आलेख 21

पहलू खान की हत्या किसी ने नहीं की
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पहलू खान की हत्या 1 अप्रैल 2017 को अलवर में हुई थी। उसे गायों की तस्करी करने के शक में 6 लोगों ने घेरकर मार डाला था। दो दिन बाद उसकी मौत हुई। उसके पहले उसने अपने बयान में हत्यारों के नाम भी पुलिस को बताए थे और उस मौके पर जो वीडियो बनाया गया था, वह भी पुलिस के पास था लेकिन राजस्थान की पुलिस ने अदालत के सामने सारा मामला इतने लचर-पचर ढंग से पेश किया कि सभी अभियुक्त बरी हो गए याने पहलू खान को किसी ने नहीं मारा। वह अपने आप मर गया। अदालत ने अपने फैसले में पुलिस की काफी मरम्मत की है लेकिन मैं अदालत से पूछता हूं कि उसने मुकदमे के दौरान पुलिस को बाध्य क्यों नहीं किया कि वह हत्या के सारे तथ्य उजागर करती। हत्या के उस वीडियो को सारे देश ने देखा था। वह खुले-आम उपलब्ध है। अदालत चाहती तो उसे खुद ‘यू टयूब’ पर देख सकती थी। उसे देखा भी लेकिन अदालत ने उस पर भरोसा नहीं किया। अदालत पुलिस की लारवाही का रोना रोती रही लेकिन मैं पूछता हूं कि क्या उसने अपना फर्ज पूरी ईमानदारी से निभाया ? अदालत ने उन पुलिसवालों को कड़ी सजा क्यों नहीं दी, जिन्होंने सारे मामले पर पानी फेरने की कोशिश की ? यह ठीक है कि राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने इस मुकदमे पर अपील करने की घोषणा की है लेकिन उसकी कौनसी मजबूरी है कि उन पुलिसवालों को वह दंडित नहीं कर रही है ? उन्हें तुरंत मुअत्तिल किया जाना चाहिए। उसकी मिलीभगत या लापरवाही की वजह से सरकार, अदालत और पुलिस विभाग की इज्जत पैंदे में बैठी जा रही है। भारत की केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी की बदनामी सारी दुनिया में की जा रही है, जो कि गलत है, क्योंकि भीड़ की हिंसा की ऐसी वारदातें कांग्रेस सरकार के राज (2009-14) में 120 बार हुईं और मोदी राज (2014-19) में सिर्फ 40 बार हुईं। जाहिर है कि इन हिंसक और मूर्खतापूर्ण कुकृत्यों को कोई भी सरकार या पार्टी प्रोत्साहित नहीं कर रही है बल्कि भारतीय समाज में फैले हुए अंधविश्वास और अंधभक्ति का यह दुष्परिणाम है। पहलू खान और उसके जैसे अन्य मामलों में यदि दोषियों को सख्त सज़ा नहीं मिली तो यह भारत की शासन-व्यवस्था के माथे पर काला टीका होगा। मैं सोचता हूं कि लाल किले के अपने भाषण में मोदी को इस भीड़ की हिंसा के विरुद्ध खुलकर बोलना चाहिए था। सच्ची गोभक्ति इसी में है कि गाय की रक्षा के बहाने मनुष्यों की हत्या न हो। गाय और मनुष्य, दोनों की रक्षा हो, यह जरुरी है।

लोकतंत्र के सजग प्रहरी थे डॉ शंकर दयाल शर्मा
मनोहर पुरी
(19 अगस्त : जन्म दिवस पर विशेष) भारतीय राजनीति के सबसे कम विवादास्पद राजनीतिज्ञ थे डॉ. शंकर दयाल शर्मा। उनका जन्म मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 19 अगस्त 1918 को एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। अन्य अनेक राजनेताओं की भान्ति डॉ. शंकर दयाल शर्मा का परिवार भी उत्तर प्रदेश से मध्य प्रदेश आ गया था। उनके पिता परम शिव भक्त थे इसीलिए उन्होंने अपने पुत्र का नाम शंकर दयाल रखा। धार्मिक दृष्टि उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली थी। डॉ. शंकर दयाल शर्मा भारत के नौवें राष्ट्रपति थे। निरन्तर राजनीति में सप्रिय भागीदारी करने के वावजूद उन्होंने नियमित पूजा पाठ करने की अपनी दिनचर्या में कभी व्यवधान नहीं आने दिया। वह एक सुयोग्य प्रशासक,स्वतंत्रता सेनानी,विद्वान लेखक,कुशल प्रशासक, कानूनविद् और विचारक के रूप में निरन्तर अपने देश की सेवा में सलंग्न रहे। उनकी शिक्षा आगरा, इलाहाबाद, लखनऊ, ऑक्सफोर्ड तथा व्रैंब्रिज विश्वविद्यालय में हुई। उन्होंने इंग्लिश,हिन्दी और संस्कृत भाषाओं में एम.ए. किया। उन्होंने बार-एट-लॉ की उपाधि प्राप्त करके छात्रों को कानून की शिक्षा भी दी। उनका विवाह विमला शर्मा के साथ हुआ।
स्वतंत्रता आन्दोलन में उन्होंने बढ़ चढ़ कर भाग लिया और भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ उनका घनिष्ठ संबंध था। जब वह इलाहाबाद में थे तब उनका सम्पर्प पं. नेहरू से हुआ। वह पंडित नेहरू के व्यक्तित्व से बहुत अधिक प्रभावित थे और उनकी कही हर बात को अपने जीवन में उतारना चाहते थे। 1936 में नेहरू जी के प्रभाव से उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेना प्रारम्भ किया। एक बार कांग्रेस में आने के बाद वह जीवन पर्यन्त कांग्रेसी ही रहे। उन्हें एक साधारण भारतीय की तरह जीवन व्यतीत करना बहुत पसन्द था इयलिए राष्ट्रपति बनने के बाद भी उन्होंने अपनी दिनचर्या में कोई विशेष बदलाव नहीं किया।
स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान उन्होंने अपनी जेल यात्राओं में कभी भी अपने लिए विशेष व्यवहार की मांग नहीं की। आजादी मिलने के बाद 1952 में वह भोपाल के मुख्य मंत्री बने। वह इस पद पर 1957 तक रहे। इस वर्ष राज्यों का पुनर्गठन किया गया और मध्य प्रदेश अस्तित्व में आया। प्रधान मंत्री के पद के अपवाद के अतिरिक्त उन्होंने देश के हर शीर्ष पद को सुशोभित किया। मध्य प्रदेश के विकास में उनका विशेष योगदान रहा। उन्होंने कांग्रेस की अंदरूनी कलह में स्वर्गीय इन्दिरा गांधी का पूरी तरह से समर्थन किया। 1974 में वह केद्र की राजनीति में आये और केद्रिय सरकार में संचार मंत्री बने। वह इस पद पर 1977 तक बने रहे। वह आन्ध्र प्रदेश,पंजाब और महाराष्ट्र के गवर्नर भी रहे। इसी बीच उनके दामाद और बेटी को सिख आतंकवादियों ने मौत के घाट उतार दिया।
1987 में उन्हें देश का उप राष्ट्रपति बनाया गया। उप राष्ट्रपति होने के कारण उन्हें राज्य सभा की अध्यक्षता भी करनी होती थी। डॉ. शर्मा का लोकतंत्रीय जीवन पद्धति में अटूट विश्वास था। वह ऐसी किसी बात को स्वीकार नहीं करते थे जिससे लोकतंत्र आहत होता हो। 1990 में जब शिवशंकर कांग्रेस के संसदीय दल के नेता थे तब कांग्रेसी सदस्य कई बार सदन की गरिमा की सीमा लांघ जाते थे। शंकर दयाल जी को यह सब बहुत ही नागवार गुजरता था। एक बार जब वह राज्य सभा की पीठ पर विराजमान थे तब निरंकुश कांग्रेसी सदस्यों के व्यवहार से पीडित हो कर वह सदन में ही फूट फूट कर रो पड़े थे। उन्होंने भावुकता भरे कंठ से कहा था,” जब तक मैं पीठासीन हूं मैं लोकतंत्र की हत्या नहीं होने दूंगा। आपके द्वारा की जाने वाली हुड़दंगबाजी देशद्रोह के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप मेरा गला घोंट दें,गोली मार दें,लेकिन लोकतंत्र को बचा लें।“ स्पष्ट है कि वह लोकतंत्रीय व्यवस्था को अपनी जान से भी अधिक प्यार करते थे। उनकी महान देश भक्ति को देखते हुए उन्हें 1992 में भारत के नौवें राष्ट्रपति के रूप में चुना गया। उन्होंने 1997 तक इस सर्वोच्च पद को सुशोभित किया।
राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने कई महत्वपूर्ण निर्णय किए। कई अल्पमतीय सरकारें अस्तित्व में आयीं परन्तु उन्होंने किसी के साथ कोई पक्षपात नहीं किया। उनके मन में विद्वेष की भावना कभी नहीं आई। कठिन से कठिन परिस्थिति में भी उन्हें अपने संयम और सूझबूझ से हर समस्या का सहज समाधान खोज लेने में महारत हासिल थी। इतने लंबे राजनैतिक जीवन में वह कभी किसी विवाद में नहीं फंसे और न ही उन पर किसी तरह का कोई आरोप लगा। जीवन के अन्तिम दिनों में उन्हें इस बात पर सन्तोष था कि वह सुख चैन की नींद सो पाते हैं क्योंकि उनकी आत्मा पर किसी प्रकार का बोझ नहीं था और उन्हें भावी जीवन की कोई समस्या तंग नहीं करती। भले ही उन्हें इस बात का कष्ट था कि आज कल सार्वजनिक स्तर बहुत नीचे चला गया है। उनका कहना था कि उनकी आत्मा एक दम साफ है। कबीर के शब्दों में कहें तो उन्होंने ज्यों की त्यें धर दीन्हीं चदरिया को अपने जीवन में उतारने में सफलता प्राप्त की। 9 अक्टूबर 1999 को उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उन्हें दिल्ली के एक हस्पताल में भर्ती करवा दिया गया। 26 दिसंबर, 1999 को उनका स्वर्गवास हो गया। उनका अन्तिम संस्कार दिल्ली में ही उनके प्रिय नेता पंडित जवाहर लाल की समाधि के समीप विजय घाट पर किया गया।

आवास निर्माण में तेजी, लेकिन सवाल है गुणवत्ता का
अजित वर्मा
केन्द्र सरकार ने पिछले दिनों दावा किया है कि शहरी क्षेत्रों में सभी जरूरतमंद लोगों को सस्ते आवास मुहैया कराने की प्रधानमंत्री योजना (पीएमएवाई) के तहत 2018 की तुलना में इस साल आवास निर्माण और आवंटन की गति दोगुना तक तेज हुई और योजना का लगभग 24 फीसद लक्ष्य हासिल कर लिया गया है।
आवास निर्माण में तेजी आ रही है, लेकिन आज भी गुणवत्ता का सवाल अपनी जगह है, क्योंकि निर्माण प्रक्रिया को अंजाम देने वाले अवसर और ठेकेदारों के चेहरे, चाल और चरित्र में परिवर्तन नहीं हुआ है। हमारा मानना है कि आवंटन के पहले सभी आवासों का गुणवत्ता परीक्षण भी किया जाना जरूरी है। यों, मंत्रालय ने निम्न एवं मध्य आय वर्ग के लिए विभिन्न श्रेणियों में सस्ते आवास मुहैया कराने के लिए जून 2015 में यह योजना शुरू की थी। इनमें 1.95 लाख आवास मध्य आय वर्ग के लिए हैं जबकि अब तक स्वीकृत 83.68 लाख आवास में से 4.48 लाख घर अनुसूचित जाति जनजाति के परिवारों को दिए जाएंगे। बेघर परिवारों की पहचान की जा रही है। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में चिन्हित बेघर परिवारों की संख्या 2.56 लाख थी। सस्ते आवास योजना में शहरी क्षेत्र के उन बेघर परिवारों को भी शामिल किया गया है, जो सार्वजनिक स्थलों पर गुजर बसर करते हैं।
पिछले दिनों संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक इस साल जुलाई तक विभिन्न श्रेणियों के निर्माणाधीन मकानों की संख्या 49.54 लाख हो गई है। योजना के तहत 26.13 मकान बनकर तैयार हो गए हैं और इनमें 23.96 लाख आवास, योजना के लाभार्थियों को सौंप भी दिए गए हैं। दिसंबर 2018 तक इस योजना के तहत शहरी क्षेत्रों में 35.67 लाख घर निर्माणाधीन थे और 12.19 घर (लगभग 12 फीसद) लाभार्थियों को आबंटित कर दिए गए थे। मंत्रालय का 2020 तक एक करोड़ घरों के निर्माण को मंजूरी देने का लक्ष्य है, जिससे 2022 तक इन घरों का निर्माण कर इन्हें जरूरतमंद लोगों को आबंटित किया जा सके। अब तक 83.68 घरों को मंजूरी दी जा चुकी है।
निर्माण कार्य में तेजी लाने वाले राज्यों में उत्तरप्रदेश, गुजरात और आंध प्रदेश सबसे आगे हैं। इनमें उत्तरप्रदेश में 3.39 लाख आवास बनकर तैयार हो चुके हैं जबकि गुजरात में बनकर तैयार घरों की संख्या 3.16 लाख और आंध प्रदेश में 3.10 लाख है। इस मामले में पीछे रह गए राज्यों में राजस्थान (64 हजार) और (बिहार 57 हजार) शामिल हैं।
कई जगह निर्माण कार्य अवरुद्ध होने का एक बड़ा कारण सामग्री आपूर्तिकर्ताओं, सेवा प्रदाताओं और निर्माणकर्ताओं के भुगतान के देयक लम्बे समय से लम्बित हैं। ऐसे में अर्थाभाव में कार्य तो अटकेंगे ही।

मिलावट पर सक्त कदम उठाने की जरूरत
रहीम खान
इसे विडंबना कहे या दुर्भाग्य की जैसे ही हमारे देश में होली हो या दीवाली जैसे महत्वपूर्ण बड़े पर्व आने की आहत होती है। वैसे ही बाजार में मिठाईयों का बोलबाला बढ़ जाता है। इसी के साथ अधिक से अधिक धन कमाने के चक्कर में व्यापारी कम खर्च में नकली चीजें मिलाकर उसे असली बताकर अधिक कीमत में बेचने से बाज नहीं आते। यही कारण है कि इन पर्वो के आने के पूर्व बड़े पैमाने पर नकली मावा पकड़े जाने की खबरे सुर्खियों मेें बनी रहती है। कम खर्च में अधिक पैसा कमाने के चक्कर में कहीं मावे में तो रंगों में ऐसी चीजे मिलाई जाती है जिसका मिठाई खाने वाले व्यक्ति के स्वास्थ्य पर घातक असर होता है। मिलावटखोरी के चक्कर में हमने देखा है कि लोग बड़े पैमाने पर अस्पताल के चक्कर काटते है। बताया जाता है कि मावे दूध, पनीर में ऐसे ऐसे रसायन मिलाये जाते है जिसके प्रभाव से लीवर ओर किडनी पर प्रतिकूल असर पड़ कर नई बीमारी को जन्म देता है। अफसोस तो इस बात का होता है कि सरकार का खाद्य सुरक्षा एवं स्वास्थ्य विभाग मिलावटी समान के धर पकड़ के लिये दीवाली और होली के पहले धर पकड़ का विशेष अभियान चलाता है जिसमें आप समाचार पत्रों और टी.वी. चैनलों पर मिलावटी समान पकडाये जाने की खबरे सुर्खिया बनी रहती है। सवाल यहीं पैदा होता है कि सरकार के द्वारा गठित विभाग होने के बाद भी मिलावट खोर अपने मन्सूबे में कैसे कामयाब हो जाते है। इसके लिये कहीं न कहीं सरकार का वो विभाग की उदासीनता पूर्ण रूप से जिम्मेदार है जिसके कंधो पर मिलावट रोकने की जिम्मेदारी होती है। टेबल के नीचे से दिये जाने वाले सौजन्य भेंट का परिणाम है कि व्यापारी वर्ग भी बिना कानून के भय के अपने उद्देश्य की प्राप्ति धडल्ले के साथ करते है। कारण स्पष्ट है कि नकली माल को असली कीमत में बेच कर एक मोटी रकम अर्जित की जाती है। प्रत्येक साल आप देख सकते है कि देश के कोने कोने में नकली मावा पकड़ाये जाने की खबरे आती है। परन्तु लचर कानून के कारण दोषी पक्षों के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो पाती जिसके कारण मिलावट खोरी की समस्या दिन दूनी रात चैगनी का रूप धारण कर रही है। अगर न्यायालय से इस प्रकार के कार्यो में शामिल लोगों को कड़ी सजा दी जाय तो शायद मिलावट खोरी में अंकुश लग सकता है। पर वैसा होता नहीं। चीन जैसे देश में मिलावट को संगीन अपराध माना जाता है और वहां इस प्रकार के कार्य करने वाले व्यक्ति यदि दोषी पाये जाते है तो उन्हें मौत की सजा दिये जाने का प्रावधान है। इसके उल्टे भारत में न्यायालय द्वारा मिलावट पर अनेक अवसरों पर चिंता तो प्रदर्शित की जाती है वास्तविकता के धरातल पर उसका सहीं तौर पर पालन नहीं होने से मामला आयाराम गयाराम का हो जाता है। देश के सुप्रीम कोर्ट ने तो इस मामले में वर्तमान कानून में सुधार लाकर उसे और कड़े बनाने में जोर दिया है। ताकि मिलावट खोरी जैसे हरकतों पर रोक लगाई जाये। केन्द्र हो या राज्य की सरकारें मिलावट की बुराईयां गिनाकर अपने कार्यो की इतिश्री कर लेती है। आम उपभोक्ता चाहे वह अमीर हो या गरीब या मध्यम वर्गीय वह तो यही चाहता है कि उसे भी भले दी दाम ज्यादा देना पड़े पर जो खाद्य पदार्थ वह ले रहा है वह सही हो। ताकि जो चीज वह खाये उसका शरीर के भीतर कोई प्रतिकूल प्रभाव न बन पाये। चांवल हुआ मिठाईयां हुई दाल हुई या वैसे ही खाद्य पदार्थ ऐसी चीजें जिसमें मिलावट कर व्यापारी अपनी तिजोरी का वजन बढ़ाने में ही लगे रहते है। उनको इस बात से कोई सरोकार नहीं कि जो काम वह कर रहे है वह अपने उन उपभोक्ताओं के साथ विश्वासघात है जो उनसे अच्छा समान होने की शर्त पर खरीदते है। इसमें सुधार के लिये आवश्यक है कि जिस प्रकार से सरकारे साफ सफाई अभियान को लेकर जनजागृति ला रही है उसी प्रकार से मिलावटखेारी के खिलाफ भी जनजागृति की आवश्यकता है। ताकि इस बुराई पर मजबूती के साथ रोक लगाई जाये। आये दिन फैलने वाले नये नये संक्रमण रोग का एक कारण खान पान में मिलावट भी है। जो शरीर के भीतर जाकर नये रोगों को जन्म देती है और शरीर के रोग प्रतिशोधक क्षमता को कमजोर करती है। मिलावट खोरी को जड़ से खत्म करने के लिये उपभोक्ताओं को भी सरकारी प्रयासों के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ना होगा और जहां भी मिलावट की सूचनाएं मिलती है उसे विधिवत रूप से संबंधित सरकारी विभाग के पास पहुंचाया जाय ताकि इस बीमारी पर अंकुश लगाया जा सके। इस समय दीपावली का प्रकाश पर्व हमारे सर पर है जिसमें सर्वाधिक मिठाईयों का लेन देन होता है। इसमें भी शातिर दिमाग के व्यापारी तरह तरह के ऐसी चीजों की मिलावट करते है जिससे शरीर को लाभ कुछ नहीं पर हानि बहुत हो जाती हैं। तरह तरह के रंगों पर मिलने वाली मिठाइयों के खरीदने के पहले उपभोक्ताओं को सजगता का परिचय देना चाहिए ताकि मिलावटी खाद्य पदार्थ के सेवन से बचें। मिलावट खोरी समाज और शरीर दोनों के लिये अभिशाप है। जिन विभागों के जिम्मे इस पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी है उन विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को भी छोटे से आर्थिक लाभ के चक्कर में जन जीवन के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाले लोगों को संरक्षण न देकर उनके खिलाफ ठोस कार्यवाही करना चाहिये। क्योंकि जिस प्रकार से वर्तमान समय हमारे देश में मिलावट खोरी का बोल बाला बढ़ा है उसके कारण ही आज मानव नये नये बीमारियों का शिकार हो रहा है जिसका ईलाज कई बार डाक्टरों के पास भी नहीं होता। मिलावटी चीज खाने का असर लीवर किडनी के साथ साथ शरीर के भीतर दूसरे अंगों पर होता है और जो अच्छे खासे व्यक्ति को पलक झपकते ही बीमार बना देती है।

राष्ट्र रक्षा और बेटियों की सुरक्षा का लें संकल्प
प्रभुनाथ शुक्ल
भारत वासियों के लिए यह अजब संयोग है कि स्वाधीनता दिवस यानी 15 अगस्त और रक्षाबंधन एक ही दिन मनाया जाएगा। दोनों महापर्व एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है। एक हमें जहां त्याग और बलिदान की सीख देता हैं वहीं दूसरा बुराईयों और आसुरी प्रवृत्तियों से समाज को सुरक्षित रखने के लिए अपने दायित्वों की याद दिलाता है। ऐसी स्थिति में हमें स्वाधीनता दिवस और रक्षाबंधन को नए नजरिए और नयी सोच के साथ मनाना चाहिए।देश और समाज की स्थितियां बदल चुकी हैं। इस बार का जश्न-ए-आजादी और रक्षाबंधन विशेष महत्व रखता है। कश्मीर जैसे मसले का एक झटके में समाधान निकाल देश ने बड़ा काम किया है। इस फैसले पर हमें राजनीति नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जब देश सुरक्षित रहेगा तो हमरा अस्तित्व भी बचा रहेगा। बदलते दौर में हमारी सामाजिक मान्यताएं और समस्याएं भी बदली हैं। इस तरह की समस्याओं के समाधान में हमारे पर्व बेहद सहायक हो सकते हैं। क्योंकि यह हमारे धार्मिक एंव सांस्कृतिक सरोकार से जुड़े होते हैं। रक्षाबंधन पर्व का सिर्फ भाई-बहन के रिश्तों तक सीमित नहीं है। यह कुरीतियों से लड़ने का संकल्प है।
स्वाधीनता दिवस और रक्षाबंधन पर्व देश, काल, वातावरण, जाति, धर्म, भाषा, प्रांतवाद की सीमा से अलग है। दोनों महापर्व हिंदुस्तान में एक साथ उमंग और उत्साह के वातावरण में मनाएं जाते हैं। यह हमारी सांस्कृतिक एकता की सबसे बड़ी मिसाल है। हमारी आजादी को 72 साल हो जाएंगे। देश इस यात्रा में आर्थिक, सामाजिक और कई अतंरराष्ट्रीय चुनौतियों का सामाना करते हुए एक सशक्त राष्ट्र के रुप में उभरा है। वैश्विक मंच पर भारत को पूरा सम्मान मिल रहा है। भारत अपनी उपस्थिति को मजबूती से दर्ज करा रहा है। दुनिया भर में उसकी अपनी एक अलग छबि निखरी है। कश्मीर में धारा-370 के खात्में पर पास्कितान हर कूटनीति अपना रहा है लेकिन चीन, अमेरिका, रुस, फ्रांस के साथ कई मुस्लिम देशों की तरफ से उसे मुंह की खानी पड़ी है। संयुक्तराष्ट संघ में उसे कश्मीर मसला उठाने की इजाजत तक नहीं मिली। पाकिस्तानी विदेशमंत्री कुरैशी खुद स्वीकार किया है कि दुनिया भर में हमारे समर्थन में कोई नहीं खड़ा है। जिस कश्मीर को पाकिस्तान अब तक विवादित मसला कहता चला आ रहा था कि आज उसी कश्मीर को पूरी दुनिया भारत का आतंरिक मामला बताते हुए पाकिस्तान को जमींन दिखा दिया है। इस बात को हमें समझना होगा। यह मसला हमारे सियासी नफे-नुकसान से अधिक राष्टवाद और उसकी आत्मा से जुड़ा है। कश्मीर के अलगाव वादियों को भी अपनी निहित सोच से बाहर आना चाहिए। जिसमें आम कश्मीरी का हित हो उस बात पर गंभीरता से विचार कर देश की मुख्यधारा से जुड़ना चाहिए। सरकार की नीतियों में सहभागी बन राष्ट्र निर्माण में एक सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
रक्षाबंधन सिर्फ हिंदुओं का ही नहीं जैन और दूसरे समाज के लोगों को भी पर्व है। सावन की पूर्णिमा को यह मनाया जाता है जिसकी वजह से इसे श्रावणी भी कहा जाता है। इसका धार्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक महत्व है। इस दिन पर्व पर बहनें भाई के की कलाई में रक्षासूत्र यानी रखी बांध तिलक लगा कर आरती उतारती हैं। भाई से अपनी रक्षा का संकल्प लेती हैं। इस रक्षाबध्ंन पर्व पर हमें अपनी सोच को बदलना होगा। बहन की रक्षा के साथ-साथ देश, समाज और बेटियों की रक्षा का भी संकल्प लेना होगा। इसके लिए युवाओं का आगे आना चाहिए। देश में मासूम बेटियों, स्कूली, कामकाजी और दूसरी महिलाओं के साथ बलात्कार जैसी घृणित घटनाएं हो रही हैं। ऐसी दंरिदगी को जड़ से खत्म करने के लिए आगे आना होगा। जब हमारी बहन हमारे हाथ की कलाई पर पवित्र रक्षासूत्र बांध कर रक्षा का संकल्प लेती है तो उसी दौरान हमें पूरे भारत की बेटियों के रक्षा का संकल्प लेना चाहिए। भारत का हर भाई अगर इस स्वाधीनता दिवस पर यह प्रण कर ले तो देश और समाज से इस कलंक का खात्मा हो जाएगा। यह तभी संभव है होगा जब हमारी युवापीढ़ी आगे आए। देश की दूसरी सबसे बड़ी समस्या पर्यावरण संकट है। अगर हर देशवासी यह संकल्प रखे कि आज से हम गंदगी नही फैलाएंगे। हरे पेड़ों की कटान नहीं होगी। जल की बर्बादी पर रोक लाएंगे। फिर तो एक स्वच्छ भारत का निर्माण होगा।
इसी तरह हम बेगारी की समस्या पर भी हद तक काबू पाया सकते हैं। अपने स्तर से अगर कोई व्यक्ति, संस्था, कंपनी युवाओं को रोजगार मुहैया कराने में सक्षम है तो उसे यह जिम्मेदारी राष्टीय दायित्व के रुप में निभानी चाहिए। भ्रष्टाचार न करने , एक दूसरी की पीड़ा में सहयोग करने का संकल्प लेकर भी हम एक अच्छे समाज का निर्माण कर सकते हैं। हमें अपने सैनिकों का बेहद सम्मान करना चाहिए। बहनों को सैनिक भाईयों को काफी तादात में राखियां भेज कर उनके हौसले बढ़ाने चाहिए। क्योंकि जब हम रात में बेखौफ होकर सोते हैं तो हमारे जमवान हमारी सीमा की सुरक्षा में लगे रहते हैं। इस तरह के संकल्प से समाज को चुटकी बजाते बदला जा सकता है। उसके लिए किसी पैसे की या बजट की आश्यकता नहीं है। बस हर देशवासी को अपनी सोच बदलनी होगी। हम राजनेता हों या अफसर, डाक्टर, पत्रकार, अधिवक्ता, कंपनी मालिक हों या संस्थान संचालक, छात्र, शिक्षक, महिलाएं, युवा, किसान या फिर आम या खास। सब मिल कर यह परिवर्तन ला सकते हैं। एक व्यक्ति देश को नहीं बदल सकता। देश का हर नागरिक इस रक्षाबंधन पर राष्टीय भावना के प्रति समर्पित कर ले तो सारी समस्याओं का समाधान निकल आएगा। लेकिन उसके लिए ईमानदार कोशिश करनी पड़ेगी। सिर्फ मंचीय भाषण से कोई सुधार नहीं होना वाला है।
भारत में जब-जब आसुरी शक्तियों का प्रभाव बढ़ा उस दौरान रक्षाबंधन जैसे पवित्र त्यौहार से हमने उस पर विजय पायी। धार्मिक मान्यता के अनुसार जब राजाबलि देवराज इंद्र का सिंहासन यज्ञ के प्रभाव से लेना चाहा तो इंद्राणी ने एक रक्षासूत्र गुरु बृहस्पति के जरिए इंद्र के हाथों बांध दिया। जिसकी वजह से इंद्र की राजाबलि से रक्षा हुई और उसका इंद्रलोक सुरक्षित बच गया। गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने बंग-भंग आंदोलन में रक्षाबंधन पर्व को सामाजिक और राजनैतिक रुप देकर अंग्रेजों के बंगाल विभाजन नीति का विरोध किया था। पवित्र अमरनाथ यात्रा गुरुपूर्णिमा को प्रारंभ होकर इसी दिन खत्म होती है। इसी दिन शिवलिंग अपने संपूर्ण आकार में आता है। उत्तराखंड में इसी दिन ब्राहमणों का उपनयन संस्कार होता है। महाराष्ट में इसे नारियल पूर्णिमां, राजस्थान में चूड़ाराखी बांधने की प्रथा कहते है। उड़ीसा, तमिलनाडू में इसे अवनि अवित्तम कहा जाता है। यूपी के ब्रज में हरियाली तीज के नाम से जाना जाता है। यह पर्व भगवान कृष्ण और द्रौपदी से भी जुड़ा हैं। कहा जाता है जब भगवान ने शिशुपाल का बध किया था तो चक्रसुदर्शन से उनकी अंगुली कट गयी थी। रक्त की धार को बंद करने के लिए द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़ कर बांधा था। मान्यता है जब कौरव सभा में द्रौपदी का चीरहरण किया तो भगवान कृष्ण साड़ियों की लाट लगा दिए थे। इतिहास में भी कई उदाहरण मिलते हैं। रक्षाबंधन के दिन लोग प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भी रक्षासूत्र बांधते हैं। ब्रहमण भी एक दूसरे को रक्षासूत्र बांधते हैं। इस दौरान डाक विभाग राखी भेजने के लिए अपनी सेवा में विशेष सुविधा देता है। यूपी की योगी सरकार ने सरकारी बसों में बहनों के लिए यात्रा छूट दिया है। आइए एक नए उमंग, उत्साह के साथ स्वाधीनता दिवस के साथ रक्षाबंधन पर्व मनाएं। देश की खुशहाली, संवृ़िद्ध और उन्नति के लिए सब मिल कर काम करें। जयहिंद!! जय भारत!! वंदेमातरम्!!!

हम जंग न होने देंगे, विश्व शांति के हम साधक हैं, जंग न होने देंगे
प्रदीप कुमार सिंह
(16 अगस्त अटलजी की पुण्य तिथि पर विशेष ) मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूं? – विश्वात्मा अटल जी ‘विश्व शांति के हम साधक हैं जंग न होने देंगे, युद्धविहीन विश्व का सपना भंग न होने देंगे। हम जंग न होने देंगे..’ इस युगानुकूल गीत द्वारा महान युग तथा भविष्य दृष्टा कवि अटल जी ने सारी मानव जाति को सन्देश दिया था कि विश्व को युद्धों से नहीं वरन् विश्व शांति के विचारों से चलाने में ही मानवता की भलाई है। इस विश्वात्मा के लिए हृदय से बरबस यह वाक्य निकलता है – जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि। विश्व शान्ति के महान विचार के अनुरूप अपना सारा जीवन विश्व मानवता के कल्याण के लिए समर्पित करने वाले वह अत्यन्त ही सरल, विनोदप्रिय एवं मिलनसार व्यक्ति थे। सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी एक कुशल राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक अच्छे वक्ता भी थे।
भले ही 16 अगस्त 2018 में अटल जी इस नाशवान तथा स्थूल देह को छोड़कर विश्वात्मा बनकर परमात्मा में विलीन हो गये। लेकिन उनकी ओजस्वी वाणी तथा महान व्यक्तित्व भारतवासियों सहित विश्ववासियों को युगों-युगों तक सत्य के मार्ग पर एक अटल खोजी की तरह चलते रहो, चलते रहो की निरन्तर प्रेरणा देता रहेगा। चाहे एक विपक्षी नेता की भूमिका हो या चाहे प्रधानमंत्री की भूमिका हो दोनों ही भूमिकाओं में उन्होंने भारतीय राजनीति को परम सर्वोच्चता पर स्थापित किया। संसार में बिरले ही राजनेता ऐसी मिसाल प्रस्तुत कर पाते हैं। जीवन भर अविवाहित रहकर मानवता की सेवा ही उनका एकमात्र ध्येय तथा धर्म था।
अटल जी पूर्व प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई की सरकार में 1977 से 1979 तक विदेश मंत्री रहे। इस दौरान वर्ष 1977 में संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने अत्यन्त ही विश्वव्यापी दृष्टिकोण से ओतप्रोत भाषण दिया था। अटल जी ही पहले विदेश मंत्री थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण देकर भारत को गौरवान्वित किया था। इस भाषण कुछ अंश इस प्रकार थे – अध्यक्ष महोदय, भारत की वसुधैव कुटुम्बकम् की परिकल्पना बहुत पुरानी है। हमारा इस धारणा में विश्वास रहा है कि सारा संसार एक परिवार है। … मैं भारत की ओर से इस महासभा को आश्वासन देना चाहता हूं कि हम एक विश्व के आदर्शों की प्राप्ति और मानव कल्याण तथा उसके गौरव के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे नहीं रहेंगे। अटल जी ने अपने भाषण की समाप्ति ‘‘जय जगत’’ के जयघोष से की थी। इस विश्वात्मा ने ‘‘जय जगत’’ से अपने भाषण की समाप्ति करके दुनिया को सुखद अहसास कराया कि भारत चाहता है, किसी एक देश की नहीं वरन् सारे विश्व की जीत हो। दुनिया को अटल जी के अंदर भारत की विश्वात्मा के दर्शन हुए थे।
अटल जी के इस भाषण में भी उनके विश्व शांति का साधक होने का पता चलता हैं। संयुक्त राष्ट्र में अटल बिहारी वाजपेयी का हिंदी में दिया भाषण उस वक्त काफी लोकप्रिय हुआ था। यह पहला मौका था जब संयुक्त राष्ट्र जैसे शान्ति के सबसे बड़े अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की ‘विश्व गुरू’ की गरिमा का बोध सारे विश्व को हुआ था। संयुक्त राष्ट्र में उस समय उपस्थित विश्व के 193 सदस्य देशों के प्रतिनिधियों को इतना पसंद आया कि उन्होंने देर तक खड़े होकर भारत की महान संस्कृति के सम्मान में जोरदार तालियां बजाकर अपनी हार्दिक प्रसन्नता प्रकट की थी। इस विहंगम तथा मनोहारी दृश्य ने महात्मा गांधी के इस विचार की सच्चाई को महसूस कराया था कि एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा जब दिशा से भटकी मानव जाति सही मार्गदर्शन के लिए भारत की ओर रूख करेगी।
ब्रिटिश शासकों ने जोर-जबरदस्ती से विश्व के 54 देशों में अपने उपनिवेशवाद का विस्तार किया था। मेरे विचार से आधुनिक लोकतंत्र का विचार उसी काल में अस्तित्व में आया तथा विकसित हुआ था। अटल जी लोकतंत्र के प्रहरी थे जब कभी लोकतंत्र की मर्यादा पर आँच आई तो अटल जी ने उसका डटकर मुकाबला किया। इसके साथ ही उन्होंने कभी भी राजनीतिक और व्यक्तिगत संबंधों को मिलाया नहीं। 21वीं सदी में इस विश्वात्मा के दिखाये मार्ग में आगे बढ़ते हुए हमें लोकतंत्र को देश की सीमाओं से निकालकर वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था (विश्व संसद) का स्वरूप प्रदान करना चाहिए। लोकतंत्र की स्थापना मानवता की रक्षा के लिए ही की गयी थी। अतः राज्य, देश तथा विश्व से मानवता सबसे ऊपर है।
यूरोप के 27 देश जो कभी आपस में युद्धांे की विभीषका में बुरी तरह से फंसे थे। उन्होंने लोकतंत्र को देश की सीमाओं से निकालकर लोकतांत्रिक यूरोपिन यूनियन की स्थापना कर ली है। इसके अन्तर्गत इन देशों ने मिलकर अपनी एक यूरोपियन संसद, नियम-कानून, यूरो मुद्रा, वीजा से मुक्ति आदि कल्याणकारी कदम उठाकर अपने-अपने देश के नागरिकों को आजादी, समृद्धि तथा सुरक्षा का वास्तविक अनुभव कराया है। साथ ही दकियानुसी विचारकों की इस शंका को झूठा साबित कर दिया कि यूरोप के 27 देशों में आने-जाने के लिए वीजा से मुक्ति देने से यूरोप के अधिकांश लोग लंदन तथा पेरिस जैसे विकसित महानगरों की ओर भागेगे जिससे भारी अराजकता तथा अफरा-तफरी मच जायेगी।
अटल जी सर्वाधिक नौ बार सांसद चुने गए थे। वे सबसे लम्बे समय तक सांसद रहे थे और श्री जवाहरलाल नेहरू व श्रीमती इंदिरा गांधी के बाद सबसे लम्बे समय तक गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी। अटल जी विश्व शांति के पुजारी के रूप में भी जाने जाते हैं। उनके द्वारा सारी दुनिया में शांति की स्थापना हेतु कई कदम उठाये गये। अत्यन्त ही सरल स्वभाव वाले अटल जी को 17 अगस्त 1994 को वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित किया गया। उस अवसर पर अटल जी ने अपने भाषण में कहा था कि ‘‘मैं आप सबको हृदय से धन्यवाद देता हूं। मैं प्रयत्न करूगा कि इस सम्मान के लायक अपने आचरण को बनाये रख सकूं। जब कभी मेरे पैर डगमगायें तब ये सम्मान मुझे चेतावनी देता रहे कि इस रास्ते पर डांवाडोल होने की गलती नहीं कर सकते।’’
25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जन्में अटल जी ने राजनीति में अपना पहला कदम 1942 में रखा था जब ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के दौरान उन्हें व उनके बड़े भाई प्रेम जी को 23 दिन के लिए गिरफ्तार किया गया था। अटल जी के नेतृत्व क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह एनडीए सरकार के पहले ऐसे गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे जिन्होंने बिना किसी समस्या के 5 साल तक प्रधानमंत्री पद का दायित्व बहुत ही कुशलता के साथ निभाया।
उनकी प्रसिद्ध कविताओं की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं – ‘बाधाएँ आती हैं आएँ, घिरें प्रलय की घोर घटाएँ, पावों के नीचे अंगारे, सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ, निज हाथों में हँसते-हँसते, आग लगाकर जलना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा।’, हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं गीत नया गाता हूं, मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?, ‘हे प्रभु! मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना, गैरों को गले न लगा सकूँ, इतनी रूखाई कभी मत देना’ से उनकी अटूट संकल्प शक्ति तथा मानवीय उच्च मूल्यों का पता चलता है।
अटल जी सदैव दल से ऊपर उठकर देशहित के बारे में सोचते, लिखते और बोलते थे। उनकी व्यक्तित्व इस प्रकार का था कि उनकी एक आवाज पर सभी देशवासी एक जुट होकर देशहित के लिये कार्य करने के लिये सदैव उत्साहित रहते थे। उनके भाषण किसी चुम्बक के समान होते थे, जिसको सुनने के लिये लोगों का हुजूम बरबस ही उनकी तरफ खिंचा आता था। विरोधी पक्ष भी अटल जी के धारा प्रवाह और तेजस्वी भाषण का कायल रहा है। अटल जी के भाषण, शालीनता और शब्दों की गरिमा का अद्भुत मिश्रण था।
अटल व्यक्तित्व वाले हमारे पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल जी हमेशा अपने देशवासियों के साथ ही सारे विश्व के लोगों के हृदय एवं उनकी यादों में सदैव अमर रहेंगे। हमारा मानना है कि अपने जीवन द्वारा सारे विश्व में अटल जी एक कुशल राजनीतिज्ञ व श्रेष्ठ वक्ता के साथ ही विश्व मानवता के सबसे बड़े पुजारी के रूप में अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे हैं। अपने देश की भाषा, अपने देश की ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की महान संस्कृति पर गर्व करने वाले विश्व शांति के साधक माननीय अटल जी के प्रति हम अपनी हार्दिक श्रद्धा एवं सुमन उनकी प्रिय कविता ‘‘विश्व शांति के हम साधक हैं, जंग न होने देंगे’’ के द्वारा सादर अर्पित करते हैं:-
हम जंग न होने देंगे! विश्व शांति के हम साधक हैं, जंग न होने देंगे! कभी न खेतों में फिर खूनी खाद फलेगी, खलिहानों में नहीं मौत की फसल खिलेगी, आसमान फिर कभी न अंगारे उगलेगा, एटम से नागासाकी फिर नहीं जलेगी, युद्धविहीन विश्व का सपना भंग न होने देंगे। जंग न होने देंगे। हथियारों के ढेरों पर जिनका है डेरा, मुँह में शांति, बगल में बम, धोखे का फेरा, कफन बेचने वालों से कह दो चिल्लाकर, दुनिया जान गई है उनका असली चेहरा, कामयाब हो उनकी चालें, ढंग न होने देंगे। जंग न होने देंगे।
हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी, हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी, हमने छेड़ी जंग भूख से, बीमारी से, आगे आकर हाथ बटाए दुनिया सारी। हरी-भरी धरती को खूनी रंग न लेने देंगे, जंग न होने देंगे। भारत-पाकिस्तान पड़ोसी, साथ-साथ रहना है, प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है, तीन बार लड़ चुके लड़ाई, कितना महँगा सौदा, रूसी बम हो या अमेरिकी, खून एक बहना है। जो हम पर गुजरी, बच्चों के संग न होने देंगे। जंग न होने देंगे।
वर्तमान में विश्व की दयनीय सच्चाई यह है कि विश्व न्यायालय के तराजू के एक पलड़े में सुरक्षा के नाम पर देशों द्वारा बनाये गये हजारों की संख्या में घातक तथा मानव संहारक परमाणु बमों का भारी जखीरा रखा है तो दूसरे पलड़े में विश्व भर के ढाई अरब बच्चों को सुरक्षित भविष्य है। मानव जाति को तय करना है कि आखिर हमारे शक्तिशाली देशों के माननीय राष्ट्राध्यक्ष विश्व को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? क्या उन्हें मानव सम्यता की यात्रा की अगली मंजिल ठीक-ठीक पता है? इस महाप्रश्न को संसार के प्रत्येक जागरूक नागरिक को समय रहते मानवीय ढंग से बहुत सोच समझकर हल करना है! एक भारतीय तथा विश्व नागरिक होने के नाते मेरे विचार से मानव जाति की अन्तिम आशा विश्व संसद तथा उसके प्रभावशाली विश्व न्यायालय के गठन पर टिकी है। किसी महापुरूष ने कहा है कि अभी नहीं तो फिर कभी नहीं!

नए कश्मीर का सूत्रपात
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
दिल्ली के नेताओं और अफसरों को आशंका थी कि ईद के दिन कश्मीर में घमासान मचेगा। यह आशंका 14 और 15 अगस्त के लिए भी बनी हुई है लेकिन यह लेख लिखे जाने तक कश्मीर से कोई भी अप्रिय खबर नहीं आई है। मैं प्रायः टेलिविजन नहीं देख पाता हूं लेकिन आज घनघोर व्यस्तता के बावजूद दिन में चार-छह बार उसे देखा, क्योंकि मुझे भी शंका थी कि कश्मीर में कुछ भी हो सकता है, हालांकि तीन दिन पहले मैंने लिखा था कि हमारे कश्मीरी भाई-बहनों को यह ईद एतिहासिक शैली में मनानी चाहिए, क्योंकि 5 अगस्त को उनकी फर्जी हैसियत खत्म हुई है और अन्य भारतीयों की तरह उन्हें सच्ची आजादी मिली है। कश्मीर के आम लोग तो बहुत शालीन, सुसंस्कृत और शांतिप्रिय हैं लेकिन नेताओं और गुमराह आतंकियों की मजबूरी है कि वे लोगों को उकसाते हैं और हिंसा भड़काते हैं। लेकिन कितना गजब हुआ है कि आज पूरा कश्मीर खोल दिया गया है, हजारों लोग मस्जिदों में जाकर नमाज़ पढ़ रहे हैं और बाजारों में खरीदी कर रहे हैं किंतु कहीं से कोई तोड़-फोड़ या मार-पीट की खबर नहीं आई है। हो सकता है कि ऐसा प्रेस, फोन, टेलिविजन आदि पर लगे प्रतिबंधों के कारण हो रहा है। विदेशी अखबार और रेडियो कुछ बता जरुर रहे हैं लेकिन यदि कोई बड़ी घटना घटी होती तो भारत सरकार के लिए उसे छिपाना मुश्किल था। फोन तो कुछ घंटों के लिए चालू थे ही। तो इस शांति और व्यवस्था का अर्थ क्या हम यह लगाएं कि कश्मीर की जनता ने धारा 370 और 35 ए के खात्मे को पचा लिया है ? उसने उसका बुरा नहीं माना है ? यदि ऐसा होता तो सारे नेताओं को भी छोड़ दिया जाता लेकिन सरकार के विरोधियों को भी मानना पड़ेगा कि ईद के मौके पर कश्मीरियों के लिए केंद्र सरकार और राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने जैसी प्रचुर सुविधाएं जुटाई हैं, उन्होंने कश्मीरियों के दिलों में सदभावना जरुर पैदा की होगी। जो भी हो, अभी 14 अगस्त और 15 अगस्त को भी आना है। एक पाकिस्तान-दिवस और दूसरा भारत-दिवस है। यदि इन दोनों दिनों में कोई दुर्घटना नहीं होती है तो माना जा सकता है कि कश्मीर में एक नए युग का सूत्रपात हो गया है।

बाढ़ प्राकृतिक आपदा नहीं हमारी देन
सनत कुमार जैन
देश के कई राज्यों में इन दिनों बाढ़ के हालात हैं। पूर्वोत्तर राज्यों सहित बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों के कई इलाके बाढ़ के पानी से लबालब हैं। कहीं बांध या तटबंध टूट कर बाढ़ से होती तबाही को विकराल रूप दे रहे हैं। अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और हजारों लोग बेघर हैं। माना कि प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह नहीं रोका जा सकता, किंतु उच्च स्तर की तकनीक और बेहतर प्रयासों से उसके प्रभावों को न्यूनतम अवश्य किया जा सकता है। इस साल कई महीने पहले ही सामान्य मानसून के साथ ही बाढ़ की आशंका भी व्यक्त की गई थी, लेकिन बाढ़ की आशंका वाले राज्यों में वहां की सरकारों ने इस आपदा से निपटने के लिए ऐसी तैयारियां नहीं की, जिनसे लोगों को उफनती नदियों के प्रकोप से काफी हद तक बचाया जा सकता था।
चिंता की बात है कि विश्वभर में बाढ़ के कारण होने वाली मौतों का पांचवां हिस्सा भारत में ही होता है और बाढ़ की वजह से हर साल देश को हजारों करोड़ का नुकसान होता है। बाढ़ जैसी आपदाओं के चलते जान-माल के नुकसान के साथ-साथ लाखों हेक्टेयर क्षेत्र में फसलों के बर्बाद होने से देश की अर्थव्यवस्था पर इतना बुरा प्रभाव पड़ता है कि उस राज्य का विकास सालों पीछे चला जाता है। पंजाब में पिछले दिनों घग्गर नदी पर बना बांध टूट जाने से करीब दो हजार एकड़ कृषि भूमि जलमग्न हो गई। बिहार के दरभंगा और मधुबनी में भी कमला बलान बांध कई जगहों से टूट गया व बड़े हिस्से को अपनी जद में ले लिया। सरकारी तंत्र द्वारा हर साल बाढ़ जैसे हालात पैदा होने के बाद बांधों या तटबंधों की कामचलाऊ मरम्मत कर उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है और अगले साल फिर बाढ़ का तांडव सामने आने पर प्राकृतिक आपदा की संज्ञा देने की कोशिशें हो जाती हैं।
हालात इतने खराब हो चुके हैं कि जब भी औसत से ज्यादा बारिश हो जाती है तो बाढ़ आ जाती है। दरअसल हम अभी तक वर्षा जल संचयन के लिए कोई कारगर योजना नहीं बना सके हैं। हम समझना ही नहीं चाहते कि सूखा और बाढ़ जैसी आपदाएं पूरी तरह एक-दूसरे से ही जुड़ी हैं और इनका स्थायी समाधान जल प्रबंधन की कारगर योजनाएं बना कर और उन पर ईमानदारीपूर्वक काम करके ही संभव है।
महाराष्ट्र हो या असम अथवा देश के अन्य राज्य, हर साल जब भी किसी राज्य में बाढ़ जैसी कोई आपदा एक साथ करोड़ों लोगों के जनजीवन को प्रभावित करती है तो केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री, मुख्यमंत्री बाढग़्रस्त क्षेत्रों के हवाई दौरे करते हैं और सरकारों द्वरा बाढ़ पीडि़तों के लिए राहत राशि देने की घोषणाएं की जाती हैं। लेकिन जैसे ही बाढ़ का पानी उतरता है, सरकारी तंत्र बाढ़ के कहर को बड़ी आसानी से भुला देता है। पिछले 50 सालों में बाढ़ पर ही सरकारों ने 170 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा धनराशि खर्च कर डाली। लेकिन इतना कुछ होने के बाद भी अगर हालात सुधरने के बजाय साल दर साल बदतर होते जा रहे हैं तो समझा जा सकता है कि कमी आखिर कहां है! सीधा-सा अर्थ है कि बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम को संचालित करने वाले लोग अपना काम जिम्मेदारी, ईमानदारी और मुस्तैदी के साथ नहीं कर रहे थे।
बहरहाल, यदि हम चाहते हैं कि देश में हर साल ऐसी आपदाएं भारी तबाही न मचाएं तो हमें कुपित प्रकृति को शांत करने के सकारात्मक उपाय करने होंगे और इसके लिए प्रकृति के विभिन्न रूपों जंगल, पहाड़, वृक्ष, नदी और झीलों इत्यादि की महत्ता समझनी होगी। वरना हमारी लापरवाही की भेंट चढ़कर प्रकृति नष्ट हो जाएगी। बाढ़ की विभीषिका हमारी लापरवाही की देन है। अंधाधुंध विकास के नाम पर हम प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ कर रहे हैं, वही बदले में पा भी रहे हैं, मगर चेत एक बार भी नहीं रहे।

बायोडीजल को बढ़ावा देना सही फैसला
सिद्धार्थ शंकर
सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने एक योजना की शुरुआत की जिसके तहत वे 100 शहरों में इस्तेमाल हो चुके खाने के तेल से बायोडीजल प्राप्त करेंगी। कंपनियां इसके लिए प्राइवेट कंपनियों से समझौता करेंगी, जो बायोडीजल बनाने के लिए प्लांट लगाएंगी। शुरुआत में तेल कंपनियां बायोडीजल 51 रुपए प्रति लीटर लेंगी और दूसरे साल इसकी कीमत ५२.७ रुपए लीटर होगी और तीसरे साल इसकी कीमत बढक़र ५४.५ रुपए प्रति लीटर हो जाएगी। भारत में हर साल २,७०० करोड़ लीटर कुकिंग ऑयल का इस्तेमाल होता है, जिसमें से १४० करोड़ का होटल्स, रेस्त्रां और कैंटीन से एकत्र किया जा सकता है। इनसे हर साल करीब ११० करोड़ लीटर बायोडीजल बनाया जाएगा।
बायोडीजल पारंपरिक या जीवाश्म डीजल के मुकाबले एक वैकल्पिक ईंधन है। इसे सीधे तौर पर वनस्पति तेल, पशुओं के वसा, तेल और खाना पकाने के अपशिष्ट तेल से बनाया जाता है। इन तेलों को बायोडीजल में परिवर्तित करने के लिए प्रयक्त प्रक्रिया को ट्रान्स-इस्टरीकरण कहा जाता है। बायोडीजल जैविक स्त्रोतों से प्राप्त डीजल के जैसा ही गैर-परंपरागत ईंधन होता है। इसका नवीनीकरण ऊर्जा स्त्रोतों से बनाया जाता है। यह परंपरागत ईंधनों का एक स्वच्छ विकल्प है। इसमें कम मात्रा में पेट्रेलियम पदार्थ मिलाया जाता है और विभिन्न प्रकार की गाडि़य़ों में प्रयोग किया जाता है। सबसे खास बात यह कि ये विषैला नहीं होता है और इसी के साथ ही बायोडिग्रेडेबल भी होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये भविष्य का ईंधन है। इस प्रक्रिया में वनस्पति तेल या वसा से ग्लीसरीन को निकालना होता है। इसके बाद इसमें मेथिल इस्टर और ग्लीसलीन आदि सह-उत्पाद भी मिलाए जाते हैं। बायोडीजल में हानिकारक तत्व सल्फर और आरोमैटिक्स नहीं मिलाए जाते हैं जैसा कि परम्परागत ईंधनों में होता है। बायोडीजल को बनाने के लिए जरूरी चीजें जेट्रोफा तेल, मेथेनोल, सोडियम हाइड्रोक्साइड होती हैं।
बायोडीजल भारत के लिए इस लिहाज से भी हम है क्योंकि भारत में पेट्रोलियम जरूरतों का केवल २० फीसदी हिस्सा ही पैदा होता है। बाकी का पेट्रोलियम विदेशों से आयात किया जाता है। जिस रफ्तार से हमारे देश में पेट्रोलियम पदार्थों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, उस रफ्तार से देश में तेल का भंडार अगले ४० से ५० सालों में खत्म हो जाएगा।
इसलिए भविष्य में जैविक ईंधन के स्थान पर जैविक ईंधन का विकास करना जरूरी है। इस जरूरत को जैट्रोफा नाम का पौधा खत्म कर सकता है। ये पौधा देश के विभिन्न भागों में बहुतायत में उगने लगा है। इसके कई अन्य नामों से भी जाना जाता है, जैसे ट्रोफा मिथाईल ईस्टर, रतनजोत, बायोडीजल, बायोफ्यूल जैव ईंधन, जैव डीजल, जैट्रोफा करकास। ये पौधा कई सालों तक फल देता है। इसके बीज में लगभग ४० फीसदी तेल होता है। इससे डीजल बनाने के लिए वास्तविक डीजल में लगभग १८ फीसदी जैट्रोफा के बाजों से प्राप्त तेल को मिलाकर बायोडीजल बनाया जाता है। इस प्रकार बने बायोडीजल को डीजल चलित किसी भी इंजन जैसे ट्रक, बस, ट्रैक्टर, जेनरेटर आदि में इस्तेमाल किया जा सकता है। जैट्रोफा का पौधा एक बार उगने के बाद ८ से १० सालों तक लगातार बीज देती रहता है।
आज सडक़ों पर दिखाई देने वाली गाडिय़ों से लेकर बिजली के अभाव में प्रयुक्त जनरेटर तक के इंजन में ईंधन के रूप में ९५ प्रतिशत जीवाश्मश्म ईंधन अर्थात पेट्रोलियम-डीजल का उपयोग होता है। यह ईंधन नवीकरणीय न होने के कारण अपर्याप्त, बल्कि भविष्य में प्राप्त भी नहीं होगा। दूसरी ओर इसके प्रयोग से निकलने वाले धुएं में कई ऐसे कारक हैं, जो जैव-पारिस्थितिकी के संतुलन को बिगाडऩे में अहम भूमिका निभाते हैं। डीजल इंजन के उपयोग हेतु डीजल का प्रतिस्थापन के रूप में सामने आ चुका है, बायोडीजल।
भारत सरकार द्वारा जैव ईंधन पर एक नई परिवर्धित राष्ट्रीय नीति लाने की कोशिश हो रही है। तत्कालीन सरकार के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा ११ सितम्बर, २००८ को मंजूरी दी गई थी। इस राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के अनुसार, २०१७ से जैव ईंधन के रूप में २० प्रतिशत मिश्रण के लिए बायोइथेनॉल और बायोडीजल प्रस्तावित किया गया था। इसमें घोषित नीति के तहत देश में उपजाऊ भूमि में पौधरोपण को प्रोत्साहन देने की बजाय सामुदायिक, सरकारी, जंगली बंजर भूमि पर जैव ईंधन से सम्बन्धित पौधरोपण को बढ़ावा दिया जाएगा तथा व्यर्थ, डिग्रेडेड एवं सीमान्त भूमि में होने वाले अखाद्य तेल बीजों से बायोडीजल का उत्पादन किया जाएगा।
वर्ष २०११ में अमेरिकन खनन सुरक्षा एवं स्वास्थ्य प्रशासन विभाग के एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि बायोडीजल मिश्रित डीजल के उपयोग से भूमिगत जेनसेट में पार्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है। जिसका सकारात्मक प्रभाव श्रमिकों के स्वास्थ्य पर दिखाई दिया। बायोडीजल के उपयोग से इंजन संचालन भी परिवर्धित होती है। इससे इंजन रख-रखाव पर आने वाले खर्चे को कम किया जा सकता है। इंजन की आयु में बढ़ोतरी होती है। पर्यावरण पर भी बायोडीजल का सकारात्मक प्रभाव सिद्ध किया जा चुका है। इस तरह बायोडीजल भविष्य का एक महत्वपूर्ण ईंधन विकल्प के रूप में स्वयं को स्थापित कर रहा है।

क्या इसी आधार पर राम मंदिर निर्माण संभव हैं ?
डॉ. अरविन्द प्रेमचंद जैन
जम्मू कश्मीर से 370 धारा को हटाने का कार्य बहुत स्तुत्य और सराहनीय हैं। पंडित नेहरू की बहुत बड़ी गलतियों को सुधारने का मौका मिला, सरकार, मोदी जी, अमित शाह और उनकी टीम का बहुत साहसिक कदम हैं। इस कदम को उठाने का साहस कोई सामान्य कार्य नहीं था। इसके दूरगामी प्रभाव को भी दृष्टिगत रखकर यह कदम उठाया जिसके लिए बधाई के पात्र हैं। यह दृढ इच्छाशक्ति का प्रतीक और उससे से अधिक संसद में बहुमत का होना।
हर निर्णय को दो पक्ष होते हैं और आप जब कठोर कदम उठाते हैं तो जो प्रभावित होते हैं उनकी असहमति होना लाज़िमी हैं। पर कुछ को खुश करने के लिए जनमत की उपेक्षा नहीं की जाती हैं। जब कोई कार्य जान हित में लिया जाता हैं तब कुछ विरोध का होना जरूरी हैं। आप सब को खुश नहीं कर सकते हो।। यह बहुत पुराना असाध्य रोग था। जब चिकित्सा असफल होती हैं तब शल्य क्रिया जरुरी होती हैं।
हर सिक्के को दो पहलु होते हैं। समस्या आज से ७० वर्ष जिन परिस्थियों में की गयी थी उनका पोस्ट मोर्टेम बहुत हुआ पर होता यह हैं की जिस समय जो स्थितियां थी उसके अनुरूप निर्णय लिया गया होगा और तत्कालीन स्थितियों में भी निर्णय होते हैं वे उस समय की परिस्थिति के अनुकूल होते हैं। और जो काम करता हैं उसकी ही आलोचना होती हैं जो कोई काम नहीं करेगा उसकी भी आलोचना होती हैं।
सादगी नौजवानी की मौत हैं
कुछ न कुछ इलज़ाम होना चाहिए।
किसी कार्य की सफलता के लिए सात बातें होना जरूरी हैं –द्रव्य क्षेत्र काल भव भाव निमित्त और उपादान। इसके अलावा जो काम जिस समय होना होता हैं वह होकर रहता हैं उसके लिए अनुकूलता मिली, जैसे पूर्ण बहुमत, सेना की मौजूदगी, निर्णय, बहुमत सहयोग और समय की अनुकूलता। दूसरा जिसके भाग्य में श्रेय लिखा रहता हैं उसे मिलता हैं। ये सब अपने अपने पुण्य पाप का ठाठ हैं। इसमें कोई को भी अहम भाव नहीं करना और रखना चाहिए। बहुत बड़ी उपलब्धि हैं
जिस ढंग से यह मामला निपटाया हैं अब इस तरीके से राम मंदिर निर्माण भी होगा। न्यायालय का निर्णय स्पष्ट नहीं होगा, होगा तो उस स्थान के तीन हिस्से होंगे और एक पक्ष अपना हिस्सा नहीं छोड़ेगा और विवाद जाति का हैं उसमे अनेक विघ्न संतोषी बैठे हैं जो निर्माण नहीं होने देंगे, तो उसके लिए एक ही मार्ग हैं वहां पर त्रिस्तरित सुरक्षा कवच रखेंगे यानी पूरा क्षेत्र इस प्रकार की नाका बंदी में रखकर तत्काल निर्माण करेंगे, कारण इस निर्णय से हौसला अफ़ज़ाई हो गया हैं। और समझ लिया हैं की बहुमत के आगे कोई कुछ नहीं कर सकता और मोदी जी और सरकार की दृढ इच्छाशक्ति हैं तो अब कोई अड़चन नहीं होगी।
इसके बाद उत्तर प्रदेश को भी पूर्वांचल बनाना हैं कारण वर्तमान में बहुत बड़ा राज्य होने से उसका रख रखाव सही ढंग से नहीं होने से समस्या होती हैं, हो सकता हैं पश्चिमांचल और पूर्वांचल बनाएंगे जिससे दो मुख्य मंत्री और बन जायेंगे और सत्ता हासिल करने में सुविधा होगी और और कई राज्यपाल बनाकर उपकृत करेंगे।
इसी प्रकार पश्चिम बंगाल को भी बोडो लैंड से विभक्त करके उसके भी दो भाग बना सकते हैं। जिससे उन प्रांतों में शांति के साथ विकास के दरवाज़े खुल जायेंगे और सत्ता काबिज़ होने में सहूलियत होगी।
क्योकि एक प्रयोग सफल होने पर उससे प्रेरित होकर अन्य प्रयोग करने में कोई हानि नहीं हैं। होना भी चाहिए। जिनको अपने भविष्य की चिंता हैं उन्हें अभी समयानुकूल मिला हैं सो मत चूको सुलतान। समय होत बलवान। भविष्य अनिश्चितता का होता हैं। इसीलिए गर्म तवे पर चोट जरूर मारो।।
अभी पुण्य का ठाठ हैं। मिटटी छुओ सोना होता हैं और कभी कभी सोना छुओ मिटटी होने लगता हैं। इसीलिए अभी समय अनुकूल हैं और कम हैं, तो कुछ मुख्य समस्याओं को निपटालो।
तुमको हो सलाम, क्योकि किया तुमने कमाल,
तुमने जो किया उसने बताया तुम्हारा हुनर
हुनर की अपनी अदा रही
जिस पर सब फ़िदा हुए
जो किया अच्छा किया,
जो होगा वह भविष्य के गर्भ में
भविष्य वर्तमान से बनता हैं
और वर्तमान बहुत अस्थायी होता हैं
यानि हम भविष्य में जीने की ललक
पर भविष्य अनिश्चित होता हैं
वर्तमान सुदृढ़ हो।

मध्यप्रदेश और गुजरात के बीच नर्मदा को लेकर फिर शुरू हुआ विवाद
अजित वर्मा
मध्यप्रदेश में भाजपा की सत्ता जाने और कांग्रेस की सत्ता आने के बाद एक बार फिर गुजरात में नर्मदा पर बने सरदार सरोवर बांध को लेकर विवाद की स्थिति बनना शुरू हो गयी है। गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने आरोप लगाया है कि दोनों राज्यों के बीच 40 वर्षों में नर्मदा जल के बंटवारे को लेकर कभी विवाद नहीं हुआ, लेकिन मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार नर्मदा जल की सप्लाई को लेकर गंदी राजनीति कर रही है। वहीं गुजरात के मुख्यमंत्री को मध्यप्रदेश ने नर्मदा का पानी बंद करने की चेतावनी दी है। मध्यप्रदेश सरकार का आरोप है कि उसके द्वारा दिए जा रहे पानी का गुजरात सरकार संग्रह कर रही है। जिसकी वजह से मध्यप्रदेश के कई गांव डूब क्षेत्र में चले जाएंगे।
नर्मदा बांध के पानी को लेकर मध्यप्रदेश और गुजरात सरकार के बीच ठन गई है। जानकारी है कि मध्य प्रदेश सरकार कभी भी नर्मदा का पानी गुजरात को देना बंद कर सकती है। अब तक गुजरात और मध्यप्रदेश समेत केन्द्र में भाजपा की सरकार थी, तब तक सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन अब मध्यप्रदेश में सरकार बदल गई है। मध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार ने गुजरात की भाजपा सरकार के खिलाफ कड़ा रुख अपना लिया है। मध्यप्रदेश सरकार का दावा है कि उसके पास गुजरात का पानी बंद करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। उसका कहना है कि जब गुजरात सरकार करार के मुताबिक काम नहीं कर रही तो उसे पानी क्यों दिया जाए। मध्यप्रदेश सरकार का आरोप है कि बिजली उत्पादन के लिए दिए जाने वाला पानी गुजरात सरकार संग्रह कर रही है। मध्यप्रदेश सरकार का आरोप है कि गुजरात सरकार मध्यप्रदेश के लोगों का हित नहीं चाहती। जानकारी के मुताबिक गुजरात सरकार ने नर्मदा बांध पूरी तरह भरने के लिए मध्यप्रदेश से पानी मांगा था। करीब दो साल पहले दिल्ली में हुई बैठक में मध्यप्रदेश और गुजरात सरकार के बीच नर्मदा बांध को भरने को लेकर सहमति बन गई थी। उस वक्त मध्यप्रदेश और गुजरात में भाजपा की सरकारें थीं। सहमति के मुताबिक मध्यप्रदेश से गुजरात को पानी छोड़ा जाने लगा। लेकिन बांध की क्षमता के मुताबिक उसमें पानी बढ़ने से मध्यप्रदेश के डूब क्षेत्र के गांवों में पानी आने लगा।
दरअसल मध्यप्रदेश और गुजरात के बीच हुए करार के मुताबिक मध्य प्रदेश से मिलने वाले पानी से गुजरात बिजली उत्पादन कर मध्य प्रदेश को देगा। परंतु वर्तमान में गुजरात न तो बिजली उत्पादन कर रहा है और न ही नर्मदा बांध से पानी छोड़ रहा है। मध्य प्रदेश से मिलने वाले पानी का गुजरात संग्रह कर रहा है। जिसकी वजह से मध्य प्रदेश के कई गांव डूब क्षेत्र में आ रहे हैं। इन स्थितियों को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने गुजरात को दिए जाने वाला पानी रोकने का फैसला किया है। गुजरात को यदि लगातार पानी दिया गया तो बांध का जलस्तर बढ़ेगा और उसकी वजह से मध्य प्रदेश के गांव डूब जाएंगे। यह तय है कि अब मध्यप्रदेश और गुजरात के बीच नर्मदा के पानी को लेकर विवाद और बढ़ता जायेगा।

कश्मीर अभी इम्तिहान आगे और भी
डॉ नीलम महेंद्
कश्मीर में “कुछ बड़ा होने वाला है” के सस्पेंस से आखिर पर्दा उठ ही गया। राष्ट्रपति के एक हस्ताक्षर ने उस ऐतिहासिक भूल को सुधार दिया जिसके बहाने पाक सालों से वहां आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने में सफल होता रहा लेकिन यह समझ से परे है कि कश्मीर के राजनैतिक दलों के महबूबा मुफ्ती फ़ारूख़ अब्दुल्ला सरीखे नेता और कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष जो कल तक यह कहता था कि कश्मीर समस्या का हल सैन्य कार्यवाही नहीं है बल्कि राजनैतिक है, वो मोदी सरकार के इस राजनीतक हल को क्यों पचा पा रहे हैं। शायद इसलिए कि मोदी सरकार के इस कदम से कश्मीर में अब इनकी राजनीति की कोई गुंजाइश नहीं बची है। लेकिन क्या यह सब इतना आसान था ? घरेलू मोर्चे पर भले ही मोदी सरकार ने इसके संवैधानिक कानूनी राजनैतिक आंतरिक सुरक्षा और विपक्ष समेत लागभग हर पक्ष को साधकर अपनी कूटनीतिक सफलता का परिचय दिया है लेकिन अभी इम्तिहान आगे और भी है।
क्योंकि पाक की घरेलू राजनीति, उसके चुनाव सब कश्मीर के इर्दगिर्द ही घूमते हैं तो नापाक पाक इतनी आसानी से हार नहीं मानेगा। चूंकि भारत सरकार के इस कदम से अब कश्मीर पर स्थानीय राजनीति का अंत हो चुका है और प्रशासन की बागडोर पूर्ण रूप से केंद्र के पास होगी, पाक के लिए अब करो या मरो की स्थिति उत्पन्न हो गई है। शायद इसलिए उसने अपनी प्रतिक्रिया शुरू कर दी है और वो अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान इस ओर आकर्षित करने भी लगा है। हालांकि वैश्विक पटल पर भारत की मौजूदा स्थिति को देखते हुए इसकी संभावना कम ही है कि भारत के आंतरिक मामलों में कोई भी देश दखल दे और पाकिस्तान का साथ दे। बालाकोट स्ट्राइक पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया इसका प्रमाण है।
इसलिए जो लोग इस समय घाटी में सुरक्षा के लिहाज से केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कदमों जैसे अतिरिक्त सैन्य बल की तैनाती, कर्फ़्यू, धारा 144, क्षेत्रीय दलों के नेताओं की नज़रबंदी को लोकतंत्र की हत्या या तानाशाहपूर्ण रवैया कह रहे हैं उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि पाक की कोशिश होगी कि किसी भी तरह से घाटी में कश्मीरियों के विद्रोह के नाम पर हिंसा की आग सुलगाई जाए ताकि वो अंतर्राष्ट्रीय मोर्च पर यह संदेश दे पाए कि भारत कश्मीरी आवाम की आवाज को दबा कर कश्मीर में अन्याय कर रहा है और मानवाधिकारों के नाम पर यू एन और अंर्तराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसे संस्थानों को दखल देने के लिए बाध्य करे। इसलिए केंद्र सरकार के इन कदमों का विरोध करके ना सिर्फ वो पाकिस्तान की मदद कर रहे हैं बल्कि एक आम कश्मीरी के साथ भी अन्याय कर रहे हैं। क्योंकि विगत 70 सालों ने यह साबित किया है कि धारा 370 वो लौ थी जो कश्मीर के गिने चुने राजनैतिक रसूख़ वाले परिवारों के घरों के चिरागों को तो रोशन कर रही थी लेकिन आम कश्मीरी के घरों को आतंकवाद अशिक्षा और गरीबी की आग से जला रही थी। संविधान की धारा 370 और 35 ए ने कश्मीर में अलगाववाद की आग को कट्टरपंथ और जेहाद के उस दावानल में तब्दील कर दिया था कि पूरा कश्मीर हिंसा की आग से सुलग उठा और बुरहान वाणी जैसा आतंकी वहाँ के युवाओं का आदर्श बन गया । जब 21वीं सदी के भारत के युवा स्किल इंडिया और मेक इन इंडिया के जरिए उद्यमी बनकर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भविष्य के भारत की सफलता के किरदार बनने के लिए तैयार हो रहे थे तो कश्मीर के युवा 500 रूपए के लिए पत्थरबाज बन कर भविष्य के आतंकवादी बनकर तैयार हो रहे थे। जी हाँ सेना के एक सर्वे के हवाले से यह बात सामने आई थी कि आज का पत्थर फेंकने वाला युवक ही कल का आतंकवादी होता है। सरकार के इस कदम का विरोध करने वालों से देश जानना चाहता है कि 370 या 35ए से राज्य के दो चार राजनैतिक परिवारों के अलावा किसी आम कश्मीरी को क्या फायदा मिला? यही कि उनके बच्चों को पढ़ने के लिए अच्छे अवसर नहीं मिले? उन्हें अच्छी चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिलीं? हिंसा के कारण वहाँ का पर्यटन उद्योग पनप नहीं पाया? जो छोटा मोटा व्यापार था वो भी आए दिन के कर्फ़्यू की भेंट चढ़ जाता था? क्या हम एक आम कश्मीरी की तकलीफ का अंदाज़ा गृहमंत्री के राज्यसभा में इस बयान से लगा सकते हैं कि वो एक सीमेंट की बोरी की कीमत देश के किसी अन्य भाग के नागरिक से 100 रूपए ज्यादा चुकाता है सिर्फ इसलिए कि वहाँ केवल कुछ लोगों का रसूख़ चलता है? क्या हम इस बात से इंकार कर सकते हैं कि अब जब सरकार के इस कदम से राज्य में निवेश होगा, उद्योग लगेंगे पर्यटन बढ़ेगा तो रोज़गार के अवसर भी बढ़ेंगे खुशहाली बढ़ेगी इससे वो कश्मीर जो अबतक 370 के नाम पर अनेक राजनैतिक कारणों से अलग थलग किया जाता रहा अब देश की मुख्यधारा से आर्थिक रूप से जुड़ सकेगा। इसके अलावा अपने अलग संविधान और अलग झंडे के अस्तित्व के कारण जो कश्मीरी आवाम आजतक भारत से अपना भावनात्मक लगाव नहीं जोड़ पाई अब भारत के संविधान और तिरंगे को अपना कर उसमें निश्चित रूप से एक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का आगाज़ होगा जो धीरे धीरे उसे भारत के साथ भावनात्मक रूप से भी जोड़ेगा। बस जरूरत है आम कश्मीरी के उस नैरेटिव को बदलने की जो बड़ी चालाकी से सालों से उसे मीठे जहर के रूप में दिया जाता रहा है भारत के खिलाफ भड़का कर जो उसे भारत से जुड़ने नहीं देता। जरूरत है आम कश्मीरी के मन में इस फैसले के पार एक नई खुशहाल सुबह के होने का विश्वास जगाने की, उनका विश्वास जीतने की। कूटनीतिक और राजनैतिक लड़ाई तो मोदी सरकार जीत चुकी है लेकिन उसकी असली चुनौती कश्मीर में सालों से चल रहे इस रणनीतिक युद्ध को जीतने की है।

आदिजन की संस्कृति के प्रति भी सजग रहें
कमल नाथ
विश्व आदिवासी दिवस पर उन सभी जनजातीय बंधुओं को बधाई, जो प्रकृति के करीब रहते हुए प्रकृति की सेवा कर रहे हैं। राज्य सरकार ने आदिजन दिवस पर अवकाश घोषित किया है। हम सब उनका सम्मान करें, जो प्रकृति को हमसे ज्यादा समझते हैं। आदिवासी समाज जंगलों की पूजा करता हैं। उनकी रक्षा करता है। इसी सांस्कृतिक पहचान के साथ समाज में रहते हैं।
वह दिन अब दूर नहीं जब हरियाली और वन संपदा अर्थ-व्यवस्थाओं और देशों की पहचान के सबसे प्रमुख मापदंड होंगे। जिसके पास जितनी ज्यादा हरियाली होगी वह उतना ही अमीर कहलायेगा। उस दिन हम आदिजन के योगदान की कीमत समझ पायेंगे। हम जानते हैं कि बैगा लोग स्वयं को धरतीपुत्र मानते हैं। इसलिए कई वर्षों से वे हल चलाकर खेती नहीं करते थे। उनकी मान्यता थी कि धरती माता को इससे दुख होगा। आधुनिक सुख-सुविधाओं से दूर बिश्नोई समुदाय का वन्य-जीव प्रेम हो या पेड़ों से लिपट कर उन्हें बचाने का उदाहरण हो। जाहिर है कि आदिजन प्रकृति की रक्षक के साथ पृथ्वी पर सबसे पहले बसने वाले लोग हैं। आज हम टंट्या भील, बिरसा मुंडा और गुंडाधुर जैसे उन सभी आदिजन को भी याद करते हैं जिन्होंने विद्रोह करके आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के दांत खटटे कर दिये थे।
हमारी सांस्कृतिक विविधता में अपनी आदिजन की संस्कृति की भी भागीदारी है। आदि संस्कृति प्रकृति पूजा की संस्कृति है। यह खुशी की बात है कि इस साल अंतर्राष्ट्रीय विश्व आदिजन दिवस को आदिजन की भाषा पर केंद्रित किया गया है।
मध्यप्रदेश में हमने निर्णय लिया कि गोंडी बोली में गोंड समाज के बच्चों के लिए प्राथमिक कक्षाओं का पाठ्यक्रम तैयार करेंगे। संस्कृति बचाने के लिए बोलियों और भाषाओं को बचाना जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे आधुनिक ज्ञान और भाषा से दूर रहें। वे अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत भी पढे़ और अपनी बोली को भी बचा कर रखें। अपनी बोली बोलना पिछड़ेपन की निशानी नहीं बल्कि गर्व की बात है।
हमारे प्रदेश में कोल, भील, गोंड, बैगा, भारिया और सहरिया जैसी आदिम जातियाँ रहती हैं। ये पशु पक्षियों, पेड़-पौधों की रक्षा करते हैं। इन्हीं के चित्रों का गोदना बनवाते हैं। गोदना उनकी उप-जातियों, गोत्र की पहचान होती है जिसके कारण वे अपने समाज में जाने जाते हैं। यह चित्र मोर, मछली, जामुन का पेड़ आदि के होते हैं।
जनजातियों के जन्म गीत, शोक गीत, विवाह गीत, नृत्य, संगीत, तीज-त्यौहार, देवी-देवता, पहेलियाँ, कहावतें, कहानियाँ, कला-संस्कृति सब विशेष होते हैं। वे विवेक से भरे पूरे लोग है। आधुनिक शिक्षा से थोड़ा दूर रहने के बावजूद उनके पास प्रकृति का दिया ज्ञान भरपूर है।
मुझसे मिलने वाले कुछ आदिवासी परिवारों ने अपने समाज में आम बोलचाल में आने वाली कहावतों का जिक्र किया। उनके अर्थ इतने गंभीर और दार्शनिक हैं कि आश्चर्य होता है। एक भीली व्यक्ति ने मुझे एक कहावत सुनाई – ‘ऊँट सड़ीने भीख मांगे’। इसका मतलब है कि ऊँट पर चढ़कर भीख मांगने से भीख नहीं मिलती। ऐसे ही एक गोंडी समाज के मुखिया ने एक कहावत बताई कि ‘खाडे खेतो गाभिन गाय, जब जानू जब मूंह मा आये।’ इसका मतलब है कि खेतों का अनाज और गर्भवती गाय का दूध जब तब तक मुंह में नहीं आता तब तक भरोसा नहीं किया जा सकता। भील समाज में भी अक्सर बोला जाता है कि – ‘भील भोला आने सेठा मोटा’। इसका मतलब है कि भील के भोलेपन से ही सेठ मालामाल हुआ। ये सब कहावतें दर्शाती हैं कि आदिजन जीवन की बहुत गहरी समझ रखते हैं।
कई जनजातियों का उल्लेख तो रामायण में मिलता है। जब भगवान श्रीराम चित्रकूट आये वे कोल जनजाति के लोगों से मिले थे। ‘कोल विराट वेश जब सब आए, रचे परन तृण सरन सुहाने।’ अभी हाल में जब मेरे ध्यान में लाया गया कि सतना जिले के कोल बहुल गाँव बटोही में कोल समुदाय के बच्चों के लिए स्कूल नहीं है तो मैंने तत्काल स्कूल बनाने के निर्देश दिए। बटोही गांव में बच्चों के लिए प्राथमिक शाला अच्छी तरह चले, यह हमारी जिम्मेदारी है।
आज गोंडी चित्रकला की न सिर्फ मध्यप्रदेश बल्कि पूरे विश्व में पहचान है। गोंड चित्रकला को जीवित रखने वालों को सरकार पूरी मदद करेगी । यह हमारा कर्त्तव्य है। गोंड और परधान लोग गुदुम बाजा बजाते हैं। हम चाहते हैं कि आदिवासी समुदाय की कला प्रतिभा दुनिया के सामने आए।
शिक्षित नागरिक समाज से यह अपेक्षा है कि यह अहसास रहे कि कुछ दूर जंगल में ऐसे आदिजन भी रहते हैं जो हमारे ही जैसे हैं। वे सबसे पहले धरती पर बसने वाले लोग हैं और जंगलों में ही बसे रह गए।
जब कांग्रेस सरकार ने वनवासी अधिकार अधिनियम बनाया था तो कई संदेह पैदा किए गए थे। आज इसी कानून के कारण वनवासियों को पहचान मिली है। जिन जंगलों में उनके पुरखे रहते थे वहाँ उनका अधिकार है। उन्हें कोई नहीं हटा सकता। हमने उनके अधिकार को कानूनी मान्यता दी है।
आदिवासी संस्कृति में देव स्थानों के महत्व को देखते हुए हमने देव स्थानों के रखरखाव के लिए सहायता देने का निर्णय लिया है। यह संस्कृति को पहचानने की एक छोटी सी पहल है। हमारी सरकार आदिजन की नई पीढ़ी के विकास और उनकी संस्कृति बचाने में मदद देने के लिए वचनबद्ध है।
आदिजन दिवस पर एक बार फिर सभी परिवारों को बधाई। आधुनिक समाज में रहने वाले नागरिकों से अपील करता हूँ कि वे समझें कि हमारे समय में हमारे जैसा ही आदि समाज भी रहता है। यह सब लिखते समय स्वीडिश कवि पावलस उत्सी की कुछ लाइनें बरबस याद हो आती हैं जिनका हिंदी में अर्थ यह है कि –
‘जब तक हमारे पास जल है जिसमें मछलियाँ तैरती है,
जब तक हमारे पास जमीन है जहाँ हिरण चरते हैं,
जब तक हमारे पास जंगल है जहाँ जानवर छुप सकते हैं
हम इस पृथ्वी पर सुरक्षित हैं ।’
अब हमारा कर्त्तव्य है कि अपनी जिम्मेदारी के प्रति सजग रहें।
(ब्लागर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं)

सुषमा-जैसा कोई और नहीं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
बहन सुषमा स्वराज का आकस्मिक महाप्रयाण हृदय विदारक है। वे विलक्षण वक्ता, उदारमना और उत्कृष्ट राजनेता थीं। पिछले 40-45 साल से उनका मेरा भाई-बहन का-सा संबंध था। जब 1998 में प्रधानमंत्री अटलजी ने सांसदों का प्रतिनिधि मंडल पाकिस्तान भेजा था तो उसमें सुषमाजी, मीराकुमार आदि कुछ बहनें भी हमारे साथ थीं। उस समय की विरोधी नेता बेनज़ीर भुट्टो मुझसे मिलने होटल में आईं तो मैंने सुषमाजी का परिचय उनसे कराया और कहा कि ये कुछ दिन पहले तक दिल्ली की वज़ीरे—आला (मुख्यमंत्री) थीं लेकिन किसी दिन आप दोनों देवियां अपने-अपने मुल्क की वजीरे-आज़म (प्रधानमंत्री) बनेंगी। बेनज़ीर उस संक्षिप्त मुलाकात से इतनी खुश हुईं कि जब वे दिल्ली आईं तो उन्होंने मुझे हवाई अड्डे से फोन किया और कहा कि आपकी ‘उस बहन’ से भी मिलना है। मैंने कहा कि आज उनका जन्मदिन है। बेनजीर एक गुलदस्ता लेकर सुषमाजी के घर पहुंचीं। सुषमाजी संघ की स्वयंसेवक नहीं थीं। वे मुझे अक्सर समाजवादी नेता मधु लिमयेजी के घर मिला करती थीं। लगभग 40 साल पहले जब वे देवीलालजी की सरकार में मंत्री बनीं तो वे मुझे एक हिंदी सम्मेलन का मुख्य अतिथि बनाकर गुड़गांव ले गईं। गुड़गांव मैंने पहली बार सुषमाजी की कृपा से ही देखा। एक बार एक बड़े कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करने के लिए मुझे और मेरे बेटे सुपर्ण को वे नारनौल ले गईं। 6-7 साल के सुपर्ण को उन्होंने अपनी गोदी में सुलाए रखा। पूरी रात कवि सम्मेलन चला। उन्होंने अपने धन्यवाद भाषण में हर कवि की कविता की पहली दो पंक्तियां बिल्कुल क्रमवार बिना कागज देखे दोहरा दीं। मैं दंग रह गया। मैंने मन में सोचा कि यह बहन तो अद्वितीय प्रतिभा की धनी है। मैंने सुषमा-जैसा कोई और व्यक्ति आज तक देखा ही नहीं। मेरे अनेक प्रदर्शनों, सभाओं और गोष्ठियों में वे हमेशा बढ़-चढ़कर भाग लेती थीं। उनके साथ के दर्जनों चित्र आज मेरे दफ्तर ने जारी किए हैं। पड़ौसी देशों के कई बड़े नेताओं ने सुषमाजी से हुई सार्थक भेंटों का जिक्र मुझसे कई बार किया है। मेरी पत्नी वेदवतीजी के साथ भी उनके मधुर संबंध थे। उनका स्वभाव इतना अच्छा था कि विरोधी दलों के नेता भी उनका सम्मान करते थे। उन्होंने देश के सूचना मंत्री और विदेश मंत्री के तौर पर कई अनूठे कार्य किए। यदि उनको मौका मिलता तो वे भारत की प्रधानमंत्री के तौर पर महान नेता सिद्ध होतीं। सुषमा स्वराज और शीला दीक्षित, दोनों का लगभग एक साथ जाना भारतीय राजनीति की अपूरणीय क्षति है। दोनों के बारे में कई मार्मिक और अंतरंग संस्मरण कभी और ! अभी तो मेरी इस प्यारी बहन को हार्दिक श्रद्धांजलि!
…/राजेश/3.40/ 8 अगस्त 3019

कश्मीर पर विपक्ष की मसखरी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जम्मू-कश्मीर के सवाल पर कल और आज संसद में विपक्षी नेताओं ने जो तर्क दिए, वे कितने लचर-पचर और बेतुके थे ? इनके हल्केपन का सबसे बड़ा प्रमाण तो यही था कि जब ये तर्क दिए जा रहे थे और तर्क करनेवाले घूंसा तान-तानकर और हाथ-हाथ हिलाकर भाषण झाड़ रहे थे, तब उनकी अपनी पार्टी के लोग भी ताली तक नहीं बजा रहे थे। अपने मुरझाए हुए चेहरों को लेकर वे दाएं-बाएं देख रहे थे। गुलाम नबी आजाद के भाषण के वक्त उनके साथ बैठे कांग्रेसी सांसदों के चेहरे देखने लायक थे। गुलाम नबी ने कहा कि भाजपा सरकार ने भारतमाता के सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हैं। कश्मीर को भारत का मस्तक माना जाता है, यह ठीक है लेकिन लद्दाख को उससे अलग करना उसके टुकड़े-टुकड़े करना कैसे हो गया ? यह ठीक है कि भाजपा नेता धारा 370 और 35 को खत्म करने के पहले कुछ कश्मीरी नेताओं को साथ ले लेते तो बेहतर होता या कुछ कश्मीरी जनमत को प्रभावित कर लेते तो आदर्श स्थिति होती लेकिन क्या यह व्यावहारिक था ? पाकिस्तानी प्रोपेगंडे, पैसे और हथियारों के आगे सीना तानने या मुंह खोलने की हिम्मत किस कश्मीरी नेता में थी ? कांग्रेसी नेताओं का यह तर्क भी बड़ा बोदा है कि भाजपा सरकार ने कश्मीर के साथ बहुत धोखाधड़ी की है। नेहरु के वादे को भंग कर दिया है। ऐसा लगता है कि हमारे कांग्रेसी मित्र सिर्फ विरोध के लिए विरोध कर रहे हैं। क्या अब वे जनमत-संग्रह के लिए तैयार थे ? अपने 50-55 साल के शासन में उन्होंने यह क्यों नहीं करवाया ? सिर्फ 370 और 35ए का ढोंग करते रहे। अब उनके सारे विरोध की तान इसी बात पर टूट रही है कि जम्मू-कश्मीर को केंद्र-प्रशासित क्षेत्र क्यों घोषित किया गया है ? गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया है कि कश्मीर के हालात ठीक रहे तो उसे पूर्ण राज्य का दर्जा भी दिया जा सकता है। कश्मीर के सवाल पर पूरा पाकिस्तान एक आवाज में भारत की निंदा कर रहा है लेकिन भारत को देखिए कि इसी मुद्दे पर हमारा विपक्ष जूतों में दाल बांट रहा है। हमारे विपक्ष ने खुद को मसखरा या जोकर बना लिया है। कांग्रेस-जैसी महान पार्टी ने कश्मीर के पूर्ण विलय का विरोध करके खुद को कब्र में उतार लिया है। यह भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य है। अटलजी ने 1971 में जैसे बांग्लादेश पर इंदिरा गांधी का अभिनंदन किया था, वैसे ही कांग्रेस भी कश्मीर पर मोदी और शाह को शाबाशी दे सकती थी।

अगस्त क्रांति और उसके शहीद
वीरेन्द्र सिंह परिहार
सन् 1942 की अगस्त क्रांति भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है महात्मा गॉधी की ‘करो या मरो‘ की ललकार आम भारतीयों को गहरे तक आंदोलित कर गई। जिसके चलते गुलाम भारत में क्रांतिकारी स्वरूप देखने को मिला।
8 अगस्त सन्् 1942 को मुम्बई में होने वाली कांग्रेस महासमिति का अधिवेशन ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो‘ प्रस्ताव पास करके 10 बजे रात्रि में समाप्त हुआ और 9 अगस्त को सूर्योदय से पहले ही देश के गणमान्य नेतागण बंदी बनाकर जेलों में बंद कर दिए गए। इतना ही नहीं तार, समाचार पत्रों को भी बंद कर दिया गया। देश के भिन्न-भिन्न भागों पर कार्यकर्ता राह चलते या स्टेशनों पर पकड़ लिए गए। बावजूद इसके अपने नेताओं की गिरतारी का समाचार पाते ही आम जन निहत्था होने पर भी मैदान में आ गया। स्थान-स्थान पर रेल की पटरियां उखाड़ दी गई। बिजली के तार काट डाले गए। सरकारी भवनों को गिराने या उस पर कब्जा करने की उपक्रम शुरू हो गया। कुछ क्षेत्रों पर संगठित रूप से लोगों ने प्राणों की बाजी लगा दी। सरकार की ओर से चलने वाले दमन चक्र में कितनी जाने गई, कितने गांव और घर नष्ट हुए, कितने लोगों को जेल भेजा गया- इन सबका पूरा विवरण अप्राप्त है। फिर भी कुछ प्रमुख शहीदों की शहादत इस अवसर पर देखने योग्य है।
पटना सेकेट्रिएट के शहीद- रेडियो द्वारा मुम्बई में हुए अधिवेशन और समिति के निर्णय का समाचार पाकर 11 अगस्त को पटना नगर जयघोष तथा इंकलाब जिंदाबाद के नारों से गूंज उठा। इस अवसर पर एक भारी जुलूस निकाला गया। सेकेट्रिएट पहुंच कर जनता वहां पर राष्ट्रीय ध्वज लगाना चाहती थी। इस अवसर पर जिला मजिस्ट्रट मिस्टर आर्चर ने गुरखे सिपाहियों को गोली चलाने का आदेश दे दिया। जिसके चलते आठ विद्यार्थी शहीद हो गए और कई घायल हुए। फिर भी एक विद्यार्थी द्वारा धारासभा भवन की दीवार पर चढ़कर राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया गया। गोलीकांड में मरने वालों विद्यार्थियों की संख्या दस से ऊपर थी। सासाराम गोलीकांड के शहीद-सासाराम (शाहाबाद) में उत्साहित जनता के एक बड़े दल ने 15 अगस्त सन्् 1942 को स्टेशन और कचहरी पर राष्ट्रीय झंडा लगाकर एस.डी.ओ. के बंगले के सामने पहुंचकर अपना आसन जमा दिया। कुछ आदमियों में सहसा आवेश उत्पन्न होने के कारण ढेलेबाजी आरम्भ हो गई। जिसके साथ ही गोरों ने गोली चलाना शुरू कर दिया। इस गोलीकांड में करीब पांच लोग मारे गय। समस्तीपुर गोलीकांड के शहीद- 15 अगस्त 1942 को गोरों की एक स्पेशल ट्रेन दोपहर के लगभग वहां आकर रूकी। उसे देखकर कुछ लोगों की भीड़ ने आकर ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो‘ ‘इंकलाब जिंदाबाद‘ के नारे लगाए। इस पर जब वह स्पेशल ट्रेन छूटकर गुमटी के पास पहुंची तो वहां गोरे दोनों ओर के फाटक खोलकर गाड़ी में चढ़ गए। गोरे कमांडर की सीटी बजी जिसके साथ ही चलती ट्रेन से गोलियों की वर्षा होने लगी। जिसके चलते पचासों व्यक्ति घायल हुए और दर्जनों व्यक्ति शहीद हुए। धमदाहा गोलीकांड के शहीद- 25 अगस्त सन्् 1942 को बिहार के पूर्णिया जिले के धमदाहा पुलिस थाना क्षेत्र में हुए भयानक गोलीकांड में सैकड़ो व्यक्ति घायल हुए। केवल शहीद होने वाली की संख्या चालीस से ऊपर पहुंच गई थी। बेतिया काण्ड के शहीद- बिहार के चम्पारन जिले के बेतिया नगर के पुलिस थाने के सामने धारा 144 तोड़ने के अपराध में बिट्रिश पुलिस द्वारा 24 अगस्त को किए गए गोलीकांड में दसों व्यक्ति शहीद हुए।
लंसाडी गोलीकांड के शहीद:- 15 सितंबर 1942 को लसांडी ग्राम के पुलिस थाने के सामने वाले मैदान में 10-15 लारी भरे गोरों के दल ने जोश से भरी जनता पर अमानुषिक रूप से गोलियां बरसाईं। इसमें भी दर्जनों लोग काल के ग्रास बने। हिल्सा गोलीकांड के शहीद- हिल्सा थाने (जिला पटना) पर 15 अगस्त 1942 को एकत्रित जनता जो जोश से थाने पर तिरंगा फहराने का प्रयास कर रही थी, मशीनगनों से उन्हें तितर-बितर करने के लिए गोलियां चलाई गई। इस गोलीकांड में सत्रह लोग जख्मी हुए, जिनमें से पांच ने धटना स्थल पर ही दम तोड़ दिया। पीरपैंती काण्ड के शहीद- पीरपैंती (भागलपुर) में 19 अगस्त को निकले जुलूस पर गांव के कुछ जमीदारों ने थाने में जाकर रिपोर्ट करके अंग्रेजों को जनता के खिलाफ उकसा कर गोली चलवाई। जिसमें पचास से ऊपर की शहादतें हुईं जिनमें कुछ स्त्रियां भी थीं। मुजफरपुर कांड के शहीद:- मुजफरपुर जिले के पुपरी और वाजपट्टी थाने पर 23 अगस्त तथा मीनापुर थाने पर 15 अगस्त को हुए जघन्य गोलीकांड में अनेक निहत्थे, निरपराध देशभक्तों की जाने गई अथवा गम्भीर रूप से घायल हुए। छपरा कांड के शहीद- अगस्त 1942 के आंदोलन के समय छपरा ऐसे उत्साही कार्यकर्ताओं का केन्द्र माना जाता था जो चारों ओर संगठित और सहयोग द्वारा तोड़-फोड़ के कामों का नेतृत्व करते थे। 30 अगस्त को जबकि छपरा में कार्यकर्ता लोग किसी आवश्यक समस्या पर विचार-विमर्श कर रहे थे, फौजी सिपाहियों से भरी लारियां वहां आ पहुंची और थाने के सामने जमा लोगों पर अधाधुन्ध गोलियां चलाई गई जिसमें कई लोग शहीद हो गए। सोनबरसा कांड के शहीद:- उत्तर प्रदेश के बलिया में अगस्त आंदोलन में ब्रिटिश हुकूमत का सफाया करके समानान्तर सरकार कायम कर ली गई थी। वहां के 16 वर्षीय वीर विद्रोही बालक सूरज ने आंदोलन के आरम्भ में ही बलिया शहर के अंदर लगी हुई धारा 144 तोड़ने में सबसे आगे कदम उठाया था और पुलिस द्वारा बंदी बनाकर जेल भेज दिया गया था। लेकिन वहां जागरूक जनता ने ब्रिटिश अधिकारियों को हटाकर अपनी सरकार कायम की। जेल के फाटक खोल दिए जिससे निकलने वाले अन्य कैदियों के साथ बलिया का सूरज बाहर निकल आया। यह समाचार पाते ही मार्स स्मिथ गोरी फौज लेकर वहां आ पहुंचा और सोनबरसा थाने पर अधिकार करने के लिए आए युवकों पर दनादन गोलियां बरसाई जिससे अनेक लोग हताहत हुए, उनमे बलिया का वीर बालक सूरज भी था। अनेक लोगों में शहादत दी। वर्धा गोलीकांड के शहीद- कांग्रेस महाधिवेशन समाप्त होने पर मुम्बई से लौटे दीनदयाल चूड़ी वाले के वर्धा पहुंचने पर वर्घा की जनता ने सभा बुलाकर दीनदयाल का भाषण सुनने की इच्छा जाहिर की। अंग्रेजी पुलिस द्वारा विरोध करने पर जनता भड़क उठी और उसने क्रुद्ध होकर, ‘इंकलाब जिंदाबाद‘ के नारे लगाने आरम्भ कर दिया। जवाब में पुलिस ने गोलियां चलाई जिसमें 30 वर्ष का युवा मजदूर जंगलू मारा गया। बाद में जब महात्मा गांधी वर्धा आए तो उन्होंने जंगलू की समाधि पर फूल-माला चढ़ाकर श्रद्धाजलि अर्पित की। इसके अलावा बिहार के सोनपुर, खगड़िया, सुल्तानगंज, पारूथाना, गया, दलसिंह सराय, रोहियार आदि जगहों पर भी अंग्रेजो की गोलियों से सैकड़ों लोगों ने शहादत दी और इससे भी ज्यादा लोग घायन हुए।
उपरोक्त विवरण सन् 1942 में भारत में स्थान-स्थान पर हुए अगस्त आंदोलन की एक छोटी सी सक्षिप्त झांकी मात्र है। अगस्त आंदोलन का यदि पूरा विवरण दिया जाय तो एक मोटा ग्रंथ तैयार हो जाएगा। अगस्त आंदोलन दक्षिण भारत छोड़कर शेष सम्पूर्ण भारत में खूब फैला जिसने जन जाग्रति को अभूतपूर्व प्रमाण प्रस्तुत करके ब्रिटिश हुकूमत को यह दिखा दिया कि भारतवासी स्वराज पाने के लिए कृत संकल्प हैं। अगस्त क्रान्ति की विकरालता का अनुमान अंग्रेजी हुकूमत द्वारा अधिकृत रूप से पेश विवरण से सहज रूप से लगाया जा सकता है। सरकार द्वारा परोसा गया विवरण इस प्रकार है- पुलिस और फौज की गोलियों से 940 व्यक्ति मरे और 1930 घायल हुए, विभिन्न स्थानों पर 60229 व्यक्ति गिरतार हुए, 118000 लोग नजरबंद हुए, 160 स्थानों पर क्रांति को कुचलने के लिए सेना बुलानी पड़ी। यहां तक कि हवाई जहाजों से छ: बार हमले किए गए। क्रांति की चपेट में 59 रेलगाड़ियां गिरायी गई और 318 स्टेशन नष्ट हुए। 954 डाकस्थानों पर हमले हुए और 12000 स्थानों पर टेलीग्राम तार काटे गये। अगस्त क्रांति की घटना के स्वरूप, उसके विस्तृत प्रसार और जन सहभागिता को देखते हुए उसे विश्व की सबसे बड़ी जन क्रान्तियों के रूप में निरूपित किया जा सकता है। इसमें देश के विभिन्न वर्गों, समुदायों और समुदाय के लोगों ने भागीदारी निभाई थी। शहीदों में शुमार किए जाने वाले आंदोलनकारियों में चिकित्सक, अभिभाषक, पत्रकार, कृषक, पुजारी, बढ़ई, व्यवसायी, समाजसेवी, इंजीनियर, मिल मजदूर, लुहार, पुताईकर्मी, अध्यापक, विद्यार्थी, लोकगायक, लोककवि, हांकर व कर्मचारी आदि थे।
अगस्त क्रांति के अन्तर्गत वीरगति पानेवालों में अबोध बालक, किशोर, युवा, अधेड़ तथा वृद्ध भी सम्मिलित थे। यहां तक कि 90 वर्ष की उम्र के राजकुमार दुसाध भी शहीदों के विरादरी में थे। उन्होंने इसके पहले भी आजादी के कई आन्दोलनों में जेल यात्रा की थी। सन् 1942 के आंदोलन में राजकुमार दुसाध को गिरतारी के बाद बलिया की जेल में रखा गया और जेल यात्रा के दौरान ही उन्होंने अपनी जीवन यात्रा पूर्ण की।

सरकार के खिलाफ बोलना अब आसान नहीं होगा
सनत जैन
संसद में जिस तरीके से यूएपीए, एनआईए,सूचना अधिकार कानून और 3 तलाक बिल के संशोधन बिल पास किए गए हैं। उससे सरकार की मंशा स्पष्ट है, कि सरकार के खिलाफ बोलने वाले लोगों और विपक्षी दलों को नियंत्रित करने के लिए ही सरकार ने यह संशोधन बिल पास कराए। जिससे केंद्र सरकार को असीमित शक्तियां मिल गई हैं। संसद में चंद घंटों की बहस के बाद यह सारे बिल पास हुए हैं। इसके साथ ही तीन तलाक बिल भी बड़ी जल्दबाजी में पास किया गया है। सरकार किसी भी बिल को स्टेडिंग कमेटी में भेजने को राजी नहीं हुई। इसको लेकर यह कहा जा रहा है, सरकार एक नई दिशा की ओर बढ़ गई है। जिसके कारण संघीय व्यवस्था और दोहरी नागरिकता जैसे विषयों में गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। गैरकानूनी गतिविधियां निरोधक कानून की अनुसूची 4 के तहत, राष्ट्रीय जांच एजेंसी अब किसी भी व्यक्ति को ना केवल आतंकवादी घोषित कर सकती है, बल्कि उसकी संपत्ति को भी जप्त कर सकती हैं। जो संशोधन बिल पास हुआ है, उसके अनुसार अब संबंधित राज्य के डीजीपी से भी अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी। अर्थात कानून व्यवस्था में जो राज्य की जिम्मेदारी होती थी, उससे वह प्रथक हो गई हैं। केंद्र की राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए अब भारत के किसी भी राज्य में जाकर कोई भी कार्यवाही कर सकती है। किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित कर सकती है, उसकी संपत्ति जप्त कर सकती है। इससे राज्यों तथा नागरिकों के मौलिक अधिकार सीमित हो गए हैं।
इसी तरह सूचना अधिकार कानून में सरकार ने संशोधन करके सूचना अधिकार आयुक्तों को सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में ले लिया है। अभी तक सूचना आयुक्तों का वेतन सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के समकक्ष होता था। अब यह अधिकार केंद्र सरकार के पास आ गया है। वह सूचना आयुक्तों के वेतन और उनकी सेवाओं के संबंध में निर्धारण कर सके। बिल पास होने के बाद अब सूचना आयुक्त केंद्र सरकार और उसके किसी विभाग के बारे में आदेश करने के बारे में एक बार नहीं, सौ बार सोचेंगे। क्योंकि जो संशोधन हुए हैं, उसके अनुसार उनका कार्यकाल और वेतन निर्धारण करने का अधिकार अब केंद्र सरकार के पास पहुंच गया है। सूचना अधिकार आयुक्त अब भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की तरह बॉस इज ऑलवेज राइट की तरह सूचना अधिकार कानून में निर्णय देने के लिए बाध्य हो गए हैं, अथवा उनकी रवानगी तय मानी जाएगी। जजों की नियुक्ति में कलेजियम की अनुशंशा के बाद भी सरकार ने नियुक्ति नहीं करके अपने आप से सुप्रीम कोर्ट को अवगत करा दिया है। इस संशोधन के बाद सरकार वही जानकारी देगी, जो वह देना चाहती है। 2005 के सूचना अधिकार कानून में सूचना अधिकार आयुक्तों को जो शक्तियां प्राप्त हुई थी। भले ही उनमें कोई संशोधन नहीं किया गया। उसके बाद भी आम नागरिकों को सूचना अधिकार कानून के तहत सरकार के कामकाज को जानने का जो अधिकार मिला था। वह इस संशोधन के बाद अप्रत्यक्ष रूप से समाप्त कर दिया गया है।
इसी तरह तीन तलाक बिल को पास करते समय केवल मुस्लिम वर्ग के पुरुषों पर ही अपराधिक प्रकरण दायर करने, और गैर जमानती अपराध बनाने का प्रावधान किया गया है। जबकि हिंदू पर्सनल कानून में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है। दोनों कानूनों में इस तरह के परिवर्तन होने से यह कहा जा सकता है कि मुस्लिम पुरुषों को भारत में दूसरे दर्जे का नागरिक मान लिया गया है। इस बिल के पास होने से मुस्लिम महिलाओं की स्थिति और भी खराब होगी। क्योंकि जो व्यक्ति जेल चला जाएगा, 3 साल जेल में रहकर आएगा वह अपनी पत्नी और अपने बच्चों को क्यों अपनाएगा। इससे तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं अपना जीवन यापन करने के लिए या तो अपराधिक गतिविधियों में लिप्त होंगी, या अपना यौन शोषण कराकर जीवन यापन करने को मजबूर होंगी। इससे कानून व्यवस्था की स्थिति बद से बदतर हो सकती है।
सरकार ने उपरोक्त तीनों कानूनों को पास कराने के लिए जिस तरह की हड़बड़ी की है। वह चौंकाने वाली है। सरकार बिल पास कराने समय गंभीर भी नहीं दिखी। कानून बेहतर ढंग से पारित हों, जल्दबाजी में सरकार ने संसद के इन बिलों को प्रवर समिति के पास नहीं भेजा। जिसके कारण सरकार की ओर से जो बिल जैसे आए थे, वैसे ही पास हो गए। संसदीय कार्य प्रणाली के अनुसार इनके कानूनी प्रावधान किस तरह के हों, इसका भी परीक्षण नहीं हुआ। केवल कुछ घंटों की बहस के बाद लोकसभा में बहुमत के बल पर, और राज्यसभा में जोड़-तोड़ और फ्लोर मैनेजमेंट के बल पर, यह बिल पास करा लिए गए। सरकार ने विपक्ष की एक जुटता नहीं होने का लाभ, राज्यसभा में बेहतर तरीके से उठाया है। इसके लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की जितनी प्रशंसा की जाए, वह कम है। किंतु संसदीय कार्यप्रणाली को अनदेखा करते हुए सरकार ने जिस तरह से इन बिलों को पास कराया है। आगे चलकर यह सरकार के लिए परेशानी का कारण बनेंगे। भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार लोकसभा और राज्यसभा का सत्र खत्म होने जा रहा है। लेकिन संसद की विभिन्न समितियों का गठन ही नहीं हुआ। लोकसभा के अध्यक्ष अथवा राज्यसभा के सभापति बिलों को प्रस्तुत करने के पूर्व स्थाई प्रवर समिति के पास भेजकर उनकी समीक्षा करा लेते थे । इस बार अभी तक समिति का गठन ही नहीं हुआ। संसदीय व्यवस्था में प्रारंभिक रूप से जो काम समिति में बिल पेश करने के पूर्व होता था, वह भी नहीं हुआ। संसदीय परीक्षण के बिना दर्जनों बिल सरकार ने राज्यसभा से भी पास करा लिए । इन बिलों के पास होने से भारत के 125 करोड़ नागरिकों के दैनिक जीवन में बहुत बड़ा असर पड़ने जा रहा है। खासतौर पर सड़क एवं परिवहन मंत्रालय द्वारा जो भारी जुर्माना वाहन चालकों पर आरोपित किया है। उससे करोड़ों आम नागरिक प्रभावित होने जा रहे हैं। तीन तलाक बिल को लेकर यह कहा जा रहा है, कि महिलाएं इसका बड़े पैमाने पर पति से लड़ाई होने पर दुरुपयोग कर सकती हैं। इसके साथ ही सरकार के खिलाफ बोलने पर अब आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप लगाकर किसी भी व्यक्ति को जेल भेजने और उनकी संपत्ति जप्त करने जैसे अधिकार अब केंद्र सरकार के पास पहुंच गए हैं। केंद्र सरकार ने जो बिल पास कराये हैं। लगभग आधा दर्जन बिल ऐसे हैं, जिसमें राज्य सरकारों की शक्तियों को काफी कम दिया गया है। इससे भारत की संघीय व्यवस्था में केंद्र एवं राज्यों के बीच जबरदस्त टकराव पैदा होने की संभावनाओं को बढ़ा दिया है विपक्ष का एकजुट ना होना और सरकार द्वारा अपनी ताकत के बल पर जिस तरह कानून में संशोधन किए जा रहे हैं। फौरी तौर पर वह भले सरकार के लिए मुफीद साबित हो रहे हो। लेकिन आगे चलकर इससे सरकार और आम नागरिकों की कठिनाई बढ़ने वाली है। यह ठीक है कि आम नागरिकों के पास कोई शक्तियां नहीं होती है। किंतु इसके बाद भी मताधिकार और भीड़तंत्र समय-समय पर सरकार के खिलाफ खड़ा होता रहा है। यह बड़े से बड़ा परिवर्तन एक ही झटके में कर देता है केंद्र सरकार को अपने बहुमत का उपयोग, सत्ता को ज्यादा से ज्यादा समय तक बनाए रखने के लिए जरूरी है कि वह भीड़ को एकजुट ना होने दें। ज्यादा दबाव आने से भीड़तंत्र बड़े से बड़े कर परिवर्तन करने का कारण बनता है। इतिहास यदि देखेंगे, तो इसकी पुनरावृत्ति एक बार नहीं कई बार हो चुकी है। आशा है, सरकार अपने उत्तरदायित्व को समझते हुए भारतीय संविधान की मूल भावना, मौलिक अधिकारों और संघीय व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए निर्णय करेगी।

कश्मीर में नई सुबह का आगाज , ख़त्म हुआ एक इतिहास
प्रभुनाथ शुक्ल
जम्मू-कश्मीर पर केंद्र सरकार का फैसला अपने आप में ऐतिहास है। पूरे देश में जश्न का महौल है। लेकिन इस फैसले से वोटबैंक की राजनीति करने वालों को गहरा आघात पहुंचा है। कश्मीर पर सारी अटकलें और संशय खत्म हो गए हैं। मोदी सरकार के मिशन कश्मीर की सारी तस्वीर साफ हो गई है। जिसकी आशंका जतायी जा रही थी वहीं हुआ। सरकार राज्य से धारा-370 हटाने के लिए कदम बढ़ा दिया। गृहमंत्री अमितशाह ने संसद में इसे हटाने की सिफारिश भी पेश कर दिए। जम्मू-कश्मीर को विशेष नागरिक सुविधा देने वाली धारा-35 ए को खत्म कर दिया गया है। जम्मू-कश्मीर राज्य अब एक और हिस्से बंट जाएगा, दूसरा राज्य लद्दाख होगा।निश्चित तौर पर केंद्र की मोदी सरकार का राष्टीय सुरक्षा पर बड़ा फैसला आया है। जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा और सुविधाएं देने वाली धारा 35 को खत्म कर उसे भारतीय गणराज्य के सामान नागरिक अधिकारों से जोड़ दिया गया है। अब आप वहां जमींन भी खरीद सकते और शादियां भी कर सकते हैं। क्योंकि 35 ए का आदेश राष्टपति की तरफ से दिया गया था। लिहाजा उसे उन्हीं तरीके से खत्म कर दिया गया है। मोदी सरकार के निर्णय से कांग्रेस और पूरा विपक्ष सख्ते हैं। लेकिन पूरा देश सरकार के साथ खड़ा है। क्योंकि कश्मीर एक देश एक कानूनी की तरफ बढ़ रहा है। गृहमंत्री अमितशाह राज्यसभा में यह संवैधानिक संशोधन पेश कर कश्मीरी नेताओं और अलगाव वादियों को जमींन दिखा दिया है। लिहाजा अब धारा-370 का भी कलंक जल्द मिट जाएगा। देश के लिए गौरव की बात है। कांग्रेस तुष्टीकरण की नीति अपना कर सिर्फ वोटबैंक की राजनीति करती रही जिसकी नतीजा है वह पूरे देश से खत्म हो गई और कश्मीर आज वह साफ नीति नहीं बना पायी है।
राज्यसभा में गृहमंत्री अमितशाह की तरफ से धारा-35 ए खत्म होने की सूचना देश की राजनीति में भूचाल आ गया है, लेकिन सरकार को कोई खतरा नहीं है। क्योंकि सरकार के पास बहुमत से अधिक अंक हैं। लिहाजा विपक्ष के पास सिर पीटने के अलावा कोई मुद्दा नहीं है। दूसरी बात सरकार ने इस तरह का कोई गलत कदम भी नहीं उठाया है जिसके खिलाफ देश के लोग हों। देश के लोगों की जो इच्छा थी सरकार ने वही काम किया है। लेकिन प्रतिपक्ष के सीने पर सांप लोटने लगा है। क्योंकि विपक्ष के पास सिर्फ सिर पीटने के अलावा उसके पास कुछ नहीं है। संसद में केवल वह घड़ियाली आंसू बहा रहा है। मोदी सरकार के साहसिक फैसले ने विपक्ष के नेताओं और कश्मीर के अलगाव वादियों को अलग-थलग कर दिया है। सरकार के इस फैसले के बाद अलगाव वादियों और आतंवादियों की सक्रियता देश और जम्मू-कश्मीर में बढ़ सकती है। पाकिस्तान के साथ भारत विरोधी इस्लामिक देश अस्थिर करने की साजिश रच सकते हैं। वैश्विक मंच पर अफवाहें फैलायी जा सकती हैं। भारत विरोधी मुहिम में लगे लोग वैश्विक एकजुटता दिखा सकते हैं। लेकिन अब दौर गुजर गया है भारत हर स्थिति का मुकाबला करने में सक्षम है।
कश्मीर में किसी भी हालात से निपटने के लिए सरकार ने पूरा इंतजाम कर लिया है। पूरे जम्मू-कश्मीर को सेना के हवाले कर दिया गया है। नागरिक सुरक्षा और सतर्कता को लेकर सारे आदेश पहले ही जारी किए जा चुके हैं। मीडिया और प्रबुद्ध वर्ग पहले ही यह आशंका जता रहा था कि सरकार कश्मीर पर साहसिक निर्णय ले सकती है।
भारत सरकार के तत्कालीन राष्टपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने धारा-370 के तहत कश्मीर के नागरिकों को विशेष सुविधा के लिए 14 मई 1954 को धारा 35 एक का विशेष आदेश जारी किया था। 1956 में जम्मू-कश्मीर के संविधान में वहां की नागरिकता को परिभाषित किया गया। जिसके अनुसार 1954 के पूर्व या यह कानून लागू होने के 10 साल पहले से जो लोग कश्मीर में निवास कर रहे हैं यहां के नागरिक माने जाएंगे। राज्य को मिले इस विशेष दर्जे के अनुसार देश के दूसरे राज्य का वहां कोई भी व्यक्ति यहां जमींन नहीं खरीद सकता था और न ही वहां की नागरिकता हासिल कर सकता था। शरणार्थियों को वहां सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती थी। वोट देने का अधिकार नहीं था। स्कूलों में उनके बच्चों का दाखिल तक नहीं हो सकता था। वहां की लड़की अगर किसी बाहरी व्यक्ति से शादी कर लिया तो उसे वहां की नाागरिकता नहीं मिलती थी। हालांकि यह कानून संसद के जरिए नहीं पारित था। यह केवल राष्टपति की तरफ से दिया गया विशेष अधिकार था। जिसे मोदी सरकार ने साहत दिखाते हुए राष्टपति के जरिए ही खत्म कर दिया। निश्च तौर पर अपने आप में यह बड़ा और ऐतिहासिक फैसला है।
जम्मू-कश्मीर राज्य को विभाजित कर भाजपा ने कश्मीर और पाकिस्तान राग अलापने वाले नेताओं को जमींन दिखा दिया है। लद्दाख को अलग राज्य बनाकर वहां सीटों को नए जरिए से परिसीमित कर लोकतंत्र की नई जमींन तैयार की जाएगी। देश के सुरक्षा के लिहाज से भी सरकार ने यह बड़ा कदम उठाया है। कोई भी व्यक्ति सरकार के फैसले विरोध में नहीं खड़ा है। सिर्फ चुनावी और वोट बैंक की राजनीति करने वाले आंसू बहा रहे हैं। सरकार की इस नीति से कश्मीर अब पूरे नियंत्रण में होगा। अलगाववादी अपने आप बिल में घुस जाएंगे। आतंकवाद का सफाया होगा। क्योंकि नये गठन के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर केंद्र का सीधा नियंत्रण होगा। राज्य सरकार उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर पाएगी। कश्मीर देश की सुरक्षा के लिहाज से अहम राज्य है। पाकिस्तान और चीन की कुटिल नीति की वजह से देश की सामरिक सुरक्षा के लिए वहां स्थितियां अनुकुल नहीं थी। लेकिन सरकार के इस निर्णय के बाद स्थितियां बदलेंगी और इस फैसले से जम्मू-कश्मीर का सारा नियंत्रण केंद्र सरकार के अधीन होगा। सरकार ने इस फैसले ने अमेरिका को भी जमींन दिखाई है। जिसमें अमेरिकी राष्टपति डोनाल्ड टंप कश्मीर मसले पर मघ्यस्तता का राग अलाप रहे थे। भारत सरकार का यह फैसला दुनिया को एक नया संदेश देने में कामयाब हुआ है। इसके अलावा पाकिस्तान और चीन के लिए भी कड़ा संदेश है।
मोदी सरकार कश्मीर के राजनैतिक दलों, अलगाव वादियों, आतंकवादियों और पाकिस्तान से निपटने के लिए सारी तैयारी कर लिया है। जम्मू-कश्मीर में भारी तादात में फोर्स तैनात कर दी गयी है। नागरिक सुरक्षा को देखते हुए सारी हिदायतें पहले की जारी की जा चुकी थीं। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह दिन बेहद खास है। इतिहास की भूल को सुधारते हुए राष्टहित में यह कदम स्वागत योग्य है। इस मसले पर सरकार की जीतनी तारीफ की जाय वह कम है। कश्मीर से 370 हटने का भी रास्ता साफ हो गया है। देश में अब एक साफ-सुथरी राजनीति का दौर शुरु हुआ है। अब लोकतंत्र को सिर्फ सत्ता तक पहहुंचने का जरिया समझना बड़ी भूल होगी। देश की जनता जो चाहती है उसे सरकारों को हरहाल में पूरा करना होगा। अ बवह दौर आ गया है जब अलगाव वादियों को वंदेमातरम् और जयहिंद बोलना होगा। जम्मू-कश्मीर में अब सिर्फ भारतीय तिरंगा लहराएगा। जम्मू-कश्मीर को एक नयी आजादी मिली है। इसका स्वागत करना चाहिए। सरकार को अलगाव वादियों को सबक सीखाना चाहिए। लेकिन नागरिक अधिकारों का दमन न हो इसका विशेष खयाल रखना होगा।

आयुर्वेद सौतेली या अवैध संतान हैं शासन की ?
डॉ. अरविन्द प्रेमचंद जैन
जब से आधुनिक चिकित्सा शास्त्र का प्रादुर्भाव हुआ और कुछ अंग्रेजपरस्त लोगो ने इसको अंगीकार किया तब से आयुर्वेद विज्ञानं का तिरस्कार होना शुरू हुआ,जब तक पेनिसिलिन की खोज नहीं हुई थी तब तक आयुर्वेद विज्ञानं भारत में बहुत फला फूला। पर स्वतंत्रता के बाद पहली स्वास्थ्य मंत्री श्रीमती राजकुमारी अमृता कौर ने जो आयुर्वेद की दुर्दशा की जब से आयुर्वेद पनप नहीं पाया।
शुरुआत से इसे स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत रखा गया, वहां पर दोयम दर्ज़े का व्यवहार किया गया, कभी भी मुख्य धारा से नहीं जोड़ा गया। मात्रा सहयोगी के रूप में रखा गया। उस समय कहीं भी औषधालय खोल दिए जाते थे न भवन, न फर्नीचर, न पर्याप्त औषधियां न पूरा स्टाफ, किराये का भवन ढूंढों और काम करो। उसके बाद विभाग अलग बना तब भी मुख्य नियंत्रण सिविल सर्जन के अधीन।
वर्षों की मांग के बाद स्वास्थ्य विभाग से पृथक चिकित्सा चिकित्सा विभाग के अंतर्गत आया। उसका नियंत्रण भी चिकित्सा शिक्षा मंत्री के पास। धीरे धीरे भारतीय चिकित्सा पद्धति एवं होमियोपैथी विभाग का मंत्री बनाया पर वह भी कैबिनेट मिनिस्टर के अधीन। आज भी आयुष विभाग का स्वतंत्र मंत्री नहीं हैं।
बात इस बात से कहनी हैं की दिनांक २६ जुलाई २०१९ को मध्य शासन द्वारा एंटीबॉयटिक्स प्रतिरोध के सम्बन्ध में एक नीति लागु की हैं जिसमे वेटनरी, फ़ूड एंड ड्रग, पशुपालन विभाग, कृषि विभाग को सम्मिलित करके स्वास्थ्य विभाग द्वारा एनटीमिक्रोबिअल रेजिस्टेंस की रोकथाम हेतु राज्य स्तरीय एक्शन प्लान का निर्माण किया गया हैं। जिसका उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में एंटीबॉयटिक्स दवाओं के अनियंत्रित उपयोग की रोकथाम, एंटीबॉयटिक्स दवाओं का उपयोग सम्बन्धी विभाग वार दिशा निर्देश व विभिन्न स्टेट होल्डर एवं जन समुदाय में जागरूकता लाने हेतु नीति तय करना हैं। इसमें १३६ सदस्यों को कार्य हेतु जोड़ा गया हैं जिसमे आई ए एस, मेडिकलकॉलेज। एम्स पर्यावरण विभाग, स्वास्थ्य विभाग पशु विभाग, नर्सिंग होम एसोसिएशन, मेडिकल फार्मेसी एसोसिएशन, फ़ूड एंड ड्रग्स आदि अनेक विभागों को सम्मिलित किया गया पर स्वास्थ्य से सम्बंधित न चिकित्सा शिक्षा विभाग और न आयुष विभाग के अंतरगत आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा पद्धति से सम्बंधित विभाग को नहीं रखा गया।
इस महत्वपूर्ण विषय जो चिकित्सा से सम्बंधित हैं जो चिकित्सा करते हैं और उनके द्वारा भी एंटीबॉयटिक्स काउपयोग किया जाता हैं और जो एंटीबॉयटिक्स की जगह प्रतिनिधि द्रव्य के रूप में चिकित्सा में काम कर सकते हैं उनको नजर अंदाज़ किया गया हैं।
इस सम्बन्ध में एंटीबॉयटिक्स के उपयोग के सम्बन्ध में इस पद्धति का उपयोग करना या उन्हें सम्मिलित करना कितना हानिकारक होता। इसका आशय यह हैं की प्रदेश सरकार आयुष विभाग को अपनी सौतेली संतान या अवैध संतान मानती हैं या अयोग्य या नाकारा मानती और दुःख का विषय हैं की वर्तमान में आयुष और चिकित्सा शिक्षा मंत्री स्वयं एक चिकित्सक हैं। एक चिकित्सक के नाते के साथ एक विभाग का मंत्री जो इस विषय में विभाग की भागीदारी निभाने में सक्रीय योगदान देते उन्हें वंचित किया गया। यह अतयनत दुःख की बात हैं
क्या आयुष विभाग दोयम दर्ज़े का विभाग हैं। इस कार्यक्रम के बाद इस लेख के लेखक ने व्यक्तिगत रूप से माननीय स्वास्थ्य मंत्री श्री तुलसी सिलावट जी, प्रमुख सचिव स्वास्थ्य श्रीमती पल्लवी जैन गोविल, डॉक्टर सुजीत के सिंह उप संचालक महानिर्देशक स्वास्थ्य मंत्रालय नई दिल्ली, डॉक्टर अनुज शर्मा टेक्निकल ऑफिसर विश्व स्वास्थ्य संगठन नई दिल्ली एवं डाक्टर पंकज शुक्ल एन . एच. एम् सेचर्चा की पर किसी की तरफ से कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला और न भविष्य में कोई गुंजाईश समझ में आती हैं। हाँ ध्यान रखेंगे
किसी भी काम की सफलता में सबके साथ जो विभाग सीधे तौर पर इस नीति से जुड़े हैं उनकी भागीदारी शासन नहीं लेना चाहती या उपेक्षा करती हैं तो इससे समझ में आता हैं की सरकार मात्र ओठों से सहानुभति देना चाहती हैं और इस विभाग को मुख्य धारा में नहीं जोड़ना चाहती हैं। जबकि इस विभाग के अधिकांश चिकित्सक एलोपैथी का उपयोग करते हैं और वे बहुत सफल हैं।
यह शासन में बैठे वरिष्ठम अधिकारीयों की संकीर्ण मानसिकता का द्योतक हैं और इसके अलावा कुछ नहीं। किसी से सक्रीय भागीदारी की अपेक्षा करते हैं तो उन्हें भी सम्मान के साथ आमंत्रण देना चाहिए। आखिर ये भी सरकार का एक प्रमुख अंग हैं। जब किसी पद्धति का कोई स्थान नहीं था और हैं तब आयुर्वेद ही कारगर सिद्ध होती हैं पर उसको अंगीकार करने के हिचक क्यों ?
आज भी कोई बड़ा से बड़ा या छोटे से छोटा
अपने किचिन से नहीं बचा हैं
हमारा किचिन पहला दवाखाना हैं,था और रहेगा
आज सब क्यों चिंतित हैं एंटीबॉयटिक्स
जो सब अपने आपको भगवान् मानकर बैठे हैं
प्रोफेसर, नर्सिंग होम फार्मेसी वाले
बड़ी बड़ी कंपनी के दलाल हैं
जिनको बहुत कमीशन, घूमने फिरने का खरचा
ये ही उठाते हैं
जिनका जमीर बिका हुआ हैं
वे ही करते है खिलवाड़ जिंदगी से

पन्द्रह अगस्त को ‘35ए’ खत्म करने का तोहफा…?
( ओमप्रकाश मेहता)
देश की सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक ही चर्चा गर्म है, और वह है इस बार लाल किले से प्रधानमंत्री द्वारा आजादी की बहत्तरवीं वर्गग्रंथी पर कश्मीर से अनुच्छेद-35ए खत्म करने की घोषणा। सरकार ने कश्मीर में दस हजार विशेष प्रशिक्षित सैनिक तैनात कर इसकी शुरूआत भी कर दी है। यद्यपि सरकार ने अनुच्छेद-35ए खत्म करने के अधिकारिक संकेत नहीं दिए है और सैनिकों की नई तैनाती के पीछे पुराने थके-हारे सैनिकों की वापसी, बड़े आतंकी या पाकिस्तानी हमले की आशंका आदि कारण बताए जा रहे है, किंतु केन्द्र सरकार के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की अचानक गुपचुप कश्मीर यात्रा, वहां राज्यपाल व शीर्ष अधिकारियों से विचार-विमर्श और वहां से लौटते ही दस हजार सैनिकों की वहां तैनाती कुछ रहस्यमयी कहानी बयां करती है, जो कश्मीर में पिछले बहत्तर साल से जारी राज्य को विशेष दर्जा दिलाने वाले संविधान के अनुच्छेद-35ए से जुडी है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि जब राजनाथ सिंह की जगह भाजपाध्यक्ष अमित शाह को गृहमंत्री का दायित्व सौंपा गया था, तो उसके पीछे मोदी जी की एक ही मंशा थी जो कश्मीर में लागू अनुच्छेद-35ए व धारा-370 से जुड़ी थी, देश में राज कर रही भाजपा के चुनावी घोषणा-पत्र में भी जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने वाले संविधान के इन अनुच्छेदों को खत्म करने का वादा किया गया था। इसीलिए गृहमंत्री का पदग्रहण करते ही अमित शाह ने सबसे पहले कश्मीर का ही दौरा किया था और राज्यपाल सतपाल मलिक से काफी गंभीर विचार-विमर्श भी हुआ था। उसके बाद कश्मीर से निष्कासित पण्डितों से गृहमंत्री का विचार-विमर्श तथा कश्मीर की समस्याओं व वहां की स्थितियों पर गंभीर चिंतन यह स्पष्ट करता है कि सरकार शीघ्र ही कश्मीर पर कोई गंभीर कदम उठाने जा रही है, और वह कदम अनुच्छेद-35ए खत्म करने से ही सम्बंधित हो सकता है। जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सतपाल मलिक ने पिछले दिनों एक सार्वजनिक कार्यक्रम में आतंकियों को पुलिस व सेना की जगह भ्रष्ट अधिकारियों व नेताओं को निशाना बनाने का विवादित बयान देकर भी ऐसा ही कुछ संकेत देने की कौशिश की थी, जिसके लिए उन्हें बाद में खेद भी प्रकट करना पड़ा। इस तरह केन्द्र सरकार व जम्मू-कश्मीर प्रशासन के बीच यह खिचड़ी लम्बे अर्से से पक रही है और इसकी भनक जम्मू-कश्मीर के राजनेताओं को भी लग चुकी है, तभी तो ऊमर अब्ब्दुल्ला के बाद मेहबूबा मुफ्ती को अनुच्छेद-35ए को लेकर विस्फोटक बयान देने को मजबूर होना पड़ा। अब ये कश्मीर नेता, जो इस मामले पर एकजुट है, अपने बयानों से कश्मीर में भय और दहशत का माहौल तैयार करने लगे है, जिसका परिणाम यह हो रहा है कि कश्मीरियों ने अपने वतन से पलायन और अनाज (राशन) भंडारण की तैयारी शुरू कर दी है, और सैनिकों की बढ़ती गश्त और उनकी मुस्तैदी से वहां भय की भावना निर्मित होने लगी है। केन्द्र सरकार ने भी सतर्क होकर वहां की पल-पल की खबरों पर नजर रखना शुरू कर दिया है, साथ ही एनआईए ने छापे मारी की भी शुरूआत कर दी है।
अब संविधान की उन विशेष अनुच्छेदों ‘370’ व ‘35ए’ पर नजर डाली जाए, जिसके तहत् जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ है। यद्यपि ये धाराएं अस्थायी है जो राज्य विधानसभा की अनुमति से कभी भी खत्म की जा सकती है, किंतु आज तक चूंकि किसी भी केन्द्र सरकारर ने इस दिशा में प्रयास नहीं किया, इसलिए ये धाराएं पिछले सत्तर सालों से चली आ रही है और जम्मू-कश्मीर को देश के अन्य राज्यों से अलग विशेष दर्जा प्राप्त है।
धारा-35ए जम्मू-कश्मीर विधानसभा को राज्य के ‘स्थायी निवासी’ की परिभाषा तय करने का अधिकार देता है। वर्ष 1954 मंे इस तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद के आदेश के माध्यम से संविधान से जोड़ा गया था, इस अनुच्छेद ने स्थायी नागरिकता को विशेष अधिकार दिए है, इसके तहत अस्थायी नागरिक न जम्मू-कश्मीर में स्थायी रूप से निवास कर सकते है और न ही इस राज्य में कोई चल-अचल सम्पत्ति खरीद सकते है। साथ ही इस राज्य की कोई महिला या पुरूष किसी अन्य राज्य के निवासी लड़के-लड़की से विवाह रचा सकता है, यदि विवाह रचाता है तो संबंधित लड़के या लड़की की जम्मू-कश्मीर की स्थायी नागरिकता स्वतः ही खत्म हो जाती है। अब मोदी सरकार का प्रयास है कि जम्मू-कश्मीर से यह विशेष धारा खत्म कर इस राज्य को भी अन्य राज्यों की बराबरी में खड़ा कर दिया जाए।
अब यदि अनुच्छेद-370 पर नजर डाली जाए तो इस अनुच्छेद के प्रावधानों के मुताबिक संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में सिर्फ रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है, किंतु इन तीन विषयों के अलावा किसी अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू करवाने के लिए केन्द्र को राज्य सरकार से अनुमति सहमति लेनी पड़ती है, इसी अनुच्छेद के तहत् जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रीय ध्वज भी अलग है, साथ ही इसी धारा के प्रावधानों के तहत जम्मू-कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल भी छः साल का है, जबकि पूरे देश में संसद व राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल पांच साल है और इसी धारा के तहत जम्मू-कश्मीर में सूचना का अधिकार (आर.टी.आई.) भी लागू नहीं होता।
इस तरह कुल मिलाकर संविधान के ‘370’ व ‘35ए’ के विशेष प्रावधानों के कारण भारतीय गणराज्य में सिर्फ जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है और पूरे देश में समानता के संवैधानिक अधिकार के तहत देश की मौजूदा मोदी सरकार जम्मू-कश्मीर से ये संवैधानिक बंधन खत्म कर देश के सभी राज्यों के एक ही समानता की श्रेणी में लाना चाहती है और मोदी जी ने गृहमंत्री अमित शाह को यही महत्वपूर्ण साहसिक जिम्मेदाारी सौंपी है। इस बारे में प्रधानमंत्री व गृहमंत्री के बीच गंभीर मंत्रणा कर अगले चरणों पर चर्चा भी हो चुकी है, संभव है प्रधानमंत्री जी अगले महीनें स्वतंत्रता की बहत्तरवी वर्षग्रंथी पर लाल किले की प्राचीर से देश को यह सौगात देने की घोषणा करें!

 

दिल्ली से सीखे सब सरकारें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने ऐसा एतिहासिक काम कर दिखाया है, जिसका अनुकरण भारत की सभी प्रांतीय सरकारों को तो करना ही चाहिए, हमारे पड़ौसी देशों की सरकारें भी उससे प्रेरणा ले सकती है। ‘आप’ पार्टी की इस सरकार ने दिल्लीवासियों के लिए 200 यूनिट प्रति माह की बिजली का बिल माफ कर दिया है। यदि किसी घर में 201 यूनिट से 400 यूनिट तक बिजली खर्च होती है तो उसे आधा बिल ही चुकाना होगा। इस नई रियायत का सीधा फायदा दिल्ली के लगभग 60 लाख उपभोक्ताओं को मिलेगा। प्रत्येक घर और दुकान को 600 रु. से 1000 रु. तक हर महिने बचत होगी। इतना ही नहीं, दिल्ली प्रदेश की बिजली की खपत भी घट जाएगी, क्योंकि हर आदमी कोशिश करेगा कि वह 200 के बाद एक यूनिट भी न बढ़ने दे। जो 400 यूनिट बिजली जलाएंगे, वे भी अपनी खपत पर सख्त निगरानी रखेंगे ताकि उन्हें आधे पैसों से ज्यादा न देने पड़ें। जाहिर है कि इस कदम से दिल्लीवालों को जबर्दस्त राहत मिलेगी। दिल्ली के 80 प्रतिशत से भी ज्यादा लोग ‘आप’ सरकार के प्रशंसक बन जाएंगे। दिल्ली के विपक्षी दलों, भाजपा और कांग्रेस, का नाराज़ होना स्वाभाविक है। उनके इस आरोप में कोई दम नहीं है कि केजरीवाल सरकार लोगों में मुफ्तखोरी की आदत डाल रही है। क्या उनके मंत्रियों, विधायकों और सांसदों ने उन्हें मुफ्त मिलनेवालीं बिजली का कभी बहिष्कार किया है ? उनका यह कहना सही हो सकता है कि यह अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया का चुनावी पैंतरा है। अगर ऐसा है तो भी इसमें गलत क्या है ? इन दोनों बड़ी पार्टियों के पास केंद्र और राज्यों की कई सरकारें हैं। इन्होंने भी ऐसा पैंतरा क्यों नहीं मार लिया ? सभी पार्टियां चुनाव जीतने के लिए तरह-तरह के पैंतरे मारती हैं। अब यह आरोप लगाने की कोई तुक नहीं है कि दिल्ली की आप सरकार ने पहले बिजली के दामों में फेर-बदल करके 850 करोड़ रु. लुट लिए और अब वह वही पैसा बांटकर जनता को बेवकूफ बना रही है। केजरीवाल सरकार के इस कदम से उसका वोट बैंक मजबूत होगा, इसमें जरा भी शक नहीं है, क्योंकि इसका फायदा सबसे ज्यादा उस तबके को मिलेगा, जो सबसे ज्यादा वंचित है, गरीब है और जिसके मतदाताओं की संख्या सबसे ज्यादा है। यों भी लोकतांत्रिक सरकारें दावा करती हैं कि वे लोक कल्याणकारी होती हैं। तो क्या यह उनका न्यूनतम कर्तव्य नहीं है कि वे जनता को हवा, दवा, पानी और बिजली आसान से आसान कीमत पर उपलब्ध करवाएं ? मेरा बस चले तो मैं इस सूची में हर नागरिक के लिए रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और मनोरंजन को भी जुड़वा दूं।

भ्रामक विज्ञापनों पर शिकंजा कसना जरूरी
सनत जैन
ग्राहकों को अधिक अधिकार देने और उपभोक्ता अदालतों को पहले से ज्यादा मजबूत बनाने संबंधी प्रावधान वाले उपभोक्ता संरक्षण विधेयक पर लोकसभा ने मुहर लगा दी है। अगले सप्ताह राज्यसभा में इस बिल के पारित होने के बाद उपभोक्ताओं के हित में नया कानून उपभोक्ता संरक्षण कानून 1986 की जगह लेगा। इस बिल में केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण के गठन का प्रस्ताव है। यह प्राधिकरण अनैतिक व्यापारिक गतिविधियों को रोकने और ग्राहकों के अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप कर सकता है। यह बिल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बीते तीन से भी अधिक दशक से बड़ा प्रयास नहीं हुआ है, जबकि इस बीच ऑन लाइन मार्केटिंग समेत व्यापार के क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया है। ऐसी परिस्थिति में ग्राहकों के अधिकारों की रक्षा के लिए पुराने कानून में बदलाव की जरूरत है। हालांकि, अब सरकार ने इस दिशा में पहल की है।
ग्राहकों के हितों की रक्षा के लिए केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण का गठन किया जाएगा, निर्माता और सेवा प्रदाताओं की जिम्मेदारी सिर्फ अपने ग्राहक तक नहीं बल्कि सभी उपभोक्ताओं के प्रति होगी, उपभोक्ता अदालत में ग्राहक को वकील की जरूरत नहीं होगर, भ्रामक विज्ञापन पर सेलेब्रिटी को भारी जुर्माना भरना होगा और 21 दिनों में हर हाल में शिकायत दर्ज होगी। सामान के निर्माण, सेवा, पैकेजिंग, लेबलिंग में खामी की वजह से ग्राहक की मौत या उसके किसी भी तरह के नुकसान के लिए अब निर्माता ही नहीं विक्रेता भी जिमेदार होगा। यह कानून इसलिए जरूरी है क्योंकि भ्रामक विज्ञापनों के फेर में फंसकर ग्राहक न सिर्फ जेब ढीली कर रहा है, बल्कि शरीर को भी नुकसान पहुंचा रहा है।
पिछले दो वर्षों में फास्ट फूड मैगी में हानिकारक तत्व की मौजूदगी के मामले उजागर होने के बाद कई फिल्मी सितारों ने किए थे। इस खाद्य पदार्थ का विज्ञापन करने वाली कई मशहूर हस्तियों-अमिताभ बच्चन, प्रीति जिंटा और माधुरी दीक्षित पर बिहार की एक अदालत ने पुलिस केस दर्ज करने व जरूरत पडऩे पर गिरफ्तार करने के निर्देश भी दिए थे। माधुरी दीक्षित हों या महेंद्र सिंह धोनी, उनके कदमों से यह सवाल एक बार फिर उठा है कि क्या मशहूर लोगों और सिने हस्तियों को ऐसी चीजों का प्रचार करना चाहिए, जिनकी गुणवत्ता और उपयोगिता आदि को लेकर कई संदेह हो सकते हैं? क्या उन्हें ऐसी चीजों का बखान करना चाहिए जिनके वे खुद ग्राहक नहीं हैं, जिनका वे खुद तो इस्तेमाल नहीं करते, लेकिन उनके गुणों का बढ़-चढ़कर उल्लेख करते हुए जनता से उन्हें अपनाने की बात कहते हैं। मशहूर हस्तियां ऐसा प्रचार क्यों करती हैं? पिछले साल एक माह (फरवरी) के दौरान भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) की ग्राहक शिकायत परिषद को जिन 167 विज्ञापनों की शिकायतें मिली थीं, उनमें से 73 शिकायतें पर्सनल और हेल्थकेयर वर्ग में भ्रामक विज्ञापनों को लेकर ही की गई थीं और ये शिकायतें सही भी पाई गईं। शिकायतों के आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विज्ञापनों द्वारा धोखाधड़ी किस स्तर पर हो रही है? ऐसे में यह समझना भी कठिन नहीं कि इन विज्ञापनों के चमक-दमक भरे दावों पर लगाम लगाना कितना जरूरी है। देखा गया है कि बाजार में किसी भी उत्पाद को चर्चित कराने और उसकी बिक्री बढ़ाने के लिए विभिन्न कंपनियां सिनेमा और खेल जगत की हस्तियों का सहारा लेती हैं।
यह कतई जरूरी नहीं होता कि ये हस्तियां उन सारे उत्पादों का अपने जीवन में इस्तेमाल करते हों, पर विज्ञापनों में उनकी छवि इस तरह पेश की जाती है कि वे उनका धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं और उनके कई फायदे उन्हें नजर आए हैं। अपने चहेते सितारों को किसी चीज का प्रचार करते देख आम लोगों के मन में यह भावना पैदा होती है कि क्यों न वे भी उन चीजों का इस्तेमाल करें। साबुन, तेल, सूप, नूडल्स, वॉटर प्यूरीफायर से लेकर सेहत बनाने वाली दवाओं तक के प्रचार सिनेमा व खेल जगत की हस्तियां खूब करती हैं। यही नहीं, वे शायद ही कभी जांच अपने स्तर पर कराती हैं कि जिन बातों या फायदों का उल्लेख उन्होंने विज्ञापन में किया है, उनमें कोई सचाई है भी या नहीं। वे विज्ञापनदाता द्वारा सुझाई गई लाइनों और दावों को दोहरा देते हैं जिससे आम जनता में यह संदेश जाता है कि उनके चेहेते सितारे तक वे चीजें अपने प्रयोग में ला रहे हैं जो बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं और उन्हें खरीदने में कोई हर्ज नहीं हैं।
खास तौर से बच्चों और महिलाओं को किसी खास वस्तु की तरफ आकर्षित करने के लिए ऐसे ही सितारों द्वारा कोई उत्पाद विज्ञापनों में लाया जाता है और देखते ही देखते उस उत्पाद की बिक्री बढ़ जाती है। यह विज्ञापन जगत की सोची-समझी प्रक्रिया है। पर इसमें पेच यही है कि क्या इस तरह भोली-भाली जनता को मूर्ख तो नहीं बनाया जाता है? इस बारे में सच्चाई यह है कि खेल या सिनेजगत की हस्तियों द्वारा प्रचारित चीजों के विज्ञापनों में यह घोषणा कहीं नहीं होती है कि इन चीजों का इस्तेमाल खुद उन हस्तियों ने किया है। किसी उत्पाद की गुणवत्ता को जांचे-परखे बिना उन्हें खरीदने की सलाह देने के बारे में कुछ नियम देश में पहले से हैं। जैसे खाने-पीने की चीजों के बारे में केंद्रीय खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग का नियम यह है कि अगर किसी कंपनी का ब्रांड अंबेसडर किसी चीज की खासियत या गुणवत्ता का बखान करता है और वह गुण उसमें नहीं होता है, तो ऐसे विज्ञापन को भ्रामक माना जाता है। ऐसे विज्ञापन के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।
सितारों को दौलत-शोहरत से आगे बढ़कर जनता के हितों के बारे में भी सोचना चाहिए। वे यह कर बरी नहीं हो सकते हैं कि उन्होंने किसी उत्पाद का सिर्फ प्रचार किया है, उसे उन्होंने खुद इस्तेमाल में नहीं लिया है। यह काम कानून के जरिए भी हो सकता है। भ्रामक विज्ञापनों के लिए सितारों को भी दोषी मानकर कठघरे में लाया जाना चाहिए और इसकी वाजिब सजा दी जानी चाहिए। सरकार का कानून बनाना इसलिए जरूरी है ताकि भ्रामक विज्ञापनों के नकारात्मक प्रभावों को लेकर जनता सतर्क रहे।

कितना शरीफ है, यह बलात्कारी !
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सर्वोच्च न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उन्नाव में हुए बलात्कार के मामले में जिस फुर्ती से कार्रवाई की है, उसने देश के सीने में लगे घाव पर थोड़ा मरहम जरुर लगाया है। उप्र के विधायक कुलदीप सेंगर पर आरोप है कि 2017 में एक कम उम्र की लड़की के साथ उसने जो बलात्कार किया था और उस बलात्कार पर पर्दा डालने के लिए उसने कई नृशंस हत्याओं का सहारा लिया है, वैसा मर्मभेदी किस्सा तो पहले कभी सुनने में भी नहीं आया। जिस लड़की के साथ बलात्कार हुआ था, उसने इंसाफ का दरवाजा खटखटाने के खातिर पिछले साल उप्र के मुख्यमंत्री के घर के आगे आत्मदाह करने की कोशिश भी की थी। उस विधायक पर आरोप है कि उस पीड़ित लड़की के साथ-साथ उसके उन सब रिश्तेदारों को भी वह मौत के घाट उतार देना चाहता है, जो उस कुकर्म के साक्षी रहे हैं या जो उस लड़की को न्याय दिलाने के लिए कमर कसे हुए हैं। लड़की के पिता को पुलिस से फर्जी मामले में गिरफ्तार करवाकर पहले ही मरवा दिया गया। लड़की का चाचा अभी जेल में है। वह लड़की, उसकी चाची और उसका वकील जिस कार से यात्रा कर रहे थे, उस कार को एक छिपे हुए नंबर के ट्रक ने इतनी जोर से टक्कर मारी कि बलात्कार की साक्षी वह चाची मर गई। दूसरी चाची भी मर गईं। वह लड़की और उसका वकील अभी भी मृत्यु-शय्या पर हैं। शंका है कि यह सारा षड़यंत्र सेंगर जेल में रहते हुए ही करवा रहा है। इस हत्याकांड में उप्र के एक मंत्री के दामाद का भी हाथ बताया जा रहा है। ऐसा लगता है कि यह सारा मामला जातिवाद के चक्र में फंस गया है। उप्र की सरकार पर आरोप है कि उसने सारे मामले को ढील दे रखी है। वास्तव में विधायक सेंगर आजकल भाजपा का सदस्य रहा है। उसे पहले निलंबित किया गया था और अब उसे पार्टी से निकाला गया है। सेंगर पहले कांग्रेस में था, फिर वह बसपा में गया, फिर सपा में रहा और फिर 2017 में भाजपा में आया। याने वह इतना शरीफ और काम का आदमी है कि सभी पार्टियों ने उसका स्वागत किया। हमारी राजनीतिक पार्टियों के नैतिक दीवालियेपन का साक्षात प्रतीक है- कुलदीप सेंगर ! सर्वोच्च न्यायालय ने सारे मामले को 45 दिन में पूरा करने और उसे लखनऊ से दिल्ली लाने का निर्देश दिया है। ट्रक-दुर्घटना की जांच सात दिन में पूरी होगी। पीड़िता के परिवार को पूर्ण सुरक्षा और पीड़िता को उप्र सरकार 25 लाख रु. तुरंत देगी। घायलों के इलाज की जिम्मेदारी सरकार लेगी। अदालत ने सरकार के कान तो खींच दिए हैं लेकिन यह समझ में नहीं आता कि हमारी जनता का चरित्र कैसा है ? ऐसे अपराधी चरित्र के नरपशुओं को चुनकर वह विधानसभा और संसद में कैसे भेजेती है ? क्या अपने लिए भी वह कोई सजा सुझाएगी ?

कानून का राज अमीरों के लिए
सनत कुमार जैन
भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू है। यहां के नागरिकों को समान अधिकार संविधान से मिले है। विधायिका को कानून बनाने, कार्यपालिका को कानून का पालन कराने तथा न्यायपालिका को, कार्यपालिका और विधायिका तथा संविधान नागरिकों मौलिक प्रदत्त अधिकारों की रक्षा करने का दायित्व सौंपा गया है। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई लड़ रहे योद्धाओं ने संघर्ष किया था। उन्होंने ईस्ट इंडिया कम्पनी, अंग्रेजों, राजाओं और जागीरदारों द्वारा आम नागरिकों से गुलामों की तरह जो व्यवहार किया जा रहा था, उसे देखा था। जिसके कारण वह देश को अंग्रेजों की गुलामी से स्वतंत्र कराने और उसके बाद भारतीय संविधान में गरीब एवं अमीर को बिना किसी के भेदभाव के न्याय मिले। इसके लिए संविधान के माध्यम से हमें जो मौलिक अधिकार दिए थे। उन सभी मौलिक अधिकारों के लाभ अब केवल अमीरों को तो मिल रहे हैं। गरीबों के साथ न्याय के नाम पर अन्याय करने का काम अमीरों एवं ताकतवरों लोगों ने पहले से ज्यादा अब करना शुरू कर दिया है। अब तो बुर्जुग भी कहने लगे है कि इससे अच्छा शासन तो अंग्रेजों का था। मुगलराज में जो प्रताणना हिन्दुओं को नहीं सहनी पड़ी। जो वर्तमान राज में हिन्दुओं को सहना पड़ रही है। पिछले तीन दशकों में विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका में अमीरों की दखंलदाजी बढ़ी है। शासन-प्रशासन एवं निर्वाचित प्रतिनिधि जिस तरह अमीरों के साथ मिलकर गरीबों को लूटने और प्रताणित करने का काम कर रहे हैं। उससे गरीबों को न्याय मिलना तो दूर, न्याय के नाम पर उन्हें प्रताणित करने का जो सिलिसला शुरू हुआ है, वह अब अपने चरम पर पहुंच गया है। उससे गरीब त्राहि-त्राहि कर रहा है।
हाल ही में उन्नाव की घटना ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की वास्तविक्ता को उजागर कर, हर भारतीय नागरिक को सोचने पर विवश कर दिया है, कि क्या हम लोकतांत्रिक देश में रह रहे है। क्या यहां पर कानून का राज है। भाजपा के विधायक कुलदीप सिंह ने एक पीड़िता के साथ रेप (बलत्कार) किया। पुलिस में शिकायत करने पर आरोपी पर कार्यवाही करने से पुलिस बचती रही।आरोपी के पिता की हत्या रेप के बाद पुलिस पर है। जब मामले ने तूल पकड़ा, तो पुलिस ने तहरीर (रिर्पोट) लिखकर आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। आरोपी और उसके परिवारजन लगातार पीड़िता और उसके परिवार को लगातार धमका रहे थे, कि वह अपनी रिर्पोट वापिस ले ले। बाद में कोर्ट में बयान बदलने का दबाव बना रहे थे। भाजपा के एक सांसद जो गेरूआ वस्त्र पहनकर अपने आपको साधु और हिन्दुओं का लंबरदार बताते है। वह आरोपी से मिलने जेल पहुंच जाते है। राजनैतिक दबाव में पीड़िता की रेप के सबूत कमजोर करने का काम पुलिस और जाँच एजेंसियों कर रही थी। आरोपी जेल में था। आरोपी के परिवारजनों ने पीड़ित परिवार के सदस्यों पर झूठे आरोप लगाकर पीड़िता के चाचा को गिरफ्तार कराकर जेल भेज दिया। पीड़िता और उसके परिवार ने 33बार पुलिस से तथा न्यायालय से सुरक्षा की गुहार लगाई। सरकार ने सुरक्षा उपलब्ध करा दी। सुरक्षाकर्मी भी बजाए पीड़िता और उसके परिवार की सुरक्षा देने के स्थान पर पीड़ित परिवार की जासूसी कर आरोपी को खबरें दे रहे थे। पीड़िता का इलाज चल रहा था। उसके परिवार को लगातार प्रताणित किया जा रहा था। पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट में सुरक्षा के लिए 12 जुलाई को पत्र लिखकर की गुहार लगाई। इससे नाराज पीड़ित परिवार के सदस्यों को सरेराह बिना नम्बर के ट्रक से टक्कर मारकर आरोपी ने पीड़िता और उसके परिवार के सदस्यों को मारने की कोशिश कीं। इस टक्कर में पीड़िता की चाची घटना स्थल पर ही मर गई। पीड़िता और परिवार के अन्य सदस्य गंभीर रूप से घायल हो गए। लखनऊ के किंगजार्ज मेडीकल कॉलेज में उसका इलाज चल रहा है। वेंटीलेटर में जीवन-मौत का संघर्ष पीड़िता कर रही है। मामले ने जब तूल पकड़ा तो सरकार हरकत में आई। पुलिस और शासन अभी भी आरोपी को बचाने का प्रयास अप्रत्यक्ष रूप से कर रहा है। प्रत्यक्ष रूप में पीड़िता को न्याय दिलाने की बात कर रहा है। पत्नी का अंतिम संस्कार करने के लिए पीड़िता के चाचा को लाने के लिए पीड़िता के परिवार को पापड़ बेलना पड़ रहा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है। गरीब अथवा सामान्य परिवार कैसे भारत में न्याय प्राप्त सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने जब इस मामले ने तूल पकड़ा, तो फटाफट सुनवाई करने और पत्र पर कार्यवाही ना करने वाले रजिस्टार को नोटिस जारी कर दिया। भाजपा के गिरफ्तार विधायक को बचाने का काम जब सांसद उ.प्र. की पुलिस और सरकार कर रही है। ऐसी स्थिति में तो यही कहा जा सकता है, होई वही जो राम रचि राखा। इसमें लोकतंत्र में मिले न्याय की तो बात नहीं रही। तुलसीदास जी, रामचरित्र मानस में हमें जो ज्ञान दे गए है। वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में वहीं ज्ञान सार्थक है। “समरथ को नहीं दोष गुसांई” की तर्ज पर पीड़िता और उसका परिवार, यदि अपना भाग्य मानकर चुपचाप बैठ गया होता, तो जो कष्ट उस परिवार को न्याय मांगने में झेलना पड़ रहा है। वह तो नहीं भोगना पड़ता। न्याय की आस में रसूखदार और अमीर किस तरह कानून को अपनी जेब में रखकर मनमानी करते है। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था के वर्तमान का सत्य है। वर्तमान शासन व्यवस्था में जो इस सत्य को स्वीकार कर लेगा, वह शोषण कराता रहेगा, अपना भाग्य मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेगा। इससे उसके कष्ट एक बार में जो होना था, वह हो जाएगा। रोज-रोज, तिल-तिल करके न्याय, कानून व्यवस्था, मौलिक अधिकार के फेर में पड़कर अभी जो अन्याय और कष्ट हो रहा है। वह तो नहीं होगा। भगवान की आज्ञा समझकर अमीरों एवं रसूखदारों के खिलाफ आवाज उठाना वर्तमान में पाप करने के समान है। गरीब और सामान्य व्यक्ति शोषण को नियति मानकर जितना स्वीकार करेंगे, उतना ही सुखी रहेंगे। यही कलयुग और वर्तमान व्यवस्था का सत्य है। जिस तरह धृतराष्ट्र के दरबार में जब द्रोपदी का चीरहरण हो रहा था। भीष्म पितामह, बिदूर एवं राजगुरु नजरे झुकायें नीचे बैठे थे। कुछ इसी तरह की स्थिति पुन- देखने को मिल रही है।

काबुल में अराजकता
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
एक तरफ तालिबान को पटाने के लिए अमेरिका इमरान खान को फुसलाने की कोशिश कर रहा है और दूसरी तरफ तालिबान ने अफगानिस्तान में उप-राष्ट्रपति के उम्मीदवार अमरुल्लाह सालेह पर हमला बोल दिया है। सालेह राष्ट्रपति हामिद करजई के दौर में अफगानिस्तान के गुप्तचर विभाग के मुखिया थे। कुछ वर्षों पहले वे काबुल होटल में मुझसे मिलने आए थे और मैंने उनका रवैया भारत के बारे में काफी मित्रतापूर्ण पाया था। यह अच्छा हुआ कि उनकी जान बच गई। वे घायल हुए और उनके 20 साथी मारे गए। यहां प्रश्न यही है कि सालेह पर हुए हमले का अर्थ क्या निकाला जाए ? पहली बात तो यह कि सालेह खुद तालिबान के सख्त विरोधी हैं। उन्होंने गुप्तचर विभाग के प्रमुख के तौर पर कई ऐसे कदम उठाए है, जिन पर पाकिस्तान ने काफी नाराजी जाहिर की। वे वर्तमान राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथी के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं। उन पर जानलेवा हमले का अर्थ यह हुआ कि पाकिस्तान और तालिबान नहीं चाहते कि सितंबर में होनेवाले चुनाव तक गनी और सालेह-जैसे लोग जिंदा भी रहें। वे इस चुनाव को एक फिजूल की हरकत समझ रहे हो सकते हैं। यदि तालिबान से अमेरिका और पाकिस्तान बात कर रहे हैं तो वह बात इसीलिए हो रही है कि काबुल की सत्ता उन्हें कैसे सौंपी जाए ? यदि सत्ता उन्हें ही सौंपी जानी है तो चुनाव का ढोंग किसलिए किया जा रहा है ? अमेरिका और पाकिस्तान ने तालिबान को चुनाव लड़ने के लिए अब तक तैयार क्यों नहीं किया ? यों भी आधे अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा है। यदि तालिबान सचमुच अपने पांव पर खड़े होते और लोकप्रिय होते तो उन्हें चुनाव से परहेज क्यों होता ? अमेरिका और पाकिस्तान, दोनों को यह गलतफहमी है कि तालिबान का राज होने पर अफगानिस्तान में शांति हो जाएगी। ज्यादातर तालिबान लोग गिलजई पठान हैं। उनके शीर्ष नेताओं से मेरा काबुल, कंधार, लंदन और वाशिंगटन में कई बार संपर्क रहा है। उनके सत्तारुढ़ होने पर उनकी स्वायत्ता पाकिस्तान पर बहुत भारी पड़ सकती है। वे स्वतंत्र पख्तूनिस्तान की मांग भी कर सकते हैं। इसके अलावा तालिबान के लौटने की जरा भी संभावना बनी नहीं कि काबुल, कंधार, हेरात, मज़ारे-शरीफ जैसे शहर खाली हो जाएंगे। अमेरिका अपना पिंड छुड़ाने के लिए अफगानिस्तान को अराजकता की भट्टी में झोंकने पर उतावला हो रहा है।

सवालों के घेरे में अनुच्छेद 35 ए
दिलीप झा संगम
अनुच्छेद 35ए इसलिए सवालों के घेरे में है क्योंकि उसे राष्ट्रपति के आदेश के तहत संविधान में जोड़ा गया था। अनुच्छेद 351 इतना भेदभाव भरा है इसका पता इससे चलता है कि उसके कारण जम्मू-कश्मीर से बाहर के लोग इस राज्य में ना तो अचल संपत्ति खरीद सकते हैं और ना ही सरकारी नौकरी हासिल कर सकते हैं।
इस तरह धारा 35 ए जम्मू कश्मीर विधानसभा को राज्य के स्थाई निवासी की परिभाषा तय करने का अधिकार देता है। वर्ष 1954 में इसे तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के आदेश के माध्यम से संविधान से जोड़ा गया था। लेकिन इस विवादास्पद और भेदभाव पूर्ण अनुच्छेद 370 को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के लिए तैयार है और यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि उसके समक्ष जम्मू कश्मीर से जुड़ा एक और विवादास्पद अनुच्छेद 35ए पहले से ही विचाराधीन है। इस अनुच्छेद के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का फैसला जो भी हो, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि राष्ट्रपति के आदेश निर्देश से कोई प्रावधान संविधान का हिस्सा नहीं हो सकता। 370 के बारे में पहले दिन से स्पष्ट है कि यह अस्थाई व्यवस्था है। जाहिर है यह अस्थाई व्यवस्था तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए की गई थी। क्योंकि उस समय के राजनेताओं को यह भरोसा था कि परिस्थितियां जरुर बदलेंगी इसलिए अनुच्छेद 370 को अस्थाई रूप दिया गया था। यह विडंबना है कि जो व्यवस्था अस्थाई तौर पर लागू की गई उससे कुछ राजनीतिक दल स्थाई रूप देने की वकालत कर रहे हैं।
क्या यह संविधान की भावना के प्रतिकूल नहीं? आखिर अस्थाई व्यवस्था को स्थाई रूप कैसे दिया जा सकता है? इस पर विभिन्न दलों के नेताओं और लोगों की राय कुछ भी हो सकती है लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अनुच्छेद 370 भारत से अलगाव का जरिया बन गया है। कश्मीर केंद्रित दल कश्मीरियत का जिक्र कुछ इस तरह करते हैं जैसे वह भारतीयता जैसे विराट स्वरूप से कोई अलग चीज हो। वहीं भाजपा के एजेंडे में वर्षों से शामिल है कि एक देश, एक विधान एवं एक निशान को लागू कर देशव्यापी पहचान को जन-जन तक पहुंचाना है। यह भी सर्वविदित है कि मोदी सरकार को दोबारा प्रचंड बहुमत जनता ने कुछ ऐतिहासिक काम जो आज तक नहीं हुए उन्हें पूरे करने के लिए दिए हैं। जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 35ए हटाने को लेकर केंद्र सरकार ने जो अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है उससे अलगाववादी बेचैन है। इसके पीछे कारण यह है कि अलगाववादियों की दुकान अब घाटी में बंद हो रही है। यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर के सूरत ए हालात बदल रहे हैं। आतंकियों को फंडिंग करने वालों पर एनआईए का कड़ा प्रहार जारी है। इससे प्रतीत होता है कि कश्मीर में व्याप्त अलगाववाद एवं आतंकवाद की कमर तोड़ने के लिए मोदी सरकार प्रतिबद्ध है।
यूं तो आतंकवाद को लेकर भाजपा की नीति जीरो टॉलरेंस हमेशा रही है लेकिन वर्तमान में पीएम मोदी और गृह मंत्री शाह की अनोखी जोड़ी कार्यशैली संस्कृति पर बल देकर राजनीतिक भूलों को सुधारने में जुटी हैं। पिछले 70 सालों की समस्या को हल करने की दिशा में मोदी सरकार अग्रसर है क्योंकि अनुच्छेद 370 इस समस्या की जड़ है और इसे खत्म करने के लिए पहल होने लगी है। निसंदेह किसी राज्य को उसके हालात के मद्देनजर विशेष दर्जा देने में कोई हर्ज नहीं है। वर्तमान में 10 राज्यों को विशेष दर्जा हासिल है, लेकिन ऐसा विशेष दर्जा किसी राज्य को नहीं दिया जा सकता जो अलगाववाद को हवा दे और राष्ट्रीय एकता में बाधक बने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जम्मू कश्मीर की समस्या की तह में जाकर उसे हल करने के लिए प्रयत्नशील हैं और यही कारण है कि उन्होंने अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा और सहायता बंद कर दी है। जो आज तक कांग्रेस सरकार नहीं कर पायी परिणाम स्वरूप अब कश्मीर के हालात में सुधार हो रहा है लेकिन पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस के नेताओं को अमन बहाली प्रक्रिया रास नहीं आ रही हैं। वे अपने वोट बैंक के लिए घाटी के लोगों को भ्रमित करने में जुटे हैं। वहीं कश्मीर में अतिरिक्त सैन्य बलों की तैनाती पर विभिन्न राजनीतिक दलों की बयानबाजी के बीच पीएम मोदी ने रेडियो पर प्रसारित अपने मासिक कार्यक्रम मन की बात में आतंकियों और अलगाववादियों को भी संदेश दिया है कि घृणा और हिंसा की उनकी मंशा सफल नहीं होगी। उन्होंने कहा कि कश्मीर के लोग अब विकास की मुख्यधारा से जुड़ने को बेताब है।

राज्यपाल अब संविधान के नहीं’ सत्ता के संरक्षक….?
ओमप्रकाश मेहता
इक्कीसवीं सदी के आरंभ में अर्थात् स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में राज्यों के राज्यपालों के पद और उनकी भूमिका पर काफी बहस छिड़ी थी और उस बहस का भावार्थ यही निकाला गया था कि ‘राज्यपाल’ का पद निरर्थक और व्यर्थ है। वास्तव में भारतीय संविधान में राज्यपाल पद का समावेश इसलिए किया गया था, जिससे कि राज्यपाल भारत के राष्ट्रपति जी के प्रतिनिधि के रूप में प्रदेशों में संविधान को ईमानदारी से लागू रहने और उसके उल्लंघन पर सत्तारूढ़ दल या सत्ता पदाधिकारियों पर नियंत्रण रखें। चूंकि राष्ट्रपति को राष्ट्रीय स्तर पर पूरे संवैधानिक अधिकार प्राप्त होते है, वैसे ही राज्यस्तर पर संवैधानिक अधिकार राज्यपाल के पास हो और वे राज्यों में संवैधानिक व्यवस्था सुचारू रूप से चलाने में संरक्षक की भूमिका निभाएं इसी उद्देश्य से राज्यपाल का पद कायम किया गया था और इसी संवैधानिक भावना के अनुरूप आजादी के बाद कुछ दशकों तक राज्यपालों ने अपनी भूमिका का निर्वहन भी किया, किंतु बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में सत्ता की राजनीति ने राज्यपालों को भी अपनी ‘कठपुतली’ की श्रेणी में ले लिया और उसी समय से जो केन्द्र में सत्तारूढ़ दलों की मंशा के अनुरूप राज्य सरकारों को गिराया व उठाया जाने लगा, तब तत्कालीन प्र्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को यह प्रक्रिया रास नहीं आई और तभी सत्ता के गलियारें से ही राज्यपाल की भूमिकाओं को लेकर सवाल उठाए जाने लगे थे और इस पद की संवैधानिक उपयोगिता के आगे प्रश्न चिन्ह खड़े किए जाने लगे थे किंतु वाजपेयी सरकार के बाद यूपीए सरकार आने पर कुछ समय तक इन चर्चाओं पर विराम लग गया, किंतु यूपीए सरकार के दौरान भी राज्यपालों की नियुक्ति का मुख्य मापदण्ड उनका ‘‘संवैधानिक ज्ञान या अनुभव’’ नहीं ‘‘राजनीतिक जोड़-तोड़ की क्षमता’’ ही रहा, और जब पांच साल पहले मोदी जी की एनडीए सरकार बनी तो उन्होंने भी विरासत में मिली इस प्रक्रिया को अपने अनुसार और सहज बनाकर उसे जारी रखा, और इसका दायरा राज्यपाल से विस्तारित होकर राष्ट्रपति तक बढ़ा दिया गया और इस तरह राष्ट्रपति से लेकर राज्यपाल तक के संवैधानिक पद सत्ता के ‘यस मैन’ बनकर रह गए।
…..और अब तो राज्यपालों की नियुक्ति के पूर्व सम्बंधित राजनेताओं का ‘बाॅयोडाटा’ देखा जाता है और उनकी जोड़-तोड़़ की राजनीतिक क्षमता को रेखांकित कर उन्हें संबंधित परेशानी राज्य में नियुक्ति दी जाती है, जैसा कि हाल ही में मध्यप्रदेश में दी गई। मध्यप्रदेश में नवनियुक्त राज्यपाल का ‘बाॅयोडाटा’ उत्तरप्रदेश के घर-घर में मौजूद है। यही स्थिति आज देश के हर राज्य में मौजूद है, जहां गैर भाजपा सरकारें है, और मेरे इस तर्क का ताजा उदाहरण कर्नाटक राज्य और वहां का राजनीतिक घटनाक्रम के बीच राज्यपाल की भूमिका है।
देश की केन्द्रीय राजनीति आज चूंकि गृृहमंत्री अमित शाह तक सिमटकर रह गई है और राज्यपालों की नियुक्ति में गृृह मंत्रालय की ही अहम् भूमिका होती है, इसलिए अब यह संभावना बढ़ गई है कि राज्यपालों के चयन के मापदण्ड बदल जाएं और उन्हें ही इस अहम् पद पर सुशोभित किया जाए जो गठजोड़ की राजनीति का विशेषज्ञ हो और देश के बुद्धिजीवियों की इस आशंका को लाल जी टंडन की नियुक्ति ने सही साबित भी कर दिया है। यद्यपि टंडन जी भी राजनीति की नदी के घिसे-पीटे शंकर है, जिन्होंने 2009 में अटल जी की अस्वस्थता के बाद ‘‘लखनऊ का अटल’’ बनने की कौशिश की थी, लखनऊ की सरज़मी पर ऐतिहासिक पुस्तक भी लिखी जो काफी चर्चित भी रही। किंतु लेखक से ज्यादा उनकी ख्याति भाजपा मायावती के बीच गठजोड़ की रही इसलिए इस ‘घिसेपीटे’ शंकर की पूजा करने का मोदी सरकार ने फैसला लिया।
वैसे मध्यप्रदेश का तो यह एक महज उदाहरण है, पिछले पांच सालों में नियुक्त किए गए राज्यपालों व उनकी भूमिकाओं की समीक्षा की जाए तो वह समीक्षा इस पद की संवैधानिक गरिमा के अनुकूल कतई नहीं होगी। इससे तो अच्छा होता राज्यपाल का पद विलोपित कर उसकी जगह ‘संवैधानिक नियंत्रक’ का पद कायम कर दिया गया होता, तो आज राज्य सरकारों के लिए अधिक सुविधाजनक होता।

कालजयी रचनाकार-मुंशी प्रेमचंद
प्रो.शरद नारायण खरे
(प्रेमचंद जयंती 31जुलाई पर आलेख) प्रेमचंद हिंदी के युग प्रवर्तक रचनाकार हैं। उनकी रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है। वे ऐसे सर्वप्रथम उपन्यासकार थे जिन्होंने उपन्यास साहित्य को तिलस्मी और ऐय्यारी से बाहर निकाल कर उसे वास्तविक भूमि पर ला खड़ा किया। उन्होंने अपनी रचनाओं में जन साधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया। उनकी कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं। प्रेमचंद की रचनाओं को देश में ही नहीं विदेशों में भी आदर प्राप्त हैं। प्रेमचंद और उनकी साहित्य का अंतर्राष्ट्रीय महत्व है। आज उन पर और उनके साहित्य पर विश्व के उस विशाल जन समूह को गर्व है जो साम्राज्यवाद, पूँजीवाद और सामंतवाद के साथ संघर्ष में जुटा हुआ है।
प्रेमचंद की रचनाओं में जीवन की विविध समस्याओं का चित्रण हुआ है। उन्होंने मिल मालिक और मजदूरों, ज़मीदारों और किसानों तथा नवीनता और प्राचीनता का संघर्ष दिखाया है।
प्रेमचंद के युग-प्रवर्तक अवदान की चर्चा करते हुए डॉ॰ नगेन्द्र लिखते हैं -“प्रथमतः उन्होंने हिन्दी कथा साहित्य को ‘मनोरंजन’ के स्तर से उठाकर जीवन के साथ सार्थक रूप से जोड़ने का काम किया। चारों और फैले हुए जीवन और अनेक सामयिक समस्याओं …ने उन्हें उपन्यास लेखन के लिए प्रेरित किया।”
प्रेमचंद ने अपने पात्रों का चुनाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से किया है, किंतु उनकी दृष्टि समाज से उपेक्षित वर्ग की ओर अधिक रहा है। प्रेमचंद जी ने आदर्शोन्मुख यथार्थवाद को अपनाया है। उनके पात्र प्रायः वर्ग के प्रतिनिधि रूप में सामने आते हैं। घटनाओं ने विकास के साथ-साथ उनकी रचनाओं में पात्रों के चरित्र का भी विकास होता चलता है। उनके कथोपकथन मनोवैज्ञानिक होते हैं। प्रेमचंद जी एक सच्चे समाज सुधारक और क्रांतिकारी लेखक थे। उन्होंने अपनी कृतियों में स्थान-स्थान पर दहेज, बेमेल विवाह आदि का सबल विरोध किया है। नारी के प्रति उनके मन में स्वाभाविक श्रद्धा थी। समाज में उपेक्षिता, अपमानिता और पतिता स्त्रियों के प्रति उनका ह्रदय सहानुभूति से परिपूर्ण रहा है।
मुंशी प्रेमचंद के बारे में मूर्धन्य आलोचक हजारीप्रसाद द्विवेदी लिखते हैं-“अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के आचार-व्यवहार, भाषा-भाव, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा, दुःख-सुख और सूझ-बूझ को जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता. . ….समाज के विभिन्न आयामों को उनसे अधिक विश्वसनीयता से दिखा पाने वाले परिदर्शक को हिन्दी-उर्दू की दुनिया नहीं जानती. परन्तु आप सर्वत्र ही एक बात लक्ष्य करेंगे. जो संस्कृतियों औए संपदाओं से लद नहीं गए हैं, अशिक्षित निर्धन हैं, जो गंवार और जाहिल हैं, वो उन लोगों से अधिक आत्मबल रखते हैं और न्याय के प्रति अधिक सम्मान दिखाते हैं, जो शिक्षित हैं, चतुर हैं, जो दुनियादार हैं जो शहरी हैं। यही प्रेमचंद का जीवन-दर्शन है। ”
प्रेमचंद ने अतीत का गौरव राग नहीं गाया, न ही भविष्य की हैरत-अंगेज़ कल्पना की. वे ईमानदारी के साथ वर्तमान काल की अपनी वर्तमान अवस्था का विश्लेषण करते रहे. उन्होंने देखा की ये बंधन भीतर का है, बाहर का नहीं. एक बार अगर ये किसान, ये गरीब, यह अनुभव कर सकें की संसार की कोइ भी शक्ति उन्हें नहीं दबा सकती तो ये निश्चय ही अजेय हो जायेंगे।सच्चा प्रेम सेवा ओर त्याग में ही अभिव्यक्ति पाता है। प्रेमचंद का पात्र जब प्रेम करने लगता है तो सेवा की ओर अग्रसर होता है और अपना सर्वस्व परित्याग कर देता है।
उनकी भाषा —
प्रेमचंद की भाषा सरल और सजीव और व्यावहारिक है। उसे साधारण पढ़े-लिखे लोग भी समझ लेते हैं। उसमें आवश्यकतानुसार अंग्रेज़ी, उर्दू, फारसी आदि के शब्दों का भी प्रयोग है। प्रेमचंद की भाषा भावों और विचारों के अनुकूल है। गंभीर भावों को व्यक्त करने में गंभीर भाषा और सरल भावों को व्यक्त करने में सरल भाषा को अपनाया गया है। इस कारण भाषा में स्वाभाविक उतार-चढ़ाव आ गया है। प्रेमचंद जी की भाषा पात्रों के अनुकूल है। उनके हिंदू पात्र हिंदी और मुस्लिम पात्र उर्दू बोलते हैं। इसी प्रकार ग्रामीण पात्रों की भाषा ग्रामीण है। और शिक्षितों की भाषा शुद्ध और परिष्कृत भाषा है।
डॉ॰ नगेन्द्र लिखते हैं : “उनके उपन्यासों की भाषा की खूबी यह है कि शब्दों के चुनाव एवं वाक्य-योजना की दृष्टि से उसे ‘सरल’ एवं ‘बोलचाल की भाषा’ कहा जाता है। पर भाषा की इस सरलता को निर्जीवता, एकरसता एवं अकाव्यात्मकता का पर्याय नहीं समझा जाना चाहिए।
“भाषा के सटीक, सार्थक एवं व्यंजनापूर्ण प्रयोग में वे अपने समकालीन ही नहीं, बाद के उपन्यासकारों को भी पीछे छोड़ जाते हैं।
वास्तव में,प्रेमचंद ने सहज सामान्य मानवीय व्यापारों को मनोवैज्ञानिक स्थितियों से जोड़कर उनमें एक सहज-तीव्र मानवीय रुचि पैदा कर दी।
“शिल्प और भाषा की दृष्टि से भी प्रेमचंद ने हिन्दी उपन्यास को विशिष्ट स्तर प्रदान किया। …चित्रणीय विषय के अनुरूप शिल्प के अन्वेषण का प्रयोग हिन्दी उपन्यास में पहले प्रेमचंद ने ही किया। उनकी विशेषता यह है कि उनके द्वारा प्रस्तुत किये गए दृश्य अत्यंत सजीव गतिमान और नाटकीय हैं।
शैली –
प्रेमचंद ने हिंदी और उर्दू दोनों की शैलियों को मिला दिया है। उनका हिंदी और उर्दू दोनों पर अधिकार था, अतः वे भावों को व्यक्त करने के लिए बड़े सरल और सजीव शब्द ढूँढ़ लेते थे। उनकी शैली में चुलबुलापन और निखार है। प्रेमचंद की शैली की दूसरी विशेषता सरलता और सजीवता है। उनकी शैली में अलंकारिकता का भी गुण विद्यमान है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों के द्वारा शैली में विशेष लालित्य आ गया है। इस प्रकार की अलंकारिक शैली का परिचय देते हुए वे लिखते हैं- ‘अरब की भारी तलवार ईसाई की हल्की कटार के सामने शिथिल हो गई। एक सर्प के भाँति फन से चोट करती थी, दुसरी नागिन की भाँति उड़ती थी। एक लहरों की भाँति लपकती थी दूसरी जल की मछलियों की भाँति चमकती थी।’
चित्रोपमता भी प्रेमचंद की शैली में खूब मिलती है। प्रेमचंद भाव घटना अथवा पात्र का ऐसे ढंग से वर्णन करते हैं कि सारा दृश्य आँखों के सम्मुख नाच उठता है उसका एक चित्र-सा खिंच जाता है। रंगभूमि उपन्यास के सूरदास की झोपड़ी का दृश्य बहुत सजीव है-
‘कैसा नैराश्यपूर्ण दृश्य था। न खाट न बिस्तर, न बर्तन न भांडे। एक कोने में एक मिट्टी का घड़ा जिसको आयु का अनुमान उस पर जमी हुई काई से हो सकता था। चूल्हे के पास हांडी थी। एक पुरानी चलनी की भाँति छिद्रों से भरा हुआ तवा और एक छोटी-सी कठौत और एक लोटा। बस यही उस घर की संपत्ति थी।’
प्रेमचंद के पात्रों के उत्तर-प्रत्युत्तर उनकी शैली में अभिनयात्मकता का गुण भी समावेश कर देते हैं। उनकी शैली में हास्य-व्यंग्य का भी पुट रहता है, किंतु उनका व्यंग्य ऐसा नहीं होता जो किसा का दिल दुखाए। उसमें एक ऐसी मिठास रहती है जो मनोरंजन के साथ-साथ हमारी आँखें भी खोल देती हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत है- ‘वह गाँव में पुण्यात्मा मशहूर थे। पूर्णमासी को नित्य सत्यनारायण की कथा सुनते पर पटवारी होने के नाते खेत बेगार में जुतवाते थे, सिंचाई बेगार में करवाते थे और आसामियों को एक दूसरे से लड़वा कर रकमें मारते थे। सारा गाँव उनसे काँपता था। परमार्थी थे। बुखार के दिनों में सरकारी कुनैन बाँट कर यश कमाते थे।’
मुहावरों और सूक्तियों का प्रयोग करने में प्रेमचंद जी बड़े कुशल थे। उन्होंने शहरी और ग्रामीण दोनों ही प्रकार के मुहावरों का खूब प्रयोग किया है। प्रेमचंद की सी मुहावरेदार शैली कदाचित ही किसी हिंदी लेखक की हो। क्षमा कहानी में प्रयुक्त एक सूक्ति देखें-‘जिसको तलवार का आश्रय लेना पड़े वह सत्य ही नहीं है।’ प्रेमचंद जी की शैली पर उनके व्यक्तित्व की छाप स्पष्ट रूप से अंकित है। नि:संदेह मुंशी प्रेमचंद कालजयी कहानीकार व अमर उपन्यासकार थे।उन्हें उपन्यास-सम्राट के रूप में जाना जाता है।

कश्मीरः भारत-पाक अपना ढोंग खत्म करें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कश्मीर में 10 हजार नए पुलिसवालों की तैनाती से हड़कंप मचा हुआ है। कश्मीरी नेता और अलगाववादी लोग भी यह मान रहे हैं कि यह तैनाती इसलिए की जा रही है कि सरकार धारा 370 और 35 ए को खत्म करनेवाली है। उन कश्मीरी नेताओं का कहना है कि यदि ऐसा हुआ तो कश्मीर में उथल-पुथल मच जाएगी। जो नेता कश्मीर को भारत का अटूट अंग मानते हैं, वे भी अलगाववादी बन सकते हैं। सरकार का कहना है कि उसने अमरनाथ-यात्रियों की सुरक्षा का विशेष इंतजाम किया है। उसे डर है कि कहीं दूसरा पुलवामा-कांड न हो जाए। करगिल-युद्ध की 20 वीं वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कड़े संदेश ने भी कश्मीर में लहर-सी उठा दी है। मुझसे कई भारतीय और पाकिस्तानी टीवी चैनलों ने पूछा है कि इस मामले में आपकी राय क्या है ? मेरी राय तो साफ है। कश्मीर में 50 हजार जवान पहले से हैं अगर 50 हजार और भी भेज दिए जाएं तो आम कश्मीरी को डरने की जरुरत क्या है ? कोई भी जवान ज्यादती करेगा तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। हां, डर उन्हें होना चाहिए, जो हिंसा करते हैं, आतंक फैलाते हैं। ये आतंकवादी किसे मारते हैं ? वे ज्यादातर बेकसूर कश्मीरियों की हत्या करते हैं। उन्होंने हिंदू-कम, मुसलमान ज्यादा मारे हैं। जहां तक धारा 370 का सवाल है, सच्चे मायनों में वह कभी की खत्म हो चुकी है। उसकी लाश को सजाए रखने में क्या तुक है ? जहां तक धारा 35 ए का सवाल है, मेरा मानना है कि कश्मीर और कश्मीरियत की रक्षा करना बेहद जरुरी है। इस धारा के उन सब प्रावधानों को बचाए रखना और कठोर बनाए रखना, भारत का कर्तव्य है, जिनके कारण कश्मीर को ‘पृथ्वी का स्वर्ग’ कहा जाता है। हमें ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए कि कश्मीर की घाटी हरयाणा, पंजाब या उप्र के किसी जिले की तरह दिखने लगे। इसके अलावा कश्मीर के सवाल पर भारत और पाकिस्तान, दोनों को अपना ढोंग खत्म करना चाहिए। दोनों को एक-दूसरे के कश्मीरों पर कब्जे की बात भूल जाना चाहिए। दोनों कश्मीर, दोनों देशों के अभिन्न अंग घोषित हों। पाकिस्तान अपने कश्मीर को ‘आजाद कश्मीर’ कहना बंद करे और उसे पूरी तरह से पाकिस्तान का एक प्रांत बना ले। भारत 370 खत्म करे और कश्मीर को अन्य प्रांतों की तरह अपना एक प्रांत बना ले। दोनों कश्मीरों की कश्मीरियत को दोनों देश हर कीमत पर बरकरार रखें। आज का कश्मीर एक खाई है। मैं चाहता हूं कि वह भारत और पाकिस्तान के बीच प्रेम का पुल बने।
(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं और कश्मीर से संबंधित सभी पक्षों के नेता उनके संपर्क में हैं)

पानी चोरी करने वाले किसानों को होगी 2 साल की सजा
सनत कुमार जैन
गुजरात सरकार ने विधानसभा में नया कानून जिसे सिंचाई और जल निकासी संशोधन बिल 2019 का नाम दिया गया है इसमें सरकार ने प्रावधान किया है, कि पानी चोरी अब अपराध होगा जो किसान पानी की चोरी करेगा उसे, इस कृत्य पर 2 साल की जेल और जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इस कानून के बन जाने के बाद यदि कोई किसान पानी चोरी करते हुए पकड़ा गया, तो उसे 2 साल की जेल और 2 लाख तक का जुर्माना या दोनों सजा एक साथ हो सकती हैं। देश में इस तरह का यह पहला कानून है। जिसमें पानी की चोरी करने पर किसानों को 2 साल के लिए जेल भेजा जाएगा। प्राकृतिक आपदा के कारण यदि पानी नहीं बरसा, और किसान ने फसल को बचाने के लिए पानी की चोरी कर ली। ऐसी स्थिति में उसे 2 साल के लिए जेल जाना पड़ेगा। गुजरात सरकार के इस प्रावधान से किसानों में चिंता व्याप्त हो गई है। फसल में जब पानी बहुत आवश्यक होता है। तभी किसान जब सरकार से पानी नहीं मिलता है, तब चोरी करने को विवश होता है। पानी नहीं मिलने पर पूरी फसल बर्बाद होने से बचाने के लिए किसान चोरी करके भी फसल को बचाने का प्रयास करता है किंतु सरकार अब इस मामले में किसानों को जेल भेजने में अमादा हो गई है। अभी तक बिना अनुमति के सिंचाई के लिए पानी लेने पर जुर्माने का प्रावधान था। गुजरात सरकार ने अब सजा का प्रावधान करके किसानों को चिंता में डाल दिया है। सरकार के इस नए संशोधन प्रस्ताव के बाद किसान खेती करेंगे, या डर के मारे खेती करना ही छोड़ देंगे।
गुजरात देश का पहला ऐसा राज्य है जिसने पानी चोरी करने पर किसानों को जेल भेजने का प्रावधान किया है। गुजरात सरकार की देखा देखी अन्य राज्य में इसी तरह का प्रयास कर सकते हैं। जिसका दीर्घ कालीन असर खेती पर पड़ना तय माना जा रहा है। किसान बहुत जोखिम लेकर खेती करता है। उसके ऊपर खाद बीज और मजदूरी का कर्ज होता है। यदि समय पर बारिश नहीं होती है तो पूरी फसल बर्बाद हो जाती है। ऐसे समय पर यदि उसे फसल बचाने के लिए पानी लेना आवश्यक हो जाता है। बिना अनुमति के यदि उसमें पानी ले लिया तो उसका जेल जाना तय होगा। ऐसी स्थिति में अब किसान खेती करेंगे या नहीं इसको लेकर गुजरात में किसानों के बीच चर्चाएं होने लगी हैं। गुजरात में लगभग दो दशक से भाजपा का शासन है। इतने लंबे शासनकाल में यदि किसानों को फसल के लिए पानी नहीं मिल पा रहा है, तो यह गुजरात सरकार की अक्षमता ही मानी जाएगी। जैसे कोई मां अपने बच्चे को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करती है। लगभग वही हालत किसान की होती हैं। किसान अपनी फसल को बच्चे की तरह पालता पोसता हैं। वह अपनी फसल को बर्बाद होते देख नहीं सकता है। खेती के धंधे से हजारों किसान प्रत्येक राज्य में जमीन बेचकर बाहर हो रहे थे। सरकार के इस रुख के बाद किसान फसल बोना ही छोड़ दें। जमीन बेचकर खेती के स्थान पर नौकरी अथवा अन्य धंधे में जाने कि संभावना बढ़ गई है। जिसके कारण अगले कुछ वर्षों में खाद्यान्न, सब्जी, इत्यादि के संकट का सामना करना पड़ सकता है। पिछले डेढ़ दशक में किसानों के उपर कर्ज का बोझ बढ़ता ही जा रहा है। प्रत्येक राज्य में हजारों की संख्या में किसान आत्म हत्या कर रहे है। खेती का लागत मूल्य बढ़ता जा रहा है। फसल की कीमत उस तुलना में किसानों को नहीं मिल पाती है। फसल बीमा के नाम पर सरकार की राह पर बीमा कंपनियों द्वारा शोषण किया जा रहा है। किसान की जिस फसल पर कर्ज दिया गया है। किसान से उसका बीमा प्रीमियम बैंक द्वारा काट लिया जाता है। जब फसल बर्बाद होती है,तो बीमा कंपनी लोन राशि, जिसका प्रीमियम बैंक ने काटा था, वह मुआवजा भी नहीं देती है। किसान को लूटने के लिए पटवारी, तहसीलदार, बैंक, बीमा कंपनियां और,सहकारी समितियां कोई मौका नहीं छोड़ती है। इसके बाद भी किसान खेती कर अपने परंपरागत व्यवसाय से जुड़ा हुआ था। किसानों को जेल भोगने के इस कानून के बाद किसान खेती की जमीन बेचकर नौकरी करने मजबूर होंगे। खेती के धंधे में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाने के लिए सरकार इस तरह के कानून बना रही है। गुजरात सरकार के कानून से यही संदेश मिल रहा है।

राज्यसभा में झूमा झटकी के साथ सूचना अधिकार संशोधन बिल पास
सनत जैन
गुरुवार को राज्यसभा ने सूचना अधिकार संशोधन विधेयक ध्वनि मत से पारित कराने में असाधारण सफलता अर्जित की है। संसद के दोनों सदनों से यह बिल विपक्ष के भारी विरोध के बाद भी बिना किसी संशोधन के पारित कराने का जौहर भाजपा ने करके दिखाया है। उससे सभी राजनैतिक दलों के बीच सरकार के प्रबंधन और कूटनीति की चर्चा हो रही है। विपक्षियों के तरकश से निकले सारे तीर सरकार तक नहीं पहुंच पाए। सूचना अधिकार संशोधन बिल के प्रावधान को लेकर लोकसभा एवं राज्यसभा में काफी तीखी बहस हुई। विपक्ष ने पूरी ताकत से इस बिल का विरोध किया। किंतु लोकसभा में 303 मत के समर्थन से यह बिल पास हुआ। दूसरे दिन राज्यसभा में 75 के मुकाबले 117 वोटों से यह बिल पास हो गया। उल्लेखनीय है, राज्यसभा में सरकार के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। इसके बाद भी जोड़-तोड़ करके तथा फ्लोर मैनेजमेंट के माध्यम से सरकार ने बिल पास कराकर विपक्ष को तगड़ी मात दी है।
राज्यसभा में विपक्ष इस बिल को पेश ही नहीं होने दे रहा था। सारे दिन नारेबाजी होती रही। उसके बाद भी सरकार ने ना केवल इस बिल को सदन में पेश किया, वरन पास भी करा लिया। इस बिल को जिस तरह से पास कराया गया है उसको लेकर राजनीतिक क्षेत्रों में यह कहा जा रहा है कि जो जीता वही सिकंदर की तर्ज पर भाजपा ने राज्यसभा में जिस तरह से बिल पास कराया है। उससे सरकार और संसद की गरीमा गिरी है।
मत विभाजन के लिए राज्यसभा में सरकार के मंत्री और भाजपा के सदस्यों ने पर्चियों का वितरण किया। मत विभाजन के दौरान मत पर्चियों का वितरण और संग्रहण भाजपा के सांसदों द्वारा किए जाने, और उन्हें महासचिव को सौंपने का आरोप लगाकर चुनाव की निष्पक्षता को लेकर कांग्रेस ने अपना विरोध भी दर्ज कराया। कांग्रेस के विप्लव ठाकुर और तृणमूल कांग्रेस की डोला सेन ने भाजपा में हाल ही में शामिल हुए सांसद सीएम रमेश पर पर्चियों की हेराफेरी करने का आरोप लगाया। राज्यसभा में सांसदों के बीच धक्का-मुक्की हुई, इसी बीच ध्वनिमत से 75 के मुकाबले 117 वोटों से विपक्ष का प्रस्ताव गिर गया। सूचना अधिकार संशोधन विधेयक ध्वनिमत से पारित हो गया।
राज्यसभा से, सूचना अधिकार बिल पास हो जाने से सरकार काफी उत्साहित है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार अगले सप्ताह सरकार सभी 14 विवादित विधेयकों को राज्यसभा में प्रस्तुत कर पास कराने का काम करेगी। नेशनल मेडिकल बिल पिछले डेढ़ साल से लंबित है। संसद परिसर की चर्चाओं के अनुसार सरकार ने अप्रत्यक्ष रुप से छोटे-छोटे राजनैतिक दलों के सांसद जो यूपीए के समर्थक थे। उनसे लंबित बिलों को पास कराने के लिए सहमति प्राप्त कर ली है। राज्यसभा से 14 विधेयकों को पास कराकर सरकार विपक्ष को उसकी दयनीय स्थिति का अहसार कराने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ने वाली है। भारत में जिस तरह से आर्थिक मामलों को लेकर सरकार का विरोध बढ़ रहा है। उसको देखते हुए सरकार ने अपना रुख काफी आक्रामक कर लिया है। सरकार विपक्ष के दबाब में आए बिना सरकार चलाने की मुद्रा में है।

अपनी व्यवस्था भी बना ली मोदी जी ने !
डॉ. अरविन्द जैन
बहुत पहले पंगत भोज होता था और कहीं कहीं आज भी होता हैं। इसमें यह फायदा होता हैं की सब लोग एक कतार में बैठते हैं और अलग अलग सामग्री परोसने वाले परोसते हैं जैसे कोई पूरी, कोई दाल कोई सब्ज़ी कोई मिठाई, कोई नमकीन आदि आदि। इसमें जब किसी को कुछ अलग से चाहिए रहता तब वह परोसने वाले से कहता भाई चाचा जी को रसगुल्ला परसो तो उसे भी मिलजाता हैं। यह चतुराई कहलाती हैं। दूसरा पंगत में हमेशा वहां बैठो जहाँ से परोसना शुरू होता हैं। सब पीछे बैठने से परोसने वाली सामग्री ख़तम हो जाती हैं। इसीलिए यह भी होशियारी सीखना चाहिए।
मोदी ने कहा, ‘आप सबके आशीर्वाद से मैंने ठान लिया है कि दिल्ली में सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों की स्मृति में एक बहुत बड़ा आधुनिक संग्रहालय बनाया जाएगा ”
इस बहाने स्वयं की भी व्यवस्था पूर्व से कर ली और अब संग्रहालय में स्थापित होने के लिए नए नए स्टाइल की ड्रेस नयी नयी प्रकार की भाषण व्यवस्था जिससे यदि भूतपूर्व हुए तो उनका व्यक्तित्व हमेशा उदीयमान रहेगा और अभी बनना हैं तो उनकी भूमिका विशेष होने से उनका विशेष ध्यान रखा जायेगा और होना भी चाहिए,
परोसने वाला कभी भूखा रह सकता हैं ?,कभी नहीं, अब तो और अच्छा मौका मिलेगा जो उनकी व्यक्तिगत सभी सामग्री को प्रदर्शित किया जा सकेगा, और नहीं होगी तो बना ली जाएगी। आधे में सब और आधे में हम / मैं।
यहाँ एक बात का उल्लेख करना जरुरी हैं की इसमें भूतपूर्व उपप्रधान मंत्री को भी प्रदर्शित किया जाय तो कम से कम प्रधानमंत्री के तथागत गुरु आडवाणी जी को भी वहां जगह मिल जाएगी, ऐसा सुझाव हैं, शायद अमान्य होगा पर उनक लिए दक्षिणा का सही होगा जिससे चिरस्थायी यादगार रहेंगी और गुरु दक्षिणा के साथ प्रधानसेवक का व्यक्तिगत रूप से कुछ खरचा तो नहीं लगना। होगा। कितने २ -४ मात्र। आखिर वे भी प्रधान मंत्री की दौड़ में शामिल थे और प्रधान मंत्री की अनुपस्थिति में वे कार्यवाहक प्रधानमंत्री तो हो जाते थे। नरहे भूतपूर्व परन्तु कार्यवाहक तो रहे। हो सकता हैं की वर्तमान में कार्यवाहक की परम्परा न हो। कारण विदेश यात्रा में भी अपना देश अपने साथ लेकर जाते हो।
यह गंभीर नहीं पर विचारणीय मुद्दा हैं इस पर उनको हिकारत भरी नज़र से नहीं देखना चाहिए। वो उनको देखते तो हैं चाहे दुश्मनी से ही, देखते हैं, पहचानते हैं। वे बेचारे एकलव्य जैसा अंगूठा तो नहीं मांग रहे बस कुछ स्थान दिल में न सही तो संग्रहालय में दे देना चाहिए। संग्रहालय कोई जीवित वस्तु तो नहीं हैं, मात्र दो चार हाल और बन जायेंगे और अब लगभग ५० वर्षों तक न कोई उपप्रधानमंत्री बनना हैं और न कोई प्रधानमंत्री।
और जब मुखिया की इच्छा हो उसको पूरा होना ही हैं। मंदिर न बने कारण उससे राजनीती चलती हैं, वह बन जायेगा फिर चुनाव के लिए क्या मुद्दा रहेगा। हाँ यह जरूर हैं की प्रधान सेवक के धुर विरोधी जैसे नेहरू, इंदिरा, राजीव को मज़बूरी में रखना होगा। हो सकता हैं की कहीं भी जगह दे दे। यानी सबसे पहले या आखिरी में। मज़बूरी हैं पहले में रखना पड़ेगा या पीछे रखेंगे तो वहां से भी पहले माने जायेंगे नेहरू जी। अजब मुसीबत है नेहरू जी के साथ। धुर विरोधी सबसे सामने।
पर राजनीती में सब चलता हैं
ये दिन के दो होते हैं और
रात के एक
एक बार जरूर सोचते होंगे
प्रधान सेवक
की
आपकी नीतियों के कारण
मुझे मौका मिला
जैसे जीतने वाला पहलवान
हारने वाले का शुक्रिया अदा करता हैं
की
आप अच्छे हारे, जिस कारण
मैं जीता।

मध्यप्रदेश में उच्च शिक्षा और खेल की तस्वीर बदलेगी
जीतू पटवारी
शिक्षा समाज और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करती है। खेल उत्साह,प्रसन्नता और ऊँचाईयों को प्रतिबिंबित करते है वहीं युवा तेज,पराक्रम और शक्ति के पुंज होते है। मध्यप्रदेश के प्रत्येक विद्यार्थी को गुणवत्तापूर्ण,सुलभ और सस्ती शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए कमलनाथ सरकार प्रतिबद्ध है। खेलों में उत्कृष्ट खिलाड़ी तैयार कर देश का गौरव बढ़ाने में योगदान देना सरकार का लक्ष्य है और युवाओं की बेहतरी से लोककल्याणकारी राज्य को मजबूत करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।
मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार के कार्यकाल का यह आठवां महीना है और इस दौरान लोकसभा की आचार संहिता का पालन भी हुआ है। कमलनाथ सरकार के सामने चुनौतियां तो असंख्य है लेकिन लोक कल्याण का संकल्प भी है। 15 साल तक भाजपा सरकार ने उच्च शिक्षा,खेल और युवा कल्याण के प्रति जो उपेक्षा का भाव रखा उससे राज्य में निराशा का भाव व्याप्त हो गया था। उच्च शिक्षा विभाग वर्तमान में संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। लोक कल्याण का अर्थ जनता की बेहतरी होता है लेकिन भाजपा सरकार ने लोकलुभावन दृष्टि रखकर उच्च शिक्षा की व्यवस्था को ही अस्त व्यस्त कर दिया।
पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने अत्यधिक घोषणाएं कर कालेज तो खोल दिए लेकिन दूसरी और कई कालेजों के पास जमीन ही नहीं है, कई कालेजों के पास भवन नहीं है और अगर ये दोनों भी है तो शिक्षक व पुस्तकालय, लैब नहीं है। 191 महाविद्यालयों के पास स्वयं का भवन नहीं है उनमें से 6 महाविद्यालय किराये के भवनों में संचालित हो रहे है। 128 महाविद्यालय ऐसे है जहां एक भी नियमित शिक्षक पदस्थ नहीं है और 150 महाविद्यालय में एक भी नियमित कर्मचारी पदस्थ नहीं है। पूर्ववर्ती सरकार के इस विभाग के प्रति उपेक्षा भाव के चलते हमारे प्रदेश का राष्ट्रीय स्तर की रैंकिगं में प्रथम 100 में कहीं स्थान नहीं है।
कमलनाथ सरकार ने अपने सालाना बजट से 15 साल की कमियों और आधे अधूरे छोड़ दिए गए कार्यों को पूरा करने का संकल्प लिया है। इस साल बजट में उच्च शिक्षा के लिए दो हजार तीन सौ बयालीस करोड़, छिहत्तर लाख, अठहत्तर हजार, रूपये जबकि खेल और युवा कल्याण के लिए दो सौ करोड़ बाईस लाख रूपये का प्रावधान किया है। राज्य में पहली बार कौशल और खेल विश्वविद्यालय की स्थापना से तस्वीर निश्चित ही बदलेगी वहीं विधायक कप के आयोजन के लिए प्रत्येक वर्ष 1 लाख की राशि और 5 लाख की अतिरिक्त सहायता से राज्य के कोने कोने में खेलों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। मध्यप्रदेश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालय कई वर्षों से शिक्षकों की कमी से जूझ रहे है अत: यह कमी चरणपूर्वक भर्ती और नियुक्ति से दूर की जायेगी वहीं सालों से सेवाएं देने वाले अतिथि विद्वान भी व्यवस्था का अंग बने रहेंगे। विद्यार्थियों की प्रवेश प्रक्रिया को सरल और समयबद्ध किया गया है,बालिकाओं के लिए प्रवेश शुल्क पूरी तरह माफ कर दिया गया है वहीं अजा जजा की तरह ही ओबीसी तथा आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को भी निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें तथा स्टेशनरी प्रदाय की जा रही है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए लागू किये गये 10 प्रतिशत आरक्षण को देखते हुए सीटों में इस प्रकार वृद्धि की गयी है,वहीं एकीकृत प्रबंधन प्रणाली लागू की जा रही है जिससे छात्रों का प्रवेश, परिणाम, डिग्री आदि कार्य छात्र को सुलभता से प्राप्त हो।
उत्कृष्ट शिक्षाविदों को जोड़कर उच्च शिक्षा परिषद का गठन किया जा रहा है इसके साथ ही उत्कृष्ट संस्थानों की तर्ज़ पर ऑटोनामी के साथ उत्कृष्ट संस्थान विकसित किये जा रहे है। विभाग के अंतर्गत संचालित विश्वविद्यालयों महाविद्यालयों में उपलब्ध सुविधाओं के विकास एवं सुदृढ़ीकरण के लिए तीन हजार करोड़ मूल्य की वर्ल्ड बैंक परियोजना लागू की गई है। इस परियोजना में हम 200 महाविद्यालयों को आधुनिक संसाधनों से लैंस कर रहे है,46 कन्या महाविद्यालयों में छात्रावासों का निर्माण,राज्य में नवीन आदर्श महाविद्यालयों की स्थापना के साथ राजगढ़ में एक नवीन व्यावसायिक महाविद्यालय की स्थापना की जा रही है। 33 सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के रूप में उन्नत करने के साथ विश्वबैंक परियोजना के तहत 153 कम्प्यूटर लैब, 2000 स्मार्ट क्लासेस, 200 लैंग्वेज लैब,200 ई-लाईब्रेरी तथा विज्ञान विषयों की प्रयोगशालाएँ निर्मित किये जाने की योजना है। रोजगार वृद्धि के लिए एक कॉमन कॅरियर पोर्टल विकसित किया जा रहा है जिससे छात्रों एवं उद्यमियों को एक प्लेटफार्म मिलेगा। पीएससी,यूपीएससी की तैयारी के लिए सरकारी मदद के साथ ही उन्हें बाहर भी भेजा जायेगा। यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के साथ शिक्षक एवं विद्यार्थी वर्ग के लिए एमओयू किया है जिससे विद्यार्थियों व शिक्षकों की अंग्रेजी भाषा पर दक्षता बढ़े। नॉलेज कार्पोरेशन के गठन से विद्यार्थियों का चहुंमुखी विकास सुनिश्चित होगा वहीं मध्यप्रदेश में युवाओं में पर्यावरण संरक्षण को लेकर व्यापक जागरूकता के लिए अभियान भी शुरू किया जा रहा है।
मध्यप्रदेश सरकार खेलों के सर्वांगीण विकास के साथ खिलाड़ियों के बेहतर भविष्य के लिए भी कृतसंकल्पित है। उत्कृष्ट कोच के लिए डेवलपमेंट प्रोग्राम और खेल अकादमियों के खिलाड़ियों के लिये चिकित्सा व दुर्घटना बीमा योजना प्रारंभ की गई है जिसमे दिव्यांग खिलाड़ी शामिल है। ओलम्पिक विजेता को 2 करोड़ रुपये के पुरस्कार के साथ ही राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले और भाग लेने वाले खिलाड़ियों को पुरस्कार राशि में 4 गुना से बढ़ाकर 20 से 25 गुना वृद्धि कर दी गई है। खिलाड़ियों के लिए गाँधी,शंकरदयाल शर्मा,इंदिरा और राजीव प्रतिभा और प्रोत्साहन योजना लागू की गई है। खिलाड़ियों को अन्तर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण के साथ खेल कोटे से खिलाड़ियों का भविष्य सुरक्षित होगा। पीपीपी योजना से समाज का बड़ा वर्ग भी भागीदार बनेगा। नई विकसित होने वाली कॉलोनियों अथवा आवासीय क्षेत्र में खेल सुविधाओं का निर्माण किया जावेगा। राजीव गांधी ग्रामीण युवा केन्द्र के अंतर्गत प्रत्येक ग्रामीण युवा केन्द्र में इन्डोर व ऑऊटडोर खेल मैदान तथा फिटनेस सेन्टर की सुविधा भी चरणबद्ध तरीके से उपलब्ध कराई जावेगी।
हमारी सरकार प्रदेश की खुशहाली और लोक कल्याण के लिए संकल्पित होकर कार्य कर रही है। खेल और उच्च शिक्षा की उत्कृष्टता से मध्य प्रदेश को विकसित राज्य के रूप में राष्ट्र में पहचान दिलाना हमारा लक्ष्य है।

इमरान पर भरोसा क्यों न करें ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कमाल कर दिया। उन्होंने अमेरिका में अपने आतंकवादियों के बारे में ऐसी बात कह दी, जो आज तक किसी भी पाकिस्तानी नेता ने कहने की हिम्मत नहीं की। उन्होंने अमेरिका के एक ‘शांति संस्थान’ में भाषण देते हुए कह दिया कि पाकिस्तान में 30 हजार से 40 हजार तक सशस्त्र आतंकवादी सक्रिय हैं। उनकी सक्रियता को पिछली पाकिस्तानी सरकारें छिपाती रही हैं और उनके बारे में झूठ बोलती रही हैं। ये आतंकवादी अफगानिस्तान और कश्मीर में खूंरेजी करते रहे हैं। ऐसे 40 गिरोह पाकिस्तान में दनदना रहे हैं। उनके खिलाफ 2014 से कार्रवाई शुरु हुई, जब उन्होंने पेशावर के फौजी स्कूल के डेढ़ सौ बच्चों को मार डाला था। इमरान ने दावा किया कि उनकी सरकार ने सत्ता में आते ही इन दहशतगर्द गिरोहों के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरु कर दी है। हाफिज सईद इस समय गिरफ्तार है और उसकी जमात-उद-दावा के 300 मदरसे, स्कूल, अस्पताल, प्रकाशन संस्थान और एंबुलेंसों को सरकार ने जब्त कर लिया है। इमरान के इस तेवर से पाकिस्तान के कई राजनीतिक दल, टीवी चैनलों के एंकर और देशभक्त पत्रकार लोग बेहद खफा हैं लेकिन वे यह क्यों नहीं समझते कि इमरान की इस साफगोई का जबर्दस्त फायदा पाकिस्तान को मिल सकता है। अंतरराष्ट्रीय वितीय टास्क फोर्स अक्तूबर में पाकिस्तान को काली सूची में डालनेवाली है। क्या वह रहम नहीं खाएगी ? इसके अलावा अमेरिकी नीति-निर्माताओं पर इमरान की इस स्वीकारोक्ति का क्या कोई असर नहीं पड़ेगा ? इमरान ने तालिबान और काबुल सरकार के बीच भी समझौता करवाने का संकल्प प्रकट किया है। पाकिस्तान के विरोधी नेता इस नए तेवर को इमरान का ढोंग बता रहे हैं, उनका शीर्षासन कह रहे हैं, वे उन्हें फौज का चमचा बताते रहे हैं लेकिन मैं सोचता हूं कि इस नये इमरान का जन्म पाकिस्तान की मजबूरी में से हुआ है। यह मजबूरी तात्कालिक हो सकती है लेकिन यह है, सच ! भारत के लिए इस सच को स्वीकारना काफी मुश्किल है। दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है लेकिन मैं सोचता हूं कि भारत अपनी सुरक्षा के बारे में पूरी सावधानी रखे लेकिन इमरान पर भरोसा भी क्यों न करे ?

राजनीति तो वेश्या है: भर्तृहरि
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हम समझ रहे हैं कि कर्नाटक के नाटक का समापन हो गया। विधानसभा में विश्वास का प्रस्ताव क्या गिरा और मुख्यमंत्री डी. कुमारस्वामी ने इस्तीफा क्या दिया, देश के लोगों ने चैन की सांस ले ली लेकिन पिछले 18 दिन से चल रहे इस नाटक का यह पटाक्षेप या अंत नहीं है, बल्कि उसकी यह शुरुआत है। यह किसको पता नहीं था कि कांग्रेस+जद (से) गठबंधन की यह सरकार गिरनेवाली ही है। इसे बचाना पहले दिन से ही लगभग असंभव दिख रहा था। अब जिन तेरह विधायकों ने इस्तीफे दिए हैं, उनका भाग्य तो अधर में लटका ही हुआ है, यह भी पता नहीं कि सिर्फ 6 के बहुमत से बननेवाली भाजपा सरकार कितने दिन चलेगी ? इसमें शक नहीं कि 14 महिने पहले विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण कांग्रेस और जद के अस्वाभाविक गठबंधन का राज कायम हो गया था। पहले दिन से ही गठबंधन के इस दूध में मक्खियां तैरने लगी थीं और अब जब लोकसभा चुनाव हुए तो इस गठबंधन का सूपड़ा लगभग साफ हो गया। कांग्रेस और जद (से) के जिन विधायकों ने दल-बदल किया है, वे कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री ने उनके निर्वाचन-क्षेत्रों की उपेक्षा की है, इसीलिए वे पार्टी छोड़ रहे हैं। उनका करारा जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने विधानसभा को बताया है कि किस विधायक को विकास के नाम पर कितने सौ करोड़ रु. दिए गए हैं। उधर कांग्रेस आरोप लगा रही है कि इन विधायकों को भाजपा ने 40 करोड़ से 100 करोड़ तक प्रति व्यक्ति दिए हैं। दूसरे शब्दों में कर्नाटक में भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा हुई है। कर्नाटक में पहले उन पार्टियों ने हाथ से हाथ मिलाकर सरकार बनाई, जो चुनाव में एक-दूसरे पर गालियों की वर्षा कर रहे थे और अब भाजपा की जो नई सरकार बन रही है, वह उन लोगों के सहारे बन रही है, जो भाजपा, येदियुरप्पा और मोदी को पानी पी-पीकर कोसते रहे हैं। ऐसी स्थिति में जबकि सभी पार्टियों ने सिद्धांतों को ताक पर रख दिया है, आप किसको सही कहें और किसको गलत ? गोवा में जो हुआ, वह इससे भी ज्यादा भीषण है। पैसों और पदों के खातिर कौन नेता और कौन दल कब शीर्षासन की मुद्रा धारण करेगा, कुछ नहीं कह सकते। सत्ता की खातिर कांग्रेस कब भाजपा बन जाएगी और भाजपा कब कांग्रेस बन जाएगी, कोई नहीं जानता। इसीलिए भर्तृहरि ने हजार साल पहले राजनीति को वारांगना (वेश्या) कहा था।

पुलवामा हमले जैसे हालात से निपटने खरीदा जा रहा है खास बम
अजित वर्मा
भारतीय सेना को अत्याधुनिक संसाधनों से लगातार सुसज्जित किया जा रहा है। इसी का नतीजा है कि भारतीय सेना हर दिन अपडेट होती जा रही है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद जैसे हालात से निपटने के लिए सेना बेहद सटीक हमले के लिए एक खास बम खरीदने जा रही है। लंबी दूरी की तोपों में इस गोला-बारूद का इस्तेमाल होगा। इसकी खास बात यह है कि बेहद घनी आबादी में भी ऐक्सकैलिबर गाइडेड गोला दुश्मन के टारगेट को पूरी सटीकता से 50 किमी से भी ज्यादा दूरी से निशाना बना सकता है। पाकिस्तान अक्सर नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर गोलाबारी करता रहता है, ऐसे में यह भारतीय हथियार आबादी के बीच मौजूद दुश्मन के ठिकाने को भी बर्बाद कर सकेगा।
भारतीय सेना आपातकालीन खरीद प्रक्रिया के तहत अमेरिका से ऐक्सकैलिबर आर्टिलरी ऐम्यनिशन खरीदने की योजना बना रही है। हथियार प्रणालियों और गोला-बारूद खरीदने के लिए मिले आपातकालीन अधिकारों के तहत इस खरीद की समीक्षा की जा रही है, जिससे भविष्य में पुलवामा हमले के बाद बनी स्थिति के लिए तैयारी पुख्ता की जा सके। यह गोला-बारूद नियंत्रण रेखा पर तैनात यूनिटों के लिए खरीदा जा रहा है जहां पाकिस्तान गोलाबारी करता रहता है। यह बम हवा में और बंकर जैसे मजबूत ढांचे में घुसने के बाद भी धमाका कर सकता है। हाल में हुई एक बैठक में सेना ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को अमेरिका से इस गाइडेड ऐम्यनिशन की खरीद की योजना के बारे में जानकारी दे दी है, जो जीपीएस सिस्टम का इस्तेमाल कर 50 किमी की दूरी से ही दुश्मन के ठिकाने को तबाह कर सकता है।
इस बम को अफगानिस्तान में युद्ध के समय तोप से दागे गए गोले के निशाने को बेहद सटीक बनाने के लिए अमेरिका में विकसित किया गया था। अमेरिकी सैनिक करीब दो दशक से अफगानिस्तान में लड़ रहे हैं। उधर, भारतीय सेना अमेरिका में बनी एम-77 अल्ट्रा-लाइट होवित्जर्स तोपें भी खरीद रही है जिससे ऐक्सकैलिबर ऐम्यनिशन को दागा जा सकता है। भारतीय सेना लगातार अपनी तैयारियों को मजबूत करती जा रही है। स्पाइक ऐंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें खरीदी जा रही हैं, जो दुश्मन के बख्तरबंद ठिकाने को भी बर्बाद कर सकती हैं। युद्ध की तैयारी के लिए भारतीय वायुसेना ने हाल में कई हथियार और अपने लड़ाकू विमानों के लिए साजोसामान खरीदे हैं। एयरफोर्स की खरीद में बालाकोट एयर स्ट्राइक में इस्तेमाल किए गए स्पाइस 2000 बम भी शामिल हैं, जिसे इजरायल ने बनाया है। इसका अपडेट वर्जन भी भारत ने खरीदा है। इतना ही नहीं, एमआई-35 अटैक हेलिकॉप्टरों के लिए त्रम अटाका ऐंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल भी आईएएफ को मिल रही है।
निश्चित ही भारतीय सेना का अत्याधुनिक संसाधनों से संपन्न होते जाना देश की ताकत बढ़ायेगा।

कश्मीरः ट्रंप की मध्यस्थता ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने मेहमान इमरान खान से कह दिया कि नरेंद्र मोदी ने पिछली मुलाकात में उनसे निवेदन किया था कि वे कश्मीर के मामले में मध्यस्थता करें। ट्रंप के इस बयान ने हमारे विदेश मंत्रालय में भूकंप ला दिया है। रात देर गए उसने ट्रंप के दावे का खंडन किया। अब कैसे मालूम करें कि कौन सही है ? ट्रंप या हमारा विदेश मंत्रालय ? जहां तक ट्रंप का सवाल है, उन्हें अमेरिकी अखबारों ने ‘झूठों के सरदार’ की उपाधि दे रखी है। ‘वाशिंगटन पोस्ट’ के मुताबिक ट्रंप एक दिन में औसत 17 बार झूठ बोलते हैं। उन्होंने अपने दो साल के कार्यकाल में 8158 बार झूठ बोला है। कश्मीर पर मध्यस्थता की जो बात उन्होंने कही है, वह भी इसी श्रेणी में रखने की इच्छा होती है लेकिन इसमें एक अन्य संभावना भी हो सकती है। वह यह कि ट्रंप ने मोदी से पूछा हो कि आप कश्मीर-समस्या हल क्यों नहीं करते ? इस पर मोदी ने कह दिया हो कि आप भी कोशिश कर लीजिए। इसे ट्रंप ने मध्यस्थता समझ लिया हो। समझा न हो तो भी इमरान के मध्यस्थता के सुझाव के जवाब में उन्होंने मध्यस्थता शब्द का प्रयोग कर दिया। कश्मीर मसले पर 1948 में संयुक्तराष्ट्र संघ को बीच में डालकर नेहरुजी पछताए और बाद में जब भी कुछ विश्व नेताओं ने मध्यस्थता की पेशकश की, भारत ने रद्द कर दी। कुछ माह पहले नार्वे के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान के एक पूर्व राष्ट्रपति ने मुझे सुझाव दिया था कि मध्यस्थता का रास्ता अपनाया जाए। मैं खुद कुछ पहल करुं। मैंने अनौपचारिक बातचीत को तो ठीक बताया लेकिन औपचारिक तौर पर सरकारी मध्यस्थता को मुझे नकारना पड़ा। वैसे भी इस समय ट्रंप को अफगानिस्तान और तालिबान से अमेरिका का पिंड छुड़ाना है। इसीलिए उन्होंने इमरान को वाशिंगटन आने दिया है और उनसे वे लल्लो-चप्पो करना चाहेंगे। इमरान का यह सोच स्वाभाविक है कि जैसे अमेरिकी मध्यस्थता से तालिबान का मामला हल हो रहा है वैसे ही कश्मीर का मसला भी हल हो जाए लेकिन दोनों मामलों में बहुत फर्क है। मैं कश्मीर पर भारत-पाक संवाद के पक्ष में तो हूं लेकिन किसी बिचौलिए को अनावश्यक मानता हूं। ट्रंप के तेवर कितना ही भारत-प्रेम प्रकट करते हों लेकिन वे स्वयं इस योग्य नहीं हैं कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय विवाद में वे मध्यस्थता कर सकें।

हमारे जन प्रतिनिधियों जो जनता से चुने हुए हैं को इतनी सुरक्षा क्यों ?
डॉ. अरविन्द जैन
राजशाही काल में जब कोई महामंत्री या मंत्री अत्याचार करता था तब वह अपने साथ 2 -4 सैनिक रखता था कारण मंत्री स्वयं इतना बलवान और सक्षम होता था की जनता से निपटना जानता था, राजा भी बहुत कलाकार, हुनरबाज़ होते थे की वे जनता या दुश्मन की चाल समझ जाते थे। उनको अधिक सुरक्षा की जरुरत नहीं पड़ती थे, उसके बाद हमारे देश में अंग्रेंज आये, वो भी बहुत कम, उस अनुपात में हमारी आबादी उनसे अधिक थी पर उनका प्रभाव इतना था की उनको भी अधिक सुरक्षा की जरुरत नहीं पड़ती थी। फिर आजादी की लड़ाई में तो हमारे नेता सुरक्षा विहीन रहते थे जिसका उदाहरण महात्मा गाँधी की हत्या।
जैसे जैसे आजादी के बाद नेताओं की चाल ढाल में, नैतिकता का अभाव आने लगा और उनके द्वारा धन लोलुपता बड़ी तब उन्होंने पहले अपने साथ निजी तौर गुंडें। लठैत रखना शुरू किया। उसके बाद प्रिवीपर्स ख़तम होने के बाद राजे महाराजे सामान्य स्थिति में आ गए कुछ को छोड़ कर सब बिना सुरक्षा के रहने लगे। उस समय बहुत अधिक से अधिक 500 -600 राजा महाराज जमींदार रहे होंगे पर उसके बाद उनकी आदतों को देखकर हमारे यहाँ वर्तमान में चुने और भूतपूर्व सांसद, मंत्री, विधायक सेवा निवृत न्यायाधीश, आदि आदि लगभग 5,,79, 092 वी आई पी हैं जिनके लिए सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर सैनिक, हवाई यात्रा विदेश यात्रायें, आने जाने के लिए वाहन, मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, कम दामों में उच्चतम क्वालिटी का भोजन आदि आदि, की सुविधाएँ पेंशन भत्ता के साथ मिलती हैं।
अब हम अन्य देशों की ओर निगाह डाले की उनके यहाँ कितने वी आई पी होते हैं — जैसे ब्रिटेन में 84, फ्रांस में 109 जापान में 125, जर्मनी में 142 अमेरिएका में 252 रूस में 312 चीन में 435 और भारत नहीं इंडिया में 5, 79,092 को सब सुविधा दी जाती हैं। इसके साथ हमारे देश में अजब गज़ब हैं सांसद, विधायक मंत्री मुख्य मंत्री राज्यपाल, राष्ट्रपति यदि एक व्यक्ति बनता हैं तो उसे हर पद का वेतन भत्ता अलग अलग मिलता हैं ऐसा क्यों ?
इस प्रकार देखा जाय तो कितना पैसा इन पर व्यय होता हैं और इसके अलावा जनता द्वारा चुने हुए जन प्रतिनिधि इतने भयभीत क्यों होते हैं की उनकी सुरक्षा में करोड़ों रुपये साल खरच होते हैं, । क्या वे पद पर आकर अजर अमर हो जाते हैं और पद से हटने के बाद भी उतनी सुरक्षा क्यों और उनके मरने के बाद भी उनके परिवार के लिए भी सुरक्षा। क्या एक बार पद पर आने के बाद उनको स्वर्गवासी होने तक का लाइसेंस मिल जाता हैं और उसके बाद उनके परिवार जनों को। क्या इतनी सहानुभूति सरकारी अधिकारी कर्मचाहरियों को देना चाहिए अथवा नहीं?
जब एक सरकारी कर्मचारी 25 वर्ष की उम्र से 60 वर्ष तक कार्य करता हैं, वह अपनी जवानी पूरी सरकारी नौकरी में झोंक देता हैं तब उसे पेंशन मिलती हैं और इन चुने हुए प्रतिनिधि सिर्फ चुने जाने के बाद ताजिंदगी भत्ता प्राप्त करते हैं, जैसे कोई शादी का जोड़ा शादी करने के बाद सुहाग रात न मना पाए और उनमे से कोई एक मर जाए तब वह विधुर या विधवा कहलाने लगती हैं पर सांसद, विधायक सदा सुहागन होती हैं ऐसा क्यों ?
एक तरफ हम गरीबी की दुहाई दे रहे हैं, दूसरी ओर हमारे ऊपर इतना करारोध हैं की मध्यम वर्ग को अपना भरण पोषण करने में परेशानी हो रही और गरीबों को सरकार ने अपनी तिजोरी खोलकर रख दी हैं जिसका खरचा भी हम मध्यम वर्ग को उठाना पड़ रहा हैं और इसके बाद लाखों वी आई पी का खर्चा हम कर दाताओं से क्यों वसूलकर उनको दिया जा रहा हैं। इस पर पुर्नविचार होना जरूरी हैं और कोई जरूरी नहीं हैं की जनता के द्वारा चुने प्रतिनिधियों को उस कार्यकाल तक देना चाहिए उसके बाद कोई जरुरी नहीं।
मजेदार बात यह होती हैं की जब वेतन भत्ते बढ़ाने की बात आती हैं तब सब एक हो जाते हैं और सरकारी कर्मचारियों की बात आती हैं तो सरकार नंगपन करती हैं। यह दोहरा मापदंड बंद होना चाहिए।
बहुत हो चूका जनता का शोषण
कभी गरीबी कभी महगाईं
कभी कम वर्षा सूखा का बहाना
अपने ऐशो आराम में कोई नहीं कोताही
आने के पहले इतनी चौकसी की
परिंदा न पर मार सके
जिस दिन काल आएगा
जल, थल, नभ महल से भी नहीं बच पाएंगे
क्यों इस गरीब देश का खून
कब तक चूसोगे
कलयुगी सांसद और विधायक
नाकारा
संसद, विधानसभा रोती हैं
इन करतूतें से ।

मिलावटियों को मौत की सजा दें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
मैं आज इंदौर में हूं। यहां के अखबारों में एक खबर बड़े जोरों से छापी है कि भिंड-मुरैना में सिंथेटिक दूध के कई कारखानों पर छापे मारे गए हैं। राजस्थान और उप्र के पड़ौसी प्रांतों के सीमांतों पर भी नकली दूध की ये फेक्टरियां मजे से चल रही हैं। इस मिलावटी दूध के साथ-साथ घी, मक्खन, पनीर और मावे में भी मिलावट की जाती है। दिल्ली, अलवर तथा देश के कई अन्य शहरों से भी इस तरह की खबरें आती रही हैं। यह मिलावट सिर्फ दूध में ही नहीं होती। फलों को चमकदार बनाने के लिए उन पर रंग-रोगन भी चढ़ाया जाता है और सब्जियों को वजनदार बनाने के लिए उन्हें तरह-तरह की दवाइयों के इंजेक्शन भी दिए जाते हैं। यह मिलावट जानलेवा होती है। दूध में पानी मिलाने की बात हम बचपन से सुनते आए हैं लेकिन आजकल मिलावट में ज़हरीले रसायनों का भी इस्तेमाल किया जाता है। इसीलिए देश में लाखों लोग अकारण ही बीमार पड़ जाते हैं और कई बार मर भी जाते हैं। लेकिन सरकार ने इन मिलावटियों के लिए जो सजा रखी है, उसे जानकर हंसी आती है और दुख होता है। अभी कितना ही खतरनाक मिलावटी को पकड़ा जाए, उसे ज्यादा से ज्यादा तीन महिने की सजा और उस पर 1 लाख रु. जुर्माना होता है। वह मिलावट करके लाखों रु. रोज कमाता है और तीन माह तक वह सरकारी खर्चे पर जेल में मौज करेगा। वाह री सजा और वाह री सरकार ! कौन डरेगा, इस तरह के अपराध करने से ? मोदी सरकार को चाहिए था कि मिलावट-विरोधी विधेयक वह संसद की पहली बैठक में ही लाती और कैसा विधयेक लाती ? ऐसा कि उसकी खबर पढ़ते ही मिलावटियों की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ जातीं। मिलावटियों को कम से कम 10 साल की सजा हो और उनसे 10 लाख रु. जुर्माना वसूलना चाहिए। खतरनाक मिलावटियों को उम्र-कैद और फांसी की सजा तो दी ही जानी चाहिए, सारे देश में उसका समुचित प्रचार भी होना चाहिए। उनका सारा कारखाना और सारी चल-अचल संपत्ति जब्त की जानी चाहिए। मिलावट करनेवाले कर्मचारियों के लिए भी समुचित सजा का प्रावधान होना चाहिए। मिलावट को रोकने का जिम्मा स्वास्थ्य मंत्रालय का है। स्वास्थ्य मंत्री डाॅ. हर्षवर्द्धन थोड़ा साहस दिखाएं तो हर सांसद, वह चाहे किसी भी पाटी का हो, उनके इस कठोर विधेयक का स्वागत करेगा। यह इस सरकार का सर्वजनहिताय एतिहासिक कार्य होगा।

प्रो. अनुसुईया का दमुआ से लेकर दिल्ली तक का सफर…!
नईम कुरेशी
मध्य प्रदेश की सियासत से चलकर दिल्ली में अपना वजूद स्थापित करना वो भी पिछड़े आदिवासी वर्ग से आने वाली महिला नेत्री के लिये एक बड़ा चैलेंज माना जाता है पर छिंदवाड़ा से चलकर विधायक प्रदेश में वजीर की कुर्सी पर बैठकर अपनी पहचान बनाये रखने का साहस व गुण हमने पिछले 30 सालों में मेडम अनुसुईया उइके में ही देखा वो राज्यसभा में रहकर राष्ट्रीय महिला आयोग में अपनी खास पहचान बनाकर महिला वर्ग के दुखों के पहाड़ों से टकराती हुइऔ राष्ट्रीय एस.टी. कमीशन में उपाध्यक्ष के पद पर 3 साल से काम कर रही थीं। जहां मैने उन्हें आदिवासी वर्ग के लिये भारत सरकार के रेल मंत्रालय के अफसरों को फटकारते हुए भी मार्च-अप्रैल में देखा है।
उइके मैडम के मन में गरीबों, दलितों के लिये असीम प्रेम देखा। उन्हें आदिवासियों कमजोर तब्कों के लिये चिंतित भी मैं 30 सालों से देखता आ रहा हूँ। उन्हें सन्् 2000 में 19 साल पहले हमारे कुछ मित्रों व तत्कालीन पुलिस आई.जी. नरेन्द्र त्रिपाठी ने ग्वालियर में महिलाओं के सम्मेलन में बुलाकर सम्मानित करने का भी गर्व प्राप्त रहा था। आज प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें छत्तीसगढ़ का राजपाल नियुक्त कर महिला व पिछड़े दलितों को सम्मान दिया है। कांग्रेस की तुलना में भारतीय जनता पार्टी शुरू से ही कमजोर तब्कों का ध्यान काफी ज्यादा रखती आ रही हैं। ये भी एक विचारणीय सवाल है। भले ही मध्य प्रदेश में आदिवासी बच्चे पूरे देश में कुपोषण से सबसे ज्यादा मारे जा रहे हों पर फिर भी केन्द्र सरकार बजट देने में पहले से ज्यादा प्रखर रही है।
मुझे डॉ. भागीरथ प्रसाद, होशियार सिंह, एस.व्ही. प्रभात, आम्रवंशी, सरजियस मिंज, के.एल.मीणा आदि कमजोर तब्के के लोगों से 40 सालों से मिलने जुलने व उनकी कार्यशैली देखने का अवसर मिला। देखा गया कि ये लोग आम गरीबों के प्रति काफी संवेदनशील व न्यायप्रिय रहे थे। इसी तरह निर्मला बुच, रंजना चौधरी से लेकर अनसुइया जी को भी देखने का अवसर मिला ये महिलायें अपने अपने क्षेत्र में सक्रिय व सामाजिक न्याय का पक्ष मजबूत करती रही हैं। जब वे मध्य प्रदेश में 2006 में राज्य अ.जा.जा. की अध्यक्ष थीं तब लगभग हर रोज अपने भोपाल ऑफिस में जाती थीं। जबकि आमतौर पर आयोग के अध्यक्ष लोग हते या 15 दिन में एक-दो बार जाते हैं।
प्रोफेसर रहीं अनुसुईया जी छिंदवाड़ा के दमुआ नगर पंचायत क्षेत्र की निवासी हैं। वो तहसील परासिया के शा. महाविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर के तौर पर काफी लोकप्रिय रहीं, 1982 से सियासत में आ गइऔ व 1985-90 में दमुआ विधानसभा से विधायक चुनी गइऔ। उनकी लोकप्रियता के चलते उन्हें अर्जुन सिंह ने अपने मंत्री मंडल में उपमंत्री के तौर पर नियुक्त किया ये घटना आदिवासी क्षेत्र की किसी महिला के लिये 1985-86 में कितनी बड़ी बात रही होगी ये स्वयं कल्पना की जा सकती है। 1991 में उन्होंने कांग्रेस के घुटन भरे माहौल से मुक्त होकर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया और यहां भी उनकी लोकप्रियता को देखते हुए म.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने उन्हें म.प्र. के अ.जा.जा. आयोग का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया था। जनवरी 2006 से मार्च 2006 तक सिर्फ 3 महीने तक ही इस आयोग के माध्यम से उन्होंने खूब समाजसेवा व जनजाति वालों को राहत दिलाई। उनकी इसी सक्रियता के चलते उन्हें भारतीय जनता पार्टी के आला कमान ने राज्यसभा का सदस्य बना दिया। उनके हौसले व संघर्ष को सलाम किया।
खुशी से लोटपोट हैं
अनुसुईया मैडम के बारे में पूर्व विधायक पांढुर्णा जतन उइके से लेकर 3 बार के विधायक रहे पंडित रमेश दुबे तक उनकी तारीफों के पुल बनाते हुए देखे व सुने गये। दुबे जी के अनुसार अनुसुईया जी ने हमारे जिले व इलाके का नाम देश दुनिया में रोशन कर दिया। उनकी सादगी व न्यायप्रियता के ये लाग फैन देखे गये। सन्् 2000 में जब हमने अनुसुईया जी को ग्वालियर व भिण्ड में महिलाओं की समस्याओं से रूबरू कराया तो वो काफी गम्भीरता से महिलाओं की सुरक्षा पर गम्भीर देखी गई थीं। राज्यसभा में उनके साथ ग्वालियर राज घराने की महारानी राजमाता विजयाराजे सिंधिया की भाभी मायासिंह भी सदस्य रही थीं। उन्होंने भी मुझे उईके मैडम की प्रशंसा में कहा कि वो सादगी की मूर्ति हैं। वो जब राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में वाईस चेयरमैन रही थीं। तब भी उनकी सक्रियता कमाल की देखी गई। उनके छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बाहुल्य राज्य में राजपाल बन जाने से आम लोगों को उनके अनुभव का खूब लाभ मिलने वाला है। दिलचस्प है उनका छिन्दवाड़ा के दमुआ से दिल्ली व अब रायपुर तक का सफर भारतीय जनता पार्टी में लगता है कि कांग्रेस से ज्यादा गरीबों, दलितों, पिछड़ों की फिक्र करने वाले लोग हैं।

शीलाजी प्रधानमंत्री के लायक थीं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
श्रीमती शीला दीक्षित बीमार थीं और काफी कमजोर हो गई थीं। लेकिन ऐसी संभावना नहीं थी कि वे अचानक हमारे बीच से महाप्रयाण कर जाएंगी। आज अखबारों और टीवी चैनलों ने जिस तरह की भाव-भीनी विदाई उन्हें दी है, बहुत कम नेताओं को दी जाती है। जब वे दिल्ली की पहली बार मुख्यमंत्री बनीं तब और अब भी जो नेता उनका डटकर विरोध करते रहे हैं, वे भी उन्हें भीगे हुए नेत्रों से अलविदा कह रहे हैं। सभी मानते हैं कि आज दिल्ली का जो भव्य रुप है, उसका श्रेय शीलाजी को ही है। उन्हें मेट्रो रेल, सड़कों, पुलों, नई-नई बस्तियों और भव्य भवनों के निर्माण का श्रेय सभी दे रहे हैं। लेकिन मैं मानता हूं कि यदि शीलाजी को मौका मिलता तो वे भारत की उत्तम प्रधानमंत्री भी सिद्ध होतीं। मेरा उनसे लगभग चालीस साल का बहुत आत्मीय संबंध रहा है। उनकी कुछ व्यक्तिगत विशेषताएं मैं आपको बताना चाहता हूं। उनके आदरणीय ससुर उमाशंकरजी दीक्षित से मेरा पुराना परिचय था। जब मैं उनसे मिलने जाता था तो मुझे पता नहीं रहता था कि उनकी बहू कौन है लेकिन एक दिन शीलाजी से परिचय हुआ और वह मित्रता में बदल गया। एक-दूसरे के घर आना-जाना शुरु हो गया। उनके निर्वाचन क्षेत्र कन्नौज में एक सभा में हम साथ-साथ बोले। वे अचार्य नरेंद्रदेव का नाम बोलने में जरा अटक गईं। मैंने धीरे से बता दिया। उन्होंने मुझे बार-बार धन्यवाद दिया। हम लोग फिर अक्सर मिलने लगे। वे प्रधानमंत्री राजीव गांधी के मंत्रालय में राज्यमंत्री थीं। वे जब निजामुद्दीन में रहने लगीं तो वे अक्सर मुझे और उस्ताद अमजदअली खान को खाने पर साथ-साथ बुलातीं। वे साबुत करेले की सब्जी इतनी अच्छी बनाती थीं कि जब भी बुलातीं (मुख्यमंत्री बनने पर भी) तो कहतीं, ‘भाई, आपके लिए करेले की सब्जी तो मैं खुद ही बनाऊंगी।’ एक दिन पाकिस्तान के एक पूर्व प्रधानमंत्री मेरे घर आए। उसी समय शीलाजी का फोन आया। मैंने उन्हें बताया तो कहने लगीं, आज करेला बना रही हूं। आप आइए और उन्हें भी ले आइए। मैंने कहा कि ‘प्रोटोकाॅल’ की अड़चन पड़ सकती है। तत्काल शीलाजी ने कहा कि मैं अभी आती हूं, खुद, उन्हें बुलाने के लिए। उन्हें अपने पद का घमंड बिल्कुल भी नहीं था। एक बार वे दिल्ली के लिए एक राजभाषा विधेयक ले आईं। मुझे लगा कि उसमें हिंदी को उचित स्थान नहीं दिया गया है। मैंने फोन किया तो बोलीं कि आप दो-तीन सांसदों को अपने साथ ले आइए और अफसरों को फटकार लगाइए। हम गए और उन्होंने उस विधेयक को वापस लेकर बदल लिया। ऐसे कई काम हिंदी के लिए मैंने उन्हें जब भी बताए, उन्होंने सहर्ष कर दिए। उनमें सहजता और आत्मीयता इतनी थी कि यदि किसी सभा में वे मंच पर बैठी हों और मैं नीचे श्रोताओं में तो अक्सर मुझे वे आग्रहपूर्वक अपने साथ मंच पर बुला ले जातीं। एक बार मैं 40 सांसदों के साथ लाहौर गया। अटलजी ने भेजा था। प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो से जब मैंने सुषमा स्वराज का परिचय करवाया तो मैंने कहा कि कुछ दिन पहले तक ये दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं तो बेनजीर ने पूछा कि आजकल वो दूसरी मेडम कौन हैं? मैंने कहा, वो शीला दीक्षित हैं। वो मेरी बड़ी बहन हैं और ये सुषमाजी मेरी छोटी बहन हैं। शीलाजी से कुछ ऐसा समीकरण बैठ गया था कि जब अर्जुनसिंहजी के साथ मिलकर वे कांग्रेस से अलग होने लगी थीं तो अनुशासन समिति के उपाध्यक्ष बलरामजी जाखड़ ने अन्य नेताओं के साथ शीलाजी को भी निकालने का फैसला कर लिया। मैंने प्रंधानमंत्री नरसिंहरावजी को बताया। शीलाजी ने मेरे कहने पर प्र.मं. को तुरंत एक फेक्स भेजा और उनका निष्कासन उस वक्त टल गया। वे जब केरल की राज्यपाल नियुक्त हुईं तो उन्होंने मुझे वहां कई बार बुलाया। मैं जा नहीं सका। पिछले दिनों मेरी पत्नी बीमार हुई तो चुनाव के दौरान भी उनके फोन आते रहे। मुझे अफसोस है कि इधर मैं उनसे मिल नहीं सका। मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि।

पाक के ये “नापाक रहनुमा ”
तनवीर जाफ़री
भारत को विभाजित कर एक अलग इस्लामी राष्ट्र का गठन करने वाले कुछ मुस्लिम नेताओं ने जब इस राष्ट्र का नामकरण “पाकिस्तान” करने का निर्णय लिया होगा उस समय हो सकता है उन्होंने इस बात की कल्पना की हो कि भविष्य में यह देश अर्थात पाकिस्तान दुनिया का सबसे शक्तिशाली इस्लामी राष्ट्र बनेग। इन्होंने यह भी सोचा होगा कि पाकिस्तान भविष्य में मुस्लिम राष्ट्रों का नेतृत्व करेगा। संयुक्त भारत में रहने वाले मुसलमानों को वरग़लाने के लिए इन चंद नाम निहाद मुस्लिम नेताओं ने इस प्रस्तावित देश का नाम “पाकिस्तान” रखकर यह जताना चाहा था कि यह एक “पाक” अर्थात “पवित्र आस्तां” अर्थात “पवित्र लोगों का घर” बनेगा। परन्तु जब इतिहास से मुझे यह जानकारी मिली कि पाकिस्तान के गठन के सबसे बड़े किरदार और मुख्य संस्थापक यानी मोहम्मद अली जिन्नाह उस समय के एक ऐसे इस्माइली शिया मुसलमान थे जो शराब पिए बिना रात का भोजन नहीं करते थे। इतना ही नहीं बल्कि सूअर के मांस के उपयोग से भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी, उसी समय से मेरे ज़ेहन में यह बात उठने लगी थी कि भले ही इस नए नवेले देश का नाम “पाक” आस्तां क्यों न रख दिया गया हो परन्तु दरअसल इसकी बुनियाद डालने वाले पाक के सबसे लोकप्रिय नेता इस्लामी नज़रिये से स्वयं में ही न केवल “नापाक” थे बल्कि ग़ैर इस्लामी भी थे। उनकी जीवनी से पता चलता है कि इस्माइली शिया मुसलमान होते हुए भी उन्होंने कभी हज यात्रा नहीं की। उनकी किसी भी जीवनी में नमाज़ पढ़ने और रोज़े रखने आदि इस्लामिक गतिविधियों का पालन करने का भी कोई ज़िक्र नहीं है। उनके विषय में उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़ वे सूअर व शराबख़ोरी लुक छुप कर नहीं करते थे बल्कि उनकी पत्नी रतन बाई जिन्ना के लिए अपने हाथों से सूअर का मांस बनाती थी। सूअर का मांस व शराब के सेवन को इस्लाम में हराम माना जाता है। वे अक्सर समारोहों में भी शराब पीते थे। बल्कि यह चीज़ें उनके सामान्य जीवन का हिस्सा थीं । क्या अजब इत्तेफ़ाक़ है कि आज तक उन्हीं जिन्नाह को तथाकथित इस्लामिक देश, पाकिस्तान के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। वे मुस्लिम लीग के भी सर्वोच्च नेता थे। पाकिस्तान के गठन के बाद वे वहां के पहले गवर्नर जनरल बने। पाकिस्तान में उन्हें क़ायदे-आज़म यानी महान नेता और बाबा-ए-क़ौम अर्थात राष्ट्र पिता के लक़ब से नवाज़ा जाता है। उनके जन्म दिन पर पाकिस्तान में अवकाश भी रहता है।पाकिस्तान और दुनिया के तमाम लोग आज भी उनकी मज़ार पर फ़ातिहा पढ़ने जाते हैं। यहाँ मैं यह भी स्पष्ट करता चलूँ कि किसी भी आम व्यक्ति का खान पान निश्चित रूप से उसका अति व्यक्तिगत विषय है। लिहाज़ा एक व्यक्ति के नाते जिन्नाह साहब के किसी भी शौक़ पर आपत्ति करने का किसी को भी कोई हक़ नहीं। परन्तु चूँकि वे एक तथाकथित इस्लामी राष्ट्र के संस्थापक थे इसलिए उनका इस्लामी शिक्षाओं व संस्कारों का अनुसरण करना ज़रूरी था। और निश्चित रूप से इस्लामी शिक्षा किसी भी मुसलमान को शराब और सूअर नोशी की इजाज़त नहीं देती।
बहरहाल ग़ैर इस्लामी चाल चलन रखने वाले रहनुमाओं की कोशिशों के नतीजे में बने देश का हश्र भी आज वैसा ही होता दिखाई दे रहा है जैसी कि इस देश की बुनियाद रक्खी गई है। अपने अस्तित्व में आने के मात्र 24 वर्षों बाद ही पाकिस्तान के इस्लामी राष्ट्र होने के दावे की हवा पूरी तरह उस समय निकल गई जबकि पूर्वी पाकिस्तान ने इस्लाम के नाम पर इकठ्ठा रहने के बजाए क्षेत्र व भाषा के नाम पर अलग रहना ज़्यादा लाभदायक और ज़रूरी समझा। आख़िर जब इस्लामी राष्ट्र का सपना दिखा कर भारत को विभाजित किया गया था तो उस स्थिति को क्योंकर बनाए नहीं रक्खा गया?1971 से पहले भी पाकिस्तान के स्थानीय मुसलमानों द्वारा भारत से 1947 में व उसके बाद पहुँचने वाले मुसलमानों के साथ काफ़ी ज़ुल्म, ज़्यादती व अन्याय करने की ख़बरें आती रही हैं। उन्हें आज तक मुहाजिर कहा जाता है। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान को जनरल ज़ियाउलहक़ के रूप में एक ऐसा कट्टर शासक मिला जिसने पाकिस्तान को कट्टरपंथ के मार्ग पर आगे बढ़ाया। ज़िया के समय ही पाकिस्तान में ईश निंदा क़ानून बना जिसका आज तक दुरूपयोग होता आ रहा है। आज पाकिस्तान अलग अलग विचारधारा के कट्टरपंथियों का गढ़ बन चुका है। हिन्दू, सिख, ईसाई, शिया, अहमदिया, बरेलवी तथा सूफ़ी मत के लोग वहां पूरी तरह असुरक्षित हैं। तालिबानों का भी पाकिस्तान के बड़े क्षेत्र में गहरा प्रभाव है। कश्मीर सहित पूरे भारत में कई दशकों से आतंक फैलाने की पाकिस्तान की जो कोशिशें हैं वह भी इस्लामी शिक्षाओं का हिस्सा क़तई नहीं हैं। इस्लाम धर्म में झूठ बोलना भी गुनाह है। परन्तु पाकिस्तान तो भारत में प्रायोजित की जा रही दहशतगर्दी को लेकर भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से झूठ बोलता रहता है। यह तथाकथित इस्लामी राष्ट्र पाकिस्तान ही है जहाँ जुलाई 2007 में इस्लामाबाद में इतना बड़ा लाल मस्जिद हादसा हुआ जिसकी पूरी दुनिया में दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती। ग़ौर तलब है कि परवेज़ मुशर्रफ़ के राष्ट्रपति काल में लाल मस्जिद में सेना द्वारा एक बड़ा आतंकवाद विरोधी ऑप्रेशन छेड़ा गया था। 3 से 11 जुलाई 2007 तक चले 8 दिन के इस ऑपरेशन में 154 लोग मारे गए थे जबकि 50 आतंकी हिरासत में लिए गए थे। इस मस्जिद का एक जेहादी इमाम मारा गया था जबकि दूसरा फ़ौजियों से अपनी जान बचाने के लिए बुर्क़ा ओढ़ कर भागते हुए पकड़ा गया था।
क्या उपरोक्त घटनाओं व इनके पात्रों के बारे में पढ़कर यह सोचा जा सकता है कि यह उस इस्लामी मत के लोगों या किसी ऐसे इस्लामी देश की बातें हैं जो इस्लाम हज़रत मोहम्मद, हज़रत अली व हज़रत इमाम हुसैन व इमाम हसन की शिक्षाओं का इस्लाम है? झूठ, मक्कारी, क़त्लोग़ारत, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, बेईमानी, रिश्वतख़ोरी, आतंकवाद को सरपरस्ती देना जैसी बातें क्या “पाक” व “इस्लामिक रिपब्लिक” जैसे शब्द अपने देश के नाम के साथ जोड़ने की इजाज़त देती हैं। पिछले दिनों पाकिस्तान के बारे में सिलसिलेवार तरीक़े से छपी ख़बरों ने पूरी दुनिया को चौंका कर रख दिया। ख़बर यह थी कि इस “पाक” और “इस्लामी” देश के एक पूर्व राष्ट्रपति व दो पूर्व प्रधानमंत्री रिश्वत, धनशोधन, पद के दुरूपयोग तथा भ्रष्टाचार के मामले में जेल की सलाख़ों के पीछे पहुँच चुके हैं जबकि दो अन्य पूर्व प्रधानमंत्री ऐसे ही आरोपों में मुक़ददमों का सामना कर रहे हैं। इस समय जहाँ आसिफ़ ज़रदारी के रूप में एक पूर्व राष्ट्रपति पाकिस्तान की जेल की शोभाबढ़ा रहे हैं वहीँ नवाज़ शरीफ़ और शाहिद ख़ाकान अब्बासी जैसे पाक के दो पूर्व प्रधानमंत्री भी जेलों की रौनक़ में इज़ाफ़ा कर रहे हैं। सभी पर भ्रष्टाचार व आर्थिक अनियमिताओं तथा इसके लिए पद का दुरूपयोग करने का इलज़ाम है। आसिफ़ अली ज़रदारी को तो उनकी पत्नी बेनज़ीर भुट्टो के प्रधानमंत्री रहते हुए ही “मिस्टर 10 परसेंट” की उपाधि मिल गयी थी।आश्चर्य तो यह है की बदनाम व्यक्ति होने के बावजूद उनकी पार्टी ने बेनज़ीर की हत्या के बाद उन्हें कैसे राष्ट्रपति बना दिया। इन तीन “नापाक रहनुमाओं ” के अलावा दो और पूर्व”पाक” प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी और राजा परवेज़ अशरफ़ भी ऐसे ही मामलों का अदालती सामना कर रहे हैं। यदि अदालत ने इन्हें भी “नापाक ” साबित कर दिया तो पाकिस्तान “नापाक रहनुमाओं ” के सज़ा पाने व जेल जाने के अपने ही मौजूदा 3 के रिकार्ड को तोड़ कर 5 “नापाक रहनुमाओं ” तक पहुंचा देगा।
भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी के अलावा भी हैवानियत व अराजकता जैसे ग़ैर इस्लामी व ग़ैर इंसानी मामलों में भी पाकिस्तान का रेकार्ड पूरी तरह नापाक है। कभी इस देश ने राजनैतिक मतभेदों के चलते प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को फांसी के फंदे पर लटकते देखा तो कभी औरत होने के बावजूद तथाकथित इस्लाम परस्तों द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो को हलाक कर दिया गया। मस्जिदों, इमामबारगाहों, दरगाहों आदि को निशाना बनाकर हज़ारों लोगों की जानें जाना तो इस “पाक” देश में आम बात हो गयी है। कभी नमाज़ियों पर हमला, कभी मुहर्रम के जुलूस पर आत्मघाती हमला, कभी फ़ौजियों और उनके मासूम बच्चों की सामूहिक हत्याएं यही वह हालात हैं जिसने पाक को “नापाक” देश के रूप में प्रचारित कर दिया है। पिछले दिनों पाकिस्तान पर आए भयंकर आर्थिक संकट पर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की मार्मिक अपील ने यह सोचने के लिए मजबूर किया कि आख़िर पड़ोसी देश की दुर्दशा की वजह क्या है। तो पीछे मुड़कर देखने पर यही नज़र आया कि जिस तरह इस की बुनियाद ही नापाक थी उसी तरह आगे चलकर भी यहाँ के रहनुमाओं ने भी नपाकीज़गी में और इज़ाफ़ा करने में कोई कसर बाक़ी नहीं रक्खी। पाकिस्तान की रुसवाई का सबसे बड़ा कारण ही यही है।

प्रत्यक्ष कर संग्रह का लक्ष्य
अजित वर्मा
भारत सरकार ने प्रत्यक्ष कर संग्रहण का इस बार जो लक्ष्य निर्धारित किया है, उसे विशेषज्ञ यह मान रहे हैं कि यह लक्ष्य हासिल करने के करीब रहेगा। सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए प्रत्यक्ष कर संग्रह का लक्ष्य नए सिरे से तय करते हुए इसे 13.35 लाख करोड़ रुपए तय किया है जिसे केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) प्रमुख ने कठिन लेकिन हासिल किया जा सकने वाला बताया है।
यह भी कहा जा रहा है कि सरकार छूट और कटौती समाप्त होने के बाद कंपनी कर की दरों में और कमी लाने के बारे में सोच सकती है। पिछले संशोधित अनुमान में 2019 -20 के लिए हमारा लक्ष्य 13.78 लाख करोड़ रुपए तय किया गया था। यह अपेक्षाकृत अवास्तविक दिखता था क्योंकि यह सालाना आधार पर करीब 24 फीसद की वृद्धि को दर्शा रहा था।
बजट पर विचार के दौरान प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने इस बारे में अपनी बातें रखी थीं। इसी का नतीजा है कि सरकार ने पिछले साल के वास्तविक संग्रह को देखते हुए उस आधार पर लक्ष्य तय किया। और प्रत्यक्ष कर के लिये बजट में तय संग्रह लक्ष्य को अब 13.35 लाख रुपये तय किया गया है। यह अपेक्षाकृत अवास्तविक दिखता था क्योंकि सालाना आधार पर करीब 17.5 फीसद वृद्धि को बताता है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि यह लक्ष्य हमें काफी उम्मीद देता है कि हम दिए गए लक्ष्य के अनुसार 17.5 फीसद वृद्धि हासिल करने में कामयाब होंगे। आयकर विभाग ने पिछले वित्तवर्ष में प्रत्यक्ष संग्रह 11.37 लाख करोड़ रुपए प्राप्त किया।
निवेश और वृद्धि को गति देने के लिए बजट में जो कदम उठाया गया है, उस पर यह भरोसा जताया गया है कि अर्थव्यवस्था अच्छी करेगी और परिणामस्वरूप राजस्व संग्रह भी अच्छा रहेगा। प्रत्यक्ष कर संग्रह में व्यक्तिगत आयकर, प्रतिभूति सौदा कर और कपंनी कर शामिल हैं। कंपनी कर की दर के बारे में यह बताया जा रहा है कि वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले सप्ताह बजट में लगभग सभी कंपनियों के लिए कर की दरें कम की है।
सवाल यह है कि कंपनी की कर दरें कुछ छूट और कटौती से जुड़ी हैं जिसे कंपनियां प्राप्त कर रही हैं। सरकार की नीति कहती है कि छूट और कटौती को समय के साथ धीरे-धीरे समाप्त किया जाएगा। यह करीब पांच से 10 साल हो सकता है। सीबीडीटी प्रमुख मोदी ने कहा- इसीलिये छूट और कटौती खत्म होने के साथ हम निश्चित रूप से मान सकते हैं कि कंपनी कर की दर कम होगी। वहीं दूसरी ओर प्रत्यक्ष कर संग्रह का निर्धारित लक्ष्य हासिल भी हो सकेगा।

नारी शक्ति की प्रतीक शीला दीक्षित का यूं चले जाना
डॉ हिदायत अहमद खान
यह खबर स्तब्ध कर देने वाली है कि कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अब हमारे बीच नहीं रहीं। इस सूचना पर विश्वास करने को मन नहीं करता, क्योंकि जिस लगन और मेहनत के साथ राजनीति के क्षेत्र में वो लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहीं थीं, उसे देखते हुए लोगों को यही उम्मीद थी कि उनकी चहेती नेता आज नहीं तो कल एक बार फिर दिल्ली की मुख्यमंत्री बनेंगी। इस दुनिया को उन्होंने ऐसे समय हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है जबकि कांग्रेस को ही नहीं बल्कि राजनीतिक जगत को भी उनकी महती आवश्यकता थी। दरअसल एक तरफ चुनावी हार से कांग्रेस मायूसी के दलदल में समाती चली गई है, जिसे उबारने के लिए शीला दीक्षित जैसे मजबूत नेतृत्व की ही आवश्यकता थी। वहीं दूसरी तरफ सिद्धांतों से समझौता कर धन और पद-प्रतिष्ठा को महत्व देने वाले तमाम नेताओं के लिए शीला दीक्षित एक सबक साबित हो सकतीं थीं। आज राजनीति के क्षेत्र में भ्रष्टाचारियों, अपराधियों और धन कुबेरों का बर्चस्व कायम होता जा रहा है, जिससे निपटने के लिए सिद्धांतों पर चलने वालों की आवश्यकता महसूस होती है। इसलिए कुछ बेहतर करने वाले आत्मविश्वास से भरी नारी शक्ति के तौर पर राजनीति में स्थापित शीला दीक्षित की कमी देश को हमेशा खलेगी। चेहरे पर हल्की मुस्कान लिए, जरा हल्के से बोलने वाली दृढ़ प्रतिज्ञ शीला दीक्षित कुछ समय से बीमार चल रहीं थीं, जिस कारण दिल्ली के एस्कॉर्ट अस्पताल में जेरे इलाज उन्होंने 81 साल की उम्र में अंतिम सांसें लीं। दिल्ली की सियासत में बतौर महिला मुख्यमंत्री बने रहने का तमगा भी उन्हें हासिल रहा, जिसे तोड़ पाना अब भविष्य में किसी के बूते की बात नहीं लगती है। दरअसल सब की चहेती शीला दीक्षित 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। बतौर मुख्यमंत्री उनका कार्यकाल 1998 से 2013 तक रहा। वो केरल की राज्यपाल भी रहीं। इससे पहले शीला दीक्षित 1984 से 1989 तक उत्तर प्रदेश की कन्नौज लोकसभा सीट से सांसद भी रहीं। महिला सशक्तिकरण का उदाहरण पेश करने वाली शीला दीक्षित का जन्म 31 मार्च 1938 को पंजाब के कपूरथला में हुआ था। उनकी स्कूली शिक्षा दिल्ली के कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी स्कूल में संपन्न हुई। इसके बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस कॉलेज से ग्रेजुएशन के साथ ही एमए की डिग्री भी हासिल की। आपका विवाह प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी एवं पूर्व राज्यपाल व केन्द्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री रहे उमाशंकर दीक्षित के परिवार में हुआ। आपके पति स्व. विनोद दीक्षित भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य थे। आपकी दो संतानें, एक पुत्र और एक पुत्री है। एक पढ़ी-लिखी संभ्रांत महिला होने के नाते राजनीतिक क्षेत्र का इस्तेमाल उन्होंने महिला उत्थान के लिए सफलता पूर्वक किया। उन्होंने समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए अथक प्रयास किए। उन्होंने ऐसे अनेक अभियानों का नेतृत्व किया, जिनसे महिलाओं का भला हो सकता था। यही नहीं बल्कि महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों के विरोध में भी उन्होंने आवाज बुलंद की और इसी के साथ अगस्त 1990 में 23 दिनों तक अपने 82 साथियों के साथ उन्होंने जेल यात्रा भी की। ऐसी संघर्षशील महिला नेत्री को पाकर दिल्ली ही नहीं बल्कि संपूर्ण देश अपने आपको गौरवांवित महसूस करता रहा है। यह कम गौरव की बात नहीं है कि शीला दीक्षित ने 1984 से 1989 तक संयुक्त राष्ट्र संघ की महिला स्तर समिति में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। इन तमाम उपलब्धियों से पहले 1970 में, वे यंग विमन्स असोसियेशन की अध्यक्षा बनीं और इसी दौरान उन्होंने दिल्ली में दो बड़े महिला छात्रावास खुलवाए। इसके साथ ही वो इंदिरा गाँधी स्मारक ट्रस्ट की सचिव भी हैं। यह वही ट्रस्ट है जो शांति, निशस्त्रीकरण एवं विकास के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार प्रदान करता है। यही नहीं शीला दीक्षित धर्म-निर्पेक्षता पर अडिग रहने वाली नेता रही हैं, उन्होंने सदा ही सांप्रदायिक ताकतों का हर संभव विरोध किया। दरअसल शीला दीक्षित का मानना था कि विविधता वाले हमारे देश हिंदुस्तान में यदि जनतंत्र को जीवित रखते हुए मजबूती प्रदान करना है तो सही व्यवहार और सत्यता के मानदंडों का पालन करना जीवन का एक अभिन्न अंग होना चाहिये। राजनीति के बदलते प्रतिमानों में शीला दीक्षित का स्थान सर्वोच्च शिखर वाला ठहरता है। उनके यूं अचानक चले जाने से सियासी जगत में जो जगह खाली हुई है अब वो भर पाना नामुमकिन जैसी बात है।

सैकड़ों मायावती और हजारों आनंद
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत के लगभग सभी टीवी चैनलों और अखबारों में यह खबर खूब छपी है कि मायावती के भाई की 400 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त कर ली गई है। दिल्ली के पास नोएडा इलाके में उप्र की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के भाई आनंदकुमार की यह सात एकड़ जमीन थी। यह जमीन आनंद ने उस समय कब्जाई थी, जब उसकी बड़ी बहन उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री थी। यह जमीन बेनामी है। आनंद और उसकी पत्नी विचित्रा इस मंहगी जमीन पर एक पांच सितारा होटल और कई आलीशान इमारतें बनाने की तैयारी कर रहे थे। आनंद के पास जाहिरा तौर पर इस समय 1350 करोड़ रु. की संपत्ति है। उसने कई फर्जी कंपनियां बना रखी हैं। यह वही आनंदकुमार है, जो 1996 में इसी नोएडा-प्रशासन में 7-8 सौ रु. माहवार की नौकरी करता था लेकिन बहनजी के राज में वह अरबपति बन गया। मायावती ने अपने इसी भाई को बहुजन समाज पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया है। जाहिर है कि आनंद पर लगे आरोप अदालत में सिद्ध हो गए तो उसे कम से कम सात साल की सजा मिलेगी और कुल संपत्ति का 25 प्रतिशत याने अरबों रु. जुर्माना भी भरना पड़ेगा। केंद्र की मोदी सरकार और उप्र की योगी सरकार को बधाई कि उसने लिहाजदारी नहीं दिखाई और नेताजी को कठघरे में खड़ा कर दिया लेकिन मैं पूछता हूं कि क्या देश में मायावती एक ही है और आनंद एक ही है ? सरकार ने सिर्फ आनंद को पकड़ा, मायावती कैसे छूट गई ? आपने पत्ते तोड़ लिये लेकिन जड़ तो हरी की हरी है। आनंद ने यदि यह भ्रष्टाचार किया है तो किसके दम पर किया है ? देश में सैकड़ों मायावतियां हैं और हजारों आनंद हैं ? क्या देश में एक भी नेता ऐसा है, जो कह सके कि मेरा दामन साफ है ? मायावती का तो कोई परिवार नहीं है। कहा जाता है कि लोग अपने बाल-बच्चों के लिए भ्रष्टाचार करते हैं। मायावती का संदेश है कि अब देश बिना परिवारवाले नेताओं से भी सावधान रहे। नेतागीरी इस देश में काजल की कोठरी बन गई है। किसी नेता का दामन साफ रह ही नहीं सकता। यदि मोदी और योगी भारत की राजनीति शुद्धिकरण करना चाहते हैं तो उन्हें चाहिए कि वे सभी दलों के प्रमुख नेताओं और उनके रिश्तेदारों की खुली जांच करवाएं और उनकी सारी संपत्तियां जब्त करवाएं। भाजपा को भी न छोड़ें। सरकार के पास इतना धन इकट्ठा हो जाएगा कि उसे आयकर वसूलने की जरुरत नहीं रहेगी।

सरकार जरूरी या संगठन
ओमप्रकाश मेहता
अमित शाह के सरकार में जाने से संगठन कमजोर हुआ….? हर शख्स का अपनी जगह अपना महत्व होता है, फिर वह चाहे परिवार हो या समाज, या कि राजनीति, इस ब्रह्म वाक्य को आज पूरा देश महसूस करने को मजबूर है, देश की सत्ता का जबसे मोदी और अमित शाह के बीच बंटवारा हुआ है, तभी से देश के सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी का रूतबा कम होता दिखाई दे रहा है, पिछले माह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने ‘हनुमान’ अमित शाह जी को संगठन की राजनीति से बाहर कर उन्हें सरकार में अपना प्रमुख सहयोगी बनाकर पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र के क्रियान्वयन और कश्मीर समस्या जैसे मुद्दे सौंपकर उन्हें गृहमंत्री बना दिया, अब अमित शाह अपने आपमें इतने उलझ गए कि उन्हें पार्टी संगठन की ओर ध्यान देने का समय ही नहीं मिल पा रहा, यद्यपि अमित भाई पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभी भी है, किंतु उन्होंने कार्यवाहक अध्यक्ष जे.पी. नड्डा जी को सम्पूर्ण कार्यभार सौंपकर अपने आपको गृह मंत्रालय तक सीमित कर लिया, यद्यपि सरकार में ऐसा कहा जाता है कि अमित शाह का हर शब्द मोदी का ही शब्द मानकर उस पर अमल किया जा रहा है, क्योंकि मोदी जी ने सरकार के दैनंदिनी कार्य अमित भाई को सौंपकर स्वयं के राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय मामलों तक ही सीमित कर लिया है। इस प्रकार कुल मिलाकर सरकार का अस्सी फीसदी महत्वपूर्ण कार्यभार अमित भाई के कंधों पर आ गया है और अमित भाई उसी में व्यस्त हो गए है, इसलिए वे न तो अब पार्टी को देख पा रहे है और न ही संघ व विहिप जैसे अहम् अनुषांगिक संगठनों को? इसी कारण से पिछले दिनों से यह महसूस किया जा रहा है कि पार्टी व पार्टी के साथ तालमेल कर सरकार से जुड़े दलों में अनुशासन हीनता बढ़ती जा रही है, जिस नड्डा जी जैसे तीसरी श्रेणी के नेता नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं।
हाल ही में देश में सत्तारूढ़ एनडीए संगठन में शामिल जदयू की बिहार सरकार ने भाजपा के सरंक्षक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की गतिविधियों पर खूफिया जांच शुरू करवा दी और भाजपा कुछ नहीं कर पाई। इसी तरह भारतीय जनता पार्टी संसदीय दल की बैठक में भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री के क्रिकेट-बल्लेबाज विधायक की करतूतों की प्रधानमंत्री मोदी ने खुलकर भत्र्सना की और यह भी कहा कि उक्त विधायक चाहे किसी का भी बेटा हो उसके खिलाफ व उसका जेल के द्वार पर स्वागत करने वाले पार्टीजनों के खिलाफ पार्टी से निकालने की कार्यवाही की जाए, किंतु चूंकि उक्त विधायक के दबंग पिता का पार्टी में रूतबा है, इसलिए उक्त विधायक को पार्टी ने सिर्फ एक नोटिस या ‘कारण बताओं सूचना-पत्र’ देकर कत्र्तव्य की खानापूर्ति कर ली, अर्थात् प्रधानमंत्री जी के निर्देशों की भी अनदेखी कर दी गई, इसके पूर्व भोपाल की सांसद प्रज्ञा भारती ठाकुर द्वारा गांधी जी के हत्यारें नाथूराम गोड़से की तारीफ करने पर भी प्रधानमंत्री जी ने काफी दुःखी होकर अपने विचार व्यक्त किए थे, किंतु उक्त घटना को भी पार्टी ने कोई विशेष महत्व नहीं दिया। जबकि आज की वास्तविकता यह है कि मोदी रूपि गंगा में साथ बहने के कारण इन कथित पापियों का भी राजनीति में उद्धार हुआ है और आज ये लोग जो भी है, जिस जगह पर भी है, मोदी जी के कारण है।
यदि हम भाजपा का पुराना इतिहास देखें तो यह वहीं पार्टी है, जिसके शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवानी को पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर जाकर उनके बारें में सिर्फ दो शब्द बोलने पर पार्टी के शीर्ष पदों से इस्तीफा देना पड़ा था, आज स्वयं अड़वानी व उनके साथी डाॅ. मुरली मनोहर जोशी को पार्टी के ऐसे दिन देखने पड़ रहे है, वे आखिर क्या सोचते होंगे? क्या इन पितृपुरूषों की घुटन को पार्टी के किसी शीर्ष नेता ने आज तक महसूस किया?
इस तरह कुल मिलाकर इतनी लम्बी जिरह करने का मकसद यह है कि अब कांग्रेस के रसातल की ओर जाने के बाद देश के आम वोटर की आस मोदी-शाह की भाजपा से ही है, और यदि ये शीर्ष नेता भी संगठन की जगह सत्ता को वरीयता देने लगे है तो फिर देश की भावी राजनीति का क्या होगा? क्या फिर देश में राष्ट्रीय दल एक भी नहीं बचेगा और क्षेत्रिय दल देश पर बारी-बारी से राज करेंगे?

जाधव को रिहा करे पाकिस्तान
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के जज इस समय परम आनंद की स्थिति में होंगे। उन्होंने अपनी जिंदगी में कूलभूषण जाधव के मामले-जैसा फैसला कभी नहीं दिया होगा। इस फैसले का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि वादी और प्रतिवादी दोनों ही जश्न मना रहे हैं। भारत कह रहा है कि 16 में से 15 जजों ने जाधव के मुकदमे को फिर से चलाने और उसे भारतीय वकीलों की मदद लेने का अधिकार देकर पाकिस्तान के मुंह पर करारा तमाचा लगाया है और पाकिस्तान कह रहा है कि अदालत ने भारत की इस प्रार्थना को रद्द कर दिया है कि जाधव को वह निर्दोष माने और उसे रिहा करे। अदालत ने उस पर फिर से मुकदमा चलाने को कहा है। पाकिस्तान उसका स्वागत करता है। अगर पाकिस्तानी लोग इस फैसले पर जश्न मना रहे हैं तो भारत में भी लोग खुश हैं कि कुलभूषण जाधव की जान बच गई। वह बचेगी या नहीं, यह तो पाकिस्तान की अदालत तय करेगी लेकिन अब पाकिस्तान की फौजी या नागरिक अदालत अपनी मनमानी नहीं कर सकती। उसे भारतीय वकीलों के लिए भी अपने दरवाजे खोलने होंगे। पाकिस्तान ने जाधव पर एकतरफा फैसला देकर अंतरराष्ट्रीय अदालत के सामने अपनी नाक नीची कर ली। उसके मृत्युदंड के फैसले पर पुनर्विचार की बात कहकर हेग की अदालत ने पाकिस्तान को परेशानी में डाल दिया है। पाकिस्तानियों को इस बात की तकलीफ जरुर होगी कि इस मामले में अमेरिका और चीन ने भी उसका साथ नहीं दिया। उनके जजों ने भी पाकिस्तान की आलोचना की है कि उसने जाधव के मामले में वियना अभिसमय या अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का उल्लंघन किया है। अब यदि जाधव पर दुबारा मुकदमा चलाकर पाकिस्तान उसे फांसी देना चाहेगा तो वह आसान नहीं होगा। बेहतर यही होगा कि इमरान खान गहरी उदारता का परिचय दें। जैसे उन्होंने भारतीय पायलट अभिनंदन को रिहा किया, वैसे ही वे जाधव को रिहा कर दें। इस काम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी और भारत-पाक संवाद का रास्ता खुलेगा। ऐसा होने पर जाधव के मामले में न भारत हारेगा और न ही पाकिस्तान। भारत और पाकिस्तान, दोनों ही जीतेंगे।

वृद्धजनों को दें पूर्ण सम्मान
डा0 जगदीश गाँधी
माँ की ममता तथा करूणा से भरी बचपन की एक बड़ी ही मार्मिक कहानी मुझे याद आ रही है – सांसारिक स्वार्थ में डूबा एक व्यक्ति अपनी बूढ़ी माँ का दिल निकालने के लिए हाथ में छुरी लेकर गया और माँ को मारकर उसका दिल हाथ में लेकर खुशी-खुशी चला। रास्ते में उसे जोर की ठोकर लगी वह गिर पड़ा। छिटककर हाथ से गिरा माँ का कलेजा बेटे की तकलीफ से तड़प गया। माँ के दिल से आह निकली मेरे प्यारे बेटे चोट तो नहीं आयी। माँ तो सदैव अपने बच्चों पर जीवन की सारी पूँजी लुटाने के लिए लालयित रहती है। मोहम्मद साहब ने कहा था कि अगर धरती पर कहीं जन्नत है तो वह माँ के कदमों में है।
पारिवारिक एकता का ज्ञान देने की जिम्मेदारी परिवार तथा स्कूल निभाये :-
समाज में बढ़ रही घोर प्रतिस्पर्धा से नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है। बुजुर्गो पर इसका प्रभाव ज्यादा है। उनकी उपेक्षा में बढ़ोतरी हुई है। जीवन के अंतिम पड़ाव में वह बेटे व परिवार के सुख से वंचित हो रहे हैं। इस पर जल्द नियंत्रण नहीं किया गया तो स्थिति भयावह हो जाएगी। बच्चों में बुजुर्गो के प्रति स्नेह व लगाव पैदा करना बहुत जरूरी है। बच्चों को यह बताया जाए कि बुजुर्गो की सेवा से ही जीवन सफल हो सकता है। समाज तथा विशेषकर स्कूलों के लिए यह एक चुनौती है। इसके लिए मानवीय सूझबूझ से भरी व्यापक योजना बनाने की जरूरत है।
केवल प्रेमपूर्ण हृदय वाला परिवार ही प्रकाशित है :-
समाज में बुजुर्गो का परम स्थान है लेकिन तेजी से बदलते समाज में उनका स्थान गिरता जा रहा है। विदेशों में पढ़ाने व अधिक धन कमाने के लिए वहीं नौकरी करने वालों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। आधुनिक सुख-सुविधाओं की चाह में वे स्वयं तो बड़े शहरों में रहना चाहते हैं लेकिन अपने मां-बाप को गांव-कस्बे में रखना चाहते हैं। बेटा जब अपने बूढ़े मां-बाप को अपने से दूर रखेगा तो उनकी सेवा कैसे हो सकती है?
वृद्धजनों को पूरा सम्मान तथा सामाजिक सुरक्षा देना समाज का उत्तरदायित्व है :-
वर्तमान भौतिक युग में आज सारे विश्व में वृद्धजनों के प्रति घोर उपेक्षा बरती जा रही हैं। विकसित देशों ने इस समस्या से निपटने के लिए सरकार की ओर से वृद्धजनों के लिए ओल्ड ऐज होम स्थापित किये हैं। जिसमें वृद्धजनों के खाने-पीने, बेहतर आवासीय सुविधायें, आधुनिक चिकित्सा, स्वस्थ मनोरंजन, खेलकूद, ज्ञानवर्धन हेतु लाइब्रेरी आदि-आदि सब कुछ उपलब्ध कराया गया है। साथ ही वृद्धजनों को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए अच्छी खासी पेन्शन भी सरकार की ओर से दी जाती है। हमारे देश में वृद्धजनों के लिए ओल्ड ऐज होम की सुविधायें नहीं हैं। सीनियर सिटीजन को दी जाने वाली पेन्शन की राशि भी बहुत कम है। इस दिशा में सरकार तथा कॅारपोरेट जगत को सार्थक कदम उठाकर वृद्धजनों को सम्मानजनक जीवन जीने के अवसर उपलब्ध कराने के लिए आगे आना चाहिए।
संयुक्त परिवार वसुधैव कुटुम्बकम् की सीख देने की प्राथमिक पाठशाला है :-
प्राचीन काल में हमारे देश में संयुक्त परिवारों में वृद्धजनों को पूरा सम्मान, सुरक्षा तथा देखभाल मिलती थी। उद्देश्यहीन शिक्षा तथा भौतिकता की अंधी दौड़ ने हमारे देश में भी संयुक्त परिवारों की श्रेष्ठ परम्परा को बुरी तरह बिखेर दिया है। विशेषकर शहरों में एकल परिवार का रिवाज तेजी से बढ़ रहा है।
धरती में यदि कहीं जन्नत है तो माता-पिता के कदमों में है :-
इस धरती पर हमारे भौतिक शरीर के जन्मदाता माता-पिता संसार में सर्वोपरि हैं। हमें उनका सम्मान करना चाहिए। जिन मां-बाप ने अपना सब कुछ लगाकर अपनी संतानों को योग्य बनाया वे संतानें जब बड़े होकर अपने वृद्ध मां-बाप की उपेक्षा करती हैं तो उन पर क्या बीतती है इस पीड़ा की अभिव्यक्ति कोई भुगत-भोगी ही भली प्रकार कर सकता है। वृद्धजनों का मूल्यांकन केवल भौतिक दृष्टि से करना सबसे बड़ी नासमझी है। वृद्धजन अनुभव तथा ज्ञान की पूंजी होते हैं। बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह का कहना है कि जब हमारे सामने माता-पिता तथा परमात्मा में से किसी एक का चयन करने का प्रश्न आये तो हमें माता-पिता को चुनना चाहिए। माता-पिता की सच्चे हृदय से सेवा करना परमात्मा की नजदीकी प्राप्त करने का सबसे सरल तथा सीधा मार्ग है। साथ ही मानव जीवन के परम लक्ष्य अपनी आत्मा का विकास करने का श्रेष्ठ मार्ग भी है। हमारे शास्त्र कहते हैं कि जिस घर में माता-पिता का सम्मान होता है उस घर में देवता वास करते हैं। माता-पिता धरती के भगवान है। माता-पिता इस धरती पर परमात्मा की सच्ची पहचान है।

भारतीय भाषाओं की विजय
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
तमिलनाडु के राज्यसभा सदस्यों को मैं हार्दिक बधाई देता हूं कि उन्होंने राज्यसभा का काम ठप्प करवाकर सारी भारतीय भाषाओं को मान्यता दिलवाई। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद की सराहना करनी होगी कि उन्होंने तत्काल फैसला करके तमिल ही नहीं, सभी भाषाओं के द्वार खोल दिए। तमिलनाडु में 14 जुलाई को पोस्ट आफिसों में भर्ती के लिए कुछ परीक्षाएं हुईं। उनका माध्यम सिर्फ अंग्रेजी और हिंदी रखा गया। तमिलनाडु में कोई आदमी पोस्ट आफिस का कर्मचारी बने और वह तमिल न जाने तो वह किस काम का है ? यही बात देश के सभी प्रांतों पर लागू होती है। उन्हें एक अखिल भारतीय भाषा के साथ-साथ प्रांतीय भाषा भी आनी चाहिए। याने अखिल भारतीय भाषा का कामचलाऊ ज्ञान हो और प्रांतीय भाषा इस लायक आए कि उसमें ही वे अपनी भर्ती परीक्षा दे सकें । इस नियम को तमिलनाडु में उलट दिया गया था। इसी बात पर द्रमुक और अन्नाद्रमुक ने राज्यसभा में हंगामा खड़ा कर दिया था। जब मैंने अब से 54 साल पहले इंडियन स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में अपना पीएच.डी. का शोधग्रंथ हिंदी में लिखने की मांग की थी तो द्रमुक के नेता अन्नादुरई और के. मनोहरन ने लोकसभा ठप्प कर दी थी। तब डाॅ. लोहिया ने उन्हें समझाया था कि वैदिक सिर्फ हिंदी में लिखने की मांग नहीं कर रहा है, वह सभी भारतीय भाषाओं के दरवाजे खुलवाना चाहता है। अन्नादुरईजी घनघोर हिंदी- विरोधी थे लेकिन उनसे मिलकर मैंने उन्हें अपना दृष्टिकोण समझाया तो वे काफी नरम पड़ गए। आज उनके शिष्यों ने पोस्ट आफिस की भर्ती परीक्षा में तमिल माध्यम की मांग करके समस्त भारतीय भाषाओं के दरवाजे खुलवा दिए हैं। 14 जुलाई को हुई भर्ती—परीक्षा को रद्द कर दिया गया है। बहुत पहले से हम मांग करते रहे हैं कि ससंद में सभी भारतीय भाषाओं में बोलने और संघ लोकसेवा आयोग में परीक्षाएं देने की अनुमति होनी चाहिए। यह काम तो शुरु हो गया है लेकिन अभी भी देश की न्यायपालिका पिछड़ी हुई है। उसका लगभग सारा काम अब भी अंग्रेजी में ही होता है। राष्ट्रपतिजी की पहल पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसलों का संक्षिप्त हिंदी अनुवाद करना शुरु कर दिया है, जो कि अच्छी शुरुआत है लेकिन यह काफी नहीं है। समस्त भारतीय भाषाओं को हर क्षेत्र में उनका उचित स्थान मिलने लगे तो हिंदी अपने आप सर्वभाषा बन जाएगी।

राजस्थान कांग्रेस में जारी है वर्चस्व की जंग
रमेश सर्राफ धमोरा
राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की लड़ाई अब सडक़ों पर आ गई है। विधानसभा में बजट पेश करने के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बयान ने राजनीति में नई हलचल मचा दी थी। अब तक मुख्यमंत्री पद पर अपने उम्मीदवारी के बारे में चुप्पी साधने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने साफ कहा कि विधानसभा चुनाव के दौरान प्रदेश की जनता चाहती थी कि अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने और कोई नहीं। राहुल गांधी ने उसी भावना का आदर करते हुए मुझे यह अवसर दिया था। विधानसभा चुनाव को याद करते हुए अशोक गहलोत ने कहा था कि प्रदेश की जनता चाहती थी कि मैं मुख्यमंत्री बनूं, जनता ने किसी और का नाम नहीं लिया और इसीलिए मैंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
दरअसल पहली बार मुख्यमंत्री ने इस तरह का बयान दिया है। इससे पहले अशोक गहलोत कभी इस तरह खुलकर नहीं बोले। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को प्रदेश में करारी हार मिली और प्रदेश में कांग्रेस की राजनीति में उथलपुथल मच गई। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि लोकसभा चुनाव में हम सफल नहीं हो पाए, लेकिन यह सिर्फ प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश में हुआ। राहुल गांधी के इस्तीफे देने के बाद कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति गरमाई हुई है। अशोक गहलोत को जयपुर से दिल्ली अध्यक्ष बनाकर भेजने की भी चर्चा चली थी। लेकिन प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अप्रत्यक्ष रूप से संकेत दे दिया कि वे राजस्थान ही रहेंगे, क्योंकि प्रदेश की जनता का मन था कि वे मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री का सीधा ईशारा उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की तरफ था। विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद की लड़ाई हारे सचिन पायलट को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के साथ उप मुख्यमंत्री बनाया गया था।
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का बयान आते ही उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने गहलोत पर पलटवार करते हुये कहा कि राजस्थान की जनता ने पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के नाम पर वोट दिए थे। देश के 3 राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव एक साथ हुये थे। तीनो ही प्रदेशो में कांग्रेस की सरकार बनी है। तीनो ही प्रदेशो में कांग्रेस पार्टी की नीतियों व राहुल गांधी के कुशल नेतृत्व के कारण बहुमत मिल पाया था। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बहुत मेहनत करके कांग्रेसी सरकार बनवाई थी। इसमें प्रदेश के किसी एक नेता का योगदान नहीं था जिसके कारण प्रदेश में सरकार बन पाई थी।
राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अचानक विवादित बयान देकर ठंडे पड़े माहौल में अचानक गर्माहट ला दी। गहलोत के बयान से राजस्थान में कांग्रेस की लड़ाई खुलकर सडक़ों पर आ गई है। प्रदेश की जनता में साफ संदेश जा रहा है कि राजस्थान कांग्रेस में दो खेमें बने हुये हैं। एक खेमें का नेतृत्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कर रहे हैं। वहीं दूसरे खेमे का नेतृत्व में उप मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट कर रहें हैं। प्रदेश की राजनीति में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए दोनों नेता में जंग जारी है।
लोकसभा चुनाव में राजस्थान में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट दिल्ली में मुख्यमंत्री बनने के लिए लोबिंग करने लगे हैं। सचिन पायलट का तर्क है कि 2018 के विधानसभा चुनाव का नेतृत्व राहुल गांधी ने किया था जिस कारण प्रदेश में सरकार बनी थी। वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव का राजस्थान में नेतृत्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने किया था जिनके नेतृत्व में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई।
आज राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बने सात महीने हो गए हैं। लेकिन प्रदेश की जनता को कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा है। पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के समय में जो समस्याएं थी वह जस की तस मुंह बाये खड़ी है। सात माह में राज्य सरकार कोई नई योजना शुरू नहीं कर पाई है। बिजली की दरों में बढ़ोत्तरी होने से आम आदमी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। विधानसभा चुनावो से पूर्व कांग्रेस ने प्रदेश के किसानो से वादा किया था कि उनकी सरकार बनने के दस दिन के अंदर प्रदेश के सभी किसानों का दो लाख रूपये तक का कृषि से सम्बधित कर्जा माफ कर दिया जायेगा। मगर कांग्रेस सरकार अपना कर्ज माफी का वादा आज तक पूरा नहीं कर पायी है।
किसानो का कर्ज माफ नहीं होने के कारण कर्ज से परेशान किसान आये दिन आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं। इससे प्रदेश के किसानो में सरकार के प्रति नाराजगी व्याप्त हो रही है। जिसका खामियाजा कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में सभी सीटो पर हार कर उठाना पड़ा था। प्रदेश में सभी विकास कार्य ठप पड़े हैं। बजट के अभाव में भाजपा सरकार के दौरान से चल रहे सडक़ों के निर्माण, मरम्मत के कार्य बंद पड़े हैं। बकाया भुगतान की मांग को लेकर ठेकेदारों ने हड़ताल कर रखी है।
प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती जा रही है। प्रदेश में भ्रष्टाचार पूर्व वत जारी है। राज्य में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो छोटी-मोटी कार्यवाही कर खानापूर्ति कर रहा है। प्रशासन पर नौकरशाही हावी हो रही है। विधायक, मंत्री तबादलों में लगे हैं। इस कारण उनके जिलो में दौरे नहीं हो पा रहे हैं। काम नहीं होने से कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में निराशा व्याप्त होने लगी है। प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के विधायकों की मंत्रियों से शिकायत है कि उनके काम नहीं कर रहे हैं।
ऊपर से प्रदेश के दो बड़े नेताओं के आपसी टकराव के चलते प्रदेश की जनता को लगने लगा है कि उन्होंने काग्रेस को वोट देकर कहीं गलती तो नहीं कर दी है। कांग्रेस नेताओं के आपसी टकराव के चलते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सभी 25 सीटों पर हार का सामना देखना पड़ा था। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने गृह जिले जोधपुर सीट से अपने पुत्र वैभव गहलोत को भी नहीं जिला सके।
मुख्यमंत्री गहलोत ने अपने बजट में कुछ लोक लुभावनी घोषणाएं करके वाहवाही पाने का प्रयास किया है। मगर योजनाएं धरातल पर कितना उतर पाती है यह तो आने वाला समय बताएगा। प्रदेश में जबसे गहलोत तीसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं उनके सामने आए दिन सत्ता बचाने का संकट खड़ा रहता है। उनको बार-बार दौड़ कर दिल्ली जाकर कांग्रेस के बड़े नेताओं के सामने अपनी पैरवी करनी पड़ती है।
विधानसभा सत्र चल रहा है जिसमें विपक्षी दल सरकार पर हमलावर हो रहे हैं। विधानसभा अध्यक्ष डा. सीपी जोशी सरकार के मंत्रियों को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। ऐसे में प्रदेश के लोगों को लगता है कि ऐसा माहौल ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है। कांग्रेस शासन चलाने के लिये जब तक कोई स्थाई फॉर्मूला लागू नहीं करेगा व गहलोत- पायलेट के मध्य चलने वाली उठापटक पर रोक नहीं लगायेगी तब तक प्रदेश में सत्ता की लड़ाई इसी तरह चलती रहेगी।

सत्ता सत्य है, राजनीति मिथ्या
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कर्नाटक और गोवा में जो कुछ हो रहा है, उसने सारे देश को वेदांती बना दिया है। वेदांत की प्रसिद्ध उक्ति है- ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या- याने ब्रह्म ही सत्य है, यह जगत तो मिथ्या है। दूसरे शब्दों में सत्ता ही सत्य है, राजनीति मिथ्या है। सत्ता ही ब्रह्म है, बाकी सब सपना है। राजनीति, विचारधारा, सिद्धांत, परंपरा, निष्ठा सब कुछ मिथ्या है। कर्नाटक और गोवा के कांग्रेसी विधायकों ने अपनी पार्टी छोड़ने की घोषणा क्यों की है ? क्या अपने केंद्रीय या प्रांतीय नेतृत्व से उनका कोई मतभेद था ? क्या वे वर्तमान सरकारों से कोई बेहतर सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं ? क्या उनकी पार्टियों ने कोई भयंकर भ्रष्ट आचरण किया है ? ऐसा कुछ नहीं है। जो है, सो एक ही बात है कि इन विधायकों पर मंत्री बनने का भूत सवार हो गया है। तुमने हमें मंत्री क्यों नहीं बनाया ? अब हम तुम्हें सत्ता में नहीं रहने देंगे। हम मंत्री बनें या न बनें, तुमको तो हम सत्ता में नहीं ही रहने देंगे। हमें पुरस्कार मिले या न मिले, तुम्हें हम सजा जरुर दिलवा देंगे। यह तो कथा हुई कर्नाटक की और गोवा के 10 कांग्रेस विधायक भाजपा में इसलिए शामिल हो गए कि उनमें से दो-तीन को तो मंत्रिपद मिल ही जाएगा, बाकी के विधायक सत्तारुढ़ दल के सदस्य होने के नाते माल-मलाई पर हाथ साफ करते रहेंगे। दल-बदल कानून उनके विरुद्ध लागू नहीं होगा, क्योंकि उनकी संख्या दो-तिहाई से ज्यादा है, 14 में से 10 । यह तो हुई कांग्रेसी विधायकों की लीला लेकिन जरा देखिए भाजपा का भी रवैया ! कर्नाटक में उसे अपनी सरकार बनाना है, क्योंकि संसद की 28 में से 25 सीटें जीतकर उसने अपना झंडा गाड़ दिया है। उसे इस बात की परवाह नहीं है कि देश भर में उसकी छवि क्या बनेगी ? आरोप है कि हर इस्तीफेबाज विधायक को 40 करोड़ से 100 करोड़ रु. तक दिए गए हैं। यह आरोप निराधार हो सकता है लेकिन इस्तीफे देनेवाले विधायक आखिर इतनी बड़ी कुर्बानी क्यों कर रहे हैं ? उन पर तो दल-बदल कानून लागू होगा, क्योंकि उनकी संख्या एक-चौथाई भी नहीं है। जाहिर है कि वे कहीं के नहीं रहेंगे। दुबारा चुनाव लड़ने पर उनकी जीत का भी कोई भरोसा नहीं है। इस सारे मामले में सबसे रोचक रवैया कर्नाटक की कांग्रेस और जनता दल का है। वे इन विधायकों के इस्तीफे ही स्वीकार नहीं होने दे रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बावजूद विधानसभा अध्यक्ष जैसी पलटियां खा रहे हैं, उनसे उनका यह पद ही मजाक का विषय बन गया है। कर्नाटक और गोवा ने भारतीय राजनीति की मिट्टी पलीत करके रख दी है। अब संसद को एक नया दल-बदल कानून बनाना होगा। वह यह कि अब किसी भी पार्टी के विधायक और सांसद, उनकी संख्या चाहे जितनी भी हो, यदि वे दल-बदल करेंगे तो उन्हें इस्तीफा देना होगा। दलों को भी अपना आतंरिक कानून बनाना चाहिए कि जो भी सांसद या विधायक दल बदलकर नई पार्टी में जाना चाहे, उसे प्रवेश के लिए कम से कम एक साल प्रतीक्षा करनी होगी।

अब क्या नया ठिकाना बनायेगें सिद्धू ?
रमेश सर्राफ
क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू ने आखिर पंजाब सरकार के मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। सिद्धू ने खुद ट्वीट के जरिए इसकी जानकारी दी। ट्विटर पर उन्होंने वह पत्र भी पोस्ट किया है, जिसे उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को संबोधित करते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। सिद्धू के मुताबिक 10 जून को ही उन्होंने यह पत्र तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को सौंप दिया था। हालांकि नवजोत सिंह सिद्धू ने अपना इस्तीफा 10 जून को ही दे दिया था लेकिन इसका खुलासा आज किया है। सिद्धू ने आज एक ट्वीट कर कहा है कि वे अपना इस्तीफा पंजाब के मुख्यमंत्री को भी भेज रहे हैं।
पंजाब में मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और मंत्री नवजोत सिह सिद्धू के बीच लम्बे समय से अनबन चल रही थी। लोकसभा चुनाव में पंजाब में कांग्रेस को अच्छी संख्या में सीटें न मिलने का ठीकरा अमरिंदर सिंह ने सिद्धू के सिर पर फोड़ा था और केंद्रीय आलाकमान से उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री ने लोकसभा चुनाव के बाद 6 जून को हुई कैबिनेट की पहली ही बैठक में सिद्धू का स्थानीय स्वशासन विभाग बदल कर ऊर्जा और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा विभाग दिया था। लेकिन सिद्धू ने नये विभागों का कार्यभार ग्रहण नहीं किया था और न ही उन विभागों की मीटिंग में शामिल हुए थे।
उसके बाद से लगातार सिद्धू को लेकर नाराजगी की अटकलें लगाई जा रही थीं जिन पर विराम लगाते हुए रविवार को उन्होंने खुद अपने इस्तीफे की पेशकश को सार्वजनिक कर दिया। पिछली मीटिंग में मुख्यमंत्री ने पर्यटन और संस्कृति मामलों का प्रभार भी उनसे वापस ले लिया था। यहां सवाल उठता है कि सिद्धू ने अपना इस्तीफा कांग्रेस अध्यक्ष को क्यों भेजा जबकि इस्तीफा राज्यपाल या मुख्यमंत्री को भेजना चाहिये था। अब सिद्धू ने कहा है कि वो अपना स्तीफा मुख्यमंत्री को भी भेज रहे हैं।
6 जून को अपना विभाग बदलने से मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह से खफा नवजोत सिंह सिद्धू ने नये विभाग का कार्यभार ग्रहण नहीं किया बल्कि 10 जून को दिल्ली जाकर पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी से भी मुलाकात की थी। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर और सिद्धू के बीच पिछले काफी दिनों से मनमुटाव जारी है।
कांग्रेस नेता सिद्धू पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर के साथ जारी विवाद को लेकर लगातार सुर्खियों में रहे हैं। लोकसभा चुनावों के समय से ही दोनों नेताओं में मनमुटाव जारी है। लोकसभा चुनावों के दौरान पार्टी के खराब प्रदर्शन के लिए खुद को जानबूझकर निशाना बनाए जाने का सिद्धू ने आरोप लगाया। वहीं मुख्यमंत्री ने सिद्धू से उनका विभाग छीन लिया था। इसके बाद से ही सिद्धू कैप्टन से नाराज बताए जा रहे थे।
सिद्धू का इस्तीफा ऐसे वक्त आया है, जब कांग्रेस पार्टी में लीडरशिप को लेकर संकट की स्थिति है। लोकसभा चुनावों के परिणाम आने के बाद राहुल गांधी ने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। सिद्धू और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के बीच अनबन तब शुरू हुई जब सिद्धू पिछले साल इमरान खान के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने पर उनके शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने पाकिस्तान गए थे।
पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की कैबिनेट के सदस्य रहे नवजोत सिंह सिद्धू ने उन्हें कभी अपना कैप्टन माना ही नहीं। एक प्रेस कांफ्रेस ने खुद सिद्धू ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा था कौन कैप्टन? किसका कैप्टन? मेरे कैप्टन तो राहुल गांधी हैं। यही नहीं पाकिस्तान में इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह, करतारपुर कॉरिडोर के शिलान्यास कार्यक्रम में जाने सहित कई अन्य मामलों में भी दोनों के बीच मतभेद खुलेआम सामने आए। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पिछले माह अमरिंदर ने सिद्धू का मंत्रालय बदल दिया। मामला राहुल गांधी तक पहुंचा था लेकिन फिर भी दोनों के बीच सुलह नहीं हो पाई।
नवजोत सिंह सिद्धू पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के शपथ समारोह के दौरान पाकिस्तानी आर्मी चीफ जनरल कमर बाजवा के गले मिले थे। इसे लेकर खूब विवाद हुआ था। इसके बाद करतारपुर गलियारे की नींव रखी जानी थी तो 26 नवंबर को भारत की तरफ आयोजित कार्यक्रम में सिद्धू नदारद रहे। लेकिन 28 नवंबर को पाकिस्तान में आयोजित शिलान्यास समारोह में वह शामिल हुए। तब कैप्टन अमरिंदर ने कहा था कि सिद्धू हाईकमान की परमिशन के बिना वहां गए हैं। पाकिस्तान से वापसी के बाद सिद्धू से कैप्टन की नाराजगी पर मीडिया ने बात की तो सिद्धू ने बड़े व्यंग्यात्मक लहजे में कहा था कौन कैप्टन? ओह कैप्टन? ओह आर्मी दे कैप्टन मेरे कैप्टन तो राहुल गांधी हैं।
फरवरी 2019 में पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतकी हमले को लेकर भी कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बयान एक-दूसरे अलग थे। एक तरफ कैप्टन अमरिंदर ने 41 के बदले 82 मारने की बात कहते हुए पाकिस्तान के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही थी। वहीं इस मसले पर सिद्धू का बयान था कि आतंकियों का कोई देश और मजहब नहीं होता। कुछ लोगों की करतूत के लिए किसी राष्ट्र को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अमरिंदर और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच की खींचतान का एक कारण सिद्धू की पत्नी का टिकट कटना भी माना जा रहा है। सिद्धू की पत्नी ने आरोप लगाया था कि अमरिंदर के कहने पर उनका टिकट काटा गया है। इस पर सिद्धू ने कहा था कि उनकी पत्नी झूठ नहीं बोलतीं।
पंजाब सरकार के मंत्री पद से स्तीफा देने के बाद अब सिद्धू के पास कोई काम नहीं बचा है। यदि पार्टी उन्हे संगठन में राष्ट्रीय पदाधिकारी बना भी देती है तो उससे सिद्धू संतुष्ठ होने वाले नहीं हैं। सिद्धू बहुत महत्वकांक्षी है तथा उनकी नजर पंजाब के मुख्यमंत्री पद पर है जो कैप्टन अमरिन्द्र सिंह के रहते मुश्किल है। राष्ट्रीय सचिव तो वो भाजपा में भी थे। उनको तो भाजपा ने राज्यसभा में भी मनोनित करवा दिया था। मगर उससे वो संतुष्ठ होने वाले नहीं थे जिस कारण उन्होने भाजपा व राज्यसभा से स्तीफा दे दिया था। भाजपा छोडऩे के बाद कांग्रेस व आप में उन्हे शामिल करने की होड़ सी लग गयी थी। अंत में वो कांग्रेस में शामिल होकर मंत्री बने। मगर अपनी हरकतों से वो जल्दी ही कैप्टन अमरिन्द्र सिंह के निशाने पर आ गये थे। कैप्टन को नजर अंदाज कर वो अलग चलने की कोशिश करते रहे मगर मंत्रीमंडल में उनके विभाग बदलकर कैप्टन ने उनको औकात बता दी थी। उसके बाद सिद्धू के समझ में यह बात अच्छी तरह से आ गयी कि यहां उनकी मनमानी चलने वाली नहीं हैं। ताजा घटनाक्रम व सिद्धू के पिछले इतिहास को देखने से लगता है कि शिघ्र ही कहीं वो नया ठिकाना बना लेगें।

‘‘सलाम करो, उस लड़के को!’’
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कल कुछ समाजवादी साथियों ने दिल्ली में दो दिन का समाजवादी समागम आयोजित किया था। देश भर से लगभग 150-200 ऐसे समाजवादी इकट्ठे हुए थे, जो देश की वर्तमान राजनीतिक दशा से चिंतित थे और कुछ पहल करने का विचार कर रहे थे। दूसरे दिन के सत्र में श्री रमाशंकरसिंह और श्री सुनीलम ने मुझे एक मुख्य वक्ता के रुप में बहुत ही आदर और आग्रह से निमंत्रित किया था। मैं जब बोलने खड़ा हुआ तो एक सज्जन खड़े होकर जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि आप आरएसएस के आदमी हैं। आप यहां क्यों बोल रहे हैं ? उन सज्जन को यह शायद पता नहीं कि उनके पूज्य पिताजी के साथ भी, जो डाॅ. राममनोहर लोहियाजी के सहयोगी थे, मैंने कई बार प्रदर्शन, जुलुस और मंच साझा किया है। उनको सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि 5-6 साल पहले मैंने नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए क्यों प्रस्तावित किया था और सारे देश में घूम-घूमकर उसके लिए समर्थन क्यों जुटाया था ? उनको यह पता नहीं कि पिछले पांच साल में प्रधानमंत्री और सरकार की मैंने जितनी कड़ी समीक्षा की है, किसी विरोधी दल के नेता ने भी इतना साहस नहीं किया है। लेकिन मैं न तो किसी दल और न ही किसी नेता का अंधभक्त हूं। मैं तो सिद्धांतों और विचारों पर कुर्बान जाता हूं। यदि मोदी अच्छे काम करें तो मैं उनका डटकर समर्थन क्यों नहीं करुंगा ? अब से 62 साल पहले मैंने हिंदी आंदोलन में जेल काटी है। उसके बाद मैंने कई आंदोलन इंदौर और दिल्ली में चलाए। कई बार जेल गया। मेरे साथ जेल गए लड़के आगे जाकर राज्यों और केंद्र में मंत्री, मुख्यमंत्री सांसद और विधायक बने हैं। उनमें से एक दो कल की सभा में भी मौजूद थे। अब से लगभग 60 साल पहले मैंने इंदौर के क्रिश्चियन काॅलेज में डाॅ. लोहिया का भाषण करवाने का खतरा मोल लिया था। उन्होंने मुझे अंग्रेजी हटाओ आंदोलन का बीड़ा उठाने की प्रेरणा दी थी। मैंने 1977 में नागपुर में और 1998 में इंदौर में अंग्रेजी हटाओ सम्मेलन आयोजित किए थे, जिनमें सर्वश्री राजनारायण, जार्ज फर्नांडीस, जनेश्वर मिश्र, कर्पूरी ठाकुर के अलावा भाजपा के कई मुख्यमंत्रियों और देश भर के हजारों समाजवादी, जनसंघी, कांग्रेसी, कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने भाग लिया था। मैंने हमेशा पार्टीबाजी से ऊपर उठकर काम किया है, क्योंकि मेरा लक्ष्य मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनना कभी नहीं रहा। इसीलिए मैं कभी किसी पार्टी का सदस्य नहीं बना और मैंने कभी चुनाव नहीं लड़ा। मेरा रास्ता तो बचपन से वह है, जो महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी, डाॅ. लोहिया और जयप्रकाश का रहा है। इसलिए जब मई 1966 में मेरे पीएच.डी. के शोधप्रबंध को हिंदी में लिखने के कारण संसद में जबर्दस्त हंगामा हुआ तो मेरा समर्थन मद्रास की द्रमुक पार्टी के अलावा सभी पार्टियों ने किया। इंदिरा गांधी, डाॅ. लोहिया, आचार्य कृपालानी, मधु लिमए, भागवत झा आजाद, हीरेन मुखर्जी, हेम बरुआ, अटलबिहारी वाजपेयी, दीनदयाल उपाध्याय, गुरु गोलवलकर, चंद्रशेखर राजनारायण, डाॅ. जाकिर हुसैन, दिनकरजी, बच्चनजी- सभी ने किया। मैं द्रमुक के नेता अन्नादुराईजी से भी मिला। डाॅ. लोहिया ने ही मेरे समर्थन का बीड़ा उठाया था। जब शिक्षा मंत्री छागलाजी ने मुझ पर हमला किया तो लोहियाजी ने संसद में कहा था, ‘‘सलाम करो, उस लड़के को।’’ डाॅ. लोहिया से उनके निवास, 7 गुरुद्वारा रकाबगंज पर रोज मुलाकात होती थी। उनके निधन के पहले जब वे विलिंगडन अस्पताल में भर्ती हुए तो मैं उन्हें बंगाली मार्केट रसगुल्ले खिलाने ले गया था, जहां मप्र के मंत्री आरिफ बेग, रमा मित्रा और उर्मिलेश झा (डाॅ. लोहिया के सचिव) भी साथ थे। मेरी ही पहल पर दीन दयाल शोध संस्थान ने ‘गांधी, लोहिया और दीनदयाल’ पुस्तक प्रकाशित की थी। अब के प्रौढ़ या नौजवान यदि मुझ पर किसी पार्टी या संगठन का बिल्ला चिपकाना चाहें तो यह उनकी नादानी है। ये मेरे नादान भाई मुझे तो क्या, जयप्रकाशनारायणजी को भी कोसते हैं, क्योंकि उन्होंने आपात्काल के विरुद्ध आरएसएस का सहयोग लिया था। मैं यह मानता हूं कि आज देश नेतृत्वविहीन है। ऐसी स्थिति में सत्तालोलुपता की बजाय हमें ऐसा राष्ट्रीय मोर्चा खड़ा करना चाहिए, जिसमें लोग दलों, जातियों, संप्रदायों से ऊपर उठकर देश की सेवा करें। जन-जागरण करें।

समाज में गुरु का स्थान
डॉक्टर अरविन्द पी जैन
जिसके जीवन में गुरु नहीं ,उसका जीवन शुरू नहीं .वर्तमान में गुरु का स्थान टीचर ने या शिक्षक ने ले लिया हैं .दूसरा टीचर का ध्यान अब ज्ञान देने की अपेक्षा धन की ओर होने से महत्व कम हो गया .आज छात्र शिक्षक से यह भी कहने से नहीं चूकता की आपको पैसा दे रहा हूँ और अहसान नहीं कर रहे हैं .जबकि अज्ञान ज्ञान मिलने से समाप्त हो जाता हैं .
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।
यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे।
शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है।अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है।
“अज्ञान तिमिरांधश्च ज्ञानांजन शलाकया,चक्षुन्मीलितम तस्मै श्री गुरुवै नमः ”
गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। [क] बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।
इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।
हिंदू तथा बौद्ध धर्म के साथ ही जैन धर्म में भी गुरु पूर्णिमा को एक विशेष स्थान प्राप्त है। इस दिन को जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा भी काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।
जैन धर्म में गुरु पूर्णिमा को लेकर यह मत प्रचलित है कि इसी दिन जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने गांधार राज्य के गौतम स्वामी को अपना प्रथम शिष्य बनाया था। जिससे वह ‘त्रिनोक गुहा’ के नाम से प्रसिद्ध हुए, जिसका अर्थ होता है प्रथम गुरु। यही कारण है कि जैन धर्म में इस दिन को त्रिनोक गुहा पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है
गुरु पूर्णिमा की आधुनिक परम्परा
प्राचीनकाल के अपेक्षा में आज के गुरु पूर्णिमा मनाने के तरीके में काफी परिवर्तन हो चुका है। आज के समय में ज्यादेतर लोगो द्वारा इस पर्व को विशेष महत्व नही दिया जाता है। पहले के समय में लोगो द्वारा इस दिन को बहुत ही पवित्र माना जाता था और गुरुकुल परंपरा में इस दिन को एक विशेष दर्जा प्राप्त था, अब लोग इस दिन को मात्र एक साधरण दिन की तरह मनाते हैं और नाहि पहले के तरह गुरु की महत्ता में विश्वास रखते है।
यही कारण है, लोगो के अंदर गुरु के महत्व को लेकर जागरुकता दिन-प्रतिदिन कम होते जा रही है। यदि हम ज्यादे कुछ नही कर सकते तो कम से कम अपने गुरु का आदर तो कर ही सकते हैं और वास्तव में उनका सदैव सम्मान करके हम गुरु पूर्णिमा के वास्तविक महत्व को सार्थक करने का कार्य और भी अच्छे से कर सकते हैं।
गुरु पूर्णिमा का महत्व
शास्त्रों में गुरु को पथ प्रदर्शित करने वाला तथा अंधकार को दूर करने वाला बताया गया है। गुरु का अर्थ ही है अंधकार को दूर करने वाला क्योंकि वह अज्ञानता का अंधकार दूर करके एक व्यक्ति को ज्ञान के प्रकाश के ओर ले जाते हैं। बच्चे को जन्म भले ही उसके माता-पिता द्वारा दिया जाता हो, लेकिन उसे जीवन का अर्थ समझाने और ज्ञान प्रदान करने का कार्य गुरु ही करते है।
सनातन धर्म में मनुष्य को मोक्ष और स्वर्ग प्राप्ति बिना गुरु के संभव नही है। गुरु ही है जो एक व्यक्ति की आत्मा का मिलन परमात्मा से कराते है और उनके बिना यह कार्य दूसरा कोई नही कर सकता है। एक व्यक्ति को जीवन के इस बंधन को पार करने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है। यहीं कारण है कि हिंदू धर्म में गुरु को इतना महत्व दिया जाता है।
विद्यालाभो गुरोरवशात !
विद्या की प्राप्ति गुरु से ही होती हैं !
उपदेशम दद्तपात्रे गुरुर्याति कृतार्थताम !
पात्र को उपदेश देने वाला गुरु कृतकृत्य हो जाता हैं !
किं न स्याद गुरुसेवया !
गुरु सेवा से सब कुछ हो सकता हैं !
गुरौ भक्तिस्तु कामदा !
गुरु भक्ति इष्ट फल देती हैं !
तुम सा दानी क्या कोई हो ,जग को दे दी जग की निधियाँ !
दिन रात लुटाया करते हो समशम की अविनश्वर मणियाँ!!
गुरुवर की जय हो जय हो जय हो !

कश्मीर में जवाहिरी का जिहाद
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अल कायदा के मुखिया एयमान जवाहिरी ने अजीब-सा एलान जारी किया है। उसने कश्मीरी नौजवानों से अपील की है कि वे अब बड़े जोर-शोर से आतंकवाद फैलाएं और हिंदुस्तान की नाक में दम कर दें। वे हिंदुस्तान की सरकार और अर्थव्यवस्था को पंगु बना दें। जवाहिरी या उसके मरहूम उस्ताद उसामा बिन लादेन या कोई अन्य इस्लामी अतिवादी इस तरह के बयान जारी करें, उसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है लेकिन इस बार जवाहिरी ने जो कहा है, उससे पाकिस्तान को बहुत एतराज हो सकता है, क्योंकि उसका यह कथन पाकिस्तान को सारी दुनिया में बदनाम भी कर देगा और भारत उस पर जो इल्जाम लगाता है, उसे वह मजबूती भी प्रदान करेगा। जवाहिरी ने कहा है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियां अमेरिका की गुलाम हैं। वे भारत को ब्लेकमेल करने का काम करती हैं। वे कश्मीर की आजादी के लिए नहीं लड़ती, बल्कि अमेरिका के स्वार्थों को सिद्ध करती हैं। आज पाकिस्तानी एजेंसियां कश्मीरी मुजाहिदीन के साथ वैसे ही गद्दारी कर रही हैं, जैसी उन्होंने अफगानिस्तान से रुसी वापसी के बाद अरब मुजाहिदीन के साथ की थी। इसी तर्क के आधार पर जवाहिरी ने कश्मीरी आतंकवादियों से आग्रह किया है कि वे पाकिस्तानी एजेंसियों से अपना संबंध विच्छेद करें। बिल्कुल यही बात चार-पांच दिन पहले ‘अंसार गजबतुल हिंद’ के नए मुखिया हमीद ललहरि ने कही थी। इस संगठन को ज़ाकिर मूसा ने ‘हिजबुल मुजाहिदीन’ को तोड़कर बनाया था। हिज्ब को पाकिस्तानपरस्त संगठन माना जाता है। इधर मूसा भी मारा गया और बालाकोट हमला भी हुआ। साल भर में दर्जनों प्रमुख आतंकवादी भी मारे गए। उनके गिरते हुए मनोबल को उठाने के लिए जवाहिरी ने यह पैंतरा मारा है लेकिन जवाहिरी को यह पता होना चाहिए कि पाकिस्तान की मदद के बिना ‘कश्मीरी जिहाद’ की कमर टूट जाएगी। भूवेष्टित कश्मीर के आतंकवादियों का दम घुट जाएगा। दूसरी बात यह कि आतंकवाद हजार साल भी चलता रहे तो वह कश्मीर को भारत से अलग नहीं कर पाएगा। हां, पाकिस्तान को जरुर बर्बाद कर देगा। फौजी खर्च ने पाकिस्तान को दिवालिया बना दिया है। इमरान खान जैसे स्वाभिमानी पठान को किस-किस के आगे अपना दामन नहीं पसारना पड़ रहा है ? आतंकवाद के चलते जितने लोग भारत में मारे जा रहे हैं, उससे ज्यादा पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मारे जा रहे हैं ? ये मरनेवाले कौन हैं ? बेचारे बेकसूर मुसलमान हैं। इन बेकसूर मुसलमानों को मौत के घाट उतारना कौनसा जिहाद है ? जरा जवाहिरी हमें बताए कि कुरान-शरीफ की कौनसी आयात में इसे जिहाद कहा गया है ?

जितना बजट, उतना ही कर्ज
ओमप्रकाश मेहता
मध्यप्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री कमलनाथ पिछली शिवराज सरकार की ‘‘ऋणम् धृत्वा, घृतम् पीबेत’’ (कर्जा लो और घी पियो) की विरासत में मिली नीति से काफी परेशान है, यद्यपि उन्होंने अपनी सरकार का पहला बजट तो प्रस्तुत कर दिया, किंतु उन्हें इस बात का बेहद अफसोस रहा कि राज्य की आर्थिक स्थिति और कर्ज की भारी मात्रा के कारण वे जनकल्याण व विकास की अपनी उम्मीदें पूरी नहीं कर पा रहे है, प्रदेश की जनता के प्रति सद्भावना का ताजा और सबसे अहम् उदाहरण तो यह है कि प्रदेश की विषम आर्थिक स्थिति के बावजूद उन्होंने अपने नए बजट में जनता के किसी भी वर्ग पर कोई कर का बोझ नहीं डाला और अपने सीमित बजट में ‘‘सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय’’ की ही बात की।
मध्यप्रदेश में पिछले पन्द्रह वर्षों से भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और इन पन्द्रह वर्षों में लगभग तेरह वर्ष शिवराज सिंह जी ही मुख्यमंत्री रहे, और उनका हर बजट प्रदेश की आर्थिक स्थिति का आईना सिद्ध हुआ, हर साल उन्हें कर्ज लेना पड़ा और वह कर्ज पन्द्रह साल में डेढ़ लाख हजार करोड़ तक पहुंच गया, इसके बाद जब सात माह पूर्व प्रदेश में कमलनाथ जी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी तो उसे पिछली सरकार से विरासत में डेढ़ लाख करोड़ का कर्ज भी मिला, अब कमलनाथ जी के सामने सबसे बड़ी परेशानी किसानों के कर्ज चुकाने का वादा और शिक्षित युवाओं को रोजगार मुहैय्या कराने की थी, जिस पर उन्होंने अपने तरीके से अमल किया। फिलहाल इस सरकार को केवल सात माह अर्थात् करीब दो सौ दिन का समय मिला है, इस बीच सरकार के सामने जनहित व जनकल्याण का बजट प्रस्तुत करने की अहम् जिम्मेदारी आ गई। अतः सरकार को बिना आगा-पीछे सोचे ऐसा बजट प्रस्तुत करने को अघत होना पड़ा जो सरकार के लिए आर्थिक बोझ बढ़ाने वाला था, फिर भी इस बजट की सबसे अहम् बात तो यह कि बिना कोई नया कर थोपे सरकार ने जनता के हर वर्ग के कल्याण व उनकी मुसीबतें हल करने का विशेष ध्यान रखा, खासकर किसानों व युवाओं का। किसानों का कृषि बजट में जहां 66 फीसदी की वृद्धि कर उसे 46 हजार 559 करोड़ का कर दिया गया वहीं किसानों की कर्ज माफी के लिए आठ हजार करोड़ की राशि सुरक्षित रखी गई। साथ ही प्रदेश में स्थापित होने वाले उद्योगों में प्रदेश के शिक्षित बेरोजगारों से सत्तर फीसदी नौकरियां देने का भी सख्त आदेश पारित कर दिया गया। बजट में ग्रामीण विकास हेतु 17,186 करोड़ स्कूली शिक्षा के लिए 24,499 करोड़ राज्य में बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने हेतु उसकी बजट राशि में 32 फीसदी की वृद्धि। इस प्रकार कुल दो लाख चैदह हजार 85 करोड़ का राज्य का नया बजट प्रस्तुत किया गया। वह भी तब जक केन्द्र की मोदी सरकार ने प्रदेश के हिस्से के 2,700 करोड़ रूपए की राशि का भुगतान नहीं किया।
अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौति बिना किसी विशेष आय के प्रदेश के सपनों में रंग भरना है, इसके लिए सरकार ने सामाजिक कुरीतियों से जुड़ी एश-ओ-आराम की वस्तुओं पर अधिभार लगाकर पैसा जुटाने का रास्ता खोजा है, जिसमें सबसे पहले क्रम पर शराब है, इसकी एक्साईज ड्यूटी से 3,500 करोड़ जुटाने का लक्ष्य रखा गया है, इसके बाद स्टाॅम्प ड्यूटी के तहत प्राॅपर्टी रजिस्ट्री शुल्क दो फीसदी बढ़ा दिया, इससे बारह सौ करोड़ की अतिरिक्त आय होगी। इसी तरह यात्री वाहनों के प्रति सीट लिए जाने वाले टेक्स में वृद्धि कर उससे तीन हजार करोड़ की आय का लक्ष्य निर्धारित किया गया, जो अभी तक 2,691 करोड़ था। इसी तरह ईंधन (पेट्रोल-डीजल) माईनिंग (खनिज) आदि के माध्यमों से भी सरकार का आर्थिक बोझ कम करने का प्रयास किया गया। ये सब तो आर्थिक संसाधन खोजे गए पर सरकार ने अपने प्रयासों से प्रदेश के आम गरीब व मध्यम वर्ग के साथ किसान व युवा महिला वर्ग की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा गया। यद्यपि इतने सब प्रयासों के बावजूद एक वर्ष में प्रदेश सरकार पर 28 हजार करोड़ रूपए का कर्ज बढ़ जाने का अनुमान है, किंतु सरकार का भी यह मजबूरीपूर्ण दायित्व है कि वह अपनी असुविधाओं को नजर अंदाज कर प्रदेशवासियों के कल्याण व विकास का विशेष ध्यान रखे, वही कमलनाथ सरकार करने जा रही है, इस सरकार के दिल में उम्मीदें तो अनंत है, किंतु झोली खाली होने से वह असहाय भी है। केन्द्र में अपने दल की सरकार नहीं होना भी राज्य सरकार की सबसे बड़ी चुनौति होती है।

आओ चलें एक पेड़ लगाएं …
निर्मल रानी
तेज़ रफ़्तार ज़िन्दिगी के इस दौर में हम इतने आगे निकलते जा रहे हैं की ज़िंदिगी की सबसे महत्वपूर्ण ज़रूरतों को हम न केवल पीछे छोड़े जा रहे हैं बल्कि इन ज़रूरतों की तरफ़ से प्रायः हम अपनी आँखें भी बंद किये बैठे हैं। यह ज़रूरतें भी ऐसी हैं जिनके बिना प्राणी के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इतना ही नहीं बल्कि प्रकृति प्रदत्त इन बेशक़ीमती चीज़ों का कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है। क़ुदरत द्वारा अपने प्राणियों को मुफ़्त में दी गई यह अमूल्य नेमतें हैं हवा अर्थात ऑक्सीजन एवं पानी। पृथ्वी की संरचना के समय प्रकृति द्वारा जीवनोपयोगी समस्त तत्वों की पूरी तरह से संतुलित व समीकरण के मुताबिक़ ही उत्पत्ति की गई थी। प्रकृति ने हमें स्वच्छ एवं पर्याप्त जल दिया जिसके बिना हम चंद दिन भी ज़िंदा नहीं रह सकते। हरे भरे पेड़ों के असीमित जंगल दिए जो हमें ऑक्सीजन भी देते हैं तथा सम्पूर्ण पृथ्वी के लिए सबसे लाभदायक व ज़रूरी, वर्षा कराने में अपनी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। इस प्रकार की और असंख्य चीज़ें क़ुदरत ने हमें अता की हैं जिनका प्रकृति हमसे कोई मूल्य भी नहीं लेती। यह भी कहा जा सकता है कि संसार में सभी कल कारख़ानों में निर्मित होने वाली कोई भी चीज़ ऐसी नहीं जिसकी आधार सामग्री या कच्चा माल क़ुदरत द्वारा अता किया गया न हो।
हालाँकि प्रकृति अपनी अता की गई नेमतों के बदले में तो हमसे कुछ भी नहीं मांगती परन्तु हम मानव जाति के स्वयंभू “शिक्षित व ज्ञानवान ” लोग इन बेशक़ीमती प्रकृतिक चीज़ों की क़ीमत देना या इसके बारे में सोचना तो दूर,हम उस प्रकृति का उसकी असीम कृपा व नवाज़िशों का शुक्र तक अदा करना अपनी झूठी शान के ख़िलाफ़ समझते हैं। बात सिर्फ़ इतनी भी नहीं कि हम क़ुदरत से एहसान फ़रामोशी करते हैं और उसके एहसानों का शुक्र अदा नहीं करते। बल्कि बात तो यहाँ तक पहुँच चुकी है कि विकास,प्रगति,आधुनिकता तथा विज्ञान के नाम पर मची विश्वव्यापी अंधी दौड़ में हम अपने जीवन के लिए जल,वायु तथा वृक्ष की ज़रूरतों की अनदेखी कर जल और वृक्ष दोनों के ही स्वयं दुश्मन बन बैठे हैं। अनावश्यक जल दोहन करना तथा इसे बर्बाद करना तो हमें ख़ूब आता है परन्तु जल संरक्षण करना या जल की अहमियत को समझना हम नहीं जानते। मकानों के निर्माण से लेकर फ़र्नीचर,काग़ज़ व गत्ते आदि बनाने की लिए वृक्षों को काटना तो हमें आता है परन्तु वृक्ष लगाना हम ज़रूरी नहीं समझते। इन सब चीज़ों की बर्बादी का ठेका तो हमने ले रखा है परन्तु जल जंगल के संरक्षण या इसे सुचारु रखने की उम्मीदें हम सरकार से लगाए रहते हैं। गर्मी में धूप से बचने के लिए यहाँ तक कि अपने वाहन को खड़ा करने के लिए,अपनी रेहड़ी दुकान आदि लगाने के लिए हर व्यक्ति छायादार वृक्ष की तलाश करता है।परन्तु छाया ढूंढने वाले इन्हीं लोगों से पूछिए कि इनमें से कितने लोग ऐसे हैं जो वृक्ष लगाकर अपने ही मानव समाज के लिए छाया का प्रबंध करते हैं ?कथित विकास की इस अंधी दौड़ ने केवल मानव का ही नहीं बल्कि पशु पक्षियों का जीवन भी नर्क के सामान बना दिया है। मानवीय ग़लतियों का ही नतीजा है की आज पशु पक्षियों द्वारा इस्तेमाल में लाए जाने वाले तालाब ,झीलें,जोहड़,बड़े बड़े पेड़, घास के मैदान,हरियाली आदि इतिहास की बातें बनकर रह गए हैं।
निश्चित रूप से मानव समाज की इन्हीं “कारगुज़ारियों ” की वजह से पृथ्वी का तापमान अकल्पनीय रूप से बढ़ता जा रहा है। बुद्धिजीवी वैश्विक समाज ने इसे ग्लोबल वार्मिंग का नाम दिया है। और अब इस ग्लोबल वार्मिंगसे निपटने के लिए आए दिन अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन आयोजित किये जा रहे हैं। इससे बचने व इसे कम करने के उपाए ढूंढें जा रहे हैं। दुनिया के कई “चौधरी” देश ख़ुद तो विकास के नाम पर धुआँ उगलने की रोज़ नई चिमनियां बना रहे हैं,वातावरण को ज़हरीला बनाने वाले शस्त्र निर्मित कर रहे हैं,पहाड़ों को काट काट कर उसका भूगोल बदल रहे हैं,पर्वत की छाती को चीर कर तो कहीं भूतलीय सुरंगों का निर्माण कर रहे हैं। परन्तु जब पर्यावरण के यही दुश्मन विश्व पंचायत में कहीं इकठ्ठा होते हैं तो एक दूसरे को प्रदूषण फैलाने व ग्लोबल वार्मिंग का ज़िम्मेदार बताते हैं। इन्हीं “विकास दूतों ” की विकास की होड़ का नतीजा है कि अब आम लोगों को पानी ख़रीद कर पीना पड़ रहा है। मुंह पर मास्क लगाकर घर से बाहर निकलना मजबूरी बन चुकी है। और तो और स्वच्छ ऑक्सीजन लेने के लिए भी अब “ऑक्सीजन बॉर” खुलने लगे हैं। यानी वह वक़्त भी आ चुका है कि हमें पानी ही नहीं बल्कि सांस लेने के लिए ऑक्सीजन भी ख़रीदनी पड़ेगी। गोया हमारे “विकास” और पर्यावरण के प्रति हमारी नकारात्मक सोच व लापरवाही ने हमें जाने अनजाने उस मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है जहाँ एक घूँट पीने का साफ़ पानी और साफ़ सुथरी एक सांस भी ख़रीदनी पड़ेगी और ख़रीदनी पड़ रही है।
ज़रा सोचिये जिस देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा दो वक़्त की रोटी ख़रीद कर नहीं खा पाता,जहाँ किसान,ग़रीब मज़दूर सिर्फ़ क़र्ज़ या आर्थिक तंगी के चलते आत्म हत्या करने को मजबूर हो जाते हों जो लोग जंगलों में अपनी विरासत को बचने के लिए दशकों से जूझ रहे हों और बड़े उद्योगपति, सरकार के सहयोग से उनके जल जंगल और ज़मीन पर क़ब्ज़े कर रहे हों वह ग़रीब व आदिवासी क्या पानी की बोतलें ख़रीद कर साफ़ पानी पीने की कल्पना कर सकते हैं ? क्या इनसे ऑक्सीजन बार में स्वच्छ सांस ख़रीदने की उम्मीद की जा सकती है? यदि नहीं तो देश के इस बड़े ग़रीब व असहाय वर्ग का रखवाला कौन है ? औद्योगिक घरानों,राजनीतिज्ञों,धनाढ्य लोगों तथा विकास के स्वप्नदर्शी लोगों ने तो धरती व पर्यवारण का जो सत्यानाश करना था वो कर ही लिया। बल्कि या सिलसिला अभी भी जारी है। पिछले दिनों एक विचलित कर देने वाली यह रिपोर्ट सुनने को मिली कि पूरी पृथ्वी को अकेले ही 20 प्रतिशत ऑक्सीजन देने वाले आमेज़ॉन के जंगल सरकारी संरक्षण में 2000 फ़ुटबाल के मैदान के बराबर प्रतिदिन काटे जा रहे हैं। यह काम भी विकास के लिए और पशुओं के लिए चरागाह बनाने के नाम पर किया जा रहा है। पूरा विश्व तथा पर्यावरण के प्रति चिंता रखने वाले लोग इस ख़बर से बहुत दुखी व परेशान हैं। कहाँ तो पर्यावरण संरक्षण के उपाए किये जा रहे थे तो कहाँ वैश्विक स्तर पर जलवायु को नियंत्रित करने वाला धरती का मुख्य स्रोत यानी अमेज़ॉन के वन ही समाप्त होने जा रहे हैं ?
उपरोक्त हालात में एक बात तो स्पष्ट दिखाई दे रही है कि सरकारों या दुनिया चलाने वाले दूसरे तंत्रों के भरोसे पर स्वयं हाथ पर हाथ रखकर बैठने से पर्यावरण का संरक्षण क़तई नहीं होने वाला। इनकी पहली प्राथमिकता ही औद्योगीकरण,विकास,कंक्रीट के जंगल बनाना,बेदर्दी से जल दोहन करना तथा जंगल व पहाड़ की बर्बादी है। वृक्षारोपण करना या इसके लिए चिंतित होना तो शायद दिखावा मात्र है। इसलिए यह हम साधारण मध्य व निम्न वर्ग के लोगों का ही न केवल कर्तव्य बल्कि हमारा धर्म भी है कि हम में से प्रत्येक व्यक्ति स्वयं अपने प्रयासों से वृक्षारोपण करे। जिस प्रकार हम लंगरों,भंडारों व धार्मिक समागमों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं उसी जोश जज़्बे और हौसले के साथ हम वृक्षारोपण की भी मुहिम शुरू करें और इसमें हिस्सा लें। पिछले दिनों इसी तरह का जज़बा रखने वाले सिख समाज के भाइयों का एक अनूठा लंगर देख कर आत्मा भी प्रसन्न हुई और उम्मीदें भी जगीं । पंजाब में सिख भाइयों द्वारा लंगर में बड़ी तादाद में लोगों को प्रसाद के रूप में पौधे वितरित किये गए।और लोगों द्वारा बड़े हर्ष व उत्साह के साथ इन पौधों को स्वीकार किया गया। देश व दुनिया के हर समाज सेवी व निजी संगठनों को यही करना चाहिए। एक वक़्त की रोटी खिलाकर पुण्य कमाने की मनोकामना करने के बजाए हमें जलवायु संरक्षण के लिए तथा पृथ्वी व अपनी नस्लों को बचने के लिए पौधों का दान लेना व देना चाहिए। इस मुहिम को चलाने के लिए इंतेज़ार करने का अब वक़्त बिलकुल नहीं रहा। बल्कि हमें इस दिशा में क़दम बढ़ाने में काफ़ी देर हो चुकी है। आइये मानसून के इसी मौसम में हम संकल्प लें और अपने जीवन में जब और जहाँ भी संभव हो हवादार,फलदार और छायादार दरख़्त की पौध ज़रूर लगाएं। धरती के स्वयंभू ठेकेदारों की प्राथमिकताएं हथियारों का उत्पादन,सामाजिक विभाजन,दंगा फ़साद झूठ,भ्रष्टाचार,धर्म व जाति के नाम पर विभाजन व पाखंड करना,पर्यावरण को नुक़्सान पहुँचाना व अपने उद्योगपति आक़ाओं को लाभ पहुँचाना है। यह पृथ्वी हमारी है,हमें ही इसे बचाना चाहिए और हम ही इसे बचा भी सकते हैं। इसलिए आओ, जीवन दायिनी पृथ्वी को बचाएं। आओ चलें एक पेड़ लगाएं।

काँग्रेसः कभी खुद पे, कभी हालात पे रोना आया…..?
ओमप्रकाश मेहता
आज से करीब पचास साल पहले स्व. देवानंद अभिनीत एक फिल्म आई थी, कालापानी। इस फिल्म में एक बहुत ही लोकप्रिय गीत था, ‘‘कभी खुद पे, कभी हालात पे रोना आया, बात निकली तो फिर हर बात पे रोना आया…’’, किस स्थिति-परिस्थिति में यह गाना फिल्म की कहानी के अनुरूप फिलमाया गया था, वह अलग बात है, किंतु आज यह पूरा गाना देश की मरणासन्न सबसे वरिष्ठ पार्टी कांग्रेस पर पूरी तरह अवतरित हो रहा है, आज कांग्रेस अध्यक्ष राहुल जी की स्थिति ठीक कालापानी के देवानंद जी जैसी ही हो रही है और राहुल जी भी वही गीत गुनगुनाने को मजबूर है।
वास्तव में कांग्रेस की नसीबी और बदनसीबी का एक सौ तीस साल पुराना इतिहास मानव जीवन की इन्हीं दो स्थितियों के बीच सिमट कर रह गया है। आजादी की लड़ाई जिस कांग्रेस के तिरंगें के छत्रछात्रा में लड़ी गई और फिरंगियां को यह देश छोड़कर भागने को मजबूर होना पड़ा आज वहीं तिरंगा और उसकी छत्रछाया में पली कांग्रेस अपनी आजादी को लेकर संघर्ष करने को मजबूर है। यद्यपि इसमें दोषी कोई और नहीं इसी पार्टी के पूर्वज रहे है, जिन्होंने इस पार्टी को एक परिवार विशेष तक ही सीमित रखा, किंतु पूर्वजों के साथ वे अधिक दोषी है, जिन्होंने पूर्वजों को मनमानी करने की पूरी छूट दी, अब चाहे इसे लगातार सत्ता में रहने के अहंकार को दोषी माना जाए या उस समय की स्थिति-परिस्थिति को? यह एक अलग बात है, किंतु इंदिरा जी के जाने के बाद इस पार्टी की जो फिसलन शुरू हुई थी, वह आज भी तेज गति से जारी है और पार्टी रसातल की ओर अभिमुख है, अब तो कोई चमत्कार या देवीय अवतार ही इसे बचा सकता है, फिर पार्टी की इस दुरावस्था का कारण यह भी है कि इंदिरा-राजीव के बाद जब पार्टी सोनिया के हाथों में पहुंची और उन्होंने डेढ़ दशक तक पार्टी को सहेज कर रखा, वह पार्टी बाद में पुत्र प्रेम व ममत्व के कारण ऐसे हाथों में सौंप दी गई, जो राजनीति का अनुभवहीन और बचकानी हरकतों वाला शख्स रहा, यद्यपि इसके बाद बुजुर्गों ने पार्टी से कन्नी काट ली किन्तु युवाओं ने अपनी उम्मीद कायम रखी, सोनिया जी की यह सबसे बड़ी भूल थी, वे भी बुजुर्गों को तवज्जोह देने के मामले में भाजपा के रास्ते पर चली प्रणव मुखर्जी तथा उनके समकक्ष अन्य बुजुर्गों को उपेक्षित रखा और अपनी बेटी प्रियंका का भी सहयोग उस समय लिया, जब पार्टी का रसातल में जाना तय माना जा रहा था।
यदि हम कांग्रेस की इस स्थिति की तुलना भाजपा से करें, तो भाजपा भी एक समय काफी संकट में थी, जब उसके केवल दो सदस्य संसद में थे और पार्टी बाहर भी काफी बदहवास और परेशान थी, किंतु उसी के नेताओं की सूझबूझ और दूरदृष्टि ने उसे आज की स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया, यद्यपि इस काम को करने वाले बुजुर्ग और उपेक्षित है, किंतु पूरी पार्टी उस शख्स के साथ है जो पार्टी के राष्ट्रीय पटल पर पांच साल पहले ‘नवागत’ व संसद का अनुभवहीन होने के बावजूद वह अपने बल पर राजनीति के क्षितिज पर छाया हुआ है। वैसे जहां तक मोदी का सवाल उन्होंने स्थिति-परिस्थितियों से सीख लेकर सब कुछ सीखा और पार्टी में ‘दारासिंह’ की स्थिति में आ गए, किंतु इसके ठीक विपरित कांग्रेस के नौसीखिया अध्यक्ष संसद में मोदी से गले मिलकर ‘आँख मारते’ रहे और पार्टी रसातल में जाती रही। अब जब कांग्रेस के हरे-भरे खेत को स्वार्थी चिड़ियाओं द्वारा चुग लिया गया तब अब इसका मालिक ‘रणछोड़दास’ बन अपना सिर घुन रहा है, पर इससे होता क्या है? और खेत को चुग जाने वाली चिड़ियाएँ दिखावे मात्र के लिए पार्टी की मौत पर घर आकर संवेदना व्यक्त करने वालों की भूमिका में है, आज की पार्टी की यही दुःखद स्थिति है।
कांग्रेस की इस दुःखद स्थिति का केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा पूरा राजनीतिक लाभ उठाने की तैयारी में है, और कांग्रेसशासित गिने-चुने राज्यों से भी कांग्रेस ने अभी भी कोई ठोस व सार्थक कदम नही उठाया तो हर कांग्रेसशासित राज्य में कर्नाटक की पुनरावृत्ति होगी और भाजपा के ‘‘चक्रवर्ती सम्राट’’ बनने का सपना पूरा होगा, इसलिए कांग्रेस को अंतिम चरण की लड़ाई के पहले खुद की सैन्य ताकत को मजबूत करने का करिश्मा करके दिखाना होगा।

कनाडा की तरह रहने लायक हो भारत
डॉ हिदायत अहमद खान
बेहतर रोजगार की तलाश में देश छोड़कर विदेश जाने का चलन तो पुराना है, लेकिन जिस वादे और दावे के साथ भाजपा नीत एनडीए सरकार की कमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संभाली उसके बाद सभी को उम्मीद बंधी थी कि विदेशों से लोग भारत वापस आएंगे और बेहतर जिंदगी जी सकेंगे। अफसोस पांच साल के पहले कार्यकाल में तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। अब दूसरे कार्यकाल की भी शुरुआत हो चुकी है, लेकिन कहीं से कोई सकारात्मक संदेश आता दिखलाई नहीं दे रहा है। बल्कि अब पहले से ज्यादा कठिनाइयों का सामना करते हुए देश का बेरोजगार युवा और योग्यतम कामकाजी इंसान विदेश में अपने बेहतर भविष्य को तलाशने में लगा हुआ है। कहने में हर्ज नहीं कि बीते सालों में जिस आसानी से अमेरिका व अन्य देशों का कामकाजी इंसान रुख कर लेता था अब उसे तमाम तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका की ही बात कर लें जिसके बहुत करीब होने का दावा हमारी मादी सरकार करती चली आई है और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी प्रधानमंत्री मोदी को घनिष्ट मित्र बतलाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है, बावजूद इसके अमेरिका ने एचवनबी वीजा संबंधी नियमों में परिवर्तन करके भारतीय नागरिकों के लिए परेशानी खड़ी कर दी है। ऐसे में खबर आ रही है कि भारतीय लोग अब अमेरिका के स्थान पर कनाडा में रहना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। गौरतलब है कि अमेरिका नंबर वन का नारा देते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने ज्यादा से ज्यादा कारोबारियों व कंपनी प्रबंधकों को देश के बेरोजगारों को नौकरी देने और उन्हें आगे बढ़ाने का सख्त संदेश दिया था। इसके बाद अमेरिका में काम करने वाले विदेशी नागरिकों के साथ दोयम दर्जे का बर्ताव किए जाने की खबरें भी आईं, लेकिन इस पर किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, क्योंकि उम्मीद थी कि समय के साथ सब कुछ सही हो जाएगा। अमेरिका में वीजा और अन्य तरह की दिक्कतों के चलते ज्यादातर भारतीय नागरिक अब कनाडा का रुख कर रहे हैं। कनाडा के इमिग्रेशन डिपार्टमेंट के आंकड़े बतलाते हैं कि साल 2017 की तुलना में साल 2018 में 51 फीसदी ज्यादा लोगों ने कनाडा में स्थायी निवास यानी परमानेंट रेजिडेंस हासिल किया है। इन आंकड़ों के मुताबिक, 2018 में कुल 41,675 भारतीयों को स्थायी निवास के लिए आमंत्रण भेजा गया। इसके साथ ही संभावना व्यक्त की जा रही है कि मौजूदा साल 2019 में यह संख्या और ज्यादा बढ़ सकती है। हद यह है कि अमेरिका में रहने वाले भी कनाडा में स्थायी निवास हासिल करना चाहते हैं। एक तरफ अमेरिका में काम करते हुए परेशानियों का सामना करना और दूसरी तरफ नौकरी और बेहतर काम करते हुए स्थाई निवासी बनने की आसानियां। दरअसल कनाडा का रुख करने की एक बड़ी वजह यह भी है कि कनाडा ने जीटीएस यानी ग्लोबल टैलेंट स्ट्रीम को हाल ही में पाइलट स्कीम से बदलकर स्थायी स्कीम बना दिया गया। इसके चलते कनाडाई कंपनियां सिर्फ दो हफ्ते में किसी भी अप्रवासी को कनाडा लाने का अधिकार पा लेती हैं। इस बदलाव के चलते संभावना व्यक्त की जा रही है कि कनाडा में नौकरी के लिए भारतीयों की तादाद तेजी से बढ़ेगी। दरअसल भारत में बेरोजगारी बढ़ी हुई है, काम की उपलब्धता न के बतौर है, जबकि योग्य और प्रशिक्षित लोगों की तादात बढ़ती चली जा रही है। ऐसे में विदेश जाने वालों की पहली पसंद कनाडा रहने वाली है। वैसे कहा यह भी जाता है कि इसके चलते जीटीएस कर्मचारी भविष्य में स्थानीय नागरिकता के लिए आवेदन करते नजर आ जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा। इस प्रकार एक अमेरिका है जहां मुश्किलें बढ़ रही हैं वहीं दूसरी तरफ कनाडा है जिसने अपने यहां आने वाले कामकाजी इंसान के लिए आसानियां पैदा करने का काम किया है। दरअसल कनाडा सरकार का एक्सप्रेस एंट्री सिस्टम एक ऐसा सिस्टम है जो कि स्किल्ड और क्वालिफाइड इंसानों को स्थायी निवास के लिए मैनेज करने का काम करता है। इसके तहत स्थायी निवास चाहने वालों का एक ऑनलाइन प्रोफाइल तैयार किया जाता है और उन्हें एंट्री पूल में रखा जाता है। इस बीच सीआरएस में जॉब ऑफर, उम्र, शिक्षा, अनुभव और अंग्रेजी व फ्रेंच के भाषाई ज्ञान को आधार बनाकर चयन कर लिया जाता है। नियमानुसार कटऑफ मार्क वाली लाइन पार करने वालों से स्थायी निवास के लिए आवदेन करने को कहा जाता है। ऐसा करना योग्य और जरुरतमंद के लिए आसान काम होता है, इसलिए लोगों ने अमेरिका की जगह कनाडा को स्थायी निवास स्थल बनाने को तरजीह देने का काम किया है। यह तो रही विदेश में बेहतर भविष्य की तलाश करते हुए ग्रीन कार्डधारी होने की बात, लेकिन यही स्थिति देश में देखने को कब मिलेगी? अब सवाल यह भी उठता है कि भारत सरकार इस मामले में क्या कर रही है या आगे क्या करना चाहेगी? क्योंकि जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ेगी समस्याएं और बढ़ती चली जाएंगी और इससे पहले कि विदेश में रहना मुश्किल हो जाए देश में ऐसी स्थितियां पैदा करनी होंगी ताकि विदेश गए भारतीय भी वापस आ सकें और अपना बेहतर भविष्य बना सकें। आखिर अपने देश में ही योग्यतम शिक्षित और प्रशिक्षित कामकाजी इंसान को काम का ऑफर क्योंकर नहीं मिल पाता है? यह विचार करने वाली बात है। इसके साथ ही देश में श्रम का बेहतर मूल्य देने की परिपाटी कब शुरु हो पाएगी? केंद्र सरकार को इस मामले में यहां-वहां की बातें करना छोड़ देनी चाहिए और कोशिश की जानी चाहिए कि हर हाथ को काम मिले।

राज्यसभा में बहुमत पर बेचैनी
अजित वर्मा
भारतीय जनता पार्टी अपने महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए राज्यसभा में बहुमत हासिल करने के मिशन पर लगतार तेजी से आगे बढ़ रही है। ऐसा पहली बार हो रहा है जब भाजपा दूसरे दलों के राज्यसभा सदस्यों को अपने पाले में लाने के अभियान में जुट गयी है। भाजपा कई छोटे-छोटे दलों के राज्यसभा सदस्यों को तोड़ने में ज्यादा जोर लगा रही है ताकि दल बदल की कार्यवाही से बचा जा सके।
लोकसभा चुनाव के बाद तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के चार और इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के एकमात्र राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल हो चुके हैं। इस तरह संसद के ऊपरी सदन में पार्टी के सांसदों की संख्या बढ़कर 76 हो गई है।
राज्यसभा में वर्तमान में सदस्यों की कुल संख्या 239 है जिसमें 76 सांसदों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है। इसके बाद कांग्रेस का नंबर आता है, जिसके पास कुल 48 सदस्य हैं। तीसरे नंबर पर तीन पार्टियां- समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और अन्नाद्रमुक हैं जिनके पास 13-13 सांसद हैं।
भाजपा आश्वस्त है कि जिन राज्यों में इस साल के अंत में या अगले साल चुनाव होने हैं, वहां वह विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करेगी और राज्यसभा में उसकी अंक तालिका में और सुधार होगा। इस तरह अगले साल नवंबर में उसे अपने बलबूते राज्यसभा में पूर्ण बहुमत मिल जाने की पूरी उम्मीद है।
राज्यसभा में बहुमत को लेकर भाजपा इतना इंतजार करने के मूड में नहीं दिखाई देती। पिछली लोकसभा के जिन अहम विधेयकों को राज्यसभा में विपक्ष ने लटका दिया था, भाजपा अब उन्हें जल्द से जल्द पास कराने की जुगत में लग गई है। इस समय भाजपा की नजरें एक, दो या तीन-चार सांसदों वाली पार्टियों पर लग गई है।
राज्यसभा में वर्तमान में 8 राजनीतिक दल ऐसे हैं जिनके सांसदों की संख्या 1-1 है। भाजपा के इस एक्शन प्लान की भनक लगने से छोटे दलों में हाहाकार मच गया है। ये पार्टियां अपने सांसदों को अपने साथ बनाए रखने की कोशिशों में जुट गई हैं। ऐसी खबरें हैं कि तीन राज्यसभा सांसदों वाली एक नई पार्टी के दो सांसद जल्दी ही भाजपा आने वाले हैं।
हाल ही में तेदेपा के छह सांसदों में से चार ने भाजपा का दामन थाम लिया तो उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं हो पाया। इसी तरह जब इनेलो के एकमात्र राज्यसभा सांसद भाजपा में आए तो यह कानून उन्हें भी प्रभावित नहीं कर पाया।
भाजपा को समय-समय पर मुद्दों के आधार पर वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के 2 और बीजू जनता दल के 7 सांसदों का समर्थन मिलता रहा है।
एनडीए के कुल सांसदों की बात करें तो राज्यसभा में वर्तमान में यह आंकड़ा 111 का हो गया है और वर्तमान में दस स्थान रिक्त हैं। राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनावों के बाद 5 जुलाई को सदन की दलीय स्थिति में परिवर्तन होगा और एनडीए के सांसदों की संख्या 115 हो जाएगी। 245 सदस्यीय सदन में बहुमत के लिए 123 सदस्य चाहिए। इस तरह एनडीए लगातार बहुमत के करीब पहुंचता जा रहा है। भाजपा के लिए मुश्किल यह है कि तीन तलाक और नागरिकता संशोधन विधेयक ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर एनडीए में शामिल जेडीयू को आपत्ति है, इसलिए भाजपा ने ज्यादा से ज्यादा राज्यसभा सदस्यों को अपने साथ जोड़ने का अभियान चला रखा है।

कांग्रेसः निजी दुकान बने पार्टी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कांग्रेस के अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद कई अन्य युवा नेताओं के इस्तीफों की झड़ी लग गई है। लेकिन कांग्रेस के खुर्राट बुजुर्ग नेताओं में से किसी ने भी इस्तीफा नहीं दिया है, क्योंकि चुनाव-प्रचार के दौरान उनका कोई महत्व ही नहीं था। कांग्रेस का मतलब सिर्फ राहुल गांधी था जैसे भाजपा का मतलब था, सिर्फ नरेंद्र मोदी। 2019 का चुनाव वास्तव में न तो किसी विचारधारा पर लड़ा गया और न ही किसी नारे पर। यह चुनाव तो अमेरिकी चुनाव की तरह अध्यक्षात्मक चुनाव था। भाजपा फिर भी भाई-भाई पार्टी थी। अमित शाह और नरेंद्र मोदी। नरेंद्र भाई और अमित भाई ! लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस तो मां-बेटा पार्टी भी नहीं रही। सिर्फ बेटा पार्टी बनकर रह गई। बेटे ने यों तो कोई कसर नहीं छोड़ी। बड़ी मेहनत की। बहुत घूमा। बहुत बोला। नहीं बोलने लायक भी बोला। अपनी पप्पूपने की छवि को भी सुधारा लेकिन चुनाव-परिणाम ने दिल तोड़ दिया। अब इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस पार्टी के होश गुम हैं। अभी तक वह नया अध्यक्ष नहीं ढूंढ पाई। कोई भी इस प्रायवेट लिमिटेड कंपनी का अध्यक्ष बनकर करेगा क्या ? उसे मां-बेटे का रबर का ठप्पा ही बनना पड़ेगा। क्या अध्यक्ष का चुनाव कांग्रेस के लाखों कार्यर्त्ता मिलकर करेंगे ? क्या प्रदेशों की कार्यकारिणी समितियां करेगी ? क्या केंद्रीय कार्यसमिति में चुनाव के द्वारा अध्यक्ष बनाया जाएगा ? सबसे पहले कांग्रेस को प्रायवेट लिमिटेड कंपनी से बदलकर एक राजनीतिक पार्टी का रुप दिया जाना चाहिए। कांग्रेस के फैलाए हुए जहर को भाजपा ने भी निगल लिया है। उसका स्वरुप भी प्राइवेट लिं. कं. की तरह होता चला जा रहा है। हमारी प्रांतीय पार्टियां तो पहले से ही प्रायवेट कंपनी ही नहीं, निजी दुकानें भी बनी हुई हैं। हमारी सभी पार्टियां नोट और वोट के झांझ कूटने में लगी हुई हैं। सबने अपना-अपना जातीय और सांप्रदायिक जनाधार बना रखा है। कांग्रेस के लिए यह अमूल्य अवसर है कि वह इस समय देश को लोकतंत्र के मार्ग पर चला दे। अभी वह चाहे हारी हुई उदास और छोटी पार्टी ही है लेकिन वह अपने अध्यक्ष का चुनाव लाखों सदस्यों के वोट से करे तो वह अध्यक्ष इस प्रा. लि. कं. को सचमुच राजनीतिक पार्टी में बदल सकता है। वह प्रचंड जन-आंदोलन छेड़ सकता है। सरकार को वह सही रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर सकता है। आज देश के हर जिले, हर शहर और हर गांव में कांग्रेस का कोई न कोई नामलेवा मौजूद है। उसके पास कई अनुभवी नेता भी हैं। यदि कांग्रेस में अब भी बुनियादी सुधार नहीं हुआ तो वह भी ब्रिटेन की टोरी और व्हिग पार्टी की तरह इतिहास का विषय बन जाएगी। भारत के लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य ही होगा।

भ्रष्ट नौकरशाही का सफाया?
अजित वर्मा
केंद्र सरकार ने जिस तरीके से भ्रष्ट अधिकारियों को बाहर का रास्ता दिखाना शुरू किया है, उससे साफ संकेत मिले हैं कि पहले कार्यकाल में सफलतापूर्वक स्वच्छ भारत अभियान चलाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दूसरा कार्यकाल अब नौकरशाही में स्वच्छता लाने वाला होगा। पहले बारह वरिष्ठ वित्त अधिकारियों को बाहर का रास्ता दिखाने के बाद अब राजस्व सेवा के पंद्रह वरिष्ठ अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से जबरन सेवानिवृत्त कर दिया गया है। केंद्र सरकार ने सेवा के सामान्य वित्त नियम 56- जे के तहत इन यह कार्रवाई की है। ये पंद्रह अधिकारी मुख्य अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड से संबंधित हैं।
अंग्रेज शासनकाल की बिगड़ैल नौकरशाही के लिए चलाया गया यह चिरप्रतीक्षित सफाई अभियान न केवल समयानुकूल बल्कि स्वागतयोग्य भी है। यह किसी से छिपा नहीं है कि आजादी के सात दशक बाद भी देश को पिछड़ा और गरीब रखने के लिए इसी नौकरशाही का एक बड़ा तबका सर्वाधिक जिम्मेवार है। यह ठीक है कि कुछ भ्रष्ट तत्त्वों के चलते पूरी नौकरशाही को भ्रष्ट नहीं कहा जा सकता लेकिन हर सरकारी विभाग में छिपी काली भेड़ों को पहचानना और उनके खिलाफ इसी तरह सख्त कार्रवाई करना अब अत्यंत जरूरी हो गया है।
केंद्र सरकार ने ऐसे अधिकारियों की सूची बनाई है जिनकी उम्र 50 साल से अधिक है और वे अपेक्षा के मुताबिक काम नहीं कर रहे हैं। ऐसे अधिकारियों को सरकार नियम 56 के तहत सेवानिवृत्त करने जा रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहनशीलता की नीति के तहत अपने पहले कार्यकाल में ऐसे अधिकारियों की सूची बनाने के बाद दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार ने तेजी से इन अधिकारियों को बाहर का रास्ता दिखाना शुरू किया है।
जिन अधिकारियों पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति की कार्यवाही होना है वे ऐसे अधिकारी हैं जिन पर घूसखोरी, फिरौती, कालेधन को सफेद धन करने,आय से अधिक संपत्ति अर्जन, किसी कंपनी को गलत फायदा पहुंचाने जैसे आरोप हैं। इनमें से अधिकांश अधिकारी पहले से ही सीबीआई के शिकंजे में भी हैं।
भाजपा को 2014 में स्पष्ट जनादेश मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन यूपीए सरकार में व्यापक स्तर पर फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ ही मिला था। यह ठीक है कि भाजपा सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान उसके किसी मंत्री पर बेईमानी के गंभीर आरोप नहीं लगे पर यह तथ्य भी उतना ही ठीक है कि नौकरशाही में फैले भ्रष्टाचार के चलते आम लोगों को भ्रष्टाचार की समस्या से राहत नहीं मिली। प्रशासन में निचले स्तर पर भ्रष्टाचार की उसी तरह शिकायतें आती रहीं। ईमानदार होने का दावा करने वाली केन्द्र की मोदी सरकार में भ्रष्ट नौकरशाही को देख लोगों में यह भावना घर करती दिखी कि शायद इसका कोई स्थायी समाधान है ही नहीं और सरकार कोई भी आए, अधिकारी और बाबू अपनी ही रीति-नीति पर ही चलेंगे। यह संतोष का विषय है कि मौजूदा केंद्र सरकार ने जनता की इस परेशानी को न केवल समझा बल्कि इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया है।

आंकड़ों की जगह कल्पनाओं वाला बजट
डॉ हिदायत अहमद खान
भले ही केंद्र सरकार और उसके नुमाइंदे दावा करें कि संसद में पेश बजट 2019-20 नए भारत के उदय का द्योतक है, लेकिन हकीकत यही है कि अच्छे दिनों की झलक पाने के इंतजार में बैठा आमजन इससे निराश ही हुआ है। इसके साथ ही आमजन को मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल से जिस खास तरह के बजट की दरकार थी उसमें यह खरा उतरता हुआ दिखाई नहीं देता है। इसकी वजह यही है कि बजट में गांव, गरीब और किसानों के साथ ही साथ बेरोजगार युवा पीढ़ी के लिए कुछ खास नजर नहीं आता है। जबकि यह सभी मानते हैं कि इस समय देश में इन वर्गों की दशा और दिशा सबसे ज्यादा दयनीय हो चुकी है। महंगाई से त्राहिमाम करते आमजन को इस बजट से महंगाई कम होने के स्थान पर और बढ़ती नजर आ रही है। बजट में महंगाई से निजात दिलवाने वाले कोई नुस्खे भी नहीं बतलाए गए हैं। न ही ऐसा कोई विशेष प्रावधान ही है, जिससे यह कहा जा सके कि अच्छी बारिश और अच्छी फसल के साथ ही देश में महंगाई कम हो जाएगी। देश आज भी गांवों में बसता है, अत: समझा जा सकता है कि देश का विकास इसी रास्ते से होकर गुजरेगा अन्यथा वह एकांगी हो कहीं किसी किनारे औंधेमुंह गिरा मिलेगा। इसके बाद भी एक मायने में यह बजट ऐतिहासिक साबित हुआ है। वह इस मायने में कि भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के बाद पहली बार किसी पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री के तौर पर निर्मला सीतारमण ने अपना पहला बजट संसद में पेश करने जैसा अहम काम किया है। इसके बावजूद कहना पड़ता है कि यह बजट गरीब, मजदूर और मध्यम वर्ग के लोगों को कोई राहत देता प्रतीत नहीं हो रहा है। अच्छे दिन आएंगे जैसा सुनहरा सपना मोदी सरकार दिखाती चली आई है, लेकिन कैसे आएंगे उसकी रुपरेखा भी इस मौजूदा बजट से नदारद है। बजट के अभी तक के इतिहास में पहली बार ऐसा बजट प्रस्तुत हुआ है जिसमें किस मद से कितनी आय होगी। किस मद में कितना खर्च होगा। यह भी नहीं बताया गया है। 2019-20 का बजट कल्पनाओं का बजट है। इसमें आय-व्यय का कोई ब्योरा नहीं है। इस बजट में प्रधानमंत्री मोदी की कल्पनाओं को स्थान जरुर मिला है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि यह देश को समृद्ध और जन-जन को समर्थ बनाने वाला बजट है। इस बजट से गरीब को बल मिलेगा और युवा को बेहतर कल की ओर लेकर जाएगा। इस पर विपक्ष ने सवाल करते हुए कहा कि इस बजट में कुछ भी नया नहीं है। पुराने वादों को ही फिर से दोहरा दिया गया है। इस प्रकार सुनहरे सपने दिखाने में माहिर मोदी सरकार का बजट भी सिर्फ सपनों की दुनिया में ले जाने वाला है। एक तरह से देखा जाए तो यह बजट अमीरों को केंद्र में रखकर जरुर तैयार किया गया है, लेकिन तमाम तरह की सुविधाओं का शुल्क भी उन्हीं से वसूलने का इंतजाम भी टैक्स के तौर पर कर दिया गया है। पेट्रोल और डीजल के दाम घटाने की बजाय बढ़ाने का इंतजाम कर दिया गया है। इससे महंगाई बढ़ना तय है। इसकी सीधी मार आमजन पर ही पड़ेगी, क्योंकि पेट्रोल और डीजल पर जो 1-1 रुपये सेस लगाने की बात सरकार ने बजट में कही है। वह भी आमजन के जेब से ही निकाला जाएगा। इसलिए मोदी सरकार के इस बजट से आमजन अपने आपको ठगा महसूस कर रहा है तो कोई गलत बात नहीं है। सुनहरे भविष्य की बात बजट में की गई है, लेकिन बजट में गांव, गरीब के साथ ही बेरोजगारों की बेहतरी के लिए कोई प्रावधान नजर नहीं आया है। इसलिए यह पूर्णकालिक निराशा बढ़ाने वाला बजट है। सरकार के प्रत्यक्ष कर में जबरदस्त बढ़ावा होता हुआ दिख रहा है, क्योंकि पिछले साल जो कर की राशि 6.38 लाख करोड़ थी। वह साल 2019-20 में बढ़कर 11.37 लाख करोड़ रुपए होने की संभावना व्यक्त की गई है। इस प्रकार आमजन के लिए निराशा वाला बजट और सरकार के खजाने को भरने वाला है। सरकार ने अमीरों पर जो टेक्स लगाया है वह टेक्स भी कम्पनियॉं उपभोक्ताओं से ही वसूल करती है, जिससे स्पष्ट है कि गरीब एवं मध्यम वर्ग की परेशानी बढ़ाने वाला बजट सरकार ने प्रस्तुत किया है। मध्यम व गरीब वर्ग को अपनी खुशहाली के रास्ते खुद तलाशने होंगे।

भौंसला से सीखे सारा देश
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हरयाणा में जींद के पास एक गांव है, भौंसला। इस गांव में आस-पास के 24 गांवों की एक पंचायत हुई। यह सर्वजातीय खेड़ा खाप पंचायत हुई। इसमें सभी गांवों के सरपंचों ने सर्वसम्मति से एक फैसला किया। यह फैसला ऐसा है, जो हमारी संसद को, सभी विधानसभाओं को और देश की सभी पंचायतों को भी करना चाहिए। आजादी के बाद इतना क्रांतिकारी फैसला भारत की किसी पंचायत ने शायद नहीं किया है। हमारे पड़ौस में कुछ बौद्ध और इस्लामी देश हैं, जो यह फैसला आसानी से कर सकते हैं लेकिन उनकी भी हिम्मत नहीं हुई। क्या है, यह फैसला ? यह है, अपने अपने नाम के साथ इन गांवों के लोग अब अपना जातीय उपनाम और गौत्र उपनाम नहीं लगाएंगे। सिर्फ अपना पहला नाम लिखेंगे। जैसे सिर्फ बंसीलाल, सिर्फ भजनलाल, सिर्फ देवीलाल ! वे अपने मकानों, दुकानों, वाहनों पर से भी जातीय उपनाम हटाएंगे। मैं कहता हूं कि पाठशालाओं, कालेजों, अस्पतालों, धर्मशालाओं, प्याऊओं आदि पर से जातीय नाम क्यों नहीं हटाए जाएं ? जन्मना जातीय संगठनों पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए। जातीय भेदभाव खत्म करने के लिए अब सारे देश को तैयार होना होगा। कुछ वर्ष पहले जब मनमोहनसिंह सरकार ने जातीय जन-गणना शुरु करवाई तो मैंने ‘मेरी जाति हिंदुस्तानी’ आंदोलन चलाया था। देश की सभी पार्टियों ने इस आंदोलन का समर्थन किया था। स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के हस्तक्षेप से वह जातीय जन-गणना रोक दी गई थी। यदि देश से जातीयता खत्म करनी है तो जातीय उपनाम आदि हटाना तो बस एक शुरुआत भर है। ज्यादा जरुरी है कि जातीय आधार पर नौकरियों में आरक्षण को तत्काल खत्म किया जाए। आरक्षण जरुर दिया जाए लेकिन सिर्फ शिक्षा में और उन्हें जो आर्थिक दृष्टि से कमजोर हों। विवाह करते समय वर-वधू की जात देखना बंद करें, उनके गुण, कर्म और स्वभाव को ही कुंजी बनाएं। जाति-प्रथा ने भारत-जैसे महान राष्ट्र को पंगु बना दिया है। यह हिंदू समाज का सबसे भयंकर अभिशाप है। इस सर्प ने हमारे मुसलमानों, बौद्धों, ईसाइयों, सिखों और जैनियों को भी डस लिया है। जातिवाद के विरुद्ध आर्यसमाज के प्रणेता महर्षि दयानंद ने जो मंत्र डेढ़ सौ साल पहले फूंका था, उसने हरयाणा में अपना रंग दिखाया है। मैं चाहता हूं कि इस मंत्र की प्रतिध्वनि सिर्फ भारत में ही नहीं, हमारे पड़ौसी देशों में भी हो। कुछ समाजसेवी, कुछ समाज सुधारक, कुछ साधु-संन्यासी और डाॅ. लोहिया-जैसे कुछ महान नेता उठें और दक्षिण एशिया के इन पौने दो अरब लोगों की जिंदगी में नई जान फूंक दें।

पोंगापंथी हिंदुत्व और पोंगापंथी इस्लाम
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आज हमारे विचार के लिए दो विषय सामने आए हैं। एक तो कानपुर के युवा मुहम्मद ताज का, जिसे कुछ हिंदू नौजवानों ने बेरहमी से पीटा और उससे ‘जय श्रीराम’ बुलवाने की कोशिश की और दूसरा प. बंगाल से चुनी गई सांसद तृणमूल कांग्रेस की नुसरत जहां का, जिनके खिलाफ देवबंद के किसी मौलवी ने फतवा जारी किया है, क्योंकि उन्होंने किसी जैन से शादी कर ली है और संसद में शपथ लेते समय वे सिंदूर लगाकर और मंगलसूत्र पहनकर आई थीं। ये दोनों मसले ऐसे हैं, जिनमें हमें हिंदुत्व और इस्लाम का अतिवाद दिखाई पड़ता है। इन दोनों मामलों का न तो हिंदुत्व से कुछ लेना-देना है और न ही इस्लाम से ! किसी मुसलमान या ईसाई की हत्या या पिटाई आप इसलिए कर दें कि वह राम का नाम नहीं ले रहा है, यह तो राम का ही घोर अपमान है। आप रामभक्त नहीं, रावणभक्त हैं। आपको अपने आप को हिंदू कहने का अधिकार भी नहीं है। ‘जय श्रीराम’ तो कोई भी बोल सकता है। कोई भ्रष्टाचारी नेता, कोई पतित पुरोहित, कोई वेश्या, कोई बलात्कारी, कोई चोर और कोई ठग यदि राम का नाम ले ले तो क्या वह पवित्र माना जाएगा ? क्या उस पर कोई हिंदू होने का गर्व करेगा ? जो लोग राम की जगह शिव, कृष्ण, ब्रह्मा, विष्णु आदि को मानते हैं, क्या वे हिंदू नहीं हैं ? कई संप्रदाय राम को मर्यादा पुरुषोत्तम तो मानते हैं लेकिन भगवान नहीं मानते, क्या आप उन्हें भी गैर-हिंदू कहेंगे ? इसी तरह नुसरतजहां को इस्लाम-विरोधी समझना भी बिल्कुल पोंगापंथी इस्लाम है। क्या अरबों की नकल करना ही इस्लाम है ? क्या बुर्का पहनना, तीन तलाक देना, चार-चार बीवियां रखना, अपने अरबी नाम रखना, आदि अरबी प्रथाओं को मानना ही इस्लाम है ? इस्लाम का तात्विक अर्थ यही है कि आप एक ईश्वर को मानें और बुतपरस्ती से बाज आएं। क्या मुसलमान के लिए उर्दू बोलना जरुरी है ? नुसरत अगर बांग्ला बोलती है, इंडोनेशिया के सुकर्ण यदि ‘भाषा’ बोलते हैं, अफगान बादशाह जाहिरशाह ‘पश्तो’ बोलते हैं और अफ्रीकी मुसलमान ‘स्वाहिली’ बोलते हैं तो क्या वे घटिया मुसलमान कहलाएंगे ? उत्तम मुसलमान ,उत्तम ईसाई, उत्तम यहूदी और उत्तम हिंदू वही है, जो जिस देश और काल में रहता है, उसके मुताबिक रहे और अपने मजहब की मूल तात्विक बातों को अमल में लाए। डेढ़-दो हजार साल पुराने देश-काल के ढर्रे का अंधानुकरण करना उचित नहीं है।

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने साधा बड़ा वोट बैंक
रमेश सर्राफ धमोरा
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने प्रदेश की पिछड़ी जातियों को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है। हाल ही में योगी सरकार ने एक निर्णय लेकर उत्तर प्रदेश में अन्य पिछड़े वर्ग की 17 जातियों को अनुसूचित जातियों की श्रेणी की सूची में शामिल कर दिया है। इन जातियों को अनुसूचित जातियों की श्रेणी में शामिल करने के पीछे योगी सरकार का कहना है कि ये जातियां सामाजिक और आर्थिक रूप से बहुत ज्यादा पिछड़ी हुई हैं। अब इन 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र दिया जाएगा। राज्य सरकार ने इसके लिए जिला अधिकारियों को इन 17 जातियों के परिवारों को अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश दिया गया है।
अनुसूचित जाति में शामिल की गयी ये 17 पिछड़ी जातियां निषाद, बिंद, मल्लाह, केवट, कश्यप, भर, धीवर, बाथम, मछुआरा, प्रजापति, राजभर, कहार, कुम्हार, धीमर, मांझी, तुरहा, गौड़ हैं। इन पिछड़ी जातियों को अब एससी कैटेगरी की लिस्ट में डाल दिया गया है। अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल की गयी ये सभी 17 जातियां वास्तव में बहुत पिछड़ी हुयी है तथा इनकी आर्थिक स्थिति भी काफी कमजोर है। इन जातियों के लोग काफी समय से उनको अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल करने की मांग करते आ रहें हैं। मुख्यमंत्री योगी के इस फैसले से इन सभी 17 जातियों के लोगों को सरकारी योजनाओं को और अधिक लाभ मिलने लगेगा जिनसे उनका जीवन स्तर उपर उठेगा। उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो सकेगा। योगी सरकार द्वारा लिये गये इस फैसले को इन सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को आरक्षण का लाभ प्रदान करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। योगी सरकार ने इन 17 जाति समूहों द्वारा 15 साल से की जा रही मांग को पूरा किया है।
इन 17 जातियों को अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल करने के पीछे यह तर्क दिया जा रहा कि इन सभी जातियों की सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक स्थिति निम्न स्तर की है और ये जातियां अनुसूचित जाति की सूची में शामिल होने की सभी शर्तें पूरी करती हैं। साथ ही इन जातियों को अनुसूचित जाति वर्ग की सूची में शामिल किए जाने से वर्तमान अनुसूचित जातियों को कोई नुकसान भी नहीं होगा। उत्तर प्रदेश की 12 विधानसभा सीटों पर शिघ्र ही होने वाले उपचुनाव से पहले राज्य सरकार द्वारा उठाये गये इस कदम से भारतीय जनता पार्टी को फायदा होने के आसार हैं। इससे बहुजन समाज पार्टी व समाजवादी पार्टी के वोट बैंक में कमी आना स्वाभाविक है।
हालांकि इससे पहले की सरकारों ने भी ऐसा करने की कोशिश की थी, लेकिन वो सफल नहीं हो पायी थी। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की इस कोशिश पर कोर्ट ने रोक लगा दी थी। लेकिन कुछ महीने पहले कोर्ट ने लगायी गयी रोक हटा दी थी जिसके बाद ये सरकारी आदेश जारी हुआ है। इस पर अभी अंतिम फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट से आना बाकी है। ऐसा माना जा रहा है कि योगी सरकार के इस फैसले से उत्तर प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ेगी। माना कुछ दिनों में ही यूपी में विधानसभा के उप चुनाव होने हैं, ऐस में सरकार का यह फैसला पिछड़ी जातियों को लुभाने के तौर पर देखा जा रहा है।
2004 में मुलायम सिंह यादव मे मुख्यमंत्रीत्व काल में भी एक प्रस्ताव पेश कर तत्कालीन सपा सरकार ने पिछड़े वर्ग की 17 जातियों को अनुसूचित वर्ग में शामिल करने के लिए उप्र लोक सेवा अधिनियम, 1994 में संशोधन किया था। लेकिन किसी भी जाति को अनुसूचित जाति घोषित करने की शक्ति केंद्र सरकार के पास है। उस समय केंद्र सरकार की सहमति नहीं मिलने के कारण मुलायम सरकार का फैसला निर्थक साबित हुआ था। बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस निर्णय को असंवैधानिक और व्यर्थ घोषित कर फैसले को रद्द कर दिया।
2012 में जब अखिलेश यादव सत्ता में आए तो उनकी सरकार द्वारा एक और प्रयास किया गया। सरकार ने तत्कालीन मुख्य सचिव जावेद उस्मानी की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति गठित कर इस संबंध में समाज कल्याण विभाग से विवरण मांगा गया था। जिसमें अनुसूचित जाति वर्ग के भीतर 17 से अधिक पिछड़ी उप-जातियों को हिस्सा बनाना शामिल था। हालांकि इस मामले को बाद में केंद्र सरकार ने खारिज कर दिया था।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस फैसले को प्रदेश में एक बड़े वोट बैंक को साधने के मास्टर स्ट्राक के तौर पर देखा जा रहा है। इससे जहां मायावती का अनुसूचित जाति वर्ग के वोटो पर से एक छत्र प्रभाव कम होगा वहीं भाजपा से इन जातियों के सहारे एक बड़ा वोट बैंक जुड़ेगा जिसका उसे आने वाले चुनावों में लाभ मिलेगा। मुख्यमंत्री योगी के इस फैसले से बसपा नेता मायावती व सपा नेता अखिलेश यादव के पिछड़े वोट बैंक में भाजपा ने सेंध लगा दी है। वहीं योगी मंत्रीमंडल से बर्खास्त किये गये मंत्री ओमप्रकाश राजभर भी सरकार के फैसले से हासिये पर आयेगें। उनके राजभर समाज को अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल करने ये उनकी जाति के वोटो का भी भाजपा से पूर्णतया जुड़ाव होगा।

बरसाती नदियों का भविष्य
जया केतकी शर्मा
हम केवल बड़ी नदियों के विषय में ही विचार करते हैं। उनके जल स्तर, रखरखाव, संरक्षण आदि के बारे में प्रयास करते हैं। हम उन छोटी नदियों के बारे में क्यों सोच विचार नहीं करते जो इन बड़ी नदियों के जल स्तर को बनाए रखने में खुद मिट जाती हैं। हम यहां बात करते हैं मध्यप्रदेश की। हम जानते हैं मध्यप्रदेश में आठ प्रमुख नदियाँ हैं। केन, तवा, क्षिप्रा, नर्मदा, बेतवा, सोन, चंबल, मंदाकिनी। आइए एक नजर में देखें ये नदियाँ कितनी समृद्ध हैं और किन सहायक नदियों के कारण:-
केन 250 किमी. लंबी है और यमुना की एक सहायक नदी है जो बुन्देलखंड क्षेत्र से गुजरती है। मंदाकिनी तथा केन यमुना की अंतिम उपनदियाँ हैं। केन नदी जबलपुर, मध्यप्रदेश से प्रारंभ होती है, पन्ना में इससे कई धारायें आ जुड़ती हैं इसके बाद यमुना गंगा से जा मिलती है। और फिर बाँदा, उत्तरप्रदेश में इसका यमुना से संगम होता है। इस नदी के पत्थर प्रसिद्ध है। क्षिप्रा, मध्यप्रदेश में बहने वाली एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक नदी है। यह भारत की पवित्र नदियों में एक है। उज्जैन में कुम्भ का मेला इसी नदी के किनारे लगता है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर भी यहीं है।
तवा नदी मध्य प्रदेश ही नहीं भारत की भी एक प्रमुख नदी है। यह नर्मदा की सबसे बड़ी सहायक नदी है। यह सतपुड़ा श्रेणी की नदी है जो होशंगाबाद जिले में है। नर्मदा मध्य भारत के मध्य प्रदेश और गुजरात राज्य में बहने वाली एक प्रमुख नदी है। महाकाल पर्वत के अमरकण्टक शिखर से नर्मदा नदी की उत्पत्ति हुई है। इसकी लम्बाई प्रायः 1310 किलोमीटर है। यह नदी पश्चिम की तरफ जाकर खम्बात की खाड़ी में गिरती है। इस नदी के किनारे बसा शहर जबलपुर उल्लेखनीय है। इस नदी के मुहाने पर डेल्टा नहीं है। जबलपुर के निकट भेड़ाघाट का नर्मदा जलप्रपात प्रसिद्ध है। इस नदी के किनारे अमरकंटक, नेमावर, शुक्लतीर्थ आदि प्रसिद्ध तीर्थस्थान हैं जहाँ काफी दूर-दूर से यात्री आते रहते हैं। नर्मदा नदी को ही उत्तरी और दक्षिणी भारत की सीमारेखा माना जाता है।
जो नदियां गर्मी में लुप्त हो जाती हैं वे बारिश में फिर बहने लगतीं हैं। पिपरिया से निकलते ही पहली नदी मछवासा पड़ती है।बेतवा मध्य प्रदेश राज्य में बहने वाली एक नदी है। यह यमुना की सहायक नदी है। यह मध्य-प्रदेश में भोपाल से निकलकर उत्तर-पूर्वी दिशा में बहती हुई भोपाल, विदिशा, झाँसी, जालौल आदि जिलों में होकर बहती है। इसके ऊपरी भाग में कई झरने मिलते हैं किन्तु झाँसी के निकट यह काँप के मैदान में बहती है। इसकी सम्पूर्ण लम्बाई 480 किलोमीटर है। यह हमीरपुर के निकट यमुना में मिल जाती है। इसके किनारे सॉंची और विदिशा के प्रसिद्ध व सांस्कृतिक नगर स्थित हैं।
चंबल नदी मध्य भारत में यमुना नदी की सहायक नदी है। यह नदी ‘जानापाओ पर्वत, महू से निकलती है। इसका प्राचीन नाम चरमवाती है। इसकी सहायक नदिया शिप्रा, सिंध, कलिसिन्ध, ओर कुननों नदी है। यह नदी भारत में उत्तर तथा उत्तर-मध्य भाग में राजस्थान तथा मध्य प्रदेश से होकर बहती है। यह नदी दक्षिण मोड़ को उत्तर प्रदेश राज्य में यमुना में शामिल होने के पहले राजस्थान और मध्य प्रदेश के बीच सीमा बनाती है। इस नदी पर चार जल विधुत परियोजना चल रही है। गांधी सागर, राणा सागर, जवाहर सागर, कोटा वेराज (कोटा)। प्रसिद्ध चूलीय जल प्रपात चंबल नदी (कोटा) में है।
यह एक बारहमासी नदी है। इसका उद्गम स्थल जानापाओ की पहाड़ी (मध्य प्रदेश) है। यह दक्षिण में महू शहर के, इंदौर के पास, विंध्य रेंज में मध्य प्रदेश में दक्षिण ढलान से होकर गुजरती है। चंबल और उसकी सहायक नदियॉं उत्तर पश्चिमी मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के नाले, जबकि इसकी सहायक नदी, बनास, जो अरावली पर्वतों से शुरू होती है इसमें मिल जाती है। चंबल, कावेरी, यमुना, सिन्धु, पहुज भरेह के पास पचनदा में, उत्तर प्रदेश राज्य में भिंड और इटावा जिले की सीमा पर शामिल पांच नदियों के संगम समाप्त होता है।
सोन नदी या सोनभद्र नदी भारत के मध्य प्रदेश राज्य से निकल कर उत्तर प्रदेश, झारखंड के पहाड़ियों से गुजरते हुए वैशाली जिले के सोनपुर में जाकर गंगा नदी में मिल जाती है। यह बिहार की एक प्रमुख नदी है। इस नदी का नाम सोन पड़ा क्योंकि इस नदी की रेत पीले रंग की है जो सोने की तरह चमकती है। इस नदी की रेत पूरे बिहार में भवन निर्माण के लिए उपयोग में लाया जाता है तथा रेत उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में भी निर्यात की जाती है। गंगा और सोन नदी के संगम स्थल सोनपुर में एशिया का सबसे बड़ा सोनपुर पशु मेला लगता है।
मन्दाकिनी नदी, मध्य प्रदेश के सतना जिले में बहने वाली एक नदी है। इस नदी के तट पर प्रसिद्ध तीर्थ स्थल चित्रकूट स्थित है। इस नदी पर एक बार सफाई अभियान हो चुका है। रामचरित मानस मंे इस नदी का उल्लेख दोहे में होता है।
नदी शब्द का अर्थ संस्कृत भाषा के कई अर्थों में लिया गया है, इस शब्द को दरिया,प्रवहणी, सरिता, निरन्तर चलने वाली कहा गया है। वैदिक कोष में भी नदी शब्द को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया गया है- ‘‘नदना इमा भवन्ति‘‘ अर्थात् नदी कलकल की ध्वनि करने वाली होती है। हमारे देश में नदियों को माता का संज्ञा मिला हुआ है और नदियों के किनारे ही हमारी संस्कृति पनपी। लोग अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए नदियों के किनारे ही अपना घर बनाकर रहने लगे। लेकिन अब मानव समाज अपनी स्वार्थ सिद्धी के लिए इन नदियों को औद्योगिक कचरा, शहरों के गंदे नाले का सीवर डालकर तथा नदियों को पाटकर मार रहा है।
इसका एक उदाहरण है कृष्णी नदी। सहारनपुर के खैरी गांव से कृष्णी नदी का उद्गम हुआ है। यह नदी सहारनपुर से निकलकर जिला शामली, मुजफ्फरनगर से होती हुई बागपत के बरनावा में हिडंन नदी में मिल जाती है। भारत उदय एजूकेशन सोसाइटी के कार्यकर्ता जिला बागपत के बरनावा गांव में भ्रमण के दौरान इस नदी के क्षेत्र में संगम को भी देखने गये थे। यहाॅं पर हिंडन व कृष्णी नदी का संगम है। जो सिमट कर एक नाली का रूप ले लिया है।
इस नदी के किनारे महाभारतकालीन लाक्षागृह भी खंडहर हो चुका है इसके बारे में जनश्रुति है कि महाभारत के समय कौरवों ने पांडवों को जलाकर मारने के लिए लाख का घर बनाया था। लाख ज्वलनशील होता है जो बहुत तेजी से जलता हैं। लेकिन पांडवों को दुर्योधन के इस षड़यंत्र का पता चल गया था और वे जलते हुए इस घर से सुरंग के माध्यम से निकट बहती हुई कृष्णी नदी को पारकर जान बचाने में सफल रहे थे। इस प्रकार यह नदी महाभारत काल से भी जुड़ी हुई है। आज भी इन नदियों के संगम के पास लाक्षागृह में एक गुरुकुल का संचालन होता है। जो आज भी प्राचीन संस्कृति को संजोये हुए है। इसमें विद्यार्थियों को संस्कृत, वैदिक शिक्षा, गौ सेवा आदि का संचालन किया जाता है।
यह नदी सहारनपुर के गाँव खैरी से निकलकर नानौता व शामली के पास से 150 किलोमीटर की दूरी तय कर औद्योगिक कचरों को ढोती हुई बरनावा में हिंडन नदी में मिल जाती है। लेकिन अब इस नदी की क्षमता औद्योगिक कचरों को ढोने की भी नहीं रह गयी है। चन्देनामल, धकौड़ी, जलालपुर, सिक्का आदि गांॅव इस नदी के जल से बुरी तरह प्रभावित हैं। चन्देनामल गांॅव में प्रदूषण की वजह से सरकारी कार्यक्रमों का बहिष्कार भी किया था। बरसात के मौसम में जब नदियों के उफान से बाढ़ आ रही है, गंगा व यमुना नदी भी अपने उफान पर होती हैं, तब भी कृष्णी एक छोटी नाली के रूप में बहती है। यह इस नदी की करूणादायिक कहानी है। जो हम सबके लिए चिंता का विषय है।
पहले यही स्वच्छ जल से कल-कल करते हुए बहती थी। नदी के किनारे बसने वाले गाँव के लोग इस नदी में नहाते थे, पशुओं को इसका पानी पिलाते थे तथा इस नदी के जल से फसलों की सिंचाई भी किया करते थे। उसके बाद यह नदी शुगर मिल, गत्ता कारखाने, शराब बनाने के कारखाने आदि के प्रदूषण की चपेट में आ गयी। जिस कारण लोग इसके पानी को छूने से भी डरने लगे। क्योंकि इसके जल को छूने मात्र से ही त्वचा सम्बन्धी रोग होने लगे। इसके किनारे बसने वाले गाॅंवों को पानी की बदबू झेलनी पड़ी। भूजल के स्तर में भी गिरावट आयी, भूजल भी प्रदूषित हो गया और लोग पेट की बीमारियों से ग्रसित हो गये। इसका पानी धीरे-धीरे कम होने लगा और अब यह नदी अब मृत होने की कगार पर है। आने वाले वर्षों में हो सकता है कि नदी भूगोल के नक्शे से ही समाप्त हो जाये।
यदि यही हाल रहा तो हम आने वाली पीढ़ी को बतायेंगे कि यहाँ एक कृष्णी नामक नदी बहती थी। जो अब पूर्णतः समाप्त हो गयी। चैगामा क्षेत्र की यह इकलौती नदी है जिससे लोग पहले अपनी प्यास बुझाते थे। अगर इस प्रकार एक-एक कर नदी समाप्त होती गयी तो हमारे पास नदी शब्द ही बचेगा, जल स्रोत नहीं। लेकिन अब हम उस नदी को क्या नदी कहेंगे जिसमें प्रवाह नहीं बचा हो। नदियों में ध्वनि एवं निरन्तर बहना मुख्य गुण समाप्त होते जा रहे हैं। मेरी अपने नदी प्रेमी साथियों से अपील है कि एक-एक नष्ट होती नदियों को हम सबको मिल कर बचाना है।
सागर जिले में प्रमुख रूप से धसान, बेबस, बीना, बामनेर और सुनार नदियाँ निकलती हैं। इसके अलावा कड़ान, देहार, गधेरी व कुछ अन्य छोटी बरसाती नदियाँ भी हैं। अन्य प्राकृतिक संसाधनों के मामले में सागर जिले को समृद्ध नहीं कहा जा सकता लेकिन वास्तव में जो भी संसाधन उपलब्ध हैं, उनका बुद्धिमत्तापूर्ण दोहन शेष है। कृषि उत्पादन में सागर जिले के कुछ क्षेत्रों की अच्छी पहचान हैं। खुरई तहसील में उन्नत किस्म के गेहूँ का उत्पादन बड़ी मात्रा में होता है।
बड़ी नदियाँ तो वर्ष भर जल से तर रहती हैं परंतु बरसात में जल से भर कर बड़ी नदियों को जल देने का महत्वपूर्ण कार्य करती हैं। बरसात बीतते तक उनका जलस्तर कम होते होते सूख जाता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि उनके गहरीकरण की ओर कभी किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। प्रश्न यह है कि क्या इन बरसाती नदियों में पहले की तरह वर्ष भर पानी रह सकता है? यदि एक एक कर इन बरसाती नदियों को गहरा कर संरक्षित किया जाए तो जो वर्षा का जल बेकार बहकर समुद्र में समा जाता है वह गाँव वालों को पूरे साल पानी दे सकता है। तो आइए एक पहल हम भी करें।

म.प्र. में भा.ज.पा. व कांग्रेस एक ही घर में…!
नईम कुरेशी
मध्य प्रदेश सरकार पूर्व भा.ज.पा. सरकार के 15 सालों में किये गये भ्रष्टाचारों की जांचें करने के मामलों में काफी बातें की जा रही हैं। इसी तरह 10 साल तक कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार पर भी भ्रष्टाचारों की बातें की जा रही थीं। सुन्दर लाल पटवा व उमा भारती पूर्व मुख्यमंत्रियों ने भी खुलकर कांग्रेस सरकार पर तमाम तरह के आरोपों की झड़ी लगा दी थी, जिस पर र्दििग्वजय सिंह ने पटवा व उमा भारती पर एक निजी शिकायत न्यायालय में जरूर की थी जिसमें न तो सुन्दर लाल पटवा और ना ही उमा भारती शिकायतों की सच्चाई न्यायालयों में सिद्ध कर पाये थे, नतीजे में पटवा ने 90 साल की उम्र का हवाला देकर दिग्विजय सिंह से तमाम अपीलें की थीं अपना केस वापस करने हेतु।
आमतौर से माना जा रहा है कि मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी व कांग्रेस लगभग एक ही परिवार से चलते आ रहे हैं। सत्ता की मलाई सबसे ज्यादा सिर्फ 2 जातियों के लोग खाते दिखाई दे रहे हैं। ब्राम्हण व राजपूत जाति के लोग ही दबंग बनकर आम तौर से कमजोर तब्कों पर जुल्म भी करते दिखाई दे रहे हैं। प्रकाशचन्द्र सेठी के 1971-74 के शासन के बाद से ये ट्रेंड बढ़ता दिखाई दे रहा है। लोकायुक्त पुलिस मध्य प्रदेश ने भी सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार करने में इन्हीं दो तब्कों को रिश्वत मामलों में पकड़ा है पर सियासत में इस वर्ग की धमक कांग्रेसी व भा.ज.पा. दोनों शासन में बराबर से देखी व सुनी जाती है। दलित, आदिवासी, अति पिछड़ों व अल्पसंख्यकों पर भी अत्याचार कांग्रेस व भा.ज.पा. शासन में लगातार बराबर ही रहते हैं।
पिछले 15 सालों में जहां भा.ज.पा. शासन में सत्ता का सबसे ज्यादा लाभ संघ परिवार के जनेऊधारी लोग उठाते रहे हैं। ज्यादातर विश्वविद्यालयों व राजस्व, सहकारिता, पुलिस व स्कूली शिक्षा विभाग के लगभग सभी मलाईदार पदों संघ वालों ने कब्जा करके रखा था। खूब जमकर मलाई मारी जा रही थी। भोपाल का पत्रकारिता विश्वविद्यालय में तो हद से ज्यादा हद करके ऐसे लोगों को पदों पर बैठा दिया गया था जो संघ के कार्यकत्र्ता थे या संघ के बड़े पदाधिकारियों के बेटे-बेटियां या अन्य परिजन थे। इस विश्वविद्यालय के कुलपति से लेकर रजिस्ट्रार शर्मा तक पर आर्थिक अपराध के मामले दर्ज हैं। यहां के तमाम प्रोफेसर्स भी गलत व अवैध रूप से नौकरी पर रखे जाने की खबरें हैं। लाखों रुपये खर्च करके हर महीने दिल्ली के पास एक गेस्ट हाउस किराये पर लिया गया था, जिसमें संघ के कार्यकत्र्ता ठहरते थे पर उसका किराया भोपाल के इसी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के खजाने से दिया जाता था। ऐसी ही तमाम मध्य प्रदेश की संस्थाओं का दोहन संघ परिवार ने भा.ज.पा. के शासन में किया था।
मध्य प्रदेश में शुरू से ही एक ही घर एक ही महल से दोनों पार्टियों का शासन चलता आ रहा है। जब माधवराव सिंधिया ने 1982 में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी को लाखों मतों से हराया था तब लगने लगा था कि अब महल के दो दरवाजों में से एक शायद बंद हो जायेगा पर ऐसा नहीं हुआ, सिंधिया तो बहुत ही लोकप्रिय व संवेदनशील थे पर उन्होंने सरदार अंग्रे से उनके कब्जे का महल जरूर जबरन खाली करवा लिया था। जिसमें शरद शुक्ल, राजेन्द्र तोमर आदि को मुलजिम माना गया था फिर भी मध्य प्रदेश में खासतौर से उत्तरी मध्य प्रदेश के श्योपुर-मुरैना, भिण्ड, दतिया, शिवपुरी, गुना, ग्वालियर आदि में तो एक परिवार में यदि 4 लड़के होते हैं तो उनमें से एक को कांग्रेस में दूसरे को भा.ज.पा. में व तीसरे को ठेकेदार या अफसर बनाया जाता है जिससे सत्ता हमेशा ठाकुर साहब या पंडित जी के घर में ही बनी रहती है। ज्योतिरादित्य सिंधिया भी कह चुके हैं कि हमारे कार्यकत्र्ता दिन में कांग्रेसी व रात में कमलछाप हो जाते हैं। सिंधिया अपने पिता की तरह आम जनता से दूरी यदि न बनाते होते और सुपर महाराज बनने का नाटक न करते होते तो वो चुनाव शायद नहीं हारते। राहुल गांधी को इस तरफ ध्यान देना होगा।

बल्ला मैच की जीत का प्रतीक हो,प्रजातंत्र की हार का नहीं
हिंदुस्तान की दो बड़ी खूबियाँ हैं, एक तो यह विश्व का सबसे बड़ा प्रजातंत्र है और दूसरा विश्व में सर्वाधिक युवा देश। ऐसे में स्वाभाविक है कि चुने हुए युवा जन प्रतिनिधियों से देश को अपेक्षाएं भी अधिक होंगी, और हों भी क्यों न, हमारे पास अपने प्रजातंत्र की गौरवशाली विरासत जो है। भारतीय प्रजातंत्र का जो छायादार वटवृक्ष आज हमें दिखाई देता है, इसके त्याग और बलिदान का बीज बहुत गहरा बोया गया है और आज समूचे विश्व के लिए यह प्रेरणादायी है।
पंडित नेहरू कहते थे, ‘संस्कारवान युवा ही देश का भविष्य सँवारेगा।’ आज हमारे चुने हुए युवा जनप्रतिनिधियों को आत्ममंथन-आत्मचिंतन करना चाहिए कि वो किस रास्ते पर भारत के भविष्य को ले जाना चाहते हैं। एक रास्ता प्रजातंत्र की गौरवशाली विरासत की उम्मीदों को पूरा करने वाला है, और दूसरा उन्मादी। दोस्तों, उन्मादी व्यवहार सस्ता प्रचार तो दे सकता है, प्रजातंत्र को परिपक्वता नहीं दे सकता।
युवा जनप्रतिनिधियों, आप पर दायित्व है सदन में कानून बनाने का, सड़कों पर कानून हाथ में लेने का नहीं। आप अपनी बात दृढ़ता और मुखरता से रखें, मर्यादा को लाँघ कर नहीं।
आज समूचे विश्व को हमारे बल्ले की चमक देखने को मिल रही है। हमारी क्रिकेट टीम लगातार जीत हासिल कर रही है और हमें पूरी उम्मीद है कि हम विश्व कप में अपना परचम लहराएंगे। मगर बल्ले की यह जीत बगैर मेहनत के हासिल नहीं की जा सकती। खिलाड़ियों को मर्यादित मेहनत करनी होती है। मर्यादा धैर्य सिखाती है, धैर्य से सहनशीलता आती है, सहनशीलता से वे परिपक्व होते हैं और परिपक्वता जीत की बुनियाद बनती है। अर्थात खेल का मैदान हो या प्रजातंत्र, मूल मंत्र एक ही है। यह बात मैं सीमित और संकुचित दायरे में रह कर नहीं कह रहा हूँ। सभी दल के युवा साथियों से मेरा यह अनुरोध है। मुख्यमंत्री होने के नाते मेरा दायित्व भी है कि मैं अपने नौजवान और होनहार साथियों के साथ विमर्श करता रहूँ। युवा जनप्रतिनिधि साथियों, बल्ले को मैदान में भारत की जीत का प्रतीक बनाइए, सड़कों पर प्रजातंत्र की हार का नहीं।
( कमलनाथ मुख्यमंत्री, मप्र का ब्लॉग )

काला धन खत्म कैसे हो ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
काले धन ने हमारी संसद को भी अंगूठा दिखा दिया है। कोई यह बताए कि जिनकी जिंदगी ही काले धन पर निर्भर है, वे यह क्यों और कैसे बताएंगे कि देश और विदेशों में काला धन कितना है और उसे कैसे-कैसे छिपाकर रखा गया है। हमारी लोकसभा की स्थायी वित्त समिति ने काले धन का पता करने में बरसों खपा दिए लेकिन उसके हाथ अभी तक कोई ठोस आंकड़ा तक नहीं आया है। तीन गहन अनुसंधान करनेवाली वित्तीय संस्थाओं ने संसदीय समिति की मदद में जमीन-आसमान एक कर दिए लेकिन उनका भी कहना है कि 1980 से 2010 के दौरान भारतीयों ने विदेशों में 15 लाख करोड़ से 35 लाख करोड़ रु. तक काला धन छिपा रखा है। यह धन पैदा हुआ है, निर्माण-कार्यों, खनन, दवा-निर्माण, पान-मसाला, गुटखा, तंबाकू, सट्टा, फिल्म और शिक्षा के क्षेत्रों में। तीनों संस्थाओं ने अलग-अलग दावे किए हैं। तीनों ने यह भी कहा है कि यह काला धन देश की सकल संपदा (जीडीपी) के सात प्रतिशत से 120 प्रतिशत भी हो सकता है। इन तीनों संस्थाओं को 2011 में डाॅ. मनमोहनसिंह की कांग्रेस सरकार ने यह काम सौंपा था। वास्तव में यह काम तो करना चाहिए था, मोदी सरकार को। क्योंकि 2014 का चुनाव वह इसी नारे पर जीती थी लेकिन कोई भी सरकार काले धन को खत्म कैसे कर सकती है ? यदि काला धन खत्म हो जाए तो हमारे नेताओं की दुकानें कैसे चलेंगी ? सारे राजनीतिक दलों के दफ्तरों पर ताले ठुक जाएंगे। वर्तमान सरकार को चाहिए था कि उसने नोटबंदी और जीएसटी जो लागू की, उससे काले धन पर कितना काबू पाया गया, वह यह बताती। इस सरकार ने तो बेनामी चुनावी बांड जारी करके काले धन की आवाजाही को और भी सरल बना दिया है। अच्छा तो यह है कि सरकार किसी तरह आयकर को ही खत्म करे ताकि कालेधन की कल्पना ही खत्म हो जाए। सरकार को जिस धन पर टैक्स नहीं दिया जाता, उसे काला कहने की बजाय रिश्वत, ठगी, ब्लेकमेल, वेश्यावृत्ति, हरामखोरी से कमाए पैसे को काला कहा जाए तो बेहतर होगा। लेकिन सरकार के खर्चे चलाने के लिए वैकल्पिक आमदनी के रास्ते खोजने की कोशिशें क्यों नहीं की जाए ? नागरिकों पर उनकी आय के बजाय व्यय पर टैक्स लगाने की कोई नई व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जाए ? यह काम मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं।

बेरोजगारी के लिए फिर आर्थिक सर्वेक्षण
अजित वर्मा
लोकसभा के आम चुनाव में देश के सभी राजनीतिक दलों ने बेरोजगारी को प्रमुखता से मुद्दा बनाया था। जिस तरह बेरोजगारी के आंकड़े सामने आ रहे हैं, वे वास्तव में चिंताजनक हैं। इस चिंता से वाकिफ देश की मोदी सरकार बेरोजगारी को लेकर कुछ नये और बड़े कदम उठाने की तैयारी कर रही है। इसके लिये देश में सातवें बार आर्थिक सर्वेक्षण होने जा रहा है।
केन्द्र सरकार ने सातवें आर्थिक सर्वेक्षण की तैयारी लगभग पूरी तरह कर ली है और इसके लिए देशभर में प्रशिक्षण का काम भी जारी है। ऐसा अनुमान है कि अगले छह माह में देश में समग्र आर्थिक सर्वेक्षण का काम पूरा कर लिया जाएगा। दरअसल, केन्द्र सरकार ने इस सर्वेक्षण में रोजगार के आंकड़े जुटाने का खास निर्णय लिया है। चाय-पानी की रेहड़ी से लेकर पटरी पर बैठने वालों तक को इस सर्वेक्षण के दायरे में लाने का निर्णय लिया गया है। इसमें करीब सत्ताईस करोड़ परिवारों को शामिल किया जायेगा। इसके साथ ही सात करोड़ स्थापित लोगों को भी इस दायरे में लाने का फैसला किया गया है। यह भी तय किया गया है कि सरकार अब इस तरह के सर्वेक्षण हर तीसरे साल करायेगी।
रोजगार के मामले में चाहे किसी भी दल की सरकार हो, विपक्ष के निशाने पर रही है। तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव और हाल ही में सम्पन्न हुए लोकसभा चुनावों में बेरोजगारी का मुद्दा प्रमुखता से उठा और बेरोजगारों को भत्ता देने सहित 21 लाख पद खाली होने के बावजूद नहीं भरे जाने और जीएसटी, नोटबंदी के कारण रोजगार के अवसर घटने को लेकर काफी विवाद रहा। सभी दलों ने अपने-अपने घोषणापत्रों में बेरोजगारी भत्ता देने का वादा किया था। लेकिन यह माना जा रहा है कि वास्तव में बेरोजगारी भत्ता इसका कोई समाधान नहीं हो सकता, लेकिन रोजगार के अवसर पैदा करना सरकार का दायित्व भी होता है। दरअसल, सरकार आर्थिक सर्वेक्षण के माध्यम से स्पष्ट व सही आंकड़े प्राप्त करना चाहती है। आर्थिक सर्वेक्षण में सही आंकड़ा आना जरूरी है, क्योंकि इसी के आधार पर सरकार सामाजिक व आर्थिक विकास का रोडमैप तैयार करेगी।
जब सरकार के सामने वास्तविक आंकड़े होंगे तो लोगों के जीवनस्तर को ऊंचा उठाने,पानी, बिजली, स्वास्थ्य शिक्षा, परिवहन आदि सुविधाओं के विस्तार में सहायता मिल सकेगी। माना जाना चाहिए कि सर्वेक्षण के आंकड़े आते ही सरकारी स्तर पर विश्लेषण से लेकर उसके आधार पर आर्थिक विकास की व्यवहारिक योजनाओं पर अमल करना होगा ताकि लोगों के जीवनस्तर में सुधार हो और देश के प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक जीवन यापन करने के साधन उपलब्ध हो सकें।

भाजपा-सत्ता का मद: काँग्रेस गिरती साख…..!
ओमप्रकाश मेहता
देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी अभी अपनी उम्र के चार दशक भी पूरे नहीं कर पाई और अपनी परम्परागत अस्मिता खो बैठी, क्योंकि अब यह जन-जन की नहीं बल्कि मात्र दो हस्तियों की पार्टी बनकर रह गई है, वही देश की सबसे पुरानी अर्थात् 130 साल की उम्र वाली कांग्रेस अब अपनी चमक छोड़कर अस्ताचलगामी हो रही है। जहां तक देश की शेष पार्टियों का सवाल है, वे क्षेत्रीय होकर रह गई है। अब ऐसी स्थिति में पूरा देश यह तय नहीं कर पा रहा है कि आखिर वह किसके साथ जाए? एक तरफ एकाधिकारी व अहंकारी भारतीय जनता पार्टी है, तो दूसरी ओर नेतृत्व विहिन तथा दिग्भ्रमित स्थिति वाली कांग्र्रेस….? इसीलिए पिछले लोकसभा चुनावों के समय रसातल जाती कांग्रेस को छोड़ झूठी आशाऐं जगाने वाली भाजपा का साथ दिया और कांग्रेस को दुर्दिन देखने को मजबूर होना पड़ा। किंतु अब ऐसा महसूस किया जा रहा है कि कांग्रेस अपने लिए ‘संजीवनी’ ढूंढ़ने में भी सक्षम प्रतीत नहीं हो रही है और राहुल की जिद और पार्टी की गिरती साख के बीच फंसी है, इसे इस स्थिति से उबारने के कोई सार्थक प्रयास भी नहीं हो रहे हैं।
जहाँ तक भारतीय जनता पार्टी का सवाल है, उसके दोनों मुख्य आकाओं (नरेन्द्र मोदी व अमित शाह) का एक ही मुख्य ध्येय है, वह देश की जनता की सेवा नहीं बल्कि पूरे देश का ‘चक्रवर्ती राजा’ बनना, अर्थात् देश के सभी राज्यों व केन्द्र पर राज करना और इस उद्देश्य की चमक में ये दोनों नेता पार्टी की साख, बुजुर्गों का सम्मान, पार्टी के संस्कार आदि सब कुछ भूल गए और अहंकारी सम्राट की तरह अपनी मनमर्जी देश पर थोपने लगे। आज देश के इन दोनों कर्णधारों देशवासियों के सुख-दुख या कल्याण की कोई चिंता नहीं है, चिंता है तो सिर्फ अपना ‘वोट बैंक’ बढ़ाने की, इसीलिए जनकल्याण पर खर्च होने वाला पैसा मदरसों और मुस्लिम छात्रों की छात्रवृत्ति पर खर्च करने की योजना है। आज एक ओर जहां भावी बजट को लेकर देश के अर्थशास्त्रियों से राय लेने का दिखावा किया जा रहा है, वहीं वास्तविक बजट ‘वोट बैंक’ का बनाया जा रहा है। क्योंकि देशवासियों को पिछले पांच साल का अच्छा-खासा यह अनुभव है कि 2014 में चुनाव के समय कितने वादे किए गए थे और उनमें से कितनों को जुमलों में बदल दिया गया? इसलिए अब 2019 में चुनाव के समय इन आधुनिक भाग्यविधाताओं द्वारा किए गए वादों की पूर्ति पर भी कोई भरोसा नहीं है। क्योंकि इन हस्तियों को आज की नहीं, 2024 की चिंता सताने लगी है, ये 2024 तक देश के ‘चक्रवर्ती सम्राट’ बन जाने का सपना जो देख रहे है? अपनी इसी चमक के पीछे इन हस्तियों ने पार्टी के परम्परागत उसूलों को भी धुमिल कर दिया है, जिसका ताजा उदाहरण ‘‘एक व्यक्ति-एक पद’’ का सिद्धांत है। इस सिद्धांत की हत्या की सीमा भाजपाशासित राज्यों तक पहुंच गई है, क्योंकि कई राज्यों में एक नेता दो पदों पर विराजित है। वैसे अतीत में इस पार्टी की पहचान इसमें व्याप्त अनुशासन व इसके चाल-चरित्र व चेहरे के कारण थी, किंतु अब इसमें न अनुशासन रहा और न इसका चाल, चरित्र व चेहरा चमकीला रहा। यह अब केवल ‘आत्ममुग्धा’ बनकर रह गई है, जिसके चालू भाषा में ‘‘अपने मूंह मियां मिट्ठू’’ कहा जाता है। इस पार्टी के चर्चित क्रियाकलापों में से सबसे चर्चित क्रियाकलाप बुजुर्गों का अपमान रहा। पार्टी के दो वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आड़वानी और डाॅ. मुरली मनोहर जोशी मौजूदा नेतृत्व के शिकार है।
ण्थी, आज सब कुछ खोने के बाद जो पद छोड़ने की जिद राहुल भाई कर रहे है, काश यह जिद उन्होंने पहली बार पद सौंपे जाने के समय की होती तो आज पार्टी का चेहरा कुछ अलग ही नजर आता। किंतु यहां दुःख का विषय यह है कि अभी भी कांग्रेस के दिग्गज अशोक गेहलोद जैसे गए-गुजरे चेहरे को पार्टी का नेतृत्व सौंपने की तैयारी कर रहे है, जबकि डाॅ. मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी व गुलामनबी आजाद जैसे अनेक अनुभवी चेहरे पार्टी में विद्यमान है, या फिर किसी युवा उभरते व्यक्तित्व के हाथों में पार्टी की कमान सौंप देनी चाहिए, जो बुजुर्गों से अनुभवी सलाह लेकर नए जोश से पार्टी की पुरानी साख को पुनः स्थापित कर सके। कांग्रेस के पुरोघाओं को यह कार्य प्राथमिकता से करना होगा क्योंकि पार्टी केन्द्र के बाद राज्यों में भी तेजी से अपनी साख खोजी जा रही है।

44 साल बाद घोषित और अघोषित आपातकाल की यादें
सनत जैन
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। आज से 44 साल पहले भारत में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की थी। लगभग 18 माह तक आपातकाल की छाया में भारत के नागरिकों ने शासन व्यवस्था को देखा आपातकाल के दौरान नागरिकों के सभी मूलभूत अधिकार खत्म कर दिए गए थे। विपक्षी राजनेताओं, ट्रेड यूनियन के नेताओं और छात्र संगठन से जुड़े पदाधिकारियों को आपातकाल में ‎बिना मुकदमा जेल भेज दिया गया था। अखबारों में सेंसरशिप लगा दी गई थी, जिसके कारण लगभग 18 माह तक लोगों के मौलिक अधिकार और विचारों की स्वतंत्रता लगभग लगभग समाप्त हो गई थी। 2019 में अब अघोषित आपातकाल जैसी स्थितियां होने की बात कही जा रही है। घोषित और अघोषित आपातकाल को लेकर यदि चर्चाएं हो रहे हैं, तो इसमें निश्चित रूप से कुछ ना कुछ समानताएं तो होंगी ही।
1971 में भारत-पाक के बीच युद्ध हुआ था। इस युद्ध के बाद बांग्लादेश का गठन हुआ। हजारों पाकिस्तानी सैनिकों का समर्पण कराया गया, लाखों बांग्लादेशी नाग‎रिक बांग्लादेश की सीमा पार करके भारत आ गए थे। उन्हें शरणार्थी के रूप में सरकार को रखना पड़ा। आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई थी, जिसके कारण 1973 से 1975 के बीच इंदिरा गांधी के खिलाफ देश भर में एक राजनीतिक असंतोष पनपा था। महंगाई के खिलाफ आम जनता नाराज थी। इसी दौरान जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति के आव्हान पर सभी विपक्षी दल एकजुट होकर सरकार के विरोध में खड़े हो गए थे।
1971 के लोकसभा के आम चुनाव में इंदिरा गांधी ने रायबरेली से राजनारायण को चुनाव हराया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के चुनाव को 12 जून 1975 को अवैध घोषित कर दिया था। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की चुनावी सभा में जो बिजली उपयोग की गई थी, वह सरकारी खर्च पर थी तथा उनके साथ उनके निजी सचिव साथ थे इस कारण चुनाव अवैध घोषित हो गया था। 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश वीआर कृष्णा ने हाई कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा था। इस निर्णय के तुरंत बाद अगले दिन जो रैली दिल्ली में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आयोजित हुई, उसमें उन्होंने सार्वजनिक रूप से पुलिस अधिकारियों और सेना से आव्हान किया था कि वह सरकार के आदेशों का पालन नहीं करें। उस समय जयप्रकाश नारायण लोक नायक के रूप में जन जन के नेता थे। इस स्थिति को देखते हुए 25 जून 1975 को राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री की सलाह पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल घोषित करते हुए समस्त मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए थे। संवैधानिक प्रावधानों के तहत प्रत्येक 6 माह में आपातकाल की समय अवधि बढ़ती रही और यह तीन बार बढ़ाई गई।
18 जनवरी 1977 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने चुनाव की घोषणा करते हुए आपातकाल को समाप्त घोषित कर दिया। सभी राजनीतिक दलों के कैदियों को जेल से रिहा कर दिया गया। इस चुनाव में आपातकाल को लेकर लोगों में गुस्सा था। नसबंदी और जेल में नेताओं को प्रताड़ित किए जाने की अफवाहों का उत्तर भारत के राज्यों में बड़ा असर हुआ। चुनाव में इंदिरा गांधी संजय गांधी सहित कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता चुनाव में पराजित हो गए। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस का खाता भी 1977 के चुनाव में नहीं खुला। मध्य प्रदेश जैसे राज्य से 40 लोकसभा सीटों में से मात्र एक लोकसभा सीट छिंदवाड़ा ही कांग्रेस जीत सकी। विपक्षी दलों ने संयुक्त रूप से चुनाव लड़ा। इंदिरा गांधी ने पराजित होते ही अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को भेजा और केंद्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार 1977 में गठित हुई।
केंद्र की नई सरकार ने आपातकाल मैं हुई ज्यादतियों की जांच करने के लिए शाह आयोग का गठन किया था। इसके अलावा किस्सा कुर्सी का और अन्य कई मामलों की जांच कराई गई। यह सरकार ढाई वर्ष भी अपने आप को स्थिर नहीं रख पाई। 1980 में पुनः लोकसभा चुनाव हुए और इंदिरा गांधी पुन: दो तिहाई बहुमत के साथ केंद्र में सरकार बनाने में सफल हुई। यह कहा जा सकता है कि आपातकाल के जो 18 माह आम जनता ने देखे थे। उसकी वस्तु स्थिति जानने के बाद आपातकाल का जो कलंक इंदिरा गांधी पर लगा था, वह जनता ने भारी बहुमत देकर परिस्थितियों के कारण आपातकाल को जायज मान लिया। आपातकाल के दौरान देश में शासन-प्रशासन एवं जनता के बीच एक अनुशासन बना था। सभी ‎नियं‎त्रित हो गए थे। स्वतंत्र भारत के इ‎तिहास में आपातकाल के दौरान ही जनता ने सुशासन देखा था। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के एक बयान ने यह कहकर सनसनी फैला दी थी, कि देश में आपातकाल जैसे हालात बन रहे हैं। पिछले 5 वर्षों में केंद्र की मोदी सरकार पर विपक्षी दल हमेशा यह आरोप लगाते रहे हैं कि देश में एक बार फिर आपातकाल जैसे हालात हो गए हैं। विपक्षी नेताओं और राजनीतिक दलों द्वारा सरकार पर लगातार हमले कर रहे हैं। मीडिया पर अघोषित रूप से सरकारी नियंत्रण है मीडिया वही दिखा रहा है, जो सरकार दिखाना चाहती है देश में सेंसरशिप जैसे हालात बन गए हैं। देश की अर्थव्यवस्था 1975 की तरह कमजोर ‎स्थिति में है। 45 वर्ष में पहली बार देश में सबसे ज्यादा बेरोजगारी की समस्या से देश को गुजरना पड़ रहा है। आपातकाल की 44 वीं वर्षगांठ में आपातकाल को लेकर तब और अब के बीच समानताएं खोजी जाने लगी हैं। इससे स्पष्ट है कि कहीं ना कहीं सरकार विपक्ष और आम जनता के बीच अविश्वास और विश्वसनीयता का संकट पैदा हुआ है।

आपातकाल स्वतंत्र भारत का काला अध्याय
कैलाश सोनी
हम भारतवासी सदैव से ही स्वतंत्रता के प्रेमी और उपासक रहे है इसलिए जब जब भी हमारी स्वाधीनता को अपह्त करने के प्रयत्न हुए हमने उसका प्रतिकार किया है, अनेकबार विदेशी शक्तियों ने हमें पराधीन बनाने की कोशिश की किन्तु हमारे पूर्वजो ने उनके विरूद्ध सतत संघर्ष किया और अंतत: विजयी हुए।
स्वतंत्रता की महिमा से मंडित हमारे देश के लोकतांत्रिक इतिहास से हमारी आजादी के हरण का एक काला अध्याय दर्ज है किन्तु उसके साथ ही दूसरी आजादी की हमारी संघर्ष गाथा भी जुडी है, वह हमारे आजादी से जीने के संस्कार का एक ज्वलंत उदाहरण है, पंरतु वर्तमान की नई पीढ़ी को लोकतंत्र पर आई इस अमावस्या की शायद ही कोई जानकारी होंगी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में 25 जून 1975 में एक ऐसा भी अवसर आया जब तक सत्तासीन व्यक्ति ने जिनका उनके अपने भ्रष्टाचार के कारण चुनाव परिणाम इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा रद्द कर दिया गया, अपनी सत्ता पिपासा को पूरा करने के लिये देशवासियों के सारे लोकतांत्रिक अधिकारों को तथा सारी संवैधानिक मर्यादाओं को समाप्त कर संपूर्ण देश को आपातकाल की बेड़ी में जकड़ दिया। आपातकाल लगाने के लिये आवश्यक सारे संवैधानिक प्रावधानों को दरकिनार करके यह घोषणा की गई थी। प्रावधानों के तहत आधे से अधिक प्रांत जब मांग करें, नोट भेजें कि कानून व्यवस्था संकट में है और केन्द्रीय कैबिनेट सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करे तब आपातकाल लगता है।
किंतु इंदिरा जी और उनके निकटस्थी को भय सता रहा था कि वे कहीं सत्ता से बेदखल ना हो जाये इसलिये सारे कानून हाथ में लेकर अपनी मनमर्जी से वह किया जो कतयी कानून संगत नहीं था वह तो जब आम निर्वाचन की घोषणा हुई तो उनकी अनेक साजिशे उजागर हुई निर्वान प्रक्रिया के आरंभ होते होते इंदिरा जी के मंत्रीमंडल के वरिष्ठ मंत्री बाबू जगजीवन राम ने इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस छोड़ दी उस समय उन्होंने खुलासा किया कि देश पर आपातकाल थौपने संबंधी प्रस्ताव कैबिनेट में कभी आया ही नही, उसे सिर्फ सूचित किया गया उनके शब्द में के‎बीनेट वॉस टोल्ड नॉट कन्सल्टेड और इसके विपरीत फखरूद्दीन अली महोदय को लिखित सूचना दी गयी कि वह प्रस्ताव कैबिनेट द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया था इस प्रकार सारे संवैधानिक प्रावधानो का उल्लंघन करते हुए बिना कैबिनेट के प्रस्ताव के पूरे देश पर तानाशाही का जो तांडव थोप दिया गया उसका नाम था आपातकाल ।
कोई अपील नही, कोई न्यायिक व्यवस्था नहीं, न्यायालयों के सारे अधिकार समाप्त कर दिये गये और लाखो निरपराध लोगो की धड़ाधड़ गिरफ्तारी हुई तथा लोकनायक जयप्रकाश नारायण सहित सभी विरोधी दलो के नेता जिसमें अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आड़वाणी, जार्ज फर्नाडीज, कांग्रेस के भी नेता 250 से अधिक पत्रकार जेलो में डाल दिये गये। निरपराध नागरिको के साथ हिंसा का एक ऐसा ताडव देश ने पहले कभी नही देखा था।
न्यायपालिका समाप्त कर दी गई सुप्रीम कोर्ट मे तीन जजो को सुपरसीड करके अपने चुनाव को वैध करा लिया गया संपूर्ण देश मे हाकार जेल के भीतर अकेले म.प्र. में 100 से अधिक लोकतंत्र प्रेमियो की असमय मृत्यु हुई। 110806 राजनैतिक और समाजिक नागरिको को मीसा/डीआईआर मे बिना मुकद्दमा चलाये जेलो मे निरूद्ध किया गया। इस इतिहास को जानना और परखना लोकतंत्र मे विश्वास लोकतंत्र मे विश्वास रखने वाले सभी के लिये आवश्यक है। नयी पीढी को भी इसे जानने की जरूरत है। जिसकी प्रेरणा से भविष्य मे लोकतंत्र को अक्षुण्ण रखा जा सके। देश हित मे यह बहुत आवश्यक है, ताकि अभिव्यक्ति की आजादी फिर कभी बाधिक न हो पाये। 25 एवं 26 जून 2006 को करेली मे दीवसीय का आयोजन किया था। जिसमे मध्यप्रदेश के साथ ही छत्तीसगढ के भी कुछ लोकतंत्र सेनानी शामिल हुये थे। तब लोकतंत्र सेनानी संघ को एक राज्यस्तरीय संगठन बना दिया गया था। 26 जून 2015 को भोपाल मे आयोजित सम्मेलन मे इसे अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया गया । आज इस संगठन का परिपूर्ण आकार सभी के सामने है। वह इसके केन्द्रीय पदाधिकारियो के निंरतर प्रवास और प्रयास का परिणाम है। आज कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक के लोकतंत्र सेनानी संगठित हो चुके है। लगभग सभी वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी मे आ चुके, इन सेनानियो के उत्साह मे आज भी कोई कमी नही आयी है। देश हित मे कुछ भी कर गुजरने को आज भी ये सभी तत्पर है । इसलिये सम्पर्क होते ही हर प्रांन्त मे प्रांन्तीय संगठन खड़ा हो गया, जिनके प्रांतीय सम्मेलन भी आयोजित हो रहै है।
इन सेनानियो के त्याग और तपस्या को सम्मानित करने का अर्थ अपने गौरवशाली इतिहास को सम्मानित करना है । जो लोग इतिहास को भुलाने के लिये अमादा थे उन्हे आज सम्पूर्ण देश नकार चुका है। जिन्होने इसके महत्व को समझा ऐसे कईS प्रान्त के माननीय मुख्यमंत्रीगण लोकतंत्र सेनानियो को मानधन सहित चिकित्सा, यातायात आदि की सुविधा मुहैया करके लोकतंत्र के प्रति अपने श्रद्धा भाव का उदाहरण प्रस्तुत कर रहै है । पिछले एक वर्ष मे हमारे संगठन के प्रयास और संबधित सरकारो के समर्थन से जिन प्रान्तो मे यह योजना पहली बार लागू हुई वह है। उत्तराखंड और महाराष्ट्र। उत्तरप्रदेश मे नयी सुविधाओ के साथ यह नये रूप मे लागू हुई है। असम मे इसे लागू करने के लिये आश्वसन मिल चुका है। आवश्यक प्रक्रिया से गुजरने के बाद घोषणा होने की संभावना है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा दी जा रही वित्तीय सुविधाओं पर अस्थायी रोक लगा दी है। मैं मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों को आगाह करना चाहता हू कि वे इतिहास से सबक ले तथा तानाशाही का मार्ग छोडकर वित्तीय सुविधाओं पर लगाई अस्थायी पावंदी को समाप्त कर आपातकाल के विरूद्ध संघर्ष करने वाले योद्धाओं को सम्मानित करे, अन्यथा आंदोलन का सामना करने के लिये तैयार रहे।
आपातकाल की समाप्ति के पश्चात् आई तत्कालीन केन्द्र सरकार ने यह अनुभव किया था कि यह देश का दूसरा स्वतंत्रता संग्राम है जिसने देश के लोकतंत्र को उसकी बेड़ियॉ तोडकर कारागार से मुक्त किया। इस गौरवशाली संघर्ष की महिमा को भावी पीढ़ी के सामने प्रस्तुत करने की उनकी मंशा जरूर रही होगी क्योंकि वे स्वयं इसके सेनापति व मार्गदर्शक थे, पंरतु दुर्भाग्य से वे अपना कार्यकाल पूरा नही कर पाए आज इतने वर्षो के बाद उसी संघर्ष से निकले, लोकतंत्र सेनानी अच्छी संख्या मे केन्द्र में सत्तासीन है। हमें उम्मीद थी कि सरकार आते ही स्वयं इस पर अवश्य ध्यान देगी लेकिन ऐसा नही हो सका, जनता जनार्दन के आशीर्वाद से केन्द्र में श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में प्रचण्ड बहुमत से सरकार बनी है। इसमें देश के लोकतंत्र सेनानियों की भी महती भूमिका रही है हम आशान्वित है ।
स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला महासंग्राम था। जिसमें संपूर्ण देश ने अपनी भूमिका निभाई, परंतु कैसा दुर्भाग्य नई पीढ़ी से इस इतिहास को छुपाकर रखा गया। इस संघर्ष गाथा को बच्चों के पाठयक्रम में शामिल करने की आवश्यकता से हमने सरकार को दृढतापूर्वक अवगत कराया है। हमें विश्वास है कि शीघ्र ही बच्चो को इसकी जानकारी उपलब्ध हो जाएगी। तत्कालीन केन्द्र सरकार ने ही लोकतंत्र को कलंकित किया था अत: आज की केन्द्र सरकार का यह दायित्व बनता है कि लोकतंत्र पर लगे उस कलंक को मिटाने वाले लोकतंत्र सेनानियों को स्वतंत्रता सेनानियों का दर्जा देकर इतिहास के साथ इस निमित्त हमें सरकार के प्रभावशाली मंत्रियों का समर्थन मिल रहा है इसे निर्णायक स्तर तक पहुचाने के लिये संगठन की ओर से निरंतर प्रयास जारी है। यह सब किय जाना इसलिये भी आवश्यक है कि जिससे इस संग्राम से वर्तमान तथा आगे आने वाली पीढिया स्वाधीन जीने के लिये कोई भी मूल्य चुकाने की सतत् प्रेरणा ग्रहण कर सके और दूसरी ओर शासन प्रशासन में बैठे लोगो की शक्ति और सामर्थ का भी विस्मरण न हो।
हम तो केन्द्र से बस इतना निवेदन कर सकते है कि जिस संघर्ष की सीढी चढकर आज आप आसमान की ऊंचाई को छू रहे है उस सीढी को उस इतिहास को महत्व दे और उन इतिहास पुरूषो को सम्मानित करे। पिछले 44 साल में हम लगभग 70 हजार लोकतंत्र सेनानियों को हम खो चुके है। रोज देशभर से जिस प्रकार के शोक समाचार मिल रहे है उससे लगता है कि अगले 10 साल में इनकी प्रजाति विलुप्ति की कगार तक पहुच जाएगी। अत: ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय को और अधिक टाला नही जाना चाहिए ।
(लेखक- राज्यसभा सदस्य एवं आपातकाल योद्धाओं के अ.भा.संगठन लोकतंत्र सेनानी संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष है)

भ्रष्टाचारों पर सियासतदां कार्यवाही नहीं करते…!
नईम कुरैशी
भ्रष्टाचार हमारे देश में एक बड़ा सवाल रहा है, एक बड़ा मुद्दा रहा है पर देश के सियासतदानों ने इसे कभी भी गम्भीरता से नहीं लिया क्योंकि हमारे तथाकथित नेतागण खुद ही भ्रष्टाचारों में गले गले तक डूबे दिखे हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री रहे प्रताप सिंह कैरो पर भ्रष्टाचारों के आरोप लगे थे 1960 के आसपास तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने निर्वाचित हुये कहा था क्या मैं लाल किले से ये कहूँ कि मेरे मुख्यमंत्री भ्रष्ट हैं। इसके बाद रक्षा मंत्री रहे व्ही.के. कृष्ण मेनन पर भी सेना के लिये जीप खरीदने के मामलों में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। इस पर भी नेहरू जी कुछ खास नहीं कर पाये थे।
नेहरू जी के चले जाने पर गुलजारी लाल नन्दा कुछ समय रहे थे। उन्हें काफी ईमानदार भी माना जाता रहा था पर उन्हें वक्त कुछ खास नहीं मिला। लाल बहादुर शास्त्री जी को ईमानदार कहा व सुना जाता रहा था।
श्रीमती गांधी के दौर में बढ़ा भ्रष्टाचार
श्रीमती इन्दिरा गांधी के आने के साथ ही भ्रष्टाचारों की देश में बहार सी आ गई थी। नागर वाला कांड से लेकर आपातकाल के दौरान इतने भ्रष्टाचारों व अत्याचारों के काण्ड हुये कि उन पर अनेकों उपन्यासों व किताबों को लिखा जा चुका है। इन्दिरा जी के दौर में कांग्रेस भी काफी कुछ विचारों से दूर हो गयी थी। उसके विचारों में अब गांधी के विचार दूर से होते जा रहे थे। बस अब ये विचार संजय गांधी के विचार थे या फिर विद्याचरण शुक्ल, बंसीलाल के बोल कांग्रेस में होते थे। संजय गांधी ने परिवार को नियोजित करने का अभियान जरूर चलाया पर उसके लिये भी जुल्मोसितम भी बरपाया गया। कांग्रेस एक गिरोह के तौर पर चलने लगी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी संजय गांधी को चप्पलें पहनाते हुये देखे जाते रहे थे। भ्रष्टाचारों की नदियां भी इस दौर में समुन्दर बन गये थे। आज उसका ही नतीजा है कि हमारे संसद में 40 फीसद लोग अपराधों में देखे जा रहे हैं। उसमें आधे सांसदों पर बलात्कार, लूट, अपहरण जैसे मामले भी दर्ज देखे जाते रहे हैं।
मध्य प्रदेश में सबसे महिला अत्याचार
उत्तर प्रदेश, बिहार में तो हर तीसरा सांसद व विधायक महिलाओं की इज्जतों से खेलता दिखाई दे रहा है पर हमारा कानून इसके सामने बोना व पुलिस इन सबके सामने नौकरानी या रखैल की तरह हाथ जोड़े खड़ी रहती है। जैसे उत्तर प्रदेश में सेंगर नाम के विधायक जी के सामने पिछले साल खड़ी थी, यदि आंदोलन न किया होता, मीडिया की सक्रियता न होती तो सी.बी.आई. जांच न होती और विधायक जी 16 वर्षीय नवयुवती के गुनहेगार बनकर सीना फुलाते न घूम रहे होते। मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश के बिरादरी के नाते उन्हें कानून का कोई डर ही न था। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा महिलाओं पर अत्याचार देखे व सुने जाते हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस शुरू से ही पैसे के लिये अपनी कुर्सी बचाने के लिये अत्याचारियों के पक्ष लेती आ रही है। सियासतदां यहां चापलूस व बेईमान पुलिस अफसरानों को थानों पर पदस्थापनायें कराते आ रहे हैं। भारत के हिन्दी वेल्ट में पुलिस वालों का अत्याचार भी गरीब वर्ग के लिये कमजोर तब्कों, दलितों, पिछड़ों के लिये एक बड़ी समस्या बनी हुई है पर सियासतदां अपने सामंती मिजाज के चलते इस पर कभी भी ध्यान नहीं देते। 1970 में उत्तर प्रदेश के मेरठ में माया त्यागी नामक महिला के पति को हत्या करने का सरेआम कारनामा व खुद मामा त्यागी को बेइज्जत करने का कारनामा यहां की पुलिस ने कर दिखाया था, जो चरित्र पुलिस का बीमारू राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, म.प्र. व राजस्थान का है या दिल्ली पुलिस का है। वो केरला या तमिलनाडु, मुम्बई जैसी नहीं है। उत्तर प्रदेश में तो भ्रष्टाचारों की सारी हदें पार कराने का काम उत्तर प्रदेश की पुलिस व राजस्व मेहकमा भर करता रहा है। यहां तो 90 के दशक में मुलायम सिंह यादव ने तो अपने मुख्यमंत्री काल में सारी हदें तोड़ते हुये अपने यादव बिरादरी वालों को बिना परीक्षा के व बिना ट्रेनिंग के ही थानेदार बनवा दिया था जो लम्बे वक्त तक उनके वफादार भी रहे थे।
म.प्र. में मंत्री भी कार्यवाही की जद में
मध्य प्रदेश में जवाहर लाल नेहरू ने अपने बिरादरी वाले कैलाश नाथ काटजू को जबरन मुख्यमंत्री जरूर बना दिया था पर आगे वो कामयाब नहीं हुये थे और हटाये गये। उन्हें सुनाई भी नहीं देता था। डी.पी. मिश्रा, प्रकाशचन्द्र सेठी काफी अच्छे मुख्यमंत्री मध्य प्रदेश में रहे थे। बाद में 1984 में अर्जुन सिंह व 1992 में सुन्दरलाल पटवा भी अच्छे प्रशासक व मुख्यमंत्री रहे थे। वर्तमान नरेन्द्र मोदी सरकार की इच्छा शक्ति भी भ्रष्टाचारों के मामले में काफी मजबूती देखी व सुनी जा रही है। दिल्ली के बड़े नौकरशाह भी सामंती शैली में जिंदगी जीने के आदी हो चुके थे। उन्हें मोदी सरकार ने काफी सबक सिखाया। बताया जा रहा है संयुक्त सचिव स्तर तक के बड़े आय.ए.एस. अफसरों तक को दतरों में समय पर आना पड़ रहा है। उन्हें भी टाईम पर अंगूठा लगाकर हाजरी देना पड़ती है। दो हजार उप सचिव स्तर के अफसरों की जांचें की जा चुकी हैं। उनमें से आधों को घर भेजा जाने वाला है। इनकम टैक्स के आला अफसरों की तरह जिन्हें पिछले दिनों ही सरकार ने जबरन सेवानिवृत्त कर घर भेज दिया गया। नोएडा में आई.टी. के एक कमिश्नर स्तर के अफसर पर भी बड़ी कार्यवाही मोदी सरकार ने की है व 123 भ्रष्ट अफसरों पर कार्यवाही हेतु सी.बी.सी. को रुकी हुई मंजूरी दी जाने वाली है। मध्य प्रदेश में भी आर्थिक अपराध शाखा कुछ बड़े मामलों में कार्यवाही करने जा रही है जो पिछले 15 सालों से कम्बल ओढ़कर घी पीने का काम कर रहे थे। उसमें पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति भी माने जा रहे हैं। कई मंत्रीगणों पर भी कार्यवाही की तलवार लटकी है।

स्वागत है इस युद्धाभ्यास का….
अजित वर्मा
पिछले एक दशक में हम लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि आने वाला समय साइबर स्पेस और अंतरिक्ष में लड़े जाने वाले युद्धों का है और भारत को इसकी तैयारी करने के साथ आर्टिफिशियल इण्टेलिजेन्स और डाटा नियंत्रण की दिशा में काम तेज करना चाहिए ताकि भारत किसी भी समय किसी भी चुनौती का सामना कर सके।
अब आये दिन जो खबरें आती हैं आश्वस्तिदायी और देश यह विश्वास कर सकता है कि हमारी सेना और वैज्ञानिक हर क्षेत्र में सक्रिय हैं। यह स्वागतेय है कि भारत ने अगले महीने पहली बार अंतरिक्ष युद्धाभ्यास करने की योजना बनाई है। इसका नाम रखा गया है ‘इंडस्पेसएक्स’। इस अभ्यास में सैन्य अधिकारी और वैज्ञानिक हिस्सा लेंगे। अंतरिक्ष का सैन्यीकरण हो रहा है। साथ ही साथ प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है। जुलाई के अंतिम हफ्ते में आयोजित होने वाले अभ्यास का मुख्य उद्देश्य भारत द्वारा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक अंतरिक्ष व अंतरिक्ष रोधी क्षमताओं का आकलन करना है। इससे हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा का आकलन भी होगा। भारत ने मार्च में एंटी-सैटेलाइट (ए-सैट) मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया था और हाल ही में ‘ट्राई सर्विस डिफेंस स्पेस एजंसीÓ की शुरुआत भी की है।
अधिकारिक रूप से कहा गया है कि भारत को स्पेस में विरोधियों पर निगरानी, संचार, मिसाइल की पूर्व चेतावनी और सटीक टारगेट लगाने जैसी चीजों की आवश्यकता है। इससे हमारे सशस्त्र बल की विश्वसनीयता बढ़ेगी और राष्ट्रीय सुरक्षा भी मजबूत होगी। ऐसे में ‘इंडस्पेसएक्स’ हमें अंतरिक्ष में रणनीतिक चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेगा, जिन्हें संभालने की आवश्यकता है।’
भारत के लिए एक चुनौतीपूर्ण स्थिति यह है कि चीन ने जनवरी 2007 में एक मौसम उपग्रह के खिलाफ ए-सैट मिसाइल का परीक्षण करने के बाद दोनों गतिज (प्रत्यक्ष चढ़ाई मिसाइलों सह-कक्षीय मार उपग्रहों) के साथ-साथ गैर गतिज के रूप में अंतरिक्ष में सैन्य क्षमताओं को विकसित किया है। चीन ने अंतरिक्ष में अमेरिका के वर्चस्व को चुनौती देने वाले अपने महत्वाकांक्षी कार्यक्रम (समंदर में एक जहाज से 7 सैटेलाइट छोडऩे) को हाल ही लांच किया है। चीन के इन अभियानों के मद्देनजर भारत के लिए ‘इंडस्पेसएक्स’ कार्यक्रम बेहद महत्वपूर्ण है।
भारत लंबे समय से स्थाई मजबूती से अंतरिक्ष कार्यक्रमों को अंजाम दे रहा है। इसके बावजूद वह चीन की संचार, नेविगेशन, पृथ्वी अवलोकन और अन्य उपग्रहों से मिलकर 100 से अधिक अंतरिक्ष यान मिशन की बराबरी नहीं कर पाया है। भारतीय सशस्त्र बल अब भी दो सैन्य उपग्रहों के अलावा, निगरानी, नेविगेशन और संचार उद्देश्यों के लिए बड़े पैमाने पर दोहरे उपयोग वाले रिमोट सेसिंग उपग्रह का उपयोग करते हैं।
हाल में भारत ने अंतरिक्ष में सैन्य अभियान की पहली की, जब मिशन शक्ति के तहत पृथ्वी की कक्षा में 283 कि.मी. की ऊंचाई पर 740 किलोग्राम की माइक्रोसेट-आर उपग्रह को नष्ट करने के लिए 19- टन की इंटरसेप्टर (छएड) 27 मार्च को छोड़ा गया।
भारत काउंटर-स्पेस क्षमताओं को विकसित करने के लिए काम कर रहा है, मसलन, निर्देशित ऊर्जा हथियार, लेजर, ईएमपी आदि। नई डिफेंस स्पेस एजंसी ने रक्षा इमेजरी प्रसंस्करण और विश्लेषण केंद्र (दिल्ली) और डिफेंस सेटेलाइट कंट्रोल सेंटर (भोपाल) को नया रूप देने का काम शुरू किया है।

एक देश-एक चुनाव; देश अहम् या राजनीति……?
ओमप्रकाश मेहता
एक प्रजातांत्रिक देश की धड़कन चुनाव है, चुनाव के बिना प्रजातंत्र नहीं और प्रजातंत्र नहीं तो चुनाव नहीं। चुनाव एक ऐसी संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसका निर्धारित समय पर पूरा होना जरूरी है। फिर उसका समय क्या हो? इसी पर आज जंग छिड़ी है, मोदी सरकार चाहती है कि देश में पंचायत से लेकर लोकसभा तक के सभी चुनाव एक साथ हो, इसके पीछे दलील यह दी जा रही है कि एक साथ चुनाव नहीं हो पाने के कारण प्रजातंत्र की गाड़ी रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है, चुनाव खर्चीले होते जा रहे है, सरकारें ठीक से काम नहीं कर पा रही, देश की प्रगति व कल्याण के कार्यों में बाधा उत्पन्न हो रही है और चुनावों के चक्कर में देश व सरकार का बहुमूल्य समय नष्ट हो रहा है, फिर चुनाव आयोग भी चुनाव की तैयारियों के अलावा कई महत्वपूर्ण दायित्वों पर ध्यान नहीं दे पा रहा है। इसलिए ऐसा कुछ होना चाहिए जिससे सभी चुनाव एक साथ हो, फिर इसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े?
भारत की आजादी के बाद 1952 में हुए पहले आम चुनाव के बाद अगले तीन आम चुनाव अर्थात् 1967 तक सभी चुनाव एक साथ ही हुए, किंतु 1987 अर्थात इंदिरा जी के सत्तारोहण के बाद यह परिपाटी बदल दी गई और संसद के साथ राज्य विधानसभाओं को भंग कर व राष्ट्रपति शासन लागू कर देश की अधिकांश विधानसभाओं के निर्धारित पांच साला कार्यकाल को गड़बड़ा दिया गया, और इस चलन का दुष्परिणाम आज पूरा देश भुगतने को मजबूर है।
यद्यपि इसमें कोई दो राय नहीं कि एक देश-एक चुनाव को लेकर सरकार द्वारा जो दलीलें दी जा रही है, वे गलत नहीं है जो लोकसभा चुनाव 2014 में 38 हजार करोड़ में सम्पन्न हुआ था, वह महज पांच सालों में दुगुना महंगा हो गया 2019 के लोकसभा चुनाव पर करीब साठ हजार करोड़ रूपया खर्च हुआ और चुनाव सात चरणों में होने के कारण ढाई महीने आचार संहिता लागू रही, जिससे केन्द्र व राज्य सरकारों के कई महत्वपूर्ण जन कल्याणकारी कार्य सम्पन्न नहीं हो पाए, किंतु यहां सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि जब देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के 2014 के चुनावी घोषणा-पत्र में एक देश-एक चुनाव का जिक्र था, तो फिर राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ लोकसभा के चुनाव क्यों नहीं कराए गए? महज दो-तीन महीनें बाद लोकसभा चुनाव होना थे तो इन तीन राज्यों के चुनावों को रोका जा सकता था?
…..फिर सबसे बड़ा सवाल यह कि अब इस महत्वपूर्ण मसले को तूल क्यों दी जा रही है, फिर फिलहाल तो केन्द्र सरकार अपने दम पर यह एक देश-एक चुनाव की योजना लागू कर नहीं सकती क्योंकि इसके लिए संविधान के पांच अनुच्छेद दो 83, 85, 124, 174 और 356 में संशोधन कर संसद से पारित करना पड़ेगा और इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जरूरी है, इसलिए फिलहाल यह संभव नजर नहीं आता, चाहे मोदी जी अपने आपकों कितना ही क्यों न बदल लें? जब तक समूचा प्रतिपक्ष इस मुद्दें पर सरकार के साथ नहीं आता, तब तक यह होना संभव नहीं है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, वह तो पहले ही अपने राजनीतिक प्रस्ताव में एक साथ चुनाव को गलत बता चुकी है, रही बात सपा-बसपा की, तो वे भी इसे अपने नजरियें से देखकर इस मुद्दें को उठाने की पहल को देश के अन्य ज्वलंत मुद्दों से ध्यान बांटने का प्रयास बता रहे है। जबकि कांग्रेस को आशंका है कि आज एक देश-एक चुनाव को मुद्दा बना रहे है, कल ‘एक देश-एक धर्म’ को मुद्दा बनाएगें। यद्यपि यह सही है कि यह मुद्दा मोदी जी या भाजपा का नया मुद्दा नहीं है, यह हमारे संविधान में वर्णित सबसे पुराने विचारों में से एक है, इसलिए इस मुद्दें को लेकर मोदी जी या भाजपा का कोई राजनीतिक स्वार्थ नजर नहीं आता, किंतु सबसे बड़ा सवाल यह है कि पिछले बावन सालों से बिगड़े इस चुनावी चलन को तत्कालीन शासकों ने इतनी विकृत स्थिति तक पहुंचा दिया है कि इस प्रजातंत्र व संविधान के अनुरूप स्वरूप प्रदान करने के लिए सरकार को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी, वह भी तभी जब प्रतिपक्षी दलों को भगवान सद्बुद्धि प्रदान करें। क्योंकि एक बार यदि प्रजातंत्र सही पटरी पर आ गया तो वह सभी के हित में होगा।
अब मोदी जी ने प्रतिपक्ष की महिमा को मंडित कर प्रयास तो शुरू किया है, देखियें अब आगे-आगे होता है क्या? वैसे यदि यह हो जाए तो वह देश व देशवासियों के हित में ही होगा।

प्रदूषण: लामबंद हो यूरोप के खिलाफ
अजित वर्मा
जलवायु परिवर्तन के मामले में वैश्विक समझौता अमल में न आने का दुष्प्रभाव भारत सहित न केवल समस्त हिमालयी देशों को वरन पूरे एशिया को भुगतना पड़ रहा है क्योंकि यूरोपीय देशों में तेजी से बढ़ रहे प्रदूषण का असर हिमालय पर्वतमाला पर भी पड़ रहा है। इस क्षेत्र में कार्बन की बढ़ती मात्रा चिंता पैदा कर रही है। बर्फ से ढकी हिमालय की वादियां इस प्रदूषण का तेजी से शिकार हो रही हैं और प्रदूषण का खतरनाक स्तर इन बर्फीली पर्वतमालाओं पर भी पहुँच गया है।
यूरोपीय देशों में प्रदूषण बहुत खतरनाक स्थिति में पहुँच चुका है। जिसके प्रभाव से पश्चिमी विक्षोभ के माध्यम से कार्बन की अत्यधिक मात्रा हिमालयी इलाकों में तेजी के साथ पहुंच रही है। वक्त रहते भारत और चीन सहित समस्त एशियाई देशों को यूरोप के विरुद्ध इस सवाल पर लामबन्द होकर दबाव बनाना चाहिए।
हिमालयी क्षेत्र से जिस तरह से कार्बन की मात्रा निरंतर बढ़ रही है, वह पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी है। तेजी के साथ बिगड़ते पर्यावरण के कारण दुनिया का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
हाल ही किये गए शोधों का निष्कर्ष है कि यूरोपीय देशों में बढ़ते प्रदूषण का प्रभाव तेजी के साथ हिमालयी देशों पर पड़ रहा है। पश्चिमी विक्षोभ के द्वारा बड़ी मात्रा में कार्बन हिमालयी इलाकों में बसे देशों में भी अपने पैर पसार रहा है। इसका प्रभाव हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र पर तेजी के साथ हो रहा है और हिमालय के वायु मंडल में कई परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में लगातार कार्बन की मात्रा बढ़ रही है। पहली बार वैज्ञानिकों ने उच्च हिमालयीन क्षेत्रों में कार्बन की बढ़ती मात्रा का अध्ययन किया है। इस क्षेत्र में कार्बन की मात्रा 0.1 से चार माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक मापी गई है। यदि उच्च हिमालयी इलाकों में कार्बन तथा अन्य गैसों की मात्रा तेजी के साथ बढ़ती रहेगी, तो इसका प्रभाव हिमालय के ग्लेशियरों पर भी अवश्य पड़ेगा, जिससे इस क्षेत्र के ग्लेशियर तेजी से पिघलेंगे और इन ग्लेशियरों का आकार भी घटेगा।
स्थितियां चेतावनी दे रही हैं कि पर्यावरण संरक्षण के लिए और अधिक संवेदनशील होने की आवश्यकता है। और पर्यावरण संरक्षण का काम केवल सरकारी तंत्र के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है।

सेवानिवृत्ति की आयु 58 वर्ष करने पर विचार
सनत जैन
बीएसएनएल के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति उम्र 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष करने पर सरकार बड़ी गंभीरता से विचार कर रही हैं। सरकार में जो विचार मंथन हो रहा है, उसके अनुसार बीएसएनएल के 1 लाख 76 हजार कर्मचारियों में से 50 फ़ीसदी कर्मचारी अगले 5 से 6 वर्षों में सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं। यदि उनकी आयु 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष कर दी जाती है, तो 3 से 4 साल के अंदर लगभग 85,000 अधिकारी कर्मचारी सेवानिवृत्त हो जाएंगे।
सरकारी क्षेत्र की दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल पिछले 3 वर्षों से लगातार घाटे में चल रही है। 2016-17 में 4793 करोड़, 2017-18 में 7992 करोड़ और 2018-19 में भी लगभग 7000 करोड़ रुपए के नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा है। बीएसएनएल के बढ़ते हुए घाटे को देखते हुए कंपनी, बीआरएस के माध्यम से 50 वर्ष की उम्र में तथा सेवानिवृत्त आयु 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। इसके लिए कंपनी को 6365 करोड़ रुपए वीआरएस में खर्च करने की जरूरत होगी। वित्त मंत्रालय ने इतनी बड़ी रकम वीआरएस में खर्च करने के स्थान पर और कोई उपाय सुझाने के लिए कहा था। इसके बाद कर्मचारियों की आयु 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष करने तथा वीआरएस के माध्यम से जो बोझ कंपनी पर पड़ने वाला था, वह कम हो जाएगा। बीएसएनएल में कुल कर्मचारियों और अधिकारियों की संख्या 176000 बताई जा रही है। सेवानिवृत्ति की आयु घटाने से केंद्र सरकार को फौरी तौर पर कोई मदद नहीं देनी पड़ेगी। अगले तीन-चार वर्षों में अधिकारियों और कर्मचारियों की संख्या अपने आप आधी हो जाएगी।
वीआरएस का लाभ देने पर प्रत्येक वर्ष के लिए सरकार को 35 दिन का वेतन और शेष वर्षों के लिए 25 दिन का वेतन दिया जाता है। सरकार 50 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके अधिकारियों कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति तथा वीआरएस योजना का लाभ लेकर नौकरी छोड़ने का विकल्प रखती है, ऐसी स्थिति में सरकार को लग रहा है, कि यदि सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष की जाती है। तो इसका अन्य कंपनियां विरोध कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार पुनरुद्धार योजना में सेवानिवृत्ति की उम्र घटाकर तथा बीएसएनल को परिसंपत्तियों की बिक्री कर राशि जुटाने का विकल्प कंपनी को देने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। बीएसएनएल जैसी एकाधिकार वाली कंपनी पिछले 3 वर्षों से लगातार घाटे में चल रही है। इसके पहले वर्षों में भी उसका मुनाफा तेजी के साथ घट रहा था। केंद्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की इस कंपनी को उबारने का कोई प्रयास नहीं किया। जिसके कारण बीएसएनएल की हालत बड़ी तेजी के साथ खस्ता होती चली गई। वही जिओ जैसी कंपनी ने बीएसएनएल के मार्केट में बड़ी तेजी के साथ कब्जा जमाते हुए, उसे आर्थिक रूप से इतना कमजोर कर दिया है। बी एस एन एल अपने कर्मचारियों और अधिकारियों को समय पर वेतन भी नहीं बांट पा रही हैं। दूरसंचार क्षेत्र की एकाधिकार वाली यह कंपनी यदि डूबती है, तो इसका असर अन्य कंपनियों पर भी पड़ना तय है, केंद्र सरकार को इस दिशा में काफी गंभीरता से सोच समझ कर निर्णय लेने की जरूरत है। बेरोजगारी और आर्थिक मंदी के इस दौर में विशेष रूप से, जब निजी क्षेत्र की टेलीकॉम कंपनियां भी आर्थिक दृष्टि से सरकार के ऊपर भार बन गई हैं। ऐसी स्थिति में सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। आशा है केंद्र सरकार बीएसएनल की कार्यप्रणाली को सुधारने और आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए बेहतर निर्णय लेगी।
शेयर बाजार में सूचीबद्ध 400 कंपनियां लापता
भारत में कंपनियों के माध्यम से किस तरह काला धन और भ्रष्टाचार का खेल होता है। इसका उदाहरण है, शेयर बाजार की 400 सूचीबद्ध कंपनियॉं जिनके बारे में सरकार एवं कंपनी मामलों के मंत्रालय और सेबी को कोई जानकारी नहीं है। निवेशकों का काफी बड़ा निवेश इन सूचीबद्ध कंपनियों में होता है। इसके अलावा सरकार की वित्तीय संस्थाएं भी कंपनियों में भारी निवेश करती हैं। उसके बाद यह कंपनियां यदि गायब हो जाती हैं, तो इससे बड़ी चिंता की कोई बात नहीं हो सकती हैं।
भारत के कंपनी रजिस्टर के पास करीब 11 लाख कंपनियां पंजीकृत हैं। इनमें से लगभग 5 लाख कंपनियां सक्रिय हैं। शेष छह लाख कंपनियां मुखौटा कंपनियों के रूप में उपयोग में आती हैं। जो कंपनियों के नाम पर काले धन का लेन-देन बेरोक-टोक करने का काम करते हैं। 2016 में नोटबंदी के बाद बड़ी तेजी के साथ मुखौटा कंपनियों पर कार्रवाई सरकार द्वारा की गई थी। जिसके कारण लाखों कंपनियां रातों-रात बंद हो गईं और लगभग 6000 कंपनियां एलएलपी में परिवर्तित हो गई। एलएलपी कंपनियों के लिए संसद ने सीमित दायित्व भागीदारी कानून 2008 में बनाया था। जिसमें प्रत्येक साझेदार का सीमित दायित्व निर्धारित होने की वैधता का नियम है। भागीदारों के अधिकार और दायित्व का निर्धारण उनके बीच हुए समझौते की शर्तों के आधार पर तय होता है।
नोटबंदी के बाद पहले चरण मैं सरकार ने 2 लाख 25 हजार कंपनियों के खिलाफ कार्यवाही की थी। इसमें कंपनियों के तीन लाख डायरेक्टर भी शामिल थे। इन कंपनियों का कारोबार जरूर बंद हो गया। किंतु किसी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। जिसके कारण कंपनियों का यह गोरखधंधा लगातार चल रहा है। 400 कंपनियां जो शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुई थी। उनका पैन कार्ड नहीं होना और उनका गायब हो जाना, इस बात का द्योतक है, कि भारत में कंपनियों के माध्यम से किस तरह कर चोरी और आम जनता के पैसों की बंदरबांट कंपनियों के माध्यम से की जा रही है। कंपनियों में सरकार की वित्तीय संस्थाओं का भी समय-समय पर भारी निवेश होता है। शेयर बाजार के आधार पर इसका निवेश होने से यदि यह कंपनियां गायब होती हैं , या घाटे में जाती हैं, या दिवालिया घोषित होती हैं, ऐसी दशा में सरकार के वित्तीय संस्थानों को भी अरबों खरबों रुपए का नुकसान उठाना पड़ता है। इसके साथ ही जिन लोगों ने बैंकों में अपने पैसे जमा कराए हैं, या कंपनियों पर सीधा निवेश किया है। उन सभी को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। केंद्र सरकार को इस दिशा में विशेष सजगता बरतनी होगी। अरबों खरबों रुपए के घोटाला करने वाले कंपनियों के कर्ताधर्ताओं के ऊपर कड़ी से कड़ी कार्रवाई करनी होगी। अन्यथा भारत का आर्थिक संकट और तेजी के साथ बढ़ेगा। इस पर नियंत्रण कर पाना सरकार की वश में भी नहीं होगा।

प्रश्न संविधान के मंदिर की मर्यादा का
निर्मल रानी
सत्रहवीं लोकसभा अस्तित्व में आ चुकी है। इस बार की लोकसभा में जहाँ कई नए चेहरे चुनाव जीत कर आए हैं वहीं कई अतिविवादित लोगों को भी देश की जनता ने निर्वाचित किया है। बहरहाल, जनभावनाओं का सम्मान करते हुए तथा निर्वाचन आयोग द्वारा लोकसभा को प्रेषित की गई निर्वाचित सांसदों की नई सूची के अनुसार पिछले दिनों नव निर्वाचित सांसदों ने शपथ ली। परन्तु अफ़सोस की बात यह है कि इस बार सांसदों का लोकसभा की सदस्यता ग्रहण करना जितना विवादित व शर्मनाक रहा उससे निश्चित रूप से देश के संविधान का मंदिर समझी जाने वाली भारतीय संसद अत्यंत शर्मिंदा हुई। सबसे पहला विवाद तो भोपाल से चुनी गई भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर की शपथ को लेकर हुआ जबकि उन्होंने अपना नाम प्रज्ञा सिंह ठाकुर लेने के बजाए संस्कृत में शपथ लेते हुए कुछ इन शब्दों में शपथ की शुरुआत की -‘मैं साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर स्वामी पूर्ण चेतनानंद अवधेशानंद गिरि लोकसभा सदस्य के रूप में शपथ लेती हूँ ‘ । प्रज्ञा सिंह ठाकुर द्वारा अपना उक्त पूरा नाम लिए जाने पर विपक्षी सदस्यों द्वारा टोका टाकी शुरू कर दी गई और उनके इस नाम का विरोध किया गया। विपक्षी सदस्य प्रज्ञा सिंह ठाकुर द्वारा अपने नाम के साथ अपने गुरु का नाम जोड़े जाने का विरोध कर रहे थे। जबकि लोकसभा के अधिकारियों ने उनसे अपने नाम के साथ अपने पिता का नाम जोड़ने का अनुरोध किया। ग़ौरतलब है कि मध्य प्रदेश के भिण्ड ज़िले में जन्मी प्रज्ञा ठाकुर के पिता का नाम सी पी ठाकुर है जबकि अवधेशानंद गिरि उनके अध्यात्मिक गुरु हैं।
लोकसभा में विवादों का सिलसिला यहीं नहीं थमा बल्कि इसके अगले दिन भी संविधान का यह मंदिर धर्म का अखाड़ा बनता दिखाई दिया। जिस संसद में केवल जयहिंद या भारत माता की जय के नारों की गूँज सुनाई देनी चाहिए थी अथवा अनुशासनात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो निर्वाचित माननीयों द्वारा केवल शपथ पत्र में दिए गए निर्धारित वाक्यों व शब्दों मात्र का ही उच्चारण किया जाना चाहिए। उसी संसद में राधे राधे , जय मां दुर्गा , जय श्री राम , अल्लाहु अकबर तथा हर हर महादेव के नारे सुनाई दिए। अफ़सोस की बात तो यह है कि संसद में इस प्रकार का उत्तेजनात्मक वातावरण पैदा करने वाले बेशर्म माननीयों को उस समय बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में राजनीतिज्ञों की असफलता का वह कुरूप चेहरा भी याद नहीं आया जिसने कि लगभग 150 मासूम बच्चों की जान ले ली। ऐसे सभी अनुशासनहीन सांसद देश के संविधान की धज्जियाँ उड़ाने में व्यस्त थे। कल्पना की जा सकती है कि जब शपथ ग्रहण के दौरान ही अर्थात संसद के पहले व दूसरे दिन ही इनके तेवर ऐसे हैं तो आने वाले पांच वर्षों में इनसे क्या उम्मीद की जानी चाहिए। शिकायत इस बात को लेकर भी है कि जिस समय माननीयों द्वारा शपथ ग्रहण के दौरान इस प्रकार की असंसदीय नारेबाज़ी की जा रही थी अर्थात अनुशासन की धज्जियाँ उड़ाई जा रही थीं उस समय लोकसभा के प्रोटेम स्पीकर भी असहाय दिखाई दे रहे थे तथा उनहोंने भी सदस्यों के इस असंसदीय व्यवहार की न तो आलोचना की न ही उनहोंने इसे रोकने का अनुरोध किया।
पश्चिम बंगाल में हुआ इस बार का लोकसभा चुनाव अन्य राज्यों के चुनाव की तुलना में सबसे अधिक विवादित व हिंसक रहा। भाजपा ने पश्चिम बंगाल में चुनाव को ऐसा रूप दे दिया था गोया भाजपा भगवान श्री राम की पक्षधर है और वहां की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस राम विरोधी है। भाजपा ने पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान भी न सिर्फ़ जय श्री राम के नारों का भरपूर प्रयोग किया बल्कि कई जगह अपने जुलूसों में भगवान राम व रामायण के विभिन्न पात्रों को भी भगवा वेश भूषा में प्रस्तुत किया। गोया पूरे चुनाव को धार्मिक रंग देने की कोशिश की गई। निश्चित रूप से इसी रणनीति के परिणामस्वरूप भाजपा को पश्चिम बंगाल में 18 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। जय श्री राम के नारों की गूंज संसद में उस समय भी बार बार सुनाई दे रही थी जबकि पश्चिम बंगाल के भाजपाई सांसद लोकसभा की सदस्य्ता की शपथ ले रहे थे। हुगली से भाजपा के सांसद लॉकेट चटर्जी ने तो शपथ लेने के बाद जय श्री राम , जय मां दुर्गा, जय माँ काली के भी जयकारे जय हिन्द व भारत माता की जय के साथ लगवा दिए। उधर गोरखपुर के निर्वाचित सांसद रवि किशन का नाम आते ही सदन हर-हर महादेव के नारों से गूंजने लगा. शपथ के बाद रविकिशन ने भी उत्साह में आकर हर-हर महादेव, जय पार्वती तथा गोरखनाथ की जय के नारे लगवाए. उसके बाद उन्होंने लोकसभा के सदस्यता रजिस्टर पर अपने हस्ताक्षर किये. यहां तक की सांसद हेमा मालिनी ने भी शपथ के अंत में राधे-राधे का जयघोष किया. पिछले लोकसभा में अनेक विवादित बयानों के लिए अपनी पहचान बनाने वाले साक्षी महाराज ने संस्कृत भाषा में शपथ ली और अंत में जय श्री राम का उद्घोष किया. परन्तु जब वे शपथ ले चुके, उस समय संसद में मंदिर वहीँ बनाएंगे के नारे भी गूंजने लगे.
जय श्री राम और वन्दे मातरम जैसे नारों की गूँज केवल उसी समय नहीं सुनाई दी जबकि कई भाजपाई सांसद शपथ ले रहे थे बल्कि यह जयकारे उस समय भी लगाए गए जबकि हैदराबाद के एम् आई एम् के सांसद असदुद्दीन ओवैसी का नाम शपथ लेने हेतु पुकारा गया। साफ़तौर से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि नशे में चूर नवनिर्वाचित सत्तारूढ़ सांसदों द्वारा विपक्षी सांसदों को छेड़ा या चिढ़ाया जा रहा हो । जैसे ही ओवैसी शपथ लेने के लिए आगे बढ़े, उसी समय संसद में जय श्री राम और वन्दे मातरम के नारे गूंजने लगे। देश की संसद को ‘धर्म संसद ‘ बनते देख ओवैसी भी स्वयं को विवादों से नहीं बचा सके। उन्होंने भी अल्लाहु अकबर का नारा लोकसभा में उछाल दिया। ओवैसी को देखकर जय श्री राम का नारा लगाने वालों से ओवैसी ने इशारों से और अधिक नारा लगाने के लिए भी कहा। परन्तु साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मुझे देखकर ही भाजपा के लोगों को जय श्री राम की याद आती है। यदि ऐसा है तो यह अच्छी बात है और मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं है। परन्तु अफ़सोस इस बात का है कि उन्हें बिहार में हुई बच्चों की मौत याद नहीं आ रही है। ऐसी ही स्थिति संभल से निर्वाचित सांसद शफ़ीक़ुर रहमान बर्क़ के शपथ के दौरान भी पैदा हुई। उन्होंने भारतीय संविधान को तो ज़िंदाबाद कहा परन्तु वन्दे मातरम कहने पर ऐतराज़ जताया। उनकी इस बात से असहमति जताते हुए सत्ताधारी भाजपा सदस्यों ने शेम शेम के नारे लगाए। केवल सोनिया गाँधी की शपथ के दौरान न केवल कांग्रेस सदस्यों बल्कि सत्ताधारी व विपक्षी समस्त सांसदों ने तालियां बजाकर सोनिया गाँधी द्वारा हिंदी में शपथ लिए जाने का ज़ोरदार स्वागत किया।
17 वीं लोकसभा की शुरुआत के पहले ही दिनों में जब माननीयों की अनुशासनहीनता के ऐसे रंग ढंग दिखाई दे रहे हों तो वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस सद्भावनापूर्ण अपील पर कितने खरे उतरेंगे जो उन्होंने संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद केंद्रीय कक्ष में दिए गए अपने पहले भाषण में की थी। देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया प्रज्ञा ठाकुर जैसी उस सांसद के निर्वाचन पर ही आश्चर्यचकित है जो कि ना केवल मालेगाँव बम ब्लास्ट की आरोपी रही हैं बल्कि शहीद हेमंत करकरे को श्राप दिए जाने तथा नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताये जाने जैसे अतिविवादित बयानों के लिए भी सुर्ख़ियों में रही हैं। आने वाले पांच वर्षों में यह सांसद देश के समक्ष अनुशासन की कैसी मिसाल पेश करेंगे, इसका ट्रेलर शुरुआती दिनों में ही देखा जा चुका है। निश्चित रूप से यदि यह माननीय इसी तरह बेलगाम रहे तो देश के संविधान के मंदिर की मर्यादा पर ज़रूर प्रश्न चिन्ह लग सकता है।

योग की उपयोगिता के प्रति सजग होता विश्व
डॉक्टर अरविन्द जैन
(21 जून अंतराष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष) स्वास्थ्य के प्रति जागरूक और सजग बनाने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र द्वारा योग को हर वर्ष २१ जून को अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मानने की घोसना की। 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा २१ जून को दिन विश्व योग दिवस घोषित किया गया। वैसे तो योग भारतीय संस्कृति की लिए नया नही हैं। ऋषि मुनियों के समय से ही योग क्रिया चली आ रही है लेकिन संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रति वर्ष २१ जून को विश्व योग दिवस घोषित करने से विश्व में योग के प्रति लोग ज़्यादा सजग, उत्साहित, और समर्पित हुए हैं
योग क्या है?
योग का शाब्दिक अर्थ होता है जोड़ना या बाँधना या एकता। शरीर, मन और भावनाओं को आपस में जोड़ने या बाँधने की कला को ही योग कहते हैं।
योग एक व्यायाम की क्रिया है जिससे एक इंसान को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक सकून प्राप्त होता है। योग करने के लिए किसी भी प्रकार के मशीनी औजार की ज़रूर नहीं पड़ती। योग कभी भी कहीं भी किया जा सकता है। प्रतिदिन योग करने से हर इंसान के शरीर को तरह की बीमारियों से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है। योग ना केवल इंसान को शारारिक मजबूती प्रदान करता है बल्कि मानसिक शक्ति भी प्राप्त होती है जो की आजकल की भागदौड़ वाली लाइफ स्टाइल के लिए बहुत ही ज़रूरी है। सुबह-सुबह रोजाना योग करने से शरीर स्वस्थ होता है और दिनभर शरीर में जोश और उत्साह रहता है।
योग के प्रकार
योग के 4 प्रमुख प्रकार हैं जो युगों से चले आ रहे हैं-
राज योग
कर्म योग
भक्ति योग
ज्ञान योग
योग करने का सही समय
वैसे तो योग कभी भी किया जा सकता है इसके लिए को फिक्स टाइम नही हैं लेकिन सुबह सूर्योदय से पहले एक से दो घंटे योग के लिए सबसे अच्छा समय माना गया है क्यूंकी उस समय हवा साफ और ताज़ा होती है और शरीर भी आरामदायक स्थिति में होता है। अगर सुबह आपके लिए योग करना मुमकिन ना हो तो सूर्यास्त के समय भी कर सकते हैं। लेकिन कुछ बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है-
प्रतिदिन योग का समय निर्धारित कर लें
योग मैट या दरी बिछा कर ही करें
योग खुली जगह जैसे पार्क या घर की छत में कर सकते हैं
योग की क्रियायें धीरे धीरे और आसान तरीके से शुरूवात करें
योग किसी एक्सपर्ट से ज़रूर सीखें या सलाह लें
साल २०१४ में अपने पहले भाषण के दौरान नरेन्द्र मोदी ने यू।एन। की आम सभा से कहा कि “भारतीय परंपरा का एक अनमोल उपहार है।” योग से विश्वभर में शांति का संदेश दिया जा सकता है। और योग आज के समय में विश्वभर के लोगों के लिए बहुत ही ज़रूरी है क्यूंकी योग शरीर और मान दोनो को आपस में जोड़ कर रखता है। जो की हर एक आदमी की आत्म शांति के लिए बहुत जरूरी है।
भारत सरकार की अनेकों कोशिशों के बाद साल 2014 की 11 दिसंबर तारीख को संयुक्त राष्ट्र आम सभा द्वारा हर वर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस या विश्व योग दिवस के रुप में पूरे विश्वभर में मानने की घोषणा की गयी। इस तरह 21 जून 2015 को पहली बार विश्व योग दिवस का आयोजन किया गया।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का उद्देश्य
योग के महत्व पूरी दुनिया ने जाने हैं और माने भी हैं। योग को मिले विश्वव्यापी पहचान के लिए इसकी सरलता है आसानी है। बिना खर्चे के स्वस्थ रहने का तरीका है योग। विश्व योग दिवस के अनेको उद्देश्य हैं-
योग विश्व शांति के लिए बहुत ही ज़रूरी है
योग स्वस्थ रहने का सबसे आसान और बिना खर्चे का तरीका है
योग द्वारा लोगों को प्रकृति से जोड़ना
योग शारारिक मजबूती और आत्मविश्वास के लिए ज़रूरी है
पूरे विश्व भर में स्वास्थ्य चुनौतीपूर्ण बीमारियों की दर को घटना
वैश्विक समन्वय और तालमेल के लिए
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस या विश्व योग दिवस के कारण योग सीखने वालों की माँग विश्वभर में बढ़ी है। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में योग टीचर्स की भारी माँग बढ़ी है और साल दर साल यह बढ़ती ही जाएगी। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में योग विषय पर क्लास चल रही हैं योग टीचर्स की नयी जॉब्स आ रही हैं। यह सब अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के कारण ही संभव हो सका है। योग आज हर किसी की लिए ज़रूरी हो गया है। हर किसी के लिए जिम जाना आसान नही हैं। भागदौड़ की इस लाइफ स्टाइल के कारण हर किसी के पास समय नहीं है की वो रोज जिम के लिए समय निकल सके। इसलिए लोग योग को आसानी से आपना रहे हैं क्यूँ की योग कहीं भी किया जा सकता है वो भी बिना किसी खर्चे के। योग सबसे आसान और किफायती तरीका है अपनेआप को फिट और आत्मविश्वास रखने का।
योग ,साधना, भजन, ध्यान ,पूजा पाठ,व्यायाम में मात्र आपको समय देना पड़ता हैं और अन्य कोई लागत नहीं लगती ।इसके लिए नियमितता जरुरी हैं और एक बार रूचि होने पर आनंद की अनुभूति होना शुरू हो जाती हैं ।
योग एक प्रकार से अनुशासित जीवन जीने की कला हैं इसके माध्यम से हम तन मन विचारों में एकाग्रता आने से सुखद अनुभूति होती हैं ।बस इससे जुड़ने भर की देरी हैं ।

बदले-बदले मेरे ‘सरकार’ नज़र आते है…?
ओमप्रकाश मेहता
प्रचंड बहुमत से देश में फिर से अपनी सरकार बनाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी में भी अचानक भारी परिवर्तन सा नजर आने लगा है, मोदी जी की बदली हुई चाल, परिवर्तन चरित्र और विनम्र चेहरा देखकर आज हर कोई आश्चर्यचकित है, अपनी हठ, जिद और अहम् के लिए प्रसिद्ध हो चुके नरेन्द्र भाई में आया यह अचानक परिवर्तन हर किसी को विस्मित कर रहा है, किंतु देश की यह आम धारणा है कि मोदी जी अब देश के सच्चे प्रथम सेवक की भूमिका अख्तियार करने का प्रयास कर रहे है और अपने पांच साल के शासनकाल के खट्टे-मीठे अनुभवों के आधार पर अब उन्होंने जहां अपने अगले पांच साल के शासनकाल में देश का नया इतिहास लिखने की ठान ली है, वहीं वे अपने आप को बदलने का भी प्रयास कर रहे है, ऐसा लगता है कि वे अब सब को साथ लेकर ‘न्यू इण्डिया’ के अपने सपने को साकार करना चाहते है, जिसकी शुरूआत उन्होंने ‘‘निन्दक नीयरे राखिये’’ के मंत्र को अपनाकर, और इसी शुद्ध भावना के तहत् उन्होंने संसद का पहला सत्र शुरू होने से पहले विपक्ष की महिमा को मंडित करने का प्रयास किया और यह स्वीकार किया कि विपक्ष का एक-एक शब्द हमारे लिए मूल्यवान है, विपक्ष को नम्बर की चिंता छोड़ सरकार के साथ एकजुट होकर देश को बदलने की दिशा में हाथ बंटाना चाहिए, उन्होंने कहा विपक्ष का अपना महत्व है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। इस प्रकार संसद के पहले सत्र के पहले ही दिन मोदी ने बिना किसी स्वार्थ के जो प्रतिपक्ष की तरफ सहयोग का हाथ बढ़ाया, वह प्रशंसनीय है, यदि अगले पांच साल अपनी सरकार के साथ प्रतिपक्ष की भी मोदी ने इतनी ही चिंता की तो यह देश पूरे विश्व में प्रजातंत्री देशों का सरताज बन सकता है।
मोदी जी अपने पिछले पांच साला कार्यकाल में अपने देशहित के सपनों को साकार रूप इसलिए नहीं दे पाए थे, क्योंकि राज्यसभा (ऊपरी सदन) में उन्हें बहुमत हासिल नहीं था और कोई भी विधेयक या संविधान संशोधन प्रस्ताव दोनों सदनों से पारित होने के बाद ही मूर्तरूप गृहण करता है, किंतु इस बार तो राज्यसभा में भी बदली हुई स्थितियां है और अगले कुछ दिनों में होने वाले कुछ सीटों के चुनाव के बाद राज्यसभा में भी मोदी जी की स्थिति मजबूत हो जाएगी, इसलिए वे चाहते तो बिना प्रतिपक्ष की परवाह किए कोई भी विधेयक या संशोधन पारित करवा सकते थे, किंतु मोदी जी ने उपलब्धियों के फलों से लदे और झुके वृक्ष की भूमिका अदा कर प्रतिपक्ष को वृक्ष की छांव में आकर मीठे फलों का स्वाद चखने का आमंत्रण दिया, यह उनके बदले हुए व्यक्तित्व का साक्षात स्वरूप है।
अब मोदी जी अपने अगले पांच साल के कार्यकाल के लिए एक महान सपना संजोये हुए है, जिसमें देश को हर क्षेत्र में सर्वोच्च शिखर पर ले जाने का सपना है और इसमें प्रतिपक्ष भी सहभागी बने इसी आकांक्षा से मोदी ने प्रतिपक्ष को अपने साथ आने का निमंत्रण दिया है, जिससे कि इस पुनीत कार्य में सभी की अहम् भूमिका के साथ सहयोग प्राप्त हो सके। यदि बिखरे हुए प्रतिपक्ष ने मोदी जी के आमंत्रण को राजनीतिक चाल न समझ गंभीरता से लेकर मोदी जी को सहयोग करने का देशहित में संकल्प लिया तो यह देश के पिछले सत्तर साल के इतिहास की महत्वपूर्ण मिसाल बनकर सामने आएगा और पूरे विश्व के देश इसे एक अनुकरणीय पहल मानकर उसका अनुकरण करेंगे। यद्यपि मोदी जी ने यह भी कहा है कि प्रतिपक्ष का एक-एक शब्द उनके लिए मूल्यवान है, यदि मोदी जी ने अपने हर देशहित के कदम से पहले उसके बारे में प्रतिपक्ष को साथ लेकर उसकी सलाह को महत्व दिया तो वह प्रतिपक्ष के लिए हौंसला अफजाई होगा। क्योंकि मोदी जी के सामने तीन तलाक, देश में एक साथ चुनाव, आंतरिक व बाहरी चुनौतियां जैसे कई अहम् मुद्दे है, साथ ही ‘न्यू इण्डिया’ के सपने को साकार करने की भी चुनौति है, ऐसे में यदि प्रतिपक्ष का पूर्ण सकारात्मक सहयोग उन्हें प्राप्त हो जाता है तो फिर ये चुनौतियां अपने-आप खत्म हो जाती है, इसलिए अब प्रतिपक्ष से यह दरकार है कि वह देश को नया स्वरूप प्रदान करने की दिशा में मोदी जी को अपना अमूल्य योगदान प्रदान करें।

भूमिगत जल का गिरता स्तर-कारण क्या हैं?
डॉ अरविंद जैन
तेजी से बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता औद्योगिकीकरण, फैलते शहरीकरण के अलावा ग्लोबल वार्मिंग से उत्पन्न जलवायु परिवर्तन भी इसके लिये जिम्मेदार हैं। सन 1901 में हुई प्रथम जनगणना के समय भारत की जनसंख्या 23.8 करोड़ थी जो सन 1947 यानी स्वतंत्रता प्राप्ति के समय बढ़कर 400 करोड़ हो गई। सन 2001 में भारत की जनसंख्या 103 करोड़ थी। इस समय देश की जनसंख्या 130 करोड़ (1.30 अरब) है। एक अनुमान के अनुसार सन 2025 तक भारत की जनसंख्या 139 करोड़ तथा सन 2050 तक 165 करोड़ तक पहुँच जाएगी। इस बढ़ती जनसंख्या का पेयजल खासकर भूमिगत जल पर जबर्दस्त दबाव पड़ेगा। बढ़ती आबादी के कारण जहाँ जल की आवश्यकता बढ़ी है वहीं प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता भी समय के साथ कम होती जा रही है। कुल आकलनों के अनुसार सन 2000 में जल की आवश्यकता 750 अरब घन मीटर (घन किलोमीटर) यानी 750 जीसीएम (मिलियन क्यूबिक मीटर) थी। सन 2025 तक जल की यह आवश्यकता 1050 जीसीएस तथा सन 2050 तक 1180 बीसीएम तक बढ़ जाएगी। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश में प्रति व्यक्ति जल की औसत उपलब्धता 5000 घन मीटर प्रति वर्ष थी। सन 2000 में यह घटकर 2000 घन मीटर प्रतिवर्ष रह गई। सन 2050 तक प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 1000 घन मीटर प्रतिवर्ष से भी कम हो जाने की सम्भावना है।
स्पष्ट है कि बढ़ती जनसंख्या के कारण जल की उपलब्धता कम हो जाने के चलते भूमिगत जल पर भी दबाव बढ़ा जिसका परिणाम इसके गिरते स्तर के रूप में सामने आया।
बढ़ते औद्योगिकीकरण तथा गाँवों से शहरों की ओर तेजी से पलायन तथा फैलते शहरीकरण ने भी अन्य जलस्रोतों के साथ भूमिगत जलस्रोत पर भी दबाव उत्पन्न किया है। भूमिगत जल-स्तर के तेजी से गिरने के पीछे ये सभी कारक भी जिम्मेदार रहे हैं।
जल प्रदूषण की समस्या ने बोतलबन्द जल की संस्कृति को जन्म दिया। बोतलबन्द जल बेचने वाली कम्पनियाँ भूमिगत जल का जमकर दोहन करती हैं। नतीजतन, भूजल-स्तर में गिरावट आती है। गौरतलब है कि भारत बोतलबन्द पानी का दसवाँ बड़ा उपभोक्ता है। हमारे देश में प्रति व्यक्ति बोतलबन्द पानी की खपत पाँच लीटर सालाना है जबकि वैश्विक औसत 24 है। देश में सन 2013 तक बोतलबन्द जल का कारोबार 60 अरब रुपये था। सन 2018 तक इसके 160 अरब हो जाने का अनुमान है।
पहले तालाब बहुत होते थे जिनकी परम्परा अब लगभग समाप्त हो चुकी है। इन तालाबों का जल भूगर्भ में समाहित होकर भूजल को संवर्द्धित करने का कार्य करता था। लेकिन, बदलते समय के साथ लोगों में भूमि और धन-सम्पत्ति के प्रति लालच बढ़ा जिसने तालाबों को नष्ट करने का काम किया। वैसे वर्षा का क्रम बिगड़ने से भी काफी तालाब सूख गए। रही-सही कसर भू-माफियाओं ने पूरी कर दी। उन्होंने तालाबों को पाटकर उन पर बड़े-बड़े भवन खड़े कर दिए अथवा कृषिफार्म बना डाले।
धरातल से विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जल के भूगर्भ में पहुँचने के कारण ही भूजल की सृष्टि होती है। इन स्रोतों में एक है वर्षा का जल जो पाराम्य शैलों से होकर रिस-रिसकर अन्दर पहुँचता है। शैल रंध्रों में भी जल एकत्रित होता है। जब कोई शैल पूर्णतया जल से भर जाती है तो उसे संतृप्त शैल कहते हैं। शैल रंध्रों के बन्द हो जाने से जल रिसकर नीचे नहीं जा पाता है। इस प्रकार जल नीचे न रिसने के कारण जल एकत्रित हो जाता है।यही एकत्रित जल जलभृत यानी एक्विफर कहलाता है।

दोषी प्रकृति या हम?
योगेश कुमार गोयल
तापमान में बढ़ोतरी के इस बार सारे रिकॉर्ड टूट रहे हैं। दिल्ली में जहां पारे ने सारे रिकार्ड तोड़ते हुए 48 डिग्री तापमान के आंकड़े को भी पार कर लिया है, वहीं चुरू सहित राजस्थान के कुछ इलाकों में तापमान कुछ दिन पहले ही 50 डिग्री के पार जा चुका है और श्रीगंगानगर में भी भीषण गर्मी का 75 साल का रिकॉर्ड टूट गया है, दूसरी ओर पहाड़ भी बुरी तरह तप रहे हैं। मैदानी इलाकों से इतर पहाड़ी इलाकों की बात करें तो शिमला, मसूरी जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में भी तापमान सामान्य से चार डिग्री अधिक दर्ज किया गया है। मौसम विभाग द्वारा कुछ दिन पहले ही हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र इत्यादि राज्यों में रेडअलर्ट जबकि हिमाचल तथा उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्यों में यैलोअलर्ट जारी किया गया था। उल्लेखनीय है कि यैलोअलर्ट में लू का पूर्वानुमान जारी किया जाता है जबकि रेडअलर्ट तापमान में सामान्य से चार डिग्री तक बढ़ोतरी होने पर जारी किया जाता है। लू तथा भीषण गर्मी के कहर से देशभर में कई दर्जन लोग प्राण गंवा चुके हैं।
एक ओर जहां इस समय देशभर के अनेक मैदानी और पर्वतीय इलाके भीषण गर्मी से झुलस रहे हैं, वहीं कुछ ही दिनों पहले मई माह में ही शिमला, मनाली, रोहतांग, लाहौलस्पीति सहित ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बारिश और बर्फबारी ने दिसम्बर-जनवरी जैसी शीतलहर पैदा कर दी थी। हिमाचल की अधिकांश पर्वत श्रृंखलाएं तब बर्फ की सफेद चादर से ढ़क गई थी और प्रदेश के कई इलाकों में लोग ठंड से कांपने लगे थे। दूसरी ओर दिल्ली सहित आसपास के इलाकों में भी गत 17 मई को बारिश के साथ हुई ओलावृष्टि ने हर किसी को चौंका दिया था। मई-जून में दिल्ली सहित उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में आंधी-तूफान के बाद हल्की बारिश होना सामान्य बात है किन्तु इस मौसम में एकाएक ओलावृष्टि शुरू हो जाना और फिर चंद ही दिनों बाद आसमान से आग का बरसना निश्चित रूप से पर्यावरण के बिगड़ते मिजाज और मौसम चक्र में बदलाव का स्पष्ट संकेत है। स्मरणीय रहे कि इसी साल अप्रैल माह के तीसरे सप्ताह में भी देश के कुछ राज्यों में तेज आंधी और बारिश के रूप में प्रकृति ने कहर बरपाया था। ऐसे में पिछले कुछ समय से मौसम के तेजी से बिगड़ते मिजाज के मद्देनजर इन परिस्थितियों की अनदेखी करना उचित नहीं।
हर साल गर्मी के दिनों में मौसम में थोड़ा बदलाव देखा जाना कोई नई बात नहीं है किन्तु मौसम के बदलाव ने अप्रैल माह के पहले ही पखवाड़े में ही जिस प्रकार करवटें बदलकर देखते ही देखते कई दर्जन लोगों की बलि ले ली, उसके कुछ दिनों बाद पर्वतीय इलाकों में एकाएक ठंड का प्रकोप देखा गया और अब भीषण गर्मी का कहर बरप रहा है, आसमान से आग बरस रही है, यह सब मौसम के बिगड़ते मिजाज का स्पष्ट संकेत है। मैदानी इलाकों के पर्यावरण को तो हमने अपनी करतूतों से कहीं का नहीं छोड़ा और अब पर्वतीय इलाकों के पर्यावरण से हम किस कदर खिलवाड़ कर रहे हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण पहाड़ों में बढ़ती पर्यटकों की बेतहाशा भीड़ है, जिसके चलते हाल ही में शिमला, मसूरी जैसे पर्वतीय इलाकों में भी कई-कई घंटों तक कई किलोमीटर लंबा ट्रैफिक जाम का आलम देखा गया।
वर्ष दर वर्ष अब जिस प्रकार मौसम के बिगड़ते मिजाज के चलते समय-समय पर तबाही देखने को मिल रही है, ऐसे में हमें अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि मौसम चक्र के बदलाव के चलते प्रकृति संतुलन पर जो विपरीत प्रभाव पड़ रहा है, उसकी अनदेखी के कितने भयावह परिणाम होंगे। हमें यह भी समझ लेना होगा कि यह सब प्रकृति के साथ बड़े पैमाने पर हो रही मानवीय छेड़छाड़ का ही दुष्परिणाम है। विड़म्बना है कि हम यह समझना ही नहीं चाहते कि मनुष्य प्रकृति की गोद में एक अबोध शिशु के समान है किन्तु आधुनिकता की अंधी दौड़ में वह स्वयं को प्रकृति का स्वामी समझने की भूल कर बैठा है और मानवीय गतिविधियों के चलते प्रकृति के बुरी तरह से दोहन का नतीजा बार-बार प्रकृति के प्रचण्ड प्रकोप के रूप में हमारे सामने आता रहा है।
न सिर्फ भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर तापमान में निरन्तर हो रही बढ़ोतरी और मौसम का लगातार बिगड़ता मिजाज गहन चिंता का विषय बना है। हालांकि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पिछले कुछ वर्षों में दुनियाभर में दोहा, कोपेनहेगन, कानकुन इत्यादि बड़े-बड़े अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन होते रहे हैं और वर्ष 2015 में पेरिस सम्मेलन में तो 197 देशों ने सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए अपने-अपने देश में कार्बन उत्सर्जन कम करने और 2030 तक वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री तक सीमित करने का संकल्प लिया था किन्तु उसके बावजूद इस दिशा में अभी तक कोई ठोस कदम उठते नहीं देखे गए हैं। दरअसल वास्तविकता यही है कि राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर प्रकृति के बिगड़ते मिजाज को लेकर चर्चाएं और चिंताएं तो बहुत होती हैं, तरह-तरह के संकल्प भी दोहराये जाते हैं किन्तु सुख-संसाधनों की अंधी चाहत, सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि, अनियंत्रित औद्योगिक विकास और रोजगार के अधिकाधिक अवसर पैदा करने के दबाव के चलते इस तरह की चर्चाएं और चिंताएं अर्थहीन होकर रह जाती हैं।
मौसम चक्र में बदलाव का आलम यह है कि वर्षा ऋतु में आसमान में बादलों का नामोनिशान तक नजर नहीं आता, वहीं वसंत ऋतु में बादल झमाझम बरसने लगते हैं, सर्दियों में मौसम एकाएक गर्म हो उठता है और गर्मियों में अचानक पारा लुढ़क जाता है। अचानक ज्यादा बारिश होना या एकाएक ज्यादा सर्दी या गर्मी पड़ना और फिर तूफान आना, पिछले कुछ समय से जलवायु परिवर्तन के ये भयावह खतरे बार-बार सामने आ रहे हैं और मौसम वैज्ञानिक स्वीकारने भी लगे हैं कि इस तरह की घटनाएं आने वाले समय में और भी जल्दी-जल्दी विकराल रूप में सामने आ सकती हैं। हालांकि प्रकृति बार-बार मौसम चक्र में बदलाव के संकेत, चेतावनी तथा संभलने का अवसर देती रही है लेकिन हम आदतन किसी बड़े खतरे के सामने आने तक ऐसे संकेतों या चेतावनियों को नजरअंदाज करते रहे हैं, जिसका नतीजा अक्सर भारी तबाही के रूप में सामने आता रहा है। पर्यावरण प्रदूषण के कारण पिछले तीन दशकों से जिस प्रकार मौसम चक्र तीव्र गति से बदल रहा है और प्राकृतिक आपदाओं का आकस्मिक सिलसिला तेज हुआ है, उसके बावजूद अगर हम नहीं संभलना चाहते तो इसमें भला प्रकृति का क्या दोष?
अगर पिछले वर्ष इन्हीं दिनों में प्रकृति के कहर को याद करें तो एक दर्जन से भी अधिक राज्यों में कुछ ही दिनों के भीतर प्रचण्ड धूल भरी आंधियों, बेमौसम बर्फबारी, ओलावृष्टि, बादलों का फटना, भारी बारिश और आसमान से गिरती बिजली ने सैंकड़ों जिंदगियां लील ली थी, हजारों लोग घायल हुए थे, हजारों मकान बुरी तरह ध्वस्त हुए थे, हजारों मवेशी मारे गए थे और अरबों रुपये की चल-अचल सम्पत्ति तथा फसलें तबाह हुई थी। बदरीनाथ-केदारनाथ में बेमौसम बर्फबारी ने हर किसी को आश्चर्यचकित कर दिया था। हिमाचल के शिमला, मनाली, रोहतांग सहित कई इलाके गर्मी के मौसम में भी बर्फ की सफेद चादर से ढ़क गए थे और जम्मू कश्मीर में बेमौसम बर्फबारी से कई इलाके एकाएक सर्दी की चपेट में आने से स्थिति विकराल हो गई थी। देश के इतिहास में पहली बार देखा गया था, जब करीब दो दर्जन राज्यों में बार-बार तूफान की आशंका के मद्देनजरअलर्ट जारी किए जाते रहे। मानसून जाते-जाते केरल सहित कुछ पहाड़ी राज्यों में भी विकराल बाढ़ के रूप में जिस तरह की भयानक तबाही मचा गया था, उसके स्मरण मात्र से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
कुछ साल पहले तक पहाड़ी इलाकों का ठंडा वातावरण हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करता था किन्तु पर्वतीय क्षेत्रों में यातायात के साधनों से बढ़ते प्रदूषण, बड़े-बड़े उद्योग स्थापित करने और राजमार्ग बनाने के नाम पर बड़े पैमाने पर वनों के दोहन और सुरंगें बनाने के लिए बेदर्दी से पहाड़ों का सीना चीरते जाने का ही दुष्परिणाम है कि हमारे इन खूबसूरत पहाड़ों की ठंडक भी धीरे-धीरे कम हो रही है। स्थिति इतनी बदतर होती जा रही है कि अब हिमाचल की धर्मशाला, सोलन व शिमला जैसी हसीन वादियों और यहां तक कि जम्मू कश्मीर में कटरा जैसे ठंडे माने जाते रहे स्थानों पर भी पंखों, कूलरों व ए.सी. की जरूरत महसूस की जाने लगी है। पहाड़ों में बढ़ती इसी गर्माहट के चलते हमें अक्सर घने वनों में भयानक आग लगने की खबरें भी सुनने को मिलती रहती हैं। पहाड़ों की इसी गर्माहट का सीधा असर निचले मैदानी इलाकों पर पड़ता है, जहां का पारा अब हर वर्ष बढ़ता जा रहा है।
मानवीय करतूतों के चलते वायुमंडल में कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन, ओजोन और पार्टिक्यूलेटमैटर के प्रदूषण का मिश्रण इतने खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है कि हमें सांस के जरिये असाध्य बीमारियों की सौगात मिल रही है। सीवरेज की गंदगी स्वच्छ जल स्रोतों में छोड़ने की बात हो या औद्योगिक इकाईयों का अम्लीय कचरा नदियों में बहाने की अथवा सड़कों पर रेंगती वाहनों की लंबी-लंबी कतारों से वायुमंडल में घुलते जहर की या फिर सख्त अदालती निर्देशों के बावजूद खेतों में जलती पराली से हवा में घुलते हजारों-लाखों टन धुएं की, हमारी आंखें तब तक नहीं खुलती, जब तक प्रकृति का बड़ा कहर हम पर नहीं टूट पड़ता। अधिकांश राज्यों में सीवेजट्रीटमेंट और कचरा प्रबंधन की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। पैट्रोल, डीजल से उत्पन्न होने वाले धुएं ने वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड तथा ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है। पेड़-पौधे कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित कर पर्यावरण संतुलन बनाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं लेकिन पिछले कुछ दशकों में वन-क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर दिया गया है। ब्रिटेन के प्रख्यात भौतिक शास्त्री स्टीफनहॉकिंग ने कहा था कि यदि मानव जाति की जनसंख्या इसी कदर बढ़ती रही और ऊर्जा की खपत दिन-प्रतिदिन इसी प्रकार होती रही तो करीब छह सौ वर्षों बाद पृथ्वी आग का गोला बनकर रह जाएगी। धरती का तापमान बढ़ते जाने का ही दुष्परिणाम है कि ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ पिघल रही है, जिससे समुद्रों का जलस्तर बढ़ने के कारण दुनिया के कई शहरों के जलमग्न होने की आशंका जताई जाने लगी है।
प्रकृति बार-बार अपना रौद्र रूप दिखाकर हमें स्पष्ट चेतावनी देती रही है कि अगर हमने उसके साथ अंधाधुंध खिलवाड़ बंद नहीं किया तो उसके कितने घातक परिणाम होंगे लेकिन विड़म्बना है कि अब लगातार प्रकृति का प्रचण्ड रूप देखते रहने के बावजूद हम हर बार प्रकृति की इन चेतावनियों को नजरअंदाज कर खुद अपने विनाश को आमंत्रित कर रहे हैं। हम यह समझना ही नहीं चाहते कि पहाड़ों का सीना चीरकर हरे-भरे जंगलों को तबाह कर हम जो कंक्रीटके जंगल विकसित कर रहे हैं, वह वास्तव में विकास नहीं है बल्कि विकास के नाम पर हम अपने ही विनाश का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। हम हैं कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के नाम पर वैश्विक चिंता व्यक्त करने से आगे शायद कुछ करना ही नहीं चाहते। प्रकृति कभी समुद्री तूफान तो कभी भूकम्प, कभी सूखा तो कभी अकाल के रूप में अपना विकराल रूप दिखाकर हमें बारम्बार चेतावनी देती रही है कि हम यदि इसी प्रकार प्रकृति के संसाधनों का बुरे तरीके से दोहन करते रहे तो हमारे भविष्य की तस्वीर कैसी होने वाली है।

हीरा जनम अनमोल था, कौड़ी बदले जाये
प्रदीप कुमार सिंह
(17 जून कबीर जयन्ती पर विशेष) आज समाज, देश और विश्व के देशों में बढ़ती हुई भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी, स्वार्थलोलुपता, अनेकता आदि समस्याओं से सारी मानवजाति चिंतित है। वास्तव में ये ऐसी मूलभूत समस्यायें हैं जिनसे निकल कर ही हत्या, लूट, मार-काट, आतंकवाद, धार्मिक विद्वेष, युद्धों की विभीषिका आदि समस्याओं ने जन्म लिया है। इस प्रकार आज इन समस्याओं ने पूरे विश्व की मानवजाति को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। ऐसी भयावह परिस्थिति में समाज को सही राह दिखाने के लिए आज कबीर दास जी जैसे युग प्रवर्तक की आवश्यकता है। कबीरदास जी ने समाज में व्याप्त भेदभाव को समाप्त करने पर बल देते हुए कहा था कि ‘‘वही महादेव वही मुहम्मद ब्रह्मा आदम कहिए। कोई हिंदू कोई तुर्क कहांव एक जमीं पर रहिए।’’ कबीरदास जी एक महान समाज सुधारक थे। उन्होंने अपने युग में व्याप्त सामाजिक अंधविश्वासों, कुरीतियों और रूढ़िवादिता का विरोध किया। उनका उद्देश्य विषमताग्रस्त समाज में जागृति पैदा कर लोगों को भक्ति का नया मार्ग दिखाना था, जिसमें वे काफी हद तक सफल भी हुए। कबीर दास जी ने कहा था कि ‘‘बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो हितय ढूंढो आपनो, मुझसा बुरा न कोय।।’’
कबीर दास जी कहते हैं कि मनुष्य जीवन तो अनमोल है इसलिए हमें अपने मानव जीवन को भोग-विलास में व्यतीत नहीं करना चाहिए बल्कि हमें अपने अच्छे कर्मों के द्वारा अपने जीवन को उद्देश्यमय बनाना चाहिए। कबीर दास जी कहते हैं कि ‘‘रात गंवाई सोय कर, दिवस गवायों खाय। हीरा जनम अनमोल था, कौड़ी बदले जाये।। अर्थात् मानव जीवन तो अनमोल होता है किन्तु मनुष्य ने सारी रात तो सोने में गंवा दी और सारा दिन खाने-पीने में बिता दिया। इस प्रकार अज्ञानता में मनुष्य अपने अनमोल जीवन को भोग-विलास में गंवा कर कौड़ी के भाव खत्म कर लेता है। कबीर दास जी कहते हैं कि ‘‘पानी मेरा बुदबुदा, इस मानुष की जात। देखत ही छिप जायेंगे, ज्यौं तारा परभात।।’’ अर्थात् मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले के समान है, जो थोड़ी सी हवा लगते ही फूट जाता है। जैसे सुबह होते ही रात में निकलने वाले तारे छिप जाते हैं, वैसे ही मृत्यु के आगमन पर परमात्मा द्वारा दिया गया यह जीवन समाप्त हो जाता है। इसलिए हमें अपने मानव जीवन के उद्देश्य को जानकर उनको पूरा करने का हरसंभव प्रयत्न करना चाहिए।
आज भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ का मूल मंत्र संसार से लुप्त होता जा रहा है। कहीं हिंदू, कहीं मुसलमान, कहीं ईसाई, कहीं पारसी और न जाने कितनी कौमों के लबादे ओढ़े आदमी की शक्ल के लाखों, करोड़ों लोगों की भीड़ दिखाई दे रही है। गौर से देखने पर ऐसा लगता है कि जैसे इस भीड़ में आदमी तो नजर आ रहे हैं पर आदमियत कहीं खो गई है। शक्ल सूरत तो इंसान जैसी है, मगर कारनामे शैतान जैसे होते जा रहे हैं, जबकि मानव शरीर तो नश्वर है इसे एक न एक दिन मिट्टी में मिल ही जाना है। इसलिए हमें अपने शरीर पर कभी अभिमान नहीं करना चाहिए। कबीर दास जी कहते हैं कि ‘‘माटी कहै कुम्हार को, क्या तू रौंदे मोहि। एक दिन ऐसा होयगा, मैं रौदँूगी तोहि।’’ अर्थात् मिट्टी कुम्हार से कहती है कि समय परिवर्तनशील है और एक दिन ऐसा भी आयेगा जब तेरी मृत्यु के पश्चात् मैं तुझे रौंदूगी। इसलिए हमें परमपिता परमात्मा द्वारा दिये गये शरीर पर अभिमान न करते हुए इस जगत् में रहते हुए मानव हित का अधिक से अधिक काम करना चाहिए।
कबीर तो सच्चे अर्थों में मानवतावादी थे। उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के बीच मानवता का सेतु बांधा। जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे। कबीरदास ने हिन्दू-मुसलमान का भेद मिटाकर हिन्दू भक्तों तथा मुसलमान फकीरों का सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों को हृदयांगम कर लिया। कबीरदास जी एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। वे भेदभाव रहित समाज की स्थापनाा करना चाहते थे। उन्होंने ब्रह्म के निराकार रूप में विश्वास प्रकट किया। वे हर स्तर पर सामाजिक विसंगतियों के विरूद्ध लड़ते रहे और सभी धर्मों के खिलाफ बोलते भी रहे। जैसे उन्होंने मूर्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए कहा कि ‘‘पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजौं पहार। या ते तो चाकी भली, जासे पीसी खाय संसार।।’’ इसी प्रकार उन्होंने मुसलमानों से कहा- ‘‘कंकड़ पत्थर जोरि के, मस्जिद लयी बनाय, ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।।’’
एकेश्वरवाद के समर्थक कबीरदास जी का मानना था कि ईश्वर एक है। उन्होंने व्यंग्यात्मक दोहों और सीधे-सादे शब्दों में अपने विचार को व्यक्त किया। फलतः बड़ी संख्या में सभी धर्म एवं जाति के लोग उनके अनुयायी हुए। संत कबीर का कहना था कि सभी धर्मों का लक्ष्य एक ही है। सिर्फ उनके कर्मकांड अलग-अलग होते हैं। उनका कहना था कि ‘‘माला फेरत जुग गया, मिटा न मनका फेर। कर का मनका डारि के, मन का मनका फेर।’’ अर्थात् मनुष्य ईश्वर को पाने की चाह में माला के मोती को फिरता रहता है परन्तु इससे उसके मन का दोष दूर नहीं होता है। कबीर जी कहते हैं कि हमें हाथ की माला को छोड़ देना चाहिए क्योंकि इससे हमें कोई लाभ नहीं होने वाला है। हमें तो केवल अपने मन को एकाग्र करके भीतर की बुराइयों को दूर करना चाहिए। कबीर दास जी का कहना है कि ‘‘मन मक्का दिल द्वारिका, काया काशी जान। दस द्वारे का देहरा, तामें जोति पिछान।’’ अर्थात् यह पवित्र मन ही मक्का, हृदय द्वारिका और सम्पूर्ण शरीर ही काशी है।
मानव आलस्य के कारण आज का काम कल पर टालने का प्रयास करता है। कबीर दास जी कहते हैं कि हमें आज का काम कल पर न टाल कर उसे तुरन्त पूरा कर लेना चाहिए। कबीर जी काम को टालते रहने की आदत के बहुत विरोधी थे। वे इस तथ्य को जानते थे कि मनुष्य का जीवन छोटा होता है जबकि उसे ढेर सारे कामों को इसी जीवन में रहते हुए करना है। आज से छः सौ वर्ष पूर्व भी समय के सदुपयोग के महत्व को समझते हुए कबीर दास जी ने कहा कि ‘‘काल करे जो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होयगी, बहुरी करोगे कब।’’ इस दोहे मंे कबीर जी ने समय के महत्व को थोड़े शब्दों में ही समझा दिया है। उनका कहना था कि मनुष्य जीवन की उपयोग की बात तो करते हैं किन्तु उन क्षणों एवं समय पर, जो कि जीवन की इकाई है, कोई ध्यान नहीं देते हैं। इस प्रकार समय को गवांकर वास्तव में हम अपने अनमोल जीवन को गंवाने का काम करते हैं। आज मानव जीवन में पाये जाने वाले तनाव का भी सबसे बड़ा कारण ‘समय का दुरुपयोग’ ही है। जब हम किसी काम को तुरन्त न करके आगे के लिए टाल देते हैं तो यही काम हमें बहुधा आपात स्थिति में ला देता है, जिससे मनुष्य में तनाव की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
कबीरदास जी जिस युग में आये वह युग भारतीय इतिहास में आधुनिकता के उदय का समय था। वह कर्म प्रधान समाज के पैरोकार थे और उसकी झलक उनकी रचनाओं में साफ झलकती है। लोककल्याण हेतु ही मानो उनका समस्त जीवन था। कबीर दास जी एक सच्चे विश्व-प्रेमी थे। कबीर को जागरण युग का अग्रदूत कहा जाता है। डाॅ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि साधना के क्षेत्र में वे युग-युग के गुरू थे, उन्होंने संत काव्य का पथ प्रदर्शन कर क्षेत्र में नव-निर्माण किया था। कबीरदास जी अपने जीवन में प्राप्त की गयी स्वयं की अनुभूतियों को ही काव्यरूप में ढाल देते थे। उनका स्वयं का कहना था ‘‘मैं कहता आंखिन देखी, तू कहता कागद की लेखी।’’ इस प्रकार उनके काव्य का आधार स्वानुभूति या यर्थाथ ही है। इसलिए अब वह समय आ गया है जबकि हम वर्तमान समाज में व्याप्त धर्म, जाति, रंग एवं देश के आधार पर बढ़ते हुए भेदभाव जैसी बुराइयों को जड़ से उखाड़ फेकें और संसार की समस्त मानवजाति में इंसानियत एवं मानवता की स्थापना के लिए कार्य करें।

मोदी के रवैए में सुधार
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
चार दिन पहले मैंने लिखा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना आत्म-सम्मान क्यों घटा रहे हैं ? उन्हें शांघाई सहयोग संगठन की बैठक में भाग लेना है और उन्हें किरगिजिस्तान की राजधानी बिश्केक जाना है तो क्या यह जरुरी है कि वे पाकिस्तान की हवाई-सीमा में से उड़कर जाएं, जैसे कि पूर्व विदेशमंत्री सुषमा स्वराज 21 मई को गई थीं? सुषमा और मोदी को इस सुविधा के लिए इमरान खान की सरकार से निवेदन करना पड़ा है। पाकिस्तान की सरकार ने मेहरबानी दिखाई और मोदी को अपनी हवाई सीमा में से अपने जहाज को ले जाने की अनुमति दे दी ताकि वे अपना आठ घंटे का सफर चार घंटे में ही कर सकें। यदि वे ओमान और ईरान होकर जाते तो उन्हें आठ घंटे लगते। मैंने अपने लेख में नरेंद्र भाई से यही पूछा था कि एक तरफ तो वे इमरान के बातचीत के हर प्रस्ताव को ठुकरा रहे हैं, पाकिस्तान से व्यापार का विशेष दर्जा उन्होंने खत्म कर दिया है, दक्षेस के इस सदस्य को अछूत बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं और अपने चार घंटे बचाने के लिए उसके आगे गिड़गिड़ा रहे हैं। कल मुझे मोदी के और मेरे दो-तीन साझा मित्रों ने दोपहर को फोन करके बताया कि मोदी ने पाकिस्तान को कह दिया है कि वे उसके हवाई मार्ग का इस्तेमाल नहीं करेंगे। क्या खूब ! यह हुई किसी भी नीति की एकरुपता ! लेकिन इसका अर्थ यह भी है कि आज और कल बिश्केक में मोदी और इमरान के बीच कोई संवाद नहीं होगा। न हो तो न हो इससे शांघाई-देशों का कुछ बिगड़नेवाला नहीं है लेकिन उन शेष छह देशों पर इसका क्या कोई अच्छा असर पड़ेगा ? मुझे कुछ मित्रों ने यह भी कहा कि मोदी इसलिए पाकिस्तान की हवाई-सीमा में से भी नहीं जा रहे हैं कि उन्हें अपनी सुरक्षा की भी चिंता है। मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा। फिर भी मैं सोचता हूं, जैसे कि गत माह बिश्केक में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच संक्षिप्त शिष्टाचार भेंट हो गई, वैसी भेंट दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच हो जाए तो इसे नाक का सवाल नहीं बनाया जाना चाहिए। इस बैठक का इस्तेमाल एक-दूसरे पर हमला करने की बजाय आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए किया जाए तो बेहतर होगा। मुझे यह भी समझ में नहीं आता कि शांघाई सहयोग संगठन में अफगानिस्तान का न होना कहां तक ठीक है ? अफगानिस्तान तो संपूर्ण मध्य एशिया और भारत के बीच एक जबर्दस्त और महान सेतु है। अफगानिस्तान को इसका सदस्य बनाया जाना बहुत जरुरी है। यदि सार्क, बिम्सटेक और एससीओ में से चीन और रुस को हटा दिया जाए तो यही क्षेत्र मेरी कल्पना का महान आर्यावर्त्त है।

हाई स्पीड ट्रेनों की ललक : दुर्घटनाओं से सबक लें
अजित वर्मा
हाल ही फ्रांस की राजधानी पेरिस में अचानक बिजली चले जाने से एक तेज रफ्तार ट्रेन में सवार यात्री करीब 6 घंटे तक सुरंग के भीतर फंसे रहे। इस दौरान गर्मी और रोशनी की कमी के साथ-साथ उन्हें शौचालय की कमी से भी जूझना पड़ा। फ्रेंच रेल ऑपरेटर एसएनसीएफ ने बताया कि बार्सिलोना जा रही ट्रेन पैरिस के बाहर सुरंग में फंस गई। बिजली हालांकि 10-15 मिनट के लिए ही गई थी, लेकिन ट्रेन जहां रुकी थी, उस वजह से वह देर तक स्टार्ट नहीं हुई।
सुरंग के भीतर फंसे हुए यात्रियों को लाने के लिए एक नई ट्रेन भेजी गई, लेकिन इससे कोई लाभ नहीं हुआ। यात्रियों को एसएनसीएफ कर्मचारियों, पुलिस और अग्निशमन दल के कर्मियों ने मिलकर सभी यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। 6 घंटे फंसे रहने के बाद यात्रियों को सुरंग में ही एक दूसरी ट्रेन में शिफ्ट किया गया। ट्रेन में ज्यादा संख्या में पर्यटक सवार थे। पर्यटकों ने कहा कि 6 घंटे तक बिना शौचालय के ट्रेन में फंसे रहने का अनुभव भयावह था।
यह अपने तरह की एक घटना है, लेकिन जब हम विकास की प्रक्रिया में हैं, तो हमें, खास तौर पर भारत जैसे देशों को अपनी विकास योजनाओं में ऐसी घटनाओं से बचने का प्रावधान करने की दूरदर्शिता अवश्य बरतना चाहिए। यह वक्त है, जब भारत में हाई स्पीड ट्रेनों की ही नहीं, बुलेट ट्रेन चलाने की तैयारियां चल रही हैं। यों ऐसी ट्रेनें दुनिया के तमाम विकसित देशों में चल रही हैं और इनकी तकनीक तथा इनसे जुड़े सुरक्षा पहलुओं का काफी अध्ययन भी दुनिया कर चुकी है और अनुभव भी हासिल कर चुकी है।
लेकिन ये भारत है, जहाँ आये दिन भीषण रेल-दुर्घटनाएं होती हैं। इसीलिए हमने यहां सावधान और सतर्क रहने पर जोर दिया है। फ्रांस की दुर्घटना एक अलग तरह का सबक है। इसलिए संज्ञान उसका भी लिया जाना चाहिए।

मैं सूअर और तू मेरा बच्चा’
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बारे में एक ट्वीट पर पत्रकार प्रशांत कनोजिया को उप्र की पुलिस ने दिल्ली आकर गिरफ्तार कर लिया था सर्वोच्च न्यायालय ने इस पत्रकार को तुरंत रिहा कर दिया और कहा कि उप्र सरकार की यह कार्रवाई नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लंघन है। क्या किया था ऐसा कनोजिया ने, जिसके कारण उसे गिरफ्तार कर लिया गया था ? उसने किसी महिला के उस वीडियो को ट्वीट कर दिया था, जिसमें उसने दावा किया था कि उसने योगी के साथ शादी करने का प्रस्ताव भेजा है। यह ठीक है कि किसी संन्यासी को शादी का प्रस्ताव भेजना बिल्कुल बेहूदा बात है लेकिन यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। हमारे कई विश्व-प्रसिद्ध संन्यासियों और केथोलिक पादरियों को भी इस तरह के प्रस्ताव आते रहे हैं लेकिन उन्होंने प्रस्तावकों को हंसकर टाल दिया है या कभी कभी उन्हें स्वीकार करने की भी घटनाएं हुई हैं। यदि किसी महिला ने ऐसा प्रस्ताव रख भी दिया है तो उसका योगी बुरा मानने की बजाय उसे यह कह सकते थे कि बहन, यह असंभव है। हो सकता है कि उस महिला ने अज्ञानतावश या मोहवश या जानबूझकर बदमाशी करते हुए यह प्रस्ताव रखा है। हर स्थिति में उसे हवा में उड़ा दिया जाना चाहिए था लेकिन उस प्रस्ताव को दुबारा ट्वीट करनेवाले पत्रकार को जेल भिजवाना तो उस प्रस्तावक औरत की मूर्खता से भी अधिक गंभीर मूर्खता है। ऐसे कई प्रस्ताव मुझे अपने ब्रह्मचर्य-काल में भी मिला करते थे। इंदौर, न्यूयार्क और मास्को में अब से लगभग 50-55 साल पहले जब ऐसे प्रस्ताव आते थे तो उन्हें छुए बिना ही मैं रद्दी की टोकरी के हवाले कर देता था। एक संन्यासी को ऐसे प्रस्ताव पर बुरा लगना स्वाभाविक है लेकिन वह एक पार्टी का नेता, जनता का प्रतिनिधि और मुख्यमंत्री भी है। गुस्से में आकर एक पत्रकार को गिरफ्तार करना तो अपनी छवि को विकृत करना है। सार्वजनिक जीवन में ऐसे कई क्षण आते हैं, जब उत्तेजित होने की बजाय हास्य-व्यंग्य की मुद्रा धारण करना बेहतर होता है। पिछले दिनों पद्यावती फिल्म पर मेरे लेख पर उत्तेजित होकर कई लोगों ने मुझ पर तीव्र वाक-प्रहार किए। किसी नौजवान ने मुझे लिखा कि ‘बुड्ढ़े, तू सूअर है’। मैंने उसे लिखा कि ‘तुमने मुझे कितना सुंदर तोहफा दिया है। मैं सूअर हूं और तू मेरा बच्चा है।’ उसके बाद उसका कोई जवाब नहीं आया। उसकी बोलती बंद हो गईं।

दक्षिण भारत की यात्रा से साधे मोदी ने समीकरण
रमेश सर्राफ धमोरा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दूसरे कार्यकाल की पहली विदेश यात्रा पर जाने से पहले दक्षिण भारत के केरल की यात्रा कर एक सियासी संदेश दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मालदीप दीप व श्रीलंका की दो दिवसीय विदेश यात्रा पर रवाना होने से पहले केरल के त्रिशूर स्थित गुरुवायुरप्पन मन्दिर (श्री कृष्ण मंदिर) में वहां की पारंपरिक वेशभूषा में जा कर पूजा अर्चना की व तुला दान भी किया।
त्रिशूर में भाजपा कार्यकर्ताओं की अभिनव सभा को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि वो लोकसभा चुनाव में सिर्फ राजनीति करने के लिए ही मैदान में नहीं थे। हमारा लक्ष्य देश की जनता की सेवा करना है। उन्होंने कहा के चाहे केरल में हमारा एक भी प्रत्याशी लोकसभा चुनाव में नहीं जीता हो लेकिन हमारे लिये केरल का भी उतना ही महत्व है जितना बनारस का है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि लोकसभा चुनाव में जीतने के बाद देश के 130 करोड़ नागरिकों की जिम्मेदारी हमारी है। साल के 365 दिन हम अपने राजनीतिक चिंतन के आधार पर जनता की सेवा में जुटे रहते हैं। हम सिर्फ सरकार नहीं देश बनाने आए हैं।
केरल के गुरूवायूर शहर में स्थित गुरूवायुरप्पन मंदिर करीब 5000 साल पुराना माना गया है। यहां भगवान श्री कृष्ण विराजमान है। दक्षिण भारत में इस मंदिर की गुजरात के द्वारकाधीश मन्दिर के समान ही बड़ी मान्यता है। दो दिन की विदेश यात्रा से लौटते समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आंध्र प्रदेश के तिरुपति स्थित बालाजी मंदिर में पूजा अर्चना करने गए। दक्षिण भारत में तिरूपति मन्दिर की बहुत बड़ी मान्यता है। यह मन्दिर देश के सबसे ज्यादा धनवान मंदिरो में प्रमुख हैं। आंध्र प्रदेश में भी भाजपा का एक भी प्रत्याशी लोकसभा चुनाव में नहीं जीता है। मगर मोदी ने अपनी प्रथम यात्रा के लिये दो ऐसे प्रदेशों का चयन किया जहां आगे आने वाले समय में उन्हे अपनी पार्टी का जनाधार बढ़ाना है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दक्षिण भारत के 2 प्रदेशों की यात्रा करने से यह साफ हो गया है कि उनका अगला लक्ष्य दक्षिण भारत ही है। भारतीय जनता पार्टी ने दक्षिण भारत के 6 प्रदेशों की कुल 130 लोकसभा सीटों में से 90 सीटों पर चुनाव लड़ कर 30 सीटे जीती है। दक्षिण भारत के तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक व केंद्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी में से भाजपा को सिर्फ तेलंगाना व कर्नाटका में ही सफलता मिली है। बाकी चार प्रदेशों में भाजपा का खाता भी नहीं खुला। भाजपा का अगला निशाना दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु व पुड्डुचेरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बात का अच्छी तरह से पता है कि जब तक दक्षिण भारत के सभी छ: प्रदेशों में भाजपा के सांसद जीत कर नहीं आयेगें तब तक भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रव्यापी छवी नहीं बन पायेगी।
भाजपा ने तेलंगाना की सभी 17 सीटो पर चुनाव लडक़र 4 लोकसभा सीटें जीती है तथा वहां पर भाजपा को 19.45 प्रतिशत वोट मिले हैं। आंध्र प्रदेश की 25 सीटों में से भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली है। वहां भाजपा को मात्र 0.96 प्रतिशत वोट मिले हैं। तमिलनाडू की 39 सीटों में से भाजपा ने अन्नादु्रमक के साथ गठबंधन करके मात्र 5 सीटों पर चुनाव लड़ा था मगर वहां एक भी सीट नहीं जीत पाई। तमिलनाडू में भाजपा को 3.66 प्रतिशत वोट मिले हैं। केरल की 20 सीटों में से भाजपा ने 16 सीटों पर चुनाव लड़ा था मगर एक भी सीट नहीं मिली। लेकिन केरल में भाजपा के वोट पिछली बार से काफी बढ़े हैं। हाल ही के लोकसभा चुनाव में केरल में भाजपा को 12.93 प्रतिशत वोट मिले हैं। तिरूवनंतपुरम सीट पर तो भाजपा दूसरे नम्बर पर रही है।
कर्नाटक की 28 में से भाजपा ने 27 सीटों पर चुनाव लड़ा और 25 सीटें जीती। एक सीट भाजपा के सहयोग से निर्दलिय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ी सुमनलता अम्बरीश ने जीती है। कर्नाटक में भाजपा को सर्वाधिक 51.38 प्रतिशत वोट मिले। पांडिचेरी की एकमात्र सीट पर भाजपा ने गठबंधन के तहत चुनाव नहीं लड़ा था।
इस तरह देखे तो आन्ध्र प्रदेश व केरल में भाजपा के प्रत्याशी कहीं भी मुख्य मुकाबले में नहीं रहे। इसके उपरांत भी मोदी ने इन दोनो प्रदेशो की यात्रा कर वहां के मतदाताओं को सीधा संदेश दिया है कि आपने हमें समर्थन नहीं दिया लेकिन फिर भी हम आपके साथ हैं। आपकी हर सम्भव मदद को तैयार है। मोदी की दक्षिण भारत की यात्रा करने से वहां के भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ा है। वहां अन्य राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों का भाजपा की तरफ रुझान बढ़ेगा। अपनी इसी सोच को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने अपना मिशन दक्षिण शुरू कर दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने दक्षिण भारत की यात्रा वहां के बड़े धार्मिक मंदिरो से प्रारम्भ की ताकि वहां के हिन्दू मतदाताओं को भाजपा से जोड़ा जा सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मानना है कि जिस तरह पूर्वोत्तर भारत, बंगाल, उड़ीसा में भाजपा ने अपना संगठन मजबूत कर अच्छा प्रदर्शन किया उसी तरह अगले लोकसभा चुनाव में दक्षिण भारत के राज्यो में भाजपा मजबूत होकर उभरे। मोदी के दौरे के दौरान ही कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष अध्यक्ष राहुल गांधी भी केरल में अपने लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र वायनाड का तीन दिवसीय दौरा कर रहे थे मगर मोदी की यात्रा के चलते राहुल गांधी की यात्रा को राष्ट्रीय मीडिया में स्थान नहीं मिल सका।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना हर कदम एक सोची-समझी रणनीति के तहत उठाते हैं। उनको अच्छी तरह पता रहता है कि कहां पर कौन सा दाव आजमाने से पार्टी को कितना फायदा होगा। जिस तरह भाजपा ने कर्नाटक को पार्टी के मजबूत किले में बदल दिया उसी तरह आने वाले समय में दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में भी भाजपा झंडा लहराने लगे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
अपनी आंध्र प्रदेश में तिरुपति मन्दिर यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी का आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी को विशेष महत्व देने हुये पूरे कार्यक्रम में अपने साथ रखना व तिरूपति में भाजपा की जनसभा में जगनमोहन रेड्डी की तारीफ करना इस बात का संकेत है कि समय आने पर जगनमोहन रेड्डी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खड़े नजर आएंगे। जगन मोहन रेड्डी के माध्यम से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तेलुगु देशम पार्टी के अध्यक्ष व आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को भी राजनीतिक मात देंगे।

बलात्कारियों को फांसी दी जाए
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में बकरवाल समुदाय की एक मुस्लिम लड़की के साथ पहले बलात्कार किया गया और फिर उसकी हत्या कर दी गई। वह लड़की सिर्फ आठ साल की थी। उसे एक मंदिर में ले जाकर नशीली दवाइयां खिलाई गईं और फिर उक्त कुकर्म किया गया। उन अपराधियों पर विशेष मुकदमा चला और उनमें से तीन को उम्र-कैद हुई और तीन को पांच-पांच साल की सजा ! सिर्फ डेढ़ साल में यह फैसला आ गया, यह गनीमत है। लेकिन मैं इस फैसले को नाकाफी मानता हूं। पहली बात तो यह कि इस घोर राक्षसी मामले को सांप्रदायिक रुप दिया गया। एक हिंदू रक्षा मंच ने अपराधियों को बचाने की कोशिश की, क्योंकि वे हिंदू थे और वह बच्ची मुसलमान थी। इस मामले में भाजपा के दो मंत्रियों को अपनी बेवकूफी के कारण इस्तीफे भी देने पड़े। इसके लिए भाजपा-नेतृत्व बधाई का पात्र है लेकिन कितने शर्म की बात है कि यह जघन्य अपराध एक मंदिर में हुआ और उस मंदिर का पुजारी इस नृशंस अपराध का सूत्रधार था। मैं पूछता हूं कि वह मंदिर क्या अब पूजा के लायक रह गया है ? वह किसी वेश्यालय से भी अधिक घृणित स्थान बन गया है। उस पर कठुआ के लोगों को ही बुलडोजर चला देना चाहिए। जहां तक तीन लोगों को उम्र-कैद का सवाल है, उसमें वह पुलिस अधिकारी भी है, जो बलात्कार में शामिल था और जिसने सारे मामले को रफा-दफा कराने की कोशिश की थी। जिन अन्य अपराधियों को पांच-पांच साल की सजा मिली है और जुर्माना भी ठोका गया है, वे लोग इतने वीभत्स कांड में शामिल थे कि यह सजा उनके लिए सजा नहीं है, इनाम है। अब उनमें से आधे पूरी उम्रभर और आंधी पांच साल तक जेल में सुरक्षित रहेंगे, सरकारी रोटियां तोड़ेंगे और मौज करेंगे। कभी-कभी पेरोल पर छूटकर मटरगश्ती भी करेंगे। उनको मिली इस सजा का भावी अपराधियों पर क्या असर पड़ेगा ? यही न, कि पहले अपराध करो और फिर चैन से सरकारी रोटियां तोड़ते रहो। मेरी राय में इन सभी लोगों को न सिर्फ मौत की सजा मिलनी चाहिए बल्कि इन्हें लाल किले पर फांसी दी जानी चाहिए और इनके शव कुत्तों से घसिटवाकर यमुना में बहा दिया जाना चाहिए ताकि इस तरह के संभावित अपराध करनेवालों के मन में अपराध का विचार पैदा होते ही उनकी हड्डियों में कंपकंपी दौड़ जाए। इस तरह की कठोर सजा नहीं होने का परिणाम यह है कि कठुआ-कांड के बाद उससे भी अधिक नृशंस दर्जनों घटनाएं देश में हो चुकी हैं और आज भी मध्यप्रदेश से कठुआ-जैसी ही खबर आई है।

कार्य संस्कृति बदलने के नाम
अजित वर्मा
उदारवाद की अवधारणाओं के अनुरूप देश में नयी कार्य संस्कृति विकसित करने के लिए अब एक बार फिर श्रम कानूनों में बदलाव होने वाला है।
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए श्रम कानूनों में परिवर्तन करने के लिए 100 दिन के अंदर एक कार्य योजना तैयार की है। इस कार्य योजना के लागू हो जाने पर वियतनाम और दक्षिण एशिया के देशों से भारी विदेशी निवेश आने की संभावना मंत्रालय जता रहा है। एशियाई देशों में देसी, विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करने कारपोरेट टैक्स श्रम कानूनों में छूट और बेहतर वातावरण देने का प्रयास इन 100 दिनों में नीति के रूप में किया जाएगा।
श्रम कानूनों की अड़चनों को समाप्त करने के लिए मौजूदा कानूनों में संशोधन कर उन्हें निवेशकों के लिए काफी आसान बनाया जाएगा। इसके लिए वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय श्रम मंत्रालय से लगातार संपर्क कर 10 सूत्रीय एक्शन प्लान तैयार कर रहा है, ताकि विदेशी निवेशक बड़ी तेजी के साथ भारत की ओर आकर्षित हों जो संशोधन किए जा रहे हैं। उसके बाद अब बड़ी-बड़ी कंपनियां भी अपने यहां पर पार्ट टाइम जॉब दे सकेगी। वही श्रमिकों की जिम्मेदारी भी तय करने, श्रम कानूनों में संशोधन होगा।
कोई शक नहीं कि आर्थिक विकास को गति देने के लिए देश में विदेशी निवेश बढ़ना आवश्यक है। और इसके लिए देश में कार्य संस्कृति को बदलने की जरूरत सरकार महसूस कर रही है। बड़ी कम्पनियां भारत में लागू श्रम कानूनों को अपने कामकाज को सुगमतापूर्वक करने में बाधक मानती हैं। हमारा मानना है कि कम्पनियों को पार्ट टाइम जाब देने की सुविधा मिलना चाहिए, लेकिन श्रम कानूनों में ऐसे संशोधन नहीं होना चाहिए, जिनसे श्रमिकों के हित प्रभावित हों, या उनके शोषण का मार्ग प्रशस्त हो। देखना होगा कि सरकार क्या संशोधन लागू करती है।
11जून/ईएमएस

ज्ञानियों की मूर्खता और अज्ञानियों की समझ
सनत जैन
राजस्थान के कई गांवों में 50 मिलीमीटर बारिश से भी तालाब भरे रहते हैं, मगर भोपाल में एक हजार मिलीमीटर से ज्यादा बारिश होने के बाद भी बड़ा तालाब सूख रहा है। पानी का स्तर नीचे जा रहा है और शहर के कई इलाकों में पानी को लेकर हाहाकार मचा है। भोपाल आए पर्यावरणविद फरहाद कान्ट्रैक्टर ने जल दोहन को लेकर ऐसी कई बातों का खुलासा किया है, जो आज के पढ़े-लिखे लोगों की सोच पर सवाल उठाता है। सही मायने में कहें तो आज के जमाने की सोच ने ही जलसंकट को बढ़ावा दिया है। जेसीबी से तालाब को खोदकर कभी भी उसे नहीं भरा जा सकता। हर जगह की जमीन और मिट्टी का स्वभाव अलग होता है, लेकिन आज जहां देखो, वहां जेसीबी मशीन तालाब को गहरा बनाने में लगी है। यह हाल शहरों का है, गांव का नहीं। गांव की कम पढ़ी-लिखी आबादी को जल संरक्षण के बेहतर तरीकों का पता है, वह अपने हिसाब से ऐसा कर भी रही है। बात नाराज करने वाली है, लेकिन मूर्खों की अज्ञानता अब ज्ञानियों की समझ पर भारी पड़ रही है। देश को ‘इंडिया और भारत दो भागों में बांटा जा चुका है। कम से कम जल संरक्षण के मामले में भारत, इंडिया से कई कदम आगे है…। ऐसा क्यों? कभी हमने समझने की कोशिश ही नहीं की। समझ की कमी की समस्या गांव की कम पढ़ी-लिखी में थोड़ी और शहर की शिक्षित विशेषझों से काफी ज्यादा है। सवाल यह भी है सरकारी और एनजीओ के स्तर पर जल संरक्षण के किए जा रहे कई दशकों के उपायों से पहले क्या लोगों को पानी नहीं मिलता था? वॉटर हार्वेस्टिंग और आधुनिक जल स्रोतों को बनाने के बाद हमने समस्या को किस हद तक बढ़ा दिया है, किसी को देखने की फुर्सत नहीं। आधुनिक युग में करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाकर भी हम एक बूंद का संचय नहीं कर पा रहे हैं। तो क्या हमें थोड़ी देर रुककर गलतियों पर मंथन नहीं करना चाहिए। एक समय था जब शहर हो या गांव कुएं, तालाब, पोखर आदि जल से लबालब होते थे। बरसात से पहले ही बच्चे, युवा तालाब और पोखरों में दिनभर मस्ती किया करते थे। फिर अब ऐसा क्या हो गया कि तालाब सूखते जा रहे हैं, कुएं कम होते जा रहे हैं। यह पर्यावरणीय बदलाव नहीं, हमारी आधुनिक सोच का घातक परिणाम है, जो कह रहा है कि अगर अब भी हमारी मनमानी जारी रही, तो कल कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।
पानी की सबसे ज्यादा खपत सिंचाई में होती है। फिर, औद्योगिक तथा घरेलू उपयोग में होता है। घरेलू उपयोग का 60 फीसदी पेयजल हम शौचालयों में बहा रहे हैं। भारत में कुल जल-उपयोग का करीब 70 फीसद कृषि-कार्यों में होता है। खेती तो बंद नहीं की जा सकती, क्योंकि यह हमारे पोषण का आधार है, लेकिन खेती में पानी की खपत जरूर घटाई जा सकती है। असल में, खेती में पानी की बेतहाशा खपत का दौर हरित क्रांति के समय शुरू हुआ। हरित क्रांति ने एक समय पैदावार बढ़ाने में बहुत अहम भूमिका निभाई, पर उसने रासायनिक खादों, कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता और पानी की बेतहाशा खपत वाली जिस कृषि प्रणाली का प्रसार किया वह आज पर्यावरणीय संकट की वजह बन गई है। इसलिए अब ऐसी कृषि प्रणाली की जरूरत दिनोंदिन अधिक शिद्दत से महसूस की जा रही है जो रासायनिक खादों व कीटनाशकों पर निर्भरता घटाती जाए और पानी की कम खपत से संभव हो सके। इस सिलसिले में बूंद-बूंद सिंचाई की विधि को अधिक से अधिक अपनाने की जरूरत है। तालाबों को पाटते जाने और नदियों के सिकुड़ते जाने के कारण भी सिंचाई के लिए भूजल का दोहन तेज हुआ और इसके फलस्वरूप धरती के नीचे का जल भंडार लगातार कम होता जा रहा है।
अब 800 फीट तक नलकूप खोदे जा रहे हैं। जिसके कारण जंगल नष्ट हो रहे हैं। पेड़ पौधों का पानी हमने भूजल से निकालकर इसका जीवन नष्ट कर दिया है। पेड़ पौधे लगाते हैं तो वह पानी के अभाव में सूख जाते हैं। पौधारोपण के नाम पर पेड़ पौधे का जंगल खत्म हो रहे हैं।
पानी बेचने का कारोबार इतना चोखा है कि यह अब बड़ा व्यवसाय बन गया है। शहर के लेकर ग्रामीण इलाकों में आरओ प्लांट लगा रहे हैं, जो दिन रात पानी का दोहन कर रहे हैं। पीने वाला एक डिब्बा पानी 20 रुपए बिक रहा है। वहीं भवन या सड़क निर्माण प्रयुक्त होने वाले एक टैंकर पानी की कीमत पांच सौ से 1000 रुपए है। पानी बेचने के गोरखधंधे में बड़े लोगों के शामिल होने से यह बड़ा व्यवसाय का रूप ले चुका। आज नेताओं तक के टैंकर शहर में दौड़ रहे हैं। सिर्फ मराठवाड़ा में आज की तारीख में 4 हजार टैंकर पानी की सप्लाई कर रहे हैं। दरअसल, यह एक धंधे का स्वरूप ले चुका है। पानी की कमी की समस्या है नहीं, इसे पैदा किया जा रहा है। आधुनिक संयंत्रों के जरिए पानी की कमी पूरी करने का जो खिलवाड़ चल रहा है, उसकी आड़ में टैंकरों के मालिक राजनेता करोड़ों रुपए सिर्फ 4 माह में कमाकर ऐश कर रहे हैं।
आज पूरे भारत में पानी की कमी पिछले 30-40 साल की तुलना में तीन गुना हो गई है। देश की कई छोटी-छोटी नदियां सूख चुकी हैं या सूखने की कगार पर हैं। बड़ी-बड़ी नदियों में पानी का प्रवाह कम होता जा रहा है। आखिर क्यों? क्या नदियों के उद्गम स्थल से पानी का प्रवाह कम हो गया है, या फिर उन्होंने पानी का हिसाब रखना शुरू कर दिया है। कतई नहीं…यह हमारी करनी का फल है। आज नदियां कमाई का साधन बन गई हैं। फिर हमें चिंता किस बात की। नदियों का पाट आज समझ में ही नहीं आता। कहीं ज्यादा तो कहीं थोड़ा। पता ही नहीं चलता कहां नदी है और कहां नाला। सरकार ने ही आंकड़ा जारी कर बताया था कि 1960 में देश में 10 लाख कुएं थे, लेकिन आज इनकी संख्या 2 से 3 करोड़ के बीच है। हमारे देश के 55 से 60 फीसदी लोगों को पानी की आवश्यकता की पूर्ति भूजल द्वारा होती है।
इसकी मुख्य वजह है कि बिना सोचे-समझे भूजल का अंधाधुंध दोहन। कई जगहों पर भूजल का इस कदर दोहन किया गया कि वहां आर्सेनिक और नमक तक निकल आया है। हमनें लाखों साल से जमा भूजल की विरासत का अंधाधुंध दोहन कर करोड़ों वृक्षों एवं वनस्पति का जीवन समाप्त कर पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया है। खरबों रुपया खर्च करने के बाद भी हम पीने के पानी और जंगल सुरक्षित नहीं रख पा रहे हैं। ऐसे पढ़े लिखे जरुर थे। कई-कई साल निरंतर अकाल पढ़ता था। उसके बाद भी ऐसा पेयजल संकट नहीं आया, जैसे आज देखने को मिल रहा है। जनता जनार्दन एवं सरकार को इस दिशा में सोचना होगा।

यादे बनकर रह गयी है प्याऊ
रमेश सर्राफ धमोरा
एक दौर था जब शहरों, कस्बों और गांवों में हर दूसरे-तीसरे चौराहे पर किसी सेठ -शाहूकार या स्थानीय लोगों की तरफ से लगी प्याऊ और उस प्याऊ में पीने के ठंडे पानी के साथ खाने को मिलने वाली गुड़ की डली व भूंजे चने (भूंगडें) राहगीरों को लू की गर्मी सहन करने की ताकत देता था। उस समय में आम रास्तो पर बनी प्याऊ राह गुजर रहे लोगों के हलक को सूखने से बचाती थी। पहले गांव, कस्बों और शहरों में कई प्याऊ देखने को मिल जाती थी। जहां बोरे या कूंचो की पानी(घास) से बनाये गये एकछोटे से झोंपड़े में जमीन पर बालू रेत के ऊपर पानी से भरे घड़े रखे होते थे। प्याऊ पर जाकर पानी कहते ही वहां बैठा व्यक्ति गंगासागर से ठंडा पानी पिलाता था। प्यास खत्म होने पर केवल अपना सर हिलाते ही पानी आना बंद हो जाता था।
पहले के समय में लोगो ने कई प्याऊ ऐसी जगह बनवायी थी जहां कई गांवो के रास्ते मिलते थे जिस कारण वहां राहगीरो का आवागमन लगातार लगा रहता था। वहां की प्याऊ के महत्व को देखते हुये लोगो ने उस जगह का नाम ही प्याऊ स्टैण्ड रख दिया था। इससे हमारे जीवन में प्याऊ के महत्व का पता लगाया जा सकता है। आज भी प्याऊ स्टैण्ड के नाम से जगह-जगह बस स्टैण्ड देखे जा सकते हैं।
हमारे देश में अरसे तक यह परम्परा रही है कि रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों व अन्य सार्वजनिक स्थानों पर प्याऊ हुआ करते थे। रेल स्टेशनों पर तो रेल विभाग बाकायदा एक कमर्चारी नियुक्त रहता था, जो ट्रेन आने पर यात्रियों को मुफ्त में पानी पिलाया करता था। ऐसी सभी जगहों पर घड़ों में रखा साफ पेयजल भी लोगों को मुफ्त मिलता था। उसे पीकर लोग तृप्त होते थे, पानी पिलाने और उसकी व्यवस्था करने वाले को दुआ देते थे।
कई रेल्वे स्टेशनों पर गर्मियों में पानी पिलाने का पुण्य कार्य किया जाता था। पानी पिलाने वालों की यात्रियों से केवल यही प्रार्थना होती, जितना चाहे पानी पीयें, चाहे तो सुराही में भर लें, पर पानी बरबाद न करें। उनकी यह प्रार्थना उस समय लोगों को भले ही प्रभावित न करती हों, पर आज जब उन्हीं रेल्वे स्टेशनों में एक रुपए में पानी का छोटा-सा पाऊच खरीदना पड़ता है, तब समझ में आता है कि उनकी पानी बचाओ की अपील आज कितनी सार्थक लग रही है। मगर आज के दौर में बाजारू ताकतों के आगे वे सब सुविधायें गौण हो गई हैं।
प्यासे को पानी पिलाना आज भी पुण्य का काम माना जाता है, पर ऐसे प्याऊ अब सिर्फ पर्व-त्योंहारों पर ही नजर आते हैं। इनके स्थान पर अब तकरीबन हर जगह बोतल बंद पानी ही ऊंची कीमत पर बेचा जाता है। पहले के जमाने में कुछ लोग अपनी कमाई हुई दौलत का एक हिस्सा उन लोगों की मदद में खर्च करते थे जो आर्थिक रूप से कमजोर थे। गर्मियों का मौसम आते ही बसों, ट्रेनों और सार्वजनिक उपस्थिति वाली सभी जगहों पर अब यह आम बात हो गई है कि वहां बोतलबंद बिकने वाले पानी के दर्शन तो हो जाते हैं, लेकिन ऐसा कोई सार्वजनिक हैंडपंप या नल चालू हालत में दिखाई नहीं देता है जिसका पानी पीकर तृप्त हुआ जा सके और जिसे पीने से बीमारियों के किसी खतरे का अहसास भी न हो।
वर्तमान में हालात यह हैं कि आज आम आदमी अपनी प्यास बुझाने के लिये एक लीटर पानी की बोतल के लिए 15-20 रुपये चुकाने को बाध्य है। मौजूदा स्थिति को ध्यान से देखेंगे तो पता चलेगा कि गर्म मौसम की मार से बचाने वाला हमारा जो सामाजिक तंत्र था, वह आज के इस आधुनिकता के दौर में समाप्त सा हो गया है।
शेखावाटी के सेठ साहूकारों द्वारा आमजन की पीड़ा समझते हुए जगह जगह प्याऊ बनवाकर इस सोच के साथ पुण्य का काम किया गया था कि उन द्वारा निर्मित की जा रही प्याऊ सदियों तक राहगीरों की प्यास बुझाती रहेगी। मगर उन्हें नहीं मालूम था कि कुछ ही समय पश्चात यह तो मात्र दिखावे की प्याऊ बन कर रह जाएगी और प्याऊ पर लगी रह जाएगा सिर्फ उनकी नाम पट्टिका। झुंझुनू शहर में स्टेशन से निकलने के बाद परमवीर पीरू सिंह स्कूल के पास स्वर्गीय राम कुमार मोहनी देवी रूंगटा की याद में मंड्रेला निवासी रूंगटा परिवार ने जो प्याऊ बनवाई थी आज वह खुद पानी को खुद तरस रही है। प्याऊ का संचालन बंद होने से वहां पर लगी टूटियां भी अपना अस्तित्व खोती जा रही है।
जिला कलेक्टर के बंगले के पास गोल प्याऊ के नाम से मशहूर प्याऊ जो कन्हैयालाल मोदी चैरिटेबल ट्रस्ट मुंबई द्वारा 1991 में निर्मित करवायी गई थी उस प्याऊ का संचालन बंद होना आश्चर्य की बात है। केंद्रीय बस डिपो के सामने लायंस क्लब झुंझुनू द्वारा संचालित लायंस शीतल जल मंदिर जो राधा किशन काशीनाथ जालान के आर्थिक सहयोग से संचालित की जाती है। यह प्याऊ 1990 में बनी थी जिसका उद्घाटन 14 अक्टूबर 1990 को किया गया था। बाद में यह प्याऊ डॉक्टर कुंदन बालाला जैन फैमिली ट्रस्ट द्वारा संचालित हुई। वर्तमान में यह प्याऊ केंद्रीय बस स्टैंड के नजदीक व शहर के मध्य होने के कारण अधिकांश राहगीरों के लिए अमृतम जलम का कार्य कर रही है। लेकिन प्रशासन की अनदेखी के चलते प्याऊ के बाहर अवैध रूप से रेहडी संचालकों ने अतिक्रमण कर इस प्याऊ को नजर आने से भी रोक रखा है। वर्तमान में उक्त प्याऊ प्रशासन की उदासीनता के चलते संचालन पूर्ण रूप से बंद है।
समय के साथ सब कुछ बदल रहा है। पर अच्छी परम्पराएं जब देखते ही देखते दम तोडऩे लगती है, तब दु:ख का होना स्वाभाविक है। प्याऊ परंपरा में यह भावना कभी हावी नहीं रही कि पानी पिलाना एक पुण्य कार्य है। मात्र कुछ लोग चंदा करते और एक प्याऊ शुरू हो जाती। आजकल तो प्याऊ के उद्धाटन की खबरें भी पढऩे को मिलती है। देखते ही देखते आज पानी बेचना एक बड़ा व्यवसाय बन गया है। यह हमारे द्वारा किए गए पानी की बरबादी का ही परिणाम है। आज प्याऊ अतीत बनकर रह गयी है। हमारी नयी पीढ़ी को तो शायद पता भी नहीं होगा कि कभी प्याऊ की मानव जीवन में बड़ी भूमिका होती थी।

हिंदी मत लादिए लेकिन….
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
त्रिभाषा-सूत्र के विवाद पर तीन-तीन मंत्रियों को सफाई देनी पड़ी है। उन्होंने कहा है कि यह तो शिक्षा समिति की रपट भर है। यह सरकार की नीति नहीं है। अभी इस पर सांगोपांग विचार होगा, तब यह लागू होगी। क्यों कहना पड़ा, उन्हें ऐसा ? इसलिए कि मोदी सरकार पर यदि हिंदी थोपने का ठप्पा जड़ दिया गया तो वह दक्षिण के चारों राज्यों में चारों खाने चित हो जाएगी और बंगाल में भी उसे नाकों चने चबाने पड़ेंगे। पहले जनसंघ और फिर भाजपा पर हिंदी थोपने का आरोप तो लगता ही रहा है। इसी से तंग आकर डाॅ. लोहिया ने तमिलों से कहा था कि ‘हिंदी जाए भाड़ में।’ आप पहले अंग्रेजी हटाइए। जब अंग्रेजी हटेगी तो उसकी जगह नौकरशाहों, नेताओं, सेठों, विद्वानों और संपूर्ण भद्रलोक की भाषा कौन बनेगी ? हिंदी ! अब से लगभग 30 साल पहले जब उप्र के मुख्यमंत्री मुलायमसिंह और मैं मद्रास में मुख्यमंत्री करुणानिधि से मिलने गए तो उनका पहला सवाल यही था कि क्या आप हम पर हिंदी थोपने यहां आए हैं ? हमने कहा, हम आप पर तमिल थोपने आए है। आप अपना सारा काम तमिल में कीजिए। ऐसा होगा तो हम तमिल सीखने को मजबूर होंगे और आप हिंदी सीखने को। हिंदी और सारी भारतीय भाषाओं के बीच बस एक ही दीवार है, अंग्रेजी की ! गुलामी की यह दीवार गिरी कि सारी भाषाओं में सीधा संवाद कायम हो जाएगा। शिक्षा की नई भाषा नीति में अंग्रेजी की इस दीवार पर जबर्दस्त हमले किए गए हैं। उसके लिए मैं बधाई देता हूं। किसी सरकारी रपट में यह पहली बार कहा गया है कि अंग्रेजी की अनिवार्यता ने भारत को कितनी आर्थिक और बौद्धिक हानि पहुंचाई है। अंग्रेजी थोपने के विरुद्ध जो तर्क पिछले 60 साल में लोहिया, विनोबा और मैंने दिए हैं, पहली बार उन्हें किसी सरकारी रपट में मैं देख रहा हूं। यह रपट एक तमिलभाषी वैज्ञानिक श्री कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में तैयार हुई है और वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री जयशंकर ने भी तमिलनाडु के नेताओं को आश्वस्त किया है। ये दोनों भी तमिल है और दोनों ज.ने.वि. के पढ़े हुए हैं। इसके बावजूद यह मामला तूल पकड़ेगा। इसका हल सिर्फ एक ही है कि जो हिंदी न पढ़ना चाहे, उस पर हिंदी लादी न जाए। वह हिंदी न पढ़े लेकिन अंग्रेजी को सभी जगह से हटा दें याने शासन से, प्रशासन से, शिक्षा से, न्याय से, नौकरियों से ! तब अंग्रेजी को अपनी कीमत खुद मालूम पड़ जाएगी और अंग्रेजीप्रेमी फिर क्या करेंगे ? आपके कहे बिना ही सब लोग अपने आप हिंदी पढ़ेंगे। किस सरकार में इतना दम है कि वह यह नीति लागू करे।

धार्मिक नारों से नहीं बल्कि गंदी सियासत से है देश को दिक्कत
डॉ हिदायत अहमद खान
पिछले कुछ सालों में धार्मिक नारे लगाने और दूसरे लोगों से जबरदस्ती लगवाने का खेल कुछ इस तरह से खेला गया है, जिससे एक खास राजनीतिक पार्टी को लाभ मिल सके और अन्य पार्टियों को खासा नुक्सान हो। लोकसभा चुनाव 2019 से पहले इस बात को विपक्ष ने भी भांप लिया था, इसलिए कट्टर हिंदुत्व के सामने सॉफ्ट हिंन्दुत्व का कॉन्सेप्ट लाया गया और नफरतों के खिलाफ मोहब्बतों की खुशबू बिखेरने की पुरजोर कोशिशें भी की गईं, लेकिन इसका असर और हश्र क्या हुआ यह देश और दुनिया देख चुकी है। वैसे भी धर्म में राजनीति का क्या काम और जहां राजनीति आ जाए वहां धर्म कैसे रह सकता है। क्योंकि धर्म आस्था से जुड़ा हुआ होता है, जबकि राजनीति निरा अवसरवादिता पर केंद्रित होती है। धर्म, आस्था और श्रद्धा के संबंध में गीता में कहा गया है कि ‘श्रद्धावानलभते ज्ञानम्।’ कुल मिलाकर धार्मिक आस्था का संबंध हृदय से होता है, जबकि राजनीति दिमाग से की जाती है, उसमें भावनाओं को लेशमात्र भी स्थान नहीं दिया जा सकता है। बावजूद इसके जाने-अनजाने में धार्मिक नारे लगाने और लगवाने को लेकर विवाद भी खूब हुए हैं। हद यह रही कि जिन्होंने बंदेमातरम् बुलवाने की कोशिश की जब उनसे बंदेमातरम गाने को कहा गया तो वो ही बगलें झांकते नजर आ गए। मतलब साफ था कि राजनीति साधने सिर्फ नारे लगाना है, उसकी आत्मा को समझने और आत्मसात करने की जरुरत नहीं है। इसलिए इसका बेजा लाभ राजनीतिक तौर पर उठाया गया है, जिसके चलते पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को तो वो लोग भी नहीं भा रहे हैं जो धार्मिक नारे लगाते हुए उनके सामने आ जाते हैं। ऐसे लोगों के शरीर से चमड़ी उधेड़ लेने जैसी बातें भी की जा रही हैं, लेकिन यहां समझना होगा कि धर्म कभी भी किसी पर हावी होने और उससे जोर-जबरदस्ती करवाने को नहीं कहता है। बल्कि प्रत्येक धर्म हृदय परिवर्तन पर विश्वास करता है और वही करने को कहता है। यहां कुछ कट्टरपंथी धर्म को बदनाम करने और हिंसा फैलाने का काम करते चले जा रहे हैं। इस कारण सच्चे और अच्छे धार्मिक लोग भी बदनाम हो रहे हैं, जबकि धर्म को राजनीति से जोड़कर देखने वाले कह रहे हैं कि यदि धर्म की रक्षा करनी है तो राजनीति को तो साधना ही होगा, इसके बगैर धर्म नहीं बचेगा। इस बीच राम के नाम पर राजनीति करने वाले भाजपा के नेता भी खूब मुखर हुए हैं। पश्चिम बंगाल के मामले में तो पूरी लड़ाई इसी बात को लेकर लड़ी गई है। बहरहाल दिल्ली के भाजपा नेता प्रवीण शंकर कपूर ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र लिखते हुए उन्हें आड़े हाथ लिया है। कपूर कह रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता को भगवान राम का नाम जपना चाहिए, ऐसा करने से उन पर जो बुरी शक्तियों का साया है उन्हें दूर करने में भी मदद मिलेगी। बकौल कपूर, ममता पर बुरी शक्तियों का असर इस कदर हो चुका है कि उनके सामने कोई जय श्री राम का नारा लगाता है तो वो आपा खो देती हैं और चिल्लाने लग जाती हैं। अब इस तरह की बातें करने वालों को कोई समझाए कि जब किसी स्थापित नेता के पैरों तले की जमीन धर्म के नाम पर यूं सरकाई जाएगी तो उसका हाल वैसा ही होगा है, जैसा कि इस समय ममता का हुआ है। धार्मिक नारों के जरिए उन्हें छेड़ा जाता है और वो अपना आपा खो देती हैं। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में जब ममता बनर्जी के सामने कुछ लोगों ने जय श्री राम के नारे लगाए थे तो वो नाराज हो गईं थीं, घटना का वीडियो भी वायरल कर दिया गया था। इस पर ममता बनर्जी ने आरोप लगाते हुए कहा था कि भाजपा बारंबार जय श्री राम के नारे लगवाकर धर्म को राजनीति से मिलाने का काम कर रही है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्या कारण है कि ममता के व्यवहार का विरोध करते हुए कपूर के सहयोगी तेजिंदरपाल सिंह बग्गा और पश्चिम बंगाल के भाजपा सांसद अर्जुन सिंह ने जय श्री राम लिखे पोस्टकार्ड भेजने का अभियान क्यों चलाया गया। यह तो सीधे-सीधे राजनीति चमकाने के लिए धर्म का सहारा लेने जैसी बात हो गई है। इसलिए धर्म से राजनीति को भले कोई खतरा न हो, लेकिन गंदी राजनीति के चलते धर्म जरुर संकट में आता चला जा रहा है। याद रखें कि भगवान राम और माता सीता की पूजा-पाठ, अराधना, स्तुति करने में हर्ज नहीं है, बल्कि आत्मशांति के लिए आस्थावानों को तो ऐसा करना ही चाहिए, लेकिन यही कार्य राजनीति साधने के लिए होने लग जाए तो उसे सही करार नहीं दिया जा सकता है। इसका विरोध करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सफाई देने का भी काम किया है। ममता का कहना है कि इन राजनीति प्रेरित धार्मिक नारों को जबरन थोपे जाने का सम्मान नहीं करती हैं, यह कार्य कथित तौर पर आरएसएस के नाम पर किया जा रहा है, जिसे बंगाल ने कभी स्वीकार नहीं किया है। कुल मिलाकर धार्मिक नारे लगाने वालों की भावनाओं को भी समझने की आवश्यकता है, क्योंकि जब तक भावनाएं शुद्ध आत्मशुद्धि और पुण्य कमाने से ओतप्रोत नहीं होंगी, तब तक विवाद से भी मुक्ति नहीं मिल सकती है। अंतत: धार्मिक मामलों में राजनीतिक हस्तक्षेप को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि गंदी राजनीति इसका इस्तेमाल अपने लाभ के लिए करेगी और बदनामी का ठीकरा धर्म के माथे फोड़ा जाएगा, जो सही नहीं है।

कांग्रेस: डगर कठिन परंतु असंभव नहीं
तनवीर जाफरी
लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतंत्र गंठबंधन की शानदार वापसी के साथ ही कांग्रेस पार्टी के भी एक मृत प्राय: संगठन हो जाने के कयास लगाए जाने लगे थे। ऐसा महसूस किया जाने लगा था कि जहां देश की वर्तमान राजनैतिक परिस्थितियों से जूझ पाने में कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी तथा यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी स्वयं को असहाय महसूस करते हुए संगठन से नाता तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं वहीं कांग्रेस विरोधी ख़ेमों की भी यही प्रबल इच्छा थी कि नेहरू-गांधी परिवार किसी तरह अपनी पराजय से घबरा कर राजनीति विशेषकर कांग्रेस पार्टी को संरक्षण देना बंद कर दे। पूरे योजनाबद्ध तरीके से मीडिया तथा सोशल मीडिया के माध्यम से सोनिया व राहुल गांधी के मनोबल को गिराने का प्रयास भी किया गया। कांग्रेस से इत्तेफाक न रखने वाले अनेक राजनैतिक दलों के नेता भी यही सलाह देते सुनाई दिए कि अब कांग्रेस को नेहरू-गांधी परिवार के ‘शिकंजे’ से बाहर निकलना चाहिए। ऐसे आलोचनाकार पार्टी में परिवारवाद हावी होने की दलीलें दे रहे थे। पूर्व आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव एक अकेले ऐसे नेता थे जो राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद से पराजय के बाद त्यागपत्र दिए जाने के किसी भी निर्णय के बिल्कुल ‎खिलाफ थे। वे अपनी दूरदर्शी राजनीति की नज़रों से यह देख रहे थे कि राहुल गांधी के मनोबल को गिराकर किसी भी तरह उनसे त्यागपत्र लिए जाने की साजि़श रची जा रही है। वे यह भी समझ रहे थे कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा अच्छा प्रदर्शन न किए जाने को लेकर जहां राहुल गांधी भी सदमें में हैं वहीं कांग्रेस विरोधी भी उनके समक्ष अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने जैसा वातावरण बनाकर कांग्रेस को और अधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं।
परंतु चुनाव परिणाम आने के बाद पूरे एक सप्ताह तक चले चिंतन-मंथन के बाद कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर अंगड़ाई लेनी शुरू कर दी है। पिछले दिनों संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में जहां सोनिया गांधी को कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुना गया वहीं कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाओं को जारी रखते हुए राहुल गांधी ने भी पार्टी के निराश होते जा रहे कार्यकर्ताओं का उत्साह वर्धन करने की पूरी कोशिश की। पूरा का पूरा कांग्रेस संसदीय दल सोनिया गांधी तथा राहुल गांधी के नेतृत्व में एकजुट नज़र आया। सोनिया गांधी ने जनता के अधिकारों की लड़ाई सड़क से लेकर संसद तक लडऩे का आह्वान किया। उन्होंने देश के उन 12. 5 करोड़ मतदाताओं का भी आभार व्यक्त किया जिन्होंने संसद में कांगेस के 52 सांसद जिताकर भेजे हैं। परंतु प्रश्र यह है कि क्या कांग्रेस पार्टी प्रत्येक स्तर पर भारतीय जनता पार्टी जैसे उस सत्ताधारी संगठन से मुकाबला कर सकती है जिसके पीछे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सहित और भी कई हिंदूवादी कट्टरपंथी संगठन एकजुट होकर खड़े हुए हैं? क्या कांग्रेस पार्टी भारतीय जनता पार्टी के उन हथकंडों का मुकाबला कर सकती है जिनके तहत भाजपा कांग्रेस को एक ऐसी पार्टी प्रचारित करने के षड्यंत्र में काफी हद तक सफल हो जाती है कि कांग्रेस हिंदू विरोधी संगठन है? इतना ही नहीं वह कांग्रेस को हिंदू विरोधी साबित करने के लिए उस पर मुस्लिमों का तुष्टीकरण करने वाले राजनैतिक दल का लेबल भी चिपका देती है। गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी व उसके सहयोगी संगठनों द्वारा 2014 के चुनाव के दौरान कांग्रेस के विरुद्ध सबसे मज़बूती के साथ यही दुष्प्रचार किया गया था कि कांग्रेस पार्टी लक्षित हिंसा विरोधी बिल संसद में पास कराकर हिंदुओं के विरुद्ध साजि़श रच रही है। इसके अतिरिक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस बयान का भी काफी प्रचार किया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि देश की संपदा पर अल्पसंख्यकों का पहला अधिकार है।
दरअसल कांग्रेस की ओर से जो भी इस प्रकार के बयान दिए जाते हैं या नीतियां बनाई जाती रही हैं उनका मकसद किसी धर्म विशेष का तुष्टीकरण नहीं बल्कि यह रहता था कि देश के सर्व समाज में इस बात का एहसास कायम रह सके कि वे सभी इस देश के सम्मानित नागरिक हैं और उनका भी देश पर वैसा ही अधिकार है जैसाकि देश के बहुसंख्य समाज का। दरअसल यह धारणा कांग्रेस पार्टी की नहीं बल्कि महात्मा गांधी के दर्शन से प्राप्त होने वाली धारणा है। परंतु दुर्भाग्यवश गांधी दर्शन की जगह गत् कुछ वर्षों से ‘गोडसे दर्शन’ लेने लगा है। देश के विभिन्न भागों से धर्म आधारित हिंसा के समाचार प्राप्त होते रहते हैं। गांधी जी किसी भी प्रकार की सांप्रदायिक हिंसा के घोर विरोधी थे। अपने जीवनकाल में वे कई बार हिंदुओं के मध्य जाकर मुसलमानों की रक्षा करने तथा मुसलमानों के मध्य जाकर हिंदुओं की रक्षा किए जाने के उपदेश देते रहते थे। अपने इसी उद्देश्य को लेकर धर्म आधारित हिंसा के विरुद्ध उन्हें अनशन भी करना पड़ा। परंतु मानवता के दुश्मन मुस्लिम परस्त तथा हिंदुवादी दल सभी की नज़रों में गांधीजी महज़ इसलिए खटकते रहे कि वे धार्मिक उन्माद के उस विभाजनकारी वातावरण में प्रेम व सद्भाव के बीज क्यों बो रहे हैं? ईश्वर अल्लाह एक ही नाम का संदेश क्यों दे रहे हें? और आखिरकार घोर हिंदूवादी विचारधारा में डूबे एक गिरोह ने सांप्रदायिक विचारधारा के एक प्रतिनिधि नाथू राम गोडसे के हाथों गांधी की हत्या करवा ही डाली।
यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि सर्वघर्म संभाव की धारणा की शुरुआत महात्मा गांधी द्वारा नहीं की गई थी बल्कि महात्मा गांधी स्वयं उस भारतीय दर्शन के हिमायती थे जो न केवल सर्वधर्म संभाव बल्कि विश्व बंधुत्व तथा सर्वे भवंतु सुखिन: की शिक्षा स्हस्त्राब्दियों से देता आ रहा है। गांधी जी हिंदुत्व की उस परिभाषा को भारतीयों के जन-जन में बसाना चाहते थे जो हमें वसुधैव कुटंबकम की शिक्षा देता है। परंतु नाथू राम गोडसे व उसके सभी साथी जो गांधी जी की हत्या में शामिल थे वे सबके सब कट्टरपंथी हिंदूवादी राजनीति के पैरोकार थे। और इसी विचारधारा ने महात्मा गांधी को हिंदुओं का दुश्मन मानकर उनकी हत्या कर डाली। गांधी जी के मुंह से अंतिम समय में निकले शब्द ‘हे राम’ स्वयं इस बात का सुबूत हैं कि महात्मा गांधी वास्तविक रामभक्त थे न कि राम के नाम का सहारा लेकर अपनी राजनैतिक मज़बूती की कोशिश करने वाले नेता। ठीक इसके विपरीत वर्तमान सत्ताधारी दल की पूरी की पूरी बुनियाद ही भगवान राम के सहारे पर खड़ी की गई है। दूसरी ओर इसी के साथ-साथ गोडसेवादी विचारधारा का सिर उठाना भी जारी है। इतना ही नहीं बल्कि गोडसे का ज़बरदस्त तरीके से महिमामंडन भी किया जाने लगा है। गांधी के उस हत्यारे की प्रतिमाएं बनने की खबरें आती रहती हैं। गांधी की हत्या का चित्रण करते हुए वीडियो दिखाई देते हैं। यहां तक की पिछले दिनों हिंदू महासभा ने भारतीय मुद्रा पर प्रकाशित गांधी के चित्र को हटाकर गोडसे का चित्र प्रकाशित करने की मांग तक कर डाली।
ऐसे प्रदूषित राजनैतिक वातावरण में जबकि सत्ताधारी दल दर्जनों हिदूवादी संगठनों को साथ लेकर सत्ता पर काबिज़ होने के साथ-साथ कांग्रेस पर भी हिंदू विरोधी होने का आरोप लगाता रहता है निश्चित रूप से कांग्रेस के समक्ष एक बड़ी व कठिन चुनौती के समान है। परंतु चूंकि हमारा यह देश पीरीे-फकीरों, संतों व ऋषियों-मुनियों के दौर से ही सर्वधर्म संभाव का पालन करने वाला एक धर्मनिरपेक्ष देश रहा है और धर्मनिरपेक्षता भारतीयों के डीएनए में शामिल है। लिहाज़ा कांग्रेस पार्टी को गांधी के उन सौहाद्र्रपूर्ण विचारों को लेकर जनता के मध्य जाना और सफलता हासिल करना मुश्किल तो हो सकता है परंतु असंभव नहीं।

पर्यावरण प्रदूषण के भयावह दुष्परिणाम
योगेश कुमार गोयल
(विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष) इन दिनों भीषण गर्मी समस्त भारत में कहर बरपा रही है। मैदानी इलाकों के साथ-साथ पहाड़ों में भी तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि के रिकॉर्ड टूट रहे हैं। लू और गर्मी की प्रचण्डता का आलम यह है कि जहां हिमाचल, उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्यों में मौसम विभाग द्वारा यैलोअलर्ट जारी किया गया है, वहीं हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र इत्यादि राज्यों में तो रेडअलर्ट जारी किया गया है। राजस्थान के श्रीगंगानगर में तापमान 50 डिग्री के करीब जा पहुंचा और वहां भीषण गर्मी का 75 साल का रिकॉर्ड टूट गया, वहीं चुरू में तापमान 50 डिग्री को भी पार कर गया। लू के थपेड़ों और गर्मी की प्रचण्डता के चलते विभिन्न राज्यों में कई दर्जन लोगों की मौत हो चुकी हैं। एक ओर जहां देशभर में चारों तरफ गर्मी अपना कहर बरपा रही है, वहीं कुछ ही दिनों पहले के मौसम के मिजाज की बात करें तो रोहतांग, लाहौलस्पीति, शिमला, मनाली जैसे ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में भारी बारिश तथा बर्फबारी के चलते उत्पन्न हुई शीतलहर के साथ-साथ दिल्ली सहित आसपास के इलाकों में हुई ओलावृष्टि ने हर किसी को हतप्रभ कर दिया था। निसंदेह यह सब प्रकृति के बिगड़ते मिजाज और बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण के ही भयावह दुष्परिणाम हैं, जिसका खामियाजा हमें बार-बार जान-माल के भारी नुकसान के रूप में चुकाना पड़ रहा है।
देश के कई बड़े शहर इस समय पर्यावरण प्रदूषण के चलते कितनी बुरी तरह हांफ रहे है, यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। पिछले कुछ समय में पर्यावरण संबंधी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अनेक रिपोर्टों में स्पष्ट हो चुका है कि भारत के कई बड़े शहरों में प्रदूषण विकराल रूप धारण कर चुका है और देश की राजधानी दिल्ली तो दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार है। वायु प्रदूषण की दिनों-दिन विकराल होती यही स्थिति हालात को दिन-ब-दिन बद से बदतर बनाने के लिए जिम्मेदार है। चंद माह पहले ही दिल्ली में प्रदूषण की जो भयावह तस्वीर देखी गई थी, वो रोंगटे खड़े कर देने वाली थी, जब यहां की हवा 14 गुना जहरीली दर्ज की गई थी। समय-समय पर दिल्ली तथा आसपास के इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) का स्तर सारी सीमाएं लांघता नजर आता है। पीएम-10 तथा पीएम-2.5 का स्तर भी कई गुना बढ़ जाता है। कड़ाके की ठंड हो या भीषण गर्मी, प्रदूषण का स्तर अब हर समय खतरनाक स्तर पर ही देखा जाता है।
तय मानकों के अनुसार पीएम-10 तथा पीएम-2.5 की मात्रा वातावरण में क्रमशः 100 व 60माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए लेकिन इनका स्तर वातावरण में सदैव कई गुना ज्यादा बना रहता है, जिन्हें नियंत्रित करने के अभी तक के तमाम प्रयास नाकाफी ही साबित हुए हैं। वायु में पीएम-2.5 और पीएम-10 का स्तर बढ़ जाने से यह प्रदूषित वायु फेफड़ों के अलावा त्वचा तथा आंखों को भी बहुत नुकसान पहुंचाती है। प्रदूषित हवा के चलते दिल्ली की हालत तो अक्सर गैस चैंबर सरीखी होती रही है, जहां एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है। हर साल दिल्ली में करीब पांच हजार लोग वायु प्रदूषण के कारण दम तोड़ देते हैं। मेडिकलजर्नल ‘द लांसेट’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक तो भारत में वायु प्रदूषण के चलते प्रतिवर्ष दस लाख से ज्यादा लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं।
कार्बन उत्सर्जन के मामले में दिल्ली दुनिया के 30 शीर्ष शहरों में शामिल है। पहाड़नुमा कूड़े के ढ़ेरों से निकलती जहरीली गैसें, औद्योगिक इकाईयों से निकलते जहरीले धुएं के अलावा सड़कों पर वाहनों की बढ़ती संख्या कार्बन उत्सर्जन का बड़ा कारण है और कहा जाता रहा है कि अगर दिल्ली जैसे अत्यधिक प्रदूषित शहर में वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पाना है तो लोगों को निजी वाहनों का प्रयोग कम कर सार्वजनिक परिवहन को अपनाना चाहिए और साथ ही दिल्ली में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण को बढ़ावा देकर हरियाली बढ़ानी होगी लेकिन इन दिनों दिल्ली में हो क्या रहा है? कैग की एक रिपोर्ट पर नजर डालें तो दिल्ली पहले से ही करीब नौ लाख पेड़ों की कमी से जूझ रही है और दूसरी तरफ शहरीकरण की कीमत पर सरकारी आदेशों पर साल दर साल हजारों हरे-भरे विशालकाय वृक्षों का सफाया किया जा रहा है। पिछले 5-6 वर्षों के दौरान दिल्ली में नए आवासीय परिसर, भूमिगत पार्किंग, व्यापारिक केन्द्र खोलने और मार्गों को चौड़ा करने के लिए करीब बावन हजार छायादार वृक्षों का अस्तित्व मिटाया जा चुका है और इन्हीं पांच वर्षों के प्रदूषण के आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि इस दौरान हरियाली घटने से दिल्ली में वायु प्रदूषण करीब चार सौ फीसदी बढ़ा है।
कैग की रिपोर्ट के अनुसार 2015-17 के बीच दिल्ली में 13018 वृक्ष काटे गए थे और उसके बदले 65090 पौधे लगाए जाने थे किन्तु लगाए गए मात्र 21048 पौधे और इनमें भी बहुत सारे सजावटी पौधे लगाकर खानापूर्ति कर दी गई। पेड़ों को काटने के बदले जो पौधे लगाए जाते हैं, उनमें से महज दस फीसदी ही बचे रह पाते हैं और ये छोटे-छोटे पौधे प्रदूषण से निपटने तथा वातावरण को स्वच्छ बनाए रखने में मददगार साबित नहीं होते। मौसम चक्र तेजी से बदल रहा है, जलवायु संकट गहरा रहा है और इन पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने का एक ही उपाय है वृक्षों की अधिकता। वायु प्रदूषण हो या जल प्रदूषण अथवा भू-क्षरण, इन समस्याओं से केवल ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाकर ही निपटा जा सकता है।
ऊंचे और पुराने वृक्ष काटे जाने से दिल्ली में पक्षियों की 15प्रजातियों का जीवन भी खतरे में है। दरअसल दिल्ली में स्पॉटेडआउलेट, कॉपरस्मिथबारबेट, ब्राउनहेडेडबारबेट, अलेवजेंडरपैराकीट, रोडविंगपैराकीट, ग्रेटरप्लेनबैकवुडपैकर, ग्रेहॉर्नबिल, ब्लैक काइट, ब्लैक शोल्डरकाइट, एशियनपैराडाइजफ्लाईकैचर इत्यादि पक्षियों की 15प्रजातियां ऐसी हैं, जो ऊंचे दरख्तों पर घोंसला बनाते हैं और अपने खान-पान तथा रहन-सहन की आदतों के चलते ऊंचे पेड़ों पर ही रहना पसंद करते हैं, इनमें कुछ प्रजातियां दुर्लभ पक्षियों की भी हैं। ऐसे ऊंचे वृक्ष काटे जाने से इन पक्षियों का घर भी उजड़ता है और पक्षी विज्ञानियों का कहना है कि ऊंचे दरख्तों की कमी की वजह से पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली पक्षियों की कई प्रजातियां दिल्ली का रूख करने से कतराने लगी हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी हाल ही में अपनी एक टिप्पणी में कहा है कि दिल्ली कभी पक्षियों की आबादी को लेकर मशहूर हुआ करती थी किन्तु आज स्थिति विपरीत है, पेड़-पौधों व पक्षियों के लिए यहां जगह कम होती जा रही है।
सुखद स्थिति यह है कि आम जन में पर्यावरण संरक्षण और वृक्षों के महत्व को लेकर जागरूकता आने लगी है, जो पिछले दिनों उत्तराखण्ड के करीब पांच दशक पुराने चिपको आन्दोलन की तर्ज पर दिल्ली में भी देखने को मिली थी, जब पेड़ों से चिपककर लोगों ने इन्हें जीवनदान देने के लिए आन्दोलन शुरू किया और सरकार को हजारों पेड़ काटने का अपना आदेश वापस लेना पड़ा। इन तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि दिल्ली में यहां की आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से नौ लाख पेड़ों की कमी है और यहां स्वस्थ जीवन के लिए प्राणवायु अब बहुत कम बची है। स्वच्छ प्राणवायु के अभाव में लोग तरह-तरह की भयानक बीमारियों के जाल में फंस रहे हैं, उनकी प्रजनन क्षमता पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है, उनकी कार्यक्षमता भी इससे प्रभावित हो रही है। कैंसर, हृदय रोग, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का संक्रमण, न्यूमोनिया, लकवा इत्यादि के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा इन बीमारियों के इलाज पर ही खर्च हो जाता है।

कांग्रेस का मौन “असत्याग्रह”
गोविन्द मालू
कहते हैं, कि “नादां की दोस्ती जी का जंजाल” राहुल और उनकी टीम पर यह कहावत सही चरितार्थ होती है। सेंसरशीप की पक्षधर, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की विरोधी कांग्रेस के लिए अपने प्रवक्ताओं पर एक माह की वाणी का उपवास करवाने का तुगलकी निर्णय तुगलक रोड पर रहने का परिणाम तो है, ही और जरा भी आश्चर्यजनक नहीं है।
वैसे “कांग्रेस” जो निर्णय ले ये उनका आतंरिक मामला है, लेकिन लोकतंत्र के तकाजों से दूर रहकर पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर करने से कोई राजनैतिक दल कैसे जिंदा रह सकता है। उसे तो अपना विघटन कर गांधीजी की “लोक सेवा संघ”बनाने की इच्छा को पूरा कर ही देना चाहिए। जनता ने तो उन्हें यह जनादेश दे ही दिया है।
वैसे भी अब ज्यादा कुछ बोलने को बचा नहीं, और जो बोलने वाले थे उन्हें जिम्मेदारी से वंचित कर पहले से ही दूर कर दिया गया। गुणवत्ता की कमी सत्ता में तो चल जाती है, लेकिन विपक्ष में काम करना पड़ता है। जो आरामतलबी और जी हुजूरी की शिकार कांग्रेस को रास नहीं आ सकता।
विद्वत्ता और मूर्खता के बीच तर्क और गोली का अंतर है। विपक्ष में रहते हुए भी तर्क सहित बातों को अध्ययन और जनता के मूड के हिसाब से बोला जा सकता है। लेकिन ऐसे लोग हमेशा कांग्रेस संगठन में उपेक्षित होते रहे,रही सही बेचारी प्रियंका चतुर्वेदी, बहन प्रियंका के आते ही रुखसत हो गई या कर दी गई ?
यही कांग्रेस का कुनबा है,शेखचिल्ली की बारात है !
अब बोलें भी तो क्या बोलें कब तक मुंहजोरी – सीनाजोरी करते रहें और फिर आयकर छापों का तुगलक रोड के साथ कनेक्शन उठते ही कांग्रेस नेता बैचेन हैं, कि क्या बोलें,कैसे बचें। मीडिया तो ठीक, सोशल मीडिया पर भी कांग्रेस के नेता आरोप लगा-लगा कर कोस रहे हैं, कि भाजपा ने अनाप-शनाप सोशल मीडिया केम्पेन पर खर्च किया, इससे चुनाव का माहौल मोदीमय हो गया और राहुल बाबा की टीम हार गई।
यह अल्पज्ञान का सबसे बड़ा उदाहरण है,जो मैदान खाली,उन्मुक्त और स्वतंत्र है। उस पर खेलने की क्षमता चाहिए, खेल नहीं पाओगे और हारने का दोष मत्थे मढ़ोगे यह कैसे चलेगा ,गले उतरने वाली बात ही चर्चा में दूर तलक जाती है।
एक तो जमीनी लड़ाई लड़ने की शक्ति, आदत और तरीका नहीं है। दूसरा कम से कम अपनी बात कहने और नेताओं को चर्चा में दिखने-दिखाने का जो अवसर था। वह भी R.G. की टीम ने उनके प्रवक्ताओं से छीनकर बेरोजगार बना दिया। भाजपा को अपनी बात कहने के लिए और ज्यादा समय देने के लिए धन्यवाद ।
लेकिन कांग्रेस को यह भरम नहीं होना चाहिए कि उनके डिबेट में शिरकत न करने से चैनल बंद हो जाएँगे, या इस नई राह के ब्याह में रूठी हुई बूआ को कोई मनाने जाएगा। शोर-शराबे को अभिशप्त कांग्रेस का यह “मौन असत्याग्रह” है। डूबना अच्छा है,लेकिन किनारे पर बैठकर सूखना बुरा है।

चुनौतियों का चक्रव्यूह : नई सरकार, चुनौतियाँ हजार……!
ओमप्रकाश मेहता
आज देश में कितनी विसंगतिपूर्ण स्थिति है, एक सत्तारूढ़ पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष अपना पद छोड़कर मंत्री नही बनना चाहता तो दूसरी राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष अपने पद पर बने रहने को तैयार नहीं? भारतीय राजनीति का यही मौजूदा आईना है, देश में मोदी जी की सरकार पुनः स्थापित होने से जहां राजनीति का एक वर्ग हर्षोल्लास में डूबा है तो राजनीति का दूसरा वर्ग चुनाव में हारने का ‘सूतक’ पाल रहा है। इस तरह कुल मिलाकर इन दिनों देश का राजनीतिक माहौल एक अजीब स्थिति में पहुंच गया है, आज एक ओर जहां शपथ-ग्रहण जैसे संवैधानिक कार्य में भी राजनीति का प्रवेश कराया जा चुका है तो दूसरी ओर प्रतिपक्ष सभी राजनीतिक मान-मर्यादाओं को खंूटी पर टांग कर अपने मूल दायित्व से विमुख होता जा रहा है। खैर, यह तो देश के राजनीतिक माहौल का जिक्र हुआ, अब यदि देश में फिर से सत्तारूढ़ हुई मोदी सरकार की बात करें तो अब उसके सामने चुनाव से भी बड़ी चुनौतियां मुंह बाये खड़ी है, इसमें कोई दो राय नहीं कि विश्व के इस सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देश में यहां के वोटरों ने एक अजीब उदाहरण पेश किया, न तो भारतीय जनता पार्टी की इस सरकार ने अपने पांच वर्षीय शासनकाल में अपने चुनावी वादे पूरे किए और अपने घोषणा-पत्र की पूर्ति पर ही विशेष ध्यान दिया, उल्टे नोटबंदी व जीएसटी जैसे पीड़ा दायक कदम उठाए, और जब चुनाव आया तो राष्ट्रवाद और सैना के शौर्य के बलबूते पर वोट बटौरने की कौशिश की, यह बिल्कुल भी संभव नहीं था यदि मोदी जैसे निष्कपट, ईमानदार व नेक प्रधानमंत्री नहीं होते, कुल मिलाकर यदि यह कहा जाए कि देश में भारतीय जनता पार्टी नहीं, बल्कि मोदी जीते है तो कतई गलत नहीं होगा, फिर मोदी जी के भाग्य को पर उस समय भी लग गए जब सामने प्रतिपक्ष जैसी कोई मजबूत दीवार भी नहीं रही, कांग्रेस बचकाने हाथों में खेलती रही और शेष प्रतिपक्षी दल अपनी क्षैत्रीय सीमा तक सीमित रहे, अब ऐसे विकल्प के अभाव में देश का आम वोटर करता भी क्या? जो विकल्प सामने था, उसका ही वरण कर लिया और पांच साल के लिए अपना भाग्य भी सौंप दिया। अब यह मोदी जी के सामने है कि वे देश को किस डगर पर ले जाए।खैर, जो भी हो, देश में फिर से मोदी जी की सरकार बन ही बई, पांच साल पहले जब पहली बार मोदी जी प्रधानमंत्री बने थे तब उनके सामने दस वर्षीय कांग्रेसी शासन के कथित कचरे को साफ करने की चुनौति थी, इस दौरान मोदी जी ने चाहे डेढ़ सौ से अधिक देशों की यात्राएँ कर देश के विश्व के अन्य देशों से सम्बंध ठीक करने का अभियान चलाया हो, किंतु देश वही खड़े रहने को मजबूर रहा, जहां वो पांच साल पहले खड़ा था, अर्थात् समस्याएँ व चुनौतियाँ यथावत रही, और अब इस बार मोदी जी को अपने ही पांच साला कार्यकाल की समीक्षा करनी है और यहां व्याप्त गंभीर चुनौतियों से रूबरू होना है। आज देश में चारों ओर चुनौतियाँ नजर आ रही है, फिर वह चाहे बेरोजगारी की चुनौति हो या किसानों की, या कि महंगाई की, ये चुनौतियां कोई आज की नई नहीं है, ये पहले भी थी, जिन पर पिछले पांच सालों में ध्यान नहीं दिया गया। पिछले अर्थात् 2014 के चुनाव के समय प्रतिवर्ष दो करोड़ अर्थात् पांच साल में दस करोड़ युवाओं को नौकरी देने का वादा किया गया था, किंतु यह वादा कुछ लाख तक सिमट कर रह गया। यही स्थिति किसान की है, पिछले पांच सालों में पांच लाख से अधिक किसानों ने कर्जा नहीं चुका पाने के कारण आत्म हत्याएं की, इनके कर्जे माफ करने की भी कई बार घोषणाऐं की गई, किंतु यह आत्म हत्याओं का सिलसिला आज भी जारी है।
आज नई सरकार के सामने सबसे अहम् चुनौति देश को आर्थिक विषमता के समुद्र से उबारने की है, देश में मंदी जहां सबसे ऊँचाई पर है, वहीं देश की राष्ट्रीयकृत बैंकों की हालत अत्यंत गंभीर हो गई क्योंकि बैंकों का लाखों करोड़ रूपया या तो उद्योगपति बटौर कर विदेश भाग गया कर्जा न किसान ने चुकाया न सरकार ने, भारतीय मुद्रा का अब मूल्यन अलग इस सरकार के सामने चुनौति बना हुआ है। इसके साथ आए दिन घटती-बढ़ती जीडीपी दरें सरकार का सबसे बड़ा ‘सिरदर्द’ है। फिर निर्यात क्षेत्र की मंदी पर भी ध्यान देना जरूरी हो गया है। जब तक इन प्रमुख मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया जाता तब तक आर्थिक वृद्धि दर में सुधार की कल्पना भी नही की जा सकती।
इस प्रकार कुल मिलाकर यदि यह कहा जाए कि देश के हर क्षेत्र में सरकार के सामने चुनौतियों का अम्बार है, तो कतई गलत नहीं होगा विशेषकर यदि सरकार प्राथमिकता के आधार पर आर्थिक, बेरोजगारी और किसानों से जुड़ी चुनौतियों पर ही कुछ सार्थक कदम उठाकर इनसे निपटना शुरू करें तो देश की ही नहीं इस सरकार की भी इसमें भलाई है।

इस मंत्रिमंडल के अर्थ
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल का यह शपथ-समारोह अपने आप में एतिहासिक है, क्योंकि यह ऐसा पहला गैर-कांग्रेसी मंत्रिमंडल है, जो अपने पहले पांच साल पूरे करके दूसरे पांच साल पूरे करने की शपथ ले रहा है। पिछले शपथ-समारोह से यह इस अर्थ में भी थोड़ा भिन्न है कि इसमें दक्षेस (सार्क) की बजाय ‘बिम्सटेक’ सदस्य-राष्ट्रों के प्रतिनिधि आए हैं। इसके कारण हमारे तीन पड़ौसी देशों की उपेक्षा हो गई। मालदीव, पाकिस्तान और अफगानिस्तान! मेरी राय यह थी कि दक्षेस और बिम्सटेक के अलावा अन्य पड़ौसी राष्ट्रों को भी बुलाया जाता तो बेहतर होता। ऐसे पड़ौसी राष्ट्र, जो भारत को महाशक्ति और महासम्पन्न बनाने में विशेष सहायक हो सकते हैं। शपथ-समारोह इतने कम समय में आयोजित हुआ है कि शायद इतने राष्ट्रों को एक साथ बुलाना संभव नहीं था। खैर, इस नए मंत्रिमंडल के शपथ-समारोह में मुझे यह भी अच्छा लगा कि राजनाथसिंह, अमित शाह और नितिन गडकरी की वरिष्ठता को यथोचित्त रखा गया। इन लोगों के बीच सुषमा स्वराज और अरुण जेटली को बैठा न देखकर मुझे दुख हो रहा है। सुषमा और अरुण, दोनों अपने स्वास्थ्य के कारण बाहर रहने को मजबूर हुए हैं। यह इस नए मंत्रिमंडल के लिए घाटे का सौदा है। स्वर्गीय पर्रिकर और अनंतकुमार की भी याद ताजा हुई। अमित शाह को मंत्री बनाकर मोदी ने अनौपचारिक उप-प्रधानमंत्री का पद कायम कर दिया है। जैसे अटलजी और आडवाणीजी की जुगल-जोड़ी ने काम किया, उससे भी बेहतर काम यह नरेंद्र भाई और अमित भाई की भाई-भाई जोड़ी काम करेगी। डाॅ. जयशंकर को मंत्री बनाकर मोदी ने अपनी विदेशनीति को नई धार देने की कोशिश की है। जयशंकर चीन और अमेरिका में हमारे राजदूत रह चुके हैं और विदेश सचिव भी रहे हैं। उनके पिता स्वर्गीय के. सुब्रहमण्यम भारत के माने हुए रणनीति-विशेषज्ञ रहे हैं। कुछ पूर्व मुख्यमंत्रियों की भी इस बार मंत्रिमंडल में जोड़ा गया है, इससे केंद्र सरकार को उनके अनुभव का लाभ तो मिलेगा ही, उन-उन प्रांतों में भी भाजपा का जनाधार भी बढ़ेगा। इस नए मंत्रिमंडल में कई पुराने मंत्रियों को बरकरार रखा गया है। जाहिर है कि ज्यादातर मंत्रियों ने अपना काम ठीक-ठाक किया है। जैसे कई कांग्रेसी सरकार के मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे, वैसे आरोप मोदी मंत्रिमंडल के सदस्यों पर नहीं लगे। आशा है कि मोदी सरकार की इस दूसरी अवधि में भी इस मंत्रिमंडल के सदस्यों का आचरण विवादों के परे रहेगा। इस मंत्रिमंडल में कई नए सदस्यों को भी जोड़ा गया है। इनमें से कुछ भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रहे सांसद भी मंत्री बने हैं। यह भी भाजपा के जनाधार को बढ़ाने में मदद करेगा। इस मंत्रिमंडल में महिलाओं और अहिंदी प्रांतों के सांसदों को काफी स्थान मिला है। यह भाजपा के लिए ही नहीं, संपूर्ण भारत के लिए शुभ-संकेत है। देश की जनता को सरकार, नौकरशाही, पुलिस और फौज से ज्यादा जोड़नेवाली ताकत कोई होती है तो वह एक अखिल भारतीय राजनीतिक पार्टी होती है। यह काम जो कांग्रेस करती रही, अब वही भाजपा करती दिखाई पड़ रही है। एक मजबूत पार्टी और मजबूत सरकार भारत को अगले पांच साल में विश्व-स्तरीय शक्ति बना सकती है।

मध्य प्रदेश सरकार पर संकट के बादल !
डॉक्टर अरविन्द जैन
जब कोई राजा चक्रवर्ती बनने निकलता हैं तो उसे सत्ता का मद इतना अधिक हो जाता हैं की वह समझ नहीं पाता कि क्या अन्याय हैं और क्या न्याय। इसी प्रकार अश्वमेघ यज्ञ के समय लवकुश ने अपने पिता के अश्व को बंधक बना लिया था। जब कोई भी राजा या जुआरी जीत हासिल करने लगता हैं, उस समय जीत के जोश में होश भी खोने लगता हैं और यह स्वाभाविक प्रक्रिया और गुण होते हैं ,जबकि जीतने और हारने वाले दया के पात्र होते हैं और पराधीन भी होते हैं और कटु सत्य कहें तो वे भिखारी या याचक होते हैं ,क्योकि वे घर घर वोट मांगने जाते हैं और हमेशा दाता का हाथ ऊपर होता हैं और याचक का हाथ नीचे होता हैं।
जबतक नयी सरकार का गठन नहीं हो पाता तब तक मध्य प्रदेश सरकार वेंट्रिलेटर या कृतिम सांस पर जी रही हैं और जिस दिन नव गठित केंद्र सरकार ने नजर फेरी उसी दिन से कर्णाटक और मध्य प्रदेश सरकार का अंत होना निश्चित हो जाएगा। उसका कारण कांग्रेस सरकार बहुमत के करीब हैं और कुछ निर्दलीय जिनका ज़मीर होता है या नहीं वह सुविधा शुल्क पर डिपेंड करता है। वर्तमान में प्रदेश सरकार अपने वादों को पूरा करने में सफल नहीं हो पा रही हैं उसके लिए आचार संहिता का रोड़ा रहा और अब केंद्र सरकार के इशारों पर सत्ता परिवर्तन के लिए उनके पास धनबल, जनबल और भयबल का इतना अधिक प्रभाव रहेगा कि कांग्रेस उनको नहीं सम्हाल पाएंगी और इसी समय मंत्री मंडल का गठन और परिवर्तन होने से असंतुष्ट विधायक पाला बदलने में कोई देरी नहीं करेंगे। उनको पार्टी से प्रिय सत्ता सुख होता हैं। सत्ता के लिए वे किसी भी स्तर तक जा सकते हैं। इस मामले में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के विधायकों का चरित्र समान हैं।
वर्तमान में कांग्रेस आला कमान में अस्थिरता का दौर चल रहा है और मेढकों का तोलना सरल नहीं होता। हमारे देश में नेताओं का चरित्र किसी से छिपा नहीं है। ,चंद चांदी के टुकड़ों में बिकने वाले और उनकी चमड़ी इतनी मोटी होती हैं और बेशरमी कूट कूट के भरी हैं कि उनको पाला बदलना बहुत सामान्य बात हैं ,जब सीट न मिलने पर पार्टी बदली तो पद मिलने पर वे अपनी बल्दियत तक बदल सकते हैं।
प्रदेश सरकार वर्तमान में लोकसभा चुनाव में पराजय के कारण चिंतित के साथ पशोपेश में है। मुख्य मंत्री का मंत्री परिषद् में आमूल चूल परिवर्तन उनके पद को न ले डूबे, कई धड़े उनसे अप्रसन्न हैं और उन्होंने यदि इसमें कोई भूल या गलती की तो आतंरिक बगावत होना सुनिश्चित है ,कारण जब शेर नरभक्षी हो जाता है तब उसे घास फूस अच्छा नहीं लगता।
चुनाव हारना या जीतना व्यक्तिगत और सामूहिक उत्तरदायित्व होता हैं, जब जीतते हैं सब उसका श्रेय लेते हैं और हारने में किसी न किसी पर लांक्षन लगाते हैं। यह समय आत्म निरीक्षण का हैं और सब अपने अपने कर्मों के हिसाब से फल भोगना होता है ,उगते सूरज को सब नमस्कार करते हैं पर अभी भी निराशा की जरुरत नहीं हैं।
मध्य प्रदेश में संख्या बल के कारण अस्थिरता बन सकती हैं और केंद्र के इशारे से सब कुछ होना संभव हैं। यह समय कमलनाथ सरकार के लिए संक्रमण काल है। इस समय बहुत सम्हाल कर कदम उठाने की जरुरत है अन्यथा सत्ताच्युत होना कोई कठिन नहीं हैं। इतिहास अपनी पुनरावृत्ति खुद करता है।

तंबाकू का निषेध अति आवश्यक है
(प्रो.शरद नारायण खरे)
(विश्व तंबाकू निषेध दिवस 31मई पर विशेष) पूरे विश्व के लोगों को तंबाकूमुक्त करनेे और स्वस्थ बनाने के लिये तथा स्वास्थ्य के सभी खतरों से बचाने के लिये तंबाकू चबाने या धूमपान के द्वारा होने वाली सभी परेशानियों और स्वास्थ्य जटिलताओं से लोगों को आसानी से जागरुक बनाने के लिये पूरे विश्व भर में एक मान्यता-प्राप्त कार्यक्रम के रुप में मनाने के लिये विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा पहली बार विश्व तंबाकू निषेध दिवस को आरम्भ किया गया।
रोग और इसकी समस्याओं से पूरी दुनिया को मुक्त बनाने के लिये डबल्यूएचओ द्वारा विभिन्न दूसरे स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं जैसे एड्स दिवस, मानसिक स्वास्थ्य दिवस, रक्त दान दिवस, कैंसर दिवस आदि। बहुत ही महत्वपूर्ण ढंग से पूरी दुनिया में सभी कार्यक्रम आयोजित और मनाये जाते हैं। इसे पहली बार 7 अप्रैल 1988 को डबल्यूएचओ की वर्षगाँठ पर मनाया गया और बाद में हर वर्ष 31 मई को तंबाकू निषेध दिवस के रुप में मनाने की घोषणा की गयी। डबल्यूएचओ के सदस्य राज्यों के द्वारा वर्ष 1987 में विश्व तंबाकू निषेध दिवस के रुप में इसका सृजन किया गया था।
पूरे विश्व से किसी भी रुप में तंबाकू का सेवन पूरी तरह से रोकने या कम करने के लिये लोगों को बढ़ावा देने और जागरुकता के विचार से इसे मनाया जाता है। दूसरों पर इसकी जटिलताओं के साथ ही तंबाकू इस्तेमाल के नुकसानदायक प्रभाव के संदेश को फैलाने के लिये वैश्विक तौर पर लोगों का ध्यान खींचना इस उत्सव का लक्ष्य है। इस अभियान में कई वैश्विक संगठन शामिल होते हैं जैसे राज्य सरकार, सार्वजनिक स्वास्थ्य संगठन आदि विभिन्न प्रकार के स्थानीय लोक जागरुकता कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
निकोटीन की आदत स्वास्थ्य के लिये बहुत हानिकारक है जो कि जानलेवा होता है और मस्तिष्क “अभावग्रस्त” रोग के रुप में जाना जाता है जो कभी भी उपचारित नहीं हो सकता है हालाँकि पूरी तरह से गिरफ्तार किया जा सकता है। दूसरे गैर-कानूनी ड्रग्स, मेथ, शराब, हीरोइन आदि की तरह ये मस्तिष्क डोपामाइन पथ को रोक देता है। दूसरी उत्तरजीविता क्रियाएँ जैसे खाना और पीने वाले भोजन और द्रव की तरह शरीर के लिये निकोटीन की जरुरत के बारे में गलत संदेश भेजने के लिये ये दिमाग को तैयार करता है।
उनके जीवन को बचाने के लिये धरती पर पहले से इस्तेमाल करने वालो की मदद के लिये स्वास्थ्य संगठनों के द्वारा विभिन्न प्रकार के निकोटीन की लत छुड़ाने के तरीके उपलब्ध हैं। “तंबाकू मुक्त युवा” के संदेश अभियान के द्वारा और 2008 का विश्व तंबाकू निषेध दिवस को मनाने के दौरान इसके उत्पाद या तंबाकू के प्रचार, विज्ञापन और प्रायोजन को डबल्यूएचओ ने प्रतिबंधित कर दिया है।
डबल्यूएचओ एक मुख्य संस्था है जो पूरे विश्व में विश्व तंबाकू निषेध दिवस को आयोजित करने के लिये एक केन्द्रिय हब के रुप में कार्य करती है। तंबाकू उपभोग को घटाने में इस अभियान के लिये पूरी सक्रियता और आश्चर्यजनक रुप से अपना योगदान देने वाले विभिन्न संगठनों और व्यक्तित्वों को बढ़ावा देने के लिये डबल्यूएचओ द्वारा 1988 से पुरस्कार समारोह भी आयोजित किया जाता है जो इस पुरस्कार समारोह के दौरान किसी भी देश और क्षेत्र के संगठनों और व्यक्तियों को खास अवार्ड और पहचान सर्टिफिकेट प्रदान किया जाता है।
विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाये जाने का इतिहास –
तंबाकू या इसके उत्पादों के उपभोग पर रोक लगाने या इस्तेमाल को कम करने के लिये आम जनता को बढ़ावा और प्रोत्साहन देने के लिये पूरे विश्व भर में विश्व तंबाकू निषेध दिवस को मनाना मुख्य लक्ष्य है क्योंकि ये हमें कुछ घातक बीमारियों की ओर अग्रसर करता है जैसे (कैंसर, दिल संबंधी समस्याएँ) या मृत्यु भी हो सकती है। देश के विभिन्न क्षेत्रों से व्यक्ति, वैश्विक सफलता प्राप्ति के लिये अभियान मनाने में बहुत ही सक्रियता से गैर-लाभकारी और सार्वजनिक स्वास्थ्य संगठन भाग लेते हैं तथा विज्ञापन बाँटने में शामिल होते हैं, नयी थीम और तंबाकू इस्तेमाल या इसके धुम्रपान संबंधी उत्पादों के बुरे प्रभावों से संबंधित जानकारी पर पोस्टर की प्रदर्शनी की जाती है।
अपने उत्पादों के उपभोग को बढ़ाने के लिये इसके उत्पाद या तंबाकू के खरीद, बिक्री या कंपनियों के विज्ञापन पर भी लगातार ध्यान देने का इसका लक्ष्य है। अपनी मुहिम को असरदार बनाने के लिये, डबल्यूएचओ विश्व तंबाकू निषेध दिवस से संबंधित वर्ष के एक विशेष थीम को बनाता है। पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त बनाने के साथ ही विश्व स्तर पर तंबाकू के उपभोग से बचाने के लिये सभी प्रभावशाली कदम की वास्तविक जरुरत की ओर लोगों और सरकार का ध्यान खींचने में ये कार्यक्रम एक बड़ी भूमिका निभाता है।
विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर कथन–
“तंबाकू छोड़ना इस दुनिया का सबसे आसान कार्य है। मैं जानता हूँ क्योंकि मैंने ये हजार बार किया है।”- मार्क तवैन
“तंबाकू मारता है, अगर आप मर गये, आप अपने जीवन का बहुत महत्वपूर्ण भाग खो दें