पर्यटन

ओरछा में राफ्टिंग का एडवेंचर है
देश भर में भगवान राम की पूजा राजा के रूप में कहीं होती है तो वह मध्यप्रदेश का ओरछा है। प्रतिदिन यहाँ चार बार आरती होती है-बालभोग, राजभोग, सायंकाल आरती और शयन (ब्यारी) आरती। चारों आरती के समय राजा राम को सशस्त्र पुलिस द्वारा गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है। दरअसल देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु तीर्थ-यात्रियों और पर्यटकों के लिये यह क्षण और दृश्य किसी कौतूहल से कम नहीं होता। आस्था और श्रद्धा से ओत-प्रोत वातावरण में वे जैसे रम जाते हैं।
ओरछा में राजा राम प्राचीन रानी महल में विराजित हैं, जो अब भव्य मंदिर के रूप में विख्यात है। मंदिर में भगवान राम, सीता और लक्ष्मण के साथ दरबार के रूप में विराजे हैं। सबसे अनूठी बात यह है कि मंदिर अपने निर्धारित समय पर ही खुलता और बंद होता है। यहाँ कोई व्ही.आई.पी. नहीं होता। राजा राम के दरबार में सभी एक समान हैं। मंदिर से प्रसादी के साथ मिलने वाला ‘पान का बीड़ा’ एक सुखद अनुभूति का अहसास कराता है। तभी गोस्वामी बालमुकुंद ने लिखा है “नदी बेतवा तीर पर बसा ओरछा धाम-कष्ट मिटे संकट टले मन पावे विश्राम “ ।
हर साल मार्गशीर्ष (अगहन) माह में राम राजा की विवाह पंचमी उत्सव के रूप में मनाई जाती है। इस मौके पर भगवान राम की बारात निकलती है। बारात ओरछा नगर और जानकी मंदिर तक भ्रमण कर वापस मंदिर लौटती है। वैदिक रीति से विवाह संस्कार और भंडारा होता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु और तीर्थ-यात्री इस अवसर के साक्षी बनते हैं। इसी तरह आज भी प्रत्येक पुष्य नक्षत्र में यहाँ मेला भरता है। ऐसी मान्यता है कि पुष्य नक्षत्र में ही भगवान राम ओरछा पधारे थे। स्मृति स्वरूप आज भी एक दिन का मेला भरता है।
यूँ तो बारहों महीने ओरछा में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है लेकिन शारदीय और चैत्र नवरात्रि तथा रामनवमी पर भारी भीड़ जुटती है। कवि केशव की जयंती भी धूमधाम से मनाई जाती है।
जनश्रुति और किवदंती की मानें तो राम राजा को अयोध्या से स्वयं कुँवर गणेशी बाई ओरछा लेकर आयीं थीं। तब उन्हें रानी महल में विराजित किया गया था। राम राजा की इच्छा के अनुरूप रूद्रप्रताप ने राम राजा महल निर्माण की शुरूआत 1501 से
1503 के मध्य की। भारतीय चन्द्र ने 1531 से 1554 के बीच इस महल को एक मंजिल तक बनवाया। कालान्तर में राजा मधुकर शाह ने निर्माण को पूरा करवाया। मंदिर का निर्माण इण्डो-इस्लामिक शैली में किया गया था। राम राजा मंदिर प्रांगण में सावन-भादो पिलर (टॉवरनुमा) बने हुए हैं। इनमें बहुत सारे झरोखे बने हैं। समीप ही हरदौल बैठिका है। हरदौल, बुंदेलखंड अंचल के देवता माने जाते हैं। आज भी विवाह-शादी जैसे मांगलिक आयोजन में सबसे पहले लाला हरदौल के नाम न्यौता देने की परम्परा कायम है।
हालांकि ओरछा में राम राजा की महिमा और ख्याति के आगे बाकी सब गौण हैं। लेकिन यहाँ चतुर्भुज मंदिर, राजा महल, जहाँगीर महल, राय प्रवीण महल और आनंद गार्डन, शीश महल, लक्ष्मी मंदिर, सुंदर महल, बेतवा के किनारे स्थित बुंदेलाओं की छत्रियाँ सहित अन्य स्थल देखने लायक हैं। सैलानियों के लिए आकर्षण के रूप में राजा महल में प्रतिदिन शाम को एक घंटे का साउण्ड एण्ड लाइट शो (हिन्दी-अंग्रेजी) भी बड़ा ही रुचिकर और ओरछा के इतिहास को रोचकता से दर्शाने वाला होता है। मध्यप्रदेश पर्यटन द्वारा एडवेंचर के रूप में बेतवा नदी में राफ्टिंग की सहूलियत मुहैया कराई गई है। यह अक्टूबर से मार्च माह तक पर्यटन निगम की बेतवा रिट्रीट के समीप से शुरू होती है, जो एक घंटे की रहती है। राफ्टिंग के दौरान हेरिटेज साइट की खूबसूरती दिखाई देती है। इसके अतिरिक्त फॉरेस्ट ट्रेकिंग भी कराया जाता है।
ओरछा के प्रसिद्ध राजा महल के निर्माण की शुरुआत 16 वीं शताब्दी में रूद्रप्रताप बुंदेला ने की थी। उन्होंने गढ़ कुड़ार से लाकर ओरछा को राजधानी बनाया था। महल में निवास कक्ष, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास मुख्य आकर्षण हैं। राजा महल में बुंदेली-कांगड़ा शैली की पेंटिंग मशहूर है। ये पेंटिंग्स प्राकृतिक कलर से इस तरह उकेरी गई थी कि आज भी उनकी सुंदरता और आकर्षण में कोई कमी नहीं आई है। महल में रोशनी और हवा के प्रवाह का भी समुचित ध्यान रखा गया था, जो तत्कालीन समय की वास्तु-कला का अनूठा उदाहरण है। राजा महल के प्रांगण में हमारी भेंट कनाडा, थाईलैण्ड, इंग्लैण्ड, जर्मनी, स्पेन आदि देशों से आए हुए सैलानियों से हुई जो गाइड द्वारा दी जा रही जानकारी को बड़े चाव से सुन रहे थे। सैलानियों की यह टीम फोटोग्राफी भी कर रही थी।
जहाँगीर महल को मध्यप्रदेश पर्यटन द्वारा वेडिंग डेस्टिनेशन के रूप में तैयार किया गया है। यहाँ पिछले सीजन में दो भव्य वैवाहिक आयोजन हुए। इनमें तत्कालीन समय की स्मृतियाँ सजीव हो उठी थी। माना जाता है कि जहाँगीर महल वीरसिंह देव बुंदेला ने 1605 से 1627 के बीच जहाँगीर के सम्मान में बनवाया था। महल का आर्किटेक्चर हिन्दू-मुस्लिम शैली का मिश्रण कहा जा सकता है। पाँच मंजिला भव्य
महल में लगभग 236 कक्ष हैं, इनमें 100 अण्डर ग्राउण्ड हैं। महल का विशाल मुख्य द्वार आज भी दर्शनीय है। मुख्य द्वार पर पत्थरों में उत्कीर्ण हाथी और यहाँ से पूर्वी ओरछा का सुंदर नजारा देखने लायक होता है। इन हाथियों की संख्या भी 27 नक्षत्रों के साथ जुड़ी है जो चारों दिशाओं में है। महल के बीचों-बीच प्रांगण में चारों दिशाओं में दरवाजे हैं। बीच में पानी के कुण्ड हैं जो उस समय के स्वीमिंग पुल का आभास करवाते हैं। यहाँ दुर्लभ-गिद्ध (वल्चर) भी पाये जाते हैं।
जहाँगीर महल के मुख्य द्वार के नजदीक राय प्रवीण महल है जिसे इन्द्रमणी ने बनवाकर नृत्यांगना एवं कवियत्री को दिया था। दो मंजिला महल में आनंद गार्डन भी है। उनकी यह उक्ति ‘विनती राय प्रवीण की सुनिये शाही सुजान, झूठी पाथर भजत है, बारी, बेस और श्वान’ आज भी लोकप्रिय है। ओरछा के शीशमहल में मध्यप्रदेश पर्यटन का होटल है।
दरअसल ओरछा में राम राजा के दर्शन के साथ इतिहास, पुरातात्विक प्राचीन महल और छत्रियों के अतिरिक्त एडवेंचर के रूप में राफ्टिंग और फारेस्ट का लुत्फ भी उठाया जा सकता है। छत्रियाँ पंचरतन शैली में बनी हैं। यहाँ के प्राकृतिक दृश्य-शांति और सुकून देते हैं। यह जगह प्रदूषण से मुक्त है।
आल्हा-ऊदल की वीर गाथा आज भी यहाँ सुनाई पड़ती है। मशहूर शास्त्रीय संगीत गायिका असगरी बाई टीकमगढ़ की रहवासी थी।
कैसे पहुंचे ओरछा
उत्तरप्रदेश का झाँसी यहाँ से महज 16 किलोमीटर दूर स्थित है जो रेल्वे का बड़ा जंक्शन है। टूरिस्ट को रेल मार्ग से आने की भी समुचित सहूलियत है। ग्वालियर और खजुराहो एयरपोर्ट की दूरी भी ज्यादा नहीं है। नई दिल्ली-हबीबगंज शताब्दी एक्सप्रेस यहाँ के लिए सबसे अच्छा साधन है। हाल ही में शुरू हुई भोपाल-खजुराहो ट्रेन से टीकमगढ़ पहुँचकर वहाँ से सड़क मार्ग से भी ओरछा पहुँचा जा सकता है। वर्ल्ड हेरिटेज खजुराहो के साथ ग्वालियर, चंदेरी, शिवपुरी, धुबेला म्यूजियम और ओरछा भ्रमण को आसानी से शामिल किया जा सकता है। तो आइये….इस बार…. ओरछा।

तीन पहाड़ी नदियों का संगम है मुन्नार
तीन पहाड़ी नदियों के संगम पर स्थित मुन्नार केरल का विश्व प्रसिद्व पहाड़ी पर्यटक स्थल है,जो तीन नदियों मुदप्रुझा,नल्लथन और कुंडला से घिरा है। समुद्र तल से 1,600 मीटर की उंचाई पर यह स्थित है। अंग्रेजी हुकूमत के समय मुन्नार गर्मियों में उनका रिसॉर्ट हुआ करता था।
अगर आप गर्मी की छुट्टियां बिताने के लिए किसी पहाड़ी स्टेशन की तलाश कर रहे हैं,तो मुन्नार के विशाल चाय बागान, चित्र-पुस्तक कस्बों, घुमावदार लेन आपकी छुिट्टयों का मजा बढ़ा सकते हैं। यहां के जंगलों और घास के मैदानों में पाए जाने वाले विदेशी वनस्पतियों में नीलकुरिंजी को भी देखने लोग आते है। यह फूल जो हर बारह वर्ष में एक बार में नीले रंग की पहाडिय़ों को स्नान करता है, 2018 में अगले दिन खिल जाएगा। मुन्नार में दक्षिण भारत में सबसे ऊंची चोटी है, अनमुड़ी,जो 2,695 मी। अनमूड़ी ट्रेकिंग के लिए एक आदर्श स्थान है।
आइए जानते हैं मुन्नार की कुछ खास जगहों को
इराविकुलम राष्ट्रीय उद्यान
मुन्नार के नजदीक मुख्य आकर्षणों में से एक है ईवीविकुलम राष्ट्रीय उद्यान यह पार्क दुर्लभ तितलियों, जानवरों और पक्षियों की कई प्रजातियों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। यह ट्रेकिंग के लिए एक अच्छी जगह है,पार्क चाय बागानों के एक शानदार दृश्य यहां पर दिखाई देते हैं। जब पहाड़ी ढलान नीले रंग के कालीन में ढक जाते हैं,तो वह और भी खूबसूरत दिखाई देते है,जिससे नीलकुरिन्जी के फूलों के परिणामस्वरूप आते हैं। यह पश्चिमी घाट के इस हिस्से के लिए एक पौधे है जो बारह साल में एक बार खिलता है।
अन्नामडी पीक
ईराकिकुलम नेशनल पार्क के अंदर स्थित है अन्नामुदी यह दक्षिण भारत में सबसे ऊंची चोटी है जो 2700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। चोटी के ट्रेक को इरवीकुलम में वन और वन्यजीव अधिकारियों की अनुमति के साथ अनुमति दी जाती है।
मैटपेट्टी
मन्नार टाउन से लगभग 13 किमी की दूरी पर ब्याज का एक अन्य स्थान, मैटपेट्टी है। समुद्र तल से 1700 मीटर की ऊँचाई पर स्थित, मैटूपेटी अपने भंडारण चिनाई बांध और सुंदर झील के लिए जाना जाता है, जो आनंददायक नाव की सवारी प्रदान करता है, जिससे कि एक आसपास के पहाडिय़ों और परिदृश्य का आनंद उठा सके।
पल्लीवासल
पल्लवीसल, मुन्नार के चिथीरापुरम से लगभग 3 किमी दूर स्थित केरल में पहली हाइड्रो-इलेक्ट्रिक परियोजना का स्थान है। यह विशाल सुंदर सुंदरता का स्थान है और अक्सर पिकनिक स्थल के रूप में दर्शकों द्वारा सराहा जाता है।
चिन्नाकनाल और अनयिरंगल
मुन्नार शहर के पास चिन्नाकनाल है और यहां झरने, जिसे पॉवर हाउस झरने के नाम से जाना जाता है, समुद्र तल से 2000 मीटर की दूरी पर एक विशाल चट्टान नीचे झरना। यह स्थान पश्चिमी घाट पर्वतों के सुंदर दृश्यों से समृद्ध है। जब आप चिन्नाकनाल से लगभग सात किलोमीटर की यात्रा करते हैं, तो आप अनयिरंगल तक पहुंच जाते हैं। मुन्नार से 22 किमी दूर अनयिरंगल, चाय के पौधों के हरे भरे कालीन हैं। शानदार जलाशय पर एक यात्रा एक अविस्मरणीय अनुभव है। अनयिरंगल बाँध चाय बागानों और सदाबहार वनों से घिरा हुआ है।
शीर्ष स्टेशन
मुन्नार से लगभग 32 किमी की दूरी पर शीर्ष स्टेशन, समुद्र तल से 1700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मुन्नार-कोडाईकनाल रोड पर यह सर्वोच्च बिंदु है। यात्रियों को मुन्नार के लिए यह एक जगह बनाने के लिए शीर्ष स्थान पर जाने के लिए मनोरम दृश्य का आनंद लेने के लिए यह पड़ोसी राज्य तमिलनाडु की पेशकश करता है। यह एक विशाल क्षेत्र पर खिलने वाले नीलकुरिंजी फूलों का आनंद लेने के लिए मुन्नार में एक स्थान है।
चाय संग्रहालय
मुन्नार की अपनी विरासत है जब यह चाय बागानों के उत्पत्ति और विकास की बात आती है। इस विरासत का विवरण लेना और केरल की उच्च श्रेणियों में चाय बागानों की उत्पत्ति और विकास पर कुछ अति सुंदर और दिलचस्प पहलुओं को संरक्षित करने और दिखाने के लिए, विशेष रूप से चाय के लिए एक संग्रहालय कुछ साल पहले मुन्नार में टाटा टी द्वारा खोला गया था। यह चाय संग्रहालय क्युरीओस, फोटोग्राफ और मशीनों का घर लेता है; जिनके सभी में मुन्नार में चाय बागान के मूल और विकास पर बताने की कहानी है। म्यूजियम मुन्नार में टाटा टी के नल्लथन्नी एस्टेट में स्थित है और एक यात्रा के लायक है।
कैसे जाएं
यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन अलुवा 108 किमी और अंगमाली, लगभग 109 किमी
हैं, जबकि निकटतम हवाई अड्डा कोचीन इंटरनेशनल एयरपोर्ट,है जो देश के कई बड़े शहरों से जुड़ा है।

बर्फीले पहाड और टॉय ट्रेन है दार्जिलिंग का आकर्षण

उत्तर-पूर्वी भारत का दार्जिलिंग प्रमुख पहाडी स्टेशन है.यहां पहाडों की बर्फ हरी भरी चोटियां व लुभावनी सुंदरता मन को शांति प्रदान करती है.ये दुनिया की सबसे शानदार पहाड़ी सैरगाहों में से एक है. कमोबेश प्रकृति का हर रंग इसको छू कर गया है,तथा नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर है.
हिल स्टेशनों की रानी के रूप में दार्जिलिंग की विशिष्ट पहचान है.
दार्जिलिंग पागल बना देने वाली भीड़ से दूर शंति का अनुभव कराता है. यात्री-चाहे पर्यटक हों पक्षी विज्ञानी, फोटोग्राफर, वनस्पति विज्ञानी या फिर कलाकार हमेशा के लिए दार्जिलिंग से एक अनुभव लेकर जाते है,जो उनकी स्मृति में रच बस जाता है.
प्रमुख आकर्षण
दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे लोकप्रिय टॉय ट्रेन के रूप में जाना जाता है,क्षेत्र के मुख्य आकर्षणों में से एक है. जिस ट्रैक पर ट्रेन चलती है, वह केवल 600 मिलीमीटर चौड़ा है. यूनेस्को ने इसे विश्व विरासत स्थल के रूप में डीएचआर घोषित किया है.
यहां के स्पाट
चौैरास्ता, रिज की दुकानों और रेस्तरां के साथ लाइन में खड़ा होकर ऊपर के दृश्यों को निहारा जा सकता है. यहाँ लोग धूप सेंकने के लिए भी एकत्रित होते हैं. ब्रेबोर्न पार्क व चौरास्ता से जुड़ा हुआ है और अब एक म्यूजिकल फाउंटेन की सुविधा है. यह जगह एक खुली जगह है और जहां एक पर्वत श्रृंखला की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लिया जा सकता है.

टाइगर हिल शहर से 2590 मीटर की ऊंचाई पर स्थित और 13 किलोमीटर दूर इस स्थान कंचनजंगा और ग्रेट ईस्टर्न हिमालय पर्वत पर सूर्योदय के शानदार दृश्य देखे जा सकते हैं. दार्जिलिंग से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर रेलवे लूप इंजीनियरिंग की एक अद्भुत उपलब्धि है. यह टॉय ट्रेन अपनी तरह पाश दौर हवा देखने के लिए आकर्षक है. शांति स्तूप एक जापानी बौद्ध द्वारा स्थापित आकर्षक स्थान है जहां,पैदल या टैक्सी से पहुंचा जा सकता है. यहां बुद्ध के चार बदलते रूपों को दर्शाया गया है. वेधशाला हिल,हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट,पद्मजा नायडू हिमालयन प्राणी उद्यान,राजभवन जो कि पश्चिम बंगाल के राज्यपाल की गर्मियों का निवास है.रंगित घाटी यात्री केबल कार,तेनजिंग रॉक,प्राकृतिक इतिहास का संग्रहालय,लॉयड्स बॉटनिकल गार्डन भी खूबसूरत जगह हैं जिन्हें देखने आया जा सकता है. बॉटनिकल गार्डन लॉयड बॉटनिकल गार्डन दो जीवित जीवाश्म के लिए प्रसिद्ध है. यह सिर्फ ईडन अस्पताल (शहीद दुर्गा मॉल जिला अस्पताल) से नीचे के बारे में 40 एकड़ जमीन का एक क्षेत्र को कवर करने के लिए एक खुला ढलान पर स्थित है.इसके अलावा झाड़ी का जंगल जो कि दार्जिलिंग रेलवे स्टेशन से 2 से 5 किलोमीटर की दूरी पर है,देखने जाया जा सकता है.
कैसे जाएं
उत्तरी-पूर्वी भारत के पर्यटक स्थलों की सैर के लिए फरवरी के आखिरी दिनों से लेकर मार्च और अप्रैल के शुरु के दिनों को अच्छा माना जाता है.लेकिन पर्यटक यहां साल भर आते हैं.दार्जिलिंग देश के अलग-अलग हिस्सों से अच्छी तरह हवाई, सडक़ और ट्रेन मार्ग से कोलकाता के रास्ते जुड़ा है. हवाई मार्ग के लिए दार्जिलिंग का निकटतम हवाई अड्डा बागडोगरा है,जो यहां से 96 किलोमीटर दूर है. यह दिल्ली,कोलकाता और गुवाहाटी के साथ सीधी उड़ान सेवा से जुडा है. बागडोगरा से टैक्सियों और दार्जिलिंग कैब से या फिर सिलीगुड़ी की ओर से बसें या अन्य
परिवहन सुविधा से यहां पहुंचा जा सकता है. दार्जिलिंग के करीब दो निकटतम रेलवे स्टेशन सिलीगुड़ी और न्यू जलपाईगुड़ी हैं जिनकी दूरी करीब 80 से 90 किलोमीटर हैं. जोकि कोलकाता, दिल्ली, गुवाहाटी,इलाहाबाद,वाराणसी और भारत के अन्य प्रमुख शहरों से जुडे है. दार्जिलिंग भी बहुत अच्छी तरह सिक्किम, नेपाल, भूटान और उसके आसपास के पहाड़ों से जुड़ा है. टट्टू की सेवा का भी स्थानीय पर्यटन स्थलों के भ्रमण में लाभ उठाया जा सकता है.

 

मंदिरों की नगरी है उज्जैन
उज्जैन.सिहस्थ कुंभ नगरी उज्जैन मध्यप्रदेश की सबसे पुराने और सर्वाधिक मान्यता वाली पर्यटन नगरियों में से एक है. विक्रमादित्य की उज्जैयनी नगरी का पुराणों में पवित्रतम सप्तपुरियों में उल्लेख मिलता है. इस लिए भी उज्जैन का धार्मिक महत्व अत्यधिक है. देश में स्थापित12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर भी यहीं स्थित हैं. इसके अलावा श्मशान, ऊषर, क्षेत्र, पीठ एवं वन जैसे 5 विशिष्ट संयोग इस प्राचीन नगरी के महत्व को और भी अधिक बढ़ाने वाले हैं.
यह मोक्षदायिनी शिप्रा के तट पर स्थित है. जो प्राचीनकाल से ही धर्म, दर्शन, संस्कृति, विद्या एवं आस्था का केंद्रङ्क्षबदु रहा है. उज्जैन, मंदिरों का शहर भी है. यहां की परम्पराएँ और मंदिर पुरातन काल की भाँति आज भी अक्षुण्ण बनी हुई हैं।
उज्जैन की पहचान अधिपति भगवान शिव से है उकी महिमा यहाँ के रोम-रोम में पाई जाती हैं. भारत के हृदयस्थल मध्यप्रदेश के उज्जैन में पुण्य सलिला क्षिप्रा के तट के निकट भगवान शिव महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं. दूसरी और चिंतामण भगवान गणेश का मन्दिर शिप्रा नदी के समीप फ़तेहाबाद रेलवे लाइन पर स्थित है. यह माना जाता है कि इस मंदिर में स्थापित गणेश जी की प्रतिमा स्वयंभू है. उनके दोनों ओर उनकी पत्नियां रिद्धि और सिद्धि विराजमान हैं.
उज्जैन के प्राचीन पवित्र स्थलों की आकाशगंगा में हरसिद्धि मन्दिर विशेष स्थान रखता है. यह मंदिर देवी अन्नपूर्णा को समर्पित है जो गहरे सिंदूरी रंग में रंगी है. देवी अन्नपूर्णा की मूर्ति देवी महालक्ष्मी और देवी सरस्वती की मूर्तियों के बीच विराजमान है. भगवान शिव के सुपुत्र की विशाल कलात्मक प्रतिमा महाकालेश्वर मन्दिर के पास एक तालाब के ऊपर स्थित है, जिसे पारम्परिक मंदिरों में से एक माना जाता है.
ये भी प्रमुख स्थान
प्राचीन विष्णु सागर के तट पर स्थित श्री रामजनार्दन मन्दिर विशाल परकोटे से घिरा मंदिर समूह है. इसमें एक राममंदिर है दूसरा जनार्दन (विष्णु) का मंदिर है. उधर,नगरकोट की रानी का मन्दिर नगरकोट के परकोटे की रक्षिका देवी है. मन्दिर परमारकालीन है. यहाँ अवन्ति खण्ड में वर्णित नौ मातृकाओं में से सातवीं कोटरी देवी है. दोनों नवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशेष नवरात्रि उत्सव मनाया जाता है.
त्रिवेणी नवग्रह (शनि मन्दिर)
शिप्रा नदी के त्रिवेणी घाट पर नवग्रह का यह मन्दिर यात्रियों का प्रमुख केन्द्र है. त्रिवेणी घाट के पास शिप्रा नदी पर खान नदी से संगम है. इस नदी का नाम पास ही इन्दौर नगर में बाणगंगा है. कुछ लोग इस नदी को तुंगभद्रा भी मानते थे.
इधर,गढ़ कालिका मंदिर कालिका देवी को समर्पित है, जो हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार बहुत शक्तिशाली देवी हैं. कालजयी कवि कालिदास गढ़ कालिका देवी के उपासक थे.कालिदास के सम्बन्ध में मान्यता है कि जब से वे इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने लगे तभी से उनके प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का निर्माण होने लगा.
यहां श्री गोपाल मन्दिर मराठा स्थापत्य कला का सुन्दर उदाहरण है. इस मन्दिर के गर्भगृह में गोपाल कृष्ण के अलावा शिव-पार्वती, और बायजाबाई की प्रतिमाएँ भी हैं. अंकपात के निकट शिप्रा तट के एक टीले पर मंगलनाथ का मन्दिर है. मंगलेश्वर का भव्य मंदिर शिप्रा तट पर स्थित है. ऐसा माना जाता है कि मंगलनाथ के ठीक शीर्ष के ऊपर ही आकाश में मंगलग्रह स्थित है.
सांदिपनी आश्रम,श्री कालभैरव मन्दिर,श्री सिद्धवट मन्दिर जहां सिध्दवट घाट पर अन्त्येष्टि-संस्कार सम्पन्न किया जाता है. स्कन्द पुराण में इस स्थान को प्रेत-शिला-तीर्थ कहा गया है.यहां आने पर भर्तृहरि गुफा के दर्शन भी अवश्य करना चाहिए.
कैसे पहुंचे
उज्जैन के सबसे करीब इन्दौर का देवी अहिल्याबाई होलकर हवाई अड्डा है जो यहाँ से 55कि.मी की दूरी पर स्थित है. निजी और सार्वजनिक घरेलू विमान सेवाओं के माध्यम से इन्दौर हवाई अड्डा भारत के अन्य महत्वपूर्ण शहरों से जुड़ा है. पर्यटक उज्जैन तक आने के लिए इन्दौर हवाई अड्डे से टैक्सी भी ले सकते हैं. इन्दौर से उज्जैन तक आने के लिए यात्री बस भी ले सकते हैं.
उज्जैन जंक्शन रेलवे स्टेशन उज्जैन का मुख्य रेलवे स्टेशन है जो भारत के सभी प्रमुख रेलवे स्टेशनों से जुड़ा है. पर्यटक उज्जैन से इंदौर, दिल्ली, पुणे, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, जम्मू, भोपाल, जयपुर, वाराणसी, गोरखपुर, रतलाम, अहमदाबाद, बड़ौदा, ग्वालियर, हैदराबाद, बैंगलोर और अन्य कई बड़े शहरों के लिए सीधी रेलगाडिय़ाँ ले सकते हैं.

प्राकृतिक सौंदर्य से भरा है भोपाल का वनविहार

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के बडे तालाब के पास पहाडी पर स्थित वन विहार लोगों के आकर्षण का विशेष स्थान रहा है. जिस पहाड़ी इन दिनों वन विहार आबाद है वह लगभग तीन दशक पहले वीरान हुआ करती थी जबकि तेजी से बढ़ रही आबादी और पहाड़ो पर लोगों के बेतरतीब कब्जे से यहॉं का जंगल बरबाद होने की कगार पर था . तब एैसे में वर्ष 1981 में इस पहाडी के वनक्षेत्र का संरक्षण का काम शुरू हुआ और जल्दी ही यह पहाडी हरी भरी होने लगी. 26 जनवरी 1983 को पहाडी एवं उसके आस-पास के 445.21 हे. क्षेत्र को राष्ट्ीय उद्यान का दर्जा देकर वन विहार नाम दिया गया.
वन विहार में भोपाल के बडे तालाब का कुछ भाग (लगभग 50 हे.) भी वन विहार का हिस्सा है, जो कि सारे परिदृश्य को मनोरम बनाता है. तालाब के जल विस्तार में अठखेलियॉं करती लहरें, यहां-वहां उडते जल पक्षी और तालाब में पर्यटकों को विहार कराती नौकायें एव अद्भुत सौंदर्य की रचना करती हैं. शाम के समय बडे तालाब के पार अस्त होते हुये सूर्य को देख्नना अपने आप में एक रोमांचकारी अनुभव है.
वन विहार में काफी संख्या में वन्यप्राणी हैं जिनमें सांभर, चीतल, नीलगाय, कृष्णमृग, लंगूर, जंगली सुअर, सेही, खरगोश आदि खुले में घूमते हैं. जबकि मांसाहारी वन्यप्राणी बडे-बडे बाडों में रखे गए है.
यहां पर बाघ,सिंह, तेंदुआ, भालू, हायना, सियार, गौर, बारासिंगा, सांभर, चीतल, नीलगाय, कृष्णमृग, लंगूर, जंगली सुअर, सेही, खरगोश, मगर, घडियाल, कछुआ एवं विभिन्न प्रकार के सर्प आदि हैं.
कैसे पहुंचे
देश के लगभग सभी छोटे-बड़े स्थानों से मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल जुड़ी हुई है. जहां के बड़े रेलवे स्टेशन से लगभग लगभग 08 कि.मी. तथा हबीबगंज रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी लगभग 6.5 कि.मी.है यहां तक ऑटो एवं टेक्सी के द्वारा पहुंचा जा सकता है.
सडक़ मार्ग यहां वन्य प्राणियों को नजदीक से निहारने के लिए पर्यटक स्वयं के वाहन से अथवा ऑटो एवं टेक्सी के द्वारा आ सकते हैं. उधर, वायु मार्ग द्वारा भी भोपाल के राजाभोज विमान तल से लगभग 17 कि.मी. का टेक्सी से सफर कर यहां पहुंचा जा सकता है . भोपाल देश के दोनों बड़े नगरों औद्योगिक राजधानी मुंबई एवं दिल्ली से वायु मार्ग के द्वारा नियमित सेवा से जुड़ा है.