आलेख 21

श्रीलंका में अपूर्व आतंक
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
श्रीलंका के सिंहल और तमिल लोगों के बीच हुए घमासान युद्ध ने पहले सारी दुनिया का ध्यान खींचा था लेकिन इस बार उसके ईसाइयों और मुसलमानों के बीच बही खून की नदियों ने सारी दुनिया को थर्रा दिया है। ईस्टर के पवित्र दिन श्रीलंका के गिरजाघरों और होटलों में हुए बम-विस्फोटों में 300 से ज्यादा लोग मारे गए और सैकड़ों लोग घायल हुए। उनमें दर्जनों, यूरोपीय, अमेरिकी और एशियाई लोग भी थे। इतना बड़ा आतंकी हिंसक हादसा दुनिया में शायद पहले कभी नहीं हुआ। दुनिया के ईसाई और मुस्लिम देशों में इस घटना की कड़ी भर्त्सना हो रही है। यहां प्रश्न यही है कि आखिर यह हुआ क्यों ? सवा दो करोड़ की आबादीवाले श्रीलंका में लगभग डेढ़ करोड़ बौद्ध हैं, 25 लाख हिंदू हैं, 20 लाख मुसलमान हैं और 15 लाख ईसाई हैं। बौद्ध लोग सिंहलभाषी हैं। सिंहली हैं। ज्यादातर मुसलमान तमिल हैं और ईसाइयों में सिंहल और तमिल दोनों हैं। मुसलमानों और ईसाइयों के बीच जातिगत झगड़े का सवाल ही नहीं उठता। मुसलमानों और बौद्धों के बीच 2014 और 2018 में दो बार व्यक्तिगत मामलों को लेकर झगड़ा हुआ और वह दंगों में बदल गया। मुसलमानों का बहुत नुकसान हुआ। मुसलमानों को पता है कि बौद्ध लोग महात्मा बुद्ध की अहिंसा की बातें तो बहुत करते हैं लेकिन उनके-जैसी सामूहिक हिंसा दुनिया में बहुत कम जातियां करती हैं। इसीलिए उन्होंने अपना गुस्सा ईसाइयों पर उतारा। इसके लिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों का सहारा लिया। इस्लाम के नाम पर आतंक करनेवाले संगठनों की साजिश के बिना इतना बड़ा हमला करना श्रीलंकाई मुसलमानों के बस की बात नहीं है। कई श्रीलंकाई मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया है। उनसे पता लगेगा कि इस साजिश के पीछे असली तत्व कौनसे हैं। ईस्टर के दिन श्रीलंका के गिरजाघरों पर आक्रमण का एक बड़ा संदेश यह भी है कि इस्लामी आतंकवादी यूरोप और अमेरिका के ईसाइयों को बता रहे हैं कि लो, वहां नहीं तो यहां तुमसे हम बदला निकाल रहे हैं। इस घटना के बाद श्रीलंका के मुसलमानों का जीना हराम हो जाएगा। अब बौद्ध और ईसाई मिलकर उनका विरोध करेंगे। कोई आश्चर्य नहीं कि 300 लोगों की मौत का बदला हजारों में लिया जाए। श्रीलंका के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच पहले से दंगल चल रहा है और उसकी अर्थ-व्यवस्था भी पैंदे में बैठे जा रही हैं। ऐसे में श्रीलंका को सांप्रदायिक दंगों से बचाना बेहद जरुरी है। दक्षिण एशिया के राष्ट्रों को इस मुद्दे पर एकजुट होना होगा और पाकिस्तान को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।

चुनाव में सबसे ज्यादा खर्च करने वाली पार्टी बनी भाजपा
अजित वर्मा
भारतीय जनता पार्टी जहां खर्चा करने में सबसे आगे है, वहीं पैसे बचाने में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का कोई जवाब नहीं है। पार्टियों की ओर से चुनाव आयोग को जो खर्च का ब्यौरा दिया गया है, उसमें बसपा ने अपना बैंक बैलेंस 669 करोड़ रुपए बताया है।
दूसरी ओर भाजपा की बचत सिर्फ 82 करोड़ हैं और इस मामले में वह सपा, कांग्रेस और तेदपा से भी पीछे पांचवें स्थान पर है। हालांकि कांग्रेस की ओर से पिछले साल हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद अभी ब्यौरा नहीं दिया गया है। इनमें से तीन राज्यों में उसकी सरकार बनी है। दिसंबर के आंकड़ों के हिसाब से वह बचत के मामले में तीसरे स्थान पर है।
खर्चा करने में भाजपा ने सभी दलों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। पार्टी की ओर से 758 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करने की बात आयोग को बताई गई है। इसके अलावा भाजपा ऐसी पार्टी भी है जिसे सबसे ज्यादा चंदा मिल रहा है। पार्टी ने वर्ष 2017-18 में कुल 1027 करोड़ रुपए चंदा मिलने की बात घोषित की है। पार्टियों के इनकम टैक्स रिटर्न के आधार पर एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफाम्र्स ने जो रिपोर्ट तैयार की है, उसके अनुसार भाजपा को 2016-17 में भी 1034 करोड़ रुपए का चंदा मिला था। गत 25 फरवरी तक बसपा के आठ बैंक खातों में कुल 669 करोड़ रुपए जमा थे, यह राशि पिछले साल 13 दिसंबर की तुलना में एक करोड़ कम और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना राज्यों के चुनाव से पहले 6 अक्तूबर 2018 की तुलना में पांच करोड़ रुपए ज्यादा है। हालांकि इन चुनाव के दौरान उसने 24 करोड़ रुपए जुटाए। बचत के मामले में सपा दूसरे स्थान पर है। उसके खातों में 471 करोड़ रुपए जमा हैं। हालांकि उक्त राज्यों के चुनाव के बाद उसके खाते में 11 करोड़ रुपए कम हुए हैं। 196 करोड़ की बैंक बचत के साथ कांग्रेस तीसरे स्थान पर है। चौथे स्थान पर तेलगु देशम पार्टी का बैंक बैलेंस 107 करोड़ रुपए है, जो भाजपा से ज्यादा है।
राजनैतिक दलों के खर्च को लेकर जो आंकड़े सामने आये हैं, वो लोकसभा चुनाव के पहले के हैं। अब जब अभी के लोकसभा चुनाव में किस पार्टी को कितना चंदा मिला किस पार्टी ने कितना खर्च किया है। इसका हिसाब आना अभी बाकी रहेगा। फिर भी इस मामले में भाजपा ही आगे रहने वाली है इस बात की पूरी उम्मीद है। क्योंकि केन्द्र में भाजपा की सरकार है महाराष्ट्र और गुजरात जैसे अमीर राज्यों में भाजपा की सरकार तो है ही जहां से उसे सबसे ज्यादा चंदा मिलेगा। वहीं सब मिलाकर एक दर्जन से ज्यादा राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, जिनसे चुनावी चंदा सबसे ज्यादा भाजपा को ही मिलने की उम्मीद है। देश के बड़े औद्योगिक घराने भी सबसे ज्यादा भाजपा को ही चंदा देते हैं। कुल मिलाकर इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा ही सबसे अमीर पार्टी बनकर एक बार फिर उभरेगी यह तय माना जा रहा है।

चुनाव आयोग की क्षमता पर उठते सवाल
योगेश कुमार गोयल
चुनाव के दौरान देश के लोकतांत्रिक महोत्सव की गरिमा गिराते तमाम राजनीतिक दलों के बड़बोले नेताओं पर लगाम लगाने के लिए जो कदम चुनाव आयोग द्वारा बहुत पहले ही उठा लिए जाने चाहिएं थे, अंततः सुप्रीम कोर्ट के सख्त रूख के बाद आयोग को चुनावों की शुचिता बरकरार रखने हेतु उसके लिए बाध्य होना पड़ा। अदालत को कहना पड़ा था कि आयोग ऐसे मामलों को नजरअंदाज नहीं कर सकता। चुनावी प्रक्रिया में शुचिता लाने के लिए इससे पहले भी सर्वोच्च न्यायालय ने ही समय-समय पर कड़े कदम उठाए हैं। अदालती सक्रियता के चलते ही चुनावों के दौरान जेल से चुनाव न लड़ पाने, अपराधियों, दागियों, धन-बल या विभिन्न अनैतिक तरीकों से मतदाताओं को लुभाने, कानफोडू प्रचार, गली-मोहल्लों में पोस्टरों इत्यादि से निजात मिल सकी। इस बार भी चुनावी शुचिता के लिए निर्वाचन आयोग को सख्त हिदायत देते हुए अदालत ने जो पहल की है, उसके लिए देश की सर्वोच्च अदालत प्रशंसा की हकदार है। आश्चर्य की बात रही कि अदालत की कड़ी फटकार से पहले आयोग ऐसे बदजुबान नेताओं को नसीहत या चेतावनी देने और नोटिस थमाने तक ही अपनी भूमिका का निर्वहन करता रहा, जिसका किसी भी नेता पर कोई असर नहीं देखा गया और जब अदालत द्वारा आयोग से इस संबंध में सवाल किए गए तो आयोग ने अपने अधिकारों और शक्तियों को लेकर अपनी लाचारगी का रोना रोना शुरू कर दिया। ऐसे में सर्वोच्च अदालत द्वारा आयोग को उसकी शक्तियों और अधिकारों की याद दिलाई गई, जिसके बाद आयोग की तंद्रा टूटी और वह न केवल बदजुबान नेताओं पर कार्रवाई के मामले में सक्रिय दिखा बल्कि आदर्श चुनाव संहिता के उल्लंघन के मामले में उसने कर्नाटक की वेल्लोर सीट पर 18 अप्रैल को होने वाले चुनाव को भी रद्द कर दिया, जहां 10 अप्रैल को डीएमके प्रत्याशी के. आनंद तथा उनके दो सहयोगियों के घरों पर आयकर विभाग के छापों के दौरान 11.53 करोड़ की नकदी बरामद हुई थी। आरोप लग रहे थे कि इस तरह का काला धन बड़ी संख्या में मतदाताओं को लुभाने के लिए बांटा जा रहा है।
चुनाव आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है, जिसके मजबूत कंधों पर शांतिपूर्वक निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की अहम जिम्मेदारी है। वह किसी प्रकार के राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर यह कार्य सम्पन्न करा सके, इसके लिए उसे अनेक शक्तियां और अधिकार संविधान प्रदत्त हैं। देश की चुनाव प्रणाली में शुचिता बरकरार रखते हुए उसमें देश के हर नागरिक का भरोसा बनाए रखना निर्वाचन आयोग की सबसे पहले और आखिरी जिम्मेदारी है किन्तु वह अपनी इस भूमिका का किस कदर निर्वहन करता रहा है, इसका अनुमान अदालती फटकार के बाद योगी आदित्यनाथ, मायावती, आजम खान, मेनका गांधी इत्यादि विभिन्न दलों के कुछ दिग्गज नेताओं पर आयोग की सख्ती पर सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से लगाया जा सकता है कि ऐसा लगता है कि निर्वाचन आयोग ‘जाग गया’ है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने आयोग से ऐसे मामलों को लेकर पूछा था कि आप बताएं कि आप क्या कर रहे र्हैं? चुनाव आयोग के पास अभी तक आचार संहिता के उल्लंघन और मर्यादाहीन बयानबाजी की करीब साढ़े तीन सौ शिकायतें मिली किन्तु आयोग ने उन शिकायतों पर कितना लचीला रूख अपनाया, सभी जानते हैं।
ऐसा नहीं है कि आयोग शक्तिहीन है बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत उसके पास चुनावी रंग को बदरंग करने वाले नेताओं या राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई करने के पर्याप्त अधिकार हैं और चुनावी प्रक्रिया की शुरूआत से ही होना तो यही चाहिए था कि आयोग द्वारा अश्लील बयानबाजी और समाज को बांटने वाली टिप्पणियां करने वाले लोगों से सख्ती से निपटा जाता ताकि आचार संहिता की इस प्रकार सरेआम धज्जियां उड़ाने की दूसरों की हिम्मत ही नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट की पहले से ही यह स्पष्ट व्याख्या है कि अगर कोई नेता धर्म या जाति के आधार पर वोट मांगे तो उस पर कार्रवाई की जाए और आयोग के पास इतने अधिकार भी हैं कि आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले या भड़काऊ अथवा अश्लील बयानबाजी करने वाले नेताओं के स्पष्टीकरण से संतुष्ट न होने पर वह उन्हें दंडित भी कर सकता है। अगर आयोग के दावों के अनुरूप मान भी लें कि उसके अधिकार सीमित हैं तो सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद उसके पास एकाएक बदजुबान नेताओं और आचार संहिता की धज्जियां उड़ाने वाले प्रत्याशियों पर कार्रवाई करने के अधिकार कहां से पैदा हो गए?
वास्तव में अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही का अहसास आयोग को अदालत के सख्त रूख के बाद ही हुआ है। आश्चर्य की बात है कि अदालत को कहना पड़ा कि अधिकारी आयोग के अधिकारों के बारे में जानकारी लेकर उसके समक्ष पेश हों। संविधान के तहत निर्वाचन आयोग को निर्बाध शक्तियां प्राप्त हैं। हकीकत यही है कि मतदान प्रक्रिया को शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से सम्पादित कराने के लिए संविधान में निर्वाचन आयोग को पर्याप्त अधिकार दिए गए हैं किन्तु आयोग अगर अपने इन अधिकारों का सही तरीके से उपयोग ही नहीं कर पाता। यहां सवाल आयोग की निष्पक्षता या एक संवैधानिक संस्था के रूप में उसकी स्वायत्तता पर नहीं है बल्कि सवाल है उसकी क्षमता पर, जो तमाम अधिकारों के बावजूद आचार संहिता के गंभीर मामलों में भी कहीं दिखाई नहीं दी। देश के 90 करोड़ मतदाताओं के दिलोदिमाग में आयोग की क्षमता और निष्पक्षता के प्रति पहले जैसा भरोसा बरकरार रहे, उसके लिए जरूरी है कि आयोग चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में बेहद कड़ा रूख अपनाए।
देशभर में चुनाव आचार संहिता के सरासर उल्लंघन के अनेकों मामले सामने आने के बाद भी आयोग के नरम रूख का ही असर है कि सुप्रीम कोर्ट के सख्त रूख के बाद चार बड़े नेताओं पर कार्रवाई करने के बाद भी विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की फिजां में जहर घोलने की फितरत बदलने का नाम नहीं ले रही। एक ओर जहां जयाप्रदा को लेकर अश्लील टिप्पणी के बाद आयोग की कार्रवाई के पश्चात् भी आजम खान ने दो ही दिन बाद फिर मर्यादाहीन टिप्पणी की कि चुनाव के बाद कलेक्टरों से मायावती के जूते साफ करवाएंगे तो विवादास्पद कांग्रेसी नेता नवजोत सिंह सिद्धूकटिहार में नफरत फैलाने वाली राजनीतिक बयानबाजी करते नजर आए। शिवसेना सांसद संजय राउत ने तो सरेआम बयान दे डाला कि वे न कानून को मानते हैं और न ही उन्हें चुनाव आयोग या आचार संहिता की कोई परवाह है। ऐसे में यह देखना होगा कि अदालत द्वारा पेंच कसे जाने के बाद आयोग अब आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले नेताओं पर कितना सख्त रूख अपनाता है।
आयोग के लचीले रूख के कारण ही इस बार राजनीति का बेहद छिछला स्तर देखते हुए कदम-कदम पर यही लगता रहा है, जैसे किसी भी राजनीतिक दल या नेता को चुनाव आयोग के डंडे का कोई भय ही नहीं है। हमारी राजनीति की मर्यादा तो दिनों दिन गर्त में जा ही रही है, कम से कम निर्वाचन आयोग को तो मर्यादाहीन नेताओं पर सख्ती दिखाते हुए अपनी मर्यादा की रक्षा करने के साथ-साथ लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए एक स्वस्थ मिसाल बनकर सामने आना चाहिए ताकि लोकतंत्र में उनका भरोसा बरकरार रहे। आज आयोग भले ही स्वयं को सीमित अधिकारों और शक्तियों वाली संवैधानिक संस्था के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कुछ ही दशकों पहले इसी आयोग के टीएनशेषन नामक एक कठोर, निष्पक्ष और सख्त मिजाज अधिकारी ने आयोग की इन्हीं शक्तियों और अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए तमाम राजनीतिक दलों और नेताओं की बोलती बंद कर दी थी। अगर इतने वर्षों पहले एक चुनाव अधिकारी इतना कुछ कर सकता था तो आज आयोग स्वयं को इतना बेबस क्यों दिखा रहा है? सही मायने में आज निर्वाचन आयोग में चुनाव सुधारों के लिए विख्यात रहे टीएनशेषन जैसे सख्त अधिकारियों की ही जरूरत है, जो आयोग की अपने अधिकारों का निर्भय होकर इस्तेमाल करते हुए आयोग की विश्वसनीयता बहाल कर आमजन का भरोसा स्वयं के साथ-साथ लोकतांत्रिक प्रणाली के प्रति भी बरकरार रख सकें।

आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता के साथ हो कार्रवाई
डॉ हिदायत अहमद खान
कहने को तो भारत के दक्षिणी पड़ोसी देश श्रीलंका का हिंसा और आतंकी घटनाओं से पुराना रिश्ता रहा है। यहां करीब तीन दशक तक प्रभाकरन का आतंक रहा है, वहीं लिट्टे के दंश को आखिर हम कैसे भुला सकते हैं, जबकि हमें अपने प्रिय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को एक आत्मघाती हमले में सदा के लिए खोना पड़ गया था। बहरहाल श्रीलंका से सुबह के करीब खबर आई कि सिलसिलेबार बम धमाकों में करीब दो सौ लोगों की जानें जा चुकी हैं, जबकि पांच सौ के करीब लोग जख्मी बताए जा रहे हैं। इस प्रकार सुबह के समय करीब 9 बजे लगातार सात बम धमाकों से श्रीलंका ही नहीं बल्कि पड़ोसी मुल्क भारत भी दहल गया और दुनिया को एक बार फिर संदेश गया कि आतंकवादी अपनी मौजूदगी का एहसास एशियाई देशों में कुछ ज्यादा ही करा रहे हैं। इस कायराना हमले की जितने कड़े शब्दों में निंदा की जाए कम ही है। एक बार फिर दोहराना होगा कि आतंकवाद कभी किसी का सगा नहीं हो सकता, क्योंकि न तो उसका कोई धर्म होता है, न ही कोई जाति होती है, न वह भाषा से बंधा हुआ है और न ही वह किसी विशेष क्षेत्र से ही ताल्लुक रखता है। ऐसे में उसे सिर्फ और सिर्फ इंसानियत का दुश्मन करार दिया जाना ही उचित होगा। अब वह समय आ गया है जबकि सभी शांति व सहअस्तित्व की जिम्मेदारी लेने वालों को एकसाथ इसके खिलाफ उठ खड़ा होना चाहिए। यहां यह नहीं देखा जाना चाहिए कि हमला किस पर और किन परिस्थितियों में हुआ, बल्कि यह देखा जाना उचित होगा कि हमला मानवजाति पर हुआ है, जिसमें बेगुनाहों और निहत्थों ने अपनी जानें गवाई हैं। इसलिए इस पर महज निंदा प्रस्ताव लाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेना अब उचित नहीं लगता है। दरअसल इससे पहले पुलवामा में हुए आतंकी हमले में हमने अपने 44 जवानों को खोया था। इसके बाद सीमा पार आतंकी ठिकानों पर भारतीय वायुसेना को सर्जिकल स्ट्राइक करनी पड़ गई थी। वहीं अफगानिस्तान में तो लगातार आतंकी हमले होते ही रहते हैं। इसके बाद बांग्लादेश, पाकिस्तान व नेपाल जैसे अन्य छोटे देशों में भी आतंकियों ने अपनी मौजूदगी दर्शाने के लिए समय-समय पर हमले किए हैं। इसलिए कहना पड़ता है कि अब सभी को अच्छे और बुरे आतंकवाद में फर्क करने की बजाय आतंकवाद को सिर्फ आतंकवाद मानकर कार्रवाई करने के लिए एकजुट होना चाहिए। दरअसल मौजूदा समय में हो यह रहा है कि यदि भारत में आतंकी हमला होता है तो सीधे पाकिस्तान पर शक की सुई जाती है और कहा जाता है कि कश्मीर के कारण ऐसा हो रहा है, मतलब आतंकवाद को भी किसी क्षेत्र से जोड़कर देखा जाने लगता है। वहीं जब पाकिस्तान पर आतंकी हमला होता है तो कहा जाता है कि उसके अपने पाले हुए भस्मासुर हैं जो अब उसी के लिए घातक साबित हो रहे हैं। इससे हटकर पाकिस्तान हाल ही में हुए हमले के लिए ईरान में मौजूद आतंकियों को जिम्मेदार ठहराता नजर आता है। मतलब आतंकी अपना काम करते जाते हैं और विभिन्न देश अपने-अपने नजरिये से इसे अलग-अलग खानों में रखकर इसकी भयावहता को कम करने का प्रयास करते रहते हैं। यह मानवजाति पर कुठाराघात है और इससे जितनी जल्दी छुटकारा मिलेगा शांतिप्रिय दुनिया के लिए उतना ही अच्छा होगा। बहरहाल श्रीलंका में हुए आतंकी हमले की निंदा करते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘मैं इन हमलों की कड़ी निंदा करता हूं। हमारे क्षेत्र में इस तरह की बर्बरता के लिए कोई जगह नहीं है। भारत इस मुश्किल घड़ी में श्रीलंका के लोगों के साथ एकजुटता के साथ खड़ा है। मेरी संवेदना शोक संतप्त परिवारों के साथ है। मैं इन हमलों में घायल हुए लोगों के जल्‍द स्‍वस्थ होने की कामना करता हूं।’ वहीं उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने भी हमलों पर दुख जताते हुए अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं। विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज ने श्रीलंका में मौजूद भारतीयों को सलाह दी कि वो संकट में भारतीय उच्चायोग से संपर्क कर सकते हैं। यहां पाकिस्‍तान ने भी हमलों की निंदा करते हुए कहा है कि वह इस मुश्किल घड़ी में श्रीलंका सरकार और वहां के लोगों के साथ खड़ा है। इस प्रकार मुश्किल घड़ी में सभी साथ होने की बात कहते हैं। श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना ने भी धमाकों पर गहरा शोक जताते हुए देशवासियों से शांति बनाए रखने की अपील की है। दरअसल ये हमले ईसाई समुदाय के मुख्य त्योहार ईस्टर के अवसर पर किए गए हैं, जिससे आतंकियों के इरादों को साफतौर भांपा जा सकता है। त्यौहार के समय जुटने वाली भीड़ को ध्यान में रखकर किए गए आतंकी हमले सही मायने में ज्यादा से ज्यादा लोगों की जान लेने के इरादे से किए जाते हैं ताकि दुनिया देख सके कि उनमें कितनी ताकत है। एक तरह से आतंकी गुटों में भी वर्चस्व को लेकर इस तरह के हमले कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं। श्रीलंका में इन सीरियल धमाकों से ईस्टर काले दिवस के तौर पर परिवर्तित हो गया और सभी ओर मातम पसर गया। यह सब तब हो रहा है जबकि लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम यानी लिट्टे का खात्मा 21 मई 2009 को हो गया था। दरअसल इसके संस्थापक वेलुपिल्लई प्रभाकरन को श्रीलंका सेना ने तब मार गिराया था। इसी के साथ लिट्टे ने हथियार डालने का ऐलान भी किया और जाफना को हिंसा के दौर से भी आजादी मिल गई। इस घटना के एक दशक बाद एक बार फिर श्रीलंका बम धमाकों से दहल गया है, जिससे चिंतित होना लाजमी है। गौर करने वाली बात यह भी है कि फरवरी 2018 में ही भारत आए श्रीलंका के चीफ ऑफ डिफेंस, एडमिरल आरसी विजेगुनारतने ने इंडो-पैसेफिक डायलॉग में पूरे विश्वास के साथ दावा किया था कि श्रीलंका दुनिया का एक मात्र ऐसा देश है, जिसने आतंकवाद को पूरी तरह से अपनी धरती से उखाड़ फेंकने में कामयाबी हासिल की है। उनका भी यह इशारा लिट्टे की तरफ ही था‌ अत: अब जबकि सीरिलय बम धमाके हो चुके हैं तो ज्यादातर लोगों का ध्यान भी लिट्टे की ही तरफ जा रहा है, लेकिन न तो इन धमाकों की किसी ने जिम्मेदारी ही ली है और न ही किसी प्रकार के पुख्ता सुबूत ही मिले हैं, जिससे दोषियों को सख्त से सख्त सजा दी जा सके। बावजूद इसके कहना पड़ता है कि आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता जरुरी है, तभी इससे पार पाया जा सकता है।

मोदी की भी जांच क्यों न हो ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
चुनाव आयोग ने अपने एक अफसर को मुअत्तिल कर दिया, क्योंकि उसने ओडिशा में प्र.मं. नरेंद्र मोदी के हेलिकाॅप्टर को जांच के लिए 15 मिनिट तक रोक लिया था। आयोग ने अपने हिसाब से ठीक किया, क्योंकि आयोग के नियम के अनुसार जो लोग एसपीजी (विशेष सुरक्षा समूह) की देख-रेख में रहते हैं, उनकी सुरक्षा जांच नहीं की जानी चाहिए। मोहम्मद मोहसिन नामक इस आईएएस अफसर ने आयोग के नियम का उल्लंघन कर दिया था। यहां मेरा प्रश्न यह है कि चुनाव आयोग ने यह बेतुका प्रावधान रखा ही क्यों ? जिन-जिन लोगों को एसपीजी सुरक्षा मिली हुई है, वे कौन लोग हैं? उनमें से ज्यादातर नेता लोग हैं। इनमें से कौन दूध का धुला हुआ है ? राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति की बात जाने दें, बाकी जितने भी नेता हैं, सबके सब पार्टीबाज हैं। और यह तो चुनाव का मौसम है याने करेला और नीम चढ़ा। इन दिनों हर नेता चुनाव जीतने के लिए कोई भी पैंतरा अपना सकता है। वह अपने हेलिकाॅप्टर और जहाज में बांटने के लिए करोड़ों रु., शराब की बोतलें और दुनिया भर की चीजे ले जा सकता है। उसकी जांच क्यों नहीं होनी चाहिए ? जरुर होनी चाहिए और सबसे पहले होनी चाहिए। यदि मुझे यह सुरक्षा मिली होती (कुछ वर्षों तक मुझ पर भी एक सुरक्षा थोप दी गई थी) तो मैं आगे होकर कहता कि आप कृपया मेरी जांच करें। ऐसी जांच से निर्दोष नेता की छवि में चार चांद लग जाते हैं, जैसे कि इस जांच में मोदी के लगे हैं। मोदी के हेलिकाॅप्टर में से कुछ नहीं निकला। मोदी को स्वयं चाहिए कि वे चुनाव आयोग से सार्वजनिक अपील करें कि वह अपने जांच संबंधी इस नियम को बदले। यही नियम लागू करते हुए जब ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के हेलिकाॅप्टर की जांच की गई तो वे एक शब्द भी नहीं बोले। उन्होंने चुपचाप जांच होने दी लेकिन केंद्रीय तेल मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की जांच होने लगी तो वे भड़क उठे। उनके हेलिकाॅप्टर में एक सीलबंद बड़ा सूटकेस रखा हुआ था। सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग के कान खींचे तो वह इन दिनों थोड़ा मुस्तैद हो गया है लेकिन उसकी यह मुस्तैदी सबके लिए एक-जैसी होनी चाहिए, चाहे वह प्रधानमंत्री हो या चपरासी हो।

….और अब राष्ट्रवाद के बाद जातिवाद…..?
ओमप्रकाश मेहता
अब ऐसा लगने लगा है कि इस देश में प्रजातंत्रीय संविधान की जगह नया सत्ता का संविधान लाने की तैयारी की जा रही है, इस नए संविधान का मूल मकसद सत्ता प्राप्ति के उचित-अनुचित अनुच्छेदों को जोड़कर सत्ता प्राप्ति के उद्देश्य को हासिल करने के तरीके सुझाना होगा। प्रतिपक्षी नेता जो आज के सत्तासीन नेताओं पर यह गंभीर आरोप लगा रहे है कि इस बार यदि मौजूदा सत्ता की वापसी हो गई तो देश का यह आखिरी चुनाव कहा जाएगा, यह नया संविधान इसी आरोप की पुष्टि करता है।
आज यह सब इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योंकि आजादी के बाद डाॅ. भीमराव आम्बेडकर की सदारत में जो संविधान तैयार कर आजाद भारत में 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया था, वह संविधान अब अंतिम सांस ले रहा है, इसे पहले तो अब तक के सत्तासीनों ने अपनी राजनीतिक स्वार्थ सिद्धी के लिए सवा सौ संशोधनों के तीरों से छलनी कर दिया और अब इसमें जो शेष अनुच्छेद है, उनकी अवहेलना कर संविधान की धज्जियाँ उड़ाने की कौशिशें सत्तारूढ़ नेताओं द्वारा ही की जा रही है। संविधान में स्पष्ठ उल्लेख है कि चुनावों या अन्य राजनीतिक कार्यों के लिए धर्म-जाति या सम्प्रदाय का उपयोग नहीं किया जाए, लेकिन आज देश में चुनाव प्रचार के दौर में जो कुछ भी चल रहा है, वह किसी से भी छुपा नहीं है, स्वयं देश के प्रधानमंत्री जब अपनी राजनीतिक स्वार्थ सिद्धी के लिए पहले राष्ट्रवाद, फिर देश की सेना के पराक्रम और अब जातिवाद का सहारा ले रहे है, तो अन्य नेताओं के बारे में क्या कहा जाए? और अब तो अपनी राजनीतिक चैसर फिट करने के लिए प्रतिपक्षी नेतागण संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति तक पहुंच गए? उन्हेें भी चुनावी राजनीति का मोहरा बनाने का प्रयास किया गया? यह अति नहीं तो और क्या हैं?
देश में अब तक एक दर्जन से भी अधिक लोकसभा चुनाव हो चुके है, किंतु इस चुनाव में जो निम्न और घटिया स्तर की राजनीति के दर्शन हो रहे है, उससे नेता तो नहीं देश का आम वोटर शर्मसार हो रहा है। गाली के शब्दकोष से नित नई गालियाँ चुनी जा रही है, फिर वह चाहे महिलाओं के लिए ही क्यों न हो?
ऐसा कतई नहीं है कि यह राजनीतिक स्तर सिर्फ सत्तारूढ़ दल या उससे जुड़े नेताओं का गिरा हो, बल्कि प्रतिपक्षी दलों ने भी इस गिरावट में पूरी सहभागिता निभाई।
अब यह समझ नहीं आ रहा है, आम वोटर या आम आदमी को, कि प्रधानमंत्री जी अपने पांच साल के शासनकाल की उपलब्धियाँ छोड़कर राष्ट्रवाद व जातिवाद तक कैसे पहुंच गए? क्या उनकी सरकार की एक भी उपलब्धि ऐसी नहीं है, जो चुनावी रण में सहयोगी बन सके? इसलिए उन्हें ऐसे हीनतम हथकण्डे़ अपनाने को मजबूर होना पड़ रहा है, आज चुनाव प्रचार में सत्तारूढ़ दल अपनी उपलब्धि की चर्चा क्यों नहीं कर रहा? क्या ऐसी एक भी उपलब्धि नहीं है, जो चुनाव प्रचार में सहयोगी बन सके? फिर सबसे बड़ी बात यह कि प्रतिपक्षी दल तो फिर भी गालियों के बीच अपने चुनावी घोषणा-पत्र का कभी-कभी जिक्र कर देते है, किंतु सत्तारूढ़ दल तो अपने घोषणा-पत्र में समाहित तथ्यों का भी जिक्र नहीं करता, सिर्फ प्रतिपक्ष को गालियाँ व स्वयं के प्रति सहानुभूति अर्जित करने के प्रयासों में भी प्रचार भाषण खत्म हो जाता है, शायद इसका कारण यह भी हो सकता है कि 2014 के चुनावी वादों की ये लोग याद दिलाना नहीं चाहते? क्योंकि उन वादों की किताब का हश्र भी हमारी संविधान पुस्तिका जैसा ही हुआ है।
इस तरह कुल मिलाकर इस बार जो देश में आम चुनाव हो रहे है, ये पिछले चुनावों से एकदम भिन्न है, पिछले चुनावों में प्रचार का माध्यम सत्तारूढ़ दल के लिए उसकी उपलब्धियां और प्रतिपक्ष के लिए महत्वाकांक्षी घोषणा-पत्र हुआ करते थे, किंतु इस बार पक्ष-प्रतिपक्ष सभी गालियों का कोष लेकर बैठ गए है और अपनी कर्कश वाणी से एक- दूसरे पर गालियों के तीर बरसा रहे है, इसमें इन्हें न कोई लाज आ रही है और न शर्म? और इसीलिए आम वोटर मतदान के वक्त तक यह तय नहीं कर पाता कि वोट किसे दिया जाए- साँपनाथ को, या नागनाथ को?

हिंसक सत्ता की नाकामी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
महावीर जयंति के अवसर पर हार्वर्ड केनेडी स्कूल की एक रपट दुनिया के आंदोलनों पर छपी है। यह खोजपूर्ण रपट इस मुद्दे पर छपी है कि पिछले 100 वर्षों में कितने हिंसक आंदोलन सफल हुए हैं और कितने अहिंसक ? इसके मुताबिक 36 प्रतिशत हिंसक आंदोलन सफल हुए हैं जबकि 54 प्रतिशत अहिंसक आंदोलन सफल हुए हैं। इस शोध-कार्य में विद्वानों ने दुनिया के 323 आंदोलनों का विश्लेषण किया था। पिछले 20 वर्षों में 69 प्रतिशत अहिंसक आंदोलनों ने सफलता प्राप्त की है। 20 वीं सदी में सबसे बड़े दो आंदोलन हुए। एक रुस में और दूसरा चीन में। ये दोनों आंदोलन मार्क्सवादी थे। दोनों हिंसक थे। दोनों में लाखों लोग मारे गए। रुस के सोवियत आंदोलन के नेता व्लादिमीर इलिच लेनिन थे और चीन के माओ-त्से-तुंग थे। एक ने जारशाही को उखाड़ फेंका और दूसरे ने च्यांग काई शेक को ! दोनों आंदोलन सफल हुए लेकिन उनका अंजाम क्या हुआ ? दोनों सिर के बल खड़े हो गए। दोनों असफल हो गए। वर्गविहीन समतामूलक समाज स्थपित करने की बजाय दोनों कम्युनिस्ट राष्ट्र निरंकुश तानाशाही में बदल गए। आज कोई भी उनका नामलेवा-पानीदेवा नहीं बचा है। इसी तरह के हिंसक तख्ता-पलट पूर्वी यूरोप, क्यूबा, एराक, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मिस्र, ईरान आदि में भी हुए लेकिन वे कितने दिन चल पाए ? उन्होंने कौनसी ऊंचाइयां छुईं ? या तो शीघ्र ही उनका अंत हो गया या उनसे जन्मी व्यवस्थाएं अभी तक सिसक रही हैं। भारत में भी हिंसा हुई लेकिन उसकी आजादी का संघर्ष मूलतः अहिंसक था। इसीलिए भारत में आज भी लोकतंत्र जगमगा रहा है और विविधतामयी समाज लहलहा रहा है। भारत में आज भी कई स्थानों पर हिंसक आंदोलन चल रहे हैं लेकिन वे बांझ साबित हो रहे हैं। नक्सलवादी और कश्मीरी आतंकवादी हजार साल तक भी खून बहाते रहें तो वे सफल नहीं हो सकते। यह बात अफगानिस्तान और पाकिस्तान के तालिबान और इस्लामी आतंकवादियों को भी अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए। वे नेपाल के माओवादियों से कुछ सबक क्यों नहीं लेते ? वे इस परम सत्य को क्यों नहीं समझते कि हिंसा से प्राप्त सत्ता को बनाए रखने के लिए उससे दुगुनी हिंसा निरंतर करते रहनी पड़ती है। नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी अपने-अपने समय में सफल जरुर हुए लेकिन उनका हश्र क्या हुआ, क्या हमें पता नहीं है ?

सिंदूर का चोला चढाने से होगी मनोकामना पूरी
अरविन्द जैन
(हनुमान जन्म पर विशेष) संकट मोचन, अंजनी सुत, पवन पुत्र हनुमान का जन्मोत्सव चैत्र माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है| प्रभु के लीलाओं से कौन अपरिचित अंजान है| हनुमान जयंती के दिन बजरंगबली की विधिवत पूजा पाठ करने से शत्रु पर विजय और मनोकामना की पूर्ति होती है|
हनुमान जी भगवान शिव के 11वें रूद्र अवतार माने जाते हैं| उनके जन्म के बारे में पुराणों में जो उल्लेख मिलता है उसके अनुसार अमरत्व की प्राप्ति के लिये जब देवताओं व असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया को उससे निकले अमृत को असुरों ने छीन लिया और आपस में ही लड़ने लगे। तब भगवान विष्णु मोहिनी के भेष अवतरित हुए। मोहनी रूप देख देवता व असुर तो क्या स्वयं भगवान शिवजी कामातुर हो गए। इस समय भगवान शिव ने जो वीर्य त्याग किया उसे पवनदेव ने वानरराज केसरी की पत्नी अंजना के गर्भ में प्रविष्ट कर दिया| जिसके फलस्वरूप माता अंजना के गर्भ से केसरी नंदन मारुती संकट मोचन रामभक्त श्री हनुमान का जन्म हुआ|
केसरी नंदन मारुती का नाम हनुमान कैसे पड़ा? इससे जुड़ा एक जग प्रसिद्ध किस्सा है| यह घटना हनुमानजी की बाल्यावस्था में घटी| एक दिन मारुती अपनी निद्रा से जागे और उन्हें तीव्र भूख लगी| उन्होंने पास के एक वृक्ष पर लाल पका फल देखा| जिसे खाने के लिए वे निकल पड़े| दरअसल मारुती जिसे लाल पका फल समझ रहे थे वे सूर्यदेव थे| वह अमावस्या का दिन था और राहू सूर्य को ग्रहण लगाने वाले थे। लेकिन वे सूर्य को ग्रहण लगा पाते उससे पहले ही हनुमान जी ने सूर्य को निगल लिया। राहु कुछ समझ नहीं पाए कि हो क्या रहा है? उन्होनें इंद्र से सहायता मांगी| इंद्रदेव के बार-बार आग्रह करने पर जब हनुमान जी ने सूर्यदेव को मुक्त नहीं किया तो, इंद्र ने बज्र से उनके मुख पर प्रहार किया जिससे सूर्यदेव मुक्त हुए| वहीं इस प्रहर से मारुती मूर्छित होकर आकाश से धरती की ओर गिरते हैं| पवनदेव इस घटना से क्रोधित होकर मारुती को अपने साथ ले एक गुफा में अंतर्ध्यान हो जाते हैं| जिसके परिणामस्वरूप पृथ्वी पर जीवों में त्राहि- त्राहि मच उठती है| इस विनाश को रोकने के लिए सारे देवगण पवनदेव से आग्रह करते हैं कि वे अपने क्रोध को त्याग पृथ्वी पर प्राणवायु का प्रवाह करें| सभी देव मारुती को वरदान स्वरूप कई दिव्य शक्तियाँ प्रदान करते हैं और उन्हें हनुमान नाम से पूजनीय होने का वरदान देते हैं| उस दिन से मारुती का नाम हनुमान पड़ा| इस घटना की व्याख्या तुलसीदास द्वारा रचित हनुमान चालीसा में की गई है –
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
एकबार, एक महान संत अंगिरा स्वर्ग के स्वामी, इन्द्र से मिलने के लिए स्वर्ग गए और उनका स्वागत स्वर्ग की अप्सरा, पुंजीक्ष्थला के नृत्य के साथ किया गया। हालांकि, संत को इस तरह के नृत्य में कोई रुचि नहीं थी, उन्होंने उसी स्थान पर उसी समय अपने प्रभु का ध्यान करना शुरु कर दिया। नृत्य के अन्त में, इन्द्र ने उनसे नृत्य के प्रदर्शन के बारे में पूछा। वे उस समय चुप थे और उन्होंने कहा कि, मैं अपने प्रभु के गहरे ध्यान में था, क्योंकि मुझे इस तरह के नृत्य प्रदर्शन में कोई रुचि नहीं है। यह इन्द्र और अप्सरा के लिए बहुत अधिक लज्जा का विषय था; उसने संत को निराश करना शुरु कर दिया और तब अंगिरा ने उसे शाप दिया कि, “देखो! तुमने स्वर्ग से पृथ्वी को नीचा दिखाया है। तुम पर्वतीय क्षेत्र के जंगलों में मादा बंदर के रुप में पैदा हो।”
उसे फिर अपनी गलती का अहसास हुआ और संत से क्षमा याचना की। तब उस संत को उस पर थोड़ी सी दया आई और उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया कि, “प्रभु का एक महान भक्त तुमसे पैदा होगा। वह सदैव परमात्मा की सेवा करेगा।” इसके बाद वह कुंजार (पृथ्वी पर बन्दरों के राजा) की बंटी बनी और उनका विवाह सुमेरु पर्वत के राजा केसरी से हुआ। उन्होंने पाँच दिव्य तत्वों; जैसे- ऋषि अंगिरा का शाप और आशीर्वाद, उसकी पूजा, भगवान शिव का आशीर्वाद, वायु देव का आशीर्वाद और पुत्रश्रेष्ठी यज्ञ से हनुमान को जन्म दिया। यह माना जाता है कि, भगवान शिव ने पृथ्वी पर मनुष्य के रुप पुनर्जन्म 11वें रुद्र अवतार के रुप में हनुमान वनकर जन्म लिया; क्योंकि वे अपने वास्तविक रुप में भगवान श्री राम की सेवा नहीं कर सकते थे।
सभी वानर समुदाय सहित मनुष्यों को बहुत खुशी हुई और महान उत्साह और जोश के साथ नाचकर, गाकर, और बहुत सी अन्य खुशियों वाली गतिविधियों के साथ उनका जन्मदिन मनाया। तब से ही यह दिन, उनके भक्तों के द्वारा उन्हीं की तरह ताकत और बुद्धिमत्ता प्राप्त करने के लिए हनुमान जयंती को मनाया जाता है।
हनुमान मंत्र:
मनोजवं मारुततुल्यवेगम्
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्री रामदूतं शरणं प्रपद्ये।।
हनुमान जयंती व्रत पूजा विधि
इस दिन व्रत रखने वालों को कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है| व्रत रखने वाले व्रत की पूर्व रात्रि से ब्रह्मचर्य का पालन करें| हो सके तो जमीन पर ही सोये इससे अधिक लाभ होगा| प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर प्रभू श्री राम, माता सीता व श्री हनुमान का स्मरण करें| तद्पश्चात नित्य क्रिया से निवृत होकर स्नान कर हनुमान जी की प्रतिमा को स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा करें| इसके बाद हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ करें| फिर हनुमान जी की आरती उतारें| इस दिन स्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड या हनुमान चालीसा का अखंड पाठ भी करवाया जाता है| प्रसाद के रुप में गुड़, भीगे या भुने चने एवं बेसन के लड्डू हनुमान जी को चढ़ाये जाते हैं| पूजा सामग्री में सिंदूर, केसर युक्त चंदन, धूप, अगरबती, दीपक के लिए शुद्ध घी या चमेली के तेल का उपयोग कर सकते हैं|पूजन में पुष्प के रूप में गैंदा, गुलाब, कनेर, सूरजमुखी आदि के लाल या पीले पुष्प अर्पित करें| इस दिन हनुमान जी को सिंदूर का चोला चढ़ाने से मनोकामना की शीघ्र पूर्ति होती है|
एक मान्यता के अनुसार हनुमान जी जैन थे ,इसके बहुत प्रमाण शास्त्रों में मिलते हैं .
हनुमान जयंती की सबको शुभकामनाएं .

गरीब देश : महंगे चुनाव
ओमप्रकाश मेहता
हमारा लोकतंत्र अब हमारे गरीब देश के लिए काफी खर्चीला और महंगा साबित होने लगा है, हमारे इसी देश में हमने अपना पहला लोकतंत्र महापर्व (चुनाव 1952) सिर्फ दस करोड़ रूपए में मनाया था, जो अब मात्र सढ़सठ साल बाद मनाए जा रहे इस लोकतंत्र महापर्व पर इस वर्ष इकहत्तर हजार करोड़ रूपया खर्च होने का अनुमान है, इतनी वृद्धि दर तो हमारे देश में महंगाई की भी नहीं रही, जितनी कि चुनावी खर्च की है और इस लोकसभा चुनाव के बाद पूर्व विश्व के प्रजातंत्री देशों में सबसे महंगा चुनाव कराने का सेहरा हमारे देश के सिर पर बंध जाएगा। इससे पहले हुए लोकसभा चुनाव (2014) पर हमने 35,577 करोड़ रूपए खर्च किए थे। अर्थात् इस बार पिछली बार के मुकाबले दुगुने से भी अधिक राशि खर्च होने का अनुमान है। यहां यह उल्लेखनीय है कि 2016 में अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव पर 46,270 करोड़ रूपए खर्च हुए थे, और चुनाव खर्च मंे अब तक वही सिरमौर देश था, और अब भारत अमेरिका से यह खर्चीला ताज छीनने जा रहा है।
……फिर सबसे बड़ा और अहम् तथ्य तो यह है कि यह खर्च तो वह है जो खुले आम कागजों पर दिखाया जाता है, इससे कई गुना अधिक खर्च राजनीतिक दल सब कुछ छुपाकर करते है। अर्थात् यदि यह कहा जाए कि चुनावों में देश के कालाधन का भी उपयोग हो रहा है, तो कतई गलत नहीं होगा, क्योंकि देश के बड़े उद्योगपति व पूंजीपति अरबों में पार्टियों को चंदा जो देते है, जिसका हिसाब कभी भी उजागर नहीं होता, चूंकि ये ही सत्ता के कर्णधार होते है, इस लिये इन्होंने कोई ऐसा सख्त कानून भी नहीं बनाया, जिससे इनकी यह कारगुजारी उजागर हो सके। यहां तक कि सूचना के अधिकार का कानून भी पार्टियों के चुनावी चंदे पर लागू नहीं होता। हमारे प्रजातंत्र की यह भी एक विसंगति है कि देश के पूंजीपति व उद्योगपति राजनीतिक दलों को जितनी राशि चंदे में देते है, सम्बंधित दल के सत्ता में आ जाने के बाद वह दी गई राशि से कई गुना वसूलने का प्रयास भी करते है और राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद चंदा दाताओं का विशेष ध्यान भी रखते है और उन्हें हर तरीके से ‘उपकृत’ करने का प्रयास करते है।
लोकतंत्र के साथ यह भी तो एक विसंगति जुड़ी है कि पांच साल में एक बार ही राजनीति का पहाड़ झुककर आम आदमी के पास आता है, बाकी चार साल तो आम आदमी अपने हाल पर रोता रहता है, उसके आंसू पौछने वाला कोई नहीं होता, किंतु अब समय के साथ देश का आम वोटर भी समझदार, जागरूक और सर्वज्ञाता हो गया है, अब वह समझ गया है कि उसे क्या करना है? और सत्तारूढ़ दल की कौन सी ज्यादती या गलती का उसे दण्ड देना है, शायद इसी लिए इस बार सत्ताधारी दल कुछ डरा सहमा सा नजर आ रहा है।
इसलिए कुल मिलाकर यदि इस बार चुनाव के नतीजे कुछ चमत्कारी हो तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि देश के आम मतदाता की स्मृति भी अब समय के अनुसार तीक्ष्ण हो चुकी है और वह हर बात व घटना को याद रखने लगा है। वह यह भी याद रखने लगा है कि पिछले चुनाव के समय कौन से दल के नेता ने कौनसे वादे किए थे और सत्ता में आने के बाद उनमें से कितने वादों को मूर्तरूप दिया? शायद इसी लिए सत्ताधारी दल चुनाव के समय अपनी विगत को और भविष्य की दुर्गति को लेकर चिंतित व भयभीत रहता है, आज देश में सत्तारूढ़ दल की भी वहीं स्थिति है।
इस तरह कुल मिलाकर अब देश में दैनंदिनी उपयोग की वस्तुओं के साथ चुनाव भी काफी महंगे होते जा रहे है, यदि कोई ऐसा चमत्कार हो, जिससे चुनावों के प्रबंधन और प्रचार पर खर्च होने वाली अपार धन राशि देश के गरीबों के कल्याण व विकास पर खर्च हो तो सोचिए यह भारत की विश्व में कितनी बड़ी और दुनिया के लिए अनुकरणीय मिसाल होगी?

नमो टी वी और आचार संहिता
डॉ. अरविन्द जैन
कृष्ण के मुख में किसी ने माखन लिपटाया, जब उनकी माँ ने उनसे पूछा की तुम्हारे मुख पर माखन किसने लगाया तो कहने लगे मो नहीं माखन खाओ, ग्वाल बाल मोहे मुख पर माखन लिपटाओ। एक मुहल्ले का पहलवान फुर्सत में रहता और चौराहे पर बैठा रहता, हर कोई बच्चे से पूछता बताओ अमेरिका का राष्ट्रपति कौन हैं तो बच्चा बौलता और रहो घर में, बाहर निकला करो ज्ञान बढ़ेगा, ट्रम्प हैं, दूसरे दिन पहलवान ने बालक से पूछा ब्रिटेन का प्रधान मंत्री कौन हैं, बालक चुप तो पहलवान ने बताया मे हैं, तीसरे दिन पहलवान ने बालक से पूछा भारत का राष्ट्रपति कौन हैं, तो लड़के ने नहीं बताया तो पहलवान बोलै कोविंद जी हैं, इस प्रकार बालक रोज रोज की पढाई से तंग आ कर चौथे दिन बालक पूछा ने पूछा पहलवान हीरालाल कौन हैं इस पर पहलवान चुप रहा तब बालक ने कहा रोज बाहर घुमा करो, वह रोज तुम्हारे घर जाता हैं !
इसी प्रकार नमो टी वी इस समय बहुत तेज़ी से चल रही हैं जो मोदी जी का खुला प्रचार कर रही हैं और मोदी जी का कहना हैं की मुझे नहीं मालूम हैं, यह क्या संभव हैं ? क्या मोदी जैसे तानाशाह और एकला चलने वाला व्यक्ति की इच्छा वगैर कोई पत्ता हिल सकता हैं, असंभव पर वह जान भूझ कर झूठ बोलते हैं जो उनके जन्मजात गुण हैं, बिना झूठ बोले उन्हें खाना नहीं पचता, दिन रात उनके गुणों का वर्णन करता हैं टी वी चॅनेल और उन्हें पता नहीं।
मजेदार बात यह हैं की इस टी वी को सूचना प्रसारण मंत्रालय से कोई
स्वीकृति नहीं मिली और न आजतक इस टी वी का मालिक कौन हैं का पता चला ? क्या यह बी जे पी का प्रचार तंत्र हैं। आखिर इतना कुछ हो रहा हैं और प्रधान सेवक अनभिज्ञ कैसे हो सकते हैं ? इसका खरच कौन वहन कर रहा हैं ?क्या इस प्रकार का विज्ञापन और प्रचार आचार संहिता का उल्लंघन नहीं हैं ?क्या इस प्रकार की सुविधा अन्य पार्टी को भी प्रदाय की जाना चाहिए। इस बात को आधार लेकर सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां भी नमो टी वी जैसे समूह में मांग करे। इस पर सूचना प्रसारण मंत्रालय क्या कार्यवाही करता हैं और चुनाव आयोग क्या बंदिश लगाता हैं।
क्या इस टी वी का मालिक कोई नहीं है या बिना मालिक के चल रहा हैं या बिना धन के सर्कार व्यय पर प्रसारण होना चाहिए, यह भी खुले रूप से भ्रष्टाचार के अंतरगत आता हैं। इस पर को कार्यवाही करेगा और किस पर कार्यवाही करेगा। इतना बड़ा छल खुले आम जनता और शासन और प्रशासन के सामने हो रहा हैं और सब मूक बधिर जैसे बैठे हैं, इसका मतलब इसके पीछे कोई बड़ा गिरोह काम कर रहा हैं। जैसा की कहा जाता हैं की यदि कोई चूहा, बिल्ली को आँख दिखाए तो समझो चूहा का बिल नजदीक हैं। इसी प्रकार नमो टी वी पर पार्टी और सत्ता का खुला प्रशय होने से दबंगता के साथ चल रहा हैं और कोई भी कार्यवाही नहीं करने का साहस कर पा रहा हैं।
चुनाव आयोग बिना रीढ़ का हैं वह इतना कमजोर हैं की कोई भी कार्यवाही करने में ढीलापन अख्तियार करता हैं, जैसे होली में आग लगी और सावन में आग बुझाएंगी। न योगी के ऊपर कार्यवाही की न कल्याण सिंह पर कुछ भी नहीं किया। जो स्वयं कार्यवाही करने में सक्षम हैं वह दूसरे की पाली में डालकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर देते हैं।
नमो टी वी भी भ्र्ष्टाचार का खुला खेल हैं और आचारसंहिता का खुला उल्लंघन हैं इस आधार पर नमो का चुनाव रद्द किया जाना चाहिए जिससे अन्यों को भी शिक्षा मिल सकेगी, और अन्य सभी राजनैतिक पार्टियों को भी इस प्रकार के प्रसारण की अनुमति मिलनी चाहिए।

क्या दोबारा भाजपा आने पर बंद हो जाएगी पेंशन ?
जग मोहन ठाकन
किसान कर्जा माफ़ी का नारा देकर वर्ष 2018 में तीन राज्यों –राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में जब से कांग्रेस ने जीत हासिल की है, सभी राजनैतिक पार्टियाँ किसान के कल्याण की घोषणायें करने में एक दूसरी से आगे आने की होड़ में लग गयी हैं।
भाजपा ने अपने इस पारी के अंतिम बजट में घोषणा की कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना के तहत पांच एकड़ तक के सभी छोटे और सीमान्त किसानों को प्रतिवर्ष छह हज़ार रूपए दिए जायेंगे।
बाद में राहुल गाँधी के पांच करोड़ गरीब परिवारों को न्यूनतम आय योजना के तहत प्रति परिवार प्रतिवर्ष 72000/ रूपए देने की घोषणा ने बीजेपी के गरीब परिवारों के वोट बैंक में सेंध लगाने के प्रयास को विफल कर दिया और भाजपा द्वारा गरीबों के वोट खींचने की आस पर पानी फेर दिया।
कांग्रेस के इस तीर को काटने के लिए भाजपा ने अपने ताज़ा जारी संकल्प पत्र में एक और तीर चलाया कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना के तहत बिना भू सीमा के सभी किसानों को 6 हजार रुपये का लाभ मिलेगा।
केवल छोटे किसानों को ही मदद देने से छोटे किसान तो भाजपा से जुड़ेंगें या ना जुड़ेंगें यह तो वक्त बताएगा, परन्तु सभी किसानों को इस योजना के दायरे में न लेने से बड़े किसान अवश्य भाजपा से नाराज हो गए थे।
अब संकल्प पत्र में सभी किसानों को जोड़ने की घोषणा से भाजपा ने अपने विश्वसनीय वोट बैंक रहे बड़े किसानों को पुनः अपने से बांधे रखने का प्रयास किया है। परन्तु क्या तर्क ले रही है भाजपा अपने इस अचानक तब्दीली बारे ?
केंद्र में रेलवे एवं कोयला मंत्री, पियूष गोयल, जिन्होंने भाजपा की इस पारी का अंतिम बजट भी पेश किया था, ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में, जो 10 अप्रैल 2019 के अंक में प्रकाशित हुआ है, तर्क दिया है कि – “हमारे संज्ञान में एक जेन्युइन मामला आया कि देश के कई क्षेत्रों में बड़े किसान भी अतिवर्षा, सुखा या बाढ़ की मार से पीड़ित होते रहे हैं। बुन्देलखण्ड की भांति कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ किसान सूखे से प्रभावित हैं। सभी किसानों ने, चाहे वे छोटे हैं या बड़े, सामूहिक रूप से देश को खाद्यान्न तथा अन्य फसलों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया है। इसलिए हमने सोचा कि सभी किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना के तहत कवर किया जाए। ”
फिर पांच एकड़ से अधिक वाले किसान बुढापा पेंशन से वंचित क्यों ?
भाजपा द्वारा जारी संकल्प पत्र में भाजपा ने घोषणा की है कि सभी छोटे और सीमांत किसानों को 60 साल के बाद पेंशन की सुविधा देंगे। हम देश में सभी सीमांत और छोटे किसानों के लिए पेंशन की योजना आरंभ करेंगे ताकि 60 वर्ष के बाद भी उनकी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
यदि भाजपा के संकल्प पत्र को ही भाजपा की आगामी योजनाओं का संकेत माना जाये तो भाजपा तो केवल 60 वर्ष से अधिक आयु के केवल सीमांत और छोटे किसानों को ही बुढापा पेंशन देगी।
जब भाजपा के केन्द्रीय मंत्री पियूष गोयल प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना में बड़े किसानों को शामिल करने हेतु तर्क देते हैं कि छोटे या बड़े – सभी किसान अतिवर्षा, सुखा या बाढ़ 0की मार से पीड़ित होते हैं और सभी किसानों ने सामूहिक रूप से देश को खाद्यान्न तथा अन्य फसलों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया है, तो फिर किसानों को पेंशन देने में पांच एकड़ की सीमा क्यों लगाई जा रही है ?
क्यों नहीं पांच एकड़ से ऊपर वाले सभी किसानों को भी उनके देश की तरक्की में योगदान को देखते हुए बुढ़ापा पेंशन दी जाए ?
हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं देश के उप प्रधानमंत्री दिवंगत चौधरी देवीलाल द्वारा हरियाणा में 1987 में शुरू की गयी 60 वर्ष से अधिक आयु वाले, न केवल किसान अपितु हरियाणा के हर नागरिक को बिना किसी व्यवसाय का भेदभाव किये अभी भी दी जा रही दो हज़ार रुपये प्रति माह सम्मान पेंशन की तर्ज पर देश के हर नागरिक को सम्मान पेंशन क्यों नहीं ?
अब प्रश्न उठता है कि क्या सारे देश में समान सिविल कोड लागु करने की हिमायती भाजपा अपने संकल्प पत्र को सारे देश में समान रूप से लागु करेगी ?
यदि हाँ, तो क्या भाजपा सारे देश में समरूपता लाते हुए केवल पांच एकड़ तक वाले किसानों को ही साठ वर्ष से अधिक आयु होने पर पेंशन देगी ? तो क्या हरियाणा में, जहाँ प्रदेश में भी भाजपा की सरकार है, और जहाँ सभी किसान, बिना किसी भूमि सीमा रेखा के, बुढापा पेंशन ले रहे हैं, वहां भी केवल छोटे और सीमान्त यानि पांच एकड़ तक के किसानों को ही पेंशन मिलेगी ? तो क्या लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा में पांच एकड़ से अधिक वाले किसानो की बुढ़ापा पेंशन बंद कर दी जायेगी ? क्या भाजपा इतना कठोर कदम उठा पायेगी ? क्या भाजपा पहले से पीड़ित किसानों के आक्रोश को झेल पायेगी ? इन सवालों के उत्तर भाजपा पहले दे चुकी है। वर्ष 2004 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने कर्मचारी यूनियनों के आक्रोश की परवाह किये बिना मिलिटरी कर्मियों को छोड़कर पैरामिलिटरी फोर्सेज समेत सभी केन्द्रीय एवं राज्य कर्मचारियों की पेंशन बंद कर दी थी, जिसका खामियाजा कर्मचारी आज तक भुगत रहे हैं और बार बार पुरानी पेंशन बहाली की मांग उठाते रहते हैं, परन्तु हाथी की चाल से मस्ती में चल रही भाजपा इसकी कोई परवाह नहीं कर रही है। और चले भी क्यों नहीं ? हमारे देश का वोटर मुद्दों को नहीं देखता, बल्कि जुमलों से प्रभावित होकर वोट देता है या जातिगत व धार्मिक आधार पर निर्णय कर भेडचाल में इ वी एम मशीन का बटन दबाता है, और इसी बटन के साथ ही दबा देता है अपना, देश का और प्रगति का गला। और फिर पांच साल तक मिमियाता रहता है बकरे की तरह अपनी ही कुर्बानी के इंतज़ार में, मात्र उस हरे घास की आस में जो वास्तविक नहीं है, अपितु आभासी है और सपने पाल पाल कर केवल हरी हो चुकी उसकी आँखों को हरी घास दिखाई देती है या दिखाई जाती है।

दो सीटों से क्यों लड़ रहे हैं राहुल गांधी
अजित वर्मा
राहुल गांधी इस बार दो लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं। वे अपनी परम्परागत सीट अमेठी के साथ ही दक्षिणी राज्य केरल के वायनाड लोकसभा क्षेत्र से च़ुनाव लड़ने जा रहे हैं। राहुल ने वायनाड से नामांकन पत्र भर दिया है, अब वे अमेठी से भी नामांकन भरेंगे। दो सीटों से चुनाव लड़ने को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी जारी है। अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ दूसरी बार चुनाव मैदान में उतरने जा रहीं भाजपा केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने राहुल पर निशाना साधते हुए कहा कि यह अमेठी की जनता का अपमान और उनके साथ धोखा है।
राहुल के दो सीटों पर चुनाव लड़ने का एक कारण यह भी बताया जा रहा है कि पिछले 2014 के चुनाव में अमेठी में राहुल का जीत का अंतर घटकर 1 लाख वोट रह गया था इसलिये हार के डर से राहुल गांधी दो सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं।
राहुल गांधी की दादी श्रीमती इंदिरा गांधी भी एक बार यूपी की रायबरेली की सीट के अलावा कर्नाटक की चिकमंगलूर सीट से तथा राहुल की मां श्रीमती सोनिया गांधी भी रायबरेली के साथ ही कर्नाटक के बेल्लारी सीट से चुनाव लड़ चुकी हैं। दोनों ने ही दोनों सीटों से जीत भी हासिल की थी। अब राहुल गांधी ने भी अपनी दादी और मां की तरह पहली बार दक्षिण का रुख किया है। राहुल ने वायनाड से नामांकन भरने के बाद यह कहा कि वो इस बार उत्तर के अलावा दक्षिण से भी चुनाव लड़ने जा रहे हैं क्योंकि दक्षिण की संस्कृति और समस्याएं भी अलग तरह की हैं और वे इन पर ध्यान देना चाहते हैं।
दक्षिणी राज्य हमेशा- कांग्रेस के संकट में साथ निभाते रहे हैं। 1977 में आपातकाल के बाद जब लोकसभा के चुनाव हुए थे तब भी दक्षिण ने श्रीमती इंदिरा गांधी को 145 सीटें दी थीं। पिछले चुनाव में कांग्रेस को पूरे देश से जो 44 सीटें मिलीं थीं उनमें से 17 सीटें कांग्रेस को केरल और कर्नाटक ने दी थीं। इससे साबित होता है कि दक्षिणी राज्य कांग्रेस के संकट के साथी हैं। राहुल गांधी ने भी इस बार दक्षिणी राज्यों पर ध्यान केन्द्रित किया है। पहले उनका नाम कर्नाटक से चुनाव लड़ने के लिये चर्चाओं में आया था लेकिन वे केरल के वायनाड से चुनाव लड़ने जा रहे हैं। वायनाड ऐसा क्षेत्र है जो कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमा पर है। इस तरह राहुल गांधी केरल के साथ ही कर्नाटक और तमिलनाडु पर भी ध्यान केन्द्रित कर पायेंगे।
केरल अब वामपंथियों की सत्ता का आखरी राज्य बचा है। इसलिये इस राज्य में राहुल गांधी के धमक जाने से वामपंथी दल बौखला गए हैं। कामरेड प्रकाश कारंत कहते हैं कि हम राहुल गांधी को हरायेंगे। राहुल गांधी कहते हैं कि वो साम्यवादियों के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे। साम्यवादियों को खतरा हो चला है कि राहुल के बहाने कांग्रेस केरल में पैर पसार लेगी। केरल में हाथ और हसियां के बीच कड़ा मुकाबला होने की स्थिति बन गयी है।
राहुल गांधी के दक्षिण में दस्तक देने से कांग्रेस की संभावनाएं बढ़ने की उम्मीद तो की जा रही है लेकिन राहुल की बदौलत दक्षिण में कांग्रेस को कितना फायदा होगा ये तो चुनावी नतीजों से पता चल सकेगा। यह भी पता चल पायेगा कि राहुल गांधी दोनों सीटों से जीतते हैं या नहीं।

अब मुकाबला ‘ढकोसला’ और ‘झाँसा’ के बीच……?
ओमप्रकाश मेहता
लोकसभा चुनावी महासंग्राम के पहले दौर के महज चार दिन पहले देश पर राज कर रही भारतीय जनता पार्टी ने अपनी ‘वादा पुस्तिका’ या घोषणा-पत्र जारी किया, जिसे ‘संकल्प-पत्र’ नाम दिया। इसके करीब पांच दिन पूर्व इस महासंग्राम के प्रतिपक्षी महानायक कांग्रेस ने अपना इसी तरह का दस्तावेज जारी किया। भाजपा के इस घोषणा-पत्र को जहां कांग्रेस ने ‘झाँसा-पत्र’ नाम दिया, वहीं भाजपा ने कांग्रेस के घोषणा-पत्र को ‘ढकोसला-पत्र’ नाम दिया, इस प्रकार इस बार यह महासंग्राम ‘झाँसा’ और ‘ढकोसला’ के बीच होगा और इस स्पद्र्धा में जो आम वोटर सबसे अधिक प्रलोभित कर लेगा, वही इस संग्राम का ‘मीर’ होकर इस देश पर राज करेगा, फिलहाल दोनों ही इस हेतु पूरी तरह तैयारी में जुटे है।
सत्तारूढ़ और मुख्य प्रतिपक्षी दलों के इन घोषणा पत्रों में अंतर सिर्फ इतना है कि प्रतिपक्षी दल कांग्रेस ने देश के बीस करोड़ गरीबों को 72 हजार रूपए प्रतिवर्ष देने के ‘न्याय’ से नामित योजना से सत्ता प्राप्त करने की उम्मीद जताई है, वहीं सत्तारूढ़ प्रतिपक्षी दल भारतीय जनता पाटी ने घोषणा पत्र की परम्परागत परम्परा को निभाने की भूमिका निभाई, ऐसा इसलिए लगा क्योंकि भाजपा के घोषणा पत्र में कोई विशेष नया मुद्दा नहीं है, वहीं राम मंदिर निर्माण, कश्मीर से धारा 370 व 35ए हटाने और वो ही वादे है जो 2014 के घोषणा पत्र में शामिल थे और जिनकी पांच साल तक कोई चिंता नहीं की गई, फिर भी बहात्तर हजार के मुकाबले छः हजार रूपए वार्षिक गरीबों को देने की बात अवश्य की गई। बेरोजगारी बेहाल किसानों और अन्य ज्वलंत मुद्दों पर वही घीसा-पीटा राग अलापा गया है। भाजपा ने इस बार वादा संस्कृति से ऊपर उठ देश या राष्ट्र के नाम पर चुनाव लड़ने का फैसला किया औश्र सैना व वैज्ञानिकों के शौर्यों को अपने खाते में डालकर उनके नाम पर वोट मांगने का फैसला लिया। इस तरह यदि यह कहा जाए कि भाजपा ने उनके बारे में 93 वादे किए और राष्ट्र धर्म को सबसे ऊपर रख घोषणा पत्र की औपचारिकता निभाई वहीं कांग्रेस ने 52 विषयों का चयन कर बड़े उत्साह के साथ 487 वादे किए और रोजगार को सबसे ज्यादा अहमियत दी।
यदि हम देश के अहम् मुद्दों को दोनों घोषणा पत्रों के आईने में देखें तो हम पाते है कि हमारे देश के अन्नदाता किसान के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अगले दो सालों में किसानों की आय दुगुनी करने का पुराना राग अलापा है और एक लाख तक का कर्ज पांच साल तक ब्याज मुक्त रखने का जिक्र किया है वही 25 लाख करोड़ ग्रामीण विकास पर खर्च करने की बात कहीं है साथ ही साठ वर्ष से अधिक उम्र के किसानों को पेंशन देने की भी बात कहीं है, वहीं कांग्रेस ने किसानों के लिए अलग बजट का प्रावधान करने, कर्ज नहीं पटा पाने के अपराध को ‘आपराधिक’ दायरें से निकालकर ‘सिविल’ के पाले में डालने तथा मनरेगा के कार्य दिवसों की सीमा एक से बढ़ाकर डेढ़ सौ करने की बात कही है। इसी तरह गरीबों के लिए भाजपा ने गैस सिलेण्डर का वादा दोहराया है तथा प्रत्येक परिवार को पक्का मकान देने व बिजली, पानी, शौचालय की सुविधा मुहय्या कराने की बात कहीं है, वहीं कांग्रेस ने ‘न्याय’ (न्यूनतम आय योजना) के माध्यम से प्रतिवर्ष हर गरीब परिवार को बहात्तर हजार रूपए देने की घोषणा की, अर्थात् हर गरीब परिवार को पांच साल में तीन लाख साठ हजार रूपया मिल सकेगा। इसी घोषणा से भाजपा से घबराहट महसूस की जा रही है।
अब जहां तक रोजगार का सवाल है भाजपा ने कहा है कि देश की अर्थ व्यवस्था से जुड़े बाईस बड़े क्षेत्रों मंे रोजगार के नए अवसर पैदा करने के लिए ज्यादा से ज्यादा मद्द दी जाएगी, साथ ही प्रधान मंत्री मुद्रा योजना के तहत सभी सत्रह करोड़ से ज्यादा उद्यमियों को कर्ज मुहैय्या कराया जा चुका है, उल्लेखनीय है कि भाजपा ने 2014 के चुनावी घोषणा पत्र में प्रतिवर्ष दो करोड़ बेरोजगारों को रोजगार मुहैय्या कराने की बात कही थी। कांग्रेस ने 2020 तक 22 लाख सरकारी रोजगार उपलब्ध कराने की बात कही है, इसके साथ ही दस लाख युवाओं को देश की ग्राम पंचायतों में नौकरी दिलाने का भी वादा किया है, देश के युवा बेरोजगारों को यह भी कहा गया है कि कांग्रेस की सरकार बनने पर तीन साल तक युवाओं को कोई भी नया रोजगार प्रारंभ करने के लिए सरकार से अनुमति लेने की जरूरत नही पड़ेगी।
इस प्रकार भाजपा-कांग्रेस दोनों ने ही अपने घोषणा-पत्रों के माध्यम से देश के आम वोटर को लुभाने की भरपूर कौशिश की है। किंतु ऐसा माना है कि ‘‘ये पब्लिक है, जो सब जानती है’’।

गांधी के नाम भूल जाने पर चलो कबीरदास को तो याद रखा…!
नईम कुरेशी
म.प्र. में कांग्रेस ने समझदारी से इस बार टिकिटों का बँटवारा करके अपने सियासी दांव में बढ़त जरूर बना ली है। जहां देवास से संत कबीर वाणी के प्रचार प्रसार करने वाले लोकगायक प्रहलाद टिपानिया को आगे लाकर उनकी लोकप्रियता को सलाम किया है। कांग्रेस वैसे तो अपने गांधीवादी दर्शन से काफी पहले हट चुकी थी। उसके यहां प्लेन हायजैक करने वाले गोपाल पाण्डे, कमलापति त्रिपाठियों, नारायणदत्त तिवारियों का उत्तर प्रदेश में सत्ता की चाबियाँ रही थीं वहीं बिहार में तमाम मिश्राओं के हाथों में सत्ता थी। नतीजे में उत्तर प्रदेश में कांग्रेसियों से सत्ता मुलायम व उनक परिजनों ने सत्ता छीन कर कांग्रेस को बैसाखियों पर पिछले 30 सालों से ला दिया, राजीव गांधी को उनका भोलापन खा गया। कांग्रेसियों ने संजय गांधी उनके चमचों में अकबर अहमद जैसे नये अवतारों को जन्म दिया जो उनके ताबूत में कीलें ठोकते रहे। बंसीलाल से लेकर मध्य प्रदेश के श्यामा व विद्याचरण शुक्ल की मंडली भी संजय के साथ मिलकर मलाई काटती रही।
भला हो अर्जुन सिंह, माधवराव सिंधिया का जिन्होंने 82-84 में शुक्ल बंधुओं से कांग्रेसी सत्ता का जहाज छीन लिये वरना मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस उत्तर प्रदेश की तरह लंगड़ी लूली बनकर रह जाती। कांग्रेस ने न सिर्फ अपने गांधीवादी विचारों के छिन जाने का कभी गुमान भी नहीं रहा बस सत्ता और सिर्फ सत्ता चाहे वो सामंतों, राजपूतों से मिले या फिर विचार व सिद्धांतों को बेचकर फिर भी मध्य प्रदेश में अभी भी काफी कुछ बचा है। उत्तर प्रदेश व बिहार में तो सब कुछ वो लुटवा चुकी है। दलित, पिछड़े, अति पिछड़े व अल्पसंख्यक मुसलमानों को कांग्रेसियों ने अक्सर अपना वोट बैंक समझा। उन्हें आर.एस.एस. का डर दिखाकर उनसे वोट लेते रहे पर विकास की गंगा से उन्हें अक्सर दूर भगाते रहे। कांग्रेस के ज्यादातर दलित नेता ऐसे दिये जो शराब और शवाब में मस्त रहे। बस गांधी नेहरू परिवार उन्हें वोट दिलाता रहा। उस दौर में 70-80 के दशकों में मेरठ, संभल, अलीगढ़ से लेकर इतने दंगे कराये गये संघ परिवार व कांग्रेसियों की उन पर कई बड़े ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। कांग्रेसी नेता अपनी सत्ता के दौर में संघ परिवार को भी पालते पोसते रहे। वो तो कुछ वामपंथी लोग उनके साथ लगे रहे थे 1980-90 के दशकों में उन्होंने कांग्रेसियों को बीच बीच में रोका टोका वरना मध्य प्रदेश भी उत्तर प्रदेश की तरह तथाकथित समाजवादियों की जेबों में चला जाता। 1960-70 के दशक में ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे डी.पी. मिश्रा के घमण्ड व अत्याचारों के खिलाफ जन आंदोलन छेड़ कर उन्हें धराशाही कर जनसंघ को खड़ा करने में अहम रोल अदा किया और अटल बिहारी वाजपेयी व नारायण कृष्ण शेजवलकर, माधवशंकर इन्दापुरकर आदि संघ के नेताओं को ग्वालियर राजपरिवार के कारण लोकप्रियता मिली। शेजवलकर जी ने मध्य प्रदेश में जनसंघ का झंडा ऊँचा कर समाजवादियों व कांग्रेसियों की अवसरवादिता पर काफी लगाम लगाई।
भोपाल के शाकिर अलि खॉन व ग्वालियर से रामचन्द्र सर्वटे, बालकृष्ण शर्मा आदि ने एक दो दशक तक खूब गरीबों मजदूरों व किसानों को मजबूत मंच दिये जो 70 से 90 तक ही चल पाये। उन्हें भी कांग्रेसियों ने संघ के साथ मिलकर धराशाही कर दिया। अर्जुन सिंह के शागिर्द रहे दिग्विजय सिंह ने जरूर अपनी सत्ता के 10 सालों में कभी-कभी दलितों पिछड़ों व मुसलमानों का साथ दिया व कांग्रेस की इज्जत बचाते रहे वरना मोतीलाल बोरा रीवा के श्री निवास तिवारी आदि ने कांग्रेस को एक बार फिर से डुबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसी बीच छत्तीसगढ़ से एक फर्जी आदिवासी सामंत का जन्म भी हो गया जिसे अर्जुन सिंह साहब नेकरशाही से लेकर आये थे अजीत जोगी, उसने भी कांग्रेस को डुबाने में उत्तर प्रदेश के तिवारी, त्रिपाठियों, मिश्रा, दीक्षितों की तरह काम किया। इस बीच माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस के लिये काफी कुछ किया। संघ परिवार के एक बड़े नायक रहे अटल बिहारी वाजपेयी को 84 में लोकसभा में लाखों वोटों से धराशाही कर डाला।
अच्छी बात ये है कि भले ही कांग्रेसी गांधीवाद गांधी दर्शन को जरूर भूल चुकी है पर देवास से कबीर साहब के विचारों के गायक टिपानिया को याद करके उन्हें प्रत्याशी बनाकर अपने कुछ पाप जरूर धोलेगी। आर.एन. बेरबा की बेटी किरन सिंह का चुनाव भी काफी बेहतर है वरना कांग्रेस अभी ऐसे-ऐसे नेताओं के भरासे है जो कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं फिर भी उन्हें जिलों में पार्टी की कमान सौंपना पड़ रही है क्योंकि विचारों और समाजसेवियों में उसकी पैठ खत्म जो हो चुकी है। जमीन माफिया, शराब कारोबारी, अवसरवादी ही अब उसके पास रह गये हैं।
बेलगाम युवा नौकरशाह
कांग्रेसी दौर में जहां नौकरशाहों को सामंती अंदाज में जीने व उनकी शैली में परिवर्तन करने पर मजबूर होना पड़ा था वरना 80-90 के दौर में तो कलेक्टर व कमिश्नरों से मिल पाना अकबर बादशाह से मुलाकात जैसा रहा था। मुरैना व ग्वालियर में कलेक्टर रहे खन्ना को देखने का मौका मिला। उनकी पत्नी को ए.डी.एम. जैसे लोग शॉपिंग कराते देखे जाते थे। इन सब पर अर्जुन सिंह के चाबुक से ये लोग कुछ संवेदनशील होने को मजबूर हुये थे। शिवराज मामा व उमा भारती के दौर में भी नौकरशाही जवाबदेह नहीं थी। उन्हें मामा ने क्षेत्रीय छत्रयों की सेवा में दे रखा था। हमने अपने 45 सालों के अनुभवों में 2007-8 बैच के अनय द्विवेदी व अजय गुप्ता जैसे उद्दंड व घमण्डी युवा नौकरशाह भी देखे जो क्षेत्रीय सांसद से घरोबा बनाकर न सिर्फ जन प्रतिनिधियों व समाजसेवियों से फोन पर बात करने में परहेज करते थे बल्कि जनता के हित का कोई काम उन्हें कराने में भा.ज.पा. वालों को ही पसीना आता था। राहुल नाम के एक कलेक्टर ने तो पिछले साल ही उच्च न्यायालय व सारे कायदे कानूनों को मुंह चिड़ाकर जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलपति के निवास के सामने अपने समाज की मूर्तियों का बीस फीट ऊँचा शिलालेख लगवाने व ग्वालियर फोर्ट जैसे महत्वपूर्ण विश्वप्रसिद्ध स्मारक के मैन गेट पर भी अतिक्रमण कराने की हिमाकत कर डाली। कोई सत्ताधारी जनप्रतिनिधि या प्रेस रिपोर्ट इस पर नहीं बनायी जा सकी। कांग्रेस के दौर में ये जरूर है कि अतिपिछड़ों व दलितों की भी कभी-कभी पूछ परख हो जाती है। काश कोई ज्योति बसु, प्रकाशचन्द्र सेठी व अर्जुन सिंह जैसे लोग और होते।

संवेदनशील क्षेत्रों में घुसपैठ का रोना
अजित वर्मा
पुलवामा धमाके के बाद चले तेज घटनाक्रम के बाद तनाव कुछ कम होता भले दिख रहा है, लेकिन खुफिया एजेंसियें के हवाले से खबरें आ रही हैं कि आतंकवादी समूह भारत में सैनिकों और सैन्य प्रतिष्ठानों को फिर निशाना बना सकते हैं। इसीलिए सेना को आतंकवादी समूहों की घुसपैठ की आशंका के कारण हाईअलर्ट पर रखा गया है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में सीमा पर आबादी वाले इलाके में काफी संख्या में आतंकवादी मौजूद हैं और आशंका यह है कि भारत में घुसपैठ करके ऐसे हमले करने के लिए उनका इस्तेमाल किया जा सकता है।
जम्मू क्षेत्र में पुंछ से लेकर उत्तर कश्मीर में कुपवाड़ा तक 740 किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा पर गतिविधियों पर नजर रख रहे अधिकारियों को आशंका है कि हालिया तनाव के दौरान भारी नुकसान झेल चुका पाकिस्तान भारतीय सीमा में आतंकवादियों के जरिये अपनी पुरानी शूट एंड स्कूट (हमला करो और भागो) युद्ध तकनीक का इस्तेमाल कर सकता है। पहले भी आतंकवादी समूहों ने ऐसी घुसपैठ की है, जिसमें या तो हमारे कुछ जवान मारे गए या सैन्य प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचा।
कई बार वे भारतीय सीमा पर कुछ सौ मीटर तक ही घुसते हैं, गश्ती दल पर हमला करते हैं और वापस भाग जाते हैं। पाकिस्तानी सेना भारतीय चौकियों पर गोलीबारी कर उन्हें सुरक्षा कवच मुहैया कराती हैं। पूर्व में जम्मू क्षेत्र के कठुआ, पुंछ और राजौरी सेक्टरों के साथ-साथ कश्मीर क्षेत्र में कुपवाड़ा, उरी और गुरेज में इस तरह की घुसपैठ देखी जा चुकी है। इसमें घुसपैठिये नियंत्रण रेखा पार करने के बाद जो भी पहला सैन्य प्रतिष्ठान या सैनिक दिखाई देता है, उस पर हमला करते हैं। इसके साथ ही विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल कर नजदीक से जवानों को निशाना बनाने की घटनाएं भी देखी गई हैं। इनमें चाकू से हमला या भारतीय सेना के गश्ती दल के रास्तों पर आइईडी लगाना भी शामिल है।
हम यह बातें दशकों से सुनते आ रहे हैं और यह भी घुसपैठ रोकने के लिए उपाय किये गये हैं, तो हमारे मन में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है जब हमारा देश अंतरिक्ष के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो चुका है तो हम अपनी सीमा, विशेषत: संवेदनशील सीमा की सूक्ष्म निगरानी अंतरिक्ष में उपग्रह स्थापित करके क्यों नहीं कर सकते? दूसरे, पूरी दुनिया जानती है कि अंतरिक्ष में हमारे उपग्रह स्थापित हैं, तो क्या वे ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं हैं? हम चन्द्रयान पर पहुँच गये। मंगल की ओर हमारा यान अग्रसर है तो आखिर पाकिस्तान और चीन के साथ अपनी सीमा की उपग्रहीय निगरानी में हमारे सामने क्या बाधा है? कौन रोक रहा है हमें? यह बात हम बहुत उच्चस्वरों में 1999 के कारगिल युद्ध के समय से लिख रहे हैं। उपग्रह स्थापित करने की खबरें आयी भी थीं। पर अब क्या स्थिति है? सरकार और सेना को इस विषय में स्वत: चिंतन करना चाहिए और देश को आश्वस्ति भी देना चाहिए।

मोदी सरकार पर विश्वसनीयता का संकट
सनत जैन
सुप्रीम कोर्ट ने राफेल मामले में जो फैसला दिया है, उससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर विश्वसनीयता का संकट खड़ा हो गया है। लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण के मतदान के पूर्व सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर भारत सहित अन्य देशों में भी होगा। 2014 में नरेंद्र मोदी की छवि आम जनता के बीच एक ऐसे नेता के रूप में बनी थी, जो बेहद ईमानदार है। भ्रष्टाचार और कालेधन को भारत से समाप्त कर देगा। उसके नेतृत्व में देश में कानून व्यवस्था का राज होगा। सबका साथ और सबका विकास होगा और अच्छे दिन आएंगे।
विदेशों से जो काला धन भारत ने वापस आएगा, उससे आम लोगों के खाते में पैसे आएंगे। आम जनता ने उन्हें हीरो के रूप में स्वीकार कर यह माना था कि मोदी राज में कांग्रेस जो 60 वर्षों में नहीं कर पाई, वह मोदी 60 माह में कर दिखाएंगे। मोदी ने अपनी सभाओं में एक आम जनता से स्पष्ट बहुमत की मांग की थी। भारत की जनता ने 30 वर्ष बाद केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार देकर मोदी अर्थात अपने हीरो की कथनी और करनी में विश्वास किया था।
2014 में केंद्र में पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार बनी। राज्य के चुनाव में भी मोदी का जादू चला। अधिकांश राज्यों में भाजपा की सरकारें बनी। दिल्ली एवं बिहार का विधानसभा चुनाव जरूर मोदी की इच्छा के विपरीत गए। मोदी का दिग्विजय रथ दिल्ली और बिहार ने रोका था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सलाहकार अमित शाह का जादू जनता के साथ चढ़कर बोल रहा था। जम्मू- कश्मीर में भी भाजपा पीडीपी के साथ सरकार बनाने में सफल रहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की। भारत में पहली बार महिलाएं अपने पति और बच्चों की नजरों में अपमानित हुई। उनकी कई वर्षों की बचत जो उन्होंने अपने कठिन समय पर पति और बच्चों से छुपाकर एकत्रित की थी वह बैंकों में जमा करनी पड़ी। शादी विवाह और बीमारी की हालत में उन्हें बाकी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी आम जनता ने अपने हीरो मोदी को समर्थन दिया। नोटबंदी के समय भी कहा गया कि 60 दिनों में सारा काला धन बैंकों में जमा हो जाएगा। इसका फायदा गरीबों को मिलेगा। लोगों को लगा कि जनधन खाते में नोटबंदी के बाद जो काला धन बैंकों में जमा होगा उसे गरीबों में बांटा जाएगा। उत्तर प्रदेश की विधानसभा चुनावों में लोगों ने भाजपा के पक्ष में मतदान करके भारी बहुमत के साथ भाजपा की सरकार उत्तर प्रदेश में बनवा दी।
नोटबंदी के बाद मीटर उल्टा घूमना शुरू हो गया। सारा धन बैंक में वापस आया। 15 लाख को जुमला बता दिया गया। 60 दिन का सपना भी जुमला बन कर रह गया। स्पष्ट बहुमत होने के बाद भी राम मंदिर नहीं बना। जम्मू कश्मीर में भाजपा की गठबंधन सरकार बनने के बाद 35 ए एवं धारा 370 समाप्त नहीं हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व एवं गठबंधन सरकार होते हुए भी सबसे ज्यादा सैनिक जम्मू कश्मीर में शहीद हुए। पाकिस्तान में सीमा का उल्लंघन करते हुए सबसे ज्यादा हमले पिछले 3 वर्षों में किए। सैकड़ों कश्मीर नागरिक आतंकी मुठभेड़ में मारे गए। गौ मांस का निर्यात मोदी राज में सबसे ज्यादा बढ़ा। 2 करोड़ लोगों को रोजगार देने का वादा किया था किंतु रोजगार नहीं मिला। उल्टा नोटबंदी के बाद बेरोजगारी ने पिछले 45 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया। किसानों की आत्महत्या बढ़ गई और महिलाओं एवं दलितों पर अत्याचार बढ़े हैं। मॉब लिंचिंग की घटनाएं बढ़ी है। जीएसटी के माध्यम से आम लोगों पर टैक्स बढ़ाया गया। पेट्रोल डीजल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में कम होने के बावजूद महंगे दामों पर बेचा गया। गरीब और गरीब हुआ अरबपति और खरबपति का धन पिछले 5 वर्षों में तेजी के साथ बड़ा है।
पिछले कई माह से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राफेल मामलों में चौकीदार चोर है के नारे लगवा रहे हैं। राफेल मामले में सरकार कह रही है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सरकार को क्लीन चिट दे दी है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की थी। इसमें कहा गया था कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को गलत जानकारी दी थी। सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं और सरकार का पक्ष सुना। उसके बाद सरकार की दलील खारिज करते हुए राफेल मामले की खुली सुनवाई करने की मांग स्वीकार कर ली है। लोकसभा चुनाव का प्रचार शुरू है। 2013- 14 में मोदी के पक्ष में एक लहर चल रही थी। लहर अब देखने को नहीं मिल रही है। 5 साल की मोदी राज में जनता की अपेक्षाएं और जो बातें मोदी ने 2014 में किए थे उसका मंथन जनता कर रही है। नरेंद्र मोदी के ऊपर 5 वर्ष पूर्व किए गए वादों के अनुसार यदि काम हुआ है तो जनता उन पर विश्वास करती किंतु जिस तरह की स्थिति देखने को मिल रही है उससे स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी और भाजपा को लेकर आम जनता के मन में विश्वसनीयता पर संकट है। सुप्रीम कोर्ट के आए फैसले से यह संकट और बढ़ गया है। लोकसभा चुनाव में इसका असर जरूर होगा।

यूरोप-ओशिनिया देशों के बीच व्यापारिक संबंध
अजित वर्मा
भारत में यूरोपीय और ओशिनिया देश प्रमुख व्यापारिक साझेदार होने के साथ ही निवेश के प्रमुख स्रोत भी हैं। इन देशों में व्यापार की प्रचुर संभावनाए मौजूद हैं जिनका लाभ उठाया जा सकता है। इन देशों के साथ भारत ने हाल के दिनों में आर्थिक संबंधों को अगले स्तर तक ले जाने के प्रयासों के तहत कुछ व्यापारिक समझौते किए गए हैं। इन प्रयासों को तार्किक निष्कर्ष पर ले जाने की आवश्यकता है। वाणिज्य सचिव डॉ.अनूप वधावन ने नई दिल्ली में यूरोपीय और ओशिनिया देशों के राजदूतों और उच्चायुक्तों के साथ व्यापार और आर्थिक सहयोग पर वार्ता भी की है। ओशिनियाई देश प्रशांत महासागर और उसके आसपास के क्षेत्र के द्वीपीय देश हैं जिन्हें उनकी भौगोलिक समानता के कारण ओशिनियाई देशों के रूप में जाना जाता है। विकासशील और विकसित देशों के साथ होने वाली व्यापार वार्ताओं की तरह ही यूरोपीय और ओशिनियाई देशों के साथ भी लंबे समय से ऐसी वार्ताएं की जा रही हैं।
भारत एक विकासशील देश है जबकि यूरोपीय संघ और ओशिनिया देश मुख्य रूप से विकसित हैं और इस वजह से हमारी महत्वाकांक्षाएं, आकांक्षाएं और संवेदनाएं कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में इन देशों के साथ मेल नहीं खाती हैं। यह आशा व्यक्त की जा रही है कि भारत, यूरोपीय संघ और ओशिनिया देश इन मुद्दों को सुलझाने में सक्षम होंगे और निकट भविष्य में आपासी समझ विकसित कर किसी प्रकार के औपचारिक समझौते तक पहुंच पाएंगे।
भारत,यूरोपीय संघ और ओशिनिया में उपलब्ध अवसरों को समझने के लिए सरकार, निर्यात, व्यापार और निवेश से संबंधित संस्थानों, निर्यातकों और व्यवसायों आदि के हर स्तर पर संपर्क बनाए रखना जरूरी है। एक-दूसरे की बाध्यताओं को समझते हुए सभी पक्षों की रजामंदी से बीच का रास्ता निकालने की भी आज सबसे बड़ी आश्यकता समझी जा रही है।

विश्व का पहला संगीत विद्यालय दतिया में…
नईम कुरेशी
यहां ब्रम्हाजी के 4 मानस पुत्रों सनत कुमारों ने जिन्हें सनक, सनन्दन, सनातन और सनत कुमारों ने घोर तप किया था व 4 गहरे कुँए भी खोदे थे जिनमें जल न निकलने पर सिन्धु नदी जो विदिशा के सिरोंज से निकलती है उसे आवाहन करना लिखा गया है।
– सिन्धु नाम्नी नदी चन्द्रे पुरे चोतर वाहिनी।
नदी उत्तर की ओर जा रही थी। ऋषियों के आवाहन पर उसने अपना कुछ मार्ग बदल लिया तेज गर्जन के साथ। ऋषियों द्वारा खोदे गये कुओं को भरकर आगे बढ़ गई। यही स्थान सनत्कूप या सनकुआ कहलाता है।
पद्म पुराण के दूसरे खण्ड में भी ”सनकुआ“ का खास जिक्र है।“ नारदजी की तपस्थली भी इसी सनकुआ सेंवढ़ा से 5-6 किलोमीटर जंगल में है। उसका भी वर्णन पद्मपुराण में पाया जाता है।
”शुण्डस्य चोत्तरे भागे नारदस्त पतेैघुना“
यहाँ ऊँची पहाड़ी पर वन खण्डेश्वर शिव मंदिर है, पद्म पुराण में यहीं का वर्णन है। यहीं नारद जी का तप स्थल है। सनत कुमारों को नारदजी ने ही इसी क्षेत्र में संगीत की शिक्षा प्रदान करने के प्रमाण मिलते हैं।
ये इलाका देश दुनिया का प्राचीन संगीत विद्यालय माना जा सकता है। इसी क्षेत्र में सेंवढ़ा दुर्ग, महल दतिया नरेश ने 3 सदी पूर्व बनवाये थे। यहां उनके शिकारगाह अभी भी मौजूद हैं। यहाँ के मंदिरों में महान शैलचित्र भी बने पाये गये हैं जो हजारों साल पुराने कहे जाते हैं। इसी इलाके में रतनगढ़ माता का काफी प्राचीन मंदिर भी है। जहां शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास की भी यादें जुड़ी हैं। वो सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड से जुड़े रहे थे। यहाँ हर सोमवार को मेला भरता है जहाँ हजारों श्रद्धालु आते रहते हैं।
17 वीं सदी के एक नामचीन संत कवि अक्षर अनन्य ने भी सनकुआ पर साधना की थी। उन्हें ब्रम्ह ज्ञानी और पूर्णतया आडम्बरहीन संत कवि माना गया है। हिन्दी साहित्य में उनका बड़ा स्थान है।
सेंवढ़ा के सिन्धु नदी तट से जो 5 किलोमीटर जंगल में नारद जी का प्राचीन मंदिर बताया गया है वहां प्राचीन हजारों साल पुरानी चित्रकारी का भी वर्णन देखा जा सकता है। कई इतिहासकार व साहित्यकार डाॅ. श्यामबिहारी श्रीवास्तव व डाॅ. कामिनी के अनुसार ये इलाका सनकादि क्षेत्र अतीतकाल से कछारों, पुरानी तपस्यास्थली से लेकर प्राकृतिक सौंदर्य का इलाका माना गया है।
तानसेन का जन्म बेहट, ग्वालियर
भारतमुनि के नाट्यशास्त्र, जो उनके पुत्रों ने पूर्ण किया था उसमें आचार कोहलका नाम उल्लेखनीय है। उसे भी दुनिया का वही स्थान माना गया है। इसी वजह से हम कह सकते हैं कि यह दुनिया का पहला संगीत क्षेत्र रहा था। अमर गायक तानसेन से भी हजारों साल पहले वैसे भी – तानसेन बेहट में जन्मे थे जो ग्वालियर जिले में यहीं से 50 किलोमीटर मात्र की दूरी पर है।
सेंवढ़ा से दतिया
ये इलाका इतिहास में भी काफी लोकप्रिय है। दतिया जिसे श्रीकृष्ण के बुआ के लड़के वक्रदन्त ने स्थापित किया था। ये बुन्देलखण्ड का काफी प्राचीन नगर माना जाता है। दतिया अपने मंदिरों के लिये काफी प्रसिद्ध रहा है। इसलिये ही इसे लघु वृन्दावन भी कहा गया है। इस इलाके में जैन मंदिर समूह भी सैकड़ों साल पुराने हैं सोनागिरी ग्राम पहाड़ी पर। दतिया जिले के गामा पहलवान भी विश्व विजेता रहे थे कुश्ती में जिन्होंने काफी नाम दिलाया दतिया को। आज भी उनका घर परिजन इस दतिया में मौजूद हैं।
रानी कुंती का घर
ग्वालियर इलाके की पौराणिकता का केन्द्र महाभारत काल तक जाता है। ग्वालियर इलाका आदि मानव की प्रिय और सुरक्षित क्रीडा स्थल भी रहा है। जौरा के समीप पहाड़गढ़ में लाखों साल पहले की बनीं पेंटिंग भी इसका प्रमाण कही जा सकती हैं। ग्वालियर से मात्र 25 किलोमीटर की दूरी पर ही बानमौर के समीप नूराबाद से लगा हुआ सांक नदी है। यहां के राजा कुंती भोज हुये हैं जिनका देजी राजवंश का इतिहास माना गया है, जो दतिया तक जाता था। इसे आसन नदी भी लिखा गया है। इन्हीं की बेटी कुंती हुईं हैं जो श्रीकृष्ण की बुआ और पाण्डवों की माताश्री थीं। राजा कुंत भोज का महाभारत में भी जिक्र है। वो पाण्डवों की ओर से कौरवों से युद्ध करते हैं। महाभारत काल में भी ग्वालियर मुख्य शक्ति केन्द्र रहा था। ईसा से 6-7 सदी तक द्वापर युग में भी इसकी चर्चा रही है। यहीं से कुंती ने अपने नवजात पुत्र को मंजूषा में रखकर सांक नदी के संगम में प्रवाहित करना इतिहासकार बताते हैं। जो आगे चलकर जालौन जिले के रामपुरा-जगम्मनपुर में एक केवट को मिली थी। ये इलाका पंचनदा- पांच नदियों का संगम कहलाता है। इसी मंजुषा में दानवीर कर्ण रहे थे।
§ शैलचित्र
§ नारद जी मंदिर
§ सनकुआ प्रपात
§ झरने आदि।

चौकीदारो! एक नज़र गौवंश पर भी…
निर्मल रानी
लोकसभा चुनावों का रण प्रारंभ हो चुका है। अनेक राजनैतिक दल मतदाताओं के मध्य तरह-तरह के वादों व आश्वासनों के साथ संपर्क साध रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से इस चुनाव में पूरा चुनावी विमर्श जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों से हटकर पूरी तरह से भावनाओं, राष्ट्रवाद, धर्म-जाति तथा भारत-पाकिस्तान जैसे विषयों की ओर मोडऩे की कोशिश की जा रही है। दूसरी ओर विपक्षी दल बेरोज़गारी, मंहगाई, नोटबंदी, सांप्रदायिकता, जातिवाद तथा भ्रष्टाचार जैसे विषय लेकर जनता के बीच जा रहे हैं। परंतु इस बार के चुनावों में गौवंश या गौरक्षा का विषय कोई चुनावी मुद्दा नहीं है। न तो तथाकथित स्वयंभू गौरक्षकों की हमदर्द भारतीय जनता पार्टी की ओर से न ही विपक्षी दलों की तरफ से। यहां यह याद दिलाने की ज़रूरत नहीं कि 2014 से लेकर गत् वर्ष तक पूरे देश में गौरक्षा तथा गाय को लेकर होने वाली हिंसा का बोलबाला रहा। नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान अपने चुनावी भाषणों में वादा किया था कि उनके सत्ता में आने के बाद यूपीए सरकार द्वारा चलाई जा रही ‘गुलाबी क्रांति’ अर्थात् बीफ मांस के व्यापार व निर्यात को बंद कर दिया जाएगा। परंतु सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। बजाए इसके आंकड़े यही बता रहे हैं कि बीफ निर्यात के क्षेत्र में यूपीए सरकार की तुलना में कहीं अधिक व्यवसाय बढ़ा है।
सवाल यह है कि गौवंश की रक्षा का विषय चुनावी सभाओं में उठाना तथा देश के गौभक्तों की भावनाओं को झकझोरना मात्र ही क्या इस विषय को उछालने का मकसद था? यह सोचना बेहद ज़रूरी है 2014 से लेकर 2019 के मध्य के पांच वर्षों के दौरान गिौवंश का कितना कल्याण हुआ है? उसे राष्ट्रीय स्तर पर कितनी सुरक्षा व देखभाल मयस्सर हो सकी है? कल तक किसानों तथा आम लोगों के लिए वरदान समझा जाने वाला गौवंश क्या इन पांच वर्षों के दौरान भी आम लोगों के लिए लाभदायक व सहयोगी साबित हुआ है? देश के शहरी लोगों से लेकर ग्रामवासियों तक के लिए आज के समय में गौवंश लाभदायक साबित हो रहा है या हानिकारक? स्वयं गायों के पैदा होने वाले बछड़ों पर इन दिनों क्या गुज़र रही है? खेतिहर किसानों के लिए आज गौवंश वरदान साबित हो रहा है या अभिशाप? गौरक्षा की बातें करने वाले तथा इसे अपनी राजनीति तथा व्यवसाय का सबसे महत्वपूर्ण कारक समझने वाले तथाकथित राष्ट्रवादी इन दिनों गौवंश की रक्षा, सुरक्षा, स्वास्थय व देखभाल के लिए क्या कर रहे हैं? निश्चित रूप से मतदाताओं को चुनाव के समय तथाकथित स्वयंभू गौरक्षकों से यह सवाल ज़रूर पूछना चाहिए।
गौवंश की रक्षा के नाम पर गत् पांच वर्षों में दक्षिणपंथियों द्वारा जो चंद गिने-चुने कदम उठाए जा रहे थे उनमें या तो किसी अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति के ‎‎फ्रिज अथवा रसोई में रखे हुए मांस को लेकर हंगामा बरपा करना तथा किसी कमज़ोर व्यक्ति की पीट-पीट कर हत्या कर देना शामिल रहा या फिर गौवंश के साथ आते-जाते किसी अकेले व्यक्ति पर धर्म के आधार पर टृट पडऩा व उसे पीट-पीट कर मार डालना। इन घटनाओं से न तो गौवंश की रक्षा हो सकी न ही इसके बिक्री अथवा निर्यात पर कोई अंकुश लग सका। हां इतना फर्क ज़रूर पड़ा कि स्वयंभू गौरक्षकों द्वारा रास्ते में की जा रही नाजायज़ वसूली, मारपीट व हिंसा से भयभीत होकर लोगों ने गौवंश का व्यापार करना ही छोड़ दिया। ट्रांसपोर्टस ने भी गौवंश लादने व लाने-ले जाने हेतु अपनी ट्रकों को भेजना बंद कर दिया। इसका सीधा प्रभाव उन गौपालकों पर पड़ा जो अपनी गायों का दूध कम हो जाने की स्थिति में उस गाय को किसी व्यापारी को बेच दिया करते थे तथा अधिक दूध देने वाली गाय खरीद कर लाया करते थे। परंतु ट्रकों के उपलब्ध न होने तथा व्यापारियों द्वारा गौवंश की खरीददारी बंद कर देने के परिणामस्वरूप अब स्थिति बहुत ही खतरनाक मोड़ पर आ गई है। जिन गायों से गौपालक किसी फायदे की उम्मीद नहीं रखता उसे अपने घर के बाहर का रास्ता दिखा रहा है। हद तो यह है कि पैदा होते ही गायों के बछड़े सड़कों पर छोड़े जा रहे हैं।
पूरे देश में इस समय गौवंश के सड़कों पर घूमने के चलते दुर्घटनाओं में काफी तेज़ी आई है। पैदल, साईकल सवार व कार अथवा मोटरसाईकल पर चलने वाला कोई भी व्यक्ति किसी भी समय इस प्रकार के आक्रामक आवारा पशुओं का शिकार हो सकता है। शहरों के अलावा गांवों की सिथति तो पहले से भी ज़्यादा खराब हो चुकी है। देश के मैदानी इलाकों का जो किसान पहले नील गाय के झुंड से ही बेहद परेशान था उसके लिए अब गाय व सांड जैसे आवारा पशुओं के झुंड भी एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। कई जगहों से ऐसी खबरें आती रहती हैं कि इन दिनों गेहूं की फसल की रखवाली करने हेतु किसानों के परिवार के लोग 24 घंटे हाथों में लाठियां लेकर आवारा पशुओं से अपनी फसल की चौकीदारी करने में डटे हुए हैं। उधर किसानों के गुस्से के चलते तथा शहरों में वाहन से होने वाली दुर्घटनाओं की वजह से गौवंश को भी मनुष्यों की हिंसा या आक्रामकता का सामना करना पड़ रहा है। चंडीगढ़ जैसे महानगर में चारों ओर यहां तक कि शहर के बीचो-बीच चंडीगढ़-दिल्ली राजमार्ग पर कई बार ऐसे आवारा पशुओं के बड़े-बड़े झुंड न केवल यातायात को बाधित कर रहे हैं बल्कि कई बार सड़कों पर सांडों के मल्लयुद्ध भी दिखाई दे जाते हैं। इसके कारण कई लोगों की कारों के शीशे टूट चुके हैं व गाडिय़ां क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। कई लोग घायल हो चुके हैं।
पिछले दिनों देश के एक वरिष्ठ पत्रकार द्वारा गुजरात-महाराष्ट्र के मध्य एक स्टिंग आप्रेशन कर तथाकथित गौरक्षकों की हकीकत का पर्दाफाश किया गया था। उन्होंने दिखाया कि किस प्रकार दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े लोग मोटे पैसे लेकर वध हेतु जाने वाले गौवंश को मुख्य मार्गों से आने-जाने की अनुमति देते हैं। स्टिंग करने वाले पत्रकार निरंजन टाकले ने स्वयं एक गौवंश व्यवसायी की भूमिका अदा करते हुए ऐसे अनेक तथाकथित गौरक्षकों को बेनकाब किया जो केवल पैसे ठगने व वसूलने की खातिर गौरक्षा के नाम का आवरण अपने ऊपर चढ़ाए हुए थे। परंतु हमारे देश के धर्मभीरू लोग इन पाखंडी तथाकथित गौरक्षकों तथा इन्हें संचालित करने वाले शातिर दिमाग राजनीतिज्ञों के झांसे में आ जाते हैं और यह महसूस करने लगते हैं कि वास्तव में यही लोग गौमाता के असल रखवाले हैं जबकि सच्चाई ठीक इसके विपरीत है? अन्यथा क्या वजह है कि देश में चलने वाले अधिकांश कत्लखाने सत्ता के संरक्षण में सत्ता के चहेतों द्वारा ही संचालित किए जा रहे हैं? क्या वजह है कि यूपीए सरकार की तुलना में वर्तमान सरकार के दौर में गत् पांच वर्षों में बीफ निर्यात में बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गई है?
इसलिए ‘मैं भी चौकीदार’ का नारा बुलंद करने वालों से देश के किसानों को यह ज़रूर कहना चाहिए कि वे आएं और सबसे पहले उनके खेतों की चौकीदारी कर उनकी फसल की रक्षा करें। शहरी लोगों को भी इन स्वयंभू चौकीदारों से यह कहना चाहिए कि यह चौकीदार शहरों में घूमने वाले आवारा पशुओं के हमलों से उनकी चौकीदारी करें। इतना ही नहीं बल्कि बेज़ुबान गौवंश को भी इन्हीं चौकीदारों से यह सवाल पूछना चाहिए कि पांच वर्षों तक उसकी सुरक्षा के नाम पर जो उन्माद पूरे देश में फैलाया गया उसके बाद आ‎खिर इन पांच वर्षों में उन्हें सड़कों पर और बड़ी संख्या में दर-दर भटकने के लिए तथा कूड़ों के ढेर पर प्लास्टिक व पॉलिथिन खाने व वाहनों की टक्कर झेल कर घायल होने के लिए क्यों छोड़ दिया गया ? केवल टीर्शर्टस पर ‘मैं भी चौकीदार’ लिखे जाने से न तो गौवंश की रक्षा हो सकती है न ही किसानों की फसल की न ही शहरी राहगीरों की।

संवत्सर पड़वा के प्रणेता विक्रमादित्य
डॉ. अरविन्द जैन
इतिहास हमेशा विवाद का विषय रहा हैं और उससे हमेशा विवाद का रौद्र रूप हो जाता हैं। वो तो धन्य हैं इतिहासकार और विद्वान् जिन्होंने अपनी खोज से बहुत सीमा तक खोज कर अनेक विवादों को निर्विवाद कर दिया अन्यथा संकीर्ण मानसिकता के कारण विरोध का होना स्वाभाविक होता हैं। ऐसे कई उदाहरण इतिहास के मिल जाते हैं।
ऐतिहासिक राजकीय भारतीय संवत् के सर्वप्रथम प्रवर्तक राजा विक्रमादित्य थे। आप अनेक भारतीय लोककथाओं के नायक हैं। अयोध्या के राजा राम के बाद उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने इस देश की परम्परा में जैसा गहरा स्थान बनाया है, वैसा दूसरा कोई राजा कभी नहीं बना सका। राजा विक्रमादित्य तीव्र बुद्धिमान, पराक्रमी, उदार, दानशील, धर्मसहिष्णु, विद्यारसिक, विद्वानों के प्रश्रयदाता, न्यायपरायण, धर्मात्मा, प्रजावत्सल एवं सुशासक के रूप में आदर्श भारतीय नरेश माने जाते हैं।
पूर्ववर्ती चन्द्रगुप्त मौर्य एवं खारवेल जैसे महान् जैन सम्राटों की परम्परा में देश को विदेशियों के आक्रमण से मुक्त करने में यह महान् जैन सम्राट विक्रमादित्य भी अविस्मरणीय है। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार वह जैनधर्म का परमभक्त था। कुलधर्म और राजधर्म भी जैनधर्म था। विक्रमादित्य ने चिरकाल तक राज्य किया और स्वदेश को सुखी, समृद्ध एवं नैतिक बनाया। विक्रमादित्य तथा उसके उपरान्त उसके वंशजों ने मालवा पर लगभग १०० वर्ष राज्य किया था। विक्रमादित्य जैसे राजा के आदर्शों का स्मरण हम लोग चैत्र शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन यानि युग प्रतिपदा को राष्ट्रीय नव वर्ष दिवस के रूप में मना कर करते हैं।
विक्रमादित्य उज्जैन के अनुश्रुत राजा थे, जो अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे। “विक्रमादित्य” की उपाधि भारतीय इतिहास में बाद के कई अन्य राजाओं ने प्राप्त की थी, जिनमें गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय और सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य (जो हेमु के नाम से प्रसिद्ध थे) उल्लेखनीय हैं। राजा विक्रमादित्य नाम, ‘विक्रम’ और ‘आदित्य’ के समास से बना है जिसका अर्थ ‘पराक्रम का सूर्य’ या ‘सूर्य के समान पराक्रमी’ है।उन्हें विक्रम या विक्रमार्क (विक्रम + अर्क) भी कहा जाता है (संस्कृत में अर्क का अर्थ सूर्य है)। भविष्य पुराण व आईने अकबरी के अनुसार विक्रमादित्य पंवार (प्रमार) वंश के सम्राट थे जिनकी राजधानी उज्जयनी थी।
हिन्दू शिशुओं में ‘विक्रम’ नामकरण के बढ़ते प्रचलन का श्रेय आंशिक रूप से विक्रमादित्य की लोकप्रियता और उनके जीवन के बारे में लोकप्रिय लोक कथाअनुश्रुत विक्रमादित्य, संस्कृत और भारत के क्षेत्रीय भाषाओं, दोनों में एक लोकप्रिय व्यक्तित्व है। उनका नाम बड़ी आसानी से ऐसी किसी घटना या स्मारक के साथ जोड़ दिया जाता है, जिनके ऐतिहासिक विवरण अज्ञात हों, हालांकि उनके इर्द-गिर्द कहानियों का पूरा चक्र फला-फूला है। संस्कृत की सर्वाधिक लोकप्रिय दो कथा-श्रृंखलाएं हैं वेताल पंचविंशति या बेताल पच्चीसी (“पिशाच की 25 कहानियां”) और सिंहासन-द्वात्रिंशिका (“सिंहासन की 32 कहानियां” जो सिहांसन बत्तीसी के नाम से भी विख्यात हैं)। इन दोनों के संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में कई रूपांतरण मिलते हैं।
पिशाच (बेताल) की कहानियों में बेताल, पच्चीस कहानियां सुनाता है, जिसमें राजा बेताल को बंदी बनाना चाहता है और वह राजा को उलझन पैदा करने वाली कहानियां सुनाता है और उनका अंत राजा के समक्ष एक प्रश्न रखते हुए करता है। वस्तुतः पहले एक साधु, राजा से विनती करते हैं कि वे बेताल से बिना कोई शब्द बोले उसे उनके पास ले आएं, नहीं तो बेताल उड़ कर वापस अपनी जगह चला जाएगा| राजा केवल उस स्थिति में ही चुप रह सकते थे, जब वे उत्तर न जानते हों, अन्यथा राजा का सिर फट जाता| दुर्भाग्यवश, राजा को पता चलता है कि वे उसके सारे सवालों का जवाब जानते हैं; इसीलिए विक्रमादित्य को उलझन में डालने वाले अंतिम सवाल तक, बेताल को पकड़ने और फिर उसके छूट जाने का सिलसिला चौबीस बार चलता है। इन कहानियों का एक रूपांतरण कथा-सरित्सागर में देखा जा सकता है।
सिंहासन के क़िस्से, विक्रमादित्य के उस सिंहासन से जुड़े हुए हैं जो खो गया था और कई सदियों बाद धार के परमार राजा भोज द्वारा बरामद किया गया था। स्वयं राजा भोज भी काफ़ी प्रसिद्ध थे और कहानियों की यह श्रृंखला उनके सिंहासन पर बैठने के प्रयासों के बारे में है। इस सिंहासन में 32 पुतलियां लगी हुई थीं, जो बोल सकती थीं और राजा को चुनौती देती हैं कि राजा केवल उस स्थिति में ही सिंहासन पर बैठ सकते हैं, यदि वे उनके द्वारा सुनाई जाने वाली कहानी में विक्रमादित्य की तरह उदार हैं। इससे विक्रमादित्य की 32 कोशिशें (और 32 कहानियां) सामने आती हैं और हर बार भोज अपनी हीनता स्वीकार करते हैं। अंत में पुतलियां उनकी विनम्रता से प्रसन्न होकर उन्हें सिंहासन पर बैठने देती हैं।
विक्रम और शनि
शनि से संबंधित विक्रमादित्य की कहानी को अक्सर कर्नाटक राज्य के यक्षगान में प्रस्तुत किया जाता है। कहानी के अनुसार, विक्रम नवरात्रि का पर्व बड़े धूम-धाम से मना रहे थे और प्रतिदिन एक ग्रह पर वाद-विवाद चल रहा था। अंतिम दिन की बहस शनि के बारे में थी। ब्राह्मण ने शनि की शक्तियों सहित उनकी महानता और पृथ्वी पर धर्म को बनाए रखने में उनकी भूमिका की व्याख्या की। समारोह में ब्राह्मण ने ये भी कहा कि विक्रम की जन्म कुंडली के अनुसार उनके बारहवें घर में शनि का प्रवेश है, जिसे सबसे खराब माना जाता है। लेकिन विक्रम संतुष्ट नहीं थे; उन्होंने शनि को महज लोककंटक के रूप में देखा, जिन्होंने उनके पिता (सूर्य), गुरु (बृहस्पति) को कष्ट दिया था। इसलिए विक्रम ने कहा कि वे शनि को पूजा के योग्य मानने के लिए तैयार नहीं हैं। विक्रम को अपनी शक्तियों पर, विशेष रूप से अपने देवी मां का कृपा पात्र होने पर बहुत गर्व था। जब उन्होंने नवरात्रि समारोह की सभा के सामने शनि की पूजा को अस्वीकृत कर दिया, तो शनि भगवान क्रोधित हो गए। उन्होंने विक्रम को चुनौती दी कि वे विक्रम को अपनी पूजा करने के लिए बाध्य कर देंगे। जैसे ही शनि आकाश में अंतर्धान हो गए, विक्रम ने कहा कि यह उनकी खुशकिस्मती है और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए उनके पास सबका आशीर्वाद है। विक्रम ने निष्कर्ष निकाला कि संभवतः ब्राह्मण ने उनकी कुंडली के बारे में जो बताया था वह सच हो; लेकिन वे शनि की महानता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। विक्रम ने निश्चयपूर्वक कहा कि “जो कुछ होना है, वह होकर रहेगा और जो कुछ नहीं होना है, वह नहीं होगा” और उन्होंने कहा कि वे शनि की चुनौती को स्वीकार करते हैं।
एक दिन एक घोड़े बेचने वाला उनके महल में आया और कहा कि विक्रम के राज्य में उसका घोड़ा खरीदने वाला कोई नहीं है। घोड़े में अद्भुत विशेषताएं थीं – जो एक छलांग में आसमान पर, तो दूसरे में धरती पर पहुंचता था। इस प्रकार कोई भी धरती पर उड़ या सवारी कर सकता है। विक्रम को उस पर विश्वास नहीं हुआ, इसीलिए उन्होंने कहा कि घोड़े की क़ीमत चुकाने से पहले वे सवारी करके देखेंगे। विक्रेता इसके लिए मान गया और विक्रम घोड़े पर बैठे और घोड़े को दौडाया। विक्रेता के कहे अनुसार, घोड़ा उन्हें आसमान में ले गया। दूसरी छलांग में घोड़े को धरती पर आना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय उसने विक्रम को कुछ दूर चलाया और जंगल में फेंक दिया। विक्रम घायल हो गए और वापसी का रास्ता ढूंढ़ने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि यह सब उनका नसीब है, इसके अलावा और कुछ नहीं हो सकता; वे घोड़े के विक्रेता के रूप में शनि को पहचानने में असफल रहे। जब वे जंगल में रास्ता ढ़ूढ़ने की कोशिश कर रहे थे, डाकुओं के एक समूह ने उन पर हमला किया। उन्होंने उनके सारे गहने लूट लिए और उन्हें खूब पीटा। विक्रम तब भी हालत से विचलित हुए बिना कहने लगे कि डाकुओं ने सिर्फ़ उनका मुकुट ही तो लिया है, उनका सिर तो नहीं। चलते-चलते वे पानी के लिए एक नदी के किनारे पहुंचे। ज़मीन की फिसलन ने उन्हें पानी में पहुंचाया और तेज़ बहाव ने उन्हें काफ़ी दूर घसीटा।
किसी तरह धीरे-धीरे विक्रम एक नगर पहुंचे और भूखे ही एक पेड़ के नीचे बैठ गए। जिस पेड़ के नीचे विक्रम बैठे हुए थे, ठीक उसके सामने एक कंजूस दुकानदार की दुकान थी। जिस दिन से विक्रम उस पेड़ के नीचे बैठे, उस दिन से दुकान में बिक्री बहुत बढ़ गई। लालच में दुकानदार ने सोचा कि दुकान के बाहर इस व्यक्ति के होने से इतने अधिक पैसों की कमाई होती है और उसने विक्रम को घर पर आमंत्रित करने और भोजन देने का निर्णय लिया। बिक्री में लंबे समय तक वृद्धि की आशा में, उसने अपनी पुत्री को विक्रम के साथ शादी करने के लिए कहा। भोजन के बाद जब विक्रम कमरे में सो रहे थे, तब पुत्री ने कमरे में प्रवेश किया। वह बिस्तर के पास विक्रम के जागने की प्रतीक्षा करने लगी। धीरे- धीरे उसे भी नींद आने लगी। उसने अपने गहने उतार दिए और उन्हें एक बत्तख के चित्र के साथ लगी कील पर लटका दिया। वह सो गई। जागने पर विक्रम ने देखा कि चित्र का बत्तख उसके गहने निगल रहा है। जब वे अपने द्वारा देखे गए दृश्य को याद कर ही रहे थे कि दुकानदार की पुत्री जग गई और देखती है कि उसके गहने गायब हैं। उसने अपने पिता को बुलाया और कहा कि वह चोर है।
विक्रम को वहां के राजा के पास ले जाया गया। राजा ने निर्णय लिया कि विक्रम के हाथ और पैर काट कर उन्हें रेगिस्तान में छोड़ दिया जाए। जब विक्रम रेगिस्तान में चलने में असमर्थ और ख़ून से लथपथ हो गए, तभी उज्जैन में अपने मायके से ससुराल लौट रही एक महिला ने उन्हें देखा और पहचान लिया। उसने उनकी हालत के बारे में पूछताछ की और बताया कि उज्जैनवासी उनकी घुड़सवारी के बाद गायब हो जाने से काफी चिंतित हैं। वह अपने ससुराल वालों से उन्हें अपने घर में जगह देने का अनुरोध करती है और वे उन्हें अपने घर में रख लेते हैं। उसके परिवार वाले श्रमिक वर्ग के थे; विक्रम उनसे कुछ काम मांगते हैं। वे कहते हैं कि वे खेतों में निगरानी करेंगे और हांक लगाएंगे ताकि बैल अनाज को अलग करते हुए चक्कर लगाएं। वे हमेशा के लिए केवल मेहमान बन कर ही नहीं रहना चाहते हैं।
एक शाम जब विक्रम काम कर रहे थे, हवा से मोमबत्ती बुझ जाती है। वे दीपक राग गाते हैं और मोमबत्ती जलाते हैं। इससे सारे नगर की मोमबत्तियां जल उठती हैं – नगर की राजकुमारी ने प्रतिज्ञा कि थी कि वे ऐसे व्यक्ति से विवाह करेंगी जो दीपक राग गाकर मोमबत्ती जला सकेगा। वह संगीत के स्रोत के रूप में उस विकलांग आदमी को देख कर चकित हो जाती है, लेकिन फिर भी उसी से शादी करने का फैसला करती है। राजा जब विक्रम को देखते हैं तो याद करके आग-बबूला हो जाते हैं कि पहले उन पर चोरी का आरोप था और अब वह उनकी बेटी से विवाह के प्रयास में है। वे विक्रम का सिर काटने के लिए अपनी तलवार निकाल लेते हैं। उस समय विक्रम अनुभव करते हैं कि उनके साथ यह सब शनि की शक्तियों के कारण हो रहा है। अपनी मौत से पहले वे शनि से प्रार्थना करते हैं। वे अपनी ग़लतियों को स्वीकार करते हैं और सहमति जताते हैं कि उनमें अपनी हैसियत की वजह से काफ़ी घमंड था। शनि प्रकट होते हैं और उन्हें उनके गहने, हाथ, पैर और सब कुछ वापस लौटाते हैं। विक्रम शनि से अनुरोध करते हैं कि जैसी पीड़ा उन्होंने सही है, वैसी पीड़ा सामान्य जन को ना दें। वे कहते हैं कि उन जैसा मजबूत इन्सान भले ही पीड़ा सह ले, पर सामान्य लोग सहन करने में सक्षम नहीं होंगे। शनि उनकी बात से सहमत होते हुए कहते हैं कि वे ऐसा कतई नहीं करेंगे। राजा अपने सम्राट को पहचान कर, उनके समक्ष समर्पण करते हैं और अपनी पुत्री की शादी उनसे कराने के लिए सहमत हो जाते हैं। उसी समय, दुकानदार दौड़ कर महल पहुंचता है और कहता है कि बतख ने अपने मुंह से गहने वापस उगल दिए हैं। वह भी राजा को अपनी बेटी सौंपता है। विक्रम उज्जैन लौट आते हैं और शनि के आशीर्वाद से महान सम्राट के रूप में जीवन व्यतीत करते हैं।
नौ रत्न और उज्जैन में विक्रमादित्य का दरबार
भारतीय परंपरा के अनुसार धन्वन्तरि, क्षपनक, अमरसिंह, शंकु, खटकरपारा, कालिदास, वेतालभट्ट (या (बेतालभट्ट), वररुचि और वराहमिहिर उज्जैन में विक्रमादित्य के राज दरबार का अंग थे। कहते हैं कि राजा के पास “नवरत्न” कहलाने वाले नौ ऐसे विद्वान थे।
कालिदास प्रसिद्ध संस्कृत राजकवि थे। वराहमिहिर उस युग के प्रमुख ज्योतिषी थे, जिन्होंने विक्रमादित्य की बेटे की मौत की भविष्यवाणी की थी। वेतालभट्ट एक धर्माचार्य थे। माना जाता है कि उन्होंने विक्रमादित्य को सोलह छंदों की रचना “नीति-प्रदीपकालिदास प्रसिद्ध संस्कृत राजकवि थे। वराहमिहिर उस युग के प्रमुख ज्योतिषी थे, जिन्होंने विक्रमादित्य की बेटे की मौत की भविष्यवाणी की थी। वेतालभट्ट एक धर्माचार्य थे। माना जाता है कि उन्होंने विक्रमादित्य को सोलह छंदों की रचना “नीति-प्रदीप” (“आचरण का दीया”) का श्रेय दिया है।
विक्रमार्कस्य आस्थाने नवरत्नानि
धन्वन्तरिः क्षपणकोऽमरसिंहः शंकूवेताळभट्टघटकर्परकालिदासाः।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेस्सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य॥
नौ रत्नों के चित्र
मध्यप्रदेश में स्थित उज्जैन-महानगर के महाकाल मन्दिर के पास विक्रमादित्य टिला है। वहाँ विक्रमादित्य के संग्रहालय में नवरत्नों की मूर्तियाँ स्थापित की गई। इस प्रकार जैन राजा विक्रमादित्य का योगदान भारतीय इतिहास के साहित्य ,ज्योतिष आदि सभी विधाओं में उन्नत किया जिसके कारण हम उनके पदचिन्हों पर चल रहे हैं।
धन्य हैं ऐसे महामानव जिनकी देन से मानवता हमेश ऋणी रहेंगी।
05अप्रैल/ईएमएस

न्यायाधीशों का आचरण : एक अधूरी कार्यवाही
अजित वर्मा
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने तीन उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को प्रोन्नति न देने का फैसला किया है। क्योंकि तीनों के खिलाफ न्यायिक कदाचार, अनुशासन की कमी, उच्च न्यायिक मानकों के विपरीत आदेश सुनाने जैसे मामले सामने आए हैं। कहा जा रहा है कि एक सीजे का नाम इसलिए रोका गया, क्योंकि वे काम के दिनों में छुट्टी लेकर गोल्फ खेलने चले गए। दूसरे सीजे को इसलिए प्रोन्नति नहीं दी जाएगी, क्योंकि वे लगातार राज्य सरकार के हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल करते रहे। तीसरे सीजे ने सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को खुश करने के लिए एक लोक सेवा आयोग के खिलाफ आदेश सुनाए।
हालांकि कॉलेजियम ने इन तीनों मुख्य न्यायाधीशों के नाम सार्वजनिक न करने का फैसला भी किया क्योंकि नाम सार्वजनिक होने से उनके पद पर बने रहने पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इससे उन्हें कार्यकाल पूरा करने में कठिनाई आ सकती है।
हम कहना चाहते हैं कि पूरा देश अपने सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान करता है। न्यायपालिका की छाव और प्रतिष्ठा सबके लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन हम पहले भी लिख चुके हैं और यहाँ फिर लिख रहे हैं कि सीजर और सीजर की पत्नी दोनों को संदेह से परे रहना चाहिए। न्यायाधीशों और सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम दोनों सर्वथा सम्माननीय हैं। परन्तु सवाल यह उठता है कि जिन लोगों को कॉलेजियम ने न्यायिक कदाचार, अनुशासन की कमी और उच्च न्यायिक मानकों के विपरीत आदेश सुनाने जैसे मामलों में दोषी पाया वे किसी भी राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी कैसे बने रह सकते हैं। कॉलेजियम अगर इस दलील के साथ उनके नाम उजागर करे कि ऐसा किये जाने पर उन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है या उन्हें अपना कार्यकाल पूरा करने में कठिनाई आ सकती है, तो इस पर सवाल उठना लाजिमी है। एक दोष सिद्ध व्यक्ति मुख्य न्यायाधीश तो क्या न्यायाधीश रहने बल्कि विधिजगत में प्रतिष्ठा पाने के योग्य भी नहीं हो सकता यह इसलिए कॉलेजियम में प्रतिष्ठित न्यायाधीश होते हैं। अगर वे किसी मुख्य न्यायाधीश के आचरण पर अंगुली उठाते हैं तो इसे दोष सिद्ध ही माना जायेगा। तो फिर न तो नामों की पोशीदागी जायज है, न उनका पद पर बने रहना। आज कोई नहीं जानता कि न्यायपालिका के पावन सरोवर को गंदा करने वाली ये तीन मछलियां कौन हैं, लेकिन यह तो तय ही है न कि तीन गंदी मछलियां मौजूद हैं। तो फिर उन्हें इस पवित्र सरोवर से निकाल कर बाहर फेंका जाना ही नैतिकता का तकाज़ा है।

वायनाड से देश को साधने की जुगत
डॉ हिदायत अहमद खान
पिछले कुछ दिनों से केरल का वायनाड लोकसभा क्षेत्र देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह क्षेत्र चर्चा में इसलिए आया क्योंकि यहां से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी बतौर पार्टी उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे हैं। वैसे राहुल गांधी उत्तर प्रदेश की अमेठी लोकसभा सीट से वर्ष 2004 से लगातार तीन बार चुनाव जीतते आ रहे हैं। इस प्रकार जीतने की हैट्रिक बनाने के साथ अमेठी के जनादेश से लोकसभा संसदीय क्षेत्र से संसद पहुंचते रहे राहुल गांधी को अचानक ऐसा क्या हुआ कि उन्हें अमेठी के अतिरिक्त वायनाड को भी अपना चुनाव क्षेत्र बनाना पड़ गया? इस सवाल को लेकर जहां तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं वहीं सत्ता पक्ष के लोग तंज कसते दिख रहे हैं और देश व दुनिया को बतलाने का काम कर रहे हैं कि राहुल गांधी असल में भाजपा उम्मीदवार स्मृति ईरानी (जो पिछले चुनाव में उनसे हार चुकी हैं) से घबरा गए हैं और हार की आशंका के चलते उन्होंने एक अन्य सीट से चुनाव लड़ने जैसा फैसला मजबूरी में लिया है। इस तरह के जुबानी जमा खर्च करने वालों में किसी और की बात क्या की जाए खुद भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राहुल पर तंज कसते हुए कहा था कि ‘वॉट्स ऐप पर मैंने पढ़ा कि राहुल अमेठी को छोड़कर केरल भाग गए हैं। आखिर उन्हें केरल क्यों जाना पड़ा? हम सब जानते हैं कि राहुल का अमेठी से ही लड़ना तय था, लेकिन अब वो वहां जाकर ध्रुवीकरण की राजनीति से जीत हासिल करना चाहते हैं।’ मतलब भाजपा और उसके नेता अभी तक जिस ध्रुवीकरण से चुनाव साधते हाए हैं वही राहुल कर रहे हैं, इसलिए तकलीफ बढ़ गई है। बहरहाल भाजपा अध्यक्ष शाह के बयान में जहां तंज है वहीं एक तरह की घबराहट भी देखने को मिल रही है। दरअसल भाजपा ने अमेठी संसदीय क्षेत्र से राहुल के खिलाफ इस बार भी केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को ही मैदान में उतारा है। बावजूद इसके कि 2014 के लोकसभा चुनाव में राहुल ने उन्हें करीब 1.07 लाख वोटों से हराया था। इसलिए असमंजस की स्थिति तो अभी भी बनी हुई है, लेकिन बिचलित करने वाली बात यह है कि वायनाड तीन राज्यों की सीमा को मिलाने वाला क्षेत्र है और एक खास रणनीति के तहत ही राहुल को यहां से उतारा गया है। इस संबंध में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटोनी के बयान को देखा जा सकता है, जिसमें वो कहते हैं कि राहुल गांधी को अमेठी के अलावा वायनाड से चुनाव में उतारने की कई वजहें हैं। पहली वजह तो यही है कि यह सीट सांस्कृतिक और भौगोलिक रूप से काफी अहम है। दूसरा यह कि केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमाओं को यह जोड़ती है। इस प्रकार राहुल यहां से चुनाव लड़कर एक तरह से पूरे दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व करते नजर आएंगे। अब चूंकि भाजपा और उसके अनुवांशिक संगठनों पर देश के सांस्कृतिक माहौल को खराब करने के आरोप लगते रहे हैं और इसकी आवाजें सबसे ज्यादा दक्षिण प्रांतों से ही उठती रही हैं अत: राहुल का वायनाड को चुनना सही मायने में भाजपा के लिए सिरदर्द पैदा करने के बराबर है। कहना गलत नहीं होगा कि महज एक सीट से चुनाव लड़ कर पूरे दक्षिण भारत को अपने पक्ष में कर लेने जैसा काम कांग्रेस की बेहतरीन रणनीति का हिस्सा है, इस पर जमीनी कार्य करने और मन मुताबिक परिणाम लेने की आवश्यकता है। आखिर यह कैसे भुलाया जा सकता है कि दक्षिण से जो बात उठती है वह देश के मध्य क्षेत्र से होते हुए उत्तर व पश्चिम क्षेत्र में तेजी से फैलती और उसका असर भी होता है। ऐसे में कांग्रेस महज एक सीट के जरिए पूरे देश को अपनी बात सुनाने में कामयाब होती दिख रही है। वहीं दूसरी तरफ भाजपा से भी कहा जा रहा है कि वह दक्षिण ही नहीं बल्कि उत्तर भारत की ओर भी अपना ध्यान लगाए, क्योंकि यदि यहां पर भी फिफ्टी-फिफ्टी वाला परिणाम आया तो सत्ता हाथ से जाती चली जाएगी। गौरतलब है कि राहुल ने वायनाड से नामांकन पत्र भरने के साथ ही रोड शो किया, जिसमें कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी उनके साथ नजर आईं। यहां प्रियंका ने राहुल को साहसी व्यक्ति बताया और वायनाड की जनता से उन्होंने अपील की कि राहुल का ख्याल रखें। प्रियंका की अपने भाई के लिए यह भावनात्मक अपील थी, जो आमजन के दिलों को छू गई। दरअसल गांधी परिवार की शहादतें देश भूला नहीं सकता है। भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर राहुल व प्रियंका गांधी के पिता भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के शहीद होने का अपना ही गौरवपूर्ण इतिहास है। बहरहाल वायनाड में 23 अप्रैल को मतदान होना है, जिससे पहले विभिन्न धर्मों की संस्कृति बचाने की खातिर पूरे देश को मथने की जुगत भी राजनीतिक पार्टियां जरुर ही भिड़ाती नजर आएंगी। अंतत: केरल की वायनाड लोकसभा सीट से देश को साधने का काम कांग्रेस किस तरह से करती है यह देखने वाली बात है, क्योंकि पिछले चुनावों की तरह इस चुनाव में किसी के नाम का कोई जादू देश में चलता दिखाई नहीं दे रहा है। इसलिए मुद्दों और बेहतर चुनाव मैनेजमेंट के जरिए ही चुनाव साधे जा सकेंगे।

एक भारतीय आत्मा : माखनलाल चतुर्वेदी
वीरेन्द्र सिंह परिहार
(4 अप्रैल जन्म तिथि पर विशेष) माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल 1889 होषंगाबाद जिले के बाबई नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम नंदलाल चतुर्वेदी था। 1906 में वह मसगगॉव में अध्यापक के पद पर नियुक्त हुए, बाद में खण्डवा में। माखनलाल जी अध्यापन काल से ही 1912 से ही सुबोध सिंधु में लेख, समाचार आदि लिखने लगे थे। दषहरे के अवसर पर उनके लिखे लेख ”षक्ति पूजा“ में अंग्रेज षासन को राजद्रोह की गंध मिली, पर वह बच गए। माखनलाल जी के संपादकीय जीवन की षुरुआत 7 अप्रैल 1913 से ’प्रभा‘ से हुई। लेकिन यह पत्रिका फरवरी 1914 में बंद हो गई और तब माखनलाल जी का तय वेतन 30 रु. भी बंद हो गया। नौबत यहां तक आ गई कि घर के जेबर बेंच-बेंचकर घर चलाना पड़ा। बाद में ’प्रताप‘ के युवा संपादक गणेष षंकर विद्यार्थी जब खण्डवा आए तो उन्होंने ’प्रभा‘ को अपने कानपुर स्थित ’प्रताप‘ प्रेस से छपवाने का प्रस्ताव किया। यद्यपि इसी बीच माखनलाल जी की पत्नी ग्यारसी बाई का निधन हो गया। उल्लेखनीय है कि माखनलाल जी आजीवन दूसरा विवाह नहीं किया। पर 1915 में मार्च से ’प्रभा‘ के द्वितीय वर्श का प्रथम अंक प्रताप प्रेस से पूर्ववत साज-सजा के साथ निकला। ’प्रभा‘ के माध्यम से माखनलाल जी यह संकेत देने लगे कि वह साहित्य को राजनीतिक आंदोलन की प्रेरक वाणी बनाने में विष्वास करते हैं। लेकिन दो वर्शों तक कठोर घाटा सहने के बाद ’प्रभा‘ का प्रकाषन पुन: बंद हो गया। बाद में ’प्रभा‘ को गणेष षंकर विद्यार्थी को हस्तांतरित कर दिया गया। 1916 से 1919 तक ’स्वतंत्र‘ पत्रकार के रूप में माखनलाल ने खूब लिखा। इस बीच वह गणेष षंकर विद्यार्थी के साथ रहे। ’प्रताप‘ को हर संभव सहयोग दिया। इसी दौरान उनके नाटक ’कृश्णार्जुन युद्ध‘ का मंचन भी हुआ और प्रकाषन भी। उसी दौरान उन्होंने गणेष षंकर विद्यार्थी के साथ महात्मा गांधी से प्रथम भेंट की। बाद में गांधी जी उनकी जन्मभूमि बावई भी गए। इसके पहले 1922 में जेल से लौटते ही ’कर्मवीर‘ से मुक्त होकर माखनलाल जी नागपुर सत्याग्रह में षामिल होने चल पड़े और 1923 में अपने नायकत्व में झंडा सत्याग्रह को सफल किया। इतिहासकार कहते हैं- झंडा सत्याग्रह आजादी के आंदोलन का अद्वितीय और सर्वोत्तम अध्याय है। उन्होंने यह भी कहा, हम सब लोग बात करते हैं, बोलना तो माखनलाल जी ही जानते हैं। गणेष षंकर विद्यार्थी के एक वर्श जेल में रहने के दौरान अक्टूबर 1923 से मार्च 1924 तक माखनलाल जी ने ’प्रताप‘ को संभाला। ’प्रताप‘ के संपादन से मुक्त होने के बाद उन्होंने कानपुर में ही ’प्रभा‘ के प्रकाषन का दायित्व भी संभाला। फिर 1928 से पुन: ’कर्मवीर‘ का खण्डवा से प्रकाषन षुरू किया जो 1959 तक चला।
1919 में इतिहास प्रसिद्ध आयोजन हुआ- फकीर गांधी का। माखनलाल जी भी इसमें सम्मिलित थे। वह गांधी जी के भाशण से आष्वस्त नहीं हुए लेकिन आयोजन में फकीर की बानी से राजा-महाराजाओं के पानी उतरने का जो नजारा देखा, उससे निष्चय किया कि अब वही कार्यक्रम स्वीकार करना है, जिसे गांधी जी अपनाएंगे। प्रगट रूप से माखनलाल जी अपने सषस्त्र क्रांति के विचार की सक्रियता से विश्राम लेकर गांधी जी की राजनीति में संगी-यात्री हो गए।
अप्रैल 1919 में तृतीय मध्य प्रान्तीय हिंदी साहित्य सम्मेलन हुआ। उसमें प्रस्ताव पारित हुआ कि मध्य प्रांत के हिंदी क्षेत्रों से एक हिंदी पत्र निकलना चाहिए। 1919 की जुलाई-अगस्त में पत्रिका (साप्ताहिक) का डिक्लेरेषन लिया गया। जबलपुर से डिक्लेरेषन के वक्त उन्हें सलाह दी गई थी कि वह अंग्रेज अधिकारियों को बताए कि रोजी-रोटी के लिए यह पत्र निकाला जा रहा है। पर माखनलाल जी ने मजिस्टेट मिस्टर मिथाइस से कहा- मैं ऐसा पत्र निकालना चाहूंगा कि ब्रिटिष षासन चलते-चलते रुक जाए। फिर भी ’कर्मवीर‘ के डिक्लेरेषन की अर्जी मंजूर हो गई। 17 जनवरी 1920 से ’कर्मवीर‘ का प्रकाषन जबलपुर में आरंभ हुआ। पण्डित विश्णुदत्त षुक्ल एवं पं. माधवराव ने पहले अंक का प्रथम अग्रलेख लिखा- ’हम चल पड़े हैं।‘ हमारी ऑखों में भारतीय जीवन गुलामी की जंजीरों से कसा दिखता है। हृदय से पवित्रता पूर्वक हम प्रयत्न करेंगे कि वे जंजीरें फिसल जाए या टुकड़े-टुकड़े होकर गिरने की कृपा करें। हम स्वतंत्रता के हामी हैं, मुक्ति के उपासक हैं। हम जिस तरह भीरूता नश्ट कर देने के लिए तैयार रहेंगे, उसी तरह अत्याचारों को भी। जिनके पास बल है, किन्तु मनुश्यता नहीं, उनको हम मनुश्यता की याद दिलाएंगे। जिनके पास मनुश्यता है, किन्तु संसार का कोई बल नहीं, उन निर्बलों को उनके बल की याद दिलाएंगे। संसार के इस सिद्धान्त के षंखध्वनि में साथ देंगे कि अपने आप पर षासन करने के लिए तैयार हों। हमारा विष्वास हैं कि संसार के सब विभागों की गुलामी खड़ी नहीं रह सकती, यदि हम अपने आपके षासक हो जाएं। माखनलाल जी ने स्पश्ट लिखा कि ’भारत को उस ताकत की जरूरत है, जिसमें चाहे प्राण देना पड़े, चाहे अपने बच्चों को कटवाना पड़े, किन्तु जिसका एकमात्र लक्ष्य हो स्वाधीनता। जिस स्वाधीनता के लिए देष की हजारों जाने कुर्बान न हों, वह स्वाधीनता भारत की स्वाधीनता नहीं। भारत के लिए एक ही पथ है- प्राण देकर स्वाधीनता प्राप्त करना, डिप्लोमेसी नहीं जो कायरता का चिन्ह है। भारत के लिए सच्चा मार्ग अहिंसात्मक असहकारिता ही है।
जो होना था, वही हुआ। ’कर्मवीर‘ के अहिंसक सत्याग्रही रूप के तेज से ब्रिटिष हुकूमत की ऑखें चौंधियाने लगीं। प्रषासन बौखला गया। उसने 124(ए) (राजद्रोह) का अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा। 12 जून 1921 को पं. माखनलाल चतुर्वेदी राजद्रोह के अपराध में गिरतार कर लिए गए, वह भी ’कर्मवीर‘ में प्रकाषित किसी रिपोर्ट या आलेख के लिए नहीं, बल्कि 12 मार्च 1921 को बिलासपुर जिला कान्फ्रेन्स में दिए गए भाशण के लिए। उन्हें आठ महीने की कड़ी कैद की सजा दी गई। सजा काटकर माखनलाल जी वापस आए तो देखा कि ’कर्मवीर‘ का वातावरण बदला हुआ था। मूल नीति न बदलने पर उन्हें ’कर्मवीर‘ के संपादक पद से डिसमिस कर दिया गया।
4 अप्रैल 1925 से रामनवमी के दिन ’कर्मवीर‘ दुबारा प्रकाषित हुआ, इस बार वह खण्डवा से निकला, अब यह माखनलाल चतुर्वेदी का निजी प्रकाषन था। चंद अंकों से ही ’कर्मवीर‘ अखिल भारतीय ख्याति का पत्र बन गया। ’कर्मवीर‘ सहस्त्रों पाठकों की आषा-आकांक्षाओं का प्रतीक बन गया। उसकी वैचारिक तेजस्विता और आधुनिकता से भयभीत होकर अनेक रियासतों- भोपाल, झाबुआ, धार, इंदौर, ग्वालियर एवं देवास और साथ ही राजस्थान की कुछ रियासतों ने ’कर्मवीर‘ का प्रवेष अपने यहां निशिद्ध कर दिया। इंदौर में तो कानूनन निशिद्ध कर दिया गया। चतुर्वेदी जी ने ’कर्मवीर‘ के पाठकों से लेकर लेखकों और व्यवस्थापकों के बीच प्रतिश्ठा के साथ पत्रकारिता व पत्र-उद्यम व व्यवसाय चलाने के लिए निम्न पैमाने रखे- कर्मवीर के संपादन और कर्मवीर की कठिनाईयों का उल्लेख न करना, कभी धन के लिए अपील न निकालना, ग्राहक संख्या बढ़ाने के लिए ’कर्मवीर‘ के कालमों में न लिखना, सनसनीखेज खबरे कभी न छापना, विज्ञापन जुटाने के लिए किसी आदमी की नियुक्ति न करना, क्रांतिकारी पार्टी के खिलाफ गांधी जी के भी वक्तव्य छापने से इंकार करना। ऐसी स्थिति में ’कर्मवीर‘ जन-जीवन का लाडला बना। वह जितनी तीक्ष्णता से ब्रिटिष षासन के पापों पर आक्रमण करता था, उतनी ही तीव्रता से उन लोगों को चुनौती देता जो देषद्रोह और षोशण का खुला खेल खेलते थे। इसीलिए ’कर्मवीर‘ अपने समय का विष्वास-सेतु बन गया। पत्रकारिता की षक्ति ’कर्मवीर‘ के माध्यम से उजागर हुई। अनेक आंदोलनों में ’कर्मवीर‘ ने नेतृत्व किया और अभूतपूर्व सफलताऍ अर्जित कीं। माखनलाल जी ने ’कर्मवीर‘ के माध्यम से एक ऐसे राश्ट्रीय चिंतन को जन्म दिया जिसे अंतर्राश्ट्रीय राश्ट्रीयता कहा जा सकता है।
माखनलाल जी का स्पश्ट कहना था, जिस देष में कलम तलवार जैसी प्रखर नहीं होती, उस देष में तलवार भी तलवार बनकर नहीं रह सकती। 1930 में बैतूल के जगल सत्याग्रह में उन्होंने सहयोग किया। 29 अप्रैल 1930 जबलपुर में असहयोग आंदोलन में गिरतार किए गए। 1943 में ’हिम किरीटनी‘ और ’साहित्य देवता‘ का प्रकाषन हुआ। ’हिम किरीटनी‘ पर उन्हें देव पुरस्कार प्राप्त हुआ। देष की आजादी के बाद ’हिम तरंगिनी‘ पर उन्हें 1954 में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। यह पुरस्कार पाने वाले चतुर्वेदी जी प्रथम हिंदी साहित्यकार थे। 1963 में उनकी विषिश्ट साहित्यिक सेवाओं के लिए पद्म भूशण सम्मान प्राप्त हुआ। जिसे अपने विद्रोही स्वभाव के चलते 10 सितम्बर 1967 को राश्ट्र भाशा विधेयक के विरोध के चलते उन्होंने परित्याग कर दिया। अंतत: 30 जनवरी 1968 के दिन वह सदैव के लिए पृथ्वी की गोद में सो गए।

चुनौतीपू्र्ण सफर को आसान बनाया
बी.डेविड
कमलनाथ ने जब मध्यप्रदेश का नेतृत्व सम्हाला। फिर चाहे वह कांग्रेस पार्टी का हो या सरकार का, उनके सामने चुनौतियों का पहाड़ था। प्रदेश में संगठन की स्थिति बद से बदतर वाली थी। पंद्रह साल भाजपा राज के कारण जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा हुआ था। सरकार के दमन चक्र से आम कार्यकर्ता हतोत्साहित था। एकजुटता का अभाव था। धन, बल दल या अहंकार से लबरेज भाजपा सरकार से दो-दो हाथ करने की एक पहाड़ जैसी चुनौती उनके सामने थी। विधानसभा चुनाव नजदीक थे। ऐसे में हताश कार्यकर्ता के साथ एक अहंकारी, धन, बल और छल की भाजपा सरकार के साथ चुनाव के महायुद्ध में लड़ना और जीतना असंभव सा दिखलाई देता था। जादू की कोई छड़ी नहीं थी कि वे उसे छुआकर इन सारी स्थितियों को सामान्य कर दें। कमल नाथ जी के अध्यक्ष बनने के बाद केन्द्रीय नेतृत्व हो या आम कांग्रेस कार्यकर्ता बड़ी उम्मीद से कमल नाथ जी की और देख रहा था। आसान काम करना उनकी फितरत में नहीं था। चुनौतियाँ स्वीकार करना और उनसे दो-दो हाथ करना कमल नाथ जी का स्वभाव है। उनका राजनीति में 45 साल का एक ऐसा लंबा अनुभव है जिसमें उन्होंने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के देशव्यापी चुनौतियों का सामना किया है।
मई 2018 में जब वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने तब विधानसभा चुनाव आते-आते उन्होंने पूरे प्रदेश में कांग्रेसी संगठन को जो मजबूती दी वह आश्चर्य चकित कर देने वाली थी। इन छह माह में उन्होंने गाँव-गाँव में कार्यकर्ताओं की एक ऐसी फौज तैयार की जो हताशा से उबर कर उत्साह और ऊर्जा से परिपूर्ण थी। इस दौरान उन्होंने संगठन में लगभग दो लाख नियुक्तियाँ कर सोए हुए संगठन को खड़ा कर दिया। विधानसभा चुनाव आते-आते उन्होंने एक ऐसी फौज तैयार कर ली थी जो 15 साल की चुनौती का सक्षमता के साथ मुकाबला कर सके। यह उनका आत्म-विश्वास और साहसिक फैसला था कि उन्होंने प्रदेश में किसी भी गठबंधन के बगैर कार्यकर्ताओं की दम पर चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। उन्होंने जो ठाना, जैसा सोचा, वह 11 दिसम्बर को कर दिखाया। जब प्रदेश में कांग्रेस पार्टी को 15 साल बाद सत्ता में लौटने का जनादेश मिला। मध्यप्रदेश में कांग्रेस का न केवल 15 साल का वनवास खत्म हुआ बल्कि एक अहंकारी, कुशासित और भ्रष्टाचारी भाजपा शासन से प्रदेश के किसानों, बेरोजगारों और आम नागरिकों को मुक्ति भी मिली।
सालभर पहले इस तरह के परिणाम की उम्मीद करने की कोई सोच भी नहीं सकता था। कमल नाथ जी ने 11 माह में मध्यप्रदेश में एक ऐसा चमत्कार दिखलाया जिससे इतने कम समय में 15 साल के बिखरे-टूटे और सुस्त संगठन ऊर्जावान नहर आने लगा। वहीं 15 साल के लंबे समय के बाद कांग्रेस को जनादेश दिलवाने में सफलता हासिल कीं। भाजपा के खोखले “ओरा” मेंअपनी कुशल रणनीति से सबके साथ मिलकर उन्होंने जो सेंध लगाई उसने उन्हें प्रदेश के आम कार्यकर्ताओं का मसीहा बना दिया। कांग्रेस की सरकार प्रदेश में बनाना तो एक चुनौती तो थी ही लेकिन उससे बड़ी चुनौती अब उनके सामने सरकार चलाने की थी। किसानों की कर्ज माफी, बेरोजगारी में नंबर-वन प्रदेश, महिलाओं के ऊपर बलात्कार में नंबर वन प्रदेश, किसानों की आत्महत्या में नंबर-वन प्रदेश को भाजपा से मुक्त कराकर इन समस्याओं से मुक्त कराने की चुनौती आसान नहीं थी। यह चुनौती उन्होंने 17 दिसम्बर को मुख्यमंत्री बनते ही स्वीकारी।
खाली-खजाना और आसन्न लोकसभा चुनाव उनके सामने एक बड़ी बाधा थी। राहुल गांधी का वचन 10 दिन में किसानों की कर्ज माफी का फैसला उनके सामने था। पर वे इस दौरान कभी विचलित नहीं हुए। उनके चेहरे का आत्म-विश्वास और उनके कद, अनुभव और चुनौतियों से निपटने की उनकी अभिनव रणनीतियों ने हर मुश्किल चीज को आसान कर दिया। शपथ लेते ही पहले घंटे के अंदर उन्होंने कर्ज माफी का मध्यप्रदेश के इतिहास का सबसे बड़ा साहसिक फैसला लिया। यहाँ एक और तथ्य का उल्लेख जरूरी है। किसी भी पार्टी का घोषणा पत्र वह भी वचन-पत्र के रूप में प्रदेश की जनता के सामने रखना खेल नहीं था। कमल नाथ जी ने वचन-पत्र के हर बिन्दु को पूरे होशो-हवास के साथ शामिल किया। वे कमिटमेंट वाले व्यक्तित्व हैं इसलिए उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि सिर्फ चुनाव जीतने के लिए वचन-पत्र नहीं बनेगा। वह पाँच साल में पूरा हो, इस आधार पर उन्होंने वचन-पत्र बनाया। हर क्षेत्र के विशेषज्ञों की मदद से उन्होंने उस वचन-पत्र को तैयार किया। उन्हें पता था कि शिवराज सरकार ने चुनाव जीतने के लिये पूरे प्रदेश को दाँव पर लगा दिया है। उन्होंने वचन-पत्र के हर बिन्दु को पूरे होने पर क्या वित्तीय भार आएगा इसका आंकलन करवाया तब जाकर उन्होंने वचन-पत्र को अंतिम रूप दिया।
कमिटमेंट पूरा करने और लोगों का सरकार के प्रति विश्वास लौटाने के लिए उन्होंने वचन-पत्र के हर बिन्दु पर पहले दिन से ही काम शुरू कर दिया। 50 लाख किसानों के 53 हजार करोड़ का कर्ज माफ करने का फैसला लिया और उसे 40वें दिन पूरा कर दिखाया। यह उनकी सोची-समझी रणनीति का परिणाम था कि एक एतिहासिक फैसले को उन्होंने इतने कम समय में पूरा करके एक नया इतिहास बनाया। उसके बाद नौजवानों के लिए युवा स्वाभिमान योजना शुरू कर, बिजली के बिल को आधा कर, कन्यादान विवाह योजना की अनुदान राशि 28 हजार से 51 हजार करने, सामाजिक सुरक्षा पेंशन 300 से बढ़ाकर 600 रुपये करने सहित 76 दिन में वचन-पत्र के 83 बिन्दुओं को पूरा कर दिया। यह उनके प्रशासनिक अनुभव और दृढ़ इच्छाशक्ति का ही कमाल था। यही नहीं उन्होंने प्रदेश की आधी आबादी पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने एवं 10 प्रतिशत सवर्णों को आरक्षण देने की घोषणा करके सबको चौंका दिया। कोई इतने कम दिन में इतने बड़े फैसले कैसे ले सकता है। वह भी बगैर आडम्बर के, शोर शराबे, के बिना फोटो विज्ञापन के। 17 दिसम्बर के पहले तो इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती थी कि प्रदेश में ऐसी भी कोई सरकार हो सकती है। उद्योगों का विश्वास लौटाने के लिए उन्होंने निवेश की नई रणनीति बनाई। इसमें रोजगार की संभावना और उपलब्धता को सर्वोच्चता पर रखा। उन्होंने सबसे पहले मौजूदा उद्योगों का सरकार पर विश्वास कायम हो, इस बुनियादी जरूरत पर ध्यान दिया। गोलमेज कांफ्रेंस बुलाई। यानी इतने कम दिनों में हर वर्ग, हर क्षेत्र और हर स्तर पर उन्होंने जो फैसले लिए वे इतने कम समय में गागर में सागर भरने के समान ही हैं।
जैसा कि ऊपर इस बात का जिक्र है कि कमल नाथ जी के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं थी कि वे संगठन से लेकर सरकार तक बिखरी पड़ी चुनौतियों को समाप्त कर सकें। पर आज 100 दिन बाद यह महसूस होता है कि कोई न कोई तो उनके पास छड़ी जरुर है जिसका जादू साफ नजर आ रहा है। उसके दम पर उन्होंने इतना कुछ कर दिखाया। वह भी पूरी सादगी और बगैर किसी हो हल्ला के। यही कमल नाथ जी की काबिलियत है जिसकी बहुत समय से जरूरत इस प्रदेश को थी। पाँच साल बाद इस प्रदेश को जब हम देखेंगे तो खुद ही कहेंगे कि यह तो जादू की छड़ी का कमाल है।

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