संभावना क्षीण हैं रोक थाम की

अर्थशास्त्रियों का अनर्थशास्त्र
रघु ठाकुर
नोबल पुरूस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री श्री अभिजीत बनर्जी पिछले दिनों भारत के दौरे पर थे। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा की ट्रेड वॉर का फायदा उठाने के लिए भारत को कंपनियों को स्थापित करने की प्रक्रिया को आसान बनाना होगा- साथ ही कनेक्टीविटी – आसान बनाना, जमीन अधिग्रहण और आधुनिक श्रम कानूनों पर भी ध्यान देना होगा।
2. उन्होंने यह भी कहा की भारत के ज्यादातर गरीब उद्यमी नहीं बनना चाहते इसलिए भारत में गरीबी बड़ी समस्या है।
श्री बनर्जी को जो नोबल पुरूस्कार मिला है वह देने वाले कौन लोग है और उनके देने के आधार क्या है यह दुनिया को कम ज्ञात है? नोबल पुरूस्कार जिन महानुभाव के नाम से स्थापित है श्री अल्फ्रेड नोबल वे हथियारों के बड़े व्यापारी थे और हथियारों की कमाई से यह पुरूस्कार स्थापित हुआ हैं। वैसे तो दुनिया के सभी वैश्विक पुरूस्कारों के पीछे की ऐसी ही कहानियां है, मेगसाय पुरूस्कार भी जिन महानुभाव के नाम से है उन्होंने अमेरिकी कारपोरेट की पूर्ति के लिए ही अपने देश के लोगों को बली का बकरा बनाया था। ऐसे ही कारपोरेट के पिट्ठूओं की गद्दारी की सेवाओं के लिए ही अमेरिकी कारपोरेट के द्वारा पुरूस्कार स्थापित करना कारपोरेट धर्म है। आखिर अंग्रेज भी तो आजादी के आंदोलन के खिलाफ उनके सेवकों को राय बहादुर आदि उपाधियों से नवाजा करते थे।
जहां तक पहले मुद्दे का सवाल है, श्री अभिजीत बनर्जी ने ट्रेड वॉर का फायदा उठाने के लिए जो सुझाव दिए है, वे उद्योग जगत व कारपोरेट्स के ही हथियार है, जिन्हें डब्लू.टी.ओ. के माध्यम से और वैश्वीकरण के नाम से कई दशको से दुनिया के सामने परोसा जा रहा है।
कंपनी स्थापित करने की प्रक्रिया आज भी कोई कठिन नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार का एक बड़ा तरीका है। उद्यम के नाम पर लोग कम्पनियां बनाते है, फिर अनुदान लेते है, किसानों की जमीनों का अधिग्रहण कर जमीने लेते है, कारखाना लगाया तो ठीक व न भी लगाया तो अनुदान व ऋण लेकर विदेशों की सैर करते है। बाद में कोई न कोई बहाना बता कर कारखाना बंद कर देते है और अधिग्रहित ज़मीन के मालिक बनकर उसे बेचकर अरबपति बने रहते है। श्री बनर्जी को पता नहीं है, भारत में सात लाख से अधिक कारखाने जो कंपनी के रूप में पंजीकृत है वो पहले से ही बंद है। उनके कब्जे में कई करोड़ एकड़ ज़मीन किसानों की है, तथा जिनके ऊपर सरकारी बैंकों का लाखों करोड़ों का कर्ज बकाया है जो, डूबते खातों के रूप में (एन.पी.ए. बनाकर) लगभग साफ या माफ कर दिया गया है। ट्रेड वॉर इस समय मुख्यत: अमेरिका और चीन के बीच है, इसमें कभी-कभी थोड़ी भूमिका यूरोप के देश निभाते है। ये सभी दुनिया के विकसित और संपन्न देश है, जिनकी कम्पनियां महाकाय है व दशकों से स्थापित है, और भारी मुनाफे कमाती रही है। भारत की सत्ता और खजाने पर आधारित नवजात कम्पनियां क्या इन ट्रेड वॉर प्रतिभागियों का मुकाबला कर सकेगी या आने वाले कुछ वर्षें में भी इनके लायक समर्थ बन सकेगी, यह कहना भी मुश्किल होगा? यह कुछ ऐसी कल्पना है कि जैसे कोई यह कहे की दारा सिंह जैसे दुनिया के बड़े पहलवान का मुकाबला करने के लिए बच्चा पैदा किया जाए व उसे सरकारी मदद और खुराक के पोषण से पहलवान से लड़ाया जाए। अगर श्री अभिजीत बनर्जी कारपोरेट अर्थशास्त्री नहीं होते या भारत के जमीनी अर्थशास्त्री होते तो शायद वह यह कहते की भारत सरकार को कारपोरेट वॉर का हिस्सेदार बनने की बजाय कृषि को एक लाभप्रद उद्योग के रूप में विकसित करना चाहिए जिससे करोड़ों लोगों को रोजगार मिल सकता है और अर्थव्यवस्था को स्थाई मजबूती मिल सकती है। वे अगर कारपोरेट के अर्थशास्त्री नहीं होते तो शायद यह सुझाव भारत की सरकार व जनता को देते कि वह मितव्ययता और संयमित उपभोग के रास्ते का वरण कर, बापू को उनके 150वें वर्ष में कर्म श्रद्धांजलि अर्पित करें।
दूसरा बिंदू जो उन्होंने कहा है कि भारत के गरीब ज्यादातर उद्यमी नहीं बनना चाहते इसलिए गरीबी बड़ी समस्या है। श्री बनर्जी उच्च शिक्षा प्राप्त है और वे जरूर जानते होंगे कि भारत देश की स्थति यह है कि हम दुनिया में पेट भरने के क्रम में यानि भूख मिटाने में बहुत नीचे 102वें पायदान पर है। वे यह भी जानते होंगे कि योजना आयोग के द्वारा गठित सेन गुप्ता समिति ने अपनी रपट में यह कहा था कि देश के 80 करोड़ लोगों की क्रय क्षमता 20रू. से भी कम है, उनमें से भी लगभग 30 करोड़ लोग ऐसे है जिनकी दैनिक क्रय क्षमता 10रू. से भी कम है। वह यह भी जानते होंगे कि पिछले डेढ़ दशक में लगभग पाँच लाख से अधिक किसानों ने कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या की है। इन हालात में गरीबों पर यह तोहमत लगाना की वे उद्यमी नहीं बनना चाहते। यह गरीबों का अपमान है। बहुत संभव है कि वे स्व. धीरू भाई अम्बानी का उदाहरण दें कि धीरू भाई पेट्रोल पंप पर काम करते करते कारपोरेट बन गए। मैं धीरू भाई की लगन व मेहनत को न चुनौती दे रहा हू न नकार रहा हू। मैं उम्मीद करता हू कि धीरू भाई से लेकर अभी तक अम्बानी परिवार के विशाल सम्राज्य खड़ा करने के पीछे राजसत्ता, नौकरशाही, और राजनैतिक भ्रष्टाचार का त्रि-सूत्रीय गठ-जोड़ है। मैं मानता हू कि कुछ एक अपवाद होते है, परन्तु दुनिया में यह स्थापित तथ्य है कि उद्योग लगाने के लिए पूँजी चाहिए वरना वैश्वीकरण के बाद की भारत और दुनिया की सरकारें विदेशी पूँजी निवेश का रोना क्यों रोती।
श्री अभिजीत बनर्जी नहीं जानते या नहीं जानना चाहते कि भारत की गरीबी के पीछे दो बड़े कारण है, विषमता और बेरोजगारी। जब श्री मुकेश अम्बानी की कम्पनियां 3 माह में ग्यारह हज़ार दो सौ करोड़ का मुनाफा कमाती है, 18 फीसदी मुनाफा वृद्धि करती है तो वह यह उन एक करोड़ लोगों को गरीब बनाकर कमाती है, जिनकी क्रय क्षमता 20 रू. से कम होती है। उनके आधार पर ही अपनी संपन्नता और सफलता हासिल करती है। विश्व के बाजार में अम्बानी बंधु कहीं नजर नहीं आते, चीन या अमेरिका के ट्रेड वॉर में भिड़ने वाली किन कंपनीयों से इनका मुकाबला है या इन्होंने कभी मुकाबला किया है बतायें? श्री अभिजीत बनर्जी कृपया बताएँ कि हमारे देश की बड़ी कम्पनियां या कारपोरेट या तो अमेरीका या चीन की विशालकाय कम्पनियों की सहायक कंपनी है या पेटी कान्ट्रेक्टर है या फिर अफ्रीकी देशों में उनकी गरीबी या लाचारी का लाभ उठाकर बनने वाले बड़े जमींदार या उद्योगपति है। श्री बनर्जी को भूलना नहीं चाहिए कि अम्बानी बंधु को राफल विमान डील का पेटी कान्ट्रेक्ट मिला है, तो वह भी राजसत्ता के सहारे। अडानी को यदि आस्ट्रेलिया में खनन का ठेका मिला है तो वह भी राजसत्ता के सहारे और देश में भी यह कारपोरेट रूपी झाड़ हरे-भरे हो रहे या बढ़ रहे है तो इसमें भी राजसत्ता का हाथ है। माइक्रो क्रेडिट और स्वयं सहायता समूह गरीबों को फ्रिज, टी.वी., आदि खरीदने का पैसा देते है यह सही है। परंतु क्या माइको फाइनेंसिंग, अम्बानी, अडानी, या बिल गेट्स की पूँजी के मुकाबले पूँजी बनाने के मदद देने के लायक है। स्वयं सहायता समूह द्वारा अचार, पापड़ बनाने के माध्यम से जीने का सहारा तो मिल सकता है परंतु वह कंपनी खड़े करने और ऐसी कम्पनी याने ट्रेड वॉर के मुकाबले कंपनी खड़ा करने या पूँजी देने लायक नहीं हो सकते।
हमारे नोबल लारेट कितने काबिल है इसका प्रमाण तो नालंदा विश्वविद्यालय के पिछले 10 वर्ष की प्रगति और खर्च करने की तुलना कर देखा जा सकता हैं श्री अमर्त्य सेन इस विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति बने थे। उनके वेतन और यात्राओं पर कितना खर्च हुआ और विश्वविद्यलाय का कितना विकास हुआ, यह कहानी छुपी नहीं है। हालत यह हो गये थे कि सरकार को उनसे मुक्ति लेनी पड़ी।
श्री बनर्जी की लंबी मुलाकात प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से हो चुकी है, और यह समझ जाना चाहिए की कारपोरेट पोषक सत्ता और कारपोरेट पोषित अर्थशास्त्री का मिलन किस व्यवस्था और किस अर्थशास्त्र को जन्म देगा।

रेप करने वाले मानसिक रोगी या अपराधी?
सनत जैन
भारत में पिछले एक दशक में बलात्कार की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। बलात्कार की घटनाओं को रोकने के लिए और अपराधियों को दंडित करने के लिए सरकार ने पिछले एक दशक में कई सख्त कानून बनाए हैं। इसके अलावा लड़कियों और लड़कों को सेक्स संबंधी शिक्षा भी दी जा रही है। यौन अपराधों को रोकने के लिए पुलिस को भी विशेष अधिकार दिए गए हैं। न्यायालयों में बलात्कार के दोषियों पर जल्द से जल्द सुनवाई हो और सजा मिले, उसका भी प्रावधान किया गया है। कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार करने के मामले में फांसी की सजा का भी प्रावधान किया गया है। लेकिन इसके बाद भी बलात्कार की घटनाएं कम होने के स्थान पर बढ़ती ही जा रही हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि बहुत कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं बढ़ी हैं। बलात्कार के बाद बच्चियों को मारने की घटनाएं भी पहले की तुलना में बहुत ज्यादा देखने को मिली हैं। इसका एक ही अर्थ है कि बलात्कार के बाद अपराधी फांसी से बचने के लिए महिलाओं और बच्चियों की हत्या करके सबूत मिटाने की चेष्टा करते हैं। जहां बलात्कार जैसे अपराध होते हैं, वहां कोई प्रत्यक्षदर्शी तो होता नहीं है। ऐसी स्थिति में दोषी को पकड़ पाना भी पुलिस के लिए मुश्किल होता है। सीसीटीवी कैमरे की सहायता से यदि संदिग्ध व्यक्ति को पकड़ भी लिया जाता है। तो उसको सजा दिला पाना, प्रत्यक्षदर्शी नहीं होने की दशा में बहुत मुश्किल होता है। भीड़ तंत्र के दबाव में पुलिस निरपराध को भी फंसाकर मामले को शांत करती है।
इस तरह की घटनाओं के बाद समाज में व्याप्त भारी रोष और भीड़तंत्र की मांग पर, सरकार बिना सोचे समझे कानून बना देती हैं। सख्त कानून बन जाने के बाद भी घटनाएं कम होने के स्थान पर बढ़ती ही जा रही हैं। समाज, सरकार, पुलिस कोई भी इनके वास्तविक कारणों को जानने की कोशिश नहीं कर रहा है। यह चिंता का विषय है।
कारणों को खोजने की जरूरत
पिछले एक दशक में बलात्कार की घटनाएं बड़ी तेजी के साथ भारत में बढ़ी हैं। छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार होना सबसे बड़ी चिंता का कारण है। सेक्स करना एक मानसिक अवस्था है। जो अपराधी रेप जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। निश्चित रूप से वह मानसिक रोग के शिकार होते हैं। अन्यथा वह कभी भी छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार कर ही नहीं पाते। सामाजिक व्यवस्था और सोच में पिछले एक दशक में बड़ी तेजी के साथ परिवर्तन आया है। सेक्स संबंधों को लेकर भारतीय समाज में अनैतिकता बढ़ी है। लंबी उम्र तक शादी नहीं होने के कारण अनैतिक संबंध बड़ी तेजी के साथ बढ़े हैं। बलात्कार जैसी घटनाएं भी बड़ी तेजी के साथ बढ़ रही हैं। पिछले एक दशक में बच्चों से लेकर बड़ों के बीच स्मार्टफोन और इंटरनेट का प्रभाव देखने को मिल रहा है। कम उम्र के बच्चे सेक्स संबंधों को लेकर समय के पहले ही परिपक्व हो रहे हैं। दो दशक पहले जब इंटरनेट और मोबाइल फोन नहीं था। तब सेक्स संबंधों को लेकर भारतीय समाज की एक अलग सोच थी। युवाओं में भी 18 से 20 साल की उम्र तक-सेक्स संबंध बनाने की मानसिकता तथा उत्कण्ठा नहीं होती थी। वर्ष 2000 तक 18 से 25 वर्ष की उम्र में युवा युवतियों की शादी हो जाया करती थी। महिलाओं एवं लड़कियों का पहनावा एवं घूमने फिरने में शालीनता थी। परिवार के सदस्य संयुक्त एवं समूह के साथ रहने के कारण, बलात्कार जैसी घटनाएं होने का अवसर आसानी से नहीं मिलता था।
पिछले 20 वर्षों में युवा युवतियों की सोच, रहन-सहन, शिक्षा के लिए शहरों में जाकर अकेले रहना, मोबाइल और इंटरनेट के साथ लगातार बने रहते हैं। जिसके कारण पिछले दो दशक में भारतीय समाज की सोच और युवा-युवतियों की सोच में भारी परिवर्तन आया है। कैरियर बनाने के चक्कर में युवा और युवती 30 से 35 साल की उम्र तक शादी नहीं करते हैं। पढ़ाई, कोचिंग, पीएचडी एवं अन्य कोर्स करने के नाम पर वह घर से बाहर रहकर, उन्मुक्त व्यवहार, शार्ट एवं फैशन का पहनावा, देर रात तक घूमना फिरना शुरू हो जाता है। इस बीच अनैतिक संबंध भी बन जाते हैं। कुछ लोग जो इस तरह के संबंध नहीं बना पाते हैं। वह धीरे-धीरे मानसिक रोगी होने लगते हैं।
पाश्चात्य देशों की नकल सबसे ज्यादा नुकसानदेह
वर्तमान स्थिति में युवा युवतियों द्वारा पाश्चात्य देशों की नकल करने के कारण, भारतीय सामाजिक व्यवस्था और सोच में भारी परिवर्तन आया है। भारतीय समाज अपनी सामाजिक परंपराओं का पालन भी करना चाहता है। वहीं पुरानी अपनी सोच को बदलने के लिए तैयार नहीं है। युवाओं के बीच दोहरी मानसिकता के चलते बहुत सारी विसंगतियां देखने को मिल रही हैं। युवा वर्ग खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हुए नजर आ रहे हैं। पश्चिमी देशों में 14 से 18 साल के युवा युवती सेक्स संबंध बना लेते हैं। वहां के परिवार और समाज में इसकी मान्यता है। कानून भी इसकी इजाजत देता है। पश्चिमी देशों में शादी की उम्र 30 से 35 वर्ष के बाद आमतौर पर शुरू होती हैं। जब परिपक्वता दोनों में आ जाती है। उनके सेक्स संबंध उनकी शारीरिक और मानसिक आवश्यकता के अनुसार बहुत कम उम्र में ही बन जाते हैं। इसके विपरीत भारत में 30 से 35 वर्ष की उम्र तक युवा-युवती शादी नहीं कर रहे हैं। युवाओं में आपस में संबंध बनाना सामाजिक तौर पर स्वीकार नहीं किया जाता है। दुनिया भर के देशों में सेक्स वर्कर आसानी से उपलब्ध होते हैं। भारत में सेक्स वर्कर का धंधा गैरकानूनी है। जिसके कारण भारत में मोबाइल और इंटरनेट के बाद वैवाहिक बंधन में नहीं बधने के कारण यौन संबंधों सें अपराध बड़ी तेजी के साथ बढ़ रहे हैं। चिकित्सा विज्ञान की बात करें तो 14 वर्ष की उम्र से अधिक के युवा युवतियों में सेक्स संबंधी प्राकृतिक मांग उत्पन्न होती है। यदि यह प्राकृतिक मांग पूरी नहीं हो पाती है, तो यह धीरे-धीरे मानसिक रूप से बीमार होने लगते है। भारत के कई राज्यों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं का अनुपात काफी कम है। जिसके कारण शादी करने के लिए लड़कियां उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। वैकल्पिक अन्य कोई व्यवस्था ना होने से भी बलात्कार और छेड़छाड़ की घटनाएं, भारत में तेजी के साथ बढ़ रही हैं। चुकी यह मानसिक रोग है, अतः इसे कानून बनाकर भी नियंत्रित कर पाना संभव नहीं होगा।
प्रकृति के साथ खिलवाड़ ठीक नहीं
भारत में स्त्री पुरुषों के बीच सेक्स संबंधों को लेकर जो दूरियां और विसंगतियां बढ़ रही हैं। उसको दूर किए जाने की आवश्यकता है। भारत में लड़कियों के लिए शादी की उम्र 18 वर्ष तथा युवकों के लिए 21 वर्ष है। कई दशक पहले भारत में बाल विवाह बड़ी संख्या में होते थे। किंतु अब 25 से 30 वर्ष की उम्र हो जाने के बाद भी युवा युवती शादी के बंधन में नहीं बंध पा रहे हैं। जिसके कारण सामाजिक व्यवस्था तेजी के साथ बिगड़ रही है। पिछले एक दशक में युवा-युवती अपना कैरियर बनाने के लिए 30 और 35 वर्ष की उम्र तक शादी करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। इस बीच वह अपने अनैतिक संबंध भी बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। स्वेच्छा से बने योन संबंध एवं लिविंग रिलेशन में कई वर्ष रहने के बाद विवाद होने की स्थिति में बलात्कार के प्रकरण दर्ज कराना भी आज आम बात हो गई है। भारत में महिलाओं के लिए विशेष कानून लागू किए गए हैं। इसका लाभ उठाने के लिए महिलाओं द्वारा बलात्कार के प्रकरण दर्ज कराने से रिकॉर्ड बड़ी तेजी के साथ बढ़ रहा है। जिससे सामाजिक सद्भाव और महिला पुरुषों के संबंध में एक अलग तरीके का तनाव देखने को मिल रहा है।
वर्तमान स्थिति में भारतीय सामाजिक, आर्थिक एवं प्राकृतिक स्थिति को देखते हुए समाज और सरकार को इस समस्या के वास्तविक कारणों को खोजना होगा। केवल कानून और पुलिस के माध्यम से बलात्कार और यौन अपराधों को रोकना संभव नहीं है। सेक्स प्रकृति जन्य मानसिक एवं शारीरिक मांग है। जो समय पर पूरी ना हो तो यह धीरे-धीरे सामान्य व्यक्ति को भी मानसिक रोगी बना देता है। इसमें महिलाओं और पुरुषों के बीच में भेद करना संभव नहीं है। जरूरत इस बात की है, कि इस समस्या पर विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ, सामाजिक एवं धार्मिक नेतृत्व करने वाले विशिष्ट व्यक्ति, इस संबंध में खुलकर चर्चा करें। वास्तविक समस्या के कारणों को खोज कर उसके निदान के प्रयास करें दो। नावों की सवारी और भीड़तंत्र की सोच से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है।

ड्रोन उड़ाने वाले नक्सलियों को देखते ही गोली मारने का आदेश
अजित वर्मा
माओवादियों द्वारा ड्रोन कब्जाने और उसके संचालन की घटना के हाल में सामने आने के बाद वामपंथी चरमपंथी प्रभावित राज्यों में तैनात सुरक्षा बलों को इन्हें देखते ही गोली मारने के आदेश जारी किए गए हैं। यह नया निर्देश केंद्र में स्थित सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियों की केंन्द्रीय कमान द्वारा दिया गया है। हाल में छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सल हिंसा से सबसे बुरी तरह प्रभावित सुकमा जिले के केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (केरिपुब) शिविर पर ड्रोन या मानव रहित यान (यूएवी) मंडराने के मामले सामने आने के बाद यह निर्देश दिये गए है।
मौके पर तैनात बलों से साझा किए गए आधिकारिक संदेश के मुताबिक, लाल और सफेद रोशनी उत्सर्जित करने वाले ड्रोन पिछले तीन दिनों में कम से कम चार बार किस्ताराम और पालोडी में केरिपुब शिविर के पास उड़ते देखे गए। ड्रोन द्वारा होने वाली हल्की आवाज ने शिविर में तैनात जवानों का ध्यान खींचा जिसके बाद जवानों ने मोर्चा संभाला और नक्सलियों द्वारा गड़बड़ी फैलाने की आशंका को देखते हुए आसपास के शिविरों को सतर्क किया गया। हालांकि सुरक्षा बल जब तक इन ड्रोनों पर लक्ष्य साधकर उन्हें मार गिराते ये छोटे मानवरहित यान आसमान में गायब हो गए।
इस घटनाक्रम के सामने आने के बाद सुरक्षा प्रतिष्ठानों ने मामले की जांच शुरू की, जिसके बाद खुफिया एजंसियां मुुंंबई के एक दुकानदार के पास पहुंची जिसके बारे में संदेह है कि उसने अज्ञात लोगों को ड्रोन बेचे। ये लोग संभवत: नक्सली थे। इस संबंध में जांच जारी है।
खुफिया एजंसियां खास तौर पर दो शिविरों को लेकर चिंतित हैं, जहां ड्रोन देखे गए। ये दोनों शिविर नक्सल प्रभाव वाले इलाके में हैं। जहां समुचित सड़क संपर्क नहीं है और नियमित रूप से इसके आसपास सशस्त्र माओवादियों की आवाजाही देखी गई है क्योंकि इस इलाके की सीमा ओड़ीशा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के जंगल से सटे इलाकों से लगती है। इस गतिविधि से जुड़ी जानकारी रखने वाले एक शीर्ष सुरक्षा अधिकारी का मानना है कि यह घटनाक्रम गंभीर चिंता का विषय है। माओवादियों द्वारा ड्रोन रखना और उसका इस्तेमाल करना एक नई चुनौती है और सुरक्षा बलों को लंबे समय से इसकी आशंका थी। अब जाकर यह मामला सामने आया है। इसी बात को ध्यान में रखकर ही वामपंथी चरमपंथ प्रभावित सभी राज्यों में सुरक्षा बलों को नक्सलियों द्वारा संचालित ऐसे ड्रोनों या मानवरहित यान को देखते ही मार गिराने का आदेश दिया गया है।
शुरुआती विश्लेषण में सामने आया है कि जो ड्रोन देखे गए वो ऐसे थे जिनका इस्तेमाल शादी या सार्वजनिक सभाओं जैसे सामाजिक कार्यक्रमों में किया जाता है। एजंसियों को शक है कि नक्सलियों ने हाल में ये छोटे ड्रोन हासिल किए हैं जिनका उद्देश्य सुरक्षा बलों के शिविरों से जुड़ी जानकारियां हासिल करना और उनकी गतिविधियोंं पर नजर रखना आदि है।

गीता में धर्म का अर्थ
हर्षवर्धन पाठक
पिछले कुछ वर्शों से धर्म और सम्प्रदाय की बहुत चर्चा हो रही है। इस संबंध में विष्लेशण रोचक होगा कि हिन्दुओं के प्रमुख धर्म ग्रंथ गीता में धर्म का क्या अर्थ दिया गया है और क्या क्या सन्दर्भ मिलते हैं?
महाभारत ग्रंथ का यह उदाहरण इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि जब कीचड़ में फंसे रथ के पहिये को निकालने के लिए कर्ण नीचे उतरा तब श्री कृश्ण ने उस पर बाण चलाने के लिए अर्जुन से कहा। इस पर कर्ण ने कहा कि यह धर्म संगत नहीं है। इसके उत्तर में श्रीकृश्ण ने पूछा कि तुम्हारा धर्म उस कहां गया था जब निषस्त्र अभिमन्यु पर सात महारथी आक्रमण कर रहे थे और उनमें तुम भी षामिल थे। श्री कृश्ण कर्ण से पूछते हैं- क्व ते धर्मस्तदागत: (अर्थात तुम्हारा धर्म तब कहां गया?) गीता में अर्जुन को श्री कृश्ण ने जो उपदेष दिया इस उपदेष की अलग-अलग व्याख्यायें हैं। आचार्य विनाबा भावे ने अपने प्रसिद्ध ”गीता प्रवचन“ में लिखा है कि अर्जुन वास्तव में स्वजन आसक्ति से प्रभावित था। गीता में इसी पर प्रहार है। अर्जुन अहिंसा समर्थक नहीं था लेकिन वह स्वजनों पर प्रहार नहीं करना चाहता था।
यदि आप समझते हैं कि गीता में धर्म की चर्चा निम्नलिखित ष्लोक तक सीमित है, यदा यदा हि धर्मस्यग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम््, तब आप निष्चित रुप से गलत हैं। गीता में धर्म को व्यापक तथा प्रसंग अनुसार लिया गया है। उदाहरण के लिये गीता के अठारहवें अध्याय का यह ष्लोक देखें। श्रीकृश्ण अर्जुन से कहते हैं।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं षरणं ब्रज , अहं त्वां सर्व पापेभ्यो मा षुच:
इस ष्लोक का षब्दार्थ यह है कि श्रीकृश्ण अर्जुन से कहते हैं कि सभी धर्मों का परित्याग कर मेरी षरण आ जाओ। मैं तुम्हारे सभी पापों से तुम्हें मुक्त कर तुम्हें मोक्ष प्रदान करुंगा। इसमें कोई संषय नहीं है। लेकिन ष्लोक का भावार्थ कुछ और इषारा करता है। यह सभी को मालूम है कि जिस समय यह महायुद्ध हुआ उस समय ईसाई धर्म और बौद्ध धर्म नहीं था। इस्लाम धर्म का प्रष्न ही नहीं है? षायद जैन धर्म था। उस कालखंड में केवल सनातन धर्म या नारायणी धर्म था जिसे आज हिन्दू धर्म के नाम से जानते हैं। अत: सभी धर्मों के परित्याग का कोई मतलब नहीं है। जिस धर्म का अर्थ लिया जाता है यहां वह अर्थ लागू नहीं होता।
लोकमान्य तिलक ने अपने विख्यात ग्रंथ ”गीता रहस्य“ में इस ष्लोक के संदर्भ में धर्म से आषय विभिन्न व्यावहारिक धर्मों से लिया है जैसे दान धर्म, पुत्र धर्म, यज्ञ धर्म, सत्य धर्म, सन्यास धर्म आदि। यहां श्रीकृश्ण अर्जुन से कहते हैं कि उक्त धर्मों के चक्कर में नहीं फंस कर केवल मुझे भज मैं तुम्हारा उद्धार कर दूंगा। वृन्दावन के संत स्वामी अखंडानंद सरस्वती ने सभी धर्मों से आषा विधि-विधान, प्रवत्ति और निवृत्ति से लिया है। यहां इसका अर्थ इन्द्रियों मन बुद्धि आदि के धर्म से हैं। वस्तुत: कोई धर्माधर्म न मेरा है और न उसका कोई अस्तित्व है। वे कहते हैं इसी का नाम है सर्व धर्म परित्याग।
इस अन्तिम अध्याय में तीन ष्लोक के बाद यह ष्लोक आता है जब श्रीकृश्ण अर्जुन से पूछते हैं अध्येश्यते च य इमं धर्म संवादमावयो: ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिश्ट: स्यामिति में मत:।“
इस ष्लोक का अर्थ है।
जो भी इस धर्म संवाद का अध्ययन करेगा वह अपनी बुद्धि के अनुसार इसका ज्ञान प्राप्त करेगा।
इन ष्लोकों के उदाहरण का तात्पर्य यही है कि गीता में धर्म को बहुत व्यापक अर्थ में लिया गया है।
गीता के इस ष्लोक को लें इसमें धर्म की अलग व्याख्या है।
श्रेयान्स्वधर्मों विगुण: परधर्मात्वनुश्टितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मों भयावह:।।
इस ष्लोक में स्वधर्मे निधनं श्रेय: का अर्थ भिनन् है। यह पहले ही स्पश्ट किया गया है कि गीता प्रवचन के समय केवल एक ही धर्म की चर्चा है। अत: यहां पर धर्म का अर्थ बिल्कुल अलग है।
द्वितीय अध्याय के प्रारंभ में अर्जुन के द्ववारा प्रकट यह संषय भी उल्लेखनीय है कि वह धर्मसम्मूढचेता है और उसे अपने धर्म या कर्तव्य का ज्ञान नहीं है अर्थात वह उलझन में हैं। उसे धर्म या कर्तव्य का ज्ञान नहीं है अर्थात वह उलझन में है।
यहां धर्म का अर्थ कर्तव्य से है। गीता में वास्तव में अर्जुन के इसी संषय का निराकर्ण है। वह स्वजनासक्ति का षिकार हो कर युद्ध से पलायन चाहता था। गीता में अर्जुन के इसी मोह का उपचार है।
चतुर्थ अध्याय में यह बहुत चर्चित ष्लोक है। यदा यदा ही धर्मस्यग्लानिर्भवति भारत अभ्युस्थानम्धर्मस्य तदात्मानम्् सृजाम्यहम। इस ष्लोक का अर्थ बहुधा गलत समझा जाता है। अठारहवें अध्याय में अन्त में श्री कृश्ण का यह कथन भी उल्लेखनीय है कि हम दोनों के इस धर्म संवाद का जो अध्ययन करेगा उसे ज्ञान प्राप्त होगा। यह ष्लोक ऊपर उद्धत किया गया है।
इस अद्धुत ग्रंथ के कुछ उदाहरण दिये गये हैं। लेकिन यह कुछ उदाहरण मात्र हैं। गीता का पूर्ण अध्ययन ऐसे अनेक उदाहरण प्रस्तुत करेगा। गीता में धर्म षब्द के अनेक अर्थ हैं परन्तु धर्म से कही हिन्दू धर्म मात्र का आषय नहीं है। सोवियत रुश और अनेक देषों में गीता के महत्व को स्वीकार किया गया है।

मुफ़्त की ‘लोक लुभावन रेवड़ियां’ बांटने से ज़रूरी है ‘मुफ़्त शिक्षा’
तनवीर जाफ़री
देश का प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान, दिल्ली का जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, इन दिनों एक बार फिर चर्चा में है। दिल्ली की सड़कों पर आए दिन जे एन यू के छात्रों द्वारा अनेक छोटे बड़े धरने प्रदर्शन किये जा रहे हैं। इस बार छात्रों में आए उबाल का कारण है विश्वविद्यालय के छात्रावास नियमों में किया जाने वाला बदलाव तथा छात्रावास की फ़ीस में की गयी बेतहाशा वृद्धि । हालांकि इस विषय पर विश्वविद्यालय प्रशासन का यह कहना है कि चूँकि पिछले 14 वर्षों से छात्रावास शुल्क के ढांचे में कोई बदलाव नहीं किया गया था इसलिए इतने लम्बे समय के बाद इसमें संशोधन किया जाना ज़रूरी हो गया था। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा घोषित किये गए नए नियमों के अनुसार छात्रावास की फ़ीस में भारी भरकम बदलाव किया गया है। इसके अंतर्गत छात्रावास के डबल सीटर कमरे का किराया जो पहले केवल 10 रुपये था उसे बढ़ा कर 300 रुपये प्रति माह किया गया। अर्थात इसमें अचानक 30 गुणा की वृद्धि कर दी गयी है। इसी तरह छात्रावास के एकल (सिंगल) सीटर कमरे का किराया 20 रुपये से 30 गुणा बढ़ाकर 600 रुपये कर दिया गया है। इसी तरह एक बार एकमुश्त जमा की जाने वाली वन टाइम मेस सिक्यूरिटी फ़ीस 5500 रुपये से बढ़ा कर 12000 रुपये कर दी गयी थी। ख़बरों के अनुसार छात्रों के आंदोलन के दबाव में आकर इसे पुनः 12000 से घटाकर 5500 कर दिया गया है। वैसे भी यह रक़म किसी भी छात्र के छात्रावास छोड़ने के समय उसे वापस कर दी जाती है। अन्य नियम जो प्रशासन द्वारा लागू किये गए हैं उनके तहत छात्रावास में रहने वाले छात्रों को ज़्यादा से ज़्यादा रात11.30 बजे के बाद अपने हॉस्टल के भीतर रहना होगा इसके बाद वे बाहर नहीं निकल सकेंगे। कोई छात्र या छात्रा अपने छात्रावास के अलावा किसी अन्य छात्रावास या कैंपस में किसी अन्य जगह पाया जाता है तो उसे छात्रावास से निष्कासित कर दिया जाएगा। इस पर छात्रों का कहना है कि पुस्तकालय में बैठने के लिए अथवा किताबों अथवा नोट्स के आदान प्रदान के लिए या फिर परीक्षा की तैयारी हेतु उन्हें कैम्पस में किसी भी समय निकलना पड़ता है। इसके अतिरिक्त छात्रावास के नए नियमों में छात्रों को डाइनिंग हॉल में ”उचित कपड़े” पहन कर आने का निर्देश भी दिया गया है। इस विषय पर छात्रों का सवाल है कि ‘उचित कपड़े’ की आख़िर परिभाषा क्या है और कौन से लिबास उचित हैं कौन से अनुचित इसका निर्धारण कौन करेगा। इसके अतिरिक्त भी विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रावास में रह रहे छात्र-छात्राओं से छात्रावास के रखरखाव के लिए 1700 रुपये की फ़ीस प्रति माह वसूलने का फ़ैसला भी लिया है। छात्रों में इस नए नियम को लेकर सबसे अधिक नाराज़गी है। इससे पहले विश्वविद्यालय में पानी, बिजली, रख-रखाव अथवा सफ़ाई के नाम पर छात्रों से कोई पैसे वसूले नहीं जाते थे। छात्रों का कहना है कि ग़रीब परिवारों से आने वाले छात्र प्रति माह 1700 रूपये जैसी भारी भरकम रक़म हरगिज़ नहीं दे सकते।
जे एन यू छात्र संघ द्वारा छात्रावास की फ़ीस बढ़ोत्तरी के इस नए नियमों को वापस लिए जाने की मांग को लेकर आंदोलन किया जा रहा है। अनेक छात्र-छात्राओं का कहना है यह ‘काला-ड्राफ़्ट’ न केवल छात्रों के मौलिक अधिकारों का हनन है बल्कि यदि बढ़ाई गयी यह फ़ीस की नई रक़म घटाई नहीं जाती तो वे पढ़ाई छोड़ने तक के लिए मजबूर हो सकते हैं। जे एन यू में लगभग 20 दिनों से चल रहे इस आंदोलन में पुलिस भी अपनी दमनकारी नीति अपना चुकी है। कई लहूलुहान छात्रों के चित्र सोशल मीडिया पर वॉयरल होते देखे गए। जे एन यू में फ़ीस बढ़ोत्तरी के विरुद्ध छात्रों के आंदोलनरत होने का एक कारण यह भी है कि यहाँ ग़रीब परिवारों के लगभग 40 प्रतिशत छात्र-छात्राएं दाख़िला लेते हैं और वे बढ़े हुए नए शुल्क को दे पाने में स्वयं को असमर्थ महसूस कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि देश की जो सरकारें अथवा राजनैतिक दल शिक्षा हासिल करने को हर भारतीय नागरिक का मौलिक अधिकार बताने की दुहाईयाँ दिया करते थे वही आज शिक्षा को इतना मंहगा बनाने पर क्यों तुले हुए हैं? ख़ासतौर पर प्रायः जे एन यू ही सरकार के निशाने पर क्यों रहती है। जे एन यू का चरित्र हनन किये जाने का प्रयास प्रायः दक्षिणपंथी शक्तियों द्वारा किया जाता रहा है। वर्ष 2016 में जब यहाँ के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को देशद्रोह के झूठे मामले में गिरफ़्तार किया गया था उस समय भी जे एन यू के कई ‘पारम्परिक अशिक्षित विरोधियों’ द्वारा कैम्पस को बदनाम करने के उद्देश्य से उपयोग में लाए गए निरोध से लेकर बकरे व मुर्ग़े की चबाई गयी हड्डियां,बियर व शराब की बोतलें,अधिया व पौव्वे तथा सिगरेट व बीड़ी के जले हुए टोटे तक की गिनती एक विधायक द्वारा बताई गयी थी। बुरी नज़र से कैम्पस को देखने वाले इन पूर्वाग्रही लोगों ने यह सब तो गिनकर मीडिया को ज़रूर बताया था परन्तु उन्होंने यह नहीं बताया कि यह विश्वविद्यालय देश को कितने भारत रत्न,कितने नोबल पुरस्कार विजेता,कितने आई ए एस टॉपर,कितने मंत्री व उच्चाधिकारी तथा कितने न्यायाधीश आदि दे चुका है?
निश्चित रूप से देश का यह सर्वप्रतिष्ठित विश्व विद्यालय देश के कर दाताओं के पैसों से चलता है। इसकी सब्सिडी का भुगतान भी देश करता है। परन्तु देश का यह पैसा यदि ग़रीब या मध्यम परिवारों से आने वाले छात्रों की शिक्षा पर लगे तो उसमें क्या हर्ज है? क्या सरदार पटेल की मूर्ति पर 500 करोड़ रूपये से अधिक की जनता की रक़म ख़र्च करना ज़्यादा ज़रूरी है ? आज देश के सैकड़ों शहरों में अनेक निर्माण कार्य ऐसे हो रहे हैं जो बिल्कुल ग़ैर ज़रूरी हैं परन्तु लोकलुभावन ज़रूर हैं। उदाहरण के तौर पर कहीं बने बनाए घंटाघर को तोड़ कर नए डिज़ाइन का स्मारक या प्रतीक बनाया जा रहा है। कहीं पार्क या तालाबों का पुनर्निर्माण किया जा रहा है। पार्कों व तालाबों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर मंहगे पत्थर लगवाए जा रहे हैं तथा उन्हें मंहगी डिज़ाइन से आकार दिया जा रहा है। इस प्रकार के निर्माण के पीछे बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है। गुजरात के मुख्यमंत्री महोदय अपने लिए नया विमान ले रहे हैं तो प्रधानमंत्री के लिए नई अत्याधुनिक कार ली जा रही है। देश को बुलेट ट्रेन के सपने दिखाए जा रहे हैं।अयोध्या के दीपोत्सव और कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा,हरियाणा में प्रत्येक वर्ष होने वाला गीता महोत्सव जैसे अनेक आयोजनों पर जनता के हज़ारों करोड़ रूपये ख़र्च किये जा सकते हैं परन्तु उस शिक्षा के लिए पैसे क्यों नहीं ख़र्च किये जा सकते या सरकार उस शिक्षा पर सब्सिडी क्यों नहीं दे सकती जिस शिक्षा से न केवल एक पूरे का पूरा परिवार आत्मनिर्भर व शिक्षित बनता है बल्कि देश भी शिक्षित होता है और आगे बढ़ता है? अतः देश की सरकारों को सबसे अधिक धन शिक्षा व स्वास्थ पर ही ख़र्च करना चाहिए न कि लोकलुभावन रेवड़ियां बांटने अथवा धर्म या रक्षा से संबंधित ज़रूरतों पर। यदि कोई भी सरकार शिक्षा को किसी भी रूप से मंहगा या ग़रीबों की पहुँच से बाहर करने का प्रयास करती है इसका सीधा सा मतलब यही है कि यह देश के ग़रीब तबक़े के लोगों को शिक्षा से दूर रखने की बड़ी साज़िश है। और यह भी कि राजनैतिक लोग स्वयं को शिक्षित समाज से ही सबसे अधिक भयभीत महसूस करते हैं।

राजनीति में कोई किसी का नहीं होता सगा !
डॉ. भरत मिश्र प्राची
महाराश्ट्र राज्य के विधान सभा चुनाव उपरान्त जो स्थिति उभर कर सामने आई जहां भाजपा एवं शिव सेना तथा एनसीपी एवं काग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा जिसमें भाजपा एवं शिव सेना को सरकार बनाने हेतु सपश्ट बहुमत तो मिला पर सियासती समझौते के चलते भाजपा व शिव सेना दोनों अलग – थलग पड़ गये। महाराश्ट्र में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी भाजपा बहुमत के आभाव में अपने सहयोगी दल शिव सेना के साथ मुख्यमंत्री कार्यकाल के बटवारे को लेकर सियासती समझौता नहीं हो पाने के कारण सरकार नहीं बना सकी। वहां एक साथ चुनाव लड़ने वाले राजनीतिक दल भाजपा व शिवसेना एक दूसरे से अलग ही नहीं हुये बल्कि सत्ता के लिये शिव सेना ने अपनो वर्शो संबंध भी तोड़ अपने को एनडीए से अलग कर लिया। फिर भी राज्यपाल द्वारा दिये समय के अंतराल तक सरकार बनाने के लिये एनसीपी एवं कांग्रेस का समर्थन पत्र नहीं जुटा पाई। इसी बीच राज्यपाल ने एनसीपी को सरकार बनाने के लिये आमंत्रण पत्र दे डाला। कांग्रेस इस सियासती गेम को अंत समय तक खेलती रही। इस तरह के हालात किसी भी दल को स्पश्ट बहुमत नहीं मिल पाने के कारण ही उभरे जहां सियासी जंग में कौन किधर हो जाये कह पाना मुश्किल है। इस तरह के हालात में खरीद – फरोख्त की भी प्रक्रिया तेजी से उभरती है। इससे बचने के लिये कांग्रेस ने अपने विधायकों को जयपुर भेज दिया एवं शिवसेना व एनसीपी अपने विधायकों पर अुत समय तक नजर गड़ाये रही कि उनका कोई विधायक इस तरह की प्रक्रिया का शिकार न हो जाय। शिव सेना का साथ नहीं मिलने पर भाजपा ने अपनी समझदारी दिखाते हुये राज्यपाल से सरकार बनाने के न्योता को नकार दिया। इसके बाद महाराश्ट्र राज्य में राश्ट्रपति शासन भी लग गया जिसके खिलाफ शिव सेना सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी। सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या होगा, कब आयेगा यह तो आगे की बात रही फिलहाल महाराश्ट्र राज्य की राजनीति में रातों रात नई घटना घट गई। जहां शिव सेना को सरकार बनाने का साथ दे रही एनसीपी के विधायक रातों रात पाला बदलकर भाजपा के साथ खड़े हो गये। जिससे जहां कल तक शिव सेना, एनसीपी एवं कांग्रेस की मिली जुली सरकार बनती नजर आ रही थी वहीं एनसीपी के सहयोग से भाजपा की सरकार बन गई। जहां कल तक राश्ट्रपति शासन लगा था वहां रातों रात राश्ट्रपति शासन भी हट गया एवं सुबह होते – होते सरकार भी गठित हो गई। इस तरह का राजनीति में तत्काल का उलट फेर पहली बार देखा गया जिसकी भनक मीडिया तक को नहीं रही। यह राजनीतिक खेल पूर्व नियोजित रहा जिसमें एनसीपी के साथ भाजपा की सांठ गाठ पहले से ही तय रही जिसका साकार रूप नई सरकार के गठन के तहत पर्दे से बाहर उभर कर सामने आया। इस खेल का राजनीतिक खामियाजा शिव सेना को भुगतना पड़ा जिसका सरकार बनाने का सपना सदा सदा के लिये खटाई में पड़ गया। शिव सेना को सरकार बनाने की भूमिका में मदद देने की कवायद करने वाले राजनीतिक दल एनसीपी एवं कांग्रेस से एनसीपी का एक धड़ा अजीत पंवार के साथ भाजपा से जा मिला जिससे शिव सेना के साथ सरकार बनाये जाने की सारी संभवनाएं हवा में उड़ गई।
महाराश्ट्र राज्य में राश्ट्रपति शासन लागू होने एवं सरकार बनने की पृश्ठिभूमि में शिव सेना , एनसीपी एवं कांग्रेस सभी के सभी जिम्मेवार है। राज्य की जनता ने तो सरकार बनाने के लिये भाजपा एवं शिव सेना गठबंधन को जनादेश दिया पर सत्ता बनाने की ललक ने शिव सेना को आज अलग – थलग कर दिया। सहयोगी दल का साथ नहीं मिलने से भाजपा ने सरकार बनाने के मामले को पहले तो नकार दिया और मौका मिलते ही शिव सेना को सरकार बनाने के मामले में साथ दे रहे एनसीपी में तोड़ फोड़ कर सरकार बना ली। कांग्रेस को समर्थन पत्र देने के मामलें में देर करने का खामियाजा भुगतना पड़ा। इस तरह के बदलते राजनीतिक प्रकरण पर एनसीपी के मुखिया शरद पंवार ने भाजपा से नफरत होने की बात कर अपने को पाक तो कर लिया पर इस तरह के प्रकरण के शक के दायरे से वे निकल नहीं पाये। राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता। सभी मौका परस्त होते है। सत्ता पाने के लिये कोई किसी से भी हाथ मिला सकता। इस तरह के प्रकरण इस बात के साक्शी रहे है, भविश्य में भी रहेंगे।

इस सत्ता उलट-पुलट के अर्थ
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
महाराष्ट्र में रातों-रात जो सत्ता-पलट हुआ था, वह अब सत्ता-उलट हो गया है। पहले अजित पवार का इस्तीफा हुआ। फिर देवेंद्र फड़नवीस का भी इस्तीफा हो गया। क्यों नहीं होता ? अजित पवार के उपमुख्यमंत्रिपद पर ही फड़नवीस का मुख्यमंत्री पद टिका हुआ था। फड़नवीस के इस्तीफे की वजह से अब विधान-सभा में शक्ति-परीक्षण की जरुरत नहीं होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने शक्ति-परीक्षण का आदेश जारी करके अपनी निष्पक्षता जरुर सिद्ध कर दी है लेकिन क्या किसी लोकतंत्र के लिए यह शर्म की बात नहीं है कि 188 विधायकों को सिर्फ तीन जजों ने नाच नचा दिया ? अदालत ऊपर हो गई और जनता के प्रतिनिधि नीचे हो गए। महाराष्ट्र की विधानसभा में यदि शक्ति परीक्षण होता तो भाजपा की इज्जत पैंदे में बैठ जाती। इसीलिए इस्तीफा देकर फड़नवीस ने अच्छा किया लेकिन भाजपा को इस घटना ने जबर्दस्त धक्का लगा दिया है। शिव सेना, राकांपा और कांग्रेस के मुंबई में साथ आने का एक संदेश यह भी है कि दिल्ली की भाजपा सरकार के खिलाफ भारत की सभी पार्टियां एक होने में नहीं चूकेंगी। मोदी के लिए यह बड़ी चुनौती होगी। फड़नवीस और अजित पवार को जो आनन-फानन शपथ दिलाई गई थी, उससे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, महाराष्ट्र के राज्यपाल और भाजपा अध्यक्ष की छवि भी विकृत हुए बिना नहीं रहेगी। यदि फड़नवीस की सरकार बन जाती तब भी उसका परिणाम यही होता। यदि सत्ता-पलट का यह क्षणिक नाटक नहीं होता और विपक्ष के ‘अप्राकृतिक’ गठबंधन की सरकार बन जाती तो फड़नवीस के प्रति महाराष्ट्र की सहानुभूति बढ़ जाती। अब विपक्ष का यह गठबंधन पहले से ज्यादा मजबूत हो गया है, हालांकि इसके आतंरिक अन्तर्विरोध इतने गहरे हैं कि यह पांच साल तक ठीक से चल पाएगा या नहीं, यह कहना अभी मुश्किल है।

गर्भवती महिलाओं को भी मोबाइल का उपयोग कितना लाभप्रद हैं ?
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
महाभारत काल में जब अर्जुन सुभद्रा को चक्रव्यूह के बारे में बता रहे थे जितने समय तक जाएगी उतना अभिमन्यु ने सुना .इससे यह सिद्ध होता हैं की गर्भस्थ शिशु पर भी उनके भावों का प्रभाव पड़ता हैं .गर्भिणी स्त्री जैसे भाव रखती हैं वैसे भावों का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता हैं .आज कल मोबाइल ,टी वी और उपलब्ध साहित्य का प्रभाव भी माँ के साथ शिशु पर भी पड़ता हैं .इसके प्रभाव और दुष्प्रभाव दोनों उपयोगकर्ता पर पड़ते हैं .
मोबाइल फोन को लंबे समय तक देखते रहने से न सिर्फ आपकी आंखों को नुकसान होता है। बल्कि हाल ही में हुई एक अध्ययन की मानें तो अगर गर्भवती महिला लंबे समय तक मोबाइल फोन उपयोग करे तो होने वाले बच्चे में स्वाभाव से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि मोबाइल फोन जो अब स्मार्टफोन बन चुका है हमारी जिंदगी का ऐसा अहम हिस्सा बन चुका है जिसे हम अपनी जिंदगी से अब अलग नहीं कर सकते। मोबाइल के बिना अपनी जिंदगी की कल्पना करना भी शायद मुश्किल ही लगे। बच्चों से लेकर युवावस्था और बुजुर्गों तक… हर किसी के हाथ में स्मार्टफोन रहता है और बड़ी संख्या में लोगों की इसकी लत भी लग चुकी है। इस लिस्ट में गर्भवती महिलाएं भी शामिल हैं। लेकिन मोबाइल के अधिकतम उपयोग का न सिर्फ आप पर बल्कि गर्भ के अंदर पल रहे बच्चे पर भी बुरा असर पड़ता है।
बच्चे में बिहेवियर से जुड़ी दिक्कतें
मोबाइल फोन की स्क्रीन और उससे निकल रही ब्राइट ब्लू लाइट को लंबे समय तक देखते रहने से न सिर्फ आपकी आंखों को नुकसान होता है। बल्कि हाल ही में हुई एक स्टडी की मानें तो अगर प्रेग्नेंट महिला लंबे समय तक मोबाइल फोन यूज करे तो होने वाले बच्चे में बिहेवियर से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं। वैज्ञानिकों ने डेनमार्क में इसको लेकर एक स्टडी की जिसमें प्रसव पूर्व और प्रसव के बाद मोबाइल फोन यूज करने का बच्चे के व्यवहार और इससे जुड़ी समस्याओं के बीच क्या लिंक ये जानने की कोशिश की गई।
हाइपरऐक्टिविटी और बिहेवियरल इशू का शिकार
इस स्टडी में ऐसी महिलाओं को शामिल किया गया जिनके बच्चे 7 साल के थे। स्टडी के दौरान महिलाओं को एक प्रश्नोत्तरी दिया गया था जिसमें उनके बच्चे की हेल्थ और बिहेवियर के साथ-साथ वे खुद फोन का कितना इस्तेमाल करती हैं, इससे जुड़े सवालों के जवाब देने थे। स्टडी के आखिर में यह बात सामने आयी कि जिन महिलाओं के बच्चे प्रसव से पूर्व और प्रसव के बाद स्मार्टफोन के प्रति एक्सपोज थे यानी जिन मांओं ने प्रेग्नेंसी के दौरान और डिलिवरी के बाद भी मोबाइल यूज ज्यादा किया उनके बच्चे हाइपरऐक्टिविटी और बिहेवियरल इशूज का शिकार थे।
प्रेग्नेंट महिलाएं इन बातों का रखें ध्यान
– मोबाइल फोन पर बहुत ज्यादा बात करने की बजाए टेक्स्ट भेजें या लैंडलाइन का उपयोग करें
– प्रेग्नेंसी के दौरान बहुत ज्यादा सोशल मीडिया को स्क्रॉल न करें
– जहां तक संभव हो हैंड्स फ्री किट यूज करें ताकि सिर और शरीर के नजदीक रेडिएशन को कम किया जा सके।
संभव हो तो इनका उपयोग ना करना ही हितकारी हैं और जन्म के बाद आजकल मोबाइल से फोटो लेना भी हानिकारक हैं .कारण गर्भस्थ शिशु नौ माह तक अँधेरे माहौल में रहता हैं और उसे प्रकाश का संसर्ग उसके लिए हानिकारक होता हैं और वह उस प्रकाश से अभ्यस्त होने से उसका लती बनने लगता हैं जिस कारण उसे दूध पीना ,खेलने में भी मोबाइल या टी वी की जरुरत पड़ती हैं .यह घातकता की निशानी हैं।

हालात में बदलाव क्या संघ को अब अहमियत मिलने लगी…..?
ओमप्रकाश मेहता
बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान संघ प्रमुख डाॅ. मोहनराव भागवत के आरक्षण सम्बंधी एक बयान पर भारतीय जनता पार्टी द्वारा अपनी हार का ठीकरा भागवत के सिर पर फोड़ने के बाद से ही मोदी सरकार ने अपने कथित संरक्षक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से दूरी बना ली थी और संरक्षक को मजबूर होकर ‘सेवक’ की मुद्रा अख्तियार करनी पड़ी थी। इसी तिरस्कार के कारण संघ प्रवक्ता को एक बार सरकार व भाजपा को चेतावनी भी देनी पड़ी थी कि यदि संघ के स्वयं सेवक भाजपा के प्रति असहयोग आंदोलन छोड़ दें तो इस सरकार की क्या हालत होगी? लेकिन प्रधानमंत्री व भाजपाध्यक्ष पर इस चेतावनी का भी कोई असर नहीं हुआ था और संघ से दूरी बनाए रखाने का दौर जारी रखा गया, किंतु अब जब हरियाणा और महाराष्ट्र के विधान सभा चुनावों के परिणामों और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करिश्में में कभी आने का अहसास मोदी-शाह को हुआ तो अब संघ की अहमियत को स्वीकारा जाने लगा है और संघ प्रमुख ने भी पुरानी सभी गुस्ताखियां माफ कर सरकार व पार्टी को सहयोग करने का निर्णय लिया है।
हाल ही में महाराष्ट्र में चुनाव परिणामों के बाद पैदा हुए राजनीतिक बवंडर को व खत्म करने के लिए भागवत का ‘ब्रम्हास्त्र’ काम में लेने का तय किया गया और भागवत जी अमित शाह के अनुरोध को स्वीकार कर महाराष्ट्र के इस महासमर में कूद पड़े। अब यह अलग विषय है कि भागवत जी के बयान का असर ‘भाजपा या शिवसेना’ पर हुआ या नहीं? किंतु यह जरूर सिद्ध हो गया कि मोदी- अमित शाह ने भागवत व संघ की अहमियत को मंजूर किया और इसी का परिणा है कि संघ प्रमुख अब राजनीतिक महत्व के विषयों पर खुलकर बयान देने लगे, फिर वह चाहे एनआरसी का मामला हो या अगले केन्द्र के बजट में ग्रामोद्योग को विशेष महत्व का सवाल हो। संघ से जुड़े अर्थशास्त्रियों ने पिछले दिनों वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण से मिलकर भावी बजट के बारे में बहुमूल्य सुझाव सौंपे है जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े आर्थिक व औद्योगिक मसलों पर विशेष ध्यान देने का अनुरोध किया था, वित्तमंत्री ने सुझावों को सहर्ष स्वीकार कर बजट बनाते समय इन पर विशेष रूप से ध्यान देने का आश्वासन भी दिया।
वैसे देश के राजनीतिक क्षेत्र में मोदी-अमित शाह के प्रति संघ की ‘स्नेहवृष्टि’ का एक प्रमुख कारण यह भी माना जा रहा है कि भाजपा की केन्द्र सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में संघ व भाजपा के प्रमुख बिन्दुओं पर विशेष ध्यान दे रही है, जिनमें संघ के तीन प्रमुख बिन्दु तीन तलाक, धारा-370 और राम मंदिर के मुद्दें शामिल है। एनआरसी को दी जा रही प्राथामिकताा से भी संघ प्रुफल्लित है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि भाजपा व संघ के मूल उद्देश्य ‘‘हिन्दू राष्ट्र’’ की दिशा में संघ एनआरसी को सरकार का एक महत्वपूर्ण कदम मान रहा है, क्योंकि असम में सम्पन्न एनआरसी का निचैड़ यही निकाला जा रहा है कि वहां जो उन्नीस लाख घुसपैठिए घोषित किए गए उनमें नब्बें फीसदी मुस्लिम है, संघ व सरकार का तर्क है कि यदि पूरे देश में एनआरसी लागू कर दी गई तो भारत की मौजूदा जनसंख्या का एक बड़ा भाग घुसपैठियां घोषित होगा और जब ये कथित मुस्लिम घुसपैठियें देश से बाहर कर दिए जाएगें तो यह देश हिन्दू बाहुल्य होकर ‘हिन्दूराष्ट्र’ बना जाएगा। असम के बाद केन्द्र सरकार की नजर पश्चिम बंगाल पर है, जहां बताया जा रहा है कि ममता सरकार का मुख्य आधार ही बंगलादेशी घुसपैठियें है जो करोड़ों की संख्या में पिछले कई दशकों से पश्चिम बंगाल में डेरा डाले हुए है, मोदी-शाह को विश्वास है कि यदि एनआरसी में असम के बाद पश्चिम बंगाल का नम्बर लगा दिया तो प्रदेश में अगले साल आसानी से भाजपा की सरकार बन सकेगी, इसी तरह अगले एक-दो सालों में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होना है, उन राज्यों पर केन्द्र सरकार एनआरसी को लेकर विशेष ध्यान दे रही है। जिससे कि अभी नहीं तो अगले पांच सालों में पूरे देश के सभी राज्यों पर भाजपा का ‘एकछत्र राज’ कायम हो सके।
इसके साथ ही भाजपा ने अब राष्ट्रीय चुनावी मुद्दों के साथ उन मुद्दों पर भी ध्यान देने का फैसला लिया है जो देश के आम वोटर से जुड़े है। क्योंकि अभी तक केन्द्र की मोदी सरकार पर यही मुख्य आरोप लगाया जा रहा था कि सरकार सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दों पर ध्यान दे रही है, आम जनता व किसानों की समस्याऐं यथावत है, साथ ही मोदी सरकार के पहले कार्यकाल (2014-19) की भी अब खुलकर समीक्षा की जाने लगी है और उस कार्यकाल को निरर्थक माना जा रहा है, इन सब राष्ट्रीय चर्चा से जुड़े मुद्दों पर अब सरकार का ध्यान जा रहा है, जिसका श्रेय आमतौर पर संघ को दिया जा रहा है, सरकार ने संघ के ‘तिरस्कार काल’ की समीक्षा भी की और उसी के परिणाम स्वरूप अब संघ को अहमियत देना दिख रहा है, यद्यपि संघ स्वयं विवादित रहा है, क्योंकि कई विवाद उससे जुड़े है, किंतु ऐसा कहा जा रहा है कि ‘‘मोदी मेहरबान तो संघ पहलवान’’।

भाजपा ने डाले हथियार
सिद्धार्थ शंकर
अब तक सिर्फ सुना गया था कि राजनीति न जाने कब कौन सा रंग दिखा दे, मगर महाराष्ट्र के नाटक में पल-पल जिस तरह से सीन बदले और किरदार बदले, उसने सभी तरह की संभावनाओं और आशंकाओं को निर्मूल साबित कर दिया। पिछले एक माह से चल रहे महाराष्ट्र के घटनाक्रम में लगभग रोज अनिश्चय की स्थिति बनी है। कभी भाजपा हावी तो कभी विपक्ष। समाधान आज तक किसी की तरफ से नहीं आया। इन सबके बीच सवाल तब उठने लगा जब रातों रात अजित पवार के समर्थन से सरकार बनाने वाले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का दिनदहाड़े इस्तीफा हो गया। पिछले शुक्रवार-शनिवार की रात सरकार बनाने के बाद का घटनाक्रम जिस तरह से बदला, उसने भाजपा को बुरी तरह फंसा दिया। बहुमत का जुगाड़ न होते देख पहले एनसीपी में अकेले पड़े उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने इस्तीफा सौंपा, फिर फडणवीस ने भी हथियार डाल दिए। यह सब तब हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार शाम 5 बजे तक फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया था। जो भी फडणवीस को इस्तीफा देने का आदेश दिल्ली से आया, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कार्यवाहक अध्यक्ष जेपी नड्डा की उच्चस्तरीय बैठक हुई। बैठक में सरकार बचाने की सभी संभावनाओं को टटोला गया, मगर बात बनते न देख भाजपा ने पैर पीछे खींचने में भलाई समझी। हालांकि, यह सोमवार की शाम ही तय हो गया था कि भाजपा बहुमत हासिल नहीं कर पाएगी। हयात होटल में शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस के विधायकों ने जिस तरह से एकजुटता दिखाई, उससे भाजपा की सारी योजना धरी रह गई।
भाजपा समर्थन हासिल करने के लिए जिन संभावनाओं पर काम कर रही थी, वह काफी पेचीदा था। महाराष्ट्र में सुप्रीम कोर्ट की ओर से बुधवार शाम पांच बजे तक बहुमत परीक्षण की डेडलाइन फिक्स करने के बाद से यह सबसे बड़ा सवाल था कि क्या सीएम देवेंद्र फडणवीस 145 का मैजिक नंबर जुटा पाएंगे? विपक्ष अपने पास 162 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहा है। 105 विधायकों वाली भाजपा अजित पवार के दम पर बहुमत के दावे पर अडिग थी, मगर ऐसा हो नहीं पाया। कहा जा रहा था कि एनसीपी के पास कुल 54 विधायक हैं। दल-बदल कानून के प्रावधान के तहत अलग गुट को मान्यता हासिल करने के लिए दो तिहाई विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। इस लिहाज से अजित पवार को 36 विधायकों का समर्थन चाहिए। अगर अजित 36 या इससे ज्यादा विधायकों का समर्थन हासिल कर लेते हैं तो उन्हें नई पार्टी बनाने में मुश्किल नहीं होगी लेकिन अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो बागी विधायकों की सदस्यता खत्म हो सकती है। उनके अलावा करीब 13 निर्दलीय विधायकों के समर्थन का दावा भाजपा पहले ही कर रही थी। ये निर्दलीय शिवसेना और बीजेपी के बागी नेता हैं। ऐसे में भाजपा के 105+36+13= 154 यानी फडणवीस सरकार आसानी से बहुमत साबित कर लेती। दूसरी स्थिति यह हो सकती थी कि विपक्षी दलों के कुछ विधायक वोटिंग के दौरान सदन से अनुपस्थित हो जाएं। इस स्थिति में प्रोटेम स्पीकर की भूमिका भी अहम हो जाती। ऐसे में बहुमत का आंकड़ा घट जाता और भाजपा आसानी से बहुमत साबित कर लेती। फडणवीस सरकार बचने की यही एकमात्र सबसे संभव स्थिति दिख रही थी, मगर भाजपा ने इस राह पर जाने से इंकार कर दिया। तीसरी स्थिति यह हो सकती थी कि भाजपा शिवसेना के खेमे में ही सेंध लगा ले और विधायकों को तोड़ ले या फिर उनसे इस्तीफा दिलवा दे। विधानसभा में इस समय शिवसेना के पाक 56 विधायक हैं। ऐसी स्थिति में भी विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा घट जाता। बीते कुछ दिनों से भाजपा के कुछ नेता भी दबी जुबान में यह दावा कर रहे थे कि शिवसेना के कुछ विधायक उनसे संपर्क में हैं। बाकी सबके खिलाफ होने पर फडणवीस के लिए सरकार बचाने की एक अंतिम स्थिति यह हो सकती थी कि कांग्रेस के 44 विधायकों में से बड़ा खेमा टूटकर भाजपा में शामिल हो जाए या फिर उसे समर्थन कर दे। मगर ऐसा होना दिन में चंाद निकलने जैसा होता।
बहरहाल, अब जबकि सारी संभावनाएं गौण हो चुकी हैं तो उस व्यक्ति की भी तलाश शुरू हो गई है, जिस पर इस नाकामी का ठीकरा फोड़ा जाए। जाहिर है भाजपा इस कूटनीतिक हार का पूरा खामियाजा फडणवीस पर फोड़ेगी।

न्यायिक सक्रियता से ही रूकेगी सीवर में होने वाली मौत
रमेश सर्राफ धमोरा
राजस्थान में सीकर जिले के फतेहपुर में सीवरेज की खुदाई के दौरान हुई तीन मजदूरों की मौत के मामले में वहां के अपर जिला एवम सेशन न्यायाधीश शिवप्रसाद तम्बोली ने कुछ दिनो पूर्व ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। कोर्ट ने इस मामले में कंपनी के इंजीनियर सहित तीन लोगों को गैर इरादतन हत्या का दोषी मानते हुये दस-दस साल के कारावास की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने माना कि काम कर रहे मजदूरों के लिए सुरक्षा का इंतजाम करना कम्पनी और ठेकेदार की जिम्मेदारी थी। कोर्ट ने माना कि उस दिन कम्पनी की ओर से सीवरेज का काम किया जा रहा था और सुरक्षा संबंधी उपाय नहीं करने के कारण तीन मजदूरों को जान गंवानी पड़ी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ समय पहले हाथ से मैला साफ करने के दौरान सीवर में होने वाली मौतों पर चिंता जताने के साथ ही सख्त टिप्पाणी की थी। देश के सबसे बड़े कोर्ट ने कहा था कि देश को आजाद हुए 72 साल से अधिक समय हो चुका है। लेकिन देश में जाति के आधार पर भेदभाव जारी है। मनुष्य के साथ इस तरह का व्यवहार सबसे अधिक अमानवीय आचरण है। इस हालात में बदलाव होना चाहिए। जस्टिस अरुण मिश्रा, एमआर शाह और बीआर गवई की पीठ ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से सवाल किया कि आखिर हाथ से मैला साफ करने और सीवर के नाले या मैनहोल की सफाई करने वालों को मास्क व ऑक्सीजन सिलेंडर जैसे सुरक्षा उपकरण क्यों नहीं मुहैया कराई जाते हैं? दुनिया के किसी भी देश में लोगों को गैस चैंबर में मरने के लिये नहीं भेजा जाता है। इस वजह से हर महीने चार से पांच लोगों की मौत हो जाती है। कोर्ट ने कहा संविधान में प्रावधान है कि सभी मनुष्य समान हैं लेकिन प्राधिकारी उन्हें समान सुविधाएं मुहैया नहीं कराते।
पीठ ने इस स्थिति को अमानवीय करार देते हुए कहा कि बिना सुरक्षा उपकरणों के सफाई करने वाले लोग सीवर और मैनहोल में अपनी जान गंवा रहे हैं। वेणुगोपाल ने पीठ से कहा कि देश में नागरिकों को होने वाली क्षति और उनके लिए जिम्मेदार लोगों से निपटने के लिये अपकृत्य कानून बना नहीं है। ऐसी घटनाओं का स्वत: संज्ञान लेने का मजिस्ट्रेट को अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि सडक़ पर झाड़ू लगा रहे या मैनहोल की सफाई कर रहे व्यक्ति के खिलाफ कोई मामला दायर नहीं किया जा सकता, लेकिन ये काम करने का निर्देश देने वाले अधिकारी या प्राधिकारी को इसका जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
सीवर सफाई के दौरान हादसों में मजदूरों की दर्दनाक मौतों की खबरें लगातार आती रहती हैं। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में कुछ दिनो पूर्व सीवर टैंक की जहरीली गैस की चपेट में आने से 5 लोगों की मौत हो गई थी। कुछ माह पूर्व गुजरात के वड़ोदरा जिले के डभोई तहसील में एक होटल की सीवेरेज टैंक साफ करने उतरे सात मजदूरों की दम घुटने से मौत हो गई थी। घटना की रात सात मजदूर एक होटल की सीवरेज टैंक साफ करने के लिए उतरे थे। लेकिन टैंक सफाई के दौरान दम घुटने से उन सभी मजदूरों की मौत हो गई थी।
मई में उत्तर पश्चिम दिल्ली के एक मकान के सेप्टिक टैंक में उतरने के बाद दो मजदूरों की मौत हो गई थी। इस मामले में भी जांच में यह बात सामने आई थी कि मजदूर टैंक में बिना मास्क, ग्लव्स और सुरक्षा उपकरणों के उतरे थे। नोएडा स्थित सलारपुर में सीवर की खुदाई करते समय पास में बह रहे नाले का पानी भरने से दो मजदूरों की डूबने से मौत हो गई थी। गत वर्ष आन्ध्र प्रदेश राज्य के चित्तूर जिले के पालमनेरू मंडल गांव में एक गटर की सफाई करने के दौरान जहरीली गैस की चपेट में आने से सात लोगो की मौत हो गयी थी। देश के विभिन्न हिस्सो में हम आये दिन इस प्रकार की घटनाओं से सम्बन्धित खबरें समाचार पत्रों में पढ़ते रहते हैं।
देश के विभिन्न हिस्सो में पिछले एक वर्ष में सीवर की सफाई करने के दौरान 200 से अधिक व्यक्तियों की मौत हो चुकी है। इस अमानवीय त्रासदी में मरने वाले अधिकांश लोग असंगठित दैनिक मजदूर होते हैं। इस कारण इनके मरने पर कहीं विरोध दर्ज नहीं होता है। देश में 27 लाख सफाई कर्मचारी हैं जिसमें 20 लाख ठेके पर काम करते हैं। एक सफाईकर्मी की औसतन कमाई 6 से 10 हजार रुपये प्रति माह होती है। आधे से ज्यादा सफाई कर्मी अनेको बिमारियों से पीडि़त होते हैं। इस कारण 90 फीसदी गटर-सीवर साफ करने वालों की मौत 60 वर्ष की उम्र से पहले ही हो जाती है। इस कार्य को करने वालों के लिये बीमा की भी कोई सुविधा नहीं होती है।
कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सीवर की सफाई करने वाली एजेंसी के पास सीवर लाईन के नक्शे, उसकी गहराई से सम्बंधित आंकड़े होना चाहिए। सीवर सफाई के काम में लगे लोगों की नियमित स्वास्थ्य की जांच, नियमित प्रशिक्षण के नियम का पालन होता कहीं नहीं दिखता है।
सभी सरकारी दिशा-निर्देशों में दर्ज हैं कि सीवर सफाई करने वालों को गैस -टेस्टर, गंदी हवा को बाहर फेंकन के लिए ब्लोअर, टॉर्च, दस्ताने, चश्मा और कान को ढंकन का कैप, हैलमेट मुहैया करवाना आवश्यक है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इस बारे में कड़े आदेश जारी कर चुका है। इसके बावजूद ये उपकरण और सुविधाएं गायब है। दिनों दिन सीवर लाइनों की लंबाई बढ़ रही है वहीं मजदूरों की संख्या में कमी की जा रही है।
गटर की सफाई करने वालो की मौत होने के साथ ही उनपर निर्भर उनका परिवार भी बेसहारा हो जाता है। परिवार की आमदनी का स्रोत अचानक से बंद हो जाता है। देश में जाम सीवर की मरम्मत करने के दौरान प्रतिवर्ष दम घुटने से काफी लोग मारे जाते हैं। इससे पता चलता है कि हमारी गंदगी साफ करने वाले हमारे ही जैसे इंसानों की जान कितनी सस्ती है। सीवर सफाई के काम में लगे लोगों को सामाजिक उपेक्षा का भी सामना करना पड़ता है।
आमतौर पर सीवर में उतरने से पहले सफाईकर्मी शराब पीते है। शराब पीने के बाद शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। तभी सीवर में उतरते ही इनका दम घुटने लगता है। सफाई का काम करने के बाद उन्हें नहाने के लिए साबुन, नहाने को पानी तथा पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी भी कार्यकारी एजेंसी की है। इसके बावजूद ये उपकरण और सुविधाएं इनको अभी तक नहीं मिल पा रही है। भारत में इसे प्रतिबंधित किये जाने के उपरान्त भी यह गंभीर समस्या बनी हुई है। अब देश की सर्वोच्च अदालत ने गटर की सफाई करने वालों की सुध लेते हुये सरकार की खिंचाई की है। इससे लगता है कि सफाई करने वाले इन स्वच्छता सिपाहियों के भी जल्दी ही अच्छे दिन आयेगें व सरकारी अकर्मण्यता से होने वाली उनकी असामयिक मौत पर रोक लग पायेगी।

भारतीय संविधान के सत्तर वर्ष
हर्षवर्धन पाठक
इस 26 नवम्बर को भारतीय संविधान बने सत्तर वर्श हो जायेंगे। सत्तर वर्श पूर्व इसी तिथि अर्थात 26 नवम्बर 1949 को हमने अपना संविधान आत्मार्पित किया था। तीन माह बाद 26 जनवरी 1950 को हमारे देष ने पहला गणतन्त्र दिवस मनाया। इसके पूर्व ब्रिटिष संविधान लागू था। यह परंपराओं पर आधारित है। इसके विपरीत हमारा संविधान लिखित है।
भारत का संविधान विष्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान माना जाता है। इसमें 448 अनुच्छेद 12 अनुसूचियां हैं , हाल ही में अयोध्या विवाद का फैसला दिया गया। जब सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुये अयोध्या विवाद के सम्बंध में अपना निर्णय दिया तब यह अनुच्छेद फिर चर्चा में आये। डॉ. भीमराव अंबेडकर को यह वृहत संविधान बनाने का श्रेय दिया जाता है।
संविधान सभा में वैसे 284 सदस्य थे। डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में गठित इस सभा में डाक्टर भीमराव अम्बेडकर ने जिस मेहनत और मेधा के साथ संविधान बनाने में रुचि ली वह अभूतपूर्व थी। इस कारण इससे डा. अम्बेडकर की यादें जुड़ी हुई है जिसकी वजह से इस संविधान में फेर बदल की कोई भी बात उनके अनुनायियों को बहुत बुरी लगती है। हर षहर में भीम नगर है तो उनकी प्रतिमायें सर्वत्र स्थापित हैं। हमारे देष का हर राजनीतिज्ञ संविधान की षपथ खाता है।
भारतीय संविधान राश्ट्र का सर्वोच्च विधान है। संविधान की प्रस्तावना ”हम भारत के लोग“ से प्रारंभ होती है, जिसका स्पश्ट संकेत है कि संविधान निर्माण में नागरिकों को अधिक महत्व दिया गया है। यह भी डा. अम्बेडकर के लोक प्रेम का परिचायक है। संविधान में यह घोशणा की गई कि देष में संसदीय लोकतांत्रिक समाजवादी गण तंत्र स्थापित किया गया है। बाद में इसमें श्रीमती इन्दिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में धर्म निरपेक्ष शब्द भी जोड़ा गया।
संविधान की एक विषेशता यह भी है कि इसमें राज्य को नीति निर्देष भी हैं तो राश्ट्र के नागरिकों के लिये अधिकार भी दिये गये हैं। इन मूल अधिकारों का कुछ मामलों में दुरुपयोग भी होता है लेकिन ये अधिकार भारतीय संविधान के सर्वाधिक महत्वपूर्ण बिन्दु हैं। कुछ व्यक्तियों के द्वारा दुरुपयोग होने के कारण इनका महत्व कम नहीं होता। इनमें प्रमुख हैं अभिव्यक्ति का अधिकार, समानता का अधिकार, षिक्षा तथा संस्कृति का अधिकार, षोशण के विरुद्ध अधिकार।
भारतीय संविधान में भारत को राज्यों का संघ बताया गया है किन्तु हमारे संविधान निर्माताओं ने राश्ट्रीय एकता का भी ध्यान रखा है। राज्यों को असीमित अधिकार नहीं दिये गये हैं। भारत राश्ट्र में संविधान निर्माताओं ने एक राश्ट्रीय ध्वज , राश्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सर्वोच्च न्यायाधीश रखे गए हैं। भारत में संसद सम्प्रभु तथा सर्वोच्च है। नियम बनाने के अधिकारों का भी विभाजन किया गया है, संघ और राज्यों को अलग-अलग अधिकार दिये गये हैं लेकिन एक समवर्ती सूची भी बनाई है। इसमें यह स्पश्ट किया गया है कि यदि संघ और राज्य दोनों नियम बनायेंगें तो संघ के नियम लागू होंगे।
संविधान निर्माण के समय यह ध्यान भी रखा गया है कि किसी को भी असीमित अधिकार न हो। राश्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीष पर भी महाभियोग का प्रावधान रखा गया है। चैक एण्ड बैंलेंस का प्राकृतिक नियम ध्यान में रखा गया है।
भारत का संविधान प्रेम बिहारी रायजादा ने पेन से लिखा था। इसकी मूल प्रति संसद के पुस्तकालय में रखी है। इसके निर्माण का कार्य आजादी मिलने के 14 दिन बाद ही षुरु हो गया था। डाक्टर भीमराव अम्बेडकर को यह महत्वपूर्ण कार्य सौंपा गया। उन्होंने दूसरे देषों के उस समय लागू संविधानों का अध्ययन किया। उसके बाद भारतीय संविधान बनाया गया। इस संविधान की खूबी यह है कि संघात्मक होने के साथ ही एकात्मक भी है। प्रति वर्श 26 नवम्बर को मनाया जाने वाला संविधान दिवस डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की अमिट स्मृति है। यह संविधान उनके परिश्रम और प्रतिभा का परिचय देता है।

खानपान बना– बहस का बड़ा मुद्दा
डॉक्टर अरविन्द
खानपान एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनता जा रहा हैं उसका कारण अपने अपने तर्क पर सच्चाई एक ही होती हैं .आज लोग मांसाहार की वकालत बहुत करते हैं और उससे किसी को कोई परहेज़ नहीं हैं .खूब जो भी खाना हो खाओ .जैसे हम कभी मिटटी का घड़ा खरीदते हैं तो उसे थोक पीटकर देखते हैं उसी प्रकार जो हम खा रहे हैं वह हमारे लिए लाभप्रद हैं या नहीं .यदि लाभप्रद हैं तो अवश्य सेवन करो और हानिकारक हैं तो उसका विश्लेषण करो और उपयोग करो.वह खाना जो हानिकारक के अलावा स्वास्थ्य निर्माण में सहायक नहीं हैं उसका सेवन नहीं करना चाहिए.
वैसे खाना पीना पहनना पूजा पाठ व्यक्ति की अपनी अपनी मान्यता के साथ स्वतंत्रता हैं पर हमें विवेक पूर्ण निर्णय लेकर सेवन करना चाहिए .
इन दिनों दुनिया में यह बहस जोरों पर है कि बेहतर स्वास्थ्य और फिटनेस के लिए क्या खाना चाहिए क्या नहीं। बाजार में तरह-तरह के डायट प्लान और उन्हें सपोर्ट करने वाली उतनी ही तरह की रिसर्च आ रही हैं। लोगों को अपनी-अपनी जरूरत के मुताबिक डायट प्लान चाहिए। अगर डायबिटीज पर नियंत्रण चाहिए तो एक तरह की डायट, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर के लिए दूसरी तरह की। जिम में वजन उठाने के लिए यानी पावरलिफ्टिंग के लिए खास तरह की डायट। तेज दौड़ने, दिन भर तरोताजा महसूस करने, कैंसर के खतरों से बचने के लिए अलग-अलग किस्म की डायट। आप अगर चाहें तो न्यूट्रिशनिस्ट से अपने ब्लड ग्रुप के हिसाब से या अपने शरीर की पाचन शक्ति के मुताबिक भी खास अपने लिए डायट प्लान बनवा सकते हैं।
खिलाड़ियों के दावे
डायट के बाजार में कुछ साल पहले तक कीटो डायट का बहुत बोलबाला था। कीटो यानी कीटोजेनिक डायट में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा घटा दी जाती है और जरूरी ऊर्जा प्रोटीन व फैट से ली जाती है। कई एथलीटों ने अपनी कीटो डायट के बारे में पब्लिक में घोषणा की और अपने अनुभव भी साझा किए। कुछ साल पहले भारत में वजन घटाने के लिए कीटो डायट अपनाने का फैशन चल निकला था। पर सबसे तीखी बहस जिस डायट को लेकर चल रही है वह है वीगन डायट जिसमें सिर्फ पौधों से मिलने वाला भोजन शामिल है। बहस पौधों से मिलने वाले भोजन पर नहीं बल्कि इस बात को लेकर हो रही है कि वीगन डायट लेने वाले अपनी ताकत की जरूरतों के लिए जानवरों से मिलने वाले किसी भी तरह के उत्पाद के खिलाफ हैं और दावा कर रहे हैं कि ऐसा करने से उनके शारीरिक प्रदर्शन पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा बल्कि उसमें सुधार आ रहा है।
पिछले साल नेटफ्लिक्स पर आई डॉक्युमेंट्री फिल्म ‘गेम चेंजर्स’ ने इस संबंध में एक अभूतपूर्व बहस छेड़ दी है। इसमें वीगन डायट लेने वाले कई सिलेब्रिटी खिलाड़ियों से बातचीत की गई है जिन्होंने अपने-अपने तरीकों से दावा किया कि कैसे वीगन डायट लेने के कारण ही वे अपने प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ पाए और खेल की थकान, चोट आदि से रिकवर करने में भी किस तरह इसने सबसे कारगर भूमिका निभाई। दुनिया भर के शाकाहारियों की हमेशा से यह चिंता रही है कि पौधों से मिलने वाले भोजन में पर्याप्त प्रोटीन नहीं मिल पाता। मांसाहारियों ने अपनी प्रोटीन की जरूरतों को लेकर कभी कोई फिक्र नहीं की क्योंकि उनके पास जानवरों से मिलने वाले भोजन की बेशुमार चॉइस रही है।
‘गेम चेंजर्स’ मांसाहारियों को शाकाहारियों की अपेक्षा प्रोटीन के बेहतर और ज्यादा विकल्प मिलने की बात को निरस्त करते हुए इस नई खोज का दावा करती है कि जानवरों के उत्पादों से मिलने वाला प्रोटीन शरीर के लिए न सिर्फ नुकसानदायक होता है क्योंकि उससे कैंसर व कई अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है बल्कि प्लांट प्रोटीन मानव शरीर के लिए ज्यादा प्रभावी और अनुकूल है। डॉक्युमेंट्री में जर्मनी के स्ट्रांगमैन पैट्रिक बाबूमियां को दिखाया गया है जो वीगन होते हुए भी 555 किलो वजन उठाने का कीर्तिमान बनाते दिखाते हैं। फिल्म में उनका एक डायलॉग है- ‘एक आदमी ने मुझसे पूछा कि तुम बिना प्रोटीन खाए सांड जैसे ताकतवर कैसे हो गए? मेरा जवाब था – तुमने क्या कभी सांड को मीट खाते हुए देखा?’ इस डॉक्युमेंट्री में अपनी बॉडी बिल्डिंग के दम पर हॉलिवुड में धूम मचाने वाले आर्नोल्ड श्वार्जनेगर, फॉर्म्युला वन चैंपियन लिविस हेमिल्टन, ऑस्ट्रेलियाई स्प्रिंटर मोर्गन मिशेल, मिक्स्ड मार्शल आर्ट के नंबर वन फाइटर रहे जेम्स विल्क्स, अल्ट्रामैराथन दौड़ने वाले दुनिया के टॉप रनर स्कॉट ज्यूरेक जैसे दिग्गज वीगन डायट की ताकीद करते दिखते हैं। डॉक्युमेंट्री यहां तक बताती है कि वीगन डायट मर्दों में सेक्शुअल पावर भी बढ़ाता है। इसके हिमायती दावा करते हैं कि हमारे दांतों का स्ट्रक्चर शाकाहार के अनुकूल है। वे फिक्रमंद हैं कि नॉन-वेज डायट के लिए पशुपालन करने में पृथ्वी के संसाधन खर्च हो रहे हैं और पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है।
भारत के विराट कोहली समेत जिस तरह दिग्गज खिलाड़ियों ने वीगन डायट अपनाया है, उससे दुनिया भर के लोगों का ध्यान इसकी ओर गया है। पर यह बात नॉन-वेज डायट के धंधे में लगे तबके के गले नहीं उतरने वाली। डॉक्युमेंट्री ने सीधे-सीधे उनके पेट पर लात मारी है। इसलिए कोई हैरानी नहीं कि कुछ ही महीनों में फिल्म के दावों को झूठा करार करने वालों का तांता लग गया। उस पर सबसे बड़ा आरोप यह लगाया जा रहा है कि इसके निर्माता और इसमें काम करने वाले ज्यादातर लोग वीगन डायट के बिजनेस से जुड़े हुए हैं। लिहाजा उन्होंने अपने व्यावसायिक लाभ के लिए झूठे और अपुष्ट स्रोतों के आधार पर फिल्म बनाकर लोगों के साथ धोखा किया है। चूंकि मामला खरबों रुपये के डायट बिजनेस का है, इसलिए दोनों ओर से दावे और प्रतिदावे किए जा रहे हैं।
सतर्कता की जरूरत
जाहिर है, दोनों में से किसी एक को सही मानकर उसे फॉलो नहीं किया जा सकता। भोजन निजी मसला है और सबकी भोजन से अपनी अलग-अलग जरूरतें और अपेक्षाएं रहती हैं। सिर्फ भोजन को महत्व देने वालों का कहना है कि अपने लिए भोजन के चयन का सबसे अच्छा तरीका है कि हम खुद ही जांच करें कि हमारे शरीर के लिए क्या अनुकूल है और क्या प्रतिकूल। वैसे यह तो तय है कि हम क्या खा रहे हैं, इसे लेकर सतर्क होने का वक्त आ गया है क्योंकि शोध हमें कई हैरतअंगेज परिणाम दे रहे हैं। आप अगर वीगन होना चाहते हैं, तो बेहतर है कि खुद जांच लें कि आपका शरीर ऐसे भोजन के साथ कैसे निर्वाह करता है। याद रखें कि आपसे ज्यादा आपके शरीर को भोजन की जरूरत है और उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि दुनिया में कौन कैसा भोजन कर रहा है।
तन मन धन करता कौन ख़राब ,
मछली ,अंडा, मांस ,शराब

चुनौतियों से भरा होगा जस्टिस बोबड़े का कार्यकाल
योगेश कुमार गोयल
चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की सेवानिवृत्ति के पश्चात् 18 नवम्बर को जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाल लिया है और इस प्रकार वे भारत के 47वें मुख्य न्यायाधीश बन गए हैं। स्थापित परम्परा के अनुरूप न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने अपनी विदाई से कुछ दिनों पहले ही अपने उत्तराधिकारी के रूप में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जज न्यायमूर्ति बोबड़े की नियुक्ति की सिफारिश कर दी थी और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा 29 अक्तूबर को उनकी नियुक्ति को स्वीकृति दे दी गई थी। जस्टिस गोगोई 3 अक्तूबर 2018 को देश के 46वें मुख्य न्यायाधीश बने थे, जिनके 17 नवम्बर को रिटायर होने के बाद जस्टिस एस ए बोबड़े ने उनका स्थान लिया है। जस्टिस गोगोई का कार्यकाल करीब एक साल का था, जिसमें उन्होंने अयोध्या विवाद कई महत्वपूर्ण मसलों पर फैसले सुनाकर न्याय जगत में एक नया इतिहास रचा और अब जस्टिस बोबड़े के करीब डेढ़ वर्षीय कार्यकाल पर भी सबकी नजरें केन्द्रित रहेंगी क्योंकि उनके समक्ष भी कई महत्वपूर्ण मुद्दे सामने आएंगे, जिन पर उन्हें अपना निर्णय सुनाना है। गौरतलब है कि जस्टिस बोबड़े का कार्यकाल 23 अप्रैल 2021 तक का होगा। जस्टिस बोबड़े ही वह न्यायाधीश हैं, जिन्होंने करीब छह साल पूर्व सबसे पहले स्वेच्छा से ही अपनी सम्पत्ति की घोषणा करते हुए दूसरों के लिए आदर्श प्रस्तुत किया था। उन्होंने बताया था कि उनके पास बचत के 2158032 रुपये, फिक्स्ड डिपोजिट में 1230541 रुपये, मुम्बई के एक फ्लैट में हिस्सा तथा नागपुर में दो इमारतों का मालिकाना हक है।
न्यायमूूर्ति बोबड़े इस साल उस वक्त ज्यादा चर्चा में आए थे, जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट की ही एक पूर्व महिला कर्मचारी द्वारा मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए जाने के बाद उस अति संवेदनशील मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित हाउस पैनल का अध्यक्ष बनाया गया था, जिसमें न्यायमूर्ति एन वी रमन तथा इंदिरा बनर्जी शामिल थे। इस पैनल ने अपनी जांच के बाद जस्टिस गोगोई को क्लीनचिट दी थी। जनवरी 2018 में जब सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कांफ्रैंस की थी, तब जस्टिस गोगोई, जे चेलमेश्वर, मदन लोकुर तथा कुरियन जोसेफ के बीच मतभेदों को निपटाने में अहम भूमिका निभाने के चलते भी जस्टिस बोबड़े चर्चा में आए थे। उस समय उन्होंने कहा था कि कोलेजियम ठीक तरीके से काम कर रहा है और केन्द्र के साथ उसके कोई मतभेद नहीं हैं।
24 अप्रैल 1956 को महाराष्ट्र के नागपुर में जन्मे न्यायमूर्ति शरद अरविंद बोबड़े को वकालत का पेशा विरासत में ही मिला था। उनके दादा एक वकील थे और पिता अरविंद बोबड़े महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल रहे हैं जबकि बड़े भाई स्व. विनोद अरविंद बोबड़े सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील रहे थे। उनकी बेटी रूक्मणि दिल्ली में वकालत कर रही हैं और बेटा श्रीनिवास मुम्बई में वकील है। शरद अरविंद बोबड़े ने नागपुर विश्वविद्यालय से एलएलबी करने के पश्चात् वर्ष 1978 में बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र की सदस्यता लेते हुए अपने वकालत कैरियर की शुरूआत की थी, जिसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ में वकालत की और 1998 में वरिष्ठ अधिवक्ता मनोनीत किए गए। 29 मार्च 2000 को उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में बतौर अतिरिक्त न्यायाधीश पदभार ग्रहण किया और फिर 16 अक्तूबर 2012 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। पदोन्नति मिलने के बाद 12 अप्रैल 2013 को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में बतौर जज कमान संभाली। सुप्रीम कोर्ट में जज बनने के बाद वे सर्वोच्च अदालत की कई महत्वपूर्ण खण्डपीठों का हिस्सा रहे। वे अदालत की उस बेंच का भी हिस्सा थे, जिसने आदेश दिया था कि आधार कार्ड न रखने वाले किसी भी भारतीय नागरिक को सरकारी फायदों से वंचित नहीं किया जा सकता। बहुतप्रतीक्षित और राजनीतिक दृष्टि से सर्वाधिक संवेदनशील माने जाते रहे रामजन्मभूमि विवाद की सुनवाई कर रही मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली उस पांच सदस्यीय संविधान पीठ का भी वे अहम हिस्सा थे, जिसने अपने फैसले से देश की न्याय प्रणाली के प्रति हर देशवासी का भरोसा बनाए रखा है।
जस्टिस बोबड़े ने देश के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अति महत्वपूर्ण कार्यभार तो संभाल लिया है लेकिन यह भी तय है कि उनका यह पूरा कार्यकाल चुनौतियों से भरा रहेगा। सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट तथा निचली अदालतों में लंबित मामलों के निपटारे, अदालतों में न्यायाधीशों की बड़ी कमी, विचाराधीन कैदियों की सुनवाई में विलम्ब, न्यायपालिका तथा कार्यपालिका के बीच टकराव जैसी स्थितियां इत्यादि उनके समक्ष कई ऐसी बड़ी चुनौतियां होंगी, जिनसे निपटते हुए उन्हें इनके समाधान के प्रयास भी करने होंगे। अदालतों में लंबित मामलों को निपटाने और मुकद्दमों में होने वाली देरी को दूर करने के लिए वर्ष 2009 में प्रक्रियागत खामी को दूर करना, मानव संसाधन का विकास करना, निचली अदालतों में बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाना जैसे रणनीतिक नीतिगत कदम उठाए जाने की जरूरत पर विशेष जोर दिया गया था लेकिन इस दिशा में सकारात्मक प्रयास नहीं हुए। न्यायमूर्ति बोबड़े इस चुनौती से कैसे निपटेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।
अगर भारतीय अदालतों में लंबित मामलों पर नजर डालें तो फिलहाल देशभर की अदालतों में 3.53 करोड़ से भी ज्यादा मामले लंबित हैं। यदि निचली अदालतों या उच्च न्यायालयों की बात छोड़ भी दें तो सर्वोच्च न्यायालय में ही करीब 58669 मामले लंबित हैं, जिनमें से 40409 मामले ऐसे हैं, जो करीब तीस सालों से लंबित हैं। ‘नेशनल ज्यूडिशयरी डेटा ग्रिड’ के अनुसार उच्च न्यायालयों में 4363260 मामले लंबित हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि मामलों को जिस गति से निपटाया जा रहा है, उस हिसाब से लंबित मामलों को निपटाने में 400 साल लग जाएंगे और वो भी तब, जब और कोई नया मामला सामने न आए। देश में प्रतिवर्ष मुकद्दमों की संख्या जिस गति से बढ़ रही है, उससे भी तेज गति से लंबित मामलों की संख्या बढ़ रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2012 में ‘नेशनल कोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम’ आरंभ किया था, जिसका आकलन है कि भारतीय अदालतों में वर्ष 2040 तक मुकद्दमों की संख्या बढ़कर 15 करोड़ हो जाएगी और इसके लिए 75 हजार और अदालतें बनाने की जरूरत है। यह न्यायमूर्ति बोबड़े की चिंता का प्रमुख विषय रहेगा।
सर्वोच्च न्यायालय सहित देश की सभी अदालतें न्यायाधीशों की भारी कमी से जूझ रही हैं। विधि आयोग ने वर्ष 1987 में सुझाव दिया था कि प्रत्येक दस लाख भारतीयों पर 10.5 न्यायाधीशों की नियुक्ति का अनुपात बढ़ाकर 107 किया जाना चाहिए लेकिन यह विड़म्बना ही है कि इन सिफारिशों के 32 साल भी यह अनुपात मात्र 15.4 ही है। सर्वोच्च न्यायालय में फिलहाल 31 न्यायाधीश हैं, जहां आठ अतिरिक्त न्यायाधीशों की आवश्यकता है। इसी प्रकार उच्च न्यायालय और निचली अदालतों में भी 5535 न्यायाधीशों की कमी है। आर्थिक सर्वेक्षण में अनुमान लगाया गया है कि अदालतों में लंबित मामलों को पांच वर्षों के भीतर निपटाने के लिए करीब 8521 न्यायाधीशों की जरूरत है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने स्वयं इस तथ्य को रेखांकित करते हुए कहा था कि जिला और उपमंडल स्तरों पर अदालतों में ही स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या 18 हजार है लेकिन फिलहाल इन अदालतों में केवल 15 हजार के करीब ही न्यायाधीश हैं।
मुख्य न्यायाधीश बोबड़े के लिए चिंता का एक बड़ा विषय यह भी रहेगा कि अदालतों में न्यायाधीशों की कमी के चलते जेलों में बंद करीब चार लाख विचाराधीन कैदी अपनी सुनवाई का नंबर आने के लिए ही लंबा इंतजार कर रहे हैं। ये ऐसे कैदी होते हैं, जिन्हें उनका अपराध साबित नहीं होने दोषी नहीं माना जा सकता और इनमें से काफी बड़ी संख्या ऐसे कैदियों की है, जिन्हें अगर जमानत मिल भी जाए तो उनके पास इतनी राशि नहीं होती कि वे अपने लिए जमानत का इंतजाम कर सकें। न्यायमूर्ति बोबड़े के लिए इस दिशा में सक्रिय पहल करते हुए ऐसे कैदियों को शीघ्र सुनवाई का अवसर मिलने की व्यवस्था करना बहुत बड़ी चुनौती रहेगी।
समय-समय पर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव देखा जाता रहा है। सरकार द्वारा कई अवसरों पर कहा गया है कि न्यायपालिका ने जरूरत से ज्यादा सक्रियता दिखाते हुए अपनी सीमारेखा का उल्लंघन किया है और वह कार्यपालिका के क्षेत्र में दखल दे रही है। हालांकि यह अलग बात है कि ऐसा अक्सर तभी हुआ, जब कार्यपालिका अपने दायित्वों के निर्वहन में विफल हुई और न्यायपालिका को न्याय सुनिश्चित करने के लिए स्वयं आगे आना पड़ा। जस्टिस अरविंद बोबड़े की नियुक्ति पर भले ही कोई विवाद नहीं रहा हो और न्यायपालिका व कार्यपालिका के बीच भी कोई टकराव नहीं देखा गया लेकिन अक्सर देखा गया है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में भी न्यायपालिका का सरकार के साथ टकराव रहा है। पिछले दिनों भी कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि ऐसी उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि सरकार कॉलेजियम की सिफारिशों पर राजी ही होगी। हालांकि जस्टिस बोबड़े का कहना है कि सरकार के साथ उनके संबंध ठीक हैं और सरकार तथा न्यायपालिका को साथ चलना होगा। भारत की न्याय वितरण प्रणाली को अच्छा बताते हुए उनका कहना है कि इसमें आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जैसी अच्छी तकनीक शामिल करने जैसे कुछ मामूली बदलावों की जरूरत हो सकती है। उनका कहना है कि सभी मुकद्दमों में न्याय सुनिश्चित करना उनका फौरी लक्ष्य है और वे न्यायपालिका में बहुप्रतीक्षित सुधार करके उन्हें अमल में लाना चाहते हैं। बहरहाल, देखना होगा कि अपने समक्ष सामने आने वाली उपरोक्त चुनौतियों का मुकाबला करते हुए वे अपने इस डेढ़ वर्ष से भी कम समय के छोटे कार्यकाल में न्यायपालिका में सुधार के लिए कितना कार्य कर पाते हैं। न्यायमूर्ति एस ए बोबड़े का कहना है कि किसी भी न्यायिक प्रणाली की शीर्ष प्राथमिकता समय पर न्याय मुहैया कराना है, जिसमें न तो ज्यादा देरी की जा सकती है और न ही जल्दबाजी। उनका कहना है कि न्याय में देरी से अपराधों में वृद्धि हो सकती है। ऐसे में सभी की नजरें इस ओर केन्द्रित रहेंगी कि वे कैसे इन चुनौतियों से पार पाते हैं।

राजनैतिक नैतिकता के आईने में उद्धव ठाकरे व लालू यादव
निर्मल रानी
महाराष्ट्र की राजनीति में जो भूचाल की स्थिति पैदा हुई है,नैतिकता के लिहाज़ से यदि देखें तो ऐसे हालात की उम्मीद नहीं की जा सकती थी। मगर जब कुर्सी की चाह, ख़ास तौर पर मुख्यमंत्री के पद की लालसा का सवाल हो तो राजनीति में ‘नैतिकता’ शब्द की कोई गुंजाईश नज़र नहीं आती। भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का लगभग 25 वर्ष पुराना गठबंधन इन्हीं हालात की भेंट चढ़ गया। 288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में पिछले दिनों हुए आम चुनावों किसी भी दाल को बहुमत नहीं मिल सका। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को 105 सीटें मिलीं और शिवसेना को 56 सीटें हासिल हुईं। उधर एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटों पर जीत मिली। सर्कार बनाने के लिए ज़रूरी 146 सीटों का आंकड़ा चुनाव पूर्व गठबंधन वाली भाजपा व शिवसेना आसानी से पूरा करती नज़र आ रही है। परन्तु 56 सीटें जितने वाली शिव सेना ने भाजपा के सामने मुख्यमंत्री पद लिए जाने की शर्त रख दी जिसे भाजपा ने मंज़ूर नहीं किया। नतीजतन स्थिति राष्ट्रपति शासन तक जा पहुंची। इस राजनैतिक उठापटक में ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो बाद में पता चलेगा परन्तु फ़िलहाल जो बड़े राजनैतिक बदलाव हुए हैं उनमें शिव सेना न केवल घाटे में बल्कि राजनैतिक रूप से अलग थलग पड़ती भी दिखाई दे रही है। शिव सेना का भाजपा से गठबंधन भी टूट चूका है और शिव सेना के लोकसभा सांसद व सेना के एकमात्र केंद्रीय मंत्री अरविंद सावंत ने ”शिव सेना सच के साथ है. इस माहौल में दिल्ली में सरकार में बने रहने का क्या मतलब है?,यह कहते हुए नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा भी दे दिया है।वे मोदी सरकार में भारी उद्योग मंत्री थे। अब सच क्या है,राजनीति में सच की परिभाषा क्या है,राजनीति में ‘वास्तविक सच’ की कोई ज़रुरत या गुंजाईश है भी या नहीं या फिर मौक़ापरस्ती ही ‘सच’ की सबसे बड़ी परिभाषा बन चुकी है इन बातों पर चिंतन करने की सख़्त ज़रुरत है।
आज भाजपा व शिव सेना एक दूसरे को वर्तमान राजनैतिक उथल पुथल के लिए ज़िम्मेदार ही नहीं ठहरा रहे बल्कि एक दुसरे पर झूठ बोलने का इल्ज़ाम भी लगा रहे हैं। शिव सेना का कहना है कि महारष्ट्र के राजनैतिक हालात के लिए शिवसेना नहीं बल्कि भाजपा का अहंकार ज़िम्मेदार है। परन्तु एक बात तो ज़रूर स्पष्ट है कि हिंदुत्व के नाम पर साथ आए ये दोनों राजनैतिक दल मुख्यमंत्री के पद की ख़ातिर अलग हो गए इसका सीधा सा मतलब यही हुआ कि दोनों ही दलों के लिए हिंदुत्व या विचारधारा की बातें करना महज़ एक छलावा था वास्तव में तो मुख्यमंत्री का पर हिंदुत्व वाद से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण था। इस राजनैतिक उथल पुथल के दौरान शिव सेना की तरफ़ से भाजपा के और कुछ ऐसे ‘विषायुक्त ‘तीर भी छोड़े गए जो विपक्षी दाल समय समय पर छोड़ा करते थे। सत्ता की खींचतान के बीच जब शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत से जब पूछा गया था कि भाजपा के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन होने के बावजूद सरकार बनाने में देरी क्यों हो रही है तो उन्होंने कहा, ‘यहां कोई दुष्यंत नहीं है जिसके पिता जेल में हों। हम धर्म और सत्य की राजनीति करते हैं।उनका इशारा हरियाणा में सत्ता के लिए भाजपा व जननायक जनता पार्टी में सत्ता के लिए हुए समझौते की तरफ़ था। क्योंकि दोनों ही एक दुसरे के विरुद्ध चुनाव लाडे थे तथा चुनाव प्रचार के दौरान दोनों ही ने एक दुसरे पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए थे।दूसरा सवाल शिव सेना ने भाजपा के सामने यह भी रखा कि जब भाजपा महबूबा मुफ़्ती की पार्टी पी डी पी से जम्मू कश्मीर में गठबंधन कर सकती हो तो शिव सेना को कांग्रेस से आपत्ति क्यों ?
बहरहाल राजनीति में अनैतिकता का बोलबाला है,ऐसे वातावरण में आज राष्ट्रीय जनता दाल के प्रमुख लालू यादव को 2015 के बिहार विधान सभा के चुनाव परिणाम के सन्दर्भ में याद करना ज़रूरी है। भारतीय जनता पार्टी को बिहार की सत्ता से दूर रखने के लिए महागठबंधन बनाया गया था जिसमें नितीश कुमार के नेतृत्व वाली जनता दाल यूनाइटेड,लालू यादव की राष्ट्रिय जनता दाल तथा कांग्रेस पार्टी शामिल थे। जबकि भाजपा राम विलास पासवान की लोक जान शक्ति पार्टी के साथ चुनाव मैदान में थी। लालू यादव ने राज्य में नितीश कुमार की ‘विकास बाबू’ की छवि को सामने रखकर चुनाव लड़ा था लिहाज़ा सत्ता में आने पर मुख्यमंत्री नितीश ही बनेंगे यह उनका वादा था। चुनाव परिणाम आने पर राज्य जनता दाल यूनाइटेड को 71 सीटें मिलीं जबकि राष्ट्रिय जनता दाल को 80 व कांग्रेस पार्टी को 27 सीटें प्राप्त हुईं। उधर भाजपा को 53 व उसकी सहयोगी लोजपा को मात्र 2 सीटों पर संतोष करना पड़ा। इस चुनाव परिणाम बाद महाराष्ट्र की स्थिति की ही तरह सबकी नज़रें लालू यादव पर जा टिकी थीं। अनैतिकता की राजनीति के वर्तमान वातावरण में यह क़यास लगाए जाने लगे थे कि राज्य में सबसे बड़ी पार्टी में उभरी आरजेडी अपने वादे के अनुसार नितीश को मुख्यमंत्री बनने देगी या सबसे बड़े दल होने के नाते स्वयं मुख्यमंत्री पद का दवा करेगी। परन्तु अत्यंत संक्षिप्त राजनैतिक बाद लालू यादव ने अपने वेड पर क़ाएम रहते हुए कुमार मुख्यमंत्री बनाए जाने का रास्ता हमवार किया और अपने दोनों पुत्रों को नितीश मंत्रिमंडल में सम्मानपूर्ण जगह दिला दी। यानी सबसे बड़े दल के रूप उभरने के बावजूद मुख्यमंत्री पद के लिए नहीं अड़े। भले ही इस वादा वफ़ाई का बुरा नतीजा भुगतना पड़ा और आज तक वे भुगत भी रहे हैं।
उधर ठीक इसके विपरीत दूसरे नंबर पर आने वाली शिवसेना महाराष्ट्र में मुख्य मंत्री पद के लिए इस हद तक आई कि विधान सभा भंग होने तक की नौबत आ गयी। शिवसेना व भाजपा का अलग होना हिन्दुत्व के दो तथाकथित अलम्बरदारों का अलग होना है जो यह साबित करता है कि सत्ता व पद के आगे हिंदुत्व या हिंदुत्ववादी विचारधारा की कोई अहमियत नहीं जबकि साम्प्रदायिक ताक़तों को सत्ता से रोकने व धर्मर्निर्पेक्षता को मज़बूत करने की ख़ातिर लालू यादव ने 2015 में न केवल मुख्यमंत्री पद पर अपना दावा पेश नहीं किया बल्कि जनता से किये गए अपने चुनाव पूर्व वादे को भी निभाया। आगे चलकर नितीश कुमार ने कैसे राजनैतिक चरित्र का परिचय दिया वो भी पूरे देश ने देखा। इसलिए कहा जा सकता है वैचारिक व सैद्धांतिक दृष्टिकोण से महाराष्ट्र की राजनीति की तुलना में 2015 में बिहार में लिया गया लालू यादव का स्टैंड उद्धव ठाकरे की तुलना में कहीं ज़्यादा वैचारिक,सिद्धांतवादी व नैतिक प्रतीत होता है। शायद यही वजह है कि चारा घोटाला व भ्रष्टाचार के दूसरे आरोपों के बावजूद लालू यादव की धर्मनिर्पेक्ष छवि व उनकी लोकप्रियता अभी भी बरक़रार है। जबकि शिवसेना को पुत्रमोह, सत्तामोह तथा वैचारिक व सैद्धांतिक उल्लंघन का भी सामना करना पड़ रहा है।

प्रदूषण के उपाय
सिद्धार्थ शंकर
सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों और सरकारों को डांट-फटकार व चेतावनियों के बावजूद दिल्ली सहित उत्तर भारत के बड़े हिस्से में वायु प्रदूषण से निपटने को लेकर सरकारी तंत्र और जनप्रतिनिधियों में जिस तरह की उदासीनता और लापरवाही देखने को मिल रही है, वह हतप्रभ करने वाली है। शहरी विकास मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति ने दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के मुद्दे पर बैठक बुलाई थी, 29 में 25 सांसद बैठक से नदारद रहे। ज्यादातर वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इसे तवज्जो नहीं दी। दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए प्रयासों के नाम पर जो भी किया जा रहा है, उससे सर्वोच्च अदालत भी संतुष्ट नहीं है। इसीलिए उसे कहना पड़ा है कि दिल्ली सरकार की सम-विषम योजना एक तरह से आधा अधूरा प्रयास है। सम-विषम योजना के पीछे मूल भावना को लेकर किसी तरह का कोई संदेह नहीं है, लेकिन जिस तरह से इसे लागू किया जाता रहा है, उससे इस पर सवाल खड़े होते हैं। आपत्ति का बड़ा कारण तो दोपहिया, तिपहिया वाहनों को छूट दी गई है। फिर महिलाओं को इससे अलग रखा गया है। अगर वायु प्रदूषण से निपटने के लिए कोई ठोस योजना लागू करनी है तो उसे सब पर लागू किया जाना चाहिए, तभी उनके नतीजे देखने को मिलेंगे। दोपहिया और तिपहिया से होने वाले प्रदूषण की भागीदारी कारों के प्रदूषण से काफी ज्यादा है। सम-विषम योजना से छूट के प्रावधान इसकी गंभीरता को कम करते हैं। सच्चाई यह है कि हम वायु प्रदूषण को लेकर केवल विलाप कर रहे हैं, लेकिन उससे निपटने के उपाय खोजने के लिए हमारे पास वक्त है, न इच्छाशक्ति।
वायु प्रदूषण से उत्पन्न गंभीर हालात पर अगर सर्वोच्च अदालत सक्रियता और कड़ा रुख नहीं दिखाती तो सरकारें शायद इतना भी नहीं करतीं और लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया जाता। फिर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट ‘एयर पॉल्यूशन एंड चाइल्ड हेल्थ: प्रिसक्राइबिंग क्लीन एयर के हवाले से बताया गया है कि वर्ष 2016 में भारत में पांच वर्ष से कम वायु प्रदूषण के कारण मरने वाले बच्चों की संख्या एक लाख के करीब थी। यह संख्या विश्व में पांच वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों की वायु प्रदूषण से होने वाली मृत्यु का पांचवा भाग है। इन मौतों में पांच वर्ष से कम आयु की बच्चियों का प्रतिशत भारत में 55 प्रतिशत के लगभग है व पांच से 14 वर्ष की आयु के बीच यह प्रतिशत बढ़कर 57 प्रतिशत के लगभग हो जाता है। (वर्ष 2016 में 5 से 14 आयु वर्ग के बच्चों की वायु प्रदूषण से होने वाली मौतें 7000 हैं, जिसमें से बच्चियों की संख्या 4000 के लगभग हैं)। यदि हम भारत की तुलना इसके अन्य पड़ोसी देशों से करें तो बांग्लादेश में 11,487, भूटान में 37, चीन में 11,377, म्यांमार में 5,543, नेपाल में 2,086, पाकिस्तान में 38,252 एवं श्रीलंका में 2016 में 5 वर्ष से कम मरने वाले शिशुओं की संख्या 94 है। प्रति लाख बच्चों पर यह आंकड़ा 96.6 बच्चियां व 74.3 बच्चे हैं, जो 5 वर्ष से कम आयु वर्ग में आते हैं। वहीं 5 से 14 आयु वर्ग में प्रति लाख पर 3.4 बच्चियां व 2.3 बच्चे हैं। भारत में बढ़ते प्रदूषण का स्तर एक चिंता का विषय है परंतु आज इतने सारे संसाधनों होने के बावजूद भी हम प्रदूषण के स्तर को कम कर पाने में नाकाम ही साबित हुए हैं। भारत, जो कि एक विश्व शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, आज अफ्रीका के निम्न आय वर्ग के देशों के साथ, प्रदूषण नियंत्रण में नाकाम होने पर खड़ा है। हमारे देश के करीब एक दर्जन से अधिक शहर विश्व के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों की सूची में गिने जाते हैं। उत्तर-भारत का ‘कानपुरÓ शहर वर्ष 2016 में विश्व का सबसे प्रदूषित शहर घोषित हुआ है।
देश में नदियों के प्रदूषण स्तर में कोई सुधार नहीं हुए हैं। हालांकि नदियों की सफाई हेतु कार्य योजना व कार्यक्रम बनाए गए हैं परंतु काम होता नहीं दिख रहा है। जहां हम पहले थे आज भी वहीं खड़े हैं। पर्यावरण से जुड़े न्यायिक मामले देखने हेतु हमारे देश में एक राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण भी कार्य रहा है। साथ ही कई कार्यक्रम समय-समय पर सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे हैं। इसके बावजूद भी पर्यावरण के प्रति चेतना जगाने में समाज असफल रहा है।

मध्यप्रदेश के बेहतर विकास का भविष्य दृष्टा
माधवेन्द्र सिंह
मध्यप्रदेश सौभाग्यशाली है कि उसे मुख्यमंत्री के रूप में कमल नाथ जैसा वैश्विक सोच का भविष्य दृष्टा व्यक्तित्व मिला है। यह अलंकरण उन लोगों को अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है, जो कमल नाथ जी के व्यक्तित्व और कृतित्व से परिचित नहीं है। जिन्होंने केन्द्र में विभिन्न मंत्रालयों में मंत्री के रूप में और छिंदवाड़ा में बतौर सांसद उनके द्वारा करवाये गए क्षेत्र के चहुँमुखी विकास को न केवल देखा है बल्कि नजदीक से समझा है वे इस ‍विशेषण से सौ फीसदी सहमत होंगे।
कमल नाथ जी को जब भी जहाँ भी जो जिम्मेदारी मिली है उन्होंने उस क्षेत्र में बुनियादी बदलाव किए भविष्य की जरूरतों को देखकर निर्णय लिए, नीति बनाई और उसे जमीनी हकीकत में तब्दील किया। उन्होंने बहुत पहले यह समझ लिया था कि युवाओं को अगर रोजगार उपलब्ध करवाना हैं, तो शिक्षा के साथ कौशल विकास बहुत जरूरी है। जब वे रोजगार की बात करते है तो उनके मस्तिष्क में इंजीनियर, डॉक्टर या स्नातक-स्नातकोत्तर शिक्षा पाए लोगों की चिंता नहीं होती है बल्कि वे उस बेरोजगार के लिए भी सोच रखते है जो पाँचवीं, आठवीं पास है। उनका छिंदवाड़ा मॉडल का रोजगार क्षेत्र इसी सोच के अनुरूप बना है। उन्होंने शिक्षित लोगों के साथ अशिक्षित लोगों को रोजगार मिले इसके लिए ऐसी संरचना तैयार की कि लोग अपने कौशल विकास से सम्मानित रोजगार प्राप्त करने में सफल हुए। राजनीति में इस तरह की दृष्टि और उसे दिशा देने वाले नेता कमतर ही है।
बेहतर भविष्य की उनकी सोच हर क्षेत्र में इतनी गहरी है कि वह सतही परिवर्तन नहीं करती बल्कि वह मूल में जाकर जड़ों को मजबूत बनाती है। किसानों की ऋण माफी को वो कृषि क्षेत्र की हालात में सुधार लाने का समाधान नहीं मानते। वे इसे एक ऐसी राहत मानते हैं, जो किसानों को आगे बढ़ने के लिए या तनाव मुक्त होने में सहायक होती है। कृषि क्षेत्र को उन्नत बनाने के लिए उनकी स्पष्ट मान्यता है कि जब तक हम किसानों के बढ़ते हुए उत्पादन का उपयोग उनकी आय दोगुना करने में नहीं करेंगे तब तक किसानों के चेहरे पर मुस्कुराहट लाना असंभव है। जब वे मुख्यमंत्री बने और दो घण्टे के अंदर किसानों की ऋण माफी का निर्णय लिया तो वे इस बात के लिए अपनी पीठ नहीं थपथपाते कि उन्होंने 20 लाख किसानों का कर्ज माफ कर दिया और आने वाले दिनों 18 लाख किसानों का कर्ज और माफ करेंगे। कर्ज माफी के साथ ही उनकी खेती-किसानी को आय से जोड़ने की चिंता शुरू हो जाती है। वे खाद्य प्र-संस्करण इकाइयों की बात करते है। सोच है तो परिणाम मिलेंगे ही। आज प्रदेश में खाद्य प्र-संस्करण इकाईयां स्थापित हो रही हैं, कई स्थानों पर स्थापित हो गई हैं। इसके जरिए वे किसानों के उत्पादन से उनकी आय कैसे दोगुना हो, इस बारे में सोचना शुरू कर देते है। उन्होंने किसानों को कर्ज माफी, बिजली एवं अन्य सुविधाएँ देने के बुनियादी निर्णय लिए लेकिन उसके बाद उनके लिए एक समग्र योजना बनाना प्रारंभ कर दिया, जो आने वाले दिनों में किसानों की खुशहाली की दिशा में एक बड़ा क्रांतिकारी बदलाव का आधार बनेगी।
समाज के कमजोर तबके के प्रति उनकी संवेदनशील सोच का ही नतीजा था कि उन्होंने आते ही बुजुर्गों की पेंशन राशि को बढ़ाकर 300 से 600 रुपए किया जिसे वे 1000 रुपए तक बढ़ाएंगे। गरीब परिवार की कन्याओं के विवाह के लिये दिए जाने वाले अनुदान राशि को 28 हजार से बढ़ाकर 51 हजार रुपए कर दिया। यह मध्यप्रदेश के इतिहास में पहली बार है और अगर हम यह कहे कि ऐसा भी पहली बार हुआ जब बढ़ते हुए बिजली बिल को थामते हुए उन्होंने इंदिरा गृह ज्योति योजना के जरिए गरीब से लेकर मध्यम वर्ग तक को राहत पहुँचाई। एक मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने बिजली बिल के जो स्लेब निर्धारित किए, उससे लोगों की जेब को तो राहत मिली ही साथ ही ऊर्जा बचत के लिए भी उनका यह कदम आज के समय में उनकी भविष्य की बेहतर सोच का अनूठा उदाहरण है। आदिवासी समाज को साहूकारों के कर्ज से मुक्त करने का क्रांतिकारी निर्णय लिया, पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला लिया। ग्यारह माह में इतने बड़े फैसले और उन पर अमल भी शुरू हो गया। मुख्यमंत्री घोषणाएं नहीं करते हैं वे कहते हैं मैं काम करता हूँ और उन्होंने मध्यप्रदेश की बेहतर तस्वीर के लिए ऐतिहासिक बदलाव कर दिए।
विश्वास है तभी निवेश आएगा उनकी इस वन लाइनर सोच ने उनके 11 माह के शासनकाल में ‍प्रदेश में उद्योग और निवेश के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन की शुरूआत की है। कार्यभार सम्हालने के दो माह बाद ही उन्होंने मिंटो हॉल में मध्यप्रदेश में उद्योग, व्यापार, व्यवसाय से जुड़े लोगों की गोलमेज कॉन्फ्रेंस बुलवाई। कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य था प्रदेश में निवेश में आने वाली बाधाओं को जानना। यह जानना वे इसलिए जरूरी मानते हैं क्योंकि जब तक हम हमारे ही प्रदेश में उद्योग और व्यवसाय के क्षेत्र में काम कर रहे लोग अगर सरकार की उद्योग एवं निवेश नीति से असंतुष्ट है, तब हम नए निवेश की कल्पना कैंसे कर सकते हैं। वे कहते है कि यह हमारे ब्रांड एम्बेसडर हैं, अगर हमने इनकी समस्याओं का समाधान कर दिया तो ये ही लोग प्रदेश में नए निवेश की ब्रांडिंग करने में मददगार साबित होंगे। नीतियों को लेकर उनकी सोच ही अभिनव है। वे कहते है कि नीतियाँ वही सफल होती हैं, जो निवेश को या किसी अन्य को आकर्षित करती है उनकी मदद करती है। सिर्फ नीति बनाकर बैठ जाने से परिणाम हासिल नहीं होते। “मैग्नीफिसेंट मध्यप्रदेश” के आयोजन की सफलता इस बात का प्रतीक है कि उन्होंने अपने अल्प कार्यकाल में ही मध्यप्रदेश के प्रति उद्योग जगत और निवेशकों के विश्वास को प्राप्त किया। मुकेश अंबानी, आदि गोदरेज, इंडिया सीमेंट के श्रीनिवासन, रवि झुनझुनवाला से लेकर जितने उद्योगपति मैग्नीफिसेंट मध्यप्रदेश में शामिल हुए उन्होंने निवेश के क्षेत्र में मुख्यमंत्री की साहसिक सोच और दूरदृष्टि की सराहना की। आज के किसी राजनेता को यह खिताब मिलना दुर्लभता की श्रेणी में ही गिना जाएगा।
विरासत में मिले खाली खजाने और जर्जर अर्थ-व्यवस्था के बीच जो दायित्व कमल नाथ जी को मिला और उन्होंने अपने कुशल प्रबंधन के साथ जिस तरह सभी चुनौतियों का सामना किया उससे पता चलता है कि वे किस कद के नेता है। किसानों की कर्ज माफी आसान नहीं थी पर अपने इस वचन को उन्होंने जिस कौशल से पूरा किया, वह एक शोध का विषय है। वे उन नेताओं में शुमार नहीं है जो लोकप्रियता के लिए अर्नगल घोषणाएँ करते है। कांग्रेस का वचन-पत्र जब तैयार हो रहा था तो उन्होंने हर वचन को पूरा करने के लिए आने वाली चुनौतियों को समझा और उसके समाधान की भी तैयारी की। यही कारण है कि वे सरकार बनते ही मात्र 73 दिनों में 83 वचनों को पूरा करने जैसा बड़ा काम कर पाये।
त्वरित निर्णय, समय – सीमा, क्रियान्वयन, गुणवत्ता, परिणाम और समय प्रबंधन कमल नाथ जी के दैनंदिन काम का अहम हिस्सा है। इससे वे कोई भी समझौता नहीं करते है। वे जब विभागों की समीक्षा करते है तो उनकी विभागीय गतिविधियों के आकलन इन बिन्दुओं पर ही आधारित होते हैं। वे समस्या और उसके समाधान को जितनी शीघ्रता से समझते है, वह उनका दुर्लभ गुण है। वे योजनाओं की डिलेवरी सिस्टम पर जोर देते है। उन्होंने कहा कि योजनाएँ चाहे कितनी अच्छी हो लेकिन उसका क्रियान्वयन जमीन पर जरूरतमंदों को लाभान्वित नहीं कर रहा है तो वे सिर्फ हमारी सरकार की सजावट का ही हिस्सा है। वे इस सजावट को खत्म करके योजनाओं की क्रियान्वयन व्यवस्था को सुधारने के लिए निरंतर काम कर रहे हैं। वे हर काम की समय – सीमा का निर्धारण करते हैं। गुणवत्ता और परिणाम सुनिश्चित हो, इस पर उनकी पैनी निगाह रहती है। समय प्रबंधन के मामले में उनका कोई सानी नहीं है। अगर 11 बजे का समय दिया है तो कमल नाथ जी 11 बजने में पाँच मिनिट पहले पहुँच जाएँगे, लेकिन पाँच मिनिट बाद नहीं।
मुख्यमंत्री कमल नाथ की साफ नीयत और नीति, ईमानदार कोशिशों से मध्यप्रदेश में पिछले 10-11 माह में जन- उम्मीदें पूरी होने लगी हैं। ऊर्जावान सोच, बगैर शोरगुल, आत्म-प्रशंसा से दूर और सधे हुए कदमों के साथ उनकी पदचाप और उनके फैसलों की धमक, जन और तंत्र के बीच महसूस होने लगी है। पाँच साल बाद निश्चित ही मध्यप्रदेश की तस्वीर उज्जवल होगी और प्रदेशवासियों की तकदीर बेहतर होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

ब्रिक्स में भारत की धाक
सिद्धार्थ शंकर
ग्लोबल बिजनेस फोरम में अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक मंदी का जिक्र किया तो वहीं दुनिया में ब्रिक्स देशों के महत्व की भी चर्चा की। आतंकवाद का जिक्र करने के साथ ही पीएम मोदी ने आपसी संबंधों को मजबूती प्रदान करने के लिए सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया तो लंबे समय के लिए व्यावसायिक भागीदारी की तरफ इशारा भी कर दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्राजील की राजधानी ब्रासिलिया में आयोजित ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) सम्मेलन में शिरकत कर भारत की धाक जमा दी। ग्लोबल बिजनेस फोरम में अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक मंदी का जिक्र किया, तो वहीं दुनिया में ब्रिक्स देशों के महत्व की भी चर्चा की। आतंकवाद का जिक्र करने के साथ ही पीएम मोदी ने आपसी संबंधों को मजबूती प्रदान करने के लिए सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया तो व्यापार के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों को चिन्हित करने का सुझाव देकर लंबे समय के लिए व्यावसायिक भागीदारी की तरफ इशारा भी कर दिया। प्रधानमंत्री ने भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे ओपन अर्थव्यवस्था बताने के साथ बिजनेस फ्रेंडली एनवायरनमेंट का जिक्र करते हुए निवेशकों को भारत में निवेश का निमंत्रण भी दे दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह दौरा कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और सफल माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स सम्मेलन के इतर भी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मुलाकात की और संबंधों की पुरातनता के साथ ही महत्व की चर्चा कर द्विपक्षीय संबंधों को नया आयाम देने की प्रतिबद्धता दोहराई। पीएम मोदी ने अमेरिकी प्रायद्वीप के महत्वपूर्ण देश ब्राजील के राष्ट्रपति को जहां भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि आने का निमंत्रण दिया, वहीं भारत के पुराने मित्र रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी पीएम मोदी को अपने देश आने का न्योता दिया। पीएम मोदी ने रूसी राष्ट्रपति के साथ वार्ता में दोनों देशों के पुराने संबंधों का जिक्र किया। दोनों ही देशों ने स्पेशल और प्रिविलेज स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप को आगे बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की और इसे आगे बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की। इससे भारत और रूस के संबंधों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पड़ोसी देश चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बैठक में अपनी दोस्ती का जिक्र करते हुए व्यापार से जुड़े पहलुओं पर चर्चा की। दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच हुई वार्ता का लब्बोलुआब यह रहा कि सीमा पर शांति बनाए रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए दोनों देशों ने वर्षों पुराने सीमा विवाद के समाधान की दिशा में पहल करते हुए विशेष प्रतिनिधियों के बीच अगले दौर की वार्ता का ऐलान कर दिया।
बहरहाल, पीएम बनने के बाद पीएम मोदी ने छठी बार इस सम्मेलन में शिरकत की। यह भारत के लिए ब्रिक्स देशों के दूसरे चक्र की शुरुआत है। भारत के लिए यह संगठन काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह विकासशील देशों की उभरती हुई आवाज बन चुका है। ब्रिक्स देशों को विकसित देशों के आक्रामक संगठनों से तगड़ी चुनौती मिलती रहती है, इसके अलावा डब्लूटीओ से लेकर जलवायु परिवर्तन के मसले तक विकासशील देशों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में भारत का यह मानना है कि ब्रिक्स से ही विकासशील देशों के हितों की रक्षा हो सकती है। पिछले एक दशक में वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका बढ़ी है, ऐसे में भारत ब्रिक्स में भी लीडरशिप करना चाहता है। भारत ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर इस संगठन का आतंकवाद के प्रति रुख को सख्त बनाया है और इसकी वजह से आतंकवाद से निपटने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। आतंकवाद को ब्रिक्स देशों के शीर्ष एजेंडे में रखवाना वास्तव में भारत के लिए एक बड़ी सफलता है।

भारत के कालापानी-लिपुलेख पर नेपाल का दावा
अजित वर्मा
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के दो केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद जारी भारत के नए राजनीतिक नक्शे पर नेपाल ने आपत्ति जताई है। नेपाल ने दावा किया है कि उत्तराखंड के कालापानी और लिपुलेख उसके धारचूला जिले के हिस्से हैं। नेपाल ने कहा है कि संबंधित क्षेत्र को लेकर भारत से बात जारी है और ये मुद्दा अभी तक अनसुलझा है। वहीं भारत ने कहा है कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए विदेश सचिवों को जिम्मेदारी सौंपी गयी है। ऐसे में बातचीत के जरिये नेपाल से मतभेद को सुलझा लिया जाएगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता बताते हैं कि नए मानचित्र में भारत ने अपने ही हिस्से को दिखाया है। चूंकि पूर्ण राज्य जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बांट कर दो नए केंद्रशासित प्रदेश बनाए गए हैं। इसी के मद्देनजर नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया गया है। नए मानचित्र में भारत ने किसी नए भूभाग को अपने हिस्से में शामिल नहीं किया है। जहां तक नेपाल की आपत्तियों का सवाल है तो दोनों देश सीमा विवाद के मसले को सचिव स्तर की बातचीत में सुलझाने पर सहमत हैं। ऐसे में नेपाल की आपत्तियों को इसी बातचीत में सुलझा लिया जाएगा।
नेपाल के दावे को लेकर नेपाल सरकार के प्रवक्ता संचार और सूचना मंत्री गोकुल प्रसाद बास्कोटा ने कालापानी को नेपाल का अभिन्न अंग बताया है। संचार मंत्री ने कहा कि 58 वर्ष पहले नेपाल द्वारा कालापानी में जनगणना कराना ही इसका ऐतिहासिक प्रमाण है। उन्होंने संचार मंत्रालय द्वारा आयोजित किए गए नियमित पत्रकार सम्मेलन में कहा कि ’नेपाल और भारत के बीच जुड़े भू-भाग में से केवल दो प्रतिशत जगह पर ही सीमा विवाद है और इसका समाधान करना अभी बाकी है। हम राजनीतिक और कूटनीतिक पहल से प्रमाण के साथ इस विवाद का समाधान करेंगे। बास्कोटा ने नेपाल सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा भारत को सार्वजनिक राजनीतिक नक्शे पर अपनी धारणा स्पष्ट रूप से रख देने की बात भी कही है।

पाक की मति मारी गई…
सिद्धार्थ शंकर
अयोध्या मुद्दे पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पाकिस्तान ने यूनेस्को के मंच पर उठाकर अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया है। हालांकि, भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है, मगर इसकी कोई जरूरत नहीं थी। उसका तमाशा पूरी दुनिया देख रही है।
अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भारत के मुस्लिम समुदाय ने स्वीकार कर लिया। देश में भाई चारे का माहौल बना हुआ है। दोनों पक्षों ने जिस तरह की मिसाल पेश की, वह किसी भी देश के लिए नजीर है। दुनिया के कई देशों खासकर मुस्लिम देशों ने भी अयोध्या मुद्दे पर आए फैसले को भारत का अंदरूनी मानकर प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन पाकिस्तान इन सबसे अलग है। फैसला आने के दिन से पड़ोसी मुल्क में मातम पसरा है। वहां के लोगों की छोड़ो सरकार भी जाहिलों की तरह सोचने और करने लगी है। अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की चर्चा पाकिस्तान में खूब हो रही है। पाकिस्तानी मीडिया में भी इस फैसले को काफी तवज्जो मिली है। वहां की सेना से लेकर विदेश मंत्रालय तक की प्रतिक्रिया आ चुकी है। वहां के अखबार संपादकीय लिख रहे हैं कि भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में तोड़ी गई मस्जिद की जगह मंदिर बनाने की अनुमति दे दी है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस को अवैध बताया है लेकिन दूसरी तरफ मंदिर बनाने की अनुमति देकर अप्रत्यक्ष रूप से भीड़ की तोडफ़ोड़ का समर्थन भी किया है। शायद यह ज्यादा अच्छा होता कि कोर्ट किसी भी पक्ष की तरफदारी नहीं करता क्योंकि यह मुद्दा भारत में काफी संवेदनशील था और इसका संबंध सांप्रदायिक सौहार्द से भी है। कुछ ऐसी प्रतिक्रिया सरकार के स्तर पर भी आई थी। तब भारत ने पाकिस्तान की प्रतिक्रिया पर कड़ा ऐतराज जताया था और कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पाकिस्तान के बयान को हम अस्वीकार करते हैं। ये भारत का आंतरिक मामला है. यह कानून के शासन और सभी धर्मों, अवधारणाओं के लिए समान सम्मान से संबंधित है, जो उनका मामला नहीं है। विदेश मंत्रालय ने कहा था कि पाकिस्तान की समझ की कमी आश्चर्य की बात नहीं है। गौरतलब है कि अयोध्या का फैसला उस दिन आया था जब सिख श्रद्धालुओं के लिए करतारपुर कॉरिडोर खोला गया। पाकिस्तान को इस फैसले को सकारात्मक अंदाज में लेना चाहिए था, जो वह नहीं कर सका।
अब वह इससे भी एक कदम आगे निकल गया है। कश्मीर के मुद्दे पर दुनिया में अलग पडऩे के बाद भी पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया और यूनेस्को जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसने अयोध्या का मामला उठा दिया। पाकिस्तान के शिक्षा मंत्री शफाकत महमूद ने कहा था कि यह फैसला यूनेस्को धार्मिक स्वतंत्रता के मूल्यों के अनुरूप नहीं है। हालांकि, यूनेस्को के मंच पर उसकी दाल नहीं गली और भारत से खूब खरीखोटी सुनने को मिली। भारत ने कहा, पाक को हमारे अंदरूनी मामलों में टांग अड़ाने की मानसिक बीमारी है। भारत ने कहा कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से दुनिया परेशान है। अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी फैसला दिया है लेकिन पाक जिस तरह की घृणास्पद बातें फैला रहा है, वो निंदनीय है और उन्हें बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। निश्चित रूप से पाक के इस कदम के पीछे उसकी बौखलाहट है। वह कैसे भी भारत को घेरना चाह रहा है। इसीलिए कभी कश्मीर तो कभी अयोध्या जैसे मामलों को वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठा रहा है। दरअसल, पाक के साथ इस समय एक-दो को छोड़ कोई भी देश नहीं है। यही बात उसे अखर रही है। पाकिस्तान में इन दिनों ऐसे कई अंदरूनी मसले हैं, मगर वहां की सरकार उन पर ध्यान नहीं दे रही है। महंगाई आसमान छू रही है, उसे काबू में करने के प्रति इमरान सरकार के पास न कोई नीति है और न ही नीयत। संभव यह भी है कि पाकिस्तान एक दिन अपने देश की बढ़ती महंगाई के लिए भारत को ही जिम्मेदार ठहरा दे।

महाराष्ट्र; शर्मसार प्रजातंत्र
ओमप्रकाश मेहता
राष्ट्र के अंदर समाहित महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों के बाद पिछले एक पखवाड़े से ’पदलिप्सा‘ का नाटक खेला जा रहा है, और यहां राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद भी इस नाटक का पटाक्षेप नजर नहीं आ रहा है, अभी भी यहां के राजनेता अपनी गोटी फिट करने में व्यस्त है। ……और यदि सत्ता के अमृत के प्याले से चूकी भाजपा और उसके प्रधानमंत्री जी विरोधियों को प्रतिशोध का ”डोज़“ देने से बाज नहीं आए तो छ: महीनें बाद महाराष्ट्र में पुन: चुनाव के माध्यम से जनता की खून पसीने की कमाई का हजारों करोड़ रूपया फिर जाया होगा और देश की जनता को मूकदर्शक बनकर यह ’दुखांत नाटक‘ देखने को मजबूर होना पड़ेगा। आज की राजनीति का यह सबसे अहम्् दु:खद नाटक होगा, जिसने प्रजातंत्र को निर्वस्त्र होने को मजबूर कर दिया है। यदि देश के अन्य प्रान्तों में भी यही नाटक खेला जाने लगा तो देश के प्रजातंत्र की आयु अत्यंत अल्प हो जाएगी और फिर प्रजातंत्र के लिए आंसू बहाने के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं रहेगा।
देश की मोदी सरकार ने सामाजिक क्षेत्र से चाहे ’तीन तलाक‘ का कलंक मिटा दिया हो, किंतु राजनीतिक क्षेत्र में यह प्रथा जोर-शोर से जारी है और अब तो स्वयं भाजपा को ही इससे अभिशप्त होने को मजबूर होना पड़ रहा है। राष्ट्र के प्रमुख राज्य महाराष्ट्र में पिछले महीने राज्य विधानसभा के चुनावा सम्पन्न हुए, ये चुनाव भाजपा और शिवसेना ने एकजुट होकर लड़े थे और इस गठबंधन ने सत्ता के लिए जरूरी बहुमत का आंकड़ा भी हासिल कर लिया था, इसलिए परिणाम घोषित होने पर किसी की भी यह कल्पना नहीं थी कि महाराष्ट्र में किसी राजनीतिक नाटक के प्रहसन लिखे जा रहे हैं, बल्कि आशंका हरियाणा को लेकर थी जहां सत्तारूढ़ भाजपा बहुमत हासिल करने में कुछ पीछे रह गई थी किंतु वहां के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने जोड़तोड़ करके पूर्व कांग्रेस नेता के प्रपौत्र से राजनीतिक गठबंधन किया और सरकार बना ली, जबकि महाराष्ट्र में जहां सरकार आसानी से बनती नजर आ रही, वहां भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने चुनाव पूर्व वादे का रायता फैला दिया और स्थिति गठबंधन तोड़ने केन्द्र से अपने मंत्री का इस्तीफा दिलवाने और राजनीतिक गाली-गलौच तक पहुंच गई। शिवसेना की दलील थी कि भाजपाध्यक्ष अमित शाह के सामने चुनाव पूर्व सत्ता प्राप्ति पर पचास-पचास प्रतिशत भागीदारी की बात हुई थी, जिसमें मुख्यमंत्री का पद भी शामिल था, जबकि भाजपा पहले ही दैवेन्द्र फणनवीस को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा कर चुकी थी, इस दलीय विग्रह के बाद ’तीन तलाक‘ लागू हो गया और भाजपा अल्पमत में आ गई और अंतत: उन्होंने राज्यपाल को सरकार नहीं बनाने का टका सा जवाब दे दिया। इसके बाद शिवसेना ने कांगेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस की ओर रूख किया, किंतु दोनों दल एक सप्ताह तक फैसला नहीं कर पाए कि उन्हें शिवसेना के साथ सरकार बनाना है या नहीं, इधर राज्यपाल ने भाजपा के बाद शिवसेना से पूछा सरकार बना सकने के बारें में किंतु कांग्रेस व एनसीपी की ढीली नीति के कारण राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन की विधिवत घोषणा कर दी गई। किंतु इस नाटक का दु:खद अंत हो जाने के बाद शिवसेना व दोनों कांग्रेस ’मुर्दालोकतंत्र‘ में जान फूंकने के प्रयास जारी रखे हुए है और आश्वस्त है कि अगले छ: महीनें में तो वे बहुमत जुटा ही लेंगे।
यद्यपि शिवसेना का आरोप है कि राज्यपाल ने उन्हें समर्थन जुटाने का पर्याप्त समय नहीं दिया और कांग्रेस का कहना है कि राज्यपाल ने उन्हें अपना बहुमत सिद्ध कर सरकार बनाने का मौका ही नहीं दिया, लेकिन ये दल यही अपने आरोप सही भी मानते है तो यह क्यों भूलते है कि आज देश में मोदी के राज्यपाल है, और उनका नियंत्रण अघोषित रूप से केन्द्रीय गृहमंत्री के हाथों में है, जो अभी भी भाजपा के अध्यक्ष है।
इस प्रकार कुल मिलाकर इस नाटक को ’दु:खांत‘ बनाने में किसी एक दल विशेष की नहीं बल्कि महाराष्ट्र के सभी राजनीतिक दलों व कथित रूप से महामहिम राज्यपाल की भूमिकाएँ अहम्् रही। अब तो यही उम्मीद करें कि इसका मंचन किसी अन्य राज्य में न हों?
इस प्रकार कुल मिलाकर विश्व के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में कुछ ऐसे प्रयासों का शुभारंभ हो गया है, जिससे यहां के लोकतंत्र को केवल क्षति ही नहीं बल्कि खात्में तक की आशंका पैदा हो सकती है? जिस देश में ’कुर्सी‘ सबसे अहम्् मान ली जाए और देश व देशवासियों को गौण मान लिया जाए, वहां के लोकतंत्र की दुर्गति की कल्पना भी संभव नहीं है, इसलिए इस देश में तो अब प्रजातंत्र या लोकतंत्र का भगवान ही मालिक रहेगा। भगवान इस नाटक के पात्रों को सद्बुद्धि प्रदान करें।

मंत्री तोमर का नालों में उतर कर सफाई करना क्यों नींद उड़ा रहा है…!
नईम कुरेशी
उत्तर भारत में ग्वालियर शहर में कोलकत्ता के साथ् 1908 में बिजली और इससे भी काफी पहले शुद्ध पेय जल सिंधिया शासक ले आये थे। यहां कि नगर पालिका के तो स्वयं अध्यक्ष भी रहे थे। 1905 में दौलतगंज क्षेत्र लश्कर के बड़े सेठ को नगर पालिका के पार्षद भी थे। उन्होंने अपने दरवाजे पर एक बिना इजाजत चबूतरा बना लिया। तब के अध्यक्ष ने ये चबूतरा हटवाकर पार्षद पर 5 रुपये का जुर्माना भी लगा दिया था। इसके निर्माण में इसे भव्य बनाने में सिंधिया राजवंश के काम की सब तरफ तारीफें भी देखी सुनी जाती हैं।
आज ग्वालियर राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की ऊँचाई पर है। यहां का पर्यटन, स्मारक व संगीत इसे अपने आप में खास बनाये हुए है। उस्ताद अमजद अलि खाॅन साहब जैसे सरोद वादक व मीता पंडित के गायन को देश दुनिया में काफी नाम मिलता रहा है। यहां के ग्वालियर फोर्ट पर 1526 में मुगल बादशाह बाबर ने आकर 7 दिन तक ठहर कर भी यहां का विस्तार से वर्णन अपने बाबरनामे में 4 पेजों में कर इसके महत्व व यहां निर्माण कार्यों, वास्तुकला को भरपूर सराहा था। जिसे सिंधिया वंश ने 18-19 सदी में और आगे बढ़ाया पर आज पिछले 40 सालों में शहर का विकास काफी धीमा पड़ गया है। साफ सफाई भी गड़बड़ा चुकी है। यहां के नुमाइन्दों व नौकरशाहों में शहर की सफाई सड़कों के सुचारु निर्माण कर उन्हें ठीक ठाक रखने व पेयजल की समस्याओं पर पिछले 30 सालों में 3 से 4 हजार करोड़ों के घोटाले तो अमृत योजना के नाम पर किये गये न जांचें हुईं और न कोई दंडित हुआ। सियासतदां इन मामलों में कुछ ज्यादा दोषी लगते हैं। एक स्वर्ण रेखा नदी के 10 किलोमीटर तक के इलाके को बर्बाद कर उस पर सीमेंट, कांक्रीट से पक्का करा दिया गया। 400 करोड़ रुपये बर्बाद हो गये। इस नदी के किनारे के 200 से भी ज्यादा कुएँ व बाबड़ियाँ जो ज्यादातर रियासतकाल की थीं सूख गये कोई एक लाख लोगों को जल संकट में भांजे साहब ने झौंक दिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री से लेकर इस अन्याय के खिलाफ ग्वालियर में उपविधायकगण ठगे से खड़े रह गये।
आज का शहर ग्वालियर लापरवाह नगर निगम अतिक्रमणों व गन्दगी की राजधानी बनी हुई है। एक से पांच दिनों तक सफाई कर्मचारी नहीं आते। उनमें भी सफाई वालों को लेकर उनके दरोगा निरीक्षकों की कमजोर निगरानी व कुछ मिलीभगत से शहर की साफ सफाई चरमराई हुई है। निगम के ज्यादातर क्षेत्राधिकार जेड.ओ. थानेदारों की तरह सिर्फ उगाई में लगे हैं। सरकारी जमीनों पर मार्केट बनवाकर लाखों करोड़ों डकार रहे हैं। नाला सफाई के बजट के 80 फीसद तक फंड आपस में बांट लिया जाता है पर कोई सुनने को तैयार नहीं है। निगम की सड़कें अधिकतर महीनों में टूटती दिखाई दे रही हैं। इन पर कभी कार्यवाही भी कुछ भी नहीं होती। किसी को जेल भेज दें तो 50 फीसद भ्रष्टाचार रुक जायेगा। मंत्री, विधायक, कलेक्टर, निगम आयुक्त सब के सब परेशान हैं। कुछ पार्षदों का आरोप है कि पिछले 2 सालों में ही नगर निगम अफसरों ने सफाई कम्पनी से मिलकर 500 करोड़ का घोटाला तक कर लिया है। यहां के 66 पार्षदों में से आधे से भी ज्यादा खुद ठेकेदारी करते देखे जाते हैं। जो सड़क सीमेंटों की वो बनवाते हैं वो कहीं-कहीं एक महीने में ही खराब हो जाती है। पिछले 10 सालों में उपनगर ग्वालियर से दूसरी बार विधायक प्रद्यम्न सिंह तोमर पहले सियासतदां देखे गये जो आम जनता की मुश्किल परेशानी के लिये फौरन सड़कों पर आ जाते रहे थे। अस्पतालों की दुर्दशा से लेकर नगर निगम की साफ सफाई, गन्दे नालों से पनप रही महामारी डेंगू को पूरे प्रदेश में अपनी राजधानी बना चुकी है। तोमर इस मामले में पिछले एक महीने से आक्रामक होकर सफाई करने, खुद गहरे नालों में सफाई करते दिखाई दे रहे हैं। जिससे एक तरफ नगर निगम प्रशासन बेचैन हैं वहीं दूसरी तरफ उनके राजनैतिक विरोधियों की भी नींदें उड़ी हुई हैं। कांग्रेसी तो कांग्रेसी संघ वालों में भी तोमर को हीरो बताया जा रहा है।
निगम में भ्रष्टाचार
ग्वालियर में गंदगी के लिये जहां निगम अमले की कमियां यहां होने वाले भ्रष्टाचार हैं वहीं सियासी दांव पेच व खुद जनता की उदासीनता व जागरुक न होना है पर सत्ता दल वालों में महापौरों की बेवजह आलोचना करना वहां ऐसे आयुक्तों को पदस्थ करा देना जो महापौरों की न सुनकर सिर्फ उनकी सुनते थे भी रहा है। ग्वालियर के समीक्षा गुप्ता भी अच्छी संवेदनशील महापौर रहीं और विवेक शेजवलकर भी लाजवाब व मिलनसार, मृदुभाषी के तौर पर जाने जाते हैं पर उन्हें उनकी ही पार्टी वालों ने विपक्ष से ज्यादा उन्हें परेशान कराया। साफ सफाई के मामले में इन्दौर को छोड़कर कहीं भी खासतौर से ग्वालियर में ईमानदारी से कोशिशें नहीं की जा रही हैं। यहां के ज्यादातर पार्षद जब खुद ठेकेदार बन बैठे हों तथा वो साफ सफाई को शहर का मुद्दा ही न मानें तो क्या बन पडेगा। अफसर तो मीटिंगे करेंगे, निरीक्षण पर निरीक्षण करेंगे, बैठकों पर बैठकें और अंत में रिजल्ट तो शून्य का शून्य ही रहने वाला है। 1978-80 तक डाॅ. भागीरथ प्रसाद साहब ने व 83-84 में अनिल जैन साहब ने काफी बेहतर निजाम चलाया। ग्वालियर नगर निगम का नगरों में स्थानीय सरकारें बनते ही निजाम बिगड़ गया। ऊपर से लूटखसोट की सियासत इस सब पर मंत्री तोमर की गांधीगिरी से कुछ प्रभाव जरूर पड़ने वाला है। अब तक कोई आम जनता के लिये नालों में क्यों नहीं उतरा ये बड़ा सवाल है।

ये नेता नहीं, कुर्सीदास हैं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारतीय राजनीति के घोर अधःपतन का घिनौना रुप किसी को देखना हो तो वह आजकल के महाराष्ट्र को देखे। जो लोग अपने आप को नेता कहते हैं, वे क्या हैं ? वे सिर्फ कुर्सीदास हैं। कुर्सी के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। शिव सेना-जैसी पार्टी कांग्रेस से हाथ मिलाकर सरकार बनाने के लिए उतावली हो गई है। बाल ठाकरे से लेकर आदित्य ठाकरे ने कांग्रेस की कब्र खोदने में कौन-कौन-सी कुल्हाड़ियां नहीं चलाई हैं, उस पर उन्होंने कितनी बार नहीं थूका है लेकिन अब उसी कांग्रेस के तलुवे चाटने को आज शिव सेना बेताब है। बालासाहब ठाकरे स्वर्ग में बैठे-बैठें अब क्या सोच रहे होंगे, अपने उत्तराधिकारियों के बारे में ? मुझे उनकी वह पुरानी भेंट-वार्ता अभी भी याद है, जिसमें उन्होंने साफ-साफ कहा था कि भाजपा और शिव सेना में से जिसे भी ज्यादा सीटें मिलेंगी, मुख्यमंत्री उसी पार्टी का बनेगा। इसमें विवाद करने की जरुरत ही नहीं है। अभी भाजपा को 105 और शिव सेना को उससे लगभग आधी (56) सीटें मिली हैं। फिर भी वह अड़ी हुई है, मुख्यमंत्री पद लेने के लिए। अब यदि वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (54) से गठबंधन कर लेती है तो भी उसकी सीटें सिर्फ 110 होंगी याने कांग्रेस (44) की खुशामद के बिना वह सरकार नहीं बना सकती। मैंने तीन दिन पहले लिखा था कि यदि शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस मिलकर सरकार बना लें तथा भाजपा बाहर बैठी रहे तो उक्त तीन पार्टियों का भट्ठा बैठे बिना नहीं रहेगा। कोई ईश्वरीय चमत्कार ही इस उटपटांग सरकार को पांच साल तक चला सकता है। उसके बाद जो भी चुनाव होंगे, उसमें महाराष्ट्र की जनता इस बेमेल खिचड़ी को उलट देगी। महाराष्ट्र ही नहीं, सारा देश यह नज्जारा देखकर चकित है। लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि ये हमारे नेता हैं कि गिरगिटान हैं। उनके कोई आदर्श, कोई सिद्धांत, उनकी कोई नीति, कोई परंपरा, कोई मर्यादा भी होती है या नहीं ? यह बात सिर्फ शिव सेना पर ही लागू नहीं होती। भाजपा ने इस चुनाव में क्या किया है ? दर्जनों कांग्रेसियों को रातोंरात भाजपा में ले लिया है। उनमें से कुछ जीते भी हैं। वे कुर्सी के चक्कर में इधर आ फंसे। अब वे क्या करेंगे ? वे दल-बदल करने की स्थिति में भी नहीं हैं। वे मन-बदल पहले ही कर चुके। महाराष्ट्र में शिव सेना, राकांपा और कांग्रेस की सरकार चाहे बन ही जाए लेकिन उसे पता है कि केंद्र में भाजपा की सरकार है। वह क्या उसे चलने देगी ? पता नहीं, ये तीनों पार्टियां क्या सोचकर सांठ-गांठ कर रही हैं?

ए डी एच डी : बीमारी को अनदेखा तो नहीं कर रहे आप?
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
जो जीव /शिशु जन्म लेता हैं यदि वह जन्मजात रोगग्रस्त होता हैं या जन्म के बाद बाह्य संक्रमन से ग्रसित होता हैं .शिशु या मानव में रोग के स्थान दो होते हैं पहला शरीर और दूसरा मन .दोनों का एक दूसरे पर प्रभाव पड़ता हैं .कभी कभी शिशु के क्रियाकलापों से हम बहुत प्रभावित होते हैं पर कभी कभी वे रोगजन्य होते हैं .इस पर ध्यान रखना आवश्यक हैं .
हम सभी अपने बच्चे की परवरिश में अपना सर्वोत्तम देना चाहते हैं। लेकिन कई बार स्थितियां ऐसी होती हैं कि हम अपने बच्चे की बीमारी को नहीं पहचान पाते हैं, खासतौर पर अगर बीमारी उसकी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी हो। ऐसी ही एक दिक्कत या मेडिकल लैंग्वेज में कहें तो डिसऑर्डर है ADHD (Attention Deficient Hyperactive Disorder)यह डिसऑर्डर बच्चे की लर्निंग और सोशल ग्रोथ में दिक्कतें खड़ी करता है और बच्चा अपनी योग्यता के अनुसार रिजल्ट नहीं दे पाता है।
बच्चे शरारती होते ही हैं
हम सभी जानते हैं बच्चे शरारती होते ही हैं। लेकिन शरारती बच्चों और एडीएचडी डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चों में फर्क पहचानना बहुत जरूरी है। इस बीमारी के लक्षण आमतौर पर बच्चे में 3 से 4 साल की उम्र में दिखने शुरू हो जाते हैं और 12 से 13 साल की उम्र तक बने रहते हैं और बच्चे की चीजें सीखने की क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। जबकि कुछ बच्चों में ये लक्षण 20-25 की उम्र तक भी बने रह सकते हैं।
इस डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चों को अटेंशन(ध्यान ) और कंसंट्रेशन(एकाग्रता) से जुड़ी समस्याएं होती हैं। इनके लिए किसी एक चीज पर ध्यान बनाए रखना या किसी बात को ध्यान से सुनना मुश्किल होता है। यही वजह होती है कि पालक और शिक्षक की बताई गई बातों को ये ध्यान से नहीं सुनते हैं या याद नहीं रख पाते हैं, क्योंकि इनका ब्रेन लगातार ऐक्टिव रहता है और इससे इनकी याददाश्त पर बुरा असर पड़ता है।
इस डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चे बार-बार वही गलतियां दोहराते हैं, जिन्हें लेकर उन्हें पहले भी कई बार डांट पड़ चुकी होती है और समझाया जा चुका होता है। ये बच्चे किसी भी काम को बमुश्किल पूरा कर पाते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि ये बहुत देर तक किसी काम में ध्यान नहीं लगा पाते और पहले काम को बीच में ही छोड़कर तुरंत दूसरे काम में लग जाते हैं और दिनभर उछलकूद मचाते हुए इसी तरह की ऐक्टिविटीज दोहराते रहते हैं।
ए डी एच डी डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चे अक्सर अपना सामान खोते रहते हैं। जैसे, स्कूल बैग, बुक्स और लंच बॉक्स जैसी डेली यूज की चीजें संभालना भी उनके लिए मुश्किल रहता है और इन्हें याद नहीं रहता कि इन्होंने अपना सामान कहां रखा है?
ए डी एच डी से पीड़ित बच्चे हर समय बेचैन से रहते हैं, हाई एनर्जी फील करते हैं और एक साथ कई काम करने की कोशिश करते हैं।
जिन बच्चों को एडीएचडी की शिकायत होती है, वे बहुत बातें करते हैं और बहुत जल्दी गुस्सा भी हो जाते हैं। ये बहुत अधिक उछलकूद करते हैं, दूसरों के काम में दिक्कतें पैदा करते हैं या दो लोगों को आपस में बात भी नहीं करने देते हैं। ऐसे बच्चों को शांत होकर खेलने या आराम करने में दिक्कत होती है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि नॉर्मल IQ होने के बावजूद ये शिक्षण में उतना अच्छा कार्य नहीं कर पाते, जितना अच्छा करने की क्षमता इनके अंदर होती है।
अगर इस तरह के लक्षण आप बच्चे में देखते हैं तो इनके समाधान के लिए आप अपने नजदीकी पेडियाट्रिशियनशिशु रोग विशेषज्ञ या मनोरोग चिकित्सक से जरूर मिलें। इसका इलाज संभव है और बिहेवियर थेरपी के साथ-साथ कुछ एक्सपर्ट आपको कुछ जरूरी मेडिसिन्स भी बच्चे के लिए दे सकते हैं।
बच्चे से जुड़ी इस समस्या को पहचानने में पैरंट्स के साथ ही स्कूल टीचर्स का बहुत बड़ा योगदान हो सकता है। बच्चे को लेकर शिक्षकों का फीडबैक बहुत महत्वपूर्ण होता है। ताकि उसकी क्रियाकलापों को सही तरीके से समझकर, उसे बेहतर तरीके से चिकित्सा किया जा सके। यह रोग भविष्य में बहुत दुखद परिणति लाकर खड़ा देता हैं .शिशु ,परिवार और अपने भविष्य के प्रति एक प्रकार से जिम्मेदारी बन जाता हैं।

गुरु नानक देव जी ने भारत को जागृत किया
कमलनाथ
गुरु नानक देव जी मानवता में विश्वास रखने वालों और नि:स्वार्थ भाव से मानवता की सेवा में समर्पित लोगों के लिए अनन्य प्रेरणा-स्रोत रहे हैं। हम इस महान संत की 550 वीं जयंती मनाते हुए आध्यात्मिक रूप से स्वयं को धन्य समझते हैं।
नानक शाह फकीर जी की शिक्षाएं आज और भी ज्यादा प्रासंगिक हो गई हैं क्योंकि मनुष्य स्वरचित दुखों का सामना कर रहा है। सामाजिक, सांस्कृतिक एकता की भावना को खतरों का सामना करना पड़ रहा है और मानवीय मूल्यों में मनुष्य का विश्वास बुरी तरह डगमगा गया है। वर्षों पहले गुरुनानक देव जी ने इस तरह की स्थितियों की चेतावनी दी थी और सुधारवादी कदम भी सुझाए थे।
भारत के गौरवान्वित नागरिकों के रूप में हम गुरु नानक देव जी को अपने मार्गदर्शक और दार्शनिक के रूप में पाकर खुद को भाग्यशाली मानते हैं। आज, जब दुनिया में सांस्कृतिक विविधता के लिए नापाक ताकतों और कट्टरपंथी सोच ने खतरे पैदा किये है, हम अपने मार्गदर्शक के रूप में गुरु नानक देव जी की बानी पाकर धन्य हैं। वे सिर्फ सिख समुदाय के गुरु नहीं हैं। वे मानवता के महान आध्यात्मिक शिक्षक हैं क्योंकि वे मन और हृदय के विकारों से मुक्ति पर जोर देते हैं।
गुरु नानक देव जी सामाजिक-धार्मिक और सांस्कृतिक सद्भाव के प्रतीक हैं। गुरु नानक देव जी और भाई मरदाना का साथ एक अनूठा उदाहरण है। यह सांस्कृतिक एकता को रेखांकित करता है। दो महान पुण्यात्माएँ परस्पर आध्यात्मिक गहराई से एकाकार थी। भाई मरदाना गुरुजी से 10 साल बड़े थे और अपने अंतिम समय तक उनके साथ रहे। उन्होंने निरंकार की महिमा का गायन करते हुए दो दशकों तक एक साथ आध्यात्मिक यात्रा की। गुरुनानक देव जी गाते थे और भाई मरदाना उनके साथ रबाब पर संगत करते थे। वे विलक्षण रबाब वादक थे। यहाँ तक ​​कि उन्होंने इसे छह-तार वाला यंत्र बनाकर इसमें सुधार किया। उनका जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। संगीत का उनका ज्ञान श्री गुरु ग्रंथ साहिब में स्पष्ट झलकता है। उसे विभिन्न रागों में निबद्ध किया गया है। भाई मरदाना का उल्लेख श्री गुरु ग्रंथ साहिब में भी है। भाई गुरुदास जी ने लिखा है –
‘इक बाबा अकाल रूप दूजा रबाबी मरदाना।’
दुनिया को यह जानने की जरूरत है कि – ‘आदि सच, जुगादि सच, है भी सच, नानक होसी भी सच।’ इसका सीधा सा अर्थ यह है कि ईश्वर एक परम सत्य, सर्वव्यापी है। सिवाय उसके कुछ भी वास्तविक नहीं है । वह सर्वकालिक है। अनन्त था अनन्त रहेगा।
ज्ञान के ऐसे शब्दों से गुरु नानक देव जी ने भारत के लोगों को जागृत किया। उर्दू के दार्शनिक कवि अल्लामा इक़बाल ने कहा है –
‘फिर उठी आखिर सदा तौहीद की पंजाब से,
हिंद को एक मर्द-ए-कामिल ने जगाया ख्वाब से’
(एक बार फिर पंजाब से एक दिव्य आवाज उठी जिसने उद्घोष किया कि ईश्वर एक है। एक सिद्ध पुरुष गुरु नानक देव जी ने भारत को जगाया।)
गुरु नानक देव जी और भाई मरदाना ने कीर्तन की परंपरा शुरू की, जो आध्यात्मिक जागृति का माध्यम साबित हुई है। समानता के विचार को प्रदर्शित करने के लिए, उन्होंने लंगर के आयोजन की परंपरा शुरू की। वर्षों बाद हम समझ पाए हैं कि यह एक क्रांतिकारी धार्मिक सुधारवादी कदम था।
गुरु नानक देव जी ने भारत को आध्यात्मिक भव्यता दी। उन्होंने कहा कि आंतरिक जागृति ही मूल्यवान वस्तु है। उन्होंने घोषणा की कि सभी समान हैं और सभी दिव्य ऊर्जा से भरपूर है। अपनी आध्यात्मिक यात्राओं के माध्यम से गुरु नानक देव जी ने भारत को जागृत किया और इसकी महिमा को ऊँचाइयाँ दी।
गुरु नानक देव जी ने जो उपदेश दिया उसका पालन किया। उन्होंने अपने बोले प्रत्येक शब्द को आत्मसात किया और सामाजिक सुधार लाए। मानवता की भलाई के लिए हमारे पास उनके दर्शन की सबसे अच्छी सीख हैं। उन्होंने कहा- हमेशा सच्चाई के पक्ष में रहें और मानवता की सेवा के लिए तैयार रहें। हमेशा पाँच बुराइयों को दूर करें- काम, क्रोध, लोभ, मोह ,अहंकार। गुरु ज्ञान का सच्चा स्रोत होते हैं। गुरु पर विश्वास रखें।
आइए हम अपने दैनिक जीवन में गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं, वैश्विक भाईचारे व सांस्कृतिक अखंडता को मजबूत करने के लिए सदैव तैयार रहें।
(ब्लॉगर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं)

भाजपा के सामने अब चुनौती
सिद्वार्थशंकर
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण एक लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का एक मुख्य मुद्दा रहा है। आज यह पार्टी जो कुछ भी है, इसी मुद्दे की वजह से ही है। जहां एक तरफ सुप्रीम कोर्ट का फैसला भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों को कुछ समय तक प्रसन्नता देगा, वहीं पार्टी के सामने अब चुनौती होगी अपनी आगे की यात्रा के लिए नया एजेंडा तय करने की। यह मुद्दा लंबे समय तक लंबित रहा था, जिसने पार्टी को अपना आधार बनाने और समर्थकों को संगठित रखने में पार्टी की खासी मदद की, लेकिन अब यह मील का पत्थर पार होते ही सब कुछ पीछे छूट जाएगा, तब यह सोचना पड़ेगा कि इसके आगे क्या? यह भी सच है कि 2014 में भाजपा विकास के वादे के साथ सत्ता में आई थी। हमें यह नहीं पता कि 2024 के अगले आम चुनाव तक इसका कामकाज कैसा रहेगा।
पार्टी की जरूरत अब यह है कि वह अब किसी ऐसे बड़े मुद्दे को पहचाने और अपनाए, जो उसे सीधे लोगों से जोड़ता हो। जरूरी नहीं है कि पार्टी का नया एजेंडा किसी आस्था या किसी तरह धर्म से जुड़ा हुआ ही हो। मुद्दा, दरअसल ऐसा होना चाहिए जो लोगों को यह संदेश देने में कामयाब रहे कि पार्टी अपने मतदाताओं और समर्थकों का वास्तव में पूरा खयाल रखती है। यह मुद्दा विकास से जुड़ा हुआ भी हो सकता है। फिलहाल यह घोषणा कठिन है कि लोग 2024 तक किन मुद्दों को पसंद करेंगे। सुप्रीम कोर्ट के शनिवार के फैसले पर कुछ लोग अपना अति-उत्साह प्रदर्शित करने के लिए बढ़-चढ़कर आगे आ सकते हैं। ये ऐसे लोग हो सकते हैं, जो यह चाहेंगे कि भावनाएं भड़कें। अगर ऐसा हुआ, तो इस समय सरकार पर रोजगार के नए अवसर तैयार करने का जो दबाव बन रहा है, वह कुछ समय के लिए हल्का पड़ सकता है।
सर्वोच्च अदालत को जो फैसला आया है, उसमें केंद्र सरकार की अपनी कोई भूमिका नहीं है, लेकिन इस फैसले ने केंद्र सरकार को कुछ राहत तो दी ही है। खासकर आर्थिक मसलों पर सरकार के ऊपर जो दबाव बना था, वह इससे कुछ कम तो हुआ ही है, लेकिन यह एक अलग मसला है। हमें जो फैसला मिला है, वह सर्वोच्च न्यायालय का फैसला है, जिसने दशकों पुरानी एक समस्या को समाधान तक पहुंचाने की कोशिश की है। किसी भी तरह से इसके जरिये विभिन्न धर्मों के धर्मावलंबियों के बीच तनाव फैलाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। मोदी सरकार ने दूसरे कार्यकाल की छह महीने की छोटी अवधि में दशकों पुराने तीन मुद्दों (अनुच्छेद 370, राम मंदिर और समान नागरिक संहिता) में से दो मुद्दों का हल निकाल लिया। अनुच्छेद 370 निरस्त करने के बाद शुक्रवार को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की राह प्रशस्त हुई है। इससे पहले मोदी सरकार ने तीन तलाक को दंडनीय अपराध बनाया। हालांकि भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति की झोली में अब सिर्फ समान नागरिक संहिता का मुद्दा नहीं बचा है। इससे पहले सरकार धर्मांतरण विरोधी कानून, नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय जनसंख्या नीति को अमलीजामा पहनाने की तैयारी में है। दरअसल वर्तमान स्थिति भाजपा के हिंदुत्व की राजनीति के अनुकूल है।
लोकसभा में जहां पार्टी और राजग को प्रचंड बहुमत हासिल है, वहीं राज्यसभा में भी राजग धीरे धीरे बहुमत की ओर बढ़ रहा है। बीती सदी के नब्बे के दशक में हिंदुत्व की राजनीति का मुखर विरोध करने वाले कई विपक्षी दल नरम हिंदुत्व की राह पर हैं। इसी के परिणामस्वरूप उच्च सदन में बहुमत न होने के बावजूद सरकार अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और इससे पहले तीन तलाक को दंडनीय अपराध बनाने वाले बिल को पारित करा पाई। राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होने के बाद हिंदुत्व की राजनीति की गाड़ी की रफ्तार धीमी नहीं होगी। सरकार के पास इस राजनीति की गाड़ी को रफ्तार देने के लिए पर्याप्त मुद्दे मौजूद हैं। मसलन सरकार की रणनीति तीसरे हफ्ते से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में धर्मांतरण विरोधी बिल के साथ नागरिकता संशोधन बिल पारित कराने की तैयारी में है। इसके बाद सरकार के एजेंडे में नई जनसंख्या नीति तैयार करना है। अंत में सरकार देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की ओर कदम बढ़ाएगी।
खासतौर पर समान नागरिक संहिता लागू करने में केंद्र सरकार के समक्ष कोई अड़चन नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में जज रहते अपने एक फैसले में जस्टिस विक्रमजीत सिंह सहित एक अन्य जज ने समान नागरिक संहिता की वकालत की थी। हिंदूवादी संगठनों के एजेंडे में अयोध्या में राम मंदिर के साथ मथुर और काशी में भी मंदिर निर्माण की बात थी। हालांकि 1991 में संसद ने एक बिल को मंजूरी दी थी जिसमें 1947 के बाद धार्मिक स्थलों की यथास्थिति बरकरार रखने की बात कही गई है। इसमें तब अयोध्या को शामिल नहीं किया गया था। फिर सरकार ने ट्रस्ट गठन को लेकर भी एजेंडा साफ कर दिया है। सरकार इस मामले में जल्दबाजी के मूड में नहीं है। सरकार पहले कमेटी बनाएगी और कानूनी पहलुओं पर विचार करेगी। मतलब साफ है मंदिर बनने से पहले इस मुद्दे को पूरी तरह भुना लेना। वैसे सरकार के इस फैसले को कुछ लोग प्रशासनिक नजरिए से भी देख रहे हैं। शनिवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही विहिप ने ट्रस्ट में भागीदारी का दावा ठोक दिया है।
उधर, अखिल भारतीय संत समिति ने कहा है कि राम जन्मभूमि न्यास के पास करोड़ों हिंदुओं की तरफ से इकट्ठा हुई शिला व धन है। लिहाजा ट्रस्ट पहले इन संसाधनों का इस्तेमाल कर उसकी गरिमा को बरकरार रखे। निर्मोही अखाड़ा भी दावा पेश करने की तैयारी है। उससे सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में निर्मोही अखाड़ा से कहा है कि वह ट्रस्ट का हिस्सा बनने के लिए केंद्र सरकार के पास जा सकता है। इस ट्रस्ट के लिए मोदी सरकार को कई कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं पर फैसला करना होगा। साथ ही इसके कई पहलू भी हैं, जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ 2.77 एकड़ जमीन के मसले पर फैसला दिया है। बाकी बचे 64.23 एकड़ जमीन का क्या होगा इसका फैसला भी ट्रस्ट अपने हाथों में ले सकता है।
शेष जमीन को केंद्र सरकार ने 1993 में अधिगृहीत कर लिया था। इसमें 43 एकड़ जमीन विहिप के पास थी, जिसका उसने मुआवजा नहीं लिया है। इस आधार पर विहिप ट्रस्ट में शामिल होने का दावा कर सकता है। इसके अलावा करीब 20 एकड़ जमीन श्री अरविंद आश्रम समेत कई संगठनों की थी। इन्होंने केंद्र से इसका मुआवजा ले लिया था। यह मसला भी ट्रस्ट की जिम्मेदारी बनेगा। उम्मीद है कि मुआवजा लेने के बावजूद यह संगठन जमीन मंदिर के नाम दान कर देंगे। वहीं सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय के बाद अब राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। लेकिन भव्य राम मंदिर के निर्माण में अभी 5 साल का समय और लगेगा। इस फैसले का लंबे समय से इंतजार कर रहे विश्व हिंदू परिषद ने मंदिर का डिजाइन पहले से ही तैयार किया हुआ है।
राम मंदिर निर्माण की कार्यशाला से जुड़े एक पर्यवेक्षक के मुताबिक, भव्य राम मंदिर के निर्माण में अभी कम से कम 5 साल का समय और लगेगा और इस निर्माण कार्य के लिए 250 विशेषज्ञ शिल्पकारों की जरूरत होगी, जो बिना रुके व बिना थके मंदिर का निर्माण कर सकें। जो भी हो अभी तो भाजपा फायदे में है और मंदिर फैसले का पूरा श्रेय मिलने की आस भी है। लिहाजा भाजपा का हिंदुत्व मुद्दा अभी खत्म नहीं हुआ है, बल्कि यह शुरुआत है।

अपनो के निशाने पर गहलोत सरकार
रमेश सर्राफ धमोरा
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इन दिनों अपनी ही कांग्रेस पार्टी के नेताओं के निशाने पर आ रहे हैं। कुछ दिनों पहले गहलोत सरकार ने प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव में हाइब्रिड फार्मूला लागू किया था जिसको लेकर प्रदेश भर में बवाल मचा था। राजस्थान कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष व राजस्थान सरकार में उप मुख्यमंत्री सचिन पायलेट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के उस फार्मूले का डटकर विरोध किया था। परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास, खाद्य आपूर्ति मंत्री रमेश मीणा, सहकारिता मंत्री उदयलाल आंजना सहित कांग्रेस के कई विधायकों ने भी सरकार के फैसले को जन विरोधी बताते हुए पायलेट का समर्थन किया था।
सचिन पायलेट का कहना था कि कांग्रेस विधायक दल की बैठक में या केबीनेट की मिटिंग में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं लाया गया था। यहां तक कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी को भी इस बाबत कभी कोई जानकारी नहीं दी गयी थी। ऐसे में जन विरोधी फैसले को राज्य में कैसे लागू होने दिया जा सकता है। पायलेट का कहना था कि इस फार्मूले से तो कोई भी व्यक्ति बिना चुनाव लड़े ही पैसों के बल पर नगरीय निकायों का प्रमुख बन जायेगा। फिर वर्षों से पार्टी में काम करने वाले कार्यकर्ताओं का क्या होगा। उस वक्त मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल ने हाइब्रिड फार्मूले का बचाव भी किया था मगर अंतत: मामला कांग्रेस आलाकमान के पास दिल्ली तक पहुंचा और अशोक गहलोत को अपना हाइब्रिड फार्मूला वापस लेकर फिर से चुने गए पार्षदों में से ही नगरीय निकायों के अध्यक्ष बनाने का नियम लागू करना पड़ा था।
हाल ही में गहलोत सरकार ने भाजपा सरकार द्वारा प्रदेश में सडक़ों पर चलने वाले निजी वाहनों को टोल टैक्स से दी गई छूट को वापस लेने का निर्णय किया है जिसका भी कांग्रेस सहित सभी दलों में विरोध हो रहा है। नगरीय निकायों के चुनाव से पूर्व टोल टैक्स लागू करने के फैसले का खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है। टोल टैक्स को फिर से लागू करने के फैसले का भी गहलोत ने बचाव करते हुए कहा है कि टोल टैक्स की छूट निजी वाहन चलानेवालों को को दी जा रही थी जो टैक्स टोल टैक्स चुकाने में सक्षम है। भाजपा की पूर्ववर्ती सरकार द्वारा टोल टैक्स में दी गई छूट नियम विरुद्ध है। इसलिए राज्य सरकार ने इसे फिर से लागू करने का फैसला किया है।
इसी तरह अक्टूबर 2018 में वसुंधरा राजे सरकार ने प्रदेश के किसानों को उनके कृषि कुओं के बिजली बिलों में 833 रूपये प्रतिमाह का अनुदान देना का निर्णय किया था। जिस में भी अब बिजली कंपनियों के अधिकारी दिक्कत पैदा करने लगे हैं। बिजली विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कृषि उपभोक्ता पहले बिजली का पूरा बिल चुकाये फिर अनुदान की राशि उसके बैंक खाते में भेजी जायेगी। उपभोक्ता के खातों में जमा कराने के नियम से प्रदेश के आधे से अधिक किसान इस छूट का लाभ नही उठा पायेगें। प्रदेश में कई किसानों के भूमि का नामांतरण नहीं हुआ है तो कई किसानों के आपस में पारिवारिक विवाद चल रहे हैं। इसलिए एक साथ बैंक खाता नहीं खुल सकता है। इसमें किसानों को विभिन्न तरह की समस्या आ रही है। किसान संगठनों का कहना है कि पूर्व की भाजपा सरकार ने किसानों को मिलने वाले अनुदान को बिजली बिलों में ही समायोजित करने का जो फैसला किया था उसे ही बरकरार रखना चाहिए। बैंक खाते में अनुदान की राशि जाने से काफी किसानो को परेशानी उठानी पड़ेगी। अधिकतर किसानो का सामूहिक कृषि कनेक्शन है। कई कृषि कनेक्शन मृतको के नाम से ही चल रहे हैं उनका अभी तक नामान्तरण दर्ज नहीं हो पाया है। ऐसे में उनको अनुदान से वंचित रहना पड़ सकता है।
राजस्थान रोडवेज ने प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिदिन करीब 2 लाख किलोमीटर रूट पर बसों के परिचालन में कटौती कर दी है। जिससे गांव में परिवहन सेवा की पहुंच कम हो गई है। जिसका असर आम ग्रामीण पर पड़ रहा है। इससे गांवों के लोगों को आवागमन के साधनों की कमी महसूस होने लगी है। प्रदेश सरकार के इन फैसलों का सीधा असर गांव के गरीब, किसान, मजदूरों पर पड़ रहा है। प्रदेश में खनन माफिया पुलिस, प्रशासन पर भारी पड़ रहा हैं। प्रदेश भर में अवैध खनन जोरों पर हैं। खनन माफियाओं का दुस्सास इतना बढ़ गया है कि वह सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों पर भी हमला करने से नहीं चूक रहे हैं। पत्थर, रोड़ी, बजरी की ठेकेदारों द्धारा मनमानी कीमत वसूली जा रही है। प्रतिबंधित क्षेत्र में भी खनन का कार्य धड़ल्ले से जारी है।
बसपा से कांग्रेस में आए 6 विधायकों का विधायक दल में तो विलय हो गया है लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी कलह की वजह से अभी तक उन्हें प्रदेश कांग्रेस कमेटी कार्यालय में विधिवत रूप से कांग्रेस की सदस्यता नहीं प्रदान की गई है। जबकि उनको कांग्रेस में शामिल करने से पूर्व इस बात का वायदा किया गया था कि उन्हें सम्मान के साथ कांग्रेस में शामिल किया जाएगा। उनमें से कुछ विधायकों को मंत्री व कुछ विधायकों को विभिन्न निगम बोर्ड का अध्यक्ष बनाया जाएगा। लेकिन उनके साथ किया वायदा भी अभी अधर झूल में लटका हुआ है। मंत्रिमंडल के पुनर्गठन की मांग भी लंबे समय से चल रही है लेकिन अभी तक उस पर भी कोई निर्णय नहीं हो पाया है। प्रदेश में सत्ता व संगठन के गतिरोध के कारण विभिन्न निगम, बोर्ड, आयोग में गैर सरकारी सदस्यों,अध्यक्षों की नियुक्तियां नहीं हो पा रही है।
हाल ही में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव व राजस्थान के प्रभारी अविनाश पांडे ने जयपुर के एक निजी होटल में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलेट के बीच सुलह कराने के उद्देश्य से लम्बी चर्चा की लेकिन उसके अभी कोई नतीजे सामने नहीं आयें है। उस मीटिंग में बसपा से कांग्रेस में शामिल होने वाले पांच विधायकों से भी फेस टू फेस चर्चा की गई थी। उनकी शिकायत थी कि कांग्रेस ने उनसे किया वादा अभी तक पूरा नहीं किया है।
राजस्थान में विधानसभा की दो सीटो मंडावा व खींवसर के उपचुनावों में में कांग्रेस ने मंडावा सीट तो जीत ली मगर कांग्रेस के दिग्गज नेता हरेंद्र मिर्धा खींवसर सीट पर सांसद हनुमान बेनीवाल के भाई नारायण बेनीवाल के हाथों से हाथों पराजित हो गए। कांग्रेस की आपसी फूट मिर्धा की हार की प्रमुख वजह मानी जा रही है।
प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति बदतर हो रही है। आए दिन जगह-जगह बलात्कार की घटनाएं घट रही हैं। कांग्रेस सरकार के आने के बाद भी प्रदेश में कर्ज से परेशान होकर करीबन एक दर्जन किसानों ने आत्महत्या कर ली है। दिन दहाड़े सरेआम दुकानदारों को गोली मारकर लूटा जा रहा है। अपराधियों में बिल्कुल भी भय नहीं है। प्रदेश में अपराधी बेखौफ होकर अपराध को अंजाम दे रहे हैं। प्रदेश की जनता भय के साए में जीने को मजबूर हो रही है। इन सब परिस्थितियों के कारण प्रदेश की आम जनता को लगने लगा है कि उन्होंने कांग्रेस को वोट देकर कहीं गलती तो नहीं कर दी है।
यदि समय रहते कांग्रेस अपने सत्ता व संगठन के झगड़े को नहीं सुलटा पाती है तो उसका खामियाजा उसे आगे आने वाले निकाय व पंचायती राज चुनाव में उठाना पड़ेगा। आगे चलकर प्रदेश में सरकार के खिलाफ एक नकारात्मक वातावरण बनेगा जो सरकार के लिए खतरे की घंटी साबित होगा।

मंदिर विवाद का पटाक्षेप
सिद्धार्थ शंकर
2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे सुन्नी वक्फ बोर्ड, रामलला विराजमान और निर्मोही अखाड़ा के बीच अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद से जुड़े भूमि विवाद का पटाक्षेप हो गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस भूमि को 3 बराबर-बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ अलग-अलग पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी और इस साल अगस्त में मामले की नियमित सुनवाई शुरू की। 40 दिन की नियमित सुनवाई के बाद शनिवार को सुप्रीम कोर्ट ने शिया बोर्ड और निर्मोही अखाड़े के दावे को खारिज करते हुए रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच फैसला दिया। फैसले में कोर्ट ने विवादित भूमि पर मंदिर बनाने और अयोध्या में ही पांच एकड़ जमीन मस्जिद के लिए देने का आदेश दिया। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली खण्डपीठ में जस्टिस एसए बोबड़े, जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल थे। इस खण्डपीठ ने जो फैसला दिया है, वह इस लिहाज से ऐतिहासिक है, क्योंकि कोर्ट के सामने मामले का समाधान करने के साथ ही दोनों पक्षों को संतुष्ट करना भी था। इस फैसले से पहले पूरे देश का माहौल जिस तरीके से तनावपूर्ण था, उसे देखते हुए भी सुप्रीम कोर्ट के सामने फैसले में सामंजस्य बैठाना जरूरी हो गया था। हालांकि कोर्ट ने जो फैसला दिया, उस पर आपत्ति किसी को नहीं है और सभी सहमत हैं। इसी परंपरा को कायम करने की अपील काफी दिनों से की जा रही थी। देश के सौहार्द्र को कायम रखने की जो मिसाल लोगों ने दिखाई है, वह उम्दा है। अगर पूरे विवाद पर नजर डालें तो अयोध्या विवाद करीब साढ़े चार सौ साल से भी ज्यादा पुराना है। राम मंदिर और बाबरी मस्जिद को लेकर दो समुदायों के बीच यह विवाद 1528 से चला आ रहा है। 1885 में मामला पहली बार कोर्ट पहुंचा। महंत रघुवर दास ने फैजाबाद की अदालत में मुकदमा दर्ज कर विवादित ढांचे में पूजा की इजाजत मांगी। इसके बाद 1886 में फैजाबाद कोर्ट ने फैसले में कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मस्जिद हिंदुओं के पवित्र स्थल पर बनी है। बता दें कि 1853 में मंदिर-मस्जिद विवाद को लेकर पहली बार हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हिंसा हुई। हिंदुओं ने आरोप लगाया कि भगवान राम के मंदिर को तोडक़र मस्जिद का निर्माण हुआ। निर्मोही अखाड़े के महंत रघुबर दास ने फैजाबाद कोर्ट में मस्जिद परिसर में मंदिर बनवाने की अपील की पर कोर्ट ने मांग खारिज कर दी। ब्रिटिश सरकार ने दीवार और गुंबदों को फिर से बनवाया। कहा जाता है कि 1949 में मस्जिद में श्रीराम की मूर्ति मिली। इस पर विरोध व्यक्त किया गया और मस्जिद में नमाज पढऩा बंद कर दिया गया। फिर दोनों पक्षों ने लोग कोर्ट पहुंच गए। इसपर सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित कर ताला लगवाया दिया। अयोध्या विवाद एक राजनीतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक-धार्मिक विवाद है जो नब्बे के दशक में सबसे ज्यादा उभार पर था। इस विवाद का मूल मुद्दा राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद की स्थिति को लेकर है। विवाद इस बात को लेकर है कि क्या हिंदू मंदिर को ध्वस्त कर वहां मस्जिद बनाया गया या मंदिर को मस्जिद के रूप में बदल दिया गया।
मुगल शासक बाबर 1526 में भारत आया। 1528 तक वह अवध वर्तमान अयोध्या तक पहुंच गया। बाबर के सेनापति मीर बाकी ने 1528-29 में एक मस्जिद का निर्माण कराया था। यह अभी भी रहस्य है कि क्या मंदिर को तोडक़र मस्जिद बनवाई गई या मंदिर की ही मस्जिद के अनुसार बदला गया किन्तु यहां पर आकर यहां की धार्मिक भावनाओं के विपरीत कार्य किये और इस्लाम धर्म को बढ़ाने के लिए हिन्दुओं को जबरदस्ती मुस्लिम बनाया, लगभग 90 फीसदी मुस्लिम पहले हिन्दू ही थे जिनका धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम बनाया गया है, अत: मुस्लिम समाज (पूर्व मे हिन्दू समाज) को राम मंदिर बनने की संभावना है, और सबको पता है कि बाबरी मस्जिद की जगह पहले रामलला ही विराजमान थे। 1528 में राम जन्म भूमि पर मस्जिद बनाई गई थी। हिन्दुओं के पौराणिक ग्रन्थ रामायण और रामचरित मानस के अनुसार यहां भगवान राम का जन्म हुआ था।
बता दें कि 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी। 21 मार्च 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से विवाद सुलझाने को कहा। 19 अप्रैल 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित भाजपा और आरएसएस के कई नेताओं के खिलाफ आपराधिक केस चलाने का आदेश दिया।
8 मार्च 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के राम मंदिर और बाबरी मस्जिद मामले को मध्यस्थता के लिए भेज दिया। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच जजों वाली पीठ ने तीन सदस्यों को मध्यस्थता समिति का सदस्य बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस फकीर मोहम्मद इब्राहिम खलीफुल्ला इस समिति के प्रमुख थे। उनके अलावा पैनल में आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू भी शामिल किया गया। हिंदू महासभा के वकील वरुण कुमार सिन्हा ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि मध्यस्था के हमारे पुराने अनुभव बुरे ही रहे हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इसपर विचार करना चाहिए।
मध्यस्थता की कोशिशें नाकाम होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामला अपने हाथ में लिया और ४० दिन तक नियमित सुनवाई की। ९ नवंबर २०१९ को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए पूरे विवाद का पटाक्षेप कर दिया। १०४५ पन्नों वाले फैसले में शीर्ष कोर्ट ने न सिर्फ विवाद का समाधान दिया, बल्कि देश को इस तरह के मामलों में आपसी एकता बनाए रखने और धैर्य से काम लेने का संदेश भी दिया। उम्मीद है कि अब हिन्दू और मुस्लिमों के बीच उन्माद का कारण बनने वाला यह विवाद सदा-सदा के लिए खत्म हो जाएगा और देश मंदिर-मस्जिद से आगे की सोच सकेगा।

भारत-सऊदी संबंधों का नया दौर
योगेश कुमार गोयल
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सऊदी अरब यात्रा को दोनों देशों के बीच संबंधों में नई ऊर्जा भरने के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रधानमंत्री ‘फ्यूचर इन्वेस्टमेंट इनिशिएटिव’ फोरम (दावोस इन द डेजर्ट) में शामिल होने के लिए दो दिन के दौरे पर सऊदी अरब गए थे, जहां दोनों देशों के बीच तेल एवं गैस, रक्षा तथा नागर विमानन सहित विभिन्न प्रमुख क्षेत्रों में कई अहम समझौते हुए। मोदी की सऊदी यात्रा के दौरान दो महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, जिनमें से एक है ‘इंडियन स्ट्रैटिजिक पैट्रोलियम रिजर्व लिमिटेड’ तथा ‘सऊदी आरामको’ के बीच हुआ समझौता, जिसके तहत सऊदी अरब कर्नाटक में तेल रिजर्व रखने का दूसरा प्लांट बनाने में अहम रोल अदा करेगा। दूसरा समझौता है, भारत के इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन की पश्चिमी एशिया यूनिट तथा सऊदी अरब की अल-जेरी कम्पनी के बीच हुआ समझौता। इस यात्रा के दौरान ‘भारत-सऊदी अरब रणनीतिक साझेदारी परिषद’ के गठन की घोषणा भी की गई, जिसमें दोनों देशों का नेतृत्व शामिल होगा, जो भारत को अपनी उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा करने में मदद करेगा। इस परिषद की अगुवाई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान करेंगे और परिषद दो वर्ष के अंतराल पर मिला करेगी।
सऊदी अरब ही वह प्रमुख देश है, जिसकी मुस्लिम देशों में भारत की पैठ बनाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है और वह ऊर्जा क्षेत्र तथा आर्थिक मोर्चे के साथ-साथ कूटनीतिक मोर्चे पर भी भारत के प्रमुख सहयोगी के रूप में तेजी से उभरा है। हालांकि एक समय था, जब भारत और सऊदी अरब के बीच संबंध इतनेे बेहतर नहीं थे। इसका सबसे बड़ा कारण था कि सऊदी अरब को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में देखा जाता था, जिसकी नीति सदैव पाकिस्तान परस्त और पाक समर्थित ही रही और जो भारत के विरूद्ध पाक प्रायोजित आतंकवाद को धन तथा अन्य संसाधन मुहैया कराता था। तब सऊदी अरब हर कदम पर पाकिस्तान के साथ ही खड़ा नजर आता था लेकिन भारत की 2008 में शुरू हुई ‘लुक ईस्ट नीति’ के बाद से वह धीरे-धीरे भारत के करीब आ रहा है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अब तक दो बार की सऊदी अरब यात्राओं के बाद दोनों देशों के संबंधों में व्यापक सुधार देखा जा रहा है। पिछले तीन वर्षों में प्रधानमंत्री की यह दूसरी सऊदी यात्रा थी। इससे पहले वे 2016 में सऊदी अरब गए थे और तब वहां के बादशाह सलमान ने उन्हें सऊदी अरब के ‘सर्वोच्च नागरिक सम्मान’ से सम्मानित किया था। उसके बाद इसी साल पुलवामा हमले के बाद दोषियों को सजा दिलाने की भारत की वैश्विक मुहिम को अंतर्राष्ट्रीय समर्थन मिलने के दौर में सऊदी क्राउन प्रिंस भारत के दौरे पर आए थे। भारत यात्रा के दौरान उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ भारत की मुहिम का समर्थन किया था। उस दौरान दोनों देशों के बीच पांच महत्वपूर्ण समझौते भी हुए थे।
यह भारत की आर्थिक और कूटनीतिक सफलता ही है कि एक ओर वह सऊदी अरब को एक बड़े व्यापारिक साझेदार के रूप में जोड़ने में सफल रहा है, वहीं सऊदी अरब भारत के रूख को समझते हुए कश्मीर को अब भारत का आंतरिक मामला मानता है और संकेत दे चुका है कि इस मुद्दे पर वह अब पाकिस्तान के पक्ष में नहीं है। गौरतलब है कि मोदी और सऊदी अरब के युवराज के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के बाद जारी संयुक्त बयान में दोनों देशों के आंतरिक मामलों में सभी रूपों में हस्तक्षेप को खारिज कर दिया गया। प्रधानमंत्री की इस बार की सऊदी यात्रा के बाद दोनों पक्ष रक्षा तथा सुरक्षा क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमत हुए हैं और अब दोनों देश अपना पहला संयुक्त नौसैनिक अभ्यास मार्च 2020 में करेंगे। भारत तथा सऊदी अरब के घनिष्ठ होते संबंधों की अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि पाकिस्तान के लाख प्रयासों के बावजूद सऊदी अरब अब भारत को पूरा महत्व देने लगा है। सऊदी अरब के लिए भारत उन आठ बड़ी शक्तियों में से एक है, जिनके साथ वह अपने ‘विजन 2030’ के तहत रणनीतिक साझेदारी करना चाहता है। भारत के साथ संबंधों में सुधार के पीछे उसके सहयोग का यह भी एक बड़ा कारण है। आपसी संबंधों को बेहतर करने की दिशा में दोनों देश अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अब लगातार दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय दे रहे हैं।
सऊदी अरब ने बेहद बुरे समय में भी हमेशा पाकिस्तान की भरपूर मदद की है और पाकिस्तान के साथ उसके रिश्ते आज भी अच्छे ही हैं लेकिन इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने के बाद तुर्की और मलेशिया के एकदम विपरीत जिस प्रकार का सकारात्मक रूख सऊदी ने दिखाया और कश्मीर मुद्दे पर बढ़ते संकट को लेकर पाकिस्तान को चेताया भी, उससे भारत-सऊदी संबंधों की ऊष्मा को महसूस किया जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के तमाम प्रोपेगेंडा के बाद भी सऊदी साफ संकेत दे चुका है कि वह कश्मीर मसले पर भारत की चिंताओं और संवेदनशीलता को समझता है। सऊदी अरब कश्मीर मसले पर भारत के रूख का सम्मान करते हुए यह मानने लगा है कि भारत जो भी कर रहा है, अपनी आबादी की बेहतरी के लिए कर रहा है। पाकिस्तान का प्रमुख सहयोगी माना जाने वाला सऊदी अरब ही अगर अब क्षेत्र को आतंकवाद मुक्त बनाने के भारत के अभियान में उसका पक्ष ले रहा है और इस चुनौती से निपटने के लिए पूर्ण सहयोग देने की प्रतिबद्धता जता रहा है तो भारत की इससे बड़ी कूटनीतिक सफलता और कोई हो भी नहीं सकती। बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत को आतंकवाद के मुद्दे पर सऊदी अरब का समर्थन भारत के बढ़ते महत्व और सकारात्मक कूटनीति का ही परिणाम है।
भारत और सऊदी अरब के बीच प्रगाढ़ होते संबंधों का सीधा असर अब सऊदी-पाकिस्तान के संबंधों पर देखा जा रहा है, जिसकी बानगी पिछले दिनों देखने को भी मिली। संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में हिस्सा लेने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान सऊदी क्राउन प्रिंस के विमान में ही न्यूयार्क गए थे और उस समय प्रिंस ने इमरान को सख्त हिदायत भी दी थी कि वह संयुक्त राष्ट्र के मंच पर कश्मीर का मुद्दा न उछालें और इस मुद्दे को दूसरे इस्लामिक राष्ट्रों से भी न जोड़ें लेकिन जब इमरान ने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में इसी मुद्दे को पुरजोर तरीके से उछालते हुए भारतीय प्रधानमंत्री को सीधे-सीधे निशाना बनाने की कोशिश की तो उनकी इस हरकत से सऊदी प्रिंस इस कदर खफा हुए कि उन्होंने अपना विमान ही वापस बुला लिया था, जिसके बाद इमरान को कमर्शियल प्लेन से अपने वतन लौटना पड़ा था। सऊदी अरब की इस नाराजगी को भांपते हुए इमरान ने पिछले माह इसीलिए दोबारा सऊदी का दौरा किया था।
पिछले कुछ वर्षों में भारत और सऊदी अरब के बीच व्यापारिक रिश्ते काफी मजबूत हुए हैं और दोनों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा है। सही मायनों में पिछले कुछ समय में सऊदी अरब विभिन्न मोर्चों पर भारत का एक भरोसेमंद साथी ही साबित हुआ है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है, जो अपनी जरूरतों का करीब 83 फीसदी तेल आयात करता है और इराक के बाद भारत के लिए सऊदी अरब ही दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है, जो भारत का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी बन गया है। दोनों देशों के संबंधों के पुख्ता होने का स्पष्ट संकेत देती सबसे अहम बात यह है कि तेल के उत्पादन में 50-60 फीसदी कमी हो जाने के दिनों में भी सऊदी ने कभी भी भारत को तेल देने में आनाकानी नहीं की। वर्ष 2017-18 में दोनों देशों के बीच 27.48 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था और अब सऊदी अरब भारत में 100 अरब डॉलर का निवेश करने जा रहा है, जो ऊर्जा, रिफाइनरी, पैट्रोकेमिकल्स, कृषि तथा खनन क्षेत्र में होगा। दूसरी ओर भारत भी सऊदी में स्मार्ट सिटी, रेड सी टूरिज्म, एंटरटेनमेंट सिटी जैसी परियोजनाओं में हिस्सेदारी बढ़ा रहा है। भारत अपनी आवश्यकताओं का 18 फीसदी कच्चा तेल तथा 32 फीसदी एलपीजी सऊदी से ही आयात करता है और वहां से करीब 22 अरब डॉलर के पैट्रो पदार्थ खरीदता है। 2018-19 में सऊदी अरब ने भारत को 40.33 मिलियन टन क्रूड ऑयल बेचा था। सऊदी में 27 लाख से भी ज्यादा भारतीय रहते हैं, जिनमें से करीब 15 लाख वहां रोजगार कर रहे हैं और इन्हीं के जरिये प्रतिवर्ष भारत में 11 बिलियन डॉलर से भी अधिक विदेशी मुद्रा आती है।
ऐसा नहीं है कि केवल भारत को ही सऊदी अरब की जरूरत है बल्कि आजकल जिस तरह का वैश्विक माहौल है, उसके चलते सऊदी को भारत की भी उतनी ही जरूरत है। वैश्विक मंचों पर जिस प्रकार भारत की हैसियत लगातार बढ़ रही है, ऐसे में सऊदी भी विभिन्न क्षेत्रों में भारत के साथ साझेदारी करना चाहता है। पूरी दुनिया जिस तरह की आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही है, उससे सऊदी भी अछूता नहीं है। सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था तेल पर ही निर्भर रही है लेकिन कच्चे तेल के दामों में गिरावट से वह पहले से ही परेशान है। दूसरी ओर यमन के साथ लड़ाई में शामिल होने के चलते उसका खर्च काफी बढ़ गया है। यही कारण है कि उसने अब तेल और गैस के व्यापार से बाहर निकलकर दूसरे क्षेत्रों में भी निवेश कर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के प्रयास शुरू किए हैं। भारत के अलावा अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया इत्यादि देशों के साथ संबंधों में सुधार की कवायद के पीछे यह भी बहुत महत्वपूर्ण कारक है। सऊदी अरब अब अपनी कट्टर मुस्लिम राष्ट्र की छवि से बाहर निकलने की लगातार कोशिश कर रहा है, जिसके चलते उसने अपने वहां महिलाओं को कई प्रकार के अधिकार भी दिए हैं। सऊदी अरब के इस तरह के प्रयासों की पूरी दुनिया ने सराहना की है। बहरहाल, जहां भारत और सऊदी अरब के प्रगाढ़ होते संबंधों से दोनों देशों में बढ़ते आपसी कारोबार के चलते दोनों में ही आर्थिक तरक्की के नए रास्ते खुलेंगे, वहीं इन रिश्तों में नई ऊर्जा भरने से आने वाले समय में एशिया महाद्वीप के राजनीतिक समीकरण भी नए रूप में सामने आ सकते हैं।

रियल एस्टेट को डोज
सिद्धार्थ शंकर
सरकार ने अटकी परियोजनाओं में फंसे मकान खरीदारों और रीयल एस्टेट कंपनियों को बड़ी राहत देने की घोषणा करते हुए 25,000 करोड़ रुपए का फंड देने का ऐलान किया है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि देशभर में 1600 हाउसिंग प्रोजेक्ट और 4.58 लाख यूनिट्स (घर या फ्लैट्स) अटके पड़े हंै। सरकार इस वैकल्पिक निवेश कोष (एआईएफ) में 10,000 करोड़ रुपए डालेगी जबकि शेष 15,000 करोड़ रुपए का योगदान स्टेट बैंक और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की ओर से किया जायेगा। इससे कोष का समूचा आकार 25,000 करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगा। इस कोष के तहत केवल रेरा में पंजीकृत परियोजनाओं पर ही विचार किया जायेगा। वित्त मंत्री ने साफ किया कि यह राहत उन्हीं परियोजनाओं को मिलेगी, जो लटके हैं। परियोजना यदि शुरू ही नहीं हुई है तो इस कोष से कोई राहत नहीं मिलेगी। उदाहरण के लिए यदि किसी परियोजना में तीन टावर बनने हैं, उसमें एक टावर में 50 प्रतिशत काम हुआ है, दूसरे में 30 प्रतिशत और तीसरे में कोई ही काम नहीं हुआ है, तो हम सबसे पहले 50 प्रतिशत पूरी हुई परियोजना को कोष उपलब्ध कराया जाएगा। सरकार की इस पहल से न केवल अर्थव्यवस्था में रोजगार पैदा होंगे बल्कि सीमेंट, लोहा और इस्पात उद्योग की भी मांग बढ़ेगी। इस फैसले का उद्देश्य अर्थव्यवस्था के इस प्रमुख क्षेत्र पर बने दबाव से उसे राहत पहुंचाना भी है।
सरकार ने रियल एस्टेट कारोबार को मंदी से उबारने की दिशा में जो पहल शुरू की है उससे यह उम्मीद बंधती है कि सरकार आने वाले दिनों में ऐसे बड़े कदम उठाएगी, जिनसे इस क्षेत्र में पिछले चार-पांच साल से चला आ रहा संकट खत्म हो और बिल्डरों के साथ-साथ ग्राहकों का भी भला हो। अभी तक रियल एस्टेट क्षेत्र एक तरह से दम तोड़े हुए है। जायदाद खरीदने-बेचने का कारोबार करने वाले सड़क पर हैं और सिर्फ बड़े कारोबारी थोड़ी-बहुत हिम्मत से डटे हैं। रियल एस्टेट में लंबे समय से खरीदार नहीं हैं। नोटबंदी के बाद यह संकट और गहराता चला गया। ये उसी का असर है कि आज लाखों फ्लैट बन कर तैयार हैं, लेकिन खरीदार नहीं हैं।
जमीन-जायदाद का कारोबार लंबे समय से नगदी संकट की मार झेल रहा है। इसकी एक वजह यह भी है कि बैंक और गैरबैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) पहले तो इस क्षेत्र के लिए पैसे दे रही थीं, लेकिन अब इन्होंने हाथ खींच लिए हैं। एनबीएफसी तो खुद नगदी संकट में फंसी हैं और ऐसी आशंका भी बनी हुई है कि कहीं इन्हें भी एनपीए की बीमारी न लग जाए।
यह पहले से कहा जा रहा था कि रियल एस्टेट क्षेत्र में जान फूंकने के लिए सरकार को एक साथ कई मोर्चों पर जूझना होगा। इनमें सबसे जटिल काम इस क्षेत्र को पूंजी मुहैया कराने का है, ताकि बिल्डर अटकी हुई परियोजनाएं पूरी कर सकें। अब जबकि सरकार ने यह कर दिखाया है, तो उम्मीद करनी चाहिए कि हालात कुछ हद तक सुधरेंगे। दूसरी बड़ी समस्या मकान खरीदारों को लेकर है। आम्रपाली, जेपी जैसे कुछ बड़े समूहों की परियोजनाओं में 42 हजार से ज्यादा लोगों के पैसे फंसे हुए हैं और सर्वोच्च अदालत ने अब इनका काम पूरा करने और लोगों को मकान दिलाने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर डाली है। इसलिए ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि सरकार अटकी परियोजनाओं को पूरा करने और खरीदारों को संकट से निकालने के लिए अलग से कोष बना सकती है।
हाल में रिजर्व बैंक ने भी अपनी मौद्रिक नीति में चौथी बार नीतिगत दरों में कटौती है और साथ ही बैंकों पर कर्ज सस्ता करने के लिए दबाव बनाया है। बैंक कर्ज सस्ता होने से भी रियल एस्टेट क्षेत्र को पटरी पर लाने में मदद मिलेगी।
इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस वक्त फिर से मंदी जैसे हालात का सामना कर रही है। ऐसे में रियल एस्टेट उद्योग को फिर से खड़ा कर पाना कोई आसान काम नहीं हैं। उसे हर स्तर पर भारी रियायतों की जरूरत है। इसीलिए बिल्डरों और क्रेडाई (कनफेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया) और नारेडको (नेशनल रियल एस्टेट डेवलपमेंट काउंसिल) ने सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया है कि सरकार बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों पर इस क्षेत्र में पैसा डालने के लिए दबाव बनाए। लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर बैंक पहले ही एनपीए की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। ऐसे में वे कोई जोखिम नहीं ले सकते। सीमेंट और इस्पात जैसे क्षेत्र रियल एस्टेट कारोबार पर टिके होते हैं। इसमें मंदी का मतलब है सीमेंट और इस्पात जैसे उद्योगों पर खतरा मंडराना। इसलिए सरकार को अब ऐसी रणनीति बनानी होगी, जिसमें बैंकों के जोखिम का खयाल रखते हुए रियल एस्टेट उद्योग में पैसा डलवाया जाए, ताकि इससे जुड़े दूसरे प्रमुख क्षेत्रों में भी मंदी के हालात दूर हों। मंदी की वजह से बड़ी संख्या में लोगों का रोजगार जा रहा है, यह भी कम गंभीर चिंता का विषय नहीं है। ऐसे में सरकार के प्रयास कहां तक सफल हो पाते हैं, यह आने वाला वक्त ही बताएगा!

क्या कश्मीरी कभी भारतीय हो पाएगें…..?
ओमप्रकाश मेहता
आज से जम्मू-कश्मीर का दर्जा बदल गया, अब वह देश का नौवां केन्द्र शासित राज्य हो गया है, जम्मू-कश्मीर के साथ लद्दाख भी केन्द्र शासित राज्य हो गया है, इस तरह देश में केन्द्र शासित राज्यों की संख्या सात से बढ़कर नौ हो गई है। जम्मू-कश्मीर के केन्द्र शासित राज्य हो जाने के बाद आज भी वही बहात्तर साल पुराना सवाल जीवित है कि क्या कश्मीरी कभी भारतीय हो पाएगें? स्मरणीय है कि भारत की आजादी के बाद जब पाकिस्तान का जन्म हुआ था, तब कश्मीर को लेकर काफी खींचतान हुई थी, पाक के तत्कालीन जनक मोहम्मद अली जिन्ना कश्मीर को पाक के साथ जोड़ना चाहते थे जबकि प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू व शेख अब्दुल्ला कश्मीर को भारत में रखना चाहते थे, इस विवाद को बढ़ता देख जिन्ना व नेहरू के बीच कश्मीर में इसी मुद्दें पर रायशुमारी का फैसला हुआ, किंतु नेहरू जी यह जानते थे कि कश्मीर का पूरा अवाम पाकिस्तान के साथ है, इसलिए उन्होंने अपनी चार्तुथ से कश्मीर को भारत के साथ रख लिया और फिर अपने जीते जी रायशुमारी नहीं कराई, शेख अब्दुल्ला की जिद पर संविधान की धारा-370 का प्रावधान कर कश्मीर को विशेष अधिकार प्राप्त राज्य का दर्जा दे दिया गया।
अब मौजूदा मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से धारा-370 के एक झटके में खत्म तो कर दिया, किंतु क्या वे कश्मीरियों को ‘‘सच्चा भारतीय’’ बना पाएगें? जम्मू-कश्मीर से धारा-370 खत्म किए नब्बे दिन होने को आ रहे है, और पहले दिन से ही वहां स्थिति सामान्य होने का ढ़िढोरा पीटा जा रहा है, यदि वहां स्थिति सामान्य थी तो फिर बच्चों के स्कूल अब क्यों खोले गए? और जो स्कूल पहले प्रशासन के दबाव में खुल गए थे, उनमें बच्चें क्यों नहीं आए? इस दौरान जितने भी समाचार चैनलों ने जम्मू-कश्मीर की विशेष रिपोर्ट जारी की, किसी ने भी यह स्वीकार नही किया कि वहां स्थिति सामान्य है, बल्कि जिन चैनलों ने कश्मीरियों से बात की सभी ने वहां की स्थिति को लेकर चिंता प्रकट की और आज भी वही स्थिति है, और अब तो वहां घटी आतंकी घटनाओं और उनमें हुई निरीहों की हत्याओं ने भी यह सिद्ध कर दिया कि कश्मीर में स्थिति सामान्य नहीं है।
यही नहीं पिछले दिनों तो हद तब हो गई जब सरकार ने अपने देश के सांसदों को जम्मू-कश्मीर जाने से रोक कर यूरोपीय संघ के सांसदों को कश्मीर की सैर करवा दी। ऐसा क्यों किया गया? यह तो अधिकारिक तौर पर केन्द्र की किसी भी हस्ती ने नहीं बताया, किंतु युरोपीय संघ के सांसदों ने जो कश्मीर में देखा उससे वे संतुष्ट नहीं थे और यह कहने को मजबूर थे कि आज भी कश्मीर में स्थिति सामान्य नहीं है। अब ये ही सांसद अपने-अपने देशों में जाकर वहां के विधान मंडलों में कश्मीर का हाल बयां करेगें तो देश की विश्व पटल पर क्या इज्जत रह जाएगी? जब इन विदेशी सांसदों ने यही की सरकार से हमारे विपक्षी सांसदों को कश्मीर जाने देने की सिफारिश कर दी तो अब इस सरकार में विराजित महापुरूषों से क्या कहा जाए?
जहां तक लद्दाख का सवाल है, वह जम्मू-कश्मीर जैसा समस्या प्रधान देश नहीं है, यद्यपि वहां चीन की दखलंदाजी की स्थायी समस्या है, और वह रहेगी, क्योंकि केन्द्र शासित राज्य बना दिए जाने से वह समस्या खत्म नहीं होगी, उसके लिए कोई सार्थक द्विपक्षीय पहल करनी पड़ेगी, इसलिए लद्दाख को जम्मू-कश्मीर के साथ जोड़ना कतई ठीक नहीं है। यह उसका दुर्भाग्य था कि उसे अब तक जम्मू-कश्मीर के साथ जोड़ रखा था।
अब यह तो फिलहाल कहना मुश्किल ही है कि जम्मू-कश्मीर में स्थिति सामान्य कब होगी? क्योंकि वहां की स्थिति वहां के नागरिकों से जुड़ी है, जब तक कश्मीरियों के दिल नहीं बदलते, जब तक वे अपने आपकों भावनात्मक रूप से भारत के साथ नहीं जोड़ते तब तक जम्मू कश्मीर में स्थिति सामान्य नहीं हो सकती, और उसके लिए इस सरकार को कश्मीरियों की मूल समस्याएँ समझकर, उन्हें दूर कर कश्मीरियों का दिल जीतना होगा, सिर्फ सेना में वहां के युवकों की भर्ती करके उन्हें आतंकवादी बनने से रोकने का ढ़िढोरा पीटने से कुछ नहीं होगा। कश्मीरियों की कुछ अपनी स्थानीय समस्याएँ है जो उनके व्यवसाय व उद्योग के साथ उनकी रोजी-रोटी से जुड़ी है, उनका समाधान प्राथमिकता के आधार पर खोजना होगा तथा उसे कार्यरूप में परिणित करना होगा, तभी कश्मीर व कश्मीरी सही अर्थों में भारत का अंग बन पाएगा। विदेशियों को कश्मीर की सैर करवाने से कुछ नहीं होगा, उल्टा वहां की समस्याओं का विश्वव्यापीकरण हो जाएगा, इसके लिए सरकार को अपनी प्राथमिकताएँ बदलनी होगी।

आर्थिक सुस्ती के गंभीर असर
सिद्वार्थ शंकर
इस वित्त वर्ष की शुरुआत से ही आर्थिक सुस्ती देखने को मिल रही है। इसके चलते औद्योगिक उत्पादन और रोजगार से लेकर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर बुरा असर पड़ा है। कई महीने तक ऑटोमोबाइल सेक्टर भी सुस्ती का सामना करता रहा। हालांकि त्योहारों की वजह से इसमें सुधार देखा गया है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने अब जो डेटा जारी किया जिसमें साफ देखा जा सकता है कि स्लोडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा है। अक्टूबर में बेरोजगारी की दर बढ़कर 8.5 प्रतिशत हो गई जो कि अगस्त 2016 के बाद सबसे ज्यादा है। यह सितंबर के मुकाबले भी 7.2 फीसदी ज्यादा है। सीएमआईई के आंकड़ों के मुताबिक यह स्लोडाउन का असर है। इसके अलावा अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की तरफ से एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई है, जिसके मुताबिक पिछले 6 सालों में करीब 90 लाख रोजगार के अवसरों में कमी आई है। इस रिपोर्ट को संतोष मेहरोत्रा और जगति के परीदा ने मिलकर तैयार किया है और इसे अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ सस्टेनेबेल एंप्लॉयमेंट की तरफ से प्रकाशित किया गया है।
अक्टूबर में मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट पिछले दो साल में सबसे स्लो रहा। आईएचएस इंडिया के पैकेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स में भी गिरावट देखी गई। यह सितंबर में 51.4 थी जो कि अक्टूबर में घटकर 50.6 हो गई। एजेंसी 400 प्रोड्यूसर्स को शामिल करके सर्वे करवाती है जिसमें नए ऑर्डर, आउटपुट, जॉब, सप्लायर के डिलिवरी टाइम और स्टॉक परचेज के आंकड़े इक_े किए जाते हैं। यह सूचकांक अगर 50 के ऊपर होता है तो वृद्धि मानी जाती है वहीं 50 के नीचे आ जाने से बाजार में स्लोडाउन की स्थिति मानी जाती है।
टैक्स कलेक्शन में भी सरकार को झटका लगा है। अक्टूबर में जीएसटी कलेक्शन गिरकर 95,380 करोड़ पर पहुंच गया। पिछले साल इस महीने में जीएसटी संग्रह 1,00,710 था। यह लगातार तीसरा महीना है जब जीएसटी 1 लाख करोड़ से कम है। आंकड़ों के मुताबिक इस वित्त वर्ष के पहले छह महीने में टैक्स कलेक्शन में ग्रोथ केवल 1.5 फीसदी की रही है जो कि 2009-10 के बाद सबसे कम है। बता दें कि अप्रैल-जून की तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 5 प्रतिशत दर्ज की गई जो कि 6 साल में सबसे कम है। जुलाई-सितंबर का डेटा 30 नवंबर में जारी किया जाएगा। निवेशकों के मुताबिक यह स्लोडाउन साल 2006 से भी लंबा है। पिछले कुछ दिनों में जिस तरह की रिपोर्ट आई है, वह शुभ संकेत नहीं है। आर्थिक सुधार के सरकार के प्रयास असर नहीं दिखा रहे हैं और आम जनता पर भार पड़ता जा रहा है। यह वक्त सरकार के लिए चेतने वाला है। अगर अब भी मंदी को दरकिनार किया जाता रहा तो आने वाला कल और भी भयावह होगा।

चिंताजनक है ‘पुलिसिया तफ़्तीश’ पर सवाल उठना
निर्मल रानी
देश में पिछले दिनों दो ऐसी घटनाएं घटित हुईं जिन्होंने जनता का पूरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। पहली घटना गत 12 अक्टूबर शनिवार को प्रातःकाल उत्तरी दिल्ली का वीआईपी इलाक़ा समझे जाने वाले सिविल लाइंस थाना क्षेत्र में घटित हुई। इस घटना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भतीजी दमयंती मोदी के साथ झपटमारी अथवा राहज़नी की घटना पेश आई। दिल्ली पुलिस के अनुसार 12 अक्टूबर शनिवार को क़रीब सात बजे दमयंती बेन मोदी ऑटो में बैठकर जैसे ही गुजराती समाज भवन के पास अपने परिवार के साथ ऑटो से उतरने लगीं, उसी समय दो स्कूटी सवारों ने उन पर झपट्टा मारा। दमयंती बेन सपरिवार अमृतसर से दिल्ली आई थीं तथा उन्हें उत्तरी दिल्ली के सिविल लाइंस क्षेत्र स्थित गुजराती समाज भवन पहुंचना था।ज्यूँ ही उनका ऑटो गुजराती समाज भवन के मुख्य द्वार के सामने पहुंचा ठीक उसी क्षण स्कूटी पर सवार दो बदमाशों ने दमयंती बेन मोदी पर झपट्टा मारा और उनका पर्स उनके हाथों से छीन कर फ़रार हो गए। दमयंती बेन के अनुसार उनके पर्स में लगभग 56 हज़ार रुपये, दो मोबाइल फ़ोन और कई ज़रूरी काग़ज़ात थे। उन्हें घटना के दिन अर्थात शनिवार को ही अहमदाबाद की विमान यात्रा भी करनी थी। परन्तु पर्स के साथ ही उनके यात्रा संबंधी ज़रूरी काग़ज़ात भी झपटमारी में चले गए थे। सिविल लाइंस के जिस इलाक़े में प्रधानमंत्री की भतीजी के साथ दिनदहाड़े यह सनसनीख़ेज़ वारदात पेश आई उसी स्थान के बिल्कुल क़रीब ही दिल्ली के उप-राज्यपाल का आवास है और वहीँ पर पर दिल्ली के मुख्यमंत्री का निवास भी है। दिल्ली विधानसभा भी इसी घटना स्थल के समीप ही स्थित है।
बहरहाल,बधाई के पात्र है दिल्ली की चुस्त,दुरुस्त,कुशल,सक्षम व कर्तव्यनिष्ठ पुलिस जिसने राहज़नी की इस घटना के मात्र 24 घंटे के भीतर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भतीजी दमयंती मोदी के साथ राजधानी दिल्ली में हुई इस लूट के मामले में दिल्ली पुलिस ने गौरव उर्फ़ नोनू (21वर्ष) नाम के एक बदमाश को हरियाणा के सोनीपत से गिरफ़्तार कर लिया । और कुछ ही देर बाद पुलिस ने बादल नामक दूसरे आरोपी को भी गिरफ़्तार कर लिया। पुलिस के अनुसार नोनू नाम का अपराधी पहाड़गंज थाना क्षेत्र में नबी करीम का रहने वाला है। पुलिस ने अपराधी नोनू की निशानदेही पर पीएम मोदी की भतीजी दमयंती बेन के पर्स में मौजूद 56 हज़ार रूपये की नक़दी, दो मोबाइल फ़ोन और काग़ज़ात भी बरामद कर लिए। इतना ही नहीं बल्कि दिल्ली पुलिस ने राहज़नी की इस घटना में इस्तेमाल की गई स्कूटी भी बरामद कर ली। निश्चित रूप से देश को दिल्ली पुलिस की इस क़द्र चौकसी व उसकी तत्परता पर नाज़ है जिसने भीड़ भाड़ वाली घनी राजधानी में होने वाले इस अपराध का पटाक्षेप अपनी कार्यकुशलता का शानदार प्रदर्शन करते हुए कर डाला।
ऐसा ही एक हाई प्रोफ़ाइल अपराध गत 18 अक्टूबर शुक्रवार की दोपहर को पुराने लखनऊ के अति व्यस्त एवं भीड़ भरे चौक इलाक़े में उस समय घटित हुआ जबकि हिन्दू समाज पार्टी के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की हत्यारों ने उन्हीं के घर में ही गला रेत कर हत्या कर दी। उत्तर प्रदेश पुलिस ने भी इस हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने का दावा मात्र 48 घंटे के भीतर ही कर डाला। पुलिस ने संदिग्धों के स्केच भी जारी किये और उनपर ढाई लाख रुपए के इनाम की घोषणा भी कर दी। अब तक चार संदिग्ध हत्यारों की गिरफ़्तारी का दावा भी उत्तर प्रदेश पुलिस कर चुकी है। उत्तर प्रदेश,गुजरात तथा महाराष्ट्र से संदिग्धों की गिरफ़्तारी की ख़बरें हैं। माना जा सकता है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भतीजी दमयंती मोदी के साथ झपटमारी की घटना की ही तरह वैसी ही तत्परता कमलेश तिवारी की हत्या के मामले में भी दिखाई जैसी दिल्ली पुलिस ने गत दिनों दिखाई थी। निश्चित रूप से पूरा देश पुलिस से ऐसी ही चौकसी बरतने व अपराधियों को पकड़ने में इसी प्रकार की तेज़ी व तत्परता प्रदर्शित करने की उम्मीद करता है।
परन्तु उपरोक्त वारदातों के बाद दिखाई गई त्वरित पुलिसिया तफ़्तीश व इससे सम्बंधित गिरफ़्तारियों से एक सवाल यह भी उठता है कि क्या इस प्रकार की तफ़्तीश और यथाशीघ्र संभव लूटे गए माल की बरामदगी करना व हत्या के आरोपियों को गिरफ़्तार करने जैसा कर्तव्य निर्वाहन चुनिंन्दा व हाई प्रोफ़ाइल मामलों तक ही सीमित रहता है या फिर आम लोगों के साथ घटित होने वाले अपराधों में भी पुलिस इतनी ही तत्परता बरतती है? आज देश में ऐसे ही न जाने कितने ऐसे अपराधिक मामले हैं जिनमें अपराधियों का कोई सुराग़ ही नहीं मिल पा रहा है। ऐसा ही सबसे चर्चित जे एन यू के छात्र नजीब की गुमशुदगी का मामला है। यह जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की तीन वर्ष पूर्व अक्तूबर 2016 की घटना है। 14 अक्तूबर 2016 की रात जे एन यू कैंपस स्थित हॉस्टल में नजीब अहमद और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कुछ छात्रों के बीच मारपीट की घटना घटित हुई। इससे अगले ही दिन यानी 15 अक्तूबर 2016 को जे एन यू कैंपस स्थित माही-मांडवी हॉस्टल से नजीब अहमद लापता हो गया। इसके अगले दिन 17 अक्तूबर को विश्वविद्यालय प्रबंधन ने नजीब के परिजनों के साथ दिल्ली पुलिस में नजीब के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज करवाई। इसके बाद दिल्ली पुलिस की जांच चलती रही। परिजनों की मांग पर अदालत ने जांच का ज़िम्मा सीबीआई को सौंपा। इसके बावजूद आज तक किसी भी जांच एजेंसी को नजीब से जुड़ी कोई जानकारी हासिल नहीं हो पाई है। गत 15 अक्टूबर को अपने बेटे नजीब की गुमशुदगी के तीन वर्ष पूरे होने की पूर्व संध्या पर उसकी मां फ़ातिमा नफ़ीस जेएनयू पहुंची। दिल्ली में पत्रकारों माध्यम से फ़ातिमा नफ़ीस ने सरकर व पुलिस से यह सवाल पूछा कि ‘जब अपराधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भतीजी का पर्स झपट लेते हैं और देश की सबसे स्मार्ट पुलिस 24 घंटे में अपराधियों के साथ-साथ लूट का सारा सामान व पैसा भी फ़ौरन बरामद कर लेती है। काश उसी तरह मेरे बेटे नजीब के लिए भी दिल्ली पुलिस और सीबीआई ने इसी तरह से जांच की होती तो आज मैं शहर-दर-शहर नहीं भटकती’। परन्तु आज तक दिल्ली पुलिस व सीबीआई न तो नजीब की तलाश कर सकी न ही अपराधियों तक पहुँच सकी। यह तक पता नहीं चल पा रहा है कि नजीब ज़िंदा भी है या नहीं।
ऐसी ही और भी कई घटनाएं हैं जो पुलिस व जांच एजेंसियों की कार्य प्रणाली पर उंगली उठाती हैं। यह सवाल उस समय और भी प्रखर हो जाते हैं जबकि हाई प्रोफ़ाइल मामलों में पुलिस आनन फ़ानन में अपराधियों की गर्दन पर तो अपने हाथ डाल देती है परन्तु आम लोगों के मामले में ऐसी तत्परता नहीं दिखा पाती। । लिहाज़ा यदि भारतीय पुलिस व सुरक्षा एजेंसियों को अपनी प्रतिष्ठा क़ायम रखनी है तथा आम जनता में अपने प्रति विश्वास बनाए रखना है तो साधारण से साधारण घटना में भी वैसी ही चौकसी,कुशलता व तत्परता का परिचय देना चाहिए जैसा कि उसने गत एक सप्ताह में घटी उपरोक्त दोनों घटनाओं में दिया है।

न कांग्रेस मुक्त भारत न पचहत्तर पार:टूटा अहंकार
तनवीर जाफ़री
महाराष्ट्र तथा हरियाणा राज्यों में हुए विधानसभा के आम चुनावों के परिणाम आ चुके हैं। देश के एक समाचार पत्र ने इन परिणामों के संबंध में अत्यंत उपयुक्त शीर्षक लगाते हुए लिखा -‘मतदाताओं ने सभी को कहा -हैप्पी दीपावली’। वास्तव में इन परिणामों ने इन चुनावों में सक्रिय लगभग सभी राजनैतिक दलों को खुश रहने का कोई न कोई अवसर ज़रूर प्रदान किया है। हरियाणा में जैसे भी हो मगर भारतीय जनता पार्टी सत्ता में वापसी करने में सफल रही जबकि महाराष्ट्र उसकी अपनी चुनाव पूर्व सहयोगी शिवसेना के साथ मुख्यमंत्री पद को लेकर घमासान जारी है । कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी दोनों ही दलों ने अपने आप में पहले से काफ़ी अधिक सुधार किया दोनों ही दलों की राजनैतिक स्थित महाराष्ट्र तथा हरियाणा के आम चुनावों से लेकर विभिन्न राज्यों में हुए लोकसभा व विधान सभा के उप चुनावों तक में काफ़ी बेहतर हुई। उधर हरियाणा के चुनावी मैदान में उतरी सबसे नई नवेली पार्टी जननायक जनता पार्टी ने अपने चुनाव निशान ‘चाबी’ की हैसियत को अपने पहले ही चुनाव में ही उस समय पहचनवा दिया जबकि पहली बार में ही सत्ता की चाबी भी उसी के पास रही और पहले ही चुनाव में उप मुख्यमंत्री का पद हासिल कर पाने में जजपा कामयाब रही। उपरोक्त पूरे राजनैतिक घटनाक्रम में किसी प्रकार की नैतिकता आदि की बात करने की ज़रुरत इसलिए नहीं कि यह राजनैतिक जोड़ तोड़ और सत्ता समीकरण बिठाने के विषय हैं लिहाज़ा यहाँ ‘नैतिकता ‘,सिद्धांत अथवा वैचारिक प्रतिबद्धता के दृष्टिकोण से किसी भी पहलू पर नज़र डालना क़तई मुनासिब नहीं।
24 अक्टूबर की शाम तक जिस समय लगभग पूरे चुनाव परिणाम आ चुके थे और यह स्पष्ट हो चुका था कि प्रधानमंत्री मोदी व ग़ृह मंत्री अमित शाह द्वारा बार बार दिया जाने वाला ‘कांग्रेस मुक्त भारत ‘ बनाए जाने का नारा जहाँ एक बार फिर असफल हुआ वहीं हरियाणा में भी पिछले कई महीनों से भाजपा द्वारा चलाया जा रहा ‘अब की बार 75 पार’ का अभियान भी मुंह के बल गिर पड़ा। कांग्रेस पार्टी ने तमाम तरह की नकारात्मकता अर्थात संगठन में खींचतान,अनेक कांग्रेस नेताओं के ठीक चुनाव पूर्व पार्टी छोड़ने,टिकट आवंटन में मचे घमासान,कई लोगों के पार्टी टिकट न मिलने पर उनके स्वतंत्र चुनाव लड़ने,आख़री समय पर प्रत्याशी घोषित करने,सोनिया गाँधी,राहुल गाँधी व प्रियंका गाँधी जैसे सर्वप्रमुख नेताओं की चुनाव प्रचार अभियान में पूरी दिलचस्पी न लिए जाने,कई प्रमुख पार्टी नेताओं के विरुद्ध हो रही क़ानूनी जाँच पड़ताल और आर्थिक संकट आदि झेलने के बावजूद जैसा प्रदर्शन महाराष्ट्र,हरियाणा तथा कई राज्यों के उप चुनावों में किया है उसकी किसी भी राजनैतिक विश्लेषक को यहाँ तक कि शायद कांग्रेसजनों को भी उम्मीद नहीं थी। चुनाव परिणामों से यह भी स्पष्ट हो गया कि चुनाव में ‘मोदी के नाम का जादू’ जैसी कोई भी चीज़ अब मतदाताओं के बीच नहीं रह गई है।
भारतीय जनता पार्टी ने हरियाणा में 2005 में हुए चुनाव में मात्र दो सीटों पर जीत दर्ज की थी जो 2009 का चुनाव आते आते केवल चार सीटें जीतने की स्थिति में आ सकी। परन्तु 2014 में पहली बार भाजपा ने जब राज्य की 90 में से 46 सीटों पर जीत दर्ज की उस समय से ही बहुमत के नशे में चूर भाजपाइ नेताओं में पार्टी को अजेय समझने जैसा अहंकार पैदा होना शुरू हो गया था।अन्यथा लोकतान्त्रिक व्यवस्था में,जहाँ जीत हार,और यश अपयश की सारी चाभियाँ ही ‘लोक ‘ अथवा जनता के पास हों वहां स्वयं भू रूप से यह घोषणा कर देना कि ‘अब की बार-75 पार’ न केवल लोकतंत्र का अपमान है बल्कि अहंकार की पराकाष्ठा भी है। और हरियाणा चुनाव नतीजों ने यह दिखा भी दिया कि नारों व अहंकार के प्रभाव में जनता नहीं आने वाली। हरियाणा में खट्टर मंत्रिमंडल के सात मंत्रियों को भी जनता ने इस चुनाव में धूल चटा दी। इन में कई जो स्वयं को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बताते थे उनकी ज़मानत भी ज़ब्त हो गई। और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,अमित शाह तथा राजनाथ सिंह जैसे नेताओं की कई जनसभाएं करवाने के बावजूद हरियाणा में बीजेपी ने कुल 40 सीटें जीती जबकि कांग्रेस ने 31, जननायक जनता पार्टी ने 10, तथा निर्दलीयों ने सात सीटों पर जीत दर्ज कर ‘अब की बार-75 पार’ के नारे को हवा हवाई नारा साबित कर दिया। ठीक इसके विपरीत संगठनात्मक तौर पर बुरे दौर से गुज़र रही कांग्रेस पार्टी जो कि हरियाणा में विशेष रूप से ठीक चुनाव पूर्व ही एक निर्णायक संकटकालीन दौर से गुज़री। यहाँ तक कि आला कमान ने ठीक चुनाव पूर्व ही 3 वर्षों से हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पर आसीन रहे अशोक तंवर को हटाकर कुमारी शैलजा को राज्य कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने जैसा ज़ोख़िम भरा फ़ैसला लिया। उधर भाजपा के नेता पूरे देश में घूम घूम कर जनता से देश को कांग्रेस मुक्त करने की ज़ोरदार अपील करते आ रहे हैं। पंडित जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस पार्टी को जम कर एक साथ कोसा जा रहा है। कश्मीर से धरा 370 हटाने के केंद्र सरकार के फ़ैसले के बाद इसी बहाने कांग्रेस व नेहरू पर महाराष्ट्र से हरियाणा तक एक बार फिर निशाने साधे गए। परन्तु नतीजा यही रहा की भाजपा को लड़खड़ाना पड़ा और कांग्रेस सहित लगभग सभी विपक्षी दल पहले से अधिक मज़बूत हुए।
इसके बावजूद भाजपा द्वारा बहुमत के जादुई आंकड़े छूकर सत्ता हासिल करना, यह वास्तव में जनादेश का कितना सम्मान है और कितना अपमान,सत्ता के लिए भाजपा को कहाँ किस प्रकार घुटने टेकने पड़े हैं,यहाँ तक कि अपनी हर आलोचना हर तरह का विरोध करने वाले यहाँ तक कि अपने ही विरुद्ध चुनाव लड़कर 10 सीटें जीत कर आने वाले जजपा जैसे नव गठित क्षेत्रीय दल के साथ उन्हीं की शर्तों पर सरकार बनाना यह सब कुछ देश ने भली भांति देखा है। जो भाजपा 90 सीटों की हरियाणा विधान सभा में ‘अब की बार 75 पार’ का नारा दे रही थी वह कितने बुलंद हौसले व इरादे से चुनाव मैदान में रही होगी इसका अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है। वहीं राज्य में त्रिकोणीय चुनावी संघर्ष के बाद और कहीं कहीं तो चतुर्थकोणीय चुनाव होने के बावजूद यदि पार्टी बहुमत का 46 का आंकड़ा भी नहीं छू सकी तो इससे साफ़ है कि हरियाणा का जनमत भाजपा की खट्टर सरकार के विरुद्ध था। भले ही भाजपा विरोधियों में से भी किसी एक दल को जनता ने पूर्ण बहुमत नहीं दिया। परन्तु केंद्र में सत्ता व सत्ता सम्बन्धी प्रतिष्ठानों का लाभ उठाकर भाजपा ने जननायक जनता पार्टी के नेता दुष्यंत चौटाला को उप मुख्यमंत्री पद देकर अपनी सत्ता की रह आसान कर ली। इस तिकड़मबाज़ी को दोनों ही दलों भाजपा व जननायक जनता पार्टी की मौक़ा परस्ती तो कहा जा सकता है परन्तु जनादेश का सम्मान हरगिज़ नहीं। जनता जनार्दन ने तो महाराष्ट्र व हरियाणा दोनों ही जगह यह दिखा दिया कि न तो भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का नारा साकार हुआ न ही पार्टी हरियाणा में ‘पचहत्तर पार’ कर सकी,हाँ जनता ने ऐसे नारे लगाने वालों का अहंकार ज़रूर चूर चूर कर दिया।

मेहनती लोगों का मध्यप्रदेश नई उड़ान क्यों नहीं भर सकता ?
कमल नाथ
मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस पर सभी नागरिकों को हार्दिक शुभकामनाएँ । हम सबके लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर है। मैं उन सभी बंधुओं को भी हार्दिक बधाई देता हूँ जो विदेशों में बस गए हैं और अपने प्रदेश की खूबसूरत वादियों और सुनहरे पलों को याद करते हैं। मैं उन सबको भी नमन करता हूँ, जिन्होंने मध्यप्रदेश के निर्माण में अपूर्व योगदान दिया है और उत्साहपूर्वक राज्य के नवनिर्माण में जुटे हुए हैं।
मध्यप्रदेश एक लंबा सफर तय कर चुका है। यह एक शानदार राज्य है। सिर्फ इसलिए नहीं कि यहाँ शांतिपूर्ण सांस्कृतिक विविधता है, मोहक जैव-विविधता, प्राकृतिक सौंदर्य है या लुभावने स्मारक है। यह अपने शांतिप्रिय और मेहनती लोगों के कारण अद्वितीय है। सर्वधर्म समभाव मध्यप्रदेश की पहचान है।
निस्संदेह, मध्य प्रदेश का सौंदर्य सबको सम्मोहित कर देता है। नर्मदा नदी का निर्मल प्रवाह, स्वतंत्र विचरण करते टाइगर, कान्हा नेशनल पार्क की अद्भुत सुंदरता, पत्थरों पर अंकित कविता खजुराहो, अद्भुत महेश्वरी और चंदेरी साड़ी, सांस्कृतिक विविधता और भी बहुत है यहाँ।
छह दशकों की यात्रा के बाद हम बेहतर भविष्य के लिए नई रणनीतियाँ तैयार कर रहे हैं।
मैं समझता हूँ कि हमने भविष्य की रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय बातों में अपना कीमती समय और ऊर्जा खर्च की। मध्यप्रदेश आगे क्यों नहीं बढ़ सकता जब यहाँ के लोग मेहनती है? हम हर क्षेत्र में उत्कृष्ट बन सकते हैं। हमारे विश्वविद्यालय उत्कृष्टता हासिल कर सकते हैं। हमारा पर्यटन तेजी से पनप सकता है । औद्योगिक विकास में हम नया मुकाम हासिल कर सकते हैं। हमारे उत्साही और प्रतिभाशाली युवा चमत्कार कर सकते हैं। हमारे किसान अपने कौशल से कमाल कर सकते हैं। हमें उनके लिए नए रास्ते बनाने होंगे। लोग अपने आत्म-विश्वास ,अपनी ऊर्जा, प्रतिभा और ज्ञान से आश्चर्यजनक परिवर्तन ला सकते हैं।
मध्य प्रदेश को एक शांतिपूर्ण राज्य बनाने का श्रेय यहाँ नागरिकों को जाता है। मध्य प्रदेश को एक उत्कृष्ट कार्य-योजना चाहिए। मौजूदा बुनियादी ढाँचे का उपयोग करते हुए मानव और प्राकृतिक संसाधनों के उत्कृष्ट प्रबंधन की जरुरत है। प्रदेश की सबसे बड़ी पूंजी यहाँ की युवा प्रतिभाएँ हैं। उन्हें अवसरों की आवश्यकता है। यह हमारा कर्त्तव्य है कि हम उनके लिए अवसर पैदा करें। मध्य प्रदेश को आगे ले जाने में हर नागरिक की समान जिम्मेदारी है। हमने लोक विवेक का आदर किया है। अपनी नीतियों और निर्णयों में लोगों की अपेक्षाओं का ध्यान रखा है।
आज मध्य प्रदेश नए क्षितिज में उड़ान भरने को तैयार है। हमारी अर्थ-व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत हमारा कृषि क्षेत्र है। अब हमें खेती में उद्यमिता को बढ़ावा देना होगा ताकि हमारे किसान आत्म-निर्भर बनें।
अब आर्थिक गतिविधि से युवा जनशक्ति को जोड़ने और उनके लिए नौकरी के अवसर पैदा करना पहली प्राथमिकता है। औद्योगिक विकास का उद्देश्य नौकरी के अवसर बढ़ाना है।
मेरा विचार है कि वर्तमान का बेहतर प्रबंधन और भविष्य की उत्कृष्ट प्लानिंग जरुरी है। प्रदेश के लोग निपुण, प्रतिभाशाली और ज्ञान से परिपूर्ण हैं। प्रत्येक नीति में उनकी आकांक्षाओं को स्थान मिलना चाहिए। नागरिकों को बेहतर सेवाएँ देने के लिए हम वचनबद्ध है। इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का सहारा लेने का समय आ गया है।
मुझे लोगों की शक्ति पर भरोसा है। मैं युवा पीढ़ी की प्रतिभा में विश्वास करता हूँ। हमें अपने उद्यमियों पर भरोसा है। मैं सशक्त हो रही महिलाओं की प्रतिभा की प्रशंसा करता हूँ।
हमने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह लोगों की सरकार है । जवाबदेह शासन के साथ लोगों के सहयोग से हम मध्य प्रदेश को हर क्षेत्र में मजबूत बनाएंगे। मध्यप्रदेश अब नई उड़ान भरेगा। यह हमारा संकल्प है।
– ब्लॉगर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।

कश्मीर में हिंसा
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कश्मीर के हाल देखने के लिए इधर से 23 यूरोपीय सांसद श्रीनगर पहुंचे और उधर कुलगाम में आतंकवादियों ने पांच मजदूरों की हत्या कर दी। इस खबर के आगे मोदी की सउदी यात्रा और बगदादी की हत्या की खबर फीकी पड़ गई। यूरोपीय सांसदों का कश्मीर-भ्रमण भी अखबारों के पिछले पृष्ठों पर सरक गया। जो लोग मारे गए, वे कौन थे ? वे सब बांग्लादेशी और मुसलमान थे। मुर्शिदाबाद के निवासी इन मजदूरों का राजनीति से क्या लेना-देना लेकिन आतंकवादियों ने इन्हें मार गिराया। यह कौनसी बहादुरी है ? यह तो शुद्ध कायरता है। निहत्थे मजदूरों को मारनेवालों को कौनसी जगह मिलेगी ? जन्नत या दोजख (नरक)? इन हत्यारों को आप क्या कहेंगे ? क्या वे जिहादी हैं ? उन्हें पता नहीं कि उनकी यह हरकत, यह बेवजह तशद्दुद (अकारण हिंसा) किसी भी काफिराना हरकत से कम नहीं है। ये दहशतगर्द लोग कश्मीरी आवाम के घोर शत्रु हैं। कश्मीर के हालात धीरे-धीरे ठीक हो रहे थे लेकिन अब सरकार को भी सोचना पड़ेगा कि सारे प्रतिबंध इतनी जल्दी हटा लेना ठीक है या नहीं ? इन आतंकवादियों ने भारत सरकार के हाथ में नई बंदूक पकड़ा दी है। ये लोग पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि बिगाड़ने के लिए भी जिम्मेदार हैं। ये समझ रहे हैं कि ये हत्याएं करके वे यूरोपीय सांसदों को भारत के दावों के बारे में एक निषेधात्मक संदेश दे सकेंगे लेकिन कश्मीर में उनकी उपस्थिति में ये हिंसा उन्हें (और पाकिस्तान को भी) बदनाम किए बिना नहीं रहेगी। यूरोपीय सांसदों से उम्मीद थी कि वे कश्मीर के हालात के बारे में अपनी निष्पक्ष और निडर राय देंगे लेकिन अब जरा सोचिए कि इन हत्याओं का उनके मन पर क्या असर पड़ेगा। मैं पहले भी लिख चुका हूं कि यदि कश्मीरी लोग शांति और सदभावना का रास्ता पकड़ेंगे तो भारत सरकार ही नहीं भारत के करोड़ों लोग उनके अधिकारों, सुविधाओं और सम्मान के लिए जी-जान लगा देंगे। वरना कश्मीर का यह आपात्काल बढ़ता ही चला जाएगा और उसका मामला उलझता ही चला जाएगा।

कश्मीर के अंगने में विदेशियों का क्या काम है?
सनत जैन
जम्मू-कश्मीर में धारा 370 और 35ए खत्म करने के पूर्व जिस तरह से इंटरनेट और मोबाइल फोन की सेवाएं बंद हैं। विपक्षी दलों के नेताओं को नजर बंद करके रखा गया। पूरे कश्मीर में सेना के जवान तैनात किए गए। धारा 144 लगाकर लोगों का आना-जाना प्रतिबंधित किया गया। पिछले ढाई महीनों से जम्मू-कश्मीर में व्यापार, पर्यटन और निर्माण कार्य रुके पड़े हैं। उसको लेकर जम्मू-कश्मीर ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। इसमें कोई संदेह नहीं है, प्रधानमंत्री मोदी उनके सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल तथा विदेश मंत्री ने एक रणनीति के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का पक्ष बहुत बेहतर तरीके से रखकर इसे अंदरूनी मामला बताया। पाकिस्तान की सारी कोशिशें नाकाम करने में भारत की रणनीति काफी काम आई। यह भी सही है, कि मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि कमजोर हुई है। समय बीतने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय दबाव, भारत के ऊपर बढ़ता जा रहा है। चीन पाकिस्तान के समर्थन में खड़ा है। भारत का विरोध कश्मीर मुद्दे को लेकर नहीं कर रहा है। इसके पीछे उसकी व्यापारिक रणनीति है। इसके बाद भी पाकिस्तान को चीन का खुला समर्थन है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप “दोई पलीतो दे दो तेल, तुम नाचो हम देखें खेल” में अमेरिका को दोहरा लाभ हो रहा है। पाकिस्तान को वह आंतरिक रूप से शह दे रहा है, वहीं भारत के ऊपर दबाव बनाकर रक्षा सौदे और अन्य मामलों में समर्थन की खुलकर कीमत भी वसूल कर रहा है। कश्मीर पर गतिरोध को लगभग 3 माह होने को जा रहे हैं। उसके बाद भी वहां पर शांति स्थापित नहीं हो पा रही है। सेना और पुलिस बल की वापसी नहीं हो रही है। कश्मीर से भारत का संपर्क लगभग टूटा हुआ है। ट्रक वाले भी वहां जाने से मना कर रहे हैं। उत्तर भारत के जो मजदूर कश्मीर में जाकर काम करते थे। वह भी इस परिवर्तन के बाद नहीं पहुंचे हैं। पर्यटन उद्योग भी ठप्प पड़ा हुआ है। बार-बार मोबाइल फोन, एसएमएस सेवा और इंटरनेट सेवा बंद की जा रही है। जिसके कारण अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के ऊपर दबाव लगातार बढ़ रहा है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है कि यूरोपीय देशों के 27 सांसद कश्मीर के हालात को देखने के लिए भारत में पहुंचे हैं। जो प्रतिनिधि मण्डल आया है। उसे यूरोपीय यूनियन ने नहीं भेजा है। यह कयास लग रहे है कि भारत सरकार की पहल पर विदेशों में बसे मोदी समर्थकों ने दक्षिण पंथी यूरोपिय नेताओं का प्रतिनिधि मण्डल भारत भेजा है। यह प्रायोजित कार्यक्रम है। जिसमें भारत सरकार के उपर मानव अधिकार संगठन तथा यूरोपिय समुदाय का जो दबाव बढ़ रहा है। उसे अंर्तरराष्ट्रीय स्तर पर दबाया जा सके। विदेशी पत्रकारों को भी जम्मू-कश्मीर जाने की अनुमति भारत सरकार ने नहीं दी। भारतीय सांसदों की टीम भी कश्मीर के दौरे पर नहीं भेजी गई। वहीं यूरोपिय सांसदों के समूह का प्रायोजित कार्यक्रम बताकर इसकी आलोचना भी भारत में हो रही है।
कई देशों के सांसद, कश्मीर की हालत को जानने के लिए सरकारी बंदोबस्त के साथ कश्मीर पहुंचे हैं। भारत सरकार के अधिकारी उनके दौरे का इंतजाम कर रहे हैं। वह जहां ले जाना चाहेंगे, वहीं तक प्रतिनिधिमंडल जाएंगे। लेकिन इतना तय है, कि यहां से लौटने के बाद कश्मीर के बारे में उनकी रिपोर्ट और दौरे की डिटेल भारत सरकार के लिए नई मुसीबतों को खड़ा करेगी। यूरोपीय संघ के जो सांसद कश्मीर पहुंचे हैं। उन्हें बंद बाजार देखने को मिले हैं। वैसी गतिविधियां नहीं मिली जैसे आमतौर पर देखने को मिलती हैं। कश्मीर में अभी तक बिना सुरक्षा के स्थानीय लोगों की भी आवाजाही सुनिश्चित नहीं हो पा रही है। ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आने वाले समय में भारत को अपनी स्थिति को मजबूत बनाने के लिए बहुत सोच समझकर तैयारी करनी होगी। अमेरिका और यूरोपीय देश मानव अधिकारों को लेकर हमेशा से सजग रहे हैं। भारत में 1975 में जब आपातकाल लगा था और 1 साल का कार्यकाल संसद का बढ़ाया गया था। उस समय भी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के ऊपर अंतरराष्ट्रीय दबाव बना था। लोकतंत्र बहाल करने के लिए उन्हें इमरजेंसी हटाने या अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध झेलने के लिए तैयार रहने के लिए कहा गया था। अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते 1977 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को आपातकाल हटाना पड़ा था। जेलों में बंद विपक्षी नेताओं को अंर्तराष्ट्रीय दबाव में रिहा करना पड़ा था। 1977 में हुए चुनाव में कांग्रेस की जबरदस्त पराजय हुई। केंद्र में पहली बार विवक्षी दलों की जनता पार्टी की सरकार केंद्र में बनी।
कश्मीर मुद्दे को लेकर भारत की स्थिति अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच कमजोर हुई है। अमेरिका चीन और रूस जैसे देशों ने इस स्थिति का लाभ, अपने व्यापारिक हितों को ध्यान में रखते हुए, भारत पर दबाव बनाकर अपना हित साधा है। पाकिस्तान को सहायता भी दे रहे हैं, और बदले में भारत से फायदा भी ले रहे हैं। भारत सरकार को इस बात को अच्छी तरह से समझना होगा। बेहतर होगा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में शांति व्यवस्था कायम हो। स्थानीय नेताओं को सरकार विश्वास में ले। कानून व्यवस्था की स्थिति बिना स्थानीय नेताओं के बनाए रखना नामुमकिन है। लंबे समय तक फोर्स को तैनात रख पाना भी भारत सरकार के लिए संभव नहीं है। पिछले 3 माह में कश्मीर की स्थिति नियंत्रित नहीं हो पाना चिंता का विषय है। नेपाल, भूटान, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में चीन ने अपना जबरदस्त प्रभाव बनाया है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के चलते भारत दो पाटों के बीच जिस तरह गेहूं पिसता है उसी तरह की स्थिति अब भारत की बनती हुई दिख रही है। ऐसी स्थिति में भारत को सतर्क रहने की जरूरत है। अमेरिका और चीन को लेकर हमारे 70 सालों के अनुभव भी हैं। इनसे सबक लेते हुए राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति को बेहतर बनाने के लिए, विपक्षी दलों को भी विश्वास में लेना सरकार के लिए जरूरी हो गया है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आगे चलकर काफी बड़ी परेशानी और नुकसान भारत को उठाना पड़ सकता है। पाकिस्तान तो शुरू से ही मुफलिसी में जीने का आदी हो चुका है। पाकिस्तान की तुलना भारत से ना कभी हुई है, और ना कभी हो सकती हैं। पाकिस्तान हमेशा से अमेरिका का मोहरा बनकर जीवन जीने का आदी रहा है। अब चीन भी उसके साथ हैं। ऐसी स्थिति में भारत सरकार को सजगता के साथ दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखते हुए, निर्णय लेने की अपेक्षा है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को जानने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव भारत के ऊपर बढ़ रहा है। यूरोपीय संघ के जो सांसद कश्मीर का दौरा करने आए हैं। वह इस बात का प्रमाण है, उनके वापस जाने के बाद निश्चित रूप से भारत के ऊपर कश्मीर के मुद्दे पर दबाव बढ़ेगा। भारत के आंतरिक मुद्दे पर विदेशियों का क्या काम है। इस मुद्दे पर मीडिया और विपक्ष ने सरकार को घेरा है।

भारतीय एकता के शिल्पी
वीरेन्द्र परिहार
(31अक्टूबर-जन्मदिवस पर) सरदार पटेल का जन्म भगवान कृष्ण की कर्मभूमि स्वामी दयानन्द सरस्वती और महात्मा गांधी की जन्मभूमि गुजरात मे 31 अक्टूबर 1875 को बोरसद के करमसद गांव मे हुआ था। उनके पिता झेंबरभाइ सच्चे ईश्वर-भक्त, साहसी, दूरदर्शी, संयमी और देशभक्त थे।सरदार पटेल के पिता झेंबरभाई ने1857 के स्वाधीनता सेनानियों की मदद करते हुए महारानी लक्ष्मीबाई की सेना मे शामिल होकर अग्रजों के साथ युद्ध किया था। इस तरह से सरदार पटेल जिनका वास्तविक नाम वल्लभभाई पटेल था। वल्लभभाई का साहस धेर्य और कर्तव्यपरायणता अद्भुत थी। मुम्बई मे एक आपरेशन के दौरान जब उनकी पत्नी की मृत्य हो गई,और तार द्वारा इसका समाचार उन्हे मिला तब वह एक हत्या के एक मुकदमें मे बहस कर रहे थें। तार पाकर पहले तो वह स्तब्ध हुए, पर दुसरे ही क्षण वह पूरी तरह सतर्क और सचेत होकर बहस करने लगें कि कही थाड़ी भी ढिलाई उनके पक्षकार का अहित न कर दे। तो यह थी उनके कर्तब्यबोध की मिसाल। उस समय उनकी उम्र मात्र 33 वर्ष थी, फिर भी उन्होने आजीवन दुसरा विवाह नही किया।
विलायत जाकर पढने की वल्लभभाई की तमन्ना 1910 मे पूरी हुई ऐर वह प्रथम श्रेणी मे प्रथम स्थान प्राप्त कर 1913 मे विलायत से स्वदेश लौट आए । वह अहमदाबाद को अपनी कर्मभूमि बनाकर वहां वकालत करने लगे ।शीघ्र ही वह गांधी जी के संपर्क मे आ गए और उनके द्वारा गठित गुजरात राजनैतिक परिषद के मंत्री बनाए गए। उन दिनों बेगार- प्रथा जोरो पर थी। अन्याय के विरोधी सरदार भला यह कैसे सहन करते?उन्होने बेगार प्रथा -सम्पात करने के लिए कमिशनर को पत्र लिखा कि सात दिनों के अन्दर यदि बेगार-प्रथा सम्पात नही की गई तो लोगों से स्वत: बन्द करने का अनुरोध करेगें। फलत: कमिश्नर ने बेगार -प्रथा बन्द करने का फैसला दे दिया। यही वल्लभभाई की पहली बड़ी राजनैतिक विजय थी। इसी से वह गांधी जी के निकटतम सहयोगी और विश्वासपात्र बन गये। वर्ष 1917 मे खेड़ा जिले मे लगान वसूली के विरोध मे गांधी जी के अगुवाई मे जो आन्दोलन हुआ उसके वह प्रमुख सिपहसालार रहे। गांधी जी ने इस अवसर पर कहा कि वल्लभभाई तो उनके लिए अनिवार्य है। बरदोली सत्याग्रह की समाप्ति पर महात्मा गांधी ने यह उद्गार व्यक्त किया- ”मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि जब बल्लभ भाई से मैं पहले-पहल मिला, तब मैंने सोचा था कि वह अख्खड़ पुरुश हमारे किस काम का होगा, परन्तु जब मैं उनसे सम्पर्क में आया, तब मुझे लगा कि बल्लभ भाई तो मेरे लिए अनिवार्य हैं। विश्णु प्रभाकर के शब्दों में कहें तो ”रामकृश्ण परमहंस ने अपने विवेकानन्द को पहचान लिया था।“
सन1920 मे लाला लाजपत राय की अध्यक्षता मे कांगेस के अधिवेशन मे ब्रिटिश सरकार से असहयोग का प्रस्ताव पारित किया गया। वल्लभभाई ने उसी दिन से वकालत छोड़ दिया और खादी पहनने लगे। इतना ही नही अपने बच्चों का नाम स्कूल से कटवा दिया,इस बीच उनकी बहुत सी उपलब्धियॉ रही। 1927 मे गुजरात के बाढ़ पीड़ितो की उन्होंने जिस ढ़ंग से सहायता की उसे देखकर ब्रिटिश सरकार को भी इसे मानवता की सच्ची -सेवा कहना पड़ा। पर वल्लभभाई को जिस घटना ने सरदार बनाया, वह 1928 का बारदोली आन्दोलन था। यहां पर अंग्रेज सरकार ने किसानों पर लगान 30 प्रतिशत बढ़ा दिया था, जबकि उनकी माली हालत काफी श्sााचनीय थी। सरदार ने किसानो को आन्दोलन के खतरों से आगाह किया और एक सच्चे नेता की तरह उन्हे पूरी तरह तैयार कर सत्याग्रह -आन्दोलन शुरू कर दिया।इसी आन्दोलन के चलते वह राष्टीय राजनीति के केन्द्र मे आ गए। उस समय देश के प्रसिद्ध अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा-“बारदोली मे पूरी सरकारी मशीनरी ठप्प पड़ी है, गांधी के शिष्य पटेल की वहां तूती बोलती हैं।” बिटिश सरकार ने यहा खूब अत्याचार किया, आदमियों के साथ भैसों तक को जेल मे डाल दिया। उस आन्दोलन को लेकर प्रसिद्ध साहित्यकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जो उस समय मुम्बई की धारा सभा के सदस्य थे। उन्होंने अंग्रेज गर्वनर को लिखा, बारदोली ताल्लुके मे अस्सी हजार स्त्री-पुरूष सुसंगठित होकर विरोध के लिए भीष्म प्रतिज्ञा किए बैठे है। आपके कर्मी अधिकारी को मीलो तक हजामत के लिए नाई नही मिलता, आपके एक अधिकारी की गाड़ी कीचड़ मे फॅस गई तो वल्लभभाई की कृपा से ही निकली। कलेक्टर को वल्लभभाई की आज्ञा के बिना स्टेशन मे कोई सवारी नही मिलती।मैने जिन गावों की यात्रा की उनमे एक भी स्त्री-पुरूष ऐसा नही मिला जिसे अपने निर्णय पर पछतावा हो। इस आन्दोलन की दृढ़ता के चलते आखिर में बिटिश सरकार को झुकना पड़ा। गांधी ने उन्हे इस अवसर पर बारदोली का सरदार कह कर संबोधित किया और वह सचमुच पूरे देश के सरदार बन गए।
29 जून 1930 में सरदार पटेल कांग्रेस के स्थापनापत्र अध्यक्ष नियुक्त किए गए, उनके नेतृत्व में कांग्रेस का संगठन सुदृढ तो हुआ ही कांग्रेस में भी नई जान आ गई ।इस बीच वह कई बार जेल गए । 1931 में सरदार पटेल कांग्रेस के कराची अधिवेशन के अध्यक्ष बनाए गए । 14 जनवरी 1932 को कांग्रेस को सरकार द्वारा अवैध घोषित कर दिया और गॉधी जी के साथ सरदार को भी यरवदा जेल भेज दिया गया जहॉ वह गॉधी के साथ 1 वर्ष 4 माह बन्द रहें । वहॉ उन्होने गॉधी की मॉ जैसी सेवा की । 1932 मे बोरसद में भयंकर प्लेग फैला था । 1935 में यह फिर सत्ताइस गॉवों में फैल गया । सरकारी मशीनरी इस महामारी की पूर्ण उपेक्षा कर रही थी ,सरदार पटेल इस अवसर पर स्वयं- सेवकों का एक दल बनाकर और बोरसद में एक अस्पताल खोलकर गॉव – गॉव घूमकर बरसात और चिलचिलाती धूप की परवाह किए वगैर रोगियों की तीमारदारी में जुट गए और थोडे ही समय में इस महामारी से मुक्ति दिला दी ।
8 अगस्त 1942 को कांगेस के द्वारा अंग्रेजी सरकार के विरोध में ” भारत छोड़ो “ का प्रस्ताव पास किया गया , और महात्मा गॉधी ने “करो या मरो “ का नारा दिया । इसमें सरदार पटेल को गिरतार कर लिया गया और फिर 15 जून 1945 को ही उन्हे रिहा किया गया । 8 मार्च 1947 को उन्होने भी देश- विभाजन का प्रस्ताव भारी मन से स्वीकार किया ।उनका कहना था कि यदि समूचे देश को पाकिस्तान बनने से रोकना है तो देश के विभाजन की मर्मान्तक पीड़ा स्वीकार ही करनी होगी । ।1946 में अन्तरिम सरकार के समय ही 15 में से 12 प्रान्तीय कांग्रेस समितियों नें पटेल को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव किया था लेकिन महात्मा गॉधी की इच्छा के चलते सरदार पटेल ने पंडित नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया । देश के गृह मंत्री होते हुए भी 562 देशी रियासतों का उन्होने जिस ढ़ंग से विलय किया उसमें विस्मार्क जैसी संगठन शक्ति और चाणक्य जैसी दूरदर्शिता दिखाई । महात्मा गॉधी ने स्वत: कहा कि यह कार्य किसी चमत्कार से कम नही है। उनका कहना था कि जब तक भारत को एकता के सूत्र में नही पिरो दूंगा तब तक मरॅगा नही और यह कार्य वास्तव में स्वाधीनता प्राप्ति से भी ज्यादा महत्वपूर्ण था। जरा सोचिए सरदार पटेल न होते तो उस भारत का नक्शा कई रियासतों और बुनियादी अधिकारों से वंचित प्रजा का होता । वस्तुत: सरदार ने ही भारतीय स्वाधीनता को स्थायित्व दिया था। जबकि उनकी उम्र इस समय 70 के ऊपर थी, और वह हृदय रोग के साथ पेट की भयकंर बीमारी से भी ग्रस्त थे। सरदार पटेल का पोता विपिन 21 साल का था, वह अमेरिका में रहकर पढ़ाई कर रहा था। सरदार पटेल के हार्ट अटैक की जानकारी पाकर वह उनसे मिलने आया। सरदार ने उससे कहा कि जब तक मैं इस पद पर हू, यानी गृहमंत्री हू, तुम मुझसे मिलने मत आया करो, अन्यथा तुम्हारा कोई दुरुपयोग करेगा।
सोमनाथ मंिदर जिसे विदेशी आक्राताओं ने बार-बार लूटा था 1024 में महमूद गजनवी ने इसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था । भारत के स्वाधीन हो जाने पर 13 नवम्बर 1947 को सरदार पटेल जब तात्कालीन निर्माण मंत्री श्री गाडगिल के साथ सौराष्ट्र दौरे पर गए तो सोमनाथ मंदिर की दुर्दशा देखकर उनका हृदय रो पड़ा । उन्होंने तत्काल मन्दिर के पुर्ननिर्माण का निर्णय ले लिया जिसका उद्घाटन 11 मई 1951 को स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू ने किया ।यद्यपि सरदार के ऐसे कृत्यो के चलते उन्हे साम्प्रदायिक कहने वालो की कमी नही थी । पर जैसा कि महात्मा गांधी ने स्वत: कहा कि सरदार पटेल तो हीरा है,वह साम्प्रदायिक हो- ही नही सकते ।यहॉ तक कि रफी अहमद किंदवई ने भी कहा कि सरदार साम्प्रदायिक नही राष्ट्रवादी है । अमेरिकी राश्ट्रपति जे.एफ. कैनेडी ने 1956 में भारत को सुरक्षा परिवार की स्थायी सदस्यता थाल में सजाकर भेंट करनी चाही थी, क्योंकि एशिया में कम्युनिस्ट चीन के मुकाबले में वह भारत को मजबूत होते देखना चाहते थे। लेकिन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरु ने अपनी वैश्विक गुट निरपेक्ष नेता की रुमानी छवि के मोहजाल में फंसकर इसे ठुकरा दिया था। इतना ही नहीं चीन के प्रति दीवानगी की हद तक अंधविश्वास रखने वाले नेहरु ने भारत के स्थान पर चीन को सुरक्षा परिशद में प्रवेश देने की मांग कर डाली। सनद है कि सरदार पटेल ने कई साल पहले भी नेहरु को चीन पर बिलकुल भी भरोसा न करने और व्यवहारिकता के साथ अपने देष के हितों की रक्षा करने को कहा था।
अपनी मृत्यु के एक महीने पहले 7 नवम्बर 1950 को सरदार पटेल ने नेहरु को चीन के बारे में आगाह करते हुए पत्र लिखा। इसमें वे लिखते हैं- ”पिछले कुछ महीनों से रुसी रवैए के अतिरिक्त दुनिया में अकेले हम ही हैं, जिसने चीन के संयुक्त राश्ट्र में प्रवेश का समर्थन किया है। अमेरिका, ब्रिटेन के साथ और संयुक्त राश्ट्र में हमने बातचीत और पत्राचार दोनों में चीन के अधिकारों और भावनाओं की रक्षा की है। इसके बाद भी चीन द्वारा हम पर संदेह करने से ही स्पश्ट होता है कि चीन हमें शत्रु मानता है। मुझे नहीं लगता कि हम चीन के प्रति इससे अधिक उदारता दिखा सकते हैं।“
जब सरदार ने यह पत्र लिखा उस समय तिब्बत पर चीन का आक्रमण जारी था। चीन तिब्बत के बारे में कपटपूर्ण बयानबाजी कर रहा था। पटेल तिब्बत की सुरक्षा को भारत की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानते थे। उन्होंने लिखा- ”मैंने पत्राचार (चीन की सरकार, भारत के राजदूत और प्रधानमंत्री नेहरु के मध्य) को ध्यान से उदारतापूर्वक पढ़ा, परन्तु संतोशजनक निश्कर्श पर नहीं पहुंच सका। चीन की सरकार ने शांतिपूर्ण इरादों की घोशणा करके हमें धोखा देने का प्रयास किया है। वे हमारे राजदूत के मन में यह बात बिठाने में सफल हो गए हैं कि चीन तिब्बत मामले का षांतिपूर्ण हल चाहता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस पत्राचार के बीच के समय में चीनी तिब्बत पर भीशण आक्रमण की तैयारी कर रहे हैं। त्रासदी यह है कि तिब्बतियों ने हम पर विश्वास किया है, परन्तु हम उन्हें चीन की कूटनीति और दुश्ट इरादों से बचाने में असफल रहे हैं।“
पत्र में आगे वे कहते हैं ”उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए हमें तिब्बत के विलुप्त होने (चीन द्वारा कब्जा करने) और चीन के हमारे दरवाजे तक आ पहुंचने से नई परिस्थिति पर विचार करना चाहिए। भारत के सम्पूर्ण इतिहास में हमें शायद ही कभी अपने उत्तर-पूर्वी सीमांत की चिंता करनी पड़ी होगी। हिमालय उत्तर में होने वाले किसी भी संभावित खतरे के लिए अभेद्य दीवार सिद्ध हुआ है। (उत्तर में) हमारे पास मैत्रीपूर्ण तिब्बत था, जिसने हमारे लिए कोई समस्या उत्पन्न नहीं की।“
भारत का तिब्बत के साथ भूमि समझौता था, अब चीन तिब्बत पर चढ़ आया है। भारत यदि आगे बढ़कर तिब्बत पर चीनी हमले का विरोध करता तो अमेरिका और पश्चिमी देश भारत का साथ देने को उत्सुक होते। लेकिन प्रधानमंत्री नेहरु चीन के खिलाफ कठोर कदम उठाने के पक्ष में नहीं थे, जिसकी परिणिति 1962 के भारत-चीन युद्ध के रूप में हुई। सरदार ने य़ुद्ध के 12 साल पहले ही आगामी संकट को लेकर चेतावनी दे दी थी। उन्हीं के शब्दों में ”निकट का इतिहास हमें बताता है कि कम्युनिज्म साम्राज्यवाद के विरुद्ध कोई ढाल नहीं है। इस सन्दर्भ में चीन की महत्वाकांक्षा न केवल भारत की ओर के हिमालय के ढालों पर कब्जा करने की है, बल्कि उसकी दृश्टि असम तक है। जब रिपोर्ट समान आई कि चीन भारत के क्षेत्र (लद्दाख) में सड़क बना रहा है तो भी कोई ठोस कार्यवाई नहीं की गई। सेना को साजो-सामान और हथियारों से मोहताज रखा गया। रक्षा कारखानों में कॉफी, कप-प्लेट और सौन्दर्य प्रसाधन बनवाए जा रहे थे। चीन से युद्ध में सेना की कमान नेहरु के करीबी एक ऐसे सैन्य अधिकारी को दी गई थी, जिसे एक दिन भी युद्ध का अनुभव नहीं था और जो बहाना बनाकर दिल्ली के अस्पताल में भर्ती होकर युद्ध का संचालन कर रहा था। सरदार पटेल निहायत दृढ़ और दूरदर्शी थें, उन्होंने पंडित नेहरू से कहा था कि यदि कश्मीर मामला उन्हे दे दिया जाएं तो 15 दिन में सुलझा देंगे । पर ऐसा न होने के कारण काश्मीर कितना बड़ा नासूर बन चुका है । आज उनके जन्मदिन 31 अक्टूवर को जब सरदार सरोवर में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के नाम से जब विश्व में उनकी सबसे ऊँची प्रतिमा का अनावरण प्रधानमंत्री द्वारा किया जा रहा है तो निश्चित रूप से सम्पूर्ण राष्ट्र उनके प्रति उनके किए गये महान कार्यों के प्रति सच्चे अर्थों में अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहा है।

कब मुक्त होगी पुलिस
सिद्धार्थ शंकर
पुलिस महानिदेशकों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव से संबंधित पांच राज्यों द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने काफी पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि पुलिस-प्रशासन का राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होना जरूरी है। मगर ऐसा आज तक नहीं हो पाया है। मौजूदा दौर में भारतीय पुलिस अतिशय राजनीतिक दबाव में है। यहां तक कि विभागीय कामकाज पर भी अब राजनीतिक दबाव देखने को मिलता रहता है। नियुक्तियों एवं स्थानांतरण में तो विशेष रूप से। कहीं-कहीं तो स्थिति इतनी विकट है कि पुलिसकर्मियों की पहचान पुलिस विभाग के कर्मठ अधिकारी के रूप में नहीं बल्कि मंत्रियों के ‘आदमियोंÓ के रूप में की जाती है। अतएव समस्त राजनीतिक दल अपने निजी स्वार्थों के चलते ही पुलिस प्रशासन को एक स्वायत्त संस्था नहीं बनने देना चाहते। वह यह कतई नहीं चाहते हैं कि जिस पुलिस का इस्तेमाल वे अपना हित साधने के लिए करते हैं वह स्वायत्त हो। बात भले ही कड़वी लगे मगर हकीकत यही है कि नेता पुलिस की ताकत को अपने हाथ से नहीं निकलने देना चाहते।
ऐसे कई सवाल हैं जो कि पुलिस को लेकर हमारे मन में उठते हैं। क्या यह वाकई आम लोगों की पुलिस है या नेताओं की? अब आम आदमी के दिमाग में पुलिस की छवि सिर्फ नेताओं को हिफाजत देने वाले की बन गई है। साफ है ऐसी स्थिति में पुलिस स्वायत्तता पर गौर करना आवश्यक है। भारतीय पुलिस स्वतंत्रता के संदर्भ में हमें पश्चिमी देशों से प्रेरणा लेनी चाहिए जहां पर पुलिस तंत्र को स्वतंत्र निष्पक्ष व जनसहयोगी बनाने पर विशेष बल दिया गया है और उसके अनुरूप सुधार भी किए गए हैं। वहां की पुलिस का स्वरूप ऐसा बनाया गया है कि शासन प्रशासन में पर्याप्त दखल रखने वाले भी पुलिस के कार्यों से घबराते हैं। यही कारण है कि वहां की पुलिस राजनीतिक व नौकरशाही के दबाव से मुक्त होकर निष्पक्ष एवं स्वतंत्र रूप से काम कर रही है। हमारे यहां स्थिति इससे बिल्कुल उलट है।
भारत में बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण पुलिस की किरकिरी बढ़ी है और उसकी निष्पक्ष छवि नहीं बन पा रही है। यही कारण है कि आज देश में पुलिस सुधार की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। पुलिस की भूमिका यदि प्रभावी और दबावमुक्त नहीं है तो अराजकता तो बढ़ती ही है साथ ही विकास पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यह आवश्यक है कि पुलिस व्यवस्था में ढांचागत सुधार किया जाए व पुलिस की कार्यशैली को दबावमुक्त बनाने के लिए उसे स्वायत्तता प्रदान की जाए। बहरहाल वर्तमान पुलिस तंत्र में व्यापक सुधार करना सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है। आजादी के सात दशक के बाद भी हमारे देश में अंगे्रजों के समय की 150 साल पुरानी पुलिस व्यवस्था लागू है। अगर इतिहास में झांककर देखें तो पता चलता है पुलिस आज भी 1861 ई. में गोरों द्वारा बनाए गए पुलिस अधिनियम के माध्यम से संचालित होती है। पुलिस प्रशासन का मूल कार्य समाज में अपराध को रोकना एवं कानून व्यवस्था को कायम रखना होता है। ब्रिटिश हुकूमत ने वर्ष 1861 के पुलिस अधिनियम का निर्माण तो भारतीयों के दमन एवं शोषण के मूल उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए किया था। तो दमनकारी एवं शोषणकारी पुलिस अधिनियम के राह पर चलने वाली पुलिस व्यवस्था से आखिर स्वच्छ छवि की परिकल्पना कैसे की जा सकती है? इसी कारण से समाज में पुलिस का चेहरा बदनाम हुआ है। आज समाज के लोगों में क्रूर एवं आराधिक किस्म की पुलिस का चेहरा समा गया है।
ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जिस दिन पुलिसकर्मियों की क्रूर व काली करतूतें पढने या फिर सुनने को न मिलें। दरअसल इसमें पूरी तरह का दोषी इन पुलिसकर्मियों को नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि इन सभी के अंदर भी शोषण एवं दु:ख की एक कहानी दबी हुई होती है। क्रूर एवं निर्दयी पुलिस के दिल की बात जानने पर हमें यह पता चलता है कि वह आखिर ऐसी क्यों बनी? पुलिस वाले भी तो समाज के ही अंग होते हैं। उन्हें भी घूमने टहलने एवं घर परिवार वालों के साथ समय बिताने की इच्छा होती है और इसके लिए उन्हें फुर्सत तो मिल ही नहीं पाती। मिले भी कहां से जब उनसे 18-20 घंटे की नौकरी कराई जाती है। हालांकि, मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार ने पुलिस कर्मियों के साप्ताहिक अवकाश का निर्णय लिया है, जिसे पुलिस के साथ समाज के विभिन्न वर्गों ने सराहा है, लेकिन जरूरत इसे समग्र रूप में लेने की है। मनोविज्ञान यह कहता है कि लगातार काम करने से व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है और अपने मन की खुन्नस दूसरों पर उतारने पर उतारू हो जाता है।
इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए आज देश में पुलिस सुधार की अतिशय आवश्यकता महसूस हो रही है। ऐसा नहीं है कि इस व्यवस्था को बदलने की कोशिश नहीं की गई है। आजादी से लेकर आज तक पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए न जाने कितनी समितियां एवं आयोग गठित किए गए और न जाने कितनी रिपोर्ट सौंपी गईं लेकिन अमल के स्तर पर नतीजा सिफर ही साबित हुआ। अभी तक जितने भी प्रयास किए गए हैं, उनमें राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव देखा गया है। पुलिस सुधार के लिए कई समितियों और आयोगों का गठन किया गया और इन सबने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी पर उन पर कोई अमल ही नहीं किया। 1996 में पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह और एनके सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल लगाकर यह अनुरोध किया था कि केंद्र एवं राज्य सरकारें 1979 के राष्ट्रीय पुलिस आयोग (एनपीसी) रिपोर्ट को लागू करें। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1998 में पूर्व पुलिस अधिकारी रिबेरो कमेटी गठित कर दी और उसने अपनी रिपोर्ट 1999 में दे दी। इसके बाद पद्मनभैया कमेटी का गठन किया गया, जिसने वर्ष 2000 में रिपोर्ट दी।
यह सही है कि कानून व्यवस्था राज्य सूची में होने के कारण ज्यादातर पुलिस राज्य सरकारों के अधीन होती है और राज्यों में पुलिस व्यवस्था पर पूरी तरह राजनीतिक प्रभाव होता है। राज्य में जैसी सरकार होगी वैसी ही उसकी पुलिस भी होगी। आज ऐसी पुलिस की आवश्यकता है जो राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त हो तथा जनतांत्रिक हो।

भूख की लाइलाज बीमारी का उपचार
हेमेन्द्र क्षीरसागर
अन्न खाये मन भर छोड़ेना कन भर। अब मंदातों के कारण उलट अन्न खाये कन भर छोड़ो मन भर हो गया। विभीषिका, कोई खां-खां के मरता है तो भूख रहकर यह दंतकथा प्रचलित होने के साथ फलीभूत भी है। ये दोनों ही हालात में भूख को लाइलाज बीमारी बनाने में मददगार है। लिहाजा, भूख और कुपोषण एक सिक्के के दो पहलु हैं। जहां तक कुपोषण की बात करे तो कुपोषण एक बुरा पोषण होता हैं। इसका संबंध आवश्यकता से अधिक हो या कम किवां अनुचित प्रकार का भोजन, जिसका शरीर पर कुप्रभाव पडता हैं। वहीं बच्चों में कुपोषण के बहुत सारे लक्षण होते है। जिनमें से अधिकांश अज्ञानता, गरीबी, भूखमरी और कमजोर पोषण से संबंधित हैं।
दुर्भाग्य जनक, गिरफ्त आऐ बच्चे अपनी पढाई निरंतर जारी नहीं रख पाते और गरीबी के दोषपूर्ण चक्र में फंस जाते हेैं। कुपोषण का प्रभाव प्रौढावस्था तक अपनी जडें जमाए रखता हैं। प्राय: देखा गया है कि भारत में कुपोषण लडकों की अपेक्षा लडकियों में अधिक पाया जाता हैं। और अनिवार्यत: इसका कारण है घर पर लडकियों के साथ किया जाने वाला भेदभाव या पक्षपात। निर्धन परिवारों में और कुछ अन्य जातियों में लडकियों का विवाह छोटी आयु में ही कर दिया जाता हैं। जिससे 14 या 15 वर्ष की आयु में ही बच्चा पैदा हो जाता हैं। ऐसा बच्चा प्राय: सामान्य से काफी कम भार का होता हैं। जिससे या तो वह मर जाता है अथवा उसका विकास अवरूद्ध हो जाता हैं। इससे भी अधिक खतरा इस बात का होता हैं कि शीघ्र गर्भाधान के कारण लडकी का जीवन संकट में आ जाता हैं।
सामान्य रूप से भारत में बच्चों की पोषण संबंधी स्थिति एक चिंता का विषय हैं। यूनेस्को की रिर्पोट में भारत में कुपोषण सब-सहारा अफ्रीका की तुलना में अधिक पाया था। मुताबिक विश्व के एक तिहाई कुपोषित बच्चे भारत में ही पाए गए। कुपोषण बच्चे के विकास तथा सीखने की क्षमता को अवरूद्ध कर देता हैं। इससे बच्चों की मृत्यु भी हो सकती हैं। अमुमन जिन बच्चों की बचपन में मृत्यु हो जाती है उनमें 50 फीसद बच्चे कुपोषण के कारण मरते हैं। भारत में तीन वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों में से 46 प्रतिशत अपनी आयु की दृष्टि से बहुत छोटे लगते हैंए लगभग 47 प्रतिशत बच्चे कम भार के होते हैं और लगभग 16 प्रतिशत की मृत्यु हो जाती हैं। इनमें बहुत सारे बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित होते हैं। कुपोषण की व्यापकता राज्यों में अलग-अलग हैं।
दरअसल, हमारे देश में पोषण एक मात्र पेट भरने का तरीका है चाहे वह किसी भी तरह से क्यों ना हो भूख मिटना चाहिए। उसके लिए कुछ भी खाना क्यों ना पडे पोषक तत्वों की फ्रिक किसे हैं। हो भी क्यों क्योंकि भूख की तृष्णा शांत करने के लिए इंसान कुछ भी करने को आमदा हो जाता हैं। आखिर! भूख दुनिया की सबसे बडी लाइलाज बिमारी जो बनते जा रही हैं। इसी जद्दोजहाद में भिक्षावृत्ति, वेष्यावृत्ति, बाल मजदूरी और चोरी करना आम बात हो गई हैं। इसमें बची कुची कसर भूखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी, रूढिवादिता, व्यसन, दिखास और असम्यक प्राकृतिक आपदाऐ पूरी कर देती हैं।
बदतर, सवाल यह उत्पन्न होता हैं कि आम इंसान दो वक्त की रोटी कहां से जुगाड करें। किविदंती सरकारों, हुक्मरानों या भगवान भरोसे रहे किवां खाली पेट रहकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दे यह कोई समस्या का सर्वमान्य निदान नहीं हैं। हमें समाधान में समस्या नहीं, समस्या में समाधान खोजना होगा। वह समाधान मिलेगा कृषि और स्वरोजगार के संवहनीय आजीविका के साधनों में। जरूरत हैं तो खेती में सम्यक् आमूलचूल परिवर्तन तथा निचले स्तर तक रोजगार के संसाधन विकसित करने की। वह आएगा, जल-जंगल-जमीन-पशुधन के संरक्षण और संर्वधन से। अभिष्ठ खेती और पंरपरागत व्यवसायों में कौशल विकास का अभिवर्द्धन ऐसा साधन हैं जो सभी को भूख से बचा सकती हैं। जरूरत है तो भूख मिटाने के वास्ते भोजन के प्रकार नहीं आहार पर ध्यान देते हुए हाथों में काम दिलाने की पहल से भूख की लाइलाज बीमारी का उपचार होगी।

भाजपा पर लगा ब्रेक
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
मैंने कल लिखा था कि हरयाणा और महाराष्ट्र के चुनावों में यदि भाजपा को प्रचंड बहुमत याने क्रमशः 75 और 240 सीटें मिल गईं तो भाजपा सरकारें ऐसी हो जाएंगी, जैसे बिना ब्रेक की गाड़ी हो जाती है लेकिन दोनों प्रदेशों की जनता को अब भाजपा की ओर से धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि उसने भाजपा की गाड़ी पर ब्रेक लगा दिया है। दोनों प्रदेशों में भाजपा ने सीटें खोई हैं। हरयाणा में तो उसे साधारण बहुमत भी नहीं मिला है और इस बार शिव सेना के साथ गठबंधन करने के बावजूद उसकी सीटें काफी घट गई हैं। यह ठीक है कि महाराष्ट्र में सरकार बनाने लायक सीटें भाजपा गठबंधन को मिल गई हैं। हरयाणा में भी जोड़-तोड़ करके सरकार बनाना उसके लिए ज्यादा कठिन नहीं होगा। गोवा, कर्नाटक और अरुणाचल के उदाहरण हमारे सामने हैं लेकिन ऐसी सरकारें कितनी जन-सेवा कर पाएंगी, इसका अंदाजा हम लगा सकते हैं। उनके सिर पर अस्थिरता की तलवार बराबर लटकती रहती है। महाराष्ट्र में शिव सेना को भाजपा के मुकाबले बेहतर सफलता मिली है। उसकी कीमत वह जरुर वसूलेगी। वह तो अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी लेकिन शायद वह उप-मुख्यमंत्री का पद लेकर चुप हो जाए लेकिन यह निश्चित है कि उनमें तनाव सदा बना रहेगा। इसी आपसी कहा-सुनी का दुष्परिणाम इन दोनों पार्टियों को महाराष्ट्र की जनता ने भुगता दिया है। दोनों प्रदेशों की जनता से ‘एक्जिट पोल’ वालों ने जो उम्मीदें रखी थीं, वे बिल्कुल गलत साबित हुई हैं और यह बात भी गलत साबित हुई है कि हमारी जनता भाजपा को सिर पर बिठाने के लिए मजबूर है। दोनों प्रदेशों की जनता ने दिखा दिया है कि वह मजबूर नहीं है। उसने भाजपा के कान उमेठ दिए हैं। उस पर भाजपा और कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का असर बिल्कुल भी नहीं दिखा। अगर वह दिखता तो कांग्रेस का सूंपड़ा साफ हो जाता और दोनों प्रदेशों में भाजपा को अपूर्व बहुमत मिल जाता। मोदी ने चुनाव के एक दिन पहले पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक (फर्जीकल) का दांव मारा लेकिन वह बेकार हो गया और राहुल गांधी का जो हाल पहले था, वह अब भी जारी रहा। दूसरे शब्दों में महाराष्ट्र और हरयाणा के चुनाव प्रादेशिक नेतृत्व और प्रादेशिक मुद्दों पर ही हुए हैं। हरयाणा में जातिवाद की दस्तक भी जोरदार रही। अब दिल्ली प्रदेश के चुनाव सिर पर हैं। पता नहीं, भाजपा और कांग्रेस का यहां हश्र कैसा होगा। केंद्र सरकार के लिए अब कठिनाई का दौर शुरु हो गया है। आशा है, अब वह कुछ सबक लेगी।

असमंजस में मीडिया की दुनिया
प्रो. संजय द्विवेदी
मीडिया की दुनिया में आदर्शों और मूल्यों का विमर्श इन दिनों चरम पर है। विमर्शकारों की दुनिया दो हिस्सों में बंट गयी है। एक वर्ग मीडिया को कोसने में सारी हदें पार कर दे रहा है तो दूसरा वर्ग मानता है जो हो रहा वह बहुत स्वाभाविक है तथा काल-परिस्थिति के अनुसार ही है। उदारीकरण और भूमंडलीकृत दुनिया में भारतीय मीडिया और समाज के पारंपरिक मूल्यों का बहुत महत्त्व नहीं है।
एक समय में मीडिया के मूल्य थे सेवा, संयम और राष्ट्र कल्याण। आज व्यावसायिक सफलता और चर्चा में बने रहना ही सबसे बड़े मूल्य हैं। कभी हमारे आदर्श महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, विष्णुराव पराड़कर, माखनलाल चतुर्वेदी और गणेशशंकर विद्यार्थी थे, ताजा स्थितियों में वे रुपर्ट मर्डोक और जुकरबर्ग हों? सिद्धांत भी बदल गए हैं। ऐसे में मीडिया को पारंपरिक चश्मे से देखने वाले लोग हैरत में हैं। इस अंधेरे में भी कुछ लोग मशाल थामे खड़े हैं, जिनके नामों का जिक्र अकसर होता है, किंतु यह नितांत व्यक्तिगत मामला माना जा रहा है। यह मान लिया गया है कि ऐसे लोग अपनी बैचेनियों या वैचारिक आधार के नाते इस तरह से हैं और उनकी मुख्यधारा के मीडिया में जगह सीमित है। तो क्या मीडिया ने अपने नैसर्गिक मूल्यों से भी शीर्षासन कर लिया है, यह बड़ा सवाल है।
सच तो यह है भूमंडलीकरण और उदारीकरण इन दो शब्दों ने भारतीय समाज और मीडिया दोनों को प्रभावित किया है। 1991 के बाद सिर्फ मीडिया ही नहीं पूरा समाज बदला है, उसके मूल्य, सिद्धांत, जीवनशैली में क्रांतिकारी परिर्वतन परिलक्षित हुए हैं। एक ऐसी दुनिया बन गयी है या बना दी गई है जिसके बारे में काफी कुछ कहा जा चुका है। आज भूमंडलीकरण को लागू हुए तीन दशक होने जा रहे हैं। उस समय के प्रधानमंत्री श्री पीवी नरसिंह राव और तत्कालीन वित्तमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने इसकी शुरुआत की तबसे हर सरकार ने कमोबेश इन्हीं मूल्यों को पोषित किया। एक समय तो ऐसा भी आया जब श्री अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में जब उदारीकरण का दूसरा दौर शुरू हुआ तो स्वयं नरसिंह राव जी ने टिप्पणी की “हमने तो खिड़कियां खोली थीं, आपने तो दरवाजे भी उखाड़ दिए।” यानी उदारीकरण-भूमंडलीकरण या मुक्त बाजार व्यवस्था को लेकर हमारे समाज में हिचकिचाहटें हर तरफ थी। एक तरफ वामपंथी, समाजवादी, पारंपरिक गांधीवादी इसके विरुद्ध लिख और बोल रहे थे, तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी अपने भारतीय मजूदर संघ एवं स्वदेशी जागरण मंच जैसे संगठनों के माध्यम से इस पूरी प्रक्रिया को प्रश्नांकित कर रहा था। यह साधारण नहीं था कि संघ विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी ने वाजपेयी सरकार के वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा को ‘अनर्थ मंत्री’ कहकर संबोधित किया। खैर ये बातें अब मायने नहीं रखतीं। 1991 से 2019 तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है और सरकारें, समाज व मीडिया तीनों ‘मुक्त बाजार’ के साथ रहना सीख गए हैं। यानी पीछे लौटने का रास्ता बंद है। बावजूद इसके यह बहस अपनी जगह कायम है कि हमारे मीडिया को ज्यादा सरोकारी, ज्यादा जनधर्मी, ज्यादा मानवीय और ज्यादा संवेदनशील कैसे बनाया जाए। व्यवसाय की नैतिकता को किस तरह से सिद्धांतों और आदर्शों के साथ जोड़ा जा सके। यह साधारण नहीं है कि अनेक संगठन आज भी मूल्य आधारित मीडिया की बहस से जुड़े हुए हैं। जिनमें ब्रह्मकुमारीज और प्रो. कमल दीक्षित द्वारा चलाए जा रहे ‘मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति’ के अभियानों को देखा जाना चाहिए। प्रो. दीक्षित इसके साथ ही ‘मूल्यानुगत मीडिया’ नाम की एक पत्रिका का प्रकाशन भी कर रहे हैं। जिनमें इन्हीं विमर्शों को जगह दी जा रही है।
इस सारे समय में पठनीयता का संकट, सोशल मीडिया का बढ़ता असर, मीडिया के कंटेट में तेजी से आ रहे बदलाव, निजी नैतिकता और व्यावसायिक नैतिकता के सवाल, मोबाइल संस्कृति से उपजी चुनौतियों के बीच मूल्यों की बहस को देखा जाना चाहिए। इस समूचे परिवेश में आदर्श, मूल्य और सिद्धांतों की बातचीत भी बेमानी लगने लगी है। बावजूद इसके एक सुंदर दुनिया का सपना, एक बेहतर दुनिया का सपना देखने वाले लोग हमेशा एक स्वस्थ और सरोकारी मीडिया की बहस के साथ खड़े रहेंगे। संवेदना, मानवीयता और प्रकृति का साथ ही किसी भी संवाद माध्यम को सार्थक बनाता है। संवेदना और सरोकार समाज जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यक है, तो मीडिया उससे अछूता कैसे रह सकता है।
सही मायने में यह समय गहरी सांस्कृतिक निरक्षता और संवेदनहीनता का समय है। इसमें सबके बीच मीडिया भी गहरे असमंजस में है। लोक के साथ साहचर्य और समाज में कम होते संवाद ने उसे भ्रमित किया है। चमकती स्क्रीनों, रंगीन अखबारों और स्मार्ट हो चुके मोबाइल उसके मानस और कृतित्व को बदलने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में मूल्यों की बात कई बार नक्कारखाने में तूती की तरह लगती है। किंतु जब मीडिया के विमर्शकार,संचालक यह सोचने बैठेंगे कि मीडिया किसके लिए और क्यों- तब उन्हें इसी समाज के पास आना होगा। रूचि परिष्कार, मत निर्माण की अपनी भूमिका को पुनर्परिभाषित करना होगा। क्योंकि तभी मीडिया की सार्थकता है और तभी उसका मूल्य है । लाख मीडिया क्रांति के बाद भी ‘भरोसा’ वह शब्द है जो आसानी से अर्जित नहीं होता। लाखों का प्रसार आपके प्राणवान और सच के साथ होने की गारंटी नहीं है। ‘विचारों के अनुकूलून’ के समय में भी लोग सच को पकड़ लेते हैं। मीडिया का काम सूचनाओं का सत्यान्वेषण ही है, वरना वे सिर्फ सूचनाएं होंगी-खबर या समाचार नहीं बन पाएंगी।
कोई भी मीडिया सत्यान्वेषण की अपनी भूख से ही सार्थक बनता है, लोक में आदर का पात्र बनता है। हमें अपने मीडिया को मूल्यों, सिद्धांतों और आदर्शों के साथ खड़ा करना होगा, यह शब्द आज की दुनिया में बोझ भले लगते हों पर किसी भी संवाद माध्यम को सार्थकता देने वाले शब्द यही हैं। सच की खोज कठिन है पर रुकी नहीं है। सच से साथ खड़े रहना कभी आसान नहीं था। हर समय अपने नायक खोज ही लेता है। इस कठिन समय में भी कुछ चमकते चेहरे हमें इसलिए दिखते हैं क्योंकि वे मूल्यों के साथ, आदर्शों की दिखाई राह पर अपने सिद्धांतों के साथ डटे हैं। समय ऐसे ही नायकों को इतिहास में दर्ज करता है और उन्हें ही मान देता है। आइए भारतीय मीडिया के पारंपरिक अधिष्ठान पर खड़े होकर हम अपने वर्तमान को सार्थक बनाएं।

फेल होते शिक्षक और अक्षर ज्ञान से दूर होते बच्चे
डॉ अजय खेमरिया
मप्र में हजारों सरकारी शिक्षक दक्षता संवर्धन परीक्षा में फेल हो गए तब जबकि उन्हें किताब अपने साथ ले जाकर इस परीक्षा के जबाब लिखने थे।फेल होने वाले प्रदेश की सरकारी माध्यमिक शालाओं यानी मिडिल स्कूलों में पदस्थ है।समझा जा सकता है कि जिस राज्य के मिडिल स्कूल के शिक्षक किताब में से देखकर भी परीक्षा पास नही कर सकते है उस राज्य में बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता किस दर्जे की होगी।मप्र की सरकार ने यह दक्षता परीक्षा उन शिक्षकों के लिये आयोजित की थी जिनके स्कूलों से निकलकर बच्चे नजदीकी हाईस्कूलों में दाखिल हुए थे और इस साल उन स्कूलों का हाईस्कूल रिजल्ट 30 फीसदी से कम रहा था।अफसरों ने माना था कि हाईस्कूलों का रिजल्ट इसलिये बिगड़ा है क्योंकि मिडिल स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान नही दिया गया है यहां पदस्थ सरकारी शिक्षक अध्यापन में दक्ष नही है।इस परीक्षा को आयोजित करते समय प्रदेश की शिक्षा आयुक्त ने दावा किया था कि जो शिक्षक पर में फेल होंगे उनके विरुद्ध अनिवार्य सेवा निवृत्त की करवाई की जाएगी।बाद में सरकार ने इस महीने अक्टूबर में फिर से अलग अलग तारीखों में परीक्षाओं का आयोजन किया उसमें भी जून की तरह बड़ी संख्या में सरकारी शिक्षक फेल हो गए।अब सरकार क्या अनुशासनात्मक करवाई करेगी यह देखना होगा।लेकिन सवाल प्रदेश की समग्र नीति पर भी उठ रहे है।शिक्षकों के अपने तर्क है उनका कहना है कि जब 2009 के शिक्षा गारंटी कानून में किसी भी बच्चे को फेल नही करने के प्रावधान है तब वह कैसे बच्चों को अगली कक्षा में जाने से रोक सकते है?2009 के आरटीई कानून में मिडिल तक शालेय बच्चों को ग्रेडिंग करने का प्रावधान था इसके पीछे मूल वजह मासूम बच्चों को अंकों की अंधी प्रतिस्पर्धा से दूर रखकर उनका स्वाभाविक विकास करना था।आरटीई के तहत गांव के हर बच्चे का शाला में प्रवेश कराया जाना अनिवार्य है इसके लिये हर गांव का विलेज एजुकेशन रजिस्टर तैयार किया जाता है जिसमें 06 से 14 साल तक के प्रत्येक बच्चे का रिकार्ड रखा जाना है।मप्र में अब हर बच्चे की समग्र आईडी जारी की गई है जिसे समग्र ऑनलाइन पोर्टल पर देखा जा सकता है।0 से 6 साल के सभी बच्चों का रिकॉर्ड गांव कस्बे की आंगनबाड़ी में रखा जाता है जैसे ही बच्चे की आयु 6 वर्ष होती है उसकी सूचना संबंधित शाला के वीइआर यानी विलेज एजुकेशन रजीस्टर में दर्ज हो जाती है।संख्यात्मक पंजीयन के लिये यह सिस्टम भले ही कारगर लगता हो लेकिन बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता के लिहाज से यह बेहद ही खराब साबित हुआ है क्योंकि सरकारी शिक्षक के हाथ पूरी तरह से बंधे हुए है उसकी पहली प्राथमिकता अपनी शाला क्षेत्र के सभी बच्चों को शाला में पंजीकृत करना है ऐसा न करने पर उसके विरुद्ध अफसरों की करवाई का भय है।दूसरा हर बच्चे को अगली शाला में प्रोन्नत करना ही था इसलिए आज मप्र के लाखों बच्चें मिडिल पास करने के बाद भी अक्षर ज्ञान और गणित की प्राथमिकी तक से वाकिफ नही है।कमजोर बच्चों के लिये ग्रीष्मावकाश में अलग से विशेष कक्षाओं के प्रावधान भी है।लेकिन व्यवहार में ग्रामीण शालेय शिक्षा आज बुरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है।मंत्रालय में बैठे अफसर पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन में आदर्श लगने वाले नित नए प्रयोग सिस्टम के साथ करते रहते है।नवाचार के नाम पर पिछले 25 सालों में बुनियादी शिक्षा के ढांचे को पूरी तरह से प्रयोगशाला की तरह लिया गया।सबसे ज्यादा नुकसान तो मध्यान्ह भोजन और इसमें छिपी लूट के सुगठित रैकेट ने पहुचाया है।कभी शाला विकास समितियों,पालक शिक्षक संघ,फिर जनभागीदारी समिति जैसे प्रयोग कर इन समितियों के माध्यम से स्कूलों में स्थानीय राजनीति का प्रवेश कराया गया क्योंकि सरकारी धन इन्ही के माध्यम से खर्च किया जा रहा है।पहले स्कुलों में सिर्फ पढ़ने पढ़ाने का काम होता था आज स्कुलों में भोजन निर्माण,गणवेश वितरण,स्थानीय विकास के लिये मारामारी होती है।दूसरी तरफ 85 फीसदी गांवों में शिक्षक निवास नही करते है वे पास के कस्बे या शहर में रहते है।जाहिर है स्कूलों में शिक्षक भी समय पर नही आते है।सरकार के लगभग सभी सर्वे शिक्षकों के माध्यम से ही होते है एक गांव में अगर दो मतदान केंद्र है तो दो शिक्षक तो बीएलओ की ड्यूटी में ही हमेशा व्यस्त रहते है।मप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने शिक्षाकर्मी ,गुरुजी,की भर्ती स्थानीय निकायों से इसलिये कराई थी ताकि शिक्षकों को गांव के बाहर या शहर से न आना पड़े।लेकिन इस अच्छी सोच को शिक्षकों ने भी तिरोहित कर दिया आज हकीकत यही है कि गांवों में मजबूरी में ही कोई शिक्षक निवास करता है।
स्कूलों में आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है 80 फीसदी स्कूलों में बिजली कनेक्शन नही है।शिक्षा के अधिकार कानून से नए स्कूल तो हर जगह खोल दिये गए लेकिन उनमें न शिक्षक है न कोई अन्य सुविधाएं।शालेय शिक्षा में लगातार बढ़ता बजट असल मे उच्च अफसरशाही और नेताओं के लिये दुधारू साबित हो रहा है।इसलिये नित नए प्रयोग हो रहे है जिनकी आड़ में अरबों रुपये अब तक खर्च हो चुके है।मसलन 1999 में मप्र में हेड स्टार्ट नाम की योजना शुरू हुई जिसमें गांव गांव कम्प्यूटर रखवा दिए गए जबकि न इन स्कूलों में बिजली थी न इन्हें चलाने वाले ऑपरेटर।कभी शाला पुस्तकालय,कभी स्मार्ट क्लास,कभी आर ओ वाटर,कभी व्यावसायिक निपुणता, कभी कौशल विकास,कभी अंग्रेजी कौशल ,कभी फिट इंडिया जैसे नित प्रयोग असल मे अफसरों के लिये कुबेर के खजाना साबित हो रहे है।क्योंकि सब खरीदारी केंद्रीयकृत ही होती है और शिक्षको पर थोप दी जाती है।
अक्षर ज्ञान तक से दूर लाखों बच्चों की यह संख्या और किताब से नकल तक न उतार पाने वाले शिक्षकों के युग्म से कैसा भविष्य गढा जा रहा है?यह आसानी से समझा जा सकता है।

सावरकर पर सबर कर
ओमप्रकाश मेहता
कम से कम हमारे शहीदों को तो बख्शों…..? भारत की राजनीति का स्तर अब कौन से पाताल लोक में ले जाया जाएगा, यह आम आदमी की समझ से परे है, क्योंकि आज के राजनेता अपने किए गए कार्यों पर नहीं शहीदों के नाम पर वोट मांगने लगे है, केन्द्र में मौजूदा सत्ताधारी दल ने अब तक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को राजनीति का मोहरा बना रखा था, किंतु अब अपनी राजनीतिक स्वार्थसिद्धी के लिए आजादी के शहीदों का कद उनके ही क्षेत्रों में जाकर उनके नाम पर वोट की फसल काटने के उद्देश्य से उनका कद छोटा किया जा रहा है, जिसका ताजा उदाहरण देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी द्वारा महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव हेतु जारी संकल्प पत्र में महाराष्ट्रीयन शहीद विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) को ‘भारतरत्न’ की पदवी से सम्मानित करने का वादा करना है और प्रधानमंत्री द्वारा महाराष्ट्र चुनाव प्रचार में इस वादे का बार-बार जिक्र करना है।
वीर सावरकर को छिछली राजनीति को मोहरा बनाने से न सिर्फ सावरकर जी के जीवन से जुड़ी वे किस्से-कहानियां उजागर की गई जो उन्हें विवादित व निंदा का पात्र बनाती है, बल्कि उनकी गरिमा भी कम करती है। जबकि पूरे देश में वीर सावरकर एक सर्वमान्य स्वतंत्रता सेनानी रहे है, जिनकी महात्मा गांधी ने भी तारीफ की थी, अब उनको राजनीति का मोहरा बनाने के बाद उन्हें बापू की हत्या का साझेदार तक कहा जा रहा है, जबकि देश की नई पीढ़ी सावरकर जी के ऐसे किसी इतिहास को नहीं जानती थी और वे नई पीढ़ी के भी प्रेरणा स्त्रोत रहें, किंतु अब वही नई पीढ़ी उन्हें अब किस नजरिये से देखने लगी है, यह किसी से भी छुपा नहीं है?
दूसरे भारतीय जनता पार्टी ने अपनी स्वार्थ लिप्सा के कारण शहीदों को राष्ट्रीय परीधि से निकालकर क्षेत्रीय खांचे में डालने का भी प्रयास किया है, जो सावरकर जी पूरे देश के स्वातंत्र्य इतिहास के प्रमुख पात्र थे, अब उन्हें क्षेत्रवाद का अंग बना दिया, यही स्थिति चलती रही तो वीर सुभाष पश्चिमी बंगाल तक, चन्द्रशेखर आजाद मध्यप्रदेश तक और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई उत्तरप्रदेश तक सीमित होकर रह जाएगी, क्योंकि अब इन प्रसिद्ध शहीदों के परिजनों ने भी अपने पूर्वज शहीदों के लिए ‘भारतरत्न’ की मांग शुरू कर दी है, तो यह देश पसंद करेगा? यदि यही सिलसिला जारी रहा तो प्रत्येक शहीद के मौजूदा परिजन अपने-अपने पूर्वज शहीद के लिए देश के सर्वोच्च सम्मान की मांग करेंगे, या उस वक्त का इंतजार करंेगे जब उनके क्षेत्र में लोकसभा या विधानसभा का चुनाव हो और राजनीतिक दल उनके शहीद पूर्वजों को ‘भारतरत्न’ देने का वादा अपने संकल्प पत्र में करें? और यदि यह चलन पूरे देश में शुरू हो गया तो शहीद पूर्वजों की आत्माएंे आज की राजनीति व उनके नेताओं को कैसी दुआएं या बददुआऐं देगी?
जब देश में सत्तारूढ़ पार्टी व उसके दिग्गज नेता अपने चुनाव प्रचार का माध्यम इस स्तर पर लाकर खड़ा कर रहे है तो फिर दूसरे क्षेत्रीय या जिलास्तरीय दल कौन से हथकण्डे अपनाएगें इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है, फिर जो राष्ट्रीय दल यह शहीदी हथकण्डा अपना रहा है, वह पिछले साढ़े पांच सालों से देश की सत्ता पर काबिज है, क्या इन सढ़सठ महीनों में उसने कोई ऐसा कार्य नहीं किया, जिसे वह चुनावी मुद्दा बना पाए? जहां तक तीन तलाक या जम्मू-कश्मीर से धारा-370 खत्म करने का सवाल है, वही भी एक सम्प्रदाय व क्षेत्र विशेष में चर्चित है ही, क्योंकि तीन तलाक व जम्मू-कश्मीर से जुड़े लोगों की आवाजें ही सतह पर कहा आ पा रही है, वास्तव में तो सत्तारूढ़ दल की इन उपलब्धियों के सही मूल्यांकनकर्ता ये ही लोग है, हाँ, सत्तारूढ़ दल के लिए बेरोजगारी महंगाई, उन्मूलन, आर्थिक सुधार जैसे मुद््दें चुनावी मुद्दे बन सकते थे, किंतु इन क्षेत्रों में कुछ हो ही नहीं पाया तो इसमें बैचारे सावरकर जी या अन्य शहीदों का क्या दोष?
इस तरह कुल मिलाकर एक प्रदेश की सत्ता बरकरार रखने के लिए शहीदों पर राजनीति को ठीक नहीं कहा जा सकता, शायद इस मामले में भाजपा के सहयोगी दल शिवसेना के प्रमुख का सवाल सही है कि ‘‘वीर सावरकर जी को भाजपाने अभी तक याने पिछले पांच साल में सर्वोच्च सम्मान क्यों नहीं दिया’’?

जिसकी लाठी उसकी भैंस
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
यह बात सनातन सत्य हैं की हर युग में शासकों ने अपने अपने कार्यकाल में अपने निजियों ,सम्बन्धियों और विचार धाराओं वालों का उपकृत किया था और यह जरुरी भी होता था ,कारण वे उस शासक के भक्त /पिछलग्गू हो जाते थे। जिनको राजाश्रय मिलता था उनका सम्मान स्वाभाविक रूप से समाज , सत्ता में बढ़ जाता था। उनकी क़द्र भी होने लगती हैं।
स्वामीप्रसादः सम्पदं जनयति न पुनरभिजात्यम पाण्डित्यं वा !
स्वामी की प्रसन्नता से सम्पत्ति प्राप्त होती हैं ,कुलीनता और बुद्धिमत्ता से नहीं।
इसी कारण शासक लोगों के यहाँ चाटुकारों ,कवियों की होड़ लगी रहती थी की कौन कितने नजदीक पहुंचे और वे नवरत्नों में गिने जावे। यह क्षेत्र इतना व्यापक होता हैं की इसमें शासक की कृपादृष्टि होना अनिवार्य हैं। बिना राजा के प्रसन्नता से कुछ नहीं होता और जो राजा द्वारा दण्डित होता हैं वह सब जगह से तिरस्कृत होता हैं जैसे चिदंबरम।
वर्तमान शासन इस बात पर कटिबद्ध हैं की जब तक सत्ता शीन हैं जितने अधिक से अधिक लोगों को कृतार्थ कर दे जिससे आगामी काल में शासक के गुणगान करने वाले पुरुस्कृत तो कम से कम रहेंगे। कारण कोई भी किसी को खुश नहीं कर सकता हैं। जैसे गुलाब के फूल को आप प्रेमिका के गालों में सैंकड़ों बार रगड़ों तो उसे घाव हो जायेगा। हालांकि वह गुलाब का फूल हैं। इसी प्रकार सरकार से सब खुश नहीं रह सकते। विपक्ष तो कभी नहीं पर पक्षधर भी नहीं हो पाते.
जिनको मंत्री पद दिया गया था उनका पत्ता साफ़ कर दिया गया तो वे अप्रतक्ष्य में नाराज़ हो जाते हैं ,इसका मतलब संतुष्टि की कोई सीमा या बंधन नहीं हैं। वर्तमान में सरकारी सम्मान बहुत दरियादिली से बांटे या दिए जा रहे हैं ,इस कारण उनका महत्व कुछ कम होता जा रहा हैं। राजनैतिक ,सामाजिक ,साहित्यिक ,धार्मिक वैज्ञानिक क्षेत्रों में काम करने वाले बहुत होते हैं पर सबको सम्मानित करना संभव नहीं हैं पर उनको सम्मान मिल जाता हैं जो केंद्र के नजदीक होते हैं। अन्यथा परिधि में तो सभी चक्कर लगा रहे हैं।
अब तो सरकार भारत के सर्वोच्च सम्मान उनको भी देने में चूक नहीं कर रही हैं जिनका तत्समय शासन के विरोध में गतिविधियां रही और जिनको उस कारण कारावास भोगना पड़ा पर वर्तमान में उस विचार धारा के कारण वे पूजनीय हो गए। इस आधार पर सरकार चाहे तो अपनी विचार धारा को मानने वालों को कृतार्थ करने में कोई विलम्ब न करे। सरकार के पास लगभग १०० -१५० वर्ष का पूरा इतिहास हैं उनमे से चुनाव करना संभवतः कठिन नहीं होगा। सूची मै दे सकता हूँ पर वो मान्य हो यह कोई जरुरी नहीं हैं।
अभी बहुत समय हैं सरकार के पास कारण वर्तमान सरकारको लगभग ५० वर्षतक शासन करनेलक्ष्य हैं ,उस अवधि तक भारत देश पुरूस्कार /सम्मान प्रधान देश माना जायेगा और जो पुरुस्कृत होंगे वे निश्चित ही सरकार के कृपा पात्र रहेंगे। जो स्वर्गीय हो चुके हैं उनको भी पुनर्जीवित किया जा सकेगा।
हम नित नए नामों की सूची का इंतज़ार करेंगे।

लंदन में नए दक्षिण एशिया का सपना
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कल सुबह लंदन से मैं दिल्ली के लिए रवाना होउंगा। इस दस दिन के प्रवास में ‘दक्षिण एशियाई लोक संघ’ (पीपल्स यूनियन ऑफ साउथ एशिया) का मेरा विचार यहां काफी जड़ पकड़ गया है। पड़ौसी देशों के ही नहीं, ब्रिटेन और इजरायल के कई भद्र लोगों ने भी सहयोग का वादा किया है। उनका कहना था कि इस तरह के क्षेत्रीय संगठन दुनिया के कई महाद्वीपों में काम कर रहे हैं लेकिन क्या वजह है कि दक्षिण एशिया में ऐसा कोई संगठन नहीं है, जो इसके सारे देशों के लोगों को जोड़ सके। मेरा सुझाव था कि दक्षेस (सार्क) के आठ देशों में बर्मा, ईरान, मोरिशस और मध्य एशिया की पांचों राष्ट्र- उजबेकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किरगिजिस्तान और ताजिकिस्तान को भी जोड़ लिया जाना चाहिए। ये सभी राष्ट्र वृहद आर्यावर्त्त के हिस्से सदियों से रहे हैं। ये एक बड़े परिवार की तरह हैं। यदि यूरोप के परस्पर विरोधी और विभिन्न राष्ट्र जुड़कर यूरोपीय संघ बना सकते हैं तो हम एक दक्षिण एशियाई संघ क्यों नहीं बना सकते ? एक सुझाव यह भी है कि इस संघ में संयुक्त अरब अमारात के सातों देशों को भी क्यों नहीं जोड़ा जाए ? मुझे आश्चर्य यह हो रहा है कि दक्षिण एशिया के इस महासंघ को खड़ा करने में लंदन के लोगों में इतना उत्साह कहां से आ गया है ? शायद यह इसीलिए है कि दक्षिण एशियाई देशों के लोग यहां मिलकर रहते हैं और उनके खुले हुए आपसी संबंध हैं। आज पड़ौसी देशों के कई प्रोफेसर, पत्रकार और उद्योगपति मिलने आए। उन्होंने कहा कि इस संगठन का पहला कार्यालय लंदन में ही क्यों नहीं खोला जाए ? एक भाई का सुझाव था कि ऐसी फिल्म तुरंत बनाई जाए, जो करोड़ों दर्शकों को यह बताए कि यदि अगले पांच-दस साल में दक्षिण एशिया का महासंघ बन जाए तो इस इलाके का रंग-रुप कैसा निखर आएगा। यह विचार सभी देशों को एकजुट होने के लिए जबर्दस्त प्रेरणा दे सकता है। लंदन में पैदा हुआ नए दक्षिण एशिया का यह सपना दो-ढाई अरब लोगों की जिंदगी में नई रोशनी भर देगा।

मध्य-पूर्व में कुर्दिस्तान की आहट
सिद्धार्थ शंकर
बगावत और हिंसक संघर्षों से लंबे समय से जूझते देश सीरिया की आंतरिक राजनीति ने एक बार फिर करवट ली है। इस्लामिक स्टेट (आइएस) के खूनी संघर्ष से निपटने में सीरिया के मददगार रहे तुर्की के तेवर अचानक बदल गए हैं। दरअसल, कुछ दिनों पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी सेना को सीरिया की जंग से अलग करने का जैसे ही ऐलान किया, वैसे ही तुर्की ने कुर्दों को निशाना बना कर पश्चिम एशिया में नया संकट खड़ा कर दिया है। तुर्की कुर्दों के संगठन को आतंकवादी समूह मानता है और उसे अपनी संप्रभुता के लिए खतरा बताता रहा है। वहीं, अमेरिका कुर्दों को लेकर उदार रवैया दिखाता रहा है। पश्चिम एशिया की मुसलिम लड़ाकू जनजाति कुर्द अपनी बहादुरी और दिलेरी के लिए दुनिया भर में विख्यात है। इसका प्रभाव सीरिया के उत्तरी इलाकों के साथ ही तुर्की, इराक और ईरान तक है।
सीरिया के उत्तर में कुर्द ठिकानों पर तुर्की की सेना लगातार गोलाबारी कर रही है और इससे इस इलाके में रहने वाले हजारों परिवार युद्ध की मार झेल रहे हैं। दुनिया के सबसे खतरनाक इलाकों में शुमार इस क्षेत्र में आइएस के कई लड़ाके कुर्दों के कब्जे में हैं और तुर्की के हमलों के बाद से वे जेलों से भाग रहे हैं। आइएस के इन खूंखार लड़ाकों को कुर्दों ने अमेरिकी सेना की मदद से बड़ी मुश्किल से पकड़ा था। ऐसे में इनका भाग निकलना पश्चिम एशिया सहित पूरी दुनिया को खतरे में डाल सकता है। यदि ये लड़ाके फिर से संगठित हो गए तो आइएस मध्य-पूर्व में फिर से मजबूत हो जाएगा और इसके दूरगामी परिणाम बेहद खतरनाक होंगे। दूसरी ओर, तुर्की के राष्ट्रपति कुर्दों पर हमले के अमेरिका और यूरोप के विरोध को दरकिनार कर धमका रहे हैं कि यदि उन्हें हमलों से रोका गया तो वे पश्चिमी एशिया के 36 लाख युद्ध प्रभावित शरणार्थियों को यूरोप में धकेल देंगे।
तुर्की का कहना है कि सीरिया से गृह युद्ध के चलते जो शरणार्थी तुर्की में रह रहे हैं, उन्हें वे सुरक्षित क्षेत्र में बसाना चाहते हैं। वह वहां 20 लाख सीरियाई शरणार्थियों के लिए एक शिविर बनाएगा। फिलहाल यह इलाका कुर्दों के पास है। कुर्द लड़ाकों की मदद कर रही सीरिया सरकार की सेना रणनीतिक रूप से अहम मानबिज शहर में दाखिल हो गई है। तुर्की इस इलाके को खाली करवा कर सुरक्षित क्षेत्र बनाने की बात कह रहा है। इस समूचे घटनाक्रम में अमेरिका की पश्चिम एशिया को लेकर पूर्व से चली आ रही अस्थायी और अस्पष्ट नीति एक बार फिर सामने आई है।
बीते कई सालों से महाशक्तियां मध्य-पूर्व को शतरंज की बिसात पर तोल कर शह और मात का खेल खेलती रही हैं। इसमें तेल की राजनीति के साथ मजहब की जोर आजमाइश को बढ़ावा दिया गया है। विश्व के संपूर्ण उपलब्ध तेल का लगभग 66 प्रतिशत ईरान की खाड़ी के आसपास के इलाकों, मुख्य रूप से कुवैत, ईरान और सऊदी अरब में पाया जाता है। सोवियत संघ और अमेरिका तो तेल के मामले में आत्मनिर्भर हैं, लेकिन यदि यूरोप को इस इलाके से तेल मिलना बंद हो जाए तो उसके अधिकांश उद्योग धंधे बंद हो जाएंगे और इस प्रकार यूरोपीय महाद्वीप की औद्योगिक और सामरिक क्षमता बर्बाद हो जाएगी। यही कारण है कि पश्चिमी देश मध्य-पूर्व पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं।
ईरान को रोकने के लिए अरब राष्ट्रवाद को तोडऩे की जरूरत थी और इसी का परिणाम हुआ कि वर्तमान में मध्य-पूर्व शिया-सुन्नी के संघर्ष का अखाड़ा बन गया है। शिया बहुल ईरान की इस्लामिक क्रांति से नाराज अमेरिका ने सुन्नी राष्ट्रवाद की कट्टरता को उभारने में अभूतपूर्व योगदान दिया। इसका असर मध्य-पूर्व के एक महत्त्वपूर्ण देश सीरिया पर भी पड़ा। सीरिया में बहुसंख्यक सुन्नी हैं, जबकि वहां के राष्ट्रपति असद शिया हैं और ईरान समर्थित माने जाते हैं। सीरिया के पूर्व में इराक और उत्तर में तुर्की है। 74 फीसद सुन्नी आबादी वाले सीरिया में सत्ता अल्पसंख्यक शिया संप्रदाय के बशर अल असद के हाथों में है। उन्हें रूस, अपने पारंपरिक सहयोगी ईरान और ईरान के समर्थन वाले लेबनानी चरमपंथी गुट हिजबुल्ला से मजबूत कूटनीतिक और सैन्य सहयोग मिलता रहा है।
फिर 2011 में जब मशहूर ‘अरब स्प्रिंग’ विरोध प्रदर्शनों ने ट्यूनीशिया और मिस्र में सत्तापलट कर दिया था तो अमेरिका ने इसे असद को सत्ता से बेदखल करने के स्वर्णिम अवसर के रूप में देखा। सीरिया की सत्ता से असद को हटाने के प्रयास में अमेरिका के मददगार वहां कई विद्रोही संगठन बन गए और इसी बीच आइएस इस इलाके में मजबूती से अपनी पैठ बनाने में सफल हो गया। साल 2013 में अलकायदा से अलग होकर आइएस अस्तित्व में आया और इससे मध्य-पूर्व में संघर्ष का एक नया सिलसिला शुरू हो गया। आइएस ने अमेरिकी योजनाओं के विपरीत ईसाइयों और उदार मुसलमानों के खिलाफ जेहाद की घोषणा कर मध्य-पूर्व के राजनीतिक संघर्ष की दिशा बदल दी।
आईएस ने इस इलाके के तेल कुओं पर अपना कब्जा जमा कर महाशक्तियों के सामने चुनौती पेश कर दी और इसके बाद पश्चिमी देशों, अमेरिका, रूस, तुर्की जैसे देशों ने आईएस को मिल कर खत्म करने में अपनी भूमिका निभाई। लंबे समय से इस युद्धग्रस्त इलाके से आईएस समाप्त होने की कगार पर आया तो अब एक बार फिर तुर्की ने कुर्दों के खिलाफ मोर्चा खोल कर नए संकट को जन्म दे दिया है। कभी विरोधी रहे कुर्द सीरिया की असद सरकार से मिल कर तुर्की का प्रतिरोध कर रहे हैं। वहीं अब रूस भी कुर्दों के समर्थन में आ गया है।
तुर्की से कुर्दों का विरोध पारंपरिक माना जाता है और कुर्द तुर्की को अपने दुश्मन की तरह देखते हैं। पहले विश्व युद्ध में ऑटोमन साम्राज्य की हार के बाद पश्चिमी सहयोगी देशों ने 1920 में संधि कर कुर्दों के लिए अलग देश बनाने की बात कही थी। 1923 में तुर्की के नेता मुस्तफा कमाल पाशा ने इस संधि को खारिज कर दिया था। तुर्की की सेना ने 1920 और 1930 के दशक में कुर्दिश उभार को कुचल दिया था। तब से कुर्दों और तुर्की के बीच दुश्मनी और गहरा गई। तुर्की में इस समय बीस फीसद कुर्द हैं। पीढिय़ों से तुर्की में कुर्दों के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार होता रहा है। तुर्की में कुर्दिश नाम और उनके रिवाजों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसके साथ ही कुर्दिश भाषा भी प्रतिबंधित है।
यहां तक कि कुर्दिश पहचान को भी खत्म कर दिया गया है। साल 2017 में इराक में अलग कुर्दिस्तान के लिए जनमत संग्रह हुआ तो भारी तादाद में कुर्दों ने इसके पक्ष में मत डाले। इसके बाद तुर्की कुर्दों को लेकर गहरे दबाव में आ गया। उसे डर है कि इस इलाके में कुर्दिस्तान के बनने से उसके देश में बसने वाले कुर्द विद्रोह कर कुर्दिस्तान में मिलने की मांग करेंगे और इससे तुर्की की संप्रभुता पर नया संकट खड़ा हो सकता है।
यूरोप के एकमात्र मुसलिम बहुल देश तुर्की के राष्ट्रपति की मुसलिम शरणार्थियों के नाम पर दी जा रही धमकियों से यूरोप, रूस और अमेरिका चिंतित हैं। ऐसे में सीरिया में संतुलन, ईरान को दबाने और इराक सहित अन्य खाड़ी देशों पर अपना प्रभाव जमाए रखने के लिए मुमकिन है कि आने वाले समय में अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र अलग कुर्दिस्तान की मांग को मान लें। ऐसा होने पर मध्य-पूर्व का भूगोल एक बार फिर बदल जाएगा और दक्षिणी-पूर्वी तुर्की, उत्तरी-पूर्वी सीरिया, उत्तरी इराक, उत्तर-पूर्वी ईरान और दक्षिण-पश्चिमी आर्मेनिया को मिला कर कुर्दिस्तान अस्तित्व में आ सकता है। कुर्दिस्तान सऊदी अरब और ईरान के प्रभुत्व को खत्म करने का पश्चिमी हथियार बन सकता है और बदलते वैश्विक परिदृश्य में इसकी संभावनाएं बलवती हो गई हैं।

अबकी बार बच गया पाकिस्तान
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आज के दिन पाकिस्तान की सांस अधर में लटकी हुई थी। यदि पेरिस स्थित वित्तीय कार्रवाई टास्क फोर्स (एफएटीएफ) आज पाकिस्तान को उसकी भूरी सूची में से निकालकर काली सूची में डाल देती तो उसकी नय्या डूब जाती। काली सूची में आने का अर्थ है, वह अंतरराष्ट्रीय अछूत बन जाए। पाकिस्तान पर यह ठप्पा लग जाता और वह ईरान और उत्तर कोरिया की श्रेणी में चला जाता। उसकी आर्थिक घेराबंदी हो जाती। दुनिया के देश उसकी आर्थिक मदद नहीं कर पाते। उसका हुक्का-पानी बंद हो जाता। पाकिस्तान का आरोप है कि इस काम के लिए भारत ने अपना पूरा जोर लगा रखा है। आज पेरिस में हुई बैठक में एफएटीएफ ने पाकिस्तान को काली सूची में तो नहीं डाला है लेकिन उसे भूरी सूची से भी बाहर नहीं निकाला है। उसे पिछले साल यह चेतावनी दी गई थी लेकिन लाख दावे करने के बावजूद अभी तक इमरान-सरकार अपने आतंकवादी संगठनों और उनके वित्तीय स्त्रोतों को काबू नहीं कर सकी है। अब उसे फरवरी 2020 तक एक मौका और दिया गया है। उसे जून 2018 में 27 सूत्री योजना दी गई थी। लेकिन अभी तक 15 माह बीत जाने के बावजूद वह सिर्फ 5 मुद्दों पर कार्रवाई कर सका है। पाकिस्तानी सरकार चुप नहीं बैठी है। उसने आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कई कदम उठाए हैं। उनके बैंक-खाते सील कर दिए हैं, उनके दफ्तरों से उन्हें बेदखल कर दिया है और उनके कुछ सरगनाओं को जेल में भी डाल दिया है लेकिन उक्त वित्तीय संगठन के सदस्य पाकिस्तानी सरकार की कार्रवाई से पूर्ण संतुष्ट नहीं हैं। इस संगठन का अध्यक्ष आजकल चीन है। चीन इस आड़े वक्त में पाकिस्तान के खूब काम आया है। अगर चीन की जगह कोई और राष्ट्र होता तो पाकिस्तान पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता लेकिन अब भी पाकिस्तान को आतंकवाद के विरुद्ध अपनी कमर कस लेनी चाहिए वरना अगले साल फरवरी में उसे कोई नहीं बचा पाएगा, चीन भी नहीं। यहां लंदन में कुछ पाकिस्तानी दोस्तों ने मुझसे कहा कि जब तक पाकिस्तान को बाहरी मदद बंद नहीं होगी, वह अपने पांव पर खड़ा ही नहीं होगा।

फैसले की धुन्ध : अयोध्या विवाद; क्या फैसला सर्वमान्य होगा….?
ओमप्रकाश मेहता
देश की सबसे बड़ी अदालत ने करीब चालीस दिन की अनवरत मशक्कत के बाद बहुविवादित व चिर प्रतीक्षित अयोध्या रामजन्म भूमि विवाद की सुनवाई पूरी कर ली, अब पूरा देश फैसले की प्रतीक्षा में है, जो नवम्बर के पहले पखवाड़े में कभी भी आज सकता है। चूंकि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई सत्रह नवम्बर को सेवानिवृत्त हो रहे है, इसलिए वे चाहते है कि उनके पद पर रहते हुए इस चिर विवादित विवाद पर फैसला आ जाए, जिससे इस विवाद के पांच सौ साल के इंतिहास में उनका नाम भी दर्ज हो जाए। यदि राजनीतिक दृष्टि से भी देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी अपने कार्यकाल की बड़ी उपलब्धियों में राममंदिर की उपलब्धि भी जोड़ना चाहते है, जिससे की उनके शेष बचे साढ़े चार साल के कार्यकाल में मंदिर बनकर तैयार हो जाए और उनके शासन का मार्ग और प्रशस्त हो जाए।
वैसे इस चिरविवादित मामले को लेकर पिछले पांच सौ सालों में क्या-क्या हुआ यह तो सर्वविदित है, तत्कालीन फैसलों को लेकर कभी मुस्लिम पक्ष खुश हुआ तो कभी हिन्दू पक्ष। इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से हिन्दू पक्ष सर्वाधिक खुश हुआ, और इसी फैसले के कारण यह विवाद सर्वोच्च न्यायालय की चैखट पर पहुंचा, क्योंकि मुस्लिम पक्ष इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से काफी निराश, दुःखी व उत्तेजित हो गया था, अब लगातार चालीस दिन सुनवाई करके सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के पांच न्यायाधीशों ने काफी मशक्कत की है, सभी पक्षों को ध्यान से सुना है और अब वे इस विवाद का अंतिम फैसला सुनाने की तैयारी कर रहें है। अब फैसला कैसा व किसके पक्ष या विपक्ष में आएगा? यह तो फिलहाल नहीं कहा जा सकता, किंतु यह सही है कि इस विवाद से जुड़े दोनों ही पक्ष काफी आशान्वित नजर आ रहे है, और सुप्रीम कोर्ट की भी यह मंशा नजर आ रही है कि कथित रामजन्म भूमि का मालिकाना हक किसी को भी मिले, किंतु दूसरे पक्ष को भी न्यायालय निराश नहीं होने देगा, उसे भी कुछ तो उपलब्धि अवश्य हासिल होगी।
इसके साथ ही यहां यह भी उल्लेखनीय है कि फिलहाल दोनों ही पक्ष भावी फैसले को लेकर अपनी आम सहमति जाहिर कर रहे हैं और सभी दावा कर रहे है कि सर्वोच्च न्यायालय जो भी फैसला सुनाएगा वह सर्वमान्य होगा। किंतु दोनों पक्षों के इन दावों के साथ यह आशंका भी प्रकट की जा रही है कि अभी फैसला आने के पूर्व न्यायालय में न्यायाधीशों के सामने ही दस्तावेज (नक्शें) फाड़े जा रहे है और एक पक्ष विशेष से सर्वाधिक सवाल पूछने के आरोप लगाए जा रहे है, अर्थात् अपरोक्ष रूप से माननीय न्यायाधीशों पर पक्षपात के आरोप मढ़े जा रहे है, तो क्या ये पक्ष फैसला अपने पक्ष में नहीं आने के बाद उसे सहर्ष स्वीकार कर लेगें? और क्या तब देश के सबसे बड़े न्यायालय को आरोपों के कटघरे में खड़े करने की कोशिशें नहीं की जाएगी? आज देश को इसी बात की सबसे बड़ी चिंता है।
वैसे यहां एक संभावना यह भी प्रकट की जा रही है कि यदि इस चिरविवादित प्रकरण का फैसला हिन्दूओं के पक्ष में आता है तो सत्तापक्ष व उससे जुड़े संगठन देश में एक ही पखवाड़े में दो बार दीपावली मनाएगी और चूंकि संसद का शीतकालीन सत्र 18 नवम्बर से शुरू हो रहा है और तब तक इस विवाद का फैसला आ चुका होगा, इसलिए वह संसद सत्र शीतकालीन सत्र नहीं बल्कि ‘‘मंगलमयी महोत्सव सत्र’’ होगा, जिसमें सत्तारूढ़ दल इस फैसले को अपने शासनकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि बताने में नहीं चूकेेगा और पूरे देश में विश्व हिन्दू परिषद, भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और अन्य हिन्दू संगठन काफी खुशियां मनाने वाले है, फिर चाहे इस विवाद को निपटाने में मशक्कत चाहे न्याय पालिका ने ही क्यों न की हो, उपलब्धि तो मोदी सरकार की ही गिनाई जाएगी, क्योंकि भाजपा के इसी काल के चुनावी घोषणा-पत्र में जम्मू-कश्मीर से धारा-370 व 35ए हटाने के साथ ही रामजन्म भूमि पर भव्य मंदिर बनाने का वादा भी किया गया था। इस तरह धर्म व न्याय से जुड़े इस विवाद के फैसले का श्रेय सरकार के खाते में जमा हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।

गाँधी के देश में गोडसे का महिमामण्डन?
तनवीर जाफ़री
कृतज्ञ राष्ट्र इस वर्ष अपने परम प्रिय राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की 150 वीं जयंती मना रहा है। इस अवसर पर गांधीवादी विचारधारा तथा गाँधी दर्शन को लेकर पुनः चर्चा छिड़ गयी है। हिंसा,आक्रामकता,सांप्रदायिकता,ग़रीबी तथा जातिवाद के घोर विरोधी गाँधी को देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में इसलिए भी अधिक शिद्दत से याद किया जाता रहा है क्योंकि विश्व के कई हिस्सों में इस समय हिंसा,आक्रामकता,सांप्रदायिकता,जातिवाद,वर्गवाद,पूंजीवाद तथा नफ़रत का बोल बाला हो रहा है। दुर्भाग्य पूर्ण बात तो यह है कि ख़ुद गाँधी का देश भारत भी इन्हीं हालात का शिकार है। मानवता को दरकिनार कर बहुसंख्यवाद की राजनीति पर ज़ोर दिया जा रहा है। बहुरंगीय संस्कृति व भाषा के इस महान देश को एकरंगीय संस्कृति व भाषा का देश बनाने के प्रयास हो रहे हैं। ज़ाहिर है गाँधी दर्शन के विरुद्ध बनते इस वातावरण में उन्हीं शक्तियों तथा विचारधारा के लोगों की ही सक्रियता है जो गाँधी जी के जीवनकाल से ही गाँधी के सहनशीलता व ‘सर्वधर्म समभाव’ के विचारों से सहमत नहीं हैं। निश्चित रूप से यही वजह है कि आज देश में न केवल गाँधी विरोधी शक्तियां सक्रिय हो रही हैं बल्कि गाँधी के हत्यारे नाथू राम गोडसे का महिमामंडन भी मुखरित होकर किया जाने लगा है। उसकी मूर्तियां स्थापित करने के प्रयास किये जा रहे हैं। इतना ही नहीं जो लोग गोडसे का महिमामंडन करते हैं और उसे राष्ट्रभक्त बताते हैं वह लोग चुनाव जीत कर संसद में भी पहुँच चुके हैं।
ये सांसद कोई साधारण सांसद भी नहीं हैं बल्कि इनमें प्रज्ञा ठाकुर जैसी सांसद तो कई आतंकवादी वारदातों में आरोपी भी रही है। कई भगवाधारी मंत्री व सांसद हैं जो गोडसे का महिमामंडन करने से नहीं चूकते। निश्चित रूप से गाँधी विरोध व गोडसे से हमदर्दी का मत रखने वालों का गाँधी जी से मुख्यतः दो बातों को लेकर ही विरोध है। हिंदूवादी संगठनों का आरोप है कि वे मुसलमानों के हितों का अधिक ध्यान रखते थे तथा यह भी कि देश के बंटवारे में उनका रुख़ नर्म था। एक आरोप यह भी है कि विभाजन के पश्चात् भारत पाक के मध्य हुए संसाधनों के बंटवारे के समय भी गाँधी जी ने कथित रूप से पाकिस्तान के हित में कई फ़ैसले लिए। इस तरह के आरोप ही अपने आप में यह साबित करते हैं कि गांधी जी कितने विशाल ह्रदय के स्वामी थे जबकि ऐसे इल्ज़ाम लगाने वाले लोगों के विचार कितने संकीर्ण व स्वार्थ पर आधारित हैं। बेशक गांधी जी की इस सोच ने खांटी हिंदूवादी सोच रखने से नफ़रत वालों को गाँधी से नफ़रत करने की सीख दी परन्तु उनके ऐसे ही फ़ैसलों ने ही उन्हें गांधी से महात्मा गाँधी बना दिया। हमारे देश के इस अनमोल सपूत को जिसे हमारे ही देश के ‘साम्प्रदायिक विचारवान’ लोग मुस्लिमों का तुष्टिकरण करने वाला नेता बताते हैं वे भी खुलकर गाँधी की आलोचना करने का सहस नहीं कर पाते। आलोचना करना दूर की बात है उल्टे इस विचारधारा के लोग गांधी की तारीफ़ करते या उनके विचारों का अनुसरण करने की दुहाई देते हुए भी दिखाई देना चाहते हैं ताकि दुनिया की नज़रों में वे भी गाँधी जैसे विचारवान नज़र आएं।
वैचारिक दृष्टि से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व इसके सहयोगी संगठनों को गाँधी की विचारधारा का विरोधी ही माना जाता है। आज जो भी गोडसेवादी स्वर मुखरित होते सुनाई दे रहे हैं वे सभी सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी से ही जुड़े हुए हैं। परन्तु इसके विपरीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गाँधी जी को विश्व के समक्ष भारत का अनमोल रत्न बताने की ही कोशिश करते हैं। पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी का एक लेख अमेरिका के प्रसिद्ध अख़बार न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित हुआ। गाँधी जी की 150 वीं जयंती के मौक़े पर प्रकाशित इस लेख का शीर्षक था ‘भारत और दुनिया को गाँधी की ज़रुरत क्यों है’। अपने लेख की शुरुआत में मोदी ने अमरीकी नेता मार्टिन लूथर किंग के 1959 के दौरे को याद करते हुए उनके इस कथन का ज़िक्र किया है जिसमें लूथर किंग ने कहा था -‘दूसरे देशों में मैं एक पर्यटक के तौर पर जा सकता हूँ परन्तु भारत आना किसी तीर्थ यात्रा की तरह है’।इस लेख में ग़रीबी कम करने, स्वच्छता अभियान चलाने व सौर्य ऊर्जा जैसी योजनाओं का भी ज़िक्र है। निश्चित रूप से गाँधी के दृष्टिकोण व उनके विचारों को किसी एक लेख या ग्रन्थ में समाहित नहीं किया जा सकता। गाँधी जी ने हमेशा सह-अस्तित्व की बात की। उन्होंने गांधी हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात की। उनका कहना था कि ‘हमको मानवता में विश्वास नहीं खोना चाहिए’। गाँधी जी का कहना था कि ‘मानवता एक महासागर के सामान है, यदि सागर की कुछ बूंदें गंदी हैं, तो पूरे महासागर को गंदा नहीं कहा जा सकता’। परन्तु आज जान बूझकर पूरी योजना बनाकर कुछ हिंसक लोगों की गतिविधियों को धर्म विशेष के साथ जोड़ने की जीतोड़ कोशिश वैश्विक स्तर पर की जा रही है। वे कहते थे कि ‘दुनिया के सभी धर्म, हर मामले में भिन्न हो सकते हैं, पर सभी एकजुट रूप से घोषणा करते हैं कि इस दुनिया में सत्य के अलावा कुछ भी नहीं रहता है’। गाँधी जी के सभी धर्मों के बारे में ऐसे विचार थे परन्तु गांधी विरोधी इस बात से सहमत नहीं उनकी नज़रों में धर्म विशेष आतंकवादी धर्म भी है और जेहादी व फ़सादी भी। गाँधी जी का विचार था कि ‘अहिंसा की शक्ति से आप पूरी दुनिया को हिला सकते हैं’। परन्तु आज जगह जगह हिंसा से ही जीत हासिल करने की कोशिश की जा रही है। अहिंसा परमो धर्मः की जगह गोया हिंसा परमो धर्मः ने ले ली है।
गाँधी जी की धर्म के विषय में भी जो शिक्षाएं थीं वे मानवतापूर्ण तथा पृथ्वी पर सदा के लिए अमर रहने वाली शिक्षाएं थीं।आप फ़रमाते थे कि – मैं धर्मों में नहीं बल्कि सभी महान धर्मों के मूल सत्य में विश्वास करता हूं।’उनका कहना था कि ‘ सभी धर्म हमें एक ही शिक्षा देते हैं, केवल उनके दृश्टिकोण अलग अलग हैं। इसी प्रकार गाँधी जी का कथन था कि हिंदू धर्म सभी मानव जाति ही नहीं बल्कि भाईचारे पर ज़ोर देता है। गाँधी जी यह भी कहा करते थे कि -‘मैं ख़ुद को हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, यहूदी, बौद्ध और कन्फ़्यूशियस मानता हूं’। ज़ाहिर है महात्मा गाँधी के इन विचारों में न तो कहीं साम्प्रदायिकता की गुंजाईश है न जाति या वर्ण व्यवस्था की। न ग़रीबी पैमाना है न अमीरी। न हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना है न बहुसंख्यवाद की राजनीति करने की गुंजाइश । वे हमेशा केवल मानवता और वास्तविक धर्म की बातें करते दिखाई देते थे। तभी तो वे यह भी कहा करते थे कि निर्धन हो या अमीर, भगवान सभी के लिए है। वो हम में से हर एक के लिए होता है। गाँधी जी के मुताबिक़ -‘सज्जनता, आत्म-बलिदान और उदारता किसी एक जाति या धर्म का अनन्य अधिकार नहीं है’।वे हमेशा लोगों को विनम्र रहने की सीख भी देते थे और कहते थे कि ‘विनम्रता के बिना सेवा, स्वार्थ और अहंकार है’।वे ग़रीबी को हिंसा का सबसे बुरा रूप मानते थे।
आज के सन्दर्भ में यदि हम क़र्ज़ से तंग हुए किसानों की आत्महत्या को देखें,बेरोज़गारी व असुरक्षा की वजह से बढ़ती ख़ुदकशी की घटनाओं को देखें,आसाम में एन आर सी के चलते लोगों में छाया भय तथा धर्म के आधार पर लोगों में फैलाई जा रही दहशत पर नज़र डालें या फिर कश्मीर में कश्मीरियों के साथ होने वाले ज़ुल्म व अन्याय को देखें,जनता के संसाधनों पर सत्ताधीशों की ऐश परस्ती देखें,महिलाओं के साथ दिनोंदिन बढ़ता जा रहा ज़ुल्म व शोषण देखें तो हम आसानी से इस निष्कर्ष पर स्वयं पहुँच जाएंगे कि यह सब गाँधी के देश में बढ़ते गोडसे के महिमामण्डन का ही परिणाम है। परन्तु इसके बावजूद सच्चाई तो यही है कि गोडसे व उसके साम्प्रदायिकता पूर्ण हिंदूवादी विचारों ने गाँधी जी की हत्या कर उनको पूरी दुनिया के लिए इस क़द्र अमर कर दिया कि जो भी भारत की सत्ता पर बैठेगा उसके लिए दिखावे के लिए ही सही परन्तु महात्मा गाँधी की सत्य व अहिंसा,मानवता व सर्वधर्म समभाव के सिद्धांतों की उपेक्षा व अवहेलना कर पाना कभी भी इतना आसान नहीं होगा।

लोक शिक्षण से छूटेगी ई-सिगरेट की लत
मुकेश तिवारी
पाबंदियों और मनाइयों का हमारे देश में क्या हश्र होता है इसे आसानी से जाना जा सकता है लेकिन कानूनी तौर पर भी पाबंदियां लगाने में गुरेज नहीं किया जाता पाबंदी के माध्यम से समस्या का तुरंत-फुरत हल निकाल लिया जाता है और उम्मीद की जाती है कि अध्यादेश जारी होते ही लोग उसे मानना शुरू कर देंगे लेकिन हकीकत में ऐसा होता नहीं पाबंदियां मजाक बन कर रह जाती हैं और मनाइयां बेमौत मर जाती हैं खासतौर पर आबादी के बड़े हिस्से में फैली समस्या के निवारण के लिए लगी पाबंदियां वजह यह है कि ऐसी पाबंदियों नींव को लागू करने की यंत्रणा किसी सरकार के पास नहीं है मसलन सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान कानूनी तौर पर अपराध है लेकिन इसका पालन करवाना मुमकिन नहीं इसलिए बेखौफ धुएं के छल्ले उड़ाते लोग पहले की ही तरह मौजूद हैं दरअसल में कानूनी तौर पर निरोधक कार्यवाही माना गया है उपाय किसी छोटे समूह पर तो कारगर हो सकता है लेकिन विशाल तबके पर नितांत बेमानी है। इलेक्ट्रॉनिक यानी ई- सिगरेट के उत्पादन बिक्री भंडारण प्रचार लाने ले जाने और निर्यात को प्रतिबंधित करने के लिए पिछले माह केंद्र द्वारा जारी अध्यादेश की भी इसी श्रेणी में आता है तथ्य है कि इसके उपयोग से कैंसर जैसा असाध्य रोग होता है यह भी तथ्य है कि किशोर किशोरियों में इसकी लत बढ़ती जा रही है लेकिन यह किसी से ढका छिपा नहीं है कि प्रतिबंध लगाने मात्र से यदि लत छूटती तो अब तक दुनिया से नशे का सारा सामान ओझल हो गया होता उपाय यही है कि सेहत को बर्बाद करने वाली ऐसी जहरीली चीजों के बारे मैं उस तबके को विशेष रूप से शिक्षित किया जाए जिसमें इनका ज्यादा प्रचलन है यह भी एक तरह का लोक जागरण है जिसमें सरकारें सहयोग तो दे सकती हैं लेकिन खुद इसका संचालन नहीं कर सकती सरकारें हद से हद इनके बनने से ज्ञात ठिकानों पर ताले डलवा सकती हैं हालांकि भारत में ई सिगरेट का विनिर्माण नहीं होता है यह आयत की जाती है लोगों को इ सिगरेट की भयावहता के बारे में मनवाने का काम दीर्घकालीन तो है लेकिन दुशवार नहीं आखिर पाबंदियां तभी कारगर होती है जब लोग पूरे मनयोग से तैयार होते हैं।

सावरकर साम्प्रदायिक थे या शुद्ध बुद्धिवादी ?
डॉ -वेदप्रताप वैदिक
स्वातंत्र्यवीर सावरकर का स्वतंत्र भारत में क्या स्थान है ? न तो उन्हें भारत रत्न दिया गया, न संसद के केन्द्रीय कक्ष में उनका चित्र लगाया गया, न संसद के अंदर या बाहर उनकी मूर्ति स्थापित की गई, न उन पर अभी तक कोई बढ़िया फिल्म बनाई गई, न उनकी जन्म-शताब्दि मनाई गई और न ही उनकी जन्म-तिथि और पुण्य-तिथि पर उनको याद किया जाता है। इसका कारण क्या है ?
क्या हमें पता नहीं कि भारत के लिए पूर्ण स्वराज्य की माँग सबसे पहले सावरकर ने की थी। 50 साल की सज़ा पानेवाले वे पहले और अकेले क्रांतिकारी थे। वे पहले ऐसे नेता थे, जिन्होंने विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी। वे ऐसे पहले भारतीय बेरिस्टर थे, जिन्हें ब्रिटेन ने उनके उग्र राजनैतिक विचारों के कारण डिग्री नहीं दी थी। वे ऐसे पहले भारतीय लेखक थे, जिनकी पुस्तकों पर छपने से पहले ही दो देशों की सरकारों ने पाबन्दी लगा दी थी। वे दुनिया के पहले ऐसे कवि थे, जिन्होंने जेल की दीवारों पर कील से कविताएँ लिखी थीं। वे ऐसे पहले कैदी थे, जिनकी रिहाई का मुकदमा हेग के अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय में चला था। वे एकमात्र ऐसे क्रान्तिकारी थे, जिन्होंने उच्च कोटि के काव्य, नाटक, उपन्यास, कहानी, निबंध आदि के अलावा इतिहास और राजनीति पर पांडित्यपूर्ण मौलिक ग्रन्थों की रचना की थी। वे ऐसे पहले भारतीय नेता थे, जिन्होंने भारत की आज़ादी के सवाल को अन्तरराष्ट्रीय मुद्दा बना दिया था। हमने सावरकर के अलावा क्या किसी ऐसे क्रान्तिकारी का नाम सुना है, जिसकी पुस्तकें मदाम भीकाजीकामा, सरदार भगतसिंह और सुभाषचन्द्र बोस जैसे महापुरूषों ने अपने सिर-माथे पर रखी हों और उन्हें छपवाकर चोरी-छिपे बंटवाया हो ? 27 साल तक अण्डमान-निकोबार और रत्नागिरी की जेलों में अपना सर्वस्व होम देनेवाला सावरकर जैसा कोई दूसरा क्रांतिकारी क्या दुनिया में कहीं और हुआ है ? फिर भी क्या बात है कि सावरकर का नाम लेने में आजकल के तथाकथित राष्ट्रवादियों का भी कलेजा काँपता है ?
इसका कारण स्पष्ट है। विनायक दामोदर सावरकर के माथे पर साम्प्रदायिकता और हिंसा का बिल्ला चिपका दिया गया है। यह माना जाता है कि भारत की सशस्त्र क्रांति और हिन्दू साम्प्रदायिकता के जन्मदाता सावरकर ही थे। इसमें शक नहीं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दोनों आद्य निर्माता डाॅ0 केशव बलिराम हेडगेवार और गुरू गोलवलकर सावरकर के अनुयायी थे, लेकिन क्या वजह है कि सावरकर के प्रति संघ में भी कोई उत्साह नहीं है ? सावरकर की तरह सशस्त्र क्रांतिकारी तो और भी कई हुए लेकिन उनकी अवहेलना वैसी नहीं हुई, जैसी कि सावरकर की होती रही है। सावरकर की अवहेलना का मुख्य कारण यह था कि गाँधी और नेहरू को सबसे कड़ी चुनौती सावरकर ने ही दी थी। गाँधी के असली वैचारिक प्रतिद्वंद्वी जिन्ना, सुभाष और आम्बेडकर नहीं, सावरकर ही थे। उक्त तीनों नेताओं ने स्वाधीनता संग्राम के दौरान कभी न कभी गाँधी के साथ मिलकर काम किया था लेकिन सावरकर एक मात्र ऐसे बड़े नेता थे, जिन्होंने अपने लन्दन-प्रवास के दिनों से ही गाँधी को नकार दिया था। श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा लंदन में स्थापित ‘इंडिया हाउस’ का संचालन सावरकर किया करते थे। ‘इंडिया हाउस’ में दो बार सावरकर और गाँधी की भेंट भी हुई। गाँधी की तथाकथित ‘अंग्रेज-भक्ति’ और अहिंसा को सावरकर ने पहले दिन से ही गलत बताया था। यद्यपि गाँधी, सावरकर से 14 साल बड़े थे और सावरकर के लंदन पहुँचने (1906) के पहले ही वे अपने साउथ अफ्रीकी आंदोलन के कारण प्रसिद्ध हो चुके थे लेकिन अगले चार साल में ही सावरकर विश्व-विख्यात क्रांतिकारी का दर्जा पा गए थे। 27 साल की आयु में उन्हें पचास साल की सज़ा मिली थी। ब्रिटेन से भारत लाए जाते वक्त उन्होंने जहाज से समुद्र में छलांग क्या लगाई, वे सारी दुनिया के क्रांतिकारियों के कण्ठहार बन गए। दुश्मन के चंगुल से पलायन तो नेपोलियन, लेनिन और सुभाष बोस ने भी किया था, लेकिन सावरकर के पलायन में जो रोमांच और नाटकीयता थी, उसने उसे अद्वितीय बना दिया था। कल्पना कीजिए कि जैसे गाँधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका छोड़कर भारत आए, वैसे ही 1910 में सावरकर अपनी बैरिस्टरी पढ़कर भारत लौट आते तो क्या होता ? भारत का राष्ट्रपिता कौन कहलाता ? गाँधी या सावरकर ? भारत की जनता पर किसकी पकड़ ज्यादा होती, किसका असर ज्यादा होता ? गाँधी का या सावरकर का ? सावरकर को बाल गंगाधर तिलक, स्वामी श्रद्धानंद, लाला लाजपतराय, मदनमोहन मालवीय, विपिनचन्द्र पाल जैसे सबसे प्रभावशाली नेताओं का उत्तराधिकार मिलता और गाँधी को दादाभाई नौरोजी और गोपालकृष्ण गोखले जैसे नरम नेताओं का ! कौन जानता है कि खिलाफत का आंदोलन भारत में उठता या न उठता । जिस खिलाफत ने पहले जिन्ना को भड़काया, काँग्रेस से अलग किया और कट्टर मुस्लिम लीगी बनाया, उसी खिलाफत ने सावरकर को कट्टर हिन्दुत्ववादी बनाया। यदि मुस्लिम सांप्रदायिकता का भूचाल न आया होता तो हिन्दू राष्ट्रवाद का नारा सावरकर लगाते या न लगाते, कुछ पता नहीं। सावरकर के पास जैसा मौलिक पांडित्य, विलक्षण वक्तृत्व और अपार साहस था, वैसा काँग्रेस के किसी भी नेता के पास न था। इसमें शक नहीं कि गाँधी के पास जो जादू की छड़ी थी, वह सावरकर क्या, 20 वीं सदी की दुनिया में किसी भी नेता के पास न थी लेकिन अगर सावरकर जेल से बाहर होते तो भारत की जनता काफी चक्कर में पड़ जाती। उसे समझ में नहीं आता कि वह सावरकर के हिन्दुत्व को तिलक करे या गाँधी के ! उसे तय करना पड़ता कि सावरकर का हिन्दुत्व प्रामाणिक है या गाँधी का ! यह भी संभव था कि सावरकर के हिन्दू राष्ट्रवाद और जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद में सीधी टक्कर होती और 1947 की बजाय भारत विभाजन 1937 या 1927 में ही हो जाता और गाँधी इतिहास के हाशिए में चले जाते ! सावरकर के जेल में और गाँधी के मैदान में रहने के कारण जमीन-आसमान का अन्तर पड़ गया। 1937 में सावरकर जब रिहा हुए तब तक गाँधी और नेहरू भारत-हृदय सम्राट बन चुके थे। वे खिलाफत, असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन चला चुके थे। उन्होंने काँग्रेस को भारत की मुख्यधारा बना दिया था। जिन्ना, आम्बेडकर और मानवेंद्रनाथ राय अपनी अलग धाराएँ काटने की कोशिश कर रहे थे लेकिन गाँधी को उन्हीं के पाले में पहुँचकर चुनौती देनेवाला कोई नहीं था। यह बीड़ा उठाया सावरकर ने। सावरकर को काँग्रेस में आने के लिए किस-किसने नहीं मनाया लेकिन वे ‘मुस्लिम ब्लेकमेल’ के आगे घुटने टेकनेवाली पार्टी में कैसे शामिल होते ? वे 1937 में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष बन गए। हिन्दू महासभा ने गाँधी के हिन्दूवाद और अहिंसा, दोनों को चुनौती दी।
सावरकर और गाँधी दोनों हिन्दुत्व के प्रवक्ता थे और दोनों अखंड भारत के समर्थक थे। गाँधी का हिन्दुत्व पारम्परिक, सनातनी, अहिंसक प्रतिकार और जन्मना वर्णाश्रम का समर्थक और अ-हिन्दुओं के प्रति उदार था जबकि सावरकर का हिन्दुत्व अ-हिन्दुओं के प्रति ‘उचित’ रवैए का पोषक, परम्परा-भंजक, हिंसक प्रतिकार और बुद्धिवादी दृष्टिकोण का पक्षधर था। सावरकर ने हिन्दुत्व के दो आवश्यक तत्व बताए। जो व्यक्ति भारत भूमि (अखंड भारत) को अपना पितृभू और पुण्यभू मानता है, वह हिन्दू है। यह परिभाषा समस्त सनातनी, आर्यसमाजी, ब्रह्मसमाजी, देवसमाजी, सिख, बौद्ध, जैन तथा ब्राह्मणों से दलितों तक को हिन्दुत्व की विशाल परिधि में लाती है और उन्हें एक सूत्र में बाँधने और उनके सैनिकीकरण का आग्रह करती है। वह ईसाइयों और पारसियों को भी सहन करने के लिए तैयार है लेकिन मुसलमानों को वह किसी भी कीमत पर ‘हिन्दू’ मानने को तैयार नहीं है, क्योंकि भारत चाहे मुसलमानों का पितृभू (बाप-दादों का देश) हो सकता है लेकिन उनका पुण्यभू तो मक्का-मदीना ही है। उनका सुल्तान तो तुर्की का खलीफा ही है। यह एक तात्कालिक तथ्य था, चिरंतन सत्य नही। लेकिन इस तथ्य को हिन्दूवादियों ने एक तर्क में ढाल लिया और तत्कालीन मुस्लिम पृथकतावाद की खाई को पहले से अधिक गहरा कर दिया। सावरकर के इस तर्क की कमियों पर कभी अलग से चर्चा करेंगे लेकिन यह मान भी लें कि सावरकर का तर्क सही है और मुसलमान हिन्दुत्व की परिधि के बाहर हैं तो भी सावरकर के हिन्दू राष्ट्र में मुसलमानों की स्थिति क्या होगी, यह कसौटी यह तय करेगी कि सावरकर सांप्रदायिक थे या नहीं। सावरकर को जाँचने की दूसरी कसौटी यह हो सकती है कि यदि उन्होंने मुस्लिम पृथकतावाद और परराष्ट्र निष्ठा पर आक्रमण किया तो उन्होेंने हिन्दुओं की गंभीर बीमारियों पर भी हमला किया या नहीं? दूसरे शब्दों में सावरकर के विचारों के मूल में हिन्दू सांप्रदायिकता थी या शुद्ध बुद्धिवाद था, जिसके कारण हिन्दुओं और मुसलमानों में उनकी क्रमशः व्यापक और सीमित स्वीकृति भी नहीं हो सकी। न हिन्दुओं ने उनका साथ दिया और न मुसलमानों ने उनकी सुनी। न खुदा ही मिला और न ही विसाले-सनम !
इन दोनों कसौटियों पर यदि सावरकर के विचारों को कसा जाए तो यह कहना कठिन जो जाएगा कि वे सांप्रदायिक थे बल्कि यह मानना सरल हो जाएगा कि वे उग्र बुद्धिवादी थे और इसीलिए राष्ट्रवादी भी थे। अगर वे सांप्रदायिक होते तो 1909 में लिखे गए अपने ग्रन्थ ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ में वे बहादुरशाह जफ़र, अवध की बेगमों, अनेक मौलाना तथा फौज के मुस्लिम अफसरों की बहादुरी का मार्मिक वर्णन नहीं करते। इस विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ की भूमिका में वे यह नहीं कहते कि अब शिवाजी और औरंगजेब की दुश्मनी के दिन लद गए। यदि सावरकर संकीर्ण व्यक्ति होते तो लंदन में आसफ अली, सय्यद रजा हैदर, सिकन्दर हयात खाँ, मदाम भिकायजी कामा जैसे अ-हिन्दू लोग उनके अभिन्न मित्र नहीं होते। आसफ अली ने अपने संस्मरणों में सावरकर को जन्मजात नेता और शिवाजी का प्रतिरूप कहा है। सावरकर ने हिन्दू महासभा के नेता के रूप में मुस्लिम लीग से टक्कर लेने की जो खुली घोषणा की थी, उसके कारण स्पष्ट थे। पहला, महात्मा गाँधी द्वारा चलाया गया खिलाफत आन्दोलन हिन्दू-मुस्लिम एकता का अपूर्व प्रयास था, इसमें शक नहीं लेकिन उसके कारण ही मुस्लिम पृथकतावाद का बीज बोया गया। 1924 में खुद तुर्की नेता कमाल पाशा ने खलीफा के पद को खत्म कर दिया तो भारत के मुसलमान भड़क उठे। केरल में मोपला विद्रोह हुआ। भारत के मुसलमानों ने अपने आचरण से यह गलत प्रभाव पैदा किया कि उनका शरीर भारत में है लेकिन आत्मा तुर्की में है। वे मुसलमान पहले हैं, भारतीय बाद में हैं। तुर्की के खलीफा के लिए वे अपनी जान न्यौछावर कर सकते हैं लेकिन भारत की आजादी की उन्हें ज़रा भी चिन्ता नहीं है। इसी प्रकार मुसलमानों के सबसे बड़े नेता मोहम्मद अली द्वारा अफगान बादशाह को इस्लामी राज्य कायम करने के लिए भारत पर हमले का निमंत्रण देना भी ऐसी घटना थी, जिसने औसत हिन्दुओं को रुष्ट कर दिया और गाँधी जैसे नेता को भी विवश किया कि वे मोहम्मद अली से माफी मँगवाएँ। एक तरफ हिन्दुओं के दिल में यह बात बैठ गई कि मुसलमान भारत के प्रति वफादार नहीं हैं और दूसरी तरफ मुस्लिम संस्थाओं ने यह मान लिया कि अगर अंग्रेज चले गए तो मुसलमानों को हिन्दुओं की गुलामी करनी पड़ेगी। इसीलिए उन्होंने अंग्रेजों को भारत से भगाने की बजाय उनसे अपने लिए रियायतें माँगना शुरू कर दिया। यदि जनसंख्या में उनका अनुपात 20 से 25 प्रतिशत तक था तो वे राज-काज में 33 से 50 प्रतिशत तक प्रतिनिधित्व माँगने लगे। अपनी प्रकम्पकारी पुस्तक ‘पाकिस्तान पर कुछ विचार’ में डाॅ0 आम्बेडकर ने इसे हिटलरी ब्लेकमेल की संज्ञा दी है। उन्होंने लोगों के बलात् धर्म-परिवर्तन, गुण्डागर्दी और गीदड़भभकियों की भी कड़ी निन्दा की है। सावरकर ने अपने प्रखर भाषणों और लेखों में इसी ब्लेकमेल के खिलाफ झण्डा गाड़ दिया। उन्होंने 1937 के अपने हिन्दू महासभा के अध्यक्षीय भाषण में साफ़-साफ़ कहा कि काँग्रेस की घुटनेटेकू नीति के बावजूद भारत में इस समय दो अलग-अलग राष्ट्र रह रहे हैं। यह भारत के लिए खतरे की घंटी है। यदि पाकिस्तान का निर्माण हो गया तो वह भारत के लिए स्थायी सिरदर्द होगा। भारत की अखंडता भंग होने को है। उसे बचाने का दायित्व हिंदुओं पर है। इसीलिए ‘राजनीति का हिंदूकरण हो और हिंदुओं का सैनिकीकरण हो।’ अहिंसा जहाँ तक चल सके, वहाँ तक अच्छा लेकिन उन्होंने गाँधी की परमपूर्ण अहिंसा को अपराध बताया। जुलाई 1940 में जब सुभाष बोस सावरकर से बंबई में मिले तो उन्होंने सुभाष बाबू को अंग्रेजों के विरूद्ध सशस्त्र संघर्ष की प्रेरणा दी।
अपने अनेक भाषणों और लेखों में सावरकर ने साफ़-साफ़ कहा कि हिन्दू लोग अपने लिए किसी भी प्रकार का विशेषाधिकार नहीं चाहते। वे एक संयुक्त और अखंड राष्ट्र बनाकर रह सकते हैं बशर्ते कि कोई भी समुदाय अपने लिए विशेषाधिकारों की माँग न करे। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा ”भारतीय राज्य को पूर्ण भारतीय बनाओ। मताधिकार, सार्वजनिक नौकरियों, दफ्तरों, कराधान आदि में धर्म और जाति के आधार पर कोई भेदभाव न किया जाए। किसी आदमी के हिन्दू या मुसलमान, ईसाई या यहूदी होने से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। ….जाति, पंथ, वंश और धर्म का अन्तर किए बिना ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ का नियम राज्य का सामान्य आधार होना चाहिए।“ क्या यह घोषणा सांप्रदायिक है ? लगभग 10 हजार पृष्ठ के समग्र सावरकर वाडमय (प्रभात प्रकाशन) में ढूँढने पर भी कहीं ऐसी पंक्तियाँ नहीं मिलतीं, जिनमें मुसलमानों को सताने, तंग करने या दंडित करने की बात कही गई हो। ‘हिन्दुत्व’ नामक अत्यंत चर्चित ग्रंथ में तत्कालीन मुसलमानों की ‘राष्ट्रविरोधी गतिविधियों’ पर अपना क्षोभ प्रकट करते हुए सावरकर लिखते हैं कि उन्होंने हिंदुत्व का नारा क्यों दिया था।– ” अपने अहिन्दू बंधुओं अथवा विश्व के अन्य किसी प्राणी को किसी प्रकार से कष्ट पहुँचाने हेतु नहीं अपितु इसलिए कि आज विश्व में जो विभिन्न संघ और वाद प्रभावी हो रहे हैं, उनमें से किसी को भी हम पर आक्रांता बनकर चढ़ दौड़ने का दुस्साहस न हो सके। “उन्होंने आगे यह भी कहा कि ” कम से कम उस समय तक “ हिन्दुओं को अपनी कमर कसनी होगी” जब तक हिन्दुस्थान के अन्य सम्प्रदाय हिन्दुस्थान के हितों को ही अपना सर्वश्रेष्ठ हित और कर्तव्य मानने को तैयार नहीं हैं …। “वास्तव में भारत की आज़ादी के साथ वह समय भी आ गया । यदि 1947 का भारत सावरकर के सपनों का हिन्दू राष्ट्र नहीं था तो क्या था ? स्वयं सावरकर ने अपनी मृत्यु से कुछ माह पहले 1965 में ‘आर्गेनाइज़र’ में प्रकाशित भेंट-वार्ता में इस तथ्य को स्वीकार किया है। सावरकर ने मुसलमानों का नहीं, बल्कि उनकी तत्कालीन ब्रिटिश भक्ति, पर-निष्ठा और ब्लेकमेल का विरोध किया था। क्या स्वतंत्र भारत में यह विरोध प्रासंगिक रह गया है ?
इस विरोध का आधार संकीर्ण साम्प्रदायिकता नहीं, शुद्ध बुद्धिवाद था। यदि वैसा नहीं होता तो क्या हिंदुत्व का कोई प्रवक्ता आपात् परिस्थितियांे में गोवध और गोमांस भक्षण का समर्थन कर सकता था ? स्वयं सावरकर का अन्तिम संस्कार और उनके बेटे का विवाह जिस पद्धति से हुआ, क्या वह किसी भी पारम्परिक हिन्दू संगठन को स्वीकार हो सकती थी ? सावरकर ने वेद-प्रामाण्य, फलित ज्योतिष, व्रत-उपवास, कर्मकांडी पाखंड, जन्मना वर्ण-व्यवस्था, अस्पृश्यता, स्त्री-पुरूष समानता आदि प्रश्नों पर इतने निर्मम विचार व्यक्त किए हैं कि उनके सामने विवेकानंद, गाँधी और कहीं-कहीं आम्बेडकर भी फीके पड़ जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उनसे सहमत होना तो असंभव ही था। सावरकर के विचारों पर अगर मुल्ला-मौलवी छुरा ताने रहते थे तो पंडित-पुरोहित उन पर गदा-प्रहार के लिए कटिबद्ध रहते थे। जैसे कबीर और दयानंद की स्वीकृति कहीं भी सहज नहीं है, वैसे ही सावरकर की भी नहीे हैं।

जानलेवा बना पीएमसी
सिद्वार्थशंकर
पीएमसी घोटाला सामने आने के बाद से निवेशकों के बीच हड़कंप मचा हुआ है। मगर अब यह हड़कंप जानलेवा साबित होने लगा है। पीएमसी बैंक में लाखों की रकम फंसने के बाद मुंबई निवासी संजय गुलाटी की मौत हो गई। संजय सोमवार को बैंक के खिलाफ हुए प्रदर्शन में शामिल थे। वहां उन्होंने जिस तरह का माहौल देखा, उससे आहत हुए और घर आने के बाद उनकी मौत हो गई। संजय ने पीएमसी में 90 लाख रुपए जमा कर रखे थे, घोटाले की खबर सुनते ही उनके होश फाख्ता हो गए। बता दें कि पीएमसी बैंक में वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आने के बाद केंद्रीय बैंक ने इस बैंक के ग्राहकों के लिए नकदी निकासी की सीमा तय करने के साथ ही बैंक पर कई तरह के अन्य प्रतिबंध लगा दिए हैं। बता दें कि पंजाब एंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक में फाइनेंशियल फ्रॉड लगभग एक दशक से चल रहा था। जॉय थॉमस की अगुवाई में बैंक मैनेजमेंट ने कंस्ट्रक्शन कंपनी को फंड दिलाने के लिए हजारों डमी अकाउंट खोले हुए थे। यह खेल करीब 10 साल से चल रहा था। थॉमस और मैनेजमेंट के कुछ लोगों ने मिलकर चार हजार 226 करोड़ रुपए (बैंक के टोटल लोन का 73 फीसदी हिस्सा) सिर्फ एक ही कंपनी को दिए थे, जो अब दिवालिया हो गई है। बैंक की तरफ से बांटे गए कुल लोन का दो तिहाई हिस्सा सिर्फ एक कस्टमर को दिया गया था। ऐसे में इस बैंक का दिवाला पिट गया और आरबीआई ने इसके कामकाज पर रोक लगा दी। उसने निवेशकों के पैसे निकालने की लिमिट तय कर दी। पहले आरबीआई ने बैंक के हर खाते से निकासी की ऊपरी सीमा 1,एक हजार रुपए तय की थी जिसे बढ़ाकर 10 हजार रुपए कर दिया गया। इसके बाद यह सीमा 25 हजार कर दी गई और अब यह लिमिट 40 हजार रुपए हो गई है।
मुंबई स्थित पंजाब एंड महाराष्ट्र सहकारी बैंक (पीएमसी बैंक) में घोटाले और अनियमितताओं की परतें अब जिस तरह से खुल रही हैं, उससे ज्यादा हैरानी इसलिए नहीं होनी चाहिए कि भारत की बैंकिंग प्रणाली की असल तस्वीर यही है। ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है। लेकिन अब यह साफ हो चुका है कि बड़-बड़ी कंपनियां कर्ज डकार कर बैंकों को खोखला बना रही हैं और आम जनता की गाढ़ी कमाई पर मौज कर रही हैं। भारतीय रिजर्व बैंक अगर ईमानदारी से जांच कराए तो पता चलेगा कि ज्यादातर सहकारी बैंकों में इसी तरह के खेल चल रहे हैं। देश में हजारों की संख्या में सहकारी बैंक चल रहे हैं और इनका नियंत्रण राज्य सरकार के हाथ में होता है।
सहकारी बैंकों के संचालन में नेताओं के दबदबे और हस्तक्षेप भी जगजाहिर हैं। लेकिन इनका नियामक रिजर्व बैंक है। ऐसे में अगर किसी बैंक में कोई अनियमितता पाई जाती है, जनता के पैसे डूबने का खतरा खड़ा होता है तो उसके लिए रिजर्व बैंक जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। भारत में जिस तरह से बैंक घोटाले हो जाते हैं, उससे यह साफ है कि बैंकों पर निगरानी करने वाला तंत्र वाकई बेहद लापरवाह, कमजोर और अक्षम साबित हुआ है।
पीएमसी बैंक में लोगों के जिस तरह से पैसे फंस गए हैं, वह चिंताजनक है। इस बैंक के ग्राहकों में बड़ी संख्या तो उन लोगों की है, जिन्होंने जीवनभर की कमाई बैंक में सावधि जमा के रूप में भी जमा की थी। लोगों की पगार, पेंशन सब इसमें जमा होती है, उस इलाके के छोटे दुकानदारों और आवास समितियों के खाते इसमें हैं। पर अब सब बंद हैं।
सहकारी बैंक हों या बड़ेसरकारी और निजी बैंक, पिछले कुछ सालों में जिस तरह से इनमें घोटालों और गड़बडिय़ों का खुलासा होता रहा है, उसने बैंकिंग व्यवस्था पर लोगों का भरोसा डिगाया है। हाल में एक निजी बैंक के कर्ज देने पर रोक लगा दी गई। इससे लोगों में यह डर बैठना स्वाभाविक है कि कहीं किसी दिन उनके बैंक में भी ऐसा न हो जाए। ऐसे मामलों में समस्या यह होती है कि जब किसी बैंक पर ग्राहकों के धन की निकासी जैसी कठोर पाबंदियां लगा दी जाती हैं तो पैसा लंबे समय तक के लिए अनिश्चितता में फंस जाता है।
रिजर्व बैंक को इस बारे में सोचना चाहिए कि अगर किसी बैंक पर इस तरह की कड़ी कार्रवाई करने की जरूरत है तो पहले यह सुनिश्चित हो कि लोगों के पैसे जब्त न हों। उन्हें रकम निकासी के तुरंत विकल्प दिए जाएं। बैंकों में होने वाली गड़बडिय़ां बता रही हैं कि ऑडिट प्रणाली ठप-सी है। पंजाब नेशनल बैंक घोटाले में यही हुआ था और लंबे समय तक उस शाखा का ऑडिट ही नहीं हुआ जो नीरव मोदी और मेहुल चौकसी पर मेहरबान थी। सहकारी बैंकों को लूट से बचाने के लिए रिजर्व बैंक को अपना निगरानी तंत्र मजबूत करने की जरूरत है।

कमलनाथ ने जगाया उद्योगपतियों का विश्वास
सनत जैन
मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार जो कहती है, वह करती है। इंदौर में 18 अक्टूबर को होने जा रहे, मैग्नीफिसेंट एमपी में आने वाले औद्योगिक घरानों और उद्योगपतियों के लिए सरकार ने जो तैयारियां की हैं। कारोबारियों को निवेश के बाद म.प्र. में किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। म.प्र. में बदलाव के वादे के साथ सत्ता में आई कमलनाथ सरकार देश की पहली सरकार है, जिसने उद्योगों की समस्याओं के हिसाब से उद्योग नीति को मूर्तरूप दिया है। सरकार विभिन्न सेक्टर के उद्योग के अनुसार सुविधाएं दे रही है। औद्योगिक सूझबूझ वाले मुख्यमंत्री कमलनाथ का विजन मध्यप्रदेश को विकसित राज्यों की कतार में लाना है। इसके लिए उन्होंने पहले उद्योगों को श्रेणियों में बांटा, फिर उनकी समस्याएं को पहचाना फिर उनके निराकरण की उम्दा कोशिश की। उद्योगों के प्रति कमलनाथ सरकार का यह एजेंडा देश में शायद ही कहीं देखने को मिले। कहा जाता है कि कारोबारी सुगमता वह चाबी है, जो प्रदेश में निवेश और उद्यमिता के ताले को खोलकर औद्योगिक गतिविधियों में इजाफा कर सकती है। इससे एक ओर जहां कारोबारियों की राह आसान हुई है। वहीं बढ़ती गतिविधियों से पनपे नए रोजगार के साधन युवाओं को बेहतर भविष्य देंगे।
कारोबारी सुगमता में म.प्र. अव्वल
किसी प्रदेश में होने वाला निवेश काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है, कि कारोबारियों के लिए मध्यप्रदेश में कारोबार अन्य राज्यों की तुलना में आसान है। कारोबारी सुगमता में उस प्रदेश की स्थिति इसका सटीक पहचान कराती है। मध्यप्रदेश इस मामले में देश के अन्य प्रांतों से बहुत आगे आ रहा है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में प्रदेश सरकार लगातार प्रयास कर रही है, कि कारोबारी सुगमता में निरंतर सुधार हो। प्रदेश में नया निवेश सतत् आता रहे। कमलनाथ का मानना है कि नागरिक सेवाओं की तरह कारोबारियों की समस्याओं की सुनवाई भी जल्द से जल्द हो।
दूसरे प्रदेशों पर भारी म.प्र.
मुख्यमंत्री कमलनाथ के 9 माह के कार्यकाल में ही मध्यप्रदेश तमाम मानकों पर देश के दूसरे प्रदेशों पर भारी पड़ रहा है। हाल ही में विश्व बैंक और उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवद्र्धन विभाग (डीपीआईआईटी) की ओर से तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि कारोबारी सुगमता के मामले में मध्यप्रदेश चुनिंदा राज्यों में शामिल है। कारोबारी प्रस्तावों के क्रियान्वयन के लिए जारी मानकों के अनुसार प्रदेश का अनुपालन 95 प्रतिशत है।
नवाचार से निकल रहा हल
कमलनाथ सरकार ने मध्यप्रदेश में औद्योगिक गतिविधयों को बढ़ाने और रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए नए तरीके अपनाए हैं। जिनके सकारात्मक परिणाम भी हमें देखने को मिल रहे हैं। प्रदेश सरकार अपने इन्वेस्ट पोर्टल के माध्यम से संभावित निवेशकों को एकल खिड़की निस्तारण प्रदान कर रही है। कमलनाथ के राज में मध्यप्रदेश में निवेश के इच्छुक कारोबारियों को विभिन्न विभागों के चक्कर काटने की आवश्यकता नहीं रही है। अब वे एक ही स्थान पर संपर्क करके तमाम मंजूरियां, भूमि आवंटन, जरूरी रियायतें त्वरित हासिल कर सकते हैं। इतना ही नहीं आगे चलकर परियोजना के विस्तार या नवीनीकरण का काम भी यहीं से हो सकता है। वर्तमान में 8 विभागों की 32 सेवाओं का लाभ इन्वेस्ट पोर्टल के माध्यम से लिया जा सकता है।
इन वजहों से म.प्र. पहली पसंद
मध्यप्रदेश में ऐसे अनेक कारक हैं जिनकी बदौलत वह निवेशकों की पहली पसंद बना हुआ है।
भूमि आवंटन
मध्यप्रदेश में औद्योगिक भूमि प्रचुर मात्रा में मौजूद है। इंदौर के निकट पीथमपुर, भोपाल के निकट मंडीदीप, ग्वालियर के निकट मालनपुर इंडिस्ट्रयल एरिया के अलावा भी प्रदेश के विभिन्न जिलों में लैंड बैंक बनाये गये हैं जिन्हें जरूरत पडऩे पर कारोबारियों को आवंटित किया जा सकता है। मप्र औद्योगिक विकास निगम के पास कुल मिलाकर 1.20 लाख एकड़ जमीन उपलब्ध है। बीते कुछ समय में विभाग ने 650 से अधिक लैंड पार्सल कारोबारियों को आवंटित किये हैं।
जरुरत के अनुसार रियायतें
मध्यप्रदेश सरकार उद्यमियों को पूंजीगत रियायतें भी प्रदान कर रही है। प्रदेश में फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाने वाले कारोबारी हों या स्टार्ट अप और एसएमई कारोबारी, सरकार उन्हें विभिन्न बुनियादी सुविधाओं के लिए पूंजीगत रियायत देने की नई नीति बनाई है। विभिन्न उपक्रम लगाने वालों को स्टैंप शुल्क में मुक्ति और निशुल्क बिजली उपलब्ध कराने का प्रावधान भी प्रदेश सरकार ने किया है। उद्योगों को मूल निवेश राशि के 10 प्रतिशत से लेकर 40 प्रतिशत तक की छूट प्रदान की जा रही है। वृहद श्रेणी के उद्योगों के लिए यह राशि 10 प्रतिशत और छोटे उद्योगों के लिए 40 प्रतिशत है। प्रत्येक उद्योग में निवेश रोजगार क्षमता तथा ग्रामीण अंचलों के संसाधनों पर आधारित उद्योग लगाने पर रियायतें भी अलग -अलग हैं।
किसानों और बेरोजगार के हित में
सरसरी तौर पर देखने पर लगता है, कि सरकार ये सारी रियायतें तो कारोबारियों को दे रही है, भला इससे आम जनता का क्या भला हो सकता है? कारोबारी सुगमता का सीधा संबंध प्रदेश की आम जनता से है। प्रदेश में निवेश समर्थक और कारोबार की अहमियत समझने वाली सरकार हो, तो रोजगार की स्थिति में सुधार होता है। प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बीते कुछ दिनों में देश के शीर्षस्थ कारोबारियों के साथ मुलाकात कर उन्हें मध्यप्रदेश में निवेश करने के लिए आमंत्रित किया। इन कारोबारियों में रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी, शापूरजी पालोनजी समूह के साइरस मिस्त्री समेत देश के तमाम बड़े उद्यमी शामिल थे। इन उद्यमियों ने प्रदेश में बड़े पैमाने पर निवेश की इच्छा भी जताई है। यह निवेश जब जमीन पर उतरेगा तो प्रदेश के आर्थिक विकास को तो गति मिलेगी ही, स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलेंगे। प्रदेश सरकार ने निजी उद्यमों में मिलने वाले रोजगार में स्थानीय लोगों को 70 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा भी की है। वहीं किसानों को भी लाभ हो उसके उत्पाद का बेहतर मूल्य एवं बड़ा बाजार मिले इसका भी ध्यान रखा गया है।
श्रम शक्ति को कुशल बनाना प्राथमिकता
मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने वक्तव्यों में बार-बार यह दोहराते रहे हैं कि उद्योगों को बढ़ावा देना, प्रदेश में रोजगार के अवसर तैयार करना तथा प्रदेश की श्रम शक्ति को कुशल बनाना उनकी प्राथमिकता में है। ऐसे में अगर कारोबारी सुगमता के माध्यम से कारोबार के अनुकूल माहौल तैयार होता है, तो इसमें सभी का हित है। भूमि आवंटन से लेकर श्रम सुधारों तक और राजस्व सुधार से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में दी जा रही सब्सिडी तक प्रदेश कारोबारी सुगमता के साथ लगातार आगे बढ़ रहा है।
नाथ का विजन मप्र को देगा नई ऊर्जा
देश की हृदयस्थली होने के नाते मध्यप्रदेश एक विशिष्ट हैसियत रखता है। यहां होने वाला निवेश राज्य के सकल घरेलू उत्पाद को तो मजबूत करेगा साथ ही, रोजगार के अवसरों के साथ ग्रामीण और अद्र्धशहरी इलाकों में रहने वाले लोगों की आय और क्रयशक्ति बढ़ायेगा। मौजूदा वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में यह बात बहुत मायने रखती।

*भोपाल नगर निगम का विभाजन: इसमें गलत क्या है?*
राजेन्द्र चतुर्वेदी
मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार ने भोपाल नगर निगम को दो भागों में बांटने का फैसला कर लिया है। यह ऐसा फैसला है, जिसका जनता स्वागत कर रही है, जबकि भाजपा राजनीतिक कारणों से विरोध।
ये लोग एक बहुत ही ‘रोचक’ सवाल पूछ रहे हैं कि सरकार बताए कि आखिर वह भोपाल नगर निगम को दो हिस्सों में क्यों बांटना चाहती है? यह सवाल इतना सरल है कि इसका जवाब कोई भी दे सकता है। क्या यह सवाल भाजपा से नहीं पूछा जाना चाहिए कि उसके नेता यह बताने का कष्ट करेंगे कि वे इसका विरोध क्यों कर रहे हैं?
आखिर,भोपाल नगर निगम के दो हिस्सों में बंटने के बाद उन्हें किस दुकानदारी के बंद होने का डर है? एक पूर्व मंत्री जी ने तो यहां तक कहा है कि अगर भोपाल को दो नगर निगमों में बांटा जाएगा, तो प्रदेश के टुकड़े हो जाएंगे। मंत्री जी नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं। जो लोग देश को बांटने की राजनीति कर रहे हैं, वे प्रदेश के विभाजन की चिंता में दुबले होने लगें, तो इसे उनकी हताशा ही कहा जाएगा? विरोध के लिए विरोध की राजनीति करने वालों को अपनी हताशा को छिपाकर रखना चाहिए। लेकिन हताशा का स्तर इतना ऊंचा है कि एक ‘नेताजी’ तो यह तक कह बैठे कि कांग्रेस हिंदू-मुसलमान के आधार पर भोपाल नगर निगम को बांट रही है। हिंदू-मुसलमान के आधार पर समाज को बांटने की राजनीति करने वाली भाजपा के नेताओं से यह उम्मीद कोई नहीं कर सकता कि वे सांप्रदायिक विद्वेश नहीं फैलाएंगे। खैर, लोकतंत्र का एक सर्वस्वीकृत सिद्धांत है कि प्रशासनिक इकाइयां जितनी छोटी होंगी, जनता को उतनी ही सुविधा मिलेगी। छोटी प्रशासनिक इकाइयों के पक्ष में भाजपा नेता और पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की आवाज काफी बुलंद हुआ करती थी। वे देश को छोटे-छोटे राज्यों में बांटने के पक्षधर थे। मध्यप्रदेश को बांटकर छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश को बांटकर उत्तराखंड और बिहार को बांटकर झारखंड राज्य का गठन उन्हीं शासनकाल में हुआ था। यदि आज अटल जी हमारे बीच होते, तो वे कमलनाथ सरकार के फैसले का स्वागत ही करते। दरअसल, प्रशासनिक इकाइयों का आकार छोटा करने के लिए ही नए राज्यों, नए जिलों, तहसीलों, नगर निकायों का सृजन किया जाता है। जब प्रशासनिक इकाई छोटी होती है, तो जनता और शासन- प्रशासन के बीच की दूरी कम हो जाती है। जैसे- भोपाल के लोग अपनी किसी समस्या को लेकर जितनी आसानी से मुख्यमंत्री, मंत्रियों, पुलिस-प्रशासन के आला अफसरों से मिल सकते हैं, उतनी आसानी से प्रदेश के सुदूर अंचलों के लोग नहीं मिल सकते। राजधानी एक प्रशासनिक इकाई ही तो है और इस इकाई से जो अंचल जितना दूर है, वहां के लोगों का राजधानी तक आना उतना ही दुष्कर। राजधानी का तो उदाहरण मात्र दिया गया है। आम जनता के ज्यादातर काम ग्रामीण-शहरी निकायों, जिला, तहसील, थानों में पड़ते हैं। इन सभी प्रशासनिक इकाइयों की आम जनता से कम दूरी होनी चाहिए। अंतत: ये इकाइयां जनता की सुविधा, उसकी समस्याओं के निराकरण के लिए ही स्थापित की गई हैं।
एक बहुत बड़ा मसला आबादी का होता है। जब आबादी बढ़ती है, तो प्रशासनिक इकाइयों पर काम का बोझ भी बढ़ता है। इस सूरते-हाल में उस प्रशासनिक इकाई को बांटकर दो मुख्यालय बना दिए जाते हैं। इससे काम का बोझ बंट जाता है और मुख्यालय जनता के करीब पहुंच जाता है। क्या भाजपा नेता यह नहीं जानते कि भोपाल की आबादी लगातार बढ़ रही है? अभी 10-12 साल पहले जो गांव भोपाल से बाहर हुआ करते थे, वे अब भोपाल में शामिल हो गए हैं। शहर का आकर इतना फैलता गया कि उसने गांवों को अपने में समाहित कर लिया। आज भोपाल के दो नहीं, तीन चेहरे हैं। एक चेहरा तो वह है, जहां नागरिकों को ठीक-ठाक सुविधाएं दी जा सकती हैं। वे अभी मिल नहीं पा रही हैं, तो नगर निगम की अकर्मण्यता की वजह से। दूसरा चेहरा वह है, जहां सुविधाएं तो हैं, लेकिन नाम मात्र के लिए। भोपाल के ही कुछ इलाके केवल कहने भर को शहर हैं। वहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अकाल है। यह भोपाल का तीसरा चेहरा है। क्या अरेरा कॉलोनी और कोलार के नागरिकों को एक जैसी सुविधाएं देने का दावा कर सकता है, भोपाल का भाजपा शासित नगर निगम? क्या आनंद नगर और महाराणा प्रताप नगर की तुलना की जा सकती है? क्या अयोध्या नगर, करोद या भानपुर की तुलना होशंगाबाद रोड पर स्थित किसी कॉलोनी से हो सकती है? नहीं, क्योंकि जहां नगर निगम की जितनी पहुंच या जहां के लोगों की नगर निगम तक जितनी पहुंच, वहां उतना विकास हुआ है, उतनी ही जनसुविधाओं में इजाफा हुआ है। जो इलाका दूर है, उसके साथ न्याय नहीं हो पाया है।
भोपाल का एक जैसा विकास, शहरवासियों को एक जैसी बुनियादी सुविधाएं तभी मिलेंगी, जब नगर निगम तो दो भागों में बांटा जाएगा। इस तरह के विभाजनों का कहीं विरोध नहीं किया जाता। 2002 में बेंगलुरु नगर निगम तीन हिस्सों में बंटा, तो वहां के सभी लोगों ने इसका स्वागत ही किया। चेन्नई नगर निगम भी अपनी स्थापना से लेकर अब तक चार बार विभाजित हो चुका है। पुणे, मुंबई, कोलकाता आदि नगरीय निकायों का विभाजन हुआ, लेकिन विरोध किसी ने नहीं किया। हां, जब 2011-12 में दिल्ली नगर निगम को चार हिस्सों में बांटा गया था, तब भाजपा के लोगों ने ही हंगामा किया था। यह बात अलग है कि जब उन्हें दिल्ली की जनता का समर्थन नहीं मिला, तो वे चुप हो गए थे। आज भाजपा नेता स्वयं स्वीकार करते हैं कि यदि दिल्ली नगर निगम को चार भागों में नहीं बांटा गया होता, तो उसका वैसा विकास नहीं हुआ होता, जैसा अब हुआ है। दिवंगत वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्वयं स्वीकार किया था कि नगर निगम का विभाजन दिल्ली के हित में रहा, लेकिन जब विभाजन हो रहा था, तब ये जनता की भावनाओं की कद्र नहीं कर रहे थे।
जबकि जनता यह बात खूब समझती है कि सरकार का कौन सा निर्णय उसके हित में है, कौन सा नहीं। उसे पता होता है कि जब प्रशासनिक इकाई के मुख्यालय की दूरी उससे कम होती है, तो उसके पास अपने काम के लिए भाग-दौड़ करने का समय निकल आता है। तब राशन कार्ड सुधरवाने के लिए दो दिन तक दुकान बंद नहीं रखनी पड़ती, नौकरी से छुट्टी नहीं लेनी पड़ती। जब मुख्यालय पास होता है, तो अपने रोज के कार्य करते हुए भी वक्त निकाला जा सकता है। पास में मुख्यालय होने का एक और फायदा यह होता है कि कर्मचारी सतर्क रहते हैं। वे लोगों के काम को टाल नहीं पाते। जैसे- थाने से पांच-10 किलोमीटर दूर अगर एसपी का कार्यालय हो, तो ऐसे थानों में अलग तरह की सतर्कता देश के किसी भी हिस्से में देखी जा सकती है। इसका कारण यही डर होता है कि सामने वाला आदमी शिकायत लेकर कहीं ‘बड़े साहब’ के पास न चला जाए। ज्यादातर कर्मचारियों की मनोदशा यह होती है कि जहां उनकी शिकायत हो सकती है, वह स्थान दूर है, तो वे अपने ही अंदाज में काम करते हैं। उनका रवैया टालने वाला ज्यादा होता है, काम को करने की जगह।
नगर निगम वह प्रशासनिक इकाई है, जहां सभी को काम पड़ता है। इसलिए भोपाल नगर निगम के विभाजन का विरोध कुल मिलाकर जनता का विरोध है। भाजपा कमलनाथ सरकार का विरोध करने के चक्कर में यह तक भूल गई है कि वह जनता का विरोध कर रही है। वह नहीं चाहती कि जनता की समस्याओं का समाधान आसानी से हो। भाजपा को जनविरोधी राजनीति करने से बचना चाहिए।
*लेखक राजेन्द्र चतुर्वेदी, मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं।*

’लोहिया का कथन सच निकला जे.पी. ने देश को हिलाया’’
रघु ठाकुर
(11 अक्टूबर जन्मदिवस पर विशेष ) जयप्रकाश जी को लोकनायक का संबोधन देश की जनता ने 1974 में दिया था, जब उन्होंने बिहार आंदोलन और उसके बाद समूचे देश में सम्पूर्ण क्रांति के नाम से आंदोलन का नेतृत्व किया था। निसंदेह 1974 का आंदोलन आजादी के बाद के देश में हुये आंदोलनों में सबसे व्यापक था। 1974 की रेल हड़ताल जो शायद दुनिया की सबसे बड़ी हड़ताल थी, इसके हिस्सेदार देश के 20 लाख कर्मचारी थे। परन्तु जे.पी. के आंदोलन मंे शारीरिक और मानसिक भागीदारी करोड़ों लोगों की थी।
1952 के संसदीय आम चुनाव के बाद जिसमें तत्कालीन सोशलिस्ट पार्टी पराजित हुई थी। इसके बाद जे.पी.जो समाजवादी नेता थे, पार्टी व राजनीति छोड़कर सर्वोदय में चले गये थे। डाॅ.लोहिया जो 1940 के दशक से जे.पी. के समतुल्य समाजवादी नेता थे और जयप्रकाश और लोहिया का नाम समाजवादी कार्यकर्ताओं के लिये आदर्श समाजवादी नाम थे। यहाॅ तक कि समाजवादी आंदोलन के नारों में भी लोहिया और जयप्रकाश के नारे साथ-साथ ही लगते थे।
डाॅ.लोहिया, जयप्रकाश की व्यापक छवि और प्रभाव को समझते थे और इसीलिये अपनी मृत्यु के कुछ दिनो पूर्व डाॅ.लोहिया ने पटना मंे भाषण देते हुये जयप्रकाश जी से पुनः समाजवादी आंदोलन का नेतृत्व करने का आवाहन किया था। लोहिया ने कहा था कि ’’जयप्रकाश, तुम देश को हिला सकते हो बशर्ते खुद न हिलो’’ और इस दूसरी पंक्ति का तात्पर्य जे.पी. की भावुकता से था।
1974 में गुजरात के नौजवानों ने छात्रावासों के भोजनालयों में भोजन की थाली के बढ़े दाम के विरुद्व आंदोलन शुरू किया था और जो धीरे-धीरे यह आंदोलन समूचे प्रदेश के छात्रों का आंदोलन बन गया था । रविशंकर महाराज जो गुजरात के सर्वमान्य गांधीवादी नेता थे, ने आंदोलन की अगुवाई की थी और स्व.मोरारजी भाई देसाई ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार जिसके मुख्यमंत्री चिमनभाई थे, को बर्खास्त करने की मांग की थी और अनिश्चित कालीन उपवास शुरू किया था। श्रीमति इंदिरा गांधी जो प्रधानमंत्री थी को जनता के दबाव में अपनी ही पार्टी की सरकार को बर्खास्त करना पड़ा। इस आंदोलन में शामिल होने के लिये जब जे.पी. पहुंचे तो उन्हें स्वतः ही एक प्रकार का आत्मविश्वास प्राप्त हुआ और उन्होंने सार्वजनिक रुप से स्वीकार किया था कि गुजरात के नौजवानों ने मुझे नई रोशनी दिखाई है। गुजरात से लौटने के बाद ही जे.पी.ने बिहार के छात्रों के आंदोलन की अगुवाई की और बिहार आंदोलन के नाम से शुरु हुआ आंदोलन लगभग समूचे देश में फैला। हालांकि इसकी सघनता उत्तर भारत, पश्चिमी भारत और पूर्वी भारत में जितनी ज्यादा थी उतनी दक्शिण भारत में नही थी।
जे.पी.ने सम्पूर्ण क्रांति का अर्थ व्यवस्था में सम्पूर्ण बदलाव कहा था और स्व.डाॅ.लोहिया के द्वारा दुनिया में बदलाव के लिये तय की गई ’’सप्त क्रांति’’ का सगुण कार्यक्रम माना था।
जे.पी. ने सम्पूर्ण क्रांति के आंदोलन की अगुवाई करते समय जिन कार्यक्रमों पर तत्कालीन रुप से ज्यादा जोर दिया था उनमें चुनाव सुधार, भ्रष्टाचार की समाप्ति, विकेन्द्रीकरण, मंहगाई को रोकना, बेरोजगारी और राजकीय दमन और काले कानून की समाप्ति प्रमुख रुप से थी। जे.पी. के इस आंदोलन में समाजवादी तो अपनी सम्पूर्ण भावना के साथ थे क्योंकि उनका जे.पी. के साथ लगभग 35 वर्षो का कार्यात्मक और रागात्मक लगाव था। समाजवादी साथियों ने कभी भी जे.पी. को अलग नही माना और सर्वोदय में जाने के बाद भी वे समाजवादियों के लिये पूर्ववत मान्य नेता थे। सर्वोदय के वैचारिक रुप से दो हिस्से हो गये थे और जो लोग विनोवा जी को अपना अंतिम वाक्य मानते थे उन्हें छोड़कर एक बड़ा हिस्सा जे.पी के साथ संघर्ष में आया। बावजूद इसके कि विनोवा जी अन्यानिक कारणों से आंदोलन के हक में नही थे। वामपंथियों में भी बॅटवारा हुआ था और सी.पी.आई. कांग्रेस के साथ थी परन्तु सी.पी.एम और अन्य माक्र्सवादी धड़े इस आंदोलन के सहभागी थे। भारतीय क्रांतिदल जिसका नेतृत्व स्व.चरण सिंह, बीजू पटनायक, राजनारायण और कर्पूरी ठाकुर अपने अपने राज्यों में करते थे, सम्पूर्ण तौर पर सम्पूर्ण क्रांति के आंदोलन का हिस्सेदार थे क्योंकि भारतीय क्रांतिदल में भी राजनायण और कर्पूरी जैसे समाजवादी नेताओं की बड़ी ताकत थी। जनसंघ और राष्ट्रीय स्ंवय सेवक संघ भी अपने निर्णय के माध्यम से इस आंदोलन में सहभागी बने। जब जनसंघ और संघ इसका हिस्सेदार बना तो तत्कालीन सरकार के इशारे पर प्रचार तंत्र ने यह कहकर आंदोलन को विभाजित करने का प्रयास किया था कि जे.पी. के आंदोलन में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ जैसी संस्थायें जो फासिस्ट है, श्षामिल है। तत्कालीन सरकारी पार्टी की ओर से कुछ लोगो ने जे.पी. को राष्ट्रद्रोही की संज्ञा भी दी थी और जे.पी. ने उत्तर देते हुये कहा कि अगर मैं राष्ट्रद्रोही हो जाऊॅगा तो इस देश में कोई राष्ट्रभक्त नही बचेगा। यह उनका अपनी राष्ट्रभक्ति के प्रति गहरा विश्वास था। जे.पी. ने यह भी कहा कि अगर संघ फासिस्ट है और मेरे साथ है फिर मैं भी फासिस्ट हूं। जे.पी. यह जानते थे और उनका विश्वास इतना गहरा था कि देश कभी भी उनके राष्ट्र प्रेम, लोकतांत्रिक और धर्म निरपेक्ष चरित्र पर शक नही करेगा। जे.पी. को यह भी विश्वास था कि इस आंदोलन में शामिल होने से नई युवा शक्ति का उदय होगा और जो राजनैतिक दल शामिल हुये थे उनके स्वभाव और चरित्र पर शक नही करेगा। जे.पी. ने 1977 के आम चुनाव के पूर्व सबको मिलाकर एक जनता पार्टी का गठन कराया। केवल सी.पी.एम. ने अपना पृथक अस्तित्व बचाये रखा। हांलाकि जनता पार्टी जिसकी सरकार चुनाव के बाद केन्द्र में बनी और अनेक राज्यों में भी बनी से जे.पी.को धोखा हुआ, उनका विश्वास खंडित हुआ। जनता पार्टी सरकारों ने जे.पी. के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन के मुद्दे को लेकर लगभग कुछ भी नही किया और केवल सत्ता और संगठन के कब्जे के अंतर खेल में ही पार्टी फंसी रही। जनसंघ के जो लोग सरकारों में आये थे
उन्होंने सरकारों को चलाना ही अपना लक्श्य समझ लिया और जिस बदलाव की उम्मीद जे.पी. ने की थी उसे निराशा में बदल दिया। दो घटनाओं का मैं विशेष उल्लेख करूंगा:-
1. बिहार सरकार के जनसंघ और संघ पृष्ठभूमि के मंत्री श्री दीनानाथ पांडे, नाथूराम गोडसे के भाई श्री गोपाल गोडसे को लेकर बिहार में दौरा करने लगे और गांधी जी की हत्या को उचित ठहराने लगे।
2. 26 जून 1979 को पटना में जे.पी. का अभिनंदन कार्यक्रम था और एक सम्पूर्ण क्रांति सम्मेलन रखा गया था। इस सम्मेलन में मैं स्वतः भी शामिल था तथा तत्कालीन सर संघ संचालक स्व. बालासाहब देवरस इस सम्मेलन में जे.पी. का अभिनंदन करने आये थे। उनका भाषण जो टेप भी है और 27 जून 1979 के पटना के समाचार पत्रों में छपा भी था वह तथ्य को समझने के लिये महत्वपूर्ण है। स्व.देवरस ने अपने भाषण में कहा कि मैं अक्सर संघ कार्यो के लिये यात्रा में रहता हॅू अतः मैं नही पढ़ सका या जान सका कि सम्पूर्ण क्रांति क्या है? परन्तु जे.पी. जैसे महान व्यक्ति जब उसकी चर्चा कर रहे है तो मुझे लगता है कि वह कुछ अच्छी ही बात होगी। क्या बाला साहब का यह कथन मुद्दों से बच निकलने का कथन नही है? 1977 के चुनाव के पूर्व आपातकाल में वे स्वतः जेल में थे और क्या उन्हें इतनी लम्बी अवधि में सम्पूर्ण क्रांति के बारे में पढ़ने या जानने का अवसर नही मिला होगा?
जो मुद्दे सम्पूर्ण क्रांति के मुद्दे थे वे अभी भी लगभग अनिर्णीत है- बेरोजगारी चरम पर है, भ्रष्टाचार और मंहगाई चरम पर है, चुनाव सुधार, यद्यपि टी.एन.शेषन ने अपने कार्याकाल में कुछ शुरुआत की थी परन्तु बड़े सुधार अभी भी लंबित है। आज केन्द्र में श्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री है और उनकी पार्टी ही अकेले बहुमत की सरकार है। श्री नरेन्द्र मोदी जी, जे.पी.आंदोलन के हिस्सेदार भी रहे है तथा समय-समय पर जे.पी. की याद भी करते है और उसका उत्तर वे कैसे देते है वही इतिहास में उनका स्थान तय करेगा। जो लोग आपातकाल में जेलो में रहे है या बाहर रहकर भी आपातकाल के खिलाफ संघर्ष में सहयोगी रहे है और जो विभिन्न प्रदेशों में दलीय सत्ताओं के आधार पर विभिन्न संगठनों में कार्यरत है, आज उनके सामने भी यह चुनौती है।
प्रधानमंत्री से मेरी अपेक्षा है कि वे 11 अक्टूकर को जयप्रकाश जी के जन्मदिन के अवसर पर निम्न कार्यक्रमों की घोषणा करें:-
1. चुनाव सुधार लागू हों जिनमें समूचे देश के पंचायत से लेकर संसद तक याने जनपद, जिला पंचायत, सहकारी समितियाॅ, सहकारी बैंक, विधानसभा और संसद
तक एक साथ हो। हर पाॅच वर्ष में एक माह चुनाव के लिये निर्धारित हो जिसमें सारे चुनाव एक साथ हों जिससे चुनाव खर्च भी सीमित होगा और देश का अमूल्य समय, धन और साधन भी बचेगा।
2. बाजार की मंहगाई को रोकने के लिये ’’दाम बाॅधो’’ नीति का एलान करें ताकि लागत खर्च और बाजार मूल्य में आखिरी छोर तक 50 पैसे से ज्यादा फर्क न हो।
3. कृषि उपजों के दो फसलों के बीच का उतार चढ़ाव 6 प्रतिशत से अधिक न हो, का कानून बने तथा खाद्यान्न की सुरक्षा और संधारण के लिये कृषक भंडारगृह जो किसान के ही घर में हो ऐसी योजना शुरु हो तथा क्षेत्रीय उत्पाद के आधार पर खाद्य प्रस्ंास्करण के क्षेत्रीय उद्योग लगाये जाने की घोषणा करें जिससे कुछ माह के अंदर ही देश में 30-40 लाख लोगों को रोजगार मिल सकता है।
4. लोकतंत्र को नियंत्रित या समाप्त करने वाले काले कानूनों को समाप्त किया जाये।

5. सभी बेरोजगारों को बेकारी भत्ता न्यूनतम 5 हजार रुपया और चयन परीक्षाओं के शुल्क को समाप्त करने की घोषणा करें।
अगर प्रधानमंत्री जी ये घोषणायें करेगे तो वह लोक नायक जयप्रकाश के प्रति सच्ची श्रद्वांजलि होगी। आपातकाल के मीसाबंदियों या आपातकाल के विरुद्व आंदोलन के सहयोगी मित्रों से मैं अपील करुॅगा कि आज भी हमारा दायित्व इन बुनियादी सवालों के प्रति है और इसीलिये हमें दलीय खाकों के ऊपर उठकर अपने और पराये का भेद छोड़कर गीता को सम्मुख रखकर उपरोक्त कार्यक्रमों को पूरा कराने के लिये लड़ने की तैयारी करना होगी। सरकारों में बैठे लोग हमारे अपने है शत्रु नही है परन्तु नीति और कत्र्तव्य की पुकार है कि हम उन्हें प्रेरित करने और बाध्य करने के लिये पुनः सिविल नाफरमानी के मार्ग पर उतरें।

राष्ट्रपिता तुम्हें प्रणाम
रघु ठाकुर
अमेरिका के राष्ट्रपति श्री ट्रंप न केवल दुनिया में बल्कि अमेरिका में भी एक अविश्वसनीय- गैर जिम्मेदार और कमोवेश मूर्ख व्यक्ति माने जाते है। यद्यपि वह अपने राजनैतिक स्वार्थें के प्रति सदैव सजग रहते है। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अमेरिकी यात्रा में ”हाउडी मोदी“ के नाम से ह्यूस्टन में जलसा प्रायोजित किया गया था। इसका उद्देश्य एक तरफ भारत में श्री मोदी को वैश्विक नेता बताने और इस प्रकार की छवि निर्माण करने का उद्देश्य था दूसरी तरफ आगामी चुनाव में भारतीय मतदाताओं को ट्रंप के पक्ष, में करना था, चूंकि श्रीमति तुलसी गेवार्ड उनके विरूद्ध प्रत्याशी है, और वे भारतीय मूल की हिन्दू महिला है। इसलिए ट्रंप के लिए भारतीय मतदाताओं का समर्थन कठिन हो सकता था ”हाउडी मोदी“ के माध्यम से इस चुनावी संकट से पार पाने का कुछ प्रयास श्री ट्रंप ने किया है।
मोदी के माध्यम से भारतीय मतदाताओं का समर्थन पाने के लिये श्री ट्रंप इतने उत्साहित हो गए कि उन्होंने श्री मोदी को ”फादर ऑफ इंडिया“ घोषित कर दिया। किसी व्यक्ति को देश याने भौगोलिक इकाई का पिता मानने या न मानने का और घोषित करने या न करने का अधिकार उस देश के निवासी नागरिकों का होता है। महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता का पहला संबोधन, नेता जी श्री सुभाष चंद्र बोस ने किया था जिसे पहले देश ने फिर दुनिया ने स्वीकार किया। अगर ट्रंप ने श्री मोदी को फादर ऑफ अमेरिका या फादर ऑफ ट्रंप घोषित किया होता तो वह उनका व्यक्तिगत अधिकार था, परन्तु किसी दूसरे देश के बारे में, अपने स्वार्थ के लिए ऐसी टिप्पणी करना तो उस पद के लिए घोषित व्यक्ति को भी छोटा या हल्का बनाना है। राष्ट्रपिता जैसी उपाधि कोई संवैधानिक उपाधि नहीं है, बल्कि यह जन स्वीकारिता पर निर्भर करती है। अगर उस दिन श्री नरेन्द्र मोदी स्वत: इसका खंडन करते और विनम्रता पूर्वक कहते की ”भारत में एक ही राष्ट्र पिता है और वह है महात्मा गाँधी“ तो श्री नरेन्द्र मोदी का कद भारतीयों के मन में और ऊँचा हाता। पर उनकी चुप्पी और प्रसन्नता ने न केवल उन्हें देश में लोलुप सिद्ध किया है, बल्कि हास्य का पात्र बना दिया है। आचार्य धर्मेंद्र जैसे कट्टर मानसिकता और गाँधी विरोधी लोग यदा कदा महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता कहने पर इस आधार पर आपत्ति करते रहे है एक व्यक्ति सवा सौ करोड़ लोगों का पिता कैसे हो सकता है? शायद ही अब वे इस मोदी के मामले पर जबान खोले और कहें एक व्यक्ति एक सौ तीस करोड़ लोगों का पिता कैसे हो सकता है। वे और उनके जैसे लोग इतने तो समझदार है, जानते है कि श्री नरेन्द्र मोदी के विरूद्ध बोलने या उनकी नाराजगी का क्या अर्थ होता है? श्री आसाराम, राम रहीम, रामपाल जैसा शायद वे नहीं बनना चाहेंगे। अभी तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में सर्वेच्च पद सर संघ संचालक का होता रहा है। इस पद को संघ के लोग सम्मान पूर्वक या योजना पूर्वक परम पूज्यनीय कहते रहे है। श्री ट्रंप ने श्री मोदी और संघ के बीच एक संकट खड़ा कर दिया है। और भाजपा सरकार तथा संघ के रिश्तो पर तनाव का संकट खड़ा कर दिया है। अब या तो श्री मोहन भागवत और संघ के लोगों को श्री मोदी को फादर ऑफ इंडिया कहने या मानने से इंकार करना होगा या फिर अपने पिता के पैर छूना होगा। इस ट्रंप जनित नैतिक व व्यवहारिक संकट का हल संघ कैसे निकालेगा यह उन पर ही निर्भर है हालांकि संघ का योजना कौशल निर्विवाद हैं। वैसे ट्रंप ने जाने अनजाने इतना तो अच्छा किया की मोदी को ”फादर ऑफ इंडिया“ कहा। दरअसल इंडिया और राष्ट्र के बीच में मौलिक फर्क है। इंडिया केवल देश के आबादी के 15-20 प्रतिशत लोगों का पर्याय है जो अंग्रेजी दा व पाश्चात्य सभ्यता के पोषक है। पूँजीपति है, कारपोरेट है, और शोषण के पर्याय है। भारत देश की उस 85 प्रतिशत आबादी का पर्याय है जो भारतीय भाषाओं को जानती बोलती है-जो किसान है-मजदूर है- अनुसूचित जाति-जन जाति-पिछड़े व गरीब है, और जो मेहनत कश है। पर दूसरे के श्रम की लूटने वाले नहीं है। महात्मा गाँधी इस भारत के राष्टपिता हैं, और ट्रंप के मोदी उस कारपोरेट जगत के पिता है जो सत्ता की ताकत के माध्यम से कारपोरेट्स को, पूंजीपतियों को और मीडिया के मालिकों को बनाते मिटाते है। श्री ट्रंप ने उन्हें ”फादर ऑफ इंडिया“ कहकर उन 10-15 प्रतिशत लोगों का पर्याय और पिता बता दिया है जो भारतीय सभ्यता पर विश्वास नहीं करते। जो अमेरिका और पश्चिम की पूंजीवादी सभ्यता को अपना आदर्श मानते है। दरअसल इंडिया, भारत रूपी विशाल राष्ट्र का एक बदनुमा दाग जैसा है। जिस प्रकार सुंदर शरीर पर एक छोटा सा निशान बदनुमा बन जाता है। वह तो महात्मा गाँधी ही थे, कि ”अगर उन्हें कोई फादर ऑफ इंडिया कहता तो वे उसे तत्काल हिम्मत के साथ नकार देते और कहते की इस गुलामी के इंडिया को मिटाओ और आजादी का भारत बनाओ। ”परन्तु वे महात्मा गाँधी थे, इसलिए ऐसा कर सकते थे, परन्तु ये मोदी है, जिनसे यह उम्मीद करना बेकार है।
वैसे भी श्री मोदी देश के मामूली से अल्पमत के नुमाइंदे है, चूंकि चुनाव प्रणाली में, जीत-हार कई प्रकार के कारणों पर निर्भर करती है जिसमें कई बार मामूली मतों के अंदर से भी संसदीय संख्या बड़ी हो जाती है। उन्हें 2019 के चुनाव में मतदान करने वाले मतदाताओं का 40 प्रतिशत से कुछ अधिक मत मिला है। अगर इसे देश के कुल मतदाताओं की कसौटी पर रखा जाए तो देश के कुल मतदाताओं का यह लगभग 31 प्रतिशत होता है। फिर जो एन.डी.ए. के घटक दल है जैसे जद यू, लोक जनशक्ति अपना दल आदि के भाजपा को स्थानान्तिरित वोटों की गणना की जाए तो वह भी 4-5 प्रतिशत होंगे। तथा भारतीय जनता पार्टी में, जो मोदी विरोधी तबका है अगर उसकी निजी मत शक्ति की गणना की जाए तो वह लगभग 2 प्रतिशत होगी, यानि श्री मोदी वास्तव में देश के 24 प्रतिशत लोगों के ऐच्छिक नुमाइंदे है, 76 प्रतिशत लोग इसमें उनकी पार्टी के लोग भी शामिल है। जो न उन्हें अपना नेता मानते है, न पिता। देश एक भौगोलिक इकाई होती है और राष्ट्र एक व्यापक, भौगोलिक, एवं सांस्कृतिक इकाई होती है। ”इंडिया“ अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा खींची रेखाएं हैं, और भारत एक विशाल और व्यापक स्वाभाविक इकाई है, जो ”अंग्रेजी इंडिया से“ बहुत बड़ी व व्यापक है। अच्छा हुआ कि ट्रंप की जबान नहीं फिसली और उन्होंने श्री मोदी को ”फादर ऑफ इंडिया“ शब्द का ही इस्तेमाल किया।

पाँच सौ गुना तक महंगी बिक रहीं दवाएं
अजित वर्मा
आम आदमी के लिये सबसे जरूरी दवाओं की कीमतों को लेकर हमेशा से विवाद की स्थिति बनी रही है। अब यह बात सामने आयी है कि अस्पताल मालिक डॉक्टरों और केमिस्ट के दबाव में आकर दवा निर्माता दवा के पैकेट पर 500 फीसदी तक बढ़ा मनमाना दाम प्रिंट कर रहे हैं सभी दवा की कीमत पर 30 फीसदी का मार्जिन कैप लगने से दवा और मेडिकल उपकरणों की कीमतें 90 फीसदी तक कम हो जाएंगी, जिससे निर्माताओं के दवाओं की बिक्री के दाम पर कोई असर नहीं पड़ेगा। गैर अधिसूचित दवाओं पर रिटेलर की खरीद की कीमत से 500 फीसदी तक से ज्यादा दाम ग्राहकों से वसूला जा रहा है। अभी हाल ही में प्रमुख कंपनियों के 1107 दवाइयों की स्टडी की गयी है, जिसका औसत एमआरपी रिटेलर की दवाओं की खरीद की कीमत से 500 फीसदी ज्यादा है। वहीं दूसरी ओर यह स्थिति भी है कि ब्रांडेड और जैनेरिक दवा के क्वालिटी में कोई अंतर नहीं है।
डॉक्टरों पर बड़े-बड़े या कैपिटल अक्षरों में जेनेरिक दवाएं लिखने की कोई बाध्यता नहीं है। वहीं अब तो अधिकांश डॉक्टरों ने खुद की दवाईयें की दूकानें भी खोल ली हैं। इसलिए अधिकांश डॉक्टर न पढ़े जाने वाली भाषा में ब्रांडेड दवाइयां लिख रहे हैं मरीजों को डॉक्टरों के पास बनी केमिस्ट की दुकानों से वह दवाएं मनमाने दामों पर खरीदनी पड़ती है।
दवा में ‘ब्रांड’ के नाम पर लूट का काला कारोबार- बीमारी से ज्यादा आम आदमी ‘महंगी दवाओं’ के बोझ से दब रहा है सरकार, निजी दवा कंपनियों के मनमर्जी के दाम वसूलने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने में पूर्णत: असफल साबित हुई है वहीं जन औषधालय, आम मरीज की पहुंच से दूर हैं और प्राइवेट दवा कपंनियों की तादाद बढ़ती जा रही है।
ब्रांडिंग के खेल में जेनरिक दवाओं के महत्व को दबाया जा रहा है। जीवनदाता सफेदपोश डॉक्टरों का ‘कमिशन’ कई गुना बढ़ गया है प्राइवेट दवा कंपनियों के मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव की घुसपैठ सरकारी अस्पतालों के अंदर खाने तक हो गई है और लूट का कारोबार चरम पर है। अब तो दवा कंपनियां डॉक्टरों को तरह-तरह के प्रलोभन भी देती हैं। कई कंपनियां तो ज्यादा दवाईयां खपाने वाले डॉक्टरों को अब विदेशों की सैर भी करवाती हैं। यह विडम्बना ही है कि डॉक्टरों और दवा के कारोबार को लेकर कोई गंभीर प्रयास होते नजर नहीं आ रहे हैं।

एनसीपी-कांग्रेस ही नहीं, भाजपा-शिवसेना की भी परीक्षा
अजित वर्मा
महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होने के बाद एक ओर भाजपा खेमे में उत्साह का माहौल है, वहीं कांग्रेस-एनसीपी खेमे में निराशा छाई हुई है। विरोधी दलों के ज्यादातर दिग्गज नेता या तो कमल के साथ हो लिए हैं, या शिवसेना के बंधन में बंध गए हैं। एनसीपी प्रमुख शरद पवार राज्य में घूम रहे हैं, लेकिन खेमों में बंटी कांग्रेस अभी भी भ्रम की स्थित में है। इस बार का चुनाव कांग्रेस और एनसीपी राज्य में अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई है।
तीन तलाक और जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद देश में यह पहला बड़ा चुनाव होने जा रहा हैं। इन चुनाव के माध्यम से जनता का सही मूड भांपने का अवसर मिलेगा, क्योंकि अब तक भाजपा सरकार दावा करती रही है कि दोनों निर्णयों से जनता में खुशी का माहौल है। अगर महाराष्ट्र में भाजपा की सीटें बढ़ती हैं, तो निश्चित ही भाजपा का दावा सही साबित होगा, वर्ना उनके दावों की पोल खुल जाएगी।
लोकसभा चुनावों में मिली हार से कांग्रेस और राकांपा उबरी ही नहीं थी कि उनकी पार्टी में ही विरोध इस कदर शुरू हुआ कि मजबूत से मजबूत नेता भी पार्टी छोड़ गए। दोनों पार्टियों में पूरी तरह से अविश्वास का माहौल है। हालात इस कदर बिगड़ गए हैं कि कब कौन पार्टी छोड़ दे, इसका भरोसा नहीं है। ऐसे में दोनों दलों को अब अपने अस्तित्व को बचाए रखने की चुनौती होगी। महाराष्ट्र की राजनीतिक में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बेहद मजबूत होकर उभरे हैं। पिछले पांच साल में उन्होंने अपनी पार्टी के दिग्गजों को जहां चित कर दिया, वहीं विरोधी दल कांग्रेस-राकांपा को भी धूल चटा दी। विधानसभा में विरोधी पक्ष नेता राधाकृष्ण विखे पाटील जैसे दिग्गज नेता को फड़नवीस ने सरकार में शामिल कर लिया। शिवसेना के लिए भी एक लक्ष्मण रेखा खींच दी गयी है। आलम यह है कि मुख्यमंत्री जिसे भाजपा में शामिल नहीं कर सके, उसे शिवसेना में एडजस्ट करा दिया। मुख्यमंत्री ने औरंगाबाद से कांग्रेस के दिग्गज विधायक अब्दुल सत्तार के साथ बैठक की, लेकिन उन्हें शिवसेना में भर्ती करा दिया। अब मुख्यमंत्री के लिए चुनौती है कि वे भाजपा के लिए पिछले विधानसभा चुनाव से ज्यादा सीटें जीतकर लाएं। पिछले चुनाव में भाजपा ने 122 सीटों जीती थी।
वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-राकांपा का गठबंधन टूट गया था। सभी दलों ने अपने-अपने दम पर चुनाव लड़ा था। लेकिन इस बार भाजपा और शिवसेना तथा कांग्रेस और राकांपा के बीच चुनावी गठबंधन हो रहा है इसलिये अब दोनों गठबंधनों के बीच मुकाबला होने जा रहा है।

रावण ने जानबूझकर राम के हाथों मृत्यु के लिये सीता का अपहरण किया था
हर्षवर्धन पाठक
दशहरा के समय जब राम की विजय का घोष होता है तो रावण की पराजय और मृत्यु की चर्चा भी होती है। वास्तव में दशहरा के मौके पर राम तथा रावण दोनों का स्मरण होता है।
रामानुज लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा का अंग भंग किये जाने का कारण सब को मालूम हैं। लेकिन इस सिलसिले में दो तथ्य ध्यान दिये योग्य हैं। श्रीराम और लक्ष्मण दोनों प्रारंभ में शूर्पणखा का प्रस्ताव टालते हैं। जब शूर्पणखा डरावना रूप धारण करती है तब सीता को भयभीत देखकर लक्ष्मण शूर्पणखा के नाक-कान काटते है। तब भी शूर्पणखा राम की बुराई नहीं करती है, सीता का रूप वर्णन करते हुए वह रावण से कहती है:-
सोभा धाम राम अस नामा।
तिन्ह के संग नारि एक स्यामा।
रूप रासि विधि नारी संवारी।
रति सत कोटि तासु बलहारी।
सीता के रूप की प्रशंसा करते हुए वह रावण को उकसाती है कि सीता का अपहरण कर लो लेकिन राम के विरूद्ध कुछ नही कहती है।
रावण का कथित अहंकार और जिद को तुलसीदास ने बार-बार दिखाया है लेकिन वे अरण्यकांड में रावण के मन की बात कह गये।
कथा प्रसंग यह है कि दरबार में बहिन शूर्पणखा को महाबली रावण अपने बल और शौर्य की कहानियां सुनाकर सांत्वना देता हैं लेकिन वह इसके बाद रात भर सो नहीं पाया। तुलसीदास अरण्यकांड के दोहा क्रमांक 22 में रावण के रात्रि जागरण तथा उसके मनोमंथन की बात कहते है।
शूर्पणखा समुझाई करि, बल बोलेसि बहु भांति।
गयऊ भवन अति सोच बस, नींद परई न राति।
रावण रात भर सो नही पाया। यद्यपि उसने अपनी बहिन को दरबार में अपने बल तथा शौर्य के बहुत किस्से सुनाये परन्तु रात्रि जागते हुए वह यह सोचता रहा कि खर दूषण जैसे मेरे समान बलशाली राक्षसों को राम ने मार दिया तो वे निश्चय ही भगवान के अवतार हैं। भगवान का भजन इस जन्म में इस तन से नहीं हो सकता तो एक ही विकल्प बचता है कि भगवान के हाथ से मृत्यु के द्वारा मुझे मोक्ष मिले।
रावण की इस मनोदशा का वर्णन करते हुए महाकवि यह भी लिखते है कि रावण ने यह निश्चय कर लिया है कि मैं हठ पूर्वक श्रीराम का दुश्मन बनूंगा। यदि वे दोनों (राम और लक्ष्मण) ईश्वर के अवतार नहीं है तो मैं उन दोनों से युद्ध जीत लूंगा और यदि वे ईश्वर के अवतार हुए तो और यदि वे ईश्वर के अवतार हुए तो उनके हाथों मरकर स्वर्ग जाऊंगा। यह उल्लेखनीय प्रसंग है।
रावण के इस मनोमन्थन का उल्लेख संत कवि ने इन शब्दों में किया है:-
तो मैं जाई बैरी हठ करऊ
प्रभु सर प्रान तजे भव तरऊ।
इसके बाद अगले दोहा में तुलसीदास ने एक और रहस्योद्घाटन किया। श्रीराम सीता से कहते हैं कि तुम कुछ समय के लिए अग्नि में निवास करो। तब तक मैं राक्षसों का संहार करूंगा। श्रीराम के मुंह से यह बात सुनकर सीता ने अग्नि में प्रवेश कर लिया। अग्नि से उनका प्रतिबिम्ब सामने आया जो वैसा ही रूप था। लक्ष्मण को यह ज्ञात नहीं था क्योकि उस समय वे वन गये हुये थे।
रावण-वध के बाद सीता की अग्नि परीक्षा का कारण भी यही था कि श्रीराम मूल सीता को अग्नि से वापिस प्राप्त करना चाहते थे, जो पूर्व में अग्नि में समा गई थी। तुलसीदास ने इस प्रसंग का वर्णन इस प्रकार किया है।
सुनहू प्रिया व्रत रूचिर सुसीला
मैं कछू करब ललित नर लीला।
तुम्ह पावक मंह करऊं निवासा।
जो लगि करौं निसाचर नासा।
निज प्रति बिम्ब राखि तंह सीता।
तैसई सील रूप सुविनीत।।
इसके बाद इस सीता का हरण हुआ। रावण इस सीता का अपहरण कर ले गया तथा राम-रावण युद्ध की भूमिका बनी। अरण्यकांड में ही शबरी द्वारा दिये गये कंद मूल फल राम के द्वारा खाये जाने का वर्णन है। श्रीराम ने शबरी को भक्ति के नौ प्रकारों (नवधा भक्ति) का उपदेश दिया।
श्रीराम ने इसके पूर्व लक्ष्मण को भी नवधा भक्ति से अवगत कराया था। यह प्रसंग भी अरण्यकाण्ड मे आया है। लेकिन लक्ष्मण और शबरी को दिये गये नवधा भक्ति के उपदेशों में अन्तर है। यह है कि जहां श्रीराम ने लक्ष्मण को ईश्वर से प्रेम करना सिखाया वहां शबरी की वह भक्ति बताई जिसमे मनुष्य ईश्वर का प्रिय होता है।
शबरी ने ही पंपासुर का मार्ग बताया जहां श्रीराम लक्ष्मण की भेट पहले हनुमान से और फिर सुग्रीव से होती है।
वृन्दावन के विख्यात संत दिवंगत स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती ने अरण्यकाण्ड की तुलना माया नगरी हरिद्वार से की है। उनका कथन यह है कि जिस प्रकार तालाब में उतरने के लिये सीढ़िया उतरनी पड़ती है वैसे ही रामचरित मानस के सात सोपान अर्थात सात सीढ़ियां है। राम चरित मानस के सात सोपानों का नामकरण वे सात मोक्षदायिनी पुरियों के नाम पर करते हैं। वे अरण्यकाण्ड को वे माया प्रथान बताते हुये इसे हरिद्वार बताते है। ये सात पुरियां है अयोध्यां, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवन्तिका तथा द्वारावती (द्वारका)। अरण्यकाण्ड की वे माया प्रधान बनाते है। इसमें सभी माया करते है। राम-सीता-लक्ष्मण ने अरण्य की शरण ली। वहां राम ने सीता के अग्नि प्रवेश की माया रची तो रावण ने विप्रवेश धारण कर सीता हरण की माया की। मारीच ने कंचन मृग बनकर सीता को लुभाने की माया की, तो अंत में लक्ष्मण के स्वर में सीता का उच्चारण कर एक और माया की। खर-दूषण ने राम से माया युद्ध किया तो राम ने भी माया युद्ध कर उसका उत्तर दिया। शूर्पणखा ने भी राम को प्रलोभित करने की माया की।

विकास की पटरी पर रेल
सिद्धार्थ शंकर
देश की कॉर्पोरेट सेक्टर की पहली ट्रेन तेजस के लिए अब इंतजार खत्म हो गया है। देश की पहली प्राइवेट ट्रेन को सीएम योगी आदित्यनाथ लखनऊ जंक्शन से इसे हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। रेलवे ने तेजस एक्सप्रेस के किराए का भी ऐलान कर दिया है। यह ट्रेन सप्ताह में 6 दिन चलेगी। दिल्ली-लखनऊ तेजस एक्सप्रेस के यात्रियों को ट्रेन के विलंब होने पर मुआवजा दिया जाएगा। रेलवे की सहायक कंपनी ने मंगलवार को यह जानकारी दी। इसमें कहा गया कि एक घंटे से अधिक का विलंब होने पर 100 रुपए की राशि अदा की जाएगी, जबकि दो घंटे से अधिक की देरी होने पर 250 रुपए का मुआवजा दिया जाएगा। तेजस मंगलवार को छोड़कर हफ्ते में छह दिन चलेगी। छह अक्टूबर से ट्रेन सुबह 6 बजकर 10 मिनट पर लखनऊ जंक्शन से छूटकर 7 बजकर 20 मिनट पर कानपुर और वहां से 7 बजकर 25 मिनट पर चलकर 11 बजकर 43 मिनट पर गाजियाबाद पहुंचेगी। यहां से 11 बजकर 45 मिनट पर छूटकर 12.25 मिनट पर नई दिल्ली पहुंचेगी। नई दिल्ली से ट्रेन शाम 4 बजकर 30 मिनट पर रवाना होकर शाम 5 बजकर 10 मिनट पर गाजियाबाद, रात 9.30 मिनट पर कानपुर और रात 10 बजकर 45 मिनट पर लखनऊ आएगी।
देश की पहली प्राइवेट ट्रेन को पटरियों पर दौड़ते देखना वाकई सुखद है और रेलवे के कायाकल्प के लिए जरूरी भी। यह ट्रेन रेलवे की विस्तार नीति को बढ़ावा देगी और विभाग पर लगातार आ रहे बोझ से छुटकारा भी दिलाएगी। हालांकि, इस टे्रन के बहाने रेलवे के निजीकरण को लेकर उठ रही शंकाओं का रेल मंत्री पीयूष गोयल समाधान कर चुके हैं, फिर भी यह ऐसा पहलू है, जिसकी तरफ एकबारगी नजर डालनी ही चाहिए। बहरहाल, देश की पहली प्राइवेट ट्रेन की परिकल्पना सुरेश प्रभु की है। रेल मंत्री रहते प्रभु ने कहा था कि वो रेल के विकास के लिए निजी कंपनियों के साथ ज्वाइंट वेंचर करेंगे, साथ ही राज्यों का भी सहयोग लेंगे। अगर मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में रेलवे के विकास पर नजर डालें तो पता चलेगा कि विकास पटरी पर काफी आगे निकल गया है। रेलवे ने एक नई सेवा का ऐलान किया है। इस सेवा के जरिए टिकट बुक करवाते समय भले ही उन्हें कंफर्म टिकट न मिले, मगर उन्हें यह जरूर पता चल जाएगा कि उनके वेट लिस्ट टिकटों के कन्फर्म होने संभावना कितनी है। लोगों को ट्रेनों में खाने की क्वालिटी को लेकर शिकायत रहती है। अभी राजधानी और शताब्दी में खाने की अधिक मात्रा दी जाती है। भारतीय रेलवे अब ऐसी ट्रेनों में खाने की मात्रा कम करेगी, ताकि इसकी गुणवत्ता में सुधार लाया जा सके। हाल ही में रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा रेलवे के जोनल प्रमुखों को कहा था कि ट्रेनों में होने वाली देरी का असर उनके अप्रेजल में नजर आएगा। इसमें सुधार के लिए उन्होंने अधिकारियों को एक महीने का वक्त दिया है। संभव है कि प्रमोशन दांव पर लगने के बाद ट्रेनों की समयबाध्यता बढ़ेगी।
अगले साल से भारतीय रेलवे को एयरपोर्ट जैसे स्टेशन मिलेंगे, जो आकर्षण के लिहाज से बड़ा बदलाव होगा। मध्यप्रदेश में हबीबगंज और गुजरात में गांधी नगर के रेलवे स्टेशन किसी सामान्य हवाई अड्डे को टक्कर देंगे। कुल 68 रेलवे स्टेशनों के सुधार के लिए 5,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।
मोदी सरकार ने गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकारों को 1,504 किलोमीटर लंबे वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडर के लिए जमीन अधिग्रहण में होने वाली देरी के लिए आड़े हाथों लिया है। भारतीय रेलवे का नेटवर्क विशालकाय है। इस वजहे से इसमें बदलाव की संभावनाएं और गति काफी सुस्त रहती है. हर जगह एक साथ बदलाव पहुंच पाना संभव भी नहीं है, मगर यदि समय पर सही प्रयास किया जाए, तो परिवर्तन लाया जा सकता है।
किलोमीटर लंबी पटरियों पर दौड़ती भारतीय रेल हमारी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। माल ढुलाई और यात्रियों के आवागमन का प्राथमिक साधन होने के साथ रोजगार उपलब्ध करानेवाली सबसे बड़ी संस्था रेल ही है। सत्ता में आते ही पीएम नरेंद्र मोदी ने इसके कायाकल्प का भरोसा दिलाया था. हालांकि ऐसे वादे पहले भी किये गये थे। रेल के विस्तार एवं विकास की दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धियां भी हासिल हुई थीं, लेकिन यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा बेहतर करने तथा रेल नेटवर्क की व्यावसायिक संभावनाओं को वास्तविकता में बदलने की आकांक्षाएं संतोषजनक रूप से पूरी नहीं हो सकी थीं। मोदी सरकार के पहले बजट में ही तत्कालीन रेलमंत्री सदानंद गौड़ा ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी पर जोर देकर सुधार की पहलकदमी की थी। रेल बजट की एक परंपरा बन गई थी कि व्यापक विकास की आवश्यकताओं को किनारे रख राजनीतिक नफे-नुकसान को देखते हुए नयी यात्री रेलगाडिय़ों की घोषणा की जाती थी। प्रभु ने इस परिपाटी को न सिर्फ तोड़ा, बल्कि पूरे रेल प्रणाली के आधुनिकीकरण, विद्युतीकरण और मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर के रख-रखाव पर जोर दिया। खस्ताहाल पटरियों के कारण हमारे देश में ट्रेनों की गति कम है, इससे माल ढुलाई और यात्री गाडिय़ां देरी से भी चलती हैं।
यह समस्या अब भी है, क्योंकि इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने में समय लगता है, लेकिन मौजूदा सरकार की कोशिशों से इसमें सुधार हुआ है और अनेक तेज गति की ट्रेनें चल रही हैं। एक महत्वपूर्ण निर्णय यह हुआ कि 92 साल से चली आ रही अलग रेल बजट की परंपरा को विराम देते हुए 2017 में रेल बजट को आम बजट में समाहित कर दिया गया. उस वर्ष 2016-17 के बजट से आठ फीसदी की वृद्धि की गई थी। तब वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पांच सालों में रेल सुरक्षा के लिए एक लाख करोड़ रुपए का कोष बनाने की घोषणा की थी। रेल सुरक्षा पर बातें पहले भी होती थीं, पर आवंटन की कमी से अच्छे परिणाम नहीं आते थे, पर बीते चार सालों में इस दिशा में बहुत काम हुआ है और दुर्घटनाओं में कमी आई है।

असंगठित जनता को लूटते संगठित व्यवसायी ?
निर्मल रानी
लगभग दस बारह वर्ष पूर्व आपने मोबाईल नेटवर्क उपलब्ध करने वाली एयरटेल जैसी कई कम्पनीज़ के ऑफ़र्स में लाइफ़ टाइम ऑफ़र दिए जाने के बारे में ज़रूर सुना होगा। मेरे जैसे करोड़ों देशवासियों ने हर महीने मोबाईल टाक टाईम चार्ज करवाने की झंझट से बचने के लिए कंपनी के लाइफ़ टाइम ऑफ़र को स्वीकार करते हुए उसके द्वारा मांगे गए एक हज़ार रूपये भी दे दिए थे। इसके कुछ समय पश्चात् इस प्रकार का लाइफ़ टाइम ऑफ़र स्वीकार करने वालों के मोबाईल फ़ोन पर उन कम्पनीज़ द्वारा इस आशय के सन्देश भेजे गए कि आप का लाइफ़ टाइम कनेक्शन 2030 या किसी पर 2032 या 2033 या 34 आदि तक वैध रहेगा। इस प्रकार की जानकारी भी दी गयी। इस ऑफ़र की घोषणा व इसकी बिक्री को लगभग 10 वर्ष बीत चुके हैं। इसलिए हमें यह जानना ज़रूरी है कि क्या लाइफ़ टाइम ऑफ़र देने वाली सभी कम्पनीज़आज भी सही सलामत भारतीय बाज़ारों में क़ायम रहकर लाइफ़ टाइम ऑफ़र उपलब्ध कराने के अपने वचन पर क़ाएम हैं?वह सभी कम्पनीज़आज भी भारतीय बाज़ारों में जीवित नज़र आ रही हैं? इसी प्रकार अपना मोबाईल पोर्ट करने अर्थात उसी पुराने नंबर को बरक़रार रखते हुए किसी अन्य मोबाईल नेटवर्क कंपनी में अपना कनेक्शन स्थानांतरित करने की व्यवस्था थी। वह नई मोबाईल नेटवर्क कंपनी अपनी शर्तों के अनुसार तथा अपने निर्धारित रेट पर नेटवर्क की सेवाएं उपलब्ध कराती थीं। परन्तु भारतीय बाज़ार का उतार चढ़ाव तथा अपने घाटे मुनाफ़े का अपने तरीक़े से आंकलन करने के बाद गत दो दशकों में नेटवर्क सेवाएं उपलब्धकरने वाली अनेक कम्पनीज़ विशाल भारतीय बाज़ार के क्षितिज पर पहले तो सितारों की तरह चमकीं और कुछ ही समय के बाद सितारों की ही तरह आँखों से ओझल भी हो गयीं।
ऐसे में सवाल यह कि कोई भी नेटवर्क सेवाएं उपलब्ध कराने वाली कम्पनी भारतीय बाज़ार में टिकी रहे या भारतीय बाज़ार को छोड़ जाए। अथवा नेटवर्क सेवाएं उपलब्ध कराने वाली किसी दूसरी कम्पनी में उसका विलय हो जाए। परन्तु एक ग्राहक से कंपनी द्वारा किये गए उस वादे की वैधानिक स्थिति क्या होगी जिसके तहत उसने ग्राहक को लुभाया और तरह तरह की लालच देकर कनेक्शन लेने हेतु वातावरण तैयार किया ? गत दो दशकों के दौरान भारत में मोबाईल नेटवर्क मुहैय्या कराने वाली अनेक कम्पनीज़ आईं और चली गयीं। उनकी शर्तें व ग्राहकों के साथ किये गए उनके सभी क़रार भी धराशायी हो गए। अब न तो कोई लाइफ़ टाइम कनेक्शन रह गया है न ही पिछली कंपनी की शर्तों व रेट पर कोई नई कम्पनी सुविधाएं दे रही है। सब की अपनी अपनी शर्तें हैं आपको उसे मानना ही पड़ेगा। मोबाईल नेटवर्क मुहैय्या कराने वाली अनेक कम्पनीज़ के अपने अपने नियम हैं वे पोर्ट करने वाली किसी अन्य कंपनी के नियमों को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। अब लाइफ़ टाईम ऑफ़र के नाम पर जनता से लूटे गए सैकड़ों करोड़ रुपयों की भी कोई जवाबदेही किसी भी कंपनी की नहीं है। अब यदि आप नियमित रूप से अपना मोबाईल कंपनी के पैकेज के अनुरूप प्रत्येक माह चार्ज करा रहे हैं फिर तो ग़नीमत है अन्यथा आपकी पैकेज की तिथि समाप्त होते ही आने व जाने वाली सभी कॉल्स कंपनी बंद कर देती है। और यदि इनकमिंग कॉल्स की व्यवस्था को जीवित रखना चाहते हैं तो प्रत्येक माह किसी कंपनी का 35 रु तो किसी का 23 रु प्रति माह के हिसाब से ज़रूर चार्ज करना पड़ेगा अन्यथा आपके हाथों का मोबाईल संचार सुविधाएं मुहैय्या करा पाने में पूरी तरह असमर्थ है। भले ही आप ने लाइफ़ टाइम सदस्य के रूप में किसी कम्पनी को एक हज़ार रूपये क्यों न दे रक्खे हों।
यहाँ महीने के नाम पर 30 या 31 दिन गिनने की भी ग़लती मत करें। इन संगठित व्यवसायियों ने लूट खसोट की अपनी सुविधा के मद्देनज़र महीने का निर्धारण भी मात्र 28 दिनों का कर रखा है। गोया हर महीने दो या तीन दिन के फ़ालतू पैसे महीने भर के पैकेज के नाम पर प्रत्येक ग्राहक से ठगे जा रहे हैं। हमें एक वर्ष में बारह महीने की यदि आय होती है तो इन कम्पनीज़ ने साल के 12 नहीं बल्कि 13 महीने या इससे भी कुछ अधिक निर्धारित कर दिए हैं। और असंगठित ग्राहक लूटा भी जा रहा है और तमाशबीन भी बना हुआ है। आपकी कॉल ड्राप होती है या सही सिग्नल नहीं मिलते अथवा बातचीत के दरम्यान काल काट जाती है अथवा रेकार्डेड यंत्र आपको कॉल कनेक्ट करने के बजाए और कुछ बोलता रहता है तो इसकी ज़िम्मेदारी भी कोई कम्पनी नहीं लेती सिवाए इसके की आप सम्बंधित कंपनी के ग्राहक सेवा केंद्र पर फ़ोन करें और यहाँ बैठा कोई युवक या युवती आपको बातों बातों में ही अपनी मीठी व सुरीली भाषा से ही संतुष्ट कर दे और अंत में भी आप से यही पूछे कि और कोई सेवा बताएं या काल करने हेतु धन्यवाद कर आपकी शिकायत का ‘सुखद अंत’ कर दे। वैसे भी जबसे देश के सबसे बड़ा सरकारी संचार संस्थान बी एस एन एल की तरफ़ से सरकार ने जान बूझ कर आँखें फेरनी शुरू की हैं तभी से निजी कम्पनीज़ के हौसले बुलंद हो चुके हैं। अनेक निजी कम्पनीज़ के इस क्षेत्र से ग़ाएब हो जाने के बावजूद जिओ,एयरटेल,आइडिया,व वोडाफ़ोन जैसी कई कम्पनीज़ अपने कारोबार में निरंतर विस्तार भी कर रही हैं। यहाँ यह बताने की ज़रुरत नहीं कि इन कम्पनीज़ के स्वामी सरकार के मुखियाओं से अपने ‘मधुर सम्बन्ध’ रखते हैं लिहाज़ा इन्हें सरकार का पूरा संरक्षण भी हासिल होता है। इतना अधिक कि सरकार अपने संचार संस्थान बी एस एन एल के आधुनिकीकरण पर या इसके कर्मचारियों की मांगों पर गंभीरता पूर्वक ध्यान देने के बजाए संचार क्षेत्र की निजी कम्पनीज़ के समक्ष आने वाली परेशानियों से शीघ्रता से निपटती है। जिओ के बाज़ार में उतरने के समय पूरे देश ने देखा कि किस प्रकार जिओ के विज्ञापन में बड़े पैमाने पर देश के प्रधानमंत्री के चित्र का इस्तेमाल किया गया। जैसे कि जिओ निजी संचार संस्थान न होकर कोई सरकारी संचार संस्थान हो। इस बात को लेकर उस समय थोड़ा बहुत हो हल्ला भी हुआ था परन्तु जो कुछ करना या होना था वह हो चुका था। देश को जिओ पर सरकरी संरक्षण होने का सन्देश सफलतापूर्वक दिया जा चुका था। आज पूरे देश में व्यापक स्तर पर इसका फैला नेटवर्क जिओ पर सरकारी संरक्षण का सुबूत है।
इसी प्रकार के और भी कई ऐसे निजी यहाँ तक कि कई सरकारी क्षेत्र भी ऐसे हैं जहाँ जनता के पैसों की मनमानी तरीक़े से लूट खसोट सिर्फ़ इसलिए की जाती है क्योंकि आम लोग असंगठित हैं,विभिन्न वर्गों में बंटे हुए हैं। जनता को अपने हितों से अधिक चिंता अपने धर्म व जाति,संस्कृति व भाषा आदि की सताने लगी है। और निःसंदेह जनता की इन्हीं कमज़ोरियों का फ़ायदा संगठित संस्थानों या संस्थाओं के लोग बड़ी ही आसानी से उठा रहे हैं।
05अक्टूबर/ईएमएस

अंधविश्वास की काट कब
सिद्धार्थ शंकर
ओडिशा के गंजम से इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला एक मामला सामने आया है। कुछ लोगों ने जादूटोना करने के शक में छह बुजुर्गों के दांत तोड़ दिए और उन्हें मानव मलमूत्र खाने के लिए मजबूर किया। हैरानी की बात यह है कि पीडि़त मदद के लिए गुहार लगाते रहे, लेकिन कोई उनकी सहायता के लिए आगे नहीं आया। गोपुरपुर गांव के कुछ लोगों को शक था कि छह बुजुर्ग व्यक्ति जादूटोना कर रहे हैं, जिसके चलते उनके इलाके में कम से कम छह महिलाओं की मौत हो गई और सात अन्य बीमार हो गईं। पुलिस के मुताबिक उन्होंने मंगलवार को छह लोगों को जबरदस्ती घर से बाहर निकाला और उन्हें मानव मलमूत्र खाने के लिए मजबूर किया, बाद में उनके दांत उखाड़ दिए। इन छह ने मदद की गुहार भी लगाई लेकिन कोई भी उनके लिए आगे नहीं आया। जादू टोना के नाम पर किसी के साथ ज्यादती की यह पहली घटना नहीं है। देश में कई मौकों पर इंसानियत को शर्मसार करने वाली तस्वीर सामने आ चुकी है। मगर आज तक कोई समाधान नहीं हो सका।
यह घटना अपने आप में बताने के लिए काफी है कि विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच हमारे समाज में बहुत सारे लोग वैज्ञानिक चेतना के अभाव में किस कदर किसी बीमारी के कारण पर विचार करने की स्थिति में नहीं पहुंच सके हैं। यह एक जगजाहिर तथ्य है कि ऐसे अंधविश्वासों की वजह से देश भर में कितने लोगों और खासकर महिलाओं को त्रासद उत्पीडऩ का सामना करना पड़ता है। तांत्रिक या ओझा के बहकावे में आकार किसी महिला को डायन या काला जादू करने वाली बताने, उसे मैला पिलाने, निर्वस्त्र करके घुमाने और हत्या तक कर देने की खबरें अक्सर आती रहती हैं। विडंबना है कि ऐसे अंधविश्वासों में पड़े लोगों को यह भी अहसास नहीं होता कि भ्रम में पड़ कर वे अपराध कर रहे हैं। कई बार धार्मिक परंपरा का नाम देकर ऐसी धारणाओं का बचाव किया जाता है। देश के कुछ राज्यों में जब अंधविश्वास के खिलाफ कानून बनाने की कोशिशें की जा रही थीं, तो उसके विरोध के लिए धार्मिक पक्ष और मान्यताओं का ही हवाला दिया गया था।
साफ है कि अंधविश्वासों के बने रहने में कुछ लोग अपना हित समझते हैं और इसीलिए वैज्ञानिक सोच के बजाय भ्रम पर आधारित परंपराओं को बढ़ावा देने में लगे रहते हैं। महाराष्ट्र में अंधविश्वास विरोधी आंदोलन और जागरूकता अभियानों की कमी नहीं रही है। इसके बावजूद आज भी अगर देश में कहीं भी जादू-टोना या अंधविश्वास पर आधारित मान्यताओं की वजह से किसी की हत्या कर दी जाती है तो यह सोचने की जरूरत है कि व्यवस्थागत रूप से सामाजिक विकास के किन पहलुओं की अनदेखी की गई है। भारतीय संविधान की धारा 51-ए (एच) के तहत वैज्ञानिक दृष्टि के विकास और जरूरत को नागरिकों को बुनियादी कर्तव्य के रूप में रेखांकित किया गया है। पर आजादी से बाद से अब तक सरकारों की ओर से शायद ही कभी इस मकसद से कोई ठोस पहलकदमी की गई या वैज्ञानिक चेतना के विकास, उसके प्रचार-प्रसार को मुख्य कार्यक्रमों में शामिल किया गया। नतीजतन, परंपरागत तौर पर जिस रूप में अंधविश्वास समाज में चलता आया है, लोग उससे अलग कुछ सोचने की कोशिश नहीं करते। जरूरत इस बात की है कि न केवल सामाजिक संगठनों, बल्कि खुद सरकार की ओर से भी शिक्षा-पद्धति में अंधविश्वासों के खिलाफ पाठ शामिल करने के साथ-साथ व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जाएं। अन्यथा अंधविश्वास की वजह से होने वाली घटनाएं हमारे तमाम विकास पर सवाल उठाती रहेंगी।
आज की तारीख में अनेक बाबाओं और तांत्रिकों का धंधा अंधविश्वास के कारण ही चल रहा है। सच कहा जाए तो अंधविश्वास फैलाने वाले काफी संगठित और मजबूत हैं, तभी तो उनका विरोध करने पर नरेंद्र दाभोलकर जैसे लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। संविधान में वैज्ञानिक सोच को आगे बढ़ाने के संकल्प के बावजूद कार्यपालिका और विधायिका के स्तर पर अंधविश्वास से लडऩे की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई देती।
कुछ राज्यों में भले इस मामले में कानून बन गया हो, लेकिन ज्यादातर राज्य इसे लेकर उदासीन हैं। अक्सर जाने-अनजाने प्रशासन ही इसे बढ़ावा देता रहता है। अंधविश्वास विकास और तरक्की के रास्ते में बड़ी बाधा है। सरकार को चाहिए कि वह अफवाह फैलाने वालों से सख्ती से निपटे और लोगों को जागरूक करे। आज अंधविश्वास और अवैज्ञानिक सोच के खिलाफ सामाजिक आंदोलन की जरूरत है। इसके लिए सरकार, सामाजिक-धार्मिक संगठनों और प्रबुद्ध वर्ग को एकजुट होना होगा।

सीवर में होने वाली मौतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
रमेश सर्राफ धमोरा
कुछ दिनो पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने देश में हाथ से मैला साफ करने के दौरान सीवर में होने वाली मौतों पर चिंता जताने के साथ ही सख्त टिप्पाणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि देश को आजाद हुए 70 साल से अधिक समय हो चुका है। लेकिन देश में जाति के आधार पर भेदभाव जारी है। मनुष्य के साथ इस तरह का व्यवहार सबसे अधिक अमानवीय आचरण है। इस हालात में बदलाव होना चाहिए।
जस्टिस अरुण मिश्रा, एमआर शाह और बीआर गवई की पीठ ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से सवाल किया कि आखिर हाथ से मैला साफ करने और सीवर के नाले या मैनहोल की सफाई करने वालों को मास्क व ऑक्सीजन सिलेंडर जैसे सुरक्षा उपकरण क्यों नहीं मुहैया कराई जाते हैं? दुनिया के किसी भी देश में लोगों को गैस चैंबर में मरने के लिये नहीं भेजा जाता है। इस वजह से हर महीने चार से पांच लोगों की मौत हो जाती है। कोर्ट ने कहा संविधान में प्रावधान है कि सभी मनुष्य समान हैं लेकिन प्राधिकारी उन्हें समान सुविधाएं मुहैया नहीं कराते।
पीठ ने इस स्थिति को अमानवीय करार देते हुए कहा कि बिना सुरक्षा उपकरणों के सफाई करने वाले लोग सीवर और मैनहोल में अपनी जान गंवा रहे हैं। वेणुगोपाल ने पीठ से कहा कि देश में नागरिकों को होने वाली क्षति और उनके लिए जिम्मेदार लोगों से निपटने के लिये अपकृत्य कानून बना नहीं है। ऐसी घटनाओं का स्वत: संज्ञान लेने का मजिस्ट्रेट को अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि सडक़ पर झाडू लगा रहे या मैनहोल की सफाई कर रहे व्यक्ति के खिलाफ कोई मामला दायर नहीं किया जा सकता, लेकिन ये काम करने का निर्देश देने वाले अधिकारी या प्राधिकारी को इसका जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
सीवर सफाई के दौरान हादसों में मजदूरों की दर्दनाक मौतों की खबरें लगातार आती रहती हैं। कुछ माह पूर्व गुजरात के वड़ोदरा जिले के डभोई तहसील में एक होटल की सीवेरेज टैंक साफ करने उतरे सात मजदूरों की दम घुटने से मौत हो गई है। घटना बीती रात की है जब सात मजदूर एक होटल की सीवेज टैंक साफ करने के लिए उतरे थे। लेकिन टैंक सफाई के दौरान दम घुटने से उन सभी मजदूरों की मौत हो गई।
मई में उत्तर पश्चिम दिल्ली के एक मकान के सेप्टिक टैंक में उतरने के बाद दो मजदूरों की मौत हो गई थी। इस मामले में भी जांच में यह बात सामने आई थी कि मजदूर टैंक में बिना मास्क, ग्लव्स और सुरक्षा उपकरणों के उतरे थे। नोएडा सेक्टर 107 में स्थित सलारपुर में सीवर की खुदाई करते समय पास में बह रहे नाले का पानी भरने से दो मजदूरों की डूबने से मौत हो गई थी। गत वर्ष आन्ध्र प्रदेश राज्य के चित्तूर जिले के पालमनेरू मंडल गांव में एक गटर की सफाई करने के दौरान जहरीली गैस की चपेट में आने से सात लोगो की मौत हो गयी थी। देश के विभिन्न हिस्सो में हम आये दिन इस प्रकार की घटनाओं से सम्बन्धित खबरें समाचार पत्रों में पढ़ते रहते हैं।
देश के विभिन्न हिस्सो में पिछले एक वर्ष में सीवर की सफाई करने के दौरान 200 से अधिक व्यक्तियों की मौत हो चुकी है। अधिकतर टैंक की सफाई के दौरान मरने वालों की उम्र 20 से 55 वर्ष के लोगों की होती है। इस अमानवीय त्रासदी में मरने वाले अधिकांश लोग असंगठित दैनिक मजदूर होते हैं। इस कारण इनके मरने पर ना तो कहीं विरोध दर्ज होता है और न ही भविष्य में ऐसी दुर्घटनाएं रोकने के उपाय।
देश भर में 27 लाख सफाई कर्मचारी। जिसमें 7 लाख स्थायी व 20 लाख ठेके पर काम करते हैं। एक सफाईकर्मी की औसतन कमाई 7 से 9 हजार रुपये प्रति माह होती है। आधे से ज्यादा सफाईकर्मी कॉलरा, अस्थमा, मलेरिया और कैंसर जैसी बिमारियों से पीडि़त होते हैं। इस कारण 90 फीसदी गटर-सीवर साफ करने वालों की मौत 60 बरस से पहले हो जाती है। इस कार्य को करने वालों के लिये बीमा की भी कोई सुविधा नहीं होती है।
कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सीवर की सफाई करने वाली एजेंसी के पास सीवर लाईन के नक्शे, उसकी गहराई से सम्बंधित आंकड़े होना चाहिए। सीवर सफाई का दैनिक रिकॉर्ड, काम में लगे लोगों की नियमित स्वास्थ्य की जांच, आवश्यक सुरक्षा उपकरण मुहैया करवाना, काम में लग कर्मचारियों का नियमित प्रशिक्षण, सीवर में गिरने वाल कचरे की नियमित जांच कि कहीं इसमें कोई रसायन तो नहीं गिर रहे हैं जैसे निर्देशों का पालन होता कहीं नहीं दिखता है। भूमिगत सीवरों ने भले ही शहरी जीवन में कुछ सहूलियतें दी हों, लेकिन इसकी सफाई करने वालों के जीवन में इन अंधेरे नालो ने और भी अंधेरा कर दिया है। देश में दो लाख से अधिक लोग जाम हो गए सीवरों को खोलने, मेनहोल में घुस कर वहां जमा कचरे को हटान के काम में लगे हैं।
सभी सरकारी दिशा-निर्देशों में दर्ज हैं कि सीवर सफाई करने वालों को गैस -टेस्टर, गंदी हवा को बाहर फेंकन के लिए ब्लोअर, टॉर्च, दस्ताने, चश्मा और कान को ढंकन का कैप, हैलमेट मुहैया करवाना आवश्यक है। मुंबई हाईकोर्ट का निर्देश था कि सीवर सफाई का काम ठेकेदारों के माध्यम से कतई नहीं करवाना चाहिए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इस बारे में कड़े आदेश जारी कर चुका है। इसके बावजूद ये उपकरण और सुविधाएं गायब है। एक तरफ दिनों दिन सीवर की लंबाई में वृद्वि हो रही है वहीं दूसरी मजदूरों की संख्या में कमी आई।
सीवर सफाई में लगे श्रमिकों में से आधे लोग सांस की बीमारियों, खांसी व सीने में दर्द के रोगी हैं। 11 प्रतिशत को डरमैटाइसिस, एग्जिमा और ऐसे ही चर्मरोग हैं। लगातार गंदे पानी में डुबकी लगाने के कारण कान बहने व कान में संक्रमण, आंखों में जलन व कम दिखने की शिकायत करने वालों का संख्या 32 फीसदी थी।
गटर की सफाई करने वालो की मौत होने के साथ ही इनका पूरा परिवार भी अनाथ हो जाता है। परिवार की आमदनी का स्रोत समाप्त हो जाता है। मासूम बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ दो वक्त के खाने की भी परेशानी हो जाती है। मरने वालों का पूरा परिवार बेसहारा हो जाता है। देश में जाम सीवर की मरम्मत करने के दौरान प्रतिवर्ष दम घुटने से काफी लोग मारे जाते हैं। इससे पता चलता है कि हमारी गंदगी साफ करने वाले हमारे ही जैसे इंसानों की जान कितनी सस्ती है। ऐसी बदबू, गंदगी और रोजगार की अनिश्चितता में जीने वाले इन लोगों का शराब व अन्य नशों की गिरफ्त में आना लाजिमी ही है। नशे की यह लत उन्हें कई गंभीर बीमारियों का शिकार बना देती है। सीवर सफाई के काम में लगे लोगों को सामाजिक उपेक्षा का भी सामना करना पड़ता है। इन लोगों के यहां रोटी-बेटी का रिश्ता करने में उनके ही समाज वाले परहेज करते हैं।
आमतौर पर ये लोग सीवर में उतरने से पहले शराब पीते हैं, क्योंकि नशे के सरूर में वे भूल पाते हैं कि काम करते समय उन्हें कितनी गंदगी से गुजरना है। शराब पीने के बाद शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, फिर गहरे सीवरों में तो वैसे ही आक्सीजन की कमी रहती है। तभी सीवर में उतरते ही इनका दम घुटने लगता है। सफाई का काम करने के बाद उन्हें नहाने के लिए साबुन व पानी तथा पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी भी कार्यकारी एजेंसी की है। इसके बावजूद ये उपकरण और सुविधाएं इनको अभी तक नहीं मिल पा रही है।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 1993 से अब तक इस प्रथा के कारण देश में कुल 620 लोगों की मौत हो चुकी है। तमिलनाडु में ही ऐसे 144 मामले दर्ज किए गए हैं। भारत में हाथ से मैला ढोने की प्रथा को प्रतिबंधित किये जाने के उपरान्त भी यह देश में यह गंभीर समस्या बनी हुई है। अब देश की सर्वोच्च अदालत ने गटर की सफाई करने वालों की सुध ली है व सरकार की खिंचाई की है। इससे लगता है कि सफाई करने वाले इन सिपाहियों के भी जल्दी ही अच्छे दिन आयेगें व सरकारी अकर्मण्यता से होने वाली उनकी मौत पर रोक लग पायेगी।

एससी/एसटी को राहत
सिद्धार्थ शंकर
एससी/एसटी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाया। सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में दिए गए आदेश को रद्द कर दिया है और अब इसके बाद इससे जुड़े मामलों में तुरंत गिरफ्तारी होगी। इससे पहले मार्च 2018 में दिए गए कोर्ट के ही एक आदेश में इन मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। कोर्ट के आदेश में कहा गया था कि शिकायत दर्ज होने पर पुलिस पहले मामले की जांच करेगी और दोषी पाए जाने पर ही गिरफ्तारी हो। हालांकि, इस आदेश का देशभर में विरोध हुआ था और सरकार ने भी सर्वोच्च न्यायालय से अपील की थी कि वो इस आदेश को वापस ले ले। 20 सितंबर को प्रावधानों को हल्का करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा था। केंद्र सरकार द्वारा 20 मार्च 2018 को सुनाए गए फैसले को लेकर पुनर्विचार याचिका दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के आदेश को वापस लेते हुए कहा कि इस तरह का आदेश जारी ही नहीं किया जाना चाहिए था। कोर्ट ने इस दौरान कहा कि अनुच्छेद 15 के तहत एससी और एसटी के लोगों को संरक्षण मिला हुआ है लेकिन फिर भी उनके साथ भेदभाव होता है। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की बेंच ने ये भी माना कि एससी-एसटी समुदाय के लोगों को अभी भी उत्पीडऩ और भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में इस कानून को डायल्यूट करने का कोई औचित्य नहीं है। पीठ ने कहा था कि कई मौकों पर, निर्दोष नागरिकों को आरोपी और लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों को निभाने से रोका जा रहा है जबकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को लागू करते समय विधायिका का ऐसा इरादा कभी भी नहीं था। अदालत ने यह कहा था कि अत्याचार अधिनियम के तहत मामलों में अग्रिम जमानत देने के खिलाफ कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, अगर कोई भी प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता या जहां शिकायतकर्ता को प्रथम दृष्टया दोषी पाया जाता है। पीठ ने कहा था कि अत्याचार अधिनियम के तहत मामलों में गिरफ्तारी के कानून के दुरुपयोग के मद्देनजर किसी लोक सेवक की गिरफ्तारी केवल नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा अनुमोदन के बाद और एक गैर-लोक सेवक की गिरफ्तारी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के अनुमोदन के बाद ही हो सकती है।
गौरतलब है कि जब फैसला आया था तब नरेंद्र मोदी सरकार को काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था कि वह एससी-एसटी समुदाय के लोगों के हितों की रक्षा नहीं कर रही है।
अगर कोर्ट के पहले फैसले के आलोक में देखें तो पता चलेगा कि वह फैसला समाज के उपेक्षित तबके को न्याय दिलाने के मकसद से था। एक अर्से से यह महसूस किया जा रहा था कि अनुसूचित जाति-जनजाति प्रताडऩा निवारण अधिनियम अर्थात एससी-एससी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है, लेकिन इस बारे में सरकार के स्तर पर कोई पहल इसलिए नहीं हो पा रही थी कि कहीं उसकी मनमानी व्याख्या करके उसे राजनीतिक तूल न दे दिया जाए। इन स्थितियों में इसके अलावा और कोई उपाय नहीं रह गया था कि सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप करके कुछ ऐसे उपाय करता ताकि यह अधिनियम बदला लेने का जरिया बनने से बचे। हालांकि, अब जबकि कोर्ट ने अपना फैसला बदल दिया है तो सरकार और समाज दोनों की भूमिका बढ़ गई है। सरकार के स्तर पर यह देखना होगा कि किसी का अहित न होने पाए। ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिससे कोई भी किसी को आधार बनाकर कार्रवाई की तलवार न लटका दे।
दरअसल सरकार और समाज के वंचित तबकों के बीच कुछ समय से एक अविश्वास की स्थिति कायम होती जा रही है। यही अविश्वास किसी को भी जेल भेजने व मुकदमा दर्ज कराने तक पहुंच जाता है। अत: यह समाज की भी जिम्मेदारी है कि वह देखे कि लोगों का अंत: मन इतना शुद्ध हो कि सिर्फ निजी स्वार्थ के लिए वह किसी को न फंसा सके। कोर्ट ने अपना जो फैसला पलटा है, वह एक वंचित समुदाय के हितों को देखते हुए ही। अगर पहले की तरह फर्जी मुकदमे होते गए, तो फिर फैसले को पलटने का कोई आधार नहीं बचेगा और समाज में अविश्वास की खाई और गहरी होती जाएगी।

बूचड़खाना और शाकाहार अंडा
डॉ. अरविन्द प्रेमचंद जैन
इसको कहते हैं एक तीर से दो निशान !जी हाँ दिग्विजय सिंह ने अपने पुत्र मंत्री को पात्र लिखा की जान भावनाओं और धरम को देखते हुए आदमपुर में नगर निगम भोपाल द्वारा निर्मित किया जा रहा बूचड़ खाना का निर्माण नहीं होगा, उसके लिए अन्य जगह देखी जाएँगी। अब भविष्य में कोई स्थान की जरुरत नहीं पड़ेंगी कारण केंद्र सरकार द्वारा की गई शोध के अनुसार भविष्य में प्रयोगशाला द्वारा अहिंसा मीट तैयार किया जा रहा हैं और अब पॉलट्री फॉर्म की भी जरुरत नहीं पड़ेगी कारण अब शाकाहारी अण्डों का भी निर्माण
विज्ञान ने बहुत विकास कर लिया और करता ही जा रहा हैं। नित्य नयी खोज होती जा रही हैं, कहीं जी.एम. बीज, क्लोनिंग बच्चे, बकरी, उसके बाद टेस्ट टियूब बेबी। इसके बाद हमारे आहार पर भी बहुत अधिक आक्रमण हो रहे हैं। हरित क्रांति के कारण उत्पादन बढ़ा और रसायनों के उपयोग से गंभीर बीमारियां ने घेरना शुरू किया। उसके बाद श्वेत क्रांति आयी तो दूध की नदियां बहने लगी और नकली मिलावटी दूध इतना मिलने लगा की इतिहास में जैसे दूध की नदियां भारत में बहती थी। इस क्रांति ने भी बहुत अधिक बीमारियों को बढ़ाया। दोनों क्रांतियों ने मनुष्य को जहरीला बना दिया। आज सांप मनुष्य को काटे तो सांप मर जाता हैं।
कहते हैं की आवश्यकता ही आविष्कार की जननी हैं। भारत के भाग्य विधाताओं यानी नेताओं को लगने लगा की हमारा देश आर्थिक रूप से विपन्न हैं और गरीबी नहीं जा रही या हट नहीं पा रही तो उन्होंने पिंक क्रांति यानी मांस का उत्पादन और निर्यात शुरू की इससे हमारा देश विश्व में मांस,चमड़ा, अंडा मछली के निर्यात में नंबर एक पर हैं, मजेदार बात इससे अरबों, खरबों रुपयों की आमद होती हैं और बिना किसी जानवर को मारे ! क्या यह संभव हैं ?जी हां हैं और अब तो सरकार अन्न की बचत के लिए घरो घर मांस, अंडा भेजने की व्यवस्था कर रही हैं, और मध्यान्ह भोजन में तो कुछ राज्य अंडा दे रहे हैं। यानी अब भविष्य में अहिंसा मीट और शाकाहार अंडा आने वाला हैं। यह सब इसलिए की हमारे देश में कुपोषण हैं उसको दूर करना हैं।
यानि मांस अंडा शाकाहारी होगा इससे सरकार के साथ शाकाहारी लोगों को कोई हिचक नहीं होगी। पहले बिरयानी माँसाहारी समझा जाता था पर अब शाकाहारी बिरयानी मिलने लगा। जैसे हॉट डॉग इसको कभी कभी गरम कुत्ता कह देते तो झगड़ा हो जाता। जैसे पिज़्ज़ा बर्गर आदि के ऍफ़ सी, डॉमिनोज,मैक्डोनाल्ड आदि बेचती हैं जिसमे शुद्ध नॉनवेज होता हैं पर वह शुद्ध सफाई से बनता हैं और कोई कोई कहते हैं की उनका किचिन भी अलग अलग होता हैं और बनाने वाला एक होता हैं उससे दोनों प्रकार के आहारियों को सुविधा होती हैं। यानि शाकाहार और मांसाहार का। अहिंसा के घाट पर गाय और शेर एक साथ खाना का रहे हैं।
चलो अच्छा हो रहा हैं की अहिंसा मीट और शाकाहार अंडा मिलने से कम से कम मंदिरों में नकली मावा की मिठाई तो प्रसाद के रूप में नहीं देना होगी या पड़ेगी। सरकार द्वारा प्रामाणिक
अहिंसा मीट यानि मांस और अंडा शाकाहारी मिलेगा तो कोई भी परेशानी नहीं होगी और उसकी आड़ में शुद्ध मांस और अंडा भी खपने लगेगा। कारण सब एक से दिखेंगे तब किसी को क्या आपत्ति। और इस बहाने नकली और असली बिकेगा।
अब तो खुले आम नकली और असली मांस और अंडे की दुकान खुलेंगी जो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त रहेंगी। और उसमे जो सस्ता और महंगा होगा उसमे आराम से मिलावट होगी और जन भावनाओं से खिलवाड़ होगा।
ये सब अहिंसा प्रेमियों, और जो पक्के धर्म को पालने वाले हैं उनके साथ धोखा किया जा रहा हैं। भविष्य में इनके क्या क्या दुष्परिणाम होंगे यह कोई नहीं जानता पर हमारे देश में चरित्र और नैतिकता का ह्रास होने से कुछ भी संभवहैं। विज्ञानं की अपनी सीमा हैं और व्यापारियों की असीमित। उनमे धन के पीछे क्या क्या खिला रहे हैं भगवान जाने।
पहली बात मांस अहिंसात्मक नहीं होता और न अंडा शाकाहार होता हैं इसीलिए अहिंसा मांस और शाकाहार अंडा का नामकरण बदला जावें जिससे शाकाहारियों और धर्मभीरु लोग भ्रमित न हो। यह सब नाटक सरकार कुपोषण दूर करने के नाम पर कर रही हैं।
यह देश में अहिंसा की शुरुआत हो गयी हैं,

आज भारत को महात्मा की ज्यादा जरूरत
कमलनाथ
वे लोग महान है जिन्होंने इस धरती पर महात्मा गांधी को देखा और सुना था। महात्मा गांधी जैसा व्यक्तित्व सदियों में जन्म लेता है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने सच कहा था कि – आने वाली पीढ़ियाँ शायद ही वह विश्वास करें कि इस धरती पर गांधीजी जैसा हाड़-मांस का पुतला कभी चलता था।
आज पूरा देश गांधी जी की 150वीं जयंती मना रहा है। यह हम सब के लिए अभूतपूर्व अवसर है। सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि भारत जैसे कई देशों के लिए यह विशेष अवसर है क्योंकि महात्मा गांधी एक विश्व नागरिक थे। पूरी दुनिया यह जानकर आश्चर्यचकित थी कि सत्य और अहिंसा के दो दिव्य अस्त्रों के साथ भारत ने अपने नागरिक अधिकारों की लड़ाई कैसे लड़ी और जीती। पहले दक्षिण अफ्रीकामें सत्याग्रह और फिर स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करते हुए महात्मा गांधी विश्व के शीर्ष नेताओं की श्रेणी में गिने जाने लगे थे। इसलिए स्वाभाविक रूप से महात्मा की 150वीं जयंती का वैश्विक महत्व है।
आज हमें महात्मा गांधी को याद करने और उनके दर्शन को समझने की सबसे ज्यादा जरूरत है। वह इसलिए कि भारत सहित विश्व के कई देशों की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थितियों में जो तनाव चल रहा है उसका समाधान गांधी जी के दर्शन में है। नैतिक मूल्यों और मानवीय गरिमा पर जो संकट है उसे दूर करने में गांधीजी मदद कर सकते हैं। धर्म और जाति को लेकर उन्माद की जो स्थिति बन रही हैं उससे बचने का उपाय गांधी जी के विचारों में है। गांधी जी अपने समय से बहुत आगे थे। उनका जीवन शिक्षा देता है कि अच्छे विचारों को अपना लो, बुरे विचार अपने आप दूर हो जायेंगे। विचार कोई शोभा की वस्तु नहीं है, विचार आत्मा की शुद्धि के काम आते हैं। उनसे मानव-कल्याण का काम किया जाता है। आज हमें गांधी जी से बहुत सीखने की जरूरत है, उनका जीवन स्वयं एक पाठशाला है। सत्य की पाठशाला, जहाँ जीवन मूल्यों को समझने, समझाने और व्यावहारिक रूप में अपनाने के तौर-तरीके सिखाये जाते हैं। गांधी दर्शन की पाठशाला अब विश्वविद्यालय का स्वरूप ले चुकी है और सबके लिए हमेशा खुली है। यहाँ सभी धर्मों, जाति और विचारधाराओं के लोग शिक्षा लेने आ सकते हैं। महात्मा गांधी भारत की पहचान है । पूरे विश्व में भारत को गांधी का देश कहते हैं। गांधीजी के बिना भारत की कल्पना अधूरी है। गांधीजी भारत के कण-कण में दर्शनीय है। गांधीजी सर्वोदय आधारित समाज की स्थापना करना चाहते थे । सर्वोदय का सीधा अर्थ है सबका कल्याण । सबकी समृद्धि । वे पर्यावरण को भी जीवंत मानते थे । इसलिए पर्यावरण की रक्षा और विवेकपूर्ण उपयोग की बात करते थे। गांधी जी एक महान शिक्षक भी थे। जिन सर्वश्रेष्ठ और मानव हितैषी विचारों को उन्होंने अपनाया, उनका ईमानदारी से पालन किया। सच्चाई के रास्ते पर चलने के तरीके सिखाए, जो आज पूरी दुनिया के लिए मिसाल है। वे कर्मयोगी, ज्ञानयोगी और भक्तियोगी थे। आज हर समाज चाहता है कि वह कर्म, ज्ञान और भक्ति का समन्वय बने और अपने नागरिकों से इसे अपनाने की अपेक्षा करें। इसलिए गांधी जी के दर्शन में हर धर्म का स्थान और मान-सम्मान है। आज भारत सहित पूरे विश्व में सर्वधर्म समभाव की जरूरत है। सत्य और शांति की स्थापना की जरूरत है। साथ ही व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुँचाए बिना तरक्की करने की जरूरत है। मैं युवाओं से आग्रह करूंगा कि गांधी जी की 150वीं जयंती पर उनके जीवन और उनके लेखन को पढ़ें। महात्मा गांधी का जीवन पढ़ने पर खुद इस सवाल का जवाब भी मिल जाएगा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनके नहीं रहने पर क्यों कहा था कि ‘हमारे जीवन से प्रकाश चला गया।’ गांधीजी को जितना पढ़ेंगे, उतना हमारा रास्ता आसान होगा। वे कहते थे कि शिक्षा का अर्थ है चारित्रिक दुर्गुणों के प्रति सचेत रहना और उन्हें दूर करना।
गांधी जी को अपनाना आसान है। गांधी के रास्ते पर चलना आसान है, हर नागरिक अपने आप में गांधी हैं। यदि आप सच बोलना और सुनना चाहते हैं, यदि आप आत्म-निर्भर बनने के लिए प्रयत्नशील हैं, यदि हर धर्म का सम्मान करते हैं और शांति चाहते हैं, यदि अपने साथी नागरिकों की गरिमा का सम्मान करते हैं, पर्यावरण की रक्षा और आदर करते हैं, यदि अपने कारीगरों की कला पर गर्व करते हैं और कमजोर का साथ देते हैं, तो समझिए कि आप गांधीजी के दर्शन पर अमल कर रहे हैं। आइए हम सब मिलकर सर्वोदय आधारित भारत बनाने में अपनी भूमिका तय करें और पूरी ईमानदारी से अपने कर्त्तव्य का पालन करें।
ब्लागर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री है

गांधीवाद :जीवन की पाठशाला है
प्रो.शरद नारायण खरे
गांधीवाद महात्मा गांधी के आदर्शों, विश्वासों एवं दर्शन से उदभूत विचारों के संग्रह को कहा जाता है, जो स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेताओं में से थे। यह ऐसे उन सभी विचारों का एक समेकित रूप है जो गांधीजी ने जीवन पर्यंत जिया था।सत्याग्रह उनकी राजनीतिक जीवन शैली का अनिवार्य अंग था ।सत्य एवं आग्रह दोनो ही संस्कृत भाषा के शब्द हैं, जो भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान प्रचलित हुआ था, जिसका अर्थ होता है सत्य के प्रति सत्य के माध्यम से आग्रही होना।गांधीवाद के बुनियादी तत्वों में से सत्य सर्वोपरि है। वे मानते थे कि सत्य ही किसी भी राजनैतिक संस्था, सामाजिक संस्थान इत्यादि की धुरी होनी चाहिए। वे अपने किसी भी राजनैतिक निर्णय को लेने से पहले सच्चाई के सिद्धांतो का पालन अवश्य करते थे।गांधीजी का कहना था “मेरे पास दुनियावालों को सिखाने के लिए कुछ भी नया नहीं है। सत्य एवं अहिंसा तो दुनिया में उतने ही पुराने हैं जितने हमारे पर्वत हैं।”सत्य, अहिंसा, मानवीय स्वतंत्रता, समानता एवं न्याय पर उनकी निष्ठा को उनकी निजी जिंदगी के उदाहरणों से बखूबी समझा जा सकता है।
कहा जाता है कि सत्य की व्याख्या अक्सर वस्तुनिष्ठ नहीं होती। गांधीवाद के अनुसार सत्य के पालन को अक्षरशः नहीं बल्कि आत्मिक सत्य को मानने की सलाह दी गयी है। यदि कोई ईमानदारीपूर्वक मानता है कि अहिंसा आवश्यक है तो उसे सत्य की रक्षा के रूप में भी इसे स्वीकार करना चाहिए। जब गांधीजी प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान स्वदेश लौटे थे तो उन्होंने कहा था कि वे शायद युद्ध में ब्रिटिशों की ओर से भाग लेने में कोई बुराई नहीं मानते। गांधीजी के अनुसार ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा होते हुए भारतीयों के लिए समान अधिकार की मांग करना और साम्राज्य की सुरक्षा में अपनी भागीदारी न निभाना उचित नहीं होता। वहीं दूसरी तरफ द्वतीय विश्वयुद्ध के समय जापान द्वारा भारत की सीमा के निकट पहुंच जाने पर गांधीजी ने युद्ध में भाग लेने को उचित नहीं माना बल्कि वहां अहिंसा का सहारा लेने की वकालत की है।
अहिंसा का सामान्य अर्थ है ‘हिंसा न करना’। इसका व्यापक अर्थ है – किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से कोई नुकसान न पहुँचाना। मन में भी किसी का अहित न सोचना, किसी को कटुवाणी आदि के द्वारा भी पीड़ा न देना तथा कर्म से भी किसी भी अवस्था में, किसी भी प्राणी का कोई नुकसान न करना।
गांधीजी का मानना था कि उपवास व्यक्ति के मन पर सकाराकमक असर डालता है |उपवास व्यक्ति केनशारीरिक अंगों में भी तन्दुरस्ती लाता है|यह अनुकुल परिस्थितियों की रचना भी करता है ।वह अंतर्रात्मा को पवित्र व बलशाली भी बनाता है ।
गाँधी जी के अनसार धर्म और राजनीति को अलग नही किया जा सकता है क्योंकि धर्म मनुष्य को सदाचारी बनने के लिए प्रेरित करता है । स्व धर्म सबका अपना अपना होता है,पर धर्म मनुष्य को नैतिक बनाता है । सत्य बोलना, चोरी नहीं करना, परदु:खकातरता, दूसरों की सहायता करना आदि बातें यही सभी धर्म सिखाते हैं । इन मूल्यों को अपनाने से ही राजनीति सेवा भाव से की जा सकेगी । गाँधी जी आडम्बर और कर्मकांड को धर्म नही मानते और जोर देकर कहते हैं कि मन्दिर मे बैठे भगवान मेरे राम नही है । स्वामी विवेकानंद जी के दरिद्र नारायण की संकल्पना को अपनाते हुए मानव सेवा को ही वो सच्चा धर्म मानते हैं । वास्तव मे उनका विश्वास है कि प्रत्येक प्राणी इश्वर की सन्तान हैं और ये सत्य है; सत्य ही ईश्वर है ।
गांधीवाद स्वदेशी को मानते हुए आम आदमी की खुशहाली तथा सद्भाव की बात करते हुए मानवता व देशप्रेम की बात करता है ।सच में गांधीवाद ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘जियो और जीने दो’ तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:———-‘के आदर्श की बात करता है ।यही कहूंगा कि-
“जीवन को सद् राह नित,देता गांधीवाद ।
रहे गूंजता नित्य ही,सत्य-अहिंसा नाद ।।

अब कश्मीर का हाल क्या है ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
संयुक्तराष्ट्र में मोदी और इमरान के बाद कश्मीर का हाल क्या है ? इमरान खान के भाषण का असर चाहे चीन और तुर्की के अलावा किसी भी राष्ट्र पर न पड़ा हो लेकिन 55 दिन से सोये कश्मीर में अब कुछ न कुछ हलचल मची है। जगह-जगह लोगों ने प्रदर्शन भी किए हैं, हथगोले भी फेंके हैं और आतंकियों ने भी अपने तेवर दिखाए हैं। कुछ लोग मारे भी गए हैं। कई इलाकों में कर्फ्यू दुबारा लगाना पड़ा है। फौजियों की संख्या भी बढ़ाने पर विचार हो रहा है। स्कूल-कालेज खुले हैं लेकिन उनमें कोई दिखाई नहीं पड़ता। दुकानें भी मुश्किल से एक-दो घंटे के लिए खुल पा रही हैं। सड़कों पर भी यातायात लगभग बंद-सा हो गया है। यह सब मुझे देश के प्रमुख अखबारों की खबरों से पता चला है, क्योंकि मोबाइल फोन और इंटरनेट तो बंद पड़े हैं। अखबारों ने कश्मीर की इन खबरों को अपने मुखपृष्ठों पर छापा है। इससे पता चलता है कि भारत में अभी भी अभिव्यक्ति की आजादी कायम है और उसका पूरा-पूरा इस्तेमाल पत्रकार व विरोधी नेता लोग खुले-आम कर रहे हैं। मुझे विश्वास था कि संयुक्तराष्ट्र संघ के दंगल के बाद कश्मीर की घुटन कुछ घटेगी लेकिन अब ऐसा लगता है कि प्रतिबंधों का यह दौर शायद लंबा खिंचेगा। हो सकता है कि यह दिसंबर तक खिंच जाए। जहां तक मुझे खबर है, भारत सरकार के इरादे बिल्कुल नेक हैं। वह कश्मीर में खून की एक बूंद भी बहते हुए नहीं देखना चाहती और कश्मीरियों से खुला संवाद करना चाहती है लेकिन यदि वहां हिंसा होती है और आतंकी सक्रिय होते हैं तो सरकार को मजबूरन सख्ती करनी होगी। यहां संतोष का विषय है कि जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने खुले तौर पर घोषणा की है कि उनकी सरकार अगले कुछ दिनों में ही लगभग 70 हजार नौजवानों को नौकरियां देनेवाली है। यह काम अगले तीन महिने में पूरा हो जाएगा। हर गांव से कम से कम पांच लोगों को नौकरी मिलेगी। सरकारी कंपनी ‘नाफेड’ ने पहली बार 8000 करोड़ रु. के सेब खरीदे हैं और 1100 ट्रक रोज सेब कश्मीर से बाहर ले जाए जा रहे हैं। सेबवालों को उनके सेब के डेढ़े दाम भी दिए जा रहे हैं। अस्पतालों में 55 दिन में 70 हजार आपरेशन और एक लाख लोगों का इलाज किया गया है। बच्चे यदि स्कूलों में नहीं आ रहे हैं तो उन्हें पेन ड्राइव के जरिए पढ़ाने का इंतजाम किया जा रहा है। कश्मीर में उद्योग-धंधे लगाने और पर्यटन को बढ़ाने के लिए कुछ नई पहल भी की जा रही हैं। ये सब काम तो ठीक हैं लेकिन मैं सोचता हूं कि कश्मीरी नेताओं और जनता से भी खुले संवाद की खिड़कियां खोलनी अब जरुरी है। यदि इस पहल को सफलता मिलेगी तो भारत-पाक संवाद के हालत अपने आप तैयार हो जाएंगे।

शाकाहार की ओर बढ़ने लगे लोग
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
(1 अक्टूम्बर विश्व शाकाहार दिवस पर विशेष) दुनियाभर में आज शाकाहार दिवस मनाया जा रहा है। खुशी की बात ये है कि दुनिया अब शाकाहार की ओर बढ़ने लगी है पिछले कुछ साल के आंकड़ों पर भरोसा करें तो दुनिया में शाकाहारियों की तादाद बढ़ रही है। हालांकि मांसाहारियों की तुलना में अब भी खासी कम है। इस दिवस पर सभी मानव जाति को शुभकामनाएं ,
बढ़ रहे हैं शाकाहारी
दुनिया में तेजी से प्लांट बेस यानि वनस्पति आधारित खानपान के तौर तरीके बढ़ रहे हैं। लोग इसे तेजी से अपना रहे हैं। ये आंदोलन का रूप ले रहा है, जिसे काफी पसंद भी किया जा रहा है।
दुनिया की सबसे बड़ी फूड फैक्ट्री नेस्ले का अनुमान है, “वनस्पति आधारित खानों का क्रेज अब बढेगा।” एक और कंपनी जस्टइट के सर्वे का कहना है, “दुनिया में 94 फीसदी हेल्दी फूड आर्डर बढा है।” एक अन्य अमेरिकी कंपनी ग्रबहब का डेटा कहता है, “अमेरिका में दुकानों और मॉल्स से हरी सब्जियां ले जाने की संख्या बढ रही है।”
गूगल ट्रेंड्स का सर्च डाटा कहता है, ” वर्ष 2014 से 2018 के बीच दुनियाभर में असरदार तरीके से शाकाहार की ओर लोगों का रुझान बढा है। इजराइल, आस्ट्रेलिया, आस्ट्रिया, कनाडा और न्यूजीलैंड में शाकाहारी बढ़ रहे हैं।”
ग्लोबडाटा की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, “अमेरिका में शाकाहारी लोगों में 600 फीसदी की बढोतरी हुई है।” रिपोर्ट कहती है, “वर्ष 2014 में अमेरिका में केवल एक फीसदी लोग शाकाहारी होने का दावा करते थे लेकिन वर्ष 2017 में ये संख्या छह फीसदी हो चुकी है। ब्रिटेन में एक दशक पहले की तुलना में वेजन 350 फीसदी बढे हैं।”
कनाडा में वर्ष 2017 में शाकाहार पर सबसे ज्यादा सर्च हुई। पहली बार कनाडा की नई फूड गाइड का मसौदा तैयार हुआ, इसे कनाडा की सरकार ने 2017 में रिलीज किया, जिसमें हरी सब्जियों और वनस्पति आधारित खानों की पैरवी की गई
हर जगह बढ़ रहा है शाकाहार का बाजार
नीलसन की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, पुर्तगाल में पिछले एक दशक में शाकाहारियों की संख्या 400 फीसदी तक बढ़ी है। चीन की सरकार अपने लोगों को मांसाहार के लिए हतोत्साहित कर रही है। उसका कहना है कि मांसाहार की खपत को 50 फीसदी तक कम किया जाना चाहिए।
रिसर्च कहता है कि चीन में शाकाहार का बाजार 17 फीसदी की दर से 2015 से 2020 के बीच बढने की उम्मीद जाहिर की जा रही है। हांगकांग में 22 फीसदी लोग शाकाहारी खाने और हरी सब्जियों की आदत डाल रहे हैं।
आस्ट्रेलिया में वर्ष 2014 से 2016 के बीच 02 फीसदी शाकाहार उत्पाद लांच किए गए। आस्ट्रेलिया दुनिया का तीसरा तेजी से बढ़ता शाकाहार का बाजार है। अमेरिका में फास्ट कैजुअल रेस्टोरेंट एक लाख दस हजार मील हर महीने परोसता है और वो इसे दुनियाभर में फैलाने की योजना बना रहा है। मैकडोनाल्ड्स् ने स्वीडन, फिनलैंड सहित कई देशों में मैकवेजन बर्गर लांच किये हैं। पिज्जा हट ने ब्रिटेन में वेजन चीज पिज्जा पेश किया
फ्रेंड्स ऑफ़ अर्थ नामक संस्था के मुताबिक दुनियाभर में 50 करोड़ लोग ऐसे हैं जो पूरी तरह से शाकाहारी हैं लेकिन तादाद बढ़ रही है। दुनिया के सबसे ज्यादा शाकाहारी भारत में हैं, हालांकि ये आंकड़े पुराने हैं। माना जा रहा है कि वर्ष 2018 में शाकाहार के प्रति सबसे ज्यादा ट्रेंड देखा गया है लिहाजा शाकाहारियों की तादाद भी और बढ़ चुकी होगी।
भारत – 30 से 40 फीसदी शाकाहारी
ताइवान – 14 फीसदी
आस्ट्रेलिया – 11 फीसदी
मैक्सिको – 19 फीसदी
इजराइल – 13 फीसदी
ब्राजील – 14 फीसदी
स्वीडन – 10 फीसदी
न्यूजीलैंड- 10.3 फीसदी
जर्मनी – 10 फीसदी
कितनी तरह के भोजन करने वाले
दुनिया में तीन तरह का भोजन करने वाले लोग हैं। पहले जो मांसाहार करते हैं, यानी नॉन -वेजिटेरिअन . दूसरे जो शाकाहारी हैं- यानी वेजेटेरियंस और तीसरे वो लोग हैं जो शाकाहारी हैं और जानवरों से प्राप्त किए जाने वाले पदार्थ जैसे दूध का सेवन भी नहीं करते। ऐसे लोगों को (वीगन) कहा जाता है।
मांसाहार कम होने पर फायदे
– भोजन में मांसाहार की मात्रा कम करने से दुनिया भर में हर साल करीब 66 लाख 73 हज़ार करोड़ रुपये बचाए जा सकते हैं जबकि ग्रीन गैस उत्सर्जन में कमी आने से 34 लाख करोड़ रुपये बचाए जा सकेंगे।
– कम कैलोरी वाला भोजन करने से मोटापे की समस्या कम होगी। स्वास्थ्य पर लगने वाले खर्च में कमी आएगी।
– फल और सब्ज़ियों का उत्पादन बढ़ने से भारत सहित दक्षिण एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था को जबरदस्त फायदा होगा
– अमेरिका की नेशनल अकादमी ऑफ़ साइंसेज के एक नए रिसर्च के मुताबिक, अगर पूरी दुनिया में शाकाहार को बढ़ावा मिले तो धरती को ज्यादा स्वस्थ, ज्यादा ठंडा और ज्यादा दौलतमंद बनाया जा सकता है।
मांसाहार उत्पादन में ज्यादा पानी
– एक अनुमान के मुताबिक जानवरों को पालने के लिए उन्हें जो भोजन दिया जाता है, वो अगर इंसानों को मिलने लगे तो दोगुने लोगों का पेट भर सकता है। इसी तरह मीट प्रोडक्ट्स को खाने की टेबल तक पहुंचाने में सब्जियों के मुकाबले 100 गुना ज़्यादा पानी का इस्तेमाल किया जाता है।
– आधा किलो आलू उगाने में 127 लीटर पानी लगता है जबकि आधा किलो मांस का उत्पादन करने के लिए 9 हज़ार लीटर से ज्यादा पानी बर्बाद होता है जबकि आधा किलो गेंहूं का आटा बनाने में 681 लीटर पानी का इस्तेमाल होता है।
– फ्रेंड्स ऑफ़ अर्थ नामक संस्था के मुताबिक मीट प्रोडक्ट्स पैदा करने के लिए हर साल करीब 6 लाख हेक्टेयर जंगल काट दिए जाते हैं ताकि उस ज़मीन पर जानवरों को पाला जा सके।
– कुल मिलाकर अगर वैज्ञानिक रिपोर्ट्स को आधार बनाया जाए तो ये कहना गलत नहीं होगा हफ्ते में सिर्फ एक दिन के लिए शाकाहार को अपनाकर भी, धरती को बचाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा सकता है, क्योंकि मांसाहार कम होने से ग्लोबल वार्मिंग में कमी आएगी, और धरती के वातावरण को ठंडा बनाने में मदद मिलेगी।
शाकाहार से भी बनती है मसल्स
शाकाहारी भोजन में मसल्स बनाने के लिए सभी जरूरी पोषक तत्व होते हैं। सब्जियों से मिलने वाली कार्बोहाईड्रेट और वसा बीमारियों से बचाव करती है, साथ ही प्रोटीन से आपकी मसल्स का निर्माण होता है। सब्जियों में शरीर के लिए फायदेमंद विटामिन्‍स, एंटीऑक्सीडेंट और अमीनो एसिड भी पाया जाता है।
कुछ शाकाहारी खाद्य पदार्थों की जिनके सेवन और वर्क आउट से आप आकर्षक और मजबूत मसल्स पा सकते हैं। प्रोटीन के लिए चना, दाल, बादाम, काजू, अनाज और मटर का सेवन फायदेमंद रहता है। बटरमिल्‍क भी मसल्स बनाने में मददगार है। छाछ में नाम मात्र की वसा होती है, यह भी मसल्स निर्माण में सहायक है
इतिहास क्या कहता है
शाकाहार के शुरुआती रिकॉर्ड ईसा पूर्व छठी शताब्दी में प्राचीन भारत और प्राचीन ग्रीस में पाए जाते हैं। लेकिन प्राचीनकाल में रोमन साम्राज्य के ईसाईकरण के बाद शाकाहार व्यावहारिक रूप से यूरोप से गायब हो गया।
कौन सा धर्म खानपान पर क्या कहता है
हिंदू धर्म – हिंदू धर्म में शाकाहार को श्रेष्ठ माना गया है। ये विश्वास है कि मांसाहारी भोजन मस्तिष्क और आध्यात्मिक विकास के लिए हानिकारक है। हिंदू धर्म पशु-प्राणियों के अंहिसा के सिद्धांत को भी मानता है। हिंदू शाकाहारी आमतौर पर अंडे से परहेज़ करते हैं लेकिन दूध और डेयरी उत्पादों का उपभोग करते हैं, इसलिए वे लैक्टो-शाकाहारी हैं। हालांकि अपने संप्रदाय और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार हिंदुओं के खानपान की आदतें अलग होती हैं।
जैन धर्म- ये दृढ तरीके से शाकाहार पर जोर देते हैं। यहां तक शाकाहार में कुछ ऐसी सब्जियां नहीं खाते, जो जड़ की होती हैं, क्योंकि वो इसे पौधों की हत्या के रूप में देखते हैं। वे फलियां और फल खाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
बौद्ध धर्म- बौद्ध धर्म शाकाहार पर विश्वास करता है। लेकिन थैरवादी या स्थविरवादी आमतौर पर मांस खाया करते हैं। महायान बौद्ध धर्म में, ऐसे अनेक संस्कृत ग्रंथ हैं जिनमे बुद्ध अपने अनुयायियों को मांस से परहेज करने का निर्देश देते हैं। तिब्बत और जापानी बौद्धों के बहुमत सहित महायान की कुछ शाखाएं मांस खाया करती हैं जबकि चीनी बौद्ध मांस नहीं खाते।
सिख धर्म- सिख धर्म के सिद्धांत शाकाहार या मांसाहार पर अलग से कोई वकालत नहीं करते। भोजन का निर्णय व्यक्ति पर छोड़ दिया गया है। कुछ सिख संप्रदाय से संबंधित “अमृतधारी” मांस और अंडे के उपभोग का जोरदार विरोध करते हैं।
यहूदी धर्म- मांस त्याग की पैरवी करता है और इसे नैतिक तौर पर गलत बताता है। हालाँकि यहूदियों के लिए मांस खाना न आवश्यक है और न ही निषिद्ध।
ईसाई धर्म- मौजूदा ईसाई संस्कृति सामान्य रूप से शाकाहार नहीं है। हालाँकि, सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट और पारंपरिक मोनैस्टिक शाकाहार पर जोर डालते हैं।
इस्लाम- व्यक्तिगत तौर पर मांस का स्वाद पसंद न करने वालों को शाकाहार चुनने की आजादी प्रदान करता है।
उपरोक्त आधार के अलावा मानव शरीर की संरचना मांसाहार के लिए नहीं हैं ।शाकाहार यानि शांति कारक और हानि रहित .इसको अपनाने में लाभ हैं ।
आये इस दिन हम संकल्प ले की हम स्वयं शाकाहारी बने और और कम से एक व्यक्ति को शाकाहार बनाने प्रेरित करे। कोई भी शाकाहार परिषद् का सदस्य बन सकता हैं जो पूर्णतया शाकाहारी ,अहिंसा प्रेमी और जीवदया के प्रति दया का भाव रखता हो।

भाजपा अपनी इज्जत बचाए
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भाजपा के पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानंद और उनके कालेज की एक छात्रा के मामले ने भाजपा की छवि को धूल में मिलाकर रख दिया है। जो पार्टी अपनी चाल, चेहरे और चरित्र पर गर्व करती थी, क्या अब वह कहीं अपना मुंह दिखाने लायक रह गई है ? वह छात्रा साल भर से चिन्मय पर आरोप लगा रही है कि उसके साथ वह बलात्कार और मारपीट करता रहा है लेकिन जब तक उसने इन बातों को इंटरनेट पर जग-जाहिर नहीं किया, न तो उप्र की पुलिस ने कोई सुनवाई की और न ही उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कोई ध्यान दिया। जब सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप किया तो चिन्मय के खिलाफ कार्रवाई शुरु तो हुई लेकिन उसे बीमारी के बहाने अस्पताल में आराम फरमाने भेज दिया गया है और दूसरी तरफ पीड़िता के साथ क्या हुआ, वह आप जानें तो आप चकित रह जाएंगे। बलात्कारी अस्पताल में है और बलात्कार—पीड़िता जेल में है। पीड़िता पर जो आरोप है, उसके कुछ प्रमाण पुलिस जरुर पेश करेगी लेकिन वे आरोप क्या हैं ? वे मजाक हैं। पीड़िता और उसके तीन साथियों को जेल में इसलिए डाला गया है कि वे चिन्मय से पैसे मूंडने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने पैसे मूंड लिये हैं, यह आरोप उन पर नहीं है। उधर चिन्मय पर जो आरोप लगाया गया है, जरा आप उसकी चतुराई देखिए। चिन्मय पर उप्र की पुलिस ने जो आरोप लगाया है, वह बलात्कार का नहीं है बल्कि ‘शारीरिक संबंधों के लिए सत्ता के दुरुपयोग’ का है। याने चिन्मय ने बलात्कार किया है या नहीं, यह पता नहीं लेकिन उन्होंने सिर्फ सत्ता का दुरुपयोग किया है। क्या यह मजाक नहीं है ? मुख्यमंत्री आदित्यनाथ एक तरफ ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान चला रहे हैं और दूसरी तरफ उनकी सरकार बलात्कारी बचाओ अभियान चला रही है। यह कितने शर्म की बात है कि एक संन्यासी मुख्यमंत्री है और उसकी नाक के नीचे हिंदू धर्म का संन्यास-जैसा पवित्र आश्रम सारी दुनिया में बदनाम हो रहा है। हिंदुत्व पर गर्व करनेवाली मोदी सरकार का हिंदुत्व क्या यही है ? प्रधानमंत्री को अपनी छवि, भाजपा की छवि, भारत की छवि और संन्यास की छवि की रक्षा करनी हो तो उन्हें इस मामले में तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। यदि चिन्मय से यह पाप हुआ है तो उसे उसको स्वीकार करना चाहिए और अदालत सजा दे, उसके पहले खुद को खुद कठोरतम सजा दे डालनी चाहिए और यदि वे निर्दोष हैं तो अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए उन्हें आमरण अनशन करके अपनी जान की बाजी लगा देनी चाहिए।

हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषा का क्या समाधान?
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
आज विषय बहुत गंभीर हैं की राष्ट्रभाषा /राजभाषा कौन सी होना चाहिए ? यह भाषा की लड़ाई नहीं हैं यह सबके अस्तित्व की लड़ाई हैं। वैसे सबसे पहले हमें राष्ट्रभाषा हिंदी को प्रथम रखना चाहिए और उसके बाद अंग्रेजी को प्राथमिकता दे। स्थानीय भाषाओँको भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
एक मजेदार बात यह हैं की अन्य प्रदेश के वासी जैसे कन्नड़ ,तमिल ,तेलगु ओड़िया, असमी आदि अनेक स्थानीय और प्रांतीय भाषाई लोग हिंदी के माध्यम से अपनी रोजी रोटी खा रहे और कमा रहे। उदाहरण के लिए हिंदी भाषी फिल्मों में इन प्रांतों द्वारा फिल्मों में काम किया जाता हैं ,और सब लोग हिंदी गानों को मस्ती से सुनते हैं। कभी कभी टेलीविजन में साक्षत्कार आते हैं तब वे हिंदी में बात करते हैं तब वे अंग्रेजी या अपनी भाषा में जबाव देते हैं ,इसका आशय वे हिंदी जानते हैं। आज हिंदी वासी लोग उनके प्रान्त घूमने जाते हैं वे उनकी बात समझते हैं।
एक देश, एक भाषा: गृह मंत्री अमित शाह बोले- कभी किसी क्षेत्रीय भाषा पर हिंदी थोपने की बात नहीं क केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि उन्होंने कभी किसी क्षेत्रीय भाषाओं पर हिंदी थोपने की बात नहीं कही थी। उन्होंने कहा कि इसपर राजनीति की जा रही है। उन्होंने विपक्षी दलों को भी आड़े हाथों लिया।
मैंने कभी किसी क्षेत्रीय भाषा पर हिंदी थोपने की बात नहीं की थी। मैंने एक मातृभाषा सीखने के बाद दूसरी भाषा के तौर पर हिंदी सीखने का आग्रह किया था। मैं खुद एक गैर हिंदी भाषी राज्य गुजरात से आता हूं। अगर कोई व्यक्ति इसपर राजनीति करना चाहता है तो वह उसकी इच्छा है।’
शाह ने अपने हिंदी दिवस के भाषण में कहा था कि अनेक भाषाएं, अनेक बोलियां कई लोगों को देश के लिए बोझ लगती हैं। उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है यह हमारी देश की सबसे बड़ी ताकत हैं। परंतु जरूरत है देश की एक भाषा हो, जिसके कारण विदेशी भाषाओं को जगह न मिले। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमारे पुरखों और स्वतंत्रता सेनानियों ने राजभाषा की कल्पना की थी और राजभाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार किया था।’
गृह मंत्री द्वारा ऐसा कोई कथन नहीं किया गया जहाँ विरोध हो पर हमने जो अंग्रेजी को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रखी उस पर चिंतन जरूरी हैं। इसके लिए जरूरी यह होगा की हमें अपने सरकारी तंत्र जैसे संसद ,न्यायलय और अन्य क्षेत्रों में हिंदी को प्राथमिकता दे.हिंदी को राष्ट्रभाषा होना चाहिए जिससे हम अपने आप गौरवान्वित हो सके उसके बाद अन्य भाषाओं को भी अन्य भाषी सीखे और उनके साहित्य से अवगत हों.
इस विषय पर अन्य भाषायी यदि विवाद करते हैं तो यह उचित नहीं हैं ,यदि बहुलता को देखे और उसके बाद उसकी उपयोगिता को समझे तो कुछ निर्णय निकल सकता हैं। भाषा से कोई परेशानी नहीं पर किसी को इसका दर्ज़ा देना जरूरी हैं। अंग्रेजी से भी कोई विरोध नहीं हैं ,वह संपर्क का सशक्त माध्यम हैं उससे इंकार नहीं किया जा सकता हैं।
भाषा एक ऐसा रोग बन गया हैं
जिसे असाध्य कहा जा सकता हैं
या हो गया
असाध्यनि प्रति नास्ति चिंता
हर साल ऐसी ही रस्म अदायगी
और हम इंडिया से भारत नहीं हो पाएंगे।

लोकतंत्र को मजबूत करने वाला फैसला
विवेक तन्खा
ब्रिटेन के इतिहास में पहली बार तब संवैधानिक संकट की स्थिति बन गई तब वहां के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने संसद को पांच हफ्ते के लिए निलंबित करने का सुझाव दिया। ब्रिटेन की महारानी को दिये गये इस सुझाव के पीछे उनका मंतव्य यूरोपियन युनियन से बाहर होने के लिए होने वाली डील पर बहस से बचना था। उन्होंने यह भी कहा कि इस दौरान उनकी सरकार की नीतियां महारानी के भाषण के जरिये सामने रखी जाएंगी। जॉनसन के इस फैसले की तत्काल चौरफा आलोचनाएं शुरू हो गईं। ब्रिटेन के राजनेताओं ने इस फैसले को लोकतंत्र पर आघात बताया। उनका कहना था कि जॉनसन गैर कानूनी तरीके से संसद को ब्रेगि्जट यूरोपियन यूनियन से अलग होने का फैसला) की तारीख से बिल्कुल पहले रद्द करवा दिया है। ताकि संसद के बिना डील के ब्रेगि्जट की उनकी योजना पर बहस करके बावजूद ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने अपना फैसला वापस लेने से इंकार कर दिया।
उल्लेखनीय है कि ब्रिटेन आने वाले 31 अक्टूबर को 28 देशों के समूह यूरोपियन यूनियन को छोड़ने वाला है। संसद को सस्पेंड करने के फैसले के बाद विपक्षी दलों ने जॉनसन पर महारानी को गुमराह करने का आरोप लगाया था, जिनकी अनुमति संसद को निलंबित करने के लिए अनिवार्य होती है। इस तरह ब्रिटेन में एक संवैधानिक संकट खड़ा हो गया। फैसले को इंग्लैड के हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। लेकिन इस अदालत ने मामले की सुनवाई करने से यह कहकर मना कर दिया कि यह मामला न्यायालय में सुनवाई के दायरे से बाहर है।
आखिरकर मामला ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट पहुंचा गया। वहां एक सप्ताह के भीतर मामला सूचीबद्ध हो गया। इस मामले की सुनवाई के लिए शीघ्र ही 11 जजों की एक पीठ बना दी गई। मामले की सुनवाई दो दिन चल चली। और फिर जल्द ही सुनवाई दो दिन तक चली और फिर जल्द ही फैसला सुना दिया गया।
अदालत ने प्रधानमंत्री जानसन के फैसले को गलत करार दिया। अदालत ने कहा कि प्रधानमंत्री ने संसद को अपने कर्तव्य का फैसला बहुत ही संक्षिप्त था लेकिन दमदार था, अब सवाल यह है कि ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या लोकतंत्र की रक्षा के संदर्भ में भारतीय सुप्रीम कोर्ट के लिए मिसाल हो सकता है?
अब तक का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि भारत की सर्वोच्च अदालत निश्चित दायरे में काम करती रही है। बात यदि दल बदल कानून से संबंधित हो तो भी अदालत ऐसे में सदन के अध्यक्ष के फैसले को तरजीह देती है। देश में ऐसे ही अनेक मामले उठते रहते है, लेकिन अदालत आमतौर पर संसद के फैसलों को गलत नहीं ठहराती।
मुझे आपातकाल के दौर की याद आती है। तब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन जीने और निजता के अधिकार को अस्वीकार कर दिया था। 1976 में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की एक पीठ ने आपातकाल के दौरान यह फैसला दिया था कि आपातकाल के समय व्यक्ति के मिले जीवन और निजता के अधिकार को वापस लिया जा सकता है। यह फैसला कांग्रेस के उस कदम के समर्थन में था जिसे सरकार अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के विरुद्ध इस्तेमाल कर सकती है।
तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जसि्टस ए. एन. रे की अध्यक्षता वाली पांच जजों की इस पीठ में जस्टिस एच आर खन्ना. जस्टिस एच आर बेग, जस्टिस एम एच बेग, जस्टिस वाई वी चंद्रचूढ़ और जस्टिस पीएन भगवती शामिल थे। इस फैसले से केवल जस्टिस एच आर खन्ना असहमत थे। उन्हें अपनी इस असहमति की कीमत भी चुकानी पड़ी थी। इस फैसले के बाद सीजेआई के पद पर नियुक्ती के दौरान जस्टिस खन्ना की वरिष्ठता को दरकिनार कर दिया गया। उनकी जगह जस्टिस एमएच बेग को सीजेआई जस्टिस जे एस खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस डीवाई चंद्रचूढ़ भी शामिल थे। जो सुप्रीम कोर्ट के 1976 के में शामिल रहे जस्टिस वाई वी. चंद्रचूढ़ के पुत्र हैं।
देश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले अपने आप में यह बताते हैं कि उसकी स्थिति क्या है। भारत में फैसले प्रधानमंत्री कैबिनेट के साथ राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से करते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के लिए उसके फैसलों को उस तरह से पलटना संभव नहीं होता। जैसे कि ब्रिटेन में सरलता से हो जाता है। बहुत से मामले हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि उनमें सुप्रीम कोर्ट को सीधे तौर पर हस्तक्षेप करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट कहता है कि कानून बनाने का काम सरकार का है, वह तो केवल समीक्षा कर सकता है। हां, .यह कह सकते हैं कि ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट ने जिस सफलता से सरकार के विरोध में फैसला करने की हिम्मत दिखाई, वैसी भारत की सुप्रीम कोर्ट को करनी चाहिए लेकिन जरूर तो नहीं सुप्रीम कोर्ट सरकार के हर फैसले से असहमत ही हो। यह उसकी सोच पर निर्भर करता है।
– 31 अक्टूबर को 28 देशों के समूह यूरोपियन यूनियन को छोड़ने वाला है। संसद को सस्पेंड करने के फैसले के बाद विपक्षी दलों ने जॉनसन पर महारानी को गुमराह करने का आरोप लगाया था, जिनकी अनुमति संसद को निलंबित करने के लिए अनिवार्य होती है।
(राज्यसभा सदस्य, प्रदेश के एडिशनल सॉलिस्टर जनरल रहे)

ट्रंप की नोबेल की चाह
सिद्धार्थ शंकर
अभी कुछ दिन पहले जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र में खुद को नोबेल पुरस्कार न मिलने को लेकर नाखुशी जाहिर की थी, तब बहुत से लोगों ने इसे ट्रंप की फितरत से जोड़कर देखा था और कहा था कि ट्रंप इसी तरह की बातें करने के लिए विख्यात हैं। मगर जानकारों का कहना है कि ट्रंप की यह पीड़ा न तो चर्चा में बने रहने के लिए थी और न ही माहौल को हल्का करने के लिए। ट्रंप वाकई चाहते हैं कि उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया जाए। ट्रंप के अब तक के कार्यकाल को देखें तो पता चलेगा कि उन्होंने न सिर्फ काम करने का एजेंडा सेट किया, बल्कि उसी के मुताबिक चले भी। जहां जरूरत थी वहां भी और जहां जरूरत नहीं थी, वहां भी उन्होंने अपनी टांग फंसाई। नतीजा यह निकला कि कहीं उनकी कोशिशों को सराहा गया तो कहीं खारिज किया गया। अपनी इसी नीतियों के चलते वे विवादित भी कहलाए। नोबेल पुरस्कार पाने की ख्वाहिश पाले ट्रंप को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक सबसे मुफीद समय लग रहा है। कश्मीर को लेकर पिछले कुछ माह से आ रहे ट्रंप के बयानों ने पटकथा लिखने का काम किया। ट्रंप जानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र की बैठक में दुनियाभर के राष्ट्र प्रमुख आएंगे और उनकी कोशिशों को सराहेंगे।
ट्रंप लगातार कश्मीर को लेकर स्टैंड बदल रहे हैं। कभी वे पाकिस्तान के साथ खड़े होते हैं, तो कभी भारत के साथ। तो कभी दोनों को ही नसीहत देने की भूमिका में आ जाते हैं। ट्रंप के अब तक के बयानों को देखें तो जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री उनसे मिलने अमेरिका गए तो उन्होंने यहां तक कह दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे कश्मीर पर मध्यस्थता करने की बात की थी, इसलिए वे यह करने को तैयार हैं। विवाद बढ़ा तो अमेरिका में हर स्तर पर ट्रंप का बयान खारिज किया गया। विदेश मंत्रालय को बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर कहना पड़ा कि मोदी ने ट्रंप से इस आशय की कोई बात नहीं की। अब जबकि मोदी संयुक्त राष्ट्र की बैठक में पहुंचे तो ट्रंप कहने लगे कि जब तक भारत तैयार नहीं होगा तब तक वे मध्यस्थता की कोशिश नहीं करेंगे। भारत अकेले ही इस समस्या को सुलझा सकता है। इस बयान को 48 घंटे भी नहीं हुए थे कि अब ट्रंप फिर से भारत और पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दा हल करने की नसीहत देने लगे हैं। नोबेल पाने की ट्रंप की चाह उन्हें सिर्फ कश्मीर लेकर नहीं जा रही। इससे पहले वे उत्तर कोरिया तक भी पहुंच बना चुके हैं। खतरनाक हथियारों की होड़ में जुटे उत्तर कोरिया के शासन किम जोंग के साथ ट्रंप तीन बार बात कर चुके हैं, मगर अब तक किम की सोच बदल नहीं पाए हैं। इसीलिए वे फिर से भारत और पाकिस्तान को टारगेट करने पर लगे हैं। हालांकि, भारत कह चुका है कि कश्मीर उसका अंदरूनी मामला है और इसमें किसी तीसरे पक्ष की भूमिका मंजूर नहीं है। ऐसा नहीं है कि भारत का यह पक्ष पहली बार आया है। समस्या के पहले दिन ेसे भारत मध्यस्थता को खारिज करता रहा है। अब ट्रंप इसे मानें या नहीं, मगर इतना तो तय है कि भारत उनकी बातों को तवज्जो नहीं देगा। बेहतर है कि वे पाकिस्तान पर जोर दिखाएं और उसे पीछे हटने को कहें। शायद ऐसा कर ट्रंप नोबेल पाने के हकदार हो जाएं। जहां तक बात भारत की है, वह ट्रंप की मंशा कामयाब नहीं होने देगा।

क्या-क्या अदाएं हैं हमारे ट्रंपजी की
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
ह्यूस्टन में नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप की संयुक्त सभा ने जो जलवा पैदा किया है, उससे इन दोनों नेताओं के अंदरुनी और बाहरी विरोधी-सभी हतप्रभ हैं। दोनों नेता प्रचार-कला के महापंडित हैं। दोनों एक-दूसरे के गुरु-शिष्य और शिष्य-गुरु हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति का विद्यार्थी होने के नाते मैं कल जिस अदृश्य तथ्य को समझ रहा था और जिसके बारे में पहले भी लिख चुका हूं, अब वही होने जा रहा है। दो देशों के नेता परस्पर कैसा भी व्यवहार करें लेकिन उन दोनों देशों के संबंधों का निर्धारण उनके राष्ट्रहित ही करते हैं। ट्रंप ने ह्यूस्टन में मोदी और भारत के लिए तारीफों के पुल बांध दिए लेकिन क्या यही उन्होंने इमरान खान के साथ नहीं किया ? कल जब इमरान उनसे न्यूयार्क में मिले तो उनकी हर अदा ऐसी थी, जैसे कि वे भारत और पाकिस्तान में कोई फर्क ही नहीं करते। जो लोग ह्यूस्टन की नौटंकी देखकर फूले नहीं समा रहे थे, वे ट्रंप की इस अदा से पंचर हो गए। ट्रंप ने मोदी और इमरान दोनों को महान बताकर भारत-पाक के बीच मध्यस्थता करने का राग दुबारा अलाप दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने ह्यूस्टन में मोदी के भाषण को काफी ‘आक्रामक’ बता दिया। यह तो उन्होंने पत्रकारों को बताया लेकिन पत्रकारों को जो पता नहीं है याने इमरान को, पता नहीं, उन्होंने क्या-क्या उल्टा-सीधा घुमाया होगा जबकि ह्यूस्टन में मोदी ने पाकिस्तान के खिलाफ किसी आक्रमक शब्द का इस्तेमाल तो किया ही नहीं, घुमा-फिराकर उसका नाम लिये बिना उसकी कुछ आक्रमक प्रवृत्तियों का और उसकी मुश्किलों का जिक्र किया। जबकि खुद ट्रंप महाशय ने ‘इस्लामिक टेररिज्म’ शब्द का इस्तेमाल किया। याने तालियां बजवाने के खातिर ट्रंप कुछ भी बोल सकते हैं। ट्रंप के इस तेवर का साफ-साफ विरोध इमरान खान ने ‘कौंसिल आॅफ फारेन रिलेशंस’ (न्यूयार्क) के अपने भाषण में कर दिया। इमरान को ट्रंप का रवैया इतना अजीब लगा है कि उन्होंने यहां तक कह डाला कि (ट्रंप को क्या पता नहीं है कि) ‘इस्लाम सिर्फ एक प्रकार का है। वह नरम या गरम नहीं है।’ जब ट्रंप और इमरान संयुक्तराष्ट्र संघ भवन में पत्रकारों के साथ खड़े थे तो ट्रंप अपनी ही हांकते चले जा रहे थे। बेचारे इमरान खान चुपचाप खड़े रहे। ट्रंप ने कश्मीर के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा। जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि आतंकवाद के हिसाब से क्या पाकिस्तान सबसे खतरनाक देश नहीं है तो उन्होंने झट से ईरान का नाम ले दिया। वे भारत और पाकिस्तान दोनों को खुश करने में लगे हुए हैं। देखना यह है कि वे भारत-अमेरिका व्यापार के उलझे हुए सवालों पर क्या रवैया अपनाते हैं। ट्रंप अमेरिका को बार-बार दुनिया का सबसे बड़ा महाशक्ति राष्ट्र घोषित करते रहते हैं तो फिर क्या वजह है कि वह सारे दक्षिण एशिया को महासंघ के एक सूत्र में बांधने का व्रत क्यों नहीं लेते ? सिर्फ अमेरिका के संकीर्ण और क्षुद्र स्वार्थों को सिद्ध करने में ही वे लीन क्यों हैं ?

पूरे देश के लिये एक दर्जन सरकारी बैंक काफी हैं
अजित वर्मा
अभी हाल ही में 10 बैंकों का विलय करके चार बैंक बना दिये जाने के फैसले को लेकर बैंकिंग जगत में नयी हलचल मची है। वित्त सचिव राजीव कुमार ने कहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के 10 बैंकों का विलय कर चार बैंक बनाने से बैंकों के एकीकरण की प्रक्रिया लगभग पूरी हो गई है। आकांक्षी और नए भारत की जरूरतों को पूरा करने के लिए 12 सार्वजनिक बैंकों की संख्या बिल्कुल उचित है।
इस एकीकरण के पूरा होने के बाद देश में राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या घटकर 12 रह जाएगी। 2017 से यह 27 थी। वित्त सचिव दोहरा रहे हैं कि बैंकों की यह संख्या देश की जरूरत के हिसाब से पूरी तरह उचित है। सरकार ने 30 अगस्त को सार्वजनिक क्षेत्र के 10 बैंकों का एकीकरण कर चार बैंक बनाने की घोषणा की थी। सरकार के इस फैसले से 5,000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को पान में मदद मिलेगी। अगले चरण की वृद्धि को समर्थन के लिए देश को बड़े बैंक की जरूरत है। बैंकों के विलय की जो बड़ी घोषणा हुई है उससे इसमें मदद मिलेगी। अब हमारे पास छह विशाल आकार के बैंक होंगे। इन बैंकों का पूंजी आधार, आकार पैमाना और दक्षता उच्चस्तर की होगी।
वित्त सचिव कुमार ने बैंकिंग क्षेत्र के बहीखातों को साफ-सुथरा बनाने के अभियान की अगुआई की है। उनके कार्यकाल में कई चीजें पहली बार हुई हैं। बैंकिंग इतिहास में उनमें सबसे अधिक पूंजी डाली गई है। इसी तरह पहली बार बैंक ऑफ बड़ौदा की अगुआई में तीन बैंकों का विलय हुआ है। बैंकों की बहीखातों को साफ-सुथरा करने की प्रक्रिया के अब नतीजे सामने आने लगे हैं।
चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 18 में से 14 सार्वजनिक बैंकों ने लाभ दर्ज किया है। इससे पहले इसी साल विजया बैंक और देना बैंक का बैंक आफ बड़ौदा में विलय हुआ। इससे देश का दूसरा सबसे बड़ा सरकारी बैंक अस्तित्व में आया। अप्रैल 2017 में भारतीय स्टेट बैंक में पांच सहायक बैंकों – स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर,स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर और स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद व भारतीय महिला बैंक का विलय हुआ। यह तय हो गया है कि अब आगे बैंकों का विलय नहीं होगा और मौजूदा 12 सरकारी बैंक ही देश की संपूर्ण बैंकिंग व्यवस्था को सम्हालेंगे।

मोदी और ट्रंप बम-बम
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह अमेरिका-यात्रा उनकी पिछली सभी अमेरिका-यात्राओं से अधिक महत्वपूर्ण और एतिहासिक मानी जाएगी। इसलिए कि संयुक्तराष्ट्र संघ की महासभा के अधिवेशन में भाग लेने के लिए सौ-सवा-सौ राष्ट्राध्यक्ष हर साल न्यूयार्क पहुंचते हैं लेकिन उनमें से ज्यादातर अमेरिकी राष्ट्रपति से हाथ तक नहीं मिला पाते हैं जबकि मोदी इस यात्रा के दौरान उनसे कई बार बात करेंगे और मिलेंगे। ह्यूस्टन में प्रवासी भारतीयों की जो विशाल जन-सभा हुई है, वह एतिहासिक है, क्योंकि पहली बात तो यह कि अमेरिका का कोई भी नेता इतनी बड़ी सभा अपने दम पर नहीं कर सकता। दूसरी बात, यह कि यह शायद पहला मौका है, जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति किसी अन्य देश के प्रधानमंत्री के साथ इस तरह की जनसभा में साझेदारी कर रहा हो। तीसरी बात यह कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने भाषण में ‘इस्लामी आतंकवाद’ और सीमा-सुरक्षा के सवाल उठाकर सभा में उपस्थित 50-60 हजार लोगों का ही नहीं, भारत और दुनिया के करोड़ों टीवी दर्शकों का दिल जीत लिया। अमेरिका के जो प्रवासी भारतीय कट्टर डमोक्रेट हैं और ट्रंप की मजाक उड़ाते रहते हैं, वे भी मंत्र-मुग्ध थे। दोनों नेताओं के भाषण सुनकर ऐसा लगा कि वे अपनी-अपनी चुनावी-सभा में बोल रहे हैं। मोदी ने ट्रंप के दुबारा राष्ट्रपति बनने का भी समर्थन कर दिया। मोदी ने लगे हाथ समस्त गैर-हिंदीभाषियों को भी गदगद कर दिया। उन्होंने कई भारतीय भाषाओं में बोलकर बताया कि ‘भारत में सब कुशल-क्षेम है।’ वह है या नहीं है, यह अलग बात है लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हिंदीवाले बयान को लेकर गलतफहमी फैलानेवाले कई भारतीय नेताओं के गाल पर मोदी ने प्यारी-सी चपत भी लगा दी। पाकिस्तान का नाम लिये बिना मोदी और ट्रंप ने यह स्पष्ट कर दिया कि इमरान की इस अमेरिका-यात्रा का हश्र क्या होनेवाला है। क्या कोई पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इस तरह की संयुक्त जन-सभा अमेरिका में आयोजित करने की कल्पना कर सकता है ? हां, खबरें कहती हैं कि ह्यूस्टन की सभा के बाहर एक पाकिस्तानी मंत्री के सानिध्य में पाकिस्तान के कुछ प्रवासियों और सिखिस्तान समर्थकों ने नारेबाजी भी की लेकिन इस एतिहासिक जनसभा के अलावा मोदी ने वहां कश्मीरी पंडितों, सिखों और दाउदी बोहरा प्रतिनिधि मंडलों से भी भेंट की। इसके अलावा मोदी के ह्यूस्टन-प्रवास की एक महत्वपूर्ण घटना यह भी है कि भारत की गैस और तेल की आपूर्ति के लिए अमेरिका की 17 बड़ी कंपनियों के कर्णधारों से भी बात की। एक और भी काम हुआ है, जिससे हर भारतीय का सीना गर्व से फूल सकता है। भारतीय कंपनी पेट्रोनेट अब ह्यूस्टन में 2.5 बिलियन डालर का निवेश करेगी ताकि उसे अगले 40 साल तक 50 लाख मीट्रिक टन गैस हर साल अमेरिका से मिलती रहे।

बड़ी तेजी के साथ बढ़ रहा है राज्यों का राजकोषीय घाटा
सनत जैन
आर्थिक मंदी और केंद्र सरकार द्वारा बजट में टैक्स के रूप में उपकर लगाकर, जो वसूली की जा रही है। उससे राज्यों की स्थिति, दिनों दिन काफी खस्ता हालत होती जा रही है। केंद्र सरकार ने पिछले दो केंद्रीय बजट में पेट्रोल और डीजल में उपकर के रूप में उत्पाद शुल्क बढ़ाया है। उसका कोई भी लाभ राज्यों को नहीं मिल पा रहा है। उपकर के रूप में जो राशि सरकारी खजाने में आती है, वह पूरी की पूरी केंद्र सरकार के पास पहुंचती है।
42 फ़ीसदी का झुनझुना
केंद्र सरकार ने 14वें वित्त आयोग के फार्मूले के अनुसार राज्यों को केंद्र को मिलने वाली राशि का 42 फ़ीसदी हिस्सा राज्यों को देने का फार्मूला बनाया था। पिछले वर्षों के केंद्रीय बजट में केंद्रीय कर सीधे नहीं उपकर के रूप में वसूल करने का नया फार्मूला केंद्र सरकार ने निकाला है । पिछले 2 वर्षों में पेट्रोल और डीजल आयकर अथवा अन्य मामलों में उपकर के रूप में शुल्क बढ़ाया गया है। जिसका लाभ राज्यों को नहीं मिल पा रहा है। जिसके कारण राज्यों का आर्थिक संकट बढ़ रहा है।
नोटबंदी और आर्थिक मंदी के कारण जो संकट उत्पन्न हुआ है। उसमें जीएसटी से जो आए बढ़नी चाहिए थी वह राज्यों की नहीं बढ़ पा रही है। जिसके कारण कई राज्यों की स्थिति बहुत खराब हो गई है। हाल ही में केंद्र सरकार ने कारपोरेट कर में जो कमी की है। उसका नुकसान भी राज्यों को उठाना पड़ेगा है क्योंकि राज्यों की 42 फ़ीसदी हिस्सेदारी होने से उन्हें आर्थिक नुकसान होगा।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपयों का जो लाभांश प्राप्त हुआ है । इसका लाभ भी राज्यों को नहीं मिलना है। अतिरिक्त राजस्व के रूप में यह केंद्र सरकार के खजाने में ही जाएगा।
15वें वित्त आयोग के चेयरमैन एनके सिंह ने सभी राज्यों से वस्तु एवं सेवा कर जीएसटी के राजस्व को बढ़ाने का अनुरोध किया है। जबकि स्थिति ठीक इसके विपरीत है। आर्थिक मंदी के कारण जीएसटी की आय में कोई वृद्धि नहीं हो पा रही है। उल्टे कई राज्यों में पिछले वर्ष की तुलना में कम राजस्व इकट्ठा हुआ है। 2022 तक केंद्र सरकार को जीएसटी में होने वाले नुकसान की भरपाई राज्यों को करनी है। केंद्र सरकार को वर्ष 2022 तक जीएसटी में यदि कोई कमी होती है, तो 14 फ़ीसदी प्रतिवर्ष की वृद्धि के साथ राज्यों को भरपाई करनी है। केंद्र एवं राज्य सरकारें लगातार प्रयास कर रहे हैं कि जीएसटी से प्राप्त होने वाला राजस्व बढ़े, किंतु आर्थिक मंदी के कारण कर राजस्व बढ़ने की स्थान पर और कम हो रहा है, जिससे राज्यों की आर्थिक स्थिति बड़ी तेजी के साथ खराब हो रही है।
अप्रैल से जुलाई माह के पहले 4 माह में जिन राज्यों का राजस्व घाटा बढ़ा है। उनमें आंध्र प्रदेश 59.3 राजस्थान 35.5, पंजाब 12.5 कर्नाटक 12.3 गुजरात 8, केरल 7.6 तथा हरियाणा को 6.1 का नुकसान उठाना पड़ा है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी कर राजस्व में कमी आई है। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ उड़ीसा तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश तेलंगाना, उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल भी कर राजस्व की कमी से जूझ रहे हैं।
आर्थिक मंदी को देखते हुए औद्योगिक एवं व्यापारिक जगत के लोग केंद्र एवं राज्य सरकारों से राहत की मांग कर रहे हैं। किंतु केंद्र एवं राज्य सरकार की ऐसी स्थिति नहीं है, कि वह राहत प्रदान कर सकें। जीएसटी के राजस्व में वृद्धि नहीं होने के कारण केंद्र एवं राज्य सरकारों के समक्ष गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। राजकोषीय घाटे से निपटने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों को जहां अपनी आय बढ़ानी होगी वही अपने खर्चों को संतुलित कर बजट घाटे को नियंत्रित करना पड़ेगा।
केंद्र एवं राज्यों के संबंध में तल्खी
केंद्र सरकार ने पिछले दो बजटों में पीछे के रास्ते (सेस- उपकर के माध्यम ) से टैक्स बढ़ाने का काम किया है जिसके कारण राज्यों को दोहरा नुकसान हो रहा है. केंद्र सरकार ने पेट्रोल डीजल और अन्य चीजों पर उपकर बढ़ाकर, केंद्र के खजाने को भरने का काम किया है। उपकर से एकत्रित की गई राशि पर राज्यों का कोई अधिकार नहीं होने से, राज्यों को आर्थिक दृष्टि से नुकसान उठाना पड़ रहा है। राज्यों का केंद्र पर दबाव पड़ना शुरू हो गया है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कैसे निपटती हैं। यह देखना होगा। जिस तरह की आर्थिक ती स्थिति पिछले 4 महीनों में सामने आई है। उससे गैर भाजपा शासित प्रदेशों के साथ-साथ भाजपा शासित राज्य भी आर्थिक संकट का शिकार हो रहे हैं। कर्नाटक और गुजरात राज्य भी उसमें शामिल हैं। केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को दी जाने वाली 42 फ़ीसदी हिस्सेदारी की भरपाई करने की के लिए उपकार के रूप में जो राजस्व केंद्र सरकार द्वारा वसूला जा रहा है। उसमें राज्यों को हिस्सा नहीं मिलने से अब राज्यों की आर्थिक स्थिति खस्ता हाल में पहुंच गई हैं। केंद्र सरकार द्वारा पिछले वर्षों में केद्रीय योजनाएं कम करने तथा केंद्रीय योजना की राशि में कटौती करने से भाजपा शासित राज्य भी त्राहिमान त्राहिमान कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के भय से वह मौन अवश्य हैं। इससे राज्यों में भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ गिरने लगा है। विरोध बढ़ने लगा है। यह चिंता का विषय है।

गरीबों के लिए सार्वजनिक सेवाओं में बदलाव
नरेन्द्र सिंह तोमर
सार्वजनिक सेवाओं की सुविधाजनक, आसान और विश्वसनीय प्रणाली तैयार करने का कार्य अक्सर इस आधार पर छोड़ दिया जाता है कि यह सब निजी क्षेत्र कर लेगा क्योंकि सार्वजनिक व्यवस्थाओं से गुणवत्तापूर्ण सेवाओं की प्रदायगी कराना कठिन ही नहीं, लगभग असंभव है। भारत जैसे विशाल देश में सर्वाधिक वंचित परिवारों तक जरूरी सेवाओं की समता और न्याय आधारित प्रदायगी अनिवार्य रूप से लाभार्थियों के साक्ष्य-आधारित चयन, भलीभांति किए गए अनुसंधान के आधार पर नीतिगत उपायों, (जिनमें समय पर सुधारात्मक कार्यों का प्रावधान हो), सूचना – प्रौद्योगिकी से जुडे संसाधनों की उपलब्धता और उनके पूर्ण उपयोग के जरिए मानवीय हस्तक्षेप को कम से कम करने, और अन्य के साथ-साथ संघीय संरचना में काम करने वाली विभिन्न एजेंसियों के साथ ठोस तालमेल पर निर्भर करती है। बुनियादी ढांचागत कमियों, विस्तृत भौगोलिक क्षेत्रों और देश के कई दुर्गम भूभागों में दूर-दूर बसी विरल आबादी को ध्यान में रखते हुए यह कार्य और भी जरूरी हो जाता है। वास्तव में इतने बड़े पैमाने पर अपेक्षित सेवाओं की संकल्पना, योजना तैयार करना और सेवाएं प्रदान करना गैर-सरकारी एजेंसियों के लिए असंभव है। हालाँकि निजी क्षेत्र और स्थानीय/राज्य स्तरों पर कुछ उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त हुई हैं। तथापि, “सबका साथ सबका विकास” के व्यापक फ्रेमवर्क में “सभी के लिए आवास”, “सभी के लिए स्वास्थ्य”, “सभी के लिए शिक्षा”, “सभी के लिए रोजगार” जैसे महत्त्वाकांक्षी राष्ट्रीय लक्ष्यों की पूर्ति और “नए भारत” का स्वप्न साकार करने के लिए सार्वजनिक सेवाओं की पर्याप्त व्यवस्था बहुत जरूरी है, ताकि अखिल भारतीय आधार पर कार्यक्रमों की आयोजना, वित्तपोषण, कार्यान्वयन और निगरानी के साथ उनमें समय-समय पर अपेक्षित बदलाव किए जा सकें। इस संबंध में निम्नलिखित गतिविधियां आवश्यक और महत्वपूर्ण हैं:-
– परिवारों में अभाव की स्थिति के निर्धारण के लिए अखिल भारतीय स्तर पर अचूक सर्वेक्षण की आयोजना और संचालन तथा स्थानीय सरकारों से उस सर्वेक्षण की पुनरीक्षा कराना;
– पिछले अनुभवों और सर्वोत्तम राष्ट्रीय एवं वैश्विक पद्धतियों से सीख लेते हुए कार्यक्रमों की रूप रेखा तैयार करना, ताकि आवश्यकतानुसार कार्यक्रम सुनिश्चित किए जा सकें;
– भली-भांति तैयार किए गए कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त वित्त-पोषण की व्यवस्था करना;
– अनुभवों से सीख लेते हुए प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर तालमेल बनाना तथा कार्यान्वयन के दौरान तत्काल सुधारात्मक उपाय करना।
गरीबी उन्मूलन का अंतिम लक्ष्य हासिल करने के वास्ते भारत के एक बड़े अभावग्रस्त जनसमुदाय के लिए सेवाएं सुनिश्चित करने हेतु उपर्युक्त व्यवस्थाएं अपरिहार्य हैं। हाल ही के सफल अनुभव से साबित होता है कि हम इन्हें किसी भी कीमत पर नजर अंदाज नहीं कर सकते।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान ग्रामीण विकास के क्षेत्र में चलाए गए ग्राम स्वराज अभियान जैसे कार्यक्रम पूरी तरह पारदर्शी रहे हैं। वास्तव में ये कार्यक्रम समुदाय के प्रति पूरी जवाबदेही के साथ अपेक्षित परिणाम हासिल करने के लिए भरोसेमंद सार्वजनिक सेवा प्रणाली तैयार करने के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
गौरतलब है कि हमारी यह यात्रा जुलाई, 2015 में सामाजिक – आर्थिक और जाति आधारित जनगणना (एसईसीसी) 2011 के आंकड़ों को अंतिम रूप दिए जाने के साथ शुरू हुई। गरीबों के लिए चलाए जाने वाले लोक कल्याण कार्यक्रमों में अभावग्रस्त परिवारों का सटीक और उद्देश्य-परक निर्धारण किया जाना आवश्यक था। गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वालों की वर्ष 2002 में तैयार की गई बी.पी.एल. सूची ग्राम प्रधान का विशेषाधिकार बन चुकी थी और इससे गरीब अक्सर छूट जाते थे। एसईसीसी के तहत अभाव के पैरामीटरों की पहचान करना आसान है। आंकड़े एकत्रित किए जाने के समय लोगों को यह जानकारी नहीं थी कि एसईसीसी का इस्तेमाल क्या और किस तरह होगा। इसके आधार पर तैयार की गई रिपोर्टें वास्तविकता के बहुत नजदीक हैं।
परिवारों की गरीबी के पैरामीटरों को तैयार किए जाने के बाद ग्राम सभा के माध्यम से पुष्टि की प्रक्रिया ने इस डाटाबेस में समुदाय आधारित सुधार का अवसर दिया । एलपीजी कनेक्शन के लिए उज्ज्वला, बिजली के नि:शुल्क कनेक्शन के लिए सौभाग्य, मकान की व्यवस्था के लिए प्रधान मंत्री आवास योजना-ग्रामीण (पीएमएवाई-जी), अस्पताल में चिकित्सीय सहायता के लिए आयुष्मान भारत जैसे कार्यक्रमों के अंतर्गत लाभार्थियों का चयन एसईसीसी के अभाव संबंधी मानदंडों के आधार पर किया गया। यह डाटाबेस धर्म, जाति और वर्ग निरपेक्ष है। यह गरीबी के विभिन्न आयामों को दर्शाने वाले अभाव संबंधी पैरामीटरों पर आधारित है जिनका सत्यापन आसानी से किया जा सकता है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत राज्यों के श्रम बजटों के निर्धारण तथा दीन दयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) के अंतर्गत महिला स्व-सहायता समूहों (एसएचजी) के गठन में सभी अभावग्रस्त परिवारों के समावेशन के लिए एसईसीसी के आंकड़ों का उपयोग किया गया।
गरीबी के सटीक निर्धारण, आँकड़ों में सुधार और उन्हें अद्यतन बनाने में ग्राम सभाओं की भागीदारी से आधार, आईटी/डीबीटी, परिसंपत्तियों की जियो-टैगिंग, कार्यक्रमों के लिए राज्यों में एक नोडल खाते, पंचायतों को धनराशि खर्च करने का अधिकार दिए जाने किंतु नकद राशि न देने, सार्वजनिक वित्त प्रबंधन प्रणाली (पीएफएमएस) जैसे प्रशासनिक और वित्तीय प्रबंधन सुधारों को अपनाया जा सका। इसके परिणामस्वरूप लीकेज की स्थिति में बड़ा बदलाव आया। गरीबों के जन-धन खाते और अन्य खाते भी बिना बिचौलियों के प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के माध्यम बन गए। इससे व्यवस्था में काफी सुधार हुआ। पंचायत के खाते में नकद राशि अंतरण किए जाने की बजाय केवल पंचायत के निर्वाचित नेता के प्राधिकार से मजदूरी और सामग्री के लिए भुगतान इस प्रणाली के माध्यम से किए जा सकते हैं।
मनरेगा जैसे कार्यक्रमों से गरीबों के खातों में धनराशि के अंतरण, टिकाऊ परिसंपत्तियों के सृजन और आजीविका सुरक्षा सहित प्रमुख सुधारों को बढ़ावा मिला। मांग के अनुसार दिहाड़ी मजदूरी के लिए रोजगार उपलब्ध कराना जरूरी है, साथ ही यह भी आवश्यक है कि मजदूरी आधारित इस रोजगार के परिणामस्वरूप गरीबों की आय और दशा में सुधार लाने वाली टिकाऊ परिसंपत्तियों का सृजन भी हो। ग्राम पंचायत स्तर पर मजदूरी और सामग्री के 60:40 के अनुपात जैसे नियमों में बदलाव कर इसे जिला स्तर पर भी लागू किया गया। गरीबों के लिए स्वयं अपने मकान के निर्माण कार्य में 90/95 दिन के कार्य के लिए सहायता के रूप में व्यक्तिगत लाभार्थी योजनाएं शुरू की गईं। इन योजनाओं में गरीबों के साथ सीमांत एवं छोटे किसानों को भी शामिल कर, मनरेगा के अंतर्गत पशुओं के बाड़े बनाए गए, कुएं और खेत तालाब खोदे गए और पौधरोपण कार्य किए गए। प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (एनआरएम) तथा कृषि और इससे जुड़े कार्यकलापों पर अधिक जोर देते हुए सामुदायिक परिसंपत्तियों का निर्माण भी जारी रखा गया। हमने मनरेगा के अंतर्गत लीकेज पर पूरी तरह अंकुश लगाने और गुणवत्तापूर्ण परिसंपत्तियों के सृजन के लिए साक्ष्यों का सहारा लिया। वर्ष 2018 में आर्थिक विकास संस्थान के अध्ययन में पाया गया कि बनाई गई 76 प्रतिशत परिसंपत्तियां अच्छी या बहुत अच्छी थीं । केवल 0.5% परिसंपत्तियां असंतोषजनक पाई गईं। मनरेगा और इसके सुचारू कार्यान्वयन के लिए विश्वसनीय सार्वजनिक व्यवस्था तैयार करना एक महत्वपूर्ण कदम है। यह वही कार्यक्रम है जिसमें संदीप सुखतांकर, क्लीमेंट इम्बर्ट इत्यादि द्वारा वर्ष 2007 से 2013 के दौरान कराए गए अध्ययनों में बड़े पैमाने पर लीकेज का पता चला था। निधियों को उचित और पारदर्शी तरीके तथा सही तकनीकी सहायता के साथ खर्च करने की योग्यता से पहले ही मनरेगा को निधियां मिल चुकी थीं। हमने प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के लिए एक तकनीकी दल गठित कर साक्ष्य आधारित कार्यक्रम लागू करने के लिए इस प्रौद्योगिकी का उपयोग किया। अब इसके परिणाम दिखाई दे रहे हैं। 15 दिनों के भीतर ही भुगतान आदेशों की संख्या 2013-14 के मात्र 26 प्रतिशत से बढ़ कर 2018-19 में 90 प्रतिशत से अधिक हो गई। इस वर्ष हम यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि भुगतान आदेश न केवल समय पर जारी हों, बल्कि धनराशि पंद्रह दिन के भीतर ही खाते में जमा हो जाए।
ग्रामीण आवास कार्यक्रम में पिछले 5 वर्षों के दौरान 15 मिलियन से अधिक मकान बनाए गए हैं और चरण-वार जियो-टैग किए गए चित्र भी pmayg.nic.in वेबसाइट पर पब्लिक डोमेन में डाल दिये गये हैं । सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञों ने देश भर में विविधता को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में पारंपरिक मकान के डिजाइनों का अध्ययन किया। स्थानीय सामग्री के उपयोग को बढ़ावा देने के साथ राजमिस्त्रियों को कारगर तरीके से प्रशिक्षित किया गया। मौजूदा समय में सभी प्रकार की राशि इलेक्ट्रॉनिक तरीके से सत्यापित बैंक खातों में अंतरित की जाती है। सम्पूर्ण प्रक्रिया की निगरानी उचित समय पर वेबसाइट पर उपलब्ध डैशबोर्ड के जरिए की जाती है। प्रौद्योगिकी के प्रभावी उपयोग से मकानों का निर्माण कार्य पूरा होने की वार्षिक दर में 5 गुना वृद्धि हुई है। इससे हमारा यह विश्वास मजबूत हुआ है कि सभी के लिए 2022 तक मकान का लक्ष्य प्राप्त करना पूरी तरह संभव है। इन मकानों को तालमेल के जरिये स्वच्छ भारत शौचालय, सौभाग्य बिजली कनेक्शन, उज्ज्वला एलपीजी कनेक्शन और मनरेगा योजना के अंतर्गत 90 दिन का काम भी मिला है। कई व्यक्ति आयुष्मान भारत के भी लाभार्थी हैं और महिलाएं डीएवाई-एनआरएलएम के अंतर्गत बैंक लिंकेज वाले स्व-सहायता समूह की सदस्य हैं। बहुआयामी प्रयासों के जरिए गरीबों की जीवन दशा निश्चित रूप से बदली है। बीमारू कहे जाने वाले राज्यों में ज्यादातर लोग जर्जर कच्ची झोपडि़यों में रहते हैं। ऐसे राज्यों ने प्रधानमंत्री आवास योजना – ग्रामीण के अंतर्गत उत्कृष्ट काम कर अन्य राज्यों के लिए मिसाल पेश की है। यह भारत का एकमात्र ऐसा कार्यक्रम है, जहां बीमारू राज्यों ने आगे कदम बढ़ाकर परिवर्तन की अगुवाई की है।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत एसएचजी के माध्यम से महिलाओं की सामुदायिक एकजुटता उल्लेखनीय रहने के बावजूद आजीविका में विविधता लाने और बैंक लिंकेज प्रदान करने के लिए अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। बैंक लिंकेज पर जोर दिए जाने से पिछले 5 वर्षों में एनआरएलएम के अंतर्गत लगभग तीन करोड़ महिलाओं के लिए दो लाख करोड़ रू. से अधिक के ऋण की मंजूरी मिल चुकी है। इससे आजीविका में बड़े पैमाने पर विविधता आई है। महिलाओं को सार्वजनिक परिवहन, बैंकिंग करेस्पॉन्डेंट और कस्टम सेंटर के स्वामित्व जैसे विभिन्न नए कार्यकलाप शुरू करने के अवसर मिले हैं। आजीविका मिशन से जुड़ी 6 करोड़ से अधिक महिलाएं बगैर किसी पूंजीगत सब्सिडी के, गरीबों का भाग्य बदल रही हैं। उनकी नॉन-परफॉर्मिंग परिसंपत्तियां (एनपीए) वर्ष 2013 की 7 प्रतिशत से घटकर आज 2 प्रतिशत से कुछ ही ज्यादा रह गई हैं। नि:संदेह ये महिलाएं हमारी सर्वश्रेष्ठ कर्जदार हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में रचनात्मक बदलाव के लिए इस बात की जरूरत है कि उनके नैनो उद्यमों को मदद दी जाए ताकि वे आने वाले वर्षों में सूक्ष्म और लघु उद्यम का रूप ले सकें। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने उद्यमों के विकास के लिए डीडीयू-जीकेवाई के अंतर्गत 67 प्रतिशत से अधिक रोजगार और आरएसईटीआई कार्यक्रम के अंतर्गत दो तिहाई से अधिक नियोजन सुनिश्चित किया है। इस योजना में नियोजन आधारित रोजगार और ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थानों (आरएसईटीआई) के तहत स्वरोजगार पर जोर देने के लिए कौशल विकास कार्यक्रमों में सुधार किए गए है।
14वें वित्त आयोग के अंतर्गत बड़ी धनराशि का अंतरण किए जाने से ग्राम पंचायतें अब ग्रामीण सड़कों और नालियों के साथ जरूरत के मुताबिक अन्य ढांचागत सुधार कर सकती हैं। पिछले एक वर्ष से मनरेगा और पीएमएवाई-जी के अंतर्गत जियो-टैगिंग, आईटी/डीबीटी अंतरण और पीएफएमएस के जरिये पूरी प्रणाली को जवाबदेह एवं पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई है। हमें पूरा विश्वास है कि पीआरआईएसॉफ्ट के अंतर्गत खातों की इलेक्ट्रॉनिक निगरानी, परिसंपत्तियों की जियो-टैगिंग, लेन-देन आधारित एमआईएस के जरिए निधियों के अंतरण और एकल नोडल खाते के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ेगी। स्थानीय खातों में निधियों के नकद अंतरण से भ्रष्टाचार की गुंजाइश बढ़ती है। अगर प्राधिकरण ग्राम पंचायत में निधियां खर्च करें, लेकिन भुगतान इलेक्ट्रॉनिक तरीके से मजदूरों और विक्रेताओं के खाते में किया जाए, तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। वृद्धों, विधवाओं और दिव्यांगों को पेंशन देने के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम – एनएसएपी के अंतर्गत इसी प्रकार के प्रयास किए गए थे। उनके अभिलेखों को डिजिटल बनाया गया । आज अधिकांश राज्यों में प्रौद्योगिकी की मदद से गरीबों को उनके बैंक खातों और आईटी/डीबीटी प्लेटफॉर्म के जरिए प्रति माह पेंशन राशि अंतरित करने में मदद मिली है। नि:संदेह, महिला स्व-सहायता समूहों की मदद से दूरदराज के क्षेत्रों में बैंकिंग करेस्पॉन्डेंटों का विस्तार करने से वृद्ध और बीमार विधवाओं को उनके घर पर ही पेंशन उपलब्ध कराने का रास्ता खुलेगा। प्रौद्योगिकी, प्रभावी विश्वसनीय सार्वजनिक व्यवस्था तैयार करने में बहुत सहायक है। पिछले 4 वर्षों का अनुभव हमें विश्वास दिलाता है कि ऐसा कर पाना संभव है ।
ग्राम स्वराज अभियान सरकार के 7 प्रमुख जनकल्याण कार्यक्रमों के अंतर्गत देश के 63974 गांवों में सभी पात्र व्यक्तियों के सर्वव्यापी कवरेज का एक अनोखा प्रयास था। इस कार्यक्रम के तहत एलपीजी कनेक्शन के लिए उज्ज्वला, मुफ्त बिजली कनेक्शन के लिए सौभाग्य, मुफ्त एलईडी बल्ब के लिए उजाला, टीकाकरण के लिए मिशन इंद्रधनुष, बैंक खातों के लिए जन-धन तथा दुर्घटना बीमा एवं जीवन बीमा कार्यक्रमों को एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर प्रभावी निगरानी प्रणाली के जरिये गरीबों के घर-घर पहुंचाया गया । इस काम में बड़ी संख्या में केंद्रीय कर्मचारियों की भी मदद ली गई। यह छह करोड़ महिला स्व-सहायता समूहों और पंचायती राज संस्थाओं के 31 लाख निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के मिलकर काम करने का अनूठा सहयोगात्मक संघीय प्रयास था। इससे साबित हो गया कि अगर इच्छा-शक्ति हो, तो बड़े से बड़े लक्ष्य को भी प्राप्त कर पाना कठिन नहीं है ।
प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के अंतर्गत ग्रामीण सड़कों के लिए भी इसी प्रकार के प्रयास किए गए। इससे पिछले 1000 दिनों में प्रतिदिन 130-135 किमी. लंबाई की सड़कों का निर्माण हुआ जो प्रभावी निगरानी और राज्यों के साथ लगातार बातचीत के जरिए संभव हो पाया । बीमारू राज्यों के मैदानी क्षेत्रों में 500 से अधिक और पर्वतीय क्षेत्रों में 250 से अधिक आबादी वाली पात्र बसावटों को सड़कों से जोड़ने की एक बड़ी चुनौती सामने थी। उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया गया कि लगभग 97 प्रतिशत पात्र और व्यवहार्य बसावटों को मार्च, 2019 तक सड़कों से जोड़ दिया जाए। हालांकि मूल लक्ष्य मार्च, 2022 तक का था। ग्रामीण सड़क कार्यक्रम से इस बात की भी पुष्टि हुई है कि पीएमजीएसवाई जैसा लोक कार्यक्रम किस प्रकार निर्धारित समयसीमा के भीतर और उचित लागत पर सार्वजनिक सेवाएं प्रदान कर सकता है। इसमें कार्बन फुटप्रिंट कम करने और विकास को स्थायी आधार देने के लिए रद्दी प्लास्टिक जैसी हरित प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए 30,000 किमी. से अधिक सड़क मार्गों का निर्माण किया गया।
ग्रामीण कृषि बाजार (ग्राम), उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों, अस्पतालों को बस्तियों से जोड़ते हुए 1,25,000 किलीमीटर थ्रु और प्रमुख ग्रामीण सड़कों का 80,250 करोड़ रुपये की लागत से समेकन कार्य की मंजूरी सरकार ने दे दी है । सभी राज्यों को दिशानिर्देश भेज दिए गए हैं और परियोजनाओं की मंजूरी के लिए प्रारम्भिक कार्य भी शुरू हो चुके हैं ।
यह सच है कि हम सार्वजनिक सेवा प्रणलियों की सफलता का जिक्र करने में भी कोई रूचि नहीं लेते क्योंकि हम में से ज्यादातर लोगों की धारणा सरकारों को निष्क्रिय तथा निजी क्षेत्र को कारगर स्वरूप में देखने की बन चुकी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि निजी क्षेत्र ने कई शानदार उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन हमें इसके साथ-साथ इसे भी समझना जरूरी है कि सामाजिक क्षेत्र में गरीबों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रम जैसी अनेक सार्वजनिक सेवाओं में अब भी समुदाय के नेतृत्व और स्वामित्व वाली एक ऐसी सार्वजनिक सेवा प्रदायगी व्यवस्था की जरूरत है जो परिणामों पर केंद्रित हो और गरीबों की जीवन दशा में सुधार तथा कल्याण ही उसका अंतिम लक्ष्य हो। विश्वसनीय सार्वजनिक सेवा प्रणाली तैयार करने से अब पीछे नहीं हटा जा सकता, क्योंकि यह गरीबों की जीवन दशा में परिवर्तन और सुधार लाने के लिए अत्यंत आवश्यक है । प्रसन्नता की बात यह है कि केन्द्र में लोकप्रिय और यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में वर्तमान राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार शुरू से ही इसके लिए प्रयत्नशील रही है । इसके अनेक सुखद परिणाम सामने आए हैं और यह सिलसिला रूकने वाला नहीं है।

लाईफ जैकेट’ विहीन सोनिया; डूबती काँग्रेस…..?
ओमप्रकाश मेहता
आज भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चिंता प्रतिपक्ष विहीन राजनीति है, इतिहास गवाह है कि मजबूत प्रतिपक्ष के अभाव की स्थिति में ही तानाशाही का जन्म होता है और अब भारतीय लोकतंत्र को यही एक डर सता रहा है, वह इसलिए क्योंकि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के सामने किसी भी प्रतिपक्षी राष्ट्रीय दल की अहमियत शेष नहीं रही देश का सबसे पुराना राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस धीरे-धीरे अपनी अहमियत और महत्व खोता जा रहा है तथा एक सौ तीस साल की उम्र का यह अतिबुजुर्ग दल कई तरह की व्याधियों से पीड़ित हो राजनीति के महासागर में डूब जाने की स्थिति में है, यद्यपि इसे अच्छे दिन दिखाने वाले परिवार की बहू सोनिया गांधी इसे बचाने के लिए तूफानी समंदर में कूद तो पड़ी है, पर चूंकि उन्होंने किसी तरह की कोई भी ‘लाईफ जैकेट’ नहीं पहन रखी है, इसलिए स्वयं डूबने वाले ही अपने जीवन के प्रति निराश दिखाई दे रहे हैं।
मौजूदा भारतीय लोकतंत्र में कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी राजनीतिक संगठन है, जिसने न सिर्फ 130 साल में भारत को हर स्थिति में करीबब से देखा है, बल्कि उसे निखारने और इसे महिमामंडित करने में सक्रिय भूमिका भी निभाई है। इसलिए यही एकमात्र ऐसा दल है जो भारत को हर तरीके से अच्छे से सोचता-समझता है और आज समय के थपैड़ों ने इस दल का मरणासन्न स्थिति में पहुंचा दिया है और इस स्थिति का फायदा सत्तारूढ़ दल उठाकर उसकी सरकार तानाशाही की राह न पकड़ ले यह आशंका मजबूत होती जा रही है।
वैसे यदि कांग्रेस की मौजूदा स्थिति के कारणों का ईमानदारी से विश्लेषण किया जाए तो कांग्रेस की इस दुरावस्था के लिए स्वयं कांग्रेस व उसके ‘‘बिगड़े सपूतों’’ के अलावा कोई दोषी नही हैं। राजनीति का यह तो एक कटू सत्य है कि जब किसी एक दल को सत्ता की लम्बी पारी मिल जाती है तो वह निरंकुश हो बिना अपना भविष्य सोचे कुछ ऐसे फैसले ले लेता है, जो स्वयं उसी के लिए आत्मघाती सिद्ध होते है, आजादी के बाद से यही कांग्रेस के साथ हुआ, आजादी के बाद के अब तक के बहत्तर सालों में से पैसठ से अधिक सालों तक कांग्रेस सत्ता में रही आजादी के बाद सत्रह साल पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनके बाद लगभग सत्रह साल ही इंदिरा जी प्रधानमंत्री रही, बीच में कुछ महीनों (ढाई साल) के लिए जनता पार्टी सत्ता में रही, और इन चैतीस सालों में भारत के विभाजन से लेकर आपातकाल जैसे फैसले भी लिए गए, इनके बाद देश की कमान राजीव गांधी तथा नरसिंहराव के हाथों में रही, इनके बाद डाॅ. मनमोहन सिंह एक दशक तक प्रधानमंत्री रहें। इसलिए इतनी लम्बी अवधि में जरूरी नहीं कि सत्तारूढ़ कांग्रेस ने ‘जन हिताय’ फैसले ही लिये हो, और इसीलिए मनमोहन सिंह के पहले अटल जी और मनमोहन सिंह के बाद नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने। चूंकि आजादी के बाद कई सालों तक राष्ट्रीय दल के रूप में कांग्रेस ही थी, इसलिए देश के आम मतदाता के सामने कांग्रेस को चुनने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, इसलिए नेहरू-इंदिरा इतनी लम्बी अवधि तक सत्ता में रहें, इंदिरा के आपातकाल के दौरान चूंकि प्रमुख प्रतिपक्षी दलों ने एकजूट होकर जनता पार्टी नामक संगठन बना लिया था, तो आपातकाल पीड़ित देश की जनता ने उसे चुन लिया, किंतु ये सभी अनुभवहीन थे, इसलिए ढाई साल से ज्यादा नहीं टिक पाए और 1980 में फिर इंदिरा जी को विकल्प के रूप में देश ने सत्ता सौंप दी। किंतु इंदिरा जी की हत्या के बाद कांग्रेस परिवारवाद से बाहर नहीं आ पाई, जिसकी परिणति यह हुई की राजीव की हत्या के बाद नरसिंहराव के कार्यकाल में बाबरी मस्जिद काण्ड हुआ और उसी के साथ कांग्रेस के विकल्प के रूप में भारतीय जनता पार्टी मैदान में आई और अटल जी प्रधानमंत्री बन गए, उसके बाद 2004 में एक बार फिर कांग्रेस को देश की बागडोर सोनिया पर विश्वास कर सौंपी गई और सोनिया ने डाॅ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनवा दिया, डाॅ. मनमोहन सिंह चूंकि राजनीति के ‘घिसे-पिटे’ मोहरे थे, इसलिए उन्होंने एक दशक तक सरकार चलाई, किंतु 2014 में भाजपा ने मोदी नाम के ‘धूमकेतू’ को राजनीति के आकाश में उतार दिया, जिसकी चमक से आज तक जनता ‘चमत्कृत’ है।
…..और इसी ‘धूमकेतु’ की चमक ने कांग्रेस को इस दुरावस्था में ढकेल दिया है, अब कांग्रेस के पास लागू करने को कोई प्रयोग भी शेष नहीं बचे है, बेटा पार्टी को सम्हाल नहीं पाया, इसलिए मजबूर होकर नेहरू खानदान की इस बहू को ही इसे जीवनदान देने को मजबूर होना पड़ा, अब वे अपने प्रयासों में कहां तक सफल हो पाती है, यह तो भविष्य के गर्भ में है, किंतु कांग्रेस के पास इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं था, इसलिए सोनिया जी के सामने कांग्रेस को नया जीवनदान देने की सबसे बड़ी चुनौती है, अब उनके अपने ही पार्टीजन उन्हें इस पुनीत कार्य में कितना योगदान करते है या पार्टी को धक्का देते है यह सब देखने वाली बात होगी।

खुशहाल मध्यप्रदेश की ओर बढ़ते कदम
पी-सी-शर्मा
यह खुशहाल और हरा-भरा नया मध्य प्रदेश है,जो लोक-कल्याण का संकल्प लिए नई ऊँचाइयाँ छू रहा है। यहाँ किसान खुशहाल होकर आगे बढ़ रहे है। ग्रामीण इलाकों का सर्वांगीण विकास हो रहा है। बहनें और बेटियाँ सुरक्षित होकर उन्नति के नए आयाम स्थापित कर रही है। नौनिहालों की आँखों में स्वर्णिम सपने हैं। समाज में सुख-शांति और सद्भावना है। युवाओं के लिए रोजगार की असंख्य संभावनाएँ जगी हैं। कौशल विकास के पुख्ता और सहज इंतजाम होने से समाज का हर तबका लाभान्वित हो रहा है। जल, जंगल और जमीन के असल रक्षक आदिवासी समाज में प्रसन्नता और विश्वास बढ़ा है और उनकी उम्मीदें आसमान पर है। दलित और वंचित वर्ग आत्म-विश्वास से भरा हुआ है। पिछड़ा वर्ग का आरक्षण बढ़कर 27 प्रतिशत होने से समाज के एक बड़े तबके में विकास के साथ कदम-ताल का विश्वास बढ़ा है। अल्पसंख्यक समुदाय भयमुक्त होकर विकास का हमराह बना हुआ है।
पिछले 15 सालों के कुशासन ने युवाओं को हतोत्साहित किया था लेकिन कमलनाथ सरकार ने युवाओं के कल्याण की बेहतरीन परिकल्पना से नई संभावनाएँ जगाई हैं। युवाओं के लिए रोजगार के नए और बेहतर अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने उद्योग नीति मेँ संशोधन कर राज्य मेँ लगने वाले उद्योगों मेँ स्थानीय युवाओं को 70 प्रतिशत रोजगार देना अनिवार्य कर दिया है। खिलाड़ियों को उच्च स्तर की सुविधाएँ देने को सरकार प्रतिबद्ध है। राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता मेँ भाग लेने वाले और जीतने वाले खिलाड़ियों के लिए पुरस्कार राशि कई गुना बढ़ा दी गई है। शिक्षा संस्थानों का कायाकल्प करके आधुनिक संसाधन बढ़ाएँ जा रहे हैं जिससे हमारे नौनिहाल बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अर्जित कर सके।
स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त किया गया है। ग्रामीण इलाकों तक आसानी से बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ जन-मानस को मिल सके, इसके लिए लोक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के क्षेत्र मेँ तत्परता से कार्य किए जा रहे हैं। पंचायतों को मजबूत किया गया है और शासन की योजनाओं का लाभ गाँव-गाँव तक पहुँचे यह सुनिश्चित किया गया है। वहीं नगरीय विकास को बेहतर और नियोजित स्वरूप दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री शहरी अधोसंरचना योजना से नगरीय विकास को गति मिली है। बिजली की दरों को सस्ता करने से आम आदमी को बहुत राहत मिली है। पर्यटन की दृष्टि से देश-विदेश मेँ राज्य की नई पहचान बनी है। परिवहन की व्यवस्थाएँ बेहतर हुई हैं। कर्मचारी कल्याण हो या सामाजिक न्याय, लोगों का विश्वास बढ़ा है।
हमारी आस्था, धर्म, जन-जागरण और प्रेरणा के प्रतीक साधु-संतों की भी इस प्रदेश में वैसी ही चिंता की जा रही है, जैसी अन्य जन-समुदाय की। आध्यात्म विभाग ने संत समागम के माध्यम से साधु-संतों का सम्मान करके और उनकी समस्याओं पर व्यापक विमर्श कर यह साफ संदेश दिया गया है कि प्रदेश की कमलनाथ सरकार की लोक कल्याणकारी नीति से कोई भी वर्ग अछूता नहीं रहे। राज्य में धर्मस्व, धार्मिक न्यास और आनंद विभाग को मिलाकर अध्यात्म विभाग का गठन इसीलिए किया गया जिससे आस्था और विश्वास के साथ हमारा धर्म निरपेक्ष ढाँचा और मजबूत बने। धार्मिक स्थानों का समुचित और चहुँमुखी विकास कर धर्मावलम्बियों को सुलभ और बेहतर सुविधाएँ मिल सके, इस दिशा मेँ तेजी से कार्य किए जा रहे हैं। प्रदेश में शासन संधारित मंदिरों के पुजारियों के मानदेय में तीन गुना वृद्धि की गई है। इसके साथ ही कई धार्मिक स्थलों को पर्यटन केन्द्रों के रूप में विकसित करके वहाँ आधुनिक और उच्च स्तर की सुविधाओं का भी विकास किया जा रहा है। इससे स्थानीय स्तर पर व्यापक रोजगार बढ़ने की संभावनाएँ बढ़ी है। विमानन के क्षेत्र में शासकीय हवाई पट्टियों को पायलट प्रशिक्षण, उड्डयन गतिविधियों एयर स्पोर्ट्स, हेलीकॉप्टर अकादमी के लिए सुलभ बनाया गया है।
मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना का लाभ प्रदेश की जनता को खूब मिल रहा है और प्रदेश के कोने-कोने से धर्मावलम्बी विभिन्न तीर्थ-स्थानों पर जाकर दर्शन लाभ ले रहे है। धार्मिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण राम वनगमन पथ की प्रस्तावित योजना रचनात्मक होकर राज्य के कई इलाकों में विकास के द्वार खोल रही है। राम वनगमन पथ के प्रस्तावित मार्ग में सतना, पन्ना, कटनी, उमरिया, शहडोल और अनूपपुर जिले आते हैं। इन स्थानों के प्रमुख धर्म-स्थलों का जीर्णोद्धार, संरक्षण और विकास किया जाएगा। नदियो, झरनों और वनों का संरक्षण कर उन्हें प्रदूषण मुक्त रखने के साथ ही समुचित जन सुविधाएँ सुलभ करवाकर पर्यटन के लिए भी विकसित किया जाएगा।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया को माना जाता है। हमारे पत्रकार कृत-संकल्पित होकर लोकतंत्र को मजबूत करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं और कमलनाथ सरकार पत्रकारों की सुरक्षा और उनकी बेहतरी के लिए निरंतर कार्य कर रही है। पत्रकार प्रोटेक्शन एक्ट लागू करने की तैयारी है। महिला पत्रकारों को प्रोत्साहन और सुरक्षा देने के लिए राज्य स्तरीय समिति का गठन,पत्रकारिता सम्मान, दुर्घटना और स्वास्थ्य बीमा योजना,पत्रकार आवास ऋण योजना जैसे कई अन्य प्रभावकारी कदम उठाये गए है। विधि और विधायी के कार्य समय पर सम्पन्न हो इसके लिये भी व्यवस्था को बेहतर करने के कदम उठाये गए हैं। एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट को लागू किए जाने को लेकर सरकार तैयार है। अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश के 4 अतिरिक्त न्यायालयों की स्थापना,वाणिज्यिक न्यायालयों का गठन और व्यवहार न्यायाधीश वर्ग-2 की भर्ती सुनिश्चित करने जैसे कार्यों का फायदा निश्चित ही जन-समुदाय को मिलेगा।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी से देश और समाज का तेजी से विकास हो, इसके प्रयास पूर्व प्रधानमन्त्री स्व. राजीव गांधी ने लगभग 35 साल पहले ही प्रारम्भ कर दिए थे। कमलनाथ सरकार इस दिशा में तेजी से कार्य कर रही है। भोपाल में साईंस सिटी का विकास, उज्जैन और जबलपुर में उप क्षेत्रीय विज्ञान केंद्र की स्थापना,समस्त सेवाओं को ऑन लाईन करने जैसे कई प्रभावशाली कदम उसी दिशा में सकारात्मक प्रयास है। विकास से दूर मध्यप्रदेश के विकास के लिए व्यापक और सकारात्मक सोच की आवश्यकता को देखते हुए कमलनाथ सरकार ने संकल्पित होकर प्रतिबद्धता से उसे पूरा करने का प्रयास किया है। पिछली सरकार ने किसानों के खिलाफ जो अन्याय पूर्ण और हिंसात्मक व्यवहार किया था, उससे अन्नदाता भयभीत और बदहाल थे। कमलनाथ सरकार ने जय किसान फसल ऋण माफी योजना से किसानों को व्यापक राहत दी। इसे साथ ही कृषि और किसान कल्याण के लिए व्यापक योजनाओं की शुरुआत की। मुख्यमंत्री कृषक जीवन कल्याण योजना से आकस्मिक और अप्रत्याशित दुर्घटनाओं से निबट पाने के प्रति किसानों में विश्वास जागा है। जाहिर है कमलनाथ सरकार जब से आई है,मध्य प्रदेश मेँ खुशहाली आई है। बेहतर और खुशहाल मध्यप्रदेश बने, इसलिए हम संकल्पित होकर कार्य कर रहे हैं। लोक कल्याण ही हमारा ध्येय है।
( लेखक मध्यप्रदेश के जनसम्पर्क, विधि-विधायी मंत्री है)

हमारे प्रेरक ग़ज़नवी नहीं बल्कि मोहम्मद के घराने वाले हैं
तनवीर जाफ़री
‘पाकिस्तान ने अपनी रक्षा प्रणाली में जिन मिसाइलों को “सुसज्जित” कर रखा है उनमें से कुछ मिसाइलों के नाम हैं- बाबर, गौरी और ग़ज़नी” । पाकिस्तान द्वारा अपनी मिज़ाइलों का इस प्रकार का नामकरण किया जाना ज़ाहिर है उसके इरादों,नीयत व उसकी आक्रामकता को दर्शाता है।पाकिस्तान द्वारा यह नाम अनायास ही नहीं रखे गए बल्कि सही मायने में पाकिस्तान इसी प्रकार के आक्रांताओं व लुटेरे शासकों से ही प्रेरित व प्रभावित रहा है। जबकि भारत में इन शासकों की गिनती लुटेरे आक्रांताओं में की जाती है। ख़ास तौर पर महमूद ग़ज़नवी को तो भारत में आक्रमण के दौरान लूटपाट मचाने व सोमनाथ के प्राचीन मंदिर तोड़ने वाले एक आक्रामक शासक के रूप में जाना जाता है। ग़ौर तलब है कि ग़ज़नवी ने सबसे बड़ा आक्रमण 1026 ई. में काठियावाड़ के सोमनाथ मंदिर पर था। विध्वंसकारी महमूद ने सोमनाथ मंदिर का शिवलिंग तोड़ दिया था और मंदिर को ध्वस्त कर दिया था।इस हमले में हज़ारों लोग मरे गए थे जबकि ग़ज़नवी के लुटेरे सैनिक मंदिर का सोना और भारी ख़ज़ाना लूटकर ले गए थे। अकेले सोमनाथ से उसे अब तक की सभी लूटों से अधिक धन मिला था। ग़ज़नवी जैसे लुटेरे आक्रांताओं ने भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में अपने ऐसे ही लूट पाट के कारनामों से इस्लाम व मुसलमानों की छवि को धूल धूसरित करने का काम किया था। यही वह दौर था जबकि सन 61 हिजरी में करबला में यज़ीद के लश्कर की तर्ज़ पर धर्म के नाम पर अपने इस्लामी साम्राज्य को बढ़ाने की चेष्टा करते हुए लूटपाट,क़त्लो ग़ारत तथा धर्मस्थलों को तोड़ने जैसी अनेक इबारतें लिखी गयीं। कहना ग़लत नहीं होगा कि ऐसे ही शासकों ने अन्य धर्मों के लोगों के दिलों में मुसलमानों के प्रति नफ़रत पैदा की तथा इस्लाम धर्म की छवि धूमिल की।
जिस प्रकार यज़ीद के समर्थक उसके प्रशंसक व उसे अपना प्रेरणा स्रोत मानने वाले लोग 61 हिजरी के दौर में करबला की घटना के समय मौजूद थे उसी तरह यज़ीद व यज़ीदियत के रस्ते पर चलने वाले आतंकी सरग़नाओं के समर्थक व उनके प्रशंसक आज भी मौजूद हैं। यज़ीद भी तलवार के बल पर इस्लामी हुकूमत को फैलाने का दावा तो करता था मगर हक़ीक़त में वह इस्लाम का इतना बड़ा दुश्मन था जिसने रसूल-ए-पाक हज़रत मुहम्मद के परिवार के लोगों को ही करबला (इराक़) में शहीद कर पूरे इस्लामी जगत के चेहरे पर कला धब्बा लगाने की कोशिश की। इसी साम्रज्य्वादी सोच का प्रतिनिधित्व अलक़ायदा, दाइश,आई एस व तालिबान जैसे इनके अनेक सहयोगी संगठन भी कर रहे हैं। देखने में रंग रूप व पहनावे में चूँकि यह भी कट्टर मुसलमान ही प्रतीत होते हैं लिहाज़ा इस्लाम विरोधी शक्तियों को इनकी हर “कारगुज़ारियों” को मुसलमानों व इस्लाम से जोड़ने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगता। निश्चित रूप से पाकिस्तान की तबाही व वहां अल्पसंख्यकों के साथ वहां होने वाले ज़ुल्मो जब्र का मुख्य कारण ही यही है कि पाकिस्तान इस्लाम के वास्तविक नायकों अर्थात नबी,पैग़म्बर,ख़लीफ़ा,इमाम से ज़्यादा ग़ज़नवी,अब्दाली,लाडेन,जवाहरी,मसूद अज़हर व हाफ़िज़ सईद जैसे उन लोगों से प्रेरित होता है जो इस्लाम व मुसलमानों को हमेशा हीकलंकित करते रहे हैं।
अभी पिछले दिनों एक बार फिर कश्मीर के ताज़ा तरीन सुरते-ए-हाल के सन्दर्भ में बात करते हुए पाकिस्तान के धार्मिक संगठन जमात-ए-इस्लामी प्रमुख सिराज उल हक़ ने अपनी गिनती “ग़ज़नवी की औलादों” में की है। ख़बरों के मुताबिक़ जमात प्रमुख सिराज उल हक़ ने ये भी कहा कि “कश्मीर पाकिस्तान के लिए ज़िंदगी और मौत का सवाल है। उन्होंने बड़े ही गौरवान्वित लहजे में अपने लिए यह भी कहा कि वो “महमूद ग़ज़नवी की औलाद” हैं। वे स्वयं को किस रिश्ते से ग़ज़नवी की औलाद बता रहे हैं मुझे नहीं मालूम। क्योंकि शाब्दिक अर्थ के लिहाज़ से तो विलादत देने वाले को वालिद और उससे पैदा होने वाली संतान को औलाद कहा जाता है। हो सकता है उनका शजरा ग़ज़नवी से मिलता भी हो परन्तु यदि वे महज़ एक मुसलमान होने के नाते उस आक्रांता से अपना रिश्ता जोड़ रहे हैं तो उन्हें यह बताना ज़रूरी है कि यह लुटेरे और आक्रांता कभी भी भारतीय मुसलमानों के नायक अथवा प्रेरणा स्रोत नहीं रहे। यह क्या कोई भी मुस्लिम सुल्तान या शासक,बादशाह अथवा नवाब कभी भी इस्लाम धर्म का नायक कभी भी न हुआ है न हो सकता है न ही उसे इस्लामी नायक व मुसलमानों का प्रेरणास्रोत माना जा सकता है। भले ही उसने नमाज़,रोज़ा,हज आदि का पालन भी क्यों न किया हो। इस्लाम पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद व उनके परिजनों हज़रत अली ,बीबी फ़ातिमा ,हज़रत इमाम हसन व हज़रात इमम हुसैन जैसे हज़रत मुहम्मद के घराने वालों से प्रेरणा हासिल करने वाला धर्म है। इस्लाम, पैग़म्बरों,इमामों व मुहम्मद के घराने वालों को अपना आदर्श मानने वाला धर्म है।इस्लाम उस त्याग,तपस्या और क़ुर्बानी का धर्म है जो करबला में हज़रत इमाम हुसैन की शहादत की शक्ल में सिर चढ़ कर बोला। इस्लाम हुसैनियत के बल पर ज़िंदा है यज़ीदियत के बल पर नहीं। यज़ीदियत के लक्षण तो यही हैं जो ग़ज़नवी,अब्दाली,लाडेन,जवाहरी,मसूद अज़हर व हाफ़िज़ सईद जैसे लोगों में और इनके चहेतों में दिखाई दे रहे हैं।
यहाँ पाकिस्तान के जमात प्रमुख सिराज उल हक़ के कश