आलेख 21

भाजपा-सत्ता का मद: काँग्रेस गिरती साख…..!
ओमप्रकाश मेहता
देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी अभी अपनी उम्र के चार दशक भी पूरे नहीं कर पाई और अपनी परम्परागत अस्मिता खो बैठी, क्योंकि अब यह जन-जन की नहीं बल्कि मात्र दो हस्तियों की पार्टी बनकर रह गई है, वही देश की सबसे पुरानी अर्थात् 130 साल की उम्र वाली कांग्रेस अब अपनी चमक छोड़कर अस्ताचलगामी हो रही है। जहां तक देश की शेष पार्टियों का सवाल है, वे क्षेत्रीय होकर रह गई है। अब ऐसी स्थिति में पूरा देश यह तय नहीं कर पा रहा है कि आखिर वह किसके साथ जाए? एक तरफ एकाधिकारी व अहंकारी भारतीय जनता पार्टी है, तो दूसरी ओर नेतृत्व विहिन तथा दिग्भ्रमित स्थिति वाली कांग्र्रेस….? इसीलिए पिछले लोकसभा चुनावों के समय रसातल जाती कांग्रेस को छोड़ झूठी आशाऐं जगाने वाली भाजपा का साथ दिया और कांग्रेस को दुर्दिन देखने को मजबूर होना पड़ा। किंतु अब ऐसा महसूस किया जा रहा है कि कांग्रेस अपने लिए ‘संजीवनी’ ढूंढ़ने में भी सक्षम प्रतीत नहीं हो रही है और राहुल की जिद और पार्टी की गिरती साख के बीच फंसी है, इसे इस स्थिति से उबारने के कोई सार्थक प्रयास भी नहीं हो रहे हैं।
जहाँ तक भारतीय जनता पार्टी का सवाल है, उसके दोनों मुख्य आकाओं (नरेन्द्र मोदी व अमित शाह) का एक ही मुख्य ध्येय है, वह देश की जनता की सेवा नहीं बल्कि पूरे देश का ‘चक्रवर्ती राजा’ बनना, अर्थात् देश के सभी राज्यों व केन्द्र पर राज करना और इस उद्देश्य की चमक में ये दोनों नेता पार्टी की साख, बुजुर्गों का सम्मान, पार्टी के संस्कार आदि सब कुछ भूल गए और अहंकारी सम्राट की तरह अपनी मनमर्जी देश पर थोपने लगे। आज देश के इन दोनों कर्णधारों देशवासियों के सुख-दुख या कल्याण की कोई चिंता नहीं है, चिंता है तो सिर्फ अपना ‘वोट बैंक’ बढ़ाने की, इसीलिए जनकल्याण पर खर्च होने वाला पैसा मदरसों और मुस्लिम छात्रों की छात्रवृत्ति पर खर्च करने की योजना है। आज एक ओर जहां भावी बजट को लेकर देश के अर्थशास्त्रियों से राय लेने का दिखावा किया जा रहा है, वहीं वास्तविक बजट ‘वोट बैंक’ का बनाया जा रहा है। क्योंकि देशवासियों को पिछले पांच साल का अच्छा-खासा यह अनुभव है कि 2014 में चुनाव के समय कितने वादे किए गए थे और उनमें से कितनों को जुमलों में बदल दिया गया? इसलिए अब 2019 में चुनाव के समय इन आधुनिक भाग्यविधाताओं द्वारा किए गए वादों की पूर्ति पर भी कोई भरोसा नहीं है। क्योंकि इन हस्तियों को आज की नहीं, 2024 की चिंता सताने लगी है, ये 2024 तक देश के ‘चक्रवर्ती सम्राट’ बन जाने का सपना जो देख रहे है? अपनी इसी चमक के पीछे इन हस्तियों ने पार्टी के परम्परागत उसूलों को भी धुमिल कर दिया है, जिसका ताजा उदाहरण ‘‘एक व्यक्ति-एक पद’’ का सिद्धांत है। इस सिद्धांत की हत्या की सीमा भाजपाशासित राज्यों तक पहुंच गई है, क्योंकि कई राज्यों में एक नेता दो पदों पर विराजित है। वैसे अतीत में इस पार्टी की पहचान इसमें व्याप्त अनुशासन व इसके चाल-चरित्र व चेहरे के कारण थी, किंतु अब इसमें न अनुशासन रहा और न इसका चाल, चरित्र व चेहरा चमकीला रहा। यह अब केवल ‘आत्ममुग्धा’ बनकर रह गई है, जिसके चालू भाषा में ‘‘अपने मूंह मियां मिट्ठू’’ कहा जाता है। इस पार्टी के चर्चित क्रियाकलापों में से सबसे चर्चित क्रियाकलाप बुजुर्गों का अपमान रहा। पार्टी के दो वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आड़वानी और डाॅ. मुरली मनोहर जोशी मौजूदा नेतृत्व के शिकार है।
ण्थी, आज सब कुछ खोने के बाद जो पद छोड़ने की जिद राहुल भाई कर रहे है, काश यह जिद उन्होंने पहली बार पद सौंपे जाने के समय की होती तो आज पार्टी का चेहरा कुछ अलग ही नजर आता। किंतु यहां दुःख का विषय यह है कि अभी भी कांग्रेस के दिग्गज अशोक गेहलोद जैसे गए-गुजरे चेहरे को पार्टी का नेतृत्व सौंपने की तैयारी कर रहे है, जबकि डाॅ. मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी व गुलामनबी आजाद जैसे अनेक अनुभवी चेहरे पार्टी में विद्यमान है, या फिर किसी युवा उभरते व्यक्तित्व के हाथों में पार्टी की कमान सौंप देनी चाहिए, जो बुजुर्गों से अनुभवी सलाह लेकर नए जोश से पार्टी की पुरानी साख को पुनः स्थापित कर सके। कांग्रेस के पुरोघाओं को यह कार्य प्राथमिकता से करना होगा क्योंकि पार्टी केन्द्र के बाद राज्यों में भी तेजी से अपनी साख खोजी जा रही है।

44 साल बाद घोषित और अघोषित आपातकाल की यादें
सनत जैन
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। आज से 44 साल पहले भारत में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की थी। लगभग 18 माह तक आपातकाल की छाया में भारत के नागरिकों ने शासन व्यवस्था को देखा आपातकाल के दौरान नागरिकों के सभी मूलभूत अधिकार खत्म कर दिए गए थे। विपक्षी राजनेताओं, ट्रेड यूनियन के नेताओं और छात्र संगठन से जुड़े पदाधिकारियों को आपातकाल में ‎बिना मुकदमा जेल भेज दिया गया था। अखबारों में सेंसरशिप लगा दी गई थी, जिसके कारण लगभग 18 माह तक लोगों के मौलिक अधिकार और विचारों की स्वतंत्रता लगभग लगभग समाप्त हो गई थी। 2019 में अब अघोषित आपातकाल जैसी स्थितियां होने की बात कही जा रही है। घोषित और अघोषित आपातकाल को लेकर यदि चर्चाएं हो रहे हैं, तो इसमें निश्चित रूप से कुछ ना कुछ समानताएं तो होंगी ही।
1971 में भारत-पाक के बीच युद्ध हुआ था। इस युद्ध के बाद बांग्लादेश का गठन हुआ। हजारों पाकिस्तानी सैनिकों का समर्पण कराया गया, लाखों बांग्लादेशी नाग‎रिक बांग्लादेश की सीमा पार करके भारत आ गए थे। उन्हें शरणार्थी के रूप में सरकार को रखना पड़ा। आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई थी, जिसके कारण 1973 से 1975 के बीच इंदिरा गांधी के खिलाफ देश भर में एक राजनीतिक असंतोष पनपा था। महंगाई के खिलाफ आम जनता नाराज थी। इसी दौरान जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति के आव्हान पर सभी विपक्षी दल एकजुट होकर सरकार के विरोध में खड़े हो गए थे।
1971 के लोकसभा के आम चुनाव में इंदिरा गांधी ने रायबरेली से राजनारायण को चुनाव हराया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के चुनाव को 12 जून 1975 को अवैध घोषित कर दिया था। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की चुनावी सभा में जो बिजली उपयोग की गई थी, वह सरकारी खर्च पर थी तथा उनके साथ उनके निजी सचिव साथ थे इस कारण चुनाव अवैध घोषित हो गया था। 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश वीआर कृष्णा ने हाई कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा था। इस निर्णय के तुरंत बाद अगले दिन जो रैली दिल्ली में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आयोजित हुई, उसमें उन्होंने सार्वजनिक रूप से पुलिस अधिकारियों और सेना से आव्हान किया था कि वह सरकार के आदेशों का पालन नहीं करें। उस समय जयप्रकाश नारायण लोक नायक के रूप में जन जन के नेता थे। इस स्थिति को देखते हुए 25 जून 1975 को राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री की सलाह पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल घोषित करते हुए समस्त मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए थे। संवैधानिक प्रावधानों के तहत प्रत्येक 6 माह में आपातकाल की समय अवधि बढ़ती रही और यह तीन बार बढ़ाई गई।
18 जनवरी 1977 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने चुनाव की घोषणा करते हुए आपातकाल को समाप्त घोषित कर दिया। सभी राजनीतिक दलों के कैदियों को जेल से रिहा कर दिया गया। इस चुनाव में आपातकाल को लेकर लोगों में गुस्सा था। नसबंदी और जेल में नेताओं को प्रताड़ित किए जाने की अफवाहों का उत्तर भारत के राज्यों में बड़ा असर हुआ। चुनाव में इंदिरा गांधी संजय गांधी सहित कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता चुनाव में पराजित हो गए। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस का खाता भी 1977 के चुनाव में नहीं खुला। मध्य प्रदेश जैसे राज्य से 40 लोकसभा सीटों में से मात्र एक लोकसभा सीट छिंदवाड़ा ही कांग्रेस जीत सकी। विपक्षी दलों ने संयुक्त रूप से चुनाव लड़ा। इंदिरा गांधी ने पराजित होते ही अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को भेजा और केंद्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार 1977 में गठित हुई।
केंद्र की नई सरकार ने आपातकाल मैं हुई ज्यादतियों की जांच करने के लिए शाह आयोग का गठन किया था। इसके अलावा किस्सा कुर्सी का और अन्य कई मामलों की जांच कराई गई। यह सरकार ढाई वर्ष भी अपने आप को स्थिर नहीं रख पाई। 1980 में पुनः लोकसभा चुनाव हुए और इंदिरा गांधी पुन: दो तिहाई बहुमत के साथ केंद्र में सरकार बनाने में सफल हुई। यह कहा जा सकता है कि आपातकाल के जो 18 माह आम जनता ने देखे थे। उसकी वस्तु स्थिति जानने के बाद आपातकाल का जो कलंक इंदिरा गांधी पर लगा था, वह जनता ने भारी बहुमत देकर परिस्थितियों के कारण आपातकाल को जायज मान लिया। आपातकाल के दौरान देश में शासन-प्रशासन एवं जनता के बीच एक अनुशासन बना था। सभी ‎नियं‎त्रित हो गए थे। स्वतंत्र भारत के इ‎तिहास में आपातकाल के दौरान ही जनता ने सुशासन देखा था। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के एक बयान ने यह कहकर सनसनी फैला दी थी, कि देश में आपातकाल जैसे हालात बन रहे हैं। पिछले 5 वर्षों में केंद्र की मोदी सरकार पर विपक्षी दल हमेशा यह आरोप लगाते रहे हैं कि देश में एक बार फिर आपातकाल जैसे हालात हो गए हैं। विपक्षी नेताओं और राजनीतिक दलों द्वारा सरकार पर लगातार हमले कर रहे हैं। मीडिया पर अघोषित रूप से सरकारी नियंत्रण है मीडिया वही दिखा रहा है, जो सरकार दिखाना चाहती है देश में सेंसरशिप जैसे हालात बन गए हैं। देश की अर्थव्यवस्था 1975 की तरह कमजोर ‎स्थिति में है। 45 वर्ष में पहली बार देश में सबसे ज्यादा बेरोजगारी की समस्या से देश को गुजरना पड़ रहा है। आपातकाल की 44 वीं वर्षगांठ में आपातकाल को लेकर तब और अब के बीच समानताएं खोजी जाने लगी हैं। इससे स्पष्ट है कि कहीं ना कहीं सरकार विपक्ष और आम जनता के बीच अविश्वास और विश्वसनीयता का संकट पैदा हुआ है।

आपातकाल स्वतंत्र भारत का काला अध्याय
कैलाश सोनी
हम भारतवासी सदैव से ही स्वतंत्रता के प्रेमी और उपासक रहे है इसलिए जब जब भी हमारी स्वाधीनता को अपह्त करने के प्रयत्न हुए हमने उसका प्रतिकार किया है, अनेकबार विदेशी शक्तियों ने हमें पराधीन बनाने की कोशिश की किन्तु हमारे पूर्वजो ने उनके विरूद्ध सतत संघर्ष किया और अंतत: विजयी हुए।
स्वतंत्रता की महिमा से मंडित हमारे देश के लोकतांत्रिक इतिहास से हमारी आजादी के हरण का एक काला अध्याय दर्ज है किन्तु उसके साथ ही दूसरी आजादी की हमारी संघर्ष गाथा भी जुडी है, वह हमारे आजादी से जीने के संस्कार का एक ज्वलंत उदाहरण है, पंरतु वर्तमान की नई पीढ़ी को लोकतंत्र पर आई इस अमावस्या की शायद ही कोई जानकारी होंगी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में 25 जून 1975 में एक ऐसा भी अवसर आया जब तक सत्तासीन व्यक्ति ने जिनका उनके अपने भ्रष्टाचार के कारण चुनाव परिणाम इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा रद्द कर दिया गया, अपनी सत्ता पिपासा को पूरा करने के लिये देशवासियों के सारे लोकतांत्रिक अधिकारों को तथा सारी संवैधानिक मर्यादाओं को समाप्त कर संपूर्ण देश को आपातकाल की बेड़ी में जकड़ दिया। आपातकाल लगाने के लिये आवश्यक सारे संवैधानिक प्रावधानों को दरकिनार करके यह घोषणा की गई थी। प्रावधानों के तहत आधे से अधिक प्रांत जब मांग करें, नोट भेजें कि कानून व्यवस्था संकट में है और केन्द्रीय कैबिनेट सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करे तब आपातकाल लगता है।
किंतु इंदिरा जी और उनके निकटस्थी को भय सता रहा था कि वे कहीं सत्ता से बेदखल ना हो जाये इसलिये सारे कानून हाथ में लेकर अपनी मनमर्जी से वह किया जो कतयी कानून संगत नहीं था वह तो जब आम निर्वाचन की घोषणा हुई तो उनकी अनेक साजिशे उजागर हुई निर्वान प्रक्रिया के आरंभ होते होते इंदिरा जी के मंत्रीमंडल के वरिष्ठ मंत्री बाबू जगजीवन राम ने इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस छोड़ दी उस समय उन्होंने खुलासा किया कि देश पर आपातकाल थौपने संबंधी प्रस्ताव कैबिनेट में कभी आया ही नही, उसे सिर्फ सूचित किया गया उनके शब्द में के‎बीनेट वॉस टोल्ड नॉट कन्सल्टेड और इसके विपरीत फखरूद्दीन अली महोदय को लिखित सूचना दी गयी कि वह प्रस्ताव कैबिनेट द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया था इस प्रकार सारे संवैधानिक प्रावधानो का उल्लंघन करते हुए बिना कैबिनेट के प्रस्ताव के पूरे देश पर तानाशाही का जो तांडव थोप दिया गया उसका नाम था आपातकाल ।
कोई अपील नही, कोई न्यायिक व्यवस्था नहीं, न्यायालयों के सारे अधिकार समाप्त कर दिये गये और लाखो निरपराध लोगो की धड़ाधड़ गिरफ्तारी हुई तथा लोकनायक जयप्रकाश नारायण सहित सभी विरोधी दलो के नेता जिसमें अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आड़वाणी, जार्ज फर्नाडीज, कांग्रेस के भी नेता 250 से अधिक पत्रकार जेलो में डाल दिये गये। निरपराध नागरिको के साथ हिंसा का एक ऐसा ताडव देश ने पहले कभी नही देखा था।
न्यायपालिका समाप्त कर दी गई सुप्रीम कोर्ट मे तीन जजो को सुपरसीड करके अपने चुनाव को वैध करा लिया गया संपूर्ण देश मे हाकार जेल के भीतर अकेले म.प्र. में 100 से अधिक लोकतंत्र प्रेमियो की असमय मृत्यु हुई। 110806 राजनैतिक और समाजिक नागरिको को मीसा/डीआईआर मे बिना मुकद्दमा चलाये जेलो मे निरूद्ध किया गया। इस इतिहास को जानना और परखना लोकतंत्र मे विश्वास लोकतंत्र मे विश्वास रखने वाले सभी के लिये आवश्यक है। नयी पीढी को भी इसे जानने की जरूरत है। जिसकी प्रेरणा से भविष्य मे लोकतंत्र को अक्षुण्ण रखा जा सके। देश हित मे यह बहुत आवश्यक है, ताकि अभिव्यक्ति की आजादी फिर कभी बाधिक न हो पाये। 25 एवं 26 जून 2006 को करेली मे दीवसीय का आयोजन किया था। जिसमे मध्यप्रदेश के साथ ही छत्तीसगढ के भी कुछ लोकतंत्र सेनानी शामिल हुये थे। तब लोकतंत्र सेनानी संघ को एक राज्यस्तरीय संगठन बना दिया गया था। 26 जून 2015 को भोपाल मे आयोजित सम्मेलन मे इसे अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया गया । आज इस संगठन का परिपूर्ण आकार सभी के सामने है। वह इसके केन्द्रीय पदाधिकारियो के निंरतर प्रवास और प्रयास का परिणाम है। आज कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक के लोकतंत्र सेनानी संगठित हो चुके है। लगभग सभी वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी मे आ चुके, इन सेनानियो के उत्साह मे आज भी कोई कमी नही आयी है। देश हित मे कुछ भी कर गुजरने को आज भी ये सभी तत्पर है । इसलिये सम्पर्क होते ही हर प्रांन्त मे प्रांन्तीय संगठन खड़ा हो गया, जिनके प्रांतीय सम्मेलन भी आयोजित हो रहै है।
इन सेनानियो के त्याग और तपस्या को सम्मानित करने का अर्थ अपने गौरवशाली इतिहास को सम्मानित करना है । जो लोग इतिहास को भुलाने के लिये अमादा थे उन्हे आज सम्पूर्ण देश नकार चुका है। जिन्होने इसके महत्व को समझा ऐसे कईS प्रान्त के माननीय मुख्यमंत्रीगण लोकतंत्र सेनानियो को मानधन सहित चिकित्सा, यातायात आदि की सुविधा मुहैया करके लोकतंत्र के प्रति अपने श्रद्धा भाव का उदाहरण प्रस्तुत कर रहै है । पिछले एक वर्ष मे हमारे संगठन के प्रयास और संबधित सरकारो के समर्थन से जिन प्रान्तो मे यह योजना पहली बार लागू हुई वह है। उत्तराखंड और महाराष्ट्र। उत्तरप्रदेश मे नयी सुविधाओ के साथ यह नये रूप मे लागू हुई है। असम मे इसे लागू करने के लिये आश्वसन मिल चुका है। आवश्यक प्रक्रिया से गुजरने के बाद घोषणा होने की संभावना है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा दी जा रही वित्तीय सुविधाओं पर अस्थायी रोक लगा दी है। मैं मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों को आगाह करना चाहता हू कि वे इतिहास से सबक ले तथा तानाशाही का मार्ग छोडकर वित्तीय सुविधाओं पर लगाई अस्थायी पावंदी को समाप्त कर आपातकाल के विरूद्ध संघर्ष करने वाले योद्धाओं को सम्मानित करे, अन्यथा आंदोलन का सामना करने के लिये तैयार रहे।
आपातकाल की समाप्ति के पश्चात् आई तत्कालीन केन्द्र सरकार ने यह अनुभव किया था कि यह देश का दूसरा स्वतंत्रता संग्राम है जिसने देश के लोकतंत्र को उसकी बेड़ियॉ तोडकर कारागार से मुक्त किया। इस गौरवशाली संघर्ष की महिमा को भावी पीढ़ी के सामने प्रस्तुत करने की उनकी मंशा जरूर रही होगी क्योंकि वे स्वयं इसके सेनापति व मार्गदर्शक थे, पंरतु दुर्भाग्य से वे अपना कार्यकाल पूरा नही कर पाए आज इतने वर्षो के बाद उसी संघर्ष से निकले, लोकतंत्र सेनानी अच्छी संख्या मे केन्द्र में सत्तासीन है। हमें उम्मीद थी कि सरकार आते ही स्वयं इस पर अवश्य ध्यान देगी लेकिन ऐसा नही हो सका, जनता जनार्दन के आशीर्वाद से केन्द्र में श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में प्रचण्ड बहुमत से सरकार बनी है। इसमें देश के लोकतंत्र सेनानियों की भी महती भूमिका रही है हम आशान्वित है ।
स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला महासंग्राम था। जिसमें संपूर्ण देश ने अपनी भूमिका निभाई, परंतु कैसा दुर्भाग्य नई पीढ़ी से इस इतिहास को छुपाकर रखा गया। इस संघर्ष गाथा को बच्चों के पाठयक्रम में शामिल करने की आवश्यकता से हमने सरकार को दृढतापूर्वक अवगत कराया है। हमें विश्वास है कि शीघ्र ही बच्चो को इसकी जानकारी उपलब्ध हो जाएगी। तत्कालीन केन्द्र सरकार ने ही लोकतंत्र को कलंकित किया था अत: आज की केन्द्र सरकार का यह दायित्व बनता है कि लोकतंत्र पर लगे उस कलंक को मिटाने वाले लोकतंत्र सेनानियों को स्वतंत्रता सेनानियों का दर्जा देकर इतिहास के साथ इस निमित्त हमें सरकार के प्रभावशाली मंत्रियों का समर्थन मिल रहा है इसे निर्णायक स्तर तक पहुचाने के लिये संगठन की ओर से निरंतर प्रयास जारी है। यह सब किय जाना इसलिये भी आवश्यक है कि जिससे इस संग्राम से वर्तमान तथा आगे आने वाली पीढिया स्वाधीन जीने के लिये कोई भी मूल्य चुकाने की सतत् प्रेरणा ग्रहण कर सके और दूसरी ओर शासन प्रशासन में बैठे लोगो की शक्ति और सामर्थ का भी विस्मरण न हो।
हम तो केन्द्र से बस इतना निवेदन कर सकते है कि जिस संघर्ष की सीढी चढकर आज आप आसमान की ऊंचाई को छू रहे है उस सीढी को उस इतिहास को महत्व दे और उन इतिहास पुरूषो को सम्मानित करे। पिछले 44 साल में हम लगभग 70 हजार लोकतंत्र सेनानियों को हम खो चुके है। रोज देशभर से जिस प्रकार के शोक समाचार मिल रहे है उससे लगता है कि अगले 10 साल में इनकी प्रजाति विलुप्ति की कगार तक पहुच जाएगी। अत: ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय को और अधिक टाला नही जाना चाहिए ।
(लेखक- राज्यसभा सदस्य एवं आपातकाल योद्धाओं के अ.भा.संगठन लोकतंत्र सेनानी संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष है)

भ्रष्टाचारों पर सियासतदां कार्यवाही नहीं करते…!
नईम कुरैशी
भ्रष्टाचार हमारे देश में एक बड़ा सवाल रहा है, एक बड़ा मुद्दा रहा है पर देश के सियासतदानों ने इसे कभी भी गम्भीरता से नहीं लिया क्योंकि हमारे तथाकथित नेतागण खुद ही भ्रष्टाचारों में गले गले तक डूबे दिखे हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री रहे प्रताप सिंह कैरो पर भ्रष्टाचारों के आरोप लगे थे 1960 के आसपास तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने निर्वाचित हुये कहा था क्या मैं लाल किले से ये कहूँ कि मेरे मुख्यमंत्री भ्रष्ट हैं। इसके बाद रक्षा मंत्री रहे व्ही.के. कृष्ण मेनन पर भी सेना के लिये जीप खरीदने के मामलों में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। इस पर भी नेहरू जी कुछ खास नहीं कर पाये थे।
नेहरू जी के चले जाने पर गुलजारी लाल नन्दा कुछ समय रहे थे। उन्हें काफी ईमानदार भी माना जाता रहा था पर उन्हें वक्त कुछ खास नहीं मिला। लाल बहादुर शास्त्री जी को ईमानदार कहा व सुना जाता रहा था।
श्रीमती गांधी के दौर में बढ़ा भ्रष्टाचार
श्रीमती इन्दिरा गांधी के आने के साथ ही भ्रष्टाचारों की देश में बहार सी आ गई थी। नागर वाला कांड से लेकर आपातकाल के दौरान इतने भ्रष्टाचारों व अत्याचारों के काण्ड हुये कि उन पर अनेकों उपन्यासों व किताबों को लिखा जा चुका है। इन्दिरा जी के दौर में कांग्रेस भी काफी कुछ विचारों से दूर हो गयी थी। उसके विचारों में अब गांधी के विचार दूर से होते जा रहे थे। बस अब ये विचार संजय गांधी के विचार थे या फिर विद्याचरण शुक्ल, बंसीलाल के बोल कांग्रेस में होते थे। संजय गांधी ने परिवार को नियोजित करने का अभियान जरूर चलाया पर उसके लिये भी जुल्मोसितम भी बरपाया गया। कांग्रेस एक गिरोह के तौर पर चलने लगी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी संजय गांधी को चप्पलें पहनाते हुये देखे जाते रहे थे। भ्रष्टाचारों की नदियां भी इस दौर में समुन्दर बन गये थे। आज उसका ही नतीजा है कि हमारे संसद में 40 फीसद लोग अपराधों में देखे जा रहे हैं। उसमें आधे सांसदों पर बलात्कार, लूट, अपहरण जैसे मामले भी दर्ज देखे जाते रहे हैं।
मध्य प्रदेश में सबसे महिला अत्याचार
उत्तर प्रदेश, बिहार में तो हर तीसरा सांसद व विधायक महिलाओं की इज्जतों से खेलता दिखाई दे रहा है पर हमारा कानून इसके सामने बोना व पुलिस इन सबके सामने नौकरानी या रखैल की तरह हाथ जोड़े खड़ी रहती है। जैसे उत्तर प्रदेश में सेंगर नाम के विधायक जी के सामने पिछले साल खड़ी थी, यदि आंदोलन न किया होता, मीडिया की सक्रियता न होती तो सी.बी.आई. जांच न होती और विधायक जी 16 वर्षीय नवयुवती के गुनहेगार बनकर सीना फुलाते न घूम रहे होते। मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश के बिरादरी के नाते उन्हें कानून का कोई डर ही न था। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा महिलाओं पर अत्याचार देखे व सुने जाते हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस शुरू से ही पैसे के लिये अपनी कुर्सी बचाने के लिये अत्याचारियों के पक्ष लेती आ रही है। सियासतदां यहां चापलूस व बेईमान पुलिस अफसरानों को थानों पर पदस्थापनायें कराते आ रहे हैं। भारत के हिन्दी वेल्ट में पुलिस वालों का अत्याचार भी गरीब वर्ग के लिये कमजोर तब्कों, दलितों, पिछड़ों के लिये एक बड़ी समस्या बनी हुई है पर सियासतदां अपने सामंती मिजाज के चलते इस पर कभी भी ध्यान नहीं देते। 1970 में उत्तर प्रदेश के मेरठ में माया त्यागी नामक महिला के पति को हत्या करने का सरेआम कारनामा व खुद मामा त्यागी को बेइज्जत करने का कारनामा यहां की पुलिस ने कर दिखाया था, जो चरित्र पुलिस का बीमारू राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, म.प्र. व राजस्थान का है या दिल्ली पुलिस का है। वो केरला या तमिलनाडु, मुम्बई जैसी नहीं है। उत्तर प्रदेश में तो भ्रष्टाचारों की सारी हदें पार कराने का काम उत्तर प्रदेश की पुलिस व राजस्व मेहकमा भर करता रहा है। यहां तो 90 के दशक में मुलायम सिंह यादव ने तो अपने मुख्यमंत्री काल में सारी हदें तोड़ते हुये अपने यादव बिरादरी वालों को बिना परीक्षा के व बिना ट्रेनिंग के ही थानेदार बनवा दिया था जो लम्बे वक्त तक उनके वफादार भी रहे थे।
म.प्र. में मंत्री भी कार्यवाही की जद में
मध्य प्रदेश में जवाहर लाल नेहरू ने अपने बिरादरी वाले कैलाश नाथ काटजू को जबरन मुख्यमंत्री जरूर बना दिया था पर आगे वो कामयाब नहीं हुये थे और हटाये गये। उन्हें सुनाई भी नहीं देता था। डी.पी. मिश्रा, प्रकाशचन्द्र सेठी काफी अच्छे मुख्यमंत्री मध्य प्रदेश में रहे थे। बाद में 1984 में अर्जुन सिंह व 1992 में सुन्दरलाल पटवा भी अच्छे प्रशासक व मुख्यमंत्री रहे थे। वर्तमान नरेन्द्र मोदी सरकार की इच्छा शक्ति भी भ्रष्टाचारों के मामले में काफी मजबूती देखी व सुनी जा रही है। दिल्ली के बड़े नौकरशाह भी सामंती शैली में जिंदगी जीने के आदी हो चुके थे। उन्हें मोदी सरकार ने काफी सबक सिखाया। बताया जा रहा है संयुक्त सचिव स्तर तक के बड़े आय.ए.एस. अफसरों तक को दतरों में समय पर आना पड़ रहा है। उन्हें भी टाईम पर अंगूठा लगाकर हाजरी देना पड़ती है। दो हजार उप सचिव स्तर के अफसरों की जांचें की जा चुकी हैं। उनमें से आधों को घर भेजा जाने वाला है। इनकम टैक्स के आला अफसरों की तरह जिन्हें पिछले दिनों ही सरकार ने जबरन सेवानिवृत्त कर घर भेज दिया गया। नोएडा में आई.टी. के एक कमिश्नर स्तर के अफसर पर भी बड़ी कार्यवाही मोदी सरकार ने की है व 123 भ्रष्ट अफसरों पर कार्यवाही हेतु सी.बी.सी. को रुकी हुई मंजूरी दी जाने वाली है। मध्य प्रदेश में भी आर्थिक अपराध शाखा कुछ बड़े मामलों में कार्यवाही करने जा रही है जो पिछले 15 सालों से कम्बल ओढ़कर घी पीने का काम कर रहे थे। उसमें पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति भी माने जा रहे हैं। कई मंत्रीगणों पर भी कार्यवाही की तलवार लटकी है।

स्वागत है इस युद्धाभ्यास का….
अजित वर्मा
पिछले एक दशक में हम लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि आने वाला समय साइबर स्पेस और अंतरिक्ष में लड़े जाने वाले युद्धों का है और भारत को इसकी तैयारी करने के साथ आर्टिफिशियल इण्टेलिजेन्स और डाटा नियंत्रण की दिशा में काम तेज करना चाहिए ताकि भारत किसी भी समय किसी भी चुनौती का सामना कर सके।
अब आये दिन जो खबरें आती हैं आश्वस्तिदायी और देश यह विश्वास कर सकता है कि हमारी सेना और वैज्ञानिक हर क्षेत्र में सक्रिय हैं। यह स्वागतेय है कि भारत ने अगले महीने पहली बार अंतरिक्ष युद्धाभ्यास करने की योजना बनाई है। इसका नाम रखा गया है ‘इंडस्पेसएक्स’। इस अभ्यास में सैन्य अधिकारी और वैज्ञानिक हिस्सा लेंगे। अंतरिक्ष का सैन्यीकरण हो रहा है। साथ ही साथ प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है। जुलाई के अंतिम हफ्ते में आयोजित होने वाले अभ्यास का मुख्य उद्देश्य भारत द्वारा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक अंतरिक्ष व अंतरिक्ष रोधी क्षमताओं का आकलन करना है। इससे हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा का आकलन भी होगा। भारत ने मार्च में एंटी-सैटेलाइट (ए-सैट) मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया था और हाल ही में ‘ट्राई सर्विस डिफेंस स्पेस एजंसीÓ की शुरुआत भी की है।
अधिकारिक रूप से कहा गया है कि भारत को स्पेस में विरोधियों पर निगरानी, संचार, मिसाइल की पूर्व चेतावनी और सटीक टारगेट लगाने जैसी चीजों की आवश्यकता है। इससे हमारे सशस्त्र बल की विश्वसनीयता बढ़ेगी और राष्ट्रीय सुरक्षा भी मजबूत होगी। ऐसे में ‘इंडस्पेसएक्स’ हमें अंतरिक्ष में रणनीतिक चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेगा, जिन्हें संभालने की आवश्यकता है।’
भारत के लिए एक चुनौतीपूर्ण स्थिति यह है कि चीन ने जनवरी 2007 में एक मौसम उपग्रह के खिलाफ ए-सैट मिसाइल का परीक्षण करने के बाद दोनों गतिज (प्रत्यक्ष चढ़ाई मिसाइलों सह-कक्षीय मार उपग्रहों) के साथ-साथ गैर गतिज के रूप में अंतरिक्ष में सैन्य क्षमताओं को विकसित किया है। चीन ने अंतरिक्ष में अमेरिका के वर्चस्व को चुनौती देने वाले अपने महत्वाकांक्षी कार्यक्रम (समंदर में एक जहाज से 7 सैटेलाइट छोडऩे) को हाल ही लांच किया है। चीन के इन अभियानों के मद्देनजर भारत के लिए ‘इंडस्पेसएक्स’ कार्यक्रम बेहद महत्वपूर्ण है।
भारत लंबे समय से स्थाई मजबूती से अंतरिक्ष कार्यक्रमों को अंजाम दे रहा है। इसके बावजूद वह चीन की संचार, नेविगेशन, पृथ्वी अवलोकन और अन्य उपग्रहों से मिलकर 100 से अधिक अंतरिक्ष यान मिशन की बराबरी नहीं कर पाया है। भारतीय सशस्त्र बल अब भी दो सैन्य उपग्रहों के अलावा, निगरानी, नेविगेशन और संचार उद्देश्यों के लिए बड़े पैमाने पर दोहरे उपयोग वाले रिमोट सेसिंग उपग्रह का उपयोग करते हैं।
हाल में भारत ने अंतरिक्ष में सैन्य अभियान की पहली की, जब मिशन शक्ति के तहत पृथ्वी की कक्षा में 283 कि.मी. की ऊंचाई पर 740 किलोग्राम की माइक्रोसेट-आर उपग्रह को नष्ट करने के लिए 19- टन की इंटरसेप्टर (छएड) 27 मार्च को छोड़ा गया।
भारत काउंटर-स्पेस क्षमताओं को विकसित करने के लिए काम कर रहा है, मसलन, निर्देशित ऊर्जा हथियार, लेजर, ईएमपी आदि। नई डिफेंस स्पेस एजंसी ने रक्षा इमेजरी प्रसंस्करण और विश्लेषण केंद्र (दिल्ली) और डिफेंस सेटेलाइट कंट्रोल सेंटर (भोपाल) को नया रूप देने का काम शुरू किया है।

एक देश-एक चुनाव; देश अहम् या राजनीति……?
ओमप्रकाश मेहता
एक प्रजातांत्रिक देश की धड़कन चुनाव है, चुनाव के बिना प्रजातंत्र नहीं और प्रजातंत्र नहीं तो चुनाव नहीं। चुनाव एक ऐसी संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसका निर्धारित समय पर पूरा होना जरूरी है। फिर उसका समय क्या हो? इसी पर आज जंग छिड़ी है, मोदी सरकार चाहती है कि देश में पंचायत से लेकर लोकसभा तक के सभी चुनाव एक साथ हो, इसके पीछे दलील यह दी जा रही है कि एक साथ चुनाव नहीं हो पाने के कारण प्रजातंत्र की गाड़ी रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है, चुनाव खर्चीले होते जा रहे है, सरकारें ठीक से काम नहीं कर पा रही, देश की प्रगति व कल्याण के कार्यों में बाधा उत्पन्न हो रही है और चुनावों के चक्कर में देश व सरकार का बहुमूल्य समय नष्ट हो रहा है, फिर चुनाव आयोग भी चुनाव की तैयारियों के अलावा कई महत्वपूर्ण दायित्वों पर ध्यान नहीं दे पा रहा है। इसलिए ऐसा कुछ होना चाहिए जिससे सभी चुनाव एक साथ हो, फिर इसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े?
भारत की आजादी के बाद 1952 में हुए पहले आम चुनाव के बाद अगले तीन आम चुनाव अर्थात् 1967 तक सभी चुनाव एक साथ ही हुए, किंतु 1987 अर्थात इंदिरा जी के सत्तारोहण के बाद यह परिपाटी बदल दी गई और संसद के साथ राज्य विधानसभाओं को भंग कर व राष्ट्रपति शासन लागू कर देश की अधिकांश विधानसभाओं के निर्धारित पांच साला कार्यकाल को गड़बड़ा दिया गया, और इस चलन का दुष्परिणाम आज पूरा देश भुगतने को मजबूर है।
यद्यपि इसमें कोई दो राय नहीं कि एक देश-एक चुनाव को लेकर सरकार द्वारा जो दलीलें दी जा रही है, वे गलत नहीं है जो लोकसभा चुनाव 2014 में 38 हजार करोड़ में सम्पन्न हुआ था, वह महज पांच सालों में दुगुना महंगा हो गया 2019 के लोकसभा चुनाव पर करीब साठ हजार करोड़ रूपया खर्च हुआ और चुनाव सात चरणों में होने के कारण ढाई महीने आचार संहिता लागू रही, जिससे केन्द्र व राज्य सरकारों के कई महत्वपूर्ण जन कल्याणकारी कार्य सम्पन्न नहीं हो पाए, किंतु यहां सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि जब देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के 2014 के चुनावी घोषणा-पत्र में एक देश-एक चुनाव का जिक्र था, तो फिर राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ लोकसभा के चुनाव क्यों नहीं कराए गए? महज दो-तीन महीनें बाद लोकसभा चुनाव होना थे तो इन तीन राज्यों के चुनावों को रोका जा सकता था?
…..फिर सबसे बड़ा सवाल यह कि अब इस महत्वपूर्ण मसले को तूल क्यों दी जा रही है, फिर फिलहाल तो केन्द्र सरकार अपने दम पर यह एक देश-एक चुनाव की योजना लागू कर नहीं सकती क्योंकि इसके लिए संविधान के पांच अनुच्छेद दो 83, 85, 124, 174 और 356 में संशोधन कर संसद से पारित करना पड़ेगा और इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जरूरी है, इसलिए फिलहाल यह संभव नजर नहीं आता, चाहे मोदी जी अपने आपकों कितना ही क्यों न बदल लें? जब तक समूचा प्रतिपक्ष इस मुद्दें पर सरकार के साथ नहीं आता, तब तक यह होना संभव नहीं है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, वह तो पहले ही अपने राजनीतिक प्रस्ताव में एक साथ चुनाव को गलत बता चुकी है, रही बात सपा-बसपा की, तो वे भी इसे अपने नजरियें से देखकर इस मुद्दें को उठाने की पहल को देश के अन्य ज्वलंत मुद्दों से ध्यान बांटने का प्रयास बता रहे है। जबकि कांग्रेस को आशंका है कि आज एक देश-एक चुनाव को मुद्दा बना रहे है, कल ‘एक देश-एक धर्म’ को मुद्दा बनाएगें। यद्यपि यह सही है कि यह मुद्दा मोदी जी या भाजपा का नया मुद्दा नहीं है, यह हमारे संविधान में वर्णित सबसे पुराने विचारों में से एक है, इसलिए इस मुद्दें को लेकर मोदी जी या भाजपा का कोई राजनीतिक स्वार्थ नजर नहीं आता, किंतु सबसे बड़ा सवाल यह है कि पिछले बावन सालों से बिगड़े इस चुनावी चलन को तत्कालीन शासकों ने इतनी विकृत स्थिति तक पहुंचा दिया है कि इस प्रजातंत्र व संविधान के अनुरूप स्वरूप प्रदान करने के लिए सरकार को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी, वह भी तभी जब प्रतिपक्षी दलों को भगवान सद्बुद्धि प्रदान करें। क्योंकि एक बार यदि प्रजातंत्र सही पटरी पर आ गया तो वह सभी के हित में होगा।
अब मोदी जी ने प्रतिपक्ष की महिमा को मंडित कर प्रयास तो शुरू किया है, देखियें अब आगे-आगे होता है क्या? वैसे यदि यह हो जाए तो वह देश व देशवासियों के हित में ही होगा।

प्रदूषण: लामबंद हो यूरोप के खिलाफ
अजित वर्मा
जलवायु परिवर्तन के मामले में वैश्विक समझौता अमल में न आने का दुष्प्रभाव भारत सहित न केवल समस्त हिमालयी देशों को वरन पूरे एशिया को भुगतना पड़ रहा है क्योंकि यूरोपीय देशों में तेजी से बढ़ रहे प्रदूषण का असर हिमालय पर्वतमाला पर भी पड़ रहा है। इस क्षेत्र में कार्बन की बढ़ती मात्रा चिंता पैदा कर रही है। बर्फ से ढकी हिमालय की वादियां इस प्रदूषण का तेजी से शिकार हो रही हैं और प्रदूषण का खतरनाक स्तर इन बर्फीली पर्वतमालाओं पर भी पहुँच गया है।
यूरोपीय देशों में प्रदूषण बहुत खतरनाक स्थिति में पहुँच चुका है। जिसके प्रभाव से पश्चिमी विक्षोभ के माध्यम से कार्बन की अत्यधिक मात्रा हिमालयी इलाकों में तेजी के साथ पहुंच रही है। वक्त रहते भारत और चीन सहित समस्त एशियाई देशों को यूरोप के विरुद्ध इस सवाल पर लामबन्द होकर दबाव बनाना चाहिए।
हिमालयी क्षेत्र से जिस तरह से कार्बन की मात्रा निरंतर बढ़ रही है, वह पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी है। तेजी के साथ बिगड़ते पर्यावरण के कारण दुनिया का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
हाल ही किये गए शोधों का निष्कर्ष है कि यूरोपीय देशों में बढ़ते प्रदूषण का प्रभाव तेजी के साथ हिमालयी देशों पर पड़ रहा है। पश्चिमी विक्षोभ के द्वारा बड़ी मात्रा में कार्बन हिमालयी इलाकों में बसे देशों में भी अपने पैर पसार रहा है। इसका प्रभाव हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र पर तेजी के साथ हो रहा है और हिमालय के वायु मंडल में कई परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में लगातार कार्बन की मात्रा बढ़ रही है। पहली बार वैज्ञानिकों ने उच्च हिमालयीन क्षेत्रों में कार्बन की बढ़ती मात्रा का अध्ययन किया है। इस क्षेत्र में कार्बन की मात्रा 0.1 से चार माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक मापी गई है। यदि उच्च हिमालयी इलाकों में कार्बन तथा अन्य गैसों की मात्रा तेजी के साथ बढ़ती रहेगी, तो इसका प्रभाव हिमालय के ग्लेशियरों पर भी अवश्य पड़ेगा, जिससे इस क्षेत्र के ग्लेशियर तेजी से पिघलेंगे और इन ग्लेशियरों का आकार भी घटेगा।
स्थितियां चेतावनी दे रही हैं कि पर्यावरण संरक्षण के लिए और अधिक संवेदनशील होने की आवश्यकता है। और पर्यावरण संरक्षण का काम केवल सरकारी तंत्र के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है।

सेवानिवृत्ति की आयु 58 वर्ष करने पर विचार
सनत जैन
बीएसएनएल के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति उम्र 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष करने पर सरकार बड़ी गंभीरता से विचार कर रही हैं। सरकार में जो विचार मंथन हो रहा है, उसके अनुसार बीएसएनएल के 1 लाख 76 हजार कर्मचारियों में से 50 फ़ीसदी कर्मचारी अगले 5 से 6 वर्षों में सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं। यदि उनकी आयु 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष कर दी जाती है, तो 3 से 4 साल के अंदर लगभग 85,000 अधिकारी कर्मचारी सेवानिवृत्त हो जाएंगे।
सरकारी क्षेत्र की दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल पिछले 3 वर्षों से लगातार घाटे में चल रही है। 2016-17 में 4793 करोड़, 2017-18 में 7992 करोड़ और 2018-19 में भी लगभग 7000 करोड़ रुपए के नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा है। बीएसएनएल के बढ़ते हुए घाटे को देखते हुए कंपनी, बीआरएस के माध्यम से 50 वर्ष की उम्र में तथा सेवानिवृत्त आयु 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। इसके लिए कंपनी को 6365 करोड़ रुपए वीआरएस में खर्च करने की जरूरत होगी। वित्त मंत्रालय ने इतनी बड़ी रकम वीआरएस में खर्च करने के स्थान पर और कोई उपाय सुझाने के लिए कहा था। इसके बाद कर्मचारियों की आयु 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष करने तथा वीआरएस के माध्यम से जो बोझ कंपनी पर पड़ने वाला था, वह कम हो जाएगा। बीएसएनएल में कुल कर्मचारियों और अधिकारियों की संख्या 176000 बताई जा रही है। सेवानिवृत्ति की आयु घटाने से केंद्र सरकार को फौरी तौर पर कोई मदद नहीं देनी पड़ेगी। अगले तीन-चार वर्षों में अधिकारियों और कर्मचारियों की संख्या अपने आप आधी हो जाएगी।
वीआरएस का लाभ देने पर प्रत्येक वर्ष के लिए सरकार को 35 दिन का वेतन और शेष वर्षों के लिए 25 दिन का वेतन दिया जाता है। सरकार 50 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके अधिकारियों कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति तथा वीआरएस योजना का लाभ लेकर नौकरी छोड़ने का विकल्प रखती है, ऐसी स्थिति में सरकार को लग रहा है, कि यदि सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष की जाती है। तो इसका अन्य कंपनियां विरोध कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार पुनरुद्धार योजना में सेवानिवृत्ति की उम्र घटाकर तथा बीएसएनल को परिसंपत्तियों की बिक्री कर राशि जुटाने का विकल्प कंपनी को देने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। बीएसएनएल जैसी एकाधिकार वाली कंपनी पिछले 3 वर्षों से लगातार घाटे में चल रही है। इसके पहले वर्षों में भी उसका मुनाफा तेजी के साथ घट रहा था। केंद्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की इस कंपनी को उबारने का कोई प्रयास नहीं किया। जिसके कारण बीएसएनएल की हालत बड़ी तेजी के साथ खस्ता होती चली गई। वही जिओ जैसी कंपनी ने बीएसएनएल के मार्केट में बड़ी तेजी के साथ कब्जा जमाते हुए, उसे आर्थिक रूप से इतना कमजोर कर दिया है। बी एस एन एल अपने कर्मचारियों और अधिकारियों को समय पर वेतन भी नहीं बांट पा रही हैं। दूरसंचार क्षेत्र की एकाधिकार वाली यह कंपनी यदि डूबती है, तो इसका असर अन्य कंपनियों पर भी पड़ना तय है, केंद्र सरकार को इस दिशा में काफी गंभीरता से सोच समझ कर निर्णय लेने की जरूरत है। बेरोजगारी और आर्थिक मंदी के इस दौर में विशेष रूप से, जब निजी क्षेत्र की टेलीकॉम कंपनियां भी आर्थिक दृष्टि से सरकार के ऊपर भार बन गई हैं। ऐसी स्थिति में सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। आशा है केंद्र सरकार बीएसएनल की कार्यप्रणाली को सुधारने और आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए बेहतर निर्णय लेगी।
शेयर बाजार में सूचीबद्ध 400 कंपनियां लापता
भारत में कंपनियों के माध्यम से किस तरह काला धन और भ्रष्टाचार का खेल होता है। इसका उदाहरण है, शेयर बाजार की 400 सूचीबद्ध कंपनियॉं जिनके बारे में सरकार एवं कंपनी मामलों के मंत्रालय और सेबी को कोई जानकारी नहीं है। निवेशकों का काफी बड़ा निवेश इन सूचीबद्ध कंपनियों में होता है। इसके अलावा सरकार की वित्तीय संस्थाएं भी कंपनियों में भारी निवेश करती हैं। उसके बाद यह कंपनियां यदि गायब हो जाती हैं, तो इससे बड़ी चिंता की कोई बात नहीं हो सकती हैं।
भारत के कंपनी रजिस्टर के पास करीब 11 लाख कंपनियां पंजीकृत हैं। इनमें से लगभग 5 लाख कंपनियां सक्रिय हैं। शेष छह लाख कंपनियां मुखौटा कंपनियों के रूप में उपयोग में आती हैं। जो कंपनियों के नाम पर काले धन का लेन-देन बेरोक-टोक करने का काम करते हैं। 2016 में नोटबंदी के बाद बड़ी तेजी के साथ मुखौटा कंपनियों पर कार्रवाई सरकार द्वारा की गई थी। जिसके कारण लाखों कंपनियां रातों-रात बंद हो गईं और लगभग 6000 कंपनियां एलएलपी में परिवर्तित हो गई। एलएलपी कंपनियों के लिए संसद ने सीमित दायित्व भागीदारी कानून 2008 में बनाया था। जिसमें प्रत्येक साझेदार का सीमित दायित्व निर्धारित होने की वैधता का नियम है। भागीदारों के अधिकार और दायित्व का निर्धारण उनके बीच हुए समझौते की शर्तों के आधार पर तय होता है।
नोटबंदी के बाद पहले चरण मैं सरकार ने 2 लाख 25 हजार कंपनियों के खिलाफ कार्यवाही की थी। इसमें कंपनियों के तीन लाख डायरेक्टर भी शामिल थे। इन कंपनियों का कारोबार जरूर बंद हो गया। किंतु किसी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। जिसके कारण कंपनियों का यह गोरखधंधा लगातार चल रहा है। 400 कंपनियां जो शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुई थी। उनका पैन कार्ड नहीं होना और उनका गायब हो जाना, इस बात का द्योतक है, कि भारत में कंपनियों के माध्यम से किस तरह कर चोरी और आम जनता के पैसों की बंदरबांट कंपनियों के माध्यम से की जा रही है। कंपनियों में सरकार की वित्तीय संस्थाओं का भी समय-समय पर भारी निवेश होता है। शेयर बाजार के आधार पर इसका निवेश होने से यदि यह कंपनियां गायब होती हैं , या घाटे में जाती हैं, या दिवालिया घोषित होती हैं, ऐसी दशा में सरकार के वित्तीय संस्थानों को भी अरबों खरबों रुपए का नुकसान उठाना पड़ता है। इसके साथ ही जिन लोगों ने बैंकों में अपने पैसे जमा कराए हैं, या कंपनियों पर सीधा निवेश किया है। उन सभी को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। केंद्र सरकार को इस दिशा में विशेष सजगता बरतनी होगी। अरबों खरबों रुपए के घोटाला करने वाले कंपनियों के कर्ताधर्ताओं के ऊपर कड़ी से कड़ी कार्रवाई करनी होगी। अन्यथा भारत का आर्थिक संकट और तेजी के साथ बढ़ेगा। इस पर नियंत्रण कर पाना सरकार की वश में भी नहीं होगा।

प्रश्न संविधान के मंदिर की मर्यादा का
निर्मल रानी
सत्रहवीं लोकसभा अस्तित्व में आ चुकी है। इस बार की लोकसभा में जहाँ कई नए चेहरे चुनाव जीत कर आए हैं वहीं कई अतिविवादित लोगों को भी देश की जनता ने निर्वाचित किया है। बहरहाल, जनभावनाओं का सम्मान करते हुए तथा निर्वाचन आयोग द्वारा लोकसभा को प्रेषित की गई निर्वाचित सांसदों की नई सूची के अनुसार पिछले दिनों नव निर्वाचित सांसदों ने शपथ ली। परन्तु अफ़सोस की बात यह है कि इस बार सांसदों का लोकसभा की सदस्यता ग्रहण करना जितना विवादित व शर्मनाक रहा उससे निश्चित रूप से देश के संविधान का मंदिर समझी जाने वाली भारतीय संसद अत्यंत शर्मिंदा हुई। सबसे पहला विवाद तो भोपाल से चुनी गई भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर की शपथ को लेकर हुआ जबकि उन्होंने अपना नाम प्रज्ञा सिंह ठाकुर लेने के बजाए संस्कृत में शपथ लेते हुए कुछ इन शब्दों में शपथ की शुरुआत की -‘मैं साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर स्वामी पूर्ण चेतनानंद अवधेशानंद गिरि लोकसभा सदस्य के रूप में शपथ लेती हूँ ‘ । प्रज्ञा सिंह ठाकुर द्वारा अपना उक्त पूरा नाम लिए जाने पर विपक्षी सदस्यों द्वारा टोका टाकी शुरू कर दी गई और उनके इस नाम का विरोध किया गया। विपक्षी सदस्य प्रज्ञा सिंह ठाकुर द्वारा अपने नाम के साथ अपने गुरु का नाम जोड़े जाने का विरोध कर रहे थे। जबकि लोकसभा के अधिकारियों ने उनसे अपने नाम के साथ अपने पिता का नाम जोड़ने का अनुरोध किया। ग़ौरतलब है कि मध्य प्रदेश के भिण्ड ज़िले में जन्मी प्रज्ञा ठाकुर के पिता का नाम सी पी ठाकुर है जबकि अवधेशानंद गिरि उनके अध्यात्मिक गुरु हैं।
लोकसभा में विवादों का सिलसिला यहीं नहीं थमा बल्कि इसके अगले दिन भी संविधान का यह मंदिर धर्म का अखाड़ा बनता दिखाई दिया। जिस संसद में केवल जयहिंद या भारत माता की जय के नारों की गूँज सुनाई देनी चाहिए थी अथवा अनुशासनात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो निर्वाचित माननीयों द्वारा केवल शपथ पत्र में दिए गए निर्धारित वाक्यों व शब्दों मात्र का ही उच्चारण किया जाना चाहिए। उसी संसद में राधे राधे , जय मां दुर्गा , जय श्री राम , अल्लाहु अकबर तथा हर हर महादेव के नारे सुनाई दिए। अफ़सोस की बात तो यह है कि संसद में इस प्रकार का उत्तेजनात्मक वातावरण पैदा करने वाले बेशर्म माननीयों को उस समय बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में राजनीतिज्ञों की असफलता का वह कुरूप चेहरा भी याद नहीं आया जिसने कि लगभग 150 मासूम बच्चों की जान ले ली। ऐसे सभी अनुशासनहीन सांसद देश के संविधान की धज्जियाँ उड़ाने में व्यस्त थे। कल्पना की जा सकती है कि जब शपथ ग्रहण के दौरान ही अर्थात संसद के पहले व दूसरे दिन ही इनके तेवर ऐसे हैं तो आने वाले पांच वर्षों में इनसे क्या उम्मीद की जानी चाहिए। शिकायत इस बात को लेकर भी है कि जिस समय माननीयों द्वारा शपथ ग्रहण के दौरान इस प्रकार की असंसदीय नारेबाज़ी की जा रही थी अर्थात अनुशासन की धज्जियाँ उड़ाई जा रही थीं उस समय लोकसभा के प्रोटेम स्पीकर भी असहाय दिखाई दे रहे थे तथा उनहोंने भी सदस्यों के इस असंसदीय व्यवहार की न तो आलोचना की न ही उनहोंने इसे रोकने का अनुरोध किया।
पश्चिम बंगाल में हुआ इस बार का लोकसभा चुनाव अन्य राज्यों के चुनाव की तुलना में सबसे अधिक विवादित व हिंसक रहा। भाजपा ने पश्चिम बंगाल में चुनाव को ऐसा रूप दे दिया था गोया भाजपा भगवान श्री राम की पक्षधर है और वहां की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस राम विरोधी है। भाजपा ने पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान भी न सिर्फ़ जय श्री राम के नारों का भरपूर प्रयोग किया बल्कि कई जगह अपने जुलूसों में भगवान राम व रामायण के विभिन्न पात्रों को भी भगवा वेश भूषा में प्रस्तुत किया। गोया पूरे चुनाव को धार्मिक रंग देने की कोशिश की गई। निश्चित रूप से इसी रणनीति के परिणामस्वरूप भाजपा को पश्चिम बंगाल में 18 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। जय श्री राम के नारों की गूंज संसद में उस समय भी बार बार सुनाई दे रही थी जबकि पश्चिम बंगाल के भाजपाई सांसद लोकसभा की सदस्य्ता की शपथ ले रहे थे। हुगली से भाजपा के सांसद लॉकेट चटर्जी ने तो शपथ लेने के बाद जय श्री राम , जय मां दुर्गा, जय माँ काली के भी जयकारे जय हिन्द व भारत माता की जय के साथ लगवा दिए। उधर गोरखपुर के निर्वाचित सांसद रवि किशन का नाम आते ही सदन हर-हर महादेव के नारों से गूंजने लगा. शपथ के बाद रविकिशन ने भी उत्साह में आकर हर-हर महादेव, जय पार्वती तथा गोरखनाथ की जय के नारे लगवाए. उसके बाद उन्होंने लोकसभा के सदस्यता रजिस्टर पर अपने हस्ताक्षर किये. यहां तक की सांसद हेमा मालिनी ने भी शपथ के अंत में राधे-राधे का जयघोष किया. पिछले लोकसभा में अनेक विवादित बयानों के लिए अपनी पहचान बनाने वाले साक्षी महाराज ने संस्कृत भाषा में शपथ ली और अंत में जय श्री राम का उद्घोष किया. परन्तु जब वे शपथ ले चुके, उस समय संसद में मंदिर वहीँ बनाएंगे के नारे भी गूंजने लगे.
जय श्री राम और वन्दे मातरम जैसे नारों की गूँज केवल उसी समय नहीं सुनाई दी जबकि कई भाजपाई सांसद शपथ ले रहे थे बल्कि यह जयकारे उस समय भी लगाए गए जबकि हैदराबाद के एम् आई एम् के सांसद असदुद्दीन ओवैसी का नाम शपथ लेने हेतु पुकारा गया। साफ़तौर से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि नशे में चूर नवनिर्वाचित सत्तारूढ़ सांसदों द्वारा विपक्षी सांसदों को छेड़ा या चिढ़ाया जा रहा हो । जैसे ही ओवैसी शपथ लेने के लिए आगे बढ़े, उसी समय संसद में जय श्री राम और वन्दे मातरम के नारे गूंजने लगे। देश की संसद को ‘धर्म संसद ‘ बनते देख ओवैसी भी स्वयं को विवादों से नहीं बचा सके। उन्होंने भी अल्लाहु अकबर का नारा लोकसभा में उछाल दिया। ओवैसी को देखकर जय श्री राम का नारा लगाने वालों से ओवैसी ने इशारों से और अधिक नारा लगाने के लिए भी कहा। परन्तु साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मुझे देखकर ही भाजपा के लोगों को जय श्री राम की याद आती है। यदि ऐसा है तो यह अच्छी बात है और मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं है। परन्तु अफ़सोस इस बात का है कि उन्हें बिहार में हुई बच्चों की मौत याद नहीं आ रही है। ऐसी ही स्थिति संभल से निर्वाचित सांसद शफ़ीक़ुर रहमान बर्क़ के शपथ के दौरान भी पैदा हुई। उन्होंने भारतीय संविधान को तो ज़िंदाबाद कहा परन्तु वन्दे मातरम कहने पर ऐतराज़ जताया। उनकी इस बात से असहमति जताते हुए सत्ताधारी भाजपा सदस्यों ने शेम शेम के नारे लगाए। केवल सोनिया गाँधी की शपथ के दौरान न केवल कांग्रेस सदस्यों बल्कि सत्ताधारी व विपक्षी समस्त सांसदों ने तालियां बजाकर सोनिया गाँधी द्वारा हिंदी में शपथ लिए जाने का ज़ोरदार स्वागत किया।
17 वीं लोकसभा की शुरुआत के पहले ही दिनों में जब माननीयों की अनुशासनहीनता के ऐसे रंग ढंग दिखाई दे रहे हों तो वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस सद्भावनापूर्ण अपील पर कितने खरे उतरेंगे जो उन्होंने संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद केंद्रीय कक्ष में दिए गए अपने पहले भाषण में की थी। देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया प्रज्ञा ठाकुर जैसी उस सांसद के निर्वाचन पर ही आश्चर्यचकित है जो कि ना केवल मालेगाँव बम ब्लास्ट की आरोपी रही हैं बल्कि शहीद हेमंत करकरे को श्राप दिए जाने तथा नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताये जाने जैसे अतिविवादित बयानों के लिए भी सुर्ख़ियों में रही हैं। आने वाले पांच वर्षों में यह सांसद देश के समक्ष अनुशासन की कैसी मिसाल पेश करेंगे, इसका ट्रेलर शुरुआती दिनों में ही देखा जा चुका है। निश्चित रूप से यदि यह माननीय इसी तरह बेलगाम रहे तो देश के संविधान के मंदिर की मर्यादा पर ज़रूर प्रश्न चिन्ह लग सकता है।

योग की उपयोगिता के प्रति सजग होता विश्व
डॉक्टर अरविन्द जैन
(21 जून अंतराष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष) स्वास्थ्य के प्रति जागरूक और सजग बनाने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र द्वारा योग को हर वर्ष २१ जून को अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मानने की घोसना की। 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा २१ जून को दिन विश्व योग दिवस घोषित किया गया। वैसे तो योग भारतीय संस्कृति की लिए नया नही हैं। ऋषि मुनियों के समय से ही योग क्रिया चली आ रही है लेकिन संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रति वर्ष २१ जून को विश्व योग दिवस घोषित करने से विश्व में योग के प्रति लोग ज़्यादा सजग, उत्साहित, और समर्पित हुए हैं
योग क्या है?
योग का शाब्दिक अर्थ होता है जोड़ना या बाँधना या एकता। शरीर, मन और भावनाओं को आपस में जोड़ने या बाँधने की कला को ही योग कहते हैं।
योग एक व्यायाम की क्रिया है जिससे एक इंसान को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक सकून प्राप्त होता है। योग करने के लिए किसी भी प्रकार के मशीनी औजार की ज़रूर नहीं पड़ती। योग कभी भी कहीं भी किया जा सकता है। प्रतिदिन योग करने से हर इंसान के शरीर को तरह की बीमारियों से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है। योग ना केवल इंसान को शारारिक मजबूती प्रदान करता है बल्कि मानसिक शक्ति भी प्राप्त होती है जो की आजकल की भागदौड़ वाली लाइफ स्टाइल के लिए बहुत ही ज़रूरी है। सुबह-सुबह रोजाना योग करने से शरीर स्वस्थ होता है और दिनभर शरीर में जोश और उत्साह रहता है।
योग के प्रकार
योग के 4 प्रमुख प्रकार हैं जो युगों से चले आ रहे हैं-
राज योग
कर्म योग
भक्ति योग
ज्ञान योग
योग करने का सही समय
वैसे तो योग कभी भी किया जा सकता है इसके लिए को फिक्स टाइम नही हैं लेकिन सुबह सूर्योदय से पहले एक से दो घंटे योग के लिए सबसे अच्छा समय माना गया है क्यूंकी उस समय हवा साफ और ताज़ा होती है और शरीर भी आरामदायक स्थिति में होता है। अगर सुबह आपके लिए योग करना मुमकिन ना हो तो सूर्यास्त के समय भी कर सकते हैं। लेकिन कुछ बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है-
प्रतिदिन योग का समय निर्धारित कर लें
योग मैट या दरी बिछा कर ही करें
योग खुली जगह जैसे पार्क या घर की छत में कर सकते हैं
योग की क्रियायें धीरे धीरे और आसान तरीके से शुरूवात करें
योग किसी एक्सपर्ट से ज़रूर सीखें या सलाह लें
साल २०१४ में अपने पहले भाषण के दौरान नरेन्द्र मोदी ने यू।एन। की आम सभा से कहा कि “भारतीय परंपरा का एक अनमोल उपहार है।” योग से विश्वभर में शांति का संदेश दिया जा सकता है। और योग आज के समय में विश्वभर के लोगों के लिए बहुत ही ज़रूरी है क्यूंकी योग शरीर और मान दोनो को आपस में जोड़ कर रखता है। जो की हर एक आदमी की आत्म शांति के लिए बहुत जरूरी है।
भारत सरकार की अनेकों कोशिशों के बाद साल 2014 की 11 दिसंबर तारीख को संयुक्त राष्ट्र आम सभा द्वारा हर वर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस या विश्व योग दिवस के रुप में पूरे विश्वभर में मानने की घोषणा की गयी। इस तरह 21 जून 2015 को पहली बार विश्व योग दिवस का आयोजन किया गया।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का उद्देश्य
योग के महत्व पूरी दुनिया ने जाने हैं और माने भी हैं। योग को मिले विश्वव्यापी पहचान के लिए इसकी सरलता है आसानी है। बिना खर्चे के स्वस्थ रहने का तरीका है योग। विश्व योग दिवस के अनेको उद्देश्य हैं-
योग विश्व शांति के लिए बहुत ही ज़रूरी है
योग स्वस्थ रहने का सबसे आसान और बिना खर्चे का तरीका है
योग द्वारा लोगों को प्रकृति से जोड़ना
योग शारारिक मजबूती और आत्मविश्वास के लिए ज़रूरी है
पूरे विश्व भर में स्वास्थ्य चुनौतीपूर्ण बीमारियों की दर को घटना
वैश्विक समन्वय और तालमेल के लिए
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस या विश्व योग दिवस के कारण योग सीखने वालों की माँग विश्वभर में बढ़ी है। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में योग टीचर्स की भारी माँग बढ़ी है और साल दर साल यह बढ़ती ही जाएगी। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में योग विषय पर क्लास चल रही हैं योग टीचर्स की नयी जॉब्स आ रही हैं। यह सब अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के कारण ही संभव हो सका है। योग आज हर किसी की लिए ज़रूरी हो गया है। हर किसी के लिए जिम जाना आसान नही हैं। भागदौड़ की इस लाइफ स्टाइल के कारण हर किसी के पास समय नहीं है की वो रोज जिम के लिए समय निकल सके। इसलिए लोग योग को आसानी से आपना रहे हैं क्यूँ की योग कहीं भी किया जा सकता है वो भी बिना किसी खर्चे के। योग सबसे आसान और किफायती तरीका है अपनेआप को फिट और आत्मविश्वास रखने का।
योग ,साधना, भजन, ध्यान ,पूजा पाठ,व्यायाम में मात्र आपको समय देना पड़ता हैं और अन्य कोई लागत नहीं लगती ।इसके लिए नियमितता जरुरी हैं और एक बार रूचि होने पर आनंद की अनुभूति होना शुरू हो जाती हैं ।
योग एक प्रकार से अनुशासित जीवन जीने की कला हैं इसके माध्यम से हम तन मन विचारों में एकाग्रता आने से सुखद अनुभूति होती हैं ।बस इससे जुड़ने भर की देरी हैं ।

बदले-बदले मेरे ‘सरकार’ नज़र आते है…?
ओमप्रकाश मेहता
प्रचंड बहुमत से देश में फिर से अपनी सरकार बनाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी में भी अचानक भारी परिवर्तन सा नजर आने लगा है, मोदी जी की बदली हुई चाल, परिवर्तन चरित्र और विनम्र चेहरा देखकर आज हर कोई आश्चर्यचकित है, अपनी हठ, जिद और अहम् के लिए प्रसिद्ध हो चुके नरेन्द्र भाई में आया यह अचानक परिवर्तन हर किसी को विस्मित कर रहा है, किंतु देश की यह आम धारणा है कि मोदी जी अब देश के सच्चे प्रथम सेवक की भूमिका अख्तियार करने का प्रयास कर रहे है और अपने पांच साल के शासनकाल के खट्टे-मीठे अनुभवों के आधार पर अब उन्होंने जहां अपने अगले पांच साल के शासनकाल में देश का नया इतिहास लिखने की ठान ली है, वहीं वे अपने आप को बदलने का भी प्रयास कर रहे है, ऐसा लगता है कि वे अब सब को साथ लेकर ‘न्यू इण्डिया’ के अपने सपने को साकार करना चाहते है, जिसकी शुरूआत उन्होंने ‘‘निन्दक नीयरे राखिये’’ के मंत्र को अपनाकर, और इसी शुद्ध भावना के तहत् उन्होंने संसद का पहला सत्र शुरू होने से पहले विपक्ष की महिमा को मंडित करने का प्रयास किया और यह स्वीकार किया कि विपक्ष का एक-एक शब्द हमारे लिए मूल्यवान है, विपक्ष को नम्बर की चिंता छोड़ सरकार के साथ एकजुट होकर देश को बदलने की दिशा में हाथ बंटाना चाहिए, उन्होंने कहा विपक्ष का अपना महत्व है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। इस प्रकार संसद के पहले सत्र के पहले ही दिन मोदी ने बिना किसी स्वार्थ के जो प्रतिपक्ष की तरफ सहयोग का हाथ बढ़ाया, वह प्रशंसनीय है, यदि अगले पांच साल अपनी सरकार के साथ प्रतिपक्ष की भी मोदी ने इतनी ही चिंता की तो यह देश पूरे विश्व में प्रजातंत्री देशों का सरताज बन सकता है।
मोदी जी अपने पिछले पांच साला कार्यकाल में अपने देशहित के सपनों को साकार रूप इसलिए नहीं दे पाए थे, क्योंकि राज्यसभा (ऊपरी सदन) में उन्हें बहुमत हासिल नहीं था और कोई भी विधेयक या संविधान संशोधन प्रस्ताव दोनों सदनों से पारित होने के बाद ही मूर्तरूप गृहण करता है, किंतु इस बार तो राज्यसभा में भी बदली हुई स्थितियां है और अगले कुछ दिनों में होने वाले कुछ सीटों के चुनाव के बाद राज्यसभा में भी मोदी जी की स्थिति मजबूत हो जाएगी, इसलिए वे चाहते तो बिना प्रतिपक्ष की परवाह किए कोई भी विधेयक या संशोधन पारित करवा सकते थे, किंतु मोदी जी ने उपलब्धियों के फलों से लदे और झुके वृक्ष की भूमिका अदा कर प्रतिपक्ष को वृक्ष की छांव में आकर मीठे फलों का स्वाद चखने का आमंत्रण दिया, यह उनके बदले हुए व्यक्तित्व का साक्षात स्वरूप है।
अब मोदी जी अपने अगले पांच साल के कार्यकाल के लिए एक महान सपना संजोये हुए है, जिसमें देश को हर क्षेत्र में सर्वोच्च शिखर पर ले जाने का सपना है और इसमें प्रतिपक्ष भी सहभागी बने इसी आकांक्षा से मोदी ने प्रतिपक्ष को अपने साथ आने का निमंत्रण दिया है, जिससे कि इस पुनीत कार्य में सभी की अहम् भूमिका के साथ सहयोग प्राप्त हो सके। यदि बिखरे हुए प्रतिपक्ष ने मोदी जी के आमंत्रण को राजनीतिक चाल न समझ गंभीरता से लेकर मोदी जी को सहयोग करने का देशहित में संकल्प लिया तो यह देश के पिछले सत्तर साल के इतिहास की महत्वपूर्ण मिसाल बनकर सामने आएगा और पूरे विश्व के देश इसे एक अनुकरणीय पहल मानकर उसका अनुकरण करेंगे। यद्यपि मोदी जी ने यह भी कहा है कि प्रतिपक्ष का एक-एक शब्द उनके लिए मूल्यवान है, यदि मोदी जी ने अपने हर देशहित के कदम से पहले उसके बारे में प्रतिपक्ष को साथ लेकर उसकी सलाह को महत्व दिया तो वह प्रतिपक्ष के लिए हौंसला अफजाई होगा। क्योंकि मोदी जी के सामने तीन तलाक, देश में एक साथ चुनाव, आंतरिक व बाहरी चुनौतियां जैसे कई अहम् मुद्दे है, साथ ही ‘न्यू इण्डिया’ के सपने को साकार करने की भी चुनौति है, ऐसे में यदि प्रतिपक्ष का पूर्ण सकारात्मक सहयोग उन्हें प्राप्त हो जाता है तो फिर ये चुनौतियां अपने-आप खत्म हो जाती है, इसलिए अब प्रतिपक्ष से यह दरकार है कि वह देश को नया स्वरूप प्रदान करने की दिशा में मोदी जी को अपना अमूल्य योगदान प्रदान करें।

भूमिगत जल का गिरता स्तर-कारण क्या हैं?
डॉ अरविंद जैन
तेजी से बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता औद्योगिकीकरण, फैलते शहरीकरण के अलावा ग्लोबल वार्मिंग से उत्पन्न जलवायु परिवर्तन भी इसके लिये जिम्मेदार हैं। सन 1901 में हुई प्रथम जनगणना के समय भारत की जनसंख्या 23.8 करोड़ थी जो सन 1947 यानी स्वतंत्रता प्राप्ति के समय बढ़कर 400 करोड़ हो गई। सन 2001 में भारत की जनसंख्या 103 करोड़ थी। इस समय देश की जनसंख्या 130 करोड़ (1.30 अरब) है। एक अनुमान के अनुसार सन 2025 तक भारत की जनसंख्या 139 करोड़ तथा सन 2050 तक 165 करोड़ तक पहुँच जाएगी। इस बढ़ती जनसंख्या का पेयजल खासकर भूमिगत जल पर जबर्दस्त दबाव पड़ेगा। बढ़ती आबादी के कारण जहाँ जल की आवश्यकता बढ़ी है वहीं प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता भी समय के साथ कम होती जा रही है। कुल आकलनों के अनुसार सन 2000 में जल की आवश्यकता 750 अरब घन मीटर (घन किलोमीटर) यानी 750 जीसीएम (मिलियन क्यूबिक मीटर) थी। सन 2025 तक जल की यह आवश्यकता 1050 जीसीएस तथा सन 2050 तक 1180 बीसीएम तक बढ़ जाएगी। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश में प्रति व्यक्ति जल की औसत उपलब्धता 5000 घन मीटर प्रति वर्ष थी। सन 2000 में यह घटकर 2000 घन मीटर प्रतिवर्ष रह गई। सन 2050 तक प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 1000 घन मीटर प्रतिवर्ष से भी कम हो जाने की सम्भावना है।
स्पष्ट है कि बढ़ती जनसंख्या के कारण जल की उपलब्धता कम हो जाने के चलते भूमिगत जल पर भी दबाव बढ़ा जिसका परिणाम इसके गिरते स्तर के रूप में सामने आया।
बढ़ते औद्योगिकीकरण तथा गाँवों से शहरों की ओर तेजी से पलायन तथा फैलते शहरीकरण ने भी अन्य जलस्रोतों के साथ भूमिगत जलस्रोत पर भी दबाव उत्पन्न किया है। भूमिगत जल-स्तर के तेजी से गिरने के पीछे ये सभी कारक भी जिम्मेदार रहे हैं।
जल प्रदूषण की समस्या ने बोतलबन्द जल की संस्कृति को जन्म दिया। बोतलबन्द जल बेचने वाली कम्पनियाँ भूमिगत जल का जमकर दोहन करती हैं। नतीजतन, भूजल-स्तर में गिरावट आती है। गौरतलब है कि भारत बोतलबन्द पानी का दसवाँ बड़ा उपभोक्ता है। हमारे देश में प्रति व्यक्ति बोतलबन्द पानी की खपत पाँच लीटर सालाना है जबकि वैश्विक औसत 24 है। देश में सन 2013 तक बोतलबन्द जल का कारोबार 60 अरब रुपये था। सन 2018 तक इसके 160 अरब हो जाने का अनुमान है।
पहले तालाब बहुत होते थे जिनकी परम्परा अब लगभग समाप्त हो चुकी है। इन तालाबों का जल भूगर्भ में समाहित होकर भूजल को संवर्द्धित करने का कार्य करता था। लेकिन, बदलते समय के साथ लोगों में भूमि और धन-सम्पत्ति के प्रति लालच बढ़ा जिसने तालाबों को नष्ट करने का काम किया। वैसे वर्षा का क्रम बिगड़ने से भी काफी तालाब सूख गए। रही-सही कसर भू-माफियाओं ने पूरी कर दी। उन्होंने तालाबों को पाटकर उन पर बड़े-बड़े भवन खड़े कर दिए अथवा कृषिफार्म बना डाले।
धरातल से विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जल के भूगर्भ में पहुँचने के कारण ही भूजल की सृष्टि होती है। इन स्रोतों में एक है वर्षा का जल जो पाराम्य शैलों से होकर रिस-रिसकर अन्दर पहुँचता है। शैल रंध्रों में भी जल एकत्रित होता है। जब कोई शैल पूर्णतया जल से भर जाती है तो उसे संतृप्त शैल कहते हैं। शैल रंध्रों के बन्द हो जाने से जल रिसकर नीचे नहीं जा पाता है। इस प्रकार जल नीचे न रिसने के कारण जल एकत्रित हो जाता है।यही एकत्रित जल जलभृत यानी एक्विफर कहलाता है।

दोषी प्रकृति या हम?
योगेश कुमार गोयल
तापमान में बढ़ोतरी के इस बार सारे रिकॉर्ड टूट रहे हैं। दिल्ली में जहां पारे ने सारे रिकार्ड तोड़ते हुए 48 डिग्री तापमान के आंकड़े को भी पार कर लिया है, वहीं चुरू सहित राजस्थान के कुछ इलाकों में तापमान कुछ दिन पहले ही 50 डिग्री के पार जा चुका है और श्रीगंगानगर में भी भीषण गर्मी का 75 साल का रिकॉर्ड टूट गया है, दूसरी ओर पहाड़ भी बुरी तरह तप रहे हैं। मैदानी इलाकों से इतर पहाड़ी इलाकों की बात करें तो शिमला, मसूरी जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में भी तापमान सामान्य से चार डिग्री अधिक दर्ज किया गया है। मौसम विभाग द्वारा कुछ दिन पहले ही हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र इत्यादि राज्यों में रेडअलर्ट जबकि हिमाचल तथा उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्यों में यैलोअलर्ट जारी किया गया था। उल्लेखनीय है कि यैलोअलर्ट में लू का पूर्वानुमान जारी किया जाता है जबकि रेडअलर्ट तापमान में सामान्य से चार डिग्री तक बढ़ोतरी होने पर जारी किया जाता है। लू तथा भीषण गर्मी के कहर से देशभर में कई दर्जन लोग प्राण गंवा चुके हैं।
एक ओर जहां इस समय देशभर के अनेक मैदानी और पर्वतीय इलाके भीषण गर्मी से झुलस रहे हैं, वहीं कुछ ही दिनों पहले मई माह में ही शिमला, मनाली, रोहतांग, लाहौलस्पीति सहित ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बारिश और बर्फबारी ने दिसम्बर-जनवरी जैसी शीतलहर पैदा कर दी थी। हिमाचल की अधिकांश पर्वत श्रृंखलाएं तब बर्फ की सफेद चादर से ढ़क गई थी और प्रदेश के कई इलाकों में लोग ठंड से कांपने लगे थे। दूसरी ओर दिल्ली सहित आसपास के इलाकों में भी गत 17 मई को बारिश के साथ हुई ओलावृष्टि ने हर किसी को चौंका दिया था। मई-जून में दिल्ली सहित उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में आंधी-तूफान के बाद हल्की बारिश होना सामान्य बात है किन्तु इस मौसम में एकाएक ओलावृष्टि शुरू हो जाना और फिर चंद ही दिनों बाद आसमान से आग का बरसना निश्चित रूप से पर्यावरण के बिगड़ते मिजाज और मौसम चक्र में बदलाव का स्पष्ट संकेत है। स्मरणीय रहे कि इसी साल अप्रैल माह के तीसरे सप्ताह में भी देश के कुछ राज्यों में तेज आंधी और बारिश के रूप में प्रकृति ने कहर बरपाया था। ऐसे में पिछले कुछ समय से मौसम के तेजी से बिगड़ते मिजाज के मद्देनजर इन परिस्थितियों की अनदेखी करना उचित नहीं।
हर साल गर्मी के दिनों में मौसम में थोड़ा बदलाव देखा जाना कोई नई बात नहीं है किन्तु मौसम के बदलाव ने अप्रैल माह के पहले ही पखवाड़े में ही जिस प्रकार करवटें बदलकर देखते ही देखते कई दर्जन लोगों की बलि ले ली, उसके कुछ दिनों बाद पर्वतीय इलाकों में एकाएक ठंड का प्रकोप देखा गया और अब भीषण गर्मी का कहर बरप रहा है, आसमान से आग बरस रही है, यह सब मौसम के बिगड़ते मिजाज का स्पष्ट संकेत है। मैदानी इलाकों के पर्यावरण को तो हमने अपनी करतूतों से कहीं का नहीं छोड़ा और अब पर्वतीय इलाकों के पर्यावरण से हम किस कदर खिलवाड़ कर रहे हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण पहाड़ों में बढ़ती पर्यटकों की बेतहाशा भीड़ है, जिसके चलते हाल ही में शिमला, मसूरी जैसे पर्वतीय इलाकों में भी कई-कई घंटों तक कई किलोमीटर लंबा ट्रैफिक जाम का आलम देखा गया।
वर्ष दर वर्ष अब जिस प्रकार मौसम के बिगड़ते मिजाज के चलते समय-समय पर तबाही देखने को मिल रही है, ऐसे में हमें अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि मौसम चक्र के बदलाव के चलते प्रकृति संतुलन पर जो विपरीत प्रभाव पड़ रहा है, उसकी अनदेखी के कितने भयावह परिणाम होंगे। हमें यह भी समझ लेना होगा कि यह सब प्रकृति के साथ बड़े पैमाने पर हो रही मानवीय छेड़छाड़ का ही दुष्परिणाम है। विड़म्बना है कि हम यह समझना ही नहीं चाहते कि मनुष्य प्रकृति की गोद में एक अबोध शिशु के समान है किन्तु आधुनिकता की अंधी दौड़ में वह स्वयं को प्रकृति का स्वामी समझने की भूल कर बैठा है और मानवीय गतिविधियों के चलते प्रकृति के बुरी तरह से दोहन का नतीजा बार-बार प्रकृति के प्रचण्ड प्रकोप के रूप में हमारे सामने आता रहा है।
न सिर्फ भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर तापमान में निरन्तर हो रही बढ़ोतरी और मौसम का लगातार बिगड़ता मिजाज गहन चिंता का विषय बना है। हालांकि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पिछले कुछ वर्षों में दुनियाभर में दोहा, कोपेनहेगन, कानकुन इत्यादि बड़े-बड़े अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन होते रहे हैं और वर्ष 2015 में पेरिस सम्मेलन में तो 197 देशों ने सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए अपने-अपने देश में कार्बन उत्सर्जन कम करने और 2030 तक वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री तक सीमित करने का संकल्प लिया था किन्तु उसके बावजूद इस दिशा में अभी तक कोई ठोस कदम उठते नहीं देखे गए हैं। दरअसल वास्तविकता यही है कि राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर प्रकृति के बिगड़ते मिजाज को लेकर चर्चाएं और चिंताएं तो बहुत होती हैं, तरह-तरह के संकल्प भी दोहराये जाते हैं किन्तु सुख-संसाधनों की अंधी चाहत, सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि, अनियंत्रित औद्योगिक विकास और रोजगार के अधिकाधिक अवसर पैदा करने के दबाव के चलते इस तरह की चर्चाएं और चिंताएं अर्थहीन होकर रह जाती हैं।
मौसम चक्र में बदलाव का आलम यह है कि वर्षा ऋतु में आसमान में बादलों का नामोनिशान तक नजर नहीं आता, वहीं वसंत ऋतु में बादल झमाझम बरसने लगते हैं, सर्दियों में मौसम एकाएक गर्म हो उठता है और गर्मियों में अचानक पारा लुढ़क जाता है। अचानक ज्यादा बारिश होना या एकाएक ज्यादा सर्दी या गर्मी पड़ना और फिर तूफान आना, पिछले कुछ समय से जलवायु परिवर्तन के ये भयावह खतरे बार-बार सामने आ रहे हैं और मौसम वैज्ञानिक स्वीकारने भी लगे हैं कि इस तरह की घटनाएं आने वाले समय में और भी जल्दी-जल्दी विकराल रूप में सामने आ सकती हैं। हालांकि प्रकृति बार-बार मौसम चक्र में बदलाव के संकेत, चेतावनी तथा संभलने का अवसर देती रही है लेकिन हम आदतन किसी बड़े खतरे के सामने आने तक ऐसे संकेतों या चेतावनियों को नजरअंदाज करते रहे हैं, जिसका नतीजा अक्सर भारी तबाही के रूप में सामने आता रहा है। पर्यावरण प्रदूषण के कारण पिछले तीन दशकों से जिस प्रकार मौसम चक्र तीव्र गति से बदल रहा है और प्राकृतिक आपदाओं का आकस्मिक सिलसिला तेज हुआ है, उसके बावजूद अगर हम नहीं संभलना चाहते तो इसमें भला प्रकृति का क्या दोष?
अगर पिछले वर्ष इन्हीं दिनों में प्रकृति के कहर को याद करें तो एक दर्जन से भी अधिक राज्यों में कुछ ही दिनों के भीतर प्रचण्ड धूल भरी आंधियों, बेमौसम बर्फबारी, ओलावृष्टि, बादलों का फटना, भारी बारिश और आसमान से गिरती बिजली ने सैंकड़ों जिंदगियां लील ली थी, हजारों लोग घायल हुए थे, हजारों मकान बुरी तरह ध्वस्त हुए थे, हजारों मवेशी मारे गए थे और अरबों रुपये की चल-अचल सम्पत्ति तथा फसलें तबाह हुई थी। बदरीनाथ-केदारनाथ में बेमौसम बर्फबारी ने हर किसी को आश्चर्यचकित कर दिया था। हिमाचल के शिमला, मनाली, रोहतांग सहित कई इलाके गर्मी के मौसम में भी बर्फ की सफेद चादर से ढ़क गए थे और जम्मू कश्मीर में बेमौसम बर्फबारी से कई इलाके एकाएक सर्दी की चपेट में आने से स्थिति विकराल हो गई थी। देश के इतिहास में पहली बार देखा गया था, जब करीब दो दर्जन राज्यों में बार-बार तूफान की आशंका के मद्देनजरअलर्ट जारी किए जाते रहे। मानसून जाते-जाते केरल सहित कुछ पहाड़ी राज्यों में भी विकराल बाढ़ के रूप में जिस तरह की भयानक तबाही मचा गया था, उसके स्मरण मात्र से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
कुछ साल पहले तक पहाड़ी इलाकों का ठंडा वातावरण हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करता था किन्तु पर्वतीय क्षेत्रों में यातायात के साधनों से बढ़ते प्रदूषण, बड़े-बड़े उद्योग स्थापित करने और राजमार्ग बनाने के नाम पर बड़े पैमाने पर वनों के दोहन और सुरंगें बनाने के लिए बेदर्दी से पहाड़ों का सीना चीरते जाने का ही दुष्परिणाम है कि हमारे इन खूबसूरत पहाड़ों की ठंडक भी धीरे-धीरे कम हो रही है। स्थिति इतनी बदतर होती जा रही है कि अब हिमाचल की धर्मशाला, सोलन व शिमला जैसी हसीन वादियों और यहां तक कि जम्मू कश्मीर में कटरा जैसे ठंडे माने जाते रहे स्थानों पर भी पंखों, कूलरों व ए.सी. की जरूरत महसूस की जाने लगी है। पहाड़ों में बढ़ती इसी गर्माहट के चलते हमें अक्सर घने वनों में भयानक आग लगने की खबरें भी सुनने को मिलती रहती हैं। पहाड़ों की इसी गर्माहट का सीधा असर निचले मैदानी इलाकों पर पड़ता है, जहां का पारा अब हर वर्ष बढ़ता जा रहा है।
मानवीय करतूतों के चलते वायुमंडल में कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन, ओजोन और पार्टिक्यूलेटमैटर के प्रदूषण का मिश्रण इतने खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है कि हमें सांस के जरिये असाध्य बीमारियों की सौगात मिल रही है। सीवरेज की गंदगी स्वच्छ जल स्रोतों में छोड़ने की बात हो या औद्योगिक इकाईयों का अम्लीय कचरा नदियों में बहाने की अथवा सड़कों पर रेंगती वाहनों की लंबी-लंबी कतारों से वायुमंडल में घुलते जहर की या फिर सख्त अदालती निर्देशों के बावजूद खेतों में जलती पराली से हवा में घुलते हजारों-लाखों टन धुएं की, हमारी आंखें तब तक नहीं खुलती, जब तक प्रकृति का बड़ा कहर हम पर नहीं टूट पड़ता। अधिकांश राज्यों में सीवेजट्रीटमेंट और कचरा प्रबंधन की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। पैट्रोल, डीजल से उत्पन्न होने वाले धुएं ने वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड तथा ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है। पेड़-पौधे कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित कर पर्यावरण संतुलन बनाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं लेकिन पिछले कुछ दशकों में वन-क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर दिया गया है। ब्रिटेन के प्रख्यात भौतिक शास्त्री स्टीफनहॉकिंग ने कहा था कि यदि मानव जाति की जनसंख्या इसी कदर बढ़ती रही और ऊर्जा की खपत दिन-प्रतिदिन इसी प्रकार होती रही तो करीब छह सौ वर्षों बाद पृथ्वी आग का गोला बनकर रह जाएगी। धरती का तापमान बढ़ते जाने का ही दुष्परिणाम है कि ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ पिघल रही है, जिससे समुद्रों का जलस्तर बढ़ने के कारण दुनिया के कई शहरों के जलमग्न होने की आशंका जताई जाने लगी है।
प्रकृति बार-बार अपना रौद्र रूप दिखाकर हमें स्पष्ट चेतावनी देती रही है कि अगर हमने उसके साथ अंधाधुंध खिलवाड़ बंद नहीं किया तो उसके कितने घातक परिणाम होंगे लेकिन विड़म्बना है कि अब लगातार प्रकृति का प्रचण्ड रूप देखते रहने के बावजूद हम हर बार प्रकृति की इन चेतावनियों को नजरअंदाज कर खुद अपने विनाश को आमंत्रित कर रहे हैं। हम यह समझना ही नहीं चाहते कि पहाड़ों का सीना चीरकर हरे-भरे जंगलों को तबाह कर हम जो कंक्रीटके जंगल विकसित कर रहे हैं, वह वास्तव में विकास नहीं है बल्कि विकास के नाम पर हम अपने ही विनाश का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। हम हैं कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के नाम पर वैश्विक चिंता व्यक्त करने से आगे शायद कुछ करना ही नहीं चाहते। प्रकृति कभी समुद्री तूफान तो कभी भूकम्प, कभी सूखा तो कभी अकाल के रूप में अपना विकराल रूप दिखाकर हमें बारम्बार चेतावनी देती रही है कि हम यदि इसी प्रकार प्रकृति के संसाधनों का बुरे तरीके से दोहन करते रहे तो हमारे भविष्य की तस्वीर कैसी होने वाली है।

हीरा जनम अनमोल था, कौड़ी बदले जाये
प्रदीप कुमार सिंह
(17 जून कबीर जयन्ती पर विशेष) आज समाज, देश और विश्व के देशों में बढ़ती हुई भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी, स्वार्थलोलुपता, अनेकता आदि समस्याओं से सारी मानवजाति चिंतित है। वास्तव में ये ऐसी मूलभूत समस्यायें हैं जिनसे निकल कर ही हत्या, लूट, मार-काट, आतंकवाद, धार्मिक विद्वेष, युद्धों की विभीषिका आदि समस्याओं ने जन्म लिया है। इस प्रकार आज इन समस्याओं ने पूरे विश्व की मानवजाति को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। ऐसी भयावह परिस्थिति में समाज को सही राह दिखाने के लिए आज कबीर दास जी जैसे युग प्रवर्तक की आवश्यकता है। कबीरदास जी ने समाज में व्याप्त भेदभाव को समाप्त करने पर बल देते हुए कहा था कि ‘‘वही महादेव वही मुहम्मद ब्रह्मा आदम कहिए। कोई हिंदू कोई तुर्क कहांव एक जमीं पर रहिए।’’ कबीरदास जी एक महान समाज सुधारक थे। उन्होंने अपने युग में व्याप्त सामाजिक अंधविश्वासों, कुरीतियों और रूढ़िवादिता का विरोध किया। उनका उद्देश्य विषमताग्रस्त समाज में जागृति पैदा कर लोगों को भक्ति का नया मार्ग दिखाना था, जिसमें वे काफी हद तक सफल भी हुए। कबीर दास जी ने कहा था कि ‘‘बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो हितय ढूंढो आपनो, मुझसा बुरा न कोय।।’’
कबीर दास जी कहते हैं कि मनुष्य जीवन तो अनमोल है इसलिए हमें अपने मानव जीवन को भोग-विलास में व्यतीत नहीं करना चाहिए बल्कि हमें अपने अच्छे कर्मों के द्वारा अपने जीवन को उद्देश्यमय बनाना चाहिए। कबीर दास जी कहते हैं कि ‘‘रात गंवाई सोय कर, दिवस गवायों खाय। हीरा जनम अनमोल था, कौड़ी बदले जाये।। अर्थात् मानव जीवन तो अनमोल होता है किन्तु मनुष्य ने सारी रात तो सोने में गंवा दी और सारा दिन खाने-पीने में बिता दिया। इस प्रकार अज्ञानता में मनुष्य अपने अनमोल जीवन को भोग-विलास में गंवा कर कौड़ी के भाव खत्म कर लेता है। कबीर दास जी कहते हैं कि ‘‘पानी मेरा बुदबुदा, इस मानुष की जात। देखत ही छिप जायेंगे, ज्यौं तारा परभात।।’’ अर्थात् मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले के समान है, जो थोड़ी सी हवा लगते ही फूट जाता है। जैसे सुबह होते ही रात में निकलने वाले तारे छिप जाते हैं, वैसे ही मृत्यु के आगमन पर परमात्मा द्वारा दिया गया यह जीवन समाप्त हो जाता है। इसलिए हमें अपने मानव जीवन के उद्देश्य को जानकर उनको पूरा करने का हरसंभव प्रयत्न करना चाहिए।
आज भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ का मूल मंत्र संसार से लुप्त होता जा रहा है। कहीं हिंदू, कहीं मुसलमान, कहीं ईसाई, कहीं पारसी और न जाने कितनी कौमों के लबादे ओढ़े आदमी की शक्ल के लाखों, करोड़ों लोगों की भीड़ दिखाई दे रही है। गौर से देखने पर ऐसा लगता है कि जैसे इस भीड़ में आदमी तो नजर आ रहे हैं पर आदमियत कहीं खो गई है। शक्ल सूरत तो इंसान जैसी है, मगर कारनामे शैतान जैसे होते जा रहे हैं, जबकि मानव शरीर तो नश्वर है इसे एक न एक दिन मिट्टी में मिल ही जाना है। इसलिए हमें अपने शरीर पर कभी अभिमान नहीं करना चाहिए। कबीर दास जी कहते हैं कि ‘‘माटी कहै कुम्हार को, क्या तू रौंदे मोहि। एक दिन ऐसा होयगा, मैं रौदँूगी तोहि।’’ अर्थात् मिट्टी कुम्हार से कहती है कि समय परिवर्तनशील है और एक दिन ऐसा भी आयेगा जब तेरी मृत्यु के पश्चात् मैं तुझे रौंदूगी। इसलिए हमें परमपिता परमात्मा द्वारा दिये गये शरीर पर अभिमान न करते हुए इस जगत् में रहते हुए मानव हित का अधिक से अधिक काम करना चाहिए।
कबीर तो सच्चे अर्थों में मानवतावादी थे। उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के बीच मानवता का सेतु बांधा। जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे। कबीरदास ने हिन्दू-मुसलमान का भेद मिटाकर हिन्दू भक्तों तथा मुसलमान फकीरों का सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों को हृदयांगम कर लिया। कबीरदास जी एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। वे भेदभाव रहित समाज की स्थापनाा करना चाहते थे। उन्होंने ब्रह्म के निराकार रूप में विश्वास प्रकट किया। वे हर स्तर पर सामाजिक विसंगतियों के विरूद्ध लड़ते रहे और सभी धर्मों के खिलाफ बोलते भी रहे। जैसे उन्होंने मूर्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए कहा कि ‘‘पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजौं पहार। या ते तो चाकी भली, जासे पीसी खाय संसार।।’’ इसी प्रकार उन्होंने मुसलमानों से कहा- ‘‘कंकड़ पत्थर जोरि के, मस्जिद लयी बनाय, ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।।’’
एकेश्वरवाद के समर्थक कबीरदास जी का मानना था कि ईश्वर एक है। उन्होंने व्यंग्यात्मक दोहों और सीधे-सादे शब्दों में अपने विचार को व्यक्त किया। फलतः बड़ी संख्या में सभी धर्म एवं जाति के लोग उनके अनुयायी हुए। संत कबीर का कहना था कि सभी धर्मों का लक्ष्य एक ही है। सिर्फ उनके कर्मकांड अलग-अलग होते हैं। उनका कहना था कि ‘‘माला फेरत जुग गया, मिटा न मनका फेर। कर का मनका डारि के, मन का मनका फेर।’’ अर्थात् मनुष्य ईश्वर को पाने की चाह में माला के मोती को फिरता रहता है परन्तु इससे उसके मन का दोष दूर नहीं होता है। कबीर जी कहते हैं कि हमें हाथ की माला को छोड़ देना चाहिए क्योंकि इससे हमें कोई लाभ नहीं होने वाला है। हमें तो केवल अपने मन को एकाग्र करके भीतर की बुराइयों को दूर करना चाहिए। कबीर दास जी का कहना है कि ‘‘मन मक्का दिल द्वारिका, काया काशी जान। दस द्वारे का देहरा, तामें जोति पिछान।’’ अर्थात् यह पवित्र मन ही मक्का, हृदय द्वारिका और सम्पूर्ण शरीर ही काशी है।
मानव आलस्य के कारण आज का काम कल पर टालने का प्रयास करता है। कबीर दास जी कहते हैं कि हमें आज का काम कल पर न टाल कर उसे तुरन्त पूरा कर लेना चाहिए। कबीर जी काम को टालते रहने की आदत के बहुत विरोधी थे। वे इस तथ्य को जानते थे कि मनुष्य का जीवन छोटा होता है जबकि उसे ढेर सारे कामों को इसी जीवन में रहते हुए करना है। आज से छः सौ वर्ष पूर्व भी समय के सदुपयोग के महत्व को समझते हुए कबीर दास जी ने कहा कि ‘‘काल करे जो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होयगी, बहुरी करोगे कब।’’ इस दोहे मंे कबीर जी ने समय के महत्व को थोड़े शब्दों में ही समझा दिया है। उनका कहना था कि मनुष्य जीवन की उपयोग की बात तो करते हैं किन्तु उन क्षणों एवं समय पर, जो कि जीवन की इकाई है, कोई ध्यान नहीं देते हैं। इस प्रकार समय को गवांकर वास्तव में हम अपने अनमोल जीवन को गंवाने का काम करते हैं। आज मानव जीवन में पाये जाने वाले तनाव का भी सबसे बड़ा कारण ‘समय का दुरुपयोग’ ही है। जब हम किसी काम को तुरन्त न करके आगे के लिए टाल देते हैं तो यही काम हमें बहुधा आपात स्थिति में ला देता है, जिससे मनुष्य में तनाव की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
कबीरदास जी जिस युग में आये वह युग भारतीय इतिहास में आधुनिकता के उदय का समय था। वह कर्म प्रधान समाज के पैरोकार थे और उसकी झलक उनकी रचनाओं में साफ झलकती है। लोककल्याण हेतु ही मानो उनका समस्त जीवन था। कबीर दास जी एक सच्चे विश्व-प्रेमी थे। कबीर को जागरण युग का अग्रदूत कहा जाता है। डाॅ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि साधना के क्षेत्र में वे युग-युग के गुरू थे, उन्होंने संत काव्य का पथ प्रदर्शन कर क्षेत्र में नव-निर्माण किया था। कबीरदास जी अपने जीवन में प्राप्त की गयी स्वयं की अनुभूतियों को ही काव्यरूप में ढाल देते थे। उनका स्वयं का कहना था ‘‘मैं कहता आंखिन देखी, तू कहता कागद की लेखी।’’ इस प्रकार उनके काव्य का आधार स्वानुभूति या यर्थाथ ही है। इसलिए अब वह समय आ गया है जबकि हम वर्तमान समाज में व्याप्त धर्म, जाति, रंग एवं देश के आधार पर बढ़ते हुए भेदभाव जैसी बुराइयों को जड़ से उखाड़ फेकें और संसार की समस्त मानवजाति में इंसानियत एवं मानवता की स्थापना के लिए कार्य करें।

मोदी के रवैए में सुधार
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
चार दिन पहले मैंने लिखा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना आत्म-सम्मान क्यों घटा रहे हैं ? उन्हें शांघाई सहयोग संगठन की बैठक में भाग लेना है और उन्हें किरगिजिस्तान की राजधानी बिश्केक जाना है तो क्या यह जरुरी है कि वे पाकिस्तान की हवाई-सीमा में से उड़कर जाएं, जैसे कि पूर्व विदेशमंत्री सुषमा स्वराज 21 मई को गई थीं? सुषमा और मोदी को इस सुविधा के लिए इमरान खान की सरकार से निवेदन करना पड़ा है। पाकिस्तान की सरकार ने मेहरबानी दिखाई और मोदी को अपनी हवाई सीमा में से अपने जहाज को ले जाने की अनुमति दे दी ताकि वे अपना आठ घंटे का सफर चार घंटे में ही कर सकें। यदि वे ओमान और ईरान होकर जाते तो उन्हें आठ घंटे लगते। मैंने अपने लेख में नरेंद्र भाई से यही पूछा था कि एक तरफ तो वे इमरान के बातचीत के हर प्रस्ताव को ठुकरा रहे हैं, पाकिस्तान से व्यापार का विशेष दर्जा उन्होंने खत्म कर दिया है, दक्षेस के इस सदस्य को अछूत बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं और अपने चार घंटे बचाने के लिए उसके आगे गिड़गिड़ा रहे हैं। कल मुझे मोदी के और मेरे दो-तीन साझा मित्रों ने दोपहर को फोन करके बताया कि मोदी ने पाकिस्तान को कह दिया है कि वे उसके हवाई मार्ग का इस्तेमाल नहीं करेंगे। क्या खूब ! यह हुई किसी भी नीति की एकरुपता ! लेकिन इसका अर्थ यह भी है कि आज और कल बिश्केक में मोदी और इमरान के बीच कोई संवाद नहीं होगा। न हो तो न हो इससे शांघाई-देशों का कुछ बिगड़नेवाला नहीं है लेकिन उन शेष छह देशों पर इसका क्या कोई अच्छा असर पड़ेगा ? मुझे कुछ मित्रों ने यह भी कहा कि मोदी इसलिए पाकिस्तान की हवाई-सीमा में से भी नहीं जा रहे हैं कि उन्हें अपनी सुरक्षा की भी चिंता है। मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा। फिर भी मैं सोचता हूं, जैसे कि गत माह बिश्केक में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच संक्षिप्त शिष्टाचार भेंट हो गई, वैसी भेंट दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच हो जाए तो इसे नाक का सवाल नहीं बनाया जाना चाहिए। इस बैठक का इस्तेमाल एक-दूसरे पर हमला करने की बजाय आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए किया जाए तो बेहतर होगा। मुझे यह भी समझ में नहीं आता कि शांघाई सहयोग संगठन में अफगानिस्तान का न होना कहां तक ठीक है ? अफगानिस्तान तो संपूर्ण मध्य एशिया और भारत के बीच एक जबर्दस्त और महान सेतु है। अफगानिस्तान को इसका सदस्य बनाया जाना बहुत जरुरी है। यदि सार्क, बिम्सटेक और एससीओ में से चीन और रुस को हटा दिया जाए तो यही क्षेत्र मेरी कल्पना का महान आर्यावर्त्त है।

हाई स्पीड ट्रेनों की ललक : दुर्घटनाओं से सबक लें
अजित वर्मा
हाल ही फ्रांस की राजधानी पेरिस में अचानक बिजली चले जाने से एक तेज रफ्तार ट्रेन में सवार यात्री करीब 6 घंटे तक सुरंग के भीतर फंसे रहे। इस दौरान गर्मी और रोशनी की कमी के साथ-साथ उन्हें शौचालय की कमी से भी जूझना पड़ा। फ्रेंच रेल ऑपरेटर एसएनसीएफ ने बताया कि बार्सिलोना जा रही ट्रेन पैरिस के बाहर सुरंग में फंस गई। बिजली हालांकि 10-15 मिनट के लिए ही गई थी, लेकिन ट्रेन जहां रुकी थी, उस वजह से वह देर तक स्टार्ट नहीं हुई।
सुरंग के भीतर फंसे हुए यात्रियों को लाने के लिए एक नई ट्रेन भेजी गई, लेकिन इससे कोई लाभ नहीं हुआ। यात्रियों को एसएनसीएफ कर्मचारियों, पुलिस और अग्निशमन दल के कर्मियों ने मिलकर सभी यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। 6 घंटे फंसे रहने के बाद यात्रियों को सुरंग में ही एक दूसरी ट्रेन में शिफ्ट किया गया। ट्रेन में ज्यादा संख्या में पर्यटक सवार थे। पर्यटकों ने कहा कि 6 घंटे तक बिना शौचालय के ट्रेन में फंसे रहने का अनुभव भयावह था।
यह अपने तरह की एक घटना है, लेकिन जब हम विकास की प्रक्रिया में हैं, तो हमें, खास तौर पर भारत जैसे देशों को अपनी विकास योजनाओं में ऐसी घटनाओं से बचने का प्रावधान करने की दूरदर्शिता अवश्य बरतना चाहिए। यह वक्त है, जब भारत में हाई स्पीड ट्रेनों की ही नहीं, बुलेट ट्रेन चलाने की तैयारियां चल रही हैं। यों ऐसी ट्रेनें दुनिया के तमाम विकसित देशों में चल रही हैं और इनकी तकनीक तथा इनसे जुड़े सुरक्षा पहलुओं का काफी अध्ययन भी दुनिया कर चुकी है और अनुभव भी हासिल कर चुकी है।
लेकिन ये भारत है, जहाँ आये दिन भीषण रेल-दुर्घटनाएं होती हैं। इसीलिए हमने यहां सावधान और सतर्क रहने पर जोर दिया है। फ्रांस की दुर्घटना एक अलग तरह का सबक है। इसलिए संज्ञान उसका भी लिया जाना चाहिए।

मैं सूअर और तू मेरा बच्चा’
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बारे में एक ट्वीट पर पत्रकार प्रशांत कनोजिया को उप्र की पुलिस ने दिल्ली आकर गिरफ्तार कर लिया था सर्वोच्च न्यायालय ने इस पत्रकार को तुरंत रिहा कर दिया और कहा कि उप्र सरकार की यह कार्रवाई नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लंघन है। क्या किया था ऐसा कनोजिया ने, जिसके कारण उसे गिरफ्तार कर लिया गया था ? उसने किसी महिला के उस वीडियो को ट्वीट कर दिया था, जिसमें उसने दावा किया था कि उसने योगी के साथ शादी करने का प्रस्ताव भेजा है। यह ठीक है कि किसी संन्यासी को शादी का प्रस्ताव भेजना बिल्कुल बेहूदा बात है लेकिन यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। हमारे कई विश्व-प्रसिद्ध संन्यासियों और केथोलिक पादरियों को भी इस तरह के प्रस्ताव आते रहे हैं लेकिन उन्होंने प्रस्तावकों को हंसकर टाल दिया है या कभी कभी उन्हें स्वीकार करने की भी घटनाएं हुई हैं। यदि किसी महिला ने ऐसा प्रस्ताव रख भी दिया है तो उसका योगी बुरा मानने की बजाय उसे यह कह सकते थे कि बहन, यह असंभव है। हो सकता है कि उस महिला ने अज्ञानतावश या मोहवश या जानबूझकर बदमाशी करते हुए यह प्रस्ताव रखा है। हर स्थिति में उसे हवा में उड़ा दिया जाना चाहिए था लेकिन उस प्रस्ताव को दुबारा ट्वीट करनेवाले पत्रकार को जेल भिजवाना तो उस प्रस्तावक औरत की मूर्खता से भी अधिक गंभीर मूर्खता है। ऐसे कई प्रस्ताव मुझे अपने ब्रह्मचर्य-काल में भी मिला करते थे। इंदौर, न्यूयार्क और मास्को में अब से लगभग 50-55 साल पहले जब ऐसे प्रस्ताव आते थे तो उन्हें छुए बिना ही मैं रद्दी की टोकरी के हवाले कर देता था। एक संन्यासी को ऐसे प्रस्ताव पर बुरा लगना स्वाभाविक है लेकिन वह एक पार्टी का नेता, जनता का प्रतिनिधि और मुख्यमंत्री भी है। गुस्से में आकर एक पत्रकार को गिरफ्तार करना तो अपनी छवि को विकृत करना है। सार्वजनिक जीवन में ऐसे कई क्षण आते हैं, जब उत्तेजित होने की बजाय हास्य-व्यंग्य की मुद्रा धारण करना बेहतर होता है। पिछले दिनों पद्यावती फिल्म पर मेरे लेख पर उत्तेजित होकर कई लोगों ने मुझ पर तीव्र वाक-प्रहार किए। किसी नौजवान ने मुझे लिखा कि ‘बुड्ढ़े, तू सूअर है’। मैंने उसे लिखा कि ‘तुमने मुझे कितना सुंदर तोहफा दिया है। मैं सूअर हूं और तू मेरा बच्चा है।’ उसके बाद उसका कोई जवाब नहीं आया। उसकी बोलती बंद हो गईं।

दक्षिण भारत की यात्रा से साधे मोदी ने समीकरण
रमेश सर्राफ धमोरा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दूसरे कार्यकाल की पहली विदेश यात्रा पर जाने से पहले दक्षिण भारत के केरल की यात्रा कर एक सियासी संदेश दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मालदीप दीप व श्रीलंका की दो दिवसीय विदेश यात्रा पर रवाना होने से पहले केरल के त्रिशूर स्थित गुरुवायुरप्पन मन्दिर (श्री कृष्ण मंदिर) में वहां की पारंपरिक वेशभूषा में जा कर पूजा अर्चना की व तुला दान भी किया।
त्रिशूर में भाजपा कार्यकर्ताओं की अभिनव सभा को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि वो लोकसभा चुनाव में सिर्फ राजनीति करने के लिए ही मैदान में नहीं थे। हमारा लक्ष्य देश की जनता की सेवा करना है। उन्होंने कहा के चाहे केरल में हमारा एक भी प्रत्याशी लोकसभा चुनाव में नहीं जीता हो लेकिन हमारे लिये केरल का भी उतना ही महत्व है जितना बनारस का है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि लोकसभा चुनाव में जीतने के बाद देश के 130 करोड़ नागरिकों की जिम्मेदारी हमारी है। साल के 365 दिन हम अपने राजनीतिक चिंतन के आधार पर जनता की सेवा में जुटे रहते हैं। हम सिर्फ सरकार नहीं देश बनाने आए हैं।
केरल के गुरूवायूर शहर में स्थित गुरूवायुरप्पन मंदिर करीब 5000 साल पुराना माना गया है। यहां भगवान श्री कृष्ण विराजमान है। दक्षिण भारत में इस मंदिर की गुजरात के द्वारकाधीश मन्दिर के समान ही बड़ी मान्यता है। दो दिन की विदेश यात्रा से लौटते समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आंध्र प्रदेश के तिरुपति स्थित बालाजी मंदिर में पूजा अर्चना करने गए। दक्षिण भारत में तिरूपति मन्दिर की बहुत बड़ी मान्यता है। यह मन्दिर देश के सबसे ज्यादा धनवान मंदिरो में प्रमुख हैं। आंध्र प्रदेश में भी भाजपा का एक भी प्रत्याशी लोकसभा चुनाव में नहीं जीता है। मगर मोदी ने अपनी प्रथम यात्रा के लिये दो ऐसे प्रदेशों का चयन किया जहां आगे आने वाले समय में उन्हे अपनी पार्टी का जनाधार बढ़ाना है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दक्षिण भारत के 2 प्रदेशों की यात्रा करने से यह साफ हो गया है कि उनका अगला लक्ष्य दक्षिण भारत ही है। भारतीय जनता पार्टी ने दक्षिण भारत के 6 प्रदेशों की कुल 130 लोकसभा सीटों में से 90 सीटों पर चुनाव लड़ कर 30 सीटे जीती है। दक्षिण भारत के तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक व केंद्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी में से भाजपा को सिर्फ तेलंगाना व कर्नाटका में ही सफलता मिली है। बाकी चार प्रदेशों में भाजपा का खाता भी नहीं खुला। भाजपा का अगला निशाना दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु व पुड्डुचेरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बात का अच्छी तरह से पता है कि जब तक दक्षिण भारत के सभी छ: प्रदेशों में भाजपा के सांसद जीत कर नहीं आयेगें तब तक भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रव्यापी छवी नहीं बन पायेगी।
भाजपा ने तेलंगाना की सभी 17 सीटो पर चुनाव लडक़र 4 लोकसभा सीटें जीती है तथा वहां पर भाजपा को 19.45 प्रतिशत वोट मिले हैं। आंध्र प्रदेश की 25 सीटों में से भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली है। वहां भाजपा को मात्र 0.96 प्रतिशत वोट मिले हैं। तमिलनाडू की 39 सीटों में से भाजपा ने अन्नादु्रमक के साथ गठबंधन करके मात्र 5 सीटों पर चुनाव लड़ा था मगर वहां एक भी सीट नहीं जीत पाई। तमिलनाडू में भाजपा को 3.66 प्रतिशत वोट मिले हैं। केरल की 20 सीटों में से भाजपा ने 16 सीटों पर चुनाव लड़ा था मगर एक भी सीट नहीं मिली। लेकिन केरल में भाजपा के वोट पिछली बार से काफी बढ़े हैं। हाल ही के लोकसभा चुनाव में केरल में भाजपा को 12.93 प्रतिशत वोट मिले हैं। तिरूवनंतपुरम सीट पर तो भाजपा दूसरे नम्बर पर रही है।
कर्नाटक की 28 में से भाजपा ने 27 सीटों पर चुनाव लड़ा और 25 सीटें जीती। एक सीट भाजपा के सहयोग से निर्दलिय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ी सुमनलता अम्बरीश ने जीती है। कर्नाटक में भाजपा को सर्वाधिक 51.38 प्रतिशत वोट मिले। पांडिचेरी की एकमात्र सीट पर भाजपा ने गठबंधन के तहत चुनाव नहीं लड़ा था।
इस तरह देखे तो आन्ध्र प्रदेश व केरल में भाजपा के प्रत्याशी कहीं भी मुख्य मुकाबले में नहीं रहे। इसके उपरांत भी मोदी ने इन दोनो प्रदेशो की यात्रा कर वहां के मतदाताओं को सीधा संदेश दिया है कि आपने हमें समर्थन नहीं दिया लेकिन फिर भी हम आपके साथ हैं। आपकी हर सम्भव मदद को तैयार है। मोदी की दक्षिण भारत की यात्रा करने से वहां के भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ा है। वहां अन्य राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों का भाजपा की तरफ रुझान बढ़ेगा। अपनी इसी सोच को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने अपना मिशन दक्षिण शुरू कर दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने दक्षिण भारत की यात्रा वहां के बड़े धार्मिक मंदिरो से प्रारम्भ की ताकि वहां के हिन्दू मतदाताओं को भाजपा से जोड़ा जा सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मानना है कि जिस तरह पूर्वोत्तर भारत, बंगाल, उड़ीसा में भाजपा ने अपना संगठन मजबूत कर अच्छा प्रदर्शन किया उसी तरह अगले लोकसभा चुनाव में दक्षिण भारत के राज्यो में भाजपा मजबूत होकर उभरे। मोदी के दौरे के दौरान ही कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष अध्यक्ष राहुल गांधी भी केरल में अपने लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र वायनाड का तीन दिवसीय दौरा कर रहे थे मगर मोदी की यात्रा के चलते राहुल गांधी की यात्रा को राष्ट्रीय मीडिया में स्थान नहीं मिल सका।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना हर कदम एक सोची-समझी रणनीति के तहत उठाते हैं। उनको अच्छी तरह पता रहता है कि कहां पर कौन सा दाव आजमाने से पार्टी को कितना फायदा होगा। जिस तरह भाजपा ने कर्नाटक को पार्टी के मजबूत किले में बदल दिया उसी तरह आने वाले समय में दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में भी भाजपा झंडा लहराने लगे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
अपनी आंध्र प्रदेश में तिरुपति मन्दिर यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी का आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी को विशेष महत्व देने हुये पूरे कार्यक्रम में अपने साथ रखना व तिरूपति में भाजपा की जनसभा में जगनमोहन रेड्डी की तारीफ करना इस बात का संकेत है कि समय आने पर जगनमोहन रेड्डी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खड़े नजर आएंगे। जगन मोहन रेड्डी के माध्यम से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तेलुगु देशम पार्टी के अध्यक्ष व आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को भी राजनीतिक मात देंगे।

बलात्कारियों को फांसी दी जाए
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में बकरवाल समुदाय की एक मुस्लिम लड़की के साथ पहले बलात्कार किया गया और फिर उसकी हत्या कर दी गई। वह लड़की सिर्फ आठ साल की थी। उसे एक मंदिर में ले जाकर नशीली दवाइयां खिलाई गईं और फिर उक्त कुकर्म किया गया। उन अपराधियों पर विशेष मुकदमा चला और उनमें से तीन को उम्र-कैद हुई और तीन को पांच-पांच साल की सजा ! सिर्फ डेढ़ साल में यह फैसला आ गया, यह गनीमत है। लेकिन मैं इस फैसले को नाकाफी मानता हूं। पहली बात तो यह कि इस घोर राक्षसी मामले को सांप्रदायिक रुप दिया गया। एक हिंदू रक्षा मंच ने अपराधियों को बचाने की कोशिश की, क्योंकि वे हिंदू थे और वह बच्ची मुसलमान थी। इस मामले में भाजपा के दो मंत्रियों को अपनी बेवकूफी के कारण इस्तीफे भी देने पड़े। इसके लिए भाजपा-नेतृत्व बधाई का पात्र है लेकिन कितने शर्म की बात है कि यह जघन्य अपराध एक मंदिर में हुआ और उस मंदिर का पुजारी इस नृशंस अपराध का सूत्रधार था। मैं पूछता हूं कि वह मंदिर क्या अब पूजा के लायक रह गया है ? वह किसी वेश्यालय से भी अधिक घृणित स्थान बन गया है। उस पर कठुआ के लोगों को ही बुलडोजर चला देना चाहिए। जहां तक तीन लोगों को उम्र-कैद का सवाल है, उसमें वह पुलिस अधिकारी भी है, जो बलात्कार में शामिल था और जिसने सारे मामले को रफा-दफा कराने की कोशिश की थी। जिन अन्य अपराधियों को पांच-पांच साल की सजा मिली है और जुर्माना भी ठोका गया है, वे लोग इतने वीभत्स कांड में शामिल थे कि यह सजा उनके लिए सजा नहीं है, इनाम है। अब उनमें से आधे पूरी उम्रभर और आंधी पांच साल तक जेल में सुरक्षित रहेंगे, सरकारी रोटियां तोड़ेंगे और मौज करेंगे। कभी-कभी पेरोल पर छूटकर मटरगश्ती भी करेंगे। उनको मिली इस सजा का भावी अपराधियों पर क्या असर पड़ेगा ? यही न, कि पहले अपराध करो और फिर चैन से सरकारी रोटियां तोड़ते रहो। मेरी राय में इन सभी लोगों को न सिर्फ मौत की सजा मिलनी चाहिए बल्कि इन्हें लाल किले पर फांसी दी जानी चाहिए और इनके शव कुत्तों से घसिटवाकर यमुना में बहा दिया जाना चाहिए ताकि इस तरह के संभावित अपराध करनेवालों के मन में अपराध का विचार पैदा होते ही उनकी हड्डियों में कंपकंपी दौड़ जाए। इस तरह की कठोर सजा नहीं होने का परिणाम यह है कि कठुआ-कांड के बाद उससे भी अधिक नृशंस दर्जनों घटनाएं देश में हो चुकी हैं और आज भी मध्यप्रदेश से कठुआ-जैसी ही खबर आई है।

कार्य संस्कृति बदलने के नाम
अजित वर्मा
उदारवाद की अवधारणाओं के अनुरूप देश में नयी कार्य संस्कृति विकसित करने के लिए अब एक बार फिर श्रम कानूनों में बदलाव होने वाला है।
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए श्रम कानूनों में परिवर्तन करने के लिए 100 दिन के अंदर एक कार्य योजना तैयार की है। इस कार्य योजना के लागू हो जाने पर वियतनाम और दक्षिण एशिया के देशों से भारी विदेशी निवेश आने की संभावना मंत्रालय जता रहा है। एशियाई देशों में देसी, विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करने कारपोरेट टैक्स श्रम कानूनों में छूट और बेहतर वातावरण देने का प्रयास इन 100 दिनों में नीति के रूप में किया जाएगा।
श्रम कानूनों की अड़चनों को समाप्त करने के लिए मौजूदा कानूनों में संशोधन कर उन्हें निवेशकों के लिए काफी आसान बनाया जाएगा। इसके लिए वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय श्रम मंत्रालय से लगातार संपर्क कर 10 सूत्रीय एक्शन प्लान तैयार कर रहा है, ताकि विदेशी निवेशक बड़ी तेजी के साथ भारत की ओर आकर्षित हों जो संशोधन किए जा रहे हैं। उसके बाद अब बड़ी-बड़ी कंपनियां भी अपने यहां पर पार्ट टाइम जॉब दे सकेगी। वही श्रमिकों की जिम्मेदारी भी तय करने, श्रम कानूनों में संशोधन होगा।
कोई शक नहीं कि आर्थिक विकास को गति देने के लिए देश में विदेशी निवेश बढ़ना आवश्यक है। और इसके लिए देश में कार्य संस्कृति को बदलने की जरूरत सरकार महसूस कर रही है। बड़ी कम्पनियां भारत में लागू श्रम कानूनों को अपने कामकाज को सुगमतापूर्वक करने में बाधक मानती हैं। हमारा मानना है कि कम्पनियों को पार्ट टाइम जाब देने की सुविधा मिलना चाहिए, लेकिन श्रम कानूनों में ऐसे संशोधन नहीं होना चाहिए, जिनसे श्रमिकों के हित प्रभावित हों, या उनके शोषण का मार्ग प्रशस्त हो। देखना होगा कि सरकार क्या संशोधन लागू करती है।
11जून/ईएमएस

ज्ञानियों की मूर्खता और अज्ञानियों की समझ
सनत जैन
राजस्थान के कई गांवों में 50 मिलीमीटर बारिश से भी तालाब भरे रहते हैं, मगर भोपाल में एक हजार मिलीमीटर से ज्यादा बारिश होने के बाद भी बड़ा तालाब सूख रहा है। पानी का स्तर नीचे जा रहा है और शहर के कई इलाकों में पानी को लेकर हाहाकार मचा है। भोपाल आए पर्यावरणविद फरहाद कान्ट्रैक्टर ने जल दोहन को लेकर ऐसी कई बातों का खुलासा किया है, जो आज के पढ़े-लिखे लोगों की सोच पर सवाल उठाता है। सही मायने में कहें तो आज के जमाने की सोच ने ही जलसंकट को बढ़ावा दिया है। जेसीबी से तालाब को खोदकर कभी भी उसे नहीं भरा जा सकता। हर जगह की जमीन और मिट्टी का स्वभाव अलग होता है, लेकिन आज जहां देखो, वहां जेसीबी मशीन तालाब को गहरा बनाने में लगी है। यह हाल शहरों का है, गांव का नहीं। गांव की कम पढ़ी-लिखी आबादी को जल संरक्षण के बेहतर तरीकों का पता है, वह अपने हिसाब से ऐसा कर भी रही है। बात नाराज करने वाली है, लेकिन मूर्खों की अज्ञानता अब ज्ञानियों की समझ पर भारी पड़ रही है। देश को ‘इंडिया और भारत दो भागों में बांटा जा चुका है। कम से कम जल संरक्षण के मामले में भारत, इंडिया से कई कदम आगे है…। ऐसा क्यों? कभी हमने समझने की कोशिश ही नहीं की। समझ की कमी की समस्या गांव की कम पढ़ी-लिखी में थोड़ी और शहर की शिक्षित विशेषझों से काफी ज्यादा है। सवाल यह भी है सरकारी और एनजीओ के स्तर पर जल संरक्षण के किए जा रहे कई दशकों के उपायों से पहले क्या लोगों को पानी नहीं मिलता था? वॉटर हार्वेस्टिंग और आधुनिक जल स्रोतों को बनाने के बाद हमने समस्या को किस हद तक बढ़ा दिया है, किसी को देखने की फुर्सत नहीं। आधुनिक युग में करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाकर भी हम एक बूंद का संचय नहीं कर पा रहे हैं। तो क्या हमें थोड़ी देर रुककर गलतियों पर मंथन नहीं करना चाहिए। एक समय था जब शहर हो या गांव कुएं, तालाब, पोखर आदि जल से लबालब होते थे। बरसात से पहले ही बच्चे, युवा तालाब और पोखरों में दिनभर मस्ती किया करते थे। फिर अब ऐसा क्या हो गया कि तालाब सूखते जा रहे हैं, कुएं कम होते जा रहे हैं। यह पर्यावरणीय बदलाव नहीं, हमारी आधुनिक सोच का घातक परिणाम है, जो कह रहा है कि अगर अब भी हमारी मनमानी जारी रही, तो कल कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।
पानी की सबसे ज्यादा खपत सिंचाई में होती है। फिर, औद्योगिक तथा घरेलू उपयोग में होता है। घरेलू उपयोग का 60 फीसदी पेयजल हम शौचालयों में बहा रहे हैं। भारत में कुल जल-उपयोग का करीब 70 फीसद कृषि-कार्यों में होता है। खेती तो बंद नहीं की जा सकती, क्योंकि यह हमारे पोषण का आधार है, लेकिन खेती में पानी की खपत जरूर घटाई जा सकती है। असल में, खेती में पानी की बेतहाशा खपत का दौर हरित क्रांति के समय शुरू हुआ। हरित क्रांति ने एक समय पैदावार बढ़ाने में बहुत अहम भूमिका निभाई, पर उसने रासायनिक खादों, कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता और पानी की बेतहाशा खपत वाली जिस कृषि प्रणाली का प्रसार किया वह आज पर्यावरणीय संकट की वजह बन गई है। इसलिए अब ऐसी कृषि प्रणाली की जरूरत दिनोंदिन अधिक शिद्दत से महसूस की जा रही है जो रासायनिक खादों व कीटनाशकों पर निर्भरता घटाती जाए और पानी की कम खपत से संभव हो सके। इस सिलसिले में बूंद-बूंद सिंचाई की विधि को अधिक से अधिक अपनाने की जरूरत है। तालाबों को पाटते जाने और नदियों के सिकुड़ते जाने के कारण भी सिंचाई के लिए भूजल का दोहन तेज हुआ और इसके फलस्वरूप धरती के नीचे का जल भंडार लगातार कम होता जा रहा है।
अब 800 फीट तक नलकूप खोदे जा रहे हैं। जिसके कारण जंगल नष्ट हो रहे हैं। पेड़ पौधों का पानी हमने भूजल से निकालकर इसका जीवन नष्ट कर दिया है। पेड़ पौधे लगाते हैं तो वह पानी के अभाव में सूख जाते हैं। पौधारोपण के नाम पर पेड़ पौधे का जंगल खत्म हो रहे हैं।
पानी बेचने का कारोबार इतना चोखा है कि यह अब बड़ा व्यवसाय बन गया है। शहर के लेकर ग्रामीण इलाकों में आरओ प्लांट लगा रहे हैं, जो दिन रात पानी का दोहन कर रहे हैं। पीने वाला एक डिब्बा पानी 20 रुपए बिक रहा है। वहीं भवन या सड़क निर्माण प्रयुक्त होने वाले एक टैंकर पानी की कीमत पांच सौ से 1000 रुपए है। पानी बेचने के गोरखधंधे में बड़े लोगों के शामिल होने से यह बड़ा व्यवसाय का रूप ले चुका। आज नेताओं तक के टैंकर शहर में दौड़ रहे हैं। सिर्फ मराठवाड़ा में आज की तारीख में 4 हजार टैंकर पानी की सप्लाई कर रहे हैं। दरअसल, यह एक धंधे का स्वरूप ले चुका है। पानी की कमी की समस्या है नहीं, इसे पैदा किया जा रहा है। आधुनिक संयंत्रों के जरिए पानी की कमी पूरी करने का जो खिलवाड़ चल रहा है, उसकी आड़ में टैंकरों के मालिक राजनेता करोड़ों रुपए सिर्फ 4 माह में कमाकर ऐश कर रहे हैं।
आज पूरे भारत में पानी की कमी पिछले 30-40 साल की तुलना में तीन गुना हो गई है। देश की कई छोटी-छोटी नदियां सूख चुकी हैं या सूखने की कगार पर हैं। बड़ी-बड़ी नदियों में पानी का प्रवाह कम होता जा रहा है। आखिर क्यों? क्या नदियों के उद्गम स्थल से पानी का प्रवाह कम हो गया है, या फिर उन्होंने पानी का हिसाब रखना शुरू कर दिया है। कतई नहीं…यह हमारी करनी का फल है। आज नदियां कमाई का साधन बन गई हैं। फिर हमें चिंता किस बात की। नदियों का पाट आज समझ में ही नहीं आता। कहीं ज्यादा तो कहीं थोड़ा। पता ही नहीं चलता कहां नदी है और कहां नाला। सरकार ने ही आंकड़ा जारी कर बताया था कि 1960 में देश में 10 लाख कुएं थे, लेकिन आज इनकी संख्या 2 से 3 करोड़ के बीच है। हमारे देश के 55 से 60 फीसदी लोगों को पानी की आवश्यकता की पूर्ति भूजल द्वारा होती है।
इसकी मुख्य वजह है कि बिना सोचे-समझे भूजल का अंधाधुंध दोहन। कई जगहों पर भूजल का इस कदर दोहन किया गया कि वहां आर्सेनिक और नमक तक निकल आया है। हमनें लाखों साल से जमा भूजल की विरासत का अंधाधुंध दोहन कर करोड़ों वृक्षों एवं वनस्पति का जीवन समाप्त कर पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया है। खरबों रुपया खर्च करने के बाद भी हम पीने के पानी और जंगल सुरक्षित नहीं रख पा रहे हैं। ऐसे पढ़े लिखे जरुर थे। कई-कई साल निरंतर अकाल पढ़ता था। उसके बाद भी ऐसा पेयजल संकट नहीं आया, जैसे आज देखने को मिल रहा है। जनता जनार्दन एवं सरकार को इस दिशा में सोचना होगा।

यादे बनकर रह गयी है प्याऊ
रमेश सर्राफ धमोरा
एक दौर था जब शहरों, कस्बों और गांवों में हर दूसरे-तीसरे चौराहे पर किसी सेठ -शाहूकार या स्थानीय लोगों की तरफ से लगी प्याऊ और उस प्याऊ में पीने के ठंडे पानी के साथ खाने को मिलने वाली गुड़ की डली व भूंजे चने (भूंगडें) राहगीरों को लू की गर्मी सहन करने की ताकत देता था। उस समय में आम रास्तो पर बनी प्याऊ राह गुजर रहे लोगों के हलक को सूखने से बचाती थी। पहले गांव, कस्बों और शहरों में कई प्याऊ देखने को मिल जाती थी। जहां बोरे या कूंचो की पानी(घास) से बनाये गये एकछोटे से झोंपड़े में जमीन पर बालू रेत के ऊपर पानी से भरे घड़े रखे होते थे। प्याऊ पर जाकर पानी कहते ही वहां बैठा व्यक्ति गंगासागर से ठंडा पानी पिलाता था। प्यास खत्म होने पर केवल अपना सर हिलाते ही पानी आना बंद हो जाता था।
पहले के समय में लोगो ने कई प्याऊ ऐसी जगह बनवायी थी जहां कई गांवो के रास्ते मिलते थे जिस कारण वहां राहगीरो का आवागमन लगातार लगा रहता था। वहां की प्याऊ के महत्व को देखते हुये लोगो ने उस जगह का नाम ही प्याऊ स्टैण्ड रख दिया था। इससे हमारे जीवन में प्याऊ के महत्व का पता लगाया जा सकता है। आज भी प्याऊ स्टैण्ड के नाम से जगह-जगह बस स्टैण्ड देखे जा सकते हैं।
हमारे देश में अरसे तक यह परम्परा रही है कि रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों व अन्य सार्वजनिक स्थानों पर प्याऊ हुआ करते थे। रेल स्टेशनों पर तो रेल विभाग बाकायदा एक कमर्चारी नियुक्त रहता था, जो ट्रेन आने पर यात्रियों को मुफ्त में पानी पिलाया करता था। ऐसी सभी जगहों पर घड़ों में रखा साफ पेयजल भी लोगों को मुफ्त मिलता था। उसे पीकर लोग तृप्त होते थे, पानी पिलाने और उसकी व्यवस्था करने वाले को दुआ देते थे।
कई रेल्वे स्टेशनों पर गर्मियों में पानी पिलाने का पुण्य कार्य किया जाता था। पानी पिलाने वालों की यात्रियों से केवल यही प्रार्थना होती, जितना चाहे पानी पीयें, चाहे तो सुराही में भर लें, पर पानी बरबाद न करें। उनकी यह प्रार्थना उस समय लोगों को भले ही प्रभावित न करती हों, पर आज जब उन्हीं रेल्वे स्टेशनों में एक रुपए में पानी का छोटा-सा पाऊच खरीदना पड़ता है, तब समझ में आता है कि उनकी पानी बचाओ की अपील आज कितनी सार्थक लग रही है। मगर आज के दौर में बाजारू ताकतों के आगे वे सब सुविधायें गौण हो गई हैं।
प्यासे को पानी पिलाना आज भी पुण्य का काम माना जाता है, पर ऐसे प्याऊ अब सिर्फ पर्व-त्योंहारों पर ही नजर आते हैं। इनके स्थान पर अब तकरीबन हर जगह बोतल बंद पानी ही ऊंची कीमत पर बेचा जाता है। पहले के जमाने में कुछ लोग अपनी कमाई हुई दौलत का एक हिस्सा उन लोगों की मदद में खर्च करते थे जो आर्थिक रूप से कमजोर थे। गर्मियों का मौसम आते ही बसों, ट्रेनों और सार्वजनिक उपस्थिति वाली सभी जगहों पर अब यह आम बात हो गई है कि वहां बोतलबंद बिकने वाले पानी के दर्शन तो हो जाते हैं, लेकिन ऐसा कोई सार्वजनिक हैंडपंप या नल चालू हालत में दिखाई नहीं देता है जिसका पानी पीकर तृप्त हुआ जा सके और जिसे पीने से बीमारियों के किसी खतरे का अहसास भी न हो।
वर्तमान में हालात यह हैं कि आज आम आदमी अपनी प्यास बुझाने के लिये एक लीटर पानी की बोतल के लिए 15-20 रुपये चुकाने को बाध्य है। मौजूदा स्थिति को ध्यान से देखेंगे तो पता चलेगा कि गर्म मौसम की मार से बचाने वाला हमारा जो सामाजिक तंत्र था, वह आज के इस आधुनिकता के दौर में समाप्त सा हो गया है।
शेखावाटी के सेठ साहूकारों द्वारा आमजन की पीड़ा समझते हुए जगह जगह प्याऊ बनवाकर इस सोच के साथ पुण्य का काम किया गया था कि उन द्वारा निर्मित की जा रही प्याऊ सदियों तक राहगीरों की प्यास बुझाती रहेगी। मगर उन्हें नहीं मालूम था कि कुछ ही समय पश्चात यह तो मात्र दिखावे की प्याऊ बन कर रह जाएगी और प्याऊ पर लगी रह जाएगा सिर्फ उनकी नाम पट्टिका। झुंझुनू शहर में स्टेशन से निकलने के बाद परमवीर पीरू सिंह स्कूल के पास स्वर्गीय राम कुमार मोहनी देवी रूंगटा की याद में मंड्रेला निवासी रूंगटा परिवार ने जो प्याऊ बनवाई थी आज वह खुद पानी को खुद तरस रही है। प्याऊ का संचालन बंद होने से वहां पर लगी टूटियां भी अपना अस्तित्व खोती जा रही है।
जिला कलेक्टर के बंगले के पास गोल प्याऊ के नाम से मशहूर प्याऊ जो कन्हैयालाल मोदी चैरिटेबल ट्रस्ट मुंबई द्वारा 1991 में निर्मित करवायी गई थी उस प्याऊ का संचालन बंद होना आश्चर्य की बात है। केंद्रीय बस डिपो के सामने लायंस क्लब झुंझुनू द्वारा संचालित लायंस शीतल जल मंदिर जो राधा किशन काशीनाथ जालान के आर्थिक सहयोग से संचालित की जाती है। यह प्याऊ 1990 में बनी थी जिसका उद्घाटन 14 अक्टूबर 1990 को किया गया था। बाद में यह प्याऊ डॉक्टर कुंदन बालाला जैन फैमिली ट्रस्ट द्वारा संचालित हुई। वर्तमान में यह प्याऊ केंद्रीय बस स्टैंड के नजदीक व शहर के मध्य होने के कारण अधिकांश राहगीरों के लिए अमृतम जलम का कार्य कर रही है। लेकिन प्रशासन की अनदेखी के चलते प्याऊ के बाहर अवैध रूप से रेहडी संचालकों ने अतिक्रमण कर इस प्याऊ को नजर आने से भी रोक रखा है। वर्तमान में उक्त प्याऊ प्रशासन की उदासीनता के चलते संचालन पूर्ण रूप से बंद है।
समय के साथ सब कुछ बदल रहा है। पर अच्छी परम्पराएं जब देखते ही देखते दम तोडऩे लगती है, तब दु:ख का होना स्वाभाविक है। प्याऊ परंपरा में यह भावना कभी हावी नहीं रही कि पानी पिलाना एक पुण्य कार्य है। मात्र कुछ लोग चंदा करते और एक प्याऊ शुरू हो जाती। आजकल तो प्याऊ के उद्धाटन की खबरें भी पढऩे को मिलती है। देखते ही देखते आज पानी बेचना एक बड़ा व्यवसाय बन गया है। यह हमारे द्वारा किए गए पानी की बरबादी का ही परिणाम है। आज प्याऊ अतीत बनकर रह गयी है। हमारी नयी पीढ़ी को तो शायद पता भी नहीं होगा कि कभी प्याऊ की मानव जीवन में बड़ी भूमिका होती थी।

हिंदी मत लादिए लेकिन….
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
त्रिभाषा-सूत्र के विवाद पर तीन-तीन मंत्रियों को सफाई देनी पड़ी है। उन्होंने कहा है कि यह तो शिक्षा समिति की रपट भर है। यह सरकार की नीति नहीं है। अभी इस पर सांगोपांग विचार होगा, तब यह लागू होगी। क्यों कहना पड़ा, उन्हें ऐसा ? इसलिए कि मोदी सरकार पर यदि हिंदी थोपने का ठप्पा जड़ दिया गया तो वह दक्षिण के चारों राज्यों में चारों खाने चित हो जाएगी और बंगाल में भी उसे नाकों चने चबाने पड़ेंगे। पहले जनसंघ और फिर भाजपा पर हिंदी थोपने का आरोप तो लगता ही रहा है। इसी से तंग आकर डाॅ. लोहिया ने तमिलों से कहा था कि ‘हिंदी जाए भाड़ में।’ आप पहले अंग्रेजी हटाइए। जब अंग्रेजी हटेगी तो उसकी जगह नौकरशाहों, नेताओं, सेठों, विद्वानों और संपूर्ण भद्रलोक की भाषा कौन बनेगी ? हिंदी ! अब से लगभग 30 साल पहले जब उप्र के मुख्यमंत्री मुलायमसिंह और मैं मद्रास में मुख्यमंत्री करुणानिधि से मिलने गए तो उनका पहला सवाल यही था कि क्या आप हम पर हिंदी थोपने यहां आए हैं ? हमने कहा, हम आप पर तमिल थोपने आए है। आप अपना सारा काम तमिल में कीजिए। ऐसा होगा तो हम तमिल सीखने को मजबूर होंगे और आप हिंदी सीखने को। हिंदी और सारी भारतीय भाषाओं के बीच बस एक ही दीवार है, अंग्रेजी की ! गुलामी की यह दीवार गिरी कि सारी भाषाओं में सीधा संवाद कायम हो जाएगा। शिक्षा की नई भाषा नीति में अंग्रेजी की इस दीवार पर जबर्दस्त हमले किए गए हैं। उसके लिए मैं बधाई देता हूं। किसी सरकारी रपट में यह पहली बार कहा गया है कि अंग्रेजी की अनिवार्यता ने भारत को कितनी आर्थिक और बौद्धिक हानि पहुंचाई है। अंग्रेजी थोपने के विरुद्ध जो तर्क पिछले 60 साल में लोहिया, विनोबा और मैंने दिए हैं, पहली बार उन्हें किसी सरकारी रपट में मैं देख रहा हूं। यह रपट एक तमिलभाषी वैज्ञानिक श्री कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में तैयार हुई है और वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री जयशंकर ने भी तमिलनाडु के नेताओं को आश्वस्त किया है। ये दोनों भी तमिल है और दोनों ज.ने.वि. के पढ़े हुए हैं। इसके बावजूद यह मामला तूल पकड़ेगा। इसका हल सिर्फ एक ही है कि जो हिंदी न पढ़ना चाहे, उस पर हिंदी लादी न जाए। वह हिंदी न पढ़े लेकिन अंग्रेजी को सभी जगह से हटा दें याने शासन से, प्रशासन से, शिक्षा से, न्याय से, नौकरियों से ! तब अंग्रेजी को अपनी कीमत खुद मालूम पड़ जाएगी और अंग्रेजीप्रेमी फिर क्या करेंगे ? आपके कहे बिना ही सब लोग अपने आप हिंदी पढ़ेंगे। किस सरकार में इतना दम है कि वह यह नीति लागू करे।

धार्मिक नारों से नहीं बल्कि गंदी सियासत से है देश को दिक्कत
डॉ हिदायत अहमद खान
पिछले कुछ सालों में धार्मिक नारे लगाने और दूसरे लोगों से जबरदस्ती लगवाने का खेल कुछ इस तरह से खेला गया है, जिससे एक खास राजनीतिक पार्टी को लाभ मिल सके और अन्य पार्टियों को खासा नुक्सान हो। लोकसभा चुनाव 2019 से पहले इस बात को विपक्ष ने भी भांप लिया था, इसलिए कट्टर हिंदुत्व के सामने सॉफ्ट हिंन्दुत्व का कॉन्सेप्ट लाया गया और नफरतों के खिलाफ मोहब्बतों की खुशबू बिखेरने की पुरजोर कोशिशें भी की गईं, लेकिन इसका असर और हश्र क्या हुआ यह देश और दुनिया देख चुकी है। वैसे भी धर्म में राजनीति का क्या काम और जहां राजनीति आ जाए वहां धर्म कैसे रह सकता है। क्योंकि धर्म आस्था से जुड़ा हुआ होता है, जबकि राजनीति निरा अवसरवादिता पर केंद्रित होती है। धर्म, आस्था और श्रद्धा के संबंध में गीता में कहा गया है कि ‘श्रद्धावानलभते ज्ञानम्।’ कुल मिलाकर धार्मिक आस्था का संबंध हृदय से होता है, जबकि राजनीति दिमाग से की जाती है, उसमें भावनाओं को लेशमात्र भी स्थान नहीं दिया जा सकता है। बावजूद इसके जाने-अनजाने में धार्मिक नारे लगाने और लगवाने को लेकर विवाद भी खूब हुए हैं। हद यह रही कि जिन्होंने बंदेमातरम् बुलवाने की कोशिश की जब उनसे बंदेमातरम गाने को कहा गया तो वो ही बगलें झांकते नजर आ गए। मतलब साफ था कि राजनीति साधने सिर्फ नारे लगाना है, उसकी आत्मा को समझने और आत्मसात करने की जरुरत नहीं है। इसलिए इसका बेजा लाभ राजनीतिक तौर पर उठाया गया है, जिसके चलते पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को तो वो लोग भी नहीं भा रहे हैं जो धार्मिक नारे लगाते हुए उनके सामने आ जाते हैं। ऐसे लोगों के शरीर से चमड़ी उधेड़ लेने जैसी बातें भी की जा रही हैं, लेकिन यहां समझना होगा कि धर्म कभी भी किसी पर हावी होने और उससे जोर-जबरदस्ती करवाने को नहीं कहता है। बल्कि प्रत्येक धर्म हृदय परिवर्तन पर विश्वास करता है और वही करने को कहता है। यहां कुछ कट्टरपंथी धर्म को बदनाम करने और हिंसा फैलाने का काम करते चले जा रहे हैं। इस कारण सच्चे और अच्छे धार्मिक लोग भी बदनाम हो रहे हैं, जबकि धर्म को राजनीति से जोड़कर देखने वाले कह रहे हैं कि यदि धर्म की रक्षा करनी है तो राजनीति को तो साधना ही होगा, इसके बगैर धर्म नहीं बचेगा। इस बीच राम के नाम पर राजनीति करने वाले भाजपा के नेता भी खूब मुखर हुए हैं। पश्चिम बंगाल के मामले में तो पूरी लड़ाई इसी बात को लेकर लड़ी गई है। बहरहाल दिल्ली के भाजपा नेता प्रवीण शंकर कपूर ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र लिखते हुए उन्हें आड़े हाथ लिया है। कपूर कह रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता को भगवान राम का नाम जपना चाहिए, ऐसा करने से उन पर जो बुरी शक्तियों का साया है उन्हें दूर करने में भी मदद मिलेगी। बकौल कपूर, ममता पर बुरी शक्तियों का असर इस कदर हो चुका है कि उनके सामने कोई जय श्री राम का नारा लगाता है तो वो आपा खो देती हैं और चिल्लाने लग जाती हैं। अब इस तरह की बातें करने वालों को कोई समझाए कि जब किसी स्थापित नेता के पैरों तले की जमीन धर्म के नाम पर यूं सरकाई जाएगी तो उसका हाल वैसा ही होगा है, जैसा कि इस समय ममता का हुआ है। धार्मिक नारों के जरिए उन्हें छेड़ा जाता है और वो अपना आपा खो देती हैं। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में जब ममता बनर्जी के सामने कुछ लोगों ने जय श्री राम के नारे लगाए थे तो वो नाराज हो गईं थीं, घटना का वीडियो भी वायरल कर दिया गया था। इस पर ममता बनर्जी ने आरोप लगाते हुए कहा था कि भाजपा बारंबार जय श्री राम के नारे लगवाकर धर्म को राजनीति से मिलाने का काम कर रही है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्या कारण है कि ममता के व्यवहार का विरोध करते हुए कपूर के सहयोगी तेजिंदरपाल सिंह बग्गा और पश्चिम बंगाल के भाजपा सांसद अर्जुन सिंह ने जय श्री राम लिखे पोस्टकार्ड भेजने का अभियान क्यों चलाया गया। यह तो सीधे-सीधे राजनीति चमकाने के लिए धर्म का सहारा लेने जैसी बात हो गई है। इसलिए धर्म से राजनीति को भले कोई खतरा न हो, लेकिन गंदी राजनीति के चलते धर्म जरुर संकट में आता चला जा रहा है। याद रखें कि भगवान राम और माता सीता की पूजा-पाठ, अराधना, स्तुति करने में हर्ज नहीं है, बल्कि आत्मशांति के लिए आस्थावानों को तो ऐसा करना ही चाहिए, लेकिन यही कार्य राजनीति साधने के लिए होने लग जाए तो उसे सही करार नहीं दिया जा सकता है। इसका विरोध करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सफाई देने का भी काम किया है। ममता का कहना है कि इन राजनीति प्रेरित धार्मिक नारों को जबरन थोपे जाने का सम्मान नहीं करती हैं, यह कार्य कथित तौर पर आरएसएस के नाम पर किया जा रहा है, जिसे बंगाल ने कभी स्वीकार नहीं किया है। कुल मिलाकर धार्मिक नारे लगाने वालों की भावनाओं को भी समझने की आवश्यकता है, क्योंकि जब तक भावनाएं शुद्ध आत्मशुद्धि और पुण्य कमाने से ओतप्रोत नहीं होंगी, तब तक विवाद से भी मुक्ति नहीं मिल सकती है। अंतत: धार्मिक मामलों में राजनीतिक हस्तक्षेप को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि गंदी राजनीति इसका इस्तेमाल अपने लाभ के लिए करेगी और बदनामी का ठीकरा धर्म के माथे फोड़ा जाएगा, जो सही नहीं है।

कांग्रेस: डगर कठिन परंतु असंभव नहीं
तनवीर जाफरी
लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतंत्र गंठबंधन की शानदार वापसी के साथ ही कांग्रेस पार्टी के भी एक मृत प्राय: संगठन हो जाने के कयास लगाए जाने लगे थे। ऐसा महसूस किया जाने लगा था कि जहां देश की वर्तमान राजनैतिक परिस्थितियों से जूझ पाने में कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी तथा यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी स्वयं को असहाय महसूस करते हुए संगठन से नाता तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं वहीं कांग्रेस विरोधी ख़ेमों की भी यही प्रबल इच्छा थी कि नेहरू-गांधी परिवार किसी तरह अपनी पराजय से घबरा कर राजनीति विशेषकर कांग्रेस पार्टी को संरक्षण देना बंद कर दे। पूरे योजनाबद्ध तरीके से मीडिया तथा सोशल मीडिया के माध्यम से सोनिया व राहुल गांधी के मनोबल को गिराने का प्रयास भी किया गया। कांग्रेस से इत्तेफाक न रखने वाले अनेक राजनैतिक दलों के नेता भी यही सलाह देते सुनाई दिए कि अब कांग्रेस को नेहरू-गांधी परिवार के ‘शिकंजे’ से बाहर निकलना चाहिए। ऐसे आलोचनाकार पार्टी में परिवारवाद हावी होने की दलीलें दे रहे थे। पूर्व आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव एक अकेले ऐसे नेता थे जो राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद से पराजय के बाद त्यागपत्र दिए जाने के किसी भी निर्णय के बिल्कुल ‎खिलाफ थे। वे अपनी दूरदर्शी राजनीति की नज़रों से यह देख रहे थे कि राहुल गांधी के मनोबल को गिराकर किसी भी तरह उनसे त्यागपत्र लिए जाने की साजि़श रची जा रही है। वे यह भी समझ रहे थे कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा अच्छा प्रदर्शन न किए जाने को लेकर जहां राहुल गांधी भी सदमें में हैं वहीं कांग्रेस विरोधी भी उनके समक्ष अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने जैसा वातावरण बनाकर कांग्रेस को और अधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं।
परंतु चुनाव परिणाम आने के बाद पूरे एक सप्ताह तक चले चिंतन-मंथन के बाद कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर अंगड़ाई लेनी शुरू कर दी है। पिछले दिनों संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में जहां सोनिया गांधी को कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुना गया वहीं कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाओं को जारी रखते हुए राहुल गांधी ने भी पार्टी के निराश होते जा रहे कार्यकर्ताओं का उत्साह वर्धन करने की पूरी कोशिश की। पूरा का पूरा कांग्रेस संसदीय दल सोनिया गांधी तथा राहुल गांधी के नेतृत्व में एकजुट नज़र आया। सोनिया गांधी ने जनता के अधिकारों की लड़ाई सड़क से लेकर संसद तक लडऩे का आह्वान किया। उन्होंने देश के उन 12. 5 करोड़ मतदाताओं का भी आभार व्यक्त किया जिन्होंने संसद में कांगेस के 52 सांसद जिताकर भेजे हैं। परंतु प्रश्र यह है कि क्या कांग्रेस पार्टी प्रत्येक स्तर पर भारतीय जनता पार्टी जैसे उस सत्ताधारी संगठन से मुकाबला कर सकती है जिसके पीछे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सहित और भी कई हिंदूवादी कट्टरपंथी संगठन एकजुट होकर खड़े हुए हैं? क्या कांग्रेस पार्टी भारतीय जनता पार्टी के उन हथकंडों का मुकाबला कर सकती है जिनके तहत भाजपा कांग्रेस को एक ऐसी पार्टी प्रचारित करने के षड्यंत्र में काफी हद तक सफल हो जाती है कि कांग्रेस हिंदू विरोधी संगठन है? इतना ही नहीं वह कांग्रेस को हिंदू विरोधी साबित करने के लिए उस पर मुस्लिमों का तुष्टीकरण करने वाले राजनैतिक दल का लेबल भी चिपका देती है। गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी व उसके सहयोगी संगठनों द्वारा 2014 के चुनाव के दौरान कांग्रेस के विरुद्ध सबसे मज़बूती के साथ यही दुष्प्रचार किया गया था कि कांग्रेस पार्टी लक्षित हिंसा विरोधी बिल संसद में पास कराकर हिंदुओं के विरुद्ध साजि़श रच रही है। इसके अतिरिक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस बयान का भी काफी प्रचार किया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि देश की संपदा पर अल्पसंख्यकों का पहला अधिकार है।
दरअसल कांग्रेस की ओर से जो भी इस प्रकार के बयान दिए जाते हैं या नीतियां बनाई जाती रही हैं उनका मकसद किसी धर्म विशेष का तुष्टीकरण नहीं बल्कि यह रहता था कि देश के सर्व समाज में इस बात का एहसास कायम रह सके कि वे सभी इस देश के सम्मानित नागरिक हैं और उनका भी देश पर वैसा ही अधिकार है जैसाकि देश के बहुसंख्य समाज का। दरअसल यह धारणा कांग्रेस पार्टी की नहीं बल्कि महात्मा गांधी के दर्शन से प्राप्त होने वाली धारणा है। परंतु दुर्भाग्यवश गांधी दर्शन की जगह गत् कुछ वर्षों से ‘गोडसे दर्शन’ लेने लगा है। देश के विभिन्न भागों से धर्म आधारित हिंसा के समाचार प्राप्त होते रहते हैं। गांधी जी किसी भी प्रकार की सांप्रदायिक हिंसा के घोर विरोधी थे। अपने जीवनकाल में वे कई बार हिंदुओं के मध्य जाकर मुसलमानों की रक्षा करने तथा मुसलमानों के मध्य जाकर हिंदुओं की रक्षा किए जाने के उपदेश देते रहते थे। अपने इसी उद्देश्य को लेकर धर्म आधारित हिंसा के विरुद्ध उन्हें अनशन भी करना पड़ा। परंतु मानवता के दुश्मन मुस्लिम परस्त तथा हिंदुवादी दल सभी की नज़रों में गांधीजी महज़ इसलिए खटकते रहे कि वे धार्मिक उन्माद के उस विभाजनकारी वातावरण में प्रेम व सद्भाव के बीज क्यों बो रहे हैं? ईश्वर अल्लाह एक ही नाम का संदेश क्यों दे रहे हें? और आखिरकार घोर हिंदूवादी विचारधारा में डूबे एक गिरोह ने सांप्रदायिक विचारधारा के एक प्रतिनिधि नाथू राम गोडसे के हाथों गांधी की हत्या करवा ही डाली।
यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि सर्वघर्म संभाव की धारणा की शुरुआत महात्मा गांधी द्वारा नहीं की गई थी बल्कि महात्मा गांधी स्वयं उस भारतीय दर्शन के हिमायती थे जो न केवल सर्वधर्म संभाव बल्कि विश्व बंधुत्व तथा सर्वे भवंतु सुखिन: की शिक्षा स्हस्त्राब्दियों से देता आ रहा है। गांधी जी हिंदुत्व की उस परिभाषा को भारतीयों के जन-जन में बसाना चाहते थे जो हमें वसुधैव कुटंबकम की शिक्षा देता है। परंतु नाथू राम गोडसे व उसके सभी साथी जो गांधी जी की हत्या में शामिल थे वे सबके सब कट्टरपंथी हिंदूवादी राजनीति के पैरोकार थे। और इसी विचारधारा ने महात्मा गांधी को हिंदुओं का दुश्मन मानकर उनकी हत्या कर डाली। गांधी जी के मुंह से अंतिम समय में निकले शब्द ‘हे राम’ स्वयं इस बात का सुबूत हैं कि महात्मा गांधी वास्तविक रामभक्त थे न कि राम के नाम का सहारा लेकर अपनी राजनैतिक मज़बूती की कोशिश करने वाले नेता। ठीक इसके विपरीत वर्तमान सत्ताधारी दल की पूरी की पूरी बुनियाद ही भगवान राम के सहारे पर खड़ी की गई है। दूसरी ओर इसी के साथ-साथ गोडसेवादी विचारधारा का सिर उठाना भी जारी है। इतना ही नहीं बल्कि गोडसे का ज़बरदस्त तरीके से महिमामंडन भी किया जाने लगा है। गांधी के उस हत्यारे की प्रतिमाएं बनने की खबरें आती रहती हैं। गांधी की हत्या का चित्रण करते हुए वीडियो दिखाई देते हैं। यहां तक की पिछले दिनों हिंदू महासभा ने भारतीय मुद्रा पर प्रकाशित गांधी के चित्र को हटाकर गोडसे का चित्र प्रकाशित करने की मांग तक कर डाली।
ऐसे प्रदूषित राजनैतिक वातावरण में जबकि सत्ताधारी दल दर्जनों हिदूवादी संगठनों को साथ लेकर सत्ता पर काबिज़ होने के साथ-साथ कांग्रेस पर भी हिंदू विरोधी होने का आरोप लगाता रहता है निश्चित रूप से कांग्रेस के समक्ष एक बड़ी व कठिन चुनौती के समान है। परंतु चूंकि हमारा यह देश पीरीे-फकीरों, संतों व ऋषियों-मुनियों के दौर से ही सर्वधर्म संभाव का पालन करने वाला एक धर्मनिरपेक्ष देश रहा है और धर्मनिरपेक्षता भारतीयों के डीएनए में शामिल है। लिहाज़ा कांग्रेस पार्टी को गांधी के उन सौहाद्र्रपूर्ण विचारों को लेकर जनता के मध्य जाना और सफलता हासिल करना मुश्किल तो हो सकता है परंतु असंभव नहीं।

पर्यावरण प्रदूषण के भयावह दुष्परिणाम
योगेश कुमार गोयल
(विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष) इन दिनों भीषण गर्मी समस्त भारत में कहर बरपा रही है। मैदानी इलाकों के साथ-साथ पहाड़ों में भी तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि के रिकॉर्ड टूट रहे हैं। लू और गर्मी की प्रचण्डता का आलम यह है कि जहां हिमाचल, उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्यों में मौसम विभाग द्वारा यैलोअलर्ट जारी किया गया है, वहीं हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र इत्यादि राज्यों में तो रेडअलर्ट जारी किया गया है। राजस्थान के श्रीगंगानगर में तापमान 50 डिग्री के करीब जा पहुंचा और वहां भीषण गर्मी का 75 साल का रिकॉर्ड टूट गया, वहीं चुरू में तापमान 50 डिग्री को भी पार कर गया। लू के थपेड़ों और गर्मी की प्रचण्डता के चलते विभिन्न राज्यों में कई दर्जन लोगों की मौत हो चुकी हैं। एक ओर जहां देशभर में चारों तरफ गर्मी अपना कहर बरपा रही है, वहीं कुछ ही दिनों पहले के मौसम के मिजाज की बात करें तो रोहतांग, लाहौलस्पीति, शिमला, मनाली जैसे ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में भारी बारिश तथा बर्फबारी के चलते उत्पन्न हुई शीतलहर के साथ-साथ दिल्ली सहित आसपास के इलाकों में हुई ओलावृष्टि ने हर किसी को हतप्रभ कर दिया था। निसंदेह यह सब प्रकृति के बिगड़ते मिजाज और बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण के ही भयावह दुष्परिणाम हैं, जिसका खामियाजा हमें बार-बार जान-माल के भारी नुकसान के रूप में चुकाना पड़ रहा है।
देश के कई बड़े शहर इस समय पर्यावरण प्रदूषण के चलते कितनी बुरी तरह हांफ रहे है, यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। पिछले कुछ समय में पर्यावरण संबंधी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अनेक रिपोर्टों में स्पष्ट हो चुका है कि भारत के कई बड़े शहरों में प्रदूषण विकराल रूप धारण कर चुका है और देश की राजधानी दिल्ली तो दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार है। वायु प्रदूषण की दिनों-दिन विकराल होती यही स्थिति हालात को दिन-ब-दिन बद से बदतर बनाने के लिए जिम्मेदार है। चंद माह पहले ही दिल्ली में प्रदूषण की जो भयावह तस्वीर देखी गई थी, वो रोंगटे खड़े कर देने वाली थी, जब यहां की हवा 14 गुना जहरीली दर्ज की गई थी। समय-समय पर दिल्ली तथा आसपास के इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) का स्तर सारी सीमाएं लांघता नजर आता है। पीएम-10 तथा पीएम-2.5 का स्तर भी कई गुना बढ़ जाता है। कड़ाके की ठंड हो या भीषण गर्मी, प्रदूषण का स्तर अब हर समय खतरनाक स्तर पर ही देखा जाता है।
तय मानकों के अनुसार पीएम-10 तथा पीएम-2.5 की मात्रा वातावरण में क्रमशः 100 व 60माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए लेकिन इनका स्तर वातावरण में सदैव कई गुना ज्यादा बना रहता है, जिन्हें नियंत्रित करने के अभी तक के तमाम प्रयास नाकाफी ही साबित हुए हैं। वायु में पीएम-2.5 और पीएम-10 का स्तर बढ़ जाने से यह प्रदूषित वायु फेफड़ों के अलावा त्वचा तथा आंखों को भी बहुत नुकसान पहुंचाती है। प्रदूषित हवा के चलते दिल्ली की हालत तो अक्सर गैस चैंबर सरीखी होती रही है, जहां एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है। हर साल दिल्ली में करीब पांच हजार लोग वायु प्रदूषण के कारण दम तोड़ देते हैं। मेडिकलजर्नल ‘द लांसेट’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक तो भारत में वायु प्रदूषण के चलते प्रतिवर्ष दस लाख से ज्यादा लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं।
कार्बन उत्सर्जन के मामले में दिल्ली दुनिया के 30 शीर्ष शहरों में शामिल है। पहाड़नुमा कूड़े के ढ़ेरों से निकलती जहरीली गैसें, औद्योगिक इकाईयों से निकलते जहरीले धुएं के अलावा सड़कों पर वाहनों की बढ़ती संख्या कार्बन उत्सर्जन का बड़ा कारण है और कहा जाता रहा है कि अगर दिल्ली जैसे अत्यधिक प्रदूषित शहर में वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पाना है तो लोगों को निजी वाहनों का प्रयोग कम कर सार्वजनिक परिवहन को अपनाना चाहिए और साथ ही दिल्ली में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण को बढ़ावा देकर हरियाली बढ़ानी होगी लेकिन इन दिनों दिल्ली में हो क्या रहा है? कैग की एक रिपोर्ट पर नजर डालें तो दिल्ली पहले से ही करीब नौ लाख पेड़ों की कमी से जूझ रही है और दूसरी तरफ शहरीकरण की कीमत पर सरकारी आदेशों पर साल दर साल हजारों हरे-भरे विशालकाय वृक्षों का सफाया किया जा रहा है। पिछले 5-6 वर्षों के दौरान दिल्ली में नए आवासीय परिसर, भूमिगत पार्किंग, व्यापारिक केन्द्र खोलने और मार्गों को चौड़ा करने के लिए करीब बावन हजार छायादार वृक्षों का अस्तित्व मिटाया जा चुका है और इन्हीं पांच वर्षों के प्रदूषण के आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि इस दौरान हरियाली घटने से दिल्ली में वायु प्रदूषण करीब चार सौ फीसदी बढ़ा है।
कैग की रिपोर्ट के अनुसार 2015-17 के बीच दिल्ली में 13018 वृक्ष काटे गए थे और उसके बदले 65090 पौधे लगाए जाने थे किन्तु लगाए गए मात्र 21048 पौधे और इनमें भी बहुत सारे सजावटी पौधे लगाकर खानापूर्ति कर दी गई। पेड़ों को काटने के बदले जो पौधे लगाए जाते हैं, उनमें से महज दस फीसदी ही बचे रह पाते हैं और ये छोटे-छोटे पौधे प्रदूषण से निपटने तथा वातावरण को स्वच्छ बनाए रखने में मददगार साबित नहीं होते। मौसम चक्र तेजी से बदल रहा है, जलवायु संकट गहरा रहा है और इन पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने का एक ही उपाय है वृक्षों की अधिकता। वायु प्रदूषण हो या जल प्रदूषण अथवा भू-क्षरण, इन समस्याओं से केवल ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाकर ही निपटा जा सकता है।
ऊंचे और पुराने वृक्ष काटे जाने से दिल्ली में पक्षियों की 15प्रजातियों का जीवन भी खतरे में है। दरअसल दिल्ली में स्पॉटेडआउलेट, कॉपरस्मिथबारबेट, ब्राउनहेडेडबारबेट, अलेवजेंडरपैराकीट, रोडविंगपैराकीट, ग्रेटरप्लेनबैकवुडपैकर, ग्रेहॉर्नबिल, ब्लैक काइट, ब्लैक शोल्डरकाइट, एशियनपैराडाइजफ्लाईकैचर इत्यादि पक्षियों की 15प्रजातियां ऐसी हैं, जो ऊंचे दरख्तों पर घोंसला बनाते हैं और अपने खान-पान तथा रहन-सहन की आदतों के चलते ऊंचे पेड़ों पर ही रहना पसंद करते हैं, इनमें कुछ प्रजातियां दुर्लभ पक्षियों की भी हैं। ऐसे ऊंचे वृक्ष काटे जाने से इन पक्षियों का घर भी उजड़ता है और पक्षी विज्ञानियों का कहना है कि ऊंचे दरख्तों की कमी की वजह से पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली पक्षियों की कई प्रजातियां दिल्ली का रूख करने से कतराने लगी हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी हाल ही में अपनी एक टिप्पणी में कहा है कि दिल्ली कभी पक्षियों की आबादी को लेकर मशहूर हुआ करती थी किन्तु आज स्थिति विपरीत है, पेड़-पौधों व पक्षियों के लिए यहां जगह कम होती जा रही है।
सुखद स्थिति यह है कि आम जन में पर्यावरण संरक्षण और वृक्षों के महत्व को लेकर जागरूकता आने लगी है, जो पिछले दिनों उत्तराखण्ड के करीब पांच दशक पुराने चिपको आन्दोलन की तर्ज पर दिल्ली में भी देखने को मिली थी, जब पेड़ों से चिपककर लोगों ने इन्हें जीवनदान देने के लिए आन्दोलन शुरू किया और सरकार को हजारों पेड़ काटने का अपना आदेश वापस लेना पड़ा। इन तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि दिल्ली में यहां की आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से नौ लाख पेड़ों की कमी है और यहां स्वस्थ जीवन के लिए प्राणवायु अब बहुत कम बची है। स्वच्छ प्राणवायु के अभाव में लोग तरह-तरह की भयानक बीमारियों के जाल में फंस रहे हैं, उनकी प्रजनन क्षमता पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है, उनकी कार्यक्षमता भी इससे प्रभावित हो रही है। कैंसर, हृदय रोग, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का संक्रमण, न्यूमोनिया, लकवा इत्यादि के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा इन बीमारियों के इलाज पर ही खर्च हो जाता है।

कांग्रेस का मौन “असत्याग्रह”
गोविन्द मालू
कहते हैं, कि “नादां की दोस्ती जी का जंजाल” राहुल और उनकी टीम पर यह कहावत सही चरितार्थ होती है। सेंसरशीप की पक्षधर, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की विरोधी कांग्रेस के लिए अपने प्रवक्ताओं पर एक माह की वाणी का उपवास करवाने का तुगलकी निर्णय तुगलक रोड पर रहने का परिणाम तो है, ही और जरा भी आश्चर्यजनक नहीं है।
वैसे “कांग्रेस” जो निर्णय ले ये उनका आतंरिक मामला है, लेकिन लोकतंत्र के तकाजों से दूर रहकर पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर करने से कोई राजनैतिक दल कैसे जिंदा रह सकता है। उसे तो अपना विघटन कर गांधीजी की “लोक सेवा संघ”बनाने की इच्छा को पूरा कर ही देना चाहिए। जनता ने तो उन्हें यह जनादेश दे ही दिया है।
वैसे भी अब ज्यादा कुछ बोलने को बचा नहीं, और जो बोलने वाले थे उन्हें जिम्मेदारी से वंचित कर पहले से ही दूर कर दिया गया। गुणवत्ता की कमी सत्ता में तो चल जाती है, लेकिन विपक्ष में काम करना पड़ता है। जो आरामतलबी और जी हुजूरी की शिकार कांग्रेस को रास नहीं आ सकता।
विद्वत्ता और मूर्खता के बीच तर्क और गोली का अंतर है। विपक्ष में रहते हुए भी तर्क सहित बातों को अध्ययन और जनता के मूड के हिसाब से बोला जा सकता है। लेकिन ऐसे लोग हमेशा कांग्रेस संगठन में उपेक्षित होते रहे,रही सही बेचारी प्रियंका चतुर्वेदी, बहन प्रियंका के आते ही रुखसत हो गई या कर दी गई ?
यही कांग्रेस का कुनबा है,शेखचिल्ली की बारात है !
अब बोलें भी तो क्या बोलें कब तक मुंहजोरी – सीनाजोरी करते रहें और फिर आयकर छापों का तुगलक रोड के साथ कनेक्शन उठते ही कांग्रेस नेता बैचेन हैं, कि क्या बोलें,कैसे बचें। मीडिया तो ठीक, सोशल मीडिया पर भी कांग्रेस के नेता आरोप लगा-लगा कर कोस रहे हैं, कि भाजपा ने अनाप-शनाप सोशल मीडिया केम्पेन पर खर्च किया, इससे चुनाव का माहौल मोदीमय हो गया और राहुल बाबा की टीम हार गई।
यह अल्पज्ञान का सबसे बड़ा उदाहरण है,जो मैदान खाली,उन्मुक्त और स्वतंत्र है। उस पर खेलने की क्षमता चाहिए, खेल नहीं पाओगे और हारने का दोष मत्थे मढ़ोगे यह कैसे चलेगा ,गले उतरने वाली बात ही चर्चा में दूर तलक जाती है।
एक तो जमीनी लड़ाई लड़ने की शक्ति, आदत और तरीका नहीं है। दूसरा कम से कम अपनी बात कहने और नेताओं को चर्चा में दिखने-दिखाने का जो अवसर था। वह भी R.G. की टीम ने उनके प्रवक्ताओं से छीनकर बेरोजगार बना दिया। भाजपा को अपनी बात कहने के लिए और ज्यादा समय देने के लिए धन्यवाद ।
लेकिन कांग्रेस को यह भरम नहीं होना चाहिए कि उनके डिबेट में शिरकत न करने से चैनल बंद हो जाएँगे, या इस नई राह के ब्याह में रूठी हुई बूआ को कोई मनाने जाएगा। शोर-शराबे को अभिशप्त कांग्रेस का यह “मौन असत्याग्रह” है। डूबना अच्छा है,लेकिन किनारे पर बैठकर सूखना बुरा है।

चुनौतियों का चक्रव्यूह : नई सरकार, चुनौतियाँ हजार……!
ओमप्रकाश मेहता
आज देश में कितनी विसंगतिपूर्ण स्थिति है, एक सत्तारूढ़ पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष अपना पद छोड़कर मंत्री नही बनना चाहता तो दूसरी राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष अपने पद पर बने रहने को तैयार नहीं? भारतीय राजनीति का यही मौजूदा आईना है, देश में मोदी जी की सरकार पुनः स्थापित होने से जहां राजनीति का एक वर्ग हर्षोल्लास में डूबा है तो राजनीति का दूसरा वर्ग चुनाव में हारने का ‘सूतक’ पाल रहा है। इस तरह कुल मिलाकर इन दिनों देश का राजनीतिक माहौल एक अजीब स्थिति में पहुंच गया है, आज एक ओर जहां शपथ-ग्रहण जैसे संवैधानिक कार्य में भी राजनीति का प्रवेश कराया जा चुका है तो दूसरी ओर प्रतिपक्ष सभी राजनीतिक मान-मर्यादाओं को खंूटी पर टांग कर अपने मूल दायित्व से विमुख होता जा रहा है। खैर, यह तो देश के राजनीतिक माहौल का जिक्र हुआ, अब यदि देश में फिर से सत्तारूढ़ हुई मोदी सरकार की बात करें तो अब उसके सामने चुनाव से भी बड़ी चुनौतियां मुंह बाये खड़ी है, इसमें कोई दो राय नहीं कि विश्व के इस सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देश में यहां के वोटरों ने एक अजीब उदाहरण पेश किया, न तो भारतीय जनता पार्टी की इस सरकार ने अपने पांच वर्षीय शासनकाल में अपने चुनावी वादे पूरे किए और अपने घोषणा-पत्र की पूर्ति पर ही विशेष ध्यान दिया, उल्टे नोटबंदी व जीएसटी जैसे पीड़ा दायक कदम उठाए, और जब चुनाव आया तो राष्ट्रवाद और सैना के शौर्य के बलबूते पर वोट बटौरने की कौशिश की, यह बिल्कुल भी संभव नहीं था यदि मोदी जैसे निष्कपट, ईमानदार व नेक प्रधानमंत्री नहीं होते, कुल मिलाकर यदि यह कहा जाए कि देश में भारतीय जनता पार्टी नहीं, बल्कि मोदी जीते है तो कतई गलत नहीं होगा, फिर मोदी जी के भाग्य को पर उस समय भी लग गए जब सामने प्रतिपक्ष जैसी कोई मजबूत दीवार भी नहीं रही, कांग्रेस बचकाने हाथों में खेलती रही और शेष प्रतिपक्षी दल अपनी क्षैत्रीय सीमा तक सीमित रहे, अब ऐसे विकल्प के अभाव में देश का आम वोटर करता भी क्या? जो विकल्प सामने था, उसका ही वरण कर लिया और पांच साल के लिए अपना भाग्य भी सौंप दिया। अब यह मोदी जी के सामने है कि वे देश को किस डगर पर ले जाए।खैर, जो भी हो, देश में फिर से मोदी जी की सरकार बन ही बई, पांच साल पहले जब पहली बार मोदी जी प्रधानमंत्री बने थे तब उनके सामने दस वर्षीय कांग्रेसी शासन के कथित कचरे को साफ करने की चुनौति थी, इस दौरान मोदी जी ने चाहे डेढ़ सौ से अधिक देशों की यात्राएँ कर देश के विश्व के अन्य देशों से सम्बंध ठीक करने का अभियान चलाया हो, किंतु देश वही खड़े रहने को मजबूर रहा, जहां वो पांच साल पहले खड़ा था, अर्थात् समस्याएँ व चुनौतियाँ यथावत रही, और अब इस बार मोदी जी को अपने ही पांच साला कार्यकाल की समीक्षा करनी है और यहां व्याप्त गंभीर चुनौतियों से रूबरू होना है। आज देश में चारों ओर चुनौतियाँ नजर आ रही है, फिर वह चाहे बेरोजगारी की चुनौति हो या किसानों की, या कि महंगाई की, ये चुनौतियां कोई आज की नई नहीं है, ये पहले भी थी, जिन पर पिछले पांच सालों में ध्यान नहीं दिया गया। पिछले अर्थात् 2014 के चुनाव के समय प्रतिवर्ष दो करोड़ अर्थात् पांच साल में दस करोड़ युवाओं को नौकरी देने का वादा किया गया था, किंतु यह वादा कुछ लाख तक सिमट कर रह गया। यही स्थिति किसान की है, पिछले पांच सालों में पांच लाख से अधिक किसानों ने कर्जा नहीं चुका पाने के कारण आत्म हत्याएं की, इनके कर्जे माफ करने की भी कई बार घोषणाऐं की गई, किंतु यह आत्म हत्याओं का सिलसिला आज भी जारी है।
आज नई सरकार के सामने सबसे अहम् चुनौति देश को आर्थिक विषमता के समुद्र से उबारने की है, देश में मंदी जहां सबसे ऊँचाई पर है, वहीं देश की राष्ट्रीयकृत बैंकों की हालत अत्यंत गंभीर हो गई क्योंकि बैंकों का लाखों करोड़ रूपया या तो उद्योगपति बटौर कर विदेश भाग गया कर्जा न किसान ने चुकाया न सरकार ने, भारतीय मुद्रा का अब मूल्यन अलग इस सरकार के सामने चुनौति बना हुआ है। इसके साथ आए दिन घटती-बढ़ती जीडीपी दरें सरकार का सबसे बड़ा ‘सिरदर्द’ है। फिर निर्यात क्षेत्र की मंदी पर भी ध्यान देना जरूरी हो गया है। जब तक इन प्रमुख मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया जाता तब तक आर्थिक वृद्धि दर में सुधार की कल्पना भी नही की जा सकती।
इस प्रकार कुल मिलाकर यदि यह कहा जाए कि देश के हर क्षेत्र में सरकार के सामने चुनौतियों का अम्बार है, तो कतई गलत नहीं होगा विशेषकर यदि सरकार प्राथमिकता के आधार पर आर्थिक, बेरोजगारी और किसानों से जुड़ी चुनौतियों पर ही कुछ सार्थक कदम उठाकर इनसे निपटना शुरू करें तो देश की ही नहीं इस सरकार की भी इसमें भलाई है।

इस मंत्रिमंडल के अर्थ
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल का यह शपथ-समारोह अपने आप में एतिहासिक है, क्योंकि यह ऐसा पहला गैर-कांग्रेसी मंत्रिमंडल है, जो अपने पहले पांच साल पूरे करके दूसरे पांच साल पूरे करने की शपथ ले रहा है। पिछले शपथ-समारोह से यह इस अर्थ में भी थोड़ा भिन्न है कि इसमें दक्षेस (सार्क) की बजाय ‘बिम्सटेक’ सदस्य-राष्ट्रों के प्रतिनिधि आए हैं। इसके कारण हमारे तीन पड़ौसी देशों की उपेक्षा हो गई। मालदीव, पाकिस्तान और अफगानिस्तान! मेरी राय यह थी कि दक्षेस और बिम्सटेक के अलावा अन्य पड़ौसी राष्ट्रों को भी बुलाया जाता तो बेहतर होता। ऐसे पड़ौसी राष्ट्र, जो भारत को महाशक्ति और महासम्पन्न बनाने में विशेष सहायक हो सकते हैं। शपथ-समारोह इतने कम समय में आयोजित हुआ है कि शायद इतने राष्ट्रों को एक साथ बुलाना संभव नहीं था। खैर, इस नए मंत्रिमंडल के शपथ-समारोह में मुझे यह भी अच्छा लगा कि राजनाथसिंह, अमित शाह और नितिन गडकरी की वरिष्ठता को यथोचित्त रखा गया। इन लोगों के बीच सुषमा स्वराज और अरुण जेटली को बैठा न देखकर मुझे दुख हो रहा है। सुषमा और अरुण, दोनों अपने स्वास्थ्य के कारण बाहर रहने को मजबूर हुए हैं। यह इस नए मंत्रिमंडल के लिए घाटे का सौदा है। स्वर्गीय पर्रिकर और अनंतकुमार की भी याद ताजा हुई। अमित शाह को मंत्री बनाकर मोदी ने अनौपचारिक उप-प्रधानमंत्री का पद कायम कर दिया है। जैसे अटलजी और आडवाणीजी की जुगल-जोड़ी ने काम किया, उससे भी बेहतर काम यह नरेंद्र भाई और अमित भाई की भाई-भाई जोड़ी काम करेगी। डाॅ. जयशंकर को मंत्री बनाकर मोदी ने अपनी विदेशनीति को नई धार देने की कोशिश की है। जयशंकर चीन और अमेरिका में हमारे राजदूत रह चुके हैं और विदेश सचिव भी रहे हैं। उनके पिता स्वर्गीय के. सुब्रहमण्यम भारत के माने हुए रणनीति-विशेषज्ञ रहे हैं। कुछ पूर्व मुख्यमंत्रियों की भी इस बार मंत्रिमंडल में जोड़ा गया है, इससे केंद्र सरकार को उनके अनुभव का लाभ तो मिलेगा ही, उन-उन प्रांतों में भी भाजपा का जनाधार भी बढ़ेगा। इस नए मंत्रिमंडल में कई पुराने मंत्रियों को बरकरार रखा गया है। जाहिर है कि ज्यादातर मंत्रियों ने अपना काम ठीक-ठाक किया है। जैसे कई कांग्रेसी सरकार के मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे, वैसे आरोप मोदी मंत्रिमंडल के सदस्यों पर नहीं लगे। आशा है कि मोदी सरकार की इस दूसरी अवधि में भी इस मंत्रिमंडल के सदस्यों का आचरण विवादों के परे रहेगा। इस मंत्रिमंडल में कई नए सदस्यों को भी जोड़ा गया है। इनमें से कुछ भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रहे सांसद भी मंत्री बने हैं। यह भी भाजपा के जनाधार को बढ़ाने में मदद करेगा। इस मंत्रिमंडल में महिलाओं और अहिंदी प्रांतों के सांसदों को काफी स्थान मिला है। यह भाजपा के लिए ही नहीं, संपूर्ण भारत के लिए शुभ-संकेत है। देश की जनता को सरकार, नौकरशाही, पुलिस और फौज से ज्यादा जोड़नेवाली ताकत कोई होती है तो वह एक अखिल भारतीय राजनीतिक पार्टी होती है। यह काम जो कांग्रेस करती रही, अब वही भाजपा करती दिखाई पड़ रही है। एक मजबूत पार्टी और मजबूत सरकार भारत को अगले पांच साल में विश्व-स्तरीय शक्ति बना सकती है।

मध्य प्रदेश सरकार पर संकट के बादल !
डॉक्टर अरविन्द जैन
जब कोई राजा चक्रवर्ती बनने निकलता हैं तो उसे सत्ता का मद इतना अधिक हो जाता हैं की वह समझ नहीं पाता कि क्या अन्याय हैं और क्या न्याय। इसी प्रकार अश्वमेघ यज्ञ के समय लवकुश ने अपने पिता के अश्व को बंधक बना लिया था। जब कोई भी राजा या जुआरी जीत हासिल करने लगता हैं, उस समय जीत के जोश में होश भी खोने लगता हैं और यह स्वाभाविक प्रक्रिया और गुण होते हैं ,जबकि जीतने और हारने वाले दया के पात्र होते हैं और पराधीन भी होते हैं और कटु सत्य कहें तो वे भिखारी या याचक होते हैं ,क्योकि वे घर घर वोट मांगने जाते हैं और हमेशा दाता का हाथ ऊपर होता हैं और याचक का हाथ नीचे होता हैं।
जबतक नयी सरकार का गठन नहीं हो पाता तब तक मध्य प्रदेश सरकार वेंट्रिलेटर या कृतिम सांस पर जी रही हैं और जिस दिन नव गठित केंद्र सरकार ने नजर फेरी उसी दिन से कर्णाटक और मध्य प्रदेश सरकार का अंत होना निश्चित हो जाएगा। उसका कारण कांग्रेस सरकार बहुमत के करीब हैं और कुछ निर्दलीय जिनका ज़मीर होता है या नहीं वह सुविधा शुल्क पर डिपेंड करता है। वर्तमान में प्रदेश सरकार अपने वादों को पूरा करने में सफल नहीं हो पा रही हैं उसके लिए आचार संहिता का रोड़ा रहा और अब केंद्र सरकार के इशारों पर सत्ता परिवर्तन के लिए उनके पास धनबल, जनबल और भयबल का इतना अधिक प्रभाव रहेगा कि कांग्रेस उनको नहीं सम्हाल पाएंगी और इसी समय मंत्री मंडल का गठन और परिवर्तन होने से असंतुष्ट विधायक पाला बदलने में कोई देरी नहीं करेंगे। उनको पार्टी से प्रिय सत्ता सुख होता हैं। सत्ता के लिए वे किसी भी स्तर तक जा सकते हैं। इस मामले में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के विधायकों का चरित्र समान हैं।
वर्तमान में कांग्रेस आला कमान में अस्थिरता का दौर चल रहा है और मेढकों का तोलना सरल नहीं होता। हमारे देश में नेताओं का चरित्र किसी से छिपा नहीं है। ,चंद चांदी के टुकड़ों में बिकने वाले और उनकी चमड़ी इतनी मोटी होती हैं और बेशरमी कूट कूट के भरी हैं कि उनको पाला बदलना बहुत सामान्य बात हैं ,जब सीट न मिलने पर पार्टी बदली तो पद मिलने पर वे अपनी बल्दियत तक बदल सकते हैं।
प्रदेश सरकार वर्तमान में लोकसभा चुनाव में पराजय के कारण चिंतित के साथ पशोपेश में है। मुख्य मंत्री का मंत्री परिषद् में आमूल चूल परिवर्तन उनके पद को न ले डूबे, कई धड़े उनसे अप्रसन्न हैं और उन्होंने यदि इसमें कोई भूल या गलती की तो आतंरिक बगावत होना सुनिश्चित है ,कारण जब शेर नरभक्षी हो जाता है तब उसे घास फूस अच्छा नहीं लगता।
चुनाव हारना या जीतना व्यक्तिगत और सामूहिक उत्तरदायित्व होता हैं, जब जीतते हैं सब उसका श्रेय लेते हैं और हारने में किसी न किसी पर लांक्षन लगाते हैं। यह समय आत्म निरीक्षण का हैं और सब अपने अपने कर्मों के हिसाब से फल भोगना होता है ,उगते सूरज को सब नमस्कार करते हैं पर अभी भी निराशा की जरुरत नहीं हैं।
मध्य प्रदेश में संख्या बल के कारण अस्थिरता बन सकती हैं और केंद्र के इशारे से सब कुछ होना संभव हैं। यह समय कमलनाथ सरकार के लिए संक्रमण काल है। इस समय बहुत सम्हाल कर कदम उठाने की जरुरत है अन्यथा सत्ताच्युत होना कोई कठिन नहीं हैं। इतिहास अपनी पुनरावृत्ति खुद करता है।

तंबाकू का निषेध अति आवश्यक है
(प्रो.शरद नारायण खरे)
(विश्व तंबाकू निषेध दिवस 31मई पर विशेष) पूरे विश्व के लोगों को तंबाकूमुक्त करनेे और स्वस्थ बनाने के लिये तथा स्वास्थ्य के सभी खतरों से बचाने के लिये तंबाकू चबाने या धूमपान के द्वारा होने वाली सभी परेशानियों और स्वास्थ्य जटिलताओं से लोगों को आसानी से जागरुक बनाने के लिये पूरे विश्व भर में एक मान्यता-प्राप्त कार्यक्रम के रुप में मनाने के लिये विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा पहली बार विश्व तंबाकू निषेध दिवस को आरम्भ किया गया।
रोग और इसकी समस्याओं से पूरी दुनिया को मुक्त बनाने के लिये डबल्यूएचओ द्वारा विभिन्न दूसरे स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं जैसे एड्स दिवस, मानसिक स्वास्थ्य दिवस, रक्त दान दिवस, कैंसर दिवस आदि। बहुत ही महत्वपूर्ण ढंग से पूरी दुनिया में सभी कार्यक्रम आयोजित और मनाये जाते हैं। इसे पहली बार 7 अप्रैल 1988 को डबल्यूएचओ की वर्षगाँठ पर मनाया गया और बाद में हर वर्ष 31 मई को तंबाकू निषेध दिवस के रुप में मनाने की घोषणा की गयी। डबल्यूएचओ के सदस्य राज्यों के द्वारा वर्ष 1987 में विश्व तंबाकू निषेध दिवस के रुप में इसका सृजन किया गया था।
पूरे विश्व से किसी भी रुप में तंबाकू का सेवन पूरी तरह से रोकने या कम करने के लिये लोगों को बढ़ावा देने और जागरुकता के विचार से इसे मनाया जाता है। दूसरों पर इसकी जटिलताओं के साथ ही तंबाकू इस्तेमाल के नुकसानदायक प्रभाव के संदेश को फैलाने के लिये वैश्विक तौर पर लोगों का ध्यान खींचना इस उत्सव का लक्ष्य है। इस अभियान में कई वैश्विक संगठन शामिल होते हैं जैसे राज्य सरकार, सार्वजनिक स्वास्थ्य संगठन आदि विभिन्न प्रकार के स्थानीय लोक जागरुकता कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
निकोटीन की आदत स्वास्थ्य के लिये बहुत हानिकारक है जो कि जानलेवा होता है और मस्तिष्क “अभावग्रस्त” रोग के रुप में जाना जाता है जो कभी भी उपचारित नहीं हो सकता है हालाँकि पूरी तरह से गिरफ्तार किया जा सकता है। दूसरे गैर-कानूनी ड्रग्स, मेथ, शराब, हीरोइन आदि की तरह ये मस्तिष्क डोपामाइन पथ को रोक देता है। दूसरी उत्तरजीविता क्रियाएँ जैसे खाना और पीने वाले भोजन और द्रव की तरह शरीर के लिये निकोटीन की जरुरत के बारे में गलत संदेश भेजने के लिये ये दिमाग को तैयार करता है।
उनके जीवन को बचाने के लिये धरती पर पहले से इस्तेमाल करने वालो की मदद के लिये स्वास्थ्य संगठनों के द्वारा विभिन्न प्रकार के निकोटीन की लत छुड़ाने के तरीके उपलब्ध हैं। “तंबाकू मुक्त युवा” के संदेश अभियान के द्वारा और 2008 का विश्व तंबाकू निषेध दिवस को मनाने के दौरान इसके उत्पाद या तंबाकू के प्रचार, विज्ञापन और प्रायोजन को डबल्यूएचओ ने प्रतिबंधित कर दिया है।
डबल्यूएचओ एक मुख्य संस्था है जो पूरे विश्व में विश्व तंबाकू निषेध दिवस को आयोजित करने के लिये एक केन्द्रिय हब के रुप में कार्य करती है। तंबाकू उपभोग को घटाने में इस अभियान के लिये पूरी सक्रियता और आश्चर्यजनक रुप से अपना योगदान देने वाले विभिन्न संगठनों और व्यक्तित्वों को बढ़ावा देने के लिये डबल्यूएचओ द्वारा 1988 से पुरस्कार समारोह भी आयोजित किया जाता है जो इस पुरस्कार समारोह के दौरान किसी भी देश और क्षेत्र के संगठनों और व्यक्तियों को खास अवार्ड और पहचान सर्टिफिकेट प्रदान किया जाता है।
विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाये जाने का इतिहास –
तंबाकू या इसके उत्पादों के उपभोग पर रोक लगाने या इस्तेमाल को कम करने के लिये आम जनता को बढ़ावा और प्रोत्साहन देने के लिये पूरे विश्व भर में विश्व तंबाकू निषेध दिवस को मनाना मुख्य लक्ष्य है क्योंकि ये हमें कुछ घातक बीमारियों की ओर अग्रसर करता है जैसे (कैंसर, दिल संबंधी समस्याएँ) या मृत्यु भी हो सकती है। देश के विभिन्न क्षेत्रों से व्यक्ति, वैश्विक सफलता प्राप्ति के लिये अभियान मनाने में बहुत ही सक्रियता से गैर-लाभकारी और सार्वजनिक स्वास्थ्य संगठन भाग लेते हैं तथा विज्ञापन बाँटने में शामिल होते हैं, नयी थीम और तंबाकू इस्तेमाल या इसके धुम्रपान संबंधी उत्पादों के बुरे प्रभावों से संबंधित जानकारी पर पोस्टर की प्रदर्शनी की जाती है।
अपने उत्पादों के उपभोग को बढ़ाने के लिये इसके उत्पाद या तंबाकू के खरीद, बिक्री या कंपनियों के विज्ञापन पर भी लगातार ध्यान देने का इसका लक्ष्य है। अपनी मुहिम को असरदार बनाने के लिये, डबल्यूएचओ विश्व तंबाकू निषेध दिवस से संबंधित वर्ष के एक विशेष थीम को बनाता है। पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त बनाने के साथ ही विश्व स्तर पर तंबाकू के उपभोग से बचाने के लिये सभी प्रभावशाली कदम की वास्तविक जरुरत की ओर लोगों और सरकार का ध्यान खींचने में ये कार्यक्रम एक बड़ी भूमिका निभाता है।
विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर कथन–
“तंबाकू छोड़ना इस दुनिया का सबसे आसान कार्य है। मैं जानता हूँ क्योंकि मैंने ये हजार बार किया है।”- मार्क तवैन
“तंबाकू मारता है, अगर आप मर गये, आप अपने जीवन का बहुत महत्वपूर्ण भाग खो देंगे।”- ब्रुक शील्ड
“तंबाकू का वास्तविक चेहरा बीमारी, मौत और डर है- ना कि चमक और कृत्रिमता जो तंबाकू उद्योग के नशीली दवाएँ बेचने वाले लोग हमें दिखाने की कोशिश करते हैं।”-डेविड बिर्न
ज्यादा धूम्रपान करना जीवित इंसान को मारता है और मरे सुअर को बचाता है।”- जार्ज डी प्रेंटिस
सिगरेट छोड़ने का सबसे अच्छा तरीका है तुरंत इसको रोकना- कोई अगर, और या लेकिन नहीं।”- एडिथ जिट्लर
सिगरेट हत्यारा होता है जो डिब्बे में यात्रा करता है।”- अनजान लेखक
“तंबाकू एक गंदी आदत है जैसे कथन के लिये मैं समर्पित हूँ।”- कैरोलिन हेलब्रुन
विश्व तंबाकू निषेध दिवस थीम-
विश्व तंबाकू निषेध दिवस को पूरे विश्व भर में प्रभावशाली तरीके से मनाने के लिये, अधिक जागरुकता के लिये लोगों में एक वैश्विक संदेश फैलाने के लिये केन्द्रिय अंग के रुप में हर साल एक खास विषय का डबल्यूएचओ चुनाव करता है। विश्व तंबाकू निषेध दिवस के उत्सव को आयोजित करने वाले सदस्यों को इस विषय पर दूसरे प्रचारक वस्तुएँ जैसे ब्रौचर, पोस्टर, फ्लायर्स, प्रेस विज्ञप्ति, वेबसाइट्स आदि भी डबल्यूएचओ के द्वारा उपलब्ध कराया जाता है।1987 से लेकर 2019के विषय (थीम) वर्ष के आधार पर दिये गये जो विश्व स्तर पर तंबाकू के विरुद्ध जागरुकता का प्रसारण करते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम चेतनाशील बनकर अपने
तन-मन व धन की रक्षा करें।

‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’में है विश्व की समस्याओं का समाधान
पीके सिंह
(महारानी अहिल्या बाई होल्कर की जयन्ती 31मई पर विशेष) भारत सांस्कृतिक विविधता के कारण एक लघु विश्व का स्वरूप धारण किये हुए हैं। भारत की सांस्कृतिक विविधता ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का सन्देश देती है अर्थात सारी वसुधा एक विश्व परिवार है। भारत की महान नारी लोकमाता अहिल्या बाई होल्कर ने लोक कल्याण की भावना से होलकर साम्राज्य का संचालन हृदय की विशालता, असीम उदारता तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर बड़ी ही कुशलतापूर्वक किया। देश-विदेश में इस महान नारी की जयन्ती प्रतिवर्ष बड़े ही उल्लासपूर्ण तथा प्रेरणादायी वातावरण में मनायी जाती है। इस महान नारी की जयन्ती पर हमें उन्हीं की तरह अपने हृदय को विशाल करके उदारतापूर्वक सारी वसुधा को कुटुम्ब बनाने का संकल्प लेना चाहिए। भारत सरकार से मेरी अपील है कि वह लोकमाता अहिल्याबाई की जयन्ती 31 मई को राष्ट्रीय स्तर पर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ दिवस के रूप में मनाने के लिए प्रस्ताव पारित करें।
वह भारत की ऐसी प्रथम नारी शासिका थी जिन्होंने अपनी प्रजा को अपनी संतानों की तरह लोकमाता के रूप में संरक्षण दिया। साथ ही अत्यन्त ही लोक कल्याणकारी कानून बनाये जिसमें सभी का हित सुरक्षित था। पड़ोसी राजाओं के साथ उन्होेंने मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित किये। वे युद्ध के पक्ष में कभी भी नहीं रही, वरन् वे कानून आधारित न्यायपूर्ण राज संचालन पर विश्वास करती थी। आज भी महारानी के सम्बोधन की बजाय वह देश में लोकमाता या देवी के रूप में सबके हृदय में श्रद्धापूर्वक वास करती हैं। उन्होंने एक महारानी होते हुए भी एक सादगीपूर्ण, शुद्ध, दयालु तथा ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित हृदय जीवन पर्यन्त धारण किये रहने की मिसाल प्रस्तुत की।
वसुधैव कुटुम्बकम् भारतीय संस्कृति का आदर्श तथा सर्वमान्य विचारधारा है। जो महा उपनिषद सहित कई ग्रन्थों में लिपिबद्ध है। चारों वेदों का एक लाइन में सार है – उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।। उदार चरित्र वाले लोगों के लिए यह सम्पूर्ण धरती ही परिवार है। यह वाक्य विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक तथा युवा भारत की संसद के प्रवेश कक्ष में भी अंकित है। भारतीय संविधान में निहित वसुधैव कुटुम्बकम् के विचार को सारे संसार में फैलाना है।
अब आगे भारत के प्रत्येक नागरिक को वसुधैव कुटुम्बकम पर आधारित वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था (विश्व संसद) का गठन करने का लक्ष्य बनाना चाहिए। वर्तमान में विश्व का संचालन पांच वीटो पाॅवर सम्पन्न शक्तिशाली देश अपनी मर्जी से कर रहे हैं। विश्व को अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद, वीटो पाॅवर रहित, परमाणु शस्त्रों की होड़ से मुक्त तथा युद्ध रहित बनाने का संकल्प भी हमें आज के महान दिवस पर लेना है। यह चिन्ता का विषय है कि आम आदमी की प्रसन्नता की रैंकिंग में भारत विश्व में 113वें स्थान पर है जबकि भूखों की सूचकांक में भारत का दर्जा विश्व में 119वां है। ‘ग्लोबल विलेज’ के रूप में विकसित 21वीं सदी के विश्व समाज में भी अहिल्या बाई के लोक कल्याणी विचार आज भी पूरी तरह सारगर्भित तथा युगानुकूल हैं।
भारत के गौरव को बढ़ाने वाली इस महान नारी लोकमाता अहिल्या बाई का जन्म 31 मई, 1725 को औरंगाबाद जिले के चैड़ी गांव (महाराष्ट्र) में एक साधारण परिवार में हुआ था। अहिल्या बाई के जीवन को महानता के शिखर पर पहुॅचाने में उनके ससुर महान यौद्धा मल्हार राव होलकर की मुख्य भूमिका रही है। इन्दौर जिले के आसपास के एक बड़े मालवा क्षेत्र में होल्कर साम्राज्य की स्थापना श्रीमंत मल्हार राव होल्कर ने अपने पराक्रम से की थी। मल्हार राव विशेष रूप से मध्य भारत में मालवा के पहले मराठा सुबेदार होने के लिए जाने जाते थे। महान यौद्धा मल्हार राव का जन्म 16 मार्च 1693 में तथा मृत्यु 20 मई 1766 में हुई। उनकी जीवन यात्रा एक भेड़ पालक चारवाहे के रूप में शुरू होकर एक महान यौद्धा के शिखर तक पहुंची।
अठारहवीं सदी के मध्य में मल्हारराव होल्कर ने पेशवा बाजीराव प्रथम की ओर से अनेक लड़ाइयाँ जीती थीं। मालवा पर पूर्ण नियंत्रण ग्रहण करने के पश्चात, 18 मई 1724 को इंदौर मराठा साम्राज्य में सम्मिलित हो गया था। 1733 में बाजीराव पेशवा ने इन्दौर को मल्हारराव होल्कर को पुरस्कार के रूप में दिया था। मल्हारराव ने मालवा के दक्षिण-पश्चिम भाग में अधिपत्य कर होल्कर राजवंश की नींव रखी और इन्दौर को अपनी राजधानी बनाया।
लोकमाता अहिल्या बाई होल्कर ने सदैव लोक कल्याण की भावना से अपने जीवन के एक-एक पल को एकमात्र अपनी आत्मा को विकसित करने के लिए लगाया। लोकमाता अहिल्या बाई होल्कर आज स्थूल देह रूप में हमारे बीच नहीं है किन्तु उनकी सूक्ष्म विश्वात्मा जाति, धर्म तथा राष्ट्र से ऊपर उठकर लोकमाता के रूप में भारत सहित प्रत्येक विश्ववासी को विश्व एकता, विश्व शान्ति तथा विश्व बन्धुत्व के मार्ग पर चलते हुए अब आगे सारी वसुधा को कुटुम्ब बनाने के लिए सदैव प्रेरित करती रहेगी। पृथ्वी एक देश है हम सभी इसके नागरिक हैं।

शपथ में इमरान को बुलाएं या नहीं ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनकी विजय पर बधाई देते हुए दोनों देशों के बीच बातचीत शुरु करने की पेशकश की है। भारत की तरफ से कहा गया कि बातचीत और आतंक साथ-साथ नहीं चल सकते। इसका मतलब क्या हुआ ? शायद यही कि 30 मई को होनेवाले शपथ-समारोह में इमरान को नहीं बुलाया जाएगा ? यदि इमरान को नहीं बुलाएं और सभी पड़ौसी देशों के नेताओं को बुलाएं तो क्या यह अटपटा नहीं लगेगा ? जब नवाज शरीफ को 2014 में बुलाया गया था, तब भी आतंकवाद चल रहा था या नहीं ? यह ठीक है कि इमरान खान पाकिस्तानी फौज के ज्यादा करीब हैं लेकिन इमरान जबसे प्रधानमंत्री बने हैं, वे भारत के साथ ताल्लुकात सुधारने की बात बार-बार करते रहे हैं। करतारपुर का मामला उन्होंने ही सुलझाया है। हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को किरगिजिस्तान जाने के लिए पाकिस्तान की वायु-सीमा में से उड़ने की सुविधा उन्हीं की सरकार ने दी है। चुनाव के पहले इमरान खान ने खुले-आम यह बयान दिया था मोदी अगर जीत गए तो भारत-पाक रिश्ते जरुर सुधरेंगे। किरगिजिस्तान की राजधानी बिश्केक में हुए सम्मेलन में भारत और पाक विदेशमंत्री एक-दूसरे से काफी अच्छे ढंग से पेश आए। इन घटनाओं से ऐसा लगता है कि दोनों देशों में बात शुरु होना चाहिए। इमरान-सरकार ने प्रमुख आतंकियों पर काफी बंदिशे भी लगाई हैं। उन्होंने पश्चिमी राष्ट्रों को आश्वस्त किया है कि वे पाकिस्तान से आतंकवाद को खत्म करके ही रहेंगे। जाहिर है कि उनकी अपनी सीमाएं हैं। उनकी घोषणाओं पर विश्वास करके यदि उनके शपथ-समारोह में मोदी ने बुला लिया तो विपक्ष के द्वारा पुलवामा के हत्याकांड को जबर्दस्त ढंग से उछाला जाएगा। यह दुविधा तो है। यह भी हो सकता है कि इस बार शपथ-समारोह में सिर्फ पांच महाशक्तियों के नेताओं को ही बुलाया जाए लेकिन इतनी अल्प-सूचना पर उनका आना बहुत मुश्किल है। इस सब उहा-पोह के बीच मोदी थोड़ी हिम्मत दिखा सकते हैं और इमरान को बुलाकर उनसे आतंकियों के विरुद्ध स्पष्ट और कठोर घोषणाएं करवा सकते हैं। इस बार के शपथ समारोह को पहले से भी अधिक भव्य और प्रचारात्मक होना चाहिए लेकिन पाकिस्तान की फांस निकाले बिना वह कैसे होगा ?

काँग्रेस के सिर से ‘वंशवाद’ का कलंक मिटा देना चाहते है राहुल……!
ओमप्रकाश मेहता
ऐसा लगता है लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार ने राहुल गांधी की कार्यशैली को एक नई दिशा दी है, इसकी झलक चुनाव परिणामों के बाद राहुल की अध्यक्ष पद से इस्तीफे की जिद और पुत्र प्रेम में आबद्ध वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को सीख देने व कांग्रेस को गांधी-नेहरू परिवार से अलग अध्यक्ष देने के उनके कथन से परिलक्षित है। क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री जी से लेकर अन्य सत्तारूढ़ दल के नेताओं द्वारा कांग्रेस को ‘‘पारिवारिक पार्टी’’ कहा गया, उससे राहुल काफी व्यथित है। अब राहुल चाहते है कि कांग्रेस गांधी-नेहरू परिवार से मुक्ति पाकर ‘वंशवाद’ के कलंक से मुक्त हो, तथा यह जन-जन की पार्टी बने, अब आज की स्थिति में राहुल के इन विचारों को कांग्रेस में कितना स्थान मिलता है, यह तो फिलहाल कहना मुश्किल है, किंतु इसी परिवार के एक युवा मुखिया के दिल-दिमाग में आए ये विचार यह स्पष्ट अवश्य करते है कि राहुल कांग्रेस के वास्तविक हितचिंतक है और अब कांग्रेस की वरिष्ठ पीढ़ी में कोई भी कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है, चाहे वे प्रणव मुखर्जी हो या डाॅ. मनमोहन सिंह या कि शीला दीक्षित, इसलिए आज की युवा पीढ़ी में से ही ऐसा एक सक्षाम युवा खोजना पड़ेगा, जो नेहरू गांधी की इस विरासत को पुष्पित-पल्लवित कर सके और इस दल की पुरानी गरिमा लौटा सके, फिर वह चाहे ज्योतिरादित्य सिंधिया हो या सचिन पाॅयलट। किंतु यह सही है कि सुविचार चोंट खाने के बाद ही आता है और वह राहुल जी के दिल-दिमाग पर छा गया है।
इस तरह कांग्रेस की इस हार को यदि पार्टी के भविष्य के हिसाब से ‘वरदान’ माना जाए तो कतई गलत नहीं होगा, क्योंकि अब अकेले राहुल जी के विचार में ही नहीं, हर सच्चे कांग्रेसी के दिल-दिमाग में यह भावना कुलांचे मार रही है कि पार्टी को नवजीवन देने का यही सही वक्त है। इस दिशा में कांग्रेस को भाजपा को ‘गुरू’ मान लेना चाहिए, क्योंकि लोकसभा में मात्र दो सदस्यों के बुरे समय से बाहर निकलकर आज वह 303 सदस्यों के ‘अच्छे दिनों’ तक पहुंची है और इस दौरान भाजपा किस दुष्काल से गुजरी यह किसी से भी छिपा नहीं है, मोदी जैसा एक भगीरथ आया जिसने भाजपा के नाले को गंगा में बदल दिया।
फिर जहां तक कांग्र्रेस के दौर का सवाल है, उसे इन दिनों सिर्फ आत्मचिंतन की नहीं बल्कि पुनर्निमाण के दौर की आवश्यकता है, जो उसके मूलभूत ढ़ांचे को बदलकर उसे सही रास्ते पर खड़ा कर दे। किंतु इस पथ तक पहुंचने के लिए पार्टी नेतृत्व को उन बड़बोले नेताओं को दूर रखना होगा, जो इसी पार्टी को अपने वाणी के तीक्ष्ण बाणों से हर समय बेधने के प्रयास में रहते है और पुराने घावों में नमक भरने का प्रयास करते रहते है, मेरा इशारा आप समझ ही गए होंगे, जी, सही समझा सैम पित्रौदा और मणीशंकर अय्यर जैसे नेताओं से। क्योंकि सैम पित्रौदा के ‘‘हुआ तो हुआ’’ ने जितना पार्टी को नुक्सान पहुंचाया उतना नरेन्द्र मोदी जी के ‘नामदार’ ने भी नहीं पहुंचाया। फिर सबसे बड़े खेद की बात यह है कि राहुल जी को भी ‘सब कुछ’ लुट जाने के बाद अब यह समझ मंे आ रहा है कि कौन पार्टी के हित में है और कौन नहीं? यहां यदि यह कहा जाए कि राहुल जी की अपनी टीम के सदस्यों सर्वश्री निखिल अल्वा, अलंकार सवाई, कौशल विद्यार्थी, के. राजू तथा सैम पित्रौदा का पार्टी की हार में सर्वाधिक योगदान रहा तो कतई गलत नहीं होगा।
किंतु ‘‘देर आये दुरूस्त आये’’ की तर्ज पर यह बड़ी ठांेकर लगने के बाद भी यदि पार्टी सम्भल जाती है, अपनी बुराईयां खोजकर उन्हें दूर करने का प्रयास करती है तो वास्तव में ये चुनाव और इनके परिणाम पार्टी के लिए संजीवनी सिद्ध हो सकते है। ….. और अब राहुल ने जो ठान लिया है, वे उसे करके रहेंगे। राहुल अब विकासखण्ड स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक पार्टी में फैरबदल चाहते है, ‘‘पूरे घर के बदल डालूंगा’’ की तर्ज पर उन्होंने सत्ता वाले राज्यों व अन्य राज्यों की इकाईयों में व्यापक रूप से फैरबदल का फैसला ले लिया है, साथ ही राहुल जी पार्टी पर चुनाव प्रचार के दौरान लगे सभी कलंकों को मिटाकर अगले चुनावों तक पार्टी को नए रूप में पेश करना चाहते है। क्योंकि अब पार्टी के पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है, जो भी मिलेगा वही इसकी उपलब्धि होगी।

राहुल गांधी का अमेठी से ‘बेआबरू’ होना…
तनवीर जाफरी
उत्तर प्रदेश का अमेठी लोकसभा क्षेत्र (37)गत् 40 वर्षों से कांग्रेस पार्टी का अभेद दुर्ग समझा जाता रहा है। 1977 में आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस की पहली राष्ट्रव्यापी पराजय के दौरान सर्वप्रथम संजय गांधी को उनके जनता पार्टी के प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार रवींद्र प्रताप सिंह ने पराजित किया था। बाद में 1979 में संजय गांधी यहां से विजयी हुए। उस समय से लेकर 2019 तक अर्थात् पूरे चार दशक तक अमेठी लोकसभा क्षेत्र कांग्रेस पार्टी का एक ऐसा अभेद दुर्ग समझा गया जिसे अब तक कोई पराजित नहीं कर सका था। यहां तक कि अमेठी के राजघराने द्वारा कांग्रेस प्रत्याशी का विरोध किए जाने के बावजूद भी यह संसदीय सीट गांधी परिवार के किसी न किसी सदस्य की झोली में ही रही। 1979 में पहली बार संजय गांधी से लेकर 2014 में राहुल गांधी तक यहां से गांधी परिवार का ही कोई न कोई सदस्य अपनी जीत दर्ज कराता रहा। संजय गांधी की मृत्यु के पश्चात राजीव गांधी फिर सोनिया गांधी तथा 2019 तक राहुल गांधी यहां के जनप्रतिनिधि चुने जाते रहे हैं। इस बार यह पहला अवसर था जबकि कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी को इसी क्षेत्र से अपनी प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार स्मृति ईरानी से लगभग 50 हज़ार वोटों से पराजय का मुंह देखना पड़ा। आ‎खिर क्या कारण था कि चार दशकों तक अमेठी पर एकछत्र वर्चस्व रखने वाले गांधी परिवार से अमेठी के मतदाता विमुख हो गए? कौन से ऐसे हालात थे जिनकी वजह से राहुल गांधी को अमेठी के साथ-साथ पहली बार केरल के वायनाड से भी चुनाव लडऩे की ज़रूरत महसूस हुई?
इसमें कोई संदेह नहीं कि चार दशकों से अमेठीवासियों का गांधी परिवार से गहरा व आत्मिक रिश्ता रहा है। इस रिश्ते को प्रगाढ़ करने तथा इसमें आत्मीयता का बोध पैदा करने में राजीव गांधी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इत्तेफाक से मुझे संजय गांधी व राजीव गांधी दोनों ही के चुनाव अभियान को अमेठी में लंबे समय तक रहकर बेहद करीब से देखने का अवसर मिला। संजय गांधी की मृत्यु के पश्चात अमेठी में हुए उपचुनाव में जब राजीव गांधी विमान पायलेट की सेवा त्यागकर अमेठी की जनता से अपने भाई संजय गांधी के किए गए वादों को पूरा करने के हौसले के साथ चुनाव मैदान में उतरे थे उसी समय राजीव गांधी की सादगी, उनकी विनम्रता, उनकी शराफत तथा मधुर वाणी ने अमेठी के लोगों के दिलों को छू लिया था। अमेठी में जो भी बड़े विकास कार्य किए गए वह संजय गांधी व राजीव गांधी के सांसद काल में ही किए गए। उसी दौर में अमेठी लोकसभा क्षेत्र में पडऩे वाला जगदीशपुर व मुसा‎फिरखाना क्षेत्र औद्योगिक क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ। यहां कई बड़े व मंझौले उद्योग स्थापित हुए। परंतु इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी के सांसद चुने जाने के बाद न तो इस क्षेत्र में कोई नया बड़ा उद्योग स्थापित हुआ न ही इस क्षेत्र के विकास का पहिया राजीव गांधी के सांसद काल के समय की तुलना में आगे बढ़ सका।
इसके अतिरिक्त राजीव गांधी की तुलना में राहुल गांधी अमेठीवासियों से उतनी निकटता तथा अपनत्व कायम नहीं रख सके। बिना किसी सुरक्षा के तामझाम के ही राजीव गांधी अमेठी के आम लोगों से मिलते-जुलते थे, वे अपने कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत. रूप से उनके नामों से जानते थे यहां तक कि अमेठी संसदीय क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए राजीव गांधी ने अपने कार्यालय में एक अलग अमेठी सेल स्थापित किया था। प्रत्येक गांव का सरपंच उनसे किसी भी समय सीधे तौर पर संपर्क स्थापित कर सकता था। परंतु राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद से ही अमेठी के लोगों से उनका फासला बढऩा शुरु हो गया। वैसे भी वे जब कभी अमेठी आते तो भी जनता के बीच में जाने के बजाए सरकारी अतिथिगृहों तक ही अपनी अमेठी यात्रा सीमित रखते और पार्टी के ही प्रमुख कार्यकर्ताओं से मिल-मिला कर अपने अमेठी दौरे की इतिश्री कर देते। एक अनुमान के अनुसार वे गत् पांच वर्षों में एक संासद के रूप में 28 बार अपने निर्वाचन क्षेत्र पधारे। इनमें से अधिकांशत: उन्होंने पार्टी नेताओं व अधिकारियों से ही बैठकें कीं तथा मतदाताओं से प्राय: फासला बनाकर रखा। गोया राहुल गांधी को इस बात का मुगालता हो गया था कि अमेठी के मतदाता उनके ऐसे ‘पारिवारिक मतदाता’ हैं जो संभवत:कभी उनके परिवार से विमुख नहीं हो सकते।
दूसरी ओर राहुल गांधी को अमेठी से धूल चटाने की दूरगामी योजना पर काम करते हुए भारतीय जनता पार्टी ने 2014 में ही अपना पहला कार्ड तो उसी समय खेल दिया था जबकि राहुल गांधी से पराजित होने के बाद भी स्मृति ईरानी को मोदी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। इतना ही नहीं बल्कि पराजित होने के बावजूद केंद्र सरकार की सहायता से स्मृति ईरानी ने अमेठी में अनेक छोटे व मध्यम श्रेणी के विकास कार्य करवाए। यहां तक कि रूस-भारत सहयोग से बनने वाली क्लाशिनिकोव 203 के निर्माण की एक यूनिट भी अमेठी में स्थापित की गई। स्मृति ईरानी 2014 से 2019 के बीच न केवल बार-बार जनता के मध्य आती-जाती रहीं बल्कि उनके दु:ख-सुख में भी बराबर शरीक होती रहीं। कहा जाता है कि ईरानी ने गत् पांच वर्षों में साठ से अधिक बार अमेठी के दौरे किए। उन्होंने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी सहित कई और प्रमुख स्टार प्रचारकों के दौरे कराए। स्मृति ने अमेठी के कई गांवों में जाकर जूते, कपड़े, साडिय़ां, कापी-किताबें तथा कलम आदि भी वितरित किए। अमेठी की गऱीब जनता ने जहां इसे स्मृति ईरानी की कृतज्ञता समझी वहीं कांग्रेस की ओर से स्मृति ईरानी की इस कारगुज़ारी को यह कहकर प्रचारित किया गया कि ‘स्मृति ईरानी ने अमेठी के लोगों को गरीब व भिखारी समझकर यह सामग्री वितरित की है’। उधर स्मृति ईरानी इन सभी आरोपों की परवाह किए बिना लगभग दो महीने तक लगातार अमेठी में रहकर जनसंपर्क साधती रहीं तथा किसानों के खाद, बीज, बिजली-पानी आदि सभी ज़रूरतों के प्रति संवेदनशील रहीं।
उधर राहुल गांधी ने अमेठी के साथ-साथ केरल की वायनाड सीट से चुनाव लडऩे का जो फैसला किया उसे भी स्मृति ईरानी की ओर से अमेठी में यह कहकर खूब प्रचारित किया गया कि अमेठी के मतदाताओं पर राहुल को विश्वास नहीं था इसीलिए उन्होंने दूसरी सीट से भी चुनाव लडऩे का फैसला किया। अमेठी के मतदाताओं में यह भी संदेश गया कि यदि राहुल अमेठी से जीत भी जाते हैं तो भी वे यहां से इस्तीफा दे सकते हैं। रही-सही कसर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राहुल गांधी पर किए गए उसे आक्रमण ने पूरी कर दी जिसमें मोदी ने राहुल गांधी पर वायनाड से इसलिए चुनाव लडऩे का आरोप लगाया था क्योंकि वहां अल्पसंख्यक मतदाताओं की संख्या अधिक है। गोया राहुल गांधी को अमेठी के बहुसंख्य समाज के मतदाताओं पर विश्वास नहीं रहा। उपरोक्त समस्त परिस्थितियों व रणनीति को देखते हुए साफतौर पर यह कहा जा सकता है कि 2019 में राहुल गांधी की अमेठी से पराजय की स्क्रिप्ट लिखने की शुरुआत भारतीय जनता पार्टी ने 2014 से ही कर दी थी परंतु राहुल गांधी व उनके सलाहकार इसे गंभीरता से नहीं से नहीं ले सके। निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी अमेठी के मतदाताओं को स्मृति ईरानी को मंत्रिमंडल में शामिल कर तथा पराजित होने के बावजूद क्षेत्र के विकास में उनकी भागीदारी तय करने की बदौलत यह विश्वास दिला पाने में पूरी तरह सफल रही कि क्षेत्र का विकास राहुल गांधी की तुलना में स्मृति ईरानी कहीं अधिक अच्छे तरीके से करा सकती हंै। इन्हीं कारणों से राहुल गांधी को इस बार अमेठी से ‘बेआबरू’ होना पड़ा।

कांग्रेस की संगत से साफ हुये वामपंथी दल
रमेश सर्राफ धमोरा
देश में सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव परिणामों की घोषणा हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले से भी अधिक बहुमत हासिल कर देश में दूसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रहे हैं। इन चुनावो में जहां भाजपा व उसके सहयोगी दलो की सीटो की संख्या में बढ़ोत्तरी हुयी है। वहीं लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा घाटा वामपंथी दलों को उठाना पड़ा है। एक तरह से देखा जाये तो वामपंथी दलों का देश में सूपड़ा ही साफ हो गया है। कभी देश में मुख्य विपक्षी दल रहे वामपंथी दलो का अपने प्रभाव क्षेत्र वाले पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा व केरला में पूरी तरह सफाया हो गया। तीनो प्रदेशो की कुल 64 लोकसभा सीटो में से सिर्फ माकपा केरला में एक सीट जीत पायी है जबकि केरला में माकपा की अगुवाई में वामदलो की प्रदेश सरकार भी चल रही है।
2004 में 63, 2009 में 24, 2014 में 11 सीट जीतने वाला वाम मोर्चा 2019 के लोकसभा चुनाव में मात्र पांच सीट ही जीत पाया है। इन पांच सीटो में से चार तो अकेले तमिलनाडू की है जहां उनका दु्रमक से गठबंधन था व दु्रमक के पक्ष में चली लहर का फायदा वामपंथियो को भी मिल गया। अन्यथा तमिलनाडू में कभी उनका जनाधार नहीं रहा है। तमिलनाडू में माकपा को दो सीट व भाकपा को दो सीट मिली जबकि वहां उनको वोट क्रमश: 2.40 फीसदी माकपा को व 2.43 फीसदी भाकपा को मिले हैं। इतने कम वोट मिलने के बाद भी दो- दो सीटे जीतने का का मुख्य कारण दु्रमक से गठबंधन करने को माना जा रहा है।
वामपंथी दलो ने पश्चिम बंगाल पर 1977 से लेकर 2011 तक लगातार 34 वर्षो तक एकछत्र शासन किया था। वहां उनको एक भी सीट नहीं मिलना उनके गिरते जनाधार को दर्शाता है। पश्चिम बंगाल में तो वामपंथी दलो के वोट बैंक में भी भारी गिरावट देखने को मिली है। हाल ही के लोकसभा चुनाव में यहां माकपा को मात्र 4.12 फीसदी, भाकपा को 00.40 फीसदी, आरएसपी को 00.51 फीसदी वोट ही मिले। जबकि सत्तारूढ़ त्रूणमल कांग्रेस को 43.28 फीसदी, भाजपा को 40.25 फीसदी, कांग्रेस को 5.61 फीसदी वोट मिले। यहां गत 42 वर्षो से सरकार से बाहर चल रही कांग्रेस ही वामदलो से ज्यादा वोट व दो सीट जीत पाने में सफल रही है।
वामपंथी दलो ने त्रिपुरा में लगातार 25 वर्ष तक शासन किया। 2018 में वहां भाजपा ने वामपंथियों को करारी शिकस्त देकर पहली बार अपनी सरकार बनायी थी। मगर उस वक्त सरकार भले ही भाजपा की बनी हो मगर वोट प्रतिशत में वामपंथी दल भाजपा से लगभग बराबरी पर ही रहे थे। उस समय जहां भाजपा को 9 लाख 99 हजार 93 (43 फीसदी)वोट व 36 सीट मिली थी वहीं वामपंथी दल माकपा को 9 लाख 92 हजार 575 (42.7 फीसदी)वोट व 16 सीट मिली थी। इस तरह देखे तो मात्र 6 हजार 518 वोट ही कम मिले थे। मगर 2019 के लोकसभा चुनाव में तो त्रिपुरा में भी वाम दलो का सफाया हो गया। वामदल त्रिपुरा में अपनी दोनो लाकसभा सीटो पर हार गये। उन्हे मात्र 17.31 फीसदी ही वोट मिले जबकि विधानसभा चुनाव में मात्र 1.80 फीसदी वोट लेने वाली कांग्रेस के वोट बढक़र 25.24 फीसदी हो गये हैं।
केरला में सरकार चला रहे वामपंथी दलो को 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश की 20 में से मात्र एक सीट मिली है जबकि वहां कांग्रेस को 15 व उसके गठबंधन के सहयोगियों ने चार सीटे जीती हैं। 2016 में विधानसभा चुनाव में वहां वाममोर्चा ने 140 में से 91 सीटे जीत कर सरकार बनायी थी। मगर अब अपनी सरकार के होते हुये भी वामदलो को केरल में मात्र एक सीट पर संतोष करना पड़ा है। केरला में सत्तारूढ़ वामदलो को कांग्रेस से वोट भी कम मिले। वहां कांग्रेस को 37.24 फसदी वोट व वामदलो को 34.33 फसदी वोट मिले।
देश में आज वामपंथी दल अप्रासंगिक बनते जा रहे हैं। वामपंथी दलो का जनाधार धीरे-धीरे सिकुड़ता जा रहा है। वामदलो के घटते जनाधार का मुख्य कारण है उनका अपनीमूल विचारधारा से दूर होना व जनसंघर्ष जिसके बल पर उनकी देश में पहचान बनी थी उसको छोडक़र सुविधा भोगी बन जाना रहा है। आंख मीच कर कांग्रेस की हर बात का समर्थन करने से आम जन में वामपंथी दलो की कांग्रेस के पिछलगू होने की छवी बन गयी जो उनके खिसकते जनाधार का सबसे बड़ा कारण है।
चूंकी देश में कांग्रेस व वामदल सेक्युलर विचारधारा के हिमायती माने जाते रहे हैं। इस कारण दोनो का वोट बैक भी एक जैसा ही है। ऐसे में कांग्रेस के साथ होने से वामदलो का वोट खिसककर कांग्रेस की तरफ जाने लगा है। उपर से केरला जहां उनकी देश में एकमात्र सरकार चल रही है वहां की वायनाड सीट से कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी के चुनाव लड़ने से कांग्रेस के पक्ष में वोटो का ध्रुवीकरण हो गया। केरला की आधी आबादी मुस्लिम व ईसाई है। राहुल गांधी कांग्रेस के सबसे बड़े नेता हैं। उनके केरला से चुनाव लड़ने का कांग्रेस को खासा फायदा मिला व कांग्रेस 20 में से 19 सीटे जीत गयी।
देश में सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ कांग्रेस कोई भी मार्चा बनाती है उसमें वाम दल सबसे पहले शामिल होते हैं। संसद में भी वो कांग्रेस की लाईन का ही समर्थन करते है। आज कांग्रेस पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा व केरला में वामपंथी दलो से ज्यादा ताकतवर बन चुकी है जबकि कभी ये तीनो ही प्रदेश वामदलो के गढ़ माने जाते थे। अपने ही गढ़ में पिछड़ते जाने के बाद भी अभी तक वामपंथी दल सावचेत नहीं हुये लगते हैं।
देश की राजनीति में कामरेडो को अपना अस्तित्व बचाना है तो उनको अपनी मौजूदा नीति में परिवर्तन करना होगा। उनको अपनी पुरानी पहचान कायम करनी होगी। पार्टी को बंद कमरो से निकाल कर सडक़ पर लाना होगा। पार्टी में नये लोगों को जोडऩा होगा। आज वामदलो में नये कार्यकर्ता जुड़ने का सिलसिला थम सा गया है जिसे पुन: शुरू करना होगा। दलित, महिलाओं को जोडऩे के लिये पोलित ब्यूरो में दलितो, महिलाओं को प्रतिनिधित्व देना होगा। वामदलो ने आज तक पोलित ब्यूरो में किसी दलित को सदस्य नहीं बनाया है। वाम दलो के कांग्रेस के पीछे चिपके रहने से एक दिन कांग्रेस उनका रहा-सहा जनाधार भी निगल जायेगी। आज भाजपा विराध के नाम पर वामदल कांग्रेस की हर बात का समर्थन करते नजर आते हैं जो उनके घटते जनाधार का बड़ा कारण है।
देश की जनता कभी कामरेडो को कांग्रेस का विकल्प मानती थी मगर कांग्रेस का विकल्प बनने के स्थान पर कांग्रेस की गोद में बैठते चले गये। 2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लडऩे से उनका वहां रहा सहा जनाधार भी खत्म हो गया। वहां कांग्रेस वामपंथी दलो से ज्यादा सीटे जीतकर विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल बन गयी व कामरेड मुंह ताकते रह गये। अभी भी कामरेडो का कांग्रेस से मोह भंग नहीं हुआ है। इसी के चलते देश में भोपाल सहित कई सीटो पर बिन मांगे कांग्रेस प्रत्याशियों का समर्थन किया था। यदि समय रहते कम्युनिष्ट पार्र्टियां अपनी कार्यशैली में परिवर्तन नहीं लायेगी तो आने वाले समय में वो देश की राजनीति में अप्रसांगिक बन कर रह जायेगी।

जनादेश में छिपे संदेशों को काश ! विपक्षी दल समझें !
प्रभात झा
सन् 2019 लोकसभा चुनाव के जनादेश का सभी राजनैतिक दलों को गहरा अध्ययन करना चाहिए। मुझे विश्वास है कि वे ऐसा कर भी रहे होंगे। अभी तक जो हमने विश्लेषण किया है, उसमे राजनैतिक दलों के लिए अनेक सन्देश छिपे है, उसे क्रमशः रखने का प्रयास कर रहा हूं। इस जनादेश में इतिहास रचा है। ‘इतिहास’ घटता है न कि घटाया जाता है। अवसर तो भारत में बहुत बड़े बड़े नेताओं और राजनैतिक दलों को मिला, पर प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते अमित शाह ने सहमति और समन्वय का इतिहास रचा है। यह वर्तमान राजनीति में आद्वितीय घटना है। इस सन्देश के पीछे इस ‘समन्वय’ की बहुत बड़ी भूमिका है।
नेता जो सोचता है, संगठन उसे पूरा करने में लग जाए और संगठन जो सोचे उसे नेता पूरा करने में लग जाए यह सामान्य बात नहीं है। भाजपा को छोड़कर देश में अभी ऐसा राजनैतिक दल कोई नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने असंभव को संभव कर दिखाया है। इस जनादेश में जो सबसे बड़ा सन्देश है, वह यह है कि नेता को अपने अध्यक्ष यानी संगठन पर और संगठन को अपने नेता पर अटूट विश्वास होना चाहिए। जबकि आज की राजनीति में होता यह है कि ‘नेता’ सरकार पर ही नहीं संगठन को भी चलाने लगता है और संगठन नेता को हटाने में लग जाता है। आज भारतीय राजनीति के शीर्ष नेतृत्व में इस स्तर पर ऐसे ही सात्विक विश्वास की आवश्यकता लगती है। कमोवेश इस धुरी पर विपक्षी दल अपने को देखंगे तो बहुत ही कमजोर पाएंगे।
इस जनादेश में कुछ महत्वपूर्ण सन्देश और भी है जैसे भारत के जनविवेक को जातीय आधार पर देखना। जनतंत्र के 73 वर्ष हो गए। अब जनता परिपक्व हो गई है। उसके जन विवेक को जात से जोड़कर अपना गुलाम या मजबूरी समझना हमारी नादानी हो सकती है, समझदारी नहीं। ‘जातीय’ मिथक तोड़ने का यह प्रयास निरंतर जारी रहना चाहिए। सब समाज को लिए साथ में बढ़ते जाना सिर्फ गीत नहीं है, इस भावना को संगठन में साकार करना चाहिए।
इस जनादेश में सन्देश है की ”दल से बड़ा देश” है। इस विचार से हटकर अन्य राजनैतिक दलों की स्थिति यह है कि सबसे पहले स्वयं फिर दल और उसके बाद देश। अधिकतर राजनैतिक दल तो सिर्फ परिवार चलाने के लिए पार्टी चलाते है। इस जनादेश ने साफतौर पर सन्देश दिया है कि अपवाद स्वरुप परिवारवाद या वंशवाद ठीक है, पर इसी भाव पर आधारित राजनैतिक दलों को जनता ने धराशाही कर दिया। इस चुनाव में ऐसा कई जगह देखने को मिला।
जनादेश 2019 में एक और बड़ा सन्देश है की यदि आप जनप्रतिनिधि है तो आप पर जनता का हक़ है। आपको न्यूज़ चैनलों की तरह ‘चौबीस घंटे’ दिखना पडेगा। चैनलों को तो दिखना पड़ता है, पर अब राजनैतिक तौर पर निर्वाचित जनप्रतिनिधि को दिखने के साथ-साथ काम भी करते रहना होगा।
इस जनादेश में एक और सन्देश कि आप विरोध के लिए विरोध न करें। विरोध सार्थक – समर्थ और तथ्यों के साथ साथ जनता के विवेक को स्वीकार भी होना चाहिए। अनर्गल आरोपों से नेता और उसके राजनैतिक दल का ही बुरा हश्र होता है। पुलवामा के बाद बालाकोट की घटना को देश ने सराहा, पर विपक्षी दलों ने मजाक उड़ाया। विपक्ष की इसको लेकर बड़ी आलोचना हुई । भारतीय राजनीति में मतभेद सदैव रहेंगे, पर उसकी मर्यादाएं और मानदंड को कभी नहीं भूलना चाहिए।
एक और महत्वपूर्ण सन्देश है इस जनादेश में। इसे सभी राजनैतिक दलों को खासकर विरोधी दलों को समझना चाहिए। जैसे देश में होते हुए विकास और दिखते हुए काम की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। विपक्षी दलों ने आंखे होते हुए भी इन मसलों पर अंधे होने का प्रमाण दिया। आप दो आंखों से जनता को देखना चाहते हो, पर आप यह भूल जाते हो कि जनता हजारों आंखों से आपके हर कार्य को देखती है।अतः विरोध विचारों का होना चाहिए न की देश में हो रहे विकास का। विपक्षी दल विकास का विरोध करती रही अतः उनका स्वयं का विकास रुक गया और साथ ही उनकी सोच भी थम गयी।
जनादेश में सन्देश यह भी है कि धर्म निरपेक्षता के नाम पर अब मतदाता को, आम नागरिक को गुमराह नहीं किया जा सकता |
इस जनादेश में एक बहुत ही गहरा सन्देश है, जिसे सभी दलों को गौर से समझना चाहिए। आज भारतीय राजनीति में नए लोगों को दल से जोड़ना। पीढ़ियों में परिवर्तन। अनुभव और ऊर्जा का समन्वय। प्रतिमा की रक्षा और अमर्यादितों को पलायन पर मजबूर करना । आज भाजपा को छोड़कर किसी राजनैतिक दल ने इस तरह का साहस नहीं दिखाया।
सन् 2019 के जनादेश में जो सबसे महत्वपूर्ण सन्देश दिया है, कि देश उसे पसंद करता है जो देश हित में साहसिक निर्णय लेते हैं न कि केवल दल हित में। मोदी सरकार के साहस को लोगों ने वोट की नजरों से नहीं देखा। देश ने मोदी सरकार के साहसिक निर्णयों को देश हित में देखा। जबकि सभी विपक्षी दलों ने उन साहसी निर्णयों को वोटों की नजरों से देखा। अब यहां समझ में आता है कि जिस साहसिक निर्णय को जनता ख़ुशी से स्वीकार करती है, उस निर्णय के विरुद्ध विपक्षी दल विरोध जताकर क्या जनता के मन के विरुद्ध नहीं जा रहे ? यह बाट तो स्पष्ट हो गयी है की जनता साहसिक निर्णय वाली सरकार चाहती है । इस जनादेश में सन्देश तो बहुत है पर एक अंतिम और महत्वपूर्ण सन्देश है कि संविधान संसद, सरहद और सुरक्षाके साथ-साथ उपलब्ध लोगों में देश किनके हाथों में सुरक्षित है। इन अहम् मसलों पर लोग जब विचार करते हैं तो उनकी आंखों से सभी नेताओं के चेहरे चलचित्र की तरह सामने आते है। ऐसा होने पर लोग उसी की ओर जिन पर उनका अटूट विश्वास होता है। जन- जन का विश्वास जीतने के लिए विश्वास पूर्ण कार्य भी करना पड़ता है। नरेंद्र मोदी इस मसले पर सबसे अव्वल रहे। उन्हें इसका दोहरा ईनाम मिला। एक यह की उनपर जनता में अटूट विश्वास था और अमित शाह ने उस अटूट जनविश्वास को जन-जन तक बड़ी ताकत से संगठन के माध्यम से घर घर ले गए। इस जनादेश का मेरी नजरों में एक महत्वपूर्ण सन्देश जिसे मै मानता हूं, वह यह है कि अपने दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं को सम्मान देना। दल का श्रृंगार होता है दल का कार्यकर्ता। जिस दल को उनके कार्यकताओं का विश्वास नहीं वह दल जनता में कैसे विश्वास हांसिल कर सकता है। आज भारतीय राजनीति और राजनैतिक दलों में इसकी महती आवश्यकता होनी चाहिए। कार्यकर्ता राजनैतिक दलों और जनता के बीच सेतु का कार्य करता है। इस जनादेश में सन्देश तो बहुत है क्रमश ! राजनैतिक दल ईमानदारी से समझने का प्रयत्न कर लें । (लेखक- भाजपा नेता एवं राज्यसभा सांसद हैं)

प्रथम आम चुनाव और जवाहरलाल नेहरू
एल एस हरदेनिया
(पुण्यतिथि के अवसर पर विशेष ) चुनाव समाप्त हो चुके हैं और नतीजे आ गए हैं। नतीजों से यह सिद्ध हो गया है कि हमारे देश में संसदीय प्रजातंत्र की नींव काफी मजबूत है। इस नींव को डालने में महान स्वतंत्रता सेनानी, चिंतक, लेखक एवं प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की महती भूमिका रही है। आज उनकी पुण्यतिथि (27 मई) के अवसर पर हम उनके योगदान को याद करें और इतिहास के उन पन्नों को पलटें जब जद्दोजहद के बीच प्रथम चुनाव हुआ था। उस चुनाव के दौरान नेहरूजी ने पूरे देश का सघन भ्रमण किया था और सैंकड़ों जनसभाओं को संबोधित किया था।
नेहरूजी ने लोकतंत्र की मजबूत नींव डालने के लिए जो अनेक निर्णय लिए उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण था वह निर्णय जिसके अंतर्गत उन्होंने हर वयस्क भारतीय, अर्थात जिसकी आयु 21 वर्ष अथवा उससे अधिक हो, को मताधिकार दिया। यह अधिकार इस तथ्य के बावजूद दिया गया कि उस समय 90 प्रतिशत भारतीय निरक्षर थे।
इस निर्णय से सारी दुनिया भौचक्की हो गई थी। यह शंका प्रकट की गई थी कि निरक्षर अपने मताधिकार का प्रयोग ठीक से नहीं कर पाएंगे। वे न तो उम्मीदवार का नाम पढ़ सकेंगे और ना ही उसकी पार्टी का।
हमारे देश में भी अनेक व्यक्तियों और संगठनों ने ऐसी शंका प्रकट की थी। ऐसी शंका व्यक्त करने वाले संगठनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी शामिल था। संघ ने अपने मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ में लिखा कि ‘‘नेहरू स्वयं इस निर्णय की असफलता के प्रत्यक्षदर्शी होंगे। नेहरू की आदत है नारों व सपनों के सहारे जिंदा रहने की। इसलिए वे किसी की नहीं सुनते हैं और अपनी जिद के चलते अव्यवहारिक फैसले लेते हैं।‘‘
चौतरफा विरोध के चलते नेहरू स्वयं चिंतित एवं आशंकित हुए किंतु अंततः अपने निर्णय पर कायम रहे। उन्होंनें चुनाव की तैयारी करने की जिम्मेदारी वरिष्ठ आईसीएस अधिकारी सुकुमार सेन को सौंपी। चुनावों का संचालन करने के लिए चुनाव आयोग का गठन किया गया और सेन को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। नेहरू चाहते थे कि चुनाव जल्द से जल्द हों।
चुनाव संपन्न कराना एक अत्यधिक चुनौतीपूर्ण कार्य था। उस समय (सन् 1950 में) 21 वर्ष या उससे अधिक आयु के भारतीयों की संख्या लगभग 17 करोड़ थी। इनमें से लगभग 85 प्रतिशत पूर्णतः निरक्षर थे। उस दौरान एक अमरीकी विद्वान ने शंका प्रकट की थी कि चुनाव संपन्न कराना लगभग असंभव होगा। यह तय किया गया कि 500 प्रतिनिधि लोकसभा के लिए और लगभग चार हजार प्रतिनिधि राज्यों की विधानसभाओं के लिए चुने जाएंगे। मतदान के लिए 2,24,000 मतदान केन्द्र बनाए गए। इन मतदान केन्द्रों के लिए लोहे की 20 लाख मतपेटियों की जरूरत थी। इन पेटियों को बनाने के लिए 8,200 टन इस्पात की आवश्यकता थी। मतपत्र बनाने के लिए कागज की 3 लाख 80 हजार रीमों की जरूरत थी। मतदान केन्द्रों पर 56,000 प्रेसाईडिंग अधिकारियों व इनकी सहायता के लिए दो लाख अस्सी हजार क्लर्कों को भर्ती किया गया। निर्वाचन सुरक्षित ढ़ंग से संपन्न हों इसके लिए 2 लाख 24 हजार पुलिस जवानों की आवश्यकता थी।
चुनाव की तैयारियां पूरी होते ही जवाहरलाल नेहरू चुनाव प्रचार के लिए निकल पड़े। चुनाव प्रचार की यात्राएं हवाई जहाज, कार, ट्रेन, नाव और कहीं-कहीं बैलगाड़ी और घोड़े पर सवार होकर की गईं। एक मोटे अंदाज के अनुसार नौ सप्ताहों में नेहरू ने 25 हजार मील की यात्रा की। नेहरूजी की पहली चुनावी सभा 30 सितंबर 1951 को पंजाब के लुधियाना शहर में हुई। इस जनसभा में नेहरू ने साम्प्रदायिक संगठनों पर जोरदार हमला बोला और चेतावनी दी कि जिस दिन ये साम्प्रदायिक ताकतें देश की सत्ता पर काबिज हो जाएंगी और अपने उद्देश्यों में सफल हो जाएंगी उस दिन पूरे देश में हाहाकार मच जाएगा और देश की एकता छिन्न-भिन्न हो जाएगी। आज जब हम देखते है लोगों में राजनीतिक असहिष्णुता इतनी बढ़ती जा रही है कि अब लोग आपसी रिश्तों का भी ख्याल नहीं रखते तब हमें लगता है कि नेहरूजी की यह आशंका सच साबित तो नहीं हो रही है। पांच लाख से ज्यादा श्रोताओं को संबोधित करते हुए नेहरू ने कहा कि अपने दिमाग की खिड़कियां खुली रखें और हर तरह के विचारों के झोंकों को प्रवेश दें।
नेहरूजी का दूसरा महत्वपूर्ण भाषण दिल्ली में हुआ। गांधीजी के जन्मदिन पर आयोजित इस जनसभा में नेहरू ने घोषणा की कि उनका लक्ष्य देश से छुआछूत और सामंतवाद को समाप्त करना है। इस अवसर पर भी नेहरू ने साम्प्रदायिकता पर जोरदार हमला किया। साम्प्रदायिकता को देश की एकता के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हुए उन्होंने कहा कि इसके विरूद्ध सामूहिक चेतना जागृत करना और उसे जड़-मूल से उखाड़ फेंकना आवश्यक है। उनके भाषण के दौरान बार-बार तालियां बजीं और उस समय तो तालियां लगातार काफी समय तक बजती रहीं जब उन्होंने अपनी आवाज ऊँची करते हुए कहा कि ‘‘यदि कोई व्यक्ति धर्म के नाम पर किसी पर हमला करता है तो ऐसे व्यक्ति और संगठन के विरूद्ध में अपनी अंतिम सांस तक लड़ूंगा – सरकार के मुखिया के रूप में और एक साधारण नागरिक की हैसियत से भी।‘‘
अपने चुनाव प्रचार के दौरान नेहरू लगभग प्रत्येक जनसभा में साम्प्रदायिकता के जहर के प्रति लोगों को आगाह करते थे। एक जनसभा में उन्होंने जातिवाद की भी सख्त शब्दों में भर्त्सना की। मध्यप्रदेश के बिलासपुर में उन्होंने वामपंथियों की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि समाजवादी समाज के निर्माण के लिए धैर्य की आवष्कता है।
एक सभा में उन्होंने कहा कि ‘‘प्रतिपक्षी भी शक्तिशाली और विद्वान व्यक्ति होना चाहिए। मेरी प्रबल इच्छा है कि डॉ. अंबेडकर, जयप्रकाश नारायण और जे. बी. कृपलानी जैसे लोग संसद में आएं। मैं ऐसे लोगों का सम्मान करता हूं।‘‘ उन्होंने इस बात पर दुःख प्रकट किया कि उन्हें राजनीतिक रूप से अपने समाजवादी मित्रों के खिलाफ चुनाव प्रचार करना पड़ रहा है।
उनके चुनाव प्रचार के संबंध में एक पत्रकार ने लिखा था कि वे इस दौरान सोये कम और भ्रमण ज्यादा किया। उन्होंने 300 सभाओं में लगभग दो करोड़ लोगों को संबोधित किया। इसके अतिरिक्त लाखों लोगों ने सड़क किनारे खड़े होकर उनके दर्शन किए। उनके श्रोताओं में मजदूर, किसान, महिलाएं, मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग के लोग शामिल थे।
इस बारे में उन्होंने एक पत्र में लिखा कि ‘‘मेरी सभाओं में लाखों लोग आते थे। मैं उनकी आंखो में झांकने का प्रयास करता था। मेरी बातों पर उनकी प्रतिक्रिया को समझने की कोशिश करता था। उनके बीच रहते हुए मुझे अपने देश के गौरवशाली अतीत के दृश्य याद आते थे। अतीत के साथ-साथ मुझे उनकी आंखों में भविष्य की चिंताएं और महत्वाकांक्षाएं नजर आती थीं। इनके बीच रहने में मुझे भारी आनंद आता था।‘‘
नेहरूजी के चुनाव प्रचार के बाद पूरे देश में चुनाव शांतिपूर्ण ढ़ंग से संपन्न हो गए। चुनाव की सफलता का संपूर्ण विश्व ने स्वागत किया। चुनाव के दौरान चेस्टर बाउल्स भारत में अमेरिका के राजदूत थे। उन्होंने चुनाव की सफलता पर शंका प्रकट की थी। उन्हें यह समझ में नहीं आता था कि निरक्षर मतदाता कैसे अपने जनप्रतिनिधि चुनेंगे। पर उनकी यह आशंका निर्मूल साबित हुई और उन्होंने अपनी भूल स्वीकारी।

अब विरोधी दल क्या करें ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
इस चुनाव के परिणाम आने के बाद देश के विरोधी दलों की हवा निकली हुई-सी क्यों लग रही है ? चुनाव के पहले वे एकजुट न हो सके तो चुनाव के बाद क्या वे एकजुट हो सकेंगे ? उन्हें हताशा और निराशा के गर्त्त में गिरने से बचना चाहिए। यदि वे भारतीय लोकतंत्र से सचमुच प्यार करते हैं तो उन्हें कमर कसकर फिर खड़े होना चाहिए। इस समय सारे विरोधी सांसदों की संख्या 200 के आस-पास है। सत्तारुढ़ भाजपा गठबंधन की संख्या 350 के आस-पास है। लेकिन जरा याद करें कि अकेली सत्तारुढ़ कांग्रेस के पास कभी 410 कभी 361 और कभी 352 सांसद भी रहे हैं। विपक्षी सांसदों की संख्या अब से भी बहुत कम रही है लेकिन उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। वे मानते थे कि मोटर कार जितने ज्यादा हाॅर्स पावर की हो, उसका ब्रेक भी उतना ही तगड़ा होना चाहिए लेकिन ब्रेक कार के एंजिन जितना बड़ा तो नहीं हो सकता। वह तो छोटा ही होगा। विपक्ष इस बार संख्या में थोड़ा छोटा है तो क्या हुआ ? उसकी जिम्मेदारी पहले से भी ज्यादा है। मुझे याद है कि 1962 और 1967 में संयुक्त सोश्यलिस्ट पार्टी के पांच-छह सांसद ही नेहरु और इंदिरा सरकार का दम फुलाने के लिए काफी होते थे। उनके सदन में पांव रखते ही प्रधानमंत्रियों के चेहरों की रंगत बदलने लगती थी। यह ठीक है कि सभी विपक्षी सांसद सत्ता-विरोधी नहीं होते। कुछ विपक्षी दल तो ऐसे हैं, जो अभी तक अलग-थलग बैठे थे, वे भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल हो जाएंगे लेकिन जो अब भी विरोध में हैं, उन्हें तुरंत अपनी एक बैठक बुलानी चाहिए और अपना एक ढीला-ढाला महासंघ खड़ा करना चाहिए। पहले जो महागठबंधन बनता उसका एकमात्र आधार सत्ता प्राप्ति होती लेकिन अब जो बने, उसका आधार एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम हो। ऐसा कार्यक्रम, जिसे लागू करवाने के लिए संसद में और उसके बाहर जबर्दस्त दबाव बनाया जाए। ऐसा कार्यक्रम बनवाने के लिए पहले तो खुद नेताओं को गंभीरतापूर्वक पढ़ाई-लिखाई करनी होगी और फिर विशेषज्ञों से सलाह-मश्विरा करना होगा। सरकार जहां भी गलती करती दिखे, उसकी जमकर खिंचाई करने की क्षमता विपक्ष में होनी चाहिए। सिर्फ आंख मारने और झप्पी मारने से काम नहीं चलेगा। यह कहना भी बेमतलब है कि भाजपा के साथ कांग्रेस की लड़ाई वैचारिक है। यदि यह वैचारिक होती तो कांग्रेस के नेताओं को मोदी की तरह नौटंकियां नहीं करनी पड़तीं। उन्होंने जनेऊधारी और पूजा-पाठी होने का नाटक क्यों किया ? अब प्रांतीय नेताओं को यह भी समझ में आ गया होगा कि जात और संप्रदाय की नावें उन्हें पार नहीं लगा सकतीं। अब देश के हर दल को जनता की समस्याओं के व्यावहारिक हल खोजने होंगे और उनकी हार-जीत के आधार वे ही बनेंगे। ये व्यावहारिक हल तात्कालिक और दूरगामी, दोनों होना चाहिए। भारतीय समाज में मूलभूत सुधार सिर्फ कानून के जरिए नहीं हो सकता। हमारे राजनीतिक दल सिर्फ सरकार बनाने में अपनी सारी शक्ति खर्च कर देते हैं। वोट और नोट ही उनके लिए ब्रह्म है। जन-सेवा और समाज सुधार तो उनके लिए सिर्फ माया है। वे गांधी की कांग्रेस, लोहिया की संसोपा, विनोबा के सर्वोदय और गोलवलकर के संघ की तरह जन-जागरण और जन-आंदोलन में भी रुचि लें, यह बहुत जरुरी है।

मोदी जीत –विपक्ष को सीख !
डॉक्टर अरविन्द जैन
प्रधान मंत्री मोदी जी को हार्दिक बधाई उनके कौशलीय विजय पर और विपक्ष की सफलता पर। एक बार की भूल क्षम्य होती हैं पर बारबार की गयी भूल अपराध के श्रेणी में मानी जाती हैं। जब सामने वाला शक्तिशाली ,सत्ताशीन हो और उसकी निरंतर कार्य क्षमता बढ़ रही हो उस समय यदि किसी को हराना हो तो उसके लिए एकता की आवश्यकता होती हैं। एकता के लिए सबसे पहली शर्त अपना अहम त्यागना जो की मानवीय गुणों के प्रतिकूल होने के बाद भी जरुरी होता हैं।
भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार द्वारा निरन्तर बाह्य मतभेद बनाये गए और वे निरंतर एक दूसरे के पूरक रहे ,यानी वे दिन के दो और रात के एक रहे जबकि विपक्ष एक के एक और रात में अलग लग रहे. सबसे पहली बात कांग्रेस का आचरण या उसके विरोध में जो भ्रष्टाचार के दाग लगे उन्हें उसने सक्षमता से सामना न करके बिखरे रहे। दूसरा उनके पास नेर्तृत्व का अभाव यानी दूसरी पंक्ति की तैयारी नहीं और पार्टी में व्यक्तिवाद होने से आतंरिक विखराव और आपसी मेल मिलाप का अभाव।
दूसरा अन्य पार्टियां जो की बहुत शक्तिशाली न होने के बाद भी किसी की अधीनता न स्वीकारना और अपना हम सर्वोपरि रखकर बिना आधार के अपने अपने तिलस्मी भवनों में रहकर स्वयं का राजा बनने का अहसास होना जिस कारण एकता न होना और जिसका फायदा सत्ता पार्टी को उठाना या सत्ता पार्टी के पिट्ठू रहना कारण सत्ता में न भी ए तो सत्ता से लाभ मिलता रहे.ऐसा क्या कारण हैं की आपसी मेल मिलाप किसी एक नेता के साथ न होना। इसका ही परिणाम हैं की सत्ता पार्टी ने फुट डालो की नीति का उपयोग कर लाभ उठाया चिड़िया चुग गयी खेत अब पस्ताये का होत।
अब कुछ दिन दुःख में बिताये और उसके बाद आत्मचिंतन और आत्मविश्लेषण करे और समझे। यदि इस विषय पर आगामी चुनाव की रणनीति तैयार करे तो ठीक हैं और जीतने वाली पार्टी अब और ज़ोरदार तरीके से आगामी चुनाव कीतैयारी करेगी। उससे लड़ने के लिए एकता के साथ मतभिन्नता दूर करना होंगी। मतभिन्नता होना जरुरी हैं पर मनभिन्नता नहीं होना चाहिए पर मन भिन्नता की खाई इतनी गहरी हैं की उस कारण आपस में मिलना कठिन लगता हैं जबकि होना नहीं चाहिए.
पार्टी ,प्रत्याशी के लिए चुनाव न लड़कर मोदी व्यक्ति के लिए चुनाव लड़े.चुनाव लड़ना और उसका प्रबंधन करना दोनों अलग अलग बात हैं पर इस बार दोनों का भरपूर उपयोग किया गया. इस बार चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने मुद्दों पर चुनाव न लड़कर व्यक्तिवाद पर चुनाव लड़ा। मोदी जी सुबह से रात तक अपना भाषण गाँधी नेहरू से शुरू कर अंत उसी पर करते थे,उन्होंने नौकरी ,बेरोजगारी ,किसान की समस्याओं पर कोई अपना दृष्टिकोण रखा और उन्होंने और पार्टी ने एक जुट होकर संघर्ष किया और उसका प्रतिफल उनकी विजय हुई जिसकी अपेक्षा नहीं थी पर मिली। अपने उद्बोधन में बहुत अच्छी बात कही की केंद्रीय चुनाव आयोग (केंचुआ ) की कार्यशैली से खुश हैं। अब पता नहीं तीसरे आयोग की क्या दशा होंगी ?स्वाभाविक हैं जो पालतू —होगा उसको मालिक के प्रति बफादार होना होगा. वे अब किसी से बदले की कार्यवाही नहीं करेंगे पर जो कानून के अंदर आएगा उसको बख्शा नहीं जायेगा ,हो सकता हैं की कांग्रेस पार्टी के नेताओं पर नियमानुसार कार्यवाही की जा सकती हैं।
विपक्ष यदिअपना भविष्य बनाना चाहे उसके लिए किसी एक को जो योग्य हो ,पप्पू न हो को अभी से अपना नेता मानकर उसकी रज़ामंदी से काम करेंगे तो भविष्य उज्जवल होगा अन्यथा भविष्य किसी को कोसते कोसते निकलेगा और प्रचंड बहुमत के कारण जो भी निर्णय लिए जायेंगे वो मान्य होंगे और आप फन मार कर कोसते रहेंगे। प्रजातंत्र में जनता का विश्वास जीतना सरल और कठिन दोनों हैं।
इस संसार में कोई भी किसी का न मित्र हैं और न शत्रु ,मेरे द्वारा किये गए कर्म ही मेरे मित्र हैं और मेरे शत्रु। दूसरी बात द्रव्य क्षेत्र काल भव भाव निम्मित और उपादान की अनुकूलता से सफलता मिलती हैं ,व्यक्ति का पुण्य पाप का ठाठ होने से सुख सफलता मिलती हैं।
नामोपलब्धिमात्रेण कार्यसिद्धिः किमिष्यते?— नाम की उपलब्धि मात्र से कार्य की सिद्धि नहीं होती।
अकालसाधनम शौर्य न फलाय प्रकल्पते !—-प्रतिकूल समय में प्रगट की हुई शूरता फलदायी नहीं होती।
बुद्धिनारग्रेसरी यस्य न निबरन्धः फलतयसौ!—-बुद्धिहीन प्रयत्न कभी सफल नहीं होता।
इस प्रकार सत्ता पक्ष और विपक्ष की बहुत बड़ी जिम्मेदारियां हैं उन्हें पूरा करेंगे क्योकि सत्ता उस पक्षी जैसा होता हैं जिसके दोनों पंख हो। एक पंख से वह उड़ नहीं सकता इसी प्रकार बिना विपक्ष के सत्ता निरकुंश हो जाती हैं और इसकी संभावना होती हैं। देश में प्रजातंत्र के कारण बिना खुनी हिंसा के सत्ता का हस्तांतरण हो जाता हैं।
नयी जीत के अवसर पर नयी उम्मीद रखते हैं और भविष्य शुभ हो यह कामना करते हैं।

हित साधक कैसे साबित होंगे राष्ट्रपति ट्रंप के फैसले
डॉ हिदायत अहमद खान
अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ लेने के साथ ही डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसे अनेक फैसले लिए, जिससे वो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बनते चले गए। इसके साथ ही जब उनके 100 दिन का कार्यकाल पूरा हुआ तो उन्होंने खुद भी कहा कि उनके सौ दिन का कार्यकाल अमेरिकी इतिहास में सबसे बेहतर है। इस प्रकार राष्ट्रपति के तौर पर ट्रंप ने अमेरिका समेत दुनिया को यह जतलाने का प्रयास किया कि उनका कार्यकाल पिछले राष्ट्रपतियों के कार्यकालों से बेहतर रहने वाला है, लेकिन शुरु से जिस तरह के फैसले उन्होंने लिए, उससे अमेरिका की मुसीबतें बढ़ती नजर आई हैं, जिस कारण वो अपने फैसलों को वापस लेते हुए भी नजर आए हैं। मौजूदा हालात पर नजर डालें तो मालूम चलता है कि अमेरिका अभी भी नीतिगत अनिश्चिंतता से उबर नहीं पाया है। इस कारण ट्रंप की लोकप्रियता का ग्राफ भी लगातार गिरता चला गया है। इससे पहले 2016 में जब राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा दिया था, तभी राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय नीतियों पर संशय के बादल छा गए थे। तब सवाल खड़े किए गए थे कि आखिर ट्रंप की मंशा क्या है? यहां ट्रंप ने सत्ता की कमान संभालने के पहले ही दिन अपने पहले एजुकेटिव आदेश में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के एफोरडेबल एक्ट का विखंडन कर दिया, जिससे संदेश गया कि पूर्व सरकारों के फैसलों को ट्रंप हटाने में देर नहीं लगाएंगे। इसके तीन दिन बाद ही बारह देशों के संगठन ट्रांस-पेसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) समझौते से अमेरिका को हटा लिया गया। इसके बाद और भी ऐसे अनेक फैसले सामने आते गए जिससे ट्रंप शासन लगातार विवादों में आता चला गया। यहां सात मुस्लिम बहुल देशों के नागरिकों पर प्रतिबंध लगाने के फैसले पर वो अपने ही घर में घिरते नजर आए थे। वहीं मैक्सिको-अमेरिका सीमा पर दीवार बनाने का फैसला, पूर्वी अफगानिस्तान में ‘मातृ-बम’ गिराए जाने का फैसला, उत्तर कोरिया को लेकर सख्त रुख और चीन पर दबाव बनाने वाला फैसला, एचवनबी वीजा पर पाबंदी ऐसे अनेक फैसले हैं, जिससे ट्रंप तो सुर्खियों में बने रहे लेकिन कहीं न कहीं अमेरिका और अमेरिकावासी पीछे होते चले गए। इन फैसलों ने अमेरिका को मुसीबत में डालने का काम भी किया। चूंकि ये फैसले ट्रंप के प्रारंभिक काल के रहे हैं, अत: कहा जाता रहा कि महज सौ दिन का समय किसी प्रशासन के बारे में ठोस आंकलन के लिए पर्याप्त समय नहीं है। अमेरिका की भलाई के लिए ट्रंप नीतियां बदलेंगे और बेहतर परिणाम देने वाले फैसले भी लेंगे, लेकिन अभी तक तो ऐसा कुछ होता हुआ दिखाई नहीं दिया। अब तो हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि सीरिया के बाद उत्तर कोरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, ईरान और चीन से भी दो-दो हाथ किए जाने जैसी बातें हो रही हैं। चीन से व्यापार को लेकर तनाव जारी है तो वहीं ईरान से युद्ध करने जैसे हालात पैदा कर दिए गए हैं। यह अलग बात है कि ट्रंप ने चारों ओर से खतरा बढ़ता देख जारी ट्रेड वॉर में कुछ नरमी के संकेत भी दे दिए हैं। दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने वाहनों के आयात पर टैरिफ में भारी वृद्धि के फैसले को आगामी छह माह के लिए टाल दिया है। वैसे इस छूट के पीछे की रणनीति यह भी है कि व्यापार में छूट की खातिर यूरोप और जापान पर बातचीत के लिए दबाव बनाया जा सके। बहरहाल इस फैसले से व्यापार युद्ध के बढ़ने की आशंका जरुर कम होती नजर आ रही है। गौरतलब है कि ट्रंप के फैसले के बाद वैश्विक स्तर पर ट्रेड वार शुरु हो जाने की आशंका ने जन्म ले लिया था। ट्रंप के फैसले से जापान और जर्मनी के साथ अमेरिकी रिश्तों पर भी खटास पड़ सकती थी। इस मामले से हटकर जब ईरान पर नजर दौड़ाते हैं तो पाते हैं कि यहां पर भी युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। असल में अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को धमकाते हुए ट्वीट किया है कि अमेरिकी हितों के खिलाफ कोई भी हमला होने पर भयावह परिणाम भुगतने होंगे। गौरतलब है कि पूर्व राष्ट्रपति ओबामा के कार्यकाल में ईरान के साथ ‘पी फाइव प्लस वन’ देशों, जर्मनी और यूरोपीय संघ की न्यूक्लियर डील पर सहमति बनी थी, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने इस डील से अमेरिका को हटा लिया और अमेरिका-ईरान परमाणु समझौते को अपने स्तर पर खत्म कर दिया। यही नहीं बल्कि इसके बाद तो ट्रंप ने ईरान पर फिर से कड़े प्रतिबंध लगा दिए। इसमें तेल निर्यात पर पाबंदी है, जिसके तहत भारत जैसे अनेक तेल आयातक देशों को ईरान से तेल नहीं लेने की चेतावनी दी गई है। इससे अमेरिका और ईरान के बीच अस्थिरता बढ़ती चली जा रही है। बावजूद इसके कहा जा रहा है कि अमेरिका अपनी नीतियों को लेकर स्पष्ट नहीं है, जबकि ईरान की इच्छा इस मामले को आगे ले जाने की लग रही है। इसे लेकर खाड़ी देशों में भी उथल-पुथल शुरु हो गई है। यह तेल की आग बहुत भयानक रुप ले सकती है, इसलिए इस मामले में बीच का रास्ता निकालना ही होगा। इसलिए राष्ट्रपति ट्रंप ने भले ही कहा हो कि उनके देश ने ईरान से बातचीत की कोई पेशकश नहीं की है, लेकिन उसे इसकी पहल करनी ही चाहिए। जहां तक ईरान का सवाल है तो उसकी स्थिति इस समय मरता क्या नहीं करता वाली हो गई है। ट्रंप भी इस बात को मानते हैं कि ईरान की अर्थव्यवस्था तबाह हो रही है, जो कि ईरान के लोगों के लिए वाकई दु:खद है। अब सवाल यही है कि यदि ईरान के आम नागरिकों के जान-माल की चिंता अमेरिका को है तो फिर वह यह क्योंकर धमकी दे रहा है कि यदि अमेरिकी हितों पर हमला किया गया तो उसे तबाह कर दिया जाएगा। मतलब साफ है कि ट्रंप ने अपने कार्यकाल में कहा कुछ और किया कुछ और है। उनके लिए कथित तौर पर अमेरिकी हित पहले हैं बाद में दुनिया के आमजन की बात आती है। इस समय ईरान जहां अमेरिका को माकूल जवाब देने की बात कह रहा है तो वहीं राष्ट्रपति ट्रंप उसे पूरी तरह बर्बाद कर देने की धमकी दे रहे हैं। इस युद्ध की आशंका के बीच यदि चीन और रुस समेत अन्य ईरान के समर्थक आगे आए और वो भी युद्ध की भाषा बोलने लगे तो यह दुनिया के लिए तबाही वाला मंजर होगा। इसलिए इसे टाला जाना चाहिए और कोशिश की जानी चाहिए कि जिस तरह से दूसरे मामलों में ट्रंप ने अपने कदम वापस लिए हैं, ठीक उसी तरह ईरान मामले में भी वह विचार करते हुए सही कदम उठाए।

पत्रकारिता का स्वरूप,विविध आयाम व महत्व
प्रो.शरद नारायण खरे
पत्रकारिता शब्द अंग्रेज़ी के “जर्नलिज़्म”का हिंदी रूपांतर है। शब्दार्थ की दृष्टि से “जर्नलिज्म” शब्द ‘जर्नल’ से निर्मित है और इसका आशय है ‘दैनिक’। अर्थात जिसमें दैनिक कार्यों व सरकारी बैठकों का विवरण हो। आज जर्णल शब्द ‘मैगजीन’ का द्योतक हो चला है। यानी, दैनिक, दैनिक समाचार-पत्र या दूसरे प्रकाशन, कोई सर्वाधिक प्रकाशन जिसमें किसी विशिष्ट क्षेत्र के समाचार हो। पत्रकारिता लोकतंत्र का अविभाज्य अंग है। प्रतिपल परिवर्तित होनेवाले जीवन और जगत का दर्शन पत्रकारिता द्वारा ही संभंव है। परिस्थितियों के अध्ययन, चिंतन-मनन और आत्माभिव्यक्ति की प्रवृत्ति और दूसरों का कल्याण अर्थात् लोकमंगल की भावना ने ही पत्रकारिता को जन्म दिया है।
सी. जी. मूलर ने बिल्कुल सही कहा है कि- सामायिक ज्ञान का व्यवसाय ही पत्रकारिता है। इसमें तथ्यों की प्राप्ति उनका मूल्यांकन एवं ठीक-ठाक प्रस्तुतीकरण होता है।’
डॉ॰ अर्जुन तिवारी के कथानानुसार- ज्ञान और विचारों को समीक्षात्मक टिप्पणियों के साथ शब्द, ध्वनि तथा चित्रों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाना ही पत्रकारिता है। यह वह विद्या है जिसमें सभी प्रकार के पत्रकारों के कार्यो, कर्तव्यों और लक्ष्यों का विवेचन होता है। पत्रकारिता समय के साथ समाज की दिग्दर्शिका और नियामिका है।”श्री प्रेमनाथ चतुर्वेदी के अनुसार पत्रकारिता विशिष्ट देश, काल और परिस्थिति के आधार पर तथ्यों का, परोक्ष मूल्य का संदर्भ प्रस्तुत करती है।
टाइम्स पत्रिका के अनुसार- पत्रकारिता इधर-उधर उधर से एकत्रित, सूचनाओं का केंद्र, जो सही दृष्टि से संदेश भेजने का काम करता है, जिससे घटनाओं का सहीपन को देखा जाता है।
डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र के अनुसार- पत्रकारिता वह विद्या है जिसमें पत्रकारों के कार्यों, कर्तव्यों, और उद्देश्यों का विवेचन किया जाता है। जो अपने युग और अपने संबंध में लिखा जाए वह पत्रकारिता है।
डॉ भुवन सुराणा के अनुसार- पत्रकारिता वह धर्म है जिसका संबंध पत्रकार के उस धर्म से है जिसमें वह तत्कालिक घटनाओं और समस्याओं का अधिक सही और निष्पक्ष विवरण पाठक के समक्ष प्रस्तुत करता है।
उपरोक्त परिभाषाएं के आधार पर हम कह सकते हैं कि पत्रकारिता जनता को समसामयिक घटनाएं वस्तुनिष्ठ तथा निष्पक्ष रुप से उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण कार्य है।सत्य की आधार शीला पर पत्रकारिता का कार्य आधारित होता है तथा जनकल्याण की भावना से जुड़कर पत्रकारिता सामाजिक परिवर्तन का साधन बन जाता है।
पत्रकारिता का स्वरूप व विशेषताएं
सामाजिक सरोकारों तथा सार्वजनिक हित से जुड़कर ही पत्रकारिता सार्थक बनती है। सामाजिक सरोकारों को व्यवस्था की दहलीज तक पहुँचाने और प्रशासन की जनहितकारी नीतियों तथा योजनाओं को समाज के सबसे निचले तबके तक ले जाने के दायित्व का निर्वाह ही सार्थक पत्रकारिता है।
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा पाया (स्तम्भ) भी कहा जाता है। पत्रकारिता ने लोकतंत्र में यह महत्त्वपूर्ण स्थान अपने आप नहीं हासिल किया है बल्कि सामाजिक सरोकारों के प्रति पत्रकारिता के दायित्वों के महत्त्व को देखते हुए समाज ने ही दर्जा दिया है। कोई भी लोकतंत्र तभी सशक्त है जब पत्रकारिता सामाजिक सरोकारों के प्रति अपनी सार्थक भूमिका निभाती रहे। सार्थक पत्रकारिता का उद्देश्य ही यह होना चाहिए कि वह प्रशासन और समाज के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी की भूमिका अपनाये।
पत्रकारिता के इतिहास पर नजर लडालें तो स्वतंत्रता के पूर्व पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य स्वतंत्रता प्राप्ति का लक्ष्य था। स्वतंत्रता के लिए चले आंदोलन और स्वाधीनता संग्राम में पत्रकारिता ने अहम और सार्थक भूमिका निभाई। उस दौर में पत्रकारिता ने पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोने के साथ-साथ पूरे समाज को स्वाधीनता की प्राप्ति के लक्ष्य से जोड़े रखा।
इंटरनेट और सूचना के आधिकार (आर.टी.आई.) ने आज की पत्रकारिता को बहुआयामी और अनंत बना दिया है। आज कोई भी जानकारी पलक झपकते उपलब्ध की और कराई जा सकती है। मीडिया आज काफी सशक्त, स्वतंत्र और प्रभावकारी हो गया है। पत्रकारिता की पहुँच और आभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का व्यापक इस्तेमाल आमतौर पर सामाजिक सरोकारों और भलाई से ही जुड़ा है, किंतु कभी कभार इसका दुरपयोग भी होने लगा है।
संचार क्रांति तथा सूचना के आधिकार के अलावा आर्थिक उदारीकरण ने पत्रकारिता के चेहरे को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। विज्ञापनों से होनेवाली अथाह कमाई ने पत्रकारिता को काफी हद्द तक व्यावसायिक बना दिया है। मीडिया का लक्ष्य आज आधिक से आधिक कमाई का हो चला है। मीडिया के इसी व्यावसायिक दृष्टिकोन का नतीजा है कि उसका ध्यान सामाजिक सरोकारों से कहीं भटक गया है। मुद्दों पर आधारित पत्रकारिता के बजाय आज इन्फोटेमेंट ही मीडिया की सुर्खियों में रहता है।
इंटरनेट की व्यापकता और उस तक सार्वजनिक पहुँच के कारण उसका दुष्प्रयोग भी होने लगा है। इंटरनेट के उपयोगकर्ता निजी भड़ास निकालने और अतंर्गततथा आपत्तिजनक प्रलाप करने के लिए इस उपयोगी साधन का गलत इस्तेमाल करने लगे हैं। यही कारण है कि यदा-कदा मीडिया के इन बहुपयोगी साधनों पर अंकुश लगाने की बहस भी छिड़ जाती है। गनीमत है कि यह बहस सुझावों और शिकायतों तक ही सीमित रहती है। उस पर अमल की नौबत नहीं आने पाती। लोकतंत्र के हित में यही है कि जहाँ तक हो सके पत्रकारिता हो स्वतंत्र और निर्बाध रहने दिया जाए, और पत्रकारिता का अपना हित इसमें है कि वह आभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग समाज और सामाजिक सरोकारोंके प्रति अपने दायित्वों के ईमानदार निवर्हन के लिए करती रहे।
मनुष्य स्वभाव से ही जिज्ञासु होता है। उसे वह सब जानना अच्छा लगता है जो सार्वजनिक नहीं हो अथवा जिसे छिपाने की कोशिश की जा रही हो। मनुष्य यदि पत्रकार हो तो उसकी यही कोशिश रहती है कि वह ऐसी गूढ़ बातें या सच उजागर करे जो रहस्य की गहराइयों में कैद हो। सच की तह तक जाकर उसे सतह पर लाने या उजागर करने को ही हम अन्वेषी या खोजी पत्रकारिता कहते हैं।
खोजी पत्रकारिता एक तरह से जासूसी का ही दूसरा रूप है जिसमें जोखिम भी बहुत है। यह सामान्य पत्रकारिता से कई मायनों में अलग और आधिक श्रमसाध्य है। इसमें एक-एक तथ्य और कड़ियों को एक दूसरे से जोड़ना होता है तब कहीं जाकर वांछित लक्ष्य की प्राप्ति होती है। कई बार तो पत्रकारों द्वारा की गई कड़ी मेहनत और खोज को बीच में ही छोड़ देना पड़ता है, क्योंकि आगे के रास्ते बंद हो चुके होते हैं। पत्रकारिता से जुड़ी पुरानी घटनाओं पर नजर दौड़ायें तो माई लाई कोड, वाटरगेट कांड, जैक एंडर्सन का पेंटागन पेपर्स जैसे अंतरराष्ट्रीय कांड तथा अन्य राष्ट्रीय घोटाले खोजी पत्रकारिता के चर्चित उदाहरण हैं। ये घटनायें खोजी पत्रकारिता के उस दौर की हैं जब संचार क्रांति, इंटरनेट या सूचना का आधिकार (आर.टी.आई) जैसे प्रभावशाली अस्त्र पत्रकारों के पास नहीं थे। इन प्रभावशाली हथियारों के अस्तित्व में आने के बाद तो घोटाले उजागर होने का जैसे एक दौर हीशुरु हो गया। जाने-माने पत्रकार जुलियन असांज के ‘विकीलिक्स’ ने तो ऐसे-ऐसे रहस्योद्घाटन किये जिनसे कई देशों की सरकारें तक हिल गई।
इंटरनेट और सूचना के आधिकार ने पत्रकारों और पत्रकारिता की धार को अत्यंत पैना बना दिया लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि पत्रकारिता की आड़ में इन हथियारों का इस्तेमाल ’ब्लैकमेलिंग’ जैसे गलत उद्देश्य के लिए भी होने लगा है। समय-समय पर हुये कुछ ’स्टिंग ऑपरेशन’ और कई बहुचर्चित सी. डी. कांड इसके उदाहरण हैं।
पर पत्रकारिता मर्यादाओं के घेरे में होना चाहिए। खोजी पत्रकारिता साहसिक तक तो ठीक है, लेकिन इसका दुस्साहस न तो पत्रकारिता के हित में है और न ही समाज के।सदैव स्वस्थ सकारात्मक पत्रकारिता ही जनहितैषी सिध्द होती है।

एक्जिट पोलः अंदाजी घोड़े
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
एक्जिट पोल की खबरों ने विपक्षी दलों का दिल बैठा दिया है। एकाध को छोड़कर सभी कह रहे हैं कि दुबारा मोदी सरकार बनेगी। विपक्षी नेता अब या तो मौनी बाबा बन गए हैं या हकला रहे हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि वे अगले तीन-चार दिन कैसे काटें। लेकिन भाजपा गदगद है। यदि एक्जिट पोल की भविष्यवाणियां सत्य सिद्ध हो गईं तो जैसा कि मैंने कल कहा था, भारत में एक मजबूत और स्थिर सरकार अगले पांच साल के लिए आ जाएगी लेकिन यह तो 23 मई को ही पता चलेगा। अभी तो हमें यह भी जानना चाहिए कि ये एक्जिट पोल कितने पोले होते हैं या हो सकते हैं। चुनाव परिणाम के पहले दौड़ाए गए ये अंदाजी घोड़े कई बार मुंह के बल गिरे हैं। देश ने यह खेल 1971 और 1977 में भी देखा था और 2004 में अटलजी ने और 2009 में मनमोहनसिंह को भी उल्टे परिणामों ने भी यही खेल दिखाया था। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप, इस्राइल में नेतन्याहू और अभी-अभी आस्ट्रेलिया में भी यही हुआ है। अपना वोट डालने के बाद जो वोटर बाहर आता है कि वह किसी अनजान आदमी को अपने गुप्त मतदान की सही जानकारी दे, यह जरुरी नहीं है। यदि देश के 90 करोड़ मतदाताओं में से आठ-नौ लाख से बात करके अपने नतीजों का आप ढोल पीटने लगते हैं तो आपको कहां तक सही माना जा सकता है ? एक प्रतिशत की राय को 100 प्रतिशत की राय कैसे मान सकते हैं ? मतदाता मनुष्य है, चना या चावल नहीं। हंडिया का एक चावल पका हो तो हम मानकर चलते हैं कि सभी चावल पक गए हैं लेकिन आदमी तो चावल नहीं है। जड़ नहीं है, निर्जीव वस्तु नहीं है। हर आदमी का अपना अंतःकरण है, अपनी बुद्धि है, अपनी पसंदगी और नापसंदगी होती है। इसके अलावा एक्जिट पोल करनेवाले लोगों को आप बेहद ईमानदार और निष्पक्ष मान लें तो भी उनका अपना रुझान तो होता ही है। जब ठोस तथ्य सामने न हों और आपके अंदाजी घोड़े दौड़ने हों तो वह रुझान आपके नतीजों पर हावी हो सकता है। इसीलिए कोई जिसे 350 सीटें देता है, उसे कोई और 150 में ही निपटा देता है। ऐसी स्थिति में एक्जिट पोल के नतीजों को दिल से लगा बैठना ठीक नहीं है। बहुत सुखी और बहुत दुखी होना ठीक नहीं है। फिर भी एक्जिट पोल और चुनाव के पहले होनेवाले सर्वेक्षणों को आप एकदम अछूत भी घोषित नहीं कर सकते हैं। यह एक अनिवार्य मानवीय कमजोरी है। अब से चालीस-पचास साल पहले, जब कोई गर्भवती महिला प्रसूति-घर में जाती थी तो लोग डाॅक्टरों से पूछते थे कि लड़का होगा या लड़की ? मतदान के बारे में यह रहस्य हमेशा बना रहेगा, क्योंकि उसका गुप्त रहना बेहद जरुरी है। चुनाव के पहले तरह-तरह की दर्जनों भविष्यवाणियां होती हैं। कई बार तीर फिसल जाता है और तुक्का निशाने पर बैठ जाता है।

गरीबी हटाओ महज एक राजनैतिक नारा
अजित वर्मा
नितिन गड़करी देश के ऐसे केन्द्रीय मंत्री हैं जो अपनी बात बेवॉकी से करते हैं। गड़करी कहते हैं कि देश में गरीबी हटाने के लिये कभी भी गंभीरतापूर्वक प्रयास नहीं किये गये। वे कहते हैं कि गरीबी हटाओ महज एक राजनैतिक नारा बनकर रह गया है। गड़करी का मानना है कि आर्थिक नीतियों के आधार पर भविष्य के निर्णय होते हैं। दुर्भाग्य से इस चुनाव में जिन विषयों पर जो चर्चा होनी चाहिए थी, वह नहीं हो पा रही है। देश में आजादी के बाद कई विचारधाराएं आई और गईं, लेकिन समाज के अंतिम व्यक्ति को लेकर कोई आर्थिक चिंतन नहीं हुआ। जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, मनमोहन सिंह तक सभी ने गरीबी हटाओं की बात की और अब राहुल गांधी भी यही बात कह रहे हैं। अगर इतने समय के बाद भी कांग्रेस यहीं बात दोहरा रही है तो अब तक उन्होंने सत्ता में रहते हुए क्या किया?
श्री गडकरी बताते हैं कि हमारे आर्थिक चिंतन का केंद्र पं. दीनदयाल उपाध्याय का दिया हुआ एकात्म मानववाद है। हमारी योजनाएं अंत्योदय पर केंद्रित हैं। समाज के सबसे पिछड़े व्यक्ति दरिद्रनारायण को भगवान मानकर सेवा करना हमारा लक्ष्य है। अंत्योदय हमारा सामाजिक और आर्थिक चिंतन है। उन्होंने कहा कि इस चिंतन के आधार पर ही सरकार हर वर्ग तक पहुंचने का काम कर रही है।
श्री गडकरी ने एक बड़ी महत्वपूर्ण बात भी कही कि जिसका राजा व्यापारी होता है, उसकी जनता भिखारी होती है। सरकार का काम होटल और उद्योग चलाना नहीं, सरकार का काम नीति निर्धारक का होता है और इसलिए मोदी सरकार ‘िमनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ पर काम कर रही है। अच्छी लीडरशिप, अच्छी सरकार सबकुछ कर सकती है। बशर्त है, जनता की उसमे भागीदारी हो। गड़करी दावा करते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसे अनेक प्रकल्प और अभियान चलाकर जनता की उनमें भागीदारी सुनिश्चित की है। भारतीय जनता पार्टी की पॉलिसी रही है कि जनता को भय, भूख, भ्रष्टाचार और आतंक मुक्त वातावरण दें, इस दिशा में मोदी सरकार ने काफी हद तक सफलता हासिल की है।

अब कमान राष्ट्रपति के हाथों
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
यदि इस 2019 के चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिल जाए और एक स्थिर सरकार बन जाए तो भारतीय लोकतंत्र के लिए इससे बढ़िया बात तो कोई हो ही नहीं सकती। वह सरकार पिछले पांच साल की सरकार से बेहतर होगी, ऐसी आशा हम सभी कर सकते हैं। एक तो वह अपनी भयंकर भूलों से सबक लेगी। दूसरे, इस बार विपक्ष जरा मजबूत होगा। वह भी कान खींचने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। इस दूसरी अवधि में प्रचार मंत्रीजी प्रधानमंत्री बनने की पूरी कोशिश करेंगे। जहां तक विपक्षी दलों का सवाल है, उनके धुआंधार और आक्रामक प्रचार के बावजूद किसी दल ने ऐसा दावा करने की हिम्मत तक नहीं की है कि वह सरकार बना पाएगा। ऐसा दावा तो जाने दीजिए, किसी ने यह भी नहीं कहा है कि वह सबसे बड़ा दल बनकर उभरेगा। यदि सारे विरोधी दल मिलकर बहुमत में आ जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा। हो सकता है कि भाजपा को 200 के आस-पास सीटे मिलें और 2014 की तरह अपने दम पर सरकार बनाने में वह सफल न हो। ऐसे में क्या होगा ? ऐसे में भारतीय लोकतंत्र की कमान मोदी या राहुल या ममता या मायावती के हाथ में नहीं होगी। वह होगी, भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों में। जब किसी का भी स्पष्ट बहुमत नहीं होगा तो वे किसी को भी प्रधानमंत्री की शपथ दिला सकते हैं और उसे एक सप्ताह या एक मास का समय दे सकते हैं कि वह लोकसभा में अपना बहुमत सिद्ध करे। वे ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री की शपथ दिलवाना चाहेंगे, जो लोकसभा में अपना बहुमत सिद्ध कर सके और बाद में पांच साल तक सरकार चला सके। यह जरुरी नहीं है कि वह सबसे अधिक सीटें जीतनेवाली पार्टी के नेता को ही यह मौका दें। वे कह सकते हैं कि आप तो हारे हुए हैं, जनता द्वारा रद्द किए हुए हैं। आपको दुबारा मौका क्यों दूं ? बासी कढ़ी को चूल्हे पर फिर क्यों चढ़ाऊं ? उस पार्टी के नेता राजीव गांधी की तरह खुद ही प्रधानमंत्री की दौड़ से बाहर भी हो जा सकते हैं। ऐसे में उस पार्टी के किसी दूसरे नेता को मौका देने के बात भी राष्ट्रपति सोच सकते हैं। राष्ट्रपति कम सीटोंवाली किसी अन्य पार्टी के नेता को भी शपथ दिला सकते हैं और उससे सदन में शक्ति-परीक्षा करवा सकते हैं जैसे कि भाजपा के अटलबिहारी वाजपेयी को राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने मौका दिया था। तात्पर्य यह कि अस्पष्ट बहुमत की स्थिति में राष्ट्रपति का पद, जिसे ध्वजमात्र समझा जाता है, सबसे अधिक महत्वपूर्ण और शक्तिशाली बन जाता है। उनका स्वविवेक ही यह तय करेगा कि अगले पांच साल में भारत के लोकतंत्र की दशा और दिशा कैसी होगी ?

उत्तरप्रदेश को लेकर कांग्रेस के दीर्घकालीन हित
अजित वर्मा
दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तरप्रदेश से ही होकर जाता है यह एक मान्य तथ्य है। 80 लोकसभा वाले उत्तरप्रदेश की देश की सियासत में महत्वपूर्ण भूमिका भी है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस इस बार अकेले अपनी दम पर चुनाव लड़ी है। सपा-बसपा के गठबंधन में इस बार कांग्रेस को शामिल नहीं किया गया। कांग्रेस के लिये सिर्फ रायबरेली और अमेठी सीट गठबंधन ने छोड़ दी थी। कांग्रेस ने 2009 के चुनाव के आधार पर 21 सीटों की मांग की थी जो उसने जीती थीं। लेकिन कांग्रेस की यह मांग नहीं मानी गयी। अंतत: कांग्रेस ने अकेले अपनी दम पर ही लोकसभा का यूपी में चुनाव लड़ा है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता यू पी के प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया ने उत्तरप्रदेश में उनकी पार्टी के 2014 की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करने का भरोसा जताते हुए कहा कि पार्टी ने दीर्घकालीन हितों को ध्यान में रखकर राज्य में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। कांग्रेस महासचिव ने कहा कि राज्य में पार्टी को मजबूत करने की रणनीति है और परिणाम दिखाएंगे कि अपने दम पर चुनाव लड़ना सही फैसला था।
उत्तरप्रदेश (पश्चिम) के मामलों के लिए पार्टी प्रभारी सिंधिया ने कहा कि हमने इस बार उत्तरप्रदेश में अपने दम पर खड़े होने और राज्य में पार्टी को मजबूत करने का फैसला किया है। उत्तरप्रदेश में परिणाम के बाद आप देखेंगे कि पार्टी के दीर्घकालीन हित को दिमाग में रखकर यह संभवत: सही फैसला है। हम इस बार पूरे उत्तरप्रदेश में बेहतर काम करेंगे…मतदाताओं को फैसला करने दीजिए।‘क्या बसपा-सपा-रालोद महागठबंधन से कांग्रेस को उत्तरप्रदेश में नुकसान होगा, सिंधिया कहते हैं कि मुझे लगता है कि हर दल उस जगह आगे रहेगा जहां वह सबसे मजबूत है। इसलिए महागठबंधन से कांग्रेस की संभावनाओं को नुकसान पहुंचने या इसके विपरीत होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस पार्टी के पास सबसे मजबूत उम्मीदवार और सबसे मजबूत संगठन है।’ सिंधिया ने यह कहा कि राजनीति संभावनाओं की कला है। अंतत: राजनीति में कुछ भी संभव है और आपको डटे रहना होगा और प्रयास करना होगा। कभी-कभी प्रयास रंग लाते हैं, कभी-कभी ऐसा नहीं हो पाता।’ 23 मई को मतगणना के बाद क्या होगा, यह तब देखेंगे जब पता चलेगा कि ऊंट किस करवट बैठता है।
जब सिंधिया उत्तरप्रदेश में कांग्रेस के दीर्घकालीन हित की बात करते हैं तो इसे गंभीरता से समझना होगा। वास्तव में कांग्रेस उत्तरप्रदेश में प्राय: मारणासन्न है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी वह कुछ खास नहीं कर पायी। इसीलिये इस बार उत्तरप्रदेश में कांग्रेस को लोकसभा चुनाव के बहाने जीवनदान देने की कोशिश की गयी है। यह तो नतीजे से पता चलेगा कि कांग्रेस ने यूपी में क्या हासिल किया है। वास्तव में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की नजर यूपी में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव पर है। इसीलिए राहुल ने यूपी में कांग्रेस को खड़ा करने की जिम्मेदारी अपनी बहन प्रियंका गांधी और अपने अभिन्न ज्योतिरादित्य सिंधिया को इस बार सौंपी है। कांग्रेस की कोशिश रहेगी कि वह 2022 में उत्तरप्रदेश में अपनी सरकार बनाये और प्रियंका गांधी मुख्यमंत्री बनें। यही कांग्रेस का दीर्घकालीन हित यूपी में नजर आ रहा है।

मुसीबत में डालकर माफी मांगने का आशय
सात चरणों वाले लोकसभा चुनाव 2019 बिगड़े और स्तरहीन बयानों के लिए तो याद किए ही जाएंगे, इसके साथ ही महात्मा गांधी की हत्या के दोषी नाथूराम गोडसे को महात्मा और देशभक्त बताने जैसे विवादित बयान से शर्मसार होते हुए भी दिखेंगे। दरअसल महात्मा गांधी का अपमान देश का अपमान जैसा है और उनके हत्यारे को यूं महिमामंडित करना किसी बड़े गुनाह से कम नहीं है। इसलिए इन बयानों का राजनीति में बेजा असर भी देखने को मिलेगा। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि लोकसभा के अंतिम चरणों में ये बयान भाजपा की लुटिया डुबोने का काम करते नजर आएंगे। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को अपना प्रत्याशी बनाया, जो कि मालेगांव ब्लास्ट की आरोपी रहते हुए जमानत पर हैं। लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान गोडसे को लेकर कमल हासन ने जो कहा उससे संबधित सवाल साध्वी प्रज्ञा से किया गया, जिसके जवाब में उन्होंने कहा था कि ‘नाथूराम गोडसे देश भक्त थे, हैं और रहेंगे।’ इस बयान का वीडियो फुटेज सोशल मीडिया पर जैसे ही तेजी से वायरल होना शुरु हुआ मानों राजनीतिक गलियारे में हंगामा मच गया। इस बयान के कारण भाजपा बैकफुट पर जाती दिखी। लोगों ने कहना शुरु कर दिया कि महात्मा गांधी के हत्यारों के साथ खड़े होने वालों को आखिर देश की सत्ता कैसे सौंपी जा सकती है। तगड़ा राजनीतिक विरोध होता देख पार्टी ने इस घृणित और विवादित बयान से पल्ला झाड़ लिया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि यह पार्टी विचारधारा से हटकर की गई बात है और यह उनका अपना निजी बयान है, इससे पार्टी का कोई लेना-देना नहीं है। इस पर सवाल किया जा रहा है कि पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी बनाया है तो कुछ तो जिम्मेदारी बनती ही होगी। मतलब सफाई देने का काम अब पार्टी नेतृत्व करता दिखा, जबकि दूसरी तरफ साध्वी के समर्थन में पार्टी नेता और मंत्री भी सामने आते दिखे। केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने तो साध्वी का समर्थन करते हुए ट्विट पर एक के बाद एक पोस्ट कर मामले को मानों तूल देने का काम ही कर दिया। वहीं नलिन कटील ने भी बयान दे दिया। इन तमाम नेताओं के विवादास्पद बयानों को संज्ञान में लेते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि पार्टी की गरिमा और विचारधारा के विपरीत इन बयानों को पार्टी ने गंभीरता से लेकर तीनों बयानों को अनुशासन समिति को भेजने का निर्णय किया है। बहरहाल जब तक जांच होगी और फैसला आएगा, तब तक तो चुनाव मैदान में असर हो चुका होगा। वैसे भी कहा तो यही जाता है कि बंदूक से निकली गोली और जुबान से निकली बोली अपना असर तो छोड़कर ही दम लेती हैं। अत: विपक्ष के साथ ही साथ सामान्यजन ने भी इस तरह के बयानों पर तीखी प्रतिक्रियाएं देना शुरु कर दीं, जिससे लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण में भाजपा पूरी तरह से बैकफुट पर आ गई है। इसी बीच ट्विटर के जरिए साध्वी प्रज्ञा सिंह ने माफी मांगने का काम किया, जिसे लेकर कहा जाने लगा कि साध्वी को भी एहसास हो गया है कि उनसे बहुत बड़ी गलती हो गई है। इसलिए उन्होंने देश की जनता से माफी मांगते हुए कहा है कि उनका बयान पूरी तरह से गलत था और वो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का बहुत सम्मान करती हैं। इस माफी पर कहने को तो कहा जा सकता है कि पहली भूल होती तो माफ भी किया जा सकता था, लेकिन भाजपा में शामिल होने से लेकर महज एक माह में तीन-तीन बार अपने बयानों के जरिए पार्टी को शर्मशार कर देना कोई नादानी तो नहीं कही जा सकती है। मुंबई आतंकी हमले में शहीद हुए हेमंत करकरे के बारे में जो बोला उसे यहां दोहराना भी उचित नहीं लगता, इसी तरह राम मंदिर के बारे में उन्होंने जो कहा उससे विवाद खड़ा हुआ और अब तो हद ही हो गई कि सीधे महात्मा गांधी के हत्यारे को देशभक्त बतला दिया गया। यहां गौर करने वाली बात यह है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इस मामले में सफाई देनी पड़ गई, उन्होंने एक साक्षात्कार के दौरान कहा कि ‘गांधीजी और गोडसे के संबंध में जो भी बयान दिए गए, वे भयंकर खराब हैं, घृणा और आलोचना के लायक हैं, सभ्य समाज में यह सोच नहीं चल सकती है। इस तरह की बातें करने वालों को आगे सौ बार सोचना होगा। उन्होंने माफी मांग ली है, यह अलग बात है, लेकिन मैं अब मन से माफ नहीं कर पाऊंगा।’ अब जबकि प्रधानमंत्री मोदी खुद कह रहे हैं कि उन्हें वो मन से माफ नहीं कर पाएंगे तो फिर देश की जनता कैसे माफ करेगी, यह बड़ा विचारणीय प्रश्न हो गया है। इससे नुक्सान तो पार्टी को ही होने वाला है। वैसे गांधी विरोधी पोस्ट लिखे जाने पर मध्य प्रदेश के भाजपा प्रवक्ता अनिल सौमित्र को निलंबित किया जा चुका है तो कहा जा रहा है कि क्या साध्वी प्रज्ञा समेत अन्य नेताओं पर भी इसी तरह की कोई बड़ी कार्रवाई करते हुए उन्हें पार्टी से बेदखल किया जाएगा या नहीं, क्योंकि इससे कम में तो बात बनती नहीं दिख रही है। विपक्ष को तो मानों घर बैठे मुद्दा मिल गया है इसलिए वो भाजपा से माफी मांगने की बात कह रही है। गौरतलब है कि सौमित्र ने तो गांधीजी को पाकिस्तान का राष्ट्रपति बतलाने का काम किया था, जिसे संज्ञान में लेते हुए उन्हें निलंबित कर दिया गया। कुल मिलाकर राजनीतिक पार्टियों को भी समझना होगा कि जीत ही सब कुछ नहीं होती, जिसके लिए इस तरह के शॉर्टकट अपनाए जाएं, कि देश की बदनामी ही होने लग जाए। चुनाव के दौरान संयम और साहस के साथ ही साथ पार्टी को सिद्धांतों और विचारधारा पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए और हो सके तो देश के विकास और जनहित की बातों के अलावा कोई अन्य विवादित बयानों को जगह मिलनी ही नहीं चाहिए। तभी इस तरह के विवादित बयानों और देश की इज्जत के साथ खिलवाड़ करने वालों से छ़टकारा मिल सकता है।

सत्ता की धमक- डरा-सहमा चुनाव आयोग…..?
ओमप्रकाश मेहता
हमारे संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अनुसार देश में चुनावों के दौर में चुनाव आयोग सरकार से भी सर्वोपरी व शक्तिमान होता है, फिर मौजूदा लोकसभा चुनावों के समय आमतौर पर यह महसूस क्यों किया जा रहा है कि भारतीय चुनाव आयोग डरा-सहमा और सरकार के अधीन कार्यरत् है? इसी चुनाव आयोग का एक वह सुनहरा कार्यकाल था, जब टी.एन. शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त हुआ करते थे और प्रदेश के मुख्यमंत्रीगण उनकी अटैची उठाए नजर आते थे। किंतु आज तो स्थिति एकदम विपरीत है और चुनाव आयोग की नजर सत्तासीनों की भूकुटी पर रहती है जो उनके इशारे का इंतजार करती रहती है, क्या यह मौजूदा सरकार द्वारा संवैधानिक संगठनों पर कब्जे के प्रयासों का असर तो नहीं?
मौजूदा लोकसभा चुनावों को लेकर चुनाव आयोग शुरू से ही संदेह के घेरे में है, चुनाव आयोग ने जो लोकसभा के चुनावों के लिए करीब दो महीने लम्बा सात चरणों में मतदान का कार्यक्रम जारी किया, इसी फैसले को लेकर चुनाव आयोग पर कई तरह के आरोप लगाए गए, यहां तक कहा गया कि सत्तारूढ़ दल को राजनीतिक लाभ पहुंचाने और उसकी सुविधानुसार इतना लम्बा चुनाव कार्यक्रम जारी किया गया। चुनाव तिथियों की घोषणा के साथ ही आदर्श आचार संहिता लागू हो जाने से राज्य सरकारों के कई जनहितैषि कार्यक्रमों पर विराम लग गया और देश की जनता को सही समय पर सरकार की आर्थिक सहायताएँ नहीं मिल पाई।
फिर इसके बाद चुनाव आयोग पर यह गंभीर आरोप लगाए जाने लगे कि आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में आयोग निष्पक्ष नहीं है, सत्तारूढ़ दल प्रमुख व सरकार के नेतृत्व के खिलाफ पहुंचने वाली शिकायतों को नजर अंदाज करने का गंभीर आरोप चुनाव आयोग पर लगाया गया, जबकि प्रतिपक्ष का आरोप है कि प्रतिपक्षी दलों के लोगों के खिलाफ शिकायतें प्राप्त होने पर चुनाव आयोग तत्काल सक्रिय होकर कार्यवाही करता है, किंतु प्रधानमंत्री व भाजपाध्यक्ष की दर्जनों शिकायतें मिलने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं करता और जब सुप्रीम कोर्ट निर्देश देता है तब भी शिकायत निर्मूल घोषित कर देता है, चुनाव आयोग ने शिकायतें सही पाए जाने पर भी कोई सख्त कार्यवाही करने की अपेक्षा कुछ घण्टों के लिए प्रचार पर रोक ही लगाई।
आखिर चुनाव आयोग स्वयं गंभीर आरोपों के घेरे में क्यों आ रहा है? ताजे घटनाक्रम में पश्चिम बंगाल में हुई चुनावी हिंसा, आगजनी व ईश्वरचन्द्र विद्या सागर की प्रतिमा भंजन की घटनाओं में चुनाव आयोग ने सिर्फ सरकार के कुछ अफसरों को इधर से उधर कर दिया तथा पश्चिम बंगाल में मतदान पूर्व प्रचार बंद करने की अवधि में बीस घण्टें का फैरबदल कर दिया, भारत में अब तक हुए चुनावों के दौर में चुनाव आयोग ने अनुच्छेद-324 का उपयोग पहली बार किया, किंतु इस फैसले को लेकर भी वह फिर विवादों में आ गया, क्योंकि सार्वजनिक चुनाव प्रचार की सीमा सिर्फ बीस घण्टे पहले की गई अर्थात् नियमानुसार चुनाव प्रचार 17 मई को शाम 5ः00 बजे बंद होना था, उसके बजाए 16 मई को रात 10ः00 बजे सार्वजनिक प्रचार प्रतिबंधित किया गया, इस पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी व कांग्रेस का आरोप है कि 16 मई को प्रधानमंत्री जी की दो रैलियों के आयोजनों को दृष्टिगत रखते हुए चुनाव आयोग ने यह समयसीमा निर्धारित की, वर्ना चुनाव आयोग 15 मई की रात से ही यह प्रतिबंध लागू कर सकता था, साथ ही चुनाव आयोग पर एक गंभीर आरोप यह भी लगाया कि सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष के तीखे तैवरों व आरोपों के बाद चुनाव आयोग सक्रिय हुआ और ये फोरे कदम उठाए, जबकि तोड़फोड़, आगजनी व हिंसक कार्यवाही करने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं व उनके दलों के खिलाफ आयोग ने कोई सख्त कार्यवाही नहीं की?
इस तरह कुल मिलाकर भारतीय चुनाव आयोग जितना इस बार आरोपों के कटघरें में खड़ा नजर आया, उतना इससे पहले कभी नजर नहीं आया, शायद इसके पीछे दो ही कारण हो सकते है- या तो मुख्य चुनाव आयुक्त को अपने सुनहरे भविष्य की चिंता या फिर मौजूदा सरकार द्वारा संवैधानिक संगठनों को अपने कब्जें में करने का असर?

महाराष्ट्र का भीषण सूखा
डॉ हिदायत अहमद खान
इस अत्याधुनिक युग में भी सूखा जैसी विकट समस्या से लोग जूझ रहे हैं और सरकारें हैं कि हमने देखा, हम देख रहे हैं और हम देखेंगे जैसे रटे-रटाए जुमलों से काम चलाती नजर आ रही हैं। संकट को लेकर विपक्ष हमलावर होता है तो कह दिया जाता है कि आपने अपने कार्यकाल में क्या कर लिया था जो आज सवाल उठा रहे हैं। मतलब एक सोची-समझी रणनीति के तहत पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहता है और संकट का दौर भी निकल जाता है, मानों हर्र लगे न फिटकरी और रंग चोखा हो गया हो। मतलब मानसून दस्तक देता है और समझ लिया जाता है कि जल संकट समाप्त हो गया, जबकि अगले साल जल संकट की तस्वीर और डरावनी हो जाती है। अब ऐसा भी नहीं है कि शासन-प्रशासन कुछ नहीं करता, बल्कि जो योजनाएं बनाई जाती हैं उन्हें जमीनी स्तर पर फलीभूत करने का काम ईमानदारी के साथ नहीं ही किया जाता है। इस कारण समस्या विकराल रुप लेती चली जाती है। इन्हीं वजहों से महाराष्ट्र का जल संकट लगातार भयावह होता चला गया है। वैसे कहने को तो सरकार वही अच्छी मानी जाती है, जो आमजन की खातिर मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति बिना किसी संकट के मुहैया करा सके। अब जबकि बताया जा रहा है कि महाराष्ट्र में 47 साल में सबसे भीषण सूखा पड़ा है और इसकी जानकारी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार दे रहे हैं तो शर्म करने के अलावा कुछ बचता नहीं है। कहते हैं शरद पवार ने पहले तो मुख्यमंत्री को पत्र लिखा और उसके बाद खुद मुलाकात करने पहुंचे और भीषण अकाल की यथा स्थिति से उन्हें अवगत कराते हुए जरुरी कदम उठाने की अपील की। यहां सवाल यह उठता है कि हर साल जल संकट की स्थिति बद से बदतर होती चली जाती है, लेकिन जिम्मेदार क्या कु्छ कर रहे हैं और यह संकट आजादी के बाद से अब तक क्योंकर खत्म नहीं हो पा रहा है, इस पर उचित व ठोस कदम उठाए नहीं गए हैं। पहले जिस जमीन पर महज 30 से 40 फिट गहराई पर पानी आसानी से मिल जाता था अब वहां 400 फीट पर पानी बमुश्किल मिलता है। भू-जल स्तर लगातार गिरता चला गया है। उस पर वर्षा की कमी और जल स्रोतों का लगातार सूखते जाना ग्रामीण अंचलों के रहवासियों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है। बताया जाता है कि महाराष्ट्र में 1972 के बाद का यह सबसे भीषण अकाल है, जिसमें महाराष्ट्र के 21 हजार गांव सूखे की चपेट में हैं और 151 तहसीलों को सरकार सूखाग्रस्त घोषित कर चुकी है। संपूर्ण राज्य के बांधों में कुल 16 फीसदी पानी ही बचा है। मराठवाड़ा की स्थिति तो और भी भयावह होती जा रही है, क्योंकि यहां पांच प्रतिशत से भी कम पानी बचा है। मानसून आने में अभी करीब एक माह का समय शेष बताया जाता है, ऐसे में जल संकट और भी भयावह होने वाला है। कहने को तो सरकार ने पानी की वैकल्पिक व्यवस्था करने के इंतजाम कर दिए हैं। इनमें टैंकरों से सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पेयजल पहुंचाने के आदेश दिए गए हैं, लेकिन इससे क्या, क्योंकि जहां टैंकर पहुंचते भी हैं तो वो नाकाफी होते हैं, क्योंकि उनका रोटीन तो 20 से 25 दिन में एक बार ही आने का होता है। ऐसे हालात में पूरा गांव अपना काम धंधा छोड़कर यहां से वहां पानी की तलाश में भटकता फिरता है। समस्या के समाधान में सबसे बड़ी वजह जो अवरोधक बनती है वह राजनीतिक जुमलेबाजी ही है। वादों का पूरा नहीं करना। सत्ता हासिल करने के लिए बड़े-बड़े वादे करना और फिर कुर्सी में बैठते हुए सब कुछ भूल जाना। उन राजनीतिक पार्टियों और नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि चुनाव के समय में जनता से बड़े-बड़े वादे जो किए जाते हैं, उनका सही से पालन क्यों नहीं होता है। चुनाव के दौरान कहा जाता है कि हर छोटी बड़ी समस्या का समाधान तलाश लिया जाएगा और गांवों को चमन कर दिया जाएगा। किसी को मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भटकना नहीं पड़ेगा, लेकिन सरकार बनते ही तमाम वादों को भुला दिया जाता है और उन्हें जुमले करार दिए जाते हैं, ताकि सरकार की दहलीज पर कोई उनके किए वादों की याद दिलाने न पहुंचने पाए। एक तरह से आमजन के लिए सरकार के बंगलों और दफ्तरों के दरबाजे पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं और चंद अमीरजादों के बीच बैठकर सरकार-सरकार खेलने का जो खेल खेला जाता है उससे वो चंद अमीर ही फायदा उठा पाते हैं, जो हमेशा सरकार की नजरों के सामने रहते हैं। ऐसे हालात में महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्र के निवासी तेज आवाज में अपनी मांगों को रख भी नहीं सकते हैं, क्योंकि यदि अपनी बात ऊंची आवाज में रख दी तो सूखते गले की प्यास बुझाएंगे कैसे और नहीं कह पाए तो प्यासे मरना ही मरना है। इसलिए विपक्ष तो सरकार पर अकाल से निपटने में नाकाम रहने का आरोप लगा कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है, जबकि सरकार में बैठे लोग दिलासा देते नजर आते हैं कि आज नहीं तो कल हालात सुधर ही जाएंगे। मतलब सब रामभरोसे ही चलता दिखता है, इसलिए नाराज आमजन कहता दिखता है कि जब रामभरोसे ही रहना है तो फिर ये सरकारें आखिर किस काम की हैं और ये किसके प्रति जवाबदेही रखती हैं, क्योंकि अपनी सरकार बनाने वाला आमजन तो त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहा है। महाराष्ट्र के सूखे के हालात ये हैं कि यवतमाल जिले का आजंती गांव सूखे के कारण बदनाम हो चुका है और कोई अपनी लड़की की शादी इस गांव के लड़के से करने को तैयार नहीं होता है। पानी की कमी के चलते युवा अविवाहित हैं। इनकी अपनी घर बसाने और परिवार चलाने की समस्या है, लेकिन क्या किया जाए क्योंकि शासन-प्रशासन तो समस्या के समाधान मामले में निकम्मा जो साबित हो रहा है। फिलहाल प्रशासन ने ऐसे करीब आठ सौ गांवों को सूखाग्रस्त घोषित किया हुआ है, जहां वाकई अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इससे निपटने के लिए जरुरी हो गया है कि इन ग्रामीण अंचलों को ज्यादा से ज्यादा हरा-भरा बनाया जाए और ज्यादा से ज्यादा जल स्रोतों को उपलब्ध कराया जाए। इसके बगैर जल संकट का कोई समाधान नहीं है। वर्ना अभी तो जल के अभाव में किसान और ग्रामीणजन अपने मवेशियों को आधे दामों में बेंचने को मजबूर हुए हैं, कल के लिए उनकी अपनी जिंदगी भी दूभर हो जाएगी। वैसे भी अनेक ग्रामों के लोग शहर की ओर पलायन कर चुके हैं, जिस कारण गांवों के घरों में ताले लटके दिखाई दे रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि यह जल संकट अचानक तो आया नहीं है, फिर इससे बचने के उपाय पहले से क्यों नहीं किए गए हैं। यही वह सवाल है, जो सरकार के कामकाज पर सवालिया निशान लगाता है।

बौद्ध दर्शन में है जीवन का यथार्थ
प्रो.शरद नारायण खरे
(बुध्द पूर्णिमा 18मई पर विशेष) बौद्ध दर्शन से अभिप्राय उस दर्शन से है जो भगवान बुद्ध के निर्वाण के बाद बौद्ध धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों द्वारा विकसित किया गया और बाद में पूरे एशिया में उसका प्रसार हुआ। ‘दुःख से मुक्ति’ बौद्ध धर्म का सदा से मुख्य ध्येय रहा है। कर्म, ध्यान एवं प्रज्ञा इसके साधन रहे हैं।
बुद्ध के उपदेश तीन पिटकों में संकलित हैं। ये सुत्त पिटक, विनय पिटक और अभिधम्म पिटक कहलाते हैं। ये पिटक बौद्ध धर्म के आगम हैं। क्रियाशील सत्य की धारणा बौद्ध मत की मौलिक विशेषता है। उपनिषदों का ब्रह्म अचल और अपरिवर्तनशील है। बुद्ध के अनुसार परिवर्तन ही सत्य है। पश्चिमी दर्शन में हैराक्लाइटस और बर्गसाँ ने भी परिवर्तन को सत्य माना। इस परिवर्तन का कोई अपरिवर्तनीय आधार भी नहीं है। बाह्य और आंतरिक जगत् में कोई ध्रुव सत्य नहीं है। बाह्य पदार्थ “स्वलक्षणों” के संघात हैं। आत्मा भी मनोभावों और विज्ञानों की धारा है। इस प्रकार बौद्धमत में उपनिषदों के आत्मवाद का खंडन करके “अनात्मवाद” की स्थापना की गई है। फिर भी बौद्धमत में कर्म और पुनर्जन्म मान्य हैं। आत्मा का न मानने पर भी बौद्धधर्म करुणा से ओतप्रोत हैं। दु:ख से द्रवित होकर ही बुद्ध ने सन्यास लिया और दु:ख के निरोध का उपाय खोजा। अविद्या, तृष्णा आदि में दु:ख का कारण खोजकर उन्होंने इनके उच्छेद को निर्वाण का मार्ग बताया।
अनात्मवादी होने के कारण बौद्ध धर्म का वेदांत से विरोध हुआ। इस विरोध का फल यह हुआ कि बौद्ध धर्म को भारत से निर्वासित होना पड़ा। किन्तु एशिया के पूर्वी देशों में उसका प्रचार हुआ। बुद्ध के अनुयायियों में मतभेद के कारण कई संप्रदाय बन गए। जैन संप्रदाय वेदांत के समान ध्यानवादी है। इसका चीन में प्रचार है।
सिद्धांत भेद के अनुसार बौद्ध परंपरा में चार दर्शन प्रसिद्ध हैं। इनमें वैभाषिक और सौत्रांतिक मत हीनयान परंपरा में हैं। यह दक्षिणी बौद्धमत हैं। इसका प्रचार भी लंका में है। योगाचार और माध्यमिक मत महायान परंपरा में हैं। यह उत्तरी बौद्धमत है। इन चारों दर्शनों का उदय ईसा की आरंभिक शब्ताब्दियों में हुआ। इसी समय वैदिक परंपरा में षड्दर्शनों का उदय हुआ। इस प्रकार भारतीय पंरपरा में दर्शन संप्रदायों का आविर्भाव लगभग एक ही साथ हुआ है तथा उनका विकास परस्पर विरोध के द्वारा हुआ है। पश्चिमी दर्शनों की भाँति ये दर्शन पूर्वापर क्रम में उदित नहीं हुए हैं।
वसुबंधु, कुमारलात, मैत्रेय और नागार्जुन इन दर्शनों के प्रमुख आचार्य थे। वैभाषिक मत बाह्य वस्तुओं की सत्ता तथा स्वलक्षणों के रूप में उनका प्रत्यक्ष मानता है। अत: उसे बाह्य प्रत्यक्षवाद अथवा “सर्वास्तित्ववाद” कहते हैं। सैत्रांतिक मत के अनुसार पदार्थों का प्रत्यक्ष नहीं, अनुमान होता है। अत: उसे बाह्यानुमेयवाद कहते हैं। योगाचार मत के अनुसार बाह्य पदार्थों की सत्ता नहीं। हमे जो कुछ दिखाई देता है वह विज्ञान मात्र है। योगाचार मत विज्ञानवाद कहलाता है। माध्यमिक मत के अनुसार विज्ञान भी सत्य नहीं है। सब कुछ शून्य है। शून्य का अर्थ निरस्वभाव, नि:स्वरूप अथवा अनिर्वचनीय है। शून्यवाद का यह शून्य वेदांत के ब्रह्म के बहुत निकट आ जाता है।
बौद्ध दर्शन अपने प्रारम्भिक काल में जैन दर्शन की ही भाँति आचारशास्त्र के रूप में ही था। बाद में बुद्ध के उपदेशों के आधार पर विभिन्न विद्वानों ने इसे आध्यात्मिक रूप देकर एक सशक्त दार्शनिकशास्त्र बनाया। बुद्ध द्वारा सर्वप्रथम सारनाथ में दिये गये उपदेशों में से चार आर्यसत्य इस प्रकार हैं :- ‘दुःखसमुदायनिरोधमार्गाश्चत्वारआर्यबुद्धस्याभिमतानि तत्त्वानि।’ अर्थात् –
1. दुःख- संसार दुखमय है।
2. समुदय – दुख उत्पन्न होने का कारण है (तृष्णा)
3. निरोध- दुख का निवारण संभव है।
4. मार्ग- दुख निवारक मार्ग (आष्टांगिक मार्ग)
बुद्धाभिमत इन चारों तत्त्वों में से दुःखसमुदाय के अन्तर्गत द्वादशनिदान (जरामरण, जाति, भव, उपादान, तृष्णा, वेदना, स्पर्श, षडायतन, नामरूप, विज्ञान, संस्कार तथा अविद्या) तथा दुःखनिरोध के उपायों में अष्टांगमार्ग (सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीव, सम्यक् प्रयत्न, सम्यक् स्मृति तथा सम्यक् समाधि) का विशेष महत्व है। इसके अतिरिक्त पंचशील (अहिंसा, अस्तेय, सत्यभाषण, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह) तथा द्वादश आयतन (पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, पंच कर्मेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि), जिनसे सम्यक् कर्म करना चाहिए- भी आचार की दृष्टि से महनीय हैं। वस्तुतः चार आर्य सत्यों का विशद विवेचन ही बौद्ध दर्शन है,जो दुख, समुदय, निरोध व मार्ग केे रूप मेंं न केवल हमेें चेतना देता
है, बल्कि हमें जीवन जीने का मार्ग भी दिखाता है।

अमेरिका: वैश्विक ‘थानेदारी’ की बढ़ती सनक
तनवीर जाफरी
अमेरिका व ईरान के संबंध हालांकि गत् चार दशकों से तनावपूर्ण चल रहे हैं। परंतु पिछले दिनों अमेरिका द्वारा मध्यपूर्व में विमानवाहक युद्धपोत यूएसएस अब्राहम लिंकन तैनात करने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि इन दोनों देशों में किसी भी समय युद्ध भी छिड़ सकता है। अमेरिका ने इससे पहले लंबे समय तक ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इतना ही नहीं बल्कि अमेरिका ने ईरान के अनेक सहयोगी देशों को भी ईरान से अलग-थलग करने की कोशिश की। ईरान द्वारा की जाने वाली तेल की बिक्री को बाधित किया। कई देशों को ईरान से तेल न लेने के निर्देश दिए गए। कई देशों से ईरान से व्यापार प्रतिबंधित कराए गए। यह सब केवल इसलिए किया गया ताकि ईरान को आर्थिक रूप से कमज़ोर किया जा सके। अमेरिका ईरान की वर्तमान सरकार को अस्थिर कर वहां सत्ता परिवर्तन कराना चाहता है। कुल मिलाकर अमेरिका की यही मंशा है कि वह आर्थिक व सामरिक सभी मोर्चों पर ईरान को कमज़ोर करे। गौरतलब है कि अमेरिका द्वारा थोपे गए युद्ध व अस्थिरता की मार झेलने वाले इराक व सीरिया जैसे देशों के बाद ईरान ही मध्यपूर्व में इस समय सबसे मज़बूत देश है। ज़ाहिर है अमेरिका अपनी अंतर्राष्ट्रीय नीति के तहत दुनिया के किसी भी देश को शक्तिशाली देश के रूप में देखना नहीं चाहता। खासतौर पर उन देशों को तो कतई नहीं जो इसराईल व अरब की तरह अमेरिका की खुशामदपरस्ती न करते हों। ईरान 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद अब एक ऐसे देश के रूप में स्थापित हो चुका है जहां के लोग अमेरिका की आंखों से आंखें मिलाकर बात करने का साहस रखते हैं। वे अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद शिक्षा,साईंस,टेक्नोलजी तथा सामरिक क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ते जा रहे हैं।
वैसे भी अमेरिका व ईरान के मध्य पैदा हुई तल्खी का इतिहास लगभग 40 वर्ष पुराना है। 1979 से पूर्व शाह रज़ा पहलवी जो ईरान के बादशाह थे जो पश्चिमी सभ्यता के पैरोकार होने के साथ-साथ अमेरिका की कठपुतली बनकर रहा करते थे। अमेरिका को ईरान का वह दौर पसंद था। परंतु उस दौर में ईरान के लोग पथभ्रष्ट हो रहे थे। वहां का समाज पश्चिमी सभ्यता में डूबता जा रहा था। अनेक गैर इस्लामी तथा गैर इंसानी कृत्य हुआ करते थे। तानाशाही के उस दौर में अनेक धर्मावलंबी लोगों को तरह-तरह के ज़ुल्म व ज़्यादतियों का सामना करना पड़ता था। इसी दौर में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे आयतुल्ला खुमैनी की ईरान वापसी हुई। खोमैनी ईरानी समाज के पश्चिमीकरण के लिए तथा धीरे-धीरे अमेरिका पर बढ़ती जा रही निर्भरता के लिए शाह को ही जि़म्मेदार मानते थे। यदि हम शाह पहलवी के पूर्व के ईरान पर भी नज़र डालें तो 1953 से पहले भी ईरान में मोहम्मद मूसा देगा की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार थी। उन्होंने ही ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था। परंतु उस समय भी अमेरिका व ब्रिटेन ने साजि़श रचकर ईरान की लोकतांत्रिक मूसा देगा सरकार को अपदस्थ करवाकर शाह रज़ा पहलवी को सत्ता सौंप दी थी। ज़ाहिर है ऐसे में अमेरिका की कठपुतली बने शाह ने ईरान के भविष्य का हर फैसला अमेरिकी हितों तथा उसकी इच्छाओं के अनुरूप ही लेना था।
अमेरिका 1979 की इस्लामी क्रांति के फौरन बाद ईरान में घटी उस घटना को भी नहीं भूल पा रहा है जिसने अमेरिका के विश्व के सर्वशक्तिमान होने के भ्रम को तोड़ दिया था। शाह के तख्तापलट के फौरन बाद जैसे ही ईरान व अमेरिका के राजनयिक संबंध समाप्त हुए उसके साथ ही ईरानी छात्रों के एक बड़े समूह ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर अपना नियंत्रण कर लिया। दूतावास में 52 अमेरिकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया। ईरान के लोग उस समय तत्कालीन राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर से शाह पहलवी को वापस ईरान भेजे जाने की मांग कर रहे थे। उस समय शाह न्यूयार्क में कैंसर का इलाज करवा रहे थे। बाद में मिस्र में शाह पहलवी का देहांत हो गया। परंतु अमेरिकी बंधकों को ईरानी छात्रों ने उस समय तक नहीं छोड़ा जबतक कि अमेरिका में जिम्मी कार्टर का शासन समाप्त नहीं हुआ और रोनाल्ड रीगन अमेरिका के नए राष्ट्रपति नहीं बने। अमेरिका उस समय से लेकर अब तक यही मानता आ रहा है कि ईरान की इस्लामी क्रांति तथा इस्लामी क्रांति के प्रमुख आयतुल्ला खुमैनी का भी इस पूरे बंधक प्रकरण में पूरा समर्थन व योगदान था। 1979 की क्रांति के बाद अमेरिका ने ईरान को सबक सिखाने का एक दूसरा रास्ता यह चुना कि उसने ईरान के पड़ोसी देश इराक को ईरान के विरुद्ध उकसाकर 1980 में ईरान पर आक्रमण करवा दिया। आठ वर्षों तक चले इस इराक-ईरान युद्ध में एक अनुमान के अनुसार दोनों ही देशों के लगभग पांच लाख लोग मारे गए थे। कहा जाता है कि इसी युद्ध में इराक द्वारा ईरान के विरुद्ध रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया गया था जिसका प्रभाव ईरान पर काफी लंबे समय तक देखा गया। इसी युद्ध के बाद ईरान ने परमाणु हथियारों की संभावनाओं की ओर देखना शुरु किया था।
वर्तमान समय में ईरान को इज़राईल जैसे उस पड़ोसी देश से पूरा खतरा है जो परमाणु शस्त्र संपन्न देश है। सऊदी अरब का शाही घराना गत् कई दशकों से अमेरिका की गोद में बैठकर न केवल ईरान के विरुद्ध साजि़शें रच रहा है बल्कि प्रत्येक ऐसे मानवाधिकार विरोधी कार्य कर रहा है जिसकी अन्य देशों में किए जाने पर अमेरिका निंदा किया करता है। अमेरिका न तो इज़राईल के ‎फिलिस्तीनियों पर किए जा रहे अत्याचार की आलोचना करता है न ही सऊदी अरब शासन द्वारा किए जाने वाले ज़ुल्म पर अपनी कोई प्रतिक्रिया देता है। पूरे विश्व में लोकतंत्र की हिमायत करने वाले अमेरिका को सऊदी अरब में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करने या चुनाव कराने की ज़रूरत महसूस नहीं होती। अमेरिका को केवल चीन,रूस,उत्तर कोरिया,ईरान,वेनेज़ुएला,सीरिया,यमन,मिस्र जैसे देश ही दिखाई देते हैं। यदि हम पूरे विश्व के मानचित्र पर नज़र डाल कर देखें तो हम यही पाएंगे कि दुनिया के जिन-जिन देशों ने अपने स्वाभिमान की रक्षा करने की कोशिश की तथा अमेरिका के आगे नतमस्तक होने से इंकार किया वही देश अमेरिका की नज़रों में न केवल अलोकतांत्रिक हैं बल्कि उन्हीं देशों में मानवाधिकारों का हनन भी हो रहा है । दुनिया यह भी जानती है कि अमेरिका किसी भी स्वाभिमानी व आत्मनिर्भर राष्ट्र का सगा दोस्त नहीं है। इराक जैसे देश का उदाहरण सबके सामने है।
अब अमेरिका ने ईरान को उसके द्वारा चलाए जाने वाले परमाणु कार्यक्रम को लेकर घेरना शुरु कर दिया है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ईरान को शैतान की धुरी का नाम दे चुके हैं तो दूसरी ओर अमेरिका का परम सहयोगी देश इज़राईल भी अपने लिए ईरान को ही सबसे बड़ा खतरा मान रहा है। अमेरिका द्वारा मध्य-पूर्व के समुद्री क्षेत्र में अपने दो विमानवाहक युद्धपोत तैनात करने के बाद ईरान ने अपने-आप को 2015 में हुए अंतर्राष्ट्रीय परमाणु समझौते से आंशिक रूप से अलग कर लिया है। अमेरिका पिछले वर्ष ही स्वयं को इस समझौते से अलग कर चुका था। इस बीच यह भी खबर है कि अमेरिका ने बड़ी संख्या में बी-52 लड़ाकू विमानों को भी इस क्षेत्र में भेज दिया है। अभी कुछ ही दिन पूर्व ईरान के रेव्यूलेशनरी गार्ड कापर््स को भी अमेरिका ने आतंकवादियों का गिरोह बताते हुए उसे काली सूची में डाल दिया थी। इन सब तेज़ी से बदलते घटनाक्रमों के बीच पिछले दिनों अमेरिकी विदेश मंत्री माईक पाम्पियो अपनी जर्मनी की यात्रा को रद्द करके अचानक इराक की राजधानी बगदाद जा पहुंचे। ऐसा माना जा रहा है कि उन्होंने अमेरिका व ईरान के बीच बनते जा रहे जंग के माहौल के संबंध में ही इराकी नेताओं के साथ बैठक की है। यदि अमेरिका ईरान पर युद्ध थोपता है तो पूरे विश्व पर इसका क्या दुर्भाव होगा यह तो वक्त ही बताएगा परंतु यह तो तय है कि अमेरिकी थानेदारी की बढ़ती सनक पूरे विश्व को अस्थिरता तथा संकट की ओर ले जा रही है।

मोदी जी ‘विभाजक’ अधिक; ‘सुधारक’ कम…..!
ओमप्रकाश मेहता
भारत में लोकसभा चुनावों के दौर में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त ‘टाईम’ पत्रिका ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी पर दस पृष्ठीय विश्लेषण प्रस्तुत किया है, जिसके सात पृष्ठो में मोदी जी को ‘विभाजक’ और लोक लुभावनवादी बताया गया है, जबकि तीन पृष्ठों में उन्हें ‘सुधारवादी’ बताया गया है।
‘टाईस’ पत्रिका के वरिष्ठ लेखक आतिश तासीर ने जहां अपने नाम के अनुसार भारतीय सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री जी के लिए ‘आतिश’ (विस्फोटक पदार्थ) का काम किया है, वहीं एक अन्य लेखक इवान ब्रेमर ने मोदी जी को ‘सुधारवादी’ बताने की कौशिश की है और उनके पांच साला कार्यकाल का विश्लेषण किया है।
अपने सात पृष्ठीय विश्लेषण में जहां आतिश तासीर ने अपनी ‘आतीशी तासिर’ बताने की कौशिश की और मोदी पर आरोप लगाया कि ‘‘वे एक बार फिर गढ़े हुए राष्ट्रवाद के सहारे सत्ता में आना चाहते है।’’ तासीर ने अपने विश्लेषण की शुरूआत 2014 से करते हुए मोदी जी द्वारा 2014 में लिए गए मनमोहक वादों का स्मरण किया तथा स्पष्ट रूप से कहा कि वे वादे आज भी अधूरे है और देश की आम जनता आज भी उनके पूरे होने की वाट जोह रही है। कहा गया है कि मोदी जी ने अपनी लोकप्रियता के विस्तार हेतु तुर्की, ब्राजिल, ब्रिटेन और अमेरिका के भारतीय बहुसंख्यक वर्ग को साधने की कौशिश की। कहा गया कि मोदी ने देश के संस्थापक पितामहों जवाहरलाल के सिद्धांतों व अन्यों को बदनाम करने की कौशिशें की और अपने को इनसे अधिक राष्ट्रभक्त व सुधारक बताया। नेहरू के धर्म निरपेक्ष समाजवाद को खत्म करने का प्रयास किया। यह भी लिखा गया कि मोदी ने भारत के हिन्दुओं व मुसलमानों के बीच वैमनस्यता बढ़ाने की कौशिशें की। उन्होंने उदारवादी संस्कृति के बजाए धार्मिक राष्ट्रवाद, जातिवादी, कट्टरता व मुस्लिमों के प्रति हीन भावना को आगे बढ़ाया। मोदी के शासनकाल में पुराने उच्च आदर्श शक्तिशाली ‘एलिट क्लाॅस’ का खेल लगने लगे। मोदी ने अपने पांच वर्षीय शासनकाल में युवा, महिला, गरीब सभी की उपेक्षा की व इनके लिए किए गए वादों की पूर्ति पर ध्यान नहीं दिया, इस कारण बेरोजगारी का आंकड़ा दिन दूना रात चैगुना बढ़ता गया। इस विश्लेषण में आतिश ने गाय के नाम पर की गई कुछ हत्याओं का भी जिक्र किया। लिखा गया कि मोदी ने बिखरे हुए प्रतिपक्ष व राहुल गांधी की बचकानी हरकतों व अनुभवहीनता का पूरा राजनीतिक लाभ उठाने की कौशिश की। मोदी अब अपने ही द्वारा गढ़े गए नव राष्ट्रवाद के सहारे पुनः सत्ता प्राप्त करना चाहते है। वे पाकिस्तान, राष्ट्रवाद व सैना के शौर्य के बलबूते पर फिर से सत्ता में वापसी चाहते है, अपनी पांच साला उपलब्धियों के बल पर नहीं। आतिश ने आरोप लगाया कि भारतीय सांस्कृतिक अनुसंधान परिषद से लेकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय तक प्रशासकों व प्रोफेसरों का चयन योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि राजनीतिक समर्पण भाव के आधार पर किया। इस के बावजूद आतिश का कहना है कि अपनी भाषण कला के आधार पर वे फिर सत्ता हथिया सकते है।
एक और जहां आतिश तासीर ने सात पृष्ठों में मोदी जी की कथित असलियत उजागर करने की कौशिशें की वहीं शेष तीन पृष्ठों पर इवान बे्रमर ने मोदी जी की तारीफ में लिखा कि- ‘‘मोदी पहले की तुलना में अब ज्यादा लोकप्रिय नतीजें दे सकते है।’’ लेखक की धारण है कि मोदी के विकास कार्यक्रमों ने लाखों लोगों के जीवनस्तर को बेहतर बनाया व बेहतर अवसर पैदा किये। श्री ब्रेमर ने लिखा कि हांलाकि भारत विश्व की सबसे तेज गति में बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था का स्पर्धी है, पर पिछली जनवरी में लीक एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार 2017 में बेरोजगारी की दर पिछले 45 वर्षों में सबसे ज्यादा (6.1 फीसदी) रही, फिर भी मोदी ऐसे शख्स है जो अच्छे नतीजे दे सकते है उन्होंने चीन, अमेरिका व जापान से सम्बंध सुधारे है व इन देशों से काफी अपेक्षाएं की जा रही है।
ब्रेमर के अनुसार मोदी ने सबसे पहले यह महसूस किया कि सरकार के पास खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा हो, 2017 में लागू जीएसटी ने केन्द्र व राज्यों के पैचिदा कर ढ़ांचे को चुस्त-दुरूस्त करने का प्रयास किया। जिसका लाभ अभी भी मिल रहा है। साथ ही इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए भारी धनराशि आवंटित की, माइक्रो-हाईवे, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और विमान तलों के निर्माण में विश्वस्तरीयता का ख्याल रखा।
लेखक ने यूपीए सरकार के समय के आधार कार्ड में सुधार तथा तीस करोड़ गरीबों के बैंक खाते खुलवाने का भी जिक्र किया। ऐसे कदमों ने भ्रष्टाचार में कमी की है। साथ ही जन स्वास्थ्य बीमा योजना से पचास करोड़ को लाभ मिलने व उज्जवला योजना से गरीब वर्ग में रसोई गैस कनेक्शन बांटने की भी तारीफ की गई। इस प्रकार पत्रिका के दोनों ख्यातनाम लेखकों ने मोदी जी पर सटीक व प्रभावी विश्लेषण पेश किया है, इससे मोदी जी को राजनीतिक लाभ मिलता है या उनकी छवि प्रभावित होती है? यह तो अगले सप्ताह ही पता चल पाएगा।

अंकों की अंधी दौड़ में बच्चों को नहीं ढकेले माता-पिता
सनत जैन
मई माह तक अधिकांश स्कूल और कालेजों के परीक्षा परिणाम आते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में इस समय छात्र-छात्राएं परिणाम के बाद या परिणाम आने के पूर्व ही डर भय और अवसाद के कारण घर छोड़कर भाग जाते हैं, या आत्महत्या कर लेते हैं। ऐसे समाचार परीक्षा परिणाम आने के समय बड़ी संख्या में देखने को मिलते हैं। बच्चों और युवाओं में कम नंबर आने के बाद उनका आत्मविश्वास लगभग खत्म हो जाता है। उन्हें लगता है, कि कैरियर बनाने के लिए जो अवसर मिला था, वह समाप्त हो गया है। जिसके चलते वह इतने मानसिक दबाव में होते हैं, कि वह आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। इसमें बच्चों और युवाओं से ज्यादा गलती, उनके माता-पिता की होती है। जो बच्चे को बालपन से ही अंको की दौड़ में शामिल कर देते हैं। कम अंक आने से उनका विश्वास डिगने लगता है। माता-पिता उनके कम अंक लाने से उन पर नाराज होते हैं। धीरे-धीरे बच्चों की पढ़ाई से या तो रूचि खत्म हो जाती है, या जिस कैरियर बनाने के लिए वह निकले थे। जब वह सपना पूरा नहीं होता है, तो वह आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।
सामाजिक एवं पारिवारिक रिश्तो में दरार
अंको की इस अंधी दौड़ ने पारिवारिक एवं सामाजिक रिश्तो में बड़ी दरार पैदा कर दी है। मेरिट में सहेली या बच्चे के दोस्त के एक या दो नंबर कम ज्यादा हो जाने से मां क्लासटीचर भी लड़ जाती है, कि उनके बच्चे को जानबूझकर कम नंबर दिए हैं। इसी तरह अंको की दौड़ ने बच्चों की दोस्ती को दुश्मनी में बदल दिया है। माता पिता के रिश्ते भी अब अंको के कारण बनते और बिगड़ते रहते हैं। जिसके कारण जो आत्मीय रिश्ता बच्चे का माता-पिता से बनना चाहिए था। वह बनने के पहले ही बिखरने लगता है।
स्कूल कॉलेज बने ढोर (पशु) बाजार
मीडिया और शैक्षिक संस्थानों ने डिग्री को रोजगार नौकरी का बाजार बनाकर प्रचारित किया है। इसका असर माता पिता पर सबसे ज्यादा हुआ है। उन्हें लगता है कि महंगे स्कूल और कालेजों में अपने बच्चों को पढ़ाकर, उनका भविष्य बेहतर बना देंगे। डिग्री मिलते ही उन्हें लाखों रुपए का पैकेज मिल जाएगा। इस मानसिकता ने बच्चों के ऊपर बेहतर अंक लाने और प्रतिस्पर्धा में बने रहने का बचपन से ही दबाव बना दिया है। माता-पिता सोचते हैं, कि मोटी फीस देखकर वह अपने बच्चों के ऊपर उपकार कर रहे हैं, या उसका बेहतर भविष्य बना रहे हैं। लेकिन इसके ठीक विपरीत असर होता है। अंको के मानसिक दबाव से बच्चा अपनी प्रतिभा को खोने लगता है। वह पशुओं की तरह टाइप्ड ज्ञान जो बहुत सीमित होता है, उसी से अंक लेकर प्रतिस्पर्धा की दौड़ में शामिल होता है। जिसमें 1 फ़ीसदी भी कैरियर बनाने में सफल नहीं हो पाते हैं। 99 फ़ीसदी युवा असफल होने के कारण अपने परिवार और समाज से धीरे-धीरे दूर होकर विद्रोही होने लगते हैं। डिग्री से रोजगार प्रचारित करके शिक्षण संस्थानों ने पिछले दो दशक में अरबों रुपए की कमाई की है। इसी तरह मीडिया हाउस ने भी अरबों रुपयों की कमाई की है। लेकिन माता पिता से बच्चे दूर होते चले गए। वहीं डिग्री लेकर भी 8 करोड़ से ज्यादा स्नातक युवा बेरोजगार घूम रहे हैं। धीरे-धीरे यह अपराध की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। कैम्पस सिलेक्शन के नाम पर कालेज में युवाओं को ढोर बाजार की तरह पेश किया जाता है। यहां पर समझना जरुरी होते हैं, युवा संवेदनशील होते हैं। सफल और असफल होने पर उन पर मानसिक दबाव बनता है।
डॉक्टर इंजीनियर और सरकारी नौकरी सभी को नहीं मिल सकती
पिछले 25 वर्षों में भारतीय समाज में पढ़ाई अच्छे नंबर, अच्छे कॉलेज से डिग्री लेने पर माना जाता है, कि उसके बाद उनके बच्चों का भविष्य पूरी तरह सुरक्षित हो जाएगा। वास्तविकता यह है की अंको की दौड़ में 100 में से 40 बच्चों को यदि अच्छे नंबर मिल भी गए। हर विषय के हर साल लाखों बच्चे उच्च शिक्षा संस्थानों से निकलते हैं। सरकारी और कारपोरेट नौकरी कुछ हजार लोगों को ही मिल पाती है। उसमें भी लाखों रुपए की रिश्वत या कोचिंग के रूप में खर्च होते हैं। वर्तमान शिक्षा पद्धति में जो बच्चे डिग्री लेकर बाहर निकल रहे हैं। उन्हें अन्य कोई ज्ञान ना होने के कारण वह किसी अन्य नौकरी या अन्य काम के लिए उपयोगी नहीं हो पाते हैं। पिछले कई वर्षों से पीएचडी, स्नातक और परास्नातक युवाओं को अच्छे तरीके से ना तो अंग्रेजी लिखना आती है, नाही हिंदी, उन्हें कंप्यूटर का भी कोई ज्ञान नहीं होता है। सेमेस्टर सिस्टम के कारण आगे पाठ और पीछे सपाट के कारण उन्हें अपने विषय का भी मूल ज्ञान नहीं होता है। ऐसी स्थिति में करोड़ों युवा, अंको की दौड़ तथा डिग्री होते हुए बेरोजगार हैं। यह माता पिता और समाज के लिए भी सबसे बड़ी चिंता का विषय हैं।
बच्चों के टैलेंट को पहचाने, सही शिक्षा को प्रेरित करें
हर माता-पिता अपने बच्चों को बेहद प्यार करते है। इसमें कोई शक नहीं है। बच्चों को तो कोई ज्ञान नहीं होता है। लेकिन मां-बाप को बेहतर समझ होती है। बच्चों के लिए जीवन जीने की शिक्षा भी जरूरी है। प्राइमरी और मिडिल की शिक्षा में मातृभाषा, हिंदी, अंग्रेजी तथा कंप्यूटर का बेहतर ज्ञान होने पर, बच्चे की जिस विषय में रुचि युवा अवस्था में बनेगी। वह उसमें आगे बढ़ेगा। भाषा और कंप्यूटर का ज्ञान होने के कारण उसे जो भी अवसर मिलेंगे। वह उसको हमेशा आगे बढ़ाते रहेंगे। डिग्री से कोई ज्ञान हासिल नहीं होता है। जब तक उसका व्यवहारिक ज्ञान ना हो। यह बात माता-पिता को समझनी होगी। वर्तमान समय में हजारों सेवा और रोजगार के नए क्षेत्र विकसित हुए हैं। जहां करोणों प्रशिक्षित लोगों की जरुरत है। योग्यता के आधार पर कम पढ़े लिखे लोग भी लाखों रुपए कमा रहे हैं। उनकी समाज में विशिष्टता बनी हैं।
भारतीय शिक्षा पद्धति
भारत में हमेशा से शिक्षा देने का काम माता-पिता और गुरुजन करते रहे हैं। माता-पिता बच्चों को जीवन जीने के लिए सभी सामाजिक और पारिवारिक कार्यों से जोड़कर, आत्मीयता के साथ उसे अक्षर ज्ञान दिलाकर आगे बढ़ाने का काम करते है। पिछले दो दशक में केवल स्कूली किताबी ज्ञान और कॉलेज में आने के बाद सेमेस्टर सिस्टम का किताबी ज्ञान का बोझ बच्चों के ऊपर डाल दिया जाता है। वह सामाजिक एवं पारिवारिक जिम्मेदारियों से भी नहीं जुड़ पाते हैं। जिसके कारण उच्चशिक्षा की पढ़ाई करने के बाद भी समाज और परिवार के किसी काम के लिए तैयार नहीं हो पाते हैं। बच्चा जो काम लगातार होते हुए देखता है। उसी को करने लगता है। उसी काम में विशेषज्ञता के साथ अपना विशेष स्थान बनाता हुआ, आया है। अंको की अंधी दौड़ ने कालेजों का फायदा कराया है। किंतु बच्चों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। अब इसका असर परिवार और समाज के बीच हो रहा है, इसे समझना आवश्यक है।
औपचारिक शिक्षा जरुरी नहीं
नोबेल पुरस्कार विजेता रविंद्र नाथ टैगोर ने कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं मिसाइल में अब्दुल कलाम आजाद मात्र स्नातक थे। 1990 तक भारत के तकनीकी और अन्य क्षेत्रों में केवल स्नातक व्यक्ति भारत और विश्व स्तर पर, उच्च पदों पर पहुंचे। दुनिया भर के जो सफल व्यक्ति हैं। उनमें से अधिकांश हायर सेकेंडरी की परीक्षा भी पास नहीं कर पाए। बीच में पढ़ाई छोड़ कर उन्होंने रोजगार व्यवसाय और शोध के क्षेत्र में नए-नए काम करके करोड़ों अरबों रुपए कमाकर विशिष्ट स्थान बनाया। ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं है। भारत की आचार्य परंपरा जो वास्तविक ज्ञान के आधार पर बोलकर सुनकर और लिखकर आचार्य परंपरा के माध्यम से ज्ञान को सतत आगे बढ़ाती रही है। शंकराचार्य, संत महात्मा, कबीर और जैन आचार्य विद्यासागर जैसे हजारों उदाहरण है। जिनकी औपचारिक शिक्षा ना के बराबर थी। किंतु इन्होंने कई भाषाओं में कई विषयों में ग्रंथ लिखकर और सामान्य भाषा में उसे प्रतिपादित करके शिक्षा का विकास के क्रम में सही महत्व समय-समय पर देने का काम किया है। वर्तमान स्थिति में माता-पिता अपने बच्चों को पशुओं की तरह सीमित शिक्षा देकर उनके गले में डिग्री के टेक लगवाकर, उनके साथ बहुत बड़ी नाइंसाफी कर रहे हैं। माता-पिता अपने बच्चों को जिन्हें वह सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। उन्हीं के भविष्य से अनजाने में खिलवाड़ कर रहे हैं, उससे बचें। बच्चे भले कम अंक लाएं, लेकिन बच्चों में ईश्वर ने उन्हें कोई ना कोई विशिष्ट गुण और विशिष्ट रुचि के साथ पैदा होता है। माता-पिता अब भगवान बनने की चेष्टा कर रहे हैं। वह अपनी मर्जी से बच्चों को अपनी इच्छा से वह बनाना चाहते हैं, जिसके लिए वह तैयार नहीं है। इससे जितना ज्यादा से ज्यादा बचा जा सके, उतना अच्छा है। समय स्वयं सीखने का अवसर देता है। जीवन और समय मिलकर हर व्यक्ति को अवसर देकर उनके भाग्य का निर्माण करते हैं। इस बात को हर माता पिता समाज और सरकार को समझना होगा।

म.प्र में व्यवसायिक शिक्षा की हकीकत
डॉक्टर अरविन्द जैन
मध्यप्रदेश सरकार को मनपसन्द सरकार कहना उचित हैं कारण यहाँ पर सब काम जो असंभव कहलाते हैं यहाँ संभव हैं ।हजारो स्कूलें बिना शिक्षक के चल रही हैं ,बिना भवन के हैं और कोई कोई स्कूल बिना छात्रों के हैं ,और जहाँ सब कुछ हैं वहां पढाई नहीं हैं ।प्राथमिक स्तर की पढाई इतनी निम्म स्तरीय होती हैं की पांचवी पास छात्र अपना नाम नहीं लिख पता ।और उसके बाद छठवीं से आठवीं तक वो पूरी पढाई न कर पाने से उसके माँ बाप को उसकी नौकरी की चिंता नहीं रहती कारण आठवीं पास न होने से रोजगार कार्यालय में पंजीकृत नहीं हो सकता ,जिसके कारण उनके माँ बाप को यह चिंता नहीं रहती की लड़का पढाई करने के बाद दूसरे शहर या देश भाग जाएगा ।कम से कम वह माँ बाप की सेवा के योग्य रहेगा और कम पढ़ा लिखा होने से वह कोई भी छोटा मोटा काम करके अपना भरण पोषण कर लेगा और बेरोजगार की श्रेणी में नहीं आएगा और वह और उसका परिवार,सरकार चिंता मुक्त रहेगी ।
इसके बाद आजकल माध्यमिक ,प्राइमरी स्कूल स्तर के शिक्षकों की भारी कमी हैं कारण आजकल सबसे सरल सुविधाजनक शिक्षा इंजीनिरिंग की हो गयी हैं तो शिक्षकीय कार्य इंजीनियर नहीं कर सकते और बी एड आजकल प्राइमरी शिक्षा से भी गयी बीती हैं ,उनकी परीक्षा एक प्रकार की औपचरिकता होती हैं ।उसके बाद हर साल नित्य नए प्रयोग शिक्षा में होते हैं और उनका पाठ्यक्रम भी बदलता जाता हैं जो शिक्षकों को पल्ले नहीं पड़ता तो वे क्या ख़ाक छात्रों को पढ़ाएंगे ।११ वी के बाद विषय चयन भी बहुत सामान्य व्यवस्था के अंतरगत होती हैं और फिर प्रवेश परीक्षा के माध्यम से इंजीनरिंग ,मेडिकल ,लॉ और अन्य शाखाओं में प्रवेश विश्वविधयालय स्तर पर होता हैं ।।ये कॉलेज एक प्रकार के इंजीनियरिंग मेडिकल लॉ विषयों की फैक्ट्री हैं जहाँ से एक से सांचे में ढले छात्र निकलते हैं और जिनकी योग्यता किसी भी अन्य प्रदेश की स्तरीय संसथान से श्रेष्ठ न होकर घटिया होती हैं ।
मनपसंद सरकार के अंतरगत शासकीय के साथ निजी कॉलेजों की स्थिति बहुत ही निम्म स्तर की हैं जहाँ न शिक्षक हैं न अधोसंरचना हैं और न कोई क्लास लगती मात्र फीस के आधार पर उपाधि दी जाती हैं ,इसी कारन अधिकांश संस्थाओं की मान्यताएं खतरे में हैं और अनेकों कॉलेज बंद होने की कगार पर हैं और यहाँ से पास छात्रों की योग्यता और उपाधि की मान्यता का कोई अन्य जगह महत्व नहीं हैं। आज स्थिति यह हैं की उपाधि धारक कोई भी निम्म स्तरीय काम करने को तैयार हैं ,मजबूर हैं ,बाध्य अहइँ कारण पेट के खातिर कुछ भी करने को तैयार हैं ।और कोई कोई तो अवसाद में आने पर आत्महत्या भी कर लेते हैं ।
इसके बाद मेडिकल कॉलेजों की स्थिति और भी दयनीय हैं पहली बात प्रवेश परीक्षा में धांधलियां मामूली बात हैं उसके बाद प्रवेश में लाखों रुपये का लेन देन और उसके बाद बिना योग्यता के उपाधि मिलना और फिर योग्यता न होने पर किसी निजी नरसिंघ होम में नर्सिंग स्टाफ का काम करते हैं और मध्य प्रदेश का व्यापम काण्ड विश्व स्तर पर कुख्यात हो चूका हैं और कभी बिना परीक्षा के पास होना आदि आदि अनियमितायें होती हैं ।निजी कॉलेज तो कुछ योगदान देते हैं पर वहां पैसों की धांधलियां होती हैं और कहीं कहीं अधोसंरचना का अभाव होने से उनके भविष्य अंधकारमय हो जाते हैं ।
भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टिट्यूट यूनिवर्सिटी में कितने फ़ैल हुए छात्रों को पास किया गया और कितनों को फ़ैल किया गया और अब तो स्थिति यहाँ तक पहुंच गयी हैं की कई छात्रों के विरोधः पुलिस में रिपोर्ट दर्ज़ की गयी हैं ।ये उस स्थान की बात हैं जहाँ से न्याय की गंगा बहती हैं ।जब गंगोत्री ही अपवित्र हैं तो गंगा कहाँ तक पवित्र होगी ?
ऐसे ना जाने कितनी संस्थाएं बिना अनुमति के धलले से चल रही हैं और सरकार में पदस्थ अफसर कुम्भकर्णी निद्रा में लोभ लालच के कारण अंधे बैठे हुए हैं ।हमारे प्रान्त में क्या देश में ला एंड आर्डर (लाओ और आदेश ले जाओं ) की व्यवस्था हैं ।जितना अधिक नियंत्रण उतना अधिक भ्रष्टाचार ।जो जितना अधिक कड़क अफसर उतना अधिक भ्रष्ट या जितना मधुर बोलने वाला उतना लक्ष्मी विलासी होता हैं ,उनका स्पष्ट कहना हैं की नौकरी करने का वेतन मिलता हैं और काम करने /कराने के लिए लक्ष्मी चाहिए ।घोडा घास से यारी करेगा तो उसका पेट कैसे भरेगा ?
लाखों शिक्षकों /प्रोफेसरों के पद खाली हैं ,प्रभारियों से कार्य सम्पादित कराया जा रहा हैं ,उससे शासन को और उच्च अधिकारीयों को यह फायदा होता हैं की वे प्रभारी कार्यालयीन कार्यों में अनुभवहीन होने से गलतियां करते हैं हैं या हो जाती हैं तो उन पर अप्रत्यक्ष्य दबाव बनाया जाता हैं और इसके अलावा उन्हें प्रभार से हटाने का भय दिखते रहते हैं जिससे कार्यालयीन कार तो प्रभावित होते हैं और कई जाँच के कारण अकाल काल के गाल में समां जाते हैं ।इससे उच्च अधिकारीयों को दोनों तरह से फायदा होता हैं ।नियुक्ति और हटाने के भय से सुविधा शुल्क मिलती रहती हैं और शासन का कार्य अप्रभावित होता हैं ।
जब बुनियाद ही कमजोर होती हैं या रहती हैं तो कुछ बिरले ही छात्र शोध में काम कर पाते हैं अन्यथा अधिकांश अपने पेट की लड़ाई में लगते हैं या रूचि के अनुरूप काम नहीं मिलने से अनमने मन से काम करते हैं ।आजकल शिक्षा पर बजट भी सरकार कम करती जा रही हैं ,और जिस पार्टी की सरकार होती हैं वे अपनी विचारधारा थोपती हैं ।मनपसंद सरकार ने विगत १५ वर्षों में संघ की विचार धारा से प्रभावित होकर सब संस्थाओं में संघीय दर्शन को जबरन थोपा हैं ,इतिहास को तोड़ मरोड़ कर परोसा जा रहा हैं और गया ।वैसे ही केंद्र सरकार ने सर्वोच्च संवैधानिक संस्थाओं को संघीय ढांचा में ढाल दिया हैं ,जबकि शिक्षा को राजनीती से अप्रभावित होना चाहिए पर शिक्षा विभाग से ही राजनीती का पाठ पठाया और सिखाया जाता हैं ।विश्वविद्यालय राजनीती की पाठशाला होती हैं ।
अब यह प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हैं की इस प्रकार के मानदंडों पर हम कैसे विश्वगुरु की कल्पना कर सकते हैं ,इस सम्बन्ध यह बात सही भी हैं की देश में क्रांति मूर्खों से ही आती हैं ,पढ़े लिखे लोग कब क्यों कहाँ जैसे प्रश्न करते हैं और मूर्खो अपढ़ को आदेश का पालन करना पड़ता हैं ।वह किन्तु परन्तु नहीं करता ,इसीलिए वर्तमान सरकारें इसी प्रथा का पालन कर रही हैं ।और उनके लिए जरुरी हैं ,जैसा प्रधान सेवक वैसी प्रजा ,यानी मुर्ख राजा मुर्ख प्रजा ।राजा के कृत्यों का प्रभाव प्रजा पर पड़ता हैं ।राजा यदि झूठ बोलता हैं ,मक्कारी करता हैं आत्मप्रशंसा में लीं रहता हैं ,पर निंदा में उसे निंदा रस मिलता हैं ,बातों से ही दिन में तारें दिखाता हैं ,जिसे अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करने में दिन रात बेचैन रहता हैं ,कल्पना लोक में सैर कराता हैं उस देश की प्रजा भी कल्पना लोक में ही जीती हैं ।
शिक्षा एक ऐसा संवेदनशील विषय हैं जिसमे पूरी गंभीरता की जरुरत हैं ,इसके कारण देश का भविष्य निर्माण होता हैं ,जिस देश की शिक्षा कमजोर हो उसका भविष्य अंधकारमय होता हैं और होगा ।मात्र नवीनतम तकनीकी से हम ज्ञानवान नहीं बन पायेगें ,हम मात्र सूचना एकत्रित करने वाली मशीन रह जायेंगे और उसी पर आधारित रहेंगे ,
यह अजीबोगरीब संधिकाल हैं इससे यदि हम नहीं उबरे तो सिर्फ मात्र कागज़ों में ही श्रेष्ठ रहेंगे ,मूलरूप से शून्य होंगे ।

सत्ता के किंगमेकर
डॉ हिदायत अहमद खान
इसमें शक नहीं कि मौजूदा लोकसभा चुनाव बिना किसी लहर के लड़े जा रहे हैं। ऐसा कोई मुद्दा भी नहीं है, जिसके नाम पर देशभर में एकतरफा मतदान हो जाता। इसलिए मतदाता तो खामोश है, लेकिन राजनीतिक पार्टियां और उनके प्रमुख कद्दावर कहे जाने वाले नेता लगातार अपनी बात जनता के बीच में रखने की खातिर कान के पर्दे फाड़ने वाले अंदाज में चीखते और असंयमित व गिरी हुई भाषा का उपयोग करते देखे जा रहे हैं। आदर्श चुनाव आचार संहिता का पालन करवाने में चुनाव आयोग को भी पसीना आया जा रहा है। आचार संहिता उल्लंघन की शिकायतों पर शिकायतें हो रही हैं और जो कार्रवाई हो रही है उससे भी सियासी तौर पर कोई संतुष्ट नजर नहीं आता है। इसलिए कहने में हर्ज नहीं कि पूरा घमासान राजनीतिक है, जिसमें जनता का कोई रोल नहीं, क्योंकि वह समझ गई है कि निर्णय तो उसे ही करना है, इसलिए ये जो चाहें करते रहें, इससे फर्क क्या पड़ता है। जहां तक लहर की बात है तो इसमें शक नहीं कि 2014 के पिछले आम चुनाव में मोदी लहर थी, जिस कारण पूर्ण बहुमत हासिल हुआ और मोदी सरकार को अपने कार्यकाल में किसी तरह की कोई परेशानी का सामना भी नहीं करना पड़ा। मौजूदा आम चुनाव में मोदी लहर इसलिए अप्रभावी सिद्ध हुई क्योंकि पिछले चुनाव में जनता से जो वादे किए गए थे उन्हें पूरा नहीं किया गया। इसके विपरीत हुआ यह कि जिन योजनाओं और फैसलों को लेकर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी यूपीए की मनमोहन सरकार को खुद भी घेरते देखे जाते थे, उन्होंने ही अपने कार्यकाल में उन्हीं योजनाओं और फैसलों को लागू करने का काम युद्धस्तर पर किया, जिसका जिक्र भी नहीं किया जाना चाहिए था। इनमें सबसे पहला नोटबंदी का फैसला रहा है, जिसे लेकर कहा गया था कि मनमोहन सरकार कोई बड़ा घोटाला करने जा रही, इसलिए नोटबंदी का देशभर में विरोध करने की बात कही गई थी। इसके बाद जीएसटी लागू करने को लेकर संसद से लेकर सड़क तक आंदोलन करने की चेतावनी दी गई थी और इसे आगे बढ़ने नहीं दिया गया। ऐसे ही यूपीए सरकार आधार कार्ड को अनिवार्य करने जा रही थी तो भाजपा ने टांग अड़ाकर उसे रोक दिया था। इन तमाम योजनाओं और सरकार के फैसलों का विरोध करते हुए कहा गया था कि विदेश में जमा कालाधन सरकार बनते ही वापस लाया जाएगा और प्रत्येक नागरिक के खाते में 15-15 लाख रुपये जमा कराए जाएंगे। इसके साथ ही न तो अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए सरकार ने कोई अध्यादेश लाया और न ही पड़ोसी दुश्मन देश को ही सबक सिखाया जा सका। उल्टा सीमा पार से आतंकवादी घुसपैठ करते रहे और हमारे देश के जवान शहीद होते रहे। पुलवामा आतंकी हमले के बाद वायुसेना ने जरुर एयर स्ट्राइक करके पाकिस्तान को करारा जवाब देने जैसा गौरवशाली कार्य किया, लेकिन इससे क्या, क्योंकि सेना के जवानों की जांबाजी और सरकार के दावों को मिलाकर तो नहीं देखा जा सकता है। इन तमाम कारणों से भाजपा के ही अनेक अनुवांशिक संगठन मोदी सरकार से खिन्न होते चले गए, जिसका नुक्सान भाजपा को अब लोकसभा चुनाव परिणाम में देखने को मिल सकता है। बहरहाल चुनाव परिणाम तो 23 मई को ही आएंगे, लेकिन इससे पहले राजनीतिक पंडितों ने भविष्यवाणी कर दी है कि इस आम चुनाव में किसी पार्टी विशेष को पूर्ण बहुमत मिलने वाला नहीं है। ऐसे में सभी की नजरें क्षेत्रीय पार्टियों के उन कद्दावर और प्रभावी कहे जाने वाले नेताओं पर टिक गई हैं जो भविष्य में सत्ता के किंगमेकर साबित हो सकते हैं। इस नजरिये से देखें तो यदि लोकसभा चुनाव में एनडीए या यूपीए को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है तो समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमों मायावती, बीजू जनता दल के मुखिया और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव और उनकी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति एवं वाईएस जगनमोहन रेड्डी और उनकी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। गौरतलब है कि कांग्रेस की अगुवाई में उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने की बजाय इस बार सपा और बसपा ने साथ चुनाव लड़ने का फैसला लिया। इस फैसले पर तरह-तरह के सवाल भी उठाए गए, लेकिन कुछ कर गुजरने की चाहत लिए बुआ और भतीजे की जोड़ी आगे बढ़ती गई है। अब देखना होगा कि यह बुआ-भतीजे की जोड़ी क्या कमाल करके दिखा रही है। वैसे संभावना तो यही है कि सपा-बसपा गठबंधन को उत्तर प्रदेश में सीटों का अच्छा-खासा फायदा हो सकता है। चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे प्रभावी नहीं होने के कारण भी आंध्र प्रदेश में भी वाईएसआर कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद जागी है। अब यदि इस आंकलन के मुताबिक ही चुनवा नतीजे आते हैं तब तो केंद्र की कुर्सी पर आसीन होने के लिए इन नेताओं की भूमिका पर ही डिपेंड होना पड़ेगा। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नामों को प्रधानमंत्री की दौड़ से हटा भी दिया जाए, तब भी कोई एक सिंगल नाम प्रधानमंत्री के दावेदार के तौर पर नजर नहीं आता है। इसलिए यह मामला जितना सीधा नजर आता है उतना है नहीं। अखिलेश कह चुके हैं कि वो मायावती को प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते हैं, इससे पहले उन्होंने पिता मुलायम सिंह को प्रधानमंत्री बनने पर खुशी होने की बात कही थी। दरअसल इसके पीछे अखिलेश एक बार फिर उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने की लालसा रखे हुए हैं, जिससे यह सिद्ध हो जाता है कि वो उसे ही समर्थन देंगे जो उन्हें यूपी का मुख्यमंत्री बनाने का दम रखता होगा। इसलिए भाजपा ने अपना दांव खेलते हुए कह दिया था कि बुआ जी तो ठगी गई हैं, वहीं ममता बनर्जी पर भी दबाव बनाने का काम बदस्तूर जारी है। यह सब इसलिए है क्योंकि राष्ट्रीय पार्टियों को एहसास हो चुका है कि पूर्ण बहुमत हासिल करना अब मुमकिन नहीं रह गया है। फिर भी मतदाता खामोश है, इसलिए परिणाम तो चौंकाने वाले आएंगे।

क्या मोदी जी भारत के प्रमुख विभाजनकारी?
डॉक्टर अरविन्द जैन
ये शब्द अमेरिका से प्रकाशित टाइम पत्रिका के नए अंक में प्रकाशित हुआ हैं। जिसका शीर्षक ” क्या दुनिया का लोकतंत्र मोदी सरकार के पांचा साल सहन कर पायेगा “नीति शास्त्र में लिखा हैं की जब कोई अपने मुख से अपनी प्रशंसा करता हैं वह उतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कोई और आपकी प्रशंसा करे।
“निंदक नियरें राख किये” इसका मतलब हैं की हमारी कोई निंदा करता हैं तो वह हमारा हितेषी होता हैं और जो मुख पर आपकी प्रशंसा करता हैं और पीठ पीछे बुराई करता हैं वह आपका शत्रु हैं ऐसा समझना चाहिए।
हमारे प्रधान मंत्री के शब्दकोष में उनकी आलोचना के लिए कोई स्थान नहीं होता हैं कारण उनमे इतनी सहन शक्ति नहीं हैं की वे अपनी कमजोरी, बुराई सुन सके या सहन कर सके। उनके पास तर्क बहुत होते हैं और उनके लिए बहुत सलाहकार बैठे हुए रहते हैं जो इतनी सलाह देते हैं। हम देश वासी उनकी योग्यता /ज्ञान /अनुभव से पूर्ण वाकिफ हैं। वे तोता रटंत हैं। उनकी हठधर्मिता के कारण उनके निजी भी उनसे किनारा काटने लगे। वर्तमान में उनके मंत्रिमंडल में मत विभाजन हो तो उनको स्वयं की वोट के अलावा अन्य की वोट न मिल पाए। कारण मंत्रियों, सांसदों, विधायकों पर इतना मानसिक दबाव हैं की उनके और पार्टी अध्यक्ष के समक्ष कोई मुख नहीं खोल सकता, बोलने की स्वन्त्रता नहीं। उन दोने केद्वारा सत्ता और शासन चलाया जा रहा हैं और उनकी छवि बहुत अच्छी हैं वह उनके लिए, जनसामान्य, उनके कार्यकर्त्ता को हिटलरशाही महसूस हो रही हैं।
लेख में इस बात का उल्लेख किया गया हैं की मोदी ने अपने भाषणों और बयानों में भारत की महान शखिसयतों पर राजनैतिक हमले किये। इसमें नेहरू तक शामिल हैं। वह कांग्रेस मुक्त भारत की चर्चा करते हैं पर वे भारतीय जनता पार्टी और उनके प्रत्याशियों को छोड़कर मोदी के लिए वोट माँगते हैं !उन्होंने कभी भी हिन्दू मुस्लिमों के बीच भाईचारे की भावना मजबूत करने को कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखाई। मोदी का सत्ता में आना दिखाता हैं की भारत में जिस उदार संस्कृति की चर्चा की जाती थी, वहां धार्मिक राष्ट्रवाद, मुसलमानों के खिलाफ भावनाएं और जातिगत कट्टरता पनप रही थी।
ऐसा नहीं हैं की मोदी जी कार्यकाल में आर्थिक नीतियों की जमकर तारीफ की और विदेशों से संपर्क बहुत बढे किन्तु बुनयादी समस्याओं को हल करने में असफल रहे जिनकी चर्चा अपने भाषणों में नहीं करते जिनके आधार पर पिछला चुनाव जीते थे। जैसे रोजगार के मामलों में पूर्णतः असफल रहे, किसानों की आत्महत्यायों का प्रतिशत बढ़ा, शिक्षा में बजट की कटौती, स्वस्थ्य व्यवस्था की कमी का कारण लाखों हजारों रिक्त पद।
कभी कभी मोदी अपनी असफलता का कारण पिछली सरकार की कुप्रबंधन पर २०१४ में जितनी अधिक सीटें मिली और अधिकांश राज्यों में उनकी पार्टी की सरकार होने के बाद क्रियान्वनयन में कमजोरी का श्रेय कौन को देना होगा। इसका मुख्य कारण पूरा तंत्र उन्होंने अपने नियंत्रण में रखा, पूर्ण उपलब्धियों का श्रेय उनके नाम होना चाहिए। मैं- मैं के कारण अन्य मंत्रियों में हीन भावना से कोई काम करना नहीं चाहता। वे इतने कड़े काम करने वाले हैं की कोई उनके साथ काम नहीं करना चाहते। अपनी अपनी ढपली ढपली और अपना अपना राग। यदि आज भी मंत्रिमण्डल में मत विभाजन हो तो मोदी जी को स्वयं की वोट मिलें।
हर सिक्के को दो पहलु होते हैं। जैसे खाली गिलास भरा हैं तो कोई कहता हैं आधा गिलास भरा और कोई कहता हैं आधा ग्लास खाली। जितनी अपेक्षा की थी उसमे कितने खरे उतरे और कितने असफल हुए। एक फायदा जरूर हुआ की जन सामान्य की रूचि अब टी वी देखने की नहीं रही। क्योकि पूर्ण संचार और सूचना तंत्र मोदी मीडिया के नाम से जाने लगा और उसमे जो परोसा जा रहा हैं वह एकपक्षीय होता हैं जिससे अरुचि और सच्चाई से दूर जो बहुत हानिकारण होगा।
अब बहुत सावधानी से निर्णय लेने का वक़्त आ गया हैं की हमें देश को विभाजित करने वालों को सत्ता सौपना हैं ! निर्णय आपके हाथ में हैं। एक बार परिवर्तन होना चाहिए अन्यथा लोकतंत्र भी खतरे में पड़ेगा।

अगली सरकार और अहंकार
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
2019 का चुनाव अब अंतिम चरण में है। लोग पूछ रहे हैं कि सरकार किसकी बनेगी ? यह क्यों पूछ रहे हैं ? क्योंकि किसी की भी बनती नहीं दिख रही है याने किसी की भी बन सकती है। किसी की याने क्या ? किसी एक पार्टी की नहीं। जो भी बनेगी, वह मिली-जुली बनेगी। उसे आप गठबंधन की कहें या ठगबंधन की! तो पहला प्रश्न यह है कि सबसे बड़ी पार्टी कौन उभरेगी ? सबसे ज्यादा सीटें किसे मिलेंगी ? इसका जवाब तो काफी सरल है। या तो भाजपा को मिलेंगी या कांग्रेस को मिलेंगी ? कांग्रेस को सबसे ज्यादा नहीं मिल सकतीं। उसकी 50 सीटों की 300 नहीं हो सकतीं। उसके पास न तो वैसा कोई नेता है, न नीति है, न नारा है। लेकिन मोहभंग को प्राप्त हुई जनता कांग्रेस को कुछ न कुछ लाभ जरुर पहुंचाएगी। 50 की 80 भी हो सकती हैं और 100 भी ! 100 सीटोंवाली कांग्रेस सरकार कैसे बना सकती है ? इसी प्रकार भाजपा, जिसे 2014 में 282 सीटें मिली थीं, यदि उसे इस बार 200 या उससे कम सीटें मिलीं तो वह भी मुश्किल में पड़ जाएगी। 2014 में उसे 282 सीटें मिली थीं। वह चाहती तो अकेले ही राज कर सकती थी लेकिन इस बार मामला काफी टेढ़ा है। उसके सत्ता में रहते हुए भी वह 282 से खिसककर 272 पर आ गई तो अब आम चुनाव में उसका क्या हाल होगा ? उसे बहुमत तो मिलने से रहा। अल्पमतवाली भाजपा के नेता यदि नरेंद्र मोदी रहे तो उसके साथ गठबंधन बनाने के लिए कौन पार्टी तैयार होगी ? भाजपा और संघ के वरिष्ठ नेताओं को पटाना ही मुश्किल होगा, अन्य दलों की बात तो दूर की कौड़ी है। इसीलिए भाजपा को अपने वैकल्पिक नेता के बारे में अभी से सोचना होगा। यही बात कांग्रेस पर भी लागू होती है। मोदी में जो कमी व्यक्ति के तौर पर है, वह कांग्रेस में पार्टी के तौर पर है। कांग्रेस विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी होगी लेकिन अन्य पार्टियां उसके अहंकार को कैसे पचा पाएंगी ? यदि कांग्रेस चाहती है कि देश में नई सरकार बने तो उसे थोड़ा पीछे खिसककर बैठना होगा। विपक्ष में प्रधानमंत्री के ज्यादातर उम्मीदवार पुराने कांग्रेसी ही हैं। गठबंधन कोई भी बने, उसकी सफलता में अहंकार सबसे बड़ी बाधा सिद्ध होगा।

सरोकार विहीन नेता और मुद्दे विहीन चुनाव
रघु ठाकुर
भोपाल लोकसभा के चुनाव एक अर्थ में धार्मिक प्रयोगशाला या हिन्दुत्व की प्रयोगशाला के रूप में हो रहे है। भाजपा की ओर से साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को प्रत्याशी बनाया गया है। शायद यही सोचकर कि हिन्दु-मुसलमान के मजहबी खानों में बांटकर चुनाव जीतना आसान हो सकता है। दूसरी तरफ कांग्रेस ने भले ही किसी साधु या साध्वी को खड़ा नही किया हो परन्तु कांग्रेस भी लगातार हिन्दू होने को प्रमाणित करने में लगी है। और आजकल हर चौराहे कार्यालय के शुरू होने के पहले पूजा-अर्चना, दक्षिणा का कार्यक्रम चल रहा है। कांग्रेस प्रत्याशी का अपना अधिकांश समय मंदिरों में जाकर माथा टेकने में जाता है। और यह बोल भी रहे है और दिखाने का प्रयास भी कर रहे है कि वे भी कम हिन्दू नहीं है। यहाँ तक कि उन्होंने अपने राघोगढ़ के किले और परंमपराओं का भी जिक्र किया और अनेक माध्यमों से करवाया भी कि वे हिन्दू विरोधी नही हैं, बल्कि पूरे हिन्दू है।
साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के प्रचार में भोपाल की पूर्व सांसद एवं पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती काफी सक्रिय है और वह अपनी शैली में प्रज्ञा ठाकुर का चुनाव अभियान चला रही है।
कांग्रेस पार्टी ने अपने रणनीति के तहत अप्रत्यक्ष व आक्रामक हिन्दुत्व का प्रचार शुरू किया है। शायद इसका ठेका उन्ही कम्प्यूटर बाबा को दिया है, जिन्हें पिछले वर्ष श्री शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमण्डल में एक निगम का अध्यक्ष बनाया गया था और राज्य मंत्री का दर्जा दिया था। उस समय विधानसभा के चुनाव का भाजपा का टिकिट पाने की अभिलाषा में कम्प्यूटर बाबा श्री शिवराज सिंह चौहान के प्रति प्रतिबद्ध थे और उनके सरकारी मकान की छत पर शीर्षासन करते फोटो अखबारों में प्रमुखता से छपते थे। अब अखबारों के मुताबिक कम्प्यूटर बाबा 7,000 साधुओं की फौज कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार कराने के लिये उतारने की तैयारी में हैं। साध्वी और साधुओं के इस तथाकथित धर्म युद्ध में किसकी विजय होगी कहना कठिन है। परन्तु 3 बाते निश्चित रूप से निष्कर्ष के रूप में सामने हैं :-
1. इस पूजा पाठ के अभियान से मंदिरों के पूजारियों की आमदनी निसंदेह रूप से अच्छी खासी हो गयी है और जितनी कमाई उन्हें साल दो साल में होती है उससे अधिक कमाई इस संक्षिप्त चुनाव अभियान में हो रही है।
2. कौन बड़ा हिन्दू कौन छोटा हिन्दू, कौन नकली कौन असली हिन्दू। यह सिद्ध करने का अभियान इतना तेज चला है कि ऐसा लगने लगा है कि जैसे प्रदेश की राजधानी भोपाल में भाजपा के मानस के दो प्रत्याशी चुनाव लड़ रहें हों। चुनाव असली मुद्दों पर नहीं बल्कि भाजपा बनाम भाजपा जैसा हो गया है। मानसिक घबराहट इतनी ज्यादा है कि किसने जाकर अयोध्या में राम लला के दर्शन के किये, किसने – कितने बार ढोक बजाई यह भी चुनाव प्रचार का मुद्दा है। कांग्रेस के एक नेता ने तो अपना जनेऊ भी दिखाया तथा बताया कि वे कौन से ब्राम्हण है? कौन सा गोत्र है? यह भी खुलासा किया और उज्जैन के महाकाल मंदिर में तो आजकल चुनावबाज नेता परम्परागत धोती लपेट कर अर्धवस्त्रों में पूजा पाठ कर रहे हैं। पता नहीं ऐसी पूजाओं से ये नेता भगवान को बेवकूफ बना रहें हैं या फिर उस निरीह जनता को जो केवल अखबार या मीडिया तक ही अपनी दृष्टि सीमित रखती है। उससे आगे जाने की समझ ही उसने विकसित नहीं की है। कुल मिलाकर एक तो निष्कर्ष यह भी है कि चुनाव के इस पाषाण पूजा के युद्ध में ईश्वर और धर्म, मानवता और सच्चाई चारों हारेगें केवल ताकतवर झूठ जीतेगा।
भारतीय राजनीति और चुनाव कितने अमानवीय और मुद्दे विहीन हो गये है इसकी कल्पना कुछ घटनाओं से की जा सकती है। 5 मई के समाचार पत्रों में प्रमुखता से एक समाचार छपा कि भोपाल में एक गरीब और आदिवासी परिवार जिसके मुखिया का नाम बंटी कौली है कि पत्नी लक्ष्मी कौली ने शीतलदास की बगिया में जाकर अपनी छोटी-छोटी बच्चियों को पहले पोहा और भजिया खिलाया और फिर कूद कर बच्चों सहित जान दे दी। इसकी वजह यह है कि बंटी कौली का बेटा राजा कौली कई दिनों से बीमार था इसके ईलाज के लिये उसके पास पैसे नहीं थे। एक दिन पहले रात में उसकी पत्नी से चर्चा हुई थी। उसने कहा कि उसने निजी बैंक से 15,000/- रूपया कर्जा के लिए आवेदन किया है जो शायद एक दो दिन में मंजूर हो जायगा, और उसने यह भी कहा कि मैं फिर आत्महत्या कर लूगा ताकि बेटे का ईलाज हो जायेगा और तुम्हें कर्ज भी नहीं चुकाना पड़ेगा। उसकी पत्नी ने दुखी: होकर उससे कहा कि ऐसा नहीं कहते। हो सकता है कि बंटी की मन की शंका उसके मन में इतनी गहरी बैठ गई और उसने इसलिये भयभीत होकर अपनी बच्चियों को लेकर स्वयं यह आत्महत्या का फैसला कर लिया हो।
5 मई के समाचार पत्रों को मैंने और भी बारीकी से देखा कि शायद कोई प्रत्याशी इस गरीब बंटी कौली के घर सांत्वना के दो शब्द कहने या फिर उसकी मदद करने पहुंचा हो। परन्तु ऐसा कोई समाचार मेरे पढ़ने में नहीं आया। हिन्दुत्व का यह अमानवीय चेहरा वही लोग बना रहे है जो आजकल दिन रात हिन्दुत्व का नाम लेकर हिन्दुत्व के हँसिये या हारवेस्टर का प्रयोग कर वोट की फसलें काटने की तैयारी में लगे है। इतनी बड़ी दुखद: घटना इन सत्ता आकांक्षी दलों, नेताओं, साध्वी और साधुओं के लिये कोई मुद्दा नहीं है। हो सकता है कि पूँछने पर वे मुस्कुराते हुये यह कह दें कि ”बंटी कौली की पत्नी और बच्चियों को तो मोक्ष मिल गया है।“
महाराष्ट्र के विदर्भ एवं मराठवाडा में जल संकट इतना भयानक है कि वहाँ के समाचार पत्रों में प्रमुखता से छप रहे हैं। 5 मई 19 के समाचार पत्रों में समाचार छपा है कि एक बाल्टी पानी लेने घण्टों इंतजार करना पड़ता है। जल स्त्रोत नदी नाले अभी से सूख चुके है। हालात इतने चिन्ताजनक हैं कि महिलाओं को 5-6 कि.मी. दूर जाकर गड्डों से पानी लाना पड़ रहा है। एक 70 वर्ष की बुजुर्ग महिला के गड्डे में गिरने से कमर की हड्डी टूट गयी। 440 या 450 तापमान में भी महिलायें पानी लेने को जा रही हैं। यहां तक कि गर्मी से उनकी नाक से खून भी बह जाता है। जल संकट की ऐसी स्थिति केवल महाराष्ट्र में ही है। ऐसा नहीं है बल्कि देश के कई अन्य हिस्सों में भी ऐसे ही अमानवीय और सरोकार विहीन चुनावी मुद्दे एवं मुद्दे विहीन राजनीति की कल्पना भी भयाभय है। जहाँ एक तरफ प्रत्याशी एक से एक महँगी वातानुकूलित कारों में दौरे कर रहें हो, लाखों करोड़ों रूपया हवाई जहाज, हैली-कॉपटरों और प्रचार पर खर्च कर रहें हों, लाखों रूपये रोज पूजा-पुजारियों पर खर्च कर रहें हो, वहाँ गरीबी के चलते आत्महत्या और जल के चलते मरती जिन्दगियों का अन्तरविरोध दुखद: है। क्या भारत के मतदाता कभी इन मुद्दों पर विचार कर अपना वोट देंगे?
बंटी कौली की पत्नी की आत्महत्या के पहले उनकी बात-चीत से एक और नया आयाम सामने आया है। अभी तक यह किस्से आम थे कि कर्ज न चुकाने की वजह से किसान आत्महत्या कर रहें हैं अब तो यह हालात हो गयी है कि कर्ज लेकर चुकाना न पड़े, इसलिये लोग आत्महत्या की तैयारी कर रहें हैं। ऐसे चुनावों में कुछ नहीं बदलेगा, अंतत: जनता फिर हारेगी।

तू मूर्ख, मैं महामूर्ख !
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अब ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ फिर से राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गई है। सितंबर 2016 में जब सरकार ने प्रचार किया था कि उसने पाकिस्तान पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की है, तभी मैंने लिखा था कि यह ‘फर्जीकल स्ट्राइक’ है। हमारे प्रचार मंत्रीजी को यह पता ही नहीं है कि ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ क्या होती है ? लेकिन प्रचार मंत्रीजी की ताकत का लोहा मानना पड़ेगा कि उन्होंने कांग्रेस को अब मजबूर कर दिया है कि वह भी अपनी ‘सर्जिकल स्ट्राइकों’ की डोंडी पीटने लगी है। उसका कहना है कि अगर मोदी ने एक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की है तो मनमोहनसिंह ने छह की थी लेकिन उसका प्रचार नहीं किया था। कांग्रेस ने उन स्ट्राइकों के नाम और तिथि भी प्रसारित की है। यह ऐसा ही है कि जैसे अखाड़े में भिड़ रहे दो पहलवानों में से पहला कहे कि मैं मूर्ख हूं तो दूसरा अपने आप को बड़ा सिद्ध करने के लिए कहे कि मैं महामूर्ख हूं। इन सर्जिकल स्ट्राइक करनेवाली सरकारों से कोई पूछे कि आपकी ये फौजी शल्य-चिकित्सा क्या मजाक साबित नहीं हुई हैं ? ऐसी फौजी कार्रवाइयां नरसिंहरावजी, अटलजी और डाॅ. मनमोहनसिंह की सरकारें दसियों बार कर चुकी हैं लेकिन उन्होंने कभी इनके नगाड़े नहीं पीटे। वे नगाड़े पीटने लायक थीं भी नहीं। सर्जिकल स्ट्राइक के नगाड़े पीटने की जरुरत ही नहीं पड़ती है। अगर वे सचमुच हों तो अपने आप नगाड़े पिटने लगते हैं। 1967 में इस्राइल ने जब मिस्र के सैकड़ों जहाज एक ही झटके में उड़ा दिए थे, 1976 में इस्राइली कमांडो ने उगांडा के एंटेबी हवाई अड्डे और 1981 में ओसीराक के परमाणु-संयंत्र पर हमला किया था, 1983 में जब अमेरिका ने सद्दाम के एराक पर खंजर भौंका था, अफगानिस्तान में फजलुल्लाह का सिर कलम किया था और पाकिस्तान के जबड़े से उसामा बिन लादेन को खींच लाया था, तब कहा जा सकता था कि यह सर्जिकल स्ट्राइक हुई है। आपकी स्ट्राइकों में आपने क्या किया, सद्दाम और उसामा तो क्या, आप एक मच्छर भी नहीं मार सके। आपकी सर्जिकल स्ट्राइकों के बावजूद आपकी संसद पर हमला हुआ, आपकी मुंबई की होटलों पर आतंकी टूट पड़े, आपके फौजी अड्डों पर भी मार पड़ गई, पुलवामा में सामूहिक हत्याकांड हो गया। यदि एक भी सच्ची सर्जिकल स्ट्राइक हो जाती तो पाकिस्तान कश्मीर का नाम ही भूल जाता। सर्जिकल स्ट्राइक के जो वीडियो हमारी सरकार ने दिखाए, वे भी इतने बेजान थे कि उन्हें देखने के बाद लग रहा था कि सरकार खुद ही सिद्ध कर रही है कि उसकी सर्जिकल स्ट्राइक कितनी फर्जी थी। अब इस फर्जीवाड़े में देश की दोनों पार्टियां फंस गई हैं।

आतंकी मसूद अज़हर पर प्रतिबन्ध और प्रधान सेवक
डॉक्टर अरविन्द जैन
जब किसी मोटी लकड़ी या पीढ़ को कुल्हाड़ी से काटा जाता हैं तब उसको काटने में मानलो 20 घाव लगे और 21 वे घाव में कटी तो यह नहीं मानना चाहिए की 20 घाव अकारथ गए। इसी प्रकार मसूद अजहर के सम्बन्ध में जो आज सफलता मिली उसमे प्रधान सेवक अपनी स्वयं की पीठ थपथपा रहें हैं यह बहुत हास्यपद हैं। इस प्रक्रिया में वर्ष २०००,२०१६ ,२०१७, औरमार्च २०१९ में असफलता मिली थी उस समय प्रधान सेवक क्यों चुप्पी बांधे रहें।
प्रधान सेवक वैसे विदूषक हैं और उनके पास लफ़्फ़ाज़ी के अलावा विशेष कुछ नहीं हैं ,बढ़ चढ़कर बोलना और इस समय चुनाव की गर्मी और मौसम की गर्मी के कारण उनके दिमाग को नवरत्न कोई तेल की जरुरत हैं और जब उन्होंने अपने कार्यकाल में इतनी उपलब्धियां प्राप्त करि ली हैं या थी तो इतने क्यों परेशां हो रहे हैं .और उन्होंने सत्ता की सर्वोच्च संस्थाओं को अपने गिरफ्त में कर रखा हैं की उनके प्रतिकूल कोई भी किसी प्रकार की टिप्पणी नहीं करना चाहता। वर्तमान में चुनाव आयोग उनका गुलाम बना हैं। ऐसी स्थिति हो गयी हैं की —
वो क़त्ल भी करते हैं तो चरचा नहीं होती ,
और हम भी बरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम।
उच्च भी बोलना चाहते हैं जैसे मनोरोगी की हालत होती हैं। कभी कहेंगे की कोई उनको मार डालना चाहता हैं। एक बात ध्यान देने योग्य हैं की नेता ,की मौत से देश को को हानि नहीं होते कारण उनके पीछे बहुत लम्बी कतार होती हैं ,हाँ हानि होती हैं लेखक। वकवि ,साहित्यकार संगीतकार, कलाकार,रंगकर्मी ,वैज्ञानिक आदि की। नेता देश के भार होते हैं ,वे अपराधों के जनक और संरक्षक होते हैं ,वे स्वयं गुंडे बदमाश लुच्चे लफंगे होते हैं।
अजहर मसूद के प्रतिबन्ध से क्या आतंकवाद समाप्त हो जाएगा। आतंकवाद का कीड़ा दुगनी मात्रा में बढ़ता हैं जैसे अमीबा होता हैं। जब तक उसके सर पर वहां की सरकार का हाथ रहेगा उसको कोई चिंता नहीं हैं और वहां की सरकार इनकी दम पर चलती हैं। इनका नेटवर्क इतना बड़ा होता हैं की पाकिस्तान का प्रधान मंत्री या राष्ट्रपति या सेना कब कितनी सांस लेती हैं उनको पहले पता चलता हैं। वे इतने खूंखार होते हैं की जब वो हत्या करने या कराने के बाद हाथ नहीं धोते तब वे इन प्रतिबंधों से कैसे डरेंगे और क्यों डरेंगे।
इनकी मानसिकता खून खराबा करने की होती हैं ,ये लोग रोज अपनी जान हथेली पर रखकर चलते हैं की उनको मौत से दर नहीं लगता हैं ,वे तो खुद मौत के सौदागर हैं और उनके लिए मौत के घात उतारना सामान्य बात हैं।
प्रधान सेवक को अभी नवरत्न तेल की जरुरत हैं और भाषा पर नियंत्रण न रखना और चुनाव आयोग के द्वारा उन्हें क्लीन चिट देना उनको और मुंहफट बनाने का प्रमाण पत्र देना हैं।
प्रतिबन्ध के क्या परिणाम होंगे यह तो समय बताएगा कारण उस पर कार्यवाही करने का दायित्व पाकिस्तान सरकार का हैं और वह स्वयं वैशाखी पर चलती हैं तो वह क्या कार्यवाही करेंगी। और प्रधान सेवक दिवास्वप्न देखने और दिखाने में माहिर हैं। उनके द्वारा देश की मुलभुत समस्याओं से निपटने को कोई कारगर मार्ग नहीं ढूंढा और अब हवा हवाई हो रहे हैं। रोजगार किसानों की समस्याएं ,भिक्षा स्वास्थ्य व्यापार की स्थिति दयनीय हैं ,कोई रोजगार सृजन नहीं किया ,जो था उसे चौपट किया।
आत्मप्रशंसा और परनिंदा ही उनका मूल उद्देश्य हैं ,सबसे पहले नींद से उठने के बाद ध्यान में नेहरू गाँधी परिवार का ध्यान करते हैं ,इतना नाम भगवान् का लिया होता तो शायद कोई सिद्धि मिल जाती। ये दो गले के हैं अंदर कुछ और बाहर कुछ।इनसे अब कोई भी संतुष्ट नहीं हैं। चुनाव में प्रबंधन करना हैं और सत्ता में होने से सुगम और सरल हैं। छोटो छोटी सफलता से कुछ नहीं होने वाला ,जमीनी हकीकत होना चाहिए।

चार चुभते हुए मामले
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आज अदालत के चार मामलों ने देश में बड़ी खबरें बनाईं। एक तो प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगाई का मामला, दूसरा राहुल गांधी की माफी, तीसरा किरन बेदी पर लगाम और चौथा नारायण सांई की उम्र-कैद का मामला। रंजन गोगोई पर लगे यौन-उत्पीड़न के आरोप की सुनवाई का पीड़ित महिला ने बहिष्कार कर दिया। उसका कहना है कि तीन जजों की वह कमेटी उसे इतना डरा-धमका रही थी और उसकी नौकरी बहाल करने का लालच भी दे रही थी कि उसे यह समझ नहीं पड़ रहा था कि यह उसके आरोपों की न्यायिक जांच है या कुछ और है। उसकी शिकायत यह भी है कि न तो वहां होनेवाली बातचीत का कोई रेकार्ड रखा जा रहा था और न ही उसकी मदद के लिए किसी वकील या साथी को वहां बैठने दिया जा रहा था। उसे यह भी हिदायत थी कि वहां हुई बातचीत को वह गोपनीय रखे। इसमें शक नहीं कि उस महिला को कई प्रसिद्ध वकीलों का समर्थन मिल रहा है। लेकिन यह मामला इतना उलझ गया है कि पहले तो प्रधान न्यायाधीश और अब उस जजों की न्यायिक जांच कमेटी पर भी प्रश्न-चिन्ह लग गए हैं। राहुल गांधी को सर्वोच्च न्यायालय से माफी मांगने पर मजबूर होना पड़ा लेकिन राहुल अभी भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उनका आचरण देश की सबसे महान पार्टी के अध्यक्ष के लायक नहीं है। पुद्दुचेरी की उप-राज्यपाल किरन बेदी को मद्रास उच्च न्यायालय ने फटकार लगाई है। जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को दरकिनार करके अपनेवाली चलाना कहां तक ठीक है ? किरनजी को अब अपनी पुरानी पुलिसवाली आदत छोड़कर संवैधानिक मर्यादा में रहना होगा। चौथा मामला आसाराम के कुपुत्र नारायण सांई का है। उसे अदालत ने उम्र-कैद से नवाजा है। एक साध्वी के साथ बलात्कार और व्यभिचार करने की यह सजा है। जैसा बाप वैसा बेटा ! आसाराम को मैंने झांसाराम और निराशाराम की उपाधि दी थी। अंदाजा है कि नारायण की मां और बहन भी शीघ्र ही जेल जाएंगी। इस परिवार ने साधु-संतों और संन्यास की जितनी बदनामी की है, उतनी शायद ही किसी ने की हो। ये अकेले नहीं हैं। इनके जैसे कई हैं। सच्चे साधु तो बस गिनती के ही हैं। इन पाखंडी साधुओं से भी ज्यादा दोष उन अंधभक्तों का है, जो भगवा वस्त्र देखते ही अपना दिमाग ताक पर रख देते हैं।

खाद्य विशेषज्ञों की भ्रमित सलाह
डॉक्टर अरविन्द जैन
वर्तमान सेलिब्रटी न्यूट्रिशनिस्ट प्रचलन में चल रही भ्रांतियों को दूर करते हैं जैसे देशी घी अच्छा हैं वशर्ते दिन में दो -तीन चम्मच ही लिया जाए। दूसरा कई अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के खाने के बारे में बताना कि वे वीगन फ़ूड ,सलाद और सब्जियों का रस लेते हैं। यहाँ तक कि बात बहुत हद तक ठीक और अनुकरणीय हैं और मान्य है। तथा जो दूषित दूध है उसको कम करें यह भी ठीक है। इसके साथ ही खाद्य विशेषज्ञ बच्चों के लिए नाश्ता में प्रोटीन के लिए अंकुरतित अन्न ,पोहा आदि लेना चाहिए बताने के साथ अंडे का प्रयोग करने की बात करते हैं तो उनके बताए पर प्रश्न चिन्ह लगता है।
इसके साथ शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने विटामिन बी १२ और जिंक के साथ मीट, अंडे, मछली और दूध से मिलता हैं वही मीट और अंडे मछली के अलावा काजू बादाम, चना, मटर सोया प्रॉडक्ट्स में जिंक मिलता हैं। इसके साथ वकालत की जाती है कि संतुलित आहार दाल रोटी सब्जी से ही शक्ति मिलत्ती हैं।
इसके अलावा कोर्बोहड्रेटपर भी योग्य प्रकाश डाला जाता है और ऑर्गनिक सब्जी अन्न का उपयोग करने कि सलाह दी जाती है। यहां कहना पड़ता है कि उनके द्वारा अंडा मछली मीट के उपयोग के बारे में जो सलाह दी जाती है और प्रेरित किया यह अवैज्ञानिक हैं। और दोनों विपरीत ध्रुव हैं।
शाकाहार, अहिंसा, जीव दया के क्षेत्र में काम करने वालों के पास दस्तावेजी साक्ष्य हैं जिसमे स्पष्ट इंगित किया गया हैं कि मछली, अंडा, मांस प्राकृतिक भोजन नहीं हैं ये स्वास्थ्य के लिए पूर्णतः हानिकारक हैं इन्हे विषाहार कहा जाता हैं। ये स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी करते हैं। और कैंसर हृदय किडनी आदि गंभीर बीमारियोंको आमंत्रित करती हैं। एक तरफ आप जैविक खाद्य, साग सब्जी के बारे में प्रोत्साहन देते हैं और दूसरी और अभक्ष्य और दूषित आहार की वकालत करतं हैं। जहां तक प्रोटीन की बात है तो सोया और चना के साथ आप मूंगफली से १००% प्रोटीन ले सकते हैं।
१०० ग्राम सोयाबीन में ४५।२ ग्राम प्रोटीन मिलता हैं, मूंगफली में ३२।५ ग्राम प्रोटीन और चना में २३।५ ग्राम प्रोटीन मिलता हैं इस प्रकार ३००ग्राम में आपको १०० ग्राम प्रोटीन मिलेगा। इसके अलावा आर्थिक रुप से सोयाबीन १०० ग्राम ५ रुपये ,मूंगफली १५ रुपये और चना १५ रुपये इस प्रकार ३५ रुपये में आपको १०० ग्राम शुद्ध प्रोटीन के अलावा अन्य खनिज तत्व मिलते हैं जबकि अंडा १०० ग्राम में १४।३ ग्राम प्रोटीन, एक अंडा का वजन २५ ग्राम तो ४ अण्डों में १४।३ ग्राम प्रोटीन और सौ ग्राम अंडे से प्रोटीन पाने के लिए लगभग ३० अंडे लगेंगे जिनकी कीमत ६ रुपये के हिसाब से १८० रुपये खर्च करने पड़ेंगे और अशुद्ध, हानिकारक तत्व मिलेंगे, इसी प्रकार मछली और मांस में भी प्रोटीन नगण्य होता हैं और महंगा के साथ मौत का आमंत्रण होता हैं।
इस विषय पर बहुत शोध और साहित्य उपलब्ध हैं जिससे सिद्ध होता हैं कि अंडा ,मछली और अंडा सामान्यतः स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं, जबकि उनके विकल्प हमारे पास बहुत प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।
हम अहिंसा प्रधान देश कि निवासी हैं तो हमें अधिकतम शाकाहार का प्रयोग करना चाहिए। वैसे खान पान व्यक्तिगत विषय पर जन सामान्य को ऐसी बातों के लिए प्रत्साहित नहीं करना चाहिए। जिनसे असाध्य बीमारियां ही फैलती हैं और जिनका इलाज मौत हैं। विचार करें कि जब हम बीमार होते हैं तब हम दाल रोटी सब्जी खाते हैं या मांस मछली अंडा खाते हैं !

लोकतंत्र में नोटा की सार्थकता
योगेश कुमार गोयल
71 वर्ष पूर्व देश की आजादी के समय भारत में लोकतंत्र की स्थापना करते हुए जिस आम आदमी को इस लोकतंत्र की महत्वपूर्ण नींव माना गया था, वह आम आदमी हर पांच साल बाद इस भरोसे के साथ मतदान करते हुए सरकार का चयन करता है कि चुनी जाने वाली सरकार उसके दुख-दर्द को समझेगी और उसकी तरक्की के लिए हरसंभव जरूरी कदम उठाएगी किन्तु इस आदमी का भरोसा हर बार टूटता रहा और यह सिलसिला यथावत चला आ रहा है। इसके चलते मतदाताओं के मन में रोष पनपता गया क्योंकि चुनावों के दौरान उसके समक्ष कोई विकल्प मौजूद नहीं था लेकिन कुछ वर्ष उसे ‘नोटा’ के रूप में एक ऐसा विकल्प मिला, जिसके जरिये वो चुनाव में पसंद न आने वाले सभी उम्मीदवारों को नकार सकता है। ‘नोटा’ का अर्थ है ‘नन ऑफ द अबॉव’ अर्थात् इनमें से कोई नहीं। गत वर्ष हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में जिस प्रकार करीब 12 लाख मतदाताओं ने सभी उम्मीदवारों को खारिज करते हुए ‘नोटा’ के विकल्प को चुना था, उसके बाद से ही नोटा चर्चा में है और फिलहाल हो रहे लोकसभा चुनाव के इस दौर में लोकतंत्र में नोटा की सार्थकता पर चर्चा करना और भी जरूरी हो गया है। अनुमान लगाया जा सकता है कि चुनाव में जहां एक-एक वोट की अत्यधिक महत्ता होती है, वहां पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में 12 लाख नोटा वोटों का कितना महत्व रहा होगा।
आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा छत्तीसगढ़ में 2.1 फीसदी वोट नोटा के खाते में गए थे, जहां आप को 0.9प्रतिशत, सपा और राकांपा को 0.2 तथा भाकपा को 0.3प्रतिशत वोट मिले थे। मध्य प्रदेश में डेढ़ फीसदी अर्थात् 5 लाख 42 हजार मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था, जहां नोटा को सपा तथा आप से भी ज्यादा वोट मिले, जिन्हें क्रमशः 1 तथा 0.7 फीसदी वोट मिले थे। यहां 22सीटों पर तो नोटा वोटों की संख्या हार-जीत के अंतर से भी अधिक रही थी जबकि राजस्थान में 15सीटों पर ऐसा ही हाल देखा गया था, जहां सपा को सिर्फ 0.2 फीसदी वोट मिले थे जबकि सभी दलों के उम्मीदवारों को नकारते हुए नोटा पर 1.3 फीसदी मतदाताओं ने भरोसा जताया था। तेलंगाना में माकपा व भाकपा को 0.4 फीसदी तथा राकांपा को 0.2प्रतिशतमत प्राप्त हुए थे जबकि नोटा के खाते में 1.1प्रतिशतमत पड़े थे। मिजोरम में भी 0.5प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा को अपनाया था।
अगर 2017 में हुए पांच विधानसभा चुनावों में नोटा के इस्तेमाल की बात करें तो सभी राज्यों में कई उम्मीदवारों की हार-जीत में नोटा एक बड़ा कारक बनकर उभरा था। उन विधानसभा चुनावों में नोटा को कुल 936503 वोट मिले थे, जिन्हें किसी भी दृष्टि से नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। उत्तर प्रदेश में नोटा को 0.9प्रतिशत अर्थात् करीब 7.58 लाख वोट मिले, जो सीपीआई, एआईएमआईएम तथा बीएमयूपी को मिले कुल मतों से भी ज्यादा थे। इसी प्रकार उत्तराखंड में 50408 लोगों ने नोटा को पसंद किया था और एक प्रतिशत वोट हासिल करते हुए नोटा भाजपा, कांग्रेस तथा बसपा के बाद चौथे स्थान पर रहा था। पंजाब में नोटा को 0.7प्रतिशत अर्थात् एक लाख 84 हजार लोगों ने पसंद किया था जबकि मणिपुर में 0.5 फीसदी अर्थात् 9062 लोगों ने नोटा का बटन दबाया था। गोवा में नोटा को कुल मतों के 1.2 फीसदी वोट मिले थे और नोटा को पसंद करने वाले लोगों की संख्या 10919 रही। 2016 में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तो 831835 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था, जो कुल मतदान का डेढ़ फीसदी रहा। तमिलनाडु में 557888 मतदाताओं ने जबकि केरल में 1 लाख 7 हजार मतदाताओं ने नोटा बटन दबाया था।
हालांकि बहुत से लोगों और खासकर राजनीतिक दलों द्वारा कहा जाता रहा है कि नोटा बटन दबाने से मतदाता का वोट बर्बाद हो जाता है क्योंकि कानून के मुताबिक नोटा को मिले मत अयोग्य माने जाते रहे हैं और चुनाव में हार-जीत का निर्णय योग्य वोटों के आधार पर ही होता है। उम्मीदवारों की जमानत जब्त करने के लिए भी नोटा वोटों को वैध नहीं माना जाता। दरअसल अभी तक नोटा को मिले मतों का मतगणना पर कोई असर नहीं पड़ता था क्योंकि अगर किसी चुनाव क्षेत्र में नोटा को सभी उम्मीदवारों से अधिक मत भी मिल जाते थे तो भी सर्वाधिक मत पाने वाला उम्मीदवार ही विजयी होता था। दरअसल मतगणना के दौरान भले ही नोटामतों की गिनती उसी प्रकार की जाती रही है, जिस प्रकार उम्मीदवारों के मतों की गिनती होती है लेकिन नोटा को मिले मतों की वजह से चुनाव निरस्त नहीं होता किन्तु गत वर्ष हरियाणा नगर निगम चुनावों में राज्य निर्वाचन आयोग की ऐतिहासिक पहल के बाद नोटा की सार्थकता लोकतंत्र में पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ गई है।
हमें यह समझने की दरकार है कि नोटा वोटर वे मतदाता नहीं हैं, जो कोई न कोई बहाना बनाकर मतदान करने से बचते हैं और चुनाव उपरांत दूषित राजनीतिक व्यवस्था को कोसने में अपनी ऊर्जा नष्ट करते हैं बल्कि वे ऐसे वोटर हैं, जो किसी के बहकावे में आकर सिर्फ वोट देने के लिए ही मतदान प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनते बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखते हुए लंबी-लंबी कतारों में लगकर मतदान करते हैं और अपना स्पष्ट विरोध दर्ज कराते हैं, इसलिए ‘नोटा’ को वोट बर्बाद करने वाला औजार मानना उचित नहीं। वास्तव में नोटा वर्तमान दूषित राजनीति में बदलाव को गति देने का हथियार है। कुछ वर्ष पहले तक चुनाव के दौरान बहुत से लोगों से प्रायः यही सुनने को मिलता था कि वे बहती हवा को देखकर अर्थात् जीत की संभावना वाले प्रत्याशी को अपना वोट देंगे वरना उनका कीमती वोट बर्बाद हो जाएगा किन्तु नोटा ने मजबूरी में जीत की संभावना वाले प्रत्याशी को वोट न देने की स्थिति में वोट बर्बाद हो जाने की धारणा को तोड़ने में अहम भूमिका निभाई है।
ऐसे में बेहतर यही है कि ‘नोटा’ कानून में संशोधन करते हुए हरियाणा निर्वाचन आयोग की पहल को समूचे देश में लागू किया जाए ताकि लोकतंत्र में नोटा की सार्थकता और उपयोगिता बढ़े और यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को नए आयाम प्रदान करते हुए सौ फीसदी मतदान की दिशा में सार्थक भूमिका निभा सके। बहरहाल, नोटा लोकतांत्रिक व्यवस्था में मजबूती के साथ अपनी सार्थकता साबित कर सके, इसके लिए जरूरी है कि आमजन को ‘नोटा’ की व्यवस्था और उसके महत्व के बारे जागरूक करने के लिए व्यापक स्तर पर अभियान चलाया जाए और उन्हें बताया जाए कि नोटा उनका ऐसा एकमात्र सशक्त अधिकार है, जिसके जरिये वे अपने लोकतांत्रिक उत्तरदायित्वों के निर्वहन के साथ राजनीतिक दलों को राजनीति में शुचिता, नैतिकता एवं ईमानदारी बनाने के लिए योग्य उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारने पर विवश कर सकते हैं।

एयर इंडिया, किंगफिशर, जेट के बाद अब पवनहंस
सनत जैन
भारत में हवाई सेवाओं की स्थिति बद से बदहाल स्थिति में पहुंच गई है। सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी एयरइंडिया आर्थिक रुप से पहिले से ही बदहाल है। विजय माल्या की किंगफिशर बंद हो चुकी है। किंगफिशर में हुए घाटे और बैंक का कर्ज नहीं चुका पाने के कारण विजय माल्या भारत छोड़कर विदेश भाग गए है। यह क्रम रुका नहीं, अब जेट एयरवेज, बैंक का कर्ज नहीं चुका पाने और आर्थिक बदहाली के कारण बंद होने की कगार पर है। कई महीनों से इसके पायलट और कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला। यात्रियों ने जो टिकट एडवांस में खरीदे थे। उड़ाने रद्द होने पर जेट एयरवेज यात्रियों का पैसा वापिस नहीं कर रही है। जेट एयरवेज के अध्यक्ष नरेश गोयल ने इस्तीफा दे दिया है। नया बोर्ड बना, वह भी जेट एयरवेज की सेवायें शुरु नहीं कर पाया। बैंकों ने आगे फायनेंस करने से मना कर दिया। सरकार ने भी कोई मदद नहीं की। हजारों कर्मचारियों को कई माह से वेतन नहीं मिलने के कारण वह सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे है। जेट एयरवेज का एक कर्मचारी जो कैंसर की बीमारी से जूझ रहा था। उसने आत्महत्या कर ली।
अब पवनहंस एयरवेज आर्थिक संकट में आ गई है। 2018-19 में इस सरकारी कम्पनी को 89 करोड़ का घाटा था। बैंकों का इस कम्पनी पर हजारों करोड़ रुपया बकाया है। कर्मचारियों को कम्पनी अप्रैल माह से वेतन भी नहीं दे पाएगी। एयरवेज सेक्टर की यह स्थिति क्यों बनी। इसको लेकर सभी पक्ष मौन है। पिछले एक माह से भारत की हवाई सेवायें अस्त-व्यस्त हैं। यात्री लगातार परेशान हो रहे है। हाल ही में एयरइंडिया का सर्वर खराब हो जाने से यात्री कई घंटों परेशान होते रहे। हवाई यात्राओं में इस तरह की अराजक स्थिति इससे पहिले कभी नहीं देखी गई।
फ्यूल की बढ़ती कीमतें एयरपोर्ट में विमानों की लैंडिंग शुल्क, रखरखाव, हेंगर इत्यादि के शुल्क कई गुना बढ़ा दिए गए है। एयरवेज कम्पनियों ने भी बैंकों से कर्ज लेकर बेतहाशा खर्च और हेराफेरी की। जिसके कारण आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया की स्थिति पिछले तीन वर्षों से बनी हुई है। सरकार एवं बैंकों ने ऑख मूंदकर रखी थी। जिसके कारण देश की हवाई सेवायें अस्त-व्यस्त हो गई। वहीं भारत की चौथी हवाई कम्पनी घाटे के कारण औने-पौने दामों में बिकने जा रही है।
पिछले पांच वर्षों में देश की सार्वजनिक क्षेत्र की कई कम्पनियां आर्थिक रुप से घाटे में चल गई हैं। भारत संचार निगम की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स को वेतन बांटने के लिए बैंक से कर्ज लेना पड़ा, ओएनजीसी जैसी नवरत्न कम्पनी भी सरकार की गलत नीतियों के कारण आर्थिक बदहाली की शिकार हो गई है। सार्वजनिक क्षेत्र की लगभग सभी कम्पनी आर्थिक रुप से पिछले वर्षों में बीमार हो गई हैं। वहीं निजी क्षेत्र की रिलायंस जैसी कम्पनियां भारी मुनाफा कमा रही है। पिछले कई दशकों से अरबों रुपया निवेश करके सार्वजनिक क्षेत्र की जो कम्पनियां बेहतर प्रदर्शन कर रही थी। पिछले वर्षों में सरकार के गलत निर्णयों से यह बंद होने की कगार पर पहुंच गई है। सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों को निजी क्षेत्र को सौंपने की साजिश की बात राजनैतिक एवं सचिवालय के गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। चर्चाओं के अनुसार भारत संचार निगम और ओएनजीसी जैसी कम्पनियों को रिलायंस समूह अधिग्रहित करना चाहता है। एयरइंडिया को लेकर टाटा समूह ने अपनी रुचि जताई थी। उसके बाद से ही सार्वजनिक क्षेत्र की नवरत्न एवं प्रमुख कम्पनियां तेजी से आर्थिक बदहाली की शिकार हुई है। जीवन बीमा निगम जैसी कम्पनियों का सरकार ने घाटे की कम्पनियों में निवेश कराकर भारतीय जीवन बीमा निगम की स्थिति भी काफी कमजोर कर दी है। सरकार इस ओर कोई ध्यान क्यों नहीं दे रही है। इसको लेकर तरह-तरह की चर्चायें हैं।

न्यायपालिका की अग्नि-परीक्षा
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हमारे सर्वोच्च न्यायालय की इज्जत दांव पर लग गई है। पहले तो प्रधान न्यायाधीश रंजन-गोगोई पर यौन-उत्पीड़न का आरोप लगा और अब एक वकील ने अपने हलफनामे में दावा किया है कि जस्टिस गोगोई को फंसाने के लिए कुछ ताकतवर लोगों ने यह षड़यंत्र रचा है। उस वकील ने बंद लिफाफे में सारा मामला उजागर करते हुए लिखा है कि जो लोग गोगोई को फंसाना चाहते हैं, उन्होंने उनके यौन-अत्याचार पर दिल्ली में प्रेस-कांफ्रेंस करने के लिए उन्हें डेढ़ करोड़ रु. देने की भी पेशकश की थी। यह सचमुच बड़ा गंभीर आरोप है। इसकी जांच की जिम्मेदारी सेवानिवृत्त न्यायाधीश ए.के. पटनायक को दी गई है और उन्हें यह अधिकार भी दे दिया गया है कि वह सरकार की प्रमुख जांच एजेंसियों और पुलिस की सहायता भी ले सकते हैं। इस जांच को उस जांच से अलग रखा गया है, जो उस महिला के आरोपों के यौन-उत्पीड़न की जांच करेगी। याने एक साथ दो जांचें होंगी। कहा नहीं जा सकता कि इन दोनों जांचों में से क्या निकलेगा लेकिन आशा है कि ये जांचें निष्पक्ष होंगी। यौन-उत्पीड़न की जांच कमेटी के एक जज ने अपने आपको उससे अलग कर लिया है, क्योंकि उस यौन-पीड़ित महिला ने उनके बारे में शक प्रकट किया था। इस आतंरिक कमेटी में अब दो महिलाएं हो गई हैं। जो दूसरी कमेटी है, वह जस्टिस पटनायक की है। जस्टिस पटनायक अपनी निर्भीकता और निष्पक्षता के लिए विख्यात हैं। पहले भी इसी तरह के मामलों में वे दो-टूक फैसले दे चुके हैं। यदि उस वकील के आरोप सही साबित हो गए तो देश की न्यायपालिका और राज्य-व्यवस्था की प्रामणिकता पर गहरा संदेह उत्पन्न हो जाएगा। यह मामला उस गहरे षड़यंत्र को उजागर करेगा, जो निष्पक्ष न्याय के विरुद्ध सत्ताधीश और धनाधीश  लोग करते रहते हैं। न्यायपालिका को पथ-भ्रष्ट करनेवाले इन तत्वों को यदि कठोरतम सजा नहीं दी गई तो देश में न्याय की हत्या के ये निर्मम और अदृश्य षड़यंत्र जारी रहेंगे। उसका यह लाभ जरुर होगा कि जस्टिस गोगोई इस अग्नि-परीक्षा से यदि सही-सलामत बच निकले तो उनकी प्रतिष्ठा और न्यायपालिका की प्रतिष्ठा बची रह जाएगी।

वंशबेल के सहारे : कौन पहुंचेगा हरियाणा से लोकसभा के द्वारे ?
जग मोहन ठाकन
हरियाणा में मौसमी तापमान के साथ साथ राजनैतिक पारा भी चुनावी गर्माहट का अहसास करा रहा है। तीन लालों की धरती हरियाणा में लोक सभा के चुनाव 12 मई को होंगे। कभी बंसीलाल, देवीलाल तथा भजन लाल के इर्द गिर्द घूमने वाली राजनीति आज एक नए लाल, भाजपा के वर्तमान मुख्यमंत्री मनोहर लाल की परिक्रमा करती नज़र आ रही है। चाहे कांग्रेस हो, जेजेपी हो या पारिवारिक लड़ाई में धरातल खो चुकी इंडियन नेशनल लोकदल पार्टी या अन्य छुट- पुट पार्टी हो, सभी का पब्लिक के सामने प्रस्तुत व प्रचारित किया जा रहा एक ही मुख्य टारगेट दिखता है – वर्तमान लाल यानि भाजपा को हराना। यह बात इतर है कि कुछ पार्टियों के खाने के दांत अलग हैं और दिखाने के अलग।
कभी हरियाणा की राजनीति के धुरंधर रहे दिवंगत नेताओं के तीसरी व चौथी पीढ़ी के वंशज अपने खुद के कार्यों एवं गुणों की बजाय अपने दादाओं और परदादाओं के नाम पर आज भी लोक सभा की सीढियों पर चढ़ने को प्रयासरत हैं और अपने भाषणों में अपने पूर्वजों के यशोगान व बलिदानों की कहानियां सुनाकर चुनाव की वैतरणी पार करना चाह रहे हैं, उन्हें कितनी सफलता मिलेगी, यह तो 23 मई को ही पता चलेगा। कुल दस लोकसभा सीटों में से आठ सीटों पर पुराने धुरंधरों के ग्यारह वंशज लिगेसी के दम पर ताल ठोक रहे हैं। हालांकि भारतीय राजनैतिक क्षितिज पर जब भी कोई वंशवाद / परिवारवाद के नाम पर टीका –टिपण्णी होती है तो केवल नेहरु –गाँधी परिवार का ही नाम उभारा जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि हर प्रदेश व हल्का स्तर तक वंशवाद के नाम पर राजनैतिक फायदा उठाने में कोई भी दल पीछे नहीं है।
वंशवाद के आसरे वोट बटोरने हेतु कांग्रेस ने भिवानी (श्रुति चौधरी –बंशीलाल ), रोहतक व सोनीपत (दीपेंदर हुडा / भूपेंदर हुडा –चौधरी रणबीर सिंह), हिसार ( भव्य बिश्नोई-भजन लाल ), अम्बाला ( कुमारी शैलजा –दल बीर सिंह ), करनाल ( कुलदीप शर्मा पुत्र चिरंजीलाल शर्मा ) ; भाजपा ने हिसार ( ब्रिजेंदर सिंह –बिरेंदर सिंह / चौधरी छोटूराम ), गुरुग्राम ( राव इन्दर जीत सिंह –राव बिरेंदर सिंह ) ; इंडियन नेशनल लोकदल ने कुरुक्षेत्र ( अर्जुन चौटाला –ओमप्रकाश चौटाला/ चौधरी देवीलाल ) तथा जन नायक जनता पार्टी ने हिसार (दुष्यन्त चौटाला –ओमप्रकाश चौटाला /चौधरी देवीलाल ) तथा सोनीपत (दिग्विजय चौटाला -–ओमप्रकाश चौटाला /चौधरी देवीलाल ) लोकसभाई क्षेत्रो से पुराने राजनैतिक घरानों के पहलवान मैदान में उतारे हैं।
सबसे ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री एवं उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल के वंशजों ने कमर कसी है। देवीलाल के तीन प्रपोत्र –दुष्यन्त हिसार से, दिग्विजय सोनीपत से तथा अर्जुन चौटाला कुरुक्षेत्र से महाभारत का युद्ध लड़ रहे हैं।
देवीलाल के इन वंशजों में सत्ता हासिल करने की इतनी ललक जगी है कि उन्होंने अपनी दादा-परदादा की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल को विभाजित कर एक अन्य नए दल जननायक जनता पार्टी, जे जे पी, का गठन तक कर डाला। हरियाणा की कुल दस लोकसभा सीटों में से तीन सीटों पर चौधरी देवीलाल के वंशज चुनाव मैदान में उतरे हैं। हिसार सीट से देवीलाल के प्रपोत्र एवं पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के पौत्र वर्तमान सांसद दुष्यन्त चौटाला (जेजेपी) दुबारा संसद में जाने को लालायित हैं। उनका मुकाबला भी पुराने राजनीतिज्ञों के वंशजों से है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी भजन लाल के पौत्र भव्य बिश्नोई (कांग्रेस ) तथा आजादी से पूर्व के संयुक्त पंजाब में ताकतवर मंत्री तथा किसान नेता रहे चौधरी छोटू राम के दोहते एवं वर्तमान में केंद्र में भाजपा सरकार में मंत्री बिरेंदर सिंह, के पुत्र हाल में आईएएस की नौकरी को तिलांजलि दे राजनीति के माध्यम से समाज सेवा का सपना पालने वाले ब्रिजेंदर सिंह(भाजपा ) दुष्यन्त की सीट छीनने को आतुर हैं। हिसार की यह सीट तय कर देगी कि किसकी लिगेसी आज भी कायम है।
गुरुग्राम सीट से हरियाणा के मात्र आठ माह ( 24.03.1967 से 02.11.1967 ) मुख्यमंत्री रहे राव बिरेंदर सिंह के पुत्र राव इंद्र जीत सिंह, जो 1998, 2004, 2009 में कांग्रेस के सांसद रहे हैं, 2014 में पाला बदल कर भाजपा से सांसद बने और अब पुनः 2019 के चुनाव में भाजपा की टिकट पर सांसद बनने का प्रयास कर रहे हैं।
राव बिरेन्द्र सिंह के बाद हरियाणा की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर 22.11.68 से 30.11.1975, 05.07.85 से 19.06.87 तथा 11.05.96 से 23.07.99 के दौरान तीन बार काबिज रहे चौधरी बंशीलाल की पौत्री तथा पूर्व सांसद सुरेन्द्र सिंह एवं वर्तमान में तोशाम (भिवानी) से कांग्रेस विधायक किरण चौधरी की पुत्री श्रुति चौधरी भिवानी –महेंद्रगढ़ लोकसभा सीट से अपने दादा व पिता के राजनैतिक विरोधी एवं वर्तमान सांसद धर्मवीर सिंह से कड़े मुकाबले में जीत के लिए आतुर हैं। 2014 में धर्मवीर से हुई अपनी हार का श्रुति चौधरी इस बार बदला हर हाल में लेना चाहती हैं।
सोनीपत एवं रोहतक की दो सीटों पर तो बाप व बेटा चुनाव मैदान में हैं। कभी संविधान सभा के सदस्य तथा सांसद व विधायक रहे चौधरी रणबीर सिंह के पुत्र एवं पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुडा (कांग्रेस ) सोनीपत से देवीलाल के प्रपोत्र से मुकाबला कर रहे हैं तो वहीँ रोहतक सीट से भूपेन्द्र हुडा के पुत्र एवं पूर्व में तीन बार सांसद रह चुके दीपेन्द्र हुडा (कांग्रेस ) अपनी ही पुरानी सीट पर पुनः काबिज होने के लिए लंगोट कसे हुए हैं। भूपेन्द्र सिंह हुडा वर्ष 2005 से 2014 तक हरियाणा के मुख्यमंत्री तथा 1991, 1996, 1998 तथा 2004 में रोहतक से लोक सभा सदस्य रह चुके हैं और उसके बाद 2005, 2009 तथा 2014 में उनके पुत्र दीपेन्द्र हुडा यहाँ से सांसद बने हैं। रोहतक की सीट पर हुडा परिवार का एक तरफ़ा वर्चस्व माना जाता है, हरियाणा की बिग गन चौधरी देवीलाल को भूपेंदर हुडा तीन बार रोहतक से हरा चुके हैं।
एक और पुराने धुरंधर कांग्रेसी नेता एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिवंगत चौधरी दलबीर सिंह(1967, 1971,1980 एवं 1984 में चार बार कांग्रेस के सांसद ) की पुत्री एवं वर्तमान राज्य सभा सांसद कुमारी शैलजा (कांग्रेस ) अम्बाला रिज़र्व सीट से पुनः जीत का स्वाद चखना चाहती हैं। कुमारी शैलजा 2004 तथा 2009 में अम्बाला से और 1991 व 1996 में सिरसा से कांग्रेस पार्टी की टिकट पर सांसद रह चुकी हैं।
करनाल सीट पर चार बार ( 1980 1984 1989, 1991) लगातार कांग्रेसी सांसद रह चुके धुरंधर ब्राह्मण नेता पंडित चिरंजीलाल के पुत्र एवं पूर्व विधानसभा स्पीकर कुलदीप शर्मा, हालाँकि अपने पुत्र चाणक्य को टिकट दिलाकर अगली पीढ़ी को आगे लाना चाहते थे, कांग्रेस के प्रत्यासी के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं।
लोकसभा की दस में से आठ सीटों पर ग्यारह वंशज मैदान में हैं, इनमे से तीन वंशजों (हिसार सीट पर तीन में से दो तथा सोनीपत सीट पर दो में से एक ) का हारना तो तय है ही। अगर इन सीटों पर एक एक वंशज चुनाव जीतता है, तो हरियाणा की अस्सी प्रतिशत सीटों पर वंशज ही राज करेंगे। वर्तमान हालात में छह वंशजों का जीतना लगभग तय लग रहा है। पर यदि ऐसा होता है तो काफी चिंतनीय विषय है कि फिर आम आदमी कैसे पहुँच पायेगा संसद तक ? अब देखना यह है कि अपने पूर्वजों की वंशबेल के सहारे कितने वंशज लोकसभा की सीढियाँ चढ़ पाते हैं ? और हरियाणा की जनता इन वंशजों को हराकर इनके लिगेसी के दावे को कितना धराशाही करती है ?

ईरान पर अमेरिका की दादागीरी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
परमाणु-समझौते को लेकर डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिका ईरान से इतना नाराज है कि उसने अब ईरानी तेल खरीदने पर प्रतिबंध की घोषणा कर दी है। 2 मई के बाद जो भी राष्ट्र ईरान से तेल खरीदेगा, अमेरिका उसके खिलाफ कार्रवाई करेगा। दूसरे शब्दों में ईरान का हुक्का-पानी बंद करने पर अमेरिका तुल पड़ा है। भारत ईरान से 11 बिलियन डॉलर का अपना 11 प्रतिशत तेल आयात करता है। इसी प्रकार वह वेनेजुएला से भी लगभग 6.4 प्रतिशत तेल हर साल खरीदता है। ट्रंप ने वेनेजुएला पर भी प्रतिबंध लगा रखा है। याने भारत के कुल तेल-आयात का 17 प्रतिशत खतरे में पड़ जाएगा। यो भी तेल की कीमत 64 डॉलर प्रति बेरल से बढ़कर 74 डॉलर हो गई है। इसी कारण डॉलर के मुकाबले रुपया गिर गया है। लेकिन भारत में तेल के दाम अभी नहीं बढ़े हैं, क्योंकि सरकार यह खतरा मोल नहीं लेना चाहती, खासतौर से चुनाव के मौसम में। उसने अमेरिकी प्रतिबंध की भी निंदा नहीं की है, जैसी कि चीन-जैसे कुछ देशों ने की है। भारत सरकार का कहना है कि वह अपने तेल की कमी एराक, सउदी अरब और अमारात से कहकर पूरा करेगी। अमेरिका भी तेल भेज सकता है। लेकिन कांग्रेस ने कहा है कि मोदी सरकार ने भारत की संप्रभुता खो दी है, क्योंकि वह ट्रंप के दबाव में आ गई है। ट्रंप ने हमारी संप्रभुता पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है। यह प्रतिक्रिया जरा अतिवादी है। हम यह क्यों भूल रहे हैं कि ट्रंप मसूद अजहर के मामले में भारत का कितना साथ दे रहे हैं और पाकिस्तान को आतंकवाद से मुक्त करने के लिए कितना दबाव डाल रहे हैं। वे भारत द्वारा संचालित ईरान के चाहबहार-प्रोजेक्ट में भी कोई अड़ंगा नहीं लगा रहे हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपेयो ने आश्वस्त किया है कि इस प्रतिबंध का मित्र-राष्ट्रों पर वे कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ने देंगे। लेकिन यह समझ में नहीं आता कि ईरानी तेल का रुपए में जो भुगतान होता है और बदले में ईरान जो भारतीय माल खरीदता है, उसकी भरपाई डॉलरों में कैसे होगी, कौन करेगा ? ईरान पर अमेरिका की यह एकतरफा कार्रवाई शुद्ध ब्लेकमेल से कम नहीं है, हालांकि उसके पीछे कुछ अनुमानित कारण भी हैं लेकिन उनका समाधान संयुक्तराष्ट्र संघ के जरिए होता तो कहीं बेहतर रहता। ईरान के साथ हुए छह राष्ट्रों के परमाणु-समझौते को अकेले अमेरिका ने रद्द करके फिर से अपनी विश्व-दादागीरी जमाने की कोशिश की है।

अब न्याय पालिका पर नज़र……?
ओमप्रकाश मेहता
लोकतंत्र के महल की किरायेदार मौजूदा सत्ताधारी दल ने सत्ता प्राप्ति के बाद से ही लोकतंत्री महल के आधार स्तंभों पर कब्जे की शुरूआत कर दी थी, अब तक के पांच सालों में इस सत्ताधारी दल ने इस लोकतंत्री महल के तीन स्तंभों कार्यपालिका, विधायिका और कथित चैथे स्तंभ खबर पालिका पर कब्जा कर लिया, अब इन तीनों स्तंभों में सत्ताधारी दल के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। सत्ताधारी दल की इस नियंत्रण करने की हवस के कारण देश का आम नागरिक काफी हलाकान और परेशान हो गया था, क्योंकि सत्ताधारी दल के नियंत्रण वाले तीनों स्तंभों ने जनतंत्री देश के ‘जन’ की उपेक्षा कर ‘तंत्र’ के लिए काम करना शुरू कर दिया था इसलिए हलाकान व परेशान आम आदमी का भरोसा सिर्फ चैथे स्तंभ न्याय पालिका पर ही केन्द्रित हो गया था। इसीलिए पिछले चार साल में देश की न्याय पालिका में काम काफी बढ़ गया और देश की न्याय पालिका ईमानदारी से अपने दायित्व का निर्वहन कर रही है, इसी दौर में न्याय पालिका ने कई बार अपने फैसलों में सरकार के अहम्् फैसलों पर नाराजी व्यक्त की और उन्हें रद्द करके उन सरकारी निर्णयों से प्रभावित वर्गों को न्याय दिया।
अब अहम् में डूबे सत्ताधारी दल ने अन्य स्तंभों की तरह इस न्याय पालिका स्तंभ पर भी कब्जा करने पर मंथन किया, और पहले तो सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों का चयन करने वाले ‘काॅलेजियम पद्धति’ को बदलने या उस पर कब्जे की कोशिश की और जब उसमंे वांछित सफलता नहीं मिल पाई तो माननीय न्यायाधीशों के चरित्र हनन तक का हथकण्डा अपना लिया, और इसके पहले शिकार हुए सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई, उनकी भूतपूर्व महिला सहायक से आरोप लगवा दिया कि गोगोई साहब ने उस महिला का यौन शोषण किया व उसके परिजनों को नौकरी से निकलवा दिया। इस गंभीर आरोप से मुख्य न्यायाधिपति का विचलित होना स्वाभाविक था, किंतु उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा कि वे ऐसे आरोपों से डरने वाले या पद छोड़कर भागने वाले नहीं है।
इस आरोप के बाद मीडिया व सोशल मीडिया के माध्यम से ये आरोप लगाए जाने लगे कि मुख्य न्यायाधिपति चूंकि असम के पूर्व कांग्रेस मुख्यमंत्री के पुत्र है, इसलिए वे कांग्रेसी विचारधारा के व्यक्ति है, इसीलिए अपने फैसलों में वे कांग्रेसियों का बचाव करते है, उदाहरण के रूप में चिदम्बरम परिवार तथा सोनिया गांधी के परिजनों की जमानत की मिसालें पेश की गई, यही नही उनके सरकार विरोधी फैसलों व राम मंदिर के मुद्दें को भी कथित कांग्रेसी विचारधारा से जोड़कर मीडिया में पेश किया गया। शायद सत्ताधारी दल की यह भी धारण थी कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से यदि इस अभियान की शुरूआत की गई तो देश के उच्च न्यायालय व जिला न्यायाधीश भी भविष्य में सरकार के मामलों में सोच समझ कर फैसलें देंगे? किंतु रंजन गोगोई पर हुए इस चरित्र हनन के हमले के विरोध में पूरे देश के वकील खुलकर सत्ताधारी व सरकार के विरोध में आ गए, ऐसा माहौल देखकर स्वयं केन्द्र में वित्तमंत्री पद पर विराजित और मूलतः वकील अरूण जेटली ने भी अपने ही दल व सरकार द्वारा चलाए गए इस अभियान की निंदा की। शायद उनकी यह धारणा रही होगी कि मंत्री पद तो अस्थाई है, आज है कल नहीं, किंतु वकीली तो उन्हें जिन्दगी भर करना है इसलिए वे स्वयं सत्ताधारी दल के ‘चरित्र हनन’ अभियान का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे।
यद्यपि सत्ताधारी दल के इस हीन कृत्य के कई सबूत भी सामने आने लगे है, सुप्रीम कोर्ट के ही वरिष्ठ वकील उत्सव बैंस ने यह प्रकरण सामने आने के बाद खुलकर कहा कि उनके पास भी कुछ लोग मुख्य न्यायाधीश को बदनाम करने का प्रस्ताव लेकर रिश्वत देने आए थे। जिस पर उन लोगों को अपमानित कर भगा दिया गया था। श्री बैंस का कहना है कि यह सोची समझी सर्वोच्च साजिश के तहत किया जा रहा है, जिससे कि मुख्य न्यायाधीश इसी सप्ताह कोर्ट में पेश होने वाले महत्वपूर्ण मामलों पर सरकार या सत्ताधारी दल पर विरोधी फैसले न दे सके और उन्हें शर्मिंदगी में पद छोड़कर जाना पड़े? किंतु दृढ़ न्यायाधीश श्री गोगोई ने ऐसी सभी संभावनाओं को यह कहकर खत्म कर दिया कि ‘‘वे डरने वाले नहीं है।’’ साथ ही यह भी कहा कि ‘‘अब न्यायपालिका की भी राह आसान नहीं है, वह खतरे में है।’’ अब इस मामले की धीरे-धीरे परतें खुल रही है, और वह दिन दूर नहीं जब साजिशकर्ताओं के चेहरे सामने आ जाएगें। लेकिन अब यह तय है कि आज हर संवैधानिक संगठन भयाक्रांत है, क्योंकि उन पर कब्जे की चाले चली जा रही है, और शायद इसी कारण चुनाव आयोग पर भी अनैक तरह के आरोप लगने लगे है।

श्रीलंका में अपूर्व आतंक
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
श्रीलंका के सिंहल और तमिल लोगों के बीच हुए घमासान युद्ध ने पहले सारी दुनिया का ध्यान खींचा था लेकिन इस बार उसके ईसाइयों और मुसलमानों के बीच बही खून की नदियों ने सारी दुनिया को थर्रा दिया है। ईस्टर के पवित्र दिन श्रीलंका के गिरजाघरों और होटलों में हुए बम-विस्फोटों में 300 से ज्यादा लोग मारे गए और सैकड़ों लोग घायल हुए। उनमें दर्जनों, यूरोपीय, अमेरिकी और एशियाई लोग भी थे। इतना बड़ा आतंकी हिंसक हादसा दुनिया में शायद पहले कभी नहीं हुआ। दुनिया के ईसाई और मुस्लिम देशों में इस घटना की कड़ी भर्त्सना हो रही है। यहां प्रश्न यही है कि आखिर यह हुआ क्यों ? सवा दो करोड़ की आबादीवाले श्रीलंका में लगभग डेढ़ करोड़ बौद्ध हैं, 25 लाख हिंदू हैं, 20 लाख मुसलमान हैं और 15 लाख ईसाई हैं। बौद्ध लोग सिंहलभाषी हैं। सिंहली हैं। ज्यादातर मुसलमान तमिल हैं और ईसाइयों में सिंहल और तमिल दोनों हैं। मुसलमानों और ईसाइयों के बीच जातिगत झगड़े का सवाल ही नहीं उठता। मुसलमानों और बौद्धों के बीच 2014 और 2018 में दो बार व्यक्तिगत मामलों को लेकर झगड़ा हुआ और वह दंगों में बदल गया। मुसलमानों का बहुत नुकसान हुआ। मुसलमानों को पता है कि बौद्ध लोग महात्मा बुद्ध की अहिंसा की बातें तो बहुत करते हैं लेकिन उनके-जैसी सामूहिक हिंसा दुनिया में बहुत कम जातियां करती हैं। इसीलिए उन्होंने अपना गुस्सा ईसाइयों पर उतारा। इसके लिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों का सहारा लिया। इस्लाम के नाम पर आतंक करनेवाले संगठनों की साजिश के बिना इतना बड़ा हमला करना श्रीलंकाई मुसलमानों के बस की बात नहीं है। कई श्रीलंकाई मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया है। उनसे पता लगेगा कि इस साजिश के पीछे असली तत्व कौनसे हैं। ईस्टर के दिन श्रीलंका के गिरजाघरों पर आक्रमण का एक बड़ा संदेश यह भी है कि इस्लामी आतंकवादी यूरोप और अमेरिका के ईसाइयों को बता रहे हैं कि लो, वहां नहीं तो यहां तुमसे हम बदला निकाल रहे हैं। इस घटना के बाद श्रीलंका के मुसलमानों का जीना हराम हो जाएगा। अब बौद्ध और ईसाई मिलकर उनका विरोध करेंगे। कोई आश्चर्य नहीं कि 300 लोगों की मौत का बदला हजारों में लिया जाए। श्रीलंका के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच पहले से दंगल चल रहा है और उसकी अर्थ-व्यवस्था भी पैंदे में बैठे जा रही हैं। ऐसे में श्रीलंका को सांप्रदायिक दंगों से बचाना बेहद जरुरी है। दक्षिण एशिया के राष्ट्रों को इस मुद्दे पर एकजुट होना होगा और पाकिस्तान को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।

चुनाव में सबसे ज्यादा खर्च करने वाली पार्टी बनी भाजपा
अजित वर्मा
भारतीय जनता पार्टी जहां खर्चा करने में सबसे आगे है, वहीं पैसे बचाने में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का कोई जवाब नहीं है। पार्टियों की ओर से चुनाव आयोग को जो खर्च का ब्यौरा दिया गया है, उसमें बसपा ने अपना बैंक बैलेंस 669 करोड़ रुपए बताया है।
दूसरी ओर भाजपा की बचत सिर्फ 82 करोड़ हैं और इस मामले में वह सपा, कांग्रेस और तेदपा से भी पीछे पांचवें स्थान पर है। हालांकि कांग्रेस की ओर से पिछले साल हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद अभी ब्यौरा नहीं दिया गया है। इनमें से तीन राज्यों में उसकी सरकार बनी है। दिसंबर के आंकड़ों के हिसाब से वह बचत के मामले में तीसरे स्थान पर है।
खर्चा करने में भाजपा ने सभी दलों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। पार्टी की ओर से 758 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करने की बात आयोग को बताई गई है। इसके अलावा भाजपा ऐसी पार्टी भी है जिसे सबसे ज्यादा चंदा मिल रहा है। पार्टी ने वर्ष 2017-18 में कुल 1027 करोड़ रुपए चंदा मिलने की बात घोषित की है। पार्टियों के इनकम टैक्स रिटर्न के आधार पर एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफाम्र्स ने जो रिपोर्ट तैयार की है, उसके अनुसार भाजपा को 2016-17 में भी 1034 करोड़ रुपए का चंदा मिला था। गत 25 फरवरी तक बसपा के आठ बैंक खातों में कुल 669 करोड़ रुपए जमा थे, यह राशि पिछले साल 13 दिसंबर की तुलना में एक करोड़ कम और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना राज्यों के चुनाव से पहले 6 अक्तूबर 2018 की तुलना में पांच करोड़ रुपए ज्यादा है। हालांकि इन चुनाव के दौरान उसने 24 करोड़ रुपए जुटाए। बचत के मामले में सपा दूसरे स्थान पर है। उसके खातों में 471 करोड़ रुपए जमा हैं। हालांकि उक्त राज्यों के चुनाव के बाद उसके खाते में 11 करोड़ रुपए कम हुए हैं। 196 करोड़ की बैंक बचत के साथ कांग्रेस तीसरे स्थान पर है। चौथे स्थान पर तेलगु देशम पार्टी का बैंक बैलेंस 107 करोड़ रुपए है, जो भाजपा से ज्यादा है।
राजनैतिक दलों के खर्च को लेकर जो आंकड़े सामने आये हैं, वो लोकसभा चुनाव के पहले के हैं। अब जब अभी के लोकसभा चुनाव में किस पार्टी को कितना चंदा मिला किस पार्टी ने कितना खर्च किया है। इसका हिसाब आना अभी बाकी रहेगा। फिर भी इस मामले में भाजपा ही आगे रहने वाली है इस बात की पूरी उम्मीद है। क्योंकि केन्द्र में भाजपा की सरकार है महाराष्ट्र और गुजरात जैसे अमीर राज्यों में भाजपा की सरकार तो है ही जहां से उसे सबसे ज्यादा चंदा मिलेगा। वहीं सब मिलाकर एक दर्जन से ज्यादा राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, जिनसे चुनावी चंदा सबसे ज्यादा भाजपा को ही मिलने की उम्मीद है। देश के बड़े औद्योगिक घराने भी सबसे ज्यादा भाजपा को ही चंदा देते हैं। कुल मिलाकर इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा ही सबसे अमीर पार्टी बनकर एक बार फिर उभरेगी यह तय माना जा रहा है।

चुनाव आयोग की क्षमता पर उठते सवाल
योगेश कुमार गोयल
चुनाव के दौरान देश के लोकतांत्रिक महोत्सव की गरिमा गिराते तमाम राजनीतिक दलों के बड़बोले नेताओं पर लगाम लगाने के लिए जो कदम चुनाव आयोग द्वारा बहुत पहले ही उठा लिए जाने चाहिएं थे, अंततः सुप्रीम कोर्ट के सख्त रूख के बाद आयोग को चुनावों की शुचिता बरकरार रखने हेतु उसके लिए बाध्य होना पड़ा। अदालत को कहना पड़ा था कि आयोग ऐसे मामलों को नजरअंदाज नहीं कर सकता। चुनावी प्रक्रिया में शुचिता लाने के लिए इससे पहले भी सर्वोच्च न्यायालय ने ही समय-समय पर कड़े कदम उठाए हैं। अदालती सक्रियता के चलते ही चुनावों के दौरान जेल से चुनाव न लड़ पाने, अपराधियों, दागियों, धन-बल या विभिन्न अनैतिक तरीकों से मतदाताओं को लुभाने, कानफोडू प्रचार, गली-मोहल्लों में पोस्टरों इत्यादि से निजात मिल सकी। इस बार भी चुनावी शुचिता के लिए निर्वाचन आयोग को सख्त हिदायत देते हुए अदालत ने जो पहल की है, उसके लिए देश की सर्वोच्च अदालत प्रशंसा की हकदार है। आश्चर्य की बात रही कि अदालत की कड़ी फटकार से पहले आयोग ऐसे बदजुबान नेताओं को नसीहत या चेतावनी देने और नोटिस थमाने तक ही अपनी भूमिका का निर्वहन करता रहा, जिसका किसी भी नेता पर कोई असर नहीं देखा गया और जब अदालत द्वारा आयोग से इस संबंध में सवाल किए गए तो आयोग ने अपने अधिकारों और शक्तियों को लेकर अपनी लाचारगी का रोना रोना शुरू कर दिया। ऐसे में सर्वोच्च अदालत द्वारा आयोग को उसकी शक्तियों और अधिकारों की याद दिलाई गई, जिसके बाद आयोग की तंद्रा टूटी और वह न केवल बदजुबान नेताओं पर कार्रवाई के मामले में सक्रिय दिखा बल्कि आदर्श चुनाव संहिता के उल्लंघन के मामले में उसने कर्नाटक की वेल्लोर सीट पर 18 अप्रैल को होने वाले चुनाव को भी रद्द कर दिया, जहां 10 अप्रैल को डीएमके प्रत्याशी के. आनंद तथा उनके दो सहयोगियों के घरों पर आयकर विभाग के छापों के दौरान 11.53 करोड़ की नकदी बरामद हुई थी। आरोप लग रहे थे कि इस तरह का काला धन बड़ी संख्या में मतदाताओं को लुभाने के लिए बांटा जा रहा है।
चुनाव आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है, जिसके मजबूत कंधों पर शांतिपूर्वक निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की अहम जिम्मेदारी है। वह किसी प्रकार के राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर यह कार्य सम्पन्न करा सके, इसके लिए उसे अनेक शक्तियां और अधिकार संविधान प्रदत्त हैं। देश की चुनाव प्रणाली में शुचिता बरकरार रखते हुए उसमें देश के हर नागरिक का भरोसा बनाए रखना निर्वाचन आयोग की सबसे पहले और आखिरी जिम्मेदारी है किन्तु वह अपनी इस भूमिका का किस कदर निर्वहन करता रहा है, इसका अनुमान अदालती फटकार के बाद योगी आदित्यनाथ, मायावती, आजम खान, मेनका गांधी इत्यादि विभिन्न दलों के कुछ दिग्गज नेताओं पर आयोग की सख्ती पर सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से लगाया जा सकता है कि ऐसा लगता है कि निर्वाचन आयोग ‘जाग गया’ है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने आयोग से ऐसे मामलों को लेकर पूछा था कि आप बताएं कि आप क्या कर रहे र्हैं? चुनाव आयोग के पास अभी तक आचार संहिता के उल्लंघन और मर्यादाहीन बयानबाजी की करीब साढ़े तीन सौ शिकायतें मिली किन्तु आयोग ने उन शिकायतों पर कितना लचीला रूख अपनाया, सभी जानते हैं।
ऐसा नहीं है कि आयोग शक्तिहीन है बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत उसके पास चुनावी रंग को बदरंग करने वाले नेताओं या राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई करने के पर्याप्त अधिकार हैं और चुनावी प्रक्रिया की शुरूआत से ही होना तो यही चाहिए था कि आयोग द्वारा अश्लील बयानबाजी और समाज को बांटने वाली टिप्पणियां करने वाले लोगों से सख्ती से निपटा जाता ताकि आचार संहिता की इस प्रकार सरेआम धज्जियां उड़ाने की दूसरों की हिम्मत ही नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट की पहले से ही यह स्पष्ट व्याख्या है कि अगर कोई नेता धर्म या जाति के आधार पर वोट मांगे तो उस पर कार्रवाई की जाए और आयोग के पास इतने अधिकार भी हैं कि आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले या भड़काऊ अथवा अश्लील बयानबाजी करने वाले नेताओं के स्पष्टीकरण से संतुष्ट न होने पर वह उन्हें दंडित भी कर सकता है। अगर आयोग के दावों के अनुरूप मान भी लें कि उसके अधिकार सीमित हैं तो सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद उसके पास एकाएक बदजुबान नेताओं और आचार संहिता की धज्जियां उड़ाने वाले प्रत्याशियों पर कार्रवाई करने के अधिकार कहां से पैदा हो गए?
वास्तव में अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही का अहसास आयोग को अदालत के सख्त रूख के बाद ही हुआ है। आश्चर्य की बात है कि अदालत को कहना पड़ा कि अधिकारी आयोग के अधिकारों के बारे में जानकारी लेकर उसके समक्ष पेश हों। संविधान के तहत निर्वाचन आयोग को निर्बाध शक्तियां प्राप्त हैं। हकीकत यही है कि मतदान प्रक्रिया को शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से सम्पादित कराने के लिए संविधान में निर्वाचन आयोग को पर्याप्त अधिकार दिए गए हैं किन्तु आयोग अगर अपने इन अधिकारों का सही तरीके से उपयोग ही नहीं कर पाता। यहां सवाल आयोग की निष्पक्षता या एक संवैधानिक संस्था के रूप में उसकी स्वायत्तता पर नहीं है बल्कि सवाल है उसकी क्षमता पर, जो तमाम अधिकारों के बावजूद आचार संहिता के गंभीर मामलों में भी कहीं दिखाई नहीं दी। देश के 90 करोड़ मतदाताओं के दिलोदिमाग में आयोग की क्षमता और निष्पक्षता के प्रति पहले जैसा भरोसा बरकरार रहे, उसके लिए जरूरी है कि आयोग चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में बेहद कड़ा रूख अपनाए।
देशभर में चुनाव आचार संहिता के सरासर उल्लंघन के अनेकों मामले सामने आने के बाद भी आयोग के नरम रूख का ही असर है कि सुप्रीम कोर्ट के सख्त रूख के बाद चार बड़े नेताओं पर कार्रवाई करने के बाद भी विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की फिजां में जहर घोलने की फितरत बदलने का नाम नहीं ले रही। एक ओर जहां जयाप्रदा को लेकर अश्लील टिप्पणी के बाद आयोग की कार्रवाई के पश्चात् भी आजम खान ने दो ही दिन बाद फिर मर्यादाहीन टिप्पणी की कि चुनाव के बाद कलेक्टरों से मायावती के जूते साफ करवाएंगे तो विवादास्पद कांग्रेसी नेता नवजोत सिंह सिद्धूकटिहार में नफरत फैलाने वाली राजनीतिक बयानबाजी करते नजर आए। शिवसेना सांसद संजय राउत ने तो सरेआम बयान दे डाला कि वे न कानून को मानते हैं और न ही उन्हें चुनाव आयोग या आचार संहिता की कोई परवाह है। ऐसे में यह देखना होगा कि अदालत द्वारा पेंच कसे जाने के बाद आयोग अब आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले नेताओं पर कितना सख्त रूख अपनाता है।
आयोग के लचीले रूख के कारण ही इस बार राजनीति का बेहद छिछला स्तर देखते हुए कदम-कदम पर यही लगता रहा है, जैसे किसी भी राजनीतिक दल या नेता को चुनाव आयोग के डंडे का कोई भय ही नहीं है। हमारी राजनीति की मर्यादा तो दिनों दिन गर्त में जा ही रही है, कम से कम निर्वाचन आयोग को तो मर्यादाहीन नेताओं पर सख्ती दिखाते हुए अपनी मर्यादा की रक्षा करने के साथ-साथ लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए एक स्वस्थ मिसाल बनकर सामने आना चाहिए ताकि लोकतंत्र में उनका भरोसा बरकरार रहे। आज आयोग भले ही स्वयं को सीमित अधिकारों और शक्तियों वाली संवैधानिक संस्था के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कुछ ही दशकों पहले इसी आयोग के टीएनशेषन नामक एक कठोर, निष्पक्ष और सख्त मिजाज अधिकारी ने आयोग की इन्हीं शक्तियों और अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए तमाम राजनीतिक दलों और नेताओं की बोलती बंद कर दी थी। अगर इतने वर्षों पहले एक चुनाव अधिकारी इतना कुछ कर सकता था तो आज आयोग स्वयं को इतना बेबस क्यों दिखा रहा है? सही मायने में आज निर्वाचन आयोग में चुनाव सुधारों के लिए विख्यात रहे टीएनशेषन जैसे सख्त अधिकारियों की ही जरूरत है, जो आयोग की अपने अधिकारों का निर्भय होकर इस्तेमाल करते हुए आयोग की विश्वसनीयता बहाल कर आमजन का भरोसा स्वयं के साथ-साथ लोकतांत्रिक प्रणाली के प्रति भी बरकरार रख सकें।

आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता के साथ हो कार्रवाई
डॉ हिदायत अहमद खान
कहने को तो भारत के दक्षिणी पड़ोसी देश श्रीलंका का हिंसा और आतंकी घटनाओं से पुराना रिश्ता रहा है। यहां करीब तीन दशक तक प्रभाकरन का आतंक रहा है, वहीं लिट्टे के दंश को आखिर हम कैसे भुला सकते हैं, जबकि हमें अपने प्रिय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को एक आत्मघाती हमले में सदा के लिए खोना पड़ गया था। बहरहाल श्रीलंका से सुबह के करीब खबर आई कि सिलसिलेबार बम धमाकों में करीब दो सौ लोगों की जानें जा चुकी हैं, जबकि पांच सौ के करीब लोग जख्मी बताए जा रहे हैं। इस प्रकार सुबह के समय करीब 9 बजे लगातार सात बम धमाकों से श्रीलंका ही नहीं बल्कि पड़ोसी मुल्क भारत भी दहल गया और दुनिया को एक बार फिर संदेश गया कि आतंकवादी अपनी मौजूदगी का एहसास एशियाई देशों में कुछ ज्यादा ही करा रहे हैं। इस कायराना हमले की जितने कड़े शब्दों में निंदा की जाए कम ही है। एक बार फिर दोहराना होगा कि आतंकवाद कभी किसी का सगा नहीं हो सकता, क्योंकि न तो उसका कोई धर्म होता है, न ही कोई जाति होती है, न वह भाषा से बंधा हुआ है और न ही वह किसी विशेष क्षेत्र से ही ताल्लुक रखता है। ऐसे में उसे सिर्फ और सिर्फ इंसानियत का दुश्मन करार दिया जाना ही उचित होगा। अब वह समय आ गया है जबकि सभी शांति व सहअस्तित्व की जिम्मेदारी लेने वालों को एकसाथ इसके खिलाफ उठ खड़ा होना चाहिए। यहां यह नहीं देखा जाना चाहिए कि हमला किस पर और किन परिस्थितियों में हुआ, बल्कि यह देखा जाना उचित होगा कि हमला मानवजाति पर हुआ है, जिसमें बेगुनाहों और निहत्थों ने अपनी जानें गवाई हैं। इसलिए इस पर महज निंदा प्रस्ताव लाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेना अब उचित नहीं लगता है। दरअसल इससे पहले पुलवामा में हुए आतंकी हमले में हमने अपने 44 जवानों को खोया था। इसके बाद सीमा पार आतंकी ठिकानों पर भारतीय वायुसेना को सर्जिकल स्ट्राइक करनी पड़ गई थी। वहीं अफगानिस्तान में तो लगातार आतंकी हमले होते ही रहते हैं। इसके बाद बांग्लादेश, पाकिस्तान व नेपाल जैसे अन्य छोटे देशों में भी आतंकियों ने अपनी मौजूदगी दर्शाने के लिए समय-समय पर हमले किए हैं। इसलिए कहना पड़ता है कि अब सभी को अच्छे और बुरे आतंकवाद में फर्क करने की बजाय आतंकवाद को सिर्फ आतंकवाद मानकर कार्रवाई करने के लिए एकजुट होना चाहिए। दरअसल मौजूदा समय में हो यह रहा है कि यदि भारत में आतंकी हमला होता है तो सीधे पाकिस्तान पर शक की सुई जाती है और कहा जाता है कि कश्मीर के कारण ऐसा हो रहा है, मतलब आतंकवाद को भी किसी क्षेत्र से जोड़कर देखा जाने लगता है। वहीं जब पाकिस्तान पर आतंकी हमला होता है तो कहा जाता है कि उसके अपने पाले हुए भस्मासुर हैं जो अब उसी के लिए घातक साबित हो रहे हैं। इससे हटकर पाकिस्तान हाल ही में हुए हमले के लिए ईरान में मौजूद आतंकियों को जिम्मेदार ठहराता नजर आता है। मतलब आतंकी अपना काम करते जाते हैं और विभिन्न देश अपने-अपने नजरिये से इसे अलग-अलग खानों में रखकर इसकी भयावहता को कम करने का प्रयास करते रहते हैं। यह मानवजाति पर कुठाराघात है और इससे जितनी जल्दी छुटकारा मिलेगा शांतिप्रिय दुनिया के लिए उतना ही अच्छा होगा। बहरहाल श्रीलंका में हुए आतंकी हमले की निंदा करते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘मैं इन हमलों की कड़ी निंदा करता हूं। हमारे क्षेत्र में इस तरह की बर्बरता के लिए कोई जगह नहीं है। भारत इस मुश्किल घड़ी में श्रीलंका के लोगों के साथ एकजुटता के साथ खड़ा है। मेरी संवेदना शोक संतप्त परिवारों के साथ है। मैं इन हमलों में घायल हुए लोगों के जल्‍द स्‍वस्थ होने की कामना करता हूं।’ वहीं उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने भी हमलों पर दुख जताते हुए अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं। विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज ने श्रीलंका में मौजूद भारतीयों को सलाह दी कि वो संकट में भारतीय उच्चायोग से संपर्क कर सकते हैं। यहां पाकिस्‍तान ने भी हमलों की निंदा करते हुए कहा है कि वह इस मुश्किल घड़ी में श्रीलंका सरकार और वहां के लोगों के साथ खड़ा है। इस प्रकार मुश्किल घड़ी में सभी साथ होने की बात कहते हैं। श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना ने भी धमाकों पर गहरा शोक जताते हुए देशवासियों से शांति बनाए रखने की अपील की है। दरअसल ये हमले ईसाई समुदाय के मुख्य त्योहार ईस्टर के अवसर पर किए गए हैं, जिससे आतंकियों के इरादों को साफतौर भांपा जा सकता है। त्यौहार के समय जुटने वाली भीड़ को ध्यान में रखकर किए गए आतंकी हमले सही मायने में ज्यादा से ज्यादा लोगों की जान लेने के इरादे से किए जाते हैं ताकि दुनिया देख सके कि उनमें कितनी ताकत है। एक तरह से आतंकी गुटों में भी वर्चस्व को लेकर इस तरह के हमले कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं। श्रीलंका में इन सीरियल धमाकों से ईस्टर काले दिवस के तौर पर परिवर्तित हो गया और सभी ओर मातम पसर गया। यह सब तब हो रहा है जबकि लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम यानी लिट्टे का खात्मा 21 मई 2009 को हो गया था। दरअसल इसके संस्थापक वेलुपिल्लई प्रभाकरन को श्रीलंका सेना ने तब मार गिराया था। इसी के साथ लिट्टे ने हथियार डालने का ऐलान भी किया और जाफना को हिंसा के दौर से भी आजादी मिल गई। इस घटना के एक दशक बाद एक बार फिर श्रीलंका बम धमाकों से दहल गया है, जिससे चिंतित होना लाजमी है। गौर करने वाली बात यह भी है कि फरवरी 2018 में ही भारत आए श्रीलंका के चीफ ऑफ डिफेंस, एडमिरल आरसी विजेगुनारतने ने इंडो-पैसेफिक डायलॉग में पूरे विश्वास के साथ दावा किया था कि श्रीलंका दुनिया का एक मात्र ऐसा देश है, जिसने आतंकवाद को पूरी तरह से अपनी धरती से उखाड़ फेंकने में कामयाबी हासिल की है। उनका भी यह इशारा लिट्टे की तरफ ही था‌ अत: अब जबकि सीरिलय बम धमाके हो चुके हैं तो ज्यादातर लोगों का ध्यान भी लिट्टे की ही तरफ जा रहा है, लेकिन न तो इन धमाकों की किसी ने जिम्मेदारी ही ली है और न ही किसी प्रकार के पुख्ता सुबूत ही मिले हैं, जिससे दोषियों को सख्त से सख्त सजा दी जा सके। बावजूद इसके कहना पड़ता है कि आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता जरुरी है, तभी इससे पार पाया जा सकता है।

मोदी की भी जांच क्यों न हो ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
चुनाव आयोग ने अपने एक अफसर को मुअत्तिल कर दिया, क्योंकि उसने ओडिशा में प्र.मं. नरेंद्र मोदी के हेलिकाॅप्टर को जांच के लिए 15 मिनिट तक रोक लिया था। आयोग ने अपने हिसाब से ठीक किया, क्योंकि आयोग के नियम के अनुसार जो लोग एसपीजी (विशेष सुरक्षा समूह) की देख-रेख में रहते हैं, उनकी सुरक्षा जांच नहीं की जानी चाहिए। मोहम्मद मोहसिन नामक इस आईएएस अफसर ने आयोग के नियम का उल्लंघन कर दिया था। यहां मेरा प्रश्न यह है कि चुनाव आयोग ने यह बेतुका प्रावधान रखा ही क्यों ? जिन-जिन लोगों को एसपीजी सुरक्षा मिली हुई है, वे कौन लोग हैं? उनमें से ज्यादातर नेता लोग हैं। इनमें से कौन दूध का धुला हुआ है ? राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति की बात जाने दें, बाकी जितने भी नेता हैं, सबके सब पार्टीबाज हैं। और यह तो चुनाव का मौसम है याने करेला और नीम चढ़ा। इन दिनों हर नेता चुनाव जीतने के लिए कोई भी पैंतरा अपना सकता है। वह अपने हेलिकाॅप्टर और जहाज में बांटने के लिए करोड़ों रु., शराब की बोतलें और दुनिया भर की चीजे ले जा सकता है। उसकी जांच क्यों नहीं होनी चाहिए ? जरुर होनी चाहिए और सबसे पहले होनी चाहिए। यदि मुझे यह सुरक्षा मिली होती (कुछ वर्षों तक मुझ पर भी एक सुरक्षा थोप दी गई थी) तो मैं आगे होकर कहता कि आप कृपया मेरी जांच करें। ऐसी जांच से निर्दोष नेता की छवि में चार चांद लग जाते हैं, जैसे कि इस जांच में मोदी के लगे हैं। मोदी के हेलिकाॅप्टर में से कुछ नहीं निकला। मोदी को स्वयं चाहिए कि वे चुनाव आयोग से सार्वजनिक अपील करें कि वह अपने जांच संबंधी इस नियम को बदले। यही नियम लागू करते हुए जब ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के हेलिकाॅप्टर की जांच की गई तो वे एक शब्द भी नहीं बोले। उन्होंने चुपचाप जांच होने दी लेकिन केंद्रीय तेल मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की जांच होने लगी तो वे भड़क उठे। उनके हेलिकाॅप्टर में एक सीलबंद बड़ा सूटकेस रखा हुआ था। सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग के कान खींचे तो वह इन दिनों थोड़ा मुस्तैद हो गया है लेकिन उसकी यह मुस्तैदी सबके लिए एक-जैसी होनी चाहिए, चाहे वह प्रधानमंत्री हो या चपरासी हो।

….और अब राष्ट्रवाद के बाद जातिवाद…..?
ओमप्रकाश मेहता
अब ऐसा लगने लगा है कि इस देश में प्रजातंत्रीय संविधान की जगह नया सत्ता का संविधान लाने की तैयारी की जा रही है, इस नए संविधान का मूल मकसद सत्ता प्राप्ति के उचित-अनुचित अनुच्छेदों को जोड़कर सत्ता प्राप्ति के उद्देश्य को हासिल करने के तरीके सुझाना होगा। प्रतिपक्षी नेता जो आज के सत्तासीन नेताओं पर यह गंभीर आरोप लगा रहे है कि इस बार यदि मौजूदा सत्ता की वापसी हो गई तो देश का यह आखिरी चुनाव कहा जाएगा, यह नया संविधान इसी आरोप की पुष्टि करता है।
आज यह सब इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योंकि आजादी के बाद डाॅ. भीमराव आम्बेडकर की सदारत में जो संविधान तैयार कर आजाद भारत में 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया था, वह संविधान अब अंतिम सांस ले रहा है, इसे पहले तो अब तक के सत्तासीनों ने अपनी राजनीतिक स्वार्थ सिद्धी के लिए सवा सौ संशोधनों के तीरों से छलनी कर दिया और अब इसमें जो शेष अनुच्छेद है, उनकी अवहेलना कर संविधान की धज्जियाँ उड़ाने की कौशिशें सत्तारूढ़ नेताओं द्वारा ही की जा रही है। संविधान में स्पष्ठ उल्लेख है कि चुनावों या अन्य राजनीतिक कार्यों के लिए धर्म-जाति या सम्प्रदाय का उपयोग नहीं किया जाए, लेकिन आज देश में चुनाव प्रचार के दौर में जो कुछ भी चल रहा है, वह किसी से भी छुपा नहीं है, स्वयं देश के प्रधानमंत्री जब अपनी राजनीतिक स्वार्थ सिद्धी के लिए पहले राष्ट्रवाद, फिर देश की सेना के पराक्रम और अब जातिवाद का सहारा ले रहे है, तो अन्य नेताओं के बारे में क्या कहा जाए? और अब तो अपनी राजनीतिक चैसर फिट करने के लिए प्रतिपक्षी नेतागण संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति तक पहुंच गए? उन्हेें भी चुनावी राजनीति का मोहरा बनाने का प्रयास किया गया? यह अति नहीं तो और क्या हैं?
देश में अब तक एक दर्जन से भी अधिक लोकसभा चुनाव हो चुके है, किंतु इस चुनाव में जो निम्न और घटिया स्तर की राजनीति के दर्शन हो रहे है, उससे नेता तो नहीं देश का आम वोटर शर्मसार हो रहा है। गाली के शब्दकोष से नित नई गालियाँ चुनी जा रही है, फिर वह चाहे महिलाओं के लिए ही क्यों न हो?
ऐसा कतई नहीं है कि यह राजनीतिक स्तर सिर्फ सत्तारूढ़ दल या उससे जुड़े नेताओं का गिरा हो, बल्कि प्रतिपक्षी दलों ने भी इस गिरावट में पूरी सहभागिता निभाई।
अब यह समझ नहीं आ रहा है, आम वोटर या आम आदमी को, कि प्रधानमंत्री जी अपने पांच साल के शासनकाल की उपलब्धियाँ छोड़कर राष्ट्रवाद व जातिवाद तक कैसे पहुंच गए? क्या उनकी सरकार की एक भी उपलब्धि ऐसी नहीं है, जो चुनावी रण में सहयोगी बन सके? इसलिए उन्हें ऐसे हीनतम हथकण्डे़ अपनाने को मजबूर होना पड़ रहा है, आज चुनाव प्रचार में सत्तारूढ़ दल अपनी उपलब्धि की चर्चा क्यों नहीं कर रहा? क्या ऐसी एक भी उपलब्धि नहीं है, जो चुनाव प्रचार में सहयोगी बन सके? फिर सबसे बड़ी बात यह कि प्रतिपक्षी दल तो फिर भी गालियों के बीच अपने चुनावी घोषणा-पत्र का कभी-कभी जिक्र कर देते है, किंतु सत्तारूढ़ दल तो अपने घोषणा-पत्र में समाहित तथ्यों का भी जिक्र नहीं करता, सिर्फ प्रतिपक्ष को गालियाँ व स्वयं के प्रति सहानुभूति अर्जित करने के प्रयासों में भी प्रचार भाषण खत्म हो जाता है, शायद इसका कारण यह भी हो सकता है कि 2014 के चुनावी वादों की ये लोग याद दिलाना नहीं चाहते? क्योंकि उन वादों की किताब का हश्र भी हमारी संविधान पुस्तिका जैसा ही हुआ है।
इस तरह कुल मिलाकर इस बार जो देश में आम चुनाव हो रहे है, ये पिछले चुनावों से एकदम भिन्न है, पिछले चुनावों में प्रचार का माध्यम सत्तारूढ़ दल के लिए उसकी उपलब्धियां और प्रतिपक्ष के लिए महत्वाकांक्षी घोषणा-पत्र हुआ करते थे, किंतु इस बार पक्ष-प्रतिपक्ष सभी गालियों का कोष लेकर बैठ गए है और अपनी कर्कश वाणी से एक- दूसरे पर गालियों के तीर बरसा रहे है, इसमें इन्हें न कोई लाज आ रही है और न शर्म? और इसीलिए आम वोटर मतदान के वक्त तक यह तय नहीं कर पाता कि वोट किसे दिया जाए- साँपनाथ को, या नागनाथ को?

हिंसक सत्ता की नाकामी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
महावीर जयंति के अवसर पर हार्वर्ड केनेडी स्कूल की एक रपट दुनिया के आंदोलनों पर छपी है। यह खोजपूर्ण रपट इस मुद्दे पर छपी है कि पिछले 100 वर्षों में कितने हिंसक आंदोलन सफल हुए हैं और कितने अहिंसक ? इसके मुताबिक 36 प्रतिशत हिंसक आंदोलन सफल हुए हैं जबकि 54 प्रतिशत अहिंसक आंदोलन सफल हुए हैं। इस शोध-कार्य में विद्वानों ने दुनिया के 323 आंदोलनों का विश्लेषण किया था। पिछले 20 वर्षों में 69 प्रतिशत अहिंसक आंदोलनों ने सफलता प्राप्त की है। 20 वीं सदी में सबसे बड़े दो आंदोलन हुए। एक रुस में और दूसरा चीन में। ये दोनों आंदोलन मार्क्सवादी थे। दोनों हिंसक थे। दोनों में लाखों लोग मारे गए। रुस के सोवियत आंदोलन के नेता व्लादिमीर इलिच लेनिन थे और चीन के माओ-त्से-तुंग थे। एक ने जारशाही को उखाड़ फेंका और दूसरे ने च्यांग काई शेक को ! दोनों आंदोलन सफल हुए लेकिन उनका अंजाम क्या हुआ ? दोनों सिर के बल खड़े हो गए। दोनों असफल हो गए। वर्गविहीन समतामूलक समाज स्थपित करने की बजाय दोनों कम्युनिस्ट राष्ट्र निरंकुश तानाशाही में बदल गए। आज कोई भी उनका नामलेवा-पानीदेवा नहीं बचा है। इसी तरह के हिंसक तख्ता-पलट पूर्वी यूरोप, क्यूबा, एराक, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मिस्र, ईरान आदि में भी हुए लेकिन वे कितने दिन चल पाए ? उन्होंने कौनसी ऊंचाइयां छुईं ? या तो शीघ्र ही उनका अंत हो गया या उनसे जन्मी व्यवस्थाएं अभी तक सिसक रही हैं। भारत में भी हिंसा हुई लेकिन उसकी आजादी का संघर्ष मूलतः अहिंसक था। इसीलिए भारत में आज भी लोकतंत्र जगमगा रहा है और विविधतामयी समाज लहलहा रहा है। भारत में आज भी कई स्थानों पर हिंसक आंदोलन चल रहे हैं लेकिन वे बांझ साबित हो रहे हैं। नक्सलवादी और कश्मीरी आतंकवादी हजार साल तक भी खून बहाते रहें तो वे सफल नहीं हो सकते। यह बात अफगानिस्तान और पाकिस्तान के तालिबान और इस्लामी आतंकवादियों को भी अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए। वे नेपाल के माओवादियों से कुछ सबक क्यों नहीं लेते ? वे इस परम सत्य को क्यों नहीं समझते कि हिंसा से प्राप्त सत्ता को बनाए रखने के लिए उससे दुगुनी हिंसा निरंतर करते रहनी पड़ती है। नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी अपने-अपने समय में सफल जरुर हुए लेकिन उनका हश्र क्या हुआ, क्या हमें पता नहीं है ?

सिंदूर का चोला चढाने से होगी मनोकामना पूरी
अरविन्द जैन
(हनुमान जन्म पर विशेष) संकट मोचन, अंजनी सुत, पवन पुत्र हनुमान का जन्मोत्सव चैत्र माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है| प्रभु के लीलाओं से कौन अपरिचित अंजान है| हनुमान जयंती के दिन बजरंगबली की विधिवत पूजा पाठ करने से शत्रु पर विजय और मनोकामना की पूर्ति होती है|
हनुमान जी भगवान शिव के 11वें रूद्र अवतार माने जाते हैं| उनके जन्म के बारे में पुराणों में जो उल्लेख मिलता है उसके अनुसार अमरत्व की प्राप्ति के लिये जब देवताओं व असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया को उससे निकले अमृत को असुरों ने छीन लिया और आपस में ही लड़ने लगे। तब भगवान विष्णु मोहिनी के भेष अवतरित हुए। मोहनी रूप देख देवता व असुर तो क्या स्वयं भगवान शिवजी कामातुर हो गए। इस समय भगवान शिव ने जो वीर्य त्याग किया उसे पवनदेव ने वानरराज केसरी की पत्नी अंजना के गर्भ में प्रविष्ट कर दिया| जिसके फलस्वरूप माता अंजना के गर्भ से केसरी नंदन मारुती संकट मोचन रामभक्त श्री हनुमान का जन्म हुआ|
केसरी नंदन मारुती का नाम हनुमान कैसे पड़ा? इससे जुड़ा एक जग प्रसिद्ध किस्सा है| यह घटना हनुमानजी की बाल्यावस्था में घटी| एक दिन मारुती अपनी निद्रा से जागे और उन्हें तीव्र भूख लगी| उन्होंने पास के एक वृक्ष पर लाल पका फल देखा| जिसे खाने के लिए वे निकल पड़े| दरअसल मारुती जिसे लाल पका फल समझ रहे थे वे सूर्यदेव थे| वह अमावस्या का दिन था और राहू सूर्य को ग्रहण लगाने वाले थे। लेकिन वे सूर्य को ग्रहण लगा पाते उससे पहले ही हनुमान जी ने सूर्य को निगल लिया। राहु कुछ समझ नहीं पाए कि हो क्या रहा है? उन्होनें इंद्र से सहायता मांगी| इंद्रदेव के बार-बार आग्रह करने पर जब हनुमान जी ने सूर्यदेव को मुक्त नहीं किया तो, इंद्र ने बज्र से उनके मुख पर प्रहार किया जिससे सूर्यदेव मुक्त हुए| वहीं इस प्रहर से मारुती मूर्छित होकर आकाश से धरती की ओर गिरते हैं| पवनदेव इस घटना से क्रोधित होकर मारुती को अपने साथ ले एक गुफा में अंतर्ध्यान हो जाते हैं| जिसके परिणामस्वरूप पृथ्वी पर जीवों में त्राहि- त्राहि मच उठती है| इस विनाश को रोकने के लिए सारे देवगण पवनदेव से आग्रह करते हैं कि वे अपने क्रोध को त्याग पृथ्वी पर प्राणवायु का प्रवाह करें| सभी देव मारुती को वरदान स्वरूप कई दिव्य शक्तियाँ प्रदान करते हैं और उन्हें हनुमान नाम से पूजनीय होने का वरदान देते हैं| उस दिन से मारुती का नाम हनुमान पड़ा| इस घटना की व्याख्या तुलसीदास द्वारा रचित हनुमान चालीसा में की गई है –
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
एकबार, एक महान संत अंगिरा स्वर्ग के स्वामी, इन्द्र से मिलने के लिए स्वर्ग गए और उनका स्वागत स्वर्ग की अप्सरा, पुंजीक्ष्थला के नृत्य के साथ किया गया। हालांकि, संत को इस तरह के नृत्य में कोई रुचि नहीं थी, उन्होंने उसी स्थान पर उसी समय अपने प्रभु का ध्यान करना शुरु कर दिया। नृत्य के अन्त में, इन्द्र ने उनसे नृत्य के प्रदर्शन के बारे में पूछा। वे उस समय चुप थे और उन्होंने कहा कि, मैं अपने प्रभु के गहरे ध्यान में था, क्योंकि मुझे इस तरह के नृत्य प्रदर्शन में कोई रुचि नहीं है। यह इन्द्र और अप्सरा के लिए बहुत अधिक लज्जा का विषय था; उसने संत को निराश करना शुरु कर दिया और तब अंगिरा ने उसे शाप दिया कि, “देखो! तुमने स्वर्ग से पृथ्वी को नीचा दिखाया है। तुम पर्वतीय क्षेत्र के जंगलों में मादा बंदर के रुप में पैदा हो।”
उसे फिर अपनी गलती का अहसास हुआ और संत से क्षमा याचना की। तब उस संत को उस पर थोड़ी सी दया आई और उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया कि, “प्रभु का एक महान भक्त तुमसे पैदा होगा। वह सदैव परमात्मा की सेवा करेगा।” इसके बाद वह कुंजार (पृथ्वी पर बन्दरों के राजा) की बंटी बनी और उनका विवाह सुमेरु पर्वत के राजा केसरी से हुआ। उन्होंने पाँच दिव्य तत्वों; जैसे- ऋषि अंगिरा का शाप और आशीर्वाद, उसकी पूजा, भगवान शिव का आशीर्वाद, वायु देव का आशीर्वाद और पुत्रश्रेष्ठी यज्ञ से हनुमान को जन्म दिया। यह माना जाता है कि, भगवान शिव ने पृथ्वी पर मनुष्य के रुप पुनर्जन्म 11वें रुद्र अवतार के रुप में हनुमान वनकर जन्म लिया; क्योंकि वे अपने वास्तविक रुप में भगवान श्री राम की सेवा नहीं कर सकते थे।
सभी वानर समुदाय सहित मनुष्यों को बहुत खुशी हुई और महान उत्साह और जोश के साथ नाचकर, गाकर, और बहुत सी अन्य खुशियों वाली गतिविधियों के साथ उनका जन्मदिन मनाया। तब से ही यह दिन, उनके भक्तों के द्वारा उन्हीं की तरह ताकत और बुद्धिमत्ता प्राप्त करने के लिए हनुमान जयंती को मनाया जाता है।
हनुमान मंत्र:
मनोजवं मारुततुल्यवेगम्
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्री रामदूतं शरणं प्रपद्ये।।
हनुमान जयंती व्रत पूजा विधि
इस दिन व्रत रखने वालों को कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है| व्रत रखने वाले व्रत की पूर्व रात्रि से ब्रह्मचर्य का पालन करें| हो सके तो जमीन पर ही सोये इससे अधिक लाभ होगा| प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर प्रभू श्री राम, माता सीता व श्री हनुमान का स्मरण करें| तद्पश्चात नित्य क्रिया से निवृत होकर स्नान कर हनुमान जी की प्रतिमा को स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा करें| इसके बाद हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ करें| फिर हनुमान जी की आरती उतारें| इस दिन स्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड या हनुमान चालीसा का अखंड पाठ भी करवाया जाता है| प्रसाद के रुप में गुड़, भीगे या भुने चने एवं बेसन के लड्डू हनुमान जी को चढ़ाये जाते हैं| पूजा सामग्री में सिंदूर, केसर युक्त चंदन, धूप, अगरबती, दीपक के लिए शुद्ध घी या चमेली के तेल का उपयोग कर सकते हैं|पूजन में पुष्प के रूप में गैंदा, गुलाब, कनेर, सूरजमुखी आदि के लाल या पीले पुष्प अर्पित करें| इस दिन हनुमान जी को सिंदूर का चोला चढ़ाने से मनोकामना की शीघ्र पूर्ति होती है|
एक मान्यता के अनुसार हनुमान जी जैन थे ,इसके बहुत प्रमाण शास्त्रों में मिलते हैं .
हनुमान जयंती की सबको शुभकामनाएं .

गरीब देश : महंगे चुनाव
ओमप्रकाश मेहता
हमारा लोकतंत्र अब हमारे गरीब देश के लिए काफी खर्चीला और महंगा साबित होने लगा है, हमारे इसी देश में हमने अपना पहला लोकतंत्र महापर्व (चुनाव 1952) सिर्फ दस करोड़ रूपए में मनाया था, जो अब मात्र सढ़सठ साल बाद मनाए जा रहे इस लोकतंत्र महापर्व पर इस वर्ष इकहत्तर हजार करोड़ रूपया खर्च होने का अनुमान है, इतनी वृद्धि दर तो हमारे देश में महंगाई की भी नहीं रही, जितनी कि चुनावी खर्च की है और इस लोकसभा चुनाव के बाद पूर्व विश्व के प्रजातंत्री देशों में सबसे महंगा चुनाव कराने का सेहरा हमारे देश के सिर पर बंध जाएगा। इससे पहले हुए लोकसभा चुनाव (2014) पर हमने 35,577 करोड़ रूपए खर्च किए थे। अर्थात् इस बार पिछली बार के मुकाबले दुगुने से भी अधिक राशि खर्च होने का अनुमान है। यहां यह उल्लेखनीय है कि 2016 में अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव पर 46,270 करोड़ रूपए खर्च हुए थे, और चुनाव खर्च मंे अब तक वही सिरमौर देश था, और अब भारत अमेरिका से यह खर्चीला ताज छीनने जा रहा है।
……फिर सबसे बड़ा और अहम् तथ्य तो यह है कि यह खर्च तो वह है जो खुले आम कागजों पर दिखाया जाता है, इससे कई गुना अधिक खर्च राजनीतिक दल सब कुछ छुपाकर करते है। अर्थात् यदि यह कहा जाए कि चुनावों में देश के कालाधन का भी उपयोग हो रहा है, तो कतई गलत नहीं होगा, क्योंकि देश के बड़े उद्योगपति व पूंजीपति अरबों में पार्टियों को चंदा जो देते है, जिसका हिसाब कभी भी उजागर नहीं होता, चूंकि ये ही सत्ता के कर्णधार होते है, इस लिये इन्होंने कोई ऐसा सख्त कानून भी नहीं बनाया, जिससे इनकी यह कारगुजारी उजागर हो सके। यहां तक कि सूचना के अधिकार का कानून भी पार्टियों के चुनावी चंदे पर लागू नहीं होता। हमारे प्रजातंत्र की यह भी एक विसंगति है कि देश के पूंजीपति व उद्योगपति राजनीतिक दलों को जितनी राशि चंदे में देते है, सम्बंधित दल के सत्ता में आ जाने के बाद वह दी गई राशि से कई गुना वसूलने का प्रयास भी करते है और राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद चंदा दाताओं का विशेष ध्यान भी रखते है और उन्हें हर तरीके से ‘उपकृत’ करने का प्रयास करते है।
लोकतंत्र के साथ यह भी तो एक विसंगति जुड़ी है कि पांच साल में एक बार ही राजनीति का पहाड़ झुककर आम आदमी के पास आता है, बाकी चार साल तो आम आदमी अपने हाल पर रोता रहता है, उसके आंसू पौछने वाला कोई नहीं होता, किंतु अब समय के साथ देश का आम वोटर भी समझदार, जागरूक और सर्वज्ञाता हो गया है, अब वह समझ गया है कि उसे क्या करना है? और सत्तारूढ़ दल की कौन सी ज्यादती या गलती का उसे दण्ड देना है, शायद इसी लिए इस बार सत्ताधारी दल कुछ डरा सहमा सा नजर आ रहा है।
इसलिए कुल मिलाकर यदि इस बार चुनाव के नतीजे कुछ चमत्कारी हो तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि देश के आम मतदाता की स्मृति भी अब समय के अनुसार तीक्ष्ण हो चुकी है और वह हर बात व घटना को याद रखने लगा है। वह यह भी याद रखने लगा है कि पिछले चुनाव के समय कौन से दल के नेता ने कौनसे वादे किए थे और सत्ता में आने के बाद उनमें से कितने वादों को मूर्तरूप दिया? शायद इसी लिए सत्ताधारी दल चुनाव के समय अपनी विगत को और भविष्य की दुर्गति को लेकर चिंतित व भयभीत रहता है, आज देश में सत्तारूढ़ दल की भी वहीं स्थिति है।
इस तरह कुल मिलाकर अब देश में दैनंदिनी उपयोग की वस्तुओं के साथ चुनाव भी काफी महंगे होते जा रहे है, यदि कोई ऐसा चमत्कार हो, जिससे चुनावों के प्रबंधन और प्रचार पर खर्च होने वाली अपार धन राशि देश के गरीबों के कल्याण व विकास पर खर्च हो तो सोचिए यह भारत की विश्व में कितनी बड़ी और दुनिया के लिए अनुकरणीय मिसाल होगी?

नमो टी वी और आचार संहिता
डॉ. अरविन्द जैन
कृष्ण के मुख में किसी ने माखन लिपटाया, जब उनकी माँ ने उनसे पूछा की तुम्हारे मुख पर माखन किसने लगाया तो कहने लगे मो नहीं माखन खाओ, ग्वाल बाल मोहे मुख पर माखन लिपटाओ। एक मुहल्ले का पहलवान फुर्सत में रहता और चौराहे पर बैठा रहता, हर कोई बच्चे से पूछता बताओ अमेरिका का राष्ट्रपति कौन हैं तो बच्चा बौलता और रहो घर में, बाहर निकला करो ज्ञान बढ़ेगा, ट्रम्प हैं, दूसरे दिन पहलवान ने बालक से पूछा ब्रिटेन का प्रधान मंत्री कौन हैं, बालक चुप तो पहलवान ने बताया मे हैं, तीसरे दिन पहलवान ने बालक से पूछा भारत का राष्ट्रपति कौन हैं, तो लड़के ने नहीं बताया तो पहलवान बोलै कोविंद जी हैं, इस प्रकार बालक रोज रोज की पढाई से तंग आ कर चौथे दिन बालक पूछा ने पूछा पहलवान हीरालाल कौन हैं इस पर पहलवान चुप रहा तब बालक ने कहा रोज बाहर घुमा करो, वह रोज तुम्हारे घर जाता हैं !
इसी प्रकार नमो टी वी इस समय बहुत तेज़ी से चल रही हैं जो मोदी जी का खुला प्रचार कर रही हैं और मोदी जी का कहना हैं की मुझे नहीं मालूम हैं, यह क्या संभव हैं ? क्या मोदी जैसे तानाशाह और एकला चलने वाला व्यक्ति की इच्छा वगैर कोई पत्ता हिल सकता हैं, असंभव पर वह जान भूझ कर झूठ बोलते हैं जो उनके जन्मजात गुण हैं, बिना झूठ बोले उन्हें खाना नहीं पचता, दिन रात उनके गुणों का वर्णन करता हैं टी वी चॅनेल और उन्हें पता नहीं।
मजेदार बात यह हैं की इस टी वी को सूचना प्रसारण मंत्रालय से कोई
स्वीकृति नहीं मिली और न आजतक इस टी वी का मालिक कौन हैं का पता चला ? क्या यह बी जे पी का प्रचार तंत्र हैं। आखिर इतना कुछ हो रहा हैं और प्रधान सेवक अनभिज्ञ कैसे हो सकते हैं ? इसका खरच कौन वहन कर रहा हैं ?क्या इस प्रकार का विज्ञापन और प्रचार आचार संहिता का उल्लंघन नहीं हैं ?क्या इस प्रकार की सुविधा अन्य पार्टी को भी प्रदाय की जाना चाहिए। इस बात को आधार लेकर सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां भी नमो टी वी जैसे समूह में मांग करे। इस पर सूचना प्रसारण मंत्रालय क्या कार्यवाही करता हैं और चुनाव आयोग क्या बंदिश लगाता हैं।
क्या इस टी वी का मालिक कोई नहीं है या बिना मालिक के चल रहा हैं या बिना धन के सर्कार व्यय पर प्रसारण होना चाहिए, यह भी खुले रूप से भ्रष्टाचार के अंतरगत आता हैं। इस पर को कार्यवाही करेगा और किस पर कार्यवाही करेगा। इतना बड़ा छल खुले आम जनता और शासन और प्रशासन के सामने हो रहा हैं और सब मूक बधिर जैसे बैठे हैं, इसका मतलब इसके पीछे कोई बड़ा गिरोह काम कर रहा हैं। जैसा की कहा जाता हैं की यदि कोई चूहा, बिल्ली को आँख दिखाए तो समझो चूहा का बिल नजदीक हैं। इसी प्रकार नमो टी वी पर पार्टी और सत्ता का खुला प्रशय होने से दबंगता के साथ चल रहा हैं और कोई भी कार्यवाही नहीं करने का साहस कर पा रहा हैं।
चुनाव आयोग बिना रीढ़ का हैं वह इतना कमजोर हैं की कोई भी कार्यवाही करने में ढीलापन अख्तियार करता हैं, जैसे होली में आग लगी और सावन में आग बुझाएंगी। न योगी के ऊपर कार्यवाही की न कल्याण सिंह पर कुछ भी नहीं किया। जो स्वयं कार्यवाही करने में सक्षम हैं वह दूसरे की पाली में डालकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर देते हैं।
नमो टी वी भी भ्र्ष्टाचार का खुला खेल हैं और आचारसंहिता का खुला उल्लंघन हैं इस आधार पर नमो का चुनाव रद्द किया जाना चाहिए जिससे अन्यों को भी शिक्षा मिल सकेगी, और अन्य सभी राजनैतिक पार्टियों को भी इस प्रकार के प्रसारण की अनुमति मिलनी चाहिए।

क्या दोबारा भाजपा आने पर बंद हो जाएगी पेंशन ?
जग मोहन ठाकन
किसान कर्जा माफ़ी का नारा देकर वर्ष 2018 में तीन राज्यों –राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में जब से कांग्रेस ने जीत हासिल की है, सभी राजनैतिक पार्टियाँ किसान के कल्याण की घोषणायें करने में एक दूसरी से आगे आने की होड़ में लग गयी हैं।
भाजपा ने अपने इस पारी के अंतिम बजट में घोषणा की कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना के तहत पांच एकड़ तक के सभी छोटे और सीमान्त किसानों को प्रतिवर्ष छह हज़ार रूपए दिए जायेंगे।
बाद में राहुल गाँधी के पांच करोड़ गरीब परिवारों को न्यूनतम आय योजना के तहत प्रति परिवार प्रतिवर्ष 72000/ रूपए देने की घोषणा ने बीजेपी के गरीब परिवारों के वोट बैंक में सेंध लगाने के प्रयास को विफल कर दिया और भाजपा द्वारा गरीबों के वोट खींचने की आस पर पानी फेर दिया।
कांग्रेस के इस तीर को काटने के लिए भाजपा ने अपने ताज़ा जारी संकल्प पत्र में एक और तीर चलाया कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना के तहत बिना भू सीमा के सभी किसानों को 6 हजार रुपये का लाभ मिलेगा।
केवल छोटे किसानों को ही मदद देने से छोटे किसान तो भाजपा से जुड़ेंगें या ना जुड़ेंगें यह तो वक्त बताएगा, परन्तु सभी किसानों को इस योजना के दायरे में न लेने से बड़े किसान अवश्य भाजपा से नाराज हो गए थे।
अब संकल्प पत्र में सभी किसानों को जोड़ने की घोषणा से भाजपा ने अपने विश्वसनीय वोट बैंक रहे बड़े किसानों को पुनः अपने से बांधे रखने का प्रयास किया है। परन्तु क्या तर्क ले रही है भाजपा अपने इस अचानक तब्दीली बारे ?
केंद्र में रेलवे एवं कोयला मंत्री, पियूष गोयल, जिन्होंने भाजपा की इस पारी का अंतिम बजट भी पेश किया था, ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में, जो 10 अप्रैल 2019 के अंक में प्रकाशित हुआ है, तर्क दिया है कि – “हमारे संज्ञान में एक जेन्युइन मामला आया कि देश के कई क्षेत्रों में बड़े किसान भी अतिवर्षा, सुखा या बाढ़ की मार से पीड़ित होते रहे हैं। बुन्देलखण्ड की भांति कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ किसान सूखे से प्रभावित हैं। सभी किसानों ने, चाहे वे छोटे हैं या बड़े, सामूहिक रूप से देश को खाद्यान्न तथा अन्य फसलों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया है। इसलिए हमने सोचा कि सभी किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना के तहत कवर किया जाए। ”
फिर पांच एकड़ से अधिक वाले किसान बुढापा पेंशन से वंचित क्यों ?
भाजपा द्वारा जारी संकल्प पत्र में भाजपा ने घोषणा की है कि सभी छोटे और सीमांत किसानों को 60 साल के बाद पेंशन की सुविधा देंगे। हम देश में सभी सीमांत और छोटे किसानों के लिए पेंशन की योजना आरंभ करेंगे ताकि 60 वर्ष के बाद भी उनकी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
यदि भाजपा के संकल्प पत्र को ही भाजपा की आगामी योजनाओं का संकेत माना जाये तो भाजपा तो केवल 60 वर्ष से अधिक आयु के केवल सीमांत और छोटे किसानों को ही बुढापा पेंशन देगी।
जब भाजपा के केन्द्रीय मंत्री पियूष गोयल प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना में बड़े किसानों को शामिल करने हेतु तर्क देते हैं कि छोटे या बड़े – सभी किसान अतिवर्षा, सुखा या बाढ़ 0की मार से पीड़ित होते हैं और सभी किसानों ने सामूहिक रूप से देश को खाद्यान्न तथा अन्य फसलों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया है, तो फिर किसानों को पेंशन देने में पांच एकड़ की सीमा क्यों लगाई जा रही है ?
क्यों नहीं पांच एकड़ से ऊपर वाले सभी किसानों को भी उनके देश की तरक्की में योगदान को देखते हुए बुढ़ापा पेंशन दी जाए ?
हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं देश के उप प्रधानमंत्री दिवंगत चौधरी देवीलाल द्वारा हरियाणा में 1987 में शुरू की गयी 60 वर्ष से अधिक आयु वाले, न केवल किसान अपितु हरियाणा के हर नागरिक को बिना किसी व्यवसाय का भेदभाव किये अभी भी दी जा रही दो हज़ार रुपये प्रति माह सम्मान पेंशन की तर्ज पर देश के हर नागरिक को सम्मान पेंशन क्यों नहीं ?
अब प्रश्न उठता है कि क्या सारे देश में समान सिविल कोड लागु करने की हिमायती भाजपा अपने संकल्प पत्र को सारे देश में समान रूप से लागु करेगी ?
यदि हाँ, तो क्या भाजपा सारे देश में समरूपता लाते हुए केवल पांच एकड़ तक वाले किसानों को ही साठ वर्ष से अधिक आयु होने पर पेंशन देगी ? तो क्या हरियाणा में, जहाँ प्रदेश में भी भाजपा की सरकार है, और जहाँ सभी किसान, बिना किसी भूमि सीमा रेखा के, बुढापा पेंशन ले रहे हैं, वहां भी केवल छोटे और सीमान्त यानि पांच एकड़ तक के किसानों को ही पेंशन मिलेगी ? तो क्या लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा में पांच एकड़ से अधिक वाले किसानो की बुढ़ापा पेंशन बंद कर दी जायेगी ? क्या भाजपा इतना कठोर कदम उठा पायेगी ? क्या भाजपा पहले से पीड़ित किसानों के आक्रोश को झेल पायेगी ? इन सवालों के उत्तर भाजपा पहले दे चुकी है। वर्ष 2004 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने कर्मचारी यूनियनों के आक्रोश की परवाह किये बिना मिलिटरी कर्मियों को छोड़कर पैरामिलिटरी फोर्सेज समेत सभी केन्द्रीय एवं राज्य कर्मचारियों की पेंशन बंद कर दी थी, जिसका खामियाजा कर्मचारी आज तक भुगत रहे हैं और बार बार पुरानी पेंशन बहाली की मांग उठाते रहते हैं, परन्तु हाथी की चाल से मस्ती में चल रही भाजपा इसकी कोई परवाह नहीं कर रही है। और चले भी क्यों नहीं ? हमारे देश का वोटर मुद्दों को नहीं देखता, बल्कि जुमलों से प्रभावित होकर वोट देता है या जातिगत व धार्मिक आधार पर निर्णय कर भेडचाल में इ वी एम मशीन का बटन दबाता है, और इसी बटन के साथ ही दबा देता है अपना, देश का और प्रगति का गला। और फिर पांच साल तक मिमियाता रहता है बकरे की तरह अपनी ही कुर्बानी के इंतज़ार में, मात्र उस हरे घास की आस में जो वास्तविक नहीं है, अपितु आभासी है और सपने पाल पाल कर केवल हरी हो चुकी उसकी आँखों को हरी घास दिखाई देती है या दिखाई जाती है।

दो सीटों से क्यों लड़ रहे हैं राहुल गांधी
अजित वर्मा
राहुल गांधी इस बार दो लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं। वे अपनी परम्परागत सीट अमेठी के साथ ही दक्षिणी राज्य केरल के वायनाड लोकसभा क्षेत्र से च़ुनाव लड़ने जा रहे हैं। राहुल ने वायनाड से नामांकन पत्र भर दिया है, अब वे अमेठी से भी नामांकन भरेंगे। दो सीटों से चुनाव लड़ने को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी जारी है। अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ दूसरी बार चुनाव मैदान में उतरने जा रहीं भाजपा केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने राहुल पर निशाना साधते हुए कहा कि यह अमेठी की जनता का अपमान और उनके साथ धोखा है।
राहुल के दो सीटों पर चुनाव लड़ने का एक कारण यह भी बताया जा रहा है कि पिछले 2014 के चुनाव में अमेठी में राहुल का जीत का अंतर घटकर 1 लाख वोट रह गया था इसलिये हार के डर से राहुल गांधी दो सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं।
राहुल गांधी की दादी श्रीमती इंदिरा गांधी भी एक बार यूपी की रायबरेली की सीट के अलावा कर्नाटक की चिकमंगलूर सीट से तथा राहुल की मां श्रीमती सोनिया गांधी भी रायबरेली के साथ ही कर्नाटक के बेल्लारी सीट से चुनाव लड़ चुकी हैं। दोनों ने ही दोनों सीटों से जीत भी हासिल की थी। अब राहुल गांधी ने भी अपनी दादी और मां की तरह पहली बार दक्षिण का रुख किया है। राहुल ने वायनाड से नामांकन भरने के बाद यह कहा कि वो इस बार उत्तर के अलावा दक्षिण से भी चुनाव लड़ने जा रहे हैं क्योंकि दक्षिण की संस्कृति और समस्याएं भी अलग तरह की हैं और वे इन पर ध्यान देना चाहते हैं।
दक्षिणी राज्य हमेशा- कांग्रेस के संकट में साथ निभाते रहे हैं। 1977 में आपातकाल के बाद जब लोकसभा के चुनाव हुए थे तब भी दक्षिण ने श्रीमती इंदिरा गांधी को 145 सीटें दी थीं। पिछले चुनाव में कांग्रेस को पूरे देश से जो 44 सीटें मिलीं थीं उनमें से 17 सीटें कांग्रेस को केरल और कर्नाटक ने दी थीं। इससे साबित होता है कि दक्षिणी राज्य कांग्रेस के संकट के साथी हैं। राहुल गांधी ने भी इस बार दक्षिणी राज्यों पर ध्यान केन्द्रित किया है। पहले उनका नाम कर्नाटक से चुनाव लड़ने के लिये चर्चाओं में आया था लेकिन वे केरल के वायनाड से चुनाव लड़ने जा रहे हैं। वायनाड ऐसा क्षेत्र है जो कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमा पर है। इस तरह राहुल गांधी केरल के साथ ही कर्नाटक और तमिलनाडु पर भी ध्यान केन्द्रित कर पायेंगे।
केरल अब वामपंथियों की सत्ता का आखरी राज्य बचा है। इसलिये इस राज्य में राहुल गांधी के धमक जाने से वामपंथी दल बौखला गए हैं। कामरेड प्रकाश कारंत कहते हैं कि हम राहुल गांधी को हरायेंगे। राहुल गांधी कहते हैं कि वो साम्यवादियों के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे। साम्यवादियों को खतरा हो चला है कि राहुल के बहाने कांग्रेस केरल में पैर पसार लेगी। केरल में हाथ और हसियां के बीच कड़ा मुकाबला होने की स्थिति बन गयी है।
राहुल गांधी के दक्षिण में दस्तक देने से कांग्रेस की संभावनाएं बढ़ने की उम्मीद तो की जा रही है लेकिन राहुल की बदौलत दक्षिण में कांग्रेस को कितना फायदा होगा ये तो चुनावी नतीजों से पता चल सकेगा। यह भी पता चल पायेगा कि राहुल गांधी दोनों सीटों से जीतते हैं या नहीं।

अब मुकाबला ‘ढकोसला’ और ‘झाँसा’ के बीच……?
ओमप्रकाश मेहता
लोकसभा चुनावी महासंग्राम के पहले दौर के महज चार दिन पहले देश पर राज कर रही भारतीय जनता पार्टी ने अपनी ‘वादा पुस्तिका’ या घोषणा-पत्र जारी किया, जिसे ‘संकल्प-पत्र’ नाम दिया। इसके करीब पांच दिन पूर्व इस महासंग्राम के प्रतिपक्षी महानायक कांग्रेस ने अपना इसी तरह का दस्तावेज जारी किया। भाजपा के इस घोषणा-पत्र को जहां कांग्रेस ने ‘झाँसा-पत्र’ नाम दिया, वहीं भाजपा ने कांग्रेस के घोषणा-पत्र को ‘ढकोसला-पत्र’ नाम दिया, इस प्रकार इस बार यह महासंग्राम ‘झाँसा’ और ‘ढकोसला’ के बीच होगा और इस स्पद्र्धा में जो आम वोटर सबसे अधिक प्रलोभित कर लेगा, वही इस संग्राम का ‘मीर’ होकर इस देश पर राज करेगा, फिलहाल दोनों ही इस हेतु पूरी तरह तैयारी में जुटे है।
सत्तारूढ़ और मुख्य प्रतिपक्षी दलों के इन घोषणा पत्रों में अंतर सिर्फ इतना है कि प्रतिपक्षी दल कांग्रेस ने देश के बीस करोड़ गरीबों को 72 हजार रूपए प्रतिवर्ष देने के ‘न्याय’ से नामित योजना से सत्ता प्राप्त करने की उम्मीद जताई है, वहीं सत्तारूढ़ प्रतिपक्षी दल भारतीय जनता पाटी ने घोषणा पत्र की परम्परागत परम्परा को निभाने की भूमिका निभाई, ऐसा इसलिए लगा क्योंकि भाजपा के घोषणा पत्र में कोई विशेष नया मुद्दा नहीं है, वहीं राम मंदिर निर्माण, कश्मीर से धारा 370 व 35ए हटाने और वो ही वादे है जो 2014 के घोषणा पत्र में शामिल थे और जिनकी पांच साल तक कोई चिंता नहीं की गई, फिर भी बहात्तर हजार के मुकाबले छः हजार रूपए वार्षिक गरीबों को देने की बात अवश्य की गई। बेरोजगारी बेहाल किसानों और अन्य ज्वलंत मुद्दों पर वही घीसा-पीटा राग अलापा गया है। भाजपा ने इस बार वादा संस्कृति से ऊपर उठ देश या राष्ट्र के नाम पर चुनाव लड़ने का फैसला किया औश्र सैना व वैज्ञानिकों के शौर्यों को अपने खाते में डालकर उनके नाम पर वोट मांगने का फैसला लिया। इस तरह यदि यह कहा जाए कि भाजपा ने उनके बारे में 93 वादे किए और राष्ट्र धर्म को सबसे ऊपर रख घोषणा पत्र की औपचारिकता निभाई वहीं कांग्रेस ने 52 विषयों का चयन कर बड़े उत्साह के साथ 487 वादे किए और रोजगार को सबसे ज्यादा अहमियत दी।
यदि हम देश के अहम् मुद्दों को दोनों घोषणा पत्रों के आईने में देखें तो हम पाते है कि हमारे देश के अन्नदाता किसान के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अगले दो सालों में किसानों की आय दुगुनी करने का पुराना राग अलापा है और एक लाख तक का कर्ज पांच साल तक ब्याज मुक्त रखने का जिक्र किया है वही 25 लाख करोड़ ग्रामीण विकास पर खर्च करने की बात कहीं है साथ ही साठ वर्ष से अधिक उम्र के किसानों को पेंशन देने की भी बात कहीं है, वहीं कांग्रेस ने किसानों के लिए अलग बजट का प्रावधान करने, कर्ज नहीं पटा पाने के अपराध को ‘आपराधिक’ दायरें से निकालकर ‘सिविल’ के पाले में डालने तथा मनरेगा के कार्य दिवसों की सीमा एक से बढ़ाकर डेढ़ सौ करने की बात कही है। इसी तरह गरीबों के लिए भाजपा ने गैस सिलेण्डर का वादा दोहराया है तथा प्रत्येक परिवार को पक्का मकान देने व बिजली, पानी, शौचालय की सुविधा मुहय्या कराने की बात कहीं है, वहीं कांग्रेस ने ‘न्याय’ (न्यूनतम आय योजना) के माध्यम से प्रतिवर्ष हर गरीब परिवार को बहात्तर हजार रूपए देने की घोषणा की, अर्थात् हर गरीब परिवार को पांच साल में तीन लाख साठ हजार रूपया मिल सकेगा। इसी घोषणा से भाजपा से घबराहट महसूस की जा रही है।
अब जहां तक रोजगार का सवाल है भाजपा ने कहा है कि देश की अर्थ व्यवस्था से जुड़े बाईस बड़े क्षेत्रों मंे रोजगार के नए अवसर पैदा करने के लिए ज्यादा से ज्यादा मद्द दी जाएगी, साथ ही प्रधान मंत्री मुद्रा योजना के तहत सभी सत्रह करोड़ से ज्यादा उद्यमियों को कर्ज मुहैय्या कराया जा चुका है, उल्लेखनीय है कि भाजपा ने 2014 के चुनावी घोषणा पत्र में प्रतिवर्ष दो करोड़ बेरोजगारों को रोजगार मुहैय्या कराने की बात कही थी। कांग्रेस ने 2020 तक 22 लाख सरकारी रोजगार उपलब्ध कराने की बात कही है, इसके साथ ही दस लाख युवाओं को देश की ग्राम पंचायतों में नौकरी दिलाने का भी वादा किया है, देश के युवा बेरोजगारों को यह भी कहा गया है कि कांग्रेस की सरकार बनने पर तीन साल तक युवाओं को कोई भी नया रोजगार प्रारंभ करने के लिए सरकार से अनुमति लेने की जरूरत नही पड़ेगी।
इस प्रकार भाजपा-कांग्रेस दोनों ने ही अपने घोषणा-पत्रों के माध्यम से देश के आम वोटर को लुभाने की भरपूर कौशिश की है। किंतु ऐसा माना है कि ‘‘ये पब्लिक है, जो सब जानती है’’।

गांधी के नाम भूल जाने पर चलो कबीरदास को तो याद रखा…!
नईम कुरेशी
म.प्र. में कांग्रेस ने समझदारी से इस बार टिकिटों का बँटवारा करके अपने सियासी दांव में बढ़त जरूर बना ली है। जहां देवास से संत कबीर वाणी के प्रचार प्रसार करने वाले लोकगायक प्रहलाद टिपानिया को आगे लाकर उनकी लोकप्रियता को सलाम किया है। कांग्रेस वैसे तो अपने गांधीवादी दर्शन से काफी पहले हट चुकी थी। उसके यहां प्लेन हायजैक करने वाले गोपाल पाण्डे, कमलापति त्रिपाठियों, नारायणदत्त तिवारियों का उत्तर प्रदेश में सत्ता की चाबियाँ रही थीं वहीं बिहार में तमाम मिश्राओं के हाथों में सत्ता थी। नतीजे में उत्तर प्रदेश में कांग्रेसियों से सत्ता मुलायम व उनक परिजनों ने सत्ता छीन कर कांग्रेस को बैसाखियों पर पिछले 30 सालों से ला दिया, राजीव गांधी को उनका भोलापन खा गया। कांग्रेसियों ने संजय गांधी उनके चमचों में अकबर अहमद जैसे नये अवतारों को जन्म दिया जो उनके ताबूत में कीलें ठोकते रहे। बंसीलाल से लेकर मध्य प्रदेश के श्यामा व विद्याचरण शुक्ल की मंडली भी संजय के साथ मिलकर मलाई काटती रही।
भला हो अर्जुन सिंह, माधवराव सिंधिया का जिन्होंने 82-84 में शुक्ल बंधुओं से कांग्रेसी सत्ता का जहाज छीन लिये वरना मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस उत्तर प्रदेश की तरह लंगड़ी लूली बनकर रह जाती। कांग्रेस ने न सिर्फ अपने गांधीवादी विचारों के छिन जाने का कभी गुमान भी नहीं रहा बस सत्ता और सिर्फ सत्ता चाहे वो सामंतों, राजपूतों से मिले या फिर विचार व सिद्धांतों को बेचकर फिर भी मध्य प्रदेश में अभी भी काफी कुछ बचा है। उत्तर प्रदेश व बिहार में तो सब कुछ वो लुटवा चुकी है। दलित, पिछड़े, अति पिछड़े व अल्पसंख्यक मुसलमानों को कांग्रेसियों ने अक्सर अपना वोट बैंक समझा। उन्हें आर.एस.एस. का डर दिखाकर उनसे वोट लेते रहे पर विकास की गंगा से उन्हें अक्सर दूर भगाते रहे। कांग्रेस के ज्यादातर दलित नेता ऐसे दिये जो शराब और शवाब में मस्त रहे। बस गांधी नेहरू परिवार उन्हें वोट दिलाता रहा। उस दौर में 70-80 के दशकों में मेरठ, संभल, अलीगढ़ से लेकर इतने दंगे कराये गये संघ परिवार व कांग्रेसियों की उन पर कई बड़े ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। कांग्रेसी नेता अपनी सत्ता के दौर में संघ परिवार को भी पालते पोसते रहे। वो तो कुछ वामपंथी लोग उनके साथ लगे रहे थे 1980-90 के दशकों में उन्होंने कांग्रेसियों को बीच बीच में रोका टोका वरना मध्य प्रदेश भी उत्तर प्रदेश की तरह तथाकथित समाजवादियों की जेबों में चला जाता। 1960-70 के दशक में ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे डी.पी. मिश्रा के घमण्ड व अत्याचारों के खिलाफ जन आंदोलन छेड़ कर उन्हें धराशाही कर जनसंघ को खड़ा करने में अहम रोल अदा किया और अटल बिहारी वाजपेयी व नारायण कृष्ण शेजवलकर, माधवशंकर इन्दापुरकर आदि संघ के नेताओं को ग्वालियर राजपरिवार के कारण लोकप्रियता मिली। शेजवलकर जी ने मध्य प्रदेश में जनसंघ का झंडा ऊँचा कर समाजवादियों व कांग्रेसियों की अवसरवादिता पर काफी लगाम लगाई।
भोपाल के शाकिर अलि खॉन व ग्वालियर से रामचन्द्र सर्वटे, बालकृष्ण शर्मा आदि ने एक दो दशक तक खूब गरीबों मजदूरों व किसानों को मजबूत मंच दिये जो 70 से 90 तक ही चल पाये। उन्हें भी कांग्रेसियों ने संघ के साथ मिलकर धराशाही कर दिया। अर्जुन सिंह के शागिर्द रहे दिग्विजय सिंह ने जरूर अपनी सत्ता के 10 सालों में कभी-कभी दलितों पिछड़ों व मुसलमानों का साथ दिया व कांग्रेस की इज्जत बचाते रहे वरना मोतीलाल बोरा रीवा के श्री निवास तिवारी आदि ने कांग्रेस को एक बार फिर से डुबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसी बीच छत्तीसगढ़ से एक फर्जी आदिवासी सामंत का जन्म भी हो गया जिसे अर्जुन सिंह साहब नेकरशाही से लेकर आये थे अजीत जोगी, उसने भी कांग्रेस को डुबाने में उत्तर प्रदेश के तिवारी, त्रिपाठियों, मिश्रा, दीक्षितों की तरह काम किया। इस बीच माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस के लिये काफी कुछ किया। संघ परिवार के एक बड़े नायक रहे अटल बिहारी वाजपेयी को 84 में लोकसभा में लाखों वोटों से धराशाही कर डाला।
अच्छी बात ये है कि भले ही कांग्रेसी गांधीवाद गांधी दर्शन को जरूर भूल चुकी है पर देवास से कबीर साहब के विचारों के गायक टिपानिया को याद करके उन्हें प्रत्याशी बनाकर अपने कुछ पाप जरूर धोलेगी। आर.एन. बेरबा की बेटी किरन सिंह का चुनाव भी काफी बेहतर है वरना कांग्रेस अभी ऐसे-ऐसे नेताओं के भरासे है जो कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं फिर भी उन्हें जिलों में पार्टी की कमान सौंपना पड़ रही है क्योंकि विचारों और समाजसेवियों में उसकी पैठ खत्म जो हो चुकी है। जमीन माफिया, शराब कारोबारी, अवसरवादी ही अब उसके पास रह गये हैं।
बेलगाम युवा नौकरशाह
कांग्रेसी दौर में जहां नौकरशाहों को सामंती अंदाज में जीने व उनकी शैली में परिवर्तन करने पर मजबूर होना पड़ा था वरना 80-90 के दौर में तो कलेक्टर व कमिश्नरों से मिल पाना अकबर बादशाह से मुलाकात जैसा रहा था। मुरैना व ग्वालियर में कलेक्टर रहे खन्ना को देखने का मौका मिला। उनकी पत्नी को ए.डी.एम. जैसे लोग शॉपिंग कराते देखे जाते थे। इन सब पर अर्जुन सिंह के चाबुक से ये लोग कुछ संवेदनशील होने को मजबूर हुये थे। शिवराज मामा व उमा भारती के दौर में भी नौकरशाही जवाबदेह नहीं थी। उन्हें मामा ने क्षेत्रीय छत्रयों की सेवा में दे रखा था। हमने अपने 45 सालों के अनुभवों में 2007-8 बैच के अनय द्विवेदी व अजय गुप्ता जैसे उद्दंड व घमण्डी युवा नौकरशाह भी देखे जो क्षेत्रीय सांसद से घरोबा बनाकर न सिर्फ जन प्रतिनिधियों व समाजसेवियों से फोन पर बात करने में परहेज करते थे बल्कि जनता के हित का कोई काम उन्हें कराने में भा.ज.पा. वालों को ही पसीना आता था। राहुल नाम के एक कलेक्टर ने तो पिछले साल ही उच्च न्यायालय व सारे कायदे कानूनों को मुंह चिड़ाकर जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलपति के निवास के सामने अपने समाज की मूर्तियों का बीस फीट ऊँचा शिलालेख लगवाने व ग्वालियर फोर्ट जैसे महत्वपूर्ण विश्वप्रसिद्ध स्मारक के मैन गेट पर भी अतिक्रमण कराने की हिमाकत कर डाली। कोई सत्ताधारी जनप्रतिनिधि या प्रेस रिपोर्ट इस पर नहीं बनायी जा सकी। कांग्रेस के दौर में ये जरूर है कि अतिपिछड़ों व दलितों की भी कभी-कभी पूछ परख हो जाती है। काश कोई ज्योति बसु, प्रकाशचन्द्र सेठी व अर्जुन सिंह जैसे लोग और होते।

संवेदनशील क्षेत्रों में घुसपैठ का रोना
अजित वर्मा
पुलवामा धमाके के बाद चले तेज घटनाक्रम के बाद तनाव कुछ कम होता भले दिख रहा है, लेकिन खुफिया एजेंसियें के हवाले से खबरें आ रही हैं कि आतंकवादी समूह भारत में सैनिकों और सैन्य प्रतिष्ठानों को फिर निशाना बना सकते हैं। इसीलिए सेना को आतंकवादी समूहों की घुसपैठ की आशंका के कारण हाईअलर्ट पर रखा गया है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में सीमा पर आबादी वाले इलाके में काफी संख्या में आतंकवादी मौजूद हैं और आशंका यह है कि भारत में घुसपैठ करके ऐसे हमले करने के लिए उनका इस्तेमाल किया जा सकता है।
जम्मू क्षेत्र में पुंछ से लेकर उत्तर कश्मीर में कुपवाड़ा तक 740 किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा पर गतिविधियों पर नजर रख रहे अधिकारियों को आशंका है कि हालिया तनाव के दौरान भारी नुकसान झेल चुका पाकिस्तान भारतीय सीमा में आतंकवादियों के जरिये अपनी पुरानी शूट एंड स्कूट (हमला करो और भागो) युद्ध तकनीक का इस्तेमाल कर सकता है। पहले भी आतंकवादी समूहों ने ऐसी घुसपैठ की है, जिसमें या तो हमारे कुछ जवान मारे गए या सैन्य प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचा।
कई बार वे भारतीय सीमा पर कुछ सौ मीटर तक ही घुसते हैं, गश्ती दल पर हमला करते हैं और वापस भाग जाते हैं। पाकिस्तानी सेना भारतीय चौकियों पर गोलीबारी कर उन्हें सुरक्षा कवच मुहैया कराती हैं। पूर्व में जम्मू क्षेत्र के कठुआ, पुंछ और राजौरी सेक्टरों के साथ-साथ कश्मीर क्षेत्र में कुपवाड़ा, उरी और गुरेज में इस तरह की घुसपैठ देखी जा चुकी है। इसमें घुसपैठिये नियंत्रण रेखा पार करने के बाद जो भी पहला सैन्य प्रतिष्ठान या सैनिक दिखाई देता है, उस पर हमला करते हैं। इसके साथ ही विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल कर नजदीक से जवानों को निशाना बनाने की घटनाएं भी देखी गई हैं। इनमें चाकू से हमला या भारतीय सेना के गश्ती दल के रास्तों पर आइईडी लगाना भी शामिल है।
हम यह बातें दशकों से सुनते आ रहे हैं और यह भी घुसपैठ रोकने के लिए उपाय किये गये हैं, तो हमारे मन में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है जब हमारा देश अंतरिक्ष के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो चुका है तो हम अपनी सीमा, विशेषत: संवेदनशील सीमा की सूक्ष्म निगरानी अंतरिक्ष में उपग्रह स्थापित करके क्यों नहीं कर सकते? दूसरे, पूरी दुनिया जानती है कि अंतरिक्ष में हमारे उपग्रह स्थापित हैं, तो क्या वे ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं हैं? हम चन्द्रयान पर पहुँच गये। मंगल की ओर हमारा यान अग्रसर है तो आखिर पाकिस्तान और चीन के साथ अपनी सीमा की उपग्रहीय निगरानी में हमारे सामने क्या बाधा है? कौन रोक रहा है हमें? यह बात हम बहुत उच्चस्वरों में 1999 के कारगिल युद्ध के समय से लिख रहे हैं। उपग्रह स्थापित करने की खबरें आयी भी थीं। पर अब क्या स्थिति है? सरकार और सेना को इस विषय में स्वत: चिंतन करना चाहिए और देश को आश्वस्ति भी देना चाहिए।

मोदी सरकार पर विश्वसनीयता का संकट
सनत जैन
सुप्रीम कोर्ट ने राफेल मामले में जो फैसला दिया है, उससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर विश्वसनीयता का संकट खड़ा हो गया है। लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण के मतदान के पूर्व सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर भारत सहित अन्य देशों में भी होगा। 2014 में नरेंद्र मोदी की छवि आम जनता के बीच एक ऐसे नेता के रूप में बनी थी, जो बेहद ईमानदार है। भ्रष्टाचार और कालेधन को भारत से समाप्त कर देगा। उसके नेतृत्व में देश में कानून व्यवस्था का राज होगा। सबका साथ और सबका विकास होगा और अच्छे दिन आएंगे।
विदेशों से जो काला धन भारत ने वापस आएगा, उससे आम लोगों के खाते में पैसे आएंगे। आम जनता ने उन्हें हीरो के रूप में स्वीकार कर यह माना था कि मोदी राज में कांग्रेस जो 60 वर्षों में नहीं कर पाई, वह मोदी 60 माह में कर दिखाएंगे। मोदी ने अपनी सभाओं में एक आम जनता से स्पष्ट बहुमत की मांग की थी। भारत की जनता ने 30 वर्ष बाद केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार देकर मोदी अर्थात अपने हीरो की कथनी और करनी में विश्वास किया था।
2014 में केंद्र में पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार बनी। राज्य के चुनाव में भी मोदी का जादू चला। अधिकांश राज्यों में भाजपा की सरकारें बनी। दिल्ली एवं बिहार का विधानसभा चुनाव जरूर मोदी की इच्छा के विपरीत गए। मोदी का दिग्विजय रथ दिल्ली और बिहार ने रोका था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सलाहकार अमित शाह का जादू जनता के साथ चढ़कर बोल रहा था। जम्मू- कश्मीर में भी भाजपा पीडीपी के साथ सरकार बनाने में सफल रहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की। भारत में पहली बार महिलाएं अपने पति और बच्चों की नजरों में अपमानित हुई। उनकी कई वर्षों की बचत जो उन्होंने अपने कठिन समय पर पति और बच्चों से छुपाकर एकत्रित की थी वह बैंकों में जमा करनी पड़ी। शादी विवाह और बीमारी की हालत में उन्हें बाकी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी आम जनता ने अपने हीरो मोदी को समर्थन दिया। नोटबंदी के समय भी कहा गया कि 60 दिनों में सारा काला धन बैंकों में जमा हो जाएगा। इसका फायदा गरीबों को मिलेगा। लोगों को लगा कि जनधन खाते में नोटबंदी के बाद जो काला धन बैंकों में जमा होगा उसे गरीबों में बांटा जाएगा। उत्तर प्रदेश की विधानसभा चुनावों में लोगों ने भाजपा के पक्ष में मतदान करके भारी बहुमत के साथ भाजपा की सरकार उत्तर प्रदेश में बनवा दी।
नोटबंदी के बाद मीटर उल्टा घूमना शुरू हो गया। सारा धन बैंक में वापस आया। 15 लाख को जुमला बता दिया गया। 60 दिन का सपना भी जुमला बन कर रह गया। स्पष्ट बहुमत होने के बाद भी राम मंदिर नहीं बना। जम्मू कश्मीर में भाजपा की गठबंधन सरकार बनने के बाद 35 ए एवं धारा 370 समाप्त नहीं हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व एवं गठबंधन सरकार होते हुए भी सबसे ज्यादा सैनिक जम्मू कश्मीर में शहीद हुए। पाकिस्तान में सीमा का उल्लंघन करते हुए सबसे ज्यादा हमले पिछले 3 वर्षों में किए। सैकड़ों कश्मीर नागरिक आतंकी मुठभेड़ में मारे गए। गौ मांस का निर्यात मोदी राज में सबसे ज्यादा बढ़ा। 2 करोड़ लोगों को रोजगार देने का वादा किया था किंतु रोजगार नहीं मिला। उल्टा नोटबंदी के बाद बेरोजगारी ने पिछले 45 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया। किसानों की आत्महत्या बढ़ गई और महिलाओं एवं दलितों पर अत्याचार बढ़े हैं। मॉब लिंचिंग की घटनाएं बढ़ी है। जीएसटी के माध्यम से आम लोगों पर टैक्स बढ़ाया गया। पेट्रोल डीजल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में कम होने के बावजूद महंगे दामों पर बेचा गया। गरीब और गरीब हुआ अरबपति और खरबपति का धन पिछले 5 वर्षों में तेजी के साथ बड़ा है।
पिछले कई माह से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राफेल मामलों में चौकीदार चोर है के नारे लगवा रहे हैं। राफेल मामले में सरकार कह रही है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सरकार को क्लीन चिट दे दी है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की थी। इसमें कहा गया था कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को गलत जानकारी दी थी। सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं और सरकार का पक्ष सुना। उसके बाद सरकार की दलील खारिज करते हुए राफेल मामले की खुली सुनवाई करने की मांग स्वीकार कर ली है। लोकसभा चुनाव का प्रचार शुरू है। 2013- 14 में मोदी के पक्ष में एक लहर चल रही थी। लहर अब देखने को नहीं मिल रही है। 5 साल की मोदी राज में जनता की अपेक्षाएं और जो बातें मोदी ने 2014 में किए थे उसका मंथन जनता कर रही है। नरेंद्र मोदी के ऊपर 5 वर्ष पूर्व किए गए वादों के अनुसार यदि काम हुआ है तो जनता उन पर विश्वास करती किंतु जिस तरह की स्थिति देखने को मिल रही है उससे स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी और भाजपा को लेकर आम जनता के मन में विश्वसनीयता पर संकट है। सुप्रीम कोर्ट के आए फैसले से यह संकट और बढ़ गया है। लोकसभा चुनाव में इसका असर जरूर होगा।

यूरोप-ओशिनिया देशों के बीच व्यापारिक संबंध
अजित वर्मा
भारत में यूरोपीय और ओशिनिया देश प्रमुख व्यापारिक साझेदार होने के साथ ही निवेश के प्रमुख स्रोत भी हैं। इन देशों में व्यापार की प्रचुर संभावनाए मौजूद हैं जिनका लाभ उठाया जा सकता है। इन देशों के साथ भारत ने हाल के दिनों में आर्थिक संबंधों को अगले स्तर तक ले जाने के प्रयासों के तहत कुछ व्यापारिक समझौते किए गए हैं। इन प्रयासों को तार्किक निष्कर्ष पर ले जाने की आवश्यकता है। वाणिज्य सचिव डॉ.अनूप वधावन ने नई दिल्ली में यूरोपीय और ओशिनिया देशों के राजदूतों और उच्चायुक्तों के साथ व्यापार और आर्थिक सहयोग पर वार्ता भी की है। ओशिनियाई देश प्रशांत महासागर और उसके आसपास के क्षेत्र के द्वीपीय देश हैं जिन्हें उनकी भौगोलिक समानता के कारण ओशिनियाई देशों के रूप में जाना जाता है। विकासशील और विकसित देशों के साथ होने वाली व्यापार वार्ताओं की तरह ही यूरोपीय और ओशिनियाई देशों के साथ भी लंबे समय से ऐसी वार्ताएं की जा रही हैं।
भारत एक विकासशील देश है जबकि यूरोपीय संघ और ओशिनिया देश मुख्य रूप से विकसित हैं और इस वजह से हमारी महत्वाकांक्षाएं, आकांक्षाएं और संवेदनाएं कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में इन देशों के साथ मेल नहीं खाती हैं। यह आशा व्यक्त की जा रही है कि भारत, यूरोपीय संघ और ओशिनिया देश इन मुद्दों को सुलझाने में सक्षम होंगे और निकट भविष्य में आपासी समझ विकसित कर किसी प्रकार के औपचारिक समझौते तक पहुंच पाएंगे।
भारत,यूरोपीय संघ और ओशिनिया में उपलब्ध अवसरों को समझने के लिए सरकार, निर्यात, व्यापार और निवेश से संबंधित संस्थानों, निर्यातकों और व्यवसायों आदि के हर स्तर पर संपर्क बनाए रखना जरूरी है। एक-दूसरे की बाध्यताओं को समझते हुए सभी पक्षों की रजामंदी से बीच का रास्ता निकालने की भी आज सबसे बड़ी आश्यकता समझी जा रही है।

विश्व का पहला संगीत विद्यालय दतिया में…
नईम कुरेशी
यहां ब्रम्हाजी के 4 मानस पुत्रों सनत कुमारों ने जिन्हें सनक, सनन्दन, सनातन और सनत कुमारों ने घोर तप किया था व 4 गहरे कुँए भी खोदे थे जिनमें जल न निकलने पर सिन्धु नदी जो विदिशा के सिरोंज से निकलती है उसे आवाहन करना लिखा गया है।
– सिन्धु नाम्नी नदी चन्द्रे पुरे चोतर वाहिनी।
नदी उत्तर की ओर जा रही थी। ऋषियों के आवाहन पर उसने अपना कुछ मार्ग बदल लिया तेज गर्जन के साथ। ऋषियों द्वारा खोदे गये कुओं को भरकर आगे बढ़ गई। यही स्थान सनत्कूप या सनकुआ कहलाता है।
पद्म पुराण के दूसरे खण्ड में भी ”सनकुआ“ का खास जिक्र है।“ नारदजी की तपस्थली भी इसी सनकुआ सेंवढ़ा से 5-6 किलोमीटर जंगल में है। उसका भी वर्णन पद्मपुराण में पाया जाता है।
”शुण्डस्य चोत्तरे भागे नारदस्त पतेैघुना“
यहाँ ऊँची पहाड़ी पर वन खण्डेश्वर शिव मंदिर है, पद्म पुराण में यहीं का वर्णन है। यहीं नारद जी का तप स्थल है। सनत कुमारों को नारदजी ने ही इसी क्षेत्र में संगीत की शिक्षा प्रदान करने के प्रमाण मिलते हैं।
ये इलाका देश दुनिया का प्राचीन संगीत विद्यालय माना जा सकता है। इसी क्षेत्र में सेंवढ़ा दुर्ग, महल दतिया नरेश ने 3 सदी पूर्व बनवाये थे। यहां उनके शिकारगाह अभी भी मौजूद हैं। यहाँ के मंदिरों में महान शैलचित्र भी बने पाये गये हैं जो हजारों साल पुराने कहे जाते हैं। इसी इलाके में रतनगढ़ माता का काफी प्राचीन मंदिर भी है। जहां शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास की भी यादें जुड़ी हैं। वो सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड से जुड़े रहे थे। यहाँ हर सोमवार को मेला भरता है जहाँ हजारों श्रद्धालु आते रहते हैं।
17 वीं सदी के एक नामचीन संत कवि अक्षर अनन्य ने भी सनकुआ पर साधना की थी। उन्हें ब्रम्ह ज्ञानी और पूर्णतया आडम्बरहीन संत कवि माना गया है। हिन्दी साहित्य में उनका बड़ा स्थान है।
सेंवढ़ा के सिन्धु नदी तट से जो 5 किलोमीटर जंगल में नारद जी का प्राचीन मंदिर बताया गया है वहां प्राचीन हजारों साल पुरानी चित्रकारी का भी वर्णन देखा जा सकता है। कई इतिहासकार व साहित्यकार डाॅ. श्यामबिहारी श्रीवास्तव व डाॅ. कामिनी के अनुसार ये इलाका सनकादि क्षेत्र अतीतकाल से कछारों, पुरानी तपस्यास्थली से लेकर प्राकृतिक सौंदर्य का इलाका माना गया है।
तानसेन का जन्म बेहट, ग्वालियर
भारतमुनि के नाट्यशास्त्र, जो उनके पुत्रों ने पूर्ण किया था उसमें आचार कोहलका नाम उल्लेखनीय है। उसे भी दुनिया का वही स्थान माना गया है। इसी वजह से हम कह सकते हैं कि यह दुनिया का पहला संगीत क्षेत्र रहा था। अमर गायक तानसेन से भी हजारों साल पहले वैसे भी – तानसेन बेहट में जन्मे थे जो ग्वालियर जिले में यहीं से 50 किलोमीटर मात्र की दूरी पर है।
सेंवढ़ा से दतिया
ये इलाका इतिहास में भी काफी लोकप्रिय है। दतिया जिसे श्रीकृष्ण के बुआ के लड़के वक्रदन्त ने स्थापित किया था। ये बुन्देलखण्ड का काफी प्राचीन नगर माना जाता है। दतिया अपने मंदिरों के लिये काफी प्रसिद्ध रहा है। इसलिये ही इसे लघु वृन्दावन भी कहा गया है। इस इलाके में जैन मंदिर समूह भी सैकड़ों साल पुराने हैं सोनागिरी ग्राम पहाड़ी पर। दतिया जिले के गामा पहलवान भी विश्व विजेता रहे थे कुश्ती में जिन्होंने काफी नाम दिलाया दतिया को। आज भी उनका घर परिजन इस दतिया में मौजूद हैं।
रानी कुंती का घर
ग्वालियर इलाके की पौराणिकता का केन्द्र महाभारत काल तक जाता है। ग्वालियर इलाका आदि मानव की प्रिय और सुरक्षित क्रीडा स्थल भी रहा है। जौरा के समीप पहाड़गढ़ में लाखों साल पहले की बनीं पेंटिंग भी इसका प्रमाण कही जा सकती हैं। ग्वालियर से मात्र 25 किलोमीटर की दूरी पर ही बानमौर के समीप नूराबाद से लगा हुआ सांक नदी है। यहां के राजा कुंती भोज हुये हैं जिनका देजी राजवंश का इतिहास माना गया है, जो दतिया तक जाता था। इसे आसन नदी भी लिखा गया है। इन्हीं की बेटी कुंती हुईं हैं जो श्रीकृष्ण की बुआ और पाण्डवों की माताश्री थीं। राजा कुंत भोज का महाभारत में भी जिक्र है। वो पाण्डवों की ओर से कौरवों से युद्ध करते हैं। महाभारत काल में भी ग्वालियर मुख्य शक्ति केन्द्र रहा था। ईसा से 6-7 सदी तक द्वापर युग में भी इसकी चर्चा रही है। यहीं से कुंती ने अपने नवजात पुत्र को मंजूषा में रखकर सांक नदी के संगम में प्रवाहित करना इतिहासकार बताते हैं। जो आगे चलकर जालौन जिले के रामपुरा-जगम्मनपुर में एक केवट को मिली थी। ये इलाका पंचनदा- पांच नदियों का संगम कहलाता है। इसी मंजुषा में दानवीर कर्ण रहे थे।
§ शैलचित्र
§ नारद जी मंदिर
§ सनकुआ प्रपात
§ झरने आदि।

चौकीदारो! एक नज़र गौवंश पर भी…
निर्मल रानी
लोकसभा चुनावों का रण प्रारंभ हो चुका है। अनेक राजनैतिक दल मतदाताओं के मध्य तरह-तरह के वादों व आश्वासनों के साथ संपर्क साध रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से इस चुनाव में पूरा चुनावी विमर्श जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों से हटकर पूरी तरह से भावनाओं, राष्ट्रवाद, धर्म-जाति तथा भारत-पाकिस्तान जैसे विषयों की ओर मोडऩे की कोशिश की जा रही है। दूसरी ओर विपक्षी दल बेरोज़गारी, मंहगाई, नोटबंदी, सांप्रदायिकता, जातिवाद तथा भ्रष्टाचार जैसे विषय लेकर जनता के बीच जा रहे हैं। परंतु इस बार के चुनावों में गौवंश या गौरक्षा का विषय कोई चुनावी मुद्दा नहीं है। न तो तथाकथित स्वयंभू गौरक्षकों की हमदर्द भारतीय जनता पार्टी की ओर से न ही विपक्षी दलों की तरफ से। यहां यह याद दिलाने की ज़रूरत नहीं कि 2014 से लेकर गत् वर्ष तक पूरे देश में गौरक्षा तथा गाय को लेकर होने वाली हिंसा का बोलबाला रहा। नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान अपने चुनावी भाषणों में वादा किया था कि उनके सत्ता में आने के बाद यूपीए सरकार द्वारा चलाई जा रही ‘गुलाबी क्रांति’ अर्थात् बीफ मांस के व्यापार व निर्यात को बंद कर दिया जाएगा। परंतु सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। बजाए इसके आंकड़े यही बता रहे हैं कि बीफ निर्यात के क्षेत्र में यूपीए सरकार की तुलना में कहीं अधिक व्यवसाय बढ़ा है।
सवाल यह है कि गौवंश की रक्षा का विषय चुनावी सभाओं में उठाना तथा देश के गौभक्तों की भावनाओं को झकझोरना मात्र ही क्या इस विषय को उछालने का मकसद था? यह सोचना बेहद ज़रूरी है 2014 से लेकर 2019 के मध्य के पांच वर्षों के दौरान गिौवंश का कितना कल्याण हुआ है? उसे राष्ट्रीय स्तर पर कितनी सुरक्षा व देखभाल मयस्सर हो सकी है? कल तक किसानों तथा आम लोगों के लिए वरदान समझा जाने वाला गौवंश क्या इन पांच वर्षों के दौरान भी आम लोगों के लिए लाभदायक व सहयोगी साबित हुआ है? देश के शहरी लोगों से लेकर ग्रामवासियों तक के लिए आज के समय में गौवंश लाभदायक साबित हो रहा है या हानिकारक? स्वयं गायों के पैदा होने वाले बछड़ों पर इन दिनों क्या गुज़र रही है? खेतिहर किसानों के लिए आज गौवंश वरदान साबित हो रहा है या अभिशाप? गौरक्षा की बातें करने वाले तथा इसे अपनी राजनीति तथा व्यवसाय का सबसे महत्वपूर्ण कारक समझने वाले तथाकथित राष्ट्रवादी इन दिनों गौवंश की रक्षा, सुरक्षा, स्वास्थय व देखभाल के लिए क्या कर रहे हैं? निश्चित रूप से मतदाताओं को चुनाव के समय तथाकथित स्वयंभू गौरक्षकों से यह सवाल ज़रूर पूछना चाहिए।
गौवंश की रक्षा के नाम पर गत् पांच वर्षों में दक्षिणपंथियों द्वारा जो चंद गिने-चुने कदम उठाए जा रहे थे उनमें या तो किसी अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति के ‎‎फ्रिज अथवा रसोई में रखे हुए मांस को लेकर हंगामा बरपा करना तथा किसी कमज़ोर व्यक्ति की पीट-पीट कर हत्या कर देना शामिल रहा या फिर गौवंश के साथ आते-जाते किसी अकेले व्यक्ति पर धर्म के आधार पर टृट पडऩा व उसे पीट-पीट कर मार डालना। इन घटनाओं से न तो गौवंश की रक्षा हो सकी न ही इसके बिक्री अथवा निर्यात पर कोई अंकुश लग सका। हां इतना फर्क ज़रूर पड़ा कि स्वयंभू गौरक्षकों द्वारा रास्ते में की जा रही नाजायज़ वसूली, मारपीट व हिंसा से भयभीत होकर लोगों ने गौवंश का व्यापार करना ही छोड़ दिया। ट्रांसपोर्टस ने भी गौवंश लादने व लाने-ले जाने हेतु अपनी ट्रकों को भेजना बंद कर दिया। इसका सीधा प्रभाव उन गौपालकों पर पड़ा जो अपनी गायों का दूध कम हो जाने की स्थिति में उस गाय को किसी व्यापारी को बेच दिया करते थे तथा अधिक दूध देने वाली गाय खरीद कर लाया करते थे। परंतु ट्रकों के उपलब्ध न होने तथा व्यापारियों द्वारा गौवंश की खरीददारी बंद कर देने के परिणामस्वरूप अब स्थिति बहुत ही खतरनाक मोड़ पर आ गई है। जिन गायों से गौपालक किसी फायदे की उम्मीद नहीं रखता उसे अपने घर के बाहर का रास्ता दिखा रहा है। हद तो यह है कि पैदा होते ही गायों के बछड़े सड़कों पर छोड़े जा रहे हैं।
पूरे देश में इस समय गौवंश के सड़कों पर घूमने के चलते दुर्घटनाओं में काफी तेज़ी आई है। पैदल, साईकल सवार व कार अथवा मोटरसाईकल पर चलने वाला कोई भी व्यक्ति किसी भी समय इस प्रकार के आक्रामक आवारा पशुओं का शिकार हो सकता है। शहरों के अलावा गांवों की सिथति तो पहले से भी ज़्यादा खराब हो चुकी है। देश के मैदानी इलाकों का जो किसान पहले नील गाय के झुंड से ही बेहद परेशान था उसके लिए अब गाय व सांड जैसे आवारा पशुओं के झुंड भी एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। कई जगहों से ऐसी खबरें आती रहती हैं कि इन दिनों गेहूं की फसल की रखवाली करने हेतु किसानों के परिवार के लोग 24 घंटे हाथों में लाठियां लेकर आवारा पशुओं से अपनी फसल की चौकीदारी करने में डटे हुए हैं। उधर किसानों के गुस्से के चलते तथा शहरों में वाहन से होने वाली दुर्घटनाओं की वजह से गौवंश को भी मनुष्यों की हिंसा या आक्रामकता का सामना करना पड़ रहा है। चंडीगढ़ जैसे महानगर में चारों ओर यहां तक कि शहर के बीचो-बीच चंडीगढ़-दिल्ली राजमार्ग पर कई बार ऐसे आवारा पशुओं के बड़े-बड़े झुंड न केवल यातायात को बाधित कर रहे हैं बल्कि कई बार सड़कों पर सांडों के मल्लयुद्ध भी दिखाई दे जाते हैं। इसके कारण कई लोगों की कारों के शीशे टूट चुके हैं व गाडिय़ां क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। कई लोग घायल हो चुके हैं।
पिछले दिनों देश के एक वरिष्ठ पत्रकार द्वारा गुजरात-महाराष्ट्र के मध्य एक स्टिंग आप्रेशन कर तथाकथित गौरक्षकों की हकीकत का पर्दाफाश किया गया था। उन्होंने दिखाया कि किस प्रकार दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े लोग मोटे पैसे लेकर वध हेतु जाने वाले गौवंश को मुख्य मार्गों से आने-जाने की अनुमति देते हैं। स्टिंग करने वाले पत्रकार निरंजन टाकले ने स्वयं एक गौवंश व्यवसायी की भूमिका अदा करते हुए ऐसे अनेक तथाकथित गौरक्षकों को बेनकाब किया जो केवल पैसे ठगने व वसूलने की खातिर गौरक्षा के नाम का आवरण अपने ऊपर चढ़ाए हुए थे। परंतु हमारे देश के धर्मभीरू लोग इन पाखंडी तथाकथित गौरक्षकों तथा इन्हें संचालित करने वाले शातिर दिमाग राजनीतिज्ञों के झांसे में आ जाते हैं और यह महसूस करने लगते हैं कि वास्तव में यही लोग गौमाता के असल रखवाले हैं जबकि सच्चाई ठीक इसके विपरीत है? अन्यथा क्या वजह है कि देश में चलने वाले अधिकांश कत्लखाने सत्ता के संरक्षण में सत्ता के चहेतों द्वारा ही संचालित किए जा रहे हैं? क्या वजह है कि यूपीए सरकार की तुलना में वर्तमान सरकार के दौर में गत् पांच वर्षों में बीफ निर्यात में बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गई है?
इसलिए ‘मैं भी चौकीदार’ का नारा बुलंद करने वालों से देश के किसानों को यह ज़रूर कहना चाहिए कि वे आएं और सबसे पहले उनके खेतों की चौकीदारी कर उनकी फसल की रक्षा करें। शहरी लोगों को भी इन स्वयंभू चौकीदारों से यह कहना चाहिए कि यह चौकीदार शहरों में घूमने वाले आवारा पशुओं के हमलों से उनकी चौकीदारी करें। इतना ही नहीं बल्कि बेज़ुबान गौवंश को भी इन्हीं चौकीदारों से यह सवाल पूछना चाहिए कि पांच वर्षों तक उसकी सुरक्षा के नाम पर जो उन्माद पूरे देश में फैलाया गया उसके बाद आ‎खिर इन पांच वर्षों में उन्हें सड़कों पर और बड़ी संख्या में दर-दर भटकने के लिए तथा कूड़ों के ढेर पर प्लास्टिक व पॉलिथिन खाने व वाहनों की टक्कर झेल कर घायल होने के लिए क्यों छोड़ दिया गया ? केवल टीर्शर्टस पर ‘मैं भी चौकीदार’ लिखे जाने से न तो गौवंश की रक्षा हो सकती है न ही किसानों की फसल की न ही शहरी राहगीरों की।

संवत्सर पड़वा के प्रणेता विक्रमादित्य
डॉ. अरविन्द जैन
इतिहास हमेशा विवाद का विषय रहा हैं और उससे हमेशा विवाद का रौद्र रूप हो जाता हैं। वो तो धन्य हैं इतिहासकार और विद्वान् जिन्होंने अपनी खोज से बहुत सीमा तक खोज कर अनेक विवादों को निर्विवाद कर दिया अन्यथा संकीर्ण मानसिकता के कारण विरोध का होना स्वाभाविक होता हैं। ऐसे कई उदाहरण इतिहास के मिल जाते हैं।
ऐतिहासिक राजकीय भारतीय संवत् के सर्वप्रथम प्रवर्तक राजा विक्रमादित्य थे। आप अनेक भारतीय लोककथाओं के नायक हैं। अयोध्या के राजा राम के बाद उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने इस देश की परम्परा में जैसा गहरा स्थान बनाया है, वैसा दूसरा कोई राजा कभी नहीं बना सका। राजा विक्रमादित्य तीव्र बुद्धिमान, पराक्रमी, उदार, दानशील, धर्मसहिष्णु, विद्यारसिक, विद्वानों के प्रश्रयदाता, न्यायपरायण, धर्मात्मा, प्रजावत्सल एवं सुशासक के रूप में आदर्श भारतीय नरेश माने जाते हैं।
पूर्ववर्ती चन्द्रगुप्त मौर्य एवं खारवेल जैसे महान् जैन सम्राटों की परम्परा में देश को विदेशियों के आक्रमण से मुक्त करने में यह महान् जैन सम्राट विक्रमादित्य भी अविस्मरणीय है। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार वह जैनधर्म का परमभक्त था। कुलधर्म और राजधर्म भी जैनधर्म था। विक्रमादित्य ने चिरकाल तक राज्य किया और स्वदेश को सुखी, समृद्ध एवं नैतिक बनाया। विक्रमादित्य तथा उसके उपरान्त उसके वंशजों ने मालवा पर लगभग १०० वर्ष राज्य किया था। विक्रमादित्य जैसे राजा के आदर्शों का स्मरण हम लोग चैत्र शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन यानि युग प्रतिपदा को राष्ट्रीय नव वर्ष दिवस के रूप में मना कर करते हैं।
विक्रमादित्य उज्जैन के अनुश्रुत राजा थे, जो अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे। “विक्रमादित्य” की उपाधि भारतीय इतिहास में बाद के कई अन्य राजाओं ने प्राप्त की थी, जिनमें गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय और सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य (जो हेमु के नाम से प्रसिद्ध थे) उल्लेखनीय हैं। राजा विक्रमादित्य नाम, ‘विक्रम’ और ‘आदित्य’ के समास से बना है जिसका अर्थ ‘पराक्रम का सूर्य’ या ‘सूर्य के समान पराक्रमी’ है।उन्हें विक्रम या विक्रमार्क (विक्रम + अर्क) भी कहा जाता है (संस्कृत में अर्क का अर्थ सूर्य है)। भविष्य पुराण व आईने अकबरी के अनुसार विक्रमादित्य पंवार (प्रमार) वंश के सम्राट थे जिनकी राजधानी उज्जयनी थी।
हिन्दू शिशुओं में ‘विक्रम’ नामकरण के बढ़ते प्रचलन का श्रेय आंशिक रूप से विक्रमादित्य की लोकप्रियता और उनके जीवन के बारे में लोकप्रिय लोक कथाअनुश्रुत विक्रमादित्य, संस्कृत और भारत के क्षेत्रीय भाषाओं, दोनों में एक लोकप्रिय व्यक्तित्व है। उनका नाम बड़ी आसानी से ऐसी किसी घटना या स्मारक के साथ जोड़ दिया जाता है, जिनके ऐतिहासिक विवरण अज्ञात हों, हालांकि उनके इर्द-गिर्द कहानियों का पूरा चक्र फला-फूला है। संस्कृत की सर्वाधिक लोकप्रिय दो कथा-श्रृंखलाएं हैं वेताल पंचविंशति या बेताल पच्चीसी (“पिशाच की 25 कहानियां”) और सिंहासन-द्वात्रिंशिका (“सिंहासन की 32 कहानियां” जो सिहांसन बत्तीसी के नाम से भी विख्यात हैं)। इन दोनों के संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में कई रूपांतरण मिलते हैं।
पिशाच (बेताल) की कहानियों में बेताल, पच्चीस कहानियां सुनाता है, जिसमें राजा बेताल को बंदी बनाना चाहता है और वह राजा को उलझन पैदा करने वाली कहानियां सुनाता है और उनका अंत राजा के समक्ष एक प्रश्न रखते हुए करता है। वस्तुतः पहले एक साधु, राजा से विनती करते हैं कि वे बेताल से बिना कोई शब्द बोले उसे उनके पास ले आएं, नहीं तो बेताल उड़ कर वापस अपनी जगह चला जाएगा| राजा केवल उस स्थिति में ही चुप रह सकते थे, जब वे उत्तर न जानते हों, अन्यथा राजा का सिर फट जाता| दुर्भाग्यवश, राजा को पता चलता है कि वे उसके सारे सवालों का जवाब जानते हैं; इसीलिए विक्रमादित्य को उलझन में डालने वाले अंतिम सवाल तक, बेताल को पकड़ने और फिर उसके छूट जाने का सिलसिला चौबीस बार चलता है। इन कहानियों का एक रूपांतरण कथा-सरित्सागर में देखा जा सकता है।
सिंहासन के क़िस्से, विक्रमादित्य के उस सिंहासन से जुड़े हुए हैं जो खो गया था और कई सदियों बाद धार के परमार राजा भोज द्वारा बरामद किया गया था। स्वयं राजा भोज भी काफ़ी प्रसिद्ध थे और कहानियों की यह श्रृंखला उनके सिंहासन पर बैठने के प्रयासों के बारे में है। इस सिंहासन में 32 पुतलियां लगी हुई थीं, जो बोल सकती थीं और राजा को चुनौती देती हैं कि राजा केवल उस स्थिति में ही सिंहासन पर बैठ सकते हैं, यदि वे उनके द्वारा सुनाई जाने वाली कहानी में विक्रमादित्य की तरह उदार हैं। इससे विक्रमादित्य की 32 कोशिशें (और 32 कहानियां) सामने आती हैं और हर बार भोज अपनी हीनता स्वीकार करते हैं। अंत में पुतलियां उनकी विनम्रता से प्रसन्न होकर उन्हें सिंहासन पर बैठने देती हैं।
विक्रम और शनि
शनि से संबंधित विक्रमादित्य की कहानी को अक्सर कर्नाटक राज्य के यक्षगान में प्रस्तुत किया जाता है। कहानी के अनुसार, विक्रम नवरात्रि का पर्व बड़े धूम-धाम से मना रहे थे और प्रतिदिन एक ग्रह पर वाद-विवाद चल रहा था। अंतिम दिन की बहस शनि के बारे में थी। ब्राह्मण ने शनि की शक्तियों सहित उनकी महानता और पृथ्वी पर धर्म को बनाए रखने में उनकी भूमिका की व्याख्या की। समारोह में ब्राह्मण ने ये भी कहा कि विक्रम की जन्म कुंडली के अनुसार उनके बारहवें घर में शनि का प्रवेश है, जिसे सबसे खराब माना जाता है। लेकिन विक्रम संतुष्ट नहीं थे; उन्होंने शनि को महज लोककंटक के रूप में देखा, जिन्होंने उनके पिता (सूर्य), गुरु (बृहस्पति) को कष्ट दिया था। इसलिए विक्रम ने कहा कि वे शनि को पूजा के योग्य मानने के लिए तैयार नहीं हैं। विक्रम को अपनी शक्तियों पर, विशेष रूप से अपने देवी मां का कृपा पात्र होने पर बहुत गर्व था। जब उन्होंने नवरात्रि समारोह की सभा के सामने शनि की पूजा को अस्वीकृत कर दिया, तो शनि भगवान क्रोधित हो गए। उन्होंने विक्रम को चुनौती दी कि वे विक्रम को अपनी पूजा करने के लिए बाध्य कर देंगे। जैसे ही शनि आकाश में अंतर्धान हो गए, विक्रम ने कहा कि यह उनकी खुशकिस्मती है और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए उनके पास सबका आशीर्वाद है। विक्रम ने निष्कर्ष निकाला कि संभवतः ब्राह्मण ने उनकी कुंडली के बारे में जो बताया था वह सच हो; लेकिन वे शनि की महानता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। विक्रम ने निश्चयपूर्वक कहा कि “जो कुछ होना है, वह होकर रहेगा और जो कुछ नहीं होना है, वह नहीं होगा” और उन्होंने कहा कि वे शनि की चुनौती को स्वीकार करते हैं।
एक दिन एक घोड़े बेचने वाला उनके महल में आया और कहा कि विक्रम के राज्य में उसका घोड़ा खरीदने वाला कोई नहीं है। घोड़े में अद्भुत विशेषताएं थीं – जो एक छलांग में आसमान पर, तो दूसरे में धरती पर पहुंचता था। इस प्रकार कोई भी धरती पर उड़ या सवारी कर सकता है। विक्रम को उस पर विश्वास नहीं हुआ, इसीलिए उन्होंने कहा कि घोड़े की क़ीमत चुकाने से पहले वे सवारी करके देखेंगे। विक्रेता इसके लिए मान गया और विक्रम घोड़े पर बैठे और घोड़े को दौडाया। विक्रेता के कहे अनुसार, घोड़ा उन्हें आसमान में ले गया। दूसरी छलांग में घोड़े को धरती पर आना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय उसने विक्रम को कुछ दूर चलाया और जंगल में फेंक दिया। विक्रम घायल हो गए और वापसी का रास्ता ढूंढ़ने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि यह सब उनका नसीब है, इसके अलावा और कुछ नहीं हो सकता; वे घोड़े के विक्रेता के रूप में शनि को पहचानने में असफल रहे। जब वे जंगल में रास्ता ढ़ूढ़ने की कोशिश कर रहे थे, डाकुओं के एक समूह ने उन पर हमला किया। उन्होंने उनके सारे गहने लूट लिए और उन्हें खूब पीटा। विक्रम तब भी हालत से विचलित हुए बिना कहने लगे कि डाकुओं ने सिर्फ़ उनका मुकुट ही तो लिया है, उनका सिर तो नहीं। चलते-चलते वे पानी के लिए एक नदी के किनारे पहुंचे। ज़मीन की फिसलन ने उन्हें पानी में पहुंचाया और तेज़ बहाव ने उन्हें काफ़ी दूर घसीटा।
किसी तरह धीरे-धीरे विक्रम एक नगर पहुंचे और भूखे ही एक पेड़ के नीचे बैठ गए। जिस पेड़ के नीचे विक्रम बैठे हुए थे, ठीक उसके सामने एक कंजूस दुकानदार की दुकान थी। जिस दिन से विक्रम उस पेड़ के नीचे बैठे, उस दिन से दुकान में बिक्री बहुत बढ़ गई। लालच में दुकानदार ने सोचा कि दुकान के बाहर इस व्यक्ति के होने से इतने अधिक पैसों की कमाई होती है और उसने विक्रम को घर पर आमंत्रित करने और भोजन देने का निर्णय लिया। बिक्री में लंबे समय तक वृद्धि की आशा में, उसने अपनी पुत्री को विक्रम के साथ शादी करने के लिए कहा। भोजन के बाद जब विक्रम कमरे में सो रहे थे, तब पुत्री ने कमरे में प्रवेश किया। वह बिस्तर के पास विक्रम के जागने की प्रतीक्षा करने लगी। धीरे- धीरे उसे भी नींद आने लगी। उसने अपने गहने उतार दिए और उन्हें एक बत्तख के चित्र के साथ लगी कील पर लटका दिया। वह सो गई। जागने पर विक्रम ने देखा कि चित्र का बत्तख उसके गहने निगल रहा है। जब वे अपने द्वारा देखे गए दृश्य को याद कर ही रहे थे कि दुकानदार की पुत्री जग गई और देखती है कि उसके गहने गायब हैं। उसने अपने पिता को बुलाया और कहा कि वह चोर है।
विक्रम को वहां के राजा के पास ले जाया गया। राजा ने निर्णय लिया कि विक्रम के हाथ और पैर काट कर उन्हें रेगिस्तान में छोड़ दिया जाए। जब विक्रम रेगिस्तान में चलने में असमर्थ और ख़ून से लथपथ हो गए, तभी उज्जैन में अपने मायके से ससुराल लौट रही एक महिला ने उन्हें देखा और पहचान लिया। उसने उनकी हालत के बारे में पूछताछ की और बताया कि उज्जैनवासी उनकी घुड़सवारी के बाद गायब हो जाने से काफी चिंतित हैं। वह अपने ससुराल वालों से उन्हें अपने घर में जगह देने का अनुरोध करती है और वे उन्हें अपने घर में रख लेते हैं। उसके परिवार वाले श्रमिक वर्ग के थे; विक्रम उनसे कुछ काम मांगते हैं। वे कहते हैं कि वे खेतों में निगरानी करेंगे और हांक लगाएंगे ताकि बैल अनाज को अलग करते हुए चक्कर लगाएं। वे हमेशा के लिए केवल मेहमान बन कर ही नहीं रहना चाहते हैं।
एक शाम जब विक्रम काम कर रहे थे, हवा से मोमबत्ती बुझ जाती है। वे दीपक राग गाते हैं और मोमबत्ती जलाते हैं। इससे सारे नगर की मोमबत्तियां जल उठती हैं – नगर की राजकुमारी ने प्रतिज्ञा कि थी कि वे ऐसे व्यक्ति से विवाह करेंगी जो दीपक राग गाकर मोमबत्ती जला सकेगा। वह संगीत के स्रोत के रूप में उस विकलांग आदमी को देख कर चकित हो जाती है, लेकिन फिर भी उसी से शादी करने का फैसला करती है। राजा जब विक्रम को देखते हैं तो याद करके आग-बबूला हो जाते हैं कि पहले उन पर चोरी का आरोप था और अब वह उनकी बेटी से विवाह के प्रयास में है। वे विक्रम का सिर काटने के लिए अपनी तलवार निकाल लेते हैं। उस समय विक्रम अनुभव करते हैं कि उनके साथ यह सब शनि की शक्तियों के कारण हो रहा है। अपनी मौत से पहले वे शनि से प्रार्थना करते हैं। वे अपनी ग़लतियों को स्वीकार करते हैं और सहमति जताते हैं कि उनमें अपनी हैसियत की वजह से काफ़ी घमंड था। शनि प्रकट होते हैं और उन्हें उनके गहने, हाथ, पैर और सब कुछ वापस लौटाते हैं। विक्रम शनि से अनुरोध करते हैं कि जैसी पीड़ा उन्होंने सही है, वैसी पीड़ा सामान्य जन को ना दें। वे कहते हैं कि उन जैसा मजबूत इन्सान भले ही पीड़ा सह ले, पर सामान्य लोग सहन करने में सक्षम नहीं होंगे। शनि उनकी बात से सहमत होते हुए कहते हैं कि वे ऐसा कतई नहीं करेंगे। राजा अपने सम्राट को पहचान कर, उनके समक्ष समर्पण करते हैं और अपनी पुत्री की शादी उनसे कराने के लिए सहमत हो जाते हैं। उसी समय, दुकानदार दौड़ कर महल पहुंचता है और कहता है कि बतख ने अपने मुंह से गहने वापस उगल दिए हैं। वह भी राजा को अपनी बेटी सौंपता है। विक्रम उज्जैन लौट आते हैं और शनि के आशीर्वाद से महान सम्राट के रूप में जीवन व्यतीत करते हैं।
नौ रत्न और उज्जैन में विक्रमादित्य का दरबार
भारतीय परंपरा के अनुसार धन्वन्तरि, क्षपनक, अमरसिंह, शंकु, खटकरपारा, कालिदास, वेतालभट्ट (या (बेतालभट्ट), वररुचि और वराहमिहिर उज्जैन में विक्रमादित्य के राज दरबार का अंग थे। कहते हैं कि राजा के पास “नवरत्न” कहलाने वाले नौ ऐसे विद्वान थे।
कालिदास प्रसिद्ध संस्कृत राजकवि थे। वराहमिहिर उस युग के प्रमुख ज्योतिषी थे, जिन्होंने विक्रमादित्य की बेटे की मौत की भविष्यवाणी की थी। वेतालभट्ट एक धर्माचार्य थे। माना जाता है कि उन्होंने विक्रमादित्य को सोलह छंदों की रचना “नीति-प्रदीपकालिदास प्रसिद्ध संस्कृत राजकवि थे। वराहमिहिर उस युग के प्रमुख ज्योतिषी थे, जिन्होंने विक्रमादित्य की बेटे की मौत की भविष्यवाणी की थी। वेतालभट्ट एक धर्माचार्य थे। माना जाता है कि उन्होंने विक्रमादित्य को सोलह छंदों की रचना “नीति-प्रदीप” (“आचरण का दीया”) का श्रेय दिया है।
विक्रमार्कस्य आस्थाने नवरत्नानि
धन्वन्तरिः क्षपणकोऽमरसिंहः शंकूवेताळभट्टघटकर्परकालिदासाः।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेस्सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य॥
नौ रत्नों के चित्र
मध्यप्रदेश में स्थित उज्जैन-महानगर के महाकाल मन्दिर के पास विक्रमादित्य टिला है। वहाँ विक्रमादित्य के संग्रहालय में नवरत्नों की मूर्तियाँ स्थापित की गई। इस प्रकार जैन राजा विक्रमादित्य का योगदान भारतीय इतिहास के साहित्य ,ज्योतिष आदि सभी विधाओं में उन्नत किया जिसके कारण हम उनके पदचिन्हों पर चल रहे हैं।
धन्य हैं ऐसे महामानव जिनकी देन से मानवता हमेश ऋणी रहेंगी।
05अप्रैल/ईएमएस

न्यायाधीशों का आचरण : एक अधूरी कार्यवाही
अजित वर्मा
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने तीन उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को प्रोन्नति न देने का फैसला किया है। क्योंकि तीनों के खिलाफ न्यायिक कदाचार, अनुशासन की कमी, उच्च न्यायिक मानकों के विपरीत आदेश सुनाने जैसे मामले सामने आए हैं। कहा जा रहा है कि एक सीजे का नाम इसलिए रोका गया, क्योंकि वे काम के दिनों में छुट्टी लेकर गोल्फ खेलने चले गए। दूसरे सीजे को इसलिए प्रोन्नति नहीं दी जाएगी, क्योंकि वे लगातार राज्य सरकार के हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल करते रहे। तीसरे सीजे ने सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को खुश करने के लिए एक लोक सेवा आयोग के खिलाफ आदेश सुनाए।
हालांकि कॉलेजियम ने इन तीनों मुख्य न्यायाधीशों के नाम सार्वजनिक न करने का फैसला भी किया क्योंकि नाम सार्वजनिक होने से उनके पद पर बने रहने पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इससे उन्हें कार्यकाल पूरा करने में कठिनाई आ सकती है।
हम कहना चाहते हैं कि पूरा देश अपने सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान करता है। न्यायपालिका की छाव और प्रतिष्ठा सबके लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन हम पहले भी लिख चुके हैं और यहाँ फिर लिख रहे हैं कि सीजर और सीजर की पत्नी दोनों को संदेह से परे रहना चाहिए। न्यायाधीशों और सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम दोनों सर्वथा सम्माननीय हैं। परन्तु सवाल यह उठता है कि जिन लोगों को कॉलेजियम ने न्यायिक कदाचार, अनुशासन की कमी और उच्च न्यायिक मानकों के विपरीत आदेश सुनाने जैसे मामलों में दोषी पाया वे किसी भी राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी कैसे बने रह सकते हैं। कॉलेजियम अगर इस दलील के साथ उनके नाम उजागर करे कि ऐसा किये जाने पर उन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है या उन्हें अपना कार्यकाल पूरा करने में कठिनाई आ सकती है, तो इस पर सवाल उठना लाजिमी है। एक दोष सिद्ध व्यक्ति मुख्य न्यायाधीश तो क्या न्यायाधीश रहने बल्कि विधिजगत में प्रतिष्ठा पाने के योग्य भी नहीं हो सकता यह इसलिए कॉलेजियम में प्रतिष्ठित न्यायाधीश होते हैं। अगर वे किसी मुख्य न्यायाधीश के आचरण पर अंगुली उठाते हैं तो इसे दोष सिद्ध ही माना जायेगा। तो फिर न तो नामों की पोशीदागी जायज है, न उनका पद पर बने रहना। आज कोई नहीं जानता कि न्यायपालिका के पावन सरोवर को गंदा करने वाली ये तीन मछलियां कौन हैं, लेकिन यह तो तय ही है न कि तीन गंदी मछलियां मौजूद हैं। तो फिर उन्हें इस पवित्र सरोवर से निकाल कर बाहर फेंका जाना ही नैतिकता का तकाज़ा है।

वायनाड से देश को साधने की जुगत
डॉ हिदायत अहमद खान
पिछले कुछ दिनों से केरल का वायनाड लोकसभा क्षेत्र देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह क्षेत्र चर्चा में इसलिए आया क्योंकि यहां से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी बतौर पार्टी उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे हैं। वैसे राहुल गांधी उत्तर प्रदेश की अमेठी लोकसभा सीट से वर्ष 2004 से लगातार तीन बार चुनाव जीतते आ रहे हैं। इस प्रकार जीतने की हैट्रिक बनाने के साथ अमेठी के जनादेश से लोकसभा संसदीय क्षेत्र से संसद पहुंचते रहे राहुल गांधी को अचानक ऐसा क्या हुआ कि उन्हें अमेठी के अतिरिक्त वायनाड को भी अपना चुनाव क्षेत्र बनाना पड़ गया? इस सवाल को लेकर जहां तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं वहीं सत्ता पक्ष के लोग तंज कसते दिख रहे हैं और देश व दुनिया को बतलाने का काम कर रहे हैं कि राहुल गांधी असल में भाजपा उम्मीदवार स्मृति ईरानी (जो पिछले चुनाव में उनसे हार चुकी हैं) से घबरा गए हैं और हार की आशंका के चलते उन्होंने एक अन्य सीट से चुनाव लड़ने जैसा फैसला मजबूरी में लिया है। इस तरह के जुबानी जमा खर्च करने वालों में किसी और की बात क्या की जाए खुद भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राहुल पर तंज कसते हुए कहा था कि ‘वॉट्स ऐप पर मैंने पढ़ा कि राहुल अमेठी को छोड़कर केरल भाग गए हैं। आखिर उन्हें केरल क्यों जाना पड़ा? हम सब जानते हैं कि राहुल का अमेठी से ही लड़ना तय था, लेकिन अब वो वहां जाकर ध्रुवीकरण की राजनीति से जीत हासिल करना चाहते हैं।’ मतलब भाजपा और उसके नेता अभी तक जिस ध्रुवीकरण से चुनाव साधते हाए हैं वही राहुल कर रहे हैं, इसलिए तकलीफ बढ़ गई है। बहरहाल भाजपा अध्यक्ष शाह के बयान में जहां तंज है वहीं एक तरह की घबराहट भी देखने को मिल रही है। दरअसल भाजपा ने अमेठी संसदीय क्षेत्र से राहुल के खिलाफ इस बार भी केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को ही मैदान में उतारा है। बावजूद इसके कि 2014 के लोकसभा चुनाव में राहुल ने उन्हें करीब 1.07 लाख वोटों से हराया था। इसलिए असमंजस की स्थिति तो अभी भी बनी हुई है, लेकिन बिचलित करने वाली बात यह है कि वायनाड तीन राज्यों की सीमा को मिलाने वाला क्षेत्र है और एक खास रणनीति के तहत ही राहुल को यहां से उतारा गया है। इस संबंध में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटोनी के बयान को देखा जा सकता है, जिसमें वो कहते हैं कि राहुल गांधी को अमेठी के अलावा वायनाड से चुनाव में उतारने की कई वजहें हैं। पहली वजह तो यही है कि यह सीट सांस्कृतिक और भौगोलिक रूप से काफी अहम है। दूसरा यह कि केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमाओं को यह जोड़ती है। इस प्रकार राहुल यहां से चुनाव लड़कर एक तरह से पूरे दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व करते नजर आएंगे। अब चूंकि भाजपा और उसके अनुवांशिक संगठनों पर देश के सांस्कृतिक माहौल को खराब करने के आरोप लगते रहे हैं और इसकी आवाजें सबसे ज्यादा दक्षिण प्रांतों से ही उठती रही हैं अत: राहुल का वायनाड को चुनना सही मायने में भाजपा के लिए सिरदर्द पैदा करने के बराबर है। कहना गलत नहीं होगा कि महज एक सीट से चुनाव लड़ कर पूरे दक्षिण भारत को अपने पक्ष में कर लेने जैसा काम कांग्रेस की बेहतरीन रणनीति का हिस्सा है, इस पर जमीनी कार्य करने और मन मुताबिक परिणाम लेने की आवश्यकता है। आखिर यह कैसे भुलाया जा सकता है कि दक्षिण से जो बात उठती है वह देश के मध्य क्षेत्र से होते हुए उत्तर व पश्चिम क्षेत्र में तेजी से फैलती और उसका असर भी होता है। ऐसे में कांग्रेस महज एक सीट के जरिए पूरे देश को अपनी बात सुनाने में कामयाब होती दिख रही है। वहीं दूसरी तरफ भाजपा से भी कहा जा रहा है कि वह दक्षिण ही नहीं बल्कि उत्तर भारत की ओर भी अपना ध्यान लगाए, क्योंकि यदि यहां पर भी फिफ्टी-फिफ्टी वाला परिणाम आया तो सत्ता हाथ से जाती चली जाएगी। गौरतलब है कि राहुल ने वायनाड से नामांकन पत्र भरने के साथ ही रोड शो किया, जिसमें कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी उनके साथ नजर आईं। यहां प्रियंका ने राहुल को साहसी व्यक्ति बताया और वायनाड की जनता से उन्होंने अपील की कि राहुल का ख्याल रखें। प्रियंका की अपने भाई के लिए यह भावनात्मक अपील थी, जो आमजन के दिलों को छू गई। दरअसल गांधी परिवार की शहादतें देश भूला नहीं सकता है। भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर राहुल व प्रियंका गांधी के पिता भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के शहीद होने का अपना ही गौरवपूर्ण इतिहास है। बहरहाल वायनाड में 23 अप्रैल को मतदान होना है, जिससे पहले विभिन्न धर्मों की संस्कृति बचाने की खातिर पूरे देश को मथने की जुगत भी राजनीतिक पार्टियां जरुर ही भिड़ाती नजर आएंगी। अंतत: केरल की वायनाड लोकसभा सीट से देश को साधने का काम कांग्रेस किस तरह से करती है यह देखने वाली बात है, क्योंकि पिछले चुनावों की तरह इस चुनाव में किसी के नाम का कोई जादू देश में चलता दिखाई नहीं दे रहा है। इसलिए मुद्दों और बेहतर चुनाव मैनेजमेंट के जरिए ही चुनाव साधे जा सकेंगे।

एक भारतीय आत्मा : माखनलाल चतुर्वेदी
वीरेन्द्र सिंह परिहार
(4 अप्रैल जन्म तिथि पर विशेष) माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल 1889 होषंगाबाद जिले के बाबई नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम नंदलाल चतुर्वेदी था। 1906 में वह मसगगॉव में अध्यापक के पद पर नियुक्त हुए, बाद में खण्डवा में। माखनलाल जी अध्यापन काल से ही 1912 से ही सुबोध सिंधु में लेख, समाचार आदि लिखने लगे थे। दषहरे के अवसर पर उनके लिखे लेख ”षक्ति पूजा“ में अंग्रेज षासन को राजद्रोह की गंध मिली, पर वह बच गए। माखनलाल जी के संपादकीय जीवन की षुरुआत 7 अप्रैल 1913 से ’प्रभा‘ से हुई। लेकिन यह पत्रिका फरवरी 1914 में बंद हो गई और तब माखनलाल जी का तय वेतन 30 रु. भी बंद हो गया। नौबत यहां तक आ गई कि घर के जेबर बेंच-बेंचकर घर चलाना पड़ा। बाद में ’प्रताप‘ के युवा संपादक गणेष षंकर विद्यार्थी जब खण्डवा आए तो उन्होंने ’प्रभा‘ को अपने कानपुर स्थित ’प्रताप‘ प्रेस से छपवाने का प्रस्ताव किया। यद्यपि इसी बीच माखनलाल जी की पत्नी ग्यारसी बाई का निधन हो गया। उल्लेखनीय है कि माखनलाल जी आजीवन दूसरा विवाह नहीं किया। पर 1915 में मार्च से ’प्रभा‘ के द्वितीय वर्श का प्रथम अंक प्रताप प्रेस से पूर्ववत साज-सजा के साथ निकला। ’प्रभा‘ के माध्यम से माखनलाल जी यह संकेत देने लगे कि वह साहित्य को राजनीतिक आंदोलन की प्रेरक वाणी बनाने में विष्वास करते हैं। लेकिन दो वर्शों तक कठोर घाटा सहने के बाद ’प्रभा‘ का प्रकाषन पुन: बंद हो गया। बाद में ’प्रभा‘ को गणेष षंकर विद्यार्थी को हस्तांतरित कर दिया गया। 1916 से 1919 तक ’स्वतंत्र‘ पत्रकार के रूप में माखनलाल ने खूब लिखा। इस बीच वह गणेष षंकर विद्यार्थी के साथ रहे। ’प्रताप‘ को हर संभव सहयोग दिया। इसी दौरान उनके नाटक ’कृश्णार्जुन युद्ध‘ का मंचन भी हुआ और प्रकाषन भी। उसी दौरान उन्होंने गणेष षंकर विद्यार्थी के साथ महात्मा गांधी से प्रथम भेंट की। बाद में गांधी जी उनकी जन्मभूमि बावई भी गए। इसके पहले 1922 में जेल से लौटते ही ’कर्मवीर‘ से मुक्त होकर माखनलाल जी नागपुर सत्याग्रह में षामिल होने चल पड़े और 1923 में अपने नायकत्व में झंडा सत्याग्रह को सफल किया। इतिहासकार कहते हैं- झंडा सत्याग्रह आजादी के आंदोलन का अद्वितीय और सर्वोत्तम अध्याय है। उन्होंने यह भी कहा, हम सब लोग बात करते हैं, बोलना तो माखनलाल जी ही जानते हैं। गणेष षंकर विद्यार्थी के एक वर्श जेल में रहने के दौरान अक्टूबर 1923 से मार्च 1924 तक माखनलाल जी ने ’प्रताप‘ को संभाला। ’प्रताप‘ के संपादन से मुक्त होने के बाद उन्होंने कानपुर में ही ’प्रभा‘ के प्रकाषन का दायित्व भी संभाला। फिर 1928 से पुन: ’कर्मवीर‘ का खण्डवा से प्रकाषन षुरू किया जो 1959 तक चला।
1919 में इतिहास प्रसिद्ध आयोजन हुआ- फकीर गांधी का। माखनलाल जी भी इसमें सम्मिलित थे। वह गांधी जी के भाशण से आष्वस्त नहीं हुए लेकिन आयोजन में फकीर की बानी से राजा-महाराजाओं के पानी उतरने का जो नजारा देखा, उससे निष्चय किया कि अब वही कार्यक्रम स्वीकार करना है, जिसे गांधी जी अपनाएंगे। प्रगट रूप से माखनलाल जी अपने सषस्त्र क्रांति के विचार की सक्रियता से विश्राम लेकर गांधी जी की राजनीति में संगी-यात्री हो गए।
अप्रैल 1919 में तृतीय मध्य प्रान्तीय हिंदी साहित्य सम्मेलन हुआ। उसमें प्रस्ताव पारित हुआ कि मध्य प्रांत के हिंदी क्षेत्रों से एक हिंदी पत्र निकलना चाहिए। 1919 की जुलाई-अगस्त में पत्रिका (साप्ताहिक) का डिक्लेरेषन लिया गया। जबलपुर से डिक्लेरेषन के वक्त उन्हें सलाह दी गई थी कि वह अंग्रेज अधिकारियों को बताए कि रोजी-रोटी के लिए यह पत्र निकाला जा रहा है। पर माखनलाल जी ने मजिस्टेट मिस्टर मिथाइस से कहा- मैं ऐसा पत्र निकालना चाहूंगा कि ब्रिटिष षासन चलते-चलते रुक जाए। फिर भी ’कर्मवीर‘ के डिक्लेरेषन की अर्जी मंजूर हो गई। 17 जनवरी 1920 से ’कर्मवीर‘ का प्रकाषन जबलपुर में आरंभ हुआ। पण्डित विश्णुदत्त षुक्ल एवं पं. माधवराव ने पहले अंक का प्रथम अग्रलेख लिखा- ’हम चल पड़े हैं।‘ हमारी ऑखों में भारतीय जीवन गुलामी की जंजीरों से कसा दिखता है। हृदय से पवित्रता पूर्वक हम प्रयत्न करेंगे कि वे जंजीरें फिसल जाए या टुकड़े-टुकड़े होकर गिरने की कृपा करें। हम स्वतंत्रता के हामी हैं, मुक्ति के उपासक हैं। हम जिस तरह भीरूता नश्ट कर देने के लिए तैयार रहेंगे, उसी तरह अत्याचारों को भी। जिनके पास बल है, किन्तु मनुश्यता नहीं, उनको हम मनुश्यता की याद दिलाएंगे। जिनके पास मनुश्यता है, किन्तु संसार का कोई बल नहीं, उन निर्बलों को उनके बल की याद दिलाएंगे। संसार के इस सिद्धान्त के षंखध्वनि में साथ देंगे कि अपने आप पर षासन करने के लिए तैयार हों। हमारा विष्वास हैं कि संसार के सब विभागों की गुलामी खड़ी नहीं रह सकती, यदि हम अपने आपके षासक हो जाएं। माखनलाल जी ने स्पश्ट लिखा कि ’भारत को उस ताकत की जरूरत है, जिसमें चाहे प्राण देना पड़े, चाहे अपने बच्चों को कटवाना पड़े, किन्तु जिसका एकमात्र लक्ष्य हो स्वाधीनता। जिस स्वाधीनता के लिए देष की हजारों जाने कुर्बान न हों, वह स्वाधीनता भारत की स्वाधीनता नहीं। भारत के लिए एक ही पथ है- प्राण देकर स्वाधीनता प्राप्त करना, डिप्लोमेसी नहीं जो कायरता का चिन्ह है। भारत के लिए सच्चा मार्ग अहिंसात्मक असहकारिता ही है।
जो होना था, वही हुआ। ’कर्मवीर‘ के अहिंसक सत्याग्रही रूप के तेज से ब्रिटिष हुकूमत की ऑखें चौंधियाने लगीं। प्रषासन बौखला गया। उसने 124(ए) (राजद्रोह) का अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा। 12 जून 1921 को पं. माखनलाल चतुर्वेदी राजद्रोह के अपराध में गिरतार कर लिए गए, वह भी ’कर्मवीर‘ में प्रकाषित किसी रिपोर्ट या आलेख के लिए नहीं, बल्कि 12 मार्च 1921 को बिलासपुर जिला कान्फ्रेन्स में दिए गए भाशण के लिए। उन्हें आठ महीने की कड़ी कैद की सजा दी गई। सजा काटकर माखनलाल जी वापस आए तो देखा कि ’कर्मवीर‘ का वातावरण बदला हुआ था। मूल नीति न बदलने पर उन्हें ’कर्मवीर‘ के संपादक पद से डिसमिस कर दिया गया।
4 अप्रैल 1925 से रामनवमी के दिन ’कर्मवीर‘ दुबारा प्रकाषित हुआ, इस बार वह खण्डवा से निकला, अब यह माखनलाल चतुर्वेदी का निजी प्रकाषन था। चंद अंकों से ही ’कर्मवीर‘ अखिल भारतीय ख्याति का पत्र बन गया। ’कर्मवीर‘ सहस्त्रों पाठकों की आषा-आकांक्षाओं का प्रतीक बन गया। उसकी वैचारिक तेजस्विता और आधुनिकता से भयभीत होकर अनेक रियासतों- भोपाल, झाबुआ, धार, इंदौर, ग्वालियर एवं देवास और साथ ही राजस्थान की कुछ रियासतों ने ’कर्मवीर‘ का प्रवेष अपने यहां निशिद्ध कर दिया। इंदौर में तो कानूनन निशिद्ध कर दिया गया। चतुर्वेदी जी ने ’कर्मवीर‘ के पाठकों से लेकर लेखकों और व्यवस्थापकों के बीच प्रतिश्ठा के साथ पत्रकारिता व पत्र-उद्यम व व्यवसाय चलाने के लिए निम्न पैमाने रखे- कर्मवीर के संपादन और कर्मवीर की कठिनाईयों का उल्लेख न करना, कभी धन के लिए अपील न निकालना, ग्राहक संख्या बढ़ाने के लिए ’कर्मवीर‘ के कालमों में न लिखना, सनसनीखेज खबरे कभी न छापना, विज्ञापन जुटाने के लिए किसी आदमी की नियुक्ति न करना, क्रांतिकारी पार्टी के खिलाफ गांधी जी के भी वक्तव्य छापने से इंकार करना। ऐसी स्थिति में ’कर्मवीर‘ जन-जीवन का लाडला बना। वह जितनी तीक्ष्णता से ब्रिटिष षासन के पापों पर आक्रमण करता था, उतनी ही तीव्रता से उन लोगों को चुनौती देता जो देषद्रोह और षोशण का खुला खेल खेलते थे। इसीलिए ’कर्मवीर‘ अपने समय का विष्वास-सेतु बन गया। पत्रकारिता की षक्ति ’कर्मवीर‘ के माध्यम से उजागर हुई। अनेक आंदोलनों में ’कर्मवीर‘ ने नेतृत्व किया और अभूतपूर्व सफलताऍ अर्जित कीं। माखनलाल जी ने ’कर्मवीर‘ के माध्यम से एक ऐसे राश्ट्रीय चिंतन को जन्म दिया जिसे अंतर्राश्ट्रीय राश्ट्रीयता कहा जा सकता है।
माखनलाल जी का स्पश्ट कहना था, जिस देष में कलम तलवार जैसी प्रखर नहीं होती, उस देष में तलवार भी तलवार बनकर नहीं रह सकती। 1930 में बैतूल के जगल सत्याग्रह में उन्होंने सहयोग किया। 29 अप्रैल 1930 जबलपुर में असहयोग आंदोलन में गिरतार किए गए। 1943 में ’हिम किरीटनी‘ और ’साहित्य देवता‘ का प्रकाषन हुआ। ’हिम किरीटनी‘ पर उन्हें देव पुरस्कार प्राप्त हुआ। देष की आजादी के बाद ’हिम तरंगिनी‘ पर उन्हें 1954 में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। यह पुरस्कार पाने वाले चतुर्वेदी जी प्रथम हिंदी साहित्यकार थे। 1963 में उनकी विषिश्ट साहित्यिक सेवाओं के लिए पद्म भूशण सम्मान प्राप्त हुआ। जिसे अपने विद्रोही स्वभाव के चलते 10 सितम्बर 1967 को राश्ट्र भाशा विधेयक के विरोध के चलते उन्होंने परित्याग कर दिया। अंतत: 30 जनवरी 1968 के दिन वह सदैव के लिए पृथ्वी की गोद में सो गए।

चुनौतीपू्र्ण सफर को आसान बनाया
बी.डेविड
कमलनाथ ने जब मध्यप्रदेश का नेतृत्व सम्हाला। फिर चाहे वह कांग्रेस पार्टी का हो या सरकार का, उनके सामने चुनौतियों का पहाड़ था। प्रदेश में संगठन की स्थिति बद से बदतर वाली थी। पंद्रह साल भाजपा राज के कारण जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा हुआ था। सरकार के दमन चक्र से आम कार्यकर्ता हतोत्साहित था। एकजुटता का अभाव था। धन, बल दल या अहंकार से लबरेज भाजपा सरकार से दो-दो हाथ करने की एक पहाड़ जैसी चुनौती उनके सामने थी। विधानसभा चुनाव नजदीक थे। ऐसे में हताश कार्यकर्ता के साथ एक अहंकारी, धन, बल और छल की भाजपा सरकार के साथ चुनाव के महायुद्ध में लड़ना और जीतना असंभव सा दिखलाई देता था। जादू की कोई छड़ी नहीं थी कि वे उसे छुआकर इन सारी स्थितियों को सामान्य कर दें। कमल नाथ जी के अध्यक्ष बनने के बाद केन्द्रीय नेतृत्व हो या आम कांग्रेस कार्यकर्ता बड़ी उम्मीद से कमल नाथ जी की और देख रहा था। आसान काम करना उनकी फितरत में नहीं था। चुनौतियाँ स्वीकार करना और उनसे दो-दो हाथ करना कमल नाथ जी का स्वभाव है। उनका राजनीति में 45 साल का एक ऐसा लंबा अनुभव है जिसमें उन्होंने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के देशव्यापी चुनौतियों का सामना किया है।
मई 2018 में जब वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने तब विधानसभा चुनाव आते-आते उन्होंने पूरे प्रदेश में कांग्रेसी संगठन को जो मजबूती दी वह आश्चर्य चकित कर देने वाली थी। इन छह माह में उन्होंने गाँव-गाँव में कार्यकर्ताओं की एक ऐसी फौज तैयार की जो हताशा से उबर कर उत्साह और ऊर्जा से परिपूर्ण थी। इस दौरान उन्होंने संगठन में लगभग दो लाख नियुक्तियाँ कर सोए हुए संगठन को खड़ा कर दिया। विधानसभा चुनाव आते-आते उन्होंने एक ऐसी फौज तैयार कर ली थी जो 15 साल की चुनौती का सक्षमता के साथ मुकाबला कर सके। यह उनका आत्म-विश्वास और साहसिक फैसला था कि उन्होंने प्रदेश में किसी भी गठबंधन के बगैर कार्यकर्ताओं की दम पर चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। उन्होंने जो ठाना, जैसा सोचा, वह 11 दिसम्बर को कर दिखाया। जब प्रदेश में कांग्रेस पार्टी को 15 साल बाद सत्ता में लौटने का जनादेश मिला। मध्यप्रदेश में कांग्रेस का न केवल 15 साल का वनवास खत्म हुआ बल्कि एक अहंकारी, कुशासित और भ्रष्टाचारी भाजपा शासन से प्रदेश के किसानों, बेरोजगारों और आम नागरिकों को मुक्ति भी मिली।
सालभर पहले इस तरह के परिणाम की उम्मीद करने की कोई सोच भी नहीं सकता था। कमल नाथ जी ने 11 माह में मध्यप्रदेश में एक ऐसा चमत्कार दिखलाया जिससे इतने कम समय में 15 साल के बिखरे-टूटे और सुस्त संगठन ऊर्जावान नहर आने लगा। वहीं 15 साल के लंबे समय के बाद कांग्रेस को जनादेश दिलवाने में सफलता हासिल कीं। भाजपा के खोखले “ओरा” मेंअपनी कुशल रणनीति से सबके साथ मिलकर उन्होंने जो सेंध लगाई उसने उन्हें प्रदेश के आम कार्यकर्ताओं का मसीहा बना दिया। कांग्रेस की सरकार प्रदेश में बनाना तो एक चुनौती तो थी ही लेकिन उससे बड़ी चुनौती अब उनके सामने सरकार चलाने की थी। किसानों की कर्ज माफी, बेरोजगारी में नंबर-वन प्रदेश, महिलाओं के ऊपर बलात्कार में नंबर वन प्रदेश, किसानों की आत्महत्या में नंबर-वन प्रदेश को भाजपा से मुक्त कराकर इन समस्याओं से मुक्त कराने की चुनौती आसान नहीं थी। यह चुनौती उन्होंने 17 दिसम्बर को मुख्यमंत्री बनते ही स्वीकारी।
खाली-खजाना और आसन्न लोकसभा चुनाव उनके सामने एक बड़ी बाधा थी। राहुल गांधी का वचन 10 दिन में किसानों की कर्ज माफी का फैसला उनके सामने था। पर वे इस दौरान कभी विचलित नहीं हुए। उनके चेहरे का आत्म-विश्वास और उनके कद, अनुभव और चुनौतियों से निपटने की उनकी अभिनव रणनीतियों ने हर मुश्किल चीज को आसान कर दिया। शपथ लेते ही पहले घंटे के अंदर उन्होंने कर्ज माफी का मध्यप्रदेश के इतिहास का सबसे बड़ा साहसिक फैसला लिया। यहाँ एक और तथ्य का उल्लेख जरूरी है। किसी भी पार्टी का घोषणा पत्र वह भी वचन-पत्र के रूप में प्रदेश की जनता के सामने रखना खेल नहीं था। कमल नाथ जी ने वचन-पत्र के हर बिन्दु को पूरे होशो-हवास के साथ शामिल किया। वे कमिटमेंट वाले व्यक्तित्व हैं इसलिए उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि सिर्फ चुनाव जीतने के लिए वचन-पत्र नहीं बनेगा। वह पाँच साल में पूरा हो, इस आधार पर उन्होंने वचन-पत्र बनाया। हर क्षेत्र के विशेषज्ञों की मदद से उन्होंने उस वचन-पत्र को तैयार किया। उन्हें पता था कि शिवराज सरकार ने चुनाव जीतने के लिये पूरे प्रदेश को दाँव पर लगा दिया है। उन्होंने वचन-पत्र के हर बिन्दु को पूरे होने पर क्या वित्तीय भार आएगा इसका आंकलन करवाया तब जाकर उन्होंने वचन-पत्र को अंतिम रूप दिया।
कमिटमेंट पूरा करने और लोगों का सरकार के प्रति विश्वास लौटाने के लिए उन्होंने वचन-पत्र के हर बिन्दु पर पहले दिन से ही काम शुरू कर दिया। 50 लाख किसानों के 53 हजार करोड़ का कर्ज माफ करने का फैसला लिया और उसे 40वें दिन पूरा कर दिखाया। यह उनकी सोची-समझी रणनीति का परिणाम था कि एक एतिहासिक फैसले को उन्होंने इतने कम समय में पूरा करके एक नया इतिहास बनाया। उसके बाद नौजवानों के लिए युवा स्वाभिमान योजना शुरू कर, बिजली के बिल को आधा कर, कन्यादान विवाह योजना की अनुदान राशि 28 हजार से 51 हजार करने, सामाजिक सुरक्षा पेंशन 300 से बढ़ाकर 600 रुपये करने सहित 76 दिन में वचन-पत्र के 83 बिन्दुओं को पूरा कर दिया। यह उनके प्रशासनिक अनुभव और दृढ़ इच्छाशक्ति का ही कमाल था। यही नहीं उन्होंने प्रदेश की आधी आबादी पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने एवं 10 प्रतिशत सवर्णों को आरक्षण देने की घोषणा करके सबको चौंका दिया। कोई इतने कम दिन में इतने बड़े फैसले कैसे ले सकता है। वह भी बगैर आडम्बर के, शोर शराबे, के बिना फोटो विज्ञापन के। 17 दिसम्बर के पहले तो इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती थी कि प्रदेश में ऐसी भी कोई सरकार हो सकती है। उद्योगों का विश्वास लौटाने के लिए उन्होंने निवेश की नई रणनीति बनाई। इसमें रोजगार की संभावना और उपलब्धता को सर्वोच्चता पर रखा। उन्होंने सबसे पहले मौजूदा उद्योगों का सरकार पर विश्वास कायम हो, इस बुनियादी जरूरत पर ध्यान दिया। गोलमेज कांफ्रेंस बुलाई। यानी इतने कम दिनों में हर वर्ग, हर क्षेत्र और हर स्तर पर उन्होंने जो फैसले लिए वे इतने कम समय में गागर में सागर भरने के समान ही हैं।
जैसा कि ऊपर इस बात का जिक्र है कि कमल नाथ जी के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं थी कि वे संगठन से लेकर सरकार तक बिखरी पड़ी चुनौतियों को समाप्त कर सकें। पर आज 100 दिन बाद यह महसूस होता है कि कोई न कोई तो उनके पास छड़ी जरुर है जिसका जादू साफ नजर आ रहा है। उसके दम पर उन्होंने इतना कुछ कर दिखाया। वह भी पूरी सादगी और बगैर किसी हो हल्ला के। यही कमल नाथ जी की काबिलियत है जिसकी बहुत समय से जरूरत इस प्रदेश को थी। पाँच साल बाद इस प्रदेश को जब हम देखेंगे तो खुद ही कहेंगे कि यह तो जादू की छड़ी का कमाल है।

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