…हो सके तो इंदौर में दफन होना चाहूंगा-मुनव्वरण राणा

भोपाल,मुनव्वरण राणा किसी परिचय को मोहताज नहीं हैं। दुनिया के ख्यात शायर और मां पर शेर लिखने वाले पहले शायरों में शुमारा राणा ने भोपाल की फिजाओं को रंगीन कर दिया। वे शाम-ए-उर्दू कार्यक्रम में शामिल होने भोपाल आये। उनसे इंटरव्यू के अंश, उन्हीं के लफ्जों में यहां पेश किये जा रहे हैं।।।
प्र। वर्तमान में महिला सुरक्षा पर कैसी परिस्थितियों पर आपकी क्या राय है?
राणा – परिस्थितियां सियासत के हिसाब से बदलती हैं। अच्छे लोग सियासत में आते हैं तो परिस्थिति अच्छी हो जाती हैं, बुरे लोग आ जाते हैं तो स्थिति खराब हो जाती है। दुनिया में सबसे आसानी से बबार्द करने वाली चीज औरत होती है। दुनिया में जितनी भी जंग हुई हैं, उसमें औरतों को ही झोंका गया, निशाना बनाया गया। देश में अभी जो सूरत-ए-हाल है, उसमें लॉ एंड ऑर्डर नहीं रह गया है, कोई बड़ी सजा नहीं रह गई और सजा है भी तो, इंसाफ नहीं है। अदालते फैसला करती हैं, फैसला कुछ भी किया जा सकता है, फैसला गांव का चौधरी भी करता है, फैसला कोई माफिया डॉन भी अपने घर में बैठकर करता है। जब फैसले होते रहेंगे, इंसाफ नहीं होगा तो महिलायें दबाई जायेंगी, लूटी जाएंगे। एंटी रोमियो स्कवायड के बहाने उस भाई को उठा लिया गया जो अपनी बहन को स्कूल छोडऩे जा रहा था।
एक आंसू भी हुकूमत के लिए खतरा है।
तुमने देखा नहीं आंसुओं का समंदर होना।
प्र। आपकी शायरियां कड़वी होती हैं, क्या इसके कारण आपको नाराजगी का सामना करना पड़ता है?
राणा – नहीं मेरी शायरियां उतनी कड़वी नहीं हैं। एक चंबल इलाका है। वहां से लखनऊ और भोपाल बराबर दूरी पर हैं। दोनों शहर दो राज्यों की राजधानियां हैं। दोनों रास्तों में हजारों नेताओं, विधायकों, सांसदों अफसरों, की कोठिया हैं। तो दो बातें हो सकती हैं, या तो यह डाकू हैं, या वे डाकू नहीं थे। वे डाकू होते तो उनकी कोठियां होतीं। या ये लूट रहे हैं। डाकु लूटकर आम लोगों में बांट देते थे, लेकिन यह तो आम लोगों को लूटकर खजाना भर रहे हैं। डाकुओं के समय में इंसाफ ज्यादा था। जब अंत्री-मंत्री आ गये तो इंसाफ खत्म हो गया। ऐसे में अगर कलम न कड़वाहट न उगले तो कलम से नाड़ा डालना चाहिए सलवार में। उससे लिखना पढऩा नहीं चाहिए।
प्र। असहिष्णुता पर क्या कहना चाहेंगे? आपने आवार्ड वापस किया था? उस पर क्या कहेंगे?
राणा – मैंने पिछली बार अवार्ड वापसी की थी। कुछ लोगों ने मुझे बुरा कहा था, लेकिन कुछ लोगों ने तारीफ भी की थी। कलबुर्गी, पानसारे की हत्या जैसे मामले पर मुझे बुरा लगा था। अखलाक जैसे एक व्यक्ति को 100 लोगों ने मार डाला। मैं अपने कलंदर का मस्त आदमी हूं।
मैं रायबरेली में रहता हूं, वहीं पैदा हुआ हूं, वहीं मरना चाहता हूं, अगर वहां नसीब न हो तो इंदौर में आखिरी वक्त बिताना चाहूंगा।
वो अपने खून से लिखने लगा है खत मुझको।
अब इस मजाक को संजीदगी से लेना।।
जो इंदौर की मिट्टी में जो खून शामिल हो गया। तो हमें इंदौर की मिट्टी ओढ़कर सोने में क्या दिक्कत।
पहले रायबरेली के किसी भी बाजार से मांस मटन ले आता था। अब डर लगता है इसे बीफ कहने लगे हैं। अब पिछले 7 महीने से मैंने मटन नहीं लिया। कहीं मैं गोश्त लेकर जाऊं और कुछ आतंकवादी जिन्हें गौरक्षक कहते हैं, वे आयें और मुझे मार दें, अखबार यह छाप देंगे कि मैं गौ माता का मांस लेकर जा रहा था। लैब की रिपोर्ट में यह आ जायेगा कि वह मांस गौ माता का ही था। जब सभी लोग झूठ बोलने लगें तो क्या कहा जायेगा। गोवा में कुछ भी खा लीजिए, असम में कुछ भी खा लिजिए, पर उत्तर प्रदेश में नहीं खा सकते। हां अगर कोई कहता है कि भारत में पाकिस्तान बनेगा तो वे गद्दार हैं, लेकिन ऐसे हालातों में दो हिन्दुस्तान बन जायेंगे। एक वह हिन्दुस्तान, जहां हिन्दुस्तानी रहेंगे और दूसरे में वे रहेंगे जो खुद को हिन्दुस्तानी कहेंगे, लेकिन वे होते नहीं।
प्र। साहित्यकार, पत्रकारों के बारे में क्या सोचते हैं?
राणा – साहित्यकार तो अभी तक मैदान में डटे हैं। यह मीडिया हाउस नहीं, यह इंडस्ट्री हाउस हैं। यह सभी बिके हुए हैं। मीडिया हाउस दरोगा के कंधे में हाथ रखके घूम रहा है। अगर आप किसी को मीडिया हाउस कहते हैं तो आप किसी शरीफ आदमी को मां की गाली दे रहे हैं। मीडिया हाउस सच बोलता है, झूठ नहीं बोलता। 10 महीने से मैंने न्यूज नहीं देखी। नीच जैसे शब्द टीवी डिबेट में हजारों बार उपयोग होते हैंं। यह मीडिया लोगों को बांट रहे हैं। धर्मों में तोड़ रहे हैं। यह अगर मीडिया हाउस हैं तो मैं बेहद शर्मिंदा हूं, मैं गलत दौर में पैदा हुआ हूं। मैं यह नहीं कहता जो पत्रकार काम कर रहे हैं वह गलत हैं, लेकिन गलती मालिकों की है। अगर मुझे मुशायरे में लिखकर एक चैक दे दिया जाये कि यह आपको तभी मिलेगा जबकि आप हुकूमत के खिलाफ नहीं बोलेंगे, तो हम नहीं बोलेंगे। अगर हम 25-30 हजार में बिक सकते हैं अपनी गरीबी में तो यह अंबानी, अदाणी, हैरानी वारानी, इन्होंने पूरे भारत को दुकान बनाकर रख दिया है। मैं न्यूज नहीं देखता, भाभी जी घर पर हैं ही देखता हूं। मुल्क नहीं रह गया, यह बाजार हो गया। हमारे समय में तुम कहकर बाते किये जाने पर डांट पड़ती थी, ऐसे दौर में टीवी में लड़ाई क्यों देखें? यह मुल्क नहीं, बाजार हो गया है।
प्र। प्रधानमंत्री जी से मुलाकात कैसी रही?
राणा – मुझे डेढ़ साल पहले प्रधानमंत्री जी ने मिलने बुलाया था, लेकिन मैं देर से पहुंचा। मैंने पीएम के पीएस से कहा कि मैं तो इस दुनिया में भी देर से आया वरना कहीं का बादशाह होता।
मैं जब प्रधानमंत्री जी से मिला तो मोदी जी ने मुझसे पूछा- मुनव्वर भाई क्या हो गया? मैंने कहा- सर घुटनों की समस्या है। मैंने उन्हें बताया कि मां से आखिरी बार चेहरा देख रहा था तो मैं बैठ गया, इसलिए मेरा इंप्लांट टूट गया। सर आपने तो मुझे खत लिखा था। तो मोदी बोले- नहीं, मुनव्वर भाई, शब्दों के साथ भावनाएं नहीं होतीं, लेकिन मैं बोला, शब्द मरहम का भी काम करते हैं,। आपने खत से मेरा सम्मान ही नहीं बढ़ाया, मेरा दुख भी आपने बांटा। मैंने उनसे कहा- माफी के साथ कहता हूं, यह जो लोकसभा राज्यसभा की कुर्सियां होती हैं, वे मेरी शख्सियत से बहुत छोटी हैं। मुझे उस दिन खुशी हुई थी जिस दिन आपने प्रोटोकॉल के खिलाफ आपने अपना प्लेन पाकिस्तान में उतार दिया था और नवाज शरीफ की मां के चरण छुआ था। यह काम कोई हिन्दुस्तानी ही कर सकता है। अगर कभी हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की चर्चा हो तो दोनों देशों की मांएं भी बैठ जायें तो हालात बदल जायें। नेहरू-जिन्ना की मांएं बैठ गई होती तो यह बटवारा नहीं होता।
कोई सरहद नहीं होती, कोई गलियारा नहीं होता।
अगर मां बीच में होती तो बटवारा नहीं होता।
जब आप 2014 में दिल्ली आने की तैयारी कर रहे थे तो आपकी माता जी आपको मिठाई खिला रही थीं तो आप बहुत अच्छे लग रहे थे। बहुत मासूम लग रहे थे। मैं चाहता हूं आपका यह चेहरा कभी दागदार न रहे जाये। आप सम्राट अशोक की तरह प्रसिद्ध हो।
इतनी आसानी से कब अहले-हुनर खुलते हैं।
जब बुलंदी पर पहुंचता हूं तो पर खुलते हैं।।
मुझे मुलाकात के लिए 6 मिनट मिले थे, लेकिन 20-22 मिनट बैठा।
जब मैं आने लगा तो प्रधानमंत्री जी ने कहा- यह मुलाकात फिर होगी, आप स्वस्थ हो जाइये। इस पर मैंने फिर कहा-
जहां मैं हूं, वहां आवाज देना जुर्म ठहरा है।
जहां तुम में हूं, वहां तक पांवों की आहट नहीं आती।।
ऐसा न कहें मुनव्वर भाई, आप मुझे ट्वीट कर दें, वाट्सएप कर दें, टेलीफोन कर दे। मैंने कहा- धन्यवाद सर, फिर मुलाकात होगी। मैंने उनसे कुछ मांगा नहीं, कोई भी वहां मांगने ही जाता है। जो मांगने नहीं जायेगा उसकी मर्दानगी सलामत रहेगी।
बादशाहों को सिखाया कलंदर होना।
आप आसान समझते हैं मुनव्वर होना।।
बड़ी कड़वाहटें हैं, इसलिए ऐसा नहीं होता।
जहर खाते चले जाता हूं, मुंह मीठा नहीं होता।।
मुनव्वर राणा से सौरभ जैन ‘अंकित’ की खास बातचीत

 

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