फिल्म सफर-शख्सियत

दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने का समय निकाल ही लेती हैं ऐश्वर्या
बॉलीवुड अभिनेत्री ऐश्वर्या राय बच्चन का आकर्षण आज भी बरकरार है। ऐश्वर्या बेहद मिलनसार भी हैं और अक्सर वो पार्टियों के बहाने तो कभी यूं भी अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने का कोई अवसर नहीं गंवाती हैं। हाल ही में ऐश्वर्या पति अभिषेक बच्चन के साथ अपने दोस्त मनीष मल्होत्रा से मिलने पहुंची।
ऐश्वर्या मिड-डे मील कार्यक्रम के तहत एक साल के लिए एक हजार बच्चों को भोजन मुहैया कराएंगी। अन्नमित्र फाउंडेशन की ओर से संचालित मिड-डे मील योजना के तहत ऐश्वर्या इस काम को करने जा रही हैं। अन्नमित्र फाउंडेशन इंटरनेशनल सोसाइटी आफ कृष्णा कांनशसनेस (इस्कॉन) द्वारा स्थापित फाउंडेशन है। ऐश्वर्या मनीष मल्होत्रा से मिलने उनके घर गयीं थीं। ऐश्वर्या ड्रेस स्टाइलिस्ट मनीष मल्होत्रा की काफी अच्छी दोस्त हैं।
ऐश्वर्या कई बार मनीष के लिए रैम्प पर भी चली हैं। इन तस्वीरों में आप देख सकते हैं अभिषेक खुद कार ड्राइव करके ऐश्वर्या को लेकर मनीष मल्होत्रा के यहां पहुंचे। इन सबके अलावा फ़िल्ममेकर करण जौहर भी मनीष मल्होत्रा के घर पर नज़र आये। यह मुलाक़ात क्यों हुई इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी है। अगर फ़िल्मों की बात करें तो ऐश्वर्या राय अपनी फ़िल्म ‘फन्ने ख़ान’ की शूटिंग में व्यस्त हैं। फ़िल्म में उनके साथ अनिल कपूर भी नज़र आयेंगे।

अब क्रिकेट खेलते नजर आएंगे रणवीर
आप यह न समझें कि रणवीर सिंह वाकई क्रिकेट के मैदान में उतरने वाले हैं बल्कि वो जिस फिल्म में काम कर रहे हैं वो क्रिकेट पर आधारित है, इसलिए उन्हें ऐसा करना पड़ा रहा है। रणवीर के बारे में आपको तो यह मालूम ही है कि संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी का किरदार उन्होंने निभाया है। अभी यह फिल्म रिलीज होने को है, लेकिन विवाद भी साथ-साथ चल रहे हैं। बहरहाल इस फिल्म की शूटिंग पूरी करने के बाद ही अभिनेता रणवीर सिंह क्रिकेट के ग्राउंड में अपना जलवा दिखाने पहुंच चुके हैं। इस फिल्म का नाम है 83 जो कि कपिल देव की कप्तानी में 1983 क्रिकेट विश्व कप में जीत दर्ज करने वाली भारतीय टीम की अविश्वसनीय यात्रा को दर्शाती है। फिल्म ’83’ अगले साल पांच अप्रैल को रिलीज होगी। यह घोषणा फिल्म के निर्माता रिलायंस एंटरटेनमेंट, फैंटम फिल्म्स, विब्ररी मीडिया और कबीर खान फिल्म्स ने कर दी है। कबीर खान द्वारा निर्देशित इस फिल्म में रणवीर सिंह स्टार क्रिकेटर कपिल देव की भूमिका में नजर आने वाले हैं। फिल्म बताएगी कि किस तरह एक नई टीम ने कपिल देव की कप्तानी में वेस्टइंडीज को हराया था। इसके साथ ही फिल्म यह भी बताने का काम करेगी कि कैसे एक युवा राष्ट्र ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप खेल के मैदान में छोड़ी। इससे जुड़े बयान भी अब आने लगे हैं उसी कड़ी में कबीर खान ने कहा कि 1983 में एक युवा के रूप में जब मैंने भारत को यह विश्व कप जीतते हुए देखा, तब मुझे इसका अहसास भी नहीं था कि यह जीत भारत में क्रिकेट के जीवन को बदल कर रख देगी। बकौल कबीर ‘एक निर्देशक के रूप में मैंने अब तक जितनी भी बेहतरीन कहानियों पर काम किया है, यह उनमें से एक है।’ इसके साथ ही कबीर ने फिल्म के बारे में बहुत लंबी बातचीत की। ऐसे में उन्होंने बातों ही बातों में रणबीर की खूब तारीफ भी कर दी। उन्होंने कपिलदेव की भूमिका में रणवीर को परफेक्ट बताते हुए यहां तक कह दिया कि इस बारें में रणवीर के अलावा वो सोच भी नहीं सकते थे। इस प्रकार कपिल यदि क्रिकेट के स्टार रहे हैं तो अभिनय के मैदान में रणवीर को भी कोई सानी नहीं है। अब दर्शकों को उनकी इस नई फिल्म 83 का भी बेसब्री से इंतजार रहेगा।

विवाह बंधन में बंधने जा रहीं भारती
छोटे पर्दे पर सबको हंसाने वाली कॉमेडियन भारती सिंह जल्द ही अपने मंगेतर हर्ष लिम्बाचिया के साथ सात बंधन के रिश्ते में बंधने जा रही हैं। इससे पहले भारती के प्री वेडिंग की एक फोटो सामने आई है। भारती और हर्ष 3 दिसंबर को शादी कर रहे हैं। भारती ने अपने इंस्टा अकाउंट पर ये फोटो शेयर करते हुए लिखा कि अगर मैं अपनी जिंदगी में कोई सही काम किया है तो वो ये कि मैंने अपना दिल तुम्हें दिया।
भारती का अंदाज फोटो में इतना हास्यास्पद है कि आप भी हंसे बिना रह नहीं पाएंगे। भारती की इस फोटो पर लिखा है कि दूल्हा हम ले जाएंगे और भारती ने हर्ष को अपने कंधों पर उठा ले रखा है।
भारती और हर्ष तीन दिसंबर, 2017 को गोवा में शादी करेंगे। भारती और हर्ष इन दोनों अपनी शादी की तैयारियों में व्यस्त हैं। वहीं भारती इनदिनों अपने वजन को लेकर गंभीर नजर आ रही हैं और वजन कम करने के लिए उन्होंने कमर भी कस ली है। कुछ दिन पहले भारती और हर्ष दोनों ने अपने इंस्टा अकाउंट पर शादी का कार्ड सेलेक्ट करते हुए एक फोटो शेयर की थी और उन्होंने अपने प्रशंसकों को शादी की तैयारी शुरू होने की भी जानकारी दी थी।
भारती और हर्ष की प्री वेडिंग की तस्वीरों में केमिस्ट्री काफी जबरदस्त लगी थी। भारती ने ब्लू कलर का गाउन पहना था। वहीं हर्ष ने मैरून कलर का कोट जींस के साथ कैरी किया था। दोनों साथ में परफेक्ट लग रहे हैं।
दिसंबर में शादी होगी और उसके 20-25 दिन बाद काम पर वापस आयेंगे। भारती ने यूरोप में हनीमून की योजना बनायी है। 20 से 25 दिन अलग-अलग शहरों ग्रीस, स्पेन, बारसालोना, इटली आदि जगहों पर यह जोड़ा जायेगा।

अक्षय की विवादों वाली घंटी बजी तो बजती चली गई
भले ही अक्षय कुमार ने दीवी शो के दौरान बनी जज मल्लिका दुआ से मजाक में ही कह दिया हो कि वो घंटी बजाएं और फिर वो उनकी घंटी बजाएंगे, लेकिन इस विवाद ने ऐसा तूल पकड़ा कि विवादों की यह घंटी अब रुकने का नाम नहीं ले रही है। दरअसल बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता अक्षय कुमार के तमाम पुराने विवाद खुल गए हैं और उनकी गिनती कराई जा रही है कि यह पहला मामला नहीं है जबकि अक्षय विवादों में आए हों।
गौरतलब है कि टीवी शो द ग्रेट इंडिया लॉफ्टर चैंलेंज में अक्षय ने अपनी सहयोगी शो की दूसरी जज मल्लि‍का दुआ को मजाकिया अंदाज में कह दिया था कि ‘तुम घंटी बजाओ मैं तुम्हें बजाता हूं।’ बस इतनी सी खता थी और अक्षय को सदियों की सजा मिल गई। दरअसल इसके बाद ही मल्लि‍का दुआ और उनके पिता नामी-गिरामी वरिष्ठ पत्रकार व‍िनोद दुआ ने अक्षय को आड़े हाथों लिया और अक्षय को माफी मांगने के लिए कहा।
यह अलग बात है कि अक्षय के बचाव में उनकी पत्नी ट्विंकल खन्ना भी मैदान में उतरीं और उन्होंने विवाद खत्म करने की दिशा में अहम रोल अदा किया, लेकिन इससे क्या क्योंकि अब तो सोशल मीडिया से लेकर प्रमुख मीडिया चैनलों और अखबारों में अक्षय के पुराने विवादों को हवा दे दी गई है। बताया जा रहा है कि अक्षय इससे पहले भी अनेक विवादों में फंस चुके हैं। अगर आपको याद हो कि जब अक्षय की खिलाड़ियों का खिलाड़ी फिल्म आई थी तो उससे पहले ही उनके और उनसे उम्र में काफी बड़ी अभिनेत्री रेखा के रिश्तों को लेकर खूब चर्चा हुई थी। शूटिंग के दौरान दोनों के बीच बढ़ी करीबियां चर्चा का विषय रहीं और कहा जाने लगा कि अक्षय तो हम उम्र अभिनेत्रियों के साथ ही नहीं बल्कि उम्रदराज हिरोइनों के साथ भी अफेयर करते हैं। इससे पहले एक रैंप शो के दौरान विवाद खड़ा हो गया था जबकि ट्विंकल से अक्षय खन्ना की जीन की जिप को खुलवाने का पैंतरा आजमाया गया था। इसे अश्लीलता की हदें पार करने जैसा कहा गया और इसका खूब विरोध भी हुआ था। और इससे पहले चलें तो ‘रुस्तम’ और ‘एयरलिफ्ट’ के लिए बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड जब अक्षय को मिला तो कुछ समीक्षकों ने इसके विरोध में अपनी कलम चला दी, इसके बाद अक्षय का इतना विरोध हुआ कि उन्हें कहना पड़ा कि ‘यदि क्रिटिक्स को लगता है कि मैं इस अवॉर्ड के लायक नहीं हूं तो वो इसे वापस ले लें।’ इसके अलावा अक्षय और रवीना टंडन का विवाद भी सुर्खियां बटोर चुका है। इस मामले में रवीना ने इल्जाम लगाया था कि अक्षय का तो तीन-तीन लड़कियों से इश्क चल रहा है, ऐसे में उन्होंने ब्रेकअप ले लिया था। इसी प्रकार प्रियंका चौपड़ा के साथ भी अक्षय के अफेयर की किस्से आम हो चुके हैं। कुल मिलाकर अक्षय ने जिस घंटी को बजाने की बात कही थी वह बजी तो जरुर लेकिन उससे अक्षय की जिंदगी के विवादों वाली कहानियां ही सुनाई दे रही हैं।

करीना, सोहा और ईशा के बाद अब आसिन मां बनी
बॉलीवुड में इन दिनों अभिनेत्रयों के मां बनेने का दौर जारी है। जहां एक तरफ मां बनने के बाद करीना कपूर अपनी कमबैक फिल्‍म ‘वीरे दी वेडिंग’ के लिए खबरों में हैं वहीं सोहा खेमू भी कुछ समय पहले मां बनी हाल ही में हेमा मालिनी की बेटी और अभीनेत्री ईशा देओल ने भी एक बेटी को जन्‍म दिया है। अब इसके बाद ‘रेडी’ और ‘गजिनी’ जैसी सुपरहिट फिल्मों की अभिनेत्री असिन थोट्टुमकल ने एक बेटी को जन्म दिया है। असिन ने पिछले साल मोबाइल कंपनी माइक्रोमैक्स के को-फाउंडर राहुल शर्मा से शादी की थी।
असिन ने अपने इंस्‍टाग्राम अकाउंट पर यह खबर साझा करते हुए फैन्‍स को बताया है कि वह एक बेटी की मां बन गई हैं। असिन ने लिखा, ‘यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि हमारे घर एक नन्‍हीं परी आई है। आप सब के प्‍यार और दुआओं के लिए शुक्रिया। वह मेरे जन्‍मदिन का सबसे प्‍यारा तोहफा है।’ बता दें कि उनकी बेटी के जन्‍मदिन के एक दिन बात यानी 26 अक्‍टूबर को असिन का जन्‍मदिन भी है।
वहीं मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार असिन के पति राहुल शर्मा द्वार जारी एक बयान में कहा गया है, ‘हमें बताते हुए बेहद खुशी हो रही है कि हमें परी जैसी बेटी हुई है। पिछले 9 महीने हम दोनों के लिए बेहद खास रहे, इस दौरान हमारे लिए दुआ करने वालों और साथ देने वालों को उनके प्यार और साथ के लिए शुक्रिया।’
दक्षिण के बाद बॉलिवुड फिल्मों में काम कर चुकी असिन ने शादी के बाद ही फिल्मों से दूरी बना ली। फिल्म ‘खिलाड़ी 786’ में असिन ने अक्षय कुमार के साथ काम किया और अक्षय ने ही असिन और राहुल को भी मिलवाया था। अक्षय, असिन के बेहद करीबी दोस्तों में से एक हैं। असिन की आखिरी फिल्म ऑल इज वेल 2015 में आई थी।

बेहतरीन अभिनय के लिए जाने जाते थे शम्मी
शम्मी कपूर ने सिनेमा की दुनिया में एक जूनियर आर्टिस्ट के रूप में कदम रखा, उन्हें महीने के 50 रुपये सैलरी मिलती थी और अगले चार साल तक शम्मी कपूर अपने पिता के पृथ्वी थिएटर के पास ही निवास करते थे और साल 1952 में अपनी आखिरी सैलरी 300 रुपये ली थी। 1953 से 1955 के बीच शम्मी कपूर जब श्री लंका में छुट्टी मनाने गए हुए थे तो उनकी मुलाकात विदेशी बैली डांसर और इजिप्टियन एक्ट्रेस ‘नादिया गमाल’ से हुई और दोनों रिलेशनशिप में आ गए लेकिन कुछ समय बाद नादिया के वापस जाने पर वह रिश्ता टूट गया।
शम्मी कपूर को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का ‘एल्विस प्रेस्ली’ कहा जाता था। उन्हें ‘तुमसा नहीं देखा’, ‘दिल देकर देखो’, ‘सिंगापुर’, ‘जंगली’, ‘कॉलेज गर्ल’, ‘प्रोफेसर’, ‘चाइना टाउन’, ‘प्यार किया तो डरना क्या’, ‘कश्मीर की कली’, ‘जानवर’, ‘तीसरी मंजिल’, ‘अंदाज’ और ‘सच्चाई’ जैसी कई फिल्मों में बेहतरीन अभिनय के लिए जाना जाता है।
अपनी बेटी के जन्म के लगभग 4 साल बाद साल 1965 में गीता का देहांत हो गया। बताया जाता है कि अपनी पत्नी की मौत के बाद शम्मी कपूर काफी टूट गए थे और उन्होंने खाना पीना छोड़ दिया था। उनके बच्चे छोटे थे इसलिए उनके घरवालों ने उनपर शादी का दबाव बनाना शुरू कर दिया। उनके घरवाले चाहते थे कि वो नीला देवी से शादी करें।
पहली पत्नी गीता से शम्मी की मुलाकात साल 1955 में फिल्म ‘रंगीन रातें’ की शूटिंग के दौरान हुई थी। इस फिल्म में शम्मी कपूर लीड रोल में थे लेकिन गीता का इस फिल्म में कैमियो था। इसी दौरान दोनों का प्यार परवान चढ़ा और इसके 4 महीने बाद दोनों ने मुंबई के बाणगंगा मंदिर में शादी कर ली। शादी के एक साल बाद 1 जुलाई 1956 को दोनों एक बेटे के पिता बने। उन्होंने अपने बेटे का नाम आदित्य राज कपूर रखा। इसके लगभग 5 साल बाद साल 1961 में दोनों की एक बेटी हुई जिसका नाम कंचन रखा गया।
अपने जमाने के बेहतरीन अभिनेताओं में शामिल शम्मी कपूर का जन्म 21 अक्टूबर, 1931 को हुआ था। पहले उनका नाम शमशेर राज कपूर था। बाद में वो शम्मी कपूर के नाम से बॉलीवुड में मशहूर हुए। 1948 में शम्मी कपूर ने सिनेमा की दुनिया में एक जूनियर आर्टिस्ट के रूप में कदम रखा, उन्हें महीने के 50 रुपये सैलरी मिलती थी और अगले चार साल तक शम्मी कपूर अपने पिता के थिएटर के पास ही रहा करते थे और साल 1952 में उन्होंने अपनी आखिरी सैलरी 300 रुपये ली थी। 1953 में उन्होंने जीवन ज्योति से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। 50 से ज्यादा फिल्म में मुख्य किरदार और लगभग 20 फिल्मों में सहायक भूमिका निभाने वाले शम्मी कपूर ने अपने जीवन में सिर्फ एक बार फिल्मफेयर बेस्ट अभिनेता का अवॉर्ड अपने नाम किया।अगस्त 2011 में तबीयत बिगड़ने के बाद शम्मी कपूर को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती करवाया गया, जहां 14 अगस्त 2011 को उनका निधन हो गया।

अशोक कुमार इस प्रकार बने अभिनेता
गुजरे जमाने के मशहूर अभिनेता अशोक कुमार अपने यादगार अभिनय के लिए हमेशा याद रखे जायेंगे। अशोक कुमार अपने परिवार के भी काफी करीब रहे। उन्होंन अपना जन्म दिन मनाना इसलिए मनाना छोड़ दिया क्योंकि उसी दिन उनके भाई और गायक किशोर कुमार की पुण्यतिथि भी होती है।
अशोक कुमार ने सबसे पहले बॉलवुड में एंटी हीरो की छवि वाली भूमिकाएं की थीं। ये फिल्म पांच साल तक चली थी।
अशोक कुमार के अभिनेता बनने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। अशोक कुमार मुंबई आकर निर्माता-निर्देशक हिमांशु राय के साथ टेक्नीशियन के रूप में काम करने लगे थे। हिमांशु 1936 में फिल्म जीवन नैया बना रहे थे लेकिन तभी अफवाह उड़ी कि फिल्म के हीरो हुसैन का हिमांशु की पत्नी देविका रानी, जो फिल्म की हीरोइन भी थीं, से अफेयर है। इसके बाद हिमांशु नाराज हो गए और अशोक कुमार से कहा कि वे अब उनकी फिल्म के हीरो होंगे। अशोक कुमार ने अभिनेता बनने से काफी इंकार किया, पर हिमांशु नहीं माने। इस तरह अशोक कुमार के अभिनय करियर की शुरुआत हुई। यहां तक कि शोले, जंजीर जैसी फ़िल्मों के को-राइटर सलीम खान की पहली कहानी अशोक कुमार ने ही ख़रीदी थी। वे उनके करीबी मित्र थे। अशोक कुमार ने फिल्मों के पेशे को बेहद सम्मान दिलाया।

आत्मकथा से सामने आये हेमा के राज
अस्सी के दशक से लेकर आज तक ड्रीम गर्ल के नाम से लोकप्रिय हेमा मालिनी की आत्मकथा के जरिये उनके जीवन के कई राज सामने आये हैं। इस बायोग्राफी का नाम ‘बियोंड द ड्रीम गर्ल’ है इसे हार्पर कॉलिन्स ने प्रकाशित किया है। हेमा की आत्मकथा को पूर्व एडिटर और प्रोड्यूसर राम कमल मुखर्जी ने लिखा है। उन्होंने कहा कि पहली बार हेमा के जीवन से जुड़ी कई बातें सामने आएंगी। इनमें उनके करियर शादी और तमाम बातों का जिक्र होगा।
हेमा मालिनी की आत्मकथा में दोनों बेटियों ईशा देओल और आहना देओल का काफी जिक्र है। दोनों बेटियों के बचपन, उनके करियर, शादी से जुड़े तमाम पहलू का जिक्र किया गया है। आत्मकथा में बताया गया है कि उन्होंने कैसे राजनीति में प्रवेश किया। आत्मकथा के लेखक रामकमल ने बताया। “18 साल पहले 1999 में गुरदासपुर लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार विनोद खन्ना के प्रचार के बाद हेमा कैसे राजनीति में आई इसका विस्तार से जिक्र किया गया है। इसमें उनके पार्टी ज्वाइन करने और राज्यसभा-लोकसभा सांसद बनने तक की कहानी है। आत्मकथा में 2015 में हुए हेमा मालिनी के कार एक्सीडेंट का भी प्रमुखता से जिक्र किया गया है।
कैसे एक्टिंग की शुरुआत हुई : पहली बार आत्मकथा के जरिए हेमा मालिनी के आध्यात्मिक जीवन का भी खुलासा होगा। किताब में इस बात का जिक्र है कि हेमा मालिनी और जयललिता एक साथ तमिल फिल्म से डेब्यू करना चाहती थीं, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। फिल्म साइन करने के बावजूद वो प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पाया। बाद में 16 साल की उम्र में राजकपूर के सामने ‘सपनों का सौदागर’ के जरिए वो हिंदी फिल्मों में हीरोइन के तौर पर नजर आईं। एक दक्षिण भारतीय लड़की के हिंदी फिल्मों की सफल अदाकारा बनने की कहानी किताब में दर्ज है।
हेमा के फैसलों पर मां का कितना असर रहा : फिल्मों के लिए प्रोड्यूसर्स, डायरेक्टर्स हेमा से नहीं बल्कि उनकी मां जया लक्ष्मी चक्रवर्ती से बात करते थे। उनकी मां को यदि फिल्म में कोई सीन आपत्तिजनक लगता था, तो वो उसे हटाने को कहती थीं। हेमा एक स्टाइलिश हीरोइन के तौर पर जानी जाती थीं। पोल्का डॉट्स, ओवरसाइज्ड सलग्लासेज, प्लेटफॉर्म हील्स का ट्रेंड उन्होंने ही शुरू किया था, लेकिन फिल्मों में वो कभी वल्गर कपड़ें पहनी नहीं नजर आई। वो खुद इन सब चीजों में कंफर्टेबल नहीं होती थीं।
क्यों टूटी जितेंद्र से सगाई : हेमा मालिनी फिल्मों में अपना करियर नहीं बनाना चाहती थीं, लेकिन वो क्या वजह थी जिसकी वजह से उन्होंने फिल्म को अपना प्रोफेशन चुना, वो दक्षिण भारतीय होते हुए भी वहां की इंडस्ट्री में क्यों नहीं गईं- इस बारे में भी आपको यह किताब पढ़कर ही पता चलेगा। इसके साथ ही उस समय के स्टार जितेंद्र से उनकी सगाई टूटने की बात भी इसमें है।

शाहरुख और गौरी की जोड़ी है मिसाल
बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान की पत्नी गौरी खान ने अपनी एक अलग और खास पहचान बनाई हैं। इंडस्ट्री में वह प्रोड्यूसर और इंटीरियर डिजाइनर के तौर पर मशहूर हैं। फिल्मी दुनिया के सबसे सफल सितारों में से एक शाहरुख खान की प्रेम कहानी कम फिल्मी नहीं है। पहले प्यार फिर शादी और 26 साल का साथ, बॉलीवुड में जहां कुछ महीनों में ही रिश्ते टूट जाते हैं वहां शाहरुख और गौरी की जोड़ी एक मिसाल है।
शाहरुख ने गौरी को 1984 में एक पार्टी में पहली बार देखा था तब वह महज 18 साल के थे। गौरी को देखते ही शाहरुख को उनसे प्यार हो गया था। उस वक्त गौरी केवल 14 साल की थीं। शुरू में अपने शर्मीले स्वभाव के कारण शाहरुख कुछ कह नहीं सके, लेकिन वह हर उस पार्टी में जाते जहां गौरी के आने की उम्मीद होती। कुछ समय बाद शाहरुख ने हिम्मत जुटाकर गौरी का फोन नंबर लिया और फिर दोनों की बातचीत शुरू हो गई
शाहरुख शुरुआत में गौरी को लेकर बहुत अधिक पोजेसिव थे। उन्हें उनका दूसरों से बात करना, बाल खुले रखना पसंद नहीं था। वह छोटी-छोटी बात में गौरी से लड़ने लगते थे। गौरी इन बातों से बेहद परेशान हो चुकी थीं। रिश्ता खत्म करने के लिए उन्होंने शाहरुख से बात करनी बंद कर दी और उन्हें दिल्ली में छोड़ अपने दोस्तों के साथ वह मुंबई चली आईं। जब शाहरुख को यह पता चला तो वह भी मुंबई पहुंचे और अपने दोस्तों के साथ गौरी की तलाश शुरू की। अंतत: वह उन्हें मुंबई के अक्सा बीच पर मिलीं जहां एक दूसरे को देखते ही दोने से शादी करने का फैसला कर लिया।
गौरी और शाहरुख अलग-अलग धर्म के हैं। दोनों को पता था कि गौरी के माता-पिता उनकी शादी के लिए तैयार नहीं होंगे इसलिए करीब पांच साल तक दोनों ने अपने रिश्ते को लोगों से छिपा कर रखा। जब गौरी के परिजनों को इस रिश्ते का पता चला तो वे बेहद नाराज हुए। पहले तो धर्म आड़े आया, उसके बाद उन्हें लगता था कि शाहरुख एक ऐसी जगह पर काम करते हैं जहां कब क्या हो जाए इसका कोई भरोसा नहीं होता। इसके अलावा उनका कहना था कि अपनी जिंदगी का इतना बड़ा फैसला करने के लिए गौरी मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं लेकिन दोनों डटे रहे और आखिरकार उन्हें शादी के लिए तैयार कर ही लिया।
शाहरुख ने गौरी से 25 अक्टूबर, 1991 को शादी की थी। जोड़ी के बड़े बेटे आर्यन का जन्म 1997 में हुआ। 2000 में शाहरुख-गौरी ने बेटी सुहाना का स्वागत किया। शाहरुख ने जुलाई 2013 में सरोगेसी के जरिए बेटे अबराम के पैदा होने की घोषणा की थी। गौरी के साथ अपने रिश्ते के बारे में शाहरुख कहते हैं कि एक दोनों बिलकुल अलग हैं।

एक पहेली बनी रही रेखा की जिंदगी
बॉलीवुड अभिनेत्री रेखा की जिंदगी हमेशा से ही एक ऐसी पहेली रही है जिसे कोई समझ नहीं पाया। रेखा को बॉलीवुड में जो कामयाबी मिली वहां तक पहुंचना हर अभिनेत्री का सपना होता है। वहीं दूसरी ओर अपनी जिंदगी में उन्होंने जो संघर्ष किया उससे वो टूटती नजर नहीं आईं, इसलिए आज भी वो एक रहस्य के तौर पर जानी जाती हैं। रेखा की जिंदगी में कई किस्से हैं, जिन्हें जानने के लिए हजारों पन्ने भी कम पड़ जाएंगे अगर वो उन्हें खोलने पर आ गईं। कुछ किस्से जरुर उन्होंने अपनी जीवनी में बयां कर दिए हैं, लेकिन उनके बारे में दुनिया जानती है।
रेखा ने अपनी जिंदगी का एक दर्दनाक वाकया बयां किया। यह दर्द उन्हें महज 15 साल की उम्र में झेलना पड़ा था। यह घटना फिल्म ‘अनजाना सफर’ की शूटिंग के दौरान हुई। एक रोमांटिक गाने के अभिनय के लिए रेखा सेट पर पहुंची थीं। वहां जैसे ही डायरेक्टर ने एक्शन बोला एक्टर बिस्वजीत ने उन्हें होठों पर किस करना शुरू कर दिया और ये किस 5 मिनट तक चला।
यह किसिंग सीन काफी समय तक सुर्खियों में बना रहा। यहां तक कि अमेरिका की ‘लाइफ मैग्जीन’ में इस पर कवर स्टोरी छपी थी। जिसका टाइटल था- ‘द किसिंग क्रायसिस ऑफ इंडिया।’
इसी तरह का एक किस्सा रेखा और विनोद मेहरा की शादी के दौरान हुआ। जब वह दोनों कोलकाता से शादी करने के बाद मुंबई लौटे तो रेखा का स्वागत चप्पल से किया गया। रेखा की सास कमला इस शादी को लेकर बेहद नाराज थीं। जैसे ही रेखा आशीर्वाद लेने के लिए झुकीं तुरंत उनकी सास ने उन्हें ढकेल दिया। उन्होंने रेखा को मारने के लिए चप्पल भी निकाली और उन्हें घर में घुसने से मना कर दिया।
रेखा के माथे का सिंदूर आज भी राज बना हुआ है। इस पर बीते कई सालों से विवाद बरकरार है। लोग जानना चाहते हैं कि आखिर वह किसके नाम का सिंदूर लगाती हैं। दरअसल, रेखा ने ऋषि कपूर और नीतू सिंह की शादी में सिंदूर लगा रखा था और मंगलसूत्र पहना था। इस कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन भी परिवार के साथ शामिल थे. यहां सफेद साड़ी, लाल बिंदी और सिंदूर में रेखा को देख सब हैरान रह गए थे।
हालांकि इस पर सफाई देते हुए रेखा ने कहा था, वह सीधे शूटिंग से शादी में आईं। सिंदूर और मंगलसूत्र उनके फिल्म के गेटअप का हिस्सा थे, जो वह निकालना भूल गई थीं बहरहाल जो भी हो आज भी रेखा को सिंदूर लगाए हुए देखा जाता है।
रेखा के सिंदूर पर अभिनेता पुनीत इस्सर की पत्नी ने कहा था कि रेखा अमिताभ के लिए सिंदूर लगाती हैं जबकि रेखा ने एक अवॉर्ड फंक्शन में कहा था कि जिस शहर से वह हैं, वहां सिंदूर लगाने का फैशन है। वहीं 2008 में एक इंटरव्यू में रेखा ने कहा, मुझे लोगों की प्रतिक्रियाओं से फर्क नहीं पड़ता। मुझे लगता है कि सिंदूर मुझ पर अच्छा लगता है।
रेखा की जिंदगी में लगातार बुरा दौर आता रहा। पति मुकेश अग्रवाल ने शादी के एक साल बाद ही खुदकुशी कर ली थी। कहा जाता है कि मुकेश ने रेखा का दुपट्टा गले में बांधकर खुदकुशी की थी जिसके बाद मुकेश के परिवार और फिल्म इंडस्ट्री के लोगों ने रेखा को कोसा था।
रेखा का कई फिल्म अभिनेताओं से नाम जुड़ा जिसके चलते उन दिनों वह विवादों में रहा करती थीं। अमिताभ के अलावा उनका नाम नवीन निश्चल, विश्वजीत, जितेंद्र, शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद मेहरा, संजय दत्त, अक्षय कुमार जैसे एक्टर्स से जुड़ा।
पिछले साल लांच हुई यासिर उस्मान की क़िताब ‘रेखा- द अनटोल्ड स्टोरी’ को लोगों ने बहुत पढ़ा और बहुत पसंद भी किया। अभिनेत्री रेखा की ज़िंदगी के वैसे कई अनछुए पहलुओं से यह क़िताब हमें रू-ब-रू कराती हैं।
यासिर बताते हैं कि उन्होंने रेखा पर क़िताब लिखने का निर्णय इसलिए नहीं लिया था कि रेखा की ज़िंदगी काफी रहस्यमयी रही है, बल्कि उन्हें एक ऐसी लड़की की ज़िंदगी की कहानी ने आकर्षित किया, जो सिर्फ 14 साल की उम्र में हिंदी सिनेमा में आती है और ना सिर्फ कमर्शियल बल्कि आर्ट फिल्मों में भी अपनी पहचान स्थापित कर लेती है।
यासिर मानते हैं कि अब भी उनकी क़िताब में रेखा से जुड़े विवादास्पद बातों को ही लोग लगातार उठाते हैं, जबकि उनकी ज़िंदगी की कई ऐसी बातें भी इस क़िताब में लिखी गयी हैं, जो उल्लेखनीय हैं।

बाल कलाकर से की थी आशा पारेख ने शुरुआत
गुजरे जमाने की दिग्गज अभिनेत्री आशा पारेख ने अपने कैरियर में एक अलग ही स्थान बनाया और अपनी अदाकारी से लंबे समय तक दर्शकों के दिलों में राज किया है। आशा ने अभिनय की शुरुआत बतौर बाल कलाकर के तौर पर की थी। दस साल की उम्र में वह पहली बार फिल्म मां (1952) में नजर आईं। इसके बाद उन्होंने कुछ और फिल्मों में भी काम किया लेकिन स्कूल पूरा करने के लिए अभिनय छोड़ दिया
बाल कलाकर के तौर पर पर्दे पर आने वाली आशा ने 16 साल की उम्र में पर्दे पर वापसी करने की सोची। वह अब हीरोइन बनकर सिल्वर स्क्रीन पर आना चाहती थीं लेकिन उनके लिए ये बिल्कुल भी आसान नहीं रहा। विजय भट्ट की फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ (1959) के लिए पहुंचीं आशा को खारिज कर दिया गया। उनका कहना था कि आशा में कुछ स्टार मैटीरियल नहीं है। इस रिजेक्शन के आठ दिन बाद फिल्म प्रोड्यूसर सुबोध मुखर्जी और राइटर डायरेक्टर नासिर हुसैन ने उन्हें शम्मी कपूर के साथ फिल्म ‘दिल देके देखो’ (1959) में बतौर हीरोइन कास्ट किया। इस फिल्म ने आशा को एक बड़ा प्लैट फॉर्म दिया और एक बड़ी स्टार बन गईं।आशा के अंदर एक्टिंग के लिए लगाव ऐसा था कि वह किसी की नकल उतारने में भी कम नहीं थीं। वह स्कूल के दिनों में यह काम खूब किया करती थीं। एक टीवी शो क्लासिक लीजेंड्स के एक एपिसोड में जावेद अख्तर ने बताया था कि आशा बचपन में अपने दोस्तों और टीचर्ल की नकल किया करती थीं। इस अभिनेत्री को अपने जीवन में पसंद का हमसफर नहीं मिल पाया और वह अविवाहित ही रहीं।

कैमरा देखकर भाग जाते हैं आरव
अभिनेता अक्षय कुमार के बेटे आरव बांद्रा के रेस्टोरेंट कॉर्नर हाउस के बाहर एक मिस्ट्री गर्ल के साथ नजर आए। जैसे ही आरव ने फोटोग्राफर्स को उनकी तस्वीरें क्लि‍क करते देखा वह वहां से भाग खड़े हुए। दरअसल जब आरव कॉर्नर हाउस के बाहर निकले तो उनके साथ एक लड़की भी नजर आईं। जैसे ही आरव ने फोटोग्राफर्स को देखा वह वहां से मुंह छिपाते हुए तेजी से अपनी कार की और बढ़े और फटाफट वहां से रवाना हो गए।
इससे पहले आरव को इसी साल मार्च में मुंबई के एक पीवीआर के बाहर देखा गया था और उस दौरान भी वे एक दूसरी लड़की के साथ नजर आए थे। कॉर्नर हाउस के बाहर आरव को जिस लड़की के साथ बाहर देखा गया है वह कौन है ये साफतौर से नहीं कहा जा सकता। वह आरव की कोई करीबी दोस्त हैं या कोई और हैं इससे फिलहाल पर्दा नहीं उठ पाया है।
ये पहली बार नहीं हैं जब आरव ने मीडिया से अपना चेहरा छि‍पाया हो। आरव अक्सर मीडिया से चेहरा छिपाते हुए नजर आते हैं। हाल ही में अक्षय और ट्विंकल के साथ भी आरव की तस्वीरें सामने आईं थी, उस दौरान भी आरव जैकेट में अपना चेहरा छि‍पाए नजर आए थे। फैमिली हो या फ्रेंड्स या फिर मिस्ट्री गर्ल्स, आरव को अपनी आउटिंग्स पर चेहरा छि‍पाते हुए देखा जा सकता है।

अब फिल्मों के लिए भटकना नहीं पड़ता
अपनी एक्टिंग के लिए नेशनल अवॉर्ड जीत चुके एक्‍टर राजकुमार राव अपनी पिछली फिल्‍म ‘बरेली की बर्फी’ के लिए खूब तारीफें लूट रहे हैं। कमर्शियल सिनेमा से लेकर ‘शाहिद’, ‘अलीगढ़’ और ‘ट्रैप्‍ड’ जैसी फिल्‍मों तक में शानदार एक्टिंग के लिए वाहवाही लूटने वाले राजकुमार लगभग हर तरह की फिल्‍मों में नजर आ चुके हैं। ऐसे में अब राजकुमार राव का कहना है कि पहले वह अपनी अगली फिल्म की खोज करते थे लेकिन अब उनके पास अच्छी कहानियों के आधार पर फिल्में चुनने का ऑप्‍शन मौजूद है। बता दें कि राजकुमार ने साल 2010 में फिल्म ‘लव सेक्स और धोखा’ से बॉलीवुड में कदम रखा था। इस साल राजकुमार राव की तीन फिल्‍में ‘ट्रैप्‍ड’, ‘बहन होगी तेरी’ और ‘बरेली की बर्फी’ रिलीज हो चुकी है और उनकी अगली फिल्‍म ‘न्‍यूटन’ जल्‍द ही रिलीज होने वाली है। राजकुमार की ‘न्यूटन’ का वर्ल्ड प्रीमियर बर्लिन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में हुआ है।
जब उनसे पूछा गया कि इतनी कम उम्र में इतनी सफलता मिलने पर उनके भीतर कोई बदलाव नजर आता है, तो राजकुमार ने कहा, ‘एक अभिनेता के रूप में कुछ खास बदलाव नहीं आए हैं। मैं हमेशा से अच्छी कहानियों का हिस्सा बनना चाहता हूं। एक बदलाव यह आया है कि अब मेरे पास अच्छी कहानियां चुनने का विकल्प मौजूद है।’ उन्होंने कहा, ‘पहले मैं सिर्फ फिल्मों की तलाश में रहता था लेकिन अब मैं अच्छी कहानियों के आधार पर फिल्में चुनता हूं।’
इस साल रिलीज हुई फिल्‍म ‘बरेली की बर्फी’ में राजकुमार राव ने प्रीतम विद्रोही का किरदार निभाया था और उन्‍हें इसके लिए खूब सराहना भी मिली। अपनी संजीदा फिल्‍मों और कमर्शियल सिनेमा पर बात करते हुए राजकुमार ने कहा, ‘मैंने इन सभी को कभी भी बांटा नहीं ‘काई पो चे’, ‘क्वीन’, ‘बहन होगी तेरी’ और ‘बरेली की बर्फी’ जैसी फिल्में वास्तव में स्वतंत्र फिल्में नहीं हैं। क्या आप किसी एक फिल्म का नाम ले सकते हैं? और वो भी ऐसे समय में जब कमर्शियल और पैरलर सिनेमा के बीच की लकीर मिट रही हैं।’
‘न्यूटन’ की बात करें तो यह फिल्‍म एक युवा सरकारी अधिकारी के इर्द-गिर्द घूमती है जिसे एक नक्सल-नियंत्रित शहर में चुनावी कार्य करने के लिए भेजा जाता है और उसके वैचारिक संघर्ष उसे कैसी स्थिति में पहुंचा देते हैं। वास्तविक स्थानों पर इस फिल्म की शूटिंग के अनुभवों बारे में राजकुमार ने कहा, ‘मुझे इसकी कहानी पहली बार में ही पसंद आ गई थी। किरदार एक आदर्शवादी है और बदलाव लाना चाहता है, हालांकि वह एक भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा है।’
राजकुमार ने कहा, ‘फिर मुझे पता चला कि इस फिल्म की शूटिंग छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में होगी.. हां, पहले मैं डर गया था लेकिन जब मैं वहां गया तो ग्रामीणों ने हमारा स्वागत किया।’ वह क्षेत्र नक्सल प्रभावित नहीं है और प्रकृति की सुंदरता भी वहां अद्भुत है। इसलिए शूटिंग अच्छी रही और हम सभी ने इसका आनंद उठाया। बता दें कि अमित मसुरकर द्वारा निर्देशित ‘न्यूटन’ भारत में 22 सितंबर को रिलीज हुई है।

आरके स्टूडियो में आग से खाक हुई यादें
शोमैन राज कपूर द्वारा बनाए गए आरके स्टूडियो के पहले स्टेज में लगी आग से कपूर खानदान आहत है। बॉलिवुड की एक से बढ़कर एक सुनहरी यादें इस आग में राख हो गयी हैं और ऋषि समेत पूरी मायानगरी इससे गम में डूबी हुई है।
ऋषि ने कहा, ‘मुझे अब भी इस पर भरोसा नहीं कर सकता।’ ऋषि ने बताया कि आग लगने के बाद वह घंटों स्टूडियो को निहारते रहे और परेशान व असहाय महसूस करते रहे। घर पर बात कर रहे ऋषि ने बताया कि वह सोच रहे हैं कि शायद ये सब एक बुरा सपना हो। ऋषि को अभी भी आग लगने की वजह नहीं पता। पुलिस इस मामले की जांच कर रही है। शनिवार को देर रात 2.20 के आसपास आग लगी। इससे पहले शुक्रवार को आरके स्टूडियो में एक रिएलिटी शो सुपर डांस 2 की शूटिंग हुई थी, जिसके बाद सेट के लाइट्स और मेकअप रूम लॉक कर दिए गए थे।
ऋषि की यादें हुईं ताजा
ऋषि आरके स्टूडियो से जुड़ी अपनी यादों में डूबते-उतराते रहे। उन्होंने उन फिल्मों में से कुछ को याद किया जिनकी शूटिंग आरके स्टूडियो में हुई थी। आवारा, श्री 420, जिस देश में गंगा बहती है, मेरा नाम जोकर, सत्य शिवम सुंदरम, राम तेरी गंगा मैली, धरम करम, प्रेम रोग से लेकर खुद के द्वारा 1999 में निर्देशित फिल्म ‘आ अब लौट चलें’ जैसी फिल्में उन्हें याद आईं। ऋषि कपूर ने बताया कि आरके स्टूडियो में खुद उनकी यात्रा रणधीर और रितु के साथ श्री 420 के ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’ गाने की शूटिंग के साथ शुरू हुई। तब वह 2 साल के थे और लगातार रोए जा रहे थे, क्योंकि उन्हें भारी बारिश के सीन में चलना था।
ऐसे में नरगिस ने उन्हें कैडबरी की चॉकलेट से मनाया और कहा कि अगर वह अपने पापा की बात मानेंगे तो उन्हें चॉकलेट मिलेगी। ऋषि ने कहा कि क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब आग ने सब खत्म कर दिया तो मुझे कैसा लगा? मैं अब 65 साल का हूं। मैं इस जगह से 63 सालों से जुड़ा हूं। यह रणधीर और राजीव के लिए भी उतना ही दुखद है।
ऋषि कपूर ने बताया कि यह उनकी मां कृष्णा कपूर के लिए बड़े झटके की तरह है। उन्होंने कहा कि मेरी मां इस घटना से काफी आहत हैं। उनकी सेहत खराब है। हमने उन्हें स्टूडियो आने से भी मना कर दिया था क्योंकि आग की वजह से चारों तरफ धुआं फैला हुआ था।
मेरा नाम जोकर का मास्क भी हुआ राख
ऋषि से जब नुकसान के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि सबकुछ खत्म हो गया। मेरा नाम जोकर में राज कपूर ने जो फेमस जोकर मास्क पहन रखा था वह भी जल गया। ऋषि कपूर ने बताया, ‘आरके फिल्म की सभी फिल्मों के कॉस्ट्यूम थे।’ आरके बैनर की फिल्मों में नगरिस से लेकर ऐश्वर्या राय तक ने जो कॉस्ट्यूम पहने थे सब तबाह हो गए। ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में पद्मनी द्वारा पहनी गईं जूलरी भी यहीं रखी हुई थीं।
पहले भी हुए थे हादसे
आरके स्टू़डियो के साथ पहले ही कई हादसे हुए थे। 1970 में जब मेरा नाम जोकर फ्लॉप हुई थी जब राज कपूर को इस स्टूडियो को गिरवी रखना पड़ा था। अपने जीवन के अंतिम दौर में राज कपूर को स्टूडियो को दो स्टेज बेचने भी पड़े थे हालांकि राज कपूर के बाद उनके बच्चों ने इस स्टूडियो को बचाकर रखा। ऋषि कपूर ने कहा, ‘हम अपनी पिता की विरासत को संभाले रहे।’ उन्होंने कहा, ‘मेरे पिता ने अपने परिवार के लिए तबतक घर नहीं खरीदा जबतक बॉबी को सफलता नहीं मिली। उन्होंने अपनी सारी कमाई स्टूडियो में लगा दी क्योंकि सिनेमा ही उनका धर्म था।’
ऋषि ने बताया कि 1951 में राज कपूर ने पहले स्टेज पर केवल चार दीवारें बनवाई थीं। उनपर छत भी नहीं थी क्योंकि वह प्राकृतिक रोशनी में शूट करते थे। उन्होंने कहा, ‘मैं और मेरे भाई फिर से उन चार दीवारों और छत को बना सकते हैं, लेकिन हम कीमती यादों के नुकसान की भरपाई कैसे करेंगे? ये अब कभी वापस नहीं आएंगे।’ ऋषि ने बताया कि यह केवल उनके परिवार का निजी नुकसान नहीं है बल्कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री का नुकसान है।

कैंसर से जूझ रहे टॉम ऑल्टर
दिग्गज अभिनेता टॉम ऑल्टर इन दिनों कैंसर से जूझ रहे हैं। जैसे ही ये ख़बर आई, मनोरंजन जगत में उनकी भूमिका और योगदान सामने आने लगे।
टॉम भारतीय मनोरंजन जगत में अपनी ख़ास जगह बनाने में सफल रहे हैं।
अंग्रेजों के समान दिखने पर धाराप्रवाह हिंदी बोलने वाले टॉम फ़िल्मों में जहां गंभीर भूमिकाएं करते दिखे हैं वहीं ‘ज़बान संभाल के’ जैसे टीवी सीरियल में उन्होंने हास्य अभिनेता का रोल किया था।
साल 1950 में मसूरी में जन्मे टॉम ऑल्टर के माता-पिता अमरीकी मूल के हैं और उनका मूल नाम थॉमस बीट ऑल्टर है। उनके दादा-दादी 1916 में अमरीका से भारत आए थे.
टॉम का परिवार पानी के रास्ते चेन्नई आया था और वहां से लाहौर गया। उनके पिता का जन्म सियालकोट में हुआ जो अब पाकिस्तान में है।
बंटवारे में उनका परिवार बंट गया। दादा-दादी पाकिस्तान में रह गए जबकि उनके माता-पिता भारत आ गए.
हिंदी और उर्दू में पारंगत ऑल्टर ने ‘चरस’ फ़िल्म से अपना सफ़र शुरू किया और शतरंज के खिलाड़ी, क्रांति जैसी फ़िल्मों से दर्शकों की निगाह में आए।
हेलेन से कटरीना तक, बॉलीवुड की ‘विदेशी’ हीरोइनें
और कौन से गोरे एक्टर?
टॉम ऑल्टर के अलावा और भी ऐसे कुछ विदेशी चेहरे हैं जो भारतीय फ़िल्मों में अपनी पहचान बनाने में सफल रहे। इनमें प्रमुख कलाकार हैं –
बॉब क्रिस्टो
मिस्टर इंडिया फ़िल्म में भगवान हनुमान की मूर्ति जब गुंडों को सबक सिखा रही थी, तो अंग्रेज़ दिखने वाला एक शख़्स ‘बजरंग बली की जय’ कर रहा था। उसकी कॉमेडी कई लोग अब तक नहीं भूले।
ये बॉब क्रिस्टो थे। साल 1938 में ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में जन्मे क्रिस्टो का असल नाम रॉबर्ट जॉन क्रिस्टो था।
वे पेशे से सिविल इंजीनियर थे जो भारत काम करने आए थे, लेकिन परबीन बाबी से मुलाक़ात के बाद उन्होंने बॉलीवुड की दुनिया में क़दम रखने का मन बना लिया।
क्रिस्टो ने अमिताभ बच्चन से लेकर अनिल कपूर जैसे बड़े सितारों के साथ काम किया। मिस्टर इंडिया में मिस्टर वॉलकॉट की भूमिका हो या फिर कालिया, नास्तिक, अग्निपथ जैसी फ़िल्मों में निभाए किरदार – इनके ज़रिए क्रिस्टो अपनी पहचान साबित करने में कामयाब रहे।
साल 1980 में अपनी पहली हिंदी फ़िल्म ‘अब्दुल्ला’ में वो जादूगर के रोल में नज़र आए और फिर क़रीब 200 से ज़्यादा फ़िल्मों में काम किया। साल 2011 में दिल की गंभीर बीमारी के कारण बंगलुरु में उनका निधन हो गया.
बेन किंग्सले
साल 1943 में इंग्लैंड के उत्तरी यॉर्कशायर में बेन किंग्सले का जन्म हुआ था और उनका असली नाम कृष्ण पंडित भांजी है। बेन किंग्सले के पिता गुजराती मूल के थे और मां इंग्लैंड की थी। दोनों इंग्लैंड में ही रहते थे।बेन किंग्सले ने 1982 में आई फ़िल्म ‘गांधी’ में महात्मा गांधी का किरदार निभाया और इसी के साथा वे भारत में मशहूर हो गए।
इस फ़िल्म के लिए उन्हें बाफ्टा, गोल्डन ग्लोब पुरस्कार और ऑस्कर से नवाज़ा गया। साल 1984 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया। बेन किंग्सले ने अंग्रेज़ी फ़िल्म ‘द जंगल बुक’ में बगीरा के किरदार को अपनी आवाज़ भी दी।
पॉल ब्लैकथॉर्न
अगर आपको आमिर ख़ान की लगान पसंद आई तो कैप्टन रसेल भी याद होंगे। ये किरदार अदा करने वाले अभिनेता का नाम है पॉल ब्लैकथॉर्न। साल 1989 में इंग्लैंड में जन्मे पॉल ब्लैकथॉर्न का ये पहला फ़िल्मी रोल था और इस भूमिका के लिए उन्होंने क़रीब छह महीने हिंदी सीखी। इसके बाद उन्होंने अमरीकी फ़िल्मों और टीवी शो का रुख़ किया। उनका ज़्यादातर बचपन इंग्लैंड और जर्मनी के सैन्य ठिकानों में गुज़रा था।

शबाना, करती थीं लड़कों का रोल
शबाना आजमी पिछले चार दशक से बॉलीवुड में बतौर एक्ट्रेस सक्र‍िय हैं। वे 18 सितंबर, 1950 को जन्मी थीं। शबाना ने अपनी अदाकारी की शुरुआत थिएटर से की थी। गर्ल्स स्कूल में शबाना को उनकी पर्सनैलि‍टी देखते हुए लड़कों के रोल दिए जाते थे। उन्होंने अपने कॉलेज के सीनियर फारुख शेख के साथ मिलकर मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज में हिन्दी नाट्य मंच बनाया था। इसके लिए उन्हें कॉलेज से पैसा नहीं मिलता था। वे और उनके साथी खुद ही इसका खर्च उठाते थे।
जब इस नाट्य मंच को हर साल अवॉर्ड्स मिलने लगे तो शबाना अपने कॉलेज प्रशासन के पास गईं और उन्होंने अंग्रेजी थिएटर ग्रुप की तरह ही कॉलेज से आथिर्क मदद दिए जाने की मांग की लेकिन उन्हें सिर्फ दस रुपए मिले1 शबाना ये देखकर नाराज हो गईं और उन्होंने इसे वापस करते हुए कहा कि आप ये हमारी तरफ से डोनेशन समझकर रख लीजिए।
इसी दौरान शबाना ने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की कुछ डिप्लोमा फिल्म देखीं। वे जया बच्चन की फिल्म सुमन देखकर देखकर बेहद प्रभावित हुईं। उन्होंने कहा कि इससे पहले उन्होंने कभी इतनी बेहतरीन एक्ट‍िंग नहीं देखी। इसके बाद शबाना ने तय कर लिया कि वे अभिनेत्री बनेंगी।
शबाना ने अभिनेत्री बनने के अपने सपने को पूरा करने के लिए एफटीआईआई पुणे जाने का तय किया।
इसके बाद शबाना को जल्द ही एफटीआईआई से बेस्ट स्टूडेंट की स्कॉलरश‍िप मिल गई। शबाना ने स्टूडेंट रहते ही दो फिल्में साइन कर ली थीं. इनमें एक थी ख्वाजा अहमद अब्बास की फासला और दूसरी कांतिलाल राठौर की पर‍िणय. कोर्स खत्म होते ही उन्होंने इसकी शूटिंग शुरू कर दी थी।
शबाना आजमी ने 1984 में जावेद अख्तर से शादी की थी। जावेद की ये दूसरी शादी थी। दरअसल, जावेद शबाना के अब्बा से मिलने उनके घर आते थे। इसी दौरान उनकी दोस्ती शबाना से हुई। धीरे-धीरे ये दोस्ती प्यार में बदली. 1984 में जावेद ने अपनी पत्नी से शबाना के लिए तलाक ले लिया और शबाना से शादी कर ली।
शबाना आजमी जब फिल्मों में आई थीं तब उन्हें डांस नहीं आता था। वे डांस करने से बेहद इतराती थीं। इसलिए वे बेहद चुनिंदा फिल्मों में ही डांस करती नजर आई हैं। शबाना आजमी ने लगातार तीन साल नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीता था। उन्हें 1983 से 1985 तक फिल्म अर्थ, कंधार और पार के लिए यह सम्मान मिला।

आईए जाने कौन है बोल्‍ड अंदाज में नजर आईं करिश्मा
वेब सीरीज ‘रागिनी एमएमएस 2.2’ का पहला पोस्‍टर रिलीज कर दिया गया है। इस पोस्‍टर में अभिनेत्री करिश्‍मा शर्मा बेहद बोल्‍ड अंदाज में नजर आ रही हैं। फिल्‍म का पहला पोस्‍टर तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। पोस्‍टर में करिश्‍मा टॉपलेस नजर आ रही हैं। सिद्धार्थ गुप्‍ता संग उनकी बोल्ड केमिस्ट्री इस वेब सीरीज के बारे में काफी कुछ बता रही है। माना जा रहा है कि इंडियन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जारी किये गये अबतक के सबसे बोल्‍ड पोस्‍टर्स में एक है। बता दें कि रिया सेन भी इस वेब सीरीज का हिस्‍सा है और वो सिमरन का किरदार निभा रही हैं। फिलहाल करिश्‍मा के किरदार के बारे में कुछ भी खुलासा नहीं किया गया है। कुछ दिनों पहले ही फिल्‍म का पहला लुक सामने आया था।
बता दें कि इस वेब सीरीज में दो लड़कियों की कहानी दिखाई गई है। जो अपने कॉलेज में कुछ असामान्य घटनाओं की गवाह बनती हैं। दोनों इस रहस्य को सुलझाने के लिए जरूरी बताई गई एमएमएस सीडी की खोज में लग जाती हैं। इस दौरान क्या-क्‍या घटनायें घटती है, इसी पर यह वेब सीरीज आगे बढ़ती है। इस वेब सीरीज को एकता कपूर ने प्रोड्यूस किया है। इसके डायरेक्टर हैं सुयश वादवाकर। करिश्‍मा शर्मा इस वेब सीरीज के पोस्‍टर से सुर्खियों में आ गईं हैं और पोस्‍टर में अपने बोल्‍ड अंदाज से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

कौन है करिश्‍मा
22 दिसंबर 1993 को जन्‍मीं करिश्‍मा टीवी की दुनियां का एक जाना-पहचाना नाम है। वे कई चर्चित सीरीयल्‍स में नजर आ चुकी हैं। वे बहुचर्चित टीवी सीरीयल ‘पवित्र रिश्‍ता’ में नजर आई थीं।
इसके अलावा वो ‘प्‍यार तूने क्‍या किया’, ‘ये है मोहब्‍बतें’, ‘बिंदास लव बाय चांस’, आहट (सीजन 6), प्‍यार तूने क्‍या किया और सिलसिला प्‍यार का में नजर आ चुकी हैं। करिश्‍मा साल 2015 की फिल्‍म ‘प्‍यार का पंचनामा 2’ में टीना के किरदार में नजर आ चुकी हैं।
यह फिल्‍म ‘रागिनी एमएमएस’ फ्रेंचाइजी की तीसरी फिल्‍म है। साल 2011 में रिलीज हुई इस फिल्‍म की पहली फ्रेंचाइजी में राजकुमार राव और कायनाज नजर आई थीं। वहीं इस फ्रेंचाइजी की दूसरी फिल्‍म साल 2014 में रिलीज हुई थी जिसमें सनी लियोनी और प्रवीन दबास नजर आये थे। वहीं अब तीसरी किस्‍त में करिश्‍मा अपनी हॉटनेस का तड़का लगाने जा रही हैं। करिश्‍मा सोशल मीडिया पर खासा सक्रिय रहती हैं और अपने फैंस के लिए लगातार फोटोज़ अपडेट करती रहती हैं। वे इंस्‍टाग्राम में अपने बोल्‍ड फोटोज़ की वजह से भी सुर्खियों में रहती हैं।

इतनी बदल गई यह अभिनेत्री
छोटे परदे से निकलकर फिल्मों में अपनी जगह बनाने वालीं प्राची देसाई गुजरात के सूरत में पली-बढ़ी हैं। उन्होंने वहीं से अपनी स्कूलिंग की। प्राची को पहला बड़ा ब्रेक एकता कपूर के टीवी सीरियल ‘कसम से’ में मिला था। इसमें उन्होंने लीड एक्टर बानी का किरदार निभाया था। इस सीरियल ने उन्हें खासी पहचान दिखाई। इसमें वे एक सीधी-सादी लड़की के रूप में दिखी हैं। वहीं आज प्राची का लुक पूरी तरह बदला नजर आता है, लेकिन 11 साल पहले वे पूरी तरह अल दिखती थीं। उनके पहले सीरियल कसम से में राम कपूर के साथ उनकी जोड़ी को खासा पसंद किया गया। इस शो ने कई अवार्ड भी जीते। प्राची भी छोटे परदे का जाना-पहचाना नाम हो गईं।
इसके बाद प्राची ने डांसिंग की ओर अपनी दिलचस्पी बढ़ाई वे कई रियलिटी शो में नजर आईं। इन शो के कारण ही कई डायरेक्टर्स की नजर प्राची पर गई।इसके बाद वे एक और चर्चित सीरियल ‘कसौटी जिंदगी की’ में नजर आईं हालांकि, इसमें उनका कैमियो रोल था, लेकिन वे अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रहीं।प्राची उस समय और ज्यादा पहचानी गईं, जब उन्होंने रियलिटी शो ‘झलक दिखला जा’ में बतौर कंटेस्टेंट हिस्सा लिया। वे इस शो की विजेता भी बनीं। इसमें भी प्राची बेहद सामान्य लुक में नजर आईं।
प्राची ने फिल्मों की शुरुआत फरहान अख्तर की फिल्म रॉकऑन से की। वे फरहान की पत्नी साक्षी श्रॉफ की भूमिका में दिखी थीं। इसमें वे पहली बार मॉडल लुक में नजर आईं।इसके बाद प्राची को एक और बड़ी फिल्म मिली। ये थी अजय देवगन और इमरान हाशमी स्टारर वन्स अपोन अ टाइम इन मुंबई। इसमें वे इमरान के अपोजिट थीं। फिल्म में उनके इंटीमेट सीन भी चर्चा में रहे।फिल्म बोल बच्चन में प्राची के लुक को काफी पसंद किया गया हालांकि, उनके किरदार को इसमें अधिक नोटिस नहीं किया।रॉक ऑन-2 में भी प्राची नजर आईं। इसमें वे पूरी तरह बदली नजर आईं, चाहे उनकी अदाकारी की बात हो या उनके लुक की. हालांकि, प्राची की ये फिल्म ज्यादा नहीं चल पाई।

विद्या बालन की सिस्टर का जवाब नहीं
बॉलीवुड की सबसे बोल्ड और सुंदर अभिनेत्रियों में से एक विद्या बालन हैं। वैसे भी अभिनेत्री विद्या बालन के बारे में कौन नहीं जानता है, लेकिन उनकी बहन प्रियंमन के बारे में कुछ लोग ही जानते होंगे। आपको बताते चलें कि प्रियंनी दक्षिण की बहुत बड़ी अभिनेत्री हैं। उन्होंने अपनी बोल्ड शैली के कारण खूब शोहरत बटोरी थी कई निर्देशक उन्हें अपनी फिल्म में लेने के लिए लाइन लगाते थे, तो प्रियंनी क्या वाकई इतनी ही बोल्ड और खूबसूरत रही हैं। दरअसल दक्षिण सिनेमा में शामिल होने से पहले प्रियंनी ने बॉलीवुड उद्योग में अपनी किस्मत आजमाने का काम किया था। तब प्रियंनी को बॉलीवुड में कोई खास जगह हासिल नहीं हुई। इस कारण उन्होंने दक्षिण सिनेमा पर अपना हाथ आजमाने की कोशिश की। उनकी कड़ी मेहनत और लगन ने दक्षिण सिनेमा में उन्हें एक अलग पहचान दे दी। प्रियंनी के साहस और बोल्डनेस के कारण लोगों ने उन्हें खूब पसंद किया है। वो वाकई एक बहुत ही प्रतिभाशाली अभिनेत्री साबित हुई हैं। प्रियंनी को अब सनसनीखेज अभिनेत्री बताया जा रहा है। उनका रंगीन मिजाजी वाला रोल उनकी दक्षिण फिल्मों में मांग बनाए रखने जैसा है। गौरतलब है कि भारतीय राजा फिल्म से प्रियंनी की शुरूआत हुई थी। इसके बाद उन्होंने फिल्मों के लिए गाने भी गाए हैं। प्रियंनी की बहुचर्चित फिल्म पारुथीरेम रही है। इस प्रकार जो लोग विद्या वालन को तो जानते हैं लेकिन प्रियनी को नहीं तो उन्हें एक बार जरुर उन्हें देखना चाहिए और उनकी अदाकारी का भी मुलाहिजा करना होगा, शायद वो भी कहीं से भी उन्नींस न बैठें।

बकौल ऋषि कपूर नरगिस से था राजकपूर को प्यार
कहते हैं कि पूत सपूत तो का धन संचय और पूत कपूत तो का धन संचय अर्थात धन संचय करने से क्या फायदा क्योंकि यदि पुत्र अच्छा है तो खुद धन कमा लेगा और यदि पुत्र में कोई खोट या खराबी है तो वह उस धन को यूं ही उड़ा देगा। ऐसे में धन संचय करने की कोशिश क्यों की जाए। यहां हम जिस धन की बात कर रहे हैं वो रुपए पैसे वाला नहीं है बल्कि फिल्मी दुनिया में नाम कमाने वाला है। इसिलए जो बात यहां बेटे पर लागू होती है वह उनके पिता पर भी लागू होना चाहिए। यहां ऐसा ही चलता है अगर यकीन नहीं आता तो देखें एक बेटा अपने पिता के लिए क्या-क्या कहता है। आप इसे उल्टी चक्की चलाने जैसा काम कह सकते हैं, जिससे कुछ पिसने की बजाय दाना वैसा ही बाहर आ जाता है। जी हां बॉलीवुड एक्टर ऋषि कपूर ने अपनी बायोग्राफी ‘खुल्लम खुल्ला-ऋषि कपूर अनसेंसर्ड’ में पिता और अपने जमाने के दिग्गज अभिनेता राज कपूर की निजी जिंदगी के बारे में कई खुलासे करके कर दिखाया है। वैसे तो अपनी फिल्मों के अलावा राज कपूर कलरफुल लाइफ के लिए भी जाने जाते रहे हैं। ऐसे में राज कपूर के बॉलीवुड की लीडिंग एक्ट्रेस के साथ संबंधों पर ऋषि कपूर ने जिस बेबाकी से राज खोले हैं वो देखते ही बनते हैं। उन्होंने बताया कि पिता के नरगिस और वैजयंतीमाला से संबंध थे। इस बायोग्राफी में उन्होंने लिखा कि उनके पिता को सिनेमा, शराब एवं बॉलीवुड की लीडिंग एक्ट्रेस से प्रेम था। अहम बात यह कि उनका अपने जमाने की पॉपुलर अदाकारा नरगिस के साथ अफेयर था। उस जमाने में राज कपूर और नरगिस सिल्वर स्क्रीन की आइकॉनिक जोड़ियों में शामिल किए जाते थे। पर्दे पर दोनों की केमिस्ट्री देखते ही बनती थी। ऋषि ने इस बायोग्राफी में आगे लिखा है कि उन दिनों मेरे पिता प्रेम में लीन थे, लेकिन मेरी मां के नहीं किसी और के प्रेम में थे। उनकी गर्लफ्रेंड बॉलीवुड की नंबर वन एक्ट्रेस थीं जिसके साथ उन्होंने सुपरहिट फिल्म आग (1948), बरसात (1949) और आवारा (1951) दी थी। यहां हद तो तब हो गई जबकि ऋषि कपूर ने नरगिस को अपने पिता राज कपूर की ‘इन-हाउस’ हीरोइन कहने से भी परहेज नहीं किया। उन्होंने बताया कि वह आरके स्टूडियो के प्रतीक में सदा के लिए अमर हो गईं। इसके बाद राज कपूर के वैजयंतीमाला से संबंध होने की बात को भी ऋषि ने उठाया है और कहा है कि जब पापा वैजयंतीमाला के साथ संबंध में थे तब मैं मां के साथ मरीन ड्राइव पर नटराज होटल में शिफ्ट हो गए थे। होटल के बाद चित्रकूट बिल्डिंग में दो महीने हम लोग रहे। पापा ने मां और मुझे वापस बुलाने की लाख कोशिशें कीं। मेरे पिता ने मां और मेरे लिए अपार्टमेंट खरीदा, लेकिन मां नहीं मानी तब तक कि जब तक पापा ने वैजयंतीमाला से संबंध खत्म नहीं कर लिए। यह अलग बात है कि वैजयंतीमाला ने राज कपूर के निधन के बाद उनसे संबंध होने की खबरों को खारिज किया था। वैजयंतीमाला का कहना था कि राज कपूर ने पब्लिसिटी स्टंट के तौर पर उनके साथ प्यार का नाटक किया था। इस पर भी ऋषि ने लिखा है और कहा है कि वैजयंतीमाला को कोई हक नहीं है कि वह बातों को तोड़-मरोड़कर पेश करें बस इसलिए क्योंकि अब राज कपूर सच्चाई बयां करने के लिए नहीं रहे। इस प्रकार देखा जाए तो एक बेटा अब अपने पिता के राजों को उधेड़ रहा है और सभी को मानों चुनौती देने के लिए खड़ा है, फिर भले ही इससे उसके अपने पिता का किरदार ही क्यों न नीचे की ओर जाता चला जाए, जैसा कि होना नहीं चाहिए क्योंकि अब राज कपूर इस दुनिया में नहीं हैं कि वो वैजयंतीमाला या खुद अपने बेटे के दावों को झूठा बताने के लिए कुछ कह पाते।

अलका ने पहले मना किया फिर एक टेक में गाया ‘एक दो तीन’ गाना
सफलता के शिखर को छूने वाली फिल्म ‘तेजाब’ के गाने ‘एक दो तीन’ और माधुरी दीक्षित को कौन भूल सकता है। सन् 1998 में आई इस फिल्म ‘तेजाब’ का सुपरहिट सॉन्ग ‘एक दो तीन’ ने अपनी तरह की अलग ही ख्याति हासिल की थी। इसे मशहूर सिंगर अलका याग्निक ने गाया था जिसे धक धक गर्ल माधुरी दीक्षित पर जबरदस्त तरीके से फिल्माया गया था। यहां आपको बताते हैं कि ऐसे हिट गाने को गाने से पहले अलका ने क्या कहा था। दरअसल इस गाने को गाने से पहले अलका याग्निक बीमार चल रहीं थीं। उनका गला भी खराब था जिसकी वजह से अलका ने गाने में परेशानी की बात कही थी। इसके बाद भी गाने को रिकॉर्ड किया गया और वह हिट भी रहा। वैसे सभी को मालूम ही होगा कि पार्श्व गायिका अलका याग्निक 80 और 90 के दशक की ऐसी मशहूर गायिका रही हैं, जिनका नाम सुनकर ही लोग गाने को पसंद करने लग जाते थे। यह अलग बात है कि उनकी आबाज में कोई बदलाव आज भी नहीं आया है, लेकिन अलका गाते हुए कम ही देखी जाती हैं। ऐसी मशहूर सिंगर अलका ने पहली बार हिन्दी फिल्म हमारी बहू किसी की लीड हीरोइन के लिए गाना गाया था। इसके बाद अलका ने कामयाबी के शिखर छुए। अलका ने कयामत से कयामत तक और तेजाब जैसी फिल्मों के गानों को आबाज दी तो कामयाबी ने मानों आसमान ही छू लिया। फिल्म तेजाब का मशहूर गीत एक दो तीन सबसे कामयाब रहा। इस सबंध में अलका ने खुद ही बताया कि तेजाब फिल्म के इस गाने की रिकॉर्डिंग जब मेहबूब स्टूडियों में हो रही थी। उसी समय उनकी तबीयत बिगड़ गई यहां तक कि गला भी साथ नहीं दे रहा था। इसे देखते हुए फिल्म के संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारे लाल से गाने की रिकॉर्डिंग किसी दूसरे दिन करने का निवेदन किया गया। चूंकि गाने की शूटिंग डेट फिक्स थी, वहीं जिस रात गाने की रिकॉर्डिंग होनी थी उसी रात 12 बजे से म्यूजिशियन स्ट्राइक पर जाने वाले थे। ऐसे में गाने को रिकॉर्ड करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता था। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने अलका को ढांढस बंधाया और कहा कि डरो मत कुछ गडबड़ होगी तो बाद में डब कर लिया जाएगा। इस बात पर भरोसा करते हुए अलका ने इस गाने की रिकॉर्डिंग की। यह किसी चमत्कार से कम नहीं था कि उस बीमारी की हालत में भी गीत की रिकॉर्डिंग इतने अच्छे से हुई कि लक्ष्मीकांत प्यारेलाल बेहद खुश हो गए। दरअसल अलका ने इस गाने को महज एक ही टेक में ओके किया था और बाद में बार-बार यह कहने पर कि दोबारागाने को डब कर लें लेकिन उनकी नहीं सुनी गई और यह कह दिया गया कि उन्हें जो चाहिए था वह मिल चुका है और वाकई गाने ने वही ऊंचाइयां छू लीं जिसकी कि कोई तमन्ना कर सकता था।

आनंद के प्रति आभार जताने नाम रखा बाबूमोशाय बंदूकबाज
नवाजुद्दीन सिद्दीकी की ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ फिल्म देखते समय सबसे पहला ख्याल यही आता है कि यह फिल्म तो उत्तर प्रदेश में रची-बसी है तो फिर बंगाली शब्द बाबूमोशाय का इस्तेमाल क्यों किया गया है। कई लोगों ने इस पर सवाल भी खड़े किए थे। फिल्म की टीम ने बताया है कि बाबूमोशाय शब्द ‘आनंद’ फिल्म से प्रेरित है। ‘आनंद’ फिल्म में राजेश खन्ना अमिताभ बच्चन को प्यार से ‘बाबूमोशाय’ के नाम से ही बुलाते थे। आनंद 1971 की सुपरहिट फिल्म थी और बॉलीवुड की क्लासिक्स में गिनी जाती है1
‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने शूटर बाबू का किरदार निभाया है। इस बारे में फिल्म के डायरेक्टर कुषाण नंदी कहते हैं, आनंद फिल्म ने हमें हमारा टाइटल दिया। हमने इसके सभी गानों का इस्तेमाल फिल्म के विभिन्न हिस्सों में किया है। महान सिनेमा का आभार जताने का हमारा यही तरीका था हालांकि फिल्म में नवाज कहते हैं कि उन्होंने बंदूक चलानी एक बंगाली से सीखी थी। वह उन्हें बाबूमोशाय के तौर पर याद है। इस तरह वह बाबूमोशाय बंदूकबाज हो गया। पांच करोड़ रु. के बजट में बनी इस फिल्म ने पहले तीन दिन में 7.53 करोड़ रु. की कमाई कर ली है। फिल्म की कहानी और नवाज का स्टाइल काफी पसंद भी किया जा रहा है।

अब अपनी फिल्मों का निर्देशित भी करेंगी कंगना
अभिनेत्री कंगना रनौत इन दिनों अपनी रिलीज़ के लिए तैयार फिल्म ‘सिमरन’ के प्रमोशन के साथ-साथ अगली फिल्म ‘मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी’ की शूटिंग और प्रॉडक्शन के कार्य में व्यस्त हैं। ‘सिमरन’ के ट्रेलर लॉन्च के मौके पर कंगना ने ऐलान किया है कि ‘मणिकर्णिका’ के बाद वह अपनी फिल्म का निर्देशन शुरू करेंगी।
कंगना पिछले कई सालों से फिल्म के लिए कहानियां और स्क्रिप्ट लिख रही हैं और अब जाकर उनकी कहानी फिल्म के निर्देशन के लिए पूरी तरह तैयार है। कंगना ने कहा, ‘मणिकर्णिका’ के बाद मैं अपनी फिल्म का निर्देशन करूंगी। मेरी कहानी और स्क्रिप्ट तैयार हो चुकी हैं। बस मैं निर्देशन शुरू करने से पहले अपने दूसरे सभी प्रॉजेक्ट का काम पूरा करने में जुटी हूं, लेकिन अब यह तो तय है कि ‘मणिकर्णिका’ का काम खत्म होते ही अपनी फिल्म के काम में जुट जाउंगी।’
‘सिमरन’ में कंगना एक अलग तरह के अंदाज में नजर आएंगी। अल्हड़, बेबाक और बिंदास सिमरन को जुआं खेलने और चोरी करने की आदत है, जिसकी वजह से वह बार-बार मुसीबत में फंसती है। कंगना फिल्म में एक तलाकशुदा महिला प्रफुल पटेल का किरदार निभा रही हैं, जो लड़कों के साथ फ्लर्ट करती है। ‘सिमरन’ गर्व से पुरुषों से कहती हैं कि उसकी आदतें कैरक्टर फ्लो नहीं बल्कि एक आर्ट है।
‘सिमरन’ को टी सीरीज ने बनाया है और यह फिल्म 15 सितंबर को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज़ होगी। फिल्म के ट्रेलर में कंगना के अलग-अलग लुक्स के साथ उन्हें बहुत बेफिक्र और बेधड़क लड़की के किरदार में दिखाने का प्रयास किया गया है।

श्रीदेवी की थी दीवानगी
बॉलीवुड में श्रीदेवी का नाम एक ऐसी स्टार अभिनेत्री के रूप में लिया जाता है जिन्होंने अपनी दिलकश अदाओं और दमदार अभिनय से दर्शको के दिल में अपनी खास जगह बनायी थी। एक दौर ऐसा भी था जब दर्शक श्रीदेवी के दीवाने थे।
श्रीदेवी ने अपने अभिनय से अस्सी और नब्बे के दशक में दर्शको के दिल में अपनी खास पहचान बनाई। श्रीदेवी का जन्म 13 अगस्त 1963 को तमिलनाडु के एक छोटे से गांव मीनमपटी में हुआ था। श्रीदेवी ने अपने सिने कॅरियर की शुरूआत महज चार वर्ष की उम्र में एक तमिल फिल्म से की थी। वर्ष 1976 तक श्रीदेवी ने कई दक्षिण भारतीय फिल्मों में बतौर बाल कलाकार काम किया। बतौर अभिनेत्री उन्होंने अपने कॅरियर की शुरूआत तमिल फिल्म से की। वर्ष 1977 में प्रदर्शित तमिल फिल्म ’16 भयानिथनिले’ की व्यावसायिक सफलता के बाद श्रीदेवी स्टार अभिनेत्री बन गई।
हिंदी फिल्मों में बतौर अभिनेत्री श्रीदेवी ने अपने सिने कॅरियर की शुरूआत वर्ष 1979 में प्रदर्शित फिल्म ‘सोलहवां सावन’ से की लेकिन फिल्म असफल होने के बाद श्रीदेवी हिंदी फिल्म उद्योग छोड़ दक्षिण भारतीय फिल्मों की ओर लौट गई। वर्ष 1983 में श्रीदेवी ने एक बार फिर फिल्म ‘हिम्मतवाला’ के जरिए हिंदी फिल्मों की ओर अपना रूख किया। फिल्म की सफलता के बाद बतौर अभिनेत्री वह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गई।
वर्ष 1983 में श्रीदेवी के सिने कॅरियर की एक और अहम फिल्म सदमा प्रदर्शित हुई हालांकि फिल्म टिकट खिड़की पर असफल साबित हुई लेकिन सिने दर्शक आज भी ऐसा मानते हैं कि यह श्रीदेवी के कॅरियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में एक है। वर्ष 1986 में प्रदर्शित फिल्म ‘नगीना’ श्रीदेवी के सिने कॅरियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में शुमार की जाती है। इस फिल्म में श्रीदवी ने इच्छाधारी नागिन का किरदार निभाया। इस फिल्म में उनपर फिल्माया गीत ‘मै तेरी दुश्मन दुश्मन तू मेरा’ में उन्होंने जबरदस्त नृत्य शैली का परिचय दिया।
वर्ष 1987 में प्रदर्शित फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ श्रीदेवी की सबसे कामयाब फिल्म साबित हुई। वर्ष 1989 में श्रीदेवी के सिने करियर की एक और महत्वपूर्ण फिल्म ‘चालबाज’ प्रदर्शित हुई। इस फिल्म में श्रीदेवी ने दो जुड़वा बहनों की भूमिका निभाई। श्रीदेवी के लिए यह किरदार काफी चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने अपने सहज अभिनय से न सिर्फ इसे अमर बना दिया बल्कि आने वाली पीढ़ी की अभिनेत्रियों के लिए उदाहरण के रूप में पेश किया है। वर्ष 1989 में ही श्रीदेवी की एक और सुपरहिट फिल्म ‘चांदनी’ प्रदर्शित हुई।
यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी इस पिल्म में श्रीदेवी ने चांदनी की शीर्षक भूमिका निभाई। इस फिल्म में श्रीदेवी ने अपनी बहुआयामी प्रतिभा का परिचय देते हुए न सिर्फ चुलबुला किरदार निभाया साथ ही कुछ दृश्यों में अपने संजीदा अभिनय से दर्शकों को भावुक कर दिया। फिल्म में अपने दमदार अभिनय के लिए श्रीदेवी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित भी की गई।
वर्ष 1991 में प्रदर्शित फिल्म ‘लम्हे’ श्रीदेवी के सिने कॅरियर की अहम फिल्मों में शुमार की जाती है। इस फिल्म में उन्हें एकबार फिर से निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा के साथ काम करने का अवसर मिला। इस फिल्म में अपने श्रीदेवी ने मां और बेटी के रूप में दोहरी भूमिका निभाई थी। फिल्म में चुलबुले अंदाज से श्रीदेवी ने दर्शकों का दिल जीत लिया। वर्ष 1992 में प्रदर्शित फिल्म ‘खुदागवाह’ में श्रीदेवी दोहरी भूमिका में दिखाई दी।
यूं तो पूरी फिल्म अमिताभ बच्चन के इर्द गिर्द घूमती थी लेकिन श्रीदेवी ने अपनी दोहरी भूमिका से दर्शकों के दिलों पर अपने अभिनय की छाप छोड़ दी। वर्ष 1996 में निर्माता-निर्देशक बोनी कपूर के साथ शादी करने के बाद श्रीदेवी ने फिल्मों में काम करना काफी हद तक कम कर दिया। वर्ष 1997 में प्रदर्शित फिल्म ‘जुदाई’ बतौर अभिनेत्री श्रीदेवी के सिने कॅरियर की अंतिम महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुई।
इस फिल्म में उनके अभिनय का नया रूप देखने को मिला। फिल्म इंडस्ट्री के रूपहले पर्दे पर श्रीदेवी की जोड़ी सदाबहार अभिनेता जीतेन्द्र के साथ भी खूब जमी। जीतेन्द्र के अलावा श्रीदेवी की जोड़ी अभिनेता अनिल कपूर के साथ भी काफी पसंद की गई। श्रीदेवी ने अपने तीन दशक लंबे सिने कॅरियर में लगभग 200 फिल्मों में काम किया। श्रीदेवी ने हिंदी फिल्मों के अलावा तेलगु, तमिल और मलयालम फिल्मों में भी काम किया है। श्रीदेवी ने वर्ष 2012 में प्रदर्शित फिल्म इंग्लिश विंग्लिश से कमबैक किया है।

छोटे शहरों की इन अभिनेत्रियों ने बनाई बॉलीवुड में पहचान
बॉलीवुड में महानगरों ही नहीं बल्कि छोटे शहरों और गांवों में रहने वाले कई अभिनेत्रियां ने भी अपनी जगह बनाई है। इन अभिनेत्रियां ने कड़ी मेहनत से अपने सपनों का साकार किया है। ऐसी कई अभिनेत्रियां हैं जिन्होंने गांव और कस्बों से निकलकर मायानगरी मुंबई तक का कामयाब सफ़र तय किया है।
अनुष्का शर्मा : अनुष्का शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुआ था। अयोध्या में आज भी बुनियादी सुविधाओं को लेकर हालात बहुत बेहतर नहीं है हालांकि, बाद में अनुष्का बैंगलोर चली गयीं क्योंकि उनके आर्मी अफ़सर पिता का ट्रांसफर बैंगलोर हो गया था।
कंगना रनौत : बॉलीवुड की क्वीन कंगना आज जहां हैं वह मुक़ाम पाने के लिए उन्होंने बेहद संघर्ष किया है। कंगना कई बार कैमरे पर यह कह चुकी हैं कि शुरू में उनकी अंग्रेजी की वजह से उनका बहुत मज़ाक उड़ाया जाता था। बाद में उन्होंने अपनी लैंग्वेज और बाकी चीज़ों पर काफी मेहनत की और उस लायक बनीं कि आज आत्मविश्वास से अपनी बात रख सकती हैं। एक से एक कामयाब फ़िल्में करने वाली कंगना मंडी, हिमाचल प्रदेश की हैं।
मीनाक्षी शेषाद्रि : मीनाक्षी धनबाद (झारखंड) के सिंदरी में पैदा हुईं, दिल्ली में पली-बढ़ी, मुंबई में काम किया और शादी कर अमेरिका चली गईं। मीनाक्षी 18 साल की उम्र में फ़िल्मों में आईं और सुपरहिट हीरोइन बन गईं। 15 साल तक सिल्वर स्क्रीन इस दामिनी की दमक से रौशन रही है। मीनाक्षी आजकल अमेरिका में रह रही हैं और उन्होंने वहां एक डांस ट्रेनिंग स्कूल खोल लिया है।
प्रियंका चोपड़ा : आज बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक में नाम कमाने वाली प्रियंका का संबंध भी छोटे शहरों से रहा है। प्रियंका का जन्म जमशेदपुर (झारखंड) में हुआ था। बाद में वो बरेली शिफ्ट हो गयीं। बरेली से फिर शुरू हुआ प्रियंका का एक नया सफ़र और आज इस मुक़ाम तक पहुंचा है। ज़ाहिर है उनकी यह यात्रा अभी बहुत दूर तक जाने वाली है।
प्रीति ज़िंटा : प्रीति की बात करें तो प्रीति हिमाचल प्रदेश के शिमला ज़िले में बसे एक छोटे से गांव रोहरू से निकलकर आज इस मुक़ाम तक पहुंची हैं। उनके पिता दुर्गानंद ज़िंटा एक आर्मी अफ़सर थे। प्रीति जब तेरह साल की थीं, तभी एक सड़क हादसे में उनके पिता की मौत हो गयी थी। ज़ाहिर है प्रीति का शुरुआती सफ़र आसान नहीं था लेकिन, उन्होंने अपनी प्रतिभा और लगन से अपनी एक मज़बूत पहचान बनायी।
विद्या बालन : विद्या बालन की परवरिश केरल के पलक्कड के पुथुर कस्बे में बसे एक छोटे से गांव पूथमकुरुस्सी में हुई है। ‘हम पांच’ टीवी सीरियल से अपने अभिनय का सफ़र शुरू करते हुए विद्या ने कामयाबी की एक नयी मिसाल कायम की। वास्तव में विद्या बालन छोटे शहर से निकली एक बड़ी स्टार बनी हैं।
मल्लिका शेरावत : इस लिस्ट में अभिनेत्री और मॉडल मल्लिका शेरावत भी शामिल हैं। इन दिनों सोशल मीडिया में छाए रहने वाली मल्लिका भी एक छोटी सी जगह रोहतक, हरियाणा से हैं। फ़िलहाल मल्लिका अपने बॉयफ्रेंड के साथ ज़्यादातर फ्रांस में रहती हैं।

कैंसर से जूझ रही मुमताज
बॉलीवुड की खूबसूरत हसीनाओं में से एक मुमताज ने 60 से 70 के दशक में अपनी अदाओं और खूबसूरत अंदाज से सभी को दीवाना बना देने वाली मुमताज ने 12 साल की छोटी उम्र में बॉलीवुड में कदम रखा था। मुमताज अब कैंसर से जुझा रही है पर इस दिग्गज अभिनेत्री ने हिम्मत नहीं हारी है और आंखिरी दम तक उससे संघर्ष करना चाहती है।
मुमताज साल 1952 में आई फिल्म संस्कार में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट नजर आई। इसके बाद लाजवंती(1958) और सोने की चिड़िया(1958) भी उन्होंने चाइल्ड एक्टर के तौर पर की। पहली बार बतौर हीरोइन वह ओ.पी.रहलान की फिल्म गहरा दाग(1963) में नजर आईं। इसके बाद उनके खाते में कुछ बी ग्रेड फिल्में आईं1 लेकिन साल 1969 में राजेश खन्ना के साथ आई दो रास्ते ने उनके लिए टर्निंग प्वाइंट का काम किया1
यह फिल्म बड़ी हिट साबित हुई। इसने राजेश खन्ना को तो बतौर सुपरस्टार स्थापित किया ही, मुमताज को भी खूब शौहरत दिलाई. इस फिल्म की बदौलत वह इंडस्ट्री की सबसे महंगी एक्ट्रेसेज की लिस्ट में शुमार हो गई थीं। यह वो दौर था जब उनके साथ काम करने से मना करने वाले स्टार्स भी उनके साथ एक फिल्म करने को तरस रहे थे।
इन्हीं एक्टर्स में से एक शशि कपूर थे। कपूर खानदान के इस स्टार ने साल 1970 में आई फिल्म ‘सच्चा झूठा’ केवल इसलिए रिजेक्ट कर दी थी क्योंकि इस फिल्म में मुमताज थीं1 शशि के मना करने के बाद इस फिल्म में राजेश खन्ना को लिया गया।
राजेश खन्ना और मुमताज की जोड़ी दर्शकों को खूब पसंद आई। मुमताज इंडस्ट्री में एक बड़ी ब्रैंड बन चुकी थीं और यह समय ऐसा था कि हर कोई उनके साथ काम करना चाहता था। कुछ ऐसा ही हाल शशि कपूर का भी था। एक समय उनके साथ काम करने से मना करने वाले शशि कपूर अब मुमताज के साथ फिल्म करना चाहते थे।
अपनी इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिए उन्होंने प्रोड्यूसर और डायरेक्टर के सामने शर्त तक रख दी थी कि वह फिल्म तभी साइन करेंगे जब उनके अपोजिट मुमताज को कास्ट किया जाएगा।
यह किस्सा साल 1974 में आई फिल्म ‘चोर मचाए शोर’ से जुड़ा है1 शशि कपूर को जब ये फिल्म ऑफर की गई थी तो उन्होंने मुमताज को कास्ट करने की शर्त पर ये फिल्म साइन की थी।

सहज धुनों के लिए जाने जाते थे संगीतकार रविशंकर
हिन्दी फ़िल्म संगीत के ऐसे परिश्रमी संगीतकार ‘रवि’ रविशंकर शर्मा उर्फ़ ‘रवि’ हिन्दी फ़िल्म संगीत के ऐसे परिश्रमी संगीतकार के रूप में याद किये जाते हैं, जिनकी सहज धुनों ने सफलता के बड़े कीर्तिमान स्थापित किए। रवि का आगमन भी बेहद रोचक तरीके से उनके हिन्दी ज्ञान के चलते फ़िल्मों की दुनिया में हुआ था। अपने शुरुआती दौर में हेमन्त कुमार जैसे बड़े संगीतकार के सहायक के रूप में वो फ़िल्म संगीत की दुनिया से जुड़े। हेमन्त कुमार उनकी अच्छी हिन्दी के कारण उन्हें ‘पण्डित जी’ कहते थे और उनकी हिन्दी पर मज़बूत पकड़ के चलते अपने गीतों के लिए ज़रूरी सलाह भी लिया करते थे।
यह जानना सुखद है कि बचपन से संगीत के प्रति आसक्त रहे रवि, हेमन्त कुमार के साथ बतौर सहायक जिन फ़िल्मों से जुड़े रहे, उनमें ‘शर्त’, ‘नागिन’, ‘दुर्गेशनन्दिनी’ और ‘एक ही रास्ता’ जैसी महत्वपूर्ण फ़िल्में शामिल हैं।
रवि के बारे में जो महत्वपूर्ण बातें उन्हें एक सफल संगीतकार बनाती हैं, उनमें तमाम ऐसी चीज़ें भी शामिल रही हैं, जो उस दौर के अन्य बड़े संगीतकारों के यहाँ मुश्किल से मिलती थीं।
वही यह कि वे ऐसे संगीतकार रहे, जिनकी मित्रता सभी ख़ेमे के लोगों से सामान्य आत्मीय धरातल पर रहीं या कि उनके लिए हर गायक-गायिका का एक ही स्तर पर सम्मानजनक स्थान रहा या फिर उनके लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता बैनर और निर्देशक की रहती थी कि निर्देशक जैसी धुन और संरचना अपनी फ़िल्मों के लिए चाहता था, वे वैसा ही करने की हरसंभव और ईमानदार कोशिश करते थे।
स्वतंत्र संगीतकार
रवि की रचनात्मक-यात्रा हेमंत कुमार से आरंभ होकर, स्वतंत्र संगीतकार के रूप में काम दिलाने के लिए देवेंद्र गोयल तक जाती है, जिनकी फ़िल्म वचन (1955) से बतौर संगीतकार उन्होने अपने करियर की शुरूआत की।
इसके बाद इस राहगुज़र में प्रमुख रूप से एसडी नारंग, रामानंद सागर, ए ए नाडियाडवाला, एस एस वासन, ए वी मय्यपन, बी आर चोपड़ा, वासु मेनन, शिवाजी गणेशन एवं गुरुदत्त के नाम शामिल होते जाते हैं।
एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में रची गई लगभग अस्सी फ़िल्मों में से कुछ फ़िल्में इस तरह हैं- ‘घूंघट’ (1960), ‘घराना’ (1961), ‘गृहस्थी’ (1963), ‘औरत’ (1967), ‘समाज को बदल डालो’ (1970), ‘भरोसा’ (1963), ‘ख़ानदान’ (1965) एवं ‘नई रोशनी’ (1967), ‘दो कलियाँ’ (1968) एवं ‘मेहरबान’ (1967)1
अलग से बीआर चोपड़ा की ढेरों फ़िल्मों का नाम लिया जाना चाहिए, जिनमें ‘ग़ुमराह’ (1963), ‘वक्त’ (1965), ‘हमराज़’ (1967), ‘आदमी और इंसान’ (1969), ‘धुंध’ (1973), ‘निक़ाह’ (1982), ‘आज की आवाज़’ (1984), ‘तवायफ़’ (1985 निर्माता आर. सी. कुमार), ‘दहलीज़’ (1986) और ‘अवाम’ (1987) प्रमुख हैं।
लता के मुक़ाबले आशा भोंसले के लिए ज़्यादा ख़ूबसूरत ढंग से बनाईं तर्ज़ें
रवि ने लता मंगेशकर के मुक़ाबले आशा भोंसले के लिए ज़्यादा ख़ूबसूरत ढंग से तर्ज़ें बनाईं।
आशा भोंसले के गीतों की विरासत में हमेशा ओपी नैय्यर और आरडी बर्मन का नाम लिया जाता है, मगर जल्दी रवि के योगदान की चर्चा नहीं होती।
व्यक्तित्व का कोमल पक्ष
आशा भोंसले की विविधतापूर्ण संगीत के धरातल का मूल्यांकन हम रवि की उन श्रेष्ठतम धुनों से कर सकते हैं, जो उनके संगीतकार व्यक्तित्व का एक अलग ही कोमल पक्ष को व्यक्त करती हैं।
आप भी इन गीतों को गुनगुनाना चाहेंगे- ‘चन्दा मामा दूर के’ (वचन), ‘तुम संग लागी बालम मोरी अंखियां’ (अलबेली), ‘बहार ले के आई क़रार ले के आई’ (जवानी की हवा), ‘इस तरह तोड़ा मेरा दिल’, ‘पवन मोरे अंगना में धीरे-धीरे आना’ (शहनाई), ‘सितारों आज तो हम भी तुम्हारे साथ’ (राखी), ‘तोरा मन दरपन कहलाए’, ‘मेरे भइया मेरे चन्दा मेरे अनमोल रतन’ (काजल), ‘दिल की कहानी रंग लाई है’ (चौदहवीं का चाँद), ‘कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी’, ‘चेहरे पे खुशी छा जाती है’, ‘आगे भी जाने न तू’ (वक्त), ‘शीशे से पी या पैमाने से पी’ (फूल और पत्थर), ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ (ये रास्ते हैं प्यार के), ‘मत जइयो नौकरिया छोड़ के’, ‘जब चली ठंडी हवा’ (दो बदन), ‘सैयां ले गयी जिया तेरी पहली नज़र’ (एक फूल दो माली), ‘ज़िन्दगी इत्तेफ़ाक़ है’ (आदमी और इंसान), ‘हुज़ूर आते आते बहुत देर कर दी’ (तवायफ़) एवं ‘कैसी मुरली बजाई घनश्याम’ (अवाम).
रवि के लिए उनके संगीतकार पक्ष को लेकर जो सर्वाधिक महत्व की बात सामने आती है, उसमें यह जानना ज़रूरी है कि उनका संगीत उस हद तक ही आधुनिक होने की मांग करता हैं, जिसमें उसकी पूर्ववर्ती परम्परा की अनुगूंजों का समावेश भी संतुलित ढंग से शामिल माना जाए.
वे ऐसी स्वच्छंदता के पैरोकार हैं, जहाँ पूर्वजों का अनुसरण और समकालीन प्रेरणा भी महत्व रखती आई है। शायद इसीलिए उनकी फ़िल्मों के ज़्यादातर गीत अपने दौर की नुमाइंदगी में ताज़गी-भरे एहसास के साथ अपनी सरलता व परम्परा की छाया को भी प्रभावी रूप में व्यक्त करते हैं।

लाजवाब इंसान भी थे रफी
गायक मोहम्मद रफी के बारे में ये कहना बड़ा मुश्किल है कि वे इंसान बड़े थे या कलाकार। कुछ ऐसा ही जादू था मोहम्मद रफी का लोगों पर। रफी साहब ना सिर्फ एक बेहतरीन सिंगर थे, बल्कि एक लाजवाब इंसान भी थे।
13 साल की उम्र में अपनी गायकी का सफर शुरू करने वाले मोहम्मद रफी ने अपने जीते-जी कई लोगों को प्रभावित किया।
मोहम्मद रफी का जन्म अमृतसर के पास कोटला सुल्तान में 24 दिसंबर 1924 को हुआ था, इसके बाद उनका परिवार 1932 में लाहौर चला गया।
लाहौर में अपने होने वाले जीजा की मदद से रफी साहब मुंबई आए, जहां उन्होंने गायकी की ट्रेनिंग लेना शुरू कर दिया। रफी ने अपना पहला गाना श्याम सुंदर की फिल्म ‘गांव की गोरी’ के लिए गाया। इस गाने को उन्होंने जीएम दुरानी के साथ मिलकर गाया था।
लोगों का मानना था कि मोहम्मद रफी की आवाज शम्मी कपूर पर सबसे ज्यादा फबती थी लेकिन मोहम्मद रफी के पसंदीदा एक्टर शम्मी कपूर नहीं बल्कि राजेंद्र कुमार थे। जिनको टीवी पर देखते ही रफी मानो खो से जाते थे।
रफी की गायकी के लिए मोहब्बत को इसी से समझा जा सकता है कि जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ था तब उस समय उनकी पहली पत्नी ने भारत में रुकने से मना कर दिया था। ऐसे में रफी ने यह फैसला किया कि वो अपने पहले प्यार यानी गायकी के खातिर मुंबई में ही रुकेंगे जिसके बाद वो अपनी पहली पत्नी से अलग हो गए।
एक बार संजय गांधी किशोर कुमार से बेहद नाराज हो गए थे। उन्हें मनाने और किशोर कुमार को संजय गांधी के गुस्से से बचाने के लिए खुद मोहम्मद रफी ने खासतौर से संजय गांधी से मुलाकात की थी1
31 जुलाई 1980 को जब रफी साहब इस दुनिया को अलविदा कह गए।
मोहम्मद रफी का दिल काफी बड़ा था. एक बार उन्होंने अपनी कॉलोनी में एक विधवा को पैसे ना होने के कारण जूझते हुए देखा। उसके बाद से ही रफी ने पोस्ट ऑफिस के जरिए एक अनजान व्यक्ति के नाम से हर महीने उस विधवा को पैसे भेजना शुरू कर दिए।
मोहम्मद रफी को संगीत से बेहद प्यार था और वो इसे पैसों के तराजू में कभी नहीं तौलते थे। ऐसे में जब उस दौर में लता मंगेशकर सहित कई सिंगर्स ने अपने पैसे बढ़ाने की मांग करना शुरू कर दी तो रफी इस कदर नाराज हो गए कि उन्होंने लता मंगेशकर के साथ कभी ना गाने का फैसला कर लिया।
अपने करियर के दौरान रफी हमेशा शीर्ष पर ही रहे। मन्ना डे के मुताबिक वो और किशोर कुमार हमेशा दूसरी पोजिशन के लिए लड़ा करते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि पहली पोजिशन पर हमेशा मोहम्मद रफी ही कायम रहेंगे।
मोहम्मद रफी के लिए लोगों की मोहब्बत कितनी थी इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब मुंबई में रफी का जनाजा निकाला गया तो उसमें करीब 10 हजार लोग शामिल हुए थे। रफी के गुजर जाने पर दो दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया था।

 

पारिवारिक सामाजिक फिल्मकार के रूप में याद रहेंगे विमल

विमल राय को एक ऐसे फिल्मकार के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने पारिवारिक सामाजिक और साफ सुथरी फिल्में बनाकर लगभग तीन दशक तक सिने प्रेमियों के दिल पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। विमल रॉय का जन्म 12 जुलाई 1909 को ढ़ाका (वर्तमान में बंगलादेश) में हुआ था। उनके पिता जमींदार थे। पिता की मृत्यु के बाद पारिवारिक विवाद के कारण उन्हें जमींदारी से बेदखल होना पड़ा। इसके बाद वह अपने परिवार को लेकर कलकत्ता चले गए।

कलकता में उनकी मुलाकात फिल्मकार पी.सी. बरूआ से हुई जिन्होंने उनकी प्रतिभा पहचान कर प्रचार सहायक के तौर पर काम करने का मौका दिया। इस बीच उनकी मुलाकात न्यू थियेटर के नितिन बोस से हुई जिन्होंने उनकी प्रतिभा को पहचाना और बतौर छायाकर काम करने का मौका दिया। इस दौरान उन्होंने डाकू मंसूर, माया, मुक्ति जैसी कई फिल्मों में छायांकन किया लेकिन इनसे उन्हें कोई खास फायदा नहीं पहुंचा। वर्ष 1936 में प्रदर्शित फिल्म देवदास बिमल राय के सिने करियर की अहम फिल्म साबित हुई। फिल्म देवदास में उन्होंने बतौर छायाकार के अलावा निर्देशक पी.सी. बरूआ के साथ सहायक के तौर पर भी काम किया था। फिल्म हिट रही और वह फिल्म इंडस्ट्री में कुछ हद तक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गए।
वर्ष 1944 में विमल रॉय ने बंग्ला फिल्म उयर पाथेर का निर्देशन किया। यह फिल्म भारतीय समाज में फैले जातिगत भेदभाव से प्रेरित थी। फिल्म को जोरदार सफलता मिली। चालीस के दशक के अंत में न्यू थियेटर के बंद होने से वह मुंबई आ गए। मुंबई आने पर उन्होंने बांबे टॉकीज से जुड़े। इस काम के लिए अभिनेता अशोक कुमार ने उनकी काफी मदद की। वर्ष 1953 में प्रदर्शित फिल्म दो बीघा जमीन के जरिए उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रखा। उन्होंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी के लिए प्रतीक चिह्न बंबई विश्वविद्यालय का राजा भाई टावर रखा। फिल्म दो बीघा जमीन उनके सिने करियर में अहम पड़ाव साबित हुई। इस फिल्म की कामयाबी के बाद बलराज साहनी और विमल रॉय शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुंचे। इस फिल्म के माध्यम से उन्होंने एक रिक्शावाले के किरदार में बलराज साहनी के रूप में पेश किया।
फिल्म की शुरूआत के समय निर्देशक विमल राय सोचते थे कि बलराज साहनी शायद इस किरदार को अच्छी तरह से निभा सके। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि शंभू महतो के किरदार के लिए विमल राय पहले बलराज साहनी का चयन नहीं कर नासिर हुसैन, जसराज या त्रिलोक कपूर को मौका देना चाहते थे। इसका कारण यह था कि बलराज वास्तविक जिंदगी में वह बहुत पढ़े लिखे इंसान थे। लेकिन उन्होंने विमल राय की सोच को गलत साबित करते हुए फिल्म में अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया। फिल्म दो बीघा जमीन से जुड़ा एक रोचक तथ्य है कि रिक्शेवाले को फिल्मी पर्दे

पर साकार करने के लिए बलराज साहनी ने कोलकाता की सड़कों पर 15 दिनों तक खुद रिक्शा चलाया और रिक्शेवालों की? जिंदगी के बारे में उनसे बातचीत की।
दो बीघा जमीन को आज भी भारतीय फिल्म इतिहास की सर्वश्रेष्ठ कलात्मक फिल्मों में शुमार किया जाता है। इस फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी काफी सराहा गया तथा कान फिल्म महोत्सव के दौरान इसे अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। इन सबके साथ ही जब फिल्म इंडस्ट्री के महान शो मैन राजकपूर ने यह फिल्म देखी तो उनकी प्रतिक्रिया रही मैं इस फिल्म को क्यों नहीं बना सका। विमल राय की यह खूबी रही कि वह फिल्म की पटकथा पर जोर दिया करते थे। वर्ष 1954 में प्रदर्शित फिल्म विराज बहू के निर्माण के दौरान जब उन्होंने अभिनेत्री कामिनी कौशल से पूछा कि उन्होंने उपन्यास को कितनी बार पढ़ा है तो कामिनी कौशल ने जवाब दिया दो बार इस पर उन्होंने कहा बीस बार पढ़ो बाद में फिल्म बनी तो अभिनेत्री कामिनी कौशल के अभिनय को देखकर दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए।
वर्ष 1955 में उनके सिने करियर की एक और महत्वपूर्ण फिल्म देवदास प्रदर्शित हुई। शरत चंद्र के उपन्यास पर बनी इस फिल्म में दिलीप कुमार, सुचित्रा सेन और वैजयंती माला ने मुख्य भूमिका निभाई थी। इस फिल्म की सफलता के बाद अभिनेता दिलीप कुमार ने कहा मैंने फिल्म इंडस्ट्री में जितना अभिनय करना था कर लिया वहीं वैजयंती माला को जब बतौर सह अभिनेत्री फिल्म फेयर पुरस्कार दिया जाने लगा तो उन्होंने यह कहकर पुरस्कार लौटा दिया कि यह उनकी मुख्य भूमिका वाली फिल्म थी। वर्ष 1959 में प्रदर्शित फिल्म सुजाता विमन राय के सिने करियर के लिए एक और अहम फिल्म साबित हुई। फिल्म में उन्होंनें अछूत जैसे गहन सामाजिक सरोकार वाले मुद्दे को अपनी फिल्म के माध्यम से पेश किया। फिल्म में अछूत कन्या की भूमिका नूतन ने निभाई थी।
वर्ष 1963 में प्रदर्शित फिल्म बंदिनी भारतीय सिनेमा जगत में अपनी संपूर्णता के लिए सदा याद की जाएगी। इस फिल्म से जुड़ा एक रोचक पहलू यह भी है फिल्म के निर्माण के पहले फिल्म अभिनेता अशोक कुमार की निर्माता विमल रॉय से अनबन हो गई थी और वह किसी भी कीमत पर उनके साथ काम नहीं करना चाहते थे लेकिन वह नूतन ही थी जो हर कीमत में अशोक कुमार को अपना नायक बनाना चाहती थी। नूतन के जोर देने पर अशोक कुमार ने फिल्म बंदिनी में काम करना स्वीकार किया था। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में बतौर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक सर्वाधिक फिल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त करने का कीर्तिमान विमल रॉय के नाम दर्ज है। उनको अपने सिने कैरियर में सात बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बिमल राय ने अपनी बनाई फिल्मों के जरिए कई छुपी हुई प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मौका दिया जिनमें संगीतकार सलिल चौधरी और गीतकार गुलजार जैसे बड़े नाम शामिल है।
वर्ष 1963 में प्रदर्शित फिल्म बंदिनी के जरिए गुलजार ने गीतकार के रूप में जबकि वर्ष 1953 में प्रदर्शित फिल्म दो बीघा जमीन की कामयाबी के बाद ही सलिल चौधरी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए थे। फिल्म इंडस्ट्री में विमन रॉय उन गिने चुने चंद फिल्मकारों में शामिल थे जो फिल्म की संख्या से अधिक उसकी गुणवत्ता पर यकीन रखते हैं इसलिए उन्होंने अपने तीन दशक के सिने करियर में लगभग 30 फिल्मों का ही निर्माण और निर्देशन किया। फिल्म निर्माण के अलावा उन्होंने महल, दीदार, नर्तकी और मेरी सूरत तेरी आंखे जैसी फिल्मों का संपादन भी किया। अपनी निर्मित फिल्मों से लगभग तीन दशक तक दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करने वाले महान फिल्माकार विमल रॉय 08 जनवरी 1965 को इस दुनिया को अलविदा कह गए। उनके निधन के बाद उनकी मौत के बाद उनके पुत्र जॉय विमल राय ने उनपर 55 मिनट की डाक्यूमेंट्री फिल्म का निर्माण किया।