फिल्मी आलेख

अमर गायक तानसेन की ध्रुव पद गायकी…!
-नईम कुरैशी
भारत के संगीत में ग्वालियर का नाम काफी ऊँचाई पर रहा है। अमर गायक तानसेन से 60-62 साल पहले तोमर शासक मानसिंह तोमर ने 15वीं सदी के शुरू में ही ग्वालियर में ध्रुव पद गायन के विकास के लिये एक संगीत स्कूल संचालित करा दिया था।
इससे पहले ग्वालियर अंचल व देश भर में ध्रुव पद मात्र मंदिरों में ईश्वर की आराधना में गाया जाता रहा था। राजा मानसिंह तोमर के दरबार में अनेक प्रसिद्ध गायक हुये थे जिसमें बैजू, बक्शू, चरनू घोडू तथा रामदास के नाम काफी चर्चित रहे हैं। गायकी के महान कलाकारों की मदद से राजा मानसिंह तोमर ने एक पुस्तक “मानकोतुहल” भी की थी। मानसिंह तोमर के संगीत विकास को अमर गायक तानसेन ने काफी आगे बढ़ा दिया। आज ध्रुव पद संगीत शैली आम तौर से हर संगीत समारोह में गायी जाती है। इस लेखक ने मानसिंह तोमर पर 10 साल पूर्व एक पुस्तक में उनके संगीत व साहित्य प्रेम पर विस्तार से लिखा है।
ध्रुव पद की भाषा शैली मध्य प्रदेशीय व बुन्देलखण्डी है। यह ग्वालियर के आस-पास की भाषा शैली है। प्रसिद्ध लेखक राहुल सांस्कृत्यायन ने लिखा है- इस बात को जानने की जरूरत है कि साहित्य, संगीत और कला का ग्वालियर सदियों तक गढ़ रहा है। जिसे हम बृजभाषा कहते हैं, वह पहले ग्वालियर के नाम से प्रसिद्ध थी।
अकबर बादशाह के दरबारी गायक मियां तानसेन (सन्् 1606-85) के कारण भी ग्वालियर को सारी दुनियां में नाम मिला। इस यादगार गायक की जन्मभूमि बनने का गौरव ग्वालियर को ही प्राप्त है। उनकी दरगाह आज भी ग्वालियर के हजीरे के पास हजारों पर्यटकों व संगीतकारों के लिये तीर्थ के समान है।
संगीत सम्राट तानसेन बादशाह अकबर के लिये युद्धकाल में भी प्रेरणा के स्त्रोत रहे थे। बादशाह की सेना की अजेयता के लिये भी तानसेन ने लिखा है। वे गायक होने के साथ साथ कवि व लेखक भी थे। तानसेन के अनुसार-
ए आयौ, आयौ के बलवंत के शाह, आयौ छत्रपति अकबर
सप्तद्वीप और अष्ठ दिसा नर नरेन्द, धर-धर डरे
निसि दिन कर एक छिन पावै, वरन न पांवे लंगा नगर
जहां जहां जीतत फिरत सुनियत है जलालउद्दीन मुहम्मद को लस्कर
साह हुमायूं कौ नन्दन, चन्दन, एक तेग जोधा अकबर
“तानसेन” को निहाल कीजै, दीजै कोटिन जरजरी नजर कमर।
अकबर ने अपने 50 साल के शासन के लंबे दौर में अनेक युद्ध लड़े। उनमें से कई युद्धों में वे तानसेन को भी साथ ले जाते थे। सम्राट अकबर के काल की सबसे महत्वपूर्ण विजय गुजरात थी। 1587 में यह युद्ध हुआ था। इस अवसर पर तानसेन भी सम्राट के साथ गये थे जहां उन्होंने अपने गुरु बख्शू के मकबरे पर भी हाजरी लगायी थी। तानसेन काफी साहसी भी थे। वे अनेक बार सम्राट अकबर के सामने अपने को उनके बराबर का कह देते थे। उन्होंने अपने एक पद में लिखा भी है- कि अगर अकबर नरपति है तब तानसेन तानपति है। इसी तरह एक बार अकबर के सामने तानसेन ने राजा रामचन्द्र की भी प्रशंसा में कई पद गाये थे।
प्रसिद्ध पुस्तक आईने अकबरी के अनुसार अकबर के दरबार में 36 प्रमुख संगीतज्ञों में से 16 अकेले ग्वालियर के ही थे। उनमें सबके मुखिया तानसेन थे। मियां तानसेन ग्वालियर गायक। बाबा रामदास, ग्वालियर गायक। सुभान खान, ग्वालियर गायक। श्रीज्ञान खां, ग्वालियर गायक। मियांचन्द, ग्वालियर गायक। तानसेन के शिष्य विचित्र खां, ग्वालियर गायक। मोहम्मद खां, ग्वालियर गायक। वीर मण्डल खां, ग्वालियर वादक। बाजबहादुर, मालवा का शासक, अद्वितीय गायक। शिहाब खां, ग्वालियर वीणा वादक। दाऊद ढोडी गायक। सरोद खां, ग्वालियर गायक। चोच खां, ग्वालियर गायक। प्रवीण खां, ग्वालियर वीणा वादक। सूरदास, ग्वालियर (बाबा रामदास के पुत्र) गायक। रंगसेन, आगरा गायक। शेखदावन, वाद्य वादक। रहमत उल्ला, गायक। मीर सैय्यद अली मशहद, तम्बूरा वादक। उस्ताद युसुफ हिरात सुल्तान हाफिज़ हुसैन। मशहद बहरम अली हिरासत, गायक। सुल्तान हाशिम मशहद, तम्बूरा वादक। उस्ताद मुहम्मद आमिन तम्बूरा वादक। हाफिज़ ख्वाजा अली, मशहूर गायक। मीर अब्दुल्ला वादक। पीर दाजा खुरासान के मीर दवाम का भतीजा, गायक। मुहम्मद हुसैन, तम्बूरा वादक थे। उनमें से 15 गायक राजा मानसिंह की संगीत शाला से सीखे हुये थे। मानसिंह ने दुनिया में पहला संगीत स्कूल ग्वालियर के किले पर स्थापित किया था।
तानसेन से दो सदी के बाद उस्ताद बड़े मोहम्मद खां, उस्ताद हद्दू-हस्सू खां की ख्याल गायकी, बाबा दीक्षित, भाऊ साहब गुरुजी, पर्वत सिंह कृष्णराव पंडित, उस्ताद हाफिज अली खां जैसे महान संगीतज्ञों ने अपनी साधना से ग्वालियर का नाम रोशन किया।

मध्य प्रदेश का मनमौजी और मस्तमौला गायक – किशोर कुमार

13 अक्टूबर – गांगुली बंधुओं को याद करने का दिन

 अशोक मनवानी 
आज आभास कुमार गांगुली अर्थात किशोर कुमार की आज  पुण्य तिथि है । किशोर दा हमसे तीस साल पहले विदा हो गए थे।  उन जैसी शख्सियत भले  हमारे
साथ भौतिक रूप से आज न हो, लेकिन दिलों  में हमेशा कायम  रहती  है. इसके साथ ही 13 अक्टूबर का जन्म किशोर कुमार के बड़े भाई श्री कुमुद कुमार गांगुली अर्थात जाने-माने चरित्र अभिनेता अशोक कुमार का जन्मदिवस भी है। किशोर कुमार को रफ़ी साहब और मुकेश जी  की तरह जिंदगी के छठे दशक में संसार छोड़ना पड़ा । यह मध्य  प्रदेश का  सौभाग्य ही है   कि  प्रतिभा संपन्न  पार्श्व गायक   किशोर कुमार ने गायन और अभिनय  दोनों क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट  पहचान बनाई. उन्होंने  गायन के साथ ही अभिनय  की दुनिया में भी बहुत कम वक्त में झंडे गाड़ दिए. जन्म भूमि खंडवा के लिए किशोर जी के मन मे असीम प्रेम था। आज उनके चाहने वाले यह विचार करते हैं कि जब किशोर कुमार हमारे मध्य प्रदेश के निमाड़ अंचल के हैं, तब क्या खंडवा में उनकी समाधि  के अलावा कोई ऐसा  संग्रहालय  नहीं होना चाहिए जहाँ किशोर जी के गाये सभी गीत हों ,उनकी फिल्मों  की तस्वीरें  हों  और साथ ही किशोर  कुमार अभिनीत  और निर्देशित सभी फिल्में  भी संकलित हों। साथ हीयह भी किया जा सकता है कि  केके और एके दोनों भाइयों की याद में एक शानदार संग्रहालय बने। अशोक कुमार भी जीवन भर मध्य प्रदेश से जुड़े रहे . उनकी स्मृतियाँ प्रदेश  से जुडी हैं. किशोर जी की स्मृतियाँ  तो  अनोखी और संग्रह योग्य हैं ही. दोनों भाइयों की याद में उनके कृतित्व को दर्शाते एक  म्यूजियम बनाया जा सकता है।
किशोर कुमारके नाम से  मध्य प्रदेश सरकार की ओर से काफी जतन किए गए हैं। पूरे देश मे किशोर जी को सम्मानीय स्थान मिला  है. भोपाल और खंडवा में आयोजित समारोहों में  राष्ट्रीय  स्तर पर किशोर कुमार राष्ट्रीय  पुरस्कार  समारोह आयोजित हुए हैं . प्रदेश की धरती पर आभास कुमार गांगुली के रूप  में 13 अक्टूबर 1929  में जन्म लेने वाले किशोर  कुमार की खास गायन शैली अपनाकर हजारों गायक अपनी जीविका चला रहे हैं। यह क्या कम महत्व की बात है। दरअसल स्पष्ट उच्चारण  और हाई  पिच में गाने की प्रतिभा और भी कई गायकों में रही है लेकिन गीत गायन में वैसी विविधता  कोई  न कर सका जो किशोर कुमार ने पैदा की।  मध्य प्रदेश के लोगो ने अपनी सम्मान भावना मध्य प्रदेश से  प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े रहे महान कलाकारों के लिए  समय-समय पर व्यक्त की है। सिर्फ किशोर कुमार के सन्दर्भ में बात करे तो  ऐसा लगता है मध्य प्रदेश के लोगों  ने  इस विलक्षण और मनमौजी गायक पर वो नाज नहीं किया, जो किया जाना चाहिए. इस सम्बन्ध में
यह भी जरुरी है कि किशोर कुमार की समाधि  पर  खंडवा नगर में साल में सिर्फ  एक बार नमन करने की बजाय  उनके नाम पर गायन के क्षेत्र  में स्कालरशिप  शुरू की जाएँ और गायन प्रशिक्षण अकादमी भी कार्य करे जिससे हम और भी किशोर कुमार पैदा करें. गायन और अभिनय के आयाम स्थापित करने वाले किशोर कुमार के बारे में कहते हैं कि वे बहुत कंजूस थे।हालांकि इसे बहुत लोग गलत बताते हैं। जो भी हो,यहाँ के लोगों को यह जरूर संतोष रहेगा कि पांच दशक की  सुदीर्घ  कला साधना  के लिए वरिष्ठ सिने कलाकार किशोर कुमार  के नाम से मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग   ने देश के अनेक अभिनेताओं ,गायकों  और सिने निर्देशकों को  मध्य प्रदेश की धरती पर सम्मानित किया है । किशोर  कुमार सम्मान राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका है.
सामाजिक स्तर  पर ऐसी पहल होना चाहिए। सिर्फ खंडवा या भोपाल में किशोर जी की जन्म वर्षगांठ मना  लेना काफी नहीं. अन्य  नगरों  से भी उत्साह दिखाई दे ,तभी मध्य प्रदेश को गांगुली बन्धुओ पर गर्व है, यह माना  जायेगा. किशोर दा ,जिन्दगी भर कहते रहे ,दूध जलेबी खाएंगे ,खंडवा में बस जायेंगे. अपनी  पिता की कर्म भूमि के लिए अपनेपन की इस भावना को समझने की जरुरत है. किशोर जी ने आखिरी यात्रा खंडवा में पूरी की, यह उनकी इच्छा भी रही थी.  यह कोई  ताज्जुब की बात नहीं है कि  किशोर जी के गायक बेटे अमित कुमार खुद  मध्य प्रदेश से लगाव कायम रखते हैं। तभी तो अमित ने साल 2016 में पिता की जयंती पर भोपाल में परफार्म किया. बस  इतना तो मध्य प्रदेश के बाशिन्दों  को करना ही होगा कि  प्रदेश की प्रतिभाओ के परिजनों से संपर्क और संवाद बनाये रखें .दरअसल किशोर कुमार एक विश्व स्तरीय  शख्सियत हैं।

बेजोड़ था किशोर दा का गायन

कई भारतीय भाषाओं  में गाने वाले किशोर जी को जिन गीतों  के लिए फिल्म फेयर  अवार्ड से नवाजा गया उनमें मंजिलें  अपनी जगह हैं… रास्ते अपनी जगह,  हमें और जीने की चाहत न होती ..  अगर तुम न होते , हजार राहें  मुड़कर देखीं …., खाई  के पान बनारस वाला …, पग घुंघरू बाँध मीरा नाची थी .., दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा.., सागर किनारे दिल ये पुकारे…शामिल हैं.इसके अलावा।.रिमझिम गिरे सावन,सुलग सुलग जाए मन…. और 1969 में आई फिल्म आराधना का मस्त गीत  जो किशोर  साहब की  मस्तमौला  वाली शख्सियत से मेल खाता है, शायद आप सभी
इसे गुनगुनाते रहे होंगे– – रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा  दीवाना …..भूल कोई हमसे न हो जाए। सिने प्रेमियों को याद होगा कि इस गीत का फिल्मांकन भी राजेश खन्ना और शर्मिला जी के साथ  बेजोड़ बन पड़ा था। इस तरह अनेक गीत किशोर कुमार के सु-मधुर गायन की वजह से यादगार बन गए।

जन्म वर्षगांठ 2 सितंबर पर विशेष

पहली सुपर अदाकारा रहीं – साधना, रूपहले परदे पर सिंध का सौंदर्य साधना

 अशोक मनवानी
हमारे देश के बंटवारे के वक्त अपने मां-बाप के साथ एक छह-सात साल की बच्ची तकलीफें उठाती हुई कराची (सिंध) से हिंदुस्तान दाखिल हुई। निर्धनता और आभाव झेलते शिवदासानी परिवार का कला के प्रति रूझान था, साधना मुम्बई में स्कूल-कॉलेज में नाटकों में हिस्सा लेती रहती थीं। एक दिन उन्हें उस जमाने के मशहूर
निर्माता सुबोध मुखर्जी ने एक पत्रिका के मुख पृष्ठ पर देखकर लव इन शिमला फिल्म के लिए बतौर अभिनेत्री चुन लिया। साधना एक वर्ष पहले 1958 में एक सिंधी फिल्म अबाणा में भूमिका कर चुकी थी। प्रेम-कथाओं के अनुरूप साधना फिल्में करती चली गई। एक मुसाफिर एक हसीना, हम दोनों, असली-नकली, वो कौन थी, राजकुमार,आरजू, दूल्हा-दुल्हन, मेरा साया, अनीता इंतकाम उनकी कामयाब फिल्में रहीं। गीता मेरा नाम के निर्देशन के कारण साधना की अलग पहचान बनी । साधना के प्रमुख नायकों में शम्मी कपूर, राजेंद्र कुमार, जॉय मुखर्जी, राजकपूर,देवानंद, सुनीलदत्त, मनोज कुमार इत्यादि शामिल थे । फिल्म दूल्हा-दुल्हन में राजकपूर के साथ साधना ने यादगार अभिनय किया। जिंदगी में सेहत रूपी धन सभी को हासिल नहीं होता। साधना साधारण बीमारियों का सामना करते-करते विवश सी हो गई और अभिनय यात्रा को विराम देना पड़ा। वे आज भी बीते दौर को याद करती रही। उनकी इच्छा सदैव यही होती थी कि उन्हें प्रशंसक युवावस्था की छवि से जानते रहें। साधना ने हिंदी सिनेमा के साथ ही देश की युवतियों को विशिष्ट केश सज्जा भी दी है। चूड़ीदार सलवार का चलन भी साधना के कारण हुआ। यही नहीं साधना ने कान के बड़े रिंग, गरारा, शरारा तिरछे काजल का फैशन भी चलाया। फिल्म एक मुसाफिर एक हसीना के लोक प्रिय होने के बाद साठ के दशक में कॉलेज की युवतियों ने हंसने के बजाय मुस्कुराना शुरु करदिया गया था । सिंध का सौंदर्य साधना के रूप रंग को देखकर जाना जा सकता है। व्यवसायी सिंधी समाज भी अभिनयनिर्देशन और फिल्म निर्माण में किसी से उन्नीस नहीं। अभाव रोड़ा नहीं बनते प्रगति में, यह साधना शिवदासानी ने सिद्व किया। जीने का अदम्य साहस उनमें रहा। अभिनय की जिन्दगी के आखिरी कुछ साल पहले छोटे पर्दे पर कार्यक्रम संयोजन से जुड़ी रहीं साधना मातृभाषा सिंधी से प्रेम करती रहीं। उन्होंने जीवन साथी आर.के.नैयर को भी सिंधी सिखा दी थी। वे गीत संगीत सुनना पसंद करती रही। स्वयं अभिनीत फिल्मों के गीत काफी रूचि से सुनती रहीं। साधना समकालीन अभिनेत्रियों, मित्रों के प्रति भी सम्मान व्यक्त करती रहीं। सिनेमा में आधुनिकता की प्रथम प्रेरणा, भावपूर्ण अदाकारी से दिलों पर छा जाने वाली, प्रसिद्ध लोकप्रिय गीतों पर अभिनय करने वाली अभिनेत्री,महिलाओं की दोहरी भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री के रूप में स्थापित हुईं। आखिरी सांस तक उनके शांत निर्मल,निश्छल चेहरे के भाव यही कहते रहे- "नैना बरसे रिमझिम-रिमझिम। साधना फिल्म इंडस्ट्री की प्रथम फैशन आइकॉन, फर्स्ट यंग एंग्री वीमन (इंतकाम) फर्स्ट पापुलर आयटम सांग परफार्मर एक्ट्रेस (मेरा साया) पापुलर डबल रोल एक्ट करने वाली एक्ट्रेस (चार फिल्में हैं जिनमें दोहरी भूमिका है) होने के अलावा साधना ने रहस्यमय और प्रेम फिल्मों को नई परिभाषा भी प्रदान की, वे राजेश खन्ना के सुपर स्टार बनने के पहले सुपर अदाकारा बन चुकी थीं।उनकी अधिकांश फिल्में सिल्वर जुबली मनाती थीं। उन दिनों साधना फिल्म निर्माताओं के लिए सफलता का पैमाना बन गई थीं। यह भी सच है कि उस दौर में उन्हें अपनी समकालीन अभिनेत्रियों के मुकाबले ज्यादा मानदेय भी मिला। वर्ष 2015 के दिसम्बर महीने की 25 तारीख को उन्होंने देह त्यागी। आज भी वे सिने प्रेमियों के हृदय में जीवित हैं।

 

मीना कुमारी : भारतीय फिल्मों का एक अध्याय
(पुण्यतिथि 01 अगस्त पर विशेष)
– जया केतकी
तुम क्या करोगे सुनकर मुझसे मेरी कहानी,
बेलुत्फ जिंदगी के किस्से हैं फीके-फीके।
भारतीय सिने जगत में 1930 से 70 के दशक तक अभिनय और कला की जो बहार देखने को मिली उसका जलवा आज भी बरकरार है। आज जब हम उस दौर की फिल्मों और अदाकाराओं के अभिनय को आंकने का प्रयास करते हैं, तो वह वर्तमान की खूबसूरत और अंग प्रदर्शन को स्वीकार करने वाली अभिनेत्रियों से बीस ही ठहरता है। जिस अभिनय की गहराई उस दौर की नायिकाओं में देखने को मिली वह आज की अदाकाराओं में नहीं।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में मीनाकुमारी का नाम सदा सम्मान से लिया जाता है। उनके अभिनय की गहराई का आज कोई सानी नहीं है। उन्होंने हिन्दी सिनेमा को एक ऐसा अध्याय दिया जिसमें अभिनय की सहजता, अदा और वागी के उतार-चढ़ाव की बारीकियां सामने आईं। मीना कुमारी ने अपनी हर फिल्म में अपने पात्र को पूर्णता प्रदान की। वास्तव में वे अपने पात्र में ही जीतीं। वे पात्र में प्राण डालने के लिए उसे स्वयं में समाहित कर लेती।
खूबसूरती और मधुर आवाज की धनी मीनाजी एक नायाब शायरा भी थीं। वे अक्सर फिल्म की शूटिंग के दौरान फुरसत के क्षणों में अपनी शेरों-शायरी सुनाकर सभी को मदमस्त कर देतीं। महजबीन उर्फ मीना कुमारी का जन्म 1 अगस्त 1932 को अलीबक्श और इकबाल बेगम की तीसरी संतान के रूप में हुआ था। मीना कुमारी के पिता संगीतकार तथा माता मशहूर नर्तकी थीं। बचपन में मीना कुमारी ने महजबीन नाम से बतौर बाल कलाकार अभिनय किया। 6 वर्ष की आयु में उन्होंने पहली बार फिल्म जेलर में काम किया। अभिनय और संगीत तो उनके रक्त में विद्यमान थे इसलिए किसी भी पात्र का अभिनय करने में उन्हें कोई वक्त नहीं लगता था। उन्होंने बचपन से ही अपने अभिनय का परचम लहराया।
50 से 70 के दशक तक उन्होंने जो फिल्म भारतीय सिने जगत को अर्पित की वे अभिनय की जीती जागती मिसाल हैं। उनकी पाकीजा और साहेब बीबी और गुलाम फिल्मों ने प्रसिद्धि के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। 1952 में बनी बैजू बावरा से मीना कुमारी की अदाकारी में नया मोड़ आया। वे फिल्म फेयर अवार्ड 1953 जीतने वाली पहली नायिका बनीं। उनके साथी कलाकारों में राजकपूर, भारत भूषण, प्रदीप कुमार, गुरुदत्त, सुनील दत्त, रहमान, राजकुमार, अशोक कुमार, दिलीप कुमार और धर्मेन्द्र प्रमुख रहे, जिन्होंने अभिनय के साथ ही मीना जी के मधुर स्वभाव का भी समय देखा। कहा जाता है कि अपने पति कमाल अमरोही से वे खुश नहीं थी और धर्मेन्द्र के साथ नाम जुड़ने के बाद मीनाजी ने शराब का सहारा लेना शुरू कर दिया। कमाल अमरोही ने मीनाजी के सौन्दर्य और अभिनय को कमाई का एक जरिया समझकर उपयोग किया और अय्याशी में उनकी गाढ़ी मेहनत की कमाई का दुरुपयोग किया। उनकी आखिरी फिल्म पाकीजा के प्रदर्शन के तीन सप्ताह बाद उनकी मृत्यु लीवर में खराबी आने के कारण हो गई।
कमाल अमरोही से जब मीनाजी का विवाह हुआ तब वह अपने पति से 15 वर्ष छोटी थीं। अमरोही जी के पहली पत्नी से बच्चे थे औ वह और बच्चे नहीं चाहते थे। 1964 में पारिवारिक क्लेशों के कारण उनका तलाक हो गया। तभी से मीनाजी ने अपनी व्यस्तता फिल्मों में और बढ़ा दी। तन्हाई से बचने के लिए वह शराब की आदी हो गईं। अपने पति के बारे में उन्होंने लिखा-
दिल सा जब साथी पाया,
बच्चे भी वो साथ ले आया।