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मराठा मोर्चे की विराट मूक रैली का संदेश…
(अजित वर्मा)
इसी माह के प्रारम्भ में 9 अगस्त को मुम्बई में निकली मराठा मोर्चे की रैली की चर्चा अब तक हो रही है। बिना किसी नेता के निकली लगभग 8 लाख लोगों की यह विराट अनुशासित रैली एक इतिहास रच गई है और लोकतंत्र में अपनी बात रखने के प्रभावी तरीके का उदाहरण भी पेश कर गई है। मुम्बई के भायखला स्थित जीजामाता उद्यान (रानीबाग) से कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में निकली यह मूक रैली निकाली आजाद मैदान पर जाकर समाप्त हुई। इस दौरान शहर के कई इलाकों में भारी ट्रैफिक जाम लग गया। मराठा मोर्चे की वजह से मुंबई में ट्रैफिक जाम के कारण स्कूली बच्चे ट्रैफिक जाम में न फंसें इसलिए एक दिन के लिए दक्षिण मुंबई के सायन, माहिम, दादर, वरली व भायखला के लगभग स्कूलों को बंद रखा गया था।
सड़कों पर जब मराठा समाज की रैली निकली तब पूरी सड़क भगवामय हो गई। राय में मराठा करीब 30 फीसदी हैं और वे सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग कर रहे हैं। मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान और अन्य प्रदेशों में बसे मराठा समाज के लोग भी मोर्चे में शामिल होने के लिए मुंबई पहुंचे। पिछले साल जुलाई महीने में अहमदनगर जिले के कोपर्डी गांव में मराठा समुदाय की 14 वर्षीय लड़की से बलात्कार और उसकी नृशंस हत्या की घटना के बाद मराठा समाज ने 9 अगस्त 2016 में औरंगाबाद से इस तरह के मूक मोर्चे की शुरुआत की थी। उसके बाद राय भर में मराठा समाज के लोग अब तक 57 मोर्चे निकाल चुके हैं। इन मोर्चों के जरिए साल भर में सकल मराठा समाज को एक सूत्र में बांधने के बाद यह 58 वां मोर्चा राजधानी मुंबई में सरकार को जगाने के लिए निकाला गया।
मोर्चे को कई सामाजिक संगठनों, गणेशोत्सव मंडल, दही-हंडी मंडल, मुंबई के डिब्बेवाले, शिवाजी मुस्लिम ब्रिगेड समेत दलित संगठनों ने भी समर्थन दिया. दूसरी ओर मराठा समाज को राय के मुस्लिम समाज के कई संगठनों ने भी समर्थन दिया। महाराष्ट्र विधानसभा के बाहर शिवसेना, कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विधायकों ने भी मराठा समुदाय की आरक्षण और अन्य मांगों के समर्थन में प्रदर्शन किया। सभी पार्टियां मराठा समुदाय को आरक्षण देने के पक्ष में रही है।इनकी मांगों को देखते हुए राय सरकार ने मंत्रियों और विपक्षी नेताओं की एक समिति बनाने का फैसला किया है। सरकार ने कहा है कि यह समिति मराठा समाज के प्रतिनिधियों से वार्ता करेगी और कोई हल निकालेगी। रैली की बात महत्वपूर्ण है सिर्फ इसलिए है कि बिना नेता के थी, मूक थी अनुशासित थी। बल्कि यादा महत्वपूर्ण अब यह देखना होगा कि सरकार इस विराट लोकतांत्रिक प्रदर्शन का प्रतिफल प्रदर्शनकारियों को क्या देती है। यह सच है कि आरक्षण का मामला सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से बाधित है। लेकिन हम यह देखना चाहेंगे कि लोकतंत्र में जनमत को सर्वोच्च वरीयता मिल पाती है या नहीं?

तलाक का रास्ता घुमावदार लेकिन राहतभरा
– डॉ हिदायत अहमद खान
विवाह संबंध विच्छेद करने को तलाक कहा जाता है और इसलिए इसे न तो ईश्वर पसंद करता है और न ही उसके सच्चे बंदे ही इसे पसंद करते हैं। वैसे भी इस्लाम के प्रारंभिक दौर से ही सभ्य मुस्लिम समाज ने तलाक को नापसंद किया है। यही वजह है कि समाज में तलाकशुदा औरत और मर्द को अच्छी निगाहों से भी नहीं देखा जाता रहा है। सभ्य पढ़े-लिखे समाज में विवाह संबंध को अंतिम क्षणों तक बनाए रखने और विवादों का हल आपसी बात-चीत व सुलह से करने का हुक्म दिया जाता है। अगर ऐसा नहीं कर सकते तो समझदार, मान्य लोगों को जिन्हें शरियत की भी जानकारी होती है से अपने विवाद को सुलझाने की गुजारिश करने की सलाह दी जाती है। बावजूद इसके जब पति और पत्नी का एक साथ, एक जगह शांतिपूर्वक रहना मुमकिन नहीं रह गया हो तो कानून के मुताबिक तलाक लेने की बात सामने आती है। इसके पीछे जो सोच काम करती है वह यह कि जब पति और पत्नी किन्हीं वजहों से साथ रहने को तैयार नहीं होते और जोर-जबरदस्ती करते हैं तो घर में क्लेश और हिंसा शुरु हो जाती है। ऐसे में किसी एक पक्ष को लगातार प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। तब मानसिक और जिस्मानी हिंसा के कारण उसका जीवन दूभर हो जाता है। अत: मानवता के नाते कोई भी पक्ष हत्या या आत्महत्या जैसा जुर्म करने की दिशा में आगे न बढ़ने पाए दोनों पक्षों को अलग होकर रहने और अपनी-अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरु करने की आजादी देने की व्यवस्था के तहत तलाक को मान्य किया जाता है। इसकी अनेक शर्तें और कानून हैं, जिन्हें समय-समय पर वैचारिक धरातल पर रखा जाता रहा है, लेकिन इसका सबसे दु:खद और कष्टकारी जो पक्ष है वो यह कि पति के द्वारा अपने फायदे के लिए एक ही समय में तीन तलाक का इस्तेमाल करना और पत्नी को होने वाली तकलीफ को बिना जाने उसे अपने जीवन से बाहर का रास्ता दिखा देना है। यह किसी की हत्या कर देने से भी क्रूर कृत्य कहा जा सकता है। बिना जुल्म सजा पाने वाली पत्नी तो मानों इससे जीते जी मार दी जाती है। वह पति के घर से एक जिंदा लाश की तरह निकलती है, जिसे समाज में बैठे भेड़िये नोंच-नोंच कर खाने को आतुर नजर आते हैं। ऐसे तलाक की प्रथा को रोकने और उस पर लगाम लगाए रखने के लिए अनेक बैरियर्स भी बनाए गए और बताया गया कि नशे की हालत में, गुस्से के वक्त में, बिना किसी बड़ी वजह के, वक्ती नोंक-झोंक या गाली-गलौच आदि छोटी-मोटी वजहों के चलते तलाक देना सही नहीं माना जा सकता है। इसलिए समय-समय पर इसके खिलाफ आवाजें बुलंद होती रहीं, हद तब हो गई जबकि संगठनात्मक तौर पर महिलाओं ने सड़कों पर आंदोलन तक कर दिया। उत्तराखंड निवासी शायरा बानों ने तीन तलाक मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना उचित समझा और फरवरी 2016 में उन्होंने इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाली महिला के रुप में सामने आईं। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को समझा और याचिका स्वीकार करते हुए सुनवाई भी की और अंतत: फैसला सुनाते हुए एक साथ तीन तलाक कह कर विवाह संबंध खत्म करने की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया। पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने इस प्रथा को पवित्र कुरान के सिद्धांतों के खिलाफ और इस्लामिक शरिया कानून का उल्लंघन करार दिया है। यही वजह है कि पांच सदस्यीय पीठ में तीन जजों के बहुमत से तलाक-ए-बिद्दत को निरस्त किया गया और सरकार को इसमें दखल देते हुए छह महीने में एक कानून बनाने का आदेश भी पीठ ने दे दिया है। इस प्रकार जहां इस फैसले से तलाक की मार सह रही महिलाओं ने राहत की सांस ली है तो वहीं इस मुद्दे को राजनीतिक मामला बनाने वालों के तमाम रास्ते भी बंद कर दिए गए हैं। इसलिए सवाल उठ रहे हैं कि कोर्ट के इस आदेश को लागू करना सरकार के लिए चुनौती तो साबित नहीं होगा? चूंकि अदालत में सुनवाई के दौरान ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी तीन तलाक के खिलाफ नियम बनाने की बात कही थी तो इस पर कोई आपत्ति वाली बात भी नहीं होना चाहिए, लेकिन सवाल यही है कि क्या केंद्र वाकई अब इस पर कानून बनाते हुए तीन तलाक देने वाले पुरुषों को किसी कठोर सजा के दायरे में लाएगा? जब तक यह प्रावधान सामने नहीं आता तब तक इसका प्रभाव देखने को समाज में नहीं मिलेगा, सिर्फ विवादित मामले ही बढ़ेंगे और दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हुए कजियात और फिर अदालतों के चक्कर लगाते नजर आएंगे, जो कि पहले से होता चला आ रहा है। अत: सभी की निगाहें इस समय केंद्र पर जाकर टिक गई हैं, जिसकी जिम्मेदारी बनती है कि वह अदालती आदेश के तहत कानून बनाने का काम जल्द से जल्द करे और राजनीति करने के फेर में न पड़े। वैसे भी सभी यही चाहते हैं कि तलाक यानी विवाह संबंध विच्छेद का रास्ता घुमावदार और पैंचीदा जरुर हो, लेकिन दोनों ही पक्षों को राहत प्रदान करने वाला ही होना चाहिए।

 

भाजपाध्यक्ष का भोपाल दौरा नसीहत…… नसीहत और सिर्फ नसीहत.
– ओमप्रकाश मेहता
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित भाई शाह की तीन दिवसीय भोपाल यात्रा को यदि ‘नसीहत यात्रा’ कहा जाए तो कतई गलत नहीं होगा, उन्होंने अपनी तेरह बैठकों में मंत्रियों, विधायकों और नेताओं की न सिर्फ नसीहतें दी बल्कि प्रधानमंत्री जी की तर्ज पर धमकी भी दी कि ‘‘अभी समय है सुधर जाओं वर्ना पार्टी टिकट नहीं देगी’’। अपनी नसीहत में भाजपाध्यक्ष ने यह भी कहा कि पार्टी का चेहरा (प्रधानमंत्री) तो सुंदर है, बाकी चाल और चरित्र आपकों सुधारना है। भाजपाध्यक्ष की इस यात्रा के दौरान अमित शाह के लिए सबसे अधिक आश्चर्यजनक मुद्दा 75 वर्ष की आयु के बाद मंत्री-विधायकों व अन्यों को हटाने का रहा, इसी के तहत भाजपा के वरिष्ठतम नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर व सरताज सिंह जी को मंत्री पद से हटा दिया गया था और यह सब शाह के ही निर्देश बताकर किया गया था, जबकि शाह ने स्वयं यहां स्पष्ट किया कि ऐसा कोई न तो उन्होंने कभी आदेश दिया और न ही ऐसा कोई प्रतिबंध है, 75 की उम्र के बाद भी चुनाव में उम्मीदवारी दी जा सकती है। उन्होंने यह भी बोला कि केबीनेट में किसे रखना या निकालना मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार होता है।
अमित शाह की एक पुरानी आदत यह जरूर है कि वे जिस राज्य के दौरे पर जाते है, उसका ‘फीडबैक’ पहले से ले लेते है, इसलिए इसी ‘फीडबैक’ के आधार पर उन्होंने मुख्यमंत्री व प्रदेशाध्यक्ष के ‘सिरदर्द’ बने मंत्रियों, विधायकों व नेताओं को नसीहतें दी और वे भी अत्यंत कड़े शब्दों में, साथ ही हर कार्यक्रम में मुख्यमंत्री व प्रदेशाध्यक्ष की तारीफें भी की। भाजपाध्यक्ष के इस रवैये से स्वाभाविक रूप से वे शख्स परेशान हो गए, जो अगले साल विधानसभा चुनावों के बाद अपना उज्जवल भविष्य की कल्पना कर रहे थे।
भाजपाध्यक्ष के इस तीन दिवसीय दौरे का मुख्य उद्देश्य मध्यप्रदेश को ‘कांग्रेस मुक्त’ करने के उनके लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्रार्टी व नेताओं को हर तरीके से तैयार करना था और उसमें वे कुछ हद तक सफल भी रहे। उन्होंने यहां तक कहा कि साम-दाम-दण्ड-भेद किसी भी तरीके से पार्टी को विधानसभा की मौजूदा 230 सीटों में से दो सौ से अधिक पर जीत दर्ज करानी है, साथ ही यह भी कहा कि कांग्रेस की जीत का आंकड़ा दहाई तक भी नहीं पहुंच पाए, ऐसे प्रयास होने चाहिए। फिर इसके लिए चाहे कुछ भी क्यों न करना पड़े?
अमित शाह का तीनों दिन ‘मूड’ कुछ उखड़ा-उखड़ा सा रहा, इसी के चलते उन्होंने न सिर्फ भरी बैठक में एक दलित मंत्री की अपमानजनक शब्दों के साथ बेईज्जती कर दी बल्कि एक-दो वरिष्ठ नेताओं को डांटकर चुप करा दिया। यहीं रवैया उनका पत्रकारवार्ता के दौरान भी रहा, जहां पूर्व चयनित प्रश्नों के जवाब दिए बाकी विवादास्पद प्रश्नों पर मौंन साध लिया। इसके साथ ही इस पूरी यात्रा के दौरान शाह ने मुस्लिमों से दूरी बनाकर रखी। इस दौरान उन्होंने कुछ चर्चित राष्ट्रीय मुद्दों पर भी अपना पक्ष रखा, उन्होंने कहा कि नोटबंदी से नाराज जनता की नाराजी की उन्हें चिंता है, साथ ही जहां तक कश्मीर से धारा-370 हटाने का सवाल है, फिलहाल केन्द्र या पार्टी के पास ऐसा कोई मुद्दा नहीं है और न ही ऐसे किसी मुद्दे पर विचार-विमर्श ही हो रहा है। यद्यपि इस पूरी यात्रा के दौरान उन्होंने संघ पदाधिकारियों को भरोसा अवश्य दिया कि ‘‘सब कुछ ठीक हो जाएगा’’। उल्लेखनीय है कि भाजपा के 2014 के चुनावी घोषणा-पत्र में कश्मीर से धारा-370 खत्म करने और निर्वासित कश्मीरी पंडितों को वापस कश्मीर में बसाने का मुद्दा शामिल था।
यहां यह काबिल-ए-गौर है कि इस तकल्लुफी भरे ‘मूड’ के बाद भी भाजपाध्यक्ष हर कार्यक्रम व हर बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी की खासीयतें बताना नहीं भूले, उनका कहना था कि आज देश में जो शांति व सद्भाव का माहौल है, उसके सूत्रधार मोदी जी है, मोदी जी है, जिन्होंने तीन साल के कार्यकाल में पचास से भी अधिक देशहित के बड़े फैसले लिए।
भाजपाध्यक्ष ने अपना तल्खी भरा रूप भोपाल की सीमा में प्रवेश करते ही यह कहकर उजागर कर दिया था कि ‘‘मैं यहां सम्मान कराने या भाषण सुनने-सुनाने नहीं आया हूँ, मेरी यात्रा का मुख्य उद्देश्य इस प्रदेश को ‘कांग्रेस मुक्त’ करने का है, और इसी में सभी का भरपूर सहयोग चाहिये’’। साथ ही उन्होंने एक ओर जहां हर कही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की तारीफ की, वहीं यह भी कहा कि ‘‘मध्यप्रदेश में अधिकारी तंत्र सरकार पर हावी है।’’
भाजपाध्यक्ष की यात्रा के दौरान पूरे समय उनके नाराजी भरे तैवरों के कारण सामान्य तो क्या सांसद तक उनसे अपने दिल की बात व शिकायतों का ब्यौरा बता नहीं पाए, यहीं नहीं सामान्य कार्यकर्ताओं को तो उन तक पहुंचने ही नहीं दिया गया।
भाजपाध्यक्ष का यह दौरा पार्टी के लिए कितना ‘फलदायी’ सिद्ध होता है, यह तो भविष्य के गर्भ में है, किंतु यह सही है कि तीन दिनी अनवरत मशक्कत से मुख्यमंत्री, प्रदेशाध्यक्ष सहित पदाधिकारी इतना थक गए कि भाजपाध्यक्ष के विदा होते ही इन्होंने चैन की सांस ली और आराम की मुद्रा में चले गए। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, उन्हें भी शाह के जाने के बाद इस बात की तसल्ली मिली कि उनके सभी विधायक फिलहाल पार्टी में ही सही-सलामत है।

भाजपाध्यक्ष का भोपाल दौरा नसीहत…… नसीहत और सिर्फ नसीहत.
– ओमप्रकाश मेहता
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित भाई शाह की तीन दिवसीय भोपाल यात्रा को यदि ‘नसीहत यात्रा’ कहा जाए तो कतई गलत नहीं होगा, उन्होंने अपनी तेरह बैठकों में मंत्रियों, विधायकों और नेताओं की न सिर्फ नसीहतें दी बल्कि प्रधानमंत्री जी की तर्ज पर धमकी भी दी कि ‘‘अभी समय है सुधर जाओं वर्ना पार्टी टिकट नहीं देगी’’। अपनी नसीहत में भाजपाध्यक्ष ने यह भी कहा कि पार्टी का चेहरा (प्रधानमंत्री) तो सुंदर है, बाकी चाल और चरित्र आपकों सुधारना है। भाजपाध्यक्ष की इस यात्रा के दौरान अमित शाह के लिए सबसे अधिक आश्चर्यजनक मुद्दा 75 वर्ष की आयु के बाद मंत्री-विधायकों व अन्यों को हटाने का रहा, इसी के तहत भाजपा के वरिष्ठतम नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर व सरताज सिंह जी को मंत्री पद से हटा दिया गया था और यह सब शाह के ही निर्देश बताकर किया गया था, जबकि शाह ने स्वयं यहां स्पष्ट किया कि ऐसा कोई न तो उन्होंने कभी आदेश दिया और न ही ऐसा कोई प्रतिबंध है, 75 की उम्र के बाद भी चुनाव में उम्मीदवारी दी जा सकती है। उन्होंने यह भी बोला कि केबीनेट में किसे रखना या निकालना मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार होता है।
अमित शाह की एक पुरानी आदत यह जरूर है कि वे जिस राज्य के दौरे पर जाते है, उसका ‘फीडबैक’ पहले से ले लेते है, इसलिए इसी ‘फीडबैक’ के आधार पर उन्होंने मुख्यमंत्री व प्रदेशाध्यक्ष के ‘सिरदर्द’ बने मंत्रियों, विधायकों व नेताओं को नसीहतें दी और वे भी अत्यंत कड़े शब्दों में, साथ ही हर कार्यक्रम में मुख्यमंत्री व प्रदेशाध्यक्ष की तारीफें भी की। भाजपाध्यक्ष के इस रवैये से स्वाभाविक रूप से वे शख्स परेशान हो गए, जो अगले साल विधानसभा चुनावों के बाद अपना उज्जवल भविष्य की कल्पना कर रहे थे।
भाजपाध्यक्ष के इस तीन दिवसीय दौरे का मुख्य उद्देश्य मध्यप्रदेश को ‘कांग्रेस मुक्त’ करने के उनके लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्रार्टी व नेताओं को हर तरीके से तैयार करना था और उसमें वे कुछ हद तक सफल भी रहे। उन्होंने यहां तक कहा कि साम-दाम-दण्ड-भेद किसी भी तरीके से पार्टी को विधानसभा की मौजूदा 230 सीटों में से दो सौ से अधिक पर जीत दर्ज करानी है, साथ ही यह भी कहा कि कांग्रेस की जीत का आंकड़ा दहाई तक भी नहीं पहुंच पाए, ऐसे प्रयास होने चाहिए। फिर इसके लिए चाहे कुछ भी क्यों न करना पड़े?
अमित शाह का तीनों दिन ‘मूड’ कुछ उखड़ा-उखड़ा सा रहा, इसी के चलते उन्होंने न सिर्फ भरी बैठक में एक दलित मंत्री की अपमानजनक शब्दों के साथ बेईज्जती कर दी बल्कि एक-दो वरिष्ठ नेताओं को डांटकर चुप करा दिया। यहीं रवैया उनका पत्रकारवार्ता के दौरान भी रहा, जहां पूर्व चयनित प्रश्नों के जवाब दिए बाकी विवादास्पद प्रश्नों पर मौंन साध लिया। इसके साथ ही इस पूरी यात्रा के दौरान शाह ने मुस्लिमों से दूरी बनाकर रखी। इस दौरान उन्होंने कुछ चर्चित राष्ट्रीय मुद्दों पर भी अपना पक्ष रखा, उन्होंने कहा कि नोटबंदी से नाराज जनता की नाराजी की उन्हें चिंता है, साथ ही जहां तक कश्मीर से धारा-370 हटाने का सवाल है, फिलहाल केन्द्र या पार्टी के पास ऐसा कोई मुद्दा नहीं है और न ही ऐसे किसी मुद्दे पर विचार-विमर्श ही हो रहा है। यद्यपि इस पूरी यात्रा के दौरान उन्होंने संघ पदाधिकारियों को भरोसा अवश्य दिया कि ‘‘सब कुछ ठीक हो जाएगा’’। उल्लेखनीय है कि भाजपा के 2014 के चुनावी घोषणा-पत्र में कश्मीर से धारा-370 खत्म करने और निर्वासित कश्मीरी पंडितों को वापस कश्मीर में बसाने का मुद्दा शामिल था।
यहां यह काबिल-ए-गौर है कि इस तकल्लुफी भरे ‘मूड’ के बाद भी भाजपाध्यक्ष हर कार्यक्रम व हर बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी की खासीयतें बताना नहीं भूले, उनका कहना था कि आज देश में जो शांति व सद्भाव का माहौल है, उसके सूत्रधार मोदी जी है, मोदी जी है, जिन्होंने तीन साल के कार्यकाल में पचास से भी अधिक देशहित के बड़े फैसले लिए।
भाजपाध्यक्ष ने अपना तल्खी भरा रूप भोपाल की सीमा में प्रवेश करते ही यह कहकर उजागर कर दिया था कि ‘‘मैं यहां सम्मान कराने या भाषण सुनने-सुनाने नहीं आया हूँ, मेरी यात्रा का मुख्य उद्देश्य इस प्रदेश को ‘कांग्रेस मुक्त’ करने का है, और इसी में सभी का भरपूर सहयोग चाहिये’’। साथ ही उन्होंने एक ओर जहां हर कही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की तारीफ की, वहीं यह भी कहा कि ‘‘मध्यप्रदेश में अधिकारी तंत्र सरकार पर हावी है।’’
भाजपाध्यक्ष की यात्रा के दौरान पूरे समय उनके नाराजी भरे तैवरों के कारण सामान्य तो क्या सांसद तक उनसे अपने दिल की बात व शिकायतों का ब्यौरा बता नहीं पाए, यहीं नहीं सामान्य कार्यकर्ताओं को तो उन तक पहुंचने ही नहीं दिया गया।
भाजपाध्यक्ष का यह दौरा पार्टी के लिए कितना ‘फलदायी’ सिद्ध होता है, यह तो भविष्य के गर्भ में है, किंतु यह सही है कि तीन दिनी अनवरत मशक्कत से मुख्यमंत्री, प्रदेशाध्यक्ष सहित पदाधिकारी इतना थक गए कि भाजपाध्यक्ष के विदा होते ही इन्होंने चैन की सांस ली और आराम की मुद्रा में चले गए। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, उन्हें भी शाह के जाने के बाद इस बात की तसल्ली मिली कि उनके सभी विधायक फिलहाल पार्टी में ही सही-सलामत है।

ट्रंप का ट्रंप-कार्ड क्या है ?
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
अमेरिका के किसी भी राष्ट्रपति ने अपने पद की गरिमा इतनी जल्दी नहीं गिराई, जितनी पिछले 7-8 महिने में डोनाल्ड ट्रंप ने गिरा ली है। ट्रंप की सरकार के सबसे मजबूत स्तंभ ढह चुके हैं। उनके महत्वपूर्ण मंत्री, सर्वोच्च अधिकारी, सर्वोच्च रणनीतिकार, न्यायाधीश और उनकी सलाहकार समितियों में शामिल प्रसिद्ध व्यवसायी और कलाकारों ने इस्तीफे दे दिए हैं। उनमें से कुछ ने यह भी कहा है कि ट्रंप ने खुद को खत्म कर लिया है। अमेरिका के राष्ट्रपति के तौर पर उनकी अवधि पूरी हो चुकी है। यों भी ट्रंप के चुनाव में रुस की भूमिका के कारण वे काफी बदनाम हो चुके हैं। उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के विरोध के कारण उनका चिकित्सा संबंधी ओबामा-विरोधी विधेयक भी लटक गया। अब वर्जीनिया के शहर शार्लोट्सविल में दो गुटों के बीच हुई मुठभेड़ ने ट्रंप के लिए मुसीबतों का पहाड़ खड़ा कर दिया है। ट्रंप विरोधियों ने बोस्टन में 40 हजार लोगों की भीड़ जमा करके ट्रंप की निंदा की है, क्योंकि उन्होंने शार्लोट्सविल में रंगभेदी, नव—नाजी और उग्र ईसाई संगठनों की कड़ी आलोचना नहीं की थी। इन गिरोहों ने उन प्रदर्शनकारियों पर हमला बोल दिया था, जो रंगभेद का विरोध कर रहे थे। ट्रंप ने दोनों पर एक समान दोष मढ़कर उग्रवादियों को गुप्त समर्थन दे दिया था। अब जबकि ट्रंप की कटु आलोचना उनके अपने लोग कर रहे हैं तो वे कुछ दृढ़ता दिखा रहे हैं लेकिन उसका कोई असर नहीं हो रहा है। लोग यह मान रहे हैं कि ट्रंप को इन उग्रवादियों ने उनके चुनाव के वक्त समर्थन दिया था। वे इसी का कर्ज चुका रहे हैं। इस तरह ट्रंप उन सब आदर्शों को भस्मसात कर रहे हैं, जो अमेरिका के संस्थापकों ने कायम किए थे। इसके बावजूद रिपब्लिकन पार्टी में ट्रंप के समर्थकों की संख्या काफी बड़ी है। इसीलिए ट्रंप देशी और विदेशी मामलों में बेलगाम होते जा रहे हैं। उन्हें हिटलर का अनुयायी कहा जा रहा है। हो सकता है कि ट्रंप उस अमेरिका की आवाज़ बन गए हैं, जो वहां के गोरे बहुसंख्यकों के दिल में हैं लेकिन जिसे वे मुंह पर नहीं लाते। गोरे अमेरिका के अचेतन मन को सहलाकर ही ट्रंप चुनाव जीते हैं। वे उसी तुरुप के पत्ते को अपना ब्रह्मास्त्र बनाए हुए हैं। पता नहीं, यह ट्रंप-कार्ड कब तक चलेगा ?

भोपाल नगर निगम दूध देने वाली गाय !
(डॉक्टर अरविन्द जैन)
देश और प्रदेश में शासन और प्रशासन के चार स्तम्भ होते हैं जैसे न्याय पालिका, कार्य पालिका, विधायिका और पत्रकारिता। इसी प्रकार नगर निगम में भी चार पाए होते हैं जिन्हे हम चौपाया कहते हैं। मेयर —- प्रशासनिक अधिकारी —- कर्मचारी — जनता जनार्दन या इससे उल्टा जनता जनार्दन —-कर्मचारी ——अधिकारी —– मेयर। यह प्रक्रिया होती हैं। सरकार का स्थानीय शासन में इनका महत्वपूर्ण भागीदारी होती हैं। इनका काम अपने क्षेत्र में स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी, साफ़ सफाई सड़क, विकास का कार्य करना और सबसे प्रमुख नए निर्माण की अनुमति देना। इसके अलावा कोई भी काम इनके अधिकार क्षेत्र के अंतरगत आने पर करना। मेयर, पार्षद और अध्यक्ष, विपक्ष का नेता इनके ऊपर पूरा प्रशासन, कर्मचारी और जनता का गुरुतर भार होता हैं।
इनके पास सरकार से और इनके स्वयं के संसाधन से जैसे विभिन्न प्रकार के कर से आमदनी होती हैं और उनके द्वारा जनता की कठिनाइयों का निराकरण होता हैं, और अमन कहीं स्थापित होता हैं। जितना बड़ा क्षेत्र उतनी बड़ी आमदनी और उतना अधिक सेवा और उतनी अधिक विकास सबका जैसे कर्मचारियों का अफसर और मेयर आदि का ! न केवल पद का उसके साथ अर्थ का होता हैं। सबका विकास अर्थात सब अर्थवान हो। कारण मुखिया मुख सो चाहिए, खानपान सो एक, पालन पोंसे सकल अंग !
आजकल नगर निगम में डीज़ल काण्ड के कारण यह लेख लिखना पड़ रहा हैं, वास्तव में हमारे देश के नेताओं, अफसरों का पाचन तंत्र बहुत अच्छा हैं। उनको अनपच की शिकायत नहीं होती, जैसे रेल गाड़ी, कुआँ तालाब का गुमना, लोहा, सीमेंट का खाना, चारा तो मामूली बात हैं प्याज की क्या औकात, आप अभी होशंगाबाद की ओर जाओ रास्ते में प्याज़ सड़ रही हैं वहां से आप बिना नाक बंद किये नहीं गुज़र सकते। यदि नाक बंद नहीं की तो आप के गुजरने के अवसर हैं और धन्य हैं वहां के निवासी। नगर निगम तो पानी का बजट कैसे ख़तम करती हैं पता नहीं पर उनके टैंकर और उस क्षेत्र के पार्षद बेचारे दिन रात जनता के हितार्थ दिन रात मेहनत करते हैं और अफसर और मेयर बड़े बड़े पुलों, बी आर टी एस जैसे कार्य अपने हाथ में लेते हैं उनको पानी आदि से कोई विशेष रूचि नहीं, इसीलिए उनकी नाक के नीचे करोड़ों रुपयों का डीज़ल पेट्रोल और वाहनों के खरीदी और उनके पार्ट्स की खरीदी में करोड़ों का खरच होना कोई बड़ी बात नहीं। !
इतनी अराजकता होने के बाद भी मेयर और कमिश्नर को पता नहीं कारण उनको इन छोटी बातों पर ध्यान देने का समय नहीं हैं !आखिर उनका पैसा थोड़ी ही खरच होता हैं जनता का होता हैं। कर न चुकाने पर सरचार्ज लग जाता हैं और इतना व्यय होने पर कोई ध्यान नहीं। क्या ये आकंड़े पर्याप्त नहीं हैं की अपर आयुक्त की गाड़ी तीन माह में ६३०० किलोमीटर चली और डीज़ल लिया २५००० किलोमीटर का, इसमें कोई आश्चर्य नहीं कारण अफसर के ऊपर उनका परिवार, नाते रिश्तेदार भी तो आश्रित होते हैं और फ्री का माल तो खाओ मन माफिक ऐसा सब जगह हैं। यह भंडारा होता हैं बेचारे पकडे गए नहीं तो बहती नदी में दुनिया हाथ धोती हैं।
वैसे नगर निगम में सफाई कर्मचारियों की गिनती करना बहुत मुश्किल जितना वेतन बांटता हैं उससे कम कर्मचारी पर चलता हैं। जब गंगोत्री ही अपवित्र हैं तो गंगा कहाँ तक पवित्र होंगी। चारों अंगों में इतना सामंजस्य रहता हैं की कभी कभी आपसी लड़ाई से ये काण्ड उजागर होते हैं नहीं तो कोई का क्या मतलब। हम नागरिकों को समाचार पत्र के द्वारा जानकारी मिल जाती हैं वरन कोई की क्या मज़ाल कुछ पता चल जाए।
ऐसी घटनाएं होने से सरकार की घोषणाओं का कोई मतलब नहीं ! ऊपर से भ्रष्टाचार मुक्त भारत और कदम कदम पर भ्रष्टाचार ! कितने काण्ड बताएं। कांडों का वर्णन रामायण में होने से यह परम्परा उतनी ही पुराणी होना चाहिए जैसे बाल काण्ड, लंका काण्ड, सुन्दर काण्ड वैसे ही प्याज काण्ड, डीज़ल काण्ड, डम्पर काण्ड आदि आदि।
इसका महत्वपूर्ण कारण यह हैं की नगर निगम में जो प्रतिनियुक्तिओं पर आते हैं वे शायद भूखी मख्खी जैसे होते हैं तो खूब खून चूसते हैं और जब अजीर्ण होने लगा या उलटी होने लगी तो तत्काल इलाज़ के लिए अन्य या अपने मूल विभाग में चले जाते हैं। जैसे अंग्रेजों ने अपने देश का खून चूस कर, सोख कर चले गए वैसे ही यह विभाग होता हैं। जहाँ पर शोषण के लिए अधिकांश आते हैं
नगर निगम हमारे शहर का गौरव होता हैं। उसके गौरव के लिए हमें स्वच्छता, साफ सफाई के साथ नियमों का पालन कर अपने आपकोगौरवन्वित होनाचाहिए। इस प्रकार की अनियमितता सहनीय नहीं हैं दोषियों के ऊपर कठोरतम कार्यवाही होना चाहिए कारण यह राशि हम जनता के द्वारा दिए गए करों के माध्यम से एकत्रित की जाती जाती जो कदापि क्षम्य नहीं हैं। औरयदि नहीं होती हैं तो इसका मतलब इसमें मेयर, अध्यक्ष, कमिश्नर आदि लिप्त हैं तो राज्य शासन को इस पर ध्यान देकर उचित जांच कराना चाहिए क्योंकि यह जनता के धन की चोरी हैं, इसलिए तो नगर निगम लाभकारी जगह रहती हैं सबके लिए। कोई ऑडिटर नहीं हैं इनके ऊपर जांच के लिए। सं स्वयंभू नेता होते हैं यहाँ!

वंदे-मातरम् इस्लाम-विरोधी नहीं
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
औरंगाबाद की नगर निगम में वंदे मातरम् को लेकर धक्का-मुक्की हो गई। असदुद्दीन औवेसी की पार्टी मजलिस-ए-इत्तहादुल मुसलमीन और भाजपा-शिवसेना के पार्षद आपस में भिड़ गए। कुछ मुसलमान यह मानकर चलते हैं कि वंदे मातरम् को गाना इस्लाम-विरोधी कार्य है। मेरी राय है कि यह खालिस गलतफहमी है। यह मुस्लिम लीग ने फैलाई थी। खुद मुहम्मद अली जिन्ना बड़े उत्साह से वंदे मातरम गाया करते थे लेकिन मुस्लिम लीगी बनने पर वे वंदे-मातरम् के सबसे बड़े विरोधी बन गए। उन्हें तकलीफ थी कि देश के सारे हिंदू और मुसलमान तिरंगे, वंदे मातरम् और गांधी पर लट्टू क्यों हुए जा रहे हैं। 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में जब रवींद्रनाथ ठाकुर ने वंदे मातरम् पहली बार गाया तो उसके अध्यक्ष अंजुमन-ए-इस्लाम के नेता रहमतुल्लाह सयानी थे। 1923 में कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना मुहम्मदअली ने इसका विरोध जरुर किया लेकिन बाकी सभी मुसलमान कांग्रेस अध्यक्षों और भारत के मुसलमान राष्ट्रपतियों ने इसे गाया है, क्योंकि इसमें इस्लाम-विरोधी एक शब्द भी नहीं है। वंदे मातरम में भारत या पृथ्वी को माता जरुर कहा गया है लेकिन अल्लाह या ईश्वर कहीं नहीं कहा गया है और वंदे का अर्थ प्रणाम, नमस्कार, सलाम, सम्मान, प्रशंसा करना आदि है। सिर्फ पूजा-अर्चना करना नहीं है। भारतमाता कोई हाड़-मांस की स्त्री नहीं है कि जिसकी पूजा को हम बुतपरस्ती कह दें। वह वैसे ही एक अवधारणा है, जैसे अल्लाह है। न किसी ने भारतमाता को देखा है, न अल्लाह को देखा है। दोनों ही निराकार हैं। पैगंबर मुहम्मद ने तो यहां तक कहा है कि माता के पैरों तले स्वर्ग होता है। यदि ईश्वर परमपूज्य है तो माता पूज्य भी क्यों नहीं हो सकती ? भारत के आर्यसमाजी तो बुतपरस्ती (मूर्तिपूजा) का मुसलमानों से भी ज्यादा विरोध करते हैं लेकिन वे भी वंदे मातरम् बड़े शौक से गाते हैं। वंदे मातरम यदि हिंदुओं का धार्मिक गीत होता तो आपने हिंदू लोगों को इसे किसी मंदिर, किसी शिवाले, किसी त्यौहार, किसी विवाह-मंडप या श्मशान में गाते हुए कभी सुना क्या ? अफगानिस्तान के पठान अपने देश को ‘मादरे-वतन’ कहते हैं और बांग्लादेश के राष्ट्रगान में चार बार मातृभूमि का उल्लेख है। इंडोनीशिया, तुर्की और सउदी अरब के राष्ट्रगीतों में भी मातृभूमि की सुंदरता और गौरव की गाथा है। क्या ये सब हिंदू राष्ट्र हैं ? वंदे मातरम् में क्या एक शब्द भी ऐसा है, जिसके गाने से किसी मुसलमान की मुसलमानियत में तिल भर भी कमी आती हो ?
(इस विषय पर डॉ. वैदिक का शोधपूर्ण लेख पढ़िए, पुस्तक, ‘भाजपा, हिंदुत्व और मुसलमान’ में)

निजी क्षेत्र के हवाले मेट्रो रेल
-प्रमोद भार्गव
देश के महानगरों में नई मेट्रो रेल लाइन बिछाने व चलाने की जबावदेही केंद्र सरकार ने नीति बनाकर निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित कर दी है। लिहाजा अब यदि कोई राज्य सरकार अपने प्रदेश के नगर में मेट्रो रेल की परियोजना शुरू करना चाहती है तो उसे हर हाल में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल अपनाना होगा। प्रदेशों को अधिकार होगा कि वे किराया निर्धारण और उसके मूल्यांकन के लिए एक स्थायी दर निर्धारण प्राधिकरण स्वतंत्र रूप से बना लें। नई नीति के तहत मेट्रो रेल परियोजनाओं को तीन भागों में विभाजित किया गया है। पहले में केंद्र सरकार कुल खर्च की 10 प्रतिशत राशि परियोजना को देगी। दूसरे में केंद्र और राज्य मिलकर 50-50 फीसदी धन राशि खर्च करेंगे। तीसरे प्रकार की परियोजनाओं में केंद्र की आर्थिक मदद वाले पीपीपी मॉडल परियोजना का अमल करेंगे। लेकिन इन तीनों तरह की परियोजनाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी अनिवार्य होगी। इस नीति ने तय कर दिया है कि केंद्र सरकार धीरे-धीरे भारतीय रेल का निजीकरण करने पर आमादा है।
भारतीय रेल विश्व का सबसे बड़ा व्यावसायिक प्रतिष्ठान है, लेकिन इस ढांचे को किसी भी स्तर पर विश्वस्तरीय नहीं माना जाता। गोया इसकी सरंचना को विश्वस्तरीय बनाने की दृष्टि से कोशिशें तेज जरूर हो गई हैं। सुविधा संपन्न तेज गति की प्रीमियम और बुलेट ट्रेनों की बुनियादी शुरूआत भी हो गई है। स्पेन की मदद से टेल्गो रेल भी चलाए जाने की तैयारी है। अब नई चुनौतियों के रूप में रेल यात्रा को आधिकारिक रूप से सुविधाजनक, सुरक्षित व यात्री फ्रेंडली बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इन सब में सरकार की कोशिश है कि वह निजी पूँजी निवेश जरिए इन्हें अमल में लाए।
इसी नजरिए से रेलवे के विकास से जुड़ी ’एक्सिस कैपिटल की ताजा अध्ययन रिपोर्ट’ आई है। ’रेलवे 360 डिग्री: एक्चुअली व्हाइट हैपेन’ नामक इस अध्ययन रिपोर्ट में रेलवे का 2030 तक का रोडमैप तैयार किया गया है। इसके मुताबिक रेलवे को अब पहले की तरह चलाना संभव नहीं रह गया है। अब इसे नई चुनौतियों के अनुरूप ढालना होगा। इसके तहत रेलों की चाल बढ़ाना, रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण करना और यात्री सुविधाओं में जबरदस्त इजाफा करना शामिल है। चूंकि 2018-19 से 70 फीसदी मालगाड़ियां अलग से बनाए जा रहे ट्रेक पर चलने लग जाएंगी, जिसकी प्रबंधन की जबावदेही रेलवे की ही सहायक संस्था डीएफसीसीएल को सौंप दी जाएगी। मालगाड़ियों से होने वाली कमाई भी इसी संस्था के खाते में जमा होगी। ऐसा शायद इसलिए किया जा रहा है, जिससे माल और यात्रीगाड़ियों से होने वाले लाभ-हानि को अलग-अलग करके दर्शाया जा सके। साफ है, लेखे-जोखे की इस प्रक्रिया से यात्री गाड़ियां घाटे का सौदा दिखने लग जाएंगी और रेलवे को इस घाटे की भरपाई के लिए हर साल यात्री किराए में वृद्धि का बहाना मिल जाएगा। साथ ही मेट्रो समेत नई रेल परियोजनाओं में निजी पूँजी निवेश का वातावरण बन जाएगा। नई मेट्रो नीति इसी मंशा की पर्याय है।
हालांकि इस नीति के बनने के साथ ही इसका विरोध भी शुरू हो गया है। मेट्रोमैन ई श्रीधरण का कहना है कि मेट्रो में पीपीपी मॉडल दुनिया में कहीं भी सफल नहीं हुआ है। कोई भी निजी कंपनी इसमें धन लगाना नहीं चाहेगी, क्योंकि इसमें लाभ की गुंजाइश न्यूनतम है। दरअसल निजी कंपनियां अपने निवेश पर 12 से लेकर 15 फीसदी तक का मुनाफा चाहती हैं। जबकि आज तक दुनिया में किसी भी मेट्रो परियोजना से 2 से 3 प्रतिशत लाभ ही संभव हुआ है। साथ ही प्रशानिक व्यवस्था में पर्याप्त दखल और नौकरियों की भर्ती अपनी इच्छानुसार करना चाहती हैं। इसमें वे आरक्षण सुविधा की भी विरोधी हैं। इस नीति को लागू करने का नुकसान यह होगा कि जो राज्य सरकारें अपने स्तर पर प्रदेश के नगरों में मेट्रो परियोजनाएं लागू कर रही थीं, उसमें यह नीति बाधा बनेगी। लखनऊ, जयपुर और मुंबई में राज्य सरकारों ने अपने बूते ही मेट्रो रेलें शुरू की हैं।
केंद्र सरकार ने यह नीति शायद इसलिए बनाई है, जिससे उसका सिरदर्द कम हो। दरअसल दिल्ली में मेट्रो की सफलता के बाद यह मान लिया गया है कि शहर की परिवहन व्यवस्था का इससे अच्छा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। दूसरे यह जनता को सम्मोहित करने का भी माध्यम बन गई है। इसलिए राज्य का हर मुख्यमंत्री और राजनीतिक दलों ने इसे मतदाताओं को रिझाने का झुनझुना समझ लिया है। इसलिए वे मेट्रो को चुनावी घोषणा पत्र में भी शामिल करने लगे हैं। कई राज्यों ने आनन-फानन में मेट्रो परियोजनाओं की बुनियाद भी महानगरों रख दी है। कई शहरों में इसकी मांग पुरजोरी से उठ रही है। भाजपा शाषित राज्यों की सरकारें केंद्र से धनराशि की मांग भी कर रही हैं। इसलिए केंद्र सरकार ने इन दबावों से छुटकारा पाने की दृष्टि से ऐसी नीति बना दी, जिसको अमल में लाना मुश्किल होगा। उद्योगपतियों को पटाने के लिए राज्यों को लाल जाजम बिछाने होंगे। बाबजूद जरूरी नहीं कि उद्योगपति मेट्रो जैसी महंगी, खर्चीली और जटिल परियोजनाओं में पूँजी निवेश करें। साफ है कि न नौ मन तेल होगा और न ही राधा नाचेगी। इसलिए अच्छा है, प्रदेश सरकारें मेट्रो के मोह से मुक्त हो और ग्रामीण विकास की ओर ध्यान दें, जिससे शहरों में आबादी का दबाव कम हो। वैसे भी जिस दिल्ली मेट्रो को एक आदर्श उदाहरण मानकर चल रहे हैं, वह मेट्रो उद्योग की दृष्टि से ज्यादा लाभ का सौदा नहीं है। लेकिन दिल्ली जैसा महानगर जो कई प्रदेशों की सीमाओं से जुड़ा होने के कारण राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र भी है, उसमें मेट्रो जैसी एक बड़ी परिवहन सुविधा जरूरी है। लेकिन दूसरी और तीसरी श्रेणी के नगरों में अरबों रुपए खर्च करके इस परियोजना को लागू करना शेखचिल्ली के सपने के तरह है। इससे अच्छा है प्रदेश सरकारें अपने नगर के अनुरूप मौजूदा परिवहन तंत्र को ही दुरुस्त कर उसका आधुनिकीकरण करें।
सरकार ने रेलवे में एकमुश्त निजीकरण करने की बजाय टुकड़े-टुकड़े कई विभागों को निजी हाथों में सौंपने का सिलसिला शुरू कर दिया है। जलपान, स्वच्छता, माल ढुलाई, निजी कोच खरीद जैसे 17 क्षेत्रों में 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी दी जा चुकी है। संकेतक प्रणाली के आधुनिकीकरण और रख-रखाव, लॉजिस्टिक पार्क निर्माण, लोकोमोटिव और कोच के निर्माण से लेकर द्रुत गति की प्रीमीयम, टेल्गो व बुलेट रेलों का ताना-बाना विदेशी पूंजी निवेश और निजीकरण के बल पर ही बुना गया है। कालांतर में इसके परिणाम अच्छे दिखाई दे सकते हैं। इसी दिशा में अगली कड़ी के तहत राज्यों के सहयोग से रेल परियोजनाओं का विस्तार किया जाएगा। कैबीनेट ने इस फैसले को मंजूरी पहले ही दे दी है। इस योजना के अनुसार प्रत्येक संयुक्त उद्यम में रेलवे और राज्य सरकार की ओर से 50-50 करोड़ रुपए की आरंभिक चुकता पूंजी का योगदान किया जाएगा। इस हिसाब से कुल 100 करोड़ का निवेश होगा। इस दृष्टि से सीमेंट, स्टील व ऊर्जा संयंत्रों के लिए कच्चे माल की ढुलाई के मकसद से रेल संपर्क बनाने में मदद मिलेगी। देश के सुदुर अचंलों में यात्री सेवाओं का विस्तार भी संभव हो सकेगा। लेकिन हाल ही में आई कैग की रिपोर्ट में जताया गया है कि रेलों में बेहद घटिया दर्जे का खाना दिया जा रहा है और सफाई भी उचित नहीं है। जब हम भोजन और सफाई को निजी हाथों में सौंपकर बीते तीन सालों के भीतर गुणवत्तापूर्ण नहीं बना पाए हैं तो मेट्रो जैसी जटिल परियोजनाओं को कैसे जमीन पर उतार पाएंगे| यह एक बड़ा सवाल है। (लेखक,वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं)

किंग नहीं किंग मेकर, अमित शाह की फितरत है,

सक्रिय संगठन, गतिशील कार्यकर्ता के सर्जक - भरतचन्द्र नायक

भारतीय जनता पार्टी ने राजनीति के विशिष्ठ पड़ाव पर ऐसे समय जब तीन दशकों से केन्द्र में स्पष्ट बहुमत मिलना लगभग असंभव मान लिया गया 16 वी लोकसभा के चुनाव 2014 में प्रचार अभियान की कमान दूसरी पीढ़ी को सौंपी। संघ और पार्टी ने लीक से हटकर कमान सौंपी तब सभी विस्मित थे। चुनाव अभियान की कमान नरेन्द्र मोदी ने संभाली और पार्टी तथा मतदाताओं के बीच विश्वास का सेतु बनाने में सफलता पायी। लोकसभा चुनावों में पार्टी ने जीत का गणित लगाया नरेन्द्र मोदी ने उसे आसानी से पूरा कर प्रचंड बहुमत के साथ ऐसे राज्यों तक में पहंुच बनायी जहां जीत का आधार जाति और सम्प्रदाय था। इससे पार्टी के साम्प्रदायिक होने का जो ठप्पा सियासी दल लगाते थे नरेन्द्र मोदी ने उसे तोड़ डाला और वाराणासी और स्वयं लखनऊ से चुनाव जीतकर सभी को आश्चर्य चकित कर दिया। उन्होंने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के समय अपने विश्वस्त साथी अमित शाह को केन्द्रीय मंत्री परिषद में शामिल होने की दावत दी लेकिन अमित शाह ने गुजरात में विधायक बने रहकर संगठन के कार्य में रूचि लेना बेहतर समझा। किंग बनने के बजाए उन्हें किंग मेकर की भूमिका में पाकर भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष का ताज संगठन ने सौंपा। काम चुनौतीपूर्ण था, लेकिन 52 वर्षीय अमित शाह ने संगठन के अपने साथियों को नई तकनीक और प्रौद्योगिकी को आत्मसात कर संगठन के विस्तार में जुटने का आव्हान किया। महासदस्यता अभियान में मोबाइल से सदस्यता की शुरूआत का कौशल अपनाकर देश में 11 करोड़ से अधिक सदस्य बनाकर भारतीय जनता पार्टी को देश ही नहीं दुनिया का सबसे बड़ा राजनैतिक दल होने का गौरव हासिल करा दिया। हिन्दी भाषी सूबों से लेकर पूर्वोत्तर, पश्चिमोत्तर राजयों और दक्षिण के सुदूरवर्ती राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की पहचान बना दी।

राष्ट्रवाद को समर्पित भारतीय जनता पार्टी को दुनिया का सबसे बडा राजनैतिक दल होने का गौरव हासिल कर चीन की वामपंथी पार्टी का दावा काफूूर कर दिया। हिन्दी भाषी सूबों से लेकर पूर्वोत्तर, पश्चिमोत्तर राज्यों और दक्षिण के सुदूरवर्ती राज्यों में भारतीय जनता पार्टी का संगठन गढ़ दिया। नए सदस्यों को वैचारिक रूप से परिपक्व बनाने के लिए पं. दीनदयाल प्रशिक्षण महाअभियान के अंचल मे लाने का महत्वकांक्षी कार्यक्रम आरंभ हुआ और उसमें सफलता भी मिली।

भारतीय राजनीति में ऐसा दुर्लभ संयोग ही होता है जब शीर्ष पर वैचारिक साम्य बन पाता है। कांग्रेस में भी प्रथम राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री एक ही दल के थे लेकिन वैचारिक आधार पर सोमनाथ मंदिर के निर्माण को लेकर परस्पर विरूद्ध धु्रवों पर थे लेकिन भाजपा के दो प्रमुख प्रधानमंत्री और पार्टी के राष्टीय अध्यक्ष अमित शाह की केमिस्ट्री ऐसी बनी कि परस्पर अटल विश्वास के धनी साबित हुए। अमित शाह के राज्यसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद उन्हें केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर रक्षा मंत्रालय दिए जाने का सुझाव जोरदारी के साथ आया लेकिन अमित शाह की संगठन में असीमित रूचि और मिशन 2019 को ध्यान में रखकर अमित शाह ने स्वयं केन्द्रीय मंत्रीमंडल में शामिल होने से इंकार करके आज की युवा पीढी और सत्ता लोलुप राजनेताओं के समक्ष एक अनुकरणीय आदर्श उपस्थित हुआ है।

दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्टीय अध्यक्ष अमित शाह के वैचारिक साम्य का ही नतीजा है कि संगठन और सरकार के निर्णय समय पर होते है जिनसे राजनैतिक दल और कार्यकर्ता भी चैक जाते है। इसलिए इनके निर्णय के प्रति सदा कोतुहल बना रहता है और दोनों के बीच हुए निर्णय को संगठन आम सामूहिक स्वीकृति मानकर आत्मसात करता है। कमोवेश राष्टपति के चुनाव में प्रत्याशी को लेकर जब रामनाथ कोविंद की घोषणा की गयी उसकी उपयुक्तता को लेकर हर्ष मिश्रित आश्चर्य जनक प्रतिक्रिया देखी गयी। सत्ता और संगठन में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के बीच जो सहमति बनती है वहीं संगठन का अंतिम फैसला माना जाता है। किसी तीसरे की भूमिका नगण्य होती है। अलबत्ता सत्ता और संगठन के स्तर पर जो फैसला लिया जाता है उसकी जानकारी सरसंघचालक डाॅ मोहन भागवत को चर्चा के रूप में होती है। निर्णय लेने में उनकी भी भूमिका नहीं होती है। इससे हर फैसले में अंत तक गोपनीयता का निर्वाह किया जाता है। फैसले के अमल में कठिनाई अथवा अन्यथा कोई परिस्थिति पैदा होने पर वे जवाबदेही की सहर्ष स्वीकार करते है। इस तरह जवाबदेही का भाव बने रहने के साथ कठिनाई का स्पष्टीकरण भी देते है और बता देते है निर्णय दूरदर्षितापूर्ण और कठोर है। प्रसव पीडा तो होगी लेकिन नतीजा राष्ट के व्यापक हित में होगा। नोटबंदी होने पर चैतरफा हमले झेले लेकिन जो भरोसा उन्होंने जनता को दिया कि कालेधन पर चोट भ्रष्टाचार पर अंकुश और आतंकवाद में कमी आयेगी। ऐसा होता देखकर देश की जनता ने कष्टों को गंवारा किया और सत्ता और संगठन की नीयत पर भरोसा किया। गुजरात में विधायक बने रहते 2012 में बहन आनंदी बेन पटेल के मुख्यमंत्री बनने पर उनके कार्यकलाप से अमित शाह संतुष्ट नहीं थे, लेकिन आनंदी बेन पटेल की गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर उन्होंने कोई रूचि नहीं दिखायी क्योंकि उन्हें तो भाजपा संगठन का विस्तार और देश में भगवा परचम फहराना उनकी प्रतिबद्धता बन चुकी थी। इस मायने में यदि अमित शाह को चुनावी दांवपैच में माहिर होने, अपनी गुरूवात्कर्षण शक्ति से दूसरे दलों को समीप लाने में महारत होने के कारण उन्हें चुनाव जीतने का तंत्र मंत्र साधक कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनका कार्यकाल यह प्रमाणित भी करता है कि जिस राजनैतिक दल को साम्प्रदायिक कहकर कथित सेकुलरवादी राजनैतिक अस्पृष्य बना चुके थे आज उसका परचम डेढ दर्जन राज्यों भारत के 70 प्रतिशत भूभाग पर फहरा रहा है।

वाकया 8 अगस्त का था। राजनैतिक प्रेक्षकों ने देखा कि गुजरात में अमित शाह और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की जीत प्रत्याषित थी ही लेकिन जिस कांग्रेस के पास सदन में 50 सदस्य थे और सोनिया गांधी के राजनैतिक सलाहकार अहमद भाई पटेल का जीतना आसान था कांग्रेस अपना घर संभालने में विवश दिखी। उसे अपने झंुड को सुरक्षित रखने के लिए कांग्रेस शासित कर्नाटक सरकार का संरक्षण लेना पडा। कहने की गरज ये कि अमित शाह ने नरेन्द्र मोदी के लक्ष्य कांग्रेस मुक्त भारत को पूरा करने में सारी शक्ति केन्द्रित कर दी है। अमित शाह के राज्यसभा में पहंुचने के साथ लोगों का सोचना है कि वे संसद भवन में प्रधानमंत्री के सबसे निकटतम और सबसे विश्वस्त व्यकित होंगे। ऐेसे लोंगों का यह सोच भी है कि उन्हें केन्द्र में रक्षामंत्री बनाकर संगठन की बागडोर केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को सौंपी जा सकती है। लेकिन अमित शाह को आने वाले दिनों में गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव अहम होंगे और वे शायद ही संगठन से निकलकर सत्ता की पगडंडी पर कदम बढायेंगे। गुजरात के चुनाव में प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की साख पर गंभीर चुनौती होगी जिसे देखते हुए प्रधानमंत्री और संगठन शायद ही अमित शाह के प्रभार में परिवर्तन करे।

इतिहास पर नजर दौडाए तो 1925 में राष्ट्र निर्माण के अनुष्ठान के रूप में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सपना देखा था। उसे पूरा करने के लिए उपयुक्त तंत्र भी आवश्यक और अपेक्षित था। उपयुक्त तंत्र विकसित करने के लिए अटलजी और आडवाणी के करिश्मायी व्यक्तित्व को नहीं भुलाया जा सकता लेकिन उनकी सफलता आंशिक थी। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को इसका श्रेय मिलना ही चाहिए कि भारतीय गणतंत्र में आज सर्वोच्च पद पर राष्ट्रपति के रूप में रामनाथ कोविद, उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू और प्रधानमंत्री के पद पर नरेन्द्र मोदी विराजमान है। लोकसभा अध्यख पद पर सुमित्रा महाजन है। इस पद पर रहकर वे पहले ही दलीय संबंध तोड चुकी है। लेकिन यह एक सुखद संयोग और कोतुहल जनक परिघटना है कि चारों राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की उपज है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयंसेवक है। भारतीय राजनीति में न तो इनकी परंपरागत पहचान है और न इनका कोई गाॅडफादर रहा है। स्वयंसेवक की पहचान और राष्ट्र को वैभव के चरम शिखर पर पहंुचाना इनकी प्रतिबद्धता जरूर रही है। इन्हें राष्ट्र ने जो गंभीर दायित्व सौपा है वह फूलों की सेज नहीं कांटो का ताज है। एक करोड पच्चीस लाख लोगों की निगाहे इनके हर कदम पर गढी हुई हैै। यह इनके लिए यहां स्वर्णिम अवसर है वहीं गंभीर चुनौती भी है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की चर्चा विष्व पटल पर हो रही है, जिसे कथित सेकुलरवादी साम्प्रदायिक बताते हुए अस्तांचल की ओर बढ रहे है।

 

राजीव गांधी : विश्व राजनीति पर गहरी छाप
(20 अगस्त जयंती पर विशेष)
मनोहर पुरी
इसे विधि की विडम्बना ही कहा जा सकता है कि राजीव गांधी जिस तेजी से भारत की राजनीति के क्षितिज पर उदित हुए थे लगभग उसी तीव्रता से विलुप्त भी हो गए। भरपूर यौवन में विधि के क्रूर हाथों ने उन्हें हम से छिन लिया। अपने नाना पंडित जवाहर लाल नेहरू और माता श्रीमती इन्दिरा गांधी की विरासत के सहारे उनकी राजनीति पर एक मजबूत पकड़ बन रही थी । देश को 21वीं शताब्दी में ले जाने के लिए वे निरन्तर प्रयत्नशील थे। वह भारत को ऐसी स्थिति में जल्दी से जल्दी पहुंचा देना चाहते थे जहां वह विश्व के अन्य विकसित देशों के साथ सिर उठा कर खड़ा हो सके। राजीव गांधी का संतुलित स्वभाव उन्हें सहज ही अतंमुर्खी बना देता था परन्तू विमान चालक होने के कारण शायद उन्हें तीव्र गति बहुत पसंदं थी और वह हर काम बहुत जल्दी जल्दी समाप्त कर लेना चाहते थे।
उन्होंने जिस आर्थिक उदारवाद की नींव रखी वह पंडित नेहरू और श्रीमती इन्दिरा गांधी की नीतियों से अलग दिखाई देती है जबकि वास्तविकता यह है कि वह नेहरू की उन नीतियों की परिणिति कही जा सकती है जो उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरन्त बाद प्रतिपादित की और इन्दिरा गांधी ने ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करने के बाद उन्हें व्यवहार में लाने का प्रयास किया। यह दूसरी बात है कि नेहरू और इन्दिरा दोनों ही अपनी नीतियों को समाजवाद के आस पास रख कर गरीबों के मसीहा के रूप में अपने आपको स्थापित किए रहे जबकि राजीव गांधी ने खुले दिल से आयातित तकनीक की वकालत की।
जल्दी से जल्दी देश में आर्थिक क्रान्ति लाने की उनकी तड़प को उनके भाषणों में सहज ही अनुभव किया जा सकता है। नेहरू एक ऐसे समय में देश की आर्थिक उन्नति का मानचित्र बना रहे थे जब कांग्रेस स्वंतत्रता आन्दोलन की लड़ाई लड़ते हुए थक चुकी थी। कांग्रेस महात्मा गांधी के उन आदर्शों को समेटने में लगी थी जिनके सहारे आर्थिक समस्यायें सुलझाना कोई सुगम कार्य नहीं था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सांस्कृतिक पुनर्जागरण के सहारे देश को उन्नति के मार्ग पर ले जाने की बात कर रहा था। समाजवादी अपने अपने ढंग से अमीरी गरीबी के मध्य खाई पाटने के कार्यक्रम बना रहे थे। कम्युनिस्ट भारत को सोवियत संघ के ढांचे में ढालने का प्रयास कर रहे थे। पं. नेहरू को सबसे बड़ी चिन्ता लोकतंत्र को बचाने की थी। नेहरू प्रजातांत्रिक प्रणाली को आहत किए बिना भारत की सामाजिक सच्चाईयों का सामना करते हुए आर्थिक विकास का दर्शन रच रहे थे। इन्दिरा गांधी ने पूरी सूझ बूझ के साथ देश की राजनीति का संचालन नेहरू के बनाए हुए ढांचे के आस पास करना प्रारम्भ कर दिया । आज भले ही कुछ लोग नेहरू की नीतियों के विरोध में कुछ बोल दें परन्तु उस समय भारत की जनता ने उनकी नीतियों को भरपूर सम्मान दिया। बाद में लोगों ने इन्दिरा गांधी को उनकी पुत्री मान कर विरासत सौंपने में कोई आनाकानी नहीं की तो राजीव गांधी को भी उन्हीं का वारिस स्वीकार करते हुए अपने दिल और दिमाग में बिठाया।
इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि नेहरू के दर्शन ने ही इस देश को एक मजबूत सुदृढ आर्थिक आधार प्रदान किया किया। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने उस समय की अनिश्चय की राजनीति में स्वयं को स्थापित करने के लिए कई प्रकार की लोकप्रिय घोषणाओं का सहारा लिया। उन्होंने गरीबी हटाओ का नारा दे कर जनता का विश्वास अर्जित करने में सफलता प्राप्त की। राजीव गांधी ने सत्ता के दलालों को बाहर का रास्ता दिखाने की बात करके अपनी एक साफ सुथरी छवि देश के सामने प्रस्तुत की। उन्होंने लोगों को यह आश्वासन दिया कि प्रशासन से वह भ्रष्टाचार को उखाड़ फेकेंगें। बाद में घटनाक्रम इतनी तेजी से बदला कि सब कुछ छिन्न भिन्न हो गया और भारतीय अर्थतंत्र उसी पुराने ढर्रे पर चलता रहा।
नेहरू-इन्दिरा और राजीव तीनों का सम्मोहन जनता को अपनी ओर आकर्षित करता रहा। तीनों ही अपने अपने समय में सबसे अधिक वोट प्राप्त करने वाले सिद्ध हुए। इस क्षेत्र में तो राजीव गांधी अपने दोनों पूर्वजों से कहीं आगे बढ़ गए। 1984 में जब उन्होंने पार्टी की बागडोर संभाली तो कांग्रेस पार्टी ने उन शिखरों को छुआ जहां तक वह पहले कभी पहुंचने में सफल नहीं हुई थी। अपने नाना की भान्ति राजीव गांधी में सैंस ऑफ हयूमर भी थी जिसे इन्दिरा जी ने सदैव अपनी दृढ़ता के पीछे छिपाए रखा। राजीव नेहरू और इन्दिरा जी की भान्ति जल्दी गुस्से में नहीं आते थे। उनका सौम्य व्यक्तित्व उन्हें लोकप्रिय बनाने में काफी सहायक हुआ। वह एक विशाल हृदय वाले इंसान थे। उन्हें जीवन की गहरी समझ थी। जीवन से निरन्तर कुछ न कुछ सीखते रहने की उन्हें आदत थी। उन्होंने बहुत कम समय में अपने आप को राजनीति में स्थापित कर लिया था।
जन्म से राजनीति के आंगन में पले बढ़े राजीव तब तक राजनीति से अलिप्त रहे जब तक उन्हें विवश करके इसमें उतारा नहीं गया। राजीव गांधी जीवन की सुहावनी वस्तुओं में गहरी रूचि रखते थे। फोटोग्राफी और ड्राइविंग में उनकी बहुत रूचि थी। वास्तव में वह एक सुखी और सहज पारिवारिक जीवन व्यतीत करना चाहते थे। राजनीति तो उन पर थोप दी गई थी। यदि उनका वश चलता तो संभवत वह राजनीतिक सत्ता को ठुकरा देते।
20 अगस्त 1944 को जन्में राजीव राजनीति में 1981 में उस समय आये जब उनके छोटे भाई संजय गांधी एक विमान हादसे के शिकार हो गए। अपनी मां का हाथ बंटाने के लिए ही उन्होंने अमेठी से संसद का चुनाव लड़ा और बाद में पार्टी के महासचिव बने। अपनी विरासत के कारण ही उन्हें राजनीति में सहज रूप से स्वीकार कर लिया गया। इ‘िदरा गांधी की हत्या के बाद उन्हें बिना किसी विरोध के पार्टी ने प्रधान मंत्री के पद पर बिठा दिया। 1984 में प्रधान मंत्री बनने से पूर्व वह 14 वर्ष तक इंडियन एअर लाइन्स में विमान चालक के रूप में कार्य करते रहे। केम्ब्रिज में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान उनकी मूलाकात सोनिया से हुई और 1968 में दोनों परिणय सूत्र में बंध गए।
नेहरू-इन्दिरा-राजीव तीनों ने ही विश्व की राजनीति पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। पं. नेहरू ने अपने दर्शन और अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टि,इन्दिरा जी ने अपने सम्पर्कों और दृढ़ता राजीव गांधी ने अपने व्यक्तित्व के कारण विश्व स्तर पर लोकप्रियता इर्जित की। वैश्विक मामलों में तीनों का अपना अपना योगदान रहा। नेहरू की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए राजीव गांधी ने विश्व रंगमंच पर भारत की भूमिका को सदैव प्रभावी बनाए रखा। नेहरू पंचशील के सिद्धांतों,इन्दिरा गंटनिरपेक्ष देशों की नेता और राजीव सार्क,नैम,चोगम और राष्ट्रसंघ में अपनी भूमिका के कारण विश्व की राजनीति में अपने आपको स्थापित किए रहे।
1984 से 1988 तक राजीव गांधी ने भारतीय राजनीति को अपने अनुकूल बनाया। 21 मई 1991 तक जब तमिलनाडु के श्री पेरम्बदूर नामक स्थान पर टाइम बम विस्फोट में उनकी हत्या हुई, वह भारत की राजनीति पर पूरी तरह से हावी रहे। राजीव की दु:खद और आसमियक मृत्यु ने भी भारत की राजनीति को प्रभावित किया। उनके निधन के साथ ही नेहरू-इन्दिरा-राजीव युग की महिमा का अंत हो गया। राजीव गांधी एक बहादुर इंसान थे और उन्हें मृत्यु से कोई भय नहीं था। वह संभवत जानते थे कि कभी वह हिंसा के शिकार होगें। इस विषय में उन्होंने कहा भी था मृत्यु से भय करने का क्या लाभ जबकि वह इस मामले में कुछ भी कर सकने की स्थिति में भी नहीं थे। यह देश का दुर्भा।गय है कि उसे राजीव जैसे युवा नेतृत्व को अतनी जल्दी खोना पड़ा।

इलाज के दाम बांधो
डॉ. वेदप्रताप वैदिक

गोरखपुर में हुई बच्चों की हत्या पर सरकार की कितनी ही किरकिरी हुई हो, लेकिन केंद्र सरकार ने घुटनों की शल्य-चिकित्सा में चल रही लूट-पाट को बंद करने का जो निर्णय लिया है, वह सराहनीय है। भारत में लगभग डेढ़ करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें अपने घुटने बदलवाने की जरुरत होती है लेकिन मुश्किल से एक-डेढ़ लाख ही बदलवा पाते हैं, क्योंकि यह इलाज जरुरत से ज्यादा मंहगा है। इस पर हजारों नहीं, लाखों रु. खर्च होते हैं। अब सरकार ने ऐसा निर्णय किया है कि जिसके वजह से यह लूटपाट रुकने की पूरी उम्मीद है। पहले यदि घुटना बदलवाने में 100 खर्च होते थे तो अब यह काम 25-30 रु. में ही हो जाएगा। जो यांत्रिक घुटना बाजार में अब तक डेढ़ लाख रु. का मिलता था, वह अब सिर्फ 55 हजार में मिलेगा। टाइटेनियम का जो घुटना ढाई लाख तक में मिलता था, वह अब 67 हजार रु. में मिलेगा। केंसर के रोगियों को लगनेवाले उपकरण की कीमत 5 लाख रु. थी, वह अब 1 लाख 14 हजार रु. में मिलेगा। जो भी डाॅक्टर, अस्पताल या दवा-विक्रेता इससे ज्यादा कीमत वसूलेगा, सरकार उसे कड़ी सजा देगी। जाहिर है कि इस नई व्यवस्था से देश के लाखों गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को विशेष राहत मिलेगी। घुटने का आॅपरेशन ज्यादातर बुजुर्ग लोग ही करवाते हैं। वे मोदी सरकार और स्वास्थ्य मंत्री जगतप्रकाश नड्ढा को तहे-दिल से आशीर्वाद देंगे। इसके पहले सरकार ने फरवरी 2017 में हृदय की शल्य-चिकित्सा में लगनेवाले उपकरणों की लूट-पाट में जबर्दस्त कटौती की थी। चिकित्सा के अनेक अन्य आयाम भी हैं, जिन पर सरकार की ओर से कठोर कार्रवाई की जरुरत है। लगभग सभी दवाइयों पर सरकार को दाम बांधो नीति लागू करनी चाहिए। किसी भी दवाई के दाम उसकी लागत के दुगुने से ज्यादा नहीं होने चाहिए। निर्माता और विक्रेता यदि इससे ज्यादा मुनाफा कमाने की कोशिश करें तो उन्हें जेल भेजा जाए। आज तो कई दवाइयां 2 रु. की हैं लेकिन वे बिकती हैं, 200 रु. में ! सिर्फ दवाइयों और उपकरणों में चलनेवाली लूट पर प्रतिबंध काफी नहीं है। अस्पतालों की पांच सितारा संस्कृति भी खत्म होनी चाहिए। आप दवा और उपकरण सस्ते कर दीजिए, वे पलंग, डाक्टरों की फीस, अनावश्यक टेस्टों का शुल्क इतना बढ़ा देंगे कि गाड़ी मुड़कर फिर वहीं खड़ी हो जाएगी। सरकार ने इतनी हिम्मत की है तो उसे डाॅक्टरों और अस्पतालों की फीस पर भी दाम बांधों नीति लागू करनी होगी।

ज्ञान और समाजसेवा से जिसने चमकाई राजनीति
-(डॉ शंकर दयाल शर्मा के जन्म दिवस 19 अगस्त पर विशेष)
डॉ हिदायत अहमद खान
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा।। यहां अल्लामा इकबाल का यह शेर भोपाल के सपूत और देश के 9वें राष्ट्रपति डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा पर सटीक बैठता है। दरअसल यह तो सभी मानते हैं कि लाखों में एकाध ही ऐसा महान शख्स होता है जो अपने ज्ञान, व्यवहार और कार्यों के साथ ही साथ सिद्धांतों के दम पर न सिर्फ परिवार बल्कि शहर व प्रदेश का नाम भी देश और दुनिया में रोशन करता है। ऐसे ही गौरवान्वित करने वाले महान व्यक्तित्वों की सूची में डॉ शर्मा का नाम पूरे सम्मान के साथ शुमार किया जाता है। डॉ शर्मा का जन्म मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में १९ अगस्त १९१८ को हुआ था। उनके पिता का नाम खुशीलाल शर्मा एवं माता सुभद्रा शर्मा था। डॉ शर्मा की शिक्षा विभिन्न शहरों में संपन्न हुई। ज्ञान की पिपासा के चलते डॉ शर्मा ने सेंट जान्स कॉलेज आगरा से जो शिक्षा का सफर शुरु किया तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय, फित्ज़विल्यम कॉलेज, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, लिंकोन इन् तथा हारवर्ड ला स्कूल से शिक्षा प्राप्त करने तक सफर जारी रखा। खास बात तो यह रही कि डॉ शर्मा ने हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत साहित्य में एमए की डिग्री विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान के साथ प्राप्त की। आपने लखनऊ विश्वविद्यालय से एलएलएम की डिग्री भी प्रथम श्रेणी में रहते हुए प्राप्त की। इसके साथ ही विधि में पीएचडी की डिग्री कैम्ब्रिज से प्राप्त कर आपने सभी को गौरवान्वित करने जैसा काम किया। यह क्या कम बात थी कि तब आपको लखनऊ विश्विद्यालय से समाज सेवा में चक्रवर्ती स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ। डॉ शर्मा ने लिंकोन इन से बैरिस्टर एट ला की भी डिग्री ली थी, जहां आपको मानद बेंचर तथा मास्टर चुना गया। आप फित्ज़विल्यम कॉलेज के मानद फैलो रहे। कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय ने आपको मानद डॉक्टर ऑफ़ ला की डिग्री से सम्मानित किया। ऐसे महानशिक्षाविद और समाजसेवी का विवाह विमला शर्मा के साथ हुआ था। छात्र जीवन में आपके मन में पंडित जवाहर लाल नेहरु ने जो छाप छोड़ी उससे वो अत्यंत प्रभावित हुए। यही वजह है कि डॉ शर्मा ने देश को आजाद करवाने में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने के कारण आपको जेल यात्राएं भी करनी पड़ीं। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के साथ ही साथ डॉ शर्मा सुयोग्य व कुशल प्रशासक, विद्वान लेखक, कानूनविद् और एक महान विचारक के रूप में आपने ख्याती अर्जित की।
शिक्षाविद के तौर पर डॉ शर्मा ने जहां बार-एट-लॉ की उपाधि प्राप्त की वहीं छात्रों को कानून की शिक्षा भी दी। ऐसे में उनका राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करना विशेष मायने रखता है। दरअसल उनमें परिस्थितिजन्य फैसले लेने का हुनर था और इसके जरिए वो अपने आपको बदलने और आगे बढ़ने में किसी विजयी योद्धा की तरह नजर आते थे। आज जबकि देश में सांप्रदायिक ताकतें सिर उठाए हुए हैं और समाज में विघटन लाने के लिए तत्पर नजर आती हैं तब डॉ शर्मा के विचार और उनके सिद्धांत गंगाजमुनी तहजीब को बचाने और देशसेवा के लिए आगे बढ़ने वाले युवाओं के प्रकाशपुंज के तौर पर नजर आते हैं। उनकी बताई हुई शिक्षा और सिद्धांत को अपनाते हुए हमारे देश के युवा लोकतंत्र विरोधी ताकतों को सबक सिखाने का काम आसानी से कर सकते हैं। दरअसल उनके बताए हुए रास्ते जहां समाजसेवा की ओर ले जाते हैं वहीं किसी भी कार्य को करने से पहले उसका पूरा ज्ञान ले लेने की भी शिक्षा प्रदान करते हैं। डॉ शर्मा ने उच्च शिक्षा ग्रहण करते हुए जिस तरह से राजनीतिक क्षेत्र को चुना लेकिन जिस मेहनत और लगन से उन्होंने सच्ची समाजसेवा की उससे संपूर्ण देश उनका कायल हो गया। अपने धर्म का पालन करते हुए देशसेवा करने का जो उदाहरण डॉ शर्मा ने प्रस्तुत किया वह वाकई काबिले जिक्र रहा है। यदि ऐसे ही सिद्धांत के साथ आज के तमाम नेता और समाजसेवी कार्य को अंजाम दें तो सांप्रदायिक समस्याओं से चुटकी में निजात मिल जाए। दरअसल डॉ शर्मा का मूल मंत्र परहित समान धर्म नहीं दूजा रहा है, जिसके दम पर उन्होंने गरीबों के दिलों को जीता और गरीबी दूर करने से लेकर समानता का अधिकार समानभाव से सभी को दिलवाने के लिए लगातार लड़ते रहे। उनकी मानवसेवा वाली धार्मिकता ही थी कि वो जहां भी गए उनके चाहने वालों की लंबी कतार लगती चली गई। उनकी बात लोगों के कान से होते हुए सीधे दिल में उतरती थी। ऐसे में उन्होंने जहां अपने को भीड़ से अलग रखा वहीं कभी वो तन्हां भी अपनेआपको महसूस नहीं होने दिया। हर वर्ग के लोगों के बीच में बैठना और उनकी समस्याओं को गंभीरता से लेकर सुनना और उसके हल के लिए उपाय सुझाना डॉ शर्मा की मानों दिनचर्या में शामिल था। ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी डॉ शर्मा को अनेक पदों की जिम्मेदारियां मिलीं जिन्हें उन्होंने बखूबी निभाया। इससे पहले १९४० के दशक में डॉ शर्मा स्वतंत्रता आन्दोलन में शामिल हुए, इस हेतु उन्होंने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ली और उसके बाद तो पलट कर नहीं देखा। सन् 1952 में डॉ शर्मा भोपालरियासत के मुख्यमंत्री बनाए गए जो कि 1956 तक रहे। देश की आजादी से लेकर अनेक घटनाओं के दृष्टा रहे डॉ शर्मा ने 1960 के दशक में श्रीमती इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व प्राप्त करने में सहायता भी प्रदान की। इंदिरा कैबिनेट में वे 1974 से 1977 तक संचार मंत्री रहे। डॉ शर्मा भोपाल से दो बार लोकसभा के लिए चुने गए। यही नहीं 1984 से वे राज्यपाल के रूप में आंध्रप्रदेश में नियुक्त हुए। 1985 से 1986 तक वे पंजाब के राज्यपाल रहे। इसके बाद डॉ शर्मा ने 1986 से 1987 तक महाराष्ट्र के राज्यपाल के तौर पर अपनी जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी से पूर्ण किया। उनकी योग्यता और लोकप्रियता ही थी कि राज्यपाल के बाद उन्हें उपराष्ट्रपति चुना गया और उसके बाद १९९२ में वो देश के राष्ट्रपति बने। ऐसे महान नेता, शिक्षाविद् और कानून के जानकार, समाजसेवी, जननेता को 9 अक्टूबर 1999 के दिन दिल का दौरा पड़ा, जिस कारण उन्हें दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया। इलाज चल ही रहा था कि 26 दिसंबर 1999 को उनकी सांसें थम गईं और राजनीतिक क्षितिज का एक ज्वाजल्यमान नक्षत्र हमसे हमेशा-हमेशा के लिए बिछड़ गया। उनका अन्तिम संस्कार दिल्ली में उनके मार्गदर्शक कहे जाने वाले जनजन के प्रिय नेता पंडित जवाहर लाल की समाधि के समीप विजय घाट पर ही किया गया। आज संपूर्ण देश अपने इस महान नेता को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए दिल से याद करता है।

मंदिर से बढ़ेगी इस्लाम की इज्जत
– डॉ. वेदप्रताप वैदिक
देश के सर्वमान्य शिया नेता मौलाना कल्बे-सादिक ने जो बात कही है, अगर वह मान ली जाए तो अयोध्या का मंदिर-मस्जिद विवाद तो हल हो ही जाएगा, सारी दुनिया में भारतीय मुसलमानों की इज्जत में चार चांद लग जाएंगे। मुस्लिम इतिहास की कुछ घटनाओं के कारण इस्लाम के बारे में अन्य मजहबों में जो अप्रिय छवि बन गई है, उसे भी हटाने में भारतीय मुसलमानों का महत्वपूर्ण योगदान माना जाएगा। मौलाना कल्बे-सादिक ने कहा है कि अयोध्या मसले पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला यदि हिंदुओं के पक्ष में जाता है तो मुसलमानों को उसे शांतिपूर्वक स्वीकार कर लेना चाहिए और हिंदुओं को वहां राम मंदिर बनाने देना चाहिए। यदि वह फैसला मुसलमानों के पक्ष में आ जाता है तो भी वह जमीन मुसलमान लोग हिंदुओं को दे दें ताकि वे वहां राम मंदिर बना सकें। बदले में वे करोड़ों हिंदुओं के दिल पा जाएंगे। दिल जीत लेंगे। मौलाना के इस विनम्र निवेदन को वे लोग क्यों मानेंगे, जिनकी सियासी दुकान इसी विवाद के कारण चल रही है ? यदि वे लोग अदालत के किसी भी फैसले को मानने की कसम खा रहे हैं तो मैं उनसे पूछता हूं कि यदि वह फैसला मंदिर के पक्ष में आ गया तो वे क्या करेंगे ? तब मजबूरी का नाम महात्मा गांधी होगा। लेकिन यदि वे मौलाना की सलाह मान लें तो उनकी इज्जत में इजाफा नहीं हो जाएगा ? बाबरी मस्जिद का क्या है ? उसे आप कहीं भी बना लीजिए। वह तो किसी की भी जन्मभूमि नहीं है। न इब्राहीम की, न मुहम्मद की, न अली की, न उमर की, न अबू बकर की और न ही बाबर की ! जबकि हिंदू मानते हैं कि वह राम की जन्मभूमि है। राम तो सबके हैं। अल्लामा इक़बाल के शब्दों में वे इमामे-हिंद हैं। राम के वक्त तो हिंदू नाम का एक इंसान भी भारत में नहीं था, सब आर्य थे। लेकिन हिंदू राम को अपना भगवान मानते हैं, क्योंकि वे भारत के महापुरुष हैं। ऐसे ही भारत के मुसलमान भी राम को अपना महापुरुष मान सकते हैं। ऐसा मानने से उनकी मुसलमानियत बिल्कुल भी कम नहीं होगी। इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है और राम उसके महापुरुष हैं। इसके अलावा, अयोध्या का मंदिर-मस्जिद विवाद मूलरुप से धार्मिक बिल्कुल नहीं है। यह हिंदू-मुसलमान नहीं, देसी-विदेशी का विवाद है। यदि यह धार्मिक विवाद है तो बताइए बाबर ने ढेरों मस्जिदें क्यों गिराई ? विदेशी आक्रांता के पास देसी लोगों का मान-मर्दन करने के यही हथियार होते हैं- उनके पूजा स्थलों, उनकी स्त्रियों और उनकी संपत्तियों को हथियाना ! मेरी समझ में नहीं आता कि हमारे मुसलमान इस्लाम के भक्त हैं या विदेशी आक्रमणकारियों के ? मौलाना कल्बे-सादिक ने वह बात कही है, जो इस्लाम का सच्चा भक्त ही कह सकता है।

क्या मुस्लिम लड़कियों को ‘शादी शगुन’ तुष्टीकरण नहीं?
– तनवीर जाफरी
केंद्र सरकार ने मुस्लिम समुदाय से संबंध रखने वाली तथा स्नातक तक अपनी पढ़ाई पूरी करने वाली युवतियों हेतु 51 हज़ार रुपये की धनराशि ‘शादी शगुन’ के तौर पर देने की घोषणा की है। यह फैसला मौलाना आज़ाद एजुकेशन फाऊंडेशन संस्था द्वारा लिया गया है जोकि केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के अधीन चलने वाली एक संस्था है। अपनी विज्ञप्ति में फाऊंडेशन द्वारा यह बात ज़ोर देकर कही गई है कि इस योजना का उद्देश्य ‘सिर्फ और सिर्फ’ मुस्लिम लड़कियों के अभिभावकों को अपनी बेटियों को कम से कम स्नातक स्तर की शिक्षा दिलाने हेतु प्रोत्साहित करना है। इस योजना के अतिरिक्त मुस्लिम लड़कियों की छात्रवृत्ति के आबंटन को लेकर भी यह निर्णय लिया गया है कि नवीं तथा दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली मुस्लिम लड़कियों को दस हज़ार रुपये की धनराशि दी जाएगी। गौरतलब है कि पहले ग्यारहवीं तथा बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाली मुस्लिम लड़कियों को 12 हज़ार रुपये की छात्रवृति मिला करती थी। फाऊंडेशन के ख़ज़ांची शाकिर हुसैन अंसारी ने इस शादी शगुन योजना का पूरा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इन शब्दों में दिया कि ‘उन्होंने सबका साथ सबका विकास’ के नारे को सच किया है।
यहां यह बताने की ज़रूरत नहीं कि जब कभी गैर भाजपाई खासतौर पर देश की कांग्रेस शासित सरकारों द्वारा कभी भी इस प्रकार का कोई भी ऐसा निर्णय लिया जाता था जिसका लाभ अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को मिलता हो, उस समय यही ‘शादी शगुन’ के योजनाकार प्रेस वार्ताएं बुलाकर चिल्ला-चिल्ला कर यह कहा करते थे कि देश में मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति की जा रही है। भारतीय जनता पार्टी के संरक्षक संगठन के कुछ अति उत्साहित नेताओं द्वारा तो जनसभाओं में यहां तक कहा जाता था कि भारतवर्ष में बहुसंख्य हिंदुओं की कमाई देश के अल्पसंख्यक मुसलमानों पर लुटाई जा रही है। परंतु आज जब पिछली सरकारों पर तुष्टीकरण का इल्ज़ाम लगाने वाली भाजपा सरकार केवल मुस्लिम लड़कियों के लिए ‘शादी शगुन’ जैसी योजना शुरु कर रही है तो इसे आ‎खिर तुष्टिकरण क्यों नहीं कहा जाना चाहिए? क्या देश में हिंदू अथवा दूसरे गैर मुस्लिम समुदाय के अभिभावकों को अपनी बेटियों के प्रोत्साहन के लिए 51 हज़ाररुपये जैसे शगुन की ज़रूरत नहीं है?आज वर्तमान केंद्र सरकार के प्रवक्ताओं तथा ज़िम्मेदार मंत्रियों द्वारा बार-बार विभिन्न अवसरों पर यह बताने और जताने की कोशिश की जाती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार अल्पसंख्यकों के विकास, उन्नति तथा खुशहाली हेतु प्रतिबद्ध है। सरकार द्वारा करोड़ों रुपये खर्च कर इस आशय के अनेक विज्ञापन भी जारी किए जाते हैं।
केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के राज्यमंत्री अल्पसंख्यकों के प्रति उनकी सरकार द्वारा अपनाए जा रहे कार्यक्रमों को गिनाते नहीं थकते। वे इसे तुष्टिकरण नहीं मानते बल्कि इसे सबका साथ सबका विकास के अंतर्गत् गिनते हैं। अल्पसंख्यकों के हितों के मद्देनज़र इनकी सरकार द्वारा शुरु की गई कोई भी योजना इनके शब्दों में अल्पसंख्यकों के सशक्तिकरण तथा अल्पसंख्यकों के व्यापक विकास के लिए शुरु की जाने वाली योजनाएं हैं, तुष्टिकरण के लिए नहीं। अभी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पूर्व पूरे देश में तीन तलाक जैसे विषय को मुस्लिम महिलाओं के प्रति अपनी हमदर्दी जताने की गरज़ से पूरे ज़ोर-शोर के साथ प्रचारित किया गया। कई ‘गोदी मीडिया’ ने भी सरकार की इस योजना में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भाजपाई इस तिहरे तलाक के विरोध में मुस्लिम महिलाओं के प्रति हमदर्दी जताते दिखाई दिए। परंतु उत्तर प्रदेश का चुनाव समाप्त होते ही तीन तलाक का मुद्दा ऐसे गायब हुआ जैसे यह कभी कोई मुद्दा था ही नहीं। गौरतलब है कि मुस्लिम समुदाय के लोग दशकों से आपस में ही इस विषय पर एक बड़ी बहस में उलझे हुए हैं। अधिकांश मुस्लिम उलेमाओं व बुद्धिजीवियों का यह मानना है कि तिहरे तलाक की व्यवस्था कोई ऐसी सर्वमान्य तलाक व्यवस्था नहीं है जिसे पूरा का पूरा मुस्लिम समाज स्वीकार करता हो या इस पर अमल करता हो अथवा इस व्यवस्था को मान्यता देता हो। परंतु अल्पसंख्यकों के इन्हीं स्वयंभू तथाकथित हितैषियों ने महज़ मुस्लिम महिलाओं के तुष्टिकरण की खातिर तथा उन्हें यह जताने के लिए कि तिहरे तलाक जैसी व्यवस्था पर अमल कर मुस्लिम मर्द औरतों पर ज़ुल्म व अत्याचार करते हैं, इस विषय को सार्वजनिक स्तर पर इतना उछाला जैसेकि तलाक देने की व्यवस्था केवल मुस्लिम समुदाय में ही हो और वह भी असभ्य तरीके से तलाक-तलाक-तलाक कहकर अपनाई जा रही हो।
केंद्र सरकार अपनी घोषणाओं के अनुसार अल्पसंख्यकों के विकास के मद्देनज़र और भी कई योजनाएं निकट भविष्य में शुरु करने की योजना बना रही है। निश्चित रूप से प्रत्येक भारतवासी चाहे वह किसी भी धर्म-जाति अथवा समाज का सदस्य क्यों न हो उसे समस्त सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने का पूरा अधिकार है। परंतु किसी धर्म अथवा जाति विशेष का हितैषी दर्शाने से पूर्व यह भी ज़रूरी है कि जिस समाज की बेटियों को शादी शगुन देने की बात की जा रही हो सर्वप्रथम उस बेटी की तथा उसके बाप और भाई की इज्ज्ज़त व जान-माल की रक्षा की गारंटी ली जाए। आज विभिन्न संस्थाओं तथा अनेक सरकारी व गैर सरकारी संगठनों द्वारा जारी किए जाने वाले आंकड़े यह बता रहे हैं कि देश में किस प्रकार सांप्रदायिक दुर्भावना अपने पैर पसार रही है। देश में जगह-जगह उग्र भीड़ द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों पर किसी न किसी बहाने से हमले किए जा रहे हैं। अनेक लोग इन हमलों में मारे भी जा चुके हैं। ऐसे परिवारों में 51 हज़ार रुपये का शगुन यदि दिया भी गया तो वह किसी मुस्लिम बेटी की शादी में काम आने के बजाए उसके परिवार के मरने वाले बाप या भाई के अंतिम संस्कार में ही काम आ सकेगा।
लिहाज़ा वर्तमान सरकार के सरबराहों को चाहिए कि वे अपने सबका साथ सबका विकास जैसे नारे पर अमल करते हुए यदि समस्त भारतवासियों को पूरी ईमानदारी व पारदर्शिता से एक ही नज़र से देखने का प्रयास करें तो इतना ही समस्त देशवासियों के लिए पर्याप्त होगा। गरीब लड़कियां शादी शगुन की ज़्यादा हकदार हैं बजाए इसके कि यह शादी शगुन सरकार के अनुसार ‘केवल और केवल’ मुस्लिम स्नातक लड़कियों को ही दिया जाएगा। यदि देश का मुस्लिम समाज वर्तमान सरकार के दौर में केवल इसी बात के लिए आश्वस्त हो जाए कि अपने देश में वह पूरी तरह स्वतंत्र है, उसके साथ सौतेला व्यवहार नहीं किया जाएगा, वह देश के अन्य नागरिकें की ही तरह भारतवर्ष का प्रथम दर्जे का नागरिक है तथा देश की सभी संपदाओं पर उसका भी बराबर का अधिकार है और धर्म के आधार पर उसके साथ कभी कहीं भेदभाव व अन्याय नहीं होगा, दाढ़ी-टोपी देखकर कोई उसपर हमला नहीं करेगा तो इतना ही मुस्लिम बेटियों व बेटों के लिए पर्याप्त है। और यदि ‘शादी शगुन’ देकर ही कृतार्थ करने में सरकार अपना राजनैतिक लाभ समझती है तो यह योजना देश की समस्त गरीब बेटियों हेतु लागू करनी चाहिए केवल मुस्लिम बेटियों के लिए नहीं। वर्तमान घोषित ‘शादी शगुन’योजना को तो मुस्लिम तुष्टिकरण के सिवा और कोई दूसरा नाम नहीं दिया जा सकता।

सोनिया, अपने विधायकों को रखना सम्हाल…….!
(ओमप्रकाश मेहता)
एक बहुप्रचलित कहावत है- ”जहं-जहं पैर पड़े संतन के, तंह-तंह बंटाढार“, आज यह कहावत भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित भाई शाह पर शत-प्रतिशत लागू हो रही है, वह भी इस संदर्भ में कि वे जहां भी जाते है वहां प्रमुख प्रतिद्वन्दी दल कांग्रेस का कबाड़ा बैठाकर आते है, अर्थात् जिस प्रदेश में भी उनके ’श्रीचरण‘ पड़ते है, वहीं के प्रमुख कांग्रेसी नेता और विधायक पके आम की तरह शाह साहब की झोली अर्थात् भाजपा के पाले में टपक जाते है। गुजरात, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों में ऐसा होने के बाद अब कांग्रेस भी सतर्क हो गई है, जैसे ही शाह साहब के दौरे का कार्यक्रम जारी होता है, वैसे ही कांग्रेस आला कमान सम्बंधित प्रदेश के पार्टी अध्यक्ष को नेताओं-विधायकों पर नजर रखने के सख्त निर्देश जारी कर देती है, जैसा कि वर्तमान में मध्यप्रदेश में हो रहा है, यहां के कांग्रेस अध्यक्ष को न सिर्फ नेताओं-विधायकों पर नजर रखने के निर्देश दिये गए है, बल्कि मध्यप्रदेश के दिग्गज क्षेत्रिय नेताओं को अभी से आगाह भी कर दिया गया है। भाजपाध्यक्ष 18 अगस्त से तीन दिन के दौरे पर भोपाल आ रहे है। ……और भाजपा के स्थानीय नेता दबी जुबान दावा कर रहे है कि गुजरात व उत्तरप्रदेश को मध्यप्रदेश में भी दोहराया जाएगा। यही नहीं यहां के भाजपा नेता तो एक फिल्मी गाने की तर्ज पर गा भी रहे है कि- ”सोनिया, अपने विधायकों को रखना सम्हाल, अमित शाह हुआ है दीवाना…..।“
230 सदस्यों वाली मध्यप्रदेश विधानसभा में कांग्रेसी विधायकों की संख्या पच्चपन है। जिनमें से करीब एक दर्जन विधायकों पर कांग्रेस की आशंका भरी नजर है क्योंकि ये निजी या दलगत राजनीति के तहत कई बार प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के प्रति हमदर्दी दिखा चुके है, इसलिए इन विधायकों की गतिविधियों पर विशेष नजर रखी जा रही है। …..और चूंकि राज्य विधानसभा चुनाव में अब केवल पन्द्रह महीने ही शेष बचे है, इसलिए कांग्रेस इस मामले में काफी सतर्क है और इसी कारण कांग्रेस के कुनबे में अंदरूनी खलबली भी मची हुई है।
जहां तक सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का सवाल है, उसमें भी कई खेमे है, किंतु दिनों-दिन देश में बढ़ रहे मोदी-शाह के रूतबे को देखते हुए खेमों में कोई विशेष हलचल नहीं है, फिर भी कभी-कभी सार्वजनिक मंचों या सरकारी अभियानों के दौरान यह खेमेबाजी खुलकर सामने आ जाती है। वैसे फिलहाल तो यही बताया जा रहा है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का तीन दिनी दौरा पन्द्रह महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी की रणनीति तय करने और अभी से नेताओं की मोर्चों पर तैनाती के उद्देश्य से हो रहा है, और यह भी घोषित किया गया है कि भाजपाध्यक्ष किसी दलित या अनुसूचित जाति- जनजाति के कार्यकर्ता के घर पर भोजन भी करेगें, किंतु स्थानीय स्तर पर इस तरह के प्रयास भी जारी है कि वह दलित या एस.सी., एस.टी. कार्यकर्ता भाजपा के बजाए कांग्रेस का हो? जिससे कि शाह कांग्रेस को एक और जोरदार झटका दे सके?
यहां यह उल्लेखनीय है कि भाजपाध्यक्ष अमित शाह का यह दौरा पार्टी संगठन को मजबूत करने कार्यकर्ताओं से लेकर नेताओं तक को नया पाठ पढ़ाने को लेकर भी है, पिछले दिनों प्रदेश के दो बड़े पार्टी नेताओं के ठिकानों पर आयकर के छापे पड़े थे, जिससे पार्टी की किरकिरी हुई थी, अत: भाजपा की ’क्लास‘ का इससे संबंधित भी एक पाठ होगा। वैसे चुनावपूर्व कांग्रेसियों को अपने पाले में लाने की चाल भाजपा की कोई नई नहीं है, पिछले लोकसभा चुनाव के एन वक्त पर कांग्रेस का टिकट प्राप्त पूर्व प्रशासनिक अधिकारी डॉ. भागीरथ प्रसाद ने कांग्रेस का टिकट ठुकराकर भारतीय जनता पार्टी ज्वाईंन कर ली थी, अत: यह उठा-पटक अगले पन्द्रह माह तक भी चले तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
अमित भाई शाह ने अपनी पार्टी के विस्तार व प्रदेशों से पार्टी का ’फीडबैक‘ लेने के लिए एक सौ दस दिन का दौरा कार्यक्रम तय किया है, इन एक सौ दस दिनों में कितने गैर-भाजपाई नेता भाजपा का दामन थामते है, यही दर्शनीय होगा। मध्यप्रदेश आने के पूर्व शाह साहब ने हरियाणा का भी दौरा किया। उनकी सबसे अधिक दिलचस्पी फिलहाल दक्षिणी राज्यों में पैठ जमाने की है, जिनमें कांग्रेस शासित कर्नाटक मुख्य है।
जहां तक मध्यप्रदेश का सवाल है, यहां पहले ही भाजपा अगले विधानसभा चुनाव में 200 का आंकड़ा पार करने की घोषणा कर चुकी है और वह इस तरह मध्यप्रदेश को विपक्ष विहीन राज्य बनाने का भी सपना देखने लगी है, इसीलिए उसकी नजर कांग्रेस के साथ बसपा पर भी है। अब भाजपा यह सपना पूरा कर पाती है या यह ’दिवास्वप्न‘ साबित होता है, यह तो भविष्य के गर्भ में है।

आतंकी प्लान पर अमल से पहले उसे ध्वस्त करना जरूरी
(अजित वर्मा)
सुरक्षा बलों का मानना है कि आतंकी संगठन अलकायदा जम्मू-कश्मीर में एक्शन करने के लिए कोई बड़ा प्लान बना रहा है। इसी प्लान के तहत अलकायदा ने जाकिर मूसा को कश्मीर के लिए अपना पहला आतंकी कमांडर बनाया है। बुरहान वानी की मौत और सेना की एनकाउंटर के बाद इस आतंकी संगठन में खलबली मच गई थी। खूफिया एजेंसियों के मुताबिक यह पहली बार है जब इस आतंकी संगठन ने कश्मीर के लिए अपने कमांडर की घोषणा की है।
हिज्बुल मुजाहिदीन में कमांडर रह चुका मूसा चंडीगढ़ के इंजीनियरिंग कॉलेज से ग्रेजुएशन कर चुका है। बुरहान वानी की मौत के बाद जाकिर मूसा को हिजबुल का नया कमांडर बनाया गया था। मूसा समय-समय पर ऑडियो और वीडियो क्लिप जारी कर भारतीय मुस्लमानों को उसकाता रहता है। जाकिर दक्षिण कश्मीर के नूरपुर का रहने वाला है। 2013 में उसने पढ़ाई छोड़ दी थी और वापस पुलवामा में अपने गांव नूरपुर चला गया था। जाकिर एक पढ़े-लिखे परिवार से आता है। कहा जाता है कि उसके सभी भाई-बहन भी डॉक्टरी या मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं। अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोडकऱ जाकिर हिज्बुल में शामिल हो गया था। जाकिर जिहादी साहित्य से काफी प्रभावित हुआ था। इसके बाद उसने आतंकी संगठन हिज्बुल मुजाहिदीन में शामिल होने का फैसला लिया था।
लेकिन हिज्बुल का कमाण्डर रहते हुए जब उसने हुर्रियत नेताओं को धमकाया तब मूसा को हिजबुल से निकाल दिया गया था मूसा ने हुर्रियत नेताओं को धमकी थी कि वह लाल चौक पर उनका सिर काट देगा।
हिज्बुल के पूर्व कमाण्डर मूसा को अलकायदा द्वारा अपने पाले में लेकर उसे कश्मीर के लिए अलकायदा का कमाण्डर बनाया जाना ऐसी घटना है, जिसकी अनदेखी भारत नहीं कर सकता। भले भारत के तमिलनाडु और केरल से कोई दो दर्जन नौजवानों के सीरिया जाकर आईएसआईएस में शामिल होने की खबरें आई हैं, लेकिन यह भी सच है कि अलकायदा अब तक भारत में अपनी जगह नहीं बना सका है। शायद इसीलिए अलकायदा मूसा के जरिये दस्तक देना चाहता है। अलकायदा की यह कोशिश अपनी जगह है, लेकिन ज्यादा चौकन्नेपन की दरकार यह खबर रखती है कि चीन के उकसावे पर तीस आतंकी संगठनों ने एक नया गिरोह बना लिया है। जरूरी है कि चीन और पाकिस्तान को हम उनसे दो कदम आगे बढ़कर उन्हीं की भाषा में जवाब दें। वे अप्रत्यक्ष युद्ध लडऩा चाहते हैं तो यही सही!

नियति की नहीं , नीयत की बात है !!
-अनुपमा श्रीवास्तव ‘अनुश्री’
सचमुच हर चीज का दोष नियति, किस्मत, भाग्य को नहीं दे सकते , यहां तो सवाल नीयत का है जो कि आज सभी की बिगड़ी हुई है। गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में l ऑक्सीजन की आपूर्ति नहीं किये जाने से इतने सारे बच्चों की असामयिक , दुखद , अप्राकृतिक मौत का मौन तमाशा पता नहीं कितने हृदय हीन , निष्ठुर लोगों ने देखा , कितने न्यूज़ पेपर और चेनल्स ने प्रकाशित किया ! वहां के , क्रंदन ,हाहाकार ने कितने संवेदनशील लोगों के दृदय में चीत्कार उत्पन्न की , विषय यह है तो ही , यह भी कि कौन और कैसे इस तरह के कृत्यों को अंजाम देता है , किस तरह इस हद तक लापरवाही को सहन किया जा सकता है !! कितनी माओं की गोद सूनी हुई और शीर्ष पर बैठे लोगों के कानों में शायद ही जूं रेंगी हो !! स्वार्थ , लालच , संवेदनहीन , गैर ज़िम्मेदाराना , जान बूझकर किये गए लापरवाहीपूर्ण निकृष्ट कृत्य की जितनी भर्तस्ना की जाये कम होगी ! बड़ी से बड़ी सज़ाएं भी कम होंगी।
यह सब लिख मैं कलम से रही हूँ पर ज़रुरत मुझे तलवार की लग रही है !!
किस दौर से गुज़र रहे हैं हम ! क्या यही विकास हैं की कोई कंपनी चंद रुपयों की ख़ातिर मासूम बच्चों की ज़िंदगी से खेल जाये !! संवेदनहीनता और अमानवीयता के आधार पर खड़ा ये कौन सा विकास प्रतिरूप है , जिसमें मानव की ज़िंदगी का ही कोई स्थान नहीं ! अगर अच्छे दिन हैं ऐसे तो बुरे दिन कैसे होते होंगे !! कैसे ये हालत पैदा हुए , यक़ीनन एक दिन में तो नहीं !! ये सोची समझी हुई मानवीय साजिश है , बुरी नीयत है , नियति नहीं , कि ढीख्रा नियति के सर मढ़ दिया जाये !! गुनहगार कंपनी सहित प्रशासन में शामिल सभी ज़िम्मेदार व्यक्तियों को इस अक्षम्य अपराध कड़े से कड़ा दंड देना चाहिए ! सबसे ज़्यादा तो आजकल बच्चों कीमुश्किलें है क्या उनका कोई मानवाधिकार नहीं ! आज उपेक्षित बच्चे चाइल्ड ट्रैफिकिंग, मानव तस्करी के के शिकार हो रहे हैं बड़ी संख्या में ! अभी तो लड़कियों के लापता होने की संख्या में भी वृद्धि होना बहुत दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है क्यों प्रशासन सचेत नहीं ! क्यों बच्चों की सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम नहीं !! बड़े बड़े विभाग और संस्थाएं सिर्फ नाम के लिए हैं !! .
आजकल भोगवादी संस्कृति , लोलुपता , लालसाओं , स्वार्थ और तथाकथित विकास ने मति हर ली है और वह विवेकवान मानव से विवेकहीन पशु की श्रेणी की तरफ उत्तरोत्तर तेज़ी से विकास कर रहा है ! न्यूज़ पेपर में प्रतिदिन दो- चार मुखौटे खुलते हैं किसी बड़े पद पर आसीन व्यक्ति के अखबार के काले आखरों में, इनकी काली करतूतों के, काले कारनामों के , जो उजली चादर से ढंकें होते हैं ! सच ही कहा गया ;हिंदुस्तानी और बेईमानी ” एक दूसरे के पर्याय , समानार्थी हो चुके हैं जिसकी गूंज विदेशों तक पहुँचती हैं। ” सौ में से नब्बे बईमान , फिर भी मेरा भारत महान !! खूब कशीदे काढ़े जाते हैं महानता के और सच्चाइयां कितनी कड़वी ! पद , पोजीशन क्या मिली , अपनी ज़ेब भरने का सुअवसर मिला !! आई . ऐ. एस अफसर से लेकर के कुलपति , नेता , सांसद , अधिकारी सभी खा खा कर अवैध कमाई हो रहे ख़ूब हट्टे-कट्टे , सभी आजकल एक ही थैली के चट्टे- बट्टे !! गोदामों में प्याज रखी नहीं गयी ,बारिश में बाहर सड़ गयी और अब जो बची उसे बढ़ी कीमतों पर बेचने की पूरी तैयारी हो रही है। ले दे के शिकार और कठपुतली है आम जनता !! जनतंत्र है लेकिन पूरा तंत्र कुछेक के हाथों में डोलता हुआ । बेबस आम जन चुपचाप यह तमाशा देखता हुआ !
भाग्यवादी भारत वासी अभी भी इस आलेख को पढ़कर तुरंत कह देंगें ‘ यहाँ तो सब चलता है या नियति का काम है हमारा नहीं ! और कुम्भकर्णी नींद में सोये हमारे किंकर्तव्यविमूढ़ कर्तव्यधारी कहेंगे अभी कुछ और बड़ा हो जाने दो फिर देखते हैं !! इन्हें ख़ुद को और ख़ुद की ज़ेब को देखने से ही फ़ुर्सत नहीं !!

25 हजार करोड़ के फसल ऋण वितरण का लक्ष्य
सुरेश गुप्ता
प्रदेश में किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज पर फसल ऋण उपलब्ध करवाया जा रहा है। वर्ष 2003-04 में कृषकों को 1274 करोड़ का फसल ऋण वितरित किया गया था, जो वर्ष 2016-17 में रुपये 11 हजार 941 करोड़ हो गया है। इस वर्ष कृषकों को 25 हजार करोड़ के फसल ऋण के वितरण का लक्ष्य है। राज्य शासन द्वारा 2334 करोड़ रुपये का ब्याज अनुदान सहकारी बैंकों को दिया जा चुका है।
मुख्यमंत्री कृषक सहकारी ऋण सहायता योजना में 177 करोड़ रुपये का अनुदान इस वर्ष प्राथमिक सहकारी साख समितियों को उपलब्ध कराया गया है। योजना से लगभग 16 लाख किसान लाभान्वित होंगे। प्रदेश में दिसम्बर, 2016 तक 77 लाख से ज्यादा किसान क्रेडिट-कार्ड जारी किये गये हैं। इनमें सहकारी बैंकों की भागीदारी 69 प्रतिशत रही है। सहकारी बैंकों से प्रतिवर्ष 5 लाख किसान क्रेडिट-कार्ड वितरण का लक्ष्य है।
समर्थन मूल्य पर गेहूँ, मक्का, धान का उपार्जन
समर्थन मूल्य पर गेहूँ, धान एवं मक्का आदि खाद्यान्न का उपार्जन किया जा रहा है। खरीफ 2016-17 में 918 खरीदी केन्द्रों में 2 लाख 88 हजार किसानों से रुपये 2883 करोड़ से ज्यादा मूल्य का धान उपार्जित किया गया। इसी तरह 248 खरीदी केन्द्रों में 28 हजार किसानों से रुपये 321 करोड़ से ज्यादा मूल्य की मक्का उपार्जित की गई है। रबी वर्ष 2017-18 में 2989 खरीदी केन्द्रों से 7 लाख 39 हजार कृषकों का रुपये 10 हजार 928 करोड़ से ज्यादा मूल्य का गेहूँ उपार्जित किया गया है।
कृषकों को बैंकिंग से जोड़ने का प्रयास
अपेक्स एवं जिला सहकारी केन्द्रीय बैंकों की शाखाओं में कोर-बैंकिंग सेवाएँ प्रारंभ करने के साथ एनईएफटी, एसएमएस एवं डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की सुविधा उपलब्ध कराई जा चुकी है। एटीएम सुविधा की कार्यवाही प्रक्रियाधीन है। प्राथमिकी कृषि सहकारी साख समितियों के सदस्य कृषकों को बैंकिंग से जोड़ने हेतु जिला सहकारी केन्द्रीय बैंकों की शाखाओं में 18 लाख के डिजिटल मेम्बर रजिस्टर तैयार कराये गये हैं। इन खातों पर रूपे केसीसी कार्ड जारी किये जाकर कृषक, नगद ऋण एटीएम से तथा वस्तु ऋण पैक्स स्तर पर माइक्रो एटीएम से प्राप्त कर सकेंगे।
बाजार हस्तक्षेप से 8 रुपये प्रति किलो प्याज की खरीदी
प्रदेश में पिछले वर्ष प्याज का अत्यधिक उत्पादन होने तथा प्याज की घटती कीमत को देखते हुए शासन द्वारा बाजार हस्तक्षेप का निर्णय लेते हुए 4 हजार 482 किसानों से रु. 62 करोड़ 42 लाख कीमत की 10 लाख 40 हजार से ज्यादा क्विंटल प्याज खरीदी गई। इस वर्ष भी रुपये 800 प्रति क्विंटल की दर से किसानों से 701 करोड़ रुपये कीमत की 8 लाख 76 हजार से ज्यादा क्विंटल प्याज की खरीदी गई।
समर्थन मूल्य पर 10 जून से खरीदी प्रारंभ कर अभी तक लगभग रुपये 1700 करोड़ की साढ़े तीन लाख मीट्रिक टन दलहन फसलें भी क्रय की गई हैं। इस हस्तक्षेप से प्रचलित मण्डी दरों के मुकाबले लगभग 1002 करोड़ की अतिरिक्ति आय किसानों को संभव हो सकी। मध्यप्रदेश कृषि उपल मंडी अधिनियम 2012 में संशोधन कर केला को छोड़कर सभी फलों को मंडी प्रांगण से बाहर फल-सब्जी के विक्रय को विनियमन से मुक्त किया गया है। इससे किसानों को सीधे फल-सब्जी खुले बाजार में बेचने का विकल्प मिला है।
खरीफ 2017 में 6 लाख 85 हजार मी. टन का रिकार्ड अग्रिम भण्डारण कर उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित की गई। किसानों द्वारा उठायी गयी रासायनिक खादों पर ब्याज की छूट भी दी गई।
उद्यानिकी फसलों का क्लस्टर में विस्तार
प्रदेश में उद्यानिकी के विकास की विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन के फलस्वरूप क्षेत्र विस्तार, उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि हुई है। उद्यानिकी फसल क्षेत्रफल बढ़कर 15 लाख हेक्टेयर हो गया है। आज प्रदेश में उद्यानिकी फसलों का उत्पादन 262 लाख मी. टन तक पहुँच गया है। उद्यानिकी फसलों का क्लस्टर में विस्तार कराया जा रहा है। उत्पादन एवं उत्पादकता की वृद्धि को बनाये रखने के लिये उत्पादकों को गुणवत्ता युक्त पौध रोपण सामग्री प्राप्त होने पर विशेष ध्यान दिया जाकर आगामी पाँच वर्षों में 100 उद्यानिकी नर्सरियों का उन्नयन किया जायेगा। इन रोपणियों के उन्नयन से कृषकों को उन्नत पौध सामग्री उचित दर पर आसानी से उपलब्ध हो सकेगी। फसलोत्तर प्रबंधन के दिशा में विशेष प्रयास किये जाकर नश्वर उत्पादों के भण्डारण के लिये दो वर्षों में 5 लाख मी. टन शीत भण्डारण एवं 5 लाख मी. टन प्याज भण्डारण क्षमता में वृद्धि की जा रही है। उद्यानिकी में यंत्रीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे कम समय में कृषि कार्य पूर्ण हो सकेगा एवं उत्पादन लागत को नियंत्रित किया जा सकेगा।
कृषि एवं उद्यानिकी फसलों के प्र-संस्करण के लिये नयी नीति बनाकर लघु एवं मध्यम प्रसंस्करण उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रदेश में तेजी से विकसित हो रहे खाद्य प्र-संस्करण उद्योग से नवीन रोजगार के अवसर भी सृजित हो रहे हैं। पिछले वर्ष में करीब 13 हजार कृषकों और इस वर्ष 18 हजार कृषकों को उन्नत तकनीकी का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
दुग्ध उत्पादन 13.45 मिलियन टन हुआ
प्रदेश का दुग्ध उत्पादन पिछले वर्ष 10.69 प्रतिशत वृद्धि के साथ बढ़कर 13.45 मिलियन टन हो गया है। गोकुल महोत्सव के जरिये 97 हजार से ज्यादा पशु चिकित्सा शिविरों का आयोजन कर करीब 33 लाख पशुपालकों और दो करोड़ पशुओं का पंजीकरण, 33 लाख पशुओं का उपचार, एक लाख से ज्यादा पशुओं का टीकाकरण तथा 5 लाख पशुओं के बांझपन का उपचार किया गया। पहली बार एफएमडी कन्ट्रोल प्रोग्राम क्रियान्वित कर प्रदेश के दो करोड़ से ज्यादा गौ-वंशीय एवं भैंसवंशीय पशुओं का टीकाकरण किया गया। करीब 66 लाख भेड़-बकरियों का पीपीआर और रीवा संभाग के चार जिलों में ढाई लाख पशुओं का ब्रुसेला टीकाकरण किया गया।
प्रदेश में पहली बार उपभोक्ताओं को उनकी माँग के आधार पर घर पर ही दूध एवं दुग्ध पदार्थ उपलब्ध करवाने के लिये मोबाईल एप बनाया गया है। नवीन मिल्क रूट का गठन एवं युक्तियुक्तकरण के उद्देश्य से 730 नवीन दुग्ध सहकारी समितियों का गठन किया गया और 2344 ग्रामों में दुग्ध संकलन केन्द्र प्रारम्भ किये गये हैं। दुग्ध उत्पादकों को उनके दूध का उचित मूल्य दिलाने के लिये 620 रुपये प्रति किलो फेट निर्धारित किया गया। यह अभी तक की सर्वाधिक दुग्ध क्रय दर है।
उपलब्ध जलक्षेत्र के 98 प्रतिशत में मछली पालन
प्रदेश के सिंचाई जलाशयों एवं ग्रामीण तालाबों के कुल उपलब्ध जलक्षेत्र का 98 प्रतिशत मछली पालन अन्तर्गत लाया जा चुका है। पिछले वित्त वर्ष में एक लाख चौरासी हजार नौ सौ तैंतीस मछुआरों का दुर्घटना बीमा कराया गया, जो अभी तक का सर्वाधिक दुर्घटना बीमा है। इस वर्ष एक लाख छयासी हजार चार सौ सत्रह मछुआरों को बीमा योजना का लाभ देने का लक्ष्य है।
राज्य सरकार द्वारा किसानों की तरह मछुआरों को भी शून्य प्रतिशत ब्याज पर ऋण सुविधा उपलब्ध कराने फिशरमेन क्रेडिट कार्ड बनाये जा रहे हैं। अभी तक कुल 58 हजार 550 मछुआ क्रेडिट कार्ड बनाये जा चुके हैं। बड़े शहरों में 8 थोक एवं छोटे कस्बों में 170 फुटकर मत्स्य बाजारों का निर्माण किया जा चुका है। प्रदेश में पंगेशियस एवं गिफ्ट तिलापिया जैसी आधुनिक पद्धति से मत्स्य-पालन शुरू किया गया है।
राजस्व प्रकरणों का निराकरण
प्रदेश भर में किसानों के सीमांकन, अविवादित नामांतरण, अविवादित बँटवारा प्रकरणों के निराकरण और ऋण पुस्तिका प्रदाय करने का अभियान चलाया जा रहा है। इससे किसानों को अपनी कृषि भूमि के इस संबंध मे होने वाली परेशानी से निजात मिल सकेगी।
378 नगरीय क्षेत्रों में बनेंगे किसान बाजार
प्रदेश के 378 नगरीय निकाय क्षेत्रों में किसान बाजार बनाये जायेंगे। जहाँ पर किसान सीधे अपनी उपज बेच सकेगा। स्मामीनाथन रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्र में आय के साधन बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे हैं। किसानों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधायें उपलब्ध कराई जा रही हैं। खेती से जनसंख्या का बोझ कम करना राज्य सरकार की प्राथमिकता में है। किसान परिवारों के युवा खेती के अलावा कृषि आधारित उद्योग लगायें इसके लिये मुख्यमंत्री युवा कृषक उद्यमी योजना बनाई जा रही है। जिसमें उन्हें दस लाख रुपये से लेकर दो करोड़ रुपये तक का ऋण उपलब्ध कराया जायेगा। इसमें 15 प्रतिशत अनुदान और पाँच वर्ष तक पाँच प्रतिशत ब्याज अनुदान की व्यवस्था रहेगी। किसानों के खेतों में सिंचाई के लिये अब माइक्रो इरीगेशन पर भी जोर दिया जा रहा है।

सेवा हमारी और मौत उनकी
(डॉ. वेदप्रताप वैदिक)
दिल्ली के एक मलकूप (सेप्टिक टैंक) को साफ करने में दो सगे भाइयों की बलि कैसे चढ़ गई, यह सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जैसे ही जहांगीर और एजाज़ मलकूप में घुसे, जहरीली गैस ने उनका दम घोंट दिया। उन्हें देखने के लिए उनके पिता युसुफ ने उस टैंक में उतरने की कोशिश की तो वह भी बेहोश हो गया। फायर ब्रिगेड ने इन तीनों को किसी तरह बाहर निकाला तो दोनों भाइयों के प्राण पखेरु उड़ चुके थे। ऐसा नहीं है कि यह घटना दिल्ली में पहली बार हुई है। पिछले एक माह में यह तीसरी घटना है। 6 अगस्त और 15 जुलाई को भी दो मलकूपों की सफाई करते हुए तीन-तीन लोगों की मौत हो चुकी है। दिल्ली शहर में इन मलकूपों को साफ करने के नाम पर दर्जनों मजदूरों की बलि चढ़ती रही है लेकिन सरकार और जनता के सिर पर जूं भी नहीं रेंगती। और यह तब हो रहा है जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरह के कामों के लिए सुरक्षा की अनिवार्य व्यवस्था के आदेश दे रखे हैं। जो लोग अपने निजी मलकूपों को साफ करवाते वक्त ठेकेदारों और मजदूरों से यह नहीं पूछते कि उनके सुरक्षा-उपकरण कहां हैं, क्या अदालत के सामने वे गुनाहगार नहीं माने जाएंगें ? उन ठेकेदारों को तो इन मौतों के लिए जिम्मेदार ठहराकर कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए। बेचारे मजदूर तो मजबूर होते हैं। उनके सामने पेट भरने की समस्या होती है। वे 100-200 रु. के लिए अपनी जान झोंक देते हैं। ज़रा हम सोचें कि ये लोग हम पर कितनी बड़ी मेहरबानी करते हैं ? क्या हम उनका एहसान इसी निर्ममता के साथ नहीं चुकाते हैं ? सेवा हमारी और मौत उनकी ! स्थानीय सरकारों को चाहिए कि जहां भी इस तरह के मलकूपों की सफाई हो, वहां वे कड़े प्रावधान लागू करें। उनका उल्लंघन करनेवाले हर व्यक्ति को यदि कड़ी सजा होने लगे तो इस तरह की दर्दनाक घटनाओं को टाला जा सकता है। जो मजदूर मरे हैं, उनके परिवारजन को इतनी बड़ी मात्रा में हर्जाना मिलना चाहिए कि उनके आश्रितों का लालन-पालन सही ढंग से हो सके। हर्जाने की यह राशि सरकार तो दे ही, ठेकेदार और मलकूप का मालिक भी दे। तभी जाकर लोग सावधान होंगे। दिल्ली सरकार ने तुरंत एक जांच कमेटी बिठाकर ठीक किया है लेकिन यह काफी नहीं है। हताहतों को उसे तुरंत मुआवजा भी देना चाहिए (हालांकि इस दुर्घटना से उसका कोई सीधा संबंध नहीं है) और इस संबंध में कड़ा कानून भी बना देना चाहिए।

हम कब होंगे आजाद!
– हेमेन्द्र क्षीरसागर
आजादी के पहले गुलामी एक मुसिबत थी, 15 अगस्त 1947 के बाद आजादी एक समस्या बन गई, बेबसी आज भी हम आजाद देष के गुलाम नागरिक है। व्यथा सत्ता बदली है व्यवस्था नहीं, स्वाधीन देष में रोटी-कपडा-मकान-सुरक्षा और दवाई-पढाई-कमाई पराधीन होने लगी। यह सब मोहलते, सोहलते और जरूरते कब अधिन होगी। इसी छटपटाहट में कहना पड रहा है हम कब होंगे आजाद! अगर ऐसा है तो यही दिन देखने के लिए हमने अंगेजी हुकुमत से छुटकारा पाया था। या खुली आजादी में जीने की तमन्ना लिए अपने लोग, अपना शासन की मीमांसा में स्वतंत्र भारत की अभिलाषा के निहितार्थ। लाजमी तौर पर स्वतंत्र आकांक्षा हरेक हिन्दुस्तानी का मैतक्य था। जो क्षण-भंगुर होते जा रही है क्योंकि स्वतंत्रता के पहले देष में देषभक्ति युक्त राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय एकता दिखाई देती थी वह आज ओझल हो गई।
राष्ट्रीयता की पुरानी कल्पना आज गतकालिन हो चुकी है। परवान राष्ट्रधर्म औपचारिकता में राष्ट्रीय पर्व ध्वजारोहण और राष्ट्रगान तक सीमित रह गया है। मतलब, असली आजादी का मकसद खत्म! चाहे उसे पाने के वास्ते कुर्बानियों का अंबार लगा हो। प्रत्युत, अमर गाथा में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आजादी जितनी मेहनत से मिली है, उतनी मेहनत से सार-संभाल कर रखना ही हमारा द्रष्टव्य, नैतिक कर्तव्य और दायित्व है। मसलन हम खैरात में आजाद नहीं हुए है जो आसानी से गवां दे। अधिष्ठान स्वतंत्र आजादी की मांग चहुंओर सांगोपांग बनाए रखने की दरकार है। अभाव में हर मोड पर हम कब होंगे आजाद की गुंज सुनाई देगी। आकृष्ट गुलामी से आजादी अभिमान है जीयो और जीने दो सम्मान है यथावत्् रखने की जद्दोजहद जारी है।
हालातों के परिदृष्य फिरंगी लूट-खसोटकर राष्ट्र का जितना धन हर साल ले जा रहे थे, उससे कई गुना हम अपनी रक्षा पर खर्च रहे है। फिर भी शांति नहीं है, न सीमाओं पर, न देष के भीतर आखिर ऐसा कब तक? कल के जघन्य अपराधी, माफिये और हत्यारे आज सासंद व विधायक बने बैठे है। जिन्हें जेल में होना चाहिए, वे सरकारी सुरक्षा में है। देष मे लोकतंत्र है, जनता द्वारा, जनता का शासन, सब धोखा ही धोखा है। मतदाता सूचियां गलत, चुनावों में रूपया-माफिया-मीडिया के कारण लोकतंत्र एक हास्य नाटक बन गया है। वीभत्स, कब इस देष की भाषा हिंदी बनेगी? संसद और विधानसभाओं में हिंदी प्रचलित होगी? न्यायालयों में फैसले हिंदी में लिखे जायेंगे?
देष में भ्रष्टाचार के मामलों की बाढ सी आई हुई है। नित नए घोटाले सामने आ रहे है। बडे-बडे राजनेता, अफसर और नौकरषाह भ्रष्टाचार में लिप्त है। उन्हें केवल सत्ता पाने या बने रहने की चिंता है। चुनाव के समय जुडे हाथों की विन्रमता, दिखावटी आत्मीयता, झूठे आष्वासन सब चुनाव जीतने के हथकण्डे है। बाद में तो ’लोकसेवकों‘ के दर्षन भी दुर्लभ हो जाते है। बेरोजगार गांवों से शहर की ओर पलायन करने मजबूर है। यदि गांवों में मूलभूत सडक, बिजली, पानी, षिक्षा, स्वास्थ, कौषलता और रोजगार की समुचित व्यवस्था हो तो लोग शहर की ओर मुंह नहीं करेंगे, पर हो उल्टा रहा है। शहरी व अन्य विकास के नाम पर किसानों की भूमि बेरहमी से अधिग्रहण हो रही है। प्रतिभूत कृषि भूमि के निरंतर कम होने से अन्न का उत्पादन भी प्रभावित होने लगा।
स्त्री उत्पीडन कम नहीं हुआ है। आज भी दहेज-प्रताडना के कारण बेटियां आत्महत्याएं कर रही है, अपराध बढ रहे है। लूट, हत्या अपहरण और बलात्कार के समाचारों से अखबार पटे पडे रहते है। भारतीय राजनीति के विकृत होते चेहरे और लोकतांत्रिक, नैतिक मूल्यों के विघटन से स्वतंत्रता का मूलाधार जनतंत्र में ’जन ही हाषिए पर चला गया और स्वार्थ केंद्र में। बरबस देष की तरक्की की उम्मीद कैसे की जा सकती है! सोदेष्यता स्वतंत्रता की अक्षुण्णता हम कब होंगे आजाद का आलाप संवैधानिक अधिकारों के जनाभिमुख होने से मुकम्मल होगा।

दूध देने वाली गाय जैसा हो टैक्स !
-डॉक्टर अरविन्द जैन
जब कोई क्रन्तिकारी कदम जनतंत्र में उठाया जाता हैं तब उसकी सफलता पर प्रश्न चिन्ह लगते हैं और ऐसा ही हुआ. सभी ने जी.एस.टी .का समर्थन नहीं किया ,और सत्ता ने बहुमत होने के कारण उन्हें दर किनार किया . ठीक भी हैं पर यदि सभी भाग लेते तो कार्यक्रम गरिमायुक्त होता ,वैसे भी हुआ. कांग्रेस और अन्य ने भाग न लेकर ,भाग लिया।
विषय इतना गंभीर हैं की अभी भी स्थिति डांवाडोल हैं ।जिसके पास पुराना माल हैं वह किस दाम में बेचे ,अभी बिल नहीं बने, क्या क्या होता हैं व्यापारी वर्ग के पास वचाब के ढंग ?.प्रधान मंत्री जी ने बहुत उच्च आदर्शों के साथ उद्बोधन दिया जैसी उनकी आदत हैं और कोई भी बात को धरम ,नीति से जोड़कर अपनी बात सिद्ध कर देते हैं यह भी अच्छी बात हैं पर होती हैं एक तरफा .एकांगी .एकांतवादी .वे हठवादिता पर अधिक जोर देते हैं और आत्म मुग्ध .आत्मा प्रशंसा से युक्त होते हैं यह भी अच्छी बात हैं ।उनके पास योग्यतम लोगों की टीम हैं .जिससे लगता हैं की उनके पास ज्ञान का कोश अच्छा हैं पर उसके बाद चूक हो ही जाती हैं यह भी अच्छी बात हैं .उन्होंने चाणक्य ,गीता और आइंस्टाइन का उदाहरण भी दिया .बहुत अच्छा लगा और उसके मुख्य बिंदु को लिया अन्य को नहीं लिया।
“जो राजा प्रजा को धर्ममार्ग की शिक्षा न देकर केवल उससे कर वसूल करने में लगा रहता हैं वह केवल प्रजा के पाप का ही भागी होता हैं और अपने ऐश्वर्य हाथ धो बैठता हैं “.वर्तमान में मात्र कर (टेक्स) अर्थ की बात हो रही हैं । धरम के नाम पर जीव ,मानव हत्याएं हो रही हैं और काम-वासना का प्रादुर्भाव बहुत हैं ।चार पुरुषार्थ में धरम रुपी अर्थ कमाया जाए और काम भी धरम से नियंत्रित हो तो आप मोक्ष पा सकते हैं ।गाडी में इंजन नहीं और हम मोक्ष की बात करते हैं .मोक्ष कोई धार्मिक शब्द नहीं हैं मोक्ष का मतलब हम अपना जीवन शांति मय जिए और अर्थ ,काम धर्म मय हो। पर हम इस समय आर्थिक दौड़ में इतने अधिक लीन हैं की सब बाते गौण हैं ।
हमें कभी कभी भाग्यवादी भी बननापड़ता हैं और कभी कर्मवादी .और धन सबके पास समानता से नहीं आता .कारण हम धर्मभीरु हैं और पूर्व जन्म में भी भरोसा रखते हैं .तो कहा जाता हैं की आपने पूर्व जन्म में जो पुण्य किया होगा उसका ही ठाठ आपको मिलता हैं .पूरा जीवन पुण्य पाप का ठाठ हैं ।
पयस्वनीया यथा क्षीरम अद्रोहेनोपजीव्यते
प्रजप्येवं धनं दोहया नातिपीड़ाकारै ; करैः .
जिस प्रकार दूध देने वाली गाय से उसे बिना किसी प्रकार की पीड़ा पहुचांए ,दूध दुहा जाता हैं उसी प्रकार राजा को भी प्रजा से धन लेना चाहिए ।अति पीड़ाकारी करों से धन संग्रह नहीं करना चाहिए। इससे यह परिभाषित किया गया हैं की जिस प्रकार ग्वाला गाय से दूध दुह कर बिना पीड़ा के अपने बछड़े को भी दूध पिलाती हैं उसी प्रकार राजा को कर जनता पर लगाना चाहिए। पर वर्तमान में सरकार कर के नाम पर रक्त पी रही हैं । इस कर प्रणाली से कुछ तो हुआ हैं इसके बाद भी बहुत छुपे कर हैं जिसका भुगतान जनता को देना पड़ते हैं .इसके अलावा जो कर वंचन करते हैं या जो क़र्ज़ लेकर अरबों रुपये डंकार गए और अब नयी बात आ रही है की किसानों का क़र्ज़ माफ़ किया जाएंगे इसका प्रभाव किस पर पड़ता हैं जो करदाता हैं ।
मोदी सरकार ने क्यों कांग्रेस पार्टी और अन्य पार्टी के विरोध को दर किनार किया।एक जगह सर्वसम्मति से काम होना चाहिए और दूसरी तरफ अपनी हठधर्मिता .आखिर उनके भावों ,विचारों को भी समझना चाहिए था ।किस बिंदु पर उनकी असहमति हैं ?सबको जानने का अवसर देना चाहिए। मोदी जी अहिंसा की बात करते हैं पर उनकी पार्टी के लोग धरम के नाम पर हत्याएं करते हैं .वे अन्य के भाव का आदर नहीं करते बस:’ही” शब्द का उपयोग करते.” भी” का उपयोग नहीं करते। उपरोक्त श्लोक के सन्दर्भ में क्या उनकी कर प्रणाली कार्य कर रही हैं .न कभी कोई भी सरकार करेंगी और न करने का माद्दा हैं ।हमारा बजट इतना कठिन होता हैं की उसको समझने में एकसाल लग जाता है तब तक नया आ जाता हैं .
हम लोग चाहते हैं सबको बराबरी का अधिकार और सबको भरपूर सुविधाएँ मिले पर इतना अधिक असंतुलन या खाई हैं असमानता में की उसका भरना मुश्किल हैं । हम पूर्ण विश्वासी हैं की यह योजना जरूर सफल होंगी और यह हमारा स्वर्णिम युग होगा ।बात अभी भविष्य के गर्भ में छिपी हैं । हम आशावादी हैं पर शोषण अधिक होना प्रजातंत्र के लिए हानिकारक हैं । वर्तमान में नोट बंदी के कारण ,फिर किसान आंदोलन ,भीड़ में जो तस्कर के नाम पर हत्या , सीमा पर दिन रात हत्याएं के बाद हम देखेंगे ,करेंगे का रिकॉर्ड जैसा वाक्य प्रचारित करना क्या ये बिंदु कुछ श्वेत परिधान को कलंकित नहीं कर रहे।
आर्थिक क्रांति के दौर में और जिसका जितना नियंत्रण करते हैं वह उतना फैलता हैं . वर्तमान में भ्रष्टाचार शिष्टाचार बनता जा रहा हैं .मात्र भाषणों में ईमानदारी दिखाई देती हैं व्यवहारिक धरातल में ये सब बातें कोशों दूर हैं । अभी कोई बात उजागर नहीं हो रही हैं पर हटने के बाद कुछ न कुछ तो जरूर निकलेगा। .न निकले अच्छी बात हैं पर हमारे देश में कोई भी काजल की कोठी से बेदाग़ नहीं निकला । आपका प्रयास सफल हो और हम भ्रमित न हो बस यही अपेक्षा हैं और गाय जैसा कर लगाए ।

लालू यादव बनाम चाणक्य
-वीरेन्द्र सिंह परिहार
एक दिन यूं ही सुबह मार्निंग वाक में रामलाल जी मिल गये। मेरा उनसे बहस मुसाहबा चलता ही रहता है। मैनें कहा-सुना है, लालू यादव इन दिनों आचार्य चाणक्य के फैन हो गये हैं। रामलाल जी को बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्होनें पूछा वह कैसे ? भला कहा लालू यादव और कहा चाणक्य । मैने कहा कि लालू यादव ने अभी हाल मे कहा है कि चाणक्य ने कहा है कि ”जिस सभा में जायज बातों को न सुना जाये और बहुमत का भय दिखाकर लोगों को न बोलनें दिया जाय वह कोई सभा नहीं है।“ इस पर रामलाल जी ने कहा कि आखिर मे ऐसा कहां हुआ कि जहां किसी की जायज बातें नहीं सुनी गई एवं बहुमत का भय दिखाकर लोगों को नहीं बोलने दिया गया। मैने कहा कि ये तो पता नहीं, अलबत्ता लालू जी तो अपने कारनामो के चलते न तो संसद के सदस्य है, न बिहार विधान सभा के न विधान परिषद के, इसलिये तो उनके साथ ऐसा होनें से कुछ रहा। अब किसके साथ ऐसा हुआ और किन लोगों ने ऐसा किया, यह तो वही बता सकते है। रामलाल जी ने इस पर कहा, यह नरेन्द्र मोदी के अलावा कौन हो सकता है, जो लालू यादव को कुनबे सहित जेल भेजने की तैयारी मे है। मैने कहा कि मेरी समझ मे तो ऐसा कुछ नहीं आता कि मोदी ने ऐसा कुछ किया हो, अलबत्ता यू-पी-ए-शासन के दौर में कंग्रेस और लालू जैसे उनके सहयोगी विरोधी दलों को हंगामा खड़ा कर जरूर नहीं बोलने देते थे। अब भी राज्यसभा मे बहुमत के चलते सत्ता पर्टी के लोगों को नहीं बोलने दिया जाता। मैने फिर कहा कि आचार्य चाणक्य ने तो यह भी लिखा है कि ”अति सुन्दर होनें के कारण सीता का हरण हुआ, अति अंहकार के कारण रावण मारा गया, अत्यधिक दान के कारण राजा बलि बांधा गया।“ इसलिये अति ठीक नहीं है। बावजूद चाणक्य को अपना रोल माडल मानने के लालू यादव ने ऐसी अति क्यों कि कि मंत्री पद देने , सांसद विधायक बनाने से लेकर बी.पी.एल. कार्ड वालों को नौकरी देनें के एवज मे उनसे भी जमीनें लिखवा ली। ऐसी अति करने का सजा तो वह भुगतने जा रहे हैं। फिर मोदी को क्यों दोष दे रहे हैं। रामलाल जी ने कहा कि अरे लालूजी दिन-रात पूरा जीवन जनता की परिवार समेत सेवा करते रहे, ऐसी स्थिति मे हजार दो हजार करोड़ की संपत्ति जुटा ली तो कौन स गुनाह कर दिया? फिर धर्मनिरपेक्षता के झंण्डाबरदार और सामाजिक न्याय के मसीहा होनें के चलते यह उनका विशेषाधिकार था। फिर भला केन्द्र सरकार उनके पीछे क्यों पड़ी है ? मैने कहा कि ये तो मुझे पता नहीं। पर आचार्य चाणक्य ने ये भी कहा है कि प्रजा सुखे – सुखे राजा। यानी प्रजा के सुख मे ही राजा का सुख है, पर लालू यादव ने इसे उलटा कर दिया यानी राजा सुखे – सुखे प्रजा, तभी तो बिहार मे उनके मुख्यमंत्री रहते एक ही उद्योग फला-फूला था वह था अपहरण उद्योग और लालू यादव अपने और अपने कुनबे को सुख के लिये कुछ इस अंदाज मे रूपये बटोर रहे थे कि निरीह पशुओं का चारा तक नहीं छोड़ा। भले ही इसके चलते वह जेल यात्रा कर आये और भविष्य भी जेल मे ही दिखता है। इस पर रामलाल जी ने फिर कहा कि ये तो ठीक है, पर जब लालू यादव ने जेल जाने के चलते अपनीं अपढ़ पत्नीं को बिहार का मुख्यमंत्री बनवाया, तो उनकी पार्टी के किसी विधायक या नेता ने तो ऐसे नाजायज कदम का विरोध क्यों नहीं किया? इसी तरह जब उन्होनें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को दर किनार कर 26-27 साल के बेटे तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री बनवाया तो पार्टी में किस ब्यक्ति ने विरोध क्यों नहीं किया ? मैने कहा कि अरे भाई ऐसी मूर्खता कौन करता, सबको पता है कि ऐसी बातों का विरोध तो दूर चूं भी करनें पर राजनीतिक भविष्य पर पूर्ण विराम तो लग ही जायेगा, भाजपा और संघ का एजेंट भी घोषित कर दिया जायेगा। तभी तो बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर सी0बी0आई0 भी एफ.आई.आर. होनें पर लालू यादव की पूरी पार्टी एक स्वर से यह प्रस्ताव पारित करती है कि तेजस्वी जी इस्तीफा नहीं देंगे, उन्हें जनता ने चुना है। इस पर रामलाल जी ने कहा कि यदि लालू जी की पार्टी में कहीं रंच-मात्र भी लोकतंत्र होता, कुछ स्वतंत्रचेता लोग होते तो वह लालू जी को सलाह दे सकते थे कि तेजस्वी का उपमुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिला दो, धृतराष्ट्र न बनो नहीं सब चला जाएगा। मैने कहा इसी का नतीजा है कि नीतीश चतुर खिलाड़ी की तरह लालू जी को किनारे कर भाजपा से हाथ मिला कर फिर से सरकार बना लिए और लालू जी चारो खाने चित हो गए। रामलाल जी ने कहा वह तो ठीक, लेकिन विपक्ष में होकर भी लालू यादव को पुत्र मोह में अंधे ही रहे और यह अक्ल नहीं आई कि तेजस्वी की जगह किसी अनुभवी और परिपक्व विधायक को विपक्ष का नेता बनाए। मैने कहा भाई रामलाल जी समझा करो- कॉग्रेस की तरह लालू जी की भी पार्टी परिवार की पार्टी है, इस तरह से परिवार के लिए पार्टी है। इसलिए टापमोस्ट जगह पर यदि लालू जी स्वत: नहीं बैठ सकते तो उनके परिवार का ही कोई बैठेगा, अंजाम चाहे जो हो, क्योंकि उनकी पार्टी निजी है इसलिए परिवार के लिए है, वह या परिवार पार्टी के लिए नहीं हैं। रामलाल जी ने कहा यह सब तो ठीक पर लालू जी कह रहें हैं कि नीतीश ने गठबंधन तोडकर धोखा दिया है, जनता को धोखा दिया है। मैने कहा कि अरे भाई जब अभी कुछ ही दिनों पहले लालू जी ने अपने और अपने कुनबे की जान बचाने के लिए अपने खास प्रेमचंद गुप्ता को वितमंत्री अरूण जेटली के पास इसके लिए भेजा कि यदि सी.बी.आई. के शिकंजे से उन्हें बचा लिए जाए तो वह नीतीश सरकार से समर्थन वापस लेकर उसे गिरा सकते हैं। ऐसी स्थिति में धोखेबाजी कौन कर रहा था समझा जा सकता है।
इस पर रामलाल जी ने कहा कि यह तो ठीक पर क्या यह सच नहीं कि आचार्य चाणक्य ने विदेशी मूल की महिला हेलेना से उत्पन्न पुत्र जस्टिन को मगध का सम्राट इसलिये नहीं बनने दिया था कि विदेशी मूल के ब्यक्ति को तो दूर, उससे उत्पन्न संतान को भी प्रमुख पद पर नहीं बैठाया जा सकता, क्योंकि इससे राष्ट्रीय हितों में आंच आ सकती है। पर लालू यादव को विदेशी मूल की सोनिया गांधी के हाथ में सत्ता सूत्र केन्द्रित होने से कोई समस्या नहीं थी, उल्टे लालू यादव आये दिन सोनिया गांधी की दुहाई भी देते रहते हैं। ऐसी स्थिति मे लालू यादव का चाणक्य से क्या लेना – देना ? मैने कहा कि आचार्य चाणक्य तो अखंण्ड भारत का सपना भर नही देखते थे, बल्कि उसे पूरा करने के लिये प्राणप्रण से जुटे थे, पर लालू यादव के लिये तो उनका कुनबा ही सब कुछ है। आचार्य चाणक्य शासन के खजाने का एक पैसा भी निजी कामों मे उपयोग नहीं कर सकते थे, यहां तक कि निजी कामों में दीपक भी निजी खर्चे का जलाते थे, पर लालू यादव के लिये राज्य और देश का खजाना उनकी निजी जागीर है। इस पर रामलाल जी ने कहा कि क्या ऐसा नहीं हो सकता कि लालू जी का हृदय परिवर्तन हो गया हो तभी वह चाणक्य की दुहाई दे रहे हो। मैने कहा अरे भाई इनकी चमडी इतनी मोटी हो गई है, कि इनका हृदय कहॉ घड़कता है पता ही नहीं चलता। अलबत्ता यदि कहीं इनको थोड़ा बहुत भी अपने किए का पश्चाताप होता तो यह सर्वप्रथम अपने अपराधों के लिए संपूर्ण राष्ट्र से मांफी मांगते। यह स्वीकार करते कि अपने कृत्यों और लूट के चलते उनकी और उनके कुनबे की शेष जिंदगी जेल में कटनी चाहिए। संघ जैसी राष्ट्रवादी संस्था को जीवन भर साम्प्रदायिक और फासिस्ट कहने कि लिए माफी मांगते। मोदी के नोटबंदी जैसे कदमों का स्वागत करते। रामलाल जी ने इस पर कहा, कहीं ऐसा तो नहीं कि “शैतान बाईबिल का उद्धरण दे रहा हो।“