आलेख 21

इंसानियत की ऊंची मिसाल
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
गुजरात में सावरकुंडला के एक मुस्लिम परिवार ने इंसानियत की बहुत ऊंची मिसाल कायम कर दी है। मियां भीखू करैशी और भानुशंकर पंडया, दोनों मजदूर थे। चालीस साल पहले एक ही जगह मजदूरी करते-करते दोनों की दोस्ती हो गई। पंडया ने शादी नहीं की। वे अकेले रहते थे। कई साल पहले उनका पांव टूट गया। वे बड़ी तकलीफ में रहते थे। उनके दोस्त कुरैशी ने आग्रह किया कि वे कुरैशी परिवार के साथ रहा करें। पंडया मान गए। साथ रहने लगे। कुरेशी के तीन लड़के थे। अबू, नसीर और जुबैर। तीनों की शादी हो गई। बच्चे हो गए। ये बच्चे पंडया को बाबा कहते थे और कुरैशी की बहुएं रोज सुबह उठकर पंडया के पांव छूती थीं। पंडया के लिए रोज़ अलग से शुद्ध शाकाहारी भोजन बनता था। तीन साल पहले भीखू कुरैशी की मृत्यु हो गई। यह घटना उनके परम मित्र भानुशंकर पंडया के लिए बड़ी हृदय-विदारक सिद्ध हुई। उनका दिल टूट गया। वे बीमार रहने लगे। इस पूरे परिवार ने पंडयाजी की सेवा उसी लगन से की, जैसे कुरैशी की की थी। पिछले हफ्ते जब पंडया का अंत समय आ पहुंचा तो उन्हें गंगाजल मंगवाकर पिलवाया गया। जब उनका निधन हुआ तो कुरैशी-परिवार ने तय किया कि उनको वैसी ही अंतिम बिदाई दी जाएगी, जो किसी ब्राह्मण को दी जानी चाहिए। इस मुस्लिम परिवार के बच्चे अरमान ने नई धोती और जनेऊ धारण की और अपने ‘हिंदू-बाबा’ का शनिवार को दाह-संस्कार किया। कपाल-क्रिया की। यह परिवार है, जो दिन में पांच बार नमाज पढ़ता है और बड़ी निष्ठा से रोजे रखता है। दाह-संस्कार करनेवाले बच्चे अरमान ने कहा है कि वह अपने ‘दादाजी’ की 12 वीं पर अपना मुंडन भी करवाएगा। यह विवरण जब मैंने ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ में पढ़ा तो मेरी आंखें भर आईं। मैं सोचने लगा कि कुरैशी परिवार के द्वारा ऐसा आचरण क्या इस्लाम के खिलाफ है ? यदि मैं किसी मुल्ला-मौलवी से पूछता तो वे कहते कि यह कुरैशियों की काफिराना हरकत है। यह इस्लाम के खिलाफ है। बिल्कुल यही बात मुझे हिंदू पोंगा पंडित भी कहते यदि कोई पंडया-परिवार किसी कुरैशी या अंसारी को ऐसी ही अंतिम बिदाई देता तो। लेकिन मज़हबों के इन ठेकेदारों से मैं पूछता हूं कि क्या धर्म का मर्म इन कर्मकांडों में ही छिपा है ? क्या धर्म याने भंगवान और इंसान के रिश्तों में इन रीति-रिवाजों का ही महत्व सबसे ज्यादा है ? क्या ईश्वर, अल्लाह, यहोवा और गॉड को देश और काल की बेड़ियां पहनाई जा सकती हैं ? कुरैशी परिवार ने इन बेड़ियों को तोड़ा है। उसने इस्लाम की इज्जत बढ़ाई है। मैं उसे बधाई देता हूं।

भारत बीफ निर्यात में विश्व में नंबर वन, 71 फीसदी भारतीय मांसाहारी!
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
वर्तमान में देश में आवारा पशुओं का उपयोग मांस निर्यात में किया जा रहा हैं और उसके बदले हम उससे अधिक राशि का रासायनिक खाद का उपयोग खेती में करते हैं .एक निरुपयोगी पशु भी बहुत खाद का काम करता हैं .उसके गोबर और मूत्र का उचित उपयोग करके हम जैविक खाद बनाकर खेती में उपयोग कर सकते हैं .पर उनका रख रखाव महंगा होने से उन्हें हम आवारा छोड़ देते हैं और उनका उपयोग कसाई करते हैं .इसके लिए सरकारों को गौशालाएं और दयोदय केंद्र खोलकर संरक्षण करना होगा .
उल्लेखनीय है कि भारत बीफ निर्यात में विश्व में पहले स्थान पर है। भारत में बीफ का सालाना कारोबार की रकम करीब सालाना 27 हजार करोड़ रुपए है। उल्लेखनीय है कि अमेरिकी कृषि विभाग का कहना है कि बीफ के निर्यात में भारत ब्राजील के साथ संयुक्त रूप से दुनिया में नंबर एक पर है। आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2015-16 में भारत की बीफ मार्केट में करीब 20 फीसदी की हिस्सेदारी थी।
वहीं वित्त वर्ष 2014-15 में भारत ने 24 लाख टन बीफ निर्यात किया था। दुनिया में निर्यात होने वाले कुल बीफ में करीब 60 फीसदी हिस्सेदारी भातर, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया की है। 2013-14 में भारत की भागीदारी 20.8 फीसदी की थी। इस लिहाज से बीफ एक्सपोर्ट में भारत ने प्रगति की है।
पिछले दो सालों में भारत ने बासमती चावल से भी ज्यादा बीफ का निर्यात किया है। पिछले 5 सालों में कुल निर्यात रेवेन्यू में बीफ निर्यात से होने वाली आय 0.76 प्रतिशत से बढक़र 1.56 प्रतिशत हो गई है। उधर कुछ दिनों पहले खबर आई थी कि ब्राजील में हानिकारक बीफ बेचे जाने के कारण यहां बीफ का आयात बंद कर दिया गया है।
अगर ब्राजील में ये बैन लगा रहता है तो भारत सहित कई देशों को फायदा हो सकता है। क्योंकि ब्राजील अब भारत से मांस आयात करने के बारे में सोच रहा है। वहीं मांस की सबसे ज्यादा खपत वाले देश चीन ने भारत से बीफ आयात पर हामी भरी है।
मीट प्रॉडक्शन और एक्सपोर्ट को प्रमोट करने के लिए केंद्र सरकार के ‘पिंक रेवॉल्यूशन’ का नतीजा दिखाई देने लगा है। देश में मीट प्रॉडक्शन और इसका एक्सपोर्ट बीते चार साल में 44 फीसदी बढ़ा है लेकिन इंडस्ट्री को रेग्युलेट करने में यह योजना नाकाम रही है।
सभी राज्यों के ऐनिमल हज्बैंड्री डिपार्टमेंट्स से एकत्रित डाटा के मुताबिक, रजिस्टर्ड कसाईघरों के मीट प्रॉडक्शन साल 2008 के 5.7 लाख टन के मुकाबले साल 2011 में 8.05 लाख टन पहुंच गया है। बोवाइन (बीफ और कैटल मीट) से होने वाली आय साल 2012-13 में 18,000 करोड़ रुपए कमाई कर सकती है। साल 2012 में भारत बीफ एक्सपोर्ट करने वाला नंबर एक देश बना।
उत्तर प्रदेश साल 2011 में तीन लाख टन के साथ टॉप बाफलो मीट-प्रड्यूसिंग राज्य बना। कम से कम 70 फीसदी बाफलो की माट एक्सपोर्ट किया गया। उत्तर प्रदेश में हिंद एग्रो इंडस्ट्रीज के डायरेक्टर सुरेंद्र कुमार रंजन ने बताया कि हमारे मीट बिना चर्बी वाले होने के साथ सस्ते भी होते हैं। हम हलाल मीट की सप्लाई करते हैं, जिसे खाड़ी देशों में प्रमुखता मिलती है।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरने वाले मीट को यूरोप, दक्षिण-पूर्व एशिया और खाड़ी देशों में भेज दिया जाता है लेकिन एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि देश में बिकने वाले मीट की बड़ी संख्या घटिया किस्म की होती है। बेस्ट क्वॉलिटी मीट को देश से बाहर भेज दिया जाता है जबकि बी-ग्रेड मीट घरेलू मार्केट में पहुंचता है।
सरकारों की दुरंगी नीतियों के कारण पशु हिंसा बढ़ रही हैं और मांस निर्यात निरंतर बढ़ रहा हैं और दूसरी और सरकारें अनमने मन से पशु संरक्षण का नाटक करती हैं .कारण मांस निर्यात से आर्थिक उन्नति होना लक्ष्य हैं .इस रफतार से यह क्रम चला तो आने वाले वर्षों में पशु धन समाप्त हो जायेगा
इसके लिए सरकार आवारा पशुओं के संरक्षण वास्ते घास भूसा और सुरक्षा प्रदान करे ,तथा ऊपर के आंकड़ों के हिसाब से मांस खाना हानि करक हैं और अनेकों वैज्ञानिकों ने चेताया भी हैं पर जिव्हा लोलुपी लोगों के कारण मांसाहार का चलन बढ़ाना और बढ़ना देश ,समाज ,परिवार और व्यक्तिगत रूप से हानिकारक होगा और हैं .कही यह परिपाटी हमारे परिवारों में तो लागु नहीं हो गयी ,हम भी अपने वृद्ध अनुपयोगी माता पिता को वृधाश्रम में तो नहीं डालने लगे ?
गौशालाओं और दयोदय केंद्रों के माध्यम से जीव दया के साथ पशुसंरक्षण भी होगा और हम अहिंसक समाज का निर्माण में योगदान दे सकेंगे।

तेल के दाम में आग
सिद्धार्थ शंकर
सऊदी अरब के ऑइल प्रोसेसिंग प्लांट्स पर शनिवार को ड्रोन से हुए हमलों के चलते इंटरनेशनल मार्केट में तेल के दाम 10 फीसदी बढ़ गए हैं। सोमवार के एशियाई बाजारों में शुरुआती कारोबार में कीमतों में तेजी देखी गई, जिसका असर पूरे विश्व पर पड़ सकता है। हमले की वजह से दुनिया के सबसे बड़े क्रूड उत्पादक की आपूर्ति करीब आधी हो गई और कच्चे तेल की कीमत ऊपर पहुंच गई हैं। एशियाई बाजार में शुरुआत में ब्रेंट क्रूड 11.77 फीसदी की तेजी के साथ 67. 31 डॉलर प्रति बैरल हो गया है। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट 10.68 फीसदी चढ़कर 60.71 डॉलर पहुंच गया।
इस बीच अरामको हमले के बाद बाजार में फैली घबराहट दूर करने की कोशिशें कर रही है। कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिन नसीर ने बाजार को आश्वस्त करने की कोशिश करते हुए कहा, ‘उत्पादन क्षमता को दोबारा पुराने स्तर पर लाने के लिए काम चल रहा है। अरामको को कुछ ही दिनों में अधिकांश उत्पादन दोबारा शुरू कर लेने की उम्मीद है। यह ड्रोन हमला ऐसे समय में हुआ है, जब कंपनी 100 अरब डॉलर की पूंजी जुटाने के लिए आईपीओ (प्रथम सार्वजनिक शेयर बिक्री) की तैयारी में है। विश्लेषकों का मानना है कि इस हमले से शायद ही आईपीओ की योजना टले, लेकिन कंपनी के मूल्यांकन पर इसका असर देखने को मिल सकता है। सऊदी इंक किताब के लेखक एलेन वॉल्ड ने कहा, ‘सउदी अरब के पास प्रचुर मात्रा में तेल का भंडार है, जिससे उपभोक्ताओं की मांग को पूरा किया जा सकता है। मुझे नहीं लगता कि इस कारण अरामको को किसी तरह का आर्थिक नुकसान होने वाला है।Ó ऐसा माना जाता है कि सउदी अरब के पास कई भूमिगत स्टोरेज फैसिलिटीज हैं, जिनमें तमाम रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के लाखों बैरल यूनिट्स भंडारित हैं। संकट के समय इनका इस्तेमाल किया जा सकता है।
अरामको की दो तेल रिफाइनरियों पर हुए ड्रोन हमले के बाद अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर गहरा गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जो कल तक ईरान से बातचीत किए जाने को तैयार थे, अब बिफर गए हैं। ट्रंप की तरफ से विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा कि सऊदी अरब पर लगभग 100 हमलों के लिए तेहरान जिम्मेदार है जबकि रूहानी और जरीफ कूटनीति में शामिल होने का दिखावा करते हैं। ईरान ने अब दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर एक अभूतपूर्व हमला किया है। यमन के हमलों का कोई सबूत नहीं है। बता दें कि ड्रोन हमले के कारण रियाद से 150 किलोमीटर दूर अबकैक शहर में रिफाइनरी में आग लग गई। अरामको कंपनी दुनिया के सबसे बड़े ऑयल प्रोसेसिंग प्लांट के रूप में जानी जाती है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा कि ईरान ने दुनिया भर में तेल सप्लाई रोकने के लिए ड्रोन हमले करवाए हैं।
यमन के ईरान समर्थित हाउती विद्रोहियों ने ऑयल रिफाइनरी पर हमले की जिम्मेदारी ली है। विद्रोहियों ने बड़े पैमाने पर ऑपरेशन शुरू किया जिसमें 10 ड्रोन शामिल थे, जिन्होंने पूर्वी अरब में अबकीक और खुरेस में रिफाइनरियों को निशाना बनाया। इस हमले के बाद फारस की खाड़ी में तनाव बढऩे की आशंका प्रबल हो गई है क्योंकि एटमी डील को लेकर अमेरिका और ईरान पहले से एक-दूसरे के आमने-सामने हैं। अरामको का खुरेस प्लांट हर दिन लगभग 10 लाख बैरल कच्चा तेल प्रोसेस करता है। अरामको के मुताबिक, इस प्लांट के पास फिलहाल 20 अरब बैरल तेल रिजर्व है। यह हमला ऐसे समय हुआ है, जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के हालात हैं। ईरान और अमेरिका के बीच पैदा हुए तनाव को लेकर दुनिया दो हिस्सों में बंटती नजर आ रही है। फिक्र की बात ये है कि दोनों ही तरफ परमाणु ताकत से लैस देशों की खेमेबंदी है। ऐसे में जरा सी चूक एक भयानक जंग को जन्म दे सकती है।

पर हित सरस धरम नहिं भाई
प्रो.शरद नारायण खरे
परोपकार अथवा परहित के बारे में कहा गया है कि,
“परहित सरस धरम धर्म नहिं भाई।
परपीड़ा सम नहिं अधमाई।।”
परोपकार की भावना मनुष्य को महानता की ओर ले जाती है। परोपकार से बढ़कर कोई पुण्य नहीं है। ईश्वर भी प्रकृति के माध्यम से हमें यह दर्शाता है कि परोपकार ही सबसे बड़ा गुण है क्योंकि पृथ्वी, नदी अथवा वृक्ष सभी दूसरों के लिए ही हैं।
‘वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै,
नदी न सर्चै नीर।
परमारथ के कारणे, साधुन धरा शरीर।’
परोपकार अर्थात् ‘पर+उपकार’ यानी दूसरों के लिए स्वयं को समर्पित करना व्यक्ति का सबसे बड़ा धर्म है। नदी का जल दूसरों के लिए है। वृक्ष कभी स्वयं अपना फल नहीं खाता है। इसी प्रकार धरती की सभी उपज दूसरों के लिए होती है। चाहे कितनी ही विषम परिस्थितियाँ क्यों न हों परन्तु ये सभी परोपकार की भावना का कभी परित्याग नहीं करते हैं।
वे मनुष्य भी महान होते हैं जो विकट से विकट परिस्थितियों में भी स्वयं को दूसरों के लिए, देश की सेवा के लिए अपने आपको बलिदान कर देते हैं। वे इतिहास में अमर हो गए। जब तक मानव सभ्यता रहेगी उनकी कुर्बानी सदा याद रहेगी।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस संदर्भ में बड़ी ही मार्मिक पंक्तियाँ लिखी हैं।
”परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अघमाई।।”
उन्होंने ‘परहित’ अर्थात् परोपकार को मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म बताया है। वहीं दूसरी ओर दूसरों को कष्ट पहुँचाने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है। परोपकार ही वह गुण है जिसके कारण प्रभु ईसा मसीह सूली पर चढ़े, गाँधी जी ने गोली खाई तथा गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने सम्मुख अपने बच्चों को दीवार में चुनते हुए देखा।
सुकरात ने विष के प्याले का वरण कर लिया लेकिन मानवता को सच्चा ज्ञान देने के मार्ग का त्याग नहीं किया। ऋषि दधीचि ने देवताओं के कल्याण के लिए अपना शरीर त्याग दिया। इसके इसी महान गुण के कारण ही आज भी लोग इन्हें श्रद्‌धापूर्वक नमन करते हैं।
परोपकार ही वह महान गुण है जो मानव को इस सृष्टि के अन्य जीवों से उसे अलग करता है और सभी में श्रेष्ठता प्रदान करता है। इस गुण के अभाव में तो मनुष्य भी पशु की ही भाँति होता।
‘मैथिलीशरण गुप्त’ जी ने ठीक ही लिखा है कि:
“यह पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे।
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
अत: वही मनुष्य महान है जिसमें परोपकार की भावना है। वह निर्धनों की सहायता में विश्वास रखता है। वह निर्बलों का सहारा बनता है तथा खुद शिक्षित होता है और शिक्षा का प्रकाश दूसरों तक फैलाता है। परोपकार की भावना से परिपूरित व्यक्ति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ भावना को अपनाकर मानवता के कल्याण के लिए निरंतर अग्रसर रहता है।
हमारे समाज में सामान्य जन परोपकार के प्रति सजग नहीं हैं और अपने ही स्वार्थ में लिप्त रहने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। इसका साक्षात् प्रमाण बड़े-बड़े सरकारी अस्पतालों में देखा जा सकता है जहाँ गरीब बीमार व्यक्तियों की कोई पूछ नहीं है। डाक्टर, नर्स सभी इन लोगों की उपेक्षा करते है।
मानवीय संवेदनहीनता का पता अन्य दैवी आपदाओं- बाढ़, भूकंप, सूखा आदि स्थितियों में भी चलता है। कभी-कभी जब दंगे-फसाद होते हैं तो लालचियों की बन आती है और वे लूट-खसोट पर उतर आते हैं। ऐसी क्षुद्रताएँ हमार समाज के लिए अभिशाप हैं। अत: आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने अंतर्मन में झाँक कर देखे और अपनी कमजोरियों को दूर करने का प्रयास करें।
“जिसने परमारथ गहा,उसमें है देवत्व।
ममता,करुणा औ’ दया,परहित के ही तत्व।। ”

रैगिंग पर रोक सामाजिक जरूरत
योगेश कुमार गोयल
सुप्रीम कोर्ट के सख्त दिशा-निर्देशों के बावजूद देशभर के कॉलेजों में रैगिंग के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे। पिछले महीने 20 अगस्त को इटावा के सैफई मेडिकल कॉलेज में वरिष्ठ छात्रों द्वारा रैगिंग के नाम पर करीब 150 जूनियर छात्रों के जबरन सिर मुंडवा दिए गए थे और मुख्यमंत्री के आदेश पर जिला प्रशासन द्वारा कराई गई शुरूआती जांच में यह भी साबित हो गया कि सैफई विश्वविद्यालय के कुलपति तथा रजिस्ट्रार ने इस मामले में लापरवाही बरती। उस मामले की जांच चल ही रही थी कि देखते ही देखते उसके बाद के एक सप्ताह के भीतर कई और कॉलेजों से भी रैगिंग की घटनाएं सामने आ गई, जो वाकई शर्मसाार कर देने वाली हैं। पिछले दिनों सहारनपुर में शेखुल हिन्द मौलाना महमूद उल हसन मेडिकल कॉलेज, देहरादून के राजकीय दून मेडिकल कॉलेज, हल्द्वानी राजकीय मेडिकल कॉलेज, राजस्थान में चूरू के पं. दीनदयाल उपाध्याय मेडिकल कॉलेज, कानपुर के चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय इत्यादि से भी सारे नियम-कानूनों को ताक पर रखकर जूनियर छात्रों की रैगिंग किए जाने के मामले सामने आए।
करीब एक दशक पहले रैगिंग के ऐसे दो मामले सामने आए थे, जिनका सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा संज्ञान लिया था और बहुत कड़े दिशा-निर्देश तय किए थे लेकिन उसके बावजूद जिस प्रकार हर साल कॉलेजों में नए सैशन की शुरूआत के बाद कुछ माह तक रैगिंग के नाम पर जूनियर छात्रों के साथ मारपीट तथा अमानवीय हरकतों की घटनाएं सामने आती रही हैं, उससे स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षण संस्थान अपने परिसरों में रैगिंग की घटनाओं को रोकने के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने और पर्याप्त कदम उठाने में कोताही बरत रहे हैं। 8 मार्च 2009 को देश के अपेक्षाकृत शांत समझे जाने वाले राज्य हिमाचल प्रदेश में कांगडा स्थित डा. राजेन्द्र प्रसाद मेडिकल कॉलेज में रैगिंग के चलते प्रथम वर्ष के छात्र 19 वर्षीय अमन सत्य काचरू की मौत और उसके 4 दिन बाद आंध्र प्रदेश में गुंटूर के बापतला स्थित कृषि इंजीनियरिंग कॉलेज की एक प्रथम वर्ष की छात्रा की कुछ सीनियर छात्राओं द्वारा की गई अभद्र रैगिंग के चलते उक्त छात्रा द्वारा आत्महत्या के प्रयास ने बुद्धिजीवियों सहित आम जनमानस को भी झकझोर दिया था और देश की सर्वोच्च अदालत को रैगिंग को लेकर कठोर रूख अपनाने पर विवश किया था। वैसे उससे चंद दिन पूर्व ही 11 फरवरी 2009 को भी सुप्रीम कोर्ट ने कठोर रवैया अपनाते हुए रैगिंग में ‘मानवाधिकार हनन की गंध आने’ जैसी टिप्पणियां करते हुए रावघन कमेटी की सिफारिशों को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया था।
यह विड़म्बना ही है कि सुप्रीम कोर्ट के कड़े रूख के बावजूद पिछले कुछ वर्षों में रैगिंग के चलते देशभर में कई दर्जन छात्रों की मौत हो चुकी है। आंकड़ों देखें तो पिछले सात साल के दौरान ही रैगिंग से परेशान होकर 54 छात्रों ने मौत को गले लगा लिया जबकि रैगिंग की कुल 4893 शिकायतें सामने आई। शिक्षण संस्थानों में खौफनाक रूप धारण कर उद्दंडतापूर्वक विचरण करते रैगिंग रूपी दानव के चलते अनेक छात्र मानसिक रोगों तथा शारीरिक अक्षमताओं के भी शिकार हो चुके हैं। रैगिंग के दौरान जूनियर छात्रों को कपड़े उतारकर नाचने के लिए बाध्य करना तो आज एक मामूली सी बात लगती है। कुछ कॉलेजों में तो इतनी भद्दी व अश्लील रैगिंग की जाती है कि छात्र रैगिंग से बचने के लिए होस्टलों की पहली या दूसरी मंजिलों से कूदकर भाग जाते हैं और इस भागदौड़ में कुछ अपने हाथ-पैर भी तुड़वा बैठते हैं तो कुछ को अपनी जान भी गंवानी पड़ती है। कुछ वर्ष पूर्व ऐसे ही कुछ मामले हरियाणा के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में भी सामने आए थे। रैगिंग से शारीरिक व मानसिक तौर पर प्रताडि़त होने वाले छात्रों में आत्महत्या जैसे हृदयविदारक कदम उठाने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है। रैगिंग के दौरान सीनियरों के अमानवीय व अश्लील आदेशों का पालन न करने वाले नए छात्रों की हत्या किए जाने के मामलों ने तो रैंगिंग के औचित्य पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
6 नवम्बर 1996 की एक अमानवीय घटना को तो कभी नहीं भुलाया जा सकेगा। उस दिन अन्नामलाई विश्वविद्यालय में रैगिंग के दौरान घटी एक बेहद वहशियाना घटना के बाद हालांकि दोषी सीनियर छात्र डेविड को अदालत द्वारा उसके घृणित अपराध के लिए करीब 36 वर्ष तक की अवधि की तीन अलग-अलग सजाएं सुनाई गई थी लेकिन लगता है कि इस तरह की घटना के परिणामों से रूबरू होने के बाद भी छात्रों ने कोई सबक नहीं लिया। शायद यही वजह है कि अदालतों को ही रैगिंग को लेकर कड़े दिशा-निर्देश जारी करने पर बाध्य होना पड़ा लेकिन फिर भी अगर रैगिंग के मामले लगातार सामने आ रहे हैं तो यह बेहद चिंता की बात है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर कॉलेजों में रैगिंग रोकने के उपायों की निगरानी के लिए नवम्बर 2006 में गठित की गई आर. के. राघवन समिति द्वारा उच्चतर शिक्षण संस्थानों में रैगिंग रोकने हेतु कठोर कदम उठाने के लिए संबंधित नियामक इकाईयों यूजीसी तथा ऐसे ही अन्य संस्थानों को वर्ष 2008 में नए शिक्षा सत्र शुरू होने से ठीक पहले फिर से निर्देश दिए गए थे, जिससे पुनः स्पष्ट हुआ था कि सुप्रीम कोर्ट के तमाम दिशा-निर्देशों और जद्दोजहद के बावजूद रैगिंग की समस्या जस की तस है। शिक्षा संस्थानों में रैगिंग की घटनाओं से निपटने के तौर-तरीकों के बारे में अनुशंसा देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर सीबीआई के पूर्व अध्यक्ष आर के राघवन की अध्यक्षता में गठित समिति के सुझावों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय खण्डपीठ ने रैगिंग के खिलाफ सख्त निर्देश जारी किए थे। राघवन समिति ने अपनी 200 पृष्ठों की रिपोर्ट ‘द मैनिस ऑफ रैगिंग इन एजुकेशनल इंस्टीच्यूट एंड मेजर्स टू कर्ब इट’ में रैगिंग रोकने के संबंध में करीब 50 सुझाव दिए थे लेकिन यह विड़म्बना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बार-बार कड़ा रूख अपनाए जाने के बावजूद न ही छात्र और न ही कॉलेज प्रशासन इससे कोई नसीहत लेते नजर आ रहे हैं।
कहना गलत न होगा कि पश्चिम की नकल के रूप में हल्के-फुल्के अंदाज में शुरू हुई रैगिंग रूपी यह परम्परा शिक्षण संस्थानों में एक ऐसे नासूर के रूप में उभरी है, जिसके चलते बीते कुछ वर्षों में बहुत से मेधावी छात्रों को शिक्षा बीच में छोड़कर अपने सपनों का गला घोंट वापस अपने घर लौट जाने का निर्णय लेना पड़ा, कुछ के समक्ष आत्महत्या जैसा कदम उठाने की नौबत आई तो कुछ छात्र रैगिंग के चलते मानसिक रोगी भी बन गए लेकिन स्थिति गंभीर होने के बाद भी जब न तो शिक्षा विभाग ने खौफनाक रूप धारण करती इस समस्या की ओर ध्यान दिया और न ही राज्य सरकारों या केन्द्र ने तो सुप्रीम कोर्ट को ही इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट के कड़े दिशा-निर्देशों के बावजूद देशभर में रैगिंग की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं तो स्पष्ट है कि न तो कॉलेज प्रशासन ऐसी घटनाओं को रोकने के प्रति गंभीर है और न ही संबंधित नियामक इकाईयां। राघवन कमेटी ने तो अपनी रिपोर्ट में रैगिंग से पीडि़त छात्रों के मामलों को दहेज पीडि़त महिलाओं के मामलों के समान देखने और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की सिफारिश भी की थी।
सर्वोच्च अदालत ने अपने एक फैसले में कहा था कि रैगिंग के मामलों में दंड कठोर होना चाहिए ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। कोर्ट ने शिक्षण संस्थानों को अपनी विवरणिकाओं में यह स्पष्ट निर्देश शामिल करने को भी कहा था कि जो भी छात्र रैगिंग में लिप्त पाए जाएंगे, उनका प्रवेश रद्द कर दिया जाएगा और अगर सीनियर छात्र ऐसा करेंगे तो उन्हें निष्कासित कर दिया जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जो शिक्षण संस्थाएं अपने यहां रैगिंग रोकने में असफल रहेंगी, उन्हें सरकार की ओर से मिलने वाला अनुदान या अन्य आर्थिक सहायता रोक दी जाएगी। अगर रैगिंग पर अंकुश लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों और इसके लिए शिक्षा संस्थानों, प्रशासन व छात्रावास अधिकारियों की जिम्मेदारियां तय करने के बावजूद रैगिंग के मामले हर साल लगातार बढ़ते रहे हैं तो इसका सा अर्थ यही है कि न तो सरकारें ऐसे मामले सोशल मीडिया के जरिये वायरल होने तक इन पर लगाम लगाने के प्रति कृतसंकल्प दिखती हैं और न ही कॉलेज प्रशासन अपनी जिम्मेदारी ठीक प्रकार से निभा रहे हैं।

लीक से हटकर चलने वाले राम जेठमलानी
डॉ. अरविन्द प्रेमचंद जैन
जैसे कहावत हैं शायर, शेर, सपूत ये हमेशा लीक से हटकर चलते हैं। उनमे से श्री जेठमलानी भी एक थे,बेबाकी, विवादी और निर्भयी होने से निडर थे। वर्तमान में ऐसे बिरले व्यक्तित्व के धनी जेठमलानी जी थे।
श्री राम जेठमलानी एक सुप्रसिद्ध भारतीय वकील और राजनीतिज्ञ थे। 6ठी व 7वीं लोक सभा में वे भारतीय जनता पार्टी से मुंबई से दो बार चुनाव जीते थे। बाद में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में केन्द्रीय कानून मन्त्री व शहरी विकास मन्त्री रहे थे। किसी विवादास्पद बयान के चलते उन्हें जब भाजपा से निकाल दिया था तो उन्होंने वाजपेयी के ही खिलाफ लखनऊ लोकसभा सीट से 2004 का चुनाव लड़ा था किन्तु हार गये। 7 मई 2010 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन का अध्यक्ष चुना गया था। 2010 में उन्हें फिर से भाजपा ने पार्टी में शामिल कर लिया था और राजस्थान से राज्य सभा का सांसद बनाया। राम जेठमलानी उच्च प्रोफाइल से सम्बन्धित मामलों के मुकदमे की पैरवी करने के कारण विवादास्पद रहे और उसके लिए उन्हें कई बार कड़ी आलोचना का सामना भी करना पड़ा था। यद्यी पि वे उच्चतम न्यायालय के सबसे महँगे वकील थे इसके बावजूद उन्होंने कई मामलों में नि:शुल्क पैरवी की। दिनांक 8 सितम्बर 2019 को स्वास्थ्य खराब होने के कारण उनका निधन हुआ
राम जेठमलानी का जन्म 14 सितम्बर 1923 को ब्रिटिश भारत के शिकारपुर शहर में जो आजकल पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त में है, भूलचन्द गुरुमुखदास जेठमलानी व उनकी पत्नी पार्वती भूलचन्द के यहाँ हुआ था। सिन्धी प्रथानुसार पुत्र के साथ पिता का नाम भी आता है अत: उनका पूरा नाम रामभूलचन्द जेठमलानी था परन्तु चूँकि उनके बचपन का नाम राम था अत: आगे चलकर वे राम जेठमलानी के नाम से ही मशहूर हो गये। स्कूली शिक्षा के दौरान दो-दो क्लास एक साल में पास करने के कारण उन्होंने 13 साल की उम्र में मैट्रिक का इम्तिहान पास कर लिया और 17 साल की उम्र में ही एल०एल०बी० की डिग्री हासिल कर ली थी। उस समय वकालत की प्रैक्टिस करने के लिये 21 साल की उम्र जरूरी थी मगर जेठमलानी के लिये एक विशेष प्रस्ताव पास करके 18 साल की उम्र में प्रैक्टिस करने की इजाजत दी गयी। बाद में उन्होंने एस०सी०साहनी लॉ कॉलेज कराची एल०एल०एम० की डिग्री प्राप्त की।
18 साल से कुछ ही अधिक उम्र में उनकी शादी पारम्परिक हिन्दू पद्धति से दुर्गा नाम की एक कन्या से कर दी गयी। 1947 में भारत-पाकिस्तान के बँटवारे से कुछ ही समय पूर्व उन्होंने रत्ना साहनी नाम की एक महिला वकील से दूसरा विवाह कर लिया। जेठमलानी के परिवार में उनकी दोनों पत्नियों से कुल चार बच्चे हैं-रानी, शोभा और महेश, तीन दुर्गा से तथा एक जनक, रत्ना से।
निधन
जेठमलानी की मृत्यु 8 सितंबर 2019 को नई दिल्ली में उनके घर पर हुई। उनके बेटे महेश जेठमलानी के अनुसार, वह पिछले कुछ महीनों से ठीक नहीं थे; राम जेठमलानी ने अपने 96 वें जन्मदिन के ठीक छह दिन पहले 7:45 बजे सुबह अंतिम सांस ली।
तुम जब आये जगत हंसा तुम रोये
अब तुम ऐसी करनी कर गए
कि जग रोया और तुम सो गए
सो गए——- सो गए ।

 

किसानों की सुध
सिद्धार्थ शंकर
यह किसी से छिपा नहीं है कि 60 साल की उम्र के बाद कोई भी व्यक्ति सामाजिक रूप से किस अवस्था में रहता है और बहुत सारे लोगों के लिए परिवार पर निर्भरता कैसी स्थिति पैदा करती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसान मानधन योजना की शुरुआत की है ताकि किसानों को बुढ़ापे में मुसीबत में न जीना पड़े, यह पेंशन योजना उसकी गारंटी देगी। गौरतलब है कि किसानों को सामाजिक सुरक्षा का कवच देने वाली इस योजना के तहत 60 साल की उम्र के बाद लघु और सीमांत किसानों को तीन हजार रुपए पेंशन देने का प्रावधान है। इस योजना का लाभ लेने के लिए उम्र के मुताबिक हर महीने एक निर्धारित रकम जमा करानी होगी। हालांकि कुछ खास सुविधाप्राप्त वर्ग के लोगों को इस योजना का लाभ नहीं मिल सकेगा।
खेती-किसानी का सवाल काफी समय से देश की मुख्य समस्याओं में शुमार है। मगर खेती के लगातार घाटे का सौदा होते जाने और किसानों के निजी जीवन में खड़ी चुनौतियों का कोई ठोस हल नहीं निकाला जा सका है। अलबत्ता अमूमन सभी सरकारों ने हर मौके पर आश्वासनों और वादों की झड़ी जरूर लगाई, लेकिन किसानों की समस्याएं गहराती ही गईं। फसलों के समर्थन मूल्य के बरक्स खुले बाजार में उनकी कीमतों ने व्यापारियों का लाभ तो सुनिश्चित किया, लेकिन किसानों के हक में कुछ खास नहीं आया। यही वजह है कि किसानों के सामने कई बार गुजारे तक का सवाल एक बड़ी चुनौती बन गया। ऐसे में उनके लिए जो न्यूनतम मदद हो सकती थी, उस पर भी कभी विचार नहीं किया गया। बल्कि खेती-किसानी को बढ़ावा व संरक्षण देने का दावा करने वाली सरकारों की प्राथमिकता में भी इस समस्या को जगह नहीं मिल सकी। नतीजतन, किसानों की मुश्किलें दिनोंदिन बढ़ती गर्इं। कृषि ऋण, फसलों की बर्बादी या खेती में घाटे से उपजे तनाव और दबाव की वजह से लाखों किसानों ने आत्महत्या तक कर ली।
ऐसे में अगर हर महीने उन्हें एक निर्धारित रकम मिलती है, तो यह सेहत संबंधी और दूसरी जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ उनके मान-सम्मान को बनाए रखने में भी मददगार हो सकती है। निश्चित रूप से लघु और सीमांत किसानों के निजी जीवन को खुशहाल और सम्मानजनक बनाने की दिशा में सरकार का यह एक बड़ा कदम है। पर कर्ज सहित खेती की आम मुश्किलों के अलावा फसलों के मारे जाने या उनकी न्यूनतम लागत भी वसूल न हो पाने के बाद किसानों के सामने कैसी समस्या खड़ी होती है, यह एक जगजाहिर सवाल रहा है। इसलिए किसानों को सामाजिक सुरक्षा कवच मुहैया कराने के साथ कृषि क्षेत्र के सामने खड़ी अन्य बड़ी चुनौतियों को दूर करने के लिए भी मजबूत इच्छाशक्ति के साथ ठोस पहलकदमी की जरूरत है। किसान मानधन योजना से निश्चित रूप से किसानों को बड़ी राहत मिल सकेगी।

भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया
विवेक रंजन श्रीवास्तव
(इंजीनियर्स डे 15 सितम्बर) आज अमेरिका में सिलिकान वैली में तब तक कोई कंपनी सफल नही मानी जाती जब तक उसमें कोई भारतीय इंजीनियर कार्यरत न हो ….,भारत के आई आई टी जैसे संस्थानो के इंजीनियर्स ने विश्व में अपनी बुद्धि से भारतीय श्रेष्ठता का समीकरण अपने पक्ष में कर दिखाया है। प्रतिवर्ष भारत रत्न सर मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया का जन्मदिवस इंजीनियर्स डे के रूप में मनाया जाता है। पंडित नेहरू ने कल कारखानो को नये भारत के तीर्थ कहा था , इन्ही तीर्थौ के पुजारी , निर्माता इंजीनियर्स को आज अभियंता दिवस पर बधाई ….विगत कुछ दशको में इंजीनियर्स की छबि में भ्रष्टाचार के घोलमाल में बढ़ोत्री हुई है , अनेक इंजीनियर्स प्रशासनिक अधिकारी या मैनेजमेंट की उच्च शिक्षा लेकर बड़े मैनेजर बन गये हैं , आइये आज इंजीनियर्स डे पर कुछ पल चिंतन करे समाज में इंजीनियर्स की इस दशा पर , हो रहे इन परिवर्तनो पर … इंजीनियर्स अब राजनेताओ के इशारो चलने वाली कठपुतली नही हो गये हैं क्या? देश में आज इंजीनियरिंग शिक्षा के हजारो कालेज खुल गये हैं , लाखो इंजीनियर्स प्रति वर्ष निकल रहे हैं , पर उनमें से कितनो में वह योग्यता या जज्बा है जो भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया में था …….मनन चिंतन का विषय है।
भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया की जीवनी ..अध्ययन और प्रेरणा पुंज भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया का जन्म मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक में 15 सितंबर 1860 को हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री तथा माता का नाम वेंकाचम्मा था। पिता संस्कृत के विद्वान थे। विश्वेश्वरैया ने प्रारंभिक शिक्षा जन्म स्थान से ही पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने बंगलूर के सेंट्रल कॉलेज में दाखिला लिया। लेकिन यहां उनके पास धन का अभाव था। अत: उन्हें टयूशन करना पड़ा। विश्वेश्वरैया ने 1881 में बीए की परीक्षा में अव्वल स्थान प्राप्त किया। इसके बाद मैसूर सरकार की मदद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पूना के साइंस कॉलेज में दाखिला लिया। 1883 की एलसीई व एफसीई (वर्तमान समय की बीई उपाधि) की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करके अपनी योग्यता का परिचय दिया। इसी उपलब्धि के चलते महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें नासिक में सहायक इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया।
दक्षिण भारत के मैसूर, कर्र्नाटक को एक विकसित एवं समृद्धशाली क्षेत्र बनाने में भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया का अभूतपूर्व योगदान है। तकरीबन 55 वर्ष पहले जब देश स्वंतत्र नहीं था, तब कृष्णराजसागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील व‌र्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर समेत अन्य कई महान उपलब्धियां एमवी ने कड़े प्रयास से ही संभव हो पाई। इसीलिए इन्हें कर्नाटक का भगीरथ भी कहते हैं। जब वह केवल 32 वर्ष के थे, उन्होंने सिंधु नदी से सुक्कुर कस्बे को पानी की पूर्ति भेजने का प्लान तैयार किया जो सभी इंजीनियरों को पसंद आया। सरकार ने सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के उपायों को ढूंढने के लिए समिति बनाई। इसके लिए भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया ने एक नए ब्लॉक सिस्टम को ईजाद किया। उन्होंने स्टील के दरवाजे बनाए जो कि बांध से पानी के बहाव को रोकने में मदद करता था। उनके इस सिस्टम की प्रशंसा ब्रिटिश अधिकारियों ने मुक्तकंठ से की। आज यह प्रणाली पूरे विश्व में प्रयोग में लाई जा रही है। विश्वेश्वरैया ने मूसा व इसा नामक दो नदियों के पानी को बांधने के लिए भी प्लान तैयार किए। इसके बाद उन्हें मैसूर का चीफ इंजीनियर नियुक्त किया गया।
उस वक्तराज्य की हालत काफी बदतर थी। विश्वेश्वरैया लोगों की आधारभूत समस्याओं जैसे अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी आदि को लेकर भी चिंतित थे। फैक्टरियों का अभाव, सिंचाई के लिए वर्षा जल पर निर्भरता तथा खेती के पारंपरिक साधनों के प्रयोग के कारण समस्याएं जस की तस थीं। इन समस्याओं के समाधान के लिए विश्वेश्वरैया ने इकॉनोमिक कॉन्फ्रेंस के गठन का सुझाव दिया। मैसूर के कृष्ण राजसागर बांध का निर्माण कराया। कृष्णराजसागर बांध के निर्माण के दौरान देश में सीमेंट नहीं बनता था, इसके लिए इंजीनियरों ने मोर्टार तैयार किया जो सीमेंट से ज्यादा मजबूत था। 1912 में विश्वेश्वरैया को मैसूर के महाराजा ने दीवान यानी मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया।
विश्वेश्वरैया शिक्षा की महत्ता को भलीभांति समझते थे। लोगों की गरीबी व कठिनाइयों का मुख्य कारण वह अशिक्षा को मानते थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में मैसूर राज्य में स्कूलों की संख्या को 4,500 से बढ़ाकर 10,500 कर दिया। इसके साथ ही विद्यार्थियों की संख्या भी 1,40,000 से 3,66,000 तक पहुंच गई। मैसूर में लड़कियों के लिए अलग हॉस्टल तथा पहला फ‌र्स्ट ग्रेड कॉलेज (महारानी कॉलेज) खुलवाने का श्रेय भी विश्वेश्वरैया को ही जाता है। उन दिनों मैसूर के सभी कॉलेज मद्रास विश्वविद्यालय से संबद्ध थे। उनके ही अथक प्रयासों के चलते मैसूर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई जो देश के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है। इसके अलावा उन्होंने श्रेष्ठ छात्रों को अध्ययन करने के लिए विदेश जाने हेतु छात्रवृत्ति की भी व्यवस्था की। उन्होंने कई कृषि, इंजीनियरिंग व औद्योगिक कालेजों को भी खुलवाया।
वह उद्योग को देश की जान मानते थे, इसीलिए उन्होंने पहले से मौजूद उद्योगों जैसे सिल्क, संदल, मेटल, स्टील आदि को जापान व इटली के विशेषज्ञों की मदद से और अधिक विकसित किया। धन की जरूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने बैंक ऑफ मैसूर खुलवाया। इस धन का उपयोग उद्योग-धंधों को विकसित करने में किया जाने लगा। 1918 में विश्वेश्वरैया दीवान पद से सेवानिवृत्त हो गए। औरों से अलग विश्वेश्वरैया ने 44 वर्ष तक और सक्रिय रहकर देश की सेवा की। सेवानिवृत्ति के दस वर्ष बाद भद्रा नदी में बाढ़ आ जाने से भद्रावती स्टील फैक्ट्री बंद हो गई। फैक्ट्री के जनरल मैनेजर जो एक अमेरिकन थे, ने स्थिति बहाल होने में छह महीने का वक्त मांगा। जोकि विश्वेश्वरैया को बहुत अधिक लगा। उन्होंने उस व्यक्ति को तुरंत हटाकर भारतीय इंजीनियरों को प्रशिक्षित कर तमाम विदेशी इंजीनियरों की जगह नियुक्त कर दिया। मैसूर में ऑटोमोबाइल तथा एयरक्राफ्ट फैक्टरी की शुरूआत करने का सपना मन में संजोए विश्वेश्वरैया ने 1935 में इस दिशा में कार्य शुरू किया। बंगलूर स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स तथा मुंबई की प्रीमियर ऑटोमोबाइल फैक्टरी उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है। 1947 में वह आल इंडिया मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष बने। उड़ीसा की नदियों की बाढ़ की समस्या से निजात पाने के लिए उन्होंने एक रिपोर्ट पेश की। इसी रिपोर्ट के आधार पर हीराकुंड तथा अन्य कई बांधों का निर्माण हुआ।
वह किसी भी कार्य को योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने में विश्वास करते थे। 1928 में पहली बार रूस ने इस बात की महत्ता को समझते हुए प्रथम पंचवर्षीय योजना तैयार की थी। लेकिन विश्वेश्वरैया ने आठ वर्ष पहले ही 1920 में अपनी किताब रिकंस्ट्रक्टिंग इंडिया में इस तथ्य पर जोर दिया था। इसके अलावा 1935 में प्लान्ड इकॉनामी फॉर इंडिया भी लिखी। मजे की बात यह है कि 98 वर्ष की उम्र में भी वह प्लानिंग पर एक किताब लिख रहे थे। देश की सेवा ही विश्वेश्वरैया की तपस्या थी। 1955 में उनकी अभूतपूर्व तथा जनहितकारी उपलब्धियों के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। जब वह 100 वर्ष के हुए तो भारत सरकार ने डाक टिकट जारी कर उनके सम्मान को और बढ़ाया। 101 वर्ष की दीर्घायु में 14 अप्रैल 1962 को उनका स्वर्गवास हो गया। 1952 में वह पटना गंगा नदी पर पुल निर्माण की योजना के संबंध में गए। उस समय उनकी आयु 92 थी। तपती धूप थी और साइट पर कार से जाना संभव नहीं था। इसके बावजूद वह साइट पर पैदल ही गए और लोगों को हैरत में डाल दिया। विश्वेश्वरैया ईमानदारी, त्याग, मेहनत इत्यादि जैसे सद्गुणों से संपन्न थे। उनका कहना था, कार्य जो भी हो लेकिन वह इस ढंग से किया गया हो कि वह दूसरों के कार्य से श्रेष्ठ हो। उनकी जीवनी हमारे लिये प्रेरणा है।

तुम्हे जान प्यारी है या पैसे प्यारे हैं ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए नए मोटर वाहन अधिनियम को लेकर देश में विचित्र विवाद चल पड़ा है। इस अधिनियम को लाने का श्रेय केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी को है। केंद्र में भाजपा की सरकार है लेकिन इसी पार्टी की कुछ प्रांतीय सरकारों ने इस अधिनियम को लागू करने से मना कर दिया है। इस नए अधिनियम के मुताबिक यातायात नियमों का उल्लंघन करनेवालों पर जुर्माने की राशि दस गुनी कर दी गई है। लायसेंस के बिना कार-चालन, नशे में वाहन-चालन, हेलमेट और सीट बेल्ट नहीं लगाना, सिग्नल की परवाह न करना, वाहन बहुत तेज चलाना, ट्रकों में सीमा से ज्यादा माल भरना आदि उल्लंघनों के लिए 10,000 रु. तक का जुर्माना और सजा का प्रावधान भी इस नए कानून में है। इतने सख्त प्रावधान इसीलिए रखे गए हैं कि यातायात नियमों का जितना भयंकर उल्लंघन भारत में होता है, दुनिया के बहुत कम देशों में होता है। करोड़ों लोग बिना लायसेंस या फर्जी लायसेंस लेकर कार चलाते हैं। शराब के नशे में धुत्त होकर भी अंधाधुंध चलाते हैं। हर साल लाखों दुर्घटनाएं होती हैं। इसी प्रवृत्ति को रोकने या घटाने के लिए गडकरी ने इतना सख्त कानून बनवाया है लेकिन इसका उद्देश्य सरकारी खजानों को भरना नहीं है। देश के लोगों को यह तय करना है कि उन्हें अपनी जान प्यारी है या पैसे प्यारे हैं। इस नए कानून का पिछले डेढ़ दो हफ्तों में ही जबर्दस्त असर हुआ है। सड़क-दुर्घटनाओं की संख्या घटी हैं और लाइसेंस बनवानेवालों की संख्या तिगुनी-चौगुनी हो गई है। दिल्ली में 15 हजार की बजाय 45 हजार लोग लायसेंस-दफ्तरों पर रोज भीड़ लगाए हुए हैं। अब सड़क के सिग्नलों पर भी कार-चालक विशेष ध्यान देने लगे हैं। मालिकों ने अपने ड्राइवरों को कह दिया है कि सिग्नलों का उल्लंघन करोगे तो जुर्माना तुमको भरना पड़ेगा। यह डर अगर कुछ माह भी बना रहे तो देश के यातायात की दशा में बहुत सुधार हो सकता है। इसके लिए देश गडकरी का आभारी रहेगा लेकिन यह होना नहीं है, क्योंकि प्रांतों की कांग्रेसी सरकारों ने ही नहीं, कई भाजपा सरकारों ने भी इस नए अधिनियम के विरुद्ध खम ठोक दिए हैं। ऐसे में गडकरी क्या करेंगे ? वे भी राज्यों को कह रहे हैं कि आपको जो करना है सो करें। बीमारी गंभीर है और दवा कड़वी है। आपको पसंद नहीं है तो आप मीठी गोली खाइए और मस्त रहिए।

हिंदी राष्ट्र भाषा बनने की बुनियाद कमज़ोर है क्या ?
डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन
(हिंदी दिवस 14 सितम्बर 2019) सौ बरस से अधिक समय हो गया हिंदी को राष्ट्रभाषा का अधिकार मिले पर आज भी हिंदी सिर्फ हिंदी मानने वालों के कारण बची हैं .महात्मा गाँधी ने 1918 मे अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था की हिंदी को राष्ट्रभाषा का अधिकारी घोषित करना और दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार -प्रसार का अनुष्ठान करना ,” नर हो न निराश करो मन को ,कुछ काम करो कुछ काम करो “ये शब्द हमें हर बार पढ़ते पढ़ते धिक्कारते हैं की काम में सफलता क्यों नहीं मिलती ? क्या हमारे प्रयास लक्ष्य को पाने में असफल हैं ? क्या हम इतने स्वाभिमानी नहीं हैं ? क्या हम अब भी पराधीन हैं ?क्या हमें काले अंग्रेजों से फिर लड़ना होंगा?जब लड़ने वाले खुद शासक के साथ हैं तो हमारा हश्र क्या होगा ? हमें कब तक भीख मांगना होगी ?हमें कब तक लड़ना होगा ?कैसे लड़ना होंगा ?और क्यों लड़ें? ये प्रश्न बरबस नहीं उठ रहे। ये प्रश्न हमारे देश की दुरंगी नीति का परिणाम नहीं हैं क्या ?
आज भी हिंदी के समाचार पत्रों में आवेदन अंग्रेजी भाषा में मंगाया गया। बिलकुल ठीक जैसे शराब बंदी की दलील शराब पीने वाला कर रहा हैं कि शराब पीने से बहुत लाभ हैं। सिगरेटबंद करने वाला कहता हैं कि सिगरेट पीने से तीन फायदा पहला घर में चोरी नहीं होती ,कुत्ता नहीं काटता और बुढ़ापा नहीं आता। इसी प्रकार जब गंगोत्री ही अपवित्र हो गयी तब गंगा कहाँ तक पवित्र होंगी।। कारण जहाँ से हिंदी का बिगुल बजाना हैं वहां से अंग्रेजी का गुणगान है रहा हैं। वेश्याओं को सधवा स्त्री से बहुत जलन होती हैं।
हिंदी कि लड़ाई लगभग सौ बरस हो गए कि राष्ट्र भाषा बने, हिंदुस्तान की, भारत की ,इंडिया की पर हम न भारतीय हो पाए ,न हिंदुस्तानी हो पाए और हम हो गए अधकचरे इंडियन। अधकच्चे आम रोमांचकारी होते हैं पर उतना अच्छा स्वाद नहीं देते हैं। हम क्या थे ,क्या हैं और क्या हो रहे। किस्से न्याय की भीख मांगे. जहाँ बेदर्द हाकिम हो वहां फरियाद क्या करना।
हमारे हाकिम असल में पहले के विदेशों में पढ़े थे ,विदेशी भाषा पढ़े थे तो उनकी विदेशी मानसिकता हो गयी. यहाँ कोई बुराई नहीं हैं ज्ञान के लिए भाषा का कोई बंधन नहीं। कारन हमें अपने मस्तिष्क के खिड़की दरवाजे हमेशा खुले रखना चाहिए. पर इतने खुले नहीं की धूल ,कचरा हमारे घर आँगन को गन्दा कर दे। आज की स्थिति यह हैं की विश्व में संपर्क भाषा के लिए अंग्रेजी अनिवार्य हैं तो फिर चीन ,जापान ,रशिया आदि देशों को क्यों नहीं अनिवार्य हैं। हम अब भी गुलामी से मुक्त नहीं हो पाए। हम दूसरों की वैसाखी पर चल कर आगे बढ़नाचाहते हैं ,और शायद बढ़ गए। और इतने आगे निकल गए की शायद वापिस आना संभव नहीं हैं ,अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व इतना अधिक हो गया हैं वह देश की भाषायों की महारानी हो गयी और अन्य भाषाएँ उसकी चेरी बन गयी. अब बस महारानी बनाने के लिए ताज़पोशी करना अनिवार्य हैं तो उसका इन्तज़ार कर रहे हैं. कारण अंग्रेजी को सिंहासन में विराजें, फिर हिंदी और अन्य भाषाएँ अधिकृत चेरी मान ली जाएंगी. अब हिंदी अधकच्चे आम के समान हैं । पता नहीं कब आम पकेगा। पर इस देश में हिंदी के आसार नहीं हैं आने के। तो हम हिंदी प्रेमियों ,साहित्यकारों ,रचनाकारों को मूक दर्शक बन भाषा की गुलामी स्वीकार कर लेना चाहिए. अब तक जितना सृजन किया आपने वह शासक के साथ धोखा दिया ,राजद्रोह किया अंग्रेजी जैसे विक्टोरिया का अपमान किया। क्यों न सब पर देश द्रोह का मुकदमा चलाया जाय. क्यों ?अंग्रेजों के समय उनकी बगावत करने का क्या इलज़ाम होता।
खैर अब बात करने ,विरोध करने का कोई अर्थ नहीं हैं। जब अंग्रेजी को राज्याश्रय मिल चूका हैं तो अब हिंदी के राष्ट्र भाषा बनाने का विचार त्याग देना क्या उचित नहीं होगा ?!और हिंदी राष्ट्र भाषा यदि बन भी जाएंगी तो हमारे लिए कौन गौरव की बात होगी. महात्मा गाँधी और अन्य लोंगो ने व्यर्थ में स्वाधीनता का आंदोलन कर देश को स्वत्रन्त्र कराया। इससे क्या फायदा हुआ. अभी भी पुराने लोग कहते हैं की अंग्रेजो का ज़माना अच्छा था. कम से कम न्याय तो मिलता था ,सस्ता था ,पर अब तो हम और अधिक गुलाम हो गए ,मानसिक आर्थिक,राजनैतिक ,सामाजिक , सांस्कृतिक धार्मिक ,वैचारिक गुलाम,आदि । हमारी सोच ,कार्य संस्कार पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित हो गयी, अब हम सिर्फ यह कहते हैं की मेरा हाथ सुंघों मेरे पिता जी ने शुद्धघी खाया था उसकी खुशबू मेरे हाथ में हैं।
अब हमें पुराणी विरासत पर गर्व करने का कोई अधिकार नहीं हैं उनका मूल्यांकन जब नहीं होना हैं तब क्यों हम उसकी सेवा करे. ?जिन्होंने अंग्रेजी की सेवा की उनको मेवा मिल रहे हैं और मिलेंगे. एक दिन संयुक्त राष्ट्र में भाषण देने से हिंदी का विकास झूठी ,कोरी कल्पना हैं। जब तक जन जन की भाषा को उचित साथ नहीं मिलेंगा तब तक हमारी प्रतिष्ठा बिना नींव की होंगी ,हम कितने भी मंज़िल भवन बनाले पर वह बेबुनियाद कहलायाएंगी।
ससे समझ में आ गया हिंदी को राष्ट्र भाषा होना बहुत कठिन हैं पर हम अपनी माँ ,भाषा हिंदी की सेवा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे और जहाँ जहाँ सरकार की खामियां हों उनको उजागर कर सरकार को मज़बूर करेंगे. हिंदी राष्ट्र भाषा बनेंगी बनेंगी उस दिन का इंतज़ार करेंगे।

दुश्मनों पर बेरहम साबित होता है ‘अपाचे’
योगेश कुमार गोयल
3 सितम्बर का दिन भारतीय वायुसेना के लिए ऐतिहासिक माना जाएगा, जब पठानकोट स्थित एयरबेस पर कुल 8 अपाचे एएच-64 हेलीकॉप्टर वायुसेना के बेड़े में शामिल किए गए। अपाचे हेलीकॉप्टरों की पहली खेप इसी साल 27 जुलाई को गाजियाबाद के हिंडन एयरबेस पर पहुुंची थी, जिन्हें अब पठानकोट एयरबेस पर तैनात कर दिया गया है। पठानकोट एयरबेस पर इन हेलिकॉप्टरों को पानी की बौछार करके सैल्यूट किया गया। इस एयरबेस पर अपाचे की तैनाती रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है क्योंकि यहां से सटी सीमा अक्सर तनावग्रस्त रही है। अपाचे भारतीय सेना में अब रूस में निर्मित बहुत पुराने हो चुके एमआई-36 हेलीकॉप्टरों का स्थान लेंगे। भारत को मार्च 2020 तक कुल 22 अपाचे हेलीकॉप्टर मिल जाएंगे और इन 22 हेलीकॉप्टरों की पूरी खेप वायुसेना में शामिल होने तथा इसी माह फ्रांस से राफेल विमानों की आपूर्ति शुरू होने के बाद निश्चित रूप से भारतीय वायुसेना की ताकत में काफी इजाफा होगा। दरअसल एएच-64ई अपाचे गार्जियन अटैक हेलीकॉप्टर को दुनिया के सबसे खतरनाक हेलीकॉप्टरों के रूप में जाना जाता है। अमेरिकी एयरोस्पेस कम्पनी ‘बोइंग’ द्वारा निर्मित यह हेलीकॉप्टर दुनिया का सबसे आधुनिक और घातक हेलिकॉप्टर माना जाता है, जो ‘लादेन किलर’ के नाम से भी विख्यात है। यह अमेरिकी सेना तथा कई अन्य अतंर्राष्ट्रीय रक्षा सेनाओं का सबसे एडवांस मल्टी रोल कॉम्बैट हेलीकॉप्टर है, जो एक साथ कई कार्यों को अंजाम दे सकता है। अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, सिंगापुर, इजरायल, नीदरलैंड, सऊदी अरब, इंडोनेशिया, मिस्र, ग्रीस, सऊदी अरब, कतर के अलावा कुछ अन्य देशों की सेनाएं भी इस हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल कर रही हैं। ‘बोइंग’ अब तक दुनियाभर में 2200 से भी अधिक अपाचे हेलीकॉप्टरों की आपूर्ति कर चुकी है और भारत दुनिया का 14वां ऐसा देश है, जिसने अपनी सेनाओं के लिए इसका चयन किया है।
पांच वर्षों तक अफगानिस्तान के संवेदनशील इलाकों में अपाचे हेलिकॉप्टर उड़ा चुके ब्रिटिश वायुसेना में पायलट रहे एड मैकी का इस हेलीकॉप्टर के बारे में कहना है कि अपाचे दुनिया की सबसे परिष्कृत किन्तु घातक मशीन है, जो अपने दुश्मनों पर बहुत बेरहम साबित होती है। मैकी के मुताबिक किसी नए पायलट को अपाचे उड़ाने के लिए कड़ी और बहुत लंबी ट्रेनिंग लेनी होती है, जिसमें काफी खर्च भी आता है। इसके लिए सेना को एक पायलट की ट्रेनिंग पर 30 लाख डॉलर तक भी खर्च करने पड़ सकते हैं। ब्रिटिश पायलट मैकी कहते हैं कि अपाचे को दो पायलट मिलकर उड़ाते हैं। मुख्य पायलट पीछे बैठता है, जिसकी सीट थोड़ी ऊंची होती है, वही हेलीकॉप्टर को नियंत्रित करता है जबकि आगे बैठा दूसरा पायलट निशाना लगाता है और फायर करता है। वह बताते हैं कि अपाचे का निशाना बहुत सटीक है, जिसका सबसे बड़ा फायदा युद्ध क्षेत्र में होता है, जहां दुश्मन पर निशाना लगाते समय आम लोगों को नुकसान नहीं पहुंचता। यह सिर्फ दुश्मन पर हमला करने में ही नहीं अपितु सर्जिकल ऑपरेशनों को सफलतापूर्वक अंजाम देने में भी वायुसेना के लिए बहुत मददगार साबित हो सकता है। अपाचे की एक और विशेषता यह है कि यह युद्ध के मैदान में केवल दुश्मन के परखच्चे उड़ाने का ही काम नहीं करता बल्कि यह युद्धस्थल की तस्वीरें खींचकर उन्हें अपने एयरबेस पर ट्रांसमिट भी कर देता है।
करीब 16 फुट ऊंचे और 18 फुट चौड़े अपाचे को उड़ाने के लिए दो पायलट होना जरूरी है। इसके बड़े विंग को चलाने के लिए इसमें दो इंजन फिट हैं, जिस कारण इसकी रफ्तार बहुत ज्यादा है। अमेरिका की डिफेंस सिक्योरिटी कॉरपोरेशन एजेंसी का कहना है कि अपाचे एएच-64ई हेलिकॉप्टर भारतीय सेना की रक्षात्मक क्षमता को बढ़ाएगा, जिससे भारतीय सेना को जमीन पर मौजूद खतरों से लड़ने में मदद मिलेगी, साथ ही सेना का आधुनिकीकरण भी होगा। भारतीय वायुसेना की सामरिक जरूरतों के लिहाज से अपाचे इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारी वायुसेना की जरूरत के मुताबिक ही इसमें अपेक्षित बदलाव किए गए हैं। ढ़ाई अरब डॉलर अर्थात् करीब साढ़े सत्रह हजार करोड़ रुपये का यह हेलीकॉप्टर सौदा करीब चार साल पहले हुआ था, जब सितम्बर 2015 में भारत ने अमेरिका से 22 अपाचे और 15 चिनूक हेलिकॉप्टर खरीदने के लिए सौदा किया था। रक्षा मंत्रालय द्वारा 2017 में भी 4168 करोड़ रुपये की लागत से बोइंग से हथियार प्रणालियों सहित छह और अपाचे हेलीकॉप्टरों की खरीद को मंजूरी दी गई थी।
अपाचे एक ऐसा अग्रणी बहुउद्देश्यीय लड़ाकू हेलीकॉप्टर है, जो दुश्मन की नाक के नीचे किसी भी मिशन को पूरा करने में सक्षम है। इसे छिपकर वार करने के लिए जाना जाता है, इसीलिए इसका इस्तेमाल दुश्मन के इलाके में आसानी से घुसने में भी किया जाता है। अमेरिकी सेना अपने कई मिशनों में इसका इस्तेमाल कर चुकी है। दुश्मन के इलाके में आसानी से घुसने की क्षमता, जमीन के काफी करीब उड़ान भरने में कारगर, हवा से जमीन में मार करने वाली मिसाइलों और बंदूकों से लैस, सिर्फ 1 मिनट में 128 टारगेट निशाना बनाने तथा दिन के अलावा रात में भी आसानी से कहीं भी जाने में सक्षम, किसी भी मौसम में उड़ान भरने तथा आसानी से टारगेट डिटेक्ट करने में सक्षम, दुश्मन के रडार को आसानी से चकमा देने में माहिर इत्यादि अनेक खूबियों से लैस अपाचे पहली बार वर्ष 1975 में आकाश में उड़ान भरता नजर आया था, जिसे 1986 में अमेरिकी सेना में शामिल किया गया था। अमेरिका ने अपने इसी हेलिकॉप्टर का पनामा से लेकर अफगानिस्तान और इराक तक के साथ दुश्मनों को धूल चटाने के लिए इस्तेमाल किया था। इसके अलावा इजरायल भी लेबनान तथा गाजा पट्टी में अपने सैन्य ऑपरेशनों के लिए अपाचे का इस्तेमाल करता रहा है।
अपाचे की ढ़ेरों विशेषताएं ही इसे भारतीय वायुसेना को नई ताकत प्रदान करने के लिए पर्याप्त हैं। इसमें सटीक मार करने और जमीन से उत्पन्न खतरों के बीच प्रतिकूल हवाईक्षेत्र में परिचालित होने की अद्भुत क्षमता है। अपाचे का डिजाइन कुछ इस प्रकार तैयार किया गया है कि यह आसानी से दुश्मन की किलेबंदी को भेदकर उसके इलाके में घुसकर बहुत सटीक हमले करने में सक्षम है और इसकी इन्हीं विशेषताओं के चलते इससे पीओके से होने वाली आतंकी घुसपैठ को रोकने और वहां के आतंकी ठिकानों को तबाह करने में भारतीय सेना को मदद मिलेगी, जहां लड़ाकू विमानों का प्रभावी इस्तेमाल संभव नहीं है। 280 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भरने में सक्षम यह हेलीकॉप्टर तेज गति के कारण बड़ी आसानी से दुश्मनों के टैंकरों के परखच्चे उड़ा सकता है। बहुत तेज रफ्तार से दौड़ने में सक्षम इस हेलीकॉप्टर को रडार पर पकड़ना बेहद मुश्किल है। यह बगैर पहचान में आए चलते-फिरते या रूके हुए लक्ष्यों को आसानी से भांप सकता है। इतना ही नहीं, सिर्फ एक मिनट के भीतर यह 128 लक्ष्यों से होने वाले खतरों को भांपकर उन्हें प्राथमिकता के साथ बता देता है। इसे इस तरीके से डिजाइन किया गया है कि यह युद्ध क्षेत्र में किसी भी परिस्थिति में टिका रह सकता है। यह किसी भी मौसम या किसी भी स्थिति में दुश्मन पर हमला कर सकता है और नाइट विजन सिस्टम की मदद से रात में भी दुश्मनों की टोह लेने, हवा से जमीन पर मार करने वाले रॉकेट दागने और मिसाइल आदि ढ़ोने में सक्षम है। टारगेट को लोकेट, ट्रैक और अटैक करने के लिए इसमें लेजर, इंफ्रारेड, सिर्फ टारगेट को ही देखने, पायलट के लिए नाइट विजन सेंसर सहित कई आधुनिक तकनीकें समाहित की गई हैं।
अपाचे एक बार में पौने तीन घंटे तक उड़ सकता है और इसकी फ्लाइंग रेंज करीब 550 किलोमीटर है। इसमें 360 डिग्री तक घूम सकने वाला अत्याधुनिक फायर कंट्रोल रडार तथा निशाना साधने वाला सिस्टम लगा है। दो जनरल इलैक्ट्रिक टी-700 हाई परफॉरमेंस टर्बोशाफ्ट इंजनों से लैस इस हेलीकॉप्टर में आगे की तरफ एक सेंसर फिट है, जिसके चलते यह रात के अंधेरे में भी उड़ान भर सकता है। इसका सबसे खतरनाक हथियार है 16 एंटी टैंक मिसाइल छोड़ने की क्षमता। दरअसल इसमें हेलिफायर, स्ट्रिंगर मिसाइलें, 70 एमएम हाइड्रा एंटी ऑर्मर रॉकेट्स लगे हैं और मिसाइलों के पेलोड इतने तीव्र विस्फोटकों से भरे होते हैं कि दुश्मन का बच निकलना नामुमकिन होता है। इसके वैकल्पिक स्टिंगर या साइडवाइंडर मिसाइल इसे हवा से हवा में हमला करने में सक्षम बनाते हैं। अपाचे हेलीकॉप्टर के नीचे दोनों तरफ 30 एमएम की दो ऑटोमैटिक राइफलें भी लगी हैं, जिनमें एक बार में शक्तिशाली विस्फोटकों वाली 30 एमएम की 1200 गोलियां भरी जा सकती हैं। इसका सबसे क्रांतिकारी फीचर है इसका हेल्मेट माउंटेड डिस्प्ले, इंटीग्रेटेड हेलमेट और डिस्प्ले साइटिंग सिस्टम, जिनकी मदद से पायलट हेलिकॉप्टर में लगी ऑटोमैटिक एम-230 चेन गन को अपने दुश्मन पर टारगेट कर सकता है। 17.73 मीटर लंबे, 4.64 मीटर ऊंचे तथा करीब 5165 किलोग्राम वजनी इस हेलीकॉप्टर में दो पायलटों के बैठने की व्यवस्था है। इसका अधिकतम भार 10400 किलोग्राम हो सकता है। डेटा नेटवर्किंग के जरिये हथियार प्रणाली से और हथियार प्रणाली तक, युद्धक्षेत्र की तस्वीरें प्राप्त करने और भेजने की इसकी क्षमता इसकी खूबियों को और भी घातक बना देती है। अगले वर्ष तक अपाचे हेलीकॉप्टरों की पूरी खेप प्राप्त होने के बाद इन हेलीकॉप्टरों को चीन तथा पाकिस्तानी सीमा पर तैनात किया जाएगा, जो वायुसेना को जमीनी बलों की सहायता के लिए भविष्य के किसी भी संयुक्त अभियान में महत्वपूर्ण धार उपलब्ध करांएगे।
यही वजह है कि माना जा रहा है कि वायुसेना में इनके शामिल होने से वायुसेना के साथ-साथ थल सेना की ऑपरेशनल ताकत में भी कई गुना बढ़ोतरी हो जाएगी। कम ऊंचाई पर उड़ने की क्षमता के कारण यह पहाड़ी क्षेत्रों में छिपकर वार करने में सक्षम हैं और इस लिहाज से यह पर्वतीय क्षेत्र में वायुसेना को महत्वपूर्ण क्षमता और ताकत प्रदान करेगा। भारत को इस समय अपने दो पड़ोसी देशों चीन और पाकिस्तान की ओर से कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। एक ओर जहां पाकिस्तान लगातार कश्मीर को लेकर भारत को धमकी देता रहा है और भारत में आतंकियों की घुसपैठ कराकर खूनखराबे के हालात पैदा करता रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन खुलकर उसका साथ देता रहा है तथा भारत के आंतरिक मामलों में अनावश्यक टांग भी अड़ाता रहा है। ऐसे में बहुत जरूरी था कि पड़ोसी दुश्मनों के हौंसलों को पस्त करने के लिए भारत सामरिक रूप से बेहद मजबूत बने और गर्व एवं संतोष की बात है कि भारत की सामरिक क्षमता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। कहना असंगत नहीं होगा कि कुछ और नए अत्याधुनिक लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, मिसाइल प्रणाली तथा अन्य साजोसामान की पूरी खेप मिलने के बाद भारतीय वायुसेना की गिनती दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वायुसेनाओं में होने लगेगी।

गले पड़ा नया ट्रैफिक कानून
सिद्धार्थ शंकर
नितिन गडकरी की गिनती उन मंत्रियों में होती है जो हमेशा कुछ नया फॉर्मूला सामने लाते हैं। गडकरी सड़क बनाने में नई तकनीक लाते हैं, लाइसेंस बनाने के लिए नए फॉर्मूले लाते हैं और अब ट्रैफिक नियमों का पालन करने के लिए गडकरी नया कानून लाए तो अकेले पड़ते नजर आ रहे हैं। सरकार के लिए उसका ही एक कानून मुसीबत बन गया है। ट्रैफिक नियमों का पालन करने के लिए लाए गए नए मोटर व्हीकल एक्ट में जुर्माना राशि को काफी बढ़ाया गया। 1 सितंबर से लागू हुए कानून के तहत हजारों की राशि के चालान कटे, लेकिन कई राज्य सरकारें इससे सतर्क हो गई हैं। कई राज्य सरकारों ने कानून में संशोधन कर जुर्माना राशि को ही घटा दिया और इन राज्यों की लिस्ट में भारतीय जनता पार्टी के राज्य ही अव्वल हैं। केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के इस नए कानून के तहत जुर्माना राशि 1000 से बढ़कर 5 हजार या 10 हजार रुपए तक बढ़ा दी गई। नया कानून लागू हुआ तो 25 हजार, 50 हजार तक के चालान की खबरें आने लगीं और तीखी बहस शुरू हो गई। आम लोगों के बीच चालान को लेकर मची हलचल के बीच राज्य सरकारों ने इस कानून का ही एक जुगाड़ निकाल लिया और इस फॉर्मूले की अगुवाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के गृह राज्य गुजरात ने की। राज्य के मुखिया विजय रूपाणी ने जुर्माना राशि में कटौती का ऐलान किया और कई जुर्मानों में राशि को 90 फीसदी तक घटा दिया। गुजरात ने एक रास्ता दिखाया तो अन्य राज्य भी उसपर चल दिए और इनमें सबसे आगे रहे वो राज्य जहां कुछ ही महीनों में चुनाव होने वाले हैं और खास बात ये है कि ये तीनों ही राज्य भाजपा शासित प्रदेश हैं। गुजरात के बाद महाराष्ट्र जागा और राज्य के परिवहन मंत्री ने नितिन गडकरी को चि_ी लिख दी, जुर्माना राशि पर चिंता जताई। देवेंद्र फडणवीस की सरकार को चिंता है कि कहीं बढ़ी हुई राशि वोटों की संख्या ना घटा जाए। महाराष्ट्र की ही राह पर झारखंड और हरियाणा चल पड़े, झारखंड जल्द ही विशेष सत्र बुलाकर केंद्र के नए मोटर व्हीकल एक्ट में संशोधन कर सकता है तो वहीं हरियाणा ने अभी 45 दिनों का जागरूक अभियान चलाने की बात कही है। महाराष्ट्र-झारखंड-हरियाणा में तो चुनाव हैं इसलिए जुर्माना घटाने के फैसले को राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है लेकिन इनसे इतर उत्तराखंड और कर्नाटक भी इस पंक्ति का हिस्सा बन गए हैं। उत्तराखंड ने 90 फीसदी जुर्माना राशि कम करने का ऐलान कर दिया तो कर्नाटक की ओर से अभी विचार कहे जाने की बात कही जा रही है। इन राज्यों के अलावा भी कई बीजेपी शासित राज्य ऐसे हैं, जहां नए कानून का नोटिफिकेशन जारी नहीं किया गया है। उदाहरण के तौर पर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में अभी नया मोटर व्हीकल एक्ट लागू नहीं हुआ है। सिर्फ बीजेपी राज्य ही नहीं बल्कि कई विपक्षी पार्टियों के राज्यों ने भी इस कानून को लागू नहीं किया है।

 

भूखे भजन होत नहिं गोपाला
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
नई मोदी सरकार के पहले सौ दिन कैसे रहे, इस विषय पर पक्ष और विपक्ष में जबर्दस्त दंगल छिड़ा हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि हमने पहले 100 दिन में वह कर दिखाया है, जो कांग्रेस अपने साठ साल के राज में नहीं कर सकी और कांग्रेसी नेता राहुल गांधी और उनकी बहन दावा कर रहे हैं कि पिछले 100 दिन में देश ने तानाशाही, ढोंग, अराजकता और झूठे दावों का नंगा नाच देखा है। ये दोनों अतिवादी बयान हैं। अगर नेता लोग ऐसे बयान नहीं देंगे तो कौन देगा ? सत्य तो कहीं इन बयानों के बीच छिपा हुआ है। इसमें शक नहीं है कि तीन तलाक, कश्मीर का पूर्ण विलय, सर्वोच्च सेनापति की नियुक्ति का संकल्प, बालाकोट का हमला जैसी कुछ कार्रवाइयां पिछले 100 दिन में ऐसी हुई हैं, जो पिछली कांग्रेसी और गैर-कांग्रेसी सरकारें भी नहीं कर सकी हैं। इसके अलावा हवाई अड्डों, सड़कों और रेल-पथ निर्माण, किसानों को सीधी सहायता, स्वच्छ भारत अभियान, बैंकों का विलय, जल-सुरक्षा, ग्राम-विकास आदि ऐसे कामों में उल्लेखनीय प्रगति इस सरकार ने वैसे ही की है, जैसी कि अन्य सरकारें करती रही हैं। विदेश नीति के क्षेत्र में भारत ने अमेरिका, फ्रांस, रुस और कुछ प्रमुख मुस्लिम राष्ट्रों के साथ पिछले दिनों में इतने अच्छे संबंध बना लिये हैं कि कश्मीर के सवाल पर पाकिस्तान को उसने किनारे लगा दिया है। इन सफल कामों का श्रेय इस सरकार को जरुर दिया जाना चाहिए लेकिन आर्थिक मोर्चे पर इसकी गिरावट इतनी तेज है कि यदि अगले कुछ माह में वह नहीं संभली तो ऊपर गिनाई गई उपलब्धियों पर पानी फिरते देर नहीं लगेगी। जब लोग भूखे मरेंगे तो उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि किसने किसको तलाक दे दिया या सेनापति कौन बन गया या कश्मीर में धारा 370 है या नहीं ? इन मुद्दों पर आजकल हम सब सरकार के भजन गा रहे हैं लेकिन यह ठीक ही कहा गया है कि ‘भूखे भजन होत नहीं गोपाला।’ सरकार भी परेशान है और वह रोज ही कुछ न कुछ द्राविड़ प्राणायाम कर रही है ताकि देश की अर्थ-व्यवस्था पटरी पर आ जाए। अभी कश्मीर का भी ठीक से कुछ पता नहीं कि अगले दो-चार माह में वहां क्या होनेवाला है ? पिछले 100 दिनों में सरकार का कुल रवैया काफी बहिर्मुखी रहा है और उसे इसका श्रेय भी मिला है लेकिन उससे भी ज्यादा जरुरी है- उसका अंतर्मुखी होना। यह ठीक है कि आज भारत में विपक्ष अधमरा हो चुका है लेकिन यदि आर्थिक असंतोष फैल गया तो जनता ही विपक्ष की भूमिका अदा करने लग सकती है।

राष्ट्र को समर्पित संत विनोबा भावे
मनोहर पुरी
(11सितंबर जन्म दिवस पर विशेष) साधु स्वभाव और विनम्र सौम्यता की प्रतिमूर्ति थे आचार्य विनोबा भावे। दृढ़ इच्छा शक्ति ,गहरी निष्ठा और अनवरत परिश्रम उनके चरित्र के ऐसे गुण थे जिनके कारण वह देश में सर्वोदय और भूदान जैसे आंदोलन प्रारम्भ करने में सफल हो पाये। बहुमुखी प्रतिभा के धनी,मौलिक विचारक और दार्शनिक विनोबा भावे में बुद्धि,वाणी और कर्म का अद्भुत समन्वय था। उन्होंने आत्मसंयम,सादगी और त्याग का जीवन व्यतीत करते हुए अपने आपको राष्ट्र और समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। वह गांधीवादी विचारधारा के सबसे बड़े अनुयायी थे। उन्हें विनोबा नाम भी स्नेह और श्रृद्धा के कारण कोचारब आश्रमवासियों ने दिया जिसे गांधी जी ने भी अपना आर्शीवाद प्रदान कर दिया था। बचपन में उनका नाम विनायक रखा गया था।
नरहरि विनायक भावे का जन्म 11 सितंबर 1895 को महाराष्ट्र के कलाबा जिले के गगोदा नामक स्थान पर चितपावन ब्राह्मण कुल में हुआ। वह नरहरि शंभुराव भावे और रुक्मिणी देवी के जेष्ठ पुत्र थे। विनायक के पिता बड़ोदरा की देशी रियासत में वस्त्र तकनीकी विशेषज्ञ के रूप में कार्य करते थे। बचपन में धार्मिक विचारों वाली माता और प्रगतिशील विचारों वाले पितामह का उन पर गहरा प्रभाव हुआ। बाद में वह महात्मा गांधी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना पूरा जीवन ही उनके आदर्शों के लिए समर्पित कर दिया। शैशवावस्था से ही उनमें सरलता,आध्यात्मिकतातथा सहिष्णुता के गुण दिखाई देने लगे थे। जब वह मात्र दस वर्ष के थे तभी उन्होंने राष्ट्र सेवा और ब्रह्मचर्य का प्रण ले लिया और उसे जीवनपर्यन्त निभाया। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। 1903 में उनका परिवार बड़ौदा चला गया। यहां पर विनोबा जी को तीसरी कक्षा में प्रवेश दिलाया गया। अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण उनकी गणना कक्षा के होशियार छात्रों में की जाती थी। 1913 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उर्त्तीण की। इसी समय के दौरान उन्होंने गीता,रामायण और महाभारत का गहन अध्ययन किया। उन्होंने अनेक भाषाओं में भी प्रवीणता प्राप्त की।
सन् 1916 में जब विनायक अपने मित्रों सहित इंटरमीडिएट की परीक्षा देने के लिए बम्बई जा रहे थे तो रेलगाड़ी में ही अचानक उन्होंने एक ऐसा निर्णय ले लिया जिसने उनके जीवन की दिशा को ही बदल दिया। सूरत स्टेशनपर उन्होंने अपने साथियों को सूचित किया कि मैं बम्बई के स्थान पर वाराणसी संस्कृत का गहन अध्ययन करने के लिएजा रहा हूं। इसी आशय का एक पत्र उन्होंने अपने पिता के नाम लिख दिया। शंकर राव कगारे और बेडेकर नामक दो अन्य मित्र भी उनके साथ काशी के लिए चल पड़े। वहां पर उन्होंने नितांत गरीबी में जीवन व्यतीत करना शुरू किया। दोपहर का भोजन वे लोग किसी मन्दिर के लंगर में खाते थे। लंगर लगाने वाले दानियों द्वारा भोजन के बाद दो पैसे की दक्षिणा भी मिलती थी। इस दक्षिणा से उनके रात के भोजन का प्रबंध हो जाता था। इस फटेहाल जीवन से तंग आ कर कुछ समय बाद शंकर राव कगारे घर वापिस चले गए। कुपोषण के कारण बेडेकर का निधन हो गया। विनायक ने एक स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाने की नौकरी कर ली। वेतन के बारे में पूछने पर विनायक ने कहा कि मुझे मात्र दो रुपए मासिक वेतन ही चाहिए क्योंकि मेरे भोजन का प्रबंध दान से हो जाता है। कमरे का किराया दो रुपया है। मुझे केवल उसी की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त मेरा कोई खर्चा नहीं है।
काशी में विनायक ने एक बार महात्मा गांधी का भाषण सुना। वह उनसे अत्याधिक प्रभावित हुए। उन्होंने गांधी जी पत्र लिखा। गांधी जी के बुलाने पर वह साबरमती आश्रम पहुंच गए। आश्रम में वह गांधी जी के विश्वस्त सहयोगीबन गए और आश्रम के राष्ट्रीय विद्यालय में छात्रों को पढ़ाने का दायित्व उन्होंने अपने ऊपर ले लिया। विनोबा जी किसी भी काम को करने में संकोच नहीं करते थे। आश्रम में पाखानों की साफ सफाई करने से लेकर आटा दाल पीसने तक का कार्य वह स्वयं अपने हाथों से करते थे। हर प्रकार का कार्य पूरी तन्मयता से सम्पन्न करके वह आश्रमवासियों के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करना चाहते थे। उनकी इस कठोर साधना पर गांधी जी का ध्यान हमेशा रहता था। इसी कारण जब सेठ जमनादास बजाज ने वर्धा में आश्रम की स्थापना की तब वहां के संचालन के लिए गांधी जी ने विनोबा जी को वहां भेज दिया। 1921 की वर्ष प्रतिपदा को विनोबा जी वर्धा पहुंच गए। इस आश्रम में गांधी जी द्वारा निर्देशित भारत के नव निर्माण के सारे रचनात्मक कार्य सम्पन्न होने लगे। उन्होंने सर्वांगीण ग्राम विकास की कई योजनाएं बनाईं और ग्राम सेवा मंडलों का गठन भी किया। जब भी विनोबा जी को जेल जाना पड़ा वहां पर भी उनका जेलवासियों को पढ़ाने और स्वयं अध्ययन करने का कार्य चलता रहा। उन्होंने गीता का गहन अध्ययन किया था इसलिए वह गीता के रहस्यों से उन्हें परिचित करवाते थे। गीता पर उन्होंने अनेक प्रवचन दिए लेख और पुस्तकें भी लिखीं। उनकी गीता रहस्य नामक पुस्तक का देश विदेश की अनेक भाषाओं में प्रकाशन हुआ। ाrवनोबा जी बहुभाषिक थे। किसी भी भाषा को वह बहुत जल्दी सीख लेते थे। उनकी भाषा शैली सूत्रमय होते हुए भी बहुत ही सरल होती थी। उनके पास एक विस्तृत शब्द भंण्डार था जिस कारण वह अपनी बात को बहुत सहजता से उदाहरण दे कर समझाने में सफल होते थे। नलवाडी में रहते हुए उन्होंने अरबी भाषा सीखी और कुरान का मूल अरबी भाषा में अध्ययन किया। उन्होंने बाईबिल का भी अध्ययन किया ।
विनोबा जी का दृढ़ विश्वास था कि सिद्धांत व्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। सिद्धांतों का पालन करके ही व्यक्ति महान बनता है। जिस विचार को हम अपनाते हैं वह हमारा विचार ही हो जाता है। उन्होंने कहा कि हमने गांधी जी के समस्त विचारों को अपनाया है तो अब वे हमारे विचार ही हैं। गांधी जी के निधन के साथ वह नष्ट नहीं हुए। अब वे विचार सर्वोदय के हैं। वह हमारी बहुमूल्य विरासत है। उनको अपनाने में हमारा ही नहीं सब का कल्याण है। सब के कल्याण के लिए ही उन्होंने भूमिहीनों को भूमि उपलब्ध करवाने की योजना बनाई। इसका प्रारम्भ उन्होंने आंध्र प्रदेश के पांचमपल्ली नामक स्थान से किया। उनके अनुरोध पर वहां के जमींदार रामचन्द्र रेड्डी ने 100 एकड़ भूमि उन्हें दान में दे दी जिसे भूमिहीनों में वितरित कर दिया गया। इस कार्य के लिए विनोबा जी ने देश के कोने कोने में तेरह वर्ष पदयात्राएं कीं। इन यात्राओं के दौरान वह लगभग एक लाख किलोमीटर पैदल चले। इन यात्राओं से स्थान स्थान पर भूदान का कार्य प्रारम्भ हुआ। फलस्वरूप उन्हें लाखों एकड़ भूमि दान में प्राप्त हुई जिसे उन्होंने जरूरतमंदों के मध्य वितरित कर दिया । विनोबा जी के पिता के देहावसान पर उन्हें 25 हजार रुपए और 450 एकड़ पुश्तैनी जमीन मिली। विनोबा जी ने सारी जमीन भूमिहीनों में बांट दी। 25 हजार रुपए रचनात्मक कार्यों पर व्यय करने के लिए ग्राम सेवा मंडलों को सौंप दिए गए। भूदान के साथ ही विनोबा जी ने एक अन्य महान कार्य दस्यू उन्मूलन का भी किया। उनकी प्रेरणा से बहुत से डाकूओं ने आत्म सपमर्पण करके पुन: समाजिक जीवन में पर्दापण किया।
विनोबा जी की सप्रिय राजनीति में कोई रुचि नहीं थी। वे स्वयं को अराजनीतिक ही मानते थे। 1958 में उनके द्वारा किए गए सामाजिक कार्यों के लिए उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त मैगासे पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। इससे पूर्व यह पुरुस्कार किसी अन्य भारतीय को नहीं दिया गया था। विनोबा जी मानते थे कि विचार ही चिरंतन होते हैं। इसलिए जब 15 नवम्बर 1982 को उन्होंने देह त्यागी तो वह अपने विचारों की एक सृद्धिशाली वसीयत पूरे विश्व के लिए पीछे छोड़ गए। 1983 में उन्हें मरणोपरान्त भारत रत्न से विभूषित किया गया। उनके कार्यों की मशाल एक दिव्य मिसाल बन कर आज भी हमारा मार्ग प्रशस्त कर रही है।

इमरान थोड़ी हिम्मत करें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की मुसीबतों को मैं अच्छी तरह से समझता हूं। उन्हें पाकिस्तान की जनता को बताना है कि कश्मीर के सवाल पर वे ज़मीन-आसमान एक कर देंगे। वे जुल्फिकार अली भुट्टो को भी पीछे छोड़ देंगे। भुट्टो ने कहा था कि जरुरत पड़ी तो पाकिस्तान भारत के साथ एक हजार साल तक भी लड़ता रहेगा। पाकिस्तान के सेनापति जनरल बाजवा ने इमरान के स्वर में स्वर मिलाते हुए कहा है कि पाकिस्तान कश्मीर के लिए अपने खून की आखिरी बूंद तक लड़ता रहेगा। इसका जवाब भारतीय सुरक्षा सलाहकार अजित दोभाल ने बहुत ही सधे हुए तरीके से दिया है। उन्होंने ठीक ही कहा है कि कश्मीर की शांति पाकिस्तान के रवैए पर निर्भर है। अगर पाकिस्तान कश्मीरियों को हिंसा के लिए भड़काता रहा और आतंकियों को भेजता रहा तो जो प्रतिबंध उन पर अभी लगे हुए हैं, उन्हें हटाना मुश्किल होगा। इमरान खान को अब अच्छी तरह से पता चल गया है कि दुनिया का कोई भी देश भारत में कश्मीर के पूर्ण विलय पर आपत्ति नहीं कर रहा है। बस चीन, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देश भी अब यह कहने लगे हैं कि कश्मीर में मानव अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। बिल्कुल होनी चाहिए, यह तो हम भी कह रहे हैं लेकिन इसका धारा 370 और 35 ए के खात्मे से क्या संबंध है ? कश्मीर के पूर्ण विलय से क्या संबंध है ? इमरान खान जानते हैं कि कश्मीर में जो हो चुका है, उसे पलटाया नहीं जा सकता है। हां, इतना जरुर हो सकता है, जैसे कि गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में इशारा किया था कि जम्मू-कश्मीर को फिर से राज्य का दर्जा मिल जाए। अब इमरान खान को इतिहास का पहिया उल्टा घुमाने की कोशिश करने की बजाय यह सोचना चाहिए कि दोनों कश्मीरों के कश्मीरियों का भविष्य कैसा हो ? दोनों कश्मीरी अब तक काफी नुकसान उठा चुके हैं। ‘आजाद कश्मीरियों’ को सच्ची आजादी कैसे मिले और दोनों तरफ के कश्मीरी हिंसा और आतंकवाद से छुटकारा कैसे पाएं ? कश्मीर के नाम पर पाकिस्तान की फौज पाकिस्तानियों के सीने पर चढ़ी बैठी है, उसे इमरान नहीं समझाएंगे तो कौन समझाएगा ? कश्मीर की वजह से पूरा पाकिस्तान कराह रहा है। उसी की वजह से पहले पाकिस्तान को अमेरिका की गुलामी करनी पड़ी और अब उसे चीन की चप्पलें उठानी पड़ रही हैं। इमरान चाहें और थोड़ी हिम्मत करें तो वे पाकिस्तान को इस जन्मजात गुलामी से मुक्ति दिला सकते हैं।

मंदी के शोर के बाद कैसे होगा डेमेज कण्ट्रोल
अजित वर्मा
देश की अर्थव्यवस्था को लेकर चल रही बहस और मंदी के शोर के बीच देश के सामने 70 साल के सबसे बड़े संकट की बात कह कर नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने जो हलचल मचायी थी उससे मोदी सरकार को डेमेज कण्ट्रोल के लिए तत्काल सक्रिय होना पड़ा। खुद राजीव कुमार अपने बयान पर सफाई देने मैदान में आये। अब वे कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए मोदी सरकार कड़े कदम उठा रही है और ऐसा आगे भी करती रहेगी। किसी भी तरह से घबराने और घबराहट का माहौल पैदा करने की जरूरत नहीं है। पहले राजीव कुमार ने कहा था कि देश में 70 साल में अबतक नकदी का ऐसा संकट नहीं देखा गया है। मोदी सरकार के लिए यह अप्रत्याशित समस्या है। कोई भी किसी पर यकीन नहीं कर रहा है। कोई भी मार्केट में पैसा नहीं निकाल रहा है। उन्होंने कहा था, यह सिर्फ सरकार और प्राइवेट सेक्टर की बात नहीं है। निजी क्षेत्र में आज कोई भी किसी और को कर्ज नहीं देना चाहता। राजीव ने यह भी कहा था कि एनपीए बढ़ने के कारण अब बैंकों के नया कर्ज देने की क्षमता घट गई है। इस बीच देश में आर्थिक मंदी के हालातों को सुधारने के लिए केंद्र की मोदी सरकार ने टैक्स सुधारों की घोषणा की है। इस सुधारों के तहत मोदी सरकार देश में कैश फ्लो को बढ़ाने के लिए 5 लाख करोड़ बैंकों को देगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने निवेश को बढ़ाने के लिए लॉन्ग टर्म और शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स पर टैक्स सरचार्ज को वापस लेने की घोषणा की है। विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफपीआई पर भी अतिरिक्त सरचार्ज को वापस लिया जाएगा। कॉर्पोरेट सोशल रेस्पॉन्सिबिलिटी को उन्होंने क्रिमिनल केस न बनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि इस पर सिर्फ जुर्माना ही लगेगा। स्टार्टअप्स पर लगने वाले एंजैल टैक्स की वापसी का भी फैसला लिया गया है। इसके साथ ही बैंकों के लिए 70,000 करोड़ का पैकेज रिलीज करने का ऐलान किया गया है। सरकार की ओर से आर्थिक सुधारों का जिक्र करते हुए वित्तमंत्री ने कहा कि जीएसटी में जो भी खामियां हैं, उसे दूर किया जाएगा। टैक्स और लेबर कानून में लगातार सुधार कर रहे हैं। बैकिंग सेक्टर, ऑटो सेक्टर के लिए भी वित्तमंत्री ने बड़े ऐलान किये हैं।
दरअसल, आर्थिक क्षेत्रों में हलचल के कारण अन्तरराष्ट्रीय हैं तो प्राकृतिक भी एक ओर जहाँ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प द्वारा बड़े पैमाने पर छेड़ा गया ट्रेड वॉर एक कारण है तो जलवायु परिवर्तन भी विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन भी भारत की अर्थव्यवस्था को इस सदी के अंत तक 10 प्रतिशत तक कम कर सकता है। कहा जा रहा है कि अगर पैरिस समझौता नहीं होता है तो लगभग सभी देश – चाहे वे अमीर हों या गरीब, उष्ण हों या शीत, सभी आर्थिक रूप से प्रभावित होंगे। शोधकर्ताओं ने कहा कि इसके कारण 2100 तक अमेरिका का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), मौजूदा से 10.5 प्रतिशत कम हो जाएगा जो कि पर्याप्त रूप से नुकसानदायक हो सकता है। तो जापान, भारत और न्यूजीलैंड भी अपनी आय का 10 प्रतिशत खो देंगे। कनाडा दावा करता है कि वह तापमान में वृद्धि से आर्थिक रूप से लाभान्वित होगा, वह भी साल 2100 तक अपनी मौजूदा आय का 13 प्रतिशत से अधिक खो देगा।
कुछ लोग हैं जो भारत नोटबन्दी, जीएसटी और बैंकिंग तथा लेन-देन के नये नियमों को देश में आर्थिक मंदी के लिए दोषी ठहरा रहे हैं। लेकिन यह फिलहाल बहस का ही विषय है। देखना तो मैदानी हकीकतों को है। इसमें अभी समय लगेगा।

तालिबान के साथ अटपटा समझौता
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिका की तरफ से जलमई खलीलजाद अफगानिस्तान के तालिबान नेताओं से पिछले डेढ़-दो साल से जो बात कर रहे थे, वह अब खटाई में पड़ती दिखाई पड़ रही है, क्योंकि अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने उस पर दस्तखत करने से मना कर दिया है। अभी-अभी ताजा सूचना मिली है कि अगर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उस समझौते पर अंगूठा लगा दिया तो बेचारा पोंपिओ क्या करेगा ? लेकिन सवाल यह है कि ट्रंप के दस्तखत के बावजूद क्या इस समझौते से अफगानिस्तान में शांति हो जाएगी ? इसका सीधा-सा जवाब यह है कि अफगानिस्तान की शांति से अमेरिका को क्या लेना-देना है ? उसने उसामा बिन लादेन को मारकर न्यूयार्क हमले का बदला निकाल लिया है और शीत युद्ध के दौरान काबुल पर छाई रुस की छाया को उड़ा दिया है। अब वह अफगानिस्तान में अरबों डाॅलर क्यों बहाए और हर साल अपने दर्जनों फौजियों को क्या मरवाए ? ट्रंप का तो चुनावी नारा यही था कि वे अगर राष्ट्रपति बन गए तो वे अफगानिस्तान से अमेरिका का पिंड छुड़ाकर ही दम लेंगे। इसीलिए कोई आश्चर्य नहीं कि वे इस समझौते पर खुद ही अपने दस्तखत चिपका दें। अभी तक हमें क्या, अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी और प्रधानमंत्री डाॅ. अब्दुल्ला को ही पता नहीं कि खलीलजाद और तालिबान के बीच किन-किन मुद्दों पर समझौता हुआ है। सुना है कि गनी को समझौते का मूलपाठ अभी तक नहीं दिया गया है लेकिन माना जा रहा है कि अमेरिकी फौज 5 अफगान अड्डों को खाली करेगी, 135 दिनों में। साढ़े आठ हजार फौजी वापस जाएंगे। यह पता नहीं कि अफगानिस्तान में 28 सितंबर को होनेवाला राष्ट्रपति-चुनाव होगा या नहीं ? समझौते के बाद क्या वर्तमान सरकार हटेगी और उसकी जगह तालिबान की इस्लामी अमीरात आ जाएगी ? यह भी पता नहीं कि तालिबान और गनी के सरकार के बीच सीधी बातचीत होगी या नहीं ? जो लोग पिछले 18 साल से तालिबान का विरोध कर रहे थे और हामिद करजई और गनी सरकार का साथ दे रहे थे, उनका क्या होगा ? तालिबान-विरोधी देशों के दूतावासों को क्या काबुल में अब बंद करना होगा ? जिन स्कूलों और कालेजों में आधुनिक पढ़ाई हो रही थी, उनका अब क्या होगा ? यदि इस समझौते से तालिबान खुश हैं तो लगभग रोजाना वे हमले क्यों कर रहे हैं ? अफगानिस्तान अब लोकतंत्र रहेगा या शरियातंत्र ? इन सब सवालों को लेकर अमेरिकी कांग्रेस (संसद) की विदेश नीति कमेटी भी परेशान है। खलीलजाद को वह तीन बार उसके सामने पेश होने को कह चुकी है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जान बोल्टन भी परेशान हैं। यदि यह गोलमाल समझौता इसी तरह हो गया तो मानकर चलिए कि अफगानिस्तान एक बार फिर अराजकता का शिकार हो जाएगा। पाकिस्तान की मुसीबतें सबसे ज्यादा बढ़ेंगी। भारत भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा।

4 दिन में जुर्माने से 1 करोड़ 71 लाख की वसूली
सनत जैन
मोटर व्हीकल एक्ट में सरकार ने जुर्माने की राशि में जो संशोधन किया है। पिछले 4 दिनों में 1 करोड़ 71 लाख रुपया जर्माने में वसूल किए है। यह जुर्माना हरियाणा राज्य में 52.32 लाख, 343 चालानों के माध्यम से वसूला गया है। उड़ीसा में 88.90 लाख रुपया 4080 चालान काटे गये। कर्नाटक के बैंगलूर में ट्राफिक पुलिस ने 30 लाख रुपया पिछले 4 दिनों में वसूल किये हैं। दिल्ली राज्य में भी 1 दिन में ट्रैफिक पुलिस ने 3900 चालान काटे हैं। इसमें कितना जुर्माना वसूला गया है। इसके आंकड़े अभी सामने नहीं आये हैं। दिल्ली राज्य के जुर्माने को जोड़ दिया जाये, तो यह राशि 4 करोड़ रुपया से ऊपर पहुंच जाएगी। मोटर व्हीकल एक्ट में नए जुर्माने का जो प्रावधान किया है, वह कुछ ही शहरों में लागू हुआ है। जब यह देश भर में कार्यवाही होगी, तो सरकार प्रतिदिन अरबों रुपयों की राशि जुर्माने के रूप में वसूल करेगी। केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी का कहना है कि सड़क हादसों में प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ लाख लोगों की मौत दुर्घटनाएं में हो रही है। इससे ज्यादा आत्महत्या, किसान, युवा बेरोजगार एवं छात्र-छात्राएं भारत में हो रही हैं। यदि तीनों की आत्महत्या का आंकड़ा जोड़ दिया जाये, तो प्रतिवर्ष भारत में लगभग 3 लाख 50हजार से ज्यादा मौतें आत्महत्या के कारण हो रही हैं। इन्हें रोकने के लिए केन्द्र सरकार ने क्या उपाय किये, आत्महत्या किन कारणों से हो रही है। जो उसके लिए जिम्मेदार हैं उन पर जुर्माना और उनके प्रति कार्यवाही को लेकर सरकार क्यों मौन है? इसको लेकर आम आदमी का गुस्सा शासन, प्रशासन और व्यवस्थाओ पर स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। सारी दुनिया के देशों में सबसे ज्यादा आत्महत्या भारत में हो रही है।
मोटर व्हीकल एक्ट में वाहन चालकों के ऊपर विभिन्म मामलों में 10 हजार रुपया तक का जुर्माना वसूल करने का प्रावधान किया गया है। एक बार में पुलिस किसी भी वाहन चालक पर अधिकतम 52500 रुपये का जुर्माना वसूल कर सकती है। इस दायरे में दुपहिया वाहन से लेकर बड़े वाहनों के चालकों को रखा गया है। भारत की पुलिस लहरें गिनने का पैसा वसूल करती है। जिस देश में रिपोर्ट लिखवाने के लिए पुलिस रिश्वत लेती है, वहां पर पुलिस के हाथों में जुर्माने के इस झुनझुने को पकड़ाने से आम आदमी की क्या दुर्दशा होगी, यह आसानी से समझा जा सकता है। भारत जैसे देश में जहां 90 फीसदी परिवारों की आय 10 हजार से 15 हजार रुपया मासिक है। उनसे यह जुर्माना किस तरह वसूल किया जा सकता है। यदि उन्होने जुर्माना नहीं दिया, तो वाहन जब्त होगा। उन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है। जुर्माना यदि चुका दिया तो वह परिवार की पूरे माह गुजर वसर किस तरह करेगा। सरकार ने इसका कोई विकल्प नहीं सुझाया है। जिन सड़क दुर्घनाओं का हवाला दिया जा रहा है। उनमें 60 फीसदी से ज्यादा मौतें खराब सड़कों, वाहन निर्माता कंपनियों की लापरवाही तथा सड़क पर काम चलने के दौरान ठेकेदारों एवं सरकारी एजेंसियों द्वारा सूचनै फलक एवं दुर्घटनाओं को रोकने के लिए जो कार्य करना था, वह नहीं किये जाने के कारण दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। आपातकाल के दौरान जिस तरह संजय गांधी ने नसबंदी कार्यक्रम के लक्ष्य देकर आम जनता के बीच भय का वातावरण बनवाकर जनसंख्या नियंत्रण की कोशिश की थी। ठीक उसी तरह अघोषित अपातकाल में वाहन चालकों के मन में पुलिस का भय वर्तमान सरकार बनाने का काम कर रही है। कहा जाता है कि वाहन की जांच के समय पुलिस कोई न कोई कमी बताकर जुर्माना वसूल सकती है। पहले भी पुलिस और आरटीओ द्वारा जबरिया वसूली की जा रही है। ऐसा हमारा मोटर व्हीकल एक्ट है। जब पुलिस के हाथ में सरकार ने वसूली का इतना बड़ा हथियार थमा दिया हो तो वाहन चालकों की क्या हालत होगी। आसानी से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। पुलिस के चालान से बचने के लिए जो वाहन भगाने के लिए तेजी से वाहन चलाने का प्रयास करेगे, उससे दुर्घटनाएं और बढ़ने की संभावना है। सरकार ने जुर्माने की राशि लागू करने के पूर्व संवेदनशीलता का जो परिचय देना चाहिए था। वह नहीं दिया गया है। जिसके कारण जनरोष बढ़ना तय है।

भारत-रुस: नई ऊंचाईयां
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह रुस-यात्रा भारतीय प्रधानमंत्रियों की पिछली कई यात्राओं के मुकाबले कहीं अधिक सार्थक रही है। उसका पहला प्रमाण तो यही है कि पूर्वी आर्थिक मंच के बहुराष्ट्रीय सम्मेलन में मोदी को मुख्य अतिथि बनाया गया है। दूसरी बात यह है कि मोदी और पुतिन, दोनों ने साफ-साफ कहा है कि किसी भी देश को अन्य देश के आंतरिक मामलों में टांग अड़ाने का कोई अधिकार नहीं है। पुतिन का यह बयान क्या ख्रुश्चौफ और बुल्गानिन के उस बयान की याद नहीं दिलाता है, जो उन्होंने अपनी पहली यात्रा के दौरान प्र.म. नेहरु के सामने दिया था ? उन्होंने कहा था कि कश्मीर में आपको कोई खतरा हो तो आप हमें आवाज़ दीजिए हम आपके खातिर दौड़े चले आएंगे। शीतयुद्ध के दौरान पाकिस्तानपरस्त अमेरिका को टक्कर देने के हिसाब से यह बात ठीक थी लेकिन पिछले दो-ढाई दशक में रुस-अमेरिका समीकरण बदलने के कारण कश्मीर पर रुसी रवैया थोड़ा ढीला हो गया था। उसने पाकिस्तान के साथ भी पींगें बढ़ानी शुरु कर दी थीं लेकिन रुस के इस ताजा रवैए ने भारत-रुस दोस्ती पर फिर से पक्की मुहर लगा दी है। भारत और रुस ने तरह-तरह के 25 समझौतों पर दस्तखत किए हैं। अभी भी रुस भारत का सबसे बड़ा हथियार-विक्रेता है। यों तो आजकल भारत-अमेरिका के बीच घनिष्टता अपूर्व रुप से बढ़ी हुई है और ट्रंप का रवैया कश्मीर के मामले में भारतपरस्ती का है और अमेरिका यह भी चाहता है कि सुदूर पूर्व में भारत की भूमिका बलवती हो ताकि चीन के प्रभाव को सीमित किया जा सके। इस मामले में रुस भी पीछे नहीं है। रुस वैसे चीन से अच्छे संबंध बनाए हुए हैं लेकिन चीन के महान रेशम पथ की योजना से वह सहमत नहीं है। वह चाहता है कि भारत मध्य एशिया के राष्ट्रों और सुदूर-पूर्व के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। इसीलिए ब्लादिवस्तोक में होनेवाले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत को केंद्र में रखा गया है। जाहिर है कि इससे पाकिस्तान परेशान होगा। इस समय सउदी अरब और संयुक्त अरब अमारात के विदेश मंत्री हताश इमरान सरकार के पिचके हुए गुब्बारे में थोड़ी हवा जरुर भरेंगे लेकिन अब पाकिस्तान का भला इसी में है कि खुद के दिमाग में फंसी भारत-गांठ को खोल दे और अपना ध्यान संकट में फंसे अपने देश पर केंद्रित करे।

जुर्माने पर फिर से सोचना जरूरी
सिद्धार्थ शंकर
यातायात नियमों के उल्लंघन को लेकर जुर्माने के नए कानून पर मचे बवाल के बीच सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने स्पष्ट किया है कि यातायात नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने में भारी वृद्धि का फैसला कानून का पालन अनिवार्य बनाने के लिए किया गया है, न कि सरकारी खजाने को भरने के मकसद से। दरअसल, इस महीने से जुर्माने की रकम 30 गुना तक बढऩे और सजा की अवधि में भी इजाफे का नया नियम लागू किए जाने पर कोहराम मचा हुआ है। पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के साथ-साथ गुजरात ने बढ़ी हुई दर पर जुर्माना वसूलने से इनकार कर दिया है। गडकरी ने देश में सड़क हादसों में हो रही मौतों का जिक्र करते हुए कहा कि बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके लिए कड़े जुर्माने के बिना ट्रैफिक रूल कोई मायने नहीं रखता है। उन्होंने कहा कि जुर्माना बढ़ाने का फैसला काफी समझ-बूझकर और विभिन्न पक्षों से सलाह लेकर लागू किया गया है। दरअसल, एक सितंबर को संशोधित मोटर व्हीकल एक्ट-1988 लागू होने के बाद भारी-भरकम जुर्माने के चालान कटने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
गुरुग्राम पुलिस ने गुरुवार को एक ट्रैक्टर ट्रॉली ड्राइवर को कई नियमों के उल्लंघन के आरोप में 59 हजार रुपए का चालान काट दिया। उससे पहले, दो सितंबर को गुरुग्राम में ही एक स्कूटी चालक पर विभिन्न मामलों में 23 हजार रुपए का जुर्माना लगाया गया था। उसने यह कहते हुए जुर्माना भरने से इंकार कर दिया था कि उसकी स्कूटी की कीमत ही मात्र 15 हजार रुपए है। बुधवार की ही बात है जब ऑटो ड्राइवर को नशे की हालत में ड्राइव करने, ड्राइविंग लाइसेंस समेत जरूरी दस्तावेज नहीं होने के कारण 47,500 रुपए का चालान काटा गया। चालान की यह रकम पहली नजर में भले ही बहुत ज्यादा लग रही हो, मगर इसके दो पहलू हैं। जिस पर समाज और लोगों को ध्यान देना होगा। साथ ही सरकार को भी जुर्माने की राशि पर नए सिरे से विचार करना होगा। आज सड़कों पर वाहन चालकों की मनमानी किस तरह से सामने आती है, यह किसी से छिपा नहीं है। आए दिन हादसों में मौतों का बढ़ रहा ग्राफ यह बताने को काफी है कि हम किस कदर लापरवाह हैं और इस लापरवाही मे वाहन चालक कभी अपनी जान गंवा देते हैं या कभी दूसरों की जान जोखिम में डाल देते हैं।
अभी कुछ दिन पहले खबर आई थी कि देश का लगभग हर तीसरा ड्राइविंग लाइसेंस फर्जी है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस समय पांच करोड़ से अधिक लोग फर्जी दस्तावेजों के सहारे सड़कों पर वाहन चला रहे हैं। सड़क परिवहन व सुरक्षा विधेयक को महत्वपूर्ण बताते हुए गडकरी ने कहा कि लगभग डेढ़ लाख लोग हर साल सड़क हादसों में मारे जाते हैं। नए कानून लागू हो जाने से पूरी व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव आएगा। अगर लोगों को जुर्माने की रकम कुछ ज्यादा लग रही है तो इस पर सरकार को विचार कर लेना चाहिए।

कश्मीरियों से सार्थक संवाद
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
गृहमंत्री अमित शाह से जम्मू-कश्मीर के लगभग 100 लोगों के प्रतिनिधि मंडल ने कल दिल खोलकर बात की। उनमें पंचायतों के सरपंच, पंच और सेब-उत्पादक किसान आदि भी थे। यह पूछा जा सकता है कि लगभग 4500 पंचायतों के 35 हजार पंचों में से कुछ दर्जन पंचों के मिलने का क्या महत्व है ? जो मिले हैं, वे कितने कश्मीरियों का प्रतिनिधित्व करते हैं ? यह प्रश्न अपनी जगह सही है लेकिन जो परिस्थितियां अभी कश्मीर में हैं, उन्हें देखते हुए इतने लोगों से भी गृहमंत्री का मिलना अपने आप में महत्वपूर्ण है। कई बार कुछ लोग ही बहुत-से लोगों की इतनी बातें कह देते हैं, जितनी वे बहुत-से लोग सब मिलकर भी नहीं कह पाते। इस भेंट में यही हुआ। पंचों ने जब कहा कि वे डर के मारे घर से बाहर नहीं निकल पाते तो गृहमंत्री ने कहा कि सभी पंचों और ग्रामप्रधानों के लिए सरकार दो-दो लाख का बीमा करेगी। उन्होंने सभी पंचों और दुकानदारों को भी सुरक्षा देने का आश्वासन दिया। एक दुकानदार की इसीलिए हत्या कर दी गई है कि उसे आतंकवादियों ने दुकान बंद रखने की धमकी दी थी। गृहमंत्री ने अगले 15-20 दिन में संचार के सभी साधनों को खोल देने का भी संकेत दिया। कश्मीर के हर गांव के कम से कम पांच नौजवानों को रोजगार का भी भरोसा दिया गया। राज्यपाल सतपाल मलिक पहले ही 50 हजार रोजगार देने की घोषणा कर चुके हैं। गृहमंत्री ने 316 खंडों में शीघ्र ही चुनाव करवाने की घोषणा की है। जम्मू में हुई फौज-भर्ती की रैली में हजारों नौजवानों ने भाग लिया है। गृहमंत्री ने यह आश्वासन भी दिया है कि जम्मू-कश्मीर का ज्यों ही वातावरण ठीक-ठाक होगा, उसे राज्य का दर्जा दिए जाने में देर नहीं की जाएगी। अमित शाह ने यह कहकर कश्मीरियों के घाव पर मरहम रख दिया है कि धारा 35 ए के खत्म होने का अर्थ यह नहीं कि कश्मीर की जमीन बाहरी लोग आकर कब्जा करने लगेंगे। यह बात मैंने 5 अगस्त को ही लिखी थी। मुझे खुशी है कि सरकार ने कश्मीरियत की रक्षा का भरोसा दिलाया है लेकिन मेरी समझ में नहीं आता कि यही बात नरेंद्र मोदी ज़रा साफ-साफ और जोर से क्यों नहीं कहते ? यदि कश्मीरियों को 5 अगस्त के पूर्ण विलय के फायदे सरकार ठीक से समझा पाएगी तो जिस हुड़दंग की आशंका से वह डरी हुई है, उसे काबू में लाना कठिन नहीं होगा।

“विशिष्ट” लोगों के अवैज्ञानिक कुतर्क
निर्मल रानी
भारतीय वैज्ञानिकों ने अपनी योग्यता के बल पर चन्द्रमा पर पताका फहराने के लिए अपनी कमर कस ली है। देश के शिक्षित व योग्य युवाओं के घोर परिश्रम की बदौलत भारतवर्ष दुनिया में पहले से अधिक मज़बूत स्थिति में नज़र आ रहा है। देश में मौजूद अनेक आई आई टी व अन्य कई शिक्षण संस्थान प्रत्येक वर्ष देश को तमाम ऐसे युवा व होनहार वैज्ञानिक इस देश को दे रहे हैं जो देश की तरक़्क़ी में अपना बेशक़ीमती योगदान कर रहे हैं। देश के विकास का मुख्य आधार शिक्षा तथा विज्ञान ही है। परन्तु अफ़सोसनाक बात यह है कि कई ज़िम्मेदार लोग इस हक़ीक़त को झुठलाने तथा अपने अन्धविश्वास व अवैज्ञानिकता भरे विचारों से लोगों को गुमराह करने की कोशिश में लगे हुए हैं। कभी कभी ऐसे लोग जिनमें कि अनेक जनप्रतिनिधि व ‘विशिष्ट’ लोग भी शामिल हैं, ऐसे बयान देते हैं जो हास्यास्पद होने की वजह से पूरे देश को हंसी का पात्र बनाते हैं। पिछले दिनों एक ऐसा ही बयान भोपाल की सांसद प्रज्ञा ठाकुर द्वारा दिया गया जो न केवल अवैज्ञानिक व अतार्किक था बल्कि अज्ञानतापूर्ण भी था। 26 अगस्त को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में प्रदेश भाजपा कार्यालय में पूर्व वित्तमंत्री एवं भाजपा नेता अरुण जेटली तथा राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौड़ को श्रद्धांजलि अर्पित करने हेतु एक श्रद्धांजलि सभा रखी गयी थी. इसमें राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज चौहान सहित प्रदेश भाजपा के अनेक बड़े नेताओं ने भी भाग लिया। सभी उपस्थित प्रमुख नेताओं ने दिवंगत नेताओं को अपने अपने शब्दों में श्रद्धांजलि दी तथा देश व पार्टी के लिए दिए गए उनके योगदान को याद किया। परन्तु वक्ताओं की कड़ी में जब भोपाल की चर्चित सांसद प्रज्ञा ठाकुर का नंबर आया तो उन्होंने एक ऐसा बेतुका बयान दे डाला जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।प्रज्ञा ठाकुर ने कहा, ‘मैं जब चुनाव लड़ रही थी तब एक महाराज जी आए थे, उन्होंने कहा था ये बहुत बुरा समय चल रहा है. आप अपनी साधना को बढ़ा लो. विपक्ष एक “मारक शक्ति” का प्रयोग आपकी पार्टी और उसके नेताओं के लिए कर रहा है ऐसे में आप सावधान रहें.’ प्रज्ञा ठाकुर ने आगे कहा कि मैं यह बात भूल गई थी, लेकिन अब जब मैं ये देखती हूं कि हमारी पार्टी के नेता यूं एक के बाद एक जा रहे हैं तो मुझे लग रहा है कि कहीं ये सच तो नहीं? ये सच है कि हमारा शीर्ष नेतृत्व हमारे बीच से असमय जा रहा है.”
गोया प्रज्ञा ठाकुर के मुताबिक़ भाजपा नेताओं की मृत्यु के लिए भी विपक्ष ज़िम्मेदार है। संतोषजनक तो यह है कि उन्होंने पूरे विपक्ष को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया अन्यथा यदि वे पंडित नेहरू को ही इसके लिए अकेले भी ज़िम्मेदार ठहरा देतीं तो भी कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। उनके इस बयान से यह तो ज़ाहिर होता ही है कि तंत्र मन्त्र विद्या से कोई न कोई ऐसा उपाय किया जा सकता है जिससे “मारक शक्ति” पैदा हो। लगता है प्रज्ञा ठाकुर भी इस शक्ति को हासिल कर चुकी हैं। तभी उन्होंने यह दावे भी किये हैं कि ए टी एस प्रमुख हेमंत करकरे को उन्होंने ही श्राप दिया था जिससे वह 2008 में मुंबई के ताज होटल में 26/11 के हमले में पाक प्रायोजित आतंकवादियों के हाथों शहीद हुए थे। उनके इस विवादित एवं शहीद का अपमान करने वाले बयान के बाद ही यह सवाल भी पूछे जाने लगे थे कि जब प्रज्ञा ठाकुर के श्राप में इतनी शक्ति है तो उन्होंने ऐसा ही श्राप अजमल क़साब व हाफ़िज़ सईद जैसे आतंकवादियों को क्यों नहीं दिया। यदि वे समय पूर्व इन्हें श्राप दे देतीं तो 26/11 के मुंबई हमले में 160 से अधिक लोगों की जानें बच गयी होतीं। प्रज्ञा ठाकुर गाय की पीठ पर हाथ फेरने से कैंसर रोग ठीक होने का दवा भी करती रही हैं। इसके सुबूत में वे स्वयं को इससे लाभान्वित हुआ भी बताती हैं। वे गाय के दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर के मिश्रण से तैयार पंचगव्य के सेवन द्वारा भी कैंसर व अन्य रोगों के उपचार का दावा करती रही हैं। यदि प्रज्ञा ठाकुर के यह दावे सही हैं तो देश और दुनिया भर के कैंसर अस्पतालों में इन विधियों का उपयोग क्यों नहीं किया जाता।अमरीका जैसे शोध में अग्रणी रहने वाले देश गौमूत्र व पंचगव्य पर शोध क्यों नहीं करते। या दुनिया के अन्य देश इन मान्यताओं या विश्वासों को स्वीकृति क्यों नहीं देते। जबकि यही अमेरिका नीम और हल्दी जैसी गुणकारी चीज़ों का भरपूर लाभ उठा रहा है। यहाँ सवाल यह है कि हमारे देश के प्रगतिशील व वैज्ञानिक सोच रखने वाले युवाओं पर भोपाल जैसे महानगर से निर्वाचित होकर आने वाली प्रज्ञा ठाकुर जैसी जनप्रतिनधि के ऐसे अतार्किक व अवैज्ञानिक “उपदेशों” का क्या प्रभाव पड़ेगा ?
दो वर्ष पूर्व जब चीन की सेना ने सिक्किम सेक्टर में भारतीय सीमा में डोकलाम क्षेत्र में घुसपैठ की थी उस समय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश ने चीनी सेना का मुक़ाबला मंत्रोच्चारण के द्वारा करने की बात कही थी। संघ नेता इंद्रेश ने कहा था कि “चीन एक असुर शक्ति है अतः उसका मुक़ाबला करने के लिए सभी देशवासी इस मन्त्र का जाप करें कि- “कैलाश,हिमालय और तिब्बत चीन की असुर शक्ति से मुक्त हों “। उनके अनुसार इस मन्त्र से हमारी ऊर्जा बढ़ेगी और चीन का नुक़्सान होगा। यदि इस कथन में ज़रा सी भी सच्चाई है तो सत्ता में आने के बाद बड़े बड़े वैज्ञानिक व सैन्य शोध संस्थानों पर पैसे ख़र्च करने के बजाए तंत्र मन्त्र विद्या वाले बड़े संसथान तैयार किये जाने चाहिए। इन मन्त्रों का उच्चारण देश की चारों ओर की सीमाओं पर,कश्मीर व अन्य आतंक प्रभावित राज्यों में तथा नक्सल व माओवादी हमलों को रोकने के लिए क्यों नहीं किया जाता। हमारे देश में मंत्रशक्ति से जुड़ी सोमनाथ मंदिर की एक प्राचीन घटना बेहद प्रसिद्ध है।बताया जाता है कि महमूद ग़ज़नवी ने सन 1024 में लगभग पांच हज़ार की सेना के साथ सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया था। उसने मंदिर की बेशक़ीमती सम्पत्ति लूटी थी । जिस समय ग़ज़नवी ने आक्रमण किया बताया जाता है कि उस समय लगभग पचास हज़ार भक्तजन मंदिर के अंदर हाथ जोड़कर पूजा अर्चना कर रहे थे। वे ग़ज़नवी की लुटेरी सेना से लड़ने के लिए भी तैयार थे। परन्तु मंदिर के पुजारियों ने उन्हें आश्वस्त किया की उनके द्वारा किये जा रहे मंत्रोच्चारण से ग़ज़नवी व उसकी लुटेरी सेना का अंत हो जाएगा। ग़ज़नवी की सेना के मंदिर में प्रवेश करने तक मंदिर के सभी पुजारी बुलंद आवाज़ में मंत्रोच्चारण करते रहे। पुजारियों ने भक्तों को भी लड़ने नहीं दिया। नतीजतन तंत्र मन्त्र विद्या निष्प्रभावी साबित हुई। पुजारियों सहित मंदिर में मौजूद हज़ारों भक्तों की हत्या कर दी गयी। इसी हमले में ग़ज़नवी ने मंदिर की बेशक़ीमती संपत्ति लूट ली। उस समय से लेकर आज तक इतिहास के उस खंड को तो याद किया जाता है जिसमें ग़ज़नवी को मंदिर पर आक्रमण करने वाला लुटेरा व घुसपैठिया बताया जाता है परन्तु इतने प्रसिद्ध व सिद्ध ज्योतिर्लिंग की रक्षा हेतु पढ़े गए मन्त्रों की असफलता का उल्लेख नहीं किया जाता।
ऐसी तमाम अवैज्ञानिक व तर्कहीन बातें इन दिनों अनेक विशिष्ट लोगों के मुंह से निकलती सुनाई दे रही हैं। कभी प्रधानमंत्री से लेकर और कई बड़े नेता व विशिष्ट लोग गणेश सर्जरी को विश्व का पहला बड़ा सर्जिकल ऑपरेशन बताते हैं तो कभी राजयपाल जैसे पद पर बैठा व्यक्ति कहता है कि मोरनी मोर के आंसू पीकर गर्भवती होती है तो कभी सीता जी को पहला टेस्ट ट्यूब बेबी बता दिया जाता है। मिसाइल और विमान की टेक्नोलॉजी भी प्राचीन भारत की खोज का नतीजा बताई जाती हैं। यह और बात है कि पूरा विश्व इन बातों को गंभीरता से लेने के बजाए ऐसी बातों पर हँसता ज़रूर है। ख़ास तौर पर उस स्थिति में जब ऐसी अवैज्ञानिक व तर्कहीन बातें देश के जनप्रतिनिधियों व विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा की जाती हों। इससे देश के प्रगतिशील व वैज्ञानिक सोच रखने वाले वह युवा भी भ्र्मित होते हैं जिनके कांधों पर देश का भविष्य टिका हुआ है।

भारतीय वायुसेना को ताकतवर बनाएगा अपाचे
योगेश कुमार गोयल
(दुनिया की चंद ताकतवर वायुसेनाओं में शुमार भारतीय वायुसेना की ताकत उस समय और बढ़ गई, जब 27 जुलाई को उसे अमेरिकी एयरोस्पेस कम्पनी ‘बोइंग’ द्वारा चार एएच-64ई अपाचेगार्जियनअटैकहेलीकॉप्टरों की पहली खेप मिल गई, चार अपाचेहेलीकॉप्टर इसी सप्ताह और मिलने की संभावना है। कुछ ही माह पहले बोइंगकम्पनी द्वारा एक अपाचेहेलीकॉप्टर पहले ही भारत को सौंपा जा चुका है, इस तरह भारतीय वायुसेना के बेड़े में फिलहाल 9अपाचेअटैकहेलीकॉप्टर हो जाएंगे तथा आने वाले समय में कई और अपाचेहेलीकॉप्टरों की आपूर्ति भारतीय वायुसेना को होनी है। ये हेलीकॉप्टर भारतीय वायुसेना के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण इसलिए माने जा रहे हैं क्योंकि इन्हें दुनिया के सबसे खतरनाक हेलीकॉप्टरों के रूप में जाना जाता है और यही वजह है कि इन हेलीकॉप्टरों के भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल होने से हमारी वायुसेना की ताकत बढ़ गई है। बोइंगकम्पनी अब तक विश्वभर में 2200 से भी अधिक अपाचेहेलीकॉप्टरों की आपूर्ति कर चुकी है और भारत दुनिया का 14वां ऐसा देश है, जिसने अपनी सेनाओं के लिए इस हेलीकॉप्टर का चयन किया है। फिलहाल अमेरिका, ब्रिटेन, इजरायल, नीदरलैंड, सऊदी अरब, मिस्र इत्यादि देशों की वायुसेनाएं इसका इस्तेमाल कर रही हैं। बोइंगएएच-64 ई अपाचे को दुनिया का सबसे आधुनिक और घातक हेलिकॉप्टर माना जाता है, जो ‘लादेनकिलर’ के नाम से भी विख्यात है। यह अमेरिकी सेना तथा कई अन्य अतंर्राष्ट्रीय रक्षा सेनाओं का सबसे एडवांसमल्टीरोलकॉम्बैटहेलीकॉप्टर है, जो एक साथ कई कार्यों को अंजाम दे सकता है। अमेरिका, इजरायल, मिस्र तथा नीदरलैंड के अलावा कुछ अन्य देशों की सेनाएं भी इस हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल कर रही हैं। इसलिए इन हेलीकॉप्टरों को भारतीय वायुसेना में शामिल करना वायुसेना के बेड़े के आधुनिकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
भारतीय वायुसेना का मानना है कि अपाचे बेड़े के जुड़ने से बल की लड़ाकू क्षमताओं में काफी वृद्धि होगी क्योंकि इन हेलीकॉप्टरों में भविष्य की आवश्यकताओं के मद्देनजर बदलाव किए गए हैं। दरअसल भारतीय वायुसेना की जरूरत के मुताबिक ही अपाचेहेलीकॉप्टर में अपेक्षित बदलाव किए गए हैं। वायुसेना का कहना है कि भविष्य में थलसेना के साथ किसी भी तरह के साझा ऑपरेशन में अपाचेअटैक हेलिकॉप्टर बड़ा फर्क पैदा करेंगे। ढ़ाई अरब डॉलर अर्थात् करीब साढ़े सत्रह हजार करोड़ रुपये का यह हेलीकॉप्टर सौदा करीब चार साल पहले हुआ था, जब सितम्बर 2015 में भारत ने अमेरिका से 22अपाचे और 15चिनूक हेलिकॉप्टर खरीदने के लिए सौदा किया था। रक्षा मंत्रालय द्वारा 2017 में भी 4168 करोड़ रुपये की लागत से बोइंग से हथियार प्रणालियों सहित छह और अपाचेहेलीकॉप्टरों की खरीद को मंजूरी दी गई थी। अपाचे एक ऐसा अग्रणी बहुउद्देश्यीय लड़ाकू हेलीकॉप्टर है, जिसे खुद अमेरिकी सेना इस्तेमाल करती है। अमेरिका का अपाचेहेलीकॉप्टर पहली बार वर्ष 1975 में आकाश में उड़ान भरता नजर आया था तथा वर्ष 1986 में इसे पहली बार अमेरिकी सेना में शामिल किया गया था। अमेरिका ने अपने इसी अपाचेअटैक हेलिकॉप्टर का पनामा से लेकर अफगानिस्तान और इराक तक के साथ दुश्मनों को धूल चटाने के लिए इस्तेमाल किया था। इसके अलावा इजरायल भी लेबनान तथा गाजा पट्टी में अपने सैन्य ऑपरेशनों के लिए अपाचे का इस्तेमाल करता रहा है।
अपाचे की ढ़ेरों विशेषताएं ही इसे भारतीय वायुसेना को नई ताकत प्रदान करने के लिए पर्याप्त हैं। इसमें सटीक मार करने और जमीन से उत्पन्न खतरों के बीच प्रतिकूल हवाईक्षेत्र में परिचालित होने की अद्भुत क्षमता है। अपाचे का डिजाइन कुछ इस प्रकार तैयार किया गया है कि यह आसानी से दुश्मन की किलेबंदी को भेदकर उसके इलाके में घुसकर बहुत सटीक हमले करने में सक्षम है और इसकी इन्हीं विशेषताओं के चलते इससे पीओके में आतंकी ठिकानों को तबाह करने में भारतीय सेना को मदद मिलेगी। 365 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भरने में सक्षम यह हेलीकॉप्टर तेज गति के कारण बड़ी आसानी से दुश्मनों के टैंकरों के परखच्चे उड़ा सकता है। बहुत तेज रफ्तार से दौड़ने में सक्षम इस हेलीकॉप्टर को रडार पर पकड़ना बेहद मुश्किल है। यह बगैर पहचान में आए चलते-फिरते या रूके हुए लक्ष्यों को आसानी से भांप सकता है। इतना ही नहीं, सिर्फ एक मिनट के भीतर यह 128 लक्ष्यों से होने वाले खतरों को भांपकर उन्हें प्राथमिकता के साथ बता देता है। इसे इस तरीके से डिजाइन किया गया है कि यह युद्ध क्षेत्र में किसी भी परिस्थिति में टिका रह सकता है। यह किसी भी मौसम या किसी भी स्थिति में दुश्मन पर हमला कर सकता है और नाइटविजनसिस्टम की मदद से रात में भी दुश्मनों की टोह लेने, हवा से जमीन पर मार करने वाले रॉकेट दागने और मिसाइल आदि ढ़ोने में सक्षम है। टारगेट को लोकेट, ट्रैक और अटैक करने के लिए इसमें लेजर, इंफ्रारेड, सिर्फ टारगेट को ही देखने, पायलट के लिए नाइटविजन सेंसर सहित कई आधुनिक तकनीकें समाहित की गई हैं। यह एक बार में पौने तीन घंटे तक उड़ सकता है और इसकी फ्लाइंग रेंज करीब 550 किलोमीटर है। इसमें अत्याधुनिक रडार तथा निशाना साधने वाला सिस्टम लगा है।
दो जनरल इलैक्ट्रिकटी-700 हाई परफॉरमेंसटर्बोशाफ्ट इंजनों से लैस इस हेलीकॉप्टर में आगे की तरफ एक सेंसर फिट है, जिसके चलते यह रात के अंधेरे में भी उड़ान भर सकता है। इसका सबसे खतरनाक हथियार है 16एंटी टैंक मिसाइल छोड़ने की क्षमता। दरअसल इसमें हेलिफायर, स्ट्रिंगरमिसाइलें, 70एमएमरॉकेट्स लगे हैं और मिसाइलों के पेलोड इतने तीव्र विस्फोटकों से भरे होते हैं कि दुश्मन का बच निकलना नामुमकिन होता है। इसके वैकल्पिक स्टिंगर या साइडवाइंडरमिसाइल इसे हवा से हवा में हमला करने में सक्षम बनाते हैं। अपाचेहेलीकॉप्टर के नीचे दोनों तरफ 30एमएम की दो ऑटोमैटिकराइफलें भी लगी हैं, जिनमें एक बार में शक्तिशाली विस्फोटकों वाली 30एमएम की 1200 गोलियां भरी जा सकती हैं। इसका सबसे क्रांतिकारी फीचर है इसका हेल्मेटमाउंटेड डिस्प्ले, इंटीग्रेटेडहेलमेट और डिस्प्ले साइटिंगसिस्टम, जिनकी मदद से पायलट हेलिकॉप्टर में लगी ऑटोमैटिकएम-230 चेन गन को अपने दुश्मन पर टारगेट कर सकता है। 17.73 मीटर लंबे, 4.64 मीटर ऊंचे तथा करीब 5165 किलोग्राम वजनी इस हेलीकॉप्टर में दो पायलटों के बैठने की व्यवस्था है। इसका अधिकतम भार 10400 किलोग्राम हो सकता है। डेटानेटवर्किंग के जरिये हथियार प्रणाली से और हथियार प्रणाली तक, युद्धक्षेत्र की तस्वीरें प्राप्त करने और भेजने की इसकी क्षमता इसकी खूबियों को और भी घातक बना देती है।
अपाचेहेलीकॉप्टरों को चीन तथा पाकिस्तानी सीमा पर तैनात किया जाएगा तथा ये भारतीय सेना में विशुद्ध रूप से हमले करने का ही काम करेंगे। ये लड़ाकू हेलीकॉप्टर जमीनी बलों की सहायता के लिए भविष्य के किसी भी संयुक्त अभियान में महत्वपूर्ण धार उपलब्ध करांएगे। यही वजह है कि माना जा रहा है कि वायुसेना में इनके शामिल होने से वायुसेना के साथ-साथ थल सेना की ऑपरेशनल ताकत में भी कई गुना बढ़ोतरी हो जाएगी। कम ऊंचाई पर उड़ने की क्षमता के कारण यह पहाड़ी क्षेत्रों में छिपकर वार करने में सक्षम हैं और इस लिहाज से यह पर्वतीय क्षेत्र में वायुसेना को महत्वपूर्ण क्षमता और ताकत प्रदान करेगा। इसी साल 26 मार्च को चार हैवीलिफ्ट ‘चिनूक’ हेलीकॉप्टर भी वायुसेना के बेड़े में शामिल हुए थे और 11चिनूक मार्च 2020 तक मिलने की संभावना है। एमआई-17 जैसे मध्यम श्रेणी के भारी वजन उठाने वाले रूसी लिफ्टहेलीकॉप्टर भारतीय वायुसेना के पास पहले से ही मौजूद हैं। कुछ माह पूर्व रूस के साथ भी 37 हजार करोड़ रुपये की लागत से मल्टीफंक्शनरडार से लैस एस-400एंटीएयरक्राफ्टमिसाइल प्रणाली का सौदा किया गया था, जो दुनियाभर में सर्वाधिक उन्नत मिसाइल रक्षा प्रणालियों में से एक है और वायुसेना के लिए ‘बूस्टर खुराक’ मानी जाती रही है। अपाचे युद्ध के समय में गेम चेंजर साबित हो सकता है और एस-400एंटीएयरक्राफ्टमिसाइल प्रणाली, चिनूक, अपाचे तथा आने वाले दिनों में राफेल मिलकर भारतीय वायुसेना को इतनी ताकत प्रदान करेंगे, जिसे देखते हुए यह कहना असंगत नहीं होगा कि भारतीय वायुसेनादिनोंदिन ताकतवर होती जा रही है।

महान शिक्षाशास्त्री थे सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन
मनोहर पुरी
(05 सितम्बर : शिक्षक दिवस पर विशेष) भारत के दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन का जन्म दिवस पूरे देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसके पीछे मुख्य कारण उनका शिक्षा के प्रति समर्पण और शिक्षा के वास्तविक गुणों को आत्मसात करना रहा। वह राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत ,दर्शनशास्त्र, कुशल प्रशासक और महान तत्ववेत्ता विचारक थे। सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर सन् 1888 को तमिलनाडु के तिरुतणी नामक कस्बे में हुआ। उनका परिवार प्रांगानाडु नियोगी ब्राह्मण जाति का था। उनके पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी एवं माता का नाम श्रीमती सीताम्मा था। डॉ. राधाकृष्णन अपने माता पिता की दूसरी संतान थे। उनके पिता श्री वीरास्वामी शिक्षक होने के साथ पुरोहिताई का कार्य भी करते थे। इस प्रकार उनके परिवार में धर्म एवं शिक्षा का वातावरण था जिसका प्रभाव डॉ. राधाकृष्णन पर होना स्वाभाविक भी था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा अपने ही कस्बे तिरुतणी के अल्लामा राम प्राथमिक स्कूल से प्रारम्भ हुई। दसवीं की परीक्षा लुधरन मिशन हाई स्कूल से पास करने के बाद उन्होंने वूरहेस कॉलेज बेल्लौर से एफ.ए.किया। पढ़ाई के दौरान ही उनका विवाह शिवकामा से साथ हो गया। दर्शन शास्त्र के साथ उन्होंने मद्रास प्रिश्चियन कालेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। कुशाग्र बुद्धि वाले होने के कारण उनकी अपने विषयों के साथ साथ अंग्रेजी भाषा पर बहुत अच्छी पकड़ बन गई।
उन्होंनें इसी महाविद्यालय से दर्शन शास्त्र में एम.ए. किया। एम.ए. की उपाधि के लिए उन्होंने सन् 1908 ई. में शोध प्रबंध ‘ दि एथिक्स ऑफ वेदान्त ` शीर्षक से प्रस्तुत किया। इस प्रकार उन्होंने अपनी शिक्षा का आधार भारतीय वेद दर्शन को बनाया। अपने पहले ही शोध प्रबंध में उन्होंने वेदान्त के मायावाद का गहन विशलेषण किया। उन्होंने कहा कि वेदान्त दर्शन इस जगत को अविद्या की सृष्टि मानता है। यह जगत अनित्य है,भ्रम है और मृगतृष्णा है। अविद्याजनित यह भ्रम ज्ञान के द्वारा समाप्त हो जाता है परन्तु उस स्थिति में भी यह भासमान जगत विद्यमान रहता है। उसका अस्तित्व नहीं मिटता। वह अपनी पहली ही रचना से लेखन के क्षेत्र में पहचाने जाने लगे। उनके शोध प्रबंध की विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रशंसा की गई। यहीं से उनकी लेखन क्षमता के साथ साथ विद्वता की चर्चा होनी प्रारम्भ हो गई। अधिकांश विद्वानों का मत था कि ,’ इस शोध प्रबंध में दर्शनशास्त्र के न केवल मूल सिद्धांतों का विवेचन किया गया है बल्कि उन्हें आत्मसात भी कर लिया गया है। जटिल एवं गंभीर मुद्दों को सहज ढंग से अभिव्यक्त करने की अद्भुत क्षमता और अंग्रेजी भाषा में अधिकार पूर्ण प्रवाह में अपनी बात कहने में यह प्रबंध आशातीत सफलता प्राप्त कर सकता है।` बाद में विश्व भर में उन्हें धर्मशास्त्र का विलक्षण व्याख्यता माना गया। अपने संपूर्ण व्यक्तित्व में वह एक महान शिक्षा शास्त्र, मौलिक विचारों के प्रवक्ता,सात्विक लेखक और महान दार्शनिक स्वीकार किए गए।
एम.ए.करने के पश्चात वह प्रेसीडेंसी कालेज मद्रास में दर्शन शास्त्र के अध्यापक नियुक्त हो गए। सन् 1918 ई. में डॉ राधाकृष्णन को मैसूर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया गया। 1928 ई. में वह कलकता विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र पढ़ाने के लिए चले गए। उन्होंने सन् 1931 से 1936 तक आन्ध्र विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद को सुशोभित किया। सन् 1936 से 1952 तक वह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाते रहे। इससे पूर्व वह 1939 से 1948 तक बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय के कुलपति रहे थे। एक ऐसा अवसर भी आया था जब डॉ. राधाकृष्णन कलकत्ता,काशी और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों का कार्य एक साथ देख रहे थे।
डॉ राधाकृष्णन अपने हृदय में मानवता के प्रति अगाध प्रेम रखते थे। उनका मत था कि यदि निष्ठापूर्वक वस्तुओं पर अतंरात्मा की शक्ति स्थापित कर दी जाए तो मानव जीवन मंगलमय और कल्याणकारी हो जायेगा। उनका दृष्टिकोण सभी के लिए एक जैसा कल्याणकारी था। वह जानते थे कि भारतीय समाज अस्वस्थ वृत्तियों से अप्रांत है,परन्तु यह समाज इतना अधिक बीमार भी नहीं है कि इसे रोगमुक्त किया ही न जा सके। भारतीयों की प्रतिभा और मान्यताओं पर उनका अडिग विश्वास था। एक बार जब वह अमरीका प्रवास कर रहे थे तो उन्होंने कुछ संवाददाताओं को सम्बोबिधत करते हुए कहा कि ,” भारत में विभिन्न धार्मिक विश्वासों ,जातियों और आर्थिक स्तरों के करोड़ों लोगों ने गत दो शताब्दियों के मध्य राष्ट्रीय सामंजस्य और प्रजातंत्रीय भावना उत्पन्न करने में ऐसी सफलता प्राप्त की है कि जिसे देख कर निराशावादी भविष्य वक्ताओं को आश्चर्यचकित रह जाना पड़ा है।“ इसी सन्दर्भ में एक बार उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता के विषय में विचार व्यक्त करते हुए कहा था,” आपने लोगों को धरती पर तीव्र गति से दौड़ना,आसमान में बहुत ऊंचाई तक उडना और पानी पर तैरना तो सिखा दिया परन्तु मनुष्यों की तरह रहना आपको नहीं आया।“
लगभग यही विचार मिलती जुलती भाषा में उन्होंने तब व्यक्त किए जब एक ब्रिटिश नेता ने उनसे प्रश्न किया कि जितनी प्रगति पश्चिमी देशों ने की है उतनी भारत क्यों नहीं कर पाया। उन्होंने उत्तर दिया भले ही आपने चिड़ियों की तरह से उडना और मछली की तरह से तैरना सीख लिया हो परन्तु मानव की तरह प्रेम से धरती पर रहना आप लोग नहीं सीख पाये। प्रेम, करूणा और मानवता जैसे सद्गुणों की प्रेरणा देने की क्षमता आज भी भारत में ही है।
डॉ. राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ मानते थे। मानवीय गुणों के विकास एवं धार्मिक शिक्षा पर वह बहुत बल देते थे। वह मानते थे कि व्यक्ति के जीवन में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान। आज हमारी शिक्षा प्रणाली पश्चिम के प्रभाव के कारण विद्यार्थियों में स्वार्थ,बेईमानी और अहंकार की भावनाओं को बढ़ावा दे रही है। वह कहते थे कि विश्वविद्यालय गंगा और यमुना के संगम की तरह शिक्षकों और छात्रों का पवित्र संगम है। शिक्षा के लिए बड़े बड़े भवन और विभिन्न प्रकार की साधन सामग्री उतनी महत्वपूर्ण नहीं होती जितने कि शिक्षक । उन का मत था कि,” विश्वविद्यालय ज्ञान बेचने की दुकानें नहीं हैं,वे तो ऐसे तीर्थस्थल हैं जिन में स्नान करने से व्यक्ति की बुद्धि,इच्छा और भावना का परिष्कार और आचरण का संस्कार होता है। विश्वविद्यालय बौद्धिक जीवन के देवालय हैं,उनकी आत्मा है ज्ञान का शोधहैं । वे संस्कृति के तीर्थ और स्वतंत्रता के दुर्ग हैं।“
डॉ. राधाकृष्णन हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक थे। उन्हें इस बात पर गर्व का अनुभव होता था कि वह इस पवित्र और ऋषिमुनियों की धरती पर जन्में और हिन्दुत्व उनकी शिराओं में दौड़ रहा है। वह एक आस्थावान हिन्दू थे परन्तु वह अन्य सभी धर्मों के प्रति समान आदर भाव रखते थे। सादगी पसन्द डॉ. राधाकृष्णान स्वभाव से अत्यंत विनम्र और धौर्यवान थे। कर्मवाद के सिद्धांत कें संबंध में उनका मानना था कि इस सिद्धांत के कारण हम भाग्यवादी अकर्मण्य कभी नहीं बनते इससे हम कर्म करने में स्वाधीन हो कर निराशा,पीड़ा व अपराध बोध से मुक्त हो कर अपने जीवन में आशा का संचार करते हैं। यह सिद्धांत अतीत के द्वारा वर्तमान को नियंत्रित बताता है। किन्तु फिर भी हम भविष्य निर्माण के लिए मुक्त रहते हैं।
जीवन के अंतिम दिनों में सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन की मोतियाबिन्द के कारण देखने की क्षमता कम हो गई थी फिर भी उनका लेखन और पठन पाठन विचार विमर्श के साथ अविरल चलता रहा। 17अपैल 1976 को मद्रास में उन्हें दिल का दौरा पड़ा और हृदयाघत के कारण वह इस नश्वर शरीर को त्याग कर हमारे मध्य से चले गए। उनके परिवार में पांच पंत्रियां एवं एक पुत्र था। आज भी राष्ट्र उन्हें एक महान शिक्षक के अतिरिक्त एक दर्शनिक राष्ट्रपति के रूप में स्मरण करता है।

मुसलमान और हिंदुत्व
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुखों की मुलाकात को जितना महत्व खबरपालिका में मिलना चाहिए था, नहीं मिला। मेरी राय में श्री मोहन भागवत और मौलाना अर्शद मदनी की इस भेंट का महत्व ऐतिहासिक है। ऐसा इसलिए भी है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान इधर कई बार कह चुके हैं कि आरएसएस और नरेंद्र मोदी हिटलर और मुसोलिनी के नक्शे-कदम पर चल रहे हैं। वे कश्मीरी मुसलमानों को खत्म करने पर आमादा हैं। संघ के बारे में यह विचार बद्धमूल है कि वह उग्रवादी हिंदुओं का संगठन है और वह पूरी तरह से मुस्लिम-विरोधी है। भारत के मुस्लिम संगठन भी पानी पी-पीकर संघ को कोसते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दोनों पक्षों के रवैयों में कुछ सुधार हुआ है। भागवत और मदनी की भेंट इसका प्रमाण है। यह काम सबसे पहले संघ-प्रमुख कुप्प सी. सुदर्शनजी ने शुरु किया था। सुदर्शनजी अब से 50-55 साल पहले जब इंदौर में शाखा चलाते थे, तब मैं उनसे कहा करता था कि देश के करोड़ों मुसलमानों को हम यदि अराष्ट्रीय और अछूत मानते रहेंगे तो भारत न तो कभी महाशक्ति बन पाएगा और न ही संपन्न हो पाएंगा। सर संघचालक बनने पर उन्होंने ‘राष्ट्रीय मुस्लिम मंच’ की स्थापना की। उन्होंने मुझसे अनुरोध किया था कि मैं ही उसका उदघाटन करुं। मैं तो वह दिन देखना चाहता हूं जबकि संघ की शाखाओं में मुसलमान, ईसाई, यहूदी भी जमकर भाग लें। विदेशों में जन्मे मज़हबों या विचारधाराओं के अनुयायिओं को हम विदेशी मानने लगें या उनकी देशभक्ति पर शक करने लगें, यह सर्वथा अनुचित है। यदि मेरे इस विचार से मोहन भागवत सहमत हैं कि हिंदुत्व ही भारतीयता है और भारतीयता ही हिंदुत्व तो मैं कहूंगा कि संघ के दरवाजे समस्त भारतीयों के लिए खोल दिए जाने चाहिए। इसका उल्टा भी लागू होना चाहिए। याने अपने मुसलमान, ईसाई और यहूदी भाइयों से हम यह क्यों नहीं चाहें कि वे अपने नाम, वेश-भूषा, खान-पान, तीज-त्यौहार, नाते-रिश्तों में बाहरी मुल्कों की आंख मींचकर नकल न करें। भारतीयता को मजबूती से पकड़े रहें। वे इंडोनेशिया के मुसलमानों से सबक लें। राष्ट्रपति सुकर्ण, उनकी बेटी मेघावती और उसके पिता अली शास्त्रविदजोजो क्या अपने नाम संस्कृत में या ‘भाषा इंडोनेशिया’ में रखने के कारण काफिर हो गए ? क्या वे मुसलमान नहीं रहे ? सच्चे भारतीय होने और सच्चे मुसलमान होने में कोई अन्तर्विरोध नहीं है।

आरक्षण ख़त्म करने ने से पहले नफ़रत के संस्कारों का ख़ात्मा ज़रूरी
तनवीर जाफ़री
धर्म व शास्त्र प्रदत्त वर्ण व्यवस्था तमाम सरकारी व ग़ैर सरकारी कोशिशों के बावजूद देश से समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही है। बल्कि ऐसा महसूस होता है कि आधुनिक भारत के शिक्षित समाज में शायद यह और भी बढ़ती ही जा रही है। भले ही हमें महानगरों या अन्य शहरी क्षेत्रों से दलित समाज के उत्पीड़न के समाचार तुलनात्मक रूप से कम सुनाई देते हों परन्तु देश का अधिकांश भाग यहाँ तक कि दक्षिण भारत के वह क्षेत्र जिन्हें उत्तर भारत की तुलना में अधिक आधुनिक व उदारवादी सोच रखने वाला माना जाता है, वे भी अभी तक वर्ण व्यवस्था द्वारा दिखाए गए जातिगत ऊंच नीच की बेड़ियों से मुक्त नहीं हो पाए हैं। मुग़ल व अंग्रेज़ों के शासनकाल में भी दलितों पर सवर्णों द्वारा अत्याचार किये जाने व उन्हें अछूत बताकर उनका अपमान करने की तमाम घटनाएं होती थीं परन्तु आज़ादी के बाद तो जैसे देश क्या आज़ाद हुआ गोया दलितों पर अत्याचार करने की भी पूरी आज़ादी स्वर्ण दबंगों को हासिल हो गयी। दलित उत्पीड़न के नित्य नए इतिहास लिखे जाने लगे। कहना ग़लत नहीं होगा की दलितों से नफ़रत करने वाले लोगों द्वारा कभी कभी दलितों पर ऐसे ज़ुल्म किये जाने के समाचार आते हैं जैसे ज़ुल्म जानवरों पर भी नहीं किये जाते। यही वजह थी कि बाबा साहब भीम राव अंबेडकर जैसे राष्ट्रवादी नेता को भी इस बात की हमेशा चिंता सताती रही कि वर्णाश्रम के संस्कार रखने वाले हिन्दू धर्म में दलितों का भविष्य आख़िर क्या होगा ? उन्होंने अनेक बार इस आशंका को अपने भाषणों व आलेखों के माध्यम से ज़ाहिर भी किया था कि यदि आज़ादी के बाद ” हिंदू भारत” बना तो वह दलितों के लिए अंग्रेज़ी राज की तुलना में और ज़्यादा क्रूर होगा। निःसंदेह दलितों पर स्वतंत्रता के बाद बढ़ते अत्याचार व इनके तरीक़े बाबा साहब की उस दूरदर्शी सोच पर मोहर लगाते हैं।
भारत में आरक्षण की व्यवस्था भी इसी उद्देश्य के लिए की गई थी ताकि सामाजिक अन्याय का दंश सदियों से झेलता आ रहा यह दबा कुचला समाज आरक्षण के सहारे शिक्षित होगा,रोज़गार हासिल करेगा,संपन्न होगा तथा धीरे धीरे उसे शेष समाज के बराबर आने का अवसर मिलेगा। यह व्यवस्था शासन व प्रशासन के अंतर्गत की गयी व्यवस्था तो बनी परन्तु जिस सनातनीय शिक्षा ने वर्णाश्रम की बुनियाद डाली थी उसमें न तो कोई परिवर्तन किया गया न ही उसे समाप्त करने की कोशिश की गयी। परिणाम स्वरूप आज भी दलित के घर में जन्म लेने वाला व्यक्ति जन्म से ही नीच व अछूत माना जाता है। भले ही आगे चलकर वह कितना ही महान व्यक्ति क्यों न बन जाए परन्तु चूँकि उसका जन्म दलित परिवार में हुआ है लिहाज़ा तिरस्कार,उपेक्षा व अवहेलना व स्वयं को नीच व तुच्छ समझना गोया उसका जन्म सिद्ध अधिकार है। स्वयं को हिन्दू धर्म का ठेकेदार समझने वाली वह शक्तियां जो स्वर्ण हिन्दुओं के संरक्षण में संचालित हैं वे कभी कभी सामूहिक भोज का “राजनैतिक प्रदर्शन” कर हिन्दू एकता का सन्देश सिर्फ़ इसलिए तो देना चाहती हैं ताकि दुनिया को यह बताया जा सके कि भारत का हिन्दू समाज एक और संगठित है। अपनी इन्हीं कोशिशों के तहत कभी भारत में दलित राष्ट्रपति बनाया जाता है तो कभी गृह मंत्री,राजयपाल,रक्षा मंत्री या अन्य महत्वपूर्ण पदों पर बिठा दिया जाता है। परन्तु नफ़रत की संस्कारित जड़ों पर सीधे प्रहार नहीं किया जाता। बजाए वर्णाश्रम व्यवस्था को चिन्हित करने या उसे ज़िम्मेदार ठहराने के बजाए कभी मुग़लों को तो कभी अंग्रेज़ों को ही इस व्यवस्था का दोषी ठहरा कर सच्चाई को छुपाने की कोशिश की जाती रही है। महाराष्ट्र के पुणे ज़िले मे स्थित भीमा कोरेगांव वह जगह है जहाँ इसी संस्कारित नफ़रत पर आधारित एक ऐसा इतिहास लिखा जा चुका है जो लाख प्रयासों के बावजूद छुपाए नहीं छुपता।यहाँ महार (दलित) समुदाय द्वारा ब्रिटिशों के साथ मिलकर ब्राह्मण पेशवाओं के खिलाफ युद्ध लड़ा गया।इस युद्ध में ब्राह्मण पेशवाओं को ब्रिटिश सेना से पराजय मिली। ब्रिटिशर्स ने इस जीत का श्रेय महार समुदाय को दिया। इसी युद्ध की वर्षगांठ मनाने के लिए प्रत्येक वर्ष 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव में महार समुदाय के हज़ारों लोग इकठ्ठा होते हैं। ब्राह्मण पेशवाओं द्वारा दलितों के साथ कैसा बर्ताव किया जाता था उसका ज़िक्र इतिहास में दर्ज है।
यही मानसिकता आज कहीं दलित समाज के दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने से रोकती है कहीं निर्वाचित दलित सरपंच को स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराने से रोक देती है तो कहीं मध्यान भोजन के समय स्कूलों में दलित छात्रों को अलग बैठाये जाने जैसी घटनाएं सामने आती हैं तो कहीं स्कूल में यही भोजन दलित समुदाय के हाथों से बना होने के कारण स्वर्ण जाति के बच्चे खाने से ही मना कर देते हैं। कहीं कथित उच्च जाति के लोग अपनी बस्ती से दलित की बारात नहीं गुज़रने देते तो कहीं मृतक दलित की शवयात्रा सवर्णों के इलाक़े से नहीं गुज़रने दी जाती। गत वर्ष गुजरात में अहमदाबाद से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित वालथेरा गांव मेंकथित ‘ऊंची’ जाति के लोगों ने एक दलित महिला को केवल इसलिए बुरी तरह मारा क्योंकि वह ‘ऊंची’ जाति के लोगों के सामने कुर्सी पर बैठी हुई थी। हालांकि वह दलित महिला ग्राम पंचायत द्वारा आयोजित शिविर में स्कूल में आधार कार्ड बनवाने के लिए आए एक कथित ‘ऊंची’ जाति के लड़के की उंगलियों के निशान लिए जाने में उस बच्चे की सहायता कर रही थी. इसके बावजूद दबंगों ने लात मारकर उसे कुर्सी से नीचे गिराया और लाठियों से पीटना शुरू कर दिया। जब उस असहाय दलित महिला के पति और पुत्र वहां पहुंचे तो उन्हें भी इन दबंगों ने ख़ूब पीटा। बिहार,झारखण्ड,उड़ीसा व मध्य प्रदेश जैसे कई राज्यों में तो दलित महिलाओं को चुड़ैल या भूतनी बता कर दबंग लोग जब चाहें तब पीटते रहते हैं। दलित दूल्हे की घुड़चढ़ी रोकने की घटना तो कई राज्यों में होती ही रहती हैं। दलित बच्चियों से बलात्कार व हत्या की तमाम घटनाएं भी होती रहती हैं।
संविधान में आरक्षण की व्यवस्था का राजनैतिक लाभ भी देश के कुछ गिने चुने दलित नेताओं द्वारा उठाया जा रहा है। वे आरक्षण को अपनी पारिवारिक बपौती समझ कर गत 70 वर्षों से इसका लाभ ख़ुद लेते आ रहे हैं या अपने परिवार के सदस्यों को पहुंचा रहे हैं। दलितों पर देश भर से आने वाले अत्याचार के संस्कारों के बावजूद आजतक किसी दलित मंत्री सांसद या विधायक ने रोष स्वरूप अपने इस्तीफ़े का प्रस्ताव नहीं रखा। अभी गत 17 अगस्त को तमिलनाडु के वेल्लोर ज़िले के वानियाम्बड़ी क़स्बे में एन कुप्पन नाम के एक 46 वर्षीय दलित व्यक्ति की मृत्यु हो गयी थी। इसकी शव यात्रा को स्थानीय स्वर्ण जाति के लोगों द्वारा शमशान घाट जाने के लिए रास्ता नहीं दिया गया। कुप्पन के शव को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट ले जाया जाना था, परन्तु उच्च जाति के स्थानीय लोगों की ज़मीन रास्ते में पड़ती है। इस वजह से दलित व्यक्ति के शव को लोग मुख्य रास्ते से नहीं ले जा पाए। श्मशान घाट पहुंचने के लिए 20 फ़ुट ऊंचे पुल का इस्तेमाल करना पड़ा, जहां नदी के ऊपर बने इस पुल से शव को रस्सियों के सहारे लटकाकर नीचे उतारा गया।बताया जाता है कि सभी लोगों के शमशान घाट तक जाने का एक ही रास्ता है जिसपर स्वर्ण दबंगों द्वारा क़ब्ज़ा कर अपने खेत बना लिए गए हैं। देश के किसी भी दलित नेता द्वारा इस घटना पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया। रविदास मंदिर गिराए जाने को लेकर दिल्ली की सड़कों पर उबाल आया हुआ है। अंबेडकर की मूर्ति तोड़ना और अन्य दलित स्मारकों का अपमान करना देश में एक आम बात हो चुकी है। परन्तु नफ़रत की इन जड़ों पर प्रहार करने का न तो किसी में साहस है न ही कोई करना चाहता है क्योंकि राजनेताओं के हित तो सामाजिक विभाजन व सामाजिक बिखराव में ही निहित हैं। हाँ दलितों को मान सम्मान व शिक्षा आदि के अतिरिक्त अवसर उपलब्ध करने वाली आरक्षण व्यवस्था इन कथित स्वर्ण जाति के लोगों को ज़रूर खटक रही है। कितना अच्छा हो कि आरक्षण को समाप्त करने से पहले नफ़रत की उन जड़ों व संस्कारों को समाप्त किया जाए जो सामाजिक असमानता,ऊंच नीच व छूत-अछूत जैसी शिक्षाएं व संस्कार देती हैं।

कश्मीरः अब नया राग
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत में कश्मीर के पूर्ण विलय को अब एक महीना हो रहा है। ऐसा लगता है कि भारत और पाकिस्तान अपनी-अपनी शाब्दिक गोलाबारी से थक गए हैं। दोनों देशों के नेताओं ने अब नया राग छेड़ा है। दोनों एक-दूसरे से बात करना चाहते हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने कहा है कि यदि भारत सरकार कश्मीरी नेताओं को रिहा कर दे और उनसे उन्हें बात करने दे तो वे भारत से संवाद कर सकते हैं। इधर हमारे विदेश मंत्री ने यूरोपीय संघ से ब्रुसेल्स में कहा है कि भारत भी पाकिस्तान से बात करने को तैयार है बशर्ते कि वह आतंकवाद और हिंसा का रास्ता छोड़ दे। अब दोनों देशों के बीच परंपरागत युद्ध और परमाणु-मुठभेड़ की बात पर्दे के पीछे चली गई हैं। सच्चाई तो यह है कि अब भारत को तो अपनी तरफ से कुछ करना नहीं है। उसे जो करना था, वह उसने 5 अगस्त को कर दिया। जो कुछ करना था या अब करना है, वह पाकिस्तान को करना है। पाकिस्तान आज सीमित युद्ध छेड़ने की स्थिति में भी नहीं है। उसकी आर्थिक और राजनीतिक हालत भी डांवाडोल है। कश्मीर के सवाल पर दुनिया के एक राष्ट्र ने भी भारत की कार्रवाई का विरोध नहीं किया है। सिर्फ चीन कुछ बोला है लेकिन वह क्या बोला है, उसका मतलब क्या है, उसे खुद इसका पता नहीं है। वह खुद हांगकांग, सिक्यांग और तिब्बत के कारण फंसा हुआ है। वह पाकिस्तान का साथ देने का नाटक इसलिए कर रहा है कि एक तो उसे पाक ने कश्मीर की 5 हजार वर्ग किमी जमीन भेंट कर रखी है और दूसरा वह बलूचिस्तान को अपना अड्डा बना रहा है। अब चीन और पाकिस्तान के पास सिर्फ एक ही मुद्दा रह गया है। वह कश्मीर किसका है, यह नहीं, बल्कि यह कि वहां मानव अधिकारों का हनन हो रहा है। मानव अधिकारों की रक्षा के नाम पर अनेक अंतरराष्ट्रीय संगठन चीन और पाकिस्तान की बातों पर कान जरुर देंगे लेकिन भारत सरकार की दक्षता पर यह निर्भर करेगा कि वह इस प्रोपेगंडा की काट कैसे करेगी ? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि गिरफ्तार कश्मीरी नेताओं और पाकिस्तानी नेताओं से भी कुछ प्रमुख भारतीय नागरिक बात करने के लिए भेजे जाएं, ऐसे नागरिक जिनकी प्रतिष्ठा और प्रामाणिकता किसी सरकारी नेता से कम नहीं है ? इंदिरा गांधी, नरसिंहराव और अटलजी की सरकारें ऐसी करती रही हैं। जरुरी यह भी है कि कश्मीरी जनता की सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाए और उन पर से प्रतिबंध उठा लिए जाएं लेकिन उन्हें यह बता दिया जाए कि हिंसा और आतंक का प्रतिकार अत्यंक कठोर हो सकता है।

प्रजातन्त्र; दुःखद कहानी
ओमप्रकाश मेहता
राजनीति में विलुप्त संवैधानिक पद…..? भारत को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा दिलाने वाले महापुरूषों व स्वतंत्रता संग्राम के महायज्ञ में अपने जीवन की आहूतियां चढ़ाने वाले शहीदों को क्या यह अंदाज था कि उनके अपने भारत को मात्र सत्तर साल में राजनीति का ऐसा ‘‘अजीर्ण’’ हो जाएगा कि वह भारत की अस्मिता, संविधान और संवैधानिक पद सभी उदरस्थ कर लेगा। फिर भी भारतीय राजनेताओं का पेट नहीं भरेगा? आज हमारा देश कहने को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्री देश है, किंतु यहां की वास्तविकता यह है कि सत्तर साल बाद भी यहां की राजनीति, उसे चलाने वाले लोग और आम भारतीय लोकतंत्र या स्वतंत्रता का सही-सही अर्थ ही नही समझ पाए और इसी का कारण है कि आज आम भारतीय अपनी ‘मरजी’ को ‘स्वतंत्रता’ समझ बैठे है और अब तो उसके सामने न किसी संविधान की अहमियत रह गई है और न संवैधानिक पद की। जहां तक संविधान का सवाल है, उसे अब तक सवा सौ से अधिक संशोधनों के तीरों से घायल कर उसे ‘‘शर-शैया’’ पर लेटने को मजबूर कर दिया है और अब उसकी उपयोगिता धार्मिक ग्रंथ श्रीमद्भागवत्गीता की तरह शपथ के माध्यम तक ही सीमित होकर रह गई है।
यह तो हुई संविधान की दुःखद कथा, अब यदि हम संवैधानिक पदों की बात करें तो ये सब ऐसे ‘‘रैन कोट’’ बन कर रह गए है जो पद पर विराजित शख्स की आरोपों की बौछारों से रक्षा करते है, फिर इसे औढ़ने वाला चाहे कितनी ही दूसरों पर कैसे ही हीनत्तम शब्दों की बौछारें बरसाये उससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि संवैधानिक पद पर विराजित शख्स केवल सत्तारूढ़ दल का वेतनभोगी राजनेता है, जिसकी आस्था न तो संविधान में है और न अपने अधीन राज्य या राष्ट्र में, वह पद ग्रहण करने के पहले भी सत्तारूढ़ पार्टी का नेता था और पदग्रहण करने के बाद भी है।
वैसे हमारे संविधान की यह एक बहुत बड़ी कमी है कि उसमें राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति व राज्यपाल के पदों को ‘कठपुतली’ से अधिक नहीं माना। केन्द्र सरकार जो भी प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास भेजती है, उस पर उसे हस्ताक्षर करना ही होते है, यदि कभी वह असहमत होकर प्रस्ताव लौटा भी देते है तो सरकार उसी प्रस्ताव को फैरबदल का दिखावा कर पुनः राष्ट्रपति जी को भेज देती है और तब असहमति के बावजूद राष्ट्रपति को उस पर हस्ताक्षर कर स्वीकृति की मुहर लगानी पड़ती है।
यह तो हुई प्रथम व सर्वोच्च संवैधानिक पद की चर्चा, अब यदि राज्यों के प्रमुख संवैधानिक पद राज्यपाल की चर्चा करें तो आज राज्यपाल पद पर विराजित शख्स राज्यपाल कम, सत्तारूढ़ दल के एजेण्ट अधिक बनकर रह गए है, जो न सिर्फ प्रधानमंत्री व अन्य महत्वपूर्ण पदों पर विराजित महान नेताओं का व्यक्तिगत प्रचार-प्रसार करते है, बल्कि एक राजनेता की तरह प्रतिपक्षी दलों के नेताओं व सरकार के फैसलों का विरोध करने वालों के लिए अपशब्दों को प्रयोग भी करते है, जिसका ताजा उदाहरण जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल पद की गरिमा को गिराने वाला राज्यापाल का अपशब्दों से मंडित बयान है। भारत के विभिन्न राज्यों के राज्यपालों के अनेक ऐसे उदाहरण है, जो उनकी पद की गरिमा को धूल-घूसरित करते है, यही स्थिति उप-राष्ट्रपति जी की है, जो आए दिन सत्तारूढ़ दल के पक्ष में बयानबाजी करते रहते है। यदि आज की वास्तविकता स्पष्ट की जाए तो वह यही है कि सर्वोच्च संवैधानिक पद केन्द्र की ‘कठपुतली’ बनने को मजबूर है तो राज्यों का सर्वोच्च संवैधानिक पद केन्द्र में सत्तारूढ़ का प्रचारक।
यह दुरावस्था सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, राज्य के सर्वोच्च संवैधानिक पद की गरिमा उस राज्य में तो और अधिक गिरती नजर आती है, जहां केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी की विरोधी पार्टी की सरकारें है, ऐसे राज्यों में आज राज्यपालों का दुरूपयोग वहां की सरकार गिराने और केन्द्र में सत्तारूढ़ दल की सरकार बनाने में होता है।
इन्हीं सब दुरावस्थाओं को देखते हुए कुछ दिनों पहले देश में यह चर्चा चलाई गई थी कि राज्यपाल के पदों की कोई उपयोगिता नहीं है, इसलिए उन्हें खत्म कर दिया जाना चाहिए। यद्यपि वह चर्चा ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकी, क्योंकि केन्द्र सरकार यह अपने राजनीतिक स्वार्थों के चलते ऐसा नहीं चाहती थी, किंतु अब समय आ गया है कि यदि देश में वास्तविक लोकतंत्र स्थापित किया जाना है कि इस वर्तमान दुरावस्था या व्यवस्था पर गंभीर चिंतन कर वर्तमान चलन में कुछ आवश्यक सुधार जरूरी है, वर्ना ऐसे ही चलता रहा तो इस देश में प्रजातंत्र ‘‘मनमर्जी के पिंजरे’’ में कैद होकर रह जाएगा और फिर कोई कुछ नहीं कर पाएगा।

टैक्स वसूली टैक्स टेरर नहीं
रघु ठाकुर
बंगलोर के काफी चेन (कैफे काॐडे) के मालिक वी जी सिद्धार्थ की आत्महत्या के बाद देश में एक नये शब्द को गढ़ा गया है जिसका नाम ”टेक्स टेरर“ दिया गया है चूंकि श्री सिद्धार्थ खरबपति थे और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री श्री कृष्णा के दामाद थे अत: श्री सिद्धार्थ की आत्महत्या की चर्चा मीडिया ने बहुत ही संवेदनशील ढंग से की। कहा जाता ह,S कि उनके ऊपर 21 सौ करोड़ रूपया की देनदारी बची थी। जिससे वे परेशान थे और अपनी रियल स्टेट प्रापर्टी को बेचना चाह रहे थे। 29 जुलाई को वे अचानक लापता हो गए थे और 31 जुलाई को उनका शव मिला।
किसी भी व्यक्ति का आत्महत्या या मृत्यु इस आधार पर दुखद है कि अंतत: एक इंसान की मृत्यु है। श्री कृष्णा के प्रति और स्व. सिद्धार्थ के परिवार के प्रति मेरी पूर्ण संवेदना है। परन्तु मैं इस घटना को एक भिन्न रूप में देखता हू। उन्हें कर्ज चुकाने के लिए सम्पत्ति बेचने का अवसर नहीं मिला, उन्हें इस प्रक्रिया में वैधानिक दिक्कते आई आदि-आदि तर्क देश में बहुत तेजी के साथ परोसे गए हैं। यह हमारे देश की और वैसे तो दुनिया की दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति है कि जब व्यवस्था से पीड़ित कोई गरीब मर जाता है तो मीडिया के लिए वह केवल एक सूचना मात्र होती है परन्तु जब कोई पैसे वाले की मृत्यु होती है तो उसकी सारी कमी अवगुणों को पीछे कर मीडिया उन मामलों में अति मानवीय और संवेदनशील बन जाता है। यही श्री सिद्धार्थ के मामले में हुआ है। किसी भी कोने से यह सवाल नहीं उठाया गया कि आखिर उन्होंने इतना भारी कर्ज क्यों लिया? आज उद्योग जगत में आम चलन है कि उद्योगपति अनेकों वित्तीय संस्थाओं से भिन्न भिन्न कम्पनियां बना कर कर्ज लेते है और बाद में या तो उसे चुकाते नहीं है या अपने राजनैतिक रसूखों कर इस्तेमाल कर या तो इन हजारों करोड़ों की कर्ज की राशि को एन.पी.ए. में डलवा देते है या फिर कोर्ट कचहरी में लटकाए रखते हैं। और अगर किसी कारण वश कुछ ज्यादा वसूली का दबाव बना तो विदेशों में सम्पत्तियां खरीद कर बेनामी सम्पत्ति तैयार करते है तथा जाकर विदेशों में बस जाते है। विजय माल्या, नीरव मोदी, कुछ अनेकों वर्षें से आराम से विदेशों में रह रहे है और भारतीय कानून और सत्ता उन्हें वापिस लाने में लगभग थककर हार चुकी है। ऐसा नहीं है कि, यह केवल कानून की खामी है। बल्कि कहीं न कहीं सत्ता तंत्र की मिली भगत का इसका कारण है। वर्ना सरकार उन देशों से कूटनीतिक समझौते करती द्विपक्षीय संधिया करती तथा अपने देश के कानून के तहत घोषित अपराधियों को वापिस देने का द्विपक्षीय समझौता करती। विदेशी-अदालते भी कभी-कभी मानव अधिकार के नाम पर या कभी किसी अन्य बहाने के नाम पर अनुचित संरक्षण देती है। उनका बचाव करती है। जैसे श्री नीरव मोदी ने लंदन की अदालत में तर्क दिया कि भारत के जेलों तथा मुंबई की जेलों में बंदियों के रहने लायक सुविधा नहीं है तथा लंदन की अदालत ने सरकारी वकील से भारत की जेलों के ब्यौरा मांगे। मेरी राय में यह देशी या विदेशी अदालतों का अवैधानिक कार्य है। भारत में जो जेल मेनुअल लागू है वह सभी के लिए समान है और कैसे कमरे में अपराधी रहेगा उसे ए.सी. मिलेगा या नहीं मिलेगा, कैसा खाना मिलेगा, यह विदेशी न्याय पालिका का अधिकार नहीं है, बल्कि भारतीय कानून तय करेगा।
यह तो भारत के सर्वेच्च न्यायालय का साहसिक कदम है कि उन्होंने भारत के कुछ आर्थिक अपराध क्षेत्र के बड़े मगरमच्छो को जेल पहुंचाया और उन आर्थिक अपराधियों में थोड़ा सा भय पैदा हुआ जो दशकों से आर्थिक अपराध कर रहे थे अपने आप को भारत का सुपर सत्ता धीश मानते थे तथा अपने सामने सरकार या न्यायपालिका को महत्वहीन मानते थे। हांलाकि ऐसी घटनाएं अभी तक गिनती की हुई है। भारत सरकार ने अगर आर्थिक अपराधियों के विरूद्ध बड़े पैमाने पर कार्यावाही की होती तो स्व. सिद्धार्थ जैसे लोग भारी कर्ज लेने से बचते, अपना टेक्स समय पर चुकाते और शायद उन्हें आत्महत्या करने की लाचारी नहीं होती।
उद्योग जगत की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि टेक्स दर अधिक है और इसलिये उद्योग घाटे में चले जाते हैं। वे टेक्स, कर्ज अदा करने की स्थिति में नहीं होते। अत: उन्हें कानून से रियायत देनी चाहिए। याने कर्ज व टेक्स की माफी हो या वसूली की कार्यावाही न हो और उन्हें शान से खाता-पीता छोड़ दिया जाए। मेरी राय में यह देश में दो प्रकार के कानूनों का चलन हो जाएगा। जिस प्रकार ”मनु स्मृति“ में एक ही अपराध के लिए शूद्र को अलग व्यवस्था थी और सवर्ण को अलग उसी प्रकार नई मनु स्मृति बनाने का प्रयास उद्योग जगत कर रहा है। वैसे तो नैतिक आधार पर उद्योग जगत को चाहिये था कि वह स्वत: इन टेक्स अदा न करने वालों, कर चोरों के खिलाफ या जन-धन डुबाने वाले लोगों के खिलाफ कार्यावाही की माँग करता। अगर उन्हें ज्यादा ही भाईचारा था तो जिन के उद्योग मुनाफे में चल रहे है इन सबको मिल कर बकाया दरों के टेक्स और कर्ज की बकाया रकम जमा करने की पहल करना चाहिये थी। पर इसके बजाय उन्होंने टेक्स और कर्ज वसूली के विरूद्ध ”टेक्स टेरर“ के नाम से मीडिया अभियान शुरू कर दिया और सत्ताधीशों को मानसिक दबाव में लेने तथा आम आदमी को गुमराह करने का तरीका अपनाया।
क्या टेक्स वसूली आतंक है? क्या टेक्स वसूली को आतंकी कहने वाले लोग अपराधी नहीं है? अब इन सवालों पर विचार करना होगा? दरअसल समय पर टेक्स अदा करना या कर्ज अदा करना यह वैधानिक और राष्ट्रीय दायित्व है। जो बड़े-बड़े मगरमच्छ सरकारी बैंको का याने जनता का पैसा खा जाते है, टेक्स अदा नहीं करते है सही मायने में उनका अपराध राष्ट्रद्रोह जैसा है और यह कानून बनना चाहिये कि निश्चित समय सीमा के अंदर इनकी सम्पत्ति जप्त की जानी चाहिये। (नामी बेनामी दोनों जप्त होना चाहिये) तथा इनके पासपोर्ट और वीजा रद्द कर इन्हें जेल में बंद कर इन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाना चाहिये। परन्तु इसके उलट ऐसा वातावरण बनाया गया जैसे टेक्स की माँग करना कोई अपराध है। टेक्स की राशि से ही प्रशासन तंत्र को वेतन भत्ते पेन्शन इत्यादि मिलते है। टेक्स की राशि से ही देश में विकास के काम सड़क, पानी, बिजली, के काम चलते है। केवल सरकारी या गैरसरकारी कर्मचारी ही ईमानदारी से टेक्स अदा करते हैं। शायद इसलिये भी की यह उनकी लाचारी है। उनके टेक्स की राशि भी पहले ही वेतन से कट जाती है। यहाँ तक की जो लोग अपनी बचत के रूपये बैंकों में रखते है, (किसान भी) भले ही उन्हें टेक्स (आयकर) देने की अनिवार्यता नहीं हो इसके बावजूद भी उनके टेक्स की राशि पहले ही काट ली जाती है जिसे बाद में वापिस किया जाता है। परन्तु उद्योगपतियों के लिये टेक्स देना वह अपने द्वारा किये जा रहे ऐहसान जैसा मानते हैं। भारत की संसद ने बहुमत से जो टेक्स की दरें तय की है उन्हें ”टेक्स टेरर“ कहना संसद की अवमानना है, परन्तु दुखद है कि देश के मीडिया की प्रथम निष्ठा अपने मालिकों याने उद्योग जगत के प्रति रहती है। श्री व्ही.जी. सिद्धार्थ की आत्महत्या और आये दिन इसी प्रकार घटित हो रहे हो रही घटनाओं अपराधों का कारण मूलत: भोग व लालच हैं। उद्योगपति अपने क्षमता से अधिक कर्ज लालच में ही लेते है और आजकल लालच में कितनी अमानवीय घटनायें घट रही है इसकी कल्पना भी कठिन है। पिछले दिनों समाचार पत्रों में इस प्रकार के समाचार भरे पड़े है जिनमें भोग और लालच के लिए बच्चे अपने माता, पिता तक की हत्यायें कर रहे है। यहाँ तक कि यह शराब पीने के लिए माता-पिता की हत्या करने लगे और अभी तो हाल ही में ऐसी घटना हुई जसमें लड़की दामाद ने संपत्ति की लालच में अपनी माँ की हत्या कर दी। अब कल अगर कोई कहे कि यह घटनायें या ऐसे व्यक्तियों के ऊपर अपराधिक मुकदमें, राजकीय आतंक हैं तो क्या सही होगा? अब हालात को सुधारने के लिए सरकार और समाज दोनों को आगे आना होगा। में श्री एस.एम. कृष्णा, (स्व. व्ही.जी. सिद्धार्थ के ससुर और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री) की तारीफ करॅगा कि उन्होंने एक बार भी टेक्स आतंक जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं किया बल्कि वह शांत रहे। शायद वे अपने मन में सच्चाई को समझ रहे थे। अगर देश के सभी माता पिता और परिजन अपने परिवार के लोगों के आर्थिक या गैर आर्थिक अपराधों पर पर्दा डालना व उनका वचाव बंद कर दें तभी देश में सुधार हो सकेगा।

पाक का नया पैंतरा गजनवी
सिद्धार्थ शंकर
कश्मीर पर दुनियाभर में बेइज्जत होने के बाद अब पाकिस्तान ने नया पैंतरा चला है। वह जंग और परमाणु हथियारों के बहाने दुनिया को संकट में डालने की धमकी दे रहा है। इसी तारतम्य में उसने गुरुवार को बैलिस्टिक मिसाइल गजनवी का सफल परीक्षण कर लिया है। इस बात की जानकारी खुद सेना पाकिस्तान के मेजर जनरल आसिफ गफूर ने दी है। इसकी मारक क्षमता 290 किमी बताई जा रही है। पाक के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी और प्रधानमंत्री इमरान खान ने मिसाइल परीक्षण से जुड़ी टीम की सराहना की और बधाई दी। इंटर सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस के महानिदेशक गफूर ने अपने ट्वीट के साथ मिसाइल के परीक्षण का एक वीडियो भी साझा किया। भारत के साथ तनाव के बीच पाकिस्तान युद्ध का माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है। उसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए इस परीक्षण को अंजाम दिया है। हालांकि गजनवी से कहीं अधिक बेहतर मिसाइलें भारत के पास पहले से ही मौजूद हैं। गजनवी मिसाइल का परीक्षण कराची के करीब सोनमियानी उड़ान परीक्षण रेंज से अंजाम दिए जाने की खबर है।
पाकिस्तान के पास ऐसी मिसाइल पहले से ही है, ऐसे में मिसाइल का परीक्षण कर उसने ऐसा कर दुनिया को तनाव का संदेश दिया है। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के खंड दो और तीन के हटने के बाद से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। ना केवल पाक के प्रधानमंत्री इमरान खान बल्कि वहां के वित्त मंत्री तक परमाणु युद्ध की धमकी दे रहे हैं। दूसरी ओर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह भी कह चुके हैं कि भारत परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की नीति को बदल सकता है। लेकिन क्या वाकई दोनों देश परमाणु युद्ध का जोखिम उठाने की स्थिति में हैं? अगर जापान के हिरोशिमा और नागासाकी की बात करें तो आज भी यहां परमाणु हमले का असर बरकरार है। परमाणु हमले के समय यहां बड़ी संख्या में लोगों की जान गई थी। हालात नर्क से भी बदतर हो गए थे। परमाणु हमले का असर और उसका खौफ आज भी यहां के लोग महसूस करते हैं। तो अगर पाकिस्तान और भारत के बीच परमाणु युद्ध होता है तो उसका असर भी छोटा-मोटा नहीं होगा।
अगर भारत-पाकिस्तान एक दूसरे पर परमाणु हमला करते हैं, तो काफी बड़ी तबाही मचेगी। बम जहां गिरेगा वहां से 0.79 किमी तक सब कुछ खाक हो जाएगा। परमाणु वैज्ञानिकों की रिपोर्ट के अनुसार एयर ब्लास्ट-1 से 3.21 किमी तक झटके महसूस किए जाएंगे और 10.5 किलोमीटर तक इसका रेडिएशन फैलेगा। इससे 50 से लेकर 90 फीसदी लोग प्रभावित होंगे। हालांकि, पाक जैसी धमकी दे रहा है या सोच रहा है, वैसा कर पाना संभव नहीं है। पाक की परमाणु धमकी इस मायने में बेअसर है कि एक तो उसमें ऐसा कर पाने का साहस नहीं है। दूसरी उसकी हालत बदतर है। पाक सिर्फ धौंस दे रहा है, जैसा अब गजनवी के समय किया है।
बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण करने के बाद माना जा रहा है कि तिलमिलाया पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने के लिए यह तरकीब अपना रहा है। साथ ही पाकिस्तान अपनी इन हरकतों से भारत और पाक के बीच युद्ध का माहौल बनाकर अंतर्राष्ट्रीयकरण समुदाय का ध्यान जम्मू और कश्मीर पर केंद्रित करना चाहता है। भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध की आशंकाओं को बढ़ाने के प्रयासों को जारी रखने के लिए पाकिस्तान ने यह रास्ता अपनाया है। पाकिस्तान के प्रधान मंत्री इमरान खान एक हफ्ते पहले दोनों देशों के बीच परमाणु टकराव के संकेत दिया था। पाकिस्तान की यह नापाक कोशिश इसलिए भी भारत के लिहाज से अहम हो जाती है क्योंकि पाकिस्तान के रेल मंत्री ने भी भारत-पाकिस्तान के बीच संभावित युद्ध की तारीख का ऐलान कर दिया है। रेल मंत्री शेख रशीद ने कहा था कि अक्टूबर-नवंबर में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध हो सकता है।
लगातार बढ़ते खतरों और एक दूसरे पर अविश्वास की भावना के कारण दुनिया के लगभग सभी देश अपने-अपने रक्षा क्षेत्र में सुधार कर रहे हैं। वहीं पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय बेइज्जती करवाने के बाद अब जंग का ढोल पीट रहा है। अकेला पाक नहीं दुनिया के लगभग सभी प्रमुख देश दुश्मन देश के मिसाइलों से रक्षा के लिए जरूरी बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली को अपनाए हुए हैं। भारत के पास खुद की अंतर महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल मौजूद है जबकि पाकिस्तान के लिए यह अब भी सपना है। भारत ने अपनी सुरक्षा के लिए भारत ने विश्व स्तर के कई मिसाइलों का निर्माण किया है। जिसका कोई तोड़ पाकिस्तान के पास नहीं है। भारत शुरू से ही पाकिस्तान और चीन की ओर से मिलने वाले चुनौतियों को बेअसर करने के लिए एक पूर्ण सुरक्षित एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम को विकसित करना चाहता था, लेकिन शुरुआती समय से ही फंड की कमी और सरकार की उदासीनता के चलते यह प्रोग्राम ठंडे बस्ते में चला गया। 1999 के कारगिल युद्ध के समय पाकिस्तान से मिलने वाली चुनौतियों से सरकार और सेना को मिसाइल डिफेंस सिस्टम की कमी बहुत खली। इसे ध्यान में रखकर भारत ने अपने मिसाइल डिफेंस सिस्टम प्रोग्राम को फिर से शुरू कर दिया। भारत ने दो स्तरीय मिसाइल रक्षा प्रणाली पृथ्वी एयर डिफेंस सिस्टम और एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम को देश की सामरिक जरूरतों के हिसाब से विकसित किया है। पीएडी सिस्टम जहां हाई एल्टीट्यूड पर मिसाइल को मार गिराने में कारगर है वहीं एएडी सिस्टम कम ऊंचाई पर टर्मिनल चरण में ही दुश्मन देश की मिसाइल को मार गिराने में सक्षम है।
वर्तमान में देश की डिफेंस रिसर्च एण्ड रिसर्च आर्गनाइजेशन ने पीएडी का आधुनिक वर्जन पृथ्वी व्हीकलर डिफेंस सिस्टम का परीक्षण किया है। यह पिछले मिसाइल रक्षा प्रणाली से उन्नत प्रणाली है। जिसमें रेंज और स्पीड के मामले में यह ज्यादा बेहतर होते हुए कई मामलों में अमेरिका के थाड के बराबरी का मिसाइल रक्षा प्रणाली है।

नेताशाहों और नौकरशाहों को सीधा करें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कांग्रेस के नेता चिदंबरम तो अभी फंसे ही हुए हैं, अब दूसरे कांग्रेसी नेता कुलदीप बिश्नोई की गुरुग्राम में स्थित ब्रिस्टल होटल को भी सरकार ने जब्त कर लिया है। कुलदीप की बेनामी संपत्ति को निकालने के लिए उनके और उनके भाई चंद्रमोहन के दर्जनों ठिकानों पर छापे भी मारे गए हैं। जाहिर है कि दाल में कुछ काला जरुर है वरना विरोधी नेताओं को इस तरह तंग करने पर सरकार खुद मुसीबत में फंस सकती है। यह तो अदालतें तय करेंगी कि ये नेता लेाग कितने पाक-साफ हैं लेकिन जैसा कि मैं पहले भी लिख चुका हूं कि आज की राजनीति भ्रष्टाचार के बिना हो ही नहीं सकती। ये अलग बात है कि भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति का उपयोग कुछ सिरफिरे नेता अपने लिए या अपने परिवार के लिए ना करें लेकिन चुनाव लड़ने और लड़ाने के लिए तो अंधाधुंध पैसा चाहिए या नहीं ? यह वे कहां से लाएंगे ? वे तो एक कौड़ी भी नहीं कमाते। उन्होंने अपने वेतन भी अनाप-शनाप बढ़ा लिये हैं लेकिन उनके खर्चे तो उनके वेतनों से भी कई गुना होते हैं। अपने आप को वे जनता का नौकर कहते हैं लेकिन उनका रहन-सहन बड़े-बड़े सेठों और राजा-महाराजाओं से कम नहीं होता। इन नेताओं को पकड़ने का जिम्मा मोदी सरकार ने लिया है तो यह बहुत अच्छी बात है लेकिन सवाल यह है कि सिर्फ कांग्रेसी नेता ही क्यों, भाजपाई भी क्यों नहीं ? शायद कम्युनिस्ट नेताओं की जेबें खाली मिलें लेकिन पिछड़ों, अनुसूचितों और प्रांतीय नेताओं पर भी हाथ डाला जाए तो भारतीय राजनीति का काफी शुद्धिकरण हो सकता है। 90 प्रतिशत से ज्यादा नेता राजनीति को तलाक दे देंगे। इसी प्रकार वर्तमान सरकार हर कुछ दिनों में दर्जनों अफसरों को जबरन सेवा-निवृत्त कर रही है याने नौकरी से हटा रही है। यह बहुत अच्छा है। नौकरशाहों का भ्रष्टाचार नेताशाहों से अधिक निकृष्ट होता है, क्योंकि उससे प्राप्त सारा पैसा वे खुद जीम जाते हैं और दूसरा, आम जनता उनसे बहुत तंग होती है। उन्हें नौकरी से हटाना ही काफी नहीं है। उनकी सारी चल-अचल संपत्तियां जब्त की जानी चाहिए और उनके नाम के विज्ञापन जारी किए जाने चाहिए। नेताशाहों और नौकरशाहों के नजदीकी रिश्तेदारों की संपत्तियां भी जांच के दायरे में रखी जानी चाहिए। यदि नरेंद्र मोदी सरकार ऐसा कुछ कर सके तो सारे पड़ौसी देश भी भारत का अनुकरण करेंगे।

बाल यौन उत्पीड़न : समस्या व समाधान
प्रो.शरद नारायण खरे
अल्पायु के बालक-बालिकाओं के साथ यौन दुर्व्यवहार अर्थात् दुराचार करना इस श्रेणी में आता है ।अनेक कानूनों व प्रतिबंधों के उपरांत भी बाल यौन जघन्यता का क्रम गतिमान है ।यह एक अक्षम्य सामाजिक अपराध है,जिसे सामाजिक कोढ़ भी निरूपित किया जा सकता है ।
वयस्क सम्बंधियों,परिचितों,पड़ोसियों,मित्रों के अतिरिक्त शिक्षकों व्दारा भी अबोध बालक -बालिकाओं को यौन दुष्कर्म का शिकार बनाया जाता है ।यह यौन प्रताड़ना सहकर या तो बच्चा सहमकर रह जाता है,या फिर उसे आतंकित कर मुंह बंद रखने के लिए विवश कर दिया जाता है । अनेक प्रकरणों में तो माता-पिता/अभिभावकों तक यह जघन्यता आ ही नहीं पाती है ,और यदि उनकी जानकारी में आ भी जाती है तो लोकलाज के भय से प्राय: वे चुप ही रह जाते हैं,जिससे कुकर्मियों के मनोबल में स्वाभाविक रूप से वृध्दि होती है ।
दिन-प्रतिदिन इन कुकर्मों के आंकड़ों में वृध्दि हो रही है,अतएव इस पर रोकथाम लगाने हेतु आवश्यक यह है कि –
(1)माता-पिता/अभिभावक सतर्क रहें,तथा किसी भी सम्बंधी,मित्र,पड़ोसी पर आंख बंद करके विश्वास व करें ।
(2)आवश्यक यह भी है कि माता-पिता अपने बच्चों को ‘गुड टच’ व ‘बेड टच’ के बारे में बताएं,और उन्हें कहें कि बेड टच की स्थिति में वे उसका प्रतिरोध करें,तथा माता-पिता को तत्काल सूचित करें ।
(3)माता-पिता को चाहिए कि वे उनके बच्चों के साथ आंशिक उत्पीड़न होने पर भी निकटतम पुलिस थाने में उसकी प्राथमिकी दर्ज़ कराने से न हिचकें ।
(4)माता-पिता को चाहिए कि वे घर पर आने-जाने वाले हर व्यक्ति पर नज़र रखें,तथा इस परिप्रेक्ष्य में कदापि भी लापरवाही न बरतें ।
(5)माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को न केवल साहसी-समझदार बनाएं,बल्कि टॉफी/खिलौने के प्रलोभन से दूर रहना सिखाएं ।
(6)माता-पिता को चाहिए कि अपने बच्चों को इस तरह की ड्रेस पहनाएं ,जो कि यौन सुरक्षा में सहायक सिध्द हो ।
(7)माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को घर के बाहर घूमने -फिरने की खुली छूट न दें,तथा नियंत्रण व नज़र रखें ।
(8)माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बालक-बालिका दोनों को ही यौन उत्पीड़न से बचाने के प्रति
चेतनाशील रहें ।प्राय: अभिभावक पुत्री की सुरक्षा पर ही ध्यान देते हैं,पर पुत्र की सुरक्षा के प्रति लापरवाह हो जाते हैं ।जबकि बालक भी व्यापक रूप में अप्राकृतिक यौन उत्पीड़न का शिकार होते देखे गए हैं ।
(9)लोगों को चाहिए कि वे यौन उत्पीड़कों का सामूहिक रूप से सामाजिक बहिष्कार करें,तथा उन्हें लांछित, उपेक्षित,तिरस्कृत व अपमानित करें,जिससे कि ऐसे दुष्कर्मों को हतोत्साहन मिले ।
(10)समाज के लोगों को यह संवेदना धारण करनी होगी,व परिपक्वता का परिचय भी देना होगा कि यौनोत्पीड़ित बालक-बालिकाओं को वे उपेक्षा व हीनता नहीं बल्कि स्नेह व अपनत्व की दृृष्टि से देखेंगे ।
(11)बाल यौन अपराधियों को यदि सार्वजनिक रूप से दंडित करने का प्रावधान (“प्रॉक्सो कानून” में संशोधन करके)अमल में आ जाए,तो निश्चित रूप से
बाल यौनापराध में अपेक्षित न्यूनता परिलक्षित होगी ।
(12)मेरा विचार है कि यदि इंटरनेट को नियंत्रित करके,उन्मुक्त पोर्न वीडियोज की खुली उपलब्धता को प्रतिबंधित किया जाए,तो निश्चित रूप से समाज में फैले दुराचारियों के अनियंत्रित कामावेग में न्यूनता की अपेक्षा तो की जा सकती है ।
हर बालक-बालिका को खिलने/हँसने-मुस्कराने/महकने का अधिकार है,इसलिए यह हमारा,हम सबका,सारे समाज का कर्तव्य है कि “कोई भी पुष्प
खिलने के पूर्व मुरझाना नहीं चाहिए ।”
“वह समाज जो रोक ले,बाल यौन अपराध ।
नैतिकता ,इंसानियत,को लेता जो साध ।।

कश्मीरः जुबान प्यारी या जान ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच फ्रांस में हुई भेंट अगर इमरान खान ने देखी होगी तो पता नहीं उन पर क्या गुजरी होगी ? ट्रंप ने साफ-साफ कह दिया है कि उनके द्वारा बीच-बचाव अनावश्यक है। भारत और पाक बातचीत से अपना मामला खुद सुलझा लेंगे। याने इमरान खान को जो थोड़ी-बहुत आशा अमेरिका से बंधी थी, वह भी अब हवा हो गई है। इस्लामी देशों ने पहले ही कश्मीर पर पाकिस्तान को ठेंगा दिखा दिया है लेकिन अफगानिस्तान के बहाने पाकिस्तान ने अमेरिका को अपने लिए अटका रखा था, वह सहारा भी ढह गया। अब सिर्फ चीन रह गया है लेकिन चीन एक अहसानमंद राष्ट्र है। उसे पाकिस्तान ने कश्मीर की जो 5000 वर्ग मील जमीन 1963 में भेंट की थी, उसका अहसान अब वह दबी जुबान से चुका रहा है। चीन को पता है कि उसके हांगकांग और सिंक्यांग में जो दशा है, वह कश्मीर के मुकाबले कई गुना बदतर है। यह गनीमत है कि इन दोनों मामलों को भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नहीं उठा रहा है। कश्मीर के सवाल पर यों ही सारी दुनिया भारत के साथ दिखाई पड़ रही है। ऐसी स्थिति में इमरान खान का बौखला जाना स्वाभाविक है। उन्होंने परमाणु-युद्ध पर भी उंगली रख दी और कश्मीर के लिए आखिरी सांस तक लड़ने का ऐलान कर दिया। मैं उनकी मजबूरी समझता हूं। यदि वे ऐसा नहीं करते तो उनका प्रधानमंत्री की कुर्सी में बने रहना मुश्किल हो जाता लेकिन अब बेहतर होगा कि पाकिस्तान यथार्थ को स्वीकार करे और वह सब कुछ करने से बाज़ आए, जिसके कारण कश्मीर में खून की नदियां बहने लगें। यदि कश्मीर में हिंसा भड़काई जाएगी तो फौजी प्रतिहिंसा किसी भी हद तक पहुंच सकती है। यह बहुत दुखद होगा। यह ठीक है कि कश्मीर में 5 अगस्त को जो कुछ हुआ है, उसे आम कश्मीरी का रत्तीभर भी नुकसान नहीं होगा। हां, पाकिस्तान और कुछ कश्मीरी नेताओं का धंधा जरुर बंद हो जाएगा। आम कश्मीरी का खून न बहे यह इतना जरुरी है कि उसके लिए यदि कुछ दिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता स्थगित हो जाए तो हो जाए। कश्मीरियों की जान ज्यादा प्यारी है या नेताओं को अपनी जुबान ज्यादा प्यारी है? फिर भी सरकार को हर कश्मीरी के लिए ज्यादा से ज्यादा सुविधा जुटानी चाहिए तक वह तहे-दिल से यह समझे कि जो हुआ है, वह उसके लिए बेहतर हुआ है।

मोदी जी का कवच मन्त्र ,मंत्री अरुण जेटली जी
डॉक्टर अरविन्द
मृत्यु एक ऐसा परम सत्य हैं जिसका होना निश्चित हैं पर कब कहाँ कैसे होना हैं यह अनिश्चित होता हैं .मृत्यु अत्यंत दुखदायी होती हैं .जिस प्रकार मनुष्य का जन्म बताता हैं की होनहार विरवान के होत चिकने पात उसी प्रकार मृत्यु बताती हैं की इस व्यक्ति का जीवन कैसा बीता ?कारण जीवन और कर्मों का मिलन अद्भुत होता हैं .
मोदी सरकार में विवादित राफेल काण्ड का तीसरा स्तम्भ का जाना बहुत दुखद हैं कारण उस काण्ड का बचाव करने वाले श्री मनोहर पर्रिकर ,सुषमा स्वराज्य और श्री अरुण जेटली का महत्वपूर्ण योगदान था.
श्री अरुण जेटली (28 दिसम्बर 1952 जन्म — 24 अगस्त 2019 मृत्यु ) भारत के प्रसिद्ध अधिवक्ता एवं राजनेता थे। वे भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता एवं वे पूर्व वित्त मन्त्री थे। वे राजग(राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के शासन में केन्द्रीय न्याय मन्त्री के साथ-साथ कई बड़े पदों पर आसीन थे।
व्यक्तिगत जीवन
अरुण जेटली का जन्म दिल्ली में महाराज किशन जेटली और रतन प्रभा जेटली के घर में हुआ। उनके पिता एक वकील हैं, उन्होंने अपनी विद्यालयी शिक्षा सेंट जेवियर्स स्कूल, नई दिल्ली से 1957-69 में पूर्ण की।उन्होंने अपनी 1973 में श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, नई दिल्ली से कॉमर्स में स्नातक की। उन्होंने 1977 में दिल्ली विश्‍वविद्यालय के विधि संकाय से विधि की डिग्री प्राप्त की।छात्र के रूप में अपने कैरियर के दौरान, उन्होंने अकादमिक और पाठ्यक्रम के अतिरिक्त गतिविधियों दोनों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के विभिन्न सम्मानों को प्राप्त किया हैं। वो 1974 में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संगठन के अध्यक्ष भी रहे।
अरुण जेटली ने 24 मई 1982 को संगीता जेटली से विवाह किया। उनके दो बच्चे, पुत्र रोहन और पुत्री सोनाली हैं।अरूण जेटली का 24 अगस्त 2019 को दोपहर 12:07 बजे निधन हो गया।
राजनीतिक कैरियर
जेटली 1991 से भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य थे। वह 1999 के आम चुनाव से पहले की अवधि के दौरान भाजपा के प्रवक्ता बन गए।
वाजपेयी सरकार
1999 में, भाजपा की वाजपेयी सरकार के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सत्ता में आने के बाद, उन्हें 13 अक्टूबर 1999 को सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नियुक्त किया गया। उन्हें विनिवेश राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) भी नियुक्त किया गया। विश्व व्यापार संगठन के शासन के तहत विनिवेश की नीति को प्रभावी करने के लिए पहली बार एक नया मंत्रालय बनाया गया। उन्होंने 23 जुलाई 2000 को कानून, न्याय और कंपनी मामलों के केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के रूप में राम जेठमलानी के इस्तीफे के बाद कानून, न्याय और कंपनी मामलों के मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार संभाला।
उन्हें नवम्बर 2000 में एक कैबिनेट मंत्री के रूप में पदोन्नत किया गया था और एक साथ कानून, न्याय और कंपनी मामलों और जहाजरानी मंत्री बनाया गया था। भूतल परिवहन मंत्रालय के विभाजन के बाद वह नौवहन मंत्री थे। उन्होंने 1 जुलाई 2001 से केंद्रीय मंत्री, न्याय और कंपनी मामलों के मंत्री के रूप में 1 जुलाई 2002 को नौवहन के कार्यालय को भाजपा और उसके राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में शामिल किया। उन्होंने जनवरी 2003 तक इस क्षमता में काम किया। उन्होंने 29 जनवरी 2003 को केंद्रीय मंत्रिमंडल को वाणिज्य और उद्योग और कानून और न्याय मंत्री के रूप में फिर से नियुक्त किया। मई 2004 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की हार के साथ, जेटली एक महासचिव के रूप में भाजपा की सेवा करने के लिए वापस आ गए, और अपने कानूनी कैरियर में वापस आ गए।
2004-2014
उन्हें 3 जून 2009 को एल.के.आडवाणी द्वारा राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में चुना गया था। 16 जून 2009 को उन्होंने अपनी पार्टी के वन मैन वन पोस्ट सिद्धांत के अनुसार भाजपा के महासचिव के पद से इस्तीफा दे दिया। वह पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य भी हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में, उन्होंने राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक की बातचीत के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और जन लोकपाल विधेयक के लिए अन्ना हजारे का समर्थन किया। उन्होंने 2002 में 2006 तक संसदीय सीटों को मुक्त करने के लिए भारत के संविधान में अस्सी-चौथा संशोधन सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया और 2004 में भारत के संविधान में नब्बेवें संशोधन ने दोषों को दंडित किया। हालाँकि, 1980 से पार्टी में होने के कारण उन्होंने 2014 तक कभी कोई सीधा चुनाव नहीं लड़ा। 2014 के आम चुनाव में वह लोकसभा सीट पर अमृतसर सीट के लिए भाजपा के उम्मीदवार थे (नवजोत सिंह सिद्धू की जगह), लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार से हार गए अमरिंदर सिंह। वह गुजरात से राज्यसभा सदस्य थे। उन्हें मार्च 2018 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए फिर से चुना गया।
26 अगस्त, 2012 को उन्होंने कहा (संसद के बाहर) “ऐसे अवसर होते हैं जब संसद में बाधा देश को अधिक लाभ पहुंचाती है।” इस कथन को भारत में समकालीन राजनीति में संसद की बाधा को वैधता प्रदान करने वाला माना जाता है। 2014 में सरकार बनाने के बाद भाजपा सरकार को कई बार संसद में व्यवधानोंऔर अवरोधों का सामना करना पड़ा है और विपक्ष उनके पूर्वोक्त बयान का हवाला देता रहता है। जबकि संसदीय चर्चा में उनका योगदान अनुकरणीय है, लेकिन एक वैध मंजिल की रणनीति के रूप में बाधा का उनका समर्थन भारतीय संसदीय लोकतंत्र में उनके सकारात्मक योगदान को उजागर करता है।
मोदी सरकार
26 मई 2014 को, जेटली को नवनिर्वाचित प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वित्त मंत्री के रूप में चुना गया (जिसमें उनके मंत्रिमंडल में कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय और रक्षा मंत्री शामिल हैं। विश्लेषकों ने जेटली के “अंशकालिक” का हवाला दिया। “पिछली सरकार की नीतियों की एक साधारण निरंतरता के रूप में रक्षा पर ध्यान केंद्रित करें। रॉबर्ट ब्लेक द्वारा विकीलीक्स केबल के अनुसार, अमेरिकी दूतावास पर उनकी सरकार के लिए चार्ज, जब हिंदुत्व के सवाल पर दबाया गया, जेटली ने तर्क दिया था। उस हिंदू राष्ट्रवाद को भाजपा के लिए “हमेशा एक टॉकिंग पॉइंट” कहा जाएगा और इसे एक अवसरवादी मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा। जेटली ने बाद में स्पष्ट किया कि “राष्ट्रवाद या हिंदू राष्ट्रवाद के संदर्भ में अवसरवादी शब्द का उपयोग न तो मेरा विचार है और न ही उनकी भाषा यह राजनयिक का अपना उपयोग हो सकता है।
बिहार विधान सभा चुनाव, 2015 के दौरान, अरुण जेटली ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस बात पर सहमति व्यक्त की कि धर्म के आधार पर आरक्षण का विचार खतरे से भरा है और मुस्लिम दलितों और ईसाई दलितों को आरक्षण देने के खिलाफ है क्योंकि यह जनसांख्यिकी को प्रभावित कर सकता है। वह एशियाई विकास बैंक के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सदस्य के रूप में भी कार्य करता है।
नवंबर 2015 में, जेटली ने कहा कि विवाह और तलाक को नियंत्रित करने वाले व्यक्तिगत कानून मौलिक अधिकारों के अधीन होने चाहिए, क्योंकि संवैधानिक रूप से गारंटीकृत अधिकार सर्वोच्च हैं। उन्होंने सितंबर 2016 में आय घोषणा योजना की घोषणा की।
भारत के वित्त मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान, सरकार ने 9 नवंबर, 2016 से भ्रष्टाचार, काले धन, नकली मुद्रा और आतंकवाद पर अंकुश लगाने के इरादे से महात्मा गांधी श्रृंखला के 500 और 1000 के नोटों का विमुद्रीकरण किया।
20 जून, 2017 को उन्होंने पुष्टि की कि जीएसटी रोलआउट अच्छी तरह से और सही मायने में ट्रैक पर है।
लीडरशिप ने अरुण जेटली को एक विशेषज्ञ के रूप में सिफारिश की और एलजीबीटी + मुद्दों पर नेताओं की वकालत की।
9 अगस्त 2019 को, उन्हें “सांस फूलने” की शिकायत के बाद गंभीर हालत में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में भर्ती कराया गया था। 17 अगस्त को, यह बताया गया कि जेटली जीवन आधार (लाइफ सपोर्ट) पर थे। 23 अगस्त तक उनकी तबीयत खराब हो गई थी.
24 अगस्त 2019 को 66 साल की उम्र में 12:07 अपराह्न पर जेटली का निधन हो गया.
श्री जेटली का अल्प समय में जाना देश के साथ पार्टी को बहुत क्षति हुई .एक नेता का जाना उतना हानिकारक नहीं होता जितना एक बौद्धिक व्यक्ति का जाना . उनके जीवित और कर्मशील होने से देश को नयी दिशा मिलती पर मौत पर किसी का वश नहीं हैं .ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे .

मोदी को मुस्लिम सम्मान
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यों तो पहले भी कई मुस्लिम देशों की यात्रा कर चुके हैं लेकिन इस बार उनका संयुक्त अरब अमारात (यूएई) और बहरीन जाना विशेष महत्व का है। बहरीन जानेवाले वे पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। असली बात यह है कि इन दोनों मुस्लिम देशों में वे गए हैं, दो प्रमुख घटनाओं के बाद ! पहली घटना पुलवामा-बालाकोट कांड और दूसरी कश्मीर से धारा 370 और 35 ए को खत्म करने के बाद ! इन दोनों घटनाओं के बाद पाकिस्तान समझ रहा था कि दुनिया के मुस्लिम देश भारत की भर्त्सना करेंगे और उसके आंसू पोछेंगे लेकिन कश्मीर के मामले में सबसे पहले दो देशों ने भारत का समर्थन किया। वे थे, यूएई और मालदीव। इन दोनों मुस्लिम देशों का समर्थन पाकिस्तान के मनोबल के लिए बड़ा धक्का था। अब यह धक्का और भी गहरा हो गया है। अबू धाबी के शेख मुहम्मद नाह्यान ने न सिर्फ मोदी को वहां का सर्वोच्च सम्मान (आर्डर आफ जायद) दिया बल्कि उन्हें अपना ‘भाई’ कहा और ‘अपने दूसरे घर में’ उनका स्वागत किया। यह सम्मान पहले रुस और चीन के पुतिन और शी को दिया गया था। इस अवसर पर महात्मा गांधी की स्मृति में डाक टिकिट भी जारी किया गया। बहरीन ने भी अपना सर्वोच्च सम्मान मोदी को दिया और 200 साल पुराने श्रीजी मंदिर के पुनर्निर्माण की भी घोषणा की। क्या इससे पाकिस्तान के घावों पर नमक नहीं छिड़क गया होगा ? बिल्कुल छिड़क गया है। पाकिस्तान की सीनेट के अध्यक्ष सादिक संजरानी ने गुस्से में आकर अपनी दुबई-अबूधाबी यात्रा रद्द कर दी। पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने भी इस्लामी संगठन में इसलिए भाग नहीं लिया था कि भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज वहां पुलवामा-बालाकोट पर बोलनेवाली थीं। पाकिस्तान के इन तेवरों का इन प्रमुख मुस्लिम देशों पर कोई असर नहीं हो रहा है। मोदी को घोर सांप्रदायिक और फाशीवादी कहनेवाला पाकिस्तान यह क्यों भूल गया कि उन्हें सउदी अरब, फलीस्तीन और अफगानिस्तान भी अपने सर्वोच्च पुरस्कार दे चुके हैं। पाकिस्तान की शै पर जिंदा रहनेवाले अलगाववादी और आतंकवादियों को क्या यह पता नहीं चल रहा है कि अब सारी दुनिया कश्मीर को भारत का आंतरिक मामला मान रही है ? उन्हें अब ऐसा ही समझकर कश्मीरियों की खुशहाली, सुरक्षा और संपन्नता की भरपूर कोशिश करनी चाहिए।

खेल-खिलाड़ी भारतीय बैडमिंटन की प्रिंसेस पीवी सिंधु सिंधु ने रचा इतिहास
योगेश कुमार गोयल
2013 में पहली बार विश्व बैडमिंटन चैम्पियनशिप में कदम रखने वाली भारत की बैडमिंटन खिलाड़ी पी वी सिंधु ने 25 अगस्त को स्विट्जरलैंड के बासेल शहर में बीडब्ल्यूएफ विश्व चैम्पियनशिप के फाइनल मे अपने कौशल, फिटनेस और मानसिक शक्ति का प्रदर्शन करते हुए जापान की नोजुमी ओकुहारा को 21-7, 21-7 से मात देकर विश्व बैडमिंटन चैम्पियनशिप का महिलाओं का एकल खिताब अपने नाम करके एक नया इतिहास रच दिया और साथ ही नोजुमी से दो वर्ष पहले 2017 के फाइनल में मिली हार का हिसाब भी चुकता कर लिया। 2017 और 2018 में उन्हें रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा था लेकिन अब वह यह प्रतिष्ठित चैम्पियनशिप जीतने वाली पहली भारतीय शटलर बन गई हैं। उनसे पहले कोई भी भारतीय पुरूष या महिला खिलाड़ी यह कारनामा नहीं कर सका है। पूरे फाइनल मैच में जापान की तीसरी वरीयता प्राप्त नोजोमी ओकुहारा पांचवी वरीयता प्राप्त सिंधु के सामने कही नहीं टिकी। खुद सिंधु ने भी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि फाइनल मुकाबला इस कदर एकतरफा होगा। दरअसल सिंधु ने अपनी पुरानी कमियों को ध्यान में रखते हुए उनसे उबरकर फाइनल खेला और उसका भरपूर फायदा उन्हें इस टूर्नामेंट में मिला। हालांकि उन्होंने इस साल कोई भी खिताब नहीं जीता था, इसलिए उनसे यह करिश्मा कर दिखाने की उम्मीद कम ही थी लेकिन जब सिंधु ने क्वार्टर फाइनल में दूसरी वरीयता प्राप्त ताईवान की ताई जू यिंग को मुकाबले में हरा दिया, तब उनका आत्मविश्वास बढ़ गया। इसी आत्मविश्वास के साथ उन्होंने सेमीफाइनल मुकाबले में चीन की चेन यू फेई को बेहद आसानी से 21-7, 21-14 से हराया और फाइनल में तो इतना तेज मैच खेला कि मुकाबले को एकतरफा बनाकर शानदार और दमदार जीत हासिल की। इससे पहले वह वर्ष 2013 और 2014 में कांस्य पदक तथा 2017 और 2018 में रजत पदक जीत चुकी थी और विश्व चैम्पियनशिप में उनके खाते में केवल स्वर्ण पदक की कमी थी, जो पूरी हो गई है। 2013 में पहली बार इस टूर्नामेंट में हिस्सा लेने के बाद से सिंधु अब तक इसमें कुल पांच दशकों के साथ 21 मैच जीत चुकी हैं। अभी तक इसमें उनसे ज्यादा पदक कोई भी महिला खिलाड़ी नहीं जीत सकी है।
2016 के रियो ओलम्पिक में रजत पदक विजेता और गत वर्ष राष्ट्रमंडल खेलों, एशियाई खेलों तथा विश्व चैंम्पियनशिप में रजत पदक जीतने के बाद इस वर्ष विश्व चैम्पियन बनकर पी वी सिंधु (पुसरला वेंकट सिंधु) ने हर भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। यह खिताबी जीत हासिल कर उन्होंने भारतीय बैडमिंटन के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया है। वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उस समय सुर्खियों में आई थी, जब 2013 में चीन के ग्वांगझू में आयोजित विश्व बैडमिंटन चैम्पियनशिप में कांस्य पदक जीतकर वह यह सफलता हासिल करने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनी थी और उसके अगले ही वर्ष कोपेनहेगन में फिर से इसी सफलता को दोहराकर उन्होंने हर किसी का ध्यान आकर्षित किया था। सिंधु को अभी तक फाइनल मुकाबलों में कुल 14 बार शिकस्त झेलनी पड़ी है जबकि वह अपने कैरियर में एक दर्जन से भी अधिक खिताब अपने नाम कर चुकी हैं। पिछले साल उन्हें विश्व चैम्पियनशिप, एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों, थाईलैंड ओपन तथा इंडिया ओपन के फाइनल में हार का सामना करना पड़ा था लेकिन जब उन्होंने गत वर्ष जापान की नोजोमी ओकुहारा को शिकस्त देकर ‘विश्व टूर फाइनल्स’ खिताब जीता था, जिसे पहले ‘सुपर सीरिज फाइनल्स’ के नाम से जाना जाता था तो वह यह खिताब जीतने वाली पहली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी बनी थी। उस टूर्नामेंट में भी लगातार तीन बार खेली लेकिन 2016 में सेमीफाइनल में पराजित हो गई थी जबकि 2017 में फाइनल में मुकाबला हारकर उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा था। भारत की ओर से साइना नेहवाल ने इसी टूर्नामेंट के लिए कुल सात बार क्वालीफाई किया और टूर्नामेंट के फाइनल तक भी पहुंची थी किन्तु खिताब जीतने में असफल रही थी लेकिन सिंधु ने पिछले साल वह टूर्नामेंट जीतकर और अब विश्व चैम्पियनशिप जीतकर साबित कर दिया है कि मौजूदा वक्त में भारतीय बैडमिंटन की प्रिंसेस वही हैं।
सिंधु के बारे में विख्यात खिलाड़ी और उनके कोच गोपीचंद फुलेला कहते हैं कि वह छुपी रूस्तम साबित होती है। दरअसल सिंधु अक्सर विश्व वरीयता प्राप्त खिलाडि़यों को मुकाबले में परास्त कर चौंकाती रही हैं किन्तु जब उनका मुकाबला कम रैकिंग वाली खिलाडि़यों से होता है तो कई बार उनसे हार जाती हैं। रियो ओलम्पिक में भी वह उच्च रैंकिंग वाली खिलाडि़यों को हराकर फाइनल तक पहुंची थी। गत वर्ष के एशियाई खेलों में वह भारत का 36 वर्षों का सूखा खत्म करते हुए ताइवान की ताई जू यिंग को हराकर रजत पदक जीतने में सफल रही थी। जिस उम्र में बच्चे पड़ोस में जाने से भी डरते हैं, 8-9 साल उस छोटी सी उम्र में सिंधु प्रतिदिन 56 किलोमीटर की दूरी तय कर बैडमिंटन कैंप में ट्रेनिंग लेने जाया करती थी। आंध्र प्रदेश के हैदराबाद में 5 जुलाई 1995 को पेशेवर वालीबॉल खिलाडि़यों पी.वी. रमण और पी. विजया के घर जन्मी पीवी सिंधु को खेलों के प्रति जुनून अपने माता-पिता से विरासत में ही मिला था किन्तु उन्होंने वालीबॉल के बजाय बैडमिंटन को अपने कैरियर के लिए चुना। दरअसल उनके माता-पिता दोनों ही पेशेवर वालीबॉल खिलाड़ी रहे हैं। उनके पिता पीवी रमण को तो राष्ट्रीय वालीबॉल में उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 2000 में भारत सरकार का प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।
सिंधु ने मात्र 6 साल की उम्र में ही 2001 के ऑल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैम्पियन बने पुलेला गोपीचंद से प्रभावित होकर बैडमिंटन को अपना कैरियर चुन लिया था और 8 साल की उम्र से ही सक्रिय रूप से बैडमिंटन खेलना शुरू कर दिया था। शुरूआत में उन्होंने सिकंदराबाद में इंडियन रेलवे सिग्नल इंजीनियरिंग और दूरसंचार के बैडमिंटन कोर्ट में महबूब अली के मार्गदर्शन में बैडमिंटन की बारीकियां सीखी और कुछ ही समय बाद पुलेला गोपीचंद की बैडमिंटन अकादमी में शामिल होकर गोपीचंद के मार्गदर्शन में अपने खेल को निखारती चली गई। उसी का नतीजा है कि आज वह भारतीय बैडमिंटन का जगमगाता सितारा बन चुकी हैं। गोपीचंद फिलहाल भारतीय बैडमिंटन टीम के मुख्य कोच हैं।
एक के बाद एक मिली सफलताओं ने विश्व वरीयता प्राप्त भारतीय महिला बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु को सदैव सुर्खियों की सरताज बनाए रखा है। वह 2009 में कोलंबो में आयोजित उप-जूनियर एशियाई बैडमिंटन चैंम्पियनशिप में कांस्य पदक, 2010 में ईरान फज्र अंतर्राष्ट्रीय बैडमिंटन मुकाबले में महिला एकल में रजत पदक, 2011 में डगलस कॉमनवेल्थ यूथ गेम्स में स्वर्ण पदक, जुलाई 2012 में एशिया युवा अंडर-19 चैम्पियनशिप, दिसम्बर 2013 में मलेशियाई ओपन के दौरान महिला सिंगल्स का ‘मकाऊ ओपन ग्रैंड प्रिक्स गोल्ड’ खिताब, 2013 तथा 2014 में विश्व चैम्पियनशिप में कांस्य पदक, 2016 में गुवाहाटी दक्षिण एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक, 2016 में रियो ओलम्पिक में रजत पदक जीत चुकी हैं। सिंधु ने ब्राजील के रियो डि जेनेरियो में आयोजित 2016 के ग्रीष्मकालीन ओलम्पिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया था और महिला एकल स्पर्धा के फाइनल में पहुंचने वाली वह पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनी थी। ओलम्पिक खेलों में भारत की ओर से महिला एकल बैडमिंटन का रजत पदक जीतने वाली सिंधु पहली खिलाड़ी हैं। उससे पहले वे भारत की नेशनल चैम्पियन भी रह चुकी थी। नवम्बर 2016 में उन्होंने चीन ओपन खिताब भी अपने नाम किया था।
सिंधु चीन के ग्वांग्झू में आयोजित 2013 की विश्व बैडमिंटन चैम्पियनशिप में एकल पदक जीतने वाली भी पहली भारतीय महिला बैडमिंटन खिलाड़ी हैं, जिसमें उन्होंने ऐतिहासिक कांस्य पदक जीता था। वर्ष 2014 में उन्हें एनडीटीवी द्वारा ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ घोषित किया गया था। 2013 में सिंधु को ‘अर्जुन पुरस्कार’ तथा 30 मार्च 2015 को भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से भी सम्मानित किया जा चुका है। वह केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) और विजाग स्टील की ब्रांड एम्बेसडर हैं। सिंधु भारत के आर्थिक रूप से सम्पन्न खिलाडि़यों में से एक हैं। पिछले साल फोर्ब्स पत्रिका द्वारा जारी विश्व में सर्वाधिक कमाई करने वाली शीर्ष 10 महिला खिलाडि़यों की सूची में सिंधु सातवें स्थान पर रही थी। बहरहाल, सिंधु इस समय जिस बेहतरीन फॉर्म में हैं और दुनिया की चोटी की खिलाडि़यों को जिस प्रकार धूल चटा रही हैं, उससे वो भारतीय बैडमिंटन के सुखद भविष्य की उम्मीदें जगा रही हैं और अब उनका अगला लक्ष्य टोक्यो ओलम्पिक-2020 है तथा ओलम्पिक में स्वर्ण जीतना ही उनका सपना है। उम्मीद की जानी चाहिए कि ओलम्पिक में स्वर्ण जीतने का सिंधु का सपना साकार होगा और वो ओलम्पिक में भी सफलता का इतिहास रचकर भारत का नाम रोशन करेंगी।

फिर वही ढपली; फिर वही राग
ओमप्रकाश मेहता
अब भागवत का ’आरक्षण‘ क्या गुल खिलाएगा…..?
भारत में ’आरक्षण‘ एक ऐसा तम्बाकू जैसा जहरीला पदार्थ बना हुआ है, जिसे हर राजनेता खाने को मजबूर है, हर कोई जानता है कि यह एक राष्ट्र विरोधी जहर है, लेकिन क्या करें, राजनीति में अपना वजूद बनाए रखने के लिए इसे अपनाने की भी हर एक की मजबूरी है। आजादी के बाद जब आजाद भारत के संविधान की रचना की गई तो आर्थिक रूप से कमजोर व जातिगत रूप से उपेक्षित वर्ग को अन्य वर्गों की बराबरी में लाने के लिए मात्र पन्द्रह सालों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। किंतु बाद में जब यह मुद्दा ”वोट की राजनीति में तब्दील हो गया तो समय के साथ यह आरक्षण भी दीर्घजीवी हो गया“। आज हर राजनीतिक दल व उसके नेता दिल से आरक्षण खत्म करने के पक्ष में है, किंतु ऐसा करने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा है और इसी कारण राजनीति में जाति-धर्म और सम्प्रदाय ने अपने पैर मजबूती से जमा लिए, जिन्हें आज चाहते हुए भी कोई नहीं उखाड़ पा रहा है। जबकि आज राजनेताओं के साथ देश का हर बुद्धिजीवी नागरिक यह चाहता है कि आरक्षण की अब समीक्षा का समय आ गया है और इस आरक्षण का मौजूदा आधार जाति, धर्म या दलित खत्म कर इसे आर्थिक स्थिति के साथ जोड़ा जाना चाहिए, आर्थिक आधार पर यदि आरक्षण हो तो ही वास्तविक रूप से आरक्षण का सही मकसद पूरा होता है।
यद्यपि आज देश के हर वर्ग के नागरिक की आरक्षण को लेकर यही भावना है। अब यह बात अलग है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख जैसे कुछ लोग इस मामले में मुखरित हो जाते है और शेष सत्तारूढ़ सदस्य राजनीतिक स्वार्थ की पट्टी आँखों और होठों पर बांधकर मौन धारण कर लेते है।
बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव के कुछ समय पहले संघ प्रमुख मोहनराव भागवत ने आरक्षण को लेकर कुछ विचार व्यक्त कर दिए थे और उसके बाद जब वहां भारतीय जनता पार्टी हार गई तो हार का ठीकरा भागवत जी के सिर पर फोड़ दिया गया था और कहा गया था कि भागवत जी के बयान के कारण आरक्षण प्राप्त दलित व अन्य पिछड़े वर्गो के वोट भाजपा को नही मिल पाए और इसी कारण भाजपा को पराजय का मुँह देखना पड़ा, अब भाजपा का अपने संरक्षक पर लगाया गया यह आरोप कहां तक सही या गलत है यह तो संघ या भाजपा जाने किंतु यह सही है कि संघ प्रमुख पर भाजपा ने अपनी हार का ठीकरा फोड़ा अवश्य था।
……और अब जबकि देश में तीन प्रमुख राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव निकट भविष्य में ही होने वाले है, ऐसे समय में संघ प्रमुख ने फिर आरक्षण को लेकर एक विवादित बयान दे दिया, उनका कहना था कि आरक्षण के पक्षधर और आरक्षण विरोधियों को एक मंच पर बैठकर आरक्षण के गुण-दोषों पर गंभीर चिंतन करना चाहिए और जो इस चिंतन से निष्कर्ष निकले उसके आधार पर आरक्षण की नई नीति तय की जानी चाहिए। भागवत जी की यह कथा भाजपा को फिर रास नहीं आई, और उन्होंने अन्तत: भागवत जी को फिर सफाई देने को मजबूर कर दिया। यद्यपि भागवत जी के बयान में कही थी आरक्षण खत्म करने की ध्वनि नहीं थी, वे सिर्फ भारत के आम नागरिक की तरह ही यह चाहते थे कि आरक्षण की सुविधा उसके सही हकदार को मिले, और उसके लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू किया जाना चाहिए, किंतु यह आरक्षण भारतीय राजनीति में अपनी इतनी गहरी पैठ जमा चुका है कि आज हर राजनीतिक दल व उसका नेता आरक्षण का नाम सुनते ही चौंक जाता है और फिर उसे अपनी पार्टी का भविष्य दिखाई देने लगता है, जबकि वह स्वयं भी दिल से वही चाहता है।
यद्यपि भाजपा के भी चुनावी घोषणा पत्र में प्रच्छन्न रूप से आरक्षण की सुविधा आर्थिक आधार पर लागू करने का मुद्दा राम मंदिर व धारा-370 खत्म करने के साथ शामिल है, किंतु फिलहाल भारत सरकार के सर्वेसर्वा नरेन्द्र भाई मोदी व अमित शाह भी इस मुद्दें को छूने से डर रहे है। इसका कारण यह है कि यह मुद्दा आज सत्ता प्राप्ति या सत्ता को बरकरार रखने का एक प्रमुख माध्यम बनकर रह गया है। इसीलिए भागवत जी को अपनी सफाई में यह कहना पड़ा कि ”आरक्षण था, आरक्षण है और आरक्षण रहेगा“। अब यह बात अलग है कि आरक्षण को धारा-370 के समकक्ष लाकर नियंताओं द्वारा अपनी हिम्मत कब दिखाई जाती है?

ऑटो सेक्टर में संकट गहराया
सिद्धार्थ शंकर
अर्थव्यवस्था में मंदी और शेयर बाजार में गिरावट को देखते हुए सरकार ने शुक्रवार को कई ऐलान किए। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि विदेशी और घरेलू निवेशकों पर सरचार्ज बढ़ोतरी का फैसला वापस ले लिया गया है। सरकार कह रही है कि राहत के अभी और उपाय किए जाएंगे। मगर सरकार ने ऑटो सेक्टर के लिए कोई विशेष उपाय नहीं किए हैं। सिर्फ इतना भर कहा गया है कि 31 मार्च 2020 तक खरीदे गए बीएस-4 वाहन रजिस्ट्रेशन की पूरी अवधि के लिए वैध रहेंगे। मगर सवाल यह है कि इतना भर करने से हालात सुधर जाएंगे। सच्चाई यह है कि यात्री वाहनों की बिक्री जुलाई में 19 फीसदी घट गई। यह 19 साल में सबसे बड़ी गिरावट है। कारों की मांग गिरने की वजह से कार कंपनियों ने उत्पादन कम कर दिया है। कुछ कंपनियों ने कई प्लांट्स बंद कर दिए हैं, कुछ ने काम के घंटे घटा दिए हैं। दरअसल, इस संकट के लिए केवल मंदी जिम्मेदार नहीं है। एक साथ कई नीतियों में फेरबदल करने से ग्राहक दुविधा में पड़ गए हैं कि वो कार खरीदें या अभी इंतजार करें। कार कंपनियों पर ये छोटा-मोटा संकट नहीं है। ये संकट इतना बड़ा है जो ग्रोथ की रफ्तार पर ब्रेक लगा सकता है।
इस वक्त मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कार इंडस्ट्री में नई जान फूंकने की है। मगर पहली कोशिश में सरकार फेल हो गई है। अब दूसरी कोशिश की बात की जा रही है। देखना है कि अगली बार सरकार ऑटो सेक्टर को क्या राहत देती है। देश की सबसे बड़ी कंपनी मारुति सुजुकी हो या कोई और कंपनी, हर किसी की हालत पस्त है। ग्राहकों में दुविधा है कि कार खरीदने के लिए इंतजार करें या फिर ये सही मौका है। मंदी के माहौल में नौकरी का ठिकाना नहीं तो नई ईएमआई का बोझ लेने से भी लोग कतरा रहे हैं। अब राहत पैकेज के बगैर इस सेक्टर में जान फूंकना मुमकिन नहीं है।
मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स, हुंडई, होंडा, महिन्द्रा एंड महिन्द्रा, हीरो मोटोकॉर्प ये देश की वो दिग्गज कार और दोपहिया वाहन बनाने वाली कंपनियां है जो सालाना कई सौ करोड़ों रुपये का मुनाफा कमाती है, लेकिन इन दिनों इन सबपर मंदी हावी है। एक-एक कार बेचने के लिए इन कंपनियों को नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं। इनके प्लांट्स में लाखों गाडिय़ां ग्राहक के इंतजार में खड़ी है लेकिन ग्राहक नदारद है।
कार कंपनियों के बिक्री के आंकड़े पर नजर डाले तो जनवरी से जुलाई के बीच मारुति सुजुकी की बिक्री में 31 फीसदी की गिरावट आई है। हुंडई मोटर्स की बिक्री 15 फीसदी गिरी। महिंद्रा एंड महिंद्रा की बिक्री 29 फीसदी। टाटा मोटर्स की बिक्री 40 फीसदी, जबकि होंडा की बिक्री में 44 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। इन आंकड़ों से साबित होता है कि सभी कार कंपनियों की इन दिनों हवा निकली हुई है। ऑटो सेक्टर में गिरावट देश की अर्थव्यवस्था का खेल खराब करने के लिए काफी है, क्योंकि ऑटो इंडस्ट्री का देश की जीडीपी में 7 फीसदी का योगदान है। इंडस्ट्रियल जीडीपी में ऑटो कंपनियों का 26 फीसदी का योगदान है।
मैन्यूफैक्चरिंग जीडीपी में ऑटो कंपनियों की 49 परसेंट की हिस्सेदारी है। यानी ऑटो सेक्टर का पटरी से उतरना देश की ग्रोथ के लिए खतरनाक है। कारों की बिक्री कम होने से ऑटो पार्ट्स बनाने वाली कंपनियों की भी हालत पतली है। इन कंपनियों ने उत्पादन 30 फीसदी तक कम कर दिया है, जिसकी वजह से हजारों लोगों की नौकरी चली गई है।
अगर आगे भी ऑटो सेक्टर का ये ही हाल रहा तो स्थिति और भी भयावह हो सकती है। चेन्नई को भारत का डेट्रोयट कहा जाता है, यहां कार बनाने वाली कंपनियों के बड़े-बड़े प्लांट्स है। देश में बिकने वाली 30 फीसदी गाडिय़ां इसी शहर में तैयार होती हैं। आरजी ब्रोन्जे जो पिछले 40 साल से कारों के लिए कलपुर्जे तैयार कर रही है, उसने उत्पादन में 40 से 45 फीसदी की कमी की है। दिसंबर से पहले तक यहां 14 घंटे काम होता था अब सिर्फ 10 घंटे काम होता है।
काम में कटौती के चलते सैकड़ों कॉन्ट्रैक्ट मजदूरों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। गुजरात के राजकोट में भी ऑटो पार्ट्स बनाने वाली कंपनियों का बुरा हाल है। कार कंपनियों को जो पहले मोटे ऑर्डर मिलते थे उनमें कमी आई है, राजकोट की ऑटो इंडस्ट्री में काम करने वाले बिहार के करीब 10 हजार लोगों को वापस लौटना पड़ा है।
पूरे प्रदेश में 200 गाडिय़ों के शोरूम बंद हो गए हैं। कारों के बॉडी पार्ट्स बनाने वाली सैकड़ों यूनिट्स बंद हो गई हैं। कार के पार्ट्स बनाने वाली कंपनियों के नुमाइंदों की माने तो ऊंची टैक्स दर और सरकार की गलत नीतियों की वजह से ऑटो उद्योग की दुर्गती हुई है। जहां पहले ही ऑटो उद्योग का बैंड बजा पड़ा है। ऐसे में कारों की कीमत और रजिस्ट्रेशन फीस में इजाफा आग में घी का काम करेगा, यानी ऑटो उद्योग को मंदी के दौर से बाहर निकालना आसान नहीं है। आने वाले कुछ महीनों में भी ऑटो इंडस्ट्री के लिए दूर-दूर तक राहत की किरण नजर नहीं आ रही है। सरकार ने भले ही अप्रैल 2020 से देश में सिर्फ बीएस-6 इंजन वाली गाडिय़ों को बेचने का फैसला वापस ले लिया है, मगर यह उपाय अब भी असरकारी नहीं है। सरकार को पस्त ऑटो सेक्टर को ऐसी डोज देनी होगी, जो बूम लेकर आए।

एक ही छत के नीचे हो . अब सब धर्मों की प्रार्थना’
डा. जगदीश गांधी
अब समय आ गया है जबकि सभी धर्मों के लोगों को एक ही स्थान पर एकत्रित होकर एक ही परमपिता परमात्मा की प्रार्थना करनी चाहिए। अर्थात एक ही छत के नीचे हो-अब सब धर्मों की प्रार्थना’ हो। अज्ञानता के कारण आज एक ही परमपिता परमात्मा की ओर से युग-युग में आये अवतारों को अलग-अलग मानने के कारण ही धर्म के नाम पर चारों ओर जमकर दूरियां बढ़ रही है, जबकि सभी अवतार एक ही परमपिता परमात्मा की ओर से युग-युग में आये हैं। इस प्रकार हम सब एक ही परमात्मा की संतानें हैं। लैटिन भाषा में रिलीजन के मायने जोड़ना होता है। अर्थात जो जोड़े वह धर्म है तथा जो तोड़े वह अधर्म है।
रामायण में तुलसीदास जी ने ठीक ही लिखा है कि ‘जब जब होई धर्म की हानि – बाढ़हि असुर, अधम अभिमानी। तब तब प्रभु धरि विविध शरीरा – हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।। अर्थात जब-जब धर्म की हानि होती है और संसार में असुर, अधर्म एवं अन्यायी प्रवृत्तियों के लोगों की संख्या सज्जनों की तुलना में बढ़ जाने के कारण धरती का संतुलन बिगड़ जाता है, तब-तब परम पिता परमात्मा कृपा करके धरती पर अपने प्रतिनिधियों (अवतारों) कृष्ण, बुद्ध, अब्राहीम, मुसा, महावीर, जरस्थु, ईसा, मोहम्मद, नानक, बहाउल्लाह आदि को मानवता का मार्गदर्शन कर समाज को सुव्यवस्थित करने के लिए युग-युग में विविध रूपों में भेजते रहे हैं।
युग-युग में आये इन सभी अवतारों को दिव्य ज्ञान एक ही परमपिता परमात्मा से प्राप्त हुआ है। उदाहरण के लिए परमपिता परमात्मा ने 5000 वर्ष पूर्व कृष्ण की आत्मा में गीता के माध्यम से ‘न्याय’ का दिव्य ज्ञान भेजा। पुनः 2500 वर्ष पूर्व उसी परमपिता परमात्मा ने भगवान बुद्ध की आत्मा में त्रिपटक के माध्यम से ‘सम्यक ज्ञान’ व समता का दिव्य ज्ञान भेजा। 2000 वर्ष पूर्व उसी परमपिता परमात्मा ने कठोर मानव जीवन को करुणामय जीवन बनाने के लिए प्रभु ईसा मसीह की आत्मा में बाइबिल का ज्ञान भेजा। 1400 वर्ष पूर्व उसी परमपिता परमात्मा ने हज़रत मोहम्मद की आत्मा में कुरान के माध्यम से ‘भाईचारे’ का दिव्य ज्ञान भेजा। 400 वर्ष पूर्व उसी परमपिता परमात्मा ने स्वार्थपूर्ण मानव जीवन को त्याग (सच्चा सौदा) का पाठ पढ़ाने के लिए गुरु नानक देव जी की आत्मा में गुरूग्रंथ साहिब के माध्यम से ‘त्याग’ का दिव्य ज्ञान भेजा तथा लगभग 200 वर्ष पूर्व उसी परमात्मा ने मानव जीवन में बढ़ती हुई दूरियों को समाप्त कर एकता का पाठ मानव जाति को पढ़ाने के लिए बहाउल्लाह की आत्मा में किताबे अकदस का ज्ञान भेजा।
परमात्मा की आत्मा के पुत्र होने के कारण हम सब एक ही परमपिता परमात्मा की संतान हैं। उस परमपिता परमात्मा की प्रार्थना हम मंदिर में करें, मस्जिद में करें, गिरजाघर में करें या गुरूद्वारे में करें, और चाहे किसी भी भाषा में करें, हमारी प्रार्थनाओं को सुनने वाला ईश्वर एक ही है। अलग-अलग स्थानों, भाषाओं, वेश-भूषाओं में परमपिता परमात्मा को याद करने से धरती पर यह अज्ञान फैल गया है कि धर्म एक नहीं अनेक हैं। परमपिता परमात्मा की प्रार्थना करने के लिए किसी विशेष प्रकार की वेश-भूषा, भाषा, जाति-धर्म, स्थान आदि से कोई लेना-देना नहीं है।
गीता में जब भगवान श्रीकृष्ण से उनके शिष्य अर्जुन ने पूछा कि भगवान! आपका धर्म क्या है? भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शिष्य अर्जुन को बताया कि मैं सारी सृष्टि का सृजनहार हूँ। इसलिए मैं सारी सृष्टि के सभी प्राणी मात्र से बिना किसी भेदभाव के प्रेम करता हूँ। इस प्रकार मेरा धर्म अर्थात कर्तव्य सारी सृष्टि के प्राणी मात्र से प्रेम करना है। इसके बाद अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि भगवन् मेरा धर्म क्या है? भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि तुम मेरी आत्मा के पुत्र हो। इसलिए मेरा जो धर्म अर्थात कर्तव्य है वही तुम्हारा भी धर्म अर्थात कर्तव्य है। अतः सारी मानव जाति की भलाई करना ही तुम्हारा भी धर्म अर्थात् कर्तव्य है। भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि इस प्रकार तेरा और मेरा दोनों का धर्म एक ही है।
इस प्रकार परमपिता परमात्मा की ओर से युग-युग में आये किसी भी महान अवतार ने कोई अलग धर्म नहीं दिया है। जिस प्रकार से परमपिता परमात्मा शाश्वत और अपरिवर्तनीय है उसी प्रकार से उसका धर्म भी शाश्वत और अपरिवर्तनीय है। परमपिता परमात्मा का जो धर्म है वही धर्म उसकी सभी संतानों का भी धर्म है। मनुष्य का सदैव से एक ही धर्म (कर्तव्य) रहा है – प्रभु इच्छाओं को जानना तथा उन पर चलना। पवित्र पुस्तकों गीता, त्रिपटक, बाईबिल, कुरान, गुरू ग्रन्थ साहिब, किताबे अकदस आदि में एक ही परमपिता परमात्मा के द्वारा भेजी गई न्याय, समता, करूणा, भाईचारा, त्याग एवं हृदयों की एकता की शिक्षाओं को जानना तथा उसके अनुसार संसार में रहकर पवित्र भावना से प्रभु की इच्छाओं और आज्ञाओं के अनुसार कार्य करना ही हर प्राणी का धर्म है। इस प्रकार प्रभु की इच्छाओं को जानकर तथा उनके अनुसार कार्य करने के अलावा किसी भी प्राणी का और कोई भी दूसरा धर्म नहीं है।
आज धर्म के नाम पर बढ़ती हुई दूरियाँ सिर्फ अज्ञानता के कारण है। जबकि सभी धर्मों का उद्देश्य सम्पूर्ण मानव जाति के हृदय में प्रेम व एकता की भावना को बढ़ाकर सारी पृथ्वी पर आध्यात्मिक सभ्यता की स्थापना करना है। सभी धर्मो का स्रोत एक ही परमपिता परमात्मा है और हम सब एक ही परमपिता परमात्मा की संतान हैं। धर्म के नाम पर होने वाली दूरियों का कारण धर्म के प्रति लोगों का अज्ञान है। जब हम सभी एक ही परमात्मा की संतानें हैं तो हमारे धर्म अलग-अलग कैसे हो सकते हैं? इसलिए स्कूलों में बच्चों एवं टीचर्स के द्वारा की जाने वाली सामूहिक प्रार्थना की तरह ही समाज में भी सभी धर्मों, जातियों एवं सम्प्रदायों के लोगों को एक ही जगह पर इकट्ठे होकर सामूहिक रूप से एक ही परमपिता परमात्मा की प्रार्थना करनी चाहिए और यही प्रभु-प्रार्थना करने का सबसे सही तरीका भी है। अर्थात एक ही छत के नीचे हो-अब सब धर्मों की प्रार्थना’ हो।

करुणा की प्रतिमूर्ति:संत मदर टेरेसा
(प्रो.शरद नारायण खरे)
“लेकर जो आगे बढ़ा,पर सेवा का भाव ।
सचमुच उसकी ज़िन्दगी,पाती प्रभुता,ताव ।।”
जन्म दिवस (26अगस्त ) पर विशेष मदर टेरेसा का वास्तविक नाम ‘अगनेस गोंझा बोयाजिजू’ था। गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है। जब वह मात्र आठ साल की थीं तभी इनके पिता का निधन हो गया, जिसके बाद इनके लालन-पालन की सारी जिम्मेदारी इनकी माता द्राना बोयाजू के ऊपर आ गयी। यह पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं। इनके जन्म के समय इनकी बड़ी बहन की उम्र 7 साल और भाई की उम्र 2 साल थी, बाकी दो बच्चे बचपन में ही गुजर गए थे। वह एक सुन्दर, अध्ययनशील एवं परिश्रमी लड़की थीं। पढ़ाई के साथ-साथ, गाना उन्हें बेहद पसंद था। व और उनकी बहन पास के गिरजाघर में मुख्य गायिकाएँ थीं। ऐसा माना जाता है कि जब वे मात्र बारह साल की थीं तभी उन्हें ये अनुभव हो गया था कि वो अपना सारा जीवन मानव सेवा में लगायेंगी और 18 साल की उम्र में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो’ में शामिल होने का फैसला ले लिया। तत्पश्चात वेआयरलैंड गयीं ,जहाँ उन्होंने अंग्रेजी भाषा सीखी। अंग्रेजी सीखना इसलिए जरुरी था क्योंकि ‘लोरेटो’ की सिस्टर्स इसी माध्यम में बच्चों को भारत में पढ़ाती थीं।
मानव सेवा के पथ पर-
१९८१ ई में उन्होंने अपना नाम बदलकर टेरेसा रख लिया और आजीवन सेवा का संकल्प ले लिया। उन्होंने स्वयं लिखा है – वह १० सितम्बर १९४० का दिन था जब मैं अपने वार्षिक अवकाश पर दार्जिलिंग जा रही थी। उसी समय मेरी अन्तरात्मा से आवाज़ उठी,कि मुझे सब कुछ त्याग देना चाहिए और अपना जीवन ईश्वर एवं दरिद्र नारायण की सेवा कर के दुखी तन को समर्पित कर देना चाहिए।”
मदर टेरेसा दलितों एवं पीडितों की सेवा में किसी प्रकार की पक्षपाती नहीं थीं। उन्होंने सद्भाव बढ़ाने के लिए संसार का दौरा किया था। उनकी मान्यता थी कि ‘प्यार की भूख रोटी की भूख से कहीं बड़ी है।’ उनके मिशन से प्रेरणा लेकर संसार के विभिन्न भागों से स्वयं-सेवक भारत आये,और तन, मन, धन से गरीबों की सेवा में लग गये। मदर टेरेसा क कहना था कि सेवा का कार्य एक कठिन कार्य है और इसके लिए पूर्ण समर्थन की आवश्यकता होती है। वही लोग इस कार्य को संपन्न कर सकते हैं,जो प्यार एवं सांत्वना की वर्षा करें – भूखों को खिलायें, बेघर वालों को शरण दें, दम तोडने वाले बेबसों को प्यार से सहलायें,और अपाहिजों को हर समय ह्रदय से लगाने के लिए तैयार रहें।
मदर टेरेसा को उनकी सेवाओं के लिये विविध पुरस्कारों एवं सम्मानों से विभूषित किय गया है। १९३१ में उन्हें शांति पुरस्कार और धर्म की प्रगति के टेम्पेलटन फाउण्डेशन पुरस्कार प्रदान किए गए। विश्व भारती विध्यालय ने उन्हें “देशिकोत्तम” पदवी दी जो कि उसकी ओर से दी जाने वाली सर्वोच्च पदवी है। अमेरिका के कैथोलिक विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टोरेट की उपाधि से विभूषित किया। भारत सरकार द्वारा १९६२ में उन्हें ‘पद्म श्री’ की उपाधि मिली। १९८८ में ब्रिटेन द्वारा ‘आईर ओफ द ब्रिटिश इम्पायर’ की उपाधि प्रदान की गयी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने उन्हें डी-लिट की उपाधि से विभूषित किया। १९ दिसम्बर १९७९ को मदर टेरेसा को मानव-कल्याण कार्यों के हेतु नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। वह तीसरी भारतीय नागरिक हैं,जो संसार में इस पुरस्कार से सम्मानित की गयी थीं। मदर टेरेसा के लिए नोबल पुरस्कार की घोषणा ने जहां विश्व की पीड़ित जनता में प्रसन्नता का संचार हुआ है, वही प्रत्येक भारतीय नागरिकों ने अपने को गौर्वान्वित अनुभव किया। स्थान स्थान पर उन्का भव्य स्वागत किया गया। नार्वेनियन नोबल पुरस्कार के अध्यक्ष प्रोफेसर जान सेनेस ने कलकत्ता में मदर टेरेसा को सम्मनित करते हुए सेवा के क्षेत्र में मदर टेरेसा से प्रेरणा लेने का आग्रह सभी नागरिकों से किया था। देश की प्रधान्मंत्री तथा अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने मदर टेरेसा का भव्य स्वागत किया। अपने स्वागत में दिये भाषणों में मदर टेरेसा ने स्पष्ट कहा था कि “शब्दों से मानव-जाति की सेवा नहीं होती, उसके लिए पूरी लगन से कार्य में जुट जाने की आवश्यकता है।”
09 सितम्बर 2016 को वेटिकन सिटी में पोप फ्रांसिस ने मदर टेरेसा को संत की उपाधि से विभूषित किया।
कई व्यक्तियों ,सरकारोंऔर संस्थाओं के द्वारा उनकी प्रशंसा की जाती रही है, यद्यपि उन्होंने आलोचना का भी सामना किया है।पर वे मानव सेवा के पथ से कदापि भी विचलित नहीं हुईं ।
अपना सर्वस्व दीन दुखियों व पीड़ितों के लिए समर्पित कर देने वाली संत मदर टेरेसा के लिए बार बार सम्मानपूर्वक नमन् निवेदित करते हुए यही कहूंगा कि,–
“जो बनकर सचमुच रहा,जीवन भर इक संत ।
ऐसी मानव का कभी,हो सकता ना संत ।।”

रैगिंग पर रोक आखिर कब

सिद्धार्थ शंकर
आधुनिकता के साथ रैगिंग के तरीके भी बदलते जा रहे हैं। रैगिंग आमतौर पर सीनियर विद्यार्थी द्वारा कॉलेज में आए नए विद्यार्थी से परिचय लेने की प्रक्रिया। लेकिन अगर किसी छात्र को रैगिंग के नाम पर अपनी जान गंवाना पड़े तो उसे क्या कहेंगे। रैगिंग के नाम पर समय-समय पर अमानवीयता का चेहरा भी सामने आया है। गलत व्यवहार, अपमानजनक छेड़छाड़, मारपीट ऐसे कितने वीभत्स रूप रैगिंग में सामने आए हैं। सीनियर छात्रों के लिए रैगिंग भले ही मौज-मस्ती हो सकती है, लेकिन रैगिंग से गुजरे छात्र के जहन से रैगिंग की भयावहता मिटती नहीं है। इसी भयावहता का उदाहरण ओडिशा में सामने आया है। देश के अलग-अलग राज्यों ने रैगिंग पर बैन लगा रखा है और सुप्रीम कोर्ट ने इसे मानवाधिकारों का हनन तक करार दिया है, लेकिन ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। जहां संबलपुर की एक टेक्निकल यूनिवर्सिटी में सीनियर्स के जूनियर्स की रैगिंग करने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आई हैं।
प्रारंभिक जांच में पता चला है कि यह तस्वीरें राज्य सरकार की वीर सुरेंद्र साई यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नॉलजी की हैं। इनमें दिख रहा है कि फस्र्ट और सेकंड क्लास के छात्र स्टेज सिर्फ अंडरगार्मेंट पहने पर नाच रहे हैं और बड़ी संख्या में छात्र नीचे खड़े उन्हें देख रहे हैं। बताया गया है कि यूनिवर्सिटी में रैगिंग का यह पहला मामला नहीं है। पिछले साल भी ऐसी ही घटना सामने आई थी। राज्य के कौशल विकास और तकनीकी शिक्षा मंत्री प्रेमानंद नायक ने घटना का संज्ञान लेते हुए मामले की जांच के आदेश दिए हैं। इसका बाद यूनिवर्सिटी ने गुरुवार को 10 छात्रों को एग्जाम में बैठने से रोक दिया है। इसके अलावा करीब 52 छात्रों पर जूनियर्स की रैगिंग के लिए 2000 रुपए जुर्माना लगाया गया है। गौरतलब है कि संबलपुर की इस घटना से पहले उत्तर प्रदेश के सैफई में मेडिकल कॉलेज से 150 छात्रों का सिर मुंडाकर कैंपस में परेड का वीडियो सामने आया था। हालांकि, यूनिवर्सिटी के कुलपति ने घटना का खंडन किया था। शिक्षण संस्थानों में रैगिंग पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए लागू किए गए नियम-कायदों के बावजूद आज भी आए दिन इस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं। हालांकि इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट तक ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है और यह निर्देश है कि किसी भी रूप में रैगिंग होने पर आरोपी से लेकर संस्थान तक के खिलाफ कार्रवाई होगी। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि कुछ संस्थानों में वरिष्ठ माने वाले छात्रों के भीतर कौन-सी सामंती ग्रंथि बैठी होती है कि वे सारे नियम-कायदों को धता बता कर वहां आए नए विद्यार्थियों को परेशान करने से नहीं चूकते।
गत वर्ष पहले इलाहाबाद के मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से सामने आया है, जहां एमबीबीएस पाठ्यक्रम के पहले वर्ष में दाखिला लेने वाले सौ से ज्यादा छात्रों के साथ रैगिंग के नाम पर अमानवीय सलूक किया गया था। वहां जूनियर डॉक्टरों को मजबूर किया गया था कि वे घुटनों के बल चल कर सभी वरिष्ठों सहित कर्मचारियों को सलाम करें। छात्राओं को भी परेशान किया गया। जिन्होंने इस रैगिंग का विरोध किया, उनकी पिटाई की गई और शिकायत करने पर उनका भविष्य चौपट कर देने की धमकी दी गई। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से सभी शिक्षण संस्थानों के लिए यह सख्त निर्देश है कि अगर वहां रैगिंग की घटना हुई तो इसके लिए उन्हें भी जवाबदेह माना जाएगा। हर उच्च शिक्षा संस्थान में रैगिंग के खिलाफ एक समिति बनाने से लेकर संबंधित नियमों का पालन नहीं करने पर संस्थान की मान्यता रद्द कर देने तक की बात है। इसके बावजूद अगर कुछ शिक्षा संस्थानों में नए विद्यार्थियों को रैगिंग की मार झेलनी पड़ रही है तो यह न केवल संस्थानों की लापरवाही और नियम-कायदों को ताक पर रखने का मामला है, बल्कि यह वरिष्ठ कहे जाने वाले विद्यार्थियों के सामाजिक बर्ताव पर भी सवालिया निशान है।
पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा संस्थानों में रैगिंग की वजह से पीडि़त विद्यार्थियों की तकलीफदेह दास्तान से लेकर आत्महत्या तक कर लेने की घटनाएं सामने आने के बाद जागरूकता बढ़ी है। सामाजिक स्तर पर इसका विरोध भी हुआ है। मगर हैरानी की बात है कि जिस दौर में शिक्षण संस्थानों में मानवीय और संवेदनशील व्यवहार की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस की जा रही है, उस वक्त में भी रैगिंग के नाम पर नवागंतुकों को अपने साथ इस तरह के बर्ताव का सामना करना पड़ रहा है। कोई विद्यार्थी जब पहली बार किसी संस्थान में दाखिला लेता है तो वहां उसके साथ हुए शुरुआती व्यवहार का गहरा असर उसके मन-मस्तिष्क पर पड़ता है। यहां तक कि कई बार इससे जीवन और समाज के प्रति उनकी दृष्टि सकारात्मक या फिर नकारात्मक हो जाती है। इसलिए किसी भी शिक्षण संस्थान में यह सुनिश्चित किए जाने की जरूरत है कि वहां पहली बार आए विद्यार्थियों को ऐसा व्यवहार मिले, जिससे न केवल अपने व्यक्तित्व में सकारात्मक निखार आए, बल्कि इसका लाभ देश और समाज को भी मिले।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय में अपने अधीन आने वाले शिक्षा संस्थानों में रैगिंग के विरुद्ध कड़े निर्देश जारी किए। कई राज्यों ने भी इस पर रोक लगाने के लिए कानून बनाए। 1997 में तमिलनाडु में विधानसभा में एंटी रैगिंग कानून पास किया गया। मगर नतीजा अब तक ढांक के तीन पात है। रैगिंग एक मानसिक विकृति है। यह सिर्फ कानून से नियंत्रित नहीं हो सकेगी। रैगिंग से पीडि़त छात्रों को इसकी जानकारी अभिभावक, विश्वविद्यालय, प्रशासन और संबंधितों को देने की हिम्मत दिखानी चाहिए। आत्महत्या का विकल्प न चुनें यह सच है फिर भी हर एक की मानसिक क्षमता और सहनशीलता अंतत: अलग-अलग होती है। मगर अब जानलेवा हो चुकी इस बीमारी का इलाज ढूंढना होगा। समाज अपने स्तर पर ढूंढे और सरकार अपने स्तर पर। मगर इलाज में अब देरी संभव नहीं है।

ट्रंप का गोरखधंधा
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का गोरखधंधा भी बड़ा मजेदार है। भारत सरकार द्वारा उनकी मध्यस्थता से इंकार के बावजूद वे मध्यस्थता किए जा रहे हैं। कभी वे नरेंद्र मोदी से बात करते हैं तो कभी इमरान खान से ! मध्यस्थता और क्या होती है ? उनकी मध्यस्थता कश्मीर से बिल्कुल भी संबंधित नहीं है। वे कश्मीर के बारे में तो किसी से कोई बात कर ही नहीं रहे हैं। न तो वे भारत से पूछ रहे हैं कि आपने धारा 370 और 35 ए क्यों खत्म की है और न ही वे पाकिस्तान से कब्जाए हुए कश्मीर को लौटाने की बात कर रहे हैं। उनकी तो बस एक ही टेक है। भई ! मोदी और इमरान, तुम हालात बिगड़ने मत देना ! लड़ मत पड़ना ! इमरान, तुम इतनी लफ्फाजी मत कर देना कि भारत अपना संयम खो दे। इमरान का ट्विटर हेंडल करनेवाले किसी बाबू ने मोदी को फासिस्ट, तानाशाह और न जाने क्या-क्या कह डाला। किसी पाकिस्तानी मंत्री ने अपने परमाणु बम का हवाला भी दे दिया। इधर भारतीय रक्षा मंत्री ने परमाणु-संयम पर शाब्दिक-बल्लेबाजी कर दी। ट्रंप का यह भय निराधार नहीं है कि कश्मीर के खुलने पर हालात इतने न बदल जाएं कि दोनों देशों के बीच लड़ाई छिड़ जाए। इमरान ने दूसरे बालाकोट की बात कई बार कह दी है। दोनों के बीच पारंपरिक युद्ध छिड़ जाए तो अमेरिका को कौनसा नुकसान है ? उसे तो फायदा ही फायदा है। दोनों मुल्क उससे हथियार खरीदेंगे और उसके कृपाकांक्षी बने रहेंगे। लेकिन ट्रंप की चिंता कुछ और ही है। वह है, अफगानिस्तान। ट्रंप चाहते हैं कि राष्ट्रपति के अगले चुनाव में वे खम ठोक सकें कि देखों, मैं हूं कि जिसने अफगानिस्तान से अपनी फौजों की वापसी कर ली और हर माह करोड़ों डाॅलर वहां बर्बाद होने से बचा लिए। ट्रंप को पता है कि भारत-पाक युद्ध चाहे न छिड़े, सिर्फ तनाव ही बढ़ जाए, तो भी पाकिस्तान की जो फौजें अफगान-सीमांत पर लगी हैं, उन्हें वह भारतीय सीमांत पर डटाना चाहेगा। ऐसे में ट्रंप अपने मन की मुराद पूरी करने में काफी परेशान हो सकते हैं। इसीलिए वे अपनी खाल मोटी करके भी मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। उधर इमरान खान को पता है कि वे कहीं भी जाएं, सुरक्षा परिषद या अंतरराष्ट्रीय न्यायालय या अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन, कहीं भी उनकी दाल गलनेवाली नहीं है लेकिन पाकिस्तान की जनता के सामने उनकी हंडिया उबलती हुई दिखाई पड़ती रहनी चाहिए। अपनी फौज को काबू में रखने के लिए उन्होंने अपने जनरल बाजवा को तीन साल तक और बने रहने का रसगुल्ला दे दिया है। इस भारत-पाक तनाव के कारण ट्रंप को अपनी छवि सुधारने का मौका भी मिल रहा है। कई राष्ट्रनेताओं के बारे में उटपटांग जुमले उछालनेवाले ट्रंप के मुंह से संयम और शांति की बातें काफी मजेदार लग रही हैं।

दूषित जल से बढ़ेंगी मुश्किलें
सतीश सिंह
नीति आयोग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में 70 प्रतिशत जल की आपूर्ति दूषित हो रही है। सेफ वाटर नेटवर्क की रिपोर्ट के मुताबिक भी जल गुणवत्ता सूचकांक के 122 देशों में भारत का स्थान 120वां है। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2050 तक बढ़ती आबादी व जल के बढ़ते कारोबारी इस्तेमाल की वजह से प्रति व्यक्ति जल की खपत में 40 से 50 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। वाटर एड की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 16.3 करोड़ लोग स्वच्छ जल पीने से महरूम हैं। शहरी इलाकों में अधिकांशत: झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वाले लोग पीने योग्य जल से महरूम हैं। शहर के ऐसे इलाकों में पाइपलाइन बिछाना भी मुश्किल है। लिहाजा, झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वाले लोगों के लिए जल के छोटे-छोटे उपक्रमों को स्थापित करने की बड़ी जरूरत है। सेफ वाटर नेटवर्क की रिपोर्ट के अनुसार शहरों के झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वाली 37 करोड़ की आबादी को साफ जल मुहैया कराने के लिए सरकार को 2.2 लाख जल के छोटे-छोटे उपक्रम स्थापित करने होंगे, जिनकी लागत 44 हजार करोड़ रुपए के आसपास होगी।
यहां सवाल का उठना लाजिमी है कि क्या सरकार सभी नागरिकों को साफ जल उपलब्ध कराने के लिए तैयार है? सवाल सरकार द्वारा सभी घरों तक पीने योग्य जल पहुंचाने के लिए आधारभूत संरचना विकसित करने की भी है। सभी के घरों तक जल पहुंचाने के लिए पाइप लाइन की जरूरत है। देश की 82 करोड़ आबादी आज भी पाइपलाइन से जल नहीं पी रही है। समस्या गांवों में जल को पीने योग्य बनाने की भी है। वहां जल को साफ करने की कोई बुनियादी सुविधा उपलब्ध नहीं है। ग्रामीण आबादी अभी भी नदी, कुएं, तालाब से सीधे जल पी रही है, जिससे उनके स्वास्थ्य को भारी खतरा है। वर्ष 2014 में दूषित जल को साफ करने वाले 12 हजार सयंत्र उपलब्ध थे, जो 2018 के अंत तक बढ़कर 50 हजार हो गए हैं। सेफ वाटर नेटवर्क के मुताबिक अगर जल को साफ करने की पहल के लिए सरकारी नीति बनाई जाती है तो वर्तमान स्थिति मे जरूर बेहतरी आ सकती है। हालांकि, सरकार ने वर्ष 2030 तक सभी घरों में पाइपलाइन के जरिए पीने योग्य जल पहुंचाने का लक्ष्य रखा है, जिस पर पांच लाख करोड़ रुपए की आधारभूत संरचना विकसित करनी होगी।
भारत की ग्रामीण इलाकों में लगभग 63 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो आज भी दूषित जल पीने के लिए मजबूर हैं, जबकि 2017 में विश्व जल दिवस के दिन संयुक्त राष्ट्र संघ ने साफ जल पीना इंसान का बुनियादी हक बताया था। वर्ष 2008 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 88 प्रतिशत आबादी के पास जल उपलब्ध था, लेकिन शहरी क्षेत्र में पीने योग्य पानी तक पहुंच केवल 31 प्रतिशत आबादी की थी, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह प्रतिशत महज 21 थी। हमारे देश पर पकृति शुरू से मेहरबान रही है। प्रकृति ने हमें घने जंगल, बड़ी-बड़ी नदियां, तालाब और झील जैसी प्राकृतिक संसाधनों से नवाजा है, लेकिन हम अपनी लालची प्रवृति की वजह से धीरे-धीरे इन्हें खत्म करने पर तुले हैं। मौजूदा स्थिति को दृष्टिगत करके अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2025 तक हमारे देश में जल की भारी कमी हो जाएगी। उपलब्ध पानी भी पीने योग्य नहीं होंगे। ऐसा नहीं है कि सरकार संकट से अंजान है। बावजूद इसके सरकार की नीतियां जल को दूषित करने और जलसंकट को बढ़ावा देने वाली है। सरकार की मेक इन इंडिया की संकल्पना को साकार करने के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत है।
इस समय कोई भी कल-कारखाना जल के बिना नहीं चल सकता है। कल-कारखानों को जल को दूषित करने वाला सबसे बड़ा कारक माना जा सकता है। सरकार 100 स्मार्ट सिटी भी बनाना चाहती है, जिनके निर्माण के लिए भारी मात्रा में जल की जरूरत होगी। देश की प्रमुख नदी यमुना मर चुकी है। हिंडन का भी स्वर्गवास हो गया है। गंगा नदी भी वेंटीलेटर पर है। बावजूद इनके, सरकार कागजों पर इन्हें पुनर्जीवित करने का दावा कर रही है। जल के वाष्पीकरण, अपवाह या उपसतही जल निकासी से होने वाले नुकसानों का कम करने, भूमि की सिंचाई के लिए जल की जरूरत का निर्धारण करने, वाष्पीकरण को नियंत्रित करने, खेतों में जल का समान वितरण सुनिश्चित करने, सिंचाई के तरीकों में बदलाव लाने, ड्रिप सिंचाई विधि को बढ़ावा देने, अधिक से अधिक पौधा रोपन या वृक्षारोपण करने, वर्षा के जलको सहेजने आदि की मदद से मौजूदा स्थिति में बदलाव लाया जा सकता है।
जल प्रबंधन आज हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन अभी भी हम इसकी अहमियत नहीं समझ पाए हैं। जल-संरक्षण के कार्यान्वयन या जल-दक्षता उपायों को अपनाते हुए जल-प्रयोग में कमी लाने की जरूरत है। जल संरक्षण का उपाय एक क्रिया भर है, जिसे आदतों में लाकर सफल बनाया जा सकता है। दूषित जल पीने से हम जीवित तो जरूर रह सकते हैं, लेकिन हमारी आयु कम हो सकती है। हम कई तरह की बीमारियों से पीडि़त हो सकते हैंं। दूषित जल से फसलों की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। अस्तु, खेती-किसानी के लिए स्वस्थ पानी और पीने के लिए स्वच्छ पानी की जरूरत है। दूषित जल में हजारों की संख्या में कीटाणु होते हैं, जो हमारी मौत के कारक बनते हैं। हालांकि, दूषित जल को उबालकर, कैन्डल वाटर फिल्टर, क्लोरीनेशन, देशी विधि से शुद्धिकरण, हैलोजन टैबलेट व आरओ सिस्टम, यूवी रेडिएशन प्रणाली आदि की मदद से इसे शुद्ध किया जा सकता है, लेकिन इन प्रक्रियाओं से शिक्षा और जानकारी के अभाव में कुछ ही लोग जल को शुद्ध कर सकते हैं।
कहा जा सकता है कि दूषित जल एक गंभीर मसला है, जिसके निदान के लिए सरकार तो कोशिश करने में जुटी है, लेकिन यह हमारी भी जिम्मेदारी है कि हम स्थिति को बेहतर करने के लिए पहल करें। अगर समय रहते अपनी मानसिकता एवं आदतों में बदलाव नहीं लाएंगे तो हम खुद ही अपनी नियति के लिए जिम्मेदार होंगे। धरती के जल के दूषित होने के बाद अब समुद्र के खारे जल को पीने योग्य बनाने की पहल की जा रही है। वैज्ञानिकों ने ऐसा खास फिल्टर तैयार किया है जिससे समुद्र के बेस्वाद पानी को पीने के लायक बनाया जा सकेगा। यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह उपकरण बनाया है। इससे दूषित पदार्थों को छानने में सफलता मिली है। यह खोज भविष्य के लिए वरदान साबित हो सकती है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी थी कि 2025 तक दुनिया के 1.20 अरब लोगों को साफ पानी मिलने में मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।
वैज्ञानिकों के बनाए फिल्टर से पानी से नमक को निकाला जा सकता है और उसे पीने योग्य बनाया जा सकता है। मानव जनित जलवायु परिवर्तन के कारण शहरों में पानी की आपूर्ति पर असर पड़ा है। ऐसे में कई देश डीसैलिनैशन (विलवणीकरण-पानी से लवणों को निकालने की प्रक्रिया) पर काफी खर्च कर रहे हैं। मैनचेस्टर में टीम का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर राहुल नायर ने बताया कि यह आगे बढऩे की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे डीसैलिनैशन तकनीक को और बेहतर करने दिशा में नए संभावनाओं का द्वार खुलेगा।

‘आजाद कश्मीर’: मेरे कुछ अनुभव
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
रक्षा मंत्री राजनाथसिंह को मैं हार्दिक बधाई देता हूं कि कश्मीर पर उन्होंने मेरी ऐसी बात का समर्थन कर दिया है, जो पिछले 50 साल से प्रायः मैं ही लिखता और बोलता रहा हूं। मैं हमेशा कश्मीर पर पाकिस्तान से बातचीत का समर्थक रहा हूं लेकिन पाकिस्तान के कई विश्वविद्यालयों, शोध-संस्थानों और पत्रकारों के बीच बोलते हुए मैंने दो-टूक शब्दों में कहा है कि सबसे पहले हम आपके ‘आजाद कश्मीर’ के बारे में बात करेंगे। मैंने प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो और मियां नवाज शरीफ से ही नहीं, राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ से भी पूछा कि आपने कश्मीर के बारे में सयुक्तराष्ट्र संघ का प्रस्ताव पढ़ा है, क्या ? क्या उसके पहले अनुच्छेद में यह नहीं लिखा है कि आप अपने कब्जाए हुए कश्मीर की एक-एक इंच जमीन खाली करें। उसके बाद वहां आप जनमत संग्रह करवाएं। आपने अभी तक क्यों नहीं करवाया ? मैंने उनसे पूछा कि क्या आप अपने कश्मीरियों को ‘तीसरा विकल्प’ देंगे ? याने वे भारत या पाकिस्तान में मिलने की बजाय पृथक राष्ट्र बन जाएं ? इस पर सभी पाकिस्तानी नेता मौन हो जाते हैं। पाकिस्तान की यह नीति कश्मीर के कई उग्रवादी और आतंकवादी नेताओं को भी पसंद नहीं है। जब वे मुझसे कहते कि आप अपना कश्मीर हमारे हवाले क्यों नहीं करते तो मैं उनसे पूछता हूं कि जो कश्मीर आपके पास है, उसका क्या हाल है ? आपके ही लेखकों और कश्मीरी पत्रकारों ने लिखा है कि हमारा ‘आजाद कश्मीर’ गर्मियों में एक विराट वेश्यालय में परिवर्तित हो जाता है। मैं अपनी कश्मीरी माताओं-बहनों को किस मुंह से आपके हवाले करुं ? इसके अलावा हमारे कश्मीर में तो धारा 370 और 35 ए लगी हुई है। आपके यहां तो ऐसा कुछ नहीं है। आपके कश्मीरियों और गिलगिट-बालटिस्तानियों पर पठानों और पंजाबियों की जनसंख्या भारी पड़ती जा रही है। चीन को आपने 5000 वर्ग किमी कश्मीरी जमीन 1963 में तश्तरी पर रखकर दे दी है और आपका कश्मीर उसकी जागीर बनता जा रहा है। तथाकथित ‘आजाद कश्मीर’ के तीन प्रधानमंत्रियों से मेरी लंबी बातें हुई हैं। जब बेनजीर भुट्टो से मैंने कहा कि आपका कश्मीर तो आजाद है, अलग देश है। वहां जाने का ‘वीजा’ कहां से मिलेगा ? उसके प्रधानमंत्री से भेंट कैसे होगी ? वे हंसने लगी। उन्होंने अपने गृहमंत्री जनरल नसीरुल्लाह बाबर से कहा। जनरल बाबर ने नाश्ते पर मुझे अपने घर बुलाया और कहा कि ‘कौन गधा वहां वजीरे-आजम है?’ उसे आप फोन करें। वह ‘मुनसीपाल्टी का सदर’ है। वह खुद आपसे मिलने यहां (इस्लामाबाद) चला आएगा। दूसरे दिन यही हुआ।

हैरान कर रहीं सोने की कीमत
सिद्धार्थ शंकर
सोने के दाम एक साल में करीब 30 फीसदी और बीते दो माह में ही 4,000 रुपए प्रति 10 ग्राम से ज्यादा बढऩे से बुलियन डीलर्स के साथ ही आम निवेशक और खरीदार हैरान हैं। बीते हफ्ते 38,648 रुपए प्रति 10 ग्राम की रिकॉर्ड ऊंचाई के बाद इसके 4,045 और यहां तक की 50 हजारी होने की अटकलें भी लग रही हैं। यही हाल चांदी का है, जो 45,000 रुपए प्रति किग्रा की बुलंदी छू चुकी है। अब संभावना जताई जा रही है कि त्योहारी सीजन में गोल्ड 40000 रुपए प्रति 10 ग्राम से आगे जा सकता है। इस वक्त घरेलू बाजार में डिमांड नहीं है, इसके बावजूद गोल्ड के दाम बढ़ रहे हैं। कई कारणों से इंटरनैशनल मार्केट में गोल्ड में इन्वेस्टमेंट बढ़ रहा है। अगले माह से त्योहारी सीजन शुरू हो जाएगा। उसके बाद घरेलू डिमांड भी बढ़ जाएगी। ऐसे में गोल्ड में तेजी आना तय है। गोल्ड का अगला स्तर 39,000 रुपए का है। इसके बाद कोई बड़ी बात नहीं होगी, अगर गोल्ड 40,000 के लेवल को छू जाए। चीन और अमेरिका के बीच जारी ट्रेड वॉर के कारण इन्वेस्टर्स गोल्ड की तरफ रुख कर रहे हैं। इसके अलावा ग्लोबल मार्केट में भी स्लोडाउन की खबरों से शेयर मार्केट में इन्वेस्टमेंट कम हो रहा है। ऐसे में गोल्ड में तेजी और बढ़ सकती है।
दुनियाभर की अर्थव्यवस्था में छाई सुस्ती और कई देशों में मंदी की दस्तक से शेयरों, म्यूचुअल फंडों से निवेशकों का मुनाफा घटा है और जमा योजनाओं के ब्याज पर भी कैंची चल रही है। अब वे गोल्ड जैसे सुरक्षित निवेश को तरजीह दे रहे हैं। इससे बहुमूल्य धातुओं की डिमांड बढ़ रही है। अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध, ब्याज दरों में कटौती और अमेरिका में लंबी अवधि (30 साल) की बॉन्ड यील्ड अब तक के सबसे निचले स्तरों पर आने से डॉलर पर दबाव बढ़ा है। ज्यादातर देश अपना मुद्रा भंडार डॉलर में रखते हैं और उनकी कोशिश सोने का भंडार बढ़ाकर आगे ऊंची कीमत पर भुनाने या ज्यादा डॉलर हासिल करने की होती है। इससे भी सोने की डिमांड बढ़ी है। पूरी दुनिया के सेंट्रल बैंकों ने 2019 की पहली छमाही में 374 टन सोना खरीदा, जो पिछले साल से 68 फीसदी ज्यादा है। इस दौरान सोने की कीमत 18 फीसदी बढ़ी है। तुर्की, कजाकिस्तान, चीन और रूस के सेंट्रल बैंक सोने के सबसे बड़े खरीदार हैं, जबकि आरबीआई ने भी इस साल खरीद बढ़ाई है और टॉप-10 में शामिल हो गया है। इस साल सोने की कुल डिमांड में सेंट्रल बैंकों की खरीदारी 16 फीसदी रही है।
फिलहाल विश्व अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर और अमेरिकी मौद्रिक नीति के रुझानों से सोने में तेजी बनी रहने के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन कई राजनीतिक और आर्थिक मोड़ भी दिख रहे हैं, जहां रुझान पलट सकता है। अमेरिका में नवंबर 2020 में राष्ट्रपति चुनाव है और सत्ता बदली तो आर्थिक नीतियों में भी उथल-पुथल होगी। इसके सोने की कीमतों पर असर का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों राष्ट्रपति ट्रंप ने चाइनीज सामान पर ऊंची ड्यूटी दरों को 1 सितंबर के बजाय 15 दिसंबर से लागू करने की बात कही और दुनियाभर के बाजारों में तेजी और सोने में गिरावट आ गई। सोने की अंतरराष्ट्रीय कीमतों के मुकाबले भारत में तेजी थोड़ी पीछे है, जबकि पीक घरेलू डिमांड वाला त्योहारी सीजन अभी बाकी है। बजट में सोने के आयात पर कस्टम ड्यूटी 10 से बढ़ाकर 12.5 फीसदी किए जाने से सप्लाई टाइट रहेगी, जिससे कीमतों को और बल मिलेगा।

छोटे मुंह से बड़ी बड़ी बातें ?
तनवीर जाफ़री
बुज़र्गों से एक कहावत बचपन से ही सुनते आ रहे हैं कि “पहले तोलो फिर बोलो”। इस कहावत का अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति को अपना मुंह खोलने से पहले कई बार यह सोच लेना चाहिए कि उसके द्वारा बोले गए वचन कितने सत्य,सार्थक,अर्थपूर्ण व तार्किक हैं। बोलने वाले व्यक्ति को यह भी सोचना चाहिए की कोई व्यक्ति जिसके विषय में कुछ कहने या बोलने जा रहा है उसका व्यक्तित्व किस स्तर का है तथा उसके बारे में बोलने वाले व्यक्ति का अपना व्यक्तिगत स्तर क्या है ? इन्हीं शिक्षाओं व कहावतों के आसपास घूमते कई मुहावरे भी बनाए गए। जैसे कि यदि कोई साधारण या तुच्छ सा व्यक्ति किसी महापुरुष की तारीफ़ों के पुल बांधने लगे तो उस स्थिति को कहा जाता है “सूरज को चिराग़ दिखाना” ।और ठीक इसके विपरीत यदि कोई साधारण या अदना सा शख़्स किसी महान व्यक्ति की निंदा या आलोचना करे तो उस अवसर की कहावत है “आसमान पर थूकना”। इसी की लगभग पर्यायवाची कही जा सकने वाली एक दूसरी कहावत है “छोटा मुंह-बड़ी बात”। इसका अर्थ भी वही है कि इंसान को अपनी हैसियत व औक़ात देख कर ही अपना मुंह खोलना चाहिए। गोया हमारे बुज़ुर्गों द्वारा मुहावरों व कहावतों के माध्यम से आम लोगों को शिक्षित करने का काम प्राचीन समय से होता आ रहा है।सवाल यह है कि क्या इन कहावतों का कोई असर भी समाज पर होता है या यह महज़ हिंदी पाठ्यक्रमों में शामिल किताबी बातें ही बनकर रह गयी हैं।साधारण व आम लोगों की तो बात ही क्या करनी, संवैधानिक पदों पर बैठे व रह चुके तथाकथित विशिष्ट लोगों द्वारा अपनी हैसियत व औक़ात से कहीं लम्बी ज़ुबानें चलाई जाने लगी हैं।
उदाहरण के तौर पर महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व को ही ले लें। पूरा विश्व निर्विवादित रूप से महात्मा गाँधी को एक आदर्श पुरुष के रूप में मानता है। विश्व के अनेक महान नेता गाँधी जी को अपने लिए प्रेरणा स्रोत मानते हैं। विश्व को सत्य व अहिंसा का सन्देश देने वाले नेता के रूप में विश्व उन्हें याद करता है। दुनिया के अनेक देशों में गाँधी को सम्मान देने हेतु उनकी प्रतिमाएं लगाई गयी हैं। परन्तु उस महान आत्मा की हमारे देश की ज़हरीली विचारधारा ने न केवल हत्या कर दी बल्कि आज अपराधी अनपढ़ व अज्ञानी क़िस्म के लोगों द्वारा न केवल गाँधी जी को बुरा भला कहा जाता है बल्कि उनके हत्यारे का महिमामंडन भी किया जाता है। गोडसे के जन्मदिवस को देश में कुछ जगहों पर शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता है।गाँधी के बजाए यह शक्तियां गोडसे जयंती मनाती हैं। मेरठ में महात्मा गांधी के जन्मदिन 2 अक्टूबर 2016 को हत्यारे गोडसे की मूर्ति का अनावरण किया गया. अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के लोगों द्वारा यहाँ गांधी दिवस को ‘धिक्कार दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इतना ही नहीं बल्कि यह गोडसे प्रेमी शक्तियां मेरठ का नाम बदलकर गोडसे के नाम पर रखने की कोशिश भी करती रहती हैं। इसी तरह हिन्दू महासभा के गोडसे प्रेमी लोग 2017 में ग्वालियर में गोडसे के लिए मंदिर बनाना चाह रहे थे। परन्तु प्रशासन की चौकसी के चलते गाँधी के इस हत्यारे को महिमामंडित करने का दुष्प्रयास सफल नहीं हो सका। हमारे बीच ऐसे तत्व भी हैं जो गांधी की हत्या को फिर से जीना चाहते हैं. हत्या की सनक को राष्ट्रभक्ति में बदल देना चाहते हैं.गत वर्ष अलीगढ़ में ऐसे ही एक छोटे से समूह ने गाँधी जी की हत्या को नाटक के रूप में पेश कर उनके पुतले पर गोली चलाई और गाँधी की हत्या व उनके रक्त परवाह का मंचन किया फिर मिठाइयां बांटीं। राष्ट्रपिता की हत्या करने वाले को राष्ट्रभक्त व देशभक्त बताया जाता है। ऐसा कहने वालों के ट्रैक रिकार्ड देखिये,उनकी शिक्षाओं,योग्यताओं व देश के प्रति उनकी सेवाओं नज़र डालिये तो या तो ऐसे लोगों ने सारी उम्र साम्प्रदायिकता का ज़हर बोया है या अपराधी पृष्ठभूमि रही है अथवा धर्म का चोला पहन कर कथा प्रवचन देकर अपना जीविकोपार्जन करते रहे हैं।ऐसे लोगों के लिए शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज का कहना है कि ‘जो गोडसे को राष्ट्रभक्त बताता है, वह हिंदू ही नहीं है’। जो लोग महात्मा गाँधी के सामने एक कण जैसी हैसियत भी नहीं रखते वे लोग गाँधी जी को गलियां देने उनकी निंदा व आलोचना करते नज़र आ जाते हैं। ऐसे लोगों को न तो गाँधी जी के दर्शन का कोई ज्ञान है न ही उनमें गाँधी जी की सोच को हासिल करने या उसका अध्यन करने की सलाहियत है। फिर भी राजनीति के वर्तमान दौर में गाँधी को राष्ट्रविरोधी और गोडसे को राष्ट्रभक्त बताने की दक्षिणपंथी नेताओं में होड़ सी लगी हुई है।
गाँधी जी की ही तरह देश के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के पीछे भी यही गाँधी विरोधी विचारधारा हाथ धोकर पड़ी हुई है। पंडित नेहरू को राष्ट्र के विकास के प्रथम शिल्पकार के रूप में जाना जाता है। देश की स्वतंत्रता के बाद देश को स्वावलंबी बनाने,देश के सामाजिक ताने बने को जोड़ कर रखने,तथा अनेक धर्म,जाति,भाषा व संस्कृति के इस बहुरंगी देश को एकजुट रखने का ज़िम्मा पंडित नेहरू व उनके परम सहयोगी तत्कालीन गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल पर था। परन्तु बड़ी सोची समझी साज़िश के तहत नेहरू-पटेल मतभेद की कहानियां गढ़ी जाती हैं। नेहरू व पटेल की तुलना कर सरदार पटेल को बड़ा व नेहरू को छोटा करने की कोशिश की जाती है। जबकि इतिहास गवाह है कि स्वयं सरदार पटेल, नेहरू को अपना नेता भी मानते थे और वे नेहरू को ही देश का प्रथम प्रधानमंत्री देखना चाहते थे।परन्तु नेहरू के वैचारिक विरोधी जो नेहरू व गाँधी जी की धर्मनिरपेक्ष नीतियों से न ही कल सहमत थे न आज सहमत हैं, वही शक्तियां नेहरू-पटेल मतभेद के मनगढंत क़िस्से परोसती रहती हैं। इन्हीं कोशिशों के नतीजे में गुजरात में नर्मदा नदी के बांध पर सरदार पटेल की विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा स्थापित कराई गई। ऐसा कर निश्चित रूप से यही सन्देश दिया गया कि देश में सबसे ऊँचे क़द के नेता महात्मा गाँधी और पंडित नेहरू नहीं बल्कि सरदार पटेल थे। गोया पटेल तो गाँधी और नेहरू को अपने से बड़ा व योग्य नेता मानते थे परन्तु गाँधी व नेहरू से वैचारिक विरोध रखने वाले लोग सरदार पटेल को ही सबसे महान नेता मानते हैं। ऐसी निम्नतरीय सोच रखने वाले राजनीतिज्ञों को गाँधी-नेहरू-पटेल जैसे राष्ट्र के महान नेताओं की विशाल ह्रदयता उनकी निःस्वार्थ सोच,उनकी क़ुर्बानियों,सादगी तथा उच्च विचारों से सीख भी लेनी चाहिए तथा उनकी तुलना में अपने संकीर्ण,सीमित,विभाजनकारी व विद्वेष पूर्ण विचारों का अवलोकन कर बड़ी ईमानदारी से यह महसूस करना चाहिए कि ऐसे नेता गाँधी-नेहरू-पटेलसे अपनी तुलना कराने योग्य हैं भी या नहीं।
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तो कश्मीर मसले पर अपना ज्ञान बांटते हुए पंडित जवाहर लाल नेहरू को ‘अपराधी’ तक कह डाला। कहना ग़लत नहीं होगा कि शिवराज सिंह चौहान उसी राजनैतिक दल के नेता हैं जिसमें वह प्रज्ञा ठाकुर उन्हीं के गृह राज्य सेसांसद है जिसने मुंबई हमलों में शहीद हेमंत करकरे के लिए कहा था कि “करकरे मेरे श्राप देने की वजह से मारा गया”।जो प्रज्ञा मालेगांव बम ब्लास्ट की आरोपी है तथा कई वर्षों तक जेल में रहकर अब भी ज़मानत पर है और गोडसे जैसे महात्मा गाँधी के हत्यारे को राष्ट्रभक्त बताकर उसका महिमामंडन करती रही हैं। चौहान की पार्टी में ही आज का सबसे बहुचर्चित बलात्कारी व हत्यारा कुलदीप सिंह सेंगर रहा है। ऐसी पार्टी के नेता जब आधुनिक भारत के शिल्पकार पंडित नेहरू को ‘अपराधी’ बताएंगे तो निश्चित रूप से जवाब वही आएगा जो मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री दिग्विजय सिंह ने दिया। दिग्विजय सिंह ने कहा कि ‘चौहान जवाहरलाल नेहरू के पैरों की धूल भी नहीं हैं. ऐसे बयान देते समय उन्हें शर्म आनी चाहिए’। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी चौहान की बदकलामी की निंदा करते हुए कहा कि ‘‘देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, जिन्हें आधुनिक भारत का निर्माता, कहा जाता है..जिन्होंने आज़ादी के लिए संघर्ष किया, जिनके किए गए कार्य व देशहित में उनका योगदान अविस्मरणीय है. उनको मृत्यु के 55 वर्ष पश्चात आज उन्हें ‘अपराधी’ कह कर संबोधित करना बेहद आपत्तिजनक व निंदनीय है.’। आजकल बरसाती मेंढक की तरह तमाम ऐसे नेता व छुटभैय्ये मिल जाएंगे जो महात्मा गाँधी व पंडित नेहरू की निम्नस्तरीय शब्दों में आलोचना करते दिखाई देंगे। यह उनके संस्कार व उनकी शिक्षाओं का असर ज़रूर हो सकता है फिर भी किसी को भी ‘छोटे मुंह से बड़ी बड़ी बातें’ हरगिज़ नहीं करनी चाहिए।

राजीव गांधी : विश्व राजनीति पर गहरी छाप
मनोहर पुरी
(20 अगस्त जयंती पर विशेष) इसे विधि की विडम्बना ही कहा जा सकता है कि राजीव गांधी जिस तेजी से भारत की राजनीति के क्षितिज पर उदित हुए थे लगभग उसी तीव्रता से विलुप्त भी हो गए। भरपूर यौवन में विधि के व्रूर हाथों ने उन्हें हम से छिन लिया। अपने नाना पंडित जवाहर लाल नेहरू और माता श्रीमती इन्दिरा गांधी की विरासत के सहारे उनकी राजनीति पर एक मजबूत पकड़ बन रही थी। देश को 21वीं शताब्दी में ले जाने के लिए वे निरन्तर प्रयत्नशील थे। वह भारत को ऐसी स्थिति में जल्दी से जल्दी पहुंचा देना चाहते थे जहां वह विश्व के अन्य विकसित देशों के साथ सिर उठा कर खड़ा हो सके। राजीव गांधी का संतुलित स्वभाव उन्हें सहज ही अतंमुर्खी बना देता था परन्तू विमान चालक होने के कारण शायद उन्हें तीव्र गति बहुत पसंदं थी और वह हर काम बहुत जल्दी जल्दी समाप्त कर लेना चाहते थे।
भारत को 21वीं शताब्दी में ले जाने के लिए उन्होंने जिस आर्थिक उदारवाद की नींव रखी वह पंडित नेहरू और श्रीमती इन्दिरा गांधी की नीतियों से अलग दिखाई देती है जबकि वास्तविकता यह है कि वह नेहरू की उन नीतियों की परिणिति कही जा सकती है जो उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरन्त बाद प्रतिपादित की और इन्दिरा गांधी ने ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करने के बाद उन्हें व्यवहार में लाने का प्रयास किया। यह दूसरी बात है कि नेहरू और इन्दिरा दोनों ही अपनी नीतियों को समाजवाद के आस पास रख कर गरीबों के मसीहा के रूप में अपने आपको स्थापित किए रहे जबकि राजीव गांधी ने खुले दिल से आयातित तकनीक की वकालत की।
जल्दी से जल्दी देश में आर्थिक प्रान्ति लाने की उनकी तड़प को उनके भाषणों में सहज ही अनुभव किया जा सकता है। नेहरू एक ऐसे समय में देश की आर्थिक उन्नति का मानचित्र बना रहे थे जब कांग्रेस स्वंतत्रता आन्दोलन की लड़ाई लड़ते हुए थक चुकी थी। कांग्रेस महात्मा गांधी के उन आदर्शों को समेटने में लगी थी जिनके सहारे आर्थिक समस्यायें सुलझाना कोई सुगम कार्य नहीं था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सांस्कृतिक पुनर्जागरण के सहारे देश को उन्नति के मार्ग पर ले जाने की बात कर रहा था। समाजवादी अपने अपने ढंग से अमीरी गरीबी के मध्य खाई पाटने के कार्यप्रम बना रहे थे। कम्युनिस्ट भारत को सोवियत संघ के ढांचे में ढालने का प्रयास कर रहे थे। पं. नेहरू को सबसे बड़ी चिन्ता लोकतंत्र को बचाने की थी। नेहरू प्रजातांत्रिक प्रणाली को आहत किए बिना भारत की सामाजिक सच्चाईयों का सामना करते हुए आर्थिक विकास का दर्शन रच रहे थे। इन्दिरा गांधी ने पूरी सूझ बूझ के साथ देश की राजनीति का संचालन नेहरू के बनाए हुए ढांचे के आस पास करना प्रारम्भ कर दिया । आज भले ही कुछ लोग नेहरू की नीतियों के विरोध में कुछ बोल दें परन्तु उस समय भारत की जनता ने उनकी नीतियों को भरपूर सम्मान दिया। बाद में लोगों ने इन्दिरा गांधी को उनकी पुत्री मान कर विरासत सौंपने में कोई आनाकानी नहीं की तो राजीव गांधी को भी उन्हीं का वारिस स्वीकार करते हुए अपने दिल और दिमाग में बिठाया।
इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि नेहरू के दर्शन ने ही इस देश को एक मजबूत सुदृढ आर्थिक आधार प्रदान किया किया। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने उस समय की अनिश्चय की राजनीति में स्वयं को स्थापित करने के लिए कई प्रकार की लोकप्रिय घोषणाओं का सहारा लिया। उन्होंने गरीबी हटाओ का नारा दे कर जनता का विश्वास अर्जित करने में सफलता प्राप्त की। राजीव गांधी ने सत्ता के दलालों को बाहर का रास्ता दिखाने की बात करके अपनी एक साफ सुथरी छवि देश के सामने प्रस्तुत की। उन्होंने लोगों को यह आश्वासन दिया कि प्रशासन से वह भ्रष्टाचार को उखाड़ फेकेंगें। बाद में घटनाप्रम इतनी तेजी से बदला कि सब कुछ छिन्न भिन्न हो गया और भारतीय अर्थतंत्र उसी पुराने ढर्रे पर चलता रहा।
नेहरू-इन्दिरा और राजीव तीनों का सम्मोहन जनता को अपनी ओर आकर्षित करता रहा। तीनों ही अपने अपने समय में सबसे अधिक वोट प्राप्त करने वाले सिद्ध हुए। इस क्षेत्र में तो राजीव गांधी अपने दोनों पूर्वजों से कहीं आगे बढ़ गए। 1984 में जब उन्होंने पार्टी की बागडोर संभाली तो कांग्रेस पार्टी ने उन शिखरों को छुआ जहां तक वह पहले कभी पहुंचने में सफल नहीं हुई थी। अपने नाना की भान्ति राजीव गांधी में सैंस ऑफ हयूमर भी थी जिसे इन्दिरा जी ने सदैव अपनी दृढ़ता के पीछे छिपाए रखा। राजीव नेहरू और इन्दिरा जी की भान्ति जल्दी गुस्से में नहीं आते थे। उनका सौम्य व्यक्तित्व उन्हें लोकप्रिय बनाने में काफी सहायक हुआ। वह एक विशाल हृदय वाले इंसान थे। उन्हें जीवन की गहरी समझ थी। जीवन से निरन्तर कुछ न कुछ सीखते रहने की उन्हें आदत थी। उन्होंने बहुत कम समय में अपने आप को राजनीति में स्थापित कर लिया था।
जन्म से राजनीति के आंगन में पले बढ़े राजीव तब तक राजनीति से अलिप्त रहे जब तक उन्हें विवश करके इसमें उतारा नहीं गया। राजीव गांधी जीवन की सुहावनी वस्तुओं में गहरी रूचि रखते थे। फोटोग्राफी और ड्राइविंग में उनकी बहुत रूचि थी। वास्तव में वह एक सुखी और सहज पारिवारिक जीवन व्यतीत करना चाहते थे। राजनीति तो उन पर थोप दी गई थी। यदि उनका वश चलता तो संभवत: वह राजनीतिक सत्ता को ठुकरा देते।
20 अगस्त 1944 को जन्में राजीव राजनीति में 1981 में उस समय आये जब उनके छोटे भाई संजय गांधी एक विमान हादसे के शिकार हो गए। अपनी मां का हाथ बंटाने के लिए ही उन्होंने अमेठी से संसद का चुनाव लड़ा और बाद में पार्टी के महासचिव बने। अपनी विरासत के कारण ही उन्हें राजनीति में सहज रूप से स्वीकार कर लिया गया। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उन्हें बिना किसी विरोध के पार्टी ने प्रधान मंत्री के पद पर बिठा दिया। 1984 में प्रधान मंत्री बनने से पूर्व वह 14 वर्ष तक इंडियन एअर लाइन्स में विमान चालक के रूप में कार्य करते रहे। केम्ब्रिज में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान उनकी मूलाकात सोनिया से हुई और 1968 में दोनों परिणय सूत्र में बंध गए।
नेहरू-इन्दिरा-राजीव तीनों ने ही विश्व की राजनीति पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। पं. नेहरू ने अपने दर्शन और अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टि, इन्दिरा जी ने अपने सम्पर्कों और दृढ़ता राजीव गांधी ने अपने व्यक्तित्व के कारण विश्व स्तर पर लोकप्रियता इर्जित की। वैश्विक मामलों में तीनों का अपना अपना योगदान रहा। नेहरू की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए राजीव गांधी ने विश्व रंगमंच पर भारत की भूमिका को सदैव प्रभावी बनाए रखा। नेहरू पंचशील के सिद्धांतों, इन्दिरा गंटनिरपेक्ष देशों की नेता और राजीव सार्प,नैम,चोगम और राष्ट्रसंघ में अपनी भूमिका के कारण विश्व की राजनीति में अपने आपको स्थापित किए रहे।
1984 से 1988 तक राजीव गांधी ने भारतीय राजनीति को अपने अनुकूल बनाया। 21 मई 1991 तक जब तमिलनाडु के श्री पेरम्बदूर नामक स्थान पर टाइम बम विस्फोट में उनकी हत्या हुई, वह भारत की राजनीति पर पूरी तरह से हावी रहे। राजीव की दु:खद और आसमियक मृत्यु ने भी भारत की राजनीति को प्रभावित किया। उनके निधन के साथ ही नेहरू-इन्दिरा-राजीव युग की महिमा का अंत हो गया। राजीव गांधी एक बहादुर इंसान थे और उन्हें मृत्यु से कोई भय नहीं था। वह संभवत: जानते थे कि कभी वह हिंसा के शिकार होगें। इस विषय में उन्होंने कहा भी था मृत्यु से भय करने का क्या लाभ जबकि वह इस मामले में कुछ भी कर सकने की स्थिति में भी नहीं थे। यह देश का दुर्भाग्य है कि उसे राजीव जैसे युवा नेतृत्व को अतनी जल्दी खोना पड़ा।

पहलू खान की हत्या किसी ने नहीं की
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पहलू खान की हत्या 1 अप्रैल 2017 को अलवर में हुई थी। उसे गायों की तस्करी करने के शक में 6 लोगों ने घेरकर मार डाला था। दो दिन बाद उसकी मौत हुई। उसके पहले उसने अपने बयान में हत्यारों के नाम भी पुलिस को बताए थे और उस मौके पर जो वीडियो बनाया गया था, वह भी पुलिस के पास था लेकिन राजस्थान की पुलिस ने अदालत के सामने सारा मामला इतने लचर-पचर ढंग से पेश किया कि सभी अभियुक्त बरी हो गए याने पहलू खान को किसी ने नहीं मारा। वह अपने आप मर गया। अदालत ने अपने फैसले में पुलिस की काफी मरम्मत की है लेकिन मैं अदालत से पूछता हूं कि उसने मुकदमे के दौरान पुलिस को बाध्य क्यों नहीं किया कि वह हत्या के सारे तथ्य उजागर करती। हत्या के उस वीडियो को सारे देश ने देखा था। वह खुले-आम उपलब्ध है। अदालत चाहती तो उसे खुद ‘यू टयूब’ पर देख सकती थी। उसे देखा भी लेकिन अदालत ने उस पर भरोसा नहीं किया। अदालत पुलिस की लारवाही का रोना रोती रही लेकिन मैं पूछता हूं कि क्या उसने अपना फर्ज पूरी ईमानदारी से निभाया ? अदालत ने उन पुलिसवालों को कड़ी सजा क्यों नहीं दी, जिन्होंने सारे मामले पर पानी फेरने की कोशिश की ? यह ठीक है कि राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने इस मुकदमे पर अपील करने की घोषणा की है लेकिन उसकी कौनसी मजबूरी है कि उन पुलिसवालों को वह दंडित नहीं कर रही है ? उन्हें तुरंत मुअत्तिल किया जाना चाहिए। उसकी मिलीभगत या लापरवाही की वजह से सरकार, अदालत और पुलिस विभाग की इज्जत पैंदे में बैठी जा रही है। भारत की केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी की बदनामी सारी दुनिया में की जा रही है, जो कि गलत है, क्योंकि भीड़ की हिंसा की ऐसी वारदातें कांग्रेस सरकार के राज (2009-14) में 120 बार हुईं और मोदी राज (2014-19) में सिर्फ 40 बार हुईं। जाहिर है कि इन हिंसक और मूर्खतापूर्ण कुकृत्यों को कोई भी सरकार या पार्टी प्रोत्साहित नहीं कर रही है बल्कि भारतीय समाज में फैले हुए अंधविश्वास और अंधभक्ति का यह दुष्परिणाम है। पहलू खान और उसके जैसे अन्य मामलों में यदि दोषियों को सख्त सज़ा नहीं मिली तो यह भारत की शासन-व्यवस्था के माथे पर काला टीका होगा। मैं सोचता हूं कि लाल किले के अपने भाषण में मोदी को इस भीड़ की हिंसा के विरुद्ध खुलकर बोलना चाहिए था। सच्ची गोभक्ति इसी में है कि गाय की रक्षा के बहाने मनुष्यों की हत्या न हो। गाय और मनुष्य, दोनों की रक्षा हो, यह जरुरी है।

लोकतंत्र के सजग प्रहरी थे डॉ शंकर दयाल शर्मा
मनोहर पुरी
(19 अगस्त : जन्म दिवस पर विशेष) भारतीय राजनीति के सबसे कम विवादास्पद राजनीतिज्ञ थे डॉ. शंकर दयाल शर्मा। उनका जन्म मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 19 अगस्त 1918 को एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। अन्य अनेक राजनेताओं की भान्ति डॉ. शंकर दयाल शर्मा का परिवार भी उत्तर प्रदेश से मध्य प्रदेश आ गया था। उनके पिता परम शिव भक्त थे इसीलिए उन्होंने अपने पुत्र का नाम शंकर दयाल रखा। धार्मिक दृष्टि उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली थी। डॉ. शंकर दयाल शर्मा भारत के नौवें राष्ट्रपति थे। निरन्तर राजनीति में सप्रिय भागीदारी करने के वावजूद उन्होंने नियमित पूजा पाठ करने की अपनी दिनचर्या में कभी व्यवधान नहीं आने दिया। वह एक सुयोग्य प्रशासक,स्वतंत्रता सेनानी,विद्वान लेखक,कुशल प्रशासक, कानूनविद् और विचारक के रूप में निरन्तर अपने देश की सेवा में सलंग्न रहे। उनकी शिक्षा आगरा, इलाहाबाद, लखनऊ, ऑक्सफोर्ड तथा व्रैंब्रिज विश्वविद्यालय में हुई। उन्होंने इंग्लिश,हिन्दी और संस्कृत भाषाओं में एम.ए. किया। उन्होंने बार-एट-लॉ की उपाधि प्राप्त करके छात्रों को कानून की शिक्षा भी दी। उनका विवाह विमला शर्मा के साथ हुआ।
स्वतंत्रता आन्दोलन में उन्होंने बढ़ चढ़ कर भाग लिया और भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ उनका घनिष्ठ संबंध था। जब वह इलाहाबाद में थे तब उनका सम्पर्प पं. नेहरू से हुआ। वह पंडित नेहरू के व्यक्तित्व से बहुत अधिक प्रभावित थे और उनकी कही हर बात को अपने जीवन में उतारना चाहते थे। 1936 में नेहरू जी के प्रभाव से उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेना प्रारम्भ किया। एक बार कांग्रेस में आने के बाद वह जीवन पर्यन्त कांग्रेसी ही रहे। उन्हें एक साधारण भारतीय की तरह जीवन व्यतीत करना बहुत पसन्द था इयलिए राष्ट्रपति बनने के बाद भी उन्होंने अपनी दिनचर्या में कोई विशेष बदलाव नहीं किया।
स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान उन्होंने अपनी जेल यात्राओं में कभी भी अपने लिए विशेष व्यवहार की मांग नहीं की। आजादी मिलने के बाद 1952 में वह भोपाल के मुख्य मंत्री बने। वह इस पद पर 1957 तक रहे। इस वर्ष राज्यों का पुनर्गठन किया गया और मध्य प्रदेश अस्तित्व में आया। प्रधान मंत्री के पद के अपवाद के अतिरिक्त उन्होंने देश के हर शीर्ष पद को सुशोभित किया। मध्य प्रदेश के विकास में उनका विशेष योगदान रहा। उन्होंने कांग्रेस की अंदरूनी कलह में स्वर्गीय इन्दिरा गांधी का पूरी तरह से समर्थन किया। 1974 में वह केद्र की राजनीति में आये और केद्रिय सरकार में संचार मंत्री बने। वह इस पद पर 1977 तक बने रहे। वह आन्ध्र प्रदेश,पंजाब और महाराष्ट्र के गवर्नर भी रहे। इसी बीच उनके दामाद और बेटी को सिख आतंकवादियों ने मौत के घाट उतार दिया।
1987 में उन्हें देश का उप राष्ट्रपति बनाया गया। उप राष्ट्रपति होने के कारण उन्हें राज्य सभा की अध्यक्षता भी करनी होती थी। डॉ. शर्मा का लोकतंत्रीय जीवन पद्धति में अटूट विश्वास था। वह ऐसी किसी बात को स्वीकार नहीं करते थे जिससे लोकतंत्र आहत होता हो। 1990 में जब शिवशंकर कांग्रेस के संसदीय दल के नेता थे तब कांग्रेसी सदस्य कई बार सदन की गरिमा की सीमा लांघ जाते थे। शंकर दयाल जी को यह सब बहुत ही नागवार गुजरता था। एक बार जब वह राज्य सभा की पीठ पर विराजमान थे तब निरंकुश कांग्रेसी सदस्यों के व्यवहार से पीडित हो कर वह सदन में ही फूट फूट कर रो पड़े थे। उन्होंने भावुकता भरे कंठ से कहा था,” जब तक मैं पीठासीन हूं मैं लोकतंत्र की हत्या नहीं होने दूंगा। आपके द्वारा की जाने वाली हुड़दंगबाजी देशद्रोह के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप मेरा गला घोंट दें,गोली मार दें,लेकिन लोकतंत्र को बचा लें।“ स्पष्ट है कि वह लोकतंत्रीय व्यवस्था को अपनी जान से भी अधिक प्यार करते थे। उनकी महान देश भक्ति को देखते हुए उन्हें 1992 में भारत के नौवें राष्ट्रपति के रूप में चुना गया। उन्होंने 1997 तक इस सर्वोच्च पद को सुशोभित किया।
राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने कई महत्वपूर्ण निर्णय किए। कई अल्पमतीय सरकारें अस्तित्व में आयीं परन्तु उन्होंने किसी के साथ कोई पक्षपात नहीं किया। उनके मन में विद्वेष की भावना कभी नहीं आई। कठिन से कठिन परिस्थिति में भी उन्हें अपने संयम और सूझबूझ से हर समस्या का सहज समाधान खोज लेने में महारत हासिल थी। इतने लंबे राजनैतिक जीवन में वह कभी किसी विवाद में नहीं फंसे और न ही उन पर किसी तरह का कोई आरोप लगा। जीवन के अन्तिम दिनों में उन्हें इस बात पर सन्तोष था कि वह सुख चैन की नींद सो पाते हैं क्योंकि उनकी आत्मा पर किसी प्रकार का बोझ नहीं था और उन्हें भावी जीवन की कोई समस्या तंग नहीं करती। भले ही उन्हें इस बात का कष्ट था कि आज कल सार्वजनिक स्तर बहुत नीचे चला गया है। उनका कहना था कि उनकी आत्मा एक दम साफ है। कबीर के शब्दों में कहें तो उन्होंने ज्यों की त्यें धर दीन्हीं चदरिया को अपने जीवन में उतारने में सफलता प्राप्त की। 9 अक्टूबर 1999 को उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उन्हें दिल्ली के एक हस्पताल में भर्ती करवा दिया गया। 26 दिसंबर, 1999 को उनका स्वर्गवास हो गया। उनका अन्तिम संस्कार दिल्ली में ही उनके प्रिय नेता पंडित जवाहर लाल की समाधि के समीप विजय घाट पर किया गया।

आवास निर्माण में तेजी, लेकिन सवाल है गुणवत्ता का
अजित वर्मा
केन्द्र सरकार ने पिछले दिनों दावा किया है कि शहरी क्षेत्रों में सभी जरूरतमंद लोगों को सस्ते आवास मुहैया कराने की प्रधानमंत्री योजना (पीएमएवाई) के तहत 2018 की तुलना में इस साल आवास निर्माण और आवंटन की गति दोगुना तक तेज हुई और योजना का लगभग 24 फीसद लक्ष्य हासिल कर लिया गया है।
आवास निर्माण में तेजी आ रही है, लेकिन आज भी गुणवत्ता का सवाल अपनी जगह है, क्योंकि निर्माण प्रक्रिया को अंजाम देने वाले अवसर और ठेकेदारों के चेहरे, चाल और चरित्र में परिवर्तन नहीं हुआ है। हमारा मानना है कि आवंटन के पहले सभी आवासों का गुणवत्ता परीक्षण भी किया जाना जरूरी है। यों, मंत्रालय ने निम्न एवं मध्य आय वर्ग के लिए विभिन्न श्रेणियों में सस्ते आवास मुहैया कराने के लिए जून 2015 में यह योजना शुरू की थी। इनमें 1.95 लाख आवास मध्य आय वर्ग के लिए हैं जबकि अब तक स्वीकृत 83.68 लाख आवास में से 4.48 लाख घर अनुसूचित जाति जनजाति के परिवारों को दिए जाएंगे। बेघर परिवारों की पहचान की जा रही है। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में चिन्हित बेघर परिवारों की संख्या 2.56 लाख थी। सस्ते आवास योजना में शहरी क्षेत्र के उन बेघर परिवारों को भी शामिल किया गया है, जो सार्वजनिक स्थलों पर गुजर बसर करते हैं।
पिछले दिनों संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक इस साल जुलाई तक विभिन्न श्रेणियों के निर्माणाधीन मकानों की संख्या 49.54 लाख हो गई है। योजना के तहत 26.13 मकान बनकर तैयार हो गए हैं और इनमें 23.96 लाख आवास, योजना के लाभार्थियों को सौंप भी दिए गए हैं। दिसंबर 2018 तक इस योजना के तहत शहरी क्षेत्रों में 35.67 लाख घर निर्माणाधीन थे और 12.19 घर (लगभग 12 फीसद) लाभार्थियों को आबंटित कर दिए गए थे। मंत्रालय का 2020 तक एक करोड़ घरों के निर्माण को मंजूरी देने का लक्ष्य है, जिससे 2022 तक इन घरों का निर्माण कर इन्हें जरूरतमंद लोगों को आबंटित किया जा सके। अब तक 83.68 घरों को मंजूरी दी जा चुकी है।
निर्माण कार्य में तेजी लाने वाले राज्यों में उत्तरप्रदेश, गुजरात और आंध प्रदेश सबसे आगे हैं। इनमें उत्तरप्रदेश में 3.39 लाख आवास बनकर तैयार हो चुके हैं जबकि गुजरात में बनकर तैयार घरों की संख्या 3.16 लाख और आंध प्रदेश में 3.10 लाख है। इस मामले में पीछे रह गए राज्यों में राजस्थान (64 हजार) और (बिहार 57 हजार) शामिल हैं।
कई जगह निर्माण कार्य अवरुद्ध होने का एक बड़ा कारण सामग्री आपूर्तिकर्ताओं, सेवा प्रदाताओं और निर्माणकर्ताओं के भुगतान के देयक लम्बे समय से लम्बित हैं। ऐसे में अर्थाभाव में कार्य तो अटकेंगे ही।

मिलावट पर सक्त कदम उठाने की जरूरत
रहीम खान
इसे विडंबना कहे या दुर्भाग्य की जैसे ही हमारे देश में होली हो या दीवाली जैसे महत्वपूर्ण बड़े पर्व आने की आहत होती है। वैसे ही बाजार में मिठाईयों का बोलबाला बढ़ जाता है। इसी के साथ अधिक से अधिक धन कमाने के चक्कर में व्यापारी कम खर्च में नकली चीजें मिलाकर उसे असली बताकर अधिक कीमत में बेचने से बाज नहीं आते। यही कारण है कि इन पर्वो के आने के पूर्व बड़े पैमाने पर नकली मावा पकड़े जाने की खबरे सुर्खियों मेें बनी रहती है। कम खर्च में अधिक पैसा कमाने के चक्कर में कहीं मावे में तो रंगों में ऐसी चीजे मिलाई जाती है जिसका मिठाई खाने वाले व्यक्ति के स्वास्थ्य पर घातक असर होता है। मिलावटखोरी के चक्कर में हमने देखा है कि लोग बड़े पैमाने पर अस्पताल के चक्कर काटते है। बताया जाता है कि मावे दूध, पनीर में ऐसे ऐसे रसायन मिलाये जाते है जिसके प्रभाव से लीवर ओर किडनी पर प्रतिकूल असर पड़ कर नई बीमारी को जन्म देता है। अफसोस तो इस बात का होता है कि सरकार का खाद्य सुरक्षा एवं स्वास्थ्य विभाग मिलावटी समान के धर पकड़ के लिये दीवाली और होली के पहले धर पकड़ का विशेष अभियान चलाता है जिसमें आप समाचार पत्रों और टी.वी. चैनलों पर मिलावटी समान पकडाये जाने की खबरे सुर्खिया बनी रहती है। सवाल यहीं पैदा होता है कि सरकार के द्वारा गठित विभाग होने के बाद भी मिलावट खोर अपने मन्सूबे में कैसे कामयाब हो जाते है। इसके लिये कहीं न कहीं सरकार का वो विभाग की उदासीनता पूर्ण रूप से जिम्मेदार है जिसके कंधो पर मिलावट रोकने की जिम्मेदारी होती है। टेबल के नीचे से दिये जाने वाले सौजन्य भेंट का परिणाम है कि व्यापारी वर्ग भी बिना कानून के भय के अपने उद्देश्य की प्राप्ति धडल्ले के साथ करते है। कारण स्पष्ट है कि नकली माल को असली कीमत में बेच कर एक मोटी रकम अर्जित की जाती है। प्रत्येक साल आप देख सकते है कि देश के कोने कोने में नकली मावा पकड़ाये जाने की खबरे आती है। परन्तु लचर कानून के कारण दोषी पक्षों के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो पाती जिसके कारण मिलावट खोरी की समस्या दिन दूनी रात चैगनी का रूप धारण कर रही है। अगर न्यायालय से इस प्रकार के कार्यो में शामिल लोगों को कड़ी सजा दी जाय तो शायद मिलावट खोरी में अंकुश लग सकता है। पर वैसा होता नहीं। चीन जैसे देश में मिलावट को संगीन अपराध माना जाता है और वहां इस प्रकार के कार्य करने वाले व्यक्ति यदि दोषी पाये जाते है तो उन्हें मौत की सजा दिये जाने का प्रावधान है। इसके उल्टे भारत में न्यायालय द्वारा मिलावट पर अनेक अवसरों पर चिंता तो प्रदर्शित की जाती है वास्तविकता के धरातल पर उसका सहीं तौर पर पालन नहीं होने से मामला आयाराम गयाराम का हो जाता है। देश के सुप्रीम कोर्ट ने तो इस मामले में वर्तमान कानून में सुधार लाकर उसे और कड़े बनाने में जोर दिया है। ताकि मिलावट खोरी जैसे हरकतों पर रोक लगाई जाये। केन्द्र हो या राज्य की सरकारें मिलावट की बुराईयां गिनाकर अपने कार्यो की इतिश्री कर लेती है। आम उपभोक्ता चाहे वह अमीर हो या गरीब या मध्यम वर्गीय वह तो यही चाहता है कि उसे भी भले दी दाम ज्यादा देना पड़े पर जो खाद्य पदार्थ वह ले रहा है वह सही हो। ताकि जो चीज वह खाये उसका शरीर के भीतर कोई प्रतिकूल प्रभाव न बन पाये। चांवल हुआ मिठाईयां हुई दाल हुई या वैसे ही खाद्य पदार्थ ऐसी चीजें जिसमें मिलावट कर व्यापारी अपनी तिजोरी का वजन बढ़ाने में ही लगे रहते है। उनको इस बात से कोई सरोकार नहीं कि जो काम वह कर रहे है वह अपने उन उपभोक्ताओं के साथ विश्वासघात है जो उनसे अच्छा समान होने की शर्त पर खरीदते है। इसमें सुधार के लिये आवश्यक है कि जिस प्रकार से सरकारे साफ सफाई अभियान को लेकर जनजागृति ला रही है उसी प्रकार से मिलावटखेारी के खिलाफ भी जनजागृति की आवश्यकता है। ताकि इस बुराई पर मजबूती के साथ रोक लगाई जाये। आये दिन फैलने वाले नये नये संक्रमण रोग का एक कारण खान पान में मिलावट भी है। जो शरीर के भीतर जाकर नये रोगों को जन्म देती है और शरीर के रोग प्रतिशोधक क्षमता को कमजोर करती है। मिलावट खोरी को जड़ से खत्म करने के लिये उपभोक्ताओं को भी सरकारी प्रयासों के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ना होगा और जहां भी मिलावट की सूचनाएं मिलती है उसे विधिवत रूप से संबंधित सरकारी विभाग के पास पहुंचाया जाय ताकि इस बीमारी पर अंकुश लगाया जा सके। इस समय दीपावली का प्रकाश पर्व हमारे सर पर है जिसमें सर्वाधिक मिठाईयों का लेन देन होता है। इसमें भी शातिर दिमाग के व्यापारी तरह तरह के ऐसी चीजों की मिलावट करते है जिससे शरीर को लाभ कुछ नहीं पर हानि बहुत हो जाती हैं। तरह तरह के रंगों पर मिलने वाली मिठाइयों के खरीदने के पहले उपभोक्ताओं को सजगता का परिचय देना चाहिए ताकि मिलावटी खाद्य पदार्थ के सेवन से बचें। मिलावट खोरी समाज और शरीर दोनों के लिये अभिशाप है। जिन विभागों के जिम्मे इस पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी है उन विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को भी छोटे से आर्थिक लाभ के चक्कर में जन जीवन के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाले लोगों को संरक्षण न देकर उनके खिलाफ ठोस कार्यवाही करना चाहिये। क्योंकि जिस प्रकार से वर्तमान समय हमारे देश में मिलावट खोरी का बोल बाला बढ़ा है उसके कारण ही आज मानव नये नये बीमारियों का शिकार हो रहा है जिसका ईलाज कई बार डाक्टरों के पास भी नहीं होता। मिलावटी चीज खाने का असर लीवर किडनी के साथ साथ शरीर के भीतर दूसरे अंगों पर होता है और जो अच्छे खासे व्यक्ति को पलक झपकते ही बीमार बना देती है।

राष्ट्र रक्षा और बेटियों की सुरक्षा का लें संकल्प
प्रभुनाथ शुक्ल
भारत वासियों के लिए यह अजब संयोग है कि स्वाधीनता दिवस यानी 15 अगस्त और रक्षाबंधन एक ही दिन मनाया जाएगा। दोनों महापर्व एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है। एक हमें जहां त्याग और बलिदान की सीख देता हैं वहीं दूसरा बुराईयों और आसुरी प्रवृत्तियों से समाज को सुरक्षित रखने के लिए अपने दायित्वों की याद दिलाता है। ऐसी स्थिति में हमें स्वाधीनता दिवस और रक्षाबंधन को नए नजरिए और नयी सोच के साथ मनाना चाहिए।देश और समाज की स्थितियां बदल चुकी हैं। इस बार का जश्न-ए-आजादी और रक्षाबंधन विशेष महत्व रखता है। कश्मीर जैसे मसले का एक झटके में समाधान निकाल देश ने बड़ा काम किया है। इस फैसले पर हमें राजनीति नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जब देश सुरक्षित रहेगा तो हमरा अस्तित्व भी बचा रहेगा। बदलते दौर में हमारी सामाजिक मान्यताएं और समस्याएं भी बदली हैं। इस तरह की समस्याओं के समाधान में हमारे पर्व बेहद सहायक हो सकते हैं। क्योंकि यह हमारे धार्मिक एंव सांस्कृतिक सरोकार से जुड़े होते हैं। रक्षाबंधन पर्व का सिर्फ भाई-बहन के रिश्तों तक सीमित नहीं है। यह कुरीतियों से लड़ने का संकल्प है।
स्वाधीनता दिवस और रक्षाबंधन पर्व देश, काल, वातावरण, जाति, धर्म, भाषा, प्रांतवाद की सीमा से अलग है। दोनों महापर्व हिंदुस्तान में एक साथ उमंग और उत्साह के वातावरण में मनाएं जाते हैं। यह हमारी सांस्कृतिक एकता की सबसे बड़ी मिसाल है। हमारी आजादी को 72 साल हो जाएंगे। देश इस यात्रा में आर्थिक, सामाजिक और कई अतंरराष्ट्रीय चुनौतियों का सामाना करते हुए एक सशक्त राष्ट्र के रुप में उभरा है। वैश्विक मंच पर भारत को पूरा सम्मान मिल रहा है। भारत अपनी उपस्थिति को मजबूती से दर्ज करा रहा है। दुनिया भर में उसकी अपनी एक अलग छबि निखरी है। कश्मीर में धारा-370 के खात्में पर पास्कितान हर कूटनीति अपना रहा है लेकिन चीन, अमेरिका, रुस, फ्रांस के साथ कई मुस्लिम देशों की तरफ से उसे मुंह की खानी पड़ी है। संयुक्तराष्ट संघ में उसे कश्मीर मसला उठाने की इजाजत तक नहीं मिली। पाकिस्तानी विदेशमंत्री कुरैशी खुद स्वीकार किया है कि दुनिया भर में हमारे समर्थन में कोई नहीं खड़ा है। जिस कश्मीर को पाकिस्तान अब तक विवादित मसला कहता चला आ रहा था कि आज उसी कश्मीर को पूरी दुनिया भारत का आतंरिक मामला बताते हुए पाकिस्तान को जमींन दिखा दिया है। इस बात को हमें समझना होगा। यह मसला हमारे सियासी नफे-नुकसान से अधिक राष्टवाद और उसकी आत्मा से जुड़ा है। कश्मीर के अलगाव वादियों को भी अपनी निहित सोच से बाहर आना चाहिए। जिसमें आम कश्मीरी का हित हो उस बात पर गंभीरता से विचार कर देश की मुख्यधारा से जुड़ना चाहिए। सरकार की नीतियों में सहभागी बन राष्ट्र निर्माण में एक सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
रक्षाबंधन सिर्फ हिंदुओं का ही नहीं जैन और दूसरे समाज के लोगों को भी पर्व है। सावन की पूर्णिमा को यह मनाया जाता है जिसकी वजह से इसे श्रावणी भी कहा जाता है। इसका धार्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक महत्व है। इस दिन पर्व पर बहनें भाई के की कलाई में रक्षासूत्र यानी रखी बांध तिलक लगा कर आरती उतारती हैं। भाई से अपनी रक्षा का संकल्प लेती हैं। इस रक्षाबध्ंन पर्व पर हमें अपनी सोच को बदलना होगा। बहन की रक्षा के साथ-साथ देश, समाज और बेटियों की रक्षा का भी संकल्प लेना होगा। इसके लिए युवाओं का आगे आना चाहिए। देश में मासूम बेटियों, स्कूली, कामकाजी और दूसरी महिलाओं के साथ बलात्कार जैसी घृणित घटनाएं हो रही हैं। ऐसी दंरिदगी को जड़ से खत्म करने के लिए आगे आना होगा। जब हमारी बहन हमारे हाथ की कलाई पर पवित्र रक्षासूत्र बांध कर रक्षा का संकल्प लेती है तो उसी दौरान हमें पूरे भारत की बेटियों के रक्षा का संकल्प लेना चाहिए। भारत का हर भाई अगर इस स्वाधीनता दिवस पर यह प्रण कर ले तो देश और समाज से इस कलंक का खात्मा हो जाएगा। यह तभी संभव है होगा जब हमारी युवापीढ़ी आगे आए। देश की दूसरी सबसे बड़ी समस्या पर्यावरण संकट है। अगर हर देशवासी यह संकल्प रखे कि आज से हम गंदगी नही फैलाएंगे। हरे पेड़ों की कटान नहीं होगी। जल की बर्बादी पर रोक लाएंगे। फिर तो एक स्वच्छ भारत का निर्माण होगा।
इसी तरह हम बेगारी की समस्या पर भी हद तक काबू पाया सकते हैं। अपने स्तर से अगर कोई व्यक्ति, संस्था, कंपनी युवाओं को रोजगार मुहैया कराने में सक्षम है तो उसे यह जिम्मेदारी राष्टीय दायित्व के रुप में निभानी चाहिए। भ्रष्टाचार न करने , एक दूसरी की पीड़ा में सहयोग करने का संकल्प लेकर भी हम एक अच्छे समाज का निर्माण कर सकते हैं। हमें अपने सैनिकों का बेहद सम्मान करना चाहिए। बहनों को सैनिक भाईयों को काफी तादात में राखियां भेज कर उनके हौसले बढ़ाने चाहिए। क्योंकि जब हम रात में बेखौफ होकर सोते हैं तो हमारे जमवान हमारी सीमा की सुरक्षा में लगे रहते हैं। इस तरह के संकल्प से समाज को चुटकी बजाते बदला जा सकता है। उसके लिए किसी पैसे की या बजट की आश्यकता नहीं है। बस हर देशवासी को अपनी सोच बदलनी होगी। हम राजनेता हों या अफसर, डाक्टर, पत्रकार, अधिवक्ता, कंपनी मालिक हों या संस्थान संचालक, छात्र, शिक्षक, महिलाएं, युवा, किसान या फिर आम या खास। सब मिल कर यह परिवर्तन ला सकते हैं। एक व्यक्ति देश को नहीं बदल सकता। देश का हर नागरिक इस रक्षाबंधन पर राष्टीय भावना के प्रति समर्पित कर ले तो सारी समस्याओं का समाधान निकल आएगा। लेकिन उसके लिए ईमानदार कोशिश करनी पड़ेगी। सिर्फ मंचीय भाषण से कोई सुधार नहीं होना वाला है।
भारत में जब-जब आसुरी शक्तियों का प्रभाव बढ़ा उस दौरान रक्षाबंधन जैसे पवित्र त्यौहार से हमने उस पर विजय पायी। धार्मिक मान्यता के अनुसार जब राजाबलि देवराज इंद्र का सिंहासन यज्ञ के प्रभाव से लेना चाहा तो इंद्राणी ने एक रक्षासूत्र गुरु बृहस्पति के जरिए इंद्र के हाथों बांध दिया। जिसकी वजह से इंद्र की राजाबलि से रक्षा हुई और उसका इंद्रलोक सुरक्षित बच गया। गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने बंग-भंग आंदोलन में रक्षाबंधन पर्व को सामाजिक और राजनैतिक रुप देकर अंग्रेजों के बंगाल विभाजन नीति का विरोध किया था। पवित्र अमरनाथ यात्रा गुरुपूर्णिमा को प्रारंभ होकर इसी दिन खत्म होती है। इसी दिन शिवलिंग अपने संपूर्ण आकार में आता है। उत्तराखंड में इसी दिन ब्राहमणों का उपनयन संस्कार होता है। महाराष्ट में इसे नारियल पूर्णिमां, राजस्थान में चूड़ाराखी बांधने की प्रथा कहते है। उड़ीसा, तमिलनाडू में इसे अवनि अवित्तम कहा जाता है। यूपी के ब्रज में हरियाली तीज के नाम से जाना जाता है। यह पर्व भगवान कृष्ण और द्रौपदी से भी जुड़ा हैं। कहा जाता है जब भगवान ने शिशुपाल का बध किया था तो चक्रसुदर्शन से उनकी अंगुली कट गयी थी। रक्त की धार को बंद करने के लिए द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़ कर बांधा था। मान्यता है जब कौरव सभा में द्रौपदी का चीरहरण किया तो भगवान कृष्ण साड़ियों की लाट लगा दिए थे। इतिहास में भी कई उदाहरण मिलते हैं। रक्षाबंधन के दिन लोग प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भी रक्षासूत्र बांधते हैं। ब्रहमण भी एक दूसरे को रक्षासूत्र बांधते हैं। इस दौरान डाक विभाग राखी भेजने के लिए अपनी सेवा में विशेष सुविधा देता है। यूपी की योगी सरकार ने सरकारी बसों में बहनों के लिए यात्रा छूट दिया है। आइए एक नए उमंग, उत्साह के साथ स्वाधीनता दिवस के साथ रक्षाबंधन पर्व मनाएं। देश की खुशहाली, संवृ़िद्ध और उन्नति के लिए सब मिल कर काम करें। जयहिंद!! जय भारत!! वंदेमातरम्!!!

हम जंग न होने देंगे, विश्व शांति के हम साधक हैं, जंग न होने देंगे
प्रदीप कुमार सिंह
(16 अगस्त अटलजी की पुण्य तिथि पर विशेष ) मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूं? – विश्वात्मा अटल जी ‘विश्व शांति के हम साधक हैं जंग न होने देंगे, युद्धविहीन विश्व का सपना भंग न होने देंगे। हम जंग न होने देंगे..’ इस युगानुकूल गीत द्वारा महान युग तथा भविष्य दृष्टा कवि अटल जी ने सारी मानव जाति को सन्देश दिया था कि विश्व को युद्धों से नहीं वरन् विश्व शांति के विचारों से चलाने में ही मानवता की भलाई है। इस विश्वात्मा के लिए हृदय से बरबस यह वाक्य निकलता है – जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि। विश्व शान्ति के महान विचार के अनुरूप अपना सारा जीवन विश्व मानवता के कल्याण के लिए समर्पित करने वाले वह अत्यन्त ही सरल, विनोदप्रिय एवं मिलनसार व्यक्ति थे। सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी एक कुशल राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक अच्छे वक्ता भी थे।
भले ही 16 अगस्त 2018 में अटल जी इस नाशवान तथा स्थूल देह को छोड़कर विश्वात्मा बनकर परमात्मा में विलीन हो गये। लेकिन उनकी ओजस्वी वाणी तथा महान व्यक्तित्व भारतवासियों सहित विश्ववासियों को युगों-युगों तक सत्य के मार्ग पर एक अटल खोजी की तरह चलते रहो, चलते रहो की निरन्तर प्रेरणा देता रहेगा। चाहे एक विपक्षी नेता की भूमिका हो या चाहे प्रधानमंत्री की भूमिका हो दोनों ही भूमिकाओं में उन्होंने भारतीय राजनीति को परम सर्वोच्चता पर स्थापित किया। संसार में बिरले ही राजनेता ऐसी मिसाल प्रस्तुत कर पाते हैं। जीवन भर अविवाहित रहकर मानवता की सेवा ही उनका एकमात्र ध्येय तथा धर्म था।
अटल जी पूर्व प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई की सरकार में 1977 से 1979 तक विदेश मंत्री रहे। इस दौरान वर्ष 1977 में संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने अत्यन्त ही विश्वव्यापी दृष्टिकोण से ओतप्रोत भाषण दिया था। अटल जी ही पहले विदेश मंत्री थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण देकर भारत को गौरवान्वित किया था। इस भाषण कुछ अंश इस प्रकार थे – अध्यक्ष महोदय, भारत की वसुधैव कुटुम्बकम् की परिकल्पना बहुत पुरानी है। हमारा इस धारणा में विश्वास रहा है कि सारा संसार एक परिवार है। … मैं भारत की ओर से इस महासभा को आश्वासन देना चाहता हूं कि हम एक विश्व के आदर्शों की प्राप्ति और मानव कल्याण तथा उसके गौरव के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे नहीं रहेंगे। अटल जी ने अपने भाषण की समाप्ति ‘‘जय जगत’’ के जयघोष से की थी। इस विश्वात्मा ने ‘‘जय जगत’’ से अपने भाषण की समाप्ति करके दुनिया को सुखद अहसास कराया कि भारत चाहता है, किसी एक देश की नहीं वरन् सारे विश्व की जीत हो। दुनिया को अटल जी के अंदर भारत की विश्वात्मा के दर्शन हुए थे।
अटल जी के इस भाषण में भी उनके विश्व शांति का साधक होने का पता चलता हैं। संयुक्त राष्ट्र में अटल बिहारी वाजपेयी का हिंदी में दिया भाषण उस वक्त काफी लोकप्रिय हुआ था। यह पहला मौका था जब संयुक्त राष्ट्र जैसे शान्ति के सबसे बड़े अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की ‘विश्व गुरू’ की गरिमा का बोध सारे विश्व को हुआ था। संयुक्त राष्ट्र में उस समय उपस्थित विश्व के 193 सदस्य देशों के प्रतिनिधियों को इतना पसंद आया कि उन्होंने देर तक खड़े होकर भारत की महान संस्कृति के सम्मान में जोरदार तालियां बजाकर अपनी हार्दिक प्रसन्नता प्रकट की थी। इस विहंगम तथा मनोहारी दृश्य ने महात्मा गांधी के इस विचार की सच्चाई को महसूस कराया था कि एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा जब दिशा से भटकी मानव जाति सही मार्गदर्शन के लिए भारत की ओर रूख करेगी।
ब्रिटिश शासकों ने जोर-जबरदस्ती से विश्व के 54 देशों में अपने उपनिवेशवाद का विस्तार किया था। मेरे विचार से आधुनिक लोकतंत्र का विचार उसी काल में अस्तित्व में आया तथा विकसित हुआ था। अटल जी लोकतंत्र के प्रहरी थे जब कभी लोकतंत्र की मर्यादा पर आँच आई तो अटल जी ने उसका डटकर मुकाबला किया। इसके साथ ही उन्होंने कभी भी राजनीतिक और व्यक्तिगत संबंधों को मिलाया नहीं। 21वीं सदी में इस विश्वात्मा के दिखाये मार्ग में आगे बढ़ते हुए हमें लोकतंत्र को देश की सीमाओं से निकालकर वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था (विश्व संसद) का स्वरूप प्रदान करना चाहिए। लोकतंत्र की स्थापना मानवता की रक्षा के लिए ही की गयी थी। अतः राज्य, देश तथा विश्व से मानवता सबसे ऊपर है।
यूरोप के 27 देश जो कभी आपस में युद्धांे की विभीषका में बुरी तरह से फंसे थे। उन्होंने लोकतंत्र को देश की सीमाओं से निकालकर लोकतांत्रिक यूरोपिन यूनियन की स्थापना कर ली है। इसके अन्तर्गत इन देशों ने मिलकर अपनी एक यूरोपियन संसद, नियम-कानून, यूरो मुद्रा, वीजा से मुक्ति आदि कल्याणकारी कदम उठाकर अपने-अपने देश के नागरिकों को आजादी, समृद्धि तथा सुरक्षा का वास्तविक अनुभव कराया है। साथ ही दकियानुसी विचारकों की इस शंका को झूठा साबित कर दिया कि यूरोप के 27 देशों में आने-जाने के लिए वीजा से मुक्ति देने से यूरोप के अधिकांश लोग लंदन तथा पेरिस जैसे विकसित महानगरों की ओर भागेगे जिससे भारी अराजकता तथा अफरा-तफरी मच जायेगी।
अटल जी सर्वाधिक नौ बार सांसद चुने गए थे। वे सबसे लम्बे समय तक सांसद रहे थे और श्री जवाहरलाल नेहरू व श्रीमती इंदिरा गांधी के बाद सबसे लम्बे समय तक गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी। अटल जी विश्व शांति के पुजारी के रूप में भी जाने जाते हैं। उनके द्वारा सारी दुनिया में शांति की स्थापना हेतु कई कदम उठाये गये। अत्यन्त ही सरल स्वभाव वाले अटल जी को 17 अगस्त 1994 को वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित किया गया। उस अवसर पर अटल जी ने अपने भाषण में कहा था कि ‘‘मैं आप सबको हृदय से धन्यवाद देता हूं। मैं प्रयत्न करूगा कि इस सम्मान के लायक अपने आचरण को बनाये रख सकूं। जब कभी मेरे पैर डगमगायें तब ये सम्मान मुझे चेतावनी देता रहे कि इस रास्ते पर डांवाडोल होने की गलती नहीं कर सकते।’’
25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जन्में अटल जी ने राजनीति में अपना पहला कदम 1942 में रखा था जब ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के दौरान उन्हें व उनके बड़े भाई प्रेम जी को 23 दिन के लिए गिरफ्तार किया गया था। अटल जी के नेतृत्व क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह एनडीए सरकार के पहले ऐसे गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे जिन्होंने बिना किसी समस्या के 5 साल तक प्रधानमंत्री पद का दायित्व बहुत ही कुशलता के साथ निभाया।
उनकी प्रसिद्ध कविताओं की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं – ‘बाधाएँ आती हैं आएँ, घिरें प्रलय की घोर घटाएँ, पावों के नीचे अंगारे, सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ, निज हाथों में हँसते-हँसते, आग लगाकर जलना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा।’, हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं गीत नया गाता हूं, मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?, ‘हे प्रभु! मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना, गैरों को गले न लगा सकूँ, इतनी रूखाई कभी मत देना’ से उनकी अटूट संकल्प शक्ति तथा मानवीय उच्च मूल्यों का पता चलता है।
अटल जी सदैव दल से ऊपर उठकर देशहित के बारे में सोचते, लिखते और बोलते थे। उनकी व्यक्तित्व इस प्रकार का था कि उनकी एक आवाज पर सभी देशवासी एक जुट होकर देशहित के लिये कार्य करने के लिये सदैव उत्साहित रहते थे। उनके भाषण किसी चुम्बक के समान होते थे, जिसको सुनने के लिये लोगों का हुजूम बरबस ही उनकी तरफ खिंचा आता था। विरोधी पक्ष भी अटल जी के धारा प्रवाह और तेजस्वी भाषण का कायल रहा है। अटल जी के भाषण, शालीनता और शब्दों की गरिमा का अद्भुत मिश्रण था।
अटल व्यक्तित्व वाले हमारे पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल जी हमेशा अपने देशवासियों के साथ ही सारे विश्व के लोगों के हृदय एवं उनकी यादों में सदैव अमर रहेंगे। हमारा मानना है कि अपने जीवन द्वारा सारे विश्व में अटल जी एक कुशल राजनीतिज्ञ व श्रेष्ठ वक्ता के साथ ही विश्व मानवता के सबसे बड़े पुजारी के रूप में अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे हैं। अपने देश की भाषा, अपने देश की ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की महान संस्कृति पर गर्व करने वाले विश्व शांति के साधक माननीय अटल जी के प्रति हम अपनी हार्दिक श्रद्धा एवं सुमन उनकी प्रिय कविता ‘‘विश्व शांति के हम साधक हैं, जंग न होने देंगे’’ के द्वारा सादर अर्पित करते हैं:-
हम जंग न होने देंगे! विश्व शांति के हम साधक हैं, जंग न होने देंगे! कभी न खेतों में फिर खूनी खाद फलेगी, खलिहानों में नहीं मौत की फसल खिलेगी, आसमान फिर कभी न अंगारे उगलेगा, एटम से नागासाकी फिर नहीं जलेगी, युद्धविहीन विश्व का सपना भंग न होने देंगे। जंग न होने देंगे। हथियारों के ढेरों पर जिनका है डेरा, मुँह में शांति, बगल में बम, धोखे का फेरा, कफन बेचने वालों से कह दो चिल्लाकर, दुनिया जान गई है उनका असली चेहरा, कामयाब हो उनकी चालें, ढंग न होने देंगे। जंग न होने देंगे।
हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी, हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी, हमने छेड़ी जंग भूख से, बीमारी से, आगे आकर हाथ बटाए दुनिया सारी। हरी-भरी धरती को खूनी रंग न लेने देंगे, जंग न होने देंगे। भारत-पाकिस्तान पड़ोसी, साथ-साथ रहना है, प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है, तीन बार लड़ चुके लड़ाई, कितना महँगा सौदा, रूसी बम हो या अमेरिकी, खून एक बहना है। जो हम पर गुजरी, बच्चों के संग न होने देंगे। जंग न होने देंगे।
वर्तमान में विश्व की दयनीय सच्चाई यह है कि विश्व न्यायालय के तराजू के एक पलड़े में सुरक्षा के नाम पर देशों द्वारा बनाये गये हजारों की संख्या में घातक तथा मानव संहारक परमाणु बमों का भारी जखीरा रखा है तो दूसरे पलड़े में विश्व भर के ढाई अरब बच्चों को सुरक्षित भविष्य है। मानव जाति को तय करना है कि आखिर हमारे शक्तिशाली देशों के माननीय राष्ट्राध्यक्ष विश्व को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? क्या उन्हें मानव सम्यता की यात्रा की अगली मंजिल ठीक-ठीक पता है? इस महाप्रश्न को संसार के प्रत्येक जागरूक नागरिक को समय रहते मानवीय ढंग से बहुत सोच समझकर हल करना है! एक भारतीय तथा विश्व नागरिक होने के नाते मेरे विचार से मानव जाति की अन्तिम आशा विश्व संसद तथा उसके प्रभावशाली विश्व न्यायालय के गठन पर टिकी है। किसी महापुरूष ने कहा है कि अभी नहीं तो फिर कभी नहीं!

नए कश्मीर का सूत्रपात
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
दिल्ली के नेताओं और अफसरों को आशंका थी कि ईद के दिन कश्मीर में घमासान मचेगा। यह आशंका 14 और 15 अगस्त के लिए भी बनी हुई है लेकिन यह लेख लिखे जाने तक कश्मीर से कोई भी अप्रिय खबर नहीं आई है। मैं प्रायः टेलिविजन नहीं देख पाता हूं लेकिन आज घनघोर व्यस्तता के बावजूद दिन में चार-छह बार उसे देखा, क्योंकि मुझे भी शंका थी कि कश्मीर में कुछ भी हो सकता है, हालांकि तीन दिन पहले मैंने लिखा था कि हमारे कश्मीरी भाई-बहनों को यह ईद एतिहासिक शैली में मनानी चाहिए, क्योंकि 5 अगस्त को उनकी फर्जी हैसियत खत्म हुई है और अन्य भारतीयों की तरह उन्हें सच्ची आजादी मिली है। कश्मीर के आम लोग तो बहुत शालीन, सुसंस्कृत और शांतिप्रिय हैं लेकिन नेताओं और गुमराह आतंकियों की मजबूरी है कि वे लोगों को उकसाते हैं और हिंसा भड़काते हैं। लेकिन कितना गजब हुआ है कि आज पूरा कश्मीर खोल दिया गया है, हजारों लोग मस्जिदों में जाकर नमाज़ पढ़ रहे हैं और बाजारों में खरीदी कर रहे हैं किंतु कहीं से कोई तोड़-फोड़ या मार-पीट की खबर नहीं आई है। हो सकता है कि ऐसा प्रेस, फोन, टेलिविजन आदि पर लगे प्रतिबंधों के कारण हो रहा है। विदेशी अखबार और रेडियो कुछ बता जरुर रहे हैं लेकिन यदि कोई बड़ी घटना घटी होती तो भारत सरकार के लिए उसे छिपाना मुश्किल था। फोन तो कुछ घंटों के लिए चालू थे ही। तो इस शांति और व्यवस्था का अर्थ क्या हम यह लगाएं कि कश्मीर की जनता ने धारा 370 और 35 ए के खात्मे को पचा लिया है ? उसने उसका बुरा नहीं माना है ? यदि ऐसा होता तो सारे नेताओं को भी छोड़ दिया जाता लेकिन सरकार के विरोधियों को भी मानना पड़ेगा कि ईद के मौके पर कश्मीरियों के लिए केंद्र सरकार और राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने जैसी प्रचुर सुविधाएं जुटाई हैं, उन्होंने कश्मीरियों के दिलों में सदभावना जरुर पैदा की होगी। जो भी हो, अभी 14 अगस्त और 15 अगस्त को भी आना है। एक पाकिस्तान-दिवस और दूसरा भारत-दिवस है। यदि इन दोनों दिनों में कोई दुर्घटना नहीं होती है तो माना जा सकता है कि कश्मीर में एक नए युग का सूत्रपात हो गया है।

बाढ़ प्राकृतिक आपदा नहीं हमारी देन
सनत कुमार जैन
देश के कई राज्यों में इन दिनों बाढ़ के हालात हैं। पूर्वोत्तर राज्यों सहित बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों के कई इलाके बाढ़ के पानी से लबालब हैं। कहीं बांध या तटबंध टूट कर बाढ़ से होती तबाही को विकराल रूप दे रहे हैं। अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और हजारों लोग बेघर हैं। माना कि प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह नहीं रोका जा सकता, किंतु उच्च स्तर की तकनीक और बेहतर प्रयासों से उसके प्रभावों को न्यूनतम अवश्य किया जा सकता है। इस साल कई महीने पहले ही सामान्य मानसून के साथ ही बाढ़ की आशंका भी व्यक्त की गई थी, लेकिन बाढ़ की आशंका वाले राज्यों में वहां की सरकारों ने इस आपदा से निपटने के लिए ऐसी तैयारियां नहीं की, जिनसे लोगों को उफनती नदियों के प्रकोप से काफी हद तक बचाया जा सकता था।
चिंता की बात है कि विश्वभर में बाढ़ के कारण होने वाली मौतों का पांचवां हिस्सा भारत में ही होता है और बाढ़ की वजह से हर साल देश को हजारों करोड़ का नुकसान होता है। बाढ़ जैसी आपदाओं के चलते जान-माल के नुकसान के साथ-साथ लाखों हेक्टेयर क्षेत्र में फसलों के बर्बाद होने से देश की अर्थव्यवस्था पर इतना बुरा प्रभाव पड़ता है कि उस राज्य का विकास सालों पीछे चला जाता है। पंजाब में पिछले दिनों घग्गर नदी पर बना बांध टूट जाने से करीब दो हजार एकड़ कृषि भूमि जलमग्न हो गई। बिहार के दरभंगा और मधुबनी में भी कमला बलान बांध कई जगहों से टूट गया व बड़े हिस्से को अपनी जद में ले लिया। सरकारी तंत्र द्वारा हर साल बाढ़ जैसे हालात पैदा होने के बाद बांधों या तटबंधों की कामचलाऊ मरम्मत कर उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है और अगले साल फिर बाढ़ का तांडव सामने आने पर प्राकृतिक आपदा की संज्ञा देने की कोशिशें हो जाती हैं।
हालात इतने खराब हो चुके हैं कि जब भी औसत से ज्यादा बारिश हो जाती है तो बाढ़ आ जाती है। दरअसल हम अभी तक वर्षा जल संचयन के लिए कोई कारगर योजना नहीं बना सके हैं। हम समझना ही नहीं चाहते कि सूखा और बाढ़ जैसी आपदाएं पूरी तरह एक-दूसरे से ही जुड़ी हैं और इनका स्थायी समाधान जल प्रबंधन की कारगर योजनाएं बना कर और उन पर ईमानदारीपूर्वक काम करके ही संभव है।
महाराष्ट्र हो या असम अथवा देश के अन्य राज्य, हर साल जब भी किसी राज्य में बाढ़ जैसी कोई आपदा एक साथ करोड़ों लोगों के जनजीवन को प्रभावित करती है तो केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री, मुख्यमंत्री बाढग़्रस्त क्षेत्रों के हवाई दौरे करते हैं और सरकारों द्वरा बाढ़ पीडि़तों के लिए राहत राशि देने की घोषणाएं की जाती हैं। लेकिन जैसे ही बाढ़ का पानी उतरता है, सरकारी तंत्र बाढ़ के कहर को बड़ी आसानी से भुला देता है। पिछले 50 सालों में बाढ़ पर ही सरकारों ने 170 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा धनराशि खर्च कर डाली। लेकिन इतना कुछ होने के बाद भी अगर हालात सुधरने के बजाय साल दर साल बदतर होते जा रहे हैं तो समझा जा सकता है कि कमी आखिर कहां है! सीधा-सा अर्थ है कि बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम को संचालित करने वाले लोग अपना काम जिम्मेदारी, ईमानदारी और मुस्तैदी के साथ नहीं कर रहे थे।
बहरहाल, यदि हम चाहते हैं कि देश में हर साल ऐसी आपदाएं भारी तबाही न मचाएं तो हमें कुपित प्रकृति को शांत करने के सकारात्मक उपाय करने होंगे और इसके लिए प्रकृति के विभिन्न रूपों जंगल, पहाड़, वृक्ष, नदी और झीलों इत्यादि की महत्ता समझनी होगी। वरना हमारी लापरवाही की भेंट चढ़कर प्रकृति नष्ट हो जाएगी। बाढ़ की विभीषिका हमारी लापरवाही की देन है। अंधाधुंध विकास के नाम पर हम प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ कर रहे हैं, वही बदले में पा भी रहे हैं, मगर चेत एक बार भी नहीं रहे।

बायोडीजल को बढ़ावा देना सही फैसला
सिद्धार्थ शंकर
सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने एक योजना की शुरुआत की जिसके तहत वे 100 शहरों में इस्तेमाल हो चुके खाने के तेल से बायोडीजल प्राप्त करेंगी। कंपनियां इसके लिए प्राइवेट कंपनियों से समझौता करेंगी, जो बायोडीजल बनाने के लिए प्लांट लगाएंगी। शुरुआत में तेल कंपनियां बायोडीजल 51 रुपए प्रति लीटर लेंगी और दूसरे साल इसकी कीमत ५२.७ रुपए लीटर होगी और तीसरे साल इसकी कीमत बढक़र ५४.५ रुपए प्रति लीटर हो जाएगी। भारत में हर साल २,७०० करोड़ लीटर कुकिंग ऑयल का इस्तेमाल होता है, जिसमें से १४० करोड़ का होटल्स, रेस्त्रां और कैंटीन से एकत्र किया जा सकता है। इनसे हर साल करीब ११० करोड़ लीटर बायोडीजल बनाया जाएगा।
बायोडीजल पारंपरिक या जीवाश्म डीजल के मुकाबले एक वैकल्पिक ईंधन है। इसे सीधे तौर पर वनस्पति तेल, पशुओं के वसा, तेल और खाना पकाने के अपशिष्ट तेल से बनाया जाता है। इन तेलों को बायोडीजल में परिवर्तित करने के लिए प्रयक्त प्रक्रिया को ट्रान्स-इस्टरीकरण कहा जाता है। बायोडीजल जैविक स्त्रोतों से प्राप्त डीजल के जैसा ही गैर-परंपरागत ईंधन होता है। इसका नवीनीकरण ऊर्जा स्त्रोतों से बनाया जाता है। यह परंपरागत ईंधनों का एक स्वच्छ विकल्प है। इसमें कम मात्रा में पेट्रेलियम पदार्थ मिलाया जाता है और विभिन्न प्रकार की गाडि़य़ों में प्रयोग किया जाता है। सबसे खास बात यह कि ये विषैला नहीं होता है और इसी के साथ ही बायोडिग्रेडेबल भी होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये भविष्य का ईंधन है। इस प्रक्रिया में वनस्पति तेल या वसा से ग्लीसरीन को निकालना होता है। इसके बाद इसमें मेथिल इस्टर और ग्लीसलीन आदि सह-उत्पाद भी मिलाए जाते हैं। बायोडीजल में हानिकारक तत्व सल्फर और आरोमैटिक्स नहीं मिलाए जाते हैं जैसा कि परम्परागत ईंधनों में होता है। बायोडीजल को बनाने के लिए जरूरी चीजें जेट्रोफा तेल, मेथेनोल, सोडियम हाइड्रोक्साइड होती हैं।
बायोडीजल भारत के लिए इस लिहाज से भी हम है क्योंकि भारत में पेट्रोलियम जरूरतों का केवल २० फीसदी हिस्सा ही पैदा होता है। बाकी का पेट्रोलियम विदेशों से आयात किया जाता है। जिस रफ्तार से हमारे देश में पेट्रोलियम पदार्थों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, उस रफ्तार से देश में तेल का भंडार अगले ४० से ५० सालों में खत्म हो जाएगा।
इसलिए भविष्य में जैविक ईंधन के स्थान पर जैविक ईंधन का विकास करना जरूरी है। इस जरूरत को जैट्रोफा नाम का पौधा खत्म कर सकता है। ये पौधा देश के विभिन्न भागों में बहुतायत में उगने लगा है। इसके कई अन्य नामों से भी जाना जाता है, जैसे ट्रोफा मिथाईल ईस्टर, रतनजोत, बायोडीजल, बायोफ्यूल जैव ईंधन, जैव डीजल, जैट्रोफा करकास। ये पौधा कई सालों तक फल देता है। इसके बीज में लगभग ४० फीसदी तेल होता है। इससे डीजल बनाने के लिए वास्तविक डीजल में लगभग १८ फीसदी जैट्रोफा के बाजों से प्राप्त तेल को मिलाकर बायोडीजल बनाया जाता है। इस प्रकार बने बायोडीजल को डीजल चलित किसी भी इंजन जैसे ट्रक, बस, ट्रैक्टर, जेनरेटर आदि में इस्तेमाल किया जा सकता है। जैट्रोफा का पौधा एक बार उगने के बाद ८ से १० सालों तक लगातार बीज देती रहता है।
आज सडक़ों पर दिखाई देने वाली गाडिय़ों से लेकर बिजली के अभाव में प्रयुक्त जनरेटर तक के इंजन में ईंधन के रूप में ९५ प्रतिशत जीवाश्मश्म ईंधन अर्थात पेट्रोलियम-डीजल का उपयोग होता है। यह ईंधन नवीकरणीय न होने के कारण अपर्याप्त, बल्कि भविष्य में प्राप्त भी नहीं होगा। दूसरी ओर इसके प्रयोग से निकलने वाले धुएं में कई ऐसे कारक हैं, जो जैव-पारिस्थितिकी के संतुलन को बिगाडऩे में अहम भूमिका निभाते हैं। डीजल इंजन के उपयोग हेतु डीजल का प्रतिस्थापन के रूप में सामने आ चुका है, बायोडीजल।
भारत सरकार द्वारा जैव ईंधन पर एक नई परिवर्धित राष्ट्रीय नीति लाने की कोशिश हो रही है। तत्कालीन सरकार के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा ११ सितम्बर, २००८ को मंजूरी दी गई थी। इस राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के अनुसार, २०१७ से जैव ईंधन के रूप में २० प्रतिशत मिश्रण के लिए बायोइथेनॉल और बायोडीजल प्रस्तावित किया गया था। इसमें घोषित नीति के तहत देश में उपजाऊ भूमि में पौधरोपण को प्रोत्साहन देने की बजाय सामुदायिक, सरकारी, जंगली बंजर भूमि पर जैव ईंधन से सम्बन्धित पौधरोपण को बढ़ावा दिया जाएगा तथा व्यर्थ, डिग्रेडेड एवं सीमान्त भूमि में होने वाले अखाद्य तेल बीजों से बायोडीजल का उत्पादन किया जाएगा।
वर्ष २०११ में अमेरिकन खनन सुरक्षा एवं स्वास्थ्य प्रशासन विभाग के एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि बायोडीजल मिश्रित डीजल के उपयोग से भूमिगत जेनसेट में पार्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है। जिसका सकारात्मक प्रभाव श्रमिकों के स्वास्थ्य पर दिखाई दिया। बायोडीजल के उपयोग से इंजन संचालन भी परिवर्धित होती है। इससे इंजन रख-रखाव पर आने वाले खर्चे को कम किया जा सकता है। इंजन की आयु में बढ़ोतरी होती है। पर्यावरण पर भी बायोडीजल का सकारात्मक प्रभाव सिद्ध किया जा चुका है। इस तरह बायोडीजल भविष्य का एक महत्वपूर्ण ईंधन विकल्प के रूप में स्वयं को स्थापित कर रहा है।

क्या इसी आधार पर राम मंदिर निर्माण संभव हैं ?
डॉ. अरविन्द प्रेमचंद जैन
जम्मू कश्मीर से 370 धारा को हटाने का कार्य बहुत स्तुत्य और सराहनीय हैं। पंडित नेहरू की बहुत बड़ी गलतियों को सुधारने का मौका मिला, सरकार, मोदी जी, अमित शाह और उनकी टीम का बहुत साहसिक कदम हैं। इस कदम को उठाने का साहस कोई सामान्य कार्य नहीं था। इसके दूरगामी प्रभाव को भी दृष्टिगत रखकर यह कदम उठाया जिसके लिए बधाई के पात्र हैं। यह दृढ इच्छाशक्ति का प्रतीक और उससे से अधिक संसद में बहुमत का होना।
हर निर्णय को दो पक्ष होते हैं और आप जब कठोर कदम उठाते हैं तो जो प्रभावित होते हैं उनकी असहमति होना लाज़िमी हैं। पर कुछ को खुश करने के लिए जनमत की उपेक्षा नहीं की जाती हैं। जब कोई कार्य जान हित में लिया जाता हैं तब कुछ विरोध का होना जरूरी हैं। आप सब को खुश नहीं कर सकते हो।। यह बहुत पुराना असाध्य रोग था। जब चिकित्सा असफल होती हैं तब शल्य क्रिया जरुरी होती हैं।
हर सिक्के को दो पहलु होते हैं। समस्या आज से ७० वर्ष जिन परिस्थियों में की गयी थी उनका पोस्ट मोर्टेम बहुत हुआ पर होता यह हैं की जिस समय जो स्थितियां थी उसके अनुरूप निर्णय लिया गया होगा और तत्कालीन स्थितियों में भी निर्णय होते हैं वे उस समय की परिस्थिति के अनुकूल होते हैं। और जो काम करता हैं उसकी ही आलोचना होती हैं जो कोई काम नहीं करेगा उसकी भी आलोचना होती हैं।
सादगी नौजवानी की मौत हैं
कुछ न कुछ इलज़ाम होना चाहिए।
किसी कार्य की सफलता के लिए सात बातें होना जरूरी हैं –द्रव्य क्षेत्र काल भव भाव निमित्त और उपादान। इसके अलावा जो काम जिस समय होना होता हैं वह होकर रहता हैं उसके लिए अनुकूलता मिली, जैसे पूर्ण बहुमत, सेना की मौजूदगी, निर्णय, बहुमत सहयोग और समय की अनुकूलता। दूसरा जिसके भाग्य में श्रेय लिखा रहता हैं उसे मिलता हैं। ये सब अपने अपने पुण्य पाप का ठाठ हैं। इसमें कोई को भी अहम भाव नहीं करना और रखना चाहिए। बहुत बड़ी उपलब्धि हैं
जिस ढंग से यह मामला निपटाया हैं अब इस तरीके से राम मंदिर निर्माण भी होगा। न्यायालय का निर्णय स्पष्ट नहीं होगा, होगा तो उस स्थान के तीन हिस्से होंगे और एक पक्ष अपना हिस्सा नहीं छोड़ेगा और विवाद जाति का हैं उसमे अनेक विघ्न संतोषी बैठे हैं जो निर्माण नहीं होने देंगे, तो उसके लिए एक ही मार्ग हैं वहां पर त्रिस्तरित सुरक्षा कवच रखेंगे यानी पूरा क्षेत्र इस प्रकार की नाका बंदी में रखकर तत्काल निर्माण करेंगे, कारण इस निर्णय से हौसला अफ़ज़ाई हो गया हैं। और समझ लिया हैं की बहुमत के आगे कोई कुछ नहीं कर सकता और मोदी जी और सरकार की दृढ इच्छाशक्ति हैं तो अब कोई अड़चन नहीं होगी।
इसके बाद उत्तर प्रदेश को भी पूर्वांचल बनाना हैं कारण वर्तमान में बहुत बड़ा राज्य होने से उसका रख रखाव सही ढंग से नहीं होने से समस्या होती हैं, हो सकता हैं पश्चिमांचल और पूर्वांचल बनाएंगे जिससे दो मुख्य मंत्री और बन जायेंगे और सत्ता हासिल करने में सुविधा होगी और और कई राज्यपाल बनाकर उपकृत करेंगे।
इसी प्रकार पश्चिम बंगाल को भी बोडो लैंड से विभक्त करके उसके भी दो भाग बना सकते हैं। जिससे उन प्रांतों में शांति के साथ विकास के दरवाज़े खुल जायेंगे और सत्ता काबिज़ होने में सहूलियत होगी।
क्योकि एक प्रयोग सफल होने पर उससे प्रेरित होकर अन्य प्रयोग करने में कोई हानि नहीं हैं। होना भी चाहिए। जिनको अपने भविष्य की चिंता हैं उन्हें अभी समयानुकूल मिला हैं सो मत चूको सुलतान। समय होत बलवान। भविष्य अनिश्चितता का होता हैं। इसीलिए गर्म तवे पर चोट जरूर मारो।।
अभी पुण्य का ठाठ हैं। मिटटी छुओ सोना होता हैं और कभी कभी सोना छुओ मिटटी होने लगता हैं। इसीलिए अभी समय अनुकूल हैं और कम हैं, तो कुछ मुख्य समस्याओं को निपटालो।
तुमको हो सलाम, क्योकि किया तुमने कमाल,
तुमने जो किया उसने बताया तुम्हारा हुनर
हुनर की अपनी अदा रही
जिस पर सब फ़िदा हुए
जो किया अच्छा किया,
जो होगा वह भविष्य के गर्भ में
भविष्य वर्तमान से बनता हैं
और वर्तमान बहुत अस्थायी होता हैं
यानि हम भविष्य में जीने की ललक
पर भविष्य अनिश्चित होता हैं
वर्तमान सुदृढ़ हो।

मध्यप्रदेश और गुजरात के बीच नर्मदा को लेकर फिर शुरू हुआ विवाद
अजित वर्मा
मध्यप्रदेश में भाजपा की सत्ता जाने और कांग्रेस की सत्ता आने के बाद एक बार फिर गुजरात में नर्मदा पर बने सरदार सरोवर बांध को लेकर विवाद की स्थिति बनना शुरू हो गयी है। गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने आरोप लगाया है कि दोनों राज्यों के बीच 40 वर्षों में नर्मदा जल के बंटवारे को लेकर कभी विवाद नहीं हुआ, लेकिन मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार नर्मदा जल की सप्लाई को लेकर गंदी राजनीति कर रही है। वहीं गुजरात के मुख्यमंत्री को मध्यप्रदेश ने नर्मदा का पानी बंद करने की चेतावनी दी है। मध्यप्रदेश सरकार का आरोप है कि उसके द्वारा दिए जा रहे पानी का गुजरात सरकार संग्रह कर रही है। जिसकी वजह से मध्यप्रदेश के कई गांव डूब क्षेत्र में चले जाएंगे।
नर्मदा बांध के पानी को लेकर मध्यप्रदेश और गुजरात सरकार के बीच ठन गई है। जानकारी है कि मध्य प्रदेश सरकार कभी भी नर्मदा का पानी गुजरात को देना बंद कर सकती है। अब तक गुजरात और मध्यप्रदेश समेत केन्द्र में भाजपा की सरकार थी, तब तक सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन अब मध्यप्रदेश में सरकार बदल गई है। मध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार ने गुजरात की भाजपा सरकार के खिलाफ कड़ा रुख अपना लिया है। मध्यप्रदेश सरकार का दावा है कि उसके पास गुजरात का पानी बंद करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। उसका कहना है कि जब गुजरात सरकार करार के मुताबिक काम नहीं कर रही तो उसे पानी क्यों दिया जाए। मध्यप्रदेश सरकार का आरोप है कि बिजली उत्पादन के लिए दिए जाने वाला पानी गुजरात सरकार संग्रह कर रही है। मध्यप्रदेश सरकार का आरोप है कि गुजरात सरकार मध्यप्रदेश के लोगों का हित नहीं चाहती। जानकारी के मुताबिक गुजरात सरकार ने नर्मदा बांध पूरी तरह भरने के लिए मध्यप्रदेश से पानी मांगा था। करीब दो साल पहले दिल्ली में हुई बैठक में मध्यप्रदेश और गुजरात सरकार के बीच नर्मदा बांध को भरने को लेकर सहमति बन गई थी। उस वक्त मध्यप्रदेश और गुजरात में भाजपा की सरकारें थीं। सहमति के मुताबिक मध्यप्रदेश से गुजरात को पानी छोड़ा जाने लगा। लेकिन बांध की क्षमता के मुताबिक उसमें पानी बढ़ने से मध्यप्रदेश के डूब क्षेत्र के गांवों में पानी आने लगा।
दरअसल मध्यप्रदेश और गुजरात के बीच हुए करार के मुताबिक मध्य प्रदेश से मिलने वाले पानी से गुजरात बिजली उत्पादन कर मध्य प्रदेश को देगा। परंतु वर्तमान में गुजरात न तो बिजली उत्पादन कर रहा है और न ही नर्मदा बांध से पानी छोड़ रहा है। मध्य प्रदेश से मिलने वाले पानी का गुजरात संग्रह कर रहा है। जिसकी वजह से मध्य प्रदेश के कई गांव डूब क्षेत्र में आ रहे हैं। इन स्थितियों को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने गुजरात को दिए जाने वाला पानी रोकने का फैसला किया है। गुजरात को यदि लगातार पानी दिया गया तो बांध का जलस्तर बढ़ेगा और उसकी वजह से मध्य प्रदेश के गांव डूब जाएंगे। यह तय है कि अब मध्यप्रदेश और गुजरात के बीच नर्मदा के पानी को लेकर विवाद और बढ़ता जायेगा।

कश्मीर अभी इम्तिहान आगे और भी
डॉ नीलम महेंद्
कश्मीर में “कुछ बड़ा होने वाला है” के सस्पेंस से आखिर पर्दा उठ ही गया। राष्ट्रपति के एक हस्ताक्षर ने उस ऐतिहासिक भूल को सुधार दिया जिसके बहाने पाक सालों से वहां आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने में सफल होता रहा लेकिन यह समझ से परे है कि कश्मीर के राजनैतिक दलों के महबूबा मुफ्ती फ़ारूख़ अब्दुल्ला सरीखे नेता और कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष जो कल तक यह कहता था कि कश्मीर समस्या का हल सैन्य कार्यवाही नहीं है बल्कि राजनैतिक है, वो मोदी सरकार के इस राजनीतक हल को क्यों पचा पा रहे हैं। शायद इसलिए कि मोदी सरकार के इस कदम से कश्मीर में अब इनकी राजनीति की कोई गुंजाइश नहीं बची है। लेकिन क्या यह सब इतना आसान था ? घरेलू मोर्चे पर भले ही मोदी सरकार ने इसके संवैधानिक कानूनी राजनैतिक आंतरिक सुरक्षा और विपक्ष समेत लागभग हर पक्ष को साधकर अपनी कूटनीतिक सफलता का परिचय दिया है लेकिन अभी इम्तिहान आगे और भी है।
क्योंकि पाक की घरेलू राजनीति, उसके चुनाव सब कश्मीर के इर्दगिर्द ही घूमते हैं तो नापाक पाक इतनी आसानी से हार नहीं मानेगा। चूंकि भारत सरकार के इस कदम से अब कश्मीर पर स्थानीय राजनीति का अंत हो चुका है और प्रशासन की बागडोर पूर्ण रूप से केंद्र के पास होगी, पाक के लिए अब करो या मरो की स्थिति उत्पन्न हो गई है। शायद इसलिए उसने अपनी प्रतिक्रिया शुरू कर दी है और वो अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान इस ओर आकर्षित करने भी लगा है। हालांकि वैश्विक पटल पर भारत की मौजूदा स्थिति को देखते हुए इसकी संभावना कम ही है कि भारत के आंतरिक मामलों में कोई भी देश दखल दे और पाकिस्तान का साथ दे। बालाकोट स्ट्राइक पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया इसका प्रमाण है।
इसलिए जो लोग इस समय घाटी में सुरक्षा के लिहाज से केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कदमों जैसे अतिरिक्त सैन्य बल की तैनाती, कर्फ़्यू, धारा 144, क्षेत्रीय दलों के नेताओं की नज़रबंदी को लोकतंत्र की हत्या या तानाशाहपूर्ण रवैया कह रहे हैं उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि पाक की कोशिश होगी कि किसी भी तरह से घाटी में कश्मीरियों के विद्रोह के नाम पर हिंसा की आग सुलगाई जाए ताकि वो अंतर्राष्ट्रीय मोर्च पर यह संदेश दे पाए कि भारत कश्मीरी आवाम की आवाज को दबा कर कश्मीर में अन्याय कर रहा है और मानवाधिकारों के नाम पर यू एन और अंर्तराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसे संस्थानों को दखल देने के लिए बाध्य करे। इसलिए केंद्र सरकार के इन कदमों का विरोध करके ना सिर्फ वो पाकिस्तान की मदद कर रहे हैं बल्कि एक आम कश्मीरी के साथ भी अन्याय कर रहे हैं। क्योंकि विगत 70 सालों ने यह साबित किया है कि धारा 370 वो लौ थी जो कश्मीर के गिने चुने राजनैतिक रसूख़ वाले परिवारों के घरों के चिरागों को तो रोशन कर रही थी लेकिन आम कश्मीरी के घरों को आतंकवाद अशिक्षा और गरीबी की आग से जला रही थी। संविधान की धारा 370 और 35 ए ने कश्मीर में अलगाववाद की आग को कट्टरपंथ और जेहाद के उस दावानल में तब्दील कर दिया था कि पूरा कश्मीर हिंसा की आग से सुलग उठा और बुरहान वाणी जैसा आतंकी वहाँ के युवाओं का आदर्श बन गया । जब 21वीं सदी के भारत के युवा स्किल इंडिया और मेक इन इंडिया के जरिए उद्यमी बनकर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भविष्य के भारत की सफलता के किरदार बनने के लिए तैयार हो रहे थे तो कश्मीर के युवा 500 रूपए के लिए पत्थरबाज बन कर भविष्य के आतंकवादी बनकर तैयार हो रहे थे। जी हाँ सेना के एक सर्वे के हवाले से यह बात सामने आई थी कि आज का पत्थर फेंकने वाला युवक ही कल का आतंकवादी होता है। सरकार के इस कदम का विरोध करने वालों से देश जानना चाहता है कि 370 या 35ए से राज्य के दो चार राजनैतिक परिवारों के अलावा किसी आम कश्मीरी को क्या फायदा मिला? यही कि उनके बच्चों को पढ़ने के लिए अच्छे अवसर नहीं मिले? उन्हें अच्छी चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिलीं? हिंसा के कारण वहाँ का पर्यटन उद्योग पनप नहीं पाया? जो छोटा मोटा व्यापार था वो भी आए दिन के कर्फ़्यू की भेंट चढ़ जाता था? क्या हम एक आम कश्मीरी की तकलीफ का अंदाज़ा गृहमंत्री के राज्यसभा में इस बयान से लगा सकते हैं कि वो एक सीमेंट की बोरी की कीमत देश के किसी अन्य भाग के नागरिक से 100 रूपए ज्यादा चुकाता है सिर्फ इसलिए कि वहाँ केवल कुछ लोगों का रसूख़ चलता है? क्या हम इस बात से इंकार कर सकते हैं कि अब जब सरकार के इस कदम से राज्य में निवेश होगा, उद्योग लगेंगे पर्यटन बढ़ेगा तो रोज़गार के अवसर भी बढ़ेंगे खुशहाली बढ़ेगी इससे वो कश्मीर जो अबतक 370 के नाम पर अनेक राजनैतिक कारणों से अलग थलग किया जाता रहा अब देश की मुख्यधारा से आर्थिक रूप से जुड़ सकेगा। इसके अलावा अपने अलग संविधान और अलग झंडे के अस्तित्व के कारण जो कश्मीरी आवाम आजतक भारत से अपना भावनात्मक लगाव नहीं जोड़ पाई अब भारत के संविधान और तिरंगे को अपना कर उसमें निश्चित रूप से एक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का आगाज़ होगा जो धीरे धीरे उसे भारत के साथ भावनात्मक रूप से भी जोड़ेगा। बस जरूरत है आम कश्मीरी के उस नैरेटिव को बदलने की जो बड़ी चालाकी से सालों से उसे मीठे जहर के रूप में दिया जाता रहा है भारत के खिलाफ भड़का कर जो उसे भारत से जुड़ने नहीं देता। जरूरत है आम कश्मीरी के मन में इस फैसले के पार एक नई खुशहाल सुबह के होने का विश्वास जगाने की, उनका विश्वास जीतने की। कूटनीतिक और राजनैतिक लड़ाई तो मोदी सरकार जीत चुकी है लेकिन उसकी असली चुनौती कश्मीर में सालों से चल रहे इस रणनीतिक युद्ध को जीतने की है।

आदिजन की संस्कृति के प्रति भी सजग रहें
कमल नाथ
विश्व आदिवासी दिवस पर उन सभी जनजातीय बंधुओं को बधाई, जो प्रकृति के करीब रहते हुए प्रकृति की सेवा कर रहे हैं। राज्य सरकार ने आदिजन दिवस पर अवकाश घोषित किया है। हम सब उनका सम्मान करें, जो प्रकृति को हमसे ज्यादा समझते हैं। आदिवासी समाज जंगलों की पूजा करता हैं। उनकी रक्षा करता है। इसी सांस्कृतिक पहचान के साथ समाज में रहते हैं।
वह दिन अब दूर नहीं जब हरियाली और वन संपदा अर्थ-व्यवस्थाओं और देशों की पहचान के सबसे प्रमुख मापदंड होंगे। जिसके पास जितनी ज्यादा हरियाली होगी वह उतना ही अमीर कहलायेगा। उस दिन हम आदिजन के योगदान की कीमत समझ पायेंगे। हम जानते हैं कि बैगा लोग स्वयं को धरतीपुत्र मानते हैं। इसलिए कई वर्षों से वे हल चलाकर खेती नहीं करते थे। उनकी मान्यता थी कि धरती माता को इससे दुख होगा। आधुनिक सुख-सुविधाओं से दूर बिश्नोई समुदाय का वन्य-जीव प्रेम हो या पेड़ों से लिपट कर उन्हें बचाने का उदाहरण हो। जाहिर है कि आदिजन प्रकृति की रक्षक के साथ पृथ्वी पर सबसे पहले बसने वाले लोग हैं। आज हम टंट्या भील, बिरसा मुंडा और गुंडाधुर जैसे उन सभी आदिजन को भी याद करते हैं जिन्होंने विद्रोह करके आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के दांत खटटे कर दिये थे।
हमारी सांस्कृतिक विविधता में अपनी आदिजन की संस्कृति की भी भागीदारी है। आदि संस्कृति प्रकृति पूजा की संस्कृति है। यह खुशी की बात है कि इस साल अंतर्राष्ट्रीय विश्व आदिजन दिवस को आदिजन की भाषा पर केंद्रित किया गया है।
मध्यप्रदेश में हमने निर्णय लिया कि गोंडी बोली में गोंड समाज के बच्चों के लिए प्राथमिक कक्षाओं का पाठ्यक्रम तैयार करेंगे। संस्कृति बचाने के लिए बोलियों और भाषाओं को बचाना जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे आधुनिक ज्ञान और भाषा से दूर रहें। वे अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत भी पढे़ और अपनी बोली को भी बचा कर रखें। अपनी बोली बोलना पिछड़ेपन की निशानी नहीं बल्कि गर्व की बात है।
हमारे प्रदेश में कोल, भील, गोंड, बैगा, भारिया और सहरिया जैसी आदिम जातियाँ रहती हैं। ये पशु पक्षियों, पेड़-पौधों की रक्षा करते हैं। इन्हीं के चित्रों का गोदना बनवाते हैं। गोदना उनकी उप-जातियों, गोत्र की पहचान होती है जिसके कारण वे अपने समाज में जाने जाते हैं। यह चित्र मोर, मछली, जामुन का पेड़ आदि के होते हैं।
जनजातियों के जन्म गीत, शोक गीत, विवाह गीत, नृत्य, संगीत, तीज-त्यौहार, देवी-देवता, पहेलियाँ, कहावतें, कहानियाँ, कला-संस्कृति सब विशेष होते हैं। वे विवेक से भरे पूरे लोग है। आधुनिक शिक्षा से थोड़ा दूर रहने के बावजूद उनके पास प्रकृति का दिया ज्ञान भरपूर है।
मुझसे मिलने वाले कुछ आदिवासी परिवारों ने अपने समाज में आम बोलचाल में आने वाली कहावतों का जिक्र किया। उनके अर्थ इतने गंभीर और दार्शनिक हैं कि आश्चर्य होता है। एक भीली व्यक्ति ने मुझे एक कहावत सुनाई – ‘ऊँट सड़ीने भीख मांगे’। इसका मतलब है कि ऊँट पर चढ़कर भीख मांगने से भीख नहीं मिलती। ऐसे ही एक गोंडी समाज के मुखिया ने एक कहावत बताई कि ‘खाडे खेतो गाभिन गाय, जब जानू जब मूंह मा आये।’ इसका मतलब है कि खेतों का अनाज और गर्भवती गाय का दूध जब तब तक मुंह में नहीं आता तब तक भरोसा नहीं किया जा सकता। भील समाज में भी अक्सर बोला जाता है कि – ‘भील भोला आने सेठा मोटा’। इसका मतलब है कि भील के भोलेपन से ही सेठ मालामाल हुआ। ये सब कहावतें दर्शाती हैं कि आदिजन जीवन की बहुत गहरी समझ रखते हैं।
कई जनजातियों का उल्लेख तो रामायण में मिलता है। जब भगवान श्रीराम चित्रकूट आये वे कोल जनजाति के लोगों से मिले थे। ‘कोल विराट वेश जब सब आए, रचे परन तृण सरन सुहाने।’ अभी हाल में जब मेरे ध्यान में लाया गया कि सतना जिले के कोल बहुल गाँव बटोही में कोल समुदाय के बच्चों के लिए स्कूल नहीं है तो मैंने तत्काल स्कूल बनाने के निर्देश दिए। बटोही गांव में बच्चों के लिए प्राथमिक शाला अच्छी तरह चले, यह हमारी जिम्मेदारी है।
आज गोंडी चित्रकला की न सिर्फ मध्यप्रदेश बल्कि पूरे विश्व में पहचान है। गोंड चित्रकला को जीवित रखने वालों को सरकार पूरी मदद करेगी । यह हमारा कर्त्तव्य है। गोंड और परधान लोग गुदुम बाजा बजाते हैं। हम चाहते हैं कि आदिवासी समुदाय की कला प्रतिभा दुनिया के सामने आए।
शिक्षित नागरिक समाज से यह अपेक्षा है कि यह अहसास रहे कि कुछ दूर जंगल में ऐसे आदिजन भी रहते हैं जो हमारे ही जैसे हैं। वे सबसे पहले धरती पर बसने वाले लोग हैं और जंगलों में ही बसे रह गए।
जब कांग्रेस सरकार ने वनवासी अधिकार अधिनियम बनाया था तो कई संदेह पैदा किए गए थे। आज इसी कानून के कारण वनवासियों को पहचान मिली है। जिन जंगलों में उनके पुरखे रहते थे वहाँ उनका अधिकार है। उन्हें कोई नहीं हटा सकता। हमने उनके अधिकार को कानूनी मान्यता दी है।
आदिवासी संस्कृति में देव स्थानों के महत्व को देखते हुए हमने देव स्थानों के रखरखाव के लिए सहायता देने का निर्णय लिया है। यह संस्कृति को पहचानने की एक छोटी सी पहल है। हमारी सरकार आदिजन की नई पीढ़ी के विकास और उनकी संस्कृति बचाने में मदद देने के लिए वचनबद्ध है।
आदिजन दिवस पर एक बार फिर सभी परिवारों को बधाई। आधुनिक समाज में रहने वाले नागरिकों से अपील करता हूँ कि वे समझें कि हमारे समय में हमारे जैसा ही आदि समाज भी रहता है। यह सब लिखते समय स्वीडिश कवि पावलस उत्सी की कुछ लाइनें बरबस याद हो आती हैं जिनका हिंदी में अर्थ यह है कि –
‘जब तक हमारे पास जल है जिसमें मछलियाँ तैरती है,
जब तक हमारे पास जमीन है जहाँ हिरण चरते हैं,
जब तक हमारे पास जंगल है जहाँ जानवर छुप सकते हैं
हम इस पृथ्वी पर सुरक्षित हैं ।’
अब हमारा कर्त्तव्य है कि अपनी जिम्मेदारी के प्रति सजग रहें।
(ब्लागर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं)

सुषमा-जैसा कोई और नहीं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
बहन सुषमा स्वराज का आकस्मिक महाप्रयाण हृदय विदारक है। वे विलक्षण वक्ता, उदारमना और उत्कृष्ट राजनेता थीं। पिछले 40-45 साल से उनका मेरा भाई-बहन का-सा संबंध था। जब 1998 में प्रधानमंत्री अटलजी ने सांसदों का प्रतिनिधि मंडल पाकिस्तान भेजा था तो उसमें सुषमाजी, मीराकुमार आदि कुछ बहनें भी हमारे साथ थीं। उस समय की विरोधी नेता बेनज़ीर भुट्टो मुझसे मिलने होटल में आईं तो मैंने सुषमाजी का परिचय उनसे कराया और कहा कि ये कुछ दिन पहले तक दिल्ली की वज़ीरे—आला (मुख्यमंत्री) थीं लेकिन किसी दिन आप दोनों देवियां अपने-अपने मुल्क की वजीरे-आज़म (प्रधानमंत्री) बनेंगी। बेनज़ीर उस संक्षिप्त मुलाकात से इतनी खुश हुईं कि जब वे दिल्ली आईं तो उन्होंने मुझे हवाई अड्डे से फोन किया और कहा कि आपकी ‘उस बहन’ से भी मिलना है। मैंने कहा कि आज उनका जन्मदिन है। बेनजीर एक गुलदस्ता लेकर सुषमाजी के घर पहुंचीं। सुषमाजी संघ की स्वयंसेवक नहीं थीं। वे मुझे अक्सर समाजवादी नेता मधु लिमयेजी के घर मिला करती थीं। लगभग 40 साल पहले जब वे देवीलालजी की सरकार में मंत्री बनीं तो वे मुझे एक हिंदी सम्मेलन का मुख्य अतिथि बनाकर गुड़गांव ले गईं। गुड़गांव मैंने पहली बार सुषमाजी की कृपा से ही देखा। एक बार एक बड़े कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करने के लिए मुझे और मेरे बेटे सुपर्ण को वे नारनौल ले गईं। 6-7 साल के सुपर्ण को उन्होंने अपनी गोदी में सुलाए रखा। पूरी रात कवि सम्मेलन चला। उन्होंने अपने धन्यवाद भाषण में हर कवि की कविता की पहली दो पंक्तियां बिल्कुल क्रमवार बिना कागज देखे दोहरा दीं। मैं दंग रह गया। मैंने मन में सोचा कि यह बहन तो अद्वितीय प्रतिभा की धनी है। मैंने सुषमा-जैसा कोई और व्यक्ति आज तक देखा ही नहीं। मेरे अनेक प्रदर्शनों, सभाओं और गोष्ठियों में वे हमेशा बढ़-चढ़कर भाग लेती थीं। उनके साथ के दर्जनों चित्र आज मेरे दफ्तर ने जारी किए हैं। पड़ौसी देशों के कई बड़े नेताओं ने सुषमाजी से हुई सार्थक भेंटों का जिक्र मुझसे कई बार किया है। मेरी पत्नी वेदवतीजी के साथ भी उनके मधुर संबंध थे। उनका स्वभाव इतना अच्छा था कि विरोधी दलों के नेता भी उनका सम्मान करते थे। उन्होंने देश के सूचना मंत्री और विदेश मंत्री के तौर पर कई अनूठे कार्य किए। यदि उनको मौका मिलता तो वे भारत की प्रधानमंत्री के तौर पर महान नेता सिद्ध होतीं। सुषमा स्वराज और शीला दीक्षित, दोनों का लगभग एक साथ जाना भारतीय राजनीति की अपूरणीय क्षति है। दोनों के बारे में कई मार्मिक और अंतरंग संस्मरण कभी और ! अभी तो मेरी इस प्यारी बहन को हार्दिक श्रद्धांजलि!
…/राजेश/3.40/ 8 अगस्त 3019

कश्मीर पर विपक्ष की मसखरी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जम्मू-कश्मीर के सवाल पर कल और आज संसद में विपक्षी नेताओं ने जो तर्क दिए, वे कितने लचर-पचर और बेतुके थे ? इनके हल्केपन का सबसे बड़ा प्रमाण तो यही था कि जब ये तर्क दिए जा रहे थे और तर्क करनेवाले घूंसा तान-तानकर और हाथ-हाथ हिलाकर भाषण झाड़ रहे थे, तब उनकी अपनी पार्टी के लोग भी ताली तक नहीं बजा रहे थे। अपने मुरझाए हुए चेहरों को लेकर वे दाएं-बाएं देख रहे थे। गुलाम नबी आजाद के भाषण के वक्त उनके साथ बैठे कांग्रेसी सांसदों के चेहरे देखने लायक थे। गुलाम नबी ने कहा कि भाजपा सरकार ने भारतमाता के सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हैं। कश्मीर को भारत का मस्तक माना जाता है, यह ठीक है लेकिन लद्दाख को उससे अलग करना उसके टुकड़े-टुकड़े करना कैसे हो गया ? यह ठीक है कि भाजपा नेता धारा 370 और 35 को खत्म करने के पहले कुछ कश्मीरी नेताओं को साथ ले लेते तो बेहतर होता या कुछ कश्मीरी जनमत को प्रभावित कर लेते तो आदर्श स्थिति होती लेकिन क्या यह व्यावहारिक था ? पाकिस्तानी प्रोपेगंडे, पैसे और हथियारों के आगे सीना तानने या मुंह खोलने की हिम्मत किस कश्मीरी नेता में थी ? कांग्रेसी नेताओं का यह तर्क भी बड़ा बोदा है कि भाजपा सरकार ने कश्मीर के साथ बहुत धोखाधड़ी की है। नेहरु के वादे को भंग कर दिया है। ऐसा लगता है कि हमारे कांग्रेसी मित्र सिर्फ विरोध के लिए विरोध कर रहे हैं। क्या अब वे जनमत-संग्रह के लिए तैयार थे ? अपने 50-55 साल के शासन में उन्होंने यह क्यों नहीं करवाया ? सिर्फ 370 और 35ए का ढोंग करते रहे। अब उनके सारे विरोध की तान इसी बात पर टूट रही है कि जम्मू-कश्मीर को केंद्र-प्रशासित क्षेत्र क्यों घोषित किया गया है ? गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया है कि कश्मीर के हालात ठीक रहे तो उसे पूर्ण राज्य का दर्जा भी दिया जा सकता है। कश्मीर के सवाल पर पूरा पाकिस्तान एक आवाज में भारत की निंदा कर रहा है लेकिन भारत को देखिए कि इसी मुद्दे पर हमारा विपक्ष जूतों में दाल बांट रहा है। हमारे विपक्ष ने खुद को मसखरा या जोकर बना लिया है। कांग्रेस-जैसी महान पार्टी ने कश्मीर के पूर्ण विलय का विरोध करके खुद को कब्र में उतार लिया है। यह भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य है। अटलजी ने 1971 में जैसे बांग्लादेश पर इंदिरा गांधी का अभिनंदन किया था, वैसे ही कांग्रेस भी कश्मीर पर मोदी और शाह को शाबाशी दे सकती थी।

अगस्त क्रांति और उसके शहीद
वीरेन्द्र सिंह परिहार
सन् 1942 की अगस्त क्रांति भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है महात्मा गॉधी की ‘करो या मरो‘ की ललकार आम भारतीयों को गहरे तक आंदोलित कर गई। जिसके चलते गुलाम भारत में क्रांतिकारी स्वरूप देखने को मिला।
8 अगस्त सन्् 1942 को मुम्बई में होने वाली कांग्रेस महासमिति का अधिवेशन ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो‘ प्रस्ताव पास करके 10 बजे रात्रि में समाप्त हुआ और 9 अगस्त को सूर्योदय से पहले ही देश के गणमान्य नेतागण बंदी बनाकर जेलों में बंद कर दिए गए। इतना ही नहीं तार, समाचार पत्रों को भी बंद कर दिया गया। देश के भिन्न-भिन्न भागों पर कार्यकर्ता राह चलते या स्टेशनों पर पकड़ लिए गए। बावजूद इसके अपने नेताओं की गिरतारी का समाचार पाते ही आम जन निहत्था होने पर भी मैदान में आ गया। स्थान-स्थान पर रेल की पटरियां उखाड़ दी गई। बिजली के तार काट डाले गए। सरकारी भवनों को गिराने या उस पर कब्जा करने की उपक्रम शुरू हो गया। कुछ क्षेत्रों पर संगठित रूप से लोगों ने प्राणों की बाजी लगा दी। सरकार की ओर से चलने वाले दमन चक्र में कितनी जाने गई, कितने गांव और घर नष्ट हुए, कितने लोगों को जेल भेजा गया- इन सबका पूरा विवरण अप्राप्त है। फिर भी कुछ प्रमुख शहीदों की शहादत इस अवसर पर देखने योग्य है।
पटना सेकेट्रिएट के शहीद- रेडियो द्वारा मुम्बई में हुए अधिवेशन और समिति के निर्णय का समाचार पाकर 11 अगस्त को पटना नगर जयघोष तथा इंकलाब जिंदाबाद के नारों से गूंज उठा। इस अवसर पर एक भारी जुलूस निकाला गया। सेकेट्रिएट पहुंच कर जनता वहां पर राष्ट्रीय ध्वज लगाना चाहती थी। इस अवसर पर जिला मजिस्ट्रट मिस्टर आर्चर ने गुरखे सिपाहियों को गोली चलाने का आदेश दे दिया। जिसके चलते आठ विद्यार्थी शहीद हो गए और कई घायल हुए। फिर भी एक विद्यार्थी द्वारा धारासभा भवन की दीवार पर चढ़कर राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया गया। गोलीकांड में मरने वालों विद्यार्थियों की संख्या दस से ऊपर थी। सासाराम गोलीकांड के शहीद-सासाराम (शाहाबाद) में उत्साहित जनता के एक बड़े दल ने 15 अगस्त सन्् 1942 को स्टेशन और कचहरी पर राष्ट्रीय झंडा लगाकर एस.डी.ओ. के बंगले के सामने पहुंचकर अपना आसन जमा दिया। कुछ आदमियों में सहसा आवेश उत्पन्न होने के कारण ढेलेबाजी आरम्भ हो गई। जिसके साथ ही गोरों ने गोली चलाना शुरू कर दिया। इस गोलीकांड में करीब पांच लोग मारे गय। समस्तीपुर गोलीकांड के शहीद- 15 अगस्त 1942 को गोरों की एक स्पेशल ट्रेन दोपहर के लगभग वहां आकर रूकी। उसे देखकर कुछ लोगों की भीड़ ने आकर ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो‘ ‘इंकलाब जिंदाबाद‘ के नारे लगाए। इस पर जब वह स्पेशल ट्रेन छूटकर गुमटी के पास पहुंची तो वहां गोरे दोनों ओर के फाटक खोलकर गाड़ी में चढ़ गए। गोरे कमांडर की सीटी बजी जिसके साथ ही चलती ट्रेन से गोलियों की वर्षा होने लगी। जिसके चलते पचासों व्यक्ति घायल हुए और दर्जनों व्यक्ति शहीद हुए। धमदाहा गोलीकांड के शहीद- 25 अगस्त सन्् 1942 को बिहार के पूर्णिया जिले के धमदाहा पुलिस थाना क्षेत्र में हुए भयानक गोलीकांड में सैकड़ो व्यक्ति घायल हुए। केवल शहीद होने वाली की संख्या चालीस से ऊपर पहुंच गई थी। बेतिया काण्ड के शहीद- बिहार के चम्पारन जिले के बेतिया नगर के पुलिस थाने के सामने धारा 144 तोड़ने के अपराध में बिट्रिश पुलिस द्वारा 24 अगस्त को किए गए गोलीकांड में दसों व्यक्ति शहीद हुए।
लंसाडी गोलीकांड के शहीद:- 15 सितंबर 1942 को लसांडी ग्राम के पुलिस थाने के सामने वाले मैदान में 10-15 लारी भरे गोरों के दल ने जोश से भरी जनता पर अमानुषिक रूप से गोलियां बरसाईं। इसमें भी दर्जनों लोग काल के ग्रास बने। हिल्सा गोलीकांड के शहीद- हिल्सा थाने (जिला पटना) पर 15 अगस्त 1942 को एकत्रित जनता जो जोश से थाने पर तिरंगा फहराने का प्रयास कर रही थी, मशीनगनों से उन्हें तितर-बितर करने के लिए गोलियां चलाई गई। इस गोलीकांड में सत्रह लोग जख्मी हुए, जिनमें से पांच ने धटना स्थल पर ही दम तोड़ दिया। पीरपैंती काण्ड के शहीद- पीरपैंती (भागलपुर) में 19 अगस्त को निकले जुलूस पर गांव के कुछ जमीदारों ने थाने में जाकर रिपोर्ट करके अंग्रेजों को जनता के खिलाफ उकसा कर गोली चलवाई। जिसमें पचास से ऊपर की शहादतें हुईं जिनमें कुछ स्त्रियां भी थीं। मुजफरपुर कांड के शहीद:- मुजफरपुर जिले के पुपरी और वाजपट्टी थाने पर 23 अगस्त तथा मीनापुर थाने पर 15 अगस्त को हुए जघन्य गोलीकांड में अनेक निहत्थे, निरपराध देशभक्तों की जाने गई अथवा गम्भीर रूप से घायल हुए। छपरा कांड के शहीद- अगस्त 1942 के आंदोलन के समय छपरा ऐसे उत्साही कार्यकर्ताओं का केन्द्र माना जाता था जो चारों ओर संगठित और सहयोग द्वारा तोड़-फोड़ के कामों का नेतृत्व करते थे। 30 अगस्त को जबकि छपरा में कार्यकर्ता लोग किसी आवश्यक समस्या पर विचार-विमर्श कर रहे थे, फौजी सिपाहियों से भरी लारियां वहां आ पहुंची और थाने के सामने जमा लोगों पर अधाधुन्ध गोलियां चलाई गई जिसमें कई लोग शहीद हो गए। सोनबरसा कांड के शहीद:- उत्तर प्रदेश के बलिया में अगस्त आंदोलन में ब्रिटिश हुकूमत का सफाया करके समानान्तर सरकार कायम कर ली गई थी। वहां के 16 वर्षीय वीर विद्रोही बालक सूरज ने आंदोलन के आरम्भ में ही बलिया शहर के अंदर लगी हुई धारा 144 तोड़ने में सबसे आगे कदम उठाया था और पुलिस द्वारा बंदी बनाकर जेल भेज दिया गया था। लेकिन वहां जागरूक जनता ने ब्रिटिश अधिकारियों को हटाकर अपनी सरकार कायम की। जेल के फाटक खोल दिए जिससे निकलने वाले अन्य कैदियों के साथ बलिया का सूरज बाहर निकल आया। यह समाचार पाते ही मार्स स्मिथ गोरी फौज लेकर वहां आ पहुंचा और सोनबरसा थाने पर अधिकार करने के लिए आए युवकों पर दनादन गोलियां बरसाई जिससे अनेक लोग हताहत हुए, उनमे बलिया का वीर बालक सूरज भी था। अनेक लोगों में शहादत दी। वर्धा गोलीकांड के शहीद- कांग्रेस महाधिवेशन समाप्त होने पर मुम्बई से लौटे दीनदयाल चूड़ी वाले के वर्धा पहुंचने पर वर्घा की जनता ने सभा बुलाकर दीनदयाल का भाषण सुनने की इच्छा जाहिर की। अंग्रेजी पुलिस द्वारा विरोध करने पर जनता भड़क उठी और उसने क्रुद्ध होकर, ‘इंकलाब जिंदाबाद‘ के नारे लगाने आरम्भ कर दिया। जवाब में पुलिस ने गोलियां चलाई जिसमें 30 वर्ष का युवा मजदूर जंगलू मारा गया। बाद में जब महात्मा गांधी वर्धा आए तो उन्होंने जंगलू की समाधि पर फूल-माला चढ़ाकर श्रद्धाजलि अर्पित की। इसके अलावा बिहार के सोनपुर, खगड़िया, सुल्तानगंज, पारूथाना, गया, दलसिंह सराय, रोहियार आदि जगहों पर भी अंग्रेजो की गोलियों से सैकड़ों लोगों ने शहादत दी और इससे भी ज्यादा लोग घायन हुए।
उपरोक्त विवरण सन् 1942 में भारत में स्थान-स्थान पर हुए अगस्त आंदोलन की एक छोटी सी सक्षिप्त झांकी मात्र है। अगस्त आंदोलन का यदि पूरा विवरण दिया जाय तो एक मोटा ग्रंथ तैयार हो जाएगा। अगस्त आंदोलन दक्षिण भारत छोड़कर शेष सम्पूर्ण भारत में खूब फैला जिसने जन जाग्रति को अभूतपूर्व प्रमाण प्रस्तुत करके ब्रिटिश हुकूमत को यह दिखा दिया कि भारतवासी स्वराज पाने के लिए कृत संकल्प हैं। अगस्त क्रान्ति की विकरालता का अनुमान अंग्रेजी हुकूमत द्वारा अधिकृत रूप से पेश विवरण से सहज रूप से लगाया जा सकता है। सरकार द्वारा परोसा गया विवरण इस प्रकार है- पुलिस और फौज की गोलियों से 940 व्यक्ति मरे और 1930 घायल हुए, विभिन्न स्थानों पर 60229 व्यक्ति गिरतार हुए, 118000 लोग नजरबंद हुए, 160 स्थानों पर क्रांति को कुचलने के लिए सेना बुलानी पड़ी। यहां तक कि हवाई जहाजों से छ: बार हमले किए गए। क्रांति की चपेट में 59 रेलगाड़ियां गिरायी गई और 318 स्टेशन नष्ट हुए। 954 डाकस्थानों पर हमले हुए और 12000 स्थानों पर टेलीग्राम तार काटे गये। अगस्त क्रांति की घटना के स्वरूप, उसके विस्तृत प्रसार और जन सहभागिता को देखते हुए उसे विश्व की सबसे बड़ी जन क्रान्तियों के रूप में निरूपित किया जा सकता है। इसमें देश के विभिन्न वर्गों, समुदायों और समुदाय के लोगों ने भागीदारी निभाई थी। शहीदों में शुमार किए जाने वाले आंदोलनकारियों में चिकित्सक, अभिभाषक, पत्रकार, कृषक, पुजारी, बढ़ई, व्यवसायी, समाजसेवी, इंजीनियर, मिल मजदूर, लुहार, पुताईकर्मी, अध्यापक, विद्यार्थी, लोकगायक, लोककवि, हांकर व कर्मचारी आदि थे।
अगस्त क्रांति के अन्तर्गत वीरगति पानेवालों में अबोध बालक, किशोर, युवा, अधेड़ तथा वृद्ध भी सम्मिलित थे। यहां तक कि 90 वर्ष की उम्र के राजकुमार दुसाध भी शहीदों के विरादरी में थे। उन्होंने इसके पहले भी आजादी के कई आन्दोलनों में जेल यात्रा की थी। सन् 1942 के आंदोलन में राजकुमार दुसाध को गिरतारी के बाद बलिया की जेल में रखा गया और जेल यात्रा के दौरान ही उन्होंने अपनी जीवन यात्रा पूर्ण की।

सरकार के खिलाफ बोलना अब आसान नहीं होगा
सनत जैन
संसद में जिस तरीके से यूएपीए, एनआईए,सूचना अधिकार कानून और 3 तलाक बिल के संशोधन बिल पास किए गए हैं। उससे सरकार की मंशा स्पष्ट है, कि सरकार के खिलाफ बोलने वाले लोगों और विपक्षी दलों को नियंत्रित करने के लिए ही सरकार ने यह संशोधन बिल पास कराए। जिससे केंद्र सरकार को असीमित शक्तियां मिल गई हैं। संसद में चंद घंटों की बहस के बाद यह सारे बिल पास हुए हैं। इसके साथ ही तीन तलाक बिल भी बड़ी जल्दबाजी में पास किया गया है। सरकार किसी भी बिल को स्टेडिंग कमेटी में भेजने को राजी नहीं हुई। इसको लेकर यह कहा जा रहा है, सरकार एक नई दिशा की ओर बढ़ गई है। जिसके कारण संघीय व्यवस्था और दोहरी नागरिकता जैसे विषयों में गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। गैरकानूनी गतिविधियां निरोधक कानून की अनुसूची 4 के तहत, राष्ट्रीय जांच एजेंसी अब किसी भी व्यक्ति को ना केवल आतंकवादी घोषित कर सकती है, बल्कि उसकी संपत्ति को भी जप्त कर सकती हैं। जो संशोधन बिल पास हुआ है, उसके अनुसार अब संबंधित राज्य के डीजीपी से भी अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी। अर्थात कानून व्यवस्था में जो राज्य की जिम्मेदारी होती थी, उससे वह प्रथक हो गई हैं। केंद्र की राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए अब भारत के किसी भी राज्य में जाकर कोई भी कार्यवाही कर सकती है। किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित कर सकती है, उसकी संपत्ति जप्त कर सकती है। इससे राज्यों तथा नागरिकों के मौलिक अधिकार सीमित हो गए हैं।
इसी तरह सूचना अधिकार कानून में सरकार ने संशोधन करके सूचना अधिकार आयुक्तों को सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में ले लिया है। अभी तक सूचना आयुक्तों का वेतन सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के समकक्ष होता था। अब यह अधिकार केंद्र सरकार के पास आ गया है। वह सूचना आयुक्तों के वेतन और उनकी सेवाओं के संबंध में निर्धारण कर सके। बिल पास होने के बाद अब सूचना आयुक्त केंद्र सरकार और उसके किसी विभाग के बारे में आदेश करने के बारे में एक बार नहीं, सौ बार सोचेंगे। क्योंकि जो संशोधन हुए हैं, उसके अनुसार उनका कार्यकाल और वेतन निर्धारण करने का अधिकार अब केंद्र सरकार के पास पहुंच गया है। सूचना अधिकार आयुक्त अब भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की तरह बॉस इज ऑलवेज राइट की तरह सूचना अधिकार कानून में निर्णय देने के लिए बाध्य हो गए हैं, अथवा उनकी रवानगी तय मानी जाएगी। जजों की नियुक्ति में कलेजियम की अनुशंशा के बाद भी सरकार ने नियुक्ति नहीं करके अपने आप से सुप्रीम कोर्ट को अवगत करा दिया है। इस संशोधन के बाद सरकार वही जानकारी देगी, जो वह देना चाहती है। 2005 के सूचना अधिकार कानून में सूचना अधिकार आयुक्तों को जो शक्तियां प्राप्त हुई थी। भले ही उनमें कोई संशोधन नहीं किया गया। उसके बाद भी आम नागरिकों को सूचना अधिकार कानून के तहत सरकार के कामकाज को जानने का जो अधिकार मिला था। वह इस संशोधन के बाद अप्रत्यक्ष रूप से समाप्त कर दिया गया है।
इसी तरह तीन तलाक बिल को पास करते समय केवल मुस्लिम वर्ग के पुरुषों पर ही अपराधिक प्रकरण दायर करने, और गैर जमानती अपराध बनाने का प्रावधान किया गया है। जबकि हिंदू पर्सनल कानून में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है। दोनों कानूनों में इस तरह के परिवर्तन होने से यह कहा जा सकता है कि मुस्लिम पुरुषों को भारत में दूसरे दर्जे का नागरिक मान लिया गया है। इस बिल के पास होने से मुस्लिम महिलाओं की स्थिति और भी खराब होगी। क्योंकि जो व्यक्ति जेल चला जाएगा, 3 साल जेल में रहकर आएगा वह अपनी पत्नी और अपने बच्चों को क्यों अपनाएगा। इससे तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं अपना जीवन यापन करने के लिए या तो अपराधिक गतिविधियों में लिप्त होंगी, या अपना यौन शोषण कराकर जीवन यापन करने को मजबूर होंगी। इससे कानून व्यवस्था की स्थिति बद से बदतर हो सकती है।
सरकार ने उपरोक्त तीनों कानूनों को पास कराने के लिए जिस तरह की हड़बड़ी की है। वह चौंकाने वाली है। सरकार बिल पास कराने समय गंभीर भी नहीं दिखी। कानून बेहतर ढंग से पारित हों, जल्दबाजी में सरकार ने संसद के इन बिलों को प्रवर समिति के पास नहीं भेजा। जिसके कारण सरकार की ओर से जो बिल जैसे आए थे, वैसे ही पास हो गए। संसदीय कार्य प्रणाली के अनुसार इनके कानूनी प्रावधान किस तरह के हों, इसका भी परीक्षण नहीं हुआ। केवल कुछ घंटों की बहस के बाद लोकसभा में बहुमत के बल पर, और राज्यसभा में जोड़-तोड़ और फ्लोर मैनेजमेंट के बल पर, यह बिल पास करा लिए गए। सरकार ने विपक्ष की एक जुटता नहीं होने का लाभ, राज्यसभा में बेहतर तरीके से उठाया है। इसके लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की जितनी प्रशंसा की जाए, वह कम है। किंतु संसदीय कार्यप्रणाली को अनदेखा करते हुए सरकार ने जिस तरह से इन बिलों को पास कराया है। आगे चलकर यह सरकार के लिए परेशानी का कारण बनेंगे। भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार लोकसभा और राज्यसभा का सत्र खत्म होने जा रहा है। लेकिन संसद की विभिन्न समितियों का गठन ही नहीं हुआ। लोकसभा के अध्यक्ष अथवा राज्यसभा के सभापति बिलों को प्रस्तुत करने के पूर्व स्थाई प्रवर समिति के पास भेजकर उनकी समीक्षा करा लेते थे । इस बार अभी तक समिति का गठन ही नहीं हुआ। संसदीय व्यवस्था में प्रारंभिक रूप से जो काम समिति में बिल पेश करने के पूर्व होता था, वह भी नहीं हुआ। संसदीय परीक्षण के बिना दर्जनों बिल सरकार ने राज्यसभा से भी पास करा लिए । इन बिलों के पास होने से भारत के 125 करोड़ नागरिकों के दैनिक जीवन में बहुत बड़ा असर पड़ने जा रहा है। खासतौर पर सड़क एवं परिवहन मंत्रालय द्वारा जो भारी जुर्माना वाहन चालकों पर आरोपित किया है। उससे करोड़ों आम नागरिक प्रभावित होने जा रहे हैं। तीन तलाक बिल को लेकर यह कहा जा रहा है, कि महिलाएं इसका बड़े पैमाने पर पति से लड़ाई होने पर दुरुपयोग कर सकती हैं। इसके साथ ही सरकार के खिलाफ बोलने पर अब आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप लगाकर किसी भी व्यक्ति को जेल भेजने और उनकी संपत्ति जप्त करने जैसे अधिकार अब केंद्र सरकार के पास पहुंच गए हैं। केंद्र सरकार ने जो बिल पास कराये हैं। लगभग आधा दर्जन बिल ऐसे हैं, जिसमें राज्य सरकारों की शक्तियों को काफी कम दिया गया है। इससे भारत की संघीय व्यवस्था में केंद्र एवं राज्यों के बीच जबरदस्त टकराव पैदा होने की संभावनाओं को बढ़ा दिया है विपक्ष का एकजुट ना होना और सरकार द्वारा अपनी ताकत के बल पर जिस तरह कानून में संशोधन किए जा रहे हैं। फौरी तौर पर वह भले सरकार के लिए मुफीद साबित हो रहे हो। लेकिन आगे चलकर इससे सरकार और आम नागरिकों की कठिनाई बढ़ने वाली है। यह ठीक है कि आम नागरिकों के पास कोई शक्तियां नहीं होती है। किंतु इसके बाद भी मताधिकार और भीड़तंत्र समय-समय पर सरकार के खिलाफ खड़ा होता रहा है। यह बड़े से बड़ा परिवर्तन एक ही झटके में कर देता है केंद्र सरकार को अपने बहुमत का उपयोग, सत्ता को ज्यादा से ज्यादा समय तक बनाए रखने के लिए जरूरी है कि वह भीड़ को एकजुट ना होने दें। ज्यादा दबाव आने से भीड़तंत्र बड़े से बड़े कर परिवर्तन करने का कारण बनता है। इतिहास यदि देखेंगे, तो इसकी पुनरावृत्ति एक बार नहीं कई बार हो चुकी है। आशा है, सरकार अपने उत्तरदायित्व को समझते हुए भारतीय संविधान की मूल भावना, मौलिक अधिकारों और संघीय व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए निर्णय करेगी।

कश्मीर में नई सुबह का आगाज , ख़त्म हुआ एक इतिहास
प्रभुनाथ शुक्ल
जम्मू-कश्मीर पर केंद्र सरकार का फैसला अपने आप में ऐतिहास है। पूरे देश में जश्न का महौल है। लेकिन इस फैसले से वोटबैंक की राजनीति करने वालों को गहरा आघात पहुंचा है। कश्मीर पर सारी अटकलें और संशय खत्म हो गए हैं। मोदी सरकार के मिशन कश्मीर की सारी तस्वीर साफ हो गई है। जिसकी आशंका जतायी जा रही थी वहीं हुआ। सरकार राज्य से धारा-370 हटाने के लिए कदम बढ़ा दिया। गृहमंत्री अमितशाह ने संसद में इसे हटाने की सिफारिश भी पेश कर दिए। जम्मू-कश्मीर को विशेष नागरिक सुविधा देने वाली धारा-35 ए को खत्म कर दिया गया है। जम्मू-कश्मीर राज्य अब एक और हिस्से बंट जाएगा, दूसरा राज्य लद्दाख होगा।निश्चित तौर पर केंद्र की मोदी सरकार का राष्टीय सुरक्षा पर बड़ा फैसला आया है। जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा और सुविधाएं देने वाली धारा 35 को खत्म कर उसे भारतीय गणराज्य के सामान नागरिक अधिकारों से जोड़ दिया गया है। अब आप वहां जमींन भी खरीद सकते और शादियां भी कर सकते हैं। क्योंकि 35 ए का आदेश राष्टपति की तरफ से दिया गया था। लिहाजा उसे उन्हीं तरीके से खत्म कर दिया गया है। मोदी सरकार के निर्णय से कांग्रेस और पूरा विपक्ष सख्ते हैं। लेकिन पूरा देश सरकार के साथ खड़ा है। क्योंकि कश्मीर एक देश एक कानूनी की तरफ बढ़ रहा है। गृहमंत्री अमितशाह राज्यसभा में यह संवैधानिक संशोधन पेश कर कश्मीरी नेताओं और अलगाव वादियों को जमींन दिखा दिया है। लिहाजा अब धारा-370 का भी कलंक जल्द मिट जाएगा। देश के लिए गौरव की बात है। कांग्रेस तुष्टीकरण की नीति अपना कर सिर्फ वोटबैंक की राजनीति करती रही जिसकी नतीजा है वह पूरे देश से खत्म हो गई और कश्मीर आज वह साफ नीति नहीं बना पायी है।
राज्यसभा में गृहमंत्री अमितशाह की तरफ से धारा-35 ए खत्म होने की सूचना देश की राजनीति में भूचाल आ गया है, लेकिन सरकार को कोई खतरा नहीं है। क्योंकि सरकार के पास बहुमत से अधिक अंक हैं। लिहाजा विपक्ष के पास सिर पीटने के अलावा कोई मुद्दा नहीं है। दूसरी बात सरकार ने इस तरह का कोई गलत कदम भी नहीं उठाया है जिसके खिलाफ देश के लोग हों। देश के लोगों की जो इच्छा थी सरकार ने वही काम किया है। लेकिन प्रतिपक्ष के सीने पर सांप लोटने लगा है। क्योंकि विपक्ष के पास सिर्फ सिर पीटने के अलावा उसके पास कुछ नहीं है। संसद में केवल वह घड़ियाली आंसू बहा रहा है। मोदी सरकार के साहसिक फैसले ने विपक्ष के नेताओं और कश्मीर के अलगाव वादियों को अलग-थलग कर दिया है। सरकार के इस फैसले के बाद अलगाव वादियों और आतंवादियों की सक्रियता देश और जम्मू-कश्मीर में बढ़ सकती है। पाकिस्तान के साथ भारत विरोधी इस्लामिक देश अस्थिर करने की साजिश रच सकते हैं। वैश्विक मंच पर अफवाहें फैलायी जा सकती हैं। भारत विरोधी मुहिम में लगे लोग वैश्विक एकजुटता दिखा सकते हैं। लेकिन अब दौर गुजर गया है भारत हर स्थिति का मुकाबला करने में सक्षम है।
कश्मीर में किसी भी हालात से निपटने के लिए सरकार ने पूरा इंतजाम कर लिया है। पूरे जम्मू-कश्मीर को सेना के हवाले कर दिया गया है। नागरिक सुरक्षा और सतर्कता को लेकर सारे आदेश पहले ही जारी किए जा चुके हैं। मीडिया और प्रबुद्ध वर्ग पहले ही यह आशंका जता रहा था कि सरकार कश्मीर पर साहसिक निर्णय ले सकती है।
भारत सरकार के तत्कालीन राष्टपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने धारा-370 के तहत कश्मीर के नागरिकों को विशेष सुविधा के लिए 14 मई 1954 को धारा 35 एक का विशेष आदेश जारी किया था। 1956 में जम्मू-कश्मीर के संविधान में वहां की नागरिकता को परिभाषित किया गया। जिसके अनुसार 1954 के पूर्व या यह कानून लागू होने के 10 साल पहले से जो लोग कश्मीर में निवास कर रहे हैं यहां के नागरिक माने जाएंगे। राज्य को मिले इस विशेष दर्जे के अनुसार देश के दूसरे राज्य का वहां कोई भी व्यक्ति यहां जमींन नहीं खरीद सकता था और न ही वहां की नागरिकता हासिल कर सकता था। शरणार्थियों को वहां सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती थी। वोट देने का अधिकार नहीं था। स्कूलों में उनके बच्चों का दाखिल तक नहीं हो सकता था। वहां की लड़की अगर किसी बाहरी व्यक्ति से शादी कर लिया तो उसे वहां की नाागरिकता नहीं मिलती थी। हालांकि यह कानून संसद के जरिए नहीं पारित था। यह केवल राष्टपति की तरफ से दिया गया विशेष अधिकार था। जिसे मोदी सरकार ने साहत दिखाते हुए राष्टपति के जरिए ही खत्म कर दिया। निश्च तौर पर अपने आप में यह बड़ा और ऐतिहासिक फैसला है।
जम्मू-कश्मीर राज्य को विभाजित कर भाजपा ने कश्मीर और पाकिस्तान राग अलापने वाले नेताओं को जमींन दिखा दिया है। लद्दाख को अलग राज्य बनाकर वहां सीटों को नए जरिए से परिसीमित कर लोकतंत्र की नई जमींन तैयार की जाएगी। देश के सुरक्षा के लिहाज से भी सरकार ने यह बड़ा कदम उठाया है। कोई भी व्यक्ति सरकार के फैसले विरोध में नहीं खड़ा है। सिर्फ चुनावी और वोट बैंक की राजनीति करने वाले आंसू बहा रहे हैं। सरकार की इस नीति से कश्मीर अब पूरे नियंत्रण में होगा। अलगाववादी अपने आप बिल में घुस जाएंगे। आतंकवाद का सफाया होगा। क्योंकि नये गठन के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर केंद्र का सीधा नियंत्रण होगा। राज्य सरकार उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर पाएगी। कश्मीर देश की सुरक्षा के लिहाज से अहम राज्य है। पाकिस्तान और चीन की कुटिल नीति की वजह से देश की सामरिक सुरक्षा के लिए वहां स्थितियां अनुकुल नहीं थी। लेकिन सरकार के इस निर्णय के बाद स्थितियां बदलेंगी और इस फैसले से जम्मू-कश्मीर का सारा नियंत्रण केंद्र सरकार के अधीन होगा। सरकार ने इस फैसले ने अमेरिका को भी जमींन दिखाई है। जिसमें अमेरिकी राष्टपति डोनाल्ड टंप कश्मीर मसले पर मघ्यस्तता का राग अलाप रहे थे। भारत सरकार का यह फैसला दुनिया को एक नया संदेश देने में कामयाब हुआ है। इसके अलावा पाकिस्तान और चीन के लिए भी कड़ा संदेश है।
मोदी सरकार कश्मीर के राजनैतिक दलों, अलगाव वादियों, आतंकवादियों और पाकिस्तान से निपटने के लिए सारी तैयारी कर लिया है। जम्मू-कश्मीर में भारी तादात में फोर्स तैनात कर दी गयी है। नागरिक सुरक्षा को देखते हुए सारी हिदायतें पहले की जारी की जा चुकी थीं। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह दिन बेहद खास है। इतिहास की भूल को सुधारते हुए राष्टहित में यह कदम स्वागत योग्य है। इस मसले पर सरकार की जीतनी तारीफ की जाय वह कम है। कश्मीर से 370 हटने का भी रास्ता साफ हो गया है। देश में अब एक साफ-सुथरी राजनीति का दौर शुरु हुआ है। अब लोकतंत्र को सिर्फ सत्ता तक पहहुंचने का जरिया समझना बड़ी भूल होगी। देश की जनता जो चाहती है उसे सरकारों को हरहाल में पूरा करना होगा। अ बवह दौर आ गया है जब अलगाव वादियों को वंदेमातरम् और जयहिंद बोलना होगा। जम्मू-कश्मीर में अब सिर्फ भारतीय तिरंगा लहराएगा। जम्मू-कश्मीर को एक नयी आजादी मिली है। इसका स्वागत करना चाहिए। सरकार को अलगाव वादियों को सबक सीखाना चाहिए। लेकिन नागरिक अधिकारों का दमन न हो इसका विशेष खयाल रखना होगा।

आयुर्वेद सौतेली या अवैध संतान हैं शासन की ?
डॉ. अरविन्द प्रेमचंद जैन
जब से आधुनिक चिकित्सा शास्त्र का प्रादुर्भाव हुआ और कुछ अंग्रेजपरस्त लोगो ने इसको अंगीकार किया तब से आयुर्वेद विज्ञानं का तिरस्कार होना शुरू हुआ,जब तक पेनिसिलिन की खोज नहीं हुई थी तब तक आयुर्वेद विज्ञानं भारत में बहुत फला फूला। पर स्वतंत्रता के बाद पहली स्वास्थ्य मंत्री श्रीमती राजकुमारी अमृता कौर ने जो आयुर्वेद की दुर्दशा की जब से आयुर्वेद पनप नहीं पाया।
शुरुआत से इसे स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत रखा गया, वहां पर दोयम दर्ज़े का व्यवहार किया गया, कभी भी मुख्य धारा से नहीं जोड़ा गया। मात्रा सहयोगी के रूप में रखा गया। उस समय कहीं भी औषधालय खोल दिए जाते थे न भवन, न फर्नीचर, न पर्याप्त औषधियां न पूरा स्टाफ, किराये का भवन ढूंढों और काम करो। उसके बाद विभाग अलग बना तब भी मुख्य नियंत्रण सिविल सर्जन के अधीन।
वर्षों की मांग के बाद स्वास्थ्य विभाग से पृथक चिकित्सा चिकित्सा विभाग के अंतर्गत आया। उसका नियंत्रण भी चिकित्सा शिक्षा मंत्री के पास। धीरे धीरे भारतीय चिकित्सा पद्धति एवं होमियोपैथी विभाग का मंत्री बनाया पर वह भी कैबिनेट मिनिस्टर के अधीन। आज भी आयुष विभाग का स्वतंत्र मंत्री नहीं हैं।
बात इस बात से कहनी हैं की दिनांक २६ जुलाई २०१९ को मध्य शासन द्वारा एंटीबॉयटिक्स प्रतिरोध के सम्बन्ध में एक नीति लागु की हैं जिसमे वेटनरी, फ़ूड एंड ड्रग, पशुपालन विभाग, कृषि विभाग को सम्मिलित करके स्वास्थ्य विभाग द्वारा एनटीमिक्रोबिअल रेजिस्टेंस की रोकथाम हेतु राज्य स्तरीय एक्शन प्लान का निर्माण किया गया हैं। जिसका उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में एंटीबॉयटिक्स दवाओं के अनियंत्रित उपयोग की रोकथाम, एंटीबॉयटिक्स दवाओं का उपयोग सम्बन्धी विभाग वार दिशा निर्देश व विभिन्न स्टेट होल्डर एवं जन समुदाय में जागरूकता लाने हेतु नीति तय करना हैं। इसमें १३६ सदस्यों को कार्य हेतु जोड़ा गया हैं जिसमे आई ए एस, मेडिकलकॉलेज। एम्स पर्यावरण विभाग, स्वास्थ्य विभाग पशु विभाग, नर्सिंग होम एसोसिएशन, मेडिकल फार्मेसी एसोसिएशन, फ़ूड एंड ड्रग्स आदि अनेक विभागों को सम्मिलित किया गया पर स्वास्थ्य से सम्बंधित न चिकित्सा शिक्षा विभाग और न आयुष विभाग के अंतरगत आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा पद्धति से सम्बंधित विभाग को नहीं रखा गया।
इस महत्वपूर्ण विषय जो चिकित्सा से सम्बंधित हैं जो चिकित्सा करते हैं और उनके द्वारा भी एंटीबॉयटिक्स काउपयोग किया जाता हैं और जो एंटीबॉयटिक्स की जगह प्रतिनिधि द्रव्य के रूप में चिकित्सा में काम कर सकते हैं उनको नजर अंदाज़ किया गया हैं।
इस सम्बन्ध में एंटीबॉयटिक्स के उपयोग के सम्बन्ध में इस पद्धति का उपयोग करना या उन्हें सम्मिलित करना कितना हानिकारक होता। इसका आशय यह हैं की प्रदेश सरकार आयुष विभाग को अपनी सौतेली संतान या अवैध संतान मानती हैं या अयोग्य या नाकारा मानती और दुःख का विषय हैं की वर्तमान में आयुष और चिकित्सा शिक्षा मंत्री स्वयं एक चिकित्सक हैं। एक चिकित्सक के नाते के साथ एक विभाग का मंत्री जो इस विषय में विभाग की भागीदारी निभाने में सक्रीय योगदान देते उन्हें वंचित किया गया। यह अतयनत दुःख की बात हैं
क्या आयुष विभाग दोयम दर्ज़े का विभाग हैं। इस कार्यक्रम के बाद इस लेख के लेखक ने व्यक्तिगत रूप से माननीय स्वास्थ्य मंत्री श्री तुलसी सिलावट जी, प्रमुख सचिव स्वास्थ्य श्रीमती पल्लवी जैन गोविल, डॉक्टर सुजीत के सिंह उप संचालक महानिर्देशक स्वास्थ्य मंत्रालय नई दिल्ली, डॉक्टर अनुज शर्मा टेक्निकल ऑफिसर विश्व स्वास्थ्य संगठन नई दिल्ली एवं डाक्टर पंकज शुक्ल एन . एच. एम् सेचर्चा की पर किसी की तरफ से कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला और न भविष्य में कोई गुंजाईश समझ में आती हैं। हाँ ध्यान रखेंगे
किसी भी काम की सफलता में सबके साथ जो विभाग सीधे तौर पर इस नीति से जुड़े हैं उनकी भागीदारी शासन नहीं लेना चाहती या उपेक्षा करती हैं तो इससे समझ में आता हैं की सरकार मात्र ओठों से सहानुभति देना चाहती हैं और इस विभाग को मुख्य धारा में नहीं जोड़ना चाहती हैं। जबकि इस विभाग के अधिकांश चिकित्सक एलोपैथी का उपयोग करते हैं और वे बहुत सफल हैं।
यह शासन में बैठे वरिष्ठम अधिकारीयों की संकीर्ण मानसिकता का द्योतक हैं और इसके अलावा कुछ नहीं। किसी से सक्रीय भागीदारी की अपेक्षा करते हैं तो उन्हें भी सम्मान के साथ आमंत्रण देना चाहिए। आखिर ये भी सरकार का एक प्रमुख अंग हैं। जब किसी पद्धति का कोई स्थान नहीं था और हैं तब आयुर्वेद ही कारगर सिद्ध होती हैं पर उसको अंगीकार करने के हिचक क्यों ?
आज भी कोई बड़ा से बड़ा या छोटे से छोटा
अपने किचिन से नहीं बचा हैं
हमारा किचिन पहला दवाखाना हैं,था और रहेगा
आज सब क्यों चिंतित हैं एंटीबॉयटिक्स
जो सब अपने आपको भगवान् मानकर बैठे हैं
प्रोफेसर, नर्सिंग होम फार्मेसी वाले
बड़ी बड़ी कंपनी के दलाल हैं
जिनको बहुत कमीशन, घूमने फिरने का खरचा
ये ही उठाते हैं
जिनका जमीर बिका हुआ हैं
वे ही करते है खिलवाड़ जिंदगी से

पन्द्रह अगस्त को ‘35ए’ खत्म करने का तोहफा…?
( ओमप्रकाश मेहता)
देश की सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक ही चर्चा गर्म है, और वह है इस बार लाल किले से प्रधानमंत्री द्वारा आजादी की बहत्तरवीं वर्गग्रंथी पर कश्मीर से अनुच्छेद-35ए खत्म करने की घोषणा। सरकार ने कश्मीर में दस हजार विशेष प्रशिक्षित सैनिक तैनात कर इसकी शुरूआत भी कर दी है। यद्यपि सरकार ने अनुच्छेद-35ए खत्म करने के अधिकारिक संकेत नहीं दिए है और सैनिकों की नई तैनाती के पीछे पुराने थके-हारे सैनिकों की वापसी, बड़े आतंकी या पाकिस्तानी हमले की आशंका आदि कारण बताए जा रहे है, किंतु केन्द्र सरकार के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की अचानक गुपचुप कश्मीर यात्रा, वहां राज्यपाल व शीर्ष अधिकारियों से विचार-विमर्श और वहां से लौटते ही दस हजार सैनिकों की वहां तैनाती कुछ रहस्यमयी कहानी बयां करती है, जो कश्मीर में पिछले बहत्तर साल से जारी राज्य को विशेष दर्जा दिलाने वाले संविधान के अनुच्छेद-35ए से जुडी है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि जब राजनाथ सिंह की जगह भाजपाध्यक्ष अमित शाह को गृहमंत्री का दायित्व सौंपा गया था, तो उसके पीछे मोदी जी की एक ही मंशा थी जो कश्मीर में लागू अनुच्छेद-35ए व धारा-370 से जुड़ी थी, देश में राज कर रही भाजपा के चुनावी घोषणा-पत्र में भी जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने वाले संविधान के इन अनुच्छेदों को खत्म करने का वादा किया गया था। इसीलिए गृहमंत्री का पदग्रहण करते ही अमित शाह ने सबसे पहले कश्मीर का ही दौरा किया था और राज्यपाल सतपाल मलिक से काफी गंभीर विचार-विमर्श भी हुआ था। उसके बाद कश्मीर से निष्कासित पण्डितों से गृहमंत्री का विचार-विमर्श तथा कश्मीर की समस्याओं व वहां की स्थितियों पर गंभीर चिंतन यह स्पष्ट करता है कि सरकार शीघ्र ही कश्मीर पर कोई गंभीर कदम उठाने जा रही है, और वह कदम अनुच्छेद-35ए खत्म करने से ही सम्बंधित हो सकता है। जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सतपाल मलिक ने पिछले दिनों एक सार्वजनिक कार्यक्रम में आतंकियों को पुलिस व सेना की जगह भ्रष्ट अधिकारियों व नेताओं को निशाना बनाने का विवादित बयान देकर भी ऐसा ही कुछ संकेत देने की कौशिश की थी, जिसके लिए उन्हें बाद में खेद भी प्रकट करना पड़ा। इस तरह केन्द्र सरकार व जम्मू-कश्मीर प्रशासन के बीच यह खिचड़ी लम्बे अर्से से पक रही है और इसकी भनक जम्मू-कश्मीर के राजनेताओं को भी लग चुकी है, तभी तो ऊमर अब्ब्दुल्ला के बाद मेहबूबा मुफ्ती को अनुच्छेद-35ए को लेकर विस्फोटक बयान देने को मजबूर होना पड़ा। अब ये कश्मीर नेता, जो इस मामले पर एकजुट है, अपने बयानों से कश्मीर में भय और दहशत का माहौल तैयार करने लगे है, जिसका परिणाम यह हो रहा है कि कश्मीरियों ने अपने वतन से पलायन और अनाज (राशन) भंडारण की तैयारी शुरू कर दी है, और सैनिकों की बढ़ती गश्त और उनकी मुस्तैदी से वहां भय की भावना निर्मित होने लगी है। केन्द्र सरकार ने भी सतर्क होकर वहां की पल-पल की खबरों पर नजर रखना शुरू कर दिया है, साथ ही एनआईए ने छापे मारी की भी शुरूआत कर दी है।
अब संविधान की उन विशेष अनुच्छेदों ‘370’ व ‘35ए’ पर नजर डाली जाए, जिसके तहत् जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ है। यद्यपि ये धाराएं अस्थायी है जो राज्य विधानसभा की अनुमति से कभी भी खत्म की जा सकती है, किंतु आज तक चूंकि किसी भी केन्द्र सरकारर ने इस दिशा में प्रयास नहीं किया, इसलिए ये धाराएं पिछले सत्तर सालों से चली आ रही है और जम्मू-कश्मीर को देश के अन्य राज्यों से अलग विशेष दर्जा प्राप्त है।
धारा-35ए जम्मू-कश्मीर विधानसभा को राज्य के ‘स्थायी निवासी’ की परिभाषा तय करने का अधिकार देता है। वर्ष 1954 मंे इस तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद के आदेश के माध्यम से संविधान से जोड़ा गया था, इस अनुच्छेद ने स्थायी नागरिकता को विशेष अधिकार दिए है, इसके तहत अस्थायी नागरिक न जम्मू-कश्मीर में स्थायी रूप से निवास कर सकते है और न ही इस राज्य में कोई चल-अचल सम्पत्ति खरीद सकते है। साथ ही इस राज्य की कोई महिला या पुरूष किसी अन्य राज्य के निवासी लड़के-लड़की से विवाह रचा सकता है, यदि विवाह रचाता है तो संबंधित लड़के या लड़की की जम्मू-कश्मीर की स्थायी नागरिकता स्वतः ही खत्म हो जाती है। अब मोदी सरकार का प्रयास है कि जम्मू-कश्मीर से यह विशेष धारा खत्म कर इस राज्य को भी अन्य राज्यों की बराबरी में खड़ा कर दिया जाए।
अब यदि अनुच्छेद-370 पर नजर डाली जाए तो इस अनुच्छेद के प्रावधानों के मुताबिक संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में सिर्फ रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है, किंतु इन तीन विषयों के अलावा किसी अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू करवाने के लिए केन्द्र को राज्य सरकार से अनुमति सहमति लेनी पड़ती है, इसी अनुच्छेद के तहत् जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रीय ध्वज भी अलग है, साथ ही इसी धारा के प्रावधानों के तहत जम्मू-कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल भी छः साल का है, जबकि पूरे देश में संसद व राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल पांच साल है और इसी धारा के तहत जम्मू-कश्मीर में सूचना का अधिकार (आर.टी.आई.) भी लागू नहीं होता।
इस तरह कुल मिलाकर संविधान के ‘370’ व ‘35ए’ के विशेष प्रावधानों के कारण भारतीय गणराज्य में सिर्फ जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है और पूरे देश में समानता के संवैधानिक अधिकार के तहत देश की मौजूदा मोदी सरकार जम्मू-कश्मीर से ये संवैधानिक बंधन खत्म कर देश के सभी राज्यों के एक ही समानता की श्रेणी में लाना चाहती है और मोदी जी ने गृहमंत्री अमित शाह को यही महत्वपूर्ण साहसिक जिम्मेदाारी सौंपी है। इस बारे में प्रधानमंत्री व गृहमंत्री के बीच गंभीर मंत्रणा कर अगले चरणों पर चर्चा भी हो चुकी है, संभव है प्रधानमंत्री जी अगले महीनें स्वतंत्रता की बहत्तरवी वर्षग्रंथी पर लाल किले की प्राचीर से देश को यह सौगात देने की घोषणा करें!

 

दिल्ली से सीखे सब सरकारें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने ऐसा एतिहासिक काम कर दिखाया है, जिसका अनुकरण भारत की सभी प्रांतीय सरकारों को तो करना ही चाहिए, हमारे पड़ौसी देशों की सरकारें भी उससे प्रेरणा ले सकती है। ‘आप’ पार्टी की इस सरकार ने दिल्लीवासियों के लिए 200 यूनिट प्रति माह की बिजली का बिल माफ कर दिया है। यदि किसी घर में 201 यूनिट से 400 यूनिट तक बिजली खर्च होती है तो उसे आधा बिल ही चुकाना होगा। इस नई रियायत का सीधा फायदा दिल्ली के लगभग 60 लाख उपभोक्ताओं को मिलेगा। प्रत्येक घर और दुकान को 600 रु. से 1000 रु. तक हर महिने बचत होगी। इतना ही नहीं, दिल्ली प्रदेश की बिजली की खपत भी घट जाएगी, क्योंकि हर आदमी कोशिश करेगा कि वह 200 के बाद एक यूनिट भी न बढ़ने दे। जो 400 यूनिट बिजली जलाएंगे, वे भी अपनी खपत पर सख्त निगरानी रखेंगे ताकि उन्हें आधे पैसों से ज्यादा न देने पड़ें। जाहिर है कि इस कदम से दिल्लीवालों को जबर्दस्त राहत मिलेगी। दिल्ली के 80 प्रतिशत से भी ज्यादा लोग ‘आप’ सरकार के प्रशंसक बन जाएंगे। दिल्ली के विपक्षी दलों, भाजपा और कांग्रेस, का नाराज़ होना स्वाभाविक है। उनके इस आरोप में कोई दम नहीं है कि केजरीवाल सरकार लोगों में मुफ्तखोरी की आदत डाल रही है। क्या उनके मंत्रियों, विधायकों और सांसदों ने उन्हें मुफ्त मिलनेवालीं बिजली का कभी बहिष्कार किया है ? उनका यह कहना सही हो सकता है कि यह अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया का चुनावी पैंतरा है। अगर ऐसा है तो भी इसमें गलत क्या है ? इन दोनों बड़ी पार्टियों के पास केंद्र और राज्यों की कई सरकारें हैं। इन्होंने भी ऐसा पैंतरा क्यों नहीं मार लिया ? सभी पार्टियां चुनाव जीतने के लिए तरह-तरह के पैंतरे मारती हैं। अब यह आरोप लगाने की कोई तुक नहीं है कि दिल्ली की आप सरकार ने पहले बिजली के दामों में फेर-बदल करके 850 करोड़ रु. लुट लिए और अब वह वही पैसा बांटकर जनता को बेवकूफ बना रही है। केजरीवाल सरकार के इस कदम से उसका वोट बैंक मजबूत होगा, इसमें जरा भी शक नहीं है, क्योंकि इसका फायदा सबसे ज्यादा उस तबके को मिलेगा, जो सबसे ज्यादा वंचित है, गरीब है और जिसके मतदाताओं की संख्या सबसे ज्यादा है। यों भी लोकतांत्रिक सरकारें दावा करती हैं कि वे लोक कल्याणकारी होती हैं। तो क्या यह उनका न्यूनतम कर्तव्य नहीं है कि वे जनता को हवा, दवा, पानी और बिजली आसान से आसान कीमत पर उपलब्ध करवाएं ? मेरा बस चले तो मैं इस सूची में हर नागरिक के लिए रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और मनोरंजन को भी जुड़वा दूं।

भ्रामक विज्ञापनों पर शिकंजा कसना जरूरी
सनत जैन
ग्राहकों को अधिक अधिकार देने और उपभोक्ता अदालतों को पहले से ज्यादा मजबूत बनाने संबंधी प्रावधान वाले उपभोक्ता संरक्षण विधेयक पर लोकसभा ने मुहर लगा दी है। अगले सप्ताह राज्यसभा में इस बिल के पारित होने के बाद उपभोक्ताओं के हित में नया कानून उपभोक्ता संरक्षण कानून 1986 की जगह लेगा। इस बिल में केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण के गठन का प्रस्ताव है। यह प्राधिकरण अनैतिक व्यापारिक गतिविधियों को रोकने और ग्राहकों के अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप कर सकता है। यह बिल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बीते तीन से भी अधिक दशक से बड़ा प्रयास नहीं हुआ है, जबकि इस बीच ऑन लाइन मार्केटिंग समेत व्यापार के क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया है। ऐसी परिस्थिति में ग्राहकों के अधिकारों की रक्षा के लिए पुराने कानून में बदलाव की जरूरत है। हालांकि, अब सरकार ने इस दिशा में पहल की है।
ग्राहकों के हितों की रक्षा के लिए केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण का गठन किया जाएगा, निर्माता और सेवा प्रदाताओं की जिम्मेदारी सिर्फ अपने ग्राहक तक नहीं बल्कि सभी उपभोक्ताओं के प्रति होगी, उपभोक्ता अदालत में ग्राहक को वकील की जरूरत नहीं होगर, भ्रामक विज्ञापन पर सेलेब्रिटी को भारी जुर्माना भरना होगा और 21 दिनों में हर हाल में शिकायत दर्ज होगी। सामान के निर्माण, सेवा, पैकेजिंग, लेबलिंग में खामी की वजह से ग्राहक की मौत या उसके किसी भी तरह के नुकसान के लिए अब निर्माता ही नहीं विक्रेता भी जिमेदार होगा। यह कानून इसलिए जरूरी है क्योंकि भ्रामक विज्ञापनों के फेर में फंसकर ग्राहक न सिर्फ जेब ढीली कर रहा है, बल्कि शरीर को भी नुकसान पहुंचा रहा है।
पिछले दो वर्षों में फास्ट फूड मैगी में हानिकारक तत्व की मौजूदगी के मामले उजागर होने के बाद कई फिल्मी सितारों ने किए थे। इस खाद्य पदार्थ का विज्ञापन करने वाली कई मशहूर हस्तियों-अमिताभ बच्चन, प्रीति जिंटा और माधुरी दीक्षित पर बिहार की एक अदालत ने पुलिस केस दर्ज करने व जरूरत पडऩे पर गिरफ्तार करने के निर्देश भी दिए थे। माधुरी दीक्षित हों या महेंद्र सिंह धोनी, उनके कदमों से यह सवाल एक बार फिर उठा है कि क्या मशहूर लोगों और सिने हस्तियों को ऐसी चीजों का प्रचार करना चाहिए, जिनकी गुणवत्ता और उपयोगिता आदि को लेकर कई संदेह हो सकते हैं? क्या उन्हें ऐसी चीजों का बखान करना चाहिए जिनके वे खुद ग्राहक नहीं हैं, जिनका वे खुद तो इस्तेमाल नहीं करते, लेकिन उनके गुणों का बढ़-चढ़कर उल्लेख करते हुए जनता से उन्हें अपनाने की बात कहते हैं। मशहूर हस्तियां ऐसा प्रचार क्यों करती हैं? पिछले साल एक माह (फरवरी) के दौरान भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) की ग्राहक शिकायत परिषद को जिन 167 विज्ञापनों की शिकायतें मिली थीं, उनमें से 73 शिकायतें पर्सनल और हेल्थकेयर वर्ग में भ्रामक विज्ञापनों को लेकर ही की गई थीं और ये शिकायतें सही भी पाई गईं। शिकायतों के आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विज्ञापनों द्वारा धोखाधड़ी किस स्तर पर हो रही है? ऐसे में यह समझना भी कठिन नहीं कि इन विज्ञापनों के चमक-दमक भरे दावों पर लगाम लगाना कितना जरूरी है। देखा गया है कि बाजार में किसी भी उत्पाद को चर्चित कराने और उसकी बिक्री बढ़ाने के लिए विभिन्न कंपनियां सिनेमा और खेल जगत की हस्तियों का सहारा लेती हैं।
यह कतई जरूरी नहीं होता कि ये हस्तियां उन सारे उत्पादों का अपने जीवन में इस्तेमाल करते हों, पर विज्ञापनों में उनकी छवि इस तरह पेश की जाती है कि वे उनका धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं और उनके कई फायदे उन्हें नजर आए हैं। अपने चहेते सितारों को किसी चीज का प्रचार करते देख आम लोगों के मन में यह भावना पैदा होती है कि क्यों न वे भी उन चीजों का इस्तेमाल करें। साबुन, तेल, सूप, नूडल्स, वॉटर प्यूरीफायर से लेकर सेहत बनाने वाली दवाओं तक के प्रचार सिनेमा व खेल जगत की हस्तियां खूब करती हैं। यही नहीं, वे शायद ही कभी जांच अपने स्तर पर कराती हैं कि जिन बातों या फायदों का उल्लेख उन्होंने विज्ञापन में किया है, उनमें कोई सचाई है भी या नहीं। वे विज्ञापनदाता द्वारा सुझाई गई लाइनों और दावों को दोहरा देते हैं जिससे आम जनता में यह संदेश जाता है कि उनके चेहेते सितारे तक वे चीजें अपने प्रयोग में ला रहे हैं जो बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं और उन्हें खरीदने में कोई हर्ज नहीं हैं।
खास तौर से बच्चों और महिलाओं को किसी खास वस्तु की तरफ आकर्षित करने के लिए ऐसे ही सितारों द्वारा कोई उत्पाद विज्ञापनों में लाया जाता है और देखते ही देखते उस उत्पाद की बिक्री बढ़ जाती है। यह विज्ञापन जगत की सोची-समझी प्रक्रिया है। पर इसमें पेच यही है कि क्या इस तरह भोली-भाली जनता को मूर्ख तो नहीं बनाया जाता है? इस बारे में सच्चाई यह है कि खेल या सिनेजगत की हस्तियों द्वारा प्रचारित चीजों के विज्ञापनों में यह घोषणा कहीं नहीं होती है कि इन चीजों का इस्तेमाल खुद उन हस्तियों ने किया है। किसी उत्पाद की गुणवत्ता को जांचे-परखे बिना उन्हें खरीदने की सलाह देने के बारे में कुछ नियम देश में पहले से हैं। जैसे खाने-पीने की चीजों के बारे में केंद्रीय खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग का नियम यह है कि अगर किसी कंपनी का ब्रांड अंबेसडर किसी चीज की खासियत या गुणवत्ता का बखान करता है और वह गुण उसमें नहीं होता है, तो ऐसे विज्ञापन को भ्रामक माना जाता है। ऐसे विज्ञापन के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।
सितारों को दौलत-शोहरत से आगे बढ़कर जनता के हितों के बारे में भी सोचना चाहिए। वे यह कर बरी नहीं हो सकते हैं कि उन्होंने किसी उत्पाद का सिर्फ प्रचार किया है, उसे उन्होंने खुद इस्तेमाल में नहीं लिया है। यह काम कानून के जरिए भी हो सकता है। भ्रामक विज्ञापनों के लिए सितारों को भी दोषी मानकर कठघरे में लाया जाना चाहिए और इसकी वाजिब सजा दी जानी चाहिए। सरकार का कानून बनाना इसलिए जरूरी है ताकि भ्रामक विज्ञापनों के नकारात्मक प्रभावों को लेकर जनता सतर्क रहे।

कितना शरीफ है, यह बलात्कारी !
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सर्वोच्च न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उन्नाव में हुए बलात्कार के मामले में जिस फुर्ती से कार्रवाई की है, उसने देश के सीने में लगे घाव पर थोड़ा मरहम जरुर लगाया है। उप्र के विधायक कुलदीप सेंगर पर आरोप है कि 2017 में एक कम उम्र की लड़की के साथ उसने जो बलात्कार किया था और उस बलात्कार पर पर्दा डालने के लिए उसने कई नृशंस हत्याओं का सहारा लिया है, वैसा मर्मभेदी किस्सा तो पहले कभी सुनने में भी नहीं आया। जिस लड़की के साथ बलात्कार हुआ था, उसने इंसाफ का दरवाजा खटखटाने के खातिर पिछले साल उप्र के मुख्यमंत्री के घर के आगे आत्मदाह करने की कोशिश भी की थी। उस विधायक पर आरोप है कि उस पीड़ित लड़की के साथ-साथ उसके उन सब रिश्तेदारों को भी वह मौत के घाट उतार देना चाहता है, जो उस कुकर्म के साक्षी रहे हैं या जो उस लड़की को न्याय दिलाने के लिए कमर कसे हुए हैं। लड़की के पिता को पुलिस से फर्जी मामले में गिरफ्तार करवाकर पहले ही मरवा दिया गया। लड़की का चाचा अभी जेल में है। वह लड़की, उसकी चाची और उसका वकील जिस कार से यात्रा कर रहे थे, उस कार को एक छिपे हुए नंबर के ट्रक ने इतनी जोर से टक्कर मारी कि बलात्कार की साक्षी वह चाची मर गई। दूसरी चाची भी मर गईं। वह लड़की और उसका वकील अभी भी मृत्यु-शय्या पर हैं। शंका है कि यह सारा षड़यंत्र सेंगर जेल में रहते हुए ही करवा रहा है। इस हत्याकांड में उप्र के एक मंत्री के दामाद का भी हाथ बताया जा रहा है। ऐसा लगता है कि यह सारा मामला जातिवाद के चक्र में फंस गया है। उप्र की सरकार पर आरोप है कि उसने सारे मामले को ढील दे रखी है। वास्तव में विधायक सेंगर आजकल भाजपा का सदस्य रहा है। उसे पहले निलंबित किया गया था और अब उसे पार्टी से निकाला गया है। सेंगर पहले कांग्रेस में था, फिर वह बसपा में गया, फिर सपा में रहा और फिर 2017 में भाजपा में आया। याने वह इतना शरीफ और काम का आदमी है कि सभी पार्टियों ने उसका स्वागत किया। हमारी राजनीतिक पार्टियों के नैतिक दीवालियेपन का साक्षात प्रतीक है- कुलदीप सेंगर ! सर्वोच्च न्यायालय ने सारे मामले को 45 दिन में पूरा करने और उसे लखनऊ से दिल्ली लाने का निर्देश दिया है। ट्रक-दुर्घटना की जांच सात दिन में पूरी होगी। पीड़िता के परिवार को पूर्ण सुरक्षा और पीड़िता को उप्र सरकार 25 लाख रु. तुरंत देगी। घायलों के इलाज की जिम्मेदारी सरकार लेगी। अदालत ने सरकार के कान तो खींच दिए हैं लेकिन यह समझ में नहीं आता कि हमारी जनता का चरित्र कैसा है ? ऐसे अपराधी चरित्र के नरपशुओं को चुनकर वह विधानसभा और संसद में कैसे भेजेती है ? क्या अपने लिए भी वह कोई सजा सुझाएगी ?

कानून का राज अमीरों के लिए
सनत कुमार जैन
भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू है। यहां के नागरिकों को समान अधिकार संविधान से मिले है। विधायिका को कानून बनाने, कार्यपालिका को कानून का पालन कराने तथा न्यायपालिका को, कार्यपालिका और विधायिका तथा संविधान नागरिकों मौलिक प्रदत्त अधिकारों की रक्षा करने का दायित्व सौंपा गया है। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई लड़ रहे योद्धाओं ने संघर्ष किया था। उन्होंने ईस्ट इंडिया कम्पनी, अंग्रेजों, राजाओं और जागीरदारों द्वारा आम नागरिकों से गुलामों की तरह जो व्यवहार किया जा रहा था, उसे देखा था। जिसके कारण वह देश को अंग्रेजों की गुलामी से स्वतंत्र कराने और उसके बाद भारतीय संविधान में गरीब एवं अमीर को बिना किसी के भेदभाव के न्याय मिले। इसके लिए संविधान के माध्यम से हमें जो मौलिक अधिकार दिए थे। उन सभी मौलिक अधिकारों के लाभ अब केवल अमीरों को तो मिल रहे हैं। गरीबों के साथ न्याय के नाम पर अन्याय करने का काम अमीरों एवं ताकतवरों लोगों ने पहले से ज्यादा अब करना शुरू कर दिया है। अब तो बुर्जुग भी कहने लगे है कि इससे अच्छा शासन तो अंग्रेजों का था। मुगलराज में जो प्रताणना हिन्दुओं को नहीं सहनी पड़ी। जो वर्तमान राज में हिन्दुओं को सहना पड़ रही है। पिछले तीन दशकों में विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका में अमीरों की दखंलदाजी बढ़ी है। शासन-प्रशासन एवं निर्वाचित प्रतिनिधि जिस तरह अमीरों के साथ मिलकर गरीबों को लूटने और प्रताणित करने का काम कर रहे हैं। उससे गरीबों को न्याय मिलना तो दूर, न्याय के नाम पर उन्हें प्रताणित करने का जो सिलिसला शुरू हुआ है, वह अब अपने चरम पर पहुंच गया है। उससे गरीब त्राहि-त्राहि कर रहा है।
हाल ही में उन्नाव की घटना ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की वास्तविक्ता को उजागर कर, हर भारतीय नागरिक को सोचने पर विवश कर दिया है, कि क्या हम लोकतांत्रिक देश में रह रहे है। क्या यहां पर कानून का राज है। भाजपा के विधायक कुलदीप सिंह ने एक पीड़िता के साथ रेप (बलत्कार) किया। पुलिस में शिकायत करने पर आरोपी पर कार्यवाही करने से पुलिस बचती रही।आरोपी के पिता की हत्या रेप के बाद पुलिस पर है। जब मामले ने तूल पकड़ा, तो पुलिस ने तहरीर (रिर्पोट) लिखकर आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। आरोपी और उसके परिवारजन लगातार पीड़िता और उसके परिवार को लगातार धमका रहे थे, कि वह अपनी रिर्पोट वापिस ले ले। बाद में कोर्ट में बयान बदलने का दबाव बना रहे थे। भाजपा के एक सांसद जो गेरूआ वस्त्र पहनकर अपने आपको साधु और हिन्दुओं का लंबरदार बताते है। वह आरोपी से मिलने जेल पहुंच जाते है। राजनैतिक दबाव में पीड़िता की रेप के सबूत कमजोर करने का काम पुलिस और जाँच एजेंसियों कर रही थी। आरोपी जेल में था। आरोपी के परिवारजनों ने पीड़ित परिवार के सदस्यों पर झूठे आरोप लगाकर पीड़िता के चाचा को गिरफ्तार कराकर जेल भेज दिया। पीड़िता और उसके परिवार ने 33बार पुलिस से तथा न्यायालय से सुरक्षा की गुहार लगाई। सरकार ने सुरक्षा उपलब्ध करा दी। सुरक्षाकर्मी भी बजाए पीड़िता और उसके परिवार की सुरक्षा देने के स्थान पर पीड़ित परिवार की जासूसी कर आरोपी को खबरें दे रहे थे। पीड़िता का इलाज चल रहा था। उसके परिवार को लगातार प्रताणित किया जा रहा था। पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट में सुरक्षा के लिए 12 जुलाई को पत्र लिखकर की गुहार लगाई। इससे नाराज पीड़ित परिवार के सदस्यों को सरेराह बिना नम्बर के ट्रक से टक्कर मारकर आरोपी ने पीड़िता और उसके परिवार के सदस्यों को मारने की कोशिश कीं। इस टक्कर में पीड़िता की चाची घटना स्थल पर ही मर गई। पीड़िता और परिवार के अन्य सदस्य गंभीर रूप से घायल हो गए। लखनऊ के किंगजार्ज मेडीकल कॉलेज में उसका इलाज चल रहा है। वेंटीलेटर में जीवन-मौत का संघर्ष पीड़िता कर रही है। मामले ने जब तूल पकड़ा तो सरकार हरकत में आई। पुलिस और शासन अभी भी आरोपी को बचाने का प्रयास अप्रत्यक्ष रूप से कर रहा है। प्रत्यक्ष रूप में पीड़िता को न्याय दिलाने की बात कर रहा है। पत्नी का अंतिम संस्कार करने के लिए पीड़िता के चाचा को लाने के लिए पीड़िता के परिवार को पापड़ बेलना पड़ रहा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है। गरीब अथवा सामान्य परिवार कैसे भारत में न्याय प्राप्त सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने जब इस मामले ने तूल पकड़ा, तो फटाफट सुनवाई करने और पत्र पर कार्यवाही ना करने वाले रजिस्टार को नोटिस जारी कर दिया। भाजपा के गिरफ्तार विधायक को बचाने का काम जब सांसद उ.प्र. की पुलिस और सरकार कर रही है। ऐसी स्थिति में तो यही कहा जा सकता है, होई वही जो राम रचि राखा। इसमें लोकतंत्र में मिले न्याय की तो बात नहीं रही। तुलसीदास जी, रामचरित्र मानस में हमें जो ज्ञान दे गए है। वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में वहीं ज्ञान सार्थक है। “समरथ को नहीं दोष गुसांई” की तर्ज पर पीड़िता और उसका परिवार, यदि अपना भाग्य मानकर चुपचाप बैठ गया होता, तो जो कष्ट उस परिवार को न्याय मांगने में झेलना पड़ रहा है। वह तो नहीं भोगना पड़ता। न्याय की आस में रसूखदार और अमीर किस तरह कानून को अपनी जेब में रखकर मनमानी करते है। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था के वर्तमान का सत्य है। वर्तमान शासन व्यवस्था में जो इस सत्य को स्वीकार कर लेगा, वह शोषण कराता रहेगा, अपना भाग्य मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेगा। इससे उसके कष्ट एक बार में जो होना था, वह हो जाएगा। रोज-रोज, तिल-तिल करके न्याय, कानून व्यवस्था, मौलिक अधिकार के फेर में पड़कर अभी जो अन्याय और कष्ट हो रहा है। वह तो नहीं होगा। भगवान की आज्ञा समझकर अमीरों एवं रसूखदारों के खिलाफ आवाज उठाना वर्तमान में पाप करने के समान है। गरीब और सामान्य व्यक्ति शोषण को नियति मानकर जितना स्वीकार करेंगे, उतना ही सुखी रहेंगे। यही कलयुग और वर्तमान व्यवस्था का सत्य है। जिस तरह धृतराष्ट्र के दरबार में जब द्रोपदी का चीरहरण हो रहा था। भीष्म पितामह, बिदूर एवं राजगुरु नजरे झुकायें नीचे बैठे थे। कुछ इसी तरह की स्थिति पुन- देखने को मिल रही है।

काबुल में अराजकता
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
एक तरफ तालिबान को पटाने के लिए अमेरिका इमरान खान को फुसलाने की कोशिश कर रहा है और दूसरी तरफ तालिबान ने अफगानिस्तान में उप-राष्ट्रपति के उम्मीदवार अमरुल्लाह सालेह पर हमला बोल दिया है। सालेह राष्ट्रपति हामिद करजई के दौर में अफगानिस्तान के गुप्तचर विभाग के मुखिया थे। कुछ वर्षों पहले वे काबुल होटल में मुझसे मिलने आए थे और मैंने उनका रवैया भारत के बारे में काफी मित्रतापूर्ण पाया था। यह अच्छा हुआ कि उनकी जान बच गई। वे घायल हुए और उनके 20 साथी मारे गए। यहां प्रश्न यही है कि सालेह पर हुए हमले का अर्थ क्या निकाला जाए ? पहली बात तो यह कि सालेह खुद तालिबान के सख्त विरोधी हैं। उन्होंने गुप्तचर विभाग के प्रमुख के तौर पर कई ऐसे कदम उठाए है, जिन पर पाकिस्तान ने काफी नाराजी जाहिर की। वे वर्तमान राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथी के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं। उन पर जानलेवा हमले का अर्थ यह हुआ कि पाकिस्तान और तालिबान नहीं चाहते कि सितंबर में होनेवाले चुनाव तक गनी और सालेह-जैसे लोग जिंदा भी रहें। वे इस चुनाव को एक फिजूल की हरकत समझ रहे हो सकते हैं। यदि तालिबान से अमेरिका और पाकिस्तान बात कर रहे हैं तो वह बात इसीलिए हो रही है कि काबुल की सत्ता उन्हें कैसे सौंपी जाए ? यदि सत्ता उन्हें ही सौंपी जानी है तो चुनाव का ढोंग किसलिए किया जा रहा है ? अमेरिका और पाकिस्तान ने तालिबान को चुनाव लड़ने के लिए अब तक तैयार क्यों नहीं किया ? यों भी आधे अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा है। यदि तालिबान सचमुच अपने पांव पर खड़े होते और लोकप्रिय होते तो उन्हें चुनाव से परहेज क्यों होता ? अमेरिका और पाकिस्तान, दोनों को यह गलतफहमी है कि तालिबान का राज होने पर अफगानिस्तान में शांति हो जाएगी। ज्यादातर तालिबान लोग गिलजई पठान हैं। उनके शीर्ष नेताओं से मेरा काबुल, कंधार, लंदन और वाशिंगटन में कई बार संपर्क रहा है। उनके सत्तारुढ़ होने पर उनकी स्वायत्ता पाकिस्तान पर बहुत भारी पड़ सकती है। वे स्वतंत्र पख्तूनिस्तान की मांग भी कर सकते हैं। इसके अलावा तालिबान के लौटने की जरा भी संभावना बनी नहीं कि काबुल, कंधार, हेरात, मज़ारे-शरीफ जैसे शहर खाली हो जाएंगे। अमेरिका अपना पिंड छुड़ाने के लिए अफगानिस्तान को अराजकता की भट्टी में झोंकने पर उतावला हो रहा है।

सवालों के घेरे में अनुच्छेद 35 ए
दिलीप झा संगम
अनुच्छेद 35ए इसलिए सवालों के घेरे में है क्योंकि उसे राष्ट्रपति के आदेश के तहत संविधान में जोड़ा गया था। अनुच्छेद 351 इतना भेदभाव भरा है इसका पता इससे चलता है कि उसके कारण जम्मू-कश्मीर से बाहर के लोग इस राज्य में ना तो अचल संपत्ति खरीद सकते हैं और ना ही सरकारी नौकरी हासिल कर सकते हैं।
इस तरह धारा 35 ए जम्मू कश्मीर विधानसभा को राज्य के स्थाई निवासी की परिभाषा तय करने का अधिकार देता है। वर्ष 1954 में इसे तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के आदेश के माध्यम से संविधान से जोड़ा गया था। लेकिन इस विवादास्पद और भेदभाव पूर्ण अनुच्छेद 370 को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के लिए तैयार है और यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि उसके समक्ष जम्मू कश्मीर से जुड़ा एक और विवादास्पद अनुच्छेद 35ए पहले से ही विचाराधीन है। इस अनुच्छेद के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का फैसला जो भी हो, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि राष्ट्रपति के आदेश निर्देश से कोई प्रावधान संविधान का हिस्सा नहीं हो सकता। 370 के बारे में पहले दिन से स्पष्ट है कि यह अस्थाई व्यवस्था है। जाहिर है यह अस्थाई व्यवस्था तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए की गई थी। क्योंकि उस समय के राजनेताओं को यह भरोसा था कि परिस्थितियां जरुर बदलेंगी इसलिए अनुच्छेद 370 को अस्थाई रूप दिया गया था। यह विडंबना है कि जो व्यवस्था अस्थाई तौर पर लागू की गई उससे कुछ राजनीतिक दल स्थाई रूप देने की वकालत कर रहे हैं।
क्या यह संविधान की भावना के प्रतिकूल नहीं? आखिर अस्थाई व्यवस्था को स्थाई रूप कैसे दिया जा सकता है? इस पर विभिन्न दलों के नेताओं और लोगों की राय कुछ भी हो सकती है लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अनुच्छेद 370 भारत से अलगाव का जरिया बन गया है। कश्मीर केंद्रित दल कश्मीरियत का जिक्र कुछ इस तरह करते हैं जैसे वह भारतीयता जैसे विराट स्वरूप से कोई अलग चीज हो। वहीं भाजपा के एजेंडे में वर्षों से शामिल है कि एक देश, एक विधान एवं एक निशान को लागू कर देशव्यापी पहचान को जन-जन तक पहुंचाना है। यह भी सर्वविदित है कि मोदी सरकार को दोबारा प्रचंड बहुमत जनता ने कुछ ऐतिहासिक काम जो आज तक नहीं हुए उन्हें पूरे करने के लिए दिए हैं। जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 35ए हटाने को लेकर केंद्र सरकार ने जो अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है उससे अलगाववादी बेचैन है। इसके पीछे कारण यह है कि अलगाववादियों की दुकान अब घाटी में बंद हो रही है। यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर के सूरत ए हालात बदल रहे हैं। आतंकियों को फंडिंग करने वालों पर एनआईए का कड़ा प्रहार जारी है। इससे प्रतीत होता है कि कश्मीर में व्याप्त अलगाववाद एवं आतंकवाद की कमर तोड़ने के लिए मोदी सरकार प्रतिबद्ध है।
यूं तो आतंकवाद को लेकर भाजपा की नीति जीरो टॉलरेंस हमेशा रही है लेकिन वर्तमान में पीएम मोदी और गृह मंत्री शाह की अनोखी जोड़ी कार्यशैली संस्कृति पर बल देकर राजनीतिक भूलों को सुधारने में जुटी हैं। पिछले 70 सालों की समस्या को हल करने की दिशा में मोदी सरकार अग्रसर है क्योंकि अनुच्छेद 370 इस समस्या की जड़ है और इसे खत्म करने के लिए पहल होने लगी है। निसंदेह किसी राज्य को उसके हालात के मद्देनजर विशेष दर्जा देने में कोई हर्ज नहीं है। वर्तमान में 10 राज्यों को विशेष दर्जा हासिल है, लेकिन ऐसा विशेष दर्जा किसी राज्य को नहीं दिया जा सकता जो अलगाववाद को हवा दे और राष्ट्रीय एकता में बाधक बने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जम्मू कश्मीर की समस्या की तह में जाकर उसे हल करने के लिए प्रयत्नशील हैं और यही कारण है कि उन्होंने अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा और सहायता बंद कर दी है। जो आज तक कांग्रेस सरकार नहीं कर पायी परिणाम स्वरूप अब कश्मीर के हालात में सुधार हो रहा है लेकिन पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस के नेताओं को अमन बहाली प्रक्रिया रास नहीं आ रही हैं। वे अपने वोट बैंक के लिए घाटी के लोगों को भ्रमित करने में जुटे हैं। वहीं कश्मीर में अतिरिक्त सैन्य बलों की तैनाती पर विभिन्न राजनीतिक दलों की बयानबाजी के बीच पीएम मोदी ने रेडियो पर प्रसारित अपने मासिक कार्यक्रम मन की बात में आतंकियों और अलगाववादियों को भी संदेश दिया है कि घृणा और हिंसा की उनकी मंशा सफल नहीं होगी। उन्होंने कहा कि कश्मीर के लोग अब विकास की मुख्यधारा से जुड़ने को बेताब है।

राज्यपाल अब संविधान के नहीं’ सत्ता के संरक्षक….?
ओमप्रकाश मेहता
इक्कीसवीं सदी के आरंभ में अर्थात् स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में राज्यों के राज्यपालों के पद और उनकी भूमिका पर काफी बहस छिड़ी थी और उस बहस का भावार्थ यही निकाला गया था कि ‘राज्यपाल’ का पद निरर्थक और व्यर्थ है। वास्तव में भारतीय संविधान में राज्यपाल पद का समावेश इसलिए किया गया था, जिससे कि राज्यपाल भारत के राष्ट्रपति जी के प्रतिनिधि के रूप में प्रदेशों में संविधान को ईमानदारी से लागू रहने और उसके उल्लंघन पर सत्तारूढ़ दल या सत्ता पदाधिकारियों पर नियंत्रण रखें। चूंकि राष्ट्रपति को राष्ट्रीय स्तर पर पूरे संवैधानिक अधिकार प्राप्त होते है, वैसे ही राज्यस्तर पर संवैधानिक अधिकार राज्यपाल के पास हो और वे राज्यों में संवैधानिक व्यवस्था सुचारू रूप से चलाने में संरक्षक की भूमिका निभाएं इसी उद्देश्य से राज्यपाल का पद कायम किया गया था और इसी संवैधानिक भावना के अनुरूप आजादी के बाद कुछ दशकों तक राज्यपालों ने अपनी भूमिका का निर्वहन भी किया, किंतु बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में सत्ता की राजनीति ने राज्यपालों को भी अपनी ‘कठपुतली’ की श्रेणी में ले लिया और उसी समय से जो केन्द्र में सत्तारूढ़ दलों की मंशा के अनुरूप राज्य सरकारों को गिराया व उठाया जाने लगा, तब तत्कालीन प्र्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को यह प्रक्रिया रास नहीं आई और तभी सत्ता के गलियारें से ही राज्यपाल की भूमिकाओं को लेकर सवाल उठाए जाने लगे थे और इस पद की संवैधानिक उपयोगिता के आगे प्रश्न चिन्ह खड़े किए जाने लगे थे किंतु वाजपेयी सरकार के बाद यूपीए सरकार आने पर कुछ समय तक इन चर्चाओं पर विराम लग गया, किंतु यूपीए सरकार के दौरान भी राज्यपालों की नियुक्ति का मुख्य मापदण्ड उनका ‘‘संवैधानिक ज्ञान या अनुभव’’ नहीं ‘‘राजनीतिक जोड़-तोड़ की क्षमता’’ ही रहा, और जब पांच साल पहले मोदी जी की एनडीए सरकार बनी तो उन्होंने भी विरासत में मिली इस प्रक्रिया को अपने अनुसार और सहज बनाकर उसे जारी रखा, और इसका दायरा राज्यपाल से विस्तारित होकर राष्ट्रपति तक बढ़ा दिया गया और इस तरह राष्ट्रपति से लेकर राज्यपाल तक के संवैधानिक पद सत्ता के ‘यस मैन’ बनकर रह गए।
…..और अब तो राज्यपालों की नियुक्ति के पूर्व सम्बंधित राजनेताओं का ‘बाॅयोडाटा’ देखा जाता है और उनकी जोड़-तोड़़ की राजनीतिक क्षमता को रेखांकित कर उन्हें संबंधित परेशानी राज्य में नियुक्ति दी जाती है, जैसा कि हाल ही में मध्यप्रदेश में दी गई। मध्यप्रदेश में नवनियुक्त राज्यपाल का ‘बाॅयोडाटा’ उत्तरप्रदेश के घर-घर में मौजूद है। यही स्थिति आज देश के हर राज्य में मौजूद है, जहां गैर भाजपा सरकारें है, और मेरे इस तर्क का ताजा उदाहरण कर्नाटक राज्य और वहां का राजनीतिक घटनाक्रम के बीच राज्यपाल की भूमिका है।
देश की केन्द्रीय राजनीति आज चूंकि गृृहमंत्री अमित शाह तक सिमटकर रह गई है और राज्यपालों की नियुक्ति में गृृह मंत्रालय की ही अहम् भूमिका होती है, इसलिए अब यह संभावना बढ़ गई है कि राज्यपालों के चयन के मापदण्ड बदल जाएं और उन्हें ही इस अहम् पद पर सुशोभित किया जाए जो गठजोड़ की राजनीति का विशेषज्ञ हो और देश के बुद्धिजीवियों की इस आशंका को लाल जी टंडन की नियुक्ति ने सही साबित भी कर दिया है। यद्यपि टंडन जी भी राजनीति की नदी के घिसे-पीटे शंकर है, जिन्होंने 2009 में अटल जी की अस्वस्थता के बाद ‘‘लखनऊ का अटल’’ बनने की कौशिश की थी, लखनऊ की सरज़मी पर ऐतिहासिक पुस्तक भी लिखी जो काफी चर्चित भी रही। किंतु लेखक से ज्यादा उनकी ख्याति भाजपा मायावती के बीच गठजोड़ की रही इसलिए इस ‘घिसेपीटे’ शंकर की पूजा करने का मोदी सरकार ने फैसला लिया।
वैसे मध्यप्रदेश का तो यह एक महज उदाहरण है, पिछले पांच सालों में नियुक्त किए गए राज्यपालों व उनकी भूमिकाओं की समीक्षा की जाए तो वह समीक्षा इस पद की संवैधानिक गरिमा के अनुकूल कतई नहीं होगी। इससे तो अच्छा होता राज्यपाल का पद विलोपित कर उसकी जगह ‘संवैधानिक नियंत्रक’ का पद कायम कर दिया गया होता, तो आज राज्य सरकारों के लिए अधिक सुविधाजनक होता।

कालजयी रचनाकार-मुंशी प्रेमचंद
प्रो.शरद नारायण खरे
(प्रेमचंद जयंती 31जुलाई पर आलेख) प्रेमचंद हिंदी के युग प्रवर्तक रचनाकार हैं। उनकी रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है। वे ऐसे सर्वप्रथम उपन्यासकार थे जिन्होंने उपन्यास साहित्य को तिलस्मी और ऐय्यारी से बाहर निकाल कर उसे वास्तविक भूमि पर ला खड़ा किया। उन्होंने अपनी रचनाओं में जन साधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया। उनकी कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं। प्रेमचंद की रचनाओं को देश में ही नहीं विदेशों में भी आदर प्राप्त हैं। प्रेमचंद और उनकी साहित्य का अंतर्राष्ट्रीय महत्व है। आज उन पर और उनके साहित्य पर विश्व के उस विशाल जन समूह को गर्व है जो साम्राज्यवाद, पूँजीवाद और सामंतवाद के साथ संघर्ष में जुटा हुआ है।
प्रेमचंद की रचनाओं में जीवन की विविध समस्याओं का चित्रण हुआ है। उन्होंने मिल मालिक और मजदूरों, ज़मीदारों और किसानों तथा नवीनता और प्राचीनता का संघर्ष दिखाया है।
प्रेमचंद के युग-प्रवर्तक अवदान की चर्चा करते हुए डॉ॰ नगेन्द्र लिखते हैं -“प्रथमतः उन्होंने हिन्दी कथा साहित्य को ‘मनोरंजन’ के स्तर से उठाकर जीवन के साथ सार्थक रूप से जोड़ने का काम किया। चारों और फैले हुए जीवन और अनेक सामयिक समस्याओं …ने उन्हें उपन्यास लेखन के लिए प्रेरित किया।”
प्रेमचंद ने अपने पात्रों का चुनाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से किया है, किंतु उनकी दृष्टि समाज से उपेक्षित वर्ग की ओर अधिक रहा है। प्रेमचंद जी ने आदर्शोन्मुख यथार्थवाद को अपनाया है। उनके पात्र प्रायः वर्ग के प्रतिनिधि रूप में सामने आते हैं। घटनाओं ने विकास के साथ-साथ उनकी रचनाओं में पात्रों के चरित्र का भी विकास होता चलता है। उनके कथोपकथन मनोवैज्ञानिक होते हैं। प्रेमचंद जी एक सच्चे समाज सुधारक और क्रांतिकारी लेखक थे। उन्होंने अपनी कृतियों में स्थान-स्थान पर दहेज, बेमेल विवाह आदि का सबल विरोध किया है। नारी के प्रति उनके मन में स्वाभाविक श्रद्धा थी। समाज में उपेक्षिता, अपमानिता और पतिता स्त्रियों के प्रति उनका ह्रदय सहानुभूति से परिपूर्ण रहा है।
मुंशी प्रेमचंद के बारे में मूर्धन्य आलोचक हजारीप्रसाद द्विवेदी लिखते हैं-“अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के आचार-व्यवहार, भाषा-भाव, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा, दुःख-सुख और सूझ-बूझ को जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता. . ….समाज के विभिन्न आयामों को उनसे अधिक विश्वसनीयता से दिखा पाने वाले परिदर्शक को हिन्दी-उर्दू की दुनिया नहीं जानती. परन्तु आप सर्वत्र ही एक बात लक्ष्य करेंगे. जो संस्कृतियों औए संपदाओं से लद नहीं गए हैं, अशिक्षित निर्धन हैं, जो गंवार और जाहिल हैं, वो उन लोगों से अधिक आत्मबल रखते हैं और न्याय के प्रति अधिक सम्मान दिखाते हैं, जो शिक्षित हैं, चतुर हैं, जो दुनियादार हैं जो शहरी हैं। यही प्रेमचंद का जीवन-दर्शन है। ”
प्रेमचंद ने अतीत का गौरव राग नहीं गाया, न ही भविष्य की हैरत-अंगेज़ कल्पना की. वे ईमानदारी के साथ वर्तमान काल की अपनी वर्तमान अवस्था का विश्लेषण करते रहे. उन्होंने देखा की ये बंधन भीतर का है, बाहर का नहीं. एक बार अगर ये किसान, ये गरीब, यह अनुभव कर सकें की संसार की कोइ भी शक्ति उन्हें नहीं दबा सकती तो ये निश्चय ही अजेय हो जायेंगे।सच्चा प्रेम सेवा ओर त्याग में ही अभिव्यक्ति पाता है। प्रेमचंद का पात्र जब प्रेम करने लगता है तो सेवा की ओर अग्रसर होता है और अपना सर्वस्व परित्याग कर देता है।
उनकी भाषा —
प्रेमचंद की भाषा सरल और सजीव और व्यावहारिक है। उसे साधारण पढ़े-लिखे लोग भी समझ लेते हैं। उसमें आवश्यकतानुसार अंग्रेज़ी, उर्दू, फारसी आदि के शब्दों का भी प्रयोग है। प्रेमचंद की भाषा भावों और विचारों के अनुकूल है। गंभीर भावों को व्यक्त करने में गंभीर भाषा और सरल भावों को व्यक्त करने में सरल भाषा को अपनाया गया है। इस कारण भाषा में स्वाभाविक उतार-चढ़ाव आ गया है। प्रेमचंद जी की भाषा पात्रों के अनुकूल है। उनके हिंदू पात्र हिंदी और मुस्लिम पात्र उर्दू बोलते हैं। इसी प्रकार ग्रामीण पात्रों की भाषा ग्रामीण है। और शिक्षितों की भाषा शुद्ध और परिष्कृत भाषा है।
डॉ॰ नगेन्द्र लिखते हैं : “उनके उपन्यासों की भाषा की खूबी यह है कि शब्दों के चुनाव एवं वाक्य-योजना की दृष्टि से उसे ‘सरल’ एवं ‘बोलचाल की भाषा’ कहा जाता है। पर भाषा की इस सरलता को निर्जीवता, एकरसता एवं अकाव्यात्मकता का पर्याय नहीं समझा जाना चाहिए।
“भाषा के सटीक, सार्थक एवं व्यंजनापूर्ण प्रयोग में वे अपने समकालीन ही नहीं, बाद के उपन्यासकारों को भी पीछे छोड़ जाते हैं।
वास्तव में,प्रेमचंद ने सहज सामान्य मानवीय व्यापारों को मनोवैज्ञानिक स्थितियों से जोड़कर उनमें एक सहज-तीव्र मानवीय रुचि पैदा कर दी।
“शिल्प और भाषा की दृष्टि से भी प्रेमचंद ने हिन्दी उपन्यास को विशिष्ट स्तर प्रदान किया। …चित्रणीय विषय के अनुरूप शिल्प के अन्वेषण का प्रयोग हिन्दी उपन्यास में पहले प्रेमचंद ने ही किया। उनकी विशेषता यह है कि उनके द्वारा प्रस्तुत किये गए दृश्य अत्यंत सजीव गतिमान और नाटकीय हैं।
शैली –
प्रेमचंद ने हिंदी और उर्दू दोनों की शैलियों को मिला दिया है। उनका हिंदी और उर्दू दोनों पर अधिकार था, अतः वे भावों को व्यक्त करने के लिए बड़े सरल और सजीव शब्द ढूँढ़ लेते थे। उनकी शैली में चुलबुलापन और निखार है। प्रेमचंद की शैली की दूसरी विशेषता सरलता और सजीवता है। उनकी शैली में अलंकारिकता का भी गुण विद्यमान है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों के द्वारा शैली में विशेष लालित्य आ गया है। इस प्रकार की अलंकारिक शैली का परिचय देते हुए वे लिखते हैं- ‘अरब की भारी तलवार ईसाई की हल्की कटार के सामने शिथिल हो गई। एक सर्प के भाँति फन से चोट करती थी, दुसरी नागिन की भाँति उड़ती थी। एक लहरों की भाँति लपकती थी दूसरी जल की मछलियों की भाँति चमकती थी।’
चित्रोपमता भी प्रेमचंद की शैली में खूब मिलती है। प्रेमचंद भाव घटना अथवा पात्र का ऐसे ढंग से वर्णन करते हैं कि सारा दृश्य आँखों के सम्मुख नाच उठता है उसका एक चित्र-सा खिंच जाता है। रंगभूमि उपन्यास के सूरदास की झोपड़ी का दृश्य बहुत सजीव है-
‘कैसा नैराश्यपूर्ण दृश्य था। न खाट न बिस्तर, न बर्तन न भांडे। एक कोने में एक मिट्टी का घड़ा जिसको आयु का अनुमान उस पर जमी हुई काई से हो सकता था। चूल्हे के पास हांडी थी। एक पुरानी चलनी की भाँति छिद्रों से भरा हुआ तवा और एक छोटी-सी कठौत और एक लोटा। बस यही उस घर की संपत्ति थी।’
प्रेमचंद के पात्रों के उत्तर-प्रत्युत्तर उनकी शैली में अभिनयात्मकता का गुण भी समावेश कर देते हैं। उनकी शैली में हास्य-व्यंग्य का भी पुट रहता है, किंतु उनका व्यंग्य ऐसा नहीं होता जो किसा का दिल दुखाए। उसमें एक ऐसी मिठास रहती है जो मनोरंजन के साथ-साथ हमारी आँखें भी खोल देती हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत है- ‘वह गाँव में पुण्यात्मा मशहूर थे। पूर्णमासी को नित्य सत्यनारायण की कथा सुनते पर पटवारी होने के नाते खेत बेगार में जुतवाते थे, सिंचाई बेगार में करवाते थे और आसामियों को एक दूसरे से लड़वा कर रकमें मारते थे। सारा गाँव उनसे काँपता था। परमार्थी थे। बुखार के दिनों में सरकारी कुनैन बाँट कर यश कमाते थे।’
मुहावरों और सूक्तियों का प्रयोग करने में प्रेमचंद जी बड़े कुशल थे। उन्होंने शहरी और ग्रामीण दोनों ही प्रकार के मुहावरों का खूब प्रयोग किया है। प्रेमचंद की सी मुहावरेदार शैली कदाचित ही किसी हिंदी लेखक की हो। क्षमा कहानी में प्रयुक्त एक सूक्ति देखें-‘जिसको तलवार का आश्रय लेना पड़े वह सत्य ही नहीं है।’ प्रेमचंद जी की शैली पर उनके व्यक्तित्व की छाप स्पष्ट रूप से अंकित है। नि:संदेह मुंशी प्रेमचंद कालजयी कहानीकार व अमर उपन्यासकार थे।उन्हें उपन्यास-सम्राट के रूप में जाना जाता है।

कश्मीरः भारत-पाक अपना ढोंग खत्म करें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कश्मीर में 10 हजार नए पुलिसवालों की तैनाती से हड़कंप मचा हुआ है। कश्मीरी नेता और अलगाववादी लोग भी यह मान रहे हैं कि यह तैनाती इसलिए की जा रही है कि सरकार धारा 370 और 35 ए को खत्म करनेवाली है। उन कश्मीरी नेताओं का कहना है कि यदि ऐसा हुआ तो कश्मीर में उथल-पुथल मच जाएगी। जो नेता कश्मीर को भारत का अटूट अंग मानते हैं, वे भी अलगाववादी बन सकते हैं। सरकार का कहना है कि उसने अमरनाथ-यात्रियों की सुरक्षा का विशेष इंतजाम किया है। उसे डर है कि कहीं दूसरा पुलवामा-कांड न हो जाए। करगिल-युद्ध की 20 वीं वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कड़े संदेश ने भी कश्मीर में लहर-सी उठा दी है। मुझसे कई भारतीय और पाकिस्तानी टीवी चैनलों ने पूछा है कि इस मामले में आपकी राय क्या है ? मेरी राय तो साफ है। कश्मीर में 50 हजार जवान पहले से हैं अगर 50 हजार और भी भेज दिए जाएं तो आम कश्मीरी को डरने की जरुरत क्या है ? कोई भी जवान ज्यादती करेगा तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। हां, डर उन्हें होना चाहिए, जो हिंसा करते हैं, आतंक फैलाते हैं। ये आतंकवादी किसे मारते हैं ? वे ज्यादातर बेकसूर कश्मीरियों की हत्या करते हैं। उन्होंने हिंदू-कम, मुसलमान ज्यादा मारे हैं। जहां तक धारा 370 का सवाल है, सच्चे मायनों में वह कभी की खत्म हो चुकी है। उसकी लाश को सजाए रखने में क्या तुक है ? जहां तक धारा 35 ए का सवाल है, मेरा मानना है कि कश्मीर और कश्मीरियत की रक्षा करना बेहद जरुरी है। इस धारा के उन सब प्रावधानों को बचाए रखना और कठोर बनाए रखना, भारत का कर्तव्य है, जिनके कारण कश्मीर को ‘पृथ्वी का स्वर्ग’ कहा जाता है। हमें ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए कि कश्मीर की घाटी हरयाणा, पंजाब या उप्र के किसी जिले की तरह दिखने लगे। इसके अलावा कश्मीर के सवाल पर भारत और पाकिस्तान, दोनों को अपना ढोंग खत्म करना चाहिए। दोनों को एक-दूसरे के कश्मीरों पर कब्जे की बात भूल जाना चाहिए। दोनों कश्मीर, दोनों देशों के अभिन्न अंग घोषित हों। पाकिस्तान अपने कश्मीर को ‘आजाद कश्मीर’ कहना बंद करे और उसे पूरी तरह से पाकिस्तान का एक प्रांत बना ले। भारत 370 खत्म करे और कश्मीर को अन्य प्रांतों की तरह अपना एक प्रांत बना ले। दोनों कश्मीरों की कश्मीरियत को दोनों देश हर कीमत पर बरकरार रखें। आज का कश्मीर एक खाई है। मैं चाहता हूं कि वह भारत और पाकिस्तान के बीच प्रेम का पुल बने।
(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं और कश्मीर से संबंधित सभी पक्षों के नेता उनके संपर्क में हैं)

पानी चोरी करने वाले किसानों को होगी 2 साल की सजा
सनत कुमार जैन
गुजरात सरकार ने विधानसभा में नया कानून जिसे सिंचाई और जल निकासी संशोधन बिल 2019 का नाम दिया गया है इसमें सरकार ने प्रावधान किया है, कि पानी चोरी अब अपराध होगा जो किसान पानी की चोरी करेगा उसे, इस कृत्य पर 2 साल की जेल और जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इस कानून के बन जाने के बाद यदि कोई किसान पानी चोरी करते हुए पकड़ा गया, तो उसे 2 साल की जेल और 2 लाख तक का जुर्माना या दोनों सजा एक साथ हो सकती हैं। देश में इस तरह का यह पहला कानून है। जिसमें पानी की चोरी करने पर किसानों को 2 साल के लिए जेल भेजा जाएगा। प्राकृतिक आपदा के कारण यदि पानी नहीं बरसा, और किसान ने फसल को बचाने के लिए पानी की चोरी कर ली। ऐसी स्थिति में उसे 2 साल के लिए जेल जाना पड़ेगा। गुजरात सरकार के इस प्रावधान से किसानों में चिंता व्याप्त हो गई है। फसल में जब पानी बहुत आवश्यक होता है। तभी किसान जब सरकार से पानी नहीं मिलता है, तब चोरी करने को विवश होता है। पानी नहीं मिलने पर पूरी फसल बर्बाद होने से बचाने के लिए किसान चोरी करके भी फसल को बचाने का प्रयास करता है किंतु सरकार अब इस मामले में किसानों को जेल भेजने में अमादा हो गई है। अभी तक बिना अनुमति के सिंचाई के लिए पानी लेने पर जुर्माने का प्रावधान था। गुजरात सरकार ने अब सजा का प्रावधान करके किसानों को चिंता में डाल दिया है। सरकार के इस नए संशोधन प्रस्ताव के बाद किसान खेती करेंगे, या डर के मारे खेती करना ही छोड़ देंगे।
गुजरात देश का पहला ऐसा राज्य है जिसने पानी चोरी करने पर किसानों को जेल भेजने का प्रावधान किया है। गुजरात सरकार की देखा देखी अन्य राज्य में इसी तरह का प्रयास कर सकते हैं। जिसका दीर्घ कालीन असर खेती पर पड़ना तय माना जा रहा है। किसान बहुत जोखिम लेकर खेती करता है। उसके ऊपर खाद बीज और मजदूरी का कर्ज होता है। यदि समय पर बारिश नहीं होती है तो पूरी फसल बर्बाद हो जाती है। ऐसे समय पर यदि उसे फसल बचाने के लिए पानी लेना आवश्यक हो जाता है। बिना अनुमति के यदि उसमें पानी ले लिया तो उसका जेल जाना तय होगा। ऐसी स्थिति में अब किसान खेती करेंगे या नहीं इसको लेकर गुजरात में किसानों के बीच चर्चाएं होने लगी हैं। गुजरात में लगभग दो दशक से भाजपा का शासन है। इतने लंबे शासनकाल में यदि किसानों को फसल के लिए पानी नहीं मिल पा रहा है, तो यह गुजरात सरकार की अक्षमता ही मानी जाएगी। जैसे कोई मां अपने बच्चे को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करती है। लगभग वही हालत किसान की होती हैं। किसान अपनी फसल को बच्चे की तरह पालता पोसता हैं। वह अपनी फसल को बर्बाद होते देख नहीं सकता है। खेती के धंधे से हजारों किसान प्रत्येक राज्य में जमीन बेचकर बाहर हो रहे थे। सरकार के इस रुख के बाद किसान फसल बोना ही छोड़ दें। जमीन बेचकर खेती के स्थान पर नौकरी अथवा अन्य धंधे में जाने कि संभावना बढ़ गई है। जिसके कारण अगले कुछ वर्षों में खाद्यान्न, सब्जी, इत्यादि के संकट का सामना करना पड़ सकता है। पिछले डेढ़ दशक में किसानों के उपर कर्ज का बोझ बढ़ता ही जा रहा है। प्रत्येक राज्य में हजारों की संख्या में किसान आत्म हत्या कर रहे है। खेती का लागत मूल्य बढ़ता जा रहा है। फसल की कीमत उस तुलना में किसानों को नहीं मिल पाती है। फसल बीमा के नाम पर सरकार की राह पर बीमा कंपनियों द्वारा शोषण किया जा रहा है। किसान की जिस फसल पर कर्ज दिया गया है। किसान से उसका बीमा प्रीमियम बैंक द्वारा काट लिया जाता है। जब फसल बर्बाद होती है,तो बीमा कंपनी लोन राशि, जिसका प्रीमियम बैंक ने काटा था, वह मुआवजा भी नहीं देती है। किसान को लूटने के लिए पटवारी, तहसीलदार, बैंक, बीमा कंपनियां और,सहकारी समितियां कोई मौका नहीं छोड़ती है। इसके बाद भी किसान खेती कर अपने परंपरागत व्यवसाय से जुड़ा हुआ था। किसानों को जेल भोगने के इस कानून के बाद किसान खेती की जमीन बेचकर नौकरी करने मजबूर होंगे। खेती के धंधे में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाने के लिए सरकार इस तरह के कानून बना रही है। गुजरात सरकार के कानून से यही संदेश मिल रहा है।

राज्यसभा में झूमा झटकी के साथ सूचना अधिकार संशोधन बिल पास
सनत जैन
गुरुवार को राज्यसभा ने सूचना अधिकार संशोधन विधेयक ध्वनि मत से पारित कराने में असाधारण सफलता अर्जित की है। संसद के दोनों सदनों से यह बिल विपक्ष के भारी विरोध के बाद भी बिना किसी संशोधन के पारित कराने का जौहर भाजपा ने करके दिखाया है। उससे सभी राजनैतिक दलों के बीच सरकार के प्रबंधन और कूटनीति की चर्चा हो रही है। विपक्षियों के तरकश से निकले सारे तीर सरकार तक नहीं पहुंच पाए। सूचना अधिकार संशोधन बिल के प्रावधान को लेकर लोकसभा एवं राज्यसभा में काफी तीखी बहस हुई। विपक्ष ने पूरी ताकत से इस बिल का विरोध किया। किंतु लोकसभा में 303 मत के समर्थन से यह बिल पास हुआ। दूसरे दिन राज्यसभा में 75 के मुकाबले 117 वोटों से यह बिल पास हो गया। उल्लेखनीय है, राज्यसभा में सरकार के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। इसके बाद भी जोड़-तोड़ करके तथा फ्लोर मैनेजमेंट के माध्यम से सरकार ने बिल पास कराकर विपक्ष को तगड़ी मात दी है।
राज्यसभा में विपक्ष इस बिल को पेश ही नहीं होने दे रहा था। सारे दिन नारेबाजी होती रही। उसके बाद भी सरकार ने ना केवल इस बिल को सदन में पेश किया, वरन पास भी करा लिया। इस बिल को जिस तरह से पास कराया गया है उसको लेकर राजनीतिक क्षेत्रों में यह कहा जा रहा है कि जो जीता वही सिकंदर की तर्ज पर भाजपा ने राज्यसभा में जिस तरह से बिल पास कराया है। उससे सरकार और संसद की गरीमा गिरी है।
मत विभाजन के लिए राज्यसभा में सरकार के मंत्री और भाजपा के सदस्यों ने पर्चियों का वितरण किया। मत विभाजन के दौरान मत पर्चियों का वितरण और संग्रहण भाजपा के सांसदों द्वारा किए जाने, और उन्हें महासचिव को सौंपने का आरोप लगाकर चुनाव की निष्पक्षता को लेकर कांग्रेस ने अपना विरोध भी दर्ज कराया। कांग्रेस के विप्लव ठाकुर और तृणमूल कांग्रेस की डोला सेन ने भाजपा में हाल ही में शामिल हुए सांसद सीएम रमेश पर पर्चियों की हेराफेरी करने का आरोप लगाया। राज्यसभा में सांसदों के बीच धक्का-मुक्की हुई, इसी बीच ध्वनिमत से 75 के मुकाबले 117 वोटों से विपक्ष का प्रस्ताव गिर गया। सूचना अधिकार संशोधन विधेयक ध्वनिमत से पारित हो गया।
राज्यसभा से, सूचना अधिकार बिल पास हो जाने से सरकार काफी उत्साहित है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार अगले सप्ताह सरकार सभी 14 विवादित विधेयकों को राज्यसभा में प्रस्तुत कर पास कराने का काम करेगी। नेशनल मेडिकल बिल पिछले डेढ़ साल से लंबित है। संसद परिसर की चर्चाओं के अनुसार सरकार ने अप्रत्यक्ष रुप से छोटे-छोटे राजनैतिक दलों के सांसद जो यूपीए के समर्थक थे। उनसे लंबित बिलों को पास कराने के लिए सहमति प्राप्त कर ली है। राज्यसभा से 14 विधेयकों को पास कराकर सरकार विपक्ष को उसकी दयनीय स्थिति का अहसार कराने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ने वाली है। भारत में जिस तरह से आर्थिक मामलों को लेकर सरकार का विरोध बढ़ रहा है। उसको देखते हुए सरकार ने अपना रुख काफी आक्रामक कर लिया है। सरकार विपक्ष के दबाब में आए बिना सरकार चलाने की मुद्रा में है।

अपनी व्यवस्था भी बना ली मोदी जी ने !
डॉ. अरविन्द जैन
बहुत पहले पंगत भोज होता था और कहीं कहीं आज भी होता हैं। इसमें यह फायदा होता हैं की सब लोग एक कतार में बैठते हैं और अलग अलग सामग्री परोसने वाले परोसते हैं जैसे कोई पूरी, कोई दाल कोई सब्ज़ी कोई मिठाई, कोई नमकीन आदि आदि। इसमें जब किसी को कुछ अलग से चाहिए रहता तब वह परोसने वाले से कहता भाई चाचा जी को रसगुल्ला परसो तो उसे भी मिलजाता हैं। यह चतुराई कहलाती हैं। दूसरा पंगत में हमेशा वहां बैठो जहाँ से परोसना शुरू होता हैं। सब पीछे बैठने से परोसने वाली सामग्री ख़तम हो जाती हैं। इसीलिए यह भी होशियारी सीखना चाहिए।
मोदी ने कहा, ‘आप सबके आशीर्वाद से मैंने ठान लिया है कि दिल्ली में सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों की स्मृति में एक बहुत बड़ा आधुनिक संग्रहालय बनाया जाएगा ”
इस बहाने स्वयं की भी व्यवस्था पूर्व से कर ली और अब संग्रहालय में स्थापित होने के लिए नए नए स्टाइल की ड्रेस नयी नयी प्रकार की भाषण व्यवस्था जिससे यदि भूतपूर्व हुए तो उनका व्यक्तित्व हमेशा उदीयमान रहेगा और अभी बनना हैं तो उनकी भूमिका विशेष होने से उनका विशेष ध्यान रखा जायेगा और होना भी चाहिए,
परोसने वाला कभी भूखा रह सकता हैं ?,कभी नहीं, अब तो और अच्छा मौका मिलेगा जो उनकी व्यक्तिगत सभी सामग्री को प्रदर्शित किया जा सकेगा, और नहीं होगी तो बना ली जाएगी। आधे में सब और आधे में हम / मैं।
यहाँ एक बात का उल्लेख करना जरुरी हैं की इसमें भूतपूर्व उपप्रधान मंत्री को भी प्रदर्शित किया जाय तो कम से कम प्रधानमंत्री के तथागत गुरु आडवाणी जी को भी वहां जगह मिल जाएगी, ऐसा सुझाव हैं, शायद अमान्य होगा पर उनक लिए दक्षिणा का सही होगा जिससे चिरस्थायी यादगार रहेंगी और गुरु दक्षिणा के साथ प्रधानसेवक का व्यक्तिगत रूप से कुछ खरचा तो नहीं लगना। होगा। कितने २ -४ मात्र। आखिर वे भी प्रधान मंत्री की दौड़ में शामिल थे और प्रधान मंत्री की अनुपस्थिति में वे कार्यवाहक प्रधानमंत्री तो हो जाते थे। नरहे भूतपूर्व परन्तु कार्यवाहक तो रहे। हो सकता हैं की वर्तमान में कार्यवाहक की परम्परा न हो। कारण विदेश यात्रा में भी अपना देश अपने साथ लेकर जाते हो।
यह गंभीर नहीं पर विचारणीय मुद्दा हैं इस पर उनको हिकारत भरी नज़र से नहीं देखना चाहिए। वो उनको देखते तो हैं चाहे दुश्मनी से ही, देखते हैं, पहचानते हैं। वे बेचारे एकलव्य जैसा अंगूठा तो नहीं मांग रहे बस कुछ स्थान दिल में न सही तो संग्रहालय में दे देना चाहिए। संग्रहालय कोई जीवित वस्तु तो नहीं हैं, मात्र दो चार हाल और बन जायेंगे और अब लगभग ५० वर्षों तक न कोई उपप्रधानमंत्री बनना हैं और न कोई प्रधानमंत्री।
और जब मुखिया की इच्छा हो उसको पूरा होना ही हैं। मंदिर न बने कारण उससे राजनीती चलती हैं, वह बन जायेगा फिर चुनाव के लिए क्या मुद्दा रहेगा। हाँ यह जरूर हैं की प्रधान सेवक के धुर विरोधी जैसे नेहरू, इंदिरा, राजीव को मज़बूरी में रखना होगा। हो सकता हैं की कहीं भी जगह दे दे। यानी सबसे पहले या आखिरी में। मज़बूरी हैं पहले में रखना पड़ेगा या पीछे रखेंगे तो वहां से भी पहले माने जायेंगे नेहरू जी। अजब मुसीबत है नेहरू जी के साथ। धुर विरोधी सबसे सामने।
पर राजनीती में सब चलता हैं
ये दिन के दो होते हैं और
रात के एक
एक बार जरूर सोचते होंगे
प्रधान सेवक
की
आपकी नीतियों के कारण
मुझे मौका मिला
जैसे जीतने वाला पहलवान
हारने वाले का शुक्रिया अदा करता हैं
की
आप अच्छे हारे, जिस कारण
मैं जीता।

मध्यप्रदेश में उच्च शिक्षा और खेल की तस्वीर बदलेगी
जीतू पटवारी
शिक्षा समाज और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करती है। खेल उत्साह,प्रसन्नता और ऊँचाईयों को प्रतिबिंबित करते है वहीं युवा तेज,पराक्रम और शक्ति के पुंज होते है। मध्यप्रदेश के प्रत्येक विद्यार्थी को गुणवत्तापूर्ण,सुलभ और सस्ती शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए कमलनाथ सरकार प्रतिबद्ध है। खेलों में उत्कृष्ट खिलाड़ी तैयार कर देश का गौरव बढ़ाने में योगदान देना सरकार का लक्ष्य है और युवाओं की बेहतरी से लोककल्याणकारी राज्य को मजबूत करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।
मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार के कार्यकाल का यह आठवां महीना है और इस दौरान लोकसभा की आचार संहिता का पालन भी हुआ है। कमलनाथ सरकार के सामने चुनौतियां तो असंख्य है लेकिन लोक कल्याण का संकल्प भी है। 15 साल तक भाजपा सरकार ने उच्च शिक्षा,खेल और युवा कल्याण के प्रति जो उपेक्षा का भाव रखा उससे राज्य में निराशा का भाव व्याप्त हो गया था। उच्च शिक्षा विभाग वर्तमान में संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। लोक कल्याण का अर्थ जनता की बेहतरी होता है लेकिन भाजपा सरकार ने लोकलुभावन दृष्टि रखकर उच्च शिक्षा की व्यवस्था को ही अस्त व्यस्त कर दिया।
पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने अत्यधिक घोषणाएं कर कालेज तो खोल दिए लेकिन दूसरी और कई कालेजों के पास जमीन ही नहीं है, कई कालेजों के पास भवन नहीं है और अगर ये दोनों भी है तो शिक्षक व पुस्तकालय, लैब नहीं है। 191 महाविद्यालयों के पास स्वयं का भवन नहीं है उनमें से 6 महाविद्यालय किराये के भवनों में संचालित हो रहे है। 128 महाविद्यालय ऐसे है जहां एक भी नियमित शिक्षक पदस्थ नहीं है और 150 महाविद्यालय में एक भी नियमित कर्मचारी पदस्थ नहीं है। पूर्ववर्ती सरकार के इस विभाग के प्रति उपेक्षा भाव के चलते हमारे प्रदेश का राष्ट्रीय स्तर की रैंकिगं में प्रथम 100 में कहीं स्थान नहीं है।
कमलनाथ सरकार ने अपने सालाना बजट से 15 साल की कमियों और आधे अधूरे छोड़ दिए गए कार्यों को पूरा करने का संकल्प लिया है। इस साल बजट में उच्च शिक्षा के लिए दो हजार तीन सौ बयालीस करोड़, छिहत्तर लाख, अठहत्तर हजार, रूपये जबकि खेल और युवा कल्याण के लिए दो सौ करोड़ बाईस लाख रूपये का प्रावधान किया है। राज्य में पहली बार कौशल और खेल विश्वविद्यालय की स्थापना से तस्वीर निश्चित ही बदलेगी वहीं विधायक कप के आयोजन के लिए प्रत्येक वर्ष 1 लाख की राशि और 5 लाख की अतिरिक्त सहायता से राज्य के कोने कोने में खेलों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। मध्यप्रदेश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालय कई वर्षों से शिक्षकों की कमी से जूझ रहे है अत: यह कमी चरणपूर्वक भर्ती और नियुक्ति से दूर की जायेगी वहीं सालों से सेवाएं देने वाले अतिथि विद्वान भी व्यवस्था का अंग बने रहेंगे। विद्यार्थियों की प्रवेश प्रक्रिया को सरल और समयबद्ध किया गया है,बालिकाओं के लिए प्रवेश शुल्क पूरी तरह माफ कर दिया गया है वहीं अजा जजा की तरह ही ओबीसी तथा आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को भी निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें तथा स्टेशनरी प्रदाय की जा रही है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए लागू किये गये 10 प्रतिशत आरक्षण को देखते हुए सीटों में इस प्रकार वृद्धि की गयी है,वहीं एकीकृत प्रबंधन प्रणाली लागू की जा रही है जिससे छात्रों का प्रवेश, परिणाम, डिग्री आदि कार्य छात्र को सुलभता से प्राप्त हो।
उत्कृष्ट शिक्षाविदों को जोड़कर उच्च शिक्षा परिषद का गठन किया जा रहा है इसके साथ ही उत्कृष्ट संस्थानों की तर्ज़ पर ऑटोनामी के साथ उत्कृष्ट संस्थान विकसित किये जा रहे है। विभाग के अंतर्गत संचालित विश्वविद्यालयों महाविद्यालयों में उपलब्ध सुविधाओं के विकास एवं सुदृढ़ीकरण के लिए तीन हजार करोड़ मूल्य की वर्ल्ड बैंक परियोजना लागू की गई है। इस परियोजना में हम 200 महाविद्यालयों को आधुनिक संसाधनों से लैंस कर रहे है,46 कन्या महाविद्यालयों में छात्रावासों का निर्माण,राज्य में नवीन आदर्श महाविद्यालयों की स्थापना के साथ राजगढ़ में एक नवीन व्यावसायिक महाविद्यालय की स्थापना की जा रही है। 33 सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के रूप में उन्नत करने के साथ विश्वबैंक परियोजना के तहत 153 कम्प्यूटर लैब, 2000 स्मार्ट क्लासेस, 200 लैंग्वेज लैब,200 ई-लाईब्रेरी तथा विज्ञान विषयों की प्रयोगशालाएँ निर्मित किये जाने की योजना है। रोजगार वृद्धि के लिए एक कॉमन कॅरियर पोर्टल विकसित किया जा रहा है जिससे छात्रों एवं उद्यमियों को एक प्लेटफार्म मिलेगा। पीएससी,यूपीएससी की तैयारी के लिए सरकारी मदद के साथ ही उन्हें बाहर भी भेजा जायेगा। यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के साथ शिक्षक एवं विद्यार्थी वर्ग के लिए एमओयू किया है जिससे विद्यार्थियों व शिक्षकों की अंग्रेजी भाषा पर दक्षता बढ़े। नॉलेज कार्पोरेशन के गठन से विद्यार्थियों का चहुंमुखी विकास सुनिश्चित होगा वहीं मध्यप्रदेश में युवाओं में पर्यावरण संरक्षण को लेकर व्यापक जागरूकता के लिए अभियान भी शुरू किया जा रहा है।
मध्यप्रदेश सरकार खेलों के सर्वांगीण विकास के साथ खिलाड़ियों के बेहतर भविष्य के लिए भी कृतसंकल्पित है। उत्कृष्ट कोच के लिए डेवलपमेंट प्रोग्राम और खेल अकादमियों के खिलाड़ियों के लिये चिकित्सा व दुर्घटना बीमा योजना प्रारंभ की गई है जिसमे दिव्यांग खिलाड़ी शामिल है। ओलम्पिक विजेता को 2 करोड़ रुपये के पुरस्कार के साथ ही राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले और भाग लेने वाले खिलाड़ियों को पुरस्कार राशि में 4 गुना से बढ़ाकर 20 से 25 गुना वृद्धि कर दी गई है। खिलाड़ियों के लिए गाँधी,शंकरदयाल शर्मा,इंदिरा और राजीव प्रतिभा और प्रोत्साहन योजना लागू की गई है। खिलाड़ियों को अन्तर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण के साथ खेल कोटे से खिलाड़ियों का भविष्य सुरक्षित होगा। पीपीपी योजना से समाज का बड़ा वर्ग भी भागीदार बनेगा। नई विकसित होने वाली कॉलोनियों अथवा आवासीय क्षेत्र में खेल सुविधाओं का निर्माण किया जावेगा। राजीव गांधी ग्रामीण युवा केन्द्र के अंतर्गत प्रत्येक ग्रामीण युवा केन्द्र में इन्डोर व ऑऊटडोर खेल मैदान तथा फिटनेस सेन्टर की सुविधा भी चरणबद्ध तरीके से उपलब्ध कराई जावेगी।
हमारी सरकार प्रदेश की खुशहाली और लोक कल्याण के लिए संकल्पित होकर कार्य कर रही है। खेल और उच्च शिक्षा की उत्कृष्टता से मध्य प्रदेश को विकसित राज्य के रूप में राष्ट्र में पहचान दिलाना हमारा लक्ष्य है।

इमरान पर भरोसा क्यों न करें ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कमाल कर दिया। उन्होंने अमेरिका में अपने आतंकवादियों के बारे में ऐसी बात कह दी, जो आज तक किसी भी पाकिस्तानी नेता ने कहने की हिम्मत नहीं की। उन्होंने अमेरिका के एक ‘शांति संस्थान’ में भाषण देते हुए कह दिया कि पाकिस्तान में 30 हजार से 40 हजार तक सशस्त्र आतंकवादी सक्रिय हैं। उनकी सक्रियता को पिछली पाकिस्तानी सरकारें छिपाती रही हैं और उनके बारे में झूठ बोलती रही हैं। ये आतंकवादी अफगानिस्तान और कश्मीर में खूंरेजी करते रहे हैं। ऐसे 40 गिरोह पाकिस्तान में दनदना रहे हैं। उनके खिलाफ 2014 से कार्रवाई शुरु हुई, जब उन्होंने पेशावर के फौजी स्कूल के डेढ़ सौ बच्चों को मार डाला था। इमरान ने दावा किया कि उनकी सरकार ने सत्ता में आते ही इन दहशतगर्द गिरोहों के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरु कर दी है। हाफिज सईद इस समय गिरफ्तार है और उसकी जमात-उद-दावा के 300 मदरसे, स्कूल, अस्पताल, प्रकाशन संस्थान और एंबुलेंसों को सरकार ने जब्त कर लिया है। इमरान के इस तेवर से पाकिस्तान के कई राजनीतिक दल, टीवी चैनलों के एंकर और देशभक्त पत्रकार लोग बेहद खफा हैं लेकिन वे यह क्यों नहीं समझते कि इमरान की इस साफगोई का जबर्दस्त फायदा पाकिस्तान को मिल सकता है। अंतरराष्ट्रीय वितीय टास्क फोर्स अक्तूबर में पाकिस्तान को काली सूची में डालनेवाली है। क्या वह रहम नहीं खाएगी ? इसके अलावा अमेरिकी नीति-निर्माताओं पर इमरान की इस स्वीकारोक्ति का क्या कोई असर नहीं पड़ेगा ? इमरान ने तालिबान और काबुल सरकार के बीच भी समझौता करवाने का संकल्प प्रकट किया है। पाकिस्तान के विरोधी नेता इस नए तेवर को इमरान का ढोंग बता रहे हैं, उनका शीर्षासन कह रहे हैं, वे उन्हें फौज का चमचा बताते रहे हैं लेकिन मैं सोचता हूं कि इस नये इमरान का जन्म पाकिस्तान की मजबूरी में से हुआ है। यह मजबूरी तात्कालिक हो सकती है लेकिन यह है, सच ! भारत के लिए इस सच को स्वीकारना काफी मुश्किल है। दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है लेकिन मैं सोचता हूं कि भारत अपनी सुरक्षा के बारे में पूरी सावधानी रखे लेकिन इमरान पर भरोसा भी क्यों न करे ?

राजनीति तो वेश्या है: भर्तृहरि
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हम समझ रहे हैं कि कर्नाटक के नाटक का समापन हो गया। विधानसभा में विश्वास का प्रस्ताव क्या गिरा और मुख्यमंत्री डी. कुमारस्वामी ने इस्तीफा क्या दिया, देश के लोगों ने चैन की सांस ले ली लेकिन पिछले 18 दिन से चल रहे इस नाटक का यह पटाक्षेप या अंत नहीं है, बल्कि उसकी यह शुरुआत है। यह किसको पता नहीं था कि कांग्रेस+जद (से) गठबंधन की यह सरकार गिरनेवाली ही है। इसे बचाना पहले दिन से ही लगभग असंभव दिख रहा था। अब जिन तेरह विधायकों ने इस्तीफे दिए हैं, उनका भाग्य तो अधर में लटका ही हुआ है, यह भी पता नहीं कि सिर्फ 6 के बहुमत से बननेवाली भाजपा सरकार कितने दिन चलेगी ? इसमें शक नहीं कि 14 महिने पहले विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण कांग्रेस और जद के अस्वाभाविक गठबंधन का राज कायम हो गया था। पहले दिन से ही गठबंधन के इस दूध में मक्खियां तैरने लगी थीं और अब जब लोकसभा चुनाव हुए तो इस गठबंधन का सूपड़ा लगभग साफ हो गया। कांग्रेस और जद (से) के जिन विधायकों ने दल-बदल किया है, वे कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री ने उनके निर्वाचन-क्षेत्रों की उपेक्षा की है, इसीलिए वे पार्टी छोड़ रहे हैं। उनका करारा जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने विधानसभा को बताया है कि किस विधायक को विकास के नाम पर कितने सौ करोड़ रु. दिए गए हैं। उधर कांग्रेस आरोप लगा रही है कि इन विधायकों को भाजपा ने 40 करोड़ से 100 करोड़ तक प्रति व्यक्ति दिए हैं। दूसरे शब्दों में कर्नाटक में भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा हुई है। कर्नाटक में पहले उन पार्टियों ने हाथ से हाथ मिलाकर सरकार बनाई, जो चुनाव में एक-दूसरे पर गालियों की वर्षा कर रहे थे और अब भाजपा की जो नई सरकार बन रही है, वह उन लोगों के सहारे बन रही है, जो भाजपा, येदियुरप्पा और मोदी को पानी पी-पीकर कोसते रहे हैं। ऐसी स्थिति में जबकि सभी पार्टियों ने सिद्धांतों को ताक पर रख दिया है, आप किसको सही कहें और किसको गलत ? गोवा में जो हुआ, वह इससे भी ज्यादा भीषण है। पैसों और पदों के खातिर कौन नेता और कौन दल कब शीर्षासन की मुद्रा धारण करेगा, कुछ नहीं कह सकते। सत्ता की खातिर कांग्रेस कब भाजपा बन जाएगी और भाजपा कब कांग्रेस बन जाएगी, कोई नहीं जानता। इसीलिए भर्तृहरि ने हजार साल पहले राजनीति को वारांगना (वेश्या) कहा था।

पुलवामा हमले जैसे हालात से निपटने खरीदा जा रहा है खास बम
अजित वर्मा
भारतीय सेना को अत्याधुनिक संसाधनों से लगातार सुसज्जित किया जा रहा है। इसी का नतीजा है कि भारतीय सेना हर दिन अपडेट होती जा रही है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद जैसे हालात से निपटने के लिए सेना बेहद सटीक हमले के लिए एक खास बम खरीदने जा रही है। लंबी दूरी की तोपों में इस गोला-बारूद का इस्तेमाल होगा। इसकी खास बात यह है कि बेहद घनी आबादी में भी ऐक्सकैलिबर गाइडेड गोला दुश्मन के टारगेट को पूरी सटीकता से 50 किमी से भी ज्यादा दूरी से निशाना बना सकता है। पाकिस्तान अक्सर नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर गोलाबारी करता रहता है, ऐसे में यह भारतीय हथियार आबादी के बीच मौजूद दुश्मन के ठिकाने को भी बर्बाद कर सकेगा।
भारतीय सेना आपातकालीन खरीद प्रक्रिया के तहत अमेरिका से ऐक्सकैलिबर आर्टिलरी ऐम्यनिशन खरीदने की योजना बना रही है। हथियार प्रणालियों और गोला-बारूद खरीदने के लिए मिले आपातकालीन अधिकारों के तहत इस खरीद की समीक्षा की जा रही है, जिससे भविष्य में पुलवामा हमले के बाद बनी स्थिति के लिए तैयारी पुख्ता की जा सके। यह गोला-बारूद नियंत्रण रेखा पर तैनात यूनिटों के लिए खरीदा जा रहा है जहां पाकिस्तान गोलाबारी करता रहता है। यह बम हवा में और बंकर जैसे मजबूत ढांचे में घुसने के बाद भी धमाका कर सकता है। हाल में हुई एक बैठक में सेना ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को अमेरिका से इस गाइडेड ऐम्यनिशन की खरीद की योजना के बारे में जानकारी दे दी है, जो जीपीएस सिस्टम का इस्तेमाल कर 50 किमी की दूरी से ही दुश्मन के ठिकाने को तबाह कर सकता है।
इस बम को अफगानिस्तान में युद्ध के समय तोप से दागे गए गोले के निशाने को बेहद सटीक बनाने के लिए अमेरिका में विकसित किया गया था। अमेरिकी सैनिक करीब दो दशक से अफगानिस्तान में लड़ रहे हैं। उधर, भारतीय सेना अमेरिका में बनी एम-77 अल्ट्रा-लाइट होवित्जर्स तोपें भी खरीद रही है जिससे ऐक्सकैलिबर ऐम्यनिशन को दागा जा सकता है। भारतीय सेना लगातार अपनी तैयारियों को मजबूत करती जा रही है। स्पाइक ऐंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें खरीदी जा रही हैं, जो दुश्मन के बख्तरबंद ठिकाने को भी बर्बाद कर सकती हैं। युद्ध की तैयारी के लिए भारतीय वायुसेना ने हाल में कई हथियार और अपने लड़ाकू विमानों के लिए साजोसामान खरीदे हैं। एयरफोर्स की खरीद में बालाकोट एयर स्ट्राइक में इस्तेमाल किए गए स्पाइस 2000 बम भी शामिल हैं, जिसे इजरायल ने बनाया है। इसका अपडेट वर्जन भी भारत ने खरीदा है। इतना ही नहीं, एमआई-35 अटैक हेलिकॉप्टरों के लिए त्रम अटाका ऐंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल भी आईएएफ को मिल रही है।
निश्चित ही भारतीय सेना का अत्याधुनिक संसाधनों से संपन्न होते जाना देश की ताकत बढ़ायेगा।

कश्मीरः ट्रंप की मध्यस्थता ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने मेहमान इमरान खान से कह दिया कि नरेंद्र मोदी ने पिछली मुलाकात में उनसे निवेदन किया था कि वे कश्मीर के मामले में मध्यस्थता करें। ट्रंप के इस बयान ने हमारे विदेश मंत्रालय में भूकंप ला दिया है। रात देर गए उसने ट्रंप के दावे का खंडन किया। अब कैसे मालूम करें कि कौन सही है ? ट्रंप या हमारा विदेश मंत्रालय ? जहां तक ट्रंप का सवाल है, उन्हें अमेरिकी अखबारों ने ‘झूठों के सरदार’ की उपाधि दे रखी है। ‘वाशिंगटन पोस्ट’ के मुताबिक ट्रंप एक दिन में औसत 17 बार झूठ बोलते हैं। उन्होंने अपने दो साल के कार्यकाल में 8158 बार झूठ बोला है। कश्मीर पर मध्यस्थता की जो बात उन्होंने कही है, वह भी इसी श्रेणी में रखने की इच्छा होती है लेकिन इसमें एक अन्य संभावना भी हो सकती है। वह यह कि ट्रंप ने मोदी से पूछा हो कि आप कश्मीर-समस्या हल क्यों नहीं करते ? इस पर मोदी ने कह दिया हो कि आप भी कोशिश कर लीजिए। इसे ट्रंप ने मध्यस्थता समझ लिया हो। समझा न हो तो भी इमरान के मध्यस्थता के सुझाव के जवाब में उन्होंने मध्यस्थता शब्द का प्रयोग कर दिया। कश्मीर मसले पर 1948 में संयुक्तराष्ट्र संघ को बीच में डालकर नेहरुजी पछताए और बाद में जब भी कुछ विश्व नेताओं ने मध्यस्थता की पेशकश की, भारत ने रद्द कर दी। कुछ माह पहले नार्वे के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान के एक पूर्व राष्ट्रपति ने मुझे सुझाव दिया था कि मध्यस्थता का रास्ता अपनाया जाए। मैं खुद कुछ पहल करुं। मैंने अनौपचारिक बातचीत को तो ठीक बताया लेकिन औपचारिक तौर पर सरकारी मध्यस्थता को मुझे नकारना पड़ा। वैसे भी इस समय ट्रंप को अफगानिस्तान और तालिबान से अमेरिका का पिंड छुड़ाना है। इसीलिए उन्होंने इमरान को वाशिंगटन आने दिया है और उनसे वे लल्लो-चप्पो करना चाहेंगे। इमरान का यह सोच स्वाभाविक है कि जैसे अमेरिकी मध्यस्थता से तालिबान का मामला हल हो रहा है वैसे ही कश्मीर का मसला भी हल हो जाए लेकिन दोनों मामलों में बहुत फर्क है। मैं कश्मीर पर भारत-पाक संवाद के पक्ष में तो हूं लेकिन किसी बिचौलिए को अनावश्यक मानता हूं। ट्रंप के तेवर कितना ही भारत-प्रेम प्रकट करते हों लेकिन वे स्वयं इस योग्य नहीं हैं कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय विवाद में वे मध्यस्थता कर सकें।

हमारे जन प्रतिनिधियों जो जनता से चुने हुए हैं को इतनी सुरक्षा क्यों ?
डॉ. अरविन्द जैन
राजशाही काल में जब कोई महामंत्री या मंत्री अत्याचार करता था तब वह अपने साथ 2 -4 सैनिक रखता था कारण मंत्री स्वयं इतना बलवान और सक्षम होता था की जनता से निपटना जानता था, राजा भी बहुत कलाकार, हुनरबाज़ होते थे की वे जनता या दुश्मन की चाल समझ जाते थे। उनको अधिक सुरक्षा की जरुरत नहीं पड़ती थे, उसके बाद हमारे देश में अंग्रेंज आये, वो भी बहुत कम, उस अनुपात में हमारी आबादी उनसे अधिक थी पर उनका प्रभाव इतना था की उनको भी अधिक सुरक्षा की जरुरत नहीं पड़ती थी। फिर आजादी की लड़ाई में तो हमारे नेता सुरक्षा विहीन रहते थे जिसका उदाहरण महात्मा गाँधी की हत्या।
जैसे जैसे आजादी के बाद नेताओं की चाल ढाल में, नैतिकता का अभाव आने लगा और उनके द्वारा धन लोलुपता बड़ी तब उन्होंने पहले अपने साथ निजी तौर गुंडें। लठैत रखना शुरू किया। उसके बाद प्रिवीपर्स ख़तम होने के बाद राजे महाराजे सामान्य स्थिति में आ गए कुछ को छोड़ कर सब बिना सुरक्षा के रहने लगे। उस समय बहुत अधिक से अधिक 500 -600 राजा महाराज जमींदार रहे होंगे पर उसके बाद उनकी आदतों को देखकर हमारे यहाँ वर्तमान में चुने और भूतपूर्व सांसद, मंत्री, विधायक सेवा निवृत न्यायाधीश, आदि आदि लगभग 5,,79, 092 वी आई पी हैं जिनके लिए सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर सैनिक, हवाई यात्रा विदेश यात्रायें, आने जाने के लिए वाहन, मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, कम दामों में उच्चतम क्वालिटी का भोजन आदि आदि, की सुविधाएँ पेंशन भत्ता के साथ मिलती हैं।
अब हम अन्य देशों की ओर निगाह डाले की उनके यहाँ कितने वी आई पी होते हैं — जैसे ब्रिटेन में 84, फ्रांस में 109 जापान में 125, जर्मनी में 142 अमेरिएका में 252 रूस में 312 चीन में 435 और भारत नहीं इंडिया में 5, 79,092 को सब सुविधा दी जाती हैं। इसके साथ हमारे देश में अजब गज़ब हैं सांसद, विधायक मंत्री मुख्य मंत्री राज्यपाल, राष्ट्रपति यदि एक व्यक्ति बनता हैं तो उसे हर पद का वेतन भत्ता अलग अलग मिलता हैं ऐसा क्यों ?
इस प्रकार देखा जाय तो कितना पैसा इन पर व्यय होता हैं और इसके अलावा जनता द्वारा चुने हुए जन प्रतिनिधि इतने भयभीत क्यों होते हैं की उनकी सुरक्षा में करोड़ों रुपये साल खरच होते हैं, । क्या वे पद पर आकर अजर अमर हो जाते हैं और पद से हटने के बाद भी उतनी सुरक्षा क्यों और उनके मरने के बाद भी उनके परिवार के लिए भी सुरक्षा। क्या एक बार पद पर आने के बाद उनको स्वर्गवासी होने तक का लाइसेंस मिल जाता हैं और उसके बाद उनके परिवार जनों को। क्या इतनी सहानुभूति सरकारी अधिकारी कर्मचाहरियों को देना चाहिए अथवा नहीं?
जब एक सरकारी कर्मचारी 25 वर्ष की उम्र से 60 वर्ष तक कार्य करता हैं, वह अपनी जवानी पूरी सरकारी नौकरी में झोंक देता हैं तब उसे पेंशन मिलती हैं और इन चुने हुए प्रतिनिधि सिर्फ चुने जाने के बाद ताजिंदगी भत्ता प्राप्त करते हैं, जैसे कोई शादी का जोड़ा शादी करने के बाद सुहाग रात न मना पाए और उनमे से कोई एक मर जाए तब वह विधुर या विधवा कहलाने लगती हैं पर सांसद, विधायक सदा सुहागन होती हैं ऐसा क्यों ?
एक तरफ हम गरीबी की दुहाई दे रहे हैं, दूसरी ओर हमारे ऊपर इतना करारोध हैं की मध्यम वर्ग को अपना भरण पोषण करने में परेशानी हो रही और गरीबों को सरकार ने अपनी तिजोरी खोलकर रख दी हैं जिसका खरचा भी हम मध्यम वर्ग को उठाना पड़ रहा हैं और इसके बाद लाखों वी आई पी का खर्चा हम कर दाताओं से क्यों वसूलकर उनको दिया जा रहा हैं। इस पर पुर्नविचार होना जरूरी हैं और कोई जरूरी नहीं हैं की जनता के द्वारा चुने प्रतिनिधियों को उस कार्यकाल तक देना चाहिए उसके बाद कोई जरुरी नहीं।
मजेदार बात यह होती हैं की जब वेतन भत्ते बढ़ाने की बात आती हैं तब सब एक हो जाते हैं और सरकारी कर्मचारियों की बात आती हैं तो सरकार नंगपन करती हैं। यह दोहरा मापदंड बंद होना चाहिए।
बहुत हो चूका जनता का शोषण
कभी गरीबी कभी महगाईं
कभी कम वर्षा सूखा का बहाना
अपने ऐशो आराम में कोई नहीं कोताही
आने के पहले इतनी चौकसी की
परिंदा न पर मार सके
जिस दिन काल आएगा
जल, थल, नभ महल से भी नहीं बच पाएंगे
क्यों इस गरीब देश का खून
कब तक चूसोगे
कलयुगी सांसद और विधायक
नाकारा
संसद, विधानसभा रोती हैं
इन करतूतें से ।

मिलावटियों को मौत की सजा दें
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
मैं आज इंदौर में हूं। यहां के अखबारों में एक खबर बड़े जोरों से छापी है कि भिंड-मुरैना में सिंथेटिक दूध के कई कारखानों पर छापे मारे गए हैं। राजस्थान और उप्र के पड़ौसी प्रांतों के सीमांतों पर भी नकली दूध की ये फेक्टरियां मजे से चल रही हैं। इस मिलावटी दूध के साथ-साथ घी, मक्खन, पनीर और मावे में भी मिलावट की जाती है। दिल्ली, अलवर तथा देश के कई अन्य शहरों से भी इस तरह की खबरें आती रही हैं। यह मिलावट सिर्फ दूध में ही नहीं होती। फलों को चमकदार बनाने के लिए उन पर रंग-रोगन भी चढ़ाया जाता है और सब्जियों को वजनदार बनाने के लिए उन्हें तरह-तरह की दवाइयों के इंजेक्शन भी दिए जाते हैं। यह मिलावट जानलेवा होती है। दूध में पानी मिलाने की बात हम बचपन से सुनते आए हैं लेकिन आजकल मिलावट में ज़हरीले रसायनों का भी इस्तेमाल किया जाता है। इसीलिए देश में लाखों लोग अकारण ही बीमार पड़ जाते हैं और कई बार मर भी जाते हैं। लेकिन सरकार ने इन मिलावटियों के लिए जो सजा रखी है, उसे जानकर हंसी आती है और दुख होता है। अभी कितना ही खतरनाक मिलावटी को पकड़ा जाए, उसे ज्यादा से ज्यादा तीन महिने की सजा और उस पर 1 लाख रु. जुर्माना होता है। वह मिलावट करके लाखों रु. रोज कमाता है और तीन माह तक वह सरकारी खर्चे पर जेल में मौज करेगा। वाह री सजा और वाह री सरकार ! कौन डरेगा, इस तरह के अपराध करने से ? मोदी सरकार को चाहिए था कि मिलावट-विरोधी विधेयक वह संसद की पहली बैठक में ही लाती और कैसा विधयेक लाती ? ऐसा कि उसकी खबर पढ़ते ही मिलावटियों की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ जातीं। मिलावटियों को कम से कम 10 साल की सजा हो और उनसे 10 लाख रु. जुर्माना वसूलना चाहिए। खतरनाक मिलावटियों को उम्र-कैद और फांसी की सजा तो दी ही जानी चाहिए, सारे देश में उसका समुचित प्रचार भी होना चाहिए। उनका सारा कारखाना और सारी चल-अचल संपत्ति जब्त की जानी चाहिए। मिलावट करनेवाले कर्मचारियों के लिए भी समुचित सजा का प्रावधान होना चाहिए। मिलावट को रोकने का जिम्मा स्वास्थ्य मंत्रालय का है। स्वास्थ्य मंत्री डाॅ. हर्षवर्द्धन थोड़ा साहस दिखाएं तो हर सांसद, वह चाहे किसी भी पाटी का हो, उनके इस कठोर विधेयक का स्वागत करेगा। यह इस सरकार का सर्वजनहिताय एतिहासिक कार्य होगा।

प्रो. अनुसुईया का दमुआ से लेकर दिल्ली तक का सफर…!
नईम कुरेशी
मध्य प्रदेश की सियासत से चलकर दिल्ली में अपना वजूद स्थापित करना वो भी पिछड़े आदिवासी वर्ग से आने वाली महिला नेत्री के लिये एक बड़ा चैलेंज माना जाता है पर छिंदवाड़ा से चलकर विधायक प्रदेश में वजीर की कुर्सी पर बैठकर अपनी पहचान बनाये रखने का साहस व गुण हमने पिछले 30 सालों में मेडम अनुसुईया उइके में ही देखा वो राज्यसभा में रहकर राष्ट्रीय महिला आयोग में अपनी खास पहचान बनाकर महिला वर्ग के दुखों के पहाड़ों से टकराती हुइऔ राष्ट्रीय एस.टी. कमीशन में उपाध्यक्ष के पद पर 3 साल से काम कर रही थीं। जहां मैने उन्हें आदिवासी वर्ग के लिये भारत सरकार के रेल मंत्रालय के अफसरों को फटकारते हुए भी मार्च-अप्रैल में देखा है।
उइके मैडम के मन में गरीबों, दलितों के लिये असीम प्रेम देखा। उन्हें आदिवासियों कमजोर तब्कों के लिये चिंतित भी मैं 30 सालों से देखता आ रहा हूँ। उन्हें सन्् 2000 में 19 साल पहले हमारे कुछ मित्रों व तत्कालीन पुलिस आई.जी. नरेन्द्र त्रिपाठी ने ग्वालियर में महिलाओं के सम्मेलन में बुलाकर सम्मानित करने का भी गर्व प्राप्त रहा था। आज प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें छत्तीसगढ़ का राजपाल नियुक्त कर महिला व पिछड़े दलितों को सम्मान दिया है। कांग्रेस की तुलना में भारतीय जनता पार्टी शुरू से ही कमजोर तब्कों का ध्यान काफी ज्यादा रखती आ रही हैं। ये भी एक विचारणीय सवाल है। भले ही मध्य प्रदेश में आदिवासी बच्चे पूरे देश में कुपोषण से सबसे ज्यादा मारे जा रहे हों पर फिर भी केन्द्र सरकार बजट देने में पहले से ज्यादा प्रखर रही है।
मुझे डॉ. भागीरथ प्रसाद, होशियार सिंह, एस.व्ही. प्रभात, आम्रवंशी, सरजियस मिंज, के.एल.मीणा आदि कमजोर तब्के के लोगों से 40 सालों से मिलने जुलने व उनकी कार्यशैली देखने का अवसर मिला। देखा गया कि ये लोग आम गरीबों के प्रति काफी संवेदनशील व न्यायप्रिय रहे थे। इसी तरह निर्मला बुच, रंजना चौधरी से लेकर अनसुइया जी को भी देखने का अवसर मिला ये महिलायें अपने अपने क्षेत्र में सक्रिय व सामाजिक न्याय का पक्ष मजबूत करती रही हैं। जब वे मध्य प्रदेश में 2006 में राज्य अ.जा.जा. की अध्यक्ष थीं तब लगभग हर रोज अपने भोपाल ऑफिस में जाती थीं। जबकि आमतौर पर आयोग के अध्यक्ष लोग हते या 15 दिन में एक-दो बार जाते हैं।
प्रोफेसर रहीं अनुसुईया जी छिंदवाड़ा के दमुआ नगर पंचायत क्षेत्र की निवासी हैं। वो तहसील परासिया के शा. महाविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर के तौर पर काफी लोकप्रिय रहीं, 1982 से सियासत में आ गइऔ व 1985-90 में दमुआ विधानसभा से विधायक चुनी गइऔ। उनकी लोकप्रियता के चलते उन्हें अर्जुन सिंह ने अपने मंत्री मंडल में उपमंत्री के तौर पर नियुक्त किया ये घटना आदिवासी क्षेत्र की किसी महिला के लिये 1985-86 में कितनी बड़ी बात रही होगी ये स्वयं कल्पना की जा सकती है। 1991 में उन्होंने कांग्रेस के घुटन भरे माहौल से मुक्त होकर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया और यहां भी उनकी लोकप्रियता को देखते हुए म.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने उन्हें म.प्र. के अ.जा.जा. आयोग का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया था। जनवरी 2006 से मार्च 2006 तक सिर्फ 3 महीने तक ही इस आयोग के माध्यम से उन्होंने खूब समाजसेवा व जनजाति वालों को राहत दिलाई। उनकी इसी सक्रियता के चलते उन्हें भारतीय जनता पार्टी के आला कमान ने राज्यसभा का सदस्य बना दिया। उनके हौसले व संघर्ष को सलाम किया।
खुशी से लोटपोट हैं
अनुसुईया मैडम के बारे में पूर्व विधायक पांढुर्णा जतन उइके से लेकर 3 बार के विधायक रहे पंडित रमेश दुबे तक उनकी तारीफों के पुल बनाते हुए देखे व सुने गये। दुबे जी के अनुसार अनुसुईया जी ने हमारे जिले व इलाके का नाम देश दुनिया में रोशन कर दिया। उनकी सादगी व न्यायप्रियता के ये लाग फैन देखे गये। सन्् 2000 में जब हमने अनुसुईया जी को ग्वालियर व भिण्ड में महिलाओं की समस्याओं से रूबरू कराया तो वो काफी गम्भीरता से महिलाओं की सुरक्षा पर गम्भीर देखी गई थीं। राज्यसभा में उनके साथ ग्वालियर राज घराने की महारानी राजमाता विजयाराजे सिंधिया की भाभी मायासिंह भी सदस्य रही थीं। उन्होंने भी मुझे उईके मैडम की प्रशंसा में कहा कि वो सादगी की मूर्ति हैं। वो जब राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में वाईस चेयरमैन रही थीं। तब भी उनकी सक्रियता कमाल की देखी गई। उनके छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बाहुल्य राज्य में राजपाल बन जाने से आम लोगों को उनके अनुभव का खूब लाभ मिलने वाला है। दिलचस्प है उनका छिन्दवाड़ा के दमुआ से दिल्ली व अब रायपुर तक का सफर भारतीय जनता पार्टी में लगता है कि कांग्रेस से ज्यादा गरीबों, दलितों, पिछड़ों की फिक्र करने वाले लोग हैं।

शीलाजी प्रधानमंत्री के लायक थीं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
श्रीमती शीला दीक्षित बीमार थीं और काफी कमजोर हो गई थीं। लेकिन ऐसी संभावना नहीं थी कि वे अचानक हमारे बीच से महाप्रयाण कर जाएंगी। आज अखबारों और टीवी चैनलों ने जिस तरह की भाव-भीनी विदाई उन्हें दी है, बहुत कम नेताओं को दी जाती है। जब वे दिल्ली की पहली बार मुख्यमंत्री बनीं तब और अब भी जो नेता उनका डटकर विरोध करते रहे हैं, वे भी उन्हें भीगे हुए नेत्रों से अलविदा कह रहे हैं। सभी मानते हैं कि आज दिल्ली का जो भव्य रुप है, उसका श्रेय शीलाजी को ही है। उन्हें मेट्रो रेल, सड़कों, पुलों, नई-नई बस्तियों और भव्य भवनों के निर्माण का श्रेय सभी दे रहे हैं। लेकिन मैं मानता हूं कि यदि शीलाजी को मौका मिलता तो वे भारत की उत्तम प्रधानमंत्री भी सिद्ध होतीं। मेरा उनसे लगभग चालीस साल का बहुत आत्मीय संबंध रहा है। उनकी कुछ व्यक्तिगत विशेषताएं मैं आपको बताना चाहता हूं। उनके आदरणीय ससुर उमाशंकरजी दीक्षित से मेरा पुराना परिचय था। जब मैं उनसे मिलने जाता था तो मुझे पता नहीं रहता था कि उनकी बहू कौन है लेकिन एक दिन शीलाजी से परिचय हुआ और वह मित्रता में बदल गया। एक-दूसरे के घर आना-जाना शुरु हो गया। उनके निर्वाचन क्षेत्र कन्नौज में एक सभा में हम साथ-साथ बोले। वे अचार्य नरेंद्रदेव का नाम बोलने में जरा अटक गईं। मैंने धीरे से बता दिया। उन्होंने मुझे बार-बार धन्यवाद दिया। हम लोग फिर अक्सर मिलने लगे। वे प्रधानमंत्री राजीव गांधी के मंत्रालय में राज्यमंत्री थीं। वे जब निजामुद्दीन में रहने लगीं तो वे अक्सर मुझे और उस्ताद अमजदअली खान को खाने पर साथ-साथ बुलातीं। वे साबुत करेले की सब्जी इतनी अच्छी बनाती थीं कि जब भी बुलातीं (मुख्यमंत्री बनने पर भी) तो कहतीं, ‘भाई, आपके लिए करेले की सब्जी तो मैं खुद ही बनाऊंगी।’ एक दिन पाकिस्तान के एक पूर्व प्रधानमंत्री मेरे घर आए। उसी समय शीलाजी का फोन आया। मैंने उन्हें बताया तो कहने लगीं, आज करेला बना रही हूं। आप आइए और उन्हें भी ले आइए। मैंने कहा कि ‘प्रोटोकाॅल’ की अड़चन पड़ सकती है। तत्काल शीलाजी ने कहा कि मैं अभी आती हूं, खुद, उन्हें बुलाने के लिए। उन्हें अपने पद का घमंड बिल्कुल भी नहीं था। एक बार वे दिल्ली के लिए एक राजभाषा विधेयक ले आईं। मुझे लगा कि उसमें हिंदी को उचित स्थान नहीं दिया गया है। मैंने फोन किया तो बोलीं कि आप दो-तीन सांसदों को अपने साथ ले आइए और अफसरों को फटकार लगाइए। हम गए और उन्होंने उस विधेयक को वापस लेकर बदल लिया। ऐसे कई काम हिंदी के लिए मैंने उन्हें जब भी बताए, उन्होंने सहर्ष कर दिए। उनमें सहजता और आत्मीयता इतनी थी कि यदि किसी सभा में वे मंच पर बैठी हों और मैं नीचे श्रोताओं में तो अक्सर मुझे वे आग्रहपूर्वक अपने साथ मंच पर बुला ले जातीं। एक बार मैं 40 सांसदों के साथ लाहौर गया। अटलजी ने भेजा था। प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो से जब मैंने सुषमा स्वराज का परिचय करवाया तो मैंने कहा कि कुछ दिन पहले तक ये दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं तो बेनजीर ने पूछा कि आजकल वो दूसरी मेडम कौन हैं? मैंने कहा, वो शीला दीक्षित हैं। वो मेरी बड़ी बहन हैं और ये सुषमाजी मेरी छोटी बहन हैं। शीलाजी से कुछ ऐसा समीकरण बैठ गया था कि जब अर्जुनसिंहजी के साथ मिलकर वे कांग्रेस से अलग होने लगी थीं तो अनुशासन समिति के उपाध्यक्ष बलरामजी जाखड़ ने अन्य नेताओं के साथ शीलाजी को भी निकालने का फैसला कर लिया। मैंने प्रंधानमंत्री नरसिंहरावजी को बताया। शीलाजी ने मेरे कहने पर प्र.मं. को तुरंत एक फेक्स भेजा और उनका निष्कासन उस वक्त टल गया। वे जब केरल की राज्यपाल नियुक्त हुईं तो उन्होंने मुझे वहां कई बार बुलाया। मैं जा नहीं सका। पिछले दिनों मेरी पत्नी बीमार हुई तो चुनाव के दौरान भी उनके फोन आते रहे। मुझे अफसोस है कि इधर मैं उनसे मिल नहीं सका। मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि।

पाक के ये “नापाक रहनुमा ”
तनवीर जाफ़री
भारत को विभाजित कर एक अलग इस्लामी राष्ट्र का गठन करने वाले कुछ मुस्लिम नेताओं ने जब इस राष्ट्र का नामकरण “पाकिस्तान” करने का निर्णय लिया होगा उस समय हो सकता है उन्होंने इस बात की कल्पना की हो कि भविष्य में यह देश अर्थात पाकिस्तान दुनिया का सबसे शक्तिशाली इस्लामी राष्ट्र बनेग। इन्होंने यह भी सोचा होगा कि पाकिस्तान भविष्य में मुस्लिम राष्ट्रों का नेतृत्व करेगा। संयुक्त भारत में रहने वाले मुसलमानों को वरग़लाने के लिए इन चंद नाम निहाद मुस्लिम नेताओं ने इस प्रस्तावित देश का नाम “पाकिस्तान” रखकर यह जताना चाहा था कि यह एक “पाक” अर्थात “पवित्र आस्तां” अर्थात “पवित्र लोगों का घर” बनेगा। परन्तु जब इतिहास से मुझे यह जानकारी मिली कि पाकिस्तान के गठन के सबसे बड़े किरदार और मुख्य संस्थापक यानी मोहम्मद अली जिन्नाह उस समय के एक ऐसे इस्माइली शिया मुसलमान थे जो शराब पिए बिना रात का भोजन नहीं करते थे। इतना ही नहीं बल्कि सूअर के मांस के उपयोग से भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी, उसी समय से मेरे ज़ेहन में यह बात उठने लगी थी कि भले ही इस नए नवेले देश का नाम “पाक” आस्तां क्यों न रख दिया गया हो परन्तु दरअसल इसकी बुनियाद डालने वाले पाक के सबसे लोकप्रिय नेता इस्लामी नज़रिये से स्वयं में ही न केवल “नापाक” थे बल्कि ग़ैर इस्लामी भी थे। उनकी जीवनी से पता चलता है कि इस्माइली शिया मुसलमान होते हुए भी उन्होंने कभी हज यात्रा नहीं की। उनकी किसी भी जीवनी में नमाज़ पढ़ने और रोज़े रखने आदि इस्लामिक गतिविधियों का पालन करने का भी कोई ज़िक्र नहीं है। उनके विषय में उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़ वे सूअर व शराबख़ोरी लुक छुप कर नहीं करते थे बल्कि उनकी पत्नी रतन बाई जिन्ना के लिए अपने हाथों से सूअर का मांस बनाती थी। सूअर का मांस व शराब के सेवन को इस्लाम में हराम माना जाता है। वे अक्सर समारोहों में भी शराब पीते थे। बल्कि यह चीज़ें उनके सामान्य जीवन का हिस्सा थीं । क्या अजब इत्तेफ़ाक़ है कि आज तक उन्हीं जिन्नाह को तथाकथित इस्लामिक देश, पाकिस्तान के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। वे मुस्लिम लीग के भी सर्वोच्च नेता थे। पाकिस्तान के गठन के बाद वे वहां के पहले गवर्नर जनरल बने। पाकिस्तान में उन्हें क़ायदे-आज़म यानी महान नेता और बाबा-ए-क़ौम अर्थात राष्ट्र पिता के लक़ब से नवाज़ा जाता है। उनके जन्म दिन पर पाकिस्तान में अवकाश भी रहता है।पाकिस्तान और दुनिया के तमाम लोग आज भी उनकी मज़ार पर फ़ातिहा पढ़ने जाते हैं। यहाँ मैं यह भी स्पष्ट करता चलूँ कि किसी भी आम व्यक्ति का खान पान निश्चित रूप से उसका अति व्यक्तिगत विषय है। लिहाज़ा एक व्यक्ति के नाते जिन्नाह साहब के किसी भी शौक़ पर आपत्ति करने का किसी को भी कोई हक़ नहीं। परन्तु चूँकि वे एक तथाकथित इस्लामी राष्ट्र के संस्थापक थे इसलिए उनका इस्लामी शिक्षाओं व संस्कारों का अनुसरण करना ज़रूरी था। और निश्चित रूप से इस्लामी शिक्षा किसी भी मुसलमान को शराब और सूअर नोशी की इजाज़त नहीं देती।
बहरहाल ग़ैर इस्लामी चाल चलन रखने वाले रहनुमाओं की कोशिशों के नतीजे में बने देश का हश्र भी आज वैसा ही होता दिखाई दे रहा है जैसी कि इस देश की बुनियाद रक्खी गई है। अपने अस्तित्व में आने के मात्र 24 वर्षों बाद ही पाकिस्तान के इस्लामी राष्ट्र होने के दावे की हवा पूरी तरह उस समय निकल गई जबकि पूर्वी पाकिस्तान ने इस्लाम के नाम पर इकठ्ठा रहने के बजाए क्षेत्र व भाषा के नाम पर अलग रहना ज़्यादा लाभदायक और ज़रूरी समझा। आख़िर जब इस्लामी राष्ट्र का सपना दिखा कर भारत को विभाजित किया गया था तो उस स्थिति को क्योंकर बनाए नहीं रक्खा गया?1971 से पहले भी पाकिस्तान के स्थानीय मुसलमानों द्वारा भारत से 1947 में व उसके बाद पहुँचने वाले मुसलमानों के साथ काफ़ी ज़ुल्म, ज़्यादती व अन्याय करने की ख़बरें आती रही हैं। उन्हें आज तक मुहाजिर कहा जाता है। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान को जनरल ज़ियाउलहक़ के रूप में एक ऐसा कट्टर शासक मिला जिसने पाकिस्तान को कट्टरपंथ के मार्ग पर आगे बढ़ाया। ज़िया के समय ही पाकिस्तान में ईश निंदा क़ानून बना जिसका आज तक दुरूपयोग होता आ रहा है। आज पाकिस्तान अलग अलग विचारधारा के कट्टरपंथियों का गढ़ बन चुका है। हिन्दू, सिख, ईसाई, शिया, अहमदिया, बरेलवी तथा सूफ़ी मत के लोग वहां पूरी तरह असुरक्षित हैं। तालिबानों का भी पाकिस्तान के बड़े क्षेत्र में गहरा प्रभाव है। कश्मीर सहित पूरे भारत में कई दशकों से आतंक फैलाने की पाकिस्तान की जो कोशिशें हैं वह भी इस्लामी शिक्षाओं का हिस्सा क़तई नहीं हैं। इस्लाम धर्म में झूठ बोलना भी गुनाह है। परन्तु पाकिस्तान तो भारत में प्रायोजित की जा रही दहशतगर्दी को लेकर भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से झूठ बोलता रहता है। यह तथाकथित इस्लामी राष्ट्र पाकिस्तान ही है जहाँ जुलाई 2007 में इस्लामाबाद में इतना बड़ा लाल मस्जिद हादसा हुआ जिसकी पूरी दुनिया में दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती। ग़ौर तलब है कि परवेज़ मुशर्रफ़ के राष्ट्रपति काल में लाल मस्जिद में सेना द्वारा एक बड़ा आतंकवाद विरोधी ऑप्रेशन छेड़ा गया था। 3 से 11 जुलाई 2007 तक चले 8 दिन के इस ऑपरेशन में 154 लोग मारे गए थे जबकि 50 आतंकी हिरासत में लिए गए थे। इस मस्जिद का एक जेहादी इमाम मारा गया था जबकि दूसरा फ़ौजियों से अपनी जान बचाने के लिए बुर्क़ा ओढ़ कर भागते हुए पकड़ा गया था।
क्या उपरोक्त घटनाओं व इनके पात्रों के बारे में पढ़कर यह सोचा जा सकता है कि यह उस इस्लामी मत के लोगों या किसी ऐसे इस्लामी देश की बातें हैं जो इस्लाम हज़रत मोहम्मद, हज़रत अली व हज़रत इमाम हुसैन व इमाम हसन की शिक्षाओं का इस्लाम है? झूठ, मक्कारी, क़त्लोग़ारत, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, बेईमानी, रिश्वतख़ोरी, आतंकवाद को सरपरस्ती देना जैसी बातें क्या “पाक” व “इस्लामिक रिपब्लिक” जैसे शब्द अपने देश के नाम के साथ जोड़ने की इजाज़त देती हैं। पिछले दिनों पाकिस्तान के बारे में सिलसिलेवार तरीक़े से छपी ख़बरों ने पूरी दुनिया को चौंका कर रख दिया। ख़बर यह थी कि इस “पाक” और “इस्लामी” देश के एक पूर्व राष्ट्रपति व दो पूर्व प्रधानमंत्री रिश्वत, धनशोधन, पद के दुरूपयोग तथा भ्रष्टाचार के मामले में जेल की सलाख़ों के पीछे पहुँच चुके हैं जबकि दो अन्य पूर्व प्रधानमंत्री ऐसे ही आरोपों में मुक़ददमों का सामना कर रहे हैं। इस समय जहाँ आसिफ़ ज़रदारी के रूप में एक पूर्व राष्ट्रपति पाकिस्तान की जेल की शोभाबढ़ा रहे हैं वहीँ नवाज़ शरीफ़ और शाहिद ख़ाकान अब्बासी जैसे पाक के दो पूर्व प्रधानमंत्री भी जेलों की रौनक़ में इज़ाफ़ा कर रहे हैं। सभी पर भ्रष्टाचार व आर्थिक अनियमिताओं तथा इसके लिए पद का दुरूपयोग करने का इलज़ाम है। आसिफ़ अली ज़रदारी को तो उनकी पत्नी बेनज़ीर भुट्टो के प्रधानमंत्री रहते हुए ही “मिस्टर 10 परसेंट” की उपाधि मिल गयी थी।आश्चर्य तो यह है की बदनाम व्यक्ति होने के बावजूद उनकी पार्टी ने बेनज़ीर की हत्या के बाद उन्हें कैसे राष्ट्रपति बना दिया। इन तीन “नापाक रहनुमाओं ” के अलावा दो और पूर्व”पाक” प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी और राजा परवेज़ अशरफ़ भी ऐसे ही मामलों का अदालती सामना कर रहे हैं। यदि अदालत ने इन्हें भी “नापाक ” साबित कर दिया तो पाकिस्तान “नापाक रहनुमाओं ” के सज़ा पाने व जेल जाने के अपने ही मौजूदा 3 के रिकार्ड को तोड़ कर 5 “नापाक रहनुमाओं ” तक पहुंचा देगा।
भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी के अलावा भी हैवानियत व अराजकता जैसे ग़ैर इस्लामी व ग़ैर इंसानी मामलों में भी पाकिस्तान का रेकार्ड पूरी तरह नापाक है। कभी इस देश ने राजनैतिक मतभेदों के चलते प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को फांसी के फंदे पर लटकते देखा तो कभी औरत होने के बावजूद तथाकथित इस्लाम परस्तों द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो को हलाक कर दिया गया। मस्जिदों, इमामबारगाहों, दरगाहों आदि को निशाना बनाकर हज़ारों लोगों की जानें जाना तो इस “पाक” देश में आम बात हो गयी है। कभी नमाज़ियों पर हमला, कभी मुहर्रम के जुलूस पर आत्मघाती हमला, कभी फ़ौजियों और उनके मासूम बच्चों की सामूहिक हत्याएं यही वह हालात हैं जिसने पाक को “नापाक” देश के रूप में प्रचारित कर दिया है। पिछले दिनों पाकिस्तान पर आए भयंकर आर्थिक संकट पर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की मार्मिक अपील ने यह सोचने के लिए मजबूर किया कि आख़िर पड़ोसी देश की दुर्दशा की वजह क्या है। तो पीछे मुड़कर देखने पर यही नज़र आया कि जिस तरह इस की बुनियाद ही नापाक थी उसी तरह आगे चलकर भी यहाँ के रहनुमाओं ने भी नपाकीज़गी में और इज़ाफ़ा करने में कोई कसर बाक़ी नहीं रक्खी। पाकिस्तान की रुसवाई का सबसे बड़ा कारण ही यही है।

प्रत्यक्ष कर संग्रह का लक्ष्य
अजित वर्मा
भारत सरकार ने प्रत्यक्ष कर संग्रहण का इस बार जो लक्ष्य निर्धारित किया है, उसे विशेषज्ञ यह मान रहे हैं कि यह लक्ष्य हासिल करने के करीब रहेगा। सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए प्रत्यक्ष कर संग्रह का लक्ष्य नए सिरे से तय करते हुए इसे 13.35 लाख करोड़ रुपए तय किया है जिसे केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) प्रमुख ने कठिन लेकिन हासिल किया जा सकने वाला बताया है।
यह भी कहा जा रहा है कि सरकार छूट और कटौती समाप्त होने के बाद कंपनी कर की दरों में और कमी लाने के बारे में सोच सकती है। पिछले संशोधित अनुमान में 2019 -20 के लिए हमारा लक्ष्य 13.78 लाख करोड़ रुपए तय किया गया था। यह अपेक्षाकृत अवास्तविक दिखता था क्योंकि यह सालाना आधार पर करीब 24 फीसद की वृद्धि को दर्शा रहा था।
बजट पर विचार के दौरान प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने इस बारे में अपनी बातें रखी थीं। इसी का नतीजा है कि सरकार ने पिछले साल के वास्तविक संग्रह को देखते हुए उस आधार पर लक्ष्य तय किया। और प्रत्यक्ष कर के लिये बजट में तय संग्रह लक्ष्य को अब 13.35 लाख रुपये तय किया गया है। यह अपेक्षाकृत अवास्तविक दिखता था क्योंकि सालाना आधार पर करीब 17.5 फीसद वृद्धि को बताता है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि यह लक्ष्य हमें काफी उम्मीद देता है कि हम दिए गए लक्ष्य के अनुसार 17.5 फीसद वृद्धि हासिल करने में कामयाब होंगे। आयकर विभाग ने पिछले वित्तवर्ष में प्रत्यक्ष संग्रह 11.37 लाख करोड़ रुपए प्राप्त किया।
निवेश और वृद्धि को गति देने के लिए बजट में जो कदम उठाया गया है, उस पर यह भरोसा जताया गया है कि अर्थव्यवस्था अच्छी करेगी और परिणामस्वरूप राजस्व संग्रह भी अच्छा रहेगा। प्रत्यक्ष कर संग्रह में व्यक्तिगत आयकर, प्रतिभूति सौदा कर और कपंनी कर शामिल हैं। कंपनी कर की दर के बारे में यह बताया जा रहा है कि वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले सप्ताह बजट में लगभग सभी कंपनियों के लिए कर की दरें कम की है।
सवाल यह है कि कंपनी की कर दरें कुछ छूट और कटौती से जुड़ी हैं जिसे कंपनियां प्राप्त कर रही हैं। सरकार की नीति कहती है कि छूट और कटौती को समय के साथ धीरे-धीरे समाप्त किया जाएगा। यह करीब पांच से 10 साल हो सकता है। सीबीडीटी प्रमुख मोदी ने कहा- इसीलिये छूट और कटौती खत्म होने के साथ हम निश्चित रूप से मान सकते हैं कि कंपनी कर की दर कम होगी। वहीं दूसरी ओर प्रत्यक्ष कर संग्रह का निर्धारित लक्ष्य हासिल भी हो सकेगा।

नारी शक्ति की प्रतीक शीला दीक्षित का यूं चले जाना
डॉ हिदायत अहमद खान
यह खबर स्तब्ध कर देने वाली है कि कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अब हमारे बीच नहीं रहीं। इस सूचना पर विश्वास करने को मन नहीं करता, क्योंकि जिस लगन और मेहनत के साथ राजनीति के क्षेत्र में वो लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहीं थीं, उसे देखते हुए लोगों को यही उम्मीद थी कि उनकी चहेती नेता आज नहीं तो कल एक बार फिर दिल्ली की मुख्यमंत्री बनेंगी। इस दुनिया को उन्होंने ऐसे समय हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है जबकि कांग्रेस को ही नहीं बल्कि राजनीतिक जगत को भी उनकी महती आवश्यकता थी। दरअसल एक तरफ चुनावी हार से कांग्रेस मायूसी के दलदल में समाती चली गई है, जिसे उबारने के लिए शीला दीक्षित जैसे मजबूत नेतृत्व की ही आवश्यकता थी। वहीं दूसरी तरफ सिद्धांतों से समझौता कर धन और पद-प्रतिष्ठा को महत्व देने वाले तमाम नेताओं के लिए शीला दीक्षित एक सबक साबित हो सकतीं थीं। आज राजनीति के क्षेत्र में भ्रष्टाचारियों, अपराधियों और धन कुबेरों का बर्चस्व कायम होता जा रहा है, जिससे निपटने के लिए सिद्धांतों पर चलने वालों की आवश्यकता महसूस होती है। इसलिए कुछ बेहतर करने वाले आत्मविश्वास से भरी नारी शक्ति के तौर पर राजनीति में स्थापित शीला दीक्षित की कमी देश को हमेशा खलेगी। चेहरे पर हल्की मुस्कान लिए, जरा हल्के से बोलने वाली दृढ़ प्रतिज्ञ शीला दीक्षित कुछ समय से बीमार चल रहीं थीं, जिस कारण दिल्ली के एस्कॉर्ट अस्पताल में जेरे इलाज उन्होंने 81 साल की उम्र में अंतिम सांसें लीं। दिल्ली की सियासत में बतौर महिला मुख्यमंत्री बने रहने का तमगा भी उन्हें हासिल रहा, जिसे तोड़ पाना अब भविष्य में किसी के बूते की बात नहीं लगती है। दरअसल सब की चहेती शीला दीक्षित 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। बतौर मुख्यमंत्री उनका कार्यकाल 1998 से 2013 तक रहा। वो केरल की राज्यपाल भी रहीं। इससे पहले शीला दीक्षित 1984 से 1989 तक उत्तर प्रदेश की कन्नौज लोकसभा सीट से सांसद भी रहीं। महिला सशक्तिकरण का उदाहरण पेश करने वाली शीला दीक्षित का जन्म 31 मार्च 1938 को पंजाब के कपूरथला में हुआ था। उनकी स्कूली शिक्षा दिल्ली के कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी स्कूल में संपन्न हुई। इसके बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस कॉलेज से ग्रेजुएशन के साथ ही एमए की डिग्री भी हासिल की। आपका विवाह प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी एवं पूर्व राज्यपाल व केन्द्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री रहे उमाशंकर दीक्षित के परिवार में हुआ। आपके पति स्व. विनोद दीक्षित भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य थे। आपकी दो संतानें, एक पुत्र और एक पुत्री है। एक पढ़ी-लिखी संभ्रांत महिला होने के नाते राजनीतिक क्षेत्र का इस्तेमाल उन्होंने महिला उत्थान के लिए सफलता पूर्वक किया। उन्होंने समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए अथक प्रयास किए। उन्होंने ऐसे अनेक अभियानों का नेतृत्व किया, जिनसे महिलाओं का भला हो सकता था। यही नहीं बल्कि महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों के विरोध में भी उन्होंने आवाज बुलंद की और इसी के साथ अगस्त 1990 में 23 दिनों तक अपने 82 साथियों के साथ उन्होंने जेल यात्रा भी की। ऐसी संघर्षशील महिला नेत्री को पाकर दिल्ली ही नहीं बल्कि संपूर्ण देश अपने आपको गौरवांवित महसूस करता रहा है। यह कम गौरव की बात नहीं है कि शीला दीक्षित ने 1984 से 1989 तक संयुक्त राष्ट्र संघ की महिला स्तर समिति में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। इन तमाम उपलब्धियों से पहले 1970 में, वे यंग विमन्स असोसियेशन की अध्यक्षा बनीं और इसी दौरान उन्होंने दिल्ली में दो बड़े महिला छात्रावास खुलवाए। इसके साथ ही वो इंदिरा गाँधी स्मारक ट्रस्ट की सचिव भी हैं। यह वही ट्रस्ट है जो शांति, निशस्त्रीकरण एवं विकास के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार प्रदान करता है। यही नहीं शीला दीक्षित धर्म-निर्पेक्षता पर अडिग रहने वाली नेता रही हैं, उन्होंने सदा ही सांप्रदायिक ताकतों का हर संभव विरोध किया। दरअसल शीला दीक्षित का मानना था कि विविधता वाले हमारे देश हिंदुस्तान में यदि जनतंत्र को जीवित रखते हुए मजबूती प्रदान करना है तो सही व्यवहार और सत्यता के मानदंडों का पालन करना जीवन का एक अभिन्न अंग होना चाहिये। राजनीति के बदलते प्रतिमानों में शीला दीक्षित का स्थान सर्वोच्च शिखर वाला ठहरता है। उनके यूं अचानक चले जाने से सियासी जगत में जो जगह खाली हुई है अब वो भर पाना नामुमकिन जैसी बात है।

सैकड़ों मायावती और हजारों आनंद
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत के लगभग सभी टीवी चैनलों और अखबारों में यह खबर खूब छपी है कि मायावती के भाई की 400 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त कर ली गई है। दिल्ली के पास नोएडा इलाके में उप्र की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के भाई आनंदकुमार की यह सात एकड़ जमीन थी। यह जमीन आनंद ने उस समय कब्जाई थी, जब उसकी बड़ी बहन उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री थी। यह जमीन बेनामी है। आनंद और उसकी पत्नी विचित्रा इस मंहगी जमीन पर एक पांच सितारा होटल और कई आलीशान इमारतें बनाने की तैयारी कर रहे थे। आनंद के पास जाहिरा तौर पर इस समय 1350 करोड़ रु. की संपत्ति है। उसने कई फर्जी कंपनियां बना रखी हैं। यह वही आनंदकुमार है, जो 1996 में इसी नोएडा-प्रशासन में 7-8 सौ रु. माहवार की नौकरी करता था लेकिन बहनजी के राज में वह अरबपति बन गया। मायावती ने अपने इसी भाई को बहुजन समाज पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया है। जाहिर है कि आनंद पर लगे आरोप अदालत में सिद्ध हो गए तो उसे कम से कम सात साल की सजा मिलेगी और कुल संपत्ति का 25 प्रतिशत याने अरबों रु. जुर्माना भी भरना पड़ेगा। केंद्र की मोदी सरकार और उप्र की योगी सरकार को बधाई कि उसने लिहाजदारी नहीं दिखाई और नेताजी को कठघरे में खड़ा कर दिया लेकिन मैं पूछता हूं कि क्या देश में मायावती एक ही है और आनंद एक ही है ? सरकार ने सिर्फ आनंद को पकड़ा, मायावती कैसे छूट गई ? आपने पत्ते तोड़ लिये लेकिन जड़ तो हरी की हरी है। आनंद ने यदि यह भ्रष्टाचार किया है तो किसके दम पर किया है ? देश में सैकड़ों मायावतियां हैं और हजारों आनंद हैं ? क्या देश में एक भी नेता ऐसा है, जो कह सके कि मेरा दामन साफ है ? मायावती का तो कोई परिवार नहीं है। कहा जाता है कि लोग अपने बाल-बच्चों के लिए भ्रष्टाचार करते हैं। मायावती का संदेश है कि अब देश बिना परिवारवाले नेताओं से भी सावधान रहे। नेतागीरी इस देश में काजल की कोठरी बन गई है। किसी नेता का दामन साफ रह ही नहीं सकता। यदि मोदी और योगी भारत की राजनीति शुद्धिकरण करना चाहते हैं तो उन्हें चाहिए कि वे सभी दलों के प्रमुख नेताओं और उनके रिश्तेदारों की खुली जांच करवाएं और उनकी सारी संपत्तियां जब्त करवाएं। भाजपा को भी न छोड़ें। सरकार के पास इतना धन इकट्ठा हो जाएगा कि उसे आयकर वसूलने की जरुरत नहीं रहेगी।

सरकार जरूरी या संगठन
ओमप्रकाश मेहता
अमित शाह के सरकार में जाने से संगठन कमजोर हुआ….? हर शख्स का अपनी जगह अपना महत्व होता है, फिर वह चाहे परिवार हो या समाज, या कि राजनीति, इस ब्रह्म वाक्य को आज पूरा देश महसूस करने को मजबूर है, देश की सत्ता का जबसे मोदी और अमित शाह के बीच बंटवारा हुआ है, तभी से देश के सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी का रूतबा कम होता दिखाई दे रहा है, पिछले माह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने ‘हनुमान’ अमित शाह जी को संगठन की राजनीति से बाहर कर उन्हें सरकार में अपना प्रमुख सहयोगी बनाकर पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र के क्रियान्वयन और कश्मीर समस्या जैसे मुद्दे सौंपकर उन्हें गृहमंत्री बना दिया, अब अमित शाह अपने आपमें इतने उलझ गए कि उन्हें पार्टी संगठन की ओर ध्यान देने का समय ही नहीं मिल पा रहा, यद्यपि अमित भाई पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभी भी है, किंतु उन्होंने कार्यवाहक अध्यक्ष जे.पी. नड्डा जी को सम्पूर्ण कार्यभार सौंपकर अपने आपको गृह मंत्रालय तक सीमित कर लिया, यद्यपि सरकार में ऐसा कहा जाता है कि अमित शाह का हर शब्द मोदी का ही शब्द मानकर उस पर अमल किया जा रहा है, क्योंकि मोदी जी ने सरकार के दैनंदिनी कार्य अमित भाई को सौंपकर स्वयं के राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय मामलों तक ही सीमित कर लिया है। इस प्रकार कुल मिलाकर सरकार का अस्सी फीसदी महत्वपूर्ण कार्यभार अमित भाई के कंधों पर आ गया है और अमित भाई उसी में व्यस्त हो गए है, इसलिए वे न तो अब पार्टी को देख पा रहे है और न ही संघ व विहिप जैसे अहम् अनुषांगिक संगठनों को? इसी कारण से पिछले दिनों से यह महसूस किया जा रहा है कि पार्टी व पार्टी के साथ तालमेल कर सरकार से जुड़े दलों में अनुशासन हीनता बढ़ती जा रही है, जिस नड्डा जी जैसे तीसरी श्रेणी के नेता नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं।
हाल ही में देश में सत्तारूढ़ एनडीए संगठन में शामिल जदयू की बिहार सरकार ने भाजपा के सरंक्षक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की गतिविधियों पर खूफिया जांच शुरू करवा दी और भाजपा कुछ नहीं कर पाई। इसी तरह भारतीय जनता पार्टी संसदीय दल की बैठक में भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री के क्रिकेट-बल्लेबाज विधायक की करतूतों की प्रधानमंत्री मोदी ने खुलकर भत्र्सना की और यह भी कहा कि उक्त विधायक चाहे किसी का भी बेटा हो उसके खिलाफ व उसका जेल के द्वार पर स्वागत करने वाले पार्टीजनों के खिलाफ पार्टी से निकालने की कार्यवाही की जाए, किंतु चूंकि उक्त विधायक के दबंग पिता का पार्टी में रूतबा है, इसलिए उक्त विधायक को पार्टी ने सिर्फ एक नोटिस या ‘कारण बताओं सूचना-पत्र’ देकर कत्र्तव्य की खानापूर्ति कर ली, अर्थात् प्रधानमंत्री जी के निर्देशों की भी अनदेखी कर दी गई, इसके पूर्व भोपाल की सांसद प्रज्ञा भारती ठाकुर द्वारा गांधी जी के हत्यारें नाथूराम गोड़से की तारीफ करने पर भी प्रधानमंत्री जी ने काफी दुःखी होकर अपने विचार व्यक्त किए थे, किंतु उक्त घटना को भी पार्टी ने कोई विशेष महत्व नहीं दिया। जबकि आज की वास्तविकता यह है कि मोदी रूपि गंगा में साथ बहने के कारण इन कथित पापियों का भी राजनीति में उद्धार हुआ है और आज ये लोग जो भी है, जिस जगह पर भी है, मोदी जी के कारण है।
यदि हम भाजपा का पुराना इतिहास देखें तो यह वहीं पार्टी है, जिसके शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवानी को पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर जाकर उनके बारें में सिर्फ दो शब्द बोलने पर पार्टी के शीर्ष पदों से इस्तीफा देना पड़ा था, आज स्वयं अड़वानी व उनके साथी डाॅ. मुरली मनोहर जोशी को पार्टी के ऐसे दिन देखने पड़ रहे है, वे आखिर क्या सोचते होंगे? क्या इन पितृपुरूषों की घुटन को पार्टी के किसी शीर्ष नेता ने आज तक महसूस किया?
इस तरह कुल मिलाकर इतनी लम्बी जिरह करने का मकसद यह है कि अब कांग्रेस के रसातल की ओर जाने के बाद देश के आम वोटर की आस मोदी-शाह की भाजपा से ही है, और यदि ये शीर्ष नेता भी संगठन की जगह सत्ता को वरीयता देने लगे है तो फिर देश की भावी राजनीति का क्या होगा? क्या फिर देश में राष्ट्रीय दल एक भी नहीं बचेगा और क्षेत्रिय दल देश पर बारी-बारी से राज करेंगे?

जाधव को रिहा करे पाकिस्तान
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के जज इस समय परम आनंद की स्थिति में होंगे। उन्होंने अपनी जिंदगी में कूलभूषण जाधव के मामले-जैसा फैसला कभी नहीं दिया होगा। इस फैसले का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि वादी और प्रतिवादी दोनों ही जश्न मना रहे हैं। भारत कह रहा है कि 16 में से 15 जजों ने जाधव के मुकदमे को फिर से चलाने और उसे भारतीय वकीलों की मदद लेने का अधिकार देकर पाकिस्तान के मुंह पर करारा तमाचा लगाया है और पाकिस्तान कह रहा है कि अदालत ने भारत की इस प्रार्थना को रद्द कर दिया है कि जाधव को वह निर्दोष माने और उसे रिहा करे। अदालत ने उस पर फिर से मुकदमा चलाने को कहा है। पाकिस्तान उसका स्वागत करता है। अगर पाकिस्तानी लोग इस फैसले पर जश्न मना रहे हैं तो भारत में भी लोग खुश हैं कि कुलभूषण जाधव की जान बच गई। वह बचेगी या नहीं, यह तो पाकिस्तान की अदालत तय करेगी लेकिन अब पाकिस्तान की फौजी या नागरिक अदालत अपनी मनमानी नहीं कर सकती। उसे भारतीय वकीलों के लिए भी अपने दरवाजे खोलने होंगे। पाकिस्तान ने जाधव पर एकतरफा फैसला देकर अंतरराष्ट्रीय अदालत के सामने अपनी नाक नीची कर ली। उसके मृत्युदंड के फैसले पर पुनर्विचार की बात कहकर हेग की अदालत ने पाकिस्तान को परेशानी में डाल दिया है। पाकिस्तानियों को इस बात की तकलीफ जरुर होगी कि इस मामले में अमेरिका और चीन ने भी उसका साथ नहीं दिया। उनके जजों ने भी पाकिस्तान की आलोचना की है कि उसने जाधव के मामले में वियना अभिसमय या अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का उल्लंघन किया है। अब यदि जाधव पर दुबारा मुकदमा चलाकर पाकिस्तान उसे फांसी देना चाहेगा तो वह आसान नहीं होगा। बेहतर यही होगा कि इमरान खान गहरी उदारता का परिचय दें। जैसे उन्होंने भारतीय पायलट अभिनंदन को रिहा किया, वैसे ही वे जाधव को रिहा कर दें। इस काम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी और भारत-पाक संवाद का रास्ता खुलेगा। ऐसा होने पर जाधव के मामले में न भारत हारेगा और न ही पाकिस्तान। भारत और पाकिस्तान, दोनों ही जीतेंगे।

वृद्धजनों को दें पूर्ण सम्मान
डा0 जगदीश गाँधी
माँ की ममता तथा करूणा से भरी बचपन की एक बड़ी ही मार्मिक कहानी मुझे याद आ रही है – सांसारिक स्वार्थ में डूबा एक व्यक्ति अपनी बूढ़ी माँ का दिल निकालने के लिए हाथ में छुरी लेकर गया और माँ को मारकर उसका दिल हाथ में लेकर खुशी-खुशी चला। रास्ते में उसे जोर की ठोकर लगी वह गिर पड़ा। छिटककर हाथ से गिरा माँ का कलेजा बेटे की तकलीफ से तड़प गया। माँ के दिल से आह निकली मेरे प्यारे बेटे चोट तो नहीं आयी। माँ तो सदैव अपने बच्चों पर जीवन की सारी पूँजी लुटाने के लिए लालयित रहती है। मोहम्मद साहब ने कहा था कि अगर धरती पर कहीं जन्नत है तो वह माँ के कदमों में है।
पारिवारिक एकता का ज्ञान देने की जिम्मेदारी परिवार तथा स्कूल निभाये :-
समाज में बढ़ रही घोर प्रतिस्पर्धा से नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है। बुजुर्गो पर इसका प्रभाव ज्यादा है। उनकी उपेक्षा में बढ़ोतरी हुई है। जीवन के अंतिम पड़ाव में वह बेटे व परिवार के सुख से वंचित हो रहे हैं। इस पर जल्द नियंत्रण नहीं किया गया तो स्थिति भयावह हो जाएगी। बच्चों में बुजुर्गो के प्रति स्नेह व लगाव पैदा करना बहुत जरूरी है। बच्चों को यह बताया जाए कि बुजुर्गो की सेवा से ही जीवन सफल हो सकता है। समाज तथा विशेषकर स्कूलों के लिए यह एक चुनौती है। इसके लिए मानवीय सूझबूझ से भरी व्यापक योजना बनाने की जरूरत है।
केवल प्रेमपूर्ण हृदय वाला परिवार ही प्रकाशित है :-
समाज में बुजुर्गो का परम स्थान है लेकिन तेजी से बदलते समाज में उनका स्थान गिरता जा रहा है। विदेशों में पढ़ाने व अधिक धन कमाने के लिए वहीं नौकरी करने वालों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। आधुनिक सुख-सुविधाओं की चाह में वे स्वयं तो बड़े शहरों में रहना चाहते हैं लेकिन अपने मां-बाप को गांव-कस्बे में रखना चाहते हैं। बेटा जब अपने बूढ़े मां-बाप को अपने से दूर रखेगा तो उनकी सेवा कैसे हो सकती है?
वृद्धजनों को पूरा सम्मान तथा सामाजिक सुरक्षा देना समाज का उत्तरदायित्व है :-
वर्तमान भौतिक युग में आज सारे विश्व में वृद्धजनों के प्रति घोर उपेक्षा बरती जा रही हैं। विकसित देशों ने इस समस्या से निपटने के लिए सरकार की ओर से वृद्धजनों के लिए ओल्ड ऐज होम स्थापित किये हैं। जिसमें वृद्धजनों के खाने-पीने, बेहतर आवासीय सुविधायें, आधुनिक चिकित्सा, स्वस्थ मनोरंजन, खेलकूद, ज्ञानवर्धन हेतु लाइब्रेरी आदि-आदि सब कुछ उपलब्ध कराया गया है। साथ ही वृद्धजनों को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए अच्छी खासी पेन्शन भी सरकार की ओर से दी जाती है। हमारे देश में वृद्धजनों के लिए ओल्ड ऐज होम की सुविधायें नहीं हैं। सीनियर सिटीजन को दी जाने वाली पेन्शन की राशि भी बहुत कम है। इस दिशा में सरकार तथा कॅारपोरेट जगत को सार्थक कदम उठाकर वृद्धजनों को सम्मानजनक जीवन जीने के अवसर उपलब्ध कराने के लिए आगे आना चाहिए।
संयुक्त परिवार वसुधैव कुटुम्बकम् की सीख देने की प्राथमिक पाठशाला है :-
प्राचीन काल में हमारे देश में संयुक्त परिवारों में वृद्धजनों को पूरा सम्मान, सुरक्षा तथा देखभाल मिलती थी। उद्देश्यहीन शिक्षा तथा भौतिकता की अंधी दौड़ ने हमारे देश में भी संयुक्त परिवारों की श्रेष्ठ परम्परा को बुरी तरह बिखेर दिया है। विशेषकर शहरों में एकल परिवार का रिवाज तेजी से बढ़ रहा है।
धरती में यदि कहीं जन्नत है तो माता-पिता के कदमों में है :-
इस धरती पर हमारे भौतिक शरीर के जन्मदाता माता-पिता संसार में सर्वोपरि हैं। हमें उनका सम्मान करना चाहिए। जिन मां-बाप ने अपना सब कुछ लगाकर अपनी संतानों को योग्य बनाया वे संतानें जब बड़े होकर अपने वृद्ध मां-बाप की उपेक्षा करती हैं तो उन पर क्या बीतती है इस पीड़ा की अभिव्यक्ति कोई भुगत-भोगी ही भली प्रकार कर सकता है। वृद्धजनों का मूल्यांकन केवल भौतिक दृष्टि से करना सबसे बड़ी नासमझी है। वृद्धजन अनुभव तथा ज्ञान की पूंजी होते हैं। बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह का कहना है कि जब हमारे सामने माता-पिता तथा परमात्मा में से किसी एक का चयन करने का प्रश्न आये तो हमें माता-पिता को चुनना चाहिए। माता-पिता की सच्चे हृदय से सेवा करना परमात्मा की नजदीकी प्राप्त करने का सबसे सरल तथा सीधा मार्ग है। साथ ही मानव जीवन के परम लक्ष्य अपनी आत्मा का विकास करने का श्रेष्ठ मार्ग भी है। हमारे शास्त्र कहते हैं कि जिस घर में माता-पिता का सम्मान होता है उस घर में देवता वास करते हैं। माता-पिता धरती के भगवान है। माता-पिता इस धरती पर परमात्मा की सच्ची पहचान है।

भारतीय भाषाओं की विजय
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
तमिलनाडु के राज्यसभा सदस्यों को मैं हार्दिक बधाई देता हूं कि उन्होंने राज्यसभा का काम ठप्प करवाकर सारी भारतीय भाषाओं को मान्यता दिलवाई। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद की सराहना करनी होगी कि उन्होंने तत्काल फैसला करके तमिल ही नहीं, सभी भाषाओं के द्वार खोल दिए। तमिलनाडु में 14 जुलाई को पोस्ट आफिसों में भर्ती के लिए कुछ परीक्षाएं हुईं। उनका माध्यम सिर्फ अंग्रेजी और हिंदी रखा गया। तमिलनाडु में कोई आदमी पोस्ट आफिस का कर्मचारी बने और वह तमिल न जाने तो वह किस काम का है ? यही बात देश के सभी प्रांतों पर लागू होती है। उन्हें एक अखिल भारतीय भाषा के साथ-साथ प्रांतीय भाषा भी आनी चाहिए। याने अखिल भारतीय भाषा का कामचलाऊ ज्ञान हो और प्रांतीय भाषा इस लायक आए कि उसमें ही वे अपनी भर्ती परीक्षा दे सकें । इस नियम को तमिलनाडु में उलट दिया गया था। इसी बात पर द्रमुक और अन्नाद्रमुक ने राज्यसभा में हंगामा खड़ा कर दिया था। जब मैंने अब से 54 साल पहले इंडियन स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में अपना पीएच.डी. का शोधग्रंथ हिंदी में लिखने की मांग की थी तो द्रमुक के नेता अन्नादुरई और के. मनोहरन ने लोकसभा ठप्प कर दी थी। तब डाॅ. लोहिया ने उन्हें समझाया था कि वैदिक सिर्फ हिंदी में लिखने की मांग नहीं कर रहा है, वह सभी भारतीय भाषाओं के दरवाजे खुलवाना चाहता है। अन्नादुरईजी घनघोर हिंदी- विरोधी थे लेकिन उनसे मिलकर मैंने उन्हें अपना दृष्टिकोण समझाया तो वे काफी नरम पड़ गए। आज उनके शिष्यों ने पोस्ट आफिस की भर्ती परीक्षा में तमिल माध्यम की मांग करके समस्त भारतीय भाषाओं के दरवाजे खुलवा दिए हैं। 14 जुलाई को हुई भर्ती—परीक्षा को रद्द कर दिया गया है। बहुत पहले से हम मांग करते रहे हैं कि ससंद में सभी भारतीय भाषाओं में बोलने और संघ लोकसेवा आयोग में परीक्षाएं देने की अनुमति होनी चाहिए। यह काम तो शुरु हो गया है लेकिन अभी भी देश की न्यायपालिका पिछड़ी हुई है। उसका लगभग सारा काम अब भी अंग्रेजी में ही होता है। राष्ट्रपतिजी की पहल पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसलों का संक्षिप्त हिंदी अनुवाद करना शुरु कर दिया है, जो कि अच्छी शुरुआत है लेकिन यह काफी नहीं है। समस्त भारतीय भाषाओं को हर क्षेत्र में उनका उचित स्थान मिलने लगे तो हिंदी अपने आप सर्वभाषा बन जाएगी।

राजस्थान कांग्रेस में जारी है वर्चस्व की जंग
रमेश सर्राफ धमोरा
राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की लड़ाई अब सडक़ों पर आ गई है। विधानसभा में बजट पेश करने के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बयान ने राजनीति में नई हलचल मचा दी थी। अब तक मुख्यमंत्री पद पर अपने उम्मीदवारी के बारे में चुप्पी साधने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने साफ कहा कि विधानसभा चुनाव के दौरान प्रदेश की जनता चाहती थी कि अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने और कोई नहीं। राहुल गांधी ने उसी भावना का आदर करते हुए मुझे यह अवसर दिया था। विधानसभा चुनाव को याद करते हुए अशोक गहलोत ने कहा था कि प्रदेश की जनता चाहती थी कि मैं मुख्यमंत्री बनूं, जनता ने किसी और का नाम नहीं लिया और इसीलिए मैंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
दरअसल पहली बार मुख्यमंत्री ने इस तरह का बयान दिया है। इससे पहले अशोक गहलोत कभी इस तरह खुलकर नहीं बोले। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को प्रदेश में करारी हार मिली और प्रदेश में कांग्रेस की राजनीति में उथलपुथल मच गई। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि लोकसभा चुनाव में हम सफल नहीं हो पाए, लेकिन यह सिर्फ प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश में हुआ। राहुल गांधी के इस्तीफे देने के बाद कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति गरमाई हुई है। अशोक गहलोत को जयपुर से दिल्ली अध्यक्ष बनाकर भेजने की भी चर्चा चली थी। लेकिन प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अप्रत्यक्ष रूप से संकेत दे दिया कि वे राजस्थान ही रहेंगे, क्योंकि प्रदेश की जनता का मन था कि वे मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री का सीधा ईशारा उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की तरफ था। विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद की लड़ाई हारे सचिन पायलट को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के साथ उप मुख्यमंत्री बनाया गया था।
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का बयान आते ही उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने गहलोत पर पलटवार करते हुये कहा कि राजस्थान की जनता ने पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के नाम पर वोट दिए थे। देश के 3 राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव एक साथ हुये थे। तीनो ही प्रदेशो में कांग्रेस की सरकार बनी है। तीनो ही प्रदेशो में कांग्रेस पार्टी की नीतियों व राहुल गांधी के कुशल नेतृत्व के कारण बहुमत मिल पाया था। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बहुत मेहनत करके कांग्रेसी सरकार बनवाई थी। इसमें प्रदेश के किसी एक नेता का योगदान नहीं था जिसके कारण प्रदेश में सरकार बन पाई थी।
राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अचानक विवादित बयान देकर ठंडे पड़े माहौल में अचानक गर्माहट ला दी। गहलोत के बयान से राजस्थान में कांग्रेस की लड़ाई खुलकर सडक़ों पर आ गई है। प्रदेश की जनता में साफ संदेश जा रहा है कि राजस्थान कांग्रेस में दो खेमें बने हुये हैं। एक खेमें का नेतृत्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कर रहे हैं। वहीं दूसरे खेमे का नेतृत्व में उप मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट कर रहें हैं। प्रदेश की राजनीति में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए दोनों नेता में जंग जारी है।
लोकसभा चुनाव में राजस्थान में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट दिल्ली में मुख्यमंत्री बनने के लिए लोबिंग करने लगे हैं। सचिन पायलट का तर्क है कि 2018 के विधानसभा चुनाव का नेतृत्व राहुल गांधी ने किया था जिस कारण प्रदेश में सरकार बनी थी। वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव का राजस्थान में नेतृत्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने किया था जिनके नेतृत्व में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई।
आज राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बने सात महीने हो गए हैं। लेकिन प्रदेश की जनता को कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा है। पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के समय में जो समस्याएं थी वह जस की तस मुंह बाये खड़ी है। सात माह में राज्य सरकार कोई नई योजना शुरू नहीं कर पाई है। बिजली की दरों में बढ़ोत्तरी होने से आम आदमी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। विधानसभा चुनावो से पूर्व कांग्रेस ने प्रदेश के किसानो से वादा किया था कि उनकी सरकार बनने के दस दिन के अंदर प्रदेश के सभी किसानों का दो लाख रूपये तक का कृषि से सम्बधित कर्जा माफ कर दिया जायेगा। मगर कांग्रेस सरकार अपना कर्ज माफी का वादा आज तक पूरा नहीं कर पायी है।
किसानो का कर्ज माफ नहीं होने के कारण कर्ज से परेशान किसान आये दिन आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं। इससे प्रदेश के किसानो में सरकार के प्रति नाराजगी व्याप्त हो रही है। जिसका खामियाजा कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में सभी सीटो पर हार कर उठाना पड़ा था। प्रदेश में सभी विकास कार्य ठप पड़े हैं। बजट के अभाव में भाजपा सरकार के दौरान से चल रहे सडक़ों के निर्माण, मरम्मत के कार्य बंद पड़े हैं। बकाया भुगतान की मांग को लेकर ठेकेदारों ने हड़ताल कर रखी है।
प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती जा रही है। प्रदेश में भ्रष्टाचार पूर्व वत जारी है। राज्य में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो छोटी-मोटी कार्यवाही कर खानापूर्ति कर रहा है। प्रशासन पर नौकरशाही हावी हो रही है। विधायक, मंत्री तबादलों में लगे हैं। इस कारण उनके जिलो में दौरे नहीं हो पा रहे हैं। काम नहीं होने से कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में निराशा व्याप्त होने लगी है। प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के विधायकों की मंत्रियों से शिकायत है कि उनके काम नहीं कर रहे हैं।
ऊपर से प्रदेश के दो बड़े नेताओं के आपसी टकराव के चलते प्रदेश की जनता को लगने लगा है कि उन्होंने काग्रेस को वोट देकर कहीं गलती तो नहीं कर दी है। कांग्रेस नेताओं के आपसी टकराव के चलते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सभी 25 सीटों पर हार का सामना देखना पड़ा था। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने गृह जिले जोधपुर सीट से अपने पुत्र वैभव गहलोत को भी नहीं जिला सके।
मुख्यमंत्री गहलोत ने अपने बजट में कुछ लोक लुभावनी घोषणाएं करके वाहवाही पाने का प्रयास किया है। मगर योजनाएं धरातल पर कितना उतर पाती है यह तो आने वाला समय बताएगा। प्रदेश में जबसे गहलोत तीसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं उनके सामने आए दिन सत्ता बचाने का संकट खड़ा रहता है। उनको बार-बार दौड़ कर दिल्ली जाकर कांग्रेस के बड़े नेताओं के सामने अपनी पैरवी करनी पड़ती है।
विधानसभा सत्र चल रहा है जिसमें विपक्षी दल सरकार पर हमलावर हो रहे हैं। विधानसभा अध्यक्ष डा. सीपी जोशी सरकार के मंत्रियों को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। ऐसे में प्रदेश के लोगों को लगता है कि ऐसा माहौल ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है। कांग्रेस शासन चलाने के लिये जब तक कोई स्थाई फॉर्मूला लागू नहीं करेगा व गहलोत- पायलेट के मध्य चलने वाली उठापटक पर रोक नहीं लगायेगी तब तक प्रदेश में सत्ता की लड़ाई इसी तरह चलती रहेगी।

सत्ता सत्य है, राजनीति मिथ्या
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कर्नाटक और गोवा में जो कुछ हो रहा है, उसने सारे देश को वेदांती बना दिया है। वेदांत की प्रसिद्ध उक्ति है- ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या- याने ब्रह्म ही सत्य है, यह जगत तो मिथ्या है। दूसरे शब्दों में सत्ता ही सत्य है, राजनीति मिथ्या है। सत्ता ही ब्रह्म है, बाकी सब सपना है। राजनीति, विचारधारा, सिद्धांत, परंपरा, निष्ठा सब कुछ मिथ्या है। कर्नाटक और गोवा के कांग्रेसी विधायकों ने अपनी पार्टी छोड़ने की घोषणा क्यों की है ? क्या अपने केंद्रीय या प्रांतीय नेतृत्व से उनका कोई मतभेद था ? क्या वे वर्तमान सरकारों से कोई बेहतर सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं ? क्या उनकी पार्टियों ने कोई भयंकर भ्रष्ट आचरण किया है ? ऐसा कुछ नहीं है। जो है, सो एक ही बात है कि इन विधायकों पर मंत्री बनने का भूत सवार हो गया है। तुमने हमें मंत्री क्यों नहीं बनाया ? अब हम तुम्हें सत्ता में नहीं रहने देंगे। हम मंत्री बनें या न बनें, तुमको तो हम सत्ता में नहीं ही रहने देंगे। हमें पुरस्कार मिले या न मिले, तुम्हें हम सजा जरुर दिलवा देंगे। यह तो कथा हुई कर्नाटक की और गोवा के 10 कांग्रेस विधायक भाजपा में इसलिए शामिल हो गए कि उनमें से दो-तीन को तो मंत्रिपद मिल ही जाएगा, बाकी के विधायक सत्तारुढ़ दल के सदस्य होने के नाते माल-मलाई पर हाथ साफ करते रहेंगे। दल-बदल कानून उनके विरुद्ध लागू नहीं होगा, क्योंकि उनकी संख्या दो-तिहाई से ज्यादा है, 14 में से 10 । यह तो हुई कांग्रेसी विधायकों की लीला लेकिन जरा देखिए भाजपा का भी रवैया ! कर्नाटक में उसे अपनी सरकार बनाना है, क्योंकि संसद की 28 में से 25 सीटें जीतकर उसने अपना झंडा गाड़ दिया है। उसे इस बात की परवाह नहीं है कि देश भर में उसकी छवि क्या बनेगी ? आरोप है कि हर इस्तीफेबाज विधायक को 40 करोड़ से 100 करोड़ रु. तक दिए गए हैं। यह आरोप निराधार हो सकता है लेकिन इस्तीफे देनेवाले विधायक आखिर इतनी बड़ी कुर्बानी क्यों कर रहे हैं ? उन पर तो दल-बदल कानून लागू होगा, क्योंकि उनकी संख्या एक-चौथाई भी नहीं है। जाहिर है कि वे कहीं के नहीं रहेंगे। दुबारा चुनाव लड़ने पर उनकी जीत का भी कोई भरोसा नहीं है। इस सारे मामले में सबसे रोचक रवैया कर्नाटक की कांग्रेस और जनता दल का है। वे इन विधायकों के इस्तीफे ही स्वीकार नहीं होने दे रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बावजूद विधानसभा अध्यक्ष जैसी पलटियां खा रहे हैं, उनसे उनका यह पद ही मजाक का विषय बन गया है। कर्नाटक और गोवा ने भारतीय राजनीति की मिट्टी पलीत करके रख दी है। अब संसद को एक नया दल-बदल कानून बनाना होगा। वह यह कि अब किसी भी पार्टी के विधायक और सांसद, उनकी संख्या चाहे जितनी भी हो, यदि वे दल-बदल करेंगे तो उन्हें इस्तीफा देना होगा। दलों को भी अपना आतंरिक कानून बनाना चाहिए कि जो भी सांसद या विधायक दल बदलकर नई पार्टी में जाना चाहे, उसे प्रवेश के लिए कम से कम एक साल प्रतीक्षा करनी होगी।

अब क्या नया ठिकाना बनायेगें सिद्धू ?
रमेश सर्राफ
क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू ने आखिर पंजाब सरकार के मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। सिद्धू ने खुद ट्वीट के जरिए इसकी जानकारी दी। ट्विटर पर उन्होंने वह पत्र भी पोस्ट किया है, जिसे उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को संबोधित करते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। सिद्धू के मुताबिक 10 जून को ही उन्होंने यह पत्र तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को सौंप दिया था। हालांकि नवजोत सिंह सिद्धू ने अपना इस्तीफा 10 जून को ही दे दिया था लेकिन इसका खुलासा आज किया है। सिद्धू ने आज एक ट्वीट कर कहा है कि वे अपना इस्तीफा पंजाब के मुख्यमंत्री को भी भेज रहे हैं।
पंजाब में मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और मंत्री नवजोत सिह सिद्धू के बीच लम्बे समय से अनबन चल रही थी। लोकसभा चुनाव में पंजाब में कांग्रेस को अच्छी संख्या में सीटें न मिलने का ठीकरा अमरिंदर सिंह ने सिद्धू के सिर पर फोड़ा था और केंद्रीय आलाकमान से उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री ने लोकसभा चुनाव के बाद 6 जून को हुई कैबिनेट की पहली ही बैठक में सिद्धू का स्थानीय स्वशासन विभाग बदल कर ऊर्जा और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा विभाग दिया था। लेकिन सिद्धू ने नये विभागों का कार्यभार ग्रहण नहीं किया था और न ही उन विभागों की मीटिंग में शामिल हुए थे।
उसके बाद से लगातार सिद्धू को लेकर नाराजगी की अटकलें लगाई जा रही थीं जिन पर विराम लगाते हुए रविवार को उन्होंने खुद अपने इस्तीफे की पेशकश को सार्वजनिक कर दिया। पिछली मीटिंग में मुख्यमंत्री ने पर्यटन और संस्कृति मामलों का प्रभार भी उनसे वापस ले लिया था। यहां सवाल उठता है कि सिद्धू ने अपना इस्तीफा कांग्रेस अध्यक्ष को क्यों भेजा जबकि इस्तीफा राज्यपाल या मुख्यमंत्री को भेजना चाहिये था। अब सिद्धू ने कहा है कि वो अपना स्तीफा मुख्यमंत्री को भी भेज रहे हैं।
6 जून को अपना विभाग बदलने से मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह से खफा नवजोत सिंह सिद्धू ने नये विभाग का कार्यभार ग्रहण नहीं किया बल्कि 10 जून को दिल्ली जाकर पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी से भी मुलाकात की थी। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर और सिद्धू के बीच पिछले काफी दिनों से मनमुटाव जारी है।
कांग्रेस नेता सिद्धू पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर के साथ जारी विवाद को लेकर लगातार सुर्खियों में रहे हैं। लोकसभा चुनावों के समय से ही दोनों नेताओं में मनमुटाव जारी है। लोकसभा चुनावों के दौरान पार्टी के खराब प्रदर्शन के लिए खुद को जानबूझकर निशाना बनाए जाने का सिद्धू ने आरोप लगाया। वहीं मुख्यमंत्री ने सिद्धू से उनका विभाग छीन लिया था। इसके बाद से ही सिद्धू कैप्टन से नाराज बताए जा रहे थे।
सिद्धू का इस्तीफा ऐसे वक्त आया है, जब कांग्रेस पार्टी में लीडरशिप को लेकर संकट की स्थिति है। लोकसभा चुनावों के परिणाम आने के बाद राहुल गांधी ने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। सिद्धू और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के बीच अनबन तब शुरू हुई जब सिद्धू पिछले साल इमरान खान के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने पर उनके शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने पाकिस्तान गए थे।
पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की कैबिनेट के सदस्य रहे नवजोत सिंह सिद्धू ने उन्हें कभी अपना कैप्टन माना ही नहीं। एक प्रेस कांफ्रेस ने खुद सिद्धू ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा था कौन कैप्टन? किसका कैप्टन? मेरे कैप्टन तो राहुल गांधी हैं। यही नहीं पाकिस्तान में इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह, करतारपुर कॉरिडोर के शिलान्यास कार्यक्रम में जाने सहित कई अन्य मामलों में भी दोनों के बीच मतभेद खुलेआम सामने आए। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पिछले माह अमरिंदर ने सिद्धू का मंत्रालय बदल दिया। मामला राहुल गांधी तक पहुंचा था लेकिन फिर भी दोनों के बीच सुलह नहीं हो पाई।
नवजोत सिंह सिद्धू पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के शपथ समारोह के दौरान पाकिस्तानी आर्मी चीफ जनरल कमर बाजवा के गले मिले थे। इसे लेकर खूब विवाद हुआ था। इसके बाद करतारपुर गलियारे की नींव रखी जानी थी तो 26 नवंबर को भारत की तरफ आयोजित कार्यक्रम में सिद्धू नदारद रहे। लेकिन 28 नवंबर को पाकिस्तान में आयोजित शिलान्यास समारोह में वह शामिल हुए। तब कैप्टन अमरिंदर ने कहा था कि सिद्धू हाईकमान की परमिशन के बिना वहां गए हैं। पाकिस्तान से वापसी के बाद सिद्धू से कैप्टन की नाराजगी पर मीडिया ने बात की तो सिद्धू ने बड़े व्यंग्यात्मक लहजे में कहा था कौन कैप्टन? ओह कैप्टन? ओह आर्मी दे कैप्टन मेरे कैप्टन तो राहुल गांधी हैं।
फरवरी 2019 में पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतकी हमले को लेकर भी कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बयान एक-दूसरे अलग थे। एक तरफ कैप्टन अमरिंदर ने 41 के बदले 82 मारने की बात कहते हुए पाकिस्तान के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही थी। वहीं इस मसले पर सिद्धू का बयान था कि आतंकियों का कोई देश और मजहब नहीं होता। कुछ लोगों की करतूत के लिए किसी राष्ट्र को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अमरिंदर और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच की खींचतान का एक कारण सिद्धू की पत्नी का टिकट कटना भी माना जा रहा है। सिद्धू की पत्नी ने आरोप लगाया था कि अमरिंदर के कहने पर उनका टिकट काटा गया है। इस पर सिद्धू ने कहा था कि उनकी पत्नी झूठ नहीं बोलतीं।
पंजाब सरकार के मंत्री पद से स्तीफा देने के बाद अब सिद्धू के पास कोई काम नहीं बचा है। यदि पार्टी उन्हे संगठन में राष्ट्रीय पदाधिकारी बना भी देती है तो उससे सिद्धू संतुष्ठ होने वाले नहीं हैं। सिद्धू बहुत महत्वकांक्षी है तथा उनकी नजर पंजाब के मुख्यमंत्री पद पर है जो कैप्टन अमरिन्द्र सिंह के रहते मुश्किल है। राष्ट्रीय सचिव तो वो भाजपा में भी थे। उनको तो भाजपा ने राज्यसभा में भी मनोनित करवा दिया था। मगर उससे वो संतुष्ठ होने वाले नहीं थे जिस कारण उन्होने भाजपा व राज्यसभा से स्तीफा दे दिया था। भाजपा छोडऩे के बाद कांग्रेस व आप में उन्हे शामिल करने की होड़ सी लग गयी थी। अंत में वो कांग्रेस में शामिल होकर मंत्री बने। मगर अपनी हरकतों से वो जल्दी ही कैप्टन अमरिन्द्र सिंह के निशाने पर आ गये थे। कैप्टन को नजर अंदाज कर वो अलग चलने की कोशिश करते रहे मगर मंत्रीमंडल में उनके विभाग बदलकर कैप्टन ने उनको औकात बता दी थी। उसके बाद सिद्धू के समझ में यह बात अच्छी तरह से आ गयी कि यहां उनकी मनमानी चलने वाली नहीं हैं। ताजा घटनाक्रम व सिद्धू के पिछले इतिहास को देखने से लगता है कि शिघ्र ही कहीं वो नया ठिकाना बना लेगें।

‘‘सलाम करो, उस लड़के को!’’
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कल कुछ समाजवादी साथियों ने दिल्ली में दो दिन का समाजवादी समागम आयोजित किया था। देश भर से लगभग 150-200 ऐसे समाजवादी इकट्ठे हुए थे, जो देश की वर्तमान राजनीतिक दशा से चिंतित थे और कुछ पहल करने का विचार कर रहे थे। दूसरे दिन के सत्र में श्री रमाशंकरसिंह और श्री सुनीलम ने मुझे एक मुख्य वक्ता के रुप में बहुत ही आदर और आग्रह से निमंत्रित किया था। मैं जब बोलने खड़ा हुआ तो एक सज्जन खड़े होकर जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि आप आरएसएस के आदमी हैं। आप यहां क्यों बोल रहे हैं ? उन सज्जन को यह शायद पता नहीं कि उनके पूज्य पिताजी के साथ भी, जो डाॅ. राममनोहर लोहियाजी के सहयोगी थे, मैंने कई बार प्रदर्शन, जुलुस और मंच साझा किया है। उनको सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि 5-6 साल पहले मैंने नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए क्यों प्रस्तावित किया था और सारे देश में घूम-घूमकर उसके लिए समर्थन क्यों जुटाया था ? उनको यह पता नहीं कि पिछले पांच साल में प्रधानमंत्री और सरकार की मैंने जितनी कड़ी समीक्षा की है, किसी विरोधी दल के नेता ने भी इतना साहस नहीं किया है। लेकिन मैं न तो किसी दल और